ISSN 2229-547X विदेह सदेह ३६ रचनात्मक गद्य-पद्य लेखन भाग-५ (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ७,०००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 36: A Collection (Vol.V) of Creative Maithili Writings in Prose and Verse e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in. अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-१०९५) गजेन्द्र ठाकुर- विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण, रुबाइ: कता: गजल: हाइकू, प्राकृत आ पालि, मैथिली गजल- दू युग, विदेशी पूँजी निवेशक भाषापर (मैथिली सहित) प्रभाव, होलीपर व्यंग्य, मैथिली नाटक आ फिल्मक एकटा समानान्तर दुनियाँ, मैथिली नाटक आ आधुनिक रंगमंच, प्रदीप पुष्पजीक गजल संग्रह, चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ, उल्कामुख, सम्पादकीय (मैथिली आ ब्रेल लिपि, की मैथिली साहित्य अपन मूल स्वरमे ब्राह्मणवादी अछि?, रामनरेश रायक सूचना, यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण, साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरए कहल जाए?, साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड, विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन), की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा छी?, विहनि कथा, फजलुर रहमान हासमीक आइ २०-०७-२०११ केँ मृत्यु भऽ गेलन्हि, साहित्य अकादेमीमे समन्वयक पद लेल कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग)- एकटा रिपोर्ट, समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर, विदेह सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, २. समानान्तर ललित कला अकादेमी पुरस्कार आ ३.समानान्तर संगीत-नाटक अकादेमी पुरस्कारक नामसँ प्रसिद्ध), विदेह साहित्य उत्सव २०१२ आ विदेह साहित्य सम्मान समारोह १४ जनवरी २०१२, गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान, विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११, २०म विश्व पुस्तक मेला २०१२, २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी, नीलम फिल्म्स आ गोपाल पाठकक करतूत, मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार, डॉ. नित्यानन्द लाल दास केँ साहित्य अकादेमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार २०१०, भारतीय भाषा परिषदक युवा पुरस्कार गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल, फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, गोविन्द रचनावली, साहित्य अकादेमी, दिल्लीक महत्तर सदस्यता श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमरकेँ, विनीत उत्पलक सूचनाक अधिकारक अन्तर्गत मांगल सूचना १० सदस्यी साहित्य अकादेमीक मैथिली एडवाइजरी बोर्ड द्वारा मैथिलीकेँ खतम करबाक षडयंत्रक खुलासा, लघु राज्यक सार्थकता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, टॉमस ट्रांसट्रोमरकें २०११क साहित्य लेल १.५ मिलियन डॉलरक नोबल पुरस्कार, दूषण पंजी कट्टरवाद, श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर", स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” , हिन्दी आ मैथिली आ साहित्यिक शब्दावली, अन्तर्जाल आ मैथिली साहित्य आन्दोलन, मैथिली गजल, मैथिली नाटक- बेचा ठाकुर: बेचन ठाकुर, उपेन्द्र भगत नागवंशी आ मैथिलीमे फील्डवर्क,राजनन्दल लाल दास जी आ मायानन्द मिश्र प्रारम्भमे तामसमे रहथि, साहित्यिक लठैत आ कालीकान्त झा बूचक साहित्यिक हत्याक ओझरी, मीठ बाजएबला कायस्थ आ ब्राह्मण समाज किए टूटि गेल अछि? (पृ. २-३१२) डॉ रमानन्द झा "रमण"- मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण (पृ. ३१३-३३२) वीरेन्द्र यादव- लघुकथा- बाबा गाछी (पृ. ३३३-३३७) बेचन ठाकुर- नोमीनेशन, छल-बल, चल आइये, डाक डकोबलि (प्. ३३८-३४१) आशीष अनचिन्हार- बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी, बेचन ठाकुरजीक नाटक बेटीक अपमान, विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच, मैथिली गजलकार परिचय श्रृंखला, आशीष अनचिन्हार द्वारा १९ जुलाइ २०१२ केँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार (पृ. ३४२-४३९) मनोज झा मुक्ति- विद्यापति स्मृति समारोह वास्ते हमर दरभंगा यात्रा, जनगणनामे मातृभाषा (पृ. ४४०-४५०) नरेन्द्र मिश्र- दुर्गापूजा-2011 केर अवसरपर मैथिली-नाटक मंचन भेल- अप्पन कर्मक फल (पृ. ४५१-४५३) महाकवि भास- कर्णभारम्- (मैथिली अनुवाद बिपिन कुमार झा) (पृ. ४५४-४५६) बिपिन कुमार झा- बालानां सुखबोधाय, Maithili Word net, कलौ चण्डी महेश्वरौ, स्तरविहीन स्तर- (’अप्पन युनिभरसीटी’केर हाल), जन्मदिनक बदलैत स्वरूप, यात्राक किछु प्रश्न, सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी?, एकटा प्रश्न मीडिया सँ (पृ. ४५७-४७२) जितेन्द्र झा- नेपाली आ मैथिली भाषाक दूटा साहित्यिक कृति विमोचित, मेघशतक (श्यामशेखर झा कमल ) सँ तीनगोट कविता, अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला, विमलक गजल आ सुजितक कथा, सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे (प्रस्तुति जितेन्द्र झा) (पृ. ४७३-४९४) एस.सी सुमन- सरकार कएलक सौतिनिञा व्यवहार (पृ. ४९५-४९७) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- प्रगतिक पथपर मिथिला चित्रकला (पृ. ४९८-४९९) शम्मी वत्स/ रूपेश- हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह (पृ. ५००-५००) प्रवीण नारायण चौधरी- बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 (पृ. ५०१-५०२) रमेश रंजन- रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" (पृ. ५०३-५०४) मुन्ना जी- विहनि कथा संसार, अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी, तराजू, असरा, संगबे, छुच्छ, दुलार, दिहलगड़ि, उफाँटि, जुड़बन्हन, निंघेस, बखरा, अन्हरिया मे, सेल्फी, खोंइछक धान, दासीन, प्रतिक, सिनेहक धार, ऐब की बेरिया, परदा पर, पसार....!, आशीर्वाद, आँचर....!, उठल्लू, बाट-घाट, द्वन्द, देह मोन आ प्रेम, परमेश्वर, जिया जरए सगर राति, साढ़े एकैसम सदी, भूख, टेट्टर , गणतंत्र, अदौ सँ...,करोट, पछतावा, रक्षा, विचरण! , चुनरी, मुक्ति, दरेग, रिपोर्ताज, परस्पर, टकटकी, सुतिहार, वैधव्यता, कोखिन, विधान, मए बनबाक हर्ष!, भार उघैत, निमुधन नै छी, बेर पर, उपरौंज, विहान, दायित्व (पृ. ५०५-५८०) श्यामसुन्दर शशि- कोजग्रा धूमधाम संग मनाओल जा रहल (पृ. ५८१-५८२) राम भरोस कापड़ि भ्रमर- बिराटनगरमे बिद्यापति स्मृति पर्व (पृ. ५८३-५८५) जगदानंद झा 'मनु'- मसोमात, रहस्य, जगह, मिथिलामे जाति-पाति (पृ. ५८६-५९१) प्रियंका झा- सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली (पृ. ५९२-५९८) आशीष चौधरी- विहनि कथा- ठक (पृ. ५९९-६००) चंदन कुमार झा- आलेख- भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र, विहनि-कथा- सद्गति (पृ. ६०१-६०६) अतुलेश्वर- सोचब आवश्यक जे......, मिथिला राज्य आन्दोलन आ शहीद रञ्जु झा (पृ. ६०७-६१९) सुभाष चन्द्र यादव- गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ६२०-६२०) मुन्नी कामत- नाटक- अंधविश्वास (पृ. ६२१-६२६) सत्यनारायण झा- दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर (पृ. ६२७-६२८) सुजीत कुमार झा- लघुकथा (निष्ठा कि देखाबा, लाल डायरी, मेनका, साधना, केहन सजाय?, फुल फुलाइए कऽ रहल, बंश), झूमि उठल जनकपुरवासी, नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल, नेपालमे राष्ट्रिय जनगणना- मैथिलीकेँ स्थान दियावकेँ विशेष संकल्प, मैथिलीमे क्रिकेटक कमेन्ट्री, जंगलमे होरी (पृ. ६२९-७१७) सन्तोष कुमार मिश्र- एकटा पत्र (पृ. ७१८-७१९) मनोज कुमार मण्डल- “बाप भेल पित्ती” ओ “अधिकार” नाटक'क सफल मंचन (पृ. ७२०-७२१) शेफालिका वर्मा- डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार, रेत आ रेत, रेखाचित्र- ओ कत’ हेतीह, एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न, संस्मरण- मैथिली (उड़ीसा-१९८५) (पृ. ७२२-७५४) दुर्गानन्द मण्डल- नेना लेल सुन्दर चित्रकथा, स्वतंत्रता दिवसक अवसरपर किछु स्वतंत्र भरास (पृ. ७५५-७६०) नवीन ठाकुर- मिथिला उवाच-१, मिथिला उवाच-२ (पृ. ७६१-७६८) नवेंदु कुमार झा- मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश, ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग, नीतीशक सोंझा मोदीक समर्पण, ठंडाक मौसम मे गर्मायत बिहारक राजनीति, जापान आ कनाडाक दौरा पर जयताह मोदी, मैथिल ब्रहमण के किनार लगैलक भाजपा कीर्ति कयलनि सोनिया सॅ भेंट, बिहार मे निवेशक इच्छा जनौलक रैल बैक्सी, मधुबनी सहित तीन जगह पर बनत पीपा पूल, पंचायत प्रतिनिधि, प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी, गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि, महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव, सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित, बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक, केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार, उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह- डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज, एस एच जीक माध्यम सॅ आगा बढ़त बिहार प्रदेश मे गठित होयत दस लाख एच एच जी, राज्य सभा चुनाव-भाजपा जदयू मे उम्मीदवारक भीड़ तऽ राजदक अस्तित्वक संकट, बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली, राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण, मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान, जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर, बिहार सहित पांच प्रदेशकेँ अन्नक खरीद बढ़ैबाक निर्देश, 21 फरवरी सॅ प्रारंभ होयत विधान मंडलक बजट सत्र, मुख्यमंत्रीक स्वागतक तैयारी कऽ रहल छथि रांटी गामवासी, बढ़ि रहल अछि बालिका शिक्षाक दर, बिहार मे सभ वर्ष मनाओल जायत भूकम्प आ बाढ़ि सुरक्षा सप्ताह, सम्पन्न भेल विद्यालयक स्थापना दिवस, साकेतानन्दजीक मृत्यु कैन्सरसँ २२ दिसम्बर २०११ केँ एक बजे दिनमे पूर्णियाँ मे भऽ गेलन्हि, पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली, पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि, अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र, साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी, शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी, विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक, बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास, बिहार सरकार जानकी नवमीकेँ अवकाशक घोषणा केलक, उद्यमी सभकेँ स्वयं कर्ज देत सरकार - जीवित होयत वित्त निगम, 15 जनवरी केँ कोसी महासेतूक उद्घाटनक संभावना - एक होयत मिथिलांचल, मजगूत होयत संबंध, 20-21 दिसम्बर केँ होयत शिक्षक पात्रता परीक्षा, बढ़ि रहल प्रवेश पत्र, विधानमंडलक शीतकालीन सत्र समाप्त, पास भेल कतेको विधेयक मधुबनी मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान सह संग्रहालय, मिथिला राज्यक विरोध मे उतरलाह डा॰ मिश्र, पर्यटनक उद्योग पर सरकारक बढ़ल जोर विकसित होएत हलेश्वर पुनौरा आ पंथपाकर, लोकायुक्तक मामिला मे सत्ता आ विपक्ष मे गतिरोध, मनाओल गेल दरभंगा महाराजक जन्म दिवस, प्रदेश मे खूजत पशु विश्वविद्यालय, टाका नहि खर्च कएला पर बंद होएत आवंटन, अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत सम्पन्न भेल स्मृति पर्व, ग्लोबल भेल चेतना, मंचित भेल नाटक, राजकीय समारोहक रूप मे मनल विद्यापति पर्व, सम्मानित भेलाह विद्वान आ संस्कृतिकर्मी, चेतना समितिक सम्मान - 2011, प्रारंभ भेल नव परम्परा, आयोजित भेल पुस्तक आ चित्रकला प्रदर्शनी, राज्य गीत सॅ मिथिला निपत्ता, सरकार पर दबाब बनौलक समिति, खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री, चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा, केसीसीक लेल लागल शिविर, उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी, जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा, प्रधानमंत्री भाजपा, भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश?, लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा, बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग, अपन कूनबा बचबऽ लेल मैदान मे उतरलाह सुप्रीमो तीरक निषान पर अछि लालटेन, जदयूक वार सँ भोथर भेल विपक्षक धार, सरकारक राष्ट्रीय विरूद्ध आंदोलन करत राजद, डेयरी उद्योग मे रूचि देखौलक इंडियन पोटाष लिमिटड, कोसीक प्रलयक तीन वर्ष, भंगिमाक चुनाव सम्पन्न, कुणाल अध्यक्ष्य आ जयदेव सचिव निर्वाचित, प्रदेश मे लागु भेल सेवाक अधिकार कानून (पृ. ७६९-८६३) शांतिलक्ष्मी चौधरी- नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल, मैथिल नारि केर समस्याक समाधान (पृ. ८६४-८७४) किशन कारीगर- हास्य कथा- (आब हम जबान भ गेलहुँ, मुन्नी बदनाम भेलैए किएक?, टाई माने रस्सी, मैथिली सीखू), हमर फोटो कहिया (कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा), मोछ वाली माउगी- होली पर हास्य कथा (पृ. ८७५-९०१) राम प्रवेश मण्डल- विहनि कथा- आह मिथिला! वाह मैथिली! (पृ. ९०२-९०२) शैल झा “सागर”- एकटा पत्र एकटा समीक्षा- किस्त किस्त जीवन (पृ. ९०३-९०५) रमाकान्त राय “रमा” (आचार्य दिव्यचक्षु)- आरसी बाबूक व्यक्तित्व एवं कृतित्वपर द्विदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार- दू दर्जन विद्वानक सहभागिता (पृ. ९०६-९०९) शिव कुमार झा ‘टिल्लू’- मैथिलीपर जातिवादी कलंक (पृ. ९१०-९१३) रवि भूषण पाठक- टिल्लू जी (शिव कुमार झा) (पृ. ९१४-९१५) बृषेशचन्द्र लाल- बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ — बड़ सुख सार पाओल स्मरणे ... (पृ. ९१६-९२६) नारायण झा- रहुआ संग्राममे गृष्मकालीन शैक्षिक शिविर सह टैगोर पुरस्कारसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सम्मान समारोह- २०१२ (पृ. ९२७-९२९) सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण, त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन, शोध-पत्रिका मैथिलीक लोकार्पण, ‘मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण, कार्यशालाक आयोजन, अनुवाद कार्यशालाक आयोजन, भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण (पृ. ९३०-९४४) मिथिलेश मंडल- मरनी बेटी, कथा- सुदिक रूपैआ (पृ. ९४५-९४६) नवीन कुमार आशा- फेर सॅ वर रहलाह कुमार, बेटीक जन्म (पृ. ९४७-९५८) उमेश मण्डल- कनफेड़सँ मुँहफेड़, कुसियारक मारि, सगर राति दीप जरए, हजारीबाग, 75म कथा गोष्ठीमे 39 टा कथापाठ, विदेह साहित्य उत्सव २०१२/ विदेह सम्मान समारोह (विदेह सम्पादकक समानान्तर साहित्य अकादेमी- मैथिली पुरस्कार सह काव्य गोष्ठी), मिथिलांचलक प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षाक माध्यम् मैथिली हेतु ‘विदेह’ विचार गोष्ठी, विदेह नाट्य उत्सव- 2012, मैथिलीमे ई-पत्रकारिता, उमेश मण्डलजी द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलसँ साक्षात्कार, उमेश मण्डलक साक्षात्कार ले.क. मायानाथ झासँ (पृ. ९५९-१०१२) परमेश झा आ अनिलचन्द्र झा- मिथिला राज्य आन्दोलन (पृ. १०१३-१०१३) प्रा.परमेश्वर कापड़ि- मिथिला राज्य संघर्ष, मैथिली कथाक परिवेश आ प्रवृति विमर्श, जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न (पृ. १०१४-१०२०) कुमार पृथु- कथा–गोष्ठी (पृ. १०२१-१०२३) पूनम मंडल- दाग (उपन्यास): गौरीनाथ- लोकार्पण, "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे, समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव, ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस, स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012, दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता, ५१ साझा पुरस्कारक घोषणा, प्राज्ञ भ्रमर साझा पुरस्कारसं सम्मानित (पृ. १०२४-१०३८) नबो नारायण मिश्र (कोकिल मंच) द्वारा मैथिलीक अग्निकवि श्री रामलोचन ठाकुरसँ साक्षात्कार, नबोनारायण मिश्र जी द्वारा लेल साक्षात्कार- किशोरीकान्त मिश्र जी सँ (पृ. १०३९-१०४८) लक्ष्मी दास- अपन सन मुँह (पृ. १०४९-१०४९) संस्कृति वर्मा- मेहनत (पृ. १०५०-१०५०) प्रभात राय भट्ट- मिथिला गर्भपुत्र (पृ. १०५१-१०५३) डॉ॰ शशिधर कुमर- उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-१-२), दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात् खिस्सा अण्टार्कटिका केर (पृ. १०५४-१०९५) पद्य-खण्ड (पृ. १०९६-२२१७) राजेश मोहन झा 'गुंजन'- ज्योतिषी जीक तांडव, परिवार नियोजन, वसंत गीत, होलीक तरंग, मुस्की रहल उदासे, माय मनाइन (पृ. १०९७-११०५) आनंद कुमार झा- गै माए, मिथिला क बात सुनबै छी (तर्ज भारत का रहनेवाला हूँ), माँ मैथिलीक चरण मे अर्पित, जं बाजी त गलत बजय छी, जय मिथिला जय मैथिली, मैया अहाँ बसै छी, याद आयल, मिथिलाक नवयुवक कने नींदसँ जागू, सब परा गेल गाम घर स सुन्न परल अछि दालान यो, भटकि रहल छी तरपि रहल छी (पृ. ११०६-१११७) रमाकान्त राय 'रमा'- बिहार विधानसभा चुनव-प्रचारपर कवि दृष्टि- सांझुक सांझे उपास (पृ. १११८-११२०) चन्दन झा- बीतल माघ फागुन आयल, संस्कृतिक विडंबना, की भऽ रहल अछि अपना गाममे (पृ. ११२१-११२४) संजय कुमार मंडल- डेंगू, माघक जाड़ (पृ. ११२५-११२९) संस्कृति वर्मा- हमर देश (पृ. ११३०-११३०) जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता/ गीत- मधुमाछी (पृ. ११३१-११३३) नन्द विलास राय- किछु पद्य (पृ. ११३४-११३६) डॉ शेफालिका वर्मा- नै रचू अहाँ इतिहास हमर, अहांक हास, प्रकृति- पुरुष, बीतल इतिहास, कोसी नदी, पाथर, हम आबि रहल छी.., ठप्पा (पृ. ११३७-११५०) मनोज झा मुक्ति- ककरा करु विश्वास!, पसरल अत्याचार, गामक सावन (पृ. ११५१-११५६) प्रभात राय भट्ट- किछु गजल, गीत:-विरह, दहेज मुक्त मिथिला बनाबू, तड़पि-तड़पि बाँचि रहल छी, कतय गेलै चितचोर, गरीबक जिनगी भेल पहार, चलैतछी डगैर पैर, हम नै ज्याब आब मेला अकेला, हैंस दिय कनियाँ, हमर बाबुजी छथि बड होसियार, ६०१ सभासद महान, पेट किऐ जरैत, नैन किए भरि गेल, देलौ हम पेटकुनिया, दुल्हे पीयोलक जहर, गाम आबि जाऊ, आदर्श विवाह, कुमारी धिया, बालविबाह, बालविधवा, हमर परिचय, गीत स्वतंत्रताक, माहासंग्राम, हम रहैत छी परदेश, मिथिलाधाम, सपना देख्लौ बड अजगुत, गीत वियोगक, गंगा तट स: हिमालय केर पट, मिथिला माए, मजदुर !!! (पृ. ११५७-१२००) डॉ जया वर्मा- सागर आ मोन (पृ. १२०१-१२०२) संजय कुमार झा- बौआ बिसरि गेलहक, जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल, चलू दोस यौ गाम (पृ. १२०३-१२११) जीवकान्त- एक दिन (पृ. १२१२-१२१३) सदरे आलम "गौहर"- किछु आजाद गजल, एकटा रुबाइ (पृ. १२१४-१२१९) जितमोहन झा (जितू)- मैथिली होली गीत, दोसर फगुआ गीत...., गीत (पृ. १२२०-१२२५) अक्षय कुमार चौधरी- दियाद बलजोर (पृ. १२२६-१२२७) जवाहर लाल कश्यप- हम नहि लिखैत छी कविता, पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर, ई की भेल?, स्नेह-सूत्र टुटि गेल, उद्वेलित केने अछि / एकटा प्रश्न, परदेसक ओर, कौआ आउर बगरा, अन्नाकेँ समर्पित (पृ. १२२८-१२३६) मुन्ना जी- सबला (पृ. १२३७-१२३८) गणेश कुमार झा "बावरा"- विरह, कैंचा (पृ. १२३९-१२४२) सुबोध कुमार ठाकुर- एहेन जीवन जिबितौं, हम नै खेलब होली (पृ. १२४३-१२४६) किशन कारीगर- चाह पीबू- (हास्य कविता), पुरस्कार लऽ के नाचू, नोर झहरि रहल छल, सेहन्ता, गरीब, गीत, किछु त हम करब, भिन भिनौज, कक्का हमर उचक्का- होली पर हास्य कविता (पृ. १२४७-१२७१) पंकज कुमार झा- ओझरैल हमर बौद्धिक मोन, आनंदक रहस्य, सृष्टिक खेल, सचक पथ, संतुलन आ असंतुलन के खेल, ठाढ़ छी, अईंखक दोख आ कि हृदयक, आऊ चलु (पृ. १२७२-१२८३) उमेश मण्डल- संस्कार गीत (संकलन) (पृ. १२८४-१३४६) दुर्गानन्द मण्डल- हम देखलौं, हम हिन्दुस्तानी छी (पृ. १३४७-१३४९) डॉ. अजीत मिश्र- दुर्गा चालीसा (पृ. १३५०-१३५७) सुनील कुमार झा- हाइकू / शेनर्यू (पृ. १३५८-१३६२) आशीष अनचिन्हार- पंचसती-पंचउपसती, छत्तीस-चौबीस-छत्तीस, दू टा गद्य कविता (पृ. १३६३-१३७३) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- आजाद गजल (पृ. १३७४-१३७४) रूबी झा- १४ टा कविता, किछु गजल (पृ. १३७५-१४००) मुन्नी कामत- जड़ैत ज्योत, जिंदगीक मरीचिका, ताकैत जिनगी कूड़ा ढ़ेरमे, संकल्प, ठमकल शब्द, दहेजक बिहाड़ि, हरैल हमर रूप, विदाइ (पृ. १४०१-१४११) चंदन कुमार झा- हमहू पढबै आब, फेर हेतइ भोर, बेटी बन्हलीह परिणय डोर, दीप, जे भान नहि !!, भय, बज्जर धरती पर, मोन होइए जे, हमर करेजा, बिडम्बना, मोनक बात, मूरख मंत्री, निरपट सरकार, मायक सपथ छी दऽ रहल, घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान, बाड़ी बदलल वृन्दावन मे, सिखनिहार सँ बेशी सिखौनिहार छै जगमे, अकान, झमझम बरसै छै बून्नी, निर्लज्जा के आब भगाबू , हे, बुझलियै की ?, किछु हाइकु आ शेर्न्यु (पृ. १४१२-१४५४) पवन कुमार साह- गीत (पृ. १४५५-१४५६) श्यामल सुमन- किछु गजल सन (पृ. १४५७-१४६०) नवीन कुमार "आशा"- बेटी हमर अभिमान, की फुराएल ने जानि, मिथिलामे बसए प्राण (पृ. १४६१-१४६७) डॉ. शशिधर कुमर- डॉ॰ शशिधर कुमर- मधुश्रवणी गीत- १, मधुश्रवणी गीत- २, सिनुरदानक गीत, परिछनि गीत (द्विरागमन / दुरागमन / गौना केर बादक परिछनि), माँ शारदे वन्दना- १, माँ शारदे वन्दना- २, पूणा प्रवास (१-३), सुन्नरि प्रिया, साओन मे विरह, अहीं सञो कहै छी, अप्पन नैना सम्हार !, हम नञि रोकब, तोहर जिनगी मे वसन्तक लय, बिसरि ने सकब, अहँक नेह केर छोट सनि जे छवि अछि, हम की करू ?, विरह गीत, मिलनोत्सुका गीत, मिलन गीत, आगामी जानकी नवमी / मिथिला दिवस / मैथिली दिवस पर विशेष- भजु धरणिसुता (किर्तन), माँ जानकी वन्दना (किर्तन), किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ?, हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल, शान्तिक सपूत संग्राम करय, कहिया तक शान्ति हो ? (आवाहन गीत), जयति जयति मिथिले (जन्मभूमि स्तुति गीत), कोयली कानय भोरहि सँ, तीन तिरहुतिया, तेरह पाक, नञि पत्र एकहु टा लीखल, अहंकार, आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग, देखू आयल बसन्त, आयल होलीक दिन मतवारी, आयल होली केर तिहार, छायल मिथिला मे आजु बसन्त, हे ऐ भौजी, रूसलि किए छी?, सभ हीलि मीलि कऽ गाउ, जयति जय श्री त्रिपुरारी केर (आगामी शिवराति पर विशेष), बसन्तक आगमण पर, कामिनी! जुनि तोड़ू अहँ फूल, मातृभूमि निज मिथिला अछि, छी वासी हिन्दुस्तान के, हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी (गीत) (आगामी वेलेण्टाइन डे पर विशेष), बाबा विद्यापतिक कथन, नोर बहओने किछु नञि होयत, मातृ – भू वन्दना, धिया-पुता जनकक वंशज हम, ओ व्यक्ति की? , सखि तोहर मुखक तुलना के कर, प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम , नवकी कनिञा, कल्पनाक यान सँ, किए हँसबै छऽ मिथिला केर नाम भैय्या ?, ककरा दृष्टि मे नीक, के कह ?, की इएह कहाबैछ सुन्नरता ??, चकोरक उक्ति चानक प्रति, अहाँ सपनहि मे आबै छी, आयल करू, सुनू यौ भारत केर सरकार ! , नोर, हम कनितहु, कानि ने सकइत छी, सभ सँ रसगर माएक भाषा, गे सजनी! फोल कने फेर ठोर, हम नञि कहब कि, बरसातक एक राति, नभ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल श्यामल, आयल साओन मास सोहाओन, मेघ, हम मैथिल! मिथिला केर सन्तान, बसात (हवा), हे प्रिय! अहँक सुन्नर मुखड़ा, बनि जयतहुँ हम बच्चा, आबहु मिता छोड़ू, अरिकोंच, आजाद गजल सचित्र बाल कविता (उड़ीस, उल्लू, ऊद या ऊदबिलाड़ि, कठखोद्धी या कठखोधी, कठसुग्गी, कबार, करांकुल, किताबी कीड़ा, कोइली, गेंड़ा, घियारी कीड़ा या कुम्हरा भेम्ह, घोरन, चकबा या चकेबा, चकोर, टिटही, कड़रिक सितुआ या कड़रिक शितुआ या जोंकती, खुरचनि सितुआ या खुरचनि शितुआ, गिरगिट, ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया, गोहि, सनगोहि, डोकहर, ढील आ लीख, देबाड़ या दिबाड़, धनछुआ, नीलकण्ठ या असली नीलकण्ठ, पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! !, पपीहा , पहाड़ी मएना, पाकल आम, पानिकौआ या पानिकौर, पानिडुब्बी (उच्चा॰-पैनडुब्बी) या मछरेंगा, पोरकी या पौड़की, बगरा या बगड़ा, बगेरी, बत्तख, बागर, बिढ़नी, बेङ्ग, भगजोगनी, भेम्ह या भम्हरा, मच्छर, माटिखोद्धी या माटिखोधी, मोहखा या मोखा, राजहंस या हंसावर, लुक्खी, सतबहिनी, साही, सिरोली या सिरोली मएना, सिरौली या नकली नीलकण्ठ, सिल्ली, सुग्गा, सूरा आ फाड़ा, हँसुआ दाबी, हंस, हंसक या जलपद) (पृ. १४६८-१८५०) सत्यनारायण झा- ठुठ पीपर (पृ. १८५१-१८५२) जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ - किछु गजल (पृ. १८५३-१८८२) रमा कान्त झा- देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात (पृ. १८८३-१८८४) सन्तोष कुमार मिश्र- इतिहासहिन इतिहास (पृ. १८८५-१८८७) जगदानंद झा 'मनु'- किछु रुबाइ, किछु बाल गजल, हजल, किछु गजल, मोनक व्यथा, सभसँ आगु आगु छी, आलु कोबी मिरचाई यै, कि लेबै यै दाय यै / दाय यै , लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए, मिथिलाक गुणगान, मैथिलीक विकासक बाधा, मायक भूमि बजा रहल अछि, पाई, कथा अमर अपन मिथिला कए, मिथिला स पलायन, धन हमर मिथिला, - ऐ सुंदर-सुंदर कनियाँ, हम मौन किएक छी, मिथिला राज, गुमान (पृ. १८८७-१९६१) नवीन ठाकुर- आजाद गज़ल (प्रेम रस), काल-दिशा, गंगा, गुटखा माने मावा, एखुनका मास्टरक व्यथा, गीत- १-३, अनुकम्पा, अस्तित्व, वियोग, जाढ़ (एगो अनुभूति), मिथिला दर्पण १-२ (पृ. १९६१-१९७८) अमित मिश्र- १५ अगस्तपर एकटा गजल आ एकटा कविता, मखानक पात, हरियर गाछ, किछु बाल गजल (पृ. १९७८-२०१६) शिव कुमार यादव- बाल गजल (पृ. २०१६-२०१८) विकास झा रंजन- किछु रुबाइ, किछु गजल (पृ. २०१८-२०२१) झा हेमन्त बापी- अभिलाषा (पृ. २०२१-२०२४) सत्येन्द्र कुमार झा- पाँच गोट लघु कविता (पृ. २०२४-२०२६) विवेकानन्द झा- हाइकू (पृ. २०२७-२०२७) विद्यानन्द झा “विदू”- शिक्षाक मौलिकता (पृ. २०२८-२०२९) बिनोद मिश्र- गामक सनेस (पृ. २०३०-२०३२) प्रकाश प्रेमी- बौवा करबा की? (पृ. २०३३-२०३४) विनीत उत्पल- किछु गजल, गुटु रानी (पृ. २०३५-२०३७) रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’- कविता- माइ, रेल, रुसनी (पृ. २०३८-२०४२) मुन्नाजी- हाइकू (पृ. २०४३-२०४४) अन्जनी कुमार वर्मा- बहैत बसात, परिभाषा (पृ. २०४५-२०४६) रवि मिश्रा भारद्वाज- आजाद गजल (पृ. २०४७-२०४८) अमित मोहन झा- काश, पहिलुक दिन हम यादि करई छी, हमर प्रेयसी, आब जमाना बदलि गेलै यौ (पृ. २०४९-२०६१) शिवशंकर सिंह ठाकुर- कोह्बरक हाल कहलो ने जाय, आँजन सँ आंजित आंखि हुनकर, लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ, किए दूरेसँ झांकि कऽ देखै छी यै कनियाँ, हे स्वर्णमयी, अहाँ छी कतऽ (पृ. २०६२-२०७०) मिहिर झा- सामा गीत (संकलन), हे भगीरथ, पुनः आउ, असमंजस, गजल सन, किछु गजल, किछु भाव, छोड़ू रंज ओ रण, जमींदारी गेल राइयाई गेल/ सभटा गेल सोतियाइ नै गेल, भोज (पृ. २०७१-२०८५) मनीष झा बौआभाई- नव बरखक, हम ऋणी छी (पृ. २०८६-२०८८) इरा मल्लिक- जीवन, भौजी, बड़ अजीब मँहगाइ छै! (पृ. २०८९-२०९४) प्रवीण नारायण चौधरी- ३० टा कविता (पृ. २०९५-२१२६) शांतिलक्ष्मी चौधरी- किछु गजल, वियाह, बेरोजगारी, तिलकोर, दरीदरी, बथुआ, चुट्टीकट्टा, भाड़ाक घर, ओन-लाइन बदतमिजी (प्. २१२७-२१५७) श्वेता झा (सिंगापुर)- किछु चित्र (पृ. २१५८-२१६८) गुंजन कर्ण- किछु चित्र (पृ. २१६९-२१८०) इरा मल्लिक- किछु चित्र (पृ. २१८१-२१८३) प्रवीण कुमार ठाकुर- किछु चित्र (पृ. २१८४-२१८६) गणेश ठाकुर- किछु चित्र (पृ. २१८७-२१८९) कैलाश कुमार कामत- किछु चित्र (पृ. २१९०-२१९१) मोना पाण्डेय- चित्र (पृ. २१९२-२१९२) पल्लवी मण्डल- १० टा पद्य (पृ.२१९३-२२०५) संदेश- (पृ. २२०६-२२१७) 2
गद्य खण्ड मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम् अक्खर (अक्षर ) खम्भा तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥ [कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।] माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत। गजेन्द्र ठाकुर विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण १ समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली बला विद्यापतिसँ अछि... जै सम्बन्धमे हम चर्चा केलौं जे हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल... ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति केँ आ गोविन्ददासकेँ अपन बना लेलक आ बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल- रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। किछु गोटे ज्योतिरीश्वरक भातिज कहि विद्यापतिकेँ सम्बोधित करऽ लगलाह!! मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पज्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। २. अहाँ बंगाल किए जाइ छी, पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै। ३.मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे गेल रहथि, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद प्रभात झा कहि रहल छला, जे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि, प्रभात झा कैंपेनिंग कऽ देलखिन्ह आ एक वोटसँ केण्डीडेट जीति गेलै। हमरा अहाँ सभकेँ ई अनुभव अछि जे कोनो टाइटिल हुअए पहिने, पटनो धरिमे लोक झाजी वा झौआ ओकरा कहि दै छै। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्म्ण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा। ४.पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि।आब आउ मूल मुद्दापर। हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पदावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए।आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) बार्बर कास्टमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कवि आ ओकर कृतिक चर्चा अछि। महादेव मूलतः गएर ब्राह्मणक देवता रहथि, आस्ते-आस्ते ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा अपनाओल गेलाह। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे हुनकर संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै अछि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? उदाहरण देखू। विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर- की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? २.पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे नै छन्हि। ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ (पाली ताली नै) ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति बार्बर कास्टक रहबे करथि, वा ब्राह्मण कास्टक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए ; आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष ,उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भए जेतै? की हुनकर सृन्गरिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षड़यंत्र तं नै ? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि?"मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। जँ ओ बार्बर कास्टक रहथि तैयो आ जँ ब्राह्मण रहथि तँ आरो (कारण २१म शताब्दीक ब्राह्मणक कट्टरता तँ देखिये रहल छी आ ई हजार साल पुराण ब्राह्मण जँ पैरेलल परम्पराक रहथि तँ पागरूपी सामन्तवादी अवशेष तांत्रिक धार्मिक कर्ममे मात्र प्रयुक्त हुअए, विद्यापतिक माथपर नै)। महाकवि विद्यापति कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक विद्यापति- चित्र श्री पनकलाल मण्डल, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना (विदेह सम्मान- चित्रकला लेल- सँ सम्मानित) समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः 1350-1435 विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि।चित्र साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक “लिटेरेरी असोसियेशन”क रूपमे मान्यता प्राप्त मिथिला सांस्कृतिक परिषद- चित्रकारक नाम अज्ञात कारणसँ ऐ संस्था द्वारा गुप्त राखल गेल अछि। बोधि कायस्थ विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति(ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक)विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। उगना महादेव महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक अहिठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहैत छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। २ “विद्यापतिक मिथिला सांस्कृतिक परिषद द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग-प्रतिष्ठापन” संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति ठक्कुरः आ कविकोकिल विद्यापतिक बीचक अन्तर "मिथिला सांस्कृतिक परिषद" आ ओइसँ जुड़ल "किशोरीकान्त मिश्र" आदि नै बुझि सकला वा नै बूझऽ चाहलन्हि। ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग- विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पदावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पदावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पदावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल। ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पदावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पदावलीक प्रभाव देखबैत अछि। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाणमे ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि। मुदा पदावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)। पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि? पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह कि नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। आ ई कुकृत्य किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केलक। ऐ तरहक लोक जै मिथिलाक संस्कृतिक रक्षक, ओ संस्कृति आ भाषा जँ आइयो बाँचल छै, तँ ई ओइ संस्कृति आ भाषाक विशेषता छिऐ। आ रामलोचन ठाकुर अही प्रतिक्रियावादी "किशोरीकान्त मिश्र"क मंचसँ मंच सापेक्ष बयान देलन्हि (उपन्यासक संख्याक सम्बन्धमे) जकर कोनो ऐतिहासिक महत्व नै छै। चेतना समितिक पत्रिकामे मानेश्वर मनुज सेहो मंच सापेक्ष बयानमे जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासक संख्या मात्र ४ लिखलन्हि!!! जगदीश प्रसाद मण्डलक नाममे जँ मण्डल टाइटिल नै रहैत मात्र जगदीश प्रसाद रहैत तँ रमानाथ झाक अनुयायी हुनका श्रोत्रिय, अमर-रामदेव झाक अनुयायी हुनका ब्राह्मण आ "लालदासक स्मारिका"क लेखक वर्मा जी हुनका कायस्थ घोषित कऽ दैतथि। आ ्जँ जगदीश प्रसाद मण्डलक फोटो उपलब्ध नै रहितै तँ किशोरीकान्त मिश्रक प्रतिक्रियावादी मिथिला सांस्कृतिक परिषद जगदीश प्रसाद मण्डलक यज्ञोपवीत संस्कार कऽ हुनका पाग पहिरा फेर वएह कुकृत्य करितए जे ओ विद्यापतिक संग एक हजार सालक बाद केलक। आ बेरमाक कोनो बुढ़बा माटिक ढिमकाकेँ देखबैत जगदीश प्रसाद "झा/ ठक्कुरः" केर काल्पनिक घराड़ी, यएह छी, घोषित कऽ दितए। मलंगियाक बेटा, रामदेव झाक बेटा आ ढेर रास छद्मनामीक देल गाड़ि सेहो विदेहमे बिना काँट-छाँटक छपने अछि, जे लोक पढ़ि सकए, किछु गाड़ि जे नै छापल जा सकैए, सएह टा नै छपने छी। आ गारिक डरसँ अखन धरिक मैथिली आ मिथिलाक इतिहासकार ऐ विषयपर इशारा तँ केलन्हि मुदा आगाँ नै बढ़ला। तेँ ओ ज्योतिरीश्वर(१२७५-१३५०) पूर्व विद्यापतिये रहथि से फेर सिद्ध होइए। जयदेव (लगभग १२००)क गीत-नृत्य आ किरतनियाँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पदावली मेल खाइत अछि, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक काव्य सौष्ठवसँ मेल नै खाइत अछि। आब पुनः आबी मिथिला सांस्कृतिक परिषदक मंच जतएसँ रामलोचन ठाकुर मंच सापेक्ष बयान देलन्हि। ई परिषद विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार नै, मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार केलक। ओकर विद्यापतिकेँ पहिराओल पाग, कोलकातासँ बिन्ध्येश्वर मण्डल आ श्रीकान्त मण्डलकेँ लुप्त कऽ देलक आ मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण भऽ गेल। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक जातिगत कट्टरताक बानगी देखी:- कीर्तिलता- जाति-अजातिक विवाह अधम कएँ पारक। पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि कि राजपूतक स्त्री चरित्रहीन होइत अछि, ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सए बला वक्तव्य। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जाति-अजातिपर विशेष बल दै छथि, रक्त शुद्धता/ जाति हुनका लेल महत्वपूर्ण छन्हि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- अकुलीन कोनो दयाक अधिकारी नै अछि!! आ सौन्दर्य मात्र धनिक आ विशिष्ट वर्गक एकाधिकार अछि!! संस्कृत आ अवहट्ठबला (किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला) विद्यापति कहै छथि- जाति सामाजिक जीवनमे अन्तिम निर्धारक तत्व अछि। जे खराप कुलमे जन्म लैए ओ दुष्ट दिमागक साँप मात्र बनि सकैए!! किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- ओ देश जतऽ जातिक निअम लागू नै होइए से म्लेच्छ देश थिक( Aspects of Society and Economy of Medieval Mithila)- Upendra Thakur अमीर खुसरोसँ पहिने पागक वर्णन हमरा नै भेटल अछि। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति (पदावलीक लेखक) कहै छथि:- नृप इथि काहु करथि नहि साति। पुरख महत सब हमर सजाति॥ ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि। गोविन्ददासक पद्यो क्लिष्ट छलन्हि आ एकर समानान्तर परम्परा सेहो नै छल (सम्भवतः सवर्ण मध्य प्रचलनक कारण ई दुनू चीज छल), से बिदापत नाच जकाँ ओ एतुक्का माँटिमे संरक्षित नै भऽ सकल। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिक चर्चा मुदा वर्धमान जे हुनका सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि, ओ कविता सभ कतऽ गेल? पक्षधर लिखैपर प्रतिबन्ध लगेलन्हि मुदा रघुनाथ शिरोमणि आ हुनकर शिष्य “उदयन” आ “गंगेश”क कृतिकेँ रटि कऽ चलि गेलाह आ नवद्वीपमे नव्य-न्याय स्कूलक स्थापनाक संगे बंगालसँ विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति:- कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ “ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी” मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, - श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पदावलीक भाषा छी। “जाव न मालतो कर परगास तावे न ताहि मधुकर विलास।” आ “मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द” (मध्यकालीन मिथिला, उपेन्द्र ठाकुर) ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥….. विदातञो आस्थान भीतर भउ. तका पछा तेलङ्गी. मरहठी. वि।दओतिनी दुइ चित्रकइ गाङ्ग जउन निहालि अइसनि देषुअह. चउआञ्चरि चीरि एकहोङ्क परिहने …….से कइसन देषु. जइसे प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक सम्वाहि। का हो तइसे ता विदाञोतके दुअओ सम्वाहिका हो भउअह . दशञुन्धी राजा अवधान कराउ. विदाञोत आस्थान वइसु. (विदाञोत (पुरुख) भीतर भेल, तकर पाछाँ तेलङ्गी, मरहठी। विदओतनी (स्त्री) दूटा रंगक गङ्गा यमुनामे नहायलि एहन देखाइए। चारि-चारि आँचरबला चीर एकहकटा पहिरने। से केहन देखू. जेना प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक संगबे तेहने ओइ विदाञोतकेँ दुनू सम्वाहिका। दशञुन्धी राजाकेँ अवधान करेलक, विदाञोत स्थानपर बैसला। अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ …विदाञोत त।न्हिक गीत. नृत्य. वाद्य. ताल. घाघर परिठरइतेँ आह… विदाञोत लोकनिक गीत, नृत्य, वाद्य, ताल, घाघर पहीरि कऽ भेल। उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल। बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित छल आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल। विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत साहित्य मिथिलाक विद्वान परम्पराक लोपक बाद सोझाँ आएल, आ संस्कृत साहित्यमे विद्यापति ठक्कुरःक कोनो खास चर्च नै भेटैत अछि आ बंगालक विद्यार्थीक एनाइयो कम भऽ गेल छल, जे अबितो रहथि हुनका लेल विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत आ अवहट्ठ साहित्य समकालीनक साहित्य छल जे खतम होइत विद्वता परम्पराक साहित्य छल आ सेहो तखन लिखाइये रहल छल, मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व पदावली प्रसिद्धि प्राप्त कऽ लेने छल। ओइ कालक गोनू वा विद्यापतिक समय पाग रहबो करए सेहो निश्चित नै, कारण अमीर खुसरो (१२५३-१३२५) मात्र एकर चर्च केने छथि। विजय कुमार ठाकुर एकरा सामन्तवादी प्रतीक आ तंत्र मंत्रसँ सम्बद्ध मानै छथि। मुस्लिम आक्रमणक बाद अधीनस्थ सामन्तकेँ ई पहिराओल गेल हएत आ ई मुस्लिम टोपीसँ मेल खाइतो अछि, आ मात्र ब्राह्मण-कायस्थ मुस्लिम आक्रमणक बाद मिथिलामे सामन्त रहथि (राजपूत नै) आ आइयो अही दू वर्गक बीच ई कहियो काल बियाह आदिमे प्रयुक्त होइए। महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि। ३ फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक। आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।
मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा: वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल। प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि। वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि।
शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा: ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल। शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार!! दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पदावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पदावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पदावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)। गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि।
रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ!! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पदावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पदावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत। तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला” मे लिखै छथि- “The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila…Gangesha’s family is completely ignored and we are not expected to know even his father’s name.” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह! आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल। गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।
शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पदावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।
श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पदावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। “रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। धूर्त समागम सेहो दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि। अनुलग्नक: फणीश्वर नाथ रेणु एकटा लोकगीतक विद्यापति भूमिका महाकवि विद्यापतिपर “खोज”करैत काल हमरा लागल जे एक अध्यायक शीर्षक राख’ पड़त- “खेतिहर-बोनिहार आ बहलमानक कवि विद्यापति”। कारण पूर्णियाँ-सहरसाक इलाकामे आइयो विद्यापतिक पदावली गाबि-गाबि क’ भाव देखाक’नाचैबलाक मण्डली सभ अछि। ऐ मण्डली सभक नायक महिसवार, चरबाह आ गाड़ीक बहलमाने होइ छथि प्रायः। मैथिल पण्डित लोकनिसँ पुछलौं , ई कोना भेल? बजला, अहाँ कोन फेरामे पड़ल छी? अही सभ मूर्खक कारण आइ विद्यापतिक दुर्दशा भ’ रहल अछि। ऐ मामूली लोक सभक मोनमे जखन एलै विद्यापतिक नामपर “चारिटा पदावली” जोड़ि देलक। ..अहाँ दिग्भ्रमित भ’ रहल छी।.. मिथिलाक पण्डितक वर्जना-वाणीपर कान-बात नै दैत हम सहर्ष सहरसा (बा सहर्षा?) यात्राक तैयारी शुरू क’देलौं। ..कनचीरा गाम एकटा एहन गाम अछि जइपर दू-दू जिलाक जिला अधिकारीक शासन चलैत अछि। अदहा गाम सहरसामे, अदहा गाम पूर्णियाँमे। ... कनचीराक विद्यापति-मण्डलीक नाम दुनू जिलाक लोक लै छथि। ... जइ दिन कनचीरा गाम पहुँचलौं, गाममे एकटा अघट घटना घटित भ’ गेल रहै। दस सालसँ इलाकाक प्रतिनिधित्व करैबला नेताजी चुनावमे चितंग भ’ गेल रहथि। तइ द्वारे ओइ राति नाच-गानक दोसरे मतलब निकालल जा सकै छल, ऐ डरे “विद्यापति-मण्डली”क नायक जनकदास नाच करबाक अनुमति नै देलनि। दोसर राति ओ बड्ड खुशामद करेलाक बाद अनुमति देलनि। नायक जनकदास बड्ड तर्क-वितर्क केलाक बाद घुमा-फिरा क’ दोहरा-तेहरा क’ कहलनि, “विद्यापति- नाच” क जन्म हुनके परिवारमे पहिले-पहिल भेल। विस्तारसँ ओ कहियो किछु नै कहलनि। आ हुनका जखन ई विश्वास भ’ गेलनि जे “विद्यापति नाच मण्डली”क नामपर खर्च करबा लेल हजार- दू हजार टाका सरकारक खजानासँ ल’ क’ हम नै बहराएल छी, तखन ओ मृदंगपर थाप देलनि। राति भरि नाच देखैत रहलौं। गाए चरबैबला छौड़ा, साड़ी पहीर विरहिनी राधा बनि गेलि आ कानि-कानि गाबए लागलि- “कतेक दिवस हरि खेपब हो, तुम एसकरि नारी!” दोसर दिन, जनकदाससँ ऐ नाचक उत्पत्तिक इतिहास पुछलौं तँ ओ बाजल- नै जानि कहियासँ ऐ नाचक मूलगैनी हमरा परिवारमे चलैत आबि रहल अछि। जनकदासक ऐ उदासीक कारण छल- हमर टेपरेकार्डर।.. चुप्पे-चुप्पे सभ गीत फीतामे अहाँ भरि लेलौं, चलाकीसँ। मंगनीमे अपन काज सुतारि लेलौं अहाँ?आ, अंतिममे पचास टाका नगदी देलाक बादो ओ हमर ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै देलनि कि खेतिहर-बोनिहार, चरवाह आ बहलमान सभ कहिया आ केना विद्यापतिक पदावलीकेँ गाबि-गाबि नाचब प्रारम्भ केलनि। जनकदासक पलानीमे पुआरपर पड़ल रही दिन भरि, ओकरा दया नै लगलै। ओकर मसोमात जवान बेटी हमरा दिससँ पैरवी केलक, तखनो ओ नै पसिझल, अपन खानदानीक “हँसी” करबैबला गप के “गजट” मे “छापी” कराब’ चाहत? बुरहा जनकदास बड़द खोलि चरबै लेल चलि गेला। हम ओकर पलानीमे पड़ल रहलौं आ तकर बादे एकटा खिस्सा सुनलौं बा सपना देखलौं बा“भ्रम”मे पड़ि गेलौं- ई नै कहि सकै छी। रुबाइ : कता: गजल: हाइकू रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ हेबाक चाही। रुबाइमे मात्रा २० वा २१ राखू। रुबाइक सभ पाँतीक प्रारम्भ दू तरहे शुरू होइत अछि- १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफ–ऊ–लु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ। ओना फारसी रुबाइमे पाँती सभ लेल प्रारम्भक आगाँक ह्रस्व-दीर्घ क्रम निर्धारित छै, मुदा मैथिली लेल अहाँ २०-२१ मात्राक कोनो छन्द जे १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफ–ऊ–लु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ प्रारम्भ होइत हो, तकरा उठा सकै छी। पाँती २० वा २१ मात्राक हेबाक चाही, (मफ–ऊ–लु ।।U ) वा (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ प्रारम्भ हेबाक चाही। मुदा एक रुबाइक वाक्य सभक बहर वा छन्द/ लय एकसँ बेशी तरहक भऽ सकैए। आन चतुष्पदी जाइमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि मुदा मात्रा २०-२१ नै हुअए आ पाँती (मफ–ऊ–लु ।।U ) वा (मफ–ऊ–लुन ।।।) सँ प्रारम्भ नै हुअए से रुबाइ नै मुदा "किता/कतआ"क परिभाषामे अबैत अछि। रुबाइक चतुष्पदीक चारिम पाँती भावक चरम हेबाक चाही। दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि। एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए। दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, काफियाक भीतरमे सेहो रदीफ रहि सकैए; रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ मात्रा, एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। मुदा काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत। गजल कोनो ने कोनो बहर (छन्द) मे हेबाक चाही। वार्णिक छन्दमे सेहो ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+ ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक ऐ (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए। द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत। त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे। चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत। वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी। आब कतेक पाद आ कतऽ काफिया (यति,अन्त्यानुप्रास) देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी। मैथिली हाइकू: संस्कृतमे सत्रह सिलेबलक मीटर सभ अछि- शिखरिणी, पृथ्वी, वंशपत्रपतितम, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम, कोकिलकम, आ भाराक्रान्ता; ई सभटा वार्णिक छन्द अछि आ ऐ सभमे १७ वर्ण अक्षर होइत अछि (सभ पदमे १७ सिलेबल)। तेँ ५/७/५ क क्रममे १७ सिलेबल लेल १७ वर्ण अक्षर मैथिली हाइकू लेल प्रयुक्त हेबाक चाही। जापानमे ईश्वरक आह्वान टनका/ वाका प्रार्थना ५ ७ ५ ७ ७ स्वरूपमे होइत छल। "सेनर्यू"मे किरेजी नै होइ छै आ एकरामे प्रकृति, चान सँ आगाँ हास्य-व्यंग्य होइ छै। मुदा एकर फॉर्मेट सेहो हाइकू सन 5/7/5 सिलेबलक होइ छै। जापानी सिलेबल आ भारतीय वार्णिक छन्द मेल खाइ छै से 5/7/5 सिलेबल भेल 5/7/5 वर्ण / अक्षर। संस्कृतमे 17 सिलेबलक वार्णिक छन्द जइमे 17 वर्ण होइ छै, अछि- शिखरिणी, वंशपत्रपतितम, मन्दाक्रांता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रांता। तैँ 17 सिलेबल लेल 17 वर्ण/ अक्षर लेलहुँ अछि, जे जापानी सिलेबल (ओंजी)क लग अछि। किरेजी माने ओहन शब्द जतएसँ दोसर विचार शुरू होइत अछि, किगो भेल ऋतुसँ सम्बन्धी शब्द। किरेजी जापानीमे पाँतीक मध्य वा अंतमे अबै छइ आ तेसर पाँतीक अंतमे सेहो जखन ई पाठककेँ प्रारम्भमे लऽ अनै छै। हाइकू जेना दू प्रकृतिक चित्रकेँ जोड़ैत अछि एकरा संग चित्र-अलंकरण विधा "हैगा" सेहो जुड़ल अछि। जापानमे ईश्वरक आह्वान टनका/ वाका प्रार्थना ५ ७ ५ ७ ७ स्वरूपमे होइत छल जे बादमे ५ ७ ५ आ ७ ७ दू लेखक द्वारा लिखल जाए लागल आ नव स्वरूप प्राप्त कएलक आ एकरा रेन्गा कहल गेल। बादमे यएह कएक लेखकक सम्मिलित सहयोगी विधा “रेन्कु”क रूपमे स्थापित भेल।हैबुन एकटा यात्रा वृत्तांत अछि जाहिमे संक्षिप्त वर्णनात्मक गद्य आऽ हैकू पद्य रहैत अछि। बाशो जापानक बौद्ध भिक्षु आऽ हैकू कवि छलाह आऽ वैह हैबुनक प्रणेता छथि। जापानक यात्राक वर्णन ओऽ हैबुन द्वारा कएने छथि। पाँचटा अनुच्छेद आऽ एतबहि हैकू केर ऊपरका सीमा राखी तखने हैबुनक आत्मा रक्षित रहि सकैत अछि, नीचाँक सीमा ,१ अनुच्छेद १ हैकू केर, तँ रहबे करत। हैकू गद्य अनुच्छेदक अन्तमे ओकर चरमक रूपमे रहैत अछि। टिप्पणी: "सेनर्यू"मे किरेजी नै होइ छै आ एकरामे प्रकृति, चान सँ आगाँ हास्य-व्यंग्य होइ छै। मुदा एकर फॉर्मेट सेहो हाइकू सन 5/7/5 सिलेबलक होइ छै। जापानी सिलेबल आ भारतीय वार्णिक छन्द मेल खाइ छै से 5/7/5 सिलेबल भेल 5/7/5 वर्ण / अक्षर। संस्कृतमे 17 सिलेबलक वार्णिक छन्द जइमे 17 वर्ण होइ छै, अछि- शिखरिणी, वंशपत्रपतितम, मन्दाक्रांता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रांता। तैँ 17 सिलेबल लेल 17 वर्ण/ अक्षर लेलहुँ अछि, जे जापानी सिलेबल (ओंजी)क लग अछि। किरेजी माने ओहन शब्द जतएसँ दोसर विचार शुरू होइत अछि, किगो भेल ऋतुसँ सम्बन्धी शब्द। किरेजी जापानीमे पाँतीक मध्य वा अंतमे अबै छइ आ तेसर पाँतीक अंतमे सेहो जखन ई पाठककेँ प्रारम्भमे लऽ अनै छै। हाइकू जेना दू प्रकृतिक चित्रकेँ जोड़ैत अछि एकरा संग चित्र-अलंकरण विधा "हैगा" सेहो जुड़ल अछि।जापानमे ईश्वरक आह्वान टनका/ वाका प्रार्थना ५ ७ ५ ७ ७ स्वरूपमे होइत छल जे बादमे ५ ७ ५ आ ७ ७ दू लेखक द्वारा लिखल जाए लागल आ नव स्वरूप प्राप्त कएलक आ एकरा रेन्गा कहल गेल। बादमे यएह कएक लेखकक सम्मिलित सहयोगी विधा “रेन्कु”क रूपमे स्थापित भेल।हैबूनमे वर्णनात्मक गद्यक संग हाइकू(5/7/5) वा टनका/वाका (5/7/5/7/7)मिश्रित रहै छै। ई सभटा विधा विदेहक फेसबुक ग्रुपपर आ मैथिली हाइकू ब्लॉगपर प्रतियोगी वातावरणमे उपलब्ध अछि। बाशो जापानक बौद्ध भिक्षु आ हैकू कवि छलाह जापानक यात्राक वर्णन आ फुजी पहाड़ हुनकर कवितामे खूब अबैए। बाशोक किछु हाइकू एतए प्रस्तुत अछि बाशोक हाइकू १.केराक गाछ लग / जै बौस्तुसँ हम घृणा करै छी तकर चेन्ह/ एकटा मुसकैन्थसक कोढ़ी २.एकटा घोड़ो / हमर आँखिकेँ आकर्षित करैए अइ /बर्फयुक्त काल्हिक भोरमे ३.बीतल एक बर्ख आर / एकटा यात्रीक छाह हमर माथपर, / पुआरक पनही हमर पएरमे ४.आब तखन चलू चली/ बर्फक आनंद लेबाक लेल जाधरि / हम पिछड़ि कऽ खसि पड़ी ५.पहिल झपसी जाड़क/ बानरो चाहैए/ छोट सन पुआरक कोट ६.फुजी पर्वतक बसात/ अपन पंखामे अनलौं/ इडो लोकक उपहार ७.बाशोक अन्तिम कविता जखन ओ मृत्युशय्यापर छलाह- दुखित पड़लौं एकटा यात्रा मध्य/ हमर स्वप्न भोथियाइए/ सुखाएल घासक चौरीक चारूकात (स्वतंत्र अर्थ आ भावानुवाद, प्रीति ठाकुर) प्राकृत आ पालि प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्धकरैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)। आ वैदिक आ लौकिक संस्कृतकेँ ओइ कालमेे संस्कृत नै वरन क्रमसँ छन्दस (वैदिक संस्कृतकेँ यास्क आ पाणिनी छन्दस कहै छथि) आ भाषा (लौकिक संस्कृतकेँ पाणिनी भाषा कहै छथि) कहल जाइ छल। आ जकरा आइ प्राकृत कहै छिऐ से पालिक बाद ओइ रूपमे बुझल गेल (साहित्य लेखन सम्बन्धमे)। भरतक नाट्यशास्त्रमे ७ टा आ वररुचि ४ टा प्राकृतक चर्चा करै छथि। ओना तँ महावीरक वचन अर्ध-मागधी प्राकृत आ बुद्धक वचन मागधी-प्राकृतमे देल गेल मुदा ई दुनू मूलतः जनभाषा रहए। मुदा जखन विभिन्न क्षेत्रक लोक जुमलाह तँ बुद्ध सभकेँ अपन क्षेत्रक भाषामे बुद्धवचन सिखबा लेल कहलन्हि: अनुजानामि भिक्खवे, सकायनिरुत्तियाबुद्धवचनं परियापुणितं- माने भिक्षु लोकनि, अपन-अपन भाषामे बुद्धवचन सिखबाक अनुमति दै छी। आ बुद्धवचनमे प्रधान तत्व जनभाषा मागधीक रहल मुदा आन आन भाषाक तत्व सेहो फेंटाएल; आ से भाषा पालि भऽ गेल। मैथिली गजल- दू युग मैथिली गजलक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। गजलक प्रारम्भ इस्लामक आगमनसँ पूर्वक घटना अछि आ अवेस्ता आ वैदिक संस्कृत मध्य ढेर रास साम्य अछि। दोसर दुर्भाग्य मायानंद मिश्रक ओ कथन भेल जाहिमे ओ घोषणा केलथि जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए, हुनकर तात्पर्य दोसर रहन्हि मुदा लोक अही तरहेँ ओकरा प्रस्तुत करए लागल, कारण ओ स्वयम् गीतल नामसँ गजल लिखलन्हि। मैथिली गजलमे "अनचिन्हार आखर" सन ब्लाग उपस्थित भेल जतए बहर (छन्दयुक्त) गजल आ गजलकारक लाइन लागि गेल। मुदा सभसँ बड़का दुर्भाग्य ई भेलै जे मैथिलीक किछु तथाकथित शाइर सभ रामदेव झा द्वारा बहर संबंधी विचारकेँ नकारि देलन्हि ( देखू- लोकवेद आ लालकिलामे देवशंकर नवीन जीक आलेख)। जँ वर्तमानमे गजलक परिदृश्यकेँ देखी तँ मोटामोटी दूटा रेखा बनैत अछि (जकरा हम दू युगक नाम देने छी) पहिल भेल "जीवन युग" आ दोसर भेल "अनचिन्हार युग"। आब कने दूनू युग पर नजरि फेरल जाए। 1) जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह। रामलोचन ठाकुर जीक बहुत रचना गजल अछि मुदा ओ अपने ओकर क्रम-विन्यास कविता-गीत जकाँ बना देने छथिन्ह मुदा किछु गजलक श्रेणीमे सेहो अबैए। ऐ “जीवन युग”क गजलक प्रमुख विशेषता अछि बे-बहर अर्थात बिन छंदक गजल। ओना बहरकेँ के पूछैए जखन सुरेन्द्रनाथ जी काफियाक ओझरीमे फँसल रहि जाइ छथि। एकर अतिरिक्त आर सभ विशेषता अछि ऐ युगक। आ जँ एकै पाँतिमे हम कहए चाही तँ पाँति बनत---" गजल थिक, ई गजल थिक, आ इएह टा गजल थिक"। 2) आब कने आबी " अनचिन्हार युग" पर। ऐ युगक प्रारंभ तखन भेल जखन इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल गजल आ शेरो-शाइरीकेँ समर्पित ब्लाग "अनचिन्हार आखर" ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) क जन्म भेल।आ ऐ अन्तर्जालक “अनचिन्हार आखर” जालवृत्तक नामपर हम ऐ युगक नाम "अनचिन्हार युग" रखलहुँ अछि। ऐ युगक किछु विशेषता देखल जाए- · गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारण---- ई सौभाग्य एकमात्र "अनचिन्हारे आखर"केँ छैक जे ओ हमरासँ १३ खंडमे (एखन धरि १३ खण्ड) "मैथिली गजल शास्त्र" लिखेलक। आ ई मैथिलीक पहिल एहन शास्त्र भेल जइमे गजलक विवेचन मैथिली भाषाक तत्वपर कएल गेलै। तकरा बाद आशीष अनचिन्हार सेहो "गजलक संक्षिप्त परिचय" लीख ऐ परंपराकेँ पुष्ट केलथि। आ एकरे फल थिक जे सभ नव-गजलकार बहरमे गजल कहि रहल छथि। · स्कूलिंग ---- "अनचिन्हार आखर" गजल कहेबाक परंपरा शुरू केलक आ तइमे सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल आदि गजलकार उभरि कए अएलाह। · गजलमे मैथिलीक प्रधानता----"अनचिन्हार युग" सँ पहिने गजलमे उर्दू-हिन्दी शब्दक भरमार छल आ मान्यता छल जे बिना उर्दू-हिन्दी शब्दक गजल कहले नै जा सकैए। मुदा "अनचिन्हार आखर" ऐ कुतर्ककेँ धवस्त केलक आ गजलमे १००% मैथिली शब्दक प्रयोगकेँ सार्वजनिक केलक। · गजलक लेल पुरस्कार योजना--- "अनचिन्हार आखर" मैथिली साहित्य केर इतिहासमे पहिल बेर गजल लेल अलगसँ पुरस्कार देबाक घोषणा केलक। ऐ पुरस्कारक नाम "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा" पुरस्कार अछि। · उपर चारू विशेषताक आधारपर एकटा अंतिम मुदा सभसँ बड़का विशेषता जे निकलल ओ थिक मायानंद मिश्रक ओइ कथनक खंडन, जकर अभिप्राय छल जे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखल नै जा सकैए। "अनचिन्हार आखर" सरल वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दक अतिरिक्त फारसी/ उर्दू बहरमे सेहो मैथिली गजल लिखबाक शास्त्र ओ उदाहरण खाँटी मैथिली शब्दावलीमे प्रस्तुत केलक। विदेशी पूँजी निवेशक भाषापर (मैथिली सहित) प्रभाव विदेशी पूँजीक भारतमे सोझ निवेश दोसर देशक फर्मसँ मिलि कऽ वा ओकर सम्पत्ति वा ओकर स्टॉक कीनि कऽ होइत अछि। ओ ऐ लेल स्वॉट अनेलिसिस करै छथि आ अपन प्रवेशक लेल अपन कम दाममे उत्पादन आ सेहो तीव्र गतिसँ कएक तरहक उपाय द्वारा करबाक क्षमताकेँ देखैत करै छथि। कोन देशमे विदेशी पूँजी निवेश होएत से किछु गपपर निर्भर करैत अछि। चीनमे भारतक बनिस्पत बेशी विदेशी पूँजी आओत कारण भारतमे कार्य करबा लेल ढेर रास लोकतंत्रीय प्रक्रिया सभ छै जे उत्पाद केर दाम बढ़बैत छै। ई एना बूझि सकै छी जापान आ स्विटजरलैण्ड आदि देशमे विदेशी पूँजी कम आएल बनिस्पत स्पेनक। आ ऐ तरहेँ तुलना करी तँ नेपालमे भारतक अपेक्षा तुलनात्मक पूँजी निवेश बेशी आओत। मैथिली आ आन भाषामे विदेशी पूँजी निवेशक आगमनक सम्भावना देखी तँ तुलनात्मक रूपमे मैथिलीमे बेशी पूँजी आओत, नेपाली वा हिन्दीक तुलनामे। आ मैथिलीक सन्दर्भमे नेपालक मैथिलीक भविष्य भारतक मैथिलीक भविष्यक तुलनामे बेशी नीक बूझि पड़त जँ विदेशी पूँजीक गप आओत। मुदा विदेशी पूँजी मात्र प्रबन्धन वा अर्थशास्त्रक उपरोक्त सैद्धांतिक प्रतिफल टा नै अछि। एतए हम राजनैतिक स्थिरता आ सामाजिक संकट दुनूकेँ सोझाँ पबै छी। भारतक भयंकर लाइसेंस फीस जेना सूचना आ प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे मैथिलीक दुर्दशाक लेल जिम्मेद्दारी लेलक से नेपालमे नै अछि। से ओतए रेडियो आ टी.वी.पर मैथिली नीक दशामे अछि। मुदा राजनैतिक अस्थिरता कखनो काल नेपालमे पूँजी निवेशमे बाधक भऽ जाइए। तहिना नेपालक मैथिलीक सामाजिक आधार विस्तृत अछि मुदा भारतक तेहन नै अछि। से भारतमे मैथिलीक लेल पूँजी निवेशक ई ऋणात्मक गुणक अछि। जेना ऊपर कहने छी जे कोनो विदेशी पूँजी निवेश होएत तँ पाइ लगेनहार पहिने स्वॉट एनेलिसिस करत। मैथिलीक सन्दर्भमे स्वॉट एनेलिसिस:- मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस (हमर गुरुजी चमू कृष्ण शास्त्री जीक ऐमे बड़ पैघ योगदान छन्हि।) मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीकेँ ऐ कसौटीपर कसै छी। S- Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल – मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे ऐ भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ ऐ मे मैथिली नै बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। ऐ भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जइमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। ऐ भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। W- Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता – प्रशंसा परम्परा जइमे दोसराक निन्दा सेहो ऐमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक। परस्पर प्रशंसा सेहो ऐमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नै बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ ऐमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ ऐमे की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ ऐ लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। O- Opportunity- अवसर, योग, अवकाश – विशिष्ट विषयक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नै भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नै देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि। T- Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् – हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषय अछि आ भाषणक नै कार्यक आवश्यकता अछि। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नै स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। यूनेस्को कहैत अछि जे भारत विश्वक ६ठम सभसँ पैघ पुस्तक प्रकाशक अछि जतए अंग्रेजी लगा कऽ २५ मान्यता प्राप्त भाषामे पोथी प्रकाशन होइ छै। अंग्रेजीक पोथी प्रकाशनमे भारत संयुक्त राज्य अमेरिका आ ग्रेट ब्रिटेनक बाद तेसर स्थानपर अछि। मुदा चौबीस मुख्य भाषामे सँ यूनेस्कोक अनुसार पुस्तक प्रकाशन लेल मात्र १८ भाषा महत्वपूर्ण अछि आ ऐ १८ भाषामे मैथिली नै अछि। मैथिली ऐ १८ मे नै अछि। फेडरेशन ऑफ इण्डियन पब्लिशर्सक अनुसार मोटामोटी भारतमे १६००० प्रकाशक छथि जे सालमे ७०००० पोथी प्रकाशित करै छथि। ऐमे २१,००० पोथी अंग्रेजीमे छपैए आ तहूसँ बेशी पोथी हिन्दीमे छपैए। भारतमे साक्षरताक स्थिति जेना-जेना नीक हेतै, तेना-तेना पोथी पढ़ैबलाक संख्यामे सेहो वृद्धि हेतैक। नेपालमे मुख्यतः नेपालीक पोथी छापल जाइत अछि। भारत आ नेपाल दुनू ठाम मैथिली पोथीक प्रकाशन गुण आ संख्या दुनूमे पछुआएल अछि। सरकारी संस्थाक संग विदेशी निवेशकक सहयोग: आब प्रकाशन उद्योगसँ आगाँ बढ़ी आ सूचना-प्रसार माध्यमक आन क्षेत्र जेना टी.वी., रेडियो आ ऑनलाइन भाषाइ उपकरणपर आउ। एतऽ विदेशी निवेशक हमरा सभ लेल डॉक्यूमेन्टरी, मनोरंजन आ भाषाइ उपकरणक निर्माणमे सहयोग दऽ सकै छथि। सरकार मान्यताप्राप्त भाषा लेल बिना बजारकेँ ध्यानमे रखने खास कऽ मैथिली सहित ओइ छह भाषाकेँ ध्यानमे राखैत काज करए तँ बजारक दृष्टिसँ जे सांस्कृतिक ह्रास सूचना-प्रौद्योगिकी मध्य देखबामे आबि रहल अछि से मैथिलीमे नै आओत। अरबी भाषाकेँ फंडक कोनो कमी नै छै मुदा ओ भाष किए मरि रहल अछि, जखन ओकरा पक्षमे सरकारी कामकाज छै, मस्जिद छै, शिक्षा पद्धति छै। लेबनान, जोर्डन आ इजिप्टक अतिरिक्त सउदी अरब आ आन गल्फ देशक एकरा संरक्षण छै। मुदा पाइ एकरा लेल आफत बनल छै। सभ शेख विदेशसँ पढ़ि कऽ अबैत छथि आ मिश्रित अरबी बजै छथि आ तकरा फैशन मानल जा रहल छै। जै अरबीमे कुराण लिखल गेल आ आइ काल्हिक शैक्षिक “आधुनिक मानकीकृत अरबी- मॉडर्न स्टैण्डर्ड अरेबिक- (एम.एस.ए.)” मे बड्ड पैघ भेद आबि गेल छै। ई “आधुनिक मानकीकृत अरबी” बाजै जाए बला अरबीसँ फराक भऽ गेल अछि आ एकर काज मात्र सभ अरब देशक बीच सूत्रबद्ध करबा धरि सीमित भऽ गेल छै, जइसँ सभ एक दोसराकेँ बुझि पाबए। मुदा यएह “आधुनिक मानकीकृत अरबी” दृश्य-श्रव्य-प्रिंटमे अछि जे ककरो मातृभाष नै छिऐ वरन व्याकरण पढ़ि कऽ सीखल जाइ छै। विदेशी निवेशककेँ जे सरकार मैथिली लेल मनोरंजक कार्यक्रमकेँ मैथिलीमे डब करबाक लेल सहायता करए तँ कार्टून चैनल सभक कार्यक्रम आ धारावाहिक सभ मैथिलीमे प्रसारित भऽ सकत भने ओकरा विज्ञापन भेटौ वा नै। आ एक बेर जे ई पहिया घुमत तँ मैथिली जीबि उठत। आ ई पहिया तखने घुमत जखन मधुबनी-दरभंगा-सहरसा-सुपौलक ब्राह्मण-कायस्थ-सवर्ण मैथिलीकेँ जीबि उठऽ देताह, अपन ऋणात्मक ऊर्जाकेँ विराम देताह, समाजक सभ वर्ग जे मैथिलीसँ जुड़ि रहल अछि ओइमे बाधा देबाक बदला सहयोग करताह। समाजक राक्षसी प्रतिभायुक्त ई सर्वहारा वर्ग मैथिलीक रक्षा लेल समर्पित हसेरी बनत तखने ई भाषा आब बचत। मुख्य विदेशी निवेशक: अखन धरि हार्पर कॉलिन्स, पेंगुइन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मैकमिलन, रैंडम हाउस, पिकाडोर, हैचेट आ रुटलेज हावर्ड बिजनेस पब्लिशिंग अपन शाखा वा भारतीय सहयोगीक माध्यमसँ भाषायी क्षेत्रमे निवेश केने अछि। मुदा से निवेश अंग्रेजी धरि सीमित भऽ गेल अछि। भारतमे प्रकाशन उद्योगमे विदेशी खिलाड़ी अएलाक बाद एकटा पेंगुइन हिन्दीकेँ छोड़ि देल जाए तँ विदेशी निवेश भारतीय भाषामे लगभग नगण्य अछि। एकर कारण सेहो स्पष्ट अछि। भारतीय भाषाक प्रकाशक सरकारी खरीदपर निर्भर छथि आ गएर सरकारी खरीदमे ओ टेक्स्टबुक छपाइपर जोर दै छथि। विदेशी निवेशक सरकारी खरीद आ टेक्स्टबुक छपाइक आधारपर अपन नीति निर्धारित नै करै छथि। मैथिलीक लेल ई वरदान होइतए मुदा जे भविष्यक साक्षरता वृद्धिक अनुमान लैयो कऽ चली तँ नव साक्षर मैथिली पढ़ताह तकर आशा वर्तमान शिक्षा प्रणालीमे मैथिलीक कतिआएल स्थितिकेँ देखैत असम्भवे बुझा पड़ैत अछि, आ मैथिलीमे ने सरकारी लाइब्रेरीक खरीदक आशा छै आ ने टेक्स्ट बुक छपाइक। पाठकक संख्या तखन इन्टरनेटपर बढ़ाबए पड़त, आ जे पाठक कहियो सरकारी शिक्षा प्रणालीमे मैथिली नै पढ़ि सकल छथि तिनका प्रारम्भमे मंगनीमे डाउनलोडक सुविधा देबऽ पड़त। मैथिलीसँ अंग्रेजी आ संस्कृत आ तकर माध्यमसँ आन भाषामे अनुवाद द्वारा सरकारी आ संस्थागत पुरस्कार पद्धति द्वारा कतिआएल पोथी सभकेँ सोझाँ आनए पड़त जइसँ मैथिली साहित्यक उत्कृष्टता विदेशी निवेशकक सोझाँ आबए। आ ओम्हर सरकारी स्कूलक अतिरिक्त पब्लिक स्कूल सभमे सेहो मैथिलीक पढाइ हुअए तइ लेल समर्पित हसेरी तैयार करए पड़त। एक दोसरापर प्रत्यारोप लगेलाक बदला (कायस्थ आ ब्राह्मण द्वारा एक दोसरापर, मधुबनी-सहरसा-मधेपुरा-समस्तीपुर-बेगुसराय, पूर्णियांक लोक द्वारा एक दोसरापर आरोप-प्रत्यारोप जे मैथिलीक दुर्दशा लेल हम नै ओ जिम्मेवार छथि- तइसँ हटि कऽ) एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। आ जनताकेँ जोड़ए पड़त। हा पुरस्कार केलाक बदला जन साहित्यकारकेँ चिन्हबापर, जन नेताकेँ चिन्हबापर, जन विक्रेताकेँ चिन्हबापर अपन जान-जी लगाबऽ पड़त। विदेशी निवेशसँ छोड़ू भारतीय प्रकाशक जे कहियो ऐ क्षेत्रमे आबऽ चाहलक वा सरकारी खरीदक मशीनरी जे कोनो मैथिलीक पोथी कीनऽ चाहलक वा अनुवाद लेल कोनो स्वयंसेवी संस्था मैथिली पोथी सभक चयन करऽ चाहलक तखनो मैथिली साहित्यक पुरोधा लोकनि द्वारा, जे सलाहकार बनलाह, द्वारा भ्रमित सूची देल गेल, कतेक रास मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि देशक बाहर टपा देल गेल आ मारते रास लोक द्वारा ढेर रास बखेरा ठाढ़ कएल गेल। से सभ कियो भागि गेलाह, बाहरियो आ मैथिली सेवी सेहो। सरकारी खरीद गुणक आधारपर नै भेल, पैरवी-पैगाम आ ढेर रास आन गुणकक आधारपर भेल। विदेशी निवेशकक लग ई सभ ऋणात्मक पक्ष लऽ कऽ हमरा सभ कोना जा सकब। विदेशी निवेशसँ मैथिलीपर अप्रत्यक्ष प्रभाव: मैथिलीपर विदेशी निवेशक अप्रत्यक्ष प्रभावक रूपमे मैथिली बाजैबलाक संख्याक घटोत्तरी आ मैथिलीक शब्दावलीक ह्रासकेँ राखल जाइत अछि। ओना ई सभ भारत आ नेपालमे पैघ नग्रक अनियन्त्रित विकास आ छोट नग्रक बिना अपन आर्थिक आधारक मात्र जमीनक खरीद-बिक्रीक कारणसँ विस्तारक कारण बेसी भेल अछि। मैथिली भाषीक एके खाढ़ीमे जतेक पड़ाइन भेल अछि से आन वर्गमे तीन-चारि खाढ़ीमे भेल (जेना तमिल वा बांग्लाभाषीकेँ लऽ सकै छी।)। मुदा आनो भाषा-भाषीमे विदेश पड़ाइनसँ भाषाक लोप भेल अछि मुदा संस्कृतिक लोप नै तँ आन वर्गमे भेल अछि आ ने मैथिलीभाषी वर्गमे। मैथिली भाषीकेँ लऽ कऽ दिल्लीमे ई कहबी भऽ गेल अछि जे आन वर्ग पाँच साल दिल्लीमे रहलापर पंजाबी बाजऽ लगै छथि आ हुनकर घरक स्त्रीगण करवा-चौथ करऽ लगै छथि मुदा मैथिलीभाषी नै तँ पंजाबी सिखै छथि आ ने हुनकर घरक स्त्रीगण करवा-चौथ करै छथि। हँ जखन अहाँ पत्नीसँ मैथिलीमे नै बजबै आ बच्चाकेँ गामक दर्शनो नै करऽ देबै तँ ओ मैथिली बाजब छोड़बे करत। विदेशी निवेश जाइ तरहेँ हिन्दी आ अंग्रेजी कार्टून चैनलमे भेल अछि, ओइसँ मैथिलीटा नै पंजाबीपर सेहो संकट आबि गेल अछि। मुदा ई एकटा फेज छिऐ, आ ई फेज बीस बर्खमे खतम भऽ जाएत। जे परिवार ऐ बीस बर्खमे मैथिली बाजब छोड़ि देताह हुनका हम मैथिली दिस सोझ रूपमे नै घुरा सकब। मुदा सांस्कृतिक सन्निकटताक कारणसँ मैथिलीक परियोजना, अनुवाद, ऒडियो-वीडियो आ संचार परियोजनाकेँ ओ समर्थन करबे करताह, तकरा सम्मान देबे करताह। आ ई अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिली लेल वरदान सिद्ध हएत। आ एकटा पुनर्जागरणक काल अखन चलि रहल अछि तकर पुनरावृत्ति बीस बर्ख बाद हएत। मैथिली युद्धसँ बहार भऽ जीवित निकलत आ सुदृढ़ हएत। विदेशी निवेशककेँ मैथिलीमे निवेश केलासँ लाभ: विदेशी निवेशक कल्याणकारी कार्य सेहो करै छथि। हुनका मैथिलीक विशेषता बुझाबए पड़त। विश्व प्रसिद्ध वायोलिन वादक स्व. येहुदी मेनुहिन मैथिलीकेँ संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा कहने छलाह (बी.बी.सी.पर विद्यापति संगीत सुनि कऽ, उदय प्रकाश द्वारा सेहो कोट कएल)। विदेशी निवेशकक किछु निवेश यूनेस्कोक भाषा सम्बन्धी नीतिक आधारपर सेहो करैत अछि। आ ई कल्याणकारी निवेश लाभपर आधारित नै होइत अछि, सरकारी खरीदपर आधारित नै होइत अछि, विज्ञापनपर आधारित नै होइत अछि। अन्तर्राष्ट्रीय सर्टिफिकेशनपर आधारित गएर सरकारी संस्था सभक माध्यमसँ मैथिलीमे शैक्षिक पोथी आ मनोरंजन आ स्वास्थ्य आधारित फिल्म डोक्यूमेन्टरीक मैथिली भाषी क्षेत्रमे ग्राम पंचायतक स्कूल सभक माध्यमसँ कएल जाए तँ मैथिली भाषी लोकक हीन भावनामे कमी आओत आ भाषायी क्रान्तिक संगे आर्थिक क्रान्ति सेहो आएत। होलीपर व्यंग्य “देखियौ तँ। एतेक टाक अपन भारत आ छोट सन देश सभसँ हारि जाइए। कखनो काल ओना जितितो अछि। क्रिकेटे टा नै यौ, ओहो, आनो खेल सभमे देखू ने।” “औ बाबू। क्रिकेट, फुटबॉलमे देश पैघ रहने थोड़बे होइ छै। पूरा देश मिलि कऽ थोड़बे खेलाइ छै। यौ, एगारहे टा ने खेलाड़ी खेलेतै यौ। आ से पैघ देश रहौ आकि छोट देश।” “मुदा पैघ देशमे ११ टा खेलाड़ी चुनबा काल नीक आ तेजगरकेँ नै चुनल हएत की? ” “नीक आ तेजगर चुनबा मे सेहो झमेला अछि। आब दक्षिण अफ्रीकाकेँ लिअ। जखन ओतऽ रंगभेद रहै तखन खाली गोरका खेलाड़ी चुनल जाइ छलाह। आब रंभेद खतम भेल तँ बीच मे कारी खेलाड़ी सेहो चुनल जाए लगलाह। मुदा जखन टीम हारऽ लागल तँ पता लागल जे उल्लिखित रूपमे ई निर्णय लेल गेल छल जे अदहा कारी आ अदहा गोर खेलाड़ी चुनल जएताह। आब भारतेकेँ लिअ। उत्तर-दक्षिण, पूब-पच्छिम आ मध्य सन कतेक क्षेत्रसँ बराबर मात्रामे खेलाड़ी चुनल जाइत छथि। पहिने जे टीम रणजी ट्राफी जितै छल तकर ढेर रास खेलाड़ी टीम मे आबि जाइ छलाह। आ आब साहित्यमे सेहो ई प्रवृत्ति आएल अछि।” “साहित्यक गप कतऽ घोसिया देलियै मीत भाइ।” मीत भाइ चुनौटी निकालै छथि, एक कातसँ अहगरसँ तमाकुर झाड़ै छथि आ फेर चुनौटीक दोसर भागसँ आंगुरसँ चून बहार करै छथि आ तरहत्थीपर राखल तमाकुरमे मिज्झर करै छथि। जखन तमाकुर आ चूनक गधमिसान उठै अछि तखन नोसि झाड़ैत तमाकुरकेँ ठोढ़क नीचाँ दाबि दै छथि। “हौ, सभ गप मिलै छै। मैथिली साहित्यकेँ लैह। साहित्य आगाँ बढ़ि गेल मुदा समीक्षक ओतै ठाढ़ छथि, माने पछुआ गेल छथि। आब साहित्यकारकेँ लैह। लोक आ समाज आगाँ बढ़ि गेल मुदा साहित्यकार ओतै ठाढ़ छथि, माने पछुआ गेल छथि।” “मुदा अहाँ तँ सभकेँ एक्के संगे डाङि दै छिऐ। अपवाद तँ सेहो होइ छै।” “हौ, अपवाद तँ बेसी चीजमे होइ छै। आ जतऽ नहियो छै ओतौ सम्भावना रहै छै जे अपवाद भऽ सकै छै भविष्यमे। मुदा अपवादक डरे की निअम बनेनाइ छोड़ि दियौ हौ।” “हँ, से तँ ठीके।” “आब मैथिली साहित्यमे आउ। दछिनाहा, पछिमाहा तँ कहल जाइ छै मुदा उतराहा, पुबाहा सुनने छहक?” “नै, से तँ नै सुनने छिऐ।” “आब सुनै छिऐ पटनाबला ग्रुप, दिल्लीबल ग्रुप, कलकत्ताबला ग्रुप, जनकपुरबला ग्रुप आ दरभंगाबला ग्रुप सभ सेहो छै।” “मुदा जनकपुर आ दरभंगाकेँ छोड़ि ई आन नग्र सभ तँ मिथिलासँ बाहर छै मीत भाइ।” “हौ, सएह ने कहै छिअह। आब पटनाबला ग्रुपमे सभ पटनाक लोक थोड़बे छै। किछु पटनाक लोक दरभंगाबला ग्रुपमे आ किछु कलकत्ताबला ग्रुपमे सेहो छै।” “माने मात्र नामकरण छै।” “नै हौ। नामकरण छै आ संख्याक बहुलताक आधारपर ई नामकरण छै।” “मुदा मीत भाइ। जइ रचनामे जान रहतै तँ बिन ग्रुपोक बात सुनल जेतै ने।” “हौ, मिथिलाक क्षेत्रफल तँ थोड़ छै। मुदा तैयो ग्रुप छै, किए छै से ने बुजहक।” “से किए छै मीत भाइ।” “हौ, गाममे रहै छह तँ एक्के गाममे कएकटा फाँट नै देखै छहक।” “से तँ ई पंचायती चुनाव देखार कैये देने छै।” “आब पंचायती चुनावकेँ दोष देबहक। हौ, प्रवृत्ति होइ छै। गाममे जातिक मध्य ग्रुप होइ छै।” “आ जे एकछाहा होइ, मैथिली साहित्य जकाँ, तखन?” “तखन तँ आरो ग्रुप होइ छै। माने ब्राह्मणमे देखहक। एकहरे, दलिहरे, सरिसवे खांगुर। चर्चा कऽ कए देखहक तखन पता चलतह। सरिसवे खांगुर कहतह जे एकहरेसँ बेसी धूर्त आर कियो नै आ एकहरे कहतह जे सरिसवे खाङुर बड्ड मारुख। यादवमे कृष्णौठ आ गरेड़ी आ वैश्यमे मारवाड़ी (बाहरी) आ देसवाल (एतुक्का स्थानीय), तहिना धानुकमे मगहिया आ देसिल। हौ, कतेक गनेबह। परुकाँ साल गन्धबरिया आ चौहानी राजपूतक बीच झमेला नै मोन छह। दियाराक बनौत आ गंगा दियाराक गंगौत अलगे संगठन छै।” “तँ की हम सभ खण्ड-पखण्ड भऽ गेल छी।” “नै हौ। तोरा कहलियह जे ई प्रवृत्ति होइ छै। आब आगाँ आबह। गाम छोड़ि झंझारपुर आबि जाह तँ सौंसे गौआँ एक। झंझारपुर छोड़ि दरभंगा आबि जाह तँ सौँसे जिला एक। दरभंगासँ पटना आबि जाह तँ सौँसे मिथिला एक। दिल्ली, कोलकाता, काठमाण्डू चलि जाह तँ सौँसे बिहार आ मधेस एक बुझेतह। हिन्दीमे नै देखै छहक, बिहारी लेखकक संगठन, मध्य प्रदेशक लेखकक संगठन; सहित्य क्षेत्रमे हौ।” “माने एक हेबा लेल दूर गेनाइ जरीरू छै।” “नै हौ, सेहो नै। बात फेर वएह छै। साहित्य समाजक दर्पण हेबाक चाही, मुदा ओ पछुआ गेल छै हौ। आगाँक बदला पाछाँ जा रहल छै हौ।” मीत भाइ तमाकुर थुकरै छथि। “ई बुझू जे लोक तँ जुड़ल अछि मुदा साहित्यकार सभ नै जुड़ल छथि। हुनका सम्मान चाही आ तै लेल ओ राजनीतिज्ञ बनि गेल छथि, मैथिलीकेँ खण्ड-पखण्ड करबामे लागल छथि। आ से होइ छै ऐ छोट होइत जाइत भाषाक भौलिक क्षेत्रमे! सहरसा, सुपौल, जनकपुर, मधुबनी, दरभंगासँ बढ़ि कऽ पटना, दिल्ली, कलकत्ता आ आब प्रिन्ट आ इन्टरनेटक साहित्य मध्य सेहो ई लोकनि अन्तर करऽ चाहै छथि।” “इन्टरनेट साहित्य मध्य सेहो अन्तर! से किए मीत भाइ।” “फेर वएह गप। प्रवृत्ति होइ छै हौ। हमरा लोकनिक एकटा सांसद भारतीय संसदमे भाखड़ा नांगल परियोजनामे पनबिजली निकालबाक योजनाक विरोध केने छलाह।” “से किए मीत भाइ?” “प्रवृत्ति होइ छै हौ, जखन तोहर साहित्यकार आ राजनेता समाजसँ पछुआ जेतह तखन यएह सभ ने हेतह। आब सुनह ओ विरोध किए केने रहथिन्ह। हुनकर मानब रहन्हि जे पानिसँ जे बिजली निकालि लेल जाएत तँ किसानकेँ साबुत पानि नै भेटतै आ ओइसँ जे पटौनी हेतै तइसँ पुरकस फसिल नै हेतै।” “आब बुझलहुँ मीत भाइ। अन्तर्जालक साहित्यक विरोध पछुआएल साहित्यकार लोकनिक अज्ञानता देखबैत अछि।” “देखार तँ लोक भैये जाइ अइ ने हौ।” तावत मीत भाइ लेल अंगनासँ भांगक गोला अबै छन्हि आ हम बिदा होइ छी। ठामे गोनर भाइ भेटै छथि। “ई मितबा की सभ भाषण-भाख दै छल। बड्ड चिक्कन गप-सप होइ छै ओकर। मुदा लोक दू नमरी अछि। भरि टोलसँ केस-फौदारी लड़ि रहल अछि, पोखरिक केस तँ बान्हक केस। आ अपन माए-बापकेँ तँ बड्ड मारै छलै। मएकेँ तँ एक बेर टेटर उठि गेल छलै।” “मुदा गप्प-सप्प तँ ठीके कहै छलाह।” “तँ कोन नव गप कहै छलाह। हमहूँ कने काल बान्हपर लगही करबाक बहन्ने बिलमि गेल छलहुँ। ओ जे गप करै छल से ककरा नै बुझल छै यौ।” “हँ, से तँ सत्ते।” हम पुछै छियन्हि- “मुदा मीत भाइ जे अहूँक विषयमे सएह कहथि तखन?” “हौ, हमरा कोन बौस्तुक कमी अछि। मास्टरी करै छी। छह हजार नौ सए निनानबे टका दरमाहा अछि। ओइमे एक टका जोड़ि कऽ सात हजार टका सभ मास बैंकमे जमा कऽ दै छिऐ। आ से बीस बर्खसँ कऽ रहल छी, खेती-बाड़ीसँ गुजर करै छी। अपन बापक बेटा नै होइ जे ओइ जमा पाइसँ एकटा नवका पाइ निकालने होइ। लड़काबला लग जाइ छी, कन्यादान जे कपारपर अछि, तँ बैसैये नै दैए। की, तँ मास्टर छिऐ, कतऽसँ पाइ एतै। रौ, बाजै जो ने जे कत्ते पाइ चाही। ऐ कल्लर मीत भाइ जकाँ ठोड़बे हौ, जे भरि दिन भांग पीबि गप्प छँटैत रहैए।” बुझा पड़ल जे मीत भाइ गप्प सुनि लेने छलखिन्ह, से हमरा दुनू गोटेकेँ सोर केलन्हि। मुदा गोनर भाइ बहन्ना बना आगाँ ससरि गेलाह। मीत भाइ बजलाह- “हे ई की कहैए जे लड़काबला बैसैए नै दैए। से कोना बैसऽ दै जेतै। तेसुरकाँ हम एकटा कुटमैती कऽ देलिऐ। सभ चीज गछि लेलकै आ जखन बियाह भऽ गेलै तँ देबा काल की कहै छै बुजलहक। ... ’हमरा की मोन अछि जे ओइ धुनिमे की गछलियन्हि आ की नै, लड़काबला जे सभ कहैत गेलाह हम हँ, हँ करैत गेलियन्हि।’... आ जखन गछलाहा मोने नै छै तँ देतन्हि की कपार। आ से दोसर लड़काबलाकेँ बुझल छै, आ तखन के ओकरा बैसऽ देतै। आ हमर खिधांश करैए, धन हम जे एकटा कुटमैती भेलै।” मीत भाइ तामसे पएर झटकारैत आंगन दिस बिदा होइ छथि आ हम गुम्म भेल ठाढ़ रहि जाइ छी। मैथिली नाटक आ फिल्मक एकटा समानान्तर दुनियाँ १ मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मंडार- गाम कटघरा, प्रखण्ड- शिवाजीनगर, जिला समस्तीपुर। हिनके संग बिन्देश्वर मंडल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ - माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मँगा दे कि हम तँ माँ सिपाही हेबै- एखनो लोककेँ मोन छन्हि। एहि मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-बसन्त, अल्हा-ऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटिका पस्तुत कएल जाइत छल। मैथिली-बिदेसिया- पिआ देसाँतरक टीम सहरसा-सुपौल-पूर्णियाँसँ अबैत छल। हासन-हुसन नाटिका होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करियन, पो. वैद्यनाथपुर, जिला- समस्तीपुर विद्यापति नाटक गोरखपुर धरि जा कऽ खेलाएल छल। एहि मंडली द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटक अछि- लौंगिया मेरचाइ, विद्यापति, चीनीक लड्डू आ बसात। मैथिली नाटकक समानान्तर दुनियाँकेँ सेहो अभिलेखित आ सम्मानित कएल जएबाक प्रयास होएबाक चाही। २ मैथिली फिल्मक एकटा समानान्तर दुनियाँ मैथिलीक समानान्तर सिनेमा: धड़कन मीडिया हाउस प्रा. लि., मिरचैया, सिरहा, नेपालक (नन्दलाल महतोक प्रस्तुति, छायांकन- एम.समिर. निर्माता कमल यादव,लेखक-निर्देशक जितेन्द्र सहयोगी) "माई के ममता" मैथिली फिल्मक कलाकार: कलाकार- अबधेश कुमार गिरी, प्रियंका शर्मा, राजकुमार महतो, निर्मला महतो, अन्जनी मण्डल, नन्दन ठाकुर, धर्मेन्द्र साह, जितेन्द्र ठाकुर, रिता सहयोगी, निर्मला महतो, सुरजा महतो, प्रविन ठाकुर, दिनेश यादव, दिनेश ठाकुर, प्रेम कुमार सिंह, प्रेम कुमार महतो, अनिल कुमार महतो, ज्ञानेन्द्र कुमार महतो, संजय महतो, दशरथ महतो, बिरेन्द्र महतो,चम्पा देवी, मधुदेवी महतो, पुष्पा कर्ण, गुलजार यादव, रन्जु महतो, इन्दु साह, मनोज कुमार सिंह, राम कुमार साह, गणेश महतो, अरुण चौधरी, अनिल कुमार साह, पवन याद, हेमलाल यादव, सत्य नारायण महतो, गंगा महतो, भरोसी महतो, बैजू बावरा, अख्लेश्वर महतो, ध्रुव कुमार महतो, अनिल कुमार दास, विनोद महतो, सन्तोष साह, विपुल साह, प्रदीप साह, रोशन कुमार घिमिरे, मंचन महतो, जगदीश यादव, विन्देश्वर यादव, देविन्द्र यादव, ब्रह्मदेव महतो, इन्दु मल्लिक, उत्तम महतो, सियाशरण महतो, राधा कुमारी, सरस्वती कुमारी, कृष्णा कु. महतो, आकाश कुमार महतो, शिवम चौधरी, आशीष कुमार महतो विशेष:रिता कु. कर्ण, मिथलेश यादव, प्रमोद साह, रिना यादव, रेखा महतो, ज्ञानेन्द्र कुमार महतो, एम. समिर, अनिल कुमार महतो, सुरेश यादव, वि.पी.उदासी, सुरेश मण्डल, रामशुभक महतो, देव कुमार महतो, रामदेव पण्डित, अन्जनी मण्डल, महेश कुशवाहा, बिरेन्द्र कबीरपंथी, कुमार कुशे, बाबू राम महतो, धर्मेन्द्र साह, अनिल कुमार महतो, उपेन्द्र नारायण महतो, पवन मल्लिक, नन्दन ठाकुर, दिवाकर ठकुरी। गीतकार: जितेन्द्र सहयोगी संगीतकार: गुरुदेव कामत, कमल मण्डल, विश्वनाथ झा। गायक/ गायिका: गुरुदेव कामत, रामा मण्डल, हरिशंकर चौधरी, विश्वनाथ झा, सर्मिला महतो, मधु गुरुंग। -"प्रित के बाजी" मैथिली फिल्म -जी.प्र.गुप्ताक फ़िल्म -निर्देशक सूर्य साह -सम्पादक जितु सिंह - छायांकन कुंदन कुमार पप्पू -निर्माता जिवछ प्रसाद गुप्ता -सहनिर्माता राजकुमार गुप्ता -कथा वस्तु गीत श्याम पासवान -संगीत शैलेन्द्र वि.क. -गायक गायिका जिवछ, राजकुमार , सुनिता, प्रभा -नृत्य राम ठाकुर , अजय ठाकुर -द्वन्द कैलाश मंडल मेमोरी मिथिला फिल्मस प्रा.लि.क बैनरपर बनऽ जारहल मैथिली फिचर फिल्म आई लभ जनकपूरक शुभ मूहुर्त एहि श्रावण २५ गतेके होमय जारहल अछि । सभ पत्रकार, कलाकार, साहित्यकार लगायत मैथिली कलाप्रेमी लोकनि सँ आग्रह जे एहि समयमे उपस्थित भऽ कार्यक्रमके गरिमा बढाबी । कथा÷निर्देशन निराजन मेहता (मञ्जित) निर्माता प्रदिप राज÷कमल मण्डल संगीत ः कमल मण्डल गीत ः विनीत ठाकुर स्थान ः मधेश मिडिया हाउस समय ः दिनक १ बजे, श्रावण २५ गते हनुमान स्थान, अनामनगर, काठमाण्डू मैथिली फिल्म माई के ममता के च्यारिटी शो काठमाडौँ मे,कान्तिपुर हल, सितापाइला, काठमाडौँ, -माई के ममताके लेखक आ निर्देशक जितेन्द्र सहयोगी । मैथिली नाटक आ आधुनिक रंगमंच नाट्य शास्त्रमे वर्णन अछि जे नाटकक उत्पत्ति इन्द्रक ध्वजा उत्सवसँ भेल। मैथिली नाटक आ रंगमंचक इतिहास ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम आ अंकिया नाटसँ प्रारम्भ होइत अछि। कोलकातामे १८५० ई.क आसपास आधुनिक रंगमंच- ब्रिटिश क्लबमे शुरू भेल, मुदा बाहरी लोकक प्रवेश ओतए नै छल। पूर्व पीठिका: अंकिया नाटमे सेहो प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आ एतहु अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटकक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। शास्त्रीय आधार: मोहनजोदड़ो सभ्यतासँ प्राप्त कांस्य प्रतिमा नृत्यक मुद्राक संकेत दैत अछि, वर्तमान कथक नृत्यक ठाठ मुद्रा सदृश, दहिन हाथ ४५ डिग्रीक कोण बनेने आ वाम हाथ वाम छाबापर, संगहि वाम पएर किछु मोड़ने। ऋगवेदक शांखायन ब्राह्मणमे गीत, वाद्य आ नृत्य तीनूक संगे-संग प्रयोगक वर्णन अछि, ऐतरेय ब्राह्मणमे ऐ तीनूक गणना दैवी शिल्पमे अछि। ऋगवेद १०.७६.६ मे उषाक स्वर्णिम आभा कविकेँ सुसज्जित ऋषिक स्मरण करबैत छन्हि। ऋगवेदमे लोक नृत्यक (प्रान्चो अगाम नृतये) सेहो उल्लेख अछि। महाव्रत नाम्ना सोमयागमे दासी सभक (३-६ दासीक) सामूहिक नृत्यक वर्णन अछि। शांखायन १.११.५ मे वर्णन अछि जे विवाहमे ४-८ सुहागिनकेँ सुरा पियाओल जाइत छ्ल आ चतुर्वार नृत्य लेल प्रेरित कएल जाइत छल। वैदिक साहित्यमे विवाह विधिमे पत्नीक गायनक उल्लेख अछि। सीमन्तोन्नयन विधिमे पति वीणावादकसँ सोमदेवक वादयुक्त गान करबाक अनुरोध करैत छथि। अथर्ववेदमे वसा नाम्ना देवताक नृत्य ऋक्, साम आ गाथासँ सम्बन्धित होएबाक गप आएल अछि, सोमपानयुक्त ऐ नृत्यमे गन्धर्व सेहो होइत छलाह, से वर्णित अछि। अथर्ववेद १२.१.४१ मे गीत, वादन आ नृत्यक सामूहिक ध्वनिक वर्णन अछि। वैदिक कालमे साम संगीतक अलाबे गाथा आ नाराशंसी नाम्ना लौकिक गाथा-संगीतक सेहो प्रचलन छल। ऋक १,११५,२ मे उषाकालक सूर्योदयक बिम्ब सुन्दरीक पाछाँ जाइत युवकसँ भेल अछि। ऋक १,१२४,११ मे अरुणोदयमे लाल आभा आ बिलाइत अन्हारक संग, चूल्हिमे आगि वर्णन अछि आ बिम्ब अछि- गामक तरुणी रक्त वर्णक गाएकेँ चरबाक लेल छोड़ैत छथि। अथर्ववेद ४,१५,६ मे सामूहिक नाराक वर्णन अछि। यजुर्वेद ४०,१६ मे वर्णन अछि- सूर्यमण्डल सुवर्णपात्र अछि जे सूर्यकेँ आवृत्त कएने अछि। यजुर्वेद १७,३८-४१ मे संग्राम लेल बाजा संग जाइत देवसेना आ यजुर्वेद १७,४९ मे कवचक मर्मर ध्वनि वर्णित अछि। ऋगवेद १,१६४,२ आ यास्क ४,२७ मे संवत्सर, चक्रक वर्णन अछि। वृहदारण्यक उपनिषद २,२,३ मे सोमरसक उत्सक वर्णन अछि। वृहदारण्यक उपनिषद २,२,४ ओकर तटपरसात ऋषि आँखि, कान आदि अछि। अथर्ववेद १०,२,३१ मे शरीरकेँ अयोध्या कहल गेल अछि, गीता ५,१३ मे शरीरकेँ पुर कहल गेल अछि। यजुर्वेदमे नाट्य: यजुर्वेदमे किछु पारिभाषिक शब्दक विवरण अछि जेना सूत, शैलूष, चित्रकारिणी, ऐसँ लगैत अछि जे नाट्यमंडपक कल्पना छल। कला, साहित्य आ संगीतक समाज लेल कोन प्रयोजन, एकर नैतिक मानदण्ड की हुअए, ऐ दिस सेहो प्राच्य आ पाश्चात्य विचारक अपन विचार राखलन्हि। प्लेटो कहै छथि जे कोनो कला नीक नै भऽ सकैए किएक तँ ई सभटा असत्य आ अवास्तविक अछि। मुदा कला, संगीत आ साहित्य कखनो काल स्वान्तः सुखाय सेहो होइत अछि, एकरा पढ़ला, सुनला, देखला आ अनुभव केलासँ प्रसन्नता होइत छै, मानसिक शान्ति भेटै छै तँ कखनो काल ई उद्वेलित सेहो करैत छै। एरिस्टोटल मुदा कहै छथि जे कलाकार ज्ञानसँ युक्त होइ छथि आ विश्वकेँ बुझबामे सहयोग करै छथि। शब्दोचारण आ कला निर्माणक बाद बोध्य बौस्तुक उत्पत्ति होइ छै। शब्द आ ध्वनि, रूप, रस, राग, छन्द, आ अलंकारसँ ओकर औचित्य सिद्ध होइत छै। तखन मन्दिरक उत्सव आ राजाक प्रासादमे होइबला नाटक स्वतंत्र भऽ गेल आ एकर उपयोग वा अनुप्रयोग दोसर विषयकेँ पढ़ेबामे सेहो होमए लागल। भरतक नाट्यशास्त्र: नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। ग्राम्य माने भेल कृत्रिमताक अवहेलना मुदा अज्ञानतावश किछु गोटे एकरा गाममे होइबला नाटक बुझै छथि। लोकधर्मीमे स्वभावक अभिनयमे प्रधानता रहैत अछि, लोकक क्रियाक प्रधानता रहैत अछि, सरल आंगिक प्रदर्शन होइत अछि, आ ऐ मे पात्रक से ओ स्त्री हुअए वा पुरुष, तकर संख्या बड्ड बेसी रहैत अछि। नाट्यधर्मीमे वाणी मोने-मोन, संकेतसँ, आकाशवाणी इत्यादि; नृत्यक समावेश, वाक्यमे विलक्षणता, रागबला संगीत, आ साधारण पात्रक अलाबे दिव्य पात्र सेहो रहै छथि। कोनो निर्जीव/ वा जन्तु सेहो संवाद करऽ लगैए, एक पात्रक डबल-ट्रिपल रोल, सुख दुखक आवेग संगीतक माध्यमसँ बढ़ाओल जाइत अछि। नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत। लोकधर्मीक दू प्रकारक- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)। सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ(हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमंच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग ( वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीयर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढ़ब-ढ़ब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंगरचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति)द्वारा होइत अछि। दूटा आर अभिनय- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान। नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी-आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल। अभिनय मूल्यांकन: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि। नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह। भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे- १.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल। निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए। स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक –परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि।अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि। नाट्य-मंचन आ अभिनय कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि। भारत आ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि जे मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”। भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नहि। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतहु चरचा नहि अछि। अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दैत छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु होअए से आवश्यक नहि, पश्चिमी रंगमंचक नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। भरत:- नाटकक प्रभावसँ रस उत्पत्ति होइत अछि। नाटक कथी लेल? नाटक रसक अभिनय लेल आ संगे रसक उत्पत्ति लेल सेहो। रस कोना बहराइए? रस बहराइए कारण (विभाव), परिणाम (अनुभाव) आ संग लागल आन वस्तु (व्यभिचारी)सँ। स्थायीभाव गाढ़ भऽ सीझि कऽ रस बनैए, जकर स्वाद हम लऽ सकै छी बौद्ध चर्यागीतक बाद महाराज नान्यदेव सरस्वती हृदयालंकार फेर विद्यापति आ संगीतज्ञ जयतक शिव सिंहक दरबारमे हेबाक लोकोक्ति। विद्यापतिक पुरुष परीक्षाक कथा सभमे पुरुषक कला संगीतक प्रेम ओकर पुरुषार्थ सन महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। शुभङ्कर ठाकुरक श्रीहस्तमुक्तावली सेहो मिथिलाक ग्रन्थ मानल जाइत अछि ओना पाण्डुलिपिक उपलब्धताक आधारपर किछु विद्वान एकरा असमक रचना मानैत छथि। ऐ ग्रन्थमे अभिनयसँ सम्बन्धित हस्त परिचालनक विषद विवरण उपलब्ध अछि। आइने अकबरीमे विद्यापतिक नचारीक चर्च। विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे भरत नाट्य शास्त्र आधारित नाटक रंगमंच संकल्पना आधारित गजेन्द्र ठाकुर लिखित आ श्री बेचन ठाकुर निर्देशित “उल्कामुख” मंचित कएल गेल, जे मैथिलीमे ऐ तरहक पहिल प्रयास छल, ऐमे अभिनेत्री लोकनिक माध्यमसँ नाटक मंचन भेल, ऐमे पुरुख पात्रक अभिनय सेहो महिला कलाकार द्वारा भेल। भरत नाट्यशास्त्रक आधारपर रंगमंचक ड्राइंग श्रीमती एस.एस.जानकीक छल। ऐ तरहक एकटा प्रयास संस्कृत रंगमंचपर चेन्नैमे कएल गेल छल। मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ रामखेलावन मंडार- गाम कटघरा, प्रखण्ड- शिवाजीनगर, जिला समस्तीपुर। हिनके संग बिन्देश्वर मंडल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ - माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मँगा दे कि हम तँ माँ सिपाही हेबै- एखनो लोककेँ मोन छन्हि। एहि मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-बसन्त, अल्हा-ऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटिका पस्तुत कएल जाइत छल। मैथिली-बिदेसिया- पिआ देसाँतरक टीम सहरसा-सुपौल-पूर्णियाँसँ अबैत छल। हासन-हुसन नाटिका होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करियन, पो. वैद्यनाथपुर, जिला- समस्तीपुर विद्यापति नाटक गोरखपुर धरि जा कऽ खेलाएल छल। एहि मंडली द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटक अछि- लौंगिया मेरचाइ, विद्यापति, चीनीक लड्डू आ बसात। मैथिली नाटकक समानान्तर दुनियाँकेँ सेहो अभिलेखित आ सम्मानित कएल जएबाक प्रयास होएबाक चाही। नाट्य रंगमंच समिति सभ भंगिमा, पटना ; चेतना समिति, पटना, जमघट-, मधुबनी; मिथिला विकास परिषद, कोलकाता; अखिल भारतीय मिथिला संघ, कोलकाता; मिथिला कला केन्द्र, कोलकाता; मैथिली रंगमंच, कोलकाता; कुर्मी-क्षत्रिय छात्रवृत्ति कोष, कोलकाता; आल इण्डिया मैथिल संघ, कोलकाता; कर्ण गोष्ठी:जयन्त लोकमंच, कोलकाता; मिथिला सेवा संस्थान, कोलकाता; मिथि यात्रिक, कोलकाता; वैदेही कला मंच, कोलकाता; कोकिल मंच, कोलकाता; मिथिला कल्याण परिषद, रिसरा, कोलकाता (निर्देशन मुख्य रूपसँ श्री दयानाथ झा द्वारा १९८२ ई.सँ। सम्प्रति श्री रण्जीत कुमार झा निर्देशन कऽ रहल छथि, ०८.०१.२०१२ केँ हुनकर निर्देशनमे तंत्रनाथ झा लिखित “उपनयनक भोज” मंचित भेल।) ; झंकार, कोलकाता; मिथिला सेवा समिति बेलुर, कोलकाता; उदय पथ, कोलकाता। मिथिला नाट्य परिषद (मिनाप), जनकपुर; रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम; युवा नाट्य कला परिषद (युनाप), परवाहा, धनुषा; आकृति (उपेन्द्र भगत नागवंशी), जनकपुर; रंग वाटिका, नेपाल; चबूतरा, शिरोमणि मैथिली युबा क्लब, गांगुली, भैरब, मैथिली सांस्कृतिक युबा क्लब, बौहरबा, श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषद, गाम तिलाठी (सप्तरी, नेपाल); अरुणोदय नाट्य मंच, राजबिराज; सरस्वती नाट्य कला परिषद, मेहथ, मधुबनी; मैथिली लोकरंग (मैलोरंग), दिल्ली; मिथिलांगन, दिल्ली। मधुबनीक पजुआरिडीह टोलमे श्रीकृष्ण नाट्य समिति श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा आ गंगा झाक निर्देशनमे मैथिली नाटक मंचित होइत रहल अछि। सांस्कृतिक मंच, लोहियानगर, पटना; चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र, जनकपुर; गर्दनीबाग कला समिति, पटना; मिथिलाक्षर, जमशेदपुर; मैथिली कला मंच, बोकारो; उगना विद्यापति परिषद, बेगूसराय; मिथिला सांस्कृतिक परिषद, बोकारो स्टील सिटी; भानुकला केन्द्र, विराटनगर; आंगन, पटना; नवतरंग, बेगूसराय; भारतीय रंगमंच, दरभंगा; भद्रकाली नाट्य परिषद, कोइलख, मिथिला अनुभूति दरभंगा, विदेह अंतर्राष्ट्रीय ई-जर्नलक नाट्य उत्सव, नव ज्योति ड्रामेटिक क्लब, लौकही (१९९२ मे शम्भु शंकर आदि ब्रह्मस्थान आ उगना नाटक खेलेला)। निर्देशन: कालीकान्त झा "बूच", कामदेव पाठक, श्री कमल नारायण कर्ण (चीनीक लड्डू-ईशनाथ झा/ चारिपहर- मूल बांग्ला किरण मैत्र, मैथिली अनुवाद- निरसन लाभ), श्री श्रीकान्त मण्डल (चन्द्रगुप्त मूल बांग्ला डी.एल.राय, मैथिली अनुवाद- बाबू साहेब चौधरी/ पाथेय- गुणनाथ झा/ नायकक नाम जीवन- नचिकेता); श्री विष्णु चटर्जी आ श्री श्रीकान्त मण्डल (निष्कलंक- जनार्दन झा); प्रवीर मुखोपाध्याय; वीणा राय, मोहन चौधरी, बाबू राम सिंह, गोपाल दास, कुणाल, रवि देव, दयानाथ झा, त्रिलोचन झा, शम्भूनाथ मिश्र, काशी झा, अशोक झा, गंगा झा, गणेश प्रसाद सिन्हा, नवीन चन्द्र मिश्र, जनार्दन राय, श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अखिलेश्वर, सच्चिदानन्द, रमेश राजहंस, मोदनाथ झा, विभूति आनन्द, जावेद अख्तर खाँ, कौशल किशोर दास, प्रशान्त कान्त, अरविन्द रंजन दास, मनोज मनु, रोहिणी रमण झा, भवनाथ झा, उमाकान्त झा, लल्लन प्रसाद ठाकुर, रघुनाथ झा किरण, महेन्द्र मलंगिया, कुमार शैलेन्द्र, विनीत झा, किशोर कुमार झा, कुमार गगन, विनोद कुमार झा, के.अजय, छत्रानन्द सिंह झा, नीलम चौधरी, काजल, मनोज कुमार पाठक, आशनारायण मिश्र, श्री श्रीनारायण झा, प्रमिला झा, तनुजा शंकर, केशव नन्दन, ब्रह्मानन्द झा, संजीव तमन्ना, किसलय कृष्ण, प्रकाश झा, मुन्नाजी संजय कुमार चौधरी, कमल मोहन चुन्नू, अंशुमान सत्यकेतु, श्याम भास्कर, प्रेम कुमार, संगम कुमार ठाकुर, एल.आर.एम. राजन, भास्करानन्द झा, आशुतोष कुमार मिश्र, आनन्द कुमार झा, मनोज मनुज, संजीव मिश्र, स्वाति सिंह, स्वर्णिम, आशुतोष यादव अभिज्ञ, अशोक अश्क, दिलीप वत्स, तरुण प्रभात, माधव आनन्द, नरेन्द्र मिश्र, भारत भूषण झा, किशोर केशव, बेचन ठाकुर, उपेन्द्र भगत नागवंशी, अनिल चन्द्र झा, अंशुमान सत्यकेतु, आनंद कुमार झा, हेमनारायण साहू, रामकृष्ण मंडल छोटू, धीरेन्द्र कुमार,उत्पल झा, अभिषेक के. नारायण, चन्द्रिका प्रसाद। नाटक: नाटककार धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंशधरक चरित पर अवलंबित एवं हरण आकि स्वयंबर कथापर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक। विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।... मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।...जे जुआ खेलायब आ’ पांगना संगम ईएह दूटा केँ संसारक सार बुझैत छथि। असज्जति मिश्र पुछैत छथि जे के वादी आ’ के प्रतिवादी।स्नातक उत्तर दैत छथि-जे अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकहुँ आ’ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करैत छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि, जे ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ’ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ , जे ई तँ असले धूर्तसमागम भय गेल। विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइत छथि। एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मँगैछ। ओ’ हुनका असज्जातिमिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जातिमिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लय असज्जति मिश्रकेँ गतानि कए बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ’ बेहोश भय जाइत छथि। ओ’ हुनका मुइल बुझि कय भागि जाइत अछि। विदूषक अबैत अछि, आ’ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ’ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि, आ’ जे किछु आन प्रिय कार्य होय तँ से कहू। असज्जाति कहल जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलहुँ, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, एहिसँ प्रिय आब किछु नहि अछि। तथापि सर्वत्र सुखशांति हो तकर कामना करैत छी। जीवन झा जीवन झा लिखित नाटक सुन्दर संयोग, (1904), मैथिली सट्टक (1906), नर्मदा सागर सट्टक (1906) आ सामवती पुनर्जन्म (1908)। ऐ चारू नाटकक सामवेद विद्यालय काशीमे कएक बेर मंचन १९२० ई.सँ पहिनहिये भऽ चुकल अछि,"सुन्दर संयोग" एतैसँ प्रकाशित सेहो भेल। सुन्दर संयोगक किछु आर मंचन: १९७४ ई. माली मोड़तर (हसनपुर चीनीमिलक बगलमे), लक्ष्मीनारायण उच्च विद्यालय परिसरमे- निर्देशक श्री कालीकान्त झा "बूच", मुख्य अतिथि श्री फजलुर रहमान हासमी। दुर्गापूजामे। आयोजक देवनन्दन पाठक चीफ इन्जीनियर, आ केशनन्दन पाठक (ऑडीटर टीका बाबू), उद्घाटन: उदित राय मुखिया। १९७६: करियन, समस्तीपुर। निर्देशक: कामदेव पाठक। १९८१: पण्डित टोल, टभका (दलसिंहसरायक बगलमे): संयोजक डॉ उमेन्द्र झा "विमल", पूर्व प्रो. भाइस चान्सलर, का.सि. संस्कृत वि.वि.; आ म.म. चित्रधर मिश्र जे दरभंगा किलाक भीतरक शंकर मन्दिरक अधिष्ठाता रहथि आ म.म. उमेश मिश्र आ म.म. गंगानाथ झा हिनकर शिष्य रहथिन्ह। १९८३:मउ बाजितपुर (विद्यापति नगरक बगलमे) संस्कृत परम्परा आ पारसी थियेटरक गुणसँ ओतप्रोत ऐ नाटक सभक अन्यान्यो ठाम मंचन भेल अछि। ईशनाथ झा उगना: ई नाटक सभ महाशिवरात्रिकेँ गौरीशंकर स्थान, जमथुरिमे खेलाएल जाइत अछि। विद्यापति शिव-भक्त, हुनकर गीत-नचारी सुनबा लेल सिव विद्यापतिक घरमे उगना नोकर बनि आबि गेला। एक बेर विद्यापति यात्रापर छला आ उगना संगमे छलन्हि। रस्तामे पियास लगलापर उगना जटाक गंगधारसँ पानि निकालि विद्यापतिकेँ पियेलन्हि मुदा विद्यापतिकेँ ओइमे गंगाजलक स्वाद भेटलन्हि आ ओ उगनाक केश भीजल देखि सभटा बुझि गेलाह। उगना अपन असल रूपमे एलाह। मुदा उगना कहलखिन्ह जे विद्यापति ई गप ककरो नै कहताह नै तँ ओ अन्तर्धान भऽ जेताह। पार्वती चालि चलन्हि, विद्यापतिक पत्नी उगनाकेँ बेलपत्र अनबा लेल पठेलन्हि आ देरी भेलापर ओ उगनापर बाढनि उसाहलन्हि, विद्यापथि भेद खोलि देलन्हि आ उगना बिला गेलाह.. चीनीक लड्डू: सुधाकांत-प्रेमकांतक पिता गुजरि जाइ छथि आ से देखभाल मामा धर्मानन्द ट्रस्टी जकाँ करै छथि आ हुनकर सभक समर्थ भेलाक बाद सुधाकांतकेँ भार दऽ घुरि जाइ छथि। सुधाकांतक मुंशी बटुआ दास प्रेमकांतक पत्नी चण्डिका आ खबासनी छुलहीक सहयोगसँ बखरा करबा दै छथि, सुधाकान्त अपनो हिस्सा प्रेमकान्तकेँ दऽ दै छथि। सुधाकांत, पत्नी सुशीला आ बेटा सुकमार घरसँ बाहर कऽ देल जाइ छथि। सुधाकांतकेँ टी.बी. रोग मारि दै छन्हि। बटुआ दासक संगति प्रेमकांतकेँ सेहो दरिद्र कऽ दैत अछि। माम धर्मानन्द सुकमारकेँ अपन सम्पति लिखि दै छथि कारण हुनका सन्तान नै छन्हि। प्रेमकांत आ बटुआ दास सुकुमारकेँ मारबाक प्रयत्नमे बिख मिला कऽ चीनीक लड्डू सनेसमे सुकमारकेँ दै छथि मुदा ओइसँ बटुआ दास मरि जाइए, आ भेद खुजैए। उदयनारायण सिंह नचिकेता नायकक नाम जीवन : नवल नव विचारक अछि, शक्तिराय धनिक, कलुषित अछि आ अपन सहयोगी विनयपर चोरिक आरोप लगा ओकर बेटीक अपहरण आ बलात्कार करबैए। विनय आत्महत्या कऽ लैए। नवल आ ओकर मित्र प्रकाश आ दीपक सभटा भेद खोलैए। ओकर प्रेमिका बलात्कारक परिणामस्वरूप आत्महत्या करैए। नवल विक्षिप्त भऽ जाइए। एक छल राजा: एकटा राजा अभिमान कुमार देवक दिन मदिरा आ वैश्याक पाछाँ खराप भेलै। ओकरा एक्केटा बेटी मोहिनी छै, टकाक अभावमे ओकर बियाह नै भ्हऽ पाबि रहल छै। मुंशी विरंची, सेवक चतुरलाल आ धर्मकर्मवाली पत्नी संगे नाटक आगाँ बढ़ैए। मोहिनी आ शिक्षक शुभंकरक बीच प्रेम होइ छै। नो एण्ट्री: मा प्रविश: पोस्टमोडर्न ड्रामा, जकर एबसर्डिटी एकरा ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम लग घुरबै छै। स्वर्ग आकि नर्कक द्वारपर मुइल सभ अबै छथि आ खिस्सा-खेरहा सुनबै छथि, बादमे पता चलैए जे चित्रगुप्त/ धर्मराज सभ नकली छथि आ द्वारपर लागल अछि ताला, नो एण्ट्री। गोविन्द झा बसात: कृष्णकांत पिता द्वारा ठीक कएल युवती पुष्पा संग विवाह नै करै छथि, ओ शिक्षितसँ विवाह करऽ चाहै छथि, लिलीसँ प्रेम करै छथि। हुनकर पिता घर त्यागि दै छथि। पुष्पा घर छोड़ि महिला जागरणमे लागि गेलथि। पिताकेँ ताकैमे कृष्णकान्त असफल होइ छथि, लिलीकेँ छोड़ि रेलगाड़ीसँ कटऽ चाहै छथि, आश्रमक लोक हुनका बचा लै छन्हि, ओतए पिता, पुष्पा सभसँ भेँट होइ छन्हि, लिली सेहो बताहि भेलि ओतऽ आबि जाइ छथि। गुणनाथ झा "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकाक संचालन- सम्पादन केने छथि। मैथिलीमे आधुनिक नाटकक प्रणयन। हुनकर नाटक कनियाँ-पुतरा, पाथेय, ओ मधुयामिनी, सातम चरित्र, शेष नञि, आजुक लोक आ जय मैथिली सभक बेर-बेर मंचन भेल अछि। बाङ्गला एकाङ्की नाट्य-संग्रह ऐमे बांग्लाक २४ टा नाटककारक २४ टा नाटकक संकलन ओ सम्पादन अजित कुमार घोष केने छथि आ तकर बांग्लासँ मैथिली अनुवाद श्री गुणनाथ झा द्वारा भेल अछि। कनियाँ-पुतरा- गुणनाथ झा जीक ई पहिल पूर्णाङ्क नाटक थिक। नाटक बहुदृश्य समन्वित करैबला घूर्णीय मञ्चोपयुक्त अछि। कथा काटर प्रथापर आधारित अछि आ तकर परिणामसँ मुख्य अभिनेता आ मुख्य अभिनेत्री मनोविकारयुक्त भऽ जाइत छथि, तइ मनोदशाक सटीक चित्रण आ विश्लेषण भेल अछि। मधुयामिनी: एकाङ्क नाट्य शैलीमे दूटा पात्र, पुरुष संयुक्त परिवारक पक्ष लेनिहार आ स्त्री तकर विरोधी। संयुक्त परिवारक पक्ष लेनिहारक सामंजस्यपूर्ण विजय होइत अछि। "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकामे प्रकाशित। पाथेय: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित, मुदा पूर्णाङ्कक सभ विशेषता ऐमे भेटत। मुख्य अभिनेता मिथिलाक अधोगतिसँ दुखी भऽ गामकेँ कर्मस्थली बनबैत छथि, स्वजन विरोध करै छथि। मुदा बादमे पत्नी हुनकर संग आबि जाइ छथिन्ह। भाषा मधुर आ चलायमान अछि। लाल-बुझक्कर: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित। दाही रौदीसँ झमारल निम्न आ मध्य-निम्न वर्ग स्वतंत्रताक पहिनहियो आ बादो जीविकोपार्जन लेल प्रवास करबा लेल अभिशप्त छथि। माता-पिता विहीन लाल बुझक्करजी कनियाँकेँ नैहरमे बैसा कऽ आ सन्तानहीन पित्ती पितियैनकेँ छोड़ि नग्र प्रवास करै छथि। सातम चरित्र: एकाङ्क नाट्य शैलीमे रचित। मैथिली रंगमंचपर महिला अभिनेत्रीक अभाव, सातम चरित्रक प्रतीक्षामे पूर्वाभ्यास खतम भऽ जाइत अछि। "लोक मञ्च" मैथिली नाट्य पत्रिकामे प्रकाशित। शेष नञि: आधुनिक सामाजिक पूर्णाङ्क नाटक। पिता-माताक मृत्युक बाद अग्रजक अनुजक प्रति पितृवत व्यवहार। अनुज चाकरी करै छथि, परिवर्तनशील सामाजिक परिस्थितिक शिकार भऽ अचिन्तनीय कार्यकलाप करै छथि आ अग्रज प्रतारित होइ छथि। मुदा अग्रज मरणासन्न पत्नीक प्राणरक्षार्थ साहसपूर्ण डेग उठा लैत छथि। आजुक लोक: पूर्णाङ्क नाटक। विषय निम्नमध्यवर्गीय बेरोजगारी आ बियाहक दायित्वक बोझ। जय मैथिली: पूर्णाङ्क नाटक। मिथिलाक भाषिक-सांस्कृतिक समस्या एकर कथावस्तु अछि। महाकवि विद्यापति: विद्यापतिक नव विश्लेषण। महेन्द्र मलंगिया एक कमल नोरमे: माला पति राजेशकेँ सन्तान लेल दोसर बियाह लेल आग्रह करैए, मुदा पति मना करै छै, ओकर सासु ज्योतिषक संग मिलि मालाक दोसराक संग बेहोशीमे अश्लील फोटो लैए आ राजेशकेँ देखबैए। राजेश मालाकेँ घरसँ बहार कऽ दैए आ ज्योतिषीक पुत्रीक बियाह राजेशसँ भऽ जाइ छै। माला आत्महत्या करैए। जुआयल कनकनी: जीबू अपन माता-पिता द्वारा आत्महत्या लेल काकीकेँ दोषी मानैए मुदा बादमे जखन ओ बुझैए जे बैजू ओकर बहिनक शील भंग केलक। फेर बदला आ पश्चाताप। ओकरा आँगनक बारहमासा: बारह मासमे बोनिहारकक जिनगीक विवरण। छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। “अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। सुधांशु शेखर चौधरी भफाइत चाहक जिनगी: महेश बेरोजगार अछि, ओ चाह दोकान खोलैए ओ कवि सेहो अछि।इंजीनियर उमानाथक पत्नी चन्द्रमा दोकानपर देखलन्हि जे पुकार महेश कविता पाठ लेल जाइए, चन्द्रमा चाह बेचऽ लगै छथि, उमानाथ तमसा जाइ छथि। महेशक संगी सरिता, जे आइ.ए.एस.क पत्नी छथि, आबै छथि। लेटाइत आँचर: दीनानाथक एकेटा मात्र पुत्री ममताकेँ पति काटरक कारणसँ छोड़ि दै छन्हि। मुदा पुत्र मोदनाथक विवाहमे दहेज लेबाक प्रयत्नपर पुत्र हुनका रोकै छन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डल मिथिलाक बेटी-प्रथम दृश्य- महगीक विरोधमे कर्मचारीक हड़ताल। महगीक कारण- नोकरी दिस झुकने, खेतीक ह्रास। भू-सम्पत्तिक ह्रास, दान दहेज झर-झंझटक बढ़ोतरी। वियाहक लाम-झाम। पैसाक दुरूपयोग। कला प्रेमी धन सम्पत्तिकेँ तुच्छ बुझैत। कौरनेटियाक संग कओलेजक लड़की, जे नाच-गान सिखैत, चलि गेलि। झर-झंझटमे पोकेटमारी सेहो।सरकारी पदाधिकारीकेँ बाजैपर रोक। अपहरणक बढ़ोत्तरी, रंग-विरंगक अपहरणोक कारण िसर्फ पाइये नै जानोक खेलवाड़। सरकारी अफसरक नैतिक ह्रास। चम्मछक घटना। सरकारी तंत्र कमजोर भेने असुरक्षाक वृद्धि।समाजक विघटनमे जाति, सम्प्रदाय इत्यादिक योगदान, जइसँ इज्जत-आवरू धरि खतरामे।सिनेमा, खेल-कूदक प्रभावसँ नव पीढ़ी अपन सभ किछु- कुल, खनदान, वेवहार, छोड़ि, वाहरी हवाक अनुकरणमे पगला रहल अछि। ढहैत सामंतमे संस्कारक छाप। इनार-पोखरि स्त्रीगणक झगड़ाक अड्डा। मिथिला नारी शक्तिक प्रतीक सीता। दहेजक मारिमे जाति-पाँतिक नास। धन-सम्पत्ति आचार-विचार नष्ट करैत कोट-कचहरीक चपेटमे समाज, आपसी झगड़ाक कुप्रभाव। नवयुवकमे आत्मवलक अभाव नारीक बीच असीम धैर्य-वाल-विधवा मनुष्यपर समाजक प्रभाव। पढ़लो-िलखल कारगरो लड़कीक मोल दहेजक आगू चौपट अछि। ओना पुरूषक अपेक्षा नारीक महत्व, पुरूष प्रधान व्यवस्थामे कम रहल गहना-जेबर सेहो अहितकर। नव पीढ़ीक नारीमे नव उत्साहक जरूरत। नव-नव काज सिखैक हुनर। दोसर अंक- सामंती व्यसन- भाँग। नव पीढ़ी सेहो प्रभावित। श्रम चोर मिहनतसँ मुँह चोराएब। भाग्य-भरोसपर विसवास। धनक प्रभावसँ परिवारक विखरब। पिता-पुत्रक बीच मतभेद बलजोरी वा फुसला कऽ लड़का-लड़की वियाह...। खेतक लेन-देनमे घोखाधड़ी। जबूरिया, दोहरी रजिस्ट्री। घुसखोरी कमाइ प्रतिष्ठा। माइयो-वापक इच्छा रहैत जे बेटा घुस लिअए। नोकरीक विरोध... पुरूष प्रधान व्यवस्थामे नारीक रंग-विरंगक शोषण। पढ़ौने आरो समस्या। तेसर अंक - बहुराष्ट्रीय कम्पनीक कृषिपर दुष्प्रभाव, देशी उत्पादनक अभाव। दहेज समर्थक समाज आ दहेज विरोधी समाज दू तरहक समाज। परम्परा आ परम्परा विरोधी नव जाग्रत समाज। खण्ड-पखण्डमे समाज टूटल। नव मनुष्यक सृजन नव तकनीक नव सोच आ नव काज पकड़ने बहुराष्ट्रीय प्रभावसँ परिवार, समाज आ कला संस्कृतिपर दुष्प्रभाव, बेबस्था बदलने समाज बदलत। चारिम अंक- पाइ भेने विचारोमे बदलाव। जाहिसँ नव समाजक सूत्र पात-जन्म सेहो होइत। रामविलास (मिस्त्री) मनुष्यक महत्व दैत जइसँ दहेजकेँ धक्का लगैत। पहिनेसँ मिथिलांचलक लोक वंगल, असाम, नेपाल, ढाका, धरि ध्न कटनी, पटुआ कटनीक लेल जाइत छल। शिक्षाक विसंगति। ओकरा मेटाएब। पाँचम अंक- आदर्श वियाह। नव चेतनाक जागरण जे बेबस्था बदलत। कम्प्रोमाइज- सामंती समाजमे टुटैत कृषि आ किसानी जीवन, नब पूँजीवादी समाजमे कृषिकेँ पूँजी बनेबाक बेबस्था, बुद्धिजिवी आ श्रमिकक पलायनसँ गामक बिगड़ैत दशा, समन्वयवादी विचार-दर्शन। झमेलिया बिआह- मिथिलाक समाजमे अबैत बिआह-संस्कारक प्रक्रियामे रंग-बिरंगक बाहरी प्रभाव, बाहरी प्रभावसँ रंग-बिरंगक विवाद, झमेलक जन्म, झमेलियाक रूपमे बिआह प्रक्रियामे होइत विवादक विषद चर्च। बिरांगना- ग्रामीण जीवनक बजारोन्मुख हएब, सस्ता श्रम-शक्ति भेटलासँ पूँजीपति वर्ग द्वारा शोषण, श्रमक लूटसँ ग्रामीण लोक जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबए लेल मजबूर, रूपैयाक लालचमे नीच-सँ-नीच काज करबाक लेल तैयार लोक। तामक तमघैल- ढहैत सामंती समाजमे छिन्न-भिन्न होइत परिवार, रीति-नीति एवं परिवारिक सम्बन्ध, छिन्न-भिन्न होइत परिवारक आर्थिक आधार। सतमाए- कोनो संबंध दोषपूर्ण नै होइत छै बल्कि मनुष्यक बेबहार आ विचारमे दोष होइत छैक तही बेबहार आ विचारक सम्यक चर्च करैत ‘सतमाए’क आदर्शरूप प्रस्तुत कएल गेल अछि। कल्याणी- दिन-देखारे होइत अन्यायक प्रति सजगताक उल्लेख करैत नारी जागरणक चित्रण, बुनियादी समस्या दिस इशारा करैत समस्याक समाधान हेतु पैघ-सँ-पैघ दाम चुकबए पड़ैत अछि, तेकर चित्रण। समझौता- समाजमे कृषिकेँ पूँजी बनेबाक लेल टुटैत कृषि संस्कृतिक बुनियादी समस्याक वर्णन आ तकर निदान लेल समझौता हेतु सम्यक सोचक जरूरतिपर प्रकाश दैत ओकर महत्व ओ आवश्यकताक वर्णन। आनंद कुमार झा टाटाक मोल : काटर प्रथापर आधारित नाटक। गरीबनाथ आ सुमित्राक 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्या। पहिले बेटीक विवाहमे हुनकर बहुत खेत बिका गेलनि। दोसर बेटीक कन्यादानक लेल मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्हि। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि, अपन बहिनक देओर प्रभाकरसँ सिनेह करै छथि, छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्हि। कलह : आकाश बेरोजगार छथि। विभाता सुमित्रा अपन पुत्र राजीव लेल ज्येष्ठ पुत्रक संग यातना दैत छथि। एकटा अबोध नेनाक जन्म भेल.....। बदलैत समाज : एकटा ब्लड कैंसर पीड़ित घूरन जी अपन बीमार पुत्रक विआह करा दैत छथि। हुनका ओना बूझल नहि छलनि जे पुत्र अवधेश ब्लड-कैंसरसँ पीड़ित अछि। भजेन्द्र मुखियाक पुत्र अवधेशक मृत्युक भऽ गेलनि। अंतमे विधवा शोभाक एकटा सच्चरित्र युवक वीजेन्द्रसँ पुर्नविवाहक कल्पना कएल गेल। धधाइत नवकी कनियाॅक लहास : किछु गहनाक खातिर शिखाक आत्महत्याक प्रयास। हठात् परिवर्त्तन : देशभक्ति नाटक। गजेन्द्र ठाकुर उल्कामुख: पहिल मंचनक निर्देशक रहथि बेचन ठाकुर। जादू वास्तवितावादी ऐ नाटकमे इतिहासक एकटा षडयंत्रकेँ उघारल गेल अछि , मंच परिकल्पना रहए भरतक नाट्यशास्त्रक अनुसार। आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी ऐ मे पात्र छथि। पहिलसँ चारिम कल्लोल धरिक पात्र बदलि जाइ छथि, दोसर रूपमे पाँचम कल्लोलसँ ४ टा स्त्री पात्र बढ़ि जाइ छथि: रुद्रमति (माधवक माए) सोहागो (गंगाधरक माता), आनन्दा (गंगाधरक बहिन), मेधा (हरिकर- सेनापतिक बेटी)। गंगेश आ वल्लभाक प्रेम ऐ नाटकक विषय अछि। मुदा पहिल दू अंकक बाद तेसर आ चारिम अंक जादू वास्तविकतावादक उदाहरण बनि जाइए। आ आबि जाइ छथि सोझाँ उदयन, दीना, भदरी, आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी। आ शुरू भऽ जाइए इतिहासक एकटा षडयंत्रक अनुपालन। मुदा चारिम कल्लोलक अन्तमे भगता कहि दै छथि अपन शिष्यकेँ एकटा रहस्य.......जे विस्मरणक बादो आबि जाएत स्मरणमे।...बनि उल्कामुख... - पाँचम कल्लोलसँ संकेतक बदला वास्तविकता, कल्पनाक बदला सत्य... -पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल रहत, पाँचम कल्लोलसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत। गंगेशक तत्त्वचिन्तामणिपर ढेर रास टीका उपलब्ध अछि, गंगेशकेँ कहल जाइ छन्हि तत्वचितामणिकारक गंगेश; मुदा हुनकर कविता भऽ गेल छन्हि "उल्कामुख"!!! संकर्षण: ऐ नाटकमे एकटा पात्र, जे गाममे कहबैका आ दुष्ट-चलाक प्रवृत्तिक मानल जाइत अछि, दिल्ली एलापर (रस्ते सँ ओकर बुद्धि हेरेनाइ शुरू होइ छै) अपनाकेँ मूर्ख बुझैत अछि- बीचमे भारतक हरियाणाक एकटा कुकुरसँ सम्बन्धित लोककथा सेहो समाहित अछि। भऽ जाएब छू- (बाल चौबटिया-सड़क नाटक)- पर्यावरण आ विज्ञानकेँ सडक नाटकक माध्यमसँ पसारबाक अभियान। बेचन ठाकुर बेटीक अपमान आ छीनरदेवी: भ्रूण हत्या, महिला अधिकार आ अन्धविश्वासपर आधारित दुनू नाटक मैथिली नाटककेँ नव दिशा दैत अछि। अधिकार: इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.(सूचनाक अधिकार) सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला असली चरित्र मंजूरक कथा अछि। विश्वासघात: नेशनल हाइवेक जमीनक मुआवजामे ढेर रास पाइ देल जाइ छै आ ओकरा हड़पै लेल पारिवारिक सम्बन्धक बलि चढ़ि जाइ छै। आनंद कुमार झा टाटाक मोल : काटर प्रथापर आधारित नाटक। गरीबनाथ आ सुमित्राक 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्या। पहिले बेटीक विवाहमे हुनकर बहुत खेत बिका गेलनि। दोसर बेटीक कन्यादानक लेल मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्हि। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि, अपन बहिनक देओर प्रभाकरसँ सिनेह करै छथि, छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्हि। कलह : आकाश बेरोजगार छथि। विभाता सुमित्रा अपन पुत्र राजीव लेल ज्येष्ठ पुत्रक संग यातना दैत छथि। एकटा अबोध नेनाक जन्म भेल.....। बदलैत समाज : एकटा ब्लड कैंसर पीड़ित घूरन जी अपन बीमार पुत्रक विआह करा दैत छथि। हुनका ओना बूझल नहि छलनि जे पुत्र अवधेश ब्लड-कैंसरसँ पीड़ित अछि। भजेन्द्र मुखियाक पुत्र अवधेशक मृत्युक भऽ गेलनि। अंतमे विधवा शोभाक एकटा सच्चरित्र युवक वीजेन्द्रसँ पुर्नविवाहक कल्पना कएल गेल। धधाइत नवकी कनियाॅक लहास : किछु गहनाक खातिर शिखाक आत्महत्याक प्रयास। हठात् परिवर्त्तन : देशभक्ति नाटक। नाट्य रंगमंच समिति सभ भंगिमा, पटना ; चेतना समिति, पटना, जमघट-, मधुबनी; मिथिला विकास परिषद, कोलकाता; अखिल भारतीय मिथिला संघ, कोलकाता; मिथिला कला केन्द्र, कोलकाता; मैथिली रंगमंच, कोलकाता; कुर्मी-क्षत्रिय छात्रवृत्ति कोष, कोलकाता; आल इण्डिया मैथिल संघ, कोलकाता; कर्ण गोष्ठी:जयन्त लोकमंच, कोलकाता; मिथिला सेवा संस्थान, कोलकाता; मिथि यात्रिक, कोलकाता; वैदेही कला मंच, कोलकाता; कोकिल मंच, कोलकाता; मिथिला कल्याण परिषद, रिसरा, कोलकाता (निर्देशन मुख्य रूपसँ श्री दयानाथ झा द्वारा १९८२ ई.सँ। सम्प्रति श्री रण्जीत कुमार झा निर्देशन कऽ रहल छथि, ०८.०१.२०१२ केँ हुनकर निर्देशनमे तंत्रनाथ झा लिखित “उपनयनक भोज” मंचित भेल।) ; झंकार, कोलकाता; मिथिला सेवा समिति बेलुर, कोलकाता; उदय पथ, कोलकाता। मिथिला नाट्य परिषद (मिनाप), जनकपुर; रामानन्द युवा क्लब, जनकपुरधाम; युवा नाट्य कला परिषद (युनाप), परवाहा, धनुषा; आकृति (उपेन्द्र भगत नागवंशी), जनकपुर; रंग वाटिका, नेपाल; चबूतरा, शिरोमणि मैथिली युबा क्लब, गांगुली, भैरब, मैथिली सांस्कृतिक युबा क्लब, बौहरबा, श्री सरस्वती सांस्कृतिक नाट्य कला परिषद, गाम तिलाठी (सप्तरी, नेपाल); अरुणोदय नाट्य मंच, राजबिराज; सरस्वती नाट्य कला परिषद, मेहथ, मधुबनी; मैथिली लोकरंग (मैलोरंग), दिल्ली; मिथिलांगन, दिल्ली। मधुबनीक पजुआरिडीह टोलमे श्रीकृष्ण नाट्य समिति श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा आ गंगा झाक निर्देशनमे मैथिली नाटक मंचित होइत रहल अछि। सांस्कृतिक मंच, लोहियानगर, पटना; चित्रगुप्त सांस्कृतिक केन्द्र, जनकपुर; गर्दनीबाग कला समिति, पटना; मिथिलाक्षर, जमशेदपुर; मैथिली कला मंच, बोकारो; उगना विद्यापति परिषद, बेगूसराय; मिथिला सांस्कृतिक परिषद, बोकारो स्टील सिटी; भानुकला केन्द्र, विराटनगर; आंगन, पटना; नवतरंग, बेगूसराय; भारतीय रंगमंच, दरभंगा; भद्रकाली नाट्य परिषद, कोइलख, मिथिला अनुभूति दरभंगा, विदेह अंतर्राष्ट्रीय ई-जर्नलक नाट्य उत्सव। मैथिली नाटकक निर्देशक: श्री कमल नारायण कर्ण (चीनीक लड्डू-ईशनाथ झा/ चारिपहर- मूल बांग्ला किरण मैत्र, मैथिली अनुवाद- निरसन लाभ), श्री श्रीकान्त मण्डल (चन्द्रगुप्त मूल बांग्ला डी.एल.राय, मैथिली अनुवाद- बाबू साहेब चौधरी/ पाथेय- गुणनाथ झा/ नायकक नाम जीवन- नचिकेता); श्री विष्णु चटर्जी आ श्री श्रीकान्त मण्डल (निष्कलंक- जनार्दन झा); प्रवीर मुखोपाध्याय; वीणा राय, मोहन चौधरी, बाबू राम सिंह, गोपाल दास, कुणाल, रवि देव, दयानाथ झा, त्रिलोचन झा, शम्भूनाथ मिश्र, काशी झा, अशोक झा, गंगा झा, गणेश प्रसाद सिन्हा, नवीन चन्द्र मिश्र, जनार्दन राय, श्री कृष्णचन्द्र झा रसिक, शिवनाथ झा, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अखिलेश्वर, सच्चिदानन्द, रमेश राजहंस, मोदनाथ झा, विभूति आनन्द, जावेद अख्तर खाँ, कौशल किशोर दास, प्रशान्त कान्त, अरविन्द रंजन दास, मनोज मनु, रोहिणी रमण झा, भवनाथ झा, उमाकान्त झा, लल्लन प्रसाद ठाकुर, रघुनाथ झा किरण, महेन्द्र मलंगिया, कुमार शैलेन्द्र, विनीत झा, किशोर कुमार झा, कुमार गगन, विनोद कुमार झा, के.अजय, छत्रानन्द सिंह झा, नीलम चौधरी, काजल, मनोज कुमार पाठक, आशनारायण मिश्र, श्री श्रीनारायण झा, प्रमिला झा, तनुजा शंकर, केशव नन्दन, ब्रह्मानन्द झा, संजीव तमन्ना, किसलय कृष्ण, प्रकाश झा, मुन्नाजी संजय कुमार चौधरी, कमल मोहन चुन्नू, अंशुमान सत्यकेतु, श्याम भास्कर, प्रेम कुमार, संगम कुमार ठाकुर, एल.आर.एम. राजन, भास्करानन्द झा, आशुतोष कुमार मिश्र, आनन्द कुमार झा, मनोज मनुज, संजीव मिश्र, स्वाति सिंह, स्वर्णिम, आशुतोष यादव अभिज्ञ, अशोक अश्क, दिलीप वत्स, तरुण प्रभात, माधव आनन्द, नरेन्द्र मिश्र, भारत भूषण झा, किशोर केशव, बेचन ठाकुर, उपेन्द्र भगत नागवंशी, अनिल चन्द्र झा, अंशुमान सत्यकेतु, आनंद कुमार झा, हेमनारायण साहू, रामकृष्ण मंडल छोटू, धीरेन्द्र कुमार,उत्पल झा, अभिषेक के. नारायण, चन्द्रिका प्रसाद। प्रदीप पुष्पजीक गजल संग्रह प्रदीप पुष्पजीक गजल संग्रह आशीष अनचिन्हारक मैथिली गजलशास्त्रक रॉकेट छी। जेना उड़ैसॅं पहिने वैज्ञानिक कागजपर रॉकेटक चालि उतारि दै छैथ तहिना शास्त्र सेहो प्रतिभाकेँ मॉजि दइए। मुदा मात्र शास्त्रेटा गजलकेँ उत्कृष्ट नै बना सकत, कनी करामाती तॅं हुऐ पड़त, आ तइमे बाहरी दर्शनक संगे भीतरी मंथन सेहो जरूरी, आ तइले दिमागकेँ ट्रेनिंग दिअ पड़त आ ओतए कोनो शास्त्र काज नै आएत। आ जे गजलशास्त्रक संग मनकेँ सेहो साधि लेलैथ से छैथ प्रदीप। करामाती छैथ, कहै तॅं छैथ जे लगलेमे हीया हारि जेता/मुदा फेर लगले कहै छैथ जे चान नै भेटने डिबिये बाड़ि लेता..! जॅं एहेन गजलकार महाराष्ट्र आ तेलंगानाक सभ गाममे एकहकोटा भऽ जाए तॅं किसान हीया हारलाक बाद आत्महत्या नै करत, चान ताकि लेत। आ से ओ रौदीक मारल किसान रौदकेँ तापए लागत, जेना प्रदीपजी बिम्ब देने छैथ। आ से ओ महाजनकेँ जेना कहै छैथ- नै भेटबौ हम किछु कालक बाद/तकिहें सभ ठाम किछु सालक बाद..! आ संगे काजक बाद हलातक बिम्ब निर्मालक पुष्पक हालक संग प्रदीप पुष्प देखबै छैथ। मुदा विरहक गजल छुटल नै छैन, ओकर निशानी केतौ केकरो छुटल छै की? आ से अध-कपारी नै छुटतैन से ओ कहै छैथ। ई संग्रह धमगिज्जर मचेबे करत आ अपना सभ मनेबो करी जे हिनकर अध-कपारी नै छुटैन जइसँ आर मारते रास गजल सुनबा-ले भेटत। ई गजल सभ गेय अछि आ एकर सीडी जॅं बहार हएत तॅं ओहो धमगिज्जर मचेबेटा करत। चारिटा अंग्रेजी नाटक- डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन एगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल आ स्ट्राइफ एहि निबन्धक आधार अछि परशुराम झाक “डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इंग्लिश ड्रामा- स्टडीज इन डॉक्टर फॉस्टस, सैमसन अगोनिस्टेस, मर्डर इन द कैथेड्रल एण्ड स्ट्राइफ”। परशुराम झा १९३८- गाम- मेहथ (मधुबनी), कृति- डाइमेन्शन्स ऑफ पीस इन इन्गलिश ड्रामा,क्रिश्चियन पोएटिक ड्रामा। परशुराम झा अंग्रेजी साहित्यक आजीवन अध्यापन केने छथि। डॉक्टर फॉस्टस एलिजाबेथ युगक, सैमसन एगोनिस्टेस एज ऑफ रीजनक, मर्डर इन द कैथेड्रल आधुनिक युगक नाटक अछि। ई तीनू मुख्यतः धार्मिक नाटक अछि। स्ट्राइफ आधुनिक धर्मनिरपेक्ष नाटक अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे धर्मनिरपेक्षता धर्मसँ निकलल अछि, कमसँ कम धर्मक नैतिक सन्दर्भसँ। डॉक्टर फॉस्टस (द ट्रैजिकल हिस्ट्री ऑफ द लाइफ एण्ड डेथ ऑफ डॉक्टर फॉस्टस) क्रिस्टोफर मारलोवे (१५६४-१५९३) लिखित अछि। क्रिस्टोफर मारलोवे सेक्सपियर(१५६४-१६१६) क समकालीन छलाह। क्रिस्टोफर मारलोवेकेँ कोनो आपत्तिजनक पाण्डुलिपि लेल प्रिवी काउन्सिल द्वारा वारन्ट जारी कऽ बजाओल गेल आ तकर दस दिन बाद हुनकर चक्कू मारि हत्या कऽ देल गेल, जखन ओ मात्र २९ बर्खक छलाह। ओ जँ अपन सम्पूर्ण जिनगी जिबितथि तँ सेक्सपियरसँ पैघ नाटककार होइतथि वा नै से इतिहासक गर्भमे नुकाएल रहि गेल। ई नाटक ब्लैंक वर्स आ गद्य मिश्रित अछि। ब्लैंक वर्समे मीटर रहै छै मुदा लय नै। मारलोवेक जीवन कालमे एकर मंचन भेल मुदा एकर प्रकाशन हुनकर मृत्युक एगारह बर्खक बाद भेल। सैमसन अगोनिस्टेस (सैमसन, प्रतियोगी-योद्धा)जॉन मिल्टन (१६०८-१६७४) लिखित दुखान्त क्लोजेट पद्य-नाटक अछि। क्लोजेट नाटक तकरा कहल जाइत छै जे मंचन लेल नै वरन असगर पढ़बा लेल लिखल जाइ छै वा किछु गोटे संगे जोर-जोरसँ पढ़ि कऽ सुनबा-सुनेबा लेल। मर्डर इन द कैथेड्रल टी.एस. इलियट (१५६४-१५९३) लिखित पद्य-नाटक अछि। स्ट्राइफ(कटु संघर्ष) जॉन गाल्सवर्दी (१८६७-१९३३) लिखित नाटक अछि। डॉक्टर फॉस्टस - क्रिस्टोफर मारलोवे १५९२ ई. मे “इंग्लिश फाउस्ट बुक”मे किछु घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी कऽ “डॉक्टर फाउस्टस” नाटक रचित भेल, जे ओहि युगक वास्तविकताकेँ देखबैत अछि। डॉक्टर फॉस्टस “मेडिएवल मिस्ट्री प्ले”, मोरेलिटी प्ले” आ “इन्टरल्यूड”सँ सम्बन्धित अछि- कथ्य आ रूप दुनूमे। फेर फॉस्टसक “असीमित ज्ञान”, “लौकिक आनन्द” आ “शक्ति”क लेल अदम्य लालसा एहि नाटककेँ पुनर्जागरणक आत्माक निकट लऽ जाइत अछि। फॉस्टसक पहिल प्रवेश ओकरा लेल दूटा विकल्प लऽ अबैत अछि। ओकरा आध्यात्मिक जीवन चुनबाक छै आकि लौकिक। ओकरा नै खतम होअएबला आनन्द चाही आकि आध्यात्मिक अंधकूप आ मुत्यु। ओकरा अपन इच्छाक पालन करबाक छै आकि भगवानक। ओ ज्ञानी अछि, एरिस्टोटलक तर्क चिन्तन ओ पढ़ने अछि, रोग-व्याधि दूर करैबला चिकित्साशास्त्र ओ जनैत अछि। ओ धर्मशास्त्रमे डॉक्टरेट अछि। मुदा ई सभ ज्ञान ओकरा शान्ति आ आनन्द नै दै छै। मुदा ओ चुनैए जादू आ लौकिक इच्छाक तृप्तिक रस्ता। एहि जादूक चयन कऽ ओ “भरोस”पर भरोस छोड़ि दैए। फॉस्टसक लौकिक इच्छा छै वेस्ट इंडीजक आ अमेरिकाक (जे मारलोवेक समएमे इंडिया कहल जाइ छल) सोना, पूर्वक मोती, नीक फल। ओकर इच्छाक लेल जादूगर वाल्डेस आ कॉरनेलियस छै। नाटकक बादक भागमे मेफिस्टोफिलिसक आगमन होइ छै- फॉस्टस ओकरासँ कहैत अछि जे ओ लूसीफरकेँ सूचित करए जे फॉस्टस अपन आत्माक बदलेन लौकिक भोग लेल करबाक लेल तैयार अछि। “नीक दूत”क फॉस्टसकेँ सुझाव जे ओ स्वर्ग आ स्वर्गीय वस्तुक विषयमे सोचए, फॉस्टस “खराप दूत”क सलाह मानि धनक इच्छा करैए। अपन आत्माक निलामीक बंधकपत्र अपन खूनसँ लिखैत अछि फॉस्टस। लूसीफरकेँ अपन आत्मा समर्पित कऽ दैत अछि ओ। मेफिस्टोफिलिस ओकरा नर्कक विषयमे कहैत अछि मुदा ओ ओहिपर ध्यान नै दऽ “सुतनाइ”, “खेनाइ” आ “चलनाइ”पर ध्यान दैत अछि। बहस केनाइ, ज्ञानक संचय, खगोलशास्त्र आ वनस्पतिशास्त्रक ज्ञान आ सौन्दर्यशास्त्र ई सभ मेफिस्टोफिलिसक सहयोगसँ फॉस्टस प्राप्त करैत अछि। फॉस्टसक लैंगिक इच्छाक पूर्तिक पहिने मेफिस्टोफिलिस ओकरा बुझबैत अछि मुदा फेर एकटा “खराप आत्मा”केँ स्त्री बना फॉस्टसक पत्नीक रूप दैत अछि। “खराप आत्मा” कोनो मृत व्यक्तिक अनुकरण कऽ सकैए मुदा स्वयं जीवित नै भऽ सकैए। से तकर परिणाम ई भेल जे ओकर ठोढ़ फॉस्टसक आत्माकेँ चूसि लैत छै। “खराप आत्मा”सँ संसर्गक पाप फॉस्टस करैए आ परिणाम छै ओकर आध्यात्मिक मृत्यु। ओ भगवानसँ दूर भऽ जाइए आ ओ “खराप आत्मा” संगे चौबीस बर्ख बितेबाक लेल रस-रंगमे डूमि जाइए। मुदा जखन ओकर मृत्युक बॉन्डक समए निकट अबै छै, ओ कहैए- “हम जे जिबितौं एकरा सभक संग तँ स्थिर जीवन जिबितौं मुदा आब मरब तँ सदा लेल मरि जाएब”। आ ओकर अन्तिम क्षण- जखन ओकर मृत्यु होएबाक छैक तकर पूर्व- बारह बजेक घड़ीक टिकटिक। ओ दुखी भऽ कहैए- “ओकर आत्मा अखनो जीबए नर्कमे रहबाक लेल” मुदा... ओ विद्वान् सभकेँ कहैए- ओ साँप जे ईवकेँ प्रलोभित केलक से बचि सकैए मुदा फॉस्टस नै। ओ पश्चातापो नै कऽ सकैए, ओकरा क्षमा नै कएल जा सकै छै, पवित्र नै कएल जा सकै छै। ओ स्वीकार करैए जे ओ भगवानकेँ अपमानित केने अछि। सैमसन एगोनिस्टेस- जॉन मिल्टन नाटकक प्रारम्भमे सैमसनकेँ आन्हर कऽ गाजाक जेलमे श्रम मजदूरी लेल होएबाक आ एक गोटे द्वारा जेलक सोझाँक चमकैत किनारपर लऽ जएबाक दृश्य अछि। ई एकटा छुट्टीक दिन छल, कारण छल फिलिस्तीनक भगवान डेगोनक, जे अदहा मनुक्ख आ अदहा माँछ छथि, भोज छै। बसात लगलासँ सैमसन अपनामे ऊर्जाक संचार पबैए। ओकरामे स्वर्गसँ भेटल शक्ति छै जे फिलिस्तीनक परतंत्रतासँ इस्रायलकेँ मुक्ति दिएबा लेल छै। मुदा तखने ओकरा लगै छै जे भगवान ओकरा जतेक शक्ति देलन्हि ततेक बुद्धि नै देलन्हि, नै तँ ओ ओतेक जल्दी अपन शक्तिक रहस्य डेलिलाकेँ नै बतबितै। मुदा भगवानक बुद्धिपर ओ कोनो बहस कोना कऽ सकैए, जे की इच्छा छै ओकर। ओकर पिता मनोआ सैमसनकेँ जेलसँ बाहर निकालबाक एकटा योजना लऽ अबैत अछि। ओकर योजना जे फिलिस्तीनक सामन्तकेँ पाइ दऽ सैमसनकेँ छोड़बाबी, ई सैमसनकेँ नीक नै लगै छै, नै मानै अछि ओ। मनोआ ओकरा कहै छै जे फिलिस्तीन सभ भोजक क्रममे डेगनक प्रशंसा करत आ इस्रायलक भगवानक अपमान। ई सुनि सैमसन दुखी भऽ जाइए। ओ मनोआकेँ कहै अछि जे ओकरा कोनो आशंका नै छै जे इस्रायलक भगवान डेगोनपर विजय करत। मनोआक गेलापर ओ कोरसमे मुदा ई कहैए जे मुदा ओ कोना भगवान लेल काज कऽ सकत? डेलीला अबैए आ सैमसनकेँ कहैत अछि जे ओ फिलिस्तीनी सामन्तकेँ कहि ओकरा छोड़बाओत मुदा सैमसन ओकरा रहस्यकेँ खोलैवाली कहैए। हराफा सैमसनकेँ कहैत अछि जे भगवान सैमसनकेँ छोड़ि देने छथि। अधिकारी अबैत अछि आ ओ फिलिस्तीनक सामन्तक आदेश अनैत अछि जे सैमसनकेँ अपन करतब डेगनक भोजक अवसरपर देखेबाक छै। पहिने ओ मना करैए फेर किछु सोचि कऽ मानि जाइए। मिल्टन फिलिस्तीनीकेँ लौकिक आनन्दमे खसल आ डेगनकेँ ओहि लौकिक आनन्दक देवताक रूपमे देखबैत छथि। सैमसन दूटा खाम्हक बीचमे जाइत अछि, प्रार्थना करैत अछि आ भवनकेँ खसा दैत अछि। दूतक एहि वर्णनसँ सैमसनक पितामे शान्त प्रतिक्रिया होइत अछि। ओ कहैत छथि- दुखी होएबाक समए नै अछि। ओ अपन मुत्युसँ इस्रायल लेल सम्मान आ स्वतंत्रता अनने छथि। मर्डर इन द कैथेड्रल- टी.एस. इलियट मर्डर इन द कैथेड्रल कैंटरबरीक महिलाक कोरस स्वरसँ प्रारम्भ होइत अछि जाहिमे प्रकृतिक स्वरूपक हितकारी नै होएब आ सुरेब नै होएब वर्णित अछि। दूत आर्कबिशपक इंग्लैंड आगमनक सूचना दैत अछि। बेकेट फ्रांसमे सात बर्ख रहलाक बाद कैंटरबरी घुरैत छथि। एतए हुनका लेल बाहरी आ आन्तरिक दुनू स्तरपर संघर्ष छै। राज्यक आ धर्मक, राजा आ आर्कबिशपक संघर्ष तँ छैहे, आन्तरिक संघर्ष सेहो छै जे भीतरक इच्छा छै। ओ अपन भूतकालकेँ, जाहिमे बैरन सभक मित्रता आ चान्सलरशिप अबैत अछि, केँ “छाह” कहै छथि, एहिसँ सेहो हुनका संघर्ष करबाक छन्हि। बेकेटक बाहरी शत्रु चारिटा “नाइट” तरुआरि भँजैत अबैत छथि। बेकेट तावत अपन आन्तरिक शत्रुपर विजय प्राप्त कऽ लेने छथि आ ओ शान्तिसँ “नाइट” सभकेँ कहै छथि- “अहाँ सभक स्वागत अछि, चाहे अहाँक उद्देश्य जे हो”। ओ कहै छथि जे हुनका कहियो इच्छा नै भेलन्हि जे ओ राजाक पुत्रक मुकुट छीनि लेथि। नाइटक राजाक आदेश सुनेलापर जे ओ देश छोड़ि देथि, बेकेट कहै छथि जे आब नै, सात साल ओ अपन लोकसँ दूर रहलाह। ओ अपन हत्या कएल जएबासँ पूर्व नाइट सभसँ कहै छथि- “हमर अहाँ जे चाही करू मुदा हमर लोक अहाँकेँ छूबो नै करताह”। पुरोहित सभ हुनका इच्छाक विरुद्ध हुनका जबरदस्ती कैथेड्रलक भीतर लऽ जाइ छथि आ चर्च बन्द कऽ दै छथि। मुदा बेकेट कहै छथि- “चर्च सर्वदा खुजल रहबाक चाही, शत्रुक लेल सेहो”। जखने चर्चक दरबज्जा खुजैत अछि मातल “नाइट” सभ बेकेटक हत्याक उद्देश्यसँ पैसि जाइ छथि। बेकेटक हत्या भऽ जाइ छन्हि, पुरहित सभ भगवानकेँ धन्यवाद दै छथि जे ओ कैंटरबरीमे एकटा आर सन्त देलन्हि। स्ट्राइफ- जॉन गाल्सवर्दी ट्रेनार्था टिन प्लेट वर्क्समे एकटा औद्योगिक विवादक कारण अक्टूबरसँ श्रमिकक हड़ताल प्रारम्भ भेल। चारि मासक बाद ७ फरबरीकेँ एकटा विशेष बोर्ड मीटिंग एहिपर भेल, मैनेजर फ्रांसिस अंडरवुडक, जे कम्पनीक चेयरमेन जॉन एन्थोनीक जमाए छथि, डाइनिंग रूममे। एहि मीटिंगमे डाइरेक्टर फ्रेडरिक एच. वाइल्डर, विलियम स्कैंटलबरी, ओलीवर वैंकलिन आ एंथोनीक छोट पुत्र एडगर सेहो छथि। एडगर श्रमिकक दशासँ आहत छथि। मुदा वाइल्डर उग्र छथि कम्पनीक शेयर नीचाँ गेलासँ आ पचास हजारसँ बेशी घाटासँ ओ चिन्तित छथि। स्कैंटलबरी अहिंसाक पथिक छथि तँ वैंकलिन मध्यमार्गी छथि। एंथोनी मुदा श्रमिकक लेल कोनो सहानुभूतिक विरुद्ध छथि। वाइल्डर सुझाव दै छथि जे सेंट्रल यूनियनक हारनेसकेँ विवाद दूर करबा लेल कहल जाए मुदा एंथोनी मना करै छथि। वर्कमेन कमेटीक आन सदस्यक संग छथि रॉबर्ट्स, ओ एंथोनीक विरोध करै छथि। हारनेसक विपरीत ओहो उग्र छथि। एंथोनीक पुत्री एनिड पिताक वर्गान्तरक विरुद्ध छथि। हुनकर खबासनी एनी रोबर्ट्ससँ बियाहल छनि, एनीक सहायता एनिड करऽ चाहै छथि। एनिडक भेँट रॉबर्ट्ससँ ओकर झोपड़ीपर होइ छन्हि। ओ ओकरा समझौता लेल कहै छथि मुदा ओ एंथोनीकेँ आततायी कहै छथि। कहै छथि जे एंथोनी मरैत रहत आ रॉबर्ट्सक हाथ उठेलासँ जे ओकर जान बचि जेतै तँ रॉबर्ट्स अपन कंगुरिया आँगुरो नै उठाओत। श्रमिक मीटिंगमे रॉबर्ट्सक समर्थक इवान्स आ जॉन बलगिनमे झगड़ा भऽ जाइत छै। हेनरी थॉमस आगू अबैए आ कहैए – “लाज होइए तोहर ’स्ट्राइफ’पर”। बेरू पहरक मीटिंगमे ओ श्रीमती रॉबर्ट्सक मुत्युक सूचना दैत अपन सदस्यतासँ इस्तीफा देबाक गप करैत अछि। मुदा एंथोनी कहैए- युद्ध तँ युद्ध होइ छै। रॉबर्ट्स बोर्ड मीटिंगमे कनेक देरीसँ अबैए, ओकरा पता लगै छै जे ओकर श्रमिक सभ ओकरा हटा देलकै। आ एंथोनीकेँ सेहो निदेशक सभ हटा देलकै। हारनेसक नेतृत्वमे समझौताक गप आगाँ बढ़ैत छै। हेनरी टेक, कंपनीक सचिव संतुष्ट छथि। उल्कामुख -गंगेश आ वल्लभाक प्रेम ऐ नाटकक विषय अछि। मुदा पहिल दू अंकक बाद तेसर आ चारिम अंक बदलि जाइए। आ आबि जाइ छथि सोझाँ उदयन, दीना, भदरी, आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी। आ शुरू भऽ जाइए इतिहासक एकटा षडयंत्रक अनुपालन। मुदा चारिम कल्लोलक अन्तमे भगता कहि दै छथि अपन शिष्यकेँ एकटा रहस्य.......जे विस्मरणक बादो आबि जाएत स्मरणमे।...बनि उल्कामुख... - पाँचम कल्लोलसँ संकेतक बदला वास्तविकता, कल्पनाक बदला सत्य... -पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल रहत, पाँचम कल्लोलसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत। - गंगेशक तत्त्वचिन्तामणिपर ढेर रास टीका उपलब्ध अछि, गंगेशकेँ कहल जाइ छन्हि तत्वचितामणिकारक गंगेश; मुदा हुनकर कविता भऽ गेल छन्हि "उल्कामुख"!!! मैथिली नाटककेँ..................... नाटकक नव युगमे प्रवेश प्रवेश करबैत अछि....... उल्कामुख......................................................... विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित............................ निर्देशक रहथि बेचन ठाकुर.................................................................. मंच परिकल्पना रहए भरत नाट्यशास्त्रक अनुरूप .. उल्कामुख (मैथिली नाटक)- गजेन्द्र ठाकुर पात्र परिचय पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल रहत, पाँचम कल्लोलसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत। [ पात्र: पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि : गंगेश , वल्लभा, देवदत्त, वर्द्धमान, उदयन, दीना, भदरी, आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह, आचार्य सरभ, शिष्य साही, शिष्य खिखिर, शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी, भगता, भगताक शिष्य। पात्र: पाँचम कल्लोलसँ : शिष्य साही बनि गेल हरपति (गंगाधरक पिता), गंगेश बनि जाइ छथि गंगाधर, वल्लभा बनि जाइ छथि कुमरसुता (गंगाधरक पत्नी), भगता बनि गेल जटा, भगताक शिष्य बनि गेल दलित गायक हीरू, आचार्य व्याघ्र बनि जाइ छथि मनसुख (जीवेक पिता), आचार्य सिंह बनि जाइ छथि हरिकर-सेनापति (मेधाक पिता), आचार्य सरभ बनि जाइ छथि कीर्ति सिंह (राजा), वर्द्धमान बनि जाइ छथि मितू (गंगाधरक बहिनोइ), देवदत्त बनि जाइ छथि जीवे (मनसुखक बेटा), शिष्य खिखिर बनि गेल राजाक अर्थमंत्री नारायण, शिष्य नढ़िया बनि गेल दरबारी-१, शिष्य बिज्जी बनि गेल दरबारी-२, उदयन बनि गेल माधव (अनुभव मण्डलक सदस्य आ दरबारी), दीना बनि गेलाह माधवक सहयोगी-१, भदरी बनि गेलाह माधवक सहयोगी-२। ४ टा स्त्री पात्र ऐ अन्तिम दुनू अंकमे बढ़ि जाइ छथि: रुद्रमति (माधवक माए) सोहागो (गंगाधरक माता), आनन्दा (गंगाधरक बहिन), मेधा (हरिकर- सेनापतिक बेटी)] [ पहिलसँ चारिम कल्लोल धरिक पात्र बदलि जाइ छथि, दोसर रूपमे पाँचम कल्लोलसँ ४ टा स्त्री पात्र बढ़ि जाइ छथि: रुद्रमति (माधवक माए) सोहागो (गंगाधरक माता), आनन्दा (गंगाधरक बहिन), मेधा (हरिकर- सेनापतिक बेटी) ] पहिल कल्लोल (मंचपर वाम मत्तवर्णीपर कूटक एकटा पैघ घन आ दहिन मत्तवर्णीपर कूटक एकटा आर पैघ घन राखल रहैत अछि, घनक सभ पृष्ठपर शतरंजक आकृति बनाएल रहैत छै।। धधरा फेकैत एकटा गीदर मंचपर चारू कात घूमि जाइत अछि। दू तीनटा टॉर्चसँ ई प्रभाव उत्पन्न कएल जा सकैए। पाछूसँ हूआ-हूआक ध्वनिक संग अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर मंच प्रकाशित होइत अछि आ गंगेश आ वल्लभा रंगपीठपर वार्तालापक मुद्रामे बैसल छथि। बीचमे कूटक पैघ घन मत्तवर्णीसँ रंगपीठपर राखल जाइत अछि, जइपर मुँह खसा कऽ दुनू गोटे गप कऽ रहल छथि। ) वल्लभा: उषाक स्वर्णिम आभा सुसज्जित ऋषिक स्मरण करबैत अछि। गंगेश: की भेल? कोन ऋषिक चर्चा अहाँ कऽ रहल छी? ककर स्मरण अबैए? वल्लभा: अहाँक, आर ककर? गंगेश: हम कहियासँ ऋषि भऽ गेलौं। हम तँ एकटा साधारण विद्यार्थी छी। वल्लभा: अहाँक चातुरीक सभ ठाम चर्चा होइए। गंगेश: चातुरीक चर्चा! हम तँ वाक चातुरीक विरोध करै छी। वाक चातुरी तथ्यपर आ सत्यसँ भारी नै भऽ जाए, तकर मात्र प्रयास करै छी। वल्लभा: मुदा तइसँ की हएत। लोक तँ घुमा फिरा कऽ बात बजिते अछि। अहाँ वाक चातुरीक चलाकीकेँ देखार केने छिऐ। कतेको श्लोकमे ऐ गपपर अहाँ चरचा केने छिऐ। तैयो लोक गप घुमा कऽ बाजिये दै छथि। गंगेश: अहाँ कहियासँ हमर एतेक चिन्ता करऽ लगलौं। वल्लभा: देखू। अहाँ चर्मकार टोलमे बच्चेसँ आबि रहल छी… गंगेश: आ बच्चेसँ लोकक बोल सुनि रहल छी.. वल्लभा: मुदा लोकक बोल आर बिखाह भऽ गेल अछि.. गंगेश: कतेक बिखाह। सत्यकामक भाग्य हमरा भेटल अछि… वल्लभा: कोन सत्यकाम.. गंगेश: वएह सत्यकाम जकरा पिताक विषयमे बुझल नै छलै, ओकर मायोकेँ नै बुझल रहै जे के ओकर पिता छै। मुदा ओकर गुरु गौतम ओकरा शिक्षा देलखिन्ह। वल्लभा: अहूँसँ पूछल गेल ओ प्रश्न गंगेश? प्रश्न जे..जे..के छथि अहाँक पिता..पिताक मृत्युक पाँच बर्खक बाद कोना भेल अहाँक जन्म… गंगेश: (मुँह घुमा कऽ पाछू दिस ताकऽ लगै छथि) पूछल गेल वल्लभा, पूछल गेल। बिनु पिताक अहाँक जन्म..पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्ति… वल्लभा: (गंगेशकेँ घुमा कऽ सोझाँ लऽ अनै छथि) छोड़ू..हमरा तँ बुझले अछि। गंगेश: गुरुजी हमरोसँ पुछने रहथि पिताक विषयमे। चर्मकार टोलक जे ओ रहथि जे हमर माताकेँ आपत्कालमे सहायता देने रहथि, आब गामे छोड़ि देलन्हि। वल्लभा: हमहूँ सएह सुनने छिऐ, नै जानि कतऽ चलि गेलाह ओ। गंगेश: मुदा आइयो अहाँक टोलमे हमरा वएह आपकता भेटैए। वल्लभा: आहा। ककरा-ककरासँ। गंगेश: एकटा तँ सोझेँ छथि हमर। वल्लभा: सएह आपकता तँ लोकक आँखिकेँ नै सोहाइ छै..लोकक आँखिमे हींग सुइया.. गंगेश: वल्लभा, अहाँ तँ सभसँ गप करै छी, हमरासँ, गाछ-पातसँ, चिड़ै चुनमुनीसँ, सम्पूर्ण प्रकृतिसँ… वल्लभा: अहाँ तँ लगैए पहिने कताक जन्म स्त्री छलौं.. गंगेश: अहाँ मिथिलाक राजकुमारी छी वल्लभा। अहाँ आँखि उठा कऽ देखै छी तँ लगैए जे प्रकृति अपन हृदय खोलि कऽ प्रेम कऽ रहल अछि, अहाँ छी पतालसन गहींर आ गम्भीर मुदा उधियाइत मेघ सन साकांक्ष, वरक गाछ सन स्थिर मुदा हरदम प्रसन्न ऐ धानक शीस सन..(खेत दिस इशारा करै छथि)। वल्लभा: अहाँ कोन कम छी गंगेश, अहाँ विद्वतासँ भरल छी, कोनो सम्वाद विवाद स्थिरचित्त भऽ सुनै छी काटै छी, विक्रमादित्य सन न्याय करै छी, व्यवहारी छी आ अहाँ स्थिर छी हिमालय सन। गंगेश: वल्लभा, अहाँक सौन्दर्य अप्रतिम अछि, अहाँसँ बेशी पूर्ण ने स्वर्ण अछि ने आन किछु। अहाँ लग आबि कऽ लगैए जेना भुथियायल जहाज किनारपर लागि गेल। हमर विद्या आब पूर्ण होइए बला अछि। किछु नव चीज बहार केलौं अछि मन्थनसँ। मिथिला विद्या शून्य नै भेल अछि। उदयनक बाद कएक शताब्दी धरि मिथिलामे भगवान जगन्नाथकेँ ललकारा दै बला कियो नै भेल। वल्लभा: हे से नै कहियौ। दीना आ भदरी से ललकारा दऽ आएल रहथि जगन्नाथकेँ। गंगेश: हँ वल्लभा, माए सुनेने छथि ई खिस्सा हमरा। आ दीना-भदरी दुनू गोटे विजय सेहो प्राप्त केने रहथि। मन्दिरक कपाट खुजि गेल रहए। हे सुनाउ ने एकबेर ई खिस्सा। वल्लभा: एक्के खिस्सा बेर-बेर सुनैत मोन नै भरैए। गंगेश: नै भरैए..तत्त्वचिन्तामणि लिखबामे ई हमर उत्प्रेरक बनैए.. वल्लभा: ठीक छै। तखन दीना हम बनै छी आ भदरी अहाँ बनू। (दुनू गोटे शतरंजक घनक सोझाँ आबि जाइ छथि।) वल्लभा: जोगिया गामक दीना एलै भदरी भाइ जुमि हे… गंगेश: कालू सदाय निरसो मैयाक बेटा मजगूत हे… वल्लभा: (हँसैत आ गंगेश दिस तकैत) दीन रहथि हीन रहथि मुदा नै मजबूर हे शिकार खेलथि रणे-बने कोरथि खेत मिलि हे पाँच-पाँच मोनक कोदारि लेने बीघा कते दूर हे गंगेश: कटैया बोनक राजा छलै फोटरा गीदर हे ओकर संगी धामन रहै, बिख मशहूर हे बिख सन बोल बाजल धामन दुनू भाइकेँ जो रे दीना जो रे भदरी पानिमे बसैले रे वल्लभा: रेऽऽऽऽऽऽऽऽ….. की बजलेँ धामन तूँ तूँ, की बजलेँ धामिन गे रेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ….. हम्मर जीवन कटैय्या बोनक तूँ नै भागी हे हम्मर जीवन हम्मर बलकेँ बुझलेँ हिनताइ रे मारि-मारि छूटल ओकरापर दुनू भाइ रे धामन मारल, धामन फेकल धामिनक आगू रे धामिन थरथर करै लागल लेबौ बदला भाइ रे गंगेश: फोटर राजा कटैय्या बोनक छल दोसतियारी रे हम्मर दोस धामन मारल, दुनू मिलि भाइ रे धामिन भौजी निश्चिन्त रहू, नै करू अगुताइ हे आबै दियौ आबै दियौ शिकार खेलऽ दुनू भाइकेँ वल्लभा: दिन बीतल, गेल भदरी दीना बोन शिकार हे संग गेल बहुरन मामा फोटर तैयार हे बिखहा दाँत गरा देलक मारल दुनू भाइ केँ आत्मा बनि घूमए लागल दुनू भाइ मरि हे गंगेश: दौरी गामक हिरिया तमोलिन देखल दुनू भाइकेँ दौरी गामक जिरिया लोहारिन देखल दुनू भाइकेँ एहेन वर चाही हमरा करए लागलि तपस्या हे वल्लभा (तपस्विनी सन ध्यान लगेने बैसि जाइत छथि): दीना चाही भदरी चाही, वर दुनू सखी कऽ मरल छेँ तँ भेल की स्वीकारू गंगा पैसि कऽ (गंगेश घनक पाछाँ चल जाइ छथि आ हाथ उठबै छथि जेना गंगामे होथि। वल्लभा दोसर कातसँ हाथ पसारै छथि।) वल्लभा: मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वामी बिनु लागै यऽ सुन हे मातैर-मातैर सुनै छलौं.....। (तखने देवदत्तक प्रवेश होइत अछि।) देवदत्त: (मुस्काइत एक बेर वल्लभाकेँ आ एक बेर गंगेशकेँ देखैत छथि) कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे…… वाह गंगेश। नै नै, वाकचातुरी नै गंगेश। कोनो चातुरी नै। ई तँ अछि स्थूल प्रेम। प्रेम प्रेम देखी सगरे प्रेमे पूर्ण हे प्रेम बिनु लागै यऽ सभ सून हे… (गंगेश दिश ताकि) गंगेश। की बात छै। ऐ टोलमे तोहर माएकेँ सेहो मोन लागै छलौ आ तोरा सेहो। मुदा के बाजत। न्याय, तर्कक सोझाँ के ठठत। (वल्लभा दिश घुमि) वल्लभा। अहाँक भाग…. आकि कोनो मनता….मनता जे गंगेशक माए अहींकेँ पुतोहु बनेबा लेल मनने हेती।…. आकि गंगेशसँ सत करेने हेती जे हमर अपमानक बदलामे तोँ अही टोलमे बियाह कऽ कऽ लोककेँ देखा दहीं।…(मंचक सोझाँ घुरि जाइ छथि) न्याय आ तर्कमे के जीतत गंगेशसँ ? न्याय करत गंगेश….तर्क करत कियो नै। गंगेश: (देवदत्त दिश जोरसँ बजैत) देवदत्त.. देवदत्त: (देवदत्त दिश ताकि) नै गंगेश कोनो वचन चतुराइ नै अछि हमरामे। मुदा की कोनो तर्क नै अछि हमर वचनमे? गंगेश: (देवदत्त दिश जोरसँ बजैत) देवदत्त, ने हमर माए कोनो मनता मानने रहथि आ नहिये हमरासँ कोनो सत करबेने रहथि। आ नहिये ऐ टोलक हमर माएपर कएल उपकारक बदला हमर आ वल्लभाक प्रेम अछि। आ जेँ ऐ प्रेममे ने कोनो मनता छै, ने कोनो सत आ ने कोनो उपकार, तेँ ई प्रेम स्थूल प्रेम अछि। देवदत्त: (मंचक सोझाँ तकैत) तर्क! नै कोनो वाक चातुरी नै। (गंगेश दिस ताकि) मुदा गंगेश, ई एकटा गप अहाँ ठीक कहलौं। अहाँ क आ वल्लभा क प्रेमक तँ लोक चर्चो नै कऽ रहल अछि। दूर देशक प्रेमक मुदा चर्चा होइए। ठीके कहलौं अहाँ। सुनल अछि कोनो बड़का न्यायक ग्रन्थक अहाँ लिखि रहल छी। सुनै छिऐ जे ओ तेहेन ग्रन्थ बनि रहल अछि जकर चर्चामे सभ नैय्यायिक ओझरा जेता। भाष्यपर भाष्य, टीकापर टीका लिखाएत ओइपर। मुदा गंगेश, सावधान। अहाँक प्रेमकेँ मारबाक ई षडयंत्र तँ नै अछि गंगेश। ऐ प्रेमक चर्च सेहो पाँच-सए बर्खक बाद मुदा हजार बर्खक भीतरे फेरसँ मिथिलामे हेतै। ओहो हो..ई की कहा गेल गंगेश। (अपन जीह थकुचऽ लगैए) लोक कहैए जे हमर जीह कारी अछि। जँ धानक खेतक आरिपर ठाढ़ भऽ हम कहि दै छिऐ जे देखू ई धान केहेन सनगर अछि तँ ओ धान अगिले दिन जरि जाइ छै। लोके सभ कहैए। (फेरसँ अपन जीह थकुचऽ लगैए) स्थूल प्रेमक चर्च हेबे किए करए गंगेश। किए हुअए स्थूल प्रेमक चर्च। ऐ चर्चसँ तँ समाजमे समरसता आबि जेतै। से नै हएतऽ चर्च ऐ प्रेमक गंगेश, नै हएतऽ चर्च ऐ प्रेमक। तोहर ग्रन्थक चर्च हएत गंगेश, तोहर ग्रन्थक मिथिलाक टोल आ चौपा़ड़िमे तोहर विद्वताक संग चर्चा हेतै गंगेश, …..(बिहुँसैत)….मुदा तोहर प्रेमक कोनो चर्च नै हएत। मिथिलाक शिक्षक तोहर पोथीक प्रतिलिपिक अनुमति नै देथिन्ह गंगेश आ ने ओकर सारांश लिखबाक देथिन्ह अनुमति। आ जँ बंगालक कोनो विद्यार्थी ओकर प्रतिलिपि कइयो लेत गंगेश तँ ओ लऽ जा सकत मात्र तोहर विद्वता। तोहर न्यायशास्त्र। तोहर तर्क। मरि जेतह तोहर प्रेम गंगेश। मरि जेतह तोहर स्थूल प्रेम। वल्लभा: (देवदत्त दिस ताकि जोरसँ बजैत) देवदत्त, हजार बर्खक बाद तँ घुरत ने ई प्रेम। गंगेशक अमर पोथी लेल हमरा ओ प्रतीक्षा स्वीकार अछि। चर्च नै हएत प्रेमक…हाह…चर्च पेबा लेल प्रेम नै कएल जाइत अछि….प्रेम, प्रेम की चर्च हुअए की तेँ होइत अछि देवदत्त? देवदत्त: (वल्लभा दिस ताकि) वल्लभा, गंगेशक हारि देख रहल छी हम। गंगेशक हारि देख रहल छी हम गंगेशक मुखपर। गंगेश, की तोँ वल्लभासँ सहमत छह। की वल्लभा आ तोहर स्थूल प्रेमक चर्च नै भेने सामाजिक समरसताक तोहर उद्देश्य पूर्ण हेतह? की ऐ स्थूल प्रेम आ ऐ टोलक नाराशंसी गाथाक कोनो कर्ज तोरा पोथीपर नै छै गंगेश? की तोहर प्रचण्ड तर्क सिद्धान्त बनि कऽ नै रहि जेतऽ गंगेश? प्रायोगिक महत्व खतम नै भऽ जेतै की ओकर? हम भरोस दिआबै छियह गंगेश, भरोस दियाबै छियह, जे तोहर स्थूल प्रेमक कियो विरोध नै करतह। आ तोँ बुझैत रहबह जे ओ सभ तोहर प्रचण्ड तर्कसँ हारि कऽ विरोध नै केलन्हि। मुदा असल बात ई छै जे तोहर पोथीपर भाष्यपर भाष्य आ टीकापर टीका लिखाइत रहतह। तोहर विरोध तँ छोड़ह, तोहर सन्तानोक विरोध कियो नै करतह गंगेश। सिद्धान्त बनि कऽ रहि जेबह तोँ आ तोहर तर्क। गंगेश: (देवदत्त दिस ताकि जोरसँ बजैत) देवदत्त। अहाँक कोनो गप हमरा कठानि नै लागि रहल अछि। मुदा एतेक तर्कपूर्ण गप..अहाँ एतेक तर्कपूर्ण गप कोना कऽ रहल छी? देवदत्त: (मंचक सोझाँ तकैत) एतेक तर्कपूर्ण गप.. (गंगेश दिश ताकि) ठीके बुझलेँ गंगेश। ई सुनलाहा गप छी। ई गप हमर अपन मोनक नै अछि। चौपाड़िपर होइत शिक्षक लोकनिक गप अछि ई। हम तँ किछु बुझै नै छी, (बिहुँसैत) से जानि हमरा सोझाँ होइत रहैए ई सभ गप..जाइ छी…जाइ छी… (एम्हर ओम्हर तकैत शतरंजक घनकेँ पलटाबऽ लगैए) तँ हमरा की इनाम देब ऐ तर्कपूर्ण गप लेल गंगेश। (शतरंजक एक-एकटा खानाकेँ छुबैत) ई ६४ टा खाना अछि शतरंजक, अछि ने गंगेश? पहिल खानामे एकटा धानक दाना राखू।(एकटा राखैए) दोसरपर ओकर दुगुना।(दूटा दाना राखैए.. एक…दू..तीन..चारि..बजैत) तेसरपर दोसरक दुगुना (चारिटा दाना राखैए ..एक… दू.... बजैत)। (फेर ६४म खानापर आंगुर रखैए) अन्तिम ६४म खानापर जतेक धानक दाना अबैए ततेक दाना दिअ हमरा गंगेश.. वल्लभा: (गंगेश दिश ताकि खिसियाएल स्वरमे बजैत) दऽ दियन्हु हिनका इनाम गंगेश। नै जानि ईहो गप ओ कतौसँ सुनिये कऽ आएल हेतथि। गंगेश: (वल्लभा दिश तकैत) नै वल्लभा। ई इनाम ऐ शतरंजक खेलोसँ बेशी विषम छै। सगर पृथ्वीक अन्नक उपजा जँ पाँच सए सँ हजार बर्ख धरि उपजत तखन जा कऽ ई इनाम देल जा सकत। (देवदत्तक बांहि झमारैत) देवदत्त…देवदत्त, के बाजै छल ई गप देवदत्त? कोन चौपाड़िपर होइ छल ई गप देवदत्त? देवदत्त: (डेराइत) एतेक पैघ अछि ई इनाम!! ..पाँच सए बर्खक बाद आ हजार बर्खसँ पहिने…गंगेश..जँ ई इनाम अहाँ नै देब हमरा, तँ तावत धरि मुनाएल रहत अहाँक स्थूल प्रेम…हा हा हा…(अपने सँ बाजैए) डराओन सन गप..डराओन सन गप..(प्रस्थान कऽ जाइत अछि।) (वल्लभा आ गंगेश एक-दोसराकेँ ताकऽ लगैत छथि) (हूआ-हूआक ध्वनिक संग अन्हार पसरि जाइत अछि।) दोसर कल्लोल (दू टा शतरंज-घन दुनू रंगशीर्षपर राखल अछि। गंगेश एकटा शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि। दोसर शतरंजक घनपर प्रकाश छै मुदा ओ फेर विलुप्त भऽ जाइ छै। आ फेर वेदिकासँ एकटा गीत उठै छै।) बभनीकेँ पुत्र तोहें बाल गोरैय्या, पोथी नेने पढ़न जाइ हे पोथिया नेरौलनि गोरिल जाइ बिरिछ तर हलुआइ घर पैसल धपाइ हे किछु मधुर खेलनि गोरिल किछो छिरियौला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ग्वालिन घर पैसल धपाइ हे किछु दूध पीलनि गोरिल किछु ढ़रकओला किछु देल लंका पठाइ हे गंगेश: हम तँ बभनीक पुत्र मुदा हमर पुत्र तँ नै। ओ अछि बभनीक पुतोहुक पुत्र। हम बारह हजार ग्रन्थक बरोबरि एकटा तत्वचिन्तामणि लिखनिहार लेखक, मात्र एकटा साधारण शिक्षक छी। हमर तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि करबापर प्रतिबन्ध के लगाएत? नवद्वीपक विद्यार्थी अवश्य लऽ जाएत हमर शिक्षा अपना संग। (वेदिकासँ फेर गीत उठैए।) बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या बड़इ घर पैसल धपाइ हे किछु पान खेलनि गोरिल किछु छिड़िऔला किछु देल लंका पठाइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या डोमिन घर पैसल धपाइ हे नीक नीक पाहुर गोरिल अपने चढ़ाओलऽ काना पातर देल हड़काइ हे बभनीक पुत्र तोहेँ बाल गोरैय्या ब्राह्मण घर पैसल धपाइ हे नीक-नीक जनौ गोरिल अपने पहिरलनि औरो देलनि ओझराइ हे हकन कनै छै गोरिल ब्राह्मणीक बेटिया ब्राह्मण बाबू बड़ दुख देल हे भनहि गंगेश सुनू बाबू गोरिल गहवर पैसिये जस लेल हे गंगेश: (अपनेमे गुनधुन करैत) ई देवदत्त की कहि गेल? मुदा टोल आ चौपाड़िपर हमरा सोझाँ तँ एहेन कियो किछु नै बाजल अछि। मुदा शतरंजक अन्नक दानाक गणना। ओ तँ देवदत्त क सकमे नै छै। (वल्लभाक प्रवेश।) वल्लभा: की भेल? कोन गुनधुनी लागल अछि? गंगेश: (वल्लभा दिश ताकि) वएह देवदत्तबला गुनधुनी। वल्लभा: (गंगेश दिश ताकि) धुर छोड़ू ने। ओकरा बुद्धिक लेशो नै छै.. गंगेश: तेँ तँ वल्लभा। बुद्धिसँ काज केलापर ने सत्य आ असत्य..मुदा ओकरा बुद्धि नै छै। तेँ ओकर गपपर हमरा सोचऽ पड़ि रहल अछि। वल्लभा: अहाँ तँ तत्वचिन्तामणिक लेखकक अलाबे आब कवि सेहो भऽ गेल छी। एतेक सुन्दर गीत लिखऽ लागल छी। तत्वचिन्तामणिमे आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्र आ गीतमे बाल-गोरैय्या!! गंगेश: हँ वल्लभा। अनायासे अहाँ कतेक नीक गप बाजि देलौं (शतरंजक घन लग जाइ छथि आ ओकरा टेढ़ कऽ कंगुरिया आंगुरसँ कोनपर नियन्त्रित करै छथि।) हँ वल्लभा…..ई तत्वचिन्तामणि नै, ई आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्रक परिभाषा नै,……. ई बालगोरैय्या हएत समर्थ ऐ चौपाड़ि आ टोलक षडयंत्रकेँ तोड़बामे। (गंगेश कंगुरिया आंगुर घनसँ हटा लै छथि। घन घुमि कऽ फेर स्थिर भऽ जाइए। (गंगेश वल्लभा दिश ताकि बाजै छथि) अनायासे अहाँ कतेक नीक गप बाजि दै छी वल्लभा। (तखने देवदत्त प्रवेश करैए।) देवदत्त: (गंगेश दिश ताकि) गंगेश कवि!!!(आश्चर्यसँ हाथ पसारैए) गंगेश तत्त्वचिन्तामणिकारक। गंगेश कविक कवित्वक चर्च कियो नै करत!! वल्लभा: (देवदत्त दिश ताकि) की ईहो निर्णय टोल आ चौपाड़िपर भऽ गेल छै। देवदत्त: (वल्लभा दिश ताकि) हँ वल्लभा। मुदा तोरा कोना बुझल छौ? वल्लभा: (देवदत्त दिश ताकि) बुझल नै अछि मुदा आब बुझल भऽ गेल जे हमर आ गंगेशक प्रेमक चर्चा, हमर आ गंगेशक विवाहक चर्चापर पहरुआ ठाढ़ कऽ देल गेल छै। गंगेश: (शतरंजक घनकेँ फेर टेढ़ करैए) तँ हमर कवितापर सेहो चर्चा नै हएत। तत्त्वचिन्तामणिक सभ पाँतीपर भाष्य, टीका आ कवितापर.. वल्लभा: (शतरंजक घन गंगेशसँ अपना हाथमे लऽ लैए) गंगेश आब अहाँ चिन्ता छोड़ि दिअ। ई सभ गीत हमर नैहरामे गाओल जाएत। देवदत्त कहि अबियौ टोल आ चौपाड़िपर, गीत बन्न नै हएत। आइ नै तँ सात सए बर्ख बादो ऐ प्रेमक चर्चा फेरसँ हएत। आ जे प्रेम सात सए बर्ख इन्तजारी नै कऽ सकए ओ प्रेम प्रेम नै। की अहूपर हेतै कोनो प्रतिबन्ध। देवदत्त: (वल्लभा दिश ताकि) हेतै नै भऽ गेल छै वल्लभा। देखू ओ बँसबिट्टी। ऐ गाम आ अही गामक अहाँक नहिराक टोलक बीचमे जे बाँसक कोपर सभ देखा पड़ि रहल अछि। अहाँक नहिराकेँ परदेस बना देत ई कोपड़। अहाँक गीत ओइ टोलसँ बहार तँ हएत मुदा ऐ बँसबिट्टीमे ओ भुतहा गीत बनि घुरत.. (गंगेश दिश ताकि) तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश.. वल्लभा: सुकविकैरवकाननेन्दुः – गंगेश। अपन पुत्र वर्द्धमानकेँ कहबै हम। अपन पिताक कवि हेबाक प्रमाण छोड़त ओ..कहि दियौ देवदत्त ई गप टोल आ चौपाड़िपर। छै कियो ओतऽ सात सए साल लड़ैबला? बँसबिट्टीक गीत घुरियाइत रहतै। सुनै छिऐ कोनो ध्वनि खतम नै होइ छै दुनियाँमे। सुनै छिऐ एक्के तरहक सातटा लोक होइ छै दुनियाँमे एक्के समएमे। सात सए बर्खमे सातटा लोक नै हेतै की देवदत्त? देवदत्त: (देवदत्त दिश ताकि) नै हेतै वल्लभा। सात सए बर्खमे एकटा भऽ जाए सेहो बहुत छै। वल्लभा: एक टा तँ हेतै ने देवदत्त, तँ तइ लेल हमर सभक प्रेमक गीत विचरैत रहतै अहि बोन बँसबिट्टीमे। बँसबिट्टीक पारक जीवन, टोल, चौपाड़ि सभ खतम भऽ जेतै देवदत्त ऐ सात सए बर्खमे, मुदा ई भुतहा गीत नै खतम हेतै। ई बँसबिट्टी आत्मा सभकेँ घुरा कऽ आनत। नीक आत्मा सभकेँ। उदयनकेँ, दीनाकेँ, भदरीकेँ, आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहकेँ सेहो…. देवदत्त: नै खतम हेतै वल्लभा, नै खतम हेतै। नीक आत्मा एतै तँ दुरात्मा सेहो ने आबि जाए वल्लभा…सएह टा डर वल्लभा…दुरात्मा सेहो नै आबि जाए (देवदत्त चारू दिस ताकि झटकारि कऽ प्रस्थान करैए। वल्लभा आ गंगेश शतरंजक घन लग आबि ठाढ़ भऽ जाइ छथि।) गंगेश: वल्लभा, छोड़ू ई सभ। कोन गुनधुनी लागि गेल अहाँकेँ। सुनाउ ने खिस्सा, कोनो दोसर खिस्सा, हमरा आब न्यायक कोनो ग्रन्थ नै लिखबाक अछि। आब हमरा भरि जनम कविते करबाक अछि। सुनाउ ने खिस्सा बालाराम आ वंशीधर ब्राह्मणक, व्याघ्र आ सूकरक, गहिल आ दुर्गाक। वल्लभा: (वल्लभा घुरै छथि, दुखी मुँहपर मुस्की आबि जाइ छन्हि आ शतरंजक सभटा घनकेँ ओ एकत्र करै छथि आ हाथसँ सभटाकेँ नेपथ्य दिस सहटारि कऽ मंचसँ हटा दै छथि।) हिर्र हिर्र सूगर जाइए अखराहा करीब सँ पाछू बंशीधर भाभन खेहारैए भीर सँ भोरे भोरे अखराहामे सूगर संग युद्ध रे श्यामसिंह आबि माटि फेकल जूमि रे बंशीधरकेँ तामस उठलै बाजल किछु बात रे गहिल गहिल कहि श्याम सिंह छूटल जोर रे बंशीधर बलगर छल मारल बड़ जोर रे अरड़ा कऽ खसल श्यामसिंह, भेल अन्हेर हे ओकर बेटा बालाराम केलक एकटा सत्त हे एक सत्त दू सत्त ..तीन सत्त…हँ….. गहिल दिअ शक्ति हमरा मारी बंशीधर केँ गहील गेली दुर्गाजी लग करबेलन्हि सत्त हे दुर्गा मुदा आबै छथि बंशीधरकेँ रक्ष हे बंशीधरक सूगरकेँ मोहिनी काँटी भोकि मारल हे बंशीधर तमसा कऽ ललकारा दैए बालारामकेँ मुदा बालाराम भोंकैए काँटी ओकरो पेटमे बंशीधरक पेट चिराएल दुर्गा एली बीचमे गंगामे कऽ ठाढ़ कएल बालाराम बंशीधरकेँ दोस्ती भेलै दुहू गोटे क बीचमे गहिल मिललि, मिललि दुर्गा सभ मिलू संग हे सभ मिलि बढ़ू अहि देसमे ((वल्लभा आ गंगेश एक-दोसराकेँ ताकऽ लगैत छथि) (हूआ-हूआक ध्वनिक संग अन्हार पसरि जाइत अछि।) तेसर कल्लोल (आचार्य व्याघ्र एकटा शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि। आचार्य सिंह दोसर शतरंजक घनक चारू कात घूमि रहल छथि। दुनूक गरदनिमे कारी कपड़ा गाँती जकाँ मुँह भिरा कऽ बान्हल छन्हि। वातावरणक संगीत लगैए जेना बँसबिट्टीक हुअए आ भुतहा सन वातावरण चारू दिश सृजित अछि।) आचार्य व्याघ्र: (आचार्य सिंह दिस ताकि) तत्वचिन्तामणिमे हमरा सभक चर्चा गंगेश केलन्हि मुदा आब लोक हमर सभक असल नाम सेहो बिसरि गेल। हमर सभक पोथी सेहो सुड्डाह भऽ गेल। आचार्य सिंह: (आचार्य व्याघ्र दिस ताकि) मुदा अपना सभक तँ ऐसँ कोनो सरोकार अछिये नै, तखन? आचार्य व्याघ्र: (मंचक सोझाँ अबैत) हँऽऽऽऽऽऽ, आ मुइलाक बाद भूत राकशसँ नीक व्याघ्र आ सिंह कहेनाइ भेल ने, हँऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ। आचार्य सिंह: (आचार्य व्याघ्रकेँ पाछाँ सँ टोकैत) मुदा अपना सभक तँ कोनो सरोकार छलैहे नै, दर्शनक सिद्धान्तमे गंगेश द्वारा कएल आचार्य सिंहः आ आचार्य व्याघ्रः कहि कऽ मात्र कएल गेल छल हमरा सभक चर्चा… आचार्य व्याघ्र: (घुरि कऽ देखैत) आ तहीसँ हमरा सभ अछोप भऽ गेलौं किने। आचार्य सिंह: मुदा ओ तँ आनो लोकक चर्च तत्वचिन्तामणिमे केने छथि। ओ सभ किए अछोप नै भेला… आचार्य व्याघ्र: कारण हुनकर सभक नाम गंगेश लिखने रहथि, स्पष्ट नाम, फलना आ चिलना, मुदा अपना सभक लेल ओ आचार्य सिंहः आ आचार्य व्याघ्रः मात्र लिखने छथि। से गंगेशक कविता बनि गेल उल्कामुख आ हम सभ बनि गेलौं व्याघ्र आ सिंह। गंगेशक बेटा वर्द्धमान गंगेशक विषयमे लिखलन्हि “सुकवि कैरव काननेन्दुः”। मुदा कियो खोजो केलकै चौपाड़िपर जे जँ गंगेश कवि रहथि तँ हुनकर कविता की भेल? आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहकेँ गंगेश आदर देलन्हि। मुदा किए? ओ आदर रहए ओ पोथी सभ ओ विचार सभ जे हम सभ लिखलौं। तँ अपना सभक जइ पोथीक कारणसँ गंगेश आदर रूपमे अपना सभकेँ आचार्य व्याघ्रः आ आचार्य सिंहः कहलन्हि से पोथी सभ की भेल? ओइ पोथी सभमे तँ अपन सभक असल नाम छल। ओ पोथी सभ सेहो सुड्डाह कऽ देल गेल। आचार्य सिंह: (आचार्य व्याघ्र दिश ताकि) कोन रहस्य छै ऐ मे? आचार्य व्याघ्र: (मंचक अग्र भागमे आबि) असुरक्षा आचार्य सिंह, असुरक्षा। गंगेश केलक रक्षा हमर सभक तर्कक श्रीहर्षक आक्रमणसँ, आ बनेलक नव्य-न्याय। नवका शास्त्र, नवका न्यायशास्त्र। ओहो अजीबे भेल, पिताक मृत्युक पाँच साल बाद भेलै ओकर जन्म आ चर्मकारिणीसँ केलक विवाह। आ ओइ विवाहसँ जे पुत्र भेलै वर्धमान से फेर मिलेलक न्याय आ नव्य-न्यायकेँ। मुदा वर्द्धमान अपन पिताक कविताकेँ नै बिसरल। असुरक्षा आचार्य सिंह, चौपाड़ि मध्य बाहरक विद्यार्थीकेँ तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि पक्षधर नै करऽ दै छलखिन्ह, ने सार-संक्षेप लिखऽ दै छलखिन्ह। चौपाड़िमे वर्द्धमानक बाद सभ कियो आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह आ उल्कामुख, ऐ सभकेँ काल्पनिक बना देलक। आचार्य सिंह: (पाछूसँ आचार्य व्याघ्रकेँ टोकैत) मुदा ऐसँ सर्जन कोना हएत आचार्य व्याघ्र? बिन सर्जनक चौपाड़िपर विद्यार्थी आत्म अभिव्यक्ति कोना करत? योग्यता कोना बढ़त। पुरान इतिहास, पुरान ज्ञान व्याघ्र, सिंह आ उल्कामुख बनि नै रहि जाएत? प्रतिबन्ध, प्रतिबन्ध..फेर ज्ञानक विस्तार कोना हएत? समाजक एक वर्ग दोसरसँ कटि जाएत… प्रतिबन्ध, प्रतिबन्ध..ऐ सँ स्नेह बढ़त वा निरपेक्षता बढ़त? जे अहाँकेँ करबाक हुअए करू, जे हमरा करबाक हएत हम करब..की समाजक यएह गति हएत? आचार्य व्याघ्र: (घुरि कऽ आचार्य सिंह दिस तकैत) आचार्य सिंह। की ऐ विस्मरणकेँ रोकबाक प्रयास नै हेबाक चाही? आचार्य सिंह: हेबाक चाही आचार्य व्याघ्र। कोनो चीजक विस्मरण तावत धरि सम्भव नै जाधरि ओकरा हम सभ बुझनाइए नै छोड़ि दइ। आचार्य व्याघ्र: बुझि कऽ मोन राखनाइ, ठीक कहलौं आचार्य सिंह। तँ चौपाड़िपर ई व्यवस्था भऽ रहल हएत जे बिनु बुझने पाठ विद्यार्थीकेँ यादि कराएल जाए जइसँ सभ बिसरि जाथि गंगेश आ वल्लभाकेँ। आचार्य सिंह: मुदा हम सभ संकेतक प्रयोग कऽ सकै छी। संकेतसँ स्मरण विस्मरण नै बनत। अपूर्ण रहत चौपाड़िक पाठ, आ अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ। आचार्य व्याघ्र: मुदा कोन संकेतसँ रुकत ई विस्मरण आचार्य सिंह.. आचार्य सिंह: उल्कामुख… (आकाशवाणी होइए…आ बिजलौका लौकैए. उल्कामुख..उल्कामुख…उल्कामुख…उल्कामुख…चारू दिस सोर होइए…आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह वाम रंगशीर्ष दिश जाइ छथि। तावत आचार्य शरभ दूटा शिष्य- शिष्य खिखिर आ शिष्य शाही-क संग प्रवेश करै छथि आ रंगपीठ होइत दहिना मत्तवर्णीपर आबि जाइ छथि। दुनू शिष्य एकटा शतरंजक घन उठा कऽ अबै छथि। प्रकाश दहिना मत्तवर्णीपर केन्द्रित भऽ जाइत अछि। तीनूक गरदनिमे उज्जर कपड़ा गाँती जकाँ मुँह भिरा कऽ बान्हल छन्हि। वातावरणक संगीत लगैए जेना बँसबिट्टीक हुअए आ भुतहा सन वातावरण चारू दिश सृजित होइत अछि।वातावरण पहिनेसँ बेशी डेराओन भऽ जाइए..बीच-बीचमे गीदरक हुआ..हुआ..क अबाज अबैए।) आचार्य सरभ: (मंचक सोझाँ अबैत) ई गंगेश आ वल्लभाक विवाह… शतरंजक खाना सभ दैत्याकार बनि जाएत, सात सए सालमे जाति खतम भऽ जाएत..किछु करू… रोकू.. विस्मरण… विस्मरण…. (दुनू शिष्य दिस तकैत) शिष्य खिखिर, शिष्य शाही। शिष्य खिखिर: (आचार्यकेँ सम्बोधित करैत, शिष्य शाही सेहो पाछाँसँ लपकि कऽ देखैए) आचार्य सरभ, अपूर्ण पाठ क विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ। शिष्य शाही: (आचार्यकेँ सम्बोधित करैत, शिष्य खिखिर सेहो पाछाँसँ लपकि कऽ देखैए) आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्रक शिक्षासँ निकलल अछि संकेत लिपि, संकेतसँ स्मरण विस्मरण नै बनत आचार्य सरभ। ओ संकेत पाठ अछि उल्कामुख.. आचार्य सरभ: (दुनू हाथ आकाशमे उठा कऽ गर्जन करै छथि) की अछि ई उल्कामुख? शिष्य खिखिर, शिष्य शाही..की अछि ई उल्कामुख? बड्ड नाम सुनै छिऐ एकर। मुदा चौपाड़िपर कियो बताएत जे की छिऐ ई उल्कामुख? शिष्य शाही: आचार्य सरभ, कोना देखब ई उल्कामुख। ई आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्रक शिक्षाक प्रयोग अछि जे गंगेश आ वल्लभा अपन कविता सभमे केने छथि। जे बना देलक अपना सभकेँ भूत, कल्पना….आ सेहो आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहक प्रतापे…सभटा अछि संकेत मात्र, संकेत जे अछि चारू कात, आ जे अछि कतौ नै। आचार्य सरभ: मुदा आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह…ओहो तँ छथि कल्पना..तखन कोना कऽ रहल छथि ओ सभ ई? शिष्य शाही: अपना सभक प्रतापे.. शिष्य खिखिर: (बीचमे टोकैत) अपना सभक प्रतापे? आचार्य सरभ: हँ, जखन विस्मरणक शक्ति बढ़ि जाइए तँ स्मरण आबि जाइए ओ सभ बौस्तु जइसँ हम घृणा करै छी। आ तेँ आबि गेल आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह। आ जखन आबि गेला आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह तँ आनि लेलन्हि हमरा सभकेँ। मुदा ओ संकेत, ओ उल्कामुख ऐ बँसबिट्टीकेँ पार केलक कोना शिष्य शाही। (शिष्य शाही शिष्य खिखिर दिस बकर-बकर तकैत अछि।) शिष्य खिखिर: (आचार्य सरभ दिस ताकि) आचार्य सरभ… खतम तँ कैये देलिऐ हम सभ.. आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहकेँ…. जँ गंगेश आदर देलन्हि हुनका सभकेँ तँ से पोथी सभ सेहो सुड्डाह भऽ गेल। गंगेशक कवित्वक चर्चा सुड्डाह भऽ गेल..तँ हुनकर कविता बनि गेल उल्कामुख.. वल्लभा बना देलन्हि ओकरा उल्कामुख.. आचार्य व्याघ्र, आचार्य सिंह आ गंगेश.. ऐ तीनू नामक भय.. पुरान इतिहास व्याघ्र, सिंह आ उल्कामुख बनि गेल तँ हमहू सभ तँ सरभ, खिखिर आ शाही बनि गेलौं। सरभ तँ कल्पित भऽ गेल, पूर्ण कल्पित, ओइ नामसँ तँ कोनो जानवर छैहे नै.. मुदा सरभ नामसँ पहिनहियो कोनो जन्तु नै रहै, मुदा सरभ रहै सदिखन.. काल्पनिक जन्तु.. शाही आ खिखिर सेहो खतम भेल जाइए.. कम भेल जाइए.. व्याघ्र आ सिंह सन… प्रतिबन्ध, प्रतिबन्ध.. फेर ज्ञानक विस्तार कोना हएत? आचार्य सरभ: (अविश्वास भावसँ शिष्य खिखिर दिस ताकि) हम पूर्ण कल्पना छी शिष्य खिखिर? शिष्य शाही: (बीचमे टोकैत, आचार्य सरभ दिस ताकि) आचार्य, अहाँ कल्पना छी आ हम सभ कल्पना बनैबला छी।चौपाड़िपर बाहरक विद्यार्थीकेँ तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि पक्षधर नै करऽ दै छलखिन्ह, आब देखियौ चौपाड़िक दशा.. बाहरक विद्यार्था तँ छोड़ू एतुक्को विधार्थीक एतए अभाव भऽ गेल अछि। आचार्य सरभ: (मंचक सोझाँ आबि गर्जन करैत) हम कल्पना? आचार्य सरभ भूतकालक अछि कल्पना आकि आचार्य सरभ भविष्यकालक अछि कल्पना..विस्मरण..दोसराकेँ विस्मरण सिखबैत स्वयं विस्मरित भऽ गेल अछि आचार्य सरभ। विस्मरण मंत्र..ई उल्कामुख बनि गेल अछि भय.. दोसराकेँ विस्मरण सिखबैत स्वयं विस्मरित भऽ जाइए लोक। (आकाशवाणी होइए…. उल्कामुख..उल्कामुख…उल्कामुख…उल्कामुख…आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह वाम रंगशीर्षपर प्रकाश एलापर साकांक्ष भऽ जाइ छथि। आचार्य शरभ, शिष्य खिखिर आ शिष्य शाही दहिना मत्तवर्णीपर अन्हार भेलासँ मात्र छाह बनि जाइ छथि। तीनू छाह शतरंजक घन उठा कऽ आगाँ बढ़ैत छथि।) आचार्य व्याघ्र: हम कल्पना? भूतकालक कल्पना आकि भविष्यकालक?.. आचार्य सिंह: (बीचमे टोकैत) भूतकालक आचार्य व्याघ्र, भूतकालक। भविष्य तँ वल्लभक मृत्युक सात सए साल बाद आएत..अखन तँ अदहे बीतल अछि… भविष्यकालक तँ प्रतीक्षा अछि..मुदा तावत की की कल्पना बनि जाएत…की की बचल रहि जाएत। (सौंसे अन्हार पसरि जाइत अछि, अन्हारेमेसँ आचार्य सिंह आ आचार्य व्याघ्रक अबाज बहराइए।) आचार्य व्याघ्र: तखन कल्पने सही आचार्य सिंह। चलू वर्द्धमान, दीना, भदरी आ उदयन लग। वएह सभ कोनो गप बतेता। आचार्य सिंह: ई कोनो बेजाए गप नै हएत आचार्य व्याघ्र। षडयंत्रकेँ तँ तोड़ैए पड़त.. मुदा तावत की की बचल रहि जाएत सएह..। आचार्य व्याघ्र: से तँ देखिये रहल छी आचार्य सिंह। आचार्य सरभ आ हुनकर शिष्य शाही आ शिष्य खिखिर, ओहो सभ चुप नै छथि, किछु ने किछु कइये रहल छथि। एकटा रटैबला मशीन बनि गेल अछि मिथिलाक विद्यार्थी। नव्य-न्याय बंगाल चलि गेल, तकर ककरो कोनो चिन्ता नै छन्हि.. जे किए चलि गेल.. वल्लभा आ गंगेशकेँ खतम करैत करैत ओ सभ सेहो खतम भऽ रहल छथि। आचार्य सिंह: आचार्य व्याघ्र से तँ आरो खराप भेल.. हे आबि गेलाथि वर्द्धमान, दीन, भदरी आ उदयन। (प्रकाश भऽ जाइत अछि आ मुख्य रंगमंच स्थलपर आचार्य सिंह, आचार्य व्याघ्र, उदयन, दीना, भदरी आ वर्द्धमान देखना जाइ छथि।) आचार्य सिंह: (सभकेँ सम्बोधित करैत) हम सभ एतए एकत्र भेल छी.. वर्द्धमान: (बीचेमे टोकैत) कोनो अकाल.. उदयन: कोनो बाढ़ि.. आचार्य व्याघ्र: (सभकेँ सम्बोधित करैत) नै उदयन, बाढ़ि नै, नै वर्द्धमान अकाल नै.. आचार्य सिंह: (वर्द्धमान आ उदयनकेँ सम्बोधित करैत) वर्द्धमान, सोचक अकाल छै। उदयन, क्षुद्रताक बाढ़ि आएल छै।… दीना: (बीचमे टोकैत) कोनो बाहरी शत्रु.. भदरी: मनुक्ख आकि बनैया पशु.. आचार्य व्याघ्र: (दीना आ भदरीकेँ सम्बोधित करैत) नै दीना, कोनो बाहरी शत्रु नै। भदरी कोनो बाहरी नै, ने कोनो मनुक्ख आ नहिये कोनो बनैया पशु.. आचार्य सिंह: (दीना आ भदरीकेँ सम्बोधित करैत) सभ अपने लोक दीना-भदरी। कोनो बाहरी शत्रु नै..कोनो बनैया नै, सभ खुट्टे पड़हक.. आचार्य सरभ.. आ हुनकर शिष्य सभ.. उदयन:: (मंचक सोझाँ अबैत) जगन्नाथ मन्दिरमे उदयनक उद्घोष, जे जैँ हम तेँ तूँ पूजित होइ छह। बन्द केवार खुजि गेल। आ ई के छी आचार्य सरभ.. एकटा गीदर.. दीना-भदरी: (सम्वेत स्वरमे, मंचक सोझाँ अबैत) जड़िमे दुनू गोटे अड़ा देलिऐ शरीर आ दरकि गेलै देवार। आ बन्न केवार खुजि गेल। आ ई के छी आचार्य सरभ.. एकटा गीदर.. दीना: (मंचक सोझाँसँ पाछू घुमैत) मुइल गाइक हड्डीमे फोटरा गिदर बनि नुका कऽ सलहेस दीना-भदरी आ बाघक कुश्ती देखथि। बाघक रान पकड़ि दू कात चीर कऽ फेकी हम दुनू भाँइ आ मुइल गाइक हड्डीसँ बहार भऽ फोटरा गीदर बनल सलहेस ओकरा जोड़ि देथि आ फेर । आ ई के छी आचार्य सरभ.. एकटा गीदर.. आचार्य सिंह: सभ सएह उपाय करू, कोना ओ गीदर फेकत आगि.. जे नै फेकि सकै ओ आगि भदरी: मिथिलाक राजा मग्गहक हंशराज-वंशराजसँ नरुआरक पोखरि खुनबओलन्हि मुदा ओ जाइठ नै उठा सकल। हम दुनू भाँइ दछिनबरिया भीड़सँ जाइठ फेकलौं तँ ओ सोझे जाठिक लेल बनाएल खाधि- बॉली मे जा कऽ खसल। ई जाइठ अखनो दक्षिण दिस टेढ़ अछि। आ ई के छी आचार्य सरभ.. एकटा गीदर.. जे फेकैए आगि.. आचार्य सिंह: सभ सएह उपाय करू, कोना ओ गीदर फेकत आगिक गोला.. आ कोना बचत… कोना बचत विस्मरणसँ ई देश.. उदयन:: (कने चिन्तित होइत) विस्मरण!!!!!मन्त्रार्थमे महर्षि पतञ्जलिक वैज्ञानिक मन्तव्य “यच्छब्द आह तदस्माकं प्रमाणम्” माने जे शब्द आकि मंत्रक पद कहैत अछि सएह हमरा लेल प्रमाण अछि- एकर अर्थ बादमे वेदे प्रमाण अछि- सेहो हमरा नामसँ भविष्य पुराणमे नै जानि किए गलत रूपेँ दऽ देल गेल। अनकर देखल बौस्तुक स्मरण अनका कोना हेतै? विस्मरण.. आचार्य सरभक वस्मरण आगि अछि पसरि रहल.. आब बूझल.. आचार्य व्याघ्र: वएह स्मरण खतम कएल जा रहल छै.. स्मरण विस्मरण बनाएल जा रहल छै। दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): धामी कहलक हमरा सभकेँ काज करैले अपना खेतमे। मारि कऽ जुमा कऽ फेकलौं हम सभ ओकरा धामिन लग। धामिन गेल खिसिया आ बजेलक अपन दोस फोटरा गीदरकेँ। फोटरा गीदर मारलक हमरा सभकेँ। मुदा जिअत जिनगी पाबि कऽ ई उल्कामुख.. उदयन अहाँक विद्या पास नै अछि एतऽ.. मुदा जीबि गेल छी हम सभ मरियो कऽ… उदयन:: बुझलौं, आब बुझलौं। लोकगाथा बनबए पड़त, नाराशंसी जगबए पड़त। हमर आ गंगेशक ग्रन्थकेँ बिनु बुझने रटबाक मतलब भेल विस्मरण। वर्द्धमान: (गर्जन करैत) सुकविकैरवकाननेन्दुः गंगेश बनि जेताह उल्कामुख। आचार्य व्याघ्र: जेना हम सभ बनि गेल छी, व्याघ्र आ सिंह आचार्य सिंह। आचार्य सिंह: आ बना देने छी चौपाड़िक शिक्षककेँ आचार्य सरभ आ ओतुक्का विद्यार्थीकेँ खिखिर आ शाही। सभटा भऽ जाएत खतम? सर्वविनाश.. दीना: मुदा दौरीवाली हिरिया तमोलिन केलक तपस्या पतिक रूपमे प्राप्ति लेल.. भदरी: आ दौरीवाली जिरिया लोहारिन केलक तपस्या पतिक रूपमे प्राप्ति लेल.. दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): मरलाक बादो। गंगामे पैसि बनेलौं पत्नी दुनूकेँ। मरलाक बादो। आचार्य व्याघ्र.. आचार्य सिंह.. उदयन.. वर्द्धमान.. मरियो कऽ जिअत.. बिसरलो चीज घुरत.. उदयन:: गंगेश केलक रक्षा हमर तर्कक श्रीहर्षक आक्रमणसँ, नव्य-न्याय। नबका शास्त्र, नबका न्यायशास्त्र। ओहो अजीबे भेल, पिताक मृत्युक पाँच साल बाद भेलै ओकर जन्म आ चर्मकारिणीसँ केलक विवाह। आ ओइ विवाहसँ जे पुत्र भेलै वर्धमान से फेर मिलेलक न्याय आ नव्य-न्यायकेँ। दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): सत्यकामक सेहो तँ सएह हाल रहै। पिता के छलै ओकरा बुझले नै छलै, जबालाक पुत्रसत्यकाम, मुदा गौतम, मिथिलाक गौतम, हुनका सन गुरु भेटलै, वेदक अध्ययन केलन्हि। मरलाक बादो उदयन, नव आ पुरानक मेल आ विरोध होइए। वंशीधर बाभन आ बालारामक मेल भेल, लोक देवी गहील आ पौराणिक दुर्गा देवीक मेल भेल। उदयन:: (आश्चर्यसँ) मरलाक बादो दीना-भदरी। दीना-भदरी (सम्वेत रूपेँ): हँ उदयन। फोटरा गीदर बनल दोस…संग भेलाह सलहेस। मरलाक बादे… (अन्हार पसरि जाइत अछि, मुदा गपशप सुनबामे अबैत अछि, आचार्य सरभ आ शिष्य शाही आ खिखिरक गपशप।) आचार्य सरभ: शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी, मारू , मारू खिखिर आ शाहीकेँ मारू। विद्यामे क्षति कऽ रहल अछि ई दुनू। (मारि-पीटक शब्द आ खिखिर आ शाहीक आर्तनाद।) आचार्य सरभ: लगैए खिखिर आ शाही मरि गेल। शिष्य नढ़िया, शिष्य बिज्जी। आब पढ़ाइ शुरू करू। कोनो दिक्कत नै हएत आब। शिष्य नढ़िया: सभटा रटि लेलौं आचार्य सरभ, तूँ रटि लेलेँ बिज्जी। शिष्य बिज्जी: हमहूँ सभटा रटि लेलौं नढ़िया। हँ आचार्य हमहूँ सभटा रटि लेलौं। आचार्य सरभ: ठीक छै, अहाँ सभ जाइ जाउ। (मंचपर प्रकाश आबि जाइत अछि, आ मात्र आचार्य सरभ मंचपर देखा पड़ै छथि।) आचार्य सरभ: ठीक छै, आब सभ ठीक छै, धधरा हम फेकैत छी, हम आचार्य सरभ। बनबऽ दियौ ओकरा सभकेँ उल्कामुख, धधरा तँ हमहूँ फेकैत छी । आब हमरा बाद बनत आचार्य हमर दुनू शिष्य। हमर दुनू शिष्य बनत आचार्य, आचार्य नढ़िया आ आचार्य बिज्जी। आइ धरि तँ आचार्यमे कियो ने कियो एकटा बचिये जाइ छल जे विस्मरणमे नै रहै छल, मुदा आब हएत पूर्ण विस्मरण। मरि गेल शाही आ खिखिर। बनत आचार्य, आचार्य नढ़िया आ आचार्य बिज्जी… हएत पूर्ण विस्मरण… (तखने माइकसँ गीत आबऽ लगैए, आचार्च सरभ चारू कात ताकऽ लगै छथि…) एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा पानि सेब देवता अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँऽ? हमरा गौरध्या सन अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा गहील सन देवता अरैध के लबिहेँ गै.....। ….. आचार्य सरभ: (चारू दिस तकैत) के छी? के छी? (उद्विग्नतासँ मंचपर विचरण करैत) के छी। अपन प्रिय शिष्य खिखिर आ बिज्जीकेँ मारलौं.. मुदा ई के सभ छी जे विस्मरण रोकऽ चाहैए। संकेतसँ पसारऽ चाहैए ओ जकर हएत पूर्ण विस्मरण (पागल सन एम्हर-ओम्हर घुरियाइए, अबाज फेर अबैए)। दुर-दुर छीया ए छीया, सरभक मुँहसँ धधरा निकलै जरै किछु नै किए? दुर-दुर छीया ए छीया, ….. (रुदन स्वरमे यएह गीत फेर अबैए, सरभ चौंकै छथि। स्वर कानऽ लगैए, आ आचार्य सरभ हँसऽ लगै छथि, हँसिते रहै छथि। सगरे अन्हार पसरि जाइए।आ जखन इजोत होइए तँ उदयन, दीना, भदरी आ वर्द्धमान मुख्य रंगमंचपर देखा पड़ै छथि।) उदयन:: (मंचक सोझाँ सम्बोधित करैत) आब पुरान नाम फेरसँ रखबाक परम्परा आएल छै। से हम उदयन। ई छथि दीना, ओ भदरी, ओ वर्द्धमान..…सुनै छिऐ नामक सेहो प्रभाव पड़ै छै। जे से… वर्द्धमान: (पाछूसँ उदयनकेँ सम्बोधित करैत) धारक कातमे आ साँपबला घरमे निवास केनिहारकेँ चैन कतऽ उदयन? ई मिथिला सएह बनि गेल अछि। उदयन:: (मंचक सोझाँ घुरि सभकेँ सम्बोधित करैत) भातढाला पोखरि आ सागढाला पोखरि जाए पड़त, तत्काल। दीना: (उदयनकेँ सम्बोधित करैत) जतए भीम भात आ साग रखैत रहथि? उदयन: हँ, आ सिमलवन सेहो। भदरी: (उदयनकेँ सम्बोधित करैत) सेमापुर जतए अर्जुन अपन अस्त्र-शस्त्र अज्ञातवास कालमे नुकेने रहथि? उदयन: हँ, एकटा आर युद्ध शुरू भऽ गेल अछि। दिमागी युद्ध.. नाराशंसी.. शुरू हएत दिमागमे.. वर्द्धमान: (हाथ पसारि) घृणाक तरहरिमे प्रेम, मुस्कीसँ जीतब घृणा आ ईर्ष्याकेँ घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ ओइ तरहरिमे घृणाकेँ गारि देबै अपन प्रेमक शक्तिसँ उदयन:: हँसैत- मुस्कियाइत करबै आग्रह जे परिश्रम घृणाक तरहरि बनबऽमे लगौलक कहबै प्रेमक पोखरि काटऽ जइमे प्रेमक पानि बरखा मासमे भरि जाएत आ भरले रहत, ततेक गहींर कऽ काटल रहत माटि ओइमे हेलत प्रेम हेलैत रहत आ बहि जाएत, डूमि जाएत घृणा आ ईर्ष्या डूमि जाएत आ बझा कऽ लऽ जएतै पनिडुब्बी ओकरा दीना: जावत हम रहब नै छूबि सकत क्यो प्रेमक सत्यक पुत्रकेँ कारण शक्तिसँ, ऊर्जासँ भरल अछि सत्यक पुत्र ओकर चारूकात स्थूल-प्रेमक गिलेबासँ ठाढ़ कएल घेराबा रहत नै करू चिन्ता। भदरी: आ जहिया हम नै रहब सीखि जाएब अहाँ सभ किछु हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर सत्यक विरोधीक लेल ओइ घेराबाकेँ तोड़बाक प्रयास अहाँक स्थूल-प्रेमी मित्र सभ नै हेमऽ देथिन्ह सफल उदयन: से हम रही वा नै रही प्रयाण थम्हत नै बतहपना बढ़त नै मारि देब तँ मारि दिअ मुदा मोन राखू हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु मुदा रहबे करत स्थूल-प्रेमी साधक सभ दीना: आ करत पहिल नृत्य हस्त संचालनसँ चतुरहस्त आनन्दसँ भरल मोन सत्य, झूठ आ तकर निर्णयक लेल भदरी: सनगोहिक चामसँ छारल डफ-खजुरी लए डोरीक कम्पनसँ ध्वनि निकालत गुमकी, ओइ खजुरीक ध्वनि आ गुमकी, गुम..गुम..गुमकी... आ तखन दोसर नृत्य होएत प्रारम्भ दीना: शिखरहस्त पर्वतशिखरसन युद्धक आवाहन-प्रदर्शनक लेल घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ मारि देत तँ मारऽ दिऔ मोन राखू मुदा हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु उदयन: मुदा हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर रक्तबीजी सत्यपुत्र सभकेँ दीना-भदरी: (सम्वेत स्वरमे) बुढ़िया डाही संग अछि कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत ओ नै छथि बुढ़िया डाही खेत जे छलै सनगर यौ से बनल प्रेमक कमलदह घृणाक विरुद्ध अछि हमर ई बुढ़िया डाही (वल्लभाक अबाज अबैए, सभ चौंकि कऽ देखऽ लगै छथि।) दीना-भदरी: बुढ़िया डाही, वल्लभा.. वल्लभा.. देखू प्रभाव उदयन.. देखू.. वल्लभाक अबाज: फेर वएह गप आत्मरक्षार्थ सत्यक विरोधमे चोरबा बाजल फेर सर्जनक सुख भेटत चोरिमे? दोसराक कृति अपना नाम केलासँ आकि दोसराक मेहनतिकेँ अपन नाम देलासँ दोसराक प्रतिभाकेँ दबा कऽ कुटीचालि कऽ आर भाँग पीबि घूर तर कऽ गोलैसी कोनाकेँ आँगुर काटब जे लिखब बन्न करत तोड़ि दियौ डाँर, काटि दियौ पएर आँखि निकालि लिअ धऽ दियौ रॉलरक नीचाँमे पिसीमाल उठा दियौ बड़का एलाहेँ सर्जनक सुख पएबाले (गंगेशक अबाज अबैए, सभ चौंकि कऽ देखऽ लगै छथि।) गंगेशक अबाज: तँ की हारि जाइ तँ की छोड़ि दिऐ इच्छा जीतत आकि जीतत ईर्ष्या संकल्प हमर जे ऐ धारकेँ मोड़ि देब संकल्प जीतत आकि जीति जाएत घृणा मुदा किछु ईर्ष्या आ घृणा अछि सोझाँ अबैत ईर्ष्या जे हम धारकेँ नै मोड़ि पाबी घृणा जे बहैत रहए ओ ओहिना ओहिना किए ओहूसँ भयंकर बनि दीना-भदरी: गंगेश…. देखू प्रभाव उदयन.. देखू.. वल्लभाक अबाज: संकल्प जे हम केने छी इच्छा जे अछि हमर/ से हारि जाए आ जीति जाए ईर्ष्या-द्वेष/ जीति जाए घृणा हा हारबो करी तेना भऽ कऽ जे लोक देखए!/ जमाना देखए!! तेना कऽ हारए संकल्प हमर/ इच्छा हमर गंगेशक अबाज: धारकेँ रोकि देबाक/ ठाढ़ भऽ जएबाक सोझाँ ओकर आ मोड़ि देबाक संकल्प ओइ भयंकर उदण्ड धारकेँ मुदा किछु आर ईर्ष्या अछि सोझाँ अबैत ओ द्वेष चाहैए जे हमर प्रयास/ धारकेँ मोड़बाक प्रयास वल्लभाक अबाज: मोड़लाक प्रयासक बाद भऽ जाए धार आर भयंकर पुरान लीखपर चलैत रहए भऽ आर अत्याचारी आ हम जाइ हारि आ हारी तेना भऽ कऽ जे लोक राखए मोन मोन राखए जे कियो दुस्साहसी ठाढ़ भऽ गेल छलि धारक सोझाँ तकर भेल ई भयंकर परिणाम जे लोक डरा कऽ नै करए फेर दुस्साहस दुस्साहस ठाढ़ हेबाक उदण्ड-अत्याचारी धारक सोझाँमे लऽ ली हम पतनुकान/ आ से सुनि थरथरी पैसि जाइ लोकक हृदयमे घृणाक विरुद्ध ठाढ़ हम बुढ़िया डाही। (अबाज शान्त भऽ जाइत अछि, फेरसँ सभ साकाक्ष भऽ जाइ छथि।) उदयन: मुदा हम हँसै छी हारि तँ जाएब हम मुदा हमर साधनासँ जे रक्तबीज खसत से एक-एकटा ठोपक बीआ बनि जाएत सहस्रबाढ़निक झोँटाबला घृणाक विरुद्ध ठाढ़ अछि हमर ई बुढ़िया डाही। दीना: कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत बनत खेत जे छलै सनगर यौ, जाहिमे घृणाक तरहरि खुनेलौं यौ घृणाक तरहरि खूनल ओइ खेतमे कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़ अछि भरि गेल भदरी: मुदा प्रेमक कमल अछि फुला गेल। सहस्रबाढ़नि झोँटाबला बुढ़िया डाही केलक ई। वर्द्धमान: आ तखन फैसला हेतै आब जखन उनटि जाइए लोक उनटि जाइ छै बोल छने-छन बदलि जाइए बिचकाबैए ठोर बोलक मधुर वाणी बोली-वाणी बदलि जाइ छै बनि जाइए बिखाह गोबरझार दऽ चमकाबै छी स्मृतिकेँ घृणाक विरुद्ध ठाढ़ छलि तहियो हमर ई बुढ़िया डाही। उदयन: धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै आ ओ सभ तकर विरुद्ध ठोकि कऽ ताल भऽ जाएत ठाढ़ आ डरा जाएत द्वेष स्मरण कऽ जे फेर रक्तबीजसँ निकलल ऐ सहस्रबाढ़नि सभक रक्तबीज एकर सभक बीआक सन्तान फेर आर बढ़ि जाएत आक्रमणसँ कारण संकल्प अछि, इच्छा अछि ई सभ धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै सभ सम्वेत स्वरमे: घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। (लगैए जे सभ उड़िया रहल छथि..हबा तेज बहैए.. सभ हाथक अभिनयसँ आ देहक हवाक विरुद्ध ठाढ़ करबाक अभिनयसँ बिहाड़िमे उड़ियेबाक अभिनय करै छथि। आस्ते आस्ते अन्हार पसरि जाइए।) चारिम कल्लोल (मंचपर अन्हार अछि। नेपथ्य्सँ गीत अबैत अछि) कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डालि लोरहब बेली-चमेली कथी डालि लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल गमक लागे गेंदा फूल कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला...किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। (मंचपर प्रकाश अबैए। एक दिस मत्तवर्णीपर दीना आ दोसर दिस मत्तवर्णीपर भदरी छथि, दीना भातढाला पोखरि आ भदरी सागढाला पोखरिक कातमे छथि। एक दिस रंगशीर्षपर उदयन आ दोसर दिस रंगशीर्षपर वर्द्धमान छथि । रंगपीठ खाली अछि।) वर्द्धमान: (उदयनकेँ सम्बोधित कऽ) धारक कातमे घर बनेने छी हम आ साँपबला घरमे रहै छी अहाँ आचार्य उदयन? उदयन:: धारक कातमे निवास केनिहार आ आ साँपबला घरमे निवास केनिहारकेँ चैन कतऽ? वर्द्धमान, भातढाला पोखरि आ सागढाला पोखरिपर दीना भदरी छथि ने? दीना: (चिकड़ि कऽ) भातढाला पोखरिपर, जतए भीम भात रखैत रहथि? हम छी दीना, एतऽ भातढाला पोखरिपर। भदरी: (चिकड़ि कऽ) सागढाला पोखरि, जतए भीम साग रखैत रहथि। हम छी भदरी, एतऽ सागढाला पोखरिक कातमे। उदयन: हँ, आ सिमलवन सेहो जाए पड़त ककरो, ओतऽ कब्जा छन्हि आचार्य सरभक। भदरी: हँ वएह सेमापुर छी सिमलवन जतए अर्जुन अपन अस्त्र-शस्त्र अज्ञातवास कालमे नुकेने रहथि? उदयन: हँ, एकटा आर युद्ध शुरू भऽ गेल अछि। वर्द्धमान: मुदा ई युद्ध शास्त्रार्थसँ नै जीतल जा सकैए आचार्य उदयन। (रंगपीठ दिस इशारा करैत।) देखू ओतऽ सभ किछु लागि रहल अछि खाली खाली, मुदा अछि नुकाएल शस्त्र, घृणा, ईर्ष्या-द्वेष आ.. उदयन: (बीचमे टोकैत).. आ आचार्य सरभ। (रंगपीठक दूर भाग दिस इशारा करैत।) ओऽऽऽऽऽ छी ठाकुरगंज, भीम ठाकुर माने भनसिया बनि समै कटने रहथि, ओतै ओ कीचक वध केने रहथि। भदरी: (हाथ उठा कऽ) घृणाक वध हएत आब.. दीना: (हाथ उठा कऽ) अवश्य भदरी… भदरी: अगड़म बगड़म काठ कठम्बर दीना: दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ। भदरी: (रंगपीठ दिस आंगुर देखबैत) ओतए मनिहारीमे श्रीकृष्णक औंठीक मणि हेरा गेल छलन्हि। उदयन: (हाथ आ मुँह ऊपर उठा कऽ चिकरि कऽ) आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह। अहाँ सभकेँ कागचक व्याघ्र आ सिंह बनाबैबला आचार्य सरभक काट आब जा कऽ भेटल अछि.. हेराएल मणि, ई संकेत उल्कामुख पसारि दियौ सभ ठाम, ठाम-ठाम.. जे भेटतै ककरो.. आ बिसराइयो कऽ स्मरण भऽ जाएत ओ। (नेपथ्यसँ गीत अबैत अछि। सभ स्थिर भऽ जाइ छथि।) कटबै मे सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै...... जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे सुन लगै गोहबरिया हे कटबै......... जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै..... बिनबै झुमरि जाल हे। (अन्हार पसरि जाइत अछि।फेर इजोत होइत अछि आ आचार्य सरभ विक्षिप्त अवस्थामे मुख्य मंचपर अबै छथि।) आचार्य सरभ: (मंचसँ बाहर पाछू कात बोन दिस इशारा करैत।) ई बँसबिट्टी एतेक पातर किए भऽ गेल अछि। ऐमे सँ कोनो अबाज नै अबै छलै, मुदा आब ई गीत पहिल बेर एकरा चीड़ि कऽ आबि रहल अछि। ई कोना रोकि सकत उल्कामुखकेँ..कोना रोकि सकत?..(ठमकि कऽ पाछू दिस ताकि कऽ) शिष्य..(फेर ठमकि कऽ) मुदा ई शिष्य सभ तँ कोनो जोकरक अछिये नै। ई सभ कोना कऽ रोकि सकत उल्कामुखकेँ? ई सभ तँ रटन्त विद्याक पालक सभ अछि..आ स्त्रीक प्रतिबन्ध चौपाड़ि आ टोलमे कऽ देने छिऐ पहिनहियेसँ.. वएह सभ गीत गाबि रहल अछि... ई सभ तँ उल्कामुख बुझबे गुनबे नै करत तँ कोना कऽ रोकि सकत? (आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहक प्रवेश।) आचार्य व्याघ्र: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) आचार्य सरभ, बहुत भेल कल्पना, थाकि गेल छी हम। आचार्य सिंह: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) आचार्य सरभ, कल्पना खतम। ई जादू खतम, ई बँसबिट्टीक बेढ़ खतम भेने आब नहिये हमर, नहिये आचार्य व्याघ्रक, नहिये अहाँक, नहिये गंगेशक, नहिये वल्लभाक, नहिये वर्द्धमानक, नहिये उदयनक, नहिये दीनाक आ नहिये भदरीक अस्तित्व बाँचल। आचार्य व्याघ्र: वृन्दावन बोन बनि गेल ई बँसबिट्टी। (बाट दिस इशारा करैत) एतऽ आबैबला रस्ता ई बाटो बहिन मदति केनाइ शुरू कऽ देने अछि वल्लभाक। काछुक खोपड़ीमे सरिसवक तेलमे बाती राखि बियाहक दीप बनाओल गेल छलै वल्लभा लेल। कपोत रूपमे बिध-बिधाता आबि गेल छथि। (नेपथ्यसँ साँइ-साँइ करैत अबाज अबैए। आचार्य व्याघ्र कान पाथि सुनै छथि।) सुनू ई स्वर। स्वप्नलोकमे विचरणक दिन खतम भेल। आचार्य सिंह: (अकास दिस इशारा करैत) हरियर पाँखि आ लाल ठोरबला ई सुग्गाक जोड़ी, लटपटिया सुग्गाकेँ देखू, (अकासमे दोसर दिस इशारा करैत) ऐ प्रेम सखा मोरक जोड़ी देखू, बिदा भऽ गेल अछि ऐ वृन्दावन लेल। आचार्य सरभ: (आचार्य सिंहकेँ सम्बोधित करैत) छिन्नमस्ताक कटल मूड़ीबला धड़, ओ मूड़ी धड़सँ खसैबला बिचका मोटका धारकेँ पीबैए.. शोनितक मोटका धारकेँ.. ओ नीचाँ खसल मूड़ी, ओ खसल मूड़ी हम बनि गेल छी आचार्य सिंह….. नै हारब हम.. हएत विस्मरण.. भैये गेल अछि विस्मरण.. आचार्य व्याघ्र: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) आ दूटा आर धार दूटा दुनू कातमे ठाढ़ जोगिन पीबै छै आचार्य सरभ। दीना, भदरी, ओइ दुनू जोगिनकेँ मोहि लेलन्हि, जेना मोहि लेने रहथि ओ जिरिया लोहारिन आ हिरिया तमोलिनकेँ । आचार्य सिंह: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) इच्छा एकटा मशीन छी। सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी.. आचार्य व्याघ्र: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने रहए ई बँसबिट्टी। आचार्य सिंह: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) अचेतनता चेतना बनि गेल। ओकर भाषा अछि उल्कामुख। आचार्य व्याघ्र: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) आचार्य सरभ, अहाँक शिक्षा पद्धतिमे किछु भाव आ सोच वंचित रहए। आचार्य सिंह: (आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) निरन्तरताक विरोध करैए उल्कामुख। आचार्य सरभ: (आचार्य व्याघ्र आ सिंक बीचमे जा सोझाँ बजैत) समताक लगक शब्द असमता, न्यायक लगक शब्द अछि अन्याय आ वंचितक लगक शब्द अछि प्राप्ति। आचार्य व्याघ्र: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) नै आचार्य, ई अहाँक दमित करैबला शिक्षा पद्धति अछि, एकर विरोध करैत अछि उल्कामुख। आचार्य सरभ: (आचार्य व्याघ्र आ सिंक बीचमे जा सोझाँ बजैत) ऊँच स्थानक लोककेँ अहाँ सभ नीचाँ आनऽ चाहै छी आ निचुलकाकेँ ऊपर। आचार्य सिंह: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) अहाँक शिक्षा पद्धतिक भाग अछि ई ऊँच आ नीँच, एकर विरोध करैत अछि उल्कामुख। आचार्य सरभ: (आचार्य सिंह दिस तकैत।) एकल वाद्यकेँ मेटा कऽ अहाँ जन कोलाहल आनऽ चाहै छी। आचार्य सिंह: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) जन गाथापर लिखल नाराशंसीपर नाचत लोक आ ओकरे संगे नाच गन्धर्व। स्म्वेत स्वरक नाद अछि उल्कामुख। आचार्य सरभ: (हाथसँ वीभत्स इशारा करैत।) मुदा रचनाकार तँ मरि गेल। के मानत जे के अछि लिखने ई उल्कामुख? आचार्य व्याघ्र: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) रचनाकारसँ बेशी महत्वपूर्ण अछि ई रचना, एकर सन्देश, आ ओ रचना आ संदेश अछि उल्कामुख। आचार्य सिंह: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) रातिक राजा छल चोर, दिनमे मालिक मालिक करै छल। चोरक रूप थोड़े होइ छै आब… आब तँ चोरियो सभ करऽ लागल अछि। पहिने ओकर प्रशिक्षण होइत रहए, खेतक आरिपर। सिंह कोना काटल जाय से आरिकेँ काटि कऽ देखाओल जाइत रहए। भोर भेने जे लोक सभ खेत जाइत छल तँ देखैत छल। देखैत छल आरिमे काटल सिंघ… भरि गाम हल्ला..। रौ, सतर्क रहै जाइ जो। कोनो पैघ चोरिक योजनामे अछि ई सभ। मुदा फेर वएह सभ दिनमे सामान्य मनुक्ख।..... आचार्य व्याघ्र: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) दू दिनसँ फुटहा खा कऽ गुजर कऽ रहल छी। आइ चोरि लेल जाए पड़त। बच्चा सभक लेल। देहमे तेल लगा कऽ, मुँहमे भसम लगा कऽ। क्यो पकड़ए चाहत तँ छछलि कऽ भागि जएब। हे क्यो चोरकेँ रातिमे चीन्हि लेलहुँ तँ बरनी रहऽ देबैक। नाम नै बकि देबैक। नै तँ मारि देत... कारण दिनमे तँ अहाँ मालिक भऽ जएबैक। से डर छैक रातुक राजाकेँ। आचार्य सरभ: (आचार्य व्याघ्र आ सिंक बीचमे जा सोझाँ बजैत) की कथा सुना रहल छी..ओइ.. ओइ.. की कहलिऐ..उल्कामुखक.. आचार्य सिंह: (आगाँ बढ़ि आचार्य सरभकेँ सम्बोधित करैत) मुँह बिचकेलहुँ तँ लोक सभ बुझलक जे प्रसन्न छी, भौंहपर जोर देने बुझलक जे चिन्तनशील छी। मुदा हृदय रहैए सदिखन कनैत। से हम जनैत छी आचार्य सरभ.. आचार्य सिंह: (बाहर अकासमे एकटा किरण चमकैते रहैत अछि।) आ देखू, वनदेवी सेहो आबि गेलीह ऐ वृन्दावन, आ वनदेवीक सखी वनसप्तो, पाँखियुक्त ममातामयी गाय। आबि गेलीह वनसप्तो बोनमे हेराएल उल्कामुखकेँ रस्ता देखबै लेल। (तीनू गोटे तेना अभिनय करै छथि जेना हबामे उड़िया रहल होथि। नेपथ्यसँ साँइ-साँइ करैत अबाज बढ़िते जा रहल अछि।) तीनी गोटे सम्वेत: कल्पनाक पएर उखड़ि रहल अछि…आबि रहल अछि उल्कामुख। अगड़म बगड़म काठ कठम्बर अगड़म बगड़म काठ कठम्बर अगड़म बगड़म काठ कठम्बर आबि गेल ई उल्कामुख (उड़ियाइत तीनू गोटे खसबाक अभिनय करैत छथि आ सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।) (फेर प्रकाश होइत अछि आ मंचपर घनक स्थान गोलाकार पिण्ड लऽ लैत अछि।) भगता: घूमि रहल अछि ई पृथ्वी। (गोलाकेँ परिश्रमसँ हाथमे उठबैत छथि।) लटकल अछि ई अकासमे। एकर नीचाँमे कोनो आधार नै छै। एतेक भारी अछि तैयो कोनो भार नै छै एकरामे। अगरम बगड़म काठ कठम्बर (गोलाकेँ नीचाँमे राखि दै छथि आ घसकि कऽ पाछाँ आबि जाइ छथि- दक्षिण दिशामे। हुनकर शिष्य अबैत छथि आ गोलाकेँ घुमबऽ लगै छथि।) भगता: देखू। ई घड़ी विपरीत दिशामे घूमि रहल अछि ई पृथ्वी, मुदा जँ उत्तर दिश देखबै तखन। दक्षिण दिस तकबै तँ घड़ीक दिशामे घुमैत देखाएत ई। आ हम अहाँ जे ऐ पृथ्वीपर छी ओकरामे भार छै। आ ई पृथ्वी अछि बिन भारक, अकासमे लटकि रहल।(हुनकर शिष्य पृथ्वीकेँ उठा कऽ इशारा करै छथि।) अगरम बगड़म काठ कठम्बर (भगता उकासी करऽ लगै छथि। तखने भगताकेँ नीचाँमे उल्कामुखी ताबीज भेटै छै, ओइमे सरभक चित्र छै…ओ चिकड़ि उठैए.. “ई की.. ई की.. उल्कामुखी ताबीज… हम कहै छलिऐ सएह हएत..” ई कहि ताबीज खोलैए आ ओइमेसँ तालपत्रपर किछु अक्षर खचित रेशा सन बहराइत अछि.. आ ओ खुशीसँ बेहोश सन भऽ जाइए….. शिष्य गोलाकेँ नीचाँ राखि कऽ भगताक छाती ससारऽ लगै छथि।) भगताक शिष्य: (गुरुजीकेँ ससारब छोड़ि ठाढ़ भऽ) दक्षिण दिशासँ आएल छथि गुरुजी खिस्सा सुनि कऽ.. (मोन पाड़ैत) बासवेश्वरक। कहै छथि जे मिथिलामे सेहो हेतै ई सभ। हजार सालक बाद पुरनका गप घटित हेतै। (मुस्की दैत) मुदा गुरु छै हमर सिद्ध, केहेन केहेन गप बाजै छै नै सुनै छिऐ। (भगता होशमे आबि जाइए, बेसी जोरसँ उकासी करऽ लगैए। शिष्य भगताक छाती ससारऽ लगै छथि। सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।) पाँचम कल्लोल पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल छल, आब पाँचम अंकसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत। [सोहागो (गंगाधरक माता), शिष्य साही बनि गेल हरपति (गंगाधरक पिता), गंगेश बनि जाइ छथि गंगाधर, वल्लभा बनि जाइ छथि कुमरसुता (गंगाधरक पत्नी), भगता बनि गेल जटा, भगताक शिष्य बनि गेल दलित गायक हीरू, आचार्य व्याघ्र बनि जाइ छथि मनसुख (जीवेक पिता), आचार्य सिंह बनि जाइ छथि हरिकर-सेनापति (मेधाक पिता), आचार्य सरभ बनि जाइ छथि कीर्ति सिंह (राजा), वर्द्धमान बनि जाइ छथि मितू (गंगाधरक बहिनोइ), आनन्दा (गंगाधरक बहिन), मेधा (हरिकर- सेनापतिक बेटी), देवदत्त बनि जाइ छथि जीवे (मनसुखक बेटा), शिष्य खिखिर बनि गेल राजाक अर्थमंत्री नारायण, शिष्य नढ़िया बनि गेल दरबारी-१, शिष्य बिज्जी बनि गेल दरबारी-२, उदयन बनि गेल माधव (अनुभव मण्डलक सदस्य आ दरबारी), दीना बनि गेलाह माधवक सहयोगी-१, भदरी बनि गेलाह माधवक सहयोगी-२ , रुद्रमति (माधवक माए)] (नेपथ्यसँ गीत आबि रहल अछि।) पहिल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... मूंगक दाल नहि सोहाय, केहन गरम संओ रे ललना रे.... दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पूसक माछी ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पौरल खीर ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे ललना रे.... चारिम मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... फगुआक पूआ ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे चैत के माछ ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... आम के टिकोला ने सोहाय, कि केहन गरम सेओ रे सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... खुजल केश ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाकल आम ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... पिया के सेज ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे दसम मास चढ़ु भादव, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे.... देवकी दरदे बेयाकुल दगरिन बजायब रे जब जनमल जदुनन्दन, खुजि गेल बंधन रे ललना रे..... खुजि गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे। (गीत खतम होइते एकटा बच्चाकेँ कोरामे लेने हरपति आ सोहागो प्रवेश करै छथि।) हरपति: (सोहागोकेँ सम्बोधित करैत) सोहागो, गंगा माएक प्रतापेँ ई दिन हमरा सभकेँ देखबामे आएल अछि तेँ एकर नाम गंगाधर राखि दैत छिऐ। सोहागो: अबस्से किने। (बेटाकेँ कोरामे दुलार-मलार करऽ लगै छथि।) (तखने अगरम बगड़म काठ कठम्बर बजैत ऋषि जटा आ हुनकर संग दलित गबैय्या हुनकर शिष्य हीरू प्रवेश करैत छथि।) ऋषि जटा: अगरम बगड़म काठ कठम्बर। अद्भुत, अद्भुत, अद्भुत..ई बच्चा अद्भुत.. शिष्य हीरू: (विभोर भऽ बच्चाकेँ कोरामे उठा लै छथि आ गाबऽ लगै छथि।) कौने मास मेघबा गरजि गेल कोने मास बेंगवा बाजू रे ललना रे कोने मासे होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। सावन मेघवा गरजि गेल, भादव बेंग बाजू रे। आसिन होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। कोने तेल देव सासु के कोने ननदि जी के रे। ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के गरी ननदि जी के रे। ललना रे अमला देबैन गोतिन के हुनकर पैंच हेतनि रे। ऋषि जटा: (गरामे सरभ खचित एकटा ताबीज गंगाधरकेँ पहिराबैत छथि।) ई बच्चा अद्भुत..अद्भुत..अद्भुत..अछि.. सामान्य बच्चा नै अछि ई..तेँ ई असामान्य भेंट.. शिष्य हीरू: धधरा फेकैत ई गीदर.. ऋषि जटा.. ऋषि जटा: उल्कामुख…. (चारू गोटे एक दोसराक मुँह ताकऽ लागै छथि।) शिष्य हीरू: (आश्चर्य करैत) उल्कामुख? नाम मोन पड़ि गेल ऋषि जटा। ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) उल्कामुख? शिष्य हीरू: (आश्चर्य करैत) हँ, अहीं तँ कहलौं, उल्कामुख। ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) हमहीं कहलौं? हरपति: हँ, अहीं तँ कहलौं, उल्कामुख, ऋषि जटा। ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) सत्ते, हमहीं कहलौं? सोहागो: हँ, ऋषि जटा, अहीं तँ कहलौं, की कोनो अनिष्ट अछि? ऋषि जटा: (ऊपर तकैत) नै, कोनो अनिष्ट नै.. हम बिसरि गेल रही ई, ई हमर गुरुक गुरूक गुरुक गुरुकेँ कएकटा उपरका गुरु देने रहथिन्ह। हम ऐ ताबीजक नाम बिसरि गेल रही.. आइ अनचोक्के मोन पड़ि गेल… की नाम रखने छी ऐ दिव्य बालकक.. हरपति: गंगाधर रखने छी ऋषि जटा .. ऋषि जटा: (सोहागो आ हरपति दिस तकैत) ई ताबीज एकर गरामे चलि गेल, हमर गुरूकेँ हुनकर गुरू देने रहथि, आ हुनका हुनकर गुरू आ …हम नाम बिसरि गेल रही ऐ ताबीजक..उल्कामुख..हँ यएह हमर गुरू कहने रहथि हमरा आ हुनका कहने रहन्हि हुनकर गुरु आ..दिव्य..दिव्य..ई बच्चा दिव्य.. हरपति: (ऋषि जटाकेँ सम्बोधित करैत) ऋषि जटा कोन दिव्य गुण देख रहल छिऐ अहाँ ऐ बालकमे? सोहागो: (बच्चाकेँ सम्हारैत ऋषि जटा दिस ताकि।) ऋषि जटा, ई सन्यासी-तन्यासी तँ नै बनि जाएत? ऋषि जटा: से हमरा किछु नै बुझल अछि। मुदा लगैए जे हएत किछु। ऐ मरुभूमिमे रेतक बीच जन्मत किछु। मुदा नहियो उगि सकैए.. हरपति: से किए ऋषि जटा? शिष्य हीरू: से ऐ लेल जे ई ताबीज जतऽ ततऽ राखल रहै, पुरना पोखरि आ बोन सभमे … कतेक गोटेकेँ ऋषि जटा पहिरेने छथि ई ताबीज, आ कतेक गोटेकेँ पहिरेने छथि ऋषि जटाक गुरु आ हुनकर गुरुक गुरु आ हुनकरो गुरु.. मुदा नै भेल किछु। सोहागो: (हीरूसँ) की नै भेल हीरू? शिष्य हीरू: मरुभूमिमे रेतक बीच नै जन्मल किछुओ। (ऋषि जटा जोरसँ उकासी करऽ लगै छथि। शिष्य हीरू हुनकर छाती ससारऽ लगै छथि। सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।) (मंचपर प्रकाश होइत अछि। बालक गंगाधर पैघ भऽ गेल छथि। ओ हीरू लग हुनकर टोल गेल छथि। हीरू नीचाँमे बैसल छथि, नीचाँमे चामक किछु राखल छै जइमे हीरू किछु सी- सा रहल छथि, बगलमे साइंग राखल छै आ गंगाधर ओतऽ ठाढ़ भऽ जाइ छथि।) शिष्य हीरू: आउ गंगाधर आउ। गंगाधर: हीरू की कऽ रहल छी। शिष्य हीरू: मुरदारी सभ ढेर रास एकट्ठा भऽ गेल अछि। (ऊपर मुँहे साँस लैत) ई गैनाक चाम छिऐ, छोटेमे मड़ि गेलै। गंगाधर : (साइंगपर बैसैत) की करब एकर। शिष्य हीरू: देखियौ, मानरि बनबै छी, जँ बनि सकत तखन। कम्मे चाम छै। (गंगाधर दिस तकैत) हे ठीकसँ बैसू नै तँ गुड़कि जाएब। (तखने साइंगपर सँ गंगाधर गुड़कि जाइ छथि। आ शिष्य हीरू आ गंगाधर दुनू गोटे भभा कऽ हँसऽ लगै छथि।) :अहाँकेँ कहै छलौं। ई सांगि मुइल पैघ-पैघ मालक भार सहि लैए, मुदा अहाँ सन छोट बौआक भारकेँ ई नै सहि सकल। गंगाधर : से किए हीरू? शिष्य हीरू: ऐ दुआरे, किएकि कोनो बौस्तु कोना राखल जाए, ईहो जरूरी छै बुझब। सोझे कहि देबै जे ऐ साइंगपर एतेक भार सहबाक शक्ति छै, तँ से नै हएत। वएह ऋषि जटा ई सभ बकैत रहैए.. जे बुझि कऽ बाजू तेँ … गंगाधर: आर की सभ कहै छथि ऋषि जटा? शिष्य हीरू: बड्ड रास गप। यएह जे आमक भार हम अनुभव करै छी, मुदा आमक गाछ अपनामे लागल आमक भारक अनुभव नै करैए। गंगाधर: आर की कहै छ्थि? शिष्य हीरू: कहै छथि ई अकास दू भाग करैए ऐ विश्वकेँ.. गंगाधर: दू भाग? ई अकास दू भाग करैए? मुदा ई अकास तँ देखाइते जाइए.. तखन दोसर भाग कतऽ ऐत? शिष्य हीरू: शीसा छै ई अकास, ऐपारसँ ओइपार देखै छी हम। गंगाधर: (आश्चर्यसँ) ठीके? आर की कहै छथि ओ? शिष्य हीरू: ओ कहै छथि जे ई शब्द अछि मोती, ई शब्द अछि माणिकक इजोत, मुदा जँ शब्द शब्दे रहि जाए आ कहला आ कएलामे अन्तर भऽ जाए तँ ऐ मोती लऽ कऽ की करब आ की करब माणिकक ओइ इजोतकेँ लऽ कऽ? गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत चोरि.. शिष्य हीरू: हँ गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत शब्दक हत्या.. शिष्य हीरू: हँ गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत झूठ.. शिष्य हीरू: हँ गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत सत्यसँ घृणा.. शिष्य हीरू: हँ गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत घमण्डी शब्द.. शिष्य हीरू: हँ गंगाधर: ठीके हीरू ओ भऽ जाएत अशब्द.. ओ भऽ जाएत दोष लगाएब दोसरापर.. अपन शब्दक अर्थ नै बुझबाक दोष लगाएब दोसरापर.. शिष्य हीरू: हँ (दुनू गोटे ठाढ़ भऽ जाइ छथि आ हीरू ताण्डव नृत्यक आकृति बना लै छथि आ विभोर भऽ गाब लगै छथि) मैया दुआर अड़हुल फुल गछिया माँ हे फड़-फुल लुबधल डािर दछिन पछिम सँ सूगा एक आएल माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ गंगाधर: (ताण्डव नृत्यक आकृति बना लै छथि आ विभोर भऽ गाब लगै छथि) कियो नीपय अगुआर, कियो पछुआर हमहुँ अभागल दुआर धेने ठाढ़ िकयो लोढ़ै बेली फूल कियो अढ़ूल हमहुँ अभागल खोदी नामी दुबि कियो मांगय अन-धन, कियो पूत हमहुँ अभागल कर जोड़ि ठाढ़। (स्वर परिवर्तित कऽ हीरूक सोझाँ ठाढ़ भऽ) साओन विषहरि लेल प्रवेश भादव विषहरि खेलल झिलहोरि। आसिन विषहरि भगता लेल पान कातिक विषहरि नयना झरू नोर। अगहन विषहरि हेती अनमोल। शिष्य हीरू आ गंगाधर: (सम्वेत स्वरमे, सोझाँ-सोझीं आबि कऽ गबैत छथि।) फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय माँ हे पाते पाते खेलय पतझार कहाँ गेल, किए भेल डीहवार ठाकुर माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय …. (स्वर परिवर्तित कऽ हीरूक दूरस्त भऽ कऽ दुनू ठाढ़ भऽ कऽ) ऊँच रे अटरिया पर विषहरि माय राम, नीची रे अटरिया पर सोनरा के माय देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि सोन राम, गढ़ि विषहरि के कलस पचास बाट रे बटोहिया कि तोहें मोर भाइ राम, कहबनि विषहरि के कलसा लय जाइ तोहरो विषहरि के चिन्हियो ने जानि राम, कहबनि कोना के कलस लए जाय (अन्हार पसरि जाइत अछि।) छअम कल्लोल (मंचपर प्रकाश होइत अछि। बालक गंगाधर आठ बर्खक भऽ गेल छथि। माए-बापसँ हुनकर बहस चलि रहल छन्हि। लगैए कोनो गम्भीर विवाद छन्हि।) हरपति: एहनो भेल छै कहियो, यज्ञोपवीत नै कराएब? कोनो रोक-टोक हम केलौं, ब्राह्मणक बच्चा भऽ कऽ हीरूक टोल अहाँ गीत सुनैले, सिखैले जाइत रही, कहियो रोक-टोक केलौं? गंगाधर: (अपन उल्कामुख ताबीज देखबैत) हम एकरा धारण कऽ लेने छी पिताश्री। ऋषि जटाक देल ई उल्कामुखी ताबीज, देखू। (हाथसँ पकड़ि कऽ देखबैत छथि।) उल्कामुख धारण केनिहारकेँ कोनो संस्कार करेबाक कोन आवश्यकता छै? (हरिपति क्रोधित भऽ जाइ छथि। एम्हर-ओम्हार जाए लगै छथि।) सोहागो: (गंगाधर दिस ताकैत) एना नै बाजू गंगाधर, एहेन आइ धरि नै भेल अछि, लोक की कहत, पण्डित सभ की बाजत? जिदपना छोड़ू, आब अहाँ बच्चा नै छी। आठ बरखक भेलौं। हरपति: (सोहागो दिस तकैत) देखू। अहाँ अहीं ने कहै छलौं जे जेना-जेना उमेर बढ़तै एकर जिदपना घटतै। मुदा हम तँ देखि रहल छी जे दिनपर दिन एकर जिदपना घटबाक बदला बढ़िते जा रहल छै। मास्टर साहेब सेहो कहि रहल छला जे कोनो सबक हिनका यादि करैले दै छथिन्ह तँ सभ बच्चा यादि कऽ लैत अछि मुदा ई ओइमे मारते रास कमी निकालि दै छथि। गंगाधर: पिताजी, पाठशालामे जे रटन्त विद्या पढ़ाएल जाइत अछि से हमरा पसिन्न नै अछि। जे किछु हम पूछै छियन्हि से ओ बुझाबै नै छथि, कहै छथि जे अहिना रटि लिअ कारण हुनकर गुरूजी हुनका ओहिना रटबेने छथिन्ह। हमरा तँ लगैए जे हुनका सभकेँ अपने विषय क पूर्ण ज्ञान नै छन्हि। बेङ जकाँ ओ मात्र टर्र-टर्र करब जानै छथि। हरपति: (मंचक आगाँ जाइत) लिअ, ई आब नवका गप की उठि गेल। (सोहागो दिस तकैत) आब गंगाधरकेँ पुछियौ जे हिनका लेल नव पाठशाला कतऽ सँ बनत। सोहागो: (गंगाधर दिस ताकैत) बेटा गुरुजीक विषयमे कियो एना बजैए। गंगाधर: (सोहागो दिस तकैत) माँ, हम तँ मात्र ऋषि जटाकेँ (ताबीज पकड़ि इशारा करैत), जे हमरा ई ताबीज पहिरेलन्हि आ हुनकर शिष्य चर्मकार हीरूकेँ अपन गुरू मानै छी। हरपति: (मंचक आगाँ छड़पटाइत जाइत) चर्मकार हीरूमे की विशेषता छै। गंगाधर: (हरपति दिस तकैत) हुनकामे कला छन्हि। मुइल मालक चामकेँ कोना पकाएल जाइत अछि ओइसँ तरह तरहक पनही, मानरि, मृदंग बनबै छथि ओ। जँ कोनो समस्या एलै तँ किछु परिवर्तन करै छथि अपन ज्ञानक प्रयोगमे। गाबै छथि तेहेन तेहेन गीत जे सुनि कऽ कतेक धर्मशास्त्रक ज्ञान एक्के गीतमे प्राप्त भऽ जाइए। हरपति: (मंचक आगाँसँ छड़पटाइत घुरैत गंगाधर दिस तकैत) आ ऋषि जटामे? गंगाधर: (हरपति दिस तकैत) ओ रटै लेल नै कहै छथि किछु। पुछलापर बतबै छथि। धर्मशास्त्रक व्याक्या केलापर तमसाइ नै छथि, वरन ओकर गलत व्याक्याकेँ सुधारै छथि। हरपति: (मंचक आगाँ छड़पटाइत जाइत) हँ हँ तेँ ने पाठशालासँ निकालि देल गेलन्हि आ सप्तरीक बोनक रस्ता धेने छथि। गंगाधर: (मंचक आगाँ जाइत) माँ-पिताजी। ई हमर अन्तिम निर्णय अछि.. हम यज्ञोपवीत नै करब। हीरू कहै छथि जे पण्डित लोकनि शास्त्रक गलत व्याख्या करै छथि… धर्मकेँ छागरक बलि धरि सीमित कऽ देल गेल अछि.. हरपति: (बीचमे क्रोधित भऽ गंगाधरकेँ काटै छथि) हीरू कहै छथि.. सभ गपमे हीरू कहै छथि.. आ हीरूकेँ के ई सभ कहलकन्हि.. गंगाधर: हुनका ऋषि जटा ई गप कहलखिन्ह। हरपति: (आर क्रोधित भऽ) आ ऋषि जटाकेँ के कहलकन्हि? गंगाधर: ऋषि जटाकेँ हुनकर गुरु कहलखिन्ह..आ हुनकर गुरूकेँ हुनकर गुरू…आ ..आ…कोनो रहस्य छै जे ऐ उल्कामुखमे छै..आ जे नै छै बुझल ककरो.. हरपति: माने ककरो बुझले नै छै.. आ ओइ गपपर अहाँ अपन ई अन्तिम निर्णय लेलौं.. गंगाधर: (गप काटैत) मुदा जटिल कर्मकाण्ड अहाँकेँ नीक लगैए? हमरा तँ हीरूक गीतमे बेशी तत्त्व बुझाइए..आ हँ हमर अन्तिम निर्णय तँ अहाँ बुझिए गेलिऐ.. हरपति: आ अहाँ अन्तिम निर्णय कऽ लेब, आ तकर बादो ऐ घरमे रहब, आ अहाँ ऐ घरमे रहब आ गौँआ सभ हमरा ऐ गाममे रहऽ देत.. की ई सभ सम्भव छै? (तखने मितू- गंगाधरक बहिनोइ आ आनन्दा- गंगाधरक बहिन प्रवेश करै छथि।) आनन्दा: माँ- पिताजी। हमरा नै लगैए जे गंगाधर अपन बातसँ डिगत। हरपति: (मंचक आगाँसँ छड़पटाइत घुरैत गंगाधर दिस तकैत) हँ। सभ गप बुझि गेलौं। हिनका जगह जे भेटि गेल छन्हि। ऋषि जटा आ चर्मकार हीरू, आ पाठशाला सप्तरीक बोन। ने ऋषि जटा आ चर्मकार हीरूकेँ शिष्य भेटै छै आ ने हमर गंगाधरकेँ ओहेन गुरु। आनन्दा: माँ- पिताजी। गंगाधरकेँ अप्रत्यक्ष रूपमे घर छोड़बाक लेल विवश नै करू। सोहागो: (आनन्दा दिस सम्मुख होइत) मुदा एतुक्का हाल नै देखै छहक। यज्ञोपवीत नै करब? एहनो जिद्द भेलैए? हरपति: (सोहागो दिस सम्मुख होइत) एतुक्का हाल छोड़ू, ई हमरो स्वीकार्य नै अछि.. गंगाधर.. हमर अन्तिम निर्णय अछि जे हम सभ ई गाम नै छोड़ब। सोहागो: (हरिपतिकेँ सम्बोधित कऽ) अहाँकेँ के कहैए गाम छोड़ैले। गंगाधर: (सोहागोकेँ सम्बोधित कऽ) माँ। हिनकर कहबाक अर्थ छन्हि जे जँ हम घर नै छोड़ब तँ हिनका गाम छोड़ए पड़तन्हि। पिताश्री.. हम आइये सप्तरीक बोन दिस बिदा भऽ रहल छी.. हमर अन्तिम निर्णय आ अहाँक अन्तिम निर्णयमे कोनो साम्य नै अछि। सोहागो: (गंगाधरकेँ सम्बोधित कऽ) गंगाधर, अहाँ आठ बर्खक छी.. आ अहाँ असगरे… गंगाधर: (सोहागोकेँ सम्बोधित कऽ) असगरे कहाँ, सप्तरीक बोनमे आश्रय पक्का छन्हि, गुरुजी संग। ऋषि जटा आ चर्मकार हीरू… गंगाधर: (सोहागोकेँ सम्बोधित कऽ) तँ हमरा आज्ञा दिअ.. मितू: नै.. गंगाधरकेँ हम सभ ओहिना नै छोड़ि सकै छियन्हि। हमहू सभ संगे जाएब..(आनन्दाकेँ सम्बोधित करैत) की आनन्दा? आनन्दा: हँ, हम सभ नै छोड़ि सकै छियन्हि हुनका। माँ, अहाँ पिताजी लग रहू.. हम वचन दै छी जे गंगाधर अपन अध्ययन पूर्ण करत.. आ गंगाधर: आ ई उल्कामुख हमरा संग अछिये… (सोहागो विचलित भऽ जाइ छथि, हरपति पाथर बनि जाइ छथि। आ सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ गंगाधर, आनन्दा, मितू, ऋषि जटा आ हीरू देखा पड़ै छथि। सभक मुँहपर लक्ष्य पाबि जेबाक प्रसन्नता स्पष्ट देखा पड़ि रहल छन्हि।) आनन्दा: ऋषि जटा, हीरू। गंगाधरक तीव्र बुद्धि पाठशालामे हुनका लेल समस्या बनि गेल छलन्हि। गुरुजी प्रश्न सभक उत्तर नै दऽ पाबि रहल छला आ तेँ उन्टे गंगाधरक शिकाइत करैत रहै छला। शिष्य हीरू: एहेन शिष्य भाग्यवानकेँ भेटै छै आनन्दा। मुदा हीरा जौहरी लग नै जाए तँ हीरा पाथरे रहि जाइ छै। मितू: हँ, आ एतऽ हमहूँ सभ कतेक तरहक ईलम सीखि गेलौं। ऐ बोनक कतेक वनस्पति, जन्तु हमर सभक शिक्ष बनि गेल। गंगाधर: ऋषि जटा आ शिष्य हीरू सन शिक्षक जँ मिथिलाक सभ पाठशालामे भऽ जाए तँ भाग्योदय भऽ जेतै। मुदा ओतऽ तँ तेहेन लोक सभक भर्ती भेल छै जे..ऐ पाँच सालमे जतेक ज्ञान हम प्राप्त केलौं तकर वर्णन करू ने हीरू.. हीरू: (ठठा कऽ हँसै छथि) कथीक वर्णन करू हम.. आनन्दा: ऐ बोनक, ऐ बोनक प्राणीक, जे क्षणे-क्षण सिखबैत रहैए बड्ड किछु.. हीरू: (गेबाक मुद्रामे हाथ आगाँ करैत) साँपहि-साँप बाम दहिन छल चित्र-विचित्र वसनमा नित दिन भीख कतए सँ लायब घुरि फिरि जाहु अंगनमा भीखो ने लिअए जोगी, घुरियो ने जाइ, निकलू अंगनमा गंगाधर: ओहो.. हीरू: ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे अहाँ क अंगनमा बहिरा साँपक माड़ब बनाओल तेलिया देल बन्हनमा धामन साँपक कोरो बनाओल, अजगर के देल धरनमा हरहरा के काड़ा-छाड़ा, कड़ैत क लाओल कंगनमा पनियादरार क पहुँची लाओल ढरबा क लौल ढोलनमा सुगवा साँप क लौल जशनमा चान्द तारा क शीशा लाओल मछगिद्धि क अभरनमा गंगाधर: ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे अहाँ क अंगनमा ऋषि जटा: (उठि कऽ टहलऽ लगैत छथि) जाए पड़त गंगाधर। बहुत रास काज करबाक अछि अहाँकेँ। हमर मोनमे आब संतुष्टि अछि गंगाधर, अहाँ सन शिष्य हमरा भेटल। ई सौभाग्य हमर गुरु, हुनकर गुरु आकि हुनकर गुरुकेँ नै भेटल छलन्हि। अहाँकेँ पढ़बैकालमे जे आत्म संतुष्टि हमरा भेटल से अद्भुत। रटन्त विद्याक अखुनका वातावरणमे अहाँक विषयकेँ बुझबाक प्रवृत्ति अजगुत लागल। सन्तुष्ट छी हम.. ई उल्कामुखक प्रभाव छी आकि अहाँक प्रभाव ऐ उल्कामुखकेँ सिद्ध बना देने अछि, नै जानि की गप अछि। जाउ.. जाउ अहाँ कीर्ति सिंहक राजदरबार। देखू की करबैत अछि ई उल्कामुख….. (अन्हार पसरि जाइत अछि।) सातम कल्लोल (कीर्ति सिंहक राजदरबार। कीर्ति सिंह बैसल छथि, दरबारी-१ संगे गंगाधर आ दरबारी-२ संगे राजाक अर्थमंत्री नारायणक प्रवेश दू दिशासँ होइत अछि।) कीर्ति सिंह: (नारायण दिस तकैत) आउ अर्थमंत्री नारायण, की भेल हिसाब-किताब अखनो मिलल आकि नै। दरबारी-१: (राजा दिस सम्मुख भऽ) कोना मिलतन्हि, सभ रटन्त विद्याबला विद्यार्थी सभ पाठशालासँ बहार होइत अछि जे नव गणितक प्रश्नक ओझराहटिमे ओझरा जाइत अछि। ओइ विद्यार्थी सभकेँ किछु पुछियौ तँ बिन पोथी देखने सुरड़ि देत, मुदा ओ सभ ने कोनो हिसाब-बारी कऽ पबैए आ ने खाता-खेसरा मिला पबैए। कीर्ति सिंह: (कने ऊँच अबाजमे) अर्थमंत्री नारायण। हम ई की सुनि रहल छी? अर्थमंत्री नारायण: (हरबड़ाइत) हँ, हँ सएह तँ जोड़बा रहल छलहुँ अपन एकटा शिष्यसँ एक जोड़ दू जोड़ तीन…एक सए धरि.. माने माने एकसँ एक सए धरि जोड़.. कहने छल जे एक घण्टामे जोड़ि देब..तावत ई (दरबारी-२ दिस इशारा करैत) घीचि कऽ लऽ अनलन्हि। दरबारी-२: (दमसाइत) अर्थमंत्री, काल्हियो अहाँ बुते जोड़ मिलाओल नै भेल, जोड़पर जोड़.. औ जी… कतेक घाटा आकि नफामे अहाँक खाता-खेसरा अछि ई तँ साल भरिसँ पता चलिये नै रहल अछि। दरबारी-१: (महराज दिस साकांक्ष होइत) महराज ई बालक ओतै भेटला। कहैत रहथि जे ओ सभ हिसाब मिला देता, समय कम रहै तेँ संगे लेने एलियन्हि। गंगाधर: (महराज दिस साकांक्ष होइत) महराज जँ आदेश हुअए तँ हम किछु कही। (बीचेमे अर्थमंत्री बाजै छथि।) अर्थमंत्री नारायण: (हरबड़ाइत) एकसँ एक सए धरि जोड़मे तँ समय लगबे ने करतै महराज। (राजा इशारासँ गंगाधरकेँ बजबाक आदेश दै छथि।) गंगाधर: (महराज दिस सम्मुख होइत) धन्यवाद महराज। (अर्थमंत्री नारायण दिस सम्मुख होइत) एकसँ सए जोड़बा लेल पहिने ई बुझू जे संख्या कएक टा अछि। अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) सए टा आर कतेक। गंगाधर: एक सँ सए आ सइया निनानबे ऐमे आब काज आएत। एक आ सए, दू आ निनानबे, तीन आ अनठानबे.. ऐ सभटा जोड़ाक कतेक परिणाम आएत? अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) एक सए एक आर कतेक? गंगाधर: दू दू टा जोड़ा अछि, तँ सए टामे कतेक जोड़ा भेल। अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) पचासटा आर कतेक? गंगाधर: एक सए एक केर पचास टा जोड़ा अछि। तँ एक सए एक केँ पचाससँ गुणा करू। वा पचासकेँ सएसँ गुणा करू आ ओइमे पचास जोड़ू..कतेक भेल? अर्थमंत्री नारायण: (आश्चर्यसँ आँखि फाड़ि बजैत) पचासकेँ सएसँ गुणा…ई भेल पाँच हजार…आ आर पचास भेल पाँच हजार पचास। पाँच हजार पचास भेल महाराज। हँ ठीके तँ.. कीर्ति सिंह: अहाँक शिष्य तँ बड काबिल अछि। (गंगाधर दिस तकैत) की नाम अछि अहाँक वत्स.. अर्थमंत्री नारायण: (महराज दिस ताकि लज्जित होइत) नै महराज, ई हमर शिष्य नै छथि। ई तँ हमरासँ नोकरी माँगऽ आएल रहथि। मुदा जखन पुछलियन्हि जे कोन पाठशालासँ छी तँ कहलन्हि जे सप्तरीसँ ऋषि जटा आ हुनकर शिष्य चर्मकार हीरूसँ ई पढ़ने छथि, कोनो पाठशालामे नै पढ़ने छथि। तेँ हम नोकरीपर नै रखलियन्हि। हम लज्जित छी महराज। हिनकर नाम छियन्हि गंगाधर.. कीर्ति सिंह: आश्चर्य। कोनो पाठशालामे नै पढ़ने छथि! ऋषि जटा आ हुनकर शिष्य चर्मकार हीरूसँ पढ़ल छथि! अर्थमंत्री नारायण: (लज्जित होइत) महराज। जँ आदेश हुअए तँ गंगाधरकेँ हम नोकरीपर राखि लिअन्हि? दरबारी-१: (अर्थमंत्री नरायणसँ) राखि लियन्हि? हिनका नै रखबन्हि तँ अहाँक नोकरी खतरामे पड़ि जाएत। साल भरिसँ राज्यक खाता-खेसरा नफामे छै आकि नोकसानमे से नै बुझि रहल अछि कियो। कीर्ति सिंह: कोनो बात नै.. (दरबारी १-२ दिस इशारा करैत) जाउ आ हरिकर- सेनापतिकेँ बजाउ। (दरबारी १ एक दिशासँ आ दरबारी-२ दोसर दिशासँ बहराइ छथि।) कीर्ति सिंह: गंगाधर अहाँ राजदरबारमे नोकरी करबाले तैयार इच्छुक छी? गंगाधर: महराज हम तँ कतौ नोकरी करबाले तैयार छी। राजदरबारमे नोकरी भेटलासँ तँ हमर शिक्षाक लाभ आन लोकोकेँ भेटतै, संगे ऐ तरहक शिक्षा दोसरो ठाम हुअए सेहो हम सिद्ध कऽ सकब। (दरबारी १ आ दरबारी-२ हरिकर सेनापतिक संग अबै छथि।) कीर्ति सिंह: अर्थमंत्री आ गंगाधर। दुनू गोटे स्वागत कक्षमे बैसू गऽ। हमरा किछु अत्यावश्यक गप करबाक अछि। मुदा बैसब, कतौ जाएब नै। अर्थमंत्री नारायण आ गंगाधर: (सम्वेत स्वरमे) जी महराज। (अर्थमंत्री नारायण आ गंगाधर बहरा जाइ छथि।) सेनापति हरिकर: (कीर्ति सिंहसँ) बजेने छलौं महराज। कीर्ति सिंह: हँ सेनापति। आइ एकटा बालक गंगाधर देखाइ पड़ल अछि। बड्ड चतुर.. बड्ड दिव्य। अर्थमंत्री तँ कोनो काजक नै अछि। ने कोनो हिसाब कहि पबैए नहिये कोनो लेखा समयपर दऽ पबैए। तखन ई छै जे आज्ञाक अवहेलना नै करैए। सेनापति हरिकर: (कीर्ति सिंहसँ) जी महराज। कीर्ति सिंह: (सेनापति हरिकरसँ) हमर मोनमे एकटा गप आएल अछि। अपन धर्म बहिन कुमरसुताक विवाह.. सेनापति हरिकर: (कीर्ति सिंहसँ) अहाँ गंगाधरक विषयमे तँ नै सोचि रहल छी महराज? कीर्ति सिंह: (सेनापति हरिकरसँ) सोचि रहल छी सेनापति। सेनापति हरिकर: (कीर्ति सिंहसँ) मुदा अहाँ तँ कुलीनताक पक्षर छी महराज आ गंगाधर तँ.. कीर्ति सिंह: हँ सएह तँ आ ऐ लेल हुनका कुलीन बनाएब आवश्यक। हम गंगाधरकेँ अपन धर्म बहिन कुमरसुतासँ विवाह करबा कऽ ऐ राज्यक प्रधानमंत्री बनबैत छियन्हि। सेनापति हरिकर.. ई बालक जे अहाँक सोझाँसँ अखने गेल अछि.. बड्ड दिव्य अछि.. सेनापति हरिकर: हँ महराज (दरबारी १ आ २ दिस इशारा करैत), अखने ई दुनू गोटे हुनकर प्रतिभाक विषयमे चर्चा करैत रहथि। एहेन वर कुमरसुता लेल सर्वथा उपयुक्त छथि। अर्थमंत्री नारायण प्रधानमंत्रीक अतिरिक्त भार नै सम्हारि पाबि रहल छला। कीर्ति सिंह: तँ विवाहक सभ प्रबन्ध कएल जाए सेनापति। सेनापति हरिकर: अवश्य महराज.. अवश्य.. शीघ्र सभ इन्तजाम भऽ जाएत। (सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ लगैत अछि जे राजदरबारसँ बेशी महत्वपूर्ण गंगाधरक कार्यालय भऽ गेल अछि। ओ एकटा अनुभव मण्डलक स्थापना केने छथि जइमे ने कोनो जातिक भेद छै आ ने स्त्री-पुरुषक भेद छै। गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, कुमरसुता, आनन्दा, मेधा, जीवे, ऋषि जटा, हीरू, माधव, माधवक सहयोगी-१ आ माधवक सहयोगी-२ मंचपर आबि जाइ छथि, तखने प्रकाश होइत अछि। सभक गरामे उल्कामुख ताबीज लटकल छन्हि।) गंगाधर: नव पाठशाला सभमे विद्यार्थी सभ सोचि रहल छथि, कऽ रहल छथि अपना हाथसँ काज। स्त्री-शिक्षा फेरसँ शुरू भऽ गेल अछि। जाति-पाति खतम कऽ देल गेल अछि, शिक्षा सभक लेल। अनुभव-मण्डलक ऐ बैसकीमे सभक स्वागत अछि..अहाँक विचार सभ सुनबा लेल आतुर छथि ऋषि जटा.. ऋषि जटा: रटन्त नै बुझन्त विद्या शुरू भऽ गेल अछि.. जे हमर गुरू वा हुनकर गुरू वा हुनकर गुरुक कालमे नै छलै… रटल विद्या तँ बुझू गदहाक ऊपर राखल बोझ थिक। की मनसुख? मनसुख: ठीके किने। (अपन बेटा जीवेसँ) सभ अभ्यागत लेल जलखैक व्यवस्था करू जीवे। (हरिकरसँ) की हरिकर अहाँ सेहो किछु बाजऽ चाहै छी? हरिकर: (मेधासँ) पुत्री मेधा, अहाँ जीवेक सहयोग करू गऽ। (जीवे आ मेधा बहरा जाइ छथि।) :बाजऽ चाहै छी मनसुख मुदा कने कालमे। पहिने किछु आर गंगाधरसँ सुनऽ चाहै छी। गंगाधर: अनुभव मण्डल परिश्रमक सत्कार करैत अछि धनिकक नै। धनिकक धन कुकुड़क दूध सन अछि, जइसँ कुकुड़क बच्चा मात्रक पोषण होइ छै, मिष्टान्न नै बनै छै। कुमरसुता: हँ, सएह तँ हम अपन धर्म-भाए कीर्ति सिंहकेँ कहै छिऐ। अर्थमंत्री नारायणकेँ लगैत रहैत छै जे अनुभवमण्डलक सभटा कल्याणकारी कार्य राजकोषसँ भऽ रहल छै। आनन्दा: नारायणकेँ अर्थ नीति नै बुझल छन्हि। हुनका मात्र धन-वसूल कोना कएल जाइ छै, से बूझल छन्हि। हुनका ई नै बूझल छन्हि जे धन कोना उपार्जित कएल जाइ छै। माधव: गंगाधर कएक बेर कीर्ति सिंहकेँ हिसाब बुझा देने छथिन्ह। अनुभव मण्डलक सभ कल्याणकारी कार्य ओकर अपन उपार्जित धनसँ होइ छै। कुमरसुता: मुदा से नारायण दरबारमे गंगाधरक सोझाँमे तँ मानि लै छथि मुदा गंगाधरक परोक्षमे गंगाधरक घुमौआ हिसाब- उल्कामुखी घुमौआ हिसाब कहि नै मानबाक भ्रम उत्पन्न करै छथि। गंगाधर: साँपक काटल आ भूत-प्रेतक शिकारसँ अहाँ किछु पूछि सकै छिऐ मुदा धन रूपी भूतसँ जे ग्रस्त अछि ओकरासँ की पुछबै? अनुभवमण्डलक पाठशाला धन स्व-अर्जित करब सिखबैत अछि, आत्मनिर्भर भेनाइ सिखबैत अछि। मनसुख: सही कहलौं गंगाधर हमर बेटाकेँ कहियो अनुभव मण्डलक पाठशालामे अनुभव नै भेलै जे ओ सभ कहियो अछूत छल।(मितू दिस ताकि) की मितू? मितू: अछूत नै कहियौ मनसुख, अनुभव मण्डल ओकरा उल्कामुखी नाम देने अछि। (माधव दिस ताकि) माधव ततेक नीक व्यवस्था केने छथि उल्कामुखी पाठशाला सभक जे नै पुछू। माधव: हँ उल्कामुखीसभ निकलैए ओइ पाठशालासँ। (माधव अपन सहयोगी-१ आ सहयोगी-२ दिस तकैत बजैत छथि।) अहाँ दुनू उल्कामुखी पाठशाला सभक आर्थिक जरूरतिक पूर्तिक वर्णन दियौ। माधवक सहयोगी-१: सभ ठाम उल्कामुखी सदस्य अपन श्रमसँ शिक्षकक आ विद्यार्थीक खर्च उठा रहल छथि। माधवक सहयोगी-२: सभ ठाम उल्कामुखी सदस्य उल्कामुखी पाठशाला लेल जमीन आ भवनक खर्च उठा रहल छथि। माधवक सहयोगी-१: लोक सभक कहब अछि जे उल्कामुखी पाठशाला सभ हुनका सभ लेल बड हितकारी अछि, ओइ पाठशाला सभक विद्यार्थी आ शिक्षक सभ द्वारा कएल जा रहल प्रयोग हुनका सभक जिनगीमे क्रान्ति आनि देने अछि। माधवक सहयोगी-२: लोक सभक ईहो कहब अछि जे उल्कामुखी पाठशालाक नव-पुरान छात्र आ शिक्षक हुनका सभ कऽ बेर-बखत काज आबै छथिन्ह आ तेँ ओ सभ ऐ पाठशालाकेँ जतेक दै छथि तइसँ बेसी ई पाठशाला सभ हुनका सभकेँ आपिस करै छन्हि। (आनन्दा दिस ताकि) आनन्दा तँ रहबे करथि, जखन एकठाम ई गप चलि रहल रहए। आनन्दा: हँ, से तँ ठीके। मुदा काज अखन आर बहुत रास करबाक अछि। तखन आइ ई सभा खतम कएल जाए? हरिकर: नै हमरा एकटा गप कहबाक अछि। माधव: कोन गप सेनापति हरिकर। हरिकर: माधव, गंगाधर अखन बाहर जा रहल छथि, सप्तरी। से अहींकेँ ई काज करऽ पड़त। हमर इच्छा अछि जे हमर पुत्री मेधाक बियाह जीवेसँ भऽ जाए। हम बियाहक इन्तजाममे लागब, आ किएक तँ अहाँ आ हम दुनू गोटे राजाक दरबारमे छी से एकटा औपचारिक अनुमति हम सभ राजासँ ऐ लेल लै छी। तँ ई भार अहींपर। गंगाधर: ई तँ हर्षक विषय अछि। (उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइ छथि। सभ उठि जाइ छथि आ मनसुख आ हरिकरकेँ बधाइ देबऽ लगै छथि। जीवे आ मेधा हाथमे बिगची आदि लेने प्रवेश करै छथि। अन्हार पसरि जाइत अछि।) (राजा कीर्ति सिंहक दरबार। राजा, अर्थमंत्री नारायण, दरबारी-१, दरबारी-२ आ माधव आ हुनकर दुनू सहयोगी दरबारमे छथि। राजा तमसाएल सन छथि।) दरबारी-१: अतत्तह भऽ गेल महराज। ब्राह्मण सेनापति हरिकरक पुत्री आ चर्मकार मनसुखक पुत्रक विवाहक समाचार आएल अछि। दरबारी-२: कोनो तरहेँ ऐ प्रतिलोम विवाहकेँ उचित नै कहल जा सकैए आ ओइ स्थितिमे जखन ओइ विवाहकेँ राजाज्ञा प्राप्त नै छलै। दरबारी-१: सेहो तइ स्थितिमे जखन सेनापति ऐ दरबारक सदस्य छथि आ माधव ओइ अनुभव मण्डलक सदस्य छथि जे ई विवाह करेलक! राजा कीर्ति सिंह: (माधव दिस ताकि) जखन हम जीवे आ मेधाक विवाहक अनुमति नै देने रही तखन ई विवाह भेल कोना माधव? माधव: महराज, ओ तँ औपचारिक अनुमति छल, अनुभव मण्डलमे ओइ विवाहक कोनो विरोध नै भेल रहए। राजा कीर्ति सिंह: अनुभव मण्डल, अनुभव मण्डल। ऐ राजदरबारसँ पैघ भऽ गेल अनुभव मण्डल? अर्थमंत्री नारायण: हम सेहो आंगुर उठेने रही महराज। ई अनुभव मण्डल की की सदावर्त बँटने फिरैए, राजकोषक क्षति करैए। माधव: अनुभव मण्डलमे सभ परिश्रमक खेनाइ खाइए अर्थमंत्री नारायण। अहाँ बीच-बीचमे गंगाधरपर ई आरोप लगबैत रहै छियन्हि मुदा ओ एकर नीक जकाँ उत्तर दऽ देने छथि, आ अहाँ संतुष्ट सेहो भऽ गेल रही। दरबारी-१: संतुष्ट की हेता, गंगाधरक घुमौआ हिसाब हिनका बुझैमे अबिते नै छन्हि। दरबारी-२: मुदा ओ सभ तँ छोट मोट गप छल, ऐबेर तँ राजाक आदेशक निरादर भेल अछि। अनुभव मण्डलक कोनो काजपर राजा प्रतिबन्ध नै लगेने रहथि। रटन्त विद्या खतम करू, खतम भेल.. दरबारी-१: मुदा रटन्त विद्यासँ हिसाब जे नै मिलै छलन्हि अर्थमंत्रीक। अर्थमंत्री नारायण: मुदा रटन्त विद्या खतम भेने लोक दिमागसँ सोचऽ लागल। ई तँ प्रारम्भ अछि महराज। मनसुख चर्मकारक बेटा आ ब्राह्मण सेनापति हरिकरक पुत्रीक विवाह क्रान्ति आनि देत..की कहै छै ओकरा..(सोचैत) माधवक शिष्य-१ आ २: उल्कामुखी… कीर्ति सिंह: माधव, अहाँ सभ जाउ आ हरिकरकेँ कहि दियन्हु जे आब ओ ऐ राजक सेनापति नै रहलाह। आ गंगाधर ऐ राज्यक प्रधानमंत्री नै रहलाह सेहो अनुभवमण्डल -हुँह- अनुभवमण्डलकेँ जानकारी दऽ दियौ। आब ई दुनू भार सम्हारताह नारायण। माधव, अहाँ सभ जाउ। (माधव आ हुनकर दुनू शिष्यक प्रस्थान।) राजा कीर्ति सिंह: सेनापति नारायण, हमरा चारिटा आँखि चाही, दूटा मेधाक आ दूटा जीवेक। ऐ दुनू गोटेक आँखि निकाललाक बाद दुनूकेँ पागल ऐरावतक समक्ष धऽ दियौ। पिचरा कऽ दियौ दुनूकेँ, मुदा पहिने हमरा चाही चारिटा आँखि। दिगन्तमे ई समाचार पसरि जाए जे प्रतिलोम विवाहक परिणाम की होइ छै। ई समाचार पसरि जाए जे राजाज्ञाक विरोधक परिणाम की होइ छै। सतर्कतासँ ई काज हुअए। माधव आ हुनकर दुनू सहयोगी वा अनुभवमण्डलक ककरो ऐ विषयमे पता नै चलए, से ध्यान राखब। हमर उदारताक गलत फएदा उठाबऽ बलाकेँ ई एकटा सबक जकाँ हेतै। (अन्हार पसरि जाइत अछि आ नेपथ्यसँ जीवे आ मेधाक कनबाक अबाज अबैत अछि। फेर हाथीक चिघारसँ अकासमे बिजली कड़कऽ लगै छै। पुरुष, महिला आ हाथीक अबाज परस्पर मिज्झर भऽ जाइत अछि। करुण संगीतक मध्य आस्ते आस्ते इजोत अबैत अछि आ अनुभवमण्डलक बैसकी देखा पड़ैत अछि जइमे गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, कुमरसुता, आनन्दा, ऋषि जटा, हीरू, माधव, माधवक सहयोगी-१ आ माधवक सहयोगी-२ सभ छथि मुदा जीवे आ मेधा नै। सभक मुखपर दुख आ आक्रोश अछि।) गंगाधर: की ई अहाँ सभक अन्तिम निर्णय अछि? सभ सम्वेत स्वरमे: हँ, हँ, अन्तिम निर्णय, गंगाधर, अहाँ मानी नै मानी। कुमरसुता: हम सेहो मानै छी ऐ निर्णयकेँ। गंगाधर: अनुभव मण्डलमे सर्वदा बहुमतक सम्मान कएल गेल छै। मुदा एक बेर आर सभ गोटे विचारि लिअ। आनन्दा: (माधवसँ) माधव! अहाँसँ मेधा आ जीवेक क्रूर तरीकासँ कएल जाएबला हत्याक राजाज्ञा गुप्त राखल गेल, से कोना भेल? हरिकर: (माधवसँ) क्रूर..क्रूरतम… ओह.. एहेन हत्या, राजदरबारेक सेनापतिक पुत्रीक आ जमाएक….. ऐ तरहेँ हत्याक आदेश.. आ अहाँ एकर कनेको आभास नै प्राप्त कऽ सकलौं माधव? मनसुख: (गंगाधरसँ) गंगाधर आ अनुभव मण्डलक सदस्यगण। न्याय चाही हमरा.. राजदरबारक अन्यायक विरुद्ध न्याय। राजदरबारक अन्यायोसँ कठोर न्याय चाही हमरा.. गंगाधर: ठीक छै तँ सएह हुअए। ठीक छै, तँ एकर भार ककरापर देल जाए? माधव: हम ई भार लै छी गंगाधर, सहर्ष…सहर्ष… जे राजदरबार ई जघन्य पाप केने अछि तकरा विरुद्ध हमहीं हएब ठाढ़। जे राजदरबार ओइ षडयंत्रकेँ हमरासँ नुकेलक ओकरा विरुद्ध हमर गुप्त अभियान चलत.. आ सएह हएत हमर पश्चाताप। (अपन दुनू शिष्यक संग माधव मंचपर सोझाँ अबै छथि।) मितू: माधव। सतर्क रहऽ पड़त अहाँकेँ। राजदरबारमे सभकेँ बुझल छै जे अहाँ अनुभवमण्डलक सदस्य छी। ऋषि जटा: माधव, हम आ हीरू वातावरण तैयार करब। एहेन वातावरण जे राजदरबारकेँ बुझि पड़तै जेना अहाँकेँ अनुभवमण्डलसँ निकालि देल गेल अछि। हीरू: आ हम ई गप गीत गाबि कऽ पसारब जइसँ राजदरबारकेँ बुझि पड़तै जेना माधवकेँ अनुभवमण्डलसँ निकालि देलाक बाद अनुभवमण्डल टूटि गेल। गंगाधर: तँ सएह हुअए। अनुभव मण्डलक सभ सदस्य सप्तरी प्रस्थान करथि। माधव, अहाँ अपन दुनू सहयोगी संगे राजदरबार लेल प्रस्थान करू। ऋषि जटा आ हीरू अहाँ सभ बेसी समए नै लगाएब, शीघ्र काज सम्पन्न कऽ कए सप्तरीक बोन पहुँचू। (अन्हार पसरि जाइत अछि आ जखन इजोत होइत अछि तँ रुद्रमति- माधवक माए, माधव आ माधवक दुनू सहयोगी मंचपर छथि। खेनाइक बासन बगलमे राखल छै। रुद्रमति तमसाएल छथि।) माधवक सहयोगी-१: माता रुद्रमति, अपन पुत्र माधव आ हमरा दुनू गोटेकेँ आशीर्वाद दिअ जे अनुभव मण्डल द्वारा देल काज हम सभ पूर्ण कऽ सकी। माधवक सहयोगी-१: माता रुद्रमति, मेधा आ जीवेक जघन्य हत्याक बाद चुप बैसब कायरता होइतए। अनुभवमन्डलक निर्णय भेल अछि जे राजाकेँ ओकर कृत्यक सजा हम सभ दी। रुद्रमति: (माधवसँ) की अनुभव मण्डलक निर्णयक अनुपालन भऽ गेल माधव? माधव: नै माते..ओतै बहरेबाक अछि, तेँ सोचलौं जे बहरेबासँ पहिने घर जाइ आ मातासँ आशीर्वाद ली। रुद्रमति: अनुभव-मण्डलक निर्णयक बिनु पालन केने अहाँ घरमे कोना प्रवेश कऽ गेलौं माधव? मेधा आ जीवेक हत्या, सेहो आँखि निकालि कऽ आ हाथी द्वारा पिचड़ा कऽ कए!! अहाँ सौभाग्यशाली छी माधव जे ओइ अपराधीकेँ दण्ड देबाक भार अहाँ सभकेँ देल गेल अछि। मुदा तकर महत्व अहाँ सभ बुझै छी? माधव: बुझै छी माते। रुद्रमति: (बर्तनसँ भात नीचाँ जमीनपर फेकैत आ तमसाइत) की बुझै छी माधव? अनुभवमण्डलक निर्णयक बिनु पालन केने अहाँ घरमे कोना प्रवेश कऽ गेलौं पुत्र माधव? जाबे अहाँ अनुभवमण्डलक निर्णयक पालन नै करब ताबे अहाँ कुकुड़क योनिमे रहब, आ कुकुड़केँ थारीमे खेनाइ खेबाक अधिकार नै छै। खाउ, ई नीचाँमे फेकल भात खाउ। (माधव भुकैत छथि आ छिड़िआएल भात खाए लगैत छथि। अन्हार पसरि जाइत अछि।) (फेर मंचपर प्रकाश होइत अछि। मंच खाली अछि। हीरू आ ऋषि जटा मंचपर अबै छथि।) हीरू: हाथक कंगना, फूल क घड़ी, सेहो कहाँ पाएब हो लाल। डाँड़ क डरकस, सोनाक कड़ी से नै मन भावय हो लाल मेधा-जीवे मारल गेला, माधव चुप्पे अछि से नै मन भावय हो लाल आँखि निकालल राजा हाथी पिचबाएल मेधा-जीवे कहाँ पाएब हो लाल। ऋषि जटा: सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए माधवक गप गंगाधरकेँ तीत लगैए छठियारी पुजाबऽ लए माय अबैए माधवक गप गंगाधरकेँ तीत लगैए कजरा सेदै लए बहिन अबैए। माधवक गप गंगाधरकेँ तीत लगैए (दरबारी-१ आ दरबारी-२ क प्रवेश) दरबारी-१: ई की कहै छी अहाँ सभ? राजदरबारमे तँ सभकेँ बुझल छै जे माधव आ गंगाधर एक दोसरापर असीम विश्वास करै छथि। हीरू: करै छथि नै, करै रहथि। दरबारी-२: से की? ऋषि जटा: जीवे आ मेधाक हत्या। दरबारी-१: मुदा ओइ विषयमे तँ माधवकेँ किछु बुझले नै छलन्हि। हीरू: से तँ अहाँकेँ ने बुझल अछि। मुदा अनुभव-मण्डलमे सभ बुझैत रहए जे माधवकेँ ऐ षडयंत्रक विषयमे कोना बुझल नै भेलन्हि आ ओ कोना एकरा रोकबाक लेल प्रयासो नै कऽ सकला। ऋषि जटा: आ तेँ अनुभव-मण्डल टूटि गेलै। दरबारी-१: अनुभव-मण्डल टूटि गेलै? हीरू: माधव अनुभव-मण्डलमे सँ निकलि गेला आकि निकालि देल गेला, तँ दुनू स्थितिमे ई अनुभव-मण्डलक टुटनाइए भेलै ने। (दरबारी-१ आ २ मंचक कोनमे जाइत अछि आ कनफुसकी करैत अछि।) दरबारी-१: ई तँ नीक सूचना भेटल, राजा अनेरे माधवपर शंकित रहै छला। दरबारी-२: हँ, ऐ भगता सभकेँ पतो नै हेतै जे ओ सभ हमरा सभपर कतेक उपकार कऽ गेल अछि। दरबारी-१: (ऋषि जटा आ हीरूकेँ दूरेसँ जोरसँ सम्बोधित करैत) ठीक छै भगता भाइ सभ, आब हम सभ जाइ छी। फेर कहियो बुलैत-भांगैत भेँट भइये जाएत। हीरू: ठीके छै भाइ, भेँट हेबे करत। (दरबारी-१ आ २ प्रस्थान करैत अछि।) ऋषि जटा: चलू हीरू, काज भऽ गेल। आब अपनहियो सभ सप्तरी बोन दिस चली। हीरू: (झोरासँ निकालि कऽ झालि बजबऽ लगैत अछि।) भूत प्रेत सब झालि बजाबै योगिन क नचबै छी हे। राक्षस क संहार करै छी दुनियाँ क जुड़बै छी हे। (अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ राजदरबारमे राजा आ नारायण छथि आ तखने दरबारी-१ राजदरबारमे प्रवेश करै छथि।) दरबारी-१: जय महराज। एकटा शुभ सूचना अछि। माधवकेँ अनुभव-मण्डलसँ निकालि देल गेलै। अनुभव-मण्डलकेँ आशंका रहै जे माधव जीवे आ मेधाक हत्याक राजाज्ञाक निर्णयक जनतब अनुभव-मण्डलसँ नुकेलक। नारायण: मुदा माधवकेँ तँ ई गप्प बुझल रहबे नै करै, आ जखन ओकरा ई गप बुझले नै रहै तँ ओ कोना से गप ककरोसँ नुकेतै। दरबारी-१: मुदा से गप अनुभव-मण्डलमे के मानतै, कारण ई राजाज्ञा जखन देल गेल, तइ लगाति माधव राजदरबारेमे छल। नारायण: हँ, से तँ ठीके। मुदा अहाँकेँ ई गप कोना पता भेल? दरबारी-१: (मुस्काइत) हम खुफिया सभकेँ सभठाम लगेने छी, अनुभव-मण्डल ओकरा सभसँ बाँचल थोड़बे छै। (तखने दरबारी-२ प्रवेश करैत अछि।) दरबारी-२: (राजाकेँ सम्बोधित करैत) जय महराज, माधव आ हुनकर दुनू सहयोगी राजदरबारमे प्रवेशक अनुमति चाहै छथि। कीर्ति सिंह: अनुमति अछि। तीनू गोटेकेँ ससम्मान दरबारमे आनल जाए। (दरबारी-२ प्रस्थान करैत अछि आ फेर माधव आ माधवक दुनू सहयोगीक संग प्रवेश करैत अछि।) कीर्ति सिंह: आउ माधव। हमरा तँ भेल जे गंगाधर आ हरिकर जकाँ अहूँ राजदरबार छोड़ि देलौं। माधव: हम राजदरबार कोना छोड़ि सकै छी महराज, गंगाधर आ हरिकर लेल तँ अनुभव-मण्डल छै, नै राजदरबार तँ अनुभव-मण्डल, मुदा हमरा लेल तँ मात्र राज दरबारेटा बचल अछि। नारायण: जीवे-मेधाक मृत्युदण्डक निर्णय अनचोक्के लेल गेल। आ तेँ अहाँकेँ ऐ विषयमे नै बताओल जा सकल। माधव: बता देलो जइतए तँ राजाज्ञाकेँ हम बदलि तँ नहिये सकितौं अर्थमंत्री नारायण। कीर्ति सिंह: माधव। जँ हमरा गंगाधरक प्रति कोनो द्वेष रहितए तँ हम अपन धर्म बहिन कुमरसुताक विवाह हुनकासँ करबितौं? हुनका कुलीन बनबैले हम हुनका प्रधानमंत्री बना देलियन्हि। मुदा हमरा की बुझल छल जे ओ अकुलीनताक पोषक छथि, कुमरसुतोकेँ ओ अपना रंगमे रङि लेलन्हि। माधव: (आस्ते-आस्ते राजा लग जाइत) हँ, से तँ ओ सभकेँ अपना रङमे रङि लेलनि कीर्ति सिंह (अन्तिम दू शब्द ओ जोर लगा कऽ बजै छथि आ तरुआरिक आघात कीर्ति सिंहपर करै छथि।नारायण आ दुनू दरबारीक संग माधवक दुनू शिष्यमे युद्ध होइत अछि। माधवक दुनू शिष्य दुनू दरबारी आ नारायणकेँ गछाड़ने छथि। तावत राजाक सैनिक सभ आबि जाइत अछि मुदा माधव अपन पेटमे छूरा भोंकि आत्महत्या कऽ लै छथि। माधवक दुनू शिष्यकेँ राजाक सैनिक मारि दै छथि। तीनू गोटेक गरासँ उल्कामुख ताबीज नारायण निकालैत छथि, आ सभकेँ देखबैत छथि। अन्हार फेरसँ पसरि जाइत अछि।) (फेर मंचपर प्रकाश होइत अछि। मंच खाली अछि। अनुभवमण्डलक सदस्य मंचपर अबैत छथि जइमे गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, कुमरसुता, आनन्दा, ऋषि जटा आ हीरू छथि मुदा जीवे, मेधा, माधव आ माधवक दुनू सहयोगी नै छथि। गंगाधर छड़ी धेने छथि, आ शान्त छथि। सभ बैसि जाइ छथि।) गंगाधर: विदा लेबाक समए आबि गेल। अनुभवमण्डल सभ जातिकेँ निकट आनलक, जाति खतम केलक, मुदा.. मनसुख: नै गंगाधर, अहाँकेँ किछु नै हएत गंगाधर। हरिकर: सभ ठीक भऽ रहल अछि गंगाधर, कीर्ति सिंह मारल गेल गंगाधर। आब सभ किछु ठीक भऽ जाएत। मितू: मुदा संगमे माधव आ माधवक दुनू शिष्य सेहो मरि गेला। कुमरसुता: कीर्ति सिंहक मृत्यु आवश्यक भऽ गेल छल। मेधा आ जीवेक जघन्य हत्याक आदेश कोनो मनुक्ख नै दऽ सकैए। कीर्ति सिंह किछु एहेन गोटेसँ घेरा गेला जे हुनका मनुक्खसँ जानवर बना देलकन्हि। गंगाधर, किछु नै हएत अहाँकेँ। गंगाधर: नै कुमरसुता समय तँ सबहक अबिते छैक। हमरा किछु आशंका अछि, अनुभव-मण्डलक विषयमे। आनन्दा: गंगाधर, ई अनुभव-मण्डल ओहिना चलैत रहत जेना अहाँ चाहै छी। गंगाधर: हमरा किछु डर अछि। ऋषि जटा: कोन डर गंगाधर? हीरू: कोन डर गंगाधर? अनुभव-मण्डलमे तँ सभ जातिक प्रवेश अछि, स्त्रीक प्रति कोनो भेदभाव नै कएल जाइ छै। गंगाधर: (हाँफैत बजै छथि) आइ छै हीरू। ई काल्हियो रहए ऋषि जटा, से हम चाहै छी। मुदा यएह टा डर अछि जे बदलाक भावक ई आगि अनुभवमण्डलकेँ एकटा उल्कामुखी जाति नै बना दै ऋषि जटा। यएह एकटा डर…(खोंखी करऽ लागै छथि) यएह एकटा डर जे ओइल सधेबा लेल जे आक्रमण अनुभव-मण्डलपर हेतै तइसँ अनुभव-मण्डल अपनाकेँ एकटा घेरामे ने घेरि लिअए, आ ऐमे सभ जातिक प्रवेशपर रोक नै लागि जाए। हमरा गेलाक बाद से नै हुअए कुमरसुता... मुदा बदलाग आगिमे से भऽ जे जाए सएहटा डर.. … (खोंखी करऽ लागै छथि, कुमरसुता हुनकर माथकेँ कोरामे लऽ लै छथि। आस्ते-आस्ते गंगाधर प्राणत्याग करैत छथि। अन्हार पसरऽ लगैए आ नेपथ्यसँ अबाज अबैए.. डर लगैए हे डेराओन लगैए तोर अंगना, भयाओन लगैए हे अजगर के खम्हा पर धामिन के बरेड़िया गहुमन क कोरो फुफकार मारैए, डर लगैए हे डेराओन लगैए तोर अंगना, भयाओन लगैए कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्हनमा बिढ़नी के खोता घनघन करैए। डर लगैए हे डेराओन लगैए तोर अंगना, भयाओन लगैए सुगबा के पाढ़ि पर ढोरबा के ढोलनमा पनिया के जीभ हनहन करैए डर लगैए हे डेराओन लगैए तोर अंगना, भयाओन लगैए बिछुआ के कुण्डल सनसन करैए।) -समाप्त- सम्पादकीय मैथिली आ ब्रेल लिपि फ्रांसक लुइस ब्रेल -अठारह सए नौ ई. मे जन्म आ अठारह सए बावन ई.मे मृत्यु- जे अपने आन्हर छलाह पन्द्रह बर्खक अवस्थामे ब्रेल लिपिक आविष्कार आँखिसँ विहीन लोकक लेल कएने रहथि। एहि लिपिमे कागजपर विशेष प्रिंटरसँ उठल-उठल बिन्दुक माध्यमसँ -जकरा हाथक स्पर्शसँ अनुभव कएल जा सकए- भाषाक संप्रेषण होइत अछि। एकरा दुनू हाथक स्पर्शसँ पढ़ल जाइत अछि। दहिना हाथ संदेशकेँ रूपान्तरित कए संप्रेषित करैत अछि आ वाम हाथ अगिला पंक्तिक प्रारम्भक अनुभव करैत अछि। एहि लिपिकेँ सामान्यतः डेढ़ सए शब्द प्रति मिनटक गतिसँ पढ़ल जा सकैत अछि जे आँखि द्वारा पढ़ल जाएबला सामान्य शब्द संख्या तीन सए शब्द प्रति मिनटक अदहा अछि। एहि लिपिक आधारकेँ सेल कहल जाइत अछि। एकटा सेलक निर्माण छह टा बिन्दुक संयोजनसँ होइत अछि। एहिसँ तिरसठि प्रकारक विभिन्न वर्णक –अक्षर-संख्या आ विराम-अर्द्धविराम आदि चेन्ह- निर्माण होइत अछि। हमर लिखल सहस्रबाढ़नि जे मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक अछि (ISBN:978-93-80538-00-6) २००९ मे रिलीज भेल आ पुअर होम दरभंगा स्थित ब्लाइन्ड स्कूलकेँ पठाओल गेल अछि। की मैथिली साहित्य अपन मूल स्वरमे ब्राह्मणवादी अछि? (समन्वय २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव, दिल्लीक बहसक आधारपर) हमर उत्तर दुनू अछि- हँ आ नै। जँ अहाँ मिथिला दर्शन, अंतिका, पागबला विद्यापति पर्व समारोह केनिहार चेतना समितिक घर-बाहर, झारखण्डक सनेस वा जखन-तखनक लेखकक जातिक प्रोफाइल देखि कऽ कहि रहल छी, जातिवादी रंगमंचक मात्र दू जातिक कट्टर दर्शकक अहंकेँ संतुष्ट करबा लेल प्रयुक्त कएल जा रहल आपत्तिजनक शब्दावलीक निर्लज्जतापूर्ण प्रयोगक आधारपर कहि रहल छी, साहित्य अकादेमीमे आइ धरि सभटा आठो समन्वयक जातिक प्रोफाइलक आधारपर कहि रहल छी, सी.आइ.आइ.एल, एन.बी.टी., बा साहित्य अकादेमीक दुब्बर-पीअर कपीश संकलन आ कार्यक आधारपर कहि रहल छी, आकाशवाणी दरभंगा वा हिन्दी अखबारक दरभंगा संस्करणक आधारपर कहि रहल छी तँ उत्तर हँ अछि। मुदा जँ ज्योतिरीश्वर पूर्व/ श्रीधर दास पूर्व बिन पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापति, बा पिताक मृत्युक पाँच बर्ख बाद जन्म आ चर्मकारिणीसँ विवाह केनिहार तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश जिनकर प्रेमकविता विलुप्त कऽ देल गेल, भोरुकवा एफ.एम. चैनल, फुलप्रास लगक पकड़िया गाम (पोस्ट रतनसारा) क रामलखन साहुजी पुत्र स्व. खुशीलाल साहुजी जे २५ सालसँ नाच पार्टी कम्पनी खोलने छथि आ दसो बिगहा बोहा देलनि, बा ऐ बेर दुर्गापूजामे नै किछु तँ सए नाच पार्टी नाच केलक; ई सभ देखी तँ उत्तर नै अछि। आ जँ आकाशवाणी दरभंगा, दरभंगाक हिन्दी अखबार, आ मैथिलीक ऊपरवर्णित पत्रिका ओकरा समाचार नै बुझैए आ कोनो साधारण नाटककारक/ लेखकक सालाना उर्सक न्यूजक आधारपर मैथिली नाटककेँ मृत घोषित करैत साक्षात्कार छपैए तँ ई ओकर समस्या छै। विद्यापतिक पदावलीक आधारपर भऽ रहल बिदापत, आ ओही पदावलीक पिआ-देशांतर (माइग्रेशन)क आधारपर भऽ रहल पिआ देशान्तरक पार्टी सभमे सेहो कमी आएल अछि, मुदा जँ अनुपात देखल जाए तँ मुख्य आ समानान्तरक बीच अखनो एक आ निनानबे केर छै तखन तँ ई गएर ब्राह्मणवादी ने भेल। पर्वत ऊपर भमरा सूतल मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू-उठू मालिन बेटी गाँथू गिरमल हार हे। जँ शब्द शास्त्रम केर ऐ गीतमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ सर्वहाराक गीत नै शास्त्रीय गीत देखबामे अबै छन्हि तँ ई गीत विदेह ऑडियोमे अपलोड छै, आ ओ ओही पात्रक टोल (चर्मकार टोल) सँ रेकॉर्ड कएल गेल छै जकर ई कथा छिऐ, आ यएह गएर-ब्राह्मणवादी परम्पराक जीत अछि। विद्यापतिक कोन परंपरा- जतऽ ओ वर्णाश्रम व्यवस्थाक समर्थन करै छथि बा स्त्रीक दर्दकेँ भोगैत: कौन तप चकलहूँ भेलहूँ जननी गे बा गरीबक व्यथा -सुख सपनेहूँ नहिं भेल, गबै छथि एतौ उत्तर वएह अछि। समानान्तर परम्परा मुख्यधारा लेल सर्वदा फैशनक रूपमे छै। ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति सेहो धूर्तसमागम आ गोरक्षविजय नाटकमे क्रमशः एकरा फैशनक रूपमे लेलन्हि। अवहट्ठ सेहो साहित्यिक भाषा रहै, आ समानान्तर परम्पराकेँ मुख्य धाराक प्रगतिशील लोक द्वारा फैशनक रूपमे प्रयोग कएल गेलै। जन कवि वा एक्टीविस्ट २-४-१०-२५-५० धरि पद्य लिखि कऽ संतुष्ट नै होइ छै, मुदा जँ ई फैशनक रूपमे प्रयुक्त हुअए तँ से ज्योतिरीश्वर आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक संग यात्री-नागार्जुनक फैशनपरस्त प्रगतिशील मैथिली कवितामे अबै छै। मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्वक बिनु पागबला गएर ब्राह्मण विद्यापतिक परम्परा तँ बिदापत, पिआ देशान्तर आ रामदेव प्रसाद मण्डल झारुदारक झारू/ महाझारूमे देखा पड़त, हजारक हजार झारू लिखि कऽ बोहा देलनि, हमरा सन लोक जँ ओइमेसँ किछुओ लिखि कऽ टाइप कऽ लै छी तँ तकरो संख्या सए-दू सए ओहिना भऽ जाइ छै। जँ तरौनीक लोकनाथ झाक घरपर बैसि वर्णाश्रम धर्म बला कविता पदावलीमे घोसिया दियौ, शिव सिंह, लखिमाक नाम घोसिया दियौ तँ ज्योतिरीश्वर पूर्व पदावलीक लय टूटि जाइए, आ बिदापत आ पिआ देशान्तर पार्टी ओकर मंचन गायन नै कऽ पबैए आ ई षडयंत्र बिनु परिश्रमेक खतम भऽ जाइए। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ धरि पहुँचबाक उद्देश्यमे कनेक असहमति अछि, जे काज अखन हेबाक चाही से अछि नेटिव स्पीकर जतए रहि रहल छथि ओतुक्का दुष्प्रचारक लेल ई सूचना समाज आगाँ आबए। वंचित, महिला आ समानान्तर परम्पराक स्पोक्सपर्सनक रूपमे। जहाँ धरि मैथिली प्रिन्ट मीडियाक गप अछि, ओतौ समानान्तर लेखन क्वालिटी आ क्वान्टिटी दुनूमे ९०% स्थानपर अछि। इन्टरनेट तँ बोनस छिऐ, ४-५ सए मैथिली पोथी, दस हजार मैथिली ताल-पत्र पीडी.एफ. कैमरा रेडी कॉपीक रूपमे विदेह आर्काइवमे मुफ्त डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ओइमे देवनागरीक अतिरिक्त तिरहुता आ ब्रेलमे सेहो मैथिली अछि। गूगल आ विदेहक सौजन्यसँ चारि सएसँ ऊपर पोथी गूगल बुक्समे १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध छै; ऐमे सँ मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली डिक्शनरीक सात टा पोथी/ फाइल क्रिएटिव कॉमन्स (एट्रीब्यूशन-शेयर अलाइक)लाइसेन्सक अन्तर्गत १००% ब्राउज आ डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि, माने कियो एकर उपयोग क्रेडिट दऽ कऽ (माने साभार लिखि कऽ) आ अही तरहेँ आगाँ लाइसेन्स वितरित करबाक शर्त स्वीकार कऽ कए कऽ सकै छथि, एकरामे वृद्धि कऽ एकर संवर्धन आ व्यावसायिक उपयोग कऽ सकै छथि। ‘डायसपोरा कम्यूनिटी’ नेटिव कम्यूनिटीक प्रति अपन कर्ज उतारि रहल अछि। नेटिव स्पीकर बड्ड आगाँ बढ़ि गेल अछि, ओकर सोच आगाँ छै, ओ समानान्तर परम्पराक लेखनसँ अपनाकेँ आइडेन्टिफाइ कऽ रहल अछि, मुदा सुखाएल मुख्यधारा समाजसँ सकारात्मक दिशा आ समए क्षेत्रमे पाछाँ अछि। यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण डॉ. रमानन्द झा रमण जी द्वारा यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण कएल गेल। ऐसँ मात्र ई स्पष्ट भेल जे पर्चा लिखिनिहारकेँ नहिये यूनीकोडक विषयमे कोनो जानकारी छन्हि आ नहिये वेस्टर्न वा यूनीकोड दुनू फॉन्टक निर्माण कोनो प्रारम्भिक ज्ञान छन्हि। हँ ऐ परचाक ओइ सभ लोक लेल महत्व छै जे सीखय चाहै छथि जे पूर्वाग्रहपूर्ण आ पक्षपातपूर्ण मैथिली साहित्यक इतिहास कोना लिखल जाए। ऐसँ पहिने चेतना समितिक स्मारिकामे यूनीकोड लेल चेतना समितिक योगदानक चर्चा देखैत छी! तिरहुता यूनीकोड आवेदनकर्ता अंशुमन पाण्डेय जखन पटना गेल रहथि तँ हम हुनका कहने रहियन्हि जे विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरक दोकान छन्हि, ओतऽ सँ अहाँ मैथिलीक किताब कीनि सकै छी, मुदा दू तीन दिन ओ दोकान आ समिति बन्द रहलाक कारण ओतऽ सँ घुरि गेला, बादमे ओतए एक गोटे कहलकन्हि जे सभ दिन अहाँ अबै छी, से ई समिति अखन कमसँ कम १४-१५ दिन आर बन्द रहत कारण दू ग्रुपमे झगड़ा-झाँटी भऽ गेल छै। ई अनुभव लऽ कऽ ओ घुरल रहथि आ से समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल ओ जे योगदान देलक तकर चर्चा करैत अछि! गोविन्द झा जीक पता मँगलापर एक गोट विद्वान् (!) हुनका कहलखिन्ह जे धुर ओ की बतेता, आ गोविन्द झा जीक पता नै देलखिन्ह आ तखन दोसर ठामसँ हुनका पता उपलब्ध करबाओल गेल। साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ सगर राति दीप जरए कहल जाए? अजित आजाद- प्रभास कुमार चौधरी द्वारा बनारसमे आयोजित सगर राति दीप जरय मे हिन्दी कहानीक पाठ भेल छल। पटनामे आयोजित सगर राति दीप जरयमे सेहो हिन्दीमे कहानी पाठ भेल छल। कथाकार रहथि हृषकेश सुलभ आ संतोष दीक्षित, उर्दू भोजपुरी आ मगहीमे सेहो कथा पाठ भऽ चुकल अछि। महिषी कथा गोष्ठी (१३ अप्रैल १९९७) एक संस्था द्वारा प्रायोजित छल। पूर्णियाँ गोष्ठीकेँ सेहो एक प्रायोजक भेटल छल। पटनामे हम स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, लाइफ इन्स्योरेन्स कॉरपोरेशन आ सुधा द्वारा प्रायोजित करेने छी। एहिमे हर्ज की छैक? सगर राति दीप जरयक मंच सभ लेल खुजल छैक मुदा मैथिलीक शर्तपर नै। रूपेश कुमार झा त्योंथ: आइ जे ज्ञात भेल अछि मैथिली हेतु शर्मनाक छैक। मैथिली कथा गोष्ठीक नामपर ई सभ की भऽ रहल अछि? छी..। सभ बइमनमा सभ बैसल अछि मैथिली केर ठिकेदार बनि कऽ एकरा सभसँ यएह आशा कएल जा सकैत अछि। विनीत उत्पल: रमानंद झा रमण जी जे परचा वितरण करबैने रहथिन हम ओकरा तखने देखने रही, परचासँ लागल जे हुनकर ज्ञान इंटनेटकेँ लऽ कऽ नहि करे बराबर अछि। अप्पन बड़ाइ सभ कियो कऽ सकैत अछि, दोसराक करी तखन कोनो गप होएत। परचा छपायब कोनो पैघ वा छोट गप नहि अछि मुदा ओइमे जे छपल अछि ओकरा लऽ कऽ गंभीर हेबाक चाही। इंटरनेट/ तिरहुता यूनीकोड केँ लऽ कऽ के कत्ते काज कऽ रहल अछि तकरा लेल ठीक तथ्यक कोनो परचा छपबैक चाही। तखन विश्व्वनीयता बनल रहत। रमणजी एहन विद्वान आ आदरणीय लोकसँ ई उम्मीद नहि छल। मैथिलीक विस्तारसँ मिथिला बढ़त। अजित आजाद जी केँ स्पष्टीकरण देबाक चाही। मामला गंभीर अछि. हम सभ मैथिली भाषाक लेल काज कऽ रहल छी नहि कि कोर्टमे। एक गलती केँ पुख्ता करैक लेल पहिलुका गलतीक उदहारण नहि देल जा सकैत अछि। ई कहय मे कोनो संकोच नहि जे अजित आजादजी बड़ स्टेमिनाबला आ कर्मठ लोक अछि। बारह घंटा धरि मंच संचालन सामान्य लोक नहि कऽ सकैत अछि, जे हम दिल्ली गोष्ठीमे देखलहुं। हुनकामे किछु दिव्य शक्ति तँ अछि ताहि सँ ओ बड़ गंभीर भऽ कऽ मंच संचालन कऽ सकलखिन। मुदा कनी-कनी गपक वा अनर्गल गपक कारण हुनकर स्तर नीचाँ आबि जाइत अछि। हुनका अहि पर ध्यान देबाक चाही। जौं टी.ए/ डी.ए क गप अछि तँ प्रकाश जी/ नवीन जी/ अजित आजाद जी सँ अनुरोध जे अहि गप केँ स्पष्ट कएल जाय जे टी.ए/ डी.ए देल गेल अछि वा नै। दिल्लीमे रहैबला लोक तँ ओहिना पहुँचबे कएल, मुदा जे बाहर सँ आयल छल ओकर की हिसाब-किताब छल। जौं ई तीनू गोटेमे कियो अहि मामलाकेँ स्पष्ट करय तँ ठीक नहि तँ अहि मामले मे तीनू गोटेक मौन सहमति बुझल जाय। उमेश मण्डल: ''मिथिला विश्वविद्यालयक “मैथिली” पत्रिकामे वीणा ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्डल आ शिव कुमार झा जीक आलेख मंगबेलन्हि मुदा डिपार्टमेन्टक एकटा प्राध्यापक दुनू गोटेक आलेख हटा देलन्हि।'' हमरे सँ मंगबेने रहथि। गजेन्द्र ठाकुर: अजित आजाद जी अही तरहक लूज टाक करैत रहै छथि/ हमरा लग सगर रातिक रजिस्टर क कोपी अछि, की अहाँ ओइ कथा सभक पन्ना बता सकै छी ? अरविन्द ठाकुर जीक सुपौल गोष्ठीमे सेहो हिन्दी कथाक पाठक सूचना अछि। तँ की सगर राति केँ हिन्दीक गोष्ठी बना देल जाए? बैजू कबिलपुर मे मिथिला राज्य लेल बाजल रहथि तँ की सगर राति केँ मिथिला राज्यक मंच बना देल जाए ? अजित आजाद केँ बुझल छनि जे एल.आइ. सी. आ स्टेट बैंकक एडवर्टीजमेन्टक की पालिसी छै? की साहित्य अकादेमीक लोगो मात्र एडवर्टीजमेन्ट छल? नै, ओ स्वामित्व छल जे दिल्लीक कथा गोष्ठीकें सागर राति नै हेबऽ देलकै/अजित आजाद जी अही तरहक लूज टाक करैत रहै छथि/ ओ कबिलपुरेमे यंत्रनाथ जीक सुतबाक चर्चा करैत कहने रहथि -"कहि देल गेलन्हि गेट आउट" तँ की ई सगर रातिक अंग भऽ गेल? सुपौलमे ओ की केने रहथि? उमेश मंडल जी केँ ओ कहलनि जे ऐ बेरुका टैगोर साहित्य सम्मान जगदीश प्रसाद मंडल केँ भेटतनि, मुदा फेर शंकरदेव झाक फोन एलनि उमेशजीकेँ जे अजित आजाद टैगोर साहित्य सम्मानक ग्राउंड लिस्ट बनेलनि आ जगदीश प्रसाद मंडलक पोथीक नाम ग्राउण्डे लिस्टमे ओ नै देलनि ? ई कथनी करनीमे फर्क किए? “कथा पारस” मे शिव कुमार झा जीक कथा सम्पादक अशोक अविचल देलनि मुदा सहायक सम्पादक अजित आजाद जातिवादी मानसिकताक चलते काटि देलनि (जेना अशोक अविचल कहै छथि)? तहिना मिथिला विश्वविद्यालयक “मैथिली” पत्रिकामे वीणा ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्डल आ शिव कुमार झा जीक आलेख मंगबेलन्हि मुदा डिपार्टमेन्टक एकटा प्राध्यापक दुनू गोटेक आलेख हटा देलन्हि। शिव कुमार झा आ जगदीश प्रसाद मण्डलक क समीक्षाक दलित विमर्शसँ सभ घबड़ा गेल छथि? सीरियस डिस्कसन मे अजित आजाद जी ऐ तरहक लूज टाक की साहित्य अकादेमीक इशारा पर कऽ रहल छथि, जे अपन गोष्ठी मे मैथिली पोथीक प्रदर्शनक अनुमति नै देलक? जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मण्डल, उमेश पासवान, अच्छेलालशास्त्री, दुर्गानन्द मण्डल, झाड़ूदारजी आदि श्रेष्ठ कथाकार लोकनिकेँ एकटा पोस्टकार्डो नै देबाक आयोजन मण्डलक निर्णय अद्भुत अछि, ओना तै सँ ऐ लेखक सभक स्टेचरपर कोनो फर्क नै पड़तन्हि। भऽ सकैए ७५म गोष्ठीक आयोजक अशोक आ कमलमोहन चुन्नू वर्तमान आयोजककेँ हुनकर सभक पता सायास वा अनायास नै देने हेथिन्ह आ वर्तमान आयोजक केँ से सुविधाजनक लागल हेतन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आयोजनमे सभ धोआधोतीधारी आ चन्दन टीका पाग धारी भोज खा आएल छथि, मुदा बजेबा कालमे अपन आयोजनकेँ बभनभोज बनेबापर बिर्त छथि।ओना ई आयोजन साहित्य अकादेमीक फण्डसँ आयोजित भेल आ एकरा साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी मात्र मानल जाए। मैथिली साहित्यक इतिहासमे ७६ म सगर राति दीप जरयक रूपमे ऐ जातिवादी गोष्ठीकेँ मान्यता नै देल जा सकत। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक जातिवादी चेहरा एक बेर फेर सोझाँ आएल अछि जखन ओ मैथिलीक एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़ि देलक। साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ऐ पुरस्कारक ग्राउण्ड लिस्ट बनेबा लेल एकटा तथाकथित साहित्यकारकेँ चुनल गेल जे प्राप्त सूचनाक अनुसार जातिक आ संकीर्णताक आधारपर पोथीक नाम देलन्हि जाइमे नहिये नचिकेताक पोथी रहए, नहिये सुभाष चन्द्र यादवक आ नहिये जगदीश प्रसाद मण्डलक; संगहि ई ग्राउण्डलिस्ट बनौनिहार तथाकथित साहित्यकार विदेहक सहायक सम्पादक मुन्नाजीकेँ कहलन्हि जे जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ ऐ जिनगीमे टैगोर साहित्य पुरस्कार नै देल जेतन्हि!। रेफरी जखन ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन ओइमे चन्द्रनाथ मिश्र "अमर"क अतीत मंथन सेहो रहए जखन कि ओ पोथी निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै अछि, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल? ऐ तरहक ग्राउण्ड लिस्ट बनेनिहार आ बिनु पढ़ने पोथी अनुशंसित केनिहार रेफरीकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित करए, आ नाम सार्वजनिक कऽ स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित करए, से आग्रह; तखने मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल रहि सकत। एतए ईहो तथ्य अछि जे साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक संयोजक श्री विद्यानाथ झा विदित अखन धरि ने पुरस्कार भेटबाक सूचने आ ने पुरस्कार लेल बधाइये श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी केँ देलन्हि अछि जखनकि मण्डल जी पुरस्कार लऽ कऽ घुरि कऽ आबियो गेल छथि; संगहि टैगोर साहित्य पुरस्कार मैथिली लेल पहिल बेर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ देल जएबा सम्बन्धमे दरभंगा आकाशवाणी कोनो प्रकारक सूचना प्रसारित नै केलक आ दरभंगा, मधुबनी आदिक हिन्दी समाचार-पत्र सेहो ऐ सम्बन्धमे कोनो समाचार प्रकाशित नै केलक जखनकि देशक सभ राष्ट्रीय अंग्रेजी पत्र ( http://esamaad.blogspot.com/2012/06/tagore-literature-awards-national-media.html ) एकर सूचना बिनु कोनो अपवादक प्रकाशित केलक। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक, आकाशवाणी दरभंगाक आ दरभंगा-मधुबनीक हिन्दी समाचार पत्रक पत्रकार लोकनिक संकीर्ण जातिवादी चेहरा नीक जेकाँ सोझाँ आबि गेल। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक असली चेहरा तखन सोझाँ आओत जखन ऐ बर्खक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा हएत। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक "गामक जिनगी" मैथिली साहित्यक इतिहासक सर्वश्रेष्ठ लघु कथा संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ बधाइ। टैगोर साहित्य पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ (पुरस्कार समारोहक नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, कृष्णा सोबती आ केदारनाथ सिंह द्वारा बहिष्कार कएल गेल छल) बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता) -गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा) -हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह) -कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास) -काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता) -पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा) -तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध) -बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध) टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प) -डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां) -मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा) -ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य) -राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी) -संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया) -तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम) -उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान) टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली, संस्कृत आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर। टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। संस्कृत लेल पुरस्कार नै देल जा सकल। -मैथिली (जगदीश प्रसाद मण्डल, "गामक जिनगी") -अंग्रेजी (अमिताव घोष, "सी ऑफ पॉपीज") -कोंकणी (शीला कोलाम्बकर, "गीरा") -मलयालम (अकितम अचुतम नम्बूदरी, "अंतिमहक्कलम") -मणीपुरी (एन. कुंजामोहन सिंह, "एना केंगे केनबा नट्टे") -नेपाली (इन्द्रमणि दरनाल, "कृष्णा-कृष्णा") -संस्कृत- -सिंधी (अर्जुन हसीद, "ना इएन ना") विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन) किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.com/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२ की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा छी? सेन्टर फॉर स्टडी ऑफ इण्डियन ट्रेडिशन्स- मैथिली साहित्यसँ ऐ संस्थाक की सरोकार छै? विद्यापति सेवा संस्थान आ चेतना समिति राजनैतिक संस्था अछि- पागबला संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक सालाना विद्यापति पर्व करबाक अतिरिक्त एकर सभक की काज छै? ऑल इण्डिया मैथिली साहित्य समितिक पड़ोसीयोकेँ पता नै छै जे ई संस्था छैहो बा नै, जयकान्त मिश्रक मृत्युक बाद ऐ संस्थाक मान्यता बरकरार किए छै, की जयकान्त मिश्रक मैथिली लेल कएल अहसानक पारिश्रमिक हुनकर बेटी-जमाए लऽ रहल छथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद की अछि आ एम.बी.बी.एस. डॉक्टर, जिनका साहित्यसँ कोनो सरोकार नै छन्हि, किए वोटक अधिकार लेल ऐ मुइल संस्थाक पता अपन नामसँ दै लेल तैयार भेल छथि। मिथिला सांस्कृतिक परिषद तँ विद्यापतिकेँ पागबला फोटो पहिरा कऽ विद्यापतिक नै मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार करबाक दोषी अछिये। तँ की ई मैथिल ब्राह्मणक खाँटी संस्था सभ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बनबै लेल (साहित्य अकादेमी दिल्लीमे) मात्र वोट आ कब्जाक राजनीतिक अन्तर्गत साहित्य अकादेमीक मैथिली कन्वीनर चुनबाक लेल संस्थाक रूपमे काज कऽ रहल अछि, आ तेँ अस्तित्वमे अछि? की मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मणक भाषा अछि? साहित्य अकादेमी, दिल्लीक पुरस्कारक बँटवारा (!!!) देखी तँ उत्तर की अछि? (कुल बँटवारा ४३ बेर- २०११ धरि) मैथिल ब्राह्मण -३६ बेर!! कायस्थ-५ बेर राजपूत-२ बेर गएर सवर्ण- शून्य बेर!!!! (ई सम्पादकीय २०१२क अन्तमे मे लिखल गेल छल, ओकर ९ सालक बाद २०२१ क साहित्य अकादेमी पुरस्कार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हुनकर उपन्यास “पंगु” पर देल गेलन्हि, से ई संख्या शून्यसँ बढ़ि कऽ १ भऽ गेल अछि।) विहनि कथा ०६ फरबरी १९९५ मे सहयात्री मंचक, लोहना, मधुबनीक बैसारमे मुन्नाजी द्वारा विहनि कथाक शब्दावलीक अवधारणा प्रस्तुत कएल गेल जकर समर्थन श्री राज केलन्हि। एकर समर्थन सर्वश्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, प्रेमचन्द्र पंकज, ललन प्रसाद, प्रभु कुमार मण्डल, मलयनाथ मंडन, अतुलेश्वर, अखिलेश्वर, कुमार राहुल आ सच्चिदानन्द सच्चू केलन्हि। पहिल विहनि कथा गोष्ठी २० फरबरी १९९५ केँ हटाढ़ रुपौलीमे भेल, जइमे विहनि कथाक स्वरूपपर चर्चा आ विहनि कथाक पाठ भेल। ऐ मे शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, उमाशंकर पाठक, मुन्नाजी, यंत्रनाथ मिश्र, मतिनाथ मिश्र, श्यामानन्द ठाकुर, ललन प्रसाद, भवनाथ भवन, प्रेमचन्द्र पंकज, प्रभु कुमार मण्डल, मलयनाथ मंडन, कुमार राहुल, सच्चिदानन्द सच्चू, विजयानन्द हीरा, सुनील कर्ण, सुश्री मीरा कर्ण, करनजी, विजय शंकर मिश्र, कमलेश झा आदि भाग लेलनि। विदेहक विहनि कथा विशेषांकमे विहनि कथाक स्वरूप आ ओकर समीक्षाशास्त्रपर ढेर रास चर्चा भेल आ कथाक लम्बाइ आ विहनि कथापर विस्तृत चर्च भेल। किछु गोटेकेँ “विहनि कथा” शब्दावलीपर आपति अछि। ओ आध पन्नाक कथाक लेल लघुकथा शब्दक प्रयोग करबापर बिर्त छथि। मुदा तखन ३-४ पन्नाक कथा लेल कोन शब्द प्रयोग करब? लघुकथा तँ तइ लेल प्रयुक्त होइ छै। तँ की “अति लघु कथा” शब्दावली विहनि कथा लेल प्रयोग कएल जाए? ऐपर जे तर्क साहित्य अकादेमीक दिल्ली कथा गोष्ठीमे देल गेल से हास्यास्पद अछि। ओ लोकनि ३-४ पन्नाक कथा लेल “कथा”; आ “विहनि कथा” लेल “लघुकथा”; शब्दावलीक प्रयोग करबाक इच्छुक रहथि। मुदा कथा, खिस्सा, पिहानी तँ विहनि कथा, लघु कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास सभ लेल प्रयुक्त एकटा शब्दावली अछि, महाकाव्यमे सेहो कथा होइ छै। ऐपर हमरा अपन स्कूल दिनक एकटा खिस्सा (ई विहनि कथा भऽ सकैए) मोन पड़ैत अछि- हिसाबक कक्षामे साइन थीटा बट्टा कौस थीटा बराबड़ की, ई कहलापर एकटा विद्यार्था उत्तर देलक; साइन बट्टा कॉस, कारण थीटा-थीटा कटि जेतै; से ओइ विद्यार्थीक कहब रहै। मास्टर साहैब तमसेलखिन्ह नै, कहलखिन्ह जे बारह बटा सत्रह बराबड़ दू बटा सात हेतै? विद्यार्थी कहलक नै। किए? एक-एक कटि गेलै तँ दू बटा सात भेलै ने।– मास्टर साहैब कहलखिन्ह। विद्यार्थी कहलकै- नै। बारह आ सत्रह तँ स्वतंत्र अस्तित्व बला अछि। तखन मास्टर साहैब कहलखिन्ह- तहिना साइन थीटा आ कौस थीटा स्वतंत्र अस्तित्व बला अछि। ऐ डिसकसनक बाद “विहनि कथा” शब्दावलीपर आपति करैबला लोकनि बात बुझि जेता से आशा अछि। विहनि कथाक अतिरिक्त आर सभ विधापर जे डिसकसन जरिऐल छल, तइ सभकेँ विदेह गोष्ठी सभ द्वारा अन्तिम रूप देल जा चुकल अछि। फजलुर रहमान हासमीक आइ २०-०७-२०११ केँ मृत्यु भऽ गेलन्हि। जन्म -पटना जिलाक बराह गाममे। वृत्ति अध्यापक। हिन्दी कविता संग्रह "रश्मि राशि" आ मैथिली कविता संग्रह "निर्मोही" प्रकाशित। १९९६मे अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर साहित्य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार। (हिनकर एकटा कविता) हे भाइ हे भाइ हमरा जुनि मारह तोँ हमरा दोसर जाति दोसर धर्म्मक बूझि रहल छह- मुदा हम छी तोरे भ्राता अग्रज वा अवरज! हमरा सभकेँ एके माता नहि मारह गैर जानि कऽ संसारक दृष्टिमे तोँ पार्थ आओर हम “राधेय” बनल छी मुदा “पृथा” जानि रहल अछि हदय कानि रहल अछि चुप अछि मजबूरीसँ बेवसीसँ हे भाइ हमरा नहि मारह...। विदेह, विदेहक सदस्यक शेयार कएल पोस्ट आ विदेहक फेसबुक ग्रुपपर आयल टिप्पणी Vijay Kumar Jha shradhanjali.. July 20 at 9:21pm · Unlike · 10 people Ranjeet Jha humar sader pranam July 20 at 9:26pm · Unlike · 10 people Raman Dutt Jha फोटो मे कविता से रूबरू करावै लेल बहुत बहुत धन्यवाद | July 20 at 9:27pm · Unlike · 9 people Dhirendra Premarshi हाशमीजीक प्रति हमर हार्दिक श्रद्धासुमन। हम अपन गीत एतबए दुआ मङै छी अल्लाह एकरा कबूल कइए लिहऽ मे हुनकर सन्दर्भ राखि हुनक ई कविता सेहो रखने छियनि-प्रलयंकारी भूकम्पसरकारक दिससँ राहतठीक ओसक बुन्नजकाँहाथी तँ ठाढेठाढ नहा गेलआ चिडइपिआसलक पिआसले रहि गेल कृपया हुनक जीवनी रखबाक प्रयत्न करब उमेशजी। धीरेन्द्र प्रेमर्षि July 20 at 9:31pm via · Unlike · 11 people Nagendra Kumar Jha hamro dis se shradhanjali July 20 at 9:35pm · Unlike · 11 people Shiv Kumar Jha हमर जन्म मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा बूच सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ, हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छलनि, जखन हम नेना छलौं (४-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौरऽ हो सिपाही"-- हुनका हमरादिससँ श्रद्धांजलि.. July 20 at 9:44pm · Unlike · 9 people Rajdeo Mandal shradhanjali July 20 at 10:04pm · Unlike · 6 people Manoj Kumar Mandal ekta sunya..ee sunya bharat? July 20 at 10:11pm · Unlike · 4 people Nand Vilas Roy dukhad ,, muda jeevanak satya July 20 at 10:14pm · Unlike · 5 people Priyanka Jha ekta maithilik lel samarpit vyaktitvak nidhan July 20 at 11:36pm · Unlike · 4 people Kaushal Kumar Karej paigh bh' gel het maithili ke dushmansab ke July 21 at 12:42pm · Like · 1 person Binit Thakur dukhak ghot pibi har 1 gyani badhe jeevan ke or. jakhan apan keo teje duniya shradha sa bahe nor. e sansar maaya ke nagri kahait achhi shastra puran. shradh suman rahamaaj jee k. hamar apan kichh pait sa. BINIT THAKUR July 21 at 2:41pm · Unlike · 2 people Sanjay Kumar Mandal श्रधान्जली.... July 21 at 11:50pm · Unlike · 1 person Shiv Kumar Jha HASMEE JEEK DEHANT SAN MAITHILI KEN JE KSHATI BHEL OKAR VIVECHAN SAMBHAV NAH. July 22 at 2:54pm · Like 14 minutes ago · Like Arvind Ranjan Das Atyant prabhaavkaari prashn .... • Gajendra Thakur fatmijik mrityuk baad hunka del shradhanjali..मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध हस्ताक्षर फज़लु रहमान हासमीक आइ दिनक ३ बजे देहावसान भ' गेलनि...बेगुसराय निवासी हासमी जी कें मैथिली मे अनुवाद लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार सेहो भेट चुकल छनि....हिनक कविता सभ बाद चर्चित रहल अछि....हुनके पांति सँ हुनका श्रद्धांजलि .... सरकारी रिलीफ ...हाथी नहा गेल आ छुट्टी पियासले रहि गेल.... Unlike · · Unfollow Post · July 20 at 4:28pm You, Prabhat Ray Bhatt Uyfm, Deepak Ranjan, Sanjay Jha and 20 others like this. Pradeep Chaudhary mata rani hunka aatma ke shantee pradan karaith July 20 at 11:11am · Unlike · 5 people Ashish Anchinhar dukhad samachar......... July 20 at 4:30pm · Unlike · 5 people Bhaskar Jha maithili sahitya ke bhari kshati!!!!! July 20 at 4:30pm · Unlike · 6 people Umesh Mandal दुखद समाचार... July 20 at 4:31pm · Unlike · 5 people Vinit Utpal श्रद्धांजलि July 20 at 4:31pm via · Unlike · 5 people Pawan Jha दु:ख भेल... मैथिली के एक्टा और क्षति ................ July 20 at 4:32pm · Unlike · 5 people Shefalika Verma Fajlu rahman Hashmi jik dehawsan s Maithili sahitya ker apurniya kshati bhel....MAITHILIK EKTA STAMBHA..... HARDIK SHRADHANJALI.... July 20 at 4:34pm · Unlike · 5 people Daya Jha Mithilanchali ati dukhad samachar. July 20 at 4:37pm · Unlike · 5 people Pankaj Jha श्रद्धांजलि. July 20 at 4:38pm · Unlike · 5 people Poonam Mandal दुखद समाचार... श्रद्धांजलि... July 20 at 4:39pm · Unlike · 6 people Sanjay Kumar Mandal बहुत दु:ख भेल...... July 20 at 4:41pm · Unlike · 5 people Raman Dutt Jha Hardik sardhanjali... July 20 at 4:49pm · Unlike · 5 people Dhanakar Thakur हमर सभक श्रद्धानाजली हस्मीजी के धनाकर ठाकुर Dr. Dhanakar Thakur Spokesman, Antarrashtriya Maithili Parishad July 20 at 4:50pm via · Unlike · 6 people Amarendra Yadav ke karat ehi kshati ke purti ? July 20 at 4:51pm · Unlike · 5 people Kumar Shailendra Hasmiji Succha maithilipremi rahathi.Hunak vinamrata aakarsit karaet chal aa aakhi me ekta ajeeb san dard rahaet chal. Allaha hunak samasta prijan ke e dukh sahabak sahas dethu.Hunka Jannat nasib honi.Hardik SRADHANJALI. July 20 at 5:00pm · Unlike · 5 people Arvind Thakur जाहि किछु लोकक उपस्थितिसँ मैथिलीक उदार छवि बनैत छल,ओहिमे सँ हासमी एक छलाह|एहि क्षति आ शुन्यक पुर्ति नहि भए सकत|सृजन-यात्राक एक सहयात्री घटि गेल|अश्रुपुर्ण श्रद्धांजलि…।| July 20 at 5:48pm · Unlike · 7 people Daya Jha Mithilanchali aai ekata aar kurshi sunn bha gel,hamar manak vina ke tar tuti gel. July 20 at 5:55pm · Unlike · 5 people Daya Jha Mithilanchali shradhanjali arpit. July 20 at 5:56pm · Unlike · 5 people Kumar Umesh Mahto dukhad samachar July 20 at 8:08pm · Unlike · 5 people Daman Kumar Jha hamro ekhene pata lagal achhi,hunak chehara pratyksha bha aayal achhi,katek din hunka lel ....... anane chhi.shradhanjali July 20 at 8:23pm · Unlike · 8 people Prity Thakur shradhanjali July 20 at 8:31pm · Unlike · 7 people Vijay Kumar Jha fazlur ji ke aatma ke khuda jannat dai..shradhanjali July 20 at 9:19pm · Unlike · 8 people Daman Kumar Jha HAASHMIJIk prasidha kavita thik THARMASAK CHAAH"' E THARMAS ACHHI/AEHI ME CHAAH ACHHI/GARAM-GARAM CHAAH/EYAH ACHHI HAMMAR JEEVAN/EYAH BHA-SAKAIT ACHHI/HAMMAR MREETYU/ JKHAN DHARI BHARAL RAHAIT ACHHI/THARMAS ME CHAAH/TA DHARI BHEER RAHAIT ACHHI MEETRAK/THARMAS RIKT HOITE /BHEER CHHANTI JAITACHHI/HAMRA RAAKHA PARAIT ACHHI/DHIYAN/DEG DEG PAR/THARMASK/MEETRAK/THARMASAK RIKT HOITANHI/HAMAR MEETRA BANI JAYIT/DOSARAK MEETRA............'' HAASHMI July 20 at 9:23pm · Unlike · 7 people Vijay Kumar Jha bah daman bhai,,ahank nebok chah seho achhi... July 20 at 9:24pm · Unlike · 6 people Vijay Kumar Jha hashmi ji nnek lok rahathi, bahute gote ke maithili me anlanhi July 20 at 9:25pm · Unlike · 6 people Nagendra Kumar Jha neek kavita raakhlahu daman ji, he bhai bala kavita hamra sabhak class x maithili me rahay, hashmi ji ke shradhanjali July 20 at 9:36pm · Unlike · 7 people Shiv Kumar Jha हमर जन्म मातृक मालीपुर मोड़तरमे भेल, हाशमीजी ओइ गामक बगलमे शिक्षक छला, मालीयेपुर गाममे रहै छला, हमर बाबूजी स्व. कालीकान्त झा बूच सँ साहित्य साधनाक क्रममे बड्ड अन्तरंगता भऽ गेल छलनि, पारिवारिक सम्बन्ध जकाँ, हमर बाल्यकालक उपनाम "टिल्लू" हिनके राखल छलनि, जखन हम नेना छलौं (४-५ बर्खक) तँ ओ हमरा कहै छला- "टिल्लू मियाँ राही, पेटमे कराही, आ दौरऽ हो सिपाही"-- हुनका हमरादिससँ श्रद्धांजलि.. July 20 at 9:42pm · Unlike · 8 people Bechan Thakur fazlur ji ke hamar shradhanjali July 20 at 10:00pm · Unlike · 5 people Dhirendra Kumar fazlur bhai nai rahlah sahsa vishwas nai hoiye..naman oei aatma ke July 20 at 10:02pm · Unlike · 5 people Durganand Mandal hashmi ji ke aatmak sadgati lel parmatma se prarthana July 20 at 10:07pm · Unlike · 4 people Kapileshwar Raut mrit aatma ke shradhanjali July 20 at 10:16pm · Unlike · 4 people Avinash Jha bahut dukhad samachar, hasmi jee k nidhan s maithali bhasha aa sahitya k bahut paigh aaghat July 20 at 10:27pm · Unlike · 4 people Priyanka Jha hashmi ji ke shraddha suman arpit karai chhi July 20 at 11:36pm · Like · 2 people Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people Anshuman Satyaketu Ekta setu je jorait chhal du ta dhara k , je banhait chhal samanantar baanh k . Tuti gel. Kshati ehi lel je sambhav vishmigat bha' gel. July 21 at 7:30am via mobile · Unlike · 2 people Shiv Kumar Jha VIDEHA SAMPOONA GROUPAK DISH SAN MAHAAN KAVI KEN SHRADHANJALI. July 21 at 3:10pm · Unlike · 2 people Sanjay Kumar Mandal अफसोस...! July 21 at 11:48pm · Unlike · 1 person • about an hour ago · • Amit Jha bahoot nik jaankaqri delau apne.,,........ mithila samagra maithil evm vishwa ke kuno bhi bhag me rahai bala maithil premi lokak chhi, hamra taraf se har maithil sapoot je sat sat naman 43 minutes ago via mobile · • Amit Jha haasim jee ke hunak yogdaan ke kaaran samagra maithil sasradha naman kay rahal chhainh साहित्य अकादेमीमे समन्वयक पद लेल कालाबाजारी (ब्लैक मार्केटिंग)- एकटा रिपोर्ट साहित्य अकादेमी दिल्लीक मैथिली समन्वयक चुनाव लेल जे संस्था सभ निर्धारित अछि ओकर नाम अछि:- विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा; सचिव वैद्यनाथ चौधरी “बैजू” आ अध्यक्ष- पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमर। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा; सचिव डा. गणपति मिश्र , अध्यक्ष रहथि स्व. जयमन्त मिश्र। चेतना समिति, पटना, सचिव श्री विवेकानन्द ठाकुर, अध्यक्ष श्रीमति प्रमीला झा। राँटी मधुबनीक कोनो संस्था, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष श्री हेतुकर झा। किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद (जे संस्था विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक), वर्तमान अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण झा आ सचिव गंगाधर झा। पंचानन मिश्रक अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति, इलाहाबाद; आ मैथिली लोक साहित्य परिषद, कोलकाता, सम्भवतः वर्तमान अध्यक्ष- अणिमा सिंह (सम्भवतः मैथिली लोक साहित्य परिषद आब ऐ लिस्टमे नै अछि कारण आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्टमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली ऐ संस्थाक नाम नै देने अछि।)। ऐ मे सँ किछु संस्थाक नाम आ वर्तमान अध्यक्ष आदिमे परिवर्तन सम्भव अछि। ऐ मे सँ अधिकतर संस्था कागजी अछि वा साहित्यिक नै राजनैतिक अछि आ जातिवाद, क्षेत्रवाद आ आनुवंशिक आधारपर संचालित अछि। साहित्य अकादेमी, दिल्लीक आधिकारिक मैथिली साहित्यिक संस्था सभक लिस्ट MAITHILI 01. The Secretary All India Maithili Sahitya Samiti Tirbhukti 1/1B, Sir P.C. Banerjee Road Allahabad-211 002 02. The General Secretary Akhil Bharatiya Maithili Sahitya Parishad C/o Dr. Ganapati Mishra Lalbag Darbhanga-846 004 03. The Secretary Chetna Samity Vidyapati Bhawan Vidyapati Marg Patna-800 001 04. The Secretary Mithila Sanskritik Parishad 6 B, Kailash Saha Lane Kolkata-700 007 05. The Secretary Vidyapati Seva Sansthan Mithila Bhavan Parishar Darbhanga-846 004 06. The Secretary Centre for the Study of Indian Traditions Tantrabati Geeta Bhavan Ranti House, Ranti Madhubani-847 211 Ashok Avichal DR. VEENA THAKUR KE BADHAI Ashok Avichal Sahitya Akademi Nayi Delhi ker Maithili paramarshdatri samitik pahil sanyojak banak saubhagya Dr. Veena Thakur kein Bhetlain. nishchiten Maithili kein yogya karmath aa sahitya anuragi vidhusi pratinidhi bhetlaik. Jharkhand Maithili sahitya manch Jamshedpur aa Jharkhand Maithili Bhojpuri Sahitya Sangam dis san Dr. Thakur kein Badhai • You, Maithili Singer Parivar, Prity Thakur, Poonam Mandal and 7 others like this. • Ashish Anchinhar आशा अछि जे वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती। Sunday at 10:12pm · Unlike · 2 • Gajendra Thakur पहिल रमानाथ झा, दोसर जयकान्त मिश्र, तेसर सुरेन्द्र झा सुमन, चारिम सुरेश्वर झा, पाँचम रामदेव झा, छअम रामदेव झाक ससुर चन्द्रनाथ मिश्र अमर, सातम रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित आ आठम वीणा ठाकुर। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक समन्वयक सूचीक ई आठम लगातार मैथिल ब्राह्मण समन्वयक हेतीह। 9 अ म जँ मैथिले ब्राह्मण बनि जाए तँ लगातार तेसर हैट्रिक बनि जाएत, जइ रेकॉर्डकेँ साहित्यकार कि क्रिकेटरो नै तोड़ि सकत। Sunday at 10:19pm · Like · 2 • Ashok Avichal kam sa kam sahityan ke jatiwaad san pharak rakhak prayas hoit rahak chahi.. Veena Thakur matra maithil brahman nai Maithilik Sahityakar aa pahil Mahila chith Sunday at 10:22pm · Like · 1 • Gajendra Thakur मुदा ई पहिल महिला छथि से कने-मने आशाक किरण छोड़ैए। तेँ वीणा ठाकुर जीकेँ बधाइ। Sunday at 10:27pm · Like · 4 • Gajendra Thakur मुदा आशीष अनचिन्हार जीक गपसँ हम सहमत छी। जेना रामदेव झाक बेटा आदि अजित आजादपर "विदित" केँ ५०-६० लाख देबाक आरोप आ नचिकेता आदिपर जातिगत/ व्यक्तिगत घृणित आरोप लगेने रहए (आज अखबारमे) से की सिद्ध करैए? की वीणा ठाकुर रामदेव झा-शंकरदेव झा- चन्द्र नाथ मिश्र क कैंडीडेट छली? आशीष अनचिन्हार जीक ऐ सलाह सँ सहमत छी जे "वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती।" Sunday at 10:32pm · Like · 4 • Gajendra Thakur आ जे से नै करती तखन पहिल महिला समन्वयकक मैथिलीकेँ की लाभ हएत, आ तकर परिणाम मैथिली लेल भयंकर हएत। Sunday at 10:34pm · Like · 3 • Ashok Avichal vishwas aich je veena thakur yogya aa maithili lel samarpit sahityakar sabkein sadasya banebak kaal prathmikta detih Sunday at 10:38pm · Like · 1 • Gajendra Thakur जे संस्था सभ हुनका चुनलकन्हि अछि ओइमेसँ अधिकतर फर्जी छै, जकरा साहित्यसँ कोनो मतलब नै छै, ओही सभक सदस्य सभ भूतकालमे एडवाइजरी बोर्डमे चुनाइत आएल अछि। Sunday at 10:43pm · Like · 4 • Gajendra Thakur "योग्य" माने मात्र मैथिल ब्राह्मण नै भऽ जाए अशोक अविचलजी। Sunday at 10:44pm · Like · 4 • Gajendra Thakur साहित्यकेँ जाति-पातिसँ दूर रखबाक चाही, ई सभ मैथिल ब्राह्मण साहित्यकार सभसँ सुनैत-सुनैत हमर कान पाकि गेल अछि। कोन तरहक हिप्पोक्रेसी अहाँ लोकनि कऽ रहल छी अशोक अविचलजी। दुनियाँ सभ देखि रहल अछि। इतिहास अहाँकेँ माफ नै करत। "शब्दशास्त्रम्" कथा जे हम "उमेश मण्डल"केँ समर्पित केने छलौं, ओ समर्पणक पाँती कोना अहाँ अपन सम्पादकत्वमे प्रकाशित "कथा पारस"सँ हटा देलिऐ। जँ ओ समर्पण "उमेश झा" केँ रहितै तँ अहाँ ओ पाँती हटबितिऐ अशोक अविचलजी? Sunday at 10:52pm · Like · 1 • Ashish Anchinhar खाली बातमे जाति पाति हटेलासँ नै होइ छै अशोक अविचल जी बल्कि व्यवहारमे सेहो जाति पातिकेँ हटेबाक चाही Monday at 9:46am via mobile · Edited · Like · 2 • Poonam Mandal ''आशा अछि जे वीणा ठाकुर जी अपन एडवाइजरी बोर्डमे कबिलपुरक शंकरदेव झा-विजयदेव झा आदिकेँ दूर रखती आ 9 टा सदस्यमे सँ कमसँ कम 5 टा सदस्य गएर सवर्णकेँ रखती।'' विचारणीय अछि। Monday at 3:51pm · Like · 4 • Arbind Kumar Yadav जे संस्था सभ हुनका चुनलक ओइमेसँ अधिकतर फर्जी अछि, जकरा साहित्यसँ कोनो मतलब नै छै, ओही सभक सदस्य सभ भूतकालमे एडवाइजरी बोर्डमे चुनाइत आएल अछि। ''साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक समन्वयक सूचीक ई आठम लगातार मैथिल ब्राह्मण समन्वयक छथि।'' Monday at 4:10pm · Like · 3 • Rabindra Kumar Choudhary akan dhair jha wa misar sanyojak hoiat rahlah achhi. pahil ber thakur bhelih achhi.badlab suru bha ghel achhi. Yesterday at 2:07pm · Like · 1 • Ashish Anchinhar ई ठाकुर बाभन छथि हजाम नै Yesterday at 2:24pm via mobile · Like · 2 • Umesh Mandal Rabindra Kumar Choudhary जी, झा आ मिश्रक जगह ठाकुर भेलीह जेकरा अहाँ बदलाव कहै छिऐ; ई कोन बदलाव भेलै? Yesterday at 7:29pm · Like · 2 • Poonam Mandal http://esamaad.blogspot.in/2012/10/blog-post_5235.html समदिया: साहित्य अकादेमी, दिल्लीक मैथिलीक आठम महिला समन्वयक डॉ. वीणा ठाकुर हेती esamaad.blogspot.com Since 2004 AD, First Maithili News Portal 'Samadiya'(Poonam Mandal & Priyanka Jh...See More Yesterday at 8:05pm · Like · 3 · Remove Preview • Gajendra Thakur Vijay Deo Jha दू गो बात सर गजेन्द्र बाबु हम अपने आ अपनेक रामचेलवा के कमेन्ट पढ़ल। नीक लागल जे हमरा अपने एडवाजरी बोर्ड में मेंबर हेबाक योग्य बुझल। चलू लागले हाथ हमहूँ अहाँ के महान साहित्यकार कहि देलौ। लेकिन एकटा बात हम कहि रहल छी आ एही बात के हम वीणा जी के सेहो कहबनि जे अपने पर मोनोग्राफ जरुर लिखल जाय। अपने बड़ पैघ आ महान साहित्यकार छी सरकार आ उत्तम किस्म के थेथर सेहो। कोन बुद्धिये पोस्ट में हमर नाम देलियई सरकार। आप भी सर हद्दे करते है सब चीज़ को कस्टम का माल समझ लिए हैं। और ई सब जो ढोंग करते हैं जाति वाला तो पहले अपना टाईटिल हटाईये। अपने बेटा के जनउ में जो लाख टाका बुके थे और बभना सब को खिलाये उसका हिसाब भी दीजिये ना और हम सब तुच्छ प्राणी को ज्ञान दीजिये प्रभु की जब आप सचमुच में जाति के विरोध में हैं तो बेटा के कन्धा पर धागा काहें टाँगे गुरु। मतलब पुरे मिथिलांचल में एक आप ही भगल्पुरिया कबिलाहा है ये सब पैतराफोकासी उमेश जैसे लोगों को दीजिये गुरु। और गजेन्द्र बाबु कुछ दिन पहले तक तो आपही अजीत आज़ाद जी को गरिया रहे थे अब दोस्तियारी कैसे हो गया। आप घिना दिए गुरु। इसको पोस्ट कर दीजियेगा एक दम लाइन बाई लाइन। Yesterday at 8:39pm · Like · 3 • Gajendra Thakur ई विजदेव झाक पिताक नाम रामदेव झा आ नानाक नाम चन्द्रनाथ मिश्र अमर छियन्हि। गरिखर मे दुनू नामी- दुनू पक्षसँ ई गुण हिनका आनुवंशिक रूपेँ तँ नै आबि गेल छन्हि!! Yesterday at 8:40pm · Like · 4 • Umesh Mandal शंकरदेव झा हमरा कहने छथि जे सभ भाँइ दस सदस्यीय साहित्य अकादेमीक एडवाइजरी कमेटीक सदस्य रूपमे नै एता, आ ईहो कहने रहथि "जे जँ हम सभ मेम्बर बनी तँ रामदेव झाक बेटा नै होइ"। कतेक दिन पुरान गप भऽ गेलै। अजित आजादसँ चर्च भेल तँ ओ कहलनि- "धुर छोड़ू एकर सभक किरिया खायबक कोनो माइन नै छै, गिरल सभ छै..."।- देखा चाही आगाँ की होइए। Yesterday at 8:44pm · Unlike · 4 • Ashish Anchinhar मने जे जँ शङ्करदेव आ हुनक भाए आदि साहित्य अकादेमीक कोनो पद लेता तँ ओ रामदेवक बेटा नै हेता सएह ने Yesterday at 9:01pm via mobile · Unlike · 2 • Pawan Kumar Sah पहिल रमानाथ झा, दोसर जयकान्त मिश्र, तेसर सुरेन्द्र झा सुमन, चारिम सुरेश्वर झा, पाँचम रामदेव झा, छठम रामदेव झाक ससुर चन्द्रनाथ मिश्र अमर, सातम रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित आ आठम वीणा ठाकुर; एकछाहा झा.. मिसर... बाभन ठाकुर...!!!!!! कहिया तक चलैत रहत ई खेल?? की हिनकासँ कमजोर केण्डीडेट छलखिन्ह प्रोफेसर उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'? की हिनकासँ सौ गुणा अधिक काज नचिकेता जी नहि केने छथिन्ह मैथिली लेल? मुदा तैयो श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक बातपर ''महिला छथि से कने-मने आशाक किरण छोड़ैए।'' आश अछि, मुदा से तँ गड़गड़ेलेपर बूझब। 2 hours ago · Unlike · 1 समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL -समन्वय २०१२: भारतीय लेखनक उत्सव:२-४ नवम्बर २०१२: (इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव) -एकर साइट अछि http://samanvayindianlanguagesfestival.org -समन्वयक छथि सत्यानन्द निरूपम आ गिरिराज कराडू -उत्सवक निदेशक छथि- राज लिबरहान -उत्सवक एडवाइजरी बोर्डमे छथि-आलोक राय, के.सच्चिदानन्दन, लक्ष्मण गायकवाड, ओम थानवी, महमूद फारूकी, ममता सागर, रवि सिंह, सीतांशु यशचन्द्र, तेमशुला आओ। -आयोजन कमेटीमे छथि- १.इण्डिया हैबीटेट सेन्टरक प्रोग्राम टीम, २.पारस नाथ, अनन्त नाथ। -सहयोगी छथि, दिल्ली प्रेस आ प्रतिलिपि बुक्स। -समन्वय २०११ मे मैथिलीक प्रतिनिधित्व केने रहथि- गंगेश गुंजन। http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2011/gangesh-gunjan/ समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/schedule/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/arvind-das/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/gajendra-thakur/ http://samanvayindianlanguagesfestival.org/2012/udaya-narayana-singh/ SAMANVAY 2012 Venue: Indian Habitat Centre, Lodhi Road, New Delhi -- 110 003 2 November 2012 Afternoon 4.00- 4.30: Inauguration By Chandrashekhar Kambar, Ratan Thiyam 4.45 – 5.45: Opening Session: Boli is Back Speakers: Ratan Thiyam, Kashinath Singh, Gurvinder Singh, Nilesh Mishra Moderator: Alok Rai 6.00 – 7.00: Opening Reading Nabaneeta Dev Sen, Sitanshu Yashaschandra, Udaya Narayana Singh, Mamang Dai, Arun Kamal, Arjun Deo Charan, Narender Singh Negi 7.15 – 8.15: Evening Performance Ugana re: Vidyapati by Shovana Narayanan ———————————————————————————————————————————————— 3 Nov 2012 10.30-11.30: Manipuri: The Idea of Nation Speakers: Yumlembam Ibomcha, Dr. Dhanabir Laishram, Bijoykumar Tayenjam Moderator: Robin Ngangom 11.45-12.15: Interaction: Mapping Cities Kashinath Singh, Laxman Gaikwad, Om Thanvi 12.30-1.30 Maithili: Love’s Own Language Speakers: Uday Narayan Singh, Dev Shankar Naveen, Gajendra Thakur Moderator: Arvind Das 2.30 -3.30 Kannada: Tales of Modernities: Small Spaces, Big Ideas Speakers:Gopalkrishna Pai, Banu Mushtaq, B.T. Jahnavi Moderator: Mamta Sagar 3.45-4.15 Interaction Munawwar Rana 4.30-5.30 English: Where’s My Reader? Speakers: Palash Krishna Mehrotra, Biman Nath, S.Hussain Zaidi, Madhuri Banerjee Moderator: Jai Arjun Singh 5.45-6.30: Future of Indian Languages Publishing in Digital Era Speakers:Akshay Pathak, Prem Prakash, Shiva Kumar Moderator: Rahul Dixit 7.00-8.30 Evening Performance: Kashmiri Sufiyana Kalam Gulzar Ahmad Ganie and party ———————————————————————————————————————————————————— 4 November 2012 10.00-11.00 Oriya: Reclaiming Language, Space and Body: Women Writing Speakers: Pratibha Ray, Sarojini Sahoo, Yashodhara Mishra, Aparna Mohanty Moderator: Paramita Satpathy 11.15- 12.15: Folk Performance: Pad Dangal Jagan, Dhavale and others Introduction: Prabhat 12.30-1.30 Marathi: The City of No Outsiders Mumbai Speakers: Arun Sadhu, Hemant Divate Moderator: Prakash Bhatambrekar 2.30-3.30 Kashmiri: My Reality, My Language Speakers: Shahnaz Rasheed, Gulshan Badrani, Elyas Azad Moderator: Nisar Azam 14 3.45-4.15: Interaction Girish Kasaravali, Banu Mushtaq, Mamta Sagar 4.30-5.30: Hindi: Culture and Power: A Tale of Seven Cities (Allahabad, Benares, Bhopal, Delhi, Kolkata, Lahore, Patna) Speakers: Kashinath Singh, Ashok Vajpeyi, Arun Kamal, Alka Saraogi Moderator: Neelabh 5.45- 6.30: Mind Your Language Speakers: Sneha Khanwalkar, Varun Grover, Ratan Rajpoot, Simran Kohli Moderator: Vineet Kumar 6.30 – 7.00: Award Ceremnoy and Closing Speakers: K. Satchidanandan, Raj Liberhan, Paresh Nath, Anant Nath, Satyanand Nirupam, Giriraj Kiradoo 7.15 – 8.30: Evening Performance Solo by Rabbi Shergill विदेह सम्मान (१.समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, २. समानान्तर ललित कला अकादेमी पुरस्कार आ ३.समानान्तर संगीत-नाटक अकादेमी पुरस्कारक नामसँ प्रसिद्ध) साहित्य, पत्रकारिता, भाषा, नाच-नृत्य-नाटक-फिल्म, संगीत, कला (मूर्तिकला, चित्रकला सहित) आ सामाजिक-सार्वजनिक काजक समानान्तर दुनियाँक अभिलेखन आ सम्मान (विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in ISSN 2229-547X VIDEHA) -मैथिली नाटक/ संगीत/ कला/ मूर्तिकला/ फिल्मक समानान्तर दुनियाँक अभिलेखन आ सम्मान सेहो हएत विदेह सम्मानक घोषणा द्वारा -ई घोषणा दिसम्बरक अन्त वा जनवरी २०१२ मे हएत -मैथिली नाटक/ संगीत/ कला/ मूर्तिकला/ फिल्मक समानान्तर दुनियाँक अभिलेखन आ सम्मान कएल जाएत -विदेह नाट्य उत्सव २०१२ क अवसरपर प्रदान कएल जाएत ई सम्मान। विदेह साहित्य उत्सव २०१२ आ विदेह साहित्य सम्मान समारोह १४ जनवरी २०१२ विदेह साहित्य उत्सव २०१२ आ विदेह साहित्य सम्मान समारोह १४ जनवरी २०१२ केँ सम्पन्न भेल। विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल आ कवि सम्मेलन सम्पन्न भेल। लोकक स्वतः-स्फूर्त सहयोग आ सहभागिता विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक सफलताक रूपमे मोन राखल जाएत। विदेह भाषा सम्मान २०१२-१३ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार रूपेँ प्रसिद्ध) - बाल साहित्य लेल विदेह सम्मान २०१२- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह "तरेगन" लेल ई पुरस्कार देल जा रहल अछि। ई पुरस्कार विदेह नाट्य उत्सव २०१३ क समारोहमे देल जाएत। “तरेगन” केँ सभसँ बेशी वोट भेटलै। तीनटा पोथी १.जगदीश प्रसाद मण्डलक तरेगन, २. जीवकान्तक “खिखिरक बीअरि” आ ३.मुरलीधर झा क “पिलपिलहा गाछ” केँ विदेह www.videha.co.in पर भऽ रहल ऑनलाइन वोटिंगमे राखल गेल छल। विशेषज्ञक मतानुसार “पिलपिलहा गाछ”मे बहुत रास कथा अछि जकरा बाल कथा नै कहल जा सकैए, तइ दुआरे ऐ पोथीकेँ लिस्टसँ हटा देल गेल कारण ई पुरस्कार बाल साहित्य लेल अछि, ओनाहितो ऐ पोथीकेँ सभसँ कम वोट भेटल रहै। ऐ पोथी सभक अतिरिक्त आन पोथी सभपर विचार नै कएल गेल कारण ओ सभ पोथीक आकारक नै वरन् बुकलेटक आकारक छल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (जन्म १९४७- ) मात्र मैथिलीमे लिखै छथि आ ओ ढेर रास विहनि कथा, लघु कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास, कविता आ नाटक लिखने छ्हथि। हुनका मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ भूत आ वर्तमानक लेखकक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनका “गामक जिनगी” (लघुकथा संग्रह) लेल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११ आ टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ सेहो देल गेल अछि। तरेगन (२०१०) जगदीश प्रसाद मण्डल जी लिखित बाल-प्रेरक विहनि कथा संग्रह थिक। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ बाल सहित्य २०१२ लेल विदेह सम्मान प्राप्त करबा लेल बधाइ। विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान १.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ २०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल) २०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल) २.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह) २०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह) २०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक) २०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद) ऐमेसँ श्री रमानन्द रेणु जीक मृत्यु सम्मानक घोषणाक बाद भऽ गेलन्हि, तेँ हुनकर उत्तराधिकारीकेँ ई पदक आ प्रशस्ति-पत्र देल जाएत। ११ दिसम्बर २०११ केँ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान पं. गोविन्द झा जीकेँ पटनामे आ श्री रामलोचन ठाकुरजी केँ रिसरा (कोलकाता)मे देल गेलन्हि। पटनामे श्री मुन्नाजी आ रिसरामे श्री नबो नारायण मिश्र देलन्हि सम्मान। श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, ले.क. मायानाथ झा आ श्री आनन्द कुमार झाकेँ ऐ मासक अन्त/ अगिला मासक प्रारम्भमे निर्मली (जिला सुपौल)मे होमएबला द्वितीय समानान्तर साहित्य अकादेमी कवि/ कथा/ साहित्य सम्मेलनमे विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान देल जाएत। श्री रमानन्द रेणु (आब स्वर्गीय)क उत्तराधिकारीकेँ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान देल जाएत। “गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान” बर्ख 2011 अनचिन्हार आखर (http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) द्वारा प्रायोजित "गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011 लेल ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीकेँ प्रदान कएल गेलैन्ह। एहि बेरुक मुख्यचयनकर्ता ओस्ताद सियाराम झा"सरस" छलखिन्ह।.. विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११- निर्मली (जिला सुपौल):- साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने हुनका लोकनिकेँ कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११" दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे आयोजित कएल जा रहल अछि, समए: ४.१५ (अपराह्न): स्थान असर्फी दास साहू समाज महिला महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७); सम्पर्क-श्री उमश मंडल-०९९३१६५४७४२। ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै कएल जाएत। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल ई कार्यक्रम छै विरोध लेल नै..हमर प्रायोरिटी दिल्लीसँ बेसी मिथिला (भारत+नेपाल) अछि जतए मैथिलीक नेटिव स्पीकर रहै छथि। ई कार्यक्रम मैथिली नाटक आ रंगमंचमे सेहो मिथिला क्षेत्रमे शुरु हएत, आ मात्र साहित्य अकादेमीक गलतीक सुधार लेल नै वरन मैथिली नाटक आ रंगमंचमे शामिल तथाकथित मैथिली रंगमंचीय संस्था/ विद्यापति समिति / चेतना समिति/ मैथिल ब्राह्मण सभा, रहिका आदि सभक सुधार लेल सेहो कएल जाएत। कवि-सम्मेलन तँ मात्र शुरुआत अछि..मैथिली सिनेमा बनेबामे जतेक लोक अपस्याँत छथि ओइसँ कम खर्चामे तेलुगु/ हिन्दी/ तमिलक हिट फिल्म मैथिलीमे डब क' सकै छी, सीरियल/ कार्टून सभ मैथिलीमे डब क' सकै छी, भोजपुरीकेँ देखियौ जे भोजपुरी थानामे दरोगा बजैए सएह ओकर सिनेमाक हीरो सेहो बजैए, ... मुदा मैथिलीक फिल्म आ धारावाहिकमे किदनि मैथिली बाजल जाइए.. कवि-सम्मेलन आ रंगमंच/ नाटकक बादक स्टेज मैथिली फिल्म/ धारावाहिक आ कार्टूनक हएत.. दिनांक ९ जुलाइ २०११ केँ सायं ४.४५ बजेसँ राति ७.४५ बजे धरि विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११- निर्मली (जिला सुपौल) सम्पन्न भेल। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११" दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे असर्फी दास साहू समाज महिला इन्टर महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७) आयोजित कएल गेलन । ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै छल। समारोहक उद्घाटन हरिनारायण कामत आ श्री रामजी मण्डल द्वारा दीप प्रज्वलित कऽ कएल गेल। समारोहक अन्तमे श्री राजदेव मण्डलक २०१० ई. मे प्रकाशित कविता संग्रह “अम्बरा”, जे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह मानल जा रहल अछि, क लोकार्पण सम्मिलित रूपेँ ६ गोटे (डॉ. बचेश्वर झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री रामजी प्रसाद मण्डल, श्री रौशन कुमार गुप्ता, श्री हरिनारायण कामत, श्री नन्द विलास राय) द्वारा सम्पन्न भेल। ऐ काव्य संध्यामे कविता पाठ केलन्हि- १.श्री राधाकान्त मण्डल (स्वागत गीत), २. उमेश पासवान (गेलहे घर छी, हाल, कबाड़ी), ३. श्री रामकृष्ण मण्डल छोटू (माइ), ४. श्री रामदेव प्रसाद मण्डल “झाड़ूदार” (५ टा गीत), ५. श्री नन्द विलास राय (इन्दिरा आवास), ६.श्री कपिलेश्वर साहु (कोसी), ७.श्री रामविलास साहु (३ टा कविता), ८. श्री उमेश मण्डल (२ टा कविता), ९. श्री राजदेव मण्डल (३ टा कविता), १०. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (२ टा कविता)। सभ कविताक बाद कवितापर दुटप्पी समीक्षा सेहो भेल। कवि-सम्मेलनक अध्यक्षता श्री डॉ. बचेश्वर झा केलनि आ कार्यक्रमक संचालन श्री दुर्गानन्द मण्डल केलनि। ऐ कवि सम्मेलनक विशेषता ई रहल जे ऐ इलाकामे ऐ तरहक कार्यक्रम पहिले बेर आयोजित भेल, से श्रोता लोकनिक कहब छलन्हि। मुख्य अतिथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल कार्यक्रम बीचमे कहलनि जे ऐ कार्यक्रमक एतेक हलतलबीमे आयोजित करबाक कारण ई भऽ गेल जे आइ साहित्य अकादेमी द्वारा कोलकातामे मैथिली कवि गोष्ठी कराओल जा रहल अछि, जे हमरा सभक लेल लाजिमीक बात थिक जे हमरा-अहाँक गाममे होमएबला कार्यक्रम कोलकातामे होइए आ हमरा-अहाँकेँ बुझलो नै अछि। लोक ईहो कहलनि जे आइ धरि कार्यक्रमक सभक संचालन हिन्दीमे होइ छल, ई पहिल बेर भेल अछि जे कोनो कार्यक्रमक संचालन ऐ इकाकामे मैथिलीमे भेल। सूचना: विदेह द्वारा २०१२ क जनवरी-फरवरी मासमे पहिल “ विदेह मैथिली नाट्य महोत्सव २०१२” आयोजित कएल जाएत, संयोजक रहताह श्री बेचन ठाकुरजी। स्थान-समयक जानकारी बादमे देल जाएत। २०म विश्व पुस्तक मेला २०१२, २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी प्रगति मैदान, नव दिल्ली २१म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी (अवसर बीसम नव दिल्ली विश्व पुस्तक मेला २०१२ जखन भारतीय सिनेमाक सए बर्ख, दिल्लीक राजधानी रूपमे सए बर्ख आ रवीन्द्रनाथ टैगोरक १५०म जयन्ती संगे पड़ि रहल अछि, एकर आयोजक रहैत अछि नेशनल बुक ट्रस्ट, भारत, सौजन्य अंतिका प्रकाशन) २५ फरबरी २०१२ सँ ०४ मार्च २०१२,प्रतिदिन भोर ११ बजेसँ ८ बजे राति धरि, स्थान- अंतिका प्रकाशन , स्टाल 80-81, हॉल 11, प्रगति मैदान,२०म विश्व पुस्तक मेला 2012 नव दिल्ली। ई विश्व पुस्तक मेला दू सालमे एक बेर होइत अछि आ ४० साल पहिने १९७२ ई. मे एकर पहिल आयोजन भेल छल। नीलम फिल्म्स आ गोपाल पाठकक करतूत सूचना: नीचाँमे श्री रामभरोस भ्रमरजीक पत्र दऽ रहल छी, "नीलम फिल्म्स आ गोपाल पाठकक करतूत"- ई पंकज पराशर, सुशीला झा, डॉ. योगनाथ झा (उर्फ योगनाथ सिन्धु उर्फ सिन्धुनाथ झा)क कड़ीमे एकटा आर चोरक चोरिक शृंखला अछि जकर विदेह द्वारा पर्दाफास कएल जा रहल अछि। मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार 74 वर्षक मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार देल जा रहल अछि। लोसा पेरूक स्पेनिश भाषाक लेखक छथि। 1963 ई. मे द टाइम ऑफ द हीरो नाम्ना पहिल उपन्यासक लेखक श्री लोसा मूलतः गद्य लेखक छथि आ ओ निबन्ध, उपन्यास लिखै छथि। नोबल समिति कहलक अछि जे शक्तिक केन्द्रक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक चित्रण लेल श्री लोसा केँ ई पुरस्कार देल गेल अछि। ओ तीससँ नाटक, निबन्धक अतिरिक्त 30 सँ बेसी उपन्यास लिखने छथि। हुनकर किछु आन रचना छन्हि: द फीस्ट ऑफ द गोट, ऑंट जूलिया एंड द स्क्रीनराइटर, द ग्रीनहाउस, कंवर्सेशन इन द कैथेड्रल, कैपटन पैनटोजा एंड द स्पेसल सर्विस। डॉ. नित्यानन्द लाल दास केँ साहित्य अकादेमीक मैथिली अनुवाद पुरस्कार २०१० देल जाएत। डॉ. नित्यानन्द लाल दास , पिता स्वर्गीय सूर्यनारायण दास। फारबिसगंज कॉलेज, फारबिसगंज सँ अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पदसँ अवकाशप्राप्त। डॉ. सुरेन्द्र झा "सुमन"क संयोजकत्वक कार्यकालमे "मैथिली परामर्शदातृ समिति" (साहित्य अकादेमी, दिल्ली)क सदस्य। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक अंग्रेजी पोथी "इग्नाइटेड माइण्ड्स"क मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा" नामसँ अनुवाद। मैथिली पत्रिका सभ जेना बटुक, प्रयाग; मिथिला मिहिर, पटना; स्वदेश, दरभंगा; पहुँच, पटना आ परती पलार, अररियामे रचना प्रकाशित। १९६७ ई. सँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे सक्रिय। प्रांतीय प्रतिनिधि २००४ धरि जिला सरसंघचालक। जे.पी.आन्दोलनमे लोकतंत्र सेनानी। भारतीय भाषा परिषदक युवा पुरस्कार गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल 22 जनवरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक युवा पुरस्कार (2009-10 ) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल।संगमे युवा पुरस्कार (2009-10 ) हिन्दी लेल नीलेश रघुवंशी, कोंकणी लेल राजय रमेश पवार आ गुजराती लेल जातून जोशीकेँ देल गेल अछि। 12 मार्च 2011 केँ युवा पुरस्कारसँ हुन्दी लेल कुणाल सिंहकेँ, उड़िया लेल दिलीप स्वयंकेँ, नेपाली लेल उदय क्षेत्रीकेँ आ कन्नड़ लेल विक्रम विसाजीकेँ सम्मानित कएल जाएत। अनलकांत मैथिली त्रिमासिक "अंतिका"क सम्पादक छथि। 19 फरबरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक रचना समग्र सम्मान हिन्दी लेल केदारनाथ सिंहकेँ, तेलुगु लेल ए. रामापति रावकेँ, बांग्ला लेल जय गोस्वामीकेँ मराठी लेल अरुण साधुकेँ, हिन्दी लेल उदय प्रकाशकेँ, असमिया लेल इन्दिरा गोस्वामीकेँ, उर्दू लेल गोपीचन्द नारंगकेँ आ मलयालम लेल एम.टी.वासुदेवन नायरकेँ देल जाएत। समारोहक विशिष्ट अतिथि- ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त श्री ओ.एन.वी.कुरुप आ श्री शहरयार। फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपाल:- फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्टद्वारा स्थापित मैथिलीक सभसँ पैघ राशिक पुरस्कार फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ सँ मिथिला क्षेत्रक सुपरिचित रङ्गसंस्था मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि। एहि सम्मानमे दू लाख एक हजार) टकाक संगहि प्रशस्तिपत्र प्रदान कएल जएतैक। जनकपुरधामस्थित मिथिला नाट्यकला परिषद ( मिनापक वि.सं. २०३६ सालमे स्थापना भेल छल। तीन दशकसँ अधिक समयसँ मूलतः नाट्यविधाकेँ केन्द्रमे राखि ई संस्था नाट्य संगीत साहित्य तथा सामाजिक अभियानक माध्यमसँ मैथिली भाषा-संस्कृति एवं समाजक विकासमे विशिष्ट योगदान दैत राष्ट्रिय-अन्तर्राष्ट्रिय स्तरपर ख्याति कमबैत आएल अछि। तहिना फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कारसँ सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुर आ बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ सम्मानित करबाक निर्णय कएल गेल अछि। एहि पुरस्कारमे पच्चीस-पच्चीस हजार टकाक संगहि प्रशस्तिपत्र प्रदान करबाक प्रावधान अछि। एहि दुनू व्यक्तिमेसँ श्रीमती मीना ठाकुर विगत चारि दशकसँ मैथिली सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा साङ्गीतिक क्षेत्रमे निरन्तर क्रियाशील रहैत विविध गतिविधिक माध्यमसँ महिला सशक्तिकरणमे निरन्तर सक्रिय छथि। सप्तरीक बेस सक्रिय संस्था- मैथिल महिला परिषदक संस्थापक अध्यक्ष ठाकुरक सम्पादनमे सृजनधारा (कवितासङ्ग्रह प्रकाशित छनि। तहिना दयानन्द दिग्पाल यदुवंशी विगत चारि दशकसँ साहित्य तथा सत्संगक माध्यमसँ मैथिली भाषा-संस्कृतिक विकास एवं सामाजिक सद्भाव सम्बर्द्धनमा निरन्तर सक्रिय छथि। आशुकवित्वप्रतिभासम्पन्न कवि दिग्पालक कहिया फेरु अबै छी -कवितासङ्ग्रह प्रकाशित छनि। विख्यात् उद्योगपति तथा समाजसेवी डा. उपेन्द्र महतोद्वारा स्वर्गीय माता फूलकुमारी महतोक नामपर अपन मातृभाषा तथा मातृसंस्कृतिक उत्थानार्थ स्थापित एहि पुरस्कारक लेल प्रसिद्ध साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक संयोजकत्वमे श्रीमती पूनम ठाकुर आ धीरेन्द्र प्रेमर्षिक सदस्यतावला तीन सदस्यीय सिफारिश समिति गठन कएल गेल छल। स्व. फूलकुमारी महतोक जन्मजयन्तीक सन्दर्भमे फागुन १५ गते तदनुरूप फरवरी २७ तारिख कऽ जनकपुरधाममे एक विशेष कार्यक्रमक आयोजन कऽ ई सम्मान तथा पुरस्कार समर्पण कएल जएबाक कार्यक्रम अछि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि- - फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान समितिक सदस्य सचिव छथि। महासुन्दरी देवी (89 बर्ख) केँ मिथिला चित्रकला लेल 2011 क पद्म श्री देल जाएत। हिनका पहिने तुलसी सम्मान, शिल्पगुरू सम्मान भेटल छन्हि। भारतक राष्ट्रपति 128 पद्म पुरस्कारक देलन्हि, जइमे 13 टा पद्म विभूषण, 31 टा पद्म भूषण आ 84 टा पद्म श्री पुरस्कार अछि। ऐ 128 मे 31 टा महिला छथि, एकटा डुओ( गणना लेल एक) आ 12 टा विदेशी/ एन.आर.आइ./ पी.आइ.ओ/ मृत्योपरांत वर्गसँ छथि । पद्म पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक सेवा, विज्ञान आ आभियांत्रिकी, व्यापार आ उद्योग, चिकित्सा, साहित्य आ शिक्षा, खेलकूद आ लोकसेवा लेल देल जाइत अछि। पद्म विभूषण उत्कृष्ट आ नीक, पद्म भूषण उच्च कोटिक नीक आ पद्म श्री नीक सेवा लेल देल जाइत अछि। गणतंत्र दिवसक अवसरपर एकर घोषणा होइत अछि आ राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवनमे मार्च-अप्रैलमे देल जाइत अछि। "गोविन्द रचनावली": अनेको पत्र-पत्रिकामे छिड़िआयल स्व. गोविन्द चौधरी (1909-2002) क अनुपलब्ध रचना सबहक एक नवीन संग्रह "गोविन्द रचनावली"क नाम सँ पांचजन्य ट्रस्ट दिससँ 2010 मे प्रकाशित भेल, दरभंगामे पुस्तकक लोकार्पण पं चन्द्र नाथ मिश्र "अमर" केलनि। 264 पृष्ठक एहि पुस्तकमे लेखकक दू टा दुर्लभ फोटोक संग 23 टा कथा, एक टा एकांकी नाटक, आठ टा कविता, दू टा संस्मरण एवं मैथिली अनुवाद सहित लहेरियासराय ओकालातिखानासँ संवंधित एक टा अंग्रेजी लेखक संग्रह कैल गेल अछि। पुस्तकक संयोजन एवं सम्पादन प्रो. भीमनाथ झा तथा प्रो. प्रेम शंकर सिंह केलनि अछि। साहित्य अकादेमी, दिल्लीक महत्तर सदस्यता श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमरकेँ देल गेलन्हि। मैथिली लेल ई पहिल बेर देल गेल। ऐसँ पहिने नागार्जुनकेँ (मैथिलीक यात्रीजी) हिन्दी आ मैथिली कविक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्लीक महत्तर सदस्यता देलगेल छलन्हि। साहित्य अकादेमी महत्तर सदस्यता स्वीकृति वक्तव्य श्री चन्द्रनाथ मिश्र अमर (संक्षिप्त) पहिल:क्षण आ कणक सदुपयोगकेँ हम अपन जीवन दर्शनक अंग बना लेलौं। दोसर:स्वाध्याय, स्वावलम्बन, स्वच्छताकेँ आदर्श मानलौं। तेसर:मातृभाषा मैथिलीक चतुर्मखी विकासकेँ अपन लक्ष्य निर्धारित केलौं। चारिम: मैथिली साहित्यक इतिहासमे पसरल किछु भ्रान्तिकेँ पत्रिकारिताक इतिहास द्वारा निराकरण केलौं। पाँचम:विद्यापति गोष्ठीक माध्यमसँ मैथिलीक भाषात्वकेँ लऽ कऽ सामंजस्य आ समरसता अनबाक सफल प्रयास केलौं। विनीत उत्पलक सूचनाक अधिकारक अन्तर्गत मांगल सूचना १० सदस्यी साहित्य अकादेमीक मैथिली एडवाइजरी बोर्ड द्वारा मैथिलीकेँ खतम करबाक षडयंत्रक खुलासा केलक अछि। http://esamaad.blogspot.com/2011/11/vinit-utpals-rti-application-dated.html आ http://www.facebook.com/media/set/?set=oa.208811812530288&type=1 ऐ दुनू लिंकपर ई सूचना उपलब्ध अछि।श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, श्री बेचन ठाकुर (क्रमसँ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ जीवित कथा-उपन्यासकार, कवि आ नाटककार), श्री उमेश पासवान, श्री उमेश मण्डल, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल "झाड़ूदार", श्री दुर्गानन्द मण्डल आ श्री आनन्द कुमार झाकेँ कोनो असाइनमेन्ट नै? मुदा की मैथिली एडवाइजरी बोर्ड द्वारा मैथिलीकेँ खतम करबाक षडयंत्र मैथिलीकेँ मारि देत? नै, कारण? कारण जै तरहेँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राजदेव मण्डल, श्री बेचन ठाकुर , श्री उमेश पासवान, श्री उमेश मण्डल, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल "झाड़ूदार", श्री दुर्गानन्द मण्डल आ श्री आनन्द कुमार झा आ आन गोटे अपन तन-मन-धनसँ मैथिलीक जड़िकेँ अपन खून-पसीनासँ पटा रहल छथि..ई षडयंत्र- मैथिलीकेँ मारबाक- नै सफल हएत। ई भाषा जिबैत रहत। अविलम्ब एडवाइजरी कमेटीक सभ सदस्य अपन अपन असाइंमेट वापस करथि / करबाबथि (अपन माने अपन , अपन परिवार / बच्चा / चेला चपाटी), नै तं हिनका सभ पर त्यागपत्र देबाक लेल दवाब बनाओल जाए, हिनकर सबहक घरक सोझां अष्टजान कएल जाए, राष्ट्रगीतक गाओल जाए, राष्ट्रगीतक अष्टजाम कएल जाए / मिथिला राज्य जं ऐ स्थिति मे बनत तं यएह दस परिवार मिथिला कें भूजि खा जाएत / मिथिला राज्य संघर्ष समिति सभ ऐ छद्म अनुवाद सभकें अपन सभामे जराबथि / तखने ओ सिद्ध का' सकता जे ओ मिथिला राज्य बनेता आकि मैथिली राज्य / सी. आइ. आइ. एल. सं सेहो (मैथिलीमे ) ग्रांट -इन ऐड आ अनुवादक सूची सूचनाक अधिकार तहत मंगबाओल जाएत / लघु राज्यक सार्थकता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी राष्ट्रीय संगोष्ठी : दिनांक १४.०२.२०१० केँ प्रयागमे लघु राज्यक सार्थकता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न भेल। संगोष्ठीक आयोजन श्री विधुकान्त मिश्र, मैथिली अकादमी आ मिथिला सांस्कृतिक संगमक सहयोगसँ भेल। मुख्य वक्ता रहथि- राँचीसँ डॉ. धनाकर ठाकुर, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद। भाषिक, भौगोलिक एवं सामाजिक आधारपर लघु राज्य विशेष कऽ मिथिलांचलक गठन पर जोर देलखिन्ह। संगोष्ठीमे ई. प्रदीप झा, कर्नल देवकान्त झा, डॉ. ए.के. झा, श्री अखिलेश झा, श्री सुधीर मिश्र, संजीव झा आदि गोटे सभ अपन विचार प्रकट कयलन्हि। समारोहक अध्यक्षता कर्नल डी.के. झा कएलन्हि। ~~~~~~~~~~ स्वीडनक कवि टॉमस ट्रांसट्रोमरकें २०११क साहित्य लेल १.५ मिलियन डॉलरक नोबल पुरस्कार देबाक घोषणा कएल गेल अछि| स्वेडिश एकेडमी कहलक "ओ अपन घनगर पारदर्शी बिम्बसं सत्यक एकटा नव द्वारक परिचय करेलनि"| हुनकर पोथी सबहक अंगरेजी अनुवाद रहनि "द ग्रेट एनिग्मा ", "द हाफ फिनिश्ड हेवेन ", द डिलीटेड वर्ल्ड " | ओ अस्सी बरखक छथि| ओ १५ सं बेशी कविता संग्रह लिखने छथि जे अंगरेजी आ ६० आन भाषामे अनूदित भेल अछि| हुनकर जन्म स्टोकहोममे भेलनि| ओ मनोचिकित्सक रहथि आ हुनकर कवितामे मानवताक गहन मनोविज्ञानिक विश्लेषण भेटैत अछि |हुनकर कविता गूढ़ मुदा सोझ होइत अछि | हुनकर कविता वैयक्तिक आ सार्वत्रिक दुनू अछि| हुनकर कविता एहेन गूढ़ नै होइए जइपर चिंता करैत रहू, वरन ओ धरातलसं अस्तित्वक उच्च शिखर दिस ल' जाइए |हुनकर स्वेडन क नम्हर शीतकालक विवरण, ऋतुक लय, आ प्रकृतिक सौन्दर्य वातावरणक अद्भुत विवरण हुनकर कवितामे भेटैत अछि | हुनकर माता स्कूल शिक्षिका आ पिता पत्रकार रहथि आ ओ साहित्य, इतिहास, धर्मशास्त्र आ मनोविज्ञान पढने छथि | १९९० सं ओ एकटा आघातक बाद बजबामे सक्षम नै छथि| १९९३ का बाद अमेरिका ककरो साहित्यक नोबल नै भेटल छै| १९७४ क बाद आब जा क' कोनो स्वेडिश कें ई पुरस्कार भेटल छै| नोबल समिति आब गएर यूरोपीय भाषाक बेशी साहित्यिक पोथीपर विचार करत| ~~~~~~~~ दूषण पंजीक स्कैन कएल सिंगल पी.डी.एफ.क १७ टा फाइल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। पंजीक हमरा सभक पोथीमे ओना तँ ११००० तालपत्रक जे.पी.जी.इमेज क डी.वी.डी. सेहो अलगसँ किनबाक व्यवस्था रहै आ ओइ डी.वी.डी.केँ कबिलपुरक सगर राति दीप जरएमे हम बाँटनहियो रही, मुदा ओइमे जे दूषण पंजी रहै तकर कारण कतेक पंचैती भेल, कतेक गोटे सोझाँ आ फोनपर गारि पढ़लन्हि। अखनो बहुत गोटे पंजीमे ओकर चर्चासँ भितरे-भितरे गुम्हरैत रहैत छथि आ गपमे तामसे हाँफऽ लगै छथि जेना खून पीबि जेता। ऐ दूषण पंजीमे ब्राह्मणक आन जाति खास कऽ दलित आ मुस्लिमक संग विवाह, वा पतिक मृत्युक बाद सन्तानक जन्मक लिखित दस्तावेज अछि। ओकरामे हेर-फेर केनाइ हमरासँ सम्भव नै छल। पंजीक पोथीमे शब्दशः एकर मिथिलाक्षरसँ देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल अछि। एतए हम मूल ताड़पत्र आ बसहा पत्रपर लिखल पंजीक स्कैन कऽ बनाएल पी.डी.एफ. फाइलक लिंक दऽ रहल छी आ संगमे पंजीक लिंक सेहो। कियो नै कहि सकैत अछि जे ऐ मे एक्को रत्ती अशुद्धि अछि। गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ फेर हुनकर चर्मकारिणीसँ भेल विवाहक एतए वर्णित भेटत। ई वएह नव्य-न्यायक जनक गंगेश छथि। आनन्दा चर्मकारिणीसँ विवाह एतए सेहो भेटत जे हमरा द्वारा लिखित प्रेमकथा "शब्दशास्त्रम्"क आधार बनल। दूषण पंजी- मूल मिथिलाक्षर लेख- ताड़पत्र सिंगल पी.डी.एफ., मोदानन्द झा शाखा पंजी- मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन, प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल), उतेढ़ पंजी, पनिचोभे बीरपुर- दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि?, छोटी झा पुस्तक निर्देशिका- पत्र पंजी मूलग्राम पंजी, मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-2 मूल पंजी-३- मूल पंजी-४, मूल पंजी-५ मूल पंजी-६, मूल पंजी-७, पंजी-पोथी- (http://www.videha.co.in/new_page_15.htm ) ~~~~~~ एकटा पोथी आएल छल "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला",१९६२ (लेखक: चित्रकार श्री लक्ष्मीनाथ झा), आ दोसर पोथी "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.), २००९ (गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा , पंजीकार विद्यानन्द झा)"पंजी-पोथी- http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab आ पंजीक पात सभ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर उपलब्ध अछि। आब ऐ दुनू पोथीक किछु भाग चोरि कऽ दू गोटे अपना नामेँ छपबेलन्हि अछि आ तइमे हुनका लोकनिकेँ सहयोग सेहो भेटल छन्हि। सुशीला झा "अरिपन"२००८ नामसँ "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला" पोथीक अनुवाद अपना नामे कऽ लेने छथि,फोटो तक स्कैन कऽ चोरा लेने छथि आ तकरा भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर प्रकाशन अनुदान देने अछि, जकर विवरण ऐ पोथीपर लिखल अछि। डा. योगनाथ झा तँ सद्यः "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.) क एक भागकेँ अपना नामेँ पंजी-प्रबन्ध (वंश परिचय- प्रथमभाग, २०१०) नामसँ छपबा लेलन्हि आ ऐ मे हुनका सहयोग भेटलन्हि श्रोत्रिय समाजक संगठन "महाराजा कामेश्वर सिंह सांस्कृतिक विकास मंच"क। ई श्रोत्रिय समाजक संगठन श्री लक्ष्मीनाथ झा, जे श्रोत्रिय छलाह, केर पोथीक चोरिक विरोध कोना करत? हिनका सभकेँ देख कऽ तँ पुरान चोर पंकज पराशर (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr) सेहो लजा जाएत। दस बर्खक मेहनति दस मिनटमे चोरि करैबला ई महानुभाव डा. योगनाथ झा उर्फ योगनाथ "सिन्धु" उर्फ सिन्धुनाथ झा ७० बर्खक छथि!! आ काल्हि जँ हिनकर कियो सी.आइ.आइ.एल. मे जान-पहिचानक हेतन्हि तँ हिनको पोथीकेँ ग्रान्ट भेट जेतन्हि। ~~~~~ हम एकटा निबन्ध लिखने रही मिथिलासँ पलायनक विषयमे। ओइमे हम एकटा सिद्धान्त देने रही जे मिथिलाक गाममे पचासो बर्ख रहलाक उत्तरो लोक पलायन केने छथि, मुदा मिथिलासँ बाहर रहियो कऽ मिथिलासँ जुड़ाव सम्भव छै। ऐ सन्दर्भमे हमर एकटा कथा शब्दशास्त्रम् देखल जाए। ओइमे एकटा ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक प्रेम विवाहक वर्णन छै आ सात टा गीत ओइमे छै। अजित मिश्र ओइ कथाक प्रशंसा केने रहथि जे ई साहसिक कथा थिक, मुदा ई सत्यकथापर आधारित अछि तँ साहसक गप कतऽ सँ आएल। धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ कथा नीक लगलन्हि मुदा निम्न वर्गक कथाक भाषा हुनका पाण्डित्यपूर्ण लगलन्हि। कोनो समालोचनाक हम सामान्यतः उत्तर नै दै छी, मुदा एतए ऐ कथाक दूटा वैशिष्ट्य हम अहाँकेँ बता रहल छी। ई कथा पंजीमे उल्लिखित ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक विवाहपर आधारित छै, से ५०० साल पहिलुका (एहेन-एहेन लगभग सए अन्तर्जातीय विवाहक विवरण ओइ पोथीमे छै, मूल मिथिलाक्षर पाण्डुलिपि आ पोथीक लिंक ऊपर देल अछि।)। हुनकर वंश आइयो मिथिलामे श्रोत्रिय आ ब्राह्मणक रूपमे विद्यमान छथि, नाम आनन्दा चर्मकारिणी सेहो पंजीयेसँ हम लेने रही। तँ ई मिथिलाक इतिहासमे ५०० साल पहिनहियो मान्य रहै। ओइमे गीत सभ रहै “ पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे ” शब्दशास्त्रम "पर्वत ऊपर भमरा.."आदि गीत http://www.videha.co.in/archive.htm ऐ लिंकपर दुनियाँ सुनि रहल अछि आ बनौवा डोमकछ आदिबला गीत जँ अपन समाजसँ जुड़ावक आधारपर लिखल जैतए तँ ओ सामन्तवादी गीत नै बनितए। बृखेश चन्द्र लालक पार्टीक झिझिया लोकनृत्य असली जुड़ावक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।प्रेमर्षि जी केँ ई पाण्डित्यपूर्ण बुझेलन्हि जे कोना चर्मकारिणी सभ एहेन गीत गबैए,ओहेन भाषा बजैए। कारण हेल्लो मिथिलामे जे डोमरी आदि बला बनौआ गीत सभ बजाओल जाइए ओइमे तँ गएर ब्राह्मणक सभ्यता आ ओकर महिलाक लेल जे गीतमे शब्द प्रयोग कएल जाइ छै् आ ओइमे ब्राह्मण जे निम्न वर्गक महिलासँ छेड़खानी करैए (अथर्ववेदमे सेहो एहेन रेफरेन्स छै, मुदा तीन हजार बर्खक बाद वएह स्थिति!) से भने हुनका ओइ जाति सभकेँ जोड़बाक प्रयास लगैत होइन्ह मुदा ओ ब्राह्मण सामान्तवादी सोचक अगिला कड़ी मात्र अछि। मुदा पालन झा जे गाममे रहै छथि हुनका ई गीत/ कथाक शैली पाण्डित्यपूर्ण नै लगलन्हि ओ कहलन्हि “हमर गामक चर्मकार टोलीक महिलाक गीत सुनब तँ गुम्म पड़ि जाएब, ब्राह्मण महिलासँ नीक गीत ओ सभ गबै छथि।" जीवकान्त गाममे रहै छथि मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक “मौलाइल गाछक फूलक” नायक द्वारा अपन सभटा जमीन बाँटि देब हुनका मैथिल समाजमे अजगुत बुझेलन्हि, असम्भव बुझेलन्हि, काल्पनिक बुझेलन्हि। किए? पंजीमे कमसँ कम तीनटा (कमसँ कम) सर्वस्वदाताक उल्लेख हमरा भेटल जे अपन सभटा सम्पत्तिक दान दऽ देलन्हि। “मास्टर साहेब जीवकान्तकेँ दुख छन्हि जे हुनका भरिया नै भेटै छन्हि, खबास नै भेटै छन्हि” मानेश्वर मनुज जीवकान्तक आत्मकथाक समीक्षाक क्रममे ठीके लिखै छथि। ई किए भेल? कारण जीवकान्त ७० बर्ख गाममे रहलोक उपरान्त ने चर्मकार/ डोमक टोल कोनो उत्सव मे गेलथि आ ने धीरेन्द्र प्रेमर्षि चर्मकार/ डोमक टोलक कोनो उत्सवमे । हमर साहित्यकार मिथिलामे रहियो कऽ, गाममे रहियो कऽ पलायन कऽ गेल छथि, इन्दिरा गाँधीकेँ १९६७ क अकालमे देखाओल गेल जे मुसहर सभ बिसाँढ़ खा कऽ जिन्दा छथि मुदा ओइपर कथा लिखल गेल जगदीश प्रसाद मण्डल द्वारा (गामक जिनगी,२००९ मे), किए ? हमर नाटक उल्कामुख जे विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित हएत, मे गंगेश (नव्य न्याय तत्वचितामणि कारक) , जिनकर जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ विवाह चर्मकारिणीसँ भेलन्हि, केँ अखुनका हिसाबसँ देखबाक प्रयास कएल गेल अछि। एकटा ई-पत्र बहुत पहिने आएल छल, धीरेन्द्र प्रेमर्षिक। ओ लिखने रहथि जे हम विदेहमे “घोड़ा आ गधा दुनूकेँ संगे घोंसिया दै छिऐ।” संदेश कॉलममे ई संदेश हम अपडेट नै कऽ सकल छी। आब देवशंकर नवीनजीक साक्षात्कारक शब्द जँ गारि छिऐ तँ ई की छिऐ। भीमनाथ झा राधाकृष्ण चौधरीक “अ सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर”क विषयमे लिखने रहथि जे राधाकृष्ण चौधरी हड़ही-सुरही लेखकक नाम सेहो ओइ पोथीमे दऽ देने छथि, इतिहासमे मात्र पैघ (कृतिसँ प्रायः हुनकर मतलब होइन्ह) लोकक चर्चा हेबाक चाही। तँ की भीमनाथ झाक बादक प्रेमर्षिक पीढ़ी सेहो ओही पुरान बाटक अनुगामी नै भेल? ई तँ स्वतः सिद्ध छै जे घोड़ा आ पैघ व्यक्तित्व ओ सभ स्वयं छथि मुदा दोसराक विषयमे (अपनासँ सापेक्ष) मूल्यांकन कियो स्वयं कोना कऽ सकैए? ऐ सन्दर्भमे हमर ई कहब अछि जे लिम्बा रामकेँ आर्चेरी ओलम्पिक प्रतियोगिता लेल भारत प्रस्तुत केलक, मुदा ततेक दवाब हुनकापर पड़लन्हि जे आब हुनकर नाम लोक बिसरि गेल। जँ विदेहमे ३०० लेखक छथि तँ ओइमे सँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल हमरा सभकेँ मैथिली साहित्यमे प्राप्त भऽ सकलाह। जँ मात्र मुठिया सिंघ, सिलेबी रंग आ अदन्त फलनां बाबू सभ जुड़ल रहितथि तँ विदेहक ९३ टा अंक लगातार नै निकलि पबितए आ ने मैथिली साहित्यकेँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल आदिक विराट लेखनीसँ साक्षात्कार भऽ पबितए। ~~~~~~~ जँ सुभाष चन्द्र यादव, धीरेन्द्र , परमेश्वर कापड़ि वा बलचनमा (यात्री)क भाषा तथाकथित छोटहाबला छिऐ तँ ओ लेखकक बेछप शैली छिऐ, ओइसँ हमरा कोनो दिक्कत नै अछि, ओइमे ब्राह्मणक आ अब्राह्मणक बीच वार्तालापमे कोनो अपमानक भाव बला दू तरहक मैथिलीक प्रयोग नै कएल जाइ छै। मुदा जँ मलंगिया ब्राह्मण पात्र आ अब्राह्मण पात्र लेल दू तरहक मैथिलीक प्रयोग करै छथि, (मैथिली तँ स्वयं लोकक भाषा अछि,देश-कालक अनुसारे सृजित अछि), ओइमे मलंगियाजी केँ कोन फेँट-फाँट करबाक आवश्यकता पड़ि गेलन्हि?) तँ ओकर कारण अछि हुनकर सामन्तवादी सोच, ओ थोपड़ी सुनबा लेल ब्राह्मण दर्शकक समक्ष (ओ मानि कऽ चलै छथि जे उच्च वर्ग मात्र हुनकर नाटक देखत) अब्राह्मणकेँ हँसीक पात्र बनबै छथि। ऐ तरहक नाटकक निर्देशक थोपड़ी सुनि विभोर भऽ जाइ छथि। ऐ तरहक नाटकक अभिनेता-अभिनेत्री अपन आ अपन निर्देशकक क्षमताक आभास ब्राह्मण-कायस्थ दर्शकक थोपड़ी मध्य देखै छथि आ नाटककार तँ सद्यः सिंहासनपर विराजमान छथिये। मुदा ऐसँ मैथिली भाषीक बहुसंख्यक वर्ग जेना अपनाकेँ अपमानित अनुभव करै छथि तकर कनिको आभास, तकर मनोविज्ञानक कनेकबो ज्ञान जँ नाटककार/ निर्देशक महोदय सभकेँ रहितन्हि तँ ई थोपड़ी हुनकर हृदयकेँ भेद नै दैतन्हि? आ तखन ई कन्नारोहट किए होइए जे मैथिलीक जनसंख्या घटल जा रहल अछि!! तँ ओइ विषयमे हमर कहब अछि जे “नाट्यशास्त्रक दूटा शब्द- "ग्राम्य" आ "भाषा", ई दुनू नाट्यशास्त्रकेँ मूल रूपमे नै पढ़निहार लेल भ्रम उत्पन्न करैए। ग्राम्य नाटक भेल जै मे आकाशवाणी नै होइए, वास्त्विकता होइए (हमर अभिनय पाठशालापर आलेख देखू), नाट्यशास्त्रमे निरूपित भाषाक अनुरूप जे नाटक लिखल गेल (संस्कृतक सन्दर्भमे) ओइमे स्त्री आ शूद्र लेल प्रकृतक प्रयोग कएल गेल (कारण बुझले हएत जे संस्कृतक पंडितक घरमे हुनकर कनियाँ मूर्ख होइत रहथि आ संस्कृत जन सामान्यक भाषा नै रहि गेल छल), मुदा एक्कैसम शताब्दीक दोसर दशकमे मैथिलीमे किछु गोटे तथाकथित निम्न-वर्गक मैथिली इजाद कऽ कऽ घोसिया रहल छथि, मात्र थोपड़ीक उद्देश्य लऽ कऽ, जखनकि अखन जे संस्कृतमे नाटक लिखल जा रहल छै, जकर मंचनमे हम सहभागी रहल छी ओहूमे प्राकृत वा आन कोनो भाषा नै रहै छै। हँ नाट्यशास्त्र मे निरुपित भाषाक अनुरूप बेचन ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्डल आदि असल खाँटी मैथिली, जइमे प्रवाह छै, केर प्रयोग कऽ रहल छथि आ जे ब्राह्मणवादी नाटककार द्वारा इजाद कएल तथाकथित गएर-ब्राह्मणक भाषापर अन्तिम मारक प्रहार अछि। नाट्यशास्त्रमे ग्राम्य नाटकक सेहो चर्चा छै, मुदा लोक गाममे होइबला नाटककेँ गमैय्या नाटक आ शहरमे होइबला नाटककेँ शास्त्रीय नाटक बुझै छथि। शहरमे सेहो वास्तविकता आधारित ग्राम्य नाटक होइत अछि। यूरोपमे सर्कसमे चीनक लोककेँ गधापर आनल जाइ छलै..आब उनटे चीनबला सभ यूरोपियनक से हाल कऽ देतै..से थोपड़ीक उद्देश्यसँ मात्र ब्राह्मण दर्शकक आगमनक आशासँ जे मैथिलीक नाटककार अखनो ई खेल खेला रहल छथि, हुनका नाट्यशास्त्र मूल रूपमे पुनः पढ़बाक चाही। तेँ हुनकर सभक नाटक समीक्षाक उपरान्त , ऐ कारणसँ , अधिकसँ अधिक "मेडियोकर" स्तर धरि पहुँचि पबैत अछि। ~~~~~~~ मुद्दा छै जे किछु गोटे सगर रातिसँ लऽ कऽ सभ ठाम जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लेखन शैलीपर सवाल उठा रहल छथि, कथाक स्तरपर गप होइते कहाँ अछि, मात्र जे "करैत" आ "जाइत" क बाद अछि किए नै अछि; रामनाथहुँ किए नै अछि रामनाथो किए अछि, शब्द सभ ई कोड़ि कऽ अनै छथि (एकटा दोसर पाठकक पत्र छल!)। जतेक लेखक छथि ततेक मानकीकरण अछि तखन कथाक स्तरपर गप किए नै होइए? विषय-वस्तुपर गप किए नै होइए? जखन की हुनकर कथा विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ (मानकीकरण सेहो हुनकामे अछि) श्रेष्ठ अछि, सगर राति दीप जरए, सुपौलमे जे जातिवादी स्वर उठल आ पुरोधा सभ चुप रहलाह, मुन्नाजीक ऐ सम्बन्धमे प्रश्नावलीक अखन धरि पुरोधा लोकनि उत्तर नै देलन्हि, ओइसँ लगैए जे सभटा साजिशक तहत भऽ रहल अछि।सी.आइ.आइ.एल. कएक साल बितलोपर किए मानकीकरणक कोनो खाका नै दऽ सकल, कएकटा मीटिंग टा भेल। जखनकि ओकर कमेटी एकछाहा छै आ ओइमे वएह लोकनि छथि जे सभ सगर राति आदिमे सक्रिय छथि आ मानकीकरणक आधारपर जगदीश प्रसाद मण्डलक आलोचना हास्यास्पद रूपेँ करै छथि! मण्डलजी वा मानकीकरणक लेल कोनो हल्ला नै छै, ई मात्र ओइ अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक हल्लाक उत्तर छै जिनका ई सफलता अबूझ बुझाइ छन्हि , जे वास्तविकतासँ दूर छथि आ जे मैथिलीक सरकारी कार्यक्रममे (छद्म धरातली कार्यक्रम!) एक दोसराक ढोल पीटै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक १३ टा पोथी, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार बेचन ठाकुरक एक टा पोथी आ राजदेव मण्डलक अम्बरा (जकरा हम २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह कहने छी) केँ मैथिली पाठक जे स्थान देबाक छलै इन्टरनेटेपर नै धरातलोपर दऽ देने छै। ई सभ पोथी सभ प्रिन्टक संग ऐ लिंकपर सेहो उपलब्ध छै, देखल जाए http://www.videha.co.in/archive.htm। ७४म सगर रातिमे १५ गोट कथा पाठ भेलै जइमे जगदीश प्रसाद मण्लक नेतृत्वमे ९ गोटे गेल रहथि, आ शेष मात्र ६ गोटे रहथि, जेँ जगदीश प्रसाद मण्डल तेँ ई सगर राति आइयो चलि रहल छै। मुदा साहित्य अकादेमी आ सी.आइ.आइ.एल.क प्रायोजित धरातली कार्यक्रम (!) मे से अनुपात नै छै , किएक? कारण ओ संस्था सभ जमीनी वास्तविकतासँ दूर अछि। तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक http://www.videha.co.in/archive.htmपर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक http://www.videha.co.in/archive.htmपर वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ई टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा", बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथि, ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै, से सी.आइ.आइ.एल.क मैथिलीक छद्म मानकीकरण देखा रहल अछि। असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक http://www.videha.co.in/archive.htmपर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राजदेव मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक http://www.videha.co.in/archive.htmपर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक http://www.videha.co.in/archive.htm- मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित मानकीकरणक सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/archive.htmभेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (हुनका द्वारा इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस, जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि। धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि।सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै।विदेहमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल जाए:- “जहिना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहियो हर-कोदारि नै चलल सुखि-सुखि गािछ-विरिछ खसि उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चिड़ै-चुनमुनीक माध्यमसँ वा हवा-पानिक माध्यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि रौद-वसात, पानि-पाथर, अन्हर-विहाड़ि सहि अपन जुआनी पाबि छाती खोलि बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्ति करैत तहिना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्म बटाइ-किसान परिवारमे भेलनि।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक? ~~~~~~~~~~~~ लोकमे आब गोलैसी नै छै, हमरा क्षेत्रक राजनेता सेहो आब जाति, गोत्रक आधारपर नै मुदा काजक आधारपर वोट माँगि रहल छथि। मुदा ओइ युगक साहित्यकार/ नाटककार - जिनका सी.आइ.आइ.एल., साहित्य अकादेमी, एन.एस.डी. आदिसँ मान्यता चाहियन्हि, तखने ओ साहित्यकार/ नाटककार कहेताह- से गोलैसी नै करताह तखन हुनकर छद्म अस्तित्व कोना रहतन्हि? कारण जइ युगक ओ छथि से युग तँ कहिया ने खतम भऽ गेलै। कोनो कालजयी लेखक/ नाटककारकक अस्तित्व ऐ सरकारी संस्था सभक मोहताज नै अछि। ~~~~~~~ मैथिलीक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। आ तखन मुस्लिम अहाँसँ कोना जुड़त। मुदा आब जखन गजलक जीवन युगक समाप्ति भऽ गेल अछि (जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह।) आ अनचिन्हार युगक प्रारम्भ भऽ गेल अछि, जइमे गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारणक आधारपर सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल, शान्तिलक्ष्मी चौधरी आदि गजलकार गजल लिख रहल छथि तखन मुस्लिमक प्रवेश मैथिलीमे हेबे करत।हम शेख मोहम्मद शरीफक तेलुगु कथाक अंग्रेजी माध्यमसँ मैथिलीमे अनुवाद केने रही (जुम्मा - कथा- विदेह:सदेह:१ मे सेहो प्रकाशित) आ विदेहमे सद्रे आलम गौहर आ मो. गुल हसन छपि रहल छथि। संगमे मैथिलीमे आब कसीदा, मसनवी, फर्द, बन्द, कता, रुबाइ, हम्त, नात, मनकबत, मर्सिया, मुस्तजात, नज्म, मुजरा, कौवाली आदिपर लेख (देखल जाए आशीष अनचिन्हार -http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_07.html )क बाद मुस्लिम लेखक मैथिलीसँ कतिआएल अनुभव नै कऽ रहल छथि। मिथिलाक खोजमे मुस्लिम आ क्रिश्चियन धार्मिक स्थलक वर्णन छै (देखू http://www.videha.co.in/discovery.htm ) आ मिथिला रत्नमे सेहो यथासम्भव उल्लेख भेट जाएत (देखू http://www.videha.co.in/ratna.htm )। मिथिलाक तँ छोड़ू कर्णाटकक मुसलमान सेहो किए कन्नडक बदला उर्दूकेँ अपन मातृभाषा मानि रहल अछि, जखनकि बगलमे तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा तमिल घोषित करैए (कन्नडक उपन्यासकार भैरप्पाक उपन्यासक संस्कृत अनुवाद "आवरणम" हम पढ़ने छी, ओइमे ऐपर सेहो चर्चा छै, कर्णाटकमे ऐ उपन्यासपर कतेक हंगामा भेल रहै । मुस्लिम मैथिलीसँ दूर भागल से तमिल, मलयालम आ बांग्लाक (आ काश्मीरीक) अतिरिक्त सभ भाषामे भेल। काश्मीरमे तँ लोक बजैए काश्मीरी आ पढ़ाओल जाइ छै उर्दू- (बिहार मे पढ़ाओल जाइ छै जेना हिन्दी) , मुदा एकटा छोट राज्य सिक्किम नेपालीक अतिरिक्त लेपचा / भुटिया सेहो पढ़बै छै (लेपचा लिपि सेहो इंटैक्ट छै),मुदा बगले मे दार्जिलिंगमे से नै छै। ओकर कारण अछि सिक्किमक भाषायी उदारता जे बिहारमे (आइये नै जमीन्दारी राजेसँ) मैथिली आ मिथिलाक्षरक विरुद्ध अछि/ छल। मुसलमानक मातृभाषा उर्दू किए भेलै, आ हिन्दूक मातृभाषा हिन्दी किए से प्रश्न मात्र मैथिलीक नै अछि। बांग्ला आ तमिलकेँ बंगाल आ तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा किए मानै छथि। मिथिलाक मुसलमानेकेँ मात्र किए दोष देल जाए? मिथिलाक अधिकांश हिन्दू सेहो मैथिलीकेँ नै हिन्दीकेँ अपन मातृभाषा मानै छथि मुदा हुनका साम्प्रदायिक नै देशभक्त मानल जाइए! दोसराकेँ छोड़ू, हम तँ दरभंगाक पोथी बेचनिहारसँ मैथिली बाजैत थाकि गेलौं मुदा ओ सभ हिन्दीमे जवाब देलक! प्रश्न ओतेक सरल नै छै । ~~~~~~~~~~~~ नेट मध्य एशियामे की केलकै सभकेँ बुझले अछि। जमीनी स्तरपर निर्मलीमे जे "विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन" आयोजित भेल छलै ओकर सफलतासँ सभ भिज्ञ छथि, तहिना विदेह द्वारा जे समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेलै से काल्हि धरि अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक मध्य जे अहलदिली अनने अछिै तहूसँ सभ भिज्ञ छथि। ~~~~~~~~~~~ मिथिलाक आ मैथिलीक विकासक जे वातावरण अखुनका सरकारमे छै की ओ दरभंगा आ आन जमीन्दारी राज वा मैथिल मुख्यमंत्रीक कालमे कहियो रहै? १४ अक्टूबर २०११ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ निर्मलीमे जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा आ राजदेव मण्डलक एकटा पोथी देल गेलन्हि, मुदा जखन चेतना समितिक बैसकीमे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटनामे ओ मैथिलीक ऐ संस्थाकेँ मैथिल ब्राह्मणक संस्था बुझने रहथि आ बाजलो रहथि (बड़ाइयेमे सही, वोटक उद्देश्येसँ सही) तँ कियो सांकेतिको करेक्शन किए नै केने रहथि? १४ अक्टूबर २०११ धरि ओ मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बुझै छलाह!! ~~~~~~~~~~~ सी.आइ.एल.एल.क सभ निअम वेबसाइटपर उपलब्ध छै, आ ओकर कोन प्रावधान लक्ष्मीनाथ झा द्वारा लिखित हिन्दीक पोथी "बिहार की सांस्कृतिक चित्रकला"क निर्लज्ज चोरि कएल पोथी सुशीला झाक "अरिपन"केँ पूर्वप्रकाशन ग्रान्ट दै छै से हमरा नै बुझल अछि। मुस्लिमक गप तँ छोड़ू हिन्दूक मात्र एक जाति एकर सभ कार्यशालासँ लऽ कऽ सभ ग्रान्ट/ असाइनमेन्ट प्राप्त कऽ रहल अछिै, ओ कोन प्रावधानक अन्तर्गत छै? निअममे कोनो कमी नै होइ छै, यएह निअम तँ दोसरो भाषामे छै, ओतए किए एतेक समस्या नै छै? ~~~~~~~~~~~ साहित्य अकादेमीक मैथिलीक युवा पुरस्कार २०११ लेल भऽ रहल षडयंत्रक अन्तर्गत किछु एहेन पोथी सभ रेस मे अछि जे छपबे नै कएल, मात्र किछु प्रकाशकक लोगो आ आइ.एस.बी.एन. आ एक कॉपी साहित्य अकादेमीक देल अखबारी विज्ञापनक आलोकमे ३१ जुलाइ २०११ क अन्तिम तिथिकेँ मंगबाओल गेल (माने ओ पोथी मात्र ओ लेखक आ साहित्य अकादेमी टा पढ़ने अछि)। मुदा ई तथ्य सभकेँ बुझल छै जे कोन पोथी बजारमे अछि आ कोन मात्र पुरस्कार लेल एक कॉपी आएल अछि। साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कारक प्रारम्भिक लिस्टमे पंकज पराशरक चोरिक कविताक संग्रह सेहो अछि, धन्य साहित्य अकादेमी आ ओ कवि/ साहित्यकार लोकनि सेहो जे ऐ चोर महराजसँ अपन मैथिली कविता अनूदित करबा कऽ साहित्य अकादेमीक पत्रिकामे छपबै छथि आ तेकर एवजमे ओइ चोरकेँ पोसै छथि। ~~~~~~~~~~~~~~ श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर"मे कोनो कमी नै अछि, बशर्ते ओकर टाइटल जँ रहितै "बदलैत स्वर-मैथिली कथा श्रीनिवास-अशोक-विभूति-बिहारी-वियोगी-नवीनक विशेष सन्दर्भमे"; मुदा ई पोथी सम्पूर्ण मैथिली कथा साहित्यक स्वर हेबाक दावा करैत अछि। से एकर सीमामे ने नक्सलवाद आबि सकत, ने बिसाँढ़ आ ने पइठ। जै ग्रुपक हेबाक बातसँ नवीनजी बेर-बेर अपन साक्षात्कारमे मना केलन्हि अछि, से ग्रुप "बदलैत स्वर"क स्वर अछि। ~~~~~~~~~~~ स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८):स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” केर जन्म १९११ ई. मे अपन मामागाम सतलखामे भेलन्हि जे हुनकर पैतृक गाम तरौनीक लगेमे अछि। यात्री जी अपन गामक संस्कृत पाठशालामे पढ़ए लगलाह, फेर वाराणसी आ कलकत्ता सेहो गेलाह आ संस्कृतमे “साहित्य आचार्य” क उपाधि प्राप्त केलन्हि। तकर बाद ओ कोलम्बो लग कलनिआ स्थान गेलाह पाली आ बुद्ध धर्मक अध्ययनक लेल। ओतए ओ बौद्ध धर्ममे दीक्षित भऽ गेलाह आ हुनकर नाम पड़लन्हि -नागार्जुन। मुदा बादमे पुनः गाममे यज्ञोपवीत कऽ ब्राह्मण धर्ममे घुरलाह। यात्रीजी मार्क्सवादसँ प्रभावित छलाह, १९२९ ई. क अन्तिम मासमेमे मैथिली भाषामे पद्य लिखब शुरू कएलन्हि। १९३५ ई.सँ हिन्दीमे सेहो लिखए लगलाह। स्वामी सहजानन्द सरस्वती आ राहुल सांकृत्यायनक संग ओ किसान आन्दोलनमे संलग्न रहलाह आ १९३९ सँ १९४१ धरि ऐ क्रममे विभिन्न जेलक यात्रा कएलन्हि। हुनकर बहुत रास रचना जे महात्मा गाँधीक मृत्युक बाद लिखल गेल छल, प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। भारत-चीन युद्धमे कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चीनकेँ देल समर्थनक बाद कम्युनिस्ट पार्टीसँ मतभेद भेलन्हि। जे.पी. अन्न्दोलनमे भाग लेबाक कारण आपात्कालमे हिनका जेलमे ठूसि देल गेल। यात्रीजी हिन्दीमे बाल साहित्य सेहो लिखलन्हि। हिन्दी आ मैथिलीक अतिरिक्त बांग्ला आ संस्कृतमे सेहो हिनकर लेखन आएल। मैथिलीक दोसर साहित्य अकादमी पुरस्कार १९६९ ई. मे यात्रीजीकेँ हुनकर कविता संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ”पर भेटलन्हि। १९९४ ई.मे ओ साहित्य अकादमीक फेलो -हिन्दी आ मैथिली कविक रूपमे- भेलाह। यात्रीजी जखन २० वर्षक छलाह तखन १२ वर्षक कान्यासँ हिनकर विवाह भेल। हिनकर पिता गोकुल मिश्र अपन समाजमे अशिक्षितक गनतीमे रहथि आ चरित्रहीन छलाह। यात्रीजीक बच्चाक स्मृतिमे छन्हि जे हुनकर पिता कोना हुनकर अस्वस्थ आ ओछाओन धएल मायपर कुरहड़ि लऽ मारबाक लेल उठल छलाह, जखन ओ बेचारी हुनकासँ कुमार्ग छोड़बाक गुहारि कऽ रहल छलीह। यात्रीजी मात्र छह वर्षक छलाह जखन हुनकर माए हुनका छोड़ि प्रयाण कऽ गेलीह। यात्रीजीकेँ अपन पिताक ओ चित्र सेहो रहि-रहि सतबैत रहलन्हि जइमे हुनकासँ मातृवत प्रेम करएवाली हुनकर विधवा काकीक, हुनकर पिताक अवैध सन्तानक गर्भपातमे, लगभग मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। के एहन पाठक होएत जे यात्रीजीक हिन्दीमे लिखल “रतिनाथ की चाची” पढ़बाक काल बेर-बेर नै कानल होएत। पिता-पुत्रक ई घमासान एहन बढ़ल जे पुत्र अपन बाल-पत्नीकेँ पिता लग छोड़ि वाराणसी प्रयाण कए गेलाह। कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप हम टा संतति, से हुनक पाप ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप अनको बिसरक थिक हमर नाम माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम! (काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण, “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कऽ दैत छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी अपन पत्नी, अपराजिता, लग आबि गेलथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर” आ “विलाप” आ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि। जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत दुनू प्राणी घुमलाह। पत्नीक जोर देलापर बीच-बीचमे तरौनी सेहो घुमि कऽ आबथि। आ फेर अएल १९४९ ई., अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”। १९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आ सभक भार पत्नी अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत रहथि। हम जखन दरभंगामे पढ़ैत रही तँ यात्रीजी ख्वाजा सरायमे रहैत छलाह। हमरा मोन अछि जे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे यात्रीजी आएल छलाह आ कम्युनिस्ट पार्टीबला सभ एजेन्डा छीनि लेने छल। अगिले दिन यात्रीजी अपनाकेँ ओइ धोधा-धोखीमे गेल सभाक कार्यवाहीसँ हटा लेलन्हि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह तँ आर.एस.एस. क कार्यकर्ता लोकनिसँ जेलमे भेँट भेलन्हि आ जे.पी.क सम्पूर्ण क्रान्तिक विरुद्ध सेहो जेलसँ बाहर अएलाक बाद लिखलन्हि यात्रीजी। यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र "यात्री" आ हिन्दीमे “नागार्जुन” क नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखैत छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”? यात्री एकटा मिथ छथि? की यात्री एकटा मिथ छथि? ओ मुख्यतः हिन्दीक लेखक रहथि, मैथिलीमे ओ हिन्दीक दशमांशो नै लिखलन्हि। जे लिखबो केलन्हि तइमे सँ बेशी स्वयं द्वारा हिन्दीसँ अनूदित। मैथिली आ मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृति हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगलै मुदा तइमे सेहो ढेर रास कमी रहै जेना एकटा उदाहरण यात्री समग्रसँ- । यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। एहेन बेमारी आनो मैथिली-हिन्दी लेखकमे छन्हि। ई ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठ, मे) वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि। मिथिला क्षेत्रक शब्दावली आ संस्कृतिक- जे हिन्दीक लोककेँ अबूझ आ तेँ रुचिगर लगैे छै- तथ्यमे ई मैथिली-हिन्दी लेखक सभ अपन अज्ञानतासँ ढेर रास गलत तथ्य पड़सि रहल छथि, साम्प्रदायिक लेखक लोकनि गोनू झाक कथामे मुस्लिम तहसीलदारक अत्याचार घोंसिया रहल छथि (मुस्लिम लोकनि मिथिलामे गोनूक समए मे रहबे नै करथि)! यात्री समग्रमे बलचनमा नै लेल गेल कारण ओ हिन्दीक कृति अछि, ओकर मैथिली अनुवाद सेहो भ्रष्ट अछि लगैए जेना अदहा अनुवाद केलाक बाद मैथिली लेल हुनका लग समयाभाव भऽ गेल होइन्ह। यात्री समग्रमे नवतुरिया लेल गेल, ओहो मूल हिन्दी अछि, किए मूल मैथिली कहि कऽ लेल गेल तकर जबाब सम्पादक देताह। मैथिलीमे प्रूफ रीडरकेँ सम्पादक कहेबाक सख छन्हि आ लोक ग्रियर्सन धरिक रचनाक रिप्रिन्ट अपन सम्पादकत्वमे करबा रहल छथि। एकटा दोसर उदाहरणमे पी.सी.रायचौधुरीक दरभंगा जिला गजेटियरक तेसर अध्यायक चारिटा उपशीर्षकक अंग्रेजी रचनाकेँ मोहन भारद्वाज अपन सम्पादकत्वमे रमानाथ झा रचनावलीमे -किनको कहलासँ सत्य मानि- रमानाथ झाक रचना मानि घोसिया देलन्हि, जखन की लिखित आ वैयाकरणिक शिल्पक आधारपर ओ रचना पी.सी.रायचौधुरीक अछि। यात्री स्वयं कहै छथि जे ओ मैथिली बलचनमा पहिने लिखलन्हि आ तकर हिन्दीमे अनुवाद केलन्हि। मुदा हिन्दी बलचनमामे ओ ई नै लिखै छथि आ ओकरा हिन्दीक पहिल आंचलिक उपन्यास कहै छथि। ई बेमारी आइयो मैथिलीक लेखककेँ गरोसने अछि आ यात्री जीक ऐ मे सायास-अनायास योगदान दुखदायी अछि। राजकमल यात्रीकेँ अमर-सुमन सन पुरान ढर्राक कवि कहै छथि, प्रायः यात्रीक छन्दक प्रति सजगतासँ राजकमलकेँ ई भ्रम भेल छलन्हि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जइ रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होइत अछि जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत आ प्रायोगिक मार्क्सवादपर कताक दशक चलत। आ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता पीतारुर्णेः पल्लवैः हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता दूरे द्विरेफाः स्ता यैशसण्डलकेलिकानन कथा विस्मरिता भूतले छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥ -बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकालक भ्रममे भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहारकेँ जे पृथ्वीपर बिसरा दैत अछि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत जकर डोलब अछि चंचल आ तरल। ओइ चिनारकेँ हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़। ~~~~~~~~~~~ हिन्दी आ मैथिली आ साहित्यिक शब्दावली हिन्दी जै हिसाबे अपन भूगोल बढेलक अछि ओइ हिसाबे ओकर शब्दावली नै बढ़ल छैक,से हिन्दीसँ डरबाक कोनो प्रश्ने नै। हिन्दीक साम्राज्यवाद अंग्रीजीक साम्राज्यवादक स्थान लऽ लेने अछि आ से सभ हिन्दी दिवसपर छोट भाषाकेँ गिरबाक ओकर प्रवृत्तिपर बहस नै रोकल जा सकत। लैटिन/दक्षिण अमेरिकाक सभटा मूल भाषा खतम भऽ गेल आ ओकर स्थान स्पेनिश आ पोर्तूगीज लेलक। स्पेन अजटेक सभ्यताकेँ खतम केलक, ओकर सभ चेन्हासी मेटा देलक, मुदा मेक्सिको तकर पश्चातापमे विश्वकप फुटबॉलक आयोजन लेल जे स्टेडियम बनेलक तकर नाम अजटेक स्टेडियम रखलक। डेनमार्कक शब्दकोष बड विस्तृत छै, प्रायः २३ वोल्यूम सँ बेशीमे छै, आप्रवासी प्रायः ओकर नागरिकता लेल लै जाएबला परीक्षामे डेनिस भाषामे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, एकटा महिला जे डेनिससँ विवाह केने रहथि हुनकर बच्चा डेनमार्कक नागरिक भऽ गेल मुदा ओ कहलन्हि जे भाषा पेपर बड्ड कठिन छै, डेनिस सेहो ओइमे अनुत्तीर्ण भऽ जाइ छथि, जनसंख्या वा क्षेत्रफलक छोट रहब डेनिस वोकाबुलेरी लेल हानिकारक नै भेलै। साहित्यकक मूल सरोकार अछि विषय-वस्तुसँ। मुदा शब्दक अकाल जँ साहित्यकारेक मध्य रहत तँ ओ की संप्रेषण करताह, विषय-वस्तुकेँ कोना फरिछा पेताह। जे हाल हिन्दी साहित्यक अछि सएह मैथिलीक भऽ जाएत। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, संस्कृतिसँ दूर प्रवासी द्वारा बाजल जाएबला शब्दावली नै। शब्दावलीक ग्राह्यता नेटिव स्पीकरक गाममे बाजल जाएबला शब्दावली निर्धारित करत, आ जँ संस्कृतिसँ कटल प्रवासी द्वारा बाजल शब्दावलीकेँ आधारभूत बनाएब तँ नीक साहित्य कोड़ि कऽ निकालल बुझाएत आ गोलैसी आधारित समीक्षकक समीक्षित साहित्य नेचुरल बुझाएत। शास्त्रीय अनुशासन लेखक लेल अछि, पाठक लेल नै। लेखक जँ गजल, रोला, दोहा, कुण्डलिया शास्त्रीय आधारपर लिखताह तखने पाठककेँ नीक लगतै, जँ लेखक मेहनतिसँ दूर भगताह तँ साहित्यिक पाठकीयता घटत। शास्त्रक बान्ह तोड़बाक विधि सेहो शास्त्रक मध्य छैक, सावित्री मंत्र जँ शास्त्रीय कट्टरतासँ देखी तँ ओ गायत्री छन्दमे नै छै, मुदा हम सभ ओकरा गायत्रीमे मानै छी कारण गणना पुरेबालेल स्वः केँ सुवः कएल गेलै। दरभंगाक मजहर इमामकेँ "पिछले मौसम का फूल"पर उर्दू लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल गेल। ऐ संग्रहमे गजल (बहरयुक्त) ५५ टा आ आजाद गजल (बे-बहर) ३ टा छै, मुदा पाठक हुनका गजल लेल मोन राखने छन्हि, ओकरा मतलब नै छै जे, जे गजल ओकरा नीक लगलै से बहरमे छै वा नै, ओकरा तँ नीक लगलै। आ की ई संयोग छी जे बहरयुक्त गजले ओकरा नीक लगलै? लेखकक आइडियोलोजी पानिमे नून सन हेबाक चाही, पानिमे तेल सन नै आ ऐपर हम पहिनहियो लिखने छी। यात्री आ धूमकेतुकेँ कम्यूनिस्ट पार्टीक सोंगरक आवश्यकता पड़लन्हि कारण वामपंथ “नीक सेन्ट” आ “डिजाइनर वीयर”क भाँति हिनका सभ लेल फैशन छल, से बलचनमा कांग्रेस आ समाजवादी पार्टीसँ हटलाक बाद कम्यूनिस्ट आ लालझंडामे सभ समस्याक समाधान तकैए, ओकरा यात्रीजी सभ समाधान ओइमे दै छथिन्ह। धूमकेतुक पात्र लेल सेहो लाल झंडा लक्षमण बूटी अछि। मुदा ई लोकनि कम्यूनिस्ट मूवमेन्टसँ -फैशनक अतिरिक्त- जुड़ल नै छथि तेँ हिनकर साहित्यमे आइडियोलोजी तेल सन सहसह करैए। आब आउ चतुरानन्द मिश्र आ जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यपर। चतुरानन्द मिश्रक उपन्यासमे वा जगदीश प्रसाद मण्डलक मैथिली साहित्यमे कतौ लालझंडा वा कम्यूनिस्ट पार्टीक चर्च अहाँ देखने छी? एतए जे भेटत से अछि असल वामपंथी द्वन्दात्मक पद्धति, जीवनपर विश्वास, माने आइडियोलोजी नूनसन मिलल। आ की ई मात्र संयोग अछि जे चतुरानन्द मिश्र जीवनक प्रारम्भमे साहित्य लिखै छथि आ जगदीश प्रसाद मण्डल जीवनक उत्तरार्धमे, अन्तिम केस खतम भेलाक बाद? जगदीश प्रसाद मण्डलक गाम बेरमाक जमीन्दार ठाकुर जी हमर पितयौत भाइकेँ कहलखिन्ह जे जगदीश प्रसाद मण्डल सत्य हरिश्चन्द्र छथि, हमर गामक गौरव छथि। आ से तखन, जखन जगदीश प्रसाद मण्डल कम्यूनिस्ट मूवमेन्टक नेतृत्व केलन्हि दसो बेर जेल गेलाह, केस हुनके सभसँ लड़लन्हि आ तकर परिणाम भेल जे बेरमामे आइ दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै छै। आइयो ओ फूसक घरमे रहै छथि आ तीन बजे उठि कऽ डिबिया लेस कऽ मैथिली साहित्य लिखै छथि आ हुनकर बेटा हुनका आइ धरि लिखैत नै देखने छथिन्ह, जे कखन ओ लिखै छथि, भोगेन्द्र झाक नेतृत्वमे ओ प्रण लेने रहथि जे जखन बाजब, सभ मैथिलीमे बाजब। से हुनकर बेटा हुनका मैथिलीक अतिरिक्त दोसर भाषा बजैत नै सुनने छथिन्ह। आ सएह कारण अछि जे हुनकर विषय-वस्तु नवीन होइत अछि, हुनकर शब्दावली नेटिव स्पीकरक शब्दावली अछि, जे ओइ विषय-वस्तुकेँ फरिछेबामे सफल होइत अछि आ आवश्यक अछि। हुनकर लोक, हुनकर गाछ-बृच्छ, हुनकर फूलपात, हुनकर खेत खलिहान असल अछि, जमीनी अछि, पतालसँ कोड़ि कऽ निकालल नै। आ हुनकासँ प्रेरणा लऽ प्रवासमे रहनिहार नव साहित्यकार मैथिली लिखबासँ पहिने मिथिलाक इतिहास-भूगोल आ संस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करथु, तखने हुनकर साहित्य फराक भऽ सकतन्हि। ऐ लिंकसँ राधाकृष्ण चौधरीक “मिथिलाक इतिहास” आ जगदीश प्रसाद मण्डलक “गामक जिनगी” पढ़ू http://www.videha.co.in/archive.htmआ मैथिली शब्दावली लेल ई लिंक देखू http://www.videha.co.in/archive.htm बेरमाक ठाकुरजी सन लोकक विचार हमरा लेल बेशी महत्व राखैए,बनिस्पत गोलैसी केनिहार साहित्यकारक/ समीक्षकक जिनकर आयातित शब्दावलीबला साहित्य कोना मैथिली पाठक घटेलकै; आ खाँटी शब्दावली कोना मैथिली साहित्यक स्तर ऊँच केलकै, आ पाठक बढ़ेलकै, ई आब ककरोसँ नुकाएल नै अछि। उपन्यास लेल दू-दू बेर बूकर पुरस्कार आ साहित्यक लेल नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित जॉन मैक्सवेल कुट्सी भाषाक सन्दर्भमे कहने रहथि जे अफ्रीकान्स आ अंग्रेजी भाषाक द्विभाषिया माहौलमे हुनकर अंग्रेजी लेखन हुनका लेल बहुत रास संप्रेषण सम्बन्धी समस्या सोझाँ अनैत छल। ओ अफ्रीकान्ससँ अंग्रेजीमे तकर प्रतिकार स्वरूप ढेर रास अनुवाद केलन्हि। मुदा मैथिलीक साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता (आ किछु ऐ पुरस्कार लेल ललाइत आकांक्षी लोकनि), जे तथाकथित साहित्यकार लोकनि छथि, से जइ प्रकारेँ मैथिली आ हिन्दी दुनूक डोरी पकड़ि माहौल खराप करबामे लागल छथि, से जॉन मैक्सवेल कुट्सीसँ किछु शिक्षा ग्रहण करताह, से मात्र आशा कऽ सकै छी। अमेरिकामे ३५० शब्दक अंग्रेजीक "हाइ प्रेक्वेन्सी" आ ३५०० "बेसिक वर्ड लिस्ट" हाइ स्कूलक छात्र लेल छै जे क्रमशः कॉलेज आ ग्रेजुएट स्कूल (ओतए पोस्ट ग्रेजुएटकेँ ग्रेजुएट स्कूल कहल जाइ छै) धरि पहुँचलापर दुगुना (गएर भाषा फेकल्टीक छात्र लेल) भऽ जाइ छै। साहित्यक विद्यार्थी/ साहित्यकार लेल ऐ सँ दस गुणा अपेक्षित होइत अछि। हिन्दीमे -अपवाद स्वरूप आंचलिक पोथी छोड़ि- हिन्दीक कवि आ उपन्यासकार अठमा वर्गक २००० शब्दक शब्दावलीसँ साहित्य (पद्य, उपन्यास) रचै छथि आ मैथिलीक किछु साहित्यकार ऐ बेसिक २००० शब्दक वर्ड लिस्टकेँ मैथिलीमे आयात करए चाहै छथि, आ ओतबे धरि सीमित रहए चाहै छथि, जखन जापानी अल्फाबेटक चेन्ह ५०० धरि पहुँचि जाइ छै। अन्तर्जाल आ मैथिली साहित्य आन्दोलन: मैथिलीपर भऽ रहल अन्तर्जालीय सम्वाद कखनो काल जातिगत स्वरूप लऽ लैत अछि, लोक जोर-जोरसँ चिकड़ऽ लागै छथि आ सम्वादकेँ रोकऽ चाहै छथि। मैथिलीकेँ मारि कऽ पारि दैबला सभ मैथिली मरि जाएत डिसकसन छोड़ि दियौ, सम्वाद बन्न करू, करए लगैत छथि। किछु प्रमुख सम्वाद जे अन्तर्जालपर ऐ बीच चर्चामे रहल: साहित्यिक वर्णसंकरता आ हिन्दीक प्रश्न: आशीष अनचिन्हार मैथिली आ हिन्दी दुनूमे लिखैबला खास कऽ दुनूमे एक्के बौस्तुकेँ मौलिक कहि लिखैबलाक खिलाफ एकटा बहसक आरम्भ केलन्हि। मूल रूपमे ई मुद्दा किरणजीक छियन्हि। सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह “बनैत बिगड़ैत” क आमुखमे हमहूँ ई मुद्दा उठेने छी। एकर बहसमे विनीत उत्पल सम्बन्धित रचनाकार सभकेँ ऐ पर अपन स्थिति स्पष्ट करबा लेल कहलन्हि। अविनाश दास कहलन्हि जे मुद्दा तँ सही अछि मुदा घृणा आ आक्रोशसँ उठाएल गेल अछि, ओ ऐ नाम सभमे यात्रीजी आ तारानन्द वियोगीकेँ छोड़बाक आग्रह केलन्हि आ कहलन्हि जे ई सभ प्रतिभाक बलसँ हिन्दी-मैथिलीमे आवाजाही करबामे निपुण छथि। हुनकर ईहो धारणा छल जे अमर आ सुमनक कविता दब अछि आ ओइसँ थोथा चनाक अबाज अबैए। आशीष अनचिन्हार कहलन्हि जे तखन हिन्दीक सेहो सभ छन्दोबद्ध रचनाकेँ खारिज करए पड़त। मुदा तइपर बकथोथी शुरू भऽ गेल। गप घुमैत-घुमैत पहुँचल आ अविनाश कहलन्हि जे अनुवाद-मौलिकता कोनो चीज नै होइ छै। ओइपर हम अपन विचार देलौं जे अनुवादमे किछु कमी होइ छै भलहि ओ अनुवाद स्वयं द्वारा किए नै कएल गेल हुअए। हिन्दीक पाठककेँ ई अधिकार बनै छै जे ओकरा कहल जाए जे ओ हिन्दीमे मौलिक रचना पढ़ि रहल अछि आकि मैथिलीसँ हिन्दीमे कएल अनुवाद। तहिना मैथिलीक पाठककेँ सेहो ई हक बनै छै जे ओकरा कहल जाए जे ओ मूल मैथिली पढ़ि रहल अछि वा हिन्दीसँ मैथिलीमे कएल अनुवाद। अविनाश ऐपर कहलन्हि जे अहाँ जै भाषा (मैथिली) क पाठकक हकक गप कऽ रहल छी ओतए पाठकक संख्या कतेक छै, १०, १००, १०००...। तकर बाद बहस बढ़ैत गेल आ अविनाश जी अनचिन्हारजी केँ कहलन्हि जे जखन तर्क खोखला भऽ जाइए तँ व्यक्तिगत आक्षेप बढ़ऽ लगैए आ ऐ मामिलामे अहाँ आ हम दुनू कमीना छी। बादमे अविनाशक गपक जवाब दैत हम लिखलौं जे ई महानुभाव मैथिलीमे पाठकक संख्यापर गप उठेने छथि आ गनती १० सँ शुरू केने छथि तिनका हम कहऽ चाहै छी जे प्रिंट आ पी.डी.एफ.क तँ गप छोड़ू, हमर उपन्यास सहस्रबाढ़निक ब्रेल संस्करणक पाठक तीन संख्यामे छथि। तकर बाद तारानन्द वियोगी जीक हिन्दीमे रंग-तरंग आ अभद्र भाषा (रे-रे सम्बोधित कएल भाषा) मे पोस्ट दोसर ठाम आएल (विदेहक फेसबुक चौबटियापर) आ अपनाकेँ ओ गएर-मैथिल घोषित कएलन्हि आ सम्वेदनाक गप उठेलन्हि। ओइपर एकटा पाठक हुनका लेल मैथिलीक उपयोगिता पुरस्कार पएबा धरि सीमित बतेलन्हि तँ दोसर पाठक हुनकर सम्वेदनाक स्वरकेँ फूसि बतेलन्हि आ हुनका अपन “समय साल” मे पठाओल लेखक विषयमे मोन पाड़लन्हि जकर चर्चा बहुत दिन धरि मैथिली साहित्य मध्य चलैत रहल छल- ऐ लेखमे ओ विभूति आनन्दकेँ मैथिलीक मूल साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाकेँ सान्त्वना पुरस्कार बतेने रहथि कारण ओइ बर्ख हुनकर जवान बेटाक मृत्यु भऽ गेल छलन्हि। ई पाठक वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे तखन की अहाँक सम्वेदनाकेँ लकवा मारि गेल छल। एकटा पाठक प्रश्नक जवाबमे श्रीधरम कहलन्हि जे जाइ तरहेँ मैथिलीक किछु बेटा सभ यात्रीसँ वियोगी धरिक लेखनीक मौलिकतापर प्रश्न उठेने छथि तँ ओइ स्थितिमे कियो अही तरहेँ सोचि सकैत अछि। ओ ईहो कहलन्हि जे जँ हिनका सभकेँ हटा देल जाए तँ मैथिली साहित्यमे की बचत अण्डा !! बहुत दिनक बाद सुनील कुमार मल्लिक सेहो ऐ पोस्टपर वियोगीजी सँ प्रश्न केलन्हि जे अहाँ मैथिल नै छी तँ अहाँक आइडेन्टिटी की छी? सुभाष चन्द्र मोन पाड़लन्हि जे गंगेश गुंजन कमानी ऑडिटोरियममे मैथिली लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार लैत काल कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कार दऽ देलकन्हि से ऐ तरहक लेखकक विरोध हेबाक चाही। उमेश मंडल प्रश्न उठेलन्हि जे जखन मूलो मौलिक आ अनुवादो तखन अनुवाद नाम किए भेल? विभा रानी स्वीकार केलन्हि जे हुनकर एकटा कथा मैथिली आ हिन्दी दुनूमे मौलिक अछि। ओ लिखलन्हि जे पहिने शुद्धतावादी सभक दुआरे शोलकन्ह सभ मैथिली छोड़ि चलि गेल आ आब हुनका बजाओल जा रहल अछि जेना उपकार कएल जा रहल हुअए। उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे अहाँ कएटा शोलकन्हपर पछिला २५ बर्खमे उपकार केलिऐ, अहाँक बच्चा लिखए तँ प्रतिभाशाली आ शोलकन्हक बच्चा लिखए तँ ओकरापर अहसान कएल जा रहल छै। तारानन्द वियोगी लिखलन्हि जे हुनकर “ई भेटल तँ की भेटल” हुनकर “ये पाया तो क्या पाया” क अनुवाद नै छी। वियोगीजी लिखलन्हि जे “ई भेटल तँ की भेटल” ३२ पृष्ठक पोथी अछि आ “ये पाया तो क्या पाया” १५० पृष्ठक जे २०११ धरि प्रकाशकक कृपासँ बहार नै भऽ सकल अछि। आशीष अनचिन्हार वियोगजीक कर्मधारयक फ्लैपक स्कैन लगेलन्हि जइमे “ये पाया तो क्या पाया” २००५ ई. मे प्रकाशित कहि वियोगीजी स्वयं देखेने छथि। एकटा पाठकक ई पुछलापर जे ई कोन प्रकाशक छथि आ ई १५० पृष्ठक पाण्डुलिपि हस्तलिखित छल वा टंकित आ की ओ तकर स्कैन १० दिनमे एतए दऽ सकै छथि, तकर जवाब ओ दू मासक बादो नै दऽ सकलाह। जातिक गप फेर आएल आ ईहो जे की ई संयोग अछि जे साहित्यिक वर्णशंकरताक दोषी एकोटा कर्ण कायस्थ लेखक नै छथि। काल्पनिक प्रश्नोत्तरी आधारित मैथिली समीक्षा: काल्पनिक प्रश्नोत्तरी आधारित मैथिली समीक्षा जइमे लेखक/ समीक्षक कोनो मृत लेखकसँ भेल व्यक्तिगत चर्चा जकर कोनो इतिहास ओइ मृत लेखकक लेखनीमे नै भेटैत अछि-क चर्चा करैत अछि आ अपन लेखनी/ समीक्षाकेँ मजगूत बनबैत अछि- क चर्चा भेल आ ऐ मे मोहन भारद्वाज आ तारानन्द वियोगीक चर्चा आएल। बलचनमाक धोधिक सम्बन्धमे एकटा काल्पनिक प्रश्नोत्तरीक चर्चा मोहन भारद्वाजक परिप्रेक्ष्यमे हम विदेह प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचनामे कऽ चुकल छी। आशीष अनचिन्हार “तुमि चिर सारथि” मे तारानन्द वियोगी द्वारा स्वयंकेँ दीन-हीन दलित कहबाक मामिला पकड़लन्हि कारण ओ नहिये जातिसँ दलित छथि आ महिषीक लोकक अनुसार बेस जमीन-जत्था, पाइ कौड़ीबला छथि, आशीष अनचिन्हार कहलन्हि जे ई सम्वेदना प्राप्त करबा लेल झूठ तथ्यक प्रयोग अछि। दोसर तथ्य जे ओ अही पोथीसँ उठेलन्हि से छल काल्पनिक प्रश्नोत्तरीबला जइमे वियोगीजी लिखलन्हि जे यात्री जी अविवाहित मातृत्वक पक्षमे छलाह, ई हुनका यात्रीजी कहने छलखिन्ह !! यात्रीजीक स्वयं कएल लेखन एकर पक्षमे नै अछि। एहेने तरहक एकटा अमेरिकीक फेक संस्मरण आएल छल जइमे ओ अपनाकेँ तालिबानी द्वारा पकड़ल जएबाक आ प्रतारणा सहबाक चर्च केने छल, करोड़ों टाका जखन ओ पोथी कमा लेलक तखन एक्सपोजे आएल जइमे सिद्ध कएल गेल छलै जे ऐ तरहक किछु भेले नै छलै आ अफगानिस्तानक ओ गौँवा सभ जतए ओ व्यक्ति आपदाक बाद शरण लेने छल, ओतए ओइ व्यक्तिक नीक सेवा कएने छल। गोविन्द झाक मादेँ अजित आजाद लिखलन्हि जे ओ दुखी छथि जे नव लोक हुनकासँ सलाह नै लैत अछि तँ प्रकाश झा लिखलन्हि जे बड्ड जल्दी हुनका नव लोक मोन पड़ि गेल छन्हि, एहेने हालत ओइ सभ गोटेक हेतन्हि जे नव पीढ़ीक अवहेलना करत। आशीष अनचिन्हार प्रकाश झाकेँ मोन पाड़लखिन्ह जे मैथिली-भोजपुरी अकादेमीक बहन्ने ओ शेफालिका वर्मा आ गंगेश गुंजनपर अनर्गल आरोप किए लगेलन्हि। प्रकाश झा कहलखिन्ह जे ओ आशीष अनचिन्हरकेँ सेमीनारमे नै बजाओल गेलन्हि आ गौरीनाथकेँ सेहो आइ धरि नै बजाओल गेलन्हि, तेँ ओ ई प्रश्न उठेने रहथि। तइपर आशीष अनचिन्हार कहलखिन्ह जे महिला दिवसपर जखन सभ महिलाकेँ बजाओल गेल रहन्हि तखन ओ आ गौरीनाथ की करए जैतथि आ आशीष अनचिन्हार प्रकाश झाकेँ ईहो मोन पाड़लखिन्ह जे ओ अपन अनियमित पत्रिकाक माध्यमसँ छद्मनामसँ गौरीनाथकेँ जे विकट-विकट गारि पढ़ने छलखिन्ह से गौरीनाथकेँ मोने हेतन्हि। शेफालिका वर्मा आ गंगेश गुंजनक हुनका द्वारा पूर्वमे फज्झति करबाक तथ्य सेहो फेर सोझाँ आएल। वियोगीजी सम्वाद बन्न करबाक आग्रह केलन्हि आ कहलन्हि जे गोविन्द झा ठीके कहने छलाह जे मैथिली (मैथिली साहित्य) ३०-४० सालमे मरि जाएत। राधाकृष्ण चौधरी जीक “अ सर्वे ऑफ मैथिली लिटरेचर” विदेहक सौजन्यसँ श्रुति प्रकाशनसँ आएल आ ओइपर दूटा टिप्पणी सेहो आएल। विभूति आनन्द अपन “भाषा टीका” मे लिखै छथि जे ऐ पोथीक आमुखमे राधाकृष्ण चौधरी जै जतियारेक गप करै छथि ई पोथी तइसँ गछारल अछि। भीमनाथ झा अन्यत्र राधाकृष्ण चौधरीजीपर पोथीक आमुखमे लिखै छथि जे इतिहासमे सभ हरही-सुरहीक चर्चा नै हेबाक चाही, से मुदा राधाकृष्ण चौधरीक ऐ पोथीमे भेल अछि। मुदा विभूति आनन्द आ भीमनाथ झा ऐ सन्दर्भमे देल अपन-अपन एक पाँतीक निर्णयक पक्षमे कोनो उदाहरण नै देलन्हि। धनाकर ठाकुर चर्चा करै छथि जे मैथिलीकेँ पाइ कमेबाक आधार बनाबएबला लोक सभ हुनकर मिथिला राज्यक समर्थन नै करै छथि आ हुनकर ऐ सम्बन्धमे मेल पठेबापर अभद्र मेलसँ प्रत्युत्तर दैत छथि। ओ विदेहपर साहित्य अकादेमी पुरस्कार लेल वोटिंग करेबाक विरोध केलनि आ उमेश मण्डल केँ लिखलन्हि जे अहाँ सभ जे मेहनतिक महल ठाढ़ केने छी तइमे संस्था सभक सेहो योगदान छै। उमेशजी जवाब देलखिन्ह जे ई वोटिंग अगिलो सालसँ जारी रहत आ एकर प्रक्रिया एकरा प्रतिष्ठित बनेने छै आ तकरा अभिलेखित कएल जाएत जखन राधाकृष्ण चौधरी जीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक दोसर भाग (लेखक- गजेन्द्र ठाकुर) मे ई वर्णित हएत, जइपर हम अपन सहमति देखेलौं। उमेश मण्डल ईहो लिखलन्हि जे मेहनतिक जे महल ठाढ़ भेल छै तइमे संस्था सभक कोनो योगदान नै भेटल छै (जातिवादी तत्वक संस्था सभक विरोध अबस्स भेटल छै) आ ने संस्था सभक भविष्यमे कोनो योगदान लेल जेतै। धनाकर ठाकुर कहलन्हि जे रमानन्द झा “रमण”, देवशंकर नवीन आ प्रकाश झा विदेहमे प्रकाशित छथि आ से हिनका लोकनिसँ हम गप करी जे ओ लोकनि किए मैथिली-मैथिली करै छथि आ मिथिला राज्यक मेलक विरोध करै छथि। चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”क सौभाग्य मिथिलामे मिथिला राज्यक विरोधक चर्चा करैत ओ कहलन्हि जे ऐ तरहक मैथिली साहित्यकारक बहिष्कार हेबाक चाही। देवशंकर नवीन हुनका लिखने छलखिन्ह जे अहाँक माथमे गोबर भरल अछि आ जँ अहाँ मेल फेर पठाएब तँ अहाँकेँ हम लीगल नोटिस पठाएब, प्रकाश झा लिखलखिन्ह जे हम बाज छी ऐ समाज सेवासँ, हमर ई-मेलकेँ माफ कएल जाए। रमानन्द झा “रमण” अपन ई-मेलकेँ हुनकर मेलिंग लिस्टसँ हटेबाक मांग केलखिन्ह। हम हुनका कहलियन्हि जे अहाँ स्वयं हुनका सभसँ ई-पत्र वा टेलीफोनपर गप करू। जे कियो इन्टरनेट वा ई-पत्रपर छथि भलहि विदेहपर ई-प्रकाशित छथि, अपन जिम्मेवारी हुनकर सभक अपन छन्हि। धनाकर ठाकुर उमेश मंडलकेँ ईहो लिखने रहथिन्ह जे अपन बड़ाइ अपने नै करू दोसर लोक करत, हुनका ईहो शंका रहन्हि जे विदेहसँ जुड़ल लोक हुनकर विकीपीडियाक संशोधनकेँ हटा देलक, बादमे देखलापर पता चलल जे कियो गोटे (आब स्वीकारोक्तिक बाद सिद्ध भेल जे ई धनाकरजी छलाह) हिनका द्वारा कुणालक बादक सभ लेखक, जइमे जगदीश प्रसाद मण्डल आ तारानन्द वियोगी सहित ढेर रास लेखकक नाम छल, क नाम जे ई हटा देलन्हि, केँ रेस्टोर कऽ देलक। संगमे हिनका द्वारा ई तथ्य सभ जे मैथिलीसँ हिन्दी आ बांग्ला निकलल आ मैथिली भाषीक जनसंख्या सम्बन्धी अपुष्ट जानकारी, यूरोप स्थित विकीपीडियाक एडमिन द्वारा हटा देल गेल। जँ ई सभ विदेहसँ जुड़ल लोक छथि तँ बुझू जे मैथिलीक सुदिन आबि गेल। ईरानक एकटा राजा शतरंजक एकटा खिलाड़ीकेँ खुश भऽ कहलखिन्ह जे मांगू की मांगै छी। ओ शतरंजक पहिल घरमे एकक, दोसरमे दूक; आ एहिना एक्सपोनेन्सियल रूपेँ ६४म घरमे तकर एक्सपोनेन्शियल जतेक चाउरक दाना हएत ततेकक चाउरक दानाक मांग केलन्हि। राजा बुझलन्हि जे ई मात्र दू चारि पट्टा हेतै आर कतेक हेतै। मुदा हुनका बताओल गेलन्हि जे ई ततेक हेतै जे हुनकर राज्यक समस्त चाउरक उत्पाद सेहो पूर नै कऽ सकत तँ राजा लज्जित भेलाह। धनाकर जी सेहो विदेहमे छपल छथि आ विदेहक पाठक सेहो छथि, ओइ हिसाबे ओहो विदेहसँ जुड़ल छथि। “विदेहसँ जुड़ल लोक” एक्सपोनेन्सियल रूपेँ बढ़ि रहल छथि आ ई किछु गोटे लेल बुझौअलि बनि गेल अछि। उमेश मण्डल आ प्रकाश झा (आ मुकेश झा सेहो):- मैथिली विकीपीडियामे उमेश मण्डलजीक योगदान किछु लोककेँ नै अरघलनि आ प्रत्यक्ष रूपेँ नै अप्रत्यक्ष रूपेँ ओ लोकनि रोष प्रकट केलन्हि। जखन भाभा एटोमिक रिसर्च सेन्टरक राधामोहन चौधरी कहलन्हि जे बंगलोर, हैदराबाद आ सिएटलमे रहनिहार मैथिल लेल मैथिली टाइमपास छिऐ मुदा उमेश मण्डलजी निर्मलीमे रहि जे काज केलन्हि अछि से मैथिलीक प्रति हुनकर समर्पण देखबैए तँ प्रकाश झा लिखलन्हि जे उमेशजीक बड़ाइ करबाक बहन्ने बंगलोर, हैदराबाद आ सिएटलमे रहनिहार मैथिलक बुराइ नै करबाक चाही। ओ ईहो कहलन्हि जे विकीपीडिया लेल जे लोक काज करैए से अपन ऑफिसक कम्प्यूटरसँ आ ओइसँ ऑफिसक काज हर्जा होइ छै। ओ ईहो लिखलन्हि जे अही सभ दुआरे ई लोकनि मैथिली साहित्यसँ दूर भऽ जाइ छथि आ ओ अपनो विषयमे कहलन्हि जे पाँच साल पहिने अंतिकामे छपल कथाक बाद अही सभ कारणसँ ओ मैथिली कथा लिखनाइ छोड़ि देलखिन्ह आ अही सभ कारणसँ ओ आब मैथिली नाटक सेहो छोड़ि देताह। ऐपर पाठक लोकनि कहलन्हि जे छोड़निहार आ छोड़बेनिहार सभ एक्के जातिक (ब्राह्मण) छथि आ उमेश मण्डल वा कियो आन जातिक लोक ओइ राजनीतिमे शामिल नै हेताह, तखन ई द्वेष किएक? आशीष अनचिन्हार लिखलन्हि जे प्रकाशजी अहाँक कथा छोड़लाक बाद मैथिली कथा आर आगाँ बढ़लैक आ अहाँ द्वारा नाटक छोड़लाक बाद नाटक आर आगाँ बढ़तैक, ओ अपनाकेँ प्रकाशजी द्वारा ग्रुपसँ हटेबाक सेहो विरोध केलन्हि आ कहलन्हि जे हुनकर विचार प्रकाश जी सँ हटि कऽ भऽ सकैए, उग्र भऽ सकैए, मुदा हुनका जकाँ जातिवादी आ ग्रुपवादी विचारक ओ नै छथि। अजित आजाद सेहो प्रकाशजी द्वारा आशीष अनचिन्हारकेँ रजिस्टरसँ हटेबाक विरोध केलन्हि आ कहलन्हि जे आशीष अनचिन्हारक विचारसँ सहमति-असहमति भऽ सकैए मुदा हुनका रजिस्टरसँ हटेबाक ओ विरोध करै छथि आ आहत छथि। उमेश मण्डल जातिवादक परिभाषा देलन्हि जे जातिवाद एकटा जातियोकेँ संग लऽ कऽ नै चलैए आ मात्र जाति मध्य एकटा समूहकेँ संग लऽ चलैए, आ ऐ मे दोसर जातिक सेहो एकटा छोट समूह मौद्रिक आ अन्य लाभ लेल शामिल रहैए, संगे जातिवाद नारीविरोधी सेहो अछि। ओ प्रकाश जीकेँ कहलन्हि जे हुनका (उमेशजीकेँ) नै तँ कोनो सरकारी नोकरी छन्हि आ नहिये कोनो प्राइवेट नोकरी, से कोनो कार्यालयक कम्प्यूटर हुनका नै पइड़ लागल छन्हि, आ जे प्रकाशजीकेँ कथा-नाटक सभ लिखबासँ रोकने छन्हि ओइ समूह सभक संग प्रकाशजी तखन किए छथि? बादमे ई तथ्य सोझाँ आएल जे उन्टे प्रकाशजी अपन ऑफिसक कम्प्यूटरसँ प्रकाश आ मुकेशक नामसँ काज करै छथि आ सम्भावना बनैत अछि जे चाहे तँ मुकेशक आइ.डी.क प्रयोग ओ करै छथि वा मुकेश झा सेहो हुनकर ऑफिसक कम्प्यूटरसँ कार्यकालमे फेसबुकपर लॉग-इन करै छथि। उमेशजी ईहो मोन पाड़लन्हि जे “मिथिला दर्शन” मे रामभरोस कापड़ि भ्रमरक विद्वतापूर्ण आलेखमे मलंगिया जीक प्रति कएल किछु टिप्पणीक विरोध मुकेश झाक पत्र द्वारा मिथिला दर्शनमे भेल छल से ऐ घटनाक बाद ई सम्भावना भऽ सकैए जे ओहो प्रकाशजी वा ककरो आनक कहलापर तँ नै पठबाओल गेल। मैथिली पत्रिका सभमे पाठकीय पत्रक घृणित राजनीतिपर सेहो चर्चा भेल। उमेश मण्डल विदेहसँ जुड़ल लोकक लिस्ट देलन्हि जइमे कतेको देश-विदेशक मैथिली भाषी कम्प्यूटर वैज्ञानिकक नाम छल जे अपना-अपना ढङे मैथिली लेल काज कऽ रहल छथि। मैथिली गजल: गजलपर हमर आलेख तेरह खण्डमे आएल जे बेस चर्चामे रहल। मैथिलीक कथित गजलकार लोकनिक छन्द आ बहरक अज्ञानता मैथिली गजलक विकासमे बाधक भेल, बुझू जे लोकवेद आ लालकिलावाद मे संकलित सभ रचना गजलक परिभाषासँ बाहर अछि। मायानन्द मिश्र आ गंगेश गुंजन ऐ समस्यासँ परिचित रहथि मुदा कोनो समाधान नै ताकि सकलाह आ मायानन्द मिश्र गीतल कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि पलायनक रस्ता चुनलन्हि। श्रीधरमक पुरान कमेन्ट जे साहित्यिक वर्णसंकरताक सम्बन्धमे छल ओतए तँ नै मुदा एतए लागू होइत अछि, मैथिली गजलमे की बचल अण्डा! ठीके अण्डे बचल। आ एतएसँ नव आस जागल जखन सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार सरल वार्णिक छन्दमे अपन अ-छन्दोबद्ध गजलकेँ पुनर्लेखित केलन्हि। हमर ई अनुभव रहल अछि जे कम्प्यूटर लेल जँ कोनो प्रोग्राम बनाएल जाए आ ओ गड़बड़ भऽ जाए तँ कतबो सेक्यूरिटी आ अपडेट पैच देल जाए ओइमे कमी रहिये जाइ छै आ मेहनति सेहो बेसी पड़ै छै। ऐ सँ सुविधा आ कम मेहनति नव प्रोग्राम बनेबामे होइ छै। मैथिलीक जर्जर विधा आ संस्था सभक जँ सुधार नै हुअए तँ हमरा सभकेँ ऐ सभक बदलामे एकटा समानान्तर ढाँचा बनबए पड़त आ विश्वास करू जे ओ बेसी कारगर हएत आ ओइमे कम मेहनति लागत। बेचा ठाकुर: बेचन ठाकुरक नामकेँ प्रकाश झा द्वारा बेचा ठाकुर लिखबाक सेहो विरोध भेल। एकटा पाठक लिखलन्हि जे ई टाइपिंग गल्ती भऽ सकैए, तइपर उमेश मण्डल लिखलन्हि जे ई हुनके कहऽ दियन्हु कारण शब्द जालसँ सेहो लोक आक्रमण कऽ रहल छथि। ओ बेचन ठाकुरक नाटकक प्रकाश झा द्वारा डिलीट करबाक चर्चा केलन्हि। गंगेश गुंजनक उपन्यास माहुरबोनक पाण्डुलिपिक मिथिला मिहिर कार्यालयसँ आ लक्ष्मीनाथ झाक पाण्डुलिपिक मैथिली अकादेमी कार्यालयसँ लुप्त हेबाक चर्चा भेल। डॉ. फॉस्टस नाटकक लेखक चार्ल्स मार्लोवेक चर्चा भेल जे सेक्सपीयरसँ सम्भवतः बेशी प्रतिभाशाली रहथि मुदा हुनकर हत्या २९ बर्खक अवस्थामे कऽ देल गेलन्हि, बेचन ठाकुरक नाटकक डिलीट कएल जाएब आ हुनकर नाम बेचा ठाकुर लिखल जाएब आ टाइपिंग मिस्टेक भेल सेहो स्वीकार नै कएल जाएबकेँ ओ बेचन ठाकुरक नाटकक साहित्यिक हत्याक प्रयास कहलन्हि। ऐ सन्दर्भमे ओ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक चर्चा केलन्हि आ कहलन्हि जे ई विद्यापति आ चन्दा झाक बाद मैथिलीक तेसर पुनर्जागरण काल छी जे अगिला २०-३० साल धरि चलत आ जँ विदेह नै रहैत तँ जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुरक साहित्यिक हत्या भऽ गेल रहैत। बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सभक मोन तँ मोहनहिये छल, हिनकर विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू कऽ देने अछि। मुकेश झा लिखलन्हि जे हुनकर कोनो संस्था नटरंग नामसँ छन्हि जे रंगमचक मंचनक लेखा-जोखा रखैत अछि, तकरा लग बेचन ठाकुरजी द्वारा नाटकक मंचनक कोनो सूचना नै छै, तँ बेचन ठाकुर हुनकासँ प्रश्न केलकन्हि जे ई कोनो एन.जी.ओ. छिऐ की, कारण एकर नाम आइ पहिले बेर सोझाँ आएल अछि आ ऐ तरहक एन.जी.ओ. सभ गली-गलीमे खुजल अछि आ तेँ ऐ तरहक संस्था कागजी आ पॉकेट संस्था सभक डेटापर कियो विश्वास नै करैत अछि। जखन प्रकाश झा अपन सर्वेक्षण शुरू केलन्हि जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आंगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान, आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिये रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम त चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बल पर सौंसे भारतीय साहित्य मे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करता? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस साल मे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर ! किछु कारण अछि । सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि । सभहक अपन अपन मनतव्य छनि । मुदा अँग्रेजी मे एकटा कहाबत अछि । सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट.... । जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैत छैथि यैह हमरा लेल जीवन दायी अछि ।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलन्हि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहि पर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषा मे किछु एहन रचना होइ छै जे 'क्लासिक्स' के कोटि मे अबै छै। । (से मैथिलियो मे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबर मे राखल जाइ छै। एहि लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिय' जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृति मे आम तौर पर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा 'खास' तौर पर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृति मे तं से चलन छैके।" तइपर उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखन सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छलन्हि आ से पुनः सिद्ध भेल जखन बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलन्हि। एना किए भेल? जखन प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुर्सीपर पएर लटका कऽ बैसथि आ गप छाँटथि तकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ ९० प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखन संजय चौधरी मलंगियेक नाटक करै छथि तँ ९० प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ लऽ नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दू जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइमे सुधारले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। एकटा पाठक प्रश्न केलखिन्ह जे जँ मुकेश झाक नटरंग संस्थाकेँ नटवरलाल रंग कहल जाए तँ सेहो प्रकाश/ मुकेशकेँ स्वीकार्य हेतन्हि? प्रकाशजी उमेश मंडलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ २००८ मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम नाम सुनने रहियन्हि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर २-३ मिनटक फोनपर गप अछि आ २-३ बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर भेँट जखन उमेश मंडल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियन्हि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि। वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक सम्वाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करताह आ "मेडियोक्रिटी"सँ बाहर बहरेताह तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तन्हि। टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै। मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएक टा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" आएल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करताह आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनिक पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जड़ा क' कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सभक, जे बेसी (९५ प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, तकर वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सभक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही। जखन हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छलहुँ तँ ओतए अभिनय केनिहार सभक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जकरा लेना-देना छै तकरा अहाँ बारने छी, तँ की हएत? जखन हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छलाह तँ से आ जखन ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छलाह से, दुनू मे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि। संगहि जे लिस्ट गनाओल जाइत अछि, तैमे खतबे जी कतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ २०० लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा कऽ करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम.२ मे देल जाएत। नाटक “अधिकार” इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला (आ अभिषेक बच्चनसँ झंझारपुरमे पुरस्कार पाबैबला) असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छलन्हि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भऽ गेल अछि। उपेन्द्र भगत नागवंशी आ मैथिलीमे फील्डवर्क- ऐतिहासिक कृतघ्नताक प्रश्न: महेन्द्र मलंगिया जे काज जनकपुरमे कऽ रहल छलाह से काज उपेन्द्र भगत नागवंशी ओतए आइ कऽ रहल छथि, मुदा हुनकर काजक कोनो अभिलेखन किए नै भऽ रहल छल? महेन्द्र मलंगियाकेँ हम मैथिलीक सेक्सपियर लिखने रहियन्हि (नचिकेताक नो एण्ट्री:मा प्रविशक आमुखमे) आ हुनकर आ रामभद्र (कथाकार) क काजक विश्लेषण करबाक आह्वान केने रही। मुदा हुनकर नाटक काठक लोक आ ओकर आंगनक बारहमासाक सन्दर्भमे हमर विचार भिन्न अछि। थोपड़ी पड़ेबाले काठक लोकक मुख्य पात्र एकटा वर्णशंकर हिन्दी भरि नाटकमे बजैए जइसँ नहिये मैथिली नाटककेँ कोनो लाभ भेलै आ नहिये हिन्दी प्रेमी लोकनि प्रसन्न हेताह। ई हिन्दी नाटक छी आकि मैथिली नाटक ऐपर सेहो विवाद चलैत रहत। ओकर आंगनक बारहमासा नाटक आस रखैए जे ओकर दर्शक मैथिल ब्राह्मण हेताह आ ओइमे तथाकथित राड़क मैथिली कहि जे भाषा थोपड़ी पाड़बाक उद्देश्यसँ प्रयुक्त कएल गेल अछि से भाषाशास्त्री रामावतार यादवक ऐ कथनक विपरीत अछि जे भाषाक संधानमे एहेन स्थिति नै आबए देबाक चाही जइसँ एकर मूल विशेषता गौण पड़ि जाए। संगे बेचन ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्डल आ राजदेव मण्डलक क्रमसँ नाटक, कथा आ कविता मलंगियाजीक काल्पनिक राड़क मैथिलीक भ्रमकेँ तोड़ि देने अछि। उमेश मण्डलक डिजिटल रूपमे संरक्षित (देखू विदेह ऑडियो- वीडियो) १७ तथाकथित दलित-पिछड़ा-मुस्लिम जातिक मध्य कएल फील्डवर्क देखू सुनू आ ओइमे बाजल मैथिलीक विश्लेषण करू। ओइमे बाजल मैथिली विद्यापतिक गाम बिस्फीमे बाजल मैथिलीसँ बीस पड़त उन्नैस नै। मलंगियाजीक लेखनीमे ऐ तरहक फील्डवर्कक सर्वथा अभाव छन्हि आ हुनकर फील्डवर्क अपूर्ण छन्हि, भऽ सकैए एकटा छोट क्षेत्रमे कएल गेल होन्हि। संस्कृत नाटक सभ जइमे शूद्र आ स्त्री लेल एहने भाषाक प्रयोग होइ छलै से ऐ २१म शताब्दीमे सम्भव नै। फेर हुनकर हरिमोहन झाक पाँच पत्रक हुनकर कएल नाट्य रूपान्तरण आ ओकर प्रकाश झा द्वारा कएल निर्देशन देखू। थोपड़ीक लेल किछु एहेन समस्याकेँ हास्यास्पद बना देल गेल जकर विरुद्ध हरिमोहन झा भरि जीवन लड़ैत रहलाह। दोसर गप जे मैथिलीक साहित्यकार जे गाममे रहबाक दम्भ भरै छथि ओ गाममे रहितो गामसँ पड़ाइन केने छथि जँ ओही गामक कोनो दोसर जातिक संस्कृतिसँ सम्पर्कक गप कएल जाए तँ ओ पूर्ण अज्ञानी सिद्ध होइ छथि। पंजीक विषयमे बहुत रास भ्रम छल, ओकर स्कैनिंग कऽ इन्टरनेटपर धऽ देल गेल। किछु गोटे ओइमे सँ अन्तर्जातीय विवाह (चर्मकार, रजक, मुस्लिम आदिसँ आ गएर अधिकारक विवाहक चर्चा) केँ हटेबाक मांग केलन्हि। किछु गोटे ओइमे हुनकर एक फरीकक चर्चा नै हेबाक गप उठेलन्हि। किछु गोटेकेँ भ्रम छन्हि जे पंजीक डिजिटल स्कैनिंग आ लिप्यंतरणक उद्देश्य पंजी प्रथाक पुनर्स्थापना अछि, एकर उद्देश्य एकर उलट अछि आ कोनो ब्राह्मण वा श्रोत्रिय सभाक क्षुद्र उद्देश्य पूर्ति लेल ई मेहनति नै कएल गेल अछि। ई स्पष्ट करब एतए आवश्यक अछि जे पंजीक सम्बन्धमे भ्रम जे ई कुलीनता स्थापित करबा लेल स्थापित भेल (हरिसिंहदेव तँ नहिये केलन्हि हँ माधव सिंह केलन्हि) आ जे ई प्रतिभाक आधारपर निर्धारित भेल (हम राजक आदेश लगेने छी जइमे पाइ लऽ कऽ नीचाँसँ ऊपर स्थान निर्धारित भेल आ चूड़ा-दही खुआ कऽ पंजीकार लोकनिक हस्ताक्षर लेल गेल) तकर निवारणार्थ आ ऐ मे सँ ऐतिहासिक आ समाजशास्त्रीय तथ्य बहार करब हमर सभक उद्देश्य छल आ अछि। पंजीमे एक बेर उच्च वर्ग निर्धारित भेलाक बाद महामूर्खाधिराज उच्च कोटिक बनले रहलाह। कतेक उदाहरण अछि जइमे चालीससँ बेसी विवाह लोक केलन्हि आ बाप बेटीसँ विवाह करए पहुँचि गेलाह (मिथिलाक इतिहास, राधाकृष्ण चौधरी)। हमर जवाब ईहो अछि जे ११००० पंजी तालपत्रक जे.पी.जी. इमेजक लिप्यंतरणमे कोनो दोष नै अछि तकर गारन्टी अछि, सौराठक पंजीकार जँ अहाँक फरीकक डेटा अपडेट नै केलनि अछि तँ से हुनकर दोष, शोध आ फील्डवर्कक आधार कहा सुनी आधारित नै अछि, ई पाण्डुलिपि आधारित अछि आ जँ ओइमे कोनो डेटा अछि (जेना अन्तर्जातीय वा अनधिकार विवाह) तँ हम ओकरा हटा नै सकै छी आ ने कोनो एहन बौस्तु हम जोड़ि सकै छी जे ओइमे नै अछि। पंजीक डी.वी.डी. अलगसँ रिलीज सेहो भेल अछि आ अन्तर्जालपर सेहो उपारोपित कएल गेल अछि, एकर लिप्यंतरणक दोसर खण्ड शीघ्र आएत। पंजीक ऐतिहासिक आ समाजशास्त्रीय विश्लेषण पोथीक सए पृष्ठक आमुखमे कऽ देल गेल अछि। दोसर गप ई जे अ-इतिहासाकर लोकनिक जातिगत आधारपर कएल ऐतिहासिक कृतघ्नतापर दू तरहेँ आक्रमण भेल। एक तँ पंजीक हमर सभक पोथीमे ऐतिहासिक आधारपर पंजीक स्थापना हरसिंहदेव द्वारा कएल सिद्ध भेल आ दोसर ईहो जे हरसिंहदेव नै तँ ब्राह्मण आ नहिये कायस्थ मध्य कुलीनताक आधारपर विभेद केने छ्लाह आ श्रोत्रिय नाम्ना ब्राह्मणक उपजाति १७६० ई. मे माध्व सिंह द्वारा किछु चाटुकारक कहलापर शुरू भेल आ सएह कायस्थ मध्य सेहो भेल। मुदा गोविन्द झा बिना कोनो प्रमाणक लिखै छथि जे हरसिंहदेव पंजीक स्थापक नै छलाह। एकटा सत्तरि बर्खक ब्राह्मणक श्रोत्रिय उपजातिक योगनाथ झा प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा हमर सभक पंजीक द्वितीय खण्डक (श्रोत्रिय खण्डक) निर्लज्जतापूर्वक चोरि कऽ एक साल बाद छपबेबे टा नै केलन्हि वरन् ओइमे सँ अन्तर्जातीय विवाहक चर्चा मेटा कऽ आ आमुखमे हरसिंहदेवकेँ पंजी प्रबन्धक संस्थापक नै मानि कऽ अपन ब्राह्मणवादी विद्वेषक परिचत तँ देबे केलन्हि, हुनका ईहो भ्रम छन्हि जे श्रो‘त्रिय १७६० ई. सँ पूर्व जातिक रूपमे मिथिलामे छलाह। हरसिंहदेव-मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। १२९४ ई. मे जन्म आ १३०७ ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ १३२४-२५ ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि (मुदा ई हरसिंहदेव द्वारा लगभग १३११ ई. मे स्थापित भऽ गेल छल- मिथिलाक इतिहास- राधाकृष्ण चौधरी)। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास, कारण ओइमे वर्णित सभ गोटे माधव सिंहक समकालीन) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल। ई महानुभाव योगनाथ झा प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा प्रसिद्ध योगनाथ सिन्ध अपना नामसँ रीप्रिन्ट करेबामे सेहो अपन पंजीक अज्ञानताक परिचय देलन्हि आ ढेर रास गल्ती छपाइमे केलन्हि। अही तरहक घृणित काज पूर्वमे हिनके सभसँ सम्बन्धित किछु गोटे केने छलाह जखन ओ सभ पंजी तालपत्र सभ पंजीकार सभसँ ठकि कऽ लेने छलाह जे ओकरा फोटोकॉपी/ स्कैन कऽ घुरेताह मुदा तकरा अमेरिकासँ आएल महिला जीनियोलोजिस्ट/ सोशियोलोजिस्टकेँ बेचि देलन्हि आ पंजीकार लोकनिकेँ ५-१० पाइ प्रति तालपत्र हर्जाना देबाक प्रस्ताव राखलन्हि। मुदा २०१० ई. मे विदेहक सौजन्यसँ तीससँ बेसी बर्खसँ फाइलमे बन्द राधाकृष्ण चौधरी जीक “मिथिलाक इतिहास” श्रुति प्रकाशनसँ आएल आ ओतए ईअकाट्य रूपसँ ऐतिहासिक प्रमाणक आधारपर सिद्ध भेल अछि जे हरसिंहदेव पंजीक स्थापक छथि आ ओ नहिये ब्राह्मण आ नहिये कायस्थ मध्य कोनो कुलीन तंत्रक स्थापना केलन्हि। जातिवादी आ चोर अ-इतिहासकार लोकनिपर ई एकटा अन्तिम मारक प्रहार सिद्ध भेल आ ऐतिहासिक कृतघ्नताक ई अन्त केलक। एक बेर बिल गेट्सकेँ पूछल गेलन्हि जे ओ पाइरेसीक डरसँ “एक्स बॉक्स” भारतमे देरीसँ उतारि रहल छथि तँ हुनकर जवाब छलन्हि जे माइक्रोसॉफ्ट पाइरेसीक डरसँ कहियो कोनो उत्पाद देरीसँ नै उतारने अछि। विदेह सेहो अपन समस्त उत्पाद, (किछु लोककेँ भ्रम छन्हि जे विदेह मात्र कथा-कविता-निबन्ध छपैत अछि) जेना ऑडियो, वीडियो, कला-चित्रकला-संगीत, सॉफ्टवेयर, पंजी, प्राचीन मैथिली तालपत्रक डिजिटल संस्करण, तिरहुता/ वेकीपीडियाक तकनीकी स्वरूप , पोथीक डिजिटल रूप आदि स्वतंत्र उपयोग आ डाउनलोड लेल उपलब्ध करेने अछि आ योगनाथ प्रसिद्ध सिन्धुनाथ झा सन लोकक पाइरेसीक डरसँ विदेह ई काज नै रोकत। राजनन्दल लाल दास जी आ मायानन्द मिश्र प्रारम्भमे तामसमे रहथि, मायानन्द मिश्र ऐ लऽ कऽ जे कुरुक्षत्रम् अन्तर्मनक मे हम स्त्रीधनक ऐतिहासिक विवेचनाक आलोचना केने रही, ओ शेष तीनू पोथी, प्रथमं शैलपुत्री च, पुरोहित आ मंत्रपुत्रक आलोचनासँ मोटामोटी सहमत रहथि आ कहलन्हि जे मंत्रपुत्रमे ओ राहुल सांकृत्यायनसँ प्रभावित रहथि मुदा आब ओ ओकर पुनर्लेखन कऽ रहल छथि। राजनन्दन लालदास जीक मत छलन्हि जे हम सभकेँ एक्के लाठीसँ हाँकि दै छी। मुदा जखन ओ सभ विदेह देखलन्हि तँ अपन प्रसन्नता व्यक्त केलन्हि। ओ ईहो कहलन्हि जे मैथिलीक नामपर बनल संस्था सभ मैथिल ब्राह्मण वर्चस्वक होइत अछि आ बिना कोनो अपवादक ब्राह्मण लोकनि आपसी विवाद करिते टा छथि आ संस्था टुटिते टा अछि आ तेँ कर्ण कायस्थ लोकनिकेँ नै चाहितो मजबूरीमे मैथिलीक कार्य करैत रहबा लेल कर्णगोष्ठी बनाबए पड़लन्हि। गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा (प्रीति ठाकुर) क एकटा चित्रकथा कालिदास सेहो सम्वादकेँ जन्म देलक। किछु पाठकक कहब छल जे ओ मैथिल ब्राह्मण छलाह आ किछु हुनका कर्ण कायस्थ मानै छलाह। मुदा ई चित्रकथा हुनकर लोककथाक ई तथ्य जे ओ अमरीताकेँ कमलदहमे भेटलखिन्ह आ मिथिलाक यादवक किछु कुलमे हुनकर अखनो अभ्यर्थना होइत अछि, ओइ आधारपर रचल गेल अछि। ई मेघदूतम बला कालिदास नै छथि कारण मेघ गलतीयोसँ मिथिला नै आएल। ई दोसर कालिदास छथि आ उच्चैठमे जे दुर्गापूजा होइए तकरोसँ ई भिन्नता रखैए कारण उच्चैठक भगवती कुण्डलधारी बौद्ध तारा छथि जे बौद्धधर्मक अवसानक बाद सभ ठाम भगवती काली बनि गेलीह, आ एतए कहिया दुर्गा बनि गेलीह से नै जानि। साहित्यिक लठैत आ कालीकान्त झा बूचक साहित्यिक हत्याक ओझरी: कालीकान्त झा बूचक कोनो कविता सरकारी संस्था सभक संकलनमे नै आएल। जँ विदेह नै अबितै तँ की संसारक सभसँ मधुर आ लयात्मक भाषा (येहुदी मेनिहिनक शब्दमे) क विद्यापतिक बादक सभसँ लयात्मक कविक साहित्यिक हत्याक ओझरी नै सुनझितैक। वियोगीजी ककरा विषयमे लिखै छथि जे अहाँ लग पाइ आ लठैत हुअए तँ अहाँ साहित्यकार नै बनि सकै छी, विधायक बनि सकै छी। एकटा पाठक बिना कोट केने ई प्रश्न उठबै छथि जे ई किनकर कथन अछि तँ अविनाश (साहित्यिक वर्णसंकरताक डिसकसनक बाद ओ पुनः अबै छथि) कहै छथि जे ई हमर पैघ भाइ तारानन्द वियोगीक कथन छी आ ऐ उत्तर लेल की पुरस्कार भेटत?। तइपर कृष्णा यादव नाम्ना ई पाठक लिखै छथि जे लठैतकेँ अपन आकाकेँ पैघ भाइ कहबाक तँ अधिकार छै मुदा पुरस्कार पएबाक नै। मुदा राजमोहन झाक ई वक्तव्य जे सभ अपन-अपन चेला पोसने छथि आ ओकरा बढ़ेबामे लागल छथि, की एतए नै सोझाँ अबैत अछि? सरकारी संस्था सभक सर्वकालीन आ स्वातंत्र्योत्तर गद्य-पद्य संकलन देखू आ देखू जे ई साहित्यिक लठैत सभ तँ ऐ संकलनमे शामिल छथि (माने पुरस्कृत कएल गेल छथि, सर्वकालीन कवि बनि गेल छथि, एकर चर्चा हम सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह “बनैत बिगड़ैत” क आमुखमे सेहो केने छी) मुदा एतए कालीकान्त झा बूचक साहित्यिक हत्या कएल गेल अछि। बूचजीक सए कविताकेँ विदेह द्वारा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल गेल अछि जे आब कलानिधिक रूपमे प्रिंटमे सेहो आएल अछि, आ ऐ साहित्यिक हत्याक ओझरी सुनझा देल गेल अछि। मीठ बाजएबला कायस्थ आ ब्राह्मण समाज किए टूटि गेल अछि? एकर एकटा कारण ईहो सोझाँमे आएल जे कर्ण कायस्थ मैथिलक संस्था सभमे छल मुदा ओ संस्था सभ मैथिल ब्राह्मण बहुल छल आ कोनो संस्था नै बचल जे दू भागमे नै टूटल। से की करितौं, हमरा सभकेँ (कर्ण कायस्थ) अलग संस्था बनबए पड़ल। मुदा ऐ दुनू जातिक झगड़ासँ शेष ९० प्रतिशत मैथिली भाषीकेँ कोन सरोकार। हितेन्द्र गुप्ता मैथिली समाचारक जालवृत्त (बादमे वेबसाइट सेहो) तीन-चारि सालसँ चला रहल छथि, कुमुद सिंह सेहो मैथिली समाचारक जालवृत्त (बादमे वेबसाइट सेहो) तीन-चारि सालसँ चला रहल छथि। एकर अतिरिक्त मैथिलीमे अनचिन्हार आखर (मैथिली गजलक जालवृत्त), रेखा मिश्रक-विनोद झाक मिथिला लोक, पद्मनाभ मिश्रक कतेक रास बात, मिथिला डट कम (जनकपुरक मैथिली दैनिकक जालवृत्त), बिपिन बादलक मैथिली टाइम्स आदि ढेर रास जालवृत्त/ जालस्थल अन्तर्जालपर काज कऽ रहल अछि। फेसबुकपर आब ऐ साइटमे किछु अपन चौबटिया बनेने छथि, मोटा-मोटी सभ चौबटियाक सदस्य कॉमन छथि। किछु अहम् सेहो टकराइ छै, मुदा सभ मैथिली लेल काज कऽ रहल छथि, आ के बेसी मैथिली प्रेमी सेहो कखनो काल सम्वादमे सोझाँ अबैए। अपन कमजोरी लेल बाहरी ताकतिकेँ जिम्मेवार ठहरेबाक प्रवृत्ति सेहो छै। साहित्यमे जाति शब्द नै आबए ऐपर बहस होइ छै मुदा तर्क कमजोर भेलापर वियोगीजी नन-मैथिल बनि जाइ छथि फेर कहै छथि जे मैथिल समाजमे दोसराक कहलासँ ओपिनियन बनाओल जाइ छै लेखककेँ पढ़ला उत्तर नै। किसलय कृष्णक ऐ प्रश्नक उत्तरमे जे सए बेंगकेँ एक तराजूपर तौलब असान मुदा तीन मैथिलकेँ एक ठाम रखनाइ कठिन (ई प्रश्न तीन साल पहिने राज झा सेहो कहने रहथि, अक्सर उठैत रहै छै), एकर जवाब हम देलौं जे इन्टरनेट लोककेँ जिम्मेवार बना रहल छै, लिखलाहा गपपर आब लोककेँ स्टैण्ड लेमए पड़तन्हि, जँ जँ सम्वाद करबाक शक्ति बढ़तन्हि, मेडियोक्रिटीसँ बाहर एताह, सहनशीलता बढ़तन्हि आ ई इन्टरनेटक सभ ग्रुपमे होइ छै मात्र मैथिलक ई विशेषता नै। विदेहसँ जुड़ल लोक: भलहि सम्वादक बीच विषयकेँ मोड़बाक प्रयत्न होइ छै , मुदा ऐ डरसँ ने सम्वाद रोकल जाएत आ ने साहित्यिक समीक्षा। शिव कुमार झा आ मुन्नाजीकेँ फोन आ एस.एम.एस. अबै छन्हि आ हमरा, उमेशजी आ प्रीति ठाकुरकेँ अभद्र ई-मेल। इनारक बेंग ढेपा खसलापर चिन्तित भऽ जाइत अछि जे दुनियाँमे भूकम्प तँ नै आबि गेल। हमरा टोलमे बदरी भाइक माए एक बेर चिट्ठी लिखबै छलखिन्ह जे हुनकर महीस लागि रहल छन्हि से टोलबैय्या मोने-मोने जरि रहल छन्हि। मोने-मोनेबला गप सब्जेक्टिव अछि आ ऐ सब्जेक्टिव तत्वक साहित्यिक समीक्षामे कोनो स्थान नै। लोक तर्कक अकाल होइतहि मैथिली छोड़बाक आ मैथिल समाजकेँ गरियेबाक जे प्रक्रम शुरू करै छथि से मेडियोक्रिटीक आक्रोश अछि, “विदेहसँ जुड़ल लोक” ऐसँ बाहर छथि, आ जे ऐ मेडियोक्रिटीसँ, जातिवादसँ, ईर्ष्यासँ आ हीन भावनासँ बाहर आबि जएताह से “विदेहसँ जुड़ल लोक” भऽ जेताह। अकासी उपारोपण लेल सभ सदस्य दस सालसँ प्रतिदिन दू घण्टाक औसतसँ जमीनी काज कऽ रहल छथि। सम्वादक परम्परा पुरान अछि आ वैदिक ऋचाक पाठ केनिहारकेँ अथर्ववेद मे “अनेरे टर्र-टर्र करैबला बेंग”कहि मजाक उड़ाएल गेल अछि, से परम्परा सेहो विदेहक संग अछि। उजहियामे धारक दिशामे बहबाक जिनका आदति छन्हि से मैथिलीमे पाठक नै, प्रकाशक नै, मैथिलकेँ मैथिलीसँ प्रेम नै आदि बहन्ना मैथिली छोड़बाक लेल तकैत रहथु, धारक विपरीत हेलबाक आ धार मोड़बाक परम्परा विदेह लग छै। डॉ रमानन्द झा "रमण" मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न अछि। एक भाषाक रूपमे मैथिलीक अध्ययनक इतिहास सुदीर्घ नहि अछि। सन् 1801 ई. मे एच.टी. कोलब्रृूक भाषाक रूपमे ‘मैथिली’ शब्दक पहिले पहिल प्रयोग कएलनि। संगहि, ओ इहो लिखल जे व्यापक क्षेत्रामे मैथिलीक प्रयोग नहि अछि। कोनो महान कवि नहि भेलाह अछि। एहिसँ बेसी लिखब अनावश्यक अछि। जॉन बिम्स2(1872 ई.) एवं हॉर्नल3े3 (1880 ई.) भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग करैत, हिन्दीक एक भाषिकाक रूपमे मैथिलीक विवेचन कएलनि। सर जॉर्ज कैम्पबेल, सन् 1874 ई. मे भारतक विभिन्न भाषा कुलक नमूनाक संकलन करैत बिहारक भाषा (Dialects of Behar)समूहमे Vernacular of Patna, vernacular of Gya,vernacular of Champaran, vernacular of West Tirhoot, vernacular of East Tirhoot, vernacular of West Purnea (Hindee), तथा vernacular of East Purnea (Bengali) 4 राखल। संकलित प्रत्येक शब्द एवं मोहाबराक अङरेजी पर्याय देखि प्रतीत होइछ जे हुनक लक्ष्य भारतक भाषाक अध्ययन नहि छल। अपितु, स्थानीय भाषासँ अपरिचित अङरेज पदाधिकारी सभके ँ दैनिक जीवनमे सुविधाक हेतु विभिन्न क्षेत्राीय भाषाक शब्द आ’ मोहाबरासँ परिचय एवं अभ्यास कराएब छलनि। अतएव, कैम्पबेलक संकलनके ँभाषाक अध्ययन मानब उचित नहि होएत। बेसीसँ बेसी नमूना संकलन कहि सकैत छी। एस.एच. केलौग5 तिरहुतक भाषाक उल्लेख पूर्वी हिन्दीक एक बोलीक रूपमे प्रसंगात कएने छथि। ओ अपन व्याकरणमे मैथिलीक क्रियापद-रूपावली विस्तारपूर्वक देखऔने छथि। हॉर्नले ई अनुभव कएल जे पश्चिमी एवं पूर्वी हिन्दी एक नहि थिक, दूनूमे पर्याप्त अन्तर छकै । हानॅ र्ल े पर्वू ी हिन्दीक आठ टा भाषिका मानल जाहिम े सातम स्थानपर मैि थली6 अछि। हुनक स्पष्ट मत अछि जे पूर्वी हिन्दीक अपेक्षा मैथिलीमे अपन पड़ोसी बंगला एवं नेपालीसँ बेसी समानता छैक, भूतकालक निर्माणमे मैथिली विशेषतः बंगलाक अत्यन्त सन्निकट अछि।7 एहि प्रकारसँ कहि सकैत छी जे मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहार पहिल व्यक्ति जॉन बिम्स आ’ दोसर हॉर्नले भेलाह अछि। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक विस्तृत अध्ययन एवं स्थापना कएलनि। मैथिलीक व्याकरण लिखल। एहिमे हिनका जॉन बिम्सक क्रियारूपाली पर्याप्त सहायक भेल छनि।मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न रहितहु तिरहुतक भाषा, मिथिला भाषा वा मैथिलीक अध्ययन नहि होएबाक की कारण छल होएत, ओहि पर दृष्टिपात करबासँ पूर्व किछु अन्य भाषाक भेल अध्ययनक स्थिति पर नजरि देब अपेक्षित अछि। ए. एच. सेसीक8 अनुसार आधुनिक भारतीय आर्यभाषाक व्याकरण 1872 ई., बंगला भाषाक व्याकरण 1862 ई, ओड़िआ भाषाक व्याकरण 1831 ई., सिन्धी भाषाक व्याकरण 1872 ई., पंजाबी भाषाक व्याकरण 1851 ई., गुजरातीक व्याकरण 1867 ई., मराठीक व्याकरण 1868 ई. तथा हिन्दुस्तानीक व्याकरण 1845 ई. मे लिखल गेल। विश्वम्भर विद्यासागर 1841 ई. मे ओड़ियामे ओड़ियाक पहिल व्याकरण प्रकाशित कएल। BANGLAPEDIA: Grammar9 9 क अनुसार बंगलाक पहिल व्याकरण पुर्तगीज मिशनरी द्वारा पुर्तगालीमे1734 एवं 1742क बीच लिखाएल तथा लिबसनसँ प्रकाशित भेल। बंगलामे पहिल व्याकरण कलकत्ता स्कूल सोसाइटीक सदस्य राधाकान्त देव लिखल जकर दोसर संस्करण 1821 ई. मे भेलैक। असमीक पहिल व्याकरण मिशनरी नाथ ब्राउन 1848 ई. मे प्रकाशित कएलनि। पछाति असमी भाषा पर हुनक विस्तृत पोथी आएल। असमी भाषी पर राजकाजक भाषाक रूपमे थोपल गेल बंगलाक स्थान पर असमीके ँ कामकाजक भाषा होएबामे मिशनरी नाथ ब्राउनक उक्त पोथी बहुत सहायक भेल छलैक। भाषाक लेल ‘नेपाली’ शब्दक प्रयोग पहिले पहिल आयटोन ; (Ayton) 1820 ई. मे कएलनि आ’ । A Grammar of the Nepali Language लिखल। एहि परिप्रेक्षमे मैथिलीक व्याकरण-लेखनक इतिहास पर दृष्टिपात कएल जाए। यद्यपि मैथिलीक सान्दर्भिक चर्चा किछु-किछु रूपसँ पहिनहिसँ होइत छल, किन्तु एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक पहिल व्याकरण ; (An Introduction To The Maithili Dialect Of The Bihari Language As Spoken In North Bihar) एक विदेशी विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन 1881 ई. मे लिखलनि। हली झा द्वारा मैथिली व्याकरण लिखल जएबाक जे उल्लेख अम्बिकादत्त व्यास कएने छथि, तकर कोनहु पता नहि अछि। मैथिली व्याकरण सम्बन्धी छिट-फुट लेख ‘मिथिलामोद’क किछु आरम्भिक अंकमे भेटैत अछि। पण्डित जीवनाथ रायक लिखल ‘मैथिलीक स्वरूप ओ लेख शैली’ ‘मिथिला मिहिर’ मे प्रकाशित होइत छल10 जे पछाति अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद द्वारा पुस्तकाकार भेल। मैथिलीक पहिल व्याकरण टंकनाथ मैथिली व्याख्याता गंगापति सिंह ‘बाल व्याकरण’ लिखि 1922 ई. मे प्रकाशित कएल जकर दोसर संस्करण मैथिली साहित्य परिषद द्वारा 1937 ई. मे भेलैक। एकर बाद हीरालाल झा ‘हेम’ लिखित ‘मैथिली भाषा व्याकरण भास्कर’ लिखल जएबाक उल्लेख भेटैत अछि जकर प्रकाशन 1926 ई. मे श्रीरमेश्वर प्रेस, दरभंगासँ भेल। एहि इतिवृत्तिसँ स्पष्ट अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक प्रमुख भाषा मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक पर्याप्त साक्ष्य रहितहु सबसँ पछाति एकर व्याकरण लिखल गेल। तकर कारण की? भाषा प्रयोजन सिद्धिक माध्यम थिक। अतएव, भाषाक महत्त्व एहि बात पर निर्भर अछि जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे समाजक प्रयोजनक सिद्धिक माध्यम अछि। एकर परिमापनक दू टा आधार अछि - कार्यभार ; (Functional load) आ’ कार्य पारदर्शिता, ; (Functional Transparency) अर्थात् कार्यमे अपेक्षित स्पष्ट अभिव्यक्ति-क्षमता। भाषाक कार्यभार कम अछि वा अधिक, तकर निर्धारण एहि बातपर होइछ जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे कार्यशील अछि। उदाहरणार्थ अङरेजीके ँ देखि सकैत छी। ओ प्रायः सभ पैघ सार्वजनिक प्रक्षेत्रा जेना व्यापार, शिक्षा, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संवाद, प्रौद्योगिकी, सरकार, कानून आदि मे पसरल अछि। अतएव, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्1 मिथिला भाषाक अध्ययन- मिथिला भाषाक अध्ययन एवं डा. ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण डा. रमानन्द झा ‘रमण’अङरेजीक कार्यभार बेसी मानल जाएत। कार्य पारदर्शिता एहि बात पर निर्भर अछि जे भाषाक खास प्रक्षेत्रामे ओकर स्वायत्तता आ’ नियन्त्राण छैक वा नहि। यदि एकभाषा दोसर भाषाक प्रयोगक आरि छंटैत अछि तँ ओहि भाषाक कार्यभार उच्च मानल जाइत छैक। दोसर शब्दमे, भाषा कार्यमे पारदर्शी बूझल जाइत अछि, यदि ओ अत्यधिक नीक जकाँ खास कार्य करैत अछि। जेना, संस्कृत भारतीय सस्ं कृि त एव ं हिन्दुत्वक व्याख्या करबाम े अत्यधिक पारदर्शी रूपे ँ कार्य करतै अछि। मुदा आधुनिकताक कार्यमे पारदर्शी नहि अछि। ओहिना मैथिलीक कतेको प्रक्षेत्रामे हिन्दी सन्हिआ गेल अछि, जाहिसँ मैथिलीक कार्यभार एवं पारदर्शिता - दूनू घटि गेलैक अछि। कमल जाइत अछि। कहि सकैत छी भाषा आ’ कार्यमे स्थिर साहचार्य छैक। पारदर्शिता घटल तँ कार्यभार कमल आ’ प्रक्षेत्राक संख्या बेसी, तँ कार्यभार उच्च। कार्यभार आ’ कार्यपारदर्शिताक दृष्टिसँ मैथिली पर विचार कएल जाए। ई अनेकहु अभिलेखसँ प्रमाणित अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक भाषामे अन्यतम स्थान प्राप्त मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न परम्परा छैक। सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि एवं ओहिठामक राजा रामसिंहदेवक समयक प्राप्त शिलालेखक आधार पर इतिहासज्ञ डा. हरिकान्त लाल दासक11 निष्कर्ष अछि जे कर्णाट शासन कालमे राजकाजक भाषा मैथिली छल। प्रो. दासक इहो निष्कर्ष अछि जे मोरंग, मकवानपुर, विजयपुर, पाल्पा आदि राजालोकनिक समयक अभिलेख, स्याहा मोहर, जमीनक हस्तान्तरण सम्बर्न्धी अिभलेखसँ सेन राजालोकनिक राजकाजक भाषा मैथिली होएब प्रमाणित हाइे छ।12 एहि एेि तहासिक तथ्यस ँ निष्पन्न हाइे छ ज े मैि थलीक पय्र ागे विभिन्न पक्ष््र ात्रे ाम े हाइे त छल। साहित्य-सर्जना, दैनिक व्यावहारिक जीवन एवं राजकाजक भाषा रहने मैथिली उच्च कार्यभारक भाषा छल। किन्तु, नेपालमे राणाशाही स्थापित भेलाक बादसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रा क्रमशः घटैत गेल। मिथिलामे तुर्क, अफगानक आक्रमण एवं आधिपत्यक बाद जखन मुगल बादशाहसँ खंडबला कुलके ँ मिथिलाक राज प्राप्त भेलनि तँ जैतुकमे अरबी, फारसी एवं उर्दू सेहो अएलैक। संगहि, लोकनि×ाा सभ सेहो मैथिली भाषीक्षेत्रामे बसय लागल। एहिसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रापर संघातिक आघात भेलैक। मैथिलीक प्रयोगक प्रक्षेत्रा घोंकचए लागल। मैथिली भाषीक घनत्व तरल होइत गेल। कोलब्रूकक अभिमतसँ स्पष्टे अछि जे साहित्य-सर्जनाक क्षेत्रामे सक्रियता ठमकल छल। परिणामतः मैथिलीक प्रक्षेत्रा दैनिक जीवन आ’ मनोरंजक साहित्यक सर्जना धरि सीमित रहल। अतएव, जखन ईस्ट इन्डिया कम्पनीक हाथमे तिरहुतक शासन-सूत्रा अएलैक, तँ कम्पनी सरकारक लेल मैथिली कोनो समस्या नहि बनल। तखन समाधानक चिन्ता ओ किएक करैत? जेना आन कतेको भारतीय भाषाक पढ़ौनीक व्यवस्था अपन कर्मचारी-अधिकारी वा सेना-सिपाही लेल ओ कएलक, से मैथिलीक लेल किएक करैत? लार्ड मेकाले (1835 ई.) प्रायः एहनहि स्थितिमे रिपोर्ट कएने छल होएताह जे जाहि भाषासँ (अरबी, फारसी एवं संस्कृतक सन्दर्भमे लिखल) ने हमर प्रशासनके ँकोनो लाभ छैक आ’ ने ओहि भाषाके ँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़ेबाक लेल तैआर छथि, ताहि भाषापर किएक खर्च कएल जाए?13 भारतक प्रथम स्वाधीनता संग्रामक असफलताक उपरान्त 1857 ई. मे भारतक शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कम्पनीक हाथसँ ब्रिटिश साम्राज्ञीक हाथमे आएल तँ ओ अपन उपनिवेशक लोक सभसँ सामीप्य स्थापित करबाक हेतु क्षेत्रा विशेषक भाषाक अध्ययन एवं विकासक प्रसंग नीतिगत निर्णय कएलनि। भारत सहित ब्रिटिशक विभिन्न उपनिवेशक भाषाक शिक्षणक व्यवस्था भेल। व्याकरण लिखाएल। शब्द एवं लोक-साहित्यक संग्रह आरम्भ भेल। अध्ययन तथा प्रकाशन होअए लागल तथा अधिकारी सभके ँ स्थानीय भाषामे प्रवीणता प्राप्त करबाक हेतु ओहिना प्रोत्साहित कएल गेलनि14, जेना भारत सरकार सम्प्रति अपन कर्मचारी-अधिकारीके ँ हिन्दीक कार्यसाधक ज्ञान अर्जित करेबाक लेल प्रोत्साहित करैत अछि। जाहि भाषाक कार्यभार बेसी छलैक, ओहि भाषामे काज पहिने आरम्भ भेल। मैथिलीक कार्यभार अल्पतम छल। ध्यान पछाति गेलैक। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन मैथिलीके ँ भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक भाषा मानैत छथि। हिनक प्राच्य समूहमे 1. ओड़िआ, 2. बिहारी (मैथिली, मगही एवं भोजपुरी), 3. बंगला, आ’ 4. असमिआ अछि। हॉर्नले उपयुक्त नामकरणक अभावमे संस्कृतसँ सवं द्ध भाषाक े सँ ुविधाक हते ु गाैि डअन 15 कहलनि। सम्भव थिक हानॅ र्ल के मागर्क अनुसरण करतै उपयुक्त नामकरणक अभावमे ग्रिअर्सन सेहो बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण कए देने होथि। ओना ओहिसँ पहिने राममोहन राय बंगलामे बंगलाक पूर्ण व्याकरण ‘गौड़ीय व्याकरण’ 1833 ई.मे लिखने छलाह। ग्रिअर्सनक ई वर्गीकरण, विशेषतः बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण, पर्याप्त विवादक कारण भेल अछि। ओना साम्प्रतिक राजनीतिक परिदृश्यमे जँ एकर विवेचन करी तँ कहि सकैत छी जे ‘बिहारी अस्मिता’क पहिल उद्भावक जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन भेलाह। मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सेहो विवादक कारण भेल अछि। जार्ज ग्रिअर्सन र्मैिथलीक औपभाषिक विभाजन छओ भागमे कएने छथि -1. मानक मैथिली, 2. दक्षिणी मानक मैथिली, 3. पूर्बी मैथिली वा गॅंवारी, 4. छिकाछिकी बोली, 5. पश्चिमी मैथिली एवं 6. जोलहा बोली। पण्डित गोविन्द झा16 वर्गीकरणक तीन आधार मानल अछि- 1. क्षेत्रा, 2. सामाजिक वा शैक्षणिक स्तर तथा 3. जाति। क्षेत्राक अनुसार ओ 1. पूर्वी( नव क्षेत्राीय नामकरण अंगिका, ग्रिअर्सन - छिकाछिकी एवं गँवारी), 2. दक्षिणी, पश्चिर्मी (नव क्षेत्राीय नामकरण बज्जिका, ग्रिअर्सन - पश्चिमी मैथिली), 4. उत्तरी वा नेपाल तथा 5. केन्द्रीय। एहि विभाजनक आधार अछि मैथिलीक भाषायिक चौहद्दी। पूर्बमे बंगला, पश्चिममे भोजपुरी, दक्षिणमे मगही आ’ उत्तरमे नेपाली। अभिसरण ; (Convergence) सिद्धान्तक अनुसार सम्पर्कसँ भाषा प्रभावित होइत छैक। एहि हेतु केन्द्रीय मैथिलीके ँछोड़ि चारू कातक मैथिली अपन समीपस्थ भाषा सभसँ प्रभावित भेल आ’ जे अप्रभावित रहल मानक मैथिली कहल गेल अछि। भाषा वैज्ञानिक तथ्यक आधार पर एहि तथ्यके ँ फरिछबैत डा. रामावतार यादव17 बिहारमे मधुबनी तथा नेपालमे राजबिराजमे बाजल जाइत मैथिलीके ँमानक मैथिली कहल अछि। सामाजिक स्तरक अनुसार सभ क्षेत्रामे मैथिलीक दू स्वरूप गोविन्द झा मानैत छथि - शिक्षित एवं सुसंस्कृत उच्चवर्गक आ’ दोसर समाजक अशिक्षित एवं निम्नस्तरक लोकक भाषिका। शिक्षित वर्गक अभिरुचि मैथिलीक मानक स्वरूपक दिशि होइत छनि एवं परिष्कृत भाषा बजबामे ओ गौरवक अनुभव करैत छथि। अशिक्षित वा नीचला स्तरक लोकक भाषिकामे स्थानीय एवं जातीय विशेषता विशेष सुरक्षित रहैत अछि। जातिक अनुसार मैथिलीक तीन स्वरूप पण्डित मिथिला भाषाक अध्ययन ध्3 मिथिला भाषाक अध्ययन 4गोविन्द झा मानल अछि - 1. विद्याजीवीक भाषिका, 2. कृषिजीवी जातिक भाषिका तथा 3. व्यवसाय जीवीक भाषिका। कोन परिस्थितिमे विभिन्न भाषा-भाषी एवं सांस्कृतिक समुदायक लोकक स्थायी निवास मिथिला बनैत गेल तकर चर्च ऊपर कएलहुँ अछि। मिथिलाक प्रशासनिक क्षेत्रामे ओहि वर्गक वर्चस्व, सेहो घटैत-बढ़ैत रहल। भारतक कतेको प्रान्तमे भाषाक प्रयोगजन्य जे समरूपता देखैत छी एवं प्रयोगजन्य समरूपताक कारणे ँभाषाक नामपर जे एकजुटता अनुभव होइत अछि, तकर घोर अभाव मिथिलामे उक्त कारण सभसँ छल एवं अद्यावधि अछि। एहन कोनो केन्द्रीय राजनीतिक शक्ति वा सामाजिक संगठन नहि छलैक जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार वा मैथिलीक पठन-पाठनक मार्गमे अबैत अवरोधक तत्त्वक निराकरण कए, सर्वव्यापी प्रभावकारी निर्णय लए सकैत छल। मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सर्वग्राह्य तँ नहिएं भेलैक, अपितु किछु अंश धरि दूरत्वक ओ कारण सेहो भए गेल। एहि दूरत्वके ँबढ़ेबामे बिहार विभाजनक अगुआ एवं पटना विश्वविद्यालयक पूर्व उपकुलपति डा. सच्चिदानन्द सिंहा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता सहायक भेलैक। पटना विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मैथिलीक स्वीकृतिक प्रस्तावक समय ओ बाबू भोलालाल दासके ँकहने छलथिन्ह -‘बंगालसँ बिहारके ँअलग कएल हम अपना सभक निमित्त, अहाँलोकनिक लेल नहि। मैथिलीके ँस्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत। मिथिला जीबि उठत तँ हमरालोकनिके ँयू. पी. चल जाए पड़त। ते ँजावत हम जीअब मैथिलीके ँस्वीकृत नहि होअए देब।’18 जखन मैथिलीक अध्ययन-अध्यापने नहि, तखन व्याकरण कोना लिखाइत? प्रयोजनक दृष्टिसँ व्याकरणक दू कोटि अछि19 - पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण; (Traditional and Pedagogical Grammar)A। पारम्परिक व्याकरणक आधार साहित्य होइत अछि। ओ पोथी तथा अन्य उपलब्ध साहित्यक आधार पर भाषाक संरचनात्मक परिचय करबैत अछि। ओ इहो सुझबैत अछि जे कोना लिखी आ’ कोना नहि लिखी। कोना बाजी आ’ कोना नहि बाजी। तदनुसार, ई अनुशासनात्मक व्याकरण ; (Prescriptive) सेहो कहबैत अछि। पारम्परिक व्याकरण वर्तमान एवं भविष्य - दूनूक लेल मार्ग-दर्शक होइत अछि। एकर विपरीत, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण मानक भाषिका एवं लिखित समकालीन भाषाक संरचनात्मक स्वरूपक परिचय करबैत अछि। मानक भाषा लिखब आ’ बाजबमे व्याकरणक कोन नियमक कखन प्रयोजन होइत छैक आ’ तकर अनुसरण कोना कएल जाए, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण सीखबैत अछि। कहि सकैत छी जे भाषा विशेषक लोकक बीच उक्त समूहक भाषा कोना बाजल जाए, जाहिसँ वक्ताक अभिप्रायक सम्प्रेषण वाधित नहि रहए, वक्ता की कहैत छथि, से उक्त भाषा समूहक लोक बूझि जाथि। एकरा सम्वाद-भाषा सेहो कहि सकैत छी। पारम्परिक व्याकरणक नियम बेसी कठोर होइत अछि किन्तु शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण वा सम्वाद-भाषाक व्याकरणमे तारता होइत छैक। ओ भाषाक विभिन्न स्वरूपक प्रयोग सफल सम्वाद-स्थापन लेल करैत अछि। ठाम-ठाम जँ व्याकरणिक नियम भंगो होइत रहैछ तँ ओहि पर ध्यान नहि दैत अछि। भाषाक परिचयमे शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण पाँच स्तर पर सहायक होइत अछि - 1. शब्द स्तर ; ( Vocabulary level) - एहि स्तरपर व्याकरण शिक्षार्थीके ँ शब्द एवं ओकर विभिन्न स्वरूपक परिचय करबैत अछि। ओकर प्रयोगके ँ तेना विश्लेषित करैछ जाहिसँ शिक्षार्थी पुरुष-वचन-लिंग प्रणालीसँ परिचित भए जाथि। 2. रूपात्मक स्तर ; ( Morphological level) - एहि स्तरपर व्याकरण शब्द निर्माण,एकवचनसँ बहुवचन, समास, रूपावली, विभक्ति आदिसँ परिचय करबैत अछि। कारक तथा ओकर प्रयोग कोना कएल जाए, से सिखबैत अछि। 3. रूपस्वनिमिकी स्तर; Morphophonemic level) - एहि स्तरपर व्याकरण सन्धि तथा व्याकरणक कारणे ँ होइत स्वन-परिवर्तनसँ परिचय करबैत अछि। 4. वाक्य स्तरपर ; ( Syntactic level) - एहि स्तरपर व्याकरण वाक्य-निर्माण कोना कएल जाए, से सिखबैत अछि। शिक्षार्थी जँ अन्य भाषा-भाषी रहैत छथि तँ हुनक भाषाक वाक्यसँ तुलना करैत विश्लेषण एहि प्रकारे ँकएल जाइछ जाहिसँ काल, वचन, संयुक्त वाक्य, वाक्य-बन्ध, वाक्य परिवर्तन, समास आदिक परिचय हुनका नीक जकाँ भए जाइन। 5. डिसकोर्स स्तरपर ;( Discourse level) - भाषामे विचार कोना उतरैत अछि तथा विभिन्न वाक्य कोना सम्वद्ध भए जाइत अछि, से एहि स्तरक व्याकरण सिखबैत अछि। ग्रिअर्सनक प्रस्तुत मैथिली व्याकरणके ँजखन पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरणक दृष्टिसँ देखैत छी तँ दूनू व्याकरणक अधिकांश विशेषताक लाभ अध्येताके ँ एकहिठाम भेटल सन लगैत अछि। अङरेज विद्वान तँ उचिते, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीमे शिक्षित अधिकांश मैथिल विद्वान सेहो,जेना, डा. सुभद्र झा, डा. रामावतार यादव, डा. उदयनारायण सिंह ‘नचिकेता’, डा. योगेन्द्र प्रसाद यादव, डा. सुनील कुमार झा, डा. बालकृष्ण झा प्रभृति, मैथिलीक भाषाशास्त्राीय अध्ययन अङरेजी माध्यमे ँकएलनि अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक विशेषताक व्यापक प्रचार-प्रसार अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भेलैक अछि। हिनकालोकनिक विद्वता एवं परिश्रमसँ विद्वत् समाजमे मैथिलीक स्वीकार्यता बढ़ल एवं मिथिला भाषाक विशेषज्ञक रूपमे ई लोकनि प्रख्यात भेलाह अछि। ई सभक लेल गौरवक बात थिक। आह्लादकारी अछि। किन्तु भाषा विज्ञानक क्षेत्रामे नित प्रति होइत नव-नव सिद्धान्तक स्थापना तथा तदनुसार मिथिला भाषाक अध्ययन-विवेचनसँ मैथिलीक लोक वा मैथिलीक माध्यमे ँ अध्ययन-अध्यापन कएनिहार- वा करओनिहार मैथिलीक शिक्षार्थी, जे लाभक वास्तविक अधिकारी छथि एवं डेग-डेग पर प्रयोजन होइत छनि, लाभान्वित होएबासँ वंचित छथि। अतएव, मैथिली व्याकरण वा मैथिलीक भाषावैज्ञानिक अध्ययन सम्बन्धी सामग्री वा आकर ग्रन्थक मैथिलीमे अनुपलब्धिक स्थिति अवश्य आह्लादक नहि अछि। मैथिली लिखबामे सम्प्रति अनेकहु स्तर पर अस्तव्यस्तता अछि। ओ पसरि रहल अछि। एहि अस्तव्यस्तताक प्रमुख कारण पण्डित गोविन्द झा20 आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्तिके ँमानल अछि। ई परम्परा भंजनी प्रवृत्ति भाषाहुक क्षेत्रामे प्रवेश कए गेल अछि। दीर्घकालीन परिमार्जन, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्5 मिथिला भाषाक अध्ययन ध्6परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता आएल छलैक तकरा ई स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति अस्तव्यस्त करबामे मस्त अछि। भारतक संविधानक आठम अनुसूचीमे मैथिलीके ँसम्मिलित कएल गेलाक बाद मैथिलीक प्रक्षेत्रामे व्याप्ति आएल अछि। भारत सरकार भिन्न भाषा-भाषीके ँ मैथिली पढ़बा रहल अछि। मैथिली भाषा साहित्यक प्रचार-प्रसार लेल अनेक प्रकारे ँ प्रोत्साहित कए रहल अछि तथा मैथिली केवल ‘बुच्ची दाइ’ लोकनिक भाषा नहि रहि, ज्ञान-विज्ञानक भाषा बनए, ताहि लेल प्रयासरत अछि। दोसर दिशि मैथिलीक माध्यमे ँप्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षाक अभाव तथा मैथिलीक भाषाक जे भूगोल छैक, ओहिसँ मैथिली भाषा-भाषीक पलायन एवं सम्पर्क क्रमशः कमल जएबाक कारणे ँमैथिलीक दृष्टिसँ अशिक्षित मैथिलक संख्या निरन्तर बढ़ल जाइत अछि। मैथिलीक पारदर्शिताक क्षेत्राक आरिके ँ छपटबामे ई स्थिति सहायक अछि। एहना स्थितिमे व्याकरणक, जे भाषाक अस्तव्यस्तताके ँसरिअएबैत भाषामे अनुशासन अनैत अछि, प्रयोजन बेसी होइत छैक। भाषा-शिक्षण लेल सेहो व्याकरणक महत्त्व सर्वोपरि अछि। अङरेजीअहुमे आब दुर्लभ एवं सामान्यजनक लेल अबोधगम्य जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरणक पण्डित गोविन्द झा द्वारा भेल मैथिली अनुवाद एवं प्रकाशनसँ बेसी लाभक सम्भावना अछि। एहिसँ मिथिला भाषाक अध्ययनक क्षेत्रामे ग्रिअर्सनक की अवदान छनि, तकरहु मूल्यांकन भाषा अनुरागी सुधीसमाज कए सकताह। सन्दर्भ - 1. H.T.Colebrooke - On the Sansktit and Prakrit Languages- Asiatic Researches,1801, Misc. Essays, P.No.225 - Mait'híla, or Tirhútia, is the language used in Mit'hílà, that is, in the Sircár of Tirhút, and in some adjoining districts, limited however by the river Cusí(Causící,) and Gandhac( Gandhací,) and by the mountains of Népál; it has great affinity with Bengálí; and the character in which it is written differs little from that which is employed throughout Bengal. In Tirhút, too, the learned write Sanscrít in the Tirhutíya character and pronounce it after their own inelegant manner. As the dialect of Mit'hilà has no existensive use, and does not appear to have been at any time cultivated by elegant poets, it is unnecessary to notice it further in this place. 2. Beames -A Comparative Grammar of the Modern Aryan Languages of India, 1872. - Introduction, page No. 96 - " Crossing the Kusi river, and going westwards, we come into the region of Maithila, the modern Tirhut, where the Language is Hindi in type, though in many of its phonetic details it leans towards Bengali." 3. A. F. Rudolf Hoernle- A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Introduction page V. 4. Sir George Campbell - Languages of India, including those of the Aboriginal Tribes of Bengal,1874, Page No.60. 5. Rev. S.H.Kellogg, A Grammar of the Hindi Language, para 450, page No. 230,1876.- In the dialects of Bhojpur and Tirhut we have a still wider divergence; from High Hindi type conjugation and a close approximation, in the y of the perfect and, in Tirhut in the substantive verb Nh to the Bengali system. 6. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, page.V. - Seventhly, the Maithili or the dialect of the district of Tirhút, spoken about Muzaffarpur and Darbhanga. It is called so after the ancient city of Mithila, the capital of Videh or modern Tirhút ((Tírabhukti). 7. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the other Gaudian Languages,1880, Page No..VI.- the Maithili especially exhibits unmistakable similiarities to the neighbouring Bengali and Nepali. Indeed, I am doubtful, whether it is not more correct to class the Maithili as a Bengali dialect rather than as a E.H one. Thus in the formation of past tense, Maithili agrees very closely with Bengali, while it differ widely from E.H. 8.. A.H. Sayce, Introduction to the Science of Language, 4th Ed. 1900, page No. 39. - (I). Beames - A Comparative Grammar of the Modern Aryan ... ... Languages of India, 1872, (II). Forbes - A Grammar of the Bengali Language, 1862, (III). Sutton - An Introductory Grammar of the Oriya Language,1831, (IV.) Trumpp- Grammar of the Sindhi Language,1872, (V) Lodiana A Grammar of the Panjabi Language, 1851,( VI)), Yates- Introduction to the Hindustani Language, 1845, (VII) , Shapunji Edalji- A Grammar of the Gujarati Lanugage, 1867, (VIII). do - The Student's Manual of Marathi Grammar, 1868. 9. BANGLAPEDIA: Grammar - first Bangla grammar, Vocabolario em idioma Bengalla, e Portuguez dividido emduas partes, written by Manoel da Assumpcam, a Portuguese missionary, in Portuguese. Assumpcam wrote this grammar between 1734 and 1742 while he was serving in Bhawal.One of the members of the calcutta school society was Radhakanta Deb who believed that without the knowledge of Sanskrit it was not possible to read, write or speak Bangla correctly. His Bangala Shiksagrantha (second edition, 1821) was essentially tied to Sanskrit grammar. Radhakanta was the first Bengali to write a Bangla grammar in Bangla.The first full-fledged Bangla grammar by a Bengali was Gaudiya Vyakaran (1833) by Rammohun Roy who wrote it in 1830 at the request of the School Society. 10. जीवनाथ राय, मैि थलीक स्वरूप आ े लख्े ा शलै ी, मिथिला मिहिर, 11 दिसम्बर 191र्5 इ. 11. डा. हरिकान्त लाल दास - नेपालमे मैथिली भाषा प्रति सेन राजालोकनिक दृष्टिकोण - सयपत्राी, राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू, वर्ष 4, 2055 साल - मैथिली विशेषांक, पृ.सं. 69 - सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि। तकर प्रमाण ओतए एक खण्डहरसँ प्राप्त किछु खण्डित शिलालेख अछि। खण्डहर निरीक्षणक क्रममे एकटा शिक्षकके ँ राजा रामसिंहदेवक समयक Slab inscription भेटलनि जकर लिपि मैथिली अछि। गत वर्ष त्रिभुवन विश्वविद्यालयक इतिहास विषयक एकटा सेमिनार सिम्रौनगढ़मे भेल छल। ओतए इतिहास विषयक प्राध्यापक डा.तुलसी रामबैद्यक नेतृत्वमे अनुसन्ध्ाान टोलीके ँ एकटा खण्डित शिलालेख प्राप्त भेलनि जकर भाषा सेहो मैथिली अछि। एहि तरहे ँ अनुमान लगाएल जाइत अछि जे कर्णाट शासनकालमे मैथिली राजकाजक भाषा छल।’ 12. डा. हरिकान्तलाल दास - ओएह, पृ.सं. 70 - कर्णाटकालमे मैथिली भाषाके ँ जे स्थान प्राप्त छलैक ताहिसँ कम महत्त्वपूर्ण सेन राजालोकनिक नहि छलैक। मोरङसँ मकवानपुर तक अभिलेखकक भाषा होएबाक अनेको कारण प्रमाण भेटैत अछि। एहि सम्बन्धमे पुरातत्त्वविद् जनकलाल शर्मा लिखैत छथि जे पूरबमे विजयपुर आ’ पश्चिममे पाल्पाक सेन राजालोकनिक स्याहा मोहर आ’ ताम्रपत्रा मैथिली भाषामे भेटब कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थिक। मोरङ पदावलीसँ ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक साहित्यकार सभके ँ मकवानपुर दरबारक अतिरिक्त विजयपुर आ’ पाल्पा दरबारमे सेहो निर्वाह होइत छलनि। विजयपुर राज्यक बोलचालक भाषा मैथिली छल। ते ँराजकाजक भाषा मैथिली बनाओल गेल होएत। दन्तकाली मन्दिरक पुजारीेके ँ विजयपुरक सेन राजा द्वारा देल गेल आदेश पत्राक भाषा प्रमाणित... ... करैत अछि जे ताहि समयमे मैथिली राजकाजक भाषा छल। पण्डित तुलारामके ँकोशी क्षेत्राक जमीन जागीरस्वरूपमे देल गेल छलनि, तकर भाषा सेहो मैथिली अछि। नेपालक एकटा इतिहासकार प्रेमबहादुर लिम्बूक कथन अछि जे सेनराजा लोहाग सेन किरात प्रदेश पर विजय कएलाक बाद ओहि क्षेत्रामे किराताक्षरक स्थानमे मिथिलाक्षरके ँ प्रचारित करौलनि। फलस्वरूप, किरात संस्कृतिमे मिथिलाक संस्कृतिक प्रभाव बहुत दिन धरि रहल। एहि सभ बातक अध्ययन कएलाक बाद कहल जा सकैछ, सेनराजा सभ द्वारा मैथिली भाषाके ँ नीक संरक्षण भेटलैक। ओलोकनि अपन काम कारबाइ तक मैथिली भाषामे कएलनि। ई बहुत महत्त्वपूर्ण बात छल।’ 13. Qouted in Languages in India,p.n.71, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002 14. Minute by the Hon'ble Sir C.E.Travelyan K.C.B., on the tests to be passed in the Native Language by the Junior Civil Servants/ Military Officers in the Nothern India. Calcutta the 25th July, 1864. - Quoted - Languages in India, page No.95, Mysore,Vol. 2: 8 Nov., 2002 - 'If we wish to encourage our officers to become good practical lingiusts, we ought to make it as easy as possible to them, and to give them the same facilities as we have at home in learning French, Italian, or any other language in which there are many dialects but only on standard.' 15. A. F. Rudolf Hoernle, A Grammar of the Eastern Hindi Compared with the others Gaudian Languages,1880, Introduction - I have adopted the term Gaudian to designate collectively all North-Indian vernaculars of Sanskrit affinity, for want of a word; not as 16. गोविन्द झा - मैथिली भाषा का विकास, 1974, पृ.सं. 50 17. Dr. Ramawatar Yadav- Maithili Lingiustic Research : State-of-the-Art -Contributions to Nepalese Studies, Vol. 27, No.1 - The standard of spoken Maithili is tacitly identified with the speech of the towns of Madhubani in Bihar and Rajbiraj in Nepal. 18. किरण समग्र, 2007, पृ. सं.266। 19. Kasturi Viswanatham - New Horizons in Language and Linguistics, page No.312, CIIL, Mysore 20. गोविन्द झा, घर बाहर, जनवरी-मार्च, 2005 - ‘आजुक परम्परा भंजनी प्रवृत्ति बड़ आयासे ँबान्हल ओहि पुरान घरके ँमानू धाराशायी करबा पर लागल अछि। की समाज, की संस्कृति, की भाषा सर्वत्रा दीर्घकालीन परिमार्जन, परिष्करण ओ परिपोषणसँ जे स्तरीयता प्राप्त भेल छल, आइ तकर भारी अवमूल्यन भए गेल अछि आ’ स्वेच्छाचार बढ़ैत गेल अछि। पण्डितक लेखनीसँ बहराएल भाषा निकृष्ट मानल जाइत अछि, निरक्षरक मुहसँ बहराएल भाषा श्रेष्ठ। एहि वैचारिक क्रान्तिक प्रभावमे पड़ि मैथिलीक बहुतो नबतुरिया लेखक ई मानि बैसलाह अछि जे सर्वसाधारणक मुहसँ जेना सुनैत छी तहिना लिखब शुद्ध थिक। एहि धारणाक कारणे ँ मैथिलीक वर्तनीमे जे किछु एकरूपता आएल छल, सेहो ध्वस्त भए रहल अछि। स्वच्छन्दतावादी लोकनिके ँई बुझबाक चाहिअनि जे उच्चारणक अनुरूप लिखब कोनो प्रचलित लिपिमे नहि छैक।’ वीरेन्द्र यादव लघुकथा- बाबा गाछी आमक फलसँ लदल गाछ। बिनु ओगरबाहक बाबा गाछी, तुलसीया चाँपक कछेरमे। तुलसिया गाममे अभिजातवर्गक लोक सबहक संगहि एक घर अछोप छल। राजू डोम पढ़ल-लिखल छल। सरकार आरक्षणक पक्षमे ओइ ग्राम-पंचायतकेँ आरक्षित कए देलक। गामक प्रमुख लोक सभ मिल विचार कए राजूकेँ मुखिया आ मोहिनीकेँ प्रतिनिधि चुनलक। मोहिनी ओइ गामक पैघ शशिबाबूक पुत्रवधु छलीह। मोहिनीक पति दिन-राति गाजा-भाँग पीब, बिनु धीया-पुता जनमोनहि स्वर्ग चलि गेल। प्रतिनिधि सबहक सम्मेलनि भेल। जइमे पहिल बेर मोहिनी आ राजूक भेँट भेल। ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पाथर जकाँ गड़ि गेल। दुनूक मोनमे एक दोसरकेँ अपनेबाक आगि सुनगए लगल। पिपरीतक आतुरतामे मोहिनी चेतक वेसाखक रौदमे पियासल हिरणी जकाँ बाबा गाछीक रास्ता पकड़ि लेलक। बापक हुरकुचनिपर राजू बाबा-गाछीक बगल चाँपमे सुगर टहलाबए गेल छलए। मोहिनीक नजरि राजूपर पड़ितहि पीरीतक लहरि उमड़ि पड़ल। ओ राजूकेँ कहलक- “एम्हर गाछक छाँहमे आउ, ओतय रौदमे किअए खून सुखबै छी?” एतेक बात सुनितहि राजू गाछक लग आबि गेल। मोहिनी अपन पीरीतक पियास बुझाबए लेल झपटि कऽ राजूकेँ पकड़ि लेलक मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बुझि मोहनीसँ हाथ छोड़ौलक। मोहनी पकरा पढ़ैत बाजल- “ओ राजू...।” पियासल मानय धोबी घाट आ प्रीत नै बुझए ओछी जात। राजूक देहपर मोहनीक हाथक स्पर्शसँ हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेल जे ई चमत्कारिक बात छी जे एतेक पैघ घरक पुत्रवधुक लगमे हम बैसल छी। मोहनी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदेमे छी, हम अहाँकेँ इश्वरसँ आगा मानै छी। हमर जिनगीक संगी बनबाक लेल......।” एतेक बात सुनितहि राजू बाजल- “ई केना हएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँपर नजरि पड़िते हमहुँ ई सुधि बिसरि गेलौं जे हम अछूत छी।” मोहनी बाजल- “इंसान अछूत नै होइछ। कर्मसँ लोक ऊँच-नीच होइत अछि। मनुक्खक जिनगीमे शिक्षा आ व्यवहारक महत्व छैक। डाॅ. भीमराव अम्बेदकर जातिसँ अछोप छल मुदा अपन शिक्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलनि जे समाजक आगूक श्रेणीमे हुनक स्थान छन्हि।” मोहनी आ राजूक प्रेम पंसंगक बीचेमे कलुआ, जे शशिबाबूक मुँहलगुआ आ चालिसँ चुगला छल, किछु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि दिस जाइ छल। कलुआपर नजरि पड़ितहि राजू डेराय गेल आ नुकएबाक चेष्टा कएलक। मोहनी राजूकेँ हिम्मत बन्हैत अलग भऽ गेलि आ फेर दोसर बेर भेटबाक निश्चय कएलक। ऐ प्रेम प्रसंगक बीया सौंसे गाम छीटैत कलुआ शशिबाबूक दलानपर आबि गेल आ सकपकाइत शिशिबाबूकेँ कहि बैसल। गामक पैघ लोक सभ शशिबाबूक दलानपर आबए लगल। हिम्मत बान्हि कलुआ मोहनी आ राजूक प्रेम प्रसंगक चर्चा शशिबाबूकेँ पुन: सुनौलक। गामक लोक सभ चढ़ाव-उतारक बात बाजए लागल। मुदा अधहा जीभे, किएक तँ शशिबाबू ओइ जमानाक ग्रेजुएट छथि जइ समैमे बड़ थोड़ लोकसभ पढ़ैत-लिखैत छल। शशिबाबूक समझदारी आ जमींदारीक दाओ-चाप ओइ इलाकामे छल। शशिबाबू बाजलाह- “राजूक बाप रामा डोमकेँ बोलाओल जाए।” धीरू पहलवान रामा ओइठाम पहुँच रामाकेँ सभटा बात बताबैत, रामाकेँ संगे मालिकक दलानपर आएल। रामा डोम दारू पीब मस्त छल। दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “मालिक जे हुकुम।” कलुआ बाजल- “रे रामा, दुइ दिनमे ऐ गामसँ चलि जो। फेर धुमि कऽ ऐ गाममे नै अबिहेँ।” रामा मालिकक आदेश सुनि बाजल- “अहाँक हुकुमक पालन करब।” कहि ओइठामसँ विदा भऽ गेल। घर पहुँच रामा, राजूकेँ थप्पड़ मारैत कहलक- “तोरा होश-हबास नै। एतेक भारी जुलुम किएक केलँह।” राजू बाजल- “बाउ, हमर कोनो दोख नै छौ।” रामाक गोसा शांत भेल। भोरहरबाक चारि बजिते, बगगलक गामसँ अजानक आबाज सुनिते मोहनी घरसँ बहार भऽ बाबा गाछी आएलि, ओतए राजू सेहो छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि पड़ाए गेल। भिनसर होइते ई खबरि आगि जकाँ सौंसे गाम पसरि गेल। शशिबाबू गामक लोकसँ विचार करैत थानामे अपहरणक रपट दर्ज करबौलक जइमे राजूआ रामाक नाम देलक। ओम्हर राजू, मोहनीक संगे कोर्ट मैरिज कएलक आ किछु दिन अनतय रहबाक निश्चय कएलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलिस पकड़ि, मारबो-पिटबो केलक आ जहल पठा देलक। राजू ई खबरि सुनिते मोहनीक संगे कोर्ट गेल। बाप रामासँ भेँट कएलाक उपरान्त कोर्टमे हाजिर भेल। रामाक जमानत करौलक आ तीनू गोटे गाम दिस विदा भेल। रातिमे रामा, राजू आ मोहनी गाम आएल। भोर होइते सौंसे गामक लोक शशिबाबूक दलानपर आबए लगल। कियो बाजए- “ई डोमरा छातीपर मुँह दररि देलक।” कियो कहए- “एहन जुलुम कहियो नै भेल छल।” ऐ तरहेँ चुपचाप शशिबाबू सबहक बात सुनैत रहल। किछु कालक बाद बाजल- “हे यौ समाज परिवर्तन दुनियाँक नियम थिक। काल्हिक ऊँच आइ गहींर, काल्हिक पैघ आ बरोबरि। बदलैत कालचक्रसँ किछु सिखबाक चाही। आब अपना सभकेँ ऐ तथ्यकेँ स्वीकार करबाक अलाबा कोनो चारा नै अिछ। मोहनी विधवा पुत्रवधु छी, जन प्रतिनिधि सेहो बना देलयनि। समाजकेँ सही आ नव दिशा देबाक लेल प्रतिनिधि होइछ। अपना सभ रूढ़िवादी विचारक तियाग करू। विधवा विवाह होएबाक चाही। संगहि ऊँच-नीचक भेद भाव छोड़ू। सभलोक इश्वरक संतान छी। कियो ऊँच-नीक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक इश्वरक संतान छी। अंतरजातीय वियाहकेँ सरकार प्रश्रय दैत अछि। ऐ अवसरपर अहाँ सभकेँ हम आमंत्रित करै छी जे सांझमे सामाजिक रिति-रिबाजक अनुसार मोहनी आ राजूक वियाह होएत।” एतेक बजैत शशिबाबू उठि गेलाह आ कलुआक संगे रामा डोमक घर दिस विदा भेलाह। साँझमे राजू दुल्हा बनि बरियातीक संगे गाजा-बाजाक संग शशिबाबूक दलानपर पहुँचल। मोहनी आ राजूक िवयाह भेल। िवयाहक अवसरपर शशिबाबू घोषणा केलथि जे- दोसर टोल गरही कामत परक घर-दुआरि आ चालीस एकड़ जमीन माेहनी आ राजूक भेल। ऐ तरहेँ आधुनिक समाजवादी समाजक लोक जकाँ राजू आ मोहनी जीवन-बसर करैत ग्राम पंचायत प्रतिनिधित्व करए लगलाह। बेचन ठाकुर नोमीनेशन रामपुर पंचायतमे मानटूनक नाम नवका सत्रमे सरकार दिससँ अत्यन्त पिछड़ी जातिक लेल महिला आरक्षणक तहत आरक्षित कऽ देल गेल। अइ आरक्षणसँ लाभ पबैक मादे अति प्रसन्न भऽ मानटून घरवाली रामबतीसँ पूछलक- “गै, हमर विचार अछि जे अइ बेर तँू मुखियामे ठाढ़ होइतें। ई मौकी नै छोड़ितें।” रामबती खीसिया कऽ बाजलि- “र्इ बात बजैमे तोरा कनिको संकोच नै भेल।” हम आइ तक कोट-बेलौक नै गेलौं आ कोनो हाकिम-हुकुमसँ गप-सप्प नै केलौं। एत्ते तक जे कोनो बाहरी लोकक आगू मुँह नै उठौलौं। से जनानी जतऽ-ततऽ बौआइत! ई िकनो नै मानब।” बेचारा मानटून गुम्म पड़ि गेल। फेर किछु कालक पछाति हिम्मत कऽ पुचकाइर कऽ कहलक- “तूँ ही कह, जखन सरकार अपना सभकेँ आगू बढ़ैक अधिकार देलक तँ ओइसँ फायदा किअए नै उठाबी। मुखियाक काज समाज सेवा छी। सौंसे पंचायत प्रतिष्ठा भेटतौ।” ई बात सुनि बेचारी तत-मतमे पड़ि गेली। किछु काल पछाति बेचारी मुस्की दैत बाजलि- “तोहर कहल काटियो तँ नै सकै छी। चलऽ देखल जेतै, जे हेतै से हेतै। काल्हि नोमीनेशन कराए दए।” छल-बल मदनपुर पंचायतमे चुनावक सरगर्मी बड़ जोरपर छलै। मुस्की दैत मनोज बाजला- “मुनीलाल भाय, अपन समाजमे मुखिया पदक लेल अहीं जकाँ कर्मठ आ इमानदार लोकक खगता छै।” अइपर खीसिया कऽ मुनीलाल बजला- “से किअए यौ? सभसँ बुरबक दीनेनाथ।” मनोज मुस्का देलनि आ बाजल- “खीसिया गेलौं भाय। सच्चो कहै छी। अपन पंचाइतमे अहाँसँ योग्य आर कियो लोक कहाँ छै। खाली गरीबेटा ने छी।” मुनीलाल गिड़गिड़ा कऽ बजला- “भाय, अहीं ठाढ़ होउ। तन-मनसँ मदति करब। अहाँसँ बुजुर्ग अइ पंचायतमे आर के?” मनोज मुसकियो देलनि आ बजला- “हमरा सभकेँ आरक्षण नै अछि तँए। नै तँ िनश्चिते ठाढ़ होइतौं। मुनीलाल भाय, अहाँकेँ ठाढ़ निश्चित हेबाक अछि। तन-मन धनसँ मदति करब।” किछु सोचि कऽ मुनीलाल बजला- “भाय, अपने गामक मालिक छिऐ। अपनेक कहल हमरा मानए पड़त, जौं अहाँ सहाय छी।” ओही पंचायतक पाँच सए पोलबला सतना गामक प्रत्याशी मनोजक खानगी दोस सोमन आ एकटा आन प्रत्याशी सुकन चुनावसँ एक दिन पहिने रातिमे चोरा कऽ भरि पंचायतमे ख्ूब पाइ बँटलनि। चुनावक पछाति परिणाम आएल। सोमनकेँ दू हजार भोंट भेटलनि, मुनीलालकेँ दू सए आ सुकनकेँ उन्नैस सए। विहान भने पंचायत भवनपर आयोजित सभागारमे िनर्वाचित मुखिया सोमन प्रसन्न मने कहलनि- “धनि बाइस सए पोलबला चन्दनपुर गाम आ मनोज मालिक जे आइ मुखिया बनलौं।” अपन वार्ड सदस्य मोहितसँ ई बात सुनि घरपर मुनीलालकेँ बोम पाड़ि कना कऽ बजा गेलै- “बिना छल-बलक एलेक्शन जीतनाइ असंभव।” चल आइये आश्चर्यचकित भऽ राम बाजल- “रहीम भाय, एक्को महीना मुंबइ एना नै भेल आकि फेर गाम जाइ छेँ। की कारण छै?” रहीम हँसि कऽ बजला- “राम भाय, नाझलुहु। गाममे एलेक्शन हइ न। जोगी मुखिया गामपर खूद आबि कहि गेल ह, बाहरबलाकेँ भोँट खसाबै लऽ गाम एबाक लेल अबै-जाइक भाड़ा आ दारू फ्री।” कनीकाल गुम्म भऽ आ किछु सोचि कऽ राम बाजल- “भाय, हमरा मुंबइ एना एक सप्ताह भेल। ई बात हमरा नै बुझल छल। जौं ई बात छै तँ चलह आइये।” डाक डकोबलि मुस्की दैत मुखियाजी- “की हौ फेकन भैया। काल्हि नोमिनेशनमे चलैक छै।” ऐपर खीसिया कऽ फेकन बाजल- “कोन सपेत-के यौ?” आश्चर्यमे पड़ि मुखियाजी बाजला- “बिसरि गेलहक। काल्हि साँझमे जे पोलीथिन लेल दूटा नमरी देने रहियह।” ऐपर मुस्का कऽ फेकन जबाक देलक- “से तँ मने अछि मुदा लुटनबाबूकेँ कोना बिसरि जेबै जे आइ भोरे भोर नोमीनेशनमे जाइ लेल आ खाइ-पीये लेल पाँच सए टाका अपने दऽ गेला। हुनकामे मार्शलक व्यवस्था सेहो छै।” आशीष अनचिन्हार बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी जहिआ सनातन धर्ममे पुराण-उपनिषद् के आगमन भेल रहैक, तहिआ देवी-देवताक संख्या ३३ करोड़ रहैक। आजुक समयमे जखन कि पौराणिक समय बितला बहुत दिन भए गेल तखन देवी देवताक संख्या कतेक हएत ? हमरा बुझने ३३ करोड़सँ बेसिए। तथापि सुविधाक लेल एकरा यथावत् मानू। आ एतेक देवी-देवताक अछैतो छीनरदेवीक आविर्भाव किएक? उत्तर हम नै देब कारण ई गप्प सभ जनैत छथि मुदा लोक ऐ उत्तरकेँ नुका कऽ रखैत अछि। आ संभवतः छीनरदेवीक ऐ रूपकेँ छिनरधत्त कहल जाइत छैक। ओना एकरा बादमे हम निरुपित करब। ओइसँ पहिने एकटा आरो महत्वपूर्ण प्रश्नपर चली। जँ अहाँ श्री बेचन ठाकुर कृत ऐ नाटककेँ नीकसँ पढ़ब तँ ई बुझबामे कोनो भाँगठ नै रहत जे ऐ नाटकक मूल स्वर अंधविश्वासपर चोट करब छैक। आ जखने अहाँ ऐ निषकर्षपर पहुँचब, अहाँकेँ तुरंते प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़ि जेताह से उम्मेद अछि। आ जखने अहाँकेँ प्रो. झा मोन पड़ताह तखने हमरा मोनमे ई प्रश्न उठत जे प्रो. झा जइ प्रबलतासँ अंधविश्वासपर कलम चलेने छलाह तकरा बाबजूदो ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐ पर कलम चलेबाक जरूरति किएक पड़लनि ? एकर दूटा कारण भऽ सकैत अछि पहिल जे प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै ( हम ई नै कहि रहल छी जे ई प्रो. झाक हारि थिक कारण हरेक लेखकक एकटा सीमा होइत छैक) आ दोसर कारण भऽ सकैत अछि जे बेचन जीकेँ कोनो बिषए नै भेटल होइन्ह आ मजबूरीमे ओ ऐ पर कलम उठेने होथि। मुदा आइ बर्ख २०-११ मे जखन गामे-गाम घूमै छी आ ओकर आंतरिक स्थितिकेँ परखैत छी तँ दोसर कारण अपने-आप खत्म भऽ जाइत अछि। आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि। आ एकरा संगे ईहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे प्रो. झाक बादो ई अंधविश्वास मरल नै। आ एहने समयमे हमरा लग ई प्रश्न बिकराल रूप धऽ आबि जाइत अछि जे प्रो. झाक बाद जे नाटककार भेलाह ( चूँकि बेचन ठाकुर जीक विधा नाटक छन्हि तँए हम नाटकेक दृष्टिसँ गप्प करब) से एतेक दिन धरि की करैत छलाह ? आब हम ऐ प्रश्न सबहक उत्तर ऐ ठाम नै लिखब। एकर कारण अछि जे हमरा सदासँ विश्वास रहल अछि जे साहित्यिक संदर्भमे वर्तमान समयक उत्तर जँ भविष्यमे प्राप्त हुअए तँ ओ बेसी सटीक आ सार्थक होइत छैक।अस्तु श्री बेचन ठाकुर जीसँ मैथिली मंचकेँ बड्ड आस छैक आ तइ आसकेँ पूरा करबाक तागति भगवान हुनका देथिन्ह तइ आसाक संग चली हम प्रेक्षक समूहमे। कोनो नाटक पहिने लिखल जाइए आ तकर बाद ओ टाइप होइए वा सोझे टाइप कएल जाइए आ तकर बाद कखन छपैए, मंचनक बाद वा मंचनक पहिने; ऐ सभमे आब कोनो अन्तर नै रहलै। जॉर्ज बर्नार्ड सॉ शॉर्टहैण्डमे लिखै छलाह आ हुनकर स्टेनो ओकरा लौंगहैण्डमे टाइप करै छलीह। बिनु छपने मैथिली धूर्तसमागम मैथिलीक पहिल पोस्ट मॉडर्न अबसर्ड नाटक अछि। ई तर्क जे छपलाक पहिने मंचन भेलासँ बहुत रास कमी दूर भऽ जाइए, ऐ सन्दर्भमे मलयालम कथाकार बशीरक उदाहरण अछि जे सभ नव छपल संस्करणमे अपन कथामे नीक तत्व अनबाक दृष्टिसँ संशोधन करै छलाह, ई कथामे सम्भव तँ नाटकमे तँ आर सम्भव। तँ सिद्ध भेल जे लिखल जेबाक वा छपि गेलाक बादे नाटकक मंचन हएत आ मंचनक बाद लिखल वा छपल दुनूमे सुधार सम्भव। बेचन ठाकुरजी रंगमंच निर्देशक सेहो छथि आ विगत २५ बर्खसँ अपन गाममे मैथिली रंगमंचकेँ जियेने छथि बिना कोनो संस्थागत (सरकारी वा गएर सरकारी) सहयोगक। हिनकर रंगमंचपर हिनकर दर्जनसँ बेसी नाटकक अतिरिक्त गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक, एकांकी आ बाल नाटकक मंचन सेहो भेल अछि। बेचन ठाकुरजीक नाटक बेटीक अपमान हम व्यत्तिगत रुपेँ हरियाणाक प्रायः-प्रायः प्रत्येक कोणमे रहल-बसल छी आ तँए स्थानीय जनताक रुपमे हरियाणामे कत्तौ घुसि जाइत छी। एकर हानि हमरा जे भेल हुअए मुदा लाभ एतेक तँ जरुर भेल जे हम स्थानीय परेशानी बुझए लागल छिऐक। ओना हरियाणाक नाम सुनिते मोनमे समृद्धिक नजारा देखाए लगैत छैक। भरल-पुरल खेत सुझाए लगैत छैक। मुदा एहिठामक स्थानीय समस्या बहरिआ लोककेँ नै बुझल छैक। ऐठाम हरेक साल १००-१५० लड़काक बिआह दोसर राज्यक लड़कीसँ होइत छैक। जँ सोझ ढ़ंगे कही तँ हरियाणाक सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) असमान अछि। अर्थात १००० लड़कापर ८५०-९०० लड़की। आब अहाँ सभ हमरा हूट करबाक सोचि रहल हएब। प्रस्तुत पोथी मैथिलीक अछि आ हम हरियाणाक गप्प कऽ रहल छी से अहाँ सभकेँ उन्टा लागि रहल हएत। मुदा ऐठाम हम ई कहए चाहब जे मात्र स्थान आ मनुख बदलि जाइत छैक, मनोवृति आ समस्या वएह रहैत छैक। आब हम अही समस्याकेँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे सोची। बेसी अंतर नै भेटत आ से ऐ द्वारे जे नेपालमे सेहो मिथिला छैक। आ भारतक मिथिला आ नेपालक मिथिला दुनूमे बिआह प्रचलित छैक। तथापि जँ भारतक हिसाबे सोची तँ बिहारमे १००० लड़कापर ९२१ लड़की छैक ( ओना जँ २०११ क जनगणनाक प्रोविजनल रिपोर्ट देखब तँ संपूर्ण भारतमे १००० लड़कापर ९४० लड़की छैक)। आ जँ ऐ समस्याक परिप्रेक्ष्यमे विकसित हरियाणा आ अविकसित मिथिलाकेँ देखी तँ कोनो बेसी अंतर नै बुझाएत। अर्थात ऐ समस्यासँ दुनू क्षेत्र ग्रसित अछि। मुदा ई आब बिचारए पड़त जे ई समस्या कहाँसँ निकलैत छैक? कोन मनोवृतिसँ ई समस्या परचालित होइत छैक ? आखिर ई कोन दृष्टिकोण छैक जइ तहत लोक बेटी नै चाहैत अछि आ ऐ लेल भ्रूण हत्या सन पाप करबासँ सेहो नै हिचकैत अछि ? मिथिलाक हिसाबे गप्प करी तँ दहेज प्रथाकेँ एकर जिम्मेदार ठहराओल जा सकैए मुदा हरियाणाक हिसाबें ई कारण ओतेक प्रभावी नै कारण हरियाणामे दहेज प्रथा नै कऽ बराबर छैक। तँए हम दहेजकेँ भ्रूण हत्याक एकटा कारण मानैत छी मुदा प्रमुख कारण नै। हमरा हिसाबे ऐ समस्याक प्रमुख कारण एखनो आधुनिक कालमे बेटाकेँ अनिवार्य मानब अछि। एकर समाजिक आ आर्थिक, दुनू पक्षमे बाँटए पड़त। समस्या आ साहित्य दुनू एकै चीजक अलग-अलग नाम थिक। बिना समस्या कोनो साहित्य नै भऽ सकैत छैक। आ अंततः साहित्ये कोनो समस्याक समाधान तकैत छैक। मुदा मैथिली साहित्य एकर अपवाद अछि। ऊपर हम देखिए चुकल छी जे कोना मिथिला भ्रूण हत्याक समस्यासँ ग्रसित अछि। तथापि ऐठामक साहित्यकार ऐपर कलम नै चलौलन्हि। घोर आशचर्यक बिषए। आशचर्यक बिषए ईहो जे एहने-एहने समस्यासँ कतिआएल साहित्यकारकेँ आलोचक आ मठाधीश सभ बढ़ाबा देलथि। कोनो समाज कोनो समस्यासँ कतिआ कऽ बेसी दिन नै रहि सकैत अछि। एकर अनुभव हमरा श्री बेचन ठाकुर लिखित नाटक " बेटीक अपमान" पढ़लापर बुझाएल। आ संगहि-संग ईहो बुझाएल जे आब बेसी दिन मिथिला सूतल नै रहत आ ने बेटीकेँ खराप बुझल जाएत । विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंच मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि.. Gajendra Thakur मलंगिया जीक एकटा बयान आयल रहए, जे विदेहमे सेहो आएल रहए, ओ कहने रहथि जे नेपाली नाटकक स्थिति बड्ड दयनीय छै, मुदा ओतुक्का रंगकर्मीक प्रशंसा केने रहथि। विदेहक ऐ न्यूजक बाद हमरा जनकपुरमे हंगामा भेल रहै आ हमरो मेल पर नेपालसँ ढेर रास मेल आएल रहए, ई लिखैत जे मलंगिया जी जइ थारीमे खेलन्हि ओहीमे छेद केलन्हि। हुनकर मैथिली एकांकी संग्रहमे संकलित एकांकी सभक संकलन हुनकर नाटकीय सोचपर प्रश्न लगबैत अछि। ओइमे किछु एहेन एकांकी राखल गेल जे कहियो कोनो रूपमे नाटककार/ रंगमंचकर्मी नै रहथि; ओतै बहुत रास श्रेष्ठ नाटककार जातिक आधारपर बारल गेलाह। ओइ संग्रहक (साहित्य अकादेमीसँ २००३ ई.मे प्रकाशित)क भूमिकामे मलंगिया जीक अभद्रता ओही तरहेँ अछि जेना २०१० ई.मे प्रकाशित हुनकर छुतहा घैलमे अछि.. हुनकर जातिगत कट्टरता आर बढ़ल अछि। हुनकर सोच आर घटल अछि। Ram Bharos Kapari Bhramar Sthiti aab spast bharahal aichh.Chintaniya aa bicharniye bat aichh. Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 09:08 • Like • 3 Lalit Kumar Jha SRIMAN APAN SOCH BADHAU DOSAR KE SOCHAK CHINTA JUNI KARU Monday at 09:10 • Like • 1 Ashish Anchinhar जहिया गजेन्द्र ठाकुर आ भ्रमर अपन सोच बदलि लेता तहिया मैथिली मरि जाएत। Monday at 09:12 • Like • 4 Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... Monday at 09:14 • Like • 4 Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि। पहिने ऐ भूमिकापर आउ। हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झा “रमण” हुनका सुझाव देलखिन्ह जे “छुतहर घैल”केँ मात्र “छुतहर” कहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल- “तों कहियो पोथी के लेखी, हम कहियो अँखियन के देखी।” दोसर- यात्री जीक विलाप कविता- “काते रहै छी जनु घैल छुतहर आहि रे हम अभागलि कत बड़।” आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै? तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोक “छुतहर घैल” बजिते छैक!! मुदा ऐ तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि। “अँखियन देखी” आ लोकव्यवहार “छुतहर” मात्र कहल जाइत देखलक आ सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरा “लोइट घैल” कहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना ऐ सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्र “रमण” (प्रायः फूलचन्द्रजी “छुतहा घैल” शब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, आ जँ नै तँ ई एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!)क सुझाव मानैत मलंगिया जी “छुतहर घैल” केँ “छुतहा घैल” कऽ देलन्हि, ई ऐ गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झा “रमण”क गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। आ बादमे रमानन्द झा “रमण” चेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह आ, चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ ओ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, ऐ सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे आ कोन दुनूमे, से ओ छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। आ फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जी “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” लिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ “घैल छुतहर”, “छुतहर घैल” वा “छुतहा घैल” बाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह। कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः ओ गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल आ कॉपरनिकस पोप पॉल-३ केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता आ विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब। Monday at 09:17 • Like • 4 Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल------“अली बाबा आ चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जे “अरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि आ ओइमे विवाद अछि जे ई अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा ई मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, ऐ मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकँण देखार करैत अछि। “मिथिला तत्व विमर्श” वा “रमानाथ झा”क पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, आ तेँ ई लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखन “तहसीलदारक दाढ़ी” कतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकरा “छुतहा घैल” कऽ दियौ, लोकक कण्ठमे “कर ओसूली”करैबलाक दाढ़ी छै ओकरा “तहसीलदार”क दाढ़ी कहि साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, आ तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झा “रमण” आ आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक आ एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय)क झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल आ ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे ई गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक आ लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत। महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। आ असल कारण जइ कारणसँ ई मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि ओ छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, आ भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह ओ सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि आ भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि। Monday at 09:19 • Like • 4 Ashish Anchinhar गजेन्द्र ठाकुर- छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल----मलंगियाजीक ई कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत? हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? आ मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताक “बुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी आ ऐ सभक सम्मिलनक ई “स्लैपस्टिक ह्यूमर”? आ जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही आ जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? आ जँ नै तँ ऐ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा आ काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ ओ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे ओ ऐ निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद ई धरि सुधार आएल छन्हि जे ओ आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, ई सुधार स्वागत योग्य मुदा ऐ दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै आ गाजा कोना एलै आ ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, आ भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता आ निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, ई तथ्य ओ बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, आ तेँ ओ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। आ तेँ हुनकामे ऐ नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि। Monday at 09:19 • Like • 4 जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी: Lalit Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. Monday at 10:09 • Like Ashish Anchinhar मलंगिया जीक नाटक विद्वेष बढ़बैत अछि, हुनकर राड़ आ शोल्कन्हक प्रति आ ओकर भाषाक प्रति घृणा गएर ब्राह्म्ण केँ मैथिलीस‘ं दूर केलक अछि। Monday at 10:12 • Like • 4 Ashish Anchinhar lalit ji ahank pita aa ahank bhasha dunu ekke tarahak achhi, abhadra Monday at 10:12 • Like • 4 Ashish Anchinhar मलन्गिया जी छेड़ि घिनौने छथि Monday at 10:13 • Like • 4 Ashish Anchinhar Lalit Kumar Jha---ठीके कहैत छी भाइ ओना एकटा गदहाक मर्म दोसरे बड़का गदहा बुझि सकैए। एहि मामिलामे मतलब गदहपनमे अहाँ हमर सीनियर भेलहुँ। सधन्यवाद भाइ|... लिद्दीक ज्ञान देखि हम आर बेशी सन्तुष्ट छी , अहाँ अवश्य गदहपनमे हमर सीनियर भेलहुँ Monday at 10:14 • Like • 4 Ashish Anchinhar ललित जी अहाँ आ अहाँ पिता मलंगिया जी दुनू गोटेक भाषा एक्के तरहक अछि.. अभद्र Monday at 10:15 • Like • 4 Umesh Mandal मलंगिया जीक जीवनक प्रभाव हुनकर बच्चापर देखबामे अबैत अछि.. एतेक असभ्य? हुनकर (मलंगिया जी क) नाटक लोककेँ घृणा करब सिखेने अछि से सिद्ध भेल। ललित जी, गजेन्द्र ठाकुरक मैथिली/ अंग्रेजी/ तिरहुता मैथिली सभटा ग्रन्थक सूची एतए अछि: गजेन्द्र ठाकुर प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf विदेहक सदेह (प्रिंट) अंक VIDEHA print form विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक रचनाक संग containing matter from first 25 issues of Videha e-magazine देवनागरी वर्सन SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_DEVNAGARIVERSION_PART_2.pdf तिरहुता वर्सन SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_1.pdf SADEHA_VIDEHA_TIRHUTAVERSION_PART_2.pdf विदेह ई-पत्रिकाक २६ म सँ ५० म अंकक बीछल रचनाक संग containing matter from 26th to 50th issue of Videha e-magazine विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक PANJI_CRC.pdf - File Shared from Box - Free Online File Storage www.box.com Monday at 10:32 • Unlike • 4 Umesh Mandal ललित जी, सात जन्म लेबए पड़त अहाँकेँ आ मलंगिया जी केँ, अहाँ लिद्दीक विश्लेषण करैत रहू Monday at 10:33 • Unlike • 5 Ashish Anchinhar ललित जी तँ गदहा छथि तँए खाली लिद्दिएक विश्लेषण कए सकैत छथि Monday at 10:48 • Like • 4 Shiv Kumar Jha सात जन्म नै ललित जी,आ मलंगिया जी केँ,सत्तरि जन्म लेबऽ पड़तन्हि। Monday at 10:55 • Like • 3 Sanjay Kumar Jha हद क देलियै अपने सब. अपना मे लड़ी क , गारी फज्जती क क की मैथिलि आ मिथिला के निक होयत, इ अहाँ सब सोचलाहूँ एको बेर. बंद करू इ प्रलाप आ सब गोटे मिली के एहन काज करू जाहि से की मैथिलि आ मिथिला के उन्नति हुअय. धन्यवाद. Monday at 22:02 • Like • 1 Gunjan Shree आई काल्हि सब एक दोसरा के दुसबा मे लागल अछी,जौ कियो ग़लत केलक अछी त जिनका खराब लगलैन्ह हुनका चाही जे ओहि सौ आगू आबि क ओहि सौ बढ़िया करै,कोनो डैरि(line) के मेटा क छोट केनेय छोट लोकक काज होइत चेक,ओना facebook पर इ सब झगड़ा नही करय जाय से निबेदन..... Tuesday at 02:30 • Like • 3 Vinit Utpal दिल्ली मे भेल साहित्य अकादमी कथा गोष्ठी मे मलंगिया जी के सुपुत्र अप्पन पिताजीक नाम से पुरस्कार शुरू करबाक लेल लोक सें निहोरा करैत छलाह. अहि लेल अजित आजाद जी के खुशामद सेहो करैत छल जे अहां हमर बाबूजी के नाम पर अहि काजक ले आगा आबू. अजित आजाद जी के कहब छल जे अहि लेल एक लाख टका अहां कोनो संस्थान के जमा क दियो आ ओकर ब्याज से पुरस्कार शुरू भ जायत. मुदा हमरा जानल ई गप आगू नहि बढ़ल. ललित जी, अहिना गजशास्त्र लिखैत रहू. अहां के बुझले होयत जे 'हाथी चले बाजार, कुत्ता भूके हजार'. हाथी के डर से जंगल के राजा नुकायल घुरैत अछि आ अहां ते चिट्टा ते छी नहि जे गज के नाक मे घुसि के किछु क सकब. Tuesday at 04:35 • Unlike • 4 Ashish Anchinhar गुंजन बौआ, ई ककरो दुसबाक नै वरन् मलंगिया जीक जातिवादी रंगमंचक विरोध छै, आ ओइसँ कए किलोमीटर पैघ डैरि बेचन ठाकुर जी द्वारा खीचि लेल गेल छै, देखल जाए http://maithili-drama.blogspot.in/ विदेह मैथिली नाट्य उत्सव maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 07:28 • Like • 4 • Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/09/blog-post_25.html Tuesday at 09:28 • Like • 3 Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_1815.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: बेचन ठाकुर -बाप भेल पित्ती maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Like • 3 Umesh Mandal http://maithili-drama.blogspot.com/2011/08/blog-post_8210.html विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: अधिकार- बेचन ठाकुर maithili-drama.blogspot.com Tuesday at 09:29 • Unlike • 5 Umesh Mandal जाधरि समीक्षाकेँ खिच्चातानी आ खिच्चातानीकेँ समीक्षा अहाँ बुझैत रहबै गुंजनश्रीजी, ललित जी आ संजय जी ताधरि अहाँसभ अहिना ओझरीमे रहब, Tuesday at 09:36 • Unlike • 5 Ashish Chaudhary कलकत्तामे गंगा झा छथि, नाट्य निर्देशक, ओ मलंगिया जीसँ कहलखिन्ह जे नाटकमे जातिवादी गारि कम कऽ दैले तैपर हुनका मलंगियाजी जवाब देलखिन्ह जे मलंगियाजीकेँ जतेक गारि अबै छनि तकर दसो प्रतिशत नाटकमे नै आएल छै, शर्मनाक। Yesterday at 06:23 • Like • 2 Ashish Chaudhary बेचन ठाकुर नाटककार आ नाट्य निर्देशक http://maithili-drama.blogspot.in/p/blog-page.html मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार आ नाट्य निर्देशकक रूप्मे उभरि कऽ आएल छथि, तै पाछाँ बेचन जीक उत्कृष्ट जिनगी आ सोच छन्हि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव: पेटार maithili-drama.blogspot.com Yesterday at 06:26 • Like • 2 Ashish Anchinhar मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक जन्मदाता: सभसँ बेसी मैथिली नाटकक निर्देशन: राजरोगसँ दूर: जातीय रंगमंचक विरुद्ध बेचन ठाकुर जीक संघर्ष (मुन्नाजी आ अजित आजादक सोझाँमे मलंगिया जीक भड़ैत प्रकाश झा जकरा लेल कहै छथि- भरि दिन केश काटैत रहै छल- पाठकक लेल ई सूचना जे जातिवादी रंगमंचसँ जुड़ल लोक केश काटनाइकेँ खराप बुझै छथि, संगहि ईहो सूचना जे बेचन ठाकुर सैम पित्रोदा (जे भारतमे टेक्नोलोजी मिशनक प्रारम्भ केलन्हि) सन बरही जातिक छथि, जातिवादी रंगमंचकर्मी लोकनि हुनकर गौँआ अंतिकाक सहायक सम्पादक श्रीधरमसँ कन्फर्म कऽ सकै छथि): हिनका नामसँ कतेको रेकॉर्ड दर्ज अछि, जेना संस्कृतक बाद पहिल बेर मैथिलीमे भरत नाट्यशास्त्रक रंगमंचक संकल्पनाक अनुसार नाटक, मात्र महिला नाट्यकर्मीक माध्यमसँ ६-६ घण्टासँ ऊपरक नाटकक मंचन (जखनकि जातिवादी नाट्यकर्मी अदहा घण्टा- ४५ मिनटक नाटकक निष्पादन लेल महिला रंगकर्मीक लेल बौखैत रहै छथि, कारण हिनकर सभक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। मुदा सभ कान्तिदर्शीकेँ जातिवादिताक कोप, गारि गंजन सुनऽ पड़ै छै, मुदा बेचन ठाकुर एक्केटा छथि...हमरा सभ नाट्यकर्मी, रंगमंचकर्मी, नाटककारकेँ हुनकर मैथिली समानान्तर रंगमंच, जे २५-३० सालसँ अनवरत चलि रहल अछि, पर गर्व अछि। मिथिलाक समाज जँ जातिवादी रंगमंचक बावजूद नै टूटल अछि तँ तकर कारण अछि बेचन ठाकुर जीक मैथिली समानान्तर रंगमंच... आ से मलंगिया जीक काल्हि जन्मल भड़ैत सभकेँ नै बुझल छन्हि, मुदा मलंगिया केँ बुझल छन्हि जे हुनकासँ बेशी संख्यात्मक आ गुणात्मक नाटक/ एकांकी बेचन जीक लिखल छन्हि आ ओइ बेचन ठाकुर आ गुणनाथ झाक एकांकी मैथिली एकांकी संग्रहमे नै देलन्हि.. एकलव्यक औंठा द्रोण कटबा लेलन्हि, मुदा एतऽ तँ गुरुक औंठा मलंगियाजी कटबा रहल छथि.. Rishi Kumar Jha GAJENDRA JI CHHERAIT CHHAITHI GAJENDRA JI K APRAMANIK TATHA ASANGAT TIPPNI SABH PADHLAK BAD EAH LAGAIT ACHHI JE GAJENDRA JI LIKHAIT NAHI CHHAITH CHHATHI, LIDDI KARAIT CHHATHI. AAOR E BAL- BAL KA NIKLAIT RAHAIT ACHHI. HINAK E LIDDI MAITHILI SANSAR KE GHINA DET. KIYEK TA MAITHILI SANSAR CHHOT ACCHI. TE HINKA ANGREJI ME LIKHBAK CHHAHI. KARAN AKAR CHHETRA VISAL CHHAIK. AK KON ME HINAK LIDDI PACHA LETAIN. — in New Delhi. Like • • Monday at 9:58am • Shubh Narayan Jha and 3 others like this. Lalit Kumar Jha bahut badhiya Monday at 10:07am • Like Naresh Jha bahut uchit likhne chi rishi Monday at 12:39pm • Like Ajit Azad are chhoro bhi yaar...apne dil ko itna bara kar lena chahiye ki isme saundar bhi sama jai जातिवादी रंगमंचक भाषाक बानगी: Mukesh Jha vinit utpal pyada/pyaja no -420विनीत उत्पल जी के लेल जिनका आँखी मे रतौधी छैन | अपन आलेख मे लिखैत छैथ जे बाबा के उपर कोनो कार्यक्रम नई भेल अछि | यो उत्पल जी जौ नौकरी के बाद जे समय बचैत अछि से यदि चमचैई के अलावा अहि तरहक आयोजन देखबा मे केने रहितियेक त अहि तरहक भ्रम नहि होयत | उम्मीद अछि आगू स ध्यान राखब | Mukesh Jha Sujhal yo vinit utpal jee Mukesh Jha जत्त मलंगिया जी के नाटक के तुलना भारतीय रंगमंच के प्रसिद्ध नाटककार जेना मोहन राकेश, विजय तेंदुलकर, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार आदि स भ रहल छैक ओहि ठाम आई कालिह मे जनमल मैथिली के टुच्चा नाटकार आ नाटक स तुलना केनाई बेईमानी अछि | Mukesh Jha से बेईमान सब स पुछियोक भाई | 23 hours ago • Like Anuradha Jha अहि मे कोनो दू मत नई जे महेंद्र मलंगिया मैथिली के सर्वश्रेष्ट नाटककार छैथ | 23 hours ago • Like Anuradha Jha मलंगिया जी पर जाही तरह फेस बुक पर किछु लोक अनाप सनाप लिखी क श्रेष्टता पाब चाही रहल छैथ से सर्वदा गलत अछि | श्रेष्टता पेबाक कोनो दोसर बाट ताकल जा सकैत अछि | किछु लोकक पोस्ट आ भाषा घोर आपत्ति जनक अछि | अहि स मिथिला मैथिली के अपमान भ रहल अछि | कुंठा स ग्रसित नई हाउ आ अपन नीक काज कय क अपन स्थान बनाव नई की खिच्चम तानी मे लागल रहैत जाऊ | 23 hours ago • Like Prakash Jha मैथिली नाटकक ज्ञान सब के नै छनि. जे लोकनि नाटक वाकि रंगमंच स' जुड़ल छथि हुनका सभ स' विचार लेल जयबाक चाही. जेना कि कुणाल जी, गगन जी, किशोर केशव, प्रेमलता मिश्र प्रेम, शिवनाथ मंडल, यदुवीर यादव आदि आदि....बाँकी फेसबुक पर जे भ' रहल अछि ओकर तह मे किछु आर अछि. कोनो खास व्यक्ति केँ मात्र साहित्य अकादेमी पुरस्कार दियबाक लेल भ' रहल अछि. एही बीच महेन्द्र मलंगिया जीक पुस्तक आबि गेलन्हि कि ई लोकनि डरि गेल छथि... त' लगल्न्हि अछि उंटा चालि चल' .... 23 hours ago • Like Mukesh Jha उचित कहल अनुराधा जी मुदा किछु बेकहल लोक के कोना रोकल जा सकैत अछि | जे की अपना आ अपन खानदान के श्रेष्ट बनेबाक लेल सब कर्म करबाक लेल तैयार छैथ | जिनका मे टेलेंट हेतैन तिनका जोर जबरदस्ती नई कर परैत छैक से के बुझेतैन महामुर्ख लोकनि के | मलंगिया जी के नाटक जतेक लोकप्रिय अछि प्रेक्षक के बीच मे किनक नाटक लोकप्रिय अछि से कहौत नबका जन्मौटी नाटक के हितेषी लोकनि ? 23 hours ago • Like Mukesh Jha ओहो त एकर मतलब ई जे मात्र ई ओझराब के योजना भरी अछि ? Ashish Anchinhar एखन हमरा मोबाइल पर एकटा नम्बर सँ फोन आएल छल जकर नम्बर अछि----08595372399 । फोन करब बला कहलाह जे हम बजरंग मंडल छी। आ इ कहू जे आशीष चौधरी के छथि। हम कहलिअन्हि जे से तँ प्रकाश झासँ पूछि लिअ। ओ हमरा कहलाह जे हम प्रकाश झासँ किएक पुछबै। आ बातचीत क्रममे कहलाह जे हमर नाम किएक फेसबुक पर आएल। हम कहलिअन्हि जे हमरा जे अहाँ भोरमे अहाँ कहलहुँ जे रातिमे इ सभ मारए बला छलाह। मुदा हम रोकबा देलहुँ। बातचीतकेँ अंतमे बजरंग जी इहो कहलाह जे फेसबूक पर इ बात आनि बहुत गलत केलहुँ अछि। सभ गोटाकेँ धआन देआबी जे बजरंग मंडल मैथिली फांउडेशनसँ बेसी जुड़ल छथि जे की मैलोरंगसँ टूटि कए बनल एकटा संस्था अछि। मुदा फोन करए बला कहलाह जे हम दोसर बजरंग मंडल छी। भए सकैए जे दूटा बजरंग मंडल होथि मुदा ई संभव नै छै जे ओ दूनू के दूनू बजरंग मंडल हमरा चिन्हैत होथि। ओना जँ बजरंग जीकेँ अवाजसँ ई स्पष्ट छल जे कोनो दबाबमे जरूर छथि।ओना जँ बजरंग जी चाहथि तँ अपन पहिचान दए सकै छथि। फोन नम्बर सेहो ट्रेस भए जेतै। संगे-संग प्रकाश झा स्वंय अपने मूँहसँ मुन्ना जीकेँ कहलकै जे अंतो-अंत धरि हम आशीष अनचिन्हारकेँ मारबै ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम अनचिन्हार संगे परिचय करबा दै छी कने छूओ क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झाक एकटा परम ब्राम्हणवादी सहयोगी मुन्ना जीकेँ कहलखिन्ह जे अहाँ बचा लेबै अनचिन्हारकेँ । ताहि पर मुन्ना जी कहलखिन्ह जे हम सभ कहै नै छिऐ करै छीऐ खाली एकबेर छू क देखिऔ। ताहि पर प्रकाश झा कहलखिन्ह जे कोनो बात नै देखिऔ जे की होइ छै। जँ साहित्य अकादेमीक ओहि कथा गोष्ठीक फोटो-विडियोकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे प्रकाश झा-मुकेश झा हमरा मरबा लेल व्यग्र छल।उपरमे एकटा फोटो राखि रहल छी जाहिमे की कए रहल अछि प्रकाश से देखू---- मुदा मुन्ना जीक कहलाक बाद डरें किछु नै कएल पार लगलै प्रकाश झा एनड मुकेश झा कम्पनीकेँ। Ashish Chaudhary मलंगिया आ प्रकाश झाक इशारापर भ्रमरजीक विरुद्ध मिथिलादर्शन आ आन-आन ठाम चिट्ठी भेजनिहार मुकेश झा आब इन्टरनेट पर आबि गेल अछि, ऐ फ्रॉड आइ.डी.सँ सावधान। ई ककरो दोसरा द्वारा संचालित होइत अछि.. सावधान। ... मलंगिया जीक नाटक लोककेँ बेसी कट्टर बनेलक अछि, गएर ब्राह्मण मैथिलीसँ दूर भागल अछि। ... प्रकाश झा आ मुकेश झा घोषणा केने रहथि जे २४ मार्च २०१२ क साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीमे आशीष अनचिन्हारकेँ मारताह, बजरंग मण्डल ओतए आशीष अनचिन्हारकेँ ऐ मादे सतर्क सेहो केने रहथि। मुदा छूलो भेलन्हि?malangiya ji jatek mehnati lathait posai me lagelanhi tatek jan neek naatak likhbai me lagabitathi te aai mukesh jha, rajiv mishra, lalit jha, prakash jha san nirlajjak aavashyakta nai rahitanhi Bhaskar Jha भाई एहन ऎहन आपत्तिजनक गप के जतय तुलि देबय ओतय बढत! किनको व्यक्तिगत सोच आ आपत्ति के सार्वजनिक नहिं कयल जयबाक चाही। विद्वजन के अपन अपन मतानतर होयत छई। वोहि मतानतर पर हम - अहां आपस मे नहिं लड़ि। दूनू महान व्यक्तित्व के धनी छथि। दूनू गोटे सं हमरा सबके सीखबाक चाही। 7 April at 21:35 • Like • 1 Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत। Ashish Chaudhary भाइ पत्रिका सभमे लठैतक छद्म नामसँ चिट्ठी पठेबाक प्रवृत्तिपर किछु तँ कमी आएत। 7 April at 21:46 • Like • 2 Bhaskar Jha हां सेहो बात सही अछि 7 April at 22:05 • Like • 1 Manoj Jha इ सब मिथिला मैथिली के लेल दुर्भाग्यक गप्प थिक .. 7 April at 22:55 via Mobile • Like • 3 Umesh Mandal सामंती लोकनिक बेवहारिक परिचय.... 8 April at 01:40 • Like • 1 Shubh Narayan Jha kane positive bha chalba sa maithili ke vikas chhaik ne ki ek dosra ke khichay kela sa Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:-जातीय रंगमंचक भाषाक बानगी:- Prakash Jha सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री ...... आजकल दिल्ली मे ही हैं. Like • • Unfollow post • 4 hours ago Mukesh Jha तो ? 4 hours ago • Like Prakash Jha तो इनसे मुलाकात अब जरूरी लगता है.... 4 hours ago • Like Mukesh Jha किस वजह से भाई साहेब ? 4 hours ago • Like Prakash Jha कुछ विक्षिप्त मानसिकता के लोग इन्हें मैथिली भाषा के सहारे बदनाम करने मे लगे हैं. 4 hours ago • Like Mukesh Jha क्या बात कर रहे हैं वो बहुत अछि नृत्यागना हैं, उनके बारे मे ये अशोभनीय बात है | 4 hours ago • Like Prakash Jha जी, है तो पर... ऎसा नही करना चाहिए... खैर... आगे आगे देखिए होता है क्या.... चलता हूँ रीहर्शल के लिए.... 3 hours ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 3 hours ago • Like Mukesh Jha आ बहुत रास आहाँ एहन कुकर्मी लेखक के कारण अन्चिहाररजी आ किछु आहाँ लोकनि द्वारा पोसुवा प्यादा के कारण | आब चिन्हार भ जाव यो अनचिन्हार जी | 2 hours ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... Vinit Utpal जातिवादी रंगमंच क प्राइवेट पार्टी मे ५-१० मिनट यात्री आ राजकमल कें देल गेलन्हि आ ओकर फोटो १०-२० साल धरि बेचल जाएत , ई जातिवादी रंगमंच अखबारक कतरन समेटैत अछि. 4 hours ago • Unlike • 1 Vinit Utpal (यात्रीक जन्म ३० जून १९११ छन्हि ) 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar विनीत भाइ ई सभ फण्ड केर खेला छै जहिया फण्ड भेटतै तहिये बाबा मोन पड़तिन्ह आ सातो जन्म धरि फोटो लगा इ बाबू सभ हल्ला मचेताह।.... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar भाइ एकट गप्प इहो जे जेना जातिवादी रंगकर्मी सभ अपन दिमाग मे कूड़ा-कर्कट भरने रहै छथि तेनाहित अपन घर-आफिस कतरनसँ भरने रहै छथि। ई कतरन सभ फण्ड उगाही केर नीक साधन छै जातिवादी सभ लेल। जँ ई कतरन नै रहतै तँ फण्ड देतै के। ओना विनीत भाइ अहाँक जानकारी लेल ई कहि दी जे पेड पत्रकारितामे पाइ दए न्यूज छपा लेब जातिवादी सभ लेल कोनो बड़का गप्प नै। फोटोशापसँ ब्रोशर बना लेनाइ सेहो आसान छै। प्रिंटर सँ पर्चा सेहो छपा लिअ। भारत सरकार फण्ड देबा कालमे इएह सभ देखैत छै।.. 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अनचिन्हार जी काज कय क हल्ला करैत छीयेक आहाँ और आहाँ के ग्रुप भूते त बाबा के नाम पर एकटा गोष्टीयो नई कायल भेल | 4 hours ago • Like Mukesh Jha यो अन्चिहार जाहि ग्रुप के पोसुवा छी आहाँ ओही ग्रुप स एक बेर मंडी हाउस मे एकटा बाबा के नाम पर गोष्टी करबा क देखा दियह | 4 hours ago • Like Rajiv Mishra kya bat hai mukesh bhai gargara diye... 4 hours ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगकर्मीक बलगोविना प्रवृत्तिक कारण आ कुकुरचालिक कारण बहुत रास महिला मैथिली नाटकसँ दूर भागि गेलीह। .... 12 minutes ago • Like Ashish Anchinhar राजीव मिश्रा, प्रकाश झा आ मुकेश झा सन भड़ैतक चलते कियो परिवार आ बहु बेटीक संग जातिवादी रंगमंचक समारोह (प्राइवेट पार्टी)मे नै जाइए। about an hour ago • Like Ashish Anchinhar जातिवादी रंगमंचक शब्दावलीक बानगी:Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक | about an hour ago • Like Ashish Anchinhar ई डायलोग- "Mukesh Jha साहित्य अकेदमी पुरस्कार के कारण भ रहल अछि राजनीति | जातिवाद के हवाला दय कय रहल छैथ किछु चिन्हार आ किछु अनचिन्हार लोक घिनायल राजनीति | यो महामहिम लोकनि साहित्य अकादेमी पुरस्कार कोनो जाती विशेष के नई भेटैत छैक, उत्कृष्ट रचना के देल जायत छैक | सबुर राखु रचना मे दम्म होयत त अवश्य भेटत, अन्धेर्ज जुनि हाउ | जिनका पुरस्कार दियाब चाहैत छियेन हुनका कहियोन जे साहित्य के कोनो एक विधा के मजबूत करताह | खने कविता, खने कहानी आ आब नाटक मे सेहो अपन कलम भाजीं रहला अछि, यो ताहि स नही चलत, | खैर हल्ला करब त दओ दिया से भारी बात नई | मुदा ऐना नई चलत, जाही नाटक के आहाँ लोकनि पुरस्कार दियाबह लेल व्यग्र छि, ताहि मे दम नई अछि, आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन, से नई होयत छैक यो सरकार | आ कनि दिमाग लगाब लेल सेहो कहियोन नाटककार महोदय के -- | नाटक के अपन व्याकरण छैक तकरा अनुसरण करैत लिखता त मंचित होमा मे असोकर्ज नई हेतैक | ध्यान दियोक |आ बेसी स बेसी मंचिंत नाटक के महत्व होयत छैक |" प्रकाश झा मुन्नाजीकेँ बेचन ठाकुरक नाटकक (जिनका ओ भरि दिन केश काटैबला कहैए) विषयमे ई गप कहने रहन्हि। आब सिद्ध् भेल जे ई मुकेश झा नै प्रकाश झा अछि। 5 minutes ago • Like Ashish Anchinhar प्रकाश झा बाउ: टिनही चश्मासँ देखू बेचन ठाकुरक नाटक: "आधा किताब एक सीन मे आ बांकी आधा मे ७ गो सीन"- दुनिया लग ई किताब छै आ अपन भड़ैती जारी राखू, झूठक खेतीक संग: अहाँ भड़ैतीक अलाबे आर किछु नै कऽ सकै छी बाउ। एतए पोथीक लिंक अछि, पढ़ू आ माथ पीटू https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=0 8869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com A few seconds ago • Like • Ashish Anchinhar मलंगिया जी केँ सेहो पढ़बा देबन्हि- गुणनाथ झा कहै छलाह जे होइ छल जे उमेरक संग मलंगियाजी आधुनिक रंगमंच बुझि जेताह., मुदा काश... https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/BechanThakur.pdf?attredirects=08869256024489431480-a-videha-com-s-sites.googlegroups.com about an hour ago • Like • Sangeeta Jha gajendra jee prasidh hobay ke lel badhiya chai prasidh aadmi ke aalochna karu.aakhir malangia jee ke naam dekh ka lok kum sa kum aahan ke naam padhiye let.Ona suraj oar thuku tha thukappne par parai chai. mathili ke jeevan ahak soch par nirbhar chai aascharya 54 minutes ago • Unlike • 1 Gajendra Thakur जातिवादी रंगमंचक महिला विरोधी, दलित पिछड़ा विरोधी प्रवृत्ति दुखी करैत अछि। समानान्तर रंगमंच एकर विरोधमे आजन्म ठाढ़ रहत। Poonam Mandal काल्हि मलंगिया जीक मैलोरंगक (जकर आइ काल्हि अध्यक्ष देवशंकर नवीन छथि) दूटा सदस्य प्रकाश झा आ मुकेश झा एकटा महिलाकेँ बदनाम करबाक कोशिश (हम कोशिशे कहब, कारण हिनका सभक औकात ततेक नै छन्हि जे ओइमे ई सफल होथि, साहित्यिक सम्वेदनाक विश्लेषण ओ कऽ सकता?) केलन्हि। संगे ई दुनू गोटा जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर जीक प्रति जातिगत अपशब्द सेहो कहलन्हि। अही तरहक जातिगत टिप्पणी देवशंकर नवीन द्वारा वैदेही पत्रिकामे सुभाष चन्द्र यादव जीक विरुद्ध सेहो कएल गेल रहए। की एक्कैसम शताब्दीक ई सभ लेखक छथि? एक्कैसम शताब्दीक रंगमंचकर्मी छथि? मैलोरंग पत्रिकामे प्रेमराज नामसँ अनलकान्त (गौरीनाथ- अंतिकाक सम्पादक)केँ गारि देनिहार मैलोरंगक वर्तमान वा पूर्व अध्यक्ष अपन नाम किए नै सोझाँ आनलन्हि, किए प्रकाश आ मुकेशक कान्हपर बन्दूक राखि ओ प्रेमराजक छद्म नामसँ गारि पढ़लन्हि, पत्रिकामे जे ई मेल प्रेमराजक देल अछि ओ बाउन्स कऽ रहल अछि। मलंगियाकेँ बुजुर्गक रूपमे सम्मानदेबाक आग्रही जगदीश प्रसाद मण्डल आ बेचन ठाकुर केँ किए गरिया रहल छथि? Ashish Anchinhar धरती गोल छै..... प्रेमराजकेँ त्रिकालज्ञसँ भेँट भैए गेलै।.. मैथिली गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-1 जीवन झा आधुनिक मैथिलीक पहिल गजलकार। परिचय----स्व.जीवन झा जन्म हरिपुर गाम ( प्रखंड-सरायरंजन, समस्तीपुर ) 1856 ई.मृत्यु काशीमे 1920 ई, प्रेमशंकर सिंह हिनकर जन्म आ मृत्यु 1848-1912 लिखै छथि, काशीराजक दानाध्यक्ष पदपर बहुत दिन रहथि, हिनक चारिटा नाटक सुन्दर संयोग, नर्मदा सट्टक, मैथिली सट्टक आ सामवती पुनर्जन्म।सामाजिक विषयपर मैथिली नाटक लिखबाक प्रारम्भ ईएह केलनि, संस्कृत परम्परा रखैत फारसीसँ प्रभावित हिनकर नाटक अछि, नाटकक बीचमे ई गीत-गजल दै छला। जन्मक कोनो तिथि नै अछि। हिनक मृत्यु इ.1912 केर बैशाख शुक्ल सप्तमीकेँ भेलन्हि। हिनक गजल प्रस्तुत अछि| प्रस्तुत गजल हिनक सुन्दर संयोग नाटकसँ लेल गेल अछि जे की 1905 इ. मे लिखल गेल छल। कविवर जीवन झाक नाटक सुन्दर संयोगसँ लेल मैथिलीक पहिल गजल सुन्दर संयोग चतुर्थ अंकमे लेखक स्वयं (गजल) कहि एकरा सम्बोधित कएने छथि। (गजल) आइ भरि मानि लिअऽ नाथ ने हट जोर करू। देहरी ठाढ़ि सखी हो न एखन कोर करू ॥१॥ हाय रे दैव! इ ककरासँ कहू क्यो न सुनै। सैह खिसिआइए जकरा कनेको सोर करू ॥२॥ लाथ मानै ने क्यो सभ लोक करैए हँसी। बाजऽ भूकऽ ले जँ कनेक जकर सोझ ओठ करू ॥३॥ जाइ एखन ने धनी एक कहल मोर करू। आन संगोर करू एहि ठाम भोर करू ॥४॥ ( मैथिली गजल शास्त्र आलेख भाग-९सँ साभार ) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-2 आरसीप्रसाद सिंह मानलजाइत अछि जे जीवन झा केर बादमैथिलीमे आरसी प्रसाद सिंहगजल लिखला। हिनक जन्म इ 19अगस्त1911मे समस्तीपुरक "एरौत" नामकगाममे भेल। मैथिलीमे लिखबासँपहिने ई हिन्दीमे ख्यातिप्राप्त भए चुल छलाह। हिन्दीमेहिनक "कागजकी नाव,मधु-सन्देश,बसंतकोकिल,याद,अभेद,वर्षा-गीत,क्योंप्यार करता हूँ,मनारहा हूँ उन्हें,मौनरहने दो,उल्टीनगरी,स्वर्णकिरण,आरसी"" नन्ददास"आ"संजीवनी"नामककाव्य ग्रंथ अछि तँ मैथिलीमे"माटिकदीप "" पूजाकफूल "आ"सूर्यमुखी"काव्यग्रंथ अछि। इ.1984मे"सूर्यमुखीलेल हिनका मैथिली लेल साहित्यअकादेमी पुरस्कार भेटल। हिनकमृत्यु इ.15नवम्बर1996मेभेल। इहो जीवने झा जकाँ एक-दूटागजल लिखला। प्रस्तुत अछि हिनक"गुलाबीगजल "| गुलाबीगजल-आरसीप्रसादसिंह अहाँकआइ कोनो आने रंग देखइ छी बगएअपूर्व किछु विशेष ढंग देखइछी चमत्कारकहू, आइकोन भेलऽ छि जग मे कोनोविलक्षणे ऊर्जा-उमंगदेखइ छी बसातलागि कतहु की वसन्तक गेलऽिछ, फुललगुलाब जकाँ अंग-अंगदेखइ छी फराकेआन दिनसँ चालि मे अछि मस्ती मिजाजिदंग, कीबजैत जेँ मृंदग देखइ छी कमान-तीरचढ़ल, आओरकान धरि तानल नजरिपड़ैत ई घायल,विहंगदेखइ छी निसासवार भऽ जाइछ बिना किछु पीने अहाँकआँखिमे हम रंग भंग देखइ छी मयूरप्राण हमर पाँखि फुला कऽ नाचय बनलविऽजुलता घटाक संग देखइ छी।। लगैछरूप केहन लहलह करैत आजुक, जेनाकि फण बढ़ौने भुजंग देखइ छी उदारपयर पड़त अहाँक कोना एहि ठाँ विशालभाग्य मुदा,धऽरेतंग देखइ छी कतहुने जाउ,रहूभरि फागुन तेँ सोझे अनंगआगि लगो,हमअनंग देखइ छी ई गजल शिव कुमार झा जीक सौजन्यसँअछि जे की एकरा अनचिन्हार आखरपर दू साल पहिने प्रस्तुत केने रहथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-3 मायानंदमिश्र मैथिली गजलक चर्चित आ कुख्यात दूनू रूपमे स्थान। मायानंद मिश्रक ई कथन जे मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए, अनघोल मचेने रहए। मुदा मैथिली गजलक पहिल अरूजी मने गजल शास्त्रकारश्री गजेन्द्र ठाकुर मतें "मायानंद मिश्रक मात्र एतबा अभिमत रहन्हि जे वर्तमानमे मैथिलीमे बहरयुक्त गजल नै लिखल जा सकैए। तँए ओ स्वयं अपने गीतल नामसँ गजल रचना केलन्हि ( ऐठाम मोन राखू जे माया बाबू मैथिलीमे गजलकेँ नाम गीतल देने छलखिन्ह जे कि अस्वीकार्य छल ) मुदा आन-आन गजलकार सभ एकरा दोसर रूपमे लेलक आ परचारित केलक जे मायाबाबूक कथन थिक जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए। गजेन्द्रजी आगू लिखै छथि जे ई माया बाबूजँ ई कहबो केलखिन्ह जे मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ई कथन हुनकर सीमाक संग-संगओहि समय सभ गजलकारक सीमा छल।कारण ओहि समय एकौटा गजलकार मैथिलीमे बहरयुक्त गजल नै लीखि सकलाह आ माया बाबूक उक्तिकेँ सत्य करैत रहलाह।मुदा बाद मे इ. 2008मे अनचिन्हार आखरक आगमन होइते माया बाबूक सभ मत-अभिमत धवस्त भए गेल। हिनक जन्म 17अगस्त 1934 ई.केँ सुपौल जिलाक बनैनियाँ गाममे भेलनि।भाङ्क लोटा, आगिमोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु-हिनकरकथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़िपात पाथर , मंत्र-पुत्र,खोताआ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग,प्रथमंशैल पुत्री च,मंत्रपुत्र,पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि।1988- हिनका(मंत्रपुत्र,उपन्यास)पर मैथिलीक साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कए गेलन्हि। प्रबोध सम्मान 2007सँ सम्मानित। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-4 गंगेशगुंजन 1942 जन्मस्थान- पिलखबाड़,मधुबनी।श्रीगंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथमचौबटिया नाटक बुधिबधियाकलेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता(कथासंग्रह) कलेल साहित्य अकादमी पुरस्कारभेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्तमैथिलीमे हम एकटा मिथ्यापरिचय, लोकसुनू (कवितासंग्रह), अन्हार-इजोत (कथासंग्रह), पहिललोक (उपन्यास),आइ भोर (नाटक)दुखकदुपहरियामे (गजलसन किछु) प्रकाशित।हिन्दीमे मिथिलांचल की लोककथाएँ, मणिपद्मकनैका- बनिजाराकमैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आशब्द तैयार है (कवितासंग्रह)।१९९४-गंगेश गुंजन(उचितवक्ता,कथा)पुस्तकलेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँसम्मानित । जहाँधरि गजलक गप्प छै तँ ई मैथिलीमे" गजलसन किछु " लिखलाआ ओहो मात्र दस-पनरहटा।हिनक पोथी " दुखकदुपहरियामे " एकरबानगी देखल जा सकैए। मैथिलीकपहिल अरूजी गजेन्द्र ठाकुरकमतें.......मायानन्दमिश्र “गीतल” कहि आ गंगेशगुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे”कहि जे गलत परम्पराकेँ जारीरखबाक निर्णय लेने छथि तकराबाद मुन्ना जी आ आशीष अनचिन्हारजँ बिना छन्द/ बहरकगजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्दमिश्र, गंगेशगुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकारलोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-5 श्रीमती शेफालिका वर्मा जी मैथिलीक पहिल महिला गजलकार छथि। किछुए ( दसक भीतर ) गजल लिखने छथि। जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय), ए. एन. कालेज, पटना मे हिन्दीक प्राध्यापिका पदसँ सेवानिवृत्त । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर; विप्रलब्धा (कविता संग्रह), स्मृति रेखा (संस्मरण संग्रह), एकटा आकाश (कथा संग्रह), यायावरी (यात्रा-वृत्तान्त), भावाञ्जलि (काव्य-प्रगीत) , किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल (हिन्दी) । २००४ ई.मे- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्माकेँ, पटना;यात्री-चेतना पुरस्कार भेटलन्हि। ऐ फोटोमे श्रीमती शेफालिका वर्मा जी बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारसँ पुरस्कार ग्रहण करैत। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-6 हिनक एक-दूटा गजल अछि आ गजलक संबंधमे हिनक एक-दूटा लेख १९८४-८५केँ बीचमे प्रकाशित भेल। कथाकर, समीक्षक, अनुवादक, ग्रंथ सम्पादक । साहित्य अकादेमीक मूल एवं अनुवाद पुरस्कार प्राप्त कर्त्ता ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगाक मैथिली विभागक पूर्व प्राचार्य । प्रकाशन: पसिझैत पाथर, (अनु.) आदि । १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)लेल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) लेल साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-7 प्रस्तुत अछि किछु एहन गजलकारक सूची जे कि छिटपुट गजल लिखला आ अन्यविधामे महारत हासिल केलाह। ई सूची शुरूसँ एल क' एखनधरिक अछि। संगे-संग भारत आ नेपाल दुन्नू मिला कए अछि। जँ ऐमे कोनो नाम छूटि गेल हुअए तँ ओ अहाँ सभ तुरंत सूचित करी से हमर आग्रह।ऐ सूचीकेँ आलवे बादमे एकटा आर एहने सूची आएत जाहिमे ओहन नव गजलकारक नाम रहत।--------- मुंशी रघुनंदन दास, यदयनाथ झा यदुवर, बाबू भुवनेश्वर सिंह भुवन, आनंद झा न्यायाचार्य, रमानंद रेणु, फूल चंद्र झा प्रवीण, वैकुण्ठ विदेह, शीतल झा, प्रेमचंद्र पंकज, प.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद दास परिमल, तारानंद झा तरुण, रमाकांत राय रमा, महेन्द्र कुमार मिश्र, विनोदानंद, दिलीप कुमार झा दिवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, विलट पासवान विहंगम, सारस्वत, कर्ण संजय, अनिल चंद्र ठाकुर, श्याम सुन्दर शशि, अशोक दत्त, कमल मोहन चुन्नू, रोशन जनकपुरी, जियाउर रहमान जाफरी, धर्मेन्द्र विहवल्, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैया लाल मिश्र, गोविन्द दहाल, चंद्रेश, चंद्रमणि झा, फजलुर रहमान हाशमी, रामलोचन ठाकुर, विनयविश्व बंधु, रामदेव भावुक, सोमदेव, रामचैतन्य धीरज, महेन्द्र, केदारनाथ लाभ, गोपाल जी झा गोपेश, नंद कुमार मिश्र,देवशंकर नवीन,मार्कण्डेय प्रवासी,अमरेन्द्र यादव। कुल 51टा बहुत रास नाम धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी द्वारा संपादित गजल विशेषांक पर आधारित अछि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-8 विभूति आनंद (जन्म-4/10/1955 ) हिनक गजल संग्रह " उठा रहल घोघ तिमिर " ( प्रकाशक-भारती संस्थान (पटना) ) बर्ख JUNE 1981मे आएल। आ ई मैथिलीक पहिल गजल संग्रह बनल। हिनक संबंधमे मैथिली गजलक पहिल पूर्णकालिक आलोचक आ समीक्षक श्री ओम प्रकाश जी कहै छथि.................. " हमरा हिसाबेँ काफियाक दोख पृष्ठ बीस, बाईस, चौबीस, पचीस, अट्ठाईस, उनतीस(संयुक्ताक्षर काफियाक नियमक दोख), बत्तीस आ सैंतीस मे सेहो अछि। एकर सबहक विस्तृत वर्णन देब हम अपेक्षित नै बूझि रहल छी, कियाक तँ इ हमर उद्देश्य कथमपि नै अछि। गजल संग्रहक सब गजलक विषय-वस्तु नीक अछि आ गजलकार अपन भावना नीक जकाँ प्रकट केने छथि। किछु गजलक काफिया आ रदीफक दोख जँ कात कऽ कऽ देखी, तँ इ गजल-संग्रह एकटा नीक गजल-संग्रह अछि। गजलकारक गजल कहबाक क्षमता सेहो नीक बुझाईत अछि। हमरा ई अचरज लागि रहल अछि जे ऐ संग्रहक बाद गजलकारक दोसर गजल-संग्रह किया नै आएल अछि। एकर कारण तँ गजलकारे केँ पता हेतैन्हि, मुदा अपन अनुभवक आधार पर हम कहऽ चाहै छी जे श्री विभूति आनन्द नीक गजल लिख सकैत छथि। जँ बहरक विचार नै करी, तँ २०१२ मे आएल श्री अरविन्द ठाकुरजीक गजल-संग्रह सँ करीब एकतीस बर्ख पहिने १९८१ मे लिखल गेल एहि संग्रहक गजल सब उम्दा कहल जा सकैत अछि। एकर कारण इ जे एहि संग्रहक गजल सब मे काफियाक नियम-पालनक प्रतिशत वर्तमान समयक संग्रह सब सँ बेसी अछि। कथ्यक मजबूती सेहो नीक कोटिक अछि। खाली कुहरल तुकमिलानी केने गजल नै कहल जा सकैत अछि, इ गप एहि संग्रह केँ पढलाक बाद एखुनका गजलकार सभ केँ सेहो बुझेतन्हि, इ आशा अछि। इहो एकटा अचरजक विषय अछि जे जखन मैथिली मे नीक गजल एतेक साल पहिनो कहल गेल छल, तखन एकर बाद गजलक विकास-यात्रा पचीस-तीस बर्ख धरि कतऽ आ किया ठमकि गेल। बीचक अवधि मे मैथिली गजलक विकासक धार मे बान्ह किया बनि गेल छल, इ विचारणीय गप अछि। ओना आब इ बान्ह टूटि रहल अछि आ आशाक नब जोति मे मैथिली गजलक घोघ उठि रहल अछि। " श्री आनंद जीक अन्य विवरण एना अछि----------- जन्म: शिवनगर, मधुबनी, बिहार। चर्चित कवि, कथाकार, संपादक । प्रकाशित कृति टूटा उपन्यास टूटा समीक्षा, तीन टा कथा संग्रह, टूटा गीत-गजल संग्रह ओ चारिटा कथा-संग्रह प्रकाशित।२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-9 स्व. कलानंद भट्ट गाम--- उछटी ( दरभंगा) जन्म----15 मइ 1941, मृत्य----5 अक्टूबर1994 प्रकाशित कृति---------- कान्ह पर लहास हमर( गजल संग्रह) अप्रकाशित पांडुलिपि--- हिलकोर ( रुबाइ संग्रह) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-10 अनंत बिहारी लाल दास"इन्दु"1928-2010 प्रकाशित पोथी (मात्रगजलक दए रहल छी एहिकेँ अतिरिक्तोहिनक पोथी सभ छन्हि) 1) नवीन मैथिलीगजल-----शाइर अनन्तबिहारी लाल दस "इन्दु" 2) मधुर मैथिलीगजल------शाइर अनन्तबिहारी लाल दस "इन्दु" ( इन्दु जीक संग्रहकजानकारी हमरा सरस जी द्वाराभेटल अछि हलाकिं हुनको लग दूनूसंग्रह नै छन्हि) उपल्बधि---- 2007मे- अनन्तबिहारी लाल दास “इन्दु जीकेँ”(युद्ध आ योद्धा-अगमसिंह गिरि, नेपाली)लेलसाहित्य अकादेमी मैथिली अनुवादपुरस्कार प्राप्त भेलन्हि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-11 रवीन्द्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र-महेन्द्र नामक चर्चित जोड़ीक ई रवीन्द्र छथि। हिनक एकटा गजल संग्रह छन्हि---लेखनी एक रंग अनेक ( पूर्वांचल प्रकाशन ( पटना ), वर्ख-१९८५.) हिनक अन्य विवरण एना अछि-- जन्म पूर्णिञा जिलाक धमदाहा ग्राममे 1936 ई. मे भेलन्हि । नेने अवस्थासँ गीत गएबामे एवं कविता लिखबामे विशेष रुचि । कोनो मंच पर ठाढ़ भेला पर ई सहजहि श्रीताकेँ आह्लादित करैत छथि । हिनक सात गोट मैथिलीक गीत संग्रह, एक मिनी महाकाव्य, एक प्रयोगधर्मी काव्य, एक उपन्यास, एक नाटक ‘एक राति’ एवं एक हिन्दी नाटक,आ उपरोक्त गजल संग्रह प्रकाशित भेल छन्हि । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-12 सियारामझा "सरस" --10 JULY 1948,जन्म स्थान -मेंहथ, मधुबनी बिहार। गजल संग्रह--- 1) शोणिताएल पएरक निशान ( प्रकाशक-सरला प्रकाशन, मेहथ, प्रकाशन साल-1989) 2) लोकवेद आलालकिला ( संपादित) ( प्रकाशक---विद्यापति सेवा संस्थान, प्रकाशन साल-1990) 3) थोड़े आगि थोड़ पानि ( प्रकाशक---नवारम्भ, प्रकाशन साल-2008) विशेष------श्रीसरस जी अनचिन्हार आखर द्वाराप्रायोजित मैथिलीमे देल जाएबला गजल लेल पहिल सम्मान "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदासम्मान"क पहिल मुख्य चयनकर्ता छलाह जे किई. 2011मे शुरू भेल छल। हिनक अन्यविवरण एना अछि--- प्रसिद्ध गीतकार-गजलकार,बादमे कथा लेखन प्रारम्भकेलनि । अन्य प्रकाशित कृति---- आँजुर भरि सिंगरहार---कविता---१९८२, गीत रश्मि---गीत ( संपादन)--१९९४, नै भेटतौ खालिस्तान--गीत--१९९४, आखर-आखर गीत ---गीत--१९९९, चन्नाक पहाड़ ( अनूदित उपन्यास, साहित्य अकादेमीसँ प्रकाशित--१९९९), उगैतसूर्यक धम्मक (कथासंग्रह) आ उपरोक्तगजल संग्रह। गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-13 तारानन्द वियोगी 12/5/1966 महिषी, सहरसामे जन्म। पहिल पोथी अपन युद्धक साक्ष्य (गजल संग्रह) १९९१ मे प्रकाशित। अन्य पुस्तक हस्तक्षेप (कविता-संग्रह), अतिक्रमण (कथा-संग्रह), शिलालेख (लघुकथा संग्रह), कर्मधारय( आलोचना )। राजकमल चौधरीक कथाकृति एकटा चंपाकली एकटा विषधर संकलन-सपादन। साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल" लेल। यात्री-चेतना पुरस्कार २०१० ई.मे सेहो प्राप्त भेलन्हि। " हालचाल " आ " संकल्प " नामक दूटा पत्रिकाक किछु अंकक संपादन। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-14 रमेश-1961 गजल संग्रह---नागफेनी---IPSITA PUBLICATION, 1990 ई सियाराम झा सरस जीक छोट भए छथिन्ह आ सरस-रमेश जोड़ीक रमेश छथि। जन्म स्थान मेंहथ, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार ओ कवि । प्रकाशित कृति: समांग, समानांतर, दखल (कथा संग्रह),संगोर, समवेत स्वरक आगू, कोसी धारक सभ्यता, पाथर पर दूभि (काव्य संग्रह), प्रतिक्रिया (आलोचनात्मक निबंध),आ उपरोक्त गजल संग्रह गजलकार परिचय श्रृंखला भाग-15 सुरेन्द्र नाथ प्रकाशित गजल संग्रह- गजल हमर हथियार थिक ( नवारम्भ प्रकाशन, साल 2008) जन्म-3-2-1951 प्रकाशित पोथी--- १) दृष्टिकोण ( आलोचना आ व्यंग) 2000मे प्रकाशित २) समय शिला ( कथा) 2008 ३) मंडन मिश्र मीमांसा, अद्वैत समागम ( संपादित) 2008 गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-16 राजेन्द्र विमल, जनकपुर, नेपाल प्रकाशित गजल संग्रह----सूर्यास्तसँ पहिने मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि।कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-17 अरविन्द ठाकुर प्रकाशित गजल संग्रह---बहुरुपिया प्रदेश मे। ( नवारम्भ प्रकाशन, साल नवम्बर-2011) अन्य प्रकाशित कृति---- परती टूटि रहल अछि ( कविता), अन्हारक विरोधमे ( कथा) जन्म---14 February 1957, सुपौल गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-18 सुधांशु शेखर चौधरी 1922-1990 प्रकाशित गजल संग्रह- गजल ओ गीत ( किछु गीत छै ऐमे आ किछु गजल) जन्म दरभंगाक मिश्रटोलामे 1922 ई. मे भेलन्हि तथा मृत्यु 1990 ई. मे भेलन्हि । किछु दिन विभिन्न जीविकामे रहि पश्चात् साहित्यकारक जीवन प्रारम्भ कएल । किछु दिन ‘बैदेही’क सम्पादन श्री सुमनजी एवं श्री कृष्णकान्त मिश्रजीक संग कएल तत्पश्चात् 1960 ई. सँ 1982 ई. धरि पटनामे ‘मिथिला मिहिर’’क सफल सम्पादन कएल ।हिनक दू गोट नाट्यकृति-‘भफाइत चाहक जिनगी’, लेटाइत आँचर’, तथा ‘पहिल साँझ’ हिनक नाटकक नीक व्यावहारिक अनुभवक परिचायक अछि ।छद्मनामसँ हिनक दू गोट उपन्यास मिहिर’ मे प्रकाशित भेल अछि । हिनक उपन्यास ई वतहा संसार’ जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल आ जाहि पर 1980 क साहित्य अकादमीक पुरस्कार देल गेल । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-19 जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल" विशेष---- अनचिन्हार आखर द्वारा प्रयोजित मैथिली गजल लेल देल जाए बला " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" लेल हिनका साल २०१२ लेल मुख्य चयन कर्ता बनाएल गेल अछि। मूल नाम जगदीश चन्द्र ठाकुर, जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978; 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999 संप्रति- धुरझार गजल लीखि रहल छथि। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-20 कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक किछु गजल उपलब्ध अछि | हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात् बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका - मिथिला मिहिर, माटि - पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समय पर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि । जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डाॅ बासुकीनाथ झा ) मे हास्य कथा कारक सूची मे डाॅ विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्यक उल्लेख कयलनि । मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल ।श्रृंगाररस एवं हास्य रसक संग-संग विचार मूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि । प्रकाशित कृति (मृत्योपरांत) : कलानिधि- कविता-संग्रह। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-21 धीरेन्द्र प्रेमर्षि ई मैथिली गजलक पहिल वीर छथि जे अपन पत्रिकाक माध्यमे पहिल गजल विषेशांक निकालथि। व्यक्तिगत विवरण पूर्ण नामः धीरेन्द्र झा प्रचलित नामः धीरेन्द्र प्रेमर्षि जन्मस्थानः गोविन्दपुर, गा.वि.स. वार्ड नं.-१, बस्तीपुर, जिला- सिरहा, नेपाल जन्मथितिः वि.सं. २०२४, भादब १८ गते (३ सितम्बर १९६७) शिक्षाः स्नातक पिताक नामः पं. कृष्णलाल झा माताक नामः आनन्दीदेवी झा मूल वृत्तिः नेपाल सरकारक नोकरिहारा (कृषि विभागअन्तर्गत Plant Protection Officer) प्रकाशित साहित्यिक कृतिः समयलाई सलाम (नेपाली गजल-सङ्ग्रह) प्रकाशकः खेमलाल-हरिकला स्मृति समाज कल्याण प्रतिष्ठान, चितवनः २०६५ मलङ्गियाका मैथिली एकाङ्की (नेपालीमे अनूदित एकाङ्की-सङ्ग्रह), प्रकाशकः खेमलाल-हरिकला स्मृति समाज कल्याण प्रतिष्ठान, चितवनः २०६५ कर्मयोद्धा योगेन्द्र साह नेपाली (सम्पादन),प्रकाशकः मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुरधामः २०६५ कोन सुर सजाबी ? (मैथिली गीत-सङ्ग्रह),प्रकाशकः नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानः २०६१ अगहन भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक चर्चित पोथीक मैथिली रूपा झाक सङ्ग सहअनुवाद), प्रकाशकः रातो बङ्गला किताब, पाटनढोका, ललितपुरः २०५९ आसिन मैथिली कविता-सङ्ग्रह, सं. (आठम शताब्दीसँ बीसम शताब्दीधरिक प्रतिनिधि मैथिली कविसभक कविताक सङ्कलन) प्रकाशकः नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानः २०५१ स्वप्नकथा चलिरहल अछि (नेपालीसँ मैथिलीमे अनूदित गोविन्द गिरी प्रेरणाक कविता-सङ्ग्रह), प्रकाशकः मैथिली विकास मञ्च, काठमाण्डूः २०५० फुच्चे सिस्नुपानी धीरेन्द्र प्रेमर्षि विशेष (नेपाली हास्यव्यङ्ग्य रचनासभक सङ्ग्रह),प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल, सम्पादकः माणिकरत्न शाक्यः २०६२ शैक्षिक कृतिःखिस्सा-पिहानी (मैथिली लोककथासभ सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक), प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ हमर मिथिला (मैथिली संस्कृतिसम्बन्धी लेखसभ सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ मैथिल विभूतिसभ (मैथिल विभूतिसभक जीवनी सङ्गृहीत बालसन्दर्भ पुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०६३ हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ क ऐच्छिक मैथिली विषयक पाठ्यपुस्तक),प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५४ सँ २०५८ धरि मैथिली (कक्षा ९ आ १० क ऐच्छिक मैथिली विषयक पाठ्यपुस्तक) प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५७ आ २०५८ हिन्दी (कक्षा १० क ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तक) प्रकाशकः पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुरः २०५८ साङ्गीतिक कृतिः डेग (शान्तिक लेल युवा जागरण तथा सशक्तिकरणसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः संस्कार मिथिला, गोविन्दपुर, सिरहाः २०६६ बैशाख भोर (सकारात्मक सोच तथा शान्ति–सद्भाव सम्बर्द्धनसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सम्झौता नेपाल, काठमाण्डू, २०६५ जेठ नेहक बएन (शान्ति तथा सद्भाव सम्बर्द्धनसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सम्झौता नेपाल, काठमाण्डू, २०६४ कार्तिक गाना-बजाना (विविध मनोरञ्जनात्मक मैथिली गीतक सङ्ग्रह) प्रकाशकः गंगा कैसेट, नयादिल्लीः २०६३ बैशाख भजन दिव्यानन्द (चट्याङ मास्टर रचित नेपाली भजनसभक सङ्गीत-निर्देशन एवं गायन) प्रकाशकः श्रीमती कान्ता गौतमः २०६१ आसिन वन-गीत (संरक्षणसम्बन्धी चेतनामूलक मैथिली आ भोजपुरी गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः बाइसेप एसटी, काठमाण्डू, नेपालः २०६१ चेतना (सामाजिक परिवर्तनक दिस उन्मुख मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः एक्सनएड नेपालक सहयोगमे संस्कार मिथिलाः २०६० अगहन Song of Light : प्रियतम हमर कमौआ (सार्थक गीति क्यासेट तथा पहिल मैथिली सीडी) प्रकाशकः म्यूजिक नेपालः २०५८, सीडीक प्रकाशकः म्यूजिक मिथिला प्रेम भेल तरघुस्कीमे (विविध मनोरञ्जक मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह, क्यासेट तथा सीडी) प्रकाशकः मास्टर क्यासेटः २०५८ सिस्नु 2000.COM (हास्यव्ङग्यात्मक क्यासेट) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल आ रीमा क्यासेटः २०५७ सिस्नुपानी (हास्यव्ङग्यात्मक क्यासेट) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल आ रीमा क्यासेटः २०५६ सिस्नुपानीले (उद्देश्यमूलक हास्यव्यङ्ग्यात्मक गीतसभक सङग्रह) प्रकाशकः सिस्नुपानी नेपाल, हास्यव्यङ्ग्य सदनः २०५५ सुरक्षित मातृत्व गीतमाला (सन्देशमूलक नेपाली, मैथिली, भोजपुरी गीतसभक सङग्रह) प्रकाशकः सुरक्षित मातृत्व नेटवर्क, नेपालः २०५५ सुखक सनेस (बालस्वास्थ्य तथा परिवार कल्याणसम्बन्धी मैथिली गीतसभक सङ्ग्रह) प्रकाशकः सेभ द चिल्ड्रेन, यूएसएः २०५४ कलियुगी दुनिया (नेपालसँ बहराएल मैथिलीक पहिल गीति क्यासेट) प्रकाशकः सिम्फनिक रेकर्डिङ प्रा.लि.: २०४७ प्रकाशोन्मुख कृतिः सूत्रधार (मैथिली हाइकू-सङ्ग्रह) शब्द-सारथी (मैथिली गजलसङ्ग्रह) एमकीक जतरा (मैथिली गीत-सङ्ग्रह) साँपक पएर (मैथिली निबन्ध-सङ्कलन) ओ गीत कोन गाबए? (मैथिली कथा-सङ्ग्रह) सिनुराएल सुरूजदिस (मैथिली कवितासङ्ग्रह) नेताको मुसावतार (नेपाली हास्यव्यङ्ग्य-सङ्ग्रह) The मुड्की (संयुक्त नेपाली हास्यव्यङ्ग्यक सङ्ग्रह) श्यामप्रसादक निबन्ध (मैथिलीमे अनुवाद कएल गेल) मैथिली कथा-संसार (प्रतिनिधिमूलक कथासभक सङ्ग्रह) रचनात्मक कार्यानुभव तथा संलग्नताः रेडियो नेपाल, समाचार-वाचक तथा सम्पादक (मैथिली, नेपाली आ हिन्दी समाचार) अवधिः वि.सं. २०४९ पुससँ वि.सं. २०६१ चैत्र मसान्तधरि कान्तिपुर एफ.एम., मैथिली कार्यक्रम ‘हेल्लो मिथिला’ आ ३ अन्य, परिकल्पना तथा प्रस्तुति अवधिः वि.सं. २०५८ फागुनसँ वर्तमानधरि नेपाल एफ.एम., समावेशी लोकतन्त्रसम्बन्धी कार्यक्रम ‘आवाज’, संयोजन आ निर्देशन अवधिः वि.सं. २०६३ अखाढ़सँ वर्तमानधरि नेपाल 1 टेलिभिजन, नेपाली साहित्यिक कार्यक्रम ‘राम्रो कस्तो राम्रो’क प्रस्तुति अवधिः वि.सं. २०६४ साओनसँ एक सालधरि गोरखापत्र दैनिक, ‘नयाँ नेपाल’ परिशिष्टअन्तर्गत मैथिली खण्डक संस्थापक संयोजक अवधिः वि.सं. २०६४ आसिनसँ छओ मासधरि पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादक तथा प्रकाशक अवधिः वि.सं. २०५० अखाढ़सँ वर्तमानधरि पल्लवमिथिला, दोसर मैथिली इन्टरनेट पत्रिका (साहित्यिक), सम्पादक तथा प्रकाशक अवधिः वि.सं. २०५९ माघ मैथिल समाज, सामाजिक तथा सांस्कृतिक त्रैमासिक, सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५८ असोजदेखि वर्तमानधरि फित्कौली, नेपाली हास्यव्यङ्ग्यसम्बन्धी मासिक पत्रिका, संयुक्त सम्पादक अवधिः वि.सं. २०६२ अखाढ़सँ वर्तमानधरि कामना, नेपाली सिनेमासिक पत्रिका, सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५३ चैत्रसँ २०५५ माघधरि ज्ञान-गङ्गा, साहित्य तथा विविध समसामयिक विषयसभक पत्रिका, संयुक्त सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५९ बैशाखसँ वर्तमानधरि यती, स्वास्थ्य, यौन तथा परिवार कल्याणसम्बन्धी त्रैमासिक पत्रिका, कार्यकारी सम्पादक अवधिः वि.सं. २०५४ अगहनसँ २०५५ पुसधरि अन्य उल्लेख्य गतिविधिः नेपालक अधिकांश राष्ट्रीय अखबार तथा साहित्यिक पत्रपत्रिकामे नियमित रूपेँ कथा, कविता, गीत-गजल, हास्यव्यङ्ग्यसन साहित्यिक तथा अन्य समसामयिक लेखन। नेपाल, भारत, अमेरिका आ यूएइसँ प्रकाशित भेनिहार विभिन्न पत्रपत्रिका एवं नेट म्याग्जिनमे मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक एक हजारसँ बेसी लेख-रचना प्रकाशित। बीबीसी नेपाली सेवा आ अल इण्डिया रेडियोसहित अनेको पत्रपत्रिका, रेडियो तथा टेलिभिजन कार्यक्रममे साहित्यकार तथा भाषा अभियानी / संस्कृतिकर्मीक रूपमे अन्तर्वार्ता प्रसारित। कामना प्रकाशनक ‘नेपाल समाचारपत्र’ मे एक वर्षधरि सम्पादकीय पृष्ठक संयोजन। कान्तिपुर एफ.एम. मे हास्यव्यङ्ग्यसम्बन्धी नेपाली भाषाक साप्ताहिक कार्यक्रम ‘कुर्सीमाथि फर्सी’, एच.बी.सी. एफ.एम. मे साप्ताहिक मैथिली कार्यक्रम ‘चौबटिया’, मेट्रो एफ.एम. मे दैनिक विश्लेषणात्मक नेपाली कार्यक्रम ‘मन्थन’ क निर्देशन तथा सञ्चालन। स्वतन्त्र समाचार सेवाक insonline.net मे पहिल नेपाली अनलाइन श्रव्य समाचारक शुरुआत। ‘हिमालय टाइम्स’, साप्ताहिक ‘नेपाल’ ‘दृष्टि’, ‘बुधबार’, ‘हिमाल’ आदि पत्रिकामे स्तम्भ लेखन। ‘लेकाली सङ्गीत-यात्रा’ समेत अनेको महत्त्वपूर्ण पोथीक भाषा-सम्पादन एवं भूमिका लेखन। कथा, पटकथा, संवाद लेखन- मैथिली टेलिशृङ्खलाः ‘अन्हरजाली’, ‘आशीर्वाद’ आ ‘दूमहला’। नेपाली कथानक चलचित्र ‘दुलही’ क लेल कथाविचार तथा गीतलेखन। जङ्गल साहित्यिक गोष्ठीसमेत कतिपय साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमक संयोजन। नेपाली टेलिशृङ्खला ‘आगन्तुक’, नेपाली टेलिशृङ्खला ‘गोनू झा’ मे गीत, सङ्गीत, गायन। नेपाल, भारत तथा कतारमे अनेको साहित्यिक / साङ्गीतिक समारोहमे सहभागी। पहिल मैथिली टेलिफिल्म ‘मिथिलाक व्यथा’, ऐतिहासिक मैथिली टेलिशृङ्खला ‘महाकवि विद्यापति’ तथा नेपाली टेलिशृङ्खला ‘मदनबहादुर-हरिबहादुर भाग २’ मे अभिनय। विकट हिमाली जिला हुम्लाक इतिहासमे पहिलबेर नाटक मञ्चन एवं अन्य विभिन्न स्थानपर नेपाली, मैथिली तथा हिन्दी भाषाक नाटकसभक निर्देशन, लेखन तथा मञ्चन। प्रज्ञा-प्रतिष्ठानक नृत्य-सङ्गीत समिति तथा लोकसाहित्य समितिक सदस्य रहि क्रियाशील। जगदम्बाश्री पुरस्कार (२०५८) तथा नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानद्वारा आयोजित प्रथम मिथिला चित्रकला प्रतियोगितासहित कतोक कविता तथा गजल प्रतियोगितामे निर्णायकक भूमिका निर्वहन। संस्थागत आबद्धताः संस्थापक अध्यक्ष, कला-संस्कृति-सञ्चार संस्थाः संस्कार मिथिला संस्थापक अध्यक्ष तथा संरक्षक, मैथिली विकास मञ्च संस्थापक तथा उपाध्यक्ष, सिस्नुपानी नेपाल, हास्यव्यङ्ग्य सदन सदस्य-सचिव, फूलकुमारी महतो मैथिली सम्मान समिति, काठमाण्डू सदस्य-सचिव, वैद्यनाथ-सियादेवी मैथिली पुरस्कार प्रतिष्ठान, काठमाण्डू कार्यसमिति सदस्य, नेपाल मैथिल समाज, काठमाण्डू केन्द्रीय सदस्य, नेपाल साहित्यिक पत्रकार सङ्घ केन्द्रीय सदस्य, भाषिक अधिकार संयुक्त सङ्घर्ष समिति अन्य कतोक सङ्घ-संस्थामे आजीवन तथा मानार्थ सदस्य एवं सलाहकार पदक तथा सम्मानः राष्ट्रिय स्रष्टा सम्मान- २०६८ (प्रगतिशील तथा देशभक्त सांस्कृतिक मञ्च ) सशक्त सञ्चारकर्मी पत्रकारिता पुरस्कार- २०६८ (प्रेस काउन्सिल नेपाल ) जन-अभिनन्दन- २०६८ (सिरहा समाज सेवा, काठमाडौँ ) मिथिला दूत सम्मान- २०६७ (मैथिली सेवा समितिसहित दर्जनभरि संघ-संस्था, काठमाण्डू) मधुरिमा फूलकुमारी महतो सांस्कृतिक सम्मान- २०६५ (मधुरिमा कला केन्द्र, काठमाण्डू) लोकतान्त्रिक स्रष्टा सम्मान- २०६४ (अविरल साहित्य समाज, सिन्धुपाल्चोक) विद्या-वाचस्पति (D.Lit.)- ई. २००७ (विक्रमशिला विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार) मैथिली सङ्घर्षशील व्यक्तित्व सम्मान- २०६३ (मैथिली साहित्य परिषद्, लहान) साहित्य भास्कर- ई. २००६ (अखिल भारतीय भाषा-साहित्य सम्मेलन, भोपाल, म.प्र.) उत्कृष्ट सङ्गीतकार सम्मान- ई. २००६ (संस्कृति मिथिला, सहरसा, बिहार) जनअभिनन्दन- २०६२ (मैथिली सेवा समितिसहितक सङ्घ-संस्था, विराटनगर) मिथिलारत्न सम्मान- ई. २००५ (अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन, नयादिल्ली) वागेश्वरी सम्मान- २०६२ (वागेश्वरी सेवा समिति, राजविराज, सप्तरी) सलहेस महोत्सव सम्मान- २०६१ (सलहेस संरक्षण समिति, सिरहा) ‘माटी की गंध’ कथा पुरस्कार- ई. २००३ (अभिव्यक्ति प्रकाशन, शारजाह, यूएई) नवरङ्ग सम्मान- २०५७ (नवरङ्ग साहित्य प्रतिष्ठान, धरमपुर, झापा) भानु पदक- २०५४ (भानु कला केन्द्र, विराटनगर) विदेश-भ्रमणः भारत, चीन आ कतार। सम्पर्क पताः पोष्टहार्भेष्ट व्यवस्थापन निर्देशनालय, श्रीमहल, पुल्चोक, ललितपुर, नेपाल। फोन नं.: ९७७-१-५५३६९९४ / ९८४१२८०७३३ ईमेल- dhipre@yahoo.com आ dhipre@gmail.com नोट: पल्लवमिथिला मैथिलीक दोसर इंटरनेट पत्रिका अछि जखन की वास्तविकता ई थिक जे भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल आ अखनो ५ जुलाइ २००४ सँhttp://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर अछि, मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ" विदेह " पड़लै। ई टिप्पणी मात्र इतिहास शुद्धता लेल अछि। मैथिलीक पहिलसँ लए क' एखन धरिक हरेक इंटरनेट पत्रिकाक नाम, यूआरएल, ओकर पहिल पोस्टक तारीख ऐ ठाम देखल जा सकैए---http://www.videha.co.in/feedback.htm जँ किनको लग 5/7/2004 सँ पहिनुक लिंक छन्हि तँ प्रस्तुत कएल जाए। ( ऐ फोटोमे धीरेन्द्र प्रेमर्षि, हुनक पत्नी रूपा झा आ हुनक दू गोट बालक।) विदेहक फेसबुक भर्सन http://www.facebook.com/groups/videha/ पर भेल टिप्पणी देल जा रहल अछि। ई इतिहास शुद्धता लेल नीक अछि। You, Ashutosh Mishra, Prabin Chaudhary Pratik, Rajeev Ranjan Mishra and12 others like this. Jan Anand Mishra Premarshiji ekta star bain chukal chhaith 6 hours ago via Mobile · Unlike · 1 Ashish Anchinhar आ हमर कोशिश रहल अछि जे स्टारक स्टार सभ सेहो ऐ फोटोमे आबथि से आबि गेल छथि।. 6 hours ago · Like · 4 Dhirendra Premarshi आशिषजी, धन्यवाद परिचय शृङ्खलामे हमरा रखबाक लेल। पल्लवमिथिलाक सन्दर्भमे हम पहिनहु कहने रही जे वर्ष २००३ जनवरीसँ शुरू भेल छल मुदा ओकरा हम निरन्तरता नहि दऽ सकलहुँ। तेँ ओइपर हमर कोनो दाबा नहि अछि। हँ ओहिमे वर्तमानधरि सेहो लिखाएल अछि जे सर्वथा गलत अछि। अइ बायोडाटामे कने सम्पादन जरूरी छलै से नहि भऽ पाएल अछि। ओना पल्लवमिथिलाकेँ भाषाविद डा रामावतार यादव सार्वजिनक कएने छलाह से समाचारो छपल छल। मुदा हमरा ओ कटिंग तकबामे सेहो भाङठ हएत। कारण हम व्यवस्थापनक मामलामे बड्ड कमजोर छी। 3 hours ago · Unlike · 3 Dhirendra Premarshi २०५९ माघे संक्रान्तिदेखि नेपालको मैथिली भाषाको पहिलो इन्टरनेट पत्रिका पल्लव www.pallavmithila.mainpage.net सुरु गरिएको छ। यो पत्रिका काठमाडौँस्थित मैथिली विकास मंचको तर्फबाट धीरेन्द्र प्रेमर्षीद्वारा सम्पादन तथा प्रकाशन गरिन्छ। यसमा मैथिली भाषामा विविध साहित्यिक सामग्री राखिएका छन्। हरेक महिना यसका सामग्रीहरू अद्यावधिक गरिन्छ। (सम्प्रति नेपालक सूचना आयोगक अध्यक्ष विनय कसजूद्वारा लिखित पुस्तकमे सेहो पल्लवके बात राखल गेल अछि। एकर जे लिंक छै से अस्थायी प्रकृतिक भेलाक कारणे आब नइ भेटैत अछि। डा कसजूक किताबक लिंक अइठाम दऽ रहल छी-http://www.kasajoo.com/itbook_vinaya.pdf) mainpage.net: The Leading Main Page Site on the Net www.mainpage.net 2 hours ago · Like · Ashish Anchinhar हम http://www.pallavmithila.mainpage.net/ आhttp://www.pallavmithila.net/ दुनू खोलबाक प्रयास केलौं मुदा नै खुजलhttp://pallav.blogsome.com/ खुजल आ ओ १७ मइ २००६ केर अछि आhttp://hellomithila.blogspot.com/सेहो खुजल जे ३ मइ २००६ केर अछि। भऽ सकैए ओ डोमेन नेम डिलीट भऽ गेल हुअए, मुदा जँ डिलीट भेल डेटा देखी तँ तै हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ २००० ई.सँ yahoogeocities पर निरन्तर छल, मुदा याहू द्वारा geocities सर्विस बन्द भऽ गेलाक बाद ओहो डोमेन नेम बन्द भऽ गेल, आ http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html आ http://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html ५ जुलाइ २००४ सँ निरन्तर मैथिलीक सभसँ पुरान स्वरूपमे उपलब्ध अछि, नचिकेताक नाटक विदेहक आठम अंकसँ धारावाहिक प्रकाशित भेलै आ ओ जखन २००८ मे पोथी रूपमे एलै तखन इन्टरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ २००० ई. मे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा कएल जेबाक चर्च ओतए छै। (लिंकhttp://sites.google.com/a/shruti-publication.com/shruti-publication/Home/NO_ENTRY_MA_PRAVISH.pdf?attredirects=0) अहाँक दुनू लिंक जे खुजि रहल अछि ओकर चर्च सेहो अंतिकाक इन्टरनेट पत्रिका विशेषांकमे गजेन्द्र ठाकुरजी केने छथि। ओना अहाँक देल सूचना महत्वपूर्ण अछि आ भालसरिक गाछक बाद दोसर इन्टरनेट पत्रिका पल्लवकेँ मानल जा सकैए। तदनुसार अहाँक बायोडाटामे सम्पादन कऽ रहल छी। mainpage.net: The Leading Main Page Site on the Net www.mainpage.net 32 minutes ago · Like · Dhirendra Premarshi अहाँ सही कहै छी आशिषजी। ई बात हम उपरका कमेंटमे सेहो लिखने छी। (एकर जे लिंक छै से अस्थायी प्रकृतिक भेलाक कारणे आब नइ भेटैत अछि।) ओना एकटा बात हम कहि दी जे हमर ई दावा नइ अछि मात्र जानकारीभरि अछि। आब जेँ कि ओकर प्रमाणो खतम भेल जा रहल छै तेँ भऽ सकैए जे हम ओ विवरणो हटा दी। 22 minutes ago · Unlike · 1 Ashish Anchinhar हँ मेनपेज डॉट नेट डोमेन नेम प्रायः खतम भऽ गेल छै, तकरा बाद कियो दोसर गोटे ओकरा लेने छथि प्रायः। तै दुआरे मेनपेज डॉट नेटक सब डोमेन पल्लव सेहो खतम भऽ गेल हेतै। तै हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ आ आर किछु साइट जे याहूसिटीज केर अन्तर्गत २०००मे गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा शुरू भेल सेहो याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद खतम भऽ गेलै मुदा अखनो एकर सभ सँ पुरान लिंक ५ जुलाइ २००४ अखनो अछिये। ओइ हिसाबे सेहो भालसरिक गाछ पहिल आ पल्लव दोसर इन्टरनेट पत्रिका सिद्ध होइए आ तदनुसारे परिवर्तन/ सम्पादन कऽ देने छी.. सादर। about a minute ago · Like गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-22 विजय नाथ झा प्रकाशित गीत-गजल संग्रह---- अहींक लेल ( प्रकाशन साल 2008, प्रकाशक -शेखर प्रकाशन) पिता-प. रतिनाथ झा ( पूर्व विभागाध्यक्ष प्राच्य दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) गाम---ग्रम-पोस्ट---तलपुरवा, बाँसी, सिद्यार्थनगर,( उत्तर प्रदेश) शिक्षा---विज्ञान स्नातक ( काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) वृति---पत्रकारिता आ स्वतंत्र लेखन, आर्यावर्तक संपादकीय विभागमे विविध सेवा, चुटकुलानंदक चिट्ठी केर लेखन, आकाशवाणी आ दूरदर्शन पटनामे कविता पाठ आ अन्यान्य तरहवक प्रसारण गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-23 राम भरोस कापड़ि भ्रमर, 1951 प्रकाशित गीत-गजल संग्रह----मोमक पघलैत अधर जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)।बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान), घरमूहाँ ( उपन्यास)२०१२। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता- श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-24 नरेश कुमार विकल जन्म 27 जुलाइ 1950 भगवानपुर देसुआ (समस्तीपुर) प्रकाशित कृति---- अरिपन, महुआ मदन रस टपकय, बिन बाती दीप जरय ( काव्य-) कथा-संग्रह- भरि गेल दर्दक इनार। उपन्यास- टहकैत टीस। नाटक- चोखगर खौंच। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-25 योगानंद हीरा ई पहिल गजलकार छथि जे मैथिलीमे पूर्ण रूपेण आ पहिल बेर अरबी बहरक पालन केलथि। मुदा एही कारणे मैथिली संपादक सभ हिनका कात कए देलकन्हि मूल नाम---योगानंद दास हीरा जन्म-30-1-1940 गाम--डुमरी, पत्रालय-गणपतगंज, थाना-राघोपुर, जिला सुपौल शिक्षा-- हिन्दी भाषामे मास्टर डिग्री लेखन---मैथिली आ हिन्दी दूनूमे प्रकाशित पोथी--- नीड़ की तलाश, भले आदमी की तलाश ( उपन्यासिका), सिमटती छाया ( कहानी संग्रह), एक अच्छा मैं ( एकांकी संग्रह), आज की कहानी ( नाटक)। सभ प्रकाशित पोथी हिन्दीमे। मैथिलीमे जल्दिये हिनक पोथी आएत। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-26 गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर,जन्म-स्थान-भागलपुर 30 मार्च 1971 ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी (बिहार)। शिक्षा: एम.बी.ए. (फाइनेन्स), सी.आइ.सी., सी.एल.डी., कोविद। विदेहक http://www.videha.co.in प्रधान संपादक सहित अनेको वेबसाइटक संचालक आ पथप्रदर्शक। प्रकाशित गजल संग्रह----धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ विशेष------ हिनक चारिटा मुख्य विशेषता अछि--- 1) ई मैथिलीक पहिल अरूजी छथि, आ 2) हिनका माध्यमे मात्र बारह सालमे कुल ३५०-४००टा नवलेखक आ कतिआएल लेखक सामने अएलाह। 3) अन्तर-महाविद्यालय क्रिकेट प्रतियोगितामे "मैन ऑफ द सीरीज" (1991), सम्प्रति अमेच्योर गोल्फर| 4)अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास, मैथिली विकीपीडियाक स्थापक। गूगल मैथिली ट्रान्सलेटमे योगदान आ शब्दकोषक वृहत संकलन ओ प्रकाशन। संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन आ ओइमे अभिनय। अन्य लेखन: प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग-१ सहस्रबाढ़नि (उपन्यास) सहस्राब्दीक चौपड़पर (पद्य संग्रह) गल्प-गुच्छ (विहनि आ लघु कथा संग्रह) संकर्षण (नाटक) त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन (दूटा गीत प्रबन्ध) बाल मण्डली/ किशोर जगत (बाल नाटक, कथा, कविता आदि) उल्कामुख (नाटक) सहस्रशीर्षा (उपन्यास) प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना भाग दू (कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक-२) धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ (गजल संग्रह) शब्दशास्त्रम (कथा संग्रह) जलोदीप (बाल-नाटक संग्रह) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देवनागरी वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur.pdf तिरहुता वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Tirhuta.pdf ब्रेल वर्सन KuruKshetramAntarmanak_GajendraThakur_Braille.pdf सहस्रबाढ़नि_ब्रेल मैथिली (पी.डी.एफ.) सहस्रबाढ़नि_ब्रेल-मैथिली मिथिलाक इतिहास- भाग-२ (शीघ्र) जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी (शीघ्र) The Comet The_Science_of_Words On_the_dice-board_of_the_millennium A Survey of Maithili Literature- Vol.II- GAJENDRA THAKUR (soon) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू Learn_MithilakShara_GajendraThakur.pdf Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू LearnBraille_through_Mithilakshara.pdf Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू Learn_International_Phonetic_Alphabet_through_Mithilakshara.pdf सह-लेखन: गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES Maithili_English_Dictionary_Vol.I.pdf MaithiliEnglishDictionary_Vol.II_GajendraThakur.pdf ENGLISH-MAITHILI DICTIONARIES VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY EnglishMaithiliDictionary_Vol.I_GajendraThakur.pdf जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (Click this link to download) http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab (Click this link to download) OR right click the following link and save target as:- http://videha123.wordpress.com/files/2009/11/panji_crc1.pdf AND click this link to download some of the jpg images of palm-leaf manuscripts of Panji. http://www.esnips.com/web/videha AND CLICK EACH OF THE FOLLOWING 17 LINKS TO DOWNLOAD ALL THE 11000 JPG IMAGES IN 17 PDF FILES. पंजी (मूल मिथिलाक्षर ताड़पत्र) दूषण पंजी मोदानन्द झा शाखा पंजी मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल) उतेढ़ पंजी पनिचोभे बीरपुर दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि छोटी झा पुस्तक निर्देशिका पत्र पंजी मूलग्राम पंजी मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी मूल पंजी-२ मूल पंजी-३ मूल पंजी-४ मूल पंजी-५ मूल पंजी-६ मूल पंजी-७ गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-27 मु्न्ना जी प्रकाशित गजल संग्रह----माँझ आँगनमे कतिआएल छी। अन्य प्रकाशित पोथी----प्रतीक ( विहनि कथा ), हम पुछैत छी ( साक्षात्कार) शीघ्र प्रकाश्य पोथी---- भैया जी ( उपन्यास) आ एकटा हाइकू संग्रह हिनक अन्य विवरण एना अछि------मूलनाम- मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल विहनि कथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो विहनि कथा, लघु कथा, क्षणिका, गजल आ विहनि कथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित। मुख्यतः मैथिली विहनि कथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करबाक दिशामे संघर्षरत। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-28 शान्तिलक्ष्मी चौधरी ई श्रीमती शेफालिका वर्मा जीक बाद मैथिलीक दोसर महिला गजलकार छथि आ सभसँ पहिने अनचिन्हार आखर द्वारा हिनका गजल लिखबाक लेल प्रेरित कएल गेल। मने ई अनचिन्हार आखरक खोज थिकीह। श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-29 सदरे आलम "गौहर" विशेष---अनचिन्हार आखर द्वारा प्रयोजित मैथिली गजल लेल देल जाए बला " गजल कमला-कोसी-बागमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011क विजेता छथि। धातव्य अछि जे ई ऐ सम्मानक पहिल विजेता छथि। गाम-पुरसौलिया, भाया- जयनगर, जिला मधुबनी। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-30 अनिल कुमार मल्लिक ( अनचिन्हार आखर पर " अनिल " नामसँ उपस्थित ) हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- हम अनिल कुमार मल्लिक पिता श्री सुरेन्द्र लाल मल्लिक माता श्रीमती सुशिला देबी मल्लिक l हमर जन्म २२ दिसम्बर १९६२ मे झापा जिला, मेची अंचल, नेपाल मे भेल l हमर पुर्खा ग्राम महिशारि, थाना सिंघबारा, जिला दरिभंगा सॉ छलाह, करिब ११० साल पहिने राणा शासन के समय हमर बाबा स्व. जिवनाथ मल्लिक नेपाल अयलाह, सरकारी नोकरी गोश्वारा मे भेटलन्हि आ बाद मे पटवरिका भेटलन्हि त नेपाल के भ' क' रहि गेलहूँ हम सभ l हमर १० कक्षा तक के शिक्षा झापा के इस्कुल मे भेल, स्नातक तक के शिक्षा हमरा बिरगंज आ काठमाण्डु मे भेटल, जन प्रशासन बिषय मे स्नातकोत्तर के अन्तिम बरख छल मुदा कारण बस पुरा नहि क' सकलहूँ l २ भाई छी, ४ बहिन… हम सभ सॉ जेठ छी भाई के बिबाह बिदेह ग्रुप मे सदस्य छथि श्री बृषेश चन्द्र लाल, हुनकर जेष्ठ कन्या सॉ भेल l हमर मातृक समैला, ग्राम पोष्ट पचाढी, जिला दरिभंगा भेल l हमरा मैथिली भाषा आ अपन संस्कृती प्रति के प्रेम हमरा अपन दादी स्व.जोगमाया देबी सॉ भेटल ओ हमर आदर्श छथि l हम कओलेज के समय मे नाटक सभ लिखैत छलहूँ, गीत इ सभ गबैत छलहूँ सांस्कृतीक कार्यक्रम सभ मे नेपाली, हिन्दी, बाङ्ला या त फेर राजबंशी भाषा मे l मैथिली मे लिखनाई बुझू विदेह सॉ जुडला'क बाद मात्र सुरु भेल l मास साइत अक्टूबर २०११ मे पहिल पोष्ट छल "आखर आखर शब्द लिखै छी" l २ पुत्र'क पिता छी, पत्नी संगीता कुमारी कर्ण छथि l आशिष जी'क बताओल बेसीक कॉन्सेप्ट पर सरल बर्ण पर गजल लिखैत छी, एकटा दबाई के कम्पनि मे ब्यवस्थापक छी आ अपनो नीजी ब्यवसाय अछि त समय के कने कमी रहैत अछि l अन्चिन्हार आखर त कय बेर इ सोचि भिजिट करैत रहलौं की संभवतः हमहूँ सिख जायब मुदा नै सिख सकलहूँ अखनि धरि l हमरा नेपाल मे लोक मैथिली मे लिखैथ, पढैथ, भाषा के सम्मान भेटै से नीक लगैत अछि त जे समय भेटैत अछि कोशिष करैत छी, एकर अलावा अपन जन्म स्थान के बच्चा सभ'क शिक्षा प्रति सचेत छी आ जे संभव होइत अछि करवा'क चेष्टा करैत छी गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-31 मिहिर झा ई अनचिन्हार आखरक खोज छथि। विशेष---- मिहिर जी " अनचिन्हार आखर " द्वारा आयोजित पहिल आन-लाइन मोशायराक विजेता छथि। हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- गाम - लखनौर (झंझारपुर) जन्म - २ जून १९६३ शिक्षा - स्नातक (विज्ञान) , स्नातकोत्तर (प्रबंधन) संप्रति - जे. आई. आई. टी विश्वविद्यालय. नोएडा मे डिप्टी रजिस्ट्रार परिवार - पत्नी - श्रीमती वंदना झा, पुत्री - श्रुति आ श्रिया , पुत्र - आशीष अभिरुचि - साहित्य ( पद्य ), "अनचिन्हार आखर" के प्रेरणा सों गजल विधा मे प्रारंभिक प्रयास आकांक्षा - विश्व स्तरीय साहित्य मे मैथिली साहित्य के शीर्षस्थ देखब गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-32 ओमप्रकाश हिनक परिचय हिनक अपने शब्दमे------- हमर नाम ओम प्रकाश झा अछि। हम ओम प्रकाश नाम सँ गजल लिखैत छी। हमर बाबूजीक नाम श्री पीताम्बर झा आ माताजीक नाम श्रीमती रामकुमारी झा अछि। हमर जन्म ०५ दिसम्बर १९६९ ईस्वी मे हमर नानीगाम चुन्नी, पत्रालय मधेपुर, जिला मधुबनी मे भेल अछि। हमर पैतृक गाम ड्योढ, पत्रालय घोगरडीहा, जिला मधुबनी अछि। हम छह भाई बहिन मे सब सँ जेठ छी। दसवींक इम्तहान १९८४ मे बीरपुर, जिला सुपौल सँ पास केने छी। अन्तरस्नातक १९८६ मे सी. एम. साइंस कओलेज, दरिभंगा सँ आ स्नातक १९९० मे लंगट सिंह कओलेज, मुजफ्फरपुर सँ पास केलहुँ। सरकारी सेवा मे १९९२ मे अयलहुँ। २००१ मे प्रोन्नति भेंटला पर आयकर अधिकारी भेलहुँ आ विभिन्न स्थान सँ होइत एखन भागलपुर मे पदस्थापित छी। साहित्यक प्रति प्रेम पिता सँ भेंटल अछि। ओहो साहित्य अध्ययन मे बहुत रूचि राखै छथि आ गोट आध रचना सेहो करैत रहै छथि। हमर पढाई केर विषय विज्ञान रहल मुदा साहित्यक प्रति प्रेम ओहो समय उत्कट छल आ अपन डायरी मे किछु किछु लिखैत रहै छलौं। मुदा नै ककरो ओ रचना देखेलियै आ नै सुनेलियै। हम २०१० सँ फेसबुक पर सक्रिय भेलौं आ २०११ मे विदेह ग्रुप मे शामिल कएल गेलौं। इ घटना हमरा लेल परिवर्तनक घटना छल। विदेह पर आदरणीय गजेन्द्र भाई आ अनुज आशीष भाई (हमरा सदिखन लागैए जे इ हमर हराएल अनुज छथि, जे एकाएक भेंटला) सँ सम्पर्क भेल। इ दुनू गोटे हमर भीतर मे नुकाएल गजलकार केँ बाहर आनि दुनियाक सामने ठाढ कऽ देलखिन्ह। ओहि समय आशीष भाई हमरा अनचिन्हार आखर मे योगदान लेल आमन्त्रित केलथि। अनचिन्हार आखर पर हमरा गजलशास्त्रक नियम सब पढबाक अवसर भेंटल, जे हमरा लेल बहुत उपयोगी सिद्ध भेल। आशीष भाईक प्रेरणा पर हम अरबी बहर मे गजल लिखनाई शुरू कएलौं। हमर लिखल गजल अनचिन्हार आखर ब्लाग पर पढल जा सकैए। हम गजलक अलावे कथा, पद्य आ समीक्षा सेहो लिखै छी, मुदा मुख्य रूप सँ हम गजलकार छी। गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-33 अमित मिश्र हिनक परिचय हिनकेँ शब्दमे---- बाबू जी-श्री नविन कुमार मिश्र माँ- श्रीमती विभा देवी हम सम्तीपुर जिलाक रोसड़ा थाना अंतर्गत करियन नाम क गाम के रहनिहार छी ।हमर जन्म 11 / 1/1993 मे भेल। बाबू जी एकटा किसान छथि तेँए हमर प्रारंभीक पढ़ाइ गामक इस्कूल मे भेल आ हाइ इस्कूल बैद्यनाथ पूर सँ 2008 मे मैट्रीक केलौँ । इंटर सी .एम .साइंस काँलेज दरभंगा सँ भेल आ एतै सँ गणीत सँ स्नातक क रहल छी । हमरा भाषा सँ कोनो विषेश प्रेम नै रहल । आ मैथिली आफसनल रहबाक कारण कहियो नै पढ़लौँ मुदा हमर बाबा स्बर्गीय भोला ईसर {हमर बाबा तक ईसर लिखाइ छल मुदा बाबू जी सँ मिश्र भ गेल जे की हमर फरीकक आनो चाचा सब लिखै छथि } शिक्षक छलथिन तेँए हम भाषा सँ बेसी दूरो नै छलौं । 2008 मे हम पहिल बेर लिखलौँ जे की एकटा मैथिली मे भगवती गीत छल आ तेकर बाद प्राय: मैथिली , हिन्दी , भोजपुरी मे गीत आ बाद मे मैथिली मे किछु कविता लिखलौं । हमर किछु मित्र किछु गीत सब सुनने छलथि आ किछु गामक किर्तन मे गेने छलौँ बाद बाँकी सब डायरीये मे समेटल छल मुदा 2012 के जनवरी मे विदेह सँ जुड़ला के बाद हमर रचना अपने सबहक संग भेटल । जनवरीक अन्त मे श्री आशीष अनचिन्हार जीक आशीर्वाद भेटल आ अनचिन्हार आखर सँ भेँट भेल । गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-34 चंदन कुमार झा ई अनचिन्हार आखरक खोज छथि। हिनक परिचय हिनकहि शब्दमे---- पिता-श्री अरूण झा माता-मीना देवी जन्म-०५-०२-१९८५ ग्राम-सड़रा,मदनेश्चर स्थान पोस्ट-मदना थाना-बाबूबरही जिला-मधुबनी जन्म-स्थान-सिसवार (मामा गाम मे) नाना-स्व० शुशील झा (राजाजी) आरंभिक शिक्षा-मामा गाम मे (१०वाँ धरि) आँगाक शिक्षा- अन्तर-स्नातक (वाणिज्य) एवं स्नातक (वाणिज्य) दरिभंगा सँ, चंद्रधारी महाविद्यालय.,वित्तीय-प्रबंधन मे डिप्लोमा (वेलिंगकर इन्सटीच्युट आफ मैनेजमेन्ट,मुम्बई) व्यवसायिक जीवन- एकटा बहुराष्ट्रीय कंपनी मे लेखा-विभाग मे कार्यरत परिवार-निम्न मध्यम वर्गीय कृषक परिवार रुचि-अध्ययन-अध्यापन,नाटक-संगीत,सामाजिक सरोकार सँ जुड़ब आ' साहित्यिक गतिविधि. साहित्य लेखन-२००० ईस्वी सँ.कएक गोट कविता,लेख ईत्यादि दरभंगा रेडियो स्टेशन एवं विभिन्न पत्र-पत्रिका सभ सँ प्रकाशित-प्रसारित. किछु व्यक्ति जिनकर अनुकंपा सँ कहियो उॠण नहि होयब- श्री विजयकांत मिश्र (अध्यापक)-कन्हई,श्री शंभूनाथ झा-सुसारी,श्री ताराकांत झा (संपादक,मिथिला समाद),डा० धिरेन्द्र नाथ मिश्र (मैथिली विभागाध्यक्ष,सी.एम.कालेज) (हम ई त' नहि कहि सकब जे मैथिली सँ हमरा कहियो भेँट नहि छल किएक त' हम मैट्रिक सँ स्नातक धरि सभ दिन एच्छिक विषय के रूप मे एकरा पढलहु.हाँ तखन मैथिली व्याकरण सँ कहियो भेँट नहि भेल अवश्य. हमरा कहियो मैथिली पढब आ'कि लिखबा मे बेशी दिक्कत नहि भेल किएक तए जहिना बजैत-सुनैत छी ओहिना लिखैत छी आ' सभ दिन मैथिली साहित्य रुचिकर लगैत रहल अछि...मुदा, मैथिली मे कविता ईत्यादि हम लिखनाय चालू कएलहुँ एकरा पाँछा हमर पारिवारिक आर्थिक विपन्नता छल..एकटा एहन समय आयल जखन लगैत रहय जे पढाइ बिचहि मे छोड़य पड़त किएक त' अभिभावक पढौनिक खर्चा देबय मे असमर्थ भऽ गेल रहथि ..खोलि कय कहियो नहि कहलथि..सभदिन उत्साहित करैत रहलथि..मुदा जहिया दरभंगा सँ गाम जाइत छलौ मासक खर्च अनबा लेल माँ-बाबूजीक चिन्ता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होइत छल..लोकक धिया-पुता गाम अबैछ त' माय-बाप हर्षित होइत छैक...हमर माय कनैत छल...मुदा, खून बेचि पढेबाक जिद्द आ तइँ पढाइ नहि छोडल भेल...एहि समय मे परमादरणीय श्री ताराकांत झा जी (संपादक-मिथिला समाद) एकटा सुझाव देलनि जे दरभंगा रेडियो-स्टेशन मे हरेक-मास किछु कार्यक्रम कऽ किछु धनार्जन कयल जा सकैत अछि आ' मासक खर्छ निकालल जा सकैत अछि. हमरा ई सुझाव सूट कयलक आ' फेर सँ नव-उत्साहक संग अपने धनार्जन कय पढबाक विचार ठनलहु. तत्काल एकटा प्राइवेट स्कूल मे मास्टरी पकडि लेलहु...फेर डा. धीरेन्द्रनाथ मिश्र (तत्काळीन बिभागाध्यक्ष-मैथिली , सी.एम.कालेज) के मार्गदर्शन भेटल..केन्द्रिय पुस्तकालय, दरभंगा मे भरि दुपहरिया अगबे मैथिली के पोथी पढी ....जे मोन मे अबैत गेल लिखैत गेलहु आ' एक साल मे पचास टा सँ बेशी कविता लिखलहु....आब मोनो लागय लागल..नित नव उल्लास ......रेडियो स्टेशन सेहो ३-४ टा कार्यक्रम करबाक अवसर देलक...स्नातक खतम भेल..आगाँ पढबाक मोन छल दू टा छोट भाइक भविष्य सोचि अपन भविष्य दाँव पर लगा देलियैक...रोजी-रोजगारक अवसर मे मुम्बई चलि गेलहु..क्रमशः दिन घुरल ..फेर अपनो जहाँ धरि सकलहु आगाँ पढलहु..(फाइनान्स सँ डिप्लोमा कयलहु).....एखनहु पढतहि छी...मझिला स्नातक कयलक..छोटका भाइ एखन इंजिनीयरिंग कय रहल अछि...आब संतोष अछि....त्यागक फल भेटल...हाँ एहि झमेला मे पछिला छह बरख मे साहित्यिक रचनात्मका जेना हेराय गेल छल..मुदा संजोग जे कलकत्ता स्थान्तरित भेलहुँ..फेर ताराकांजी भेटलाह आ' नवउत्साह पाबि किछु लिखबाक प्रयास शुरू कयलहु..किछु सफलता सेहो भेटल..आ' फेर विदेह भेटल..एकर सुधि पाठक भेटल..गुरूरूप मित्र भेटल ......आ' सभटा हेरायल सपना जेना भेट गेल...अरे बाप रे ई कथा त' अनावश्यक नमहर भेल जा रल अछि..एकरा एतहि खतम करू...अहाँ सभक स्नेह बेर-बेर किछु नव लिखबाक...जिनगीक गुनबाक लेल प्रेरित करैत रहैत अछि ...एहने स्नेह सभ दिन बनल रहय एतबहि भगवती "वैदेही"सँ कामना.) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-35 श्रीमती रूबी झा ई अनचिन्हार आखरक खोज थिकीह। पिता--स्व. ताराकान्त झा नैहर--- बेला सिमरी, जिला खगड़िया सासुर--ग्राम-पो. --- समसा मनसौरचक, जिला बेगूसराय पति---श्री कमला कान्त झा शिक्षा--- स्नातक ( संस्कृत ) गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-36 प्रस्तुत अछि समवेत गजलकार परिचय। ऐमे कुल 27 गजलकार छथि। किछु गजलकारक विस्तृत परिचय देबाक इच्छा छल, मुदा बेर-बेर आग्रहक बबजूद ओ लोकनि नेट पर उपल्बध रहितो अपन परिचय नै पठा सकलाह तँए मात्र हुनक नामोल्लेखसँ काज चला रहल छी। ई सभ गजलकार अनचिन्हार आखरक खोज छथि। त्रिपुरारी कुमार शर्मा,सुनील कुमार झा, विकास झा रंजन,रोशन,दीप नारायण विद्यार्थी,प्रवीन नारायण चौधरी प्रतीक, विनीत उत्पल, भावना नवीन, भाष्कर झा, रवि मिश्रा भारद्वाज, जगदानंद झा मनु, अजय ठाकुर मोहन, प्रभात राय भट्ट, श्रीमती इरा मल्लिक, मनोहर कुमार झा, प्रवीन नारायण चौधरी, स्वाती लाल, नितेश झा रौशन ,कुमार पंकज झा, उमेश मंडल, मनीष झा बौआ भाइ, अभय दीपराज, नवल श्री पंकज, मनोज, कुंदन कुमार कर्ण, मुकुंद मयंक, अविनाश झा अंशु| आशीष अनचिन्हार द्वारा १९ जुलाइ २०१२ केँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसँ लेल साक्षात्कार आ. अनचिन्हार- काल्हि चेतना सम्मानसँ सम्मानित भेलौं, तइ लेल विदेह परिवार दिससँ बधाइ। ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, एकरा अहाँ व्यक्तिगत नै विदेह परिवारक चेतनताक प्रतीक बुझियौ। जे चेतना समितिक पत्रिका (घर-बाहर) दोसरे पन्नामे जीवित-मृत्युक सूची प्रकाशित करैत अछि, ओइ सूचीसँ विदेह परिवार (ई-पत्रिका) अखनो धरि काते रहल अछि, भलहिं गाम-घरक संस्कृतिमे किअए ने लोहोक इंजन दूबि-धान, सिनुर-पीठारसँ सुशोभित होइत हुअए। विदेह परिवार दिससँ आग्रह (चेतना समितिकेँ) करैत छन्हि जे समाजक बदलैत स्वरूप (सामाजिक, आर्थिक, बौधिक, वैचारिकपर) नजरि दथि तइ लेल सुझाव अछि जे मैिथली साहित्यक जते सम्पादक छथि, ओ अपना हाथसँ अपन पत्रिकाक इतिहास लिखि अपन-अपन परिचय दथि। एक दिस मिथिलाक उद्धारक विचार रखै छिऐ दोसर दिस पत्रिका सभ पाछू मुँहेँ घुसुकि रहल अछि। ऐ लेल के करताह? आइ कोनो समारोहमे धोती-कुर्तासँ लऽ कऽ चुस्त पेंट धरिक आगमन भऽ रहल अछि, धोतीबला तरेतर गुम्हरै छथि जे देखू ने किरदानी। तँ दोसर दिस चुस्त पैंटबला अँखिया-अँखिया सुसकारी दइ छथि जे शुभ काजमे पीड़ा धोती पहिरिये कऽ नै आएल छथि। खैर जे होउ, हमरा सभकेँ विचार कऽ एकटा रास्ता बनबए पड़त जे वस्त्रक बदलाव समायानुकुल होइत रहल अछि। पुरुषोत्तम राम बलकल धारी छलाह। आब ओ युग रहलै। आ. अनचिन्हार- अहाँकेँ चेतना समिति सम्मान सुनि हृदए गद्गद् भऽ गेल। आरो बुझैक जिज्ञासा जगल। सूचना केना भेटल? ज.प्र. मण्डल- चेतना समितिक स्थापना दिवस १८ जुलाइ छी। १९५४ ई.क १८ जुलाइकेँ किछु संगीक संग यात्रीजी चेतना समितिक स्थापना केलनि। ओना आनो-आन समारोह समितिक बीच होइते रहैए मुदा स्थायी रूपे १८ जुलाइ स्थापना दिवसक अवसरपर सभ साल किछु विशेष रूपमे होइते अछि। आठ-दस दिन पहिने विवेका बाबू (विवेकानन्द ठाकुर) जे समितिक सचिव छथि, फोन केलनि जे १८ जुलाइकेँ चेतना समितिक स्थापना दिवस छी जाहि अवसरपर समिति किछु गोटेकेँ सम्मानित करैक िनर्णए केलनि अछि। अहाँक आएब अनियार्य अछि। ओना डाक द्वारा लिखित सूचना सेहो पठा देने छी, मुदा पोस्ट–ऑफिसक जे क्रिया-कलाप छै ताहिमे समैपर नहियो पहुँचए। विवेकानन्द जीसँ गुआहाटीमे छह मास पूर्व दिसम्बरमे धर्मशालामे भेँट भेल छल। किछु प्रश्नपर गपो-सप भेल रहए। ममताजी (श्रीमती ममता ठाकुर) दूटा सोहरो गौलनि। श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर, राजाराम सिंह राठौर एवं नेपालक आरो कतेक लोक सभ रहथि हुनको सभसँ पहिल भेँट भेल छल। जखन विवेकानन्द जी फोनपर जानकारी देलनि तखन हम गुआहाटीक धर्मशालामे पहुँच गेल रही। जबाव देलियनि जे जरूर आएब। मुदा दू-तीन दिनक पछाति संगी सभ फोन केलनि जे बिना लिखित सूचनाक जाएब उचिन नै। ओ सभ चेतना समितिक क्रिया-कलापसँ नाखुश छथि। प्रश्न उठल जे आब हम कि करब? एके बात कविता आ कथामे दू-िवधामे बँटि जाइए। एक तँ रौदियाह समए भेने किसानक मन ओहिना तबधल अछि तइपर सँ आरो तबधि गेल। जाइ कि नै जाइ, विचित्र ओझरी लागि गेल। मनमे हुअए जे विवेका बाबू किछु करए चाहै छथि तइठाम सहयोग नै करब उचित नै हएत? मुदा जखन संगी सबहक दोहरा-दोहरा फोन आबए लगल तखन ओरो मन दुबिधमे पड़ए लगल। १८ जुलाईक ६ बजे सुबह। हम विवेकानन्द जीकेँ फोन केलियनि जे अपनेक कार्यक्रममे कोनो व्यवधान तँ नै भेल अछि? ओ भरिसक ओछाइनेपर रहथि। आँखि मीड़िते कहलनि जे नै, ई तँ सभ सालक कार्यक्रम छी हेबे करत। ओना ऐ बीचमे दिल्ली चल गेल रही तँए दोहरा कऽ सम्पर्क नै भऽ सकल। परसुए एलौं आ काजमे लागल छी। पुछलियनि- समए केहेन अछि? ऐठाम (गाम) पानि भऽ रहल अछि। ओ कहलनि- मेघौन तँ एतौ अछि मुदा बून्न नै पड़ैए। हुनकर जबाब सुनि मन मानि गेल एहेन खुशनुमा मौसममे भोज-भात नै हुअए तँ केहेन समैमे हुअए। फोनपर विवेका जी ईहो कहि देलनि जे न्यायमूर्ति किशोर कुमार मण्डल विशिष्ट अतिथि रहताह। तइ संग न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसाद जी, डाॅक्टर सहाएब, विजय बाबू, सभ रहबे करताह। हिनके सबहक काजो छियनि। एक तँ रौदियाह समए दोसर भिनसुरका झकास रहने सुहावन मौसम रहबे करए, तैयारीक विचार केलौं। झमटगर परिवार रहने संगी भेटिये जाइए।फेर कहि देलियनि जे आठ-नअ बजेक बस पकड़ि लेब। आ. अनचिन्हार- कते समए गामसँ पटना जाइमे लगैए? ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, की कहब। ऐबेर हवाई सफरक मौका भेटल। एते-एते दूरीक बीच एको मिनटक हेर-फेर नै देखलिऐ। मुदा अपना सबहक तँ भगवाने ने मालिक छथि। जेना कऽ रखबह भोला तहिना ने हम रहबह। गाड़ीक (ट्रेन) रास्ता एहेन बनि गेल अछि जे डेढ़ दू दिन तक लागि जाइए। मुदा एन.एच भेलासँ थोड़े सुविधा बढ़ल अछि मुदा तैयो पाँच-छह घंटा तँ लगिये जाइए। आ. अनचिन्हार- जखन पानि होइत रहए तखन बस स्टेण्ड जाइमे तँ दिक्कत भेल हएत? ज.प्र. मण्डल- दिक्कत कि दिक्कत भेल। ओना गाड़ीक (दू पहिया) सुविधा अछि, मुदा पीच्छड़मे तँ चारि पएरबला हाथी पिछड़ि खसि पड़ैए आ दू पहियाक कोन ठेकान। पएरे तीन किलो मीटर जाइक विचार कऽ लेलौं। तखन मन भेल जे छत्ता लऽ लेब। मुदा कते बेर छत्ता बिसरिये गेलौं आ कते बेर हराइये गेल। तँए छत्ता नै लऽ जेबाक विचार भेल पानियो कमलै। बूंदा-बुन्दीपर आबि गेल रहए। आ. अनचिन्हार- कते बजे पटना पहुँचलिऐ? ज.प्र. मण्डल- सवा चारि बजे पहुँचलौं। जलखैये कए कऽ चलल रही। भूखो लगि गेल रहए। पुले (गाँधी पुल) लग उतरि पहिने खेलौं। खेलाक पछाति टेम्पू पकड़ि एकटा विद्यार्थी डेरापर पहुँचलौं। ओ निरमलियेक छथि रविन्द्रजी। ओइठाम देह-हाथ पोछि फ्रेश भेलौं। पौने छह बजे राजेन्द्र नगर विद्यापति भवन लग पहुँच गेलौं। गेटपर पहुँचलौं आकि आनन्दजी (आनन्द कुमार झा) सेहो भेट गेलाह। नीक भवन नीक बेवस्था। जेना राजधानीक हेबाक चाही तइमे कमी नै। पंखा ताकि बैसलौं। पाँच मिनटक पछाति चुन्नूजी (कमल मोहन चुन्नू, घर-बाहर पत्रिकाक सहयोगी सम्पादक) देखलनि। देखिते दोसर ठाम बैसा पुछलनि जे किछु खेबो-पीबो करबै। कहलियनि जे रस्तेमे खा नेने छी। पानि पीलौं। समए छहसँ आगू बढ़ि गेल। छह बजे शुरू होइक समए रहैक, गप-सप करैले आनन्दजी लगेमे रहथि, मुदा बूझि पड़ल जेना चुन्नूजी आ विवेका बाबू काजमे जमि कऽ जुटल छथि। पुछलियनि- चुन्नूजी, रमणजी (डाॅ. रमानन्द झा रमण) केँ नै देखै छियनि? कहलनि ओ कथा गोष्ठीमे गेल छथि। कहि अपन हेमलेट, बैगक जिम्मा सुमझा कहलनि जे कने एकटा काज केने अबै छी। चुन्नू जीक काज बाधित करैक अर्थ होएत जे काजमे (समारोह) बाधा उपस्थित करब। कहलियनि, हम कतौ पड़ाएल जाइ छी, अखन जे काज लाधल अछि पहिने ओकरा सम्हाररू। चुन्नूजी तँ उठि कऽ चलि गेलाह, मुदा मनमे एकटा नव प्रश्न आबि गेल। ओ ई जे ‘घर-बाहर’ पत्रिकाक सम्पादक रमणजी छथि, तखन अपन जबाबदेहीक काज छोड़ि मद्रास चलि गेलाह, आ गोष्ठी तँ १४-१५ जुलाइक रातिमे रहै, १५ तारीखकेँ बिदा भेने १७ धरि तँ आबिये गेल हेता। खएर ! एना किअए भेल? जखन कि चेतना समितिक स्थापना दिवस १८ जुलाई छी, भरिसक यात्रीयो जी (ठीकसँ मोन नै अछि मुदा अनुमान करै छी) जखन माँ मिथिलाकेँ प्रणाम कए पड़ा कऽ अकासमे उड़ैत ओइ चिड़ै जकाँ जे उड़िते-उड़िते अंडो दैत अछि तहिना केलनि। प्रश्न घुरिआए लगल जे अपनो बेटाक मूड़न वा बिआह रहए आ साढ़ूओ बेटाक एक्के दिन होइ तखन कि कएल जाएत? कियो अपन घर सम्हारत आकि भोज खाइले जाएत। मुदा ऐठाम तँ अँटावेसक संभावना छल। चेतना समितिक तिथि अट्ठावन वर्षसँ मनकेँ पकड़ने अछि, कथा गोष्ठीक तिथि िनर्धारित कएल जाइत अछि, तइठाम समए आ दूरीक विचार केने बिना, जँ तिथि िनर्धारित कएल जाए तँ कि कहबै? एक तँ ओहिना हम सभ मिथिलांचलक काजक दौड़मे पछुआएल छी तइपर जँ काजे काजक बाधा बनत तँ कते दूर जा सकब, से तँ सभ बुझिते छी। तइ बीच विवेकाजी तीन-चारि गोटेक संग आबि किछु-किछु काजक बात पुछलनि। कहलियनि। तइ बीच अध्यक्षा प्रमीला झा सेहो एलीह। चुन्नूजी धड़फड़ाएल आबि हेलमेट हाथमे लैत चिन्हा देलनि। ओना चेतना समितिक सदस्य सबहक जानकारी अछि, मुदा चेहरासँ चिन्हारए नै छल। तँए अनभुआर जकाँ रही। मुदा कार्यकर्ताक अभाव जरूर बूझि पड़ल विलंबोसँ शुरू भेने बहुत बढ़िया कार्यक्रम भेल। आ. अनचिन्हार- विधिवत् कते बजे कार्यक्रम शुरू भेल? ज.प्र. मण्डल- ऐ प्रश्नक उत्तर ठीक-ठीक नै दऽ सकब। किएक तँ ने अपने घड़ी रखै छी आ ने मोबाइल। मुदा बैसकसँ बूझि पड़ल जे एक-डेढ़ घंटा बिलंबसँ कार्यक्रम शुरू भेल। हँ तइ बीच दूटा बात आरो भेल। इन्द्रकान्त बाबू (डॉ. इन्द्रकान्त झा) दोसर कतारक कुर्सीपर आगूमे बैसल रहथि, ओ अपन चिन्हारए देलनि। मनमे रहबे करए मुदा ओहन बीच रहने गुम रही। हुनकासँ पहिल परिचय ओइ दिन भेल छल जइ दिन मिथिला दर्शनमे छपल कथा चुनवाली पढ़ि पहिल बधाइ देलनि। गपे-सपक बीच अखिलेश बाजल जे लालकक्का (उमेश मण्डल) फोन केलनि जे साढ़े दस बजेक बसक टिकट कटा लेलौं। तेरह-चौदह नम्बर सीट अछि। आ. अनचिन्हार- कार्यक्रम केहेन भेल? ज.प्र. मण्डल- पहिल सम्मान कार्यक्रम भेल। यात्री जीक स्थापित चेतना समितिक सम्मान पाबि बहुत खुशी भेल। उच्च न्यायालयक न्यायमूर्ति किशोर कुमार मण्डलक हाथसँ सैकड़ो गण्यमान्य लोकनिक बीच, जइमे बिहार सरकारक पूर्व मुख्यमंत्री विधान परिषदक पूर्व अध्यक्ष, उच्च न्यायालयक पूर्व मुख्य न्यायमूर्तिक संग माननीय पूर्व सांसद, माननीय विधान पार्षद, अधिवक्ता, अध्यापक, डॉक्टर इत्यादि चेतना समितिक सभ छलाह। आ. अनचिन्हार- साहित्यिक माहौलमे कार्यक्रम भेल हएत? ज.प्र. मण्डल- आशीषजी, ई बहुत गंभीर प्रश्न अछि। ओना साहित्यिक माहौल अवश्य छल मुदा राजनीतिक बेसी बूझि पड़ल। अध्यक्ष जीक (चेतना समितिक अध्यक्ष) वक्तव्य विधिवत् छलनि, नीक छलनि। मुदा मंचक वक्ता लोकनि साहित्यकेँ मोड़ि राजनीति दिस घुसका देलखिन। जे गोष्ठीक अनुकूल नै रहल। मुख्य वक्ता छलाह पंडित ताराकान्त झाजी (विधान परिषदक पूर्व अध्यक्ष) जे तेना कऽ विचार मोड़ि देलखिन जे बादक वक्ताकेँ बेकावू भऽ गेलनि। ओना पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र, विधान पार्षद आ चेतना समितिक संरक्षक विजय बाबू (श्री विजय कुमार मिश्र) विधिवत अपन विचार रखलनि। यात्री जीक स्थापित चेतना समितिक विचार विन्दु गौण पड़ि गेल। तहूमे मैथिली साहित्यक बीच, टैगोर साहित्य सम्मान पहिल-पहिल भेटल, जेकर चरचो नै भेल। माननीय न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसादजी, अपन वक्तव्यकेँ किछु हद-तक मोड़लनि। ओ यात्री जीक विचारकेँ पकड़ि चेतनाक विषद व्याख्या केलनि। भाषो मनोरंजक छलनि। मनोरंजक ऐ लेल जे मैथिली-मगहीक सीमापर रहने कखनो मैथिली कखनो मगही आ कखनो मैथिली-मगही मिला कऽ बजलाह। मुदा अंग्रेजी माहौलमे रहनिहार एको शब्द अंग्रेजीक प्रयोग नै केलनि, ई सभसँ आश्चर्य लागल। समए सेहो बेशी भऽ गेल छलैक। तहूमे बसक टिकटक नाओं सुनि आरो मन दोसर दिस जाए लगल। हुअए जे बस ने छूटि जाए। आ. अनचिन्हार- अहाँ कि सभ बजलिऐ? ज.प्र. मण्डल- आभारो व्यक्त करैक अवसर नै भेटल। आ. अनचिन्हार- भोजन भात केहेन रहलै? ज.प्र. मण्डल- नीक रहलै। स्पष्ट शब्दमे विवेकाजी कहि देलखिन जे अल्पाहारक बेवस्था अछि। मुदा खीर-पूड़ी खुआएब। आ. अनचिन्हार- कते बजे सभा भवनसँ निकललौं? ज.प्र. मण्डल- दससँ ऊपर बजि गेल। मन छटपटाए लगल जे एक तँ गली-कुच्ची रस्ता, दोसर थाल-कीच सेहो, रिक्शा-टेम्पू भेटत नै। हारि-थाकि बस स्टेण्ड विदा भेलौं। सरकारी बसक टिकट, तँए हुअए जे बस नहिये पकड़ाएत। मुदा किछु दूर गेलापर रिक्शा भेट गेल। ओ कहलक जे हमरा बूझल अछि, बस निश्चित पकड़ाएत। संगमे आनन्द कुमार झाजी सेहो रहथि, हुनका टिकट नै भेलनि। भोर होइत घरपर पहुँच गेलौं। आ. अनचिन्हार- छुटल-बढ़ल जे भेल होइ, तइ संबंधमे किछु कहियौ? ज.प्र. मण्डल- ओना चेतना समितिक िनर्णयानुसार चारि गोटेकेँ सम्मानित करैक विचार छलनि। पहिल, टैगोर साहित्य सम्मानसँ सम्मानित हम (जगदीश प्रसाद मण्डल), दोसर, साहित्य अकादेमीसँ सम्मानित कवि विनोद जीक (श्री उदय चन्द्र झा विनोद), तेसर, युवा साहित्यकार आनन्द जीक आ चारिम, अनुवादक खुशीलाल बाबूकेँ (श्री खुशी लाल झा)। मुदा ओ दुनू गोटे (विनोदजी आ खुशीलाल बाबू) नै पहुँच सकल छलाह। चेतना समितिक सभ नै, मुदा किछु गोटे एहेन सक्रिय छलाह जिनका विषयमे किछु कहने बिना नै रहि सकै छी। ओ छलाह विजय बाबू (श्री विजय कुमार मिश्र), जे खेबा काल घूमि-घूमि देखैत रहलाह। दोसर छलीह श्रीमती प्रमीला झा। जे एते उमेर भेलोपर, तहूमे जेहेन परिवारक छथि, क्रियाशील जिनगी बना जीवि रहली अछि। जे धन्यवादक पात्र छथि। विवेका बाबू आ चुन्नूजी हृदैसँ चाहितौ, नीक जकाँ नै कऽ पाबि रहल छलाह, तेकर कारण छल दुनू गोटे नव छथि (कार्यक्रमक भारक खियालसँ) मुदा जे जिज्ञासा करैक ललक आ उत्साह छन्हि, जँ सही दिशामे बढ़ाबथि तँ जरूर किछु कऽ देखौता। तइ लेल दुनू गोटेकेँ धन्यवाद दैत छियनि। विवेका बाबूक ई गुण स्पष्ट देखाएल जे स्पष्टवादी छथि। इमानदारीक अनेको कारणमे स्पष्ट बाजब सेहो एकटा कारण होइत छैक। सभसँ अंतिम दृश्य आरो रोचक अछि। दस बजैत रहए। कतारबंदी भोजन शुरू भेल। धड़फड़ाएल रहबे करी, जा कऽ पाँतिमे लगि गेलौं। पाँति नमहर, तैयो पान-सात मिनट घुसुकि कऽ किछु आगू बढ़लौं। तीनू गोटे ( हम, आनन्दजी आ अखिलेस) एके ठाम रही। तही बीच धड़फराएल घुमैत चुन्नूजी पहुँचलाह। देखिते पाँतिसँ निकालि कुर्सीपर बैसा देलनि आ कहलनि जे नेने अबै छी। गेला तँ धड़फड़ाएले मुदा गरे ने अँटनि। दोसर ठाम गरे ने भेटनि। हमर मन छनगल जाए जे बस छूटि जाएत। नहिये खाएब तँ कि हेतै, गाड़ी-बसमे अधपेट्टे चलब नीक होइ छै। हुअए जे चुपे-चाप उठि कऽ विदा भऽ जाइ। फेर हुअए जे नाँहक हंगामा ठाढ़ भऽ जेतैक जे दुनू गोटे बीचेमे सँ हेरा गेला। विचार ठमकि गेल। मन पड़ि गेल, बरिआती। अपेछित बेटाक बिआहमे बरिआती गेल रही। ओहन बरिआती जिनगीक पहिल छल। खाइले बैसलौं, नीक-नीक विन्यास बनल रहै। शुरूहेमे भरि पेट चढ़ा देलिऐ। चढ़ौलाक बाद चारू कात चकोना हुअए लगलौं जे कियो एको गोटे उठताह तखन ने उठब। से किम्हरो देखबे ने करिऐ। गर-फेरि-फेरि बैसए लगलौं। आसन नमहर तँए गर लगा सुतियो सकै छी। मुदा जखने सूतब कि अनेरे हल्ला हेतै जे एक गोटे खाइते-खाइते ओंघरा गेलाह। अपनेपर खौंझ उठए जे अनेरे एते किअए खेलौं। मुदा करितौं की। चारि घंटा खाइमे बरिआती लगौलनि। अधमौगति भऽ गेल। हुअए जे ऐसँ नीक जहले जे भुखलो तँ लोक आेंघरा-ओंघरा सुतैए। एतबे नै ऐसँ आगू भेल जे खाइकाल तेहेन गप-सपक ठाहाका चलै जे हुअए कहीं पेटक गुदगुदीक संग खेलहो ने निकलए लगए। कहुना-कहुना कऽ अपनाकेँ दाबि-दुबि पार लगेलौं। हाथे धोइकाल ओही भिजलाहा हाथे कान पकड़ि सप्पत खेलौं जे एहेन बरिआती नै जाएब। कुल मिला कऽ समारोह प्रशंसनीय रहल। अगिला साल आरो बेसी नीक होइ, ई शुभकामना। देखैक हकार भेटए, तेकर प्रतीक्षा रहत। मनोज झा मुक्ति विद्यापति स्मृति समारोह वास्ते हमर दरभंगा यात्रा एहिवेर विद्यापति स्मृति दिवसकलेल सरहद ओहिपारक यात्रा हमर आ हमर किछु मित्र सबहक पहिनहिसँ तय छल । जाहि अनुसारे पहिने विद्यापतिक जन्मस्थली मधुवनी जिल्लक विस्फी गाम हमर सबहक पहिल गन्तव्य छल । विस्फीमे त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति समारोहक आयोजना लगभग १० वर्षसँ होइत आएल अछि । ताँए हम आ हमर दूगोट मित्र महोत्तरी जिल्लाक पिपरा गामके दिनेश चौधरी आ शीतलाल साह) कार्तिक धवल एकादशीक दिन ३.०० बजे जलेश्वरसँ दूटा मोटर साइकलपर प्रस्थान केलहुँ । जलेश्वरमे अवस्थित रातो नदीक किनार होइत खुड़पेरिया बाटसँ हमसब सरहद ओहिपार भिट्ठागाम होइत हमसब आगा बढ़ैत गेलहुँ । सिमरी,कोरियाही,चरौत,साहरघाट होइत हमसब उच्चैठ भगवतिक स्थान अर्थात दूर्गास्थान पहुँचलहुँ । दूर्गास्थानमे विभिन्न विद्वान सभहक प्रतिमाके मोटर साइकलेपरसँ एकटा फोटो लैत हम सब आगा बढ़ैत गेलहुँ । आगा बढैत हमसब बेनिपट्टी पहुँचलहुँ । बेनिपट्टीक बीच बजारमे विद्यापतिक एकटा पुराने प्रतिमाक स्तम्भके सरिएवाक काज भऽरहल छल । बेनिपट्टीमे किछु जलखै कऽ आगा बढबाक विचारसँ हमसब अपन मोटरसाइकलकेँ किछुकालकलेल कात लगा बन्द केलहुँ । छपरियाक भुज्जा दोकानमे बैसि भुज्जा फँकलहुँ, पान खेलहुँ आ पुन ः हमर सबहक मोटर साइकल अपन गनतव्य दिस बढऽ लागल । संभवत ः ओ गाम अरेर छल, जतऽ एकटा बोर्ड टाँगल छल जाहिपर मूर्धन्य साहित्यकार, कवि ‘यात्री’ जीक उत्सव मनाओल जेबाक सूचना देलगेल छल । दूर्भाग्यक बात जे सम्मेलनक दिन ओहिसँ एकदिन पहिने बितिगेल छल । मनके मसोह्रैत हमसब आगा बढलहुँ । आगा बाटमे रहिका गाम आएल । रहिकामे अबिते मैथिलीक एकगोट योद्धा स्व.चुनचुन मिश्रके याद आवि गेल । चुनचुन मिश्रक ओ व्यवहार मोन पड़ल जे एकबेर हम आ अनुज जितेन्द्र झा रहिका गेल छलौं, हूनकासँ भेंट होइते भरिपाँज कऽ धरैत हमरा सबके कहलाह जे कियो मैथिली कर्मीके हम देखैत छी त हमर छाती फुलि जाइत अछि । ओ मैथिली प्रति एतेक समर्पित छलाह से हूनक एहि वाक्यसँ सहजहिं अनुमान लगाओल जा सकैया–‘मैथिलीक काज केओ कतौ करैत छथि त हमर कान्ह मजबुत करैत छथि ।’ मोनहिमोन मैथिली पुत्र चुनचुनके श्रद्धाञ्जली दैत हमसब आगा बढलहुँ । बेर लुकझुकाए लागल छल । हमसब जिरो माइल पहुँचिकऽ ओतऽसँ पश्चिम विस्फीक बाट धएलहुँ । अन्हार भऽगेल छल मुदा सडक नीक होएबाक कारने हमरा सबके कनिको कठिनाई नहि भेल । विस्फी थानाक बगलमे धज्बा बजारपर रुकि पान खेलहुँ आ विस्फीए गामक काठमाण्डूमे काज कएनिहार मित्र भरत शर्माके दोकानदारेक मोबाइल माँगिकऽ फोन कएलहुँ । बातचितक बाद तय भेल जे पहिने विस्फीक गोबराही टोल जाई जतऽ मित्रक घर छल । हमसब गोबराही टोल पहुँचलहुँ । सबगोटे बहुत प्रसन्न भेलाह । विस्फी गोबराही टोलक लगभग ४०/५० गोटे ३०/३५ वर्षसँ काठमाण्डूमे काठक काज करैत छथि । काठमाण्डूमे हूनका सबहक अपने मजलिस छन्हि । ओसब कलाप्रेमी छथि, काठमाण्डूक शान्तिनगरमे होरीक कार्यक्रम हुए वा भजन किर्तन ओसब तत्पर रहैत छथि । खानपिन करैत ९.०० बाजिगेल छल । हमसब चारिटा मोटर साइकलपर विद्यापतिक डीहपर जेवाकलेल प्रस्थान केलहुँ । जखन डीहपर पहुँचलहुँ त भाषण–भूषणक कार्यक्रम समाप्त भऽगेल छल आ विद्यापतिक जीवनपर आधारित विद्यापति फिल्म पर्दापर देखाओल जा रहल छल । आयोजकसँ जखन कार्यक्रमक सन्दर्भमे पुछल गेलनि त ओसब कहलाह जे प्रख्यात उद्घोषक एवं मैथिली एकादमीक अध्यक्ष कमलाकान्त जीक ग्रुपक प्रस्तुति आजुक राति तय छल, मुदा कालाकार सब नहि आबि सकलाक कारणे हूनक कार्यक्रम रद्द भऽगेलनि आ पर्दा चलाओल जा रहल अछि । काल्हि अर्थात धवल द्वादशीक रातिमे कवि गोष्ठी आ नाटकक कार्यक्रम अछि । हमसब किछुकाल विलमि ओतऽ स्मृति भवनमे रहल पुस्तकालयक आलमिराके देखऽ लगलहुँ, जतऽ एकौहुटा पुस्तक नहि छल । जिज्ञासा रखलापर जानकारी भेल जे पहिने लाखोसँ अधिक पुस्तक छल मुदा के,कहिया आ कतऽ लगेल से जानि नहि । फेरसँ पुस्तकालयक जोरजाममे लागल बात ओसब बतौलाह । रातिएमे पुन ः गोबराही टोल घुरि एलहुँ । प्रात भिने भोरे विद्यापतिक जन्म नगरी घुमबाक कार्यक्रम बनल । हमसब पैदल गाम घुरबाक विचारसँ १०÷१२ गोटे भिनसरे निकलहुँ । गामक सब चौरि चाँचर देखिकऽ छाती फटैत जकाँ लगैछल, कारन एहिबेरुका बाढ़िसँ विस्फी लगायत परोपट्टा ४०/५० कोस धरि एक्कहु कनमा धान नहि रहिगेल छल । खेतमे धानक झुर्राठ ठाढ़ छल मुदा बालिमे छुच्छे खँखड़ी । किसान सब खेत खालि करेबालेल माथ हँसोथैत छल । हमसब बाढ़िसँ क्षत–विक्षत विस्फी घुमिकऽ घर एलहुँ । पुन ः भोजन कऽ कमतौल स्टेशनसँ कनि दूरपर रहल अहिल्या स्थान आ गौतम मुनिक आश्रम, गौतम कुण्ड देखबाकलेल ३ टा मोटर साइकलपर ७ गोटे प्रस्थान केलहुँ । बाढ़िमे कमलाक लील देखैत अहिल्या स्थान पहुँचलहुँ जतऽ श्रीराम द्वारा गौतम मुनिक पत्नि अहिल्याके उद्धार कएलगेल छल । अहिल्या स्थानके जाहिरुपे विकास होएबाक चाही ओना नहि बुझि पड़ल । सरकारद्वारा स्थानक जमीनमे पावर हाउस बनाएब एवं स्थानीय वासीद्वारा सेहो स्थानक जमीन दख्खल करब स्थानके दयनीय अवस्था उजागर कऽरहल छल । मन्दिरके जर्जर अवस्था, अहिल्या कुण्डमे स्थानिय वासीद्वारा फैलाओल जाऽरहल गन्दगी कोनो यात्रीके मोन खिन्न कऽदेत । ओतऽसँ हमसब गौतम कुण्ड दिसि प्रस्थान केलहुँ । चारुकात बाढिसँ जलमग्न रहल भूमि आ बीचमे गौतम मुनिक आश्रम । बाढिक पानिक कारणे गौतम कुण्ड डुबले छल । गौतम कुण्डमे बनैत विशाल धर्मशाला एहि स्थानके सुन्दर भविष्य दिसि इशारा कऽ रहल छल । हमसब पुन ः घुरि एलहुँ विस्फीक गोबराही टोल । द्वादशीक रातिके कनि सबेरे हमसब डीह दिस प्रस्थान केलहुँ । ओतऽ कवि गोष्ठीक कार्यक्रम चालु छल । ताहिके बाद नाटकक कार्यक्रम शुरु भेल । एकटा कालाकार होएबाक नाते हमरो प्रस्तुति ओतऽ भेल । रातिमे विश्राम कऽ प्रात भिने अर्थात धवल त्रयोदसीक दिन भोरे मित्र दिनेश आ शीतलाल विशेष कारणवस नेपाल घुरि गेलाह । हम आ मित्र भरत एवं विजय दरिभंगाकलेल प्रस्थान केलहुँ । दरिभंगा स्टेशनके बगलमे रहल पैघ पोखरिक किनारपर अवस्थित एकटा काँलेजमे त्रिदिवसिय विद्यापति विभूति पर्व समारोहक आयोजना कएलगेल छल । पहिल दिन नेपालक दिसिसँ सुनिल यादव निर्देशित, राम भरोस कापडिक ‘जनचेतना’ नाटक छल, त्रयोदशीक दिन कवि गोष्ठी आ पूर्णिमाक दिन रंगारंग मैथिली कार्यक्रमक कार्यक्रम राखल गेल छल । त्रयोदशीक दिन होमयबला कवि गोष्ठीमे कविसब पहिनहिंसँ आमन्त्रित छलाह । हमहुँ अपन एकटा कविता वाचन करबाक वास्ते गेल छलहुँ । मुदा आमन्त्रित कवि नहि भेलाक कारणे मौका भेटब कठीन छल । मुदा आतऽ प्रख्यात कालाकार एवं उद्घोषक राम सेवक ठाकुर भेटलाह, हुनका सब बात कहिलियैन त ओ आयोजक के हमर परिचय दैत मौका देवाक आग्रह केलखिन्ह आ हमरो मौका देल गेल । कवि गोष्ठीमे मैथिलीक वरिष्ट–वरिष्ट साहित्यकार, कविजी सबसँ साक्षात्कार होयबाक मौका भेटल । ओहि राति कूल ४८ टा कवि लोकनि अपन–अपन रचना ओहि मञ्चपर प्रस्तुत कएने छलाह । मञ्चपर उद्घोषणक भार भेटल रहनि ‘जनकजी’के जे करमान लागल दर्शक÷श्रोताके लोटपोट कऽदेल्खिन्ह । रचना पाठ कएनिहार कवि–साहित्यकार सबमे बालेश्वर मिश्र, कौशलेश, परमानन्द प्रभाकर, बबलु कुमार, चन्द्रेश, हजरत हाफी मन्नान, रामकुमार, रामराजा मिश्र, उमेश कर्ण, दिलिप, विष्णुदेव झा, शम्भूनाथ मिश्र, शम्भूजी सौरभ, विद्याधर मिश्र, दिनेश, अशोक कुमार मेहता, विभूति आनन्द, बुचनू पासवान,, अशोक झा, शंकर देव, महेन्द्र नारायण राम, डा.जय प्रकाश चौधरी‘जनकजी’, मन्जर सुलेमान, चन्द्रमणि सिंह, शैलेन्द्रानन्द, गणेश झा, जयजय गोपाल, चन्द्रमोहन झा‘पड़वा’, बुद्धिनाथ झा बोकारो, डा.राजेन्द्र झा, डा.चन्द्रदेव झा, हरिश्चन्द्र झा‘हरित’, मनोज झा मुक्ति, सक्रु पासवान, दिलिप कुमार झा, टुनटुन झा, शम्भूकान्त झा, श्याम विहारी राय‘सरस’, शम्भूनाथ मिश्र, रमाजी, मणिकान्त झा, कश्यपजी, अमलेन्द्र शेखर पाठक, अशोक चंचल, धनिक मण्डल, विनय विश्ववन्धु, जय नारायण झा, गंगाप्रसाद झा, डा.आर.के. रमण, सन्तोष झा आ फूलचन्द्र झा‘प्रविण’ । दरभंगामे भेल विद्यापति विभूति पर्वकलेल सबसँ पैघ जँ कियो धन्यवादक पात्र छथि त वैजुकान्त चौधरी । कवि गोष्ठीक तुरत्तवाद मधुवनी ग्रुपक नाटक मञ्चन भेल । कविगोष्ठीक बाद हमसब दरिभंगाक लगेमे रहल गौंसाघाटपर भूतक आ भगताक मेला देखबाकलेल प्रस्थान कएलहुँ । जनगणनामे मातृभाषा देशमे जनगणनाक काज शुरु भऽ गेल अछि । देशक सभ जिला आ गाममे जनगणना हेतु सरकार गणक सबके खटादेने अछि । सब भाषिक लडाइय बीड़ा उठौने संस्थासब जनगणनामे अपन–अपन मातृभाषा लिखयबाकलेल विभिन्न प्रकारक अभियानसब शुरु कऽ देने अछि । मुदा मधेशक जनता अखन भ्रमित भेल जकाँ बुझना जाइत अछि । ओ दिग्भ्रमीत बनेवाक काज कएने अछि अपनाके मधेशक कर्णधार कहेनिहार नेतासब । मधेशमे सबठाम अपन–अपन मातृभाषा रहल अछि । सब भाषा सबहक अपन–अपन प्राचीन इतिहास रहल अछि । जकरा बले अपनाके मधेशक नेता कहएवामे जे सब गर्व करैछथि, वएह नेतागण आई ओहि संस्कृति आ भाषाके कमजोर कऽरहल छथि । अपना आपके मधेशवादीदलक नेता कहेनिहार सब अपन–अपन मातृभाषाके छोडि मधेशक सम्पर्क भाषाक रुपमे रहल हिन्दी भषापर बेसी जोड दऽरहल छथि । मनुष्यक जीवनमे भाषा बहुत पैघ महत्व रखैत अछि । भाषाक कारणे पाकिस्तानसँ अपनाके अलग क कऽ बंगलादेशक निर्माण भेल उदाहरण हमरा सबहक आगा अछि । फेर मधेशवादी दलक नेतासब एहि बातके किया बिसरि रहल छथि ? किछुए दिन पहिने काठमाण्डूक एकटा प्रत्यक्ष टेलिभीजन कार्यक्रममे तमलोपा नेपालक अध्यक्ष महेन्द्र यादव अपन आ मधेशक मातृभाषा हिन्दी कहने रहथि । कि महेन्द्र यादवक माय हिन्दीमे हूनका लोरी सुनाकऽ सुतवैत छलन्हि ? हूनक माय हूनका–‘मुन्ना सो जाओ’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह कि–‘बौआ सुत रहु’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह ? जौं मुन्ना सो जाओ’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह होएत त निश्चित रुपसँ हूनकर मातृभाषा हिन्दी छैन्हि । मुदा से बात नहि अछि हूनकर माय हूनका–‘बौआ सुत रहु’ कहिकऽ सुतवैत छलखिन्ह ताँए हूनक मातृभाषा मैथिली छन्हि, ताइमे कोनो शंका नहि । महेन्द्र यादव त मात्र एकटा उदाहरण छथि, अपनाके मधेशवादी दलक नेता कहएनिहार सबके याह स्थिति छैन्हि । किनको मातृभाष मैथिली छन्हि त किनको भोजपुरी, अवधी आ आन आन । मुदा, सबकियो वकालत करैछथि हिन्दी भाषाके । हुनका सब प्रति सहजहिँ एकटा प्रश्न उठैत अछि जे कि मधेश आन्दोलनमे लागल सबकियो आन्दोलन केनिहारक मातृभाष हिन्दी छलन्हि ? कि मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु या उर्दू भाषा जे अपना मातृभाषामे लिखौता ओ मधेशी नहिं रहताह ? जौं से बात नहिं, तहन अपना–अपना कार्यकर्ताके ओसब अपना–अपना मातृभाषामे मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आ जिनकर जिनकर जे मातृभाषा छन्हि ओ लिखेवा लेल निर्देशन देवऽमे किया हिचकि रहल छथि ? हँ एतेक त ध्रुव सत्य अछि कि मधेशक सम्पर्क भाषा हिन्दी अछि, तहन हिन्दीके बढेबा खातीर आन–आन मातृभाषाक सँगे सौतिनियाँ व्यवहार किया ? मधेशवादी दलक नेता आ कार्यकर्तासब एहि बातके नहिं बिसरथु जे मातृभाषामे मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु, उर्दु, राजवंशी लगायतक भाषा लिखौनिहारसब मधेशी मात्र भऽ सकैछथि । किया त मातृभाषासँ सहजहिं बुझल जासकैया कि अमुक व्यक्ति मधेशी अछि कि नहिं । बहुतके कहब अछि जे मधेशवादी दलसब भारतमुखी अछि आ हिन्दी भारतक भाषा अछि, ताँए ओसब हिन्दीके स्थापित करबामे लागल छथि । जौं याह बातके सत्य मानल जाए त कि भारतक सब प्रदेशमे हिन्दी बुझल जाइत अछि ? हमरासबके निक जकाँ देखल अछि कि भारतक एच.डी.देबेगौड़ा सन–सन बहुतो एहन प्रधानमन्त्री भेल छथि जिनका हिन्दी त की अन्तराष्ट्रिय भाषाक रुपमे मानलगेल अंग्रेजीधरि नहि अवैत छलनि । ओसब घर स लऽ कऽ कोनो मञ्च आ विदेशक मञ्च किया नई हुए अपन मातृभाषाक प्रयोग मात्र करैत छलाह आ अखनो करैत आएल अछि । त कि एहिसँ भारतमे हिन्दी कमजोर भऽगेलैया ? कथमपि नहि । एहि कटु सत्यके मनन सब मधेशवादी दलके क कऽ शिघ्रातिशिघ्र अपना–अपना कार्यकर्ताके, भऽ रहल जनगणनामे हिन्दी भाषाके सम्पर्क भाषक लेल आ अपन–अपन मातृभाषामे मधेशक माइयक बोलीक रुपमे रहल मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु, उर्दू या आन....के े लिखएवाकलेल जागरण अभियानक निर्णय करब आवश्य अछि । तहिना मातृभाषाक नामपर बहुत रासे संघ–संस्थासब खुलल अछि । बहुत गोटेक दालिरोटी मातृभाषासँ चलैत छन्हि । मातृभाषाक नामपर खुजल संघ–संस्थासब आ मातृभाषाक नाममर अपन बाल–बच्चाके पालनिहारसबहकलेल जनगणना बहुत पैघ मौका लऽ कऽ आएल अछि । अपना–अपना दिसिसँ मातृभाषामे अपन माइयक बोली लिखेबाकलेल गाम–गाममे अभियान करबाक समय चलि आएल अछि । गाम–गाममे मातृभाषासँ प्रेम केनिहार युवासब संगठीत भऽ अपना गाममे गणक सँगे घुमिकऽ विवरणमे अपन मातृभाषा लिखएवाक काजमे जुटि जाएव आवश्यक अछि । सबकियोके अपना–अपना ठामसँ जनगणनाक विवरणमे मातृभाषाप्रति सजग रहब जरुरी अछि । राज्य आ सरकारमे रहल बहुतो लोक एहन अछि जे सबहक मातृभाषामे नेपाली या हिन्दी लिखएवालेल चाहैत अछि । जौं एहि समयमे हमसब सजग नहि रहलहुँ त इतिहास ककरो माफ नई करत । माइयक दूध धिक्कारैत रहत सबके....। नरेन्द्र मिश्र दुर्गापूजा-2011 केर अवसरपर मैथिली-नाटक मंचन भेल- अप्पन कर्मक फल स्थान- दुर्गापूजाक मेला परिसर बेरमा (उत्तरवारि पार) जिला- मधुबनी नाटककार- नरेन्द्र मिश्र िनर्देशक- माधव आनन्द आ नरेन्द्र मिश्र पात्र- कलाकार- पिताक नाओं- पता- 1. भिषन भायजी मंजल आलम मो. मुशलीम, बेरमा 2. कल्लू विजय झा श्री प्रेमचन्द्र झा बेरमा 3. शुकन टोनी झा स्व. मिथिलेश झा बेरमा 4. चाहबला धर्मेन्द्र मिश्र श्री सदानंद मिश्र बेरमा 5. कल्लू केर पत्नी धर्मेन्द्र मिश्र श्री सदानंद मिश्र बेरमा 6. शराब दोकानदार प्रमोद साहु श्री गणेश साहु बेरमा 7. समदिया विकाश ठाकुर श्री ब्रह्मदेव ठाकुर बेरमा 8. चाेर-1 प्रमोद साहु श्री गणेश साहु बेरमा 9. चोर-2 आशीष ठाकुर श्री ललन ठाकुर बेरमा 10. मुन-मुन काका विकाश ठाकुर श्री ब्रह्मदेव ठाकुर बेरमा 11. मास्टरजी माधव ठाकुर स्व. बेचन ठाकुर बेरमा सहयोगकर्त्ता- अमरेन्द्र मिश्र मधुकान्त झा ललन ठाकुर लक्ष्मीकान्त झा अंकित ठाकुर तबरेज आलम ओमप्रकाश मण्डल दीपक मण्डल शिवम मण्डल दिनेश मुखिया शंकर पासवान गुलशन अली राघव मिश्र महाकवि भास- कर्णभारम्- (मैथिली अनुवाद बिपिन कुमार झा) अनुवादकर्ता एवं ग्रन्थ परिचय:- अनुवादक बिपिन कुमार झा, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभागमे अध्यापनरत छथि। संस्कृत केर प्रमुख ग्रन्थक अनुवाद मैथिलीमे करब अनुवादकक सहज रुचि मात्र छन्हि। यदि अनुवाद केर कोनो अंश समुचित नहि लालगए तँ अवश्य सूचित करी। एतय प्राप्त श्लोकक भावानुवाद गद्येमे देल गेल अछि । ई ग्रन्थ चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसीसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। ’कर्णभारम्’ महाकवि भास रचित एकटा एकांकी अछि। जतय कर्णक उदात्त चित्रण कएल गेल अछि। नाटकक पात्र केर परिचय पुरुष पात्र कर्ण- कौरव केर सेनापति (अङ्गदेश केर राजा)। शल्य- कर्ण केर सारथी (मद्र देश केर राजा)। भट- सिपाही इन्द्र- ब्राह्मणरूपधारी इन्द्र देवदूत- इन्द्रक ब्राह्मणरूपधारी दूत। (नान्दीपाठक अन्त मे सूत्रधारक प्रवेश।) सूत्रधार- जाहि भगवान विष्णुक नरसिंह अवतारक शरीर के देखि के नर-नारी, राक्षस, देवतालोकनि और पाताललोक सेहो आश्चर्य मे पडि गेलाह। जे अपन वज्रक समान कठोर नहक अग्रभाग सँऽ दैत्यराज हिरण्यकश्यप केर छाती विदीर्ण कयलथि। एहेन राक्षसी सेनाक विनाश करयबला भगवान श्रीधर अहाँ सभ कें कल्याण करथु।।१॥ एहि तरहें हम अपने सभ कें सूचित करैत छी जे (घूमि कें आ कान द कें सुनैक अभिनय करैत) अरे ! सूचना देबा मे व्यस्त हमरा ई कोन तरहक आवाज सुनाई दरहल अछि। ठीक! देखियै तऽ! (नेपथ्य मे) महाराज अङ्गराज कर्ण सँ निवेदन कयल जाय; निवेदन कयल जाय। सूत्रधार- ठीक अछि। बुझि गेलहुँ। भयंकर लडाई शुरू भय गेला पर; व्याकुल आ हाथ जोडैत परिचारक, दुर्योधनक आज्ञा सँ कर्ण के समाद दय रहल अछि॥२॥ (सब चलि जाइत अछि।) ॥प्रस्तावना खत्म भेल॥ क्रमशः (... तीन भाग मे समाप्त होयत।) (अपूर्ण) बिपिन झा, [बिपिन कुमार झा Senior Research Fellow, IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कय रहल छथि।] बालानां सुखबोधाय एकटा नेना अपन बाबा सँऽ जिद्द केलक जे- “बाबा यौ हम पाठशाला जायब आ पढब!” बाबा के बड्ड मोन आह्लादित भेलन्हि। ओ कहलथि-“ कियाक नै हम आइये अहाँ के नाम लिखबा दैत छी। ओ गामे कऽ राधाकृष्ण इङ्गलिश पब्लिक स्कूल मे अपन पौत्र कें नाम लिखबा देलखीन्ह। बच्चा पढबा मे होशियार छल्हे सोजहे बर्षे ओ सा ते भवतु... आ बालोऽहं जगदानन्द... आदि कण्ठस्थ कय लेलक। ओकर बाद ओकरा मास्टर साहेब वर्णमाला सिखौलखीन्ह। ओ सम्पूर्ण आखर सिखिलेलक। घर आबि ओ कहलक जे- “बाबा यौ हम साक्षर भय गेलहुँ!! बाबा के बड्ड मोन प्रसन्न भेलन्हि। हुनकर बाबा बड्ड पैघ विद्वान छलखीन्ह आ शताधिक ग्रन्थ लिखने छलखीन्ह। आब ओ बाबा के ग्रन्थालय जा के अपन बाबा द्वारा लिखल सब सँऽ मोट ग्रन्थ उठा के पन्ना पलटावय लागल। कनिकाल केर बाद ओ बाजल-“ बाबा अहाँ तऽ एहि किताब के पहिले पाँती मे गल्ती लिखिने छी!! बाबा हँसय लगलाह आ कहलथि कतय? ओ बच्चा बाजल हमरा मास्टर साहेब पढेलथि जे – ’क’ केर बाद ’ख’ होइत छैक मुदा अहाँ तऽ ’क’ केर बाद ’म’ लिखिने छी! पंक्ति छल – पयसा कमलम्, कमलेन पयः। पयसा कमलेन विभाति सरः॥ बच्चा केर गप्प सुनि बाबा मन्द-मन्द मुस्कान दिय लगलथि। Maithili Word net: - आवश्यकता, कार्यान्वयन आओर तद्गत समस्याक समीक्षा। मैथिली वर्डनेट बनेबाक उद्देश्य अछि एकटा एहेन Lexical Database तैयार करब जे चयनित मैथिली भाषा केर शब्द के अर्थ, आण्टोलोजी (हैरार्की), एहि संग समस्त (चयनित) भारतीय भाषा मे ओहि शब्दक अर्थ, पर्यायपदगण आदि सहजता सँऽ उपलब्ध करा सकय। प्रश्न उठत एहि सँऽ लाभ की होयत? एहि सन्दर्भ कें विविध दृष्टि सँऽ देखल जा सकैत अछि – १. जनसामान्य मैथिलीप्रेमी हेतु २. संगणकीय भाषाविज्ञान हेतु समस्त मैथिल प्रेमी एहि स्वतन्त्र साफ्टवेयर/विकसित टूल द्वारा मैथिली के कोनो शब्द के अर्थ संगहि ओकर विविध भाषा मे अर्थ ओकर आण्टोलोजी[1], विविध भाषा मे ओकर अर्थ विविधता आओर पर्यायपदसमूह सहजता सँऽ देखबा मे समर्थ हेताह। संगणकीय भाषाविज्ञान हेतु ई विशेष उपादेय होयत कियाक तऽ मैथिली आ अन्य भारतीय भाषाक पारस्परिक यान्त्रिक अनुवाद मे ई सहयोग करत। उक्त तीन बिन्दु पर चर्चा करबाक अनन्तर अखनि धरि जे किछु उपलब्ध श्रोत अछि ओकर समीक्षा करब उचित होयत- १. कल्याणी कोश २. विविध शोधपत्र/लेख ३. विदेहक आनलाइन शब्दकोश ४. विविध अन्तर्जाल, विशेष कर संस्कृत वर्डनेट कल्याणी कोश केर उपलब्धता स्क्राइब पर नागेशजी केर सहयोग सँऽ भेटल। ई कोश एकटा मानक ग्रन्थ अछि। यद्यपि एहि शब्दकोश के अपन सीमा छैक, ई शब्दतन्त्र बनेबाक मार्ग मे विशेष उपादेय अछि। विविध शोधपत्र गूगल आ आदरणीय श्री सदन झा द्वारा (एशियाटिक के किछु अंश pdf मे) प्राप्त भेल जे चिन्तन के नवीन दिशा देलक। विदेह मैथिली शब्दकोश केर दिशा मे नीक कार्य अछि मुदा एकर अपन उद्देश्य आ सीमा छैक। ई सेहो एहि कार्य हेतु उपादेय अछि। विविध अन्तर्जाल एहि कार्य के गति प्रदान केलक संगहि प्रस्तुतीकरण के दिशा देलक। अखनिधरि की काज कयल गेल- सम्प्रति डाटा संकलन केर कार्य चलि रहल अछि। संगहि तत्समकोश के प्रारूप आ अपन Ph. D. कार्य के अनुरूप मैथिली शब्दबन्ध/शब्दतन्त्र के संरचना केर प्रारूप बनाओल जा रहल अछि। पाठक सँऽ सहयोगक अपेक्षा- एहि तथ्य सँऽ अपने सभ परिचित होयब जे मैथिली केर क्षेत्र विविधता केर संग उच्चारण (टोन) विविधता विद्यमान अछि। एहि संग अहू तथ्य सँ परिचित होयब जे कारण जे हो एतय (मैथिली भाषी केर मध्य) दू प्रकारक पूर्वाग्रह विद्यमान अछि- पहिल मैथिली बजनाइ पिछडापन के प्रतीक अछि अस्तु बच्चा सभ के तथाकथित पिछडापन सँऽ बचबैत छथि। दोसर मैथिली के उत्थान केर हेतु योगदान करबाक क्रम मे ई बिसरि जाइ छथि जे भाषा केर अन्तर्सम्बन्ध बहुत महत्त्वपूर्ण होइत अछि कोनो भाषा कोनो अन्य भाषा के अहित नहिं करैत छैक। एतय सभ सँऽ निवेदन जे उक्त दुनू पूर्वाग्रह सँऽ ऊपर उठि मैथिली के वास्तविक रूप मे अन्तर्जाल पर उपादेय बना एहि भाषा के सहज बनाबी आ एकर क्षेत्र के बृहत् करी न कि एकर क्षेत्र मे संकुचन आनी। यदि अपने मैथिली वर्डनेट सन्दर्भ मे कोनो सुझाव/श्रोतकेर जानकारी/ अथवा कोनो टिप्पणी दिअ चाहैत छी तऽ kumarvipin.jha@gmail.com पर मेल करू अथवा +9757413505 पर काल करू, ताकि मैथिली वर्डनेट निर्विघ्न एवं परिष्कृत रूप मे यथाशीघ्र लोकार्पित भय सकय। परिशिष्ट इष्ट[2]>संज्ञा 1. ऐसे कर्म जो धर्म से संबंधित हों § सामाजिक कार्य (Social) ( SCL उदाहरण:- विवाह,यज्ञ,तर्पण इत्यादि ) § कार्य (Action) ( ACT उदाहरण:- दौड़,पढ़ाई,चिंतन इत्यादि ) § अमूर्त (Abstract) ( ABS उदाहरण:- मन,हवा,गुण इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 2. वह जो सब बातों मे सहायक और शुभचिन्तक हो § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 3. एक पौधा जिसके बीजों से तेल निकाला जाता है § वनस्पति (Flora) ( FLORA उदाहरण:- शैवाल,लता,वृक्ष इत्यादि ) § सजीव (Animate) ( ANIMT उदाहरण:- मानव,जानवर,वृक्ष इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 4. वह विचार जिसे पूरा करने के लिए कोई काम किया जाए § अमूर्त (Abstract) ( ABS उदाहरण:- मन,हवा,गुण इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 5. वह देवता जिसकी पूजा किसी कुल मे परंपरा से होती आई हो § पौराणिक जीव (Mythological Character) ( MYTHCHR उदाहरण:- बकासुर,पांडु,द्रौपदी इत्यादि ) § जन्तु (Fauna) ( FAUNA उदाहरण:- गाय,मानव,सर्प इत्यादि ) § सजीव (Animate) ( ANIMT उदाहरण:- मानव,जानवर,वृक्ष इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) 6. ढला हुआ मिट्टी का विशेषकर चौकोर लम्बा टुकड़ा जिसे जोड़कर दीवार बनाई जाती है § मानवकृति (Artifact) ( ARTFCT उदाहरण:- पुस्तक,कुर्सी,नाव इत्यादि ) § वस्तु (Object) ( OBJCT उदाहरण:- पुस्तक,छाता,पत्थर इत्यादि ) § निर्जीव (Inanimate) ( INANI उदाहरण:- पुस्तक,घर,धूप इत्यादि ) § संज्ञा (Noun) ( N उदाहरण :- गाय,दूध,मिठाई इत्यादि ) विशेषण 1. जिसकी इच्छा की गई हो § संबंधसूचक (Relational) ( REL उदाहरण :- चचेरा, मौसेरा, बनारसी इत्यादि ) § विशेषण (Adjective) ( ADJ उदाहरण:- सुंदर,लिखित,अमर इत्यादि ) 2. बहुत निकट का या बहुत करीबी § अवस्थासूचक (Stative) ( STE उदाहरण :- सूखा, तर, जवान इत्यादि ) § विवरणात्मक (Descriptive) ( DES उदाहरण :- लाल, पाँच, सुंदर इत्यादि ) § विशेषण (Adjective) ( ADJ उदाहरण:- सुंदर,लिखित,अमर इत्यादि ) ________________________________________ [1] उदाहरण हेतु- परिशिष्ट देखू। [2] Hindi word net IITB कलौ चण्डी महेश्वरौ मिथिलांचल सतत सर्वदेवोपासक रहल अछि एतय कोनो देवता के कम महत्त्व नहिं देल जाइत छन्हि चाहे ओ अग्नि होइथ अथवा लक्ष्मी। एहि लीक सँऽ किछु हटि के हम दुर्गा आ महादेब के किछु विशेष स्थान भेटल छन्हि। कदाचित् कलयुग ई दुनू देवता जनसामान्य के पीडा जल्दी दूर करैत छथिन्ह। खैर जे हो ई तऽ बच्चहिं सँ सुनैत रहल छी “पढो भई चण्डी जैह से हण्डी” मैथिली साहित्यो एकर बहुत नीक टिप्पणी केने अछि-“जे सभ दुर्गापाठ अशुद्धो रटि कें गेल कलकत्ता, गाम अबैत देरी ओ लगबय लागल कित्ता॥” एहि संग गाम मे माटिक महादेब केर पूजा तऽ कदाचिते कोनो एहेन घर होयत जत नहिं होइत हो। हम एतय मधुबनी जिला केर लखनौर गाम मे बस्ती सँऽ लगभग डेढ कि०मी० दूर निर्जन मे लगभग चौदह सीढी नींचा मे करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय सभक आराध्यदेव अंकुशी महादेब केर चर्चा कय रहल छी। ई स्थान आब तऽ सडक मार्ग सऽ जुडि गेल अछि मुदा अखनहु ओतय सायंकाल देबाक समय पंडा केर अतिरिक्त कोई नहि भेटैत अछि। एहि महादेब के योगीश्वर बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईं लखनौर मे राधाकृष्ण मन्दिर प्रांगण मे स्थापित करय चाहैत छलाह अस्तु ओहि निर्जन सँ शिवलिंग के उखारबाक प्रयास करय लगलाह। भरि हाथ कोरथि मुदा महादेब पीडी भरि मात्र। फेर कोरथि फेर ओहने हाल। ओ अन्त मे लगभग १०-१५ हाथ कोरने हेता कि महादेब कहलखिन्ह जुनि कोर हम त निर्जन मे रहनहार छी हम एतहि संऽ गामक रक्षा करबह। ओहि दिन सँऽ लखनौर गाम पूर्व स राधाकृष्ण पश्चिम स बाबा डिहबार दक्षिण स अंकुशी महादेब केर द्वारा सतत सुरक्षित अछि। बहुत बेर आपात स्थिति आयल (बाढि आदि) मुदा गामक बस्ती सुरक्षित रहल। ई गप्प अलग अछि जे नव पीढी के “विशेष पुण्य” केर प्रभावक कारण देवतो के गामक संरक्षणकार्य कदाचित भारे बुझना जाइत हेतन्हि। करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय केर समस्त परिवारक पुरुष बच्चा के मूडन आइयो अही महादेब कें सामने होइत अछि चाहे ओ विदेश मे कियाक नहिं हो। आस्था एवं तर्क दूनू केर देखि ई कहल जा सकैत अछि जे एहि प्रोफेशनल युग मे सेहो त्रैलोक्य जननी भगवती दुर्गा आ अढरंढरन आशुतोष भोलेनाथ अपन प्रासंगिकता बनाके रखबाक मशक्कत करैत सफलता प्राप्त कयलथि। पुष्पदन्त अनुचित नहिं कहने छथि- जे असितगिरि समान काजर लय, समुद्ररूपी पात्र लय, देवतरुशाखा केर कलम लय, समस्त पृथ्वी रूपी पत्र पर यदि साक्षात सरस्वती सदिखनि अहाँ केर गुणगान करथि तैयो अहाँ के पार नहिं पाओल जा सकैत अछि। (आस्था आ तर्क केर अन्तर्द्वंद्व मे देवताक प्रति श्रद्धाऽभाव नहिं बुझल जाय) ॥शुभमस्तु॥ स्तरविहीन स्तर- (’अप्पन युनिभरसीटी’केर हाल) लालबुझक्कर मन्त्री जयराम रमेशक भारतीय वि्वविद्यालय के स्तर केर सम्बन्ध मे कयल गेल टिप्पणी बुद्धिजीवी वर्गक बीच मे पुनः चर्चा केर विषय बनि गेल ।आरोप प्रत्यारोप आ पूर्वाग्रह सँऽ ऊपर उठि यदि चिन्तन कयल जाय तऽ निश्चित रूप सँऽ अपन सभक वास्तविकता अछि। देश भरि मे 200 सँऽ अधिक विश्वविद्यालय अछि। मुदा गिनती केर किछु विश्वविद्यालय छोडि अधिकांश डिग्री केर प्रिंटिंग प्रेस मात्र अछि। कहल जाइत छैक जे अंग्र्ज सभ विश्वविद्यालयीय शिक्षा केर माध्यम सँऽ भारत मे शासन चलेबाक हेतु कलर्क तैयार करैत छलाह मुदा आजु क विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा प्राप्त औसत युवा एहियो योग्य नहि छथि। आजुक विश्वविद्यालय केर प्रक्रिया थीक येन केन प्रकारेण प्रवेश लिया, फीस भरू, साल भरि अपन सांसारिक क्रिया कलाप मे व्यस्त रहू, जखनि परीक्षा केर प्रवेश पत्र आ सिड्यूल आबि जाय तखनि गेस पेपर श्योर सिरीज एवं अन्यान्य साधन सँऽ परीक्षा रूपी वैतरणी पार करू। कोनो कक्षा, कोनो लेक्चर, कोनो सेमिनार केर आवश्यकता नहिं। कतहु कतहु तऽ ’लक्ष्मीजी’ सेहो ’सरस्वतीजी’ केर प्रमाणपत्र दैत छथीन्ह। विशेष उदाहरण अप्पन स्वनामधन्य मिथिला विश्वविद्यालय कऽ लिआ। षड्वर्षीय योजना, पंचवर्षीय योजना वला ऐतिहासिक गौरव रखनिहार ई विश्वविद्यालय ओहि स्थान पर अछि जे स्थान भारतवर्ष मे बौद्धिक रूप सँऽ सर्वाधिक ऊर्वर अछि। जकर परीक्षा कैलेण्डर कें भगवाने मालिक छथि किया कि हाल मे हमर एकटा अनुज सेकेण्ड ईयर पास कयलाके मात्र दू महिना बाद थर्ड ईयर कें परीक्षा देलथि! आ पूर्व मे हमर परिचित साढे पाँच वर्ष मे स्नातक बिना फेल केने उत्तीर्ण कयलथि। जाहि तरहें एकटा भातक दाना पूरा वर्तन केर भातक परिचय दैत अछि ओहि तरहें ई उदाहरण पूरा देश कें सर्वव्यापी उदाहरण अछि। आब बात करी शोधक स्थिति। ई अपने आप मे एकटा ’शोध’ केर विषय अछि कियाक तऽ अधिकांश विश्वविद्या लय के रिसर्च वर्क आ रिसर्च थिसिस के की हालात अछि एहि से अपने सभ परिचित होयब। मात्र दस हजार रुपया मे थिसिस लिखबा के जमा करू आ “डाक्टर” केर उपाधि धारण करू। दुर्भाग्यवश हमहूं भारत केर सर्वश्रेष्ठ तीन टा संस्थानक (Allahabad University, Jawaharlal Nehru University, IIT Mumbai) छात्र रहलहुं हुनकर वास्तविकता कहि हम मर्यादा केर उल्लंघन नहिं करब। एहि लेल हम क्षमाप्रार्थी छी। दस हजार रुपया खर्च कय Ph. D उपाधि हासिल करू आ बोरा भरि पैसा अथवा झोडा भरि पैरबी केर माध्यम सँऽ कतहु “असिस्टेण्ट प्रोफेश्वर” कें पद प्राप्त करू और अपनहिं सदृश “रक्तबीज” केर निर्माण करू। वेतन पचास हजार सँऽ सवा लाख रुपया मासिक और कार्यभार ’स्वेच्छानुसार’। चर्चा मे प्रोफेशनल कालेज केर चर्चा छुटि गेल। जे व्यक्ति इण्टरमीडियेट केर कैल्कुलस क सवाल हल नहि कय सकैत छथि ओ इंजीनियरिंग कालेज (सामान्यतया प्राइवेट) के डाइरेक्टर आ फैकेल्टी आदि बनि गेल छथि। मध्यम आ निम्न वर्ग के माता पिता अपन बच्चा सभ के ऊपर जिन्दगी भरि के पूंजी खर्च करि एहि कालेज सभ सं बी. टेक आ एम.बी. ए करबैत छथि। हुनक हाल ई पंक्ति पर चरितार्थ होइत छन्हि “बडे बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले”। यद्यपि ई निराशाजनक तस्वीर एकटा वास्तविकता अवश्य छी मुदा एहि अन्हार मे किछु चमकैत नक्षत्र सेहो अछि। आवश्यकता एहि गप्प के अछि जे शिक्षा प्रणाली मे सस्थागत रूप सँऽ व्यापक परिवर्तन हेबाक चाही। शिक्षा हेतु अधिक धन आबण्टन, उच्चशिक्षाऽधिकारी के पद पर ईमानदार व्यक्ति कें नियुक्ति योग्य व्यक्ति के फैकल्टी के नियुक्ति, आ संगहि यदि पूर्ण पारदर्शी व्यवस्था अगर होइत छैक तऽ निश्चित रूप सँ तस्वीर किछु भिन्न होयत। आशा अछि जे समाज बुद्धिजीवीवर्ग एवं नीतिनियन्ता उच्चशिक्षा केर सर्वोच्च प्राथमिकता देताह। तखनि एकटा ज्ञान आधारित समाज केर निर्माण अवश्य हेतैक। जन्मदिनक बदलैत स्वरूप सालो बीत गेल ओहि गप्पक मुदा अखनहुँ ओहिना स्मरण अछि। जन्मदिन केर अवसर पर कदाचिते कोई एहेन होयत जेकरा आनन्द नहिं हो। मुदा पारम्परिक रूप सँ मनाओल जाई बला जन्मदिवसोत्सव आ आजुक समय मे मनाओल जाइ बला जन्मदिवसोत्सव केर स्वरूप मे बहुत अन्तर् आबि गेल। एहि पत्रक मे हम उचित आ अनुचित केर गप्प नहिं कय रहल छी। पारम्परिक रूप सँऽ जन्मदिन तिथि केर् अनुरूप मनाओल जाइत छल। किन्तु आई काल्हि प्रचलित कैलेण्डर केर अनुसार मनाओल जाइत अछि। कारण स्पष्ट अछि। अपन समाज मे जन्मक पंजीकरणस्वरूप भारतीय माह आतिथि छल जन्मक समयानुसार राशि आदि केर निर्धारण होइत छल। मुदा वर्तमान समाज मे जन्मतिथिक मान्य प्रमाण पत्र आदि ग्रेगेरियन कैलेण्डर केर अनुसार होइत अछि। अस्तु जन्मदिन स्वाभाविक रूप सँऽ दिनांकानुरूप मनेबाक प्रथा चलल। ई द्वैधीभाव कखनहु के बहुत असुविधा दैत अछि। यदि देखल जाय तऽ दिनांकानुरूप हो अथवा तिथिक अनुरूप कतहु समस्या नहिं अछि। समस्या त अछि जन्मदिवसोत्सव मनेबाक स्वरूप मे। ओहि समय जन्मदिन उपलक्ष्य मॆं तिल लगायब छीटब आ संगहि मारकण्डेय पूजा आदि केर प्रावधान छल। मुदा आई केक काटब बाह्याडम्बर केर संग गिफ्ट केर आदान प्रदान, नाच-गान, मांस-मदिरा आदि केर कदाचित प्रावधान बनल जा रहल अछि। आवश्यकता अछि जे आगू क पीढी कें एहि सन्दर्भ मे नीक आ अधलाह क जानकारी देलजाय। जन्मदिन के मात्र एकटा पिकनिक केर दिन नहिं बनय देलजाय। अपितु आगू केर वर्ष मे उत्कर्षदायक कार्य हेतु प्रोत्साहन हेबाक चाही। दीर्घायु हेबाक हेतु यथोचित आचरण निमित्त कार्य हेबाक चाही। यात्राक किछु प्रश्न चौसठम स्वाधीनता दिवस। ई चौसठ वर्षक स्वाधीनताक युवा कही अथवा वृद्ध, उत्साहवान कही अथवा थाकल एकटा यक्ष प्रश्न अछि। राष्ट्रक एकटा आँखि आशावादी भविष्यक तेज सँ युक्त पर दोसर निराशाजनक वर्तमान सं मुरझायल। एहि तरहक संयोग कालचक्रक इतिहास मे अनुपम अछि। चौसठवर्षक यात्रा क पिटारी उपलब्धि सँ भरल पड़ल अछि एहि मे कोनो दूमत नहि मुदा जेहितरहक व्यवस्था आई लोकतंत्रक चादर ओढ़ने संविधान कऽ आड़ लय बैसल अछि ओ निरंतर प्रबुद्ध समाज केय झकझोरवाक हेतु पर्याप्त छैक। वर्तमान समयक अनेक प्रश्नक उत्तर हेतु प्रयासरत अछि। पहिल ई जे अपन राष्ट्र के गन्तव्य की थीक? दोसर ई जें राष्ट्रक निर्मल आत्मा भ्रष्टकार्य तंत्र सँ तखन धरि तक संघर्ष करत। दूनूमे के जीतत अथवा पराजित होयत? अपन राष्ट्र ई सुदीर्घ यात्रा मे जो चौराहा पर ठार अछि जयत सँ उत्कर्ष, अपकर्ष, विकास, विनाश सभ दिशा लेल रास्ता फुटैत अछि। नीति नियन्ता वा प्रबुद्ध समाज कोन मार्गक चयन करैत छाथि ई वर्तमान सदीक हेतु लेल गेल सभसँ महत्वपूर्ण निर्णय रहत। निराशा क अन्धकार मे आशा कऽ लुपलुपैत डिबिया बुझल नहि अछि अतः आशा ‘‘बलवती राजन’’ मुदा हाथ पर हाथ धरिकय बैसैक कोनो अर्थ नाहि। प्रबुद्ध समाज हेतु इस समय आत्मचिन्तनक थीक। हुनक ई कर्तव्य छी जे एहि समय अपन भूमिका चिन्हथि यदि ई समय भटकि गेलाह त ई राष्ट्रक लेल दूर्भाग्यजनक होयत। स्वतंत्रता दिवसक हार्दिक शुभकामना। सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी? सतत ई सुनैत एलहुँ- सहनशीलता एकटा गुण अछि जे प्रत्येक व्यक्ति हेतु जरूरी अछि। मुदा ई गप्प वर्तमान मे कते तक सत्य अछि ई परीक्षणक आवश्यकता अछि। सहनशीलता यदि कोनो व्यक्ति अथवा समाज कें अभिशप्त करय लागय तऽ ओ कतऽ तक उचित ई स्वयं चिन्तन कय सकैत छी। आय जतहु कतहु समस्या देखैत छी चाहे ओ भ्रष्ट आचरण सन्दर्भित हो अथवा आतंकी गतिविधि या कोनो दुर्घटना विशेष। सर्वत्र हमर सभक अभिव्यक्ति रहैत अछि ’सकार एहि लेल दोषी अछि’ ,अमुक व्यक्ति केर कारण ई भय रहल अछि’। आ नेता सभक प्रतिक्रिया रहैत अछि- ’दोषी के नहिं छोडल जायत’, ’जाँच हेतु टीम बनाओल जायत’...। संगहि जनता जनार्दन सँऽ निवेदन जे सहनशीलता केर परिचय देथि, शान्ति बनौने रहथु’। जनता अर्थात् हम अहाँ एहि सभ सँऽ अलग आर्प प्रत्यारोप केर् बाण चलबैत अपना के स्वच्छ चरित्रबला हेबाक स्वयं प्रमाणपत्र लैत छी। कहियो ई सोचलियैक जे ओ नेता हमरे सभ म स एकटा व्यक्ति छथि जे नियमक कमजोर पक्ष के अपन सबलपक्ष बना शासन करैत छथि। अपराध छोट हो वा पैघ दूनू अपराधे होइत अछि। लगभग सर्वत्र पारदर्शिता केर अभाव भ्रष्टाचरण के प्रश्रय दैत अछि। हम सभ अपन तुच्छ स्वार्थ, भय आदि हेतु पैघ भ्रष्टाचार एवं आतंकी गतिविधि के हिस्सा बनैत छी। हमरा सभ के सुविधा चाही। रेल टिकट चाही तऽ दलाल के अतिरिक्त १४००/- देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। DL बनेबाक हेतु २०००/- देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। कोनो सरकारी नौकरी हेतु १० लाख देब अपराध नै बुझना जाइत अछि। कोनो गलत आचरण के बर्दाश्त करब अपराध नै बुझना जाइत अछि। सरकारी फण्ड अगर भेटैत अछि ओकर अपन सुविधा आ करियर पर खर्च करब अपराध नै बुझना जाइत अछि। उक्त चर्चा तऽ नमूना मात्र अछि। आगू स्वयं जोडि लिय। एहेन स्थिति मे केकरा दोष देल जाय ई विचार करी। एकटा प्रश्न मीडिया सँ भारत विविधता सँ परिपूर्ण देश अछि। सर्वत्र विविधता गप्प-सप, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन सभ किछु अलग-अलग किन्तु एकटा जे समान देखैत छी ओ अछि राष्ट्र केर प्रति सम्मान। ई अलग बात अछि जे लोक सभ अपन तुच्छ स्वार्थ हेतु अपन धर्म (कर्तव्य) के विसरि के धनादि केर दास भय जाइत छथि। हम वर्तमानकालीन राष्ट्र केर शुभचिन्तक आ हुनक नेतृत्वकर्ता केर गप्प कय रहल छी। ई सभ मीडिया केर लेल आकर्षण केर केन्द्र रहलथि। नीक बात। हुनक योगदान मे मीडिया केर सहयोग नितान्त आवश्यक छैक मुदा एतय मीडिया सँ असन्तोष तखनि होमय लगैत अछि जखनि गंगा एहेन पावन नदी केर रक्षण हेतु लगातार चारि पाँच मास सँ आमरण अनशन पर बैसल निगमानन्द एहेन देशभक्त कें मरबाक उत्तरे मीडिया चर्चा केर विषय बनबैत अछि। बाबा निगमानन्द गंगा वचाव हेतु चारि-पाँच मास स अनशन पर छलाह मई मे ओ कोमा मे आबि गेलाह। ओही हास्पीटल मे बाबा रामदेब के प्रत्येक बुलेटीन के परिचर्चा केर विषय बनाओल गेल मुदा.... निगमानन्द के पोस्टमार्टम के बादे समाचार भेटल्!! एतय हम नेता सभ स कोनो शिकायत नहि करैत छी कियाक त ओ अभ्यस्त छथि मुदा मीडिया आ जनसामान्य जेकर पहुँच मे ओ (निगमानन्द) छलाह ओ (मीडिया) कदाचित कर्तव्य मे स्खलन नहि करितथि तऽ एहेन दुखद समाचार नहिं सुनय पडितय। अस्तु हमर निवेदन जे जे कोइ मीडिया स जुडल होइ अथवा जनसामान्ये कियाक नहि होई एहेन घटना के पुनरावृत्ति स रोकी....। एतय विशद नहि देल जा रहल अछि विशद चर्चा हेतु देखी- http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/06/110614_nigmanand_death_fma.shtml जितेन्द्र झा नेपाली आ मैथिली भाषाक दूटा साहित्यिक कृति विमोचित एक्कहि मञ्चपर नेपाली आ मैथिली भाषाक दूटा साहित्यिक कृति विमोचित भेल अछि । राजधानी काठमाण्डूमे पुस २३ गते आयोजित एकटा कार्यक्रममे रमेश उप्रेतीक बहुलानन्द उपन्यास आ श्यामशेखर झा कमलक मेघशतक खण्डकाव्यके विमोचन कएल गेल । विमोचन कार्यक्रम आन कार्यक्रमस बिलकुल भिन्न छल । पोथीक लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार, चर्चित नेता, मन्त्रीस करएबाक चलनके तोडैत देवकुमारी उप्रेती आ पार्वती देवी पोथीक लोकार्पण कएने छलीह । ई दुनूगोटे पोथीक स्रष्टाद्वयके माय छथिन्ह । नेपाली भाषामे लिखल बहुलानन्द उपन्यासमे नेपालक वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक मुद्दाके विषयवस्तु बनाओल गेल अछि । मैथिली भाषामे लिखल मेघशतक लघुकाव्यमे कवि मेघके माध्यमस अपन प्रियसीके सन्देश पठओने छथि। कार्यक्रमके आयोजक संस्था छल नेपाली मैथिली साहित्य संगम। आयोजक संस्था भाषिक समागमके शुरुवात कएलक अछि से कहैत वक्तासभ प्रशंसा कएने रहथि । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा उप्रेती नेपाल बहुजातीय, बहुभाषी आ बहुसांस्कृतिक देश रहल कहैत एकर बहुलताभितर एकता खोजबाक प्रयास करबापर जोड देलनि । नया नेपालमे हरेक भाषाभाषीके एक दोसराके अस्तित्व स्वीकारबाक चाही, दुनू कृतिक संयोजनस देखाओल गेल भाषिक पहिचानस राजनीतिक दलके पाठ सिखबाक ओ सल्लाह देलनि । ‘अन्य भाषाभाषीसेहो ज एकर देखासिखी करए त आपसी एकता मजबुत हएत’ उपकुलपति उप्रेतीक कहब छलनि । मेघशतकके रचनाकार श्यामशेखर झा कमल कहलनि–नेपाली मैथिली साहित्य संगम राजधानी आ राजधानी बाहर रचना होबऽबला साहित्यके जोडबाक प्रयास करत । उपन्यासकार रमेश उप्रेती नेपाली मैथिली साहित्य संगमक मञ्चस भाषिक रुपमे एक दोसराके अस्तित्व स्वीकारबाक काज भेल कहलनि । भाषिक विविधताके फायदा नेतासभ उठारहल कहैत ओ आपत्ति जनओलनि । ‘नेपाली आ मैथिली दुनू भाषाके अपन रक्षाके लेल एकजुट होएब आवश्यक अछि’ एमाले नेता रामचन्द्र झा कहलनि । कार्यक्रममे वक्तासभ विमोचित कृतिक विभिन्न पक्षपर चर्चा कएने छलथि । रमेश उप्रेती अपन बहुलानन्द उपन्यासमे एकटा अघोरीके केन्द्र बनाकऽ समाजिक, राजनीतिक दुष्प्रवृति उजागर करबाक प्रयास कएने छथि । पशुपति क्षेत्रमे रहनिहार अघोरी योगीक मुहस उप्रेती कटुसत्यके उद्घाटित कएने छथि । अघोरी नेपालमे वि.स. २००७ सालके बाद भेल राजनीतिक परिवर्तनके लेखाजोखा कएने अछि । सशस्त्र द्वन्द्वमे मारल गेल १३ हजार नेपाली नागरिकके मृत्युक हिसाब मंगनिहार अघोरी प्रमुख राजनीतिक दलके कठघेरामे ठाढ कऽ दैत अछि । मेघशतक कालिदासक मेघदूतस प्रभावित अछि । कवि अपन विरह मेघके सुनौने छथि, मेघ समदिया बनल अछि । ज किछु शास्त्रीय आधारके छोडि देल जाए त मेघशतक उत्कृष्ट रचनामे गनल जाएत प्राज्ञ रामभरोस कापडिक कहब छलनि । छन्दोबद्ध मेघशतक छन्दके पाबन्दमे पडि सीमित भेल नेता रामचन्द्र झाक विश्लेषण रहनि । मेघशतकस नेपालीय मैथिली साहित्यक श्री वृद्धिमे योगदान भेल वक्तासभ कहने छलथि । मेघशतक (श्यामशेखर झा कमल ) सँ तीनगोट कविता १ हे मेघ बनब कि दूत हमर ? सन्देश हमर नहि रत्ती भरि, बिरह ज्वर भेल विषम–सरि । नहि शब्द फुरय संदेश दिअ, अविरल बहय ई नोर दिअ । वाष्पीकृत भऽ ई नोर उडय, भऽ जाय समागम एकरास । अवरोध हमर, अनुरोध हमर, भऽ जाय समाहित ई अहास । ई भार उठा कऽ कृपा करब, स्नेह सहित एकरा धारब । एकरा बुझू स्नेहक गङ्गाजल, करबद्ध हम, अनुरोध हमर ।। हे मेघ बनब कि दूत हमर ? प्रियतम प्यारी लग गीत हमर, पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि ? पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि २ जागू मैथिल हे मैथिल ! मिथिला जागू शिथिल अहा नहि रहू बनल । गौरव अतीतपर अहा करु, सपना मिथिलाके करु सफल । मैथिल संस्कृति, मैथिली भाषा, अपन सब किछु अपन आशा । अपन संस्कृति पर गर्वकरु, अपन तऽ करु अहा परिभाषा । अपना बारेमे ज्ञान करु, ध्यान धरु अपना उपर । मृत अछि, ओ नहि जीवित, अपन स्मृतिमे नहि जकर । हे मेघ बनब कि दूत हमर ? प्रियतम प्यारी लग गीत हमर, पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि ? पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि ३ ओ सब मैथिली भाषी छथि मिथिलामे जे सब भूमिपुत्र, ओ सब मैथिल छथि मिथिलास । समुदाय कोनो वा जाति पात, नहि फरक परत किछु कहलास । मिथिलामे जे सब जन्म लेलन्हि, अथवा मिथिलाके बासी छथि । ओ सब मैथिली भाषी छथि । अपनामे नहि कोनो भेद करु, विभेद करु नहि वर्ग उपर । सबस पहिने हम मैथिल छी, मैथिली, मिथिला अपन जकर ।। हे मेघ बनब कि दूत हमर ? प्रियतम प्यारी लग गीत हमर, पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि ? पहुचादेव, की फेर जाएब बिसरि अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला मिथिलाञ्चलक घरक भितमे बनाओल जाएबला मिथिला लोकचित्रकला विश्वभरि ख्याति कमओने अछि । मुदा एखत अपने भूमिमे एकरा पहिचान खोजबाक स्थिति छैक । मिथिला चित्रकलाके सरकार बेवास्ता कएने अछि, तें ई व्यवसायिक रुप नहि लऽ सकल अछि । एकर व्यावसायिक प्रबद्र्धन नहि भऽ सकल अछि । ग्रामीण क्षेत्रक महिलाके जीवनस्तर सुधार करबाक लेल बडका साधन भऽ सकैत अछि ई चित्रकला । कियाक त खासकऽ मैथिल ललनेक हाथमे नुकाएल रहैत अछि ई चित्रकलाक जादुगरी । आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक समृद्धिक अथाह सम्भावना अछि मिथिला चित्रकलामे । लोकचित्रकलाके व्यवसायिक स्वरुप देलासं आर्थिक आ सांस्कृतिक दुनू लाभ उठाओल जा सकैत अछि । परम्परागत मिथिला चित्रकला जीवनक अंग अछि मिथिलामे । लोकचित्रकला संस्कारक द्योतक सेहो अछि । मुदा बढैत आधुनिकताक कारणे विस्तार प्रभावित भेल छैक । राज्य मिथिला चित्रकलाके एखनधरि चिन्ह नई सकल आरोप चित्रकारसभक छन्हि । नेपाल सरकार कलाके बढावा देबालेल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठान खोलने अछि । जत्तऽके प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास सम्बद्ध एक्कहु गोटे नहि अछि । ई एकटा प्रमाण मात्र अछि, आन बहुतो ठाम मिथिला चित्रकलासंग सौतिनिञा व्यवहार होइत आएल छैक । एना ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक कुलपति किरण मानन्धर कहैत छथि जे मिथिला चित्रकलाके विशेष स्थान देने छी । मिथिला चित्रकलामे विशेष दखल भेनिहारि महिलाके स्थान देल जाएत से कुलपतिक कहब छन्हि । हिनक कथनी आ करनीमे कतेक समानता अछि, आबऽ बला दिने बताओत । जत्तऽ समग्र कलाक उन्नतिक बात होइक ओत्तऽ मिथिला पेन्टिङक चित्रकार नईं अछि, एकरा विडम्बने कहबाक चाही । मिथिला चित्रकलासं सम्बद्ध चित्रकारके उचित अवसर भेटबाक चाही । नेपाल पर्यटन वर्ष २०११ मना रहल अछि, एहनमे मिथिला चित्रकलाक मादे सेहो पर्यटकके आकर्षक कएल जा सकैत अछि । एहिबीच काठमाण्डूक बबरमहलस्थित सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे एस. सी. सुमनक मिथिला चित्रकला प्रदर्शनी मिथिला कसमस हालहि सम्पन्न भेल अछि । एहि प्रदर्शनीमे कलाप्रेमी मिथिला चित्रकलाक आधुनिक आयामसभसं परिचित भेलथि । सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे हुनक ११ म् प्रदर्शनी छल ई । मिथिला क्षेत्रक जीवनशैलीक झल्काबऽ बला चित्रकलासभ देखलासं ग्यालरी मिथिलामय भऽ गेल छल । एस. सी. सुमन मिथिला चित्रकला क्षेत्रमे परिचित नाम छथि । हिनक चित्रकलासभ बेस प्रशंसा पओलक । मिथिला चित्रकला सम्बन्धमे अध्ययन अनुसन्धानक सेहो बहुत खगता छैक । मिथिला लोक चित्रकलाक कुनो खास नियम वा सिद्धान्त नहि होइत अछि । तें ई स्वच्छन्दताक पर्याय सेहो अछि । मिथिलाक समृद्ध संस्कृतिक परिचायक सेहो अछि । विमलक गजल आ सुजितक कथा साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल संग्रह सूर्यास्तस“ पहिने भादव १० गते शनिदिन राजधानी काठमाण्डूमे आयोजित एक कार्यक्रममे विमोचित भेल । राष्ट्रकवि माधव घिमिरे गजल संग्रह विमोचन कएने रहथि । विमलके सिद्धहस्त साहित्यकार कहैत ओ हुनक लेखनीक प्रशंसा कएने रहथि । विमलक एहि नव कृतिमे एक सयटा गजल संग्रह कएल गेल अछि । संगीत तथा नाट्य प्रज्ञाप्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेशरञ्जन झा, प्राज्ञ बुद्धि राना, रोचक घिमिरे, प्रहलाद पोखरेल, प्रा. परमेश्वर कापडी, धीरेन्द्र प्रेमषि सहितके साहित्यकार विमलक कृति सम्बन्धमे मन्तव्य व्यक्त कएने रहथि । गजल संग्रहक प्रकाशक पृथु प्रकाशन जनकपुधाम अछि । विमल २०६६ सालक जगदम्बाश्री पुरस्कारसं सम्मानित भेल छथि । दोसर दिस सञ्चारकर्मी सुजित कुमार झाक कथा संग्रह चिडै भादव १३ गते जनकपुरमे आयोजित एक कार्यक्रममे विमोचित भेल । ७८ पृष्ठको कथा संग्रहमे ११ टा कथा समेटल गेल अछि । साहित्यकार रोशन जनकपुरी, अबधेश पोखरेल, श्यामसुन्दर शशि, अशोक दत्त, सहितके व्यक्ति कथा संग्रहके प्रशंसा कएने रहथि । रामानन्द युवा क्लब मैथिली भाषामे एहिसं पहिने सेहो विभिन्न पोथी प्रकाशन क चुकल अछि । सुजितक अनुभव रिपोर्टर डायरीमे (प्रस्तुति जितेन्द्र झा) जनकपुरधाममे हाल पत्रकारिता सक्रिय सुजीत कुमार झाक अनुभव आ विचारसभ समेटल रिपोर्टर डायरी नामक संस्मरण प्रकाशित भेल अछि । मैथिली भाषामे प्रकाशित एहि कृतिक प्रकाशक आफन्त नेपाल नामक गैर सरकारी संस्था अछि । ओ जनकपुरमे काज करबाक क्रममे रिपोर्टिंग, घुमफिर आदिके क्रममे कएल अनुभवके डायरीमे समेटने छथि । संस्मरणमे जनकपुरक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक मुद्दासभके समेटबाक प्रयास कएल गेल अछि । लेखक मिथिला डट कम मैथिली पत्रिकाक सम्पादक छथि । डायरीमे संग्रहित संस्मरण डट कममे विभिन्न समयमे प्रकाशित भऽ चुकल अछि । प्रस्तुत अछि डायरीक किछु महत्वपुर्ण अंश । १ मैथिलीक विकास ट्रष्ट ः नाम उच्च काम तुच्छ मिथिला नाट्य कला परिषदक २०६८ साउन महिनामे भेल साधारण सभामे मैथिली विकास ट्रष्ट कोषपर हम कसिकऽ बजलहु“ । हमरा एहिपर जोड देवाक आशय छल, एहि विषयपर बहस होइक । अहु दूआरे जे ओहि समारोहमे ट्रष्ट कोषक सदस्य सचिव आ दू गोट सदस्य उपस्थित छलथि । मुदा ओसभ किछु नहि वजलथि । किएक नहि वजलथि ? हमरा नहि बुझल अछि । ट्रष्ट कोष नहि चलला सँ ककरा फाइदा भऽ रहल अछि ? या त एकरा पूर्णतः बन्द कऽ देल जाए, नहि तऽ काज शुरु कएल जाए । एहि दूनुपर वहस आवश्यक अछि । बन्द करव कोनो दृष्टि स“ बढिया नहि हैत । एक तऽ मैथिलीक नामपर कतहु स“ पैसा अवैत नहि अछि, जँ एवो कएल तऽ काज नहि भेल आ पैसा फिर्ता चलि जाएत । एहि सँ दुर्भाग्य आओर की भऽ सकैत अछि ! मैथिली विकास ट्रष्ट कोषकेँ संयोजक छथि मैथिलीक वरिष्ठ साहित्यकार डा.राजेन्द्र विमल, सदस्य सचिवमे नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रंजन, सदस्यमे पूर्वाञ्चल विश्व विद्यालयक उपकुलपति डा. रामावतार यादव, मिथिला नाट्य कला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ राम भरोष कापड़ि भ्रमर, जिल्ला विकास समिति धनुषाक पूर्व सभापति राम चरित्र साह, एकीकृत नेकपा माओवादीक नेता रोशन जनकपुरी, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वर कापड़ि आ रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष जीवनाथ चौधरी । ई सभ असफलताक मुंह कहियो देखवे नहि कएने छथि । हिनकासभक निष्ठापर प्रश्ने नहि उठाओल जा सकैत अछि । मुदा कोषके काज देखलापर मस्तिष्कमे वनल सभ प्रभाव समाप्त भऽ जाइत अछि । जिल्ला विकास समितिक कोषक ई हाल अछि तऽ सरकारक कोषके की हाल हैत ? मैथिलीक विकास किएक नहि भऽ रहल अछि । एकर छोट उदाहरण अहु सँ लेल जा सकैत अछि । किओे कहता पैसा नहि अछि तएं काज नहि होइत अछि । मुदा एहि ठाम तऽ पैसो अछि तैयो काज नहि भऽरहल अछि । २ के सुनत बेचनके राग ? बेचन पासवान मिथिलाक चर्चित गायक । धनुषा होइ, महोत्तरी होइ वा काठमाण्डूए, सभ ठामक लोक हिनका चिन्हैत छन्हि । कनिको–मनिकोमे बेचन गीत गाबि देतोक सोँचि लोक हिनका बजालैत अछि । काठमाण्डूक बडका लोकसभके गीत सुनयकेँ मन भेल तऽ बेचनकेँ बजा लैत अछि । मुदा, बेचन आइ कोन अवस्थामे जी रहल छथि, ककरो नहि बुझल हैत । ओ पैसाक लेल घर–घर भटकि रहल छथि । फुटल तबलाके छराबय हेतु देला महिनो भऽ गेल छन्हि । मुदा पैसा नहि छन्हि जे चमरा लग सँ तबला अनता । खायो पर आफत छन्हि । बिना साजक कें गीत सुनत ! बेचन आ गायक उदित नारायण झा मित्र रहथि । आर्थिक स्थिति तहिया दूनुकेँ समाने छल । काठमाण्डूमे कतेको ठाम दूनु सँगे गीत गएने छथि । काठमाण्डूमे संर्घष करैत काल बेचन नेतासभके चम्चागिरीकेँ प्राथमिकता देलन्हि आ उदित नारायण करियरकेँ । आइ उदित नारायण सँगे रहितथि तऽ बेचनोके एहन स्थिति नहि रहैत ? ३ घर–घरमे दारु भठ्ठी ! धनुषा जिल्लामे अवैध दारुक भठ्ठी सञ्चालित अछि ई वात हमरा मात्र नहि बहुतो गोटेके बुझल अछि । गोरख यादवक“े सोहनी सिंगरजोरामे रहल भठ्ठी तोडयगेल पुलिस टोली सँग रिपोर्टिङ्गके लेल हमहु“ गेल छलहु“ । ओहि ठाम पुलिस दारुसभ नष्ट कऽ भठ्ठीमे आगि सेहो लगौने छल । मुदा एहिवेर धनुषाक धनौजी गबिसक धनौजी आ भररिया तहिना औरही कप्टौलमे दारु देखलहु“ त चकित रहि गेल छलहु“ । विश्वास नहि भऽ रहल अछि जे धनुषामे अवैध दारुक कारोवार एहि रुप स“ वढि गेल अछि । हमरा एहि तीनू गाममे जाय स“ पूर्व लगैत छल गोरख यादव, सवैलाक जयसवाल, इनरवाक राजा गोइत, फुलगामाक किछु व्यक्ति मात्र ई कारोवार करैत छथि । मुदा सत्य एहि सँ फरक अछि । कतेको घरमे पुलिस दारु नष्ट कएलक । ओ घर सभ बाहर सँ बहुत सम्भ्रान्त जका“ लगैत छल मुदा भितर गेलाकवाद किछु आओर छल । धनुषाक तत्कालीन प्रहरी उपरीक्षक दिनेश आमात्य टोलीक नेतृत्व कएलाक कारण दारु नष्ट करव औपचारिकता नहि रहि गेल छल । एकटा घरमे पुलिस दारु नष्ट करय लेल पहु“चल तऽ गृहणी बरियातीकेँ पियावयके लेल दारु किन कऽ अनने जानकारी देलन्हि । मुदा भितर गेलाकवाद तऽ माहोले किछु आओर छल । ओहि घरमे मात्र पाँच सय लिटर सँ वेसी तैयारी दारु आ ओतवे संख्यामे कच्चा दारु भेटल छल । ४ पत्रकारक चुनाव सुन्धारामे सुरापान नेपाल पत्रकार महासंघक राष्ट्रिय अधिवेशन २०६८ बैशाख २०÷२१ गते सम्पन्न भेल । केन्द्रीय पार्षदक रुपमे हमहु“ सहभागी भेल छलहु“ । पार्षदक रुपमे हमर ई पहिल सहभागिता छल से नहि मुदा जे आनन्द एहिबेर लागल से कहियो नहि लागल छल । सुन्धारामे ठहरबाक व्यबस्था कएल गेल छल । सभ पत्रकारके“ ओहि एरियामे रखलाक कारण विशेषे चहल–पहल होयव स्वभाविक छल । भोजन कएलाकवाद किछु गोटे, दाइ दोहरी हेर्न जाउ“ ..कहय बला सभ सेहो भेटलथि । चुनावमे भोट पएबाक लेल किछु गोटे मु“ह स“ पोलहा रहल छलथि तऽ किछु उम्मेदवार दारुके“ बोतल लऽ कऽ आएल छलथि । काश हमहु“ दारु पिवैत रहितहु“ तऽ कतेक पिबतहु“ – कतेक । दिनमे टेक्सीपर काठमाण्डू घुमावयवला सभ सेहो भेटल । दोहरी डिस्को फाइव स्टारक भोजनक किछु गोटे मित्रसभ लाभ उठौलन्हि । ओहो सभ अपन–अपन खेत बेच कऽ ओना कऽ रहल छलथि से नहि । हुनको सभके“ किओ आओर फण्डीङ्ग कएने छल । व्यापारी, तस्कर, गलत कमायवला नेतासभ दाता रहथि । काठमाण्डूमे लगैत छल एहिना भोट होइत रहितैक आ हमसभ ऐश करैत रहितहु“ । अपना आपके“ समीक्षा करैत छी तऽ काठमाण्डूमे वितायल आनन्द प्रश्न कऽ रहल अछि की पत्रकारक इहे काज अछि ? किए एतेक मह“ग भऽ रहल अछि पत्रकारक चुनाव ? सभ्य समाजक कल्पना करयवला कलमजीविसभ स्वयं विकृति बढावयमे तऽ नहि लागल अछि । एक दू दिनक ऐश अरामलेल पत्रकारक संस्था बदनाम तऽ नहि भऽ रहल अछि ? ५ बैकुण्ठ जी, महन्थक गरिमा बुझियौ रत्न सागर स्थानक छोटे महन्थ बैकुण्ठ दास २०६८ अखारमे जिल्ला अदालत धनुषाक एक न्यायधिशक निर्णय सँ भलेही साधारण तारेखमे रिहा भऽ गेल होइथ मुदा समाज एखनो हुनका बहुतो केशमे अपराधी मानैत अछि । जाहि व्यक्तिके“ देखि कऽ मोनमे श्रद्धा जगवाक चाही ओ व्यक्तिके“ देखि कऽ लोकके“ डर लगैत अछि । हमरा जहिया बैकुण्ठ जी स“ परिचय भेल छल त ओ कहलथि, ‘पाकिस्तान सँ डाक्टरी पढने छी ।’ डाक्टर भऽ कऽ बाबाजीबला काज कनीकाल लेल उटपटांग अवश्य लागल छल । हुनका जनकपुरक सर्वशक्तिमान होवयके“ लालसा छन्हि । मन्दिरमे पैसाक“े कनेको अभाव नहि अछि । मुदा खेतपर खेत किया विका रहल अछि ? ओ अपन मन्दिरक जमीन बेचैत–बेचैत जमीनक दलाल भऽ गेल छथि । कतेको मन्दिर जमीनक कारण बरबाद भेल अछि । फेर ओहन बरबाद करयमे किछु महन्थमे हुनको हाथ अबैत अछि । पहिने हुनका स“ भेट होइत छल तऽ ओ मन्दिरके“ एना सुधार करव ओना सुधार करव कहैत छलाह मुदा बादमे बाबाजीसभपर टिप्पणी करय लगला । ओ पुलिसस“ केकर पकडाएबाक आ ककरो छोड़एबामे लागल रहल छथि । ओ न्यायालय के“ प्रभावित कऽ सकैत छथि । पत्रकारके“ अपन पक्षमे लिखावय मात्रे नहि मिडिया हाउस सेहो खोलि सकैत छथि । हुनकर निवासमे दिनभरि चटुकारसभक भीड लागल रहैत अछि । ओ सभ चाहैत अछि बैकुण्ठ जी आओर जमीन बेचौथि, आओर दलाली करौथि, चटुकारितो करव आ ऐशो हैत । जनकपुरक बहुतो मन्दिर एखन घर वा दोकानमे परिणत भऽ गेल । इहो भऽ जाएत । चटुकारसभके“ कोनो लेनादेना नहि अछि । सम्भवतः बैकुण्ठ जी विवाहो नहि कएने छथि । जे धियापुताके“ बहुतो रुपैया छोड़ि कऽ जाइ एकर लोभ हेतन्हि । फला“के पीट, फला“के मार बला बात छोड़ि इम्हर ध्यान मात्र देला स“ देखथुन कतेक प्रसन्नता होइत छन्हि । ६ जनकपुरिया आम कत्तऽ गेल ? जनकपुरमे उपलब्ध आमसभ जनकपुरक नहि रहैत अछि । एहि ठाम भारत सँ आएल आम प्रायः बिक्री होइत अछि । नेपालक कतहुँ–कतहुँ बिक्रियो भेल तऽ ओ उदयपुरक । जनकपुरक आम, बजार तक पहुँचिये नहि रहल अछि । एक समय छल जनकपुरक आम नेपालके सभ ठाम बिक्रिक लेल जाइत छल । कतेक व्यापारी तऽ भारत धरि सेहो सप्लाई करैत छल । २० वर्ष पूर्व एहि ठाम ततेक आम होइत छल जे व्यापारीसभ मालोमाल भऽजाइत छल । ओहि उमेरक सभ लोक देखने अछि । कहल जाइत छ्रैक मनुष्य की कुकुर नढिया सेहो आमक महिनामे मोटा जाइत छल । परिक्रमा सडक हुए वा जनकपुर–जलेश्वर, जनकपुर–ढल्केबर, सभ सडकके बगलमे आमक गाछ रहैत छल । तिरहुतिया गाछी, पहाडी गाछीमे ततेक आम फरैत छल जे लोक तोड़ि नहि सकैत छल । राम मन्दिरकेँ आगामे रहल राम पार्कमे सेहो आमक गाछ छल । जानकी मन्दिरक पाछुमे राम बाग छल ओतहुँ विभिन्न जातिक पूmलक अतिरिक्त आमक गाछ छल । जनकपुरक सभ मन्दिरके अलग–अलग आमक बगान छल । आम खाएकें लेल बहुतो लोक आमक महिनामे जनकपुर अबैत छल । मुदा आब नहि आमक बगान रहि गेल आ नहि आम । जनकपुर सँ बाहर जायबला बससभमे आम महिनामे आम भरल रहैत अछि मुदा ओ आम भारत सँ आएल रहैत अछि । काठमाण्डूमे जहिना बाहरके माछ राखि जनकपुरक माछ कहि ठकैती होइत अछि तहिना आमोमे । ७ जुडशीतलके जोगाड एहि सँ पहिने कहियो जुड़ शीतलमे थालमाटि नहि खेलने छलहुँ । पहिने थालक ठोप मात्र लगबैत छलहुँ । राम युवा कमिटी २ बर्षसँ थालमाटि खेलक कार्यक्रम रखैत आवि रहल अछि । ओना कही हमरे प्रयास सँ ई थालमाटि राखल गेल अछि । हम पहिने थालमाटिक रिपोर्टिङ्ग करबाक लेल धनुषाक गंगुली जाइत छलहुँ । कलाकार गुड्डु गंगुलीक नेतृत्वमे ओतय थालमाटिकेँ विशेष उत्सव होइत छल । एहि कार्यक्रमक सम्बन्धमे रामयुवा कमिटीक अध्यक्ष सोहन ठाकुरके आग्रह कएलिएन्हि जे राम युवा कमिटी सेहो एकर आयोजना किएक नहि करैत अछि ? एहि पर ओ सहमत भऽ गेलथि आ दू वर्षसँ ई पाबनि भऽ रहल अछि । कहियो ई पावनिकेँ पूरे मिथिलाञ्चलमे एक हप्ता पहिने सँ धुम रहैत छल मुदा सरकारी उदासिनता मात्र नहि एकरा समाप्त करबाक एकटा बडका प्रयास भेल । किछु वर्ष पूर्वधरि एहि दिन सँ नेपाालक एसएलसी परीक्षा शुरु होइत छल । जाहि सँ एहि पावनिकेँ बहुत हदधरि असर कएलक वा कही बसिया बड़ीभात खायमे सिमित कएलक । एकरा बचाबय परत । अहि पावनिमे रंग भरय परत । एक बेर फेर सँ मिथिलाकेँ शीतल शीतल करय परत । ८ पैसा दिअ भोट लिअ धनुषा निर्वाचन क्षेत्र नम्बर ५ क उपनिर्वाचनक प्रचार–प्रसार कोना चलि रहल अछि, ई बुझबाक लेल २०६५ चैत १६ गते सखुवा महेन्द्रनगर पहु“चल छलहु“ की, तीन–चारि गोटे हमरा लग आबि कहैत अछि, ‘भाइजी, कोन पार्टीक प्रचारमे आएल छियै ? हम सभ तऽ निर्णय कयने छी, जे बेसी पैसा देत ओकरे भोट देबै ।’ ‘पैसा ?’ ‘ह“ । अहि बेर हम सभ खोलि कऽ पैसा मँगैत छियैक ।’ ‘इन्ट्रेष्टिङ्ग !’ ओ सभ हमरा कोनो उम्मेदवार छी बुझिरहल छल । हम हुनका सभ स“ चाहलहु“ जे पैसा के की खेल भऽ रहल छैक से बुझबामे चलि आबए । तए“ बातके बढ़बैत हुनकँ सभ संगे रहल एक महिला स“ पुछलियन्हि, ‘की अहु“ के पैसा चाही ?’ ओ कनी क्रोधित होइत बजली, ‘किएक नहि, अहा“ सभ जखन हमर भोट लऽ कऽ ढौआढाकी कमा सकैत छी तऽ किए नहि हम सभ पैसा मा“गु ?’ ‘कतेक गोटे देलक अछि ?’ हमर जिज्ञासा पर ओ कहली, ‘प्रचार शुरु होबय सँ पहिने बहुत किछु सुनने छलहु“ जे फला“ महासेठ, फला“ यादव, फला“ डाक्टर ठाड़ भेल छैक । बहुते पैसा भेटत मुदा एकटा स्वतन्त्र उम्मेदवार पचास रुपैया देलक तकरबाद किओ नहि देलक अछि ।’ ओ महिला स“गे रहल एकटा वृद्धा सेहो हमरा दिस ललचायल मुद्रामे ताकि रहल छली । हमरा लागल जे हुनक मुखाकृति कहि रहल अछि जे हम हुनका बिड़ी पिय लेल सेहो जँ पैसा नहि देबैक तऽ ओ हमरा कपडा फारि देती । तथापि हम हुनका दिस तकैत पुछलहु“, ‘दाइ अहा“के किओ पैसा देलक अछि की नहि ?’ ‘एक दु गोटे कहलक अछि । मुदा की कहु“ अगो बेर ठैकि लेलक, अहुँ तऽ कम्तीमे एकरा सभके नहि ठकियौ ?’ एस.सी सुमन, चित्रकार, मिथिला चित्रकला सरकार कएलक सौतिनिञा व्यवहार मिथिला पेन्टिङ परम्परागत कला अछि, ई कला कोनो पाठशालामे नहि सिखाओल जाइत अछि । पीढीदर पीढी ई अपने आप सिखबाक काज होइत छैक । हमहु“ अपन दाइस“ सिखल“हु । कतउ सासुस“ पुतोहु सिखैत अछि त कखनो मायस“ बेटी । ताहि परिवेशमे हमहुं अपन दाइस“ मिथिला चित्रकला सिखल“हु । मिथिला पेन्टिङके अन्तर्राष्ट्रिय बजारमे बहुत माग अछि । ई त हट केक अछि । कलाकारके कलाकारितामे निर्भर करैत छैक ओकर मोल । जेना हमर पेन्टिङ १७ हजारस“ लऽकऽ ८० हजारधरिक अछि । जे सहजे बिका जाइत अछि । मिथिला पेन्टिङ व्यावसायिक रुप लेबा दिस उन्मुख अछि । कमर्सियल मार्केटमे देखी त सेरामिकमे, ब्यागमे कपडा आदिमे एकर प्रयोग भऽ रहल अछि । तें नीक बजार छैक एकर । ज“ अपन बात करी त जहन हम बजारमे अबैत छी त प्रदर्शनी लऽ कऽ हमरा कोनो दिक्कति नई होइत अछि । मिथिला चित्रकलाक विकासके जे आधारसभ अछि से किछु कमजोर भऽ रहल अछि जेना पहिने माटिक घर होइत छलै । भितके घरमे मिथिला चित्रकलाके नीक अभ्यास होइत छलै । माटिक घरक ठाममे आब क्रंक्रिटके जंगल अछि भऽ गेल । सामाजिक संस्कार आदिमे सेहो भितमे लिखबाक चलन छलै । मुदा आब बच्चा ज“ पेन्सिलस“ देबाल पर किछु लिखि दैत छैक त मायबाप डांटिदैत छैक । तें भितमे लिखबाक चलन प्रभावित भेल अछि । तैइयो तराईक मुसहर वस्ती, थारु आ झांगड जातिक वस्तीमे माटिक घरमे मिथिला चित्रकला देखल जा सकैत छैक । नेपाल सरकार एखनधरि किछु नई कऽ सकल अछि, मिथिला पेन्टिङके लेल । मिथिला पेन्टिङ जत्तऽ अछि अपने बुतापर, अपन स्थान अपने बनौने अछि । मिथिला चित्रकलामे लागल कलाकारसभ अपने मेहनतिस“ आगु बढल अछि । ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानके गठन करैत काल प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास“ सम्बद्ध एक्कहु गोटेके नहि राखल गेल । नामके लेल सभामे मिथिला पेन्टिङसं जुडल एकगोटेके जगह देल गेलै, बादमे विवाद भेलै आ ओहो पद छोडि देलनि । व्यक्तिगत रुपमे हमरा पुछी त राज्य मिथिला चित्रकलाक लेल ने किछु कएने अछि आ ने किछु कऽ सकैया । (सुमनकसंग जितेन्द्र झा द्वारा कएल गेल बातचीतपर आधारित) धीरेन्द्र प्रेमर्षि- साहित्यकार प्रगतिक पथपर मिथिला चित्रकला गुणँत्मक दृष्टिकोणसं सेहो मिथिला पेन्टिङमे बहुत काज भऽ रहल अछि । परम्परा आ आधुनिकता दुनूके जोडिकऽ एच.सी सुमन मिथिला पेन्टिङके आगू बढा रहल छथि । मदनकला देवी कर्ण, श्यामसुन्दर यादवसहितके व्यक्तिसभ परिमाणात्मक आ गुणात्मक दुनू तरहें मिथिला पेन्टिंगके आगू बढा रहल छथि । सुमनक पेन्टिङ आधुनिकताक आकाशमे सेहो भरपुर उडान भरने अछि मुदा धर्ती बिन छोडने, जे एकदम महत्वपूर्ण बात अछि । मिथिला पेन्टिंगके साधनाके रुपमे लऽ कऽ आगु बढनिहार सभ अपने आप आगु बढि रहल छथि । राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके लेल कोनो खास काज नहि भऽ सकल अछि । राष्ट्रिय स्तरमे चित्रकारसभके मूल्यांकन करैत काल मिथिला पेन्टिङस“ जुडल व्यक्तित्वके जे स्थान आ सम्मान देल जएबाक चाही, से नहि भऽ सकल अछि । जनस्तर आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरमे मिथिला पेन्टिङ नीक सम्मान पओने अछि । देशमे मिथिला पेन्टिङके स्थापित कएल जाए । खास कऽ महिला सभ एकरा जोगाकऽ रखने अछि । मैथिल महिलासभ किशोर अवस्थेसं अरिपन लिखब शुरु करैत अछि । तुसारी पावनि आदि सभ सेहो मिथिला पेन्टिङ सिखएबाक अवसर अछि । विविध पूजा–आजाक माध्यमे ओ सभ चित्रकलामे प्रवेश करैत छथि । राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके स्वीकार्यता बढाएब, व्यावसायीक सम्भावनाके खुला करब, एहिमे लगनिहारसभके सम्मानके वातावरण बनएबाक काज करबाक चाही । तहन ई राष्ट्रिय स्तरमे स्थापित भऽ सकत । एहिमे अन्तरनिहीत वैशिष्टय जे अछि ताहिस“ ई अपने अन्तर्राष्ट्रिय रुपमे स्थापित भ जाएत, व्यापक भऽ जाएत । (जितेन्द्र झा द्वारा कएल गेल बातचीतपर आधारित) शम्मी वत्स/ रूपेश हैदराबादमे विद्यापति पर्व समारोह आइ २५ दिसम्बर २०११ केँ भेल(हैदराबादसँ शम्मी वत्स/ रूपेशक रिपोर्ट) मिथिला सांस्कृतिक परिषदक तत्वावधानमे एपीएसआरटीसी कला भवन आरटीसी एक्स रोड मे आइ 25 -12 -2011, दिन रविकेँ साँझ 3 बजेसँ मैथिल "कवि कोकिल विद्यापति" क स्मृतिमे पर्व समारोह आयोजित भेल। समारोहक मुख्य अतिथि "स्वतंत्र वार्ता" हिंदी दैनिक समाचार पत्र , हैदराबादक संपादक डाक्टर राधेश्याम शुक्ल रहथि। ऐ अवसर पर मिथिलांचलक प्रसिद्ध कलाकारक दल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत केलनि। -हैदराबादमे सम्पन्न भेल विद्यापति पर्व २५ दिसम्बर २०११ केँ -हैदराबाद के एसआरटीसी कला भवनमे भेल कार्यक्रम -मुख्य अतिथि "स्वतंत्र वार्ता" हिंदी दैनिक समाचार पत्र , हैदराबादक संपादक डाक्टर राधेश्याम शुक्ल -विशिष्ट अतिथि आइ.पी.एस. अधिकारी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के आइ.जी. अशोक नाथ झा केलन्हि विद्यापति फोटोपर माल्यार्पण आ दीप प्रज्वलन -गायिका सविता नायक आ रोहित रक्षक केलन्हि गायन -सुश्री रूपल कर्ण क नृत्य -बालिका कुमारी अनिन्द्याक शास्त्रीय गीत सभकेँ मोहि लेलक प्रवीण नारायण चौधरी बिराटनगरमे विद्यापति पर्व समारोह सम्पन्न 9-10 दिसम्बर 2011 -उद्घाटन नेपालक उपराष्ट्रपति श्री परमानन्द झा द्वारा -सामा-चकेवा, झिझिया,, कमला स्नान, होली आ मिथिलाक जीवनक झाँकीक प्रस्तुति - एस.सी. सुमन आ मदन कला देवीक कला दीर्घा रहल आकर्षणक केन्द्र -कुंज बिहारी मिश्र, जितेन्द्र पाठक, पूजा, खुशबू, अर्चना, मिथिलेश ठाकुरक गीत संगीत लोककेँ झुमा देलक -सांस्कृतिक नृत्य राजदेवी कलाकेन्द्र, राजबिराज द्वारा -आर्निको बोर्डिंग स्कूल, बिराटनगर सेहो कार्यक्रममे लेलक भाग -मैथिली विकास अभियानक सेहो सहभागिता -प्रतिबिम्ब रंगमंच, जनकपुर प्रस्तुत केलक भ्रमरजीक “जट-जटिन” -बाल कलाकार अंजू यादव, अम्बिका, भावना देवांशी मन मोहि लेलन्हि -बैद्यनाथ मिश्र “बैजू”, धनाकर ठाकुर,सुखदेव पासवान, लक्ष्मी नारायण मेहता, जयराम यादव, खुशीलाल मण्डल, सियाराम झा सरस, राम भरोस कापड़ि भ्रमर, धीरेन्द्र प्रेमर्षि , देवेन्द्र झा, पूनम ठाकुर, मीना देव, पुष्पा ठाकुर, सचिन चन्द्र कर्ण, संजय कर्ण, करुणा झा, राखी झा, अलखजी, महेश रेग्मी, श्याम अधिकारी, भानुभक्त पोखरेल, महेश जाजू, नारायण कुमार, पवन कर्ण, महानन्द मिश्र, चन्द्रेश, किरण थापा, तारानाथ गौतम, भगवान झा, जितेन्द्र झा, लक्ष्मीरमण झा, काली कुमार लाल, एस.सी. सुमन, रमाकान्त झा, दयानन्द दिकपाल, वरुणमाला मिश्र, योगेन्द्र बराल, संजय दास, सुरेन्द्र नारायण मिश्र , फूल कुमार देव, अजित झा आदिक गौरवमय उपस्थिति -आयोजक “मैथिली सेवा समिति” (अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र नारायण मिश्र, उपाध्यक्ष श्री फूल कुमार देव, जेनेरल सेक्रेटरी श्री प्रवीण नारायण चौधरी, सचिव अजित झा) -प्रवीण नारायण चौधरी रहथि संयोजक -नेपालक प्रधानमंत्री श्री बाबूराम भट्टाराइक संदेश हुनकर प्रेस सचिव श्री रामरिझन यादव पढ़लन्हि रमेश रंजन रिपोर्ट- "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" -मण्डला थिएटर द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय युवा नाट्य महोत्सवमे मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर , "बुधियार छौड़ा आ राक्षस" रसियन कल्चर सेन्टर, कमल पोखरी , काठमाण्डूमे २५ नवम्बर २०११ साँझमे भेल। -रमेश रंजनक लेखन, अनिलचन्द्र झाक निर्देशन -नाटकक कलाकार परमेश झा, रवीन्द्र झा, प्रियंका झा, आ रीना रीमाल -"बुधियार छौरा आ राक्षस"क ट्राइल शो २५ नवम्बर २०११ केँ काठमाण्डूक स्कूली विद्यार्थी सभकेँ देखाओल गेलै। (प्रवीण नारायण चौधरीजीक रिपोर्ट) -"बुधियार छौड़ा आ राक्षस"क १३म प्रस्तुति -मिनाप द्वारा सड़क नाटक मंचन आइ २७ दिसम्बर २०११ केँ नेपालक बिराटनगरमे भेल -१४म प्रस्तुति झापा जिलाक भद्रपुरमे -३१ दिसम्बर २०११केँ एकर अन्तिम बेर प्रस्तुति जनकपुरमे हएत (फैमिली थियेटर प्रोजेक्टक अन्तर्गत) -विराटनगरमे नाटक क्षेत्रमे जुड़ैत अपन सजीव योगदान हेतु रामभजन कामत, डोमी कामत, राजकुमार राय एवं नवीन कर्णकेँ मिनाप तरफसँ सामरिक सहयोग हेतु मैथिली सेवा समिति महासचिव प्रवीण नारायण चौधरी आह्वान कयलन्हि - मैथिली सेवा समिति संस्थाक अध्यक्ष डा. एस. एन. झा, उपाध्यक्ष ई. फूल कुमार देव, संस्थापक अध्यक्ष डा. सुरेन्द्र ना. मिश्र ऐ आह्वानक समर्थनमे अपन प्रतिबद्धता व्यक्त केलन्हि। -सहभागी दर्शक लोकनि विराटनगरमे ऐ तरहक नाटक संस्था अवश्य हुअए तइ बातक स्वागत केलन्हि। मुन्ना जी विहनि कथा संसार अदौ कालसँ चलि आबि रहल अछि कहबाक परिपाटी। कहबाक लेल समाद होइ छै। मुदा ओ क्षणिक सूचना मात्रा होइछ। कहबाक बेगरताक मूलमे यदि कथ्य वा कथानक हुअए। कहबाक लेल समादक विस्तार हुअए ओ कोनो फलकपर विस्तार लऽ कहऽ बलाक पूर्ण विचारकंे संप्रेषित करए, सएह कथाक नाम पबैछ। कथा एक लोकसँ दोसरा लोक धरि एक पीढ़ीसँ दोसरा पीढ़ी धरि मौखिक रूपेँ हस्तान्तरित होइत रहल। से तहिया भेल जहिया लिखबाक जनतब वा सरंजामक अभाव छल। कथा लेखनक प्रारम्भमे कथ्यकेँ सोझाँ-सोझी राखि देल जाइत छल। ओकर मूल बातकेँ बढ़ा-चढ़ा प्रस्तुत कएल जाइत छल, मुदा हुबहु। जेना पहिने मौखिक हल तकरे प्रतिरूप। ई प्रतिरूप समायन्तरे क्रमिक स्तरपर परिवर्तित होइत रहल। कथाक लेल अंग्रेजीमे स्टोरी शब्द अछि। आगू एकरा गढ़बाक प्रक्रिया आ पछाति मढ़बाक प्रक्रिया शुरू भेल, जे शैलीक रूपेँ सोझाँ आएल। फेर विकासक क्रमे एकरा अगिला चरणमे एकटा औसत सीमामे बान्हल जाए लागल, ओहो कथा रहल मुदा अंग्रेजी शब्द परिवर्तन कऽ नाम फरिछाएल शॉर्ट स्टोरी। मैथिली सहित अन्यान्यो भाषामे शॉर्ट स्टोरीक शाब्दिक अर्थ लघुकथा कहि प्रारम्भ भेल छोट-छोट कथा रचना। आ ओइ लघुकथाक छोट आकारकेँ सेहो लघुकथाक नामे लिखल आ प्रकाशित कएल जाए लागल। आब लोककेँ व्यस्ततामे ई छोट-छोट कथा सोहाए लगलै। आ पाठकीय उत्साह रचनाकार मनोबल बढ़बैत आत्मविश्वासकेँ दूना केलक। परिणाम स्वरूप ध्ुरझार लिखाए लागल अतिलघुकथा। ‘लघुकथा’ अछि हिन्दी भाषासँ लेल गेल शॉर्ट स्टोरीक उधारी शब्दकोषीय अनुवाद। तकर कारण रहल-पहिल, एकटा नव विधा देखिते मैथिली रचनाकार सब देखाउँसे लिखऽ लगला छोट अकारक कथा। दोसर, जेना हिन्दी साहित्य लेखन अंग्रेजी साहित्यसँ प्रभावित हेबाक संकटसँ उबरि नै पबैए तहिना मैथिली साहित्य रचना, विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलसँ पहिने, बहुत लग धरि (पूर्णतः नै) हिन्दी साहित्य लेखनसँ आच्छादित छल। तेँ मैथिली रचनाकारकेँ कखनो एकर मैथिली शब्द जेना हिन्दीक ‘कहानी’ मैथिलीमे ‘कथा’ अछि, (हिन्दीयोमे ठाम ठीम स्टोरीकेँ ‘कथा’ शब्देँ प्रयुक्त देखल जाइए) से नै फुराएल हेतन्हि। तेँ ओ अपने अतिलघुकथाकेँ लिखैत रहलाह लघुकथा। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे ई नव विधा जहन मैथिलीमे हस्तान्तरित भेल तखन सनातनीये अतिलघु आकार-मात्राक कथा छल । एकर विकसित रूप तँ बीसम सदीक अन्तिम दशकमे देखाए लागल। जहन कि तकनीकी शिक्षा वा व्यावसायिक शिक्षासँ लगीच एवं वैश्विक परिवर्तनसँ प्रभावित नवका लोकक नव सोच विकसित भेल। अइ विधाक स्वतंत्र रूपक फरिछौट भेलाक पछाति बेगरता भेल ऐ विधा लेल अपन माटि-पानिसँ जुड़ल, अप्पन भाषिक शब्दक। वर्ष १९९५ मे ‘सहयात्री मंच’ लोहना, मध्ुबनीक साहित्यिक विमर्श प्रस्ताव रखलौं। जकरा हुलसैत सहृदये मैथिलीक कवि, कथाकार श्री राज द्वारा समर्थन कएल गेल। उपस्थित सम जन समवेते स्वीकार कएलनि। उपस्थित जन छलाह- श्री शैलेन्द्र आनन्द, भवनाथ भवन, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू एवं अन्यान्य। विहनि कथा (सीड स्टोरी), बीज कथा; स्वयंमे कथाक पूर्ण रूप अछि विहनि कथा। ई ने छोट अकारक कथा छी, आ ने कोनो कथाक छेँट। सामान्येतया कथा कतेको बिन्दुकेँ छुबैत बिरड़ो जकाँ उधियाइत पाठककेँ अपन उद्वेश्य कहबामे सक्षम भऽ पबैए। मुदा विहनि कथा माने बीज कथा स्वयंमे संपूर्ण कथा अछि। जे पाठककेँ एक मात्र अपने खुटापर खुटेसल सन राखि अपन उद्देश्यक पूर्णताकेँ एक क्रममे बिकछा लेखकीय मनस्थितिकेँ फरिछा दैए। आ पाठक ओइ सोचकेँ हुबहु मगजमे समा स्थिर भऽ जाइए। विहनि कथा एकटा बीया सन छोट की पैघ संपूर्ण गाछ हेबाक सामर्थ्य रखैए। तहिना विहनि कथा आकारेँ लघु होइतो कथाक सभ पक्ष, कथ्य, शिल्पकेँ एक खास बिन्दुपर समेटि कथाक संपूर्णता प्रदर्शित करबामे सक्षम अछि। जेना बीया पारबाक पछाति अँकुराइए, फेर दुपतिया सन देखाइत एकटा गाछक रूपमे अपन संपूर्णता पबैए तहिना विहनि कथा भूमिका, कथ्यक स्पष्टीकरणक संग सोद्देश्ये गढ़ल आ मढ़ल जाइए आ लेखकक समस्त विचारकेँ छोट आकारमे सोद्देश्यपूर्ण बना उजागर करबामे सक्षम होइए। जेना कोनो बीया अंकुरा कऽ गाछक सभ पक्ष यथा डारि, पात आदिसँ युक्त होइछ एकटा ठुट्ठ गाछ मात्र नै। तहिना विहनि कथा समस्त गुणेँ भरल-पूरल कथा छी। एहेन कथा नै जे दृष्टांत मात्र भऽ ठमकि जाए। एहेन कथा नै जकर कोनो ओर-छोड़ नै हुअए। विहनि कथा एहनो कथा नै अछि जकरा पूरा पढ़लाक पछाति लेखकक लेखन उद्देश्य बुझबाक लेल कात-करोट मुरियारी देबऽ पड़ए। एकर उद्देश्य सोझाँ सोझी फरिछाएल होइछ। विहनि कथा लघु अकारे शुरू भेल। आइ ई लघुकायमे ओइ लघुकथाक एकटा विकसित रूप अछि जे संभवतः मैथिलीमे बीसम सदीक अन्तिम दशकमे अपन स्वतंत्र रूपक वा विधाक फरिछौट करबामे सक्षम भऽ सकल। विहनि कथाक संपूर्णताकेँ ऐ तरहँे कहल जा सकैछ- विहनि कथा कथाक संपूर्ण गुणक संग ओइसँ ऊपर उठि, अपन लघुकायमे समेटल एक निश्चित बिन्दुपर ठाढ़ भेल लेखकक उद्देश्यक पूर्ति करबाक संग पाठकक मगजक भरपूर खोराक अछि। विहनि कथा २१म सदीमे रचनाकार, सम्पादक संग-संग पाठकक बीच सेहो फरिछाएल अछि। तकरे कारण अछि जे आब विहनि कथा छोट गातमे अपन सभ संपूर्णता नेने कागजपर उतरि सोझाँ अबैए। आबक समयमे दृष्टि विहीन नै, दृष्टि सम्पन्न रचनाकार सभ अइ विधाक विकासमे लागल छथि। तेँ ई आब नहिये चुटुक्का कहाइए आ नहिये कथाक छेँट वा दृष्टांत। हम पुनः ई स्पष्ट करैत कहब जे- विहनि कथा ठोस कथ्य, माँजल शिल्पमे कोनो विषयपर वर्णित ओ वौस्तु थिक जे पाठकक मन-मस्तिष्कपर चोट कऽ ओकरा सम्वेदित कऽ चिरकालिक छाप छोड़ि सकबामे सामर्थ्यवान होइए। विहनि कथा, मात्र गुदगुदी करैबला वा चुट्टी काटि बिसबिसी दैबला वौस्तु नै रहि गेल आब। ई रचनाकार आ पाठकक मोनमे समा स्थिर भऽ जाइ बला कथा थिक। आजुक व्यस्त जीवन मध्य लोककेँ कखनो ओतेक पलखति नै भऽ पबै छै जे ओ आब घंटा-घंटा भरि बैसकी लगा एके रचना पढ़ि मोनकेँ सांत्वना देत। क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति, बदलैत छेब-छटा आ तइ हेतु अधिकसँ अधिक अर्थक जोगार मध्य कटि जाइछ लोकक जिनगी। आजुक लोककेँ मीडियासँ क्षण-क्षण नव आ रोमांचित करएबला खोराक भेटि जाइत अछि तेँ साहित्यक प्रति बहुत रूचि नै बाँचब स्वाभाविक अछि। ओना आइयो उपन्यासकेँ खूब पढ़ल जाइछ। मुदा ओकरा आम पाठक मात्रक खोराक नै कहि सकै छी। तेँ रचनाकारकेँ सेहो आब सम्हरि कऽ सशक्त आ अल्प पलखतिक बीच सामंजस्य बैसाबऽ बला रचना करब आवश्यक अछि। रचनाकार, विशेष कऽ विहनि कथाकारक ई पहिल दायित्व बनैए जे ओ समयक संग चलि पाठकक समय संग भेल व्यस्तताकेँ देखि ओज आ सरल भाषिक रचनासँ विहनि कथा संसारमे योगदान सामर्थ्य हासिल करथु। पाठकक आजुक क्षण-क्षण बदलैत परिस्थिति मध्य विहनि कथाकारो जिबैत छथि। तँ ओ यदि आजुक बेहाल अर्थ तंत्र, मशीनी युगक मध्य लोकक मशीन सन हएब परिस्थितिकेँ गसिया कऽ पकड़थु। आ अही परिस्थितिकेँ पाठकक सोझाँ परसि कऽ पाठककेँ मजगूती देबामे अपनाकेँ सक्षम करबाक शक्ति अर्जित कऽ रचनारत रहथु। तहन विहनि कथा, विहनि कथाकार आ पाठकक मध्य सामंजस्य बैसि पाओत। पाठकक प्रत्येक क्षणक व्यस्तता, किछु नव करबाक सनक, अर्थोपार्जनक पाछाँ भगैत रहलासँ उपजल तनावसँ मुक्तिक साधन सेहो अछि विहनि कथा। पाठक जखन सभसँ विलग अल्पावधिक लेल खाली भेटल समयक उपयोग करऽ चाहैए तँ ओकर संग देबामे सक्षम अछि विहनि कथा। ऐ सभ बेगरता पूर्ति करबामे सक्षम विहनि कथा अपन फराक जगह छेकबामे सक्षम भेल अछि। आब विहनि कथाकार जखन समय संग चलि पाठकक मनोस्थितिक अनुकूल रचना देबामे सामर्थ्यवान छथि। ओ अपन पहिल दायित्व पाठकक मोनकेँ भाँपि तदनुकूल रचनासँ पाठककेँ बन्हवामे सक्षम भेल छथि। तहन बेगरता उठै छै एकर मूल्यांकनक। वर्तमानमे एहेन कोनो दृष्टि फरिच्छ समीक्षक वा समालोचक देखार भऽ ऐ विद्यापर काज करबामे सक्षम नै भऽ पौलाह अछि। तकर ठोस कारण अछि बदलैत समय आ परिस्थिति मध्य ओहने सोचक सामंजस्य। जे स्थापित समीक्षक छथि से दू तीन दशक पछातिक नजरिये रचनाकेँ देखबाक प्रयास करताह। हुनका ऐ मे भऽ सकैए किछु नै देखाइन। कारण जे ओ सभ कथाक जइ मूलकेँ देखैत भोगैत एलाह अछि विहनि कथा ओइसँ ऊपरक सोच आ फराक शैलीमे अछि। एकर सत्य आ पूर्ण गात तहिया फरिछाएल जहिया मठाधीश समीक्षक सबहक सोच ओइ कथा, ओकर प्राचीन चरित्र मध्य सन्हिया बैसि गेल। समाजक एकटा समस्या मँहगाइ उदाहरण स्वरूप सनातनी आ चिरायु अछि। ई कहियो खत्म होइबला चीज नै अछि। मुदा तैयो एकर चरित्र आ चेहरा सीढ़ी दर सीढ़ी बदलैत रहैए। आ ओइ संग ओइ मँहगाइक प्रतिफल सेहो ओहिना बदलैत नजरि अबैए। यथा यात्रीजीक कवितामे वर्णित मँहगाइ साहित्यमे चर्चित अछि। आइ ओहेन कोनो नव ठोस रचना मँहगाइपर नै अछि। तहिया लोक भूखे मरैत छल, पेट काटि कऽ जिबैत छल। गदैली ओढ़ि सर्दी कटै छल। आजुक मँहगाइ मध्य कियो भूखे नै मरैए। आ सामान्यो वर्गक लोक कम्मल ओढ़ि आ हीटर जरा सर्दी बितबैए। की ई फर्क सनातनी समीक्षक फरिछेबामे सफल भऽ सकताह? किन्नहुँॅ नै। किएक तँ अइ बदलल स्थितिपर ध्यान देबाक पलखति कहाँ छनि। ओ तँ प्रतिक्षा करै छथि रचनाकारकेँ जुएबाक, रचना चाहे खिज्जा रहि जाउन। कथासँ जुड़ल लोक विहनि कथा मादे विचार कऽ सकैत छलाह। मुदा हुनकर सभक दृष्टि ‘विहनि कथा’क प्रति फरिच्छ नै छनि, उदाहरणतः रंगकर्मी कुणाल, जे नाटकक संभ्रान्त, परिपक्व ज्ञाता छथि ओहो कथापर लिखबा काल विहनि कथाकेँ अस्तित्वहीन कहि बेरा दै छथि। मायानन्द मिश्र मैथिली कथा धाराक मजगूत खाम्ह छथि, ओ लघुकथा (विहनि कथा)केँ चुटुक्काक संज्ञा देलनि। माया बाबूक सोच समीचीन अछि किएक तँ ओ जइ दशकक सोचक लोक छथि तइमे लघुकथा (विहनि कथा) विद्या फरीछ नै छल। तेँ हुनको ऐ प्रति दृष्टि फरीछ नै हएब स्वाभाविक। ओ कथा विकासक आलेखमे लघुकथा (विहनि कथा)क चर्चे केलन्हि सएह बहुत अछि। [मैथिली कथाक विकास नामक आलेख, साहित्य अकादमी दिल्ली सँ प्रकाशित पोथी -‘मैथिली कथाक विकास’- सं. वासुकी नाथ झा, २००३]. विहनि कथा वा कथाकारक मूल्यांकन हेतु विहनि कथाकार स्वयं ऐ दिशामे कान्ह उठाबथि तँ सही मूल्यांकन संभव भऽ पाओत। मैथिली समीक्षाक एकटा कमजोर तत्व ईहो रहल जे ओ रचनात्मक दृष्टियेँ सड़क छाप होइत छथि। फरिछेबाक ई जे ओ अपन गुणगान मात्रा सुनऽ चाहै छथि। आलोचनामे कमी नै वाह वाही हेबाक चाही। जँ समीक्षक द्वारा हुनकर रचनात्मक दोष वा कमीकेँ उघारि सभक सोझाँ कऽ देल गेल तँ समीक्षक भऽ गेला हुनक कट्टर दुश्मन। आ तकर पछाति हुनका, रचनाकारक मुँहे, अज्ञानी, उदण्ड, स्वार्थी आदि संज्ञासँ जानए लागब। ईहो सोलह आना सत्य अछि जे मैथिली समीक्षामे किछु गोटे कृतित्वसँ पहिने व्यक्तित्वकेँ प्राथमिकता दऽ समीक्षा लिखि रइल छथि। तँ जा धरि रचनाकारमे आलोचनात्मक विचार वा कमी सहबाक सामर्थ्य नै हएत, स्वथ्य आलोचना कतऽ सँ टंाग पसारि सकत वा अपन बैसकीपर बैसि अराम कऽ सकत? ओहने किछु रचनाकार सभ द्वारा समीक्षाकेँ ओलि सधेबाक सूत्रक रूप सेहो ठाम-ठीम प्रयुक्त होइत देखाइत रहल अछि। आजुक विहनि कथा पहिने हिन्दी भाषासँ उधारी लेल शब्द ‘लघुकथा’ नामे लिखाइत रइल। अखन धरिक मौखिक जनतब अनुसारे लघुकथा शब्द प्रयोगे छपल पहिल कथा १९६८ मे मिथिला मिहिर मे काली कुमार दास लिखित ‘बुड़िबक वर’ छल। अइसँ पहिने छेँट कथा, कटपीस कथा, मिनी कथा, फिलर कथा........आदि नामे ई छपैत रहल छल। एकर पछाति जे रचनाकार विहनि कथामे सक्रिय भेला ओ नाम अछि- डॉ हंसराज, ए. सी. दीपक, तकर पछाति लिली रे, राजमोहन झा, एम. मणिकान्त, अमरनाथ, रामलोचन ठाकुर आदि। अइ नाममे सँ बेशी गोटे विहनि कथा लिखबाक प्रयोगधर्मिता मात्रक निर्वहन केलनि। हँ एम. मणिकान्त मिथिला मिहिरक माध्यमे कतेको वर्ष धरि विहनि कथा लेखनक नियमितता बनौने रहला। मुदा दुखद वा हास्यास्पद बात ई जे वर्त्तमानमे हुनक एको टा रचना उपलब्ध नै अछि। डा. हंसराज जी क मैथिलीक पहिल विहनि कथा संग्रह ‘जे की ने से’ (प्रकाशित १९७२ ई.) मैथिली विहनि कथा पेटारक पहिल सनेस कइल जा सकैए। ऐमे हास्य व्यंग्यसँ भरल लघुकायक कुल ३५ गोट विहनि कथा संग्रहित अछि। पन्नापर अंकित वर्षक अधारे एकर सभ रचना १९६३ सँ १९७२ मध्य लिखल रचना अछि। एकर कथा सभ तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक कुव्यवस्थापर चोट करैत लिखल गेल अछि। किछु रचना आइयो प्रासंगिक अछि। हंसराज निश्चित रूपसँ विहनि कथा आन्दोलनक बीया बाउग केलनि आ तेँ आइ विहनि कथाक गाछ झमटगर होइत देखाइए। किछुए वर्ष पछाति हिनकर अगिला पीढ़ीक श्री अमरनाथ अपन ‘क्षणिका’ विहनि कथा संग्रह प्रस्तुत केलन्हि (वर्ष १९७५ ई. पुर्नप्रकाशन २०११ ई.) आ एकरा एक सीढ़ी आओर ऊपर लऽ जेबाक ठोस प्रयास केलनि। ऐ संग्रहक कथा सभ खलील जिब्रानक कथाक लगीच बुझाइए आ सभ बिन्दुकेँ छुबैत रचना कएल गेल बुझाइए। एकर अधिकांश रचना आइयोक समयसँ मेल खाइत बुझाइए। मुदा लेखकसँ दूरभाषिक वार्तालापक अनुसार राजहंस जकाँ हिनको कोनो रचना तत्कालीन पत्रिकामे प्रकाशित नै भऽ सोझे संग्रहित अछि। वर्ष १९७५ विहनि कथाक स्वर्णिम शुरूआत वर्षक रूपमे देखार भेल बुझाइए जखन ‘मिथिला मिहिर’ (पाक्षिक) अपन विहनि कथा विशेषांक (लघु कथा विशेषांक नामसँ) निकालि मोकाम तँ नै मुदा बाट अवश्ये देखार केलक। ई साहसिक काज भेल कविक द्वारा ऐ नव विधाक लेल। मिथिला मिहिरक अइ विशेषांकक समय सम्पादक छलाह आदरणीय भीमनाथ झा। ओना तँ ‘अन्हरीक गाए बियेलै तँ सभ डाबा लऽ कऽ दौड़ल’ बला कहावत चरितार्थ होइत देखाएल। फेर २३ बर्ख बीति गेल। खएर! बाँझ गाए गाभिन तँ भेबे कएल.....। कथानकक नब्जक सुन्नर पकड़ि रखनिहार श्री विभूति आनन्द जी जेबी पत्रिका ‘कुश’ क नवम अंक वर्ष-१९७८ मे पत्रिकाक गातक अनुसार छओ गोट विहनि कथाक समावेश कऽ निकाललनि विहनि कथा विशेषांक (लघुकथांक विशेषांक नामसँ)। अही वर्ष १९७८ जुलाइमे साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा कथापर आयोजित सेमिनारमे परिचित कथाकार श्री रामदेव झा, कथापर प्रसंगे विहनि (लघु) कथाकेँ शामिल कऽ एक अनुच्छेद लिखि एकर विशिष्टता जतौने छलाह। जइमे विहनि (लघु) कथाक वैश्विक पटलपर खलील जिब्रानक चर्चा आ तुलना एवं मैथिली विहनि (लघु) कथाकार मे सँ अमरनाथ जीक योगदानक चर्चा कएने छलाह। आठम दशक विहनि कथाक संगोरसँ वंचित रहल। मुदा ई विहनि कथा लिखनिहारक एक टा पैघ हेँज तैयार केलक, जइमे प्रमुख नाम अछि- विभूति आनन्द, शैलेन्द्र आनन्द, श्रीराज, प्रेमकान्त झा, वैकुण्ठ झा, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, ताराचन्द्र वियोगी, चण्डेश्वर खाँ आदि। ई समूह रचनाक दृष्टिये नव अँाखि पाँखिबला छल। साम्यवादी विचारसँ प्रभावित मुदा आपत कालक दुर्दशासँ प्रेरित आ पीड़ित। विहनि कथाक पहिल संग्रह १९७२ मे बहराएल दोसर १९७५ ई. मे आ तकर पछाति अकाल! किएक? २२ वर्षक एहेन खालीपन विहनि कथाक इतिहासकेँ ठमकि जेबाक लेल बाध्य केलक। एकर बाधक छलाह तत्कालीन संपादक, सरकारी आ निजी समिति-संस्था आ प्रकाशक। मुदा तहूँसँ बेशी जिम्मेवार ऐ पीढ़ीक रचनाकार छला जे अपनाकेँ दुनू विधापर कलम चला भरमा लेलनि वा गद्यक ऐ प्रकारक उस्सर खेत देखि डरि कऽ अपनाकेँ कतिया लेलनि। अइ पीढ़ीक कतिपय रचनाकार ऐ विहनि कथा विधाक राशि नवका रचनाकार सभकेँ पकड़ा निश्चिन्त भऽ सुस्ताए लगलाह। कारण छल जे एकर फरिछाएल रूप मध्य अपन अस्तित्व वा कोनो लाभक जोगार वा प्रतिष्ठिा नै नजरि एलनि। अही बीच आएल तन्त्रनाथ झा समग्र, ओइमे सेहो किछु विहनि कथा संकलित अछि। मैथिली साहित्यक जिरात मध्य विहनिकथाक प्रसंस्कृत बीया नव रूपे बाउग केलनि अइ पीढ़ीक नवतुरिया। जइमे नाम छल ज्योति सुनीत चौधरी, दुर्गानन्द मंडल, कपिलेश्वर राउत, धीरेन्द्र कुमार, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, भारत भूषण झा, मानेश्वर मनुज, उमेश मण्डल, जगदीश प्रसाद मण्डल (बाल विहनि कथा संग किछु सुन्दर विहनि कथा जेना थल-कमल/ घरडीह/ खाता-खेसरा/ सबूत/ कौआक मैनजन), रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू', परमेश्वर कापड़ि, रघुनाथ मुखिया, ऋषि वशिष्ठ, शिव कुमार झा “टिल्लू”, मिथिलेश कुमार झा, सत्येन्द्र कुमार झा, नवनीत कुमार झा, कौशल कुमार, अनमोल झा, कुमार मनोज कश्यप, विनीत उत्पल, धनाकर ठाकुर, आशीष अनचिन्हार, सतीश चन्द्र झा, गजेन्द्र ठाकुर, भवनाथ भवन, राम विलास साहु, मुन्नी कामत, शंभु कुमार सिंह, संजय कुमार मंडल, मिथिलेश मंडल, लक्ष्मी दास, अमित मिश्र, जगदानन्द झा 'मनु', चन्दन झा, ओमप्रकाश झा, सन्दीप कुमार साफी, जवाहर लाल कश्यप, मिहिर झा, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, प्रेमचन्द्र पंकज, अखिलेश मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, मध्ुकर भारद्वाज, श्रीधरम, देवेन्द्र झा, सच्चिदानन्द सच्चु, मिथिलेश कुमार झा, कुमार राहुल, दिलीप कुमार झा “लूटन”, मुन्नाजी आदिक। ऐ पीढ़िक समूह द्वारा विहनिकथा पर ध्ुरझार काज भेल। अइ ठामसँ असली फरिछौट भेल विहनि कथाक। आ हिन्दीक उधारी शब्द लघुकथा सँ विलग खाँटी शब्द- विहनिकथा स्थापित भेल। बीसम सदीक अन्तिम दशकक पहिल काज भेल स्व. ए. सी. दीपक जी द्वारा ‘विविध विहनि (लघु) कथा विशेषांक (मार्च-१९९४ मे)। तकरा पछाति नवका पीढ़ी सेहो कान्हपर वीरा उठेलक आ शुरू भेल वैश्विक बदलल सामाजिक परिदृश्य, तकनीकीय भेल नव-नव क्रान्तिक संग जनमल नव अवधरणाक संग विहनि कथा लेल नव-नव काज। १९७५ ई.मे आएल ‘क्षणिका’ क दू दशक बाद १९९५ ई. केँ विहनि कथाक स्मृतिवर्ष कहि सकैत छी। २० फरवरी १९९५ केँ मुन्नाजी एवं मलयनाथक संयोजनमे हटाढ़ रूपौली, मध्ुबनीमे आयोजित भेल विहनि कथा गोष्ठी, जकर अध्यक्षता केलनि पं यन्त्रनाथ मिश्र आ एकर मंच संचालन कुमार राहुल द्वारा भेल। ऐ अवसरपर उपस्थित विहनि कथा पाठ केनिहार छलाह- भवनाथ भवन, मलययाथ मण्डन, प्रेमचन्द्र पंकज, मुन्नाजी, शैलेन्द्र आनन्द, प्रभु कुमार मंडल, मतिनाथ मिश्र, उमाशंकर पाठक, श्यामाचन्द्र ठाकुर, कुमार राहुल, मीरा कर्ण, ललन प्रसाद, सुनील कर्ण, सच्चिदानन्द सच्चु एवं करणजी। पढ़ल गेल रचना सभपर समीक्षीय टिप्पणीकार छलाह- शैलेन्द्र आनन्द, मुन्नाजी, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथाक ई पहिल गोष्ठी छल। ५ मार्च १९९५ केँ सहयात्री मंच लोहना, मध्ुबनी द्वारा मुन्नाजीक विहनि कथा ‘नामरद’ क एकल पाठ आ अइ पर ‘बहस’ क आयोजन कएल गेल। अइमे प्रमुख विचारक छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, विजयानन्द हीरा, भवनाथ भवन एवं प्रेमचन्द्र पंकज। हमरा जनतबे विहनि कथा आ कथाकारपर एहेन ‘बहस’ केर ई पहिल आयोजन छल। जुलाइ १९९५ मे कानपुर सँ बहराइत नवतुरिया त्रैमासिक पत्रिकाक विहनि कथा विशेषांक आएल, संपादक छलाह- प्रेमकान्त झा एवं वैकुण्ठ झा। अइमे १९ गोटेक कुल १९ गोट विहनि कथाक समायोजन छल, आ अइ विहनि कथा विधाक फरिछौट कऽ एकरा नव दिशा देखेबाक प्रयास करैत मुन्नाजीक आलेख अछि, जे कि कोनो विहनि कथा विशेषांकमे ऐ तरहक पहिल आलेख थिक। अही दशकमे प्रारम्भ भेल कथा गोष्ठी सेहो विहनि कथाक बाट बनेबा वा फरिछेबामे उत्प्रेरकक काज करैत रहल। कथा गोष्ठीक जुलाइ १९९७ क महिषीक आयोजनमे एके संग दु गोट पोथीक लोकार्पण भेल, ‘खंड-खंड जिनगी’ (प्रदीप बिहारी) आ ‘शिलालेख’ (तारानन्द वियोगी, जइमे कुल ३५ गोट रचना संकलित भेल अछि)। २१म सदीमे समय आ परिस्थितिकेँ अकानैत सभ रचनाकार खुलि कऽ विहनिकथा दिस जुमल छथि। पत्रिकाक संपादक सभ किछु कोना अइ लेल समर्पित करऽ लगलाह। अइ नव सदीक नव सोचक पहिल विहनि कथा संग्रह आयल- ‘बुझनूक’ (२००२ ई.), एकर रचनाकार श्री वैकुण्ठ झा जी अपन ३६ गोट रचना लऽ ऐ विधाकेँ बाट देखेबाक ठोस प्रयास केलन्हि। एकर बाद तँ संग्रहक झड़ी लागि गेल बुझू। अगिला संगोर हिन्दी मैथिलीक संयुक्त रचनाकार विहनिक कथाक दिशावाहक श्री देवेशंकर नवीन जी अपना कथा संग्रह-‘हाथी चलय बजार’ (२००४ ई. मे ३१ गोट विहनि कथाक संगोर) संग उपस्थिति दर्ज करौलनि। तँ २००५ ई. मे पुरान सोचक ठोस कथाकार श्री मनमोहन झा जी अपन विहनि कथाक संगोर, मिथिलाक निशापुर मे’ आनि एकरा एक डेग आओर आगाँ बढ़ेबाक प्रयास कएलनि। एकर आमुखमे श्री विजय मिश्र जी एकरा गद्य काव्यक संज्ञा देलनि अछि। वास्तवित रूपेँ तँ गद्य काव्य, काव्यक गद्यात्मक शैली थिक। ईहो सत्य अछि जे विहनि कथा गद्य रहि कविताक पूर्णतः लगीच मानल जाइए। मुदा अइमे संकलित २४ गोट रचना विहनि कथे थिक, आन किछु नै। वर्ष २००७ मे “अहींकेँ कहै छी” (सत्येन्द्र कुमार झाक ५१ गोट विहनि कथाक संग्रह) आएल। ई संग्रह विहनि कथाक प्रति पूर्ण सोझराएल आ दृष्टि फरीछ रचना सबहक संगोर थिक। युवा पीढ़ीक बहुविध, प्रतिभा संपन्न लेखक ओ संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन रचना समग्र- कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- मे लघुकथाक संग १६ गोट ठोस आ कथ्य ओ शिल्पगते फरिछाएल विहनि कथा आनि विहनिकथा संसारमे श्रीवृद्धि केलनि अछि। अखन धरि एक लिखे चलैत विहनि कथाक लिख सँ हँटि २०१० ई. मे श्री जगदीश मण्डल जी सभसँ इतर बाल मनोवैज्ञानिक विहनि कथा संग्रह ‘तरेगन’ क संग आन रचनाकार केँ सम्मोहित केलनि। २१ म सदीक पहिल दशकक अन्तिम चरणमे मैथिली ई पाक्षिक ‘विदेह’ अइ विहनि कथाक नव इतिहास लिखबा वा बनेबामे अग्रणी मानल जाएत। अपन ६७म अंक विहनि कथा समायोजनमे देशी आ विदेशी ठोस रचनाक संगोर, एवं अइ विहनि कथाक शास्त्रीय विवेचन कऽ अएना स्वरूप झलका एकर बाटकेँ मोकामक लगीच अनबामे ई पूर्णतः सफल भेल अछि। अइ अंकमे कुल ३२ रचनाकारक ७९ गोट रचना अइ विधाकेँ पूर्णतः फरिछा, सभक सोझाँ अनबामे सौ प्रतिशत सक्षम भऽ देखार भेल अछि। संपादकक अलाबे एकर सफलताक श्रेय छन्हि अइ अंकक अतिथि संपादक-मुन्नाजीकेँ। मुन्नाजी जी बड गम्भीरता पूर्वक सभक समायोजन एवं अपन आलेखेँ दोसरो रचननात्मक प्रकृतिकेँ फरिछेबाक सफल प्रयास केलनि अछि। लगभग दू दशकसँ अइ विधामे रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करबैत रहलाह, आ परिणाम “समय साक्षी थिक” २०११ मे आएल, ई संग्रह श्री अनमोल झा जीक कुल १५० रचनाक अपन जिनगीक भोगल यर्थाथक अएना थिक। २०१२ मे “टेक्नलजी” (अनमोल झा) एवं “टीस” (मिथिलेश झा) संग्रह सेहो विहनि कथाक बखारी भरबामे समर्थ बुझना जाइछ। अनमोल जीक १४९ रचनाक संग्रह सनातनी यथार्थ परसैए। ततै मिथिलेश झा जीक ‘टीस’ क ४५ गोट रचना पाठकक मानसिकताकेँ झंकृत करैए। जे कि विहनि कथाक थाती वा धराउ सदृश अनुभव करैए। १० दिसम्बर २०११केँ ‘सगर राति दीप जरय’क ७५म कथा गोष्ठीुक आयोजन पटनामे कएल गेल, ऐ अवसरपर मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी कएल गेल छल। ऐ तरहंे विहनि कथा संसारक परिदृश्य पूर्णतः भरल पूरल भऽ गेल अछि। आइ सभ दिन कियो ने कियो स्वाभाविक रूपेँ जुड़ि अपन योगदान दैत एकरा मोकामक ड्योढ़िपर आनि पट खुलबाक प्रतिज्ञामे ठाढ़ देखाइत छथि। मोकाम भेटि गेलै तँ घर पैसैमे समय नै लगतै। अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी। उपरोक्त पाँती युवा कवि मनोज कश्यप जीक गजलक अंश थिक। जे “मैथिली-भोजपुरी कविता उत्सव 2011”क अवसरपर 24 जनवरी 2011केँ दिल्लीक आइ.टी.ओ. स्थित आजाद भवनमे पढ़ल गेल छल। ऐ अवसरपर मैथिली-बोजपुरीक आठ-आठ (कुल सोलह) गोट कवि अपन रचना पाठ कयलनि। कविगोष्ठीक शुरोआत मैथिलीक युवा कवि श्री कुमार शैलेन्द्र जीक कविता पाठसँ भेल। श्री कुमार द्वारा पठित दु गोट कवितमे ‘चिट्ठी आ गाम’ बेशी प्रभावित केलक- इ मे कवि गामक विस्मृतिकेँ सेलफोनमे समाहित होइत आ थोड़वेमे गप्प के सिमटि जेवाक बाद गामक पिछला जीवन स्मरण मात्रे जीवाक सुन्दर व्याख्या केलनि- एक बानगी देखल जाओ- “आव गामेसँ चिट्ठी नहि अवैछ, सेलफोनेपर भऽ जाइछ गप्प। पहिने चिट्ठीमे गामक वर्णन होइत छलै आव सेलफोनपर होइत छैक कुशलक्षेम मात्र”। तकर पछाति गोटा गोटी सात गोट कवि अपन पद्य विधाक अनेको प्रकारक रचनाक पाठ केलनि। जाहिमे रविन्द्र लालदास पहिले सब बेर जकाँ अहू बेर ‘क्षणिका’, जकरा ओ तुरंत नामे लिखै-पढ़ै छथिकेँ सुनौलनि सबटा तुरंता मार्मिक आ प्रासंगिक छल मुदा श्रोताक सिरखारी देखि श्रोता गणक मानसिक परिपक्वता बेलरता छल। सब गप्पकेँ अर्थकेँ श्रोता देरीसँ बुझलक आ बुझबे नहि केलक। तकर पछाति ‘कुमार मनोज कश्यप’ अपन ‘गजल’ पढ़लनि जाहि माध्यमे ओ जिनगीक नव विहानकेँ तकवाक आ अपने आंगनमे पड़ौआ सन बनि जेवाक सटीक चित्रण केलनि- देखल जाओ इ पाँतीकेँ “धज्जी रातुक स्याह आँचरमे , अहलभोरकेँ ताकि रहल छी, अप्पन आंगनमे ठाढ़ आइ हम अपने घरकेँ ताकि रहल छी,, बेरा-बेरी प्रतिष्ठित, प्रौढ़ कवि सब अपन अपन रचना पाठ केलनि जाहिमे प्रमुख छलाह सुकांत सोम (पटना) राम लोचन ठाकुर (कोलकाता) प्रो. शेफालिका वर्मा दिल्ली। कार्यक्रम मनलग्गु कम आ त्रुटिगत वेशी देखाएल। पहिल बात जे इ अकादमीक स्थापने कालसँ चलि आबि रहल अछि जे पूर्ण स्थापित, समर्थ, सजग मैथिलीके शैशव, हाशियापर आ फुहड़पनक द्योतक भोजपुरी अपन अकादमीय आ मंपीय सामर्थे एकरा (मैथिली) गरोसि लैह। कखनो-कखनो तऽ दृऍष्टिगोचर होइछ जेना भोजपुरी मैथिलीकेँ काँचे घोटि एकरापर सवार भऽ जाइछ। जे अहू कार्यक्रममे पूर्णतः देखाएल। ओना अकादमीक सचिव श्री रविन्द्र श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ जी दुनूक समन्वयनक वास्ते आंशिक आ असफल प्रयास करैत रहैत छथि। कविगणमे नवतुरक समिलताक बेगरता देखल गेल। कुल मिला कऽ सरकारी आयोजनक खानापुर्त्ति स्पष्ट परिलक्षित होइत रहल। इ कार्यक्रमक अध्यक्षता मैथिलीक प्रख्यात कवित्री शांति सुमन आ मंच संचालन भोजपुरी कवि रविन्द्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाइ केलनि। इ कार्यक्रमकेँ सरकारी तौरपर मजगुती देखल गेल दिल्ली सरकारक राजभाषा मंत्री डॉ. प्रो. किरण वालिया जीक उपस्थितिसँ। किएक तऽ हुनकर उपस्थितिक पछाति सचिव, संचालक आ किछु कविगण हुनकर स्वागतगाणक राग अलापैत एना देखल गेला जे किछु काल धरि इ आयोजन अकादमीक नहि कोनो विशेष राजनैतिक पार्टीक आयोजनक भ्रम जनमा देलक। बेगरता देखाएल ऐ सभसँ उबरबाक स्वतंत्र साहित्यिक माहौलक। तराजू सर्वधर्म प्रार्थना आयोजन कएल गेल छल। सभ उमेरक आ सभ जाति धर्मक लोक उपस्थित छल। प्रार्थनाक उद्देश्य छलै देश भरिमे अमन-चैनक कामनाक! ई आरोप पूरा-पूरी गलत छैक, हिन्दू कहियो आतंक नै मचबैए। ई काज तँ कियो मुसलमाने समाजक लोक केने हएत। सिक्ख सभ सेहो अमन चैन तकैए। है, ईसाई सभपर ठाम-ठीम धर्मान्तरणक आरोप लगैत रहल अछि। ई गम्भीर आरोप तँ हिन्दुओपर लगैत रहल अछि। यौ, घोंघाउज कऽ के की भेटत? हम अहाँ तँ सूनल- सुनाएल गप्प मात्रक हवामे उधियाइत रहैत छी। सत्य तँ न्यायालयसँ निकलि कऽ सोझाँ आओत। प्रार्थना लेल जुटल लोकक ध्यान एल.सी.डी.मॉनीटरपर जा टिकलै। शान्ति अचानक भंग होइत देखाएल। सभ एक दोसराकेँ पुछऽ लगलै- सजा केकरा भेलैक, हिन्दूकेँ की मुसलमानकेँ? आर्य समाजक मठाधीश घोषणा केलन्हि- आइ कुकृत्यक सजा कोनो जाति, धर्मक लोककेँ नै भेटलैक अछि। सभ सम्वेत स्वरमे जिज्ञासा केलक- तँ सजा ककरा भेटलै? महन्थ- “ऐ बेर सजा मात्र अपराधीकेँ भेटलैक”। प्रार्थना सभागारमे सन्नाटा पसरि गेल। किएक तँ ओ अपराधी हिन्दू छल। असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! संगबे अगिनवाणक फोँका जकाँ बड़बड़ा उठल रहै नेहक लावा. कुलीन रहबाक कारणे नै कोइ बजै, आ नहिये कोइ रोकि पौलकै. दिन...... दुपहरिया सौंसे गाम सोरहा भ' गेलै.....! सुरूजक ताप सन उठल ज्वारि चान उगवा धरि चाने सन सेरा गेल रहै. मुदा ता धरि छओंड़ाक शोणितक टघार....मुँह मलिन क' देने रहै.छओंड़ी अपन ओढ़नी सँ ओकर फुटल कपार के झँपने....! गामक चारू भ'र सँ सगरोक लोक जुमि गेल रहै. सब कियो बिन माँगल सलाह देब' लगलै-....! दुन्नू के गोली मारि दे....! नै, छओंड़ी के भगा के छओंड़ा अनलकौ, एकरे गाछ मे टांगि दे, गरदनि मे गमछा लगा के. पंचायतक बैठार भेलै ,फरमान सुनएल गेल.... " छओंड़ा के काटि के गाड़ि दे !" छओंड़ी विहुँसैत पुछलक - 'आ छओंड़ी के ?' माय - बाप केधमका के सुनझा दही. नै, किन्नहुँ नै. छओंड़ी तमकि उठल- " जेबै त' दुन्नू, जीबै त' दुन्नू ." छुच्छ दुलार समस्त युवा युवती सँ अपील-" जाति- पाति, रंग- भेद, धर्म - कर्म सँ उपर उठि देशक सर्वांगिन विकासक लेल सोचै जाउ." की यौ......, आइ त' बुझाइ छल जे कोनो बड़का पाटीक बड़का नेता भ' गेलौं अहाँ . यै , हम समाजक सब रूढ़िक रीढ़ के तोड़ि नव समाज बनेबाक संकल्पित छी. आ ताहि मे अहाँ सनक उच्चकोटिक विचारवान महिला चाही, संग पुरवा लेल. सेआइये मात्र नै, जन्म जन्मांतर धरि. 'खाउ सप्पत....अहाँ संग देव, जीवन संगिनी बनि. ' ' हे भाषण छोरू, पुइछ आउ अपन पुरखा के, हमर जातिक लोक अहाँक जाति मे मिझ्झर हएत. ? ' वाह! ओइ छओंड़ाक नमहर- नमहर लच्छेदार शब्द आ वाक्य माइक आ मंचे पर तक रहि गेलै. केना नयना मे घुइस हृदय मे उतरै लए उताहुल छल! हमर जाति सुनि ओकर आँखिक पानि उतरि गेलै. 'नीक भेल जे हमर हीयाक हीत हिया मे बाँचल रहि गेल, अप्पन लोक लए.' " नै त' प्रेमक फाँस मे फँसा हमरो घीना छोड़ैत आ अपन बाप पुरखा के सेहो " दिहलगड़ि टेंगरा, पोठी, ईचना लै जाऊ...! कोना दै छीही गै ? लू ने मालिक , जे टका दै के मोन होत से द' देबै.साँझ झलफलाइ है.फेनो घरो घुरै के है. एँ गै, तों जे दिन राति खटै छें से तोहर मरद'बा की करै छौ, कहाँ छौ ओ ? ओ घरे मे रहै है मालिक. किए गै ओ मरद छौ की तों ? मालिक ओकरा घुमै फिरै मे असोकर्ज होइ है, तें भानस भात आ बाल बच्चा उएह देखै है " मुनहारि साँझ हो गेलै हम कखनी से एकर असरा मे ओसारा पर बैसल हीयै.ई मौगी भ' दुरे दुरे जा खटै है आ हम, बाल बच्चा आ भनसाघर मे लागल रहि जाइ हियै की विधनाक लिखल है से नै जानि" ई हदियाइ किए है, मनसा आ मौगी असगर मे त' अधुरे रहै है पूर त' तहन होइ है जहन दुनू एक भ' काज पुरवै है. हम करियौ की ई करौ, बात त' बरोबरिये ने बुझौ. "आ हे , दुनू गोटे बलू सब खन घर मे रहौ की नै रहौ,एक दोसरा के हिया मे त: बसले रहै है न'. ! उफाँटि ओह...! केहेन निर्मम हत्या भेलै ओकर. के केने हेतै एहेन काज ? छओंड़ी जतबे सुन्नर ततबे सुशील सेहो छलै.तहन ककरो सँ दुश्मनीयो त' नै हेतै! यै, सुन्नर आ सुशीलक संग भरल पुरल जुआन सेहो छलै. हँ से त' छलैहे. त' ककरो सँ ....रंगरभस के फेर मे भेल हेतै ! यै जहन सभ चीज सँ भरल पुरल छलैहे तहन ककरो हिया मे त' बैसिये गेल हेतै ने. नै यौ,एकक हिया मे पैसल रहितै तहन ने अ'ढ़घात सँ दोसरो जँ नजरि गड़ेने होइ ? सब टा दोष छओंड़े के किएक ? जँ छओंड़ीयो सिनेह के पीयो फेको वासन जकाँ बुझैत होइ ! पकड़ा गेलै......पुलिस पकैड़ लेलकै. ककरा यौ ? हत्यारा के! के छै ? ओकरे प्रेमी ! जुड़बन्हन गेंठजोड़बा क' दियौ ....! देखब यै कनिया , एम्हर ओम्हर नै भागथि. ककरा भगै के गप्प करै छी यै, कनिया के की वर के ? मनगर त' दुनू ने. मुदा मौगी त' जाँतल मोने रहि जाइए पर मनसा....हुलकाह बुझू. किए यै, मौगी के मोन कोनो मनसा पर नै जाइ छै की, सत्ते कहू त ' ? यौ, ज' से नै होइतै त' मनसा मौगीक प्रयोजने कोन ? मनसा मनसाक संग आ मौगी मौगीक संग रहि लैतै. तहन अहीं कहू बन्हन सँ की हएत ? हँ यौ इहो बात त' सत्ते ! " नुआ , धोतीक बन्हन सँ मोन नै बन्हाइए. मोनक बन्हन लए हिया सँ हियाक मिलान चाही " निंघेस गै दइया गै दइया, कहू त' एकर सपरतिब. ई रहत केठरीक भीतर विलइया ठोकि के , आ हम रहू टुग्गर- टापर जकाँ ढेंगराइत. मनसा त' पहिने हमर , तहन ने ओकर. पहिने प्रेमालाप! तहन देहक भूख.....निवारण.कहियो ऐ सब मे असोकर्ज नै हुअ' पबै ताहि लेल दिन राति अपना के समर्पित क' रखने रही यौ, अहाँक प्रेम फाँस मे फँसि दुनू गोटेक जुड़बंधन भेल छल. .आ हम तकर निवहता आइ धरि करैत रहलौं. मुदा अहाँ....अहाँ त' स्वर्गक सुख देखा नरक मे धकेल देलहुँ. "गै, ओ हमरासँ प्रेम केलकै आ हमहु ओकरा सँ......!" तखने दुनू एक भेलियै.आ तों त' आब देह सँ पुरान भ' गेलेँ. गै दइया गै दइया, हम पुरान भ' गेलियै आ एकर देह त' नवे धएल छै. हँ गै. त' ई कहौ जे आइ दोसराक प्रेम मे अपन अछिंजल सँ ओकरा सिक्त क' रखतै.आ काल्हि फेर तेसर.फेर....कतेक दिन धरि अपन अछिंजल सँ नवकी - नवकी छओँड़ी के घोंकि- घोंकि के छोड़ैत रहतै. ' जाधरि देह मे हुव्वा रहत!' आ ओउ निँघुछल.मौगी सबहक की हेतै ? ओहो सब हमरे जकाँ नवका प्रेम जाल बुनतै.....! बाढ़ैन नै मारतै ओहोन सिनेही के.....? " बाढ़ैन मारौ की खापड़ि, डेग त' चुकि गेलै." बखरा मुन्ना जी उँह........! की भेल. ? अहाँक दाढ़ी गड़ैए . हा....हा....हा !नीक चौल केलौं. पहिने त' बिन काटलो दाढ़ी नै गड़ल कहियो. आ आब.....! आब बौआ भेलै ने . " त' की, बौआ भेने हमर गाल मे काट उगि गेल की ." से नै यौ......! आ की हमरा लेल अहाँक हृदय मे पाथर समा गेल ? नै यौ, सिनेह त' आब बौओ के चाहियै ने . हँ, समय अलग - अलग हेतै . नै , हमरा अहाँक बीचक सिनेह मे सँ आब ओकरो बखरा लगतै. " हे देखियौ, अहाँक किरदानी पर ओहो मुस्कियाइए ." अन्हरिया मे हम ओकर दुनू पाँजर मे गुदगुदी लगाबी आ ओ खिलखिला उठए.....! बड़ मजगर लागए ओ क्षण, ओकरा लेल धानि सन. फुलवारीक बीच दुनू गोटे एके पाथर पर बैसी, सोझाँ सोझे नजरि मिलौने. दुनूक गप्पक पहाड़ नै ढ़हि पावए कखनो, कतौ , कहियो. मुदा ओकर ठोरक विहुँसव, आ हमर ओकर नयनक किरणक मिझ्झर हएब, नै जानि कत' हेरा दै छल दुनू के.सोच जतेक दुर धरि जए, सिनेहक ओतेक लगीचक एहसास होइत रहै छल. ई क्रम जारी रहल......! फेर आजुक गप्पक क्रम मे पुछि बैसल.....एँ यौ, हमरा सेझाँ पबिते अहाँ एना बेसुधि किए भ' जाइत छी ? अहाँक नयनक किरिण हमरा अहाँक हिरदय मे समेबाक लेल उताहुल क' दैए! अच्छा छोड़ू , कहू जे हम अपन विआह मे बजएब त' एबै ने ? " यै, आब ई त' पक्का ऐछ जे जहन दुनू गोटे एक मड़बा पर बैसब, तखने विआहल जएब." नै यौ, हमर अहाँक प्रेम लचार भ' गेल हमर मए बापक हमरा प्रति प्रेमक आगाँ.....! हमर विआह दोसरा सँ हएब निश्चित भेल ऐछ. सिनुर दानक बेर बिजली गुल भ' गेल. अन्हारे अन्हार.......की भेलै.....ठीक करू जनरेटर....! " ईजोत भेल.....वर सिनुरक तामा हाथ मे लेने ठाढ. कनिया......फरार ! सेल्फी यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ? कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै. हमर मोन कहैए- जेनाहमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ. यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी. बुध्दु कहीं के ! प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै. यै ,जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै. तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ. " एक दोसरा क् करेज मे समएल ." खोंइछक धान गै विमला, ओम्हर के पतियानी मे हाँसू किए लगेलें. एम्हरे आ ने हमर वाम - दहिन. एके संग दुनू गोरा कटनी करब, काजो उसरत आ तोहर मुँह निहारव सेहो संगे चलत. उँह....! एत' एलैए बोइन कर' की परेम कर' ? गै, जाबे आओर बोनिहार सब एतै ता धरि ई छओंड़ा- छओंड़ी पेटक संग- संग करेजक आगि सेहो सेरा लेतै. हरज कोन ! "ई कह जे तोरा मोन मे ओ नै होइ छौ जे हमरा होइत हएत ? यौ, छओंड़ा जते उधवा उठवैए तै सँ की कम आगि छओंड़ी के लेसै छै. मुदा हम सब निमुधन ! जबले मुँह रही त' परिवार आ समाज दुनूक प्रतिष्ठा रखनिहार बुझू. हे यौ, ओ सब अवै बला है.हम अपन आँटी ल' के जाइ छी. गै, तों ज' चलि जेम' त' हमरो बोझ कहाँ पुरत. आँटिये भरि रहि जएत. हे ले........! राजू हाँय -हाँय धान मीर के ओकरा खोंइछ मे द' देलक. विमला- ऐँ ई की करै छी, हमर विआह त' भेवे नै कएल.तहन खोंइछ ? " गै , ई खोंइछक धान नै , प्रेम दै छियौ धराउख रखिहें." आ ज' हम दोसरा के भ' जेबै ? तें ने धराउख.....! " आ जे से हेतै त' हम अहिना रहि जेबै तोहर खोँइछक याद मे! दासीन नहुएँ, नहुएँ पछिया सिहक' लागल रहै. मोन त' चान सन शीतल मुदा हृदय मे सिनेह लहक' लगलै. यै, अहाँ ठोर पर लिपिस्टिक किए लगा लै छी ? "ठोर मे नवका रंग देवा लेल ." मुदा अहाँक ठोरक वास्तविक रंग कहाँ धोखरल ऐछ एखन धरि.अहाँक ठोरक मुस्की त' कतेको ठोर त'र क' दैए. यौ वास्तविक ठोर त' एके टाक मुस्की मे मिझ्झर होइ छै. मुदा रांगल ठोर नै जानि कतेको हृदय पर पाथर जकाँ बजरैए. आ हमर हृदय त' ओहिना रहि जाइए मोम जकाँ नहुएँ नहुएँ पसिझैत अहाँक सिनेहक दासिन बनि. " दोसरा सँ की स'ख मनोरथ." प्रतिक गै , तोहर घर त' बालू के छौ, अपने भहरि के खसि पड़तौ! चुप्प, तोरो घर त' संठी के छौ, एके बिहाड़ि मे उधिया जेतौ! रंजन, बाध मे महीस आ नमिता बकरी ल' चरब' जाइ छल.कतेको चरवाहा चरवहिनीक संग इहो दुनू गोटे घोलका -माली खेलाइत रहै छल. सामा -चकेवा आ कनिया - पुतरा खेलाइत कतेको बरख धरि दुनू एक दोसराक संग झगड़ा झाँटी केलक आ फेर सहटल रहल. वयसक चढानक संग आव मिलनक चढान सेहो उपर जए लगलै.पहिने त' सबहक सोझाँ मिलान होइआ आव चोरा नुका के. " रौ रंजन आब. तोँ ककरा सँ चोरा नुकी मिलबेँ रौ !" किए गै, तोरे सँ .....! हमर त' काल्हि विआह भ' जएत. हम सासुर चलि जेबौ. आ तोँ.....? रंजन अवाक.....! की भेलौ रौ ? ' ऐँ गै, हमर सबहक मोनक महल ठीके के भहरि गेल! एतेक दिनक याद क्षणे मे विला जएत गै ?' नै रौ, चल ऐ च'र मे एक टा गाछ रोपि दै छियै.जहिया धरि लोक रहतै तहिया धरि हमर तोहर सिनेह जियैत रहतौ. ' कथी के गाछ रोपमे ? पीपर के, सब के छहरियेतै सब मोन पाड़ैत रहतौ. नै रौ चल आमक गाछ रोपि दै छियै किए गै , आमेक गाछ . किएक? रौ, जहिया फड़तै तहिया हमर तोहर रसिकताक प्रतीक दोसरो के हिया रसौतै " सिनेहक धार ऐं गै छओंड़ी, तोरा सब दिन नवका - नवका छओंड़ा संग देखै छियौ....? आंटी ओ सब हमर ब्वायफ्रेण्ड छै ! त' तोहर कोनो संगबहिना नै छौ, सब टा संग भइये छौ की ? अहाँ एना शक्क किए करै छी आंटी ! चुप्प गै लुच्ची ! " सिनेह ककरो सँ लागए त' धराउख बुझी.ई नै जे जकरे सँ नैन मिल जए, मोन बाँटि लियय. यै आंटी ,अहाँ सब बला जमाना धएल नै रहलै आब.सुनै छी जे पहिलुका लोक सबहक ( कनियो - वरक)चोरा क' मिलान होइ छलै.संतान ......दर्जन भरि ! लबरी कहीं के.....! गै, हम सब दर्जन भरि जनमाइयो के शरीर मे हुव्वा रखै छलौं.आ सब टा चिलकाक निमेरा सेहो अपने सँ करै छलौं. मुदा आवक छओंड़ा -छओंड़ीक जुआनीयो नितुआन ! शक्तिवर्द्धक दवाई, जीम आ योगा पर टिक के जीवैए. धीया - पुता भेल त' वेशी सँ वेशी दू टा ओहो पलाइए दोसरे भरोसे. यै आंटी ,लोक जनम लेलक ऐछ कमाऊ , खाऊ मौज उड़ा ऊ फेर चलि जाउ ! ' तें रंग रभस त' जरूरी छै' त' एकर मतलब भेल जे क्षणे- क्षणे किरायाक घर जकाँ घरवला सेहो बदलैत रहू.एहेन कोन प्रेम जे कतौ ककरो पर जा टिक नै पावए. यैआंटी, .....जकरा सँ मोन मिलए उएह मीत बुझू. ई काज त' उएह क' सकैए जे सिनेही ऐछ ! " तेँ मोन राखू, दुखक नोर सुखि जए त' सुख' दियौ, हृदय सँ सिनेह नै सुखल ताकए कहियो" ' ऐब की बेरिया रौ सौरभ, तोरा बड़िखन सँ देखै हियौ एने- ओने मुड़ियारी देने फिरै ही रे. किछो हेरा गेल हौ की ? दोग दोसाइने वोन झाँखुड़ मे तकने फीरै ही रे....! सौरभ अवाक्......! फेर - हँ रौ, ताकै हियै से देखाइ कहाँ कतौ हइ. की हेरा गेल हौ, कह ने त' हमहू ताकिदै हियौ. रौ सुरजा ,तोरा नै भेटतौ. तूँ हियाँ से जो. ऐँ , एहेन कोन चीज हेरएल है रौ, जे तोरा भेटतौ हमरा नै.सेहो भेटेतौ तखनी जहन हम हियाँ नै रहबै. सेआब जे होइ हमहू तोरा संग ताकिये के रहबै.दुनू गोटे मिलि तकमे त' जल्दी भेटेतौ रौ. हौअए रौ....जकरे नाम गुलाब छड़ी सएह चलि आबए. निक्की सौरभ दिस बढ़ले रहए ....सौरभ सेहो सहटल निक्की दिस दुनूक नजरि मिललै की निक्की के सोझाँ मे परि गेलै सुरजा.निक्की दुनू के मुँह लुलूअबैत पड़एल उनटे पएरे.कोनटा फड़की, दोग दोसाइने लंक ल' पड़ाइत........! सौरभ ओकरा पछुएने.....अपस्याँत! " रूक....रूक गै,आइ नहिये छोड़बौ जाबे तोरा पटा नै देबौ.तोहर ठोरक मुस्की मे अपन ठोरक मुस्की मिझ्झर क' " परदा पर हम सबहक सोझाँ सप्पत खा कहै छी.पृथ्वी अकाशक बीच अगिनक सोझाँ. आई सँ अहाँ हम्मर आ हम अहाँक भेलौं अहा.,प्रिये....! जेहने रसिकगर गप्प तेहने बनल सेट. जेना स्वर्गक आनन्द करवैए. से त' सत्ते. हमहू नै जानि कोना अहाँक करेज मे सटि सब किछु बिसैर गेलौं.ई संकोचे हेरा गेल जे हम अहाँ मंच पर छी.घर मे नै.हम अहाँ एक टा कलाकार मात्र छी सच्चौ के पति-पत्नी नै. यौ से त' ठीके. ठीके नै यै ! माने, मंचक प्रदर्शन करैत- करैत मोन नुकएल की खुजल सत्तौ के प्रदर्शन ताकय लागल ऐछ. मुदा से त' मोने भरि रहि सकैए.कल्पना करैत रहू यथार्थक खोज मे विलमल रहू. त' की हमर अहाँक प्रेम प्रदर्शन कहियो बन्न घर मे आकार नै लेत ? किन्नौ नै. "प्रेम आ कला कहियो बन्हन मे नै बन्हाइछ.लोक के देखाउ, मुदा मोन नै भरमाउ." पसार....! इह .....! चोर नहितन. कखनो एम्हर कखनो ओम्हर, हुलूक बुलूक़ करैत रहै छथि.उचक्का नहितन. की बरबराइ छी यै ? किछु नै, अहाँक उचकपनी के फरियबै छलहुँ.आब ई सब बहुत भेल छोड़ि दियय हुलूक बुलूक. जँ सत्ते सिनेही छी त' आइ एकर स्थायी निदान भ' जए. स्थायी निदान ? से कोना विआहि क'. तखन जतेक सिनेह हृदय मे उसारि राखल ऐछ, सबटा खुल्लम खुल्ला उझिल सकैछी. यै विआहो क' के लोकक प्रेमालाप लए बन्ने घर चाही. तहन विआहे किए ? प्रेमक वंशमनि पसार लए......! आशीर्वाद कला आ प्रेम कहियो कखनो कोनो सीमा मे नै बन्हएल .दुनू असीम ऐछ.तहन प्रेम पर पहरा किएक ? खास क' ओहोन प्रेम जे वएसक परिपक्वताक संग सीढी चढए आ बढए.. नै किन्नौ नै, ई सर्वथा असंभव ऐछ. प्रेमक धार मे तुँ वहि गेलेँ.मुदा हम भसिए नै देबौ. ई कह जे तोरा सब सुविधा द' पढ़बा लेल छोड़लियौ की प्रेमक धार वहेवा लेल! डैडी, प्रेमक लेल कोनो सरंजामक बेगरता नै हृदयक उदारता चाही.जाहि सँ विआहक बन्हन मे बन्हा एक दोसराक नीजता के उघि सकी. अहाँ दुनू माय बेटी बताह भ' गेलौं की ? ओ जे कहत सएह हेतै.मानलौ जेओ छओंड़ा सेहो अपने जातिक छै.पढ़ल गुनल इंजिनियर छै.मुदा एकर जन्मदाता की आश्रयदाता त' हमही छी.हम जे चाहब से हेतै ! ऐं...., निम्मी भागि गेल ! अहाँ मए भ' के की करै छलौं? हम त' अहूँ के बुझौलौं आ बेटियो के.मुदा की करू मौगी त' शुरूहे सँ वेवश ऐछ पुरूखक सोझाँ. हँ, आ बेटी वेवश छल प्रेमक आगाँ ! तहन पढल आ मुर्ख मे की अन्तर . प्रेमक बेर त' दुनू बरोबरि ! ओकरा कहि देबै जे घूरि के ऐ घर मे पएर नै दिए.आशीर्वाद त' दुरक गप्प जे ओकरा लेल ई दुआरि सदा के लेल बन्न भ' गेल. "डैडी,अहाँ हमरा लेल नव दुआरि त' ओही दिन खोलि देलौं जहिया हमरा इंजिनियरी करेलौं.उएह आशीर्वाद हमर निवहताक सारथी सेहो हएत ." आँचर....! मए बापक इच्छाक विरूद्ध प्रेम मे बताह भ' घर सँ भागल बेटीक लेल - " बेटी, तों हमर धाख नै मानलेँ.मए सँ त' सीखतेँ जे ओआइयो हमर निर्णयक विरूद्ध डेग नै उठबै छथि." तों भगलें त' सदाक लेल ऐ घरक दरवज्जा बन्न बुझ, अपना लेल.बना ले नव दुनिया बसा ले नव परिवार.बिसरि जो जन्मदाता आ आश्रयदाता के. नै , हम अहाँक भोगक वौस्त नै छलहुँ, अर्द्धांगिनी छी.आ अपन पेट मे पालल धिया लेल- " बेटी तों गलत डेग त' निश्चिते उठेलेँ मुदा प्रसन्न रह जकरा जिनगीक संगी बनेले तकरा संग.मुदा कहियो जँ सब देहरि बन्न बुझाउ तइयो एक टा दुरखा अवश्य खुजल भेटतौ- मएक आँचर ." उठल्लू देखू त' केहेन उजड़ी उपटी सन भ' गेल ऐछ! प्रेम विआह सँ भेल छुट्टा छुट्टी ओकरा मौगति धरि पहुँचा देलक ऐछ. कहू त' की उमेर छै ओकर.ह मरा आगाँ त' जनमल ऐछ.देखिते देखिते जुआन भेल, प्रेम भेलै , विआह भेलै. आ, फेर छुट्टम छुट्टा! हे, देह आ मोन दुनू सँ टुटि गेल ऐछ.ओकरा परिवार समाज द्वारा सम्हारवाक प्रयास कएल जए तोड़वाक नै.आखिर नेनमति सँ जे केलक तकर सजए जिनगी भरिक लेल हम सब त' नै दियै. बड्ड खटरास करै छी अहूँ.एहेन जे कुल शील बुझिते त' अनेरूआ लोकक प्रेम जाल मे फँसिबे नै करितए.तहिया मए बाप , गौंआ समाज ज' बुझबै त' सब बुझाय ओकर दुश्मन ! त' भोग' बुझतै कोना ? हे यौ अनिल जी,हम अहाँक हृदय सँ आभारी छी.जे अहाँ टुटल समय मे जिनगी के जीवाक आ कि भोगवाक सामर्थ्य देलौं.अहाँक प्रेम हमरा आइ धरि जियौने रहल.ज' एहिना हमरा आगुओ जियाव' चाहै छी त' अंगिया क' नव जिनगी दियय.धर्म रक्षक आ जीवन रक्षक दुनू मे नाम हएत अहाँक. हे , हम परिवार आ बाल बच्चे भरल पुरल छी.तोरा जकाँ उठल्लू नै छी हम. " ध्यान रखिहें ,सेवा आ प्रेम बँटै छी हम, सोहाग नै." बाट- घाट अहा ! केहेन मनोरम दृश्य. प्रकृतिक कोरा मे हम सब, कृत्रिम कोरा मे दुनू गोटे.कहू केहेन आनन्दक क्षण ! हँ यौ, पहाड़, जंगल ताहु मे दुइ टा जुआन छओंड़ा छओंड़ीक जोड़ी.अहाँक मोन जेना उच्छश्रृंखल हेबाक प्रयास क' रहल ऐछ ! आओर अहाँक यै ? स्थिर चित, शान्त मोन प्रेरणाक मध्य टिकल. हँ यै, जिनगीक किछु क्षण ऐ तरहें बितैत....लगैए जेना जिनगीक मठोमाठ सन. हे यौ, मुदा छओंड़ी, जँ एहेन जिनगी मे देखार भ' जए त' बुझू जेना- मसोमात सन ! तहन आब अहीं कहू आगूक की विचार ? हे यौ , हमर विचार मानव ? किएक ने .कहि के त' सुनाउ. आब दुनू गोटे अपन जिनगीक यथार्थ तकबा लेल विलगि जाउ एक दोसरा सँ. आँय यै, त' अहाँ एहिना अधखर जिनगी जियव ? नै यौ, जहिया जकर गात लगबै तहिया ने.ता धरि त' सब टा अपने छी संपुर्ण.आ ओही संपुर्णताक खातिर त' अहूँ सहटलौं! त' हम ई मानि ली जे ओ सहटब क्षणिक छल. किएक ने. " अपन बाट अपने बना, मोकाम ताकू !" द्वन्द हे , फोन क' वेशी तंग केलौं त' आवि के गरदनि मोइक देव, बुझलियै.घरवाली छी, घरे भरिक सोचू....! हम कत' जाइ छी, की करै छी ओइ मे टांग अड़वै के कोशिश नै करू. फोन राखू. यौ सुनीत हमआब जाइ छी , बड्ड बेर भेल. एन केना जए देब. त' की करव आओर ? गप्प सरक्का ! डेढ़ बरख सँ सएह करैत एलौं.मुदा आइ पता चलल जे अहाँ सिनेही नै निर्मोही छी. से की ? एक त' अहाँ विअाहल छी , परिवारिक लोक.जे हमरा सँ नुकौलौं.दोसर जे मौगीक उपभोग मात्रक वौस्त बुझि पहिने रंग रभस फेर गरदनि मोकवाक लेल तैयार..! आ आव हमरा संग....! हे रुकू.... रुकू ने,नै रूकब त' गोली मारि देब. यै, ओइ दिन त' भागि गेलौं. तकर पछाति फोन बन्द....! की भ' गेल अहाँ के ? "हे , सुनू राति मम्मी- डैडीक चिन्हल जानल लड़िका सँ हमर विआह भ' गेल.अखन हम सब हनीमून पर निकलल छी.अखनुक पछाति फेर हमरा फोन नै करी अहाँ , से मोन राखब. " विआह अहाँक,पसिन्न मम्मी- डैडीक !" हँ यौ, कुल- परिवार त' चिन्हल जानल छै. " बाट-घाटक सिनेही त' अनेरूआ होइ छै, अनेरूआक धरम- करम के कोनो किच्छो ठौर ठेकान नै ! " देह, मोन आ प्रेम सबीना आ मोहसिनक जोड़ी सौंसे जोलह टोलीमे प्रसिद्ध छल। किएक तँ मोहसिन सभ साँझ पोलिथिन पीबि कए आबए आ सबिनाकेँ खूब मारै गरियाबै। मुदा सबिना चुपचाप पाथर बनि जाए। लोककेँ आशचर्य लागै। जखन की ओकर टोलक आर मर्द-जनानी मीलि हपनामे खूब उठा-पटक, भागादौड़ी करए, हरबिर्रो मचि जाए टोल भरिमे। कहियो काल सबिना सेहो मोहसिनसँ मुँह लगा लिए आ मोहसिन भरि इच्छा कूटि दै ओकरा। बाजा-भुक्की बन्न भए जाइ दूनूमे। तखन सबिनाक बाप अबै। सबिनाक बाप बड़का मौलबी छल। सबिनाकेँ सिखाबए पढ़ाबए जे अपन अल्ला मियाँ नराज भए जाइ छथिन्ह जँ केओ मौगी अपन पतिपर हाथ छोड़ैए तँ। अब्बाक कहल बात सुनि अपन नोरकेँ नूआक खूँटमे सुखा लिए। सम्मान करए अल्ला आ कुरानकेँ। मोहसिनकेँ मुइना आइ तेसर दिन भए गेल रहै। ओ सभ दिन भोर-साँझ ओकर कब्र लग जा भेसै छल। कब्रक उपर बेना डोलबैत छल। देखहो बला लोककेँ आशचर्य लगै।एकरासँ बेसी प्रेम तँ कोनो मौगी अपन पतिकेँ नै केने हेतै। मुदा..........मुदा सत्य छल जे ओकरा मोहसिनसँ प्रेम नै रहै। ओकरा मगजमे खाली कुरान शरीफक ओ बात घुसल रहै जाहिमे कहल गेल रहै जे" साँच मुसलमान वएह अछि जे कुरानक तहरीरकेँ मानैए" आ सबिना कहियो सुनने रहए जे " जाबत धरि पतिक साराक माटि नै सुखाइत छै तावत दोसर बिआह वा परपुरुख संपर्क कुरानक नजरिये अवैध मानल जाइत अछि" आ....आब आस्ते, आस्ते मोहसिनक कब्र केर गिल्ल सारा सुखा सक्कत भेल जा रहल छलै। परमेश्वर करमान लागल लोकक बीच पंचैती शुरू भेल। पहिल पुरुष पंच----- अइ छौंड़ा-छौंड़ीकेँ तँ भकसी झोंका कए मारि दिअ। छोड़ू नै। इ प्रेमक नामपर सगरो समाजकेँ कलंकित केलक अछि। दोसर पुरुष पंच----- नै एकरा ऐ पड़ौआ छौंड़ासँ मुक्ति दिआ बिआहि दिऔ कोनो लुल्ह,नाङर,घेघाह वा कनाहसँ अपन कुकर्मक सजाए एतै भोगि लेत इ। मौगी पंच----ऐ उढ़री-ढ़ररीसँ कोन गामक लोक बिआह करत? एकरा तँ तरहड़ा खूनि गाड़ि दिऔ। एहि घोंघाउजक बीच छौंडीक कुहरल आवाज आएल----- हम अहाँ सभहँक पएर पकड़ै छी। हम उढ़री नै छी। हम एकरासँ प्रेम करै छी। हमरा जे चाही से सजाए दिअ। मुदा हमरा सभकेँ जिनगी दिअ। आ चोट्टे मुखिया जी छौड़ी माएकेँ बजा कहलखिन्ह------ लिअ एकरा झोंट पकड़ि लए जाउ आ बान्हि राखू। तखने सभ पंच समवेत स्वरे बाजल---- मुखिया जी अपने तँ परमेश्वर छिऐ तखन फेर एकर सजाए-----बास एतबे। मुखिया जी बजलाह--- नेतृत्वक काज छै जे जँ कतौ पसाही लागल देखए तँ ओहिमे पानि ढ़ारि दै नै की घी। जिया जरए सगर राति अहा.....मूहँ तँ लगै जेना चाने हो आ आँखि तँ बुझू जे मृगनयनी सन। कने मूड़ी तँ उठाउ। एक बेर नजरि मिला कए तँ देखिऔ। आँ...... एहन झटका तँ बिजुरियोसँ नै लागल छल। कोनो बात नै बिआहक पछाति पहिल राति एहने संवेदनशील होइत छै। हे यै....की भेल। एना आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार किएक ? हमरासँ कोनो गलती भेल की। नै गलती तँ हमरासँ भेल जे अपन गलतीक सजा अहाँकेँ दए देलहुँ। केहन गलती आ केहन सजाए ? किशोरी होइतहिं हम यौवनक मधुमासमे डुब्बी लगेबाक सोचि उतरए लगलहुँ। अमीरीमे पोसाइत, जुआनीकेँ पबिते मोन बान्ह-सिकड़ीकेँ तोड़ि बहार हेबाक लेल औनाए लागल छल। हम कइए की सकैत छलहुँ। किशोर वयमे भटकबाक एकमात्र कारण छल- ई भरल-पुरल देह जे जौबनकेँ चरम पर जा टिकल छल। जकरा अमीरी आ जुआनीकेँ बीचसँ निकलल संक्रमण घेर लेलक। बिआहो तँ अहाँ संग वएह सभ करेलक जे हमर बाँचल संपतिक पहिल उपभोग केने छल। हमर माए-बाप अपन बेटे जकाँ बुझि सभ सुख-सुविधासँ पूर्णछुट्टा छोडि देलनि। कारण जे माए-बापक एक मात्र संतान रही हम। यै, हम बड्ड उम्मेदसँ आजुक रातिक प्रतीक्षा करैत रही। हमरा सोंझा उपस्थित कएल गेल बहुत रास कथा स्थगित भए गेल छल। कारण छल हमर सोच-- जे हम शहरुआ छोंड़ीक लिव-इन-रिलेशनशिपकेँ फैसन वालीकेँ अपनासँ दूर राखए चाहैत छी। यौ, हमर बिआह भए गेल। हमर कुमारिक पद छुटि गेल। मुदा हम अहाँक जिनगी खराप नै करए चाहैत छी। हमर मौगी जाति असवी होइत अछि। मुदा किछु वर्ख पहिने लागल एड्सक बेमारी हमर जिनगीक सीमा देखा देलक अछि। सत्ये बेमारीक कोनो विश्वास नै, मुदा अहाँ एकटा रोगी मात्र नै अहाँ तँ चरित्रहीनसँ बेसी किछु नै देखाइ छी हमरा। जँ एतेक निष्ठावान छी जे अपन रोग हमरामे नै देखए चाहैत छी तँ अपन मूँह पर पोतल करिखासँ हमर मोन जिनगी स्याह किएक केलहुँ ? यौ, ऐ समाजक परंपरा निमाहैत लोक-लाज आ अपन रक्षार्थ पुरुषक गात लागब आवश्यक बुझलहुँ। बस। बाहर रौदक धाह देखाएल। मुदा मोनमे अन्हारे-अन्हार पसरि गेल छल। उजासक बाट सेहो अन्हराएल। साढ़े एकैसम सदी हेलो..... हाय। की हाल छै ? फाइन। ई कोनो एबाक समय छै। डेढ़ घंटा लेटसँ । खिसिया किए गेलहुँ। रस्तामे सौरभ भेटि गेल। सटि गेल हमरासँ । कहू हब भागि जैतहुँ । केहन एक्सपिरिएन्स गेन करैत ओ। मुदा अहूँ तँ समय पर नहिए आएल हएब। हँ रियाकेँ गोल्डेन पार्कमे तते ने मोन लगै छै जे घेंटा-जोड़ी कए लेने छल। छोड़िते नै छल। जखन रियासँ एते घेंटा-जोड़ी अछि तखन हमर कोन काज ? अहाँसँ नीक सौरभे जे हमर बाट जोहैए। ओ नामरद अछि की जे अहीं टाक बाट जोहैए। हम जाइ छी। कत' सौरभ लग। कथी लेल। इन्ज्याय करबा लेल।३ हेलो जुगनू कत' छी। बुढ़बा गाइड लग। की करै छी। हर्षक संग छलौहें की। आब फ्री छी। आबि जाउ हमरा लग। कतए छी अहाँ ? डीयर पार्कमे। आबै छी। तँ करू प्रतीक्षा जुगनू केर हम चलै छी। खिसिआइ छि किए। आब की केकरो पर आश्रित छै। एक जँ केलक मना तँ दोसर तैयार छै। आब बिआह तँ केकरोसँ कतौ क' लैए। मुदा भोगैए केओ, कतौ केकरो दोसराकेँ। पहिने प्रथा चल घर बदलबाकेँ मुदा आब तँ घरवला बदलबाक परंपरा छै। भूख सतबरतीक मोहर अपना उपर लगेबाक लेल नै जानि कतेको सासु आ माएकेँ आरोपित केलक। एतेक धरि जे कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरा पर शंका तँ भरि गौंआ करै मुदा ओहि मौगीक छुटल मूँहक सोंझा सभ अपन-अपन मूँह बन्द राखए। असलमे ओकर घरबला सेनाक नौकरीमे छल। छुट्टीक कमी। ताहि पर ओ मौगी गजबकेँ सुन्दर रहै। तँए ओ गामे नै अनगौंआक नजरिमे आबि गेल रहै। एक दिन गाम भरिक मौगी सभ ओकरा बैसार क' क' कूब ज्ञान देलक। ओ मौगी खूब आक्रोशित स्वरें बाजल---ऐ गामक कोन घरक बेटी-पुतोहु हाट-बजार आ मेला ज क' नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ कहियो अपन घरसँ बहरा क' दूरो पर नै जाइ छी। आब केओ पाहुन-परक एतै तँ हम ओकरा कोना क' भगा देबै। यै कनियाँ, नै बरदास भेल तँए मूहँ खोलै छी। पाहुन-परककेँ नै भगा देबै मुदा ओकरा संग करै बला रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकै छी ने। देखिऔ सभहँक बेटी-पुतोहु अपन सासु-माए केर संग जा कतौ घुमैए आ फेर चलि अबैए। केकरो किछु भेलैए आइ धरि। अहाँ तँ घरेमे रहि पेट क' लेलहुँ अछि। घरबला जे अगिला मासमे आएत तकरे लेल ई रखने छिऐ ई अनजनुआ चिलका। बुझा ने देथुन्ह ईएह सभ। हम तँ फोन पर फोन कए हारि गेलहुँ। नौकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जबानी की धराउ राखल छैओ तँ आबि घुरि जेतै फेर दिया-बातीमे एबाक बचन द' क'। ऐ बीचमे हमरा जखन मोन हएत संग रहबाक तकर कोन बाट हेतै। अहिना कुहरि क' मरबै की आ कि एकरा शांतिक लेल दोसर बाट तकबै हम। भूख लगला पर भोजन चाही खाली बचन नै। आ सभा खत्म भ' गेल छल। टेट्टर -- ऐं ,कुकूर के एतेक सेवा ? -- लिस्बियन छै . -- सासु कोना छथि ? -- छोड़ू ! -- हुनकर चर्चो अनसोहाँत ! -- कुकुरो सँ बेकार बुझू ! -- जेटका बेटा कए सालक ऐछ ? -- बीस पुर भ' गेलै . -- जल्दीये स्थान भेटत. -- कोन ? -- साउसक गणतंत्र ,मालिक, गोर लगै छीयैन! के ? हम,हीरवा कनिञा।भरि जुआनी खटि ,हिनका पुजिगर बनेलियैन आ आइ अन्चिन्हार ? पछिला मास जे अहाँ गीदड़भभकी द' गेलहुँ--जे हमर एक-एक टा कैञ्चा (टाका) हिंसाब क' दौथ। अशोकबा कहैए-घर बैस के खो। तहिये सँ अहाँ हमरा आँखि सँ ओझल भेल बुझू। माञिन्जन ठेंगा उठा बाट ध' लेलनि....ठमकति!अच्छा दुरा पर एलौं त' खगतो कहिये दियय। अशोकबा बाप बेमार हय,दवाइ आ खेनाइ,दुनू घर मे घटल है।किछो मदति क' दौथ, अशोकबा के 10 तारीख के अबैया हय,,सबटा पाइ सधा देबैन। हमरा ल'ग किछो नै हए,हम… अदौ सँ... --हमरा बेर पर अहाँ सब कें अहिना लेसि दैए।इ बुझियौ ने जे इ एकटा पुरस्कार मात्र नै,हमर बौद्धिक संपति छी।खाली लिखि के नै , अर्जित संपूर्ण धनराशि छोड़ि क' महानता थोपेलौं ऐछ। -- बाउ, तोंही टा लिखै छह की ?तोरा सँ अजोध लेखक सब एत' काहि कटै छथि।की हुनकर रचना निश्शन सन नै? --जकरा देखू तकरा गलथोथरइ, सेहो खाली सिरखारी पोथी पर। पोथी पर चर्चा कहियो नै। --रौ, आबो मूँह चुपकर !हमरा नै बूझल ऐछ जे तोरा कोना भेटलौए पुरस्कार ! -- हें..हें..हें। कक्का " डगरिन सँ कतौ पेट नुकेलैए ?" अहींक डेलवाहि क' त' सिखलौं जोगाड़।जहिना अहाँ पौलहुँ तहिना हम । -- ओह! " जाहि घरक पानिए विषान्हि हो ताहि घर साकट ताक'चललौं।" करोट यै कनिञा,सुनि के दुख हएत,मुदा कहिए देब उचित बुझै छी। कहौथ ने मां,हिनकर सबहक बात के दुख किएक हएत। बौआ लाजे नै कहैए,हम सब निर्णय केलौं जे ओकर दोसर विवाह करा दियै। इस सब जे निर्णय करथिन से उचिते हेतै।मुदा तकर प्रयोजन की ? वंश पसार लए। बाबू जी," दवाई आ जांच सं निश्तुकी भेल जे दोष हुनके मे छनि।कहौथ जे कएटा बेटीक जीवन गार्त करथिन त' मोन भरतैन ? कनिञा,हमरा माफ करैत अपन कपारक दोष बुझि संतोष करौथ। नै बाबू जी,से कोना हेतै ? की करब अहां ? हम दोसर विवाह करब! के करत अहां सं विवाह ? कोनो निसंतान मर्द!आ कन्यादान हिनके पल्ला! पछतावा -- नै रौ बौआ,सगरो समय बिगड़ल छै,एखन गाम सं नै जए देबौ। -- आंइ यौ बाबू -पहिल बेर गाम सं जाइ सं पहिने त' माय के फिरिसान केने रहियै।पढ़ि- लिखि गाम पर बैसल हमर माथ खएत की माटि हबकत ?" --अहू बेर अहींक जिद्द गाम अनलक,नै त' ओतौ कोनो… रक्षा --एक टा पोसुआ कुकुर अपन मीत सँ-- रौ, घर मे किए घोसिएल छें, निकल.देखही अनेरूआ कुकुर अपन हेंज मे घोसिए चाहैए ! -- ऐं...! एना नै होम' देबै, चल- चल तूँ बढ...! -- आ तोँ ? -- हम चिलका नुकेने अबै छी, अपना सब त' लड़ि खपि लेब, मुदा ओकर की हेतै ? विचरण ! -- अहा....हा ! यै,समुद्रक किछेर मे बैसि केहेन आनन्दक अनुभव होइए ! समुद्र मे रहि रहि उठैत लहरि आ समुद्रक किछेर मे स्वतंत्र भ' लोकक विचरण ! -- यौ, जेबै नै.....चलू ने ! --अहाँ बढू ने हम पाछाँ सँ अबै छी. " लोक सब विदेश सँ आबि एत' मनोरंजन करैए, स्वीमिंग शुट मे स्वतंत्र विचरण ! अहा की आनन्दक क्षण छै. " --ओ.....त' अहाँ समुद्रक नै, ओइ स्वीमशुट बाली सब के निहारि निहारि आनन्द उठबै छी, नै ? -- नै, नै, मोन मे उठल लहरिक वर्णन करै छलहुँ. -- समुद्र मे जा देहक लहरि सेरा ने लियय, नैत' घुरमा उठत. -- ओहू मे त' लहरिये छै ! -- यौ, समुद्रक लहरि निश्छल छैक, मुदा अहाँक......कामुक. ! चुनरी आशा दीदी बस स्टॉप पर ठाढ़ि छलीह । हुनका बगलमे ठाढ़ पुरुख उचकि - उचकि क' देखनि जेना - शंका भेलनि तँ टोकि देलखिन : - अहाँ प्रतीक्षारत नहि मुदा किनको तकै छियै - नै ? - नहि - नहि ! ओहिना । - तकर माने अहाँ हमरामे हेरायल छी - नै ? - से नहि । मुदा एकटा चुनरी जँ अहाँक देह पर होइताय ..... - जखन लोकक नजरिए मे खोंट रहतै तँ झलफांफी चुनरी कोन काजक ? पुरुख हाथक समतोला छिटकि क' रोड पर गुड़कि गेलै । ओ आगू बढलाह ता मे बस समतोला पर चढ़ि गेल रहैक । मुक्ति -- हे भगवान, अहाँक घर देर ऐछ अन्हेर नै ! आइ बुझलौं। -- की यौ, केसक निबटारा भ' गेल की ? -- नै ! -- कनिञा नै देखाइ छथि ? -- आइ हम दु सँ तीन भ' गेलौं --आठम आश्चर्य , झूट्ठा नहितन ! -- कीए ? -- विआहक तीने मास भेल, आ कहै छी तेसर....! -- सत्ते कहै छी. -- कतौ सेटिंग छलनि की ? -- हँ। -- तहन खुशी ? --आइ ओकरे संग दोसर विआह क' लेलनि ! (श्री राज कें समर्पित) दरेग -- लहालोट भेल चिलका के कोरा मे लैत दादी माँ - ऐँ यै कनिञा, केहेन निर्दयी छी ? -- माँ , फैरेक्स बनेने अबै छी! -- किए ,अपन छाती लगा लैतीयै से नै ? -- माँ , अपन दुध पीएला सँ फीगर खराब भ' जएत ! बजरूओ दुध पर त' पलाइए जेतै ने ! -- धुर ....छी ! " अहाँ सँ नीक त' ओ निमुधन गए , जे अपनो बच्चा पालैए आ अहाँ सनक मायक चिलका सेहो। रिपोर्ताज आई बारहवीं वर्गक परीक्षा परिणाम बहरेलै .चारू भ'र गहमा गहमी बढ़ि गेल छल.जत' सँ जे जनतब दिए सभ ठाम टॉपर मे धीये/ सुआसिन. पत्रकारक एक टा दल , खुशी मनबैत धीया सबहक समूह मे जा प्रश्न केलनि --" सब ठाम सँ जनतब भेटैए जे ऐ बेरक टॉपर बेटीये सब ऐछ ! अहाँ सबहक की प्रतिक्रिया ? " -- यौ, पढनिहार बेटा पढि- लिखि जोकरक हेबे करतै .नै पढ़निहारो लग बड्ड विकल्प छै, कियो जूस बेचतै, कियो रिक्सा - ठेला चलेतै , तीमन - तरकारी बेचतै, नै त' जेबीये कटतै. आ ताहू सँ मोन नै भरतै त' हमर सबहक पछोड़ ध' फिरिशान हेतै. -- पूत धन के त' लपेट देलियै आ धीया सब ? -एक गोट पत्रकार टीपलक. -- " धीया सब आब टॉप क' टॉप पद पर जा अपन जूति चलेतै ." परस्पर -- हे यै ,ओम्हर द' नै जाउ.बेर उनहि गेलैए. -- की करथिन, एखन त' साँझे छै राति नै ने भेलैए ? की करतै नेतबा सब खिधान्से ने ? -- नै यै, उछन्नर करत ! -- कक्का , ओहो सब महिला दिवस मनेबाक योजना बना रहल ऐछ ! -- धुर बताहि ! महिला कल्याण की सोचत ओ सब सुथनी ! अपन जुआनीक कल्याणक रिहर्सल करैए ! -- " अहा ! मुँह केहेन लगै छै , जेना चाने हो...." " रौ चुप्प तों सब ! बेचारी विधवा अपन हुब्बा सँ धीया - पुताक पेट त' भरै छै . " -- हा..हा..हा ! नेता जी , धीया- पुताक पेट त' पछातिक गप्प , पहिने अपन देह- पेटक जुगत धरा नेने हएत ! -- हिनका कहलियैन- बाट बदलि लौथ , नै मानलनि ने.देखलखिन जनि जाति देखि कोना चौल करैए जेना ई संबंधीये रहथिन ! -- कक्का , हमरा सँ ओकर सबहक भलहिं कोनो संबंध नै होइ मुदा ओकर चालि सँ जरूर संबंध छै. -- ऐँ.....केहेन ? --ओकर बौह , पंचायत समितिक काजे बी.डी.ओ ल'ग आ बेटी , कॉलेज जाइ छै तहन दोसरो पुरूषक जीह एहिना लपलपाइत हेतै , नै ? -- ओह !ई कहिया धरि चलैत रहतै एना से नै जानि ! -- " जा धरि एहेन पुरूष सबहक आँखिक पानि सुखएल रहतै . " टकटकी बेरा बेरी लोकक जमा भेल भीड़क सोझाँ ठोहि पाड़ि क' कान' लागल छल ओ छओँड़ी. कियो किछु पुछय त' उतारा नै द' सभहक मुँह तकैत रहल.... भीड़ बढ़ैत जा रहल छल....मुदा सब मुकदर्शक बनल. शान्त भीड़ मे सँ आब शब्द बहरेलै " गै, ई कह तोहर नाम ठेकान की छौ ?" --- यौ छोड़ू, की करब नाम ठेकान बुझि ?. --- तोरा तोहर घर धरि पहुँचा देबौ. --- यौ, हमर नै कोनो घर वाँचल आछ ने कोनो ठेकाना, हम त' दंगा पीड़ित शिविर मे सँ भागि एत' एलौं ऐछ. --- किए भगलीही , अपन जान बचेबा लेल ? --- नै यौ, अपन संपति बचेबा लेल. ! --- आँय ! तहन तो अपन गाम - घर जो ने अपन संपैतक रक्षा करिहें. ---- गाम मे किछु आब कहाँ वाँचल ऐछ.जे किछु संपति शेष ऐछ ओ त' हमरे लग ऐछ.आ तकरे बचेबा खातिर त' गाम सँ भगलौं. " कत्तौ कियो रक्षक नै देखएल. !" --- के पुरूष राखत तोरा ? जे राखत ओहो बदनाम भ' जएत. हा....हा.......हा, ठठा के हँसैत......यौ , जँ पुरूष सबके बदनामीक सत्ते डर होइतै त' गाम सँ परदेश धरि हमर संपैतक नोच- नोची नै ने करितए. ? भीड़ उछहि गेल....! सुतिहार -- तों त' बड्ड सुतिहार लगै छह हौ , थम्ह' तोरा एकर सबहक मेट (Team Leader )बना दै छीय' ! -- माथ पर बज्जर खसएब की ? हम अपने पुश्तैनी काज के सुखितगर बुझै छी...! -- गामो मे सुतिहारी देखबै छलियै अहाँ मुदा पेट भूखले रहि जए. -- तें त' शहर धेलौं ! -- आब सुखीतगर छी ने ? -- सुख मरि गेल बुझू ! -- ऐँ...? -- गाम मे तंगी एहेन जे शहर एबाक सोचबा पर मासूल जोड़ब पसेना छोड़ा देने छल . आब त' सब मास मे हवाई जहाज से जा आइब सकै छी. -- मास पुरिते गाम चल जा ठेही उतारै छ' की ? -- नै साहेब, कैञ्चा पुरि गेल त' पलखति.....उड़ि गेल ! वैधव्यता जानि नहि, पुजारीक मोनमे की छन्हि - बिधवा रमाक प्रतिए ! ओकर उमेरे कतेक हेतै - अंदाजन बीस-एकैस साल । प्रतिदिन ओ अबैत अछि आ अपन मनोकामनाक प्रश्न मंदिरमे छोड़ि दैत अछि । रमेश केँ सदैव एहि बातक कचोट रहैछ जे रमा असमय घटल घटनाक बिपत्ति उघि रहलि छलि । हँ ! एक बरख कहिया ने पूरि गेल छलै ओ विकट समय । आब रमा हँसि केँ बजबामे सक्षम भेलि ताहिमे रमेशक योगदान छैक । मधुश्रावणी दिन ! मंदिरमे महिलाक जुटान - गर्द्धमिसान ! रमा हाथमे पूजाक थारीमे फल - फूल आ माला देखि पुजारी आगू अबैत रमा सँ आग्रह कयलनि - हाँ - हाँ ? रमा ! आइ सोहागिन सभक पाबनि छैक । मंदिरक शोभा स्थिर आ स्थायी रहैक - सहयोग करू, सिरिफ आइ घुरि जाउ । रमेश ई सुनतहि थारीमे राखल गेना फूलक माला उठा रमाक घेंटमे खसा देलकै आ बाजल - आब तँ मंदिरक कोनो व्यवस्था भंग नहि हयत ने ? पुजारी आर आगू बढलाह - बाबू ! अहाँ नव विधानक संरक्षण कयल निधोख पूजा करू कोखिन " हम अपन पेट पैंच लगएब,देह नै ने।" सब स्त्री-पुरूष पेट भरवा आ देह झंपवा खातिर देश-परदेश जा की ने करैए।हम त' घरे मे रहि कोखि पोसब आ सुखक सपना पूर करब। श्रॉक्सी आ रॉड्रिग्स दंपति द्वारा देल गेल विज्ञापन -"एकटा स्वस्थ कोखिन स्त्री चाही,हमर गर्भधारण आ निवारणक लेल !" इ देखिते स्मिता मुग्ध भ' गेल छलि। आ ओइ दंपतिक संपर्क मे आबि सुखक सपना देखए लागलि। स्मिता अहां किए उठेलौं एहेन डेग,लोक की कहत हमरा ,अहांकें ? देखै छीयै यशोदा बेन कें।विदेशी सब जहन ओकर घर आबि घुरै छै तहन लोक ओकरा अभच्छक संज्ञा दै छै।आब अहीं कहू जे इएह सुनबा लेल हम गाम छोड़ि सुरत धेलहुं? नै विशाल,अहां निचैन रहू,हम चिकित्सकीय विधि सं गर्भ राखब,अवैध संबंधे नै।सफल होइते भेटत एक लाख डॉलर, हम सब भ' जएब मालोमाल। "हम कोखि बेचब,देह नै।" विधान तों किए एना धौना खसेने छें गै,जो ने झंडा ल' के ,सब धीया-पुता खुशी मनबै छै। कथी के खुशी यौ ? अझुके दिन देशक अपन विधान बनल रहै। उंह!भइया लेल हमरा लेल थोड़े न । इह!छौड़ी मुंह केना तुरूच्छ जकां केने ऐछ । गै मम्मी तों त' नहिये बाज,भइया के बड़का झंडा आ हमरा छोटकी सन। माने दुनू भाय- बहीन लेल अलग- अलग विधान ने ? गै बुच्ची,की भेलौ तहन सं एना किए घाठि फेनने छें ? यौ पप्पा,सांझ खन मम्मी के कहलियै- डोलकी ला दुध नेने अबै छी। कहलक- बताहि भेलें हें।मुनहारि सांझ के जुआन बेटी जेतै दोसरा टोल,भइया के कही अनतौ दुध। तमसा जुनि।स्त्री कखनो पुरूषक चांगुर सं नोछड़ा जाइए। " त' झंडा फहरा एहने परतंत्रताक जश्न मनाबी मए बनबाक हर्ष! ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन मे ढ़ूकि गेल। कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।। क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल। नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू। यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन। गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ! मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक! हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष। " बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।" भार उघैत ऐं गै मम्मी तों इ की करै छें ? की करै छी हम रौ ? सुनै छी जे आंटी के मूइला पछाति तों अंकल के संग धेने रहै छें। मार पपिआहा के केहेन बात बजै छें रौ ! होस्टल मे रहि हमरा गाम घरक गप्प सं कोन सरोकार।गाम एलौं त' सुनलौं गौंवा,टोलबैया सं। धुर जो,तोहर प्रेम हमर अमृत ऐछ। सत्ते गै,तहन हमर बात मानमे ? हं रौ किए ने! तों दोसर बिआह क' ले। निमुधन नै छी चट...चट....चटाक!निकल, दूर भ' जो दुरा पर सं।हम सैनिकक अंग छी,कोठा वाली नै। यै,हम किछु दिन सं नवीनक घर मे नित नव लोकक अबैया सं फिरिशान छी।नवीन विआहि क' सीमा पर चल गेल मुदा बहुरिया सीमा नंघैत सन..! चुप्प करू,जहिया सं नवीन गेलैए,कनिञा के चौकठि सं बहरी देखलियैए।अपन परार एतै त' बैला देतै की ? उंह,सब दिन नवका मनसा सबहक जात अवरजात सं सती लगैए ने। जं अहीं मुहपुरूष छी त' दंडित करू ने ओहि मनसा सबके जे जबरदस्ती घर घुइस ओकरा प्रताड़ित करै छै।आ असगर घर मे ओ निमुधन भेल छै। कनिञा एकटा छओंड़ाक नरेठी धेने दुर्गा रूप मे चौकठि नांघि गेलि- 'आइ कोनो बाप नै बचेतौ।तोहर मुक्ति हमरे हाथे।' बेर पर अमरी कक्का मोइस लैत बमकि उठलाह-- पोती भेल से त' खुशीक बात मुदा जनमिते सोहर सुनि अनकट्ठल लागल। अहां सब पुरषाक सब परंपरा ध्वस्त क' मान मर्दन करता पर वीर्त छी । कक्काक पीठ पर चालू भर सं,कलकतिया,बम्बइया,पटनिया भातिज सब लुधकल-- कक्का,बेटा विवाह मे धोती-कुर्ता त्यागि शेरवानी धारण आ घोड़चढ़ी मे से हो बमकल रहियै।मोन ऐछ ने। जाह,तों सब तुर्क बना के छोड़बह।-कक्का सरदिएलाह। हौ,कनिञा सेहो आधुनिकता मे लपटएल छथि,हुनका पुछियौन इ करते सोहनगर ?ओ त' कहती डी. जे शुरु करू। नै पप्पा,जहन हिनका विजातीय कनिञा इ कहि स्वीकार जे बेटा सर्वोपरि । " त' बेटीये सं ने बेटा!बेटी जन्म पर सोहर किए नै ? उपरौंज रे रोहित ,तोहर एडमिशन भेलौ ? हं शशांक,भ' गेल,आ किताब से हो कीना गेल। कोन स्कूल मे लिखेलौ नाम ?-शशांक पूछलक सर्वोदय बाल विद्यालय मे।-रोहित बाजल। ऐं, सरकारी स्कूल मे।गेलौ तोहर पढ़ाई।किताब देखा तं ? रौ रोहितवा,सभटा त' उएह किताब छौ,जे हमर ऐछ।माने NCERTक रौ शशांक,हमर भइया सब किछु बुझल- गमल मे नाम ओत' लिखेलखिन्ह।भइया आ दीदी सेहो अही स्कूल मे पढ़ने छथिन। पढ़िए के की सब नेहाल सनाथ केलखुन सेहो कह ने ? भइया ,सरकारी बैंक मे कैशियर छथिन आ दीदी बी. टेक करै छै। हमरा कहलनि-"मोन लगा के पढ़,तोरा हम सब अपना सं उपर ल' जेबौ।" विहान भइया,मालिक कत' छथिन ? की बात,कह ने ? पप्पा बिमार छथिन,आइ काज पर नै औता। बंकियौता पाई भेट जैतै त इलाज मे काज अबितै। ऐं ! बस एतबे।अइ लेल मालिक आ तोहर बाबू किए। जखन मोन होउ हमरा लग अबिहें ,हम खोंइछा भरि देबौ। मार मुंहझौंसा के बिन देह डोलेने पाइ ! डा.साहेब,रोगी हम नै बाबू छथिन।हमर मुंह नै निंघारू हुनका देखियौन। ओ'..एत' काज लए शिक्षा नै,देह आगू कर' पड़ै छै। शहर सं शिक्षा पाबि समाज परिवर्तनक मुहिम मे सुनीता परोपट्टाक जन प्रतिनिधि भ' चमकल। मुदा अर्थाभाव मे बी.डि.ओ के धौंस देखेनिहारि आइ बाट बदलैत- बी. डी.ओ साहेब,बान्ह खन्हियबै बला प्रोजेक्ट हमरा द' दियय। हें ...हें...हें!बड़का प्रोजेक्ट बड़का पाइक एवज मे भेटै छै! आ देहक एवज मे ? टाइम पास ! दायित्व हे,इ सब राखि लियय,हम जाइ छी।आम,लीची,खम्हरूआ,सातु सब बेरा लियर दु दिन सं बन्न छल,अरूआ जएत। जा , एखने एलियै कत' जेबै ? गाम,अपन वास पर आओर कत' ,ओकर बाद त' स्वर्गे आओर कत' ? से नै,एखने एलियै दु दिनक ट्रेनक झमारल।लगले फेर....! हौ,तोरा सबकें एबा मे असोकर्ज छल',तों त' पराधीन छह,हम त' खुल्ला।तों सब हजार- बारह सए कोस पर रह' की चान पर।हम अपन बलही बोझ उघवा मे एखनो सक्षम छी। ठीक छै,सब कुशल रह'! बाबू जी,एकर सबहक खगताक फिरिस्त नमरिते रहै छै।पूर होइ बला नै। तोहर बोझक रखबार हम ? श्यामसुन्दर शशि,जनकपुरधाम कोजग्रा धूमधाम संग मनाअोल जा रहल पान एलैए । मखान एलैए । धिया पूताके खायके सामान एलैए । आई कोजाग्रत पूर्णिमा । नव दम्पतिक घरमे हर्ष वधाई भ रहल अछि । पान मखान आ मिष्ठान्नक खर्च बढि गेल अछि । सन्ध्या वतासा लुटाओल जाएत । एहि अवसरपर जानकी मन्दिरमे एक सय एक भाड आएल । असलमे रतौलीक महेन्द्रप्रसाद ठाकुरके परिवार विगत एक सय छ वर्षस‘ कोजाग्रत पूर्णीमाक दिन जानकी मन्दिरमे भाड पठवैत आएल छथि । असलमे ठाकुर परिवार भगवती सीताके बेटी मानैत अछि आ बेटिए जकॉ आजुक दिन पान,मखान,मिष्ठान्न आ कपडा लत्ताक भाड पठवैत आएल छथि । आई सन्ध्या जानकी मन्दिरमे सेहो भव्यताकसग कोजाग्रत पूर्णिमा मनाओल जाएत । मैथिलानीलोकनि राम सीताक चुमाओन करौतीह । महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव सीताक पिताक रुपमे मखान आ बतासा लूटौताह । (चित्र श्यामसुन्दर शशि) राम भरोस कापड़ि भ्रमर, नेपाल बिराटनगरमे बिद्यापति स्मृति पर्व २०११ दिसम्बर ९-१० केँ बिराटनगरमे बिद्यापति स्मृति पर्व मनोल गेल। उद्घाटन उपराष्ट्रपति परमानन्द झा केलैन। समारोहमे प्राज्ञ राम भरोस कापरी भ्रमर , डॉ. देवेन्द्र झा , गीतकार सियाराम झा सरस बिशेष रुपें आमंत्रित छलाह।९ ता. केँ प्रभात फेरी भेलै जइमे उप राष्ट्रपति सेहो भाग लेलैन। कार्यक्रममे कवि गोष्ठी ,विचार गोष्ठी आ भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम छल। जनकपुरसँ गेल प्रतिबिम्ब टोली राम भरोस कापरी भ्रमर लिखित लोक नाट्य जट-जटिनक सुंदर प्रस्तुति केलक।- जगदानंद झा 'मनु' मसोमात चारि बरखक बाद, गामक माटि-पानि जेँ देह में बहि रहल अछि हिलकोर मारलक तँ सभ काज-बाज छोरि नोकरी सँ सात दिनक छुट्टी लय कए गाम बिदा भेलहुँ | जेना-जेना गामक दुरी कम भेल जए तेना-तेना हृदयक बेग आओर गामक माटिक गंध दुनू तेज भेल जए | ट्रेन आ बसक यात्रा क्रमसँ खत्म भेला बाद गामक चौक सँ पएरे गाम हेतु बिदा भेलहुँ जेकर दुरी करीब एक किलोमीटर रहै | ओनाहितो असगर, समानक नाम पर कन्हा पर एकटा बैग आ दोसर गाम देखक लौलसा, रिक्सा छोरि पएरे चलैक लेल प्रेरित कएलक | अपन टोल में प्रबेश करिते सभसँ पहिले छोटकी काकी पर नजैर परल | ओना गामक सम्बन्ध में ओ हमर बाबी लगैत छलथि मुदा गाम में सभ कियो हुनका छोटकी काकी कहि सम्बोधित करैत छलनि तइँ हमहुँ हुनका छोटकी काकी कहैत छलियैन | उज्जर पढिया सारी पहीरने आँचर सँ माथ आ एकटा खूट सँ नाक तक मुह झपने | रस्ता सँ आँगन जाईत घरक कोन्टा पर ओहो हमरा देखलथि, जा हुनका गोर लागि आशीर्वाद लेलहुँ | "केँ... बच्चू" छोटकी काकी केँ मुह सँ खडखराइत अबाज निकलल "हाँ काकी " "कहीया एलअ" "एखन आबिए रहल छी काकी " "एसगरे एलअ हेँ " "हाँ " "आ दिल्ली में कनियाँ, धिया-पुता सब ठीक" "अहाँक आशीर्वाद सँ सभ कुशल-मंगल, अहाँक की समाचार नीके छी ? " ई प्रश्न सुनिते हुनका आँखि सँ नोर झहरअ लगलनि नोर रोकैक असफल प्रयास करैत -" कि बौआ, एहि मसोमात केँ की नीक आ की बेजए, बेजए तँ ओहि दिन भय गेलहुँ जहिया अहाँक काका नबाडिये में छोरि स्वर्ग चलि गेला, आब तँ एहि बुढ़ारी में कियोक धूओ नहि देखए चाहैए, देखला सँ सभ केँ अमंगल होएत छैक | नहि जानि बिधाता एहि अभागनि केँ आओर कतेक ओरदा देने छथि | आई महीनों केँ बाद ककरो सँ दूमुह गप्प केलहुँ आ कियो हमरो द पुछलक ....." ई कहैत काकी अपन नोर केँ नुकबैत कोन्टा सँ अँगना दीस चलि गेली आ हमहुँ गामक जिनगीक, बिधबा, मसोमात, बुढ़ारी सोचैत आगु बढि गेलहुँ | रहस्य बाबा-बाबीक विवाहक चालीसम बर्खगांठ | दुनू गोटे अपन सम्पूर्ण परिवार केँ बिच घेरएल बैसल | चारूकात एकटा खुशीक वातावरण बनल | सभ केँ मुह पर हँसी, खुशी आ प्रशन्ता झलकि रहल छल | बाबीक पंद्रह बरखक पोती, बाबीक गरदनि पर पाछू सँ लटकि कए झुलति पुछलक -"बाबी एकटा गप्प पुछू |' बाबी -" हाँ पूछै" पोती -"बाबा-बाबी हम अहाँ दुनू केँ कहियो झगडा करति नहि देखलहुँ, एकर की रहस्य छैक |" बाबी लजाईत अपन पोती केँ कन्हा सँ उतारैत -"चल पगली, एकरा ई की फुरा गेलै |" बाबीक छोटका बेटा -"नहि मए ई तँ हमरो बुझैक अछि, ओनाहितो हमर नव-नव विवाह भेलए ई मन्त्र तँ चाहबे करी |" बाबी -" चल निर्लज, सब एक्के रंग भए गेलै, अपन बाबू सँ पूछै हुनका सब बुझल छनि |" छोटका बेटा बाबू सँ -"हाँ बाबू अहीँ कहु न अपन सफल विवाहिक जीवनक रहस्य | हमहुँ अहाँ दुनू में कहियो झगडा नहि देखलहुँ, ई मन्त्र हमरो दिय न ' ( अपन कनियाँ दिस देख क') देखू ने निर्मल तँ सदिखन हमरा सँ लडिते रहैत अछि |" बाबा, एकटा नमहर साँस लैत जेना अतीत केँ देखैक प्रयास कए रहल छथि | छोटका केँ माथ पर स्नेह सँ हाथ सहलाबैत बजला -"एकरा कियो झगडा कहैत छैक ? अहाँ दुनू में जे स्नेह अछि ओहि में किछु नोक-झोंक भेनाई सेहो आवश्यक छैक | जेना भोजन में चटनी, जीवन में सब पक्ष केँ अपन-अपन महत्व छैक मुदा हाँ ई मात्र नोक-झोंक तक रहवा चाहि झगडा नहि, नहि तँ एहि सँ आगू जीवन नर्क भए जाईत छैक | पती पत्नीक बिचक आपसी सम्बन्ध नीक अछि तँ स्वर्गक कोनो जरुरी नहि आ यदि सम्बन्ध नीक नहि अछि तँ नर्कक कोनो आवश्यकता नहि ओहि अवस्था में ई जीवने नर्क अछि |" सभ कियो एकदम चूप एकाग्रता सँ हुनक गप्प सुनैत | चुप्पी केँ तोडैत बाबा आगू बजलाह -"रहल हमर आ तोहर मए केँ बिचक सम्बन्ध तँ ई बहुत पुरान गप्प छैक, जखन हमर दुनू केँ विवाह भेल आ हम दुनू एक दोसर केँ पहिल बेर देखलहुँ तखने हम तोहर मए सँ वचन लेलहुँ जे जखन हमर मोन तमसे ' तँ ओ नहि तमसेती आ जखन हुनकर मोन तमसेतनि तखन हम नहि तमसाएब | बस ओ दिन आ आई तक हमरा दुनू केँ बिच नोक-झोंक भेल झगडा कहियो नहि |" जगह महानगरीय जिवन के अव्यवस्थित आ व्यस्त जिवन मे समाय के आगु लचार आजुक जिवन शैली | रामप्रकाश के माय अपन बेटा-पुतौह आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभ मे अपन गाम सँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि | रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकान मे रहै छथि | माय कए आगमनक बाद, जगह कें दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनी मे एकटा फोल्डिंग खाट पर लगाएल गेल | राति मे एसगर निन्द कें अभाबे करट बदलैत, माय कें मन मे ओहि दिनक सुमरण आबि गेलैन्ह, जखन गामक फुश कें एक कोठलीक घर मे केना ओ दुनु बियक्ति अपन तिनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आई एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घर मे मायक निर्वाह मे असमर्थ बालकोनी मे ओछैन केलक | माय कें आँखि सँ नोरक बूंद टपकैत, नै जानि केखन आँखि लाइग गेलैन्ह | मिथिलामे जाति-पाति ई मात्र विडंबना कहु वा कोनो अभिशाप, जे राजनैतिक आजादी भेटलाक ६५ वर्ष बादो हम मिथिलाबासी अपन सोचकेँ जाति-पातिसँ ऊपर नै उठा पाबि रहल छी | मात्र राजनैतिक आजादी ऐ कारणे जे राजनैतिक रूपसँ हम स्वतन्त्र छी परञ्च आर्थिक रूप सँ हम एखनो पराधीन छी | आर्थिक पराधीनता | अर्थात हम अपन इच्छानुसार खर्च नहि कय सकै छी, मने धनक अभाब | हमर मोन होइए अपन बच्चा कए कॉन्वेंट स्कूल मे पढाबी मुदा नहि पढ़ा सकै छी, इ थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए नीक मकान मे रही मुदा नहि किन सकै छी, इ थिक आर्थिक पराधीनता | हमर मोन होइए हमरो लग मोटर साईकिल, कार हुए, हमरो कनियाँ-बच्चा नीक कपड़ा पहिरथि मुदा नहि, इ थिक आर्थिक पराधीनता | स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो आर्थिक पराधीनता किएक ? की हमरा लग बिद्या कम अछि ? की हम कोनो राजनेता नहि बनेलहुँ ? की हम प्राकृतिक रूपेण उपेक्षित छी ? उपरोक्त सब बात गलती अछि | विद्या मे हम केकरो सँ कम नहि छी | राजनीती कए खेती अपने खेत मे होइए | प्राकृतिक कृपा अपन धरती पर पूर्ण रूपेण अछि | तखन किएक ? किएक हम स्वाधीनता कए ६५ वर्ष बादो, आर्थिक पराधीनताक जीबन जिबैक लेल बेबस छी | एखनो बच्चा कए चोकलेट नहि आनि हम कहैत छीयै, दाँत खराप भय जेतौ | कमी चोकलेट मे नहि, कमी हमर जेबी मे अछि | आ इ आर्थिक पराधीनताक एक मात्र कारन अछि, हम मिथिला बासिक सोचब तरीका | आजुक युग मे जहिखन मनुख चान-तारा पर अपन पैर राखि चुकल अछि, हम मिथिला बासी एखन तक जाति-पाति कए सोचि सँ ऊपर उठै हेतु तैयार नहि छी | बाभन-सोलकन्ह कए नाम पर बिबाद | अगरा-पिछरा कए नाम पर बिबाद | ऊँच-नीच कए नाम पर बिबाद | कोनो काज कए लय क आगु बढ़ू, जेकरा नापसन्द भेल, जाति-पाति कए नाम पर बबाल खड़ा कय देत | आ इ कोनो अशिक्षित नहि बहुत पढ़ल-लिखल वर्गों सँ नहि दूर भय रहल अछि | शिक्षित माननीयव्यक्ति सब चाहे कोनो जातिक हुअए, अपन-अपन जाति कए झंडा लय कऽ आगु आबि जाइत छथि | यदि हम स्वयं व अपन मिथिला समाज कए विकसित व विकासशील देखए चाहै छी त जाति-पाति कए झंझट सँ निकलि क एक जुट भय आगु बढ़य परत | एक संगे चलै मे मतभेद स्वभाबिक छै आ ओकरा दुर केनाई निदान्त आबश्यक छै | मुदा ओई मतभेद मे जाति कए बिच मे नहि आनि क व्यक्तिगत आलोचना, समालोचना करबाचाहि | की कोनो गोट सफल व्यक्ति कए ओकर जाति कए नाम सँ जानल जाई छै ? नै, त सफलता कए सीढ़ी पर चलै लेल जाति-पातिक सहारा किएक | इ जाति-पातिक रस्ता किछु मुठी भरि राजनेताक चालि छैन | हुनकर बात मानि त हम सब अपन विकास छोरि जाति-पाति मे लरैत रहि आ ओ दुस्त राज करैत हमरा सब कए सोधैत रहत। प्रियंका झा सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली -साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त -रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल -रवीन्द्रनाथ टैगोरक१५०म जयन्तीपर साहित्य अकादेमीसँ फण्ड लेबा लेल मात्र नाम "कथा रवीन्द्र" राखल गेल -समाप्ति कालमे संयोजककेँ गलतीक भान भेलन्हि, तखन रवीन्द्रनाथ टैगोरक एकटा कविताक दू पाँतीक हिन्दी अनुवाद देवशंकर नवीन पढ़लन्हि -मात्र १८ टा कथाक पाठ भेल -७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली, ओना ई ७७म आयोजन होइतए मुदा किएक तँ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ संचालित कथा रवीन्द्र प्रभास कुमार चौधरीक शुरु कएल "सगर राति दीप जरय" क भावनाक अपमान कऽ साहित्य अकादेमीक खिलौना बनि गेल तेँ एकरा "सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल। -एकटा मैथिली न्यूज पोर्टलक महिला संचालकक पति दारू पीबि कऽ आएल रहथि आ भोजनकालोमे हुनकर मुँह भभकैत छलन्हि। ७५म सगर राति दीप जरयमे दारू पीबापर धनाकर ठाकुर जीक विरोधक बाद कथा रवीन्द्र मे सेहो ऐ तरहक घटना भेलापर साहित्य जगतमे आक्रोश अछि। -भोजनक उपरान्त कथास्थल खाली भऽ गेल आ अधिकांश वरिष्ठ कथाकार सूतल देखल गेलाह, प्रभास कुमार चौधरीक कथा लेल भरि रातिक जगरना एकटा मखौल बनि कऽ रहि गेल। -आयोजक स्वयं ऐ गोष्ठीकेँ बभनभोजक संज्ञा देने रहथि आ अन्ततः सएह सिद्ध भेल। -ई गोष्ठी सगर राति दीप जरयक अन्त आ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीक प्रारम्भ रूपमे देखल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय" आब साहित्य अकादेमी संपोषित भऽ गेल आ ओकर इशारापर हिन्दीक लोकक कब्जा भऽ गेल, जइमे हिन्दीक पोथीक लोकार्पणसँ लऽ कऽ रवीन्द्रक कविताक हिन्दी अनुवादक दू पाँतीक पाठ धरि सम्मिलित रहल। -टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ भेल, आ ऐसँ सगर राति दीप जरयक अन्तक प्रारम्भ मानल जा रहल अछि। मुदा साहित्य अकादेमी द्वारा संपोषित कवि-सम्मेलन आ सेमीनारमे टी.ए., डी.ए. सभ कवि निबन्धकारकेँ देल जाइ छन्हि मुदा एतऽ किछुए गोटेकेँ ई सौभाग्य प्राप्त भेल। -टी.ए., डी.ए. लेल विभारानीपर सेहो जोर देल गेल मुदा ओ कहलन्हि जे हुनकर आयोजन व्यक्तिगत रहतन्हि तेँ टी.ए., डी.ए. देब हुनका लेल सम्भव नै, जँ कथाकार लोकनि चेन्नै बिना टी.ए. डी.ए. लेने नै जेता तँ ओ ऐ कार्यक्रमकेँ करबा लेल इच्छुक नै छथि। अजित आजाद कहलन्हि जे हुनका टी.ए., डी.ए.भेटतन्हि तखन ओ जेता। कमल मोहन चुन्नू अजित आजादक समर्थन केलन्हि। मुदा टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भक विरोध आशीष अनचिन्हार केलन्हि तखन जा कऽ मामिला सुलझल। -विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक सभ मैथिली कथा गोष्ठी, सेमीनारमे होइ छल मुदा साहित्य अकादेमीक फण्डिंगक शुरुआतक बाद "कथा रवीन्द्र"मे विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक अनुमति नै देबाक पाछाँ फण्ड देनिहार साहित्य अकादेमीक सुविधाजनक दबाब भऽ सकैए, से साहित्यकार लोकनिक बीचमे चर्चा अछि। [-साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी दिल्लीमे शुरू भेल/ १२ टा पोथीक लोकार्पण भेल जइमे ४ टा हिन्दीक पोथी छल !! -कथा रवीन्द्र क रूपमे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली कथा गोष्ठीक आरम्भ, संयोजक अछि मैलोरंग, देवशंकर नवीन आ प्रकाश - मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल। -साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि। -आशीष चौधरी विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी लेल पोथी जखन पसारऽ लगलाह तँ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक (कन्फूजन छल जे ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क आयोजन स्थल छी जे एतऽ एलाक बाद पता लागल जे ई साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक रूपमे हैक कऽ लेल गेल अछि।) एकटा संयोजक प्रकाश झा तकर अनुमति नै देलखिन्ह, जखन कि एकर सूचना दोसर संयोजक देवशंकर नवीनकेँ दऽ देल गेल छल। प्रकाश झा आशीष चौधरीकेँ कहलखिन्ह जे जँ मंगनीमे पोथी बाँटी तँ तकर अनुमति देल जा सकैए, मुदा तकर कोनो सम्भावनासँ आशीष चौधरी मना केलन्हि । तकर बाद आशीष चौधरी विदेहक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुरक संग अपन पोथी लऽ कऽ ओतऽ सँ बहरा गेलाह। ऐ कारणसँ किछु मैथिली पोथीक लोकार्पण नै भेल (जे ओना ७६म "सगर राति दीप जरय"मे लोकार्पण लेल आएल छल साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी लेल नै।) । ई पहिल बेर अछि जखन कोनो मैथिली गोष्ठीमे मैथिली पोथी बेचबाक अनुमति नै देल गेल, हँ कन्नारोहट होइत रहैए जे मैथिलीमे पोथी नै बिकाइए। साहित्य जगतमे ऐ तरहक जातिवादी गोष्ठी द्वारा कएल जा रहल सरकारी फण्डक मैथिलीक नामपर दुरुपयोगपर चिन्ता व्यक्त कएल जा रहल अछि। -गजेन्द्र ठाकुर फेसबुकपर लिखलन्हि- जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मण्डल, उमेश पासवान, अच्छेलालशास्त्री, दुर्गानन्द मण्डल आदि श्रेष्ठ कथाकार लोकनिकेँ एकटा पोस्टकार्डो नै देबाक आयोजन मण्डलक निर्णय अद्भुत अछि, ओना तै सँ ऐ लेखक सभक स्टेचरपर कोनो फर्क नै पड़तन्हि। भऽ सकैए ७५म गोष्ठीक आयोजक अशोक आ कमलमोहन चुन्नू वर्तमान आयोजककेँ हुनकर सभक पता सायास वा अनायास नै देने हेथिन्ह आ वर्तमान आयोजक केँ से सुविधाजनक लागल हेतन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आयोजनमे सभ धोआधोतीधारी आ चन्दन टीका पाग धारी भोज खा आएल छथि, मुदा बजेबा कालमे अपन आयोजनकेँ बभनभोज बनेबापर बिर्त छथि।..ओना ई आयोजन साहित्य अकादेमीक फण्डसँ आयोजित भऽ रहल अछि आ एकरा साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी मात्र मानल जाए। मैथिली साहित्यक इतिहासमे ७६ म सगर राति दीप जरयक रूपमे ऐ जातिवादी गोष्ठीकेँ मान्यता नै देल जा सकत। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक जातिवादी चेहरा एक बेर फेर सोझाँ आएल अछि जखन ओ मैथिलीक एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़ि देलक। पवन कुमार साह लिखलन्हि-काल्हि धरि सगर रातिक आयोजक कोनो संस्था नै होइ छल। मुदा आब ई वंधन टूटि गेल। -साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक (मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल। -साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी अध्यक्षता गंगेश गुंजन कऽ रहल छथि। -कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि। -रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि। -तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण कहलन्हि, मुदा हुनका ई कथा नीक लगलन्हि। आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्द जीक बचाव करैत रहला, अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि। -दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल। विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंगकुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि। विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय इमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिता शून्य रहल।..आशीष अनचिन्हार] आशीष चौधरी, चरैया, अररिया विहनि कथा- ठक किछु दिन पहिने जखन हम पूर्णियाँसँ पटनाक लेल बस पकड़लौं तँ हमर एकटा मित्र सेहो पटना परीक्षा दै लेल जाइ छल, संयोगसँ हमरा दुनू गोटेक सीट मीरा ट्रेवल्स नामक बसमे छल जे बस बिहार राज्य पथ परिवहन निगमक अधीन आबै छल जकर पटनामे लागैक जगह गांधी मैदानसँ सटल इलाका छल। तँ हम दुनू गोटे एकटा टेम्पूसँ पहुँचलौं महावीर मन्दिरक पाछाँमे एकटा बड निक सनक चाहवलाक दोकान छलै जकर दोकानमे चाह पीबए बलाक भीड़ लागल रहै छलै, से हमहुँ दुनू गोटे चाह पीबए लेल गेलौं। किए तँ हमरो दिल्ली आबैक छल आ हमर मित्रकेँ दिनक २ बजेसँ परीक्षा छलै से हम दुनू गोटे सोचलौं जे किए नै पटना घुमी। हम दुनू गोटे पहिल शुरूआत महावीर मन्दिरसँ शुरू केलौं, ओना तँ पटना हम बहुतो बेर घुमल छी मुदा हमर मित्र कहलक जे चलू दुनू गोटे आइ घुमी। शुरूआत भगवानक दर्शनसँ भेल। ओकर बाद स्टेशन परिसरमे लागल पुरान कोयलाक मशीन छलै, से हम दुनू गोटे ओतए घुमऽ लगलौं। जखन चारू कातसँ घुमल भऽ गेल तँ एकटा कोनामे देखलौं, एकटा महिला बड जोरसँ कानै छल, से हम दुनू गोटे ओतए गेलो तँ दंग रह गेलौं किए तँ ओतए एकटा महिला एकटा मुर्दाक संग लिपटि-लिपटिकऽ कानै छलै आ कहै छलै जे हमरा पासमे कफन लेल पैसा नै छल से अहाँ सभ हमर मदद करू। लोक सभ ओकरा किछु ने किछु पाइ देबऽ लागल। हमरो इच्छा भेल जे किछु पाइ हमहुँ दिऐ, से हम अपन पाकेटसँ २० टाकाक एकटा नोट निकालिकऽ ओकरा देलौं, से ओ हमरा आर्शीवाद देलक आ कहलक जे अहाँ ढेरो दिन जीबू। हमरा ओकरापर दया आबि गेल मुदा हमर दोस्त हमरा कहलक जे अहाँ ठका गेलौं। हम ओकरा कहलो एना कोना तँ ओ कहलक जे अहाँ एकर स्थिति देखू तँ अहूँकेँ एकरापर शक भऽ जाएत। हमरा ऐ बातपर यकीन नै भेल मुदा हमर दोस्तक कहब तँ ठीके छलै। फेर ओतए एकटा लोककेँ सेहो पुछलौं तँ ओहो सएह बात कहलक आर तँ आर ओ तँ इहो कहलक जे एकरा लहाश जानै छिऐ के दै छै। हमरा सेहो मोन भेल जे बताउ के दै छलै। ओकर मुँहसँ जखन सुनलौं तँ पएर लगक माइट खसकि गेल किए। ओकरा पुलिस बला एक सए टकामे लावारिस लहाश दऽ दैत छलै, ई ओकरासँ कमा कऽ लाश गंगामे नै तँ कतौ आन ठाम लऽ जा कऽ फेकि दैत छलै। हमरो ता तक ट्रेनक समए भऽ रहल छल से हमहूँ अपन ट्रेन पकड़ैले स्टेशनक अन्दर चलि गेलौं। ठक तँ पुलिस छलै, बेचारी बुढ़िया की ठकत, ओकरासँ ठका कऽ हमरा नीके लागल। चंदन कुमार झा, सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार आलेख- भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र भ्रष्टचारक विरूद्ध वर्तमान सामाजिक आंदोलनक "प्रतीक पुरुष" श्री अन्ना हजारे जखन सरकार के अपन कर्तव्यबोध करौलन्हि तखन सत्ता पर बैसल तथाकथित जनसेवक सभके ई आंदोलन संविधान विरूद्ध लागय लागल. सांसद के संसदीय गरिमा पर आघात बुझाय लागल. लोकतंत्र के "तंत्र"क वचाव मे सत्तातंत्र संविधानक दोहाइ देबय लागल. मुदा, लोक के सभ बिसरि गेल. लोकक पीड़ा के सभ महत्वहीन बुझय लागल. चौहत्तरि बर्षक बुजूर्ग के मात्र एक आह्वान पर जखन देशक कड़ोरो जनता सड़क पर आबय लागल आ' अपन अधिकारक हेतु लड़य लागल तऽ "सत्ता"क नजरि मे ई "भीड़" बनि गेल. सत्तासीन लोक कहय लागल जे देश मे लोकतंत्र अछि भीड़तंत्र नहि. कानून बनयबाक अधिकार मात्र संसद के छैक. मतलब साफ जे चुनावक बाद जनप्रतिनिधि अपना के शासक बुझैत छथि और जनता पर अपन हुकूम चलायब संविधान प्रदत्त अधिकार.जनसेवाक सपथ धय सिंहासन धरि पहुँचला उपरांत ओ सेवा आ शासन मे भेद बिसरि जाइत छथि.ओ बिसरि जाइत छथि जे लोकतंत्र मे लोक प्रधान होइत छैक तंत्र नहि. यैह भीड़ जखन कोनो चुनावी रैली मे कोनो राजनैतिक दलक झण्डा उठौने एकठ्ठा होइत अछि तखन ई मतदाता बनि जाइत अछि, तखन ई देशक जनता रहैत अछि.नेता एकरा अपन भाग्य-विधाता बुझैत छथि और राजनैतिक रैली मे गेल जनताक प्रत्येक उचित-अनुचित कृत्य जनभावनाक द्योतक कहबैत अछि किएक तऽ यैह मतदाता प्रत्येक नेताक लेल सत्ता-प्राप्तिक साधन होइत अछि.वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे राजनीतिज्ञक दृष्टिकोण सँ "मत"क मतलब मात्र चुनाव दिन एकटा वोट सँ अछि.मतदाता के चुनावक बाद अपन अभिमत प्रकट करब चूनल प्रतिनिधि के बर्दाश्त नहि होलइत छैक. ओ एकरा अपन अधिकार मे हस्तक्षेप बुझैत छथि. जनता जखन नेताक जय कहैत अछि तखन ई देशक जागरूक नागरिक कहबैत अछि. राजनेता सभकेँ ई तखन लोकतंत्रक कर्णधार बुझना जाइत छन्हि.लेकिन यैह जनता जखन सरकारी तंत्रक तन्द्रा तोड़बाक हेतु "भारत माताक जय" कहैत अछि किंवा "वंदे मातरम्" के नारा लगबैत अछि और हाथ मे राष्ट्रध्वज लय कुव्यवस्थाक विरोध मे आवाज उठबैत अछि तखन ई सरकार आ राजनेताक नजरि मे असभ्य, उदण्ड, आ लोकतंत्रक ओ संविधानक विरोधी बनि जाइत अछि. बात सत्य छैक जे जनता अपन प्रतिनिधि के चुनाव करैत अछि आ बहुमतक आधार पर चुनल एहि प्रतिनिधि सभके भारतीय संविधान जनहित मे नियम-कानून बनयबाक अधिकार दैत छैक मुदा जखन जनप्रतिनिधि आ सरकारी तंत्र अपन एहि संवैधानिक अधिकार के समुचित उपयोग नहि कऽ पबैत अछि और जनहितार्थ कानून बनेबा मे विफल भऽ जाइत अछि तखन जनता अपन अस्तित्व बचेबाक हेतु, अपन भविष्यक निर्माणक हेतु एवं लोक कल्याण हेतु स्वयं ठाढ़ हेबाक लेल बाध्य होइत अछि आ फेर जनभावना आंदोलनक रूप धारण करैत अछि.सामजिक सरोकार लोकतंत्रक आधार होइत छैक लेकिन जखन सरोकारक अर्थ सरकारी शब्दकोषमे संकुचित भऽ जाइत छैक अथवा किछु खास वर्गक लोकक विशेषाधिकार बनि जाइत छैक तखन वंचित समाज अपन सरोकारक हेतु लड़बा लेल मजबूर भऽ जाइत अछि. भ्रष्टाचारक विरूद्ध वर्तमान जनभावना, यथास्थितवादी भऽ चुकल जनता मे नव-चेतनाक प्रतीक अछि. खास कऽ एहि मे युवावर्गक सहभागिता भ्रष्टतंत्रक लेल स्पष्ट चेतावनी अछि जे आबय बला समय सामाजिक परिवर्तनक समय अछि. समाजक मध्यम एवं निम्नवर्ग मे आयल जागृति ई संकेत दऽ रहल अछि जे लोकतंत्र मे राजा आ प्रजाक बीच कोनो भेद नहि होइत छैक, ई एकटा समतामूलक एवं विकसित समाजक निर्माणक दिशा मे एकटा पैघ एवं महत्वपूर्ण संकेत अछि. सामाजिक न्याय, समानता एवं वंचित समाजक उत्थान, जे एखन धरि मात्र नारा तक सीमित अछि एवं विभिन्न राजनैतिक दलक वोटबैंक-राजनीति के शिकार अछि, एहि दिशा मे आब जन-जागृतिक प्रवल आशा कयल जा सकैत अछि. संभबतः राजनैतिक दल सभ सेहो एहि बदलैत व्यवस्था सँ किछु सिखत और राजनीति मे जनताक सेवा के सर्वोपरि बूझल जायत. स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एखनधरि समाज के जाति-धर्म, अमीर-गरीब, ईत्यादि विभिन्न वर्गक आधार पर बाँटि प्रत्येक राजनैतिक दल सत्तासुख प्राप्त कयलक अछि. निजी स्वार्थ भारतीय राजनीति के एखन धरि मूल भावना रहल अछि और दिनानुदिन आम जनता एकात होइत गेल अछि. वर्तमान आंदोलन के तोड़बाक हेतु सेहो सत्ता लोलुप समाजक दिस सँ प्रयास कयल गेल मुदा एहिबेर एकर मार्ग मे जे कोनो बाधा-विघ्न आकि कानूनी दाँव-पेचक तिकड़म आयल सभटा घोटाला आ घुसखोरी सँ तंग जनाक्रोशक ज्वारि मे बहि गेल संगहि एकबेर फेर साबित भेल जे दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मबल, आ संयम लक्ष्यप्राप्तिक अमोघ अस्त्र अछि. ई तखन और आसान भऽ जाइत छैक जखन केयो एहन मार्गदर्शक समाज के भेटि जाय जकरा पर सभ के विश्वास हो. एहना मे जखन देशक प्रधानमंत्री, देशक सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, संसदक पटल सँ एहि आंदोलन और आंदोलनकारी के सलाम ठोकैत छथि और देर-सवेर समस्त जन-प्रतिनिधि जनता के अपन मालिक मानय लेल बाध्य भऽ जाइत अछि तखन " जनताक इच्छा संसदक इच्छा" बनि जाइत छैक. संगहि सत्तालोलूप और चाटुकारी सभके संकेत दैत अछि जे जनआंदोलन लोकतंत्रक कारक होइछ संहारक नहि. (करीब एकबर्ख पहिने "मिथिला समाद " मे प्रकाशित) विहनि-कथा- सद्गति अनहेर भ गेलै......कोना के आब कटतै ओकर परिवारक दिन......? कंठ लागल बेटी छै घर मे...... दू टा संतान मे बेटीए जेठ छै......कोना हेतइ ओकर बियाह? किशन..असेसरक बेटा ...चौदहे बरखक छै.......कोना के सम्हारतै घर.? कोना करतै बहिनक बियाह......?बेशी जथो-पात नहि छै जे बेच लेत. पाँचे कट्ठा खेत छैक. ओकरो यदि बेच लेत तखन खेतै कथी.? अनेको प्रश्न..अनेको मुँह...सगरो संवेदना...सगरो गाम एकहि टा' बात..जुलुम भ' गेलै........भरल जुआनी मरि गेल असेसर......चालीसे बरखक अबस्था मे...नहि जानि कोन बेमारी धेलकै..ओह ....कन्नारोहट...नहि देखल जाइछ किशुनमा मायक कानब..हे भगवान...ई की भइ गेलै.....? हाक-डाक छै......के जेतै कठियारी......एगारह गोटे हिम्मत क के विदा भेल. आगाँ-आगाँ किशन हाथ मे आगिक कोहा नेने विदाह भेल...मुखाग्नि देलकै..धधकि उठल अछिया..कक्का .....हबोढकार भ' कानय लागल किशुनमा हमरा कान्ह पर मूड़ी रखने...संतोष बान्ह.....नहि भेल एहि सँ आगाँ किछु कहल हमरो..कंठ बाझि गेल जेना. तीन दिन बीतल..बैसार छै आइ..कोना हेतै काज..गंगे कात मे बढ़िया हेतै-कहलियै हम."नहि-नहि, ई ठीक नइ हेतइ"- चट द' कहलखिन्ह पढुआ कका. चुप भ' गेल रही हम."कनिञा, अहाँ कोनो तरहक चिन्ता नहि करू..हमरा लेल जेहने हमर अप्पन बेटा-पुतोहु अछि तहिना अहूँ छी. हम करबइ असेसरक श्राद्ध. ओकर श्राद्ध गामे मे हेतइ. अहाँक जतेक खर्च करबाक हो से करू. अहाँक जे केने संतोष भेटै से करू. कोनो तरहक बिथुति नहि रहतैक." -असेसरक कनिञा के कहलखिन्ह पढुआ कका. केबारक अढ़ मे बैसलि किशुनमा माय आ' दरबज्जा पर बैसल किशन, किछु नहि बाजल रहय. "हाँ-हाँ, नीक जेकाँ श्राद्ध त' हेबाके चाही जाहि सँ मृतक के सद्गति प्राप्त हो"- बजलथि पण्डित कका. पंचदान श्राद्ध आ दुनू साँझ सौजनिया होयब निश्चित भेल.एकादशा......द्वादशा...बड़..बड़ी..पचमेर..बड्ड नीक काज भेलइ. जेहने पवित्र असेसरक मोन रहैक तेहने पवित्र काज भेलै.सभ सामग्री एक पर एक..... जस दैत नोतहारी....सौँसे गाम. माछ-मौसक प्रात, आगाँ-आगाँ किशुन आ' पाछाँ ओकर माय के चौक दिस सँ अबैत देख मोन मे शंका भेल.लग अबितहि पुछलियै-कत' सँ अबैत छह.? "झंझारपुर सँ"-कहलक किशुन.मोनक शंका आओर बढ़ि गेल. तखनहि पाछाँ सँ पढ़ुआ कका के अबैत देख सभ शंका दूर भ' गेल छल.रजिस्ट्री आफिस सँ?...मुँह सँ बहरा गेल हमरा..मूड़ी झुका लेलक किशुन..किशुनक हाथ मे झुलैत रसगुल्ला भरल पन्नी देख अनायास मुँह सँ बहरा गेल-"सद्गति भेट गेल असेसर के". अतुलेश्वर सोचब आवश्यक जे...... ‘मिथिला’ शब्द ककरो लेल अपरिचित नहि, अपने देश वा विदेशक कोनो कोनमे चलि जाउ मात्र ‘मिथिलाक छी’ कहब तँ ओ अहाँक परिचय बुझि जएताह। सभक मोनमे स्वत: आबि जएतनि जतए राजा जनकक राज-दरबार छल, जतए जनकनन्दनी सीताक जन्म भेल छल, जे महाकवि विद्यापतिक जन्मस्थान थिक। हमरा मोन अछि हम जखन बहुत छोट रही तँ जनकपुरमे एक बेर कोनो धार्मिक समारोह भेल रहए, जाहिमे एक दिस जतए साधुलोकनि जुटल छलाह तँ दोसर दिस बहुतो विद्वान लोकनि सेहो। ओहि मध्य एकगोट विद्वान कहलथिन्ह जे ओ जखन मास्को गेल छलाह तँ ओतए रामायण, महाभारतक सङ-सङ विद्यापतिक पदावली सेहो भेटल छलनि। सभास्थ ओ कहलथिन्ह जे –ओतए एकटा पाठक ओहि पदावलीक विषयमे अपन टिप्पणी देने रहथिन्ह जे मैथिली मधुर भाषा नहि अछि। हुनक ओ उक्ति सुनि हमर बालमोनकेँ बड़का झटका लागल, कारण हमर घर मिथिला-मैथिल-मैथिलीक लेल पूर्ण रुपेँ समर्पित छल, जतए आन-आन भाषा मात्र पाहुन भए अबैत छल, ओहि परिवेशमे बहैत बसात सभ किछु मैथिलीक लेल छल आ तेँ हमरा ओ उक्ति सुनि बड़ चोट लागल छल। मुदा किछु क्षणक विरामक बाद ओ विद्वान आगाँ बजलाह जे मैथिली मधुर नहि, सुमधुर भाषा थिक आ हम आइ ओहि धरती पर आयल छी जतुक्का भाषा सुमधुर अछि जे माँ सीताक पर्यायवाची शब्द थिक। हुनक ओ कहब हमर बालमनमे पैसि गेल आ हम निश्चय कए लेल जे आबसँ हम अपन परिचय मिथिलाबासीक रुपमे देब। ओ क्षण आयल, जखन हम पहिल बेर मिथिला सँ बाहर पूर्वोत्तरक राज्य असम पहुँचलहुँ। हमरासँ पूछल गेल ओएह प्रश्न आ हमर उत्तरो पूर्व सोचक अनुसारहिँ निकलल। हमर उत्तर सूनि ओ लोकनि सहजहिँ चर्च प्रारम्भ कए देलनि राजा जनक ओ हुनक जगत्जननी सुपुत्री सीताक, अद्वितीय महाकवि विद्यापतिक आ बहुतो मनीषीलोकनिक। हमर छाती गौरवसँ तनि गेल। हमरहि सङ रहथि एकगोट बिहारी मित्र, जे परिचयमे बिहारी शब्द जोड़लन्हि आ विभिन्न तरहक तानासँ ग्रस्त भए गेलाह। केओ चारा घोटालाक विषयमे जिज्ञासु भए गेलाह तँ केओ लालू माहात्म्यमे, केओ दरिद्रताक विषयमे सोचब प्रारम्भ कएलनि तँ केओ ट्रेनक चोड़ीक खिस्सा, जतेक मूह ततेक खिस्सा। एहि प्रसङकेँ उठएबाक कारण अछि हमर-अहाँक सोचक विषयमे किछु सोचब। मिथिलाकेँ बिहारीपनसँ तँ जुझए पड़ैत छैक, मुदा जखन खोआ-राबड़ी-अमिरतीक गप्प अबैत अछि तँ मिथिलाकेँ ताहूसँ वंचिते रहए पड़ैत छैक, ई किएक? की! मैथिलमे पौरुषक कमी आबि गेल अछि वा हमसभ एखन धरि अपन अधिकारक महत्तेकेँ चीन्हि नहि सकलहुँ अछि? वा आने कोनो गप्प, मुदा एतबा अवश्य जे हमसभ एखनहुँ दही-चूड़ा-चीनीमे लटपटाएल छी। मिथिलाक स्वर्णीम इतिहास, ओहि ठामक अद्वितीय बौद्धिक प्रकाश, मिथिलाक सांस्कृतिक प्रवासमे आबि आन सभ केओ अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छथि, मुदा ई क्षेत्र सब दिनसँ अपनहिँ द्वारा ठकल गेल अछि, अपनहिँ द्वारा साधल गेल अछि, ई किऐक? एकरहि फरिछएबाक हेतु जखन एहि ठामक मिथिला राज्य आन्दोलनक अभिप्राय विषय पर विषय-वस्तु ताकब प्रारम्भ कएल तँ एकटा आलेख भेटल- ‘हिन्दी भाषा मे अलग राज्य की माँग क्यों सन्दर्भ मिथिला’ ओहि मे बिहारक प्रशासन आ मीडियाक मानसिकताक पर संजय मिश्र लिखने छथि- “सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाके की मिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ? आगू लिखने छथि जे - सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमी में भी है। यानि इन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं? मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं। देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं।” एहि ठाम उपर्युक्त उक्ति रखबाक पाछाँ हमर ध्येय ई अछि जे हमसभ किछुओ काल लेल एहि दिशामे सोची। सोची जे, आखिर एहन मानसिकताक जन्म किएक होइत छैक? की! एकर पाछाँ मात्र एतबहि सिद्ध करब अछि जे मिथिला आ मैथिलीकेँ उचित अधिकार निरर्थक छी? की! एखनहु एकर विरोधीलोकनि इएह सोचि रहल छथि जे मैथिल मात्र चूड़ा-दहीमे विश्वास करैत छथि? की! मैथिल एखनहुँ ‘सूतल छी, बिआह होइत अछि’मे विश्वास करैत छथि? नहि तँ एहन मानसिकता किऐक? हमरा लगैत अछि जे एहि मानसिकताक पोषण भेल आर-आर तत्वक सङ दरभंगा राजालोकनिक शासनक समयमे। यदि ओ हिन्दी, देवनागरी, उर्दू, फारसी आ अंग्रेजीकेँ सम्पोषित नहि कएने रहतथि तँ आइ मिथिला-मैथिलीक ई दशा नहि भेल रहितैक। एहि प्रकारक उक्ति देबाक पाछाँ ध्येय अछि ओहि कारणकेँ ताकब, जाहि बलेँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकारसँ वंचित रखबाक साहस प्राप्त कएल जाए रहल अछि, दरभंगा राजक दूरदृष्टिक अभाव आइ धरि मिथिलाकेँ सता रहल छैक। ओना कारण मात्र ओतबे नहि अछि। हम मैथिल जन सेहो एको पाइ कम दोषी नहि छी, एकर पाछाँ। हमसब आइओ अपन क्षेत्र-अपन मातृभाषाक प्रति सजग-सतर्क नहि भए सकलहुँ अछि, प्राय: एखनहुँ एकर महत्ताकेँ नहि आँकि सकलहुँ अछि। मिथिलाक हृदयस्थली मधुबनी जिलाक झंझारपुर विधानसभाक सदस्य श्री नीतिश मिश्र अपन क्षेत्रमे साधारणो जनसँ मैथिलीमे नहि बाजि पबैत छथि, प्राय: प्रयासो नहि करैत छथि। जँ कदाचित् केओ मैथिल एहि पर टिप्पणी करितो छथि तँ नेताजीक चमचासभ आ मिथिलाक तथाकथित बुद्धिजीवी लोकनिक उक्ति होइत छनि- ‘आह, डाक्टर साहबेक बेटा ने छथिन, सभ दिन बाहरे पढ़लनि, तेँ ई क्षम्य अछि।’ औजी, मिथिलासँ बाहर पढ़बाक परम्परा मात्र मिश्रेजीक परिवारमे छनि कि आओरो लोक पढ़ि रहल छैक। जँ बाहरे पढ़ि ओहि बुद्धिकेँ प्रयोग करब छल तँ ओहि हेतु आन कतेको माध्यम छैक। मुदा, ई जननेता बनबाक लेल जनसँ जूड़ब आवश्यक आ जनसँ जुड़बाक हेतु जन-जनकेर भाषासँ जूड़ब परम आवश्यक, जन-जनकेर मातृभाषाकेँ पूरब आवश्यक। यद्यपि एहनो राजनेताक अभाव नहि जे मैथिल जनक सङ सभ दिशामे पूरि रहल छथि, नहि तँ मैथिलीक उपर उठब असम्भव छल। मुदा, एहि ठाम ई कहबामे कोनो असौकर्यक गप्प नहि जे मिथिलामे नेतृत्त्वक पूर्व अभाव अछि। केओ राजनेता एहि हेतु कृतसंकल्पितो नहि बुझाइत छथि। परञ्च, एकबेर फेर समस्या आबि ठाढ़ भए जाइत अछि हम-अहाँ साधारण मैथिलक लग। जँ सम्पूर्ण मैथिलबासी एहि हेतु कृत-संकल्पित भए उठथि तँ ककर मजाल जे मिथिला-मैथिल-मैथिलीकेँ उचित अधिकार नहि देत। मुदा, की हमसभ एहि दिशामे साकांक्ष भए सकलहुँ अछि? हमरा तँ नहि लगैत अछि, ओना अहाँ सभक जे विचार हो। एहि बीच दरभंगा गेल रही, ओतहि रहनिहार एकटा हमर मित्रक पारिवारिक भाषा हिन्दी सुनि चकबिदोर लागि गेल। ओ अपन मैथिल पत्नीसँ हमर परिचय हिन्दीमे करौलनि आ हम हुनक मूह तकैत रहि गेलहुँ। अपनाकेँ सम्हारैत-सम्हारैत अपन परिचय मैथिलीमे देल। जँ दरभंगामे ई परिस्थिति तँ बाहरक गप्पे करब व्यर्थ। एकरा कि कहब? की, ई अपनाकेँ साधारण मैथिलसँ एक ईंच उपर देखएबाक प्रवृत्ति थिक? आ कि आने किछु। मुदा विषय अवश्य विचारणीय अछि, सोचनीय अछि। एकर पाछाँ फेर कारण तकला पर जेना बुझबामे अबैत अछि जे साधारण मैथिल अपनाकेँ मुख्य धारासँ कटैत गेलाह। एतए द्रष्टव्य थिक एकटा उक्ति, जाहिमे डा.तारानन्द वियोगी रमेश रञ्जनक कविता संग्रह रक्त क आमुख मध्य लिखने छथि – भाषाशास्त्रीलोकनि जनैत छथि जे मैथिलीक जन्म जन-बोनिहार गरीब-गुरवा द्वारा अपन सांस्कृतिक तत्वसभक अभिव्यक्ति हेतु, संस्कृतक विरोधमे भेल छल। आ वैह मैथिली आगू चलिकऽ तेहन सम्भ्रान्त आ संस्कृतिनिष्ठ बना देल गेल जे आम लोक अपन भाषा आ भावके लेल ओहिठाम कोनो जगह नहि पौलनि। मुदा, यैह मैथिली जँ संस्कृतक स्थानापन्न भऽ जइतै, एहिमे धर्म-कर्म पूजा-पाठ होबऽ लगितै, शास्त्र-चर्चा होब’ लागितै तँ एक बात छल। मुदा से किए? संस्कृत अपन बादशाहत तँ कायम कयनहि रहल, एम्हर मैथिली रजनी-सजनीक भाषाटा बनिकऽ रहि गेल।- एहि उक्तिसँ आन जे किछु हो, एतबा तँ अवश्य कहल जाए सकैत अछि जे मैथिली साधारणजनसँ दूर होइत गेलीह, गुटबाजीक प्रवृत्तिसँ आहत होइत गेलीह आ तेँ अपन उचितो अधिकार प्राप्त करबासँ वंचित होइत रहलीह। अपनेसभ देखि सकैत छी जे किछु मैथिल अपनहिँ पएर पर अपनहिँ कुड़हरि भाँजि हिन्दीक सेवा लेल नाङरि ढ़ोलौने फिरैत छथि, सोच ई जे साहित्यिक प्रभाव एकहि बेरमे हिमालय पहाड़ पर चढ़ि जाएत। ई सभ यथार्थकेँ बिसरि जाइत छथि जे हिन्दीक समृद्धिमे अछि मैथिलीक भूमिका। जँ आइ मैथिली हिन्दीक उपेक्षा करए लागय तँ हिन्दीक स्थिति मिथिलामे सेहो पूर्वोत्तर आ दक्षिण जकाँ भए जाएत, जतए हिन्दी प्रसार समिति आ कि-कि ने खोलए पड़ि रहल छैक। मुदा हमरा लोकनि तँ अपन अस्मिताकेँ ताक पर राखि दोसराकेँ सहेजबामे विश्वास करैत छी, अपन सबकिछु न्योछावर कए दोसराकेँ जीवन दए गर्वक अनुभव करैत छी। स्मरण अबैछ सद्य: बीतल ओ दिन, जनकपुर मे मिथिला संघर्ष समिति लेल आन्दोलनक समय बम बिस्फोटमे पांच गोटए शहीद भेल, जाहिमे एकटा मिथिलाक रंगकर्मी रञ्जु झा सेहो छलीह। ओ आइ धरि बिना कोनो स्वार्थकें मैथिली आ मिथिलाक लेल लड़ैत रहलीह आ अन्तमे मिथिलाक लेल अपन बलिदान तक दए देलन्हि, मुदा नेपाली मिडिया खास कए कान्तीपुर मात्र, हुनका प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करब अपन कर्त्तव्य बुझलक। एहन बलिदानीक हेतु नेपाल आ भारतक कोनो वरिष्ठ साहित्यकार किछु नहि बजलाह। कोन कारण छल जे भारतीय साहित्यकारलोकनिक सङ नेपालक साहित्यकारलोकनिमे सँ डा.राजेन्द्र प्रसाद विमल, प्राज्ञ रामभरोस कापड़ि भ्रमर, श्री अयोध्या नाथ चौधरी आ महेन्द्र मलंगिया आदिक कोनो वक्तव्य प्रकाशमे नहि आएल? आइ काल्हि छोट सँ छोट खबरि मीडिया मे रहैत अछि, मुदा हिनकालोकनिक संवेदनायुक्त कोनो समाद कतहु देखबामे नहि आएल। पता नहि एकर पाछाँ कोन असंमजसता छलनि। किछु व्यक्तिक सोच छनि जे हमरासभकेँ राजनीतिक सहयोगक आवश्यकता अछि। मुदा, वाह रे ! अपनेक मानसिकता। जाहि राजनेताकेँ हम-अहाँ बनबैत छी ओ सहायता करताह तखन हम डेग उठायब, की उचित? हमरातँ बुझबामे आबि रहल अछि जे किछु एहि प्रकारक लेखक आ साहित्यकार मैथिलीक प्रतिनिधित्व क रहल अछि जनिक मानसिकतामे मिथिला आ मैथिली सँ बेसी अपन हित छनि, अपन अस्तित्वक चिन्ता छनि। मुदा एहन-एहन व्यक्तिक चर्चासँ घबड़एबाक गप्प नहि छैक, कारण आइओ धीरेन्द्र प्रेमर्षि, श्याम सुन्दर शशि, का. रामचन्द्र झा, प्रा. परमेश्वर कापड़ि, गायक सुनील मल्लिक, प्राज्ञ रमेश रञ्जन, का. रोश जनकपुरी सनक लोक नेपालमे सक्रिय छथि जनिक कृतित्त्व आ व्यक्तित्वसँ मिथिलाकेँ गर्व करबाक अवसर बेर-बेर भेटैत रहैत अछि, मुदा प्रश्न ठाढ़क ठाढ़े अछि जे की हमसभ अपन मातृभाषाक लेल कृतसंकल्पित छी? मिथिला राज्य आन्दोलन आ शहीद रञ्जु झा मिथिलाक जनमानसमे एकटा आस जागल छल जे यदि नेपालमे मिथिला राज्यक निर्माण होइत अछि तँ एकर प्रभाव भारतमे सेहो पड़त। एहि विषय पर अपन-अपन विचार आ प्रभावक बारे मे टीका-टिप्पणी भ रहल अछि । ज्ञातव्य अछि जे नेपाल मे मिथिला राज्यक विरुद्ध षडयंत्र कयला पर नेपालक मैथिल जनता एकर विरुद्ध अपन स्वर उठौलन्हि। हुनका लोकनिक पहिल डेग छल शान्तिपूर्ण ढंग सँ अपन गप्प सरकार ओ सांसद लोकनिक समक्ष राखब आ संगहि जनमानसमे एहि प्रति भावना जागरूक करब। हुनका सभक एहि प्रयासकेँ जनताक सकारात्मक सहयोग भेटब प्रारम्भ भेलासँ किछु स्वार्थी तत्त्वकेँ बहुत जोरसँ धक्का लगलनि आ तकरहि प्रतिक्रियामे विगत जानकी नवमी दिन चलि रहल शान्तिपूर्ण धरना कार्यक्रममे एक अतिवादी उग्रवादी संगठन द्वारा बम विस्फोट कएल गेल, जकर कतबो निन्दा कएल जाए, कमे होएत। हमरा जनैत ई कार्य मिथिला राज्य आन्दोलनकेँ शिथिल करबाक लेल कयल गेल छल । कारण मैथिलक विषय मे लोकक ई भावना छनि जे ओ जतेक बजैत छथि ओतेक कए नहि पबैत छथि, मुदा मिथिला राज्यक लेल चलि रहल आन्दोलनमध्य आन्दोलनी मैथिलक मानसिकता देखि स्वार्थी तत्त्वकेँ डर पैसि गेलनि, ओ सभ सोचबाक हेतु बाध्य भए गेलाह जे आइ धरि जे किछु सुनि रहल छलहुँ ओ हमरा लोकनिक भ्रम छल। हुनका सभकेँ एतबा डर पैसि गेलनि जे संघर्षक अन्तिम चरणमे पहुँचि मारि-काट पर उतरि गेलाह। स्मरण अबैछ ओ क्षण, जखन हम बम विस्फोटक समाचार कान्तिपुर नेपाली दैनिक मे पढ़लहुँ, तँ रोइयाँ ठाढ़ भए गेल आ सोचबाक हेतु बाध्य भए गेलहुँ जे कि शान्तिपूर्ण आन्दोलनक ई गति उचित? सङहि स्मरण भए उठलाह मिथिला राज्य संघर्ष समितिक अध्यक्ष प्रा. परमेश्वर कापड़ि, जनिका फोन कए मात्र ई पूछलियैन्ह जे- ‘ई की?’ । एहनो विकट परिस्थितिमे हुनक धैर्य आ साहसपूर्ण शब्द सुनि हमर मोन किछु क्षणक लेल भावुक भए भेल, मुदा एकटा योद्धाकेँ समक्ष पएबाक गौरव बोध सेहो भेल। हुनक वक्तव्य छल- ‘ई मात्र धरना पर बैसल लोक पर कयल आक्रमण नहि छल, ई छल सम्पूर्ण मैथिल पर कयल आक्रमण। जेकर जवाब हमरा लोकनि अपन अधिकार लऽकऽ देखयबाक लेल संघर्षमे गति आनब।’ एहिना जखनि कान्तिपुर क संवाददाता आ नेपाली मैथिली साहित्यकार प्रा. श्याम सुन्दर शशि सँ, जनिका सङ हमर पारिवारिक संबंध अछि आ माँक आदेश पाबि हुनक खोज खबरि लेल, तँ ओ मात्र एतबे कहलनि- ‘जे एहि लेल शहादत दिअ पड़तैक बौआ’। एहि तरहक उक्ति सुनि हुनका लोकनिक प्रति श्रद्धा सँ माथ झुकि गेल। सम्पूर्ण घटना आ षडयंत्र पर विचार कएलाक पश्चात हमर धारणा इएह बनल जे ई सांस्कृतिक अस्मिता समाप्त करबाक षडयंत्र छल। जगत्जननी सीताक ई भूमि युग-युगसँ श्रेष्ठ सांस्कृतिक क्षेत्र रहल अछि, इएह श्रेष्ठता किछु गोटएकेँ सह्य नहि भए रहल छनि। ओसभ एहि क्षेत्रक विरुद्ध सामाजिक आ सांस्कृतिक रूप सँ किछु नहि क सकलाह, तखन क्षुद्र राजनीतिकेँ अपनएबाक विचार कए एहि तरहक घिनाएल कार्य कएलनि। एही क्रममे वृहत्त मधेशक सपना देखा मिथिलाक नाम मिटेबाक प्रयत्न कयल गेल। एहि प्रकारक राजनीतिक षडयंत्रक बीच मिथिला अपन अस्तित्वक लेल लड़ि रहल अछि, मुदा बाँचत कि नहि ओ हम नहि कहि सकैत छी। हमर एकटा मित्र छथि मणिपुरक डा. लोंगजम आनन्द सिंह, जखनि हुनका सँ मिथिला राज्य आ मैथिली भाषाक विषयमे चर्चा कएल तँ ओ कहलनि जे – अहाँक कहनाम आ वर्तमान अध्ययनक अनुसारे हम कहि सकैत छी जे मिथिला आ मैथिलीक संग ई दूर्भाग्य भ गेलैक जे ओ जाधरि अपन स्वतंत्रता अक्षुण्ण रखने रहल ताधरि कतेको प्रदेशक भाषा, साहित्य आ संस्कृतिकेँ प्रभावित करैत रहल, मुदा जहिया सँ ओकर राजनीतिक प्रभाव क्षीण होइत गेलैक, ओ एकटा वृहत्त संरचनाक माँझमे फँसैत गेल आ आइ अपन भाषा आ क्षेत्रक अस्मिता बचेबाक लेल लड़ैत देखल जा रहल अछि। एहि दुर्भाग्यकेँ समाप्त करबाक लेल सर्वप्रथम अपन राज्यक स्थापना दिस सम्पूर्ण मैथिल लोककेँ अग्रसर होएबाक चाही।- हुनक ई कथन हमरा नेपालमे मिथिला राज्यक लेल संघर्ष क रहल मैथिल जनताक सोच मे समानता देखौलक। कहि सकैत छी जे ओ लोकनि पुनः अपन अस्मिता आ पूर्वमे मिथिलाक संग कयल गेल व्यवहार प्रति सचेष्ट भए उठलाह अछि आ सद्य:घटल घटनासभसँ आओर बेसी उर्जा प्राप्त करताह। आइ धरि हमरा जनैत राजा शिवसिंह आ हुनक मैथिल सिपाही केँ छोड़ि केओ मैथिल मिथिला राज्यक लेल शहीद भेलाह अछि से हमरा बुझल नहि अछि। मुदा एहि बेर मैथिल जनता अपन धरती पर डटि संघर्षक मार्ग धएलनि आ ओहि यज्ञ मे अपन प्राणक आहूति तक दए देलन्हि। हम प्रत्येक शहीदक प्रति नमन व्यक्त करैत छी, ओसभ अनचिन्हार होयतहुँ चिन्हार छलाह कारण ओ सभ मैथिल छलाह, मुदा ओहि प्राण आहुति देनिहारि एकटा शहीद, जनिका हम मात्र मैथिलक रूपमे नहि, एकटा संघर्षशील कलाकारक रूपमे जनैत छलहुँ, छलीह शहीद रञ्जु झा। जनकपुर मे रहबाक समय वा कालक्रममे कखनो जयबा काल हुनका सँ भेंट निश्चय होइत छल मुदा बेसी परिचय नहि, कारण ओ एकटा नाट्यकर्मी छलीह आ हम छलहुँ एकटा शोधार्थी, जे अपन कम सँ कम शोधक समय अपन विषय सँ इत्तर जएबाक प्रयास नहि करैत रही, आर जे करैत होथु मुदा हम इएह करैत छलहुँ। मिनाप मे एकटा सशक्त महिला कलाकारक नाम छल रेखा कर्ण आ रेखा कर्णक पश्चात सभसँ लगनशील आ कर्मशील महिला कलाकार हमरा मिनाप मे देखाएल छलीह रञ्जु। हुनक विषय मे बहुत किछु एहि सँ पहिने पढ़ने छलहुँ आ सुनैत छलहुँ आ जहिया सँ शहीद भेलीह तँ आर बेशी हुनक विषय मे जानल । मुदा जखनि हम हुनक विषय मे पढ़ैत छलहुँ तँ हमर मोन मे अनायास एकटा भावना आयल छल जे एहि बेर जनकपुर जायब तँ निश्चय हुनका सँ भेंट करब, आ एकटा रंगकर्मीक जीवन पर उपन्यास लिखबाक प्रयास करब। कारण हमरा लोकनि बहुत किछु एहि दुआरे नहि क पबैत छी जे एहि लेल अर्थ चाही , व्यवस्था चाही, एहन परिस्थितिमे कोना होएत, मुदा रञ्जु मिथिला सन परम्परावादी सोचक तीर्थ स्थान मे अपन उद्देश्य आ लक्ष्य पूरा करैत रहलीह। एहि लेल हुनका कतहुँ भेटैत छलनि मान तँ कतहु अपमान। मुदा ओ एकटा उपन्यासक कथा नायिका जेकाँ डटल रहलीह, कतहु ओहि मे ब्रेक नहि, सहज-निर्मल धार जेकाँ बढ़ैत। हमरा सभक जीवनमे जखनि कठिनता अबैत अछि आ ओहि सँ लड़बामे अपनाकेँ सामर्थ्यहीन भपैत छी, तखनि एहन–एहन मैथिलक जीवनसँ ऊर्जा भेटैत अछि, ओहि समस्यासभसँ लड़बा लेल सशक्त मानसिकताक जन्म होइत अछि। जहिना सीताक चरित्र एखनहुँ हमरासभक लेल आदर्शतम रुपमे उपलब्ध अछि, ठीक तहिना रञ्जु सेहो सम्पूर्ण मिथिलाबासीक हृदयमे बसतीह। रञ्जु भौतिक रुपेँ अपन शरीरकेँ त्यागि देल, मुदा हुनक आत्मा मिथिलाक बसात, पानि, ओकर परिवेश आ लोकक आत्मा मे जीबैत रहत सदिखन। एतए डा. धीरेन्द्र क ओहि पाँतिक, जाहिमे नारीक आदर्शतम रुपकेँ प्रतिष्ठापित कएल गेल अछि, सङ शहीद रञ्जूक प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करैत छी- नारी थिक आधार पुरुषकेर , जाहि रूपमे देखी, जनना, भगिना, मित्र, पत्नी वा दुहिता लए पेखी। नारी थिक पर्याय ममत्वक,सहनशीलता भारी जते बतहपन पुरुष करैए, सहए सदासँ नारी। सर्वंसही धरती थिक नारी, आर पुरुष आकाश, जे वर्षण कए अपन मोनसँ उपजबैत अछि चास। नारी पुरुषक कागज थिक जइ पर लिखइछ ओ कविता, नारी शितल चन्द्र-ज्योत्सना रहओ ओना नर सविता।। सुभाष चन्द्र यादव गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर अद्भुत व्यक्ति छथि। प्रखर मेधा आ प्रचण्ड ऊर्जा सँ सम्पन्न।हुनक प्रतिभाक पसार बहुत व्यापक छनि। ओ भाषा, साहित्य आ समाजक उत्थानमे जी-जान सँ लागल छथि। गजेन्द्र ठाकुर बहुभाषाविद् छथि। हुनक ई गुण शब्दकोश-निर्माण, अनेक भाषा मे पारस्परिक अनुवाद आ विभिन्न प्रकारक अनुसंधान मे प्रतिफलित भऽ रहल अछि। ओ मैथिलीक पहिल ई-पत्रिका “विदेह”क जनक छथि। “विदेह” मैथिली केँ वैश्विक मंच प्रदान कयलक अछि। मैथिल संस्कृतिक संरक्षण आ विकासक लेल ओ एकटा विलक्षण आर्काइवक निर्माण कयने छथि जे निरन्तर संवर्धनशील अछि।सात खंड मे प्रकाशित “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” गजेन्द्र ठाकुरक सृजन आ विमर्शक फुलबाड़ी थिक। साहित्यक कोनो विधा गजेन्द्र बाबू सँ छूटल नहि छनि। हुनक साहित्यिक बहुरंगी दुनिया बहुत प्रांजल आ लोकहितकारी अछि।बाल-साहित्य मे तऽ हुनक कलाक उत्कर्ष आ निखार अनुपम अछि। मुन्नी कामत नाटक- अंधविश्वास प्रथम दृश्य गंगा- बउआ………..बउआ, सुतल छहक की, देखहक बाबू दरबाजा पर बजबै छऽ। शंकर- कि, आ..हू हू हू…। गंगा- कि भेलऽ। एना किए कराहै छहक। माय गे, माय हो, देेह तँ झरकैत छह। बउआ आँखि खोलऽ, (रूदन स्वरमे) हयौ सुनै छिऐ, दौड़ू यौ, देखियौ बउआ कऽ कि भेल। यौ, आँखि ताँखि उलटेने छै यौ, जल्दी आउ ने। (रामाक धोती सम्हारैत आंगनमे प्रवेश) रामा- एना चिकरनाइ भोकरनाइसँ काम नै चलत। जाउ दौड कऽ गोसाईं घरसँ गंगाजल नेने आउ। (गंगा दौड कऽ जाइत अछि आ गंगाजलक डिब्बा नेने अबैत अछि आ कनैत-कनैत कहैत छथि।) गंगा- हे काली माइ, हमरा कोइखक लाज राखब। हमर लालकेँ ठीक कइर दिअ। हम सहि कऽ सांझ देब। रामा- पहिले गंगाजल लाउ ने तब कोबला-पाती करैत रहब। (रामा अपन पत्नीकेँ हाथसँ झटैक कऽ गंगाजलक डिब्बा छीन लैत अछि आ शंंकरक उपर गंगाजल छीट हुनकर मुॅंह वएह जलसँ धोइ दैत अछि।) रामा- बउआ उठऽ, केना लगै छऽ आब। शंंकर- बाबूजी, हमर माथा दर्दसँ फाटल जाइत अछि आ जाड़ सेहो होइत अछि। रामा- अच्छा लै ई कम्बल ओढ़ि कऽ सुइत रहऽ, कनिकबे कालमे सभ ठिक भऽ जेतऽ। यै सुनै छिऐ शंकरक माय। गंगा- कि कहै छिऐ। रामा- बउआक माथपर पीरी परहक भभूत लगाउ आ अकरा अराम करऽ दियौ। पटाक्षेप दोसर दृश्य (पति-पत्नी अपन कक्षमे बेटाक हालत पर विचार विमर्श करैत।) गंगा- कि भेल, किए अहाँ काल्हिसँ चुप छिऐ? कि कोनो अभास भऽ रहल अछि? कहू ने, के भइडाही केने छइ। एक बेर अहाँ नाम कहि दिअ, अखने झोटा पकड़ि पोटा निकालि देबै आ घिसियाबैत पूरा गाम ओंघरेबै। सँइखोउकी बेटखोइकी सभ ककरो नीक देखै लेल नै चाहै छइ। रामा- (जोरसँ) बन्द करु अपन सत्यनरायलनक कथा। ई ककरो केलहा नै अपने घरक गोसाँइ अछि। आइ तक ककरो एहेन बोखार देखने रहिऐ। अपन देहमे अतेक आगि देविये रखैत अछि। जरूर हमरासँ कोनो गलती भेल जे हमरा पर मइया तमसा गेलखिन। हमरा हिनका शांत करै लेल गुहार लगबइये पड़त। गंगा- अहाँ तँ अपने भगत छी। कौल्हका दिन निक अछि, काल्हिये बैसकी बैठाउ। हम जाइ छी, पूजाक सामग्री जुटबै लेल। (गंगाक प्रस्थान होइत अछि आ रामा गम्भीर सोचमे डुबल रहैत अछि।) पटाक्षेप तेसर दृश्य (एगो दौरामे पूजा सामग्री एकट्ठा करि गंगा आ शंंकरक आगमन, हुनके पाछू दू-चाइर लोकनी सेहो अबैत अछि।) गंगा- बउआ बाबू आबै छऽ, ताबे तूँ पूजा करऽ। ई फूल अक्षत चढा कऽ धूप देखबऽ। शंकर- (फूल जल चढबैत कहैत छथि) आब की करब? गंगा- अतऽ कल जोइड़ बैठू। (रामाक संगे चारि लोग जे ढोल आ झाइल लेन अछि, हुनकर प्रवेश।) रामा- शंकरक माय सभ तैयारी कऽ लेलौं? गंगाजल संगेमे राखने रहब। (रामा गोसाँइ निपैत अछि आ फूल अक्षत चढा कऽ माँक प्रार्थना करऽ लगैत अछि। चारू लोकनी डाला बिचमे रखैत माँक गुहार लगबैत अछि आ ढोल झाइल सेहो बजबैत अछि।) चारू लोकनी- तोहरे दुआरे मइया हम अर्जी लगैलियइ हेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हूंऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगे, बोल जय गंगे, बोल जय गंगे। बोल कि कष्ट छउ, किए बजेलऽ हमरा, बोल, बोल, कि भेलउ? गंगा- हे मइया, कि गलती भेल हमरासँ आ हमरा घरवालासँ। सभ दिन तँ अहींक पिरी निपैत आँखि खुलैत यऽ हमर, कि अपराध भेल जे हमरा बेटाकेँ अहाँ चारि दिनसँ मतेने छी। रामा- अहिना भूइज कऽ खेबउ। अपना खाय छऽ छप्पन प्रकार आ हमरा लऽ फूल अक्षत। एक दिशसँ सभकेँ भूइज-भूइज खेबउ। गंगा- एना किए कहै छऽ, अगर हमरासँ कोनो कुघटी भेल तँ हमरा माफ कइर दिअ, अहाँ जे कहब हम सभ करै लेल राजी छी। रामा- तँअ ठिक छइ, हमरा जानक बदले जान चाही। हमरा हर अमावश्याक राइतमे इकरंगा खस्सीक बैल देबही तँ तोहर कल्याण भऽ जेतउ। ले ले, लेह अक्षत, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। गंगा- अहिना हएत भगवान, हम जानक बदले जान देब। रामा- होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगा, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। आब हम चलै छी। पटाक्षेप चौथा दृश्य (ग्रामीणक बीचमे) गंगा- हयोउ, जब घरक देवता बैल मांगै छइ तँ अहाँकेँ दइमे कि हिचकिचाहट भऽ रहल अछि। बउआ दिश देखियौ तँ, आइ पॉंच दिन भेल, बेदरा एक बेर नै आँखि खोलइ यऽ। रामा- आब अपन गहबरमे बैल नै पड़ैत अछि, हमर बाबा अपन अंगोरिया आंगुर चिर कऽ बैल सौपने रहथि, ओही कऽ बदले लरू चढबैत रहथि। केना फेरोसँ बैल दी वएह सोचै छी। गंगा- अहाँकेँ बेटाक चिंंता नै अछि? हम बैल देबै, हम वचन देने छी। एगो ग्रामीण- हो रामा, किए अतेक सोचै छऽ तूँ। अपना मने तँ नइ दै छऽ। माँ मांगलकऽ। जाधरि तूँ बैल नइ देबहक शंंकर ठीक नइ हेतऽ। बेटा लऽ दऽ दहक। गंगा- सुगनी लग एक रंगा खस्सी छइ। लऽ आनू गऽ। हम कहने रहियै तँ कहलकै, लऽ जाउ। पटाक्षेप अंतिम दृश्य (ग्रामीणक भीड़क बीच बेहोस अवस्थामे शंंकर।) गीत- काली मइया हे कनिये, काली मइया हे कनिये. होइयो न सहायऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ रघुनाथ- हयोउ, कि बात छिऐ। यौ रामा, कक्काक अइठाम अतेक भीड़ कथी कऽ छिऐ। एगो ग्रामीण- हुनका बेटा कऽ देहमे काली समैल छइ, कहै छइ कि जानक बदले जान नइ देबही तँ अकरा भूइज कअ खेबउ। अखन वएह बैइल दैत अछि, ओकरे भीड़ छिऐ। रघुनाथ- कहिया तक ई अंधविश्वास रहत अहि गाममे। चलू चलि कऽ देखै छी। (रामाक घरमे रघुनाथक आगमन) रघुनाथ- काकी, कतऽ अछि बउआ, देखू। गंगा- रघुनाथ बउआ, आइब गेलहक सहरसँ। अए, देखहक ने आइ छऽ सात दिन भऽ गेलैए, आँखि नइ खोलै छइ। जाधरि बैइल नइ देबइ, नइ छोड़थिन मइया। (रघुनाथ शंंकरक नब्ज देखैत आ सिर पर हाथ राखि आँखि देखैत कहैत छथि।) रघुनाथ- काकी अहाँ सभ अपन मुर्खताक कारण अकरा जानसँ माइर देबइ। अकरा दिमागी बुखार भेल अछि। अगर इलाजमे देर करबै तँ बेटा कतौ नइ मिलत। रामा- बेसी तूँ इंगलिस नइ बतिया, ई कोनो बुखार नइ देवीक केलहा छिऐ, हमरा अपन काज करऽ दे। रघुनाथ- हो कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल क दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अहि संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आबो तँ जागऽ। रामा- तूँ आइ हमर आँखि खोइल देलहक। चलऽ बउआकेँ अस्पताल लऽ चली। “जानक बदले जान देनाइ अछि ई अंधविश्वासक बाइन करि परन हमसभ ई कि नइ लेब आब ककरो प्राण। सत्यनारायण झा दुटा बात पुत्रक जन्म दिन पर आइ हमर जेष्ठ पुत्र चि० श्री सुमनजीक जन्म दिन छनि |हमर आशीष आ शुभ कामना |जिनगी मे पूर्ण सफलता पाबथि आ अपन मेहनतिक किछु अंश गरीब गुरबाक मदति मे लगाबथि |बेटा कतबो पैघ भ’ जाइक,माय बाप क’ बच्चे बुझायत छैक |बाल बच्चाक जन्म दिनक सुअवसर पर घर मे जन्म दिनक गप्पक क्रम मे माय बाप क’ बरबस संतानक बचपन मोन परि जाइत छैक ,से आइ हमरो सुमनजीक बचपन याद भ’ गेल अछि |कोना हुनक जन्म भेलनि ,कोना पैघ भेलाह ,कोना बच्चा मे ठेहुनिया देथि ,कोना चलनाइ सिखलनि,कोना पढलनि आ कोना एखन वर्तमान मे छथि |एकएक पल मोन परैत अछि |किछु पल एहन होयत छैक जे माय बापक मोन उदास क’ दैत छैक आ किछु एहन होयत छैक जे देह मे अनेरे गुदगुदी लगैत छैक आ अनेरे हँसी लागि जाइत छैक |हमरा तीन संतान दु पुत्र आ एक बेटी |तीनूक लालन पालन ,शिक्षा –दीक्षा ,पढ़ाई –लिखाई बहुत अनुशासित ढंग सं कयल आ ओ लोकनि पूर्ण अनुशासित छथि |जाहि ठाम अनुशासन नहि बुझू ओतय क’ मालिक भगबाने | बालबच्चा क’ अनुशासन मे राखी मुदा एकटा मित्र जकाँ बचचा संग खेलाऊ |हमहू सैह करैत छलौ |बहुत आनन्द होयत छल |आब ओ सभ त’ अतीतक एकटा खिस्सा भ’ गेलैक |एखन दु मास सं हमर पौत्र चि० आकर्ष हमरा संग पटना मे छल |ओना ओ लोकनि दुबई मे रहैत छथि |भरि दिन आकर्ष संग खेलाइत छलौ |राति क’ ओ कहैत छल जे दादाजी खिस्सा कहूँ आ हम सुमन जीक बचपन,विभुजीक बचपन आ रजनीक बचपनक खिस्सा सूना दैत छलियैक आ ओ प्रसन्न भ’ जाइत छल |अपनो हम बहुत खुशी रहैत छलौ |खिस्सा सुनबैत काल हम सतत अतीत मे चल जाइत छलौ |खीस्से सुनबैत सुनबैत एकटा विचार मोन मे आयल जे जन्म दिन पर कियैक ने एकटा कविता लिखी जाहि मे बचपन सं एखन तकक झलक होयक |एहि कविता क’ अपने सभ अवश्य पढू |एहि मे कोनों साहित्य नहि छैक ,एहि मे मोनक बात बाते जकाँ लिखल छैक जे सरल आ सहज छैक |आग्रह अपन पुत्र सं जे एहि पाँती क’ अवश्य पढथि | सुजीत कुमार झा लघुकथा- निष्ठा कि देखाबा घरक कलवेलक घण्टी बाजल । हमर परम मित्र सोहन गेटपर चुपचाप भाव हीन मुद्रामे ठाढ़ छलाह संगमे हुनकर कनियाँ नीमा सेहो । हम आह्लादित होइत सोहनकँे अपन हृदयसँ लगएलहुँ । ओ धड़फड़एलैथि । दम्माक रोगी जकाँ हकमऽ लगलैथि, ‘श्रीनाथ हमरा छोड़ब नहि, अन्यथा खसि पड़ब ।’ हम घबराकऽ हुनका अपन बाँहिसँ पकड़ि लेलहु, ‘सोहन अहाँक मुँह सुखा किए गेल अछि ?’ ‘हिनका बोखार छैन्हि, तीन–चारि महिनासँ,’ नीमा बाजि उठलीह । बहुत दुःख भेल । ‘भितर चलू ।’ हम हुनका सहारा दैत कहलहुँ । मुदा ओ आगा नहि बढ़ि सकलैथि । ठाढ़े रहलाह । हुनका आँखिमे मजबुरीक भाव छलैकि आएल, ‘श्रीनाथ, हम स्वयं चलियो नहि सकैत छी ।’ हम हुनका कोरामे उठा लेलहुँ आ ड्राइंगरुम दिस बढ़ि गेलहुँ । ‘ओमहर नइँ जाहिमे हमरा राखब, ओतऽ लऽ चलू । थाकि गेल छी, विश्राम करब ।’ हम हुनका अपन शयनकक्षक बगलबला रुममे लऽगेलहुँ । ‘श्रीनाथ, आब हम एकटा बोझ भऽ गेल छी ।’ हुनकर आँखि बन्द छल । ओ लम्बा–लम्बा साँस लऽ रहल छलाह । ‘घबराउ नहि मित्र, सभ ठीक भऽ जाएत ।’ ‘आब किछु नहि भऽ सकत । डाक्टर जबाब दऽ देने अछि । नीमाक जिद्द छल धरानमे देखएबाक तँए आबऽ पड़ल । हमर किडनी खराब भऽगेल अछि शायद ।’ ‘हम अहाँकेँ डाक्टर सरोज कोइरालासँ देखाएब । एहि रोगक विशेषज्ञ छथि । हुनकर बहुत नाम छैन्हि । मुर्दामे सेहो जान पूmकि सकैत छथि । हम एखने नम्बर लगाबऽ जारहल छी । अबेर कएलासँ नम्बर नहि भेटत ।’ घरसँ प्रस्थान करऽसँ पूर्व हम अपन कनियाँसँ कहलहुँ, ‘ई हमर विशेष पाहुन छथि । स्वागत सत्कारमे कमी नहि हएबाक चाही ।’ ‘बूझल अछि, अपने निश्चिन्त रहू,’ओ कहलीह । डाक्टर सरोज कोइरालाक क्लिनिकमे बहुत लम्बा लाइन छल मुदा पछिलका द्वारसँ जा कऽ अपन जोगाड़ कऽ लेलहुँ । घूमिकऽ अएलाक बाद हुनका सभकेँ लऽकऽ जल्दीसँ डाक्टर लग पहुँचलहुँ । तखन प्रारम्भ भेल हुनकर जाँचक चक्र । ‘हिनकर दुनू किडनी सड़ि गेल अछि ।’ ‘डाक्टर साहेब ई बदलल सेहो जा सकैए ।’ ‘भारतक भेल्लोरमे किडनीके प्रत्यारोपण होइत अछि ।’ ‘हम हिनकर इलाज ओतहि कराएब , अपने रेफर कऽ देल जाउ ।’ ‘बढियाँ बात अछि । तहियाधरि हिनका हमर लीखल दबाइ चला दियौ । एक हप्ताक कोर्ष अछि । प्रत्येक दिन एकटाकऽ सुइ । मुदा ध्यान राखब कोनो प्रशिक्षित कम्पाउण्डर सँ मात्र सुइया लगाएब । नशमे सुइ लागत एहि दवाइसँ बोखार उतरि जाएत तथा हिनका राहत महशुस हएत ।’ हम डाक्टर सरोज कोइरालाक क्लिनिक आगा रहल दवाइ दोकानसँ दवाइ किनलहुँ । तखन नीमा धीरेसँ हमरा कहलैन्हि, ‘श्रीनाथ जी, दवाइ फिर्ताकऽ दियौ ।’ ‘....किए ?’ ‘एतऽसँ सीधा अपन गाम जाएब । हमरा सभकँे एकटा गाड़ी रिजर्वकऽ दिय कनिक जीप टाइपक हएवाक चाही । उबर–खाबर गामक सड़कपर जीपे चलि सकैत अछि ।’ हम अकचका गेलहुँ । ‘ई की कहि रहल छी ?’ इलाज नहि करएबाक अछि की ? ‘श्रीनाथजी अपनेकँे कनी उटपटाङ्ग लागत, मुदा एखन अपनेकेँ सम्झाइयो नहि सकैत छी । हमरा लग एतेक समय नहि अछि । हिनका होश रहिते घरपर पहुँचब आवश्यक अछि । कतेको आवश्यक कागजपर हिनकर सही लेवाक अछि । पेन्सन कागजपर सेहो ।’ ‘नीमा आश्र्चयक बात करैत छी, अहाँ अपन स्वार्थमे आन्हर तऽ नहि भऽगेल छी ? किछु आओर कठोर बात कहबाक मोन भेल मुदा अपनाकेँ रोकि लेलहुँ । वा ई कही हुनकर पतिभक्ति आ निष्ठाक सम्बन्धमे एहिसँ पहिने कोनो दोष नहि देखने छलहुँ । सोहन हुनकर सभ दिन बराइए करैत रहैत छलाह । .....सम्भव अछि ..... किडनी सड़बाक बात सूनिकऽ घबरा गेल होइथ, तँए हम शान्त स्वरमे स्मरण करएलहुँ, ‘अहाँक गाममे प्रशिक्षित कम्पाउण्डर नहि हएत । ई सुइया ककरासँ लगाएब ?’ ‘एकटा कम्पाउण्डर सेहो ठीककऽ दिअ जे सङे जाए, जे मगत ओ देल जएतै ।’ हुनकर स्वर बदलल–बदलल छल । आग्रह नहि, बरु टालमटोल बला । हुनका प्रति हमरा विभिन्न शङ्का सभ होबऽ लागल मुदा बीच सड़कपर हुनकासँ झगड़ा करब हम नीक नहि बुझलहुँ तँए कनी धीरेसँ हम कहलहुँ, ‘सभ व्यवस्थाकऽ देब, मुदा एहिमे किछु समय लागत । अहाँ सभ ताधरि हमर घर चलू । हम जल्दिए जीप आ कम्पाउण्डर लऽकऽ अबैत छी । अहाँ सभ ओतहि रहब ।’ हुनकाधथसभकँे सम्झएला बुझएलाक बाद ओ सभ हमर घर दिस विदा भेल आ हम चैनक साँस लेलहुँ, मुदा स्वयं घर जाएबाक हिम्मत नहि जुटा पाबि रहल छलहुँ । किछु देरक बाद घर पहुँचिते नीमा अपन घर जाएके बात करऽ लगलीह । तखन हमरा वर्दास्त नहि भेल । तत्काल सोहनकँे सुइ लगाएब हमर प्राथमिकतामे छल । सात दिनधरि हुनका कोनो हालतमे रोकि हम योजना बनाबऽ लगलहुँ । मोनमे विचारक बिहारि उठि रहल छल । ओ नीमाक रुप छल वा विरोधक उपाय ? एनामे हुनका भेल्लोर कोना लऽ जा सकब ? एहि चिन्तामे किछु देर सोचैत रहलहुँ । साँझ भऽगेल तखन एकटा कम्पाउण्डर लऽकऽ घर पहुँचलहुँ । सोहन आँखि मूनिकऽ ओछाएनपर पड़ल छलाह । हम घबराकऽ हुनका दिस बढ़लहुँ । हुनकर नाड़ी असमान्य गतिसँ चलि रहल छल । ओ वेहोशीक अवस्थामे छलाह । ‘कम्पाउण्डर साहेब कनी जल्दी इन्जेक्शन लगाउ ।’ ‘श्रीनाथ जी हम दवाइ फिर्ताकऽ देलहुँ अछि,’ नीमा कहलीह । ‘किए ? हम डपैटकऽ हुनकासँ पुछलहुँ । ओ डरा गेलीह । ‘इएह कहने छलाह ।’ओ सोहन दिस इशारा करैत बजलीह । हमर टेम्पे्रचर बढ़ि गेल, ‘ई अहाँसँ जहर मगता तऽ ओहो अहाँ दऽदेबै ? छी ।’ हम जमीनपर थूकि देलहुँ । ओतऽ हुनकर छाया छल । हम दौड़ैत फेरसँ सात दिनक लेल दबाइ किनकऽ लऽ अनलहुँ । कम्पाउण्डर हुनका सुइ लगओलक । हम ओकरा पैसा दऽकऽ विदा कएलहुँ । किछु देरक बाद सोहनके आँखि खूजल । हमरा चिन्ह लेलाह, ‘श्रीनाथ अहाँ कखन अएलहुँ । बहुत प्रतीक्षा करओलहुँ । हमरा जाएके व्यवस्था भऽ गेल ?’ ‘बहुत निष्ठुर छी अहाँ । हमरासँ अपन मृत्यु मागि रहल छी । अरे हम अहाँके मित्र छी यमदूत नहि । हम अहाँक यमफाँसकँे काटि देब । भेल्लोर लऽ जाएब अहाँकेँ । ई हमर निवेदन अछि । एकरा अपने हमर हठ सेहो बूझि सकै छी ।’ ‘एतेक रुपैया नहि अछि हमरा लग । सेवा निवृतिक बाद दूटा बेटीक बियाह कएलहुँ हम, से अहूँकेँ बूझल अछि । एहि बियाहमे हमर सव पैसा समाप्त भऽ गेल आओर जे किछु बाँकी छल बिमारीमे लागि गेल ।’ ‘पैसाक चिन्ता नहि करु । एकर उपाय अछि हमरा लग । एतेक रुपैया अछि हमरा लग ।’ ‘आइधरि हम ककरोसँ कर्जा नहि लेने छी आ जाधरि जीव लेबो नइँ करब ।’ ‘एकरा हमर सहयोग बुभूm ।’ ‘हम ककरो एहसान उधार नहि रखने छी आब उतारबाक सामथ्र्य नहि अछि, तँए नहि लेब,’ सोहन दृढ स्वरमे कहलैन्हि । नीमाक मुँहपर परम तृप्तिक भाव पसरि गेल, ‘श्रीनाथजी अपने अनावश्यक रुपसँ हमरापर तमसा रहल छलहुँ, अपने सेहो सम्झाकऽ बूझि गेलहुँ ने ।’ हम हुनकर जवाब तमैककऽ देलहुँ, कर्जा नहि, एहसान नहि, अहाँ अपन जमीनक किछु भाग बेच लिअ, अहाँके दू–चारि बिग्घा जमीन अछिए, ओहिमेसँ किछु हटा दियौ ।’ ‘एतेक जल्दी बढियाँ ग्राहक नहि भेटत, भेटबो करत तऽ सही दाम नहि देत । किनऽ बला हमर आवश्यकताके मजबुरी बूझिकऽ कम मोलमे किनऽ चाहत,’ नीमा ठीक कहि रहल छथि । हम हुनका बहुत सम्झएलहुँ, मुदा ओ नहि मानलथि । तखन हुनकापर हम कसिकऽ बरसि गेलहुँ, ‘जीवनदायनी दवाइ किनबाक समय रुपैयाके मोह त्यागऽ पडैÞत छै । भाव मोलक समय वर्वाद नहि करबाक चाही । फेर अहाँ सभ एहि परिस्थितिके घुमा किए रहल छी । ई केहन पति भक्ति भेल अहाँके ? ई केहन निष्ठा ? महिला जातिक लेल अहाँ कलङ्क छी । अहाँकेँ मात्र अपनासँ मतलव अछि । पेन्सन पेपरपर सही लेवाक स्वार्थ ।’ ‘श्रीनाथ, नीमाक अपमान नहि करीयौ ई सभ आरोप अछि, हमही कहने छलहुँ मृत्यु पूर्व कागज सभके ठीक करबऽ लेल । ई एक पति–परायण महिला छथि । ई हमरा खुब सेवा करैत छथि । हमरा हिनकासँ कोनो शिकायत नहि अछि, ’ सोहन कड़ा प्रतिवाद कएलैन्हि । ओ अपन इज्जत नुका रहल छलाह । ओ अपन आँखि खोलला मुदा हुनका सत्य नहि देखा रहल छल । अर्ध चेतनमे ओ सही आ गलतक आकलन सेहो नहि कऽ रहल छलाह । ‘नीमा अहाँ अपन जमीनक मोल लगाउ अहाँक इच्छा अनुसार मोलपर हम जमीन किनब । हमरा लग बन्हकी सेहो राखि सकैत छी । सुविधा अनुसार रुपैया दऽकऽ छोड़ा सेहो सकैत छी ।’ मुदा नीमा चुप भऽ गेली । एना किए ? हमर प्रस्ताव सर्वथा स्वागत योग्य छल तैयो ओ कोन उल्झनमे छथि । कतहु हुनकर सम्वेदना देखाबटी तऽ नहि अछि ? अपन पति प्रति हुनकर निष्ठा कृत्रिम तऽ नहि अछि ? ‘की अहाँक पति भक्ति एकटा ढोङ मात्र अछि ?’ ‘नहि श्रीनाथ ई नहि ..... अपन जमीन बिक्री होबऽ नहि देब । हमर कनियाँ आ धीया–पुता की खाएत ? इएह हिनका सभक लेल एक मात्र आधार रहि गेल अछि ।’ सोहन अपना कनियाँकेँ बचाब कएलैन्हि । अपन मुक्तिक मार्ग प्रशस्त करबाक लेल हुनकर युक्ति छल । किछु होउक, मुदा हम उपचारसँ विमुख नहि होबऽ देब । तँए अन्तमे हम ब्रह्मास्त्रक प्रयोग कएलहुँ, ‘नीमा अहाँ लग किछु गहना अछि, ई बात हमरा बूझल अछि, एहिसँ पतिक इलाज कराउ ई अहाँक पति निष्ठाक अन्तिम परीक्षा अछि ।’ मुदा नीमा अपन गर्दैनि झुका लेलीह । हमरा दुःख लागल । हम आश्चर्यमे छलहुँ । हम चुपचाप माता जानकीक प्रार्थना करऽ लगलहुँ, हे माता ! हिनका सभकेँ सद्बुद्धि दिऔ ।’ ‘श्रीनाथ हमर बात सुनऽ हमर स्थिर मन प्राणके अवाज सुनऽ भाइ । हमर सूर्य अस्त होबऽ बला अछि । हमरा एकर अभाष भऽ रहल अछि । हम विदेशमे शरीर त्यागऽ नहि चाहैत छी । हम भेल्लोर कोनो हालतमे नहि जाएब , ई हमर अन्तिम इच्छा अछि । घर जएबाक व्यवस्था कऽ दिअ मित्र ।’ सोहन निराश भऽगेल छलाह । हुनका अपन चारु दिस अपन मृत्यु नजर आबि रहल छल । मृत्युक भयसँ डेराएल ई हुनकर वेदना छल । मुदा नीमा हुनका झुठोके सान्त्वना देवाक औपचारिकता नहि बुझलीह, ओ हुनकर मृत्यु गीतक कनिको विरोध नहि कएलैन्हि । आखिर किए ? किए ?? हम फेरसँ सक्रिय भेलहुँ, ‘ई अहाँके मात्र भावुकता अछि मित्र । जीवन आ मृत्युमे बहुत अन्तर होइत अछि जेना दिन आ रातिमे । जाधरि साँस ताधरि आश अछि बुझऽ पड़त । ई हमरा सभक कर्तव्य सेहो अछि । अहाँ सेहो एहिना करितहुँ । अहाँक स्थानपर यदि नीमा होइतथि तऽ अहाँ की करितहुँ ? हिनका अहाँ भेल्लोर नहि लऽ जएतहुँ ।’ सोहन पुनः अपन आँखि बन्दकऽ लेलाह अपन मुँह सेहो बन्दकऽ लेलाह ओ झुठ नहि बाजि सकैत छलाह । सत्य सेहो स्वीकार नहि कऽ सकैत छलाह ओ । ओ मात्र रुसि सकैत छलाह, जिद्द कऽ सकैत छलाह, जीवाक लेल किछु तऽ चाही, ओ नीमामे नहि छल हम हुनकर मोनक अर्थ बूझि गेल छलहुँ । नीमा स्वयं जीप गाडी रिजर्व कऽ अनलीह । संगमे कम्पाउण्डर नहि जाएत एकर व्यवस्था अपने लगक शहरसँ ओ कऽ लेतिह । हम भरि राति एहि बातकेँ लऽकऽ चिन्तित रहलहुँ । हमर मोन कोना–कोना भऽ रहल छल । भोरमे जखन हमरासँ बिदा लेबऽ आएल तखन हम हुनकासँ पुछलहुँ, ‘इलाज नहि करएबाक छल तऽ एहि ठाम एलहुँ किए ?’ ‘नहि लबितहुँ तऽ गामक लोक हमरा धिक्कारैत तँए । घर–घरमे फुसुर–फुसुर होइत .... नीमा पतिकँे बढियाँ इलाज नहि करओलैन्हि । जहियाधरि चलैत–फिरैत रहथि तहिया लगक शहरमे हिनका उपचार करबैत रहलियैन्हि, मुदा एहिपर केओ ध्यान नहि देलक । सोचैत छल हएत पेन्सन लेबऽ लेल जाइत । जीपपर लादिकऽ गामसँ हिनका लेलहुँ अछि तखन गामक बच्चा–बच्चा बूझि गेल, आब केओ हमर इमानपर आङुर नहि उठाओत ।’ हुनकर सम्वेदनशीलता पुरा–पुरा कुण्ठित भऽगेल छल । हुनकर कर्तव्य परायणता आ पतिनिष्ठा खोखला भऽगेल छल । ओ एक यांत्रिक महिला छलिह । अपन गामक लोकक अभिमतके लेल अपन पतिक इलाजक नाटक कएलैन्हि । हम जाइतो जाति व्यंङ्गवाण छोड़य सँ पाछू नहि रहलहुँ, ‘ड्राइभर साहेब साँझसँ पूर्वे प्रवेश करियह, कारण गामक लोक जल्दी सूति रहैत अछि । धीरेसँ गाडी चलबियह आ जोड़सँ लगातार हर्न बजबियह । कारण सभ लोककँे पता चलि जाइक सती–सावित्री सत्यवाणकँे ल कऽ चलि आएल छथि । तीन दिनक बाद सोहन स्वर्ग विदा भऽ गेलाह । लघुकथा- लाल डायरी साँझ भऽ गेल छल । घरपर असगरे छलहुँ, अतः लनसँ लागल गेटकेँ बन्देकऽ दी । रुमसँ गेटक दुरी अतेक छल जे ओकरा खुलब आ बन्द करबाक आभास तक नहि होइत छल । केओ धीरेसँ नुकाकऽ बाउण्ड्री–वाल भितर चलि आबे तऽ पते नहि चलत । बच्चा बाहर पढैÞत अछि । पति अपन बहिनक गाम गेल छथि । वा कही घर पुरे खाली–खाली अछि । ओना घरपर एकटा नोकर अछि । जेकरा ओ बहुत निर्देशन दऽकऽ गेल छथि, मुदा कहियो ओ ९ बजेसँ पहिने नहि अबैत अछि । खालीपनक ई क्रममे टिभीकँे आविस्कार करऽ बलाकें हृदयसँ आभार प्रगट करैत छी । जखन पत्र–पत्रिकासँ मोन भरि जाइत अछि, हम टिभीक कार्यक्रममे डूबि जाइत छी । सिरियल शुरु होबऽमे एखन समय छल तँए हम सोचलहुँ ताबत अपना लेल दूटा रोटी बना ली । बच्चा आ पति बाहर रहलाक कारणे हम भानस घरक प्रति एकदम लापरवाह भऽगेल छी । एकटा तरकारी बनबैत छी ओकरो तीन बेर खा लैत छी, कखनो फलफूल खा लैत छी, कखनो दिनक भोजन तऽ गोलेकऽ दैत छी । मोनेमोन अपन निर्णयकेँ सही कहैत चलू कम भोजन कएलासँ स्वास्थ्य बढियाँ रहैत अछि । आब के ओतेक मेहनत करए, भात–दालि आ बहुत प्रकारक तरकारी बनाबऽमे किए समय लगाबी । ओना आइ–काल्हि बड़ समय रहैत अछि । ग्यास जराकऽ हम ताबाकें चुल्हापर राखि देलहुँ आ फ्रिजमेसँ सानल आँटा निकालिकऽ एकटा रोटी बेल ताबापर रखलहुँ आ दोसर बेलऽ लगलहुँ । पहिल रोटी सेकनहे छलहुँ की मूल गेटसँ घण्टीक आवाज आएल । ओह..... के भऽ सकैत अछि, एहि समय ? ‘आबि रहल छी,’ घण्टी बजबऽ बलाके सन्तुष्टिक लेल हम जोड़सँ जबाब देलहुँ, मुदा फटाफट दोसर रोटी सेकऽ लगलहुँ । किए कि गेट खोलऽसँ पहिने हम अपन सभ काजकऽ लेबऽके पक्षमे छलहुँ । कहूँ बगलमे रहल रामपुर बाली भेलीह तऽ गेलहुँ काजसँ । पाँच मिनट कहिकऽ ओ पुरे घण्टाभरि समय लऽ लैत छथि । पुरे संसारक समाचार, गपक पुरे पेटारा हुनका लग भड़ल रहैत अछि । कोनो विषयपर चाहिकऽ बात कऽ ली । संविधान निर्माण हो वा माओवादी समस्या, मधेशी नेतासभक स्थिति सभ हुनका लग रहैत अछि । कहियो–कहियो हम सोचैत छी यदि ओ राजनीतिमे होइतथि तऽ खुब नाम कमैतथि । रामपुरबालीके अएबाक आशङ्कासँ एखन हम हाथमे लागल आँटा धोए रहल छलहुँ कि कल वेल अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ घनघना उठल । ‘एस कमिङ्ग–कमिङ्ग ।’ हाथ पोछैत हम गेट दिस बढ़लहुँ । ‘ओह ! केहन–केहन लोक होइत अछि । एतेक लम्बा घण्टी बजबैत अछि की कमजोर लोकके धड़कन ओतऽके ओतहि बन्द भऽ जाएत ।’ मोनेमोन हम बजैत जारहल छलहुँ, मुदा जहिना गेटक नजदिक पहुँचलहुँ हम अपन हाथसँ अपन केस ठीक कएलहुँ, साड़ीकँे ढंगसँ अपन कान्हपर रखलहुँ आ मुँहपर कृत्रिम मुस्की अनैत अतिथिके मोनसँ स्वागत करबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ । ‘ओह अपने छी !’हम खुशीसँ बजलहुँ, ‘प्रणाम, प्रणाम यादव जी ।’ विश्वास करु ई हमर अभिवादन लेस मात्र बनाबटी नहि छल । अभिवादनक ढङ्ग आ बातचितक शब्दे व्यक्ति विशेषसँ अपनाक अन्तरङ्गता उजागरकऽ दैत अछि । आगा अभिवादनकें हात जोड़ने पतिक प्रिय मित्र सेवक नारायण यादव ठाढ़ छला । ‘बहुत दिनक बाद अपनेकेँ चरण पड़ल अछि,’ हम गेँट बन्द कऽ ड्राइँग रुम दिस बढ़लहुँ । ‘फुरसते नहि भेटैत अछि भौजी, जखन लोक काममे लागि जाइत अछि तऽ बस....., हमर वकिल साहेब नहि छथि घरपर की !’ स्कूल क्याम्पस सभमे संङे पढ़ल आ तर्कशिला भेलाक कारण यादवजी सहितक हिनकर सभ मित्र हिनका ‘वकील साहेब’ नामसँ सम्बोधित करैत छथि । ‘नहि, ओ तऽ चारि–पाँच दिनसँ बहिनक गाम गेल छथि ।’ ‘आ अएताह कहियाधरि ......’ ‘एखन दू–चारि दिन आओर लागिए जाएत आबऽमे, शायद २० गतेधरि अएताह ?’ ‘चलू बढ़िएँ भेल ओ नहि छथि । हमरा अहाँक बीच कबाबमे हड्डी बनितैथि । हम आ अहाँ जमिकऽ चलू गप्प मारैत छी,’ यादव जी दुनू हाथकें रगरैत बजलाह । ‘हँ .....हँ.... हँ किए नहि, हम असगरे बोर भऽ रहल छलहुँ, अपने बैसू हम दू मिनटमे अबैत छी ।’ ‘कथी लाए एमहर, ओमहर करैत छी बैसू भौजी, ’यादव जी निःसंकोच हाथ पकड़िकऽ बैसबाक लेल अनुरोधकऽ देलैथि । हुनकर ई व्यवहार, ई अपनापन लोककेँ बात नहि टालबाक लेल मजबुरकऽ दैत अछि । ‘अहाँ जाति हएब उएह चाह–ताह बनाबऽ वा एहिसँ मीलल–जूलल मेहनत करऽ । बेकारके झमेलामे नहि परु भौजी । जतेक मीठ अपनेक बातमे हएत ओतेक चाहमे कतऽसँ भऽ सकैत अछि ।’ हुनकर स्पष्टतापर हम मुिस्कया उठलहुँ आ बैसैत कहलहुँ, ‘से तऽ ठीके अछि मुदा अहाँक हाथ एतेक ठण्ढा किएक अछि आब तऽ फागुनो समाप्त भऽ गेल, एतेक ठण्ढो नहि अछि ।’ ‘मुदा हम जतऽसँ आबि रहल छी, ओतऽ बहुत ठण्ढ छैक ।’ ‘ठीक छैक ओना जनकपुरमे किछु ठण्ढ बेसी पड़ैत अछि ।’ ‘ओना वकील साहेबके बिना अहाँ रहि कोना लैत छी, हमहुँ किछु कम थोरहे छी , कोनो आवश्यकता हएत तऽ कहब । ’ ‘छल परपञ्च आ बनाबटीसँ दूर यादवजीके बातके कोनो दोसर व्यक्ति सूनि लिअ तऽ हुनकर चरित्रपर सन्देहकऽ सकैत अछि, मुदा जे हुनका चिन्हैत अछि सएह हुनकर साफ हृदयके बूझि सकैत अछि ।’ ‘आ कहू बच्चा अपनेके कतऽ पढ़ि रहल अछि ? दिव्या केहन छथि, हमरा यादो करैत छथि वा नहि ?’ ‘सभ किछु बूझि गेलहुँ अपने लग गप्पक कोनो स्टक नहि अछि, तखने चालू गप्प शुरु भऽ गेल, बच्चा केहन अछि, दिव्या केहन अछि आ सुनाउ ........इएह नहि !’ कोनो बात स्पष्टसँ कहि देब यादव जी के आदत छल । ‘ओना हमर इच्छा सेहो अपनेकें बेसी बोर करबाक नहि अछि । चलैत छी ।’ ‘नहि..नहि यादवजी अपने तऽ ....’ हम की सहीमे रुक्ख व्यवहारकऽ रहल छलहुँ हम स्वंयके तौललहुँ आ परेशान भऽ गेलहुँ ।’ ‘नहि भौजी, एहन कोनो बात नहि अछि । सहीमे माएके स्वास्थ्य खराब भऽ गेल अछि ओकरे देखऽ आएल छी दोसर बेर आएब तऽ दिव्याकँे सेहो लेने आएब तहियाधरि वकील साहेब सेहो आबि जएतहा तखन जमिकऽ बैसब । यादवजी उठैत कहलैन्हि, ‘एकटा चीज तऽ हम बिसरि रहल छलहुँ ।’ यादवजी पुनः सोफापर बैसला आ एकटा डिब्बा निकालैत कहलाह, ‘भौजी ई लिअ, ई डायरी अहाँके लेल अनलहुँ अछि । किछु अबेर अवश्य भऽ गेल मुदा कि करितहुँ जनवरी–फरवरीमे फुरसते नहि भेटल अएबाक । सोचलहुँ कुरियरसँ पठा दी मुदा हम तऽ डायरी अपन हाथसँ अपनेकँे प्रजेण्ट करऽ चाहैत छलहुँ ।’ यादवजी कनी माथ झुकाकऽ डायरी हमरा दिस बढा देलाह । ‘धन्यवाद ।’ हम डायरी लैत कहलहुँ । ‘ओह फेर उएह रुक्ख सन धन्यवाद, ईदमे जेना गारा मिलैत अछि तहुना गरा मिलकऽ सेहो खुशी प्रकट कएल जासकैत अछि भौजी ।’ फेर ओ जोड़सँ हँसलाह । वकील साहेव होइतथि तऽ इष्र्यासँ जड़िजैतथि सही बात छैक ने भौजी ! ठीक छै ओ अएताह तऽ नमस्कार कहि देवैन्हि,’ आ उठिकऽ ठाढ़ होइत कहलैन्हि, ‘चलैत छी भौजी । ’ ‘नमस्कार’ !’ हम हुनका गेट तक छोडऽ अएलहुँ, फेर आएब ।’ ‘हँ–हँ अबैत रहब अपनेक सपनामे,’ ओ आकर्षित मुस्कान मुँहपर आनैत कहलाह । गेटपर आबऽधरि कतेको बेर पाछू घूमि–घूमिकऽ हाथ हिलओलैन्हि । रघु ओतहि ठाढ़ छल ओकर प्रणामके जवाव देलैन्हि आ गेटसँ बाहर चलि गेलाह । हम रघुकेँ ताला लगएबाक आदेश देलहुँ आ भितर चलि एलहुँ । सोन जकाँ मेटलकेँ मेढ़ल सुन्दर डायरी शोफापर राखल छल । हम ओकर सुन्दरताकेँ देखिकऽ हाथसँ सहलाकऽ देखलहुँ आ पृष्ठ उण्टेलहुँ भितर सुन्दर आ सुदृढ अक्षरमे लिखल छल । वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट सेवक प्रसाद यादव । नीचा आजुक गते सेहो लीखल छल । लिखवाक तरिका गजव छल । सेवक प्रसाद यादव एकटा एहने व्यक्ति छथि गोर रंग, लम्बा आ भारी शरीर, उन्नत ललाट हुनकर स्पष्ट बाजब हरेक अवसरकेँ महत्वपूर्ण आ उन्मुक्त हँसी हजारोमे अलग पहिचान देने छल । एहने लाल एलबममे अपन एक फोटो संग हमरा प्रजेण्ट कएने छलथि । जहिया हम विवाह कऽकऽ आएल छलहुँ ।ओ अन्य मित्रक बाद विशेष तरिकासँ यादवजीसँ परिचय करबैत कहलैन्हि, ‘ ई छथि हमर सेवक । ओना हम हुनका अपन मित्र बना लेने छी, काज बढ़ियाँ करैत छथि तँए ठीक कहलहुँ ने यादव जी ।’ ‘हँ, हँ फेकैत जाउ, फेकैत जाउ मुदा बूझि लिअ अहाँके बातमे ई नहि आबऽ बला छथि,’ हमरा दिस तकैत कहलैन्हि, ‘एखनो समय अछि , हिनका भगाउ वकिली वाहेक हिनका किछु नहि अबैत छैन्हि । दू दिनमे अहाँ हिनकासँ उबि नहि जाएब तऽ फेर हमरा कहब ।’ फेर पति दिस तकैत कहलाह, अहाँक विषयमे एक्कहिटा बात कहऽके मोन करैत अछि कौवाक चोचमे अनारकली । आब हमर परिचय ठीकसँ कराएब वा खोलि दिअ अहाँक सभ पोल । ’ ‘ठीक छैक...ठीक छैक ...कहि दैत छियैक,’ पति हथियार रखैत कहलैन्हि, ‘एहि लम्बा चौड़ा पहाड़ जेहन शरीरक नाम अछि, सेवक ...., नहि नहि सेवक प्रसाद यादव ।’ यादवजीकेँ शरीर तानल देखिकऽ हमर पति हँसैत कहलैन्हि, ‘मुदा हम सभ हिनका कहैत छी यादवजी...’ ‘मुदा अहाँ चाही तऽ सेवक सेहो कहि सकैत छी भौजी ।’ यादवजी रोकैत कहलैन्हि । ओना हम विना कहने अपनेकेँ सेवक छी आ जखन–जखन एहि वकील साहेबसँ मोन उबिया जाए विना कोनो सङ्कोचके हमरा लग आबि सकैत छी ।’ यादवजीके कहलाक बाद जोड़सँ हँसी बजरल । ओहि दिन अछि आ आजुक दिन । २५ सालक लम्बा समय बित गेल सभ मित्रके केश उज्जर भऽ गेल, सभ एक दूटा नाती–पोता बला भऽ गेल छथि । मुदा हुनक स्पष्टता, हुनकर उन्मुक्त हँसी अखनो जहिनाकेँ तहिना अछि । कोनो समारोहक ओ जान होइत छथि । जतऽ ओ बैसथि छथि ततऽ हुनकर अगल–बगलमे लोक ओहिना आबि जाइत अछि । हरेक उमेरक लोक हुनकर बातमे इण्ट्रेष्ट लैत अछि । कहियो ओ कहैत छथि, ‘ई जीवनकेँ हँसी ठहक्के तऽ आगाँ बढ़बैत अछि । मित्र ई नहि होइत तऽ जीवनके उजार आ रुक्ख बनाबऽमे कोनो कसर नहि छोड़ने अछि ई समय ? जिन्दा आ मुर्दामे कोनो फरक देखाइत अछि कनीकाल लेल हँसि आ बाजि लैत छी । फेर तऽ चिन्ताक पहाड़ अछि आगाँमे ठाढ, नहि जानि कोन समय उपरसँ बोलाहट आबि जाइ फेर तऽ दू गज जमीन आ किछु मित्रक स्मरण ?’ बात हुनकर सारगर्भित आ सय प्रतिशत सही होइत छल , मुदा हुनकापर ई गम्भीर विषय विल्कुल नहि जँचैत छल । केओ नहि केओ कहिए दैत छल, ‘कि यादवजी अहूँ सन्तक वाणी बाजऽ लागल छी अहाँ तऽ हँसिते नीक लगैत छी ।’ ‘ठीक छै चलैत छी ।’ यादवजी जखन गम्भीर होइत छलाह तऽ उठिकऽ जएबाक लेल उद्यत भऽ जाइत छलैथि फेर मुँहपर एकटा कृत्रिम मुस्कान लबैत कहैथि,‘ नमस्कार ।’ हुनका एहिना उठिकऽ जाइत देखि लगैत छल जेना हुनका दुःखक रागकेँ किओ छू देलक अछि । ओ आइयो ओहिना उठिकऽ चलि देलाह, हम अपन कएल गेल हरेक व्यवहारकेँ टटोइल रहल छलहुँ । एतेक दिनपर ओ आएल छलाह हमर पति सेहो एतऽ नहि छलाह, हमर कोनो बात हुनका खराव वा अपमान जकाँ तऽ नहि लागल । एहि विश्लेषणमे डुबैत हम डायरीकेँ उठाकऽ अपन डोरमे राखिकऽ सुतबाक तैयारी करऽ लगलहुँ । आइ २० गते अछि । हुनका आइए आबि जएबाक छैन्हि । कोन बससँ अबैत छथि एकर सूचना सेहो ओ देने छलैथि आइ कए दिनक बाद हमर भानस घर चमकल छल । घर तऽ ठीके छल किछु विशेष देखाबए लेल हम लनसँ दू–चारि पूmल आ पात तोड़लहुँ ओकरा गुलदस्ताक रुप देलियै आ एकटा गिलासमे किछु पानि राखि गुलदस्ताकेँ सजा ओकरा डाइनिङ्ग टेवुलपर रखलहुँ । पूmल तऽ आखिर पूmले होइत अछि । माथमे लगाउ वा टेवुलपर राखी, निखार तऽ आबिए जाइत अछि । स्वयंपर बढैÞत जारहल लापरवाहीकेँ तत्कालक लेल हम त्यागि देने छलहुँ, केना ने केना हमर चालमे सेहो तेजी आबि गेल छल । अवचेतन मोनमे बैसल एकटा पतिक प्रेमे तऽ कहल जा सकैत अछि । बच्चा घरपर नहि अछि तऽ कहियो–कहियो अधेर अवस्थामे सेहो युवा अवस्थाक आभास वा दोसर ढंगसँ कही तऽ आनन्द होइत अछि । अबेर भऽ रहल छल हम बेर–बेर मेन गेट दिस तकैत छलहुँ । घण्टी बजिते हम एक्के धापमे मेन गेटपर पहुँच गेल छलहुँ पतिक मुँह उदास देखि हम असमञ्जसमे छलहुँ जे हिनका की भेलैन्हि अछि ? आखिर पुछिए लेलहुँ, ‘ की भेल अछि ? मोन तऽ ठीक अछि ?’ ‘नहि ....’ उदासी भड़ल जवाव भेटल,‘ थाकल छी कनी आरामकऽ लिअ वा हाथ मुहँ धो लेब तऽ भोजन लगाएब,’ हम चाह दैत पुछलहुँ । पति चाहकेँ टेवुलपर राखि देलैन्हि आ ठण्ढा साँस छोड़ैत जुत्ता सहिते शोफापर पड़ि रहलाह । की भऽ गेल छैन्हि हुनका कतहु वल्डप्रेसर तऽ नहि भऽ गेल छैन्हि हमरा बहुतरास चिन्ता घेर लेलक । ‘हमर मित्र सेवक प्रसाद यादव स्मरण अछि अहाँकेँ,’ किछु देर चुप रहलाक बाद शुरु कएलैन्हि । ‘स्मरण किए नहि रहत ? अहाँ एना किए पूछि रहल छी एखन ...........’ एहिसँ पहिने हम अपन बात पूरा करितहुँ एहिसँ पहिने निर्मेष दृष्टि लैत धाराप्रवाह कहऽ लगलाह, ‘ सेवक प्रसाद यादव हमरा सभक प्रिय मित्र, पतिक नोराएल आँखि किछु अनहोनीक संकेत दऽ रहल छल । हमर पूरा शरीर कानमे केन्द्रीत भऽ गेल ।’ हमरा सभसँ रुसिकऽ चलि गेल साक्षी..........।’ ‘की ? .......आकाशपरसँ खसबाक पार आब हमर छल । हम किछु कहऽ चाहि रहल छलहुँ मुदा किछु सुनबाक अवस्थामे हमर पति कहाँ छलथि, ओतऽ मात्र बाजि रहल छलाह, ‘हुनकर माय विमार छल, देखवाक लेल अफिसक जीपसँ आबि रहल छलाह । हुनकर आदत छैन्हि, ड्राइवरकेँ ओ पाछू बैसा देलाह आ स्वयं जीप ड्राइव करऽ लगैत छलाह । ओना ओ ड्राइव बढियाँ करैत छलाह, मुदा ओहि दिन नहि जाइन की भेल, शायद सड़कपार करैत एकटा मालकेँ बचएबाक चक्करमे हुनकर जीप उनैट गेल आ खधियामे खसि पड़ल । ड्राइभरकेँ तऽ कनी–मनी चोट लागल मुदा स्टेरिङ्ग छातीमे घूसि गेलाक कारण यादवजीकेँ घटने स्थलपर मृत्यु भऽ गेल । एखने हुनकर घरसँ आबि रहल छी । दिव्याकेँ तऽ हाले नहि पुछू । हुनकर माए वेचारी कानि–कानिकऽ अधमरु भऽ गेल छल । ४७ वर्षक कोनो मरबाक उमेर होइत अछि । तीन–तीनटा वच्चा अछि । की हएत ओकर ? हे भगवान अहाँ चूनि–चूनिकऽ लोककेँ लऽ जाइत छी । हुनका बजा तऽ नहि सकैत छी । ‘काल्हि अहूँ ओतऽ चलि जाएब, लोककेँ सान्तवनो मलहमके काज करैत अछि । ’ ‘सुनू हमरो किछु सुनू’ हमर बात नहि सूनि रहलाक कारण हमरा तामस आबि रहल छल । हुनक मृत्यु कए गतेकऽ भेल छल ।’ ‘ १७ गते कऽ ।’ ‘१७ गते कऽ ....एहि १७ गते कऽ ।’ हमर आँखि आश्चर्य आ रोमाञ्चसँ भड़ल जा रहल छल ।‘ हँ.. हँ.. इएह १७ गते कऽ ।’ ‘मुदा एना कोना भऽ सकैत अछि हमर मतलव एहि १८ गते कऽ अहाँक अनुपस्थितीमे ओ अपना घरपर आएल छलाह आ एही ठाम बैसल छलैथि ...। हमरा संग बातोचित कएने छलैथि ।’ ‘की कहि रहल छी अहाँ ? ...होशमे तऽ छी, हुनकर मृत्यु फागुन १७ गते भोरेमे भेल छल आ १८ गते भोरमे अन्तिमो संस्कार भऽ गेल एहि बातक सयकड़ो लोक गवाह अछि । अहाँ कहैत छी जे १८ गतेक साँझमे ओ आएल छलाह । जे मोनमे आएल से कहि दैत छी । किछु स्मरणो–तस्मरणो रहैत अछि की नहि ?’ हमर पति हमरापर अनाप–सनाप कहि रहल छलैथि मुदा, हमर शरीर एहि बातकेँ स्वीकारयके पक्षमे नहि छल बातक सत्यताक ज्ञान एखन मात्र हमरे छल हमर हाथ–पएर काँपिकऽ ठण्ढा भऽ गेल छल । यादवजीद्वारा पकरल गेल हाथक अनुभव हमरा वेहोशीके अवस्थामे आनि देने छल, मुदा हमरा सत्यताक प्रमाण देवाक छल । शक्ति जमाकऽ हम कहलहँु, ‘ हमरा बढ़ियाँ जकाँ स्मरण अछि ओ १८ गतेक साँझ छल ओहि दिन हम दुधबलाकेँ हिसाब देने छलहुँ हमर बातपर विश्वास नहि हुअए तऽ रघुसँ पुछि लिअ । हुनका जाइत समय ओहो गेटपर ठाढ़ छल । उएह तऽ गेट वन्द कएने छल ।’ ‘हँ मालिक मलिकानि ठीक कहैत छथि हमर नमस्कारकेँ ओ हाथ उठाकऽ जवाव सेहो देलैन्हि । बरण्डापर ठाढ़ रघु हमर बातकेँ पुष्टि कएलक । ‘ मुदा एना .....कोना भऽ सकैत अछि ।’ पतिपर एखनो अविश्वासक बादल छाएल छल । तखने हमरा एका–एक यादवजीद्वारा देल गेल डायरीक स्मरण आएल, हम दौड़ैत डोर दिस बढ़लहुँ ओ डायरी एखनो ओहिठाम राखल छल । थरथराइत हाथसँ ओहि डायरीकेँ निकालहुँ हमरा हाथमे छल हमर सत्यताक प्रमाण । ओ हमर पाछू आबिकऽ ठाढ़ भऽ गेलाह । ‘देखू ई डायरी यादवजी अपने हाथसँ हमरा देने छलैथि । दूइए दिनक बात अछि डायरीक पन्ना उनटऽबैत हम कहलहुँ हमरा अहाँकेँ सम्बोधितकऽ देल गेल डायरीपर हुनकर हस्ताक्षर आ १८ गते लिखल अछि । ई रोमाञ्चक बात सूनिकऽ हमर पति मित्रक दुःखसँ उबरिकऽ एहि सोचमे डूवि गेलैथि जे मृत्युक बाद ककरो आत्माकेँ एहि प्रकारे कतहु जाएब आएब सम्भव अछि । की आजुक युगमे केओ एहिपर विश्वासकऽ सकत ? मुदा जतेक ई सत्य अछि यादवजीकेँ मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गतेक साँझ हमरा घरपर हुनक आएब, जेकर सत्यता ई लाल डायरी प्रमाणितकऽ रहल छल । हमर पति श्रद्धासँ डायरी सहलौलैन्हि । पहिल पन्नापर लिखल वकील साहेब आ भौजीकेँ सप्रेम भेट । सेवक प्रसाद यादव । यादवजीक नाम देखिकऽ ओ पुनः दःुखित भऽकऽ कहलाह, ‘हमरासँ भेटकऽ जइतहुँ मित्र, एकटा स्मरण छोड़िकऽ गेलहुँ मात्र । ओ एक–एकटा पृष्ठकेँ एना उण्टाबि रहल छलैथि ओकर मध्य हुनकर मित्र बैसल हो । मुदा की ! भितर पन्नापर जेना घड़ि रुकि गेल हुए । हरेक पन्नापर एकहिटा गते लिखल छल फागुन १८ गते आ मात्र फागुन १८ गते ............। लघुकथा- मेनका शहर बदैल गेलासँ बहुत किछु बदैल जाइत अछि । ओतऽ ओ महिला क्याम्पसमे बर्षोसँ पढ़ा रहल छलीह । तँए सह शिक्षणके लेल एहि क्याम्पसक माहोल किछु अजिब सन लागि रहल छलैन्हि । मुदा कुल मिला कऽ ई परिवर्तन मनकेँ निके लागि रहल कहल जा सकैए । एक रस्तासँ शायद ओहो एखनधरि अगुता गेल छलीह । नया स्थान, नया परिवर्तन .... धीरे–धीरे ओ सभसँ परिचित भऽ रहल छलीह । समस्या एक्केटा छलैन्हि कि पहिल पिरियडकेँ लेल घरसँ भोरे–भोर निकलऽ पड़ैत छलैन्हि । बहुत प्रयासक बाद हुनका भाड़ा बला घर भेटल रहैन्हि आ ओहो क्याम्पससँ बहुत दूर । ‘अहाँ राजीव सरसँ कहिकऽ अपन समय किए नहि बदलबा लैत छी ?’ गौरी हुनका सल्लाह देलीह । ‘राजीव सर .....,’मेनका किछु चौंकली । ‘हँ, ओहे तऽ सहायक क्याम्पस चिफ छथि । टाइम टेवल ओहे बनबैत छथि ।’ ‘कतऽके छथि ?’ ‘गजव छी मैडम । अतेक दिन भऽगेल एखन धरि अहाँके राजीव सरसँ परिचय नहि भेल अछि ।’ मेनका किछु लजा सन गेलीह । फेर ओहि दिन ओ हुनकर कार्यालयमे पहुँचलीह । फर्मपर माथ झुकाकऽ किछु चेककऽ रहल छली । हुनका देखिते उल्टे कहलैन्हि, ‘बैसू मेनका जी ।’ ‘मेनका .....’एक्कहि संग कएटा प्रश्न चिन्ह उभैर आएल हुनकर मुखाकृतिपर । ‘अहाँके शायद स्मरण नहि अछि अहाँक पुरनका क्याम्पसमे भेल कथा गोष्ठीमे अहाँसँ भेट भेल रहए,’ राजीव मुँहपर कनी मुस्कान अनैत बजलाह । ‘ओह.....,’ तखने हुनका राजीवक नाम किछु परिचित सन लागल छल । ओ मनेमन स्वयंसँ कहलीह,‘ हमहूँ कतेक बिसराह छी ।’ फेर एक्के स्वरमे सभ किछु बाजि गेलीह, ‘हमरा अपन पिरियडके समय बदलएबाक अछि । बहुत समस्या होइत अछि, घर बहुत दूर अछि । सवारी तक नहि भेटैत अछि ।’ ‘ओ ..........,’ गम्भिरतासँ बजलाह राजीव, ‘मूल समस्या अपनेक घरक अछि ने ? अहाँ एना किए नहि करैत छी हमरे घरमे आबि जाउ ? उपरका तल्ला खालिए रहैत छैक । घर एहि क्याम्पसक लगेमे अछि,’ कहिकऽ राजीव सर एकटा प्रश्न सूचक दृष्टि हुनकर मुँहपर देलैन्हि । ‘जी.........’ओ कनी अकचका गेलीह । ‘ठीक छैक, पहिने अपने घर देखि लिअ, तखन तय करब ।’ हुनकर घरसँ एलाक बाद मेनका बहुत दुविधामे पड़ि गेलीह । की करु ? हुनका पुरा–पुर अस्वीकार कऽ देबऽ चाहैत छल ? मुदा नहि जानि किए ओ चुप रहली । किए नहि कहि सकलीह की हुनका महल्लाबला घर पसिन नहि अबैत अछि ? हुनका तऽ दूर एकान्त चाही । जतऽ पत्ता तक नहि हिलए । एहने वातावरण पसिन छलैन्हि हुनका । मुदा आब की करतीह ? मोन मारि कऽ राजीव सर संगे जाए पड़लैन्हि । ओतऽ परिचय भेलैन्हि राजीव सरके कनियाँ आरती आ हुनकर दूटा बच्चासँ । ओ सुखद गृहस्थीकें देखिकऽ मोन भितर उठऽ बला टीसके ओ बहुत मुस्किलसँ दबा सकलीह । आरती हुनका खुब आदर–सत्कार कएलीह । बच्चा तऽ पहिल भेटेमे घूलिमिल गेल छल । आश्चर्य अतेक दिनक बाद कोनो घर परिवारमे अपनापनमे डूबल जेकाँ लागल । ‘दिदी, आइए अहाँ अपन सभ समान आनि लिअ । सभ गोटे मीलिकऽ रहब,’ आरती बहुत आत्मियतासँ बजलीह । हुनकर आग्रहकँे अस्वीकार नहिकऽ सकलीह मेनका । धीरे–धीरे ओ परिवारके विषयमे बहुत किछु जानि गेल छलीह । राजीव सर किछु लजकोटर छलाह । बेसी काल अपने अध्ययन, लेखनमे व्यस्त रहैत छलाह । सहायक क्याम्पस चिफ भेलाक बादो विभिन्न राजनीतिक गोष्ठी सभसँ दूरे रहैत छलाह । आरती बहुत मिलनसार आ गृहणी प्रवृतिकें छलीह । बहुत पढ़ल–लिखल नहि भेलाक बादो अपन आत्मियता आ सहजपनासँ सभके मोन मोहि लैत छलीह । ओहि दिन राजीव सर अपन नयाँ कथा पूरा कएलाह । जाढ़Þक साँझ छल, चाहक चुस्कीक संग ओकर चर्चाकऽ रहल छलाह । आरती तरकारी काटऽमे व्यस्त छलीह । मेनका धैर्यताक संग ओ कथाक प्लट सूनि रहल छलीह । राजीव सर जाही ढंगसँ नायिकाक चरित्र चित्रण कएने छलाह, हुनका किछु जँचल नहि । ओ भावावेशमे बजलीह, ‘हमरा बुझऽमे नहि अबैत अछि कि जे नायिका अतेक पढ़ल–लिखल, बुभऽय बाली अछि ओ परिस्थितिसँ लड़बाक सार्मथ्य किए नहि रखैत अछि ? किए नियतिके हाथमे सोपि दैत अछि ।’ तखने लागल जे राजीव सर एकटक हुनका देखि रहल छलाह । की छल हुनकर आँखि भितर ......... सिहरिकऽ ओ दृष्टि झुका लेलीह । ओहि समय आरती भितर जाकऽ धीया–पुताकें पढ़ऽ लेल कहि रहल छलीह । ओ चुपचाप उठिकऽ अपन रुममे चलि अएलीह । मुदा ओ दृष्टि...... अबेरधरि ओ आँखि हुनका स्मरण अबैत रहल । राजीव सर कहियो काल हुनका एना किए देखऽ लगैत छथि ? ओह, नहि ...... फेर एक हप्ताक बाद राजीव सर ओही कथाक पाण्डूलीपि हुनका हाथमे धऽ देलाह । रातिमे अबेरधरि ओहिमे डूवल रहलीह । सुखद आश्चर्य हृदयकेँ छूबि गेल छल । सत्ये..... कि हुनका कहला मात्रसँ राजीव सर अपना कथामे अतेक परिवर्तनकऽ देलाह, नायिकाक चरित्र पुरापुर बदैल देलाह । ‘कहू, आब तऽ पसिन आएल ?’ ओकर दोसर दिन राजीव सर पुछलैन्हि । ओ मुस्कियाकऽ रहि गेलीह । राजीव सर अबेरधरि अपन ओहि कथाक विषयमे बात करैत रहलाह । ओ सेहो बीच–बीचमे अपन सल्लाह दऽ दैत छलीह । अहाँ पढ़बैत छी तऽ बोटनी, मुदा साहित्यमे अहाँकें बढ़ियाँ पकड़ अछि । किए नहि अहू कथा कविता लिखैत छी ?’ राजीव सरक अवाज हुनका कतहु दूरसँ अबैत लागल । कथा, कविता..... तऽ की राजीव सरकेँ ई पता छैन्हि हमर स्वंयके जीवन कोनो कथा उपन्याससँ कम थोरहे अछि, जकरा ओ चाहिकऽ सेहो नहि लिख सकैत छलीह । मात्र स्मृति कतेको घाओकेँ खखोरि दैत अछि आ दऽ दैत अछि एकटा असहनीय पीड़ा । ओहि राति सेहो उएह स्मृति फेरसँ सजीव भऽ उठल छल । चन्द्रभूषणसँ परिचय । फेर वियाहक बाद हुनका संग बिताएल दू बर्षक मधुर सम्बन्ध । हँ, आब स्मरणे शेष रहि गेल अछि । की चन्द्रभूषण सेहो स्मरण करैत हएताह, ओ बितल क्षणकेँ ? घरपरिवारमे डूबल कहियो सोचि पबैत हएताह ? एकटा सिसकी निकलि गेल हुनक मुँहसँ । कतेक सुख दैथि ओ । किए नहि ओ एहि सभसँ निकलि पबैत छथि ? किए नहि .... शायद कोनो गरम बाउलमे धँसि गेल छथि । भागऽ चाहैत छथि, मुदा फेर ओहिमे धँसि जाइत छथि । कहियो मुक्त भऽ पएतिह एहि धीपल रेगीस्तानसँ ? ओ जेना निन्नमे चिचिया उठल छलीह । रातिमे उठिकऽ पुरे एक जग पानि ढ़ारि लेने छलीह । भोरमे सहीमे हुनका बोखार लागि गेल छल । भोजन आदिसँ निपैटकऽ उपर अएलीह आरती । हुनका सूतल देखि हुनकर देह छुलिह फेर चांैककऽ कहलीह,‘ अँएयै दिदी एतेक बोखार अछि..... आ अहाँ खबरो नहि कएलहुँ अछि ?’ आरती तत्काले डाक्टर बजओलिह, दबाइ मंगबओलैन्हि । अर्धविक्षिप्त सन अवस्थामे आरती देखैत रहलीह । ‘रहऽ दियौ नहि ई दबाइ । एहिसँ किछु नहि हएत, हम आब अपने ठीक भऽ जाएब,’ ओ कमजोर अवाजमे प्रतिवाद करैत रहलीह । ओ कोना कहतिह मोनक विकार दबाइसँ थोरहे जाएत । धीरे–धीरे जखन स्मृति सभक दंश कम हएत तखन अपने सभ समान्य भऽ जाएत । पता नहि आरती की सोचलैन्हि उपरसँ निच्चा उतैर गेलीह । साँझमे राजीव सर उपर अएलाह । चद्दरि हँटाकऽ ओ उठिकऽ बैसऽ चाहलिह मुदा, हुनका चक्कर आबि गेल । ‘ओहो ! अहाँ पड़ले रहू ने, ’तकिया उठाकऽ राजीव सर सहारा दैत कहलाह, ‘देखू दबाइ अहाँकें दुश्मन नहि अछि, फेर किए अहाँ अपनाके समाप्त करऽमे लागल छी ?’ कहैत राजीव सर अपना हाथसँ दबाइ आ पानिक गिलास एना बढ़ओलैन्हि जेना ई हुनकर आग्रह नहि बल्कि आदेश हुअए । ओ आदेशके अवहेलना मेनका नहि कऽ सकलीह । चुपचाप ओ गोटीकें घोटि लेलैन्हि । ‘बस आब चुपचाप सूतल रहू । आरती सुप आ फलपूmल लऽकऽ अबैत हएतिह । किछु खाएब–पीयब नहि तऽ विमारीसँ कोना लड़ि पाएब ?’ मौन आ नोराएल दृष्टिसँ ओ राजीव सर दिस देखैत रहलीह । के अछि आब एहि संसारमे जे हुनकर चिन्ता करए ? फेर किए नहि पुरा जञ्जालसँ छूटि जाइत छथि । राति भरि एहने सन विचार मोनकेँ उद्वेलित करैत रहल । राजीव सरके एहि प्रकारक अधिकारपूर्वक बात करब देखि हुनकर मोन भेलैन्हि जे ओ तकियामे मुँह झाँपि सिसकऽ लगलैथि । चिचिया–चिचियाकऽ कहथि, ‘किए नहि हमरा मरऽ दैत छी ? ककरा लेल जिबू ?’ तऽ की राजीव सर हुनकर मोनक बात बूझि लेने छथि, नहि तऽ क्षण भरिक लेल हुनक समीप किए आबि गेल छलाह । हुनकर गरम साँस अचेतन अवस्थामे सेहो निकटसँ अनुभव कएने छलीह । ‘मेनका ........... ’ओ हुनकर माथपर हाथ धऽकऽ कहने छलाह, ‘हम बुझैत छी कि अहाँकें अतीत सुखद नहि रहल अछि मुदा की स्मृतिक संसारमे हेराकऽ अपनाकेँ मेटा देब नीक बात भेलैक ? क्षण भरिक लेल सुखद आ अन्धकारसँ बाहर निकलू आ वर्तमान तऽ एतेक खराब नहि अछि ।’ कहैत–कहैत राजीव सरक स्वर भावुक भऽ गेल छल । ओहि समय मेनकाक इच्छा भेल ओ हुनकर बाँहिपर माथ राखि खुब कानथि । सभ किछु बता दैथि । हुनकर मन शायद एहिसँ किछु हल्लुक भऽ जाइन । ‘नहि ..........,’ दोसरे क्षण विचार आएल छल । अपन पीड़ाकेँ ओ ककरोसँ नहि बटती । राजीव सर संगे सेहो नहि । दबाइक प्रभावसँ आँखि किछु मुनाए लागल छलैन्हि । बाँहिपर हाथ थपथपाकऽ राजीव सर निचा उतरि गेलाह । एहि विमारीक बाद ओ राजीव सरके किछु आओर निकट आबि गेल छलीह । अखनधरि गम्भिरताकें जे मुखौटा ओ सदैब सावधानीसँ ओढ़ने रहैत छलीह, ओ धीरे–धीरे किछु घटि रहल छल । कहियो–कहियो मुस्किआइके, किछु गुनगुनाएके इच्छा भऽ जाइत छलैन्हि । ओहि दिन क्याम्पससँ किछु पहिने आबि गेलीह । देखलीह आरती आ राजीव सर निच्चा ठाढ़ छलाह । हुनका अबिते आरती बजलीह, ‘दिदी चलू चौरी दिस घुमऽ ।’ ‘हम ?’मेनका चौँककऽ बजलीह । ‘हँ बस, दस मिनट दैत छी झटपट तैयार भऽकऽ आउ,’ राजीव सर आग्रहक स्वरमे कहलैन्हि । हाथ–मुँह धोकऽ मेनका फटाफट सारी बदलि लेलीह । माथमे क्लिप ठीक करैत निच्चा उतैर गेलीह । ‘चलू । अहाँ दस मिनट कहलहुँ हम आओर जल्दी आबि गेलहुँ ।’ हुनकर बात सूनि आरती मुस्किया देलीह । तखने मेनका देखली राजीव सर चोराकऽ हुनका दिस ताकि रहल होथि । चौरी दिस घुमब हुनका नीक लागि रहल छलैन्हि । बहुत दिनक बाद ओ अपनाकँे तनावसँ दूर पाबि रहल छलीह । मोनू आ सञ्जूकें लऽकऽ ओ आगाँ बढ़ि गेलीह आ हुनके कोनो बातपर ठहक्का मारिकऽ हँसि देलीह तखने राजीव सरक धीरेसँ आवाज सुनाइ देलक,‘अहाँ हँसैत काल कतेक नीक लगैत छी ।’ स्वरक गहराइ हुनका भितर तक बिन्ह देने छल । हुनकर मुँह लाल भऽगेल छल । लजाकऽ चौरमे रहल गुलमोहरके पूmल दिस ताकऽ लगलीह । राजीव सरके एहि प्रकारक एकटक देखैत रहब, भितर गहींर तक उतरि जाएबला ओ दृष्टि किछु नहि कहऽ बला बहुत किछु कहि दैत छल । हुनका लागल केओ अपनाकेँ जतेक समेटकऽ राखबाक प्रयास करैत छल ओ ओतबे बन्हैत जा रहल छलीह । आरती किछु दिनक लेल नैहर गेल छलीह । बच्चाक बिना घरमे किछु बुझाइ नहि रहल छल । राजीव सर अपन अध्ययन कक्षमे व्यस्त रहैत छलाह आ ओ अपना कक्षमे । बेर–बेर निच्चा उतरऽमे हुनका सङ्कोच लगैत छलैन्हि । ओहि दिन क्याम्पसेमे हुनका थकान जकाँ लागि रहल छल । घर पहुँचकऽ भोजन के बनाओत, ई सोचिकऽ ओ बाटेसँ पाउरोटीके एकटा प्याकेट अनने छलीह । भोजन शुरुए कएने छलीह जे कतऽसँ नहि कतऽसँ राजीव सर उपर चलि अएलाह । ओ देखिते चाँैक गेलीह । ‘ओहो ! हम तऽ ई उम्मिदमे आएल छलहुँ की हमरा अहाँ भोजनपर आमंत्रित करब, मुदा अहाँ तऽ स्वंय पाउरोटीसँ ......,’ बहुत मजकिया स्वरमे राजीव सर बजलाह । ‘जी .......,’ मेनका लजा गेलीह । सहीमे हुनका ध्याने नहि रहल छल राजीव सर असगरे कोना आ की खाइत हेताह ? कमसँ कम औपचारिकताक नातासँ आमंत्रित करबाक चाहैत छल । ‘एखने सभ बनि जाएत, अपने बैसल जाउ ने ।’ राजीब सर टेबुल लग राखल कुर्सीपर बैसि रहलाह आ टेबुलपर राखल पत्रिका ओ अपना हाथमे राखि लेलाह । देखिते–देखिते मेनका बहुत चीज बना लेलीह । ककरो मात्र उपस्थिति कतेक सुख दैत अछि अन्यथा भोजन तऽ ओ दैनिक बनबैत छथि मुदा कतेक मोनसँ । ओहि दिन सेहो राजीव सर भोजन कऽकऽ उठले छलाह कि दू कप कफी बना लेलीह । राजीव सरके हाथमे कप पकड़ऽबैत हुनका किछु स्मरण आएल । बजलीह, ‘काल्हि तऽ आरती सेहो आबि जएतिह, ’हुनकर स्वरमे बितल दिनक स्मरण झलैक उठल । ‘ हँ, ’ कहिकऽ राजीव सर चुपचाप कपमे चम्मच घुमबैत रहलाह । कप फेरसँ टेबुलपर राखिकऽ अपन हाथ मेनकाके हाथपर राखि देलाह । एहि स्पर्शसँ ओ सिहरि उठलीह, मुदा हाथ हँटा नहि सकलीह । मेनु, की अहाँ एहि तरहे आजन्म हमरा संग नहि रहि सकब ? अहाँकँे नहि बूझल अछि अहाँ हमर कतेक आवश्यकता बनि चूकल छी ।’ राजीव सरक ई स्वर हुनका झिकझोरि देलक । ‘नहि सर, हम अपना कारण ककरो संसार नहि उजारि सकैत छी । राति–दिन जे शब्द मष्तिस्कपर रहैत छल ओहे बात ठोरपरसँ पिछड़िकऽ बाहर आबि गेल छल । राजीव सर चाहियोकऽ किछु नहि कहि सकलाह । ओहि राति क्षण भरिके लेल सेहो नहि सूतल छली । दुःखद स्मृतिक बन्द पन्ना फेरसँ फर–फराए लागल । अहिना कहियो नीनासँ चन्द्रभूषण कहने हएताह , ‘हम अहाँक बिना नहि रहि सकब ।’ मोनमे कचोट उठलैन्हि । चन्द्रभूषणक पत्रक ओ पंक्ति, ‘हम नीनासँ विवाह कऽ रहल छी ।’ हुनका लागल छल ओ कागजपर लिखल मात्र पंक्ति नहि बिषसँ भरल बाण छल, पापा, भैया, दिदी, पाहुन कतेक तमसाएल छल । ‘मेनु, तों कतेक कायर छेँ ? चन्द्रभूषण तोरा धोखा देलकौ आ तों प्रतिकारक एक शव्द नहि कहि सकलएँ ।’ ओ चुपचाप सुनैत रहलीह । कोना कहितथि, सम्बन्ध तऽ मोनक होइत अछि हृदयक होइत अछि । जखन ओ हृदयसँ निकालि देलाह तऽ केहन प्रतिकार ? कोन बातक प्रतिकार ? तखनसँ ओ एकटा मुखौटा चढ़ा लेने छलीह । आब ओ हरेक क्षण खिलखिलाकऽ हँसऽ बाली मेनु नहि कक्षामे गम्भिरतासँ बोटनीपर भाषण देबऽबला प्राध्यापिका छलीह । मुदा राजीव सर आब हुनकर मोनसँ ओढ़ल ओ मुखौटा किए तोडऽ चाहैत छथि ? ओ किए चाहि रहल छथि मेनका फेरसँ मेनु बनऽ ...... उएह पुरनाका मेनकु आरतीक एलाक बाद सेहो मेनका निच्चा जाए कम कऽ देने छलीह राजीव सरके आगाँ तऽ पड़बे नहि करैत छलीह । ‘की बात छैक ? शायद हम एहि बेर नैहर असगरे चलि गेलहुँ तऽ अपने तमशा गेलियै की ? मुदा दोसर बेर तऽ संगे चलबाक कार्यक्रम बनओने छी ,’ कहैत ओहि दिन आरती हुनकर शयन कक्षमे आबि गेलीह । नोटस तैयार करैत मेनका हुनकर आवाजपर चौँककऽ बजलीह, ‘कतऽ ?’ ‘होरीके छुट्टीमे पोखरा घुमऽ जारहल छी । ओ कहैत छलाह जे अहूँकें संग लऽ जएबाक छैक ।’ मेनका चुप रहलीह । राजीव सरके संग ...... मोनमे फेर किछु हलचल जकाँ भेलैन्हि । धीरेसँ बजलीह, ‘नहि, आरती हम कहाँ जा सकब छुट्टीमे हम एकटा सम्मेलनमे जारहल छी, कार्यक्रम तय भऽ चूकल छैक ।’ सूनिकऽ आरतीके उत्साह समाप्त भेल सन लागल । हुनक उदासी देखि मेनका मधुर स्वरमे फेर बजलीह, ‘कोनो बात नहि । एहि बेर अहाँ सभ घूमि आउ, फेर कहियो संगे चलबाक कार्यक्रम बना लेब । आरतीके गेलाक बाद सेहो ओ बहुत अबेरधरि गम्भीर चिन्तन करैत रहलीह । तऽ की राजीव सर ई सभ जानि–बूझिकऽ कहि रहल छथि ? तऽ फेर हुनकासँ निच्चा एक–दू बेर भेट भेल तऽ कतराकऽ किए चलि गेलाह । मेनकाकेँ हुनकर व्यवहारमे कोनो रुसल व्यक्ति जँका लागल । ओ की करथि ? प्रश्न बहुत विचित्र छल । ई सत्य छल जे सम्मेलनके असानीसँ छोड़ल जासकैत छल अन्ततः ओ निर्णय लेलीह ठीक छैक जखन राजीव सर स्वंय किछु कहता तऽ ओ पोखरा घुमऽ जएतीह । मुदा राजीव सर जाइतो नहि बजलाह । आरती चुपचाप सभ तैयारी करैत रहलीह । मेनकाके मोनमे किछु टीस छल,‘ठीक छैक, ओ छथिए के ?’ जाइत समय सभकेँ छोड़ऽ लेल रिक्सा तक आएल छलीह । आरती आ हुनकर बच्चा हुनका प्रणाम कएलक मुदा राजीव सर मुँह नुकबैत रिक्सापर बसि रहलाह । सभकँे जाइत देखि मेनकाके मोन भेलैन्हि जे जोड़–जोड़सँ कानऽ लागैथि । ओ किनका की बिगारने छथि, जे सभ हुनका दुःखे पहुँचबैत अछि । फेर उएह उदास क्षण........... उएह अकेला पन । मोन भेलैन्हि असगरे चलि जाइ मुदा कतऽ ? ओ प्रत्येक दिन पोखरा जएबाक दिन किए गनैत छलीह । छोटको आहटसँ किए चौँकि जाइत छथि ? किए बेर–बेर इच्छा होइत छैन्हि राजीब सरक फोन आबय ? आठम दिन सहीमे द्वार पर प्रवेश भेल । ‘के ?’ भोर चारि बजे राजीव सरकेँ अबैत देखि ओ घबरा गेलीह । तखने राजीव सर आगा बढ़ि हुनकर कान्हपर हाथ राखि देलाह । ‘एहि तरहे स्वंय सेहो परेशान रहलहुँ आ हमरो चयनसँ नहि रहऽ देलहुँ,’ राजीव सर धीरेसँ बजलैन्हि, ‘जनैत छी, मोन नहि लागल घुमऽमे । बहुत दिन सोचलहुँ फोन करी मुदा..........’ ‘आरती कहाँ छथि ?’ मेनकाकेँ स्मरण आएल आखिर राजीव सर संग हुनकर परिवार सेहो गेल छल । ‘घुमैत काल हुनकर बहिन रोकि लेलक बादमे अएतीह ।’ राजीब सर धीरेसँ मेनकाकेँ आओर अपन निकट आनि लेलाह । फेर स्नेहक स्वरमे बजलाह, ‘सुनू, हम आरतीसँ बात कऽ लेने छी हम तीनू गोटे अहिना सँग–सँग रहि सकैत छी आब तऽ रहब ने हमरा संग ?’ राजीव सरक मुँह मेनकाके माथपर भूmकि गेल । तीब्र चुम्बकीय आकर्षणमे बान्हल ओ ओहिना हुनकर छातीसँ लागल रहलीह । ‘ठीक छैक चलू । भोरे एकटा बैसारमे भाग लेबऽ जएबाक अछि । बाँहिपर हाथ थप–थपबैत अपना रुम दिस राजीव सर घूमि गेलाह । हुनका गेलाक बाद मेनकाकेँ किछु सोचबाक समय भेटल । किए एना भऽगेल ? किए ओ एना बहि गेलीह ? किए नहि प्रतिकार कएलीह ? फेर स्मरण आएल राजीव सरक ओ शब्द, ‘आरतीकें कोनो आपत्ती नहि अछि ।’ मुदा मोनमे फेर किछु सेहो खटकलैन्हि । कोन एहन महिला हएत जे चुप–चाप सभ किछु लुटैत देखि सकत । चन्द्रभूषणके नीनाक संग विवाहक बात सूनि कोना ओ कनैत रहलीह । लोक गेट पीट–पीटकऽ हारि गेल छल मुदा, हुनकर उएह जिद्द छल । फेर ओ क्षण की, ओ अखनोधरि नीनाके गाढ़ि पढैÞत नहि छथि ? हुनका लागल अनेरे फेर नीना आगाँ आबि गेल अछि आ हँसैत पूछि रहल अछि, ‘की आब तऽ अहूँ नीना बनि गेल छी ।’ ‘नहि,’ ओ चिचिएलीह । देवालक सहारा नहि रहैत तऽ ओ चक्कर खा कऽ खसि परितैथि । आधा घण्टाधरि ओ अहिना चुपचाप बैसल रहली । बस स्टैण्डपर कनी–मनी लोक छल वातावरणमे बेरियाक खालीपन व्याप्त छल मुदा मोनमे तऽ बहुतरास बिहारि घेरने छलैन्हि । शायद किछु क्षणक बाद कोनो बस आएत आ हुनका लऽ जाएत मुदा कतऽ ? स्मरण आएल ओ आवेदन–पत्र । एकटा लम्बा छुट्टी आ दोसर बदलीके । बस आएल । बसक हर्न हुनकर ध्यान तोड़लक हुनकर चाल यन्त्रवत् ओहि दिस बढ़ल । आगाँ दूर तक सुनसान सड़क देखाइ दऽ रहल छल । छुटैत हरियर वृक्ष शायद ओ अहिना अपन प्राप्त सुखकेँ एक बेर फेर छोड़ि अएलीह । हुनकर आँखि नोराए लागल छल, जकरा नियतकँे कठोर हात पोछि देने छल । लघुकथा- साधना साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याट–बल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा । साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब । जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’ नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे ‘घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।’ जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह । जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला । पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल । रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक । रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़ल–पड़ल किछु सोचि रहल रहैथि –एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर । साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ? ‘हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’ ‘किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।’ ‘हँ, कनि–मनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।’ साधना कहिते–कहिते सूति रहलीह । जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह ..... आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एक–एक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोना–कोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि । साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि ? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ । कतेक झगड़ा ! हँ, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़ि–लिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ? कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।’ कतेक बिकाएल कपड़ा ? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत । पैसा कतऽ बँचैत अछि ? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ? ‘की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह । भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ । ‘आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देख–भाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढैÞत जारहल छल । ‘तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।’ ‘मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारि–पीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।’ ‘हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’ ‘ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डा–आवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।’ ‘चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’ जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’ दुनूके स्वरक आवाज बढैÞत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी । साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल । साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह । कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक । ‘मम्मी अछि, बौवा ?’ ‘हँ, छैक । अपने के ?’ ‘कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।’ मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दी–जल्दी वाथ रुमसँ निकललीह । ‘बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी । ’ साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि । ‘हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।’ जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह । लघुकथा- केहन सजाय? कामनी मैडम काज समाप्त कएलाक बाद चश्मा उतारलीह । हुनका जाढ़क अनुभव भऽ रहल छल । आइ आठ बाजि गेल । साँझ रात्रीमे परिवर्तित भऽ गेल छल । चौकीदारकँे आफिस बन्द करबाक आदेश दऽ ओ साल ओढ़लीह आ अपन रुम दिस बढ़ि गेलीह । कामनी मैडमकेँ एतऽ अएला एक हप्ता मात्र भेल अछि । एकटा सरकारी विद्यालयक प्रधानाध्यपक पदसँ अवकाश प्राप्त मैडम अपन घर जाए चाहैत छलीह । मुदा मारवाड़ी सेवा समितिक अध्यक्ष रामरतन शर्माजी हुनका महिला सदन होस्टलके जिम्मेवारी स्वीकारबाक लेल बाध्य कऽ देलैन्हि । महिला सदनकँे मारवाड़ी सेवा समिति चला रहल अछि । चारि हजार विद्यार्थीक प्रधानाध्यापक लेल ई सदन छोट छल । शर्माजी एहि सदनके लेल कोनो अनुभवी व्यक्ति ताकि रहल छलाह । तँए कामनी मैडमसँ ई पदभार ग्रहण करबाक आग्रह कएलैन्हि, जकरा मैडम अस्वीकार नहिकऽ सकलीह । एतऽ पचास महिला, भोजन बनाबऽ बला तीन गोटे भनसिया आ किछु कार्यालयक कर्मचारी छल । एतऽ रहऽ बला कुल ५७ सदस्य छल । सदनके नियमानुसार ९ बजे प्रार्थनाक लेल सभ सदस्य सभाहलमे उपस्थित होइत छल । तँए मैडम महिलासभकँे चिन्हऽ लागल छलीह । एहिमे किछु विवाहित सेहो छल । केओ सरकारी कर्मचारी, केओ बिमा कम्पनी, केओ शिक्षिका, केओ एनजीओकर्मी तऽ किछु इञ्जिनियर सेहो छल । हरेक दिन अपन काजक हिसाबसँ ओ सभ जाइत छल मुदा साँझ आठ बजेधरि कोनो हालतमे घूरि जाएकेँ नियम छल । ओना मार्केटिङ्ग वा एनजीओमे काज करऽबलाके राति ९ बजेधरिके लेल छुट छल । आवश्यकता पड़लापर ओ राति १० बजेधरि बाहर रहि सकैत छल मुदा एहिके लेल मैडमकेँ पहिले सूचित करबाक नियम छल । आत्मविश्वास आ बुद्धिमतासँ काज करऽबला उच्च शिक्षित महिलाकेँ देखिकऽ मैडम स्त्रीक बदलैत प्रतिभापर बहुत प्रशन्न होइत छलीह । असगर रहैत अवलाकँे सवला बनैत देखि हुनका नीक लगैत छल । ओ एतऽ एक वर्षक लेल अनुबन्धित छलीह । सदनमे अलग–अलग वर्ग छल । एटैच बाथरुम बला रुम, तीन बेड बला रुम आ फेर चारि बेड बला रुम । चारि बेड बला रुमक लेल बाथरुम बाहर छल । मैडमक प्रभावसँ एक्के हप्ता भितर होस्टलमे सफाइ तथा अन्य कार्य नियमपूर्वक होबऽ लागल । एतऽ रहऽबाली लड़की नेपालक सभ ठामक छल । किछु मैथिल, किछु वीरगञ्ज दिसक, किछु पहाड़क तऽ किछु हुम्ला, जुम्ला दिसक लोक सेहो छल । एहि लड़कीमे एकटा श्याम रंगक, जे मौनताक चद्दरि ओढ़ने, ओकर व्यक्तित्व अलग छल । पातर–छितर युवती । बड़का–बड़का आँखि एक्के बेरमे सभकेँ अपना दिस आकर्षितकऽ लैत छल । ओकर भोला चेहरामे तऽ गजवके हाव–भाव अबैत जाइत छल । आँखिमे डेराएल सन देखाइत छल । कोनो बनाबटी श्रृंगार नहि । ओ पाउडर, काजर, टिकुलीधरि नहि लगबैत छल । समान्यतया एतऽके लड़की आत्मनिर्भर भेलाक कारण अपन रुप सज्जापर विशेष ध्यान दैत छल । काटल केश, मीलल भँओ, नीपल–पोतल चेहरा, पैmशनेबुल कपड़ा । कमाउ सभ छल तँए बनिठनिकऽ रहैत छल । एहनमे भोजपुरी भाषी ओ लड़कीक सादगी उभरिकऽ देखाइ देबऽ लगैत छल । हलका रंग बला सलवार–कुर्ती पहिरने, नहि आइरन, नहि किछु । रातिमे टिभी देखैत लड़कीक अवाज, हल्ला वा हँस्सीसँ सभागृह गुञ्जित होइत रहैत छल । मुदा ओ लड़की कोनो कोणमे ठेहुनपर दाढ़ी अड़काकऽ आ दुनू हाथसँ पएरकँे घेरने नहि जानि कतऽ देखैत रहैत छल । टिभी दिस प्रायः ओकर ध्याने नहि रहैत छल । अपने संसारमे ध्यानमग्न अपने विचारमे हेराएल रहैत छल । ओकर आँखिमे देखऽबला उदासी मैडमकेँ बेर–बेर चिन्तित करैत रहैत छल । ओकरा कोन बिपत्ति पड़ल छैक मैडमकँे ई बात डङ्क मारैत रहैत छल । बेरियामे सदन खाली रहैत छल । एक दिन बेरियामे मैडमक कानमे गीतक एकटा सुन्दर स्वर सुनाइ पड़ल । ओ स्वंयकँे नहि रोकि सकलैथि । शीघ्रतासँ ओ स्वरकँे पाछू ओहि रुम तक गेलीह जतऽ भोजपुरी भाषामे गीत गाबि रहल छल । देवालमे ओत लगओने गीतमे निमग्न बन्द आँखिसँ नोरक बर्षा भऽ रहल छल । दर्दमे डूबल स्वर गुञ्जित भऽ रहल छल । रुमक बाहरसँ मैडम किछु देर गीत सुनैत रहलीह । एकाग्रता भंग करब ठीक नहि बूझि मैडम ओतयसँ घूरि एलीह । बेर–बेर ओ इएह प्रश्नक उत्तर ताकि रहल छलीह, आखिर ओकरा कोन दुःख अछि । किए ओ एतेक उदास रहैत अछि ? दोसर दिन मैडम ओहि रुमसँ झगड़ाक आवाज सुनलैन्हि । रुमक अन्य लड़कीसँ ओकरा उकटा–पैची भऽ गेल छल । तँए हेतु ई लड़की चिचिया–चिचियाकऽ गाढ़ि पढ़ि रहल छल । ओकरा कोनो होश नहि छल, कि बाजि रहल छल । मैडम शीघ्र ओतऽ पहुँचलीह आ ओकरा देखिते बूझि गेलीह जे ओकर मानसिक अवस्था ठीक नहि अछि । ओकरा ने अपन कपड़ाक होश छल आ ने बूझि पाबि रहल छल जे ओ कि बाजि रहल अछि । चढ़Þल आँखि ओकर अस्वस्थताक बखानकऽ रहल छल । ओ भोजपुरी, मैथिली आ नेपाली भाषाक मिश्रणमे किछु बरबरा रहल छल । मैडम ओकरा निन्नक गोली आ दूध दऽकऽ जवरदस्ती सुता देलीह । ओकर नाम चमेली छल । मैडमकेँ आब ओकर चिन्ता होबऽ लागल । एखनधरि चमेलीके प्रति हुनकर जे उत्सुकता छल से आब परेशानीमे बदलि गेल छल । आब ओ सोचऽ लगलीह जे कोनो प्रकारे चमेलीकेँ बातचितक लेल तैयार कएल जाए । ओकर मोनमे विश्वास बढ़ाओल जाए । मैडम सोचैत छलीह जे कहुना ओ खूलिकऽ अपन बात कहि मोनक बोझ हल्लुक करए । मुदा एहिमे कोनो शक नहि छल जे ई लड़की बहुत बड़का दुर्घटना मोनमे दवओने अछि वा कोनो एहन कारण अछि जाहिसँ ओ कुण्ठाग्रस्त अछि । चमेलीक विषयमे मैडम एक प्रकारसँ अनुसन्धान शुरु कएलैन्हि । होस्टलक आफिसक रजिष्टरपर ओकर पूरा नाम–पता नहि छल । चमेली कम्प्युटर टाइपिङ्गकऽ किछु पैसा कमइत छल । समान्यतया होस्टलक लड़कीकेँ ओकरासँ शिकायत रहैत छल । ओ बेसी समय चुप रहैत छल, ककरोसँ ओकरा कोनो सरोकार नहि रहैत छल । मुदा कहियो–कहियो छोटको बातपर लड़ि जाइत छल । गाड़ि पढ़ैत कोनो दिन स्वयं चिरचिराकऽ बरबराए लगैत छल । दोसर लड़कीसँ दूर नहि झगड़ा लगाबएबला बात वा नहि हँस्सी–मजाक सभसँ दूर रहैत छल । ओकरा कोनो ने कोनो समस्या अवश्य अछि । मैडम ओकरासँ बात करवाक कोशिसक क्रममे कोने ने कोनो बहन्ना बना एक–दू बेर अपना रुममे बजओलैन्हि । मुदा चमेली कोनो सन्तोषजनक उत्तर नहि देलक ओ मात्र हँ वा नहिमे जबाब दऽ दैक । किछु दिनक बाद चमेलीक रुमक एकटा लड़की आबिकऽ बाजल, ‘चमेलीकँे बहुत बोखार अछि ।’ मैडम तुरन्त ओकर रुममे गेलीह । बोखारसँ तड़पैत चमेली ओछाएनपर पड़ल छल । मैडम ओकर माथपर हाथ रखलैन्हि । माथ पूरे दहैकि रहल छल । ओकरा तुरन्त दवाइ पिअओलैन्हि । बोखार कम करबाक लेल मैडम ओकर माथ लग बैसिकऽ ठण्ढा पानिक पट्टि देबऽ लगलीह । बोखारसँ चमेलीक बेहोशी जेहन अवस्था छल । ओ बरबरा रहल छल, ‘मम्मीके घर जाएब’ घर जाएब, अपन घर जाएब । ओकर बात सूनिकऽ मैडमके हृदय कानि उठल । बेचारी असगरे अछि । एकरा घरो अछि कि नहि, घर जाए चाहैत अछि, माए बाबुके स्मरणकऽ रहल अछि । बेहोशीक अवस्थामे हृदयक बात मुँहसँ निकलि रहल छल । एकर घर तऽ अछिए नहि, कि एहिसँ पहिने एकर माता पिता कतौ बाहर छल वा ई एकर सपना अछि ? मैडम किछु बूझि नहि पाबि रहल छलीह । भोरमे बोखार कम छल मुदा चमेली बहुत कमजोर भऽ गेल छल । मुँह सुखा गेल छलै । आँखि धँसि गेल छलै । बाथरुमधरि जएबाक शक्ति ओकरामे नहि छलै । मैडम ओकर शारिरीक आ मानसिक अवस्था देखि सही इलाज कराएब अपन दायित्व बुझलैन्हि । हुनका साह डाक्टर दम्पति स्मरण अएलैन्हि । नोकरीसँ अवकाश पओलाक बाद ई दम्पति अपन नर्सिङ्ग होम खोलि लेने छल । डाक्टर पति पत्नी दुनू मैडमके मित्र छल । ओ सभ मैडमकेँ बहुत सम्मान करैत छल । चमेलीक उपचार डाक्टर सोनिया साह बढियाँ जकाँ कऽ सकत एकर पूर्ण विश्वास मैडमकेँ छल । मैडम डाक्टर सोनियाके चमेलीक विषयमे टेलिफोनपर कहलैन्हि आ चमेलीकेँ लऽकऽ नर्सिङ्ग होम पहुँचलीह । चमेली कमजोरी आ बोखारक थकानक कारण बेहोशी सन हालमे छल । डाक्टर ओकरा ठीकसँ जाँच कएलैन्हि । नर्सक सहयोगसँ ओकरा कपड़ा बदलाओल गेल । दवाइ आ इञ्जेक्शन देलाक बाद आश्वस्त भऽ डाक्टर सोनिया मैडम लग आबि बजलीह, ‘घवराएके कोनो आवश्यकता नहि अछि, कमजोरी बहुत अछि दू–तीन दिनमे ठीक भऽ जाएत, हम ओकरा एडमिटकऽ लेलहुँ अछि ।’ कनि रुकिकऽ डाक्टर सोनिया फेर बजलीह, ‘ओकरा गर्भपात कएल गेल अछि । एखनधरि ओ किछु कहबाक अवस्थामे नहि अछि । अपने जे कहलहुँ अछि ओकरा देखिते मानसिक शान्तिक लेल आवश्यक दवाइ शुरुकऽ देने छी । स्वस्थ्य भेलाक बादे ओकरासँ बात करब बढ़ियाँ हएत ।’ मैडमके कनी सोचमे पडैÞत सन देखलाक बाद ओ कहलीह, ‘अपने मैडम चिन्ता नहि करु हम टेलिफोनपर खबरि दैत रहब, अपने तीन दिनक बाद आउ आशा अछि ओ स्वस्थ्य भऽ जाएत । हमसभ एकरा बढ़ियाँ जकाँ ध्यान देब ।’ चमेलीकेँ अस्पतालमे छोड़िकऽ मैडम होस्टल चलि अएलीह । लड़की सभकेँ कहलैन्हि जे चमेलीकेँ बोखार अछि । अतः अस्पतालमे भर्ती करा देल गेल अछि, चिन्ताक कोनो बात नहि, तीन–चारि दिनक बाद ओकरा आनि लेब । एतेक कहिकऽ मैडम अपना रुममे चलि गेलीह । मुदा मैडमक मोनमे उथल–पूथल मचले रहल । चमेलीकेँ लऽकऽ अनेक विचार मस्तिष्कमे घूमि रहल छल । हुनका स्वयंपर विश्वास छल । अनुभवी नजरिसँ ओहि व्यक्तिकेँ परख सही छल वा कम उमेरबला चमेलीकेँ बुझऽमे तऽ नहि गल्ती भऽ गेल छलैन्हि ? चमेली खराब, वद्चलन, भूmठ अछि ई मानऽके लेल हुनकर मोन तैयार नहि छल । अनेक सम्भावना छल जे शायद केओ एकरा असगरे रहलाक कारण फाइदा उठा लेने हो वा काज देवाक लालच दऽकऽ एकर इज्जति लूटि लेने हुअए । मैडम सोचि रहल छलीह, ‘ चमेली वद्चलन तऽ नहि अछि, कारण ओकरा लग ने पैसा आ ने कपड़ा, गहना । एक दू–टा सलवार–कुर्ती अछि ओकरा भेटवाक लेल केओ अएबो नहि करैत अछि । नहि कोनो चिठ्ठी, नहि कोनो फोन ।’ तीन दिनक बाद चमेलीक विचारमे ओझराएल मैडम दैनिक काम–काज समाप्तकऽ अस्पताल पहुँचलीह । बेरीयाधरि डाक्टर सोनिया व्यस्ततासँ मुक्त भऽ जाइत छथि । मैडम चमेलीक रुममे पहुँचलीह, ओ ओछाएनपर सूतल छल । ओकर मुँहपर आभा चलि आएल छल । शान्त, असहाय चमेलीकेँ देखिकऽ मैडमके हृदयमे ममत्व चलि आएल छल । ओ चमेलीके माथपर स्नेहसँ हाथ रखलैन्हि, तखने चमेली आँखि खोललक । मैडमके दुनू हाथ कसिकऽ पकड़ि बाजल,‘ मैडम हमरा गलत नहि बुभूm । हम खराब नहि छी । हमरापर विश्वास करु हम कोनो गलत काज नहि कएने छी । रितेश चाहैत छलाह बच्चाकेँ पालन–पोषण बढ़ियाँ जकाँ होइक । हमरा सभ जकाँ तकलिफ ओकरा नहि होइक । आर्थिक अस्थिरता आ माए बापक प्रेम, वात्सल्य भेटैक सही माहौलमे बच्चाकेँ बढ़ियाँ जकाँ देखभाल होएबाक चाही ..........’ बहुत मुश्किलसँ एतेक कहि स्वयंकेँ सम्हारऽमे असमर्थ चमेली हिचुकि–हिचुकिकऽ कानऽ लगल । मैडम ओकर पीठ थप–थपओलैन्हि तऽ स्नेहिल स्पर्श पाबिकऽ चमेली किछु शान्त भेल । ओ बहुत किछु बाजऽ चाहैत छल । डाक्टर ओकरा किछु देर शान्त भऽ बैसबाक लेल कहलक । ओकरा चाह पिवाक लेल देलक, एकर बाद चमेली दिस तकैत कहलैन्हि, ‘देखू एहि बातकेँ बढ़ियाँ जकाँ बूझि लिअ हम सभ अहाँके शुभ चिन्तक छी । विना किछु नुकओने सभ किछु कहि देब यथा सम्भव हम सभ अहाँकेँ सहयोग करब ।’ डाक्टरक ई शव्द चमेलीकेँ किछु कहबाक हौशला बढ़ओलक । ओ बाजल, ‘मैडम हमही अहाँके सभ बात कहऽबला छलहुँ । अहाँ आ डाक्टर दिदी के छी हमरा बुझऽमे नहि आबि रहल अछि, अहाँ सभ हमरा बचएलहुँ अछि । मैडम अहाँ हमरा होस्टलसँ नहि निकालब हम प्रार्थना करैत छी, हम ओहिठाम बढियाँ जकाँ रहब । ककरो तकलिफ नहि देब । चमेली जे अपना विषयमे कहलक से सूनि मैडम आश्चर्य चकित छलीह । एहनो लोक होइत अछि । एतेक निष्ठुर, पत्थरक हृदयबला । बराबर देखऽमे अबैत अछि जे कुकुर–बिलाइयक वच्चा घरक सदस्य बनि जाइत अछि । पालतु जानवरसँ सेहो हम सभ जुड़ि जाइत छी । अगल–बगलकेँ बच्चा सेहो नीक लगाऽ लगैत अछि । एका–एक पालतु कुकुर–विलाइकेँ छोड़ि देबाक कल्पना असम्भव लगैत अछि । फेर एतऽ तऽ घरमे पलल एक दशकसँँ नित्य संग होइतो एहि लड़कीकेँ छोड़ि देब सोचिकऽ मैडम सिहरि उठलीह । ओ केहन माँ अछि वा माँ संज्ञा सेहे ओकरा लेल अनुचित अछि । की महिलाक एतेक स्वार्थीरुप सेहो भऽ सकैत अछि ? जाहि बच्चाकेँ पोसपुते किए नहि बनओने हुए मुदा अपन पुत्री तऽ मानने छल, अपन नाम तऽ देने छल, पाइल–पोसिकऽ पढ़ओने छल । ओहि बेटीकेँ बस स्टेण्डपर निर्ममतासँ छोड़ि देलक मैडम किछु देर सोचिते रहलीह । चमेली वीरगञ्जके सम्पन्न यादव परिवारमे पलल–बढ़ल छल । जतऽ ओ सामान्य आ सुरक्षित सहज वाल्यावस्था व्यतित कएने छल । भड़ल–पूड़ल परिवारक कौशिल्याकेँ बच्चा नहि होइत छल । बच्चा होएबाक कोनो सम्भावना नहि देखलाक बाद कौशिल्या अनाथाश्रमसँ दू वर्षक बच्चाकेँ अनने छलीह । ओहि बच्चाक नाम चमेली राखल गेल । अपन पितियौत भाइ–वहिनक संग चमेली बड़का भेल । प्रेम, संरक्षण आ संस्कार ओ पाबि रहल छल । परिवारक अन्य बच्चा जेकाँ एकरो लेल हरेक प्रकारक प्रवन्ध छल । ओ बुझैत छल जे ओकरा गोद लेल गेल अछि । मुदा एहि बातकेँ नहि कहियो नुकाएल गेल आ नहि कहियो उच्चारण कएल गेल । एकटा लम्बा समय बित गेल । चमेली एक–एक सिढ़ी चढैÞत यौवना अवस्थामे पहुँच रहल छल । बुद्धिमान चमेली ८मे पढ़ैत छल । आश्चर्यजनक रुपमे कौशिल्या ढलैत उमेरमे गर्भवती भऽ गेलीह, हुनका मातृत्वक आहट भेल । घरमे सभ खुशी छल । चमेली सहित सभ आँखि पथने छल । चमेली आ ओकर पापाकेँ खुशीके ठेकान नहि छल । समयपर कौशिल्या पुत्रकेँ जन्म देलीह । शायद एतहिसँ चमेलीके खराब दिन शुरु भेल । अपन कोखिसँ जनमल पुत्रकेँ पाबि कौशिल्या धन्य छलीह । ओ जोड़ल सम्बन्धकेँ तोड़बाक निर्णय कएलीह । एक दिन चमेलीके पापा कहलैन्हि जे चमेलीकेँ मुन्सीजीके सङे गाम जएबाक अछि मुदा, चमेली बूझि नहि पाबि रहल छल जे पढाइयक समयमे किए ओकरा पठाओल जारहल अछि । मुंसीजी तऽ हरेक समय कामकाजसँ घुमैत रहैत छलाह । गर्मी वा दुर्गा पूजाक छुट्टीमे बच्चाक मामा वा मौसी लग पहुँचबैत छलाह । मुदा असगरे मुंसीजीके संग जाएब चमेलीकेँ किछु जमि नहि रहल छल । ओकरा अस्वीकार कएलाक बाद मम्मी बहुत सम्झओने छल की दू–तीन दिनक बात अछि गाम जाएब जरुरी अछि । छोटका बेगमे दू–चारिटा कपड़ा राखिकऽ चमेलीकँे बिदा कऽ देल गेल । घरक सभ बच्चा मुंसीजीके कोरामे पलल–बढ़ल छल । तँए चमेली हुनका संग बिदा भऽगेल । ई यात्रा चमेलीक जीवनके धार बदलि देत ओकरा कि पता छल । मध्य रातिमे चमेली सूतल छल । तखने मुंसीजी ओकरा जगओलक । कोनो बस स्टैण्ड चलि आएल छल । जतऽ ततऽ लोक सूतल छल । बस स्टैण्डक एकटा कोन्हपर खाली बेञ्चपर मुंसीजी सुतऽ लेल कहलैन्हि आ ओकर माथ लग बसि रहलाह । दू घण्टाक बाद बस आएत से बिना कोनो आशंकाके चमेली सूति रहल । तखने मुंसीजी चुपचाप ओतऽसँ निकलि गेलैथि । बहुत समय बित गेल । माथ लग ठकठकके आबाज सूनिकऽ चमेली जल्दीसँ उठल, रौद आबि गेल छल । किछु देरक लेल चमेलीकँे किछु बुझऽमे नहि आबि रहल छल कि ओ कतऽ अछि । पुलिस किछु कहि रहल छल, लोक जम्मा भऽ रहल छल । पुलिस किछु गरैज रहल छल । चिचियाकऽ किछु पूछि रहल छल । मुदा ओकर भाषा चमेलीकेँ बुझऽमे नहि आबि रहल छल । मुंसीजीके कोनो अता–पता नहि छल । चमेली लग नहि पैसा छल आ नहि किछु । ओहि ठाम रहल पुलिस मुंसीजीकेँ किछु देर खोजलक आ जखन नहि भेटल तऽ चमेलीकेँ अनाथ आश्रममे पठा देलक । अनाथ आश्रममे चमेलीक हालत बहुत खराब छल । ओतऽके भाषा, वातावरण, भोजन सभमे बहुत अन्तर छल । ओ बूझि रहल छल जे कोनो दुर्घटनाक कारण मुंसीजी ओकरासँ अलग भऽ गेल अछि । पापा ओकरा लेबाक लेल तुरन्त एताह । घरपर सभ परेशान हएत । कानि–कानि कऽ बिताएल दिन निराशाक अन्हारकँे आओर घनघोरकऽ रहल छल । एतऽके काम करऽ बाली, रहऽ बला सभ मूर्ख आ गन्दामे रहबाक आदी छल । खुब गारि बाजि रहल छल । लड़की सभकँे पिटब समान्य बात छल । चमेली भयभित छल ककरो ओकरासँ सहानुभूति नहि छल । व्यवस्थापिकासँ चमेली किछु पुछैत छल तऽ कोनो ध्यान नहि दैत छल, उल्टे चमेलिएकेँ डाँटि दैत छल । ओ सभ कहैत छल, ‘कथिलए कनैत छेँ, जीवनभरि कनिते रहबेँ, तोरासँ भेटऽ केओ नहि एतहु, तोरा अपना लग राखबाक रहितहु तऽ छोडितहुँ किए ?’ चमेलीकँे एक–एक क्षण ओतऽ रहब मुश्किल भऽ रहल छल । मुदा समय ककरो लेल रुकैत नहि अछि । एक–एक दिन बित रहल छल चमेली हताश, निराश आ उदाश छल । अनाथ आश्रमक भोजन ओकर कण्ठमे नहि ससरि रहल छल । घरपर ओकरा अँचार, चटनी, तरकारी, माछ, माउस आ स्वादिष्ट भोजनसँ भड़ल थारी भेटैत छल । रसगुल्ला बिना ओकर भोजने पुरा नहि होइत छल । आश्रममे मोट–मोट काँच–पाकल दूटा रोटी, बिना स्वादक दालि वा तरकारी आ हप्तामे दू दिन एक बाटी भात भेटैत छल । ओतऽ रहऽ बला लड़की सभ ओकरा बहुत समझबैत छल । अपन भात चुपचाप चमेलीकँे देबाके कोशिस करैत छल । उएह लड़कीसभसँ ओकरा किछु सहानुभूति भेटैत छल । आश्रमके नियम अनुसार चमेलीकेँ विद्यालयमे नामांकन कराओल गेल । नेपाली माध्यमसँ ओकरा किछु बुझऽमे नहि आबि रहल छल । कोनो तरहें एस.एल.सी. पास कराओल गेल । आब चमेली परिस्थितिसँ सम्झौता करऽ चाहलक । मुदा अनाथ आश्रमक नियम अनुसार १८ वर्षक उमेर पुरा होइते अनाथ आश्रममे रहबाक अनुमति नहि अछि । एहि क्रममे ओ अपन पापाके कतेको पत्र पठओलक । मुदा कोनो उत्तर नहि अएलाक बाद अन्तिम प्रयासक रुपमे अपन मौसीकँे एकटा पत्र लिखलक । मौसीसँ चमेलीकँे बहुत स्नेह छल । मौसी एहि शहरक अनाथ आश्रमसँ सम्पर्क कएलैन्हि आ कहुनाकऽ होस्टलमे राखएबाक प्रयास कऽ देलैन्हि । जेठ बहिनद्वारा काएल गेल पापक प्रायश्चित छोट बहिन यानी मौसी एहि प्रकार कएलक । ई होस्टल स्वच्छ आ स्वतन्त्र छल । एहि ठाम रहैत काल चमेली कम्प्युटर टाइप सिखलक आ जल्दिए अपन पएरपर ठाढ़ हएबाक कोशिस करऽ लागल । १२ कक्षाक पढाइ सेहो शुरु कएलक । चमेली कम्प्युटर टाइपिङ्गके लेल जतऽ जाइत छल ओतऽ बेरियाक छुट्टीमे ओ खाली रहैत छल । ओतऽ छोट फुलवारीमे चमेली घण्टोधरि रहैत छल । फुलवारीक बाहर रिक्सा स्टैण्ड छल । ओ रिक्सा स्टैण्ड लग रितेश दैनिक अबैत छल । स्कूलक बच्चा साँझ चारि बजे जाइत छल । ओ १० बजे बच्चाकेँ स्कूलमे छोड़लाक बाद अहिना पुलवारीमे सुस्ताए अबैत छल । ओ चुपचाप चमेलीकेँ प्रत्येक दिन देखैत रहैत छल । रितेश ओकरासँ परिचय बढओलक । रितेशक अपनत्व आ सहानुभूति चमेलीकँे मलहमके काज कएलक । चमेली हुनकासँ घूलि–मीलि गेल । धीरे–धीरे ओ रितेशकँे अपन बितल घटना सुनओलक । रितेश सान्तवनो देलैन्हि, जीबाक इच्छा बढ़ओलैन्हि । स्वयं रितेश अपन काकाके घरमे रहि रहल छलाह । ओ चमेलीक पिड़ा बुझैत छलाह । एक समान दुनू एक दोसरकँे पसिन करऽ लागल । संसारक सताओल चमेली रितेशसँ अलग होबऽ नहि चाहैत छल । ओ रितेशकँे विवाहक पवित्र बन्धनमे बान्हयके लेल कहैत रहल, दिन बितैत गेल एहि क्रममे पेटमे बच्चा भऽ गेल । मैडम पुछलैन्हि, ‘तोँ वीरगञ्ज जाए चाहैत छेँ ? तोरा हम स्वयं लऽ जएबौ ।’ चमेली तुरन्त बाजल, ‘नहि मैडम, नहि हम वल पूर्वक ककरोसँ किछु नहि चाहैत छी । मुदा, मोन करैत अछि एक बेर हुनका सभसँ भेटकऽ पुछी जे, कोन अधिकारसँ ओ हमरा पोसलैन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भँसा देलैन्हि । हम जन्मसँ अनाथ छी । ओतहि पलितहुँ, एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पड़ितए । किए हमर विश्वासकेँ तोड़ल गेल ।’ ‘अनाथ आश्रमक अनुभव कि कहू, छोट उमेरमे हमरा अचानक संसारक सभसँ खराब दृश्य देखा देलक । हमर बुद्धिमता व्यर्थ भऽ गेल । महत्वपूर्ण शिक्षाक वर्ष वर्वाद भऽ गेल । यदि पहिलेसँ आश्रममे रहितहुँ तऽ अपन मार्ग दोसर हिसावसँ बढ़बितहुँ । हमरा कतहुके नहि छोड़लैन्हि ओ सभ । मौसी आ रितेश हमराजँ सहारा नहि देने रहितैथि तऽ या मरिगेल रहितहुँ वा पागलखानामे अवश्य पहुँच गेल रहितहुँ ।’ मैडम ओकर माथ सहलओलैन्हि । डाक्टर सोनिया बातके बदललैन्हि । ओ कहलैन्हि, ‘जे भऽ गेल से भऽ गेल एहि परिस्थितिसँ अहाँकेँ लड़बाक अछि । तीन–चारि दिन हमरा लग रहू । हम अहाँ आ रितेशक विषयमे अवश्य किछु सोचब । मैडम खोजिकऽ रितेशकेँ बजओलैन्हि । ओ सज्जन, मेहनती आ इमान्दार लड़का छल । दिन भरि स्कूलक रिक्सा चलबैत छल आ रातिमे पढ़ैत छल । स्नातकक पढाइके अन्तिम वर्षक छात्र छल । मैडम आ डाक्टर सोनियाक सल्लाहसँ रितेश चमेलीसँ बियाह कएलैन्हि । डाक्टर सोनिया चमेलीकँे अपन अस्पतालमे नोकरी देलैन्हि । आखिर चमेलीकेँ जीवनक एकटा किनारा भेटिए गेल । लघुकथा्- फुल फुलाइए कऽ रहल इन्जनकँे शटिङ्ग करयकँे अवाज आबि रहल छल । बीच–बीचमे सिट्टी सेहो बाजि उठैत छल । सवारी गाडी आ माल गाडीकँे आबए जाएकेँ अवाज जोड़ सँ सुनाइ दऽ रहल छल । हम रोबोट जकाँ इम्हर सँ ओम्हर भगैत कखनो ग्यास पर पानि रखैत छलहुँ तऽ कखनो सोनुकेँ दुधक गिलास हातमे दैत छलहुँ । बीच–बीचमे हुनको आवश्यकता पुरा कऽ रहल छलहुँ । भोरक समय कोना बित जाइया पते नहि चलैत अछि । ९ बजे धरि ओहो स्टेशन चलि जाइत छथि आ सोनु सेहो स्कुलक लेल बिदा भऽ जाइत अछि । फेर हम रहि जाइत छी । आ हमर अस्त व्यस्त परल घर, जकरा हम फेर सँ सजाबय लगैत छी । सोनु अपन ब्याग पिठ पर रखलक आ स्कूल चलि देलक, इम्हर ओहो हमरा बाँहि पर एकटा स्नेही हात थपथपा चलि देला । राति सँ भऽ रहल झिस्सी आ बादलक कारण ठण्ढ महशुस भऽ रहल छल । हम आलमारीमे सँ साल निकालि कऽ ओढि लेलहुँ । आगामे टेबुल पर हमरा दूनु गोटेकेँ बिबाहक पहिल वर्षगाँठक खिचल फोटो राखल छल । हम एक टक्क देखैत रहि गेलहुँ, गुलाबी रंगक साड़ी पहिरने हम हुनकर कन्हाँ पर माथ रखने छलहुँ । फोटो हम अपना हातमे लऽ लेलहुँ । हमरा अपन अतित अपने चारु दिस घुमय लागल प्रतीत भेल । माँ बैठक रुम सँ अवाज लगौलक, ‘पिंकी, कनि बेटी, चाह बना कऽ ला नऽ ।’ हम भानस घरमे मचिया पर बैसि आलू सोहि रहल छलहुँ, बगलमे कोबीक तरकारी काटल छल, हमरा कोबीक तरकारी बहुत नीक लगैत अछि, ओकरे देखि रहल छलहुँ । माँकँे प्रेम भरल अवाज सुनि कऽ हमर हृदय जोड़–जोड़ सँ धड़कय लागल । हमरा बुझल छल एहि समय चाहक लेल किए कहल गेल अछि । रातिएमे हम माँ आ बाबुजीक बात सुनि लेने छलहुँ । ओ बातक आधार पर हमरा ई पत्ता चलि गेल छल काल्हि जखन चारि दिनक यात्रा सँ बाबुजी घर अएला ओहि क्रममे ट्रेनमे हुनका एक नवयुवक भेटल छल जे अपने जातिक आ रोजगारमे लागल छल । ओ जयनगर स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर छला । बाबुजी हुनकर बात सँ बहुत प्रभावित भेला आ किछु मिनेटक यात्रामे भेल बातक परस्पर घुलि मिल गेलाक बाद बाबुजी हुनका सँ हमरा बिषयमे बात कएने छलथि । आ ओ सहमत भेलाक बाद बाबुजी हुनका गाम जा कऽ हमर बिबाह एक प्रकार सँ तय कऽ लेने छलथि । हम एम ए पास भऽगेल छी, घरमे सभ हमर नोकरीक बिरोधमे अछि । जहिना–जहिना हमर उमेर बढि रहल अछि, माँ आ बाबुजीक चिन्ता सेहो तारक गाछ जकाँ बढि रहल अछि । घरमे दान दहेज देबाक लेल बुहत बेसी किछु नहि अछि, तैयो ओ अपन बेटीक लेल उपयुक्त बरक खोजीमे छला । कतेको लोक हमरा देखय आएल, मुदा वा त बहुत तिलकक अभाव आ फेर हमर पिरसियाम रंगक कारण बातचित बढिए नहि रहल छल । एहि सभबीच हमर अपन छोट सन सुन्दर घरक कल्पना टुटैत महशुस भऽ रहल छल । बाबुजीक बताओल बातक आधार पर हमरा मनमे एहि युवककेँ छवि बनि कऽ आबि रहल छल, हृदय जोड़ सँ धड़ैक रहल छल । धड़कैत हृदय सँ चाह बना कऽ ओढ़नी ठीक करैत बैठक रुममे चलि गेलहुँ । बाबुजी आ माँ बहुत खुशी देखाइ दऽ रहल छल । माँ ओ युवककेँ सम्बन्धमे जानकारी देलन्हि । हमरा लागय लागल जेना लम्बा पतझरकेँ बाद बहार आबि गेल अछि । चारु दिस गाछ सभ पर हरियर कनोजरि फुटि गेल अछि , अपन भावनामे हम स्वयं बहैत जा रहल छलहुँ, बादमे ओ युवककेँ फोटो सेहो हमरा देखाओल गेल । देखि कऽ दंग रहि गेलहुँ अनायासे मुहँ सँ खसि पड़ल अबेरे सँ किए नहि मुदा मोन जोगर जीवन संगी भेट रहल अछि । शायद एतेक सुन्दर पढ़ल लिखल युवक सँ हमर संसार बसय बला छल । एहिद्वारे एखन धरि हमर हिसाब किताब नहि बैसल छल । फोटो हातमे लऽ हम इहे सभ सोचि रहल छलहुँ । ‘चट्ट मगनी पट्ट बिबाह’ बला बात भेल । एतेक बढियाँ लड़का कही हात सँ नहि निकलि जाए एहिद्वारे बाबुजी एक महिना भितरे बिबाह दुरागमन सँ निबैट गेला । लड़काक बाबु नहि छल माँ गामेमे रहैत छली । अगहन महिना जाढ़ शुरुए भऽ रहल छल जाहि पर मन पसिनक सँग हमर कल्पनाक रंग आकाशमे चारु दिस छिरिआए लागल । चारि दिन सासुरमे रहलाक बाद जयनगर स्टेशनक लेल बिदा भऽ गेलहुँ । ओ स्थानक लेल हम तऽ ओहिना बहुत उत्सुक छलहुँ । पतिक व्यवहार सेहो बहुत बढियाँ छल । हुनक हँसमुखक अनुहारकँे अएना जकाँ देखैत छलहुँ । एक दोसर सँ बातचित करैत कखन जयनगर स्टेशन आबि गेल पते नहि चलल । ‘पिंकी, स्टेशन आबि गेल ।’ हुनकर अबाज सुनाइ देलक, हम एकदम चौक कऽ जल्दी सँ उठि अपन माथ झाँपय लगलहुँ । कनिक लाजो भऽ गेल पतिक नोकरी बला स्थानपर पहिल बेर अएलहुँ अछि । फेर जल्दी–जल्दी हुनकर पाछु लागि गेलहुँ । ओ ब्याग हातमे लऽ आगा–आगा जा रहल छला । हम सोचि रहल छलहुँ स्टेशन पर हुनकर चिन्हा परिचयकँे दू तीन गोटे मित्र हमरा अवश्य लेबए अएता, कारण ओ बता रहल छलथि एतेक जल्दीमे बिबाह भेल की ककरो आबएकेँ सम्भव नहि छल । मुदा आश्चर्य लागल जखन किओ देखाइ नहि देलक । हम असगरे समान सभ लऽ हुनकर पाछु चलि रहल छलहुँ । जयनगर स्टेशन सँ किछुए दुर पर किछु क्वाटर सभ बनल छल । एक केँ बाद एक क्वाटर छुटि रहल छल हमरा बुझएमे किछु नहि आबि रहल छल । अन्ततः एकटा छोटका क्वाटरक आगा पहुँच कऽ ओ गेटक ताला खोललन्हि । छोट रुम ओहि सँ सटले एकटा भानस घर आ पाछूमे बाथरुम छल । भानस घरमे आठ दशटा बरतन आ कनिमनि डिब्बा राखल छल । एकटा पुरान पेटी सेहो छल । ई की ? हम अबाक भऽ हुनका दिस ताकय लगलहुँ । ई सभ हमरा अपना आपमे अप्रत्याशीत आ अजिब जँका लागल । ‘एना की देखि रहल छी ? एखन क्वाटर नहि भेटल अछि । एहिद्वारे एहिमे रहि रहल छी । जहिना क्वाटर भेटत बदलि लेब,’ फेर ओ बातकेँ आगा बढबैत कहलन्हि, ‘ओना एखन धरि असगरे छलहुँ किए बड़का घर लितहुँ । आब अहाँ आबि गेल छी तऽ बड़का घरक कोशिश करब ।’ ओ लग आबि कऽ हमरा बाहि पर हात थपथपा खुशी कऽ देलन्हि । एक दू दिनक बाद ओ अपन काज पर सेहो जाए लगलथि आ हम असगरे रहय लगलहुँ । धीरे–धीरे लग पासक महिला सभ हमरा लग आबय लगली । एक दिन चालीस पैतालीस बर्षक एक महिला हमरा घर बाटे जाइत छली । हमरा देखि कऽ टोकि देली । भेष भुषा आ बातचित सँ पत्ता चलल ओ एतयकेँ स्टेशन मास्टरक कनियाँ छथि । एखन धरि जतेक महिला अबैत छली, पारस्परिक बिचारधारा आ स्तरमे समान्य लगलाक कारण किछु जमि नहि रहल छल । ई सोचि कऽ जखन स्टेशन मास्टरक कनियाँ अछि तऽ बातचितमे आनन्द आओत, हम हुनका आदर सँ घरमे अनलहुँ आ खुलि कऽ बातचित करय लगलहुँ । ‘लगैत अछि, अहाँ बहुत पढल लिखल छी ?’ एका एक ओ पुछलन्हि । ‘हँ हम एमए पास छी’ हम गर्व सँ कहलहुँ । ‘अहाँकँे बुझल अछि, अहाँक पति एतय की करैत छथि?’ ओ गम्भिरता सँ पुछली । ‘हँ, एतय ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि ।’ हम ओही गर्व सँ उत्तर देलहुँ । ‘ई अहाँ सँ केँ कहलक अछि ?’ ओ फेर सँ प्रश्न कएली । ‘ओहे हमरा आ हमर नैहरक लोककँे कहने छलथि ।’ हम आब सतर्क भऽगेल छलहुँ आ संगहि आश्चर्य सेहो भऽरहल छल की कतहुँ गरबर तऽ नहि छैक । ‘तऽ आब सुनु, अहाँक संग धोखा भेल अछि । ई जगदिश एहि स्टेशनक पैट म्यान अछि ।’ ओ एक एक शब्द पर जोड दैत कहलन्हि । हमर माथ घुमय जकाँ लागल एखन धरि हमरा सन्दर्भमे जतेक घटना घटि रहल छल, ओ हमरा अप्रत्याशित लागि रहल छल, ई नयाँ बात सुनि हम स्तब्ध भऽ गेल छलहुँ । ई तऽ हम कल्पनामे सेहो नहि सोचि सकैत छलहुँ । हम ओ महिलाके मुहँ दिस देखि रहल छलहुँ । हमर मोन एखनो अपन प्रियतमक लेल ई बात मानयकँे लेल तैयार नहि छल । शायद ओ हमर मोनक बात बुझिगेल छली । दू मिनेटक चुप्पिक बाद हमरा कनहा पर हात रखैत कहलन्हि, ‘एना लगैत अछि अहाँकँे हमरा बातक बिश्वास नहि भऽ रहल अछि । हम अहाँकेँ धोखामे राखय नहि चाहैत छी । एहिद्वारे काल्हि भोर दस बजे अहाँ हमर घर चलि आउ ओ तरकारी लऽ कऽ आओत । हमरा घरक तरकारी ओहे अनैत अछि । तखन अहाँकँे सभ सत्य पत्ता चलि जाएत । ई कहि कऽ ओ तऽ चलि गेली, मुदा हमर मस्तिष्कमे एकटा बबंडर उठल छल । हम ओहि ठाम बैसल आँखि सँ दूर किछु देखय लगलहुँ । हमरा एहि सभ पर बिश्वासे नहि भऽरहल छल । मुदा बेर–बेर एकटा बात घुमि रहल छल ओ अपरिचित महिलाकेँ हमरा सँ एहन झुठ बाजयकँे किए आबश्यकता पड़ि गेल । मोन कहलक, ‘पहिने सही बात पता लगाली, फेर हुनका सँ किछु कही’ ई सोँचि कऽ ओहि दिन हम समान्य जकाँ बनल रहलहुँ । दोसर दिन भोर दस बजे हुनका गेलाक बाद स्वयं तैयार भऽ कऽ ठीक दस बजे छोटका क्वाटर छोड़ि बड़का क्वाटर दिस बढि गेलहुँ । ‘आउ, बैसु ।’ स्टेशन मास्टरक कनियाँ बहुत स्नेह सँ हमरा अपना लग बैसा लेलन्हि । हम दूनु गोटे आपसमे बातचित कऽ रहल छलहुँ की ओ तखने आबि गेला । बास्तबमे तरकारीक बड़का झोड़ा लेने घाम सँ तर उपर छलथि । जहिना हम दूनु एक दोसरकँे देखलहुँ, ओहो स्तब्ध रहि गेला, किछु देरक लेल ओ ठगल जँका ओतहि ठाढ़ रहि गेला । फेर मनकेँ शान्त करैत ओ जल्दी सँ बाँकी पैसा स्टेशन मास्टरक कनियाँकेँ पकरा तिर जँका भागि गेला । आब सभ स्थिति हमरा आगा स्पष्ट भऽ गेल छल । हम लजाइत जल्दी सँ घर आबि द्वार बन्द कऽ चौकी पर उल्टा सुति हिचैक– हिचैक कऽ कानय लगलहुँ । की ई धोखा खाएकँे एतेक बड़का संसारमे हमही रहि गेल छलहुँ । चौबिस बर्षक बाद एकटा छोटका बगैचा चाहलहुँ ओहो काँट सँ भरल निकलल । हमरा हुनका पर बहुत तामस आबि रहल छल । ओ बढ़िया कपड़ा पहिर, अपनाके स्मार्ट देखा कऽ हमरा बाबुजीकेँ धोखा देलन्हि की ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि, जखन की छथि एकटा पैट म्यान । जीबनक उल्लास शुरु भेलो नहि छल की समाप्त होबय जकाँ प्रतित होबय लागल । हम सोचि रहल छलहुँ, ‘नैहरमे, कुटमैतामे, सँगीमे कोना मुहँ देखाएब । सभ हमरा पर हँसत की पैट म्यान सँ बिबाह कएने अछि । माँ बाबुजी सेहो भग्यकँे लऽ कऽ कन्ता ।’ हमरा दिमागमे रंग–विरंगक बिचार आबि रहल छल । हम दिन भरि किछु नहि खेलहुँ आ नहि कोनो काज कएलहुँ । जखन ओ ६ बजे अएलाह तखने हम चौकी पर सँ उठि हुनका खुब बात कहलहुँ । ‘अहाँ हमरा धोखा किए देलहुँ ? हमर जीवन किए बरबाद कएलहुँ ? एकटा एमए पास लडकीकँे कनियाँ बना कऽ किए अनलहुँ’ हम हुनका पर एकदम बरसि रहल छलहुँ । ओ एक दम शान्त भऽ हमरा दिस देखैत बजला, ‘नहि पिंकी, एहन बात नहि अछि । हमरा मोनमे कोनो धोखा देबाक बात नहि छल, हम अहाँ सँ पे्रम करैत छी आ करैत रहब .....’ बात काटि कऽ हम तेजी सँ हुनकर नजदिक आबि कऽ चिचिएलहुँ, ‘पे्रमक एतय की प्रश्न अछि ? अहाँ अपन औकात तऽ देखु एकटा पैट म्यान भऽ कऽ अहाँ हमरा सन लडकी सँ बिबाह कएलहुँ आ आब कहैत छी धोखा नहि देलहुँ अछि । हम अहाँ सँग नहि रहि सकैत छी ।’ ‘सुनु पिंकी हम अहाँकेँ कोनो बातक लेल जोड़ नहि देब मुदा हम साँच कहैत छी, हम एसएलसी धरि पढल छी आ आगा पढयकँे हमर बहुत इच्छा छल मुदा बाबुजीक आकास्मिक मृत्यु आ धनाभावक कारण हमर पढाइ रुकि गेल । एसएलसी कएलाक बाद कतहुँ नोकरी नहि भेटल । अन्तमे एहिठाम काज करय लगलहुँ ।’ ओ गारा बाझल अबाजमे कहि रहल छलथि । ‘हमरा ई सभ नहि सुनयकेँ अछि आ नहि अहाँकँे मजबुरीमे हमर कोनो दिलचस्पी अछि । हम आब एतय एक क्षण नहि रुकि सकैत छी । काल्हि भोरे गाडी सँ चलि जाएब ।’ ‘हम अहाँकेँ रोकब नहि आ नहि अहाँकेँ रोकयकेँ अधिकार अछि । हम अपन गल्ती स्वीकार करैत छी, मुदा एकटा बात धैर्यताक संग सुनु पिंकी, हम ई सोचि कऽ बिबाह कएने छलहुँ जे अहाँके हिम्मत पाबि कऽ आगाकँे पढाइ पुरा करब । हम जे सपना देखने छी, ओ एहि जीवनमे पुरा करब । मुदा अहाँ नहि चाहैत छी तऽ अहाँकँे इच्छा ।’ ओ हमरा नजदिक अबैत बजलथि आ हमरा कनहापर हाथ राखयकँे प्रयास कएलन्हि । मुदा ओहि समय हम एक घाइल शेरनी जकाँ तमसायल छलहुँ । हम हुनकर हात जोड़ सँ झटैक देलहुँ आ बिना हुनका देखने रुमकेँ भितर सँ बन्द कऽ पड़ि रहलहुँ । ओ राति निन्द हमरा सँ कोशो दूर छल । बाहरक पद चाप सँ हमरा आभास भऽ रहल छल ओ बरण्डेमे एम्हर–ओम्हर टहैल रहल छला । बहुत देर धरि हम आबेशमे किछु नहि किछु सोचैत रहलहुँ । बहुत देरक बाद जखन मोनक बिहारि कनिक कम भेल तखन बिचार करय लगलहुँ, ‘काल्हि हमरा जेबाक अछि । मुदा जाएब कतय ? बाबु जीक लग ? मुदा ओ घर तऽ हम छोड़ि आएल छी । आब की ओहने आदर हमरा फेर भेटत ? सभ खिस्सा बता देलाक बाद बाबुजी उल्टे तमसेता । हुनकर तबीयत आओर खराब भऽ जाएत । माँकेँ तऽ ओहिना ब्लड प्रेसर अछि, ओ कहुँ बेहोस भऽ गेल त ? निश्चय हमरा सहानुभूति भेटत, मुदा कहिया धरि ? धीरे–धीरे सभ समान्य भऽ जाएत । मुदा हमराकँे अपनाओत ? हमरा भविष्य पर परित्यक्ताक छाप लागिए जाएत । ‘पड़ोसी, सँगी, सरकुटुम्ब जे सुनत, हमरा मुहँ पर सान्तवना देत, मुदा पीठ पाछू हमर मजाक उडाओत । एतय सँ गेलाक बाद जे भविष्य हम बनाबय चाहैत छी की ओ सम्भव हैत ? भवाबेशमे कोनो नयाँ कदम उठाबय सँ पहिने हमरा ई बढियाँ जकाँ सोचि लेबाक चाही की नयाँ चाल टुटल जीवनकेँ जोड़ि सकत वा नहि ? ‘हुनका बदनामी कएला सँ की हमरा बदनामी नहि हैत ? जिनका सँग सुख दःुख निर्बाह करबाक बचन लेने छलहुँ, यदि ओ गल्तीए कएने छथि तऽ की हम एहि दुखित हालतमे हुनका छोड़ि चलि जाइ ? तऽ हम कि करु ?’ हमर पढाई बिबेक काज कएलक । हमरा धीरे–धीरे एना लागय लागल, ‘हमरा ई घर नहि छोड़बाक चाही । आब तऽ हमरा अपन एहि काँट भरल बाटिकाकँे कोशिश कऽ कऽ फुल सँ भरल बनाबयकेँ चाही । चिड़ै जखन खोता बनबैत अछि तऽ खरपतारसभ निच्चा खसैत रहैत अछि मुदा ओ कहियो हिम्मत नहि हारैत अछि । अपन खोता पुरे करैत अछि । फेर हम तऽ पढल लिखल महिला छी । ओ कहि रहल छथि तऽ शायद ओहो ठीक होथि । सम्भव अछि अपन साधना अधुरा रहलाक कारण आब हमर माध्यम सँ पुरा करय चाहैत होथि आ फेर हम तऽ हुनकर अर्धागिनी छी । महिला तऽ शक्ति होति अछि, पुरुषकँे पौरुष स्त्रीसँग पुरा होइत अछि । ‘हमरा एखन हिम्मत नहि हारबाक चाही । जखन एहि घरमे आबिए गेल छी तऽ एहि घरकँे रोशन करबाक प्रयत्न करब ।’ पुरे राति इहे सोच साँचमे निकलि गेल । जखन सुति कऽ उठलहुँ तऽ उज्जर किरण जँका हमर मन सेहो साफ भऽ गेल छल । ओ धुनक धनी छला ।ओ अपन पढाइ फेर सँ शुरु कएलन्हि । हमहुँ बोर्डिङ्ग स्कुल पकड़ि लेलहुँ । दूनुकँे त्याग, तपस्या आ साहस बास्तबमे रंग देखौलक ओ सात सालमे एमए कऽ लेलन्हि । ओ बास्तवमे सहायक स्टेशन मास्टर बनि गेला । हमर बँगैचामे छोटका फुल सोनु सेहो चलि आएल । आब हम नोकरी छोड़ि देने छी । कतहँु दुर सँ आबि रहल सीट्टीक आबाज सँ हमर ध्यान भंग भेल । हम फोटो टेबुल पर राखि देलहुँ आ खिड़की सँ बाहर दिस तकलहुँ ....कतहुँ दूर रेलक पटरीकँे दूनु कोर एक दोसर सँ मिलैत नजरि आबि रहल छल । लघुकथा- बंश हमर दृष्टि तीव्र गती सँ पत्रिकामे प्रकाशित परिणाममे अपन रोल नम्बर ताकि रहल छल । अपन रोल नम्बर पर नजरि पड़िते हमर मोनमे ओहने खुशी भेल जेना कोनो सातदिनक भुखाएलकेँ आगामे छप्पन प्रकारक व्यंजन पड़ोसि कऽ कियो धऽ देने होइ । समिपमे बाबुओ जी आ माँ ठाढ़ रहथि । हुनको आँखिमे खुशीकँे सागर हिलोर मारैत कियो देख सकैत छल । मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कऽ गेल छलहुँ, एहि क्षणकँे प्रतिक्षो एक—एक पल एक—एक वर्ष जकाँ बितौने छलहुँ हम । सम्भवतः हमरोसँ बेसी एहि क्षणकेँ प्रतिक्षा माँ कँे छल । तएँ अनायासे ओकरोे मुँहसँ निकलि पडल ‘हमर बेटी कोनो बेटासँ कम अछि ? हाकिम बनि हमर खनदानकेँ नाम रोशन करत ।’ आखिर ई हमर सपना सकार कइए कऽ देखौलक ! ओकर एहि कथनमे खुशी छलैक रहल छल आ की खुशीसँ बेसी पीडा । हमर माँ कँे मनोभावकेँ बुझि बावुजी प्रेम सँ ओकर बाहि थपथपा देलन्हि । हमरा मेडिकलमे चयनकेँ खुशीमे बाबुजी सभकेँ मँुह मिठ करएबाक लेल मिठाइ लाबय बजार चलि गेलाह । माँ भानस घरमे चलि गेल । शायद ओ कोनो निक जलपान बना हमरासभकँे खुआ अपन खुशी व्यक्त करय चाहैत छल । हम अतितक पुस्तककेँ पन्ना उलटाबय लगलहुँ । जहिएसँ हम होशगर अर्थात बुझय बला भेलहुँ । अपन मायकँे दाइद्वारा प्रताडित होइत देखने छलहुँ । पहिने तऽ हमरा बुझबामे नहि आबय । आखिर हमर माँ हुनकर की बिगाड़ने छल , कोन कमी वा अपराधक कारण सदिखन दाइ आ पिसीकेँ व्यंग्य वाणक मारि झेलैत अछि माँ ? धीरे—धीरे हम बड़का होइत गेलहुँ आ पारिवारिक तथा समाजिक परिस्थितिकेँ बुझय लगलहुँ । दाइक आक्रोशक कारण हमरा बुझयमे आबय लागल । हम तीन बहिन छी । हमरा कोनो भाइ नहि अछि । दाइकँे दृष्टिमे माँकेँ कोनो बेटा नहि होएब सबसँ बड़का अपराध छैक । तेसर बेटी यानी हमर जन्म भेलाक बाद तऽ घरमे हंगामे ठाड़ भऽ गेल छल । दाइकेँ पुरा उम्मीद छलन्हि की अहिबेर लड़कँे हेतै, मुदा से भेल नहि । फेर लड़कीए होएबाक खबर सुनि ओ हमर मुँह देखब तऽ दूर, माँ कँे छठिहार दिनक बिध तक नहि करओलन्हि । बाबुजी अस्पतालसँ किछु दिनक बाद हमरा आ माँकँे घर अनने रहथि । माँ कँे दुःख जखन कखनो बाबुजी बाँटय चाहथि, हिम्मत नइ हारबाक बात कहथि हँसय हँसाबय कँे बात करथि, ओ दाइ कँे पसिन नहि पड़ैक आ मुँह बिचुका कऽ दाइ बाजल करथि, ‘ई जोरुकँे गुलाम अछि ।’ माँ एखन तनमनक पीडा सँ उवरलो नहि रहथि की दाइ अपन बेटा यानी हमर बाबुजी पर दोसर विवाहक दबाबक बात शुरु कऽ देलन्हि । दाइयक कहब छल, ‘आखिर बेटा बिना वंश कोना चलतै ?’ जखन बाबुजी दाइकेँ बातकँे अनसुना कऽ दैथ तऽ ओ हमर माँ पर तामस उतारथि ‘३÷३ बेटीकेँ जन्म देलक, एकटा बेटा जन्माओल नहि भेलन्हि ।’ तऽ कहियो कहथि ‘ई नहि होइ छन्हि की हमर बेटाकँे पिण्ड छोड़ि दैथ जहिसँ हम दोसर पुतहुँ लऽ आउ, पता नहि केहन सँ पाला पड़ल अछि । दोसर पुतौहँु बेटा जन्माबयकँे सर्टिफिकेट अपन संग लऽ कऽ औती ? अहि सभ गप्प सँ माँ भितरे—भितर टुटय लागल, मुदा बाबुजीकेँ दृढताक कारणे दाइकेँ एक्को नहि चललन्हि , एहि मादे । माँ बाबुजी कँे कतेकोबेर बतिआइत आ दुःखी होइत सुनने आ देखन छी । एखन तक हम बहुत सम्झदार भऽ गेल छलहुँ , पढाइमे हमर रुचिकेँ देख बाबूजी हमरा विज्ञान विषयसँ इन्टर करेलाक बाद मेडिकलकँे प्रवेश परीक्षामे बैसौलथि, जखन की हमर दूनु बहिनकेँ दाइक हस्तक्षेपक कारण माध्यमिक कँे बाद घरेमे बैसय पड़ल छल । दाइकँे माँ सँ कोनो सहानुभूति नहि छलैक, विवाह कएलाक बाद सासुर अयलापर माँ कँे नाम दाइ बौअसिन रखने छल । मुदा हमरा जन्म भेलाक बाद तऽ हुनकर नजरिमे अलक्ष्नी बाहेक किछु नहि रहि गेल छल । ओ अपन आक्रोश कोनो ने कोनो बहन्ना लगा कऽ उताडैÞत रहैत छली । आ माँ अपन व्यथा छातीमे दबा नोर पीबैत रहैत छल । माँ पर होइत अत्याचारकँे देख हम मनेमन एक संकल्प लेलहुँ आ ओकरा पुरा करबाक लेल जि जान सँ पढाइमे जुटि गेलहुँ । हमर मेहनत आ लगन सफल भेल आ आइ हमरा मेडिकलमे चयन भऽ गेल । हमरा चयनमे माँ केँ बड़का हाथ छलैक, जेकरा हम शब्दमे व्यक्त नहि कऽ सकैत छी । बाबुजी हाथमे कए प्रकारक मिठाइ लऽ कऽ एला आ खुशीसँ झुमैत कहलन्हि, ‘आइ हम अपन संगी साथी करकुटुम्बसभकँे मिठाई खुएबै । मीनाकँे जन्मपर तऽ घरमे मिठाइकेँ एकटा टुकड़ियो तक नहि आएल ।’ डाक्टरीमे हमरा चयन भऽ गेल ई सुनि दाइ सेहो अचंभित छली । हुनकर दृष्टिमे तऽ लड़कीकँे अधिक पढय सँ की लाभ ? आखिर लड़कीकेँ तऽ चुल्हे फुकयकेँ छैक । जे होइक , हम धरान मेडिकल कलेजमे पढय चलि गेलहुँ । छुट्टीमे जखन हम आवी तऽ दाइसँ विशेष रुपसँ भेटैत छलहुँ । धीरे—धीरे हम अनुभव केलहुँ जे लड़कीकँे प्रति दाइकँे धारणामे परिवर्तन आवि रहल छलैक । हमरा एकर किछु—किछु अनुमान तऽ छल, मुदा तइयो हम एकर कारण माँ सँ जानय चाहैत छलहुँ । ओ कहलक कि हमर पिसीकेँ लड़काकँे लालसामे एककेँ बाद एक करैत ५ टा लड़की भेलन्हि । छठममे लड़का भेलन्हि । एतेक ने लाड प्यार ओकरा देल गेल जे ओ बिगरि गेल । बड़का भेलापर ओ अपराधी प्रवृतिको निकलल । ओकर आदत आ व्यवहार सँ मायबाबुकँे ओकरा बेटा कहयमे लाज होबय लागल छैक । पाँच बरखकँे बाद जखन हम एमविविएस कँे डिग्री लऽ कऽ घर एलहुँ तऽ मायबाबुकँे सँग—सँग दाइकँे आँखिमे सेहो खुशी देख हम पुलकित भऽ उठलहुँ । एखन हमर संघर्ष जारीए अछि । आगा आओर पढिलिख कऽ सर्जन बनय चाहैत छी । दूनु दिदीकँे विवाह भऽ गेल अछि । आब बाबुजी हमर विवाह कऽ अपन उत्तरदायित्वसँ मुक्त होबय चाहैत छथि, मुदा हमरा सर्जन बनबाक इच्छाकेँ देखैत हमर माँ मात्र नहि दाइ सेहो हमरा आगा पढावयकेँ लेल बाबुजीकँे मनौने छल । आइ कठिन परिश्रमक बाद हम एक कुशल सर्जन बनि गेल छी । दाइकँे अल्सरक अपरेशन हम स्वयं अपने हाथसँ कएलहुँ अछि । आब हमर दाइ बेटाकँे वकालत नहि करैत अछि । आब तऽ ओ कहल करैया बेटा हो वा बेटी कूलकँे मर्यादा हेतु शिक्षा आ संस्कार आवश्यक अछि । एकर अर्थ हम बढिया जकाँ बुझैत छी, मुदा जखन दाइ बजैत अछि तऽ खुशीकेँ ठेकान नहि रहैत अछि । झूमि उठल जनकपुरवासी युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी बिक्रमी शम्वत २०६९के पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजन कएलक जकर उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव कएलनि । महोत्सवमे नेपाल आ भारतके आठ गोट नाट्य समूह सहभागी भेल । चारि दिवसीय महोत्सवके समापन तथा नयॉ वर्ष २०६९के स्वागतमे मिथिला नाट्य कला परिषद एवं रामानन्द युवा क्लवक कलाकारलोकनि रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो आयोजन गएने छल । जाहिमे मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक,नेहा,ललित कामत,संगीता देव, नवीन मिश्रआदि गायक गायिकालोकनि अपन स्वरक जादूस‘ दर्शकके मन्त्रमुग्ध कद्र देने छल । महोत्सवक अन्तिम दिन मिथिला अनुभूति दरभंगा श्याम भास्कर लिखित तथा निर्देशित ‘हमर गाम’नामक नाटक मञ्चन कएने छल त रामानन्द युवा क्लव अवधेश पोख्रेल लिखित तथा पि चन्द्रशेखर आ बिएन पटेल निर्देशित ‘मर्जीवा’नाटक मञ्चन कएने छल । दुनू नाटकमे समाजक भहरैत सामाजिक मूल्य मान्यता आ धनक पाछॉ अपस्यांत लोकक कथा वर्णित छल । महोत्सवके तेसर दिन अर्थात वृहस्तपति दिन मञ्चित दू नाटकमे मिथिलाक दूगोट लोकनायकके कथा वर्णित छल । बिराट मैथिली नाट्यकला परिषद विराटनगरद्वारा प्रदर्शित ‘महाकंजुस’ नामक नाटकमे मिथिलाक लोकनायक गोनू झाक बहुचर्चित हास्य कथा वर्णित छल । एहि नाटकके संकलन आ निर्देशन युवा प्रतिभावान नाटककार रामभजन कामत छलाह त चेतना अभियान जनकपुरद्वारा मञ्चित ‘भैया अएलै अपन सोराज’ मे मुसहरजातिक लोक नायक दीना आ भद्रीक कथा वर्णित छल । नाटककार रामभरोस कापडि लिखित तथा सुनिल यादव निर्देशित ई नाटक ऐतिहासिक महत्वक छल । दोसर दिन प्रतिविम्व नाट्य समूह अवधेश पोख्रेल लिखित ‘कम्मो डार्लिंग’ एवं सीमावर्ती मधुवनीक मिथिला अनुभूति नाट्य समूह महेन्द्र मलंगिया लिखित ऐतिहासिक नाटक ‘नसवन्दी’ प्रदर्शन कएने छल । महोत्सवके पहिल दिन भारत सहरसाक पंचकोशी नाट्य समूह हरिमोहन झाक कथापर आधारित ‘पॉचपत्र’ आ मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर रमेशरंजन झा लिखित तथा अनिलचन्द्र मिश्र निर्देशित‘बुधियार छौडा आ राक्षस’नामक नाटक मञ्चन कएने छल । मिनापके नाटक शिल्प आ अभिनयके दृष्टिस‘ वेजोड छल । नाट्य महोत्सवके किछु तस्वीर सेहो तस्वीर श्यामसुन्दर शशि,कान्तिपुर नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल जनकपुरक रामानन्द चौकक बम विस्फोटक समाचार छायांकन करय जनकपुर अञ्चल अस्पतालमे सोमदिन पहुँचते छी की पत्रकार बटुक नाथ झा कनैत बाजल रंजु दिदी मरि गेलै । अए मिनापक रंजु .........हमरा मुहँ सँ एहि सँ बेसी नहि बहराएल । हमरा फुराइए नहि रहल छल बटुककेँ कोना सान्त्वना देल जाए । खुन सँ लतपत रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष रमेश ठाकुर सेहो रंजुकेँ की भेलैक पुछि रहल छलथि । कल्पनो नहि छल रंगमंचक हस्ती रंजु झा हमरा सभ लग सँ अतेक जल्दी चलि जएती । रंजु संग रंगमंचमे प्रवेश कएलाक किछुए दिनकबाद परिचय भेल छल मुदा व्यक्तिगत रुप सँ हमरा कमे बातचित होइत छल । जहिया कहियो भेटैत छलथि प्रणाम दिदी कहैत छलियन्हि आ रंजु मुसैक कऽ प्रणाम प्रणाम कहि दैत छली । मुदा एहि बेरक नाटक महोत्सवमे एक्के स्थानपर बैस कऽ सभ दिन नाटक देखैत छलहुँ एहि सँ किछु खुलि गेल रही । महोत्सबभरि सभ नाटककेँ हम समीक्षा कएने छलहुँ आ हमर समीक्षाकेँ ओ बहुत बडका प्रशंसक रहथि । सभ दिन नाटक हलमे भेटथि आ हमरा देखिते बाजए लगैथि हम जे सोचने छलहुँ सएह अपन समीक्षामे राखि देलियै । रंजुमे नाटककेँ प्रति गजबकेँ समर्पण छल । रंग मंचपर नहियो रहैत छली तैयो एकर खुब आनन्द लैत छली । किछुए दिन पूर्व मिथिला नाट्य कला परिषद जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे बुधियार छौडा आ राक्षस नाटक मञ्चन कएने छल । एभि न्यूज टिभीक लेल भिजुअल करय ओतए पहुँचलहुँ तऽ सभ सँ पाछु ठाढ़ भऽ रंजुकेँ नाटक देखैत देखलहुँ । रंजु मिनापक सदस्य भेलाक बादो असन्तुष्ट छलथि तैयो नाटक देखब नहि छोडलथि । महेन्द्र मलंगियाद्वारा लिखित छुतहा घलि नाटकमे कबुतरी देवीक जिवन्त अभिनय कएने छली । गाम नइ सुतैया, काठक लोक सहित दर्जन सँ बेसी नाटकमे ओ अभिनय कएने छली । हुनक अभिनयकेँ सभ नाटकमे सराहल गेल अछि । दिल्लीक मेलोरंग संस्था सँ किछुए दिन पूर्व सम्मानित रंजु मिनाप संग असन्तुष्टीक बाद ओतके मंचपर नहि देखाइत छली । रंजु संग नाटक महोत्सवक क्रममे एक दिन पुछने छलहुँ नाटक नहि करैत छी तऽ टाइम पास कोना होइत अछि एहिपर ओ चौकाबए बला बात कहलन्हि एखन खाली गीत लिखैत छी । ओ जानकारी देलन्हि जे एखनधरि मैथिली भाषामे ५० टा सँ बेसी गीत भऽ गेल अछि । हम फेर सँ रंजु कोना रंग मञ्चपर आबैथ एहिकेँ लऽ कऽ बहुत चिन्तित छलहुँ । रविराति मात्रे दाङ्ग जिल्ला सँ जनकपुर अबैतकाल रामानन्द युवा क्लवक अध्यक्ष नविन कुमार मिश्र संग रंजुक विषयमे बातचित कएने छलहुँ । जनकपुर अबिते मिनाप संग सम्झौता कराएब एक प्रकार सँ सप्पथ खएने छलहुँ मुदा ओ सप्पथ हमरा सभकेँ पुरा नहि भऽ सकल । मुदा रंजु मिथिला राज्यक लेल जे सपथ खएने छलथि लगैत अछि ओकरे पुरा कराबएमे सभकेँ उर्जा लगाबए पडत । नेपालमे राष्ट्रिय जनगणना- मैथिलीकेँ स्थान दियावकेँ विशेष संकल्प नेपालमे राष्ट्रिय जनगणना २०६८ शुरु करयकेँ तैयारी चलि रहल समयमे जनकपुरक युवा क्लबसभ नेपालक मिथिलाञ्चल क्षेत्रमे विशेष अभियान शुरु कएलक अछि । ओ अभियान तहत मातृभाषामे कोना मैथिल सँ मैथिली लिखावय ताहिकेँ लेल प्रयत्न करत । रामानन्द युवा क्लबक अध्यक्ष दिपेन्द्र कुमार ठाकुरक अनुसार ठाम–ठाम गोष्ठी, सभा, सडक नाटक कएल जाएत । संगहि मैथिलीकेँ विरोध करयबलाकेँ प्रतिकार सेहो कएल जाएत ओ कहलन्हि । मैथिलीक लेल संकल्प जनगणनाक क्रममे मैथिलीकेँ विशेष अभियान चलावयकेँ जनकपुरमे आयोजित एक कार्यक्रममे संकल्प लेल गेल अछि । रामानन्द युवा क्लब जनकपुरद्वारा आयोजित एक कार्यक्रममे मिथिला नाट्य कला परिषद, अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा कमिटी, मिथिला राज्य संघर्ष समिति, महावीर युवा कमिटी, राम युवा कमिटी, गणेश युवा कमिटी, महावीर नव युवा कमिटी सहितक कमिटीसभक प्रतिनिधि एवं मैथिली साहित्यकारसभक सहभागिता छल । बैसारक सहभागी एवं मिथिला नाट्य कला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहलन्हि –‘मैथिली संस्था एवं प्रेमीसभकेँ अखने जागयकेँ समय अछि, जनगणनामे चुक भेल तऽ बादमे पछतावा बाहेक किछ नहि रहि जाएत ।’ अहि दुआरे विशेष सर्तकता अपनाओल जा रहल अछि ओ कहलन्हि । मैथिलीक बाधक जनगणनामे मैथिलीक बाधक सेहो देखाएल लागल अछि । नेपालक मधेशवादी दलसभ हिन्दी भाषाकेँ पक्षधर भेलाक कारण ओ सभ हिन्दी भाषामे जनगणना नहि लिखा दिए ताहिकेँ डर मैथिली आन्दोलनी संस्थासभकेँ रहल अछि । एखन जाहि रुप सँ सक्रियता देखाओल जा रहल अछि ओकर प्रमुख कारण ओहे रहल राम युवा कमिटीक अध्यक्ष सोहन ठाकुर कहलन्हि । अहि सँ पूर्व भेल जनगणनामे मैथिलीक स्थानपर नेपाल सदभावना पार्टी हिन्दी बहुतो गोटे सँ लिखवा देने छल । फेर सँ हिन्दी लिखावयकेँ प्रयत्न शुरु कएने अछि । सदभावना पार्टीक नेतासभ विभिन्न स्थानपर हिन्दीकेँ वकालत शुरु कऽ देने अछि । रामानन्द युवा क्लबक अध्यक्ष दिपेन्द्र कुमार ठाकुर कहलन्हि –‘जे जतेक करौक हमसभ मैथिलीक मामिलामे एक जुट छी, कियो कतबो चिचियाएत मैथिलक एकता बनल रहत ।’ जनगणनामे मातृभाषाक महत्व कोन भाषाभाषीकेँ संख्या कतेक अछि एकर गिन्ती जनगणने करैत अछि । भाषाभाषीकेँ संख्या बेसी रहत तऽ ओकरा सरकारी सुविधा सेहो बेसी भेटैत अछि । अहिकेँ लेल सभ मातृभाषीबीच प्रतिस्पर्धा रहैत अछि । नेपालमे दोसर सभ सँ बेसी बाजयबला भाषा मैथिली अछि । इ स्थान एकरा फेर सँ प्राप्त भेल तऽ हरेक स्थानपर एकर महत्व बढत । आब तऽ हरेक निकायमे मैथिली बाजयबलाकेँ रोजगारी भेटत । फेर इ तखने भेट सकैत अछि जखन मैथिली भाषीक संख्या बेसी रहत । अगिलका जनगणनामे मैथिलीभाषीक संख्या १२ प्रतिशत रहल छल । अहिबेर २० प्रतिशतधरि होवयकेँ सम्भावना रहल अछि । मैथिलीमे क्रिकेटक कमेन्ट्री भारत आ पाकिस्तानबी मोेहालीक पंजाब क्रिकेट एशोसिएशनक मैदानमे ३० मार्च कऽ भेल सेमीफाइनल म्याचमे एक सँ एक इतिहास बनल तऽ दोसर दिस मैथिलीक इतिहासमे सेहो एकटा अध्याय जोडायल अछि । जनकपुर सँ प्रशारण होबयबला रेडियो मिथिला एफएम पुरे म्याचकेँ मैथिली भाषामे कमेन्ट्री कएलक अछि । बेरिया दू बजे सँ रातिक साढे ११ बजेधरि भेल ओ कमेन्ट्रीक क्रममे हरेक बलकेँ क्रिकेट खेलाडीसभद्वारा समिक्षा सेहो कएल गेल । अहि सँ पहिने रेडियोमे मैथिली भाषामे क्रिकेटक कमेन्ट्री नहि भेल छल । कमेन्ट्रीमे कँे सभ रहथि ? कमेन्ट्रीक संचालन रेडियो मिथिलाक समाचार प्रमूख सुजीत कुमार झा आ वरिष्ठ समाचारदाता अतिश कुमार मिश्र कएलन्हि । कमेन्ट्रीमे समीक्षककेँ रुपमे जनकपुरक चर्चित युवा खेलाडीसभ शोभा कान्त पाण्डे, कुमार प्रसुन, राज मोहम्मद, अभिषेक झा आ सुनिल कुमार प्रसाद सहभागी रहथि । कमेन्ट्रीमे समीक्षकेँ रुपमे सहभागी सुनिल कुमार प्रसाद कहलन्हि – क्रिकेटक प्रत्येक बलक विषयमे अपन धारणा राखब एकटा खेलाडीक रुपमे बहुत मज्जा आयल । मैथिलीमे कमेन्ट्री करब कोना कोना बुझाइत छल मुदा बाजहोमे सहज भेल आ एकटा अनुभव सेहो भेल दोसर समीक्षक अभिषेक झा कहलन्हि । कमेन्ट्रीक प्रभाव भारत आ पाकिस्तानबीचक म्याच भेलाक कारण भारत आ पाकिस्तानक लोक मात्र नहि संसारभरिक लोक उत्सुकता सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छल । सभगोटे म्याचक दृश्य देखय वा सुनय चाहैत छल । अहि दुआरे मिथिलाञ्चलमे सेहो ठाम–ठाम बड़का–बड़का प्रोजेक्टरसभ लागल छल । एहन प्रोजेक्टरक संख्या शहर वा अर्धशहरमे बेसी भेलाक कारण ग्रामीण क्षेत्र जनता एखनो रेडियो एफएमपर निर्भर रहैत अछि । ओतयकेँ जनता विशेष उत्साहकेँ संग रेडियो मिथिलाक कमेन्ट्री सुनलन्हि । ओना पहिल बेर मैथिलीमे कमेन्ट्री भेलाक कारण शहर हुए वा गाम सभ ठामक लोक सुनलन्हि । एकरो प्रतिक्षा क्रिकेटे म्याच जकाँ देखल गेल छल । जनकपुर नगर पालिकाक पूर्व मेयर बजरंग प्रसाद साह कहलन्हि –‘हम तऽ टिभी सेहो देखी आ अपन भाषाक कमेन्ट्रीकेँ लगमे रेडियो राखि कऽ सुनी ।’ पूर्व मेयर साह पुरे कमेन्ट्री सुनलन्हि । महराज महेश ठाकुर कलेज दरभंगाक प्राध्यापक चन्द्रमोहन झा पड़वाक कमेन्ट्रीक अलग अनुभव रहलन्हि । ओ दरभंगा सँ जयनगर स्थित अपन गाम जा रहल छलथि । ट्रेन अबेर भेलाक कारण भारत–पाकिस्तानबीचक म्याच कही छुटि नहि जाए ताहिकेँ लेल चिन्तित रहथि । मुदा ट्रेनमे चढलथि कि सभकेँ देखलखिन मोबाइल लगा कऽ क्रिकेटक कमेन्ट्री सुनि रहल । मैथिली आन्दोलन सँ सेहो जुडल पड़वा कहलन्हि –‘रेलक एकटा ढिब्बा मात्र नहि पुरे रेल क्रिकेटमय बनि गेल छल सभ एफएमपर अपना भाषामे कमेन्ट्री सुनि रहल छल । किछ गामसभमे लउडीस्पीकरमे एफएम लगा कऽ क्रिकेटक कमेन्ट्री सुनल गेल । मैथिलीमे कमेन्ट्रीक सोच कोना बनल ? नेपालक एफएम क्षेत्रमे एकटा अलग पहिचान बनावयबला रेडियो मिथिला किछ नहि किछ नयाँ करैत रहैत अछि । नेपाल भारतक जतेक चुनाव होइत अछि ओकर मतदान दिनक आ मतगणना दिनक प्रत्येक्ष प्रशारण करैत अछि । क्रिकेटेकेँ सेहो कमेन्ट्री किया नहि कएल जाए इ मोन विश्व कप शुरु भेले दिन सँ रहल कहैत रेडियो मिथिलाक प्रबन्ध निर्देशक गोपाल झा साइत सायद भारते पाकिस्तानबीचक म्याचदिन जुडल छल उल्लेख कएलन्हि । जनकपुर क्षेत्र लोक कमेन्ट्री हिन्दी वा अंग्रेजीमे सुनैत अछि एहनमे मैथिलीमे केहन हैत एकर चिन्ता छल प्रबन्ध निर्देशक झा कहलन्हि –‘स्रोताक रेसपोन्स गजबकेँ आएल अछि अहि सँ हमसभ अति उत्साहित छी ।’ क्षेत्रीय स्तरक खेलमे सेहो मैथिलीमे कमेन्ट्रीक माँग जनकपुर क्षेत्रमे वा नेपाल भारतक मिथिलाञ्चल क्षेत्रमे होवयबला क्षेत्रीय स्तरक क्रिकेट प्रतियोगितासभक कमेन्ट्री मैथिली भाषामे करावयकेँ जनकपुरक खेलाडीसभ माँग कएलन्हि अछि । क्रिकेट खेलाडी शोभाकान्त पाण्डे एफएममे मात्र नहि लउडीस्पीकर केँ माध्यम सँ होवयबला कमेन्ट्रीमे सेहो मैथिली भाषाक प्रयोग करवाक लेल सभकेँ अनुरोध कएलन्हि अछि । जंगलमे होरी एखन होरीकेँ मिथिलाञ्चलमे धुम अछि । जतय जाउ ओकरे चर्चा रहैत अछि । वैवाहिक कार्यक्रमसभमे तऽ रंग अविर श्रीपञ्चमीए दिन सँ शुरु भऽ गेल अछि । जे केउ सासुर जाइत छथि वा सम्धियनामे रंग अविर सँ स्वागत हेवे करैत छन्हि । साँझ होइते होरैया सभकेँ गीत गवैत लोक गाम गाममे देख सकैत अछि । जनकपुरमे होरीकेँ विशेष कार्यक्रम होइत अछि । मिथिला नाट्यकला परिषद प्रत्येक वर्ष अहि अवसरपर महामूर्ख सम्मेलन आयोजना करैत अछि । परिक्रमामे सहभागीसभ कञ्चनवनमे होरी तऽ एक हप्ता पहिने खेल चुकल अछि । कञ्चनवनमे होरी वनमे वा जंगलमे होरी हैत इ सुनलापर वहुतो लोककेँ आश्चर्य लागल हैत । मुदा सत्य इहे अछि । जनकपुर क्षेत्रक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कञ्चनवनमे फागुन २७ गते होरी सम्पन्न भेल अछि । ओ स्थलपर के बाबाजी के महिला पुरुष सभ होरी नहि हुरदंग तक खेललन्हि अछि । परिक्रमा डोला कञ्चनवनमे पहुँचलापर प्रत्येक वर्ष होरी होइत अछि जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि । ओ होरीमे जनकपुरक अधिकांश मठ मन्दिरक महन्थ, समाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक क्षेत्र सँ आवद्ध व्यक्ति सहभागि होइत अछि ओ जानकारी देलन्हि । यतेक रंग अविर होइत अछि जे जंगल सेहो रंगा जाइत अछि । रामनगरवाली नामक महिला कहैत छथि हमसभ कञ्चनेवनमे होरी खेलाइत छी पूर्णिमा दिन पुवा पुरी मात्र खाइत छी । कहल जाइत छैक त्रेता युगमे भगवान राम जानकी चारुभाइ आ चारु वहिन संगे कञ्चनवनमे होरी खेलायल छली । ओहिकेँ संस्मरणमे कञ्चनवनमे होरी खेलायल जाइत अछि । ‘जंगलमे होरीकेँ आनन्दे किछ आओर अछि’ , नेपाल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि—‘जनकपुर क्षेत्रमे सही होरी तऽ कञ्चने वनमे होइत अछि । कञ्चनवनक होरीकेँ प्रसिद्धीकेँ देखैत नेपाल सरकारक वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद ओ होरीकेँ अगिला वर्ष सँ विशेष होरी बनावयकेँ निर्णय कएने परिषदक अध्यक्ष दिगम्वर राय जानकारी दैत छथि । महामूर्ख सम्मेलनक सेहो धुम पुवा माउस खायवलासभ वा पूर्णिमा दिन रंग अविर खेलायवलासभ वहुतो स्थानपर होरीकेँ आंगुरपर गनैत हेता । मुदा जनकपुरमे सभ सँ वेसी केकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि तऽ ओ अछि होरी नहि महामुर्ख सम्मेलनकेँ । मैथिली भाषा, साहित्य, कला, सांस्कृतिक उत्थानकलेल काज करयवला नेपालक अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद ओ सम्मेलनकेँ जनकपुरमे प्रत्येक बर्ष आयोजना करैत अछि । ओ सम्मेलनमे विभिन्न विशिष्ठ व्यक्तिकेँ व्यंङ्गयात्मक उपाधि वितरण कएल जाइत अछि । महामूर्खक उपाधि केकरा वितरण कएल जाए अहिकेँ मिनाप विशेष तयारी कऽ रहल मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि । इम्हर महामूर्ख बनवाकलेल सेहो भारी प्रतिस्पर्धा देखल जा रहल अछि । अहिवेर साहित्यिक क्षेत्रक, राजनीतिक क्षेत्रक वा समाजिक क्षेत्रक हातमे महामूर्खक उपाधि भेटैत अछि तेकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि । २०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि ‘उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि । जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसी, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल । महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत ..... स्वागत वागत मूर्ख महान महामूर्ख सम्मेलन के अछि अपनेही पर अभिमान निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट अही आयब भेल प्रमाण छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग सत्यक नहि पहिचान ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत मूर्ख शिरोमणि शान पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत कुकुर सभक राग कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन मूर्ख बनय विद्वान हा कुर्सी हे कुर्सी कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण स्वागत वागत मूर्ख महान सन्तोष कुमार मिश्र एकटा पत्र ज्योतीकें चिट्ठी काठमाण्डू २१–२–२०११ प्रिय ज्योती, हम खुशीसँ आनन्दमय जीवन वितारहल छी । हँ, ई सच्च आ अवश्य समाजिक रुपे ठिक बात नइ छैक जे अहाँ हमरा लग नइ छी मुदा ई सुनि अहाँ आश्र्यचकित भऽजाएब जे हमर रक्तचापके अवस्था ठिक भऽगेल अछि । डाक्टरबाबु कहै छलाह जे अहिना परहेज कऽकऽ जँ रहब त बेशी दिन जीयब । अहाँके बुझल अछि, जे आइकाल्हि हम अफिस समयेपर पहुँच जाइछी । कोनो प्रकारक तनाब सेहो नहि रहैय । हाकिम कें त कि छैक, सहि समय पर सहि काज भऽजाय, बस, आओर कि ? आ हम अखन अहिमे सक्षम सेहो छी । काल्हि हाकिमसाहेब कहैत छलाह जे हमरामे एकटा परिवर्तण महसुश भऽरहल छैन्हि । हमर बनाओल रिर्पोटमे गल्ती त रैहते नइ छैक । आब ककरो पर कोनो प्रकारक आश नहि रहवाक कारण लगभग सबहे काज सहि समयपर ठिक–ठिक तरिकासँ हम अपने कऽ लैछी । अपना जते पाइ चाहि ताहिस बेशी कमालैछी । ते किछु बचत सेहो भऽजाइय आ घर एकटा होटल भऽगेल अछि तकर अनुभूति सेहो नइ होइय । घरमे अपन बाहेक आन कमे रहैय ते उधारक आश नहि रहैय । कनिञा, स्त्री आ घरवाली शब्दक अर्थ जे नहि बुझैत हुवे ओ कहियो नहि ओकर लायक भऽसकैय । वाथरुमसँ लऽकऽ भन्साघर धरि हम अपने करैछी मुदा सबहेकाज समय पर भऽजाइछैक । आ, अखन दिन २८ घन्टाक सेहो नहि होइछैक । एकटा आओर आश्र्यक बात सुनबैछी अहाँके; हम कपड़ा पर आइरण सेहो बड़ निकसँ कऽलैछी । शुरुवातके दू–दूटा क्रिच बनिजाइछल मुदा एखन एकदम फिट । डाक्टर जेहने कहैछलाह, ओहने भोजन बनालैछी । एकटा शल्लाह त अहाँके सेहो देबऽचाहब, कृप्या अहाँ सेहो तरकारीमे मिरचाइ आ नोन बेशी नहि खाउ, ई नोक्सानटा मात्र करैछ । हमरा साँझक समयमे पढ़के समय सेहो भेट जाइए तें हम फेरसँ कोचिङ्गमे पढ़ाबऽ सेहो लगलिए । हमर पढ़ाबऽके तरिका तऽ अहाँके बुझले अछि; कमेन्टके कोनो चान्स नहि । आ, आब आओर निक किए त एखन हमरा मेन्टल आ सेन्टिमेन्टल टर्चर नहि रहैए । हम खुश छि, मुदा आओर विषेश खुशीक आवश्यक्ता अछि । किछु हुए लोक कहैछ –बिना घरनि घरे नहि । बिषेश कि, बुद्धिमानकें लेल इशारा काफि होइछ । सदैब अहाँक प्रतिक्षामे, मात्र अहाँके सन्तोष मनोज कुमार मण्डल “बाप भेल पित्ती” ओ “अधिकार” नाटक'क सफल मंचन चनौरागंज, मधुबनी। वसंतक वेलामे सरस्वती पूजाक शुभ अवसरपर जे.एम.एस. कोचिंग सेंटर केर संस्थापक सह शिक्षक श्री बेचन ठाकुर जीक रचित दू गोट नाटकक मंचन कोचिंगक बालक-बालिका द्वारा कएल गेल। पहिल नाटक “बाप भेल पित्ती” सतौत माएक नाकारात्मक चरित्रपर आधारित छल। ऐ सम्पूर्ण नाटकक सफल प्रस्तुति कोचिंगक बालिका द्वारा कएल गेल। स्त्री, पुरूष दुनूक भूमिका बालिका सभ केलनि। नाटकक सफल मंचनक श्रेय श्री बेचन ठाकुरकेँ देबामे कनियो असोकर्ज नै कारण नाटक लिखबासँ लऽ कऽ िनर्देषन धरि ठाकुरजी स्वयं केलाह। ऐ नाटकक प्रस्तुतिसँ बुझि पड़ल जे ठाकुरजी समाजसँ कतेक सरोकार रखै छथि आ समाजक कतेक सूक्ष्म अध्ययन करै छथि। गाम-घरक परिवेश रहितो दर्शक धन्यवादक पात्र छथि जे नाटक देखबामे भाव-विभोर भऽ गेल छलाह। दोसर लघु नाटक छल “अधिकार” ई नाटक सूचनाक अधिकारसँ सम्बन्धित “बेस्ट सिटिजन अवार्ड”सँ पुरस्कृत मो. मजनूम नवादपर आधारित छल। ऐ नाटकक प्रस्तुति संस्थानक बालक द्वारा कएल गेल। सभसँ महत्वपूर्ण बात ई अछि जे दर्शकक पहिल पतियानीमे बैस मो. मजनूम नवाद सेहो आदिसँ अंत धरि नाटकक आनंद लेलाह। संगे चनौरागंगक अगल-बगल जेना बेरमा, मछधी, सिमरा, कनकपुरा, चनौरा, जगदर, रबारी, विशौलक लोक सभ दर्शक रूपमे उपस्थिति रहथि। हजारोक संख्या कहबामे कम बुझना जाइ छल। किछु लोक एहनो भेलाह जे अपन भाव मंचपर उपस्थित भऽ कऽ अभिव्यक्त केलथि। जैमे श्री कामेश्वर कामति, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री गोविन्द झा, श्री चेत नारायण साहु, श्री रमेश प्रधान, श्री विपिन साहु, श्री महावीर साहु, श्री बहादुर ठाकुर, श्री मनोज कुमार मण्डल इत्यादि प्रसन्न भऽ नाटककार सह आयोजन कर्ता माने मंचक श्री बेचन ठाकुरजीकेँ धन्यवाद ज्ञापनक संग-संग कलाकार-विद्यार्थी-सभकेँ प्रोत्साहन केलकनि। उपस्थित श्रोता सभ नाटकक विषय-वस्तुसँ काफी प्रभावित भेलाह। जेकर कारण नाटकक भाषा सेहो स्पष्ट रूपमे देखार भेल। ऐ नाटकक मंचनसँ आ श्रोता-दर्शकक उपस्थिति आ लगावसँ ई स्पष्ट देखार भेल जे जौं अहिना मैथिली नाटकक संचालन मिथिलाक गामपर हुअए तँ मैथिलीक विकास माने मिथिलाक विकासक प्रेमी-साहित्यकार-अपन विचारकेँ परोसबामे तेजी आनि सकै छथि। प्रसाद पोनिहारक कमी नै अछि। हमहुँ अपना तरफसँ आदरनीय श्री बेचन जीकेँ धन्यवाद दै छियनि आ आशा करै छी जे आगूओ अहिना अपन नाटकक माध्यमसँ समाजकेँ ओझल विषय-वस्तुसँ सुगम भाषामे समै-समैपर अवगत करबैत रहताह। जय मिथिला! जय मैथिली!! शेफालिका वर्मा डॉ कलाधर झासँ डॉ. शेफालिका वर्माक साक्षात्कार (हम हेरोगेट, इंग्लॅण्ड . मे हड्डी रोगक शल्य चिकित्सक डॉ. कलाधर झा एवं हुनक पत्नी डॉ. पूनम झा ओतए बैसल छलौं..कलाधर झाजीक पिता श्री जगधर झा जी पटना सायंस कॉलेजक प्रथम ३ टा विद्यार्थी मे सँ छलाह . श्री जगधर झा, डॉ.शीतल प्रसाद, जे दरभंगा मेडिकल कॉलेजक गोड फादर मानल जाइत छलाह आ श्री वाई एन झा ऐ तीन टा विद्यार्थी सँ पटना सायंस कॉलेज खुजल छल. डॉ. पूनम झा जे जीपी छलीह ,हुनक नाना श्री सी. एस. झा आइ.सी.एस. छलाह,आ पिता श्री महानंद झा इंजीनियर छथि....) शेफालिका वर्मा:अपने मिथिला राज्यक विषयमे की सोचैत छी, हेबाक चाही कि नै ? कलाधर झा (चौंकैत) -हं किएक नै, जरुर हेबाक चाही ,मुदा ,एखन नै, ... शेफालिका वर्मा: से किएक ? कलाधर झा (हमर प्रश्न पर ओ छुटतहि बाजि उठलाह):.जाधरि मिथिलांचलकेँ आर्थिक स्वाधीनता नै हेतैक ताधरि नै.. शेफालिका वर्मा:जेना.. कलाधर झा:(हमर प्रश्न पर ओ कनिक काल हमर मुंह देखैत रहलाह , फेर बाजि उठलाह )..हम अपना सँ किछु निर्भर भऽ जाइ, सीधे सरकारक सोझा मुंह बाबि ठाढ़ भऽ जाइ ई तँ कोनो नीक बात नै..अलग राजसँ घाटा फाएदा दुनु छैक ,सत्ताक विकेंद्रीकरण लेल मिथिला योग्य नै...आर्थिक स्वाधीनता जेना अहाँ पहिने कृषिकेँ उन्नत करू, चीनी मिल, पेपर मिल, यानि नेचुरल रिसोर्सेसकेँ देखू , अहाँ अपनासँ की सभ कऽ सकैत छी..देखू शेफालिका जी, लोग हमरा एंग्री मैन कहैत अछि , किन्तु हम नीक जकां जनैत छी जे सरकार हमर कोनो मदद ऐमे नै करत. शेफालिका वर्मा- तं सरकार हमर की करत से बाजू,--- कलाधर झा(हमर बात पर ओ चोट्टे जबाब देलाह): हँ किएक ने, सुनु, सरकारसँ हम तीन बातक मदति लऽ सकैत छी ..कानून आ व्यवस्था , परिवहन, एनेर्जी , यदि ऐ तीनूक आपूर्ति सरकार कऽ दैक तँ बंद मिल की मिथिलामे एतेक शक्ति छैक जे नव नव मिल खोलि देत,फैक्ट्री खोलि देत, मिथिलाक माछ आ मखानक खेतीसँ तँ मिथिला विश्वक सम्पदा कीनि लेत............... रेत आ रेत ‘भौजीकेँ की भ’ गेलि छैक पायल?’ बादलक स्वर सुनि चौंकि भाइ दिस तकलक पायल‘सदिखन एकटा स्वप्न-लोकमे डूबल आँखि, व्यथा-वेदनाक जीवंत रूप, भौजी जखन बात करैत छथि तँ चारू दिस जलतरगक अपूर्व ध्वनि पसरि जाइछ! जेना कोनो दीयाक ‘लौ’ हुनक पानी पर, गालपर दहकि रहल हो पायल, काल्हि राति ओ जखन पफोनपर गप्प करैत छलीह तँ लगैत छल जेना पफोन छोड़बाक हुनका मोन नहि होनि, कतेक तन्मयता, कतेक आत्मीयता...’ एकटा साँस लैत बाजल-‘अपना सभकेँ हुनक मदति करबाक चाही...’ ‘मदति.....?’ पायल चौंकि गेल। ह! पायल, भौजी हमरा माए जकाँ पोसने छथि। हम माएक अभाब कहियो नहि अनुभव कयलहुँ। ओएहा मातृतुल्य भौजी हमर कतेक उदास, कतेक परेशान.....आखिर किएक.....? ‘एहि वयसमे हिनका एहि तरहक-हमरा जेना कोना दन लगैत अछि। दुइ बच्चाक माए भौजी तखन! स्वयंकेँ मारि देतीह, अपन इच्छाक गराँ घोंटि देतीह, मुदा हारि मान’ वाली नहि छथि’ ‘नहिए, पायल हमरा तँ होइए, भौजी स्वयं नहि जनैत छथि जे ओ ककरो अथाह प्रेममे डूबलि छथि। एहि तरहक आदमी स्वयंकेँ पुफसियबैत अछि। अपनोकेँ स्वयंसँ नुकबैत अछि। हृदयक अन्तरतम गहींरंइसँ पुफटैत कामनाकेँ थकुचि दैत अछि।’ हमरा बुझबामे किछु अबैत अछि भैया, अहाँ की बाजि रहल छी? ‘हमरा होइछ, भौजी ककरो चाहैत छथि। मुदा एहि वयसमे पहुँचि कोनो स्त्राीक सतीत्बकेँ ई स्वीकार नहि होइत अछि। अपनापर अधिकार क’ अपन इच्छाक अरथी निकालि दैत छथि। जनैत छी झाड़ि बहारि पथ नित राखब कृष्ण भेला परम कठोर... एतेक उदासीएतेक व्यथा-वेदना-आघगनसँ भौजीक गीतक स्वर जेना बादल आ पायलकेँ मूक क’ गेल। भौजीकँ गीत गयबाक बड़ स’ख छलनि। ओ सदिखन किछु ने किछु गुनगुनाइत रहैत छलीहसभटा उदासीक गीत। कनेक कालक लेल गीतक स्वर रुकि गेल। प्रायः भौजी अपन नोर पोछि रहल छलीह अपन सनेस छोड़ि जायब सखिया इहो दूनू नयन चकोर एक-एक आखन जेना कराहि रहल छल, एक-एक स्वर आहत भ’ छटपटा रहल छल......!! बादल अपन सोचमे ओझरायल रहल। भौजी किएक एना बदलि गेलीह? नहि जानि, ककर खियालमे भौजी कटल गुîóी सन बेबस जकाँ पहुँचि जाइत छथि? बैसलि-बैसलि गुम-गुम! गप्प करैत-करैत जेना हेरा जाइत छथि। हमरा होइत अछि, भौजी स्वयं नहि बुझैत छथि। ओ ककरो चाहैत छथि एहि वयसमे खास क’ धर्मभीरु, दुई जुआन बच्चाक माए ककरो चाहबाक कल्पनो नहि क’ सकैत अछि। कहियो अपन दुर्बलता स्वीकार नहि क’ सकैत अछि। तैयो भावनाक बिहाड़ि कखनो-कखनो हुनका अद्वेलित क’ दैत छनि। हुनक अधरपर खेलाइत एकटा जादुइ मुस्की, हुनक व्यवहारमे कखनो चंचलता आबि जाइछ। भौजीक हृदयमे कोनो दबल-दबल पुफलझड़ी अछि। हुनक तीतल पलक कँपैत अवर आ बाझर स्वर जेना हुनक बेबसीक चेन्ह थिक। ओह! बादलक माथक नस सभ चरचरमराय लगलैक यदि ई बात सत्य होयत तँ भौजी कहियो अपन लोकसँ, अपन परम्परागत रास्तासँ हटि नहि सकैत छथि? नहि जानि एहि तरहँ कतेक जीवन अमावस्याक चिर अंधकारमे डूबि जाइछनोन जकाँ पानिमे चुपचाप घुलैत..... ओहि दिन कोनो बातपर तमसा क’ भैया आपिफस चल गेलाह। भौजी किछु नहि बजलीह। भैयाक भयंकर गर्जन-तर्जनमे डूबल भौजी मौन-मूक ठाढ़ि रहि गेलाह-भैयामे इएह एकटा खराबी छनि जे तामसमे हुनका समय-असमय, निर्दोष-दोषी-कथूक ख्याल नहि रहैत छनि। भैयाक आपिफस गेलाक बाद भौजी चुपचाप बादल आ पायलकेँ जलखै करब’ लगलीह! बादल कतेक आग्रह कयलक भौजीसँ खयवा लेल-पायल भौजीसँ प्रार्थना करैत रहलीह, मुदा भौजी!... नहि जानि हुनका की भ’ गेलनि? उदास-उदास, कानल-कानल, चिन्तामे डूबल। जेना कनबाक कोनो बहाना ताकि रहलि छथि। जेना हुनक किछु हेरा गेल हो, खाली-खाली आँखियेँ शून्य मे ताकि रहल छलीह। नहि ककरो माए, नहि ककरो पत्नी, नहि ककरो भौजीकिछुत’ नहि छलीह ओओहि काल। भौजीक ओहि रूपकेँ देखि पायल कानय लगलीहअहा!केँ की भ’ गेल भौजी? की भ’ गेल? बादलक समस्त तन, रोम रोम जेना भौजीसँ प्रश्न क’ रहल छल। मुदा, सभटा प्रश्नकेँ अनुत्तरित घुरबैत भौजी चलि गेलीह, बाथ रुममे। नहा धो क’ निकललीह आ पेफर ओएह भौजी! बादल पायलक अवरपर मुस्कीक किरण चमकि गेलैक। सभ केओ जलखै करवालेल बैसलाह। बादल कोनो अवसादमे डूबल चुपचाप भौजीक मुँह देख रहल छलाह। खिड़की पारसँ रहल छल! बादल जेना अभिभूत भ’ उठल। सिन्दूरी रंगमे डूबल भौजीक तेजोमय सौन्दर्य देखि.....ओकर आँखि एहि महान देवीक समक्ष नमित भ’ रत्तिफम किरणमे अछि, ओतबे अहाँक आत्मामे। तखन अहाँ एतेक उदास किएक छी? एतेक दुखी किएक? मुदा बादलक प्रत्येक प्रश्नकेँ भौजी अपन तिलस्मी हँसीसँ बिच्चे पगडंडीमे भटका दैत छलीह। बादल चुपचाप सोचक एकटा नमहर रास्तापर निकलि जाइत छल। ओ एहन बाट छल जाहिमे कतेको भटकाव, कतेको घुरची छल। एहि घुरचीकेँ सोझरयबामे अनेक क्षण मिलि मिनटक स्वरूप लेलेक आ अनेक मिनट मिलि घंटा। अचक्के ओकर सोचक ई क्रम टूटि कानमे दूरसँ अबैत कोनो आबाज सुनाय पड़लैक‘की बात छैक बाउ, एना ठाढ़ भ’ की सोचि रहल छी?’ बादल हड़बड़ा गेल‘किछु त’ नहि भौजीकिछु नहि।’ भौजी ओकर बाँहि पकड़ि लेलक ‘किछु बात अछि बाउ, अहाँकेँ कथीक सोच अछि? भौजीक प्रश्न सुनि ओ आँखि उठा क’ हुनका दिसि तकलक। ओह! भौजीक ओ नजरि बादलक अंतरकेँ जेना प्रकप्मित क’ गेल। ओ चुप नहि रहि सकल- ‘अहाँकेँ कखनो कखनो की भ’ जाइत अछि भौजी? सभ सुख प्राप्त रहितो भौजी कखनो लगैछ भौतिक सुख उपलब्धिक एतेक जयघोषक मध्य जेना अहाँ विराट् शून्यमे हेरा जायत छी। किएक भौजी किएक?’ जेना बादलक प्रश्न भौजीक समस्त अस्तित्वकेँ झकझोरि देलक। किछु अकचका क’ ओ एकटा निसाँस छोड़लनि। एक तोड़ पानि-बिहारिक बाद वातावरणमे एकटा विचित्रा शांति रोम जाइछ, तहिना कतेक काल धरि भौजीक चेहरा सपाट रहल आ पुनः दोसर तोड़ पानि बिहाड़ि उठल। कनेक काल पहिने धरि जे चेहरा सपाट छल, से कतेक मनोभावनासँ भीजि-तीति गेल। भौजी, बाजू ने भौजी! कोन करणेँ अहाँ एतेक आत्मपीड़न भोगि रहल छी? कखनो लगैछ अहाँ एकटा कली छी गुमसुम, चुपचुप! जखन अहाँ हँसैत छी तँ कली पूफल भ’ जाइछ। अहाँक संपर्कमे आयल सभ केओ एहि सौरभसँ सुरभित भ’ उठैछ। अपन दुःख अपन पीड़ा बिसरि जाइछ। भैयो तँ बजैत छथि जे अहाँक भौजी एकटा ‘टॉनिक’ छथि, हँसीक ‘टॉनिक’, सौरभक ‘टॉनिक’। आ’ पेफर लगैछ हवाक कोनो तीव्र झोँक आयल आ पूफलक सभटा पंखुरी धूरामे छिड़िया गेल! पूफल-पूफल नहि रहैछ, अहाँ-अहाँ नहि रहैत छी? भौजी, ई कोन बयार थिककोन पीड़ा थिक? बादल आवेशसँ हाँपफ’ लागल। भौजी ता घरि अपनाकेँ सहज क’ लेने छलीह? किछु बाजबा लेल हुनक अधर खुजल की पफोनक घंटी टनटनाय लागल। ओ दौड़लि ‘ड्राइंग-रुम’ चल गेलीह! बादलक कानमे भौजीक म(िम स्वर पड़ल‘हेलो की हाल छैक? हम? जीबैत छी हँ, जीबैत-जीबैत थााकि गेल छीहम जीब’ नहि चाहैत छी जीब’ नहि चाहैत छीबड़ कठोर यात्रा अछि एहि जीवनक.....’ बादलक कानमे भौजीक दर्द भरल स्वर घुमरैत रहल। पफोनपरकेँ छल? भौजीकेँ कोन दुःख छनि? के अछि जकरा दुःख नहि छैक? ककर जीवन सर्वथा क्लेश, व्यथासँ रिक्त अछि! मुदा ओहि दुःख, क्लेश, व्यथाकेँ अभिव्यक्त करबाक लेल सभ केओ कोनो-ने-कोनो रूपमे माध्यम ताकि लैत अछि। प्रकृति धरि एहिसँ छटल नहि अछि। आकाशक हृदयक व्याकुलताकेँ अभिव्यक्त नहि करैत अछि? आ’ सोचक ई सीमा असीम भ’ उठैत अछि, जखन आकाशक छटपटी एकटा बिजुरी .....?????? कौंधि जाइत अछि! मेघक ई स्वर.....आकाश जखन अपन वेदनाकेँ सहाजकरबामे असमर्थ भ’ जाइछत! वेदनाक ईं चीत्कार समस्त संसारकेँ कँपा दैत अछि। आकाश तँ सरिपों एतेक कमजोर, एतेक असमर्थ भ’ जाइछ जे आँखिसँ अविरल अश्रुकरण खस’ लगैछ। मुदा भौजीकेँ कनितो तँ नहि देखैत छियनि! सभटा नोर ओ पीबि लेने छथि......तावत भौजीक खनखनाइत हँसी ड्राइंग-रुमसँ पेफर सुनाइ पड़ल। परदा हँटाक’ चुपचाप बादल देखलक। मोहल्लाक चारि-पाँचटा छौड़ा भीजीकेँ घेरने-‘चाची, सरस्वती पूजाक चंदा चाहीचाची, बिना अहाँक मदतिक कोनो भ’ सकैछ‘आँटी आप हमलोगों को सलाह देती रहें‘सभक स्वरक जयमाल पहिरने भौजी मुस्कियाइत रहलीह‘बेस, अहाँ सभ निश्चिन्त रहू, एहि बेर एहि मोहल्लामे एहेन सरस्वती पूजा होयत जेहन कहियो नहि भेल अछि। ‘चाची जिन्दाबादअ!टी जिन्दाबाद’ नाराक संग छौड़ा सभ चल गेल। समयक सागरमे ज्वार-भाटा अबैत रहल आ एक दिन डाकिया चिट्टòी ल’ क’ आयल। साइकिल घंटी बजबाक संगे भौजी पागल जकाँ दौड़लीह। डाकिया एकटा लिपफापफ द’ चल गेल। भौजी छटपटाक’ चिट्टðी पढ’ लगलीह। हुनक चेहरापर अबैत-जाइत रंगकेँ खिड़कीसँ बादल चुपचाप देखैत रहल! तखन बादलक मोनमे हल्लुक सन संदेहक साँप पफन काढ़लक। ककर चिट्टðी भौजी एतेक प्रेमसँ पढ़ि अपन कोठलीमे ओछाओनतरमे राखि देलनि? बादलक निः शब्द आँखि भौजीक पाछाँ क’ रहल छल। ओकर हृदयमे एकटा आवेग उठलएकटा भनसा घरमे छलीह। अपन कोठली बंद क’ आशंकित मोन आ अव्यक्त भयक संगे ओ चिट्टðी पढ’ लागल ‘प्रिय नेहा! .....’ आ नेहाभौजीक नामक संबोधन ओकरा कोनादन लगलैक। एहिठाम केओ भौजीक नाम नहि कहैत छलनि। खाली भौजी, चाची, काकी, माँ इएह सभ रूप हुनक छलनि! खैर, बादल आगाँ बढ़ल‘पत्रा, ‘अहाँक भावमय पत्रा भेटल। हम ओकरा एकबेर दुइ बेर, अनेक बेर पढ़लहुँ। ओह! कतेक भावमयी अहाँ छी! लगैछ ईश्वर अहाँकेँ, अहाँक मोन-प्राणकेँ कोनो रेशमक मुलायम, सुकुमार, ‘मासूम’ तारक ताना-बानासँ बुनने अछि, जाहिमे सलोनी पूखणमाक स्निग्ध, चन्द्रिकाक रस निचोड़ि राखल.....’ओ पत्रा पढ़ैत जाइत छल आ बादलक माथपर आबि रहल छलभौजीक रहस्य जेना खुजि रहल छल‘एहि मोन-प्राणमे मानसरोवरक हँसक शुभ्रता आ मयूरपंखक चित्रामयता अछि। कतेक रंग, कतेक सम्मोहन भरि देल गेल अछि अहाँक अन्तरक नीलाभ आकाशमे? साओनक घटाक करुण कोमल व्याप्ति आ बिजलीक तड़ित लयसँ अपन सपनाक सिंगार कयने छी अहाँ।’ बादल अपन हृदयक धड़कन स्वयं सुनि रहल छल। भौजीक प्रत्येक हाव-भाव, एक-एक रहस्य ओकरा रोमांचित क’ रहल छल...‘एहि विशाल विश्वमे जाहि ठाम हमरा लेल कोनो विशेष आकर्षण आ सम्मोहन नहि अछि, जाहि ठाम हमरा जीवामे कि मरि जयबामे कोनो अन्तर नहि अछि ओहिठाम अहाँक पत्रा एकटा पुलक, एकटा भोरक किरण, एकटा शरदकालीन ओसक चमक आ बसन्ती बयार बनि अबैछ, हम अपन ऊपर रसवंती केतकी वा चमेली वा किछु आरक अनुभूति करैत छी.....’ बादलकेँ लगलैक, भाभी कतेक ‘Úॉड’ अछि? कतेक ‘भोला-भाला’ कतेक नीरक्षीर सन पावन मुदा असलमे? ओकरा मोन भेलैक, तुरत भौयाकेँ जाक’ पत्रा देखा दी। तुरत भौजीसँ पुछी। पेफर सोचलक, कने आर आगाँ पढ़ि ली अहाँक मोनमे किछु घुमरैत रहैत अछि। हम बुझैत छी, अपन भाइपर विश्वास नहि अछि?’ भाइ-बहिन? बहिन-भाई? बादलक दिमाग जेना चक्कर काट’ लगलैक... ओकर बनाओल रेतक सभटा रेखा बिहाड़िमे लुप्त भ’ गेलैक। ओकर ऊपर साँस जेना नीचाँ आयल? भौजी-ओह! कतेक बात ओ सोचि गेल? जेना भयंकर सपना देखिक’ ओ उठल होअयजेना कोनो अनर्थ होइत-होइत बाँचि गेलैक‘अहाँ हमरा राखी बन्हने छी। तखन अहाँकेँ हमरापर विश्वास नहि अछि? राखीक अर्थें थिक बहिनक रक्षाक भार!’ बादलक मानस-जेना पानि बरसि आकाश निरभ्र भ’ जाइत छैक एकटा पैघ ‘एक्सीडेंट, होइत-होइतएकटा भयंकर ‘ट्रैजेडी’ होइत-होइत बचि गेल। मुदा की ‘ट्रेजेडी’ होइत-होइत बचल? की भयंकर ‘एक्सीडेंट’ नहि भ’ गेल? ओहि भाग्यहीन दिवसक रेत बादलक आँखिमे गड़’ लागलएहि तरहक ओझराहटि आ भौजीक पाछाँ बेहाल बादलक प्रकृति एकदम रूक्ष भ’ गेल छल। अपन पढ़ाई-लिखाइ सभ बिसरि गेल छल! मेडिकलमे एडमिशन टाकाक तंगीक कारण नहि भ’ रहल छलैक! ओ चुप भ’ नियतिक खेल देख रहल छल। एम्हर भौजीक प्रवंचनाह!, प्रवंचने तँ छलीह-दोसर लोक लग कतेक उत्पुफल्ल, कतेक उन्मुक्त, कतेक सहज, मुदा अपने घरमे कतेक निराश, कतेक बंदिनी, कतेक दुरुह। समस्त शहरमे भौजीक बड़ाइ, छोट-पैघ, बूढ़-बेदरा स्त्राी-पुरुष सभ केओ मुक्त कंठेँ करैत छल! ओएह भौजी भरल घर, लोक रहितो, कतेक असम्पृक्त भ’ जाइत छलीह। जखन भैयाकेँ कोनो गरजे नहि छनि तँ हम कथी लेल भौजीक पाछाँ तबाह भेल छी। आ’ कॉलेज जयबा लेल बादल तैयार होब’ लागल। ड्राइंग रूममे पेफर पफोन घंटी टनटना उठल? आ पुनः भौजीक स्वर स्थिरसँ तीब्र। पुनः एकटा खनखनाइत हँसी.....आ’ बादलक कानमे जेना काँच पिघलैत रहल दस मिनट बीतल, बीस मिनट बीतलभौजीक गप्पक कतहु अन्त नहि छलबादलक दिमाग साँय-साँय क’ रहल छल। ई कोन गप भेलै पफोनपर! गप करैत छी, हँसैत जा रहल छीई की भेलैक? हम जलखै करबा लेल ठाढ़ छी, कालेज जाक’ पता लगौनाइा अछि आ भौजीएकटा नम्हर गपमेडुबल, बात-बातमे ठहाका...गप किछु सुनाइ नहि पड़ैत छल, मुदा स्वरसँ बादलक समस्त तनमे लहरि पूफकि देने छल! ओ तामसे कालेजदिस विदा भेल......गेट लग पहुँचल कि भौजी पाछाँसँ दौड़लि ओकर बाँहि पकड़ि लेलकै‘‘जलखै क’ लिय’ बाउ!’‘‘नहि बड़ अबेर भ’ गेल, हमरा कॉलेजमे किछु काज अछि।’ तिक स्वरेँ बाजल बादल। ओकर स्वर पर भौजी चौंकि उठलीह! ‘बाउ, अहाँक दुआरे हमहूँ नहि करब’ किछु अप्रतिभ होइत भौजी बजलीह। ‘हमरासँ कोन मतलब अछि अहाँकेँ? अपन जाक’ खा लिय’ उपेक्षासँ बादल बाजल। ‘हम नहि जाय देब, जा धरि अहाँ जलखै नहि करब।’ बासी मुँहेँ हम नजि जाय देबभौजी ओकर बाँहि घिचने भनसा घर दिस ल’ जाय लगलीह। ‘हम एक बेर कहि देलहुँ, नहि खायब’। अपन जगहपर अडिग छल ओ। भौजीक लेल बादलक ई रूप अकल्पनीय छल, अकथनीय छल। ओ अवाक् छलीह! वेदनाक एकटा ज्वार हुनका आँखिमे उठल, मुदा तुरते अपन कौशलसँ ओहि ज्वारकेँ उपेक्षित क’ देलनि। एकटा दर्द भरल मुस्कीक संग बजलीह‘हे यौ, केओ किछु कहि देने अछि? अहाँ एना किएक क’ रहल छी? हमरा सँ कोनो गलती भेल अछि? की बात अछि? चलू हमरा भूख लागि गेल अछि रविक प्रात थिक।’ ‘रविक प्रात...जा क’ अहाँ खा लिय’? हमरा की कहैत छीएतेक कालसँ जे अहाँ निहोरा करबा रहल छी एतेकमे त’ अहाँ कैक बेर खा लितहुँ।’ बादलक सभ उपेक्षाकेँ अनदेखन सन क’ भौजी कहैत रहलीह‘हम अहाँ बिना खाइत छी?’ अनुनय करैत बजलीह। बादलकेँ विवेक जेना कतहु हेरा गेल छल‘एतेक बहाना नहि करु भौजी! अहाँकेँ हम खूब चीन्हैत छी।’ ‘बा...द...ल....’ बादलक विद्रूप हँसीसँ भौजी जेना विवश भ’ गेलीह। ‘अहाँ अपनाकेँ की बुझैत छी? छोड़ू हमर हाथ!’ ‘बादल...! भौजीक हाथ ओकर गट्टðा पर आर मजगूत भ’ गेल।’ ‘बी बात छैक बादल जी? अहाँकेँ...’ बादलकेँ जेना अपन होश हवास पर कोनो कब्जा नहि रहलैकनहि छोड़ब? त’ लिय’...।’ भौजीक हाथ बामा हाथसँ कसि क’ मोचड़ि देलकअपन हाथ उन्मुत्तफ क’ लेलक। भौजीक मुँहसँ एकटा पीड़ा निकलल ‘ओह!’ आ हुनक सौँसे चेहरा रक्तिम भ’ गेल। बादलकेँ की भ’ गेल छैक? ‘ई कुहरब काहरब नकल हमरा ल’ग किछु नहि चलत।’ बादल क्रोधावशमे माहुर भ’ गेल छलओकर कंठ स्वर सौंसे आंगनकेँ प्रकम्पित क’ रहल छलओ बिसरि गेल छल, हमर ई भौजी थिकीह, कोमल मसृण ओस सन मातृ तुल्य-ओ भैया छथि जे वर्दाश्त करैत छथि। हमरा सभ-आ आवेशसँ ओकर स्वर रु( भ’ गेलैक। ‘अहाँ की करितहुँ?’ भौजी पुछैत रहलीह। ‘हम? पूछू, की नहि करतहुँ? आन आन लोक संग टेलीपफोन पर एतेक हँसी, एतेक ठट्ठाभैया नहि जनैत छथि तेँ ने? अहाँ भैयाक आँखि मे धूरा नहि झोँकेत छी की? अहाँ अपना केँ...... तावत बादलक गालपर पाछासँ दू-चारि चाट लागल‘बदतमीज बेहाया, अपन मातृतुल्य भौजीसँ उकटा पैंची क’ रहल छें? कोम्हर दनसँ भैया आबि गेल छलाह। थापड़ लगिते बादलक आँखि मे तरेगन नाचि गेलैक। बीचमे भैयाक हाथ पकड़ि भौजी बाजि उठलीह‘ई की करैत छी? बेटा सन छोट भाइ पर हाथ उठबैत छी’? ‘जे बेटा अपन माए पर कलंक लगबैक ओहि बेटासँ बेटा नहि रहनाइ नीक थिक।’ मुदा बादल, ओकर दिमाग जेना पगला गेल छल‘भैया, अहाँ भौजीसँ पूछू। एखन किछु काल पहिने ओ पफोन पर ककरासँ हँसि-हँसि गप्प करैत छलीह’? ‘अरे निर्लज्ज, मोन होइछ जाहि जुबानसँ ई प्रश्न निकलल, ओहि जुबानकेँ पकड़ि क’ खींचि ली.....। अहाँ के हमर सप्पत थिक। आब अहाँ शान्त भ’ जाउ। हमरा बेटा नहि अछि। हम बादलकेँ बेटासँ बढ़ि क’ मानैत छी। बेटा माएके किछु कहैत छैक त’ ओ कलंक नहि होइत छैक।’ आ भौजी पफपफकि-पफपफकि कान’ लगलीह। मुदा, भैया तमसायले स्वरमे बाज’ लगलाह ‘किछु काल पहिने तोहर भौजी हमरेसँ गप्प करैत छलीह। बुझलही, खाली तोहर विषयमे’! बादल अवाक् छल। ‘कहैत छलहु तोहर भौजी जे मेडिकल कॉलेजमे जेना होयत बौआक नाम अवश्य लिखायब। कम्पिटीशनमे नहि अयला त’ की होयतैक? जेना होयत, हम सभ टाका-पैसाक इंतिजाम क’ हुनका डॉक्टर बनायब।’ भैया दाँत पींसैत एक-एक शब्द पर जोर दैत बजैत रहलाह। ‘हम कहलियनि एतेक टाकाक इंतिजाम मुश्किल अछि! तोहर भौजी की जबाब देलकौ से बुझलही? अहाँक बैंक मे पाँच हजार जमा अछिए। हमर गहना जेबर बन्हकी राखि दस हजारसँ उपर भ’ जायत। हम कतेक विरोध कयलहुँ जे बन्हकी नहि लगायब। अहाँक गहना पर हमर कोन अधिकार अछि? मुदा हमर सभ बातकेँ ओ हँसैत-हँसैत काटि देलनि-नाम लिखयबामे मात्रा दुइए दिन बाँचल छै! हम सभ गप्प क’ रहल छी बंधकी लगयबा लेल! एखन तुरंत अहाँ चल आऊ-।’ भैयाक गर बोझिल भ’ गेलनि।...‘आ एहिठाम तोँबड़ नीक प्रतिदान प्रेमक दैत छलाह? तो ठीके पैघ आदमी बनबह। आ बादलकेँ काटू त खून नहि। रेतक ढेर...ढेर बिरहो ओकर आँखि कान, नाकमे भरि गेल आ बादलक दम औना रहल हो, घुटि रहल हो... ‘बाउ, चलू जलखै करबा लेल’ ओएह स्नेहिल स्पर्श.... रेखाचित्र- ओ कत’ हेतीह अखबारक सुरखीपर दृष्टि पड़ल, संगे एकटा छोट छीन समाचार कोनो कोन मे महत्वहीन सन खसल छल, टिहरी डैम काज करऽ लागल। ओकर फाटक सभ आस्ते-आस्ते खोलल गेल। पुरान टिहरीक समस्त अस्तित्व लांगना नदी मे समाहित भ’ गेल..... लोकक लेल समाचार छल किन्तु हमर समस्त तनकेँ काँटसँ छेदि गेल। समस्त मोन केँ ओहि पुरान टिहरी जकाँ भीलांगाना निमज्जित क’ देलक। आँखिक आगु नाचि गेल चेहरा-अल्हड़ मस्त बाला! ओ कत’ हेतीह? पुरान टिहरीक टेढ़ मेढ़ बाट पर पहाड़ी झरना जकाँ उछलैत फानैत हमर संग-संग चलि रहल छलीह गोर नार रतलाम चेहरा, ठुमकल नाक, छोट-छोट आँख अनगिन स्वप्नसँ भरल, पातर-पातर लाल ठोरसँ फूल सन भहरैत हँसीक संग कोमल काया ओहि टेहरी गामक समस्त संस्कृतिकेँ अपनामे समेटने छल। चलैत-चलैत बाटमे कोनो गाछ-वीरीछ आबि जाय तँ कात भ’ जाइत छल हमरा रस्ता देखबैत, छोट-मोट शिलाखंड आबि जाय तँ ओकरापर चढ़ि जाइत छलीह आ पएरसँ ठेलि हमरा लेल रस्ता साफ कऽ दैत छलीह। कत्तौ पैघ पाथर आबि जाय तँ ओकरो ठेलबाक प्रयास करैत छलीह, नहि सकबाक कारण हमरा दिसि विवश दष्टिसँ तकैत अपन असमर्थतापर लजा जाइत छलीह। हम हँसि दैत छलौं- रेखा, अहाँ हमरा लेल किएक एतेक परेसान, भ’ रहल छी- हम आस्ते-आस्ते चलबे करब- ने। एहि पहाड़ी रास्तापर चलबाक अभ्यास तँ हमरा- छल नहि ऊँच-नीच, सकरी चाकर- मुदा, रेखा अपने ध्यानमे छलीह- अहाँ देखैत छी दीदी जतेक अकास छूबैत पहाड़ सभ अछि डैम बनवाक बाद सभटा डूबि जायत-पते नै लगतैक जे एहिठाम कोनो शहरो छल आकि पहाड़ो छल- भय आतंकसँ ओ काँपि रहल छलीह- हँ पहाड़क, कोर मे बसल टेहरि जल-सामधि ल’ लेत। तावत बाटक दुनू कात एकटा बड़का बटवृक्ष देखाएल छल- हे देखू दीदी- ई लगैत अछि जेना दू ट गाछ होय मुदा ई बट वृक्षक जटासँ उत्पन्न दोसर गाछ थीक- आकाश मे एक दोसरा केँ आलिंगित करैत-एकटा तोरण द्वार बनौने। दीदी, जाहि ठाम एकटा गाछ सेहो सृजन करैत अछि एकटा बीयासँ दोसर गाछ बनि जाइत अछि ताहि ठाम आदमी किएक ध्वंस करैत अछि? ओकर निर्दोष प्रश्नपर हम अन्तरसँ काँपि गेछ छलौं- एकर उत्तर हमरा लग नै छल- खास कऽ ओहि अबोध बालाक भावुक प्रश्न लेल। टेहरी गामक सड़केपर दोकान सभ पसरल छल, पटनाक स्टेशन मार्केट जकाँ, दिल्लीक कमला नगर जकाँ-ऊनी कपड़ा, कैसेट, कार्ड, गहना जेवर, तीमन तरकारी- ठेलापर छोले भूठूरे, गरम-गरम चाह सभक पंत्ति। हम सभ पाँच छह गोटेसँ छलौं। हमर सभक झुण्ड देखि ओहिठामक निवासी सभक चेहरा फक्क भ’ गेलैक-आब ई अनचिन्हार सभ आबि कोन कहर ढ़ाहत- आर कोन दुःख बाकी छैक। तावत एकटा सुदर्शन व्यक्तित्व, भव्य चेतना उज्जर पैजामा कुरतासँ आवेष्टित व्यक्ति हमर सभक स्वागतमे आबि गेलथि। हमर सभक परिचय जानि सतीश बाबू हमरा सभकेँ अपना ओतऽ लऽ गेलथि- हम सभ तँ डैम देखबा लेल आयल छी- डैम। एकटा फाटल हँसी संग सतीश बाबू बजलाह- पचास बरीस पहिने हम सभ एहिठाम आयल छलौं तखन कठपुल्लासँ ओहिकात बड़का बजार छल। एहिठाम सँ श्रीनगर, उत्तर काशी, रूद्रप्रयाग सभटा लगे अछि। हमर आँखिमे कठपुल्लाकेँ स्पर्श करैत नदीक जल चमकि गेल- एहि नदीमे एखन कतेक जल होयत? भागीरथीक पानि छब्बीस मीटर नीचाँ छल, आब दुइ सय मीटर उपर आबि गेल-ए- जतेक दोकान सभ सड़कपर अछि सभक दोकानमे सरकार ताला लगाय देलकैक- नयी टेहरीमे विस्थापन लेल। मुदा केओ अपन डीह-डाबर छोडि़ जेबा लेल तैयार नै अछि। तावत एकटा सुन्दर सन पहाड़ी बाला गरम-गरम चाह बिस्कुट आ कतेक प्रकारक नमकीन ल’ क’ आबि गेलीह- लजाइत घबराइत हमरा सभक आगूमे चाहक कप राख’ लगलीह। -ई हमर बेटी रेखा थिकीह- हमर सभक उत्सुक नयनक समाधान सतीश बाबू केलथि। ओ लजा कऽ ओढ़नी अपन माथपर राख’ लगलीह- सरिपों पहाड़ी सुन्दरताकेँ कोनो एस्नो पाउडरक आवश्यकता नै होइ छैक। - अहाँ पढ़ैत छी की रेखा- हमर प्रश्न पर ओ मुड़ी .....रौ ने हइ नै- ई की पढ़त? जाहि दिनसँ डैम बननाइ आरंभ भेल आ सभक विस्थापन नयी टेहरीमे भ’ रहल छैक ताहि दिनसँ एकर हँसी खुशी खत्म भ’ गेलैक। भरि दिन गाममे एम्हरसँ ओम्हर बौआइत रहैत अछि। मुस्काइत रेखा ओहि ठामसँ भागि गेलीह। सतीश बाबूक पत्नी, बेटा, पुतौह सभ हमरा सभकेँ घेरने, हमर सभक स्वागतमे लागल छल। -जनैत छी,ई गाम कहू कि शहर बड़ समृद्ध छल। सभ व्यापारमे हम सभ मुख्य रहलहुँ। हइ हइ, केओ-केओ डाक्टर, वकील सेहो बनलाह। ई शहर 1804 मे बसल छल। कहबी छैक जे राजा सुदर्शन शाहक घोडा भैरव मंदिर लग आबि ठाढ़ भ’ गेल। तखन राजा एहि शहरक निर्माण केलथि। बहुत गोटे ईहो बजैत छथि जे यदि दुइ हजार पाँच धरि डैम नै बनत तँ कहियो नै बनत। ओम्हरसँ कोनो गौंआ बाजि उठल- कहियो नै बनत ई डैम। ठाम ठाम लीकेज भ’ रहल छैक- आ बात करैत छी। सतीश बाबूक घरमे सभटा गौंआ आबि गेल छल अपन दुखड़ा सुनेबा लेल जेना हम सभ भगवान छी- जेना हमरा सभक हाथमे बड़ पावर होय- रेखा घरक कोनमे परवा पकड़ने ठाढ़ हमरा दिसि टकटकी लगौने छलीह- पता नै ओकर मोनमे कोन भाव-अनुभाव चलि रहल छलैक। -अहाँकेँ हम गाम घुमा दै छी। एहिठामक मंदिर सभक कलाकृति देखब तँ विस्मित भ’ जायब। -किन्तु, सभ व्यर्थ- एकटा निसांस लैत सतीश बाबू बजलाह। रेखा हमर कानमे फुसफुसाइत बजलीह- हमहुँ चली अहाँ संग। - हइ हँ किएक नइ? हमरो नीक लागत। हम उत्साहित भ’ गेलौं। ओहि कोमल किशोरीमे जेना हमरा अपने छवि देखा पड़ैत छल- वर्डस्वर्थक जंगली फूल असगरे विहुसरैत’ वायलेट, जकाँ अधा नुकायल- अधा देखारि। धृत गंगा, भीलांगना, भागीरथी तीनू नदीक संगम स्थलपर सत्येश्वर महादेवक मंदिर विशाल प्रांगणक संग जगमगा रहल छल। -हम सभ एहि मंदिरकेँ पशुपति नाथक मंदिर बुझैत छी- सतीश बाबू बजलाह- मंदिरक प्रांगणक एक कोनमे बौध विरोधी संगठन धरनापर बैसल छल। ओहिठाम एकटा बड़का बैनर टाँगल छल..... हम तो इस झील की गहराई के पार जायेंगे लेकिन हमारे वो अपने कहाँ जायेंगे। हमे तो अपने ही ले डूबे इस बात का गम किसे है ऐसा कौन सा शख्स जो हमसे नजर मिलाए लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मे कोई थकता नहीं बस्तियाँ उजाड़ने मे ....टिहरी उजड़े लोगों का शहर है...’’ आँखि भरि आयल, रेखा आस्तेसँ हमर आँगुर पकड़ि लेलीह। ओहि स्पर्शमे जेना दुनिया जहानक व्यथा नुकायल छल। हम सिहरि गेलौं। तावत केओ आगू आबि सम्मोहन तोड़ि देलक- हम सभ उजड़ल लोक छी। लोक एकटा कटोरो कीनैत अछि तँ ओकरासँ स्नेह भ’ जाइत छैक। ई तँ हमर जन्मभूमि, हमर गाम थीक। एकर माटिमे जनम लय हम सभ गाछ बिरीछ जकाँ बढ़ल छी। बद्री केदारक मंदिरसँ हमर सभक संस्कार बनल अछि। माता सदृश पूजने हवे एहि शहरकेँ। एहिठामक पाथरमे जिनगीक गीत गओने छी हम सभ..... ओकर आँखि डूमि रहल छल- चारु कात गगन चुम्बी पर्वत शृंखला नीचामे तीनू नदीक गलबैहिया-बीचमे बसल टेहरी उजड़ल लोकक शहर एकटा संस्कृत कोना विनष्ट होइत अछि। सतीश बाबूक छोट भाइ प्रियव्रत बजलाह- हम सभ तँ ईहो सुनने छी जे स्वामी रामातीर्थ अपन अन्तिम दिन एहि क्षेत्रमे बितौने छथि। एहि पर्वत शृखला दस हजार फीटक ऊँचाइक आसपास कतेको बस्ती बसल छैक- असगर टेहरी गामक जनसंख्या दस हजार सँ बेसी छैक- से गाम जलमग्न भ’ जायत। एकटा बुजुर्ग भावुक भ’ कह’ लगलाह- टेहरी गाम तँ बल्कि .............. बहिए जायत’ संगे कतेक तहसील एकर चपेटमे आबि जायत- हरदम भूकम्पक आशंका लागल रहैत अछि ताहिठाम ई डैम?- हुनक झुर्राइत आंगुर सुखायल आँखिकेँ नोरायल बुझि मल’ लागल। रेखाक आँगुर हमर हाथकेँ आर बेसी आर बेसी कसने जा रहल छल, हिमालयक धरतीपर सघन अरण्यक मध्य बनल एहि गामक कोन कोनकेँ हम अपन हृदयक कैमरामे उतारि रहल छलौं। हमरो सभक आँखि नोरा गेल छल। भविष्यक विकरालता सोचि- बद्री केदार सत्येश्वरक ऐतिहासिक विशाल मंदिर, टूटल फूटल रहितो प्राचीन कलाकृतिक उत्कष्ट उदाहरण छल। जेना कोनो बीतल युगक कथा मौन मूक उजागर भऽ रहल होय। चलु ने हम आबि कऽ भैरव मंदिर देखा दी- रेखा फेर फुसफुसा कऽ एकदम आस्ते सँ बाजलि- हइ हइ चलु- सभ अपना अपनामे छल आ रेखा अपन स्पर्शसँ हमरा अपना दिसि आकृष्ट करैत रहलीह- ई हृदयक कोन रिश्ता थीक? हम ओकर संग चलैत रहलौं- पीपरक झमटगर गाछक नीचाँ छोट छीन भैरव मंदिर बनल छल- छोट सन। आदर सँ झुकि लोक प्रणाम करैत। -ई भैरव मंदिर हमर सभसँ प्रिय स्थान अछि। हम जखन उदास होइत छी तँ एहिठाम आबि बैसि जाइत छी- रेखा बजलीह- ग्राम सँ बाहर शांत एकांत स्थानपर ई भैरव मंदिर छल जाहि ठाम सुदर्शन शाहक घोड़ा ठाढ़ भ’ गेल छल आ एहि ग्रामक निर्माण भेल। एहि पुरातन मंदिरमे श्रद्धासँ हमर माथ झुकि गेल किन्तु रेखा हमर हाथ पकड़ने रहलीह जेना दूनूक हाथ एके संग प्रार्थना क’ रहल होय। की कियो एतेक मुखर होइत अछि- स्पर्शों एतेक जीवैत कथा कहानी बनि जाइत अछि? ई अनुभूति रेखाक स्पर्श हमरा देलक। एतेक देरमे पहिल बेर रेखा मुखर भेलीह किन्तु अन्तिम बात जे बजलीह हमर समस्त तन मोन केँ कँपाय देलक, जेना भूक्षरण ओहि इलाकाक नै वरण हमर समस्त तन मोनमे भ’ रहल होय। -अहाँ जनैत छी- जखन डैम चालू होय लागत, गामसँ सभ भागि जायत हम एहि भैरव मंदिरमे आबि नुका जायब। हम संकल्प नेने छी एहि गामक संगे संग हम चलि जायब। तखन ओकर बातपर हम ओतेक ध्यान नै देलौं- नेनमति छैक। -एना नै बाजू रेखा। एकटा बाट जाहि ठाम समाप्त होइत छैक ताहि ठाम दोसर बाट स्वयं खुलि जाइत छैक। ध्वंसेपर निर्माण होइत छैक। एकटा नव सूर्योदयक नव विहान होइत छैक। किन्तु ओकर चेहरा पूर्ववत भावहीन, पाथर सन रहल। जेना रेखा नै वरण ओ समस्त टेहरी ग्राम होय अपन माटि पानिक साकार अस्तित्व आ जखन अखबारमे पढ़लौ- समस्त टेहरी ग्राम भागीरथीमे समा गेल, जेना हमर मानसमे अचक्के भयंकर भूचाल आबि गेल-ओ कत’ हेतीह’ ओ कतऽ हेतीह। एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न आइ अखबार मे पढ्लों मृदुला गर्ग केर एकटा आलेख ' सेक्युलर के नाम पर सम्मान का धंधा '....ओ ते लिखलनि ..आप हमारी संस्था को दास हज़ार रुपये दो,मै आपको 'फ़लाने' सम्मान से सम्मानित करूँगा..'...ओ चमत्कृत भ गेल छलीह .केओ ते हमरा सम्मान योग्य बुझ्लनी ..पाछा जे ओ दस हज़ार क गप सामने आइल... हमरो मोन पड़ी आइल . स्थायी रूप स हम दिल्ली आइल छलों स्यात २००९ क मार्च मे.. ....२ .३ मासक उपरांत एकटा बड पैघ इंटर नेशनल संसथान दिसि से हमरा बड़का लिफाफा भेटल . रंग विरंगी बेसकीमती कागज़ मे बड़का बड़का लोगक फोटो छपल , पुरस्कार लैत, दैत...भव्य मंच, सजावट....अंग्रेजी मे एकटा पत्र हमर नामे छपल छल ..जे साहित्य आ समाजक सेवा लेल हम अहाँ के सम्मानित करे चाहैत छी..अहाँ देखि लेब जे हम कतेक गोटा के सम्मानित केने छी ,सभक फोटो सेहो पठा रहल छी ..सांचे ओहि मे पूरा प्रोग्राम केर फोटो छल .सबटा आर्ट पेपर पर .....हमर जी थरथरा गेल ई कोन संस्था थीक जे दिल्ली अबितहि सम्मानित करे लेल अगुआल अछि ...रोमांचित भ उठलों ..फेर सोचलौं ,अरे एतेक भाषाक ' हूज हु' मे नाम निकलल अछि ओहि से खोजी नेने होइत.लागले फोन आइल अहाँ के हमर लिफ़ाफ़ भेटल ..आमंत्रण भेटल.हम सब अहाँ के सम्मानित कर चाहैत छी .......हम सोचैत सोचैत ठीक छै बाजि देलों..सब टा गप्प अन्ग्रेजिये मे भेल..हमर नाम के , किएक प्रस्तावित केने हेताह , दूर दूर धरि अहि युग मे केओ नै बुझा पडल..देखा पडल .....१ लाख रुपैया मामूली गप नै थीक जे केकरो करेज होइत केओ आन के दय दी ..सभक जी अपना अपना ले ओनाय्ल अछि......बड देर धरि सोचैत रहलों ,अपन आन के गुनैत रहलों ..के भ सकैत अछि...ई कोन संस्था एतेक ठस्सा वाला थीक एतेक पाई वाला..! तखन हम अपन जेठ बेटा राजीव के फोन लगेलों जे दिल्ली विश्व विद्यालय मे प्रोफेसर अछि आ आइ ३० बरिस से दिल्लीमे अछि --ओकरा जरुर बुझल हेतैक....हम सब बात ओकरा पढ़ी के सुना देलों....ओ ख़ुशी से गद गद भ गेल..मम्मी ,एहिठाम अबिते अहाँ मैथिली भोजपुरीक सेमिनार मे भाग लेलों...आब ई ...बहुत ख़ुशी क गप , हम बाजलों ..राजू मैथिली भोजपुरी मे ते सब अप्पन छल एहि मे ते देसी विदेसी भरल अछि...हमर नाम के कहलक ..ओ एतेक खुश छल जे --छोड़ू ई सब गप भगवन जे दै छथिन ख़ुशी ख़ुशी ग्रहण करु....हम आश्वस्त भ गेलों.....अपन सम्मान दुनिया मे केकरा ख़राब लगैत छैक.... दस दिन बाद क बात छी, हम बिसरी गेलों , दिल्ली मे नव नव किनल घर द्वार के ठीक करे लगलों .....अचक्के एक दिन फोन आइल.. आर यु डॉ. शेफालिका ...हम यस बाजलों...अहांके मोन ऐछ ने काल्हिये प्रोग्रम्म थीक. ..हम चोंकि उठलों ..हं हं किएक नै...मोन अछिि... तं काल्हि ५ बजे साँझ से प्रोग्राम होइत...अहाँ एतेक हज़ार रुपैया एकटा लिफ़ाफ़ मे नेने आइब, प्रोग्राम से एक घंटा पहिने....... हम अव्चंक भ गेलों .कहियो ई सब जानि बुझि तखन ने , रूपया किएक ??? ई नियम थीक एहि संस्थाक दीप तर अन्हार , वो बाला मधुर स्वरे बजलीह एहि मे कोन बुराई, अहाँ के सम्मानक संग ट्को भेटत ..,,,,,कोनो लोस नै अछि खाली गेने गेन...हम सपाट स्वरे ब्ज्लों हमरा टका द क सम्मान नै चाही... तखन मोन मे घुमड़ लागल कतेको प्रश्न जाहि मे एकटा प्रश्न जरैत बुझैत आगि जकां ठाढ़ छल ..की एहनो होइत छैक संस्मरण- मैथिली (उड़ीसा-१९८५) जिनगी एकटा सफर थीक जे हमरा चलनाय अछ, सफर यानि यात्रा -- सफरिंग यानि पीड़ा . उर्दुक सफर आ अंग्रेजीक मे विचित्र अर्थ सम्बन्ध अछ. जिनगीक सफर तय करवा मे हमरा सब के शारीरिक स्तर पर कतेक 'सफर' करय पडैत अछ आ ओहि क्रिया मे मानसिक प्रक्रियाक कतेक 'सफरिंग' भोग पडैत अछ, ई अंग्रेजी शब्द सफरिंग सफरक पीड़ा के व्यक्त करैत अछ . विचित्र अछ सफर करैत इ मानसिकता---हमर जीवनों मे सफरिंग स जुडल सफर.... सहरसा क जुआन दुपहरिया -खिड़की स अवैत आकाशक एक टा खंड के निहारी रहल छलों ,मुदा निलाकाशक रंग मैल्छाहन छल. निश्छल हृदयक सत्यता पर ओढना जकां .हृदयक सत्यता पर लोक कें सहजहि विश्वास नै होयत छैक --असत्य मे जीवाक प्रक्रिया से त्रस्त मानव...डाकिया आबि चिठी सब द गेल..डूबल मोन किनार पर आबि गेल .एकटा आमंत्रण छल अर्थ सहित - संबलपुर, उड़ीसा मे पूर्व भारत कवि सम्मेलन आ सेमीनारक आयोजन ४--५ जून के छल. , तीन तीन टा आय.ए. एस. आफिसर क निमंत्रण छल समास प्रकाशनक दिस सँ.. की करी की नै करी क तारतम्य मे छलों १जुने '८५ के वंदना क मेडिकल टेस्ट परीक्षा दिल्ली मे छल ४-५ जून के उड़ीसा मे , हम सहरसा मे..सहरसा स पटना ,पटना स दिल्ली आ दिल्ली स उड़ीसा..पूरा त्रिपेक्ष्ण छल.मुदा सब समस्याक हल वर्मा जी लग रहैत छल . हम दिल्ली जायब ! १ तारीख के वन्दना के परीक्षा दिआय, वन्दना के राजीव लग दिल्ली मे छोड़ी हम सब २ जून के कलिंग एक्सप्रेस स दिल्ली स उड़ीसा लेल विदा भ गेलों. ,राजस्थान,हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि कतेको राज्य के पार करैत ,स्पर्श करैत झरसुगुडा पहुन्च्लों ..२४ घंटा अनवरत ट्रेन पर बैस्वाक हिस्स्क नै रहलाक कारण अप्स्यांत भ गेल छलों. झर्सुगुडा स संबलपुर लेल दोसर ट्रेन पकडलों..मनुख की पंछी सँ कम अछ ! बरगढ़ क सब स पैघ होटल ' 'ओरियंटल ' मे सब आमंत्रित कवि लोकनिक व्यवस्था छल.. २३ न. क सूट हमरा सब लेल रिजर्व छल. आगू पाछू वेटर ,२--२ -टा एम्बेसडर कार ,स्वागत समितिक सदस्य सभ पाइन क लहरि जकां उधियावैत .... कखनो काल सोचैत छी.संस्मरण हो व आत्मकथा आकी जीवनक बितैत पल हम कोनो चीजक वर्णन इतिवृत्तात्मक किएक नै क पवैत छी ? हम एक एक शहर के, स्थान के एक एक क्षण के भोगैत छी ,ओही मे सांस लेत छी ,सबटा के अपन अंतर मे उतारि लैत छी, तखने किछ लिख सकैत छी..कतेक कल्पना क लैत छी...की नीक थीक..?.............. ४ जून के १२ बजे दिन मे उद्घाटन समारोह आरम्भ भेल. गर्मी आ ताप स बरगढ़ जरि रहल छल. उद्घाटन समारोह ,केनेल रेस्ट हाउस मे छल. ओहि ठाम पुरान परिचित कवि लोकनि स भेंट भ गेल. १९८१ मे साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित 'पोएट्स वोर्कशोप', कलकता मे उड़िया कवि राजेंद्र पंधा ,आय.ए. एस., प्रोफ. हरिप्रसाद परीच्छ पटनायक , अश्विनी कुमार मिश्र, मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह, आर. के. मधुवीर आदि कतेको कवि लोकनी स फेरो भेंट भ गेल.,परिचित मुस्कांक आदान प्रदान भेल. जरैत दुपहरिया ,सुरुजक ताप तप्त यौवनक प्रखर किरन सब के अप्स्यांत केने छल. शामियाना क नीचा छः भाषाई प्रांतक कवि सम्मेलंक उद्घाटन क आयोजन छल. सभक मोन आ तन गर्मी स बरकि बरकी गलि रहल छल. अचक्के सामने मे टांगल बडका बैनर पर दृष्टि पडल , छहों भाषाक नाम बडका बडका आखर मे लिखल छल जाहि मे पहिलुक नाम छल मैथिली, तकर बाद आसामी, मणिपुरी, बंगाली,हिंदी आ उडिया , मैथिली देखतही ताप जेना चानन भ गेल, उड़ीसा मे अपन मैथिली शब्द ऐना लगैत छल जेना कोनो प्रेमी के अपन प्रियतमा स अनायासे साक्षात्कार भ गेल हो..बिहार स यानी मैथिली स हम असगर छलों याने आब मैथिलीक आन ,बान आ सान जेना हमरे हाथ होई , हम मैथिली के अपन अंक मे सटाई फुसफुसाई देलों. ' अहाँ घबराबू नै, उड़ीसा क एहि कार्यक्रम मे अहांक स्थान सर्वोच्च रहत , हम स्वर्ण मुकुट पहिराई अहांके एहिठाम से विदा करब. आ सरिपों, साँझ मे जखन दोसर सिटिंग आरम्भ भेल हम सलाह देलों जे सब केओ अपन अपन भाषा मे बजता जाहि से एक दोसरा के भाषा के चीन्ही सकी, नहि बुझितो बुझ्वाक आनंद ल सकी. ,उडियाक कवि सब हमरा बड आदर दैत छलाह..सहर्ष हमर बात स्वीकार क लेल गेल. सान्झुक सेमीनार, बरगढ़क रोशनाई खसल सियाह साँझ , जरैत दुपहरिया स कम नै . हवा नै बह्वाक प्रण क मानिनी नायिका जकां कत्तो रुसल छलीह..लोक कोना ज जिवैत अछ एहि पाथर क नगरी मे सेमिनार् क अध्यक्षता उडिया क प्रख्यात कवि आ प्रिंसिपल क रहल छलाह, संचालन रेडियो स्टेशन क प्रोग्राम executive अभय शंकर पंधा क रहल छलाह , विषय छल 'समकालीन कविता '.बिहार स हमर नामक घोषणा भेल ,थपडी पहिन्ही बाजि उठल 'पोएट्स वोर्क्शोप क आत्मीयता आर सुदृढ़ भेल.हम सब स पहिने उड़ीयाक कवि आ बरगढ़ क बीडीओ अश्विनी जी के धन्यवाद देलों जे आयोजक छलाह. मैथिली भाषा सुनतही सब श्रोता लोकनिक चेहरा पर अद्भुद पुलक आबी गेल ,हम साक्षात् देखि रहल छलों .हम बाज्लों...होटेस्ट स्टेट आ होटेस्ट डे ,ताहि मे १२ बजे दुपहरिया मे प्रखर रौद आ जरैत सुरुजक निचा हम सब गप कविताक कय रहल छी , कतेक विरोधाभास अछ . कविता इजोरियाक भाषा थीक ,कोमलता ,मृदुताक सफल संचरण रहितो हम सब एही जरैत रौद मे कविताक गप करैत छी..इयैह थीक आजुक कविता - कुंठा , संत्रास ,हाहाकार क मध्य कवि जीवित अछ ते इजोरिया कते..?? पुनह आगू बढैत हम मैथिली क सब कवि लोगनीक नाम, कविता सब क चर्च केलों ,फेरो---जहिना कोनो यग्य वा अनुष्ठान बिना महिलाक सम्पन्न नै होयत अछ वोहिना कोनो साहित्य ताधरी पूर्ण नै जाधरी महिला साहित्यकारक योगदान नै होय , आ तकर बाद हम महिला लेखिका गनक चर्च विस्तृत रुपे केलों..---------' मैथिली विजयी छलीह थपडी आ वाहवाही क नव स्पन्दन नेने....अभय पंधा हमर भाषण के हिंदी, उड़िया आ अंग्रेजी मे सम्झावैत कहलनि ..मिसेज वर्मा , हम मानैत छ जे मैथिली मे महिला साहित्यकारक बाहुल्य अछ, उडिया मे सेहो महिला लेखिकाक अभाव नै , महिला के बाहर जेवा मे परेशानी भ जायत छैक . अहाँ मि. वर्माक संग आयल छी, ,कतेक लोक के ई संजोग भेटैत छैक ? ....... किन्तु सेमीनारक समाप्ति क उपरान्त हमर मोने एकटा प्रश्न उभरल ..सब कवि अपन भाषण मे सभक चर्च केलनी किन्तु, अपन भाषाक कोनो महिला रचनाकारक चर्च नै केलनि..ई भ सकैत छैक मैथिली भाषा मे केओ पुरुख रचनाकार रहितैक तं ओ सेहो महिला क लेखनक चर्च नै करितैथ....आखिर इ वैमात्रिक व्यवहार महिला संग किएक ? महिलाक चर्च सं की हुनक अहम पर चोट पहुँचैत छैक , आकी अपना के छोट बुझ लागैत छैथ..?जाहि ठाम सम्मान देवाक गप ओहिठाम इन्फिरीयोरिटी कम्प्लेक्स किएक ?..एकर उत्तर दुनियाक कोनो पुरुख लग नै अछ.. गर्मी बड़ जोर, मंच पर उडिया कवि रवि सिंह क स्वर आर आगि उगलि रहल छल---..उड़िया क कवि लोगनिके आय धरी कोनो रचना पर पारिश्रमिक नै भेटल अछ......इ ते मैथिलिक संग सेहो छल..प्रोफ.दीपक मिश्रा ,उडिया कवि हमरा कहलैथ .जे रवि जे के लोग आगि कहैत छैथ..' उडिया कवि लोग् क मात्र दुई वर्ग छल , एकटा पदाधिकारी लोकनी दोसर प्रोफेसर सब. रातुक १० बाजी गेल, मंच पर मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह क वक्तव्य चली रहल छल....दीपक मिश्रा के मंच पर एवा लेल निमंत्रित कयल गेल,ओ क्ह्लनी.'हम कविता क सकैत छी ,ओही पर बाजी नै सकैत छी ....दीपक मिश्राक संग हम सब पार्क मे हवा खोज गेलों जे कत्तो मन्हुआय्ल सुतल हेतीह.... बाड़ी मे घुमैत हम दीपक स कहलों ..जनैत छी हमर मिथिला मे जखन बड गरम लगैत अछ, हवा नहि चलैत अछ ते हम सब एकटा फकड़ा पढैत छी ---सुषा के धोकड़ी मुसा के कान, धोकड़ी धोकड़ी हवा आन ओते से बक गेला कते......आ तकर बाद क स लक ह धरि एकटा कविता पढ़ पडैत छैक, जेना बक गेला कते..कमलपुर आगत स्वागत के केल्कानी ,किशोर बाबु, ,बैसलैथ कदम्ब क गाछ पर , पानि पिव्लैथ कोसी नदी मे, माछ खेलैथ कबई, ....एहिना सब आखर से सही गाछ, सही,माछ, सही नदीक नाम कहैत 'ह' पर खत्म होइय्त अछ आ बसात बह लगैत छैक.....दीपक हँसैत बजलाह ..तखन भ जाय शुरू.... हमहूँ सब हँसे लगलों ..बहुत समय आ धैर्यक आवश्यकता छैक दीपक जी..कोनो चीज सहजही नहि भेटैत छैक... रातुक भोजन मे पुलाव, मीट, ३--४ प्रकारक तीमन, नीचा मे दरी पर पात मे खेलों. एकटा बारीक बाजल --दालि पात पर स बहि रहल छैक..हम चोंकि गेलों, पहिल बेर बरगढ़ मे मैथिली सुन्लों..बाल्टी हाथ मे नेने एकटा युवा ..हम मैथिली जनैत छी , सीतामढ़ी घर अछ. एहिठाम बिजली विभाग मे छी. आय अहांक मैथिली मे भाषण सुनि अपन भाषा मोन पड़ी आयल.. दोसर दिन १० बजे दिन मे कवि सम्मेलन आरम्भ भेल. अभय पंधा संचालन क रहल छलाह, हुनक व्यक्तित्व मे मैथिली, उड़िया, मणिपुरी, बंगाली, असामी,हिंदी,अंग्रेजी सबटा भाषा भरल छल ,भव्य आ प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व ..देवी दास मिश्र क कविता भ रहल छल जिनका ले सब कहैत छलाह जे ओ आशु कवि छैथ ,ओ कविता लिखैत नै छैथ, कविता बजैत छैथ .. सिगरेट क धुइयाँ सँ घेरल हम बैसल छलों. राजेंद्र पंधा ,हरिप्रसाद ,आ सौभाग्य मिश्र तीनो क ठोर मे सिगरेट .....राजेंद्र पंधा क कविता क भाव --' the entire world is devided into two camps , one to love ,the another which preaches hatred....I am for love ..' ....मनुख पर ओकर नामक असर अवस्य होइत छैक ..डॉ. प्रसन्न मिश्र गुलाबी शर्ट मे सदिखन अपन प्रसन्न आनन स सब के उल्लसित करैत छलाह. ओ उड़ीसा सरकारक पत्रिका 'शिशुलेखा' क सम्पादक क संगे प्रोफेसर सेहो छलाह .प्रख्यात उड़िया कवि डॉ.सौभाग्य मिश्रक व्यक्तित्व स भाग्यक रेख छलकी र्झ्ल छल---'सुने पाखी उड़े जाय ,डेना फड फड करी ....'...नरसिंह प्रसाद त्रिपाठी कविता 'निजस्थिति' क बाद मैथिलीक कविता 'मधुगंधी वासात' नेने हम मंच पर एलों..फेर विद्यापतिक भाषा गूंजी गेल पाथरक देश मे...हरिप्रसाद जीक कविता -'सून सून आगि बेढ़ कुसुम लागि छे मते बारम्बार ईश्वर हसंते......' --------उडिया - कविता सब नम्हर नम्हर होइत अछ, मुदा, प्रसन्न कुमार प्रत्स्नी एम्.एल.ए. बड छोट कविता पढ्लनी 'चिलिका' ....मणिपुरी कवि इबोमेहा सिंह..' देबोय देबोय ( डान्स डांस ) ' सुनोलनी ते दोसर कविता जस्ट टू डे, जस्ट टू डे .....डेड जगन्नाथ डेड जगन्नाथ..... 'मोन के आक्रांत क देलक.. गर्म गर्म हवा चलि रहल छल. बीच बीच मे कोंफी आ पानि सेहो..विचित्र आ सम्मोहक लागल..कवि सम्मलेन १ बजे दिन स ४ बजे तक चलल, मुदा सब जेना कवि सब के सुनवा ले आकुल व्याकुल..मोन पड़ी आयल अपन चेतना समितिक विद्यापति पर्व समारोह '७३-७४ इसवी सभक..मिलर स्कूल केर कैम्पस मे १०,०००, श्रोता राति भरि खाली कविता सुनवा लेल मन्त्र मुग्ध बैसल रहैत छल .. सम्मेलन ख़त्म हेवाक उपरान्त सब भोजनक ओरियाओन मे लागि गेलाह. सब अफसर लोकनि अपने स कुर्सी घिच घिच के सामने आन ल्ग्लैठ. अफसरशाही क कोनो घमंड नै. भात ,दालि, दू टा तीमन आ रोहू माछक बडका बडका कुटीया..दही चीनी ..लगैत छल अपने मिथिला मे छी.. हरिप्रसाद जी वर्मा जी के पुछलनी--डू यु स्मोक ? जबाब हम देलों --नो स्मोकिंग , नो ड्रिंकिंग ....वर्मा जीक हाथ पकड़ी वो बजलाह ' बेचारा ' .देन यु हँव मेड हिज लाइफ मीजरेबुल....हमरो पत्नी हमरा पिव नै दैत छलीह ,तखन हम ओकरा स पुछ्लों. अहाँ कवि स ब्याह केलों कि प्रोफेसर स..? ओ बजलीह -निश्चित रुपे कवि से ....तखन हमरा पिव दिय..हम पिअब नै ते कविता नै क सकब..फेर ओ हमरा कविता करैत काल शराब पिवाक अनुमति द देलनि..' कविता करवाक विचित्र परिभाषा पर हंसी लागि गेल. ५ बजे प्रोफ. अशोक चन्दन होटल आबि बजलाह--शेफालिका जी, १० मिनट लेल रेस्ट हाउस चलू. उडिया क नव कवि आ छात्रगण अहांक इंटरव्यू लेताह ... भरि दिनक थाकल छलों किन्तु वर्माजीक एके डांट मे ..कोनो कार्यक्रम मे नै नहि कहियोक..एहि लेल आयल छी ने..' आ अपना पलंग स दोस्ती क लेलनी हम चंदन जी संग रेस्ट हाउस एलों..बडका मजमा लागल छल --बीच मे टेप रेकॉर्डर राखल छल..' कविताक सृजन कोना होयत छैक..?' सोझ प्रश्न लगले दिल दिमाग पर लागल--कि अहाँ जहिना कविता बनवैत छी ओहिना प्रकाशित करैत छी, @...हम हुनक समस्या आ बहसक कारण बुझि गेलों..-----देखू, जहिना प्रसव पीड़ाक काल लेबर पेन होइत छैक, ठीक ओहिना कोनो भाव शिशु हृदय मे हिलकोर करैत अछ अछ . जाधरी ओकरा कागज पर नै उतरैत छी ताधरी प्रसव पीड़ा स छटपटावैत रहैत छी.. बच्चाक जन्मक बाद माता के कतेक शान्ति भेटैत छैक वैह शान्ति कवि के कविताक जन्मक बाद भेटैत छैक. ई दोसर गप थीक जे जन्म क बाद बच्चा के केश,माथ,नाक सब के ठोकी ठाक नीक बनवैत अछ ओहिना कविता के पढि पढि नीक आर नीक ले कवि सोचैत अछ. ..' सब विस्मित विमुग्ध छलाह ..'एक टा गप आर अपन कोन रचना अहाँ के बेसी नीक लगैत अछ..' हम हांसी देलों..' आब हमरा ई नै पुछू जे अहांक अपन बाल बच्चा मे के सब स नीक लगैत अछ, रचनाकार के अपन कोनो सन्तान अधलाह नै लगैत छैक , लोग जे बुझे.....' अभय जी बजलाह..अहांक भाषण आ इंटरव्यू ८ जून के राति मे रेडिओ स प्रसारित होयत , जरुर सुनब.. .....ट्रेन पकड़बा लेल होटल स निकलैत छलों कि रोहिणीकान्त मुकर्जी ,सोवेनिर क सम्पादक पत्रिका ल पहुँचलाह--एहि मे अहाँक मैथिली कविताक अंग्रेजी रूपान्तर छपल छैक, अगुला बेर उडिया रूपान्तर प्रकाशित होयत.-------- आ फेर एकटा बिछुड्वाक दर्द नेने, सब स मिलैत सनत कुमार आ अशोक महापात्र क संग स्टेशन ले विदा भ गेलों ..मैडम ,अहाँ हमरा सब के पत्रक जबाब देब ने...? एतेक आत्मीय स्वर मे तीति भीजि गेल छलों. ....हं हं जरुर देब..शर्त एकेटा अहाँ सब हमरा मैडम नै दीदी कहू.........हं दीदी, हम सब कहियो अहाँ के नै बिसरब. आ हमर मोन ट्रेनक गति संग भगैत रहल. मणिपद्म जी एक बेर मंच पर कहने छलाह--शेफाली, अहांक मोन ते सेमरक फूल जकां उडैत रहैत अछ ....हमर मोन सांचे उडि रहल छल, उडिया लोकक सम्पर्क भाषा उडिया छल, बंगाली सभक बँगला ....आ हम सब की करैत छी..हिंदी हमर राष्ट्र भाषा थीक , मैथिली मातृभाषा , --अपन माय के आदर देब तखन त राष्ट्र के आदर द सकैत छी , जननी के पूजब तखन त जन्मभूमि के.... दुर्गानन्द मण्डल नेना लेल सुन्दर चित्रकथा श्रीमती प्रीति ठाकुरक दू गोट चित्रकथा (पहिल गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा, दोसर मैथिली चित्रकथा) मैथिली साहित्यमे पहिल बेर श्रुति प्रकाशन नई दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। दुनू चित्रकथा एक संग श्री उमेश मण्डल जीक माध्यमे भेटल। एक-आधटा पन्ना उनटैबिते मन गद्-गद भऽ गेल। लागल जे आब हम मैथिल दरिद्र नै सभ कथुसँ सम्पन्न भऽ रहल छी। साहित्यक तँ अनेको विधा होइ अछि जइमे कथा एक विधा थिक तहूमे चित्रकथा तँ बाल साहित्य लेल प्रमुख। चित्रकथाक माध्यमसँ अपन भूलल-बिसरल संस्कृतिक झलक सेहो भेटैत अछि। निश्चित रूपे मैथिली साहित्यमे एकर अभाव बहुत दिनसँ खटैक रहल छल। जेकरा श्रीमती प्रीति ठाकुर अपन चित्र कथा मैथिल समाजक बीच राखि एकटा असीम प्रतिभाक परिचय देलनि अछि। बुझना जाइ छल जेना हम अपनेकेँ स्वयं विसरि गेल छी। विसरि गेल रही ओइ समैकेँ जइ समैमे मैयाँ अपन पोता-पोती लऽ जा कऽ घूड़ लग बैसि गोनू झाक खिस्सा सुनबैत छलीह जे अति मनोरंजक आ गोनूक तीव्र बुधिक परिचायक छल। तहिना आनो आनो कथा जेकरा प्रीति जी चित्रवत् कऽ हमरा लोकनिक साेझामे रखलीह। जइमे रेशमा-चूहरमल, नैका बनिजारा, ज्योति पंजियार, महुआ घटवारिन, राजा सलहेस, छेछण महराज आ कालिदास छथि। जे कहियो आम छल, आब लुप्त प्राय: भेल जा रहल छल, ओकरा एकबेर पुन: परिचित करौलनि। जइमे लोक जनलक जे रेशमा के आ चूहड़मल के? एतबे नै, प्रेमक पराकाष्ठाक परिचयक रूपमे जे लोकक ठोरपर हीर-रांझा वा लैला-मजनू रहैत छल, की ओकरासँ कम निस्वार्थ प्रेम रेशमा आ चूहड़मलक छल ई देखेबाकमे साकांक्ष रहलीह। जतए चुहड़मल दुधवंशी दुसाध जातिक तँ दोसर तरफ रेशमा भुमिहार ब्राह्मण जातिक बेटी। जखन जुहड़मलकेँ दंगल जीत कऽ अबैत देखलक तँ दुनूक भेँट गंगाक तटपर, ओतहि प्रेमकथाक प्रारम्भ भेल। अर्थात् प्रेममे जाति-पातिसँ कोनो लेन-देन नै अपितु प्रेम तँ प्रेम थिक। प्रेम कएल नै जाइ छै अपने भऽ जाइ छै। तहिना नैका बनिजारा सेहो प्रेमेक पराकाष्ठाक परिचायक छी। भगता ज्योति पंजियार अपन वीरता आ पराक्रमक कारणे पूजित भेल। आइ जँ धर्मराजक पूजा तँ ज्योति पंजियार सेहो पूजित छथि। धर्मराजक भक्त ज्योति पंजियार बारह बर्खक तपस्याक बाद कंचन काया लऽ कऽ घूमि घर एलाह। माइक कोखि पवित्र भेल। जे एहेन पैघ भगता ओकरा कोखिसँ जनमल। तहिना महुआ घटवारिन सेहो अपन इज्जत बचाबए खातिर कौशिकी धारमे जान गमा अपन सतीत्वकेँ अकिंचन बना कऽ रखलीह। राज सलहेसक कथा तँ नाचो रूपमे प्रसिद्ध अछि। जेकरा प्रीतिजी चित्रवत् कऽ इतिहास बना देलनि। एकटा धरोहरक रूप दऽ देलथि। अनचिन्हार जकाँ छेछन महराज कथाक संग कालिदासक चित्र कथा आ हुनक यादव कुलमे जन्म हएब, हुनक यर्थाथ परिचए भेल। बहुतोकेँ ई बूझल हेतनि जे कालिदास तँ कर्ण-कायस्थ छलाह। ऐ लेल सेहो प्रीति जीकेँ धन्यवाद। प्रीति जीक दोसर रचना मैथिली चित्रकथामे कुल दस गोट कथा वर्णित अछि। जइमे राजा सलहेस, बोधि कायस्थ, दीना-भदरी, नैका-बनिजारा, विद्यापतिक आयु अवसान प्रमुख अछि। ऐ प्रकारे दुनू चित्रकथा पढ़लापर एहेन लागल जे ई कथा सभ ऐतिहासिक महत पाओत। ऐ प्रकारक रचनाक सर्वथा अभाव सन छल। जेकरा प्रीतिजी हमरा सबहक समक्ष राखि एकरा धरोहरि स्वरूप महत देलनि। ऐ पोथीकेँ नैना-भुटुकाक पहिल पसिन कहल जा सकैत अछि। खास कऽ जे बच्चा नंदन, वालहंश, वा अन्य पोथी पढ़बाक हिस्सक लगौने छल आब ओ लेखिका द्वारा रचित रचनासँ लाभ उठाओत। पोथीक प्रत्येक चित्र तथ्यात्मक आ उद्देश्यपरक अछि। चित्रकथाक माध्यमसँ प्रीतिजी मिथिलाक विलुप्त प्राय भेल विषय-वस्तुकेँ कथाक रूप दऽ जीवंत कऽ देलनि। मैथिली प्रेमी ऐ तरहक रचनाकेँ नजरअंदाज नै कऽ सकैत छथि। आबैबला पीढ़ीक लेल ऐ प्रकारक रचना नै मात्र मनोरंजक अपितु प्रेरणादायक सेहो सिद्ध हएत। पोथीक सभसँ पैघ बात ई अछि जे प्रत्येक चित्र एकटा विशेष अंदाज आ दशाकेँ प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि जे लिखल गेल पाँतिक भाव स्पष्ट कऽ रहल अछि। प्राय: सभ जातिक लोकक चित्रण ऐ चित्रकथामे समाएल अछि। जे प्रीति जीक समन्वयवादी सोचक परिचायक अछि। प्रगतिशील विचार तँ सहजहि। मिथिला सभ दिनसँ उदारक परिचायक रहल मुदा किछु लोक बेवसायिक एवं जातिवादी सोचक लाड़नि बीचमे चलौलनि आ चलाइयो रहल छथि। हमरा हर्ख भऽ रहल अछि ऐ चित्रकथाक लेखिकापर जे एतेक सुन्दर, सुगम, आ प्रगतिशील डेग बढ़ा मैथिली साहित्यक विकासमे एकटा बेछप स्थान बनौलनि अछि। हमर शुभकामना सतत रहत जे प्रीतिजी ऐ प्रकारक रचना करैत रहती आ श्रुति प्रकाशन प्रकाशित करैत रहत तँ निश्चित रूपेँ मिथिला, मैथिली आ मैथिलामे रहनिहार सभ पूर्णत: समृद्ध भऽ जेताह। स्वतंत्रता दिवसक अवसरपर किछु स्वतंत्र भरास आइ भारतीय स्वतंत्राक 65म वर्षगाॅठ मना रहल छथि। अनेरे प्रसन्न! सरकारी किंवा गैर सरकारी कार्यालय आजुक दिन स्वतंत्रता दिवसक रूपमे मना रहल अछि। विद्यालय सभमे सरकारी चिट्ठी पठा देल गेल जे फी विद्यालयक एक गोट मासाएब अमुख महादलित टोलमे झंडा फहराबथि, अन्यथा दण्डक भागीक हेता। कहक लेल सभ किछु अनसोहाते बुझना जाइत अछि। कि खादीक नम्हर कुर्ता, ठेहुनसँ निच्चा धरि, माथपर गाॅधी टोपी, डॉरमे खदीक धोती पहिर राष्ट्रधव्जक समक्ष सभटा झुट्ठठे भाषण देल जा रहल अछि। सुनैत-सुनैत देहमे आगि लागि जाइत अछि। मोन कोना ने कोनादन करए लगैत अछि। झुट्ठा लोक सबहक झुट्ठ भाषण सुनैत-सुनैत पचास बर्खक भऽ गेलौं मुदा झुट्ठे बाजि अपने सन आनो जनकेँ परतारब कते अधलाह बात भेल! जँ हार-मौसक देह अछि तँ कनियो लाज हेबाक चाही, कि बाजि रहल छी, कि कऽ रहल छी? कि सभ दिन झुट्ठे बाजि भारतक स्वतंत्रताकेँ अक्षुन्न राखि सकै छी? ई हमरा लोकनिक बीच एकटा यक्ष प्रश्नक सदृश्य राखल अछि। चारू कात देश भक्ति गीत बाजि रहल अछि। गीत सुनैत-सुनैत खुन खौलए लगैत अछि, ऐ सफेद पोस झुट्ठा सभकेँ देख कऽ जे समस्त भारतीय भाय-बहिन, माइ लोकनिकेँ सालो-सालसँ ठकैत आएल अछि। राष्ट्रधव्जक सामने बाजब किछु आ करब किछु, हिनका सभक जन्म सिद्ध अधिकार भऽ गेल अछि। धिक्कार अछि एहेन भारतीय आेइ सन्तान सभकेँ जे भारत माताक संग झुठक बेपार करैत अछि। सवाल ई उठैत अछि, देशमे जखन चारूकात भ्रष्टाचार, बेबिचार, हत्या, बालात्कार, अपहरणक बेपार भऽ रहल अछि, तखन भारतीय कोन रूपेँ स्वतंत्र छथि? देशक शीर्षस्थ नेता लोकनिक करतुत प्रात होइते अखबारमे पढ़बामे अबैत अछि। भारतीय संविधानक ऊँचसँ ऊँच पदपर आसीन मत्रीगण क्यो बेदाग नै छथि। सबहक चद्दैरमे दाग लागल छन्हि। एकटा जहलसँ बहराइ छथि, तँ दोसर जेबाक लेल ततबाए आतुर! कथी खातीर? देशक रक्षा खातीर? कखनो नै। अपितु ई आरो स्पष्ट भऽ जाइत अछि, जे अहाँ कतेक पघि भीतरघाती छी। आइ खगता अछि ऐ बातक जे अपना-अपना भीतर झाँकि कऽ देखू जे अहाँ गॉधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी.क भारतक कि दुदर्शा केलिऐ? कि अही कुकर्मक िनर्वहनक लेल अहाँक भारतीय राजनीतिक क्षितिजपर बैसाओल गेल? आइ जँ कियो सही आबाज उठबै छथि तँ ओकर ओधि उखारि अहाँ अपनाकेँ सुरक्षित राखए चाही छी। मुदा आब ओ दिन दुर नै जे अहाँ कखनो नाङट भऽ सकै छी आ अरबो-अरब भारतीय अहाँकेँ नाङटे-उघारे टी.भी.क पर्दापर देखत। तँए समए पूर्व चेतू हे मानव चेतू। अन्यथा ने िसर्फ भारतीय वल्कि अरबो-अरब जनसंख्या अहाँकेँ धुर छी! धुर छी! करत। कतेक दुखक बात अछि जे अहाँ सन सपूत भारत माताकेँ खोइछ खाली कऽ सभटा धन नुकाए कऽ आनठाम रखने छी। मुदा से ककराले? अपनेकेँ बूझक चाही जे ओ धन किसान-मदूरक खुन-पसेनाक कमाइ छी। ओ धन अहाँकेँ पचि नै सकैए। ओहि धनसँ ने तँ अहाँ अपन श्राध कऽ सकब आ ने बेटा-बेटीक वियाह। तखन ओ धन भोगत के? ऐठाम आप्त चिंतनक खगता अछि। सोचू, कने विचारू, कोन तरहक कुकर्म आ केकरा लेल करै छी। जागू, जागू हे भारतक सपूत अखनो जागू। भारतक अखण्डता आ एकता लेल जागू। भारत सबहक माता थिकीह। माताकेँ सद्विचारसँ सजाउ। आउ, अपन तियाग, निष्ठा, लोभ, मोह, अहंकारकेँ तियागि भारतकेँ माता बुझि अपन खून-पसीना स्वच्छ वुद्धि विवेकसँ माताकेँ बचाउ। बचाउ अपन मानवताकेँ, नैतिकताकेँ आदि सनातन धर्मकेँ आ राजनीतिकेँ। देशमे जरूर प्रजातंत्रक शासन अछि। किन्तु सबहक आत्मामे रावणक शासन। तँए, आइ पन्द्रह अगस्तक अवसरपर आबि ओइ रावणकेँ खतम कऽ देबाक सप्पत खाउ। सप्पत खाउ जे अपन भारतकेँ रामराज्य बना अपने राम कहाउ। धन्यवाद..., नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी) बिहार, जन्म- १५-०५-१९८४, शिक्षा- बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि- कविता, साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत- Comfort Intech Limited, malad (R.M.) मिथिला उवाच-१ पुरवा बहि रहल अछि चंडाल जकां सायं-सायं कऽ रहल अछि जेना दौगि रहल अछि .....आतुर भऽ - व्याकुल भऽ, हरा गेलैए किछु ..ताकि रहल अछि जेना ! सुखा गेल मुँह , नाक , कान सभटा , पैर तरक धरा मे दरार पड़ि गेल अछि....सौंसे खेत मे , छाती फाटि कऽ कानि रहल अछि जेना बुझा रहल छै सीता एखने गेलीहेँ धरतीमे फांक दऽकऽ ! मूड़ी ऊपर उठेलहुँ तँ लागल जेना चुनरी ओढा देलक कियो मुँहपर .........! हे भगवान् बज्जर खसौ ई करिया बदरा केँ। सभ दिन कऽ अपन सकल देखा कऽ ...मुँह दुइस कऽ भागि जाइए! कनेकबो दर्द नै छै कोंढ़मे बेदर्दाकेँ ......! आह ..हा ...नाक पर एगो शीतल बूंद खसल ओढ़नी सँ चुबि कऽ .......मोनक भ्रम अछि की ..... तखने दुनु पपनीपर खसल जेना कहि रहल अछि, उठू, आब नै सताएब हम अहाँकेँ किया एतेक अन्धेरेज भेल अछि .....संतोख भेल भीतरसँ कने ! ठनका ,ठनकल जोरसँ तखने ........! कतऽ गेल गै छौड़ी ........अमोट सुखाइ छौ अंगनामे उठा ले ने, पाइन एलै...... भिजलौ सभटा ! यै भौजी, असगनीपर सँ कपड़ा उतारू सभटा ..........भिजल ........( अमोट उठबैत एगो भौजीयोकेँ काज अरहेने गेल दुलरिया ) एक अछार बरिस कऽ रुकि गेल तँ निकलि गेलौं खेत दिस कने .......... आह हा ........ह्रदयक गहराइ तक उतरि गेल ओ सोन्ह्गर माटिक सुगंध पहिल अछारक बाद दबने छल जे बहुत दिनसँ भीतरमे ! मृग मरीचिका जेना भटकलौंहेँ कने काल ....., ओर ने कोनो छोर ओइ सुगंधक ,... सजि-धजि कऽ बैसल अछि जेना मिलनक आसमे प्रेमीक बाट तकैत... चारु दिस सुन्न पड़ल अछि खेत, नबका फसलक इंतजारमे! सरजू काका महिना भरिसँ हरक शान चढ़ा रहल छथि फारक, बड़द सभकेँ खुआ-पिया कऽ टनगर बनेने निङहारैत छलथि आकाश .. सभ दिन चारू दिशामे घूमि कऽ बरखाक आसमे, लिअ आइ बरसि पड़ल ! राति भरि कतेक बरसल नै बुझि पड़ल , मुदा निन एहन पड़लौं जेना काल्हिये बोर्डक परीक्षा खतम भेल ......! भरि गर्मीकेँ निन आँखिमे घुरमैत छल ! भोरे उठि दलानपर बैसि कऽ चाह पिबैत रही.....चन्दन बाबू कान्हपर कोदारि नेने दौगल जाइत छलाह बाध दिस ...... टोकलियनि तँ इशारामे किछु कहि कऽ भागि गेला ..... आन दिन चाहक नामपर बिन बजेन्हो टपकि पड़ैत छलथि .......आइ की भऽ गेलनि! हे यौ, ई चन्दन बाबूकेँ की भऽ गेलनिहेँ, भोरे -भोरे .....- सरजू काका ओम्हरसँ अबैत रहथि, पुछलियनि। हौ बौआ हुनकर खेतक पाइन सभटा बहल जाइत छनि, गेलाहेँ आइर बान्हऽ , ..........ओहो सुआइत.! संझाक बेर बिदा भेलहुँ पोखरि दिस .....लागल, बेंगक अज्ञातवास खतम भऽ गेल .......टर्र.. टर्र ... करैत खत्ताक ओइ पारसँ अइ पार तक ......... सुर ताल देबऽबलाक कमी नै, सभ एकै साथे प्रतियोगितामे ठाढ़ भेल जेना ! सबहक धानक बीया खसि पड़ल .........लुटकुन बाबूक बीया बड़ जोरगर छनि ....हेतै कोना ने, बेचारा ..राति दिन एक कऽ कऽ छाउर आ गोबरसँ खेतकेँ पाटि देने छलखिन! हुनकर खेतो तँ सभसँ पहिने गाममे रोपा जाइत छनि ...! आइयो कादो कऽ कऽ एलैथहेँ .......झौआहमे ..! गमछामे किछु फड़फराइत देखलियनि.....पुछलियनि काका की अछि तौनी मे ......? हौ, खेत मे बड़ माछ छल गमछा सँ माँरलहुँहेँ ! काल्हि निचका बला खेत मे चास देबै, भेज दिहक छोटका केँ, बड़ माछ छै ..ओहू खेत मे ! ठीक छै ......कहलियनि ......! मंगनीक माछ खाइमे बड़ मोन लगै छै मुँहमे पाइन आबि गेल सुनि कऽ! जल्दी अबिहेँ, मशाला पिसबा कऽ रखने रहबौ ..............( छोटका केँ जाइत-जाइत कहलिऐ। ) मिथिला उवाच-२ फलना बाबु मरि गेला बहुत नीक लोक छलाह ..........के कहलक ..........एखने एगो धिया-पुता बजैत जाइ छल जे फलना दिन भोज हेतै ....बाहर निकलहुँ तँ ...हरिबोल - हरिबोल सुनाइ पड़ल .! तूँ ....जेबहक की नै कठियारी ..... हाँ हाँ किएक नै जेबै ! .....जाएब तँ संग कऽ लेब कने - फलना बाबु छी यु कठियारी के हकार दैत छी .........चिलना बाबु नै रहला .........! ओहो.. ओहो ...काल्हिये तँ गप्प भेल छल हुनका संग हमरा पोखरिपर भेटल छलाह .........आहा..हां .. कहियौ...... जन्म मरणक कोनो भरोसा नै होइत छै यौ बाबु ..........ठीके कहैत छिऐे काका .......! लेकिन गेलाह सभटा सुख भोगि कऽ बेटा-पुतौह बड़ निक छनि , खूब सेवा वारी करैत छलनि .........! .हाँ हाँ किएक नै करथिन, कमिये कोन छलनि ....एगो बेटा डाक्टर छनि ...एगो, वन विभागक अधिकारी छनि ........बेटियो सभ सुखी सम्पन्न छनि , सभ काजसँ निश्चिंत भऽ कऽ मरलाहेँ! हँ से तँ सभ अर्थेसँ महादेवक कृपा सन भरल पुरल छथि,....... लेकिन काज राज ढंगसँ करता तखन ने ..........भगवान् कोनो कमी नै देने छनि .........जवार तँ खुएबाक चाही ........हँ तँ से किएक नै.......! चल चल देरी भऽ रहल अछि ..........फेर एबाको अछि ..........पूजा पाठ करबाक अछि ......! राम नाम सत्य है ............! हरी बोल ....हरी बोल .......! कथीक अतेक हल्ला भऽ रहल छै यौ छोटका बाबू ........- भौजी फलना बाबुक स्वर्वास भऽ गेलनि ! ठीक छै अहाँ चलि जाउ कठियारी ....... भैयाक पठा दियौ कने अंगना भोरसं भुखले प्यासल बैसल छथि ....दालानपर ! .................................................................. ! इजोरियो रातिमे टोर्च लऽ कऽ ई के आबि रहल अछि बुरलेल आदमी हौ तखने मुँहपर टोर्च मारलकैन .........काका ......एकाद्सा - दुआद्साक नोत हँकार दैत छी ......पुरख्क दफ्फा ..! आहा ...फलना बाबु ...औ औ बैसू .....! नै काका बड़ काज अछि एखन ...! हाँ अहाँकेँ तँ एखन काजक अंगना अछि बौआ , ........बहिन सभ एलीहेँ की नै? हाँ सभ आबि गेल ......काका छोटकी पुछै छल अहाँक बारेमे .........जे काका जिबिते छथिन ने ..........! हह हहह हा.. हा.. हाँ हाँ ओकरा तँ होइते हेतै , बच्चामे बड़ मारने रहिऐे ने ......! बड़की बहिनकेँ तँ ननकिरबो छऽ ने एकटा ...... हाँ ५ सालक छै ननकिरबा ..........! भगवान् देह समांग दोउ बढ़िया .......बड़ निक ! ठीक छै चली छी काका .! भोजक दिन - कए गो तरकारी छै हौ भाइ .........? सात गो तरकारी छै काका ......! कोन-कोन ? .........आलू- कोबी, भाटा-अदौरी , कदीमा , सजमैन, साग , बड़ ,आ बड़ी , आह बहुत निक .......सबेर सकाल बिझो भऽ जेतै तँ ठीक रहितै ..बेसी रातिमे नै ठीक होइ छै ...धिया पुता सब उन्घा लागै छै ..........हाँ - जाने....... कनेक देख कऽ आब तँ कतऽ तक काज आगाँ बढ़लैए .......! तखने.दूर सं..........! फलना बाबु छी यौ ....बिझो करबैत छी .! हाँ हाँ .........ठीक छै ........! हइ बिझो भेलै ....बिझो भेलै....! हइ छौरी सभ हल्ला नै कर ....! बाबा ......भर्तुआ सुइत रहल ...! हइ जो ने उठा दही ने सांझे सँ हल्ला केने छलअ भोज खाएब भोज खाएब .....जो जल्दी लोटा लऽ कऽ आऽगऽ ..! दू गो लोटा लऽ लिहँ....... हाँ...! यौ एगो आउर पात दिअ ई फाटल अछि ...... हइ छौरी ....पात खेबा की भात .....! जाए दियौ बच्चा छै हइ ले बौआा ...दोसर पात ! हइै भात उठब ने ......! मऽ तोरी गप की करैत छऽ उम्हर एखन धरि पतों नै परसला ....! दाइल लेब दाइल ..! डालना.... डालना....! पाइन ओ एगोटा तँ उठा ला कम सं कम ....की सब तरकारिये परसबऽ!..हरे करिया ..एम्हर आ ..चल पाइन उठा ले तूँ .! हइ हम पैन नै उठाएब .......! हइ बह्निचो पैन पिएला सँ धर्म हेतौ .......उठा ने ! ............. हइै क़ात भऽ कऽ हाथ धोए जाइ जाउ - हइ ई के धिया-पुता अछि ........हइ बिच्चइमे रास्ता पर पाइन हरबै छऽ ...लोक पिछैर कऽ खस्तै एकने चंडाल कही के ...! बहुत नीक .........छल काका भोज , जय जय भऽ गेलै ..! हौ एतबो नै करितै तँ नाक -कान कटब के छलै की ...एतेक सम्पैत कतऽ कऽ रखतै ....समाजमे रहऽ के छै की नै ....! हाँ सेहो छिऐ........देखियौ आब काल्हि की होइएा ....सुनऽ मे आएलऽ जे जवार भऽ रहल अछि पांच गाम नोतात.! आह करबाके चाही .. अहि सं नाम होइत छै ....अपने नाम हेतै ने कोनो हमर थोड़े ने, हाँ .......गामक नाम सेहो हेतै कने ! भोजक २-४ दिन पश्चात ...........! हौ फलना बाबुकेँ राति तबियत ख़राब भऽ गेलै की ....! हल्ला सुनलिऐ काका आइ भोरमे ........ओहो लटकले छथि ..........पाकल आम छथि ....... आब जे दिन जीबैत छथि से दिन ! हाँ .........हमरो जेबाक छलए बंबई लेकिन ई हल्ला सुनलिऐ तँ रुकि गेलहुं ! दू चारि दिन आर रूकि जाइ छी .......कही ओहो ने ...आब कतबो छथि तँ दियादे छथि ने .....चलि जाएब तँ बदनामिये हएत .....! तहि दुआरे रुकिए जाइ ...............! नवेंदु कुमार झा मिथिला आ मैथिली बॅटबाक भऽ रहल साजिश मिथिलांचलक मातृभाषा मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषी सभक उदास रवैयाक कारण आब ऐ भाषा पर संकटक मेघ उभरि रहल अछि। संविधानक अष्टम् अनुसूची मे सम्मिलित प्रदेशक एकमात्र ऐ भाषा केँ कमजोर करबाक साजिश राजनेता आ किछु साहित्यिक विद्वान कऽ रहल छथि। एक दिस बज्जिका तऽ दोसर दिस अंगिकाक नाम पर ऐ भाषा भाषी केँ तोड़बाक साजिश भऽ रहल अछि तँ दोसर दिस सीमांचल आ सुरजापुरी आदिक नारा दऽ मिथिलांचल केँ तोड़बाक प्रयास भऽ रहल अछि। बज्जिका आ अंगिका केँ मैथिलीभाषी स्वीकार कएने छथि मुदा किछु लोक अपन राजनीति आ विद्यता केँ स्थापित करबाक लेल अपन मातृभाषा मैथिलीक विरोध मे ठाढ़ भऽ मिथिला आ मैथिली विरोधक काज आसान कऽ रहल छथि। किछु दिन पहिने मुजफ्फरपुर आ वैशालीक क्षेत्र मे बज्जिकांचल आ बज्जिका भाषाक लऽ कऽ आंदोलन चलल छल जे एखन शांत पड़ल अछि तऽ एखन भागलपुरक क्षेत्रमे अंगिकाक नाम पर आंदोलन चलि रहल अछि। अंगिकाकँे संवैधानिक मान्यताक लऽ कऽ पटनामे सेहो आंदोलनक योजना अछि। दरअसल जहिना भारत केँ अपन देशक लोकसॅ खतरा अछि तहिना मिथिला आ मैथिलीकेँ अपन लोकसॅ खतरा अछि। वर्तमानमे अंगिकाक नाम पर चलि रहल आंदोलनकेँ सेहो मैथिली समर्थक होयबाक दाबा करएबला राज्य सरकारक एक मंत्रीक परोक्ष समर्थन भेटि रहल अछि। मैथिली आ अंगिकाक नामपर मैथिलीभाषीकेँ लड़ा अपन राजनीतिक रोटी सेकऽमे मंत्री लागल छथि। ताज्जूब तऽ ई अछि जे मंत्री जीक ऐ साजिशक बादो हुनकर मिथिला आ मैथिली विरोधी बात केँ लोक ग्रहण करैत छथि। कहल जाइत अछि जे दू कोस पर भाषा बदलि जाइत अछि। ई भाषाक बदली नै होइत अछि अपितु स्थानीय बोलीक रूप भाषाक परिवर्तन होइत अछि। मधुबनीसॅ किशनगंज धरि शिवहरसॅ वैशाली धरि आ बरौनी सॅ मधेपुरा धरि सभ ठामक लोक मैथिली भाषी छथि। अंतर मात्र एतबा अछि जे ऐ भाषाक बोली मे अंतर होइत अछि। ई अंतर तऽ दरभंगा जिलाक समस्तीपुर आ मुजफ्फरपुर जिलाक सटल सीमाक गाम मे सेहो अछि। एकर मतलब ई नै अछि जे ई मैथिली भाषासॅ फराक भाषा अछि। कहल जाइत अछि जे कमजोरहाक कतेको मालिक होइत अछि आ सभ अपना-अपना हिसाब सॅ मलिकौत करैत अछि। ई मिथिला आ मैथिली पर लागू भऽ रहल अछि। अपन विद्वता मे फूलल मैथिलीक विद्वानकेँ भाषाक विखंडनक भऽ रहल साजिशसँ बचैबाक फुर्सत नै छनि। मात्र साहित्य अकादमी आ आन पुरस्कारक लेल वर्ष भरि चिरौरी मे लागल रहल ई विद्वान सभ अपन हित मे मातृभाषाक हित बिसरि रहल छथि। जइ कारण क्षुद्र राजनेता आ तथाकथित विद्वान मिथिला आ मैथिली केँ कमजोर करबाक गहींर साजिश कऽ रहल छथि आ हमरा सभ कानमे तुर धऽ सूतल छी। एक दिस मातृभाषापर हमला तऽ दोसर मातृभाषाक अस्तित्व मिटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। मिथिलांचलक कोसी क्षेत्र मे सीमांचल आ सुरजापुरी कऽ नाम वोटक राजनीतिक लेल मिथ्लिांचलक सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान केँ मेटैबाक साजिश भऽ रहल अछि। आब समय सचेत होयबाक अछि। मातृभाषा आ मातृभूमिक पीठ मे छुरा घोपऽ बला असली चेहरा सोझा आनऽ पड़त नै तऽ मिथिलाक माछ जकां मातृभूमि आ मातृभाषाक अस्तित्व मेटा देल जाएत। अंगिका, बज्जिका, सीमांचल सूरजापुरी आदिक नामपर मिथिलांचल आ मैथिलीक विरूद्ध साजिश हएत तँ रहत ऐतिहासिक मिथिला आ मृदुभाषा मैथिली? ई गवर्नेंस दिस सरकार बढ़ौलक डेग बिहार ई-गर्वनेंस केँ मजगूत करबामे लागल अछि। सरकार प्रदेश मे कम्प्युटरीकरण केँ बढ़ावा दऽ रहल अछि। सरकारक मानौत अछि जे कम्प्युटरीकरणसॅ काजक गति बढ़त आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगबऽ मे सेहो मदति भेटत। ऐ दिशा मे पहिल डेग उठबैत बिहार सरकार सभ पैघ निविदा इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ आमंत्रित करबाक निर्णय लेलक अछि। संगहि सरकार सरकारी कार्यालय केँ पूरा तरहें कम्प्युटरीकृत करबाक निर्णय लेलक अछि। एखन 25 लाख सॅ बेसीक निविदा ई टेनडरिंगक माध्यमसॅ कयल जा रहल अछि। अगिला किछु वर्षमे एकर सीमा घटा कऽ तीन लाख धरि करबाक योजना अछि। ऐसॅ भ्रष्टाचारपर लगाम लगैबा मे तऽ मदति भेटबे करत। ठीकेदार सभ केँ सेहो ई-पेमेन्टक माध्यमसॅ भोगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि। राज्य सरकार आब अपन कार्यालयक सेहो पूरा तरहे कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लैत ऐ दिस तेजी सॅ डेंग उठौलक अछि। एकर अंतर्गत राज्य सरकार अपन कर्मचारी सभ केँ कम्प्युटरक प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहल अछि। सरकारक योजना एकरा प्रशासनक निचला स्तर धरि लऽ जयबाक अछि। पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरसॅ जोड़बाक योजना बनाओल गेल अछि। एकर अंतर्गत आब सभ पंचायतकेँ इलेक्ट्रानिक माध्यमसॅ भुगतान करबाक निर्णय लेल गेल अछि। केन्द्र सरकारसॅ टाका भेटलाक बाद सात दिनक भीतर ई टाका सीधा पंचायतक खातामे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक खाता मे पठा देल जाएत। संगहि सरकार सभ कर्मचारी आ पेंशनधारीक नव डाटाबेस बनैबाक निर्णय लेलक अछि जे अगिला छओ मास मे तैयार भऽ जाएत। एकर बाद हुनक भुगतान खाताक माध्यमसॅ भऽ जाएत। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी जनौलनि अछि जे काजक गति बढ़ाएब आ भ्रष्टाचार पर लगाम लगैबाक लेल सरकार कम्प्युटरीकरणकेँ बढ़ा रहल अछि। ऐ दिस पहिल डेग ई-टेंडरिंगक उठाओल गेल अछि। जल्दीए सभ सरकारी कार्यालयक कम्प्युटरीकरण करबाक निर्णय लेल गेल अछि आ पंचायत सभ केँ सेहो कम्प्युटरीकरणक माध्यम सॅ जोड़बाक निर्णय लेल गेल अछि। ऐ लेल कर्मचारी सभक लेल प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाओल जा रहल अछि। नीतीशक सोंझा मोदीक समर्पण बिहारक उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पीएमक मेटेरियल जना भाजनाक भीतर पीएम इन वेटिंगक परेशानी बढ़ा पार्टीक भीतर नव रणनीतिक संकेत देलनि अछि। भाजपा मे कतेको योग्य नेता छथि। मुदा मोदी के नीतीश कुमार मे पीएम मेटेरियल बुझि पड़ैत अछि तऽ ई कोनो संयोग भाग नहि अछि। राजनीतिक जानकार एकरा पार्टीक भीतर गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीक बढ़ैत प्रभाव के धार के भोथर करबाक मोदी विरोधी खेमाक रणनीति मानैत छथि। सुशील मोदीक एहि बयान बाद पार्टीक वरिष्ठ नेता आ बिहार मे भाजपा-जदयूक सरकार प्रमुख रणनीतिकार अरूण जेटली द्वारा फोन सॅ नीतीश कुमार सॅ भेल गपसप सॅ एहि बात के बल भेटि रहल अछि। हुनक बयान से प्रदेश भाजपा सुरक्षात्मक मुद्रा मे अछि आ कोनो नेता एहि पर खुलिक किछु बजबा पर परहेज कऽ रहल छथि। कि एक तऽ बिहार भाजपा मे सुशील कुमार मोदीक भर्सी सॅ सभ किछु होइतन अछि आ वर्तमान परिस्थिति मे नीतीश कुमारक मार्ग दर्शन पर भाजपाक डेग उठैत अछि। एक तरहे प्रदेश मे भाजपा मोदीक आगा ठेहून रोपने अछि तऽ मोदी नीतीश कुमारक चांगूर मे छथि। मोदी आ नीतीशक एहि कदम ताल सॅ विपक्षी दल के एकरा मुद्दा हाथ लागि गल अछि आ ओ नीतीश कुमार पर निशाना लगा रहल अछि। लोक सभाक चुनाव मे एखन तीन वर्षक समय अछि मुदा जे राजनीतिक परिदृश्य बनि रहल अछि ओहि मे चुनावक संभावना सेहो नजरि आबि रहल अछि तें एखने स ॅप्रधानमंत्रीक पद पर अपन-अपन दावेदारी मजगूत करबाक रणनीति मे राजगक घटक दलक नेता लागि गेल अछि। एहि मे राजगक प्रमुख घटक जदयूक वरिष्ठ नेता नीतीश कुमारक नाम पर लगातार चर्चा सॅ हुनक दावेदारी दिन पर दिन मजगूत भऽ रहल अछि। आब तऽ एक तरहे भाजपाक भीतर सेहो नीतीश कुमारक स्वीकार्यरता धीरे-धीरे बढ़ि रहल अछि। एहि सॅ पहिने भाजपाक मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक वरिष्ठ नेता मोहन भागवत सेहो नीतीश कुमारक प्रसंशा कऽ संघ परिवार हलचल बढ़ा देने छलाह। सुशील कुमार मोदीक बयानक बाद रक्षात्मक भेल भाजपाक नेता सभ ओना तऽ समर्थन आ विरोध सॅ बचि रहल छथि मुदा नीतीश कुमारक काजक प्रशंसा सॅ नहि चुकैत छथि। पार्टी नेताक मानब अछि जे मोदीक बयान नीतीश कुमारक व्यक्तित्वक संदर्भ मे अछि आ केन्द्र सरकारक भ्रष्टाचारक चर्चा सॅ लोक सभक ध्यान हटैबाक लेल एहि मामिला के बिना कोनो कारण हवा देल जा रहल अछि। मुदा एहि बातक कोनो उतर पार्टी नेता लग नहि अछि जे भाजपा मे नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह सन् कुमशल मुख्यमंत्री मे पीएम मेटेरियल मोदी के किएक नहि देखाई पड़ि रहल अछि। मोदी के गंभीर आ परिपक्व नेता मानल जाईत अछि आ हुनक बयान सेहो महत्वपूर्ण होइत अछि। ओ कोनो बयानवीर नहि छथि जे सभ मामिला पर चर्चा मे रहबाक लेल बयानबाजी करैत छथि। तें प्रधानमंत्री पदक संदर्भ मे सुशील मोदीक बयान पैघ राणनीतिक रूप् मे देखल जा रहल अछि। मोदीक बयान पर नीतीश कुमारक प्रतिक्रिया जे ई संयोगमात्र अछि ओहि रणनीति के मजगूत आधार दऽ रहल अछि। प्रदेश मे सक्रिय नीतीश विरोधी उपेन्द्र कुशवाहा प्रधानमंत्रीक दावेदारक रूप् मे नीतीश कुमार के पूरा तरहें खारिज कऽ रहल छथि तऽ राजदक वरिष्ठ नेता अब्दुलबारी सिद्दीकी मानैत छथि जे मोदीक बयान पार्टीक प्रति हुनक निष्ठाक प्रदर्शन आ एक तरहें जदयूक आगा भाजपाक समर्पण मानल जा सकैत अछि। ओना लोक सभाक चुनाव मे देरी अछि आ वर्तमान परिस्थिति मे भाजपा आ कांग्रेस दूनू मध्यावधि चुनाव सॅ बचऽ चाहैत अछि तथापि नीतीश आ सुशीलक कैमेस्ट्रीक मध्य राजनीतिक मैथेमैटिक्स सोझराओल जा रहल अछि। ठंडाक मौसम मे गर्मायत बिहारक राजनीति सितम्बर मास मे मौसम ठंढाएलाक संगहि बिहार मे राजनीतिक पारा गर्म होयत। सŸाारूढ़ जदयूक संगहि विपक्ष दिस सॅ यात्राक दौर प्रारंभ होयत। एक दिस सुशासनक गुणगान करैत प्रदेशवासीक हक आ सम्मानक लेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिकार यात्रा पर निकलताह तऽ प्रदेश मे परिवर्तनक लड़ाईक लेल राष्ट्रीय जनता दलक सुप्रीमो लालू प्रसादक परिवर्तन यात्राक चारिम चरण प्रारंभ होयत। कोइलाक कारिल लागल दाग के छोड़ैबाक लेल कांग्रेस सेहो मैदान मे उतरत। केन्द्र सरकार पर लगातार भऽ रहल हमलाक उतर देबा आ अपन पक्ष राखल आ नीतीश सरकारक असफलता के जनता धरि पहूचैबाक लेल कांग्रेस पोल खोल यात्रा प्रारंभ करत तऽ नीतीश विरोधी आ बिहार नव निर्माण मंच सम्पर्क यात्रा के माध्यम सॅ नीतीश सरकारक सुशासनक हवा निकालत। लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान सेहो जनसम्पर्क यात्राक माध्यम सॅ अपन उपस्थिति दर्ज करा रहल छथि। राजग सरकार के उखाड़ि फेंकबाक संकल्पक संग राजद परिवर्तन यात्राक चारिम चरण 19 सितम्बर सॅ प्रारंभ होयत। एहि दरमियान राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद 19 सितम्बर के बेगूसराय सॅ यात्रा प्रारंभ करताह आ 20 सितम्बर के खगड़िया, 21 सितम्बर के भागलपुर, 22 सितम्बर के मुंगेर आ 23 सितम्बर के लखीसरायक यात्राक क्रम मे जनसभाक माध्यम सॅ नीतीश सरकार पर हमला कऽ बिहार मे परिवर्तनक लेल जनता के सजग करताह। यात्राक दरमियान रात्रि विश्राम सेहो ओहि जिला मे होयत आ भिनसर दलक कार्यकर्ता सॅ भेंट करताह। हुनक यात्रा मे विपक्षक नेता अब्दुलबारी सिद्दीकी, राष्ट्रीय महासचिव रामकृपाल यादव, सांसद जगतानंद, विधान परिषद मे विपक्षक नेता गुलाम गौस, विधानसभा मे पार्टीक मुख्य सचेतक सम्राट चौधरी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आ सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव, आ पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी संग रहताह। दोसर दिस कांग्रेस सेहो अपन हेरायल राजनीतिक जमीनक खोजक लेल अभियान चलाओत। पार्टी द्वारा पहिने के कोइला अवंटन मामिला पर विपक्ष द्वारा संसद के ठप्प करबाक कार्रवाईक उतर देबाक लेल मैदान मे उतरत। कोलगेट कांड पर मचल बबालक पर विपक्ष के उतर देब आ सरकारक पक्ष रखबाक लेल बिहार मे उद्योग आ वाणिज्य राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मैदाम मे उतारत। श्री सिधिया दू दिनक बिहार यात्रा पर सितम्बर के प्रदेशक दौरा कयलनि। एकर बाद कांग्रेस केन्द्रीय योजना सभ मे बिहार मे भऽ रहल भ्रष्टाचारक विरूद्ध पोल खोल राष्ट्रपिता महात्मा गांधीक प्रतिमा पर माल्यार्पणक बाद ई अभियान प्रारंभ होयत। ओहि दिन नरकटियागंज आ रामनगर मे जन सभा आयोजित कयल जायत। 22 सितम्बर के प0 चम्पारणक हरसिद्धी आ मोतीहारी नगर 23 सितम्बर के मुजफ्फरपुरक मोतीपुर आ कुढ़नी आ 24 सितम्बर के बेगूसराय जिला मुख्यालय मे जनसभा आयोजित कयल जयत। मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक विरूद्ध लगातार अभियान चला रहल बिहार नव निर्माण मोर्चा सेहो यात्राक एहि राजनीति मे कूदलक अछि। मोर्चा प्रदेश मे सम्पर्क यात्रा आयोजित करबाक घोषणा कयलक अछि। ई यात्रा 9 सितम्बर सॅ कैमूर जिला सॅ प्रारंभ होयत। कैमूर जिला मे तीन दिन यात्राक बाद ई यात्रा तीन दिन धरि नवादा जिला मे चलत आ 22 से 28 सितम्बर धरि पूर्वी चम्पारण यात्रा होयत। बिहार के विशेष राज्यक दर्जा देबाक लेल जनता दल यू लगातार आंदोलनक माध्यम सॅ केन्द्र पर दबाव बना रहल अछि। एहि मांगक समर्थन मे दल 4 नवम्बर के पटना मे अधिकार रैली आयोजित कऽ रहल अछि। एहि रैली मे समर्थन जुटैबाक लेल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिकार यात्रा पर निकलि रहल छथि। मुख्यमंत्री एहि यात्राक लेल पटना सॅ बेतियाकक लेल 18 सितम्बर के विदा हेताह। हुनक यात्रा औपचारिक रूप सॅ 19 सितम्बर सॅ बेतिया सॅ प्रारंभ होयत। ओ 14 अक्टूबर धरि प्रतिदिन दू जिलाक यात्रा कऽ जन सभा के संबोधित करताह। एहि दरमियान ओ यात्राक लेल सरकारी गाड़ी आ सरकारी अतिथि शालाक उपयोग नहि करताह। दल द्वारा आयोजित यात्रा मे ओ दलक गाड़ी आ दल द्वारा व्यवस्था कयल गेल जगह पर राशि विश्राम करताह। सितम्बरक मास एक दिस मौसम बदललाक संगहि बिहारवासी गर्मी सॅ राहतक सांस लेताह तऽ दोसर दिस बिहारक राजनीति मे गर्माहट आओत। सभ प्रमुख दल आ नेता प्रदेशक यात्रा पर निकलि रहल छथि। ते स्वाभाविक अछि जे सभ जनता के अपना-अपना हिसाब सॅ अपन पक्ष रखताह। जखन राजनीति करबाक अछि तऽ रणनीति बनाएल आवश्यक अछि। ओना एखन लोक सभा आ विधान सभाक चुनाव मे देरी अछि मुदा राजनीतिक रणनीतिक बिना दल आ नेताक कोनो महत्व नहि अछि। अधिकार, परिवर्तन, पोल-खोल आ सम्पर्क सॅ जनता के कतेक प्रभावित कयलक ई तऽ जनादेशक परीक्षाक बादे पता चलत। सम्पर्कक माध्यम सॅ पोल खोलि परिवर्तनक विपक्षक आशाक मध्य अधिकार देयैबाक सŸााधारी दलक संकल्प सॅ जनताक मूल समस्याक कतबा समाधान होयत ई तऽ भविष्यक गर्त से अछि मुदा एहि मास मे जनता के टाइम पास करबाक लेल पूरा अवसर अछि। सŸााक वादा आ विपक्षक इरादाक संग जनता के ठंढाक मौसम मे सिहरनक संग राजनीतिक गर्मी महसूस होएत। 3 अक्टूबर के राष्ट्रपतिक बिहार दौरा दरभंगा सेहो जताह मुखर्जी राष्ट्रपतिक प्रणव मुखर्जीक 3 अक्टूबर के बिहारक दौरा करताह। श्री मुखर्जीक राष्ट्रपति बनलाक बाद पहिल बेर भऽ रहल बिहार यात्राक दरमिया ओ पटनाक संगहि दरभंगा सेहो जयताह। 3 अक्टूबर के राष्ट्रपति विशेष जहाज सॅ दूपहर मे पटना पहूचताह। पटना हवाई अड्डा पर हुनका गार्ड ऑफ ऑनर देल जायत। ओकर बाद ओ बिहार सरकारक कृषि रोड मैपक लोकार्पण श्रीकृष्ण स्मारक भवन मे करताह। श्री मुखर्जीक सम्मान मे मुख्यमंत्री आवास पर भोज आयोजित कएल गेल अछि। एहि मे सम्मिलित भेलाक बाद ओ दरभंगा विदा भऽ जेताह। ओतए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक दीक्षांत समारोह मे भाग लेलाक बाद पटना आपस आबि जयताह आ राजभवन मे रात्रि विश्राम करताह। हुनक सम्मान मे राजभवन मे रात्रि भोज आयोजित कयल गेल अछि। जापान आ कनाडाक दौरा पर जयताह मोदी प्रदेशक वित्त मंत्रीक प्राधिकृत समितिक अध्यक्ष सह प्रदेशक उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदीक नेतृत्व मे एकटा दल 13 सॅ 25 सितम्बर धरि कनाडा आ जापानक टोरंटो, ओटावा, वैनकूवर आ टोकियाक दौरा कऽ वस्तु आ सेवा कर प्रणालीक अध्ययन करत। एहि द लमे 12 प्रदेशक वित्त मंत्री आ 17 प्रदेशक वित्त सचिव आ वाणिज्य कर आयुक्त सम्मिलित रहताह। एहि सॅ पहिने श्री मोदी वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम द्वारा 11-13 सितम्बर धरि चीन मे आयोजित भविष्यक अर्थव्यवस्था विषयक सम्मेलन मे भाग लेताह आ व्याख्यान सेहो देताह। मैथिल ब्रहमण के किनार लगैलक भाजपा कीर्ति कयलनि सोनिया सॅ भेंट कोयला आवंटनाक मामिला मे संसदक मानसून सत्रक हंगामाक मध्य दरभंगाक भाजपा सांसद कीर्ति आजादक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधीक संग भेल भेट सॅ प्रदेश भाजपाक कान ठाढ़ भऽ गेल अछि। श्री आजादक पिता स्व0 भागवत झा आजाद कांग्रेसक सम्मानित नेता छलाह आ प्रदेशक मुख्यमंत्रीक रूप मे सेहो हुनका कांग्रेस अवसर देने छल। कीर्ति आजाद एहि भेटक बाद भने सफाई दऽ रहल होथि मुदा एहि भेटक किछु नहि किछु राजनीतिक चालि मानक जा रहल अछि। ओना ओ समाजवादी पार्टी आ तृणमुल कांगेसक अध्यक्ष सॅ सेहो भेट कएने छलाह। मुदा एहि पर ककरो ध्यान नहि गेल छल। कांग्रेस अध्यक्ष सॅ भेटक बाद हुनक पार्टी बदलबाक चर्चा पर ओ सफाई देलनि जे पार्टी कि किछु नेता हुनक विरूद्ध ई अफवाह पसारि रहल छथि। दरअसल प्रदेशक राजनीति मे कतियाएल मैथिल ब्राहमण नेता अपन अस्तित्व बचैबाक लेल संघर्ष कऽ रहल छथि। राजनीतिक हैसियत कम भेलाक कारण भाजपा सेहो एहि समाजक उपेक्षा कऽ रहल अछि। पूर्व मे कांग्रेस-राजद गठबंधनक बाद ई समाज भाजपाक पक्ष मे गोलबंद भेल आ लोक सभा आ विधान सभाक चुनाव मे राजगक सर्मािन मे आगा आयल। राजगक घटक भाजपाक प्रति मैथिल ब्रहमणक विशेष रूप् झुकाव भेल। मुदा पार्टी एहि समाजक भेटल समर्थन के समाजक मजबुरी बुझि एकर उपेक्षा कऽ रहल अछि तऽ एहि समाजक नेता सेहो आब दबाव बन बऽ लगलाह अछि। भाजपाक प्रति भऽ रहल मोहभंग पर ओकर सहयोगी नजरि गड़ौने अछि आ एहि दिस ओकरा सफलता सेहो भेटल। भाजपा मे उचकद वला नेता मानल जाय वला संजय झा के द लमे सम्मिलित करा पार्टी के झटका सेहो देलक अछि। आब जदयूक नजरि बिहार विधान परिषद्क सभापति ताराकान्त झा दिस अछि। हालहि मे श्री झा द्वारा शिक्षक नियोजनक चलि रहल प्रक्रिया मे मैथिली शिक्षकक नियोजनक मांग उठाओल गेल छल आ एहि दिस सक्रिय भऽ सरकार मैथिली शिक्षकक नियोजन घोषणा कऽ हुनक मिथिलांचल मे अपन पकड़ बनैबाक संकेत देलक अछि। भाजपा जतय ताराकांत झा के सभापति रहैत विधान परिषद्क टिकट सॅ वंचित कयलक ओतहि विधानसभाक उपाध्यक्षक प्रबल दावेदार विजय कुमार मिश्रा आ विनोद नारायण झा के कतिया देलक। हालांकि विनोद नारायण झा के मंत्री स्तरक पदक लालीपॉप दऽ हुनक नाराजगी कम करबाक प्रयास कयलक अछि। बिहार विधानसभाक चुनावक दरमियान भाजपा पहिने टिकटक बॅटवारा मे मैथिल ब्रहमण के कात लगा देलक आ आब सत्ता मे भागीदारीक बाट सेहो रोकि रहल अछि। एहि स्थिति मे समाजक सक्रिय नेता मे असंतोष होयब स्वाभाविक अछि। कीर्ति आजादक सोनिया गांधी सॅ भेल भेट के असंतोषक जड़ि रहल आगिक धुंआं मानल जा सकैत अछि। असल मे राजनीति ताकतक पूछ होइत अछि। ओ चाहे समाजक ताकतओ अथवा अपन व्यक्तिगत ताकत आ हैसियत। सब सॅ पैघ विडम्बना ई अछि जे मैथिल समाज एकजूट भऽ अपन राजनैतिक हैसियत नहि देखबैत अछि। एहि समाज के एकठाम राखब आ बेंक के तराजु पर तौलब बरोबरि अछि। एहि स्थितिक लाभ भाजपा पूरा तरहें उठा रहल अछि। संगठन आ सत्ता दूनू मे मैथिल ब्राहमणक उपेक्षा कऽ आधारविहीन मैथिल ब्राहमण नेता के आगो आनि भाजपा अपन चेहरा बचा रहल अछि। (रिपोर्टमे व्यक्त विचार लेखकक छन्हि।-सम्पादक) बिहार मे निवेशक इच्छा जनौलक रैल बैक्सी देशक प्रसिद्ध दवाई कम्पन रैनबैक्सी लेबोरेट्रीज बिहार मे दवाईक कारखाना लगैबाक योजना बनौलक अछि। कम्पनी ई निवेश जनेरिक दवाई बनैबाक लेल करत। कम्पनी एहि वास्ते सरकार सॅ किछु मदतिक इच्छा जनौलक अछि। कम्पनीक वैश्विक दवाई कारोबारक अध्यक्ष राजीव गुलाटी जनौलनि अछि जे प्रदेश मे पछिला किछु वर्ष मे तेजी सॅ विकास भेल अछि। देशभरि मे तेजी सॅ विकास कऽ रहल बिहार मे पैघ अवसर अछि। ओ कहलनि जे कम्पनी जनेरिटक दवाईक बेसी सॅ बेसी प्रचार-प्रसार करऽ चाहैत अछि। बिहार सरकारक जेनेरिक दवाईक बढ़ावा देबाक प्रयासक नीक परिणाम सोझा आओत। एहि लेल सरकार सॅ जमीन आ बिजली सन जमीनी सुविधाक मदति भेटबाक आशा अछि। प्रदेश मे सुपर स्पेशलिटि अस्पताल पर सरकारक जोरक विषय मे श्री गुलाटी कहलनि जे एखन अस्पतालक लाभ समाजक उच्च वर्गक धरि सीमित रहैत अछि। सरकार के एखन जमीनक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा के बढ़ैबा पर काज करबाक चाही। प्रदेश पैघ आबादी एखनो गरीबी रेखा सॅ नीचा अछि। एहि वर्ग के स्वास्थ्य सेवाक बेसी आवश्यकता अछि। ओ कहलनि जे देश भरि मे एखन गोटेक बीस हजार सॅ बेसी दवाई कम्पनी अछि मुदा देश मे नीक आ सस्त दवाईक पैघ आभाव अछि। एखनो पचास प्रतिशत आबादी धरि दवाई नहि पहूचि रहल अछि। तें राज्य सरकार सभ के एहि दिस डेग उठैबाक चाही। ज्यों बिहार सरकार एहि दिस डेग उठौलक आ कम्पनीक संग काज करबाक लेल तैयार भेल तऽ एहि मे कोनो परेशानी नहि होएत। मधुबनी सहित तीन जगह पर बनत पीपा पूल पथ निर्माण विभाग प्रदेश मे तीन जगह पर नव पीपा पूल बनैबाक निर्णय लेलक अछि। पथ निर्माण मंत्री नंद किशोर यादव जनतब देलनि अछि जे नव पीपा पूल मधुबनी, पटना आ बक्सर जिला मे बनाओल जायत। ओ जनौलनि जे मधुबनी जिलाक मधेपुर प्रखंडक कमला नदी पर पूर्वी धार भीठ भगवानपुर मे आठ सेटक नव पीपा पूल स्वीकृति देल गेल अछि। एहि पूलक निर्माण निर्माण पर 2.66 करोड़ टाका खर्च होयत। एकर सीधा लाभ पचास हजारक आबादी के होयत। ओ जनौलनि जे पटना जिला मे ग्यासपुर (बख्तियारपुर) सॅ काला दियारा घाट पर तीस सेटक पीपा पूलक लेल 8.10 करोड़ टाकाक स्वीकृति देल गेल अछि। पचास हजारक आबादीक लाभ एहि पीपा पूल सॅ होयत। एकर अलावा बक्सर जिलाक ब्रहमपुर प्रखंडक नैनीजोर गाम स्थित बिहार घाट सॅ उतरी दियारा धरि साठि सेटक नव पीपा पूलक लेल 15.62 करोड़ टाका स्वीकृत कयल गेल अछि। एहि सॅ नैनीजोर आ उतर प्रदेशक बलिया आपस मे जुड़ि जायत आ एकर दूरी 75 किलोमीटर सॅ घटि कऽ पांच किलोमीटर भऽ जायत। एहि सॅ उत्तर प्रदेश आ बिहार दूनू क्षेत्रक किसान के लाभ होयत। पंचायत प्रतिनिधि पंचायत के सशक्त आ जवाबदेह बनैबाक लेल पंचायतीराज संस्था सभक निर्वाचित प्रतिनिधि आ ओहि मे कार्यरतकर्मी सभक चारि दिनक प्रशिक्षण कार्यक्रम सभ जिला आ प्रखंड मे अक्टूबर मास पहिल सप्ताह मे होएत। एहि क्रम मे राज्य स्तरीय प्रशिक्षण समारोह 13 सितम्बर के पटना मे होयत जकर उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करताह। पंचायतीराज आ ग्रामीण कार्य मंत्री डाक्टर भीम सिंह जनतब देलनि अछि जे एहि समारोह मे प्रदेशक सभ पंचायत सॅ चूनल गेल 2000 निर्वाचित प्रतिनिधिक कार्यरत कर्मी भाग लेताह। प्रदेश मे शौचालय सॅ वंचित अछि पैघ आबादी देश भरि मे सभ परिवार के शौचालयक सुविधा नहि होयबाक कारण पैघ आबादी एखनो खुजल जगह पर शौच करबाक लेल मजबूर अछि। एहि मे अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रक लोक छथि जिनका बरसात आ बाढ़ि मे विकट स्थितिक सामना करऽ पड़ैत अछि। बिहार मे सेहो स्थिति एहने अछि। एहि ठाम 70 लाख 51 हजार 769 परिवार शौचालयक सुविधा सॅ वंचित छथि। ग्रामीण क्षेत्रक आबादी एहि मे बेसी अछि जे एहि विषम परिस्थितिक सामना करबाक लेल मजबूर छथि। गंगा नदी पर पूलक माध्यम सँ बढ़त कारोबारक चालि प्रदेश मे गंगा नदी पर पूलक कमीक कारण प्रदेश मे कारोबार के गति नहि भेटि रहल अछि। नीतीश कुमारक नेतृत्व बला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार प्रदेशमे विकासक गति देबाक संगहि कारोबारकेँ गति देबाक दिस सेहो डेग उठौलक अछि। कारोबारक एहि समस्याक समाधानक लेल सरकार गंगा नदी पर पूल बनैबा पर विशेष जोर दऽ रहल अछि। एखन गंगा नदी पर तीनटा पूल बनि रहल अछि आ चारिम पूलक लेल सेहो केन्द्र सरकार सॅ अनुमति भेटि गेल अछि। ओ तँ एखन गंगा नदी पर चारिटा पूल अछि जाहि मे पटनाक महात्मा गांधी सेतू आ मोकामाक राजेन्द्र पूल पर बेसी भार रहैत अछि। एक दिस महात्मा गांधी सेतू संरचनात्मक खराबीक कारण मात्र एक लेन चालू अछि जाहि सॅ हरदम पूल पर जाम लागल रहैत अछि। तऽ दोसर दिस राजेन्द्र पूल बेसी पुरान होयबाक कारण बेर-बेर मरम्मतिक लेल बंद करय पड़ैत अछि। एहि स्थिति मे प्रदेशक पूर्वी आ पश्चिमी भागक मध्यक आबाजाही मे परेशानी बढ़ि गेल अछि। सरकार एहि समस्याक जनतब लेलक अछि आ एहि समस्याक समाधानक प्रयास कऽ रहल अछि। गंगा नदीक ऊपर पूल यातायात लोक सुविधा आ कारोबारक लेल आवश्यक अछि तें राज्य सरकार प्रदेश मे नव पूल बनैबाक काज तेजी सॅ चलि रहल अछि। पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव जनतब देलनि जे एखन सरकार गंगा नदी पर दू टा पूल बनैबाक योजना बनौलक अछि। एहि मे एकटा ताजपुर-बख्तियारपुरक मध्य बनाओल जा रहल अछि। ई पूल सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी)क अंतर्गत बनि रहल अछि। चारि लेनक एहि पूल पर गोटेक 1700 करोड़ टाका खर्च होयत। एकर 20-20 प्रतिशत टाका केन्द्र आ राज्य सरकार दऽ रहल अछि तथा 60 प्रतिशत टाका निजी साझेदार कम्पनी लगा रहल अछि। श्री यादव जनौलनि जे महत्वक एकटा योजनाक अंतर्गत ई पूल बनाओल जा रहल अछि। एकर अंतर्गत सरकार प्रदेश के उड़ीसाक पारादीप बन्दरगाह सॅ जोड़बाक योजना बनौलक अछि। एहि परियोजनाक मंजूरिक लेल केन्द्र सरकार सॅ लगातार गपसप चलि रहल अछि। ज्यों एकर मंजूरि भेटि जाईत अछि तऽ ई प्रदेशक लेल महत्वपूर्ण होयत आ कारोबारी गतिविधि मे सेहो तेजी आओत। ओना ताजपुर-बख्तियारपुर पूल वर्ष 2016 धरि बनि कऽ तैयार भऽ जायत। सरकार के पटनाक महात्मा गांधी सेतूक समानान्तर सेहो नव पूल बनैबाक अनुमति केन्द्र सॅ भेटि गेल अछि। पथ निर्माण मंत्री जनौलनि जे सरकार कतेको दिन सॅ एहि पूल के बनैबाक अनुमति केन्द्र सॅ मांगि रहल छल। दरअसल महात्मा गांधी सेतु आब आवश्यकताक पूर्ति करबा मे छोट पड़ि रहल अछि। पटना प्रदेशक आर्थिक गतिविधिक केन्द्र अछि। तें एहि ठाम आधुनिक आ नव पुलक आवश्यकता अछि। केन्द्र सरकार महात्मा गांधी सेतुक समानांतर छह लेन एहि पुलक अनुमति देलक अछि। एहि सॅ प्रदेशक आवश्यकताक पूरा भऽ सकत। एहि सॅ उŸार आ दक्षिण बिहारक मध्य आबा जाही आसान भऽ सकत। संगहि प्रदेश मे संगहि गंगा नदी पर बनल पूल पर बोझ कम होयत। ई पूल लोक निजी साझेदारी (पीपीपी)क आधार पर बनाओल जायत। एहि लेल साझेदारक खोज कयल जा रहल अछि। एकर अलाबा सरकारक नजरि रेलवेक परियोजना पर सहो अछि। दरअसल एखन पटना आ मुंगेर मे दू-दूटा सड़क सह रेल पूल रेलवे द्वारा बनाओल जा रहल अछि। हालांकि रेलवेक खाली खजाना के देखि ई योजना सभ जल्दी पूरा भऽ सकत। एकर भरोसा राज्य सरकार के सेहो नहि अछि। राजधानी पटनाक दीघा आ सोनपुरक परमानन्दपुर मध्य बनि रहल रेल सह सड़क पूलक निर्माण स्थिति रेलवेक वास्तविकता जाहिर कऽ रहल अछि। पछिला दस वर्ष सॅ ई परियोजना चलि रहल अछि आ एखन धरि पूरा नहि भेल अछि। वर्तमान स्थिति केँ देखि संभावित समय सीमा 2015-16 धरि पूरा होयबाक उम्मीद नहि अछि। पथ निर्माण मंत्री जनौलनि जे राज्य सरकार दीघा आ परमानन्दपुरक मध्य बनि रहल रेल सह सड़क पूल के जल्दी पूरा करबाक आग्रह केन्द्र सॅ करता एहि वास्ते राज्य सरकार अन हिस्साक टाका उपलबध करा देलक अछि। महिषीमे आयोजित होयत सांस्कृतिक महोत्सव मिथिलांचल ऐतिहासिक शक्ति पीठ उग्रतारा स्थान मे नवरात्राक अवसर पर उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित कयल जायत। सहरसाक महिषी स्थित उग्रतारा स्थान मे 17 आ 18 अक्टूबर केँ आयोजित एहि दू दिनक महोत्सवक उद्घाटन बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करताह। एहि दरमियान मिथिलांचलक सांस्कृतिक, सामाजिक आ धार्मिक विरासतक महत्व पर विचार-विमर्श होयत आ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा सॅ लोकसभ केँ अवगत कराओल जायत। एहि महोत्सवक लऽ कऽ मिथिलांचल सहित पड़ोसी देश नेपालक तराई वला क्षेत्रक लोक सभ मे उत्साह देखल जा रहल अछि। सर्वसम्मतिसँ सभापति आ उपाध्यक्षक निर्वाचित बिहार विधान मंडलक मॉनसून सत्रक दरमियान बिहार विधान सभाक उपाध्यक्ष आ बिहार विधान परिषद्क सभापतिक चुनाव सम्पन्न भेल। भाजपाक वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंहक विधान परिषद्क सभापति आ एहि दलक अमरेन्द्र प्रताप सिंह विधान सभाक उपाध्यक्षक पद पर सर्वसम्मति सॅ निर्वाचित घोषित भेलाह। दूनू पदक लेल मात्र एक-एकटा नामांकन होयबाक कारण हुनका निर्वाचित घोषित कयल गेल। बिहारमे शिक्षाक लेल मदति करत विश्व बैंक विश्व बैंक बिहार मे गुणात्मक शिक्षाक लेल 1600 करोड़ टाकाक मदति करत। एहि पर सैद्धांतिक रूप सॅ सहमति बनि गेल अछि। शिक्षा मंत्री पी.के. शाही विधान मंडलक मॉनसून सत्रक दरमियान ई जनतब दैत कहलनि जे ई टाका दिसम्बर मास धरि उपलब्ध भऽ जायत। एहि टाका सॅ प्रदेशक प्रशिक्षण संस्थानक आधारभूत संरचना के मजगूत कयल जायत। केन्द्रीय विश्वविद्यालयक लऽ कऽ राज्य आ केन्द्र मे बढ़ि रहल हार बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लऽ कऽ केन्द्र आ राज्य सरकारक मध्य बनल गतिरोध समाप्त नहि भऽ रहल अछि। एक दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोतीहारी मे केन्द्रय विश्वविद्यालयक स्थापित करबा पर अड़ल छथि तऽ दोसर दिस केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल गया मे स्थापित करबा पर जोर दऽ रहल छथि। एहि मामिला मे तीन दिन पहिने मुख्यमंत्री श्री सिब्बल के चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक मांग दोहरौलनि अछि। एहि मध्य जनतब भेटल अछि जे गया मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक लेल केन्द्र सरकार के मंत्रालय जमीन उपलब्ध करा देलक अछि। केन्द्रीय विश्वविद्यालयक कुलपति डाक्टर जनक पाण्डेय एकर पुष्टि करैत कहलनि अछि जे ई सूचना भेटल अछि जे गया मे जमीनक संदर्भ मे मानव संसाधन विकास मंत्रालय आ रक्षा मंत्रालयक मध्य सहमति बनि गेल अछि। उल्लेखनीय अछि जे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक मामिला दू वर्ष सॅ श्री कुमार आ श्री सिब्बलक मध्य चिट्ठी का आदान-प्रदान मे उलझि कऽ रहि गेल अछि। विश्वविद्यालयक स्थापना गया, मोतीहारी आ पटना मे सॅ कोनो जगह पर हो एहि पर एखन धरि कोनो सहमति नहि बनि सकल अछि। हालांकि श्री सिब्बल एहि मामिला पर एखनो राज्य सरकारक संग सामंजस्य स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल छथि। प्रदेश मे उच्च शिक्षक विकासक लेल प्रस्तावित केन्द्रीय विश्वविद्यालयक जगह कऽ लऽ कऽ प्रदेश मे राजनीति सेहो गर्मा रहल अछि। मोतीहारी आ दूनू ठाम विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल आंदोलन चलि रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एहि सॅ पहिने 29 फरवरी 2012 के सेहो श्री सिब्बल के चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालयक स्थापित करबा पर जोर दैत गया मे विश्वविद्यालय स्थापित करबाक विरोध कराने छलाह। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जनतब देने छलाह जे गयाक पायनपुर मे प्रस्तावित जगह ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक केन्द्र अछि जे गयाक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा सॅ 25 किलोमीटर दूरी पर अछि। श्री सिब्बल खेद व्यक्तिक कयलनि जे राज्य सरकार केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल मोतीहारीक अलाबा कोनो विकल्प नहि देलक। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री गया मे विश्वविद्यालयक स्थापनाक प्रस्ताव स्वीकार करबाक अनुरोध करैत कहलनि जे बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक अपन अस्थायी परिसर के बदलबाक दबाब अछि। पहिनहि उचित जगहक खोज मे किछु वर्ष गमा देल गेल अछि। ओ छात्र सभके गुणवतापूर्ण शिक्षा देबाक राष्ट्रीय काज मे सहयोग करबाक अपील कयलनि अछि। श्री सिब्बल बिहारक मुख्यमंत्रीक ओहि शिकायत के निर्मूल जनबैत कहलनि अछि जे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार आ हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेश मे विश्वविद्यालय स्थापित करबा मे एक मापदंड अपनाओल गेल अछि। श्री कुमार शिकायत कयने छलाह जे विभिन्न प्रदेश मे केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लऽ कऽ फराक-फराक मापदंड अपनाओल जा रहल अछि। श्री सिब्बल किछु दिन पहिने मुख्यमंत्री के चिट्ठी लिखि एहि बात पर जोर देने छलाह जे बिहार मे केन्द्रीय विश्वविद्यालय हन ठाम स्थापित कयल जाय जे हवाई मार्ग आ आन यातायात सम्पर्क सॅ जोड़ल रहबाक संगहि वास्तविक आ आधारभूत संरचना सॅ परिपूर्ण हो। मुख्यमंत्री तीन दिन पहिने चिट्ठी लिखि मोतीहारी मे विश्वविद्यालय स्थापित करबा पर जोर दैत कहने छलाह जे मोतीहारी ऐतिहासिक जगह अछि। एहि ठाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधीक स्मरण जुड़ल अछि। ओ स्पष्ट कयलनि अछि जे मोतीहारी केन्द्रीय विश्वविद्यालयक स्थापनाक लेल उपयुक्त जगह अछि आ सरकार सभ तरहे सुविधा आ आधारभूत संरचना उपलब्ध करैबाक लेल तैयार अछि। उत्साहक संग समाप्त शताब्दी समारोह- डा॰ सच्चिदानंद उपेक्षा पर निधन परिषद् भेलाह नाराज। बिहारक स्थापनाक सय वर्ष पूरा होयबाक अवसर पर प्रदेश भरि मे आयोजित कयल गेल बिहार शताब्दी समारोह समाप्त भऽ गेला। तीन दिनक एहि समारोहक दरमियान राजधानी पटना सहित पंचायत स्तर धरि कतेको र्काक्रम सम्पन्न भेल। तीन दिन धरि सम्पूर्ण प्रदेश मे पाबनि बिहार जकां वातावरण बनल रहल। जिला, प्रखंड आ पंचायत सभ मे सेहो सरकारी आ गैर सरकारी स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कयल गेल। राजधानी पटना मे सम्पन्न तीन दिनक समारोह मे विभिन्न क्षेत्रक कतेको नामी गिरामी व्यक्ति भाग लऽ प्रदेशवासीक उत्साह मे सहभागी बनलाह। पटनाक ऐतिहासिक गांधी मैदान मे लोकप्रिय कार्यक्रम आ श्री कृष्ण स्मारक भवन मे शास्त्रीय संगीत समारोहक आनंद लोक सभ उठौलनि। 24 लाख वर्ग फीट मे बनल मुख्य समारोह स्थल पर विभिन्न विभागक स्टॉल पर प्रदेशक विकासक लेल सरकार द्वारा चलाओल जा रहल विकास योजनाक जनतब लोक सभ के देल गेल। बिहारक गौरवपूर्ण इतिहास, विकासक वर्तमान गति आ लोकहित मे सरकार द्वारा प्रदेशक विकासक बनाओल गेल योजनाक प्रदर्शन सेहो कयल गेल। प्रदेश सांस्कृतिक विरासत जनतब सेहो लोक सभ के देल गेल। लेजर शोक माध्यम सॅ प्रदेशक सभ वर्षक यात्राक प्रदर्शन आ छाया चित्रक माध्यम सॅ बिहारक इतिहास आ वर्तमान सामाजिक सांस्कृतिक स्थितिक प्रदर्शन करैत अंजलि सिन्हा, चंदन कुमार, दिनेश दिवाकर आ शैलेन्द्र कुमारक फोटो गैलरी लोक सभक आकर्षण केन्द्र बनल रहला। शताब्दी समारोहक दरमियान गांधी मैदान मे गायक उदित नारायण, ऋचा शर्मा, कैलाश खेर, रब्बानी बंधु, बाबुल सुप्रियोक सुमधुर आवाज पर झुमैत रहलाह तऽ शास्त्रीय संगीत समारोह मे पंडित जसराजा उस्ताद राशिद खान, गुलाम मुस्तफा खान आ अमजद अली खानक गायिकी सॅ भारतीय संगीत जीवंत भऽ रहल। एहि अवसर पर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा द्वारा बिहार पर बनाओल सिनेमाक प्रदर्शन सेहो कयल गेल। गीत-संगीत आ आन मनोरंजक, कार्यक्रमक मध्य एहि अवसर पर आयोजित व्यंजन मेला मे बिहारी भोजन, दही चुड़ा, माछ चुरा, लिट्टी-चोखा, बालुशाही, जलेबी, सतू, लीचीक जूस आदिक संगहि पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात आ दक्षिण भारतीय व्यंजनक मनायोग सॅ स्वाद लेलनि। ओना तऽ ई बिहारक शताब्दी समारोह छल मुदा ई पूरा समारोह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर केन्द्रित छल। समारोह मे भाग लेबऽ वला सभ प्रमुख लोक मुख्यमंत्रीक प्रशंसा करब अपन दायित्व बुझलनि। वर्ष भरि धरि चलल शताब्दी कार्यक्रमक सफलतापूर्वक सम्पन्न भेला पर सरकार राहत सांस लेलक अछि। एहि समारोहक श्रेय मुख्यमंत्रीक देबाऽ मे पूरा सरकारी अमल लागल रहल। समारोहक दरमियान विपक्षक उपेक्षा पर सरकारक सहयोगी भाजपाक विधान पार्षद हरेन्द्र प्रतापक विद्रोही तेवर सेहो सोझा आयल। बिहारक बॅटवारा मे प्रमुख भूमिका के निर्वाह कऽरय वाला सच्चिदानंद सिन्हाक एहि समारोहक दरमियान भेल उपेक्षा पर सरकार के कठघरा मे ठाढ़क देलनि। एहि संदर्भ मे हरेन्द्र प्रताप मुख्यमंत्रीक चिट्ठी सेहो लिखलनि मुदा सरकार दिस सॅ एहि पर कोनो प्रतिक्रिया नहि भेल। समारोह प्रारंभ भेलाक बाद एहि दिस हुनक सक्रियताक बादो सरकार निश्चित रहल। ओना विवाद तऽ राज्य प्रार्थना कऽ लऽ कऽ सेहो उठि रहल अछि। एहि मामिला मे एकटा जनहित याचिका सेहो भाजपाक वरिष्ठ नेता चन्द्र किशोर परासर पटना उच्च न्यायालय मे दायर कयलनि अछि। राज्यगीत मे मिथिलांचलक उपेक्षा पर सेहो सरकार चुप्पी लदने अछि। खैर, समारोहक दरमियान एहि तरहक विवाद समारोहक उत्साह मे दबल रहल। एस एच जीक माध्यम सॅ आगा बढ़त बिहार प्रदेश मे गठित होयत दस लाख एच एच जी बिहार मे महिला आ ग्रामीण क्षेत्रक विकासक लेल स्वयं सहायता समूह (एस एच जी) के मजगूत हथियार बनाओल जा रहल अछि। एहि वास्ते राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशनक अंतर्गत दस लाख स्वयं सहायता समूह गठित कयल जायत। एहि समूह सॅ अगिला दस वर्ष मे गोटेक एक करोड़ महिला सभके जोड़बाक लेल तैयार कार्य योजना के राज्य सरकार मंजूरि दऽ देलक अछि। मिशनक कार्यान्वयनक लेल बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति गठित कयल गेल अछि। ई व्यवस्था गरीबी रेखा सॅ नीचा रहय वाला (बीपीएल) परिवार के आर्थिक रूपें मजगूत करबाक लेल लागू कयल जा रहल अछि। तैयार कार्य योजनाक अंतर्गत जीविका, ग्रामीण विकास विभाग आ महिला विकास निगम द्वारा चलाओल जा रहल एसएचजी एकहि मॉडल पर काज करता मिशनक अंतर्गत चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 सॅ वित्तीय वर्ष 2021-22 धरि प्रति वर्ष एक-एक लाख स्वयं सहायता समूहक गठन कयल जायत। एहि तरहे एहि दस वर्षक दरमियान दस लाख एसएचजीक गठनक समूह मे महिला सभ के स्वरोजगारक वास्ते बैंक सभ सॅ आर्थिक मदति दे आओल जायत। एहि लेल 9200.23 करोड़ टाकाक उपबंध कयल गेल अछि। संगहि समूह द्वारा उत्पादित सभ जिला मे दू-दू टा हाट विकसित कयल जायत। देखबा मे आयल अछि जे महिला सभ एस एच जीक उपयोग गरीबी सॅ लड़बाक हथियारक रूप मे कऽ रहल छथि। केरल आ तमिलनाडू आदि आन प्रदेश सभ मे सेहो एस एच जीक नीक परिणाम सोझा आयल अछि। एहि माध्यम सॅ महिला सभ घरक चेहरा बदलि देलनि अछि। एहि के ध्यान मे राखि बिहार मे सेहो गरीबी उन्मूलन आ महिला सशक्तिकरण के बढ़ाबा देबाक उद्देश्य सॅ पैघ संख्या मे महिला सभके एस एच जी सॅ जोड़ल जायत। उल्लेखनीय अछि जे जीविका, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना आ महिला विकास निगम द्वारा संचालित एस एच जी गरीब महिला सभक आर्थिक उन्नति मे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक अछि। एहि माध्यम सॅ महिला सभ बैक सॅ कर्ज लऽ उत्पादनक काज प्रारंभ कयलक अछि। जाहि सॅ हुनक जीवन खुशहाल भेल अछि। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशनक काज गामक सभ सॅ निर्धन टोला सॅ प्रारंभ होइत अछि। एकर अंतर्गत मात्र समूहक गठन नहि कयल जाईत अछि बल्कि हुनका सभके खेतीक उपज बढ़ायब, श्री विधि सॅ खेती करब, सभ नेता के विद्यालय पढ़ायब आ अपन दस्तखत करबाक लेल प्रेरित कयल जायत। बिहार मे मिशनक क्रियान्वयनक लेल जीविका के नोडल एजेन्सी बनाओल गेल अछि। एहि माध्यम सॅ एस एच जी गठित कयल जायत। संगहि बेरोजगार सभके रोजगारक सृजनक लेल प्रशिक्षित सेहो कयल जायत। आजीविका मिशन मे जीविकाक कतेको प्रारूप के सम्मिलित कयल गेल अछि। मिशनक अंतर्गत जीविका प्रदेशक सभ 534 प्रखंड मे स्वयं सहायता समूह गठित करत। प्रदेश मे जीविकाक प्रारंभ वर्ष 2006 मे 42 प्रखंड मे कयल गेल छल। बाद मे वर्ष 2010 मे कोसी क्षेत्रक 13 प्रखंड मे एकर विस्तार कयल गेल छल। जीविकाक माध्यम सॅ महिला सभ अपन पयर पर ठाढ़ होयत। एहि समूहक माध्यम सॅ महिला सभ मे जागृति आओत आ आधा आबादी अपन हुनक तथा ज्ञानक प्रयोग कऽ बिहार के आगां बढ़ौतीहा जीविकाक मुख्य लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रक अर्थव्यवस्था के मजगूत कऽ बिहार के आगा लऽ जयबाक अछि। जीविकाक प्रबंध निदेशक अरविन्द कुमार चौधरीक कहब छनि जे प्रदेश मे स्वयं सहायता समूह महिला सभक तकदीर बदलि देलक अछि। एस एच जीक माध्यम सॅ बिहार मे नव कहानी लिखल जा रहल अछि। जीविकाक कार्यक्रम महिला सशक्तिकरणक दिशा मे बेसी प्रभावित साबित भेल अछि। आब महिला सभ घर सॅ बाहर निकलि रहल छथि आ दस्तखत कऽ बैकक संग कारोबार सेहो कऽ रहल छथि। जीविकाक अंतर्गत प्रत्येक समूहक सफलताक अपन कहानी अछि। एहि कहानी के मीडिया मे सेहो जगह देबाक आवश्यकता अछि जाहि सॅ ई आन महिलाक लेल प्रेरणाक अस्त्र बनि सकय। बिहार मे गठित उठाओल पैघ डेंग होयत। बिहार सरकार द्वारा चलाओल जा रहल जीविकाक अनुकरण कऽ भारत सरकार एकरा देश भरि मे लागू करबाक निर्णय लेलक अछि आ एकर नाम आजीविका राखल गेल अछि। जीविकाक माध्यम सॅ महिला सभ मे जागृति आओत आ ओ गरीबी सॅ मुक्तिक कारगर हथियारक रूप मे एकर अपनाओत। महिला सभक आर्थिक उन्नति मे एकर महत्वपूर्ण भूमिका होयत। प्रदेश मे ग्रामीण विकास विभाग महिला विकास निगम आ जीविका द्वारा गोटेक एक लाख स्वयं सहायता समूह संचालित कयल जा रहल अछि। गोटेक पचास हजार एस एच जी के बैक सॅ मदति दे आओल गेल अछि। महिला सभ बिना डर समूह सभक संचालन कऽ रहल छथि। राज्य सभा चुनाव-भाजपा जदयू मे उम्मीदवारक भीड़ तऽ राजदक अस्तित्वक संकट प्रदेश मे राज्य सभाक छह सीटक लेल होमय वला मतदानक लेल नामांकन पत्र भरबाक काज प्रारंभ होयबाक संगहि भाजपा आ जदयू मे राजनीतिक गतिविधि मे तेजी आबि गेल अछि। नामांकन पत्र 19 मार्च धरि भरल जायत आ मतदान 30 मार्च के कराओल जायत। विधानसभा मे संख्याक समीकरण राजगक पक्ष मे अछि आ छओ सीट पर भाजपा आ जदयूक कब्जा होयबाक संभावना अछि। पछिला 22 वर्ष मे पहिल बेर राष्ट्रीय जनता दल अपन एकटो उम्मीदवार के उच्च सदन मे पठैबाक स्थिति मे नहि अछि। छह सीट पर भाजपा आ जदयूक मध्य एखन धरि सीटक बॅटवारा पर अंतिम निर्णय नहि भेल अछि। राज्य सभाक एहि द्विवार्षिक चुनाव मे जदयूक चारि आ भाजपाक दू उम्मीदवारक जीत सुनिश्चित अछि मुदा भाजपाक तेसर सीटक दाबा कयला पर जदयू विधान परिषद चुनाव मे बेसी सीट राखि सकैत अछि। हालांकि भाजपा मे उम्मीदवारक बढ़ैत संख्या के देखि भाजपा नेतृत्व तेसर सीटक प्रति एखन धरि कोनो सक्रियता नहि देखौलक अछि आ दू सीटक लेल 16 उम्मीदवारक पैनल केन्द्रीय नेतृत्व के पठा देलक अछि जाहि पर 14-15 मार्च के नव दिल्ली मे पार्टीक केन्द्रीय चुनाव समितिक बैसक मे अंतिम निर्णय लेल जायत। प्रदेश इकाई द्वारा पठाओल गेल नाम मे पार्टी प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद, राष्ट्रीय कार्य समितिक सदस्य आर.के. सिन्हा, प्रदेश महामंत्री मंगल पाण्डेय, पूर्व केन्द्रीय मंत्री मुनीलाल, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल नारायण सिंह, विधान पार्षद गंगा प्रसाद, बालेश्वर सिंह भारती आ किरण घई, मृदुला सिन्हा, बिन्दा प्रसादक नाम प्रमुख अछि। ओना राष्ट्रीय महामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान आ अरूण जेटलीक नामक चर्चा सेहो चलि रहल अछि। हालाकि श्री जेटलीक नाम गुजरात सॅ सेहो चर्चा मे अछि आ झारखंड से निवर्तमान सदस्य एस एस अहलुवालियाक समीकरण झारखंड मे फिर नहि बैसला पर ओ बिहारक बार धऽ नव दिल्ली जा सकैत छथि ओना ज्यो पार्टी दू सीटक लेल अपन उम्मीदवार देलक तऽ रवि शंकर प्रसाद, आर.के. सिन्हा आ धर्मेन्द्र प्रधान मजगूत दावेदार छथि। उम्मीदवारक एहि भड़ मे ज्यो पार्टी के तेसर सीट हाथ लगैत अछि तऽ ओहि स्थिति मे विधान पार्षद संजय झाक मजगूत दावेदारी भऽ सकैत अछि। श्री झाक नाम पर जदयू सेहो सकारात्मक रूख देखा सकैत अछि। दोसर दिस, जदयूक संभावित दावेदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक आशीर्वाद प्राप्त करबाक लेल एड़ी-चोटी लगौने छथि। जदयू उम्मीदवार पर अंतिम मोहर मुख्यमंत्री स्वयं लगौताह। उम्मीदवारक चयन मे जदयूक राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादवक भूमिका औपचारिक भऽ सकैत अछि। विधान परिषद्क भेल चुनाव मे जाहि तरहे जदयू कोनो सदस्य के दोबारा अवसर नहि देलक ज्यों एहि फार्मुला पर राज्य सभाक उम्मीदवार तय भेल तऽ दलक निवर्तमान सदस्यक उम्मीदवारी पर तलवार लटकि सकैत अछि। दलक सूत्र सॅ भेटल जनतबक अनुसार जदयू चारि सीट पर चुनाव लड़बाक तैयारी कयने अछि जाहि लेल कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह, ग्रामीण कार्य मंत्री डा. भीम सिंह, पूर्व मंत्री राम नन्दन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव के सी त्यागी पत्रकार फरजंद अहमद, पूर्व मंत्री रामनाथ ठाकुर, आ शकील अहमद प्रदेश वशिष्ठ नारायण सिंह मजगूत दावेदार छथि। संगहि प्रदेशक आन कतेको नेता एहि मजगूत दावेदारक खेल मे अपन गोटी लाल करबाक जुगत भिड़ा रहल छथि। सूत्र सॅ भेटल जनतबक अनुसार आंध्र प्रदेश सॅ कांग्रेसक पूर्व राज्य सभा सदस्य गिरीश कुमार संघी सेहो संभावनाक द्वार खूजल अछि तऽ निवर्तमान सदस्य महेन्द्र सिंह उर्फ किंग महेन्द्र सेहो उच्च सदन मे अपन स्थान सुरक्षित रखबा मे सफल भऽ सकैत छथि। राज्य सभाक ई द्विवार्षिक चुनाव जदयूक अनिल सहनी, अली अनवर आ महेन्द्र सिंह, भाजपाक रविशंकर प्रसाद आ राजदक राजनीति प्रसाद आ जाबिर हुसैनक कार्यकाल समाप्त होयबाक कारण कराओल जा रहल अछि। राजदक एक वर्ग एहि चुनाव मे राजदक दिस सॅ मजगूत उम्मीदवार देबाक मे अछि मुदा पार्टी नेतृत्व फजीहत सॅ बचबाक लेल एखन धरि मौन अछि। बिहारक औद्योगिक विकास मे बाधा बनि रहल जमीन आ बिजली बिहारक औद्योगिक विकास मे जमीन आ बिजलीक कमी पैद्य समस्या बनि रहल अछि। देशक प्रमुख औद्योगिक संगठन ‘‘फिक्की‘‘ द्वारा हालहि मे जारी कयल गेल रिपोर्ट मे कहल गेल अछि जे कतेको पैघ कंपनी बिहार मे निवेशक प्रति रूचि देखौलक अछि मुदा जमीनक स्तर पर निवेश नहि आयल अछि। गोटेक दू तिहाइ उद्यमी प्रदेशकेँ आकर्षक निवेश स्थलक रूपमे नहि देखि रहल छथि। उद्योगक वर्तमान स्तर मे सेहो बेसी सुधार नहि होयबाक कारण एखनो पैघ संख्या मे उद्यमी सभक लेल कारोबार प्रारंभ करब मुश्किल बुझि पड़ैत अछि। रिपोर्टक अनुसार एकर मुख्य कारण जमीन आ बिजलीक कमी मानल जा रहल अछि। प्रदेश मे औद्योगिक जमीनक कमी अछि आ जे जमीन अछि ओ बहुत महग अछि। संगहि एहि ठाम जमीनक रेकार्ड सेहो बहुत पुरान अछि। जाहि सँ जमीन सँ संबंधित विवाद सेहो बेसी अछि। एहि सभ कारण सँ गोटेक 2.5 करोड़ टाकाक निवेश प्रस्ताव होयबाक बावजूद वास्तविक निवेश कम भेल अछि। फिक्कीक अनुसार प्रदेश मे बुनियादी ढाँचाक अभाव आ सरकारी मशीनरीक कमजोर रूख निवेशक गति कमजोर कऽ रहल अछि। रिपोर्टक अनुसार प्रदेश मे बिजलीक कमी निवेशमे बाधा बनि रहल अछि। प्रदेश मे एखनो आवश्यक बिजलीक 90 प्रतिशत बिजलीक खरीद केन्द्रीय पूल सँ भऽ रहल अछि। प्रदेश मे आवश्यक 5500 मेगावाट बिजलीक मोकाबला मात्र 1800 मेगावाट बिजली भेटि रहल अछि। जाहि सँ विनिर्माण इकाईकेँ बिजली नहि भेटि पाबि रहल अछि। फिक्कीक अनुसार पछिला किछु वर्षमे सड़कक मामिलामे प्रदेशमे प्रगति भेल अछि तथापि ओ कम अछि। उत्तर-बिहार आ दक्षिण बिहारक मध्य आबाजाही एखनो मुश्किल अछि। रेलवे लग सेहो आवश्यकताक मोताबिक रैक उपलब्ध नहि अछि। राष्ट्रीय राजमार्गकेँ चारि लेन आ राज्य राजमार्गकेँ दू लेन करबाक संगहि पूर्णियां, भागलपुर, गया आ डेहरीमे मध्यम दर्जाक हवाइ अड्डा बनायब आवश्यक अछि। विकासक गति मे तेजी अनबाक लेल बुनियादी ढांचाकेँ दुरूस्त करबाक आवश्यकता अछि। प्रदेशमे सत्तारूढ़ नीतीश सरकार अपन पहिल कार्यकालमे औद्योगिक विकासक लेल कतेको प्रयास प्रारंभ कयलक जकर परिणाम दोसर कार्यकालमे अयबाक संभावना अछि। एहि वर्ष प्रदेशमे बिस्कुट, कपड़ा, जूट आ वनस्पतिक इकाइ खुजबाक संभावना अछि। फिक्कीक एहि रिपोर्टक बाद सरकार औद्योगिक विकासक गति देबाक दिस ध्यान केन्द्रित कयलक अछि। उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदीक अनुसार सरकार प्रदेशमे औद्योगिक विकासक गतिमे तेजी अनबाक लेल सभ संभव प्रयास कऽ रहल अछि मुदा सभ समस्याक समाधान एकहि बेर होयब संभव नहि अछि। कतेको ट्रांसमिशन लाइनकेँ बदलल जा रहल अछि। नव बिजली-घर बनेबाक संगहि पुरान बिजली घर सभकेँ पुनर्जीवित कयल जा रहल अछि। राशन कार्डक होयत डिजिटलीकरण फर्जी राशन कार्ड केँ समाप्त करब आ सरकार द्वारा देल जायबला अन्नक बँटवारा सही तरीकासँ करबाक उद्देश्यसँ केन्द्र सरकार राशन कार्डक डिजिटलीकरण करबाक योजना बनौलक अछि। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, कर्नाटक, अरूणाचल प्रदेश, असम, चंडीगढ़, गुजरात, छत्तीसगढ़, मेघालय, पुडुचेरी आ आन्ध्र प्रदेश मे राशन कार्डक डिजिटलीकरणक काज प्रारंभ भऽ गेल अछि मुदा एकरा आगा बढ़ेबाक लेल मदतिक आवश्यकता होयत। एहि मद मे केन्द्र सरकार टाकाक आवंटन अप्रील 2012 सँ करत। केन्द्र मे सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकारक बहुप्रतिक्षीत खाद्य सुरक्षा अधिनियम सेहो अगिला वित्त वर्ष सँ लागू होयबाक संभावना अछि। राशन कार्डक डिजिटलीकरणक मामिला पर खाद्य मंत्रालय 8-9 फरवरी केँ प्रदेश सभक खाद्य आ कृषि मंत्रीक बैसक सेहो करत जाहि सँ एहि पहल केँ आगाँ बढ़ाओल जा सकय। केन्द्रीय खाद्य मंत्री पी. सी. थॉमस जनतब देलनि अछि जे एहि योजना केँ जमीन पर उतरला सँ जन वितरण प्रणालीक अंतर्गत भेटयबला अन्न योग्य लोकक हाथमे भेटि सकत। श्री थॉमस जनतब देलनि जे सरकारक प्रयासक बाद पछिला किछु वर्षमे जन वितरण प्रणालीक अन्न अपात्र लोकक हाथ मे जाय सँ रोकबा मे बहुत हद धरि सफलता भेटल अछि आ ई 40 प्रतिशत सँ 20 प्रतिशत धरि आबि गेल अछि। मुदा वास्तविक लोकक हाथ धरि अन्न पहुँचैबाक लेल एखन आर बहुत किछु करय पड़त। मंत्री सभक दू दिवसीय सम्मेलनकेँ वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आ कृषि मंत्री शरद पवार सेहो संबोधित करताह। खाद्य मंत्री जनौलनि जे फर्जी राशन कार्ड केँ रद्द करबाक लेल चलाओल गेल अभियानक दरमियान गरीबी रेखा सँ नींचा (बी. पी. एल.)क कार्डक संख्या 10.50 करोड़ सँ घटि कऽ 7.6 करोड़ धरि पहुँचि गेल अछि। मिथिलांचल मे माछ उत्पादक भरोसा देलनि मुख्यमंत्री, सौराठ मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मिथिलांचल मे स्थित नदी पोखरिक पैघ संख्याक सदुपयोग कऽ एहि क्षेत्र मे माछ पालन केँ बढ़ाबा देबाक भरोसा देलनि अछि। अपन सेवा यात्राक क्रम मे मधुबनी जिलाक सेवा यात्राक दरमियान श्री कुमार मधुबनी जिलाक सौराठ मे मिथिला चित्रकलाक संस्थान खोलबाक घोषणा करैत कहलनि जे एहि संस्थानकेँ डिम्ड विश्वविद्यालयक दर्जा देल जायत। ओ कहलनि जे मिथिलांचल मे माछ पालनक पैघ संभावना अछि। एहि क्षेत्र मे पैघ संख्या मे नदी आ पोखरि रहबाक कारण माछक उत्पादन पैघ संख्या मे भऽ सकैत अछि जाहि सँ बिहारक आवश्यकता केँ पूरा करबाक संगहि आन प्रदेश मे सेहो बेचल जा सकैत अछि। ओ कहलनि जे मिथिलांचल एकटा समृद्ध संस्कृति, मिथिला चित्रकला, महाकवि विद्यापति नगर आ पुरातात्विक महत्व वाला जगह अछि। मुख्यमंत्री मधुबनीक सेवा यात्राक क्रम मे जिलाक पुरातात्विक जगह बलिराज गढ़क यात्रा करबाक संगहि मिथिला चित्रकला लेल प्रसिद्ध रांटी गाम जा मिथिला चित्रकलाक विश्व प्रसिद्ध कलाकार 90 वर्षीय महासुन्दरी देवी आ आन कलाकार सभ सँ भेट कयलनि संगहि जिलाक बेनीपट्टीक खिरहर गाम पहुँचि जैविक खाद्य उत्पादन करय वाला किसान संजय चौधरीक काज देखलनि आ हुनक प्रशंसा कयलनि। जन आंदोलन सँ होयत कोसीक समस्याक समाधान-मेधा पाटेकर प्रसिद्ध समाज सेवा आ नेशनल एलांयस ऑफ पीपुल्स मूवमेन्टक राष्ट्रीय संयोजक मेधा पाटेकर कहलनि अछि जे कोसी क्षेत्र सँ जखन जन आंदोलन प्रारंभ होयत तखने कोसी क्षेत्रक समस्याक समाधान होयत। बिहारक दौरा पर आयल सुश्री पाटेकर सुपौलक वीरपुर मे जन सभा केँ संबोधित करैत कहलनि जे नर्मदा परियोजना जकाँ कोसीक पीड़ित सभकेँ मोआवजा भेटबाक चाही। कोसी केँ पहिनहि सँ बिहारक शोक कहल जाइत अछि तेँ सरकार केँ एकरा व्यवस्थित करबाक प्रयास करबाक चाही। कोसीक विस्थापित सभक पुनर्वासक दाबा कागजी साबित भऽ रहल अछि। मुख्यमंत्री जे दाबा कऽ रहल छथि ओकर वास्तविक स्थिति किछु आर अछि। मुख्यमंत्री जे दाबा कऽ रहल छथि ओकर वास्तविक स्थिति किछु आर अछि। ओ कोसीक जन समस्याक निपटाराक लेल विश्व बैंक द्वारा 220 करोड़ डालरक कर्जक संदर्भ मे श्वेत पत्र जारी करबाक मांग सेहो कयलनि। सुश्री पाटेकर अपन दौराक क्रममे अररिया जिलाक भजनपुराक दौरा सेहो कयलनि आ एहि ठामक स्थितिक जनतब लेलनि। भजनपुरामे एकटा व्यवसायी द्वारा रस्ता बंद करबाक क्रम मे भेल जन आंदोलन पर पुलिस द्वारा जनता पर बर्बर कारवाई कयल गेल छल। संगहि बिजलीक मांगक लऽ कऽ मुजफ्फरपुरक कांटीमे भेल जन आंदोलनक दरमियान जेल गेल आंदोलनकारीसँ सुश्री पाटेकर सेहो भेँट कयलनि आ कांटी आ भड़वनमे जन सभाकेँ संबोधित कयलाक बाद बिहार विश्वविद्यालयक सीनेट हॉल मे बुद्धिजीवी सभक संग विचार-विमर्श सेहो कयलनि। बिहार सहित पांच प्रदेशकेँ अन्नक खरीद बढ़ैबाक निर्देश अन्नक मामिला मे पिछड़ल प्रदेश सभकेँ केन्द द्वारा निर्देश देल गेल अछि। ओ खाय वाला अन्नक खरीद बढ़ैबाक लेल कार्य योजना बना लैथि जइसॅ प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानूनकेँ देश भरि मे नीक ढंग सॅ लागू कयल जा सकय। ई विशेष निर्देश बिहार सहित पश्चिम बंगाल आ झारखंडक संग पांच प्रदेशकेँ देल गेल अछि। खाद्य मंत्रालय प्रस्तावित कानूनकेँ लागू करबाक लेल खाद्यन्न केँ उपलब्ध होएबाक शंका केँ दूर करबाक लेल गहूम आ चाउरक खरीद बढ़ाबऽ पर ध्यान केन्द्रित करबाक निर्णय लेलक अछि। ऐ योजनाक अंतर्गत प्रति वर्ष 6.1 करोड़ टन अन्न क आवश्यकताक अनुमान अछि। केन्द्रीय खाद्य मंत्री पी.सी. थॉमस बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, जम्मू कश्मीर आ असम केँ चिट्ठी लिखि कहलनि अछि जे ओ अन्नक उपज बढ़ैबाक कार्य योजना बनेबाक संगहि खाद्यन्नक खरीदक स्थिति मे सेहो सुधार करथि। देश 63.5 प्रतिशत आबादी केँ सस्त अन्नक कानूनी अधिकार देबऽ वाला ऐ योजना केँ लागू करबाक जिम्मेवारी खाद्य मंत्रालयक होयत। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक संसदक शीतकालीन सत्र मे लोक सभा मे प्रस्तुत कयल गेल छल जे एखन संसदक स्थायी समितिक सोझाँ अछि। सरकारक ऐ विधेयक केँ बजट सत्र मे पारित करेबाक आ एक जुलाई सॅ लागू करबाक लक्ष्य रखलक अछि। खाद्य मंत्री पांचों प्रदेशकेँ लिखल चिट्ठी मे कहलनि अछि जे एहन प्रदेश सभ केँ विकेन्द्रीकृत असूली प्रणाली केँ अपनैबाक चाही। ऐ प्रणालीक अंतर्गत राज्य सरकार अपन स्वयंक एजेन्सीक माध्यम सॅ अन्नक खरीद करैत अछि मुदा खर्च केन्द्र सरकार वहन करैत अछि। ओ कहलनि अछि जे प्रदेश मे जतेक संभावना अछि ओकर मोकाबला धानक खरीद उत्साहवर्द्धक नै अछि। राज्य पहिनहि सॅ विकेन्द्रीकृत खरीद प्रणालीक अंतर्गत अछि तें ई महत्वपूर्ण अछि जे अन्नक खरीदक लेल सभ आवश्यक उपाय कयल जयबाक चाही। 21 फरवरी सॅ प्रारंभ होयत विधान मंडलक बजट सत्र बिहार विधान मंडलक बजट सत्र 21 फरवरी सॅ प्रारंभ होयत। चारि अप्रील धरि चलय वाला ऐ बजट सत्र मे सदनक 29 बैसक होयत। ई सत्र पैघ होयत आ ऐ मे सदस्य सभकेँ अपन बात रखबाक बेसी अवसर भेटत। ऐपर मंत्री परिषद्क बैसक मे निर्णय होयबाक संभावना अछि। सत्रक दरमियान वर्ष 2012-13क सम्पूर्ण बजट पारित कयल जायत। सूत्रक अनुसार कृषि कैबिनेट केँ अंतिम रूप देबा सॅ पहिने सदन मे चर्चा होयत। ऐसॅ पहिने 2 फरवरी केँ किसान समागम होयत जइ मे प्रदेश भरिक किसान सभ सॅ राय लेल जायत। बजट सत्र मे कृषि क्षेत्रक समस्या आ ओकर समाधानक लेल पक्ष आ विपक्षक सदस्य समग्र रूप सॅ अपन बात सदन मे रखताह। प्रदेश मे बिजलीक संकटक समाधानक लेल सौर ऊर्जा सॅ निजी नलकूप सभकेँ चालू करबाक प्रयास पर सेहो चर्चा होयत। विधान मंडलक बजट सत्र हंगामेदार होयबाक सेहो संभावना अछि। विपक्ष प्रदेशक कानून व्यवस्था सहित बिना बिजली कृषि क्षेत्रक विकासक समस्याक अलाबा धानक न्यूनतम समर्थन मूल्य नै भेटऽ पर सरकार केँ घेरबाक प्रयास करत। मुख्यमंत्रीक स्वागतक तैयारी कऽ रहल छथि रांटी गामवासी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपन सेवा यात्राक पहिल चरणक समाप्ति मिथिलांचलक हृदय स्थली मधुबनीक यात्राक संगहि होयत। श्री कुमार 16 सॅ 19 जनवरी धरि चारि दिनक सेवा यात्रा पर मधुबनी जिला मे रहताह। ऐ क्रम मे ओ मिथिला चित्रकलाक लेल विश्व प्रसिद्ध मधुबनी जिलाक रांटी गामक यात्रा करताह। ऐ दरमियान मुख्यमंत्री जिलाक विभिन्न क्षेत्रक यात्राक विकास योजनाक समीक्षा, जनता दरबार मे जनता सॅ भेट करबाक संगहि कतेको विकास योजनाक उद्घाटन आ शिलान्यास सेहो करताह। नीतीश कुमार रांटी गाम मे मिथिला चित्रकलाक विश्व प्रसिद्ध कलाकार 90 वर्षीय महासुन्दरी देवीक घर जा हुनका सॅ भेट करताह। मुख्यमंत्रीक रांटी गाम अयबाक समाद भेटलाक बाद सम्पूर्ण गामक लोक उत्साहित छथि। भेटल जनतबक अनुसार श्री कुमार 17 जनवरी केँ रांटी पहुँचताह। स्थानीय प्रशासन द्वारा महासुन्दरी देवी केँ मुख्यमंत्रीक आगमनक सूचना देलाक बाद ओ मुख्यमंत्री मैथिल परम्पराक अनुसार स्वागतक तैयारी कऽ रहल छथि। भेटल जनतबक अनुसार मिथिला चित्रकलाक प्रसिद्ध कलाकार हुनक स्वागत मे नास्ताक वास्ते मिथिलाक पारम्परिक भोजन दही चुड़ाक व्यवस्था कऽ रहल छथि हुनक विदाइ धोती, कुर्ता आ पाग दऽ करबाक योजना अछि। महासुन्दरी देवीक पुत्र बी.के. दास जनतब देलनि अछि जे रांटी गाम मिथिला चित्रकला आ सिक्की कलाक लेल विश्व प्रसिद्ध अछि मुदा गाम मे सड़क सुविधा नै अछि। ऐ गामक कलाकार केँ उचित बजार उपलब्ध करायब आ गाम मे सड़क सुविधा उपलब्ध करैबाक आग्रह मुख्यमंत्री सॅ कयल जायत। बढ़ि रहल अछि बालिका शिक्षाक दर प्रदेश मे बालिका शिक्षाकेँ प्रोत्साहित करबाक लेल नीतीश सरकारक पोशाक आ साइकिल योजनाक असरि आब सोझाँ आबि रहल अछि। सरकारक प्रयासक कारण बिहार मे विद्यालय जाय वाला छात्राक संख्या बढ़ल अछि। मैट्रिक आ इन्टरमीडिएटक परीक्षा मे सम्मिलित होमय वाला छात्राक संख्या बढ़ल अछि। वर्ष 2011क मैट्रिक परीक्षा मे कुल 9,31993 परीक्षार्थी सम्मिलित भेल छलाह जइ मे 399470 छात्रा छलीह। वर्ष 2012क मैट्रिक परीक्षाक लेल 1134720 परीक्षार्थी पंजीयन करौलनि अछि जइ मे 502361 छात्रा आ 632359 छात्र छथि। ऐ तरहेँ वर्ष 2011क इंटरमीडिएटक परीक्षा मे कुल 701851 परीक्षार्थी सम्मिलित भेल छलाह जइ मे 283564 छात्रा छलीह। वर्ष 2012क इंटरमीडिएटक परीक्षाक लेल 807726 परीक्षार्थी पंजीयन करौलनि अछि जइ मे 325790 छात्रा आ 481936 छात्र छथि। वर्ष 2011क मैट्रिक परीक्षा मे 532523 आ इंटरमीडिएटक परीक्षा मे 4180287 छात्र सम्मिलित भेल छलाह। एहि मध्य सत्र 2011-12 क मैट्रिक परीक्षाक तैयारी मे बिहार विद्यालय परीक्षा समिति लागि गेल अछि। एहि वर्षक मैट्रिक परीक्षाक लेल 20 जनवरी सॅ फार्म भरबाक काज प्रारंभ होयत आ 30 जनवरी केँ समाप्त भऽ जायत। मैट्रिकक परीक्षा 22 फरवरी सॅ प्रारंभ होयत। बिहार मे सभ वर्ष मनाओल जायत भूकम्प आ बाढ़ि सुरक्षा सप्ताह बिहार मे आब सभ वर्ष भूकम्प आ बाढ़ि सुरक्षा सप्ताह मनाओल जायत। मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक निर्देश पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार ई निर्णय लेलक अछि। 15 जनवरी सॅ भूकम्प सुरक्षा सप्ताह आ जूनक पहिल सप्ताह मे बाढ़ि सुरक्षा सप्ताह आयोजित कयल जायत। भूकम्प सुरक्षा सप्ताहक अंतर्गत 15 जनवरी सॅ प्रदेशक विद्यालय, महाविद्यालय, थाना, पंचायत प्रखंड आ जिला मुख्यालय सभ मे कार्यक्रम आयोजित कऽ ऐ माध्यम सॅ जनता केँ भूकम्प सॅ सुरक्षाक उपायक जनतब देल जायत। उल्लेखनीय अछि जे बिहार मे 15 जनवरी 1934 मे विनाश करय वाला भूकम्प आयल छल जइ मे पैघ तबाही भेल छल। ओइ भूकम्प मे मिथिलांचल क कोसी क्षेत्र सॅ जोड़य वाला कोसी पर बनल निर्मली भपटियाही रेल लाइन ध्वस्त भऽ गेल छल आ मिथिलांचल दू भाग मे बटि गेल छल। केन्द्र मे अटल बिहारी वाजपेयीक शासन काल मे ऐ रेल लाइन केँ चालू करबाक लेल कोसी महासेतुक शिलान्यास कयल गेल छल जे आब बनि कऽ तैयार अछि आ 6 फरवरी केँ एकर उद्घाटन केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री सी.पी. जोशी करताह। सम्पन्न भेल विद्यालयक स्थापना दिवस (मधुबनी) बच्चा दाई उच्च विद्यालय ननौर मधुबनीक चालीसम स्थापना दिवस सह स्वामी विवेकानन्द जयंती हर्षक संग मनाओल गेल। ऐ अवसर पर उपस्थित विद्वतजन विद्यालयक उपलब्धिक चर्चा करैत स्वामी विवेकानन्द केँ स्मरण करैत छात्र युवा सभक आह्वान कयलनि जे ओ स्वामी जीक आदर्श अनुसरण कऽ अपन बाट पर आगाँ बढ़ि अपन विद्यालय आ मातृभूमिक नाम करथि। कार्यक्रमक अध्यक्षता विद्यालयक प्रधानाचार्य भगवान झा कहलनि जखन कि कवि गंगाधर हर्ष मुख्य अतिथिक रूपमे अपन विचार रखलनि। ऐ अवसर पर विद्यालयक छात्र-छात्राक मध्य प्रतियोगिता आयोजित कयल गेल आ ऐमे विजय भेल प्रतिभागी केँ परस्कृत सेहो कयल गेल। कार्यक्रमक संचालन आकाशवाणी पटनाक मैथिली कंपेयर अखिलेश कुमार झा कयलनि। समारोह मे प्रदीप पुष्प आ कवि गंगाधर हर्षक काव्य पाठ सेहो भेल। कार्यक्रम मे प्रो. जयनंद मिश्र, प्रो. बासुकीनाथ झा, हरिनारायण मंडल, सरोजानंद ठाकुर, आकाशवाणी दरभंगा संवाददाता मणिकान्त झा आ कृष्ण मोहन सहित कतेको विद्वान उपस्थित भऽ अपन उद्बोधनक माध्यम सॅ छात्र-छात्रा सभक मार्गदर्शन कयलनि। धन्यवाद ज्ञापन नागेश्वर झा कयलनि। साकेतानन्दजीक मृत्यु कैन्सरसँ २२ दिसम्बर २०११ केँ एक बजे दिनमे पूर्णियाँ मे भऽ गेलन्हि। साकेतानन्दक जीवनी1940-2011 वरिष्ठ कथाकार, गणनायक (कथा-संग्रह) लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित। 1962 सँ सक्रिय । गोड़ेक चालिस-पचास टा कथा, रिपोर्ताज-संस्मरण, यात्रा-विवरण। पहिल मैथिली कथा “ग्लेसियर” 1962मे ‘मिथिलामिहिर’मे प्रकाशित । हिन्दियोमे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । सन 99मे छपल पहिल कथा-संग्रह “गणनायक’ केँ ओही वर्ष ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार। पैघ बान्धसँ अबैबला विपत्तिकेँ रेखांकित करैत, पर्यावरण केँ कथा वस्तु बना कऽ राजकमल प्रकाशन सँ प्रकाशित एवं अत्यंत चर्चित उपन्यास (‘डौकूमेट्री फिक्शन’) “सर्वस्वांत” । आकाशवाणीक राष्ट्रीय कार्यक्रममे प्रसारित दू टा उल्लेखनीय वृत्त रूपक- ‘महानन्दा अभयारण्य’ पर आधारित “जंगल बोलता है” एवं झारखंड क ग्रामीण क्षेत्रक ज्वलंत डाइनक समस्या पर आधारित वृत्तरूपक “नैना जोगन” चर्चित एवं प्रसिद्ध । पत्रकारिताक नाम : बृहस्पति. (2) असली नाम : साकेतानन्द सिंह, पिता : स्व. श्री विजयानन्द सिंह, माता- स्व.श्रीमती राधारमा जी, जन्म : 27 फरवरी 1940 क कुमार गंगानन्द सिंहक तत्कालीन आवास “सचिव_सदन” 5, गिरीन्द्र मोहन रोड, दरभंगा, मृत्यु 22 दिसम्बर 2011 पूर्णियाँमे। शिक्षा: क्रमशः राज स्कूल दरभंगा/ बुनियादी स्कूल श्रीनगर, पूर्णियाँ/ विलियम्स मल्टीलेटरल स्कूल,सुपौल। पश्चात पटना एवं मगध विश्वविद्यालय सँ अंग्रेजी औनर्स आ मैथिलीमे स्नात्कोत्तर। आजीवन आकाशवाणीक चाकरी। आठ राज्यक नौ केन्द्रमे विभिन्न पद पर काज । लटे-पटे 40 वर्षक कार्यकाल। पटना, दरभंगा एवं भागलपुरमे बीसो साल तक मैथिली कार्यक्रमक आयोजन, प्रस्तुतिकरणमे लागल। ओतबे दिन क्रमशः आकाशवाणी पटनाक ग्रामीण कार्यक्रम ‘चौपाल’ आ दरभंगाक ‘गामघर’ कार्यक्रम क मुख्य स्वर “जीवछ भाइ” क रूपमे ख्यात। आकाशवाणी दरभंगाक संस्थापक स्टाफ । मैथिली नाटकक कैकटा ‘लैंडमार्क’ यथा डा.रामदेव झा विरचित दू टा नाटक ‘विद्यापति’ आ ‘हरिशचन्द्र’ ; डा. मणिपद्मक ‘चुहड मल्लक मोछ’ , सल्हेस, दीनाभद्री, विदापत आदि लोक गाथा, लोक-नृत्य सभकेँ लोक गायकक मध्य जा कऽ, मूल वस्तुक ध्वन्यंकन एवं ओकर संपादन आ प्रसारण “गणनायक” कथा-संग्रह क राजस्थानी अनुवाद, राजस्थानी साहित्यक जानल-चीन्हल नाम श्री शंकरसिंह राज पुरोहित एवं हिन्दी अनुवाद ख्यातनामा अनुवादिका श्रीमती प्रतिमा पांडे केलनि। सन 2001मे आकाशवाणी हज़ारीबाग सँ केन्द्र-निदेशक क पद सँ अवकाश प्राप्त केलाक बाद पूर्ण रूपेण मैथिली लेखन, मिथिला क्षेत्रक समस्या सब पर वृत्तचित्र बनेबाक, मैथिलीक किछु नीक कथा सभक फिल्म रूपांतरणक गुनान-धुनानमे लागल रहथि…। श्रद्धांजलि.. पुरस्कारक बजार मे लागि रहल बोली देशक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था साहित्य आकदमी अपन वार्षिक पुरस्कारक घोषणा कऽ देलक मुदा एहि वर्ष सेहो मैथिली भाषा पुरस्कारक घोषणा नहि भेल। एकर कारण ओना तऽ परामर्शदात्री समितिक बैसक नहि होयब जनाओल गेल अछि जे किछु हद धरि सही सेहो अछि मुदा जे चर्चा अछि ओकर मोताबिक एहि बैसक मे संभावित नाम पर सहमति नहि बनि सकल तेॅ एखन एकरा टारि देल गेल अछि। दरअसल भारि-भरकम टाकाक पुरस्कार एहि भाषाक लेल बाधा बनल अछि। संभावित उम्मीदवार सभक नजरि तऽ एहि पर अछिए परामर्शी सभक नजरि सेहो एहि पर लागल रहैत अछि। साहित्यिक क्षेत्र मे भऽ रहल चर्चाक अनुसार मैथिली भाषाक साहित्यक अकादमी पुरस्कारक लेल बजार लागि गेल अछि आ एहि पर कब्जा करबाक लेल बोली लागि रहल अछि। साहित्यक एहि शेयर बाजार मे सूचकांक उतार चढ़ावक मध्य एखन धरि योग्य शेयर पर अपन मोहर लगैबाक प्रति परामर्शी अनिश्चयक स्थिति मे छथि। अकादमीक प्रसादक लेल दरभंगा आ दरभंगा सॅ बारहक दू टा योग्य विद्वान मे होड़ लागल अछि। एक दिस लक्ष्मीक त्यागक बात भऽ रहल अछि तऽ दोसर दिस लक्ष्मी कऽ त्यागक संगहि कुबेरक आह्वान कयल जा रहल अछि। तऽ दोसर दिस पुरस्कारक लाइन मे ठाढ़ एकटा पोथीक मूल लेखक अपन लक्ष्मीक लेल गोहारि कऽ रहल छथि। आश्चर्य ई अछि जे जाहि पोथीक भूमिका लिखबा सॅ दरभंगाक पैघ विद्वान ई कहि आपस कऽ देलनि जे ई पोथी लेखकक अपन लेखनी नहि अछि तथापि ओ ताल ठोकि दावेदारी कऽ लाइन मे अछि। दरअसल मैथिलीक परामर्शी साहित्यक जौहरी छथि। हुनक चमत्कार सँ केओ साहित्यकार भऽ अकादमीक साहित्यिक यात्रा कऽ सकैत छथि। से पुरस्कारक दावेदार सभ सेहो जनैत छथि आ तेँ मैदान मे डटल छथि। मुदा मैदान मे दूटा डटगर दावेदारक कारण एहि बेर परामर्शी सेहो चित भेल छथि। ओ एखन अनिर्णयक स्थिति मे छथि। शायद हुनका एहि बातक आभास अछि जे ई दूनू दावेदार पुरस्कारक कुस्तीक मैदान मे शकि जयताह तऽ हुनक काज आसान भऽ जायत। तेॅ नाम केँ गोपनीय आ राशि पुरस्कारक बाजार खोलि कऽ रखने छथि। जहिना एकटा दाबेदार मैदान मे कमजोर पड़ला आ हुनक सूचकांक खसल कि परामर्शी पुरस्कारक घंटी बजा देताह। आब ककर शेयर ओंघरायल आ ककरा साहित्यक ताज भेटत एहि लेल मैथिली साहित्य प्रेमी केँ एखन धैर्य राखऽ पड़त। साहित्य अकादमी मे सम्मिलित सभ भाषाक पुरस्कारक लेल मापदंड आ ओकर प्रक्रिया तय अछि। वर्षक अंतिम सप्ताह मे प्रायः पुरस्कारक घोषणा कऽ देल जाइत अछि। एहि लेल पोथीक चयनकक प्रक्रिया वर्ष भरि चलैत अछि। सभ भाषा परामर्शदात्री समिति एहि प्रक्रिया केँ समय सीमाक भीतर पूरा करबा मे सक्षम अछि तऽ भला मैथिली परामर्शी सभकेँ एहि मे विलम्ब होयबाक कारण नहि बुझि पड़ैत अछि। एकर कारण ई भऽ सकैत अछि जे या तऽ विद्वान परामर्शी सभक स्तरक पोथी पुरस्कारक लाइन मे नहि रहैत अछि अथवा जे पोथी पुरस्कारक लाइन मे रहैत अछि ओहि स्तरक विद्वान परामर्शी नहि छथि। ई दूनू कारण जँ नहि अछि तऽ भला समय सीमाक भीतर अंतिम निर्णय किएक नहि सोझा अबैत अछि। अकादमी प्रसाद येन-केन-प्रकारेन प्राप्तिक इच्छा मैथिली साहित्य केँ नोकसान पहूचा रहल अछि। मात्र प्रसादक प्राप्तिक वास्ते साहित्य सृजन करब कोनो भाषाक साहित्यक लेल लाभदायक नहि अछि। एहि सॅ साहित्यिक स्तर मे ह्रास होयत। साहित्य समाजक ऐना अछि। जँ स्तरहीन साहित्य सृजन केँ प्रश्रय देल गेल तऽ सामाजिक दशा-दिशा प्रभावित होयत। साहित्य संसार केँ पुरस्कारक बाजार बनायब किन्नहु उचित नहि अछि। पुरस्कार छोट होकि पैघ ओकर चयन प्रक्रियाक सीमाक पालन होयब आवश्यक अछि। अन्यथा कतेको आशंका केँ जन्म दऽ सकैत अछि। जेना एखन मैथिली साहित्य जगत मे व्याप्त अछि। मैथिली साहित्य संसार मे कतेको विद्वान पुरस्कारक चिन्ता कयने बिनू अपनी लेखनीक छाप छोड़ि अपन अमर कृति दऽ विदा भऽ गेलाह। मुदा वर्तमान मैथिली साहित्य जेना पुरस्कारक जाल मे फँसि गेल अछि। हजर टकिया सॅ लखटकिया पुरस्कारक लेल साहित्य सृजनक होड़ लागल अछि। पुरस्कारक बजारवाद मैथिली साहित्य केँ नोकसान पहुँचा रहल अछि। तेॅ पुरस्कारक लालसा छोड़ि साहित्यक स्तर पर ध्यानदेब आवश्यक अछि। पुरस्कार देब विद्वान परामर्शी सभक काज अछि आ जँ हुनका फ्री हैण्ड छोड़ल गेल तऽ संभव अछि जे स्तरीय पोथी केँ सम्मान भेटि सकत। पर्यटक स्थल बनल विस्फी, महिषी पर सेहो अछि नजरि मिथिलांचलक महापुरुष सभक जन्म स्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित करबाक योजना पुरस्कार काज प्रारंभ कऽ देलक अछि। सरकारक योजना महाकवि विद्यापति आ विद्वान तथा दार्शनिक मंडन मिश्रक जन्म स्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित कऽ एहि दिस पर्यटक सभ केँ विशेष रूपे विदेशी पर्यटक केँ आकर्षित करबाक योजना अछि। एहि वास्ते महाकवि विद्यापतिक जनमस्थल राजधानी पटना सॅ 110 किलोमीटर दूर मधुबनी जिलाक विस्फी मे पर्यटक काम्पलेक्स, आडियोटोरियम आ पुस्तकालय बनैबाक योजना केँ पर्यटन विभाग अंतिम रूप देलक अछि जाहि पर 47 लाख टाका खर्च होयत। विभागक सूत्रक अनुसार ई सभ पर करक लेल आधारभूत संरचना उपलब्ध करायब विभागकक प्राथमिकतामे अछि। बिहार राज्य पर्यटन निगम सेहो एहि सभ जगह दिस पर्यटक केँ आकर्षित करबाक लेल प्रयास कऽ रहल अछि। पर्यटन मंत्री सुनील सभ जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थलक रूप मे विकसित करबाक योजना बनौलक। श्री पिन्टु जनौलनि जे विद्यापति देशक प्रख्यात व्यक्ति आ बिहारक गौरव छलाह। हुनक जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थल बनेबाक मांग कतेको दिन सॅ भऽ रहल छल जे आब साकार भऽ रहल अछि जहिना पश्चिम बंगालक पर्यटन विभाग कवि गुरु रविन्द्र नाथ ठाकुर सॅ संबोधित स्थल सभक दिस पर्यटक केँ खींचि आमदनी अर्जित करैत अछि तहिना बिहार पर्यटन अपन योजना बनौलक अछि। एकरा संगहि आठम शताब्दीक प्रख्यात विद्वान आ दार्शनिक मंडल मिश्रक जन्मस्थली दिस विशेष रूप सॅ विदेशी पर्यटक केँ आकर्षित करबाक लेल एहि सॅ संबंधित जनतब पर्यटन विभाग, वेबसाइट पर उपलब्ध कराओल गेल अछि। मंडन मिश्र आदि शंकराार्यक संग सहरसा जिलाक महिषि गाम मे हिन्दू दर्शन गुण दोष पर शास्त्रार्थ मे हारल छलाह। पर्यटन मंत्री जनतब देलनि जे पर्यटक सभ केँ आकर्षित करबाक लेल विभाग सहरसा मे कोसी महोत्सवक आयोजित करैत अछि आ जल्दीए आन कतेको तरहक गतिविधि प्रारंभ कयल जायत। एहि मध्य, मधुबनी मे स्थापित होमय बाला मिथिला चित्र कला संस्थान पर संग्रहालयक लेल 3.10 एकड़ जमीनक व्यवस्था मधुबनी नगर परिषद् द्वारा कऽ लेल गेल अछि। बिहार विधान परिषद्क सभापति ताराकांत झाक कला संस्कृति मंत्री डॉ0 सुखदा पाण्डेय आ पर्यटन मंत्री सुनील कुमार पिन्टुक संग भेल बैसार मे एहि योजनाक स्वीकृति दऽ देल गेल। एहि संस्थानक निर्माण पर गोटेक 6 करोड़ टाका खर्च होएबाक उम्मीद अछि। ताराकांत झा जनतब देलनि अछि जे एहि संस्थान मे मिथिला चित्रकलाक एक वर्षीय डिप्लोमा आ दू वर्षीय डिग्रीक पाठ्यक्रम पढ़ाई प्रशिक्षण प्रारंभ होयत। परिसर मे निदेशक आ शिक्षक सभक नियुक्ति कयल जायत। एहि संस्थानक भवन निर्माणक लेल विशेष परियोजना प्रतिवेदन तैयार कयल जा रहल अछि। अन्धरा ठाढ़ी मे बनत स्मारक, सरकार केँ याद अयलनि वाचस्पति मिश्र बिहारक शताब्दी वर्षक अवसर पर चुनल गेल बिहार गौरव गीत मे मिथिलाक उपेक्षाक भरपाइ करबा मे नीतीश सरकार लागि गेल अछि। मिथिलावासीक आक्रोश केँ दबबऽ लेल पहिने जानकी नवमी छुट्टी पर मोहर लगौलाक बाद मधुबनी मे चित्रकला संस्थान खोलब, महाकवि विद्यापति आ मंडल मिश्रक जन्मस्थली केँ पर्यटन स्थल बनैबाक योजनाके मूर्त रूप दऽ अपना आप केँ पैघ मैथिल हितैषी होएबाक लेल बेचैन अछि आ आब नवम् शताब्दीक संस्कृत प्रख्यात विद्वान पंडित वाचस्पति मिश्रक जन्म स्थली मधुबनी जिलाक अन्धराठाढ़ी मे स्मारक बनैबाक घोषणा कयलक अछि। भामतीक लेखक पंडित मिश्रक स्मारक स्थल लग एकटा पर्यटक काम्पलेक्स आ पुस्तकालय सेहो बनाओल जायत। एहि वास्ते ग्रामीण सभ दू एकड़ सॅ बेसी जमीन उपलब्ध करौलनि अछि। एहि क्षेत्र क सौंदर्यींकरण सेहो कयल जायत। जाहि पर 37 लाख टाका खर्च होयत संगहि गाम मे स्थित म्यूजियमक आधुनिकीकरण पर दू लाख टाका खर्च कयल जायत। साहित्यिक जौहरी छथि अकादमीक मैथिली परामर्शी साहित्य अकादमीक महिला लेखिका सभक शीतकालीन दक्षिण भारतक मात्रा समाप्त भऽ गेल अछि। एहि यात्रा मे मैथिली साहित्यक परामर्श दात्री समिति जहि तरह महिला मैथिली लेखिका सभ चयन कयने छल एहि सॅ तऽ परामर्शदात्री सभक विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगायब आवश्यक बुझि पड़ैत अछि। मैथिली साहित्यक संग जाहि तरहे अपना आप केँ विद्वान कहय वाला परामर्शी मजाक कऽ रहल छथि ओहि सॅ साहित्यक गरिमा कम भऽ रहल अछि। एकर प्रभाव सभक सोझा अछि। आम मैथिल जन अपन भाषा सॅ दूर भऽ रहल छथि। आ अपना घर-परिवार मे मैथिली छोड़ि आन भाषाक बेधड़क प्रयोग करय वाला सभ साहित्य अकादमीक यात्राक आनन्द उठा रहल छथि। वर्तमान मे सम्पन्न मैथिली लेखिकाक शीत यात्रा मे जाहि तरहे मानवाधिकारक सहधर्मी केँ महिला मैथिली साहित्यकारक सहकर्मी बनाओल गेल एहि सॅ मैथिली साहित्यक परामर्शी सभक साहित्यिक दिवालियापन सोझा आबि गेल अछि। ई एहि बातक संकेत करैत अछि जे मैथिली भाषाक मे बढ़ैत अवसर मे चाटुकारिताक अवसर सेहो बढ़ि रहल अछि। प्रदेश मे महिला सशक्तिकरणक चलि रहल अभियानक क्रम मे मिथिलाक प्रतिनिधि सामाजिक सांस्कृतिक संस्था मे मैथिल महिला केँ स्थान देबाक नाम पर सक्रियता देल गेल आ आब एहि अधिकारक उपयोग मैथिल साहित्यक सहकर्मी बनैबाक लेल करब कतेक उचित अछि एकर निर्णय तऽ विद्वान साहित्यकार लोकनि करताह। एहि यात्राक क्रम मे आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी मे गोटेक 30टा महिला अपन आलेख पढ़लनि। मुदा किछु एहनो मैथिल महिला साहित्यकार छलीह जे अपन परमेश्वरक कयल परिश्रमक वाचन करबा मे थकमकाइत छलीह। खैर कोनो बात नहि देशक सभ तरहक संस्था सुख-सुविधाक उपयोगक लेल बनल अछि। जँ साहित्य अकादमीक एहि सुख-विलासक अनुभव मैथिली परामर्शी किछु मैथिलीक महिला साहित्यकारक करौलनि तऽ एहि मे हर्जे कोन। आखिर किछु साहित्यकारक खुट्टा मजगूत छनि आ परामर्शी सभक परामर्शक अवधि समाप्त भेलाक बाद ई परामर्शी सभक ओहि खूटा मे बन्हि पाउज करबाक जोगार भऽ सकैत अछि। ई परामर्शी सभ कतेको जागरूक छथि एकर प्रमाण सोझा अछि। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पोथी विद्यापति जकर लेखक रमानाथ झा छथि। ओकर हिन्दी अनुवाद बजार मे उपलब्ध अछि जकर मुख्य पृष्ठ पर लेखकक नाम रामनाथ झा लिखल अछि। एहि विद्वान सभकेँ एहि बातक कोनो चिन्ता नहि अछि। अकादमी सँ एहि पोथीक मुख्य पृष्ठ बदलबाक लेल शायद एखन धरि कोनो प्रयास नहि कयलनि अछि। मुदा मैथिली महिला साहित्यकारक चयन ओ जौहरी जकाँ कयलनि। मुदा प्रकाशित पोथी मे गड़बड़ी भेल तऽ कोनो चिन्ताक बात नहि अछि। वर्तमान मशीनी युग मे सय प्रतिशत शुद्धताक गारंटी तऽ हॉलमार्क गहना मे सेहो नहि अछि तऽ भला साहित्यकार आ पोथीक चयन मे शुद्धताक कोन गारंटी। ओना मैथिली साहित्यकारक ई परामर्शी दल एहि सॅ पहिने मैथिली युवा साहित्यकारक यात्राक नाम पर सेहो अपन जादुगरी देखा चुकल छथि। जँ परामर्शी अपन जादू नहि देखौताह तऽ दर्शक साहित्यकारक भीड़ कोना जुटत। खैर एहि यात्राक दरमियान पुरस्कारक सीजन सेहो अंतिम चरण मे छल मुदा एक बेर फेर साहित्य अकादमी मे मैथिलीक नाम रौशन भेल। मिथिलांचलक ठंडा सॅ दूर दक्षिण प्रदेशक शीत यात्रा पर मैथिली महिला साहित्यकारक संग परामर्शी दल सेहो रहल होयत मुदा विशेषज्ञ सभक फराक फराक रायक कारण परामर्शीक चकरा गेलाह आ पुरस्कारक लॉलीपापक कवर केँ नहि खोललनि। शताब्दी वर्ष मे प्रकाशित होयत सय पोथी बिहारक स्थापना शताब्दी वर्ष पर शिक्षा विभाग “सय वर्ष सय पोथी” नामक योजना बनौलक अछि। एहि योजनाक अंतर्गत विभाग नेना सभक लेल सय टा पोथी प्रकाशित करत। नेना सभ पर केन्द्रित एहि पोथी मे नेना सभ दुनियाँ, सामाजिक योद्धा आ नदी सॅ संबंधित रोचक कथा रहत। सभ कथा तीन सॅ चारि सय शब्द मे रहत। एहि वास्ते एकटा कार्यशाला सम्पन्न भेल जाहि मे नेना सभक लेल सृजनात्मक लेखन करय वाला सरकारी शिक्षक, स्वतंत्र बाल लेखक आ चित्रकार सहित 45 प्रतिभागी भाग लेलनि। एहि कार्यशाला मे प्रतिभागी सभ नव पाण्डुलिपिक रचना कयलनि अछि। संगहि विशिष्ठ लोकसभ सॅ सेहो कथा लिखैबाक योजना अछि। एहि सभ पोथीक लोकार्पण अगिला वर्ष बिहारक स्थापना दिवस पर आयोजित शताब्दी समारोह मे कयल जायत। एहि मध्य शताब्दी समारोहक नव प्रतीक चिन्ह जारी कयल गेल अछि जकर लोकार्पण शिक्षा मंत्री पी के शाही कयलनि। ई प्रतीक चिन्ह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयक छात्र अपूर्व सुशांत निःशुल्क तैयार कयलनि अछि। विधान परिषद्क शताब्दी वर्षक अवसर पर आयोजित होयत विशेष बैसक। बिहार विधान परिषद्क स्थापनाक शताब्दी वर्षक अवसर पर अगिला वर्ष विशेष सत्र आयोजित कयल जायत। 20 जनवरी 2012 केँ एक दिवसीय विशेष सत्र पटना कॉलेज मे आयोजित कयल जायत। 20 जनवरी 1913 केँ विधान परिषद्क पहिल सत्र पटना कॉलेज मे सम्पन्न भेल छल। सर वाल्टर मोरेक सभापतित्वक पहिल सत्र मे पांच बैसक भेल छल। एहि विशेष बैसक मे भाग लेबाक लेल सभापति ताराकांत झा बग्घी पर सवार भऽ बैसक स्थल पर जयताह। एहि मे परिषद्क सदस्यक संगहि पूर्व सदस्य केँ सेहो आमंत्रित कयल गेल अछि। बैसकक अवसर पर प्रसिद्ध गायक छज्जु लाल मिश्रक गायन सेहो होयत। परिषद्क गठन इंडियन काउंसिल एक्ट (1861 आ 1909) क अन्तर्गत एकरा गर्वर्मेंट ऑफ बिहार-उड़ीसाक लेफ्टिनेंट गवर्नरक परिषद् कहल जाइत छल। 17 फरवरी 1921 केँ बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् गठित कयल गेल छल। खादी संस्थाक विकासक लेल सरकार बनौलक योजना। बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकास बिहार मे खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक विकासक लेल उद्योग विभाग 57 करोड़ टाकाक विकास योजना बनौलक अछि। एहि योजनाक माध्यम सॅ प्रदेशक 85 खादी ग्रामोद्योग संस्थाक विकास मे मदति देल जायत। ई प्रस्ताव बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संस्थाक विकास मे मदति देल जायत। ई प्रस्ताव बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड सरकार केँ देने छल। ई टाका अगिला मास खादी संस्था सभकेँ उपलब्ध करा देल जायत। बोर्ड अपन स्तर सॅ संस्थाक चयन कऽ ओकर विकास पर टाका खर्च करत। सरकार खादी ग्रामोद्योग संस्था मे अत्याधुनिक तकनीकक उपयोग पर जोर दऽ रहल अछि। विकास योजनाक अंतर्गत 14 हजार बुनकर केँ रोजगार देबाक प्रावधान कयल गेल अछि। बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्डक अध्यक्ष त्रिपुरारी शरण विकास योजनाक स्वीकृतिक पुष्टि करैत जनतब देलनि अछि जे विभाग द्वारा उपलब्ध कराओल गेल टाका सॅ अति आधुनिक मॉडल चरखाक खरीद कयल जायत। सरकारक योजनानुसार खादीक क्षेत्र मे अति आधुनिक तकनीकिक उपयोग सॅ खादी ग्रामोद्योग संस्था सभक तेजी सॅ विकास होयत। एहि सॅ खादी संस्था सँ जुड़ल लोक सभक सेहो आर्थिक विकास होयत आ हुनक परिवारक जीवन स्तर मे सेहो सुधार होयत। बिहार सरकार जानकी नवमीकेँ अवकाशक घोषणा केलक। बिहार गीतमे मिथिलाक अवहेलनाक लेल आलोचनाक ई एकटा क्षतिपूर्तिक प्रयासक रूपमे देखल जा रहल अछि। बिहारक कैबिनेट २०१२ क कैलेण्डरकेँ मंजूरी देल अछि। अगिला साल ३० अप्रैल २०१२ केँ सोम दिन मिथिला पंचागक हिसाबेँ जानकी नवमी अछि, ३० अप्रैल २०१२ केँ रहत छुट्टी । उद्यमी सभकेँ स्वयं कर्ज देत सरकार - जीवित होयत वित्त निगम प्रदेशक उद्यमी सभके कर्ज देबाक प्रति बैंक सभक उदासीनताकेँ देखैत बिहार सरकार स्वयं कर्ज देबाक निर्णय लेलक अछि। एहि वास्ते सरकार बिहार राज्य वित्त निगमकेँ मजगूत कऽ अपन क्षमता बढ़ाओत। वित्त निगम अगिला वर्षसॅ काज करय लागत। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी जनतब देलनि अछि जे अव्यवस्थाक कारण पछिला 25 वर्ष सॅ निगम मरन्नासन हाल मे छल। एकरा फेर सॅ सक्रिय करबाक प्रयास प्रारम्भ कऽ देल गेल अछि। सरकार एकर सभ कर्जक भुगतान कऽ देत। श्री मोदीक आ अगिला वित्तीय वर्ष सॅ ई निगम उद्यमी सभकेँ कर्ज देब प्रारंभ कऽ देत। श्री मोदीक मोताबिक पछिला किछु वर्षसॅ बैंक सभ प्रदेश मे कर्ज देबाक गति बढ़ौल अछि मुदा एखनो ई संतोषजनक नहि अछि। तें सरकार स्वयं अपन क्षमता बढ़ैबाक निर्णय लैत वित्त निगमकेँ फेर सॅ चालू करय जा रहल अछि। उपमुख्यमंत्रीक अनुसार सरकारक मुख्य जोर प्रदेश मे मध्यम आ छोट उद्योगक विकास पर अछि। जतेक तेजी सॅ एहि श्रेणीक उद्योगक विकास होयत ओतबा तेजी सॅ प्रदेशक विकास होयत आ रोजगारक अवसर सेहो बढ़त। असल मे एहि तरहक उद्योग मे श्रमक बेसी सॅ बेसी उपयोग होइत अछि तें रोजगार सेहो बेसी लोककेँ भेटबाक संभावना रहैत अछि। उद्योग विभाग सचिव सी.के. मिश्रा जनौलनि अछि जे प्रदेश मे वर्तमान मे 19 लाख मध्यम आ छोट उद्योग अछि जाहि मे सॅ आधा बन्द अछि। बंद आ बिमार उद्योगक सोझा सभ सॅ पैघ समस्या कर्जक अछि। बैंक एहि मामिला मे सरकारक बेसी मदति नहि कऽ रहल अछि तें सरकारकेँ स्वयं अपन क्षमता बढ़ाएब आवश्यक अछि। 15 जनवरी केँ कोसी महासेतूक उद्घाटनक संभावना - एक होयत मिथिलांचल, मजगूत होयत संबंध कतेको वर्ष सॅ दू भाग मे बॅटल मिथिलांचल आब जल्दीए एक भऽ जायत। अगिला वर्ष मे दूनू भाग केँ एक होयबाक समाद सॅ सम्पूर्ण मिथिलांचल मे खुशीक लहरि पसरल अछि। सूत्र सॅ भेटल जनतबक अनुसार कोसी नदी पर निर्मली आ भपटियाहीक मध्य कोसी महासेतू बनि कऽ तैयार भऽ गेल अछि आ एकर उद्घाटन 15 जनवरी 2012 केँ होयबाक संभावना अछि। एहि महासेतूक उद्घाटन प्रधान मंत्रीक हाथे करैबाक प्रयास कयल जा रहल अछि। कोसी नदी पर बनल रेल पूल वर्ष 1934 मे आयल भूकम्प सँ ध्वस्त भऽ गेल छल आ मिथिलांचल दू भाग मे बटि गेल छल। दरभंगा आ मधुबनी सॅ कोसी क्षेत्र जायब दुरूह भऽ गेल छल। वर्ष 2000 मे केन्द्र मे अटल बिहारी वाजपेयीक नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार नीतीश कुमारक रेलमंत्रीत्व काल मे एहि ठाम रेल सह सड़क पूल बनैबाक काजक शिलान्यास अटल बिहारी वाजपेयीक हाथे भेल छल। नीतीश कुमारक मुख्यमंत्रीत्व मे ई साकार रूप लऽ लेलक अछि जल्दीए एहि महासेतू पर आवाजाही प्रारम्भ भऽ जायत। एहि महासेतूक चालू भेलाक निर्मली सॅ सुपौलक दूरी मात्र आधा घंटा मे तय कयल जा सकत। दरभंगा आ मधुबनी सॅ पूर्णिया पहूँचब सेहो आसान भऽ जायत आ एकर दूरी वर्तमान मे गोटेक 237 किलोमीटर सॅ घटि कऽ 142 किलोमीटर भऽ जायत। एहि सॅ मिथिलांचल एक सूत्र मे जूड़ि जायत आ बंद भेल वियाह-दानक प्रक्रिया एक बेर फेर सॅ प्रारंभ होयत। एकर गोटेक ऊंचाई 12 मीटर अछि। एकर निर्माण गेमन इंडिया कयलक अछि। एहि महासेतूक 17 वर्ष धरि रख रखाबक जिम्मेवारी सेहो निर्माण करय वाला कम्पनी पर अछि। मिथिलांचल एकीकरणक एहि क्षणकेँ यादगार बनैबाक लेल मिथिलावासी उत्साह सॅ लागल छथि। मिथिलांचलक आन क्षेत्र सॅ कोसी क्षेत्र मे वियाह-दानक कम भेल गति मे तेजी अनबाक लेल प्रतीक स्वरूप उद्घाटनक दिन उद्घाटन स्थल पर एगारहटा वर-कन्याक सामुहिक विआह योजना सेहो बनल अछि। पटनाक प्रमुख मैथिल समाज सेवी धीरू जी उद्घाटनक अवसर पर एगारहटा जोड़ाक विवाह करैबाक घोषणा कयलनि अछि। एहि लेल मधुबनी आ दरभंगा जिला आ कोसी क्षेत्रक इच्छुक वरागत आ कन्यागत केँ आमंत्रित कयलनि अछि। एहि दिस हुनका सफलता सेहो भेटल अछि। किछु वरागत आ कन्यागत एहि पर अपन सहमति सेहो देलनि अछि जे कोसी क्षेत्र आ दरभंगा-मधुबनी जिलाक छथि। प्रतीकक रूप मे कयल जा रहल एहि आयोजन सॅ एक बेर फेर मिथिलांचलक मे संबंधक क्षेत्र बढ़त आ कोसीक घाट सॅ बटल दिल फेर सॅ एक होयत। 20-21 दिसम्बर केँ होयत शिक्षक पात्रता परीक्षा, बढ़ि रहल प्रवेश पत्र प्रदेश मे शिक्षक पात्रता परीक्षा 20 आ 21 दिसम्बर केँ जिला आ अनुमंडल मुख्यालयक 1380 परीक्षा केन्द्र मे आयोजित कयल जायत। एहि परीक्षा मे गोटेक 28 लाख परीक्षार्थी सम्मिलित होयताह। एहि परीक्षाक लेल प्रवेश पत्र बँटबाक काज चलि रहल अछि। आवेदन पत्र गलती भरलाक कारण दू लाखसॅ बेसी आवेदन पत्र विभिन्न कारण रद्द कऽ देल गेल छल जाहिसॅ आवेदक सभक आक्रोश सोझाँ आबि रहल छल। आवेदक सभक एहि आक्रोश पर तत्काल डेग उठबैत सरकार आवेदन रद्द भेल उम्मीदवार सभकेँ राहत दैत सभ आवेदक केँ परीक्षा मे सम्मिलित करैबाक निर्णय लेलक अछि। शिक्षा मंत्री पी.के. शाही घोषणा कयलनि अछि जे जाहि आवेदकक आवेदन रद्द कऽ देल गेल अछि हुनका सेहो परीक्षा मे बैसबाक अवसर देल जायत। सरकारक एहि निर्णय सॅ आवेदन रद्द भेल उम्मीदवारक शिक्षक बनबाक बाट खूजि गेल अछि। विधानमंडलक शीतकालीन सत्र समाप्त, पास भेल कतेको विधेयक मधुबनी मे खुजत मिथिला चित्रकला संस्थान सह संग्रहालय बिहार विधानमंडलक शीतकालीन सत्र समाप्त भऽ गेल। 2 दिसम्बर सॅ 9 दिसम्बर धरि चल एहि सत्रक दरमियान बिहार विधान सभा आ बिहार विधान परिषद्क पांच-पांच बैसक भेल। सत्रक दरमियान सरकार कतेको महत्वपूर्ण काजक निपटाराक संगहि कतेको महत्वपूर्ण विधेयक पास करौलक। ऐतिहासिक बिहार लोकायुक्त विधेयक पर सदन सेहो अपन मोहर लगौलक। सदन मे सत्तारूढ़ दलक अपार बहुमतक मध्य विपक्ष धानक खरीद आ चारा घोटाला मे मुख्यमंत्रीक भूमिकाक लऽकऽ सदन केँ गर्म रखबाक प्रयास कऽ अपन उपस्थितिक दर्ज करैबाक प्रयास कयलक। छोट सत्रक बावजूद एहि सत्र मे लोकायुक्त विधेयकक अलावा बिहार भूमि दाखिल खारिज विधेयक, बिहार अपार्टमेट स्वामित्व (संशोधन) विधेयक, बिहार नगरपालिका संशोधन विधेयक, बिहार सहकारी सोसायटी संशोधन विधेयक, भू-सर्वेक्षण आ बंदोवस्ती विधेयक, बिहार विश्व्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक आ पटना विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक सहित एगारहटा विधेयक पास कयल गेल। बिहार विधानसभाक भेल पांच बैसक मे कुल 936 प्रश्नक सूचना भेटल छल जाहि मे 682 प्रश्न एकीकृत कयल गेल एहि मे 484 तारांकित, 176 अतारांकित आ 24 अपसूचित प्रश्न छल। स्वीकृत प्रश्न सॅ 70 प्रश्नक उत्तर देल गेल आ 90 प्रश्न केँ सभा पटल पर राखल गेल। कुल 113 ध्यानाकर्षण प्रश्न मे से 91क उत्तरक लेल संबंधित विभाग केँ पठा देल गेल। दोसर दिस बिहार विधान परिषद्क 169म बेसक मे 471 प्रश्नक सूचना भेटल जाहि मे 429 प्रश्न स्वीकृत कयल गेल। स्वीकृत प्रश्न मे 115 प्रश्नक उत्तर देल गेल आ शेष बचल प्रश्नक उतर अगिला सत्र मे सदनक पटल पर राखल जायत। दूनू सदनक विभिन्न समितिक कतेको प्रतिवेदन सदन पटल पर राखल गेल। सत्रक दरमियान मधुबनी जिलाक लौकहा विधानसभा उपचुनाव मे विजयी भेल जदयूक सतीश कुमार साह सदनक सदस्यता ग्रहण कयलनि तऽ लोक जनशक्ति पार्टी डा. प्रमोद कुमार आ नौशाद आलम के जदयू सदस्यक रूप मे मान्यता देल गेल। दूनू सदस्य लोजपा सॅ इस्तीफा दऽ जदयू मे सम्मिलित भेल छलाह। सत्रक दरमियान विधान परिषद् मे कला संस्कृति आ युवा विभागक मंत्री डा. सुखदा पाण्डेय जनतब देलनि जे मधुबनी मे मिथिलाचित्र कला संस्थान सह संग्रहालयक स्थापनाक लेल सैद्धांतिक रूप सॅ सहमति बनि गेल अछि। एहि संस्थान मे प्रशिक्षण, प्रदर्शनी आ संग्रहालयक व्यवस्था रहत। एहि ठाम प्रशिक्षण प्राप्त करय वालाकेँ डिग्री सेहो देल जायत। एहि सॅ पहिने परिषद मे शिक्षा मंत्री पी.के. शाही द्वारा संजय झाक प्रश्नक उत्तर देबाक क्रम मे परिषदक सभापति ताराकांत झा हस्तक्षेप करैत साहित्य आ संस्कृति केँ बचैबाक दिशा मे काज करबाक निर्देश देलनि। श्री झा कहलनि जे मिथिला संस्कृत शोध संस्थान दरभंगा मे साढ़े बारह हजार पाण्डुलिपि सड़ि रहल अछि जकरा बचैबाक आवश्यकता अछि। ओ कहलनि जे सरकार दुर्लभ पाण्डुलिपि सभक संरक्षण मे रूचि देखब। परिषद सदस्य संजय झा अपन ध्यानाकर्षणक माध्यम सॅ सरकारक ध्यान आकृष्ट करबैत कहलनि जे मिथिलाक्षर लिपि अति प्राचीन अछि। हालहि मे पटना मे उपेन्द्र महारथी शिल्प संस्थानक सफाईक दरमियान मिथिलांक्षर मे हस्तलिखित रामायण, महाभारत आ मिथिला दर्शन नामक पाण्डुलिपि भेटल अछि। मिथिलांक्षर मे होएबाक कारण किछु विशेष पता नहि चलि रहल अछि। मुदा देवनागरी लिपि मे किछु सूचना होयबा सॅ पता चलैत अछि जे ई पाण्डुलिपि अछि जे पहचानक मोहताज अछि। अपन उत्तर मे शिक्षा मंत्री कहलनि जे मिथिला संस्कृत शोध संस्थान एहि दिशा मे काज कऽ रहल अछि। आठ दशक पहिने पंडित जीवनाथ रायक मिथिलाक्षर लिपि मे लिखित पोथीक प्रकाशन कराओल जा रहल अछि। मिथिला राज्यक विरोध मे उतरलाह डा॰ मिश्र मिथिलांचल के सभ दिन खतरा मिथिला पुत्र सॅ रहल अछि। स्वातंत्राक 64 वर्ष मे आधा समय बिहारक नेतृत्व मिथिला पुत्रक हाथ मे रहल मुदा मिथिलांचलक दुर्गति आ विकास सभक सोझा अछि। मिथिलांचल मे राजनीति रोटी सेकबाला मैथिलांचलक राजनीतिज्ञ मिथिला हितक रक्षाक समय स्वयं मुद्रा मे आबि जाति छथि। उŸार प्रदेशक मुख्यमंत्री मायावतीक छोट प्रदेशक घोषणाक बाद बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार छोट प्रदेशक समर्थनक बाद ई आशा जागल छल जे मिथिला पुत्र सभ एहि दिशा मे डेंग बढ़ौताह मुदा मिथिला आ मैथिलीक झण्डा उठैबाक ढाबा करएबाला नेता सभ राजनीतिक चुसनीक मजबूरी मे जाहित रहे अलग मिथिल राज्यक विरोध मे ठाढ़ भेला एहि सॅ हुनक राजनीतिक चरित्र सोझा आबि गेल अछि। मिथिलाक सभ सॅ पैघ हितैषी कहए बाला बिहारक पूर्व मुख्यमंत्री डा॰ जगन्नाथ मिश्र अपन मुख्य मंत्रित्वकाल मे मैथिलीक उपेक्षाक उर्दू के प्रदेशक द्वितीय भाषाक दर्जा देलनि। विकासक नाम पर मिथिलाक कोना ठगलनि से तऽ हुनक प्रतिनिधित्व बाला झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र के देखि कऽ सहजहि पता चलैत अछि। आ आब जिनगीक तेसर चरण मे बादो मिथिलाक विकासक परोक्ष एजेन्डा सॅ पाछा नहि हटि रहल छथि। एक दिस देश भरि मे छोट प्रदेशक लेल संघर्ष चलि रहल अछि आ मिथिला प्रदेशक लेल अनुकूल वातावरण बनैबाक समय आएल अछि तऽ डाक्टर मिश्र अलग मिथिला राज्यक विरोधक झण्डा उठा सŸााक आगा अपन माथ झुका लेलनि अछि। दरअसल हुनक नजरि राज्य सभाक चुनाव पर अछि। अगिला वर्ष्ज्ञ राज्य सभाक कतेको सीट बिहार सॅ खाली भऽ रहल अछि आ डा॰ मिश्र एहि उम्मीद मे नीतीश कुमार के खुश करबाक लेल अलग मिथिला राज्यक विरोध मे उतरि गेलाह अछि। डा॰ मिश्र भने कतबो नाक रगरथि जदयू आ भाजपाक गठबंधन मे हुनका राज्य सभा देखबाक अक्सर भेटत एकर आशा कम अछि। डॉ॰ मिश्र राजनीतिक शक्तिक केन्द्र बनलाक दरमियान तऽ मिथिलाक उद्वारक लेल कोनो प्रयास तऽ नहिए कएलनि आ आब जखन उचित अवसर बुझि पड़ैत अछि तऽ मिथिलाक जन आंकाक्षा के गला दबऽ मे लागि गेलाह अछि। दरअसल मिथिलाक ई दुर्भाग्य अछि जे प्रदेशक सŸाा के सब सॅ बैसी दिन नेतृत्व करबा अवसर मिथिला पुत्र सभके भेटल मुदा विकास नहि होएबाक सौभाग्य मिथिलांचल के भेटला मिथिला राज्य आन्दोलन मिथ्लिांचलक नेताक लेल ‘‘राजनीतिक पर्यटन’’ बनि गेल अछि। एहि सॅ पहिने भाजपा सॅ निष्काषित भेलाक बाद पण्डित ताराकांत झा सेहो मिथिला राज्य अभियान चलौने छलाह। एकर राजनीतिक लाभ सेहो हुनका भेटल। पंडित झाक भाजपा मे आपसी बाद हुनका उच्च सदनक सदस्य बनाओल गेल आ संवैधानिक पद सेहो देल गेल अछि। लगैत अछि जे पंडित झा एहि मात्र एहि मादे मिथिला राज्य अभियान चलौने छलाह। पद भेटैत मिथिला राज्य अभ्यिानक हवा निकलि गेल आ एक बेर फेर मिथ्लिावासी आ मिथिलांचल ठगल गेल। केन्द्र मे राजग सरकारक मंत्री पद सॅ हटैलाक बाद भाजपाक प्रदेश अध्यक्ष डॉ॰ सी.पी. ठाकुर सेहो मैथिलीक संविधानक अष्टम् अनुसूची मे देबाक लेल दरभंगा, पटना आ दिल्ली धरि फोटो खिलौलनि। मैथिलीक मांग पूरा भेल। डॉ॰ ठाकुरक चापलूस मंडली एकर खूब प्रचार मिथिलांचल मे कएलक जेना मात्र किछुए मासक हुनक प्रयास सॅ ई सफल भेला एकर लाभ चापलूस मंडली वाम विचारक मिथिला राज्यक मठाधीश के भेल आ ओ वामपंथी सॅ दक्षिणपंथी भऽ गेलाह। भाजपाक वर्तमान कार्यकारिणी मे ओ विराजमान छथि। खैर, एहि बेर सभ सॅ मुखर विरोध डॉ॰ सी.पी. ठाकुर दिस सॅ भेल अछि तऽ पंडित ताराकांत झा मौन छथि। आब सभ राजनीति नेताक मिथिला प्रति हुनक सोच सोझा आबि गेल अछि तऽ जनताक सेहो अपन संकल्प एहि मिथिला विरोधी नेता सभक सोझा आनए पड़त। नहि तऽ जगत जननी मां सीता, लोरिक सलहेस, दीना भद्री, मंडन आ विद्यापतिक धरती एहिन कुहरेत रहत। पर्यटनक उद्योग पर सरकारक बढ़ल जोर विकसित होएत हलेश्वर पुनौरा आ पंथपाकर प्रदेश मे पर्यटनक संभावना के देखैत बिहार सरकार पूर्व राष्ट्रपति डा0 ए.पी.जे. अब्दुल कलामक सुझाव पर अमल करब प्रारंभ कऽ देलक अछि। सरकार पर्यटन उद्योग के बढ़ावा देबाक लेल कतेको योजना बनौलक अछि। सरकारक योजना जगत जननी मां सीता आ मर्यादा पुरुषोŸाम श्रीराम सॅ प्रदेश मे जुड़ल जगह सभक रामायण सर्किटक रूप मे विकसित करबाक अछि। एहि वास्ते सीतामढ़ीक पुनौर हलेश्वर स्थान, पंथपाकर, बक्सर जिलाक रामजानकी मठ आ आन प्रमुख स्थान के विकसित कऽ एहि ठाम पर्यटन के आकर्षित करबाक योजना बनाओल गेल अछि। दोसर दिस आई मुख्य मंत्री नीतीश कुमार बिहारशरीफ मे आयोजित एकटा राष्ट्रीय सेमिनार मे सूफी सर्किट बनैबाक घोषणा सेहो कएलनि अछि। रामायण सर्किटक अंतर्गत प्राचीन शास्त्र मे मर्यादा पुरुषोŸाम श्रीरामक बरियातिक बिहारक जाहि जाहि जगह होइत मिथिला नरेश राजा जनकक घर पर पहूंचत ओहि सभ जगह आ जगत जननी सीता सॅ सरोकार राखए बाला जगह सभके पर्यटनक दृष्टि सॅ विकसित कएल जायत। वाल्मीकि रामायण आ राम चरितमानस मे सीता स्वयंवरक बाद श्री रामक बरियातीक मनोरम वर्ण प्रस्तुत कएल गेल अछि। श्रीराम आ लक्ष्मण विश्वमित्रक संग अयोध्या सॅ हुनक आश्रम आयल छलाह। आ एहि ठाम सॅ विश्वामित्रक संग मिथिला नरेश द्वारा जगत जननीक विवाह वास्ते आयोजित स्वयंवर मे भाग लेने छलाह। श्रीराम एहि स्वयंवर मे शिवक धनुष तोड़ि जगत राजा जनकक संकल्प के साकार कएलनि आ राजा जनकक निमंत्रण पर अयोध्या सॅ राजा दशरथ श्रीरामक बरियाती लऽ मिथिला आएल छलाह। एहि क्रम मे प्रदेशक कतेको जगहक सॅ होइत मिथिला पहूचल छलाह। एहि मे सरयू गंगाक संगम छपरा से 8 किलोमीटर दूर सीधी, तारका वध करबाक स्थान चरित्रवन (बक्सर) गिरिव्रज (राजगीर) फतुहा, विशाला नगर (वैशाली) आदि श्री रामक बरियाती आ विश्वामित्रक संग शिक्षा ग्रहणक काल सॅ जुड़ल जगह अछि तऽ सीतामढ़ीक हलेश्वर स्थान जतए राजा जनक हर चलौने छलाह तऽ पुनौरा सीतामढ़ी मे माताक जन्म भेल छल। पंथपाकर सीतामढ़ी मे श्री रामक बरियाती रूकल छल। एहि मे दरभंगा जिलाक अहिल्या स्थान सेहो प्रमुख अछि जतए अहिल्याक उद्यार श्रीराम कएने छलाह। एहि ठाम गौतम ऋषिक आश्रम आ गौतम कुण्ड सेहो अछि। एहि सभ जगह के रामाण सर्किटक रूप मे विकसित कऽ प्रदेश मे पर्यटनक उद्योग के भजगूति देबाक सरकार कऽ रहल अछि। एहि दिशा मे सरकार डेग सेहो उठा देलक अछि। सीतामढ़ी हलेश्वर स्थान के विकसित करबाक लेल 47 लाख टाका आ बक्सरक रामजानकी मठ के विकसित करबाक लेल सेहो 52 लाख टाका जारी कऽ देल गेल अछि। लोकायुक्तक मामिला मे सत्ता आ विपक्ष मे गतिरोध प्रदेश मे मजगूत लोकायुक्त बनैबाक लऽकऽ सरकार आ विपक्ष मे विरोधाभास सोझा आबि गेल अछि। एक दिस सरकारक प्रस्तावित विधेयक पर टीम अन्ना के विरोध पर सरकारक कड़गर प्रतिक्रिया आ दोसर दिस कॉग्रेस, भाकपा माले आ लोजपा सहित आन विपक्षी दलक एहि मामिला मे सरकार पर लगाओल जा रहल निशानाक मध्य एहि विधेयक पर आम जनता सॅ राय लेबाक समय सीमा आई समाप्त भऽ गेल। सरकार एहि विधेयक के बिहार विधान मंडलक शीतकालीन सत्रक दरमियान 7 दिसम्बर के प्रस्तुत करबाक लेल तैयार अछि। एहि विधेयक पर विचारक लेल 26 नवम्बर के सर्वदलीय बैसक सेहो आयोजित कएल गेल। आम लोक सॅ भेटल सुझाव आ सर्वदलीय बैसक मे आएल सुझाव पर उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदीक अध्यक्षता बाला मंत्री समूह विचार कऽ एहि विधेयक के अंतिम रूप देत। मुख्यमंत्री के एकर अंतर्गत आनए आ लोकायुक्त नियुक्ति मे सरकारक हस्तक्षेपक बिन्दु पर सामान्य रूपे सभ सॅ बेसी आपति उठि रहल अछि। ओना सरकार स्पष्ट कएलक अछि जे सभ मामिला पर विचार कऽ एकटा मजगूत लोकायुक्त विधेयक आनल जाएत। दोसर दिस, मुख्यमंत्री के लोकायुक्तक दायरा मे अनबाक विरोध कड़ैत पूर्व मुख्यमंत्री डाक्टर जगन्नाथ मिश्र सरकार के खुश करबाक प्रयास कएलनि अछि जाहि सॅ कि दिल्लीक रास्ता खूजि सकए। मनाओल गेल दरभंगा महाराजक जन्म दिवस महाराजा कामेश्वर सिंहक 105म जन्म दिवस पर दरभंगा मे समारोहपूर्वक मनाओल गेल। एहि अवसर पर प्रख्यात समाज शास्त्री आ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालयक पूर्व प्रोफेसर डाक्टर दीपंकर गुप्ता ‘‘कामेश्वर स्मृति व्याख्यान माला’’ मे अपन व्याख्यान प्रस्तुत कएलनि। समरोह मे बिहारक पूर्व पुलिस महानिदेशक डी.एन. गौतम विशिष्ट अतिथि छलाह जखन कि सामाजिक विज्ञान अध्ययन केन्द्र कोलकाताक प्रोफेसर डाक्टर पी.के. बोस अध्यक्षता कएलनि। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन द्वारा आयोजित एहि समारोहक जनतब दैत प्रबंधक ट्रस्टी डा0 हेतुकर झा जनौलनि जे एहि अवसर पर कामेश्वर सिंह बिहार हेरिटेज श्रृंखलाक अंतर्गत प्रकाशित पुस्तकक विमोचन सेहो कएल गेल। प्रदेश मे खूजत पशु विश्वविद्यालय प्रदेश मे वर्ष 2012 सॅ प्रारंभ होमए वाला आगिला पांच वर्षक लेल पशु आ मत्स्य संसाधन विभाग अपन रोड मैप तैयार कएल अछि। जाहि मे प्रदेश मे पशु विश्वविद्यालय, पशु मित्रक नियुक्ति आ कॉलेज खोलब प्राथमिकताक सूची मे अछि। पशु आ मत्स्य संसाधन विभाग सॅ भेटल जनतबक अनुसार प्रस्तावित पशु विश्वविद्यालयक अंतर्गत एकटा नव पशु महाविद्यालय, डेयरी महाविद्यालय आ मत्स्य महाविद्यालय खोलल जायत। विभाग पशु संसाधन, डेयरी आ एहि सॅ संबंधित आन क्षेत्रक विस्तृत पढ़ाई, आ शोध आदि पर 70,000 टाका अगिला पांच वर्ष मे खर्च करत। एकर अलावा प्रदेश सभ 8442 पंचायत मे पशु मित्रक बहाली होएत। पशु मित्रक चयनक बाद हुनका प्रशिक्षित कऽ अनुबंधक आधार पर नियुक्ति होएत। वर्ष 2012-13 मे 1720, वर्ष 2013-15 मे 1720 आ, वर्ष 2016-17 मे 1562 पशु मित्र के तकनीकि मदति उपलब्ध कराओल जाएत जाहि सॅ ओ किसान के मदति करबाक संगहि पशु चिकित्सालय आ प्रखंड स्तर पर पशु चिकित्सक के सहयोग करताह। विभागक रोड मैपक अनुसार दुग्ध उत्पादन समिति मे नीजि जन भागीदारी (पीपीपी) क आधार पर पशु चारा आ पाल्ट्र प्लांट प्रत्येक प्रखंड मे लगैबाक योजना अछि। पशु चारा आ पशुक प्रदेशक सभ अड़तीस जिला मे 3800 लाखक टाकाक खर्च सॅ आधुनिक पशु वद्यशाला सेहो खोलल जायत। पशु संस्थान के मजगूत कएल जायत प्रखंड पशु सेवा केन्द्र सभ 534 प्रखंड मे खोलल जायत जाहि पर 53400 लाख टाका खर्च होएत। टाका नहि खर्च कएला पर बंद होएत आवंटन राष्ट्रीय कृषि विकास योजनाक नहि खर्च करयवाला चीनी मिल मालिक सभके विŸाीय वर्ष 2011-12क लेल टाका आवंटित नहि कएल जायत। वर्ष 2010-11क लेल एहि योजना मद सॅ आवंटित टाका मे सॅ बगहा चीनी मिल मे 35.97 लाख, नरकटियागंज मे 41.72 लाख, रीगा मे 90 लाख, लौरिया मे 65.53 लाख, मझौलिया मे 17 लाख, प्रतापुर मे 72.49 लाख, सुगौली मे 56.56 लाख, सिधवलिया मे 46 लाख आ गोपालपुर चीनी मिल मे 19.68 लाख टाका बाचल अछि। अस्तित्वक लड़ाई लड़ैत सम्पन्न भेल स्मृति पर्व चेतना समिति द्वारा आयोजित अंठाबनम् विद्यापति स्मृति पर्व समारोह सम्पन्न भऽ गेल| त्रिदिवसीय एहि समारोहक अवसरपर तीन दिन धरि राजधानी पटनाक मिथिलावासी मिथिलाक कला, संस्कृति खान-पानक रसास्वादन क' संगहि गीत-संगीतक आनन्द उठौलनि। मुदा नब्बेक दशकसॅ पहिने राजधानीक मिथिलवासीक लेल पाबनि बनल ई समारोह आब चेतनाक मात्र औपचारिकता भेल जा रहल अछि। आयोजनक घटैत स्तरसॅ जतए मैथिली भाषीक एहि समारोहक प्रति रूचि घटि रहल अछि ओतहि चेतना समिति सेहो एहि आयोजनकें बंद करबाक रणनीतिपर चलैत एहि तरहक कार्यक्रम सभ रखैत अछि जे दिन पर दिन उपस्थिति कम भऽ रहल अछि। ई चेतनाक सौभाग्य अछि जे पछिला तीन चारि वर्ष सॅ तीनू दिनक कार्यक्रम समाप्ति कऽ घोषणा सॅ पहिनहि कार्यक्रम स्थल खाली भऽ जाइत अछि आ ई संभव अछि जे आबए बाला समय मे चेतना समितिक ऊर्जावान सक्रिय अधिकारी आ कार्यकर्ता सभ तीनू दिन स्वयं धूनि रमा बाबा विद्यापतिकें गोहार लगौताह। बिहारक राजधानी पटना मे अठाबन वर्ष पहिने मैथिल आ गैर मैथिलके मिथिलाक कला संस्कृति आ माटि सॅ जोड़बाक लेल बाबा नागार्जून सहित आन कतेको मैथिल धरती पुत्र चेतना समितिक गठनक विद्यापति स्मृति पर्व परम्पराक प्रारंभ कएने छलाह जे बाद मे पटनाक मैथिल आ गैर मैथिलक मध्य ततेक लोकप्रिय भेल जे लोक नव वर्षक कलैन्डर अएलाक बाद आन पाबनि जकां विद्यापति पर्व समरोहक तिथि जरूर तकैत छलाह। मैथिली भाषीक मध्य ई समारोह ततेक लोकप्रिय भेल जे पटनाक हार्डिक पार्कक मैदान छोट पड़ि जाइत छल मुदा आब तऽ विद्यापति भवन हॉल आ मगध क्लबक मैदान पैघ भऽ रहल अछि। राजनीतिक क्षेत्र मे एहि समारोहक ई स्थिति छल जे सभ दलक नेता एहि मे अपन उपस्थिति दर्ज करैबा लेल बेचैन रहैत छलाह। शहरि भरिक मैथिलक एहि जुटान मे कतेको कन्यादान आ वरदान सांस्कृतिक कार्यक्रमक आनन्दक मध्य गपसप मे अंतिम रूप लैत छल। पछिला दू दशक मे चेतनाक ई आयोजन ओकर असफलताक कहानी गढ़ि रहल अछि हालांकि समितिक पदाधिकारीक एहि संदर्भ मे जबर्दस्त तर्क छनि आ ओहि सॅ सहमत होएब हमरा सभक मजबूरी | समितिकक मानब अछि जे टीवी इंटरनेट आदि मनोरंजन बढ़ैत साधनक कारण एहि समारोह मे उपस्थिति कम भऽ रहल अछि आ एहि तर्क सॅ भला के मना कऽ सकैत अछि। शायद समितिक जनतब नहि अछि जे आइयो दरभंगा, कोलकाता, जमशेदपुर, बोकारो आदि आब कतेको ठाम विद्यापति पर्व समारोह आयोजित भऽ रहल अछि आ एकर प्रेरणाक स्रोत चेतना समिति अछि, ओतए एखनो अपन कला संस्कृति गीत-संगीत सॅ मैथिलीभाषी के अरूचि नहि भेल अछि। दरअसल एहि आयोजनक प्रति घटि रहल रूचिक कारण चेतना समितिक मठाधीश छथि जे बाबा विद्यापतिक नामपर बनल मठपर प्रतिदिन सांझ देखा अपन कलैन्डरक अनुसार कार्यक्रम आयोजित कऽ काज समाप्त बुझैत छथि। समिति पछिला दू दशक सॅ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनीक जकां काज कऽ रहल अछि। सहकारिताक नीक जनतब राखए बलाक नियंत्रणमे ज्यों कोनो संस्था के प्राइवेट लिमिटेड बना देल जाए तऽ ओकर ई हाल होएब स्वाभाविक अछि। समितिक वर्तमान कार्य प्रणाली आ विद्यापति स्मृति पर्वक वर्तमान स्थिति देखि बाबा नागार्जूनक आत्मा के सेहो ग्लानि होइत। आब तऽ स्थिति ई अछि जे तीनू दिनक कार्यक्रमक उद्घाटक, मुख्य अतिथि, कलाकार आ दर्शक फिक्सड भऽ गेल छथि। कार्यक्रम देखबा सॅ बेसी उत्सुकता आब भेट करबाक रहैत अछि। किछु लोक एखन होइत छथि जे एहि समारोहक दरमियान भेट होइत छथि आ भेटक बाद गपसप कऽ लोक आपस अपना घर दिस बिदा भऽ जाइत छथि। पहिने एहि समारोहक उद्घाटन बिहारक राज्यपाल सॅ करैबाक परम्परा छल आ एहि समारोहक एतबा महत्व छल जे राज्यपाल आ मुख्य मंत्री एहि समारोहक लेल अपन समय सुरक्षित रखैत छलाह मुदा बिहारक राजनीति बदललाक संगहि परिस्थिति सेहो बदलल आ तखन विद्यापति स्मृति समारोहक स्वरूप बदलब स्वाभाविक अछि। हालांकि समिति अपन परम्पराकें फेर सॅ प्रारंभ कएलक आ कतेको वर्षक बाद एहि वर्ष समारोहक उद्घाटन बिहारक राज्यपाल देवानन्द कुंवर कएलनि। समितिक सभसॅ महत्वपूर्ण एहि कार्यक्रमक घटैत लोकप्रियताक लेल समितिक कार्य प्रणाली जिम्मेवार अछि। लोकतांत्रिक व्यवस्थासॅ समिति चलैबाक नामपर जे वर्तमान कार्यकारिणी बनल अछि ओ बिहारक पन्द्रह वर्षक कुशासनक याद दिया रहल अछि। हमरा सभक लेल सौभाग्यक बाद अछि जे पहिल बेर एकटा योग्य महिला अध्यक्ष प्रमीला झाक नेतृत्व मे ई आयोजन भेल। प्रमीला झा योग्य मैथिलानी छथि मुदा समितिक अध्यक्षक पद पर बैसा पर्दाक पाछासॅ समितिक सत्ताक संचालन कोनो तरहे लोकतांत्रिक आ सहकारिताक मूल भावनाक अनुरूप नहि अछि। संगहि समितिक संवैधानिक बाध्यताक कारण महिलाक अध्यक्ष बनाएब आ ओहिमे मिथिल आ मैथिलीक प्रति समर्पित मैथिलानिकें कात करब समितिक नियम पर प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करैत खैर, सभ वर्ष जकां अहू बेर पटनाक मैथिल समाज तीन दिन धरि मिथिलाक माटि संग जुड़ि अपन कला संस्कृति, गीत-संगीतक प्रति समर्पण देखौलक मुदा अस्तित्वक संकट झेलि रहल एहि समारोहमे नव दर्शक आमद होएत आ पुरान गरिमाकें स्थापित कऽ सकत एकर कल्पना तऽ वर्तमान नेतृत्व सॅ नहिए कएल जा सकैत अछि। ग्लोबल भेल चेतना चेतना समिति आब ग्लोबल भऽ गेल अछि। त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक उद्घाटनक अवसरपर राज्यपाल देवानन्द कुंवर चेतना समितिक बेवसाइटक उद्घाटन कएलनि। देश-विदेशक कोनो कोन सॅ मिथिलावासी www.chetnasamiti.org लॉग इन कऽ समितिक गतिविधि जानि सकैत छथि। समिति एहि माध्यम सॅ प्रवासी मैथिल समाजक विवाह समस्याक समाधानक लेल विवाह योग्य वर कन्याक जनतब सेहो उपलब्ध कराओत राज्यपाल एहि अवसर पर समितिक स्मारिका आ कतेको पुस्तकक विमोचन सेहो कएलनि। मंचित भेल नाटक विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक समापन नाटक मंचनक संग भेल, एहि अवसर पर प्रति वर्ष नाटकक मंचन होइत अछि। एहि वर्ष महिला लेखिका विभा रानी लिखित आ कमल मोहन चुन्नू निर्देशित नाटक ‘‘मदति करू माता’’ क मंचन भेल। प्रचलित मैथिली नाटकक विषय वस्तु सॅ हटि नव विषय वस्तुक संग प्रस्तुत ई नाटक लेखक आ निर्देशकक योग्यता आ क्षमताक अनुरूप नहि छल मुदा कलाकार सभ अपन अभिनयक माध्यम सॅ उपस्थित दर्शकक मनोरंजन करए मे सफल रहल। राजकीय समारोहक रूप मे मनल विद्यापति पर्व महाकवि विद्यापतिक जयंती राजकीय समारोहक रूप मे सेहो मनाओल गेल, श्रीकृष्ण स्मारक भवन परिसर मे आयोजित कार्यक्रम मे उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, बिहार विधान परिषद्क सभापति पंडित ताराकांत झा, खाद्य आपूर्ति मंत्री श्याम रजक, विधायक पूनम देवी सहित कतेको गणमान्य लोक महाकविक चित्र पर माल्यार्पण- श्रद्धांजलि अर्पित कएलनि, बेगूसरायक बरौनीक सिमरिया मे आयोजित अर्द्धकुम्भ मे सेहो उत्साहक संग विद्यापति पर्व समारोह मनाओल गेल। सम्मानित भेलाह विद्वान आ संस्कृतिकर्मी चेतना समिति द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक उद्घाटनक अवसर पर कतेको सम्मान आ पुरस्कार सेहो देल गेल। एहि अवसर पर समितिक स्मारिका आ आन पुस्तकक विमोचन सेहो भेल। राज्यपाल देवानंद कुंवर कतेको विद्वानकें सम्मानित कएलनि। राज्यपाल आ पूर्व मुख्यमंत्री डा0 जगन्नाथ मिश्र संयुक्त रूप सॅ स्मारिका आ पुस्तकक विमोचन कएलनि। नाटक मे नीक अभिनय आ सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकारक पुरस्कार बुद्धिनाथ मिश्र मिश्र देलनि आ कला संस्कृति आ युवा मंत्री बाल मेला मे विजय भेल नेना सभकें पुरस्कार देलनि। चेतना समितिक सम्मान - 2011 संस्कृति साहित्य सम्मान- डा. रामजी ठाकुर मैथिली साहित्य सम्मान- मोहन भारद्वाज संगीत नृत्य नाटक सम्मान- कुणाल मिथिला चित्रकला सम्मान- दुलारी देवी विशिष्ट अवदान सम्मान- महेन्द्र हजारी चेतना सेवी सम्मान- धर्मनाथ झा कीर्ति नारायण मिश्र साहित्य सम्मान- अजीत आजाद यात्री चेतना सम्मान- राम भरोस कापड़ि भ्रमर (जनकपुर) सुलभ सेवा सम्मान- मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति (गुवाहाटी) डा. माहेश्वरी सिंह महेश ग्रंथ पुरस्कार- प्रवीण कश्यप डा. महेश्वरी सिंह महेश निबंध पुरस्कार- सुश्री श्वेता भारती (भागलपुर) यशोदा देवी मिथिलाक्षर लेखन पुरस्कार- सुश्री मुक्ति रंजन झा सिद्धेश्वरी देवी मैथिली संस्कार गीत पुरस्कार- रेखा झा श्रीमती शैलवाला मिश्र स्मृति पुरस्कार- आशुतोष अभिज्ञ (सर्वश्रेष्ठ कलाकार नाटक) कामेश्वरी देवी पुरस्कार- रितू कर्ण (सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकार नाटक) प्रारंभ भेल नव परम्परा त्रिदिवसीय विद्यापति स्मृति पार्क समारोहक तीनू दिनक कार्यक्रमक प्रारंभ गोसाउनिक गीत जय-जय भैरविसॅ होइत रहल छल। मुदा एहि वर्ष समिति एकटा नव परम्परा प्रारंभ कएलक। समारोहक उद्घाटन सत्र एहि वर्ष राष्ट्रीय गीत जन गण मन सॅ प्रारंभ कऽ एकटा नव परम्परा प्रारंभ कएलक। जखन कि समारोहक समापन समदाउन सॅ होइत छल जे एहू वर्ष नहि भेल। आयोजित भेल पुस्तक आ चित्रकला प्रदर्शनी विद्यापति स्मृति पर्वक अवसर पर समारोह स्थल पर पुस्तक मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी लगाओल गेल, एहि प्रदर्शनी मे लागल कतेको पुस्तक स्टॉल पर मैथिली भाषी मैथिली भाषाक दुर्लभ साहित्य, पत्र-पत्रिका आ मैथिली गीतक सीडी आ मिथिला चित्रकलाक अवलोकन आ खरीद कएलनि। मिथिलांचलक विशिष्ट पहचानक पानक बिक्री सेहो खूब भेल। मैथिल ललना सभक व्यंजनक मेलाक रसास्वादन लोक सभ जमि कऽ कयलनि। राज्य गीत सॅ मिथिला निपत्ता, सरकार पर दबाब बनौलक समिति बिहारक शताब्दी वर्षक अवसर पर राज्य गीतक युग चयन बिहार सरकार कएलक अछि। एहि गीत मे मिथिलाक सामाजिक सांस्कृतिक झलकक एकहुटा शब्द नहि अछि। चेतना समितिक सचिव विवेकानन्द ठाकुर एहि पर चिन्ता प्रकट करैत मिथिलावासी दिस सॅ प्रदेश कला संस्कृति आ युवा मंत्री सुखदा पाण्डेयक ध्यान एहि दिस खिचलनि। श्री ठाकुर मंत्री सॅ आग्रह कएलनि जे सरकार मिथिलावासीक जनभावनाक सम्मान करैत एहि राज्य गीत पर फेर सॅ विचार करए। खूजत अलग मिथिला प्रदेशक द्वार? छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि मुख्यमंत्री बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार छोट प्रदेशक समर्थन कएलनि, सेवा यात्रापर जाइसॅ पहिने पटनामे श्रीकुमार कहलनि जे- सिद्धांत रूपसॅ छोट प्रदेशक समर्थन करैत छी मुदा ई मामिला केन्द्र आ राज्यक मध्यक अछि। नीतीश कुमारक एहि बयानक बाद अलग मिथिला राज्यक आशा बढ़ल अछि। ज्यों विकास आ प्रशासनिक दृष्टिए उत्तर प्रदेशक चारि भागमे बटबाराक प्रति श्री कुमार अपन सहमति दऽ रहल छथि तँ अलग मिथिला राज्यक लेल सेहो हुनका आगाँ अएबाक चाही। मिथिला राज्यक मांग कोनो नव नहि अछि। आजादीक बादे अलग प्रदेशक मांग होइत रहल अछि मुदा मिथिलाक संस्कृति, संस्कार आ माटिमे ओ तेजी नहि देखाओल जे झारखंड, उत्तराखंड आ छत्तीसगढ़मे देखाओल। मिथिलाक लोक शांतिप्रिय छथि आ सादगीक संग अपन बात सरकारक सोझा रखैत रहलाह अछि जकर परिणाम अछि जे स्वतंत्राक 64 वर्षक बादो रौदि आ बाढ़िक शिकार बनल अछि आ अपन माटिकेँ छोड़ि पेटक आगिकेँ शांत करबाक लेल प्रवासी बनि अनकर भविष्य सुधारि रहल छथि। ई दुर्भाग्य अछि जे गोटेक चारि दशक धरि मिथिलाक पुत्रक हाथ मे सत्ताक डोरि रहल मुदा मिथिलाक नोर पोछबाक कोनो प्रयास नहि भेल। पछिला दू दशक रणनीति दृश्य देखी तँ स्पष्ट अछि जे कुशासनक डेढ़ दशकमे विकासक मतलब सारण छल आ एखन पछिला छह वर्षमे विकासक मतलब नालन्दा भऽ गेल अछि, मुदा मिथिला पुत्र सभ मिथिलाकेँ विकासक केन्द्र नहि बना ओकरा अपन राजनीतिक शतरंज बना देलनि जकर परिणाम आइ सोझाँ अछि आ बिहारक राजनीतिमे चारू खाना चित्त भऽ बौक बनल अपन कुर्सी बचबऽ लेल दुहाइ सरकार कऽ रहल छथि। मुख्यमंत्रीक ई विचार एहन समय मे आएल अछि जखन देशमे छोट प्रदेशकेँ लऽ कऽ राजनीति गर्माएल अछि। ई उचित समय अछि जखन मिथिला राज्यक समर्थक सड़कपर उतरथि। किएक तँ बिहारक संग रहने मिथिलाक विकास होएब संभव नहि अछि। एकर उदाहरण संयुक्त बिहार अछि। संयुक्त बिहारमे विकासक धार दक्षिण बिहार (आब झारखंडमे बहैत छल तहिना एखन विकासक मतलब सेहो दक्षिण बिहार (यानि नालन्दा) भऽ गेल अछि। एतबा नहि बिहारक स्थापनाक शताब्दी वर्षमे चुनल गेल राज्य गीतमे सेहो मिथिला लापता अछि। जखन गीतक लेखक खांटी बिहारी होथि तँ भला हुनका मिथिला किएक सुझतनि। तें आब तँ सरकार सेहो मिथिलाकेँ बिहारक अंग नहि मानैत अछि। सरकारकेँ बाबू कुंवर सिंहक गुणगान स्वीकार अछि। मुदा मिथिलाक विभूति महाकवि विद्यापति, दीना-भद्री, लोरिक सलहेस, मंडन, आयाचीक जनतब नहि अछि। ज्यों एकर जनतब बिहार सरकारक विद्वान निर्णायक मंडलीकेँ रहैत तँ ओ भला मिथिलाक एहि महान विभूति सबहक उपेक्षा कऽ लिखल गेल गीतकेँ राज्य गीतक रूपमे कन्नहु स्वीकृति नहि दैत। आब समय आबि गेल अछि। उत्तर प्रदेशक मुख्यमंत्री चुनावक समय छोट प्रदेशक तुरूपक पत्ता भने अपन राजनीतिक उद्देश्यक पूर्तिक लेल फेकलनि अछि मुदा बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक छोट प्रदेशक समर्थन अलग मिथिला राज्यक निर्माणक दिशामे मीलक पाथर साबित भऽ सकैत अछि। मुदा एहि लेल प्रयास करऽ पड़त किएक तँ नेनाकेँ कनने बिना माय सेहो दूध नहि पिअबैत अछि तँ भला बिहार सरकार आ केन्द्र सरकार सादगी, सदाचार आ शांतिसॅ बैसल रहलापर अलग प्रदेश बनाओत ई असंभव अछि। चीनी निगम क मिठास सँ दूर निवेशक, नीलामीक बढ़ल समय सीमा बिहार राज्य चीनी निगम क बंद पड़ल चीनी मिल क नीलामीक चारिम चरण मे 9 मिलक नीलामी करबाक निर्णय सरकार लेने छल। एहि लेल नीलामी क समय सीमाक भीतर निवेशक कम रूचि देखौलाक बाद सरकार नीलामी क तिथि बढ़ा देलक अछि। नीलामी चारिम चरणक आवेदन पत्रक बिक्री क तिथि 24 अक्टूबर छल। जकरा बढ़ा क आब 30 नवम्बर सं बढ़ा क 22 दिसम्बर कऽ देल गेल अछि। गन्ना आयुक्त विमलानन्द झा जनतब देलनि अछि जे पहिने घोषित 24 अक्टूबर कऽ अंतिम तिथि धरि 18टा निवेशक एहि मिलक नीलामी मे रूचि देखौनि छलाह। आब जखन कि समय सीमा बढ़ा देल गेल अछि निवेशक संख्या बढ़बाक उम्मीद अछि आ उम्मीद अछि जे नव समय सीमा कऽ अर्न्तगत अंतिम समय धरि गोटेक 50टा निवेशक एहि नीलामी मे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। सरकार प्रदेश मे बंद पड़ल चीनी निगमक 9टा मिल लोहर, गोरौल, सीवान, न्यू सीवान, वारसलिगंज, हथुआ, गुरारू, समस्तीपुर आबनमनखी स्थित चीनी मिलक नीलामी चारिम चरण मे कऽ रहल अछि। एहि सँ चीनी मिगम के 278 करोड़ टाका भेटबाक उम्मीद अछि एहि मिल सभक वास्ते निवेशक के आकर्षित करबाक लेल सरकार कतेको छूट सेहो दऽ रहल अछि। एहि मिल सभके पहिने 60 वर्षक लेल पट्टा पर देल जाएत आ बाद मे निवेशक मांग पर एकरा 30 वर्षक लेल बढ़ालओल जा सकत। एहि जमीनक उपयोग निवेशक अपना मर्जी सँ उद्योग लगबइ लेल कऽ सकताह। चीनी निगमक बंद पड़ल 15 चीनी मिल मे सँ 6 मिलक नीलाम पहिनहि तीन चरण मे भऽ चूकल अछि। प्रदेश मे 1997 40टा चीनी मिल छल जाहि सँ ओहि समय से प्रति वर्ष 3 लाख टन चीनी कऽ उत्पादन होइत छल मुदा वर्तमान मात्र 12टा चीनी मिल कार्यरत अछि आ 6 लाख चीनीक उत्पादन भऽ रहल अछि। एहि तरहे कुसियारक उपज पहिने 40 लाख टन प्रति हेक्टेयर छल जे एखन 57 लाख टन प्रति हेक्टेयर भऽ गेल अछि। अगिला दू वर्ष मे कर्नाटक आ महाराष्ट्र जकां 100 लाख टन प्रति हेक्टेयर कुसियार उपजक लक्ष्य राखल गेल अछि। एहि मध्य प्रदेश मे अगिला मौसम सँ पाच टा चीनी मिल सँ हरिनगर, रोगा, लौरिया, नरकटियागंज आ सुगौली चीनी मिल सँ प्रतिदिन 270 लीटर इथनाल कऽ उत्पादन प्रारंभ भऽ जाएत। एहि मिल सँ स्प्रिट कऽ उत्पादन सेहो प्रारंभ होएत। केसीसीक लेल लागल शिविर बिहार सरकार प्रदेशक सभ किसान के वर्त्तमान वित्तीय वर्षक अंत धरि किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) उपलब्ध करैबाक लेल प्रयास मे तेजी अनलक अछि। एहि वास्ते जिला स्तर पर जिलाधिकारीक अध्यक्षता मे अनुश्रवण समिति गठित करबाक निर्देश देल गेल अछि। एहि समितिक बैसक सभ मास मे होएत जाहि मे केसीसी बटबाक कार्यान्वन आ अनुश्रवण सुनिश्चित कएल जाएत। अगिला मास 7 सँ 18 नवम्बरक मध्य प्रखंड सभ मे आयोजित कएल जाए वाला कृषि उत्सव मे केसीसीक लेल शिविर लगाओल जाएत। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी अधिकारी सभके निर्देश देलनि अछि जे 9 दिसम्बर 2011 आ 9 जनवरी 2012 के सभ प्रखंड मुख्यालय मे मेगा किसान क्रेडिट कार्ड शिविर आयोजित आयोजित करथि। कृषि विभागक विषय वस्तु विशेषज्ञ आ कृषि सलाहकार किसान सभ सँ केसीसीक लेल आवेदन पत्र लऽ बैंक के उपलब्ध करौताह। बैंक के सेहो किसान सभ सँ सीधा आवेदन लेबाक निर्देश देल गेल अछि। बैंक के भेटल आवेदन कऽ निपटारा जल्दी कऽ दस दिनक भीतर किसान क्रेडिट कार्ड देबऽ लेल कहल जाएत। उत्तर बिहार तीन टा रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे आएल तेजी पूर्व मध्य रेलवे उत्तर बिहारक तीन टा मुख्य रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रयास मे तेजी अनलक अछि। पूर्व मध्य रेलवेक सोनपुर मंडल महत्वपूर्ण मुजफ्फरपुर सँ हाजीपुरक मध्य रामदयाल-हाजीपुर रेल लाइनक दोहरीकरणक लेल तेसर बेर रेलवे बोर्ड के प्रस्ताव पठौलक अछि। 50 किलोमीटर कऽ एहि रेल लाइन पर 172 करोड़ टाका खर्च होएबाक संभावना अछि। एकर अलाबा सोनपुर मंडल द्वारा हाजीपुर-बढ़बाड़ा, आ कोसी रेलपुल (कटरिया-कुरसेला) रेल लाइनक दोहरीकरणक प्रस्ताव के अगिला रेल बजट मे स्वीकृतिक लेल पठौलक अछि। ज्यो एहि तीनु प्रस्ताव के स्वीकृति भेटि जायत तऽ सोनपुर मंडल सँ गुजरऽ बाला सभ रेल लाइनक दोहरीकरण भऽ जायत। एहि तीनु लाइनक दोहरीकरणक लेल मंडल कार्यालय तीन वर्ष सँ प्रयासरत अछि। वित्तीय वर्ष-2010-11, आ 2011-12 मे एहि लाइनक दोहरीकरणक प्रस्ताव पठाओल गेल छल जकरा रेलवे बोर्ड खारिज कऽ देने छल। रेल मंत्रालयक कमान बिहारक हाथ सँ छुटलाक बाद बिहारक प्रति रेलवेक उदासीनता सँ मंडल आ क्षेत्रीय कार्यालयक प्रयासक कोनो सकारात्मक प्ररिणाम नहि नकलल।एक बेर फरे वित्तीय वर्ष-2012-13क बजट मे एहि तीनू लाइन के स्वीकृत करैबाक लेल सोनपुर मंडल प्रयास सएलक अछि। गोटेक 541 करोड़ टाकाक संभावित खर्च बाला एहि तीनू रेल लाइनक दोहरी करण मेला सँ उत्तर बिहार सहित सम्पूर्ण मिथिलांचल मे आबाजाहि आसान भऽ सकत। एखन ई तीनू रेल लाइन पर सिंगल टैªक अछि जाहि सँ एहि तीनू लाइन पर टैªकक कमीक कारण गाड़ी सभ कतेको घंटा धरि फसल रहैत अछि। एहि योजना कें पूरा मेला सँ एहि रेल लाइन पर माल गाड़ीक परिचालन मे सेहो सुविधा होएत। पूर्व मध्य रेलवेक अन्तर्गत एखन सोनपुर-हाजीपुर आ कुरसेला-काढ़गोलाक रेल लाइनक दोहरीकरणक काज चलि रहल अछि। दोहरीकरणक लेल प्रस्तावित हाजीपुर बछवाड़ा रेल लाइनक 60 किलोमीटरक दोहरीकरण पर गोटेक 28 करोड़ टाका आ कोसी रेल पुल (कटरिया-कुरसेला) दोहरीकरण पर गोटेक 81 करोड़ टाका खर्च होएबाक अनुमान अछि। जन चेतना यात्रा मोदी सॅ सचेत अछि भाजपा भारतीय जनता पार्टीक वरिष्ठ नेत लाल कृष्ण आडवाणीक जन चेतना यात्राक लऽकऽ पार्टीक प्रदेश इकाई दिन-राति एक कएने अछि। सिताबदियारा सॅ लऽ कऽ बक्सरक उŸार प्रदेश सॅ सरल सीमा धरि श्री आडवाणीक स्वागत मे कोनो कसरि नहि नहि छोड़लक अछि। छोट सॅ पैघ सभ नेताक पोस्टर आब नजरि आबए लागल अछि। भाजपाक एहि पोस्टर मे सभ नेताक फाटो तऽ अछि मुदा प्रधानमंत्रीक दावेदार मानल जाए बाला गुजरातक मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदीक फोटो एहि पोस्टर मे नजरि नहि आबि रहल अछि। पार्टीक सूत्र सॅ भेटल जनतबक अनुसार पार्टी नेतृत्व एहि वास्ते सभके कड़गर निर्देश देने अछि जे एहि मात्रा मे कोनो तरहक विवाद नहि हो ते श्री मोदीक फोटो सॅ नेता आ कार्यकर्ता परहेज करथि। ओना गुजरातक विकास आ मोदी सरकारक कामकाज पर गर्व करऽ बाला भाजपाक अपन कार्यक्रम मे अपन नेता सॅ परहेज करबा सॅ भाजपा कार्यकर्ता भीतरे-भीतर मायूस छलाह। दरअसल भाजपा सॅ दोस्ती हाथ मिलौने बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नीक लगैत अछि मुदा नरेन्द्र मोदी संग हाथ मिलैबा सॅ हुनका रंज भऽ जाइत अछि ते नीतीश कुमार के खुश रखबाक लेल बिहार भाजपा श्री मोदी सॅ दूरी बना कऽ राखऽ चाहैत अछि। नरेन्द्र मोदी आ नीतीश कुमारक विवाद बिहार मे भेल पार्टीक राष्ट्रीय कार्यकारिणीक भेल बैसक मे खुलिक सोझा आएल छल आ मुख्यमंत्री द्वारा भाजपा नेता सभके देल गेल भोजक न्योत बिजो होमए सॅ पहिनहि रद्द कऽ डेग उठौनेरहल अछि। जन चेतना यात्रा सॅ पहिनहि भाजपा अचेत नहि भऽ जाए ते मोदीक फोटो सॅ परहेज कऽ हुनका सचेत करबाक प्रयास पार्टी कएलक अछि। ओना श्री आडवाणीक एहि प्रस्तावित यात्रा सॅ मोदी नाराज बुझि पड़ैत छथि। राष्ट्रीय कार्यकारिणीक बैसक मे नवरात्राक बहन्ने अनुपस्थित भऽ एकर स्पष्ट संकेत दऽ देलनि अछि। मोदीक नाराजगीक कारण आडवाणी गुजरात सॅ यात्रा प्रारंभ करबाक योजना के बदलि सम्पूर्ण क्रान्तिक प्रणेता जय प्रकाश जन्म भूमि सिताबदियारा सॅ यात्रा प्रारंभ करबा पर विवश भेलाह अछि। नीतीश कुमारक नरेन्द्र मोदी सॅ दूरी बनाएल रखबाक बीत लऽ बुझि पड़ैत अछि मुदा भाजपाक मोदी सॅ परहेज करब कार्यकर्ता सभके सेहो नहि गला सॅ नहि उतरि रहल अछि, मुदा पार्टी नेतृत्वक निर्देश मानब हुनक मजबूरि अछि। ओना पार्टीक एकटा आर वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी आ बिहार मे भाजपाक मजगूत स्तम्भ कैलाशपति मिश्र सेहो एहि बेर पोस्टर सॅ गायब छलाह। कहियो पार्टीक नारा छल भारत मॉ के तीन धरोहर अटल आडवाणी मुरली मनोहर। हालांकि अटल आ आडवाणीक प्रासंगिकता पार्टीक एखनो बुझा रहल अछि मुदा जोशी पार्टीक पेटारक धरोहर बनि गेल छथि। वास्तव मे नरेन्द्र मोदी पार्टीक कतेको नेताक लेल खतरा बनि गेल छथि। तें वातानुकूलित कमरा मे बैसि भाजपाक राजनीति कएनिहार दिल्ली ब्रान्ड नेता सभ हुनका राष्ट्रीय राजनीति मे दखल सॅ रोकबाक लेल एकजूट छथि। हालांकि पार्टी लग मोदीक फोटो नहि देबाक मजगूत तर्क सेहो अछि। ई तर्क अछि जे पार्टीक पोस्टर मे भाजपा शासित प्रदेशक कोनो मुख्यमंत्रीक फोटो नहि अछि तें मोदीक फोटो सेहो नहि अछि। यानि भाजपा मोदी के मात्र मुख्यमंत्री मनैत अछि। पार्टीक राष्ट्रीय नेताक रूप मे मान्यता देबाक साहस नहि कऽ रहल अछि कि एक तऽ एहि सॅ दिल्लीक कुर्सी पर कब्जा करबा मे बाधा आबि सकैत अछि। मोदीक भाजपाक पोस्टर बाय बनला सॅ राजगक कूनबा ठनमना जयबाक आशंका भाजपा के सेहो अछि। प्रधानमंत्री भाजपा भाजपाक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणीक जन चेतना यात्रा प्रदेश सॅ बिदा भऽ उत्तरप्रदेश मे प्रवेश कऽ गेल अछि। दू दिवसीय ई यात्रा बिना कोनो विवाद सफलतापूर्वक सम्पन्न भेला पर प्रदेशक भाजपाई चैनक सांस लेलनि अछि। यात्राक विरोध करबाक घोषणा मात्र घोषणा साबित भेल आ प्रधानमंत्री पदक उम्मीदवारी आ नरेन्द्र मोदी प्रकरण पर सेहो कोनो विवाद नहि आएब पार्टीक लेल राहत देबऽ बाला रहल। स्वयं आडवाणी सहित भाजपाक कोनो नेता सिताबादि यारा सॅ लऽ कऽ उŸार प्रदेशक सीमा धरि गोटेक 298 किलोमीटर यात्राक दरमियान नरेन्द्र मोदी शब्द धरि मूॅह सॅ नहि निकाललनि। हालाकि श्री आडवाणी प्रधानमंत्री पद पर अपन दावेदारीके खारिज करैत सफाई देलनि जे एकर निर्णय पार्टी करत मुदा उत्तर प्रदेश मे यात्रा प्रारंभ भेलाक संगहि प्रधानमंत्री पदक मामिला एक बेर फेर गर्म भऽ गेल अछि। महादेवक नगरी वाराणसी मे भाजपाक फायर ब्रान्ड नेत्री उमा भारती एहि मामिला पर अपन मूॅह कि खोललनि। पार्टीक भीतर घमासान प्रारंभ भऽ गेल। उत्तर प्रदेश मे भाजपाक जड़ि मजगूत करऽ मे लागत उमा भारती वाराणसी मे कहलनि जे जन जागरण यात्रा श्री आडवाणी के प्रधानमंत्री बनाओत आ देशक अगिला प्रधानमंत्री होएब तय अछि। आडवाणीक मतभेदक बाद पार्टी दोड़ि अपन अलग पार्टी बना राजनीतिक हैसियत बुझि चूकल सुश्री भारती एहि बेर आडवाणीक समर्थन मे मैदान मे कूछि गेला सॅ आडवाणी विरोधी खेमाक निन्द उड़ि गेल अछि। जखन बात प्रधानमंत्रीक हो तऽ भला केओ कोना चुप रहि सकैत अछि। राजनीति कोनो तपस्या नहि अछि। एहि मे सभक हित छोड़त अछि। ते देशक सर्वोच्च राजनीतिक पदक उम्मीदवारीक बाजार जखन खुजि गेल अछि तऽ सभ अपन-अपन शेयरक भाव बढ़बऽ मे लागि गेल छथि। सुश्री भारतीक आडवाणीक समर्थन मे देल गेल बयानक बाद वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हाक सक्रियता ई संकेत दडरहल अछि जे पार्टीक भीतर एक अनार सय बिमार क स्थिति अछि। श्री सिन्हा स्पष्ट कएलनि जे पार्टी मे प्रधानमंत्री पदक लेल कतेको योग्य नेता छथि। एहिये ओ अपना आपके सेहो सम्मिलित करैत कहलनि जे एहि पर अंतिम निर्णय पार्टी करत। हालाकि जन चेतना यात्रा के हरियर झण्डी देखा विदा करऽ बाला बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक राजनीतिक इंजीनियरिंग सेहो तेजी सॅ चलि रहल अछि। संसदक चुनाव मे एखन दू वर्ष अछि मुदा पदक लेल शह-मात करवेल एसनहि सॅ प्रारंभ भऽ गेल अछि। हिरेन पण्ड्या, संजीव भट्ट आ लोक पालक मामिला पर आलोचना सहि रहल गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सद्भावना मिशन मे खुलि कऽ समर्थन देबऽ बाला कतेको भाजपाईक आडवाणीक यात्राक समर्थन मे उतरला सॅ मोदीक दावेदारी एखन कमजोर भेल अछि आ शायद एहि कारण यात्रा पूर्व संध्या पर मोदी आडवाणीक समर्थन कऽ एखन तत्काल एहि विवाद पर विराम लगैबाक संकेत देलनि अछि मुदा आडवाणीक यात्राक सफलता स ॅप्रधानमंत्री पदक लेल हुनक दावेदारी मजगूत होएत। एहि वास्ते आडवाणीक पारिवारिक कूनबा सेहो मैदान मे उतरल अछि। श्री आडवाणीक बेटी प्रतिभा आडवाणी यात्राक संग-संग चलि पूरा व्यवस्था पर गहिर नजरि रखने अछि। आडवाणी एण्ड कम्पनी एहि बेर कोनो चूक नहि होमए देबऽ चाहैत अछि आ पीएम इन वोटिंगक सीट जनताक न्यायालयक माध्यम सॅ कान्फार्म करैबाक बेचैन अछि तऽ दोसर दिस राजगक दोसर घटक जदयू सेहो एहि पर नजरि रखने अछि। ज्यो राजग सताक लऽग पहूंचल तऽ भाजपाक भीतर आडवाणी मोदीक संघर्ष मे नीतीश कुमार राजगक सर्वसम्मति पसंद भऽ सकैत छथि। आ एहि मे आडवाणी खेमाक समर्थन सेहो भेटि सकैत अछि। ओना भाजपाक दशा आ दिशा ओकर मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तय करैत अछि ओहि दशा मे संघक पहिलआ अंतिम पसंद भाजपाक राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीन गडकरी भऽ सकैत अछि। श्री गडकरी पार्टीक नेता सभ के जोड़क झटका धीरे सॅ ओजन बढ़ैबाक तैयारी मे लागि गेल छथि। भाजपाक रथ पर सवार भऽ दिल्लीक गद्दी पर पहूचताह नीतीश? भाजपा सँ दोस्ती का मोदी सँ दूरी, ई अछि सत्ताक लेल राजनीतिक मजबूरी देश मे विपक्षीक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड पर सटीक बैसि रहल अछि। भ्रष्टाचार आ महगीक विरूद्ध भाजपाक वरिष्ठ नेता पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणीक प्रारंभ होमए बाला रथ यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा विदा करबाक निर्णयक जदयूक घोषणा सँ भाजपा राहतक सांस लेलक अछि। हालांकि जदयूक एहि निर्णय सँ राजगक भीतर प्रधानमंत्री पदक लेल संशय बढ़ि गेल अछि। एक दिस उपासक बहन्ने गुजरातक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पदक मजगूत दाबेदारी प्रस्तुत कएलनि अछि। मुदा भाजपाक भीतर मोदी विरोधी खेमा एहि रथ यात्रा लेल जदयूक समर्थन लऽ प्रधानमंत्रीक रूप मे श्री आडवाणीक दावेदारी के मजगूत करैबा मे सफल भेलाह अछि। रथ यात्राक लऽ कऽ भाजपा आ जदयू मे चलि रहल खीचतान के विराम दैत नीतीश कुमार एक बेर फेर अपना आप के कुशल राजनीतिक रंजिनियरक रूप मे सोझा अएलाह अछि। मोदीक संग पटना मे लागल पोस्टर पर नाराज होमय बाला श्री कुमारक आडवाणीक रथ पर सवार होएब दूरगामी राजनीतिक सोचक परिचायक अछि। नीतीश कुमार के एहि बादक अंदाज अछि जे केन्द्र के सत्ताक मे राजगक संभावना बनला पर प्रधानमंत्री पदक वास्ते भाजपा मे घमासान भऽ सकैत अछि आ एहि स्थिति मे आडवाणी खेमाक ओ पसिन्न बनि सकैत छथि। एखन राजग मे हुनक शासन व्यवस्था के लोहा मानल जा रहल अछि आ ओ एकर लाभ लेबाक सभ संभव प्रयास करताह। श्री कुमारक दूरगामी राजनीतिक कौशल विधान सभा चुनाव मे सेहो देखल गेल छला। विधानसभाक पहिल चरणक चुनाव अल्पसंख्यक बहुल क्षे मे छल आ जद यू साझा प्रचार अभियानक बादो पहिल चरणक चुनाव प्रचार मे लाल कृष्ण आडवाणी सँ दूरी बनौने छल। ओना लोक सभा चुनाव मे एखन समय अछि मुदा महगी आ भ्रष्टाचारक मामिला पर लाचार कांग्रेसक नेतृत्व वाला डा0 मनमोहन सिंह सरकारक विरूद्ध बनल वातावरण के भजैबाक लेल एखनहि सँ कसरत कऽ रहल अछि। हालांकि भाजपा दिस सँ एखन धरि प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नाम पर अंतिम सहमति नहिल बनल अछि मुदा जदयू राजगक प्रधानमंत्रीक उम्मीदवारक नामक घोषणा लेल अपना स्तर सँ दबाब बनाएब प्रारंभ कऽ देलक अछि। जदयूक नेता सभ एहि लेल नीतीश कुमारक नाम बेर-बेर उछालि रहल छथि हालांकि श्री कुमार बेर-बेर एहि पर सफाई दऽ अपन उम्मीदवारी के नकारि रहल छथि। तथापि आडवाणीक रथ यात्रा मे हुनक भागीदारीक घोषणा सँ प्रधानमंत्री पदक उम्मीदवारी राजगक लेल हॉट केक बनि गेल अछि। आडवाणी भाजपाक रथ यात्राक कुशल सारथि छथि। राम मंदिर आंदोलनक रथ पर सवार भऽ ओ भाजपा केऽ सत्ताक प्रमुख दावेदारक रूप मे स्थापित कएलनि अछि। देशक वर्तमान राजनीति कांग्रेस आ भाजपा के नेतृत्व मे ध्रुवीकरण भऽ गेल अछि। भाजपा महारथी एखन धरि राम रथ यात्रा जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा भारत उदय रथ याथ आ भारत सुरक्षा रथ यात्राक सारथी बनि चूकल छथि मुदा राम रथ यात्राक बाद रथ या़ाक बढ़ैत संख्याक संगहि जन समर्थन कम होईत गेल आब 11 अक्टूबर सँ जय प्रकाश जन्म भूमि सिताब दियारा सँ प्रारंभ होमए बाला रथ यात्राक सभ पर नजरि अछि। ओना महगी आ भ्रष्टाचार विरूद्ध भाजपाक भेल शंखनाद सम्मेलन कतेको ठाम भेल छल जे फ्लॉप शो साबित भेल छला। लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथयात्रा भारतीय जनता पार्टीक वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणीक महगी भ्रष्टाचारक विरूद्ध प्रस्तावित रथ यात्रा 11 अक्टूबर के सम्पूर्ण क्रान्तिक प्रणेता जय प्रकाशक जन्म स्थली उत्तर प्रदेशक सिताब दियारा सँ प्रारंभ भऽ छपरा होइत ओहि दिन राजधानी पटना पहूचत। 11 अक्टूबर के रात्रि विश्रामक बाद ई यात्रा 12 अक्टूबर के गयाक लेल विदा भऽ जाएत आ ओहि रास्ता सँ साझ मे झारखंडक सीमा मे प्रवेश करता। 11 अक्टूबर के एहि यात्रा के बिहारक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार झण्डी देखा कऽ विदा करताह। एहि अवसर पर लोकसभा मे विपक्षक नेता सुषमा स्वराज आ राज्य सभा मे विपक्षक नेता अरूण जेटली सेहो उपस्थित रहताह। भाजपाक रथ यात्राक सारथी श्री आडवाणीक ई छठम रथ यात्रा होएत। एहि सँ पहिने ओ राम रथ यात्रा, जनादेश रथ यात्रा, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा, भारत उदय रथ यात्रा आ भारत सुरक्षा रथ यात्रा कऽ चूकल छथि मुदा राम रथ यागा सन जन समर्थन आर कोनो यात्रा के नहि भेटल छल। बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग बिहारक विकासक लेल प्रदेश मे नव नव उद्योग लगैबाग नीतीश सरकार प्रयास लगातार चलि रहल अछि एहि कड़ी मे सरकार आब एफएमसीजी कम्पनी दिस ध्यान देलक अछि। आईटीसी, नस्ले आदि कम्पनी द्वारा प्रदेश मे निवेश करबाक योजनाक बाद आब डिटर्जेंट आ साबूनक क्षेत्र मे बहुराष्ट्रीय कम्पनी के टक्कर दऽ रहल घड़ी डिटर्जेंट आ साबून के इकाई प्रदेश मे लगैबाक योजना अछि। कानपुरक आरएसपीएलक ई उत्पाद बिहार मे बनैबाक लेल कम्पनी सरकारक संग गपसप कऽ रहल अछि। सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनी एहि योजनाक लऽकऽ गंभीर अछिआ गोटेक 100 करोड़ टाका निवेश करत। उद्योग विभाग प्रधान सचिव सी.के. मिश्रा जनतब देलनि अछि जे निवेशक के आकर्षित करबाक लेल सरकारक रणनीति सफल भऽ रहल अछि। पैघ कम्पनी दिस सेहो ध्यान देल जा रहल अछि। घड़ी डिटर्जेन्ट बनबऽ बाला आरएसपीएल पटना सँ सटल फतुहा लऽग जमीन पसिन्न कएलक अछि। आशा अछि जे एहि मासक अंत धरि एहि पर अंतिम निर्णय भऽ जाएत आ विस्तृत प्रस्ताव सरकार धरि पठा देल जाएत। दोसर दिस आईटीसी सेहो अपन कारोबार बढ़ा रहल अछि। कम्पनी मूंगेर मे स्थापित अपन इकाईक लऽग-पास मे नव डेयरी इकाई खोलबाक निर्णय लेल अछि। एहि इकाई मे 100 सँ 200 करोड़ टाकाक मध्य निवेश करत। एहि मध्य बहुराष्ट्रीय कम्पनी नेस्ले बिहार मे प्रस्तावित योजनाक संदर्भ मे तऽ किछु स्पष्ट नहि कएलक अछि मुदा सरकारी सूत्रक अनुसार कम्पनीक संग गप-सप चलि रहल अछि। कम्पनी के पटनाक लऽग-पास मे ऊंच जगह पर जमीनक खोज कएल जा रहल अछि। कम्पनीक एहि प्रस्तावित इकाई सँ चॉकलेट आ मैगी नूडल्सक उत्पादन होएत। अपन कूनबा बचबऽ लेल मैदान मे उतरलाह सुप्रीमो तीरक निषान पर अछि लालटेन। छओ मासक मौनक बाद राष्ट्रीय जनता दलक अध्यक्ष लालू प्रसाद अपन दलक पदाधिकारी आ कार्यकर्ताक संग बैसक कऽ प्रदेष मे सŸाारूढ़ नीतीष सरकारक विरूद्ध आंदोलन पर करबाक घोषणा कएलनि अछि। सŸाारूढ़ जदयू द्वारा राजदक सहयोगी लोक जनषक्ति पार्टी मे सेधमारी कएलाक बाद अपन दलक एकजूट करबाक लेल श्री प्रसाद क सक्रियता सँ प्रदेष राजनीतिक पारा चढ़बाक संकेत भेटि रहल अछि। दरअसल बिहार विधान परिषद् मे लोजपाक अस्तित्व समाप्त होएब आ बिहार विधान सभा मे लोजपाक अस्तित्व पर संकट के देखि लालू प्रसाद अपन कूनबा बचैबाक लेल डैमेज कंट्रोल अभियान प्रारंभ लऽ कएलनि मुदा हुनक एहि अभियान के हुनक विष्वसनीय दूटा सांसद डा0 रघुवंष प्रसाद सिंह आ जगदानंद हवा निकालि देलनि। दूनू सांसद एहि बैसक मे अनुपस्थित रहि ई संकेत देलनि जे दलक भीतर एखन सभ किछु ठीकठाक नहि अछि। जखन कि तेसर सांसद उमाषंकर सिंह एहि बैसक सूचना नहि होएबा बहाना बना दलक नेतृत्व क सोझा खुलल चुनौती देलनि अछि। लोकसभा चुनाव मे राजदक खराब प्रदर्षनक बाद दलक कतेको वरिष्ठ नेताक दल छोड़बाक जे सिलसिला प्रारंभ भेल छल जे विधान सभा चुनाव सँ पहिने धरि चलैत रहल आ ई सिलसिला एखनो जारी अछि। हालहि मे लालूक विष्वसनीय बुझल जाए बाला दल महासचिव राम वचन राय आ प्रवक्ता शकील अहमद खानक राजद के छोड़बाक घटना सँ दलके नोकषान भेल अछि। एहि क्रम मे हुनक सहयोगी लोजपाक अस्तित्व पर आएल संकट के देखि स्थिति के भापि लालू प्रसाद अपन कूनबा के बचैबाक लेल अपन दिल्ली मोह के त्यागि बिहारक रूख कएलनि अछि। श्राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद आ लोजपा अध्यक्ष राम विलास पासवानक दिल्ली प्रेम सँ दूनू दलक कार्यकर्ताक उत्साह ठंढा पड़ि गेल छल। एकर असरि विधान परिषद् मे लोजपाक जदयू मे विलयक रूप सोझा आएल। प्रदेष मे राजक कतको कार्यक्रम आ चर्चित फारबिसगंज काण्ड मे राजद सुप्रीमोक निष्क्रियता सँ सरकारक विरूद्ध राजदक हमला कमजोर पड़ल तऽ बियाडा जमीन आवंटन मामिला मे विपक्षक कड़गर रूखक बाद जदयू लोजपा आ झामुमो पर डोरा डालि विपक्षक हमलाबर धार के भोथर बना देलक अछि। राजदक वरिष्ठ नेता सभक मध्य बढ़ैत दूरी सँ दलक संकट गहिर भ्ऽ गेल अछि आ पटना मे भेल बैसक लालू प्रसाद स्वयं संकट मोचकक रूपम े उपस्थित भऽ दलके एकजूट करबाक प्रयास तेज कऽ देलनि अछि। केन्द्र मे मंत्री पदक कुर्सीक जोड़तोड़ मे लागल श्री प्रसाद आ श्री पासवानक स्थिति एखन ‘‘माया मिलि न राम ’’ बाला भऽ गेल अछि। दूनू नेता के कांग्रेस दिल्ली दरबार सँ रास्ता देखा देलक आ इम्हर प्रदेष मे दूनू दलक ऊपर संकटक मेघ घुमि रहल अछि। विधान परिषद् मे बग्ला उजरि गेल अछि तऽ विधानसभा मे जदयूक बिहारि सँ बंग्ला के बचैबाक प्रयास भऽ रहल अछि। दोसर दिस लालू प्रसाद अपन राजनीतिक कौषलक मटिया तेल सँ लालटेन क लौ के तेज करबाक प्रया समे मैदान मे उतरि गेल छथि। श्राजदक आत्मचिंतन बैसक मे कार्यकर्ताक पैघ उपस्थितिक मध्य कतेको वरिष्ठ नेताक अनुपस्थिति सँ पहिल बेर राजद सुप्रीमो के खुलल चुनौती भेटल अछि। लालू प्रसादक परिवार पहिनहि छिरिया गेल अछि आ आब दल पर छिरियैबाक संकट आबि गेल अछि। लालू प्रसादक एहि सक्रियता सँ संभव अछि जे लालटेनक लौ किछु दिन धरि स्थिर रहए मुदा ई कखन मिझा जाएत से नहि कहल जा सकैत अछि। लालू प्रसाद आ राम विलास पासवानक नव दिल्ली मे कांग्रेस सँ दोस्ती बढ़ैबाक छोड़ मे प्रदेष ये दूनू दलक जड़ि हिलि गेल अछि। दूनू नेता अपन ढजनमनाएल घरके सम्हारऽ मे कतेक सफल भऽ सकताह से तऽ आबऽ बाला मे पता चलत। जदयूक वार सँ भोथर भेल विपक्षक धार बिहार विधान सभा मे लोक जनषक्ति पार्टीक अस्तित्व पर संकट बढ़ि गेल अछि। पार्टीक तीनटा सदस्य मे सँ टूटा सदस्य प्रमोद कुमार सिंह आ नौषाद आलम बिहार विधान सभाक अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के चिट्ठी लिखि पार्टीक जदयू मे विलयक सूचना देलनि अछि। हालांकि नौषाद आलम पार्टी अध्यक्ष राम विलास पासवान सँ गपषप कएलाक बाद लोजपा मे अपन आस्था व्यक्त करैत विलयक अपन सूचना आपस लऽ लोजपा केऽ राहत देलनि अछि। विधान सभा अध्यक्ष एखन विदेषक यात्रा पर छथि। तेँ एहि पर एखन धरि कोनो निर्णय नहि भेल अछि मुदा राजनीतिक क्षेत्र मे चलि रहल चर्चाक अनुसार एकर संभावना एखनो बनल अछि जे विधानसभाध्यक्षक आपस अएलाक बाद विधान परिषद जका विधान सभा मे सेहो लोजपा क बंग्ला उजरि सकैत अछि। चर्चा तऽ इहो अछि जे आबऽ बाला समय मे राजदक संकट सेहो बढ़ि सकैत अछि। एकर संकेत सेहो भेटि रहल अछि। पछिला दिन नव दिल्ली मे बाबा रामदेव पर भेल पुलिसिया कार्रवाई पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसादक स्टैण्डक विरोध मे राजदक विधान पार्षद नवल किषोर यादवक बयान एहि बाद क संकेत अछि जे दलक भीतर फुलि रहल। विद्रोहक बैलून कखनो फूटि सकैत अछि। बियाडा जमीन आवंटन मामिला मे विपक्षक एकजूटताक बाद सक्रिय भेल जदयू नेतृत्व विपक्षक हवा निकालबाक जे रणनीति बनौलक ओकर परिणाम तत्काल सोझा आएल अछि। लोजपाक एकटा चक्का पम्चर (विधान परिषद् सँ सफाया) आ दोसर चक्काक हवा (विधानसभा मे संकट) निकलि गेल अछि जे कखनो पम्चर भऽ सकैत अछि तऽ राजदक लालटेन टिमटिमा रहल अछि। जदयूक विपक्षक सर्जरीक अभियान मे ज्यों कांग्रेसक सेहो ऑपरेषन भऽ गेल तऽ कोनो आष्चर्य नहि होएत। सरकारक राष्ट्रीय विरूद्ध आंदोलन करत राजद प्रदेष मे राष्ट्रीय जनता दलक अस्तित्व बनाएल रखबाक लेल राजद अपन संगठन के मजगूत करबा अभियान मे लागि गेल अछि गोटेक छओ मासक मौनक बाद अपन चुप्पी तोड़ैत राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद नीतीष सरकारक विरूद्ध आंदोलनक कएलनि अछि। राजद एहि क्रम मे लोक नायक जय प्रकाषक जयंतीक अवसर पर 11 अक्टूबर के पटना मार्चक घोषणा कएलक अछि। एहि सँ पहिने 1 सँ 30 सितम्बर धरि सभ जिला आ प्रमंडल मुख्यालय मे कार्यकर्ता सम्मेलन होएत जाहि मे लालू प्रसाद सेहो उपस्थित रहताह। 1 अक्टूबर मास मे पार्टीक कार्यकर्ताक प्रषिक्षण षिविर बोध गया मे आयोजित कएल जाएत आ नवम्बर-दिसम्बर मास मे सभ प्रखण्ड मुख्यालय मे दू दिवसीय कार्यकर्ता षिविर आयोजित करबाक निर्णय सेहो लेल गेल अछि। डेयरी उद्योग मे रूचि देखौलक इंडियन पोटाष लिमिटड इंडियन पोटाष लिमिटेड प्रदेष मे डेयरी उद्योग लगैबाक प्रति रूचि देखौलक अछि। कम्पनीक अध्यक्ष गोविंद नैयर मुख्यमंत्री नीतीष कुमार सँ भेट कऽ कम्पनी भावी योजना जनतब देलनि। श्री नैयर मुख्यमंत्री भेटक क्रम मे मुजफ्फरपुरक मोतीपुर चीनी मिलक पुर्न संरचना आ विस्तार क जनतब दैत जनौलनि जे एहि मिल मे बिजलीक सह उत्पादन आ बाटलिंगक संग डिस्टलरी प्लांट लगाओल जाएत। एहि पर 350 करोड़ टाकाक निवेष होएत। कम्पनी मुजफ्फरपुर मे अपन कारखानाक एकटा ईकाई केऽ सेहो पुनर्जीवित कएलक अछि जतए प्रतिदिन सय टन सिंगल सुपर फास्पेटक उत्पादन कएल जा रहल अछि। श्री नैयर भेटक दरमियान बिहार मे कम्पनीक डेयरी उद्योग लगैबाक प्रति सेहो रूचि देखौलनि। कोसीक प्रलयक तीन वर्ष कोसीक प्रलयक तीन वर्ष अठारह अगस्त के पूरा भऽ गेल। तीन वर्ष पहिने जखन कोसीक प्रचण्ड बेग मे मिथिलांचलक एकटा भाग कोसी मे विलीन भऽ गेल छल तऽ सरकारी आ गैर सरकारी संस्था सभ एहि तरहे मेहरबान छल जे लोक सभ आशा बनल जे बर्बाद भेल क्षेत्र फेर से आबाद होएत। आ किछु हद धरि रास्ता पर सेहो आएल अछि। लोक जीवन फेर सँ पटरी पर आबि रहल अछि मुदा सरकारी व्यवस्थाक काहिलि मे कोनो परिवर्तन नहि देखल जा रहल अछि। कोसीक त्रासदीक बाढ़ बिकहार सरकार पैद्य-पैद्य घोषणा कएलक। ओहि मेे किछु जमीन पर उतरल तऽ किछु पटना सँ प्रभावित क्षेत्र धरि पहूचाए सँ पहिने आकाश मे उड़ि गेल। कोसी मे समा गेल एकर चिन्ता नहितऽ पीड़ित कएलनि आ नहि सरकार। एहि क्रम मे ‘कोसी जांच आयोग‘ सेहो अस्तित्व मे आएला कोसी के घाट मे भसियाएल क्षेत्रक जका इहो आयोग जेना भसिया गेल अछि। न्यायमूर्ति राजेश कलियाक अध्यक्षता बाला एक सदस्यीय आयोग गोटेक छत्तीस भासक अपन कार्यकाल मेे एकहूटा अंतरिम रिपोर्ट नहि देलक तऽ भला अंतिम रिपोर्टक चर्चा करब बेवकूफी होएत। उत्तर बिहारक बाढ़ि बिहारक बाबू आ अभियंता सभ लेल सोनाक अण्डा देबऽ बाला मुर्गी अछि। प्रति वर्ष बाढ़ि सँ, बचाव, बाढ़ि राहत आ बाढ़िक बाद पुनर्वास आ मरम्मतिक नाम पर सरकारक खजाना बाढ़िक पानि जका बहि जाइत अछि। एहि तरहे कोसी जांच आयोग बाबू आ कर्मचारीक लेल आराम गाह बनि गेल अछि भेटल। जनतबक अनुसार आयोगक सर्वसर्वा न्याायमूर्ति बालिया छत्तीस मासक एहि कार्यकाल मे छतीसो बेर कार्यालय नहि अएलाह अछि मुदा आधुनिक सुविधा सँ युक्त कार्यालय मे अपन हाजिरी लगबऽ बाबू आ कर्मचारी जरूर अबैत छथि। किएक तऽ ई कार्यालय मनोरंजन केन्द्र बनि गेल अछि। कार्यालय कम्प्यूटर से कोसी क्षेत्रक भविष्य संबंध मे भने एको पन्ना बहि निकलल हो मुदा एहि काम तैनात कर्मचारी के ई कम्प्यूटर तास आ आन खेलक सुविधा बिना रूकावट उपलब्ध करा रहल अछि। जखन भला सरकार आयोगक गठित एकरा सभ सुविधा उपलब्ध करा अपन काज समाप्त बुझि लेलक अछि तऽ भला कर्मचारी सभक कोन दोष? ज्यो जनता सरकारक राहत, बचाव आ जांच आयोगक गठन सँ संतुष्ट अछि तऽ भला सरकार रिपोर्टक प्रति किएक सक्रिय होयत। कोसीक जनता कोसीक बाढ़ि मे अपन जमा-पूंजी बहबऽ लेल मजबूर अछि आ सरकार कोसीक त्रासदीक जांचक लेल सरकारी खजाना के बहा अपन दायित्व समाप्त बुझि रहल अछि। भंगिमाक चुनाव सम्पन्न, कुणाल अध्यक्ष्य आ जयदेव सचिव निर्वाचित मैथिली नाट्य संस्था ‘भंगिमाक‘ आम सभाक बैसार पटनामे वरिष्ठ रंगकर्मी कुणालक अध्यक्षतामे सम्पन्न भेल। एहि बैसारमे संस्थानक नव कार्यकारिणीक चुनाव कराओल गेल। निर्वाची पदाधिकारी वरिष्ठ मैथिल समाजसेवी प्रेमकांत झा सर्वसम्मति सँ वरिष्ठ रंगकर्मी कुणालकेँ अध्यक्ष, मोद नारायण झाकेँ उपाध्यक्ष, जयदेव मिश्रकेँ सचिव, उमाकांत झाकेँ कोषाध्यक्ष, मुकुल कुमारकेँ संयुक्त सचिव आ नवेन्दु कुमार झाकेँ संगठन सह प्रचार सचिव निर्वाचित घोषित कएलनि। एहिसँ पहिने बैसारमे अपन विचार रखैत रंगकर्मी आ सामाजिक कार्यकर्ता सभ प्रदेशमे मैथिली रंगकर्मक गतिविधिमे तेजी आनब आ संस्थाकेँ मजगूत करबापर जोर देलनि। बैसारमे कुमार गगन, ब्रहनानन्द झा, लक्ष्मी रमण मिश्र, कमल मोहन चुन्न, रितू कर्ण, प्रियंका सहित कतेको मैथिली रंगकर्मी उपस्थित छलाह। प्रदेश मे लागु भेल सेवाक अधिकार कानून स्वतंत्रता दिवसक अवसर पर बिहार सरकार एतिहासिक डेग उठबैत भ्रष्टाचारक सफायाक लेल प्रदेश मे सेवाक अधिकार कानून लागू कऽ देलक। पंद्रह अगस्त सँ लागु भेल भेटि कानून सँ आब जनता के तय समय सीमाक भीतर सरकारी सेवा भेटि सकत। बिहान विधान मंडल पछिला दो मई के एहि कानून के पास कएने छल। सेवाक अधिकार कानून लागु करए बाला बिहार देशक पहिला प्रदेश अछि तीन चरण मे लागु कएल जायबाला एहि कानूनक पहिल चरण मे दस विभागक पचासटा सेवा के एकरा दायरा मे राखल गे अछि आबए बाला समय मे आन सेवा के सेहो एहि कानूनक दायरा मे अनबाक योजना अछि। तय समय सीमा मे काज नहि भेला पर सरकारी कर्मी पर दो सौ पचास टाका प्रति दिनक आर्थिक दण्डक प्रावधान सेहो कएल गेल अछि। एहि कानूनक दोसर चरण मे एहि सेवाके आन लाइन कऽ देल जाएता कोनो व्यक्ति अपन घर बैसल आवश्यक सेवाक लेल आन लाइन आवेदन कऽ सकताह आ तेसर चरण मे जनता द्वारा देल गेल आवेदनक निपटारा कऽ हुनका घर पर सेवा उपलब्ध करादेल जाएत। ई व्यवस्था अगिला वर्ष छब्बीस जनवरी सँ प्रारंभ होएत। एकर अंतर्गत तत्काल सेवा सेहो प्रारंभ कएल जाएत आ पूरा व्यवस्थाक क आन लाईन मॉनिटरिंगक व्यवस्था सेहो कएल गेल अछि। एहि कानूनक सफल कार्यान्वयनक लेल सभ जिला मे एक-एकटा आईटी प्रबंधक, आआइटी सहायक तथा प्रखण्ड सभ मे एक-एकटा अटेनडेन्टक तैनाती कएल गेल अछि। शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक। नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल युनेस्को आ केन्द्र सरकार के सहयोग सँ बिहार राज्य मे चलायल जा रहल सर्वशिक्षा अभियान केर तहत नीतिश सरकार द्वारा शिक्षक नियोजन मे महिलाक लेल पचास प्रतिशत आरक्षणक बाद नारी सशक्तीकरण केर लक्ष्य पर ओकर नीक असर धरातल पर देखल जा सकैत छैक. आइ दूई-चारि साल सँ सुपौल आओर सहरसा शहर केर टेम्पू वा मेक्सी स्टैंड पर आठ सँ साढ़े नौ बजे धैरक बीच बेसी नवतुरीया आ किछु प्रोढ़ महिला लोकनि पर्स लटकौने, अपना केँ एकटा सुभ्यत शिक्षिकाक ‘लूक’ मे स्कूल पकड़वाक लेल अस्त-व्यस्त भेट जाइत छथि. आँखिक देखल तँ नहि अछि मुदा अंदाज करै छी जे कि मिथिला अंचलक कोनो आन शहर वा एकर कोनो पैघ गाम केर स्टैंडक स्थिति सेहो एकरा सँ भिन्न नहि हेतैक. शुरूआति मे तँ ई सभ शिक्षिका लोकनि अपन अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक सँग पाछु लागल ओहिना लजैल-धखैल अपन गनतव्य स्कूल दिस मुँहयाल चलि जायल करैत छलिह. मुदा आइ स्थिति बदललैक. एक तँ हिनका सभ मे आब गाम-घर सँ असगर बहरैवाक आत्मविश्वास बढ़लैक आ तेँ हिनका सभक लजैल, धकैल आ डरैल चालि-ढालि मे सेहो परिवर्तन एलैक. दोसर जे एही शिक्षिका-वर्ग मध्य जाति-धरम सँ ऊपर उठि कय सहकर्मी संग बहिनपाक नव संबंधक विस्तार भेला उपरान्त घर सँ स्कूलक बीचक हिनकर वाट सेहो आब निरस नहि रहलैक. बहिनपाक ई संबंध बढ़ला सँ पहिने जे मैथिल स्त्रीगण मे स्व-गाम, सम-जाति, वा स्व-धरम केर पुरान सूत मे बुनल अपनत्वक जटिल जाल देखल जाइत रहैक, तकर गुत्थी मे फेर सँ, एकटा अलग नवका सूत जकाँ सहकर्मी बहिनपाक अपनत्व-संबंध जाल सेहो बेधल गेलैक. आई शहर वा गाम केर एहि स्टैंड पर ई सभ शिक्षिका बहिनपाक मध्य मुस्कियावैत वा हाथ हिलवैत अभिवादन, एक-दोसर लेल जगह राखैक व्यवहार, वा एक दोसरक लेल भाड़ा देवाक जिद्द भरल आग्रह, केर घटना आम रूपे देखल जाइत छैक, जकर की पहिने मिथिलाक गाम-शहर मे अभाव देखल जाइत रहैक. आब जेना लागैत छैक जे घर सँ बाहरो मैथिल स्त्रीगणक उपस्थिती छैक. टेम्पु आ मेक्सी वाला जे निछछ पुरूखे होइत अछि सेहो प्रायः एहि शिक्षिका लोकनि केँ आब नाम, मुहल्ला आ स्कुल सँ चिन्हैत छथिन. एहि पुरूखक लेल ’ऑफ़िस ऑवर’क ई समय सबसे बेसी व्यस्तम, चुटकी भरल, आ मधुरतम होवय लागल छैक जकर चर्चा मास्टरनी वर्गक लोक करैत रहैत छथि. मुदा आई घर सँ बाहर सड़क पर एहि मे सँ किओ महिला एसकर नहि छथि बल्कि हुनका संग हिनक एकटा सम्पूर्ण वर्ग अछि आ संजोगे सभ गोटय मास्टरीये पेशाधारी. तेँ हिनका सभ के आइ सड़क पर निधोख निकलवा मे आत्मविश्वास आ सुरक्षा-भाव बेसी छैन्हि. सँबंधक ई नवका जालक ताना-बाना खाली महिला महिलाक बीच पसरलैक अछि सेहो बात नहि छैक. एकर पसार महिला आ पुरूखक मध्य सेहो भेलैक. अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक उपस्थिति सँ स्वतंत्र भेला सँ एहि नवतूरिया शिक्षिका लोकनिक लाज-धाक सेहो टुटलैक. ताहि सँ मैथिल समाज मे परस्त्री आ परपुरूख वर्ग केर बीचक अनेर दूरी राखय वाला जे पुरानपंथी बन्हन रहैक सेहो ढ़ील होइत बुझाइत छैक. एके विभागक कर्मी होवाक चलिते शिक्षा विभागक कोनो नव वा प्रस्तावित नियम, शिक्षा अधिकारिक औचक निरीक्षण आ तकर वादक घटनाक्रम, वा एक-दोसरक स्कूलक रोचक घटना मे दिलचस्पी, एहि स्त्री आ पुरूख शिक्षका-शिक्षक केँ आपसी संबंधक जाल केँ पसारै मे महत्वपुर्ण कारक बनलैक. एक तँ मिथिला संस्कृति मे नारी केँ उचित सम्मान देवाक विचार आओर दोसर केर माय-बहीन केँ अपन माय-बहिन बुझबाक पुरातनी व्यवहार पुरूख वर्ग केँ टेम्पू/मैक्सी पर महिला लेल सीट छोड़वाक लेल आ महिला वर्ग केँ आभार करै लेल बरवेश रहैक. ओतही दोसर दिस, बिपरीत लिंगक प्रति स्वाभाविक मानवीय आकर्षन किछु रसगर शिक्षक लोकनि केँ महिला लोकनि केँ चहटगर गप्प-सप, किस्सा-पिहानी, चुटकुला-मनोरंजन सुना क’ वा कोनो आन तरहक सहयोग क’ क अपना दिस आकर्षित करवाक अवसर आनैत रहैत छैक. खास कय कोशी दियरा प्रदेश केर अनेक पंचायतक विद्यालय मे काज केनिहार शिक्षका/शिक्षक सभ जखन बलुआहा, महिषी, मैना आदि कोशी घाट वाट टपैय जाइत छथि तखन नाह पर चढवा काल जनि-जाति केँ पुरूख लोकनि केर सहयोगक बेसी जरुरति होइत छन्हि. जेना कि पानि मे ठार भय नाह पकड़नाय, नाह पर स्त्रीगण केँ बैसैक जगह देनाइ, आ सबसे बेसी महिला वृन्दक संग सहानुभुति आ सभ्यताक संग व्यवहार, जनि-जाति वर्ग के प्रभावित करवाक लेल बड्ड महत्वपूर्ण होइत छैक. जे अन्ततः एहि नव नियुक्त शिक्षक- शिक्षिकाक बीच मित्रताक संबंध केँ गाढ़ बना रहल छैक. मानल जाइत अछि जे नवनियुक्त पखंड आ पंचायत शिक्षकगण मे बेसी गोटय समृद्ध घर के छथि. एहि लोकनि मे नौकरी सँ पहिने बेरोजगारी तँ छल मुदा हुनका सभ केँ खाइ-पिवाक वा ऐस-मोज करवा केर साधनक पहिनो कमी नय छल. गाम घर मे रहनिहार एहन लोकनि केँ जखन गामे-घरक आस-पास केर स्कूल मे नौकरी भेट गेलन्हि तँ ई बुझु जे हिनकर भाग्य फ़ुजि गेलन्हि. एक तँ घर सँ खाइते पीते रहथि, दोसर आब ई सभ अपन बूढ़ माय बाप केँ देख रेख केर अतिरिक्त अपन जमीन जथा केँ बटेदारी लगा केँ ओकर देख-रेख सेहो करै छथि, आ तेसर जे दरमाहा मे जे किछ पाँच छौ हजार महिना पाइ-कौड़ी होइत छनि ओ सभ बैंक खाता मे अक्षैत राखल रहैत छन्हि. ई सभ मास्टर साहैब लोकनि एकहक टा के मोटर-साईकिल ल’ लेने छथि आ अपन योवनक मस्ती मे जेना पहिया लगा लेने छथि. नाह मल्लाह वाला रस्ता मे यदपि तरदूत छैक मुदा एहि तरदूतक उपरान्तो गाड़ी रहला सँ मास्टर साहेव लोकनि केँ ई लाभ छन्हि जे कोशी दियरा प्रदेश सनक अबूहो जगह पर समय पर पहुँच जाइत छथि आओर दुर्गम प्रदेशक बच्चा लोकनि केँ दू अक्षरक बोध दैत देस निर्माण मे सहभागी बनल छथि. तखन कोनो मास्टर साहेबजी केँ जँ कहिओ साइत-संयोगें मनपसंद मास्टरनी साहेब केँ अपन गाड़ी पर बैसा केँ हुनका स्कुल तक छोड़वाक अवसर भेट जाइत छनि तेँ ओ, हमर एकटा संबंधक दियर मास्टर साहेबक शब्द मे, अपन जीवनक बड्ड अनमोल आ भावुक समय होइत छन्हि. हिनका शब्द मे, ओहि मे काम-वासनाक बोध तँ बहुतो कम छैक परंच ओही स बेशी एकटा महिला केँ सहयोग क’ क’ हुनका इम्प्रेस करैक आत्माभिमान केर मनोबोध बेसी प्रबल छैक. महिला पुरूखक मध्य मनोभावनात्मक संबंधक ई विस्तार वास्तव मे हिनका सभक मानसिकता मे छुपल प्रेम संबंध आ प्रेम विवाह केर संभावना आ सामर्थ्य केँ सेहो परिलक्षित करैत छैक. अपन दिअर मास्टर साहेबक गप्प सुनि एकटा गप्प मोन मे आबैत अछि. मिथिलाक गाम-घर मे जँ श्रमिक वर्गक जनि-जाति केँ छोरि देल जाइ तँ कोनो भी जाति, धरमक कनियो टा सुभ्यस्त परिवार मे नवतूरे सँ स्त्रीगण केँ अँगना सँ बहरेवाक प्रचलन कम भ’ जाइत अछि आ ई व्यवहार ता बुढ़ापा चलैत रहैत अछि. हाँ, शहर मे ओ जे किछु करै छथि ओतय हुनका पर सामाजिक अंकुश कम होइत छन्हि. मुदा जा धरि ओ गाम घरक छहरदेवाली मे रहैत छथि ता धरि स्त्रीगण केँ अपना व्यवहार मे अपन यौन सदाचार आ परपुरुष सँ दुरी देखवैत रहय पड़ैत छैक. एकर अनदेखी भेला सँ समस्त पुरखा आ खानदान के नाक कटय लगैत छैक. तेँ गाम-घरक परिसीमा मे एखनहुँ प्रेम वा प्रेम विवाहक संभावना नगण्य रहैत छैक. मैथिल समाज मे प्रेम विवाह पर ई रोक खाली अपन स्त्रीगणेक आचरण पर अंकुस राखि नहि करैत अछि बल्कि अपन पुरूख पात्र द्वारा कोनो महिलाक संग कयल गेल छेड़खानी, वदतमीजी, वा घरढ़ुक्की केँ कुकर्मक श्रेणीक बुझैत छथि. पुरूखो पात्र द्वारा कयल गेल कोनो एहन अपराध समस्त पुरखा आ खानदानक पाग नीचा गिरावैत बुझल जाइत छैक. खास क क मैथिल ब्राह्मण आ करण कायस्थ समाज मे जा धरि पाँजि व्यवस्था प्रचलन मे रहलैक ता धरि तँ पुरुख पात्रक एहन सभ यौन अपराध समुचा खानदान केर पाँजि के पतीत करेवा मे महत्वपुर्ण रहलैक. मुदा पाँजि व्यवस्था कमजोर भेलाक बाद मैथिल समाज अपन पुरूख वर्गक एहन व्यवहार पर तँ बहुत ढ़ील द देल बुझाइत छथि मुदा अपन स्त्रीगणक सदाचारक व्यवहार पर बेसी दृढ़ आ शंकालु रहि गेलखिन. स्त्री आ पुरूख संग असमानताक ई व्यवहार केर चलितवे पुरूख लोकनि तँ समय अनुकूल आगु बढ़तै चलि गेलाह मुदा स्त्रीगण समय केर संग डेग नहि बढ़ा सकलीह. आइ जखन मास्टरी पेशा मे मैथिल स्त्रीगण केँ आरक्षण द क व्यापक संख्या मे गाम-घरक महिला वर्ग केँ घर सँ बाहर निकलवाक अवसर भेटलैक तँ हिनका लोकनि केर नीजी जीवन सेहो सर-संबंधीक पुरूख पात्र केर तीछ्ण नजरि सँ कनेकटा दूर भेलैक. जतय ओ पुरूख वर्गक संग बैस कय अन्य आधुनिक समाज जकाँ प्रेम, प्रेम विवाह, अन्तर्जातिय विवाह, पुरूखक शोषण, स्त्रीक दोयम दर्जा, आदि विषय पर खुलि कय बात कय सकैत छथि. एकर स्वीकृति हुनका पहिने घर-आँगन केर छहरदेवालीक अंदर नहिये केर बराबर छल. हमरा विचारे जे एतय ई ध्यान राखव जरूरी कि प्रखण्ड/पंचायत शिक्षिका मे बेसीतर वोएह महिला छथि जे वेसी काल गामे घर मे रहलीह आ आइयो तक गाम घरक सामाजिक जीवन सँ समायोजित भ’ रहल छथि. दोसर दिस स्त्री-पुरूखक भावनात्मक, कल्पनात्मक आ दैहिक संबंध केर अनुभवहीन युवक-पुरूख पात्र छथि जे मैथिल समाज मे स्त्री पर एहेन अंकुशक कारण आइ धरि अपन माय-बहिन, भगिनी-भतीजी, वा अन्य कोनो निकट संबंधी सँ वेसी दुर केर एहने अनुभवहीनता वाली स्त्रीगणक संपर्क मे नहि एलाह. एहन युवक युवतीक मन मे भावनात्मक आ कल्पनात्मक प्रेम केर ’इड’ दबि केँ रहि गेलैक. स्त्रीगण पर तँ बहुत बेसी सामाजिक दबाब रहलैक. मुदा पुरूख पात्र मे एहन लोक बेसी काल अपन विपरित लिंगी आकर्षन केर फ़्रसट्रेशन केँ कोनो असगरूआ पकड़ैल स्त्रीगण पर अस्लील फ़ब्ती कसि कसि क’ वितेलाह. तखन एहने वा कोनो नीको सदाचारी आ भावुक युवक मास्टर साहेव के आइ जखन कोनो मनपसंद मास्टरनी सँ सानिध्य भेटैत छैक, हुनका इम्प्रेस करैक मोका भेटैत छैक, हुनका सँग भावनात्मक लगावक गप्प होइत छैक, तँ हुनका सभ गोटय लेल ई क्षण अनमोल आ भावुक जरूर बुझेतैन्हि जाहि मे काम-वासनाक बोध कम छैक आ परस्त्री केँ सहयोग क’ हुनका इम्प्रेस करवाक आत्माभिमानक मनोबोध बेसी छैक. एक अर्थे ई मैथिल समाज लेल शुभक सूचक छियैक. अभिवावक गण ई बुझथु सँ पुरूष गण स्त्रीगणक प्रति हरदम आक्रमके नहि होइत छैक. नीक भवना, परस्त्रीक प्रति आदर भाव, स्त्रीक सहयोग केर मनोवृति सेहो पुरूष मानसिकताक एकटा अंश छियैक. शिक्षक नियोजनक बाद शिक्षक आ शिक्षिकाक मध्य वैवाहिक संबंधक कैकटा उदाहरण हमहूँ देखलियैक. एहि मे सँ दूइ टा उदाहरण "Love Cum Arrange" विवाहक आ शेष सभटा पुर्ण रूपेन "Arrange" विवाहक छलैक. "Love Cum Arrange" विवाहक हमर मतलव अछि जे, विवाहक एहि प्रक्रिया मे सबसे पहिने दूई हृदयक मध्य प्रेम भेलैक आ तखन माता-पिता वियाहक तय-तपेसिया केलन्हि. जखन की "Arrange" विवाह मे माता-पिता ही परंपरागत ढ़ंग सँ विवाह तय केलखिन जाहि मे नवदम्पत्तिक कोनो महत्वपुर्ण भुमिका नय भेलैक. "Love marriage" अर्थात माता-पिताक बिना कोनो महत्वपूर्ण योगदान वाला प्रेमीगणक विवाह जँ कतहुँ भेलो हेतैक तँ ओ हमरा नजरि मे नहि छैक. उपर्युक्त दूनू तरहक वियाह मे हम एकटा नव गप्प ई देखलिये जे अधिकांश कथाक उत्थान मे पहिने लड़के वाला लड़की वालाक ओहि ठाम गुप्त रूप सँ संबंधक प्रस्ताव पठेलखिन. जखन लड़की वाला तैयार भ गेलाह तखन लड़की वाला अपना शर्त पर अन्य बातक निराकरण करवे मे सफल रहलाह. हमर कहैक मतलब ई जे शिक्षिकाक नौकरी भेटलाक बाद नौकरी-पेशा स्त्रीगणक सामाजिक स्थिती मे बड्ड बदलाव एलैक. एक दिस जतय ओकर आर्थिक आ सामाजिक महत्व वरक घर आ नैहरक घर मे समान्य रूप स बुझल गेलैक ओतही ओकर सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक संबंध, आ सामाजिक सम्मान केँ सेहो बृद्धितर केलकैक. मैथिल नारि केर समस्याक समाधान मैथिल नारि केर समस्याक समाधान तकै कालमे ई दूनू महत्वपूर्ण काज संगहि-संग कोना होमय, मैथिलक सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा आ आधुनिक उपयोगी मूल्यक समावेश। विधवा-विवाहक लेल मानसिक परिवर्तन जरूरी छैक, खास कऽ कऽ आइ-काल्हि जखन की परिवार छोट भऽ रहल छैक, जीवन-यात्रामे पाइक अहम महत्व छैक आ पाइ-कौड़ी एकत्रित करैमे भतेरो दिक्कतक सामना छैक, नीक आ सुखमय जीवन जीअएमे मानवीय मूल्यक प्रति लोकक श्रद्धा कम भऽ रहल छैक, भाइ-बहीन, चचा-चाची आ एतए तक कि माय-बाबूसँ आत्मीय संबंध सेहो घटि रहल छैक, लोकमे भगवानक प्रति विश्वास आ डर कम भऽ रहल छैक, सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा लोकक द्वितीयक लक्ष्य छैक आ विलासी-सुखमय जीवन जीनाइ प्राथमिक लक्ष्य भऽ गेलैकहेँ...तखन तँ पहाड़ सन जिनगी लऽ कऽ बाल-विधवा बेचारीक जीनाइ बड्ड मुश्किल छैक। संयुक्त पलिवार तेँ आब छैक नै, बड़का बेटा कलकत्ता, छोटका चेन्नै आ मझिला बनारसमे अपन अपन बाल-बच्चा केँ लऽ कऽ एकटा वा दू टा कोठलीक घरमे कोहुना कऽ रहैत छथि। बाल-विधवा बेचारी जँ सासुरमे रह्ती तैयो वा नैहरमे रहती तैयो पलिवारमे लोकक कमी छैक। जे संजुक्त पलिवार काल्हि तक अपन दुखिता धीया-पूताकेँ मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, आर्थिक आ मनोरंजनात्मक बल दैत रहैक ओ आब अपनहि अस्तित्वक अंतिम साँस लऽ रहल छैक। तखन एकटा बाल-विधवा बेचारी अस्करे भूत जकाँ गाममे कोना रहतीह। एक तँ मानसिक असकरू आपनक स्थिती आ दोसर जे जँ हुनका देहमे कनिओटा सुखायल यौवन-रस बचल छैक तँ बड़का-बड़का ठोप वाला भुखायल गिद्ध सभ हुनकापर लक्क लगोने रहैत छथि। स्त्रित्व तँ आब अपनो घरमे असुरक्षित छैक तँ सर-संबंधिक गप्पे छोड़ू। तेँ विधवा-विवाह आइ बेसी प्रासांगिक छैक। मुदा प्रश्न छैक जे आब सनातनी मैथिलक सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा कोना हेतैक। मैथिल समाजमे नारीक जे जगह छैक ओइमे परिवर्तनसँ मैथिल समाज कोना समावेश करतैक। कियो ककरो ’हाफ-ब्रदर’(अर्ध-भाइ) होएतैक, कियो ’हाफ-सिस्टर’ (आधा-बहीन), कियो ककरो पहिलका दिअर-भौज हैतैक तँ कियो ककरो पहिलका ननद-ननदोइस। एखन तक मैथिल समाजमे ऐ सभ संबंध केर की रूप हैतैक आ हिनका बीच केहेन हेम-क्षेम रहतैक से स्पष्ट नै छैक। ऐ संबंध निर्धारण केर आवश्यकता एतए सेहो बुझना जाइत छैक। पुनः आइ जे मैथिल समाज ई विश्वासक दावा करैत छैक जे पति-पत्नीक सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरक, सीता-सावित्रीक उपाख्यान केर समजोर नय, मैथिलक घर-घरमे पुजिता गौरीक आदर्श-वाक्य वर होइहो तँ शंभू नै तँ रहों कुमारी, तकरो विकल्पमे तार्किक आदर्श-विचारक स्थापना करए पड़तैक। तखन मैथिल समाजक समक्ष अपन पुरातनी सभ्यता-संस्कृतिसँ विलगावक प्रश्न सेहो ठाढ़ भऽ सकैत छैक। हमरा बुझनासँ मैथिल समाज लग एकटा आओर रस्ता छैक जे अपन बाल-बच्चाक वियाह बचपनमे नै करी, ओकरा पढ़ा-लिखा कऽ बेसीसँ बेसी समय दिऐक। व्यस्क भेला उत्तर वियाहसँ जतए हुनका अपन शैक्षिक आ आर्थिक स्वावलम्बनक अवसर भेटतैक ओतै अपन मनोनुकूल वियाह करै मे सेहो मददि भेटतैक। व्यस्क वियाहसँ बाल-विधवा सनक दारूण समस्यासँ मैथिल समाजकेँ नै गुजरे पड़तैक किएक तँ व्यस्क विधवाक समस्यासँ ई बेशी कष्टप्रद छैक। विधवा-वियाह तेँ एखनो कमो-बेस सभ समाजमे होइतै छै, मैथिल समाज ऐ सँ अछूत नै छैक। मुदा ई वियाह एकटा "good marriage" (आदर्श विवाह) केर रूपमे नैय भऽ कऽ एकटा "bad marriage" (खराप विवाह) केर रूपमे होइत छैक। ऐपर बेसी हंगामा नै करियौक। जे होइत छैक से होमए दियौक। आब केवल ई तय करियौक जे आधुनिक जीवन आ सनातनी जीवनकेँ देश, काल, पात्रक अनुकूल कोना जीअल जाय। किशन कारीगर आब हम जबान भ गेलहुँ (हास्य कथा) समाचार पढ़ि के स्टूडियो सँ निकलले रही कि मोबाइलक घंटी बाजल हम धरफरा के फोन उठेलहुँ की ओम्हर सँ अवाज आयल हौ कारीगर आब हम जवान भ गेलहुँ। ई सुनि त हमरा किछु ने फुरा रहल छल मुदा तइयो हम सहास कए के बजलहुँ अहाँ के बाजि रहल छी। ओम्हर सँ फेर अवाज आयल हौ कारीगर एना किएक बताह जेंका बजैत छह अवाजो ने चिन्हैत छहक। कहअ त इहे गप ज कोनो बचिया तोरो फोन कए के कहने रहितह त तोरो मोन धनकुटिया मशिन जेंका धक-धक करितह। मुदा हम कहैत छियह त तों बहन्ना बतियाअैत छह। हम बजलहुँ से गप त ठीके मुदा अहाँ के बाजि रहल छी से कहू ने तखने चिन्हब ने कि ओम्हर सँ फेर अवाज आएल हौ बच्चा हम बाबा भोलेनाथ बाजि रहल छी तोरे स भेंट करैए लेल आएल छलहुँ। ई सुनि हम बाबा के प्रणाम कए पुछलियैन यौ बाबा अहाँ कतेए छी। ओ खिसियाअैत बजलाह हौ बच्चा हम यूनिवार्ता लक ठाढ़ भेल छी तोहर आकाशवाणीबला सभ कहलक जे बसहा बरद लए के भीतर नहि जाए देब। तहि दुआरे हम यूनिवार्ता चलि अएलहुँ अहि ठाम कोनो रोक टोक नहि बसहो बरद मगन स घास खा रहल अछि आ हमहूँ रौद मे बैसल छी। तूं जल्दी आबह देखैत छहक सस्पेन महक चाह उधिया-उधिया कहि रहल अछि जे आब हम जवान भ गेलहु। दुनू गोटे चाहो पीअब आ गपो नाद करब।हम बजलहुँ ठीक छै बाबा अहाँ ओतए रहू हम 5 मिनट मे आबि रहल छी। बाबा सँ भेंट करबाक लेल हम आकाशवाणी के गेट न0-2 स बाहर निकैलि रोड टपि के पीटीआई बिल्डिंग लक आएले रहि कि फेर फोनक घंटी बाजल। कान मे हेडफोन लगले रहैए बिना नम्बर देखनहियै हम फोन उठेलहुँ कि ओम्हर सँ अवाज आयल यौ किशन बौआ अहाँ कहिया गाम आबि रहल छी आब हम जवान भ गेलहुँ। हम धरफराइत बजलहुँ ग ग गोर लगैत छि काकी। ओम्हर सँ फेर कोनो महिलाक अवाज आयल अई यौ बौआ अहाँ सभ दिन बकलेले रहबैह भौजी के लोक कहूं काकी कहलकैए ओ खिखिया के हँसैत बजलीह अप्पन सप्पत कहैत छी यौ बौआ आब हम जवान भ गेलहुँ। अहाँ त साफे हमरा बिसैर गेलहुँ कहियो मोनो ने पड़ैत छी। ई सुनि त एक बेर फेर हमरा किछु ने फुरा रहल छल मुदा तइओ हम बजलहुँ अहाँ कतए स बाजि रहल छि यै काकी। महिलाक अवाज आयल यौ बौआ हम भराम वाली भाउजी बाजि रहल छी। एक्को रति मोन पड़ल ।हम अपसियाँत भेल हकमैत बजलहुँ ह ह भाउजी मोन पड़ल अच्छा त अहाँ छि भराम वाली। भाउजीक गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल हा हा क हँसैत हम बजलहुँ अई यै भाउजी अहाँक चिल्का बच्चा नमहर भ गेल आ तइयो अहाँ कहैत छी जे आब हम जवान भ गेलहुँ ठीके मे की मजाक कए रहल छी। भाउजी खिखिया क हँसैत बजलीह अप्पन सप्पत कहैत छि यौ बौआ अहाँ एक बेर गाम आबि देखू हमरा देखि त बुढ़बो सबहक धोति निचा माथे ससैर जायत छैक। आ तहू स बेसी हाल त मैटिक वला विद्यार्थी सभहक हाल त और बेहाल छैक। टीशन पढै जायत काल हमरे घूरि घूरि क देखैत रहैत छैक आ सबटा सुध बुध बिसैर के धरफड़ा के साइकिलो पर स खसि पड़ैत छैक। सबटा गप कि कहू यौ बौआ गाम-गमाइत जेनिहार अनठिया लोक सभ त मोटरसाइकिल पर सँ ओंघरा पोंघरा के खसि पडैत छैक आ मुँहो कान चिक्कन भए जायत छैक।हम बजलहुँ अई यौ भाउजी भैया नहि किछु कहैत छथि हुनका ने किछु होइत छैन्हि। भाउजी बजलीह धू जी महराज की कहू आनहरो लोक अहाँ भैया स बेसी देखैत हेतै। पामर वला चश्मा मे एक्को रति कि अहाँ भैया के देखाइए। सबटा गप कि कहू अहाँ भैया के हकैम-हकैम के कहैत कहैत हम थाकि गेलहुँ जे आब हम जवान भ गेलहुँ। मुदा तइयो अहाँ भैया के वैहए गउलहे गीत इस्कूल पर सँ गाम आ गाम पर सँ इस्कूल सेहो आखि मुनने जाउ आ आउ। रस्ता पेरा कि सभ भेलै सेहो ने बुझबाक काज। ई गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल हा हा क हँसैत हम बजलहुँ आहि रे बा एहेन जुलुम त देखल नहि। हमर गप सुनि भाउजि खूब जोर स खिखिया क हँसैत बजलीह जुलुम की महाजुलुम कहियोअ। ओना अहूँ कि अपना भैया स एक्को रति कम छी। अहाँ त हरदम समाचार बनबै-सुनबै मे बेहाल रहैत छी हमर हाल के पुछैए। आई काल्हि त आनहरो लोक ईशारा स गप बुझि जायत छैक मुदा अहुँक हाल त निछटे आनहर वला अछि ने गबैए जोकर ने सुनैए जोकर। अहाँ स नीक त कोनो अनठिया के कहने रैहतियै जे आब हम जवान भ गेलहुँ त निछोहे पराएल ओ गाम चलि आएल रहितैह मुदा अहाँ त गाम अएबाक नामे नहि लैत छी। हम बजलहुँ भाउजी अहाँ जुनि खिसियाउ अहि बेर नहि त अगिला बेर हम जरूर आएब आ दुनू दिअर भाउज उला ला उ ला ला मदमस्त होरी खेलाएब। एखन हम फोन राखि रहल छी केकरो फोन आबि रहल छैक। भाउजी बजलीह मारे मुँह ध के अहूँ के मोबाइल हरदम टनटनाइते रहैए भरि मोन गप करब सेहो आफद। जहिना जवान लोक फेनाइते रहैए तहिना अहाक फोन टनटनाइते रहैए बड्ड बढ़िया त राखू। भाउजीक फोन डिसकनेक्ट करैते मातर फेर कोनो अनठिया नम्बर सँ फेर फोनक घंटी बाजल अवाज सुनि हमर मोन धकधकाएल जे आब फेर के अछि। हम हेल्लो बजलहुँ कि ओम्हर स अवाज आएल एकटा गप बुझहलियै अहाँ । हम बजलहुँ बिना कहनहिए अपनेमने अन्तरयामी केना बुझि जेबैए ओना कोन एहेन जुलुम भए गेलैए से जल्दीए कहू। कोनो महिलाक अवाज आयल यौ पाहुन हम कोना क कहू हमरा त लाज होइए। हम बजलहुँ अहाँ के लाजो होइए आ उल्टे हमरा पाहुनो कहैत छी। ओम्हर स फेर अवाज आयल चुपु ने अनठिया अनठा-अनठा के बजैत छी जेना अहाँ के बुझहले ने हुएअ ।हम बजलहुँ सत्ते कहैत छी हमरा त एक्को मिसीया ने बुझहल अछि जल्दी कहू। एतबाक मे फेर अवाज आयल अहा कहैत छी त हयैए लियअ सुनू आब हम जवान भ गेलहुँ। एतबाक बाजि ओ हा हा के खूब जोर स हँसैए लगलीह। हुनकर गप सुनि त हँसि स हमरा रहल नहि गेल मुदा तइयो हम बजलहुँ जबान भ गेलहुँ त अपना माए बाप के कहियौअ अहि मे हम कि करू। ओ बजलीह अई यौ बुढ़बा पाहुन अहूँ बरि खान्हे बुझहैत छियैक। कहू त इहो गप केकरो कहैए पड़तैह लोक अपने मने नहि बुझतैह जे घोरि घोरि के कहैए पड़तैह जे आब हम जबान भ गेलहुँ। एतबका बाजि ओ खूब जोर स हाँ हाँ के हसैए लगलीह। ओइ महिलाक हँसि सुनि त बुझहु हमर मोन धनकुटिया मशिन जेंका धक-धक करैए लागल। हकमैत हकमैत अपसियात भेल हम बजलहुँ अईं यै मैडम अहाँ जबान नहि भेलहुँ कि बुढ़ारि मे हमरा जहल टा कराएब। ओ बजलीह अईं यौ पाहुन अहाँ के डर किएक होइए एतेक काल त कोनो अनठिया गाम चलि आएल रहैतैए आ अहाँ के त होरी मे गाम अबैत बड्ड माश्चर्ज लगैए अहाँ होरी खेलाए लेल गाम आएब कि नहि। हम बजलहुँ अहाँक पाहुन से कहिया स त ओ बजलीह अईं यौ पाहुन हम जवान भेलहु आ हमरा अहा साफे बिसैर गेलहु। हम नीलू बाजि रहल छी एक्को रति मोन पड़ल कि नहि। हम बजलहुँ अच्छा त अहाँ छी बड्ड जल्दी जबान भ गेलहुँ। ओ महिला बजलीह त अहाँ मने कि अगिला कोजगरा तक अहाँक बाट तकितहुँ कि अपन जबान भ गेलहुँ। आब बुढ़ लोकक जमाना गेलैए आई काल्हि त जबान लोकक जमाना एलैए बुढ़ारी मे अहाँ भसिया गेलहुँ की। हमरे छोटकी सारि नीलू छलीह। हुनकर एहेन सुनर बचन सुनि त हम अपना देह मे अपने मने बिट्ठू काटैए लगलहु खुशि सँ मोन मयूर जेंका नाचए लागल। भेल जे सासुरे मे तिलकोरक तरूआ खा रहल छी मुदा फोन दिसि देखि इ भ्रम टूटल जे हम त संसंद मार्ग दिल्ली मे छी आ फोन पर गप कए रहल छी। हम बजलहुँ यै नीलू ठीक छैक ई बुझहु जे अगिला होरी मे हम एब्बे टा करब एतबाक कहि हम फोन राखि देलियै। फोन पर गप करैते करैते हम चाह दोकान लक चलि आएल रहि सेहो नहि बुझहलियै। हमरा देखैत मातर बाबा बजलाह अईं हौ कारीगर तोहर गप सधलहे नहि देखैत छहक तोरा फेरी मे चाहो ठंढ़ा गेल तहि दुआरे चाहो वला हमरे पर मुँह फुलेने अछि। बाबाक गप सुनि हुनका हम प्रणाम कए पुछलियैन से किएक यौ बाबा। त ओ बजलाह चाहवला के कहब छैक जे अहि दारही वला बाब दुआरे कएक टा न्यू कपल्स माने जबान छौड़ा-छौंड़ी बिना चाह पीने आपिस चलि गेलैह। आब तोंही कहअ त कारीगर छौंड़ा-छौंड़ी त अपना फेरी मे गेल चाह नहि बिकेलै त एहि मे हमर कोन दोष। चाहवला अपने मिथिला के रहैए ओकरा हम कहलियै हौ भाए दू कप चाह बनाबह बाबा सेहो पिथहिन। हम बाबा के कहलियैन बड्ड दिन बाद अपने दिल्ली अएलहुँ त गाम घरक हाल समाचार कहू। बाबा बजलाह हौ बच्चा जुनि पुछह गाम घरक हाल बुझहक छौंड़ा छौंड़ी अगिया बेताल। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह हौ बच्चा गामो घर रहबा जोग नहि रहि गेल। आई काल्हिक छौंड़ा छौंड़ी एकदम निरलज भए गेल एक्को रति लाज धाक नहि रहि गेलैए आब त मंदिरो मे रहब परले काल भए गेल। हम बजलहुँ से किएक यौ बाबा त ओ बजलाह हौ बच्चा सबटा गप तोरा कि कहियअ आब त छौंड़ा मारेर सभ पूजा करैत काल उला ला उला ला गबैत अछि एतबाक सुनैते मातर छौंड़ियो सभ कुदि-कुदि के कहतह छुबू ने छुबू हमरा आब हम जवान भ गेलहुँ। कह त के जबान के बुढ़ पुरान से त पूरा गौंआ बुझैत छैक एहि मे हल्ला करबाक कोन काज जे आब हम जबान भ गेलहुँ। देखैत छहक इ गप सुनि त बुढ़बो सबहक धोति निच्चा माथे ससैर जाएत छैक। ई भागेसर पंडा हमरा सुखचेन स नहि रहैए देत। एतबाक मे चाह वला 2 गिलास चाह देलक दुनू गोटे चाह पिबअ लगलहुँ एक घोंट चाह पिनैहे रहि कि हम पुछलियैन भागेसर कि केलक यौ बाबा। ओ बजलाह हौ कारीगर की कहियअ भागेसर पंडा त आब निरलज भ गेल। एतेक दिन ओम नमः शिवाय के जाप करैत छल आब उला ला उला ला गबै मे मगन रहैए हम जे किछु कहैत छियैक हौ भागेसर एना किएक अगिया बेताल भेल छह। त ओ हमरा कहैत अछि यौ बाबा किछु कहू ने हमरा आब हम जबान भ गेलहुँ। मुन्नी बदनाम भेलैए किएक?- एकटा हास्य कथा। इंडिया टी वि मे एकटा संगी सँ भेंट केने फिल्म सिटी नोएडा स अबैत रही। समाचार बूलेटिन क समय भ गेल रहै तही दुआरे हरबड़ाएल आकाशवाणी अबैत रही। हम सेक्टर 16 मेटो स्टेशन लक आएले रही की ओतए एकटा मित्र मदन भेंट भए गेलाह कुशल छेमक गप भेलाक बाद हम बजलहू भाए एखन हमरा जाए दियअ फेर कहियो गप नाद करब । ओ बजलाह यौ किशन अहू हरबड़ाएल नोएडा अबैत छी आ फूर सिन पड़ा जायत छी कहियो भेंटो घांट ने पहिन हमरा एकटा गप समझा दियअ तखन जाएब ।हम बजलहु जल्दी कहू त ओ बजलाह ई कहू त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? हम किछु बजितहु कि ताबैत डमरू डूगडूग क अवाज सुनलियै ओतए मेटो सीढ़ि लक बाबा भेंट भए गेलाह हमरा देखैत मातर ओ बजलाह हौ कारीगर बच्चा तोरे तकैत तकैत अई ठाम अएलहू पहिने हमरा जल्दी स एकटा गप बुझहाए दैए। हम बजलहू कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह हौ बच्चा एकटा गप कहअ त मुन्नी बदनाम भेलैए किएक ? हम बजलहु इ त हमरो नहि बुझहल अछि मुदा अहॉ कोन मुन्नी क गप कहि रहल छी। बाबा हॅसैत बजलाह हौ कारीगर तहू बड्ड अनठा अनठा क पुछैत छह कहअ त सौंसे दुनिया अनघोल भेल छै जे मुन्नी बदनाम भेलै शिला क जवानी तेरे हाथ न आनी। तई मे तोंही मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक मुन्नी फिर से बदनाम हुई मुन्नी को देख डोला इमान। एतबाक नहि चैनलो मे बचिया सभ देहदेखौआ कपड़ा पहिर खालि एहने समाचार सभ पढ़ैत छैक देखू वालीवुड मसल्ला मुन्नी बदनाम भेलै देखैत छहक इ समाचार देख सुनि दोसरो मुन्नी सभ बदनाम होइ लेल एखने स आतुर भेल छै। तहि दुआरे त हम पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ? बाबाक प्रशन सुनि त हम गुम भए गेलहु किछु ने फुरा रहल छहल आ हॅसी सेहो लागि रहल छह। बाबा फेर बजलाह हौ एतेक कथि सौचै मे लागल छह ज कहि दिमाग तिमाग भंगैठ जेतह त कोन ठिक तहू बदनाम भ जहियअ। देखहक एकटा गप त हम बुझहलियै जे जेबी मे एक्को टा पाइ नहि रहतह आ थूथून निक नहि रहतह त कतबो नाक रगरब त बापो जिनगी मे शिला क जवानी हाथ न आनी मुदा ई दोसर गप हमरा दिमागे मे ने घूसी रहल अछि जे मुन्नी बदनाम हुई। तहि दुआरे तोरा पुछलियअ जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ?हम बजलहु अच्छा बाबा एकटा गप कहू त अहा केना बुझहलियै जे मुन्नी बदनाम भेलै। बाबा बजलाह कहअ त सौंसे दुनिया ई गप अनघोल भेल छै तहू मे त आब शहर बजार स ल क गाम घर तक ई मुन्नी बदनाम ने भेलै कि हमरा रहनाई मुशकिल भए गेल। आब त कान दै जोग नहि रहलै जतै देखहक ततै मुन्नी बदनाम। हम बजलहू अई यौ बाबा मुन्नी बदनाम भेलै त अहा किएक अकक्ष भेल छी। बाबा बजलाह हौ कारीगर अकक्ष की जान बचाएब मुशकिल भए गेल अछि देखैत छहक छौंडा मारेर सभ पूजा करैत काल मंदिरे मे गाबअ लगतह मुन्नी बदनाम भेलै हेतै यै मुन्नी अहा क गली गली मे चर्चा किदैन कहा । ततबेक नहि यै छौंडी सभ मंदिरे मे सप्पत खा खा बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। कहतह हे भोला बाबा तोंही जान बचबिहअ तोरा दू लोटा बेसी क जल चढ़ेबह। मुदा गारजियन सभ हमरा आबि आबि पुछतह यौ बाबा एतए कोनो मुन्ना मुन्नी क देखलियैए। आब त हमरा डरो होइए जे कहिं बदनाम होइ क झोंक मे कोइ हमरो लेल ने बदनाम भए जाय। तहू मे नबका तूरक धिया पूताक कोनो भरोस नहि एकरा सभ क पढ़नाइ लिखनाई मे कम आ बदनाम होइ मे बेसी मोन लगैत छैक। औग ने पौछ देखतह आ खाली बदनाम होइए क फिराक मे लागल रहतह। हम बजलहू अई यौ बाबा अहा लेल के बदनाम होइए। बाबा बजलाह हौ बच्चा जूनि पूछह कि कहियअ पछिला कोजगरा मे हम अप्पन सासुर हरीपुर गेल रही कुशल छेमक गप भेलाक बाद हमर छोटकी सारि टुन्नी बजलीह यौ पाहुन एकटा गप कहू । हम कहलियैन कहू ने की एतबाक मे केम्हरो स हमर बीरपुर वाली सरहोइज चाह पान नेने दौगल अएलीह। हम एक घोंट चाह पीनैहे रही की बीरपुर वाली बजलीह पाहुन एकटा गप बुझहलियैए हम हुनका पुछलियैन कोन गप यै त ओ बाजल चुपू अनठिया कहि क बुरहारी मे खाली गप अनठा अनठा बजैत छी आ हमर सरहोइज सारि खूम जोर सॅ हा हा क हसैए लगलीह। फेर बीरपुर वाली खिखिआ क हसैत बजलीह टुन्नी बदनाम हेतै यै बुरहबा पाहुन अहि क लिए। टुन्नी ताली बजा बजा सुल मे ताल मिला गाबए लागल टुन्नी बदनाम हेतै यौ बुरहबा पाहुन अहि क लिए । हौ बच्चा टुन्नी क गप सुनी त कि कहियअ हम असमंजस मे परि गेलहु जे इ अपनो बदनाम होएत आ बुरहारी मे हमरा गंजन टा कराउत। डरे हम दोसर घोंट चाहो नहि पिलहु चाह सेरा क पानि भ गेल। फेर कि भेल यौ हम उत्सुकतावस बाबा स पुछलियैन त ओ बजलाह हौ बच्चा सभटा गप तोरा कि कहियअ टुन्नी क हम कहलियै अई यै टुन्नी एतेक छौंडा मारेर सभ साइकिल ल क ओइ बाध स ओई बाध शहर स बजार मुन्नी क तकने फिरै छै तेकरा सभ लेल बदनाम हएब से नहि त फुसियाहि क हमरा पाछु लागल छी। टुन्नी बजलीह नहि यौ पाहुन हम त अहि लेल बदनाम होएब तब ने लोको हमरा चिनहत जे हमहू बदनाम होइ लेल आतुर भेल छी। भने मीडियावला सभ क एकटा खबर सेहो भेट जेतैए जे मुन्नी फिर बदनाम हुई आ हमरो कोनो धारावाहिक मे झगरलगौन माउगी वा कि कोनो फिल्म मे आइटम गर्ल क काज भेट जाएत। कि कहियअ टुन्नी क बदनाम हेबाक प्रबल इच्छा देखि हम फुर दिस अपना सासुर स बिदा भगलहु आ फेर कहियो हरीपुर नहि गेलहु। ओकर गप सुनि त डरे हमरा हुकहुकी धए लेलक जे कहि ठीके मे टुन्नी बदनाम भेलै आ कि एना केलकै त हमहू बदनाम भए जाएब। तहि दुआरे त कहलियअ हौ बच्चा जे कहिं कोई हमरो लेल ने बदनाम भए जाए तहू मे आबक धिया पूता क कोनो ठेकान नहि बदनाम होइ दुआरे फिलमी फंडा अपनौतह। गारजिअन के इ कहतह जे हम टीशन पढ़ै लेल जाइत छी आ पढ़नाइ छोड़ि क पार्क कॉफि हाउस घूमै लेल चलि जेतह आ बदनाम होइ क फिराक मे लागल रहतह। जेना ओकरा सभ के और कोनो काजे नहि रहै तहिना। बाबा बजलाह हौ बच्चा तू ख़बर लेल हाट बजार स ल क शहर गाम सभ ठाम जाइत छह मुदा हमरा एकटा गप नहि बुझहा देलह। हम पुछलियैन कोन गप यौ बाबा की ओ बजलाह अईं हौ कारीगर तहू बड्ड अनठाह भ गेलह तोरा त ई गप बुझहले हेतह जे मुन्नी भेलै आ तहू मे मीडियावला सभ और बेसी हल्ला केने छहक। कतए कोन मुन्नी बदनाम भेलै सेहो ख़बर रखैत छह मुदा हमरा सिरिफ एक्के टा गप बुझहा दए ने जे मुन्नी बदनाम भेलै किएक ? टाई माने रस्सी- एकटा हास्य कथा ओना त रस्सी जीवन मे बड्ड उपयोगी होइत छैक। गरीब लोक लेल त आओर बेसी टाट फरक बन्है स लके घर छारै माल जाल बन्है स ले के खोपड़ी बन्है तक। मुदा जखन इह रस्सी गाराक फॉस भए जायत अछि तखने लोक बुझहैत अछि रस्सीक महिमा। जेकर गारा फॅसैत अछि वैह बैझहैत अछि जे कि भाव पड़ैत छैक। आई एहने चक्करफॉस मे फॅसल अधमरू भेल रंजन बजलाह। हम पुछलियैन जे कहू टाई माने कथी वो बजलाह रस्सी। एक दिन भिंसरे भिसंरे रंजन फोन केलैन किशन अहॉ के त जे ने से रहता है । हम ओंघाएले रही मोन त भेल जे खूम जोर स गारि परही मुदा ज्येष्ट भ्राता के गारि कोना परिहतौ तहि दुआरे कुशल छेमक गप भेलाक बाद रंजन फेर बजलाह हमरा कहिया से सासुर जाइ लेल मोन छटपटा रहा है आ अहॉ कोनो ओरियान ने नहि करता है। हम बजलहूॅ भैया अहा मंगरौना आउ ने सब ओरियान एक्के मिनट मे हो जाएगा। ई सुनि ओ हरबराएल बजलाह अच्छा किशन हम एक हप्ता बाद गाम आबि रहा है। हम कहलियैन ठिक छैक आ फोन राखि के नित क्रिया मे लागि गेलहू। हमरे पितियौत भाए छथि रंजन पूणे विश्वविद्यालय स इंजीनियरिंग केने रहैथ। परदेश मे जनम आ ओतए प्रारंभिक शिक्षा स उच्च शिक्षा धरि पढ़लाह। एकदम शहरी ठाठ बाठ मैथिलक कोनो दरश नहि हुनका अंग्रेजी मराठी बेसी बजैत छलाह। ओना त हमरो जनम परदेश मे भेल मुदा गाम आबि मैथिली सीखि गेलहु। हमरा जतबाक स्नेह अपना माटि पानि स रंजन के ततबेक बेसी अलगाव एहि सॅ। हमर कक्का बच्चा बाबू के केंद्रिय विद्यालय मे प्राचार्य रहैथ तहि दुआरे परदेश मे धिया पूता के पढौलैन। ओ मैथिली बजैत जहि स रंजनो कने मने मैथिली बुझहैत बाजल त तेरहे बाइस होइत रहैन। बच्चा बाबू के केंद्रिय विद्यालय मे नोकरी भेलैन त कहियो घूरि के मंगरौना नहि एलाह। एबो कोना करितैथ ओ सभ पूर्णिया मे जगह जमीन किनी बसि गेल रहैथ। हुनका घियो पूतो के गाम घर सॅ कोनेा मतलब नहि एकदम अनचिनहार रहैथ ओ सभ। रंजन कोनो अमेरिकी कंपनी मे सॉफटवेयर इंजीनियर रहैथ तहि दुआरे हमरा कक्का के मोन गद गद । संयोग स हुनकर बियाह दरभंगा जिलाक मब्बी गाम मे भेल। लड़की शिक्षामित्र के नोकरी मे रहथिहिन आ हमरा भैयाक ससुर सेहो प्रखणड कृषि पदाधिकारी रहैथ। तहि दुआरे मोन माफिक लेबो देबो भेलैक। लड़की वला सेहो एहि कुटमैति स खूम प्रसन्न रहैथ तहि दुआरे चैनो उड़ल पर दस लाख गनने रहैथ मुदा बियाहक बाद जमाई के सासुर बजौताह से बिसैर गेल रहैथ। एम्हर रंजन सासुर जाइ लेल छटपरटाइत रहैथ मुदा गाम घरक भंाज भुज हुनका एकदम नहि बुझहल तहि दुआरे ओ हमरा डेनवाह बनौलैन। ठीक सातम दिन सात बजे सांझ मे रंजन हमरा गाम मंगरौना अएलाह सूट बूट टाई पहिरने कियो हुनका चिनहैथ नहि। गामक कतेक लोक स पूछैत पूछैत ओ हमरा दरवज्जा पर अएलाह। एम्हर हम गाछि कात स धनरोपनी कए के आएल रहि कि हुनका देखैत मातर स्नेह बस भरि पाज के गारा मिलान केलौह मुदा रंजन रूष्ट होइत बजलाह अहा हमरा टाई मे मिट्टी लगा दिया आब हम सासुर कोना जाएगा। हुनका खिसियाअैत देखि हम बजलहु अहा चिन्ता किएक करता है हमरो लग टाई है ओहि स अहा के काम हो जाएगा। ई सुनि ओ खुशि स मोने मोन नाचए लगलाह जे टाई पहिर के जाएब त सासुर मे खूम मान दान होएत। कुशल छेमक गप भेलाक बाद दूनु गोठे हाथ मुह धो के बैसलहुॅ त माए हमर खाना परोसलीह। भोजन भात कए के राति मे विश्राम केलहु। दोसर दिन भिंसरे पहर फटफटीया पर बैसी क हम आ रंजन हुनकर सासुर मब्बी जाई लेल बिदा भेलहु। हम फटफटिया चलबै मे अपस्यात रहि मुदा रंजन टाई समहारै मे फिरिशान रहैथ। पछिया हबा खूम जोर स बहैत जहा बलुआहा बान्ह लक पहुचलहु की ठक्कन भेंट भए गेलाह आ रंजन के देखि बजलाह अहाक गारा महक रस्सी उधिया रहल अछि बान्हि लियअ नहि त उरिया जाएत। ई सुनि रंजन डरे टाई मे क्लीप लगा लेलैन आ किछू नहि बजलाह। ठक्कन हमरा पुछलैन यौ किशन इ अनठिया के छथि आ एतेक थाल खिचार मे कतए जा रहल छी। हम हुनका कहलियैन हिनका नहि चिन्हलियैन हमरे पूण्रिया वला पितिऔत भाए छथि। एखन हिनके सासुर मब्बी जा रहल छी। ठक्कन बजलाह से त ठीक मुदा कहू त गारा मे एतेक टा रस्सी बन्हबाक कोन काज ज कोनो खूरलूच्ची धिया पूता रस्सी बूझहि एकरा घिची देतै त लगले प्राण सेहो छुटि जेतैन। हम बजलहु यौ महराज इ टाई पहिरने छथि रस्सी नहि। ओ बजलाह धू जी महराज गाम घरक लोक त एहि टाई के रस्सीए बुझहत ने बेस जाउ सासुर अहू बुझिए जेबै जे टाई माने कथि हम बजलहु रस्सी। ठीक 2 बजे दुपहर मे हम आ रंजन मब्बी पहुचलहु ओतए पहुचलाह पर आगत बात भेल मुदा सभ घुरि घुरि के हमरे दिस तकैत किएक त हम धोति कुर्ता पहिरने रहि कतेक के हम अनठिया लगियै किएक त पहिल बेर भैयाक सासुर मब्बी आएल रही। रंजनक बियाह मे हमर कक्का नहि बजौलैन त बियाह मे नहि आएल रहि। एकटा बुरहि दाए बजलीह इ के छेथहिन डेनवाह हम बजलहु सेह बुझियौअ। ताबैत मे रंजन के सारि नीलू अनिला सोन सभ गोटे हेंर बान्हि के हसि मजाक करै लेल एलीह। नीलू बजलीह डूल्हा की हाल चाल अछि त रंजन हसैत बजलाह हाल ठीक नहि है सौंसे देह मे खूम थाल लग गया। एतबाक मे अनिला टाई छुबि बजलीह यौ पाहुन इ कोन अंगरेजिया आंगि अछि। ओकरा हाथ मे माटि सेहो लागल रहै वैह कादो वला माटि टाई मे लागि गेलै। टाई मे माटि लागल देखि रंजन के मोन भिन्न भिना गेलैन आ तामसे अघोर भेल बजलाह हम अखने चलि जाएगा आब। नीलू बजलीह पाहुन अहा एतेक दिन बाद सासु अएलहु त अहा के आई रहैए परत। अहा नहि रहब त हम सौसे देह आ मुहे मे माटि लगा देगा। ई सुनि रंजन सकपक्का गेलाह हम चुपचाप सभठा गप सुनैत रही। खान पिअन भेलाक बाद राति मे ओतए रहलहु मुदा रंजन के आपिस पूर्णिया अबै के रहैन तहि दुआरे भिंसरे पहिर मब्बी स बिदा भेलहु। हम दलान पर सूतल रहि भिंसरे पहर मैदान दिस स आबि मुह हाथ धो के तैयार रहि। मुदा शहरी बाबू रंजन के नीन 7 बजे टूटलैन सेहो हम अंगना जा के हरबरौलियैन तखन उठलाह आ हरबड़ी मे ब्रश केलैन आ तकरा बाद दुनू गोटे जलखै कए बिदा भेलहु मेघौन सेहो लागल रहैक। रस्ता पेरा गुफ अनहार लगैत बरखा सेहो भेल रहैए थाल खिचार सेहो रहैए। सभ स बिदा लैत सासुर स बिदा भेले रही फटफटिया स्टार्ट केने रही रंजन बैसी गेलाह की ताबैत मे केम्हरो स रंजन के छोटकी सारि सोनम दौगल अएलीह यौ पाहुन अहा के एटाइची त छुटिए गेल। ओ बजैत आ दौगल अबैत रहै जहा गाड़ि लक पहुचल की धरफरी मे ओकर पाएर पिछैर गेलैए आ अछैर पिछैर के खसैए लगलै आ हरबरी मे टाई पकरा गेलैए। टाई ततेक जोर स घिचेलैए कि रंजन फटफटिया पर स धबाक दिस खसि परलाह ततेक जोर स पंजरा मे चोट लगलैन जे कुहैर उठलाह । एम्हर हमरा हसी स रहल ने गेल। रंजन कुहरैत बजलाह हमरा एतेक चोट लगा कि देह टूट गया आ अहॉ खाली हॅसने मे लगा है। अहा किछ करेगा की नहि। हम बजलहु करेगा त एक्के मिनट मे मुदा पहिले ई कहिए टाई माने कथि। रंजन कुहरैत बजलाह किशन अहा ठीके कहता था गाम घर मे टाई माने रस्सी। मैथिली सीखू- (एकटा हास्य कथा) कोइलख वाली काकी खिसियाअैत बजलीह भरि दिन बैसल फुसियांहिक गप नाद मे लागल रहैत छी एहि स नीक जे किछू काज-राज करब से किएक नहि करैत छी। इ सुनि गजानन बाबू गरजैत बजलाह हम की करू हम त मैथिली पढ़ने छी काज राज त करैते छी त आब की करू। काकी खोंजाइत बजलीह किएक अई इ टीशन पढ़ाएब से नहि जे किछू आमदनी होइत त गाम मे कनेक खेत पथार सेहो कीन लेब। देखैत छियैक रमानन बाबू टीशन पढ़ा संपैत ढ़ेरिया लेलैन आ अहा गप नाद मे ओझराएल रहैत छी। गजानन बजलाह हे यै कोइलख वाली अहा सपना तपना देखैत छीएक टीशन तहू मे मैथिली के। इ सुनि काकी मुह चमकबैत बजलीह हे महादेव कनि अहि हिनका मति दियऔन। एतबाक मे गजनान बाबू फुफकार छोरैत बजलाह अईं यै अहा महादेव के किएक कहैत छियैन देखैत छियै महादेवक कृपा सॅ हम मैथिली स फस्ट डीविजन मे बी ए पास केने छी त आब की। काकी बजलीह यौ बाबू सोझहे डिग्री टा लेला स की होइत की ओकर किछू सार्थक काज सेहो हेबाक चाहि। देखैत छियैक आब लोग मैथिलियो पढ़ि कल्कटर लेखक भाषाविद् बनि रहल अछि मुदा अहॉ के मैथिली पढ़ाएब मे कोन मासचरज लगैए से नहि जानि। गजानन बाबू गमछा स देह कुरियबैत बजलाह यै कोइलख वाली ज अहा कहैत छी त हम कनेक रमानन बाबू स विचार पूछने अबैत छी ओ एतेक दिन स टीशन पढ़ा रहल छथि हुनका स परमार्श लेनै नीक रहत। काकी बजलीह जाउ अहॉ यै जल्दी जेब्बो टा करू अहॉ बड्ड ठेलीयाह आ कोंरहियाठ भ गेलहू। गजानन हॅफैत हा हा हा क बजलाह हइए हम एखने जा रहल छी कहू त नीक काज मे एतेक देरी किएक। रमानन बाबू विद्यार्थी सभ के पढ़बैत रहैथ की तखने गजानन धरफराएल ओतए पहुचलाह आ बजलाह कि औ सर किछू हमरो जोगार धरा दियअ। हुनका देखैत मातर रमानन बाबू बजलाह ओ हो मिस्टर गजानन कम कम मोस्ट वेलकम। गजानन पानक पीक फेकि बजलाह अपन लंगोटिया यार भ मैथिली मे बजबह त अंग्रेजी झारै मे लागल छह। इ सुनि रमानन बाबू बजलाह ओ मिस्टर गजानन प्लीज स्लोली स्टूडेंट इज हियअर सो प्लीज वेट। गजानन बजलाह रौ दोस इ वेट फेट छोड़ आ हमरो गप पर घियान दहि। इ गप सुनि रमानन बाबू विद्यार्थी सभ के ज्िल्दए छुट्टी दए देलखिहिन ओ सभ चल गेल। तकरा बाद रमानन बाबू रमानन बाबू बजलाह अई रौ गजानन तहू हरदम धरफराएल अबैत छैं कह की गप किएक एतेक अपसिंयात छैं। गजानन बजलाह रौ भाइ की कहियौह तोहर भाउज कहिया स हुरपेट रहल अछि जे टीशन किएक नहि पढ़बैत छी मुदा हमरा त किछू ने फुरा रहल अछि की करू। ओ बजलाह भाउज ठीके त कहि रहल छौ रौ दोस। गजानन बजलाह तोहि कह ने भाइ एखुनका एडभांस युग मे अगबे मैथिली के पढ़त एखन त जतए देखहि अंग्रेजी सीखू के बोर्ड लागल रहैत छैक तहू मे पहिने सीख लियअ फिस 15 दिन बाद दियौअ सेहो स्कीम रहैत छै । एना मे छौड़ा मारेर सेहो खाली अंग्रेजी स्पोकन मे नााम लिखा रहल अछि अपना भाषा स कोन काज छैक ओकरा। रमानन बाबू बजलाह से त ठीके मुदा भाइ तू चिता जूनि कर मैथिली संगे अंग्रेजी फ्री क दिहैक त तोरो बिक्री बट्टा भ जेतौह। गजानन हफैत बजलाह भाइ फरिछा के कह हम अपसियात भेल छी आ तू गप मारि रहल छैं। तखन रमानन बजलाह नहि रौ भाइ ठीके कहि रहल छियौ देखहि आइ काल्हि त देखते छिहि एकटा समान संगे एकटा फ्री देबही तबे किछु बिक्री हेतौह। तू मैथिली पढ़बहिए आ हम तोरे कोचिग मे आबि के फ्री मे अंग्रेजी पढ़ा देबै त तोरो काज हलूक भए जेतौ। ई सुनि गजानन खुशि स मोने मोन नाचए लगलाह आ हॅफैत हा हा के हसैत बजलाह हइए हम एखने चललियौ रौ भाइ जाइत छियैक हम आइए अपना घर के आगू मे मैथिली स्पोक मे बरका टा बोर्ड टांगि देबै आ ओहि बोर्ड मे लिख देबै मैथिली संगे अंग्रेजी फ्री मे सीखू। गजानन ओतए स आपीस आबि घरक आगू मे बरिका टा बोर्ड लगौलैन। सलीम आ डैनी दुनू गोटे कपरा किनबाक लेल फटफटिया पर बैसी बजार जाइत रहै की सलीम बाजल भाइ हमरा त मैथिली सीखने का मन करैत अछि। एतबाक सुनि डैनी खूम जोर स हसैत बाजल ए भाइ अहा के दिमाग सठिया गया है की भगैठ गया है। कहू त सभ अंग्रेजी सीखता है आ बम्बई जैसन शहर मे अहा मैथिली सीखेगा। सलीम बाजल भाई अहा एतेक देरी स कोनो गप किएक बुझता है। हम सभ परदेश मे रहकर कमाइत छी लेकिन अप्पन भाषा ठीक से नहि बोलता है। कहू हम अहा यदि नहि बजेगा त आन लोक सभ केना बुझहेगा। फेर अप्पन भाषा संस्कृति के बिकास केना होगा। देखिए त मराठी सभ ओ अपना भाषा पहिने बजता है तब दोसर ठाम के भाषा। ई सुनि डैनी बाजल भाई अहा ठीके कहता है आब त हमरो मन होता ह ैजे मैथिली सीखेगा आ अपना धिया पूता के सेहो कहेगा जे मैथिली सीखू। फेर ओ सीविल सेवा के तैयारी सेहो कर सकता है। सलीम बाजल त देरी किएक करता है भाइ चलू ने अभिए मैथिली वला मामू के ताकि लेता है। दुनू गोटे फटफटिया फटफटबैत बिदा भेल। सलीम फटफटीय चलबै मे मगन रहैए आ डैनी तकैए मे डैनी अचके खूम जोर स हसैए लागल ओ हो भाइ मैथिली वला मामू के त देख लिया। सलीम बाजल कतए कतए जल्दी देखाउ। डैनी फेर हॅसैत बाजल भाइ अहा के आखि चोनहरा गया है कि हइए अपने आखि से देखू ने मैथिली स्पोकन के बोर्ड। सलीम तुरंत फटफयिा बंद कए उतरल बोर्ड देखि के बाजल ठीके मे भाइ अई ठाम त मैथिली संगे अंग्रेजी सेहो फ्री है त चलिए ने मामू के खोज पूछारी करिए लेता है। गजानन बाबू कतेक दिन स विद्यार्थी सबहक बाट देखि रहल छलाह बैसल बैसल आंेघहि स झुकि रहल छलाह कि तखने सलीम आ डैनी हरबराएल पहुचल। सलीम बाजल ओ मामू ओ मामू कि एतबाक मे गजानन अकचकाइत चहाक दिस उठलाह। सलीम बाजल हमरा मैथिली सीखने का मन है इ कहू मैथिली सीखाने वला मामू अहि है की। गजानन हरबड़ाइत बजलाह हम कोनो मामू वामू नहि छी हम त मैथिलीक मास्टर छी। डैनी बाजल अच्छा ठीक छै अहॉ कतेक पाई लेगा से कहू। गजानन बजलाह अहा दुनू गोटे पढ़नाइ शुरू करू तकरा बाद फीस अपना मन स दए देबै। इ सुनि सलीम बाजल भाई मामू त बड्ड नीक आदमी है जे बम्बई मे मैथिली सीखा पढ़ा देगा। अच्छा हम दुनू गोटे काल्हि स टीशन पढने आएगा। एतबाक मे गजानन बजलाह रूकू ने चाह पी लियअ त जाएब। डैनी बाजल नहि मामू हम सभ काल्हि स पढने आएगा त अहॉ के लिए चाह बिस्कुट सेहो नेने आएगा। बेस अखैन हम सभ चलता है प्रणाम। ओ दुनू गोटे चलि गेल कि एतबाक मे कोइलख वाली काकी बजार स तीमन तरकारी किनने आपीस एलीह की गजानन चौअनिया मुसकान बजलाह आइ त कि कहू कमाल भए गेलैए। काकी बजलीह मारे मुह धके अईं यै कोन खजाना हाथ लागि गेल जे खुशि स एक्के टागे नाचि रहल छी। हे यै कि कहू आइ दू टा विद्यार्थी मैथिली पढ़बाक गप कए के गेल काल्हि स ओ सभ टीशन पढ़ै लेल आउत। काकी आश्चर्य स अकचकैत बजलीह गे माए गे अहॉक कोचिग मे विद्यार्थी कहिया स यै। इ सुनि गजानन गरजैत बजलाह विद्यार्थी हमरा कोचिंग मे नहि त की अहाक रसोइ मे चाह बनेबाक लेल औतैह। काकी बजलीह हे यै हमही बिचाार देलहू आ अहा हमरे पर खउंझा रहल छी। एतबाक मे गजनान खूम जोर स हा हा के हसैत बजलाह यै कोइलख वाली आब अहा देखैत जाउ मैथिली स्पोकन के कमाल आब कनि अहू टीशन पढ़ि लेब। काकी बजलीह ह यै किएक नहि हम त कहैत छी मैथिली पढ़ू लोके के सिखाउ आ अपनो मैथिली सीखू। हमर फोटो कहिया (कन्या भ्रूणहत्या पर एकटा कथा) कुसुम दाई भिंसरे सॅं हिंचैक-हिंचैक के कानि रहल छलीह किएक ने जानि से हमरो नहि बूझना गेल। ऑखि सॅं टप-टप नोर झहैर रहल छलैक कनैत-कनैत केखनो के हमरो दिस तकैत मुदा एक्को बेर चुप हेबाक नाम नहि। हम कॉलेज सॅ पढ़ा केॅं विद्यार्थी सभ के जल्दीए छुटटी दए के किछू काज सॅं आएल रही। जहॉ अंगना अएलहूॅं की केकरो कनबाक अवाज़ सुनलहॅू लग मे गएलहूॅ त देखलीयै जे कुसुम दाई कानि रहल छेलीह। हम लग मे जाके कुसुम के कोरा लेबाक प्रयास कएलहॅू मुदा ओ रूसि केॅं बाजल जाउ पप्पा हम अहॉ सॅ नहि बाजब। एतबाक बाजि ओ रूसि के बरंडा पर सॅ घर चलि गेल। हम दुलार कए के बजलहूॅ कुसुम अहॉ के की भेल हमर सुग्गा ने अहॉ बाजू ने। एतबाक सुनि ओ ऑखिक नोर पोछैत बाजल बाबू अहॅू बेईमान भए गेलहूॅ त आब हम केकरा सॅ अप्पन दुखःक गप कहियौअ अहि निसाफ कहू ने हमर फोटो कहियाअ \ ई गप सुनि हम कनेक अचंभित भए गेलहॅू हम फेर सॅं पुछलहूॅ कुसुम अहॉ किएक कानि रहल छलहॅू की भेल से कहू ने। त ओ बाजल बाबू अहॉ त माए के बुझहा सकैत छियैक हमर फोटो लगेबा मे कोन हर्ज हमहूॅ त मनुक्खे छी ने फेर हमरा सॅ बेइमानी किएक? अहिं कहू जे हमर फोटो कहियाअ? एतबाक मे हमर कनियॉ चाह बनौने अएलीह कि ताबैत कुसुम दाई धिया-पूता सभ संगे खेलाई धूपाई लेल चलि गेल। हम एक घोंट चाह पीबि के अपना कनियॉ सॅं पुछलहॅू कुसुम किएक कानि रहल छलैक। हमर कनियॉ मुहॅ पट-पटबैत बजलीह मारे मुहॅ धए के अहिं त ओकरा दुलारू सॅ बिगाड़ि देने छियैअ त अहिं बुझियौअ। हमरा त एखने सॅ निलेशक चिंता लागल अछि केहेन होएत केहेन नहि। हम बजलहॅू बेटाक चिंता त अछि अहॉ के मुदा ई बेटीयो त हमरे अहिंक छी एक्कर चिंता के करतै एसगर हमही की अहॅू? एतबाक सुनि हमर कनियॉ मुहॅं चमकबैत रसोइघर दिस चलि गेलिह। भिंसर भेलैक मुदा राति भरि हम ऑखि नहि मूनलहॅू एक्को रति नीन नहि आएल। भरि राति सोचैत विचारैत रहि गेलहॅू मुदा कुसुम के प्रशनक कोनो जवाब नहि सूझल। भिंसर ठीक सात बजे कुसुम दाई स्कूल जाइ लेल स्कूल बैग लए बिदा भेल त हमरा रहल नहि गेल। हम बजलहॅू कुसुम आई अहॉ स्कूल नहीं जाउ हमहॅू आइ कॉलेज सॅ छुटटी लए लेने छी तहि ,द्वारे दूनू बाप-बेटी भरि मोन गप-शप क लैत छी।एतबाक सुनि कुसुम फुदकैत हॅसैत हमरा लग मे आबि गेल कि हम ओकरा कोरा मे लए के झुला झुलाबए लगलहॅू। कुसुम बाजल पप्पा आई अहॉ पढ़बै लेल कॉलेज किएक नहि गेलहॅू अहॉ कथिक चिंता मे परि गेलहॅू से कहू। हम बजलहॅू चिंता एतबाक जे अहॉक फोटो कहियाअ? मुदा अहॉ हमरा फरिछा के कहब तखने हम बूझहब हमरा अहॉक प्रशनक कोनो जवाब नहि भेट रहल अछि त अहिं साफ साफ कहू। एतबाक सुनि कुसुम दाई बाजल अहिं कहू त पप्पा अहॉ पी.एच.डी माए हमर एम.बी.ए मुदा देबाल पर हमर फोटो नहि। एहि ,द्वारे त हम समाजक सभ लोक सॅ पूछि रहल छी जे हमर फोटो कहियाअ? समाजक सोच कहियाअ बदलत। एक त कोइखे मे हमरा मारि देल जाइत अछि। जॅं बॅचियोअ जाइत छी त हमरा दाए-माए सभक मुहॅ मलीन भए जाइत छन्हि। ओ पहिने सॅ पोता बेटा हेबाक स्वपन देखैत छथहिन मुदा बेटी हेबाक सपना कियो ने देखैत अछि। देखैत छियैक गर्भवति माउगी सभ दू-चारि मास पहिने सॅ देवाल पर बेटाक फोटो लगेने रहैत छैक। अड़ोसी पड़ोसी बजैत छथहिन हे महादेव एहि कनियॉ के बेटा देबैए फलां दाए के पोता देबैए। बेटा हाइए ,द्वारे कौबला पाति सॅ लए के अल्टॉसाउण्ड तक ई पूरा समाज बेटीक दुश्मन अछि। हमर माए त एकटा बेटीए छथहिन मुदा कहियोअ सेहन्तो देवाल पर हमर फोटो नहि लगेलखिन। त हम कोन खराब गप पुछलहूॅ जे हमर फोटो कहियाअ। कोन दिन समाजक सोच बदलत कहियाअ माए बहिन सभ देवाल पर बेटीक फोटो लगेतीह? कहियाअ बेटीक जनम भेला पर ढ़ोल पिपही बजा खुशी मनाउल जाएत मधुर बॉटल जाएत? देखैत छियैक बेटाक जनम भेला पर जिलेबी बुनियॉ मुदा बेटीक जनम भेला पर गुड़-चाउर बॉटल जाइत अछि।ई हमरा सॅ बेईमानी नहि त आर की थीक? पप्पा आई हम समाजक सभ लोक सॅ पूछि रहल छी हमर निसाफ कहियाअ? एखन हम कॉचे-कुमार छी मुदा जेना एखने सॅ हमरा बुझना जा रहल अछि जे हमर कुसुम दाई दुःखित भेल हमरा सॅ हमरा समाजक सभ पुरूख-माउगी सॅ पूछि रहल अछि बाबू अहिं निसाफ कहू हमर फोटो कहियाअ \\ मोछ वाली माउगी- होली पर हास्य कथा। धनिक दोकान दिस सॅ अबैत रही कि रस्ते मे खरंजे पर बिकाउ दास भेंट भए गेलाह पूछलनि बच्चा ई कहू करिया के कतहू देखलियैअ। हम बजलहूॅ नहि यौ बाबा हम अहॉ पोता के एमहर कहॉ देखलहूॅ। बिकाउ दास बजलाह धू जी महराज हम कारी सॅ केस दारही कटाएब आ अहॉ हमरा पोताक भांज कहि रहल छी। लगैए जे आई होरी खेलेबाक निशा मे अहॅू मातले छी। हमरे खनदानी नौआ छल कारी ठााकुर एमहर बिकाउ दासक पोतक नाम सेहो कारी। दूनू गोटे नामक अनुरूप देखैयोअ मे ततबेक कारी। कारी जतबाक देखबा मे कारी ओतबाक उजर धब- धब आकेर मोछ । बड्ड ईमानदारी सॅ शाही अंदाज मे हजामत करैत छल। ओकरा मोछक आगू मे त राजा महराजक मोछ छुछूआन लगैए। बिकाउ दास के हम कहलियैन बाबा बुझहैए मे धोखा भए गेल कारी नौआ तए अपने बथान दिस भेटत ओम्हरे जाउ ने। ताबैत उतरभारी दिस सॅ कारी अपने मगन मे झूमैत चलि अबैत रहैए। ओनाहियो फागुन मे सभ अपना धुन मे मगन रहैए। कारी के देखैत मातर बिकाउ दास बजलाह अईं रौ करिया एहि बेर जोगिरा गबै लेल नहि एबहि रौ तोहर सिद्धप वाली भाउज खोज पूछारी क रहल छलखुन जे एहि बेर किर्तन मंडली होरी गीत गाबि जोगीरा खेलेताह कि नहि। कारी मोछ पिजबैत बाजल भैया अहॉ जाउ ने अहॉ भाउजी के कहबैन भांगक सरबत बना के रखतीह। हम सभ पहिने भगवति स्थान मे होरी गीत गाबि अबीर चढ़ाएब तकरा बाद अंगने अंगने होरी खेलाएब। कारी के गप सुनि त हमहूॅ राग मल्हार मे मोने मोन नाचए लगलहूॅ जे आई भंाग पीबि क कारी संगे खूम नाचब। एहि बिचार मे मगन रही की कारी बाजल जे बच्चा अहॅू चलि आएब एहि बेर झाइल बजौनिहार लोक कम छै त अहॉ गीत गाबि झाइलो बजाएब। गाम घर मे नाटक खेलाई त हमही गीत नाद गाबै सॅ ल के मंच संचालन तक करी। तहि द्वारे निधोखे हम बजलहॅू बेस जाउ हम भगवती स्ािान मे भेंटइ भए जाएब । दूपहर दू बजे किर्तन मंडलीक सभ कलाकार आस्ते आस्ते जुटान होमए लगलयै। कारी अपना दरवज्जा पर बैसी के चिलम फूकै मे मगन रहैए एक सोंठ खिचनहियै रहै की केम्हरो सॅ मनोज क्रांतिकारी धरफराएल आएल आ कारी े देह पर धाई दिस खसल। बाजल हौ कारी कक्का आई तोरे संगे होरी खेलाएब। एतबाक मे कारी फनकैत बाजल कह त हनो खसान खसब होइत छैक एखने चिलमक आगि सॅ मोछ झरैक जाएत। फेर मनोज बाजल हौ कक्का हमरो स बेसी त डंफाक ओजन छै तही दुआरे धरफरा गेलहूॅ। तकरा बाद दूनू गोटे एक एक सोंठ चिलम खिचलक धुऑं नाक दए के फेकलकै की कारी बाजल रौ भातिज किर्तन मंडलीक कलाकार सभ कतए नुकाएल अछि। एतबाक मे हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल ढ़ूम-ढ़ूमबैत बुद्धना हरमोनियम पिपयबैत आ रामअशीष झाइलि झनकबैत तीनू गोटे तीन दिसि सॅं एकसुरे बजबैत आएल। ताबैत मे मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हल्ला गुल्ला बंद करू आ सुनु कारी कक्का के वाणी जी नहि त भरू ढ़ोलकिया के पानि जी। कि एतबाक मे कारी कठझाइल झनकबैत बाजल जोगी जा सारा...रा...रा. त सभ गोटे एक सुरे बाजल सारा रा रा। बुद्धन बाजल रौ मनोजबा तेहेन शास्त्रीय राग मे पानि भरबाक लेल कहलीह जे दू-चारि टा छौंड़ा मारेर त डरे स भागी गेल। मनोज बाजल हौ भौया रंग घोरबाक लेल त पानि चाहि ने। रामअशीष बाजल हं रौ भजार ई त ठीके कहलीहि आब ई कह जे एहि बेर भाउजी के बनत। एतबाक मे कारी मोछ पिजबैत बाजल रौ भातिज जूनि चिंता कर हम एखन जीवते छी। होरी मे कारी सौंसे गौआक भाउजी बनैत छलैक की बुढ़-पुरान की छौंड़ा मारेर सभ गोटे हंसी खुशी सॅ गीत गाबि कारी संगे दिअर भाउज जेका होरी खेलाइत छल। मनोज बाजल हौ कक्का माउगी बनबहक से साड़ी बेलाउज कहॉ छह। कारी बाजल धूर रे बुरिबक जो ने तू अपने माए बला साड़ि नेने आ ने तोरे माए त हमरा भाउजे हेतीह। हौ कक्का तूं मारि टा खूएबह तोरा त बुझलेह छह हमर बाप मलेटी सॅ रिटायर आ हमर माए सेहो मलेटी। ज ई सारी मे लाल पीअर लागल देेखतैह त कतेक मुक्का मारत से कोनो ठीक नहि। अच्छा कक्का तू चिंता नहि करअ हम अपने कनियॉ वला नुऑ नेने अबैत छी। कारी बाजल रौ भातिज तू बुरहारी मे हमरा गंजन टा करेमेह। हम ससुर भए के पूतहॅू देहक नुऑ कोना पहिरब रौ राम-राम। लोक त साड़ी देखैते मातर चिन्हि जेतैए जे ई तोरे कनियॉक नुआ छै तब त लोको कोनो दसा बॉकि नहि राखत। बुद्धन कनेक बुझनुक ओ बाजल हौ तोरा डर किएक होइत छह कियो पूछतह त कहिअक जे ई त बुधनाक साउस के नुआं छियैक। हमर साउस एखन अपने गाम आएल छथहिन। कारि ई सुनि चौअनियॉ मुस्कान दैति एकसुरे दू गिलास देसी भांगक सरबत घोंटि गेल आ बाजल बुधन तूं हरमोनिया बजाअ ताबैत हम समधिन संगे होरी खेलेने अबैत छी जोगी जा सारा...रा....रा। कि फेर सभ एकसुरे गाबैए लागल जोगी जा सारा रा रा। हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल धूम-धूमबैत बाजल होरी मे कक्का करै छथि बरजोरी बुरहोरी मे मोन होइत छनि थोरू थोरू जोगी जा सारा रा रा। मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हौ कारी कक्का एना किएक मोन लुपलुपाइत छह। कारी झाइलि झनकबैत बाजल रौ भातिज ई फगुआ होइते अछि रंगीन तोंही कह ने मलपुआ खेबाक लेल केकर मोने ने लुपलुपाइत छैक। हं हौ कक्का एनाहियो होरी मे नएका नएका भाउज सबहक गाल त मलपुए सन पुल पुल करैत रहैत छैक। कारी साड़ी पहिर अनमन माउगी बनि गेल मुदा मोछक देखार चिनहार दुआरे घोघ तनने। कारी हाथ सॅ झाइलि ल हम गीत गाबि झाइलि बजबैत होरी गाबै लगलहूॅ रंग घोरू ने कनहैया हो खेलैए होरी रंग घोरू सभ गोटे गीत गबैत भगवति स्थान बिदा भेलहूॅ। भगवति के अबीर चढ़ा प्रणाम करैत मंडलीक सभ कलाकार अंगने अंगने होरी खेलेबाक लेल बिदा भेलहूॅ। जेहेन घर तेहेन सरबत कतहॅ छूछे रंग टा। मुदा लोक हॅसी खुशी स होरी खेलाई मे मगन होइत होइत बिकाउ दासक दरवज्जा पर पहुॅचलहॅू त होरी गीत शुरू केलहॅू हो हो किनका के हाथ कनक पिचकारी बुधना हरमोनियम पिपयबैत बाजल हो बिकाउ कक्का के हाथ कनक पिचकारी। एतबाक सुनितेह विकाउ दास अपना बेटा के हाक देलखिहिन हौ मांगनि जल्दी सॅ मंडली सभहक लेल दूध भांगक सरबत नेने आबह। ई सुनि हम सभ आर बेसी जोर सॅ जोगीरा गबै लगलहूॅं ताबैत मनोज एक आध बेर डंफा लेने धरफड़ा के खसि पड़ल। ओकरा उठेलहूॅ आ सभ गोटे भरि छाक भांगक सरबत पीबि होरी गबै मे मगन। एम्हर जोगीरा देखबाक लेल कनिया-पूतरा धिया-पूता सभ घूघरू लागल। एतबाक मे सिद्धप वाली दाई अबीर उड़बैत एलीह आ हॅसैत बजलीह गे दाए गे दाए ई नचनिहार माउगी के छीयैक? सुखेत वाली कनिया बजलीह माए इहेए चिन्थुहुन ने। दाई बजलीह चिन्हबै की पहिने रंग अबीर स देह मुॅह छछारि दैति छियैक। दाई निधोखे रंग लगबै लगलीह की घिचा तिरी मे कारीक घोघ उघार भए गेलै। दाई बजलीह गे माए गे माए एहेन मोछ वाली कनियॉ त पहिनुक बेर देखलहूॅ। ताबैत कारी मुस्की मारैत बाजल भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर कारी। दाई एतबाक सुनि ठहक्का मारैत बजलीह अईं रौ मोछ वाली कनियॉ ला कनि तोहर मोछो कारीये रंग मे रंगि दैति छियौ। एकटा दिअर भाउज के निश्छल प्रेम त गामे घर मे भेटत। तखने मनोज बाजल काकी ई कनियॉ पसीन भेल किने ? दाई बजलीह हं रौ मनोज बड्ड पसीन भेल 60 वर्षक अवस्था मे पहिनुक बेर देखलहॅू एहेन सुनर मोछ वाली माउगी। राम प्रवेश मण्डल विहनि कथा- आह मिथिला! वाह मैथिली! अहाँ घर आंगनसँ निकलि संसारमे पसरि गेलौं। संसार गाम जकाँ भऽ रहल अछि। सकेंडोमे विश्वक कोनोठाम रहैबला परिजनसँ गप्प कऽ सकै छी। हुनक छाया देख सकै छी। जइसँ हृदए आनंदित, अह्लादित भऽ जाइछ। ऐ आनन्दमे हमहुँ साझी हएब, इच्छा भेल। साठि वसंत पार कऽ रहल छी। नूनूकेँ कहलियनि- “हओ, एकटा मोवाइल कीन लैह। विज्ञान आ वैज्ञानिकक ऐ चमत्कारक लाभ हमहुँ सभ उठाबी।” नूनू एकटा नीक-दामी मोवाइल कीनलक आ हाथमे दैत कहलक- “लिअ अहूँ अपन इच्छाकेँ पूरा कऽ लिअ।” हम कहलिऐ- “हओ, मॉरिससमे सुन्दरलाल अर्थोपार्जनक लेल गेल अछि। हुनकासँ गप्प कराबह।” नूनू नम्बर टीपलक आ हमरा हाथकेँ देलक। गप्प हुअए लगल। हम पुन: मोवाइल नूनू हाथकेँ दैत कहलियनि- “हओ नूनू, सुन्दरलाल तँ दोसर भाषामे बजै छै। गाममे तँ मैथिली बजै छलै। एतेक ल्दी ई परिवर्तन केना भेलै? नम्वरकेँ जाँचि अपन मातृभाषा मैथिलीमे गप्प कराबह। सुनै छी जे मोवाइलमे सभ भाषा रहै छै?” नूनू आगा किछु नै बाजि हमरापर ऑंखि ला-पीयर करए लागल। शैल झा “सागर” एकटा पत्र एकटा समीक्षा- किस्त किस्त जीवन "किस्त किस्त जीवन” अहाँ तँ सागर जी के पठोलिऐ मुदा घरुआरी नारी हेवाक कारणे ई लाभ हम उठेलों हुनकासँ पहिने हमही पढ़ी गेलों ६-६ किस्त मे ! हमरा बुझवा मे नहि आबि रहल अछि कतऽ सँ शुरू करी, की लिखी, की कही? हँ एतेक जरुर कहब एहि किताब केँ हाथ मे लैत आ किताब दिसि तकैत अनेरो आंखि सँ दहो बहो नोर झरय लागल, किये एकर कारण हम अपनों नहि जनैत छी. एहि बेर महाकुम्भक मेला लागल अछि .हमरो बहुत परिचित लोकनि सब महाकुम्भ करय जाय गेलीह अछि .हमरो कहलनि हम हिनकासँ पूछल मुदा हिनकर नहिये सन जबाब पाबि हम चुप भऽ गेलों किएक तँ हिनका एहि सबमे विश्वास कनी कम्मे छनि. लेकिन किस्त किस्त पढ़ी गेलासँ मोनमे हिलकोर उठल जे कोनो टा कुम्भ स्नानसँ बेसी सुखमय लागल . एकटा बात आर जे मोनक कोनो दोगमे अहांक दर्शन करवाक प्रबल इच्छा जागि गेल अछि। ठीके जखन अहाँकेँ दर्शन करब तँ हाथसँ छुबि कऽ देखब, आंगुरसँ दाबि कऽ देखब, चरणमे झुकि कऽ देखब . की सरिपों अहाँ वैह शेफालिका छी जे हमर माथ पर एखन हाथ रोपने छी. सत्ते विधाता क पैघ डांग अहांक रंगीन जीवन पर पडल, अहाँ लोकनिक अंतरंगता हुनको अखरि गेल्न्हि. अहाँ एकटा सफल बेटी, निश्छल प्रेयसी, सर्वस्व समर्पिता पत्नी, कुशल गृहिणी, ममतामयी माय, निष्णात लेखिका समाजसेविका, राजनयिक आ बांधवी आ आर की की नै छी ! से नहि जनितों जों ई पोथी नहि पढितों . अहाँ अतुलनीय छी तोहर सरिस एक तोंहे माधव मोन होयछ अनुमाने .( ई बात हम एहि लेल लिखलों जे सागर जी अहांक तुलना महादेवी वर्मा, महाश्वेता देवी वगैरह सँ करैत छथि, जे हो मुदा मैथिली साहित्य केँ एकटा अनमोल वस्तु भेटलैक अहांक ई पोथी. हमरा बुझने एहि पोथिक उचित मूल्यांकन नहि भेलैक अछि . हमरा सन घरेलू महिला के अरवैध कऽ पढ़वाक चाहियनि पोथी. भाषा आ शैली मे गति छैक. एक दू पेज पढ्वाक बाद हैत नहि जे पढ़ब छोड़ी . कोनो काज करी . यैह एहि कृतिक सफलता भेलैक . १९७२ मे जखन हमर ब्याह भेल छल तखन सँ मैथिली पोथी पत्रिका पढैत आबि रहल छी ! तहिया मिथिला मिहिर मे अहांक दू जुटिया गुहल केश वाला फोटो संग अहांक कविता कथा सब पढैत रही , बड बढियां, बड्ड बेश --- किस्त किस्त जीवन एकटा विरल रचना छैक आ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस क वर्षगांठ पर हम आग्रह करबनि मैथिलीक भाग्यविधाता लोकनि सँ जे एहेन उपाय करथि जे एहि पोथीक अंतर्राष्ट्रीय भाषा सब मे अनुवाद होइक ..................... आब हम अपन लेखनी के विराम देब चाहैत छी एहि एक पाती क संग---- पढ़ी गेलों ई आत्मकथा मोन मे उठल उसांस एक .. कतेक व्यथित ई बारहो मास .. कतेक व्यथित ई बारहो मास ....................... रमाकान्त राय “रमा” (आचार्य दिव्यचक्षु) आरसी बाबूक व्यक्तित्व एवं कृतित्वपर द्विदिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार- दू दर्जन विद्वानक सहभागिता मुजफ्फरपुर। साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्नातकोत्तर मैथिली विभाग, बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुरक संयुक्त तत्वधानमे महाकवि आरसी प्रसाद सिंहक जन्म शतवार्षिकीक अवसर एकटा द्विदिवसीय सेमिनारक आयोजन गत 16-17 दिसम्बर 2010केँ विश्वविद्यालयी पुस्तकालयक सभागारमे कएल गेल जैमे दू दिन धरि दू दर्जनसँ अधिक विद्वान अपन-अपन आलेखक पाठ केलनि। जैमे आरसीबाबूक महनीय सारस्वत व्यक्तत्वक विभिन्न पक्षपर विशद विवेचन कएल गेल। 15 दिसम्बरकेँ ओयोजिका सह मैथिली विभागाध्यक्ष डाॅ. कमला चौधरीक अध्यक्षतामे उद्घाटन सत्र 10 बजे प्रारम्भ भेल। कार्यक्रमक आरम्भमे स्नातकोत्तर मैथिली विभागक छात्रागण गोसाओनिक गीत प्रस्तुत केलनि। विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. राजदेव सिंह आरसीबाबूक चित्रपर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कऽ कार्यक्रमक उद्घाटन केलनि। स्वागत गीतक बाद साहित्य अकादेमीमे उपसंपादक श्री देवेन्द्र कुमार देवेश, सभागत अतिथि, प्रतिभागी साहित्यकार एवं समुपस्थित श्रोतागणकेँ स्वागत केलनि। अकादेमीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधि डाॅ. विद्यानाथ झा विदित, आरसी प्रसाद सिंहक विराट व्यक्तित्व, हुनक साहित्य साधनाक विस्तृत फलकपर विद्वत्वर्ग द्वारा गहन विचार-विमर्श करबाक आह्वान केलनि। डॉ. नरेश कुमार विकल, अपन बीज भाषणमे हुनक साहित्य साधनाक विस्तृत चर्च करैत हुनक राष्ट्रवादी, उदात एवं स्वाभिमानी चरित्रक विस्तृत चर्च करैत मैथिली साहित्यमे हुनक अवदानक सेहो चर्च केलनि। ऐ अवसरपर साहित्य अकादेमी द्वारा डाॅ. विव्येन्द्र पालिक प्रकाशित एवं डॉ. देवेन्द्र झा द्वारा अनुदित बंगला उपन्यासक लोकार्पण डाॅ. विद्यानाथ झा विदित द्वारा सम्पन्न भेल। डॉ. मदन मिश्र धन्यवाद ज्ञानक केलनि। मध्याह्न 12 बजे डॉ. देवेन्द्र झाक अध्यक्षतामे दोसर सत्र आरम्भ भेल जैमे डॉ. नरेन्द्र नारायण झा िनराला, आरसी बाबूक रचना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यपर एवं डॉ. लावण्य कीर्ति सिंह काव्या आरसीक रचनामे संगीत तत्वपर अपन-अपन आलेख पाठ केलनि। श्रोताक विशेष आग्रहपर डॉ. नरेश कुमार विकल अपन बहुप्रशंसित कविता कहुना कऽ चलि आउ अपन गाम'क सस्वर पाठ केलनि। भोजनोपरान्त अपराह्न 3 बजे डॉ. पद्मनारायण झा विरंचि'क अध्यक्षतामे श्री राजन सिंह, डॉ. रामनरेश सिंह एवं श्री श्रीमन्त पाठक आरसी बाबूक काव्यक विभिन्न आयामपर विस्तृत प्रकाश देलनि। विदित जीक आग्रहपर श्रीमन्त पाठक अपन एकटा गीत सेहो प्रस्तुत केलनि। पहिल एवं तेसर सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा एवं दोसर सत्रक डॉ. सुलेमान केलनि। दोसर दिन 16 दिसम्बरकेँ डॉ. नागेश्वर सिंह शशीन्द्र'क अध्यक्षतामे श्री रमाकान्त राय रमा, श्री विवाकान्त पाठक, एवं श्रीमती सुशीला झा आरसी बाबूक रचनाशीलता जीवन दर्शन, व्यक्तत्व एवं आदर्शपर अपन-अपन सारगर्भित आलेखक वाचन केलनि। विदित जीक आग्रहपर श्री अमलेन्दु शेखर पाठक बेंगलोर'मे भेल सर्वभाषा लेखक संगोष्ठिक विषएपर अपन अनुभव सुनौलनि आ ओइ प्रस्तुत अपन रचनाक सेहो पाठ केलनि। अध्यक्ष डाॅ. शशीन्द्रजी आरसी प्रसाद सिंह जीवनक विभिन्न पक्षपर चर्च करैत जनौलनि जे हुनकामे अपन भावना व्यक्त करबाक एकटा अद्भूत कला छल। ओ मैथिलीए नै हिन्दी भाषामे सेहो अनेक आयामक विकसित केलनि। भोजनोपरान्त पुन: डॉ. कमला चौधरीक अध्यक्षतामे समापन सत्र आरम्भ भेल जैमे डॉ. प्रमोद कुमार सिंह डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन आ डॉ. श्रीमती नीता झा अपन-अपन प्रतिवर्दनक लऽ उपस्थित भेलाह। प्रमोद बाबू आरसीक विराट िहन्दी साधना आ मातृभाषा मैथिलीक अा साधनाक तुलनात्मक विश्लेषण करैत मैथिली सेवा लग हिन्दी सेवाक फूस जकाँ बतौलनि। हिन्दीक विद्वान प्रवक्ता एवं साहित्यकार होइतो ओ मैथिलीमे धराप्रवाह बाजैत हुनक बाल साहित्य, किशोर साहित्य एवं प्रौढ़ साहित्यक प्रसंग विस्तृत चर्च केलनि। डॉ. नीता झा सम्पूर्ण कार्यक्रमक पर्यवेक्षण प्रतिवेदन प्रस्तुत केलनि जैमे सभ-सबहक सभ वक्ताक सम्भाषण मूल तत्वक बीज विद्यमान छल। डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन अपन समापन भाषणमे मैथिली साहित्यक वर्तमान दशा-दिशाक चर्च करैत ऐमे आरसी बाबूक महती योगदानक चर्च केलनि जे यद्यपि ओ हिन्दी आ मैथिली दुनूमे लिखिलनि मुदा हिन्दी हुनका ओ सम्मान नै देलकनि जकर ओ अधिकारी छलाह। मैथिली हुनक मातृभाषा छलनि जे अपन पुत्रक सम्मान दऽ मान बढ़ौलक। डॉ. विद्यानाथ झा विदित मैथिली भाषाक लेल साहित्य अकादेमी, भारतीय भाषा संस्थान आ भारत सरकारक योजनाक प्रसंग विस्तृत जानकारी देलनि। आजुक तीनू सत्रक संचालन डॉ. अमरनाथ झा केलनि। श्री शैलेन्द्र चौधरी धन्यवाद ज्ञापन केलनि। शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ मैथिलीपर जातिवादी कलंक मैथिली आर्य परिवार समूहक पहिल भाषा थिक जेकरापर जातिवादी कलंक लागल अछि। ऐ भाषाकेँ ब्राह्मणवादी प्रवृतिसँ झाँपि देबाक विरोध आवश्यक भऽ गेल। जखन लालूजी बी.पी.एस.सी.सँ एकरा बाहर केलनि तँ मात्र किछु चानन-ठोपधारी धरि एकर विरोध सीमित रहि गेल छल। ई प्रश्न विचारणीय अछि जे बिलट पासवान विहंगम, महेन्द्र नारायण राम, प्रो. रविन्द्र चौधरी आ डॉ. मोतीलाल यादव सन किछु विद्वतकेँ छोड़ि आन जातिक लोकक मध्य मैथिलीक प्रति दर्द किएक नै भेल छल। कोना हेबो करितए? जखन साहित्य अकादेमी सलाहकार बोर्डक अध्यक्ष पहिने डॉ. रामदेव झा तकर बाद हुनक ससुर चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क पश्चात रामदेव झाक समधि विद्यानाथ झा विदित, तखन आन जातिकेँ के कहए ब्राह्मणोमे विरोधाभास संभव छैक। माल महराजक िमर्जा खेलए होली। साहित्य अकादेमी देशक जनताक ऊपर लागल कर (टेक्स)सँ चलैत अछि। भातसँ सन्ना भारी, मिथिलामे ब्राह्मणक आबादी मात्र पाच-सँ-छओ प्रतिशत आ संपूर्ण मैथिलीपर हुनके अधिकार अहूमे किछु पागधारी ऐ साहित्यिक मंचकेँ पॅजियौने छथि। मैथिली गाममे रहिनिहार आम लोकक भाषा थिक। जखन मिथिला राज्यक बात होइत अछि तँ बेगूसराय के कहए हम सभ बॉका धरि चलि जाइत छी मुदा जौं अधिकारक गप तँ समस्तीपुर आ मधेपुरा आदिक ब्राह्मणो सभ भदेसक मानल जाइत छथि, ओना भदेसक ब्राह्मणमे सँ किछु साहित्यकार जेना सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, मार्कण्डेय प्रवासी, कीर्ति नारायण मिश्र सन किछु लोक सम्मानित कएल गेल छथि किएक तँ ओ सभ दरभंगा आ पटनाक बीच झुलैत उत्तरबरिया संस्कारिक लोकक विदुषक रहलाह। ऐ बेरक साहित्य अकादेमी पुरस्कार तँ निर्लज्जताक पराकाष्ठाकेँ पार कऽ देलक। वर्तमान मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्यकार जगदीश प्रसाद मंडलक नाओं निर्णायक मंडल धरि नै पहुँचल। उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ आ सुभाष चन्द्र यादवपर भारी पड़ि गेलाह चन्द्रनाथ मिश्र अमरक चेला उदयचन्द्र झा विनोद, कहिया धरि एना चलैत रहत? गलती पछातिक साहित्यकार अथवा दछिनाहा ब्राह्मण साहित्यकारो सबहक छन्हि। अपने पाग पहिर ई बिसरि जाइ छथि जे जइ समाजक ओ प्रतिनिधित्व करैत छथिन ओ कहियो हुनका माफ नै करतनि। पाग मात्र ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थ परिवारक सकल मंगलकार्यमे पहिरल जाइत अछि। आन जातिक मध्य एकर कोनो प्रयोजन वा परंपरा नै। तखन मिथिलाक सभटा साहित्यिक समारोहमे पाग पहिरेबाक प्रथाकेँ की मानल जाए? चाटुकार ब्राह्मण साहित्यकार ऐ प्रथा द्वारा की प्रमाणित करबए चाहै छथि जे मैथिली मात्र ब्राह्मणेटा केर भाषा थिक? गलती किछुए लोक करैत अछि आ दोष सम्पूर्ण समाजपर मढ़ल जाइत अछि। ब्राह्मणोमे स्व. गोपालजी झा गोपेश, स्व. कालीकान्त झा ‘बूच’, स्व. चतुरानन मिश्र, श्री स्जीत, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, डॉ. विद्यापति झा आ स्व. प्रो. रामकृपाल चौधरी ‘राकेश’ सन रचनाकारक संग न्याय नै भेल किएक तँ ओ सभ ऐ चाटुकार मंचक सदस्य नै छलथि वा छथि। तँए समन्वयवादी ब्राह्मण साहित्यकारकेँ ऐ गिरगिटिया लोक सभसँ मैथिलीक रक्षा करए पड़तनि। हम साहित्यमे आरक्षणक समर्थन नै करैत छी मुदा सबहक प्रति सम्यक भाव रखबाक चाही। विगत 10 समारोहसँ सगर राति दीप जरय’मे मैथिलीक साम्यवादी प्रांजल साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल भाग लऽ रहल छथि मुदा गोधूलि बेलामे प्रारम्भ होमएबला ऐ कथागोष्ठीमे हुनका कथा-पाठक आइ धरि रातिक 1 बजेसँ पहिने अवसर नै देल जाइत अछि। कवि राजदेव मंडलकेँ अनुवादक कोनो एसाइनमेट नै भेटलनि। हम विश्वासक संग कहैत छी जे राजदेव मंडल आ दुर्गानंद मंडल खुशीलाल झासँ श्रेष्ठ अनुवादक छथि। डॉ. रवीन्द्र चौधरी मोहन भारद्वाजसँ श्रेष्ठ आलेख लिखैत छथि। बेचन ठाकुर आ डॉ. उदय ना. सिंह नचिकेता महेन्द्र मलंगियासँ नीक नाटककार छथि। डॉ. शेफालिका वर्मा उषाकिरण खानसँ श्रेष्ठ महिला रचनाकार छथि। आनंद कुमार झाकेँ जे सम्मान देल गेल तेकर हम समर्थन करैत छी। परंच जौं ओ आनंद पासवान वा आनंद मंडल रहितथि तखन ई संभव छल? जौं आधुनिक पीढ़ीक लोक ऐ कु-बेबस्थाक विरोध नै करताह तँ संभव अछि जे हमर स्वर्गीय पिता कालीकांत झा ‘बूच’क कविताक ई पाँति सत्य प्रतीत भऽ जाए- “दिवस निकट ओ आबि रहल अछि हेती मैथिली सभसँ कात...।” ओना ऐ ब्राह्मणवादी सोचबला किछु संस्थाक सम्यक कार्यक सराहना करब सेहो आवश्यक। जेना मिथिला सांस्कृतिक परिषद जमशेदपुरक वार्षिक कलेण्डरमे विद्यापतिक संग-संग लोकदेव सलहेसक फोटो देखि नीक लागल। ऐ लेल प्रो. अशोक अविचल आ प्रो. रवीन्द्र चौधरीक संग-संग श्री एस.एन. ठाकुर आ सम्पूर्ण परिषद् धन्यवादक पात्र छथि। ऐ प्रकारक समन्वयवादी सोचकेँ शतश: नमन। रवि भूषण पाठक टिल्लू जी (शिव कुमार झा) जन्मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्लू जी ।बहुत दिन सँ अहॉं से बात नइ भ' रहल अछि आ हम प्रयासो केलहुं त' अहॉ व्यस्त रही ,कखनो टाटा ,कखनो भुवनेश्वर ।आइ अहॉक जन्मदिन अछि आ अहॉक सभ स्वप्न सभ प्रतिज्ञा सामने होयत ।भगवान सँ हमर सभक प्रार्थना कि अहॉंक सब कामना फलीभूत हो ।मैथिली भाषा क एकटा पाठक होयबाक नाते हमर ई कामना कि अहॉ सब तरहें मैथिली साहित्य के समृद्ध करी ।एकटा कविक पुत्र होयबा क नाते जे दायित्व अहॉ क छल से अहॉ लगभग पूरा क देलहुं ,मुदा एकटा लेखक होयबा क नाते अहॉके बहुत किछु करबा क अछि ,ने केवल मात्रा मे बल्कि गुणात्मकता मे सेहो । अहॉक कविता मे बूच भैया क कविता क छाया देखाइत अछि ,ई जत्ते स्वाभाविक छैक ,ओतबे अहॉ लेल अपरिहार्य अछि कि अहॉ अपन रस्ता बनाबी ।जे ओइ पीढ़ीक दुख छैक ,ई ओकरे छैक आ ओ पीढ़ी जे शिल्पक चयन केलकइ ,सेहो ओकरे रहतइ ,नवका पीढ़ी के बेशी नवोन्मेषी बनए पड़तए ,तखने ई ज्योतिरीश्वर आ विद्यापतिक भाषा अपन प्रासंगिकता बनेने रहतइ ।यद्यपि सभ भाषाक अपन अपन संस्कार होइत छैक आ ओकर रचनात्मकता सेहो इतिहासक कोखि सँ निकलि रहल छैक ,तैयो लोकल किछु नइ रहलइ ।
अहॉक आलोचना भाषा तथ्यात्मक आ निर्णयात्मक रहैत अछि ।तथ्यात्मकता यद्यपि प्रामाणिकताक अंग बनिके आबैत अछि ,तथापि कखनो कखनो ओ पाठ के बोझिल सेहो बनबैत अछि आ तथ्य क बोझ तखन आर बेशी भ' जाइत अछि ,जखन ओ केवल जानकारी क प्रदर्शनक लेल आबैत अछि ।जेना 'गामक जिनगी' पर लिखैत काल अहॉ खूब रास कहानीकारक नाम लिखैत छी । बात केवल अहींके नइ अछि ,प्राय: मैथिली मे नामक गोला चलैत छैक ,आ लेखकक भाषाक स्वभाव ,ओकर बनावट पर कम विचार होइत अछि ।तहिना तुलनात्मक आलोचनाक मतलब लेखक लोकनि दूटा किताब ,लेखक या उद्धरणांश सँ बूझैत छथिन्ह ,तुलनात्मक आलोचना के सही बाट देखयबाक जिम्मेवारी अहीं सन लेखक के अछि ।ऐतिहासिक आलोचना एखनो महत्वपूर्ण अछि ,किएक त' मैथिली साहित्यक इतिहास आ विभिन्न युग ,लेखक ,क्षेत्र आ प्रवृत्तिक कार्यभागक सही सही मानचित्र अखनो हमरा सभक समक्ष नइ अछि ।समाजशास्त्रीय आ उत्तर आधुनिक आलोचना क बाते छोड़ू ,एकर त' नामोनिशान अखन मैथिली मे नइ अछि ,मुदा अहॉ सन उद्योगी व्यक्ति हमरा समक्ष छथि ,तें आशान्वित छी ,आइ ने काल्हि सब चीज अनुकूल स्थान पर मानक रूप मे रहत । आइ बस एतबे ,जन्मदिनक फेर सॅ मंगलकामना ।अहॉ चिरायु हो । बृषेशचन्द्र लाल बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ — बड़ सुख सार पाओल स्मरणे ... एखन सम्पूर्ण मिथिला विद्यापतिमय अछि । नेपाल आ भारतक दुनू पारक मैथिलीभाषी अपन महान् साहित्यकार, जनउद्वेलक लोककवि तथा समाजक मार्गनिर्देशक कविकोकिल विद्यापतिक स्मरण श्रद्धापूर्वक कऽरहल अछि । विद्यापति अपन कालमे अपन विशिष्ट, अद्भूत आ हृदयस्पर्शी लोकलयसँ युक्त पदावलीसभक बलेँ सम्पूर्ण मिथिलाकेँ जोड़बेटा नहि कएलनि वरन् दूर–दूर तक एकर माथ गर्वसँ ऊँच कऽ देलनि । हिनक भक्ति पदावलीसभ वैष्णव सम्प्रदायक सभसँ लोकप्रिय तथा सन्तसभकलेल अध्यात्मिक अनुभूतिदायक बनि गेल । कविकोकिल एखनो सम्पूर्ण मिथिलाक एकताक डोर छथि । प्रत्येक वर्ष विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसरपर सम्पूर्ण मैथिलीभाषी एक भऽ जाइत छथि । अन्तर्राष्ट्रिय सीमा बिला जाइत अछि आ हिनक किर्तिपताकाका दुनियाँभरिमे मैथिलभाषीसभपर गौरवक सौरभ छिटैत बहैत चलि जाइत अछि । विद्यापति स्मृतिदिवस मिथिलाञ्चलमे कविकोकिलक स्मरणटामे सिमित नहि अछि, आब ई मैथिलीभाषी क्षेत्रक भाषिक आन्दोलनप्रतिक एकवद्धता प्रदर्शनक दिवसक रुप लऽ नेने अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान आ एकरा राष्ट्रियभाषाक रुपमे पुनः सम्मानित आ प्रतिष्ठित कराबएहेतु सक्रिय मिथिलाक सपूतसभकलेल ई उर्जा प्राप्तिक पर्व बनि गेल अछि । भारतेमे नहि नेपालमे सेहो मैथिली–आन्दोलनक प्रारम्भ विद्यापति स्मृति दिवसक आयोजनसँ शुरु भेल छल । काठमाण्डूमे पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीक सक्रियतासँ नेपालमे एक भाषा—एक भेषक घोरऔपनिवेशिक मानसिकतासँ चालित राजाशाही क्रूर शासन आ एकदलीय तानाशाहीक सांस्कृतिक बिरोधक शुरुआत सेहो विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजनसँ आगाँ आएल छल जकर अनुशरण बादमे अन्यान्य भाषाभाषीसभ सेहो कएलनि । नेवाररत्न शंखधरक स्मृतिमे पद्मरत्न तुलाधर आ हुनक संगीसभसँ न्हुदयाँ भिन्तुना दिवसक भव्य राजनीतिक आयोजन होमए लागल जे समूह एखन नेवार समुदायमे भाषिक आन्दोलनक नेतृत्व कऽ रहल अछि । पण्डित सुन्दर झा तहिआ पर्यटन मन्त्रालयमे कार्यरत छलाह । काठमाण्डूसँ फूलपातक प्रकाशन कऽ मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषीसभमे अनुराग वृद्धि आ अपन मातृभाषामे साहित्य रचना करएलेल लोककेँ प्रेरित करक पुनित कार्यमे सत्रिmय छलाह । आईसँ २१ वर्ष पूर्व, काठमाण्डूक मारवाडी सेवा समितिमे आयोजित विद्यापति स्मृति समारोहमे हुनकाद्वारा प्रस्तुत सयगोट व्यङ्ग दोहासभक संग्रह सुन्दर शतसई धूम मचा देने छल । ओहि दोहासभमे तत्कालिन तानाशाही राजशाहीतन्त्रक विभिन्न विषय मादेँ अद्भूत कटाक्ष कएल गेल छल । सुन्दर शतसई अत्यन्त लोकप्रिय भेल आ दोहा लोकक ठोरपर बैसि गेलैक । एहि कारणेँ पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीकेँ सरकारक प्रताडनक भागी बनए पडलनि । वृतिविकासपर नकारात्मक असर पडलनि । तथापि पण्डितजीक मैथिली प्रतिक अनुराग आ प्रतिवद्धता बढ़िते गेल आ अवकाशक बाद ओ पूर्णतः अही यज्ञमे लागि गेलाह जे जीवन पर्यन्त करिते रहलाह । जनकपुरमे पर्वक आयोजन, पत्रिका प्रकाशन, मैथिलीक वकालत — मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करएहेतु ओ अपन अन्तिम समयधरि समर्पित भऽ सक्रिय रहलाह । ओ जनकपुरक मुरलीचौकपर विद्यापतिक मूर्ति स्थापित करकहेतु सभकेँ आन्दोलित करैत रहलाह आ अन्तमे लोकतन्त्रक स्थापनाक बाद जखन हम नगरपालिकाक प्रमुख निर्वाचित भेलहुँ, हुनक ई सपना पूरा भेलनि । हुनकर अध्यक्षतामे निर्माण समिति गठित भेल । जनकपुरनगरपालिकाक अनुदानसँ विद्यापति टावरक निर्माण सम्पन्न भेल । एहि पुनित कार्यमे तत्कालिन धनुषा जिलाक सभापति रामसरोज यादवक सेहो महत्वपूर्ण योगदान छलनि । निर्माण कार्यमे शास्त्रीजी अत्यन्त स्वच्छ आ पारदर्शी रहए चाहैत छलाह जाहिसँ हुनकर अपने समितिक लोक हुनकर बिरोध करए लगलखिन । एहिसँ दुखित शास्त्रीजी निर्माण कार्यक अन्तमे निर्माण समितिक अध्यक्षता छोडि देलनि आ दोसरकेँ जिम्मा लगा देलनि । मुदा दुख असिमित रहनि । निर्माण समिति षडयन्त्रपूर्वक हुनका आ नगरप्रमुख रहितो हमरा सेहो उद्वघाटन कार्यक्रममे आमन्त्रित नहि कएलक । हमरासभ कहुना कार्य सम्पन्न होउक विमर्श कए चुप रहलहुँ । उद्वघाटन दिन शास्त्रीजी पश्चिम नेपालमे रहथि आ ओ एहि दुखकेँ वरण करैत स्वर्ग प्रस्थान कऽ देलनि । जनकपुर मैथिली अनुरागीसभक इतिहास ई एकगोट कलंक थिक । पंचायतकालमे एहन आयोजनसभ क्षेत्रीय भाषासभक अस्मिता एवं सम्मानक संघर्ष तथा एहिलेल लोकतन्त्रक अनिवार्यताक बोध कराबएदिस सेहो लक्ष्यित रहैत छल । समारोहमे पुलिस हस्तक्षेप होइत छलैक आ सहभागीसभकेँ हनुमानढ़ोकाक गुमसल ठाड़ थुनुवाघरमे अबेर रातितक थुनिकऽ राखल जाइत छलनि । रिहाईक समय होइत छल दूपहर राति — हड्डी गला देबएबला जाड़, पाला, उपरसँ तुसारो आ बहैत शीतलहरीमे सहभागीसभकेँ अपन डेरा जाए पड़ैत छलनि । शनैः पर्वक आयोजन पूर्वी नेपालक शहरसभमे होमए लागल । मिथिलाञ्चलक सांस्कृतिक आ भाषिक आन्दोलनक ई जड़ि बनि गेल । नेपालमे लोकतन्त्रक पुर्नस्थापनाक बाद पर्वक आयोजन मैथिलीप्रति मैथिलीभाषीक अनुरागक द्दोतक आ राज्यद्वारा भऽरहल भाषिक भेदभाव विरुद्ध संघर्ष दिस केन्द्रित भऽ गेल अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान, प्रगति आ प्रतिष्ठापनहेतु एहिसँ वत्र्तमान पीढ़ीमे उल्लेखनीय चेतना आ सजगताक अभिवृद्धि भेल अछि । मिथिलाक हरेक सामुदायिक आ शिक्षण संस्थासभमे आब एकहि दिन वा परिस्थिति अनुसार एकाधदिन आगाँपाछाँ पर्वक आयोजन सभ जाति आ वर्गक मैथिलीभाषीमे एकवद्धताक सूत्रक रुपमे विद्यापतिक नामक महत्वक ठोस प्रमाण अछि । जन्म, काल आ प्रतिभाक विरासत विद्यापति वास्तवमे सरस्वती–पुत्र आ विद्याक अधिपति छलाह । भाषा आ साहित्यमे योगदानक सन्दर्भमे हुनक स्थान इटलीक दा“ते आ बेलायतक चौसर जका“ छन्हि । साहित्यिक रचनाकारक संगहिं विद्यापति सफल कूटनीतिज्ञक भूमिका करैत मिथिलाक भूमिक संरक्षणलेल अपन दायिŒवक निर्वाह सेहो कएलनि । मैथिलीक अद्वितीय सेवक विद्यापतिक काल एखनतक सुनिश्चित नहि कएल जा सकल अछि, मुदा अन्वेषकसभक मत छन्हि जे ओ इस्वी सन् १३५० सँ १४४० धरि रहथि । हुनक जन्म गढा बिस्फी गाममे कश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण परिवारमे भेल रहनि । १४०२ ई.मे हुनका अपन जन्मस्थान बिस्फी ग्राम प्रदान कएल गेल रहनि जे सम्प्रति मिथिलाञ्चलक भारतक बिहार राज्यक मधुबनी जिलामे अवस्थित अछि । १४४८मे ओ श्रीमद्भागवत्क प्रतिलिपि तैयार कएने रहथिन्ह आ राजा शिवसिंहक मृत्यु (ई.१४०२)क ३२ बर्षबाद तक ओ जिवित रहलथि से प्रमाणित भए गेल अछि । ओ अपन भनिता आ कृतिसभमे मिथिलाक ओइनिवार वंशीय राजा शिवसिंहसँ भैरवसिंह तकक सम्पर्कमे रहलथि से उल्लेख कएने छथि । अपन मृत्युक तिथिक सम्बन्धमे ओ अपने कहने छथि æविद्यापतिक आयुअवसान कातिक धवल त्रियोदशी जान” । एकरे आधार मानि कातिक धवल त्रियोदशी तिथिमे हुनक स्मृति पर्व मनाओल जाइत अछि । विद्यापतिकेँ प्रतिभाक विरासत अपन उच्च पूर्वजसभसँ प्राप्त भेलनि । विष्ण्ु ठाकुर–श्र हरदित्य–श्र कर्मदित्य–श्र देवदित्य–श्र धिरेश्वर–श्र जयदत्त–श्र गणपति आ तखन हुनकर पुत्र विद्यापति । मायक नाम रहनि गंंगादेवी । देवदित्यक सभसँ जेठ बालक मिथिलाक कर्णाट राजा शत्रm सिंहक युद्ध आ शान्तिक मन्त्री रहथिन अर्थात् विदेश विभाग सम्बन्ध प्रमुख । ओ दशकर्मपद्धतिक रचना कएने रहथि । हुनक पुत्र चन्देश्वर धर्मशास्त्र, राजनीति आ ज्योतिषक प्रकाण्ड विद्वान रहथिन । तहिना देवदित्यक दोसर पुत्र गणेश्वर ठाकुर सुगतिसोपान् तथा गंगापट्टालकाक रचना कएने रहथि । हुनक जेठ बालक रामदत्त महादानपद्धति रचलनि । सभसँ छोट पुत्र विष्णुक भक्तिमे गोविन्दमानसोल्लास लिखने रहथिन । विद्यापतिक पूर्वजसभ राजासभक भण्डारिका, स्थानान्तारिका आदि पदसभपर सेहो काज कएने रहथि । मातृपक्ष सेहो राजासभक दरबारक प्रमुख पदाधिकारी रहलखिन । कविकोकिल – हिनक रचना आ प्रभाव मैथिलीक प्रसिद्ध कवि विद्यापतिके“ कविकोकिल कहल जाइत छन्हि । विद्यापतिक प्रति सम्मान स्वरुप सभतरि यएह विशेषणक प्रयोग कएल जाइत अछि । विद्यापतिके“ कविकोकिल किएक कहल गेलन्हि ? कहियास“ कहल गेलन्हि ? प्रायः एहि प्रश्नक ठीकठीक उत्तर किनको लग नहि छन्हि । विद्यापति नीक गायक छलाह । हुनक कण्ठ मधुर छलन्हि । हुनक प्रस्तुतिक कला, हुनक राग–लय–छन्द–अलंकारक अद्भूत संयोजनस“ लोक मुग्ध आ सम्मोहित भद्र जाइत छल । प्रायः तै“ हुनका लोक कविकोकिल कहने हएतनि । मुदा एहि सन्दर्भमे एक गोट ज्ञातव्य जे अपन लेखनीस“ सभस“ पहिने हिन्दीक प्रसिद्ध समालोचक डा.रामवृक्ष बेनीपुरी विद्यापतिके“ कविकोकिल कहलखिन्ह । विद्यापति पदावलीक भूमिकामे ओ लिखने छथि — मैथिली राका रजनी के राकेश कविकोकिल विद्यापति .... । डा. बेनीपुरीक एहि टिप्पणीक बाद कविवर विद्यापतिक सम्बन्धमे कोनो मनतव्य, आलेख आदिक सभस“ पहिल आस्पद रहैत अछि — कविकोकिल विद्यापति ! विद्यापतिक लेखन, विषय र भाषाक्षेत्र व्यापक आ विशाल छल । हुनकर रचना संस्कृत, प्राकृत, मैथिली आ अबहठ्ठमे प्राप्त भेल अछि । मैथिलीमे शक्ति–आराधना, नचारी, कृष्ण–लीला, प्रणय सहितक विषयपर हजारसँ फजिल गीत परिचित अछि । अबहठ्ठमे दूगोट खण्डकाव्य कित्र्तिलता आ कित्र्तिपताका तथा संस्कृत–प्राकृत–मैथिलीमेगोरक्षविजय आ संस्कृत–प्राकृतमे मणिमञ्जरी नाटकसभ उपलब्ध अछि । संस्कृतमे हुनक लिखल ग्रन्थसभकेँ शास्त्रीय आ व्यवहारोपयोगी मानल जाइत अछि । शिक्षाप्रद रोचक कथासभक संकलन पुरुषपरीक्षा तथा अभिलेखाङ्कन नमूनाक शासनोपयोगी पत्राचारसभक लिखनावली विश्वविख्यात अछि । विद्यापतिका यात्रा साहित्य भूपरिक्रमण, धर्मशास्त्र र कर्मकाण्डका पारम्परिक ग्रन्थसभ विभागसार, शैवसर्वस्वसार, दुर्गाभक्ति तरङ्गिनि, दानवाक्यावली, गङ्गावाक्यावली, गयापत्तलक, बर्षकृत्य, ब्याडी भक्तितरङ्गिनि आदि अमर कृति अछि । एहिसभ कृतिमे तखुनका समयक ऐतिहासिक सूचना एवं समकालिन सामाजिक चित्रण देखल जाइछ । कित्र्तिलता विद्यापतिक पहिल कृति मानल जाइत अछि । ओहि कालमे विद्वानसभ अपन रचना संस्कृतमे करैत रहथि । मुदा, विद्यापति अपन पहिल कृति मैथिलीमे लिखलनि आ मैथिलीमे लिखक कारण आ महत्व सेहो स्पष्ट कएलनि — देसिल बअना सब जनमिठ्ठा, ते“ तैसन जम्पओ अवहट्ठा । कित्र्तिपताकामे मैथिलीमे प्रेम सम्बन्धी कमनीय कवितासभ अछि । शैवसर्वस्वसारमे भवसिंहसँ विश्वासदेवीतकक कीर्तिकथा विरुदावली शैलीमे वर्णित अछि । गंगावाक्यावली आ दुर्गाभत्तिmतरंगिणी गंगा एवं शत्तिmक उपासनामे रचित रचनासभक संग्रह अछि । बंगाली साहित्यमे विद्यापतिक जर्बदस्त प्रभाव छन्हि । चण्डीदासक समयमे हुनका बंगाली कविमे रुपमे जानल जाइत रहन्हि । कतेक विद्वान तँ विद्यापतिकेँ जेसोरक ब्राह्मण भावानन्द रायक पुत्र बसन्त राय सिद्ध करक कोशिश करैैत छथि । प्रमाणस्वरुप ओसभ पद–कल्पतरुक १३१७ पदक उल्लेख करैत छथि जाहिमे एहि नामक प्रयोग भेल छैक । चण्डीदास वैष्णव सम्प्रदायक रहथि । विद्वान रोमेश चन्द्र दत्तक कहब छन्हि जे विद्यापतिक रचनाकेँ चण्डीदासक समयमे दोसरक रचनामे मिझरादेल जाइक आ बेसी काल दोसर रचनाकार अपन रचना विद्यापतिक नामेँ करथि । दत्तक अनुसार चण्डीदास बहुत बादमे अएलाह । मुदा ई तथ्य निश्चित अछि जे विद्यापतिक प्रभाव कृष्णकित्र्तनपर जर्बदस्त रहनि । ग्रीयरसन एहि मादेँ Maithili Chrestomathy क पृष्ठ ३४मे लिखैत छथि — And now a curious circumstance arose, unparalleled I believe in the history of literature..(His songs) were twisted and contorted, lengthened and curtailed, in the procrustean bed of the Bengali language and metre into a kind of bastard language neither Bengali nor Maithili. But this was not all. A host of imitators sprang up notably one Basant Roy of Jessore, who wrote, under the name of Vidyapati in this bastard language, songs which in their form bore a considerable resemblance to the matter of our poet, but which almost entirely wanted the polish and felicity of expression of the old master-singer … (These imitation songs known as “Brajbuli” songs) became gradually more popular amongst the Bengali people than the real songs of Vidyapati.”डा. सुकुमार सेन अपन History of Brajbuli मे ब्रजबोलीक सभ कविसभक विवरण देने छथिन । ध्यान देबए योग्य छैक जे ओहि समयक प्रभाव रविन्द्रनाथ ठाकुरपर सेहो पड़लनि । ओ भानुसिंह ठाकुरेर पदावली मे भानुसिंहक नामसँ एहन बहुतो पद लिखने छथि । तहिना आसमिया साहित्यपर सेहो कविकोकिल विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट रुपसँ पड़ल अछि । ब्रजबोली अर्थात् मैथिलीककेँ असाममे शंकरदेव लऽ गेलाह । ओ वैष्णव सम्प्रदायक प्रचारमे विद्यापतिक भजनसभक उपयोग कएलनि । असमिया भाषाक इतिहासमे ब्रजबोलीक महŒवपूर्ण स्थान छैक । असमिया भाषाक विकासक आधार ठाढ़ करएमे एकर योगदानक चर्च The Department of Historical Antiquities, Government of Assam, Gauhati द्वारा प्रकाशित सामग्रीमे भेटैत अछि । डा. सुकुमार सेन श्री चैतन्यदेव आ रामानन्दक वर्णन कएने छथि । रामानन्द ब्रजबोलीमे विद्यापति प्रभावित पदसभक रचना कऽ मधुर संगीतक संगेँ गबैत छलाह । एहिसँ ओडिसामे विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट देखएमे अबैत अछि । सोरहम शताब्दीमे चम्पति राय, महाराव प्रताप, रुद्रदेव, माधवी दास, कान्हु दास, मुरारी आ सतरहम् शताब्दीमे दामोदर दास, चन्दा कवि, यदुपति दास आदिक रचनामे विद्यापतिक प्रभावसाफे देखएमे अबैत अछि । विद्वानसभक कहब छनि जे एहि सन्दर्भमे आओर अनुसन्धान किछु आओर महŒवपूर्ण तथ्यसभ बाहर आनत । नेपालीक कवि भानुभक्तक बधूशिक्षा विद्यापतिक पुरुषपरीक्षापर आधारित अछि । एहि सन्दर्भमे प्रसिद्ध विद्वान डा. राजेन्द्र पसाद विमलजीक कहब छनि जे नेपालीक आदिकवि भानुभत्तm गजाधर सोतीक ओहिठाम एक राति बितोलन्हि आ तकरबाद बधूशिक्षाक रचना कएलन्हि । बधूशिक्षाक शैली विद्यापतिक पुरुषपरीक्षा सनक अछि । डा. विमलक अनुमान छन्हि जे जखन विद्यापति बनौलीमे आएल हएताह तकरबाद हुनक आश्रयदाता सोत्रिय कुलक किछु सोइतसभ तत्कालिन राज्यसत्ताक भयक कारणे“ पश्चिम नेपालक तनहु“ तम्घास क्षेत्रमे जा कए बैसि गेलखिन्ह, जे बादमे सोती ब्राह्मणक रुपमे परिणत भए गेलाह । भानुभक्त हुनका ओतए साहित्यिक चर्चाक क्रममे पुरुषपरीक्षास“ परिचित भए बधूशिक्षाक रचनाक लेल प्रेरित भेल हएताह । नेपालमे विद्यापतिक प्रभावक चर्च करैत काल सोचए पड़त जे तहिया नेपाल आ भारतक बीच एखन जकाँ सीमा कहाँ रहैक ? काठमाण्डू उपत्यकामे मैथिलीक स्थान केहन रहैक तकर अन्दाज एतबेसँ कएल जा सकैत अछि जे मल्ल राजासभ मैथिलीमे रचैथ आ एना कऽ ओ अपन विद्वता देखाबथि । अपनाकेँ गौरवान्वित बुझथि । बनौलीमे विद्यापतिक प्रवास आ एतए रचित पदावलीसभक अपने कथा अछि । नेपालक एखुनका तथाकथित विद्वानसभ नेपालक बहुतो तथ्यकेँ नुकाबक दुष्प्रयत्न करैत आबिरहल छथि । ओसभ अपन अज्ञानतावश नेपालकेँ स्वतनत्र आ अलग राष्ट्रिताक प्रमाणित करएलेल ऐतिहासिक तथ्यसभकेँ नुकबक कोशिशमे छथि । मैथिली आ विद्यापतिसँ सम्बन्धित बहुतो वास्तविकता अही कारणेँ अन्हार गुफासँ बाहर निकलि नहि पाबिरहल अछि । एहिलेल स्वतन्त्र आ निष्पक्ष अनुसन्धानक जरुरत अछि । (प्रस्तुत लेख काठमाण्डूसँ प्रकाशित अप्पन मिथिलाक अगहन २०६८ (२०११) वर्ष १ अंक ६ विद्यापति विशेषांकमे विद्यापति मैथिल एकताक डोर शिर्षकसँ प्रकाशित भेल अछि ।-साभार) नारायण झा रहुआ संग्राममे गृष्मकालीन शैक्षिक शिविर सह टैगोर पुरस्कारसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक सम्मान समारोह- २०१२ सुमित आनन्द, मैनेजिंग एडीटर, सोसाइटी टुडे, अम्बेदकर स्टडीज सेन्टर, सी. एम. कॉलेज, दरभंगा शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण ‘मिथिलाक उत्थानक हेतु शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक अछि’-ई गप्प ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. एस. पी. सिंह दिनांक 21.04.2012 केँ विश्व्वविद्यालय मैथिली विभागमे शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण कयलाक पश्चात् कहलनि। ओ कहलनि जे शोधकार्य शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु आवश्यक अछि। शोधक दृष्टिएँ विश्व्वविद्यालयकेँ आओरो आगू बढय पड़तैक। ओ बजलाह जे एतय प्रतिभावान शिक्षकक अभाव नहि अछि किन्तु दृढ आत्मविश्वास एवं पवित्र उद्देश्यक आवश्यकता अछि। ओ ईहो जनौलनि जे विश्वविद्यालयकेँ विकासक शिखरपर पहुँचयबाक हेतु शिक्षक, छात्र, कर्मी एवं सरकारक समवेत प्रयासक आवश्यकता अछि। कुलपति डॉ. सिंह एहि विभागक प्राचार्य डॉ. रमण झाकेँ मैथिली काव्यमे अलंकारक प्रकाशनक हेतु साधुवाद देलनि तथा एहिना शोध कार्यमे अग्रसर होइत रहबाक हेतु प्रेरित कयलनि। एहि अवसरपर विश्व्वविद्यालयक वित्तीय परामर्शी सी. आर. डीगवाल सेहो शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे मैथिली भाषामे अपन विचार रखलनि जकर लोक करतल ध्वनिसँ स्वागत कयलक। विभागाध्यक्षा डॉ. बीणा ठाकुर आगत अतिथिक स्वागत करैत बजलीह जे ओ पत्रिकाक स्तरकेँ ऊपर उठयबाक हेतु कोनहुटा प्रयास बाँकी नहि रखतीह संगहि एकर चयनित रचनासँ पुस्तकक प्रकाशन सेहो करतीह। साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित मैथिली साहित्यक मूर्धन्य विद्वान डॉ. भीमनाथ झा शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथक तुलना करैत बजलाह जे शोधग्रंथ ग्रंथक संग राखल जाइत अछि आ शोधपत्रिका पत्रिकाक संग। तेँ शोधग्रंथ विशेष महत्वक थिक । ओ ईहो कहलनि जे डॉ. रमण झाक शोधग्रंथ मैथिली काव्यमे अलंकार शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु महत्वपूर्ण अछि। एहि अवसरपर डॉ. सुरेश्व्वर झा, डॉ. बैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’, डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. कृष्णचन्द्र झा ‘मयंक’ प्रभृति विद्वान लोकनि शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे अपन अपन विचार रखलनि। दस अध्यायमे विभक्त मैथिली काव्यमे अलंकारकेँ सभक्यो उपयोगी मानलनि। कार्यक्रमक शुभारम्भ शीतल कुमारी, पुष्पलता कुमारी, सुनीता कुमारी एवं सोनी कुमारीक मंगलाचरणसँ भेल । सोसाइटी टुडेक मैनेजिंग एडीटर सुमित आनन्द स्वागत गानसँ आगत अतिथिक स्वागत कयलनि। मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रमण झा कयलनि। डॉ. झा पहिल बेरि शोधपत्रिकाक प्रकाशनमे विश्व्वविद्यालयक सहयोगक प्रति आभार ज्ञापित कयलनि। एहि अवसरपर डॉ. अरुण कुमार झा, डॉ. टुनटुन झा, डॉ. उषा चौधरी, डॉ. रमेश झा, डॉ. विभूति चन्द्र झा, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ श्री अमलेंन्दु शेखर पाठक, सोनू कुमार , आलोक, अमृता, किरण, अर्चना, श्यामानन्द, सुरेन्द्र आदि अनेक षिक्षक, शोधकर्त्ता एवं छात्र छात्रागण उपस्थित छलथि। त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन मिथिला आ मैथिलीक विकास क्यो रोकि नहि सकैत अछि। आवश्यकता अछि मिलि कए कार्य करबाक। जे मिथिला क्षेत्रमे रहैत छथि सभ मैथिल थिकाह। ई गप्प दिनांक 10-02-2012 के यू. जी. सी. प्रायोजित राष्ट्रीय सेमिनारक उद््घाटन करैत विधान परिषद्् अध्यक्ष पं. ताराकान्त झा बजलाह। अपन अध्यक्षीय भाषणमे ल.ना. मिथिला विश्वविद्यालय केर माननीय कुलपति डॉ. एस. पी. सिंह कहलनि जे ‘‘ एकैसम शताब्दीक पहिल दशकमे मैथिलीक स्थिति आ अपेक्षा विषयपर केंन्द्रित ई सेमिनार मैथिलीक विकासमे मीलक पाथर सिद्ध होयत। प्रति कुलपति डॉ. ध्रुव कुमार मैथिली भाषा एवं संस्कृतिक प्रशंसामे कहलनि जे एतयकेर लोक बहुत उदार होइत अछि। पूर्व विधान पार्षद डॉ. दिलीप कुमार चौधरी जोर दैत कहलनि जे मैथिली अनिवार्य विषय होअए आ बच्चासभक संग संवाद मैथिली माध्यमे होयबाक चाही। विशिष्ट अतिथि डॉ. वीणा ठाकुर कहलनि जे साहित्य एवं समाजक कल्याणक हेतु भाषा एवं साहित्यकँे बचायब आवश्यक अछि। मैथिलीक वरीष्ठ साहित्यकार डॉ. भीमनाथ झा कहलनि जे मैथिली साहित्यक प्रति उदासीनता जगजाहिर अछि। भाषणमे बहुत किछु कहल जाइत अछि मुदा प्रयोगमे नहि अबैत अछि। आइ.आइ.टी. मद्रासक अंग्रेजीक प्रोफेसर डॉ. श्रीश चौधरी सेहो अपन मंतव्य देलनि। कार्यक्रमक शुभारम्भ शिल्पा,निशा एवं भावनाक द्वारा ‘जय जय भैरवि’ गायनसँ भेल। स्वागत भाषण प्रधानाचार्य डॉ. आर. के. मिश्र कयलनि आ कार्यक्रमक रूपरेखा सेमिनारक सचिव डॉ. अशोक कुमार मेहता कयलनि। उद्घाटन सत्रक समाप्ति डॉ. दमन कुमार झाक घन्यवादज्ञापनसँ भेल। एहि कार्यक्रममे तीनू दिन मिलाय चारिगोट अकादमिक सत्र चलल जाहिमे प्रमुख वक्ता लोकनि छलाह-डॉ. महेन्द्र झा-सहरसा, डॉ. केष्कर ठाकुर-भागलपुर, डॉ. ललितेश मिश्र-मधेपुरा, डॉ. फूलो पासवान- मधुबनी, डॉ. देवेन्द्र झा-मुजफफ्रपृुर, डॉ. कमला चौधरी- मुजफफरपुर, डॉ. रमण झा- दरभंगा, डॉ. विभूति चन्द्र झा- दरभंगा, डॉ. वासुकी नाथ झा- पटना, डॉ. नीता झा-दरभंगा, डॉ. सत्यनारायण मेहता-पटना, डॉ. राजाराम प्रसाद- सहरसा, एवं डॉ. दमन कुमार झा, मधुबनी। एकर अतिरिक्त अनेक विश्वविद्यालयसँ आयल लगभग चारि दर्जनसँ अधिक शिक्षक, जे.आर.एफ.,एवं छात्र-छात्रा लोकनि एहि राष्ट्रीय पावनिमे अपन-अपन शोधपत्रक संग विचार रखलनि जाहिमे वि. मै. विभागक छात्र-छात्रा लोकनि सेहो छलथि। विचार व्यक्त कयनिहारमे छलाह- सोनू कुमार झा, शीतल कुमारी, सोनी कुमारी, पुड्ढलता झा, अरुणा चौधरी-पटना, डॉ. शिव प्रसाद यादब-भागलपुर, बिष्णु प्रसाद मंडल, अमृता चौधरी, अर्चना कुमारी, राधा कुमारी, राम नरेश राय, निक्की प्रियदर्शिनी-भागलपुर,भाग्य नारायण झा-मधेपुरा,सुरेन्द्र भारद्वाज, श्यामानन्द शाण्डिल्य एवं अन्य। समापन सत्रक अध्यक्षता प्रधानाचार्य डॉ. आर. के. मिश्र कयलनि तथा विशिष्ट अतिथि ल.ना.मि.वि. केर कुलानुशासक डॉ. टी. एन. झा, क्रीडा पदाधिकारी डॉ. अजयनाथ झा छलाह। संचालन डॉ. अरुण कुमार सिंह कयलनि तथा धन्यवाद ज्ञापन एवं समदाउन गायन डॉ. अशोक कुमार मेहता द्वारा भावविह््वलताक संग कय संगोष्ठीक समापन भेल। शोध-पत्रिका मैथिलीक लोकार्पण विश्वविद्यालय मैथिली विभागक शोध-पत्रिका मैथिली-अंक-5 केर लोकार्पण दिनांक 31-01-11केँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डा. समरेन्द्र प्रताप सिंहक कर-कमलसँ विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे भेल। ई शोध-पत्रिका दिसम्वर 2010 मे छपि चुकल छल किन्तु किछु अपरिहार्य कारणसँ लोकार्पणमे देरी भेल। एहि अवसरपर मैथिलीमे भाषण करैत कुलपति बजलाह जे प्रत्येक विभागसँ शोध-पत्रिका अवश्य प्रकाशित होअए तथा प्रत्येक शिक्षक वर्षमे कम सँ कम एकटा शोध-पत्र अवश्य छपाबथि। ओ ईहो कहलनि जे पी. जी. विभागक दायित्व मात्र अपनहि धरि सीमित नहि अछि अपितु एकर भूमिका सभ कॉलेजक अपन विषयक विभागक उत्थान आ विकासमे होयबाक चाही। एहि अवसरपर साहित्य अकादेमी,दिल्लीक पूर्व प्रतिनिधि डा. सुरेश्वर झा शिक्षकसँ नियमित वर्ग संचालन, शोध-कार्य करब आ करायब तथा पुस्तकालयमे समय देबाक हेतु कहलनि। साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त डा. भीमनाथ झा शोध-पत्रिकाकेँ आओरो उत्कृष्ट बनयबाक हेतु अनेक मूल्यवान सुझाव देलनि। मैथिली अकादमी, पटनाक अध्यक्ष श्री कमला कान्त झा डा. जयकान्त मिश्रक पुस्तकालय एहि विभागकेँ उपहारस्वरूप भेटबापर प्रसन्नता व्यक्त कयलनि तथा कुलपतिसँ ओकर संरक्षणक हेतु आग्रह कयलनि। डा. वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ कुलपतिसँ आग्रह कयलनि जे विश्वविद्यालयसँ जे कोनो आमंत्रण पत्र जारी होअए ताहिमे एक पीठपर मैथिलीमे सेहो अंकित रहय। कार्यक्रक संचालन करैत डा. रमण झा विश्वविद्यालयक नीतिमे परिवर्तन कए अन्य विषयक प्रतिष्ठाक छात्रकेँ दोसर विषयमे पी. जी. करबाक अवसर देबाक आवश्यकतापर बल देलनि। विभागाध्यक्ष एवं सभाध्यक्ष डा. वीणा ठाकुर शिक्षकक बहाली नहि होयबाक कारण पी. जी. मे छात्रक कमी कहलनि। एहि अवसरपर डा. शशिनाथ झा सेहो अपन मूल्यवान विचार रखलनि। श्री सुमित आनन्दक गोसाउनिक गीत एवं स्वागत गीतसँ प्रारम्भ भेल समारोहमे डा. नीता झा, डा. विभूति आनन्द सहित अनेक विभागाध्यक्ष, अनेक पदाधिकारी, भारी संख्यामे षिक्षक एवं साहित्यकार लोकनि उपस्थित छलाह। समारोहक समापन डा. रमण झाक धन्यवाद ज्ञापनसँ भेल। ‘मैथिली’ शोध-पत्रिकाक लोकार्पण ‘मैथिली’ (शोध-पत्रिका) - 6 केर लोकार्पण दिनांक 24-12-2011 केँँ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक माननीय कुलपति डाँ एस. पी. सिंहक कर-कमलसँ विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे भेल। ई शोध-पत्रिका महाकाव्यपर आधारित अछि जाहिमे पचास गोट विद्वानक शोधपरक आलेख संकलित अछि। एहि अंकमे महाकाव्यक सूचीक संग शोध-संबन्धी सूचना सेहो देल गेल अछि। एहि अंकक लोकार्पण करैत माननीय कुलपति बजलाह जे स्नातकोत्तर विभागसँ शोध-पत्रिकाक प्रकाशन एकटा नीक परम्परा थिक जकर सभ ठाम प्रशंसा होएबाक चाही। ओ कहलनि जे मिथिलाक विभूतिपर सम्पूर्ण देश गौरवान्वित अछि आ मैथिलीक क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ैत जा रहल अछि। हमरा सभके ँ मिलि कए आगाँ बढ़ए पड़त। डॉ. रमण झाक संचालनमे आयोजित एहि कार्यक्रमक मुख्य अतिथि डॉ. सुरेश्वर झा बजलाह जे ई शोध-पत्रिका बहुत उपयोगी अछि। विभागाघ्यक्षा डॉ. वीणा ठाकुर आगत अतिथिके ँ स्वागत करैत संकेत देलनि जे अगिला अंक सेहो विशेषांके रहत मुदा शोधकर्त्ता लोकनिके ँ ध्यानमे रखैत हुनका लोकनिक शोधसँ सम्बद्ध आलेख सेहो आमंत्रित कएल जाएत। डॉ. भीमनाथ झा अन्य विभागक शोध-पत्रिकास ँ एकरा एकैस कहलनि संगहि उपयोगिताक दृष्टिए ँ एहिमे विभिन्न शोधपरक सामग्रीक समावेश करबाक परामर्श देलनि। डॉ. पं. शशिनाथ झा एहि शोध-पत्रिकामे तिरहुतामे लिखल आलेखक समावेश करबाक सेहो मन्तव्य देलनि। एहि अवसरपर डॉ. मित्रनाथ झा, डॉ. कृष्णचन्द्र झा ‘मयंक’ एवं डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र सेहो अपन-अपन विचार रखलनि। समारोहमे अनेक गणमान्य व्यक्तिक संग-संग विभागीय शिक्षक डॉ. नीता झा एवं डॉ. विभूति चन्द्र झा तथा विभागक छात्र-छात्रा लोकनि सेहो उपस्थित रहथि। कार्यक्रमक शुभारम्भ शोध-छात्रा कुमारी अमृता चौधरी तथा अर्चना कुमारी एवं एम. ए.क छात्रा शीतल कुमारी तथा सुनीता कुमारी द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरणस ँ भेल। प्रो. कृष्णानन्द मिश्र स्वागत गान प्रस्तुत कयलनि तथा कार्यक्रमक समापन डॉ. रमण झाक धन्यवाद ज्ञापनस ँ भेल। कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूर तथा विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल॰ ना॰ मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगाक संयुक्त तत्वावधानमे विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक अन्तर्गत द्वि- दिवसीय ट्रांसलेशन ओरियेंटेशन प्रोग्रामक कार्यशालाक आयोजन 28-06-2011 तथा 29-06-2011 केँ भेल। कार्यक्रमक शुभारम्भ प्रतिभागीमेसँ श्री सुमित आनन्द एवं डॉ. लालति कुमारी द्वारा प्रस्तुत ‘जय जय भैरविसँ’ कयल गेल। एहि अवसरपर प्रो. वीणा ठाकुरक समीक्षात्मक ग्रंथ ‘वाणिनी’क लोकार्पण करैत डॉ. सुरेश्वर झा हिनका उत्कृष्ट समालोचकक रूपमे चित्रित कयलनि। कर्यक्रमक रूपरेखा प्रस्तुत करैत मैसूरसँ आयल नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक मैथिली भाषाक मुख्य शैक्षिक सलाहकार डॉ. अजीत मिश्र कहलनि जे राष्ट्रीय स्तरपर 63 पोथीक अनुवादक निर्णय भेल अछि जाहिमे नओ गोट अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवाद कयल जायत। एहि अवसरपर चारि गोट विशेषज्ञ 28-06-11 केँ तथा चारि गोटए 29-06-11 केँ अपन-अपन विचार प्रतिभागी लोकनिक समक्ष रखलनि। एहि क्रममे डॉ. भीमनाथ झा कहलनि जे पाठ्यक्रमक पोथीक अनुवादक हेतु टीमवर्क होयब आवश्यक अछि। मैथिली, अंग्रेजीक विशेषज्ञक संग-संग विषयक विशेषज्ञ सेहो रहथि से आवश्यक। डॉ. प्रभात नारायण झा कहलनि जे अनुवाद नव खिड़की खोलैत अछि किन्तु एकरा सहज रखबाक थिक जाहिसँ मूल गप्प पाठक धरि पहुँचि सकए। एहि अवसरपर अन्य विशेषज्ञ लोकनि सेहो अपन अपन विचार रखलनि जाहिमे प्रमुख छलाह- डॉ. विजय मिश्र, ई. अशोक ठाकुर, डॉ. अरुण कुमार झा एवं अन्य। एहि क्रममे बीस गोट प्रतिभागी लोकनि उपस्थित छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह-डॉ. नवोनाथ झा, डॉ उषा चौधरी, डॉ. अशोक कुमार मेहता, श्री अमलेंदु शेखर पाठक, श्री अमित आनन्द, श्रीमती शालिनी झा, डॉ. दुर्गानन्द ठाकुर, श्री मिथिलेश कुमार झा इत्यादि। डॉ. वीणा ठाकुरक अघ्यक्षतामे सम्पन्न समारोहमे मुख्य सहयोगी छलाह डॉ. रमण झा। कार्यक्रमक संबंधमे मैसूरसँ आयल श्री पवन कुमार चौधरी सेहो एहि ट्रांसलेशन मिशनक उद्देश्यपर प्रकाश देलनि। अनुवाद कार्यशालाक आयोजन भारतीय भाषा संस्थान मैसूर दिससँ नेशनल ट्रांसलेशन मिशनक अन्तर्गत दिनांक 01-07-2011 सँ 08-07-2011 धरि ल. ना. मिथिला विष्वविद्यालय, दरभंगाक विश्वविद्यालय मैथिली विभागमे सप्त-दिवसीय अनुवाद कार्यशालाक आयोजन भेल। एहि अवसरपर जी. ऑस्टीनक राजनीति शास्त्रक पोथी कन्स्टीच्यूशन ऑफ इण्डिया: फॉर्मर स्टोन ऑफ ए नेशनसँ चयनित 1100 तकनीकी शब्द तथा एम. हरियम्माक दर्शन शास्त्रक पोथी आउट लाइन्स ऑफ इण्डियन फिलॉसाफीक 700 तकनीकी शब्दक मैथिलीमे अनुवाद कयल गेल। एहि कार्य मे छओ गोट विषेषज्ञ रहथि डॉ. वीणा ठाकुर, डॉ. रमण झा, डॉ. दीप नारायण मिश्र, डॉ. योगानन्द सुधीर, डॉ. अमर नाथ झा एवं डॉ. राजनन्दन यादव। विशेषज्ञक अनुसार एहन-एहन कार्यसँ मैथिली साहित्य आओर समृद्ध होयत। विषेषज्ञ लोकनि कतोक नव शब्दावलीक निर्माण सेहो कयलनि अछि। मैसूरसँ आयल मैथिली भाषाक मुख्य शैक्षिक सलाहकार डॉ. अजित मिश्र, पवन कुमार चौधरी एवं डॉ. शम्भू कुमार सिंह कहलनि जे विभिन्न विषयक 63 गोट पोथीक अनुवाद होयबाक छैक जाहिमे एखन नओ गोट एहि कार्यक हेतु देल गेल छैक। ओ लोकनि ईहो कहलनि जे नओ मे सँ छओ गोट पोथीक तकनीकी शब्दक अनुवाद भए चुकल अछि। भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण जखन-तखन द्वारा ललितनारायण मिथिला विष्वविद्यालयक संगीत एवं नाट्य विभागमे डॉ भीमनाथ झाक समग्र मूल्यांकन ‘भाव-भूमि रसवंत’ पुस्तकक लोकार्पण समारोह दिनांक 06 03 2011 के ँ अपराह्ण 03 बजे दिनमे मनाओल गेल। एहि 512 पृष्ठक पुस्तकक लोकार्पण करैत बहुभाषाविद् पं गोविंद झा कहलनि जे डॉ भीमनाथ झाक भाषा सर्वजन सुलभ अछि। ओ चिंता व्यक्त कयलनि जे वर्तमान समयमे भावना मरि रहल अछि संगहि कवि लोकनिके ँ दोसरक हेतु जीबाक परामर्ष देलनि। पुस्तकक समीक्षा करैत मैथिलीक सुप्रसिद्ध समीक्षक श्री मोहन भारद्वाज हिनक एहि पोथीके ँ साहित्यिक दस्तावेज कहलनि। ओ हिनक छन्दोबद्ध एवं तुकान्त रचनाक भूरि-भूरि प्रषंसा कयलनि संगहि ईहो कहलनि जे छन्दोबद्ध रचना स्थायी महत्वक थिक। बच्चा सभक पाठ्यक्रममे सम्मिलित करबाले हुनका अर्वाचीन कविक छन्दोबद्ध रचना नहि भेटैत छनि। श्री भारद्वाज हिनका एकसरे एहन लेखक मानैत छथि जे लगभग 150 साहित्यकारपर लिखि चुकल होथि। कार्यक्रमक अध्यक्षता करैत वयोवृद्ध साहित्यकार पं चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ डॉ झाक लेखनकेँ महत्वपूर्ण अवदान कहलनि। ज्योत्स्ना चन्द्रमक संचालन एवं डॉ अषोक मेहताक धन्यवाद ज्ञापनसँ सम्पन्न समारोहमे डॉ झा अपन लेखनक संबंधमे कहलनि जे ओ जे किछु कए सकलाह से अक्षरपुरुष लोकनिक सान्निध्य आ स्नेहभाजनक कारणसँ। कार्यक्रमक ष्षुभारम्भ श्री हीरेन्द्र कुमार झाक स्वागत भाषण एवं अंजली मेहता द्वारा ‘‘वाणी हेरू, कृपा दृग फेरू’’ कविताक गायनसँ भेल जे डॉ झाक लिखल थिक। पुस्तकक सुन्दर प्रस्तुतीकरणक हेतु प्रायः सभ वक्ता लोकनि डॉ विभूति आनन्दक प्रयासक प्रषंसा कयलनि। एहि अवसरपर पटना सहित आसपासक जिलाक पर्याप्त संख्यामे साहित्यकार लोकनिक उपस्थिति छल जाहिमे प्रमुख छलाह-डॉ सुरेष्वर झा, डॉ गणपति मिश्र, श्री कमला कान्त झा, प्रो अजीत वर्मा, डॉ शिवाकान्त पाठक डॉ देवनारायण यादव, डॉ षषिनाथ झा, डॉ नीता झा, डॉ रमण झा डॉ नरेन्द्र नारायण निराला, डॉ आषा मिश्र, डॉ नरेष मोहन झा, डॉ बुचरू पासवान, डॉ धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ पुष्पम नारायण, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक इत्यादि। मिथिलेश मंडल मरनी बेटी जिनगीमे पहिल खेप रविया माएकेँ बृद्धा पेन्सन भेटलनि। मन खुब खुशी भेलनि जे सरकारमे हमरो हिस्सा अछि। विडियो सहाएब अपने हाथे बँटता तँए घूस-पेंचक डरे नै। तहुमे गामेक स्कूलपर आबि कऽ बँटता। पता लगल जे विडियो सहाएब बेरादरे छथि। तँए ओढ़ि-पहिर कऽ जाएब जरूरी अछि। पुतौहूबला चपलो आ साड़ियो पहिर विडियो सहाएबक सोझमे बैसलौं। नाओं पुकार भेल। सहाएबक आगूमे ठाढ़ भेलौं। पुछलनि- “कि नाम?” कहलियनि- “मरनी।” सुनिते कहलनि- “समए बदलि रहल छै, नाम बदलि लिअ।” कहलियनि- “हाकिम, ननीक पोसलो छी आ नानीऐक देल नाउअों छी।” चकोना भऽ विडियो सहाएब पुछलनि- “कि नानिक देल?” कहलियनि- “हाकिम, जन्मे दिन माए मरि गेलि। आेही दिनसँ नानीये पोसबो केलनि आ मरनी बेटी कहि नाउओं रखि देलनि। सियान भेलौं। आब लोक मरनियेटा कहैए।” कथा- सुदिक रूपैआ गाममे एकटा मास्टर छलाह। बारह हजार रूपैआ दरमाहा रहनि। हुनका एकटा लड़का रहनि लगभग 15 सालक। तीने परानी परिवारमे रहथि। बाप-बेटा आ माए। मास्टर सहाएब अपने रूपैआ सुइदपर लगबैमे एक नम्बर गाममे। समूचा गौआँ जनैत जे मास्टर लग बारह बजे दिन आकि रातिमे जाएब तँ रूपैआ भऽ जाएत। मास्टरकेँ गाममे सभ ए.टी.एम. बुझैत। जे कखनो जाएब तँ भऽ जाएत। 25 हजार रूपैआ तक राति या दिन कखनो लोक लऽ सकैत छल। मुदा 25 हजारसँ बेसी लेल एक दिनक समए दिअ पड़ैत रहै। बिना समान रखने किनको एक्कोटा छिद्दियो ने दैत। से सभकेँ बुझल। यएहटा एकटा शर्त्त रहनि मास्टर सहाएबक। बड़नीक लेन-देन चलैत। लोक सभ बन्हकी लगा-लगा अपन जरूरतकेँ पुरबैत। मास्टरो सहाएबकेँ मन लगनि। हिनको मन आगु बढ़ैत गेल। संजोगसँ मास्टर सहाएबक बेटा ताबत 20 वर्षक भेल। जवान भेल। बेटो ओही फेरामे पड़ल। एककेँ दू कन्ना हएत, मोनमे एलनि जे रूपैआ सुइदपर लगाएब तँ घर बैसले आमदनी हएत। ने हाथ मोलि आ ने पएर मोलि। बेटा 500 रूपैआ लोककेँ दैत 1500रूपैआ लोकसँ लैत। सुइदक सुइद जोड़ैत। मास्टर सहाएब एक दिन अपन हिसाब-बारी करैले बैसलाह तँ सुिदक रूपैआ 36 हजार कऽ महिनामे अबैत रहनि। मास्टर सहाएबकेँ मन चसकैत। बेटा एक तरफ सोचैत जे हमरा सन महाजन गाममे कियो नै अछि। (अपूर्ण) नवीन कुमार आशा फेर सॅ वर रहलाह कुमार आजुक परिस्थिति मे अगर कोनो वरक कथा-वार्ता आबै छनि तँ ओ हुनका पर उपकार होइत अछि, आ अगर वर लोकनि कथाक चर्चा सुनै छथि तँ ओ भलेहि उपर सॅ तमसाइथ मुदा अंदर सॅ खुश रहै छथि, आखिर आबि गेल वैवाहिक जीवनक समय। एहिना किछु घटलनि हमर पिताजी संग। आ सोचू अगर कोनो वरक कथाक गप्प ओकरा सॅ कएल जाए तँ ओ कते प्रसन्न होएत, एहिना हमर पिताजी संग भेल। संजीवजी हालहि मे गाम आएल छलाह, हमर पिसियौत बहिनक विवाहमे। ओइ ठाम हुनकर विवाहक गप्प चलल तँ ओ काफी खिसिया गेलाह मुदा ओ भितरकी मुस्की मारैत छलाह। विवाहक दोसर दिन संजीवजी वापिस दिल्लीक रेल पकड़ि चलि गेलाह। आब विवाहक हिसाव सॅ एक बेर कनियाक द्वितीय यात्रा होइत अछि, आई भोर मे बहिनकेँ अयबाक छलनि से आनइ लेल हम आ हमर भाइजी गेलौंह, ओतय काफी मजा आएल, आ ठाकुरजी सेहो अयलाह, आजुक कार्यक्रम छनि किछु विध-बाध हेतनि। ठाकुरजी (वरक) पहिल यात्रा अपन सासुरक काफी तनाव पूर्ण होइत अछि, काफी शुभ-शाभ्र बैसल छलाह लेकिन कते काल ओहो बरदा्स्त करताह किएक तँ सार-साइर हुनका लग गप्प दैत छलखिन। आब सॉझुक पहर अछि, सभ बइसल छथि ओइ बीचमे बिना पहिचानल नम्बर सॅ फोन केनाइ आरंभ भेल, ओइ क्रममे एकटा फोन संजीवजी लग आएल। संजीवजी कार्यालयमे छलाह। ओम्हर सॅ आवाज आएल ‘‘बौआ बाबूजी छथि’’.... संजीवजी...... नहि..... ओम्हर सॅ ........ श्री कांती जी राय, दुर्गागंज सॅ बाजि रहल छी, अहॉक बाबुजी सॅ काज छल कृपा कऽ कय हुनकर पता देब , किछु आवश्यक काज छल। संजीवजी.........जी अवश्य (फेर हमर पिताजी सोचलथि, आखिर की बात) फेर बाजला.....जी देखि कऽ दैत छी। .... श्री कांतिजी राय.............बौआ....बौआ.......अहॉ की करै छी..(अत्यधिक कम स्वरमे) ऐ आवाज पर सभ हॅसय लागल तँ राय जी फोन काटि देलखिन। कनिक काल बाद फेर फोन भेल। राय जी........बौआ अहॉ की कतय कार्य करै छी... अहि पर संजीवजी .......जी हम अपनेकेँ कनि कालमे फोन करै छी? संजीवजी कने प्रसन्न छथि की आखिर हमर नम्बर आएल। आ एम्हर सभ कियो हल्ला केलक ‘‘ बनि गेलाह बुरबक। फेर ओही राति मे फोन नै भेल आ एम्हुरका लोग बुझथि जे हमरा लोकनि तँ नहि बनि गेलौंह बुरबक। फेर भोर भेल। आइ बहिनकेँ लऽ कय हुनक सासुर जेबाक छल, हम सभ भोरे उठलौं, फेर ठाकुरजी लग गेलौं तँ ओ पुछलथि जे ओ एला क? तँ जवाब देलयनि की नहि-नहि। फेर हम सभ श्री कांतीजी रायक प्रतिमूर्ति संग लऽ गाड़ी मे बैसलौं, कनि काल सन्नाटा छायल किए तँ बहिन कानै छलीह। किछु कालक बाद हम सभ चौक क्रास कयलौं तँ ठाकुरजी कहलथि- ‘‘रायजी केँ फोन घुमाओल जाय, फेर एक दू बेर ओ नहि उठेलाह, तँ हम सभ कियो सोचलौं जे बनला रायजी बुरबक। फेर कनिक काल मे एकटा मिस कॉल आयल तँ फेर रायजी केँ फोन घुमायल गेल, एहि बेर सभ अत्यन्त चुप छल, फेर शुरू भेल वरक(संजीव) वार्तालाप। रायजी ..... बौआ हम राय जी़ संजीव....... जी रायजी.........बौआ अहॉ पता नहि प्रेषित कयलौं, कनि अहॉक बाबुजी सॅ काज छल। संजीव..........जी हम राति मे व्यस्त छलौं। ( गाड़ी मे सभ हॅसय लागल फेर इशारा भेल चुप रहबाक) रायजी.........बौआ, एकरा खराब नहि मानब, एकटा गप्प पूछी? संजीव.........जी अवश्य। रायजी.........बौआ की करय छीयै अहॉ, संजीव..........(काफी कम स्वर मे) जी हम नोएडा मे कार्यरत छी, एकटा मल्टीनेशनल कंपनी मे। रायजी.........(काफी कठोर स्वर मे) वाह...वाह बौआ एकटा गप्प बुझबाक छल, पुछु....... संजीव...........जी अवश्य रायजी...........हमर जेठ बालक ग्रेटर कैलाश मे रहैत छथि, अगर अहॉ खराब नहि मानी तँ ओ अहॉ सॅ भेट करऽ चाहैत छथि की अहॉ हुनका सॅ भेट कऽ सकै छियैन्हि। (संजीव कनी काल सोचलाह फेर बुझलनि की कथा वार्ताक गप्प अछि) संजीव..........जी हमर रात्री कालीन कार्य अछि अगर अपनेकेँ ऐतराज नहि हुअए तँ भोर मे भेट कऽ सकै छथि। रायजी...........बौआ पता तँ अहॉ पठा दिअ किएक तँ हम विदा भऽ गेल छी, अपनेक बाबुजी सॅ आवश्यक कार्य अछि, अगर एक बेर रास्ताक जानकारी दऽ दैतौंह तँ ठीक रहितय। (फेर की छल उत्साहित संजीवजी पता बता देलखिन्ह आ राय जी सेहो बौआ........बौआ कऽ रहल छलखिन्ह। राय जीकेँ सख्त हिदायत भेटल रहन्हि की अंग्रजी शब्दक प्रयोग नहि करथि।) संजीव.......... जी हम कनि देर मे पता भेज दैत छी। रायजी......... अच्छा.....अच्छा.....(कनि मुस्कुराइत) फोन काटि दैत छथि। आब आगूक ब्यूह रचना तैयार भेल, ठाकुरजी बजलाह.... आब की करब, ममिया ससुर कें तँ मन मे लडडू फूटैत हेतैन्हि। ओना संजीव प्रफुल्लित छलाह, आब विवाहक समय ऐलन्हि जे। भोरे-भोर हम सभ कियो बहिनक सासुर पहुचलौं, ओतय कनी काल धरि ऐ प्रकरण पर गप्प चलल आ सभ इंतजार करय लगलौं, पर ओइ दिन केओे नहि आयल। आब हम सभ एकटा समयक इंतजार कऽ रहल छलौं, राय जी सेहो प्रसन्न छलाह। आइ निकिताक द्वितीय-यात्राक बाद पहिल दिन हुनकर सासुर हम आ प्रत्युष (भाईजी) दुनु गोटा जा रहल छी, किएक तँ ठाकुरजीक किछु समान हमरा लग छलन्हि। हम सभ ओतऽ पहुंचलौं, ओ सभ काफी सुशील आ विनम्र छथि। हमरा सभकेँ जिज्ञासा छल की आखिर संजीव किछु कयलथि की नहि। ओतय पहुंचलाक बाद पता चलल की केओ नहि भेजल गेल। ठाकुरजी कहलथि की एतय सभकेँ रायजीक गप्प कहलियैन्ह तँ सभ कियो खुब हँसलथि। फेर राय जी सोचलाह की फोन कएल जाय की नहि, तँ निष्कर्ष निकलल की नहि एखन प्रतिक्रिया आबय दियौ। हम सभ सायं काल वापस आबि गेलौं। घर पर पहुंचलाक बाद संजीवक बाबुजीक फोन हमर मोबाइल पर आयल, तँ हम खूब नीक जकॉ गप्प कयलौं। फेर हमरा सॅ गप्प करैक क्रम मे कहलथि की कनी फोन अपन बाबूकेँ दियौन्ह। हम पछबरिया घरक बरामदा पर बइसल अपन बाबूकेँ फोन देलियन्हि आ कहलियैन्ह जे दादाजीक फोन अछि, आ ओतय गप्पी जकॉ बैसि गेलौं, किएक तँ मोन मे होइत छल की हो ने हो कथा वार्ताक गप्प कहबे करथिन्ह। गप्प आरंभ भेल .... दादाजी हाल चाल बूझैक बाद कहलथिन्ह की संजीवक विवाहक गप्प भऽ रहल छनि काते कात गप्प छनि। बाबु............. कतय सॅ , कोन गाम दादाजी...... दुर्गागंज, बुझाइ अछि मजिस्ट्रेट परिवार सॅ बाबु............. कोन परिवारक छथिन्ह दादाजी........चौधरी परिवार सॅ शायद बाबु............ की चौधरी परिवार या राय परिवार दादाजी.........ओएह किछु, वर सॅ गप्प भेलन्हि पर वर नहि बुझय देलखिन्ह जे ओ वर छथि। बाबु............. अच्छा...अच्छा (हॅसिते-हॅसिते) (कात मे बैसल राय जी सेहो मंद मंद हॅसैत छथि ओहि बातक जानकारी ककरो नहि छनि सिवाय एक दू गोटा छोड़ि कऽ) दादाजी..........हॅ आबथि तखन सोचि छी पर वर नहि तैयार छथि बाबु.................नहि नहि हम बुझा देबन्हि , नीक घर छै, करता करता.. दादाजी...........हॅ मंगैत छलखिन्ह नम्बर आ पता बाबु ............ हॅ आर सभ ठीक, संजीव सभ ठीक ने दादाजी............हॅ हॅ , ठीक छथि। फेर फोन काटि दैत छथिन्ह आ आब राय जी बाबु सभ टा गप्प बतबै छथि, फेर सभ हॅसै छथि। आ फेर बाबु बिगड़ै सेहो छथि, एना नहि करैक चाही, फेर हॅसै छथि, बाते तेहन छैक। आब ऐ बातक जानकारी ठाकुरजीकेँ देलियनि तँ ओहो प्रसन्न भेलाह आ कहलथि आखिर फँसि गेलाह हमर ममिया ससुर विवाहक चक्कर मे। फेर सब एहि विषय पर सोचैत सोचैत कय काफी हॅसला। फेर रायजी काफी उत्साहित छलाह आखिर कथा प्रगति पर छनि। आब फेर सभ विचार कैलथि की फोन कएल जाय वा नहि तँ ठाकुरजी विचार देलखिन्ह की नहि एक बेर आर प्रतिक्रिया आबै दियौ तखन ई प्रक्रम आगु बढ़ाएब। आखिर संजीव विवाह लेल फुर-फुर कय रहल छथि, आइ ई गप्प बुझी कऽ सभ (खास कय कऽ रायजी) अत्यन्त प्रसन्न छथि। ओना संजीवजी सेहो ऐ कथा वार्ताक गप्पकेँ तिल मे तार कऽ सभकेँ बतबैत छलखिन, एहि बातक जानकारी भेटल रवि दिन, ओहि दिन बाबूक छुट्टी रहैत छनि। हम, बाबु आ हमर माइ तीनु गोटा घूर तपैत रही किएक तँ दिसम्बरक महिना आ जाड़क सितलहड़ी रहैक, ओहि क्षण हमर बाबुक मोबाइल पर एकटा फोन आयल, बाबु अपन चश्मा पूवरिया घर मे बिसरि गेल छलाह ताहि द्वारे हमरा कहलथि, ककर फोन अछि? हम देखल तँ ओ संजीवजीक बड़की बहिन रितुक फोन छल दिल्ली सॅ। बाबु फोन उठेलाह आ रितुक संग गप्प मे लागि गेलाह। कुशल-पातीकह बाद ओ हमर माइक संग गप्प करय लगलीह। विवाह दानक गप्प भेल आ फेर ओ माइ सॅ पुछलखिन्ह की.... संजीव किछु कहलथि की.....। (कात मे रायजी सेहो छलाह गप्प सुनैत) माइ........ नहि नहि कहॉ गप्प सुनल हँय, विवाह मे जे आएल छलाह ओकर बाद नहि गप्प भेल, किए? रितु........ हुनका फोन पर कोई कथा वला फोन केने छलखिन्ह, पप्पाक पता आ नम्बर मॅगैत छलखिन्ह, संजीव कहलथि की गप्प करै लेल 10.30 बजे राति मे फोन केने छलखिन्ह आ कहलखिन्ह बौआ अहॉक बाबू सॅ गप्प छल किछु आवश्यक गप्प अछि। संजीव कहलथि की दू तीन बेर नम्बर देलियनि। माई...... फेर की कहलन्हि (हॅसिते हॅसिते) रितु........बुझै नै छियै, ओकरा ओनाहियो विवाहक गप्प सॅ कते चिढ़ छै। माइ...... लेकिन आब विवाह करैक चाहियैन, हम तँ दरभंगा मे कच कचा दैत छलियन्हि तँ कहै छलाह छोड़ू, नै करब तँ कतौ कऽ लेब, फेर की भेलन्हि यै। रितु.........ओ तँ सोचलथि जे पापा क कोनो दोस्त हेथिन्ह, तँय पूरा नीक जकॉ गप्प केलखिन्ह। भौजी यै कहलक की हम तँ हुनका काकाजी बुझै छलियनि पर ओ तँ ससुरजी बनय चाहैत छथि। यै भौजी कहै छै संजीव जे दू साल विवाह नहि करब, की करतै पता नहि। माइ....... लेकिन यै आब गप्प हेतनि तखन ने दू साल मे विवाह हेतनि, आब कऽ लेताह तँ काकीकेँ सेहो नीक हेतन्हि, कतय सॅ एलनि हॅ... (ओनो राय जी ऐ गप्पकेँ वर्चस्व लऽ कऽ सुनि रहल छलाह आ सोचि रहल छलाह की संजीव कते आगि मे घी डालि कय गप्पकेँ प्रस्तुत केलाह अछि। ) फेर रायजी घुर लग सॅ उठि कऽ ऐ बातक जानकारी ठाकुरजी आ निकिता केँ देलखिन्ह, निकिता एखनि सासुर मे छथि, ओ कहलक की रायजी हम गप्प करी की ? रायजी कहलथि की नहि, आब फोन पर कथा उपस्थित करै छी आ अपन माई सॅ विकल वावुकेँ (संजीवक पिताजी) गप्प करा दैत छियनि। फेर रायजी ठाकुरजी सॅ सेहो गप्प कयलथि। ठाकुरजी बजलाह की गप्पकेँ तिलक तार कऽ प्रस्तुत कैल जा रहल अछि, आब की करब रायजी ? रायजी........ नहि नहि बढ़ै दियौ एखन किछु बाकी छै, संजीवकेँ आनंद लियै दियौन्हि एखन। किछु दिनुका बाद रायजी निकिताक सासुर गेलाह फेर ओहि ठाम सॅ विकल बाबुकेँ फोन केलखिन्ह आ कथा उपस्थित कऽ देलखिन्ह। ओना हम ई सभ बुझि कय अपन काका (संजीव) केँ फोन केलियैन्ह आ हुनका बधाइ देलियैन्ह, आ हुनका सॅ पुछलियैन्ह की विवाह करबै ने काका, तँ ओ कहलथि की नहि यौ अखन दु साल नहि करब। हम कहलियैन्ह दु साल तँ विवाह होइत होइत लागि जएबे करत। ताहि पर काका एकदम खिसिया गेलाह आ फोन काटि देलथि। सभ हुनका मनबै मे विफल रहल फेर हमर बाबु संजीव केँ फोन कैलथि आ हुनका सॅ गप्प कैलथि तँ ओ किछु विंदु पर गप्प सुनि कय विवाह करै लेल तैयार भऽ गेलाह। संजीवजीक संग हुनकर परिवारक सब सदस्य काफी प्रसन्न छथि, किएक नहि हेबाक चाहियैन्हि विवाह जे प्रस्तावित छनि। फेर अचानक जहि दिन रायजी केँ विकल बाबु ओतय जेवाक छलन्हि ओहि दिन संजीवक मोबाइल पर एकटा फोन अबैत अछि.... संजीव........ हैलो...हैलो... अपरिचित..... संजीवजी, हाय हम स्मिता झा बाजि रहल छी संजीव....... जी कहू, की बात? स्मिता.........जी हमरा अहॉ सॅ किछु गप्प करबाक छल,की अपने धर सॅ बाहर छियै, नहि तँ जखन बाहर होयब तखन मिस कॉल करि देब? संजीव.........जी, अखन कहि सकैत छी, हम बाहर छी स्मिता..........जी, हमर पिताजी अहॉ ओतय कथा लऽ कऽ गेलाह अछि, हम अहॉकेँ विवाहक बाद परेशान आ दुखी नहि देखय चाहैत छी ताहि लेल किछु गप्प कहय चाहैत छी। हम अहॉकेँ देखने छी, अहॉ सुंदर आ सुशील छी पर हम अहॉ सॅ विवाह नहि कय सकैत छी आ ई गप्प हम ककरो नहि कहि सकैत छियैक तँय अहॉ अपने ई कथा तोड़ि दियौ अहॉ सॅ विशेष आग्रह अछि। संजीव.......... अहॉ चिंता जुनि करू, अहॉ ई गप्प दोस्त बुझि बतेलौंह अछि ताहि लेल हम अहॉक सहायता अवश्य करब अहॉ निश्चिन्त रहू। फेर संजीव दुखी भऽ जाइत छथि, किएक नहि कियो वर विवाहक सपना देखत, ओहो परिवारक दवाब मे तँ ओकरा पर की बितत? किए तँ-‘‘वर फेर रहि गेलाह कुमार’’। (गुंजन झाकेँ समर्पित) बेटीक जन्म बेटीक जन्म पर कतेक लोग हॅसैत खिलखिलैत छथि तअ कतेक लोग नोर बहबैत छथि। कहियो इ सोचल जॅ बेटा बुढ़ापाक लाठी बनि सकैत अछि तअ बेटी कियाक नहि। मानल जाइत अछि जे आजुक समय मे बेटा आ बेटी एक समान अछि, परंच किछु वक्ता लेल एहि विषय पर मतभेद छनि, आखिर किया ? बेटी लक्ष्मीक रूप मानल जाए छथि तय फेर लक्ष्मीक अनादर कियाक। 21वीं ष्षताब्दी, जतय बेटी बेटा सॅ आगु निकलल जाएत छथि, ईहो समय मे भ्रूण हत्या, विवाहक बाद दहेज लेल प्रताड़ित करनाए आखिर कियाक ? जे परिवार भ्रूण हत्या करैत छथि आ जे दहेज लेल प्रताड़ित करैत छथि से कहियो सोचलैत की ओ जकरा प्रताड़ित करैत छथि ओ कोनो घरक बेटी अछि। आखिर ई अंतर कहिया धरि तक मिटत। कहियो ई सोचलैत जे अगर इ समाज मे बेटीक जन्मदर कम भय जायत तय इ समाज कोना के विकसित होयत। एखन देखल जाए सकैत छैक जे हर क्षे़त्र मे बेटी अपन परचम लहरा रहल अछि, चाहे ओ सिविल, इंजिनियरिंग या अन्य क्षेत्र हुअए, फेर बेटी कय सदिखन अपमान किया कएल जाएत अछि। बेटी चाहे ओ कियाक ने एकटा मॉ हो, पुतौह हो या बेटी, ओ सदिखन अपना ऊपर होय वला अत्याचार के सहैत अछि, आखिर इ कहिया तक ? एकटा और अपन समाज मे विषरूपी ब्याप्त समस्या अछि दहेज, जेकर कारणे कतेक बेटी प्रताड़ित कैएल जाए छथि आ कतेको तअ मारि देल जाए छथि। आजुक समय मे हरेक लड़की पढ़ल लिखल आ काज करैत होय छैक पर तहियो ओकर विवाह बिना दहेजक नहि होइत छैक। जे वक्ता बेटी के अभिषाप या बेटाक दर्जा नै दैइत छथि, कि कहियो ओ सोचलैत जे ई दहेज प्रथा, भ्रूण हत्याक विरोध करि। कि समाज अपन सोच नहि बदलत। हम ई सब बातक विरोध आ घोर निंदा करैत छी, आ बेटी के हॅसैत-खेलाइत स्वागत करि तकर आवाहन करैत थिक। उमेश मण्डल कनफेड़सँ मुँहफेड़ बरसपतिबाबाकेँ एहेन दुख जिनगीमे नै भेल छलनि जेहन आइ भेलनि। जखन हुबगर छलाह तखन परोपट्टाक लोक उचित वक्ता मानि ओझराएलसँ ओझराएल पनचैती करबैत छल। मुदा हुबा घटने एहेन दिन देखए पड़लनि। कृष्णदेव मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी करैत। जे कियो काजे ओइ ऑफिस गेल सभ बुझैत जे कृष्णदेव केहेन घुसखोर अछि। रेलवे टिकट जकाँ सभ काजक रेट बनौने। संयोगसँ बरसपतिबाबा सेहो एक िदन एकटा काजे गेलाह। मुदा बुझि नै सकलथि जे घुस दऽ कऽ काज भेल। भेलनि जे सरकारी फीस लगल हएत। ऑफिससँ निकलिते एक गोटे पुछि देलकनि- “कते घुस लागल।” “घुस किअए लागत। सरकारी फीस लागल।” एक्के-दुइये जखन चारि-पाँच गोटे कहलकनि तखन मन मानि गेलनि जे फीस नै घुस लागल। मुदा आब उपाए की? कोनो सबूत तँ नै अछि। एकटा उपाए फुड़लनि। ओ ई जे अखनेसँ बाजब शुरू कऽ देब जे कृष्णदेव घुसखोर अछि। सएह केलनि। खूब बदनाम केलनि। समए मोड़ लेलक। बरसपतिबाबाक हूबा सेहो कमलनि। सौ रूपैयाक बेगरता भेलनि। गाममे कृष्णदेवक महाजनी चलैत। बरसपतिबाबा कृष्णदेवकेँ कहलखिन- “किसुन, एक साए रूपैयाक बेगरता अछि, सम्हारि दाए।” मौका पाबि, जहिना बगड़ापर बाझ झपटैत तहिना कृष्णदेव ठोकले मुँहेँ उत्तर देलकनि- “बाबा, जँ अहाँकेँ बजैऐक छल तँ हमरो पुछि लइतौं। हम लेलिऐ तँ चौरासी परचार केलौं आ डेढ़ लाख लऽ कऽ जे नोकरी भेल, आ तइपर सँ महीना-महीने भरए पड़ैए, से के बाजत?” कृष्णदेवक बात सुनि बरसपतिबाबा मने-मन विचार करए लगलथि। ठीके कनफेड़सँ मुँहफेड़ भऽ गेल। कुसियारक मारि चैत मास। तीनू गोटे सखरा जाइत रही। तीनू गोटे बच्चेक संगी मुदा तीन जातिक छी। एक सिंहजी दोसर रायजी तेसर अपने। तीख रौद मुदा पूर्वा सह दैत। रास्ता कातेमे कुसियारक खेत। डमहाएल कुसियार रससँ तड़तड़ करैत। पियासो लगि गेल रहए। कुसियार देख मोन डोलि गेल। हुनका दुनू गोटेकेँ कहलियनि एक छड़ कुसियार खाइक मोन होइए। मन हुनको दुनू गोटेकेँ रहनि मुदा आगू भऽ कऽ बजलौं हमहीं। तीन छड़ कुसियार तोड़ैक सहमति भऽ गेल। एक तँ जुआन दोसर तीन गोटे छी। असगर दुसगर बगबार रोकत तँ मारियो खएत। तीनू गोटे तीन छड़ तोड़ि लेलौं। शुरूमे जँ बुझितिऐ जे असगरोमे तागत होइ छै तँ एहन काजे नै करितौं। पछाति बुझलिऐ। कुसियारक खेतसँ निकलिते रही आकि बगबार आबि कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। हियौलक मुदा बाजल किछु नै। रस्तापर आबि गाछक छाहरिमे तीनू गोटे कुसियार खाए लगलौं। बगबारो आबि, कनी हटि कऽ ठाढ़ भऽ सिंहजीकेँ इशारा देलक। कुसियार खाइते सिंहजीक कानमे फुसफुसा कऽ किदैन कहि देलक। तहिना राइयोजीकेँ केलक। हम असगरे छुटि गेलौं। सनकल आबि कुसियार छीनि पच्चीस कुसियार मारलक आ पचास बेर कान पकड़ि कऽ उठौलक बैसौलक। माइरिक चोट ओते नै लागल जेतैक संगीक किरदानी। रूष्ट भऽ असगरे विदा भऽ गेलौं। थोड़े आगू बढ़ि पाछू घुरि तकलौं तँ रायजीक उपरमे तड़ातड़ि कुसियार बरिसति देखलिऐ। हमर मारि तँ सभ देखनहि छल। तँए कहैक जरूरते नै मुदा रायजीक मारि तँ हम नहि देखने। कनैत देख पुछलियनि- “भाय, किअए ठुनकै छी?” मुदा तैयो सोझ डारिये नै चिक्कारियेमे कहलनि- “जएह गति अहाँक सएह अपनो।” एते गप होइते छल आकि फटाक-फटाकक अबाज हुअए लगल। सिंहजी आ बगबारो गाड़ि गड़ौबलि आ ललका-लककी सेहो करैत छल। हम दुनू गोटे वामा कानक बगलमे हाथ लगा ठीकसँ सुनए लगलौं। गाड़ि पढ़ि बगबार बाजल- “बापेक खेत छलह?” सिंहजी जबाब देलखिन- “जेकरा बात नै ओकरा बाप नै। मुँह चुकरियबैत की बाजल रहह?” जहिना मारि खेलापर चोट लागल रहए आ दुखी भेल छलौं तहिना सबहक देख कऽ खुशियो भेल। हँसी-मजाक करैत तीनू गोरे सखरा भगवतीक दर्शन कऽ घुमलौं। सगर राति दीप जरए, हजारीबाग 10 सितम्बर साँझ 7बजेसँ 11 सितम्बरक भिनसर 6बजे धरि ‘सगर राति दीप जरय’क 74म कथा गोष्ठी श्री श्याम दरिहरे जीक संयोजकत्वमे सिन्दूर कैम्प हजारीबाग (झारखण्ड) मे सु-सम्पन्न भेल। गोष्ठीक अध्यक्षता केलनि- श्री रमानन्द झा ‘रमण’ आ मंच संचालन श्री कमल मोहन चुन्नूजी। झारखण्ड आ बिहार दुनू ठामक कथाकार अपन-अपन नूतन कथा/लघुकथाक पाठ केलनि यथा- सुन्दर भेल मधाई (प्रदीप बिहारी), अपन सन मुँह (लक्ष्मी दास), कचोट (शशिकान्त झा), अल्लूक चुमौन (रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’), मरनी बेटी (मिथिलेश मण्डल), कनफेरसँ मुँहफेर आ कुसियारक मारि (उमेश मण्डल), सुगन्धा (चौधरी जयंत तुलसी), भवडाह (जगदीश प्रसाद मण्डल), अधिकार (बेचन ठाकुर), एकरा की कहबै (रामविलास साहु), मदिराक प्रभाव (शिवकुमार मिश्र), पोस्टमार्टम (संतोष कुमार झा), महादुखी वा महासुखी (धनाकार ठाकुर), बौआइत मनोभाव (गिरजानन्द ठाकुर), टीश (अशोक) आ गामक सुगंध इन्टरनेट (श्याम दरिहरे)। पठित कथा आ लघुकथापर दू-टप्पी समीक्षा सेहो भेल। ऐ अवसरपर पाँच गोट मौलिक आ दू गोट अनुदित पोथीक लोकार्पण भेल यथा- (1) मिथिलाक इतिहास (प्रो. राधाकृष्ण चौधरी) लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मण्डल द्वारा। (2) A survey of Maithili literature (प्रो. राधाकृष्ण चौधरी) लो.- श्री अशोक। (3) कलानिधि (कालीकान्त झा ‘बूच’) लो.- श्री प्रदीप बिहारी। (4) रहए चाहैए गाछ (जीवकान्त) लो.- श्री तुलानन्द मिश्र। (5) धूंध के बावजूद (अजीत कु. आजाद) लो.- श्री जगदीश सिंह। (6) कठिन समय मे शब्द, हिन्दीक मैथिली अनुवाद (अजीत कु. आजाद) लोकार्पण- श्री जीवेन्द्रनाथ झा। (7) परती टूट रही है, मैथिलीक हिन्दी अनुवाद (अजीत कुमार आजाद) लोकार्पण- श्री रमानन्द झा ‘रमण’ द्वारा। सगर राति दीप जरय'क 75म आयोजन श्री अशोक जीक संयोजकत्वमे पटनामे 10 दिस्मबर 2011केँ होएबाक संभावना। 75म कथा गोष्ठीमे 39 टा कथापाठ 10 दिसम्बर 2011केँ ‘सगर राति दीप जरय’क 75म कथा गोष्ठीक आयोजन बिहार को-ऑपरेटिव फेडरेशन हॉल, बुद्धमार्ग पटनामे कएल गेल। साँझ 5:30 बजेसँ भिनसर 8 बजे धरि गोष्ठी जमल रहल। संयोजक द्वय अशोक आ कमल मोहन ‘चुन्नू’ जीक ऐ आयोजनमे 39 गोट कथा/ लघुकथाक पाठ भेल आ तइपर दूटप्पी समीक्षा सेहो कएल गेल। ऐ अवसरपर विभिन्न विधाक दर्जन भरि पोथी लोकार्पणक संग 16 म विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी आ विदेहक सहायक संपादक मुन्नाजी द्वारा मैथिलीक पहिल विहनि कथा पोस्टर प्रदर्शनी सेहो रहए। श्रीमती प्रीति ठाकुरक पोथी “मिथिलाक लोक देवता” आ विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मूल पुरस्कारसँ पुरस्कृत पोथी “गामक जिनगी” (जगदीश प्रसाद मण्डलक कथा संग्रह) , ऐ दुनू पोथीक एकहक सए प्रतिक वितरण श्रुति प्रकाशन केलक। मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्तिक ऐ 75म गोष्ठीक दीप प्रज्वलित कऽ विधिवत् उद्घाटन केलनि श्री राजमोहन झा। स्वागत केलनि श्री अशोक। अध्यक्षता केलनि श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’, संचालन डॉ. तारानन्द वियोगी। मुख्य अतिथि श्री श्यामानन्द चौधरीक उपस्थितिमे कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल पोथी लोकार्पण सत्रसँ जइमे 12 गोट पोथीक लोकार्पण क्रमश: ऐ तरहेँ भेल- 1. निबंध सुधा (निबंध संग्रह, सुधा कुमारी) लोकार्पण श्री मोहन भारद्वाज। 2. जखन तखन पत्रिका (प्रेम विशेषांक, संपादक विभूति आनंद, अशोक मेहता) लोकार्पण डॉ. वासुकीनाथ झा। 3. कोसी कातक गंगा (संस्मरण, साकेतानन्द) श्रीमती उषा किरण खाँ। 4. ऐ अकावोनमे (कविता संग्रह, राज) लोकार्पण- डॉ. रामानन्द झा ‘रमण’ 5. जुबैदा (कथा संग्रह, उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’) लोकार्पण केलनि श्री राजमोहन झा। 6. समय साक्षी थिक (लघुकथा संग्रह, अनमोल झा)- डॉ. देवशंकर नवीन आ श्री उग्रनारायण मिश्र ‘कनक’। 7. गंग नहौन (कविता संग्रह, निशाकर) डॉ. तारानंद वियोगी। 8. बेटीक अपमान आ छीनरदेवी (नाटक, बेचन ठाकुर)- श्री राजमोहन झा। 9. अनचिन्हार आखर (गजल संग्रह, आशीष अनचिन्हार)- लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री श्याम दरिहरे, श्री अनमोल झा। 10. जेना जनलियनि (संस्मरण, महेन्द्र नारायण राम ‘नीलकमल’)- लोकार्पण श्री मन्त्रेश्वर झा। 11. सीतावतरण (खण्डकाव्य, संपा. योगानंद झा) लोकार्पण श्री मोहन भारद्वाज। 12. गाममे (नेपाली भाषाक कविता संग्रह ‘गाओंमे हरू’ मूल कवियत्री रेमीका थापा केर मैथिली अनुवाद, प्रदीप बिहारी) लोकार्पण श्री अशोक। लोकार्पण सत्रक पछाति कथा सत्रक शुभारम्भ भेल जइमे नवोदित कथाकारक संग स्थापित कथाकार लोकनि अपन-अपन नूतन कथा/लघुकथाक पाठ केलनि जेकर सुची क्रमश: ऐ तरहेँ अछि- प्रदीप बिहारी- कोदारि तारानंद वियोगी- वैदिक हिंसा मन्त्रेश्वर झा दूटा लघुकथा- जगरनाथ, उजारि पन्ना झा- प्रवोधन मधुकर भारद्वाज- रीमोट शशिकान्त झा- चोरबा वंश लछमीदास- भरमे-सरम बेचन ठाकुर दूटा लघुकथा- भुखाएल आ अबाम उमेश मण्डल दूटा लघुकथा- चाेर-सिपाही आ काल्हि दिन अनमोल झा- समाङ आ अन्हार रघुनाथ मुखिया- प्रलोभन आ निचेन समयमे दुगानन्द मण्डल- पोस्टमार्टम आ प्रदूषन अजय कुमार मिश्र- उठह हौ वनियाँ हाट-बजार मेनका बिहारी- घरारी अरूाणा चौधरी- अभिन्न निक्की प्रियदर्शनी- पलायन धीरेन्द्र कुमार- मररिया चेतल कमलकान्त झा- मँहतक्की जगदीश प्रसाद मण्डल- परिवारक प्रतिष्ठा हीरेन्द्र- हाष्यपर व्यंग फ्री अर्द्धनारीश्वर- घोड़ा घास दिलीप झा- रामविलास साहु- स्वर्गक सुख शिवकुमार मिश्र- प्लेटफार्म नन्दविलास राय- जाति पंकज सत्यम्- महानता दिलीप कुमार- पुरस्कार उमेश नारायण कर्ण- अन्धविश्वास सुरेश पासवान- बगुलाक सरदार जगदीश कुमार भारती- धुरफन्दीलाल रामनारायणजी- सिनुरिया ऋृषि बशिष्ठ- देश प्रेम पंकज कुमार- प्रियांसु मुन्नाजी- विकल्प धनाकर ठाकुर- ओ श्याम दरिहरे- जौहर विभूति आनन्द- वन-वे ट्रेफिक देवशंकर नवीन- मोटर साइकिल भवनाथ झा- मंडनक मनोभाव (650-670 ऐतिहासिक घटना)। अधिक कथाकारक जमघट भेने पठीत कथा सभपर समीक्षामे थोड़ेक कंजुशी कएल गेल। जे स्वभाविक छल। मुदा तैयो किछु कथापर किछु विशेष टिप्पणी अाएल जेना तारानंद वियोगीक पठित कथा- वैदिक हिंसा’पर जगदीश प्रसाद मण्डल कहलनि- यथार्थवादी कथा पूर्णतामे कंजूसी। सम्प्रदाय, धर्म आ अध्यात्म, तीनू तीन। कथा एक अंगक, मात्र समस्याक। समस्याक कारण आ निदान सेहो होय। तहिना कोदारि कथापर दुगानंद मण्डल कहलनि- शीर्षकक सार्थकताक अभाव। अही तरहेँ भवनाथ झाक पठित- मण्डनक मनोभाव’ कथापर धनाकार ठाकुर कहलनि- ऐ कथाक मादे वेदक निंदा कऽ मण्डन मिश्रकेँ गैर ब्राह्मण विरोधी बताओल गेलहेँ। जे गलत अछि। जेकर कोनो प्रमाण नै। तइ लेल हम एकरा वहिष्कार करैत छी। कहैत डॉ. धनाकर ठाकुर गोष्ठीसँ बाहर निकलि गेलाह! चलि गेलाह!! अंतमे, अगिला गोष्ठीक आयोजन हेतु प्रस्ताव लेल घोषणा कएल गेल। पूर्व प्रस्तावमे हजारिये बागसँ दूटा छल जे क्रमश: अर्द्धनारीश्वर आ प्रदीप बिहारीक छलनि। एकटा नव प्रस्ताव डॉ. देवशंकार नवीन जीक आएल। ऐ तीनू प्रस्तावमे अर्द्धनारीश्वरक प्रस्ताव रहनि बोकारोमे हुअए। जे 74म कथा गोष्ठी हजारिये बागसँ प्रस्तावक छलाह। मुदा प्रदीप बिहारी प्रस्तावक तँ अहुठाम बनलाह जे अगिला गोष्ठी बेगुसरायमे हुअए मुदा जहिना हजारीबागक गोष्ठीमे पटना भेने चूप भऽ समर्थके बनि गेल छलाह तहिना अहुठाम 76म गोष्ठी बेगुसरायमे हुअए तकर प्रस्तावक बनलाह मुदा देवशंकर नवीनक प्रस्ताव दिल्ली लेल एने चूप भऽ समर्थक बनि गेलाह। अर्द्धनारीश्वरक बातपर कोनो विचार नै कएल गेल। अर्द्धनारीश्वर एक बेर बजेत सुनल गेलाह- ‘अर्जी ककरो मर्जी ककरो’। िनर्णए भेल जे अगिला गोष्ठी दिल्लीमे डॉ. देवशंकर नवीनजी संयोजकत्वमे कएल जाएत। उपस्थिति पुस्तिका आ दीप डॉ. देवशंकर नवीन जीकेँ सौंपैत गोष्ठी शेष भेल। विदेह साहित्य उत्सव २०१२/ विदेह सम्मान समारोह (विदेह सम्पादकक समानान्तर साहित्य अकादेमी- मैथिली पुरस्कार सह काव्य गोष्ठी) दिनांक- 14 जनवरी 2012 (शनिदिन) समए- 11: 30 बजे (पूर्वाहन) सँ 5: 50 बजे साँझ धरि स्थान- अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय, अम्बेदकर चौक वार्ड नं. 07, िनर्मली, जिला- सुपौल। आयोजक- स्थानीय साहित्य प्रेमी संयोजक- उमेश मण्डल उद्घाटन सह दीप प्रज्वलन- द्वय प्रो. राजकुमार मण्डल (अवकाश प्राप्त प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, िनर्मली महाविद्यालय िनर्मली) आ डॉ. भीमनाथ झा सम्मान समारोहक अध्यक्ष डॉ. भीमनाथ झा (अवकाश प्राप्त प्रोफेसर, विश्वविद्यालय मैथिली िवभाग, ल. ना. मि. विश्वविद्यालय- दरभंगा।) सम्मान समारोहक मंच संचालन- द्वय प्रो. शिवकुमार प्रसाद (प्राध्यापक हिन्दी विभाग िनर्मली महाविद्यालय िनर्मली) श्री संजीव कुमार ‘शमा’ स्वागत गीत- श्री रामसेवक ठाकुर, श्री रामदेवप्रसाद मण्डल झारूदार आ श्री राधाकान्त मण्डल स्वागत कविता- श्री रामविलास साहु स्वागत भाषण- प्रो. कपिलेश्वर साहु सम्मानित अतिथि- 1. ले. क. मयानाथ झा- (गाम- भराम, पोस्ट कोठिया, जिला- मधुबनी) “जेकर नारी चतुर होइ” पोथी लेल समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिलीक बाल साहित्य पुरस्कार- 2011 2. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गाम, पोस्ट- बेरमा, भाया- तमुरिया, जिला- मधुबनी) “गामक जिनगी” कथा संग्रह लेल समानान्तर साहित्य अकादेमी- मैथिलीक मूल पुरस्कार- 2011 3. श्री आनन्द कुमार झा (गाम- मेहथ, भाया- झंझारपुर, जिला- मधुबनी) “कलह” नाटक लेल समानान्तर साहित्य अकादेमी- मैथिलीक युवा पुरस्कार- 2011 नव वस्त्रक संग प्रस्शती पत्र आ विदेह सम्मानक प्रतीक चिन्ह प्रदान कएल गेल। सम्मानित कएल गेलन्हि- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ- डॉ. भीमनाथ झा, प्रो. राजकुमार मण्डल ले. क. मयानाथ झाकेँ श्री राजदेव मण्डल, प्रो. राजकुमार मण्डल श्री आनन्द कुमार झाकेँ श्री बेचन ठाकुर, प्रो. राजकुमार मण्डल विशिष्ठ अतिथि- श्री रामजी प्रसाद मण्डल (अवकाश प्राप्त पुस्तकालयाध्यक्ष िनर्मली महाविद्यालय िनर्मली, सुपौल।) प्रो. जय प्रकाश साहु (अध्यक्ष इतिहास विभाग िनर्मली महाविद्यालय िनर्मली) श्री हरिनारायण कामत (अवकाश प्राप्त शिक्षक, िनर्मली) श्री कृष्ण राम अवकाश प्राप्त शिक्षक, छजना, मधुबनी।) श्री मनोज कुमार साह (प्राचार्य, अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय िनर्मली।) श्री शिवकुमार मिश्र (गाम- बेरमा, मधुबनी।) साहिित्यक विशिष्ठ अतिथि- श्री राजदेव मण्डल (एक्केसम सदीक पहिल दसकक सर्वश्रेष्ठ कवि, गाम- मुसहरनियाँ जिला- मधुबनी।) श्री बेचन ठाकुर (प्रसिद्ध नाटककार, गाम-चनौरागंज, मधुबनी।) दोसर सत्र (काव्य पाठ) अध्यक्ष- प्रो. राजकुमार मण्डल (अवकाश प्राप्त प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, िनर्मली महाविद्यालय िनर्मली) मंच संचालक द्वय- प्रो. रमेश कुमार मण्डल प्राध्यापक, अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला महाविद्यालय, अम्बेदकर चौक वार्ड नं. 07, िनर्मली। आ श्री दुर्गानन्द मण्डल शिक्षक, उच्च विद्यालय- वनगामा, मधुबनी। काव्य गोष्ठीमे लगभग 3 दर्जन नूतन कविताक पाठ भेल। अतिथि- 1. प्रो. रमेश कुमार मण्डल 2. प्रो. हेमनारायण साहु 3. प्रो. कपिलेश्वर साहु 4. प्रो. उपेन्द्र नारायण अनुपम 5. श्रीमती कामिनी कुमारी प्रसाद 6. श्रीमती उषा कुमारी 7. प्रो. सुशील कुमार साहु 8. श्री कृष्ण कुमार साह 9. श्री राघब झा 10. श्री युगेश्वर प्रसाद साह 11. श्री लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता 12. श्री रामविलास साहु 13. श्री भोला प्रसाद यादव 14. श्री विरेन्द्र कुमार विमल 15. श्री राम प्रवेश मण्डल 16. श्री गुलाब चन्द्र यादव 17. श्री विष्णु कुमार गुप्ता 18. श्री राधाकान्त मण्डल 19. श्री मनोज कुमार राधे 20. श्री विनोद कुमार विकल 21. श्री सी. एन. मण्डल 22. श्री सुरेश महतो 23. श्री गोविन्दाचार्य 24. श्री अशोक साह 25. श्री पंकज कुमार प्रभाकर 26. श्री युगल किशोर शर्मा 27. श्री मुकेश कुमार 28. श्री दिनेश कुमार 29. श्री उमेश प्रसाद नायक 30. श्री रौशन कुमार गुप्ता 31. श्री दुर्गानंद मण्डल 32. श्री संजय कुमार मण्डल 33. श्री अखिलेश कुमार मण्डल 34. श्री मदन प्रसाद 35. श्री संजीव कुमार समा 36. श्री श्रीमोहन ठाकुर 37. श्री उमेश पासवान 38. श्री रामकृष्ण मण्डल छोटू 39. श्री खड़ानंद यादव 40. श्री नंद विलास राय 41. श्री रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ 42. सुधीर कुमार ‘सुमन’ श्री नारायण झा लगभग 3 दर्जनसँ ऊपर काव्यक पाठ भेल। मिथिलांचलक प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षाक माध्यम् मैथिली हेतु ‘विदेह’ विचार गोष्ठी िनर्मली, सुपौल, (बिहार)- मििथलांचलक प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षाक माध्यम् मैथिली हेतु ‘विदेह’ विचार गोष्ठी श्री राहुल कुमार जीक संयोजकत्वमे स्थानीय अशर्फी दास साहु समाज इण्टर महिला कॉलेज परिसरमे दुपहर 2 बजेसँ कएल गेल जेकर अध्यक्षता केलनि- उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, दीप प्रज्वलन सह गोष्ठीक उद्घाटन केलनि िनर्मली महाविद्यालयक इतिहास विभागक वरीय व्याख्याता प्रो. जयप्रकाश साह, संचालन प्रो. हेम नारायण साह। प्रो. कपिलेश्वर साह, मरौना केर पूर्व जिला पार्षद श्रीमती आशा देवी, अधिवक्ता रामलखन यादव, कवि श्री राजदेव मण्डल, अधिवक्ता वीरेन्द्र कुमार ‘विमल’ विशिष्ठ अतिथि रहथि। ऐ अवसरपर उपस्थित छलाह िनर्मली महाविद्यालय िनर्मलीक मैथिली विभागक वरीय व्याख्याता प्रो. श्रीमोहन झा, प्रो. मुकुल कुमार वर्मा, श्री विनय कुमार रूद्र, अधिवक्ता भोला प्रसाद यादव, अवकाश प्राप्त शिक्षक श्रीकृष्ण राम, िनर्मली महाविद्यालय केर हिन्दी विभागक वरीय व्याख्याता डॉ. शिवकुमार प्रसाद, प्रो. उपेन्द्र अनुपम, साहित्यकार नन्द विलास राय, मध्य विद्यालय िनर्मलीक प्रधानाध्यापक सत्य नारायण कामति, शिक्षक रामावतार साहु, शिक्षक अहमद कमाल मंजूर, मध्य विद्यालय िनर्मलीक सहायक शिक्षक जवाहर लाल गुप्ता, प्रो. सुशील कुमार, गणित विभागक व्याख्याता प्रो. दुर्गालाल साहु, इण्टर महिला कॉलेजक प्राचार्य प्रो. मनोज कुमार साह, भौतिकी विभागक प्रो. लालबाबू साह, रामप्रकाश सिंह, जितेन्द्र प्रसाद यादव, चुन्नीलाल साह, मदन प्रसाद साह, विष्णुदेव कुमार मंडल, विनोद कुमार साह, मुकुल साह, डीलर यदुराम, पुनित लाल साहु, देवराम साह, वीरेन्द्र ठाकुर, चन्द्रशेखर मंडल जलेश्वर प्रसाद साहु आदि। सर्वसम्मतिसँ िनर्णय भेल माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जीकेँ जे कोसी महासेतुक उद्घाटन लेल 08 फरवरी 2012केँ िनर्मली आबि रहलाहेँ ओही अवसरपर उपरोक्त विषय-वस्तुक स्मार पत्र प्रदान कएल जाए जइमे अधिक-सँ-अधिक लोकक हस्ताक्षर रहए। तै अनुसार स्मार-पत्र देल गेल http://esamaad.blogspot.comn/2012/02/blog-post_08.html [-जयकांत मिश्रक याचिका (CWJC No. 7505/98) पर बिहार सरकार हाई कोर्टमे सेहो हारल छल -मुदा बिहार सरकार सुप्रीम कोर्टमे केने छल अपील (Civli Appeal No. (s)7266 of 2004, न्यायमूर्ति बी.सुदर्शन रेड्डी आ सुरिन्दर सिंह निज्झर ३० सितम्बर २०१० केँ सुनवाइ केलन्हि आ अपन निर्णयमे बिहार सरकारक अपील ठोकरा देलक। -बिहार आ झारखण्डक भागमे [बिहारक सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, वैशाली (हाजीपुर), मुंगेर, बाँका, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, मोतीहारी, किशनगंज, आ कटिहार जिला आ रिटक समय १९९८ ई. मे बिहार मुदा आब झारखण्डक देवघर, गोड्डा आ साहेबगंज जिला] मैथिली अलग भाषा रूपमे बाजल जाइत अछि। जँ वर्गमे कमसँ कम १०टा छात्र आ स्कूलमे ४० टा छात्र मैथिली माध्यमसँ शिक्षा प्राप्त करऽ चाहताह तँ सरकारकेँ से व्यवस्था करए पड़तैक।] [बिहार मे मिथिलांचल क्षेत्रमे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षाक माध्यम मैथिली करबा लेल बिहार सरकारपर द्वाब बनेबा लेल ३ फरबरी २०१२ केँ विदेह द्वारा विचार गोष्ठीक आयोजन कएल जा रहल अछि आ संगमे हस्ताक्षर अभियान सेहो शुरू कएल जाएत, आ ८ फरबरी २०१२ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ ज्ञापन देल जाएत। श्री राहुल कुमार आ श्री अमरेन्द्र कुमार साहक संयोजकत्वमे विदेह विचार गोष्ठी ३ फरबरी २०१२ केँ २ बजे अपराह्णसँ अशर्फी दास साहू समाज इण्टर महिला महाविद्यालय, निर्मली (जिला सुपौल) मे आयोजित हएत। सुप्रीम कोर्ट सेहो बिहार सरकारक अपीलकेँ खारिज कऽ देने अछि आ कोनो बाधा नै बचल अछि (http://esamaad.blogspot.com/2011/11/blog-post_14.html ) बिहारक मुख्यमंत्रीकेँ १४ अक्टूबर २०११केँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल आ श्री राजदेव मण्डलक ६ टा पोथी देल गेल छलन्हि आ ई मुद्दा उठाओल गेल छल (http://esamaad.blogspot.com/2011/10/blog-post_15.html)] [Indian Constitution has given special importance to primary education through the mother tongue. Article 350(A) of the Constitution spells out: "It shall be the endeavour of every State and of every local authority within the state to provide adequate facilities for instruction in the mother tongue at the primary stage of education to, children belonging to linguistic minority groups; and the President may issue such directions to any State as he considers necessary or proper for securing the provision of such facilities."] विदेह नाट्य उत्सव- 2012 मधुबनी जिलान्तर्गत चनौरागंजक जे.एम.एस. कोचिंग परिसरमे विगत 28-29 जनवरी 2012केँ सरस्वती पूजाक अवसरपर दु-दिवसीय ‘विदेह नाट्य उत्सव’क आयोजन विदेह ई-पत्रिकाक नाट्य-रंगमंच-फिल्मक संपादक बेचन ठाकुर जीक संयोजकत्वमे कएल गेल। श्री बेचनठाकुर लिखित ‘बिसवासघात’, श्री गजेन्द्र ठाकुर लिखित ‘उल्कामुख’ आ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल लिखित ‘बिरांगना’ नाटकक मंचन श्री बेचन ठाकुरक िनर्देशनमे भेल। नाट्य रंगमंच-फिल्मपर परिचर्चा, शिशुकला प्रदर्शन, काव्य गोष्ठी, एकर अतिरिक्त नाटक अभिनय, गीत-संगीत, हास्य–कला, नृत्य-कला, मूर्ति-कला, शिल्प-वस्तुकला, काष्ठ-कला, किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति एवं चित्र-कला क्षेत्रमे 2012क ‘विदेह सम्मान’ सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ अवसरपर विशिष्ट अतिथि रहथि साहित्यकार जगदीश प्रसाद मण्डल, कवि जनककिशोर लाल दास, झंझारपुरक वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय, डी.सी.एल.आर; कुमार मिथिलेश प्रसाद सिंह, पूर्व जिला पाषर्द बलराम साहु, डॉ. उषा महासेठ, कुमार रामेश्वर लालदास, रामवृक्ष सिंह, ब्रज किशोर साह आ अवकाश प्राप्त शिक्षक हरिनारायण झा। हजारो दर्शक-श्रोताक अालाबे दूर-दूरसँ आएल साहित्य-संगीत प्रेमी सबहक उपस्थिति सेहो छल। मंचक संचालन रामसेवक ठाकुर, दुर्गानंद मंडल आ दयानंद कुमार केलनि। विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी मंचक दहिना भाग लगाओल गेल रहए जे आकर्षक रहल। दिनांक 28/01/2012 अर्थात उत्सवक पहिल दिन दुटा नाटक क्रमश: बिसवासघात आे उल्कामुख’क प्रदर्शन भेल। जतए पहिल नाटक हालेमे एन.एच. िनर्माणमे भेल घोटालासँ उपजल षड्यंत्रक प्रभावकेँ उघार केलक ओतहि दोसर नाटक जादू वास्तविकतावादी उल्कामुख जइमे ऐतिहासिक षड्यंत्रकेँ उघारल करैत खचाखच दर्शकदीर्घामे दाँते ओंगरी कटबाक स्थिति बनौलक। गुरु: ब्रह्मा गुरु: विष्णु... मंगलाचरणसँ उद्घाटन सत्र प्रारम्भ भेल। विधिवत् दीप प्रज्वलित कऽ अवकाश प्राप्त शिक्षक कुमार रामेश्वर लाल दास उद्घाटन केलनि। रंगमंचीय अध्यक्ष डाॅ. उषा महासेठ एवं श्री ब्रज किशोर साहक अभिभावकत्वमे कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल। एकटा सुन्दर स्वागत गीतसँ सुश्री शिल्पी कुमारी ओ आशा कुमारी स्वागत केलनि। नाटक मंचनसँ पूर्व काली माताक झाँकी प्रस्तुत कएल गेल जइमे काली केर प्रदर्शन केलीह सुश्री आरती कुमारी हाथक सहयोग केने रहनि सुश्री उजमा निहकत। ऐ अवसरपर गीत गाओल गेल छल- जय जय भैरवि....., जेकर गायक कलाकार रहथि कुष्ण कुमार यादव ओ कमल िकशोर ‘पंकज’। एकर अतिरिक्त जल स्वच्छता अभियानपर आधारित गीत ‘जल स्वच्छता बढ़बैत चलू....’ एवं जट-जटीन, ‘जब जब पढ़ए कहलियौ गे जटीन.....; फगुआ ‘सरस्वती पूजामे नव उमंग आनल वसन्त.....; रागिनी कुमारी, विभा कुमारी, ललिता कुमारी आ सुधीरा कुमारी द्वारा प्रस्तुत कएल गेल। बिसवासघात नाटकक प्रमुख पात्र- राम किशुन, बीरू, एस.पी, कलक्टर, उमाशंकर, गंगाराम, लक्ष्मी, ओम प्रकाश, बिलट, राजा आ हरिकिश्वर जेकर अभिनय केने छलाह क्रमश: दुर्गानंद ठाकुर, श्रवण कुमार महतो, सुनील कुमार महतो, नवीन कुमार मण्डल, अमित रंजन, सर्व नारायण महतो, नवीन कुमार, अभिनव कुमार सागर, मो. टॉसिफ, रमेश कुमार यादव, आ जीतेन्द्र कुमार पासवान। उल्कामुख नाटकक प्रमुख पात्र- गंगेश, वल्लभा, देवतत्त, आचार्य सिंह, भगता आ गंगाधर। अभिनय केने रहथि क्रमश: अंजली िप्रयदर्शिनी, प्रीति कुमारी, सुलेखा कुमारी, श्वेता कुमारी, पूजा कुमारी आ शिल्पी कुमारी। अंतमे हास्य कलाकार श्री दुर्गानंद ठाकुर द्वारा अद्भुत समाचारक प्रस्तुति कऽ रातिक 11 बजे कार्यक्रम शेष भेल। एहिना दोसर दिन माने 29/ 01/ 2012क कार्यक्रम शुभारम्भ भेल ‘विदेह सम्मान समारोह’सँ ऐ सत्रक उद्घाटन उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेत नारायण राय, डी.सी.एल.आर. कुमार मिथिलेश प्रसाद सिंह, साहित्यकार जगदीश प्रसाद मंडल, कवि जनक किशोर लाल दास, डॉ. उषा महासेठ एवं अवकाश प्राप्त शिक्षक हरिनारायण झा सम्मिलित रूपसँ दीप प्रज्वलित क’। नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प-वस्तुकला, काष्ठ-कला, किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति एवं चित्रकला क्षेत्रमे 2012क विदेह सम्मानसँ सम्मानित प्रतिभागी सबहक सूची ऐ तरहेँ अछि- अभिनय- सुश्री शिल्पी कुमारी, उमेर- 17 पिता श्री लक्ष्मण झा श्री शोभा कान्त महतो, उमेर- 15 पिता- श्री रामअवतार महतो, हास्य-अभिनय- सुश्री प्रियंका कुमारी, उमेर- 16, पिता- श्री वैद्यनाथ साह श्री दुर्गानंद ठाकुर, उमेर- 23, पिता- स्व. भरत ठाकुर नृत्य- सुश्री सुलेखा कुमारी, उमेर- 16, पिता- श्री हरेराम यादव श्री अमीत रंजन, उमेर- 18, पिता- नागेश्वर कामत चित्रकला- श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- 35, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना श्री रमेश कुमार भारती, उमेर- 23, पिता- श्री मोती मण्डल संगीत (हारमोनियम)- श्री परमानन्द ठाकुर, उमेर- 30, पिता- श्री नथुनी ठाकुर संगीत (ढोलक)- श्री बुलन राउत, उमेर- 45, पिता- स्व. चिल्टू राउत संगीत (रसनचौकी)- श्री बहादुर राम, उमेर- 55, पिता- स्व. सरजुग राम शिल्पी-वस्तुकला- श्री जगदीश मल्लिक, उमेर 50 गाम- चनौरागंज मूर्ति- कला- श्री यदुनंदन पंडित, उमेर- 45, पिता- अशर्फी पंडित काष्ठ-कला- श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, उमेर 55, गाम- छजना किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति- श्री लछमी दास, उमेर- 50, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम बेरमा उपरोक्त प्रतिभागी सभकेँ प्रस्तीपत्र, प्रतीक चिन्ह अा मालासँ सम्मानित कएल गेलनि। उपहार स्वरूप लगभग हजार-हजार रूपैयाक नव मैथिली पोथी सेहो प्रदान कएल गेल। ऐ तरहेँ विदेह द्वारा ई एकटा नव डेग, जेकरा मैथिली साहित्यमे पहिल डेग सेहो कहबामे कोनो हर्ज नै, उठाओल गेल। दोसर सत्र कवि सम्मेलन आ परिचर्चाक छल। ऐमे भाग लेलनि राम सेवक ठाकुर, दुर्गा नन्द मण्डल, नन्द विलास राय, कपिलेश्वर राउत, लक्ष्मी दास, रामविलास साहु, प्रो. उपेन्द्र नारायण अनुपम, जगदीश प्रसाद मंडल, जनक किशोल लाल दास, राम प्रवेश सिंह, शम्भू सौरभ, अजय कुमार दास, बलराम साहु, राम सेवक ठाकुर, अखिलेश कुमार मण्डल, शिवकुमार मिश्र आ मो. गुल हसन आदि कविमे अखिलेश कुमार मंडल आ लक्ष्मी दास छोड़ि सभ अपन-अपन स्वलिखित नूतन कविताक पाठ केलनि। ऐ तरहेँ दोसर सत्रक समापनक पछाति तेसर सत्र जे रंगमंच-सत्र ओ विदेह नाट्य उत्सवक अंतिम सत्र आयोजित भेल। अंतिम सत्रक विशिष्ट अतिथिगण रहथि- कामेश्वर कामति, नीलकांत दास, शिव कारक, मो. असनुद्दीन, नन्द किशोर गुप्ता, कपिलेश्वर राउत। रंगमंचीय अध्यक्षता ओ मंच संचालन केलनि दुर्गानंद मंडल। ....ग्रामीण जीवनकेँ बजारोन्मुख हएब...। सस्ता श्रम-शक्ति भेटलासँ पूँजीपति वर्ग द्वारा शोषण...। श्रमक लूटसँ ग्रामीण लोक जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबए लेल मजबूर...। रूपैयाक लालचमे नीच-सँ-नीच काज करबाक लेल लोक केना तैयार होइए इत्यादि विषय-वस्तुपर आधारित बिरांगना एकांकी’क प्रस्तुतिक पछाति विदेह नाट्य उत्सवक समापनक घोषणा कएल गेल। उपरोक्त समाचारक फोटो व विडियो निम्न लिंक सभपर उपल्ब्ध अछि। http://maithili-drama.blogspot.com/ http://esamaad.blogspot.com/ http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video मैथिलीमे ई-पत्रकारिता ई-पत्रकारिताक प्रारम्भ भेने लेखक ओ पाठक वर्गमे काफी वृद्धि देखल जाइत अछि। एकर अनेक कारणमे महत्वपूर्ण अछि भौगोलिक दूरीक अंत। जइसँ विश्वमे पसरल मैथिली भाषी, साहित्य प्रेमी सभ सोझा एलाह। ऐठाम अपन विचार व्यक्त करबाक पूर्ण स्वतंत्रा लेखको आ पाठकोकेँ भेटैत छन्हि। रचनापर त्वरित टिप्पणी-समीक्षा-समालोचनाक सुविधा सेहो इन्टरनेटपर अछि। इन्टरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक रूपमे विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" ५ जुलाइ २००४ सँ http://gajendrathakur.blogspot.com/ लिंकपर उपलब्ध अछि। ओना याहू जियोसिटीजपर २००० ईं.सँ ई साइट रहए, जे याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद आब उपलब्ध नै अछि। मैथिली ई-पत्रकारिताक आरम्भक श्रेय विदेहकेँ छै आ तँए एकर नाओं अछि ‘विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका’ वर्तमानमे ९९म अंक ई-प्रकाशित अछि। १५ फरवरी २०१२केँ १००म अंक ई-प्रकाशित होएत। गूगल एनेलेटिक्स डेटा केर मोताबिक ‘विदेह ई पत्रिका’केँ ५ जुलाइ २००४ई.सँ अखन धरि ११६ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि। विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर उपलब्ध अछि। लगभग २०० सँ बेशी मैथिली पोथी देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल तीनू लिपिमे जे पी.डी.एफ. फाइलमे फ्री डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि अनेक रचनाकारक अलाबे जगदीश प्रसाद मंडलक 2टा कथा संग्रह, 2टा एकांकी संग्रह, 3टा नाटक, 2टा कविता संग्रह, पाँचटा उपन्यासक सेहो उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त ११००० सँ बेशी, तिरहुतामे लिखल, ५०० बर्ख पुरान तालपत्र, विदेह द्वारा स्कैन कऽ ओकर देवनागरी लिप्यंतरणक संग ऐ साइटपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। सरकारी आ गएर सरकारी संस्था सभ द्वारा अखन धरि कएल समस्त प्रयाससँ ई लगभग १०० गुणा बेसी अछि। ऐ समस्त कार्यमे लगभग १०,००० घण्टाक श्रम लगाओल गेल अछि आ एतए तिरहुता, ब्रेल आ अन्तर्राष्टीय फोनेटिक अल्फाबेट (आइ्. पी. ए) सिखबाक सेहो बेबस्था कएल गेल छै आ तइ संबंधी पोथी जे श्री गजेन्द्र ठाकुर द्वारा िलखित अछि ओ फ्री डोनलोड लेल सेहो उपलब्ध अछि। विदेह मैथिली ऑडियोयुक्त वीडियो संकलन http://videha.co.in/archive.htm, एतए विविध विधाक ऑडियो जेना कथा, कविता, गजल, हाइकू, टनका, हैबून, हैगा इत्यादि, देल गेल अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि ५० घण्टाक ऑडियो संकलन जे मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत जे मैथिलीकेँ जाति आधारित भाषा हेबाक अवधारणापर मारक प्रहार सिद्ध कए रहल अछि। मैथिली वीडियोक संकलन http://videha.co.in/archive.htm, एतए नाटक, सेमीनार, वर्षकृत्य, रसनचौकी, सामा-चकेबा, कवि-सम्मेलन, विदेहक नाट्य आ साहित्य उत्सवक वीडियो, मिथिलाक खोज, गीत-ंसंगीत, मैथिली वीडियो, वोकल आर्काइव, सगर राति दीप जरए, साक्षात्कार, विद्यापति पर्व, मैथिली गजल आदिक वीडियो उपलब्ध अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि, मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीतक वीडियो, आ पहिल बेर विदेहक सौजन्यसँ सतमा कक्षाक दीक्षा भारतीक गाओल ‘गोविन्ददास’क गीत। ऐमे लगभग ५००० घण्टाक मेहनति विदेहक सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मिथिला चित्रकला/आधुनिक चित्रकला आ चित्र- http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ लिंकपर उपलब्ध अछि ‘मिथिला चित्रकला, आधुनिक चित्रकला, रंगमंच, चौबटिया-सड़क नाटक सहित कएक हजारसँ ऊपर फोटो अछि जइमे २०० सँ ऊपर िमथिलाक वनस्पति, १०० सँ ऊपर मिथिलाक जीव-जन्तु आ १०० सँ ऊपर मिथिलाक जनजीवनक किसानी आ कारीगरी संस्कृतिक फोटो सेहो अछि जइमे ५००० घण्टाक मेहनति विदेह सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ पर मैथिलीक सभ वेबसाइटक विवरण सहजताक लेल उपलब्ध अछि। विदेह द्वारा मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित कए http://madhubani-art.blogspot.com/ साइटपर राखल गेल अछि। एतए सत्तरिटा पोस्ट अछि जकरा माध्यमसँ मैथिलीक श्रेष्ठ साहित्य विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। ऐ अनुवादमे लगभग ७०० घण्टासँ बेसी समैक श्रम खर्च कएल गेल अछि। विदेह:सदेह- पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ ई मैथिली भाषाक मिथिलाक्षरमे सज्जित पहिल वेबसाइट अछि। विदेह:ब्रेल- मैथिली ब्रेलमे : पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ पर मैथिलीक पहिल साइट अछि जे क्रमश: मिथिलाक्षर आ ब्रेलमे अछि जेकारा स्पेशल स्क्रीन टच माॅनिटरसँ संबंधित आदमी पढ़ि सकै छथि तहिना स्पेशल प्रिंटरसँ प्रिंट सेहो निकालि सकै छथि। जइ दुनूमे लगभग हजार-हजार (१०००-१०००) घण्टाक मेहनति लागल अछि। नेना भुटका साइट मैथिलीमे बच्चा सबहक लेल एक मात्र साइट अछि जे संगीतज्ञ माँगनि खबासक नामपर- http://mangan-khabas.blogspot.com/ राखल गेल अछि। बाल साहित्य जेना बाल कथा, प्रेरक कथा, बाल कविता आदि समस्त बाल साहित्यकेँ आधुनिक-वैज्ञानिक दृष्टकोणसँ लिखल श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक १२५ गोट प्रेरक कथाक अलाबे विभिन्न लेखक केर साहित्य ऐपर सहजताक संग उपलब्ध अछि जेकरा विश्वमे पसरल नेना, बढ़ैत नेना आ किशोरक लेल फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्ध अछि। विदेह रेडियो: मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट- ऐठामसँ मैथिलीमे गीत-संगीत, कथा-कविता, गजल-हाइकू, टनका-हैबूनक संग अनेक परिचर्चा प्रसारित कएल जाइत अछि। साइटक नाओं अछि- http://videha123radio.wordpress.com/ विदेहक फेसबुक चौबटिया- http://www.facebook.com/groups/videha/ ऐ चौबटियापर ७७००सँ बेसी मैथिली भाषी सदस्य द्वारा गत एक सालमे १०,००० पोस्ट आ ११०० सँ बेसी फोटो पोस्ट कएल गेल अछि। प्रतिदिन १५० टासँ ऊपर कॉमेट पोस्ट सभपर अबैए जइमे मिथिला-मैथिली विकासपर स्वस्थ्य परिचर्चा होइए। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव- मैथिली रंगमंचकेँ वैश्विक स्तर प्रदान केलक अछि जे श्री बेचन ठाकुरजी द्वारा http://maithili-drama.blogspot.com/ पर उपलब्ध अछि। एतए मैथिली आ अंग्रेजीमे मैथिली रंगमंचक चित्र-आ वीडियोक माध्यमसँ विस्तारसँ वर्णन १७५ पोस्टमे देलगेल अछि, ई मैथिलीक अखन धरिक “स्लैपस्टिक ह्यूमर” बला रंगमंचक विरुद्ध विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक प्रारम्भ केलक अछि। लगभग २००० घण्टाक मेहनति ऐ वेबसाइटपर अखन धरि भऽ चुकल अछि। एतए मिथिलाक गम-गाममे होइत मैथिली रंगमंचक अतिरिक्त, कोलकाता, जनकपुर, राजबिराज, पटना, दिल्ली आदिक रंगमंचक विवरण सेहो उपलब्ध अछि। समदिया- http://esamaad.blogspot.com/ पर पूनम मण्डल आ प्रियंका झा द्वारा २००४ ई.मे शुरू भेल, साहित्यिक पत्रकारिताक लीकसँ हटि कऽ न्यूज पोर्टलक वा ई-पेपरक रूपमे मैथिली पत्रकारिताकेँ एतएसँ प्रारम्भ भेल। अखन धरि ५२५ सँ बेसी पोस्ट ऐठाम भेल अछि। सर्वश्रेष्ठ न्यूजकेँ मासक समदिया पुरस्कार देल जाइत अछि। अगस्त २०१२मे सर्वश्रेष्ठ मैथिली पत्रकारकेँ ‘विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान’सँ सम्मानित करबाक घोषणा अछि जे आब साले-साल सेहो देल जाएत। ऐ वेबसाइटपर अखन धरि ५५०० घण्टाक मेहनति पूनम मण्डल आ प्रियंका झा टाइपसँ लऽ कऽ समाचार अपलोड करबाक कार्यमे कऽ चुकल छथि आ ई साइट श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरक सीरियल चोरिक भण्डाफोड़क अतिरिक्त ढेर रास उद्घाटन कऽ साहसिक सोद्देश्य मैथिली पत्रकारिताक परिचए दऽ चुकल अछि। मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री बेचन ठाकुर, श्री विनीत उत्पल, श्री सुनील कुमार झा आ श्री आशीष अनचिन्हार द्वारा संचालित साइट अछि, ऐपर मैथिली, अंगिका, वज्जिका आ सुरजापुरीक पूर्ण विवरण उपलब्ध अछि। एतए अखन पचाससँ ऊपर पोस्ट उपलब्ध अछि। अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ एेपर ४८१टा गजल, २२टा कता, बन्द, नात, १२४टा रुबाइ, ७०टा करीब आलेखक अलाबे शेरो-शाइरीसँ संबंधित विडियो सेहो उपलब्ध अछि। मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ ऐ वेबसाइट मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली हाइकू (प्राकृत दृश्यपर ५/७/५) टनका (प्राकृत दृश्यपर ५/७/५/७/७) हैबून (प्राकृत दृश्यपर गद्यक एक-दू या तीन अनुच्छेदक अंतमे ओतबे हाइकू या टनका) हैगा (तत् संबंधी चित्र), शेनर्यू आदिक थ्योरी आ प्रैक्टिस सभ एतए भेट जाएत। मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/- ऐ वेबसाइटपर मैथिलीक अन्तर्जालपर मानकीकृत स्वरूप नेपाल आ भारतक मैथिली भाषाशास्त्री लोकनिक मतक अनुसार। मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.com/ पर, मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.com/ पर, मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.com/ पर आ मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.com/ पर उपलब्ध अछि। विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन। किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.com/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२-०४-०८ निष्कर्षत: ऐ ई-पत्रकारितामे साहित्यिक आ राजनैतिक दुनू पत्रकारिता शामिल अछि जतए, दृश्य आ श्रव्य माध्यमक प्रचुर प्रयोग कएल गेल अछि। निष्कर्षत: ऐ ई-पत्रकारितामे साहित्यिक आ राजनैतिक दुनू पत्रकारिता शामिल अछि जतए, दृश्य आ श्रव्य माध्यमक प्रचुर प्रयोग कएल गेल अछि। उमेश मण्डलजी द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्डलसँ साक्षात्कार समानान्तर साहित्य अकादेमी २०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह लेल) केँ विदेह साहित्य उत्सव २०१२ मे १४ जनवरी २०१२ केँ देल गेलन्हि। ओइ अवसरपर श्री उमेश मण्डलजी द्वारा हुनकासँ साक्षात्कार लेल गेल जे नीचाँ देल जा रहल अछि। • विदेह- विदेह सम्मान लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाई... ज.प्र.मं.- हेराएल-भोतियाएल रचनाकारक खोजि-खबरि लेबा लेल विदेह परिवारकेँ धन्यवाद। विदेह- अपनेक नजरिमे साहित्यक उद्देश्य की अछि? ज.प्र.मं.- अधिकांश विद्वानक विचारे साहित्य समाजक दर्पण थिक। जइ दर्पणसँ देखैत छी ओ तँ खाली (िसर्फ) कोनो वस्तुक उपरी भाग देखबैत अछि। मुदा शरीरक भीतर जे मन, बुइध, विवेक, आत्मा अछि ओ तँ नै देखबैत अछि। मनुष्य िनर्मित साहित्य होइत अछि तँए दुनूकेँ मिला देखबैत अछि। साहित्य जीवन दर्शन छी जे अतीत-सँ-भविष्य धरिकेँ जोड़ैत अछि। तँए साहित्यक उद्देश्य महान अछि जे मनुष्य-मनुष्यक बीच, व्यक्ति-समाजक बीच प्रेमसँ जीवैक दिशा-िनर्देश करैत अछि। वएह दिशा-िनर्देश साहित्यक उद्देश्य छी। विदेह- अहाँक साहित्यमे इतिहास/संस्कृति (खास कऽ मिथिलाक) कोना वर्णित होइत अछि? ज.प्र.मं.- अपन मिथिलांचल सभ दिनसँ कृषि प्रधान रहल अछि। ओना इतिहासक पन्नामे कृषि युगसँ पहिनहुँ शिकारी युग आ जंगली अवस्थाक चर्च अछि। से िसर्फ इतिहासेमे नै सचमुच जिनगियो रहल अछि। राजा रहितो जनक हर जोतलनि, जे कृषिक महत्वकेँ दरसबैत अछि। शुरूहेसँ मिथिलांचलमे बाहरी संस्कृतिक आक्रमण होइत रहल अछि। जइसँ अइठामक अपन संस्कृति टूटैत-झुकैत रहल अछि। रूप-विद्रप होइत रहल छैक। मुदा तैयो रिआइतो-खिआइतो जीवित रहल अछि। हम ओइ किसानी संस्कृतिकेँ अपन संस्कृति मानि चलैत छी। जे कल्याणकारीक संग-संग प्रेम, भाइ-चाराकेँ मजबूत बनबैमे सेहो सहायक अछि। विदेह- दिनानुदिनक अनुभवक अहाँक साहित्यमे कोन तरहेँ विवेचन होइत अछि? ज.प्र.मं.- दुनियाँक प्रत्येक व्यक्ति अपन बीतैत जिनगीक संग-संग परिवारो, समाजो आ देशो-दुनियाँक अनुभव करैत आबि रहल अछि। जहिना दुनियाँ गतिशील अछि तहिना जिनगियो अछि। मुदा सबहक समान आयु नै रहने किछु देखियो पड़ैत अछि आ किछु नहियो। दुनियाँकेँ देखैक आ अनुभव करैक सेहो िभन्न-भिन्न नजरि अछि। जेहन देखिनिहार तेहन दृश्य देखैत अछि। समाजक सभ अपन दिनानुदिनक क्रिया-कलापसँ जिनगीक सच्चाइ धरि पहुँचए चाहैत अछि, जइसँ सुख-समृद्धिक तृप्ति भऽ सकै। आइ सच्चाइकेँ जते इमानदारीसँ चित्र उताड़ि सकलाह ओ सृजनकर्ता ओते कालजयी होइत छथि। यएह प्रयास सभ करै छथि, हमहूँ कऽ रहल छी। विदेह- साहित्यक शक्तिक विषएमे अपनेक की कहब अछि? ज.प्र.मं.- कहलो जाइ छै संगठने शक्ति छी। जहिना व्यक्तिक संगठन परिवार होइत, तहिना परिवारक संगठन समाज छी। समाजेक दर्पण सािहत्य छी। जे जेहन समाज ओकर ओहन शक्तिशाली साहित्य। विदेह- अहाँक साहित्यमे पाप-पुण्यक विश्लेषन कोना होइत अछि? ज.प्र.मं.- पाप-पुण्य धर्मसँ जुड़ल अछि। मुदा आइ धरिक जे सामाजिक इतिहास रहल अछि ओ विकृत होइत-होइत एते विकृत भऽ गेल जे एकर स्वरूप चौपट्ट भऽ गेल। मूलत: जेना व्यासजी कहने छथि जे परोपकार धर्म आ परपीड़ा पाप छी। एकरा िसर्फ वैचारिक नै जिनगी मानि चलै छी। विदेह- कल्पना आ यथार्थक समन्वय अहाँ अपन साहित्यमे कोना करैत छी? ज.प्र.मं.- ओना साहित्यमे अनेको धारा चलि रहल अछि मुदा मूलत: एकरा तीन धारामे राखि आगू बढ़ै छी। पहिल यथार्थ, दोसर कल्पना आ तेसर दुनूक बीच समन्वयवादी। वैदिक युगक विचारधारा सामंती युगमे आबि तहस-नहस भऽ गेल। साहित्य समाजसँ कटि राज-दरवारक बीच चकभौर लगबए लगल। जइसँ साहित्य जन-गणसँ हटि भोग-विलासक वस्तु मात्र रहि गेल। पहिनहुँ रहल आ अखनो अछि जे साहित्य दुनूक (जन-गण आ राज दरवार) बीचक धारा बनि समन्वयवादी विचारधारामे बहए। एे धरतीपर सभकेँ जीबाक अधिकार छै, तइसँ दूर साहित्य हटि गेल अछि। अपन सदति प्रयास रहल अछि जे शोषित-पीड़ित, बंचितकेँ बाँहि पकड़ि ठाढ़ करी। विदेह- अहाँक साहित्यमे पात्र जीवन्त भऽ उठैत अछि, तेकर की रहस्य? ज.प्र.मं.- कोनो समस्या अाकि घटनाक प्रति ई सदति कोशिश रहैत अछि जे िनष्पक्ष भऽ देखबो करी आ िनराकरणो करी। भऽ सकैत अछि जे ऐसँ पात्रमे जीवन्तता आबि गेल होय। विदेह- साहित्य लेखन, विशेष कऽ मैथिली साहित्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ विशिष्ट आ एकर प्राथमिकताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? ज.प्र.मं.- साहित्य समाजक ओहन दर्पण छी जइमे भूत वर्तमान आ भविष्यक दर्शन होइत अछि। दुर्भाग्य रहल जे मैथिली साहित्य समटा कऽ एकभग्गू भऽ गेल अछि। किछु समाजक चर्च आवश्यकतासँ अधिक भेल अछि। जइसँ साहित्य हास-परिहासक बीच ओझरा गेल अछि। जखन कि समाजक अधिकांश हिस्सा कटि कात भऽ गेल अछि। अपन रचनामे सदति कोशिश रहैत अछि जे ओइ छुटल समाजकेँ पकड़ि सृजन करी। विदेह- की अहाँ कोनो तथ्यक झपेलहा भाग उभाड़ैत अगर हँ तँ कोना आ नै तँ किअए? ज.प्र.मं.- जहाँ धरि झपाएल तथ्यक प्रश्न अछि। झपाएल कते रंगक होइत अछि। जना शब्द-सँ-विचार झापब कोनो वस्त्र वा आनसँ झापब, खाधि खुनि माटिसँ झापब इत्यादि। मिथिलांचलक समाज (तथ्य) ओहन झपाएल अछि जेकरा दिस कियो देखिनिहारे नै भेलाह। कोनो चीज देखैसँ पहिने मनमे उठैत अछि। मन आँखिक माध्यमसँ देखैत अछि। मुदा ऐठाम तँ मने हरा गेल अछि! ओहन तथ्य दिस जखन देखैत छी तँ वएह झपेलहा बूझि पड़ैत अछि। विदेह- अहाँ कहियासँ लेखन प्रारम्भ केलौं, ककरा लेल लिखलौं, आइ-काल्हि केकरा लेल लिख रहल छी? ज.प्र.मं.- मोटा-मोटी दू हजार ईंसवी चढ़लाक बादे लिखब शुरू केलौं। ओना हिन्दी साहित्यक विद्यार्थी छी तँ हमरा लेल हिन्दीमे लिखब नीक होइत। मुदा मैथिलीक संबंध परिवार-सँ-समाज धरि तहियो छल अखनो अछि। संगहि एकटा बात आरो अछि जे जे विचार मैथिलीमे गहराइसँ वयक्त कऽ सकै छी ओ हिन्दीमे नै भऽ पबैत अछि। जहाँ धरि ककराक प्रश्न अछि? ओ स्पष्ट रूपे कहि रहल छी जे समाजक ओ दबल-कुचलल वंचित हमर मुख्य आधार अछि, जेकरा लेल लिखबो केलौं आ आगूओ जे किछु लिखब ओकरे लेल लिखब। विदेह- की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि जे मुख्य धारासँ अहाँ कतियाएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृतिक की कारण? ज.प्र.मं.- मुख्य धारासँ कतिआएलक प्रश्न उठौने छी, तँ स्पष्ट रूपे कहि दिअए चाहैत छी जे जहिना कोनो धारमे बरखाक पानि आबि-आबि धारामे मिलैत जाइत अछि, जइसँ धारोमे उफान अबैत अछि आ धरो तेज होइत अछि। मुदा हम अपनाकेँ ओहिसँ अलग बुझैत छी। कम शक्ति रहने धारा भलहिं कमजोर हुअए मुदा दृढ़ विश्वास अछि जे दू-तीन-चारि बढ़ैत-बढ़ैत मुख्य धारा बनि जाएत। तँए अपनाकेँ कतिआएल नै नव धाराक गति देनिहार बुझैत छी। ई विचारधाराक प्रश्न अछि कतिऐबाक नै। विदेह- अपन साहित्य आ रचनामे की स्वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्यक छै? ज.प्र.मं.- जहाँ धरि रचनामे इमानदारीक प्रश्न अछि। ओ िसर्फ रचने नै जिनगीक सभ क्षेत्रमे एकर महत्व छैक आ रहतैक। न्यायमूर्ति सदृश्य रचनाकारकेँ हेबाक चाहियनि। ओना प्रश्न भयंकर अछि। मुँहसँ सभ अपनाकेँ इमानदारे कहैत छथि मुदा कर्मक्षेत्र आ वौद्धिक क्षेत्रमे कते इमानदार छथि, से बेबहारेमे स्पष्ट झलकैत छन्हि। तँए बेसी कहब उचित नै। विदेह- मैथिली साहित्य आइक दिनमे की ई सभ (साहित्यकार)क सामुहिक दोष स्वीकृतिक रूप नै बुझना जाइत अछि? ज.प्र.मं.- अपना ऐठाम (मिथिलांचलमे) नैतिकता िसर्फ भाषण रहि गेल अछि। बेबहारिक रूपमे कतौ किछु ने छैक। तेकर कारण अछि जे नैतिकताक मन गढ़न्त व्याख्या, आइये नै बहुत पहिनेसँ होइत आबि रहल अछि। तँए सामुहिक दोष की कहल जाए। जाधरि मनुष्य अपन िनर्माण अपने नै करताह ताधरि सुगा रटन्तसँ की हएत। ओना दोषोमे एकरूपता नै अछि। रंग-विरंगक दोष पसरल अछि। एके गोटे एकठाम इमानदार छथि दोसरठाम बइमान। एे प्रश्नक समाधान साधारण नै अछि। ओना जँ खुल्लम-खुल्ला वाद-विवाद हुअए तँ किछु हद तक कमि सकैत अछि। विदेह- की अहाँकेँ लगैत अछि जे अहाँक पोथीकेँ हिन्दी, बंग्ला, नेपाली, अंग्रजी आदि भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्थितिमे ओतए एकर कोन रूपेँ स्वागत हेतैक? की अहाँक साहित्य ओइ भाषा आ संस्कृति सभ लेल ओतबे महत्वपूर्ण रहतै जते ओ मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्कृति निर्पेक्ष किअए नै भऽ सकल? ज.प्र.मं.- आन भाषाक अनुवादक प्रश्न अछि। कोनो भाषाक साहित्य सीमित जगहक लेल नै विश्वक लेल होइत अछि। जहाँ धरि भाषाक प्रश्न अछि ओ क्षेत्रीय होइत अछि। दुनियाँमे सत्ताइस सएसँ बेसी बोली भाषा मिला कऽ अछि। कोनो क्षेत्र वा कोनो भाषाक साहित्यकार खास क्षेत्रमे जन्म लैत छथि। ओइठामक माटि-पानिक सुगंध जइ रूपे ओ अनुभव करैत छथि तइ रूपे दूर दराजक नै बूझि पाबि सकैत छथि। तँए एक भाषा-सँ-दोसर भाषामे अनुवाद होइत अछि। कोनो साहित्य तखने समृद्ध होइत अछि जखन अपन क्षेत्रसँ आगू बढ़ि दुनियाँक साहित्यकेँ अपनामे समाहित करैत अछि। एक भाषाक साहित्यक अनुवाद दोसरमे मात्र अनुवादे नै ओइठामक सामाजिक, आर्थिक, वौद्धिक विश्लेषण सेहो प्रदान करैत अछि। तँए कोनो भाषाक साहित्य िसर्फ ओइ क्षेत्रक नै दुनियाँक सम्पत्ति बनैत अछि। विदेह- अहाँक भाषा तँ मैथिली अछि मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्कृति, विचारधाराक प्रभाव पड़ल अछि कतौ-कतौ ई स्पष्ट अछि मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? ज.प्र.मं.- आेहुना देखै छिऐ जे बच्चेसँ मिथिलांचलोमे स्कूल-कओलेजमे जे पढ़ाइ होइत छैक ओइमे हिन्दी-अंग्रेजी भाषा सेहो छैक। हिन्दी तँ अपन राष्ट्रे-भाषा छी, तँए स्वाभाविक अछि। मुदा अंग्रेजी की छी। जखन अंग्रेजी साहित्य पढ़ै दी तखन अंग्रेजिये साहित्यकारक ने कथा, उपन्यास कविता नाटक सेहो पढ़ै छी। जइसँ बच्चेसँ मन-मस्तिष्कमे अंग्रेजी भाषा, संस्कृति घर बनबए लगैत अछि। आगू चलि जखन किछु लिखए चाहैत छी तँ सिनेमाक रील जकाँ ओ मस्तिष्कमे नाचए लगैत अछि। साहित्य सृजनक अवस्था किछु भिन्न अछि। जइ समए सृजनकर्ताक मस्तिष्क ओइ भावभूमिमे विचरण करए लगैत अछि तइठाम भाषा गौण पड़ि जाइत अछि। लाखो परहेज केलोपरान्त उमड़ि-घुमड़ि कोनो ने कोनो दोग-सान्हि होइत सन्हिआइये जाइत अछि। जहाँ धरि विचारधाराक प्रश्न अछि। उन्नैसमी शताब्दीमे मार्क्सवादी विचारधारा दुनियाँक कोन-कोनमे पसरि गेल। कतौ-कतौ शासनो-सत्ता बदलल। मुदा अपन जे भारतीय चिन्तनधारा रहल अछि ओहो मानव चिन्तनधारा छी। मार्क्सवादी चिन्तनधारा आ भारतीय चिन्तनधाराक पद्धतिमे किछु-किछु भिन्नता रहितो लक्ष्यमे नजदीकी संबंध अछि। दुनू मानव-कल्याणक दिशा-िनर्देश करैत अछि। जइसँ एक-दोसरमे ताल-मेल स्वाभाविक अछि। विदेह- अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि? ज.प्र.मं.- प्रचार कम हुअए आकि बेसी, मूल प्रश्न अछि जे हमर रचनासँ कते गोटेकेँ जीवन-दिशा भेटलनि। जे कियो अपना जिनगीमे उताड़ि लाभ उठबै छथि वएह उपलब्धि भेल। जते अधिकमे हेतनि तते अपना सृजनकेँ सार्थक बूझि संतुष्ट जरूर हएब। विदेह- अहाँक कोन रचना (कोनो खास कथा) हम पहिने पढ़ी माने अहाँक अपन कोन रचना सभसँ बेसी प्रिय अछि? ज.प्र.मं.- ऐ प्रश्नक जबाब दू ढंगसँ दऽ रहल छी- पहिल जेना-जेना रचना कएल अछि ओ अहाँक सोझा अछि। हम कहब जे ओहीक्रमे ओकरा देखियौ। दोसर- ओहन गार्जियन जकाँ रचनाकार छी जेकर एकटा बेटा आइ.ए.एस. होय आ दोसर नाङर-लुल्ह, ओ जहिना दुनूकेँ समान नजरिसँ देखैत छथि तहिना हमहूँ अपना रचनाकेँ देखैत छी तँए कोन नीक आ कोन अधला से कहब कठीन अछि। उमेश मण्डलक साक्षात्कार विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ सँ सम्मानित ले.क. मायानाथ झासँ उमेश मण्डल- सभसँ पहिने विदेह बाल साहित्य सम्मान २०११ लेल अपनेकेँ बहुत-बहुत बधाइ...। अहाँक नजरिमे साहित्यक उद्देश्य की अछि? मायानाथ झा- साहित्य समाजक दर्पण थीक। सामाजिक गतिविधि, एवम् क्रिया-कलाप साहित्येसँ प्रतिविम्बित होइत अछि। मनुष्य तँ नश्वर होइत अदि, किन्तु ओकरहिंसँ िनर्मित साहित्य अक्षुण्ण होइत अछि। कोनो देश एवम् कालखण्ड साहित्यक बलेँ चिरकाल धरि जीबैत अछि। से िनर्भर करैत अछि जे भावी पीढ़ी कोन रूपेँ ओकरा सहेज-समटि कऽ रखने रहैत अछि। उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे इतिहास/संस्कृति (खास कऽ मिथिलाक) केना वर्णित होइत अछि? मायानाथ झा- हमर साहित्यक मुख्य विधा अछि- कथा। कथा एवं कविताक माध्यमसँ हम पुरान एवं प्रचलित बात, वा घटना सबहक वर्णन केलौं अछि जइमे इतिहास-संस्कृतिक पुट अछि। कथोकेँ खिस्सा-पिहानी जकाँ वर्णित केलौं अछि। चारित्रिक एवं सांस्कृतिक झलक ओइमे मूलत: छैके। उमेश मण्डल- दिनानुदिनक अनुभवक अहाँक साहित्यमे कोन तरहेँ विवेचन होइत अछि? मायानाथ झा- आक्रोश एवं आन्तरिक वेदनाक रूपमे। आधुनिक बदलैत परिवेशमे जखन अपन उत्तम आचार-विचार, उत्कृष्ट परम्परा एवं समृद्ध संहिताकेँ विलाइत देखैत छी तँ घोर दु:ख होइत अछि आ तखन सहए ने वाणी वा लेखनीसँ निकलतैक, जेना- “नहि कनिञों संकोच छै, माय बापक बोझ नहि उठेवामे। लाज तऽ छैक नहि, धाखोसँ कटि जयबामे। उतकिरना बुझाइत छैक, प्रदूषण फैलाबएमे। हेठी बुझाइत छैक, मातृभाषा बजबामे। की अटपट गप्प अछि, केहन भारी विडम्बना अछि!” उमेश मण्डल- साहित्यक शक्तिक विषएमे अपनेक की कहब अछि? मायानाथ झा- साहित्यक शक्तिक प्रसंग पुछलौं तँ हमरा मोन पड़ि आएल अछि रामधारी सिंह दिनकरक कविता- “दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार? तन में अजय शक्ति, या मन में जागे उच्च विचार।” साहित्यक शक्ति अजेय, अपरिमेय होइत अछि। अपन समाज कि देश साहित्ये शक्तिक बदौलति विश्वमे एतेक चर्चित-अर्चित अछि। तहूमे हमरा लोकनि विशेष रूपेँ। मिथिलावासी आन्दोलनकारी नहिऍंटा होइत अछि। आइ धरि साहित्यक शक्तिक बलेँ अपनाकेँ अधिकृत वा प्रतिष्ठित रखैत एलाह अछि। x` उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे पाप-पुण्यक विश्लेषण केना होइत अछि? मायानाथ झा- “परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्” रूपमे। सत्कर्म धर्म थीक आ दुष्कर्म पाप। साहित्य सेवनसँ जँ चरित्रक िनर्माण भेल तँ पुण्य कमेलौं नै तखन पापोन्गामी हएब सुनिश्चित। दु:खक गप्प जे वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे चारित्रिक गठनपर कम जोर देल जाइत अछि। धनोपार्जन संबंधित शिक्षा तइपर बेशी हाबी भेल जा रहल अछि। उमेश मण्डल- कल्पना आ यथार्थक समन्वय अहाँ अपन साहित्यमे केना करैत छी? मायानाथ झा- कल्पनाक हवा-महलपर हमरा उड़ए नै अबैत अछि। तँए हमर रचनामे कल्पनाक आधार भीत्ति-प्रायेः कतौ दृष्टगोचर होएत। परम्परागत विम्बकेँ अभिनव विम्बक संग हम समन्वय करैत छी जे हमर भोगल एवम् अनुभवक आधारशिलापर ठाढ़ रहैत अछि। विविध भावक संग जुड़ल विविध विषय आत्मीयताक डोरी पकड़ि निस्सरित होइत अछि। उमेश मण्डल- अहाँक साहित्यमे पात्र जीवन्त भऽ उठैत अछि, तेकर की रहस्य? मायानाथ झा- पात्र यथार्थताक संग जुड़ल रहैत छथि, लाग-लपेट वा आडम्बरक तामझामक बीच ओझराएल नै रहैत छथि आ तँए बुझाइत अछि जे शब्द विन्यास, वाक्-पटुताक आलम्बन नहियो रहैत ओ मुखर भऽ उठैत होथि। पाठकक दृष्टकोण एवम् अभिरूचि सेहो ऐ प्रसंग अपन महत रखैत अछि। उमेश मण्डल- साहित्य लेखन, विशेष कऽ मैथिली साहित्य लेखन अहाँ लेल कोन तरहेँ विशिष्ट अछि आ एकर प्राथमिकताकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छी? मायानाथ झा- हिन्दी कविताक दू पाँति मोन पड़ैत अछि- “जिनको न निज देश का, निज भाषा का अभिमान है। वह नर नहीं वह पशु िनरा और मृतक समान है।” अपन भाषाक प्रति हमरा अगाध सिनेह अछि। सेनामे प्रवासक संग ई प्रेम आओर प्रगाढ़ भऽ गेल बंगला एवं दक्षिणक निवासीकेँ देखि कऽ। भाषाक प्रति ओ लोकनि खूब कट्टरवादी होइत छथि। दोसर, किछु अपवाद छोड़ि हम इएह देखैत अएलौं अछि जे लोक जतेक अपन भाषामे मुखरित होइत अछि ततेक आन भाषामे नै। हमर शिक्षा गामहि-घरमे भेल अछि तँं हिन्दी-अंग्रेजी नीक जकाँ लिखबाक-पढ़बाक लूरि रहितो हम अपन भाषामे बेशी सहज रहैत छी। अवकाश प्राप्तिक बाद हम अपन डोरि सेहो आबि गेलौं, तँ हम मैथिली साहित्यकेँ प्राथमिकतासँ लेल अछि। अपन तँ अपनहि ने होइत छैक, जँ अनकर वस्तु बड्ड प्रिय आ अपन बड्ड अधलाहक मनोवृत्तिक संक्रमणसँ ग्रसित नै होइ। उमेश मण्डल- की अहाँ कोनो तथ्यक झँपलाहा भाग उघारैत छिऐक? अगर हँ तँ केना आ नै तँ किएक? मायानाथ झा- तथ्यक झँपलाहा भाग की भेल? कोनो पात्रक वा कोनो रीतिक अशोभनीय अंश ओकर विद्रुपता, कुरूपता, अश्लीलता। जखन अहाँ विवेचना करबैक तँ नींक-अधलाह दुनू देखबहि पड़त। विद्रूपताक विश्लेषणात्मक वर्णन तँ बड्ड नीक मुदा ओकर बखिया उघाड़ब वा चीरहरण करब हमरा अवांछनीय लगैत अछि। सुधी पाठकक लेल इंगित कऽ देब मात्र वेश भऽ जाइत छैक। सकारात्मक पक्षकेँ विशेष रूपेँ दर्शाएब प्राय: सभ रचनाकारक उद्देश्य रहिते छन्हि कारण नीक साहित्य आखिर कोन भेल वएह ने जे नीक तथ्यकेँ अमूल्य नीधि साबित कऽ सकए। तथ्यक उत्तमता, उत्कृष्टता पाठककेँ बिनु झकझोरिने नै छोड़ए। उमेश मण्डल- अहाँ कहिया-सँ-कहिया धरि प्रवास केलौं? प्रवासमे एतेक दिन बितेलाक बादो अहाँक रचनामे मिथिला आ ओकर संस्कृति मुख्य रूपसँ भेटैत अछि, की ई नोसटेलजिया छी? की प्रवास रहि ओतुक्का अनुभवक लेखनक अहाँ प्रथमिकता अहाँ नै बुझै छिऐक? मायानाथ झा- भारतीय थल सेनाक डाक शाखामे हम अपन जीवनक छत्तीस वर्ष आठ मास सत्रह दिन (13. 09. 1969 सँ 31. 05. 2006) बिताओल। इहए हमर प्रवास काल-खण्ड थीक। लगभग चारि दशकक बेदाग दीर्घ सेवापर हमरा गर्व अछि। सैन्य विषयपर हम किछु विशेष नै लिखलौं अछि से सही, किन्तु तकरा हम अपन नैटटेलजिया नै मानैत छी। हमर पोथी सभमे लिखल भूमिका सैन्य जीवनक अनुभव आ परिपाटीक आधारेपर वर्णित अछि। एकटा कवितामे छोटछीन बातक जिक्र सेहो अछि, नवीन रचना ‘हास्य ऊर्जा’ मे अनेक चुटकुलाक समावेश अछि। मोनमे जे एकटा विशेष रचना (आत्म कथाक रूपमे) अकार नेने अछि तकरा साकार नै कए सकलौं अछि। जाधरि भगवतीक कृपा नै हएत ताधरि नै भए सकत कारण हमर विश्वास ओहीपर आधारित अछि। जे भवतव्य हो सएह। उमेश मण्डल- अहाँ कहियासँ लेखन प्रारम्भ केलौं, केकरा लेल लिखलौं, आइ-काल्हि केकरा लेल लिख रहल छी? मायानाथ झा- हम बाल्यावस्थेसँ लेखन प्रारम्भ केलौं। स्वजन गुरुजनकेँ किछु फकरा-पिहानी जकाँ बना कऽ सुना दैत छलियनि। मोन अछि बहिनक सासुरमे बकरी मीयाँ दर्जीपर किछु कड़ी जोड़ि कऽ सुना देने रहिऐ 1956-57क बीच। चवन्नी पारितोषिक भेटल रहय। तकर बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम सभमे हम अपन भाषा सेनामे हिन्दी वा भोजपुरीमे पौरोडी बराबरि बनबैत रहलौं अछि। पैरोडी गीत आकर्षणक विशेष माध्यम बनि जाइत छल। बराबरि सराहना भेटैत रहल। सेनाक अपन शाखाक पत्रिका (मेल-मिलाप) मे हमर कविता आ आलेख बराबरि छपैत रहल। पहिल बेर प्राय: 1977-78 मे। कर्णामृत मैथिली पत्रिकामे हमर क्रमश: दू गोट कविता छपल अछि, 2004 क सन्धि कालमे। हमरा जनैत कियो लिखैत अछि पहिने अपना लेल। अपन लेखन हमरा भरपूर स्वान्त: सुख दैत अछि। तखन तँ लेखक अपन विचार, भाव, मनोव्यथा, मोनक खुशी सभटाकेँ लेखनीक माध्यमसँ दोसरा तक पहुँचाबए चाहिते अछि। भनसीयाक कएल भानसकेँ आन जखन खाइत छैक तखने ने ओकरा नीक भेलैक कि बेजाए से कहैत छैक। सएह बात लेखकोक प्रति होइत छनहि। पाठके ने हुनक कृतिक अवलोकन कए गुण-दोषक विवेचना करैत छथि। ओना हम विशेषतया लिखैत छी, बच्चा, किशोर, एवं युवा वर्गकेँ धियानमे रखैत। हुनका लोकनिमे आजुक िशक्षासँ सशक्त चारित्रिक गठन होइत नै देखाइत अछि जे अत्यन्त दयनीय एवं चिन्तनीय बात बुझाइत अछि। अर्थोपार्जनजनित शिक्षा नैतिकताक आधारशिला कथमपि नै गढ़ि सकैत अछि | दोसर समस्या अछि नवका पीढ़ीक अपन भाषासँ विमुख होएब। ओहू पाछू ओएह अर्थ-पिशाच आबि गेल छैक। विद्वान भएक पूजित हएब आजुक पीढ़ीक सेहन्ता नै प्रत्युत-अरबपति बनि नाम कमाएब नियति छैक। उमेश मण्डल- की अहाँकेँ ई लगैत रहल अछि जे मुख्य धारासँ अहाँ कतियाएल गेल छी? अहाँक रचनामे समाजकेँ बाहरसँ देखबाक प्रवृतिक की कारण? मायानाथ झा- प्रश्न पूर्णतया बोधगम्य नै प्रतीत होइत अछि। हमर कोन रचना मुख्य धारासँ कतिआएल लागि रहल अछि? मुख्य धारासँ अपनेक की तात्पर्य अछि? हमरा नै बूझि पड़ैत अछि जे हमर कोनो रचना ई लक्षित करैत अछि जे हमर प्रवृत्ति समाजकेँ बाहरसँ देखबाक अछि। व्यक्तिक समष्टि समाज होइत छैक। समाजसँ बाहर व्यक्तिक अस्तित्व तँ अर्थहीन भऽ जाइत अछि। हँ, बुद्धिजीवी समाजक आलोचक,विवेचक एवं चिन्तक तँ होइते अछि। हम तँ अपनाकेँ अपन रचनाक माध्यमसँ कोनो रूपमे तइ सीमाक पार जाइत नै बूझि रहल छी। िवदेह- अपन साहित्य आ रचनामे की स्वयंकेँ पूर्णरूपसँ इमानदार राखब आवश्यक छै? मायानाथ झा- रचनामे कोनो लेखकक ई अभिलाषा रहैत छैक जे ओ तथ्यके चरम बिन्दु तक लऽ जा सकए आ ई िनर्भर करैत छैक ओकर लेखनीक शक्ति आ चातुर्यपर। लेखकक ईमानदारीक निर्णायक होइत छथि पाठक। पाठक होइत छथि विभिन्न रूचि एवं विचारक। तँए एक्के रचनाक प्रति विभिन्न पाठकक प्रतिक्रिया विभिन्न होइत अछि। रचनाकार अपन हिसाबेँ अपने जगहपर रहि जाइत अछि। उमेश मण्डल- मैथिली साहित्य आइक दिनमे की ई सभ (साहित्यकार)क सामुहिक दोष स्वीकृतिक रूप नै बुझना जाइत अछि?- मायानाथ झा- पुन: प्रश्न स्पष्ट नै अछि। तँए हमर कोनो प्रतिक्रिया नै। उमेश मण्डल- की अहाँकेँ लगैत अछि जे अहाँक पोथीकेँ हिन्दी, बंग्ला, नेपाली, अंग्रजी आदि भाषामे अनुवाद कएल जाएत? तइ स्थितिमे ओतए एकर कोन रूपेँ स्वागत हेतैक? की अहाँक साहित्य ओइ भाषा आ संस्कृति सभ लेल ओतबे महत्वपूर्ण रहतै जते ओ मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल छै? अहाँक लेखन भाषा-संस्कृति निर्पेक्ष किअए नै भऽ सकल? मायानाथ झा- हमर पोथी जँ अन्य कोनो भाषामे अनुवाद हुअए तँ ओ ओतबे स्वागत योग्य हएत जतबा ओ अपन भाषामे अछि। ओकरामे कोनो एहन बात नै छैक जे दोसर भाषामे अनुवाद भेने ओकर महत्ता न्यून भऽ जाइक। हमर पोथीक कोनो कथा भाषा-संस्कृतिसँ तेना भऽ कऽ आबद्ध नै अछि जे दोसराक लेल अग्राह्य बनि जाएत। उमेश मण्डल- अहाँक भाषा तँ मैथिली अछि मुदा अहाँक लेखनपर बाहरी भाषा, संस्कृति, विचारधाराक प्रभाव पड़ल अछि, कतौ-कतौ ई स्पष्ट अछि मुदा बेसी ठाम नै, एकर की कारण? मायानाथ झा- सैन्य जीवनक क्रममे हम भारतक विभिन्न क्षेत्रमे रहलौं खास कए कऽ पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रमे। विभिन्न भाषासँ पाला पड़ल। मुदा हाबी रहल मुख्यतया अपने भाषा। छिटपुट रूपेँ आनो भाषाक शब्द विशेष रूपमे ऊर्दूक प्रयोगमे आबि गेल हएत। ओना कौखनक कथानकपर विशेष जोर देबाक गैर-भाषीय शब्दक प्रयोगकेँ हम अनुचित नै बुझैत छी। सेनामे भाषाक शुद्धतापर ओतेक जोर नै देल जाइत छैक जतेक कथनक स्पष्टतापर, भलहिं भाषा खिचड़ी किएक नै भऽ जाए। उमेश मण्डल- अहाँक रचनाक प्रचार ऐ पुरस्कारक बाद भयंकर रूपसँ भेल अछि, अहाँकेँ ऐसँ केहेन अनुभव भऽ रहल अछि? मायानाथ झा- प्रसन्नता होइत अछि, उत्साह बढ़ल अछि। किन्तु, प्रचार जे भेल हो, मुदा पोथीक मांग आइ धरि कतौसँ नै आएल अछि, तँए प्रचारकेँ प्रस्तर बुझी तँ से आखिर केना? विदेह साहित्य सम्मानक प्रति सादर आभार। परमेश झा आ अनिलचन्द्र झा, सदस्य महासचिव, मैथिली विकास कोष मिथिला नाट्यकला परिषद मिथिला राज्य आन्दोलन मिथिला राज्यक आन्दोलनप्रति ऐक्यबद्धता जनौने कारण नेपाली काँग्रेसक नेता विमलेन्द्र निधिक जनकपुर – १ स्थित घरपर कएलगेल तोड़फोरके घटनाप्रति गम्भीर ध्यानाकर्षण भेल अछि । एहन अलोकतान्त्रिक कृयाकलापके भत्र्सना करैत दोषीउपर कारवारी आ पीडितके क्षतिपूर्तिक माँग करैत अछि । लोकतन्त्रमे अपन विचार राखएके नागरिक अधिकारउपरके अहि हस्तक्षेपकारी काजके तत्काल बन्द करए अपील सेहो करैत छी। प्रा.परमेश्वर कापड़ि, गोष्ठी संयोजक, श्रीरामानन्द युवा क्लव, जनकपुरधाम, संयोजक- मिथिला राज्य संघर्ष समिति मिथिला राज्य संघर्ष नेपाल संघीयताक दिशामे डेग बढारहल समयमे विभिन्न क्षेत्र, वर्ग, धर्म, लिङ, जाति आ भाषाभाषी तथा समूहसब अपन अपन अधिकारक माँग करैत विभिन्न प्रकारसँ आन्दोलन करैत आविरहल अछि । जे सबहक लोकतान्त्रिक अधिकार छैक । लोकतान्त्रिक आचरण अनुरुप भ’ रहल आ होबएबला हरेक अधिकारवादी आन्दोलनक नामपर किछु समूह देशभरि पसरिरहल अराजकताप्रति समितिक गम्भीर ध्यानाकर्षण भेल अछि । मिथिला राज्यक माँगप्रति समर्थन कएने कहैत नेपाली काँग्रेसक नेता विमलेन्द्र निधिक जनकपुरस्थित घरपर तोड़फोर कएल गेल घटनाके मिथिलाराज्य संघर्ष समिति भत्र्सना करैत अछि । तहिना राजधानीमे सञ्चारकर्मी उपर भेल आक्रमणके निन्दा करैत अछि । एहन अराजकतत्वके पहिचान क’ कारवाही करए समिति सरकारसँ माँग करैत पीडितके क्षतिपूर्तिक माँग करैत अछि । मैथिली कथाक परिवेश आ प्रवृति विमर्श आजुक अपरिहार्य आवश्यकता अछि— नेपालक मैथिली कथाक प्रभाव आ प्रभुत्वपर, एकर विस्तृत परिधि आ पहुँचके सन्दर्भमे, एकर परिवेश आ प्रकृतिपर जमिक’, जुटिक’ विमर्श करब । मैथिली कथाक ऐतिहासिकता आ रचनाधर्मिताक समग्र आयाम बहुत विस्तृत आ परम ऐतिहासिक रहनहुँ, एकर — पाठकीय समस्या तथा समीक्षात्मक मूल्याँकनक संकट, — बदलैत परिप्रेक्ष्यमे, मोह भंगक स्थितिवोध, — आधुनिक, उत्तर–आधुनिकताक चुनौती आ मूल्य संक्रमणक स्थिति, — युग परिवत्र्तन आ परिवत्र्तित परिप्रेक्ष्यमे मूल्य संघर्षक दिशा, — प्रमाणिक परिवेश आ लोकसरोकारी आवाजक आवेग, — समयसंग साक्षात्कार आ सृजनात्मक रचना प्रक्रियापर, खुलिक’ बात करब । ००० एहि कथा–गोष्ठीक उद्देश्यक आवेग महत्वाकाँक्षी रहल अछि आ बहुत किछु उपलव्धीमूलक पाबए चाहैत अछि । एहनमे बड़ नीक रहत जे मैथिली कथाक — सामाजिक सन्दर्भ — - Social Context _ — सांस्कृतिक सन्दर्भ — -Cultural '' _ — राजनैतिक सन्दर्भ — { -Political '' _ — वैचारिक सन्दर्भ - Ideologicla '' _ — समसामयिक सन्दर्भ - Contemporaneous context _ — प्राायोगिक सन्दर्भ - Experimental context _ पर ठाठस’ ठठिक’, जमिक’ जाँघ जोड़िक’ एकठौहरी एकमुहरी भ’ एकर समग्र मुद्दा आ विषय–परिदृशयके एहन सानि–मथिक’ निष्कर्षपर पहुँची जे एकर रचनाधर्मिता आ लेखन–प्रक्रियाके समेकित ऊर्जा आ उत्साह दैक आ एकटा ठोस दिशानिर्देश ई पाबए । समकालीन मैथिली कथालेखनक अवलोकन आ पठित कथाके प्रतिक्रियात्मक टिप्पणीस’ कथाकारके रचनात्मक ऊर्जा आ विश्वास प्रदान करबाक हेतुए अपन धारणा सहित, अपन विचारात्मक निर्देशकीय भूमिकास’ उत्साहजनक स्थिति–परिस्तिथि निमार्ण करैत, गोष्ठीके ऐतिहासिकता प्रदान कएल जाय ! (२०६८/८/०४ ) जनकपुरमे कथा–गोष्ठी सम्पन्न श्रीरामानन्द युब क्लव जनकपुरधामक २६म् वार्षिकोत्सवक उपलक्ष्यमे मिति २०६८ पौष ४ गते १९ लिसम्वर सोमदिन प्राध्यपक परमेश्वर कापड़िक संयोजकत्वम सम्पन्न मैीथली कथाक परिवेश आ प्रवृति विमर्श विषयक एकदिवसीय कथा गोष्ठी, बहुते अर्थे विशिष्ट आ सब अर्थे उल्लेख्य रहल अछि । कार्यक्रमक आयोजकीय प्रवाह डेङी करीनक उछलैत आहर जकाँ आरि–धूरके नङहैत तोड़ैत आन–आन खेतके हानि नोकसानी नहि क’, सैतले सिटले, दमकलक पाइप सनके रहौक, जाहिस’ जै खेत, कियारीमे जतबे जेहन पानिक खगता–बेगरता होइक, ततबे पाइन पटौक, एहन सनके, कार्यक्रमक उद्देश्य आ आयोजनक औचित्यके अनमन अनुशन्धान प्रारुपक साँचमे सँिचि,एना शब्दरुप देल गेल रहए— गोष्ठीक संयोजक प्रा. परमेश्वर कापड़िक अध्यक्ष्ता एवं नेपाल संगीत नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्य प्राज्ञ रमेश रंजनक प्रमुख आतिथ्यमे सम्पन्न ओहि कथागोष्ठीक व्यवस्थापकीय सुसंचालन प्रा. श्याम शशि कएलन्हि । एके दर्जन कथा पाठ भ’ सकनहुँ, कथासब उपरा–उपरीके त’ रहबे करए, दू–दू तीन–तीनटाक’ कथा एक–एक चक्रमे पाठ कएल जाइत छल आ पठित कथासबपर कमस’ कम दस÷दसटाक’ सुन्दर आ साधल प्रतिक्रिया, टिप्पणीसब अबैत छल जे कथके माजि चमकाक’ सुन्दर अर्थबता आ धारि दैत छल । ईएह शुभ बात आ भाव छल जे एहि गोष्ठीके सराहल गेल सएह नहि, एकर अनिवार्य खगता बेगरताके अगामीयो दिनमे देखैत एकर झमटगर निरन्तरताक आग्रही माङ सब मुहे कएल गेल । जिनकर जे कथा पाठ भेल ओ एना रहए— डा.सुरेन्द्र लाभ नोरक व्यथा रमेश रंजन नियन्त्रण अनियन्त्रण अयोध्यानाथ चौधरी मद्घम श्याम शशि बयिया बृज कुमार यादब करोट फेरैत समय अशोक दत्त बेटी सुजीत झा जिद्दी नित्यानन्द मण्डल चौ विजय दत्त मणि घटैत बढ़ैत शेखी रोशन कुमार झा घर भाड़ा धनश्याम झा पता नै की भेल ! –अलिखित ) अमरकान्त झा सेवा व्यस्त छ ( गप्प ) नेपालक विशिष्ट कथाकारकं उत्कृष्ट कथा जे विभिन्न माध्यमस’ प्राप्त भइयोक’ समयाभाव आ जड़ाएल ठिठुरैत बिकठाह परिस्थितिक कारणे आ स्वंय कथाकार अपने उपस्थित नइ भ’ सकने, पाठ आ समीक्षास’ बँचित रहि गेल । ओना नियारल बात ई स्वीकारल गेलै जे ब्लवस’ प्रकाशित हुअ’बला संकलनमे ओकरा अवश्य सामेल कएले जाएत । आ ओहन महामना कथाकारमेस’ छथि— रामभरोस कापड़ि भ्रमर धर्मेन्द्र झा विह्वल कृष्णशंकर मिश्र चन्द्रकिशोर (बीरगंज) देबेन्द्र मिश्र (राजविराज) पुनम ठाकुर (राजविराज) पुनम झा कुमार पृथु लौल आ कचोट अहू बातके रहि गेलै जे हिनको सबके कथा जँ एहि गोष्ठीमे आबि, अपन स्थान सृजनात्मकत, ऐतिहासिकता पाबि, कथासंसारके झमटगर बनबितए, सेहे नइ कथासमीक्षाके आओर उर्जाबान बना गोष्ठा्ीक गरिमाके आओर निखारितथि— डा. राजेन्द्र विमल धीरेन्द्र प्रेमर्षी रुपा झा सुनिल मल्लिक परमेश्वर कापड़ि, आदि । ओहू पानिके कथाकारलोकनि जँ रहितथि त’ सोनमे सुगन्ध लागि जईतए । समीक्षा आ टिप्पणीकर्तामे रमेश रञ्जन, सुदीप झा, श्याम शशि, अशोक दत्त, सुजित झा, अजय झा, अजय अनुरागी घनश्याम झा, रोशन झा, नित्यानन्द मंडल अमरचन्द्र अनिल अमरकान्त झा जीवनाथ चौधरी, परमेश्वर कापड़ि आदि रहैथ । असलमे अरकान्तक कथा गप्प आ घनश्यामक कथा अलिखित रहने तत्काल एकरा बागि बेरा दी त’ बाँकी दसेटा कथा ओहिमे जे पाठ भेल रहए ओ प्रतिनिधिमूलक आ समसामयिक त’ दशावतारी भाव धाराक, दशोदिशाक समय–सन्दर्भस’ बहुत भेल–पाँचक लागल । मैथिली कथाक अपन पहचान आ पहुँचयुक्त परम ऐतिहासिक विस्तृति रहल अवस्थामे एहि दशेगोट कथाक धार आ भाव खोजने, खोधियारने एकर विस्तृत परिधिक बहुत उच्च आयाम अवश्य देखाइ देत अछि । बहुत कथा बदलैत समाजिक–सांस्कृतिक परिवेश आ राजनैतिक पृष्ठभूमिस’ खूब नीक जकाँ परिचित करबैत, जीवनक ऐतक लगक कथा रहए जे शब्द–भाव निर्मित्त संंसार होइतहुँ समानान्तर जिनगीक प्रत्यथ आ प्रमाणिक वोध त’ करएबे करए किछु कथा अपन आधुनिक सन्दर्भके, समसामयिक यथार्थक मुद्दाके खूब नीकजकाँ सम्बोधन करैत आक्रमक ताव–तेवरम,े परिवत्र्तन आ रुपान्तरणक पक्षमे, विष्फोटक रुपस’ आवाज दैत देखल गेल अछि । श्याम शशिक बगिया लोक श्याम नइ, लैपटौपधारी श्याम शशिक मुँहस’ कहल गेल कथामे लोकभाषा आ लोक मनोविज्ञानक अभाव रहनहँु, परम्परागत ओहि बगिया लोककथाके नवयुगीन सन्दर्भमे किछु फूट अभिप्रायक संग कहल गेल अछि आ ओहिमेके मनुषमारि, मरखौकी बूढ़िया आ ओकर बेटीके मारिक’ खिस्सा खतमक जे चमत्कारी कथा अछि, आबक लोकके ओ जे सुनाएल जाय त’, कहतै जे असली बगिया खिस्सा ईहे छै । एकर मूलमे नवयुगीन सन्दर्भ सहितक पाठान्तरक सोझ सपाट प्रभाव अछि आ प्रयोग एत’ सिझल सपरल अछि । डा. सुरेन्द्र लाभक नोरक व्यथा कथा नेतघटू निपनियाँ नेताक बेठुआ चरित्र आ मूल्यहीन किरदानीके धन्नी–चुन्नी बखिया एहनक’ उघारैत देखाएल गेल अछि, जे सिहराक’ कँपकपाक’ हाड़ हिलाक’ राखि देब’बला नव मिथक गढ़ैत अछि । गर धएने समाजिक यथार्थके, सरोकारी लोक संवेगके, नव अकार–प्रकारमे बढ़ैत–बदलैत परिवेश आ परिवत्र्तनक परिप्रेक्ष्यस’ ठोकराक’ नव आयाम कायम करैत युगवोधके बहुत साधल–सिटल भाषा–भावमे, उत्कृष्ट रुपस’ आवेगित संवेगित करैत बृजकुमार यादवक करोट फेरैत समय कथा मैथिलीक महनीय उपलव्धी मानले गेल । आनो–आन कथासब उपरा–उपरीक रहबे करए, जकरा आधारपर जीनगीके जोख’–परेख’ आ समसामयिक सामाजिक–सांस्कृतिक परिवेशक सम्पूर्णताके नापि–ताैिल अजमाक’, आ एकर साहित्यिक तथा कलात्मक भाषा–भाव पक्षस’ मेल नइ खाइत ऐगुण उबानिपनके बागि बेराक’,आधुनिक विश्व परिप्रेक्ष्य आ समकालीनतास’ मेल खाइत दिशानिर्देश आ सृजनाऊर्जाक आवेग देबाक काज ओतए समीक्षात्मक टिप्पणीसबस’ भरि पोख भेटल रहैक । सबस’ मुनल–बान्हल आ सम्हरल बात ओत ई स्वीकरल गेल जे एतबेटा, कठुआएल गोष्ठी जँ एतेक ऊर्जावाल, प्रमाणिक आ संवेगित संवाद उत्पन्न क’ सकैछ त’ आओर सम्हरल आ झमटगर गोष्ठी आओर उत्पादक आ उत्साहवर्धक रहत, तएँ एकरा निरन्तरता देव बहुत आवश्यक अछि । पूनम मंडल दाग (उपन्यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण बहुत दिन भेल, एक्कैस वर्ष, मातृभाषाक प्रति अनुरागक एक टा विशेष क्षण मे मैथिली मे लिखबाक लेल उन्मुख भेल रही—1991 मे— एहि एक्कैस वर्ष मे लगभग दू गोट कथा-संग्रह जोगर कथा आ दू गोट वैचारिक (आलोचनात्मक, संस्मरणात्मक आ विवरणात्मक) पुस्तक जोगर लेख यत्र-तत्र प्रकाशित आ छिडि़आयल रहितो ओकरा सभ केँ पुस्तकाकार संग्रहित करबाक साहस एखन धरि नइँ भेल। ई प्राय: अनके कारणेँ, जकर चर्चा बहुत आवश्यक नइँ। मुदा, ई उपन्यास एहि लेल पुस्तकाकार अपने सभक समक्ष प्रस्तुत क’ रहल छी जे एकरा पत्र-पत्रिका द्वारा प्रस्तुत करबाक सुविधा हमरा लेल नइँ छल। मुदा हमरा लग ई विश्वास छल जे मैथिलीक ओ पाठक वर्ग पढ़’ चाहताह जे प्राय: तेरह वर्ष सँ 'अंतिका’ पढ़ैत आयल छथि। मैथिली पत्रकारिताक दीर्घकालीन ओहि इतिहास—जे मैथिली पत्रिका पाठकविहीन आ घाटा मे बहराइत अछि—केँ फूसि साबित करैत जे पाठक वर्ग 'अंतिका’ केँ निरंतर 'घाटारहित’ बनौने रहलाह हुनक स्नेह पर हमरा आइयो विश्वास अछि। निश्चये ओ पाठक वर्ग हमर उपन्यास सेहो कीनिक’ पढ़ताह आ हमर पुरना विश्वास केँ आरो दृढ़ करताह। —लेखक Price : 150.00 INR स्त्री आ शूद्र दुनू केँ हीन आ मर्दनीय मान’वला कुसंस्कृतिक अवसानक कथा जे अपन तथाकथित 'ब्रह्मशक्ति’क छद्म अहंकार मे परिवर्तनक ईजोत देखिए ने पबै यए...जखन देख’ पड़ै छै तँ पाखंडक कील-कवच ओढि़ लै यए, अहुछिया कटै यए, घिनाइ यए आ अंतत: एक टा 'दाग’ मे बदलै यए जे कुसंस्कृतिक स्मृति शेषक संग परिवर्तनक संवाहक, स्त्री आ शूद्रक, संघर्ष-प्रतीक सेहो अछि। उपन्यास पठनीय अछि, विचारोत्तेजक अछि आ मैथिली मे बेछप। —कुणाल गौरीनाथ मैथिलीक चर्चित आ मानल कथाकार छथि। पठनीयता आ रोचकता हिनकर गद्य मे बेस देखाइत अछि। माँजल हाथेँ ओ ई उपन्यास लिखलनि अछि। गौरीनाथ मैथिली साहित्यक आँगुर पर गनाइ वला लेखक मे छथि जे जाति-विमर्श केँ अपन विषय वस्तु बनौलनि। आन भारतीय भाषा मे साहित्यक जे लोकतांत्रिकीकरण भेल, तकर सरि भ’क’ हेबाक मैथिली एखनो प्रतीक्षे क’ रहल अछि। ई उपन्यास मैथिली साहित्यक लोकतांत्रिकीकरण लेल कयल एक टा सार्थक आ सशक्त प्रयास अछि। 'दाग’ अनेक अंतद्वंद्व सबहक बीच सँ टपैत अछि विश्वसनीयता, रोचकता आ लेखकीय ईमानदारीक तीन टा तानल तार पर एक टा समधानल नट जकाँ। एत’ सामंतवाद आ ब्राह्मणवादक मिझेबा सँ पहिनेक दीप सनहक तेज भ’ जायब देखाइत अछि। धुरखुर नोचैत नपुंसक तामस आ वायवीय जाति दंभ अछि। नवतुरियाक आर्थिक कारणेँ जाति कट्टरताक तेजब सेहो। दलित विमर्श अछि, ओकर पड़ताल सेहो। दलितक ब्राह्मणीकरण नहि भ’ जाय, तकरो चिंता अछि। दलित विमर्शक मनुष्यतावाद आ स्त्रीवादक नजरिञे पड़ताल सेहो। आकार मे बेसी पैघ नहियो रहैत एहि मे क्लासिक सब सनहक विस्तार अछि अनेक रोचक पात्रक गाथाक बखान संग। आजुक मैथिल गाम जेना जीवंतता सँ एहि उपन्यासक पात्र बनि केँ सोझाँ अबैत अछि, से अनायासे फणीश्वरनाथ रेणु केँ मन पाडि़ दैत अछि। गामक नवजुबक सबहक दल यात्रीक नवतुरियाक योग्य वंशज अछि। जँ आजुक मिथिला, ओकर दशा-दिशा आ संगहि ओत’ होइत सामाजिक परिवर्तन रूपी अमृत मंथनक खाँटी बखान चाही, तँ 'दाग’ केँ पढ़ू। एहि रोचक आ अत्यंत पठनीय उपन्यासक व्यापक पाठक समाज द्वारा समुचित स्वागत हैत आ गाम-देहात सँ ल’क’ नगर परोपट्टा मे एहि पर चर्चा हैत, एहेन हमरा पूर्ण विश्वास अछि। —विद्यानन्द झा स्त्री आ दलित एहि दुनू विमर्श केँ एक संग समेट’वला उपन्यास हमरा जनतब मे मैथिली मे नहि लिखल गेल अछि। ई उपन्यास एहि रिक्ति केँ भरैत भविष्यक लेखन लेल प्रस्थान-विन्दु सेहो तैयार करैत अछि। 'दाग’ अपन कैनवास मे यात्रीक 'नवतुरिया’ आ ललितक 'पृथ्वीपुत्र’क संवेदना केँ सेहो विस्तार प्रदान करैत अछि। ताहि अर्थ मे ई मैथिली उपन्यास परंपराक एक टा महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हैत। 'नवतुरिया’क 'बम-पार्टी’क विकास-यात्रा केँ 'गतिशील युवा मंच’ मे देखल जा सकैत अछि। जाति, धर्म, लिंग आदि सीमाक अतिक्रमण करैत मनुष्य ओ मनुष्यताक पक्ष मे लेखकीय प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक सुभद्रा सनक पात्रक निर्माण जे अपन दृष्टि सँ जातीय-विमर्श सँ आगाँक बाट खोजैत अछि, 'पहिने मनुष्य बचतै तखन ने प्रेम!’ अभिनव कथ्य आ शिल्पक संग मिथिलाक नव बयार केँ थाह’वला उपन्यास थिक 'दाग’। —श्रीधरम उसार-पुसार ई उपन्यास हम लगभग दस वर्ष पहिने लिखब शुरू कयने रही। 2003 मे। एक्कैसम शताब्दीक नव गाम मे तखन धरि जे किछु थोड़ेक सामाजिकता बचल छल, एहि बीच सेहो खत्म जकाँ भ’ गेल। खगल केँ के देखै यए, हारी-बीमारी धरि मे तकैवला नइँ! अहाँक नीक जरूर दोसर केँ अनसोहाँत लगै छै। लोभ-लिप्साक पहाड़ समस्त सम्बन्ध आ हार्दिकता केँ धंधा आ नफा-नुकसान सँ जोडि़ देलक अछि।...गाम सँ बाहर रह’वला भाइ-भातिज केँ बेदखल करबाक यत्न बढ़ल अछि। खेती-किसानीक जगह व्यापार आ बाहरी पाइ पर जोर। सुखितगर होइते लोक शहर जकाँ आत्मकेन्द्रित भ’ रहल अछि आकि नव तरहक दबंग बनि रहल अछि, नंगटै पर उतरि रहल अछि। संगहि की ई कम दुखद जे जाति-धर्म, पाँजि-प्रतिष्ठा सनक मामिला मे एखनो; थोड़े कम सही; उग्र कोटिक सामाजिक एकता, आडम्बर आ शुद्धता देखाइते अछि?... सवर्ण समाज दलित-अछूतक कन्या पर अदौ सँ मोहित होइत रहल आ एम्हर आबि विवाह आदिक सेहो अनेक घटना सोझाँ आयल। मुदा दलित युवकक संग गामक सिरमौर पंडितजीक कन्याक भागि जायब, घर बसायब आ ओकर स्वावलंबी हैब पागधारी लोकनि केँ नइँ अरघैत छनि तँ एकरा की कहबै? खेतिहर समाज लेल खेती-किसानी सँ बढि़ ताग आ पाग कहिया धरि रहत से नइँ कहि सकब!... ओना मिथिला-मैथिल-मैथिलीक मामिला मे 'पूबा-डूबा’क हस्तक्षेप पश्चिमक श्रेष्ठता-ग्रंथि केँ कहियो स्वीकार्य नइँ रहल—खासक’ शुद्धतावादी लोकनि आ पोंगा पंडित लोकनि केँ!... निश्चये ओहेन व्यक्ति केँ मैथिल समाजक ई पाठ बेजाय लगतनि जे मनुक्ख आ मनुक्ख मे भेद करै छथि, एक केँ श्रेष्ठ आ दोसर केँ हीन बुझैत छथि!... सिमराही-प्रतापगंज-ललितग्राम-फारबिसगंज बीचक आ कात-करोटक 'पूबा-डूबा’ गाम-घरक किछु शब्द (ककनी, कुरकुटिया, ढौहरी, दोदब आदि), किछु ध्वनि, भिन्न-भिन्न तरहक उच्चारण आ वर्तनीक विविधता कोसी-पश्चिमक किछु पाठक केँ अपरिचित भनहि लगनि, आँकड़ जकाँ प्राय: नइँ लगबाक चाहियनि किएक तँ कोसी पर नव बनल पुल चालू भ’ गेल अछि...जाति मे भागनि आकि अजाति मे, बेटी-बहिन घर-घर सँ भागबे करतनि...ताग आ पाग धयले रहि जयतनि!...नव-नव बाट आ पुल आकर्षक होइत छै! से जनै अछि छान-पगहा तोड़बा लेल आकुल-व्याकुल नव तुरक मैथिल कन्या! हँ, पंडिजी बुझैतो तकरा स्वीकार’ नइँ चाहैत छथि। उपन्यासक अन्तिम पाँति पूरा क’ हम विश्रामक मुद्रा मे रही...कि पंडीजी, माने पंडित भवनाथ मिश्र, आबि गेलाह। पुछलियनि—पंडित कका, अंकुरक प्रश्नक उत्तर के देत? कहू, ओकर कोन अपराध?... पंडित कका किछु ने बजलाह, बौक बनि गेलाह!...मुदा हुनका आँखि मे अनेक तरहक मिश्रित क्रोध छलनि! ओ पहिने जकाँ दुर्वासा नइँ भ’ पाबि रहल छलाह, मुदा भाव छलनि—खचड़ै करै छह! हमरा नाँगट क’क’ राखि देलह आ आबो पुछै छह...जाह, तोरा कहियो चैन सँ नइँ रहि हेतह!... अंकुरक छाती पर जे दाग अछि, तेहन-तेहन अनेक दाग सँ एहि लेखकक गत्र-गत्र दागबाक आकांक्षी पंडित समाज आ विज्ञ आलोचक लोकनि लग निश्चये अंकुरक सवालक कोनो उत्तर नइँ हेतनि। सुभद्राक तामस आ ओकर नजरिक दापक दाग सेहो हुनका लोकनिक आत्मा पर साइत नहिए बुझाइत हेतनि!... मुदा सुधी पाठक, दलित समाज सँ आगाँ आबि रहल नवयुवक लोकनि आ स्त्रीगण लोकनिक नव पीढ़ी जरूर एकर उत्तर तकबाक प्रयास करत, से हमरा विश्वास अछि। —गौरीनाथ 01 सितम्बर, 2012 "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे -आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर --"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल। -लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल। --"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला। समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -भारतीय भाषा महोत्सव २ नवम्बरकेँ प्रारम्भ भेल- -ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक जीवनपर आधारित "उगना रे" पर कथक नृत्यांगना शोभना नारायणक नृत्य लोककेँ मंत्रमुग्ध केलक -समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस -बहसमे भाग लेलनि उदय नारायण सिंह नचिकेता, देवशंकर नवीन, विभा रानी आ गजेन्द्र ठाकुर; आ मोडेरेटर रहथि अरविन्द दास -आकाशवाणी दरभंगा, हिन्दी अखबार सभक दरभंगा संस्करण, सी.आइ.आइ.एल. , साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आ अंतिका- मिथिला दर्शन, जखन-तखन केर लेखकक प्रोफाइल, विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ विद्यापति पर्व केनिहार चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर, झारखण्ड सनेस आ जातिवादी रंगमंचक नाटकक शब्दावली आदि, ऐ सभ द्वारा मैथिली साहित्यकेँ ब्राह्मणवादी बनेबाक प्रयासक विरुद्ध गएर-ब्राह्मणवादी समानान्तर धाराक चर्च गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल -ज्योतिरीश्वर पूर्व गएर ब्राह्मण विद्यापति आ ज्योतिरीश्वरक पश्चात बला कट्टर संस्कृत-अवहट्ठ बला विद्यापतिक बीच अन्तर गजेन्द्र ठाकुर रेखांकित केलन्हि ऐ सँ पहिने हिन्दी आ मणिपुरीक कार्यक्रम सेहो भेल। स्थानीय कवि परिषद (सलहेसबाबा परिसर- औरहा) वार्षिकोत्सव- 2012. दिनांक- 27 जनवरी 2012 (शुक्र दिन) स्थानीय कवि परिषदक चारिम वार्षिकोत्सव-2012क अवसरपर सम्मान समारोह आ कवि सम्मेलन श्री उमेश पासवानक संजोजकत्वमे सुसम्पन्न भेल। स्थान- सलहेसबाबा परिसर- औरहा, प्रखण्ड- लौकही, जिला- मधुबनी, समए- 11: 00 बजे (पूर्वाहन)सँ संध्या 5 बजे धरि कार्यक्रम चलैत रहल। कार्यक्रमकेँ दीप प्रज्वलित क' विधिवत् उद्घाटन केलनि वनगामा (उत्तरी) पंचायतक मुखिया श्री दयानंद साह आ सरपंच श्री नूनू साहजी। मैथिली साहित्यक श्रेष्ठ कथाकार, नाटकरकार, उपन्यासकार आ कवि श्री जगदीश प्रसाद मंडल, एकैसम् शताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कवि श्री राजदेव मंडल आ कवि श्री अच्छेलाल शास्त्री जीकेँ नव वस्त्रक संग प्रो राधाकृष्ण चौधरी लिखित ‘मिथिलाक इतिहास’ आ मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ बाल-साहित्य ‘मिथिलाक लोकदेवता’ (श्रीमती प्रीति ठाकुर) पोथीसँ सम्मानित कएल गेलनि। सम्मान समारोहक अध्यक्षता केलनि श्री मिथिलेश सिंह (शिक्षक, मध्य विद्यालय- महदेवा, मधुबनी) आ मंच संचालन श्री दुर्गानंद मण्डल आ संजीव कुमार शमा। कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ाओल गेल श्री राधाकान्त मण्डलक स्वलिखित स्वागत गीत- हे मिथिलावासी कविवर, स्वागत हमर स्वीकार करू....सँ। ‘आशासँ फूलक माला लेने हम ठाढ़......’ सुन्दर गीतसँ प्रो. उपेन्द्र नारायण अनुपमजी सेहो स्वागत केलनि। तकरबाद स्वागत भाषण प्रस्तुत केलनि प्रो. कपिलेश्वर साहु जी आ स्वागत कविताक अतिविशिष्ठ पाठ केलनि- श्री रामविलास साहुजी। पहिल सत्रक समापनक बाद दोसर सत्र प्रारम्भ भेल जइमे लगभग 2 दर्जनसँ बेसी कवि लोकनि अपन-अपन नूतन कविताक पाठ केलनि जे ऐ तरहेँ भेल- अवकाश प्राप्त शिक्षक- श्री दुखन प्रसाद यादव- गरीबी, गणतंत्र, हमर भारत छै, श्री नंदविलास राय- मानवता, शिक्षित बेरोजगार, लक्ष्मी दास- लौटिया, अखिलेश कुमार मण्डल- जिनगी, रामविलास साहु- प्रेमक भूखल, माघक जाड़, हमर गाम घर, उमेश मण्डल- आगाँ अबै जाउ, आत्म विश्वास, अढ़ाइ हाथ, प्रो. उपेन्द्र नारायाण साह- छी कनी, प्रो. कपिलेश्वर साह- गामक घटक, श्री विरेन्द्र कुमार यादव- मारल बुइध, श्री हेमनारायण साह- व्यथा, श्री कुसुम लाल मंडल- ठाढ़ी, श्री राजदेव मंडल- कामना, श्री अच्छेलाल शास्त्री- हवा बहैत अछि सन-सन-सन, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- किछु सिखू किछु करू, उमेश पासवान- रगड़ा, संजीव कुमार शमा- भेल छने अन्हार, गप मजगर कह, प्रो. रमेश कुमार मंडल- आत्म-हत्या, अहिना श्री आशीष कुमार सिंह, श्री अमरनाथ यादव, संजय कुमार सिंह, सोनेलाल यादव, रामप्रवेश मंडल, राधाकान्त मंडल आदि। ऐ अवसरपर लौकही थानाध्यक्ष श्री राज किशोर बैठा, श्री गुप्ता प्रसाद सिंह, एस. आइ. लौकही, मधुबनी, छिन्नमस्तिका एफ.एम, राजविराज, नेपालसँ आएल प्रमोद प्रियदर्शी, भूतपूर्व सरपंच श्री रामनारायण यादव, शिक्षक श्री सत्य नारायण मण्डल, डंगराहा पंचायतक भूतपूर्व मुखिया श्री रामप्रीत मंडल जीक संग-संग लगभग पाँच सएसँ ऊपर लोक समारोहमे भाग लेलनि। ‘विदेह’ मैथिली पोथी प्रदर्शनीसँ ग्रामीण सभमे काफी हर्ष देखबामे आएल। दिल्लीमे गूंजल मैथिली कविता देशक राजधानी दिल्लीमे साहित्यिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक संस्था 'मिथिलांगन" द्वारा आयोजित कवि गोष्ठीमे मैथिली कविता आ गीत खूब गूंजल। अवसर छल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म" क जयंतीक। आयोजन रविवार, 11 सितम्बर, 2011 केँ राजघाट स्थित सत्याग्रह मंडपमे कएल गेल। विशाल मैथिली कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक युवासँ लऽ कऽ मूर्धन्य कवि अप्पन विशिष्ट कविताक पाठ कऽ उपस्थित श्रोताकेँ मंत्रमुग्ध कऽ देलन्हि। कवि गोष्ठीक अध्यक्षता पटनासँ पधारल वरिष्ठ हिन्दी-मैथिली कवि डॉ. ललित कुमुद आ संचालन प्रख्यात कवि-नाटककार कुमार शैलेन्द्र केलनि। ऐ कवि सम्मलेनमे कविता पाठक आरंभ युवा कवि विनीत उत्पल अप्पन दू टा कवितासँ केलखिन। एक्कर बाद युवा कवि किशन कारीगर, स्तुति नारायण, विनीता मल्लिक, रमण कुमार सिंह, गीतकार मानवर्धन कंठ, शारदा नन्द दास 'परिमल", 'तुरंता" लेल जानल जाएबला वरिष्ठ कवि रवींद्र लाल दास 'सुमन", रवी-वीन्द्र-महेंद्रक जोड़ीक रवींन्द्र नाथ ठाकुर, कुमार शैलेन्द्र आ शेफालिका वर्मा अप्पन कविताक पाठ पढ़लनि। ब्रह्मदेव लाल दासक मोन ठीक नै छल तेँ ओ उपस्थित नै भऽ सकलाह आ हुनकर कविताक पाठ हुनकर पुतोहु सरिता दास केलनि। समारोहक आरंभ प्रसिद्ध मैथिली गायक सुंदरमक नेतृत्वमे मिथिलांगन सांस्कृतिक दलक स्वागत गानसँ भेल। तकर बाद डॉ. शेफालिका वर्मा आ डॉ. ललित कुमुद मणिपद्मजीक व्यक्तित्व आ कृतित्व केँ लोकक आगू राखलखिन। समारोहमे मैथिली भाषाक विशिष्ट साहित्यकार रमानंद रेणु, मार्कण्डेय प्रवासी, फजलुर रहमान हासमी हिनका सभक निधन केँ लऽ कऽ शोक व्यक्त सेहो कएल गेल। संगे-संग दिल्ली उच्च न्यायालय लग भेल बम विस्फोटमे घायल भेल आ मारल गेल निर्दोष लोकक आत्माक शांति लेल दू मिनटक मौन सेहो राखल गेल। कवि गोष्ठीमे शामिल सभटा कविकेँ मिथिलांगनक स्मृति चिन्ह देल गेल आ हुनका सभसँ संस्थाक सचिव अभय कुमार लाल दास आभार व्यक्त केलनि। ५१ साझा पुरस्कारक घोषणा नेपालक साझा प्रकाशन २०६७ सालक विभिन्न विधाक पुरस्कारक घोषणा केलक अछि। -“ थारू लोककथा १’ कृति लेल रु. १५ हजार राशिक लोक-साहित्य पुरस्कार लेखक कृष्णराज सर्वहारीकेँ -रु १५ हजार राशिक “‘नयाँ साझा लोक संस्कृति पुरस्कार “‘तराईको फाँटदेखि हिमालको काखसम्म” कृति लेल “रामभरोस कापडी “‘भ्रमर”केँ - २०६७ सालक रु १५ हजार राशिक साझा बाल-साहित्य पुरस्कार- “अन्तरिक्ष र गाउँघरका कथा” कृति लेल साहित्यकार विजय चालिसेलाई केँ -रु. १०–१० हजार राशिक गरिमा सम्मान पुरस्कार–२०६७ पद्य विधा “ ‘समर्पण” शीर्षक कविताक लेल कवि निभा शाह, गद्य विधा “युग” शीर्षक कथाक लेल कथाकार वैजयन्ती मिश्र आ “‘चकछिन्ना” शीर्षक कथाक लेल कथाकार इन्द्रिस सायललाई केँ। - प्रकाशनक अध्यक्ष तथा महाप्रबन्धक ममता झाले जानकारी देलन्हि। प्राज्ञ भ्रमर साझा पुरस्कारसं सम्मानित नेपालक सभस पैघ प्रकाशन संस्था साझा प्रकाशन आइ एक भव्य समारोहमे २०६७ सालक साझा पुरस्कारसभ वितरण कएलक अछि । वरिष्ट साहित्यकार एवं प्राज्ञ रामभरोस कापडि भ्रमरके उक्त अवसरमे साझा लोक संस्कृति पुरस्कारसं सम्मानित कएल गेलनि । साझा प्रकाशनसं प्रथम बेर प्रारंभ कएल गेल ई पुरस्कार पाबबला ओं प्रथम साहित्यकार छथि । पुरस्कार पाबबला अन्य स्रष्टासभमे साझा पुरस्कार पाबबला दबसु क्षेत्री, साझा लोक साहित्य पुरस्कार पाबबला कृष्णराज सर्वहारी,साझा वाल साहित्य पुरस्कार पाबबला विजय चालिसे लगायत गरिमा सम्मान पाबबला सभ सेहो छथि । उक्त पुरस्कारसभ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा प्रसाद उप्रेतीे प्रदान कएलनि। नबो नारायण मिश्र (कोकिल मंच) द्वारा मैथिलीक अग्निकवि श्री रामलोचन ठाकुरसँ साक्षात्कार ई साक्षात्कार हुनकासँ विदेह द्वारा हुनका समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार देल जएबाक अवसर पर लेल गेल छल। प्रश्न-- अपने कलकत्ता कहिआ अएलहुँ? उत्तर---१९६३ ई.मे। प्रश्न:-- मिथिला मैथिलीसँ कोना जुड़लहुँ? उत्तर-- सुखदेव ठाकुर संगे मिथिला-संघमे अएलाक पश्चात। प्रश्न-- अपनेक मैथिली साहित्य, आंदोलन आ रंगमंचमे सभठाम सक्रिय भूमिका रहल अछि, हम चाहब जे क्रमशः कोन बिन्दुसँ प्रारंभ करैत एखन धरिक जे क्रिया-कलाप अछि ताहि पर अपन विशद जानकारी देबाक कृपा कएल जाए। उत्तर-- रंगमंच आ आंदोलनक पश्चाते साहित्यसँ जुड़लहुँ। १९७६मे रंगमंच जखन टूटि सन गेलै तकर पश्चाते लेखनमे पूर्णतः सक्रिय भेलहुँ। प्रश्न-- प्रथम आंदोलन कहिआ भेल रहै जाहिसँ अपनेक सहभागिता दर्ज भेल। उत्तर---१९७१मे प्रथम आ अंतिम १९८०मे। ९ दिसम्बर १९८०केँ मैथिली मुक्ति मोर्चाक नेतृत्वमे पटनामे विराट प्रदर्शन भेल छल जकर संयोजक हम छलहुँ आ मैथिली आंदोलनक इतिहासमे पहिल बेर मैथिल संतानक शोणितसँ पटनाक राजपथ रंगाएल छल। प्रश्न-- आंदोलनक प्रेरणा किनकासँ भेटल? उत्तर-- प्रथम बाबू भोलालाल दास आ दोसर किरणजी। प्रश्न-- रंगमंचक हेतु पूर्णतः रंगमंचसँ जुड़ल पत्रिका, नाटकक अनुवाद आ अभिनयमे अपनेक योगदानक आइओ चर्चा अछि, एहिमे आइ किनकर नाम लेबए चाहब। उत्तर---मुख्यतः प्रबीर मुखर्जी जे हमरा लोकनिक निर्देशक छलाह। ओ प्रत्येक नाटकमे हीरोकेँ पार्ट हमरे दैत छलाह। हीरोक पार्ट लेल बहुतो प्रयत्नशील छलाह मुदा हुनकर कहब छलन्हि जे जकरा हम उपयुक्त बुझैत छी से मात्र अहीँटा छी। जे समकालीन लेल इर्खाक कारण सेहो छल। प्रश्न-- मैथिली साहित्यिक हेतु लेखन, पोथी-प्रकाशन, संपादन आ संग-संपादन बेस अर्चित-चर्चित आइओ अछि, ताहि संदर्भमे अपनेक की कहब अछि। उत्तर--- पाँचम किलाससँ लिखनाइ प्रारंभ केलहुँ मुदा विधिवत् मिथिला-संघमे अएलाक पश्चात मिथिला-दर्शनसँ जुड़लहुँ। हमर प्रथम पोथी "इतिहासहंता" छपल छल जकर विमोचन यात्रीजी कएने छलाह। प्रश्न-- संपादनमे कहिआसँ सक्रिय भेलहुँ। उत्तर---"अग्निपत्र" १९७३ ई.मे जाहिमे डा. विरेन्द्र मल्लिक आ सुकान्त सोम संग छलाह। प्रश्न-- कतेक अंक छपलैक ? उत्तर---कुल सातटा अंक। प्रश्न-- पुनः दोसर कहिआ ? उत्तर---१९७६ इ.मे एकसरे पुनः प्रारंभ कएलहुँ जकर पाँचटा अंक तत्पश्चात १९८० इ.मे फेर एकटा अंक बहार भेल। जकर संपादनमे बीरेन्द्र मल्लिक आ सुकान्त सोम संग छलाह। मैथिली रंगमंचक मुखपत्र "रंगमंच" तकर संपादन १९७४ इ.मे,१९७५ इ.मे "सुल्फा" नामसँ हस्तलिखित पत्रिका निकालहुँ। मइ १९८१ इ.मे "देसकोस" जकर संपादकमे नाम छल विनोद कुमार झाक मुदा संपादन हमही करैत छलहुँ। प्रश्न-- देसकोस कतेक अंक धरि छपलैक ? उत्तर-- तीन अंक धरि। प्रश्न फेर ? उत्तर-- अक्टूबर १९८१ इ.मे "देसिल बयना"क संपादकमे नाम छलन्हि जनार्दन झाक मुदा संपादन हमही करैत छलिऐक। प्रश्न-- कतेक अंकमे कोन रूपमे यथा मासिक,त्रैमासिक? उत्तर-- एकर १३ अंक मासिक पत्रिकाक रूपमे छपलैक। रजस्ट्रेेशनक क्रममे "देसकोस"क नामे डिक्लेरेशन भेटलाक पश्चात ६ अंक धरि देसकोसक नामे प्रकाशित भेल। "मैथिली दर्शन"क पुनः प्रकाशन जनवरी २००५सँ मार्च २००६ धरि त्रैमासिक रूपे भेल जकर संपादन कएलहुँ। प्रश्न-- सेवानिवृति भेलाक पश्चात साहित्य लेल पूर्ण समय भेटल तकर सदुपयोग कोना कएल अछि ? उत्तर-- तकरे परिणाम अछि जे संप्रति मिथिला दर्शनकेँ कार्यकारी संपादकक रूपमे कार्यरत छी जकर इ दोसर पर्याय मइ २००८सँ अद्यावद्यि चलि रहल अछि। प्रश्न-- १५ आब हम पोथी रूपे प्रकाशनक जानकारी चाहब। उत्तर---संपादन------- १) आजुक कविता २) युगप्रवर्तक कवीश्वर चन्दा झा ३) कविपति विद्यापति मतिमान पोथी-------- कविता १) इतिहासहंता (१९७७) २) माटि-पानिक गीत (१९८५) ३) देशक नाम छलै सोन चिड़ैया (१९८६) ४) अपूर्वा (१९९६) ५) लाख प्रश्न अनुत्तरित (२००३) हास्य-व्यंग------ १) बेताल कथा लोककथा---- १) मैथिली लोककथा (१९८३) पुणर्मुद्रण—२००६ निबंध----- १) स्मृतिक धोखरल रंग (२००४) २) आँखि मुनने आँखि खोलने (२००६) अनुवाद------ १) प्रतिध्वनि ( काव्य--१९८२) २) जा सकै छी किन्तु कियै जाउ (काव्य--१९९९-- भाषा-भारती सम्मानसँ सम्मानित) ३) फाँस (नाटक---१९९७) ४) जादूगर ( नाटक--१९८२) ५) रिहर्सल (नाटक---२००४) ६) चारि पहर ( नाटक--मंचित---अप्रकाशित) ७) किशुन जी विशुन जी ( नाटक--मंचित---अप्रकाशित) ८) बाह रे बच्चा राम ( नाटक--मंचित---अप्रकाशित) उपन्यास----- १) पद्मा नदीक माँझी (२००९) २) नन्दितनरके ( अंतिकामे २००९, पोथी-२०११--मैथिलीमे) नन्दितनरके ( बया---२००९,पोथी २०१०-हिंदी मे) प्रश्न-- एकर अतिरिक्तो अनय-अन्य नामसँ कोना लिखलहुँ ? उत्तर---पत्रिका चलएबाक क्रममे रचनाक अभाव भेने अन्यान्य नामसँ लिखलहुँ।लेखनमे रामलोचन ठाकुरक अतिरिक्त कुमारेश काश्यप, अग्रदूत,मुजतबा अली आदि नामे विभिन्न पत्र-पत्रिकामे बहुत रास कविता, निबंध आदि छिड़िआएल अछि। प्रश्न-- मैथिली साहित्यमे किनकासँ प्रभावित भेलहुँ ? उत्तर---सर्व प्रथम विद्यापति तत्पश्चात किरण आ यात्री। प्रश्न-- बहुचर्चित साहित्यिक संस्था "संपर्क" जकर अपने संयोजक छी ताहि प्रसंग अपन मंत्व्य। उत्तर-- २३,२४ आ २५ मई १९८१केँ मुक्तिमोर्चा दरिभंगामे अधिवेशन भेलैक आ आंदोलनकेँ माटिसँ जोड़बाक प्रयासेँ १५ सदस्यीय समीति बना एकरा दरिभंगामे छोड़ि देल गेल। एम्हर देसकोस सेहो नव बाट दिस तकैत छल फलतः हम जनार्दन झा, महेश्वर झा, निरसन लाभ, आ रामाधार मिश्रक सहयोगेँ "देसिल बयना" चलाओल मुदा ओहो दीर्घजीवी नहि भए सकल।"देसकोस"मे सहयोगी छलाह विनोद कुमार झा, सत्यनारायण झा,कुणाल, आदित्यनाथ झा आदि।कलकत्ताक स्थिति क्रमशः एहन भए गेल छलैक जे उल्लेखनीय कोनो कार्यक्रम नहि तैं भेँट-घाँट सेहो दुर्लभ। एहने स्थितिमे संपर्कक स्थापना भेल जाहिसँ मासमे एकहु दिन (मासक दोसर रवि) मैथिली-प्रेमी लोकनि बैसथि आ कुशल-समाचारक आदान-प्रदानक संगहि-संग मिथिला-मैथिलीक चर्च हो।पश्चात एहिमे रचनापाठक प्रक्रिया सेहो प्रारंभ भेल जाहिमे स्वरचित नव रचना पाठक प्रावधान कएल गेल आ ओइ रचनापर विचार-विमर्श सेहो होइछ। प्रकाशनक असुविधाक कारणे नव रचनाकारकेँ प्रोत्साहित केनाइ एकर प्रधान उद्येश्य छैक। सफलता आ असफलताक बात रचनाकारे कहता, तखन ई जे एक नव प्रयोग थिक तकरा अस्वीकार नहि कएल जा सकैए। ओना हमर एहि प्रयोग चरम राँचीमे देखाइत अछि जतए ई संपर्क नामक संस्था कलकत्ताक बाद शुरु भेल मुदा रचनापाठक संगे-संग पोथीकेर प्रकाशन सेहो केलक। एकर विशेषता छैक जे एकर केओ स्थायी अध्यक्ष वा सचिव नहि छथि। प्रति बैसारक अध्यक्ष मनोनीत होइत छथि जे सभाक संचालन करैत छथि। प्रश्न-- अपनेक संपूर्ण सफलताक श्रेय ककर ? जकर प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपें प्रभाव पड़ल। उत्तर---हम जे किछु कएलहुँ वा कए रहल छी तकर श्रेय कलकत्ताकेँ छैक जे वास्तवमे मैथिलक हेतु तीर्थस्थान थिक। पोथी-पत्रिकाक प्रकाशन हो वा आंदोलन वा रंगमंच सभ क्षेत्रमे कलकत्ताक योगदान अविस्मरणीय। नाट्य विषयक आ काव्य विषयक पत्रिका कलकत्तहिसँ सर्वप्रथम प्रकाशित भेल अछि आ जँ सत्य कही तँ----- नाट्य मंचक शुभारंभ सेहो एतहिसँ भेल अछि। वर्णरत्नाकर, पदावली एवं चर्यापद जँ कलकत्ता नहि छपने रहैत तँ हमरा लोकनिकेँ से चेत-सामर्थय कहाँ अछि? प्रश्न-- अपन विभूति जिनका प्रति असीम श्रद्धा हो आ नव-पीढ़ीकेँ सेहो स्मरण रखबाक वास्ते अपन संदेशमे की कहए चाहबैक ? उत्तर--- हम मैट्रिक पास केला उपरान्त कलकत्ता आएल रही। १९६९ इ.मे सरकारी नौकरी भेटलाक पश्चात रात्रिकालीन कौलेजमे नामांकन करबौने रही आ मैथिली रखने रही। हमरा बूझल छल जे मैथिलीक विद्यार्थी नहि होइत छैक भविष्यहुँमे होएबाक संभावना नहि तथापि मैथिली विभूति ब्रजमोहन बाबूक प्रति ई श्रद्धांजलि, आत्मतुष्टियेक लेल कएक नहि हो, छल। जँ प्रातःस्मर्णीय ब्रजमोहन ठाकुरक प्रयासेँ आ आशुतोष बाबूक सदासयतासँ कलकत्ता विश्ववद्यालयकेँ द्वारा मैथिलीकेँ मान्यता प्राप्त नहि भेल रहितैक तँ आइ मैथिली संविधान धरि जा पबैत ताहूमे संदेह। नबोनारायण मिश्र जी द्वारा लेल साक्षात्कार- किशोरीकान्त मिश्र जी सँ लक्ष्मी दास अपन सन मुँह नीन टूटि गेल रहए, मुदा विछानपर पड़ले रही आकि मैझला बेटा उठबैत कहलक- “बाबू चितकबरा काकाकेँ खस्सी चोरि भऽ गेल।” पुछलिऐ- “तूँ केना बुझलिही।” कहलक- “एँह, सौंसे गामक सभ बुझलकै।” सगरे यएह गप-सप्प होइ छै। घटनो आ जिगेसोक खियालसँ बिदा भेलौं। चोर-मोट सभ सोझेमे। घटना भेल कते गोटे केसमे फँसल। शुरूमे जमानत-तमानत करा सभ निचेन भऽ गेलौं। बीस बर्ख बाद वारंटक संग चौकीदार पहुँच गेल। बहुत दिन भेने केस फड़ियबैक विचार भेल। विचार इहो भेल जे जेकर घटना छिऐ ओ जँ अपन बूझि खर्च करए तँ नीक बात। अपना सबहक दौड़-बड़हा ओकर खर्च। चितकबड़ाकेँ पुछल गेल। ठोकल मुँहे बाजल- “हमहीं कहने रहिहह।” अपन सन मुँह लेने चलि एलौं। संस्कृति वर्मा मेहनत एक टा गाम मे दू टा गाछ छल ,एकटा फूल से भरल दोसर काँट से भरल छल. फूल के अपन सुन्दरता पर बड घमंड छल. कांट वाला गाछ चुपचाप रहैत छल,किन्तु वो मेहनती छल..पानी लेल ओकर जड़ी दूर दूर धरि चलि जायत छल. फूल वाला गाछ बड आलसी छल. ओ मालीक पटेल पानि पर जिन्दा रहैत छल. अपने से पानी लेनाय त ओ सीखबे नहि केने छल. आ एक दिन मालीक मृत्यु भ गेलैक. पानी क अभाव मे फूल क गाछ सुखि साखि गेल ,फूल,पात सब टा सुखि बेजान भ गेलैक. एक दिन लकडहारा आबि ओहि गाछ के काटी ल गेल. ई देखि कांट वाला गाछ डेराय गेल.मुदा ओहि गाछ के केओ नहि काटलक. ओकर ठारी के काटी सब ल जायत छल अपन पेड़ पौधाक रक्षा करवा लेल अपन फसिल के रक्षा लेल....काँट क गाछ खुश भ गेल हम केकरो काज ते आबि रहल छी.. एहि कारन कहल गेल छैक जे रूप से किछ नै होयत छैक, जे कर्म होयत अछ ओ फल दैत छैक. अस्तु, मेहनत से जी नै चुरेबाक चाही केकरो.... प्रभात राय भट्ट मिथिला गर्भपुत्र माँ हम अहाक गर्भ मे पलि रहल छी, मुदा जन्म लेबऽसँ पहिले हम अपन मोनक बात किछ आहा के सुनाब चाहैत छी! यी हमर पुनर्जन्म अछी हमअहि मिथिलांचल के जनकपुरधाम मे जन्मलरहलौ ताहि समय मे विदेह एकटा समृद्ध राष्ट्र रहैक जेकर अपन भाषा अपन भेष बिदेह के गौरव रहैक,कोशी स गण्डकी तक गंगा स हिमालय के पट यी सम्पूर्ण भूमि मिथिलांचल रहैक जतय कोशी कमला विल्वती यमुनी भूयसी गेरुका जलाधीका दुधमती व्याघ्र्मती विरजा मांडवी इछावती लक्ष्मणा वाग्मती गण्डकी अर्थात गंगा आर हिमालय के मध्य भाग मे यी पंद्रहनदी के अंतर्गत परम पवन तिरहुत देश विख्यात छल ! जतये कोशी कमला क वेग स संगीत उत्पन होइत्छल दुधमतीस दूध बहथी नारायणी मे स्नान कैयलास स्वस्थ काया भेटैत छल, गण्डकी के वेग स प्रेरित कवी गंडक काव्यसुधा रचित छल,कवी कौशकी कोशी तट बईस काव्यवाचन करैत छल ! अनमोलसंस्कृति आर अनुपम प्रकृति केर उद्गमस्थल याह मिथिलाधाम छल बागबगीचा मे कोइली मीठ मीठ संगीत गबै छल ! शुभ-प्रभातक लाली स मिथिलाक जनजीवन स्वर्णिम छल !हर घर मंदिर आ लोग इह के साधू संत छल चाहे कोनो मौसम होइक सद्खन ईहाबहैत बसंत छल ! पग पग पोखईर माछ मखान मीठ मीठ बोली मुह मे पान इ छल मिथिलाक पहिचान, अहि ठाम जन्म लेलैथ पैघ पैघ विद्वान वाचस्पति, विद्यापति, गौतम, कपिल, कणाद, जौमिनी, शतानंद, श्रृंगी, ऋषि याज्ञवल्क्य, सांडिल, मंडन मिश्र, कुमारिल भट्ट, नागार्जुन, वाल्मीकि, कवी कौशकी, कवी गंडक, कालिदास, कवीर दास, महावीर यी सब छलैथ मिथिलापुत्र एतही जन्म लेलैथ माँ जानकी राजर्षि जनक के पुत्रीक रूप मे !एतही भगवान शिव उगना महादेव के रुपमे महा कवी विद्यापति के चाकर बनलाह ! मिथिला भूमि से अवतरित होइत छल ऋषि मुनि साधू संत भगवान ताहि स कहलगेल की यी मिथिलाभूमिअछि वसुधा के हृदय ! मिथिलाक मान समान स्वाभिमान भाषा भेष प्रेम स्नेह ज्ञान विज्ञान विश्व बिख्यात छल! अहि ठाम जन्म लेबक लेल देवी देबता सबलालायित होइत छल ! तायहेतु हमहू पूर्व जन्म मे माँ जानकी s कमाना कयने रहलू जे हे माता जाऊ हम फेर मानव कोइख मे जन्म ली ता हमरा मिथिले मेजन्म देव ! ताहि स हम अपनेक कोइख मे पली रहल छि! मुदा आजुक मिथिलाक दुर्दशा देखिक हम संकोचित भगेल्हू,विस्वास नए bh हरहाल अछि जे यी वाह्य मिथिला छई राजर्षि जनक के नगरी वैदेहिक गाम की कोनो दोसर ? सब किछ बदलल बदलल जिका लगैय,कियो कहिय हम नेपाल के मिथिला मे छि ता कियो कहैय हम विहार के मिथिला मे छि यी विदेह नगरी दू भाग मे विभक्त कोना भगेलई माए? राजा प्रजा शाषक जनता भाषा भेष व्यबहार व्यापार ज्ञान विज्ञान सब किछ बदलल बुझाईय !मिथिलाक अस्तित्व विलीन आ परतंत्र शासन के आधीन मे हमर मिथिला कोना आबिगेल माए ? मैथिल भाषा कियो नए बाजैय, धोती कुरता फाग के उपहास भरह्लय,महा कवी विद्यापति क गीत कियो नए गबैय ! मिथिलाक संस्कृति लोप के स्थिति मे कोना आबिगेल माए ? समां चकेवा ,जट जटिन,झिझिया, झूमर,झंडा निर्त्य,सल्हेश कुमार्विर्ज्वान,आल्हा उदल,कजरी मल्हार यी नाट्यकला सब कतय चलिगेल ? मिथिलाक एतिहासिक स्थल सब एतेक जरजट कोना भगेल ?माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि विहार मे,माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि नेपाल मे ,माए हमर विदेह राज्य कतय चलिगेल ?माए हम त अपन मिथिला राज्य मे जन्म लेब चाहैत छि मिथिला माए क कोरा सन निश्छल आ बत्सल प्रेम खोजलो स नए भेटत चहुओरा मे !हम अपन मोनक सबटा जिज्ञासा ब्यक्त केनु आब आहा किछ मार्गदर्शन करू माए !हम मजधार मे फसल छि हमर करूणा सुनी हमर सपना साकार करू माए !!! डॉ॰ शशिधर कुमर, ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४ एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र)- ४११०४४ उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-१-२) (भाग -१) किछु दिन पहिने गाम गेल रही । साँझ खन धिया पुता सभ घेर लेलक । सभहक एक्कहिटा जिद्द जे खिस्सा सुनाउ । हम कहल – हमरा किस्सा तिस्सा नञि आबैत अछि । जो दादी सँ सुन गऽ । प्रिया – नञि यौ अहाँ झूठ बजैत छी । हम अहाँक खिस्सा सभ पढ़ने रही विदेह मे । ई सुनितहि बाकी धिया – पुता सेहो जोर सँ चिचिआए उठल – हमहूँ पढ़ने रही । बड्ड नीक लागल छल । हम – ओ तऽ इण्टरनेट पर आबै छै, तोँ सभ कोना पढ़लह । नन्दू बाजल – हमरा सभ केँ इस्कूल मे कम्प्यूटर देलकैए । मास्टर साहेब देखओलन्हि अहाँक लिखल खिस्सा आ पढ़ि कऽ सेहो सुनओलन्हि । विकास – हाँ यौ, हऽम एक जनवरी कऽ पटना मे मामा लग रही । हुनिका लऽग मे लैपटॉप छन्हि, ओत्तहि अहाँक लीखल खिस्सा पढ़लहुँ , बहुत नीक लागल । सोनी – हाँ चित्र सभ सेहो बहुते नीक रहए । एतबहि मे बब्बन सेहो तपाक सँ बाजि उठल – हाँ हमरा ओहने खिस्सा सुनइ के हए । हमनी के परी आर केर खिस्सा नञि सुनै के हए । हम – तऽ अहीं सभ बताउ - आइ की कएल जाए ? कतऽ चलल जाए ? कोन खिस्सा सुनाओल जाए ? बब्बन – हमनी के जे अहाँ सुनेबै से सुनबै । प्रिया – हाँ, अहाँ अपने मोन सँ किछु सुनाउ ने । जएह अहाँ केँ नीक लागए सएह सुनाउ । हम – तऽ चलू आइ किछु एहेन चिड़ै सभक बारे मे सुनबैत छी जे चिड़ै रहितो चिड़ै नञि आ चिड़ै सनि नहिञो लगैत चिड़ैअहि थिक । नन्दू – माने ? सोनी – बुझौअलि नञि बुझाऊ, साफ – साफ कहू ने ! प्रिया – हाँ, खिस्सा सुनबाक अछि बुझौअलि नञि । हम – अरे, धैर्य राखू ! कहै छी सभटा । आइ हम सभ ओहि चिड़ै सभक खिस्सा सुनए जा रहल छी जे उड़ि नञि सकैत अछि – तेँ पहिल नजरि मे ओ सभ चिड़ै नञि बुझि पड़ैत अछि । सोनी – मतलब की चिड़ै रहितहु ओ चिड़ै नहि । हम – एकदम सही । पर ओकर सभक पुरखा लोकनि उड़ैत छलाह । वातावरणक प्रभाव आ आवश्यकता केर अनुसार धीरे – धीरे ओ सभ उड़नाइ छोड़ि देलन्हि आ तेँ आब ओ सभ नञि उड़ि सकैत छथि । नन्दू – मतलब कि, चिड़ै सनि नहिञो लगैत, चिड़ैअहि छथि । बब्बन – (कने दिमाग पर जोर दैत बाजल) – ........वा....ता...व...रणक.........प्रभाव ? नञि बुझली हम । हम – ठीक छै, एना बुझह । हम सभ गोटे मिथिला मे रहैत छी, तेँ मैथिल छी । हमर सभ गोटाक मातृभाषा मैथिली थिक । छै ने ? बब्बन – हाँ से तऽ छै । हम – हम सभ गोटे मैथिली बजैत छी पर तइयो बजबा मे थोड़ेक – थोड़ेक अन्तर थिक । जे पच्छिमी मिथिला मे रहैत छथि तनिका मैथिली मे भोजपूरीक किछु बेशिअहि शब्द मिलल रहैत अछि , तनिकर बजबाक अन्दाज सेहो कने कड़गर रहैत अछि । तहिना जे दक्षिण मिथिला मे रहैत छथि तनिका मे बाङ्गला, उड़िया आ सन्थाली आदि भाषाक कतिपय शब्द सभ मिलल रहैत अछि । जे केन्द्रिय मिथिला (बीच केर मिथिला) मे रहैत छथि तनिकर चारू कात मैथिलीए भाषा – भाषी छथि तेँ हुनिकर मैथिली मे आन भाषाक मिलावट अपेक्षाकृत बहुत कम रहैत अछि । नन्दू - मतलब कि, जे मैथिली भाषा – भाषी मिथिलाक सीमा भाग मे रहैत छथि हुनिकर भाषा मे आन भाषा सभक कारणेँ किछु आनो शब्द वा गुण आबि जाइत अछि जे मूलतः ओहि भाषा केर शब्द वा गुण नहि थिक । हम – एकदम सही । ई भेल सीमापरक मैथिली भाषा पर ओतुक्का वातावरणक प्रभाव । बब्बन – हूँ ऽऽऽ । नम्हर साँस लैत गम्भीरता सँ बाजल । हम – पर एहि तरहक वातावरणक प्रभाव सँ की भाषा बदलि जाइत छै ? नञि ने ? तहिना किछु चिड़ै सभ उड़नाइ बिसरि गेल अछि - पर ओकर पंख एखनो छै । किछु चिड़ै सभक पंख उड़बाक जगह वातावरणक माँग केर अनुरूप पानि मे हेलबाक काज अबैत अछि – पर मूलतः ओ पंखहि थिक । तेँ ओकरा सभ केँ चिड़ै नञि मानब मूर्खता अछि । बब्बन – हँ हमरो बगल मे कुछ लोक सभ कहय छलथिन जे रौआ के भाषा बज्जिका हए ? पर बाबूजी कहै छथिन कि हमनी के भाषा मैथिलीए हए । बस बजै मे दड़िभंगा सँ कनेक अन्तर हए । हम – हँ सही कहय छथि अहाँक बाबूजी । मिथिला, विदेह, वज्जी, बज्जी, तिरहुत आ तिरभुक्ति एक्कहि भू – भाग केर पर्यायी नाँव अछि । तेँ मैथिली, बज्जिका आ तिरहुतिया सेहो एक्कहि भाषा केर नाँव भेल, अलग – अलग भाषा केर नञि । प्राचीन काल मे एकरा “मिथिला भाषा” कहल जाइत छल । बब्बन – हँ अब बुझली । सोनी – मतलब कि मैथिलिअहि केर दोसर नाँव बज्जिका आ तिरहुतिया अछि । कने - मोने जे अन्तर अछि से ओतुक्का वातावरणक असरि थिक । एहि छोट – मोट अन्तर केर आधार पर एकरा सभ केँ अलग अलग भाषा माननाइ ओहने मूर्खता भेल जेना कि एहि विशिष्ट चिड़ै सभ केँ चिड़ै नञि माननाइ । हम – हँ , एकदम सौ प्रतिशत सही बुझलहुँ अहाँ । खैर हम सभ मुख्य खिस्सा पर चली । प्रिया – हँ । हम – शुतुर्मुर्गक नाँव सुनने छह की ? सब धिया – पुता एक्कहि संग बाजि उठल – हँ । अफ्रिका मे होइत छै । बब्बन – हँ , सहाराक मरूस्थल मे होइ हए । हम – बेस । पर सहारा मरूभूमिक अतिरिक्त अफ्रिका महादेशक आनहु भाग – जेना कि सवाना घासभूमि आ दक्षिण अफ्रिकाक कालाहारी मरूभूमि – आदि स्थान सभ मे ओ भैटैत अछि । शुतुर्मुर्ग केँ अंग्रेजी मे ऑस्ट्रिच (Ostrich) कहल जाइत छै । धरती पर एखन पाओल जाएवला चिड़ै सभ मे ई सभ सँ पैघ आ भाड़ी होइत अछि । एक पुर्ण वयस्क पुरुख शुतुर्मुर्गक लम्बाई प्रायः 1.7 सँ 2 मीटर ( 5 फीट 7 इंच सँ 6 फीट 7 इंच) धरि, जखन कि पुर्ण वयस्क स्त्री शुतुर्मुर्गक लम्बाई 1.8 सँ 2.75 मीटर ( 6 सँ 9 फिट) धरि भऽ सकैत अछि । साधारणतः एकर ओजन 60 कि॰ ग्रा॰ सँ 130 कि॰ ग्रा॰ धरि होइत अछि पर कखनो – कखनो 157 कि॰ ग्रा॰ धरि सेहो देखल गेल अछि । एकर टाँग आ गर्दनि नाम – नाम, धऽर भाग पैघ आ भारी पर मूरी बहुत छोट होइत अछि । जमीन सँ मूरी धरिक एकर उँचाई करीब 2 मीटर (6.6 फीट) तक होइत अछि । मूरीक आकार छोट रहितहु आँखि बहुत पैघ – पैघ होइत अछि । एकर आँखिक आकार समस्त रीढ़युक्त प्राणी (Vertebrates; जाहि प्राणी सभ मे रीढ़क हड्डी या ओकर समान कोनो संरचना होइत अछि) सभ मे सभसँ पैघ होइत अछि – एकर आँखिक व्यास (diameter) लगभग 50 मिली मीटर आर्थात् 2 इंच धरि होइत अछि । बहुतहि तीक्ष्ण देखबाक आ सुँघबाक शक्तिक कारण ओ दूरहि सँ अपन दुश्मन प्राणी सभक आहटि बूझि सकैत अछि आ सचेत भऽ सकैत अछि । पवन – अपना सभ मैथिल जेकाँ नञि, कि लऽग मे बैसलो दुश्मन केँ नञि चीन्हि सकी । अपन घऽर धू – धू कऽ जड़ैत रहय आ दोसराक संग बैसि कऽ थोपड़ी बजबैत रही । हम - हूँऽऽ । बड्ड फुराए छऽ तोरो । खैर, जीव विज्ञान वा प्राणीशास्त्रक (Life Science / Biology / Zoology) भाषा मे एकर नाँव स्ट्रुथिओ कैमेलस् (Struthio camelus) थिक । नन्दू – कैमेल माने ऊँट । हम – हाँ, कैमेल माने ऊँट । ऊँटहि सन शुतुर्मुर्गक पीठ पर सेहो कुब्बर होइत अछि आ रहितो अछि ऊँटहि जेना मरूस्थलहि मे - तेँ कैमेलस् । एकर पएरक हड्डी आ मांसपेशी बहुत मजबूत होइत अछि आ तेँ विपत्तिक समय मे ओ 70 कि॰ मि॰ प्रति घण्टाक गति सँ प्रायः आधा घण्टा धरि दौड़ि सकैत अछि । ओ सभ झुण्ड मे रहैत अछि जकर नेतृत्व कोनो ने कोनो पुरुख शुतुर्मुर्ग करैत अछि । एक झुण्डक सभ स्त्री सदस्य लोकनि माटिक तऽर मे बनल एक्कहि घोसला मे अण्डा दैत छथि । आ ई अण्डा सभ देखै मे भलेहि हमरा सब केँ एकरँगाह लागय पर सभ स्त्री शुतुर्मुर्ग अपन अपन अण्डा केँ चीन्हि सकैत छथि - छै ने आश्चर्यक गप्प ! आ एतबहि नञि स्त्री शुतुर्मुर्गक एक अण्डाक व्यास (diameter) 30 सँ 60 सेण्टी मीटर ( 12 सँ 24 इंच) धरि भऽ सकैत अछि । बब्बन – अरे ! ई तऽ फूटबॉल सऽ सेहो पैघ होइ हए । हम – हाँ । शुतुर्मुर्गक अण्डा संसार मे सभसँ पैघ होइत अछि । शुतुर्मुर्ग ओना तऽ शाकाहारी होइत अछि पर भोजनक अभाव मे छोट – मोट कीड़ा मकोड़ा खा कऽ सेहो गुजर करैत अछि । माँसु, चमड़ा आ पंखक लेल पिछला 200 वर्ष मे एकर अत्यधिक शिकार होयबाक कारणेँ आइ ई विलुप्त होयबाक स्थिति मे आबि गेल अछि आ सम्प्रति संरक्षित वन्य प्राणी अछि । प्रिया – ई तऽ बहुत दुखक गप्प थिक । हम – हाँ से तऽ छै । शुतुर्मुर्गक बाद उँचाई मे दुनिञाक सभसँ पैघ चिड़ै अछि – एमू (Emu) । एकर अधिकतम् ऊँचाई 1.5 सँ 1.9 मीटर (5 फीट सँ 6 फीट 3 इंच धरि) होइत अछि । ओ ऑस्ट्रेलिया केर मूल निवासी अछि आ ओतहि पाओल जाइत अछि । ओकर जैववैज्ञानिक नाँव थिक ड्रोमैअस नॉवीहॉल्लैण्डी (Dromaius novaehollandiae) । एमू प्रायः समस्त ऑस्ट्रेलिया मे विचरण करैछ । आ ताहि कारणेँ ...................... ................... आ ताहि कारणेँ ओ ऑस्ट्रेलिया केर राष्ट्रिय चिड़ै थिक – विकास बीच्चहि मे बाजि उठल । हम – अरे वाह अहाँ केँ तऽ बूझल अछि । विकास – हाँ G.K. केर किताब मे पढ़ने छलियै । हम - एमू ओना तऽ शाकाहरी होइत अछि पर विपत्तिक समय मे सर्वाहारी (Omnivorous) भऽ जाइत अछि आ अपन भूख मेटाबय लेल चमगादर आ छोट – छोट कीड़ा मकोड़ा केँ सेहो खा जाइत अछि । एकर पएर बहुत मजबूत आ तीनू औंठाक नऽह तिक्ष्ण नोक वाला भाला सन चांगुर (पञ्जा) मे परिवर्तित भऽ गेल अछि । ई चांगुर एतेक मजबूत होइत अछि कि लोहाक ताड़क सामान्य छहड़देवाली केँ तोड़ि सकैत अछि आ शिकारी शत्रु सभ सँ अपन रक्षा करबाक हेतु प्रयुक्त होइछ । सोनी – ई तऽ शुतुर्मुर्गे जेकाँ अछि । हम – हाँ किछु – किछु पर ओहि सँ अलग विशेषता सेहो रखैत अछि । जेना कि जरूरत पड़ला पर ओ पानि मे हेल सकैत अछि । एमू राति मे लगातार नञि सूति सकैत अछि । ओ ओना तऽ करीब 7 घण्टा सुतैत अछि पर हरेक 90-120 मिनट पर किछु खएबाक लेल वा मल विसर्जनक लेल उठैत अछि । एहि प्रकारेँ एक राति मे ओ निन्न सँ चारि सँ छौ बेर उठैत अछि । शुतुर्मुर्ग बेशी समय झुण्ड मे रहैत अछि आ यथासम्भव मनुक्ख सँ दूर रहए चाहैत अछि जखन कि एमू बेशी समय एकसरि रहैत अछि पर ओकरा मनुक्खक उपस्थिति सँ परहेज नञि छै । उनटहि ओ उत्सुकतावश मनुक्खक घऽरक नजदीक सेहो अबैत अछि आ मनुक्ख तथा आन जीवक चेष्टा वा नकल सेहो करैत अछि । प्रिया – तखन तऽ ओहो एहि मामिला मे नकलची बानर आ सुग्गा सनि भेल । हम – एकदम्महि की । स्त्री एमू बहुत बेर दोसर एमू केर घोसला मे अपन अण्डा दैत अछि । एहि तरहक घटना केँ जीवविज्ञान मे पोषक परजीविता (Brood parasitism) कहल जाइत अछि । पवन – यौ एहने काज कोयली सेहो करैत अछि । ओ कौआ केर घोसला मे चुपचाप अण्डा दैत अछि आ अपने भागि जाइत अछि । कौअहि कोयलियोक अण्डाक केँ अप्पन अण्डा बुझि देख - रेख करैत रहैत अछि । हम – ठीक बुझल अछि पवन बाबू । बस थोड़ेक अन्तर छै, कौआ आ कोयली दूनू अलग अलग तरहक चिड़ै अछि पर एहि ठाम एक एमू दोसर एमूक घोसला मे अण्डा दैत अछि । एमू केर सम्पुर्ण आयु 10 सँ 20 वर्षक होइत छैक । 1788 ई॰ मे जखन यूरोपवासी पहिल बेर ऑस्ट्रेलिया मे बसय गेलाह तऽ ओ खएबाक लेल एमू केर मांसु आ डिबिया जड़यबाक लेल एमू केर चर्बी प्रयोग करैत छलाह । एखनहु बहुत जगह मुर्गी आ बत्तख जेकाँ मांसु, चमड़ा आ चर्बी केर लेल एकरा पोषल जाइत अछि । विकास – ई तऽ पटना केर चिड़ियाखाना मे सेहो छै । ओतऽ एहने सनि एकटा आओरो चिड़ै छै जकर माथ पर कलगी रहैत छै गर्दनि नीला रंगक रहैत छै आ गर्दनि केर आगाँ भाग मे लाल रंगक भालरि लटकैत रहैत छै । प्रिया – से कोन ? विकास – ओकर नाम छै ........... क् ........ क् ...... केशो...... अरे याद नञि आबि रहल अछि ठीक सऽ । पर ओहो ऑस्ट्रेलिया केर मूल निवासी अछि । हम – विकास सही कहि रहल अछि । चलू नाँव हऽम बताए दैत छी । ओकर नाँव अछि कैसोवरी (Cassowary) । ई उत्तरपुर्वी ऑस्ट्रेलिया, न्यु गिनी (New Guinea) आ आस पड़ोसक द्वीप सभक आर्द्र वर्षावन (Humid Rainforest) केर मूल निवासी अछि । सम्प्रति एकर तीनि टा जाति जिबैत अछि – दक्षिणी कैसोवरी / कैजुएरिअस् कैजुएरिअस् (Casuarius casuarius), उत्तरी कैसोवरी / कैजुएरिअस् अनअपेण्डिकुलेटस् (Casuarius unappendiculatus) आ वामन या छोटका कैसोवरी / कैजुएरिअस् बेन्नेट्टाई (Casuarius bennetti) । एहि मे सँ दक्षिणी कैसोवरी विश्वक सभसँ भारी चिड़ै (शुतुर्मुर्गक बाद) आ ऊँचाई मे तेसर सभसँ पैघ चिड़ै (शुतुर्मुर्ग आ एमूक बाद) अछि । एकर कलगी केँ कैस्क्यू (Casque) कहल जाइत छै, जे कि सम्भवतः अवाज ग्रहण (sound reception & acoustic communication) करबाक काज करैत अछि । ओना तऽ ई सर्वभक्षी (Omnivorous) अछि पर विशेष रूप सञो फलभक्षी (Frugivorous) अछि । जखन गाछ सँ फऽल पाकि कऽ खसए लागैत अछि तऽ हरेक कैसोवरी एक - एक टा गाछ चुनि कऽ ओकरा नीचा मे बैसि जाइत अछि आ खसल फऽल सभ खा कऽ गुजर करैत अछि । सेब आ केरा सन पैघ फऽल सभ केँ सेहो बीया सहिते सौंसे भकसि जाइत अछि । फऽल खसब समाप्त भेला पर ओतय सञो आन गाछक नीचा या अनतऽ चलि जाइत अछि । नवजात कैसोवरी मैलछौंह रंगक आ भूरा रंगक धारीयुक्त (brown-striped) होइत अछि । एकर आयु प्रायः 40 सँ 50 वर्षक मानल जाइत अछि । एकर माँसु सीझबा मे आ पचबा मे बहुत कठिन होइछ, तेँ प्रायः उपयोग नञि कयल जाइत अछि । बब्बन – यौ, ईहो पानि मे हेलि सकय हए की ? हम – बेस पूछल बब्बनजी अपने । ई पानि मे हेलए मे माहिर अछि – हेलि कऽ पैघ – पैघ नदी केँ पार कऽ सकैत अछि आ समुद्रहु मे आराम सँ हेलि सकैत अछि । एतबहि नञि घनगर जंगल – झाड़ मे सेहो करीब 50 कि॰ मी॰ प्रति घण्टा केर गति सँ दौड़ि सकैत अछि आ 1.5 मीटर ( करीब 5 फीट) धरि कूदि सकैत अछि वा छड़पि (jump) सकैत अछि । बब्बन – बेज्जोर । सोनी – एकर बाद आब कक्कर बारी छै ? पवन – तोहर । ...................ई सुनितहि सभ धिया – पुता भभा कऽ हँसि पड़ल । हम – सुनह आब राति बहुत भऽ गेल छैक तेँ अजुका खिस्सा आइ बीचहि मे रोकैत छी । काल्हि खन साँझ मे आगा कहबह । सोनी – नञि आइए पूरा करए पड़त । हम – हमरा कोनो दिक्कति नञि पर अहाँ सभक माए – बाबू अहाँ सभ केँ डँटताह । ओना सूतब सेहो जरूरी थिक शरीरक लेल । जँ भरि राति खिस्से सुनैत रहब तऽ सूतब कखन ? आ से नञि तऽ काल्हि भोरे फेर इस्कूल कोना जायब ? प्रिया – ठीके कहय छी अहाँ । हम सभ जाइत छी । सोनी – पर हम सभ अहाँ केँ छोड़ब नञि, काल्हि पूरा करइए टा पड़त खिस्सा । हम – जरूर । उड़ि ने सकी पर चिड़ै छी हम (भाग-२) अगिला साँझ, हाट – बजार कऽ कऽ आङ्गन अबैत रही । दूरहि सँ कोनटहि लऽग सँ बुझा गेल जे धिया – पुता सभ बाट ताकि रहल अछि । आइ संख्या सेहो किछु बेशीअहि बुझि पड़ल, जे कि यथार्थे छल । लऽग अबितहि सभ धिया - पुता सामने राखल काठक कुर्सी पर हमरा झीकि – तीरि कऽ बैसा देलक आ अपने सभ सामने राखल चौकी पर बैसि रहल । सोनी – तऽ चलू आब शुरू भऽ जाउ आ आगाक खिस्सा सुनाउ । कञ्चन – हम्मे काल्हि नञि रहियै , हम्मे शुरू सऽ सुनबै । किछु धिया पुता सभ बाजल – नञि ! नञि ! हम सभ आगा केर खिस्सा सुनब । कञ्चन आइ भोरहि भागलपुर सँ आयल छलि, एहि ठाम ओकर मामा गाम । तऽ फेर भगिनमानक बऽल, कोना ओकर बात टारि सकैत छलियै । बाकी धिया – पुता केँ सेहो मोन नञि तोड़ल जा सकैत छल तेँ ओकरा सभ केँ समझबैत पहिलुका खिस्सा एक बेर फेर सँ संक्षेप मे कहल । .......................... तऽ हम सभ कैसोवरी लग आबि कऽ रूकल रही ?? - हँ, आ एकर बाद “सोन चिड़ै” केर बारी रहए । बब्बन सोनी दिशि इशारा करैत बाजल । सभ धिया – पुता फेर जोर सँ भभा कऽ हँसि पड़ल । सोनी ओहि ठाम सँ उठि, हमर कुर्सीक कात मे आबि ठाढ़ि भऽ गेलि । थोड़ेक तामस मे बाजलि – यौ देखै छियै ई सभ कोना हमरा खौंझबैत रहइए । - हम कात मे राखल एकटा मचिया अपन कुर्सीक बगल मे रखैत बजलहुँ – ठीक छै तोँ एहि ठाम बैसह । एहि मे खौंझाइ केर कोन गप्प , तोँ तऽ छऽहे “सोन चिड़ै” । लोक तऽ दुलार सँ कहैत छौ ने । - ओकर तामस कम होइत निपत्ता भऽ गेलै जेना कि सहजहि धिया – पुता सभ मे होइत छै । ओ हमरहि लऽग ओहि मचिया पर बैसि रहलि । - हँ तऽ ऑस्ट्रेलिया केर बगल मे कोन देश छै ? - हम बाकी धिया – पुता दिशि मूँह करैत बजलहुँ । – न्यूजीलैण्ड । सभ धिया पुता केँ शान्त देखि कञ्चन कने गम्भीर पर आत्मविशवास भरल स्वर मे बाजलि । हम – आ ओहि ठामक राष्ट्रिय चिड़ै कोन ? – सभ धिया पुता फेर अवाक भए हमर मूँह ताकए लागल । - तोँ सभ क्रिकेट खेलय जाय छह, टी॰ भी॰ पर सेहो देखै जाय छह, कने जोड़ दहक दिमाग पर – हम बजलहुँ । हम पुनः बजलहुँ - अच्छा छोड़ह, ई कहह जे न्यूजीलैण्ड केर लोक सभ केँ की कहल जाइत छै ? बब्बन – चहकैत बाजल – अरे, हाँ ................ कीवी । हम – एकदम सही “कीवी” ओहि ठामक राष्ट्रिय चिड़ै अछि आ ओहो उड़ि नञि सकैत अछि आ ओकरहि कारणेँ ओहि ठामक रहनिहार लोक सभ केँ सेहो कीवी कहि सम्बोधित कयल जाइत अछि । कीवीक वंश (Genus) थिक अटेरिक्स (Apteryx) । एकर पाँच टा जाति (Species) पाओल जाइत अछि , जाहि मे सँ अटेरिक्स ऑस्ट्रेलिस (Apteryx australis) बेशी प्रशिद्ध । ई लजकोटरि आ मुख्यतः राति मे विचरण कएनिहार चिड़ै अछि । तेरहम सती मे न्यूजीलैण्ड मे मनुक्खक आगमन सँ पहिने ओहि ठाम कीवी केर कोनो शत्रु नञि छल । परञ्च मनुक्ख अपना संगहि कुकुर, बिलाइ आ ओकरहि सन आन जानवर जेना कि स्टोट (Stoat) फेर्रेट (Ferret ,बिज्जी केर एक प्रकार) आदि सेहो नेने आयल । स्टोट आ फेर्रेट कीवीक अण्डा केर परम शत्रु आ कुकुर बिलाइ वयस्क कीवीक । एहि प्रकारेँ कीवीक संख्या बहुत कम होइत गेल आ ई चिड़ै वलुप्त होयबाक श्रेणी मे आबि गेल । एकरा बचयबाक लेल 2000 ई॰ मे न्यूजीलैण्ड मे पाँच टा कीवी अभयारण्य (sanctuary) बनाओल गेल अछि । प्रिया – से सभ तऽ ठीक । पर एकरा बारे मे कोनो विशेष बात बताउ । हम – बहुत किछु विशेषता छै । एकर सूँघबाक शक्ति बहुत तेज होइत अछि । सोनी – तखन तऽ ईहो कुकुरहि भेल कि ने ? हम – हाँ एहि मामिला मे कुकुरहि सन तेज । एकर नमगर चोंचक अगिला भाग मे नासाछिद्र (Nostrils) होइत अछि जखन कि आन चिड़ै सभ केर चोंच केर पछिला भाग मे । ई सर्वाहारी अछि आ फल – फूल, कीड़ा – मकोड़ा, बेङ्ग – दादुर आदि खा जाइत अछि । कीवी बिना देखनहि, जमीनक नीचा मे, बिल मे बैसल कीड़ा – मकोड़ा केँ सही – सही अन्दाजि सकैत अछि । यद्यपि शुतुर्मुर्गक अण्डा केर वास्तविक आकार दुनिञा मे सभसँ पैघ अछि , पर वयस्क चिड़ै केर आकार केर अनुपात मे अण्डा केर आकार देखला सँ कीवीक अण्डाक सानुपातिक अकार (Relative / comparative size) सभसँ पैघ होइछ । कीवीक एक अण्डा केर ओजन वयस्क स्त्री कीवीक ओजन केर चौथाई ओजन धरि भऽ सकैत अछि । ई किछु गिनल - चुनल चिड़ै मे सँ अछि जे एक बेर जोड़ी बनओलाक बाद जिनगी भरि संग रहैछ । विकास – हूँ । से नञि बूझल छल । हम – आब हम सभ नऽव दुनिञा दिशि चली । बब्बन – नऽव दुनिञा ? हम नञि बुझली । प्रिया – अमेरिका के नऽव दुनिञा कहल जाइत छै ........छै ने ? हमरा दिशि तकैत बाजलि । हम – हँ नऽव दुनिञा (New World) प्रायः अमेरिकहि केँ आ खास कऽ दक्षिणी अमेरिका (उच्चारण – दैच्छनी अमेरिका) केँ कहल जाइत छै । ओना किछु लोक ऑस्ट्रेलिया आ लऽग – पासक द्वीप समूह सभ केँ सेहो नऽव दुनिञा कहैत छथिन्ह । कञ्चन – यानि कि हम्मे सभ एक नऽव दुनिञा सऽ दोसर नऽव दुनिञा जयवो । हम – हँ । तऽ चली । सभ केओ तैय्यार छी । - सभ धिया – पुता एक स्वरेँ बाजल – हँ, तैय्यार छी । हम - द॰ अमेरिका केर मूल निवासी अछि “रिया” । ई करीब – करीब पूरा दक्षिणी अमेरिका – जेना कि ब्राजील, पेरू, अर्जेण्टीना, चीली आदि देश – मे पाओल जाइत अछि । पवन – रिया तऽ हमर मौसी के नाम हए । हम – पर एहि ठाम “रिया” मनुक्खक नञि, चिड़ै केर नाँव थिक । एकर दू टा जाति पाओल जाइछ – पहिल बड़की रिया या रिया अमेरिकाना (Rhea americana) आ दोसर छोटकी रिया या रिया पिन्नाटा (Rhea pennata) । ई सभ सर्वाहारी (Omnivirous) होइत अछि पर अधिकांशतः चाकर पत्तावला गाछ – बिरिछ केर पात खाइत अछि, पर जरूरति पड़ला पर फल, बीया आ छोट – मोट गाछक जड़ि सेहो चिबा जाइत अछि । भूख लगला पर छोट – मोट कीड़ा – मकोड़ा आ गिरगिट धरि खा सकैत अछि । नञि उरि सकएबला चिड़ै सभ मे रिया केर पंखक आकार सभसँ पैघ होइत अछि आ जखन ओ चलैत वा दौड़ैत अछि तऽ पंख केँ थोड़े – थोड़े पसारि लैत अछि । ई चिड़ै बहुत चलाक होइत अछि । सोनी – से कोना ? हम – पहिने बताओल आन चिड़ै सभ जेना ईहो जमीने पर अपन अण्डा दैत अछि , घोसला आस – पास मे पाओल जाय वला घास – पात सँ बनबैछ । एक घोसला मे 10 सँ 60 धरि अण्डा भऽ सकैत अछि । पवन – एहि मे कथी केर चलाकी ? हम - ई एकर चलाकी नञि । अण्डा खएनिहार जीव – जन्तु केर ध्यान बहटारए केर लेल ई चिड़ै अपन मुख्य घोसला केर चारू कात दू – चारि टा अण्डा छोड़ि दैत अछि । एहि प्रकारेँ अपन किछु अण्डा केर बलि दऽ कऽ शेष अण्डा केँ बुद्धिमानी सँ सुरक्षित बचा लैछ । बब्बन – हँ, तऽ बुझली, इएह छी एकर चलाकी । हम – दक्षिणी अमेरिका मे एक गोट आओरो चिड़ै भेटैछ , जे उड़ि नञि सकैछ । केओ बता सकैत छी ओकर नाँव ?? - सभ धिया – पुता एक दोसराक मूँह ताकए लागल । पर केओ किछु नञि बाजल । हम – “पेंगुइन” केर नाम सुनने छह की ? - सभ धिया – पुताक जेना भक टुटि गेल हो । एक्कहि संगे जोर सँ बाजल – यौ ! ओ तऽ अण्टार्कटिका मे होइत छै । सोनी – अहीं तऽ अपन पिछला खिस्सा – “खिस्सा अण्टार्कटिका केर” - मे लिखने छलियै । यौ अहूँ केँ निन्न लागल सन बुझाइत अछि । हम – निन्न नञि लागल अछि । हम ई थोड़े ने लिखने रही कि पेंगुइन (पेंग्वीन) खाली अण्टार्कटिकहि मे होइत अछि । पेंगुइन केर करीब 17 सँ 20 जाति पाओल जाइत अछि आ ओ अण्टार्कटिकाक अतिरिक्त दक्षिणी अमेरिका (अर्जेण्टीना, चीली), ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रिका, गैलेपैगोस द्वीपसमूह आदि स्थान पर पाओल जाइत अछि । ई सभटा स्थान पृथ्वीक दक्षिणी गोलार्ध (Southern hemisphere) मे अबैछ । जे अकार मे पैघ आ भारी पेंगुइन अछि ओ ठण्ढा जगह पर आ जे छोट आ हल्लुक पेंगुइन अछि से अपेक्षाकृत गर्म जगह पर पाओल जाइछ । सम्राट पेंगुइन या एम्पेरर पेंगुइन (Emperor penguin) सभसँ पैघ आ भारी होइछ जे कि अण्टार्कटिका मे रहैछ । एकर ऊँचाई 1.1 मीटर (लगभग साढ़े तीन फीट) आ ओजन लगभग 35 कि॰ग्रा॰ धरि होइत अछि । सम्राट पेंगुइन केर जैव वैज्ञानिक नाँव अछि ऑप्टेनोडाइटिस फोर्सटेराइ (Aptenodytes forsteri) । अच्छा, अहाँ सभ केँ एकरा बारे मे की की बूझल अछि ? बब्बन – ई हमरे आर मनुक्ख जेकाँ दू पैर सऽ चलि सकै हए । हम – एकर मतलब कि अहाँ सभ एहि चिड़ै सँ अपरिचित नञि छी । पेंगुइन मनुक्खे जेकाँ दू पएर सँ धऽर उठा कए नाकक सीध मे चलि सकैत अछि । एहि चलबाक समय ओकर छोट- क्षीण नाँगरि (Tail) सन पछिला भाग ओकरा अपन शरीर केँ सन्तुलित रखबा मे मदति करैछ । कञ्चन – हम्मे डिस्कवरी चैनल पर देखने रहियै जे ओकर पेट उज्जर आ पीठ कारी होइ छैक । हम – एकदम सही, ओकर पेटक रंग बर्फ सन उज्जर होइत अछि । एहि कारणेँ समुद्रक अन्दर सँ ताकि रहल शिकारी समुद्री जीव – जेना कि सील, वालरस आदि – समुद्रक कात मे बर्फ पर ठाढ़ पेंगुइन आ बर्फ मे भेद नञि कऽ पबैछ । एहि प्रकारेँ पेटक उज्जर रंग ओकरा लेल सुरक्षा – कवच सन काज करैत छै । तहिना पीठ परक कारी रंग सेहो – आकाश मे उड़ि रहल पैघ शिकारी चिड़ै सभ पाथर सन बुझि धोखा खा जाइत अछि । जीव विज्ञान मे एहि प्रकारक प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था केँ छद्मावरण (Camouflage) कहल जाइछ । एकर आन उदाहरण अछि गिरगिट केर रंग बदलब । आओर की ? सोनी – ओ पानि मे सेहो हेलि सकैत अछि । हम – बेस कहल । ओ समुद्रक पानि मे डुम्मी काटि कऽ हेलि (Diving) सकैत अछि । ओकर देह मे बहुत चर्बी रहैत छै । अहाँ सभ केँ बुझले होयत कि चर्बी पानि सँ हल्लुक होइत अछि आ तेँ ओ पानि मे हेलबा मे मदति करैछ । ई चर्बी पेंगुइन केँ ठण्ढी सँ सेहो सुरक्षित रखैछ । ओकर दुनू पंख पानि मे हेलबाक लेल अनुकूलित भऽ गेल अछि आ हेलबाक समय नाओ केर पतवाड़ि सदृश काज करैछ । ओ 6 सँ 12 कि॰ मि॰ प्रति घण्टा केर गति सँ पानि मे दुम्मी मारि कऽ हेलि सकैछ । सम्राट पेंगुइन समुद्र केर भीतर 365 मीटर अर्थात् 1870 फीट गहीर तक जा सकैत अछि । ओ समुद्री माछ आ जीव जन्तुक शिकार कऽ कऽ अपन पेट भरैछ आ कहुखन – कहुखन इएह फेरी मे स्वयं आन समुद्री प्राणीक (यथा सील आ वालरसक) शिकार सेहो बनि जाइछ । ओ समुद्रक पानि सेहो पिउबि कऽ पचा सकैत अछि आ समुद्रक पानि केर संग पिउल गेल अतिरिक्त नोन केँ मगरमच्छे जेकाँ नोरक संग बहा दैछ । पानि मे पेंगुइन केर हेलबाक प्रक्रिया देखबा मे बहुत किछु हवा मे कोनो चिड़ै केर उरबाक प्रक्रिया सँ मेल खाइछ । प्रिया – सही मे , ई तऽ चिड़ै सनि लगिते नञि अछि । हम – हाँ । कखनो - कखनो ई बर्फ पर छहलैत – छहलैत (Sliding) एक जगह सँ दोसर जगह पहुँचि जाइछ तऽ कखनो – कखनो छोट धिया – पुता जेकाँ दुनु पएर उठा कऽ कूदि – कूदि कऽ सेहो चलैछ । पवन – आश्चर्य !!! हम – हाँ आश्चर्ये थिक । ओना तऽ नञि उड़ि सकनिहार करीब 40 प्रकारक चिड़ै अछि पर ई चिड़ै सभ लोक केँ बेशी आकर्षित करैत अछि तेँ अहूँ सभ केँ सुना देलहुँ । ई खिस्सा आब एतहि समाप्त करैत छी । विकास – तइयो किछु आओर एहि तरहक चिड़ै सभहक नाँव तऽ बताउ । हम – नाँव तऽ अहूँ सभ केँ बुझले अछि – मुर्गा, बत्तख आ मोर । प्रिया – पर ओ सभ तऽ उड़ए छै । हम – नञि खा गेलहुँ ने धोखा । ओ सभ वास्तव मे उड़ैत नञि अछि, कोनो ऊँच स्थान सँ कुदैत अछि, अपन पंख केँ फड़फड़बैत अछि आ हवा पर गुड्डी (पतंग) जेकाँ उधियाइत वा उड़ियाइत (Glide) रहैत अछि । पवन – ठीके यौ, सही कहलहुँ अहाँ । हम – चलैत – चलैत एकटा नाँव आओर बता दैत छी – “डोडो” (Dodo) । ई चिड़ै मॉरिशस केर मूल निवासी छल, उड़ि नञि सकैत छल । अत्यधिक शिकार होयबाक कारणेँ ओ करीब चारि – साढ़े चारि सौ वर्ष पहिने विलुप्त (Extinct) भऽ गेल । पवन – ओह ! ई तऽ बहुत खड़ाब भेल । हम – हँ से तऽ अछि । पर जे एक बेर विलुप्त भऽ गेल से फेर सँ दोबारा नञि आबि सकैत अछि । - किछु क्षण केर लेल सभ धिया पुता शान्त भऽ गेल । - शान्तिमय वातावरण केँ तोड़ैत हम बजलहुँ । ठीक अछि तऽ आब चलबाक चाही । - हाँ । सभ धिया – पुता बेमोन सँ बाजल । सोनी – फेर अगिला बेर कोन खिस्सा सुनाएब । हम – से अगिलहि बेर कहब । ता धरि शुभ रात्रि । दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए वर्ष अर्थात् खिस्सा अण्टार्कटिका केर आइ धिया – पुता सभ सोचैत होयताह कि विदेहजी फेर अहू बेर कोनो उपदेश वला कविता वा गीत लऽ कऽ अओताह आ अनेरो हमर सभक दिमाग खएताह । तऽ से नञि, एहि बेर कोनो उपदेश नञि । एहि बेर हम अहाँ सभ केँ एकटा दूर देशक यात्रा पर लऽ चलैत छी – देश नञि महादेश थिक ओ । चारू कात पानि सँ (समुद्र सँ) घेड़ायल अछि – तेँ महाद्वीप थिक ओ । अहूँ सभ सोचैत होयब कि एहि ठिठुरल जार मे के घऽर छोड़ि कऽ घूमय लेल निकलत । पर जतऽ जयबाक विचार अछि ओहि ठाम तत्तेक ने जार पड़ैत अछि कि अपना ओहि ठामक माघ मास आ तीला संक्राँतिक जार सेहो गर्मी सनि बुझि पड़त । अहाँ सभक मोन मे होइत होयत जे कहीं हम कनाडा या स्विटजरलैण्ड केर बात तऽ नञि कऽ रहल छी । नञि – कथमपि नञि - स्विटजरलैण्ड वा कनाडा तऽ देश थिक आ हम महादेशक बात कऽ रहल छी । ओ महादेश जत्तऽ प्राकृतिक रूप सँ मनुक्ख नञि रहैत अछि । ............... सही सोचि रहल छी अहाँ सभ, ओकर नाम थिक “अण्टार्कटिका” । अप्पन धरती केर दक्षिणी ध्रुव केर चारू कात बसल महादेश अण्टार्कटिका । अण्टार्कटिका ग्रीक शब्दक रोमण संस्करण थिक, जकर अर्थ होइत अछि “आर्कटिक केर विपरीत” (Anti - Arctic) अर्थात् “उत्तर केर उनटा” , माने कि “दक्षिण” । चित्र सं॰ - 1 – धरतीक ग्लोब पर अण्टार्कटिकाक स्थिति अहाँ सभ केँ ई तऽ बुझले होयत कि धरती गोल अछि आ एकर दुनु ध्रुव समतोला सन थोड़ेक धँसल आ सपाट अछि । उत्तरी ध्रुव केँ 90° उत्तरी अक्षांश रेखा आ दक्षिणी ध्रुव केँ 90° दक्षिणी अक्षांश रेखा कहल जाइत अछि । रेखा नाम रहितहु ई दुनु रेखा नञि भऽ कऽ एकटा विन्दुक सदृश थिक । एकर दुनुक आस पासक क्षेत्र केँ क्रमशः “आर्कटिक क्षेत्र” आ “अण्टार्कटिक क्षेत्र” कहल जाइत अछि । संसार मे सात टा महादेश थिक जाहि मे सँ एक थिक “अण्टार्कटिका” । ओहि ठाम चारू कात केवल बर्फे - बर्फ अछि, सौंसे धरती बर्फक तऽर मे नुकायल रहैत अछि । ओ दुनियाक सभसँ बेशी निर्जन, ठण्ढा, हवा - बिहाड़ि युक्त आ शुष्क क्षेत्र अछि । सामान्य भाषा मे शुष्क माने सुखायल । अहाँ सभक मोन मे प्रश्न उठल होयत कि एक तरफ तऽ हम कहि रहल छी जे चारू कात केवल बर्फे - बर्फ अछि आ दोसर तरफ कहैत छी दुनिञाक सभ सँ सुखायल क्षेत्र – से कोना ? ओहि ठामक न्यूनतम् तापमान – 89.2°C (-128.6°F) नापल गेल अछि (रूसी अण्टार्कटिक केन्द्र “वोस्तोक” द्वारा) । तेँ पानि जमि कऽ ठोस आ कठोर (पाथरहु सँ बेशी कठोर) बर्फ भऽ जाइत अछि – हवा सँ पानिक अंश वा आर्द्रता (moisture / humidity) पुर्ण रूपेँ निपत्ता भऽ जाइत अछि, परिणामस्वरूप हवा अत्यन्त शुष्क भऽ जाइत अछि । संगहि ओहि ठाम सतह पर कोनो ऊँच पहाड़, गाछ - वृक्ष वा आन अवरोध नञि होयबाक कारणेँ ई हवा बिना रोक – टोक केर बहैत रहैत अछि आ बिहाड़िक रूप लऽ लैत अछि । एहि ठाम हवा केर अधिकतम् गति 320 कि॰मि॰ प्रति घण्टा नापल गेल अछि । दक्षिणी ध्रुव केर नज़दीक बर्फक अधिकतम् मोटाई 4.776 कि॰मि॰ पाओल गेल अछि – जाहि सँ ओहि ठामक ठण्ढीक अन्दाज आसानी सँ लगाओल जा सकैत अछि । विश्वक स्वच्छ पानि (fresh water) केर लगभग 70% अण्टार्कटिकाक हिम – आवरणक रूप मे जमल अछि जखन कि विश्वक सम्पुर्ण बर्फक 90% भाग एकसरि अण्टार्कटिका मे अछि ।
अण्टार्कटिका केर क्षेत्रफल लगभग 1 करोड़ 40 लाख वर्ग कि॰मि॰ (14.00 million km2) थिक आ ओ एशिया, अफ्रिका, उ॰ अमेरिका आ द॰ अमेरिकाक बाद विश्वक पाँचम सबसँ पैघ महादेश अछि । ई चारू कात सँ दक्षिणी हिम महासागर (अण्टार्कटिक महासागर) सँ घेड़ायल अछि । एहि महासागरक ऊपरुका भाग ठण्ढी मे जमि जाइत अछि, जाहि सँ एहि समय मे महाद्वीपक आकार प्रायः दूना बुझि पड़ैछ । एहि ठाम लगभग 6 महीना केर दिन आ 6 महीना केर राति होइत अछि तेँ अपना घड़ीक अनुसार 6 महीना धरि रातियो मे आकाश मे सूर्य देखाइ पड़ैत अछि – थिक ने आश्चर्यक गप्प ! पर गर्मी केर दिन मे सेहो अधिकतम् तापमान मात्र - 26°C (- 15°F) नापल गेल अछि । अपना सभ दिशि माघ मासक शीतलहरी मे सेहो औसत तापमान 4°C सँ 10°C केर बीचे मे रहैत अछि । आब अहीं कहू - छै ने बहुत ठण्ढा जगह ? पड़ाए गेल ने अहाँ सभक जार ? चित्र सं॰ - 2 - ठीक दक्षिणी ध्रुव केर ऊपर सँ देखला पर अण्टार्कटिका केर स्वरूपक रेखाचित्र अण्टार्कटिका केर धरती पर मनुक्खक पहुँचब एक समय मे ओहिना छल जेना कि बाद मे चान पर पहुँचब – ओहिना कठिन आ ओतबहि महत्त्वपुर्ण । लोक सभ अप्पन – अप्पन प्राणक बाजी लगा कऽ ओतए पहुँचबाक प्रयास मे लागल छलाह । किछु लोक अप्पन – अप्पन उद्देश्य वा लक्ष्य प्राप्त करबा मे सफल भेलाह आ आपिस सेहो आबि सकलाह, जखन कि किछु लोक अप्पन प्राण गमाए बैसलाह । ओहि समय मे पाल वला पनिया जहाज अण्टार्कटिका तक पहुँचबाक एक मात्र साधन छल । रस्ता मे “समुद्री बिहाड़ि” (Cyclone) मे घेड़एबाक वा “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) तथा “प्रवाहित समुद्री हिमखण्ड” (Pancake ice, Polynya etc.) सँ टकड़एबाक वा “हिमनद” (Glacier) तथा “हिमीभूत समूद्री सतह” (Pack ice, Fast ice etc.) मे फँसि जएबाक सम्भावना रहैत अछि । प्लवित / दहाइत हिमखण्ड कतेक विनाशक भऽ सकैत अछि तकर सभ सँ नीक उदाहरण “टाइटेनिक” नामक पनिया जहाजक विश्वप्रशिद्ध दुर्घटना सँ लगाओल जा सकैत अछि । ई जहाज साउथेम्पटन (ब्रिटेन) सँ न्युयॉर्क (अमेरिका) जएबा काल, 10 अप्रील 1912 कऽ एकटा एहने “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) सँ टकड़एबाक कारणेँ दुर्घटनाग्रस्त भेल छल । जएबा व अएबा दुनु कालक लेल खएबा – पिउबाक चीज – बस्तु पहिने सँ संग मे ओरिआ कए राखए पड़ैत छैक । ज्यों – ज्यों वातावरणक तापमान कम होइत जाइत छैक आ हवाक शुष्कता एवम् गति बढ़ैत छैक, त्यों – त्यों शरीर सुन्न होमए लगैत छैक, शरीरक कोशिका (Cells) सभ मरए लागैत छैक जकरा चिकित्सकिय भाषा मे “हिम – दाह / हिम – दग्ध” (Frost bite) कहल जाइत अछि । एहि “हिम - दाह” सँ किछुए काल मे मनुक्खक प्राण तक जा सकैत अछि । तेँ एहि जानमारुक ठण्ढी सँ बचबाक पूरा ओरिआओन संग मे लऽ कऽ चलए पड़ैत छै । अण्टार्कटिका केर बीचो – बीच मध्य अण्टार्कटिक पर्वतश्रेणी (Trans Antarctic Maountains) थिक जे बर्फ सँ आच्छादित रहैत अछि । ई पर्वतश्रेणी अण्टार्कटिका केँ दू भाग मे बाँटैत अछि – पैघ “मुख्य भाग” (Main land) आ दोसर छोट “प्रायद्विपीय भाग” (Antarctic peninsula) । एकर अतिरिक्त ओहि ठाम किछु सुप्त ज्वालामुखी पहाड़ सेहो थिक जे कखनो कखनो सक्रिय भऽ उठैत अछि । ओहि ठाम लगभग 70 टा स्वच्छ / मीठ पानिक झील (Fresh water lakes) सेहो अछि । ओहि ठाम मनुक्ख तऽ नञि अछि, पर प्राणीविहीन जगह नञि थिक ओ । चिड़ै मे पेंग्वीन (Penguin) (जे उड़ि नञि सकैत अछि पर पानि मे नीक जेकाँ डुबकी लगा कऽ हेलि सकैत अछि आ बर्फ पर अपन दू पएर सँ मनुक्ख जेकाँ चलि सकैत अछि), स्क्युआ (Skua) आ एल्बेट्रॉस (Albatross) (एकर दुनु पंखक पसार संसार मे आन सभ चिड़ै सँ बेशी होइत अछि) आदि ओहि ठामक मूल निवासी थिक । समुद्र मे सील (Seal), वालरस (Walrus) , क्रील (Krill), मिंक ह्वेल (Mink Whale) आदि पाओल जाइत अछि । चित्र सं॰ - 3 - अण्टार्कटिकाक जैव धरोहरि कैप्टन जेम्स कुक (Captain James Cook) पहिल मनुक्ख छलाह जे “अण्टार्कटिक वृत्त” केँ 17 जनवरी 1773 ई॰ कऽ पार कयलन्हि – एकर बाद ओ साले भरि मे दू बेर आओरो प्रयास कयलन्हि पर वातावरणीय विषमताक कारण अण्टार्कटिका धरि नञि पहुँचि सकलाह । 27 जनवरी 1820 ई॰ कऽ रूसी अण्वेषक बेल्लिंगहुसेन (Fabian Gottlieb von Bellingshausen) अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती केँ पहिल बेर दूरहि सँ देखि सकलाह – पर हुनिकहु ओहि ठाम पएर रखबाक सौभाग्य नञि भेटलन्हि । तकरा बाद बहुतो लोक प्रयास कयलन्हि पर ओहि ठाम पएर रखबा मे असफल रहलाह ।
उपलब्ध साक्ष्यक अनुसार अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती पर पहिल बेर पएर रखनिहार व्यक्ति छलाह जॉन डेविस (John Davis) – यद्यपि एहि सँ पहिने किछु आओरो लोक सभ एहि तरहक दावा कएने छलाह पर हनिकर सन्दर्भ मे पुष्टि कएनिहार कोनो साक्ष्य उपलब्ध नञि थिक । ओ सील नामक समुद्री प्राणिक शिकारक उद्देश्य सँ 7 फरवरी 1821 ई॰ कऽ पच्छिमी अण्टार्कटिका मे उतरलाह । परञ्च ओ ओहि ठाम किछुए काल ठहरि कऽ आपिस आबि गेलाह, किएक तऽ ओ शिकारी छलाह , वैज्ञानिक नञि । किछु लोक एकरहु विवादिते मानैत छथि । चित्र सं॰ - 4 - दक्षिणी ध्रुव पर पहिल बेर पएर रखनिहार मनुक्ख, नॉर्वे निवासी “रॉएल्ड अमुण्डसेन” अण्टार्कटिका आ ओकर बाद दक्षिणी ध्रुव धरि पहुँचबाक प्रतियोगिता निरन्तर चलैत रहल । एहि बेर बाजी मारलन्हि नॉर्वे वासी रॉएल्ड अमुण्डसेन (Roald Amundsen) । ओ 14 दिसम्बर 1911 ई॰ कऽ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव (Geographical south pole i.e. 90°S latitude) पर पहुँचबा मे सफल रहलाह । ओ अपन दलक सदस्य सभक संग ओहिठाम नॉर्वे केर झण्डा फहरओलन्हि आ अपन पहुँचबाक साक्ष्य ओतय सुरक्षित राखि आपिस चलि अयलाह । पहुँचबा सँ पहिने ओ अपन यात्रा केर जानकारी दुनिञा सँ नुकाए कऽ रखलन्हि – तेँ हुनक प्रतियोगी सभ केँ एहि बातक मिसियो खबड़ि नञि रहन्हि । अमुण्डसेन केर जन्म 16 जुलाई 1872 ई॰ मे नॉर्वे (यूरोप महादेशक एक टा देश) केर शहर ओस्लो (Oslo) केर नजदीक क्रिस्चिनिया (Christinia) मे भेल छलन्हि । एहि अभियान मे हुनक जहाजक नाँव छल फ्रॅम (Fram) । हुनक नजदीकी प्रतियोगी इंग्लैण्ड केर कैप्टन राबर्ट फॉल्कन सकॉट (Captain Robert Falcon Scott) अमुण्डसेनक 33 दिनक बाद 17 जनवरी 1912 ई॰ कऽ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचि सकलाह आ पहुँचलाक बाद पहिने सँ नॉर्वे केर झण्डा देखि हुनिका बहुत दुख आ तामस सेहो भेलन्हि । आपिस लौटैत काल दुर्घटना मे स्कॉट अप्पन पूरा दल केर संग मारल गेलाह । 14 दिसम्बर 2011 ई॰ कऽ अमुण्डसेनक दक्षिणी ध्रुव पर विजयक 100 वर्ष पूरा भेल । 2011 ई॰ केँ नार्वे “अमुण्डसेन वर्ष” आ यूनेस्को (UNESCO) “दक्षिण ध्रुव पर पहिल मनुक्खक शताब्दी वर्ष” केर रूप मे मनओलक अछि । चित्र सं॰ - 5 - अण्टार्कटिका केर भूगोल आ ओहिठाम भारतीय अनुसंधान केन्द्र दर्शक मानचित्र डॉ॰ सय्यद जहूर कासिम (Dr Sayed Zahoor Qasim) केर नेतृत्व मे 9 जनवरी 1982 ई॰ कऽ 21 सदस्यीय पहिल भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल अण्टार्कटिका केर हिमाच्छादित धरती पर पएर रखलक आ भारतक लेल इतिहास लिखलक । ई दल 1981 कऽ गोआ सँ अपन गण्तव्यक लेल चलल छल । डॉ॰ हर्ष गुप्ता (Dr. Harsha Gupta) केर नेतृत्व मे तेसर भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल द्वारा 1983 – 84 ई॰ मे एकटा स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना कयल गेल – जकर नाँव राखल गेल “दक्षिण गंगोत्री” । एहि मे एकटा भू - चुम्बकीय प्रयोगशाला (Geomagnetic laboratory) बनाओल गेल । ई एकटा “हिम छज्जी” (Ice shelf) पर स्थापित छल, जे बाद मे बर्फ मे धँसि गेल आ नऽव अनुसन्धान केन्द्र स्थापित करबाक आवस्यकता पड़ल । भारत अण्टार्कटिका मे अपन दोसर स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना 1989 ई॰ मे कयलक आ 1990 ई॰ सँ “दक्षिण गंगोत्री” केँ पुर्णतया बन्न कऽ देल गेल । नऽव अनुसन्धान केन्द्रक नाम राखल गेल “मैत्री” जे कि बर्फ रहित स्थान पर अवस्थित अछि । अण्टार्कटिकाक 98 प्रतिशत भाग हिमाच्छादित अछि जखन कि मात्र 2 प्रतिशत भाग बर्फ रहित अछि । मैत्रीक स्थान द॰ गंगोत्री सँ लगभग 90 कि॰ मि॰ दूर अछि । भारतक तेसर स्थायी संशोधन केन्द्र निर्माणाधीन थिक जकर नाम होयत “भारती” । भारती केर स्थापना मैत्री सँ लगभग 3000 कि॰ मि॰ दूर अण्टार्कटिका केर आन भाग मे भऽ रहल अछि जाहि सँ एहि विस्तृत महादेशक विस्तृत अध्ययन कयल जा सकय । ई केन्द्र मार्च – अप्रील 2012 ई॰ धरि प्रारम्भ भऽ जायत । 25 मई 1998 ई॰ कऽ राष्ट्रिय अण्टार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्द्र (National Centre for Antarctic and Ocean Research; NCAOR) केर स्थापना गोआ मे भेल । 14 अक्टूबर 2010 धरि भारत 30 गोट वैज्ञानिक अनुसन्धान दल अण्टार्कटिका पठाए चुकल अछि । चित्र सं॰ - 6 - अण्टार्कटिका मे भारतक पहिल (दक्षिण गंगोत्री) आ दोसर (मैत्री) अनुसंधान केन्द्र आ तेसर (भारती) अनुसन्धान केन्द्रक प्रस्तावित प्रारूप (मॉडेल) अण्टार्कटिका दुनिञाक सभसँ पैघ प्राकृतिक प्रयोगशाला (Largest Natural Laboratory) अछि । ओहि ठाम भू – चुम्बकत्व, भूगर्भ विज्ञान, पृथ्वी आ सौरमण्डलक उत्पत्ति व विकाश, समुद्री जीव – जन्तु, वायुमण्डल (विशेषतः ओजोन स्तर) पर प्रदूषणक प्रभाव, चिकित्सा, मनोविज्ञान आदिक अध्ययन आ ओहि सँ सम्बद्ध अनुसन्धान काज आदि कयल जाइत अछि ।
तऽ केहेन लागल नऽव वर्षक अवसरि पर नऽव ठामक यात्रा ? फेर कहियो जखन समय भेटत तऽ आन ठाम घुमबा – फिरबा लेल चलब । आइ बस एतबहि । आब अप्पन – अप्पन घऽर आपिस चलल जाए । पद्य खण्ड राजेश मोहन झा 'गुंजन' ज्योतिषी जीक तांडव ज्योतिषी जी तांडव करैत चलला लऽ लोटा हाथ गामक सीमान पार करिते राति बीतल भेल प्रभात करियन आ बलहाक मध्य लघु टोल भररिया तामसे मुँह लाल छलनि नचैत जेना पमरिया बैशाखक बिहाड़ि जकाँ बहैत वाचल्य कोण कोसीक भदैया धार जेना हहाइत पहुँचल खगड़िया भेटला जुगेबाबू मकइक खरिहानमे “कतऽ चलल छी ज्योतिषीजी ब्रह्म बेरूक विहानमे?” लाेहछैत बजलनि नै पुछू की भेल औ हमर ढोढ़बाकेँ गंगेश बलजोरी लऽ गेल औ पहुँचला खगन दुआरि हाथ नेने दंड-भंग पुछारि केलनि गेल कतऽ टिल्लू गंगेश संग औ बूच तों ई की कऽ देलह ऐ उमेरमे बेचलह बिनु मोले हमर सोन कुंवरकेँ कहलनि औ भैया क्रोधकेँ तियागि दियौ कन्यादान तँ भऽ गेलै आब अपने घोघट दियौ क्रोधांध आँखिसँ तकला पंडित दिस तों छह अपन लोक किए कटलह बनि उड़ीस? पड़ाएल सभ बरियाती भागलि धोबिनियाँ काँपय लगला खगन, देख ई अजीब दृश्य हसनपुरक हँसेरी पहुँचल दलानपर टिल्लूकेँ देखिते हँसेरी बाजल- “औ पंडीजी अपने पुरोहित छी ई हमर कुलगुरू चाह पीब सभ गेल विवाहक पूर्णाहुति भेल” क्रोध ठेकान नै छलनि पंडित कक्काकेँ गामेमे फरिआएब नै छोड़ब उचक्काकेँ कहलनि विभो ‘खगना मामा पकड़ू हिनक चरण कर जोड़ि माफ करू एलौं अहँक शरण कम करू क्रोधकेँ पीब लिअ चाह औ ’ऑफर’ कौशल झाक सुनि भेला बताह औ अन्हर बनि उठला, खगन पीपरक पात बनल क्रोधक भुजिया बनल दुखक कराह औ गरमीक दुपहरिया खराम भीजल घाममे चमकैत ताड़िक संग बरसलनि ओ गाममे भेल पंचैती मानि गेलथि बीस हजार गहनामे यवनिका पतन भेल प्रबुद्ध जनक कहलामे बरख बीस बीत गेल ऐ कथाकेँ बिसरब नै घटना सभ सत्ते थिक फूसि किछु बूझब नै श्रद्धा सुमन अर्पित करैत ज्योतिषी कक्काकेँ अंतिम दृश्य इति भेल जेठक रौद कड़क्कामे। परिवार नियोजन छोटका नेना बड़का नेना एतेक नेनाक कोन प्रयोजन? समाजक समस्या जकड़ि रहल बिनु सफल परिवार नियोजन टुनिया मुनिया गुड़कि रहल छै एकटा बौआ फुदकि रहल छै फुदनी फुद-फुद फुदकि रहल छै बलचनमा दही सुड़कि रहल छै फुलमतिया माइक मति अछि मारल कहथि भगवान हमर कपाड़केँ जाड़ल कहलौं हम अहाँ देब ने दोषू आबहुँ रूकि जाउ एकरा सोचू ऐ बिच टुनमा टाँग तोड़ौलक जखने लोड़ही मॉथ उठौलक केहेन अकिलपर पड़ल छै पाथर सातसँ की बढ़ाएब सत्तर जखने हाथे बाढ़नि देखलौं लत्ते-फत्ते दलान पड़ेलौं पकड़ि कान नै देब सजेसन बढ़बए दिऔ एहिना, पोपुलेशन। वसंत गीत किसलय सुमन मुस्कान सखी गे, कोकिल कलरब गान सखी गे देख जुआनी महुओमे आएल मुखरित हर्षित मुस्कान सखी गे। राज ऋृतु बनि बसि कुंजमे लोढ़थि फूल रति-मृगनयनी उदित-मुदित घोघ तर नयन हेरथि सिय-भगवान सखी गे। रंगक रेखसँ निशा भेल चकमक वेला पौली कुसुम सुवासित आशाक लता हृदेमे लतरल राधा केर मानव प्राण सखी गे। शिशिर शेष समीर भेल मादक आदित्य किरण तीक्ष्ण वाण बनल छथि त्रिपुरारि रतिक क्रंदन सुनि कऽ करै छथि प्राण-प्रदान सखी गे। कुहकैत कोइली वसंत हकारथि आम-पल्लवपर मंजरि भावथि सुरमित सुगंध मोन हेराबथि, पुष्प-वासपर भ्रमर गान सखी गे। होलीक तरंग बुढ़वोक तनपर आएल जुआनी दाँत झड़ल छन्हि करकर मोँछ ऐ भेटकेँ अपने की बूझब हम देखै छी हमहीं बूझै छी औ बाबू ई किछु आर नै थिक होरीक बसातपर जागल पिरीत सटकू बाबूक एलखिन सारि होलिक रंगमे रंगल दुआरि कुरता फाड़ि कऽ फगुआ गाबथि छोटका बाबा ढोल बजाबथि देख तमाशा बाबी भेलि सन्न आब ने देब पानि ने अन्न जुनि रूसु हमर पुरनी रानी होली देख छॅटेलौं कानी बूढ़ भेलौं मुदा मोन तँ बच्चे पुनि आएल जुआनी बात ई सत्ते चारि कहार संग हरियर डोली मोन पड़ए जुअनकी होली आरो लोक हमरोसँ बीस छथि सटल सारि संग जेना उड़ीस छथि भांङ संग मरसटका खीर पूस खाटे कटलनि- होरीक वीर ऐ बरख पार केलनि अस्सी होलीमे अंग्रेजी संग खस्सी बदनाम भेली मुन्नी संग शीला देख लअ बूढ़बाक लीला बैस संगमे गिलासक गिलास पोता सबहक संग बाबो पास ई कथा थिक ऐ होरी केर राजा भेला राजमोहन बदनाम पियाजक नोरमे होरी भीजल पटना जुआन आ दिल्ली पुरान। मुस्की रहल उदासे डोलि पत्ता, छिती-तित्ती चाेरि आर नुकैआ सिखलौं ककरहा देखिते भेलौं दूसरा पासे छलौं लड़कपनमे खेलैत बचपनमे की जानी ने की भ' गेल मुस्की रहल उदासे। दिन कटै छल साग तोड़ैमे राति बिताबी मायक कोरमे मुँहक लाली पीयर भ' गेल सीताक जीवन जकाँ वनबासे। आठ बयसमे मॉग भराएल कन्यादानक अर्थ नै बुझलाैं तैयो देव नै देखला लाली चान बिनु जेना अकाशे। झहफल सन प्रभात बनल छी बैशाखक पत्रहीन गाछ बनल छी नै देखलौं सिनेही वसंतकेँ नोरक पारण जेना उपासे। अपन वेदना कहू ककरासँ? दुष्ट समाजक रीति घेरने अछि जड़ल भाग्य पजड़ल अछि जीवन सुक्खल कली बिनु रवि-प्रकाशे। अपरोजक आ डाइन कहाबी कछमछ जीवन डगराक बैगन विधाता हमरा अपन संग लगाबथु देह निष्प्राण मुदा संग अछि सांसे। माय मनाइन अंग विभूति छन्हि जटाजूट छन्हि रहती कोना अपन अपर्णा खाइत धथूर भॉग छथि सदिखन की बुझता जगतक दु:खहणा पीटथि करेज माय मनाइन की भेल ई विधना केर लेखा औता नारद निश्चित पुछबनि बॅचलथि कन्ना भाग्यक रेखा बौराएल शिव बसहापर बैसल गिरिजा कन्ना रहती कैलाश- घर सखि हे हम कहियो नै देखलौं विचित्र वरिआती आ एहन बेछप्प बर चिन्ता जुनि करू माय मनाइन सकल सृष्टि छन्हि ठाम आ गाम अखिल भुवनक सध: छथि स्वामी क्षण कैलाश क्षण भक्तक धाम भाग्यवती छथि हमर अपर्णा कहलनि हिमराज भूदेव भवानी संग बसहापर बैसल चलला सभगण संग महादेव। आनंद कुमार झा गै माए गै माए कोरामे उठा ले हमरा, ह्रदयसँ लगा ले आएल छी तोरा शरणमे चरणसँ लगा ले गै माए........................................................ हमहूँ तोरे सखा छी, भटकि हम गेल छी माया आ लोभमे, सहटि हम गेल छी गै माए आँचरमे नुका ले हमरा नयनमे समा ले गै माए............................................................ माँ नै कुमाता होइ छै, हमहीं कपूत छी हमरा बिसर नै एना, हमहूँ तोरे पूत छी गै माए दया तों देखा दे हमरा डुबैसँ बचा ले गै माए............................................................ दस हाथ बाली मैया , कते के बचेलौं हमरा बेरमे जननी नजरि फेर लेलौं गै माए एक बेर फेर अपना करेजासँ लगा ले गै माए......................................................... डेगे डेगे दुनियां हमरा, ठोकर मारैए आँखिसँ नोर झहरए, रोकलो नै जाइए गै माए टुटल आनंदक तों आस फेर बन्हा दे गै माए........................................................ मिथिला क बात सुनबै छी (तर्ज भारत का रहनेवाला हूँ) अछि प्रेम जतय क रित बनल हम गीत ओतय क गावय छी मिथिला क रहै बाला छी मिथिले क बात सुनाबै छी जय मिथिला जय मैथली जतय पाहुन बनि क राम एला जतय हर बाला मे सीता छै सीता छै जतय घरे घरे वेद पढ़ै जतय हरेक हाथ मे गीता छै गीता छै हमहूँ मिथिलेमे जनम लेलौं २ ई सोचि सोचि इतराबै छी मिथिला क .............................. जय मिथिला जय मैथली एतय मंडन अयाचिक जनम भेलनि अछि विद्यापति क गीत अमर गीत अमर राजा साल्हेशक ई नगरी अछि जनक धाम क रित अमर रित अमर जकर कमला कोसी पएर धोबै हम नित नित शीष झुकाबै छी मिथिला क .............................. जय मिथिला जय मैथिली जतय भोजन मे तिलकोर तरइ जतय माछक मूड़ भोग चढ़य भोग चढ़य जतय डेगे डेगे पोखरि छै जतय घरे घरे पान बनय पान बनय अछि फल मे मखानक तेज केहन ई दुनियां केँ सिखाबय छी मिथिला क रहै बाला छी मिथिले क बात सुनाबय छी जय मिथिला जय मैथिली माँ मैथिलीक चरण मे अर्पित ओतबे करय छी जननी, जतबे अहाँ कहइ छी माँ मैथिली अहाँ के, चरण मे हम परल छी ओतबे करय........................................... अहिं छी माँ जगजननी, अहिं छी माँ जगदम्बा सीता सेहो अहिं छी ,अहिं छी काली अम्बा हमरा किछु नै बुझल, सबटा अहिं करय छी माँ मैथिली ........................................... हमरा लग नै किछु अछि, बस पान र मखान के पिछरल छी सब ठाम, निश्तेज निष्प्राण भेल आबो कृपा जे करीतौं, किये ऐना रुसल छी माँ मैथिली .............................................. एहन की हम करम केलों, हमरा अहाँ त्यागी देलौं हमहूँ अहिं के पूत छी, हमरे पर किये जुलुम केलौं कहिया तक हमरा तेजब ,किये ने बजा रहल छी माँ मैथिली ................................................. जानी ने कहिया स हम सब भटकी रहल छी मिथिला के बात होय कोना, दुनियां के खटकी रहल छी सुनियौ बिनती आनंदो के किये सता रहल छी माँ मैथिली ...................................................... जं बाजी त गलत बजय छी जं नै बाजी त गर्बर छइ वाह रे दुनियां गजब के दुनियां जत देखू बस हर्बर छइ जं बाजी ............................. आगू कोना अहाँ बढ़ी जायब धक्कम धुक्का कोना नै खायब बाहर भीतर एम्हर ओम्हर जत देखू सब ओझरल छइ वाह रे ................................ ककरा पर बिश्वाश करब ककरा कहबइ अप्पन छइ सब स्स्वारथक मया मे जकरल बिन मुद्दा के चर्फर छइ ... वाह रे दुनियां .......................... सबहक सुनियो सबहक करियो जेम्हर कहै ये तेम्हरे चलियोय आनंदक अभिलाषित मोन मे सदिखन अतबे हलचल छइ वाह रे दुनियां गजब के दुनियां जत देखू बस हर बर छइ जय मिथिला जय मैथिली करियोय कने भलाइ मिथिला के नाम पर कहिया तक भट्कब आब चलियोय ने गाम पर जेना ले ये मैथिल बिना उजरल छइ गाम घर करियोय कने ............................ मैथिल जत गेला ओतय भेले बहूत विकाश ओकरे कान्हा पर लात राखी लोक सब छुबय लागल आकाश बलुक इ महल बनाबय मे कोना बिसरल छी गाम घर करियोय कने ................................. जं यूथ ऑफ़ मिथिला बढ़तइ एहिना चा...रू दिश नवयुबक के इ संगठन बनायत अपने अपन भविष्य जय मिथिला के उद्घोष के लाबू सब गोटा अपना जुबान पर करियौ ...................................... मैया अहाँ बसै छी मैया अहाँ बसै छी मिथिला नगरीक माँटिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना कखनो काली बनि अहाँ एलौं कखनो दुर्गा अहाँ बनि गेलौं कखनो सीता बनि कऽ अहाँ भेटै छिऐ खेतमे मिथिला नगरीक माँटिमे ना मैया अहाँ… मण्डन भारती सेवलनि धाम रखलिअनि हुनको अहाँ शान कालिदासक आस पुरेलिअनि एकहि रातिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… जे किओ जपलनि अहाँ केर नाम पुरित कए देलिअनि सभ मांग एहि बेर बारी अछि आनन्दक एहि पाँतिमे पुण्यभूमि उच्चैठमे ना मैया अहाँ… याद आयल
आइ फेर याद आयल किएक मिथिला देश के छोड़ि देने छी जहन हम सभ अप्पन खेत केँ माय केँ कोना बिसरलौं, की भेल ई की कहू चलि पड़ल छी लऽ पिपासा छोड़ी अप्पन भेषकेँ भाइ छुटल , मित्र छुटल छुटि गेल सभ याद सभ हम तड़पि कऽ रहि गेलौं बस हाथ धेने कसि कऽ आइ फेर याद आयल ........ नया जमाना आबि गेलैए पाइ टा भगवन छै जकरा देखू एक्के रस्ता पाइ केर इन्सान छै सखी छुटल मीत छुटल रुसि गेल सभटा कोना आब तँ बिसरि रहल छी नेनपनक खेल केँ आइ........................... . गाम पर पीपर तरमे खेलाइत रहिऐ कोना कहू रोज एतए परदेश मे दिन खुजिते रोज बहु मोन कानल आँखि कानल देखि कऽ कोना सहू केना कऽ सभटा मेटायल सपना अपने सोचि कऽ आइ............. मिथिलाक नवयुवक कने नींदसँ जागू मिथिलाक नवयुवक कने नींदसँ जागू माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू जनक धाम सीता के धरती फाटल दरारि लागैत अछि परती आखिकं नोर बनल अछि शोणित किछ बढ़ी’क आब बाजू माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू की मिथिला के खून मे दोषर प्रान्त सन गर्मी नई छै मिथिला के इतिहास रचब कोनों बेशर्मी नई छै चलू एक बेर प्रगतिक झंडा ल क बढू ने आगू माँ मैथिलि कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू सोचू सब जन किछ टाकाके खातिर भटिक रहल छी कोन आईग ई धधैक रहल छै, जाही मे झुलैस रहल छी कतेक साल धीर सुतल रहब आब आलस्य के त्यागु माँ मैथिली कुहैर रहल छैथ जुनी आहाँ आव भागू सब परा गेल गाम घर स सुन्न परल अछि दालान यो सब परा गेल गाम घर स सुन्न परल अछि दालान यो स्वर्ग स सुन्दर जे मिथिला छल बनी गेल उजरल मचान यो गेलें दुलरुआ बेटा तोहूँ परदेश , कोना बिसरी गेलें गाम रौ कानईत तकई छी बेटा भरी दिन बटबा, एहिना ने छूटी जाय प्राण रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ पुछई ये बहिनी तोहर सदिखन हमरा , भैय्या नै अबई छथीन गाम रौ कतई हरा गेल समां चकेबा, राखी भार्दुतिया बनी गेल आन रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ बीती गेल दुर्गा पूजा छैठो दिवाली, करय के छई आब कन्यादान रौ तों जा बसी गेलंय परदेश जा क, हमरा बना देलें आन रौ कोना बिसरी गेंलें गाम रौ हमरा बिसरी गेलें तई ले ने कानी, क जो ने धरती के प्रणाम रौ बार पावनी छाई इ मिथिला के धरती, जतय बसई छाथीन भगवन रौ कोना बिसरी गेलें गाम रो कोना बिसरी गेलें गाम रौउ जय मिथिला जय मैथिलि जय मैथिल जय भारत जय हिंद भटकि रहल छी तरपि रहल छी भटकि रहल छी तरपि रहल छी अपने के हम पटकी रहल छी नै बढ़ देब मिथिला के हम बाहर रही क चमैक रहल छी कत बिला गेल अप्पन भाषा अंग्रेजी फारसी संग बमैक रहल छी छोरु मिथिला के बात नै करू आनक भाषा के साथ नै छोरु लेकिन एक दिन मिथिले काज देत अतबे कहै ले चहैक रहल छी भटकी रहल छी रमाकान्त राय 'रमा', जन्म- भादो पूर्णिमा सम्वत् 2003, प्रथम रचना- बटुक, बाल मािसक प्रयाग, कथा विशेषांक द्वितीय भागमे 1964ई., प्रकाशित कृति-(क) तीिनटा बाबाजी-(रूसीसँ मैथिलीमे मैथिलीमे टाल्स्टायक कथाक अनुवाद-1967ई.मे, (ख) फूलपात कविता संग्रह 1978, (ग) भांगक गोला (2004 ई.मे), (घ) कटैत पाँखि : हँसैत आँखि , कथा संग्रह-2005, शीघ्र प्रकाश्य- कृष्णकान्त मिश्र (िवनिबन्ध) साहित्य अकादेमी नई दिल्ली।प्राय: डेढ़ सए रचना (कथा-निबन्ध कविता) मैथिली हिन्दीक पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रकाशित/ प्रसारित। साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनक आयोजनक क्रममे रेलक चपेटमे पड़ि दहिना पएर छाबा धरि गमा विकलांग।सेवा निवृत अध्यापक (उच्च विद्यालय) सम्पर्क- श्री रमानिवास, मानाराय टोल पो. नरहन (समस्तीपुर) बिहार विधानसभा चुनव-प्रचारपर कवि दृष्टि सांझुक सांझे उपास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास तोड़लक सीमान सभ गिदरबा रे जकर लाॅखि धरती-अाकास सिहकै खन पुरिबा तँ लपटै खन पछिया नेरू बिनु गाए जेना काटै छै अहुड़िया गेल भैंस पानिये पड़रू समेत मुदा पानिये मांछ बॉटै नौ-नौटा गुड़िया फुटकै छै जहिना टिकुलिया रे लूटि फूलक सुवास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास ओहिना फड़काबै छै बॉहि दुनू सुअमे दिन भरि भाट जकाँ भाभट पसारै छै करै झिकमझोरि चोरि रातुक निन्नमे शांत सोन चाेरबै सोनरबा रे फूँकि ठमकल विश्वास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास हमहीं छी बाबा, परबाबा छी हमहीं टांगेपर सरङ जेना उठबै छै टिटही केओ कहै बौआ रौ हमहीं छी हौआ सभ सखि झुमरि खेलै लूल्ही कहए हमहीं सबहक धार छै बसुलबे रे कोना चतरत विश्वास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास तोंही छह माए, बाप तोहीं सुगुनियाँ सेवक छी हम तँ चमका देबऽ दुनियाँ जागह भाय, दाइ, जागह दुलरूआ पॉच बरिसले तँ मांगै छी निनियाँ सुतबह तँ चरतह ढकरबा रे कोना लहरतै चास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास हमरा लग मोर सन, तोरा लग तोर सन बाजब मधुर जे छल काल्हिए अङोर सन हम छी राजा मलिकबा रे सांझुक सांझ उपास हुलकल छै गाममे हुड़रबा रे जकर जंगलमे वास। चन्दन झा, पिता श्री मदन मोहन झा, बाबा- डॉ. उपेन्द्र नाथ झा, गाम- लोरिका, भाया-बेनीपट्टी (मधुबनी) बीतल माघ फागुन आयल बीतल माघ फागुन आयल फूलसँ लहरैत खेत जगमगायल जीवनमे रस भरि आयल ढलैत ठंड तपैत धरती सरसों अलसी राहरि गहूम ऊघि-ऊघि सभ घर आनत रोटी दुनू साँझ पकायत काजल नैना पेट भरि खेती फसल अछि नीक खाइ भरि कऽ खेत न आइत जाइत कियो आ करू मजदूरी जा हम ओ सभक सभ घरपर रहता नैना माइकेँ हम कहबनि ओ रोज खेत पर आबथि साथ लगा देबैन काजर नैनाकेँ जे किछु बेशी धन लौती चाहथि भगवन यदि तँ अगहनमे पहुना औता अबकी बेर बड़की बेटीक हाथमे हरदि लगबायब केथरी-कंबल साठ जे लेता माघक रैना गुरगुर करता संस्कृतिक विडंबना संस्कृतिक विडंबनाक जखन जखन अहसास होइए एकटा प्रश्न बेर-बेर हृदएमे तीर जकाँ चुभैए हिंदी आ अंग्रेजीक बरसातमे मैथिली भाषा मलिछोंह भऽ गेल कोनबलाक कारण अपन संस्कृति अनचोक्के हेरा गेल की भेल एहन जे अपन चन्दन गावर भय गेला शब्दक असरि हेरा गेल परिभाषा मलिछोंह सन भऽ गेल कहा गेल ओ पत्थरक पता चतुरताइ हवा भऽ गेल की भेल एहन जे अपन चन्दन गावर भऽ गेल की भऽ रहल अछि अपना गाममे की भऽ रहल अछि अपना गाममे सब बदलि रहल अछि सब गोटा गाम गाम छोड़ि नग्रक लेल दौगि रहल अछि शान्तिक त्याग कऽ हहारो दिस जा रहल अछि गामक छाछक बदला कोकाकोला बाजि रहल अछि चिट्ठी चौपातीक आब आस नै रहि गेल जहिया सँ आयल मोबाइल बात गजब भऽ गेल जहिया सँ चलल पश्चिमी बसात हवामे अश्लीलता भरि गेल आठ गजक साड़ीक बदला छः इंचक मिनी एस्कर्ट भऽ गेल जय गंगाक किनारपर साधु साधना चलए अब ओ गंगा किनार पापीक बसेरा भऽ गेल गामक झोपड़ी आब रंग बदलि रहल अछि झोपड़ी सँ पक्का मकान बनि रहल अछि गामक माटिमे आब ओ गमक नै रहि गेल आब चारो दिशासँ शराब महकि रहल अछि की भऽ रहल अछि गाममे ....(राधे ) संजय कुमार मंडल डेंगू बेरोजगारीसँ तंग आबि बीजा,पासपोर्ट बनाओल सात समुन्दर पार गल्फ कंट्रीमे नोकरी पाओल आर्थिक मंदी भेलासँ नोकरी छुटल बुझना गेल तारसँ खसल खजूरपर लटकल हारि-थाकि घुरि गाम एलौं अर्थाभावे जेना अनाथ भेलौं अबिते गाम पत्नी पड़ली बेमार दरिभंगासँ पटना धरि कएल उपचार दिनो-दिन रोग बढ़िते गेल नै भेल सुधार सी.टी स्केन सहित नाना प्रकारक इनवेस्टीगेशन भेल हजारो खर्चाक बादो रोग नै पहचानल गेल ब्लडमे सीरम प्लेटलेट घटितहि गेल डाक्टरो सभकेँ अचरज भेल डिस्चार्ज सिलिप दैत कहलनि- “मरीजकेँ घर लऽ जाउ, सेवा-सुश्रुषा करिओन, खुब खुआउ-पीआउ, जतेक दिन जीबै छथि, मेहमाने बुझू, फेर उठि ठाढ़ नै हेती छाती बज्र करू।” अंतमे दस सी.सी. ब्लड लऽ दिल्ली टेस्ट लेल भेजल गेल रिपोर्ट आएल, बेमारी डेंगू छी कहल गेल। माघक जाड़ कट-कट दाँत बजैए थरथर देह कँपैए सन-सन पछिया चलैए जेना देहकेँ छेदैए ओसक सघनता एहेन जेना वर्फ गिरैए एक माससँ सूर्यदेव नै उगलाह बुझना जाइछ ओहो जाड़सँ घर घुसलाह सरकारी उद्घोसना भेल कोट-कचहरी, स्कूल सभ बन्न क' देल गेल रोड-सड़क, गली-मोहल्ला सभ सुन्न भेल गाछक पातसँ टप-टप पानि चुबैए मनुक्खक कोन गप कुकुरो-बिलाड़ि नहिए बहराइए खड़-पतार, जारन-काठी सिमसि गेलैए लाख जतन करी धुआँ छोड़ि आगि नै पजरैए भनसा-भात, चुल्हा-चौकी सभ बन्न भेले अए मौसम वैज्ञानि घोषना भेलै- कश्मीरमे भीषण बारिस भेलै हजारो लोकक जान गेलै सेकड़ो ट्रक-गाड़ी-घोड़ाक आवागमन सड़कपर वर्फ जमलासँ बन्न भेलैए जे जहिना से तहिना ओइठाम जाम भेल ट्रक-बस, कार दुपहिया जेना वर्फ बनि जमि गेल बंगालक खाढ़ीसँ समुद्री तूफान उठलैए अस्सी मिलक रफ्तारसँ बढ़ि रहलैए गाछ-विरिछ झार-झंखार के पुछैए जे सोझा पड़ल ओकरे मोचरि खसबैए दैंत छी वा भूत-प्रेत नै जानि पड़ैए ई शीतलहरि कते जान लैत नै बुझि पड़ैए मंगला मचानेपर बैस सोचि रहल छै गाएक नेरू आ बकरीक पठरूक डाँड़ धेने छै तै बीच चारि वर्खक बेटा बेमार पड़ल छै कन्ना इलाज हएत कतए जाउ सोचि रहल छै जान बचेबा लेल बकरी बेचि कम्मल किनलकै दू सए टाका बचलै पेटक बुतात अनलकै मंगलाक हाथ खाली पड़ल छै के देत कर्जा ककरा लग जाउ किछुटा नै फुरै छै पहिनहिसँ महाजनक पाँच हजार कर्जा छै मूलधन छोड़ि ब्याज अलगे पड़ल छै गाए-बकरी पहिनहि बेच नेने छै घरवालीक हौसली बन्हकी धेने छै मंगला हिम्मत कए रहल छै घरसँ बहड़ेबाक साहस नै होइ छै इलाज बेगेर बेटा मरि जाएत मंगला हिम्मत बन्हलक हिम्मत बान्हि मंगला बच्चाकेँ उठौलक डाँड़सँ धोती खोलि बच्चाकेँ झँपलक सड़क पर अबिते पछिया मंगलाकेँ हौंकलक बुझना गेले मंगलाकेँ जेना ई हाड़ गलौलक कहुना-कहुना मंगला डाक्टर लग गेल बच्चाकेँ डाक्टर टेबुलपर राखि मंगला अचेत भेल बरबराइत बाजल- मालिक एकरा बचा लिऔ मजूरी क' पैसा चुकाएब एकरा प्राण दान दिऔ बजैत-बजैत मंगला एकबेर जोरसँ काँपल प्राण शरीर छोड़ि रस्ता स्वर्ग नापल डाक्टरकेँ मानवता जगलै बच्चाक इलाज नि:शुल्क केलकै सप्ताह दिनक दवाइ कीनि देलकै कफनक कपड़ा आ पाँच सए टाका द' मंगलाकेँ रिक्सापर झाँपि भेजबा देलकै तैयो ई जाड़ बच्चा-जवान आिक बूढ़ केकरो किछु नै बुझलकै। संस्कृति वर्मा हमर देश हम सब भारत केर संतान छी जगमग धरतीक ख़ुशी महान छी हिमालय पर्वत स निकलैत गंगाक पावन धार छी हमर भारत देश महान सब से सुन्दर ,सब से प्यारा हमर देश सब ठाम से न्यारा.. रंग रंग के फूल खिलल अछि चलि रहल सुंदर सुखद समीर जन जन के मोन मे सत्य , शिव आ सुन्दर क भाव भरल अछि ... उत्तर मे कश्मीर - फूल क घाटी दक्षिण मे कन्या कुमारी क पैर छुवैत सागर अछि रंग रंग क वेश भूषा मे एकताक सूत्र मे बान्हल ई हमर देश भारत अछि ........ जगदीश प्रसाद मण्डल कविता/ गीत- मधुमाछी पुष्प रस पीब मधुमाछी मधुर चालि चलए मधुमास मोहि-मोहि रस बना मधु बिलहए उपकारक आश माछी रहितौ तान मारि-मारि गबैत जिनगीक गीत वायु सदृश्य गंध पसारि बनैत सबहक हित डंक रहितौ डंकिनी नै जोगा मधु मधुरानी सबहक सिनेह पाबि राति-दिन महतानि बनि कहबए रानी महलक बीच संग-संग बाँटि काज चलबए दरवार जे जेहेन से तेहेन करि पबैत स-मान परिवार उपैत धन जोगा-जोगा महल बीच सजबए रानी सबहक सभ छी सभ छी एक मुस्की दए-दए सुनबए रानी कियो उपैत, करैत कियो रक्षा कियो पसारए परिवार एक सुत्र संचालित भऽ हँसैत-बजैत वारम्वार अजगुत मोहनि छाती सजा सृजति नाजूक परिवार हराएल-ढराएल बाजि-बाजि नित सजबए राज-दरवार तियाग-तपस्या समेत बीछ जोगबए मान-सम्मान जे लेलौं से देने जाइ छी नै कहब िकयो बइमान की लए एलौं की लऽ जाएब जानए जागल नैनि घर नै सजने बनबै केना सजल घरक गिरथानि आबो सुनू, सुनू आबो छाती फाड़ि कहै छी अपने केलहा छी भागी सदएसँ सुनै छी पौरूष पाबि पूजू विवेक लाज जेकर जेबर छी डेगे-डेग सम बना चालि दिन-राति सजबै छी जे जे छी से से सएह छी परखु अपन-अपन सीमा ककरो मनमे ई नै उठए भसिया गेल बालुक सीमा कालक टूकड़ी सभकेँ भेटल अपन-अपन छी रक्षक कलंकक मोटरी बान्हि जुनि हँसाउ नाओं बनि भक्षक देव कतए दानव अछि कतए दुनियाँक सभ लीला छी बेमत भऽ इन्द्रिय घोड़ा दानव देव बनै छी। (श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ सादर समर्पित....।) नन्द विलास राय किछु पद्य (1) विद्यार्जन कएला उपरान्त केलनि चरित्र िनर्माण माए-बाबूकेँ सेवा कए कऽ भेलाह नैतिकवान सत्य आओर अहिंसाकेँ जे सभकेँ दे छथि ज्ञान बुझू ओइ मनुक्खकेँ छथि पैघ विद्वान। (2) जिनगी विताबैत छथि सादा मुदा छन्हि पैघ विचार ऊँच-नीच, अमीर-गरीबसँ करै छथि समान बेबहार अपन विद्वतापर जिनका कनेको नै गुमान बुझू ओइ मनुक्खकेँ छथि पैघ विद्वान। (3) परउपकारक भावना राखि दै छथि सभकेँ शिक्षा दीक्षा दै छथि धने बुझि कऽ नै छन्हि धनक इच्छा आनक जे कल्याणक खातिर सहै छथि नोकसान बुझू ओइ मनुक्खकेँ छथि पैघ विद्वान। (4) सभ जीवपर दया करै छथि अधलाह काज करैसँ डरै छथि हाथ जोड़ि अपनासँ पैघकेँ करैत छथि जे प्रणाम बुझू ओइ मनुक्खकेँ छथि पैघ विद्वान। (5) सभकेँ समैपर अबै छथि काज जिनका लेल नै छथि कोइ आन राक्षससँ बनि जाइ छथि मनुक्ख एहेन जे दै छथि ज्ञान बुझू ओइ मनुक्खकेँ छथि पैघ विद्वान। (6) काजकेँ पूजा बुझि करैत नै छथि आराम मदैत करैले सदिखन हाजिर की भोर की साँझ छोट पैघ जीव सभमे जिनका सुझै छन्हि भगवान बुझू ओइ मनुक्खकेँ सभसँ पैघ विद्वान। डॉ शेफालिका वर्मा नै रचू अहाँ इतिहास हमर पानिक कम्पित लहरि पर , नै रचू अहाँ इतिहास हमर पवन-उर्मिक वेगपर नै रचू अहाँ हास हमर कतेक व्यथा -वाण लागल काल धनुष पर झूलि कऽ सांसक लघु लहरि सिहकौलक संसृतिक फूल कें रेत केर देवार पर ,आइ सजल उजास हमर चित्र-अंकित रेख मे नहि जीवनक स्पन्दन क्षीण सुधि-दीप ज्योतित कोना स्नेह-वर्तिका आइ अचेतन प्राणक लघु-निलय मे आइ मोन उदास हमर क्षण क्षण परिवर्तित अग-जग लहरि लहरि मे मौन निमन्त्रण नीरव निःस्वर पल पल अहांक उपहारक दर्शन तुहिन विन्दु सन किसलय अंचल मे झरैत कुसुम तारक सन भाव-हृदय घन श्यामल मे ! भेलौं निःशेष प्रीतिक प्रतीक्षा मे अनलिखल पाती दऽ रहल छी समीक्षा मे एहि अक्षम लेखनी सँ नै लिखू अहाँ तरास हमर काल-पत्र पर छविमान सतत उच्छ्वास हमर पानिक कम्पित लहरि पर नै लिखू अहाँ इतिहास हमर............... अहांक हास अहाँक हास हम सुनलों अविकल निर्झर झाहरैत झर झर श्वेत स्फटिक मुक्ता माला निश्छल शिशु सन रजत हास ! सिगरहार क फूल छोट छिन्न सुन्नर सुन्नर झहरैत जेना देवताक वरदान सन नेनाक मुस्कान सन !! अहांक ई हंसी जेना लक्स क पौडर छिरिया गेल चारु क़ात उज्जर उज्जर निर्मल निर्मल कत भेटत एहि यांत्रिक युग मे चाह्कैत चुह्कैत प्रकृत हंसी .? अधरों बनि गेल मशीन कौखन कोन कांटा कत जायत मुंह्क ठोर सिकुडत सकुचाय्त तखन बनैत अछ एक टा हंसी जकर नाम थीक फोरमेलिटी ? मेल धेल नुआ मे लेप्ट्ल सेप्टल ग्न्हैत गन्हायित आबैछ घर नौडी तेहने आजुक युग मे ठोर पर नचैत अछ एकटा बाईस तेबाईस हंसी छौडी ............................................. प्रकृति- पुरुष सागरक शांत लहरि देखी किछ किछ होयत अछ मोन मे की सरिपों नुकायल अछ सुनामी एकर अंतर मे ?? कखनो कोसी क हुँकार कखनो गंगाक आर्तनाद ....... हिमालयक चंचला बेटी सब सागरक छाती सँ लागि जायत अछ मुदा, कोन वेदना सागरक सुनामी बनि जायत अछ .. मोन होयत अछ चीरी दी एहि रहस्य के देखि ली सागरक छाती मे बैसल उपास्य के किएक बेकल अछ पल पल प्रतिपल नै मेटैत अछ तरास जकर की अकास स मिलवाक आस एकर.. आतुर अधीर की व्यर्थहि रहल एकर पीर नहि ते केकरो पिआस मेटा पवैत अछ नहि ते स्वयम अपन तरास बुझि पवैत अछ युग युग सँ तटक निर्मम रेत कें भिजावैत अछ मुदा, किनार ओहिना निर्विकार निर्लेप रही जायत अछ की ई नियति प्रकृतिक थीक पुरुष अपना के किनार बना लैत छैक भिजैत अछ, तितैत अछ किछ बाजि नहि पवैत अछ जीवनक अर्थ खोजिते रहि जायत छैक............................. बीतल इतिहास हम पलक पाँखि मे पोसि रहल छी बीतल युगक नीरव इतिहास ! नयन-पथ सं सांस मे मिलि शिखी चुनैत जलजात रहल 'आह ' सं निकलि 'चाह' मे खिली टूटल आस-पारिजात रहल ! ओ चंचल सपना पुलक भरल ई स्पंदन चिर व्यथा केर सुधि सं सुरभित स्नेह घुलल आखर तितल हमर कथाक ! नयन मे अनगिन चुम्बन सजग स्मिति रहल उन्मद सांस मे सुरभि, वेदनक क्षण चातकी सन तकैत प्रिये -पद ! आय तं सब सांस मे भरल मरण त्योहारक निस्सीम जय मौन मे प्रानक तार टूटल निसांस भेल पिआस मे लय गहन तम-सिन्धु मे उमड़ल अधर पर अंगारक हास बीतल युगक नीरव इतिहास.... कोसी नदी हमर मोनक कोमल वृंतसँ अहाँ निज नेह-गेह निर्माण केलौं हमर भावनाकेँ वरि हमरेपर शर-संधान केलौं ! हम तँ छलौं आत्मा अहाँक नदी मात्र हमरा बुझलौं .....!! बेटी हिमालयक हम मस्त अल्हड चंचल छलौं छागर पाठी , सिनुरक पूजा लैत धराक कोरमे उन्मुक्त गीत गवैत छलौं..... मुदा, नहि सह्य भेल अहाँकेँ हमर मुक्त हास , अनुपम विलास बराज बान्हि हमर छातीमे कील अहाँ ठोकि देलौं दुर्गाक सिंहनाद सन भैरवीक निनाद सन कट कट विकट ओठ पुट पाँड़रि जकाँ हुंकार भरैत हम रहि गेलौं पूर्वी पश्चिमी तटबंधक कारामे सिसकैत नारीक नियति बुझि मौन भऽ गेलौं .... जहिया कहियो ज्वार उठैत छल तामसे माहुर भऽ गामक गाम बहा दैत छलौं कतेको प्राणीकेँ निष्प्राण बेघरबार बना दैत छलौं किन्तु, अहाँक सतत उपेक्षासँ त्रस्त भऽ उठलौं हम त्यागि देलौं लौह भुजपाशकेँ अपन बाट स्वयं बनेलौं कुसहा बांध तोड़ि अपन मुक्ति स्वयम खोजलौं , तैं महाविनाशक संहारसँ सुरुज कारी भऽ गेल .... कत्तो बौलक बनल पहाड़ कत्तो जलक संसार बनि गेल .... किन्तु, अहाँ तुरत निर्णय लेलौं एकटा आर बांध बान्हि बंदिनी हमरा बनेलौं ........ एकटा आर महाप्रलयक दंश सहवा लेल हमर क्षेत्रकेँ असहाय अहाँ छोडि गेलौं ..................... पाथर हम देखने छलौं अहाँ केँ प्रज्ञा सँ आलोकित स्नेह सँ परिपूरित आत्ममुग्ध स्वयममे हेरायल अपनामे डूबल अहाँक ओ निर्लिप्त दृष्टि जेना कोनो सुरुज उगि रहल हो जेना इजोरिया बरकि बरकि चुबि रहल हो ! कतेको कमल दल विहुँसि गेल नील आकासक स्वप्न देखैत हेरायल भोतिआयल ... हम डूबि गेल छलौं अपनाकेँ निस्सहाय पाबि रहल छलौं .... ओहि इजोरियाक जलधारसँ उबरबा लेल वेगसँ बहैत प्रवाहसँ अपनाकेँ समेटि नहि पाबि रहल छलौं हम प्रवाहमे , किनार दूर भागल जा रहल छल एकटा मृत्युक बाटपर ठाढ़ व्यक्तिक अंतिम इच्छा हमर जीवन भऽ गेल छल एकटा बिरड़ो उठल रेत आ बाउलक मध्य नदीमे हमरा पाथर बना देलक आ आइ हम पाथर बनि गेल छी............ हम आबि रहल छी.. ........ माँ ! अहाँ किएक कानि रहल छी कोन सोच मे डूबल छी शक्ति रहितो अशक्त बनल छी हम सबटा जनैत छी सबटा बूझैत छी ................. अहाँ स्वयं के मेटी आन के बनव चाहलों लोक बनैत रहल ,अहाँ मिटैत रहलों ई की अहाँक त्याग नै थीक माँ ? ------हम चौंकी उठलों ..अहाँ के छी कत स बाजि रहल छी ?? माँ - हम अहांक कोखि मे छी अहाँ हमरा नहि चिन्हलों.. हम अहींक गर्भ स बाजि रहल छी अहाँ चोंकि किएक गेलों अहींक तं प्रतिकृति छी हम \ हमर दादा दादी स डरा गेलों माँ फेर बेटिय भेल के दंस स तिलमिला गेलों घाह घाह भेल अहांक अंतर हम देखने छी ...किन्तु, अहाँ हमरा नष्ट नहि करब माँ हम अहांक हिस्सा छी अहांक अपूर्ण कामनाक पूर्णता छी हम जनैत छी हमर माँ नै कान्तिह बाबु उदास नै हेताह एखनही त एकटा माय बाबु अपन विकलांग बेटी के योग्य बना देलनि बेटी की होयत छैक जमाना के देखा देलनि अहांक विहुँसैत चेहरा हमर ताकत बनत हम आबि रहल छी माँ अहाँ जत जत हारलों अपन आन मे उन जकां ओझरेलों हम ओते ओते जीती के देखा देब सबटा सम्बन्ध सोझरा लेब हम आबि रहल छी माँ .................... ठप्पा अहांक गाम कते अछ प्रश्न सुनतही अकचका गेलों हम कनिक काल सोचैत --- हमर गाम ?? उयेह ने जाहि ठाम अपन घर होयत छैक ? हं हं उयेह घर ,उयेह गाम ! हमरा ते दू टा गाम अछ .. एकटा जते से हम आयल छी दोसर हम जते एलहुं अछ मुदा, एहि मे हमर कोन अछ हम नै बूझैत छी जते स हम एलों ओते स सनेस बारि द हमरा विदा क देल गेल 'जाह अपन घर बेटी' जाहि ठाम आयल छी ओहिठाम सब सनेस बारी बिल्हल गेल 'कनियाक गाम से आयल छैक' हम की जाने गेलों हमर गाम कोन थीक हमरा नाम पर ते कत्तो किछ नै भरल पुरल घर मे हमर अस्तित्व किछ नै बस 'फलना गामवाली' बनि रही गेलों जाहि ठाम स आयल छलों ओहि गामक ठप्पा बनल रही गेलों............ मनोज झा मुक्ति ककरा करु विश्वास ! केओ भुखे मरैछ, केओ मरैछ खुब खा–खा कऽ ककरो परल लल केओ जरबैछ अन्न सड़ा–सड़ा कऽ । दिनराति कटैत अछि गरदनि खुल्लम खुल्ला जे, पाप अपन कट्बैत अछि मन्दिरमे जा–जा कऽ । दोसरके उन्नतिमे घुसक गन्ध सुँघनिहार सब, पुरस्कृत अपने होइत अछि चाकरी बजा–बजा कऽ । कहैछ जे छी सच्चा सदिखन भूmठक विछहन छिटैत अछि, जेब ओ अपन भरैत अछि, बोली भजा–भजा कऽ । ककरा कहियै भल, भगवान सेहो तेहने छई, केओ पानि बिनु सुखाइत, केओ मरैछ दहा–दहा कऽ । पसरल अत्याचार मेटा रहल अस्तित्व मनुख्खक बँचतै कोना ? पसरल अत्याचार आब ई हटतै कोना ! सम्बन्ध अखन व्यापार भऽगेल जत्रतत्र आब, पुत्र–पिताके स्नेह भाव आब जुड़तै कोना ? संस्कृति ओ संस्कार सब छोड़ि रहल अछि, अपन पहिचानक रक्षा आब होएतै कोना ? नेतासब कऽ रहल दलाली, स्वार्थमे अपना, देश, समाजक लाजक रक्षा होएतै कोना ? जातिपाति आ नोटक बलपर भोंट खसैय, देशभक्त, समाजिक नेता जनमतै कोना ? कर्मचारी सब लुटि रहल अछि दिन दहाड़े, गरीब जनताके काज आब सुतरतै कोना ? व्यापारी व्यस्त मिलावट आ कालाबाजारीमे, सुपथ मूल्यमे स्वस्थ पदार्थ आब भेटतै कोना ? प्रहरी प्रशासन ताकमे बैसल घुसक खातीर, चोरी–चकारी देश,समाजसँ हटतै कोना ? पत्रकार दलाल बनल, चाहक कपपर बिकय, निमुखा जनताक आवाज बाहर अओतै कोना ? साहित्यकार चाटुकार बनल, सबके पदे चाही, नीक साहित्यक रचना पाठक पढतै कोना ? युवा, विद्यार्थी, बुद्धिजीबी सब चुप्पे बैसल, सोंचियौ, देशक विकास कि होएतै अहिना ? चुप्पी तोडू, सब संग मिलि लडू देशक खातिर, नहि त देशक अस्तित्व आब बँचतै कोना ? गामक सावन
हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो । सावनमे झूला लगतै ना देखाकऽ हमरा तों दऽजो ।।
देखाकऽ हमरा तों दऽजो ओ, खेतक कादो आ रोपनी आरिपर बैसर गिरहथवा गजारैत खेतके हरबाहा कोदारिसँ आरि–धूर बन्हैत गवैत–झूमैत– रोपैत जनी कखनो मेघके गरजन कखनो टिपटिपाइत बुन्नी देखैला तरसि रहल नैना खेतक बादमे तों धऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।।
बितैत ओ नेनपन सावनमे बनल पोखरि सब आँगनमे भिजैत डोका बिछैछ ओ हूँज केओ कागजक नाओके बहबैत रातिमे बेंगक टरटों–टरटों सुनैला मोन ई व्याकूल अछि हमर ई कष्ट निदानकलेल मोनके सँग उड़ाकऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।।
सावन त सगरो आएल छै मूदा ओ दृश्य कतऽ भेटत ? निकलैत सजि–धजिकऽ यूवती लोढैला फूल संगीक संग गुञ्जैत चहुदिस बटगवनी देखैला दृश्य गामक ई हमरापर कृपा तों कऽजो । हवा रे लऽ चल तों हमरा मोनके गाम तु लऽजो ।। प्रभात राय भट्ट, ग्राम: धिरापुर - २, जिल्ला महोतरी ,अंचल जनकपुरधाम, नेपाल, पिता :-श्री गंगेस्वर राय (शिक्षक) माता :-श्रीमती गायत्री देवी (समाज सेविका), शिक्षा :-आई .ए., भूतपूर्व पेशा :- नेपाल ट्राफिक प्रहरी , वर्तमान पेशा :आर्म्ड फ़ोर्स (अमेरिकन राजदुतावास ,साउदी अरबिया) गजल नव वर्षक आगमन के स्वागत करैछै दुनिया नव नव दिव्यजोती सं जगमग करैछै दुनिया विगतके दू:खद सुखद क्षण छुईटगेल पछा नव वर्षमे सुख समृद्धि कामना करैछै दुनिया शुभ-प्रभातक लाली सं पुलकित अछी जन जन नव वर्षक स्वागत मे नाच गान करैछै दुनिया नव वर्ष मे नव काज करैएला आतुरछै सब शुभ काम काजक शुभारम्भ मे लागलछै दुनिया नव वर्षक वेला मे लागल हर्ष उल्लासक मेला मुश्की मुश्की मधुर वाणी बोली रहलछै दुनिया जन जन छै आतुर नव नव सुमार्गक खोजमे स्वर्णिम भाग्य निर्माणक अनुष्ठान करैछै दुनिया धन धान्य ऐश्वर्य सुख प्राप्ति होएत नव वर्षमे आशाक संग नव वर्षक स्वागत करैछै दुनिया .............................वर्ण-१९....................... गजल नव वर्षक नव उर्जा आगमन भS गेल अछी दू:खद सुखद समय पाछू छुईटगेल अछी इर्ष्या द्दोष लोभ लालच आल्श्य कय त्याग करी रोग शोक ब्यग्र ब्याधा सभटा पडागेल अछी नव प्रभातक संग नव कार्य शुभारम्भ करी नव वर्षक नवका सूर्य उदय भS गेल अछी अशुभ छोड़ी शुभ मार्ग चलबाक संकल्प करी दिव्यज्योति सभक मोन मे जागृत भगेल अछी निरर्थक अप्पन उर्जाशक्ति के ह्रास नहीं करी शुख समृद्धि प्राप्तिक मार्ग प्रसस्त भS गेल अछी सुमधुर वाणी सं सबहक मोन जीतल करी सामाजिक सहिंष्णुता आवश्यकता भS गेल अछी .............................वर्ण:-१८ ........................... गजल अहाँ सं हम प्रगाढ़ प्रेम करैत छी अहाँ किएक इ अपराध बुझैत छी जिन्गी अछी हमर अहींक नाम धनी हमरा किएक बदनाम बुझैत छी हमर आँखी अहांके दुलार करैय नैन किएक हमरा सं झुकबैत छी अछी मोनक मिलन प्रेमक संगम अहाँ किएक प्रेम इन्कार करैत छी हम छोड़ी देलहुं सब काज सजनी बस अहींक नाम लिखैत रहैत छी बिसारि देलहुं हम अलाह ईश्वर प्रेम केर हम इबादत करैत छी प्रेम छै पूजा,छै प्रेम सच्चा समर्पण अहिं कें हम अपन जिन्गी बुझैत छी ................वर्ण -१४................... गीत:-विरह आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // मुखड़ा सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२ कतय गेलहुं हमर प्रीतम चितचोर अहाँक इआदे नैना बरसैय मोर जिब नै सकब अहाँ बिनु हम सजना घुईर चली आबू पिया अपन अंगना आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२ पल पल हम मरि मरि जिबैतछी घुइट घुइट आइंखक नोर पिबैतछी घुईर आबू सुनिक हमर वेदनाक स्वर करजोरी विनती करैतछी पिया परमेश्वर आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२ अहिं हमर मथुरा काशी मका मदीना अहाँ बिनु नहीं अछी हमरा जिनगी जीना चिर निंद्रा सं जागी आबू कलक मुह सं भागी समसान सं उठी आबू कब्रस्तान सं निकली आबू आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२ आस नहि तोडू पिया साँस रहिगेल बड़ कम जौं कनियो देर करब निकली जाएत हमर दम निकली जाएत हमर दम....................२ पिया ...........पिया ........मोर पिया.....२ आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२ दहेज मुक्त मिथिला बनाबू समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज // की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२ बेट्टा बनल अछि मालजाल बाप बनल पैकारी दहेजक आगिमे जड़ि रहल अछि बहु बेट्टी बेचारी समाजमे दहेजक रोग लागल अछि बड भारी जौं उपचार नहि करब तँ फैल जाएत महामारी समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज // की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२ बेट्टी जन्म लैते बाप माथ पएर हाथ धरैए बेट्टीक ब्याह कोना करब चिंतामे डुबल रहैए शिशु हत्या करैए कियो भ्रूण हत्या करैए आगि लागल दहेजक बेट्टी जड़ि मरि मरैए समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज // की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२ मैथिल ललना पढ़ि लिख भोगेलथि विद्द्वान मुदा दहेज छै अपराध ई किनको नहि ज्ञान मांगी दहेज किए करैतछी बेट्टी बहुक अपमान करू आदर्श ब्याह यौ ललना बढ़त अहांक शान समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज // की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२ उठू जगु मैथिल ललना बढ़ू आब आगू तिलक दहेजक विरुद्ध एक अभियान चलाबू मैथिली वैदेही जानकीक भ्रूण हत्यासं बचाबू उठू जगु मैथिल दहेज मुक्त मिथिला बनाबू समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज// की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२ तड़पि-तड़पि बाँचि रहल छी तड़पि-तड़पि बाँचि रहल छी सजनी अहांक इयादमे कोना कोना हम जिबैछी प्रियम्बदा हमर कोना हेती पूर्वा पवन सं पुछै छी पात पात फुल फुल पैर अहांक नाम लिखैछी प्रेम अहांक पागल भेल सदिखन हम रहैत छी १ देख हमर ई हालत लोग मजनू हमरा बुझैए देख हमर ई तड़पन लोग बताह सेहो कहैए इयाद अहांक आबिते गोरी चिहैक उठैए करेज अहां बिनु निरसल जिनगी आब नै होइए परहेज २ घर घुरि आबू सजनी आब नै तड़पाबू स्नेहक प्यासल मोनक हिया हमर जुड़ाबू बेकल तनमन हमर अहांक संग खोजैए अहां बिनु ई दुनियाँ सुनसान वीरान लगैए ३ मधुर मिलनक आस तड़पि तड़पि बांचि रहल छी मुदा भीतर भीतर हम विरह भेल टुटि रहल छी कदम कदम पर ठेस लगैए कंकर कांट पएर चुभैए हिया हमर हारि गेल कतए कुनु खबर नै भेटैए ४ कतय गेलै चितचोर कतय गेलै चितचोर बदरा उमैर उमैर घनघोर बरसै आंगन मोर प्यासल तनमन अछि हृदय भेल हमर विभोर दिल चोरा कऽ प्रीतम मोर कतय गेलै चितचोर २ सिनेहियाक सूरत देखैले नैना सं झहरे नोर रिमझिम रिमझिम सावन वर्षे तनमन अगनके जलन सजन उठल बड जोर कतय गेलै चितचोर २ अंग अंग व्यथा उठल फटैए पोर पोर बदराक बूंद बूंद लगैए संगीतक शोर खन खन खनकैए कंगना छम छम बजैए पायल मोर २ पिया लग आउ प्यास बुझाउ मोन उठल बड़ जोरक हिलोर अहां बिनु जीवन भेल भारी मोर कतए गेलै सजन चितचोर विरहिन भेष देख हमर मुस्की मारैए चानचकोर २ गरीबक जिनगी भेल पहार दुनिया सगरो लगैया अन्हार -- २ भूखल पेट जेकर टूटल घरदुवार वर्षा मे भीत गिरल हवा उरौलक चनवार फाटल अंगा झलकैया अंग उघार सर्दी सं थर थर कापिं बहैय पूर्वाबयार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 दिन दू;खी पैर हुकुम करैया नेता आर सरकार गरीबक बच्चा कोना जिबैय केकरो नै कुनु दरकार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 बड़का माछ छोटका माछके बनौलक अपन आहार धनवान बनल अछि शिकारी निर्धन के करेय शिकार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 अन्न अन्न लय जी तर्सैया भेटे नै किछु आहार के बुझत मर्म गरीबक साहू महाजन नै दैय उधार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 माए बाबु रोग सं ग्रसित कोना करी हुनक उपचार तंग आबिगेलहूँ हम देख इ दुनियाक व्यवहार गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2 दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2 चलैतछी डगैर पैर चलैतछी डगैर पैर शुद्ध मन वचन कर्म सं गबैतछी गीत हम अपन ईमान धर्म सं वैदेहीक जन्मभूमि राजर्षि जनक के गाम मिथिलाक हम वासी वास हमर जनकपुरधाम जग मे सुन्दर अछि इ नाम जय जय जय मिथिलाधाम मिथिलाक जन जन मैथिल मथिली हमर भाषा पुनह पुनह जन्म ली मिथिलेमे इ हमर अभिलाषा उत्तर हिमगिरी हिमालय दक्षिण पावन पतित गंगा कोशी गंडक जनकपुर चाहे बसु दरभंगा इ समस्त भूमि अछि मिथिला जय जय जय मिथिलाधाम दया धर्म हृदय मे राखी मिथिलाक जन जन मैथिल सौहार्द्य वातावरण सृजन करी मिथिलाक जन जन मैथिल जातपातक भेदभाव सं दूर रही मिथिलाक मैथिल हिन्दू करैय मुस्लिमके सलाम मुस्लिम हिन्दुकें प्रणाम डोम घर दहिचुरा खेलैथ पाहून राम जय जय जय मिथिलाधाम हम नै ज्याब आब मेला अकेला यौ पिया हम नै ज्याब आब मेला अकेला मेलामे देखलौं पिया बड बड अजगुत खेला आदमी पैर आदमी रहे ठेलमठेल बिचमे छौडा सभ करैत धुरमखेल यौ पिया हम नै ज्याब आब मेला अकेला २ दरुपिबा सभ केलक बड़ा हुलदंगा केलक हमरा छेड़खानी लुचालाफंगा कियो मारैय टिहकारी कियो मारैय पिहकारी मटकी माईर माईर बोलाबे हमरा छौडाछेबारी यौ पिया हम नै ज्याब आब मेला अकेला २ प्रेमी मग्न भेल गाबैत रहे पिया मल्हार चोरबा लक भागल ओकर गिरमल्हार कान ककरो चिरल नाक रहे फारल चाई चंडाल गहना लक सभटा भागल यौ पिया हम नै ज्याब आब मेला अकेला २ गंजा भांग पिने बुढ्बो अपने मोन मतंग बड बड लीला भेल कनिया बहुरियाक संग छौडा सभ केलक पिया हमरो बड तंग आँखी सं देख्लौ पिया ई सभटा खेला यौ पिया हम नै ज्याब आब मेला अकेला हैंस दिय कनियाँ हैंस दिय हैंस दिय कने हैंस दिय कनियाँ देखू लौनेछी कनियाँ अहांलेल पैरक पैजनिया महफा मे बैठ चलू कनिया आई हमरा अंगना अहांके अईन्देव सजनी हम जयपुर के कंगना कान दुनु सोन हम अहांके देव रे झुलनियाँ नाकमे देव रे सजनी सानिया कट नथुनिया छम छम बाजैय गोरी अहांक पैरक पैजनिया लाखोमे एक अहां छि हमर सुनरी दुल्हनिया खन खन खन्कैय अहांक हाथक चुरी कंगना चलू चलू चलू कनियाँ यए आई हमरा अंगना मोती जडल लहँगा पैर लाले लाल चुनरिया लागैछी अहां धनि पूर्णिमाके चाँद सन दुतिया हैंस दिय हैंस दिय कने हैंस दिय कनियाँ देखू लौनेछी कनियाँ अहांलेल पैरक पैजनिया अहाँ लेल मोन हमर कटैय दिन राईत अहुरिया माईनजाऊ बात गोरी कहैय प्रभात जनकपुरिया हमर बाबुजी छथि बड होसियार हमर बाबुजी छथि बड होसियार, हुनका सन कियो नै बुधियार, लेनदेनमे छथि ओ बड माहिर , भला अर्थ स: संसार चलैय, ई बातों छै जग जाहिर, हम कहैछी बी.ए.एम्.ए.पढ़दीय, बाबु कहैछथि बस आब रहदीय, आई.ए.पैढ़ लेलौ ई की कम अछि? हम कोण पढ़ल लिखल ? मुदा शिक्षा मंत्री बनल अछि, पि.ए. स:सभटा काज कराबैछी, साइनके जगह औठाछाप लगाबैछी, काज करू एहन जैमे पाए नै लागे, बैसल बैसल अपार धन सम्पति घर आबे, बात हमर सुन बेट्टा,बन तहूँ हमरा सन नेता, फेर देख जिन्दगी मे चमत्कार भजेतौं, हमरा संग संग तोरो उधार भजेतौं, जो मंदिर,मस्जिद मे आईग लग्बादे, गिरजा घर,बौध गुम्बा पर डोजर चल्बादे ई सब करिहे राईत के अन्हार मे, दू चाईर गो हिन्दू के गिरादीहे ईनारमे, फेर देख हिन्दू मुस्लिम मे लडाई भजेतई, हमरा नेता सभक बड़का कमाई भजेतई, भलेही मंदिर मस्जिद के आईग बुईझ जेतई, मुदा धर्म मजहब केर आईग लागले रहतई, अनेरो घुमैत रहिहे गामेगाम टोला टोला, साथ वोकरे दिहे जेकर छै बोलबाला, वोट बैंक बैढ़ जेतौं भजेबें तहूँ हमरा सन नेता, ६०१ सभासद महान जे नै देखलौं कतय दुनियां मे ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे चोर डाका घुसल शिंहदरवार मे लोकतान्त्रिक नेता क भेष मे लूटपाट मे सभ लागल अछि देसक मालखजाना भिखमंगा कह्बैय अपना के आब उच्च राजघराना साईकल जे चलबैछल बिनु ब्रेक के ओ करैय लैंडक्रूजर के सवारी, जे पेनहैछल फाटलपुरान अंगा ओ पेन्हैय आब सुटसफारी उज्जर केश रैंग करैय कारी खाई मे जेकरा छल आफद चायपान ओ बियर वार मे करैय मधुपान गाम मे जेकर छल टुटलफूटल मकान राजधानीमे बनौलक महल आलीशान देखू यी चोर नेता सभक शान सय मे अछि पचासी बेईमान तैयो अछि ६०१ सभासद महान जे नै देखलौं कतय दुनियां मे ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे दू वर्ष मे नै बनौलक संविधान संविधानसभाक समय केलक अवसान फेर एक वर्ष ललक अनुदान ओकरो यी ६०१ केलक अपमान फेर लेलक ३ महीनाक अनुदान दिन बितल जाईय देखू कहिया बनत संबिधान गिद्ध जिका करैय सभ घिचातानी नेता सभक पोषण मे देसक टाका बनल पानी तिन पार्टी मे तेरह गुट स्वार्थलोलुपतामे भेल फुट करैय मे लागल अछि सभ ब्रम्ह्लुट सावधान!! सावधान!! सावधान!! भलेही तू नेता जो स्वार्थमे फुट मुदा हम जनता अखनो अछी एकजुट शाही तंत्र के हम जनता केलौं अंत जुनी बुझिहें अपनाक बलबंत जौं तिन महिनामे संविधान नै बनलौं हेतौ ६०१ सभासद्क शर्मनाक अंत !!! पेट किऐ जरैत जाइ छी परदेश धनि छोड़ि कऽ अपन देस, भेजब कमा कऽ धन रुपैया मीठ-मीठ सनेश, जग केर रीत सजनी आब अहाँ जानु, जिनगीक चौबटियापर एना नै कानु प्रीत सँ जौं चलैत जिनगी तँ पेट किए जरैत, अन्न बिन दुनियाँमे लोग किए मरैत, अहाँ बिन सजनी हम जीब नै सकैत छी, मुदा भूखे जौँ पेट जरत तँ प्रीतो नै सुहायत, गरीब भऽ कऽ जन्म लेलौं ऐ पत्थरक संसारमे, जिनगीक नाव अटकल रहि गेल मजधारमे, हम नाव बनब अहाँ पतवार बनू, संग संग चलू, हम नवका खोजक राही, अहाँ राय दैत चलू , दुःख सुख केर जीवन साथी अपन साथ दिअ, जिनगीक यात्रामे जौं लड़खरै तँ हिमतक हाथ दिअ, जीवनक कटुसत्य सजनी आब अहाँ मानु, जिनगी केर चौबटियापर एना नै कानु, लड़ऽ दिअ हमरा जिनगी सँ चलऽ दिअ कर्मपथपर, गन्तव्य स्थान जरुर मिलत चलू दुनु गोटा धर्मपथपर, नैन किए भरि गेल अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, अहाँक नैनमे नोर सजनी किए भरि गेल यै , नोर नै बहाउ सजनी ई थिक अनमोल मोती, अहाँ हँसि दी तँ जगमग करए हमर जीवनक ज्योति, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, एना नै होउ अहाँ उठास, मोन नै करू उदास, आइ छै दुःख तँ काल्हि सुख हेतै, ई छन भरक विपति सब टरि जेतइ, राखु मोनमे आशा आओर हमरापर भरोसा, पूरा हएत मोनक सभटा अभिलाषा, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतए चलि गेल यै, दुःख सुख तँ जीवनमे अबिते रहतै, चाहे हवा जते तेज बहतै, समुन्दरमे लहर जते जोर उठतै, चाहे धरतीसँ ज्वाला फुटतै, मुदा जीवनक यात्रा कखनो नै रुकतै, अहाँक ठोरक मुस्कान सजनी कतऽ चलि गेल यै, अहाँक नैनमे नोर सजनी किए भरि गेल यै, देलौ हम पेटकुनिया तिनगो बेट्टी देख कनियाँ, देलौं हम पेटकुनियां, डाक्टर कहैय अल्ट्रासाउंडमे, फेर अछि बेट्टीये यए, बड मुस्किल स करपरत निर्वाह, कोना हयात बेट्टीक व्याह, चलू कनियाँ करादैछी एबोर्सन, हम नए लेब आब एतेक टेंसन, रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!! मईट स जन्म लेलक सीता, करेजा स सट्लक जनक पिता, हम अहाँक कोईखक सन्तान, किया करैत छि हमर अबसान, जनक छैथ मिथिलाक पिता, बेट्टी इहाँ के सब सीता, किया करैत छि बाबा अहाँ चिंता, बेट्टा बेट्टी मे नए छै कोनो भिन्ता, भैया संग हमहू स्कुल जेबई, मोन लगाक पढ़ाई करबई, डाक्टर इंजिनियर पाईलट बनबई, जगमे अहाँक नाम रोशन करबई, दुल्हे पीयोलक जहर व्याह क्याक पिया घर गेलौं, मोन मे सुन्दर सपना सजेलौं, सासुर घरके स्वर्ग समझलौं, डोली चैढ पिया घर एलौं, हर्षित मन केकरो नए देखलौं, गिद्ध नजैर स सब हमरा देखलक, झाड़ू बारहैन स स्वागत केलक , बाप किया नए देलकौ तिलक, जरल परल जूठकुठ खियोलक, सपना सबटा भेल चकनाचूर, सास भेटल बड़ा निठुर, ठनका जिका ठंकैय ससूर, बात बात मे चंडाल जिका आईंख देख्बैय भैंसुर, जेकरा साथै लेलौं सात फेरा ओहो रहैय मर स दूर, जाधैर बाप देतौने रुपैया , सूत बिछाक आँगनमे खटिया, कल्पी कल्पी केलों गोरधरिया, कतय स बाप हमर देत रुपैया, बाबु यौ हम अहाँक राजदुलारी, छालों हम म्याके प्यारी , विधाता लिखलन केहन विधना, किया रचौलक एहन रचना, नरक स बतर जीवन हम जीबैत छि, आईंखक नोर घुईट घुईट पिबैत छि, दूल्हा मगैछौ फटफटिया आ सोनाके चैन, नए देभि त छीन लेतौ हमर सुखचैन, बेट्टीक हालत देख बाप धैल्क हाथ माथ, चैन फटफटिया लक आएब हम साथ सासूर घुइर जो बेट्टी रख बापक मान, सपना भेल सबटा चकनाचूर, सास सासूर भेटल बड़ा निठुर, मालजाल जिका बन्ह्लक देवर, ननद उतारलक गहना जेवर, मुग्ड़ी स माईर माईर बडकी दियादिन देखौलक तेवर, पिजड़ा मे हम फसल चीडैया, कटल रहे हमर पंख पंखुड़िया , पकैर धकैर दुल्हे पियोलक जहर, छटपट हम छटपटएलौं कतेक प्रहर, पत्थरके संसारमे कियो नए सुनलक हमर चीत्कार, प्राण निकलैत हम मुक्त भेलौं, छोइड दलों यी पापी संसार, गाम आबि जाऊ गाम आबिजाऊ हमर दुलरुवा पिया,आबिगेलई होली !! अहि केर प्रेमक रंग स: रंगाएब हम अपन चोली !! यी प्रेमक पाती मे लिखरहल छि अपन अभिलाशाक बोली !! अईबेर प्रभात भाईजी गाम अओता की नए पूछीरहल अछि फगुवा टोली !! बौआ काका के दालान मे बनिरहल अछि फगुवाक प्लान !! चईल रहल छई चर्चा अहिके चाहे खेत होई या खलिहान !! कनिया काकी कहै छथिन बौआ क देखला बहुते दिन भगेल !! वित साल गाम आएल मुदा विना भेट केने चईल्गेल !! अहाक संगी साथी सब एक मास पाहिले गाम आबिगेल्ल !! अहाक ओझा २५ किल्लो क खसी आ भांगक पोटरी अहिलेल दगेल !! गाम आबिजाऊ हमर दुलरुवा पिया जुड़ाउ हमर हिया !! पूवा पूरी सेहो खिलाएब ,घोईर घोईर पियाएब हम अहाक भंग !! अहि केर हाथक रंग स: रंगाएब हम अपन अंग अंग !! रंग गुलाल अवीर उडाएब हम दुनु संग संग !! प्रेमक रंग स: तन मन रंगाएब एक दोसर के संग संग !! आदर्श विवाह हम छी मिथिलाक ललना, दहेज़ ला क बनब नए बेल्गोब्ना, दहेज़ लेनाए छई अपराध, कियो करू नए एहन काज, हम करब विवाह आदर्श, अहू लिय इ सुन्दर परामर्श, भेटत सुन्दर शुशील कनिया, आहा स प्रेम खूब करती सजनिया, आँगन मे रुनझुन रुनझुन, बाजत हुनक पैजनिया , घर केर बनौती सुन्दर संसार, भेटत बाबु माए केर सेवा सत्कार, छोट सब मे लुटवती वो दुलार, अहक भेटत निश्छल प्रेमक प्यार, जौ दहेज़ लयक विवाह करबा भैया, कनिया भेटत कारिख पोतल करिया, हुकुम चलैतह शान देखैतह, बात बात मे करतह गोर्धरिया, अपने सुततह पलंग तोरा सुतैत पैरथारिया, बात बात मे नखरा देखैतह, भानस भात तोरे सा करैतह, अपने खेतह मिट माछ खुवा मिठाई, जौं किछ बाजब देतः तोरा ठेंगा देखाई, रुईस फुइल नहिरा चईल जेताह, साल भैर मे घुईर घर एतः सूद मे एकटा सूत गोद मे देतः पुछला स कहती इ थिक अहाक निशानी, आब कहू यौ दहेजुवा दूल्हा, आहा छी कतेक अज्ञानी ??? तेय हम दैतछी यी सुन्दर परामर्श, सुन्दर शुशील भद्र कनिया भेटत, विवाह करू आदर्श,विवाह करू आदर्श!!! कुमारी धिया सुनु सुनु यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !! संगी सखी सभक भेलई ब्याह, हमर होतई कहिया !! तिस वरखक भेली हम, मुदा अखनो रहिगेली कुमारी धिया !! हमरा लेल नए छाई संसार मे, एक चुटकी सिंदुरक किया !! रोज रोज हम सपना देखैत छि, डोली कहार ल्या क ऐलैथ पिया !! आईख खुलैय सपना टूटईय, जोर जोर स: फटईय हमर हीया !! गामे गाम हमर बाबा घुमैय,ल्याक हाथ मे माथक पगरी !! कतहु वर नए भेटैय,की विन पुरुख के छई यी मिथिला नगरी ?!! बेट्टावाला केर चाहि पाँच दश लाख टाका आ गाड़ी सफारी !! तिनचाईर लाख टाका ऊपरस:जौ चाहैछी जे ओझा करे नोकरी सरकारी !! अन्न धन्न गहना गुरिया एतेक चाही जे भईरजाई हुनक भखारी !! बेट्टीवाला दहेज़ मे सबकुछ लुटा क अपने भजाईत अछि भिखारी !! बाबा हमर खेत खलिहान बेच देलन आ बेच रहल छैथ अपन घरारी !! अहि कहू यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !! कतय स:देथिन बाबा हमर दहेज़ मे एतेक रुपैया !! बालविबाह हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालीउमरिया मे !! पढ़ लिख खेल कूद दिय,हमरा अपन संग्तुरिया मे !! --निक घर वर भेटल छौ,दहेज सेहो कमे मंगैछौ !! आगुम की हेतै से नए मालूम,ब्याह करहीटा परतौ !! ब्याह करहीटा परतौ गे बेट्टी.........................!! --हम चौदह वरखक कन्याकुमारी अहाक राजदुलारी !! मुदा दूल्हा छैथ विदुर आ पाकल हुनक केस दाढ़ी !! हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे २ !! --दूल्हा विदुर भेलई तईस: की धन सम्पति अपार छई !! भेटतौ नए कतौ एहन घर वर दूल्हा सेहो रोजगार छई !! --रुईक जाऊ रुईक जाऊ बाबा यौ हमरा पैघ होब दिय !! पैढ़लिख क हमरो कोनो सरकारी नोकरी करदिय !! बेट्टावाला अहाक दरवाजा पर अओता !! कहता अहाक बेट्टी स:हम अपन बेट्टा क ब्याह करब !! अहा कहब नै नै अखन हम बेट्टी क ब्याह नए करब !! फुइक फुइक क चाय पीयब ,अहू किछ शान धरब !! हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे !! --एक लाख टका के बात कहले तू भगेले सयान गे !! बेट्टी क भविष्य नए सोचलौ,हमही छलौ नादान गे !! बेट्टी क ब्याह कोना हयात सतौने छल हमरा दहेज़ क डर !! बाल विबाह करबई छलौ,खोईज लेलौ बुढ्बा वर !! नए ब्याह करबौ गे बेट्टी तोहर वालिउमरिया मे !! पढ़ लिख खेलकूद तू अपन संगतुरिया मे !! बालविधवा आहा जे नई भेटतौ त जिनगी रहित हमर उदास !! सागर पास होइतो मे बुझैत नई हमर मोनक प्यास !! अहि स पूरा भेल हमर जिनगी केर सबटा आस !! नजैर मे रखु की करेजा मे राखु अहि छी हमर भगवान !! उज्जरल पुज्जरल हमर जिनगी मे आहा एलौ !! रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौं !! की हम भेलू अहाक प्रेम पुजारी ,अहा हमर भगवान यौ !! मुर्झायल फूल छलौ हम ,अहि स खिलल हमर प्रेमक बगिया !! बालविधवा हम अबोध छलौ ,समाज केर पैरक धुल !! उठैलौ अहा हमरा करेजा स लगैलौ, बैनगेली हम फूल !! पतझर छलौ भेल हम,सिच सिच क अहा लौटेलौ हरियाली !! अनाथ अबला नारी के अपनैलौ आ बनेलौ अपन घरवाली अहि स यी हमर जिनगी बनल सुन्दर सफल सलोना !! गोद मे हमर सूरज खेलैय,अहा बनलौ बौआक खेलौना !! हमर उज्जरल पुज्जरल जिनगी मे अहा येलौ !! रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौ,ख़ुशी स हमर आँचल भरलौं !! हमर मन उपवन मे अहि बास करैत छी, अहि केर हम पूजित छी !! हमर परिचय ई अछि हमर परिचयरुपी कविता, ई अछि हमर प्रेमपरागक सरिता, धन्य धन्य अछि भाग्य हमर, जन्म लेलौ हम मिथिलाधाम मे, बास अछी हमर पावनभूमि धिरापुर गाम मे, स्वर्ग स सुन्दर आनन्द बरसैय,अई मिथिलाधम मे, धिरापुर केर धिरेस्वरमहादेव छैथ बड़ ओढरदानी, हम बालक प्रभात अबोध अज्ञानी, पिता गंगेस्वर छैथ ईश्वर के स्वरूप , माता गायत्री ममता स भरल देवीक रुप, भातृत्व प्रेमक प्रतिक प्रकाश प्रभात प्रविन, सब भाई मे अछी आदर सत्कार स्वाभिमान नबिन, सुन्दर सरल सुशिल शालीन बहिन आशा, धन्य धन्य अछि भाग्य हमर पुरा भेल अभिलाषा , भौजी सद्खन ममता स भरल स्नेह बर्सबैय, भावो भावनात्मक बत्सल स्नेह बच्चा सब मे बटैय, हमर मन उप्वनमे बास करैय चन्द्रबदन पत्नी पुनम, सोन स सुन्दर सरल शुशिल बेट्टी अछी स्वर्णिम, सत्यमार्गी संतान तेज्स्व्बी बेट्टा अछी सत्यम , धन्य धन्य अछि भाग्य हमर जन्म लेलौ मिथिलाधाममे गीत स्वतंत्रताक सुनु सुनु ययो बाबु भैया , नींद स तू जगबा कहिया , भूखे पेट पेटकुनिया देला स नई चलत आब कम हौ कालरात्री के भेलई अस्त , उठह उठह कर दुसमन के पस्त , आइधैर तोरा पर शासन केलक , आब कतय दिन रहबा गुलाम हौ, भेलई परिवर्तन बदैल गेलई दुनियाँ, मधेस अखनो रहिगेलई शासक केर कनियाँ, हसैछ दुसमन दैछ ललकार , उठह उठह दुष्ट शासक के करः प्रतिकार , मग्लाह स त भूख गरीबी रोग शोक देलकह , आब छिनक ला ला अपन अधिकार हौ , अखनो नई जगबा त जिनगी हेतह बेकार हौ , बेसी सुत्बा त अम्लपित बैढ़ जेताह , बिस्फोट भक्ह प्राण निकैइल जेताह , उठह उठह करः अपन प्राण क रक्षा , सिखह तू मान-स्वाभिमान क शिक्षा , प्राण तोहर मधेस माई मे , मान-स्वाभिमान छह तोहर स्वतंत्रता मे , बन्धकी परल छह तोहर मधेस माई, उठह उठह हों बाबु भाई , मधेस माई केर मुक्ति दिलाब , सुन्दर शांत विकाशील मधेस बनाब , कालरात्री केर भेलई अस्त , उठह उठह करः दुसमन केर पस्त माहासंग्राम संग्राम संग्राम ई अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !! विना हक हित अधिकार पौने हम नए लेब आब विश्राम !! अईधैर हम सहित गेलौ दुस्त शासक केर अन्याय !! मुदा आब नई हम सहब लक हम रहब अपन न्याय !! निरंकुश शासक शासन करईय घर मे हमरा घुईस !! मेहनत मजदूरी हम करैतछी, खून पसीना ललक हमार चुईस !! अढाईसय वरखक बाद आई भेलई मधेस मे भोर हौ !! गाऊ गाऊ गली गली मे आजादी क नारा लागल छै जोर हौ !! निरंकुश शासक कहैया हम छी बड़ा बलबंत !! मुदा आई हेतई दुष्ट निरंकुश शासक केरअंत !! संग्राम संग्राम यी अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !! विना हक हित अधिकार पौने आब नई हम लेब विश्राम !! अईधैर हम सहैत गेलौ उ बुझलक हमरा कांतर !! तन मन धन सब कब्जा कौलक हमरा बुझलक बांतर !! आब हम मांगब नई छीन क लेब अपन अधिकार हौ !! उतैर गेलौ हम रणभूमि मे करैला दुष्ट शासक केर प्रतिकार हौ !! मेची स महाकाली चुरेभावर स तराई,समग्र भूमि अछि मधेस माई !! हिन्दू मुश्लिम यादव ब्राम्हिन थारू सतार संथाल हम सब एक भाई !! जातपात कोनो नई हमर हम सब छी एक मधेसी हौ !! अपन भाषा भेष संस्कृति नया संविधान मे हम करब समावेशी हौ !! हम रहैत छी परदेश हम रहैत छी परदेश मुदा प्रेम अछि अपने देश स:!! हम छी पावनभूमि मिथिलाधाम मधेस स:!! लिखैत छी चिठ्ठी अपन ब्याथ केर नैनक नोर स:!! मोनक बात चिठ्ठी मे लिखैत छी मुदा बाईज नई सकैत छी ठोर स:!! लिखैत छी अपन दुःख क पाती,रहैत छी कोना परदेश मे !! अईब केर परदेश हम फैस गेलौ बड़का क्लेश मे !! माए केर ममता भौजी केर स्नेह बिसरल नई जाईय !! साथी संगी खेत खलिहान हमरा बड मोन परईय !! माथ जौ दुखैत हमर माए लग मे अब्थिन !! की भेल हमर सोना बेट्टा के कहिक माथ मालिश करथिन !! बोखार जौ लागैत हमरा भौजी बौआ बौआ करैत लग अब्थिन !! दुधक पट्टी माथ पर रख्थिन आ दबाई ला क हमरा खुअब्थिन !! मुदा अ इ परदेश मे धर्ती गगन चंदा सूरज सब लगईय अनचिन्हार !! बड अजगुत लगैय हमरा देख क ऐठामक दूरब्यबहार !! मानब्ता नामक छीज नई छई इन्शान बनल अछि इंजिन !! अठारह घंटा काम कर्बैय मालिक बुझैय हमरा मशीन !! जान जी लगाक केलौ काम दू चैरगो रोग हमरा भेटल इनाम !! नई सकैत छी त आब कामचोर कहिक हमरा केलक बदनाम !! लिखैत छी कथा अपन ब्यथा केर बुझाब आहा सब बिशेष मे !! नून रोटी खैहा भैया अपने देश मे ,जैइहा नई परदेश मे !! मिथिलाधाम मिथिलाधाम... स्वर्ग स: सुन्दर अछी हमार मिथिलाधम !! ऋषि मुनि तपस्वी आर माँ जानकी जन्म लेलैथ अहि ठाम !! ज्ञानभूमि तपोभूमि आर स्वर्गभूमि अछी हमर जनकपुरधाम !! गौतम कणाद मन्दन भारतीसुशिला यी अछी मिथिलांचल के गरिमा !! युगो युग गुनगान होइत अछी मथिलांचल धर्ति क महिमा !! हरबाहक श्रमदेखि धर्ति प्रतिदान केलैथ सिया जी सन् गहना !! मिथिला क सब घर स्वर्ग लगैया,लोग ईहा के साधु सन्त !! चाहे कोनो ऋतु होइ सद्खन बहैत ईहा बसन्त !! मनोरम प्रकृति आर मनमोहक मिथिला क संस्कृति !! एक दोसर स: सब लोग करैत अगाध प्रेम आर प्रिती !! हर जीव ईहा के स्वाभिमानी करैथ नै किनको आशा !! मधुरों स: मधुर मिथिला क मैथिल भाषा !! मिथिले मे पुनरजन्म लि यी सब लोग मे अछी अभिलाषा !! महाकवि विधयापति आर नागार्जुन सन् प्रखर विद्वान !! जग ब्याप्त कैलैथ मिथिला क गरिमामय शान !! स्वर्ग स सुन्दर धर्ति अछी हमर मिथिलाधम !!!!!! सपना देख्लौ बड अजगुत सपना देख्लौ बड अजगुत.. की कहिय राएत सपना देखलौं बड अजगुत हो भाई , हमरा पाछु लागल रहे एकटा बहुरुपिया कसाई, धमकी देलक गल्ह्थी लगौलक देखौलक चाकू छुरा , जान स माएर देबौ,प्राण निकाइलदेबौ,नईतकर हमर माग पूरा , गाल हमर लाल कौलक खीच क मारलाक चटा चट चांटा , निकाल बाक्स पेटी स फटा फट दू चार लाख टाका, डर स हम थर थर कापी मोन रहे घबराईल , तखने एकटा पहरा करैत प्रहरी हमरा लग चईल आईल , मोने मोन हम सोचलौ इ करता हमरा मदत , मुदा उहो रहे ओई चंडाल कसाई केर भगत , दुनु गोटा कान मे कौलक फुस फूस , बाईन्ध क हमरा डोरी स घर मे गेल घुईस , छन मे सबटा भेल छनाक घर मे परल डाका , झट पट जे आईंख खोल लौ ,त की कहिय काका , उ सपना नई सचे के बिपना रहे , हमर बिपति क एकटा घटना रहे , गीत वियोगक गीत वियोग के... पिया निर्मोहिया गेलैथ परदेश , भेजलैथ नई चिठ्ठी आ कोनो सन्देस, जिया घबराईय ,चैन नई भेटैय, सद्खन साजन अहि पर सुरता रहैय, अहाविन हे यौ साजन मोन नई लगैय - २ आईबकेर परदेस हमहू छी कलेश मे , दुःख केर पोटरी की हम भेजू सन्देस मे , आईबकेर परदेस मोन पचताईय , अहाक रे सुरतिया सजनी बिसरल नई जाईय , अहा विन हे ये सजनी मोन नई लगईय - २ नई चाही हमरा गहना ,रुपैया आऔर बड़का नाम ययौ , ख्याब नून रोटी झोपडी मे मुदा चएल आउ गाम ययौ , अहाक मुन्ना मुन्नी पर नई अछि हमार काबू , बाट चलैत बटोही क कहीदईया झट सा बाबु , सम्झौला स झट पुईछबैठेय कतए गेल हमर बाबु , सुनीकेर बेट्टाबेट्टी के बोली ,दिल पर चैइल जाईत अछि गोली , चुप चाप हम भजईत छी ,मोने मोन हम लाजईत छी कहिदु मुन्ना मुन्नी के बाबु गेल छौ पाई कमाईला विदेस , ल क अईतोऊ तोरासबल्या खेलौना आ मीठ मीठ सनेश , मोन तर्शैय हमरो सजनी अहाक प्यार आ अनुरागला , आ बेट्टा बेट्टी केर मिठिका दुलार ला - २ !!! गंगा तट स: हिमालय केर पट गंगा तट स: हिमालय केर पट कोसी स: गनडकी तक !! यी सम्पूर्ण भूमि अछि मिथिलांचल !! जतेय बहथी निर्मलगंगाजल !! हम थिक मिथिलाभूमि केर संतान !! मिथिलांचल अछि हमार आन वान शान !! मिथिलाक संस्कृति अछि हमर स्वाभिमान !! स्वर्ग स: सुन्दर अछि हमर मिथिलाधाम !! वसुधा केर हृदय थिक यी जनकपुरधाम !! जतेय जन्म लेलैथ माँ जानकी आऔर साधू संत कवीर !! एतही परम्पद पैलैथ ऋषि मुनि संत महंथ आऔर फकीर !! राजर्षि जनक छलैथ विदेह राज्यक महर्षि राजा !! कवी कौशकी गंडक बाल्मिकी मंडन !! भारती सुशीला कुमारिल भट्ट नागार्जुन !! महाकवि बिध्यापतिसं: बिद्वान रहथि प्रजा !! मिथिला रहथि न्यायिक आऔर मसंसा ज्ञानक प्रदाता !! येताही ब्याह केलैथ चारो भाई मर्यादापुरुषोतम राम बिधाता !! मिथिला अछि भारतवर्ष केर प्राकृतिकाल स: ज्ञानबिज्ञान क स्रोत !! यी सब हम जनैत भेलंहू ख़ुशी स: ओत प्रोत !! मिथिला माए अहो भाग्य अछि हमर जन्म लेलौ मिथिला माए के कोरा मे !! एहन निश्छल आ बत्सल प्रेम भेटत नए चाहुओरा mइ प्रकृति केर सुन्दर उपहार ,संस्कृति केर बिराट संसार !! मानबता केर सर्बोतम ब्याबहार मिथिलाक मुलभुतआधार !! राम रहीम मंदिर मस्जिद दसहरा होई या ईद क रित !! मिथिलावासी हिदू होई या मुस्लिम एक दोसर स:करैछैथ प्रीत !! मिथिलाक पसु पंछी सेहो जनैत अछि प्रेमक परिभाषा !! मधुरों स:मधुर अछि मिथिलाक मैथिलि भाषा !! ज्ञान सरोबर एतिहासिक धरोहर अछि मिथिलाक संस्कृति !! मन मग्न भजईत अछि देख क सुन्दर आ मनोरम प्रकृति !! मिथिले मे जन्म लेलैथ सीता केर रूप मे माए भगवती !! महाकवि विद्यापति केर चाकर बनला महादेव उमापति !! वैदेही केर सुन्दरता पर मोहित भेलैथ भगवान राम !! बसुधा केर हृदय बनल अछि हमर महान मिथिलाधाम !! कहैछैथ शास्त्र पुराण विद्वान पंडित आऔर प्रोहित !! मिथिलावासी क दर्शन स:मात्र भजाईत अछि !! मनुख क सम्पूर्ण पाप तिरोहित !! मजदुर !!! भगवान क असिम कृपा स अहा भेलौ धनवान !! मुदा भुखा निर्बस्त्र आर निर्धन सहो छैथ इन्सान !! भुख स छटपटा रहल छै,निर्धन ख्याला एक टा रोटि !! मुदा धनक लोभ स खुली नै रहल अछी अहा क पोटि !! भुखा प्यासा निर्बत्र मे करु अपन अन्न धन्न दान !! तखने ह्याब अहा सबकेर नजैर मे महान् !! दुख:भुख आ विपति सहके बईनगेल छै गरिब क मजबुरी !! दु टुक्रा रोटि ख्यालेल खुन आ पसिना बहाके करैया मजदुरी !! मजदुरक श्रम स उब्जैया फलफुल तरकारी आ बिभिन्न अन्न !! मालिक भजाईय धनवान मुदा श्रमिक रही जाईय निर्धन !! आदमी नै छै अहाक नजैर मे नोकर चाकर आर मजदुर !! निर्धन गरिब पर हुक्मत करैछी कहाँ भेलौ अहा निस्ठुर !! नै देखाऊ अईठाम ककरो झुठा रुवाब आर साख !! एकदिन जईरके भ ज्याब अहु अई माटीमे राख !! कंकर पाथर थाली मे भेटत् भुख स जौं अहा छ्टपटयाब !! मुठी बांधके जग मे एलि हाथ पसाइरके ज्याब !! डॉ जया वर्मा सागर आ मोन सागरक लहरि कखनो उद्वेलित कखनो उन्मादित एकटा सुनामी समेटने अंतर मे कतेक मौन मूक मुदा लहरिक ओइ पार की अछि ?? अनिश्चित , अपरिचित .... मोन उद्विग्न भऽ उठैत अछि / बेर बेर ओ लहरि हमरा बजा रहल अछि सपनो मे आबि बजैत अछि भयभीत नै होउ हम अभेद्य नै छी.. हमरा छुबि कऽ तँ देखू हमहूँ अहीं सन छी प्रतिपल बेचैन मुदा खुश छी हम जहिना अहाँ खुश छी मुदा बेचैन चैन हेराय बेचैन भऽ जाइत अछि चैन पाबि बेचैन भऽ जाइत अछि ई मोन.......रहस्यमय मोन // संजय कुमार झा, पिता-श्री लक्ष्मी नारायण झा, माता- श्रीमती मुंद्रिका देवी, पता- ग्राम-बेलौन, पोस्ट-नवादा, भाया- बहेरा, जिला- दरभंगा, बिहार बौआ बिसरि गेलहक बौआ बिसरि गेलहक माइक आँचर चअर चांचर गाछी-पांतर बौआ 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आ चोरएल केला कत्ते मोन पारबअ सबटा की मोने रहत किछु इन्तजार करअ बाकी फेर कहियो जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल मिथिलांचल अछि गाम यौ काज करै छी सबहक किछु-किछु सब सों किछु-किछु काम यौ शिक्षा-दीक्षा मिथिलांचल केर बचपन बीतल गाम यौ चाकर एकटा एमएनसी केर दिल्ली बीतय शाम यौ मिथिलाक बेटी जीवन संगी दू बेटी केर बापो छी असगर पुत्र पिता केर छी हम दू टा भागिनक माम यौ निहुरी-निहुरी कए गोर लगई छी भेट-थि जों अप्पन सों पैघ छोटक माथ राखै छी सदिखन आशीषक निज पाम यौ नोर बहै या सुख मे, दुःख मे नोर पोछ-इ मे छी आगाँ नीक लग-इ या पोथी-पतरा मनुक्खक अछि चाम यौ किछु विद्रोही किस्म हमर अछि भागी नहि कहियो रन सों हारिक नहि कहियो भेल खेद जीतक नहि गुमान यौ सब रहथि कुशल जीवन भरि येअह रख-इ छी मोनक चाह अपनों गारी खर-खर चलय जीब सकी विथ मान यौ चलू दोस यौ गाम मैट भ गेलै जिनगी ओकर जे नहि जाई या गाम यौ आम खा रहल आने-आने सूखि रहल लताम यौ खेत परल परात बरिस सों सुन्न परल दालान यौ के पटाबय बारिक मेथी टूटि रहल मचान यौ उजरल-उपटल गाम लगय या फुलवारी मसोमांत यौ ओ करौछ आ घैला, पटिया लोटकी, सोहारी, जांत यौ छोटकी काकिक नैहरक भरिया कहाँ भेटत ओ चतुर सुजान कहाँ सुनब दुखियाक ओ राग कोर्थू वाली भ गेल आन भग्वात्ती घरक ओ कीर्तन कहिया सुनबई आब नवाह कहिया फेर खेलेबई नाटक शोले, गोरख और गवाह बाबा संगे बैगनी गेन्नै सपने रहि जेत्तई यौ दोस झिल्ली-कचरी कतय सा किनबई कहाँ भेटै ओ भोरक ओस भौजिक मूंह देखब भेल साल गाल छुबय ले तरसय मोन होलिक ओ हुरदंग ने भेटय कानि रहल छी कोने-कोन कतेक सुनाबी मोनक आह कोंढ़ फटे या, सुखाई नोर चलू चलय छी गाम दोस यौ जिनगी रहि गेल थोरबे-थोर जीवकान्त एक दिन एक दिन छोड़ए पड़ैछ क्षुधा सम्पूर्ण क्षुधा घुरा देबए पड़ैछै वनवासी बाघकेँ त्यागए पड़ैछै पियास अछोर जे बलुआही परतीकेँ सोंपए पड़ैछै सन्तान-वृद्धिक लालसाकेँ एक दिन अरपि देबए पड़ैछै संसार जेना गाछक टुटलाहा पात जे आगि पजारबासँ बचि गेल तँ विलीन होइए माटिमे गाछक ढेग गाछी छोड़ि आबि कए खसैए चूल्हिमे विलीन भेल जाइए बसातमे जरि-जरि उड़िआइए ओकर खंड-पखंड पाँच महादेशमे सोखि लेल जाइए ओ हरियर-हरियर पातमे किछु नै छै ठाढ़, ने सूर्य ने चान ने माथ महक थकरल केश ने मुँहमे सैंतल सोगहि-सोगहि दाँत एक दिन अबैत छै सबहक लेल छोड़बाक दिन ओ क्षण भरिक दिन। सदरे आलम "गौहर", व्याख्याता:-एस.एम.जे.कालेज खाजेडीह, ग्राम पो:- पुरसौलिया.मधुबनी आजाद गजल दाम एतय सभ चीजक देब' पड़ै छै। अधिकारक लेल झग्गड़ क'र' पड़ै छै। गज भरि जमीन जौँ कौरव नहि देब' चाहै। पाँडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै। कर्बला केर खिस्सा त' दुनिया जानै छै। धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै। झग्गड़ झँझट मानलौँ नीक नहि होइ छै मुदा। जीब' खातिर ईहो क'र' पड़ै छै। "गौहर" साधु ब'न' लए चाहैत अछि मुदा। दुर्जन केँ जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै। आजाद गजल जैह देखू सैह बाजू हम त यैह पढने छी॰। राति के दिन कहैले हमरा केना कहै छी॥ चम्चागिरी चाटुकारिता नहिँ केलहुँ हम। ताहि द्वारे फूसक घर मे हम रहि छीः।। मिथिला देशक वासी छी हम मैथिली बाजब। अपन इ पहचान नहि कहियो बिशरै छीः॥ सभ दिन एके रंग नहि होयत छै कान धरु ई। कहियो नाह पर,कहियो गाङी पर नाह देखै छीः॥ सतयुग कलयुग मे नहि हम मोन के ओझराबी। दुनिया त ठीके छै जौ हम ठीक रहै छीः॥ हँसऽ मे सभ हँसत कानऽ मे नहि कानत। कानि के देखु तखन कहब जे ठीक कहै छीः॥ आजाद गजल जहिया जहिया कौआ बाजे टाट पर। देखै छी हम के अबैए बाट पर॥ झिल्ली मुरही कचरी एखनो भेटैए। आबि क' देखु अप्पन गामक हाट पर॥ सऊँसे घर मे पाबनि मनबैए सभ क्यो। बुढा बैसल खोखिँ रहल छथि खाट पर॥ निन्न कहाँ होई छै आब ओहि माएबाप केँ। बेटी बैसल रहै छै जकरा माथ पर॥ साफ सुत्थर सरकार कतय आई काल्हि भेटत भोट जतय आब खसबैए लोक जात पर॥ ताकै छी ओ पोखरि झाखङि कत' गेलै। डुब्बी मारि क' जाई छलौ जाहि जाठ पर॥ ठीक कहए छी मुदा खुट्टा गाङब एहि ठाम। लातक भूत कतय मानैए बात पर॥ जनता छी तेँनै सभ पार्टि ठकैए। दुध मलाई खाईए नेता खाट पर॥ आजाद गजल चलि गेली ओ आब सपना देखु चित्र बनाउ कल्पना देखू मुद्रा सँ तौलल जाए मनुक्ख आब आई काल्हि के नपना देखू भीतर कारी तेँ ने महकारी उपर सँ ललका झपना देखू जीति एलक्शन ठाठ करै ओ जनता अपना अपना देखू महंगाई आकाश चढ़ल आब सस्ता होयत ई सपना देखू आजाद गजल दाम एतय सभ चीजक देब पड़ै छै अधिकारक लेल झगड़ा कर' पड़ै छै गज भरि जमीन जौ कौरव नहि देब' चाहय पांडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै कर्बला केर खिस्सा त' दुनियाँ जानै छै धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै झगड़ा झंझट मानलहुँ नीक नहि होइ छै मुदा जीब' खातिर ईहो कर' पड़ै छै "गौहर" साधु ब'न' चाहैत अछि मुदा दुर्जन के जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै रुबाइ हरल भरल रहे देश अपन ई हरित बनाबी भेस अपन ई हरियाली लाबै खुशियाली गौहरक अछि उपदेश अपन ई जितमोहन झा (जितू) मैथिली होली गीत नव नवेली नवयौवना सँ विवाह रचेलाक बाद पतिदेव रोजगारक तलाश मे परदेश चैल जैत छथिन! ओ अपन अर्धांग्नी सँ वादा के कs गेल छथिन, की किछ दिन मे कमा - धमा कs ओ वापस गाम ओउता! तकर बाद बड्ड धूम - धाम सँ हुनकर दुरागमन करोउता! मुदा एहेंन नै भेल! प्रियतमक बाट जोहैत - जोहैत ओय नवयुवतीक व्यथा कs हम फगुआ गीतक माध्यम सँ अपने लोकैंन के बिच व्यक्त करे चाहे छी.... लागल अछि फागुन मास यो पिया, हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां, अगहन निहारलो, हम पूष निहारलो, माघ महिनवां मे जिया अकुलाबय, चरहल फागुनवां रिझाबई यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... राह देखि - देखि हमर दिनवां बीतल, जुल्मी सजनवां परदेशिया मे खटल, 'पंडित' कs हमर सुधिया नै आबई, चढ़ल अछि हमरो जवनिया यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... आमक गाछ पर बाजै कोयलिया, सुनी - सुनी करेजा मs लागैत अछि गोलिया, चिट्ठी नै सन्देशवां पठेलो यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन......... जल्दी सँ अहाँ टिकटवां कटायब, एहिबेर बलम हमर गवना करायब, अहाँ सँ मिल कs जियरा जुरायत, कचका कोरही सँ फूल फुलायत, छुटत संगतुरियाकें ताना यो पिया ! हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !! लागल अछि फागुन मास यो पिया..... दोसर फगुआ गीत.... फगुआ मे जियरा जुरायब यो पिया, हमर पाउते चिट्ठी चल आयब, गामक मोहल्ला के राह सजैत अछि, गल्ली गल्ली मे जोगीरा चलैत अछि, ढोलक के थाप पर बुढबो नाचैत छैथ, बुढबो गाबैत छैथ जोगीरा यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. तोरी उखैर गेल, गहुमो गहुमो पाइक गेल, आमक गाछ मे मोजर लैद गेल, सखी सहेली करैत छली मस्करियां, दूध भंगा घोटायत अपने दुवरियां, ननदों के बहकल बोलीयां यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. देवर जीक मन सन - सन सनकाई, राह चलैत हुनक खूब मोंन बहकाई, देखि के जियरा डराबे यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. गामक छौरा सभ बाजैत अछि कुबोली, कहलक भोउजी खेलब अहिं संग होली, रंग गुलाल सँ रंगब अहाँक चोली, भोउजी भोउजी कैह घेरयाबे यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. आस परोसक लोग ताना मारैत छैथ, बूढियो मई सेहो मुह बिच्काबैत छैथ, छौरा जुआन सभ मिल खिस्याबैत छैथ, चलैत अछि करेजा पर बाण यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. अहाँक बिना सेजयो नै सोभई, रहि रहि जियरा हमर रोबई, अहाँक कम्मे पर करब कुन गुमानवां, सबके बलम छैथ आँखक समनवां, कोरा मे कहिया खेलत लालनमां यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा.............. सैयां "जितू" कोना गेलो भुलाई, सावन बीतल आब फगुओ बीत जाई, अहींक संगे रंगायब हम अपन सारी, कतो रहब जून पियब भाँग तारी, फगुआ मे जिया नै जराबू यो पिया ! हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !! फगुआ मे जियरा............. गीत हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, हेयो भैया............... सगर दुनियाँमे नै हमरा सभ एहेन संस्कार, अछि कृपा भवानीक हमरा सभपर अपार, करू नै अपन मातृभूमिक आब अपमान, हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, जते जन्म लेलनि गोसाँइ लक्ष्मीनाथ महान, कवि विद्यापतिक सगर सुनु बखान, ऐ पावन भूमिक मंडन मिश्र संतान, हेयो भैया............... कहैत अछि "जितू" खोलू अहाँ अपन कान, आबू सभ मिल कऽ छेरी एक नव अभियान, अछि वादा...... अछि वादा..... अछि वादा, माँ मिथिलाकेँ देब सम्मान, हेयो भैया, हे गइ बहिना, हेयो भैया, हम सभ मिथिलाक संतान, करू अहाँ अपन मातृभूमिपर गुमान, हेयो भैया............... अक्षय कुमार चौधरी दियाद बलजोर नाम तँ मिठगर मोतीचूर बाबू स्वाद तीत-माहुर नीम जकाँ ज्ञानक तँ छथि फोंक बतासा बलधकेली करताह भीम जकाँ छोटका भाय हाकिम-हुकुम छिछ्छा कातिकक कुकुर जकाँ माय बेटी दुनूक दैहिक संसर्गी निरलज थुकचट्ट थुथुर जकाँ फरीकक सभटा डीह हड़पलन्हि दवारि देनै छथि दुर्योधन जकाँ बाप धृतराष्ट्र पुत्रमोह जालमे भाय अबंड-निपट दुःशासन जकाँ लठीधर घरमे बेटा बियाहलन्हि लाठी भजै छथि खमपाड़ा जकाँ फटेदार सभकेँ गामसँ हाँकि कऽ खेत चड़ै छथि अनेर पाड़ा जकाँ भाय-बन्धु परहेज केने छन्हि पहलमानी करै छथि लंठ जकाँ लोक परोछमे थूक फेकै छन्हि तैयो तनि चलै छथि कंस जकाँ दियाद-वादक डाह लऽ किछु लोक समाजमे पसरल छै कोढ़ि जकाँ राति-दिन महादेवकेँ कबुलथिन दियाद गलैथ राहरिक दालि जकाँ। जवाहर लाल कश्यप १९८१- , पिता श्री- हेमनारायण मिश्र, गाम फुलकाही- दरभंगा। हम नहि लिखैत छी कविता सब स पहिले टुटैत छी हम खत्म होइत अछि हम्मर इगो नष्ट होइत अछि हम्मर व्यक्तित्व तखन बनैत अछि कविता महान हम नहि लिखैत छी कविता कविता करैत अछि हम्मर निर्माण पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर पानिक बुंद चढैत अछि आगि पर बनैत अछि भाफ मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि स्वच्छ निर्मल जल / आदमी चढैत अछि सत्यक ताप पर बनैत अछि दयाशील मिलैत अछि प्रक्रिति मे खत्म होएत अछि ओकर अस्तित्व तखन बनैत अछि मानव महामानव / ई की भेल? अखनो नाचि रहल अछि वएह शीन मानसपटल पर घटना जे घटल छल स्टेशन पर् एकटा सुन्दर सुशील संभ्रान्त महिला दोसर दीन दुखी दरिद्र महिला केँ दान कऽ रहल छलीह अप्पन फेरल कपडा किछु एना अपना आप केँ ओकरा सँ बचा कहीं टच ने भऽ जाय ओकर देह मे हम अवाक रहि गेलहुँ ई कि भेल ? पाप वा पुण्य दया वा घृणा स्नेह-सूत्र टुटि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल सब कियौ छुटि गेल माला के एक-एक मोती छिडिया गेल चिडिया के ऑखि भेलै अप्पन-अप्पन पॉखि भेलै सब कियौ उडि गेल खोंता विरान भेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल आपस के प्रेम मे वैर कोना आबि गेल हंसी-मजाक बीच व्यंग्य ठौर पाबि गेल कि भेल के नहि जानि ककर नजर लागि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल किछु दिन पहिले तक परिवारक मान छल सब किछु अप्पन छल कियौ नहि आन छल सब किछु खाख भेल कोन आगि लागि गेल स्नेह-सूत्र टुटि गेल उद्वेलित केने अछि / एकटा प्रश्न उद्वेलित केने अछि एकटा प्रश्न व्याकुल भेल अछि हम्मर मोन कलिकाल मे ठाढ हम खोजि रहल छी एकटा युद्धिष्ठिर के जे सत्यवादी , तत्वदर्शी, परमग्यानी हो , जे सक्छम हो जीवनक आलोचना मे हम यक्छ बनि पुछि सकि एकटा प्रश्न आखिर जीवनक नीयति की छै? परदेसक ओर लाल साडी के कारी कोर पोछने रही काजर लागल ऑखिक नोर देखने रही ऑखि डबडबायल नोर स भरल जेना पुछि रहल पिया कहिया आयब बीतत कोना जारक राति-दिन खेलब कोना होली अहॉ बिन बसन्त अहॉ बिन नीक नहि लागत सावनक झडी देह मे आगि लगायत दिन बितनाइ पहाड भेल पिया साल अहॉ बिन कोन बितायब कनियॉ के नोर देखि ह्रिदय फाटि गेल पैर थम्हि गेल मुदा सत्यक धरातल छल किछु कठोर पैर बढैत गेल परदेसक ओर परदेसक ओर ................ कौआ आउर बगरा एकटा कौआ होइत अछि चुस्त - चालाक, चपल आ चतुर, चौकन्ना भऽ चारूकात ताकत, आ खतरा के भापैत फुर्र ... सऽ उड़ि जायत। एकटा बगरा होइत अछि निडर-निर्भीक, निरीह आ निस्चछल, लग मे आयत, चुगि - चुगि दाना खायत आ ... भगेला के बादो फुदकि - फुदकि फेर आयत। एकटा वात नोटिश केलहुं, दिनानुदिन बगरा छटल जा रहल अछि आ ... कौआ बढल जा रहल अछि। अन्नाकेँ समर्पित १ ओ चलल पुरनके चालि विसरि गेल कि भेल छल हाल छण मे धुसर भ गेल सब जे पी देलथि एक हुंकार २ अहाँ सम्भरि जाउ इतिहास स्वयं दुहरा रहल अन्ना एक और जे पी बनि सासन के नींव हिला रहल ३ एक आन्हर ध्रितराष्ट्र सदिखन पुत्र-मोह मे फसल रहल चारुकात मचल महाभारत मृत्यु ताण्डव करैत रहल दोसर हम्मर मोहनजी जे मन के नहि मोहि सकल गद्दी-मोह मे फसि सुधि-बुधि अप्पन खो चुकल भ्रष्टाचारक राज्य भेल ओ चैन स सुतल रहल मुन्ना जी सबला नारी! सभ दिन, पुरूषक गातमे जीवाक सुअवसर पबै-ए। आइ पिताक तऽ काल्हि पातिक। बुढ़ारी बितैत छैक संततिक छत्र छायामे। आ ओ निश्चिंत भऽ उघै-ए अपन सतीत्व। नेना- ओ नेनपन के बितबैया दुलार मलारमे रहैए खेलाइत पर पुरूषक कोरामे, उएह ओकर खेलौना सेहो होइत छैक पिता, कक्का, आओर भइया आदिक संगोरमे जुआनी- ओकरा संगी सबहक बीच बितबैए। आब ओ डेरए लगै-एपुरूषक स्पर्षसँ। परंज्च अहू ठाम ओकर रक्षक पुरूषे होइत छैक पतिक रूपमे। मातृत्व- मातृत्वक रक्षा करै-ए, संतानके सर्वस्वक अधार मानि। जीबै-ए भैसूर आ ससूरक बीच। सभ मिलि सतर्क रहैत छैक, ओकर मातृत्वक रक्षार्थ। बुढ़ारी- जँ भऽ जाइत अछि विधवा, शोक संतप्त भऽ जीबाक लेल होइ-ए बाध्य, परञ्च सत्य! कही तऽ- ओ तऽ एखनो सुरक्षित अछि। किएक तऽ डेन धऽ सत्य के भोगबाक सामर्थ्य देबाक लेल तैयार अछि पुत्र। वास्तवमे अब्बल तऽ ओ भेल-ए पितृहीन भऽ के। गणेश कुमार झा "बावरा": गुवाहाटी विरह छोडि आहाँ गेलंहूँ हमरा एसगरी अहि वन मे मनक बात कहब केकरा कें पतियाएत व्यथा हमर... चहुँ दिश रंग- बिरंगक आ सुगंधक अछि फुल खिलाएल मुदा एहि बिच मे हम छी मुर्झाएल... वन बबुरक गाछ सँ अछि भरल हर एक डेग पर अछि काँट चुभैत किछु चंदनक गाछ सेहो अछि जेँ अपन महक सँ मन-मुग्ध करैत अछि मुदा क्षणिक !!! हमर मनक घोडा त' बबुरक काँट पर दौडैत आँहाक स्मृति मे हेराए जाइत अछि.... जखन सागरक लहर सँ उठल सर्द पवन हमरा तन के छुबैत अछि त' बुझि पडैत अछि जेना आँहाक कोमल हाथ स्पर्श करैत हुअए मुदा, की सपनो सच होइत अछि ..??? कियाक छोडि गेलंहूँ हमरा एसगरी आहाँ के त' बुझल छल कतेक आहाँ सँ स्नेह अछि हमरा आहाँ बिनु एक पल जिनाई कठीन ई त दिवस भ' गेल गेला' की आहांक स्मृति मे हम नहि छी ..??? की आहांक ह्रदय हमरा बिनु नहि कपैत अछि ...??? शायद ! आहाँ निसहाय होएब नित्य फुला मुर्झाईत होएब हमरे जेना अहुँ शोनितक घूँट पिबैत होएब "बिनु पानी माछ" जेना तरपैत होएब विरहाक आगि मे भुस्सा जेना नहु-नहु जरैत होएब..... आब बड भेल बड सह्लों विरहाक दर्द आउ आब नव वर्ष मे मिल क करी प्रेम सुधाक रसपान....... कैंचा बिनु कैंचा नहि भेटए शिक्षा बिनु कैंचा नहि भेटए दीक्षा बिनु कैंचा नहि भेटए स्नेह दुलार बिनु कैंचा नहि भेटए मान- सम्मान | कैंचा बनल अछि कैंची कुतैर रहल अछि प्रेम - सम्बन्ध, आजु कैंचा के खातिर बेटी के होइछ प्राण -हरण | गर्भधारण सँ मृत्युकाल धरि कैंचा नहि छोडाए संग, बिनु कैंचा नहि पुरहित- पंडित ग्रहण करए श्राद्धक अन्न | मंदिर जाउ व जाउ मस्जिद बिनु कैंचा नहि हुअए पूजा संपन्न कशी जाउ वा जाउ मथुरा बिनु कैंचा नहि हो गंगा -स्नान | चाहे हुअए इलेक्शन वा सेलेक्शन बिनु कैंचा नहि कोनो एक्शन ज दुहु हाथ खोलि फेकू कैंचा फेर देखू नियोक्ताक रिएक्शन | कैंचा हुअए त' दुलारे कनियाँ बिनु कैंचा ललकारे कनियाँ धिया -पुताक त' हाल नहि पूछू नहि अपना त' ल' आबए पैंचा | कैंचा कें चारू दिश अछि चर्चा देव, गुरु, मुनि बनल अछि कैंचा|| सुबोध कुमार ठाकुर, गाम हैंठी बाला, वाया- झंझारपुर, जिला मधुबनी। सुबोधजी पेशासँ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि। एहेन जीवन जिबितौं एहेन जीवन जिबितौं अपन जीवनक हर रंगकेँ किछु उत्तम शब्दसँ कवितामे सजबितौं मोन होइए आइ हमरा, फेर किछु सुन्दर रचना करितौं! भयसँ मुक्त आ उन्मुक्त भऽ सुन्दर सपनाकेँ संग लऽ कऽ कल्पना आइ फेरसँ उन्मुक्त गगनमे उड़ितौं अपना जीवनक हर रंगकेँ किछु उत्तम शब्दसँ कवितामे सजबितौं! नहि राग रहए नहि द्वेष रहए, नहि भागम भाग नहि कोनो क्लेश रहए, मन होए हमरा हम एहेन सुन्दर जीवन जिबितौं! अपना जीवनक हर रंगकेँ.. होए कतेक कष्ट अहि भौतिक सुख लेल, जे सरिपहुँ होए भ्रष्ट आर दुख लेल, संघर्ष भरल अहि जीवनसँ, प्रतिद्वन्दताक ज्वालाकेँ हटबितौं! अपन जीवनक हर रंगकेँ काश ओ कोमल बचपन, जे छल नव किशलय दल सनक, जँ फेर घुरि कऽ आबि जेतै तँ स्वच्छन्द रूपसँ ओकरा हम सतरंगी सपनासँ सजबितौं! अपना जीवनक हर रंगकेँ नहि बुझि सकए एकरा समाज भावनासँ भरल ई हृदयक उल्लास नहि तँ अपना संगे संग एहि समाजोकेँ दू डेग चलबितौं मन होए हमरा सभकेँ अपना संग नव जीवनक सनेस दैतौं! हम नै खेलब होली जुनि सुना घुलल घमल बोली हे गे करिक्की कोइली हम नै खेलब होली प्रियतम बसै दूर देश छै हृदएमे उठए कलेश छै एनामे के भिजायत मोर चोली हम नै खेलब होली अछि वसंत उन्माद नेने परंच हमरा मनमे विषाद देने नै सोहायत हमरा ई बसंतक रंगोली हम नै खेलब होली पिया देने ई आस छल फगुआमे पटोर आनब, कहने ई बात छल मुदा आब लगैत केने छलाह ओ ठिठोली नै-नै हम नै खेलब होली नै कुनु उमंग अछि नै कुनु तरंग अछि केकरा लग हम अपन वेदनाक गीरह फोली नै खेलब हम होली बेर-बेर्अ पुरवा आबि अँचरा उड़ाबए फगुआ बयार आबि विरहकेँ जगाबए महकि उठए मन जेना फूल चमेली मुदा नै हम खेलब होली कहै सुबोध धनी जुनि हीया हारू गाबि विरह पियाकेँ कहा पठाबू काँचे उमेरियाक सप्पत दियाबू देखू पिया आबि करताह बरजोड़ी तखन अहूँ खेलब होरी किशन कारीगर चाह पीबू- (हास्य कविता) हरबड़ी मे जुनि ठोर पकाउ यौ नेता जी दिल्लीक कुर्सी भेटल सूखचेन स अहाँ बैसू आउ हम बेना डोला दैत छी फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।। भूखे मरि रहल अछि जनता मरअ दियौअ ओकरा नहि कोनो चिन्ता अहाँ के कोन अछि बेगरता संसद के कुर्सी पर बैसल अराम अहाँ करू करिक्का रूपैया स बैंक बैलेंस अहाँ भरू।। मूर्ती बनबै स रथ यात्रा करै लेल पाई अछि मुदा रोटी रोजगार हेतू एक्को टा पाई नहि अछि फुसयाँहीक चुनावी घोषणा पर घोषणा टा करू कुर्सी भेटल त घोटाला पर महाघोटाला टा करू।। बाजि गेल चुनावी पीपही राजनैतिक गठजोड़ जल्दी अहाँ करू जुनि पछुआउ सियासी कुर्सी अहाँ ताकू फेर पाँच साल जनता के बेकूफ बनाएल करू।। दुनियाक सभ स नमहर लोकतंत्र बनि गेल वोट बैंकक भेड़तंत्र सम्प्रदायिकता के आगि मे जनता के झरकाउ कुर्सी हथियाबै लेल रचू कोनो नबका षड्यंत्र।। पहिने कुर्सी फेर मंत्रालय कोना भेटत सभटा छल प्रपंच अखने अहाँ करू हे यौ लोकप्रिय भलमानुष जनप्रतिनिधी संसदो मे अहाँ खूम मुक्कम मुक्की करू।। कुर्सीक खातिर देशक संसाधन बेचलहुँ बाँचल खूचल सेहो एक दिन अहाँ बेचू जनता भूखे मरि गेल ओ बिलैटि गेल मुदा साले साल राजनैतिक रोटी अहाँ सेकू।। मँहगाइ भूखमरी कोनो समाधान ने कराउ कृषि मंत्रालय मे राखल अन्न अहाँ सड़ाउ संसद के कैंटीन मे सरकारी सब्सिडी लगाउ चिकन कोरमा शाही पनीर भरिपेट अहाँ खाउ।। घोटाला पर महाघोटाल सभ केलहुँ तइयो ने पेट अहाँ के भरल मिठ बोली बाजि जनता के ठकलहुँ एक्को दिन भूखले पेट होएत अहाँ के रहल कतेको लोक भूखले मरि गेल बेकार भेल अछि किएक संसद भवन स एक दिन बाहर निकलि अहाँ त देखू की भा परैत छैक एक्के दिन मे बुझिए जेबैए बिना किछ खेन्ने एक दिन भूखले रहि के अहाँ देखू।। मुदा कोनो चिन्ता नहि आब कुर्सी भेटिए गेल संसद भवन मे सूखचेन स अहाँ बैसू कारीगर बेना डोला दैत अछि फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।। पुरस्कार लऽ के नाचू केकरो स चिन्हा परिचे अछि कारीगर नहि यौ सरकार तऽ अहिं कहू की हम करू त आउ हमरे स चिन्हा परिचे कए लियअ आ पुरस्कार लऽ के नाचू। अपने कुटुम बैसल छथि अकेडमी आ चयन बोर्ड मे लिख्खा परही करबाक कोन काज तिकड़मबाजी कए लगबै छी पुरस्कारक भाँज। हिनके कृपा स भेटल पुरस्कार खुशी स लागल बोखार कविता कहानी तऽ तेरहे बाईस मुदा पुरस्कार लेल लगेलहुँ खूम जोगार। अहाँ जे लिखलहुँ कारीगर ओ लागल बड्ड नूनगर मुदा बिनमतलबो हम जे लिखलियै ओ लागल बड्ड चहटगर। बिनमतलब के कथा साहित्य पर अकेडमी सँ एक दिन आयल हकार कुटुम बैसले रहथि ओहि ठाम टटके भेटल पुरस्कार। आन कतबो नीक किएक ने लिखलक मुदा ओकरा ने कहियो आएत हकार नहि छै ओकरा कोनो चिन्हा परिचे पिछलगुआ टा के जल्दी भेटत पुरस्कार। पुरस्कारक बदरबाँट भऽ रहल अछि जाति वर्गक नाम पर लेखक के बाँटू जूनि पछुआउ पिछलगुआ सभ आउ आगू अहाँ पुरस्कार लऽ के खूम नाचू। साहित्यक मठाधीश सभ शुरू केलैन पुरस्कार यथार्थवादी चितंक आ लिखनिहार हुनका लेल भऽ गेलैथ बेकार। एक्को मिनट देरी नहि अहाँ करू हुनके गुणगान कए कथा अहाँ बाचू नहि तऽ जिनगी भरि पाछुए रहि जाएब पुरस्कारक जोगार मे जीजान स लागू। अहि दुआरे पछुआले रहि गेल कारीगर कहियो ने केलक केकरो आगू-पाछू देखैत छियै आब हम दोसर पुरस्कार दुआरे जोगार लगा करैत छी हुनकर आगू-पाछू। बेस त बड्ड बढ़िया हम शुभकामना दैत छी दोसर पुरस्कार अहाँ के जल्दीए भेट जाए जल्दी जोगार मे अहाँ लागू अहाँ पुरस्कार लऽ के खूम नाचू। नोर झहरि रहल छल। बहिन उठि नैहर सँ सासुर बिदा भेलीह बपहारि काटि कानि रहल छलीह हमहू बाप बाप कानि रहल छलहुँ आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल। माए गे माए भैया औ भैया एसगर हम आब जा रहल छी भरदुतिया मे आएब अहाँ एतबाक आस लगेने हम जा रहल छी। छूटल नैहर केर सखी बहिनपा आब मोन पड़त सब साँझ भिंसरबा छूटल बाबू केर दुअरिया डोली उठा ल चल हो कहरबा। जाउ जाउ बहिन जाउ अहाँ अपना गाम भरदुतिया मे आएब हम अहाँक गाम माए हमर पुरी पका कए देतीह हम नेने आएब चिनीया बदाम । जुनि कानू बहिन पोछू आखिक नोर आब सासुर भेल अहाँक अप्पन गाम सास ससुर केर सेबा करब व्यर्थ समय गमा नहि करब अराम। जेहने अप्पन माए बाप तेहने सास ससुर नहि करब कहियो झग्गर दन लोक लाज केर राखब धियान। भैया यौ भैया अहाँ ठीके कहैत छी नहि करब हम केकरो स झगरदन सभ सँ मिली जुलि के हम रहब गृहलक्ष्मीक दायित्व केर करब निरवहन। मुदा कोना क कहू औ भैया छूटल नैहर बिदा भेल छी सासुर माए कनैत अछि बाबू के लगलैन बुकोर टप टप झहरि रहल अछि आखि सँ नोर। धैरज राखू बहिन जाउ एखन अपना गाम राखि मे चलि आएब नैहर बाबू केर गाम हसी खुशी सँ गीत गाएब सभ सखी मिली समा चकेबा खेलाएब। सभ के प्रणाम क बहिन बिदा भेलीह मुदा स्नेह स कानि रहल छलीह दुनू भाए बहिन कानि रहल छलहु आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल। सेहन्ता हमरो छल एकटा सेहन्ता औ बाबू कहियो त उठी कहब अहाँ आब उठू यौ बौआ भेलैए भोर अहाँक दोस महीम कए रहल छथि सोड़।। हिचुकै हिंचुकै एसगर हम कनैत छलहु देखितहुँ अहाँ से छुटि नहि भेल हालो चाल त पुछितहुँ हमर मुदा कहियो अहाँ के सेहन्तो नहि भेल।। हमर सेहन्ता एकटा सपने रहि गेल कहियो अहाँक हृदय मे हमर स्नेह नहि भेल कहियो ने दुलार कए उठेलहु हमरा औ बाबू विधतो केलैन किस्मतक केहेन खेल।। सोझहे पाईए टा दए देला सँ बापक फर्ज़ नहि पूरा भए जायत छैक हमरो बाप केखनो दुलार करितैथ हमरा अहिं कहू केकरा ने सेहन्ता होइत छैक।। एहेन विरान जिनगी सँ नीक हमरा जनमैते किएक नहि मारि देलहु अपने मगन मे रहलहुँ सब दिन कुहसैत एसगर हमरा किएक छोड़ि देलहुँ।। माएक आँचर बापक साया दूनू गोटे कोनो छोट नेनाक होइत अछि छाया मुदा केहेन निष्ठुर भेलहु अहाँ आई धधकि रहल अछि हमर काया।। हमर किलकारीक गूँज सुनि कहियो दौगल अबितहुँ अहाँ कोरा मे लए हमरा दुलार करितहुँ मुदा कहियो ऐहेन सेहन्ता भेल कहाँ।। नेनापन के हमर सबटा सेहन्ता एकटा सपने रहि गेल मुदा आबो बिचार कए देखू कहियो अहाँक मुहो मलीन नहि भेल।। किएक से अहि कहू हम कोन अपराध केने रही हमर सबटा सख मनोरथ के बिसैर अहाँ अपने मगन मे रही।। हमरा सँ नीक कोनो अनाथ सँ पूछु केहेन बेबस होइत छैक ओकर जिनगी अहाँक जिबैतो हम छी अनाथ एहने बेबस भए गेल हमर जिनगी।। केहेन वीरान जिनगी भए गेल आब नहि अछि कोनो सेहन्ता सबहक बाप सभ केँ दुलार पुचकार करैथ आब एतबाक अछि कारीगर के सेहन्ता।। गरीब हम छी गरीब नहि आब दैत छथि हमरा कियो अपना करीब किएक त हम छी गरीब।। भरि दिन भूखले रहि केँ किछु काज राज करैत छी मुदा तइयो दू टा रोटी लिखल नहिं अछि हमरा नसीब।। जेकरे मौका भेटैत छन्हि वैह हमर शोषण करैत अछि किछु बाजब त बोइनो नहि भेटत डरे हम किछु नहि बजैत छी।। डेग डेग पर भ्रष्टाचार एसगर हम केकरा सँ लड़ब धिया पूता अन्न बिनू बिलैख रहल अछि कहू कोना के हम जिअब।। ठिकेदारो हमरे कमाई लूटि रहल अछि जेबी मे नहि अछि एक्को टा टाका नून रोटी खा कहूना के रहि जइतहुँ मुदा बढ़ल मँहगाई गरीबक घर देलक डाका।। टाकाक अभाव मे आब हम बनि गेलहुँ अस्पतालक मरीज डॉक्टरो हमरा देखी कहैत छथि तू दूरे रह नहि आ हमरा करीब।। विधाता केहेन रचना केलैन जे हमरा बनौलन्हि गरीब नहि आब दैति छथि हमरा कियो अपना करीब।। आब अहिं कहू यौ समाजक लोक अधपेटे कोनो जीबैत छी हम गरीबिक दुशचक्र अछि घेरेने जिनगी जीबाक आस भेल आब कम।। जी तोड़ मेहनत करैए चाहैत छी मुदा कतए भेटत सब दिन काज काज भेटलो पर होइत अछि शोषण एना मे कोना करब धीया पूताक पालन पोषण।। साँझ भिंसर दू टा रोटी भेटैए एतबाक आस लगेने अछि गरीब निक निकौत सेहन्तो नहि सोचैत छी किएक त हम छी गरीब।। गीत हमर दिलकेँ तोड़ि देलहुँ हमरासँ मुँह मोड़ि लेलहुँ छोड़ि कऽ एसगर हमरा अहाँ हमरासँ दूर कतौ चलि गेलहुँ मोनक बात मोनेमे रखलहुँ कहियो अहाँसँ नै कहलहुँ दूइए दिनक भेँट घाँटमे प्रेम अहाँसँ कऽ लेलहुँ बाट अहाँक तकैत रहलहुँ मुदा अहाँ नै अएलहुँ दूर जा कऽ हमरासँ अहाँ हमर मोनकेँ तड़पबैत रहलहुँ याद सताबैए अहाँक तँ मोन पड़ैए ओ सभ दिन जहिया रहैत छलहुँ अहाँ हमरासँ बड्ड खिन्न सपनामे अहींकेँ देखैत रहलहुँ अहींक वियोगमे तड़पैत रहलहुँ मुदा किशन सन प्रेमीकेँ अहाँ अनपढ़ गंवार बुझैत रहलहुँ जहिए देखलहुँ एक नज़र अहाँकेँ तहिए मोनमे बसि गेलहुँ अहाँ मुदा हमरा पवित्र प्रेमकेँ अहाँ नै बुझि सकलहुँ आब बुझबामे आबि रहल अछि हमरा अहाँक प्रेममे हम की नै केलहुँ मुदा तइयो हमरा मधुबनीमे छोड़ि अहाँ हमरासँ दूर कतौ चलि गेलहुँ दिलसँ हम साँचो प्रेम केने रही अहूँ तँ ई गप हमरा एक बेर कहने रही मुदा किएक से अहीं कहू हमरासँ दूर अहाँ कतए चलि गेलहुँ जँ अहूँ साँचो कऽ प्रेम केने होएब तँ मोन पड़ैत होएब हम मोनसँ निकलैत होएत एकटा गप कारीगर अहाँ संगे ई की केलहुँ हम हृदैसँ प्रेम केनिहार बुझत प्रियतमसँ दूर हेबाक वियोग कोना कऽ हम सहलहुँ कनेक अहूँ बुझू निश्छल प्रेम केने रही सभ दिन तेँ कहलहुँ किछु त हम करब अवस्था भेल हमर आब बेसी टूघैर टूघैर हम चलब अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा अपना माटि पानि लेल किछु त हम करब नुनु बौआ अहाँ आऊ बुचि दाय अहूँ आऊ दुनू गोटे मिली जल्दी सँ मैथिली मे किछु खिस्सा सुनाऊ नान्ही टा मे बजलौहं एखनो बाजू मातृभाषा मे बाजू अहाँ निधोख कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब नहि बाजब त कोना बुझहत लोक परदेश जायत मातर किछु लोग बिसैर जायत छित मातृभाषा कें अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत कहें मीठगर स्वाद होयत अछि मातृभाषा कें अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर एही धरोहर के हम बंचा के राखब अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू सभहक अछि एकटा इ दायित्व किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि एही परम कर्तब्य सँ मुहँ नहि मोडू स्नेह रखू हृदय मे सभ के गला लगाऊ अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू समाजक लोक अपने मे फुट्बैल करैत छथि मनसुख देशी त धनसुख परदेशी एक्के समाज मे रहि ऐना जुनि करू एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब जीबैत जिनगी किछु त हम करब हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी सभ लोक अपन भाषा मे बाजब औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब भिन भिनौज आई अपने भैयारी मे कए रहल छी कटवा-कटौज भ रहल छी अपने भैयारी मे भिन भिनौज बाबू जी अनैत छलाह किछू नीक निकौत त दुनू भाई करैत छलहूॅ खूम घोंघाउज।। एक्के थारी मे बैसी के खाइत छलहूॅ मुदा एहेन बॅटवारा नहि देखल ओ नहि हमरा देखैत अछि हम नहि ओकरा कनेक नासमझीपन आब भिन भिनौज सेहो करेलक।। बाबू जी केर मोन दुखित भेलैन केकरो आब आस नहि ओ कहैत छै हम नहि देखबैए भैयाक पार छै हम कहैत छियैक हम किया देखबैए छोटका के पार छै मरै बेर मे आब बुरहबा के एक लोटा पानि देनिहार कियो ने।। छोटकी पुतहू झॉउ झॉउ क रहल अछि त सैझलियो कोनो दसा बॉकी नहि रखने अछि ई कटवा कटौज आई अपने मे भए रहल अछि एहेन भिन भिनौज देखि बुरहबा शोक संतापे मरि रहल अछि।। झर झर बहि रहल अछि बुरहबाक ऑखि सॅ नोर एसकरे कुहैर रहल छथि मुदा केकरा करताह सोर सब किछू एक रंगे बॉटि देलाक बादो पुतहू मुॅह चमकबैत अछि त बेटा खिसियाअैत अछि भोरे भोर।। हमरा सुखचेन सॅ मरअ दियअ ने सभ सॅ बुरहबा नेहोरा कए रहल छथि मुदा जल्दी मरि जाउ घरक गारजीयन ई बुरहबा सभ मिली हुनका गंगा लाभ करा रहल छथि।। गंगा लाभ करैते मातर थरा थरा के मरि गेलाह ओही दुनू कपूतक बाप ओ अभागल बुरहबा ई सुनि आई किशन बहा रहल अछि नोर कठियारी जेबाक लेल केकरा करत सोर।। हाई रे आधुनिक बेटा पुतहू ई की जीबैत जिनगी माए बापक सत्कार नहि करैत छी मुदा हुनका मरलाक बाद ई की पॉच गाम ल पूरी जिलेबीक भोज किएक करैत छी।। केकरा सॅ कहू ओई बुरहबाक दुःख तकलीफ अपटी खेत मे चलि गेल प्राण हुनकर एहेन नहि देखल ई कटवा कटौज कारीगर करैत अछि नेहारा नहि करू एहेन भिन भिनौज।। कक्का हमर उचक्का- होली पर हास्य कविता ओंघराइत पोंघराइत हरबड़ाइत धड़फराइत धांई दिस बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का होरी मे बरजोरी देखी मुस्की मारैत काकी मारलखिन दू-चारि मुक्का।। धिया-पूता हरियर पीयर रंग सॅं भिजौलकनि बड़की काकी हॅसी क घिची देलखिन धोतीक ढे़का पिचकारी मे रंग भरने दौगलाह हमर कक्का अछैर पिछैर के बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का।। होरी खेलबाक नएका ई बसंती उमंग ततेक गोटे रंग लगौलकनि मुॅंह भेलैन बदरंग काकी के देखैत मातर कक्का बजलाह आई होरी खेलाएब हम अहींक संग।। कक्का के देखैत मातर काकी निछोहे परेलीह आ बजलीह होरी ने खेलाएब हम कोनो अनठीयाक संग जल्दी बाजू के छी अहॉं नहि त मुॅंह छछारि देब घोरने छी आई हम करिक्का रंग।। भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर होरी खेला भेल छी हम लाल पिअर आई त भैयओ नहि किछू बजताह जल्दी होरी खेलाउ एहेन मजा फेर भेटत नेक्सट ईअर।। सुहर्दे मुॅंहे मानि जाउ यै भाउजी नहि त करब हम कनि बरजोरी होरी मे त अहॉ जबान बुझाइत छी लगैत छी सोलह सालक छाउंड़ी।। आस्ते बाजू अहॉक भैया सुनि लेताह कहता किशन भए गेल केहेन उच्का केम्हरो सॅ हरबड़ाएल धड़फराएल औताह छिनी क फेक देताह हमर पिनी हुक्का।। आई ने मानब हम यै भाउजी फुॅसियाहिक नहि करू एक्को टा बहन्ना आई दिउर के भाउजी लगैत अछि कुमारि छांउड़ी रंग अबीर लगा भिजा देब हम अहॉक नएका चोली।। ठीक छै रंग लगाउ होरी मे करू बरजोरी आई बुरहबो लगैत छथि दुलरूआ दिअर ई सुनि पुतहू के भाउजी बुझि होरी खेलाई लेल बान्हे पर दौगल अएलाह कक्का हमर उचक्का।। पंकज कुमार झा, सम्प्रति- एच.सी.एल. मे अभियन्ता छथि। ओझरैल हमर बौद्धिक मोन एक अबोध ह्रदय के शूल बिना कोनो कारने अई जन्मक भूल बिना जहन भोगी रहल अई दंड पूर्व जन्म के तहनेटा पता चलैत अई जन्मांतरक् खेल ओना त सबटा मिथ्या लगैत अई विज्ञानक सोच मे ओझरैल हमर बौद्धिक मोन ईस्वरक लीला मानैक लेल तैयार नै अई मुदा ! जन्मे स रजा आ जन्मे स रंक जीवन के अनन्त रंग मे ऐना सनैल अई कि सब किछ माया अई वर्षाक बुलबुला जँका रंगीन मुदा ! फुटलाक बाद कतौ किछ नै (आर एम एल हॉस्पिटल मे एक बच्चा ह्रदय रोग स पीड़ित छल) आनंदक रहस्य देखलहुं आदमीक स्वभावक स्वरुप जहन जहन बिपत्ति अबै छैन मोनक कटुता दूर हटै छैन मीठ बोल सहयोगी बनै छैथ आ पुनः समय अनुकूल होइते मोन जहर स भैर जैत छैन अजब गजब परिवर्तन तुरंत तुरंत एके व्यक्ति के अलग अलग व्यबहार समय के अंतराल मे केना रक्त के प्रवाह बदैल देत छैक भावनाक स्वरुप के समझ स परे छैक बुझैत समझैत जनैत मुदा ! समय स हरैत व्यक्ति स्वयं घुटन महशुश करैत छैथ मुदा ! अभ्यास हावी होइत छैन आ ओ अभ्यासक परिहास मुदा ! ई सब निर्माण ईश्वर के कैल छैन प्रिज्म जँका भावनाओ के अलग अलग रूप मे परावर्तित करैक छमता मनुष्यक ह्रदय मे बनौने छैथ विस्मित त करैया मुदा ! ई कोनो व्यक्ति विशेष नई निर्माण कर्ता के निर्माण अई स्वभावक सच स्वरुप तैं समझनाई थोड़ेक कठिन अई आ तैं एकरा माईन लेला मात्र स प्रसन्नता सहजे भेटनाईये अई सृष्टिक खेल बड़ा अद्भुत अई राम एला कृष्ण एला गंगा सेहो अवतरित भेलीह ग्रंथो सब लिखैल एखैन धैर पूजन वाचन चलैत अई मुदा ! कोनो परिवर्तन नई भेल मानव स्वाभाव स वैह रही गेल कियाकि ? मानव के रचना अहि लेल भेल अई ई मात्र एक टा लुकाछिपीक खेल अई सृष्टि आ श्रष्टाक अनंत चक्र अई सचक पथ सच त याह अई कि सचक पथ पर शुले टा गड़त मोन भीतरे भीतर सबटा सहत कियाकि सच स सहनायियेटाक ज्ञान भेटल अई एकर बिपरीत चालला स शूल ने गड़त कियाकि असहनशीलताक ज्ञान पहिले स शूल के उखाड़वाक प्रयत्न करत संतुलन आ असंतुलन के खेल अजब ई देहक संरचना अई मैट पैन स बनल मुदा ! संतुलनेटा मे जीवन अई थोड़बे असंतुलन स पुनः मैट पैन स अलग भै जैत अई जीवन जड़ संग बिना देह ख़त्म भै जैत अई बड़ा कठिन अई देहक संतुलन के बनौनाई आ देह के बचा क रैख पौनाई हर छन देहक प्रकृति बदलैत छैक संतुलन असंतुलन के क्रम चलैत छैक मैट के पैन स पैन के मैट स जुड़नाई बिछरनाई चलैत रहैत छैक देहक निर्माण आ देहक अबसान संतुलन आ असंतुलन के खेल छैक ठाढ़ छी ठाढ़ छी समयक-शेषनाग स बन्हैल छी सत्य आ असत्यक बिच मथनी जँका मथाई छी मंदराचल जँका तटस्थ कच्छप पर देवता दिश एक बेर आ असुरक दिश एक बेर खींचल जैत छी अपने धुरी पर पृथ्वी जँका दिन आ राइत मे बंटैल छी अईंखक दोख आ कि हृदयक…. अईंखक कोन दोख, जे अहाँक सुन्दरता नई देखलक, ओ त देखै टा मात्र छै, बुझै नई छै, बिम्ब आ प्रतिबिम्बक, बिच फंसल मात्र एकटा पराबर्तक छै, दोस त ह्रदय के छै, जे भावना शुन्य छै, तैं अहाँक सुन्दरताक झीलों मे, मरुभुमिक दग्धातक देखै छै, ओना जे आन्हरो छैथ, से कल्पनाक ब्रश स, सुन्दरताक सृजन हृदयक भाव स करैत छैथ, मुदा ! जे भाव विहीन छैथ, अईंख रहितो, बिम्ब-प्रतिबिम्ब मे ओझराइल रहैत छैथ, अई मे हुनको कोनो दोख नई, जे भाव विहीन छैथ, यन्त्र बनी बरद जँका, जीवनक दाउन मे लागल छैथ, हुनका त आभासों नई छैन, कि अहू स बिशेष किछ छैई, मुद्रा-मतलबक डोरी मे बन्हैल, सुखैल बासि खैक आदि, स्वक्षताक रस स दूर, जीवनक मकरजाल मे, फंसल छैथ, हेराइल छैथ, आऊ चलु आऊ चलु, हाथ पकरु, मोन मिलाउ, विश्वाष बढाऊ, सत्यक सोझ दिशा मे, चलैत चलि … चलैत चलि, प्रयाश करी, एक दोसर के गीत सुनी, एक दोसर के मीत बनी, अहँ जरा, ओकर भस्म लगा, प्रेमक रश मे स्नान करी, रँग रुप, कोनो ऊँच नीच ने, सहज भाव स, झुमि ऊठी, आँग-समाँग, ज्ञाण-विज्ञान, कला-श्रीजन के ध्यान करी, जिवनक रौद-बसात के, मोनक सब मलाल के, भरीभरीक पिचकारी मे, रंग स सराबोर करी, जीवन पथ पर सँगे-सँगे, चलैत रही...चलैत रही | उमेश मण्डल संस्कार गीत (संकलन) मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 1 कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे माइ बिनु लागै य सुनऽ हे। कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे जे भातिज बिनु लागै य सुन हे कोयला-कोयला.....। मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वमी बिनु लागै य सुन हे मातैर-मातैर.....। ससिया-ससिया सुनै छलौं, ससिया बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे बालक बिनु लागै य सुन हे कमला-कमला......। मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 2 कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डाली लोरहब बेली-चमेली कथी डाली लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल-2 कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला... किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल बड़ लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। कमला...........। गमक लागे गेंदा फूल....3 मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 3 कटबै मे सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हेऽऽ जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै...... जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे-2 कटबै......... जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै..... बिनबै झुमरि जाल हे। मल्लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 4 जग मग जग मग ज्योति जले मंदिरमे देखियौ कमला के श्रृंगार कमला के लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के अधिकार जग मग जले मंदिर मे देखियौ मातैर के नाक मे नथिया सोभे हुनका झुमका के अधिकार जग मग जले मंदिर मे ससिया के मांग मे टिका सोभे हुनका होसली के अधिकार जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिर मे कमला श्रृंगार.....। मल्लाहक ब्राह्मन गीत- 1 नटुआ खूब सुन्दर सँ गाना गाभिहँ नाचिहेँ ब्राह्मण के सुनभियेँ पहिले गबिहेँ ब्राह्मण गीत तखने रामचंद्र रधुविर नटुआ देतै असिरवाद जुग जुग जीबह ब्राह्मण के सुनभिहेँ...। मल्लाहक ब्राह्मण गीत- 2 ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछिया ओहीपर कोइली धनश्याम हे.. कटबै चनन गछिया बेढ़बै अंगनामा हे छुटि जेतै कोइली घनश्याम हे.. कानए लगली खिजए लगली कोइली मुरूछिया कथीसँ मेढ़ब तोहर दुनू पखिया हे.. कथी से मेढ़ब कोइली तोहर दुनू ठोर सोने से मोरब हे कोइली तोहर दुनू पखिया रूपे से मेढ़ब तोहर दुनू ठोर हे.. जही वन जेबह हे कोइली रूनू झुनू बोलिया रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू के नाम हे...। मल्लाहक ब्राह्मण गीत- 3 गामक पछिममे एक ठूठि पखरिया ओहिपर कोइली घनश्याम हे। हरिनो ने मारे कोइली तितिरो ने मारे बीछि-बीछि मारे लए मयूर हे जब तोरा आहे कोइल सिन्दुर बकसबऽ रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू नाम हे..। डोमीनक गोसाँइ गीत-1 करिया कुखा हे काली माय लेलनि जोरि आइ हे मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे काली माइ तेसर कोस उठल शिकार हे हकन कनै छै काली बैन के मयुर हे बकैस दियौ सीर के सिन्दुर हे सारी रात नटुआ नचाबऽ हे होइत भोर मे उसारब हे......। डोमीनक गोसाँइ गीत-2 एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा पानि सेब देवता अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ? हमरा गौरध्या सन अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा गहील सन देवता अरैध के लबिहेँ गैऽऽ.....। डोमीनक गोसाँइ गीत-2 इहो हम जनतियौ गहिल मैया औथिन आंगन चनन घर ढौरितियौ हे कथिये दियरा कथिये के बाती सेरसों तेल जराबितौं सारी रात हे सोने के दियरा पताबर सुत बाती सेरसौं के तेल जराइबतौं हे जसो दियौ जसो दियौ गोसाओं अही जस वीरहब संसार हे..। डोमीनक ब्राह्मण गीत ब्राह्मण के अंगना मे चनन बृक्षिया ओइ तरो कोयली धन श्याम हेऽऽ काटबै चनन गाछ बेरबै अंगनमा रहि जेतै ब्राह्मण के इनाम हे कथिये मेराहयब कोयली तोहर दुनू पैखिया कथिये मेराहयब तोहर दुनू ठोर हेऽऽ सोने से मेराहयब कोइली तोहर दुनू पैखिया रूपे मेराहयब दुनू ठोर हे....। मुसहरक गोसाँइ गीत- किनका कोखी बस्तीपर आएल गांगे जनमलि हे कहाँ माँ लिऔ बसेरा सखी-2 आजू गांगों गोहबर आएल हाथ कमल के फूल सखी-2 किनका.... मैया कोखी गांगो जनमलि हे, गोहबर लियो बसेरा सखी आजू गांगो गोहबरमे आएल हाथ दिऔ तलवार सखी.....2 किनका कोखी बस्तीपर आएल गोगे जनमलि हे....2 मुसहरक ब्राह्मण गीत-1 ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछिया ओही तर कोयली घनश्याम हे-2 काटबै चंदन गाछ, बेरब अंगनमा छुटि जेतै कोयली घनश्याम हे-2 कानऽ खिजऽ लगलै कोयली बिरिछिया झरऽ लगलै नयना से नोर हे-2 ब्राह्मण........। जानु-कानु जानु खोजै, कोयली मुरूतिया झरऽ लगलै नयना से नोर हे-2 तोहरो जे देबौ हे काेयली सोने दुनू पखिया रूपे से मोहबै ठोर हे-2 ब्राह्मण.......। जहू वन जेबऽ हे कोयली रूनु-मुनू बोलितर रहि जेतऽ ब्राह्मण बाबू के नाम हे-2 ब्राह्मण.......। मुसहरक ब्राह्मण गीत-2 कथी बिनु यौ अहाँ ब्राह्मण कथी बिनु सकलक हिंग मैयो-2 शिव ब्राह्मण अयलह गोहबरमे किरतनियाँ नाच देखाओ सखी-2 कथी बिनु...........। दूध बिनु सेवक मुँह मलिन लड़ू बिनु सकलक हिंग भेल-2 शिव ब्राह्मण..........। कथी ब्राह्मण के मुँह मलिन, कथी बिनु सकलक हिंग मयो भजू ब्राह्मण आहै गोहबर मे, किरतनियाँ नाच देखाओ सखी-2 जनऊ बिनु सेवक मुँह मलिन, पान बिनु सकलक मुँह हिंग मयो-2 भजू..........। मुसहरमे छेका गीत- झिलिया के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा हे मइया मधुर देखि रहलौ लोभाय-2 पहिले जे अइवतौं जे गोसाआंे सब मधुर खइतौं हे मइया सब मुधर गेल बिकायी हे-2 झिलिया के..........। झिलिया के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा यौ बाबा, मधुर देखि रहलौं लोभाय हे-2 पहिेल जे अइवतौं, सब मधुर खइतौं यौ बाबा सब मधुर गेल बिकायी हे झििलया....। मुसहरमे कुमार-बियाह गीत- मन छैल मनोरथ सुति घर बियाही तहुँ करितौं पंडित जमइया हे सेहो देबौ नै जाने करितौं नै पंडित जमाय हे-2 मन छैल लवका जे पतवा कहुँवा ने पायल पुरना पतवा जे भेल अनमोल, छोटे-छोटे खिलिया लगहबियौ बाबा बहुते डड़ाबैए बरियात हे-2 येहो हम जैनतौं गयि पोती खपि लैतौं दसे गाछै मरिचिया मरिचयक जोग गै हम पोती, ओही तम फूल से उघारऽ हे...2 मन छैल मनोरथ.....। मुसहरक बियाह गीत- छोटी-मोटी तुलसी के गछिया ओही मे जे चतरल डरहिया हे-2 ओही तरऽ कमला लेलनि विसराम हे सोहागन तुलसी-2 केयो चढ़ाबै हुनका फूल अक्षत हे केयो चढ़ाबै लड़ू पान हे सोहागन तुलसी-2 भगता चढ़ाबै जुनका फूल अक्षत सेवक चढ़ाबै नऽ पान हे सोहागन तुलसी-2 छोटी-मोटी तुलसी...........। चमार जाितक गोसाँइ गीत-1 साँझ दियौ साँझ दियौ बाभन के बेटिया यै साँझ बीतल जैयऽऽ कथी के दियरा राकी कथी सुत बाती यै साँझ बीतल यैयऽऽ सोने के दियरा राकी पाटेसुत बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ जरै लागल दियरा राकी जमाके लागल बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ खेले लागल पचदेवती सारी रात यै साँझ बीतल जैयऽऽऽ। चमार जाितक गोसाँइ गीत-2 कारूवीर के अंगना मे अरहुल फूल गछिया हेऽऽ फरल फुलाल डारि लुबधल हेऽऽ उत्तरे ही राजासँ ये सुगा एक आयल बैसल सुगा अरहुल फूल गाछ हेऽऽ फल ने खाइ छेँय रे सुगबा फूलो ने खाइ छेँय डारीपाती केला सकचूर हेऽऽ उत्तरे ही राजा सँ ये एलेँ सरनरिया बैसल सुगा दिऔ ने बझाईऽऽ सुबगवों नै छियै हौ सेवक पंछी नै छियै इहो छियै सेवक के खेलौना हेऽऽ। चमार जातिक मूड़न गीत- कौने बाबा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन दादी लेलक जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन छुड़िया गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन मामा-मामी लेतनि जनम केश हो सिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन चाचा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ ललना रे अपन चाची लेतनि जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ अपन नाना कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हे ललना रे अपन नानी लेतनि जनम केश होरिलाजी के मूड़न हेऽऽ। चमार जातिक बियाह गीत-1 हरी हरी वाँस कटाइ दऽ हो बाबा ऊँचे-ऊँचे मरबा छराइ दऽ हौ बाबा मरबा बती होने ठार भेलै सोनी बेटी कइ लॉब एला वरियात हे गइया जे देलियै हौ बाबा भैसियो देलियै साइकिल रूसल जमाइ हे छुब दियौ पोती भिनसरबा लागा दियौ बजार हेऽऽ खरीद लेबै साइकिल बोधि लेबै जमाइ हे हरि हरि वाँस कटाइ दहो बाबा मरबा के बती घेने ठार सोनी बेटी कइ लाख एला वरियात हेऽऽ औठी जे देलियै हौ पापा घड़ी जे देलियै मोवाइल ले रूसल जमाइ हे छुब दियौ भिनसरबा बेटी लागा दियौ बजार हे खरीद लेबै मोवाइल बोधि लेबै जमाइ हे...। चमार जातिक बियाह गीत-2 चलु चलु हे सखी सभ अजोध्या नगरी-2 अजोध्यामे जाय के भरब गगरी-2 अजोध्या के छौड़ा सभ बर रगड़ी मारत तीर मैय गे फाेरत गगरी हुनका राजा दशरथ सँ किनायब गगरी हुनका रानी कोशीला से भराएब गगरी। चमार जातिक बियाह गीत-3 गेंद खेल गेला दुलरवा मालिन फूलवरिया तोरि देलक अरहुल फूल गाछ हेऽऽ मछिया बैसल छथिन बाबा से अपन बाबा मलिन देलक उपराग हे एहेन ज्ञान पहिले जे बरतहिहँ भोरे उठि देला उपराग हेऽऽ लड़की जे रहितै गै मालिन वरजल जाइतै छहेलबा बरजलो ने जाइ हो। गेंद खेलऽ गेला दुलरबा मालिन फूल वरिया तोरी देला सुपारी के गाछ हेऽऽ मछिया बैसल छथिन पापा से अपन पापा भोरे उठी देलक उपराग हे लड़की जे रहितै वरजल जाइतै छहेलबा बरजलो ने जाइ हे...। संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि नोतक गीत बट्टा भरि चानन रगड़ल पाने पत्र लिखल हे। ताहि पान नोतब गोसाउनि जे नित पूजि थिकि हे। ताहि पान नोतब पितर लोक जे निज आशिष देथि हे ताहि पान नोतब ऐहब लोक जाहि स मंगल हएत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दिनमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़िछथि केश िक होड़िया के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहिरब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि होड़िलाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि होड़िलाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि होड़िलाक मूड़न हे। लाबा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहिनिया चुलहा दहिनिया हे। हे सुन्दरि मंगल आगि पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि भूजल हे। दुलहिन गृह मे बैसि जे ब्याहल हे। कहय हे सखि सभ आनन्द मनाविय प्रभु गोहराविय हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहिबात कि अइहब गाबिय हे। गोसाउनिक गीत अहाँ जगजननी सकल दुख मन्जनि हमरा बिसरि किये देल। हमहूँ अबोध बोध नै हमरो िकये उसह दुख देल। कियेक चरण तब हटल अम्ब हे कियेक ऐहेन मन हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल मूस कवि कर जोड़ि विनय करू हमरा बिसरि किय देल। 2 हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जािन केँ। दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ। आबि आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि केँ विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि केँ। कोटियो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि केँ। दीन प्रभु हम नित्य पूजब नेम व्रत केँ ठानि केँ। हे भवानी। 3 अम्बे-अम्बे जय जगदम्बे, जय-जयकार करै छी हे। तिनू भुवन के माय अहाँ छी तीन नयन से तकै छी हे। सिंह पर एक कमल राजित, ताहि पर बैसल छी हे। भूत प्रेत सब झालि बजाबै योगिन के नचबै छी हे। राक्षस के संहार करै छी दुनियाँ के जुड़बै छी हे। 4 कतेक दुख सुनाएब हे जननी कतेक दुख....... तंत्र-मंत्र एको नै जानल की कहि अहाँ के सुनाएब हे जननी मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुतिआएल रखबनि संग लगाए, हे जननी सूरदास अधम जग मूरख तारा नाम तोहार, हे जननी दुर्गा नाम तोहार। 5 मैया दुआर अड़हुल फुल गछिया माँ हे फड़-फुल लुबधल डािर दछिन पछिम स सूगा एक आएल माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय माँ हे पाते पाते खेलय पतझार कहाँ गेल किए भेल डीहवार ठाकुर माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय भनहिं विद्यापति सुनू जगदम्बा हे माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय। विषहरिक गीत 1 विषहरि सेब मोरा किछुओ ने भेल बाँझिन पद मोरा रहिये गेल कियो नीपय अगुआर, कियो पछुआर हमहुँ अभागलि दुआर धेने ठार िकयो लोढ़ै बेली फूल कियो अढ़ूल हमहुँ अभागलि तिरिया खोदू नामी दुबि कियो मांगय अन-धन, कियो पूत हमहुँ अभागलि कर जोड़ि ठार। भनहिं विद्यापति विषहरि माय सभ दिन सभ ठाम रहब सहाय। 2 साओन विषहरि लेल प्रवेश भादव विषहरि खेलल झिलहोरि। आसिन विषहरि भगता लेल पान कतिक विषहरि नयना झरू नोर। अगहन विषहरि हेती अनमोल। 3 ऊँच रे अटरिया पर विषहरि माय राम, नीची रे अटरिया पर सोनरा के माय देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि सोन राम, गढ़ि विषहरि के कलस पचास बाट रे बटोहिया कि तोहें मोर भाइ राम, कहबनि विषहरि के कलसा लय जाइ तोहरो विषहरि के चिन्हियो ने जानि राम, कहबनि कोना के कलस लए जाय हमरो विषहरि के नामी-नामी केश राम, मुठी एक डाँर छनि अल्प बएस। मूड़न गीत बाबा यौ जग मूड़न करा दिअ मूड़न करा दिअ नटुआ नचा दिअ बाजा दिअ पूजा करा दिअ लौआ मंगा दिअ मूड़न करा दिअ के यौ लुटाबी अन धन सोनमा केओ हाथकेँ कंगन मामा लुटाबए अन धन सोनमा मामी लुटाबए हाथ के कंगनमा बाबा यै जग मूड़न करा दिअ मूड़न करा नटुआ नचा दिअ...। महेशवाणी 1 दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि तीन अंखिया सह-सह नचै छनि सांप सखिया दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि, धथूर के बीया दिगम्बर के रूप देख साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धिया के विष देथिन पिआ कोहबर मे मरती धीया भनहि विद्यापति सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरिया दुर-दुर......। 2 ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे सखि गौरी अंगनमा गौरी अंगना सखि, पारवती अंगनमा बहिरा साँपक माड़ब बनाओल तेलिया देल बन्हनमा हे धामन साँपक कोरो बनाओल, अजगर के देल धरनमा हे सखि गौरी अंगनमा हरहरा के काड़ा-छाड़ा, कड़ैत के लाओल कंगनमा पनियादरार के पहुँची लाओल ढरबा के लौल ढोलनमा हे, सखि गौरी........ सुगवा साँप के लौल जशनमा हे, चान्द तारा के शीशा लाओल मछगिद्धि के अभरनमा हे, सखि गौरी.........। 3 सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे अंगनमामे, हे भवनमामे साँपहि-साँप बामदहिन छल चित्र-विचित्र वसनमामे नित दिन भीख कतए सँ लायब घुरि फिरि जाहु अंगनमामे भीखो ने लिअए जोगी, घुरियो ने जाइ गौरी हे निकलू अंगनमामे भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन शिव सन दानी के भुवनमामे। 4 डर लगैए हे डेराओन लगैए गौरी हम नहि जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए हे अजगर के सम्हा पर धामिन के बरेड़िया गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम.... कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्हनमा बिढ़नी के खोता घनघन करैए। गौरी......... सुगबा के पाढ़ि पर ढोरबा के ढोलनमा पनिया के जीभ हनहन करैए गौरी......... तेहि घर मे बैसल छथि अपने महादेव बिछुआ के कुण्डल सनसन करैए। गौरी.......... 5 हम नहि गौरी शिव सँ बिआहब मोर गौरी रहत कुमारि हे भूत-प्रेत बरियाति अनलनि मोर जिया गेल डेराइ गे। गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल पएरो मे फाटल बेमाइ गे गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब गौरी ले पड़ाएब नैहर हे। भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक त्रिभुवननाथ हे शुभ-शुभ कए गौरी के बिआह, तारू होउ सनाथ गे माइ। नचारी बम-बम भैरो हो भूपाल अपनी नगरिया भोला खेबि लगाबऽ पार कथी केर नाव-नवेरिया कथी करूआरि कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार सोने केर नाव-नवेरिया रूपे करूआरि भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार जँ तोहें भैरो लाला खेबि लगाएब पार मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै निशान बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान 2 भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी अपन नगरी यो कैलास पुरी पारबती के हम टल बजाएब नित उठि नीर भरब गगरी बेलक पतिया फूल चढ़ाएब िनत उठि भांग पीसब रगड़ी भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक दानीक माथक पगड़ी। 3 जय शिवशंकर भोले दानी क्षमा मंगै छी तोरे सँ अपराधी पातक हम भारी तैं कनै छी भोरे से। तोहर शरण छोड़ि ककरा शरण मे जाएब हे शंकरदानी दयावान दाता तोरा सन के त्रिलोक मे नहि जानि। जाधरि नहि ताकब बमभोले हम चिचिआएब जोरे सँ अपना ले फक्कर भंगिया िकन्तु तोहर अनुचर भरले कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर सेवक पर सदिखन ढरले। जनम भेल माया तृष्णा मे से तृष्णा नहि पूर भेलै। कामना के लहरि मे बाबा जीवन एहिना दूरि भेलै। हे दुखमोचन पार लगाबऽ हम दुखिया छी ओरे सँ पूजन विधि नहि जानी हम हे यएह जपि-जपि कऽ धियान धरी कर्म चक्र के जीवन भरि हम पेटे ले ओरियान करी जे ज्योतिश्वर पार लगाबह हम दुखिया छी ओरे सँ। 4 हटलो ने मानय त्रिपुरारी हो विपत्ति बड़ भारी खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब चड़ि गेल फूल-फूलवारी, हो विपत्ति बड़ भारी अंगने-अंगने सखि सभ उलहन दै छथि कतेक सहब अति गारी, हो विपत्ति बड़ भारी भनहिं विद्यापति सुनू हे गौरी दाइ इहो छथि त्रिशुलधारी, हो विपत्ति बड़ भारी। सोहर- 1 धन धन राज अयोध्या धन्य राजा दशरथ रे। धन रे कौशल्या के भाग कि राम जनम लेल रे। देखैत पण्डित पुरोहित पोथी कर नेने रे ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि सिधारत रे। से सुनि रानी विकल भेल राजा मुरक्षित रे। ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे। मन गुनी रानी हरखित भेली राजा मुदित भेल रे। ललना रे....... भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे। 2 कौने मास मेघबा गरजि गेल कोने मास बेंगवा बाजू रे ललना रे कोने मासे होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। सावन मेघवा गरजि गेल, भादव बेंग बाजू रे। आसिन होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। कोने तेल देव सासु के कोने ननदि जी के रे। ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के गरी ननदि जी के रे। ललना रे अमला दबैन गोतिन के हुनकर पैंच हेतनि रे। दसमासी सोहर पहिल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... मूंगक दाल नहि सोहाय, केहन गरम संओ रे ललना रे.... दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पूसक माछी ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पौरल खीर ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे ललना रे.... चारिम मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... फगुआक पूआ ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे चैत के माछ ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... आम के टिकोला ने सोहाय, कि केहन गरम सेओ रे सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... खुजल केश ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाकल आम ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... पिया के सेज ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे दसम मास चढ़ु भादव, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे.... देवकी दरदे बेयाकुल दगरिन बजायब रे जब जनमल जदुनन्दन, खुजि गेल बंधन रे ललना रे..... खुजि गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे। 4 यशोमति अद्भुत लेखल, बालक देखल रे सुन्दर हुनकर गात, कि बात पकठोसल रे कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे पूतनाकेँ देल विचार, जाहु तौहें गोकुल रे। पूतना थन विष लेल घोरि विदा भेल गोकुल रे घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे देलनि पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्दर रे। पूतना दूध पिआओल, आओर विष पसारल रे हरि देलनि दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे। खेलौना 1 हाथक कंगना ननदी के दलनि से नहि मन भाबय हो लाल। फूल के घड़ी ननदिया माँगय, सेहो कहाँ पाएब हो लाल। डाँड़ के डरकस ननदी के दलिएनि से नहि मन भावय हो लल पियबा देलियनि ननदोसिया देलिएनि, से नहि मन भावय हो लाल। ई सभ किछु नहि हुनका चाही ओ मांगथि पठनमे हो लाल। 2 सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए सासु जे बजती बाजि कऽ की करती छठियारी पुजाबऽ लए माय अबैए सोठौरा ने खाएब...... गोतनो ने बजती बाजि कऽ की करती हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए। सोठौरा ने....... ननदो जे बजती बाजि कऽ की करती कजरा सेदै लए बहिन अबैए। सोठौरा ने....... देओर जे बजता बाजि कऽ की करता दगरिन बजबै ले भाय अबैए। सोठौरा ने....... गोसाइ गीत (मल्लाह) कमला कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे, अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे माइ बिनु लागै य सुनऽ हे। कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे अन देलौं धन देलौं लक्ष्मी बहुत हे जे भातिज बिनु लागै य सुन हे कोयला-कोयला.....। मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे स्वमी बिनु लागै य सुन हे मातैर-मातैर.....। ससिया-ससिया सुनै छलौं, ससिया बड़ी दूर हे अन देलौं धन देलौं, लक्ष्मी बहुत हे एकेटा जे बालक बिनु लागै य सुन हे कमला-कमला......। 2 कमला मैया बसत बड़ी दूर गमक लागे गेंदा फूल कथी डालि लोरहब बेली-चमेली कथी डालि लोरहब अरहूल हे गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया..... किनका चढ़ाएब बेली-चमेली किनका चढ़ाएब अरहूल गमक लागे गेंदा फूल-2 कमला चढ़ाएब बेली-चमेली कोयला चढ़ाएब अरहूल, गमक लागे गेंदा फूल हे कमला...किनका सँ मांगब अन-धन सोनमा किनकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल हे ससिया सँ मांगब अन-धन सोनमा मातैर सँ मांगब सोहाग गे मलहिनयाँ देखै मे फूल वर लाल....। 3 कटबै मे सोना सुतरिया बिनबै झुमरि जाल हे जाल फरि-फरि कमला एलखिन सन-झुन लागै गोहबरिया कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हेऽऽ कटबै...... जाल फरि-फरि गांगो एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक, सुन लगै गोहबरिया हे-2 कटबै......... जाल फरि-फरि मातैर एलखिन रून-झुन लगै गोहबरिया हे कहाँ गेली परलोभिया सेवक सुन लगै गोहबरिया हे कटबै..... बिनबै झुमरि जाल हे। 4 जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिरमे देखियौ कमला के श्रृंगर कमला के लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे देखियौ मातैर के नाक मे नथिया सोभे हुनका झुमका के अधिकार जग मग जलै मंदिर मे ससिया के मांग मे टिका सोभे हुनका होसली के अधिकार जग मग जग मग ज्योति जलै मंदिर मे कमला श्रृंगार.....। गोसाइ (डोमीन) करिया कुखा हे काली माय लेलनि जोरि आइ हे मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे काली माइ तेसर कोस उठल शिकार हे हकन कनै छै काली बन के मयुर हे बकसि दियौ सीर के सिन्दुर हे सारी रात नटुआ नचाबऽ हे होइत भोर मे उसारब हे......। 2 एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा पानि सेब देवता अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँऽ? हमरा गौरध्या सन अरैध के लबिहेँ गै एक मूड़ी तुलसी जल साजि के रखिहेँ गै मलहीनियाँ हमरा गहील सन देवता अरैध के लबिहेँ गै.....। संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि नोतक गीत बट्टा भरि चानन रगड़ल पाने पत्र लिखल हे। ताहि पान नोतब गोसाउनि जे नित पूजि थिकि हे। ताहि पान नोतब पितर लोक जे निज आशिष देथि हे ताहि पान नोतब ऐहब लोक जाहि स मंगल हएत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दिनमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़िछथि केश िक होड़िया के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहिरब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि होड़िलाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि होड़िलाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि होड़िलाक मूड़न हे। लावा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहिनिया चुलहा दहिनिया हे। हे सुन्दरि मंगल आगि पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि भूजल हे। दुलहिन गृह मे बैसि जे ब्याहल हे। कहय हे सखि सभ आनन्द मनाविय प्रभु गोहराविय हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहिबात कि अइहब गाबिय हे। गोसाउनिक गीत अहाँ जगजननी सकल दुख मन्जनि हमरा बिसरि किये देल। हमहूँ अबोध बोध नै हमरो िकये उसह दुख देल। कियेक चरण तब हटल अम्ब हे कियेक ऐहेन मन हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल मूस कवि कर जोड़ि विनय करू हमरा बिसरि किय देल। 2 हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जािन केँ। दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ। आबि आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि केँ विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि केँ। कोटियो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि केँ। दीन प्रभु हम नित्य पूजब नेम व्रत केँ ठानि केँ। हे भवानी। 3 अम्बे-अम्बे जय जगदम्बे, जय-जयकार करै छी हे। तिनू भुवन के माय अहाँ छी तीन नयन से तकै छी हे। सिंह पर एक कमल राजित, ताहि पर बैसल छी हे। भूत प्रेत सब झालि बजाबै योगिन के नचबै छी हे। राक्षस के संहार करै छी दुनियाँ के जुड़बै छी हे। 4 कतेक दुख सुनाएब हे जननी कतेक दुख....... तंत्र-मंत्र एको नै जानल की कहि अहाँ के सुनाएब हे जननी मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुतिआएल रखबनि संग लगाए, हे जननी सूरदास अधम जग मूरख तारा नाम तोहार, हे जननी दुर्गा नाम तोहार। 5 मैया दुआर अड़हुल फुल गछिया माँ हे फड़-फुल लुबधल डािर दछिन पछिम स सूगा एक आएल माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय माँ हे पाते पाते खेलय पतझार कहाँ गेल किए भेल डीहवार ठाकुर माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय भनहिं विद्यापति सुनू जगदम्बा हे माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय। विषहरिक गीत 1 विषहरि सेब मोरा किछुओ ने भेल बाँझिन पद मोरा रहिये गेल कियो नीपय अगुआर, कियो पछुआर हमहुँ अभागलि दुआर धेने ठार िकयो लोढ़ै बेली फूल कियो अढ़ूल हमहुँ अभागलि तिरिया खोदू नामी दुबि कियो मांगय अन-धन, कियो पूत हमहुँ अभागलि कर जोड़ि ठार। भनहिं विद्यापति विषहरि माय सभ दिन सभ ठाम रहब सहाय। 2 साओन विषहरि लेल प्रवेश भादव विषहरि खेलल झिलहोरि। आसिन विषहरि भगता लेल पान कतिक विषहरि नयना झरू नोर। अगहन विषहरि हेती अनमोल। 3 ऊँच रे अटरिया पर विषहरि माय राम, नीची रे अटरिया पर सोनरा के माय देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि सोन राम, गढ़ि विषहरि के कलस पचास बाट रे बटोहिया कि तोहें मोर भाइ राम, कहबनि विषहरि के कलसा लय जाइ तोहरो विषहरि के चिन्हियो ने जानि राम, कहबनि कोना के कलस लए जाय हमरो विषहरि के नामी-नामी केश राम, मुठी एक डाँर छनि अल्प बएस। महेशवाणी 1 दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि तीन अंखिया सह-सह नचै छनि सांप सखिया दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि, धथूर के बीया दिगम्बर के रूप देख साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धिया के विष देथिन पिआ कोहबर मे मरती धीया भनहि विद्यापति सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरिया दुर-दुर......। 2 ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे सखि गौरी अंगनमा गौरी अंगना सखि, पारवती अंगनमा बहिरा साँपक माड़ब बनाओल तेलिया देल बन्हनमा हे धामन साँपक कोरो बनाओल, अजगर के देल धरनमा हे सखि गौरी अंगनमा हरहरा के काड़ा-छाड़ा, कड़ैत के लाओल कंगनमा पनियादरार के पहुँची लाओल ढरबा के लौल ढोलनमा हे, सखि गौरी........ सुगवा साँप के लौल जशनमा हे, चान्द तारा के शीशा लाओल मछगिद्धि के अभरनमा हे, सखि गौरी.........। 3 सखि जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे अंगनमामे, हे भवनमामे साँपहि-साँप बामदहिन छल चित्र-विचित्र वसनमामे नित दिन भीख कतए सँ लायब घुरि फिरि जाहु अंगनमामे भीखो ने लिअए जोगी, घुरियो ने जाइ गौरी हे निकलू अंगनमामे भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइन शिव सन दानी के भुवनमामे। 4 डर लगैए हे डेराओन लगैए गौरी हम नहि जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए हे अजगर के सम्हा पर धामिन के बरेड़िया गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम.... कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्हनमा बिढ़नी के खोता घनघन करैए। गौरी......... सुगबा के पाढ़ि पर ढोरबा के ढोलनमा पनिया के जीभ हनहन करैए गौरी......... तेहि घर मे बैसल छथि अपने महादेव बिछुआ के कुण्डल सनसन करैए। गौरी.......... 5 हम नहि गौरी शिव सँ बिआहब मोर गौरी रहत कुमारि हे भूत-प्रेत बरियाति अनलनि मोर जिया गेल डेराइ गे। गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल पएरो मे फाटल बेमाइ गे गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब गौरी ले पड़ाएब नैहर हे। भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक त्रिभुवननाथ हे शुभ-शुभ कए गौरी के बिआह, तारू होउ सनाथ गे माइ। नचारी बम-बम भैरो हो भूपाल अपनी नगरिया भोला खेबि लगाबऽ पार कथी केर नाव-नवेरिया कथी करूआरि कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार सोने केर नाव-नवेरिया रूपे करूआरि भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार जँ तोहें भैरो लाला खेबि लगाएब पार मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै निशान बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान 2 भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी अपन नगरी यो कैलास पुरी पारबती के हम टल बजाएब नित उठि नीर भरब गगरी बेलक पतिया फूल चढ़ाएब िनत उठि भांग पीसब रगड़ी भनहिं विद्यापति सुनू हे मनाइनि इहो थिक दानीक माथक पगड़ी। 3 जय शिवशंकर भोले दानी क्षमा मंगै छी तोरे सँ अपराधी पातक हम भारी तैं कनै छी भोरे से। तोहर शरण छोड़ि ककरा शरण मे जाएब हे शंकरदानी दयावान दाता तोरा सन के त्रिलोक मे नहि जानि। जाधरि नहि ताकब बमभोले हम चिचिआएब जोरे सँ अपना ले फक्कर भंगिया िकन्तु तोहर अनुचर भरले कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर सेवक पर सदिखन ढरले। जनम भेल माया तृष्णा मे से तृष्णा नहि पूर भेलै। कामना के लहरि मे बाबा जीवन एहिना दूरि भेलै। हे दुखमोचन पार लगाबऽ हम दुखिया छी ओरे सँ पूजन विधि नहि जानी हम हे यएह जपि-जपि कऽ धियान धरी कर्म चक्र के जीवन भरि हम पेटे ले ओरियान करी जे ज्योतिश्वर पार लगाबह हम दुखिया छी ओरे सँ। 4 हटलो ने मानय त्रिपुरारी हो विपत्ति बड़ भारी खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब चड़ि गेल फूल-फूलवारी, हो विपत्ति बड़ भारी अंगने-अंगने सखि सभ उलहन दै छथि कतेक सहब अति गारी, हो विपत्ति बड़ भारी भनहिं विद्यापति सुनू हे गौरी दाइ इहो छथि त्रिशुलधारी, हो विपत्ति बड़ भारी। सोहर- 1 धन धन राज अयोध्या धन्य राजा दशरथ रे। धन रे कौशल्या के भाग कि राम जनम लेल रे। देखैत पण्डित पुरोहित पोथी कर नेने रे ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि सिधारत रे। से सुनि रानी विकल भेल राजा मुरक्षित रे। ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे। मन गुनी रानी हरखित भेली राजा मुदित भेल रे। ललना रे....... भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे। 2 कौने मास मेघबा गरजि गेल कोने मास बेंगवा बाजू रे ललना रे कोने मासे होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। सावन मेघवा गरजि गेल, भादव बेंग बाजू रे। आसिन होरिला जनम लेल कि गोतिनक हिया सालू रे। कोने तेल देव सासु के कोने ननदि जी के रे। ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के गरी ननदि जी के रे। ललना रे अमला दबैन गोतिन के हुनकर पैंच हेतनि रे। दसमासी सोहर पहिल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... मूंगक दाल नहि सोहाय, केहन गरम संओ रे ललना रे.... दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पूसक माछी ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पौरल खीर ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे ललना रे.... चारिम मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... फगुआक पूआ ने सोहाय, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे चैत के माछ ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... आम के टिकोला ने सोहाय, कि केहन गरम सेओ रे सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... खुजल केश ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे ललना रे..... पाकल आम ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे ललना रे.... पिया के सेज ने सोहाय, कि केहन गरम संओ रे दसम मास चढ़ु भादव, कि देवकी गरम संओ रे ललना रे.... देवकी दरदे बेयाकुल दगरिन बजायब रे जब जनमल जदुनन्दन, खुजि गेल बंधन रे ललना रे..... खुजि गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे। 4 यशोमति अद्भुत लेखल, बालक देखल रे सुन्दर हुनकर गात, कि बात पकठोसल रे कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे पूतनाकेँ देल विचार, जाहु तौहें गोकुल रे। पूतना थन विष लेल घोरि विदा भेल गोकुल रे घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे देलनि पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्दर रे। पूतना दूध पिआओल, आओर विष पसारल रे हरि देलनि दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे। खेलौना 1 हाथक कंगना ननदी के दलनि से नहि मन भाबय हो लाल। फूल के घड़ी ननदिया माँगय, सेहो कहाँ पाएब हो लाल। डाँड़ के डरकस ननदी के दलिएनि से नहि मन भावय हो लल पियबा देलियनि ननदोसिया देलिएनि, से नहि मन भावय हो लाल। ई सभ किछु नहि हुनका चाही ओ मांगथि पठनमे हो लाल। 2 सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए सासु जे बजती बाजि कऽ की करती छठियारी पुजाबऽ लए माय अबैए सोठौरा ने खाएब...... गोतनो ने बजती बाजि कऽ की करती हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए। सोठौरा ने....... ननदो जे बजती बाजि कऽ की करती कजरा सेदै लए बहिन अबैए। सोठौरा ने....... देओर जे बजता बाजि कऽ की करता दगरिन बजबै ले भाय अबैए। सोठौरा ने....... संकलन, मूड़न गीत गोसाउनि नोतक गीत बट्टा भरि चानन रगड़ल पाने पत्र लिखल हे। ताहि पान नोतब गोसाउनि जे नित पूजि थिकि हे। ताहि पान नोतब पितर लोक जे निज आशिष देथि हे ताहि पान नोतब ऐहब लोक जाहि स मंगल हैत हे। मूड़न बेरक- कौने बाबा दिनमा गुनाय जग ठानल हे। कौने बाबी पड़िछथि केश िक होड़िया के मूड़न हे। लाल पीयर चीर पहिरब केश परीछब हे बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि होड़िलाक मूड़न हे देबउ हजमा बड़ इनाम कि होड़िलाक मूड़न हे। शुभ-शुभ काट हजमा केश कि होड़िलाक मूड़न हे। लावा भुजै कालक लाव भूजय बैसली बहिनिया चुलहा दहिनिया हे। हे सुन्दरि मंगल आगि पजारल हे सात्री पत्र मे राखल लावा पुनि भूजल हे। दुलहिन गृह मे बैसि जे ब्याहल हे। कहय हे सखि सभ आनन्द मनाविय प्रभु गोहराविय हे। जुगे-जुगे बढ़ू अहिबात कि अइहब गाबिय हे। महेशवाणी दुर-दुर छीया ए छीया, एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया पाँच मुख बीच शोभनि तीन अंखिया सह-सह नचै छनि सांप सखिया दुर-दुर.....। काँख तर झोरी शोभनि, धथूर के बीया दिगम्बर के रूप देखि साले मैना के हीया दुर-दुर.....। जँ धिया के विष देथिन पिआ कोहबर मे मरती धीया भनहि विद्यापति सुनू धीया के माय बैसले ठाम गौरी के गुजरिया दुर-दुर......। दुर्गानन्द मण्डल कविता- हम देखलौं हम पूर्णिमाक रातिमे चुपेचाप धरतीपर चानकेँ उतड़ैत देखलौं घासपर गिड़ैत ओसक बुन्नमे अपन मुँह देख चानकेँ खिल-खिला कऽ हँसैत देखलौं हम पूर्णिमाक रातिमे चुपेचाप चानकेँ धरतीपर उतड़ैत देखलौं। नवयौवन, कोमल, सुन्नर ओ सुरति ओइ चानक पूरा मुखड़ा हम देखलौं धरतीपर प्रकृतिक सुन्नर, मनोरम, दृश्य देख गाछ-बिरिछ संग चानकेँ झुमैत देखलौं हम पूर्णिमाक रातिमे चुपेचाप चानकेँ धरतीपर उतड़ैत देखलौं। चान कहलक एतऽ हमरा सभ किछु नीक लागल परंच कुत्सित मानव दानवीय व्यवहार नीक नै लागल हमरे जकाँ शीतलतासँ अपन मनक भावना बाजू मानवक रंग, मानवक रूप छोड़ि दानवक भाषा नै बाजू चुपेचाप मानवक लेल, चानकेँ चिट्ठी लिखैत देखलौं हम पूर्णिमाक रातिमे चुपेचाप चानकेँ धरतीपर उतड़ैत देखलौं।। कविता- हम हिन्दुस्तानी छी हम हिप्दुस्तानी छी नै ककरोसँ डरै छी देश-िवदेशक बात करै छी अपने देशपर मरै छी। कथा पूर्वजक नै पुछू ओ सभ छथि सभसँ महान खेती-बाड़ी जिनकर धंधा जिनकासँ निखरल हिन्दुस्तान।। हमर रक्षक हमर भक्षक हमरेसँ करै छथि आश कवि बनू वा कलाम बनू पूर्ण करू अभिलाषा। बूढ़क सहारा बनि हम देशक रखबाला बनि हम नाओं हमर जेना दिवाकर जगमे एहन काम करी।। डॉ. अजीत मिश्र, जन्म स्थान- नबटोल(मात्रिक), पैत्रिक- ‘आदित्य वास’, पाहीटोल, सरिसब-पाही, मधुबनी। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दड़िभङ्गासँ स्नातकोत्तर(मैथिली) कएलाह बाद 1994 सँ 2006 धरि आकाशवाणी, दड़िभङ्गामे आकस्मिक मैथिली अन्तरवार्ताकार ओ समाचार-वाचक रुपमे कार्य। पछाति भारत सरकारक अन्तर्गत भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे मैथिलीक प्रवेशक उपरान्त मैथिलीक पहिल प्रतिनिधिक रुपमे पूर्वी प्रादेशिक केन्द्र, भुवनेश्वरमे पाहुन प्राध्यापक भए 10 जूलाइ, 2006सँ कार्य प्रारम्भ। एतए लगातार तीन वर्ष धरि कार्य सम्पादनक बाद भारत सरकारक राष्ट्रीय ज्ञान आयोगक अनुशंसा पर राष्ट्रीय अनुवाद मिशनकेर गठनक उपरान्त मैथिलीक मुख्य शैक्षिक सलाहकारक रुपमे मइ, 2009सँ भारतीय भाषा केन्द्र, मैसूरमे कार्यरत। दुर्गा चालीसा वन्दन-अभिनन्दन गुरुक चरणमे, जनिक कृपासँ सभ मतिमान। मनमे इच्छा करी प्रार्थना, माँ भगवतिकेर चपल चरण प्रणमान।। शक्ति-दायिनी, बल-बुद्धि प्रदायिनी, कए कृपा सदा बढ़ाबी मान। अछि मन करी अभ्यर्थना, जनिक कृपासँ सब किछु गतिमान।। 1 जय-जय-जय दुर्गा महरानी, दुख-दारिद्र-विपत्ति हारिणी। 2. सकल मनोरथ पूर्ण कारिणी, शंख-चक्र-त्रिशुल धारिणी। 3 कर कृपाण आ ढाल हाथमे, दस भुजा शोभय साथमे। 5. ताकए चहु दिस अपनेक आस, करी ने ककरो कहिओ निरास। 7. बाजल चहु दिस जनिकर डंका, रहल ने ककरो शक्तिक शंका। 9. अपरुप सुन्दर जनिकर रुप, शोभए सबहक हृदय स्वरुप। 4 जन-जन मांग वास हृदयमे, सभ पूरन हो सैह माथमे। 6. सुर-असुरकेर आस बनल जे, महिषासुरकेर नास कएल से। 8. जन-जन मनमे जनिक निवास, बहए सगर दिस सुन्दर सुवास। 10. मनमे बास पूरत सभ आस, जन-जन हो ने कतहु निरास। 11. हे भगवति! छी अहँ अपरुप, करए आ पाबए से समरुप। 13. जगभरि जकरा आस ने कोनो, भरि आबए सुख तकरा मोनो। 15. धवल नवल नव नित सयानी, हरए-पूरए सब हित कल्याणी। 17. मुनहर नहि कहिओ मुरझार, परतन रहए सगरो धुरझार। 12 गहल चरण मनसँ जे तोर, पाओल धन-जन तोरे कोर। 14. हे माँ-ममता जगत भवानी, मोर उर वास करह शर्वाणी। 16. चीवर वसन नयन सिनेह, दीघर सपन भरल मुड़ेर। 18. हे भगवति! अहँ रही सहाय, सकल मनोरथ संग पुराय। 19. आस-वास हो सकल जहान, जहिना जहनि बनए महान। 21. क्षोणी मौनीसँ, हो परिपूर्ण, जन-मन नहि हो, घमंडे चूर्ण। 23. करी कृपा आ सदा सहाय, भरी धरा माँ, सभे समाय। 25. शक्ति-भक्तिसँ हो न विभक्त, जन-मनमे हो तोरहि भक्त। 27. पूजए चहु दिस आस लगाए, रहए सबे नित हँसी भभाए। 20. चलए मस्त भए जेना कुरंग, मन मयूर भए बाजए मृदंग। 22. कृपा आशमे नति मति भए, हम धएल आइ ई बेना माए। 24. माँ केर ममता पाबि सकल, दीन-हीनकेर मिटए विकल। 26. धएने रही सब दिन ई धामा, पड़ए ने कहिओ ककरो बामा। 28. ईशक दृष्टिसँ पूर्ण धरा ई, सृष्टि रक्षा चढ़ि करू करी। 29. ई धरा धारसँ हो परिपूर्ण, मुदा धारकेर गर्व हो चूर्ण। 31. हे मैया! तोँ सबहक रक्षक, नजरि टेढ़ करए ने भक्षक। 33. ई जीवन जबूर ने लागे, हीन भावना दूरे भागे। 35. रहि-रहि मनमे भरए भावना, नहि कहिओ क्षीण कामना। 30. हम पतित तेँ ई पतिकिरनी, चलए ने आबए अंगने घिरनी। 32. जप-तप हमरा नहि ने आबए, नहि मन हमरा थीर उपजाबए। 34. वन्दन-अभिनन्दन नित्यनूतना, करी कृपा जे, सफल साधना। 36. तारा- तारिणी- रुद्राणीसन, शर्वाणी- नारायणी मनेमन। 37. माँ केर ममता चहुदिस भाबए, सगर समाजमे हित्तहि साजए। 39. हे मैया अछि तोरहि आस, करह ने कहिओ हमे निरास। 38. नित-नित नूतन हे भवानी, हित-हित जीवन कहे पिहानी। 40. जन-गण-मनमे तोरहि वास, रहए सगरभरि सुन्दर सुवास। शिवप्रिया हे रुप भवानी, करहु कृपा भए हित-कल्याणी, जन-मन बसए रुप मसानी, तोहेँ मैया ने बनह मानिनी। सुनील कुमार झा, सोनवर्षा राज, सम्प्रति- दिल्ली. हाइकू / शेनर्यू करियो कृपा/ करैत छि नमन/ हे छठी माई साँझक बेर/ सूर्य देव के आगांs/ जोडैत हाथ दुहि रहल/ पेट भरय लेल/ बकरी केर दूर नै ये/ बस चारि कदम/ मंजिल लेल सड़के कात/ बेचीं रहल छैक/ हाथक कला अपन गीत/ अपन वेश-भूषा/ अपन नाच नाचि रहल/ ढोल के धुन पर/ छोड़ा आ छौड़ी फेनिल पानि/ कल कल करता/ देत डूबाई स्वर्गक सीढ़ी/ बनाउ देलक ये/ विधना लेल निर्मल पानि/ शांत पड़ल छैक/ ये किछु बात धरती पर/ उतरी रहल ये/ नभ प्रकृति मोहक दॢश्य/ प्राकृतिक रचना/ इन्द्रधनुषी शेनर्यू नेता सबटा चोर/ मरय केर बाद/ बनल नेता गिरगिट सों/ रंग बदलनाय/ सिखलक ये मुहं मे राम/ बगल मे छुरी के/ करैत सिद्ध वोटक लेल/ लगेता दाँव पर/ आँखिक लाज सात पुश्त भी/ नेहाल भए जेता/ बनिके नेता निगैल गेल/ सुरसा बनि केर/ सोंसे देश के नेताक नाम/ सुनैय मे लागय/ जेना गारि ये मुखिया -: चुनाव लेल पहिरे लागल ये खादी कुरता सरपंच-: बुझायल जों महिमा चुनाव के गेल बोराय पंच-: दारु,टका सों ख़रीदे रहल ये सबटा वोट वार्ड-सदस्य -: चुनावी नैया पार करय लेल जोड़ैत हाथ जनता-: पाँच साल के निकालैत छिकार ये बुधियार दादा -: नेता बनिके पहिरे लागल ये खादी कुरता दादी-: पान चबौने नेने हाथ मे लाठी घूमि रहल बाबूजी -: धिया पुता ले रौद मे दिन भरि खटैत रहे माय -: बनि पुतौह करैत ये चाकरी अपने घोर बहिन -: भेल जवान बियाहक आस मे गिनैत दिन भाई -: लुच्चा बनिके अंगना दुआर पे छिछियाबैत हम -: देखि सुनि के परिवारक गाथा भेलोंउ क्षुब्ध आशीष अनचिन्हार पंचसती-पंचउपसती १ इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक। कविता पंचसती - पंचउपसती सती खंड १ अहिल्या सूनू गौतम ओहि भोर जखन अहाँ चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए हमर देहक लेल ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम इ इन्द्र छथि मुदा इ मोने छैक सूनू गौतम हम भासि गेल रही अहाँक नजरि मे मुदा इ अर्धसत्य थिकैक सत्य त इ थिक आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण दूनू फराक- फराक गप्प छैक सूनू गौतम हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰ २ तारा इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम बालिक कनियाँ छलहुँ आ बालिक पश्चात अहाकँ इहो सत्य छैक जतबे हम बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक ततबे अहुँ सँ करैत छी मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक जे अहाकव मृत्युक पश्चात हम तेसरोक कनियाँ हेबैक ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी. आ इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग त्रेतायुग सतयुग द्वापर आ कलियुग सभ युग मे ॰ ३ मंदोदरी राज्यक संग-संग विजेताक रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक हँ एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक जे हमरा अर्थात मंदोदरी के ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक जँ बाँकी होइक त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ मुदा तैओ हम विभीषणक कनियाँ नहि भए सकैत छियैक विभीषणक संग संभोगरत रहितो ॰ ४ कुंती योनि हरदम योनि होइ छैक चाहे ओ अक्षत हो वा क्षत लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो साधन नहि छैक जे योनिक की अवस्था छैक इ त पुरुषक मोन छैक जे योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि स्त्री के गुलाम बना लेलकै कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग लोक लाज छल मुदा आब नहि संतान हरदम संतान होइत छैक चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम मने कुंती अर्थात कर्ण आ पांडवक माए ५ द्रौपदी जखन कोनो जीवक जिनगी पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक त हमर सोहाग पंचपति सँ किएक नहि ? उपसती-खंड १ सीता राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह। अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल, हम असमय प्राण त्यागलहुँ। ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰ २ अनूसूया नाम थिक हमर अनूसूया मुदा एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल आर्यगण शूद्र स्त्री पर किएक मोहित होइत रहलाह घरक स्त्री उपेक्षित रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल इ बड्ड बादक गप्प थिक जे आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक रक्षाक लेल शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि मुदाहाय रे हमर कपार हम महासती त बनि गेलहुँ मुद स्त्री नहि ॰ ३ दमयंती जंगल मे नल हमरा छोड़ि पड़ा गेलाह इ कोनो बड़का गप्प नहि जखन ओ नाङट रहथि हम अपन नूआ फाड़ि हुनक गुप्तांग झाँपल मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि बड़का गप्प त इ छैक जे की मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि स्त्री पुरुषक नहि जँ नहि त हम कोना केलियैक ? ४ राधा अच्छर-कटुआ हमरा कृष्णक घरवाली बुझैए साक्षर कुमारि आ हम राधा एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे फसँल एकटा नारि मुदा अबला नहि कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे बिआहक बादे संभोग कएल जाए आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से विवेचना मिमांसक करताह मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि जकरा संग मोन नहि मानैत हो ओकरा संगक संभोग बलात्कार सँ कम नहि ॰ ५ गांधारी हमरा एक सए एक पुत्र छल अर्थात लोकक नजरि मे हमर पति हमरा संग एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह मुदा हम जनैत छी ओ संभोग नहि बलात्कार छल एहन बलात्कार जाहि मे ने त स्त्री चिचिआ सकैत अछि आ ने केकरो कहि सकैत अछि सुनिगबाक अतिरिक्त लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर मुदा पट्टी बान्हल हमर आँखि मे अबैत रहल कतेक रास सपना इ केओ कोना देखत ? छत्तीस-चौबीस-छत्तीस कोनो बचिआ सुन्ना-सुन्ना-सुन्ना रहैत-रहैत अनचोके मे बदलि जाइत छैक छत्तीस-चौबीस-छत्तीस मे कैमरा-लाइट-एक्शन एहि तीनू मे नहाइत अछि ओ आ तखन छत्तीस के सम्हारने रहैत छैक पारदर्शी ब्रा चौबीस-छत्तीस के बिकनी संयुत्ताक्षर जकाँ ओहिकाल मे ओकरा हाथ मे रहैत छैक कोनो ने कोने वस्तु आ वस्तु सटि जाइत छैक केखनो छत्तीस मे केखनो चौबीस-छत्तीस मे आ तखने तव हमहूँ सभ बुझैत छिऐक जे वस्तु नीक छैक बंधु एकटा गप्प सत्त इमान सँ कहैत छी छत्तीस-चौबीस-छत्तीस देखलाक पछातिए तँ बुझैत छिऐक जे वस्तु णीक हएबे करतैक एकरा अबस्स किनबाक चाही दू टा गद्य कविता 1 ( वाद ) भूख की छैक, यथार्थ की कल्पना ? अथवा एकरा एना कहिऔ जे भूख के कोन वाद मे बन्हबै---- यथार्थवाद----- तदर्थवाद----- अभिव्यंजना वाद नव चेतना वाद वा की-----------????????? 2 ( काल प्रश्न ) जकरा गाँड़ि ने धोबए आबए से ओझा कहाबए। अच्छा कहू त जकरा धोबए अबैत छैक तकरा की कहबै ? मंत्री, सभापति, अध्यक्ष आ की------------????????? धीरेन्द्र प्रेमर्षि आजाद गजल देखू कतबा तील बहै छी, नइ जाउ हम्मर काँतिमे खिच्चड़िमे कने घीओ चाही, आब तिला-सकराँतिमे जइ तिलाठकेँ तपैत गिरहतनी देह अहाँसुन सेदै छी ओहो छियै हमहीँ जनमओने घाम सिँचिकऽ माटिमे हँ यौ मालिक खूब जनै छी, शासनके तरजू की होइ! भँटा-मुरइसन हमरासुनके अहीँ बँटलियै जातिमे धरम नामके अफिम सुँघाकऽ परदादा-परनानाकेँ छी धपाएल अहाँ करऽ उगाही परपोता-परनातिमे ई नइ बुझबै पहिनहिसन सभ दँतखिसठीमे ठाढ़ अछि अप्पन अधिकारक लेल सभक्यो मिलिकऽ बैसल पाँतिमे २०६२/१०/०१, तिला-सकराँति रूबी झा , ग्राम पोस्ट समसा [मंसूर चक], जिला -बेगुसराय [बिहार], सम्प्रति:-गांधीनगर [अहमदाबाद] [गुजरात] १ मैथिलक बेटी छी तँ हम मैथिल के बेटी , हमर छैक ई बड़ भाग , भाग सं बढ़ि कऽ हमर अछि दुर्भाग्य , हमर बाप छथि अतिशय निर्धन , नै छनि खेत पथार नै सोना आ धन , निर्धन बापक सुन्नर कन्या , कोना करता दान बेटीक, बेटबेचबा अछि दुनिया , ई कियो नै सोचथि जखन एती दहेजुआ बेटी , करती बिग्रह जीबन मरण कऽ देती , अपन बापक किनल बसहा बड़द पर करती अधिकार , आँखिसँ नोरक तखन बहतनि धार, निर्धन घर जुनि धीया जनम देब भगवान , नै अछि ऐ जगमे बेटी केर कोनो मान, नै अछि तँ हएत अहूँ घर मे एक दिन बेटी , सुनु यौ मैथिल आबहु तँ चेती ...!! २ उदेश कतेक कहू हम मोनक कलेश , जहिया सँ गेलाह प्रियतम परदेश , किओ नै दै अछि हुनक उदेश , बाट जोहैत जीबन हमर भेल शेष , नोर सुखाइल करेज भेल पाथर, कतेक लिखब हम फुरै नै आखर , सिनुर टिकुली सेहो भेल झाम, आंखि केर काजर बहि गेल कोन ठाम , नै अछि सोह कोनो केहन भेलहुँ बताह, हमर दुखःक नै अछि कोनो थाह , मनक मनोरथ मोनहि रहि गेल , सपनेहुँ नै प्रियतम केर दरसन भेल , ३ गर्भ मे बेटी तोहर कोइख मे तँ अछि दुनिया हमर गै माँ , तूँ नै करबें तँ करतै के हमरा पर दया हमर गै माँ , हम तँ तोरे छी छांह , राखऽ दे ऐ जगमे पाँव , अछि मनमे लालसा बहुत देखी दुनिया केर रंग , रहब तोरे हम संग ,करबइन किनको नै तंग , निर्मोही छथि दाइ, बाबा आ बाप , कतेक केलो बिना कतेक केलौं बिलाप , नै अछि कोनो ऐ जगमे हमर सहारा हे गै माँ , तू नै करबें तँ करतै के हमरा पर दया हे गै माँ , जहिया पढ़ब, लिखब पोथी भाइए केँ पढ़ि लेब , छोड़ल भैयाक ऐँठ खाय हम जीबन जीबि लेब , खुजऽ दे तँ हमर आँखि एक बेर हे गै माँ , करब उजागर नाम हम पुरखाक, हएत नै देर हे गै माँ , कनी सोचही चिंतित भऽ हेतै जौँ केवल बेटा , लेती नै जनम बेटी तँ ई बेटा कतए सँ एता , ४ माँ केर ममता माँ केर ममता होइ अछि जेना सागर , कखनो नै खाली होइ अछि ई गागर , फूसियो जँ कखनो हम रुसि जाइत छी, आबि--आबिदेखू कोना हमरा मनाबथि सदिखन हमर ओ तँ हिम्मत बढ़ाबथि , बाटकेँ सदिखन दूर करती अँधियारा , माँ लेल बच्चा होइ अछि बड़ प्यारा , सत्य क मार्ग ओ तँ सदिखन देखाबथि, राइत मे जखन हमरा नीन नै आबए , लोरी बैस कऽ सगरो राइत ओ सुनाबथि , जखन- जखन भयस हम घबराबी, हाथ मे आँचल हुनके तँ हम पाबी , माँ तँ होइत अछि सभ गुण केर आगर, माँ केर ममता होइ अछि जेना सागर , ५ ''दहेजक कहर'' कतेक कहू,कहिआ हेतै खतम ई दहेज कहर, किनको आइग लगेनाइ किनको देनाइ जहर, बृदध् होइते सासु जी किए ई बिसरि जाइ छथि एहसास, काल्हि ओहो छलथि कनियाँ आइ बनल छथि सास, ननइद नै ई सोचलन्हि जेहने ओ छथि अपन माँ केर प्यारी , हुनक घर जे एली भाउज सेहो छथि अपन माँ के दुलारी , ऐ बातकेँ कहिया बुझथिन ऐ बातक तँ कननाइ अछि , आइ जे भाऊज पर होइ छनि काल्हि हुनको पर होनाइ अछि , सात फेरा लेलैन जे हमरा संग प्रेमक नगरी बसओलनि , देवता बुझि कऽ जिनका लग एलहुँ सेहो कसाइ भऽ गेलनि, ६ ''आब अइ देश मे'' आब देखू ऐ देशमे , लाल कम लाला बेसी अछि , काम कम घोटाला बेसी अछि , आब देखू ऐ देश मे ........! सामान अछि बड़ कम, महंगाइ बेसी अछि , आब देखू ऐ देशमे ........! नोकरी अछि बड़ कम , बेरोजगारी कतेक बेसी अछि , आब देखू ऐ देशमे ........! ईमान कतेक कम अछि , खरीदारी कतेक बेसी अछि , आब देखू ऐ देशमे ........! सेवा अछि बड़ कम , स्वार्थ कतेक बेसी अछि , आब देखू ऐ देशमे ........! शब्द अछि बड़ कम , शब्दार्थ कतेक बेसी अछि , आब देखू ऐ देशमे ........! ७ ''बिरह गीत '' कोन अगुन अपराध हरी जी के , केलियनि हे ऊधो ........! जौँ हम रहितौं बनक मयुरनी , कृष्ण करथि शृंगार मुकुट बिच , शोभितहुँ हे ऊधो ........! जौँ हम रहितौं बैजंत्रीक माला , कृष्ण पहिरथि हार ह्रदय बिच रहितहुँ , हे ऊधो .........! जौँ हम रहितौं बाँसक बाँसुरी , कृष्ण करथि स्वर गान मधुर स्वर , बजतौँ हे ऊधो .......! जौँ हम रहितौँ जलक मछली , कृष्ण करथि स्नान चरण हम, छूबितौँ हे ऊधो ....! कोन अगुन अपराध हरी जी के , केलियनि हे ऊधो .......!! ८ ''प्रेम गीत '' हे यौ प्रियतम आँचर छोइड़ दिअ भेल प्रात आँगन हम जाएब कोना , हे यै सुंदरी आँचर छोड़ब कोना , अहाँ जाएब आँगन हम रहब कोना , अछि लाजक बात बताएब कोना ,हम माइक सन्मुख जाएब कोना , हे यौ प्रियतम आँचर छोइड़ दिअ भेल प्रात आँगन हम जाएब कोना . ९ अखिआश सुगंध सुमनक जेना गमकि उठैत अछि , प्रेम हुनक ओहिना मन मे कसकि उठैत अछि , बात कहबाक जे छल से कहलो ने जाइ, प्रीतम अहाँ बिनु हमरा रहलो ने जाइ , अखिआश अहाँक बैसल भोर सँ , देखियौ तँ कोना साँझ भए गेल , चिक्कश सनैत छलौं सेहो घोर भए गेल , पहिलुक ओ रंग रभस बिसरल नै जाइत अछि , जखन ई सोची तँ नयन बर्बसे झुकि जाइत अछि , कखनो बुझाइत अछि आगम अहाँक , भागी-भागी देखि मुँह दर्पण मे जा कऽ , सजी धजी कऽ जखन चौकैठ लग गेल छी, धुर जाउ की भेल ऐ बातसँ हँसी कऽ गेल अछि , १० कतेक नीक छल ओ कतेक नीक छल ओ , हंसनाइ ओ खेल ओ मुस्कान , रहैत छलहुँ ऐ जगसँ दूर, सभटा गमसँ अनजान, नै तँ कोनो दुःख छल नै छल कोनो सपना , भावुक नै होइत छलौं के अछि आन के अपना , खेलामे होइत छलै कखनो हारि, कखनो तँ होइत छलय जीत , कखनो होइत छलै झगरा झांटी, कखनो गबैत छलौं हम गीत , थोड़बा छल लड़ाइ थोड़बा छल रंग , कतेक सुहावन छलै सखी सहेली केर संग , ओ गुड्डा गुड्रियाक कतेक नीक छल खेल , ओइ आम गाछीक अपन संगी सभसँ मेल , तखन कतेक करैत छलौं माँ बाबु जी केँ हरान, कतेक नीक छल हंसनाइ आ ओ मुस्कान , सदिखन रहैत छलौं सभ गम सँ अनजान . ११ पर्वत सन दरद कोलाहल अछि सागर एहेन , लहर एहेन अछि भरल द्वन्द्व, पर्वत एहन दर्द भरल अछि , आ ढेपा एहेन अछि आनंद , जिनगी क ई रस देखू तँ , कतेक लगैत नुनगर अछि , जीत जाइ अछि दुःख दर्द सभ, एसकर सुखे टा हारल अछि , फूल सरीखा मांछक ऊपर , बिछायल अछि काँटक फंद, पर्वत एहेन दर्द भरल अछि , आ ढेपा एहेन अछि आनंद , जतबे ताकी हम शीतलता , ओतबे लहरल आगि भेटाए, प्यास तँ चुप चाप भेल अछि , मौनक मदिरा हम पीलहुँ, संपन्न भऽ गेल सभटा गीत , शेष बाँचल अछि व्यथा केर छंद , पर्वत एहन दुःख भरल अछि , आ ढेपा एहेन अछि आनंद , १२ ''प्रियतम सरस'' हे यौ प्रियतम सरस अहाँ आएब कहिया , हमर मोनक आशा पुराएब कहिया , नीक लागए नै आब माँ बाबुक दुलार , अहाँ अपन प्रेमक ज्योति जरायब कहिया , हे यौ प्रियतम सरस ........................! बड़ देखलौं बम्बई आ दिल्ली शहर , मधुबनी दैरभंगा घुमाएब कहिया , हे प्रियतम सरस .............................! नीक लागए नै दालि भात आ माँछ मांगुर , अहाँ गरम जिलेबी खूआयब कहिया , हे यौ प्रियतम सरस ........................! बनी बैसल छी ओतै कुमदनीक फूल , मोनक उपवन मे बेली फुलायब कहिया , हे यौ प्रियतम सरस .........................! बनि बैसल छी कहिया सँ नवकी दुलिहीन, अहाँ नैहरसँ हमरा लऽ जाएब कहिया , हे यो प्रियतम सरस ..........................! १३ स्वप्न देखी अहाँ छी जेना दुतिया केर चान, अहाँ पूनम के चान बनि आएब कहिया, हे यौ प्रियतम ..................................! बिसरल नै होइत अछि अहांक मुस्कुराइत छवि , अहाँ अपना संगे हमरो हंसायेब कहिया , हे यौ प्रियतम ...................................! नीक लागए नै अहाँ बिनु कोनो शृंगार, हाथ अपने अहाँ सिन्नुर लगाएब कहिया , हे यौ प्रियतम ...................................! अनेरो खनकै अछि चुड़ी कंगन , हमर हाथ केर कंगन खनकाएब कहिया , हे यौ प्रियतम ....................................! देखू प्यासे तँ गेल हमर अधरों सुखाइ, अपन अधरसँ अमृत पिआएब कहिया , हे यौ प्रियतम सरस ...........................! पत्र लिखैत-लिखैत हमर हाथो पिरायल, हमर दर्दक दाम अहाँ चुकाएब कहिया , हे यौ प्रियतम सरस अहाँ आएब कहिया !! १४ निष्ठुर प्रियतम केहेन निष्ठुर जकां प्रियतम, अपन जन के सताबय छी , करेय छी सिनेह अतिसय हम, ताहि सा अहाँ क बताबय छी , उठे ये पीर करेजा मे किएक , अहाँ जनि बुझी दुखाबय छी , सुने छी प्रेम अहाँ अप्पन ता , आंजुर भरी- भरी लूटाबय छी , आबे ये बेर जखन हम्मर ता, देखू किय निकुती नपाबय छी , नै जानि कतेक निदर्दी छी अहाँ , सबटा बुझितो न लजाबय छी , बुझै छी बात ता सबटा हम, अहाँ हमरा की सिखाबइ छी , रहे ये मोन टांगल कतौ अहाँक, आ प्रेम हमरा सां जताबइ छी , गजल तरहत्थी दीप जरा हम ठारै छलौं, अहान्क प्रतिक्षा सदा हम ठारै छलौं , अहाँ आएब एहि बाटे फुइसे छलै , लेलों किए हाथो जरा हम ठारै छलौं , छी अहाँ कठोर देखल नै आँखि नोर , मुदा कानि आँखि फुला हम ठारे छलौं , हमर दर्दक मोल नै जानल अहाँ , कनै बुझितहुँ व्यथा हम ठारे छलौं , अही केर आशा मे ज्योँ मरब कहियो , नै आनब नामो कदा हम ठारे छलौं , बेदर्दी अहाँ दर्द बुझब की हमर, मुदा व्यर्थ पीड़ा बता हम ठारे छलौं| गजल जग मे बेटी केँ सम्मान भेटै कहियो, माइ बापक अभिमान भेटै कहियो, माँ केर कोइख सँ लेलें दुनु जनम, मुदा अधिकार समान भेटै कहियो, भरि देश केँ आइ सम्हारने छै बेटी, अपन समाजो मे मान भेटै कहियो, पहुँच गेलै बेटी अंतरिक्ष अखन, वसुंधरा पर सम्मान भेटै कहियो, भेल चौपट मिथिला दहेज प्रथा सँ, दहेज बिनु वरदान भेटै कहियो, घुटि मरै "रूबी" पुरुखक समाज मे, एको दिन नारी प्रधान भेटै कहियो..!!! गजल गजबे िनशा हुनक आँखिमे अजबे कथा हुनक आँखिमे हम बहल जाइ सदिखन भरल ब्यथा हुनक आँखिमे िभजल हम आँखिक अलौते कारी घटा हुनक आँखिमे समािहत भऽ गेलहुँ कखनो हम दबल दुिवधा हुनक आँखिमे कोयला भँ गेलहुँ जरि जरि हम जरल ज्वाला हुनक आँखिमे बेहोशे तँ छी अखन धरि हम अजबे िनशा हुनक आँखिमे गजल हे यै सोना, अहाँक रुप लगै सोना जेकाँ गोर गाल पर तील कोनो जादु टोना जेकाँ, केश मेघो सन कारी गोर गरदन शोभैए, जुट्टी अएन्चल अहाँक नाग फेना जेकाँ चितवन चंचल एहन लागैए हिरनी तेहन ताहु पर काजर मशीह भौं कमाने जेकाँ, ठोर पातर एहन पानक पोटरिया जेहन लाली लगबैए छी जखन लगै सुगा जेकाँ, देह छरहर एहन गाछ कुसियारक तेहन रस भरल पोरे-पोर चीनी बसना जेकाँ, अहाँ जखन चली बाट मोन होए उचाट गाम गाम गमकी एहन फुलक दोना जेकाँ। गजल सगरो नगरी मे कतेक, शोर भs गेलए हुनक रुपक इजोत सँ , भोर भs गेलए यौबन केर रौद चम-चम चमकै एना नहा इजोरिया, रसिक चकोर भs गेलए केखनो गुदरी ज्योँ फाटल, लेलैन्ह पहीर देह हुनकर सजल , पटोर भs गेलए अनुपम सुन्नैर लगैत जेना ओ अप्सरा मेनकाक रुप जेना कोनो थार भs गेलए ओ लेलैन अंगराइ, करेज बुढबो पिटै छौरा देखैक लेल तहलखोर भs गेलए गजल कहियौ छोड़ब नै अहाँक पछोर यौ अहाँ जायब कतऽ राखब संगे अहाँ के साँझ सँ भोर यौ अहाँ जायब कतऽ चिन्हलौ नहि जानलौ अहाँ किएक एखन धरि हमरा प्रेम बरखा सँ करब सराबोर यौ अहाँ जायब कत़ऽ अहाँ लेल तियागल लाजो तियागल धाखो अहीँक लेल प्रेम सरिता बहाएल पोरे पोर यौ अहाँ जायब कतऽ छोरलहुँ हम नैहर सासुरो छोरलहुँ अहिँक लेल मायक ममताक छोड़लहुँ कोर यौ अहाँ जाएब कतऽ अहाँ बाजु एकबेर किरीया खाउ हम ककरा लगा के मात्र अहीँ टा छी" रूबी "के चितचोर यौ अहाँ जाएब कतऽ (सरळ वार्िणक़ बहर ) बर्ण-२१ गजल ओ नहि भेलाह कहियो जौँ हमर त' की भेल होयत आब हुनके बिन गुजर त' की भेल जेठक दिवस काटल भदबरियाक रैन आइ बितइत नहि अछि पहर त' की भेल बिलक्षण आर मधुर बजैत छलथि बोल एकबेर बाजि देलथि जौ जहर त' की भेल प्रेम मे मीरा सनक भऽ गेल छी बताहि हम हुनका यदि परबाह नहि तकर त' की भेल युग-युग सँ गाबै छी गीत हुनक पथपर नहि एलाह एकोबेर एहि डगर त' की भेल हुनक आश मे अछि फाटल साड़ी आ चुनरी जोगिनिये कहैत अछि जौ नगर त' की भेल हुनके आश तकैत पिबि गेलहु बिषक प्याला बदनाम भेलहुँ जौ जग सगर त' की भ गजल अहाँक साधना मात्र सौं हम प्रेम करै छी अहाँक भावना मात्र सौं हम प्रेम करै छी देखू त' हमरा अगल- बगल नै छी मुदा अहाँक कामना मात्र सौं हम प्रेम करै छी कहिओ एको घरी अहूँ याइद केने हैब त' ओहि धारणा मात्र सौं हम प्रेम करै छी हम जतए छी अहिंक छी आ सपना सेहो त' ओहि सपना मात्र सौं हम प्रेम करै छी एको दिन हमरा सौं अहूँ प्रेम केने हैब अहाँक प्रेरणा मात्र सौं हम प्रेम करै छी प्रतिक्षा करैत रहे छी ब्याकुल भ' अहाँ के अहाँक सामना मात्र सौं हम प्रेम करै छी सरल वर्णिक बहर---वर्ण १६ गजल सिहकल जखन पुरबा बसात अहाँ अयलहु किये नहि मोन उपवन गमकल सूवास अहाँ अयलहु किये नहि चिहुकि उठि जगलहु आध-पहर राति सपन हेरायल आँखि खुजितहि टुटिगेल भरोस अहाँ अयलहु किये नहि चेतना हमर प्रियतम फेर किएक देलहु अहाँ बौराय बेकल उताहुल भेलहु हताश अहाँ अयलहु किये नहि नम्र-निवेदन हम करइत छी अहाँ सँ प्रियतम हमर गेलहु कतय नुकाय जगा आस अहाँ अयलहु किये नहि भेल आतुर मोन रूबी केर निरखि-निरखि सुरत अहाँके फागुन-चैत बित गेल मधुमास अहाँ अयलहु किये नहि गजल प्रेमक दीप जरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु अपन जान चोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु कतेक पैघ-पैघ चोट भेंटल तखनो नै अनुमान भेल विरह तीर गरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु सपना में त' पिया मिलन के हम स्वप्न सजा के राखए छी सिनेह घैल भरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु आँचर सौं बाट बहारब झार पात हटायेब पिपनी सौं आँगन सौं त' परा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु इ त' प्रेमक अनुभूति छैक कोना बूझत जे नै प्रेम करै रूबी आइंख नोरा क' राखब कनेक बताहि हम छी जनु --------------सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२ ------- गजल धूर जाउ सम्मान क' बात करै छी तौरे तोर छल सौं आघात करै छी नित बान्हि बैसई छी बरका पाग निर्लज बनि बिश्वासघात करै छी भोरे- भोर देब की भाषणे बैस क' छी निठ्ठला मुदा माँछ भात करै छी लुच्चा लफाईर जेकाँ सौंसे घुमै छी राखि काँख तौर छुरी मात करै छी गुण-दोख अपन सभ क्यो जानैथ जनितो किएक बज्रपात करै छी जागु मैथिल जगाबू मिथिला चलू भ्रस्टाचार ''रूबी'' एक कात करै छी सरल वार्णिक बहर वर्ण-13 गजल हम त' छी कनेक नादान ताहि लेल चुप छी ई जग अछि बेसी सियान ताहि लेल चुप छी कतेक नुकाएल अन्देख में निर्मम निर्दय अखनो अछि बड़ हेवान ताहि लेल चुप छी नित मार काट खून खुनामय होएत रहै मांगे अछि दुष्ट वरदान ताहि लेल चुप छी सभदिन होए अछि गर्भे में बेटी केर हत्या मुदा बनलि सब अंजान ताहि लेल चुप छी जौं कहूना मैर क' बांचल जे बेटी समाज में दहेज प्रथा लेतेन जान ताहि लेल चुप छी कहवाक हिम्मत बहुते राखने छैक ''रूबी'' किन्नो भ्रष्ट नै होय सम्मान ताहि लेल चुप छी --------सरल वार्णिक बहर वर्ण --१७--- मुन्नी कामत जड़ैत ज्योत माय गे, कतेक दिन तक हम बच्चा रहबै बकरी संगे खेलैत रहबै हमरो दुनियाकेँ जानैक एगो मौका दऽ दे माय हमरा बस्ता दिया दे। छै छोट हमरासँ मालिकक बेटा अंगरेजियेमे फटर-फटर करै छै हम नै बुझै छी देवनागरीयोक एगो अक्षर माय गे, हमरो स्कूल जाए दे। मालिकसँ जा कऽ तूँ कहि दही नै चरेबइ आब हम भैंस हुनकर नै खेबै तरकारी, रोटी हमरा नूने रोटी खा दे मुदा माय गे, हमरा तूँ पढ़ै लेल जाय दे। पढ़ि लिख हम अफसर बनबै तोरा लऽ लब साड़ी अनबै बाबूक बुरहक सहारा बनि हम दुनियामे नाम करबै माय गे, आब हमरा अपन भविष्य बनाबऽ दे हमरा जिनगी सवारऽ दे। जिंदगीक मरीचिका लटैक रहल छल गुच्छा गाछमे रसभरल मीठ आमक शरारती मन ललचाइत जी कहलक तोड़ि खाइ अकरा मुदा कि करी भय छल पहरेदारेक। मन नै मानलक पाइन मुँॅहमे भरि गेल फेर सोचलूँ बस एगो तोरू तक डर केहन यएह तँ निअम अछि संसारक। सभ खाइत अछि छुपि कऽ कखनो घरमे तँ कखनो बाहरमे ऊँच,नीच सँ बनै यऽ अतऽ सभ अपन यएह पथ पर तँ चलैत अछि सभक सभ। पर सच जे अनभिग अछि सभसँ ई अछि ई मीठ फल नै जहर अछि कोनो जे बदलि रहल अछि हमर नियत आ हमर संस्कार जे दऽ कऽ अपन मिठासक लालच झोंकि रहल अछि धधकैत भट्ठीमे। जिन्दगीक राहमे ऐत नित्य कतेक मरीचिका पर सिखब हम अकरेसँ संघर्षक रोज नया सलीका । ताकैत जिनगी कूड़ा ढ़ेरमे देह सुखल पेट हाड़ी आँखि दुनू लाल छल। टुकुर, टुकूर ताकैत छल हमरा दिस ओ ओकरा मुखमे अनंत सवाल छल। पटनाक रेलवे लाइन पर ठार एगो मासुम बच्चा फटल पुरान लटकौने टाँगने छल एगो बोरा अपन पीठ पर देखि कऽ ओकरा एना लागल जेना ताकि रहल अछि अपन जिन्दगी गन्दगीक ढ़ेरमे। पर नै जानि कतेक मासुम कहिना पनपैत अछि अहि संसारमे। नित ताकैत अछि अपन मंजिल, अपन भविष्य अहिना कूड़ाक ढ़ेरमे। संकल्प छोड़ि जाएत माझी पतवार उफनैत जिन्दगीक राहमे अछि हसरत हुनकर कि, थामैय पतवार हुनके अंश अहि मजधारमे। छी गर अहाँ कृति हुनकर तँ राही बनू अहि राहक उठाउ पतवार आ माझी बनू जिन्दगीक अपन राहक। ऐल छी अहां जतऽ तक ओइसँ आगुक कल्पना करू देख रहल अछि राह मंजिल अहाँक मुस्कुराइत ओइ पारमे। छोड़ि कऽ मोह वट वृक्षक समना करू हवा आ पानिक तब बनत व्यक्तित्व अहाँक अहाँक नामसँ अहि संसारमे। अहाँ अगर अंश छी हुनकर तँ बुझाइ नै कहियो ई दीप जे छोड़ि गेल अपन सब कुछ बस एगो अहींक विश्वासमे। ठमकल शब्द रूकि जाइत ई हवा ई नजारा ई बहार, दुनियाक हम भऽ जाएब विलीन कतैव रूकि जाइत ई कलम आर हरा जाइत शब्द कतैव। नै उठत वेदना मनमे नै उमड़त भावना कोनो। जब जाएब खामोश अतऽ सँ तँ मेटौ जएत सब हसरत दिलक ने आएब हम याद ककरो ने करब हम याद किनको ओइ अज्ञात सफरमे नै मिलत हमराही कोनो बरसैत मेघ, चिलमिलाइत धूप सबहक बीचमे रहब हम असगर ठार ने लऽ जएब, ने छोड़ि जएब किछो बस एगो दिया जे जरत अहि ठाम सदखन, सबहक मनमे हएत ओ हमर कृति, हमर करमक ज्योत। दहेजक बिहाड़ि कहिया तक रहबै हम समान यौ भइया कहिया मिटतै ई अभिशाप यौ हमरो तँ परमतमे भेजलक मुदा अबैत ऐ संसारमे सब हेय सँ देखलक कोय कुलच्छनि तँ कोय कलंकनी कहलक। भइयाकेँ दुलार केलक हमरा धुतकाइर कऽ माय भगौलक दिन-राइत हम मायक हाथ बटै छी बाबू-दायक सेवा करै छी तइयो किए ई फटकार सुनै छी सुनि रहल छी सबहक मुॅंहसँ दहेज बिनु नै हएत हमर व्याह जे थामत हाथ हमर बाबू भरत पहिले जेब ओकर। हम बेटी छी आ कि समान जे गाम-गाम सँ आउत लोग करै लऽ हमर दाम छाम। आब सजबऽ पड़त सभ बेटीकेँ अपन आत्मदाहक साज आर कहिया तक पिसाइत रहतै बेटीक समाज। हरैल हमर रूप जब एलौं तँ रूइ छेलौं कोमलताक सागरमे डूबल छेलौं प्यार सँ छुबै छल सभ हमरा हम सपनामे सूतल छेलौं। अंजान छेलौंव दुनियाक हकीकत सँ ऐ शोर शराबा, ऐ धधकैत भट्ठीसँ छिन गेल ओ स्वरूप देलक दुनिया हमरा नया रूप। देख कऽ दुनियाक रंग कॉंइप रहल अछि हमर अंग छल, कपट, धोखाधरी सब अछि सबहक संग। कतेक अरब रामक ऐमे पड़त करै लेल अतऽ सँ पापक अंत देखकऽ ई हम छी दंग आइ सबहक मनमे बसल अछि हजारो रावणक अंग। विदाइ जो गै बेटी, आब कि निहारि रहल छी नोराइल आँखिसँ ककरा ताकि रहल छी। अतै तक लिखल छेलै साथ अतै तक छेलियौ हम तोहर बाप। एक जनम तूँ अतऽ गमेलऽ हमरा संगे सभ सुख दुख हँसि कऽ बितेलऽ अहिना तूँ ओतौ रहिअ खुशीक दीप जराइयहँ केलियौ आइ हम तोरा पराइ मन रोबैत अछि ठोर हंसैत अछि कऽ रहल छी आइ तोहर विदाइ। चंदन कुमार झा, सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित एकटा कविताः- "हमहू पढबै आब" बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । नित्यदिन हम इस्कुल जेबै, पढिलिखि कऽ आफिसर बनबै, करबै हमहू बी.ए.एम.ए. पास, बाबू यौ, गामो पर करबै सभटा काज, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । बेटा-बेटी मे नहि रहतै अंतर हमहू बनबै डाक्टर, इंजीनियर, नहि करबै आब ककरो आस, बाबू यौ, नहि रहबै आब हम बेकार, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । अबला सँ सबला हम बनबै, देश समाजक सेवा करबै, नहि सहबै हम ककरो रोआब, बाबू यौ, चिन्हबै हमहूँ अप्पन अधिकार, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । दहेज-प्रथा केर भूतो भगतइ, नारी समाजक शोषण रुकतइ, तखनहि हेतइ देशक पूर्ण-विकास, बाबू यौ, जखने पढ़बै हमहू किताब, बाबू यौ, कीनि दिअ' ने हमरो किताब बाबू यौ, हमहू पढ़बै क,ख,ग,घ आब । फेर हेतइ भोर (कविता- आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित) होइत छैक साँझ जखन मद्धिम भऽ जाइत छैक सूर्यक प्रकाश लाल भऽ जाइत छैक पच्छिम भर आकाश चिड़ै सभ जाय लगैत अछि अपना-अपना आवास बंद भऽ जाइत छैक कुसुमित कमल बंद भऽ जाइत अछि ताहि मे भ्रमर । एतबहि मे भऽ जाइत छैक अन्हार भऽ जाइत छैक सभ चीज अनचिन्हार सूति रहैत अछि थाकल संसार मुदा, सूतैत नहि अछि भ्रमर । सोचैत अछि भ्रमर- फेर हेतइ भोर फेर पसरतइ चहुँदिश सूर्यक प्रकाश फेर हेतइ लाल पुरबक आकाश चिड़ै छोड़त फेर अपन आवास नहि रहतइ कतहु अन्हार जागत ई संसार फेर फुलेतइ कमल,आ' ताहि पर नाचत ओ "भ्रमर" । आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १०-०३-२००४ के तरुण-कुसुम कार्यक्रम मे प्रसारित एकटा कविताः- बेटी बन्हलीह परिणय डोर ।। मुँह पर मूस्की आँखि मे नोर कन्यागत के लागल बकोर खेलैत छलीह जे बाबाक कोर से बन्हलीह आइ परिणय डोर। छलीह चान से भेलीह चकोर घर ससुरक हेतैन्हि ईजोर माय करेजा केलनि कठोर बाबू आँखि सँ झर-झर नोर,बेटी बन्हलीह परिणय डोर ।। आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ दिनांक १० मार्च २००४ के "तरुण-कुसुम" कार्यक्रम मे कविताः- दीप दीप जड़ैत अछि, हवा सामान्य रहैत छैक जखन, कञ्पित होइत छैक दीप-शिखा, जेना हँसैत हो दीप । पवनक वेग बढ़ि जाइत छैक- अचानक...एकाएक...अकस्मात् जोर-जोर सँ, कञ्पित होमय लगैत अछि दीप-शिखा, जेना जोर-जोर सँ हँसऽ लागल हो दीप । पवनक संग लड़ैत अछि दीप । मुदा, तखनहि- पवन अपन वेग आओर बढ़ा दैत अछि, हारि जाइत अछि दीप, मरि जाइत अछि दीप, मिझा जाइत छैक दीप-शिखा, मुदा, मरियो के हमरा सभकेँ, जीवन-पर्यन्त हँसैत रहबाक, हँसैत-हँसैत लड़ैत रहबाक, सनेस दऽ जाइत अछि दीप । जे भान नहि !! आजादीक पैंसठि बरख बितलाक बादो एखनो मोन अछि जे कहिया विदेशी जिंजीरक बनहन सँ मुक्त भेल रही | मुदा, देशी जुन्ना सँ कहिया गछारल गेलहुँ से भान नहि । भय हे प्रिय हम अनंतकाल सँ, तकैत छी अहाँक बाट । दिन-राति हमर अनिमेष दूनू नेत्र सँ, बहइछ गंगा-जमुनाक धार । करैत छी अहाँक स्मरण कऽ-कऽ- करूण क्रन्दन । अहाँक एक झलक देखबा' लेल, आकुल रहैछ हमर, सर्वांग, तन-मन, संगहि- मोन रहैछ भयभीत- अहाँके देखिकऽ, अहाँके देखबाके, हमर ई व्याकुलता नहि कम भऽ जाइ| बज्जर धरती पर चम्मच सँ खुनलौँ खत्ता बज्जर धरती पर। ठूठ गाछ कलशल पत्ता बज्जर धरती पर।। हरित बाग प्रकृति सत्ता बज्जर धरती पर। चिड़ खोप लागल कत्ता बज्जर धरती पर।। सहसह लोक घोरन छत्ता बज्जर धरती पर। रंग-बिरंग पहिरन लत्ता बज्जर धरती पर।। लागल भीड़ भासल हत्ता बज्जर धरती पर। चालि जगत के अलबत्ता बज्जर धरती पर ।। मोन होइए जे मोन होइए जे पसेनेक बुन्न सँ सुखसागर निर्माण करी । मोनो होइए जे कोनो कर्मयोगीए के भगवान कही । मोन होइए जे जीवनक रणक्षेत्र मे कर्मयुद्धक आह्वान करी । मोन होइए जे अलसायल परती कोड़ि कर्मयुगक आधार रची । मोन होइए जे जिनगी मे जे किछु करी मात्र तकरे पर अभिमान करी । मोनो होइए जे फेर उठी,सम्हरि,लक्ष्य संधान करी कर्मेक बाट प्रस्थान करी । मोन होइए जे मोनक बात बात मोनहि नै रहै से कोनो अनुसंधान करी । हमर करेजा छन सँ उठलै हमर करेजा जखन अहाँके नेह मे डुबलै चन सँ उठलै हमर करेजा जखन अहीँके नेह मे टुटलै । धक दऽ रहलै हमर करेजा जखन अहाँके सोँझा पड़लै फक सँ मरलै हमर करेजा जखन अहीँबिनु एसगर पड़लै बिडम्बना एकदिश भरले डकैत-चोर दोसरदिश डरले कनैत-लोक कोना कटतइ राति अन्हार क्षण-क्षण बितैब भेल पहाड़ । एकदिश कोठा-महल ठाढ़ दोसरदिश ककरो चुबै चार केयो नञ्गटे घूमै बजार ककरो कुक्कुरो के ओहार । एकदिश छप्पन भोग सचार दोसरदिश ककरो नून-अचार दुश्मन हाथ सँ लऽ के कटार मीता के खून करैछ भजार । एकदिश अभिमानक पहाड़ दोसरदिश मोहक अंध-इनार बिच मे समतल एकपैरिया संधानि चलू जिनगीक बाट। मोनक बात आइ फेर जनु भरले घर एकात भेल छी हँसैत परिजनक बीच ठोहि पाड़ि कनैत छी। बाबू बिमार छथि गाम मे तैँ माय कनैत गेलीह कनिते छोड़ि गेलीह हमरा हँसैत दुधमुँहा नेना के कोरा मे लऽ बैसल कनैत छी । एसगरि कनिञा की-की करतीह, कोना के घर डेबतीह एहि अनचिन्हार नगर मे ? अनंत सोच मे पड़ल छी । माथ पर लाखो कर्जा कमा-कमा सूदि चुकबै छी मूल कोना सधत कोनो ने बाट देखै छी । समाजक नजरि मे कमौआ पूत बनल छी फेर के बुझत जे हकन्न कनै छी । आब तऽ दोसरक मिसिया भरि सुख लोक पहाड़ सन बुझैत अछि आ' तै तऽ तुरंते ओकर जड़ि खोधय लगैत अछि मुदा, अनकर पहाड़ सनक दुख ककरो नहि सुझैत छै ककरो हृदय के नहि चिरैत छै लोक तऽ ओकरा फुल सन हल्लुक बुझैत अछि ओहि सँ सुख पबैत अछि । मोनक बात मोनहि मे रहल सभटा आस नोरहि मे बहल ककरा कहबै,के पतिएतै, तैँ एसगरे लड़ैत छी उदीग्न मोन बुझबैत छी कर्मण्येवाधिकारस्ते ...पढ़ैत छी कर्म करैत छी जिनगीक बाट चलैत छी छिड़िआयल काँट-कुश बिछैत छी दुधमुँहा नेनाक संग बिहुसैत छी नहाइत काल कनैत छी बकोर लागल अछि बकार नहि फुटैए फेर, मोनक बात कहब कोना तैँ लिखैत छी । मूरख मंत्री, निरपट सरकार मूरख मंत्री, निरपट सरकार तकरा संग आफिसर बुधियार जनता संगहि करैछ खेलबार हनि रहल महगीक तलवार। एमहर गरीब गुरबा लचार ओमहर ककरो बढ़ल बेपार ककरो देह जनु सूखल अचार ककरो धोधि जनु उठल पहाड़। कतहु सौजनिया नोत हकार तीमन तरुआ मधुर सचार ककरो सेहन्ता नोन अचार कोना के कटतै जिनगी पहाड़ ? जनता के बुझि गाय धेनुआर दुहि रहलै निष्ठुर सरकार टुटतै मूँह आ' फुटतै कपार जहिया परतै एकर लथार । मायक सपथ छी दऽ रहल मैथिली के खून सँ देखू जनक नगरी रंगल जानकी अँगना मे देखू रावणो घुमिए रहल। देखू सियाके रक्त सँ जनक-खेतक रज सनल घायल मिथिला मैथिली बाट बिचे छथि पड़ल। माय अप्पन पुत्र सँ आह्वान छथि कइए रहल उठू जागू वीर मैथिल किए छी अहाँ चुप पड़ल । देखू मिथिला राजक सपना शोणितक धारे बहल आउ मिलि एकरा बचाउ छी मायक सपथ दऽरहल । घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान पग-पग खत्ता पोखरि धार चर-चाँचर मे नाव सवार छानि रहल अछि माछ-मखान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । चैतहु मास झल-झल पानि उबडुब पोखरि भरले मोनि छोपैछ कृषक गरमा धान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । धप-धप बाउल पुनिमक चान पुरबाक सिहकी सुधा समान बुढ़बो मटकय जेना जुआन घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । खत्ते मे जनु सड़क नुकायल टूटल पुलिया बान्हो भासल खेत बनल अछि सिन्धु समान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान । हर-हर-हर सगरो अनघोल सुनल नचारी बजिते ढो़ल बमभोला छथि बड़ा महान घुमि अयलहु कुशेश्वर-स्थान बाड़ी बदलल वृन्दावन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे मोर मगन नाचय उपवन मे महमह गमके धरणीक कण-कण जेना मलय मिझरायल पवन मे ।। छन-छन,झम-झम,बुन्नी झर-झर झिंगुर केर स्वर, बेंगक टर-टर्र खोंता बिच करब चिड़ैक फर-फर्र जनु प्रेम राग पसरल कूंजन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। कलश नवल ओढ़लक तरुवर नवयुवती सन मटकय निर्झर हँसइत धार मुस्कय सरवर सुख बरसय प्रकृति केर भवन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। चमकय बिजुरी ढनकइत जलद पपीहा के पिहु-पिहु बोल सुखद स्वर्गक लावण्य धरणी उतरल बाड़ी बदलल जेना वृन्दावन मे उमड़ि-घुमड़ि घन भरल गगन मे ।। सिखनिहार सँ बेशी सिखौनिहार छै जगमे सिखनिहार सँ बेशी सिखौनिहार छै जगमे सिखौनहार सँ बेशी परिछनहार छै जगमे परिछनहारो सँ बेशी फरिछेनिहार छै जगमे सभसँ बेशी प्रमाणपत्र बटनिहार छै जगमे । आहार सँ बेशी परसनिहार छै जगमे परसनिहार सँ बेशी खेनिहार छै जगमे खेनिहारहु सँ बेशी लुझिनिहार छै जगमे लुझिनिहारो सँ बेशी लुटनिहार छै जगमे । रोजगारो सँ बेशी कमेनिहार छै जगमे कमेनिहारो सँ बेशी बेरोजगार छै जगमे बेरोजगारो सँ बेशी मंगनिहार छै जगमे सभसँ सँ बेशी भूखे मरनिहार छै जगमे ।। अकान चुप्पहि रहैत छी हरदम बस सुनैत छी- लोकक बाजब, किदन-कहाँदन, अंटशंट, बिनु पेनीक बात, उतरा-चौड़ी, थुक्कम-फज्जति, फुसिक पंचैती, क्षणिक कुटमैती............ । बस देखैत रहैत छी टुकुर-टुकुर- मारा-पिट्टी, कुकुरक कटौझी, देयादि भतबारि, सासु-पुतोहुक अड़ारि, खेतक दड़ारि, बेबस्थाक तियारि, कनैत पुतोहु आ' पुजति कुमारि, धधकैत लहास,हास-परिहास, भोजक उल्लास, महाजन के त्रास............। चौक परहुक चाहक चुस्की, घूर लगहक कनफुसकी, चौबनिया मुस्की, बपौती वैभव केर दंभ, पुरखाक कीर्ति-स्तंभ, नेहक सीमान..........., बस हरदम रहैत छी अकानति, बनले बकान, किछु नहि बजैत छी, चुप्पहि रहैत छी, बनिकऽ अकान । झमझम बरसै छै बून्नी झमझम बरसै छै बून्नी छै नाचि रहल गरचून्नी सुनि के बेंगक टिटकारी फँसलीह कबई कुमारी ।। बगुला टकध्यान लगौने बैसल छल आस लगौने बुझू भेलै जबारी ओकरा भरि पोख पेलकै टेंगरा ।। कौआ केर भेटलैक चाली बुझू जेना नूडल्स पाताली घसि-घसि लोल पिजबैछै खने खत्ता पानि उपछै छै ।। जखने चमकल बिजलौका साकांक्ष भेल घोंघही डोका केयो जोड़ऽ लागल कुटमैती केयो करय गेल पंचैती ।। काँकोड़ बिल सँ बहरायल ओ लगैछ कने अगुतायल चाँगुर सँ महल बनेलक रचि-रचि केहन सजेलक ।। छै झूर-झमाने मूसरी सोचै जे कोना के ससरी घर-दुआरि ओकर दहेलै बुझू अपटी खेत मे फँसलै ।। केयो गाबि रहल चौमासा ककरो लेल खेल तमाशा हरखित छै खेत-पथार जंगल,पहाड़ सभ धार ।। निर्लज्जा के आब भगाबू ।। कविगोष्ठी मे हमहीं जेबइ कथो रातिभरि हमहीं बचबै पागो माथ पर हमरीं सजबै सभठाँ आगाँ हमहीं बजबै ।। मंचक मध्य मे हमही बैसबै सभठाँ भाषण हमहीं करबै बाबू छलखिन्ह हमहूँ रहबै बेटो संगहि कुथबै-पदबै ।। तगमा सभटा हमरे चाही हमरे कलम बस रहै स्याही सभ करियौ हमरे वाह-वाही नहि करबै तऽ लेब हम ढाही ।। मिथिला-मैथिल हमर बपौती ऐपार-ओहिपार हमरे कुटमैती तइँ हमही करबै पंचैती हमरे टा चलतै जेठरैती ।। पछुआ सभ ने आगू आबय देखू, केयो ने गाल बजाबय केयो ने कतौ कल्ला अलगाबय बस हमरे सभ जय-जय गाबय ।। जागू मैथिल आबहु जागू हे पछिला सभ आबू आगू मिथिला-मैथिल मान बचाबू निर्लज्जा के आब भगाबू ।। हे, बुझलियै की ? हे, बुझलियै की ? युग युग बदलि गेलैए । आब लिखनिहार-पढ़निहार, नीक-बेजायके गुननिहार, मोटगर पोथी छपेनिहार, कोनो नवका बात बतौनिहार, आलोचक किंवा चुप्पहि रहनिहार, सभक कोनो मोजर नहि छै । आब मोजर छैक ओकरे जे- बजार मे घुमथि, मंच पर सुतथि, माइक धऽ कुथथि, चंदा उघथि, अनका लुझथि, गामे-गाम बुलथि, नोत-हकार पुरथि, झट अकास छूलथि, पट पएर चुमथि, चौक पर बैसथि, अपना के सैंतथि, फुसि सगरो परसथि, आ'खा-पी के ससरथि ।। हाइकु दलान पर मचलै हरबिर्रो बरात एलै ! वरक बाप फनैछ नौ-नौ हाथ टाका खातिर ! आजुक मैना कोना परिछतीह राम जमाय ? बेटीक बाप पएर पकड़ने वर-बाप के । चण्डीक रूप फेर धेलकै बेटी एलै दलान । गर्दमिसान घुमा देलकै वर भेलै अजुबा !! गरजे मेघ चमकय बिजुरी मास अषाढ़ । बरखे बर्षा तिरपित धरती मेटलै प्यास । गुड़के डोका फनकैछ कबइ पोखरि नाञ्घि । नञ्गटा छौड़ा उपछय डबरा पोठी खातिर । बंशी पथने रोहुक जोगार मे बैसल कक्का । सगरो बाध छै छपछप पानि जगलै आश । तानल छत्ता चमकय घोघही खेत पथार । हर-बड़द कृषक परिवार लगलै चास । बकः धेयान नारी इज्जति पर लगौने नर। सगरो छैक मड़राइत गिद्ध मौस तकैत। चित्त बाघिन गिद्दर सभ मिलि देह नोचैत । शक्तिस्वरूपा चण्ड-मुण्डक पाँजे कछमछाय । भीष्म आ' द्रोण बनले धृतराष्ट्र मूड़ी गाड़ने । अर्जुन भीम पाण्डवक सैनिक हारल योद्धा । लाज बचाउ चिकरैछ द्रौपदी हे गिरधारी ! पाथर तोड़ै जेठ दुपहरिया टपके घाम । नञ्गटे देह जरठुआ रौदहि जड़लै चाम । गुमकी सौँसे पात डोलय नहि विधातो वाम। ढनकै मेघ चमकल विजुरी सुखल घाम । सुपक्क गोपी खसल छहोछित पकलै आम । अगता खेती नक्षत्र अरदारा सुखी किसान । बेघर बच्चा ढेरिऔलक बालु बनेतै घर । सिन्धु कछेर उधियाइत पानि दहेलै घर । गाछक तर सिखैछ लिखनाइ बच्चा 'घर' ! कहाँ छै ठर बुढ-पुरान केर अपने घर । अँगना घर बनल मरचर घरहि-घर । गद्दह बेर गिरगिट बाजय पहिले साँझ। घुरक धुआँ धुआयल अकास मालक थैरि। बारल साँझ गोसाउनिक गीत गमकै धूप। गोइठा आँच लहलह लहके राति अन्हार । मरुआ रोटी गमकैत फोरन माछक झोर । अँगना पिढ़ी बैसल खेनहार नेना भुटका । निःशब्द राति प्रियतम संगमे हँसी-ठिठोली । प्रेमहि लीन गमकैत कामिनी भोरबा राति । कारी अकाश बिजुरी चकमक बर्षा झहरे माटिक गंध गमगम गमके नाचय मोर झाँट बिहाड़ि थकुचलक आम कुच्चा अचार आमक गाछी खोपड़ी छारइछ पसेना घाम जोति बिरार कयलक बाउग धानक बिया मुँग जनेर हरियर कचोर सगरो बाध हर बरद आशान्वित कृषक जोतय खेत | सगरो शांत गुमकी पसरल आकुल मन । निःशब्द वन चिड़ैक फर्र-फर्र चुप्पी तोड़ल । उठलै बिर्ड़ो प्रलय मचाओल संकटे प्राण । क्षत-विक्षत धरती खसलय चिड़ैक खोँता । अंडा टूटल उजरल दुनिया मोन उदास । सोचि-बिचारि धरती उतरल खर बिछैले । नवका खोँता चिडैक चहकब नव लगैए । लालहि लाल अरुणोदय काल नील अकास । मसुरी दालि सूर्यास्त-काल मेघ एक्कहि रंग । सुखले आर्द्रा पुखो राखल रुखे बरिसत के ? बितलै राति उगलै भोरुकबा जगलै आस । अगबे कौआ निपत्ता छै कोइली पराती-भास । अरिया नाञ्घ जलोदीप सगरो दाहीक छाह । हाइकू (राम-कथा) चैत्र-नवमी अवध नगर मे रामक जन्म । मिथिला भुमि धनुष के तोड़ल सिया विवाह । दू वरदान मंगलथि कैकेयी दशरथ सँ । राजा भरत रामक वनवास सगरो शोक । स्वर्णक मृग मोहित मन सीता पकरू राम । पर्णकुटी सँ वैदेही हरलक रावण दुष्ट । किष्किंधा देश सुग्रीव के ताड़ल बालि मारल । ताकय सीता चलल चहुँओर वानर सेना । सागर-पार कपीश हनुमान लंका जारल । पाथर डारि नल-नील दू भाई बान्हल सेतु । कुंभकरण रावण के मारल जीतल लंका । घुमला राम अवध नगरिया रामहि राज । शेर्न्यु ठाँहि-पठाँहि जँ कहबै ककरो जड़तै देह ! भऽ गेल छैक मरखाह मनुख मालहि सन । एक भेल छै मुद्दई-मुदालह पंच एकात । पिया विदेशी अनमन उर्मिला मिथिला-नारी । बेटीक बाप बन्हलकै रुपैया किनतै वर !! दिन देखार केहन अतत्तह खून-खुनामे । पवन कुमार साह गीत अहाँ बिनु हम केना रहब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु हम जीअब कि मरब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु...... अहीं चैन छी हमरा अहीं तँ निन्निया सुख-दुख हमर अहीं तँ सजनियाँ अहीं जीवन हमर अहीं तँ परनिया सभ किछु छी हमर अहीं तँ सजनियाँ सजनी बिनु हम केना रहब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु......... देखू हमर चेहरा केहेन भऽ गेलए मिलैक बिनु अहाँसँ मुर्झा गेलए सूरति अहाँक हमर जीगरमे गड़ि गेलए मिलैक लेल दिल तड़सि कऽ रहि गेलए अहाँसँ हम केना मिलब हमरा बता दिअ अहाँ बिनु.....। श्यामल सुमन गजल सन १ लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ अप्पन अप्पन काज बिसरलहुँ सच पूछू तऽ लाज बिसरलहुँ सिखलहुँ लूरि जीबय के जतय कियै ओहेन समाज बिसरलहुँ छूटल अरिपन, सोहर सब किछु लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ सासुर मे छल खूब रईसी घर मे नखरा-नाज बिसरलहुँ मन गाबय छल गीत मिलन के सुर के सँग मे साज बिसरलहुँ संस्कार के बात करी नित जीबय के अन्दाज बिसरलहुँ हम छी राजा, बाकी परजा मुदा सुमन के ताज बिसरलहुँ २ ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी बहुत दूर, पर गाम देखय छी भेल बहुत बदनाम देखय छी काली-पूजा, फगुआ छूटल दारू के परिणाम देखय छी बापक कान्ह कोदारि सदरिखन बेटा केर आराम देखय छी कष्ट झुकय मे नवतुरिया केँ ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी अपनापन के बात निपत्ता घर घर मे संग्राम देखय छी धन के अर्जन घूसखोरी सँ हुनके बड़का नाम देखय छी सुमन सुधारक आशा टूटल तखनहि केवल राम देखय छी ३ व्यर्थक बात करय छी कियै अहाँ कहलहुँ, अहीं लऽ मरय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। आस लगेलहुँ, रूप सजेलहुँ, लेकिन तखनहुँ अहाँ नहि एलेहुँ। काज करय मे दिन कटैया, कुहरि कुहरिकय राति बितेलहुँ। पेटक कारण, अहाँ बिनु साजन, जहिना तहिना रहय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। सब सखियन के साजन आयल, सभहक घर मे बाजय पायल। ओढ़ि लेने छी हँसी मुँह पर, लेकिन भीतर सँ छी घायल। विरहन के दुख, लोक बुझत की, तरे तर जरय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। पीड़ा मन के, बिनु बन्धन के, ककरा कहबय दुख जीवन के। किछु नय किछु मजबूरी सबके, ताकू अवसर सुमन मिलन के। आँखिक नोर सूखल पर भीतर नोरक संग बहय छी। अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।। नवीन कुमार "आशा" बेटी हमर अभिमान अभिमान अछि बेटी मान अछि बेटी माता-पिताक प्राण अछि बेटी; जॅ नहि होयत किनको बेटी बुझि हुनक ङाढ़ गेल टुटि अभिमान अछि बेटी। मॉ के दुःख ओ बुझैत हृदय सॅ कठोर नै होयति बापक करेजक होय ओ प्राण; बेटा सॅ बढ़ि होय अछि बेटी के ज्ञान मान अछि बेटी माता-पिता के प्राण अछि बेटी। आजुक बेटी; बेटा सॅ बढ़ि के इ सगरे दुनिया जानैत अछि तहियो ने जानी पापी दुनिया के बेटी जन्मक सोच सतबैत अछि; अभिमान अछि बेटी मान अछि बेटी। ‘‘आषा’’ के गप्प पर दियो ध्यान अवष्य करू एकटा कन्या दान; जॅ करब कन्या दान तखन बाजव- ‘‘बेटी तु हमर अभिमान’’। अभिमान ---------- मान------------- माता-पिताक -------- (भगिनी सौम्या ‘‘गुनगुन’’ लेल) की फुराएल ने जानि की फुराएल ने जानि कोना फुराएल ई आइ कोना जागल सूतल प्राण कोना आएल मिथिला याद जेकर केने छलौं त्याग कोना याद आएल हुनक बलिदान जे देलथि भारतीयक पहचान की फुराएल ने जानि। कोना फुराएल हमरा ई आइ माए बाबूक कोना आएल याद जे हमरा लेल केलथि अपन त्याग हुनक याद कोना सताएल कोना मोन भेल घुरि जाइ गाम ने जानि की हमरा फुराएल। कोना याद आएल अपन मिथिला राजा जनकक ओ मिथिला जतऽ क अछि मण्डन अयाची सर गंगानाथ सन लोकसँ जुड़ल पहचान की फुराएल ने जानि कोना फुराएल ई आइ। की फुराएल हमरा ई आइ घुरि चलि आब अपन देश छोड़ि दी आब ई परदेश नै जानि हृदयमे आइ ई की भेल की फुराएल ने जानि कोना फुराएल हमरा ई आइ मिथिलाक माछक आएल याद जेकर अछि किछु अलगे स्वाद गामक भोजक अलगे मान ओइमे लोकसँ होए पहचान कोना याद आएल ओ मिथिला याद कोना एला मिथिलावासी ने जानि ई कोना भेल कोना फुराएल हमरा ई आइ। भाइ बहिनक आएल याद जिनकासँ मिलि करी हुड़दंग सभ कियोकेँ करै छलौं तंग याद आएल ओ पुरान क्षण कोना ने ई जानि की फुराएल ने जानि कोना फुराएल हमरा ई आइ। अंतमे “आशा” बस एतबा चाहए सभ कियोक जँ हुअए ईएह विचार मिथिलापर की होए अत्याचार की फुराएल ने जानि कोना फुराएल हमरा ई आइ। मिथिलामे बसए प्राण संस्कारक होइ छी धनी सदिखन सबहक हृदय बसी प्रतिभाक होइ छी खान सभ ठाम छोड़ी अपन निशान चाहे रही कतबो असगर ओतौ बना ली एकटा समाज किछु-किछु अछि दुर्गुण तैयो लोक कहए निपुण। भोरे-भोर उठी नहाइ भगवानक सुमिरण हृदय बसाइ तखन करी एतऽ ग्रहण फेर करी ओतौ विचरण ठाढ़ रहै छी सदिखन सधने नै बूझब छी अकान जखन होइ छै गलत तखन खोली अपन जुबान जखन होइ अछि बड़ गुणगान तखन बाजी ठहरू श्रीमान बैसऽ काल मुँह राखी चुप आबऽ दैत छी पहिचान मिथिलाक छी हम वासी मैथिली अछि हमर भाषा माता-पिताक करी सम्मान। मिथिलाक अछि पहिचान धोती-कुर्ता पान-मखान कतबो रही दूर देश तखनो बसए मिथिलामे प्राण मिथिलामे प्राण बस आब आशा देत पहिचान घानेरामपुरमे अछि ओकर मकान अछि मुखसँ कनी कठोर पर राखए सबहक ओ मान संस्कारक होइ छी धनी (माँ मिथिलाकेँ समर्पित) डॉ॰ शशिधर कुमर, ग्राम रुचौल, पो॰ मकरमपुर, जिला दरभंगा, पिन ८४७२३४ एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र)- ४११०४४ मधुश्रवणी गीत - १ सखी हे ! चलू मधुबन फूल - पात लोढ़य लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। बितल आषाढ़, आयल अछि साओन । ऋतु बरसातक परम सोहाओन । लागय वसुधा सुन्नर अनुपम । चहु दिशि बाट करैत’छि गमगम । सखी हे ! प्रकृतिक मनभाओन शिंगार देखय लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। कारी घटा देखि नाचय मयूर । शोभित जहँ - तहँ बहु - विधि फूल । हरियर घास लसित भेल विपुला । उमड़ल जल सञो पोखरि - सरिता । सखी हे ! मह - मह शीतल बसात बहइए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। फूल फुलायल भरि भरि डारि । चम्पा चमेली आ नेवारि । देखितहि बनय कनैलक कुञ्ज । लुबुधल जाहि पर मधुपक पुञ्ज । सखी हे ! कामिनी - कञ्चन कनैल लोढ़य लए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। बैसलि डारि करैछ खग कलरव । गूँजय बेकल पपीहाक मधु स्वर । सखी हे ! कोइलियो प्रेमक गीत गाबैए । आयल मधुश्रावणी, अहिबात पूजय लए ।। मधुश्रवणी गीत - २ चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। भाँति भाँति केर फूल फुलायल, लुबुधल भरि - भरि डारि । बेला बेली, जाही जूही, गेना - गुलाब - नेवारि । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। बेलपात आ फूल सखी हे, तोड़ब भरि – भरि डाली ।* बिसहरि - गौड़ - महादेव पूजब, माँगब सिनुरक लाली । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। आदिकाल सञो यज्ञभूमि, मिथिला केर अछि ई तिहार । छी मिथिला केर बेटी, तेँ ई जन्मसिद्ध अधिकार । चलै गे बहिना ! फुलडाली लय फूल तोड़य लए । अड़हूल तोड़य लए । सखी ! अड़हूल तोड़य लए ।। * डाली = मैथिलीक “बाँसक कमचीक बनल वस्तुविशेष”, नञि कि हिन्दीक “गाछक शाखा” सिनुरदानक गीत सखी हे ! चलू आजु मिथिलाधाम । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। मड़बा अछि चारू दिशि साजल, केरा गाछ सञो द्वारि बनाओल । भाँति - भाँति केर चित्र लिखल अछि,* साजल बहुविधि फूल आ पल्लव । गाबय सखि सभ मंगल – गान । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। सकल महीप पराभव जखने, शिवक महाधनु तोड़ल रघुवर । कतेक विघ्न केर बाद आयल अछि, ई पुणीत शुभदिवस सुअवसरि । लागल मिथिला शोभा महान । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। माथ उघाड़ि सिया छथि बैसलि, दर्शन दिव्य, देवगण उमरल । वरण कयल मन, वर सम्मुख छथि, धनि शिव-गौड़ मनोरथ पूरल ।** देथिन्ह सिऊँथेँ सिनूर श्रीराम । होयतन्हि सिय केर सिन्दुरदान ।। * प्राचीन मैथिली मे “चित्र लिखब” शब्द थिक ”चित्र बनायब” या “चित्र पाड़ब” शब्द आधुनिक मैथिलीक देन अछि । ** पुष्पवाटिका मे देल गेल माए पार्वतीक आशिर्वाद । परिछनि गीत (द्विरागमन / दुरागमन / गौना केर बादक परिछनि) चलू – चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ । नेने आयल छथि संग मे बहुरिया, जनकपुर केर चान केँ ।। गेल छलाह यज्ञक रक्षा लए, मुनि कौशिक केर संग । जाय जनकपुर कयलन्हि ओहिठाँ, शिवक धनुषकेँ भंग । जाय मिथिला नगरिया रखलन्हि ओ, मिथिलेशक मान – सम्मान केँ । चलू चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। कान दुहु कुण्डल लटकै छन्हि, गला मे कञ्चन हार । डाँढ़ शोभन्हि बिअहुतिया धोती, माथ पर ललका पाग । सुन्नर हिनकर सुरतिया लगय छन्हि, आ मुँह पर मधुर मुस्कान गे । चलू चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। श्रीराम सिया, भरत ओ माण्डवी, लखनोर्मिल, शत्रुघ्न श्रुतिकीर्त्ति । मोनहि मोन होइछ हर्षित सभ, देखि ई अनुपम चारू जोड़ी । सुन्नर चारू ई जोड़िया लगैत’छि, सखी जेना चकोर आ चान गे । चलू चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। कनक दीप ओ घी केर बाती, कञ्चन थार सजल दुहु हाथ । हर्षित मन परिछथि तीनू माता, एकाएकी बारम्बार । देखि चारू बहुरिया, होइ छथि हर्षित, सभ बासी अयोध्या धाम केर । चलू चलू सखी आजु अयोध्या, परिछऽ रघुवर श्रीराम केँ ।। उच्चारण संकेत :- अंग्रेजी आदिक पोथी सभ मे “आन भाषा – भाषी”क लेल वा “नवसिखिया” सभक लेल कोष्ठ मे “उच्चारण संकेत” (Pronunciations / Phœnetic symbols) देल रहैत छै । मैथिली मे ई परिपाटी नहि, तथापि हमरा लगैत अछि जे देबाक चाही, तेँ एहि बेर सञो शुरू कए रहल छी । मैथिली मे बहुधा “साहित्यिक शब्द लेखन” ओ “शब्दोच्चारण”क बीच थोड़ेक अन्तर देखल जाइछ, जकरा “आन भाषा – भाषी मैथिली शिक्षणार्थी” लोकनि वा “नवसिखिया” लोकनि ठीक सँ नञि बूझि पबैत छथि आ “हिन्दी व्याकरण” केर आधार पर उच्चारण करैत छथि । बहुत बेर “मैथिल” लोकनि “सर्व – साधारण गप्प – शप” मे तँ सही उच्चारण करैत छथि परञ्च जञो “लिखित मैथिली” केँ पढ़ि कऽ उच्चारण करबाक हो तँ ओ “हिन्दी” व्याकरणक आधार पर उच्चारण करैत पाओल जाइत छथि । एहि सभ कारण सँ कए बेर लिखल कविता वा गीत वा गजल सभक उच्चारण, लय, ताल, मात्रा आदि बदलि जाइत अछि । ओना तँ एहि बदलाव सभ केँ रोकब पुर्णतः सम्भव नञि आ पाठक ओ गायक लोकनिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता सेहो । पर कएक बेर ई बदलाव एहि स्वरूपक होइछ जे अभिप्रेत लय, ताल पुर्णतया बदलि जाइत अछि। नचरी, डिस्को भऽ जाइत अछि आ सुगम संगीत पॉप या रैप । तेँ उपरोक्त कारण सभक द्वारेँ, हम अप्पन रचना मे प्रयुक्त किछु शब्द सभक उच्चारण संकेत एहि बेर सँ देअब शुरू कएल अछि । क्रम संख्या गीत वा कविता सं॰ लिखित शब्द अभिप्रेत उच्चारण १ १ अहिबात अहिबात, ऐहबात २ १ साओन साओन, साउन ३ १ सोहाओन सोहाओन, सओहावन ४ १ मनभाओन मनभाओन, मनभावन ५ १ करैत’छि करैतैछ, करै अछि ६ १ सरिता सैरता ७ १ पोखरि पोखैर ८ १,२ भरि भइर, भैर ९ १,२ डारि डाइर, डाइढ़ १० १,२ नेवारि नेवाइर ११ १ देखितहि देखितहि, देखिते १२ १ जाहि जाहि, जइ १३ १ बैसलि बैसैल १४ २ अड़हूल अड़हूल, अढ़ूल १५ २,३ भाँति भाँइत,भाँति १६ २ बिसहरि बिसहैर १७ २ आदिकाल आदिकाल, आइदकाल १८ २ अधिकार अधिकार, अइधकार, ऐधकार १९ ३ सखी सखी सखि सखि, सइख, सैख २० ३ होयतन्हि होयतन्हि, हेतन्हि, हेतैन्ह, हेतैन २३ ३ दिशि दिशि, दिश २४ ३ द्वारि द्वारि, द्वाइर, दुआइर २५ ३ अवसरि अवसइर, अवसैर २६ ३ उघाड़ि उघाइड़, उघाइर २७ ३ धनि धनि, धैन २८ ३ सिऊँथ स्यूँथ, सीथ २९ ४ परिछनि परिछैन, परिछनि ३० ४ लए लए, लेऽ ३१ ४ कयलन्हि कयलन्हि, केलन्हि, केलैन्ह, केलैन ३२ ४ छलाह छलाह, छला ३३ ४ मुनि मुनि, मुइन ३४ ४ शोभन्हि शोभन्हि, शोभैन्ह, शोभैन ३५ ४ बिअहुतिया बिअहुतिया, बिहौतिया ३६ ४ परिछथि परिछथि, परिछइथ, परिछैथ, पइरछैथ, पैरछैथ ३७ ४ देखि देखि, देइख ३८ सर्वत्र केर (सम्बन्ध कारक विभक्ति) केर (।।, एकमात्रक दू आखर/अक्षर), के (ऽ, द्विमात्रिक एक आखर/अक्षर ) ३९ सर्वत्र केँ (कर्म ओ सम्प्रदान कारक विभ॰) केँ (ऽ, द्विमात्रिक), के (ऽ, द्विमात्रिक) ४० सर्वत्र के (प्रश्नवाचक सर्वनाम वा प्रश्नवाचक सार्वनामिक सम्बोधन) के (एक-, द्वि- या त्रिमात्रिक) ४१ सर्वत्र अछि अछि, अइछ, ऐछ, अइ ४२ सर्वत्र छन्हि छन्हि, छैन्ह, छैन ४३ सर्वत्र छथि छथि, छैथ क्रम संख्या लिखित शब्द अभिप्रेत उच्चारण १ पानि पाइन, पइन, पैन २ अछि अइछ ३ अग्निराशि अग्निराशि ४ राति राइत ५ अन्हरिया अन्हरिया, अन्हैरया ६ पुनमि पुनैम ७ गति गइत ८ अतिप्रबल अतिप्रबल, अइतप्रबल ९ दिशि दिशि, दिश १० जानि जाइन ११ कत’ कते १२ छाड़ि छोइड़ १३ सनि सइन, सन १४ अतिशय अतिशय, अइतशय माँ शारदे वन्दना - १ (गीत) (श्री सरस्वती पूजाक शुभ अवसरि पर विशेष) जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू । सभहक अहाँ सुनै छी हे माता, हमरो बेड़ा पार करू । क्षमा करू अपराध हमर सभ, हमरो अहाँ उद्धार करू । जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। नञि जानी पूजा केर विधि माँ, हम धिया - पुता अज्ञानी छी । दिशाहीन संसार बीच हम, अहींक चरण - अनुगामी छी । हमहूँ अहींक सन्तान छी माता, हमरो निज करुणा दान करू । पथ - प्रशस्त, शुभ - दिशाबोध, सद्ज्ञान दियऽ, अभिमान हरू। जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। नञि बालक प्रह्लाद छी हम माँ, नञि ध्रुव सन हम ज्ञानी छी । आयल छी माँ अहींक शरण मे, कृपा दृष्टि केर कामी छी । अज्ञानक अन्हार हरू माँ, ज्ञानक ज्योति प्रदान करू । नहि हमरहि, सम्पुर्ण जगत भरि, जन – जन केर कल्याण करू । जय अम्बे, जय माँ शारदे, विनय हमर स्वीकार करू ।। माँ शारदे वन्दना - २ (गीत) (श्री सरस्वती पूजाक शुभ अवसरि पर विशेष) जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् । तन शुभ्र प्रकाशित, पंकज राजित, शोभित चारु कमल नयनम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। कामिनि चतुरानन, हंसहि वाहन, शान्त स्वभाव, वाणि मधुरम् । वीणा कर शोभित, सभजन पूजित, सकल कला – कौशल कुशलम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। मम् जहि निर्बुद्धि, देहि सुबुद्धि, विद्या सम वारिधि सलिलम् । छल लोभ च कामम्, तम अज्ञानम्, हरिअ सकल मम् दोष अयम् ।। जय माँ शारदे, विद्यादायिनी, अज्ञानस्य तिमिर हरणम् ।। पूणा प्रवास (१-३) पूणा – प्रवास (१) (कविता) मिथिलाक माटि सँ दूर एतए, यौ अहाँ पुछै छी केहेन लगैए । त्वरित वेग, पर एकरस जिनगी, पुरिबा – पछिबा बुझि ने पड़ैए ।। की बसन्त – बरसात – घाम, सभ एक्कहि रंग मधुमास लगैए । की आयल, की गेल, से नञि कहि, शरद – शिशिर – हेमन्त बितैए ।। सौ - सौ उर्वशि - रति - मेनका, आँखिक सोझाँ सदा रहैए । रुचिर प्रकृति - मनोहर - सुन्नर, नन्दन - वन सन रोज हँसैए ।। मुदा तदपि नञि जानि एतऽ किए, हमर मोन, मिसियो ने लगैए । ओ मिथिला – भू याद आबैतछि, मिथिला – भाषा कहाँ भेटैए ?? पूणा – प्रवास (२) (कविता) जे देखल, से कहि ने सकै छी । बिनु कहने, चुप रहि ने सकै छी । की पूणे नगरी छी रे भैय्या, दूरहि देखि कऽ कहि ने सकै छी । जे देखल, से कहि ने सकै छी ।। देव मानि, आदर्श बुझै छी । जकरा हम सब नित्य पुजै छी । इन्द्रक कृत्य कतोक देवमय, निज जीनगी अनुसरि ने सकै छी । जे देखल, से कहि ने सकै छी ।। भोरक सूर्य - शान्त ओ सुन्नर । दूरहि, चान - तरेगन सुन्नर । लऽग सँ कक्कर दृश्य केहेन की, कोना कहू, किछु कहि ने सकै छी । जे देखल, से कहि ने सकै छी ।। पूणे - नगरी, विद्या केर नगरी । बहुत पैघ बान्हल तेँ पगरी । नहि फूसि एकहु आखर एहि मे, ओहो विद्या , जे ने वरणि सकै छी । जे देखल, से कहि ने सकै छी ।। पूणा प्रवास – (३) बरष दू हजार एक ।२ मिथिला सञो पूनाक, प्रवास शुरू भेल ।। दरिभंगा नञि, पटना सँ, पकड़ल जे रेल । पूना – कल्याण नञि, कुर्ला धरि गेल । कुर्ला सञो भी॰टी॰ वा, दादर, कल्याण जा, बऽस - ट्रेन भेटल, से पूना धरि गेल ।। बरष दू हजार एक,३ सुन्नर समाद भेटल । दरिभंगा सञो पूना, सप्ताहिक ट्रेन चलल । टिकट कटओलहुँ झट, पूजा आ छठि छल । चढ़लहुँ जे पूना मे, दरिभंगे डेग उठल ।। तकर बाद कहियो ने, ओहि ट्रेनक संग भेल । आर॰ए॰सी॰ – वेटिंग की, नो – रूमक ढंग भेल । कुर्ला – कल्याण भाया, फेरो प्रवास रहल । ट्रेनक आवृत्ति बढ़ओ, मोन मे से आश छल ।।४ बरष दू हजार तीन,५ फेरो एक बजट – रेल । पटना सञो पूना लए, एक नऽव ट्रेन देल । चमचमाइत डिब्बा सभ, बड़ नीक लगैत छल । नवकनिञा सनि सजलि, मोन केँ हरैत छल ।। आइ दू हजार बारह, देखल कतोक खेल । पटना सप्ताहिक सँ, दैनिक भए गेल । एक्सप्रेस रहए तहिया, सुपर - फास्ट भेल । “तीन” सञो प्रवास केर, साधन इएह भेल ।। नीक बात पटना, बनल अति – तेज६ । मुदा किए दरिभंगा, रहल बकलेल ? भरि दिनक जतरा कऽ, पटना पहुँचलहुँ हम । पटना सञो पूना केर, बाट आब धएलहुँ हम ।। पटनाक ट्रेन केँ, ई की भए गेल छल ? नवकनिञा असमय मे, बुढ़िया बनि गेल छल । सेकेण्ड नञि, थर्ड हैण्ड, रिपेयर सेट बॉगी छल । पुछबा पर बूझल, कलकत्ताक लॉबी छल ।। बीझ लागल लोहाक, चिप्पी सभ साटल छल । किछु तँ अपर – बर्थ, ढेकी सनि लागल छल । खएबा लए डेस्क होइछ, सेहो बिलायल छल । बाहर सञो डिब्बा धरि, राँगल - पोतयल छल ।। रतुका समय बेस, निन्न बड्ड लागल छल । अपरबर्थ - बत्ती तेँ, माथहि पर टाँगल छल । स्वीचक गुलामी सँ, ओहो स्वतन्त्र छल ।७ राति भरि आँखि पर, दिनकर प्रचण्ड छल ।। मोन पड़ल एहने सनि, पहिनहु किछु भेल छल । गंगासागर गाड़ीक, डिब्बा बदलाएल छल । इण्टरसिटीक सेहो, एहने किछु बात छल । कहिया धरि मिथिला – बिहारक ई हाल रहत ?? अर्थोपलब्धि संकेत :- १ = “पूना प्रवास (१) , (२) ( ३) २ = २००१ ई॰, जकर मई – जून मे (BAMS हेतु नाँव लिखएबाक लेल) हम पहिल बेर पूना गेल रही । तहि समय मे बिहार सँ पूनाक लेल रेलगाड़ीक कोनो सीधा सम्पर्क नञि छल । “पटना कुर्ला एक्सप्रेस” आ “पटना कुर्ला सुपर फास्ट एक्सप्रेस” छल जाहि मे सँ पहिल कल्याण जं॰ पर रुकैत छल आ दोसर नञि । कुर्ला टर्मिनस सँ पूनाक लेल कोनो रेलगाड़ी नञि छल । पूनाक लेल रेलगाड़ी भी॰टी॰/वी॰टी॰ (वर्तमान सी॰एस॰टी॰), दादर, थाना वा कल्याण सँ भेटैत छल। ३ = २००१ ई॰क शीतकालीन विशेष उद्घोषणा मे “दरभंगा पूणा एक्सप्रेस” ओही सालक अक्टूबर – नवम्बर सँ देल गेल । ४ = कोनहु रेलगाड़ीक लेल “नो-रूम” (No Room / Regret) भेटबाक मतलब छै कि ओहि मे प्रतिक्षा श्रेणी (Waiting Class) धरिक टिकट उपलब्ध नञि थिक । माने कि ओहि ट्रेनक माँग वा यात्रीक संख्या बहुत बेशी थिक अर्थात् ओहि रेलगाड़ीक आवृत्ति (Frequency) बढ़ाओल जयबाक चाही । पे दुर्भाग्य सँ आइयो स्थिति सएह अछि पर एहि रेलगाड़ी आवृत्ति नहु बढ़ाओल जा रहल अछि । सम्सत मिथिलांचलक लोक दिन भरिक समय व्यर्थ गमाए, पटना आबि ट्रेन पकड़बाक लेल विवश कएल गेल छथि । ५ = २००३ ई॰ , जहिया “पटना पूणा एक्सप्रेस” ट्रेन देल गेल । पहिने ई गाड़ी “एक्सप्रेस” जे कि बाद मे “सुपर फास्ट एक्सप्रेस” कएल गेल । पहिने ई “सप्ताहिक” छल जे कि बाद मे क्रमशः “दू-दिना”, “तीन-दिना”, “चारि-दिना” आ अन्ततः “दैनिक” कऽ देल गेल । ६ = “अति-तेज” माने “सुपर-फास्ट” । एहि ठाम सन्दर्भतः सांकेतिक रूपेँ “दैनिक” होयबाक परिचायक सेहो । ७ = माथ पर लागल “ट्युब-लाइट” जरिते रहैत छल । “स्वीच” केँ दबला सँ मिझाइत नञि छल । सुन्नरि प्रिया सुन्नरि प्रिया तेँ सुप्रिया, मम् उर बसल तेँ उर्वशी । कहबे करत सभ शशिप्रिया, हम शशि हमर अहँ प्रेयषी ।। चलैत मरु जिनगीक निर्मम्, कत’ मरीचि छकबैत छल । निरस एकसरि बाट जिनगीक, मोन केँ थकबैत छल । थाकल - प्यासल ई बटोही, घाम सञो अपस्याँत छल । पानि मिसियो, छाँह कनिञो, कतऽ भेटत अज्ञात छल । एक दिन एहिना तँ किछु सनि, लिखि देलक भाग्यक मसी । जाऽ पढ़ल, देखल लिखल छल, संग आगाँ एक सखी ।। नीक कि अधलाह ? पहिने, पढ़ि कऽ से नञि बुझि पड़ल । मन सशंकित छल अनेरो, जानि ने विधि की लिखल । की हमर मनोभाव केँ ओ, अपरिचित सखि बुझि सकत ? वा अपन छवि दर्प उबडुब, अपन बाटेँ ओ चलत । छलहुँ गुनधुन मे देखल ता, संग बैसलि रूपसी । एकटक देखैत हमरा, ठोर पर मुस्की हँसी ।। की दिवस सपना देखल हम, पर बूझल, नञि साँच छी । नञि जरए, शीतल लगए जे, ई तँ तेहने आँच छी । प्यासल पथिक केँ पानि भेटल, छाँह घनगर प्रेम केर । लऽग हीरक स्वच्छ आभा, के ताकए, मृग हेम केर । कविक मन भावक पियासल, अहीं छी मोर उर्वशी । अहीं उर-अन्तर समाहित, काव्य पटलक शोड़षी ।। साओन मे विरह रिमझिम - रिमझिम साओन बरिसय, हहराबय अछि हिया सखि मोर । कारी कारी बादर गरजय, सिहराबय अछि पोरे पोर ।। दिन दुपहरिया, राति निवीड़तम, झंकृत मन मृदंग बड़ जोड़ । पी संग ओहिना हमहूँ नचितहुँ, नाचय जहिना हर्षित मोर ।। पिक रव, पी पी मदन जगाबय, गति मोर जहिना चन्द्र चकोर । सखि हे ! भाग्य हमर बड़ निष्ठुर, निर्दयि केहेन अछि चितचोर ।। सुरभित धरणि रमणि रुचि सुन्नर, दादुर टर्र टर्र करइछ जोर । सिहकय पुरिबा, रहि रहि पछबा, तरसैत राति होइछ सखि भोर ।। अहीं सञो कहै छी अहीं सञो कहै छी । अहाँ नञि सुनै छी । पता नञि किए, आइ निष्ठुर बनल छी ।। अहँ इजोरिये रही । हम अन्हरिये सही । हे अए (ऐ) चन्ना, कहाँ हऽम चानी मँगै छी ।। प्रीति नहिञे सही । अनाशक्ते रही । मुदा घृणित मनेँ, किए नैना फेरै छी ?? छी हमहूँ मनुक्खे । मुदा दोष एतबे । हृदय मे अहँक, प्रेम प्रतिमा पूजै छी ।। डऽर चोरिक किए ? बरजोरीक किए ? एहेन छी ने पतित, अहाँ व्यर्थेँ डरै छी ।। अप्पन नैना सम्हार ! हाय ! सहलो ने जाइछ, तीर तेज - तर्रार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! केओ कहइत अछि नैन जेना सागर वा झील । मीन युगल करय केलि वा हो कमलदल नील । मुदा हमरा लगैछ ई सद्यः कटार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! आँखि सुन्नर एहेन की पाओत हरीन । की तुलना करत गोरी तोरा सँ मीन । धन्य काजर भऽ गेल बनि एकर शिंगार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! थिक कारी मुदा मनोहारी ई नैन । दूर रहितहुँ हमर छीनि लेलक ई चैन । बिनु आहटिअहि कयलक हृदय आर – पार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! देन भगवानक तोरा ई अनमोल छौ । मुल्य किछु नञि मुदा बड़ एकर मोल छौ । एकर आगाँ निछाउर ई सौंसे संसार । अप्पन नैना सम्हार ! गोरी कनखी ने मार ! हम नञि रोकब अहँ जाइ छी तऽ जाउ, हम नञि रोकब । किछु सुनितहि जाउ, बरु नञि टोकब । हम प्रेम कयल, थिक दोष हमर, सच मानल सपनहि जे देखल ।। हम नेह लगा, गलती कयलहुँ । हम प्रीति जगा, गलती कयलहुँ । नञि दोष अहाँ केर अछि कनिञो, हम अपन विकट छवि नञि देखल ।। हम स्नेहक धुनि मे, नञि सोचल । की अहाँ, की हम, से नञि देखल । छी दण्डक भागी हमहि सखी, हो अहँक हरेक दिन शुभ - मंगल ।। अहँ जतय रही, सुख सदिखन । हो अहँक संग, सातो सरगम । हम्मर हिस्सा मे भलहि नोर, हो अहँक हरेक पल मधु बोड़ल ।। तोहर जिनगी मे वसन्तक लय तोहर जिनगी मे वसन्तक लय, हम्मर पतझड़ परवाहि ने अछि । तोहर नेहक भग्नावशेष पर, प्रेम विजय निज चाह ने अछि ।। तोँ हमर ने भऽ सकलेँ, सरिपहु अनकर होयबा पर आह ने अछि । तोहर सुख मे हम्मर सुख छी, स्वीकार्य तोहर दुख छाँह ने अछि ।। हम प्यासल मरु मे पानि बिना, मरि जायब - से परवाहि ने अछि । बस तोहर जिनगी हो सुन्नर, मन मे तोहर अधलाहि ने अछि ।। छल हमरहि प्रेम मे दोष कोनहु, तोरा पर सखि अवसाद ने अछि । हो पूर तोहर हर - एक सपना, नञि भेल हमर, से आह ने अछि ।। बिसरि ने सकब (गीत) भेटि सकलहुँ ने, सरिपहु बिसरि ने सकब । दूर रहितहुँ, हृदय मे अहीं तँ रहब ।। एहि जिनगीक बाटेँ कतेको भेटत । संग लागत अनेको, अनेको छँटत । मुदा हृदयक ओ कोना अहीं लए अनामति, पवित्रहि रहत । ओ पवित्रे रहत ।। थीक जिनगी प्रवाहित, प्रवाहित रहत । संग अपना मे बहुतो समाहित करत । मुदा चञ्चल आवेगक श्रोतेँ प्रतिष्ठित, अहीं टा रहब । से अहीं टा रहब ।। दीप बहुतो जरत, चान बहुतो उगत । सूर्य बहुतो उगत, उगि कऽ डुबिते रहत । मुदा जिनगी मे ध्रुव सन दिशाबोधकारी, अहीं टा छलहुँ । आ अहीं टा रहब ।। सातो समुद्रो मे जल थिक बहूते । छै सरिता अनेको, सरोवर बहूते । मुदा ओ सरोवर पूरित प्रीति पय सँ, अहाँ लग रहए जे, कतहुँ नञि भेटत । ऐ कतहु नञि भेटत ।। अहँक नेह केर छोट सनि जे छवि अछि (गीत) अहाँ सञो जे भेटल क्षणिक नेह हमरा, तकर मुल्य कहियो, चुका ने सकै छी । अहँक नेह केर छोट सनि जे छवि अछि, ततेक गाढ़ अंकित, मेटा ने सकै छी ।। टाकाक जोरेँ बहुत किछु भेटै छै, की काया, की मोन – सब सद्यः बिकै छै । एहेन प्रीत निश्छल, बिना स्वार्थ भावेँ, छी दुर्लभ वा शायद कतहु नञि भेटै छै ।। छी जल तँ धरा पर, प्रति चारि तीनेँ, मुदा प्यास, बहुतो मेटा ने सकैत’छि । किञ्चित् जँ तृट्नाश सामर्थ्येँ सक्षम, तदपि तृप्ति - अमृत - परम ने भेटैत’छि ।। हरेक राति प्रायः उगैत’छि चानहु, पुनमि चान मासेँ एकहि बेर अबैत’छि । पुनमि तँ पुनमि छी, मुदा स्वच्छ निर्मल, शरद राति पुनिमक बहुत कम भेटैत’छि ।। बहुत छी सरोवर – सरित एहि धरा पर, ओ मानस – सरोवर एकहि टा एतए अछि । जतए जा भेटैत’छि, मनक शान्ति अनुपम, ओ कैलास एक्कहि आ सद्यः एकहि अछि ।। हम की करू ? (गीत) हमर चेतना हेरायल अछि, हम की करू ? सम्वेदना बिलायल अछि, हम की करू ? हे ऐ देखल जखन सञो अहाँ केँ प्रिय, हमर सुधि बुधि हेरायल अछि, हम की करू ?? अहाँ छी ने उर्वशी, अहाँ छी ने मेनका । मुदा तइयो हमर लेल चित्त केँ चोरा । अहँक सुन्नर छवी (वि) हमर चञ्चल मनेँ, बड़ थीर भए समायल अछि, हम की करू ?? अछि बूझल, अहूँक अछि, एहने सनि गति । हृदयफाँस लेपटायल अछि, सुन्नर सनि मति । अहँक चञ्चल चरण आ नयन ओ वयन, एखन जड़वत बन्हायल अछि, हम की करू ?? आइ मधुरिम मिलन, कत’ प्रतिक्षा केर बाद । बड़ प्रतिक्षा कराओल, अछि अपरूब तेँ स्वाद । अहँक सुन्नर सुकोमल अरुण ठोर पर, मन्द हास छिरिआएल अछि, हम की करू ?? विरह गीत किए भेलियै, पिया ! अहाँ एहेन कठोर । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। आयब शिघ्रहि, पिया जाइत कहलहुँ अहाँ । मुदा जानि ने, कतऽ जाय बैसलहुँ अहाँ । चान एकसरि अछि बैसल अहाँ बिनु चकोर । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। दिन बीतल अनेक, मास बीतल कतेक । बीतल सरस बसन्त, आयल साओन केर मेघ । मेघ रहितहुँ ने पिया आइ नचइछ मन मोर । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। किए अएलाह ने पिया, मोन कङ्गना पुछय । बन्न पिञ्जरा सनि, जेना ई अङ्गना लगय । भेल केहेन ई राति जकर अबइछ ने भोर । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। भेल आन्हर ई नैन, बाट अहँ केर तकैत । उड़ि गेल मोर चैन, याद अहाँ केँ करैत । भेल पाथर जेना, पिया ! बिहुँसय ने ठोर । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। की गेलियै बिसरि, अहाँ कोहबर केर राति । की यादहु ने अबइछ, ओ पावनि बरिसाति । कोना बनलहुँ पिया अहाँ एहेन निशोख । स्नेह सलिल केर बदला मे, देल किए नोर ।। मिलनोत्सुका गीत सखी ! कुचरल अछि वायस, किए अहल भोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। आइ अओथिन्ह जँ पिया, हम रूसि रहबै । घोघ तानि, मूँह फेरि, हऽम बैसि रहबै । मुदा, रोकबै कोना सखी ! मोनक हिलोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। कहुखन एहि चार पर, कहुखन ओहि चार पर । कखनहु दुआरि पर, कखनहु ईनार पर । किए कुचरै अछि कौआ, एना जोर – जोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। पिया कतबहु मनओथिन्ह, ने हऽम बजबै । हास कतबहु हँसओथिन्ह, ने हऽम हँसबै । हाल हम्मर कहत सखी ! नयनक ई नोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। घोघ उठबैत सखी, लऽग अओताह पिया । स्नेह हाथेँ पकड़ि, लगा लेताह हिया । नोर नयनक पोछैत, चूमि लेताह ओ ठोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। हम लाजहि ओतहि, गड़ि जयबै सखी । हम लाजहि तँ मरि – मरि जयबै सखी । कोना पुछबै, किए भेलाह, एहेन कठोर । आई लगइत अछि अओथिन्ह हमर चितचोर ।। मिलन गीत सखी ! की हम कहू, फुजय लाजेँ ने ठोर । हम बुझलियै ने आई, कोना भऽ गेलै भोर ।। सखी धक् – धक् करैत छल हमर जिया । ता बजलाह, सुनू हे ऐ प्राण – प्रिया ! आउ ! पहिरायब हऽम आई, अहाँ केँ पटोर । हम बुझलियै ने आई, कोना भऽ गेलै भोर ।। हाथ धयलन्हि पिया, गेलहुँ हम तँ लजाय । पुनः लेलन्हि मोरा, अपन छाती सटाय । चूमि लेलन्हि, ओ चट दऽ, हमर दुहु ठोर । हम बुझलियै ने आई, कोना भऽ गेलै भोर ।। मेरु पर सँ देलन्हि पिया अम्बर हटाय । पुनः लेलन्हि सखी, निज अंक बैसाय । सखी ! लाजेँ सिहरि उठल, हमर पोर – पोर । हम बुझलियै ने आई, कोना भऽ गेलै भोर ।। आँखि मुनने छलहुँ, जेना छुई – मुई । पिया अचकहि मे सखी, फोलि देलन्हि नीबी । आ कि, एतबहि मे सखी, मिझा गेलै ईजोत । हम बुझलियै ने आई, कोना भऽ गेलै भोर ।। आगामी जानकी नवमी / मिथिला दिवस / मैथिली दिवस पर विशेष भजु धरणिसुता (किर्तन) भजु धरणिसुता, तनुजा – मिथिला, जय रामलला दशरथ नन्दन । जय गौरि – महेश, गणेश, विभो, जय पवनपुत्र मारूति - नन्दन । * भजु धरणिसुता ...........................।। तजि लोभ मोह, धरु राम चरण। तजि भव माया, गहू राम चरण । धरु ध्यान सदा मिथिलेश - सुता, करू राम – रमा सादर वन्दन । भजु धरणिसुता ...........................।। सभ कष्ट - क्लेश - सन्ताप हरथि । निज भक्तक बेड़ा पार करथि । करथि गरल–सुधा, कन्दुक-वसुधा, हिय वन मे करु हुनि अभिनन्दन । भजु धरणिसुता ...........................।। श्रीराम सिया छथि कण – कण मे । ओ बसथि सभक अन्तर्मन मे । बस ध्यान धरू, सन्धान करू, करू हुनिकहि मे तन-मन अर्पण । भजु धरणिसुता ...........................।। माँ जानकी वन्दना (किर्तन) जगत जननी, कमल नयनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।। जनिक चरणरज पाबि धन्य भेल, मिथिला केर पावन धरती । मिथिलाक मान बढ़ाओल जग मे, मिथिला केर बनि स्वयं बेटी । क्षिति तनया, श्री मिथिलाङ्गिनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।। सुर नर मुनि गन्धर्व आ किन्नर, जनिकर महिमा गाबथि । सृष्टि मे कखनहु ने श्री बिनु, श्रीपति पुर्ण कहाबथि । माँ वैदेही, श्रीराम संगिनी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।। जन्म लेलन्हि नारी बनि जग मे, आदर्शहि लेल अर्पित । जिनगी बिताओल सघन विपिन मे, रामहि लेल समर्पित । लवक माता, कुशक जननी, जनक कन्या, सुता धरणी । अवध रानी, रमा – रश्मि, जनिक आसन कमल – नलिनी ।। किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? (गीत) खन आबि केओ कान मे ई बात पुछैए । किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? किए बैसल छथि मैथिल आराम सँ ? किए उठइछ ने धधरा हरेक गाम सँ ? किए दिनहु मे गुजगुज अन्हार लगैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? कतए गेलाह शिवसिंह, विद्यापति, जनक ? किए पड़ल अछि मन्द आइ माथक तिलक ? किए मिथिला मे उनटा बसात बहैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? कहू ! कनइछ के बैसल एहि कोन मे ? की ने बाँचल अछि सिंह एकहु बोन मे ? किए पीयर सनि खेतक जजाति लगैए ? किए मैथिलीक आङ्गन उदास लगैए ? हए बसन्ती पवन, कने धीरे तोँ चल (गीत) हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल । कने धीरे तोँ चल ने मचा हलचल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।। देखू कनइत अछि नगर - नगर, सिसकैत अछि गाम । बनल पावन विदेह, अपनहि केर गुलाम । हे, सुन, सुन गे सरित ! ने तोँ कर छल-छल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।। पुज्य जनकक ई धरती, मशान बनल अछि । लोक रहितहुँ जेना ई, विरान बनल अछि । सुन गे कोयली कने ! ने तोँ गा चञ्चल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।। जतए गूँजय छल सदिखन, विद्यापति केर गीत । आइ नचइत अछि ताण्डव, आ गूँजैत अछि चीख । शस्य श्यामल ई भूमि, अछि बनल मरूथल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।। उठू मैथिल युवक, कहू मैथिलीक जय । होहु आबहु सतर्क, करू मैथिलीक जय । फूँक शंख रे मधुप ! चल छोड़ शतदल । हए बसन्ती पवन ! कने धीरे तोँ चल ।। शान्तिक सपूत संग्राम करय (गीत) काश्मीर बनय, आसाम बनय । शान्तिक सपूत संग्राम करय ।* नञि दोष हुनिक एहि मे कनिञो, जँ मिथिला - भू पञ्जाब बनय ।। हम मैथिल छी - मिथिलाबासी । सम अधिकारक छी अभिलाषी । जहिना तामिल ओ गुजराती, तहिना हमहूँ मिथिलाभाषी । हमरहु इच्छा, हमरहु मिथिला, कर्णाटक ओ बङ्गाल बनय ।। हम माङ्गय छी नञि किछु विशेष, निज माङ्गय छी अधिकार बेस । हमरो प्रगतिक अछि हक ओहिना, जहिना करइछ आनहु प्रदेश । जञो नञि, तँ दोष हुनिक ने कहब, यदि क्रान्तिक कतहु मशाल जरय ।। नञि भीख, अपन अधिकार मङ्गै छी, कोशी – कमला धार मङ्गै छी । जल–थल–नभ मे सञ्चार मङ्गै छी, शिक्षा – रोजी – व्योपार मङ्गै छी । नञि कहब फेर, जञो आइ एखन, हर मैथिल, हर – विकराल बनय ।। हर प्रदेश, भारत केर हिस्सा, सभहक दर्जा एक समान । तखन किए केओ अमृत लूटय, ककरो भेटय विष – अपमान । नञि फेर कहब - हुनिका सँ केओ, जञो कोसी कमला लाल बहय ।। * स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी शान्तिप्रिय ओ सहनशील होइत अछि । ओ ककरहु सँ अनावश्यक युद्ध नञि चाहैत अछि । इतिहास साक्षी अछि कि मिथिलाक कोनहु राजा वा कोनहु व्यक्ति सिर्फ अपन राज्यक सीमाविस्तार वा अपन महत्त्वाकांक्षाक पुर्त्तिक लेल कहियो ककरहु पर अनावशयक युद्ध नञि थोपलक । ओकरा लऽग मे जतबहि भू – भाग वा सम्पदा छलै ततबहि मे सन्तुष्ट रहल । परन्तु आइ लोक ओकर शान्तिप्रिय ओ सहनशील स्वभाव केँ गलत स्वरूप मे ग्रहण करैछ । ओकरा आधुनिक राजनैतिक तन्त्र व आन विभिन्न सञ्चार माध्यम सँ बेर बेर उदाहरण देल जाइछ कि “क्या आप तेलंगाना की तरह विरोध प्रदर्शन कर सकते हो ?” ................... ओकर शान्तिपुर्ण माँग सभ केर प्रति धेआन नञि देब आओर संगहि पुर्ण दमनात्मक कार्यवाही करब सर्वथा अनुचित थिक । ओकरा जबरदस्ती अपन शान्तिपुरण रास्ता केँ छोड़बाक लेल उकसाएब थिक । स्वभाव सँ मिथिलाक सपूत / मैथिल / मिथिलाबासी / मिथलाभाषी एखनहु शान्तिप्रिय ओ सहनशील छथि । तेँ एहि गीतक माध्यमेँ भारत सरकार ओ तथाकथित समाचार व सञ्चार माध्यम सँ निवेदन जे अपन अनुचित ओ दमनात्मक क्रियाकलाप केँ विराम देथु; गलत जानकारी प्रसारित कए वा जानकारी सभ केँ गलत स्वरूप मे प्रचारित – प्रसारित कए मिथिला, मैथिल व मैथिली केँ तोड़बा – फोरबाक प्रक्रिया सँ बाज आबथु । कहिया तक शान्ति हो ? (आवाहन गीत) शान्ति, शान्ति, शान्ति, शान्ति, कहिया तक शान्ति हो ? आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।। मैथिलीक उत्थान हो, मैथिलीक सम्मान हो । भारत केर नक्शा पर, मिथिला केर नाम हो । शान्ति नञि, शान्ति नञि, क्रान्तिक आह्वान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।। घर - बाहर सर्वत्र, मैथिलीक गान हो । मैथिलीक मान हो, मैथिलीक शान हो । एहि पुनीत यज्ञ मे, स्वार्थक बलिदान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।। छलहुँ परतन्त्र, तखन बातहि किछु आओर छल । आब छी स्वतन्त्र, मुदा तइयो ने बात बनल ।* आबहु किए भ्रमित छी, दिशा केर ज्ञान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।। शस्त्र सँ ने क्रान्ति हो, शास्त्र सँ क्रान्ति हो । क्रांति, क्रांति, क्रांति, क्रांति, चेतनाक क्रान्ति हो । एकताक तीर सञो, लक्ष्यक सन्धान हो । आबहु तँ मिथिला आ मैथिली ले’ क्रान्ति हो ।। * महान भाषाविद् सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनक अनुसार बिहार केर अन्तर्गत मैथिली एकमात्र एहेन भाषा छल जे वास्तव मे भाषा होयबाक सभ शर्त पूरा करैत छल । ओ मैथिली केँ बिहारक राजकाजक भाषा केर रूप मे स्वीकार करबा हेतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सँ अनुरोध / अनुमोदन कएने छलाह । परञ्च ओहि समय भारतक स्वाधीनता संग्राम अपन चरम पर छल आ कहल गेल कि ग्रियर्शन महोदयक उपरोक्त प्रस्ताव फुटकएबाक नीति सँ प्रेरित थिक – तेँ नञि मानल जएबाक चाही । मैथिल लोकनि देशहित मे (भारतक हित मे) सहर्ष बिना कोनहु विरोध केँ मैथिली लेल जिद्द छोड़ि हिन्दीक प्रचार – प्रसार करबाक बात केँ स्वीकार कएलन्हि । एहि क्रम मे अंग्रेज लोकनि सँ मित्रता होयबाक बादहु तत्कालीन दड़िभंगा महाराज स्व॰ लक्ष्मीश्वर सिंह देवनागरी (हिन्दी) केर प्रचार बढ़एबाक हेतु निर्देश निर्गत कएलन्हि । एकर मतलब ई कथमपि नञि कि मैथिल लोकनि अप्पन मातृभाषा “मैथिली” केँ बिसरि गेलाह । मोन मे रहन्हि जे भारतक स्वाधीनताक बाद मैथिली आ मिथिला केँ स्वतः अपन स्थान भेटि जायत । अस्तु १५ अगस्त १९४७ ई॰ कऽ देश स्वाधीन भेल । पर मैथिली केर संग आशाक एकदम्मे विपरीय पुर्ण भेद – भाव कएल गेल । भाषाक आधार पर मिथिला राज्य के कहए अपितु मैथिली केर अस्तित्वहि पर प्रश्न चिन्ह लगाओल गेल, हिन्दीक बोलीक रूप मे घोषित करबाक भरिसक दुष्प्रयास कएल गेल । नहिञे साहित्य अकादमी आ नहिञे आठम अनुसुची मे स्थान देल गेल (जे कि बाद मे कतेकहु संघर्षक बाद भेटल) । एतबहि नञि मैथिली केँ तोड़बाक हेतु आ मैथिल केँ परस्पर लड़एबाक हेतु नऽव नऽव परिभाषा सभ गढ़ल गेल । मैथिली केँ भाषाक अधिकार देमए काल अस्सी मोन पानि पड़ैत छलन्हि परञ्च तिरहुतिया, बज्जिका, अंगिका आदि मैथिलीक बोली सभ केँ स्वतन्त्र भाषाक रूप मे परिभाषित कएल गेल । मैथिल लोकनिक देशहित मे कएल गेल काज वा देशभक्तिक ई केहेन पारितोषिक छल, से नहि जानि ?????? जयति जयति मिथिले (जन्मभूमि स्तुति गीत) जय हे ! जयति मिथिला । जयति मिथिले । जय कवि - कोकिल - अमिय - वाङ्गमय, जयति, जयति मिथिले ।। जय मिथिला – भू तरण – तारिणी । श्रीसीते निज गर्भ धारिणी । नतमस्तक तोरा आगाँ माँ, जन्मभूमि मिथिले ।। जय शत् – सरिते अमिय – वाहिनी । मिथिला – भू जीवन – प्रदायिनी । अमिय चरणरज माए मैथिलीक, पाबि धन्य गंगे ।। जय मिथिला धन जन वन उपवन । जय मिथिला केर पुज्य हरेक कण । बारम्बार करी स्तुति हम, जयति जयति मिथिले ।। कोयली कानय भोरहि सँ (कविता) याद अबैछ गुरुदेव रबिन्द्रक, * कोयली कानय भोरहि सँ । मिथिला केर इतिहास लिखायल, सभदिन अगबे नोरहि सँ ।। लागल कोन कुहेस हटए नहि, सुर्य अस्त छथि भोरहि सँ । मिथिला – मैथिल केर दुर्गति, देखथि विद्यापति ओरहि सँ ।। जन्मभूमि जननी ओ भाषा, बिसरि गेलह बढ़ि स्वर्गहु सँ । हे मैथिल ! धिक्कार थिकह, जिनगी बत्तर छह नर्कहु सँ ।। लाज होइछ निज जिनगी पर, हमसभ बत्तर छी चोरहि सँ । शपथ लैत छी, हम लड़ब, जत होयत हमरा जोरहि सँ ।। तन मन धन जत भाग हमर, मिथिला - मैथिली लए अर्पित अछि । हमर लेखनीक हरेक शब्द, निज भाषा लए संकल्पित अछि ।। आशीष दियऽ हे माए मैथिली, पुर्ण करी निज इच्छा हम । तोड़ि सकी हर एक व्यूह केँ, करी शत्रु केर चेष्टा भंग ।। * गुरुदेव रबिन्द्र = मैथिलीक सुप्रशिद्ध कवि व लेखक श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर (नञि कि बाङ्गालक स्व॰ रविन्द्रनाथ टैगोर) । नेनपनहि सँ हमर कान मे जे पहिल मैथिली गीत गूँजल आ हमर स्मृति पटल पर मैथिली साहित्यक प्रति अटूट सिनेह ओ निष्ठा जगओलक से छल श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर ओ श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ जीक गीत सभ । ओहि समय मे हिनक गीत सभ ततेक ने प्रशिद्ध छल जे गाम सँ पटना धरि हरेक गोटेक ठोर पर अनायासहि अबैत रहैत छल । मञ्च पर श्री रबिन्द्रजी आ स्व॰ महेन्द्रजीकेँ सुनबाक सौभाग्य बहुत बाद मे पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मे भेटल आ भेटैत रहल परञ्च गाम घऽर मे बहुत नेनपनहि सँ हर वयसमूहक लोक सभ सँ सुनल हुनिक गीत सभ हमरा प्रेरित करैत रहल । ताहू मे श्री रबिन्द्रजीक गीत “की थिक मिथिला, के छथि मैथिल” हमर मोन मस्तिष्क केँ हमेशा झकझोड़ैत रहल आ एखनहु झकझोड़ैत रहैत अछि, एहि प्रश्नक सही उत्तर तकबाक लेल बेर – बेर प्रेरित करैत रहैत अछि आ शायद आजीवन करैत रहत । तेँ ओ लोकनि हमर मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे गुरु भेलाह । ओना तँ हमर ई गीत २५ – ०३ - १९९८ कऽ लिखल गेल छल । पर गुरुदेव श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुरजीक हुनक ६७म जन्मदिनक अवसरि पर हुनिका प्रति आदर व्यक्त करैत आइ ई गीत प्रकाशित कए रहल छी । हुनिक जन्म ०७ अप्रिल १९३६ ई॰ कऽ पुर्णिञा जिलाक धमदाहा गाँव (दक्षिणबारि टोल) मे भेल छलन्हि । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक (गीत) तीन तिरहुतिया, तेरह पाक । अप्पन ढोलक, अपनहि थाप । चेतह आबहु, नञि तँ फेरहु, होयतह ओएह, ढाकक तीन पात । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। एक दोसरा सँ छकि कऽ लड़लह, खूब परस्पर टाँग तोँ झिकलह । सोति असोति आ बड़का छोटका, जानि ने की की आओरो बँटलह । उत्तराहा दक्षिणाहा कएलह, आओर पुबरिया पछबरिया । जाहि बाट पर रोज चलै छह, खानि लेलह ओएह पर खधिया । कालीदास सत्तहि पुरखा, की काटि रहल छह, नञि छह भाख । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। अपना बीच तेहल्ला पैसलह, कमजोरी तोर भाँपि ओ गेलह । परिकल भेदिया, कयल हिसाब, तेरह, छब्बीस हो बड़ भाग । नऽव - नऽव परिभाषा गढ़लक, साँच युधिष्ठिर सन ओ बजलक । अंग - बज्जि - मिथिला मे भेद, तिरहुत – कोसी – सीमा देश । कहलक कान लऽ कौआ भागल, कान के देखए ? कौआ ताक ! तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। मैथिल फोरलक, मिथिला डाहलक, मैथिलीक सेहो चिता सजओलक । भाँग पिया, भकुअओलक सभ केँ, सभ मैथिल केर बुद्धि हेरओलक । अपनहि “ओ” अदृश्य बनल छल, मुरूख मैथिलहि ऊक उठओलक । भाँग पीबि बेमत्त नचए छल, नीक – बेजाए, ने बूझि सकै छल। एतबा मे किछु मैथिलजन केँ, षडयण्त्रक भेलन्हि आभास ।* तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। किछु मैथिलजन सजग भेलाह, * जरबाक गन्ध चीन्हए लगलाह । टीनही चश्मा जे फेकलन्हि तँ, अपनहि महल जरैत देखलाह । मैथिल अपनहि फानि रहल छल, अपनहि अपनहि ठानि रहल छल । पानि के लाओत, आगि मेझाओत ? भेदियेक बात गुदानि रहल छल । तइयो सजग – सचेत – धीरमति, * मानल नञि भेदिया सँ हारि । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। अपना घऽर मे शेर बनथि, आ बाहर डऽरेँ लंक धरथि । मैथिल केँ भेटल छल श्राप, पर कहिया धरि तकर प्रताप ? हरेक चीज केर होइतछि अन्त, की एहि श्रापक नञि अवश्रंस ? बाट ने ताकू - अओताह राम, अपनहि हाथ, अपन सम्मान । मुट्ठी भरि ओहि सजग पूत केर, ** व्यर्थ ने जायत अथक प्रयास । तीन तिरहुतिया, तेरह पाक ।। * मिथिलाक ओ सपूत लोकनि से मिथिला, मैथिली ओ मैथिलक उत्थान हेतु कोनहु प्रकारक सार्थक प्रयास कएलन्हि वा योगदान देलन्हि – चाहे ओ कोनहु जाति, धर्म वा वर्ग विशेषक होथि । संगहि ओहो सपूत लोकनि जे मैथिल नहिञो रहैत मिथिला आ मैथिलीक विकास मे अपन सार्थक योगदान देलन्हि । ** ओना नाँव लिखल जाए तँ एहि सपूत लोकनिक संख्या बहुत बुझना जायत पर समस्त मैथिलगण केर संख्याक अनुपात मे ई नाँव सभ मात्र “मुट्ठी भरि” गनल जाएत । नञि पत्र एकहु टा लीखल (गीत) पहु गेलाह परदेश सखी ! दिन - मास कतेकहु बीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।* नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। सगर पहर हुनिकहि छवि मनमे, हुनिकहि पर जी टाँगल । पर नञि सखि हुनिका सुधि कनिञो, हम छी केहेन अभागलि । विरह बेदना केहेन सखी, से हऽम एही बेर सीखल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। दिन मे हुनिकहि याद अबैतछि, राति मे हुनिकहि सपना । कौआ कुचरय अहल भोर सँ, तदपि ने आबथि सजना । भेल बसन्त सखी पतझड़, नित नैन रहैतछि तीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। प्रियतम जञो दूरहि रहताह, की होयत रहि भरि अङ्गना ? ककरा लए शिंगार करब, ककरा लए पहिरब कङ्गना ? चान कठोर रहैछ मुदा, लगइत अछि अतिशय शीतल । नञि पत्र एकहु टा लीखल ।। * ई गीत आइ सँ १० - १५ साल पहिनुक सन्दर्भ मे लिखल गेल छल, जखन कि पूरा गाँव या परोपट्टा मे कतहु – कतहु कोनो एक गोट टेलीफोन बूथ होइत छलै । आ ओहि टेलीफोन बूथ पर राति मे अमुक समय सँ अमुक समय धरि STD कॉल केर पाइ आधा, अमुक समय सँ अमुक समय धरि तेहाइ आ अमुक समय सँ अमुक समय धरि चौथाइ पाइ लगैत छलै । एहिना स्थिति मे कनिञा – बहुरिया लोकनि केँ परदेश मे काज कएनिहार अपन - अपन प्रियतम सँ सीधा बात करब सम्भव नञि होइत छलन्हि । ओना मोबाइल केर चलती सँ बहुधा आब ई स्थिति नञि अछि तथापि मिथिला मे एखनहु एहि गीतक सन्दर्भ किछु हद तक प्रासंगिक अछि । अहंकार (कविता) “अहंकार” छी भूत एहेन, बड़का – बड़का केँ खएलक ई । १ की मनुक्ख केर गप्प कही, देवहु केँ सबक़ सिखओलक ई ।। नारद सन ऋषि केँ अहं भेलन्हि, २ निज मन पर हमर नियण्त्रण अछि । कहलन्हि – के हमरा डोला सकत ? त्रिभुवन केँ - मोर आमण्त्रण अछि । ब्रम्हाक तनय, विष्णूक भक्त, हर विषय सँ हम - निर्लिप्त थिकहुँ । की काम – वासना – क्रोध – लोभ, की मोह – द्वेष, सभ जय कयलहुँ । बानर सन मूँह भेलन्हि हुनकर, सच ! अहं काल केर भोजन छी । की मनुक्ख केर गप्प कही, देवहु केँ सबक़ सिखओलक ई ।। सर्जक बड़का – हम कथाकार, हम गीतकार वा गजलकार । हम के छी – ककरहु कही तुच्छ, आ कही “कूथि कऽ लिखनिहार” ? की नीक – बेजाए ? तकर निर्णय, करताह पाठक – जन, सुधी – समाज । हम तऽ लेखक, लिखबाक कर्म, हम के छी परमिट बँटनिहार ? जँ छी महान, तऽ लोक कहत; अपनहि निज गाल बजओने की । की मनुक्ख केर गप्प कही, देवहु केँ सबक़ सिखओलक ई ।। हमरा सम्मुख केओ अनचिन्हार, ३ वा हमर केओ परिचित चिन्हार । जनिका जतबा जे शक्य लिखथु, हर जन केँ अभिव्यक्तिक अधिकार ? सभ केँ माथा सोचबाक लेल, आ हाथ भेटल लिखबाक लेल । नञि जन्मजात केओ सिद्धहस्त, छी समय, निपुण बनबाक लेल । इएह मूँह – हाथ आदर दैत’छि, आ बहुतहु केँ लतिअओलक ई । की मनुक्ख केर गप्प कही, देवहु केँ सबक़ सिखओलक ई ।। जँ छी आलोचक – समालोचना, नीक - बेजाए सभटा देखी । अपना खेमा, अनकर खेमा, दुहु कात परिक्षण समलेखी । अपना खेमा अधलाहो नीक, अनका जँ कही हम - सब तीते । तऽ चानि पर खापड़ि निश्चित अछि, छी कालक गति अनुपम, ठीके । “समय” हाथ निर्णय सभ – टा, कत दुर्ग – दर्प भँसिअओलक ई । की मनुक्ख केर गप्प कही, देवहु केँ सबक़ सिखओलक ई ।। सन्दर्भ संकेत - १) ॰ एहि कविता केर विषय वस्तुक प्रेरणा “विदेह” पर विगत २ महीना सँ चलि रहल वार्तालाप सभ सँ मनःस्फुर्त भेल अछि । तेँ फेसबुक पर “विदेह” कम्युनिटीक एडमिन लोकनि केँ सादर धन्यवाद । २) ॰ ई सन्दर्भ “विष्णु – पुराण” मे वर्णित एक कथा सँ लेल गेल अछि । ३) ॰ एहि ठाम प्रयुक्त “अनचिन्हार” शब्द “अपरिचित” केर परिचायक थिक (चिन्हारक उनटा) । कोनहु व्यक्तिविशेष सँ एकर कोनहु प्रकारक सम्बन्ध नञि अछि । आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग (युगल गीत) [+ -] मलयक सुवास नेने, बहइछ पवन । आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग ।। [-] तीसी आ सरिसो केर, कुसुमित शाखा । [+] प्रेम केर मधुवन मे, नयन केर भाषा । [-] अएलाह भूतल पर मन्मथ, रती केर संग । [+ -] आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग ।। [-] धरती केर कण कण मे, हरियऽरी आयल । [+] भाँति – भाँति रंग केर, फूल फुलायल । [-] सुनि कोयलीक बोल, बढ़य प्रेमक अगन । [+ -] आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग ।। [-] सभतरि अछि जीवन, आ सभतरि यौवन । [+] प्रिया केँ निरखि कऽ, अघायल ने प्रियतम । [-] चलल भौंरा पराग लए, लसित उपवन । [+ -] आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग ।। [-] चकोरक प्रतिक्षा केर, भेल जेना अन्त । [+] चन्द्रमा सँ मिलल जनु, पार कऽ अनन्त । [-] आइ क्षितिजक पार मिलल, धरती – गगन । [+ -] आयल वसन्त नेने, नव - नव उमंग ।। [-] :- स्त्री अवाज [+] :- पुरुष अवाज [+ -] :- स्त्री आ पुरुष दुहुक समवेत अवाज देखू आयल बसन्त (गीत) बीति गेल, बीति गेल, देखू बीतल हेमन्त । निज दल-बल केर संग, देखू आयल बसन्त ।। हवा मदहोश बहय, मोन उतड़ए – चढ़ए । जनु सबतरि, अछि छायल अनंग ।। खग कलरव करय, राह गमगम करय । गूँजय कोयलीक स्वर, दिग – दिगन्त ।। देखू केसर, पलाश, बेली, चम्पा, गुलाब । भेल सुरभित, धरा संग अनन्त ।। विरह वेदना बढ़ल, मिलन सपना सजल । रम्य लगइत अछि, सुरूजक किरण ।। नऽव शाखी* उगल, आयल किशलय नवल । लागय धरती केर कण – कण जीवन्त ।। * शाखी = शाखायुक्त = गाछ - बिरिछ आयल होलीक दिन मतवारी (गीत) आयल होलीक दिन मतवारी । चहु दिशि अनंग सञ्चारी ।। हर तरफ बहय मलयानिल, लए शीतल सुगन्धि चन्दन । सौंसे भूतल हरियर – सुन्नर, हर उपवन जनु नन्दन । मारय प्रकृति जेना किलकारी । आयल होलीक दिन मतवारी ।। जमुना तट पर धूम मचल अछि, कुञ्ज – भवन मे हलचल । रंग – अबीर सँ लाल भेल आइ, जमुना केर श्यामल – जल । मारय भरि – भरि कऽ पिचकारी । आयल होलीक दिन मतवारी ।। एक दिशि अछि सभ ग्वाल – बाल, दोसर दिशि सभ ब्रजनारी । बीच मे हर्षित – मुदित राधिका, संग मे कृष्ण – मुरारी । भीजय ब्रजबाला केर साड़ी । आयल होलीक दिन मतवारी ।। आयल होली केर तिहार (गीत) आयल होली केर तिहार । संग बसन्त बहार । नेने आयल अछि संगहि, नव उमंग - उल्लास ।। कतहु लोक सभ झूमि – झूमि कऽ, घोड़ि रहल छथि भांग । कतहु करैतछि बालबृन्द सभ, रंग घोड़बाक ओरिआओन । बहय मदहोश बसात । संगे सुरभित सुवास । नेने आयल अछि संगहि, नव जीवनक उसास ।। भोरे – भोरे नबकी भौजी, कएलन्हि बन्न केबाड़ आ खिड़की । मोन खड़ाबक बहाना बना कऽ, बड़की भौजी खाट पकड़लीह । लेकिन दियऽर बड़ चलाक । चलतन्हि किनकहु ने कोनो बात । नेने आयल ओ संगहि, रंग हरियर आ लाल ।। भौजी कतबहु होथि लजबिज्जी, होथि पुरनकी, नवकी – जुअनकी । चाहे कोनहु बहाना बनओती, लेकिन रंग सँ आइ ने बचती । रंगबनि हिनकर दुहु गाल । करबनि ठोर दुहु लाल । नेने आयल छी संगहि, रंग – अबीर – गुलाल ।। दियऽर भाउज केर बीच होइछ ई, निर्मल प्रेमक धार । ई पुणीत अवसरि आयल अछि, एक बरख केर बाद । जुनि करू आइ लाज । नहिञे आन कोनहु लाथ । करू स्वागत बसन्तक, रंग – अबीर लए हाथ ।। छायल मिथिला मे आजु बसन्त (गीत) जेम्हरहि देखू, तेम्हर आइ अछि भाँति – भाँति केर रंग । आइ भेल बेमत्त लोक सभ, पीबि कऽ नबका भंग ।। भाँग पीबि कऽ आइ ई बुढ़हो, पओलन्हि नऽव खुमारी। काया लकलक, दाँतहु टूटल, पर नस – नस मे जुआनी । छायल चहु दिशि जेना उमंग । आइ भेल बेमत्त लोक सभ, पीबि कऽ नबका भंग ।। तोड़ि आजु संकल्प – प्रतिज्ञा, तरुणी संग ब्रम्हचारी ।* छाड़ि ध्यान-तप-त्याग ओ पूजा, कामिनी संग सञ्चारी । छायल अंग – अंग जेना अनंग । आइ भेल बेमत्त लोक सभ, पीबि कऽ नबका भंग ।। यत्र – तत्र देखबा मे आबए, राधा आ कृष्णक टोली । लाले रंग साड़ी रंग सँ तीतल, हरियर रंग राँगल चोली । छायल मिथिला मे आजु बसन्त । आइ भेल बेमत्त लोक सभ, पीबि कऽ नबका भंग ।। * ई पाँती सभ प्रतीकात्मक मात्र थिक । कोनहु वर्ग विशेष वा समुदाय विशेष पर आक्षेप नञि । हे ऐ भौजी, रूसलि किए छी ? (गीत) हे अए (ऐ) भौजी, रूसलि किए छी ? गाल फुला, चुप बैसलि किए छी ? घऽर मे बैसलि, किए आँखि लाल करै छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? होली मे होइतहि अछि एहिना, रंग अबीर मे, डूबल ई दुनिञा । मानव केर तऽ बात कहू की, नाचय धरती बनि नवकनिञा । किए कोप - भवन मे, अहाँ कपार धुनै छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? खेलथि ब्रज मे गोपी केर संग, कृष्णजी रंग अबीर । मिथिला मे फगुआ अछि नामी, दियऽर भाउजि केर बीच । किए आइ अहाँ, हड़ताल कएने छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? रूसू जुनि, हम करै छी भौजी, हाथ जोड़ि नेहोरा । एक बरख केर बादहि आओत, पाबनि फेर दोबारा । किए स्नेहक हाथ अपन, कात कएने छी ? दू बुन्न पड़िए जँ गेल, तऽ किए बबाल करै छी ? सभ हीलि – मीलि कऽ गाउ (गीत) सभ हीलि – मीलि कऽ गाउ । खुशी सरगम सजाउ । आयल होलीक तिहार, रंग – अबीर लगाउ ।। आयल बसन्त, बहए मलयक बसात । प्रकृति कामिनी कयल सोलहो शिंगार । नृप – आसन लगाउ । घर – आङ्गन सजाउ । आयल होलीक तिहार, रंग – अबीर लगाउ ।। वृद्ध हो, बालक हो, युवा हो या युवती । सभमे जुआनी अछि, सभमे अछि मस्ती । ढोल – डम्फा बजाउ । जुनि कनिञो लजाउ । आयल होलीक तिहार, रंग – अबीर लगाउ ।। अवधपुरी मे खेलथि लक्ष्मण, सीता केर संग होरी । मिथिलो मे अछि नामी सभतरि, दियऽर भाउजि केर जोड़ी । भौजी ! एम्हर आउ । जुनि घऽर मे नुकाउ । आयल होलीक तिहार, रंग – अबीर लगाउ ।। जयति जय श्री त्रिपुरारी केर (आगामी शिवराति पर विशेष) बम - बम भोलेनाथ, जयति - जय श्री त्रिपुरारी केर । त्रिलोचन, चन्द्रधारी केर ना ।। कर मे त्रिशूल आ डमरू विराजन्हि, जनिकर अम्बर छन्हि बघछाल । गरा मे लटकनि साँप अहर्निश, संगहि रुद्राक्षक छन्हि माल । शम्भू – गिरिजापति, जय नीलकण्ठ, जटाधारी केर । गंगा मस्तकधारी केर ना ।। श्मशान मे राज जनिक छन्हि, भूत – प्रेत केर संग । कान मे कुण्डल, हाथ कमण्डल, सौंसे देह रमओने भस्म । गौरीकान्त, गिरीश, उमापति, जय ऋतुध्वंशी केर । उगना मिथिलाविहारी केर ना ।। वास जनिक कैलाशक ऊपर, हिमगिरि जनिक तपोवन । त्रिपुरासुर केँ मारि खसाओल, कएल जलन्धर भञ्जन । कार्तिक आओर गणेशक तात, रुद्र - असुरारि केर । बसहा बरद सवारी केर ना ।। हिनक भक्त रावण छल रक्तप, तइयो मान ओकर राखल । कयल तपस्या घोर भगीरथि, मनवाञ्छित फल ओ पाओल। भोला - भंगिया – शिव - शंकर; भक्तक हितकारी जे । विष्णु - चरण पुजारी जे ना ।। बसन्तक आगमण पर भेल पुलकित दिग - दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा१ । स्वागतहि आगत वसन्तक, सजि रहल ई वसुन्धरा ।। कास केर तजि श्वेत अभरण, पहीरि कुसुमक ललित पहिरन, कऽ सकल सिंगार हर्षित, कर प्रतिक्षा वसुन्धरा । भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।। चानने मलयक सुवासित, सौरभेँ पुष्पक प्रभावित, करय गमगम, मुदित हर कण, हर दिशा, हर अन्तरा२ । भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।। हँसि रहल निमिलित कमलदल, मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर, मुदित, हर्षित, लसित कोकिल, गाबय स्वागत अन्तरा३ । भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।। अर्थ निर्देश :- १) अन्तरा = कोण / कोणा – दोगा २) अन्तरा = दू (दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान) ३) अन्तरा = गीतक आखर (सामान्य शब्देँ) कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल । फूलहि निर्मित अंग अहँक अछि, गरि जायत कोनो शूल ।। मुँह अहँक जनु रक्त कमल । नील कमलदल नयन युगल । ग्रीवा मृणाल, जल अलक बनल अछि, अधर कुसुम अरहूल । कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।। आँचरे झाँपि गुलाबक थौका । श्वासक संग मलय केर झोंका । अपनहि रमणि, रुचिर कुसुमादपि, तोड़ब किए अहँ फूल ? कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।। पद पंकज अहँ केर कोमलतर । उपवन बीच भ्रमर कर सञ्चर । अहँ केँ देखि भ्रमर लोभायल, अयलहुँ, कयलहुँ भूल । कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।। मातृभूमि निज मिथिला अछि, छी वासी हिन्दुस्तान के (मातृ भू वन्दन गीत) (विगत् गणतन्त्र दिवस पर विशेष) मातृभूमि निज मिथिला अछि, छी वासी हिन्दुस्तान के (केर)।* पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे ।। युग - युग सँ अछि ठाढ़ जतऽ, गर्वोन्नत दिव्य हिमालय । गूँजय वेद - पुराण जतऽ, अछि सदाचार केर आलय । बहय जतऽ गोदावरी, गंगा, कोशी, कमला आ कृष्णा । विभिन्न धर्म, भाषा भाषी जतऽ, रहय निडर भऽ, क्लेश विना । शत कोटि करय छी नमण आइ हम, धरती कनक समान जे। पुण्यभूमि, रणभूमि, तपोभू, धरती स्वर्ग समान जे ।। भारत केर सन्तान छी हम, आ भारत माँ केर प्रहरी । धर्म हमर अछि देशक रक्षा, देशक उन्नति – प्रगती (ति) ।** देत कुदृष्टि जे एहि धरती पर, करब तकर सन्धान । मारि भगायब हर एक केँ, जे होयत खल शैतान। इएह धरती थिक मण्डन गौतम, औलिया, नानक राम के (केर)।* पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे।। फहराय हमेशा मुक्त व्योम मे, विजयी - विश्व - तिरंगा । रहय विश्व मे सभसँ आगाँ, हमर देश केर झण्डा । अमर रहय ई देश, जतऽ अछि धीर – वीर सन्तान । मातृभूमि केर रक्षा लेऽ जे, करय निछाउर प्राण । नञि बिसरि सकब गान्धी - सुभाष, आ अगनित कत’ बलिदान केँ। पुण्यभूमि, रणभूमि, तपो - भू, धरती स्वर्ग समान जे।। * मैथिली काव्य रूप मे बहुधा “केर” आ “केँ” केर उच्चारण द्विमात्रिक “के” सन होइत अछि । यद्यपि गद्य मैथिली मे एहि प्रकारेँ लिखब गलत अछि पर पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर लिखल जा सकैत अछि । · केर = ह्रस्व उच्चारण = ।। = २ मात्रा · केँ = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा · के = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा ** पद्य मैथिलीक एकटा आओर विशेषता । पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर मूल “ह्रस्व उच्चारण” केँ “दिर्घ” आ “दिर्घ उच्चारण” केँ “ह्रस्व” रूप मे उच्चारित कयल जा सकैत अछि । हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी (गीत) (आगामी वेलेण्टाइन डे पर विशेष) हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।* हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।। गज - गामिनी, मनोहारिनी । मम् हृदय - कुञ्ज विहारिणी ।। मृदु - भाषिणी, मित - भाषिणी । छलकय अधर सञो वारुणी ।। मधु - हासिनी , सौदामिनी । रति - छवि नयन सुखदायिनी ।। प्रिय - दर्शिनी, मधु - वर्षिणी । शोभा अलंकृत - कारिणी ।। मन्मथ - जयी, सद्यः रती । कर काम जय - ध्वज धारिणी ।। अहँ उर्वशी, मम् – उर – बसी । अहँ प्रीति – पय - मन्दाकिनी ।। हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी । हे अए (ऐ) हमर शशिकामिनी ।। * शशिकामिनी = चाँदनी = चानी बाबा विद्यापतिक कथन रौ मैथिल ! मैथिली तोँ बाज । केहेन चिन्ता ? कथी केर लाज ? हमहूँ संस्कृतक पण्डित, पर मैथिली हम्मर माथक पाग ।। मीठ गीत, बहुते तोँ सुनलह, आइ सुनह मोर बोल कटाह । रोष ने करिहऽ हमरा पर, जँ हमर बोल, लागह अधलाह । हमरो समय, बहुत पोंगा सभ, बहुतहि थू – थू कएने छल । मिथिलाभाषा लिखय छलहुँ तेँ, हमरा, सभ धकिअओने छल । मिथिलाभाषा जेँ लिखलहुँ, तेँ तोँ सभ आइ करय छह याद । हमहूँ संस्कृतक पण्डित, पर मैथिली हम्मर माथक पाग ।। हे मैथिल ! किछु ज्ञान सुनह, हमर बात, किछु कान धरह । अनका सञो हमरा नञि द्वेष, पर निज भाषा किए कलेश । पढ़ह – लिखह, जे मोन होअह, पर निज भाषा जुनि बिसरह । अनका लग भले किछु डाकह, अपना मे मैथिली बाजह । धिया – पुता केँ हीन ग्रस्त भऽ, वा मद मे जुनि देखबह लाथ । हमहूँ संस्कृतक पण्डित, पर मैथिली हम्मर माथक पाग ।। बाजह सदिखन, सुनह मैथिली, गुनह मैथिली, रटह मैथिली । रचह मैथिली, लीखह मैथिली, कीनि कऽ पोथी पढ़ह मैथिली । सृजन मैथिली, च्यवन मैथिली, नाचह मैथिली, गाबह मैथिली । बाट मैथिली, घाट मैथिली, घर- बाहर, सभ ठाम मैथिली । तजि निज भाषा, कुकुरक गति हो, नञि घर केर, नञि धोबी घाट । हमहूँ संस्कृतक पण्डित, पर मैथिली हम्मर माथक पाग ।। नोर बहओने किछु नञि होयत नोर बहओने किछु नञि होयत, भेटत नञि सन्मान । पएबा लेऽ किछु पड़त गमाबए, करए पड़त संग्राम ।। भलहि सिंह हो वीर कतेको, पर रहतइ जँ सूतल । मृगा ने कहतै खा ले हमरा, मरि जायत ओ भूखल । करब परिश्रम, तखनहि जिउब, बाँचत तखनहि प्राण । पएबा लेऽ किछु पड़त गमाबए, करए पड़त संग्राम ।। निज अधिकार ओ प्राणक रक्षा, सभहक अछि कर्त्तव्य । श्रेष्ठ परम जननी केर सेवा, एतबा हो ज्ञातव्य । परमश्रेष्ठ ई कर्म मनुक्खक, कहलन्हि श्री भगवान* । पएबा लेऽ किछु पड़त गमाबए, करए पड़त संग्राम ।। स्मरणीय शोणित केर बदला, जतऽ नोर बहइत अछि । ओहिठाँ जनता शोषित, पीड़ित, पराधीन रहइत अछि । हर पल मरबा सँ उत्तम अछि, देशक लेल बलिदान । पएबा लेऽ किछु पड़त गमाबए, करए पड़त संग्राम ।। * श्री भगवान = श्री कृष्णक गीताक उपदेश मातृ – भू वन्दना (बालगीत) सिता१ मधुरम्३, मधुरपि२ मधुरम्३, मधुरादपि मधु माएक भाषा । संस्कृत प्रिय, हिन्दी प्रियतर, दुहु सँ बढ़ि कऽ मिथिलाभाषा ।। धरती सुन्नर, भारत सुन्नर, पर सुन्नरतम मिथिलाबासा । जिनगी हो समर्पित एकरहि लए, अछि मात्र इएह टा अभिलाषा ।। मिट जाय भलहि, नञि हिय हारी, सम विषम, माए अहीं केर आशा । रहए ध्यान सतत् अहँ चरणहि मे, हो हरेक जन्म मिथिलाबासा ।। १ सिता = चिन्नी वा मिश्री २ मधुर / मधूर = मिठाई ३ मधुर = मीठ धिया-पुता जनकक वंशज हम (बालगीत) चलितहि रहब अछि काज हमर, लगातार अविराम । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। प्रगतिक पथ पर बढ़ैत रहब हम, हरैत विघ्न - बाधा सभ केँ । चलितहि रहब जीवनक पथ पर, नाँघैत सरिता गिरि गह्वर केँ । सहैत चलब हम सुख – दुःख सभटा, कनिञो नञि घबड़ायब । माए मैथिलीक आँचर पर नहि, कोनहु कलंक लगायब । कनक रेख सञो लिखब भारतक विश्व पटल पर नाँव । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। चलैत रहब हम अडिग सुपथ पर, नव - नव लय जिज्ञासा । प्रेम – स्वतंत्रता - ज्ञानक भूखल, रत्नक नञि अभिलाषा । धिया – पुता जनकक वंशज हम, स्वर्णिम भविष्य केर आशा । अथक परिश्रम काज हमर, बिनु स्वार्थक कोनहु पिपासा। विश्व पटल पर फेर बनायब मिथिला केर नव पहिचान । जा धरि भेटय ने लक्ष्य जीवनक, चाही ने विश्राम ।। ओ व्यक्ति की ? (बालगीत) ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो । ओ हृदय की ? जे ने दुःखक कोनो स्वाद चिखने हो ।। ओ सैनिकहि की ? युद्ध मे जे भाग नञि लेलक । ओ नाविकहि की ? जे ने झंझावात सञो खेलल । ओ सोन की ? जे आगि केर नञि धाह सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। तरुआरि की ? जे शत्रु केर शोणित सँ नञि भीजल । ओ आँखि की ? जे नोर सन अमृत सँ नञि तीतल । संजोगे की ? जे नञि वियोगक राति सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। ओ की पथिक ? जे काँट पर चलनाय नहि सीखल । ओ की सरित ? जे पर्वतहुँ मे धार नहि चीड़ल । ओ वयस की ? जे नञि जगक अनुभव समेटने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। ओ गाछ की ? सदिखन लसित वसन्त जे देखल । ओ विजय की ? जे विघ्न – बाधा केर विना भेटल । ओ दीप की ? जे वायु केर नञि कम्प सहने हो । ओ व्यक्ति की ? जे नहि समय केर मारि सहने हो ।। सखि तोहर मुखक तुलना के कर सखि तोहर मुखक तुलना के कर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। रवि ज्योतिर्मय, सुन्नर अतिशय । पर किरणक ताप, प्रचण्ड प्रखर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। शशि अतिव धवल, अतिशय शीतल । पर अति कठोर, केवल प्रस्तर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। जँ कही जलज, नहि उचित तदपि । हो विकसित रूप ने बिनु दिनकर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। तोँ छेँ अनुपम, अनमोल रत्न । तोँ साँच थिकेँ, वा हमर स्वप्न । पर जे हो, छेँ तोँ अति सुन्दर । सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।। ।। प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।। (मिथिला वन्दन गीत) स्वर्गहु सँ सुन्नर पावन जे धाम । प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।* मण्डन - अयाची - उद्याना केर नगरी । कवि कोकिल विद्यापति केर गाम एतए विसफी । आबि एतए भेलाह शंकर निरूत्तर , कर्मभूमि जनकक, ओ सीता केर गाम । प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।। गोबर सँ नीपल द्वारि , पाड़ल अरिपन । स्वच्छ - सुगम्य बाट - घाट लागय मनोरम । गाछ जतऽ फूल, बेलपात आ अशोक केर , खल – खल हँसैत, भरल खरिहान । प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।। नामी जतऽ केर अछि भोजन सचार । चुड़ा - दऽही - चिनी आ आमक अचार । नामी अछि विश्व भरि पेण्टिङ्ग जतऽ केर, नामी जतऽ केर अछि पान आ मखान । प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।। गीत विद्यापति केर गूँजय हर अङ्गना । बाजय राधा केर पायल आ कङ्गना । गूँजय यत्र – तत्र गीत भगवान केर, हर – हर महादेव, जय राम – घनश्याम । प्रथम् पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।। * ई हमर बहुत पुराण गीत सभ मे सँ थिक, जे कि १९९० - १९९७ केर बीच किछु लोकनि द्वारा “जे॰ एन॰ कॉलेज मधुबनी”, “आर॰ के॰ कॉलेज मधुबनी” तथा “भगवती स्थान कोइलख मधुबनी” आदिक मञ्च सभ सँ गाओल जा चुकल अछि । नवकी कनिञा हरिहर झा* केर आङ्गन मे, अएलखिन्ह आइ नवकी कनिञा । जनिका कारण चुटकी लै छन्हि, हुनिकर सगरो दुनिञा । ठोकि बैसल छथि अपन कपार, सोचैत किछु अङ्गना मे । हरिहर झा केर आङ्गन मे ............................................... ।। कोन जन्म केर पाप हमर छल, भाग्य हमर एहेन भेल । कुल खानदानक मान मर्यादा, माटि मे सभ मीलि गेल । हाय रेऽ जऽरल हमर कपार, सोचै छथि बैसि अङ्गना मे । हरिहर झा केर आङ्गन मे ................................................ ।। मोबाइल पर बतियाए हमेशा, जीन्स पैण्ट पहिरए छै । ब्युटी पार्लर जाय दड़िभंगा, केश सेट करबए छै । पहीरि कऽ पएर मे सैण्डिल लाल, घुमै छै कोना अङ्गना मे । हरिहर झा केर आङ्गन मे .................................................... ।। आठ बजे ओ सूति कऽ उठती, काज ने किछुओ करती । लाज शर्म केर छुति ने कनिञो, भरि दिन सिनेमा देखती । कोना चलतै एहि घऽरक काज, सोचै छति बैसि अङ्गना मे । हरिहर झा केर आङ्गन मे ................................................ ।। * हरिहर झा नामक व्यक्ति काल्पनिक छथि । वास्तविक दुनिञाक कोनो हरिहर झा सँ एहि गीतक कोनो सम्बन्ध नञि थिक । कल्पनाक यान सँ (गीत) कल्पनाक यान सँ, मोनक उड़ान सँ, घुरि फिरि आबैत छी, प्रेयसीक गाम सँ ।। कोनटा केर कात सँ, ग्रसित लोक लाज सँ, स्वागत ओ कयलि, अपन मन्द - मन्द हास सँ ।। अधीर सनि गात सँ, विरहक प्रताप सँ, सोझाँ भेलीह ओ मिलनक उसास सँ ।। कोमल सनि हाथ सँ, तिलकोरहि पात सँ,* आँजुर दुइ नेह देल पुर्वहि प्रभात सँ ।। कागक अवाज सँ, आभासहि प्रात सँ, टूटल जे निन्न, स्वप्न डूबल सन्ताप सँ ।। * तिलकोरहि पात = प्रेयषीक पातर – पातर ठोरक लेल उपमा = तिलकोरक पात सन पातर ठोर किए हँसबै छऽ मिथिला केर नाम भैय्या ? (गीत) होइ छऽ मिथिला केर कण कण निलाम भैय्या । कोना तोँ सभ करै छऽ अराम भैय्या ?? धरती ई जनकक आइ आहत पड़ल छऽ । तोरहि सभ केर बाट तकै छऽ । कोना बैसल छऽ मूनि आँखि कान भैय्या ? कोना तोँ सभ करै छऽ अराम भैय्या ?? मिथिला केर माटि केर बोली लगै छऽ । खरिहानहि पैसि, दुष्ट गोली दगै छऽ । हृदय मैथिलीक भेलह लहु – लुहान भैय्या । कोना तोँ सभ करै छऽ अराम भैय्या ?? मिथिलाऽक नाँव बेचि गद्दी चढ़ै छऽ । पाछाँ सऽ एकरहि गर्दनि कटै छऽ । कतऽ गेलह तोऽहर ओ शान भैय्या ? कोना तोँ सभ करै छऽ अराम भैय्या ?? छीः छीः तोरा की लाजो ने होइ छऽ । कुक्कुर जेकाँ अँइठ पातो चटै छऽ । किए हँसबै छऽ मिथिलाक नाम भैय्या ? कोना तोँ सभ करै छऽ अराम भैय्या ?? ककरा दृष्टि मे नीक, के कह ? (कविता) तन सुन्नरि हम देखि रहल छी, मन सुन्नर - से कोना कहू । तन केर सुन्नरता घातक थिक, जँ सुन्नर मन केर बिना रहू ।। अहँ सुन्नरि छी, बड़ सुन्नरि छी, चर्चा पसरल सौंसे जग मे । पर सुन्नरता की थिक - के कह ? के एकरा फरिछाओत जग मे ?? नञि ठोस तरल वा गैस ई थिक, हो मानक परिभाषा जकरा । ककरा दृष्टि मे नीक के कह ? थिक कक्कर अभिलाषा ककरा ।। तन केर सुन्नरता चञ्चल थिक, मन केर सुन्नरता रहए थीर । मन सिन्धु समान अथाह, स्वच्छ, तन बरसाती धाराक नीर ।। तन भ्रामक थिक, तन नश्वर थिक, नहि प्रेमक थिक ओ परिचायक । नञि तऽ, श्रीकृष्णक की हस्ती , जे बनितथि ओ सभहक नायक ।। सुनइत छी लैला कारी छलि, कोयली कारी से जनितहि छी । आँखिक पुतरी होइत’छि कारी, गुन एकर विश्व भरि मनितहि छी ।। हो तन सुन्नर, हो मन सुन्नर, तऽ एहि सँ बढ़ि कऽ की होयत ? नहि चरम मेल दुहु केर सम्भव, जँ होयत, तऽ बढ़ि की होयत ?? की इएह कहाबैछ सुन्नरता ?? (कविता) तन गोर, नयन हिरणी सनि हो, हो अंग अंग मे चञ्चलता । दुहु ठोर पात तिलकोरहि सनि, पातर कटि मे हो लोचकता ।। हो पीनि पयोधर शिरिफल सनि, मुस्कान भरल हो मादकता । दाड़िम दाना सनि दाँत जकर, हो केश मे मेघक पाण्डरता ।। हर अलंकरण सज्जित तन पर, हर चालि - चलन मे अल्हरता । की एतबहि सँ ओ सुन्नर अछि ? की इएह कहाबैछ सुन्नरता ?? चकोरक उक्ति चानक प्रति (कविता) हे चान ! अहाँ धन्य छी । हमर मृत्यु पर प्रशन्न छी । अहँक हृदयहीनता सँ, हऽम अवसन्न छी । हे चान ! अहाँ धन्य छी ।। जिनगी भरि रटलहुँ हम, अऽहीं केर नाम । मनमे अऽहींक छवि, बसल अभिराम । की हम कहू , अहाँ पाथर अनमन्न छी । हे चान ! अहाँ धन्य छी ।। अहीं हमर इच्छा, अहीं हमर काम । अहीं हमर काया, अहीं हमर प्राण । हम तऽ अहाँक, छद्म रूप देखि सन्न छी । हे चान ! अहाँ धन्य छी ।। अहीं केर वियोगेँ, हम त्यागै छी प्राण । अहँक ठोर निष्ठुर, छिड़ियाबै मुस्कान । सोचि रहल छी, अपनेँ पाथर प्रणम्य छी । हे चान ! अहाँ धन्य छी ।। अहाँ सपनहि मे आबै छी, आयल करू (गज़ल) अहाँ सपनहि मे आबै छी, आयल करू । मोन सपनहि मे क्षणिकहु, जुड़ायल करू ।। हम चाही ने आओर किछु, अहँ सँ प्रिय । अहँ बनि कऽ गुलाब, मुस्किआयल करू ।। पाबि सकलहुँ ने अहँ केँ जदपि हम प्रिय । अहँ ओहिना, कौमुदि केँ लजायल करू ।। अहँ दूरहि रही, अहाँ अनकहि सही । दीप प्रेमक हमेशा, जड़ायल करू ।। प्रेम प्रेमहि रहत , ओ मेटा ने सकत । अहँ चाही तऽ सपनहु ने आयल करू ।। प्रेम मोनक मिलन, नहि कामक सदन । अहँ जाहि ठाँ छी,ओहि ठाँ फुलायल करू ।। सुनू यौ भारत केर सरकार ! (आह्वान गीत) सुनू यौ भारत केर सरकार ! सुनू यौ भारत केर सरकार ! नञि माँगय छी भीख हऽम, निज माँगै छी अधिकार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! जाहि धरती पर जन्म लेलहुँ हम, जाहि धरती पर खेल केलहुँ । पीबि जकर हम अमिय सलिल नित, अन्न खाय प्रतिपाल भेलहुँ । माँगि रहल छी, माए मैथिलीक पावन निर्मल प्यार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! जन्महि सँ सिखलहुँ जे बाजब, जाहि भाषा सँ दुनिञा जनलहुँ । जकर ज्ञान - गंगा मे नहा हम , वाणी रुपी रुपी रत्न केँ पओलहुँ । माँगि रहल छी, ओहि भाषा मे भाव – ज्ञान सञ्चार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! किन्नहु आब ने रहतीह मैथिली, ककरहु चरणक दासी । लेब अपन अधिकार , रहब हम लऽ कऽ अप्पन थाती । शान्ति समाहित क्रान्ति ज्वाल सँ, दूर करब अन्हार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! लेब अपन अधिकार, मैथिलक स्वाभिमान अछि जागि उठल । निज समृद्धि, उन्नति, विकाश केर, नूतन पथ अछि बना रहल । आब ने रहतीह मिथिला - शिथिला, ने सहतीह अत्याचार । सुनू यौ भारत केर सरकार ! रोकि सकैछ ने केओ आइ, कोशी कमलाक उमड़ल धारा । बान्हि सकैछ की केओ हवा, पहिरा सकइछ ओकरा काड़ा ? देब जवाब डूबा ओकरा , जे रोकत निज करुआरि । सुनू यौ भारत केर सरकार ! नोर (कविता) रे नोर धन्य जिनगी तोहर, निज प्रियाक नैन मे बसइत छेँ । बहि नैन सँ छूबि कपोल दुहु, मधुकोष अधर मे खसइत छेँ ।। पी अधर अमिय तोँ भऽ चञ्चल, मुख चूमि वेग सँ बढ़इत छेँ । पुनि चूमि प्रियाक मृणाल गृवा, कुच श्रृंग मध्य भऽ बहइत छेँ ।। तोँ केलि करैत, अठखेलि करैत, नाभी जल पूरित करइत छेँ । पुनि धार अनेक बना कटि पर, चुम्बन कऽ आगाँ बढ़इत छेँ ।। नीबी नभ तर भऽ हर्ष चित्त, सागर सँ संगम करइत छेँ । ओहि अनुपम अर्णव तट पहुँचि, अपना केँ धन्य तोँ बुझइत छेँ ।। पर व्यर्थ तोहर अभिमान सर्व, हमरहि कारण तोँ बहइत छेँ । नहि मोल तोहर रे अश्रु कोनहु, बहबाक हेतुअहि बनइत छेँ ।। हमहीं छी हुनक चितवन मे सदा, यद्यपि तोँ आँखि मे रहइत छेँ । हम हुनक हृदय, हर अंग मे छी, स्पर्श मात्र तोँ करइत छेँ ।। हम जीवन नेने अबइत छी, तोँ मरणक राह देखबइत छेँ । हमरा लग हर्षक द्युति - इजोत, तोँ तम विषाद लऽ अबइत छेँ ।। हम कनितहु, कानि ने सकइत छी (गीत) की हाल कहू, हम अहँ सँ प्रिय, सब हाल तऽ अपने जनितहि छी । हम एहि ठाँ दूर, अहाँ सँ प्रिय, चुप रहितहुँ सदिखन, कनितहि छी ।। हर एक क्षण अहाँ हमर सन्मुख, हम याद अहीं केँ करइत छी । अछि भेल जेना निन्नहु उन्मुख, भरि राति तरेगन गनइत छी ।। चन्ना मे देखि अहँक मुख छवि, जँ धीर कने हम धरइत छी । तऽ देखि कलंक, प्रिय अहँ केँ, चानहु बुझबा सँ डरइत छी ।। हे प्राण हमर ! अहँ जुनि पुछू, हम अहँ बिनु कोना कऽ रहइत छी । संदेह करब अहँ जुनि कनिञो, हम अहीँ केर पूजा करइत छी ।। सौभाग्य जे प्रिय अहँ नाड़ि थिकहुँ, नोरहु केर भाषा जनइत छी । पर हमर विवशता तऽ देखू, हम कनितहु, कानि ने सकइत छी ।। सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत) सभ सँ रसगर माएक भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी । करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा, पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।। भाषा जे पशु सँ भिन्न केलक, भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक । रटि दोसर बोली, बनि सुग्गा, अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी । सभ सँ रसगर माएक भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। हो सारि प्रिय, सरहोजि प्रिय, पत्नी केँ राखी सटा हृदय । पर अछि अस्तित्व जनिक कारण, अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी । सभ सँ रसगर माएक भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। माएक भाषा , अप्पन भाषा । मिथिला – भाषा, अप्पन भाषा । परहेज किए एहि भाषा सँ ? आउ एहि पर हम सभ गर्व करी । सभ सँ रसगर माएक भाषा, भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।। गे सजनी ! फोल कने फेर ठोर (गीत) कमल नयन लखि, मधुर वयन सुनि, हुलसित मन ई चकोर । गे सजनी ! फोल कने फेर ठोर ।। हमरा एते तोँ जुनि तरसा गे । अपन अधर मधु रस बरिसा दे । जुनि बन तोँ एतेक कठोर । गे सजनी ! फोल कने फेर ठोर ।। बोल - सुबोल हृदय उद्बेधल । तोहर सरिस दोसर नञि देखल । उर – अन्तर उठय हिलोर । गे सजनी ! फोल कने फेर ठोर ।। कोयली जदपि सातहु सुर सीखल । तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल । मधु भरल छौ पोरे पोर । गे सजनी ! फोल कने फेर ठोर ।। हम नञि कहब कि ......... (गीत) हम नञि कहब कि फूल मे गुलाब छी अहाँ, हमर जिनगी केर स्वप्न ओ “ताज” छी अहाँ । मुदा जिनगीक एकसरि अन्हरिया मे विकसित, सुन्नर ओ सुमधुर प्रभात छी अहाँ ।। हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ, “ऐश्वर्या” केर जेरॉक्स प्रतीप छी अहाँ । अहाँ नञि चाही हमरा, ई इच्छा अहँक, मुदा अहीं हमर अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।। किछु अन्यथा ने सोचब, से आग्रह हमर, एक कवि केर दुस्साहस केँ कऽ देब क्षमा । अहाँ अँऽही रहब, हऽम हमही रहब, अहँक चाहत रखबाक हमर हस्ती कहाँ !! बरसातक एक राति असित अन्हार डेराओनि राति । झमकि झमकि बरिसय बरसात ।। अछि अस्त सूर्य आ धुमिल चान । घूमय नभ मे चहुदिशि जलधर । करय गरजि गरजि कऽ मेघ नाद । रहि रहि चमकए चपला चञ्चल । बहए सुरभित शीतल रम्य बसात । झमकि झमकि बरिसय बरसात ।। प्रेमीक विछोह, प्रेमिकाक क्षोभ । मयूरक खुशी अह्वलादित नर्तन । गर्मी सँ त्रस्त – पाओल राहत । करय जीव पावसक अभिनन्दन । पाओल राहत सभ कृषक समाज । झमकि झमकि बरिसय बरसात ।। उमड़ल पोखड़ि, नदी, ताल,सड़सि । हर्षित ओ जन्तु जे जल सञ्चारी । करए दादुर, जोंक, साँप, सहसह । पसरल सौंसे धरती पर चाली । बहए माटि – पानि दुहु एक साथ । झमकि झमकि बरिसय बरसात ।। पावस राति - ई कारी घोर । पुरिबा – पछबा से बड़ जोड़ । भेल भोर, पर रौद मलीन । सूर्य जेना निज शक्ति विहीन । कहुँ – कहुँ हंसक उनमुक्त पसार । झमकि झमकि बरिसय बरसात ।। नभ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल श्यामल आयल साओन मास सोहाओन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी । लागय आजु धरा मनभाओन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।। छल छल बहइ’छ श्यामा सरिता । भेल मलिन मुख देखि ई सविता । बहु विधि सजल धजल वृंदावन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी । आयल साओन मास सोहाओन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी । मन्द पवन सखी वसन हिलावय । मन मानस मोर मदन जगावय । बाजय छमकि छमकि पायलिया, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी । लागय आजु धरा मनभाओन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।। सभ सखि मीलि चलू रास रचायब । कदमक डाड़ि मे हिरला लगायब । बजओता माधव मधुर मुरलिया, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी । आयल साओन मास सोहाओन, कि चलु सखी , चऽलू ने सखी ।। आयल साओन मास सोहाओन नभ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल श्यामल । आइ लगइ’छ प्रकृति श्याम रंग मे रँगल । सुनि मुरलीक तान । एलीह राधा ओहि ठाम । प्रीति सरिता मे डूबि, भेलीह राधहु श्यामल । आइ लगइ’छ प्रकृति श्याम रंग मे रँगल । श्याम श्यामक शरीर । श्याम यमुनाक नीर । पहीरि साँझक कलेवर , भेलीह वसुधहु श्यामल । आइ लगइ’छ प्रकृति श्याम रंग मे रँगल । छवि सुन्नर सहज । मूँह रक्तिम जलज । रक्त कंज बीच खिलल युगल श्यामल कमल । आइ लगइ’छ प्रकृति श्याम रंग मे रँगल । श्याम अलकक कुञ्ज । जेना भ्रमरक हो पुञ्ज । भासि राहु कोर, चान सेहो श्यामल श्यामल । आइ लगइ’छ प्रकृति श्याम रंग मे रँगल । घीरि आयल पयोद । देखू नचइ’छ कामोद । छूबि श्याम, श्याम, श्याम भेल अनिलहु श्यामल । नभ श्याम, धरा श्याम, सभ श्यामल श्यामल । मेघ हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई जीवन हमरहि आनल अछि । नञि गोर जदपि हम छी कारी, पर स्नेह सुधा संग आनल अछि ।। जखन – जखन एहि भूतल पर, रविकिरणक साहस बढ़ैत गेल । सभ जीव जन्तु , गाछी बिरछी, जल विन्दु-विन्दु ले तरसि गेल । एहि दारुण दुःख मे संग तोहर, हर बेर हृदय मोर कानल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई जीवन हमरहि आनल अछि ।। हर आह हमर शीतल बसात , नोरक हर बुन्न बनल अमृत । लहलहा उठल खेतक जजाति, हर जीव तृप्त, धरती संसृत । स्वागत मे सदिखन आदिकाल सँ मोर मुदित मन नाचल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई जीवन हमरहि आनल अछि ।। हर सड़सि ताल सरिता निर्झर, वन उपवन हमरहि सँ शोभित । हर जड़ि चेतन केर प्राण हमहि, छी रग मे हमहीं बनि शोणित । हमरहि निर्मित ई सकल स्वर्ग , हमरहि वसन्त ई आनल अछि । हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई जीवन हमरहि आनल अछि ।। नञि दोष हमर, जँ हो अनिष्ट, आ नाचथि ताण्डव महाकाल । जलमग्न धरा, बाढ़िक कारण, आ देखि पड़य कत्तहु अकाल । सोचू एहि मे अछि दोष ककर ? की नियम अहाँ सभ मानल अछि ? हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! ई जीवन हमरहि आनल अछि ।। हम मैथिल ! मिथिला केर सन्तान । हम मैथिल ! मिथिला केर सन्तान । नञि दुनिञा केर कनिञो ध्यान । की होयत सोचि भविष्य विषय, हम तऽ अतीत केर करी गान । हम मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। नञि दुनिञा सँ, कनिञो घबड़ायब । नञि प्रगति देखि कऽ हम ललचायब । छल हमर अतीत बहुत सुन्नर , तेँ रहत भविष्यहु नीक हमर । की अजगर करइत अछि चिन्ता ? अरे सबहक दाता , अपनहि राम । हम मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। विग्यानक द्वारि, अशान्तिक द्वारि । एहि सँ नीक, बैसी चौपाड़ि । करी अराड़ि आ पढ़ी गारि । नञि ताहि सँ जीती, करी मारि । अछि फॉर्मूला - परिभाषा व्यर्थ । चान – विजय अभिलाषा व्यर्थ । की धरती’क चान अलोपित अछि , जे करी गगन चानक अभियान ? हम मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।। हम मानि लेल अहँ सर्वश्रजष्ठ । लाठी भाँजए मे छी यथेष्ठ । अहँ शूरवीर, अहँ परम वीर । अहँ कर्मवीर, अहँ धर्मवीर । अहँ माए मैथिलीक पुत्र धीर, जे सहि सकलहुँ माएक अपमान । अहँ मैथिल , मिथिला केर सन्तान ।। बसात (हवा) ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि । स्पर्श मात्र कए सकइत छी , निज आँखि सँ देखब सपने अछि ।। ब्रम्हा बनि कखनहु सृजन करय, कहुखन हर रूप कराल धरय । कहुखन हरि सम पालनकर्त्ता, कहुखन यम - सद्यः काल बनय । ओ जिनगी छी एहि धरती केर, सभ जीवक साँस समाहित अछि । एहि धरती पर जे रिक्त लगय, ओहि शुन्यक बीच प्रवाहित अछि। नञि मूर्त रूप पओलक कहियो, पर दिव्य शक्ति संवरने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। ओ योगवाहि, की नञि बुझल ? ओ कऽ सकैछ ककरो संगति । जकरा संग, जा धरि मीत रहय, तकरे सन गुण, तकरे रंगति । के नञि जनैछ पुरिबा – पछिबा, मलयक बसात के नञि जनइछ । ककरा नञि अनुभव चक्रवात, लू – जेठक दुपहरिया तपइत । अनल, अनिल केर संग पाबि, सोनक लंका केँ डहने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। कहुखन एकसरि सरिता जल पर, जनु जलतरंग ओ बजा रहल । कखनहु मरु मे वा सागर तट, लीखि बालु सँ अपने मेटा रहल । ओकरा सोझाँ, के रहल अडिग, बिनु दर्प – दलित, के रहल ठाढ़ ? कत विटप उखाड़ल, सिन्धु मथित, भासित पहाड़, अपचित पठार । अगनित पाथर केँ काटि – छाँटि, कत रूप - अनूप ओ गढ़ने अछि । ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।। हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा, गहुमक रोटी सन गोल गोल । ने रक्त अधिक, ने श्याम प्रबल, गहुमहि सन सुन्नर गोड़ गोड़ ।। अछि मोन लोभाइत देखि – देखि, दू टा फाँरा आमक अचार । संगहि राखल सुन्नर - सुन्नर, मिरचाइक फर दू गोट लाल ।। की काज अहाँ केँ एहि रोटीक, दऽ दियऽ सखी हम भूखल छी । आपस कए जुनि सिर पाप धरू, हम छी अतीथि हम भूखल छी ।। बनि जयतहुँ हम बच्चा (गीत) आइ अनायस, हमर मोन मे, सुन्नर सनि एक इच्छा । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। सरस बसन्तक अबितहि भोरे, बीछय जयतहुँ टिकुला । बिनु मजड़ल, आमक झाँखुड़ तर, टाँगि लगबितहुँ हिड़ला । दैत्यक पहड़ा, जेठ - दुपहरिया, पर लोभेँ बम्बईय्या । बौअइतहुँ गाछी – कलमेँ, पाबितहुँ मालदह – कलकतिया । पाकल पीयर – लाल बैड़ हम, जेबी भरि – भरि अनितहुँ । लिच्ची जामुन आओर जिलेबी, किछु खयतहुँ, संग लबितहुँ । भूत – पड़ेतक डऽर तऽ, चलि जयतय पड़ाय कलकत्ता । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। साओन मास - पहिल वर्खा , बम्मा सँ खसइत झड़ – झड़ । जाय नहयतहुँ, जेना पहाड़क, कल - कल सुन्नर – निर्झर । सण्ठी केँ धुधुआय बनबितहुँ, सिगरेटक हम नाना । घूर मे दऽ अधखिज्जू आलू , तकर बनबितहुँ साना । चोड़ा – नुका, निज माए – बाप सँ, जयतहुँ दौड़ल भोड़हा । कोमल - हरियर - कञ्च – बदाम, उखाड़ि बनबितहुँ ओड़हा । फलना केँ रखबाड़ पकड़लक, भेल गाम भरि चर्चा । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। दुर्गापूजा – छठि - दिवाली, पावनि तीन सहोदरि । मास दिवस इस्कूल दरस नञि, पावनि सम नञि दोसर । की भसान केर छल उमंग, की सुन्नर हुक्का – लोली । खेल कबड्डी – किरकेट - गोली, खेली नुक्का – चोरी । चौठ – चन्द्र, मिथिलाक विशेषीकृत पावनि अति अनुपम । भाँति – भाँति पकवान देखि, बढ़ि जाय हृदय स्पन्दन । घण्टा – घण्टा बन्शी पाथितहुँ, रोहुक आश लगओने । रोहु – बोआरि ने, पोठी दू टा, अबितहुँ हाथ डोलओने । बन्शी लऽ घुमितहुँ भरि दिन, पोखड़ि – डाबर ओ खत्ता । ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।। आबहु मिता छोड़ू (गीत) गोल – गोलैसी, पर – पञ्चैती । गप्प अनेरोक, कानाफुसकी । आबहु मिता छोड़ू । दुनिञा देखू दौड़ि रहल अछि, अपने घसड़ब छोड़ू । हे यौ , अपने घसड़ब छोड़ू ।। कमजोरहा पर देखबी धाही । पुस्त - पुस्त केर करी उखाही । बात – बात पर लट्ठ - लठैती । घऽरे फनफन, बाहर लाही । बड़ बुत्ता जँ, अहँक देह मे, नूतन सर्जन कऽरू । हे यौ , नूतन सर्जन कऽरू ।। ओ केलन्हि, से नीक ने कएलन्हि । फलना जिनगी व्यर्थ गमओलन्हि । मुइलहा सारा कोरि भर्त्सना । सकल अकारथ हुनक सर्जना । आनक कृत्य अकृत्य अतीते, अहीं नीक नव गऽढ़ू । हे यौ , अहीं नीक नव गऽढ़ू ।। ओ जिनगी भरि कयल ऊकाठी । आम खेलक आ देलक आँठी । आब नरक सँ देखथु टकटक । हम्मर बोझा , हुनिकर आँटी । रोपल आन बबूड़, गलत छल, अहीँ काँट जुनि रोपू । हे यौ , अहीँ काँट जुनि रोपू ।। दऽड़ दड़बज्जा, चौक चौबटिया । व्यर्थक गप्प, अनर्गल चर्चा । एकर फूसि, ओकरा केँ लाड़णि । अपन मजा लेऽ अनका चाड़णि । अपन समय बहुमुल्य नाश कय, अनका दोष ने मऽढ़ू । हे यौ , अनका दोष ने मऽढ़ू ।। अरिकोंच (कविता) हरियर बड़का – बड़का पात, देखू कत्तेक सुन्नर लाग । ऊगय अपनहि – आप, पनिगर खत्ता - बाड़ी - झाड़ी ।। केओ “अरिकञ्चन” कहय, हऽम कही “अरिकोंच” । अहाँ “अरकान्चू” बुझू, स्वाद एक्कहि मनोहारी ।। पात पिठार संग बान्हल, सरिसो तेल चक्का छानल । नेबो खूब दए झोड़ाओल, पड़िसल तीमन सोझाँ थारी ।। संगहि भात वा सोहारी, झँसगर अरिकोंचक तरकारी । लागय भकभक तइयो नीक, एकर महिमा छी भारी ।। गामक बच्चा – बच्चा जान, शहरक अलखक चान । जे अछि खएने - सएह बूझय, आन तीमन पर भारी ।। लागय किनको जँ फूसि, वा हो मन मे जँ झूसि । चीखि देखू एक बेर , लागत मन मे पसारी ।। आजाद गजल * जे गाबि सकी, से गीत भेल, की गजल - छन्द - कविता - मुक्तक ? जँ हो जजाति, तऽ खेत भेल, की आढ़ि – धूर – हत्ता - टटहड़ि ?? हम अंगहीन, कोनो अंग विना, पर देह सिमित नञि, अछि व्यापक । मुँह – नाक - कान आ पएर - हाथ, छी हमरहि, पर ने हमर पड़तर ।। कोँढ़ी जँ फुलायल, फूल बनल, गेना – गुलाब – जूही - चम्पक । जे फड़य गाछ पर, फऽल कहल, हो आम – लताम – लकुच – कटहड़ ।। छी वारि एक, पर विविध रूप, अछि जलधि धरा, नभ मे जलधर । खन शान्त कूप – पोखड़ि – डबरा, खन चंचल सिन्धु – सरित – निर्झर ।। कर कलम हाथ लिखबाक लेल, पर मोन पता नञि की लीखत । अहँ कहलहुँ “गजल” लिखू - लिखलहुँ, पर गाबि सकब तेँ गीत कहब ।। अहँ “अनचिन्हार”, परिचित भेलहुँ, पर हम “विदेह” सौंसे सञ्चर ? उन्मुक्त बसात - चिड़ै सन मन, नहि गजल - गीत, खिस्सो लीखत ।। *श्री आशीष “अनचिन्हार” जी केर आग्रह पर तथा हुनिकहि समर्पित । उड़ीस (बाल कविता) कमला माएकेँ कहियो ठकलन्हि गोनू बाबू । एक सए एक उड़ीसक, बलि देल गोनू बाबू ।।*१ बास ओकर पुरना पलंग, कुर्सी, चौकी आ खाटमे । रातिमे ओ चुटचुट काटए, दिन नुका रहैए फाटमे ।। ओ मनुक्ख केर खून चूसि कऽ, अप्पन पेट भरैए । बदलामे कत’ रोगक संगहि, निन्नमे विघ्न करैए ।।*२ तेँ जल्दीसँ करी उपाए आ ओकरा झट उपटाबी । एहेन चौकी आ खाट पलंगकेँ, चट दऽ रौद लगाबी ।।*३ तोसक, कम्मल, सीरक, सुजनी सभकेँ रौद देखाबी । चद्दरि तकिया-खोल आदिकेँ, पानिमे दऽ खौलाबी ।। गऽह - फाट चौकी - पलंग केर, छीटी उचित दबाई । बौआ - बुच्ची दूर रही, जँ छीटथि केओ दबाई ।। तइयो जँ नञि बात बनए तँऽ अन्तिम करी प्रबन्ध । कमसँ कम छओ मास-बरष धरि, छोड़ू एहेन पलंग ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मिथिलाक प्रशिद्ध गोनू झाक खिस्सासँ उद्धृत । *२ - उड़ीस केर कटलासँ मनुक्खक रतुका निन्न तँऽ खड़ाब होइते अछि संग - संग त्वचा पर कटबाक निशान बनि जाइत अछि जे नोचए लगैत (ITCHING TENDENCY) अछि । नोचला पर (AFTER SCRATCHING) नऽह लगलासँ ओहि स्थानसभ पर घाओ आ द्वितीयक संक्रमणक (SECONDARY INFECTIONS) संभावना भऽ जाइत अछि । उड़ीसमे मनुक्खकेँ संक्रमित कए रोगग्रस्त करबाक क्षमता रखनिहार कम सँ कम २८ गोट परजीवी (PATHOGENS) पाओल जाइत अछि, जखनि कि एहि क्षेत्रमे एखन बहुत कम्मे काज भेल अछि । *३ - लकड़ीसँ बनल उपस्कर (फर्निचर) ओ बिछाओन आदिकेँ गर्म करब (तेज रौदमे आ जकरा सम्भव हो तकरा खौलैत पानिमे) आ सुखाएब सबसँ नीक घरेलू उपचार थिक । 45°C (113°F) पर एक घण्टा राखब वा -17°C (01°F) पर दू घण्टा राखब उड़ीसकेँ पुर्णतः समाप्त कऽ दैत अछि । पहिल तरीका अपनासभ दिशि गर्मीमे आ दोसर तरीका पहाड़क क्षेत्रमे सर्दीमे बेस प्रभावकारी अछि । जँ 50°°C (122°F) केर तापमान प्राप्त कएल जा सकए फर्निचर ओकरा सहन कऽ सकए तऽ मात्र दू मिनटमे पूरा उड़ीस उपटि जाइछ । चद्दरि आ वस्त्र आदिसँ उड़ीस उपटएबाक लेल आयरनक उपयोग कएल जा सकैछ । चुँकी रौदमे देला पर लकड़ीसँ बनल उपस्करक गऽह आ फाटमे उड़ीस नुका कऽ बचि जाइत अछि, तेँ ओहि ठामसँ ओकरा निकालबाक लेल उचित दबाई केँ गऽह आ फाटसभमे छीटलासँ ई विधि बेशी प्रभावकारी सिद्ध होइछ । दबाई छिटबाक काज घरक कोनो पैघ आ बुझनुक सदस्य सावधानीपुर्वक करैत छथि कारण ई दबाई मनुक्खक साँस द्वारा या मूँह आ आँखिमे पड़लासँ मनुष्यक स्वास्थ्यकेँ सेहो गम्भीर हानि पहुँचा सकैत अछि । धियापुताकेँ एहि काजसँ दूर रहबाक चाही आ अनेरो हुलुक-बुलुक नञि करबाक चाही । कोनहु दुर्घटना भेला पर सीधे यथासिघ्र चिकित्सककेँ देखएबाक चाही । *४ - उड़ीस बिना किछु खएने - पिउने 100 सँ 300 दिन धरि रहि सकैत अछि । ई अवधि वातावरणक तापमान पर निर्भर करैछ । तेँ कोनहु खुला जगह पर बिना उपयोगक छओ महीना वा एक वर्ष धरि उड़ीस लागल लकड़ीक उपस्करकेँ छोड़ि देलासँ सेहो उड़ीसकेँ उपटाओल जा सकैछ । रातिमे कचबच कचबच करइछ, नाम ओकर कचबचिया छै ।१,२ ई नञि दूर देश केर प्राणी, अपनहुँ ठाँ बारहमसिया छै ।। आँखि ओकर दुहु गोल - गोल, गोलका भाँटा केर तरुआ सनि । नाक सपाट आ लोल सुकुच्ची, आँखिक सोझाँ मड़ुआ सनि ।। दुनिञा अचरजसँ देखै छै, ओ दुनिञाकेँ अचरजसँ । राति इजोरिया खौंझाएल मन, निन्न जँ टूटल कचबचसँ ।। आँखि एकर किछु खास बनल छै, रातिमे सभ किछु देखबा लए ।३ दिनुका इजोत चोन्हराए आँखि, छै बनल ने दिनमे देखबा लए ।। गर्दनि छै सेहो किछु विशेष, ओ घूमि जाइत छै चारू कात ।४ इएह सब देखि कऽ लोक कहैए, एक्कर भूत - परेतक साथ ।। राति इजोरिया साँझक झलफल, मूँह लागए जेना हो लुच्चा । मूँहक भाव - भंगिमा गजबे, कहबै तेँ ओ मूँहदुस्सा ।।१ अपना सभक समाजमे मूर्खक, उल्लू बनि गेल छै पर्याय । दिन सूतए छै, राति जागए छै, तेँ एहेन कहबी छै भाय ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - १ - मूँहदुस्सा, कचबचिया आदि मैथिलीमे उल्लू (OWL) केर पर्यायी नाम अछि । २ - “कचबचिया” नाम मैथिलीमे उल्लूक अतिरिक्त एकटा आन चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि । एहेन शब्द जकर अलग−अलग स्थान पर अलग−अलग अर्थ हो वा अलग−अलग चीजक बोध करबैत हो मैथिलीमे अनेकार्थक शब्द कहबैत अछि । दू अलग−अलग तरहक चिड़ै केर बोध करएबाक कारण “कचबचिया” शब्द अनेकार्थक भेल । ३ - उल्लूक आँखि बहुत कम प्रकाशमे देखबाक हेतु समायोजित रहैत अछि । तेँ ओकर बनावट किछु विशिष्ट होइत अछि । उल्लूक आँखि कम प्रकाशमे दूरक वस्तुकेँ देखबा लेल बनल अछि आ ताहि कारणेँ ओ अपना लऽगक (आँखिसँ किछु सेन्टीमीटरक परिधिमे) वस्तुसभकेँ एकदम्मे नञि देखि सकैत अछि । ४ - उल्लूक गर्दनि मे १४ टा ग्रीव कशेरुक हड्डी (CERVICAL VERTIBRAE) होइत अछि जखनि कि मनुक्खमे मात्र ७ टा । मनुक्खक गर्दनि मात्र करीब १७० सँ १८० डिग्री धरि घुमि सकैत अछि जखनि कि उल्लूक करीब ३४० सँ ३५० डिग्री धरि । तेँ उल्लू एक ठाम बैसल - बैसल अपना शरीरकेँ बिना हिलएने - डोलओने, बस अपन गर्दनि घुमा कऽ अपन आगाँ आ पाछाँ सेहो देखि सकैत अछि । रातिमे विचरण करबाक कारण रात्रिचर अछिए । इएह अद्भुत गुणसभक कारण मनुक्ख ओकरा भूत-परेतक पर्याय मानैत अछि । कोना करै छै, देखही एकरा, ऊदमति धऽ लेलकैए । की छी ऊद आ केहेन ऊदमति, ककरा धऽ लेलकैए ?? ऊद छी जीव, जमीनक बासी, तइयो छै बड़ पानि प्रिय । पानिमे हेलए, डुम्मी काटए, ओकरा छै बड़ माछ प्रिय ।। देहमे ओकरा बड़ छै फुर्ती, बुट्टी - बुट्टी चमकै छै । की जमीन, की पानिक भीतर, मस्त - मगन ओ रमकै छै ।। बैसि ने रहइछ ओ निचैनसँ, पानिमे करइछ बड़ छलमल । तेँ कहबी छै - ऊदमति धेलकै, जकर मोन बेसी चंचल ।। ऊदमति मोन ने रहए थीर, लगले एम्हर, लगले ओम्हर । जेना “ऊद” ने रहैछ थीर, एखने एम्हर, एखने ओम्हर ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - ऊद वा ऊदबिलाड़ि मुख्यतः स्थलीय जीव अछि आ मीठ पानिक जलाशय सभसँ लऽ कऽ समुद्रक नोनगर पानि धरि भेटैछ । ओ मांसाहारी जीव अछि आ माछक शिकार करबामे बहुत माहिर होइत अछि । ओ पानिमे डुम्मी कटबामे आ गोंता लगएबामे अत्यन्त कुशल होइत अछि । बांग्लादेशमे एकरा पोशुआ बनाए प्रशिक्षित कएल जाइत अछि आ प्रशिक्षित ऊद मनुक्खक लेल नदीमेसँ माछ पकड़ि कऽ आनैत अछि । काठ खोधै छै अपना लोलसँ, कहबै छै तेँ कठखोद्धी । जे धरती पर माटि खोधै छै, से ने बुझियौ कठखोद्धी ।। काठ खोधि बनबइए धोधरि, गाछे - गाछे कठखोद्धी । गाछे नञि लकड़ीक उपस्कर, खाम्हो खोधैछ कठखोद्धी ।। माटिखोद्धी केर पातर लोल, कठखोद्धी केर मोट छै । माटिखोद्धी केर नमगर लोल, कठखोद्धीक किछु छोट छै ।। माटिखोद्धी केर माथक कलगी, पीयर आओर विभक्त छै । कठखोद्धी केर लाले टुहटुह, जँ छै तँऽ संशक्त छै ।।*१ पीठ - पाँखि पर स्वर्णिम पीयर, मूल रंग चितकाबर छै । अपना ठाँ इएह बेसी भेटत, जगक विविधता व्यापक छै ।।*२ चिड़ै छै पर गाछहु पर ओ तँऽ, सरपट दौड़ै - भागै छै ।*३ नाङ्गरिकेँ ओ आड़*४ बना कऽ, टिका गाछ पर बैसए छै ।। लोलसँ ठक-ठक करइत गाछमे, धोधरि सेहो बनाबै छै । अपनहु ओहिमे बास करैए, आ दोसरोकेँ बसाबै छै ।।*५ काठक अन्दरमे जे कीड़ा, परजीवी बनि पैसल छै । तकरा खा कऽ पेट भरए ओ, गाछक जिनगी बढ़बै छै ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - माटिखोद्धी केर माथक कलगी नारंगी-पीयर रंगक ओ अरीय रूपसँ विभक्त होइत अछि । जखनि कि आपना दिशि सामान्य रूपसँ भेटए बला कठखोद्धीक माथक कलगी लाल रंगक होइत अछि आ माटिखोद्धीक कलगीक तुलनामे संशक्त होइत अछि । विश्वक आन भाग मे पाओल जाए बला कठखोद्धीक किछु प्रजातिमे या तऽ कलगी नञि होइत अछि या आन रंगक सेहो होइत अछि । *२ - विश्वमे कठखोद्धीक बहुत तरहक बगए-बानी अछि पर अपना दिशि बेसीतर एहने भेटैछ । *३ - चिड़ै होयबाक बावजूदो ई गाछ पर उदग्र रूपेँ (VERTICALLY) तेजीसँ दौड़ि सकैत अछि । ई एकर विशेषता अछि । *४ - आड़ = गाछ पर अपनाकेछ एक स्थान पर बेसी काल टिकएबाक लेल आ काठ खोधए काल देह हिलए-डोलए नञि ताहि हेतु कठखोद्धी अपन नाङ्गरिकेँ मजगूत आड़ जेकाँ उपयोगमे आनैत अछि । *५ - माटिखोद्धी गाछमे वा काठमे धोधरि नञि बनबैत अछि जखनि कि कठखोद्धी बनबैत अछि । ओहि धोधरिमे पहिने अपने रहैत अछि आ बादमे छोड़ि देला पर ओहि परित्यक्त धोधरिकेँ आन चिड़ै (जेना कि - सुग्गा) वा दोसर कोनहु जीव ओकरा अपन खोंता या घऽरक रूपमे प्रयोग करैछ । *६ - गाछक अन्तः परजीवीक (ENDO PARASITES) रूपमे जे कीड़ा-मकोड़ा गाछमे घुसल रहैत अछि आ गाछक लेल नोकशानदायक होइछ तकरा आ तकर अण्डा ओ बच्चाकेँ कठखोद्धी खा जाइत अछि । एहि तरहेँ कठखोद्धीक पेट भड़ैत अछि आ संगहि गाछ सभक आयुर्दा बढ़ैत अछि । हरियर हरियर चिड़ै छै बैसल । बऽड़क फऽड़ भखै छै बैसल । नञि सुगवा-सीकी ने हरियल । नाम ओकर कह बुच्ची !! *१ लोल ओकर मजगूत लगै छै । ठक् - ठक् गाछक काठ खोधै छै । ठोस लोल आबाज करै छै । छै ने मुदा कठखोद्धी ।।*२ सूर्योदय खन बड़ चहकै छै । मुदा ने तकलासँ भेटै छै । जानि कतए ओ नुका रहै छै । हड़बड़ाए देखि लुक्खी ।।*३ बच्चा हरियर रंग गात छै । चेतन गर्दनि-माथ लाल छै । जहिना बऽड़क फऽड़ - पात छै । नाम ओकर कठसुग्गी ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हरियर रंगक चिड़ै सभमे अपना दिशि सभसँ प्रशिद्ध अछि सुग्गा आ हरियल । सुगवा सीकी सेहो हरियर रंगक होइत अछि । एहि कवितामे वर्णित चिड़ै सेहो हरियर रंगक अछि मुदा एहिठाँ नामित चिड़ै सभमेसँ नञि अछि । *२ - एहि कवितामे वर्णित चिड़ैकेँ मजगूत लोल होइत छै जाहिसँ ओ गाछक काठकेँ खोधि अपना रहबा लेल घऽर बनबैत अछि । सक्कत लोलसँ काठ पर प्रहार करबाक कारणेँ ठक् - ठक् केर स्इष्ट ध्वनि सेहो कर्णगोचर होइत अछि । मुदा तथापि ओ कठखोद्धी नामक चिड़ै नञि अछि । *३ - सूर्योदय खन सूर्य पहिल किरण पड़लाक लगभग एक घण्टा धरि ई चिड़ै खूब जोर - जोरसँ चहचहाइत अछि मुदा गाछक नीचाँ ठाढ़ भए ऊपर तकला पर देखबामे नञि अबैत अछि वा बड्ड मोश्किलसँ गोटेक - दूटा देखाइ दैत अछि । एकर मुख्य कारण ओहि चिड़ै केर रंग अछि जे गाछक पात पर पड़ैत सूर्य किरणसँ हू-ब-हू मेल खाइत अछि । *४ - कठसुग्गीक उपरुका लोलक ठीक ऊपर कड़गर नम्मा केस सदृश किछु संरचना होइत अछि जकरा अंग्रेजीमे बॉर्ब (BARB) कहल जाइत अछि । तेँ कठसुग्गीकेँ अंग्रेजीमे बार्बेट (BARBET) नामक चिड़ै कहल जाइत अछि । कठसुग्गीक कएक टा भेद - प्रभेद अछि जकरा जीवविज्ञानमे अलग-अलग जातिक (Species) रूपमे वर्गीकृत कएल गेल अछि । एहिमेसँ एकटा भेद जे अपना दिशि खूब भेटैत अछि, से अछि लाल माथ बला कठसुग्गी (COPPERSMITH BARBET) जकर वयस्कावस्थामे माथक ऊपर सुन्नर लाल रंगक मुकुट सनक संरचना रहैत अछि । एहने लाल रंगक संरचना गर्दनिपर अगिला भागमे सेहो रहैत अछि । एहि चिड़ै केर बाल्यकालमे एहि तरहक कोनहु लाल संरचना नञि रहैत अछि । एकर रंग आ बगए - बानी भोरुका रौद पड़ैत बऽड़क पातक ओ फऽड़क रंगसँ तेना ने मेल खाइत अछि कि सोझाँ रहितहुँ मनुक्खक आँखिकेँ ता धरि चिन्हबामे नञि आबैत अछि जा धरि ओ कोनहु प्रकारक हलचल नञि करैछ । अपना दिशि बेसी भेटए बला कठसुग्गीक दोसर प्रकार अछि भूरा या मटियाही माथ बला कठसुग्गी (BROWN HEADED BARBET) जकर जीवनकालक कोनहु अवस्थामे गर्दनि ओ माथ पर लाल रंगक कोनहु संरचना नञि होइत अछि । एकर माथ ओ गर्दनिक रंग भूरा या गाढ़ मटियाही रंगक होइत अछि । छी कंकूर - सहोदर, पर हम ओकरासँ किछु छोट छी । नाङ्गरि पातर छोट-क्षीण मोर, ओक्कर तँऽ चौकोर छी ।।*१ कंकूरहि सनि लोल हमर, आ देहक कारी रंग छी । माथ सेहो एकवर्णी कारी, लाल ने ओक्कर रंग छी ।।*२ सालक किछु एहनहु महीना, लोहाक बीझ सनि रंग हमर । देहक चमक बढ़ल - बदलल, हरियर-कारी छी पंख हमर ।।*३ कंकूरक सनि भलहि लोल छी, अलगहि पर सब ढंग हमर । हम नञि भेटब दूर चऽड़मे, पानिक श्रोतक संग हमर ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - करांकुलक अंग्रेजी नाम BLACK NAPED IBIS अछि आ कबारक GLOSSY IBIS, तेँ दुहुमे बहुत नजदीकक सम्बन्ध अछि । तथापि, दुहुमे बहुत किछु भिन्नता सेहो अछि आ तेँ प्राणीशास्त्रक वर्गीकरणमे सेहो दुहु अलग - अलग वंशक चिड़ै अछि । करांकुलसँ कबारक आकार छोट होइत अछि । करांकुलक नाङ्गरि चौकोर होइत अछि जखनि कि कबारक अपेक्षाकृत कम चौकोर ओ छोट । *२ - कबारक आकार-सुकार देखबामे करांकुलहि सनि लागैत अछि । लोलक आकृति सेहो कंकूरहि सनि रहैछ । पर, कबारक माथक ऊपरमे कंकूर जेकाँ लाल रंग नञि रहैत अछि । *३ - सालक किछु महीना एहन होइत अछि जाहिमे कबारक देहक रंग भूरा-कारीसँ बदलि बीझायल लोहाक रंगक (RUSTY COLOUR) आ चमकयुक्त (GLOSSY) भऽ जाइत अछि । दुहु पंखक रंग बदलि कऽ कजरी सनि गाढ़ चमकैत हरियर भऽ जाइत अछि । *४ - करांकुलक विपरीत कबार जलाशयक आस-पासक क्षेत्रमे भेटैत अछि । पानिक श्रोतसँ बेसी दूर ई चिड़ै नञि देखाइ दैछ । एत्तेक मेहनति किएक करै छेँ ? अपन स्वास्थ्य पर ध्यान ने दै छेँ । कारी - झामरि देह भेल छौ, अनमन्न तोँ कंकूर लागै छेँ ।। जे “कंकूर” छै सएह “करांकुर” । इएह “कालकण्टक” आ “करांकुल” । एकरहि उपमा रोजहि बाजथि, तइयो तोँ एकरा ने चिन्है छेँ ।।*१ चिड़ै ई कारी, धुत्थुर - कारी । लेशहि उज्जर, आँखियहु कारी । माथक लाल रंग केर कारण, भ्रमसँ तोँ “लालसर” बुझै छेँ ।।*२ प्रायः छोट झुण्डमे भेटैछ । बाध - बोन आ चऽड़मे भेटैछ । पानिक श्रोतसँ दूरहि देखही, धारक कातमे किएक ताकै छेँ ।।*३ लोल एकर किछु खास लागैत छै । बिनु बेँतक गैंतीसँ मिलैत छै । या फेर तकरहि सनि आकृति छै, जकरा तोँ तरुआरि कहै छेँ ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “कंकूर” केर उपमा अपना दिशि बहुत प्रचलित अछि, पर बहुत कम्महि लोककेँ बूझल अछि जे “कंकूड़ या कंकूर” एक टा चिड़ै केर नाम थिक । किछु लोक “कंकूर” शब्दक उत्पत्ति “कंकाल” शब्दसँ मानैत छथि − शायद ओहो लोकनि सही छथि । सूखि कऽ कंकूर भऽ गेलेँ - कंकालसँ कंकूरक उद्गम दिशि ईशारा करैछ । चिड़ै दिशि ईशारा करैत बाँकी उद्धरण उपरुका कवितामे देल गेल अछि । *२ - बहुत लोक एकर माथ परक लाल रंग देखि “एकरा” भ्रमवश “लालसर” चिड़ै कहैत छथि − से गलत थिक । चिड़ै केर सम्यक जानकारी रखनिहार/-रि लोकनि जनैत छथि कि लालसर आन चिड़ै थिक । *३ - उड़ए बला अधिकांश पैघ चिड़ै कोनहु-ने-कोनहु प्रकारक जलाशयक नजदीकमे भेटैछ । मुदा, करांकुल प्रायः जलाशयसँ बहुत दूरक घासयुक्त मैदानी क्षेत्रमे भेटैत अछि । कखनहु - कखनहु जलाशयक आस - पास सेहो भेटि सकैत अछि । *४ - एकर लोल केर आकृति विशिष्ट प्रकारक होइत अछि जे कि देखबामे बिना बेंतक गैती (PICK AXE) या फेर भीतर दिशि वक्रित तरूआरि (INWARD CURVED SWORD) सनि लागैत अछि । घूसल रहैछ किताबहिमे, ओ तँऽ छै “किताबी कीड़ा” ।*१ एहिना नञि ई कहबी बनलै, जञो कहबी, तँऽ कीड़ा ।।*२ बहुतहि दिनसँ राखल जे, पुरना किताब जञो फोलब । फोलितहि उज्जर छोट-क्षिण, कीड़ाकेँ भागैत देखब ।। माछक छी आकार ओकर, माछहि सनि ध्रुव दुहु नोकगर । बीचमे छी फूलल - फूलल, पएरक लगाति छै चौड़गर ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीक एक टा पुरान कहबी । *२ - ओना तँऽ कतेकहु तरहक कीड़ा किताबकेँ नोकशान पहुँचबैत अछि । पर ई विशिष्ट कीड़ा किताबी कीड़ाक नामेँ प्रशिद्ध अछि । *३ - एहि कीड़ाक देह कतेको खण्डमे विभक्त रहैत अछि आ जाहि खण्डसँ खोकर पएर जुड़ल रहैत अछि से सबसँ बेसी चौड़गर होइत अछि । कोइली कोइली सभ बजैत छी, पर के - के छी देखने ? *१ एक्कहि संगे बाजि उठल सभ, कोइली हम छी देखने ।। जोतला खेतमे वा पड़तीमे, पानि जतए छै लागल । कारी - कारी बहुते कोइली, नाङ्गरि बीचसँ काटल ।।*२ नञि बौआसभ आ बुच्चीसभ, ओ तँऽ छी धनछुआ । कारी - कोइली, कारी - कौआ आ करिया - धनछुआ ।। कोइली चिड़ै प्रवासी छै ओ दूर देशसँ आबए । भरि बसंत रहि, बरखा बादहिं, पुरना देश ओ भागए ।।*३ अबितहिं एहिठाँ गाछीमे ओ कू - कू राग अलापए । मज्जर, टिकला, आमक संग-संग ई आबाज हर्षाबए ।। ऊँच गाछ पर घनगर पातक बीच नुका कऽ बैसए । तेँ मनुक्ख आबाज सुनए बस, कोकिल-छवि ने देखए।। कोइली खोंता नञि बनबए, कौआ बनबैतछि खोंता । कोइली ताहिमे अण्डा पाड़ए, कौआ संग छै धोखा ।।*४ कौआ फरक ने बूझि पाबए, अपना - आनक अण्डामे । अण्डे नञि, ओ पोषए - पालए कोइलीयोक बच्चाकेँ ।। पाँखि उगल बच्चा उड़ि भागल, अपना झुण्डक संगे । कौआ मूर्ख बनल कानैत अछि, दुनिञा रंग - बिरंगे ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ मैथिलीमे, कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । *२ - धियपुता सभ (आ किछु पैघ लोक सभ सेहो) कारी रंगक कारण भ्रमवश “करिया धनछुआ”केँ (BLACK DRONGO) कोइली कहि दैत छथि । *३ - देश = राजनैतिक सीमासँ अलग देश होयब जरूरी नञि = दूरस्थ स्थान वा भिन्न जलवायुबला क्षेत्रक द्योतक *४ - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि । अंग्रेजीक CUCKOO शब्द बहुत व्यापक अछि । एहि अन्तर्गत कोइली, पपीहा आदि बहुत रास गाबय बला चिड़ै सभ अबैत अछि । एकरा अन्तर्गत अंग्रेजीक KOEL / TRUE CUCKOO आ INDIAN CUCKOO शब्दसभसँ बोध होइबला चिड़ैसभकेँ राखब बेशी उचित होयत जे जीव-विज्ञानमे क्रमशः Eudynamys आ Cuculus वंशसभक (GENERA) सदस्य पक्षी अछि । ई दुनु तरहक चिड़ै भारतमे सेहो प्रायः हर भागमे पाओल जाइत अछि । ऊपरुका चित्रमे देखाओल कोइली Eudynamys वंशक अछि । सभ प्रकारक कोइली मे मात्र नर कोइलीये टा गबैत अछि संगहि पुरुष/नर-कोइलीक रंग कारी या अपेक्षाकृत गाढ़ रंगक होइत अछि तथा मादा/स्त्री-कोइली अपेक्षाकृत हल्लुक या कम गाढ़ रंगक होइत अछि । केहेन अजगुत जीव ! − पहिरने “सूट - सफारी” । लागय सेना केर वर्दीमे भागल वर्दीधारी ।।*१ नाकक ऊपर सिंघ एगो या दूगो*२ छै जनमल ।*३ सिंघक*४ वार - प्रहार जेना तरुआरिक सनकल ।।*५ बास ओकर, घास संगहि क्षेत्र दलदली ।*६ देखितहिं देरी सिंहहुमे मचि जाइछ खलबली ।।*५ घासहि खा कऽ जिबैत अछि ई जीव शाकाहारी । निर्मम वध कऽ रहल एकर सिंघ केर व्योपारी ।।*७ भारत केर उत्तर आ पूब दिशि एकरहि राज छै । काजीरंगा - जलदापाड़ा - दुधवामे सोराज छै ।।*८ नेपालक परसा - चितबन - बर्दिया भूटानमे । भारतीय गेंड़ा बाँचल छै, एहने किछु सुठाममे ।।*८ कहियो सौंसे बास छलै - सिन्धुसँ दिहांग धरि ।*९ आब तँऽ बूझू बाँचल छै बङ्ग ओ असाम धरि ।। एकसिंघी भारत - नेपाल - भूटान आ जावा । दूसिंघी - गेंड़ा भेटैतछि अफ्रिका - सुमात्रा ।।*१० संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - गेंड़ाक शरीर पर चमरीक मोट सुरक्षात्मक स्तर होइत अछि जकर मोटाई डेढ़सँ पाँच सेन्टीमीटर धरि भऽ सकैत अछि । *२ - “एगो” आ “दूगो” क्रमशः “एक गोट” आ “दू गोट” केर संक्षिप्त रूप थिक । ठीक तहिना जेना कि अंग्रेजीक RHINO शब्द RHINOCEROS केर संक्षिप्त रूप । *३ - गेंड़ाक नाकक ऊपर एक या दू टा सिंघ होइत अछि । *४ - श्रृंग (तत्सम) > सिंग (अर्ध तत्सम) > सिंघ (तद्भव), संगहि एकसिंगही = एकसिंघी = एक सिंग/सिंघ बला । सिंघ शब्द सिंह केर तद्भव स्वरूपमे सेहो प्रयुक्त होइत अछि । एहि तरहेँ सिंघ शब्द मैथिलीमे तद्भव शब्द भेल आ अनेकार्थक शब्द सेहो कारण एकर दू टा भिन्न अर्थ होइत अछि - पहिल श्रृंग (HORN) आ दोसर सिंह (LION) । *५ - सिंघ केर उपयोग गेंड़ा अपन सुरक्षा लेल करैत अछि । सिंघ जखन पैघ भऽ जाइत अछि तँऽ ओ एतेक मजगूत भऽ जाइत अछि कि ओकर प्रहारसँ गेँड़ा कोनहु मजगूत गाछकेँ सेहो तोड़ि सकैत अछि । एहि सिंघक प्रहारसँ बाघ - सिंह सेहो डऽर मानैत अछि । *६ - गेंड़ा शाकाहारी प्राणी अछि । दलदली क्षेत्र जकर आस - पास घासक प्रचूरता हो − से गेंड़ाक प्राकृतिक आवास क्षेत्र होइत अछि । *७ - गेंड़ाक सिंघ केर तश्करी होइत अछि आ ताहि कारणेँ ओकर निर्मम अवैध हत्या कएल जाइत अछि । *८ - भारतीय गेंड़ा पहिने सम्पुर्ण उतरबारी भारतक जंगलमे पाओल जाइत छल पर आब सिर्फ किछु सुरक्षित अभ्यारण्य या निकुञ्जमे बाँचल अछि । *९ - “दिहांग” नदी - अरुणाचल प्रदेशमे “ब्रह्मपुत्र” नदी केर नाँओ । *१० - भारत, नेपाल, भुटान, म्यांमार आ जावामे प्राकृतिक रूपसँ पाओल जाए बला गेंड़ाक नाकक ऊपर मात्र एक टा सिंघ होइत अछि जखनि कि अफ्रिका महादेश आ सुमात्रामे पाओल जाए बला गेंड़ाक नाकक ऊपर दू टा सिंघ होइत अछि । दू आखर हुनिका लेल जनिका “सिंग” केर एवजमे “सिंघ” नञि रुचैत हो - “सिंग” सही कि “सिंघ” ? - एहि तरहक प्रश्न करब अनुचित । भाषाशास्त्री लोकनिक एहि तरहक प्रश्न गलत ओ अपुर्ण अछि । प्रश्न होयबाक चाही कि “सिंग” आ “सिंघ” जँ दुहु मैथिलीक शब्द थिक तँ ओहिमे भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोणसँ की अन्तर ? अथवा, प्रश्न होयबाक चाही कि ओ दुहु शब्द भाषाशास्त्रक कोन आधार पर मैथिलीक शब्द भेल ? (एहि प्रश्नक उतारा हम ऊपरमे देबाक प्रयास कएल अछि) । हम आओर अहाँ अपना मान्यताक आधार पर के होइत छी सही-गलत केर प्रमाण पत्र देनिहार ? मैथिलीक जँ वास्तवमे हित चाहैत छी तँऽ मैथिलीक भाषाशास्त्री ओ व्याकरणाचार्य लोकनिकेँ आन भाषाक भाषाशास्त्री ओ व्याकरणाचार्य लोकनि जेकाँ “एकहरबा वा एकढ़बा” बनबाक स्थान पर समावेशी होअए पड़तन्हि । ठीक तहिना जेना अंग्रेजी मे COLOUR सेहो सही अछि आ COLOR सेहो सही । LEUCOCYTE सेहो सही अछि सेहो LUCOCYTE सही आ LUKOCYTE सेहो सही । आनहु भाषा यथा हिन्दी, भोजपुरी, मगही, मराठी, बाङ्ग्ला आदिमे ई समावेशी नीति अपनाओल जा रहल अछि । यथा हिन्दीक एकटा उदाहरण नीचाँक दुहु चित्रमे देखू - केओ कहैत छथि हम मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दकेँ मैथिली मानैत छी । केओ कहैत छथि हम मात्र “स” कें मैथिली बुझैत छी “श” आ “ष” केँ नञि । यौ (अओ,औ), अहाँक अहाँक मानब ओ बूझब अहाँक अप्पन मोनक बात छी, ओ सभ पर नञि थोपल जा सकैत अछि । जँ सएह करबाक छल तँऽ कथी लेल “मैथिली वर्णमाला”केँ मैथिली व्याकरणमे स्तान देल आओर किएक किएक पढ़बेत छिऐ जे उद्गमक आधार पर शब्द मुख्यतः चारि प्रकारक होइत अछि - तत्सम, तद्भव, देशज ओ विदेशज । कोनहु जिबैत भाषा सतत प्रवाहमान नदी जेकाँ होइत अछि । ओएह नदी जिबैत अछि जे सतत प्रवाहमान होइत अछि आ अपना दुहु किनाराक माटिकेँ काटि अपनामे भँसिआ, अपना धारक संग बहा आगाँ बढ़बाक सामर्थ्य रखैत अछि । जाहि नदीमे से सामर्थ्य नञि ओ क्रमिक रूपेँ सूखाए जाइत अछि आ अन्ततः मृत भऽ जाइत अछि । कोनहु जिबैत भाषाक व्याकरण सतत समावेशी होइत अछि आ कालक्रमेण धीरे-धीरे ओहिमे किछु-किछु सकारात्मक परिवर्तन होइत रहैत अछि । शेक्सपियरकालसँ एखन धरिक अंग्रेजी व्याकरणक अध्ययन अपने कऽ सकैत छी । ई की छियै ? − घियारी छै । कीड़ा कोन ? − घियारी छै । माटिक सुन्नर घऽर आ घऽरक बासी - दुहु घियारी छै ।।*१ कुम्हरा भेम्ह छी एकरे नाम । बौका भेम्ह कहए किछु ठाम । भेम्हसँ भम्हरा नञि बुझू, ई ओहिसँ अलग घियारी छै ।।*२ कोन प्रयोजन ? − रहबा लए । अण्डा - बच्चा पोषबा लए । बहुबिध छैक “घियारी-कीड़ी”, तेहने “घऽर-घियारी” छै ।।*३ पैघ घियारी − फूल चूसैए । अण्डा - बच्चा एतए रहैए । ठूसल मारि पचहिया-बिढ़नी, ई कोन बात नियारी छै ।।*४ अण्डासँ निकसल बच्चा । जिउतै ओहि बिढ़नीकेँ खा । पैघ हैत, उड़ि जैत फेर ओ, जाहि ठाँ फूल-कियारी छै ।।*४ माटि सानि थूकेँ बान्हल । या अधपच काठक ठानल । निर्माणक साहित्य विविध छै, बहुविध रूप घियारी छै ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - साधारणतः एहि तरहक माटिक कलाकृतिकेँ आ ओकरा बनबएबला कीड़ा या कीड़ी दुहुकेँ “घियारी” कहल जाइत अछि । भ्रम नञि हो तेँ एहि तरहक कीड़ाकेँ “घियारी कीड़ा” या “घियारी कीड़ी” कहल जा सकैत अछि । *२ - “घियारी कीड़ा” या “घियारी कीड़ी” केँ बहुत ठाम “कुम्हरा भेम्ह” कहल जाइत अछि । भेम्ह नाम होयबाक कारणेँ एकरा भम्हरा (भँवरा) नञि बूझल जाए । ई भम्हरासँ (भँवरासँ) एकदम्मे भिन्न अछि । उकाठी कएला पर कटबाक प्रवृत्तिक कारण सम्भवतः एकरा संगे “भेम्ह” शब्द जुड़ल अछि । भम्हरा (भँवरा) जेकाँ उड़बा काल भम्-भम् केर आबाज नञि होयबाक कारण एकरा “बौका भेम्ह” सेहो कहल जाइत अछि । *३ - विश्वमे घियारी किड़ीक बहुते प्रकारसभ अछि तहिना ओकरा द्वारा बनाओल गेल घऽर (घियारी) केर विविध रूप - रंग । अंग्रेजीक MUD DAUBER WASP केर अधिकांश जाति आ POTTER WASP / MASON WASP सभ घियारी शब्दक अन्तर्गत आबैछ । एहि तरहेँ करीब 200 (दू सए) वंशक (GENERA) 3200 जातिक (SPECIES) समावेश घियारी किड़ीक रूपमे अछि । *४ - वयस्क घियारी कीड़ी एहि घियारीरूपी घऽरमे नञि रहैत अछि । स्त्री घियारी किड़ी एहि घऽरकेँ बनबैत अछि । ओहिमे अण्डा दैत अछि । अण्डा देबासँ पहिने ओहिमे जीविते बिढ़नी आ पचहियासभकेँ अपन दंशसँ अपाहिज कऽ कऽ ठूसि दैत अछि । घियारी किड़ीक अण्डासँ जखन बच्चा निकलैत अछि तँऽ ओ सभ एहि बिढ़नी आ पचहियासभकेँ खा कऽ पैघ होइत अछि । पैघ (वयस्क) भेला पर ओसभ ओहि घियारीकेँ छोड़ि भागि जाइत अछि आ फूलक रस पिउबि अपन शेष जिनगी निमाहैत अछि । सम्भवतः इहो एकटा कारण थिक जे एकर मैथिली नामक संग “भेम्ह” शब्द जुड़ल अछि । *५ - किछु घियारी माटिकेँ घियारी कीड़ी अपन थूकमे (SALIVA,लेर) सानि कऽ बनबैत अछि, तेँ “कुम्हरा भेम्ह” नाम पड़ल । किछु घियारी किड़ी घियारी बनएबाक लेल अधपच काठक (SEMI DIGESTED CELLULOSE, अर्धपाचित काष्ठ) प्रयोग करैछ । चुट्टी सनि छी वा चुट्टी छी, चुट्टीसँ किछु भिन्नहु छी । चुट्टा सनि छी रूप मुदा, संतोला रंगक ई छी ।।*१ आम या जामुन केर गाछ पर, रहइछ प्रायः सोहरल । जखने केओ चढ़ैछ गाछ पर, ओकरा देहमे लुधकल ।। आमक गाछक पात सीबि कऽ, गोल - गोल खोंता बनबए । चुट्टा सनि ई जीव छी घोरन, आ “घोरन छत्ता” बनबए ।।*२ अपना देशक वन्य भागमे, जन - जातिक आहार थिकै । भुजिया चटनी बहुत चहटगर, अम्मत खटगर स्वाद थिकै ।।*३ पात सीबैछ, तेँ अंग्रेजीमे, ‘वीवर ऑण्ट’ छै नाम ओकर । ‘ग्रीन’ माने जंगल सेहो होइए, ‘ग्रीन ऑण्ट’ सेहो नाम ओकर ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मोटा-मोटी जँ देखी तँऽ घोरन सेहो चुट्टीएक (चुट्टीअहिक) प्रभेद छी, मुदा तथापि अपन विशिष्टताक कारणेँ ई चुट्टीसँ फराक छी । *२ - आम, जामुन आदि गाछक स्वस्थ पातकेँ सीबि (सिउबि) कऽ घोरन रहबाक लेल घऽर बनबैछ जकरा “घोरनक छत्ता” (COMB OF A WEAVER / GREEN ANT) कहल जाइत अछि । सिउब = सीअब वा सीयब; सिउबैछ = सीबैछ । *३ - अपना देशक जनजातिय भागमे आ विश्वमे आन बहुतहु ठाम घोरनकेँ भूजि कऽ वा चटनी बनाए कऽ वा आन तरहेँ खाएल जाइत अछि । *४ - पात सीबि कऽ छत्ता बनएबाक कारण अंग्रेजीमे एकरा “वीवर अण्ट” (WEAVER ANT) आ गाछ पर रहबाक कारण “ग्रीन अण्ट” (GREEN ANT) कहल जाइत अछि । एहि ठाम ग्रीन (GREEN) केर मतलब हरियर रंग नञि अछि अपितु जंगल अछि । साम - चक, साम - चक, चक माने की ? *१ चकसँ चकेबा − से बुझही ।। चकबा - चकेबा एक्कहि बात । संस्कृतमे कहबए चक्रवाक ।।*२ एकरे नाम छी ब्राह्मिणी हंस । कर अबाज जेना करइछ हंस ।।*३ चक्रबद्ध निकसए छै अबाज । तेँ कहबैछ ओ चक्रवाक ।।*४ सामा दाइकेँ पड़लन्हि श्राप । तेँ ओ भए गेलीह चक्रवाक ।।*१ ई छी एकटा चिड़ै केर नाम । बसए चिड़ै जे दोसर ठाम ।।*५ उत्तर - भर ठण्ढा जे प्रदेश । ततहिसँ आबए अपना देश ।।*५ ठण्ढीमे आबए एहि ठाम । शान्त जलाशय कर विश्राम ।। कोशीक कछेड़, कोशी बैराज । एकर प्रिय - स्थली - प्रवास ।।*६ कहुखन बड़का पोखरि बीच । पानिमे बत्तख सनि ई जीव ।।*६ रातिमे विचरए सर्वाहारी । लोल पछलुका पाँखि छै कारी ।।*७ स्वर्णिम बिचला देह आ पाँखि । उज्जर गर्दनि कारी आँखि ।।*७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - संदर्भ पाँती − “साम-चक, साम-चक अबिहऽ हे” − मिथिलाक विशिष्ट पाबनि “सामा - चकेबा”सँ । एहि पाबनिक कथामे सामा दाइ श्रापक कारण चकेबा चिड़ै भऽ गेल छलीह । *२ - तत्सम “चक्रवाक” केर तद्भव रूप अछि “चकबा” या “चकेबा” । *३ - हंस सनि आबाज निकालबक कारण एकरा संस्कृत साहित्यमे “ब्राम्हिणी हंस” सेहो कहल गेल अछि । *४ - चकेबाक ई हंसवत आबाज चक्रबद्ध रूपमे नकलैत अछि (A SERIES OF LOUD NASAL HONKING NOTES/CALL) तेँ संस्कृतमे एकर नाम पड़ल “चक्रवाक” (चक्र = चक्रबद्ध तथा वाक् = बोल/आवाज) । *५ - मिथिला सहित सम्पुर्ण भारतवर्षमे चकेबा प्रवासी पक्षी (MIGRATORY BIRD) केर रूपमे आबैत अछि । एकर मूल स्थान उतरबारी एशिया (रूसक साइबेरिया क्षेत्र) आ दच्छिन-पूब यूरोप अछि जाहि ठाम सालहु भरि भारतक अपेक्षा मौसिम ढण्ढा रहैत अछि । ठण्ढीक समयमे ओहि क्षेत्रसभमे असहनीय ढण्ढी पड़बाक कारण ई चिड़ै पड़ाए कऽ वा प्रवास कऽ हिमालय केँ नाँघि भारतीय उपमहाद्वीपमे आबैत अछि आ एहि ठामक पैघ ओ मीठ पानिक जलाशयसभमे, वा शान्त बहैत नदीक कछेड़ वा बाढ़िक पानिसँ बनल दलदली क्षेत्रसभमे देखल जा सकैत अछि । नेपाल स्थित कोशी-बैराजमे कोनहु एक समयमे एहि चिड़ै केर उपस्थिति चारि हजार (4000) धरि देखल गेल अछि । *६ - पानिमे हेलैत काल ई स्वर्णाभ-पीयर पाँखियुक्त बत्तख सनि लागैत अछि । कहुखन - कहुखन सिल्ली जेकाँ सेहो लागैत अछि पर चकेबा आ सिल्ली दुहु दू चिड़ै केर नाम थिक । *७ - एकर लोल आ पछिला नाङ्गरि परहक पाँखि कारी होइत अछि । शेष पाँखि ऊपर सँ स्वर्णाभ-पीयर आ भीतरसँ उज्जर होइत अछि । वक्ष तथा उदर सेहो स्वर्णाभ-पीयर रहैत अछि । माथ, गर्दनि आ मुख्य पंखक पछिला हिस्सा प्रायः उज्जर सनि रहैत अछि । नाङ्गरि/लाङ्गरि आ नाङ्गर मैथिलीमे श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द अछि - नाङ्गरि/लाङ्गरि - पूँछ (TAIL) नाङ्गर - प्रायः एक पएरसँ विकलाङ्ग (HEMIPARESIS / HEMIPARALYSIS / HEMIPLEGIC); दुहु पएरसँ विगलाङ्ग तथा चलबा वा ठाढ़ हएबामे असमर्थ “लोथ” (PARAPARESIS / PARAPARALYSIS / PARAPLEGIC) कहल जाइत अछि । अहाँ नील गगन केर चन्दा, हम छी धरतीक चकोर । गाबै छथि ई गीत भाइजी, भऽ कऽ बड़ भाव-विभोर ।।*१ शायद जिनगीमे भैय्या, देखल ने कहियो चकोर । जँ देखता तँऽ फेर ने कहता, हम धरतीक चकोर ।।*२ रातिमे बैसल एकटक चानकेँ, देखल करैछ चकोर । साहित्यक छी कोर−कल्पना, साँच ने एहिमे थोड़ ।।*३ छोट लोल आ छोटकी मूरी, बड़की टा केर पेट छै । छोटकी दूटा पाँखि उड़ए नहि, सौंसे देह बस पेट छै ।।*२ तित्तिर बटेर सनि लड़ैछ ईहो, करैछ मनुक्खक मनोरंजन । इएह कारणेँ राष्ट्र-चिड़ै कहि, पाक करैतछि अभिनन्दन ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ *२ - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक उपमा-उपमेय रूपी उदाहरण प्रसिद्ध अछि । ओहने एकटा गीत केओ भाइसाहेब गाबैत छलाह आ ताहि पर आँगनक छोट मुदा नटखट भाए-बहीन सभक ई कटाक्ष भरल उक्ति अछि । ओ सभ गीतक भाव नञि बूझि शाब्दिक अर्थकेँ ध्यानमे राखि कटाक्ष कऽ रहल अछि जे चकोरक तँऽ सौंसे देहमे खाली पेटे छै तखन भाइजी ओकरा अपनासँ तुलना कोना कऽ रहल छथि; शायद भाइजी कहियो चकोर नञि देखने छथि । *३ - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक जे खिस्सा-पिहानी बताओल गेल अछि से बस साहित्यिक प्रलाप थिक । ओहिमे वास्तविकता लेशमात्रो नञि अछि । *४ - बटेर आ तित्तिर जेकाँ चकोर केर लड़ाएब सेहो किछु समुदायमे प्रसिद्ध अछि । तेँ ओ मनोरंजक पक्षीक श्रेणीमे आबैत अछि । पाकिस्तानक ओ राष्ट्रिय चिड़ै अछि । टि - टि - टि - टि बाजए टिटही । एम्हर - ओम्हर भागए टिटही ।। माथ - वक्ष - गर्दनि छै कारी । दुहु दिशि उज्जर छै एक धारी ।। टाङ्गक रंग छै टुहटुह पीयर । नाङ्गरि कारी, लोलहु पीयर ।। शेष शरीर पिरौंछे - भूरा । आँखिक परितः लाल कि पिउरा ।।*१ ओना तँऽ बहुतहु छैक प्रकार । विविध रूप ओ रंग - आकार ।।*२ अपना दिशि जे सुलभ भेटैछ । बेसीतर एहेनहि रहैछ ।।*३ कहबी - “टिटही टेकल पर्वत” । कारण चिड़ै ई बहुतहि सजग ।।*४ कनिञो खतरा भेल आभास । उड़ि भागल टिटही ओहि चास ।। जाइत - जाइत ओ करैछ सचेत । टि - टि - टि खतरा - संकेत ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - परितः = चारू कात । आँखिक चारू कात आ गलचर्म लाल अथवा पीयर होइत अछि । *२ - टिटही शब्दसँ बहुत व्यापक चिड़ैसमूहक बोध होइत अछि । एहि शब्दसँ अंग्रेजीक LAPWING आ SANDPIPER समूहक चिड़ैसभक बोध होइत अछि । *३ - एहि कवितामे अपना दिशि बेसी भेटए बला टिटहीक वर्णन अछि जे कि LAPWING समूहक सदस्य अछि । *४ *५ - अपना दिशि कहबी छै - “टिटही टेकल पर्वत” । लोक कहैत छै जे टिटही अपन पएर उपर कऽ कऽ सुतैत अछि आ ओकरा होइत छै कि ओ अपना पएरसँ पर्वतकेँ उठओने अछि । पर ई बात बस सत्य नञि । वास्तवमे टिटही बहुत सजग चिड़ै अछि । कोनहु खतरा केर आभास भेला पर ओ तुरन्त ओहि ठामसँ उड़ि भागैत अछि आ संगहि टि-टि-टि-टि आवाज निकालि आस - पासक आनहु चिड़ैसभकेँ खतरासँ सावधान कऽ दैत अछि । सम्भवतः तेँ उपरोक्त कहबी बनल होयत । कड़रिक सितुआ या कड़रिक शितुआ या जोंकती (बाल कविता) कड़रिक ऊपर सितुआ चोख ।*१ कड़रिक थम्ह पर सितुआ चोख ।*२ कड़रि - कदलि - केरा भेल अर्थ, केरा पर किए सितुआ चोख ?? *३ केराक फऽड़ ने, केराक थम्ह, आशय छी − केरा केर गाछ ।*२ ताहि केरा केर गाछक ऊपर, खुरचनि चलबय केर की काज ?? *३ खुरचनि - सितुआ धार - नदीसँ, केरा गाछ कोना पहुँचल ? नञि पहुँचल तँऽ कोना कड़रि पर, दाँत ओकर भऽ गेल धारगर ?? *४ खुरचनि - सितुआ आन जीव आ कड़रिक सितुआ आन थिकै ।*५ दुहु जीवमे छी बड़ अन्तर, की जँ एक्कहि नाम भेलै ?? कड़रिक सितुआकेँ रओ बौआ, खुरचनि - ढाकन नञि होइ छै ।*६ छाहरियुक्त माटि जे भीजल, ताहि ठाँ कड़रिक सितुआ छै ।। भाँति-भाँति छै कड़रिक सितुआ, एक्कर छै साम्राज्य बड़ी - टा । सभहक देह बहुत छै कोमल, रौद - नूनसँ भागय उनटा ।। प्रायः देह एकर छै नमगर, मूड़ी पर छै दू संस्पर्शक । कतोक जीव केर छै आहार ई, मुदा मनुक्ख एकर ने भक्षक ।।*७ छाहरिमे जे गाछ उगैतछि, तकर देहमे पानि बहुत । ओकरहि खा कऽ अछि जिबैत ई, करैछ तकर तेँ हानि बहुत ।।*८ एहने गाछ छी केरा केर आ लत्ती - फत्ती सजमनि केर । स्वयं जीव कोमल छी तइयो, भक्षक कोमल तरुगण केर ।।*९ तेँ कहबीमे केरा - कदुआ, अबल - दुबल पर्याय बनल ।*९ मुदा छगुन्ता, कड़रि आ खुरचनि, कोना एक पर्याय बनल !!*१० जोंक जेकाँ नमरैत चलैत अछि, मुदा ने जन्तुक खून चुसैत अछि । चलबामे सादृश्य छै किछु तेँ, “जोंकती” सेहो लोक कहैत अछि ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीक एकटा पुरान कहबी । कड़रि = कदलि = केरा । *२ - उपरोक्त कहबीक समानार्थी अपरूप । “कड़रिक थम्ह” संकेत करैछ जे एहि कहबीमे “कड़रि” माने केराक फऽर नञि अपितु केराक गाछ अभिप्रेत अछि । *३ - जँ एहि कहबीक “शितुआ”केँ खुरचनि मानैत छी तँऽ प्रश्न ई उठैत अछि जे कड़रिक थम्ह पर खुरचनि चलएबाक की प्रयोजन ? *४ *५ - जँ जिबैत खुरचनि (अर्थात खुरचनि सितुआ) केर बात करी तँऽ ओ नदी वा धारक पेनीमे रहैत अछि । आ केरबन्नी वा केराबाड़ी धरि पहुँचबाक कोनहु सम्भावना नञि । आ जँ बाढिक पानिक संग ताहि ठाम पहुँचिअहु गेल तँऽ केरा गाछकेँ नोकशान नञि पहुँचाए सकैछ । तेँ “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” निश्चितहि दू अलग-अलग तरहक प्राणी वा प्राणी समूह थिक । *६ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । “खुरचनि सितुआ” (FRESHWATER BIVALVE MOLLUSCS) पानिमे रहएबला जीव अछि, पानिअहिसँ भोजन तथा ऑक्सीजन प्राप्त करैछ आ बाहरसँ दूटा ढाकन सदृश कठोर अवयवसँ बनल सम्पुटसँ आवृत्त रहैछ । मुदा, “कड़रिक सितुआ” (GASTROPOD / UNIVALVE PULMONATE MOLLUSCS) जमीन पर रहएबला जीव अछि तथा ओ ऑक्सीजनकेँ सीधे वायुमण्डलसँ अपन श्वसन छिद्र वा न्यूमोस्टोम (PNEUMOSTOME) नामक अंग द्वारा ग्रहण करैछ । “कड़रिक सितुआ” जमीन पर छाहरियुक्त ओ नम स्थान पर रहैत अछि तथा ताहि ठामक वनस्पतिसभकेँ हराशंखहि जेकाँ बड़ क्षति करैछ । कड़रिक सितुआकेँ ऊपरसँ देखला पर ओकर शरीर पर प्रायः कोनहु कवच (SHELL / EXOSKELETON) नञि रहैत अछि मुदा उपरुका चामक नीचाँमे एकटा छोट-क्षिण अन्तः कवच (VESTIGIAL INTERNAL SHELL / EXOSKELETON) रहैत अछि जे कि ओकर शरीरकेँ पुर्ण रूपेँ नञि झाँपि सकैत अछि । *७ - “कड़रिक सितुआ”क भक्षण प्रायः मनुक्ख नञि करैत अछि, जखनि कि मिथिलाक जनजातीय समूहक लोक सभ “खुरचनि सितुआ”क भक्षण डोका आ घोंघरी आदि सदृश करैत अछि । *८ - छाहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदि केर भक्षण कए कड़रिक सितुआ अपन पेट भरैत अछि । *९ - छहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदिकेँ दुर्बल वा कमजोर मानल जाइत अछि कारण जे ओहि तरहक गाछ बिरिछमे पानिक मात्रा बहुत बेसी रहैत अछि आ मजगूत काठ नञि रहैत अछि । तेँ मिथिलामे एकटा कहबी आओरहु अछि - “अबल दुबल पर सितुआ चोख” । *१० - एहि प्रकारेँ निम्न चारू कहबी समानार्थी अछि - कड़रिक ऊपर सितुआ चोख कड़रिक थम्ह / गाछ पर सितुआ चोख अबल दुबल पर सितुआ चोख कदुआ ऊपर सितुआ चोख मुदा आश्चर्यक बात जे मिथिलाक जन-सामान्य ओ विद्वत-लेखक वर्गमे सेहो दूनू सितुआकेँ खुरचनि बूझल जाइत अछि जखनि कि लोक साहित्यक सूक्ष्म अवलोकनसँ स्पष्ट संकेत भेटैछ जे दुहु दू प्रकारक जीव थिक । २. खुरचनि सितुआ या खुरचनि शितुआ (बाल कविता) कड़रिक सितुआ बुझू ने हमरा, हम छी खुरचनि - सितुआ ।*१ हम ने केरा - सजमनि नाशक, निर्धन केर पेटभरुआ ।।*२ सीप सनक हमरहु दू - ढाकन, “खुरचनि” तकरहि नाम । हम छी कोमल जीव, हमर छी कवचक “खुरचनि” नाम ।।*३ पोखरि - धार - नदी - डबरा केर, पेनीमे अछि बास हमर । हम नञि धरती पर फिरैत छी, पानिमे चलइछ साँस हमर ।।*४ मनुख जे निर्धन, नहि उपाए किछु, तकर प्राण-रक्षक हम छी । आहूत बनि स्वयं, पेट भरी हम, नञि जजाति-भक्षक हम छी ।।*२ खतड़ा देखितहिं अपन कवचमे, नुका रहैत छी हम बैसल । जिबितहि हमरा उसीनि दैत छी, तइयो हमरा नञि चिन्हल ।। कोना कहैत छी कड़रिक सितुआ, अबल - दुबल पर सितुआ चोख ? हम तँऽ छी निर्बल केर रक्षक, तकरा पेटक आगिक तोष ।।*५ आन ठाम दुनिञाभरि सौंसे, हमर बहुत व्यञ्जन अछि । अपन देश, ने जानि किए, पर हमर बहुत गञ्जन अछि ।। हमर खोल खुरचनि केर जगमे, बहुतहि छी उपयोग । “बटन” बनैत छल एहिसँ पहिने, बहुविध आन प्रयोग ।। दूध आ घी केर डाढ़ी पहिने, खुरचनिसँ खोखरैत छलहुँ । रगड़ि - भूर कऽ बीच भागमे, काँच आम सोहैत छलहुँ ।। चित्रकार खुरचनिमे पहिने, रंगक करथि मिलान । पएर - मँजना केर रूपमे सेहो, हम्मर छल बड़ माँग ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । *२ - “खुरचनि सितुआ” लत्ती, साग आ छाहरियुक्त जमीन पर उपजएबला आन कोनहु तरहक /कोमलन गाछ-बिरिछकेँ कोनहु ञि पहुँचेबैत अछि । *३ - मोलस्का समुदाय (PHYLUM - MOLLUSCA) केर एहेन समस्त प्राणी (चाहे समुद्रमे रहए किंवा नदी-धार आदिमे) जे दू गोट ढाकन सदृश ठोसगर संरचनाक सम्पुटमे बन्न रहैत अछि मैथिलीमे “सीप” (BIVALVES / BIVALVE MOLLUSCS / BIVALVE MOLLUSKS) कहबैत अछि । सीपक दूनू ढाकन वा पट एक कातसँ एकटा स्नायु (LIGAMENT) द्वारा परस्पर जुड़ल रहैत अछि जे कब्जा (HINGE) जेकाँ काज करैछ । एहि कब्जाक कारणेँ सीपक दूनू ढाकन एक दिशिसँ परस्पर जुड़ल रहैत अछि आ दोसर दिशिसँ जीवक इच्छानुसार फुजि सकैत अछि । एहि प्रकारेँ खुरचनि सितुआ (UNIOES) सेहो व्यापक रूपेँ एकटा सीपहि अछि जकर दूनू ढाकनकेँ मैथिलीमे “खुरचनि” नाँओसँ जानल जाइत अछि । *४ - “खुरचनि सितुआ” नदी, धार, पोखरि आदिक पेनीमे माटि वा बालुमे आधा धँसल रहैत अछि । एकर शरीरमे दूटा नली सदृश संरचना रहैत अछि जे कवचसँ (ढाकनसँ) बाहर अलग-अलग छेदक रूपमे फुजैत अछि । एक छेदसँ पानि अन्दर जाइत अछि आ दोसरसँ बाहर आबैत अछि । पानिमे उपस्थित भोज्य पदार्थ आ ऑक्सीजनकेँ ई जीव अवशोषित कऽ लैत अछि आ उच्छिष्ट व उत्सर्जी पदार्थकेँ पानिक संग पुनः आपिस जलाशयमे त्यागि दैछ । पानिसँ निकाललाक बाद किछु दिन धरि ई सुषुप्तावस्थामे निष्क्रिय वा निस्चेष्ट रहैत अछि मुदा बेसी दिन धरि नञि जीबि सकैत अछि । *५ - कड़रिक सितुआक रूपमे खुरचनि सितुआकेँ उपस्थित करब एकटा बहुत पैघ साहित्यिक चूकि छी । खुरचनि सितुआ कोनहु प्रकारक मनुष्योपयोगी गाछ - बिरिछकेँ नोकशान नञि पहुँचबैत अछि । उनटहि, मिथिलामे सामाजिक-आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक आहार बनि ओकर क्षुधाकेँ शान्त करैछ । *६ - विश्वक विभिन्न भागमे भिन्न-भिन्न समुदायक लोकसब द्वारा खुरचनि सितुआ आहारक रूपमे लेल जाइत अछि । खुरचनिसँ पहिने शर्ट आदि केर बटन बनैत छल । गाम घरमे लोकसब दूधक डाढ़ी खखोरबाक लेल, काँच आम आ खीरा आदि सोहबाक लेल, पएर मँजबाक लेल प्रयुक्त होइत छल । पहिने चित्रकार लोकनि विभिन्न रंगकेँ फेँटबाक लेल वा मिलान करबाक लेल खुरचनिक प्रयोग करैत छलाह । गिरगिट (बाल कविता) गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें । गिरगिट केहेन ?? सोचए बच्चा मनें - मनें ।।*१ वन-उपवन बाड़ी-झाड़ी, सभ ठाँ भेटैत अछि । ठण्ढीक भोरमे बैसल, ओ रौदा सेकैत अछि । घऽरमे भेटैछ, भेटैछ संगहि रणे - बने ।*२ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। पहिने रंग रहए जे चामक, चट दऽ बदलल । या रंगक विन्यास सकल, आमूलहि बदलल । देखि अचंभित, चकित आँखि छै कने-कने ! *३ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। गोहि आओर सनगोहि, भाए छी गिरगिट केर । मुदा पैघ ने, ओतेक काय छी गिरगिट केर । जीह निकालि कऽ, पकड़ए कीड़ा क्षणें - क्षणें ।*४ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “गिरगिट” शब्दक अर्थ मैथिलीमे बहुत व्यापक अछि जे अपना आपमे सामान्य गिरगिट, ठिकठिकिआ / घरैया गिरगिट, गोहि, सनगोहि, डाइनोसॉर आदि सभकेँ समाहित करैत अछि । मैथिलीक गिरगिटक तुलना अंग्रेजीक LIZARD शब्दसँ कए सकैत छी जाहिमे COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON आदि सभ आबैत अछि । गिरगिट शब्दसँ अमेरिकी महाद्वीपक IGUANA नामक सरिसृपक केर सेहो बोध कहल जा सकैत अछि, हलाँकि ओ सामान्य गिरगिटसँ ओ बहुतहु बातमे भिन्न अछि । परिवेश वा इच्छानुसार चामक रंग बदलबाक गुण कमोबेश हर गिरगिटमे होइत अछि मुदा चमेलिओनाइडी / केमेलिओनाइडी कुल (Family - Chamaeleonidae; Eng. - Chameleons) केर गिरगिट सभमे ई गुण बहुत अधिक विकसित भेल अछि । चुँकि, मैथिलीमे ठिकठिकिआ, गोहि, सनगोहि आदि शब्द पुर्णतः परिभाषित अछि तेँ एकरा सभकेँ छोड़ि शेष सम्बन्धित प्राणीक लेल हम एहि ठाम “गिरगिट” शब्दक प्रयोग कएल अछि । *२ - सरिसृप वर्गक प्राणि होएबाक कारणेँ गिरगिट सेहो शीतरक्तीय प्राणी अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे भोरुका पहर रौद सेकैत आरामसँ देखल जा सकैत अछि । *३ - गिरगिट रंग बदलबामे माहिर होइत अछि । ओ अपन चामक रंग ओ रंगक विन्यास अपना आस - पासक परिवेशक अनुसार क्षण भरिमे बदलि लैत अछि । ओना तँऽ बहुत रास समुद्री जीवमे ई गुण पाओल जाइत अछि, मुदा धरती पर आ ओहो मनुक्खक आवास क्षेत्र केर आस - पास गिरगिटहि एहिमे सभसँ कुशल होइत अछि । जीव विज्ञानमे एहि तरहक घटनाकेँ छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) कहल जाइत अछि । ई छद्मावरण दू तरहेँ गिरगिटकेँ सुरक्षा प्रदान करेत हछि - पहिल तँऽ वातावरणक रंगमे स्वयंकेँ दुश्मनक नजरिसँ नुकाए लैत अछि आ दोसर आक्रामक रंग परिवर्तन कए प्रतिद्वन्दीकेँ डेराए दैत अछि । *४ - गिरगिटक जीह बेङ्ग जेकाँ होइत अछि आ मूँहसँ बाहर शिकार पर दागल जाइत अछि । जीह केर अगिला भाग शिकारकेँ अपन लसलस लेरमे सटाए मुँहक भीतर नेने जाइत अछि । क्र॰ सं॰ जीवक मैथिली नाम अंग्रेजी नाम विशिष्ट गुण १ गिरगिट LIZARDS (Including CHAMELEONS & IGUANAS & OTHERS) रंग बदलबामे कुशल बहुतहु गिरगिटक जीहक संरचना ओ कार्य-शैली बेङ्ग जेकाँ होइछ २ ठिकठिकिआ (ठिकठिकिया) / घरैया गिरगिट COMMON HOUSE GECKOES / HOUSE LIZARDS रंग बदलबामे बेसी कुशल नञि खतरा पड़ला पर नाङ्गरिक पछिला भागक त्याग करैछ ३ गोहि MONITOR LIZARDS / VARANUSES (Including KOMODO DRAGONS) साँप जेकाँ द्विभाजित जीह गिरगिटसँ पैघ आकार रंग बदलबाक गुण नञि ४ सनगोहि GOLDEN / YELLOW MONITOR LIZARD गोहि केर एक प्रकार चामक रंग किछु पीताभ सनि होइछ आ अपना दिशि पाओल जाइछ ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया (बाल कविता) गिरगिट छी, पर नञि छी गिरगिट, या छी घरैया गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।।*१ घरक भीत - देबाल आदि पर सदिखन भेटत । कोनहु इजोतक, लऽग - पासमे, अनुखन देखब । कीड़ी - फतिङ्गी लगीच इजोतक, खाए ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। बदलए चामक रंग, सहज गुण - से एकरामे । मुदा कने कमतर, बड़का गिरगिट तुलनामे ।*२ बहुत प्रकारक विश्वमे होइए, ई ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। खतरा बुझने, पछिला नाङरि, चट दए छोड़ैछ । छटपटाइत ओ नाङ्गरि, दुश्मनसबकेँ धोखबैछ । प्राण बचाए भागैछ बेचारा, नाङ्गरिकट्टा गिरगिट ।*३ “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। रातिचर ई गिरगिट, तेँ रातिमे, बेसी अभरैछ । वा दिनहु, अन्हार दोग दिशि, भागैत देखबैक । ठिक-ठिक-ठिक केर ध्वनिक कारणेँ, छै ठिकठिकिआ गिरगिट ।*४ “ठिकठिकिआ” सभ लोक कहैए, छी से “घरैया गिरगिट” ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - सामान्य मैथिलीमे एकरा सेहो गिरगिट कहि देल जाइत अछि, किछु हद धरि से ठीकहु अछि, मुदा गलत सेहो । गिरगिटसँ अवश्यहि किछु विशिष्ट अन्तर अछि आ तेँ गिरगिटसँ पार्थक्य देखएबाक लेल एकरा “घरैया गिरगिट” (HOUSE LIZARD) कहल जाइत अछि । गाम घऽरमे एकरा ठिकठिकिआ या ठिकठिकिया (COMMON HOUSE GECKO) सेहो कहल जाइत अछि । *२ - एकर चामक रंग माटि या गोबरसँ नीपल भीतक देबालक रंगमे छपएबला होइत अछि । एकरहुमे रंग बदलबाक क्षमता रहैत अछि, मुदा गिरगिट (CHAMELEON) केर तुलनामे एहि तरहक समायोजनक क्षमता बहुत कम होइत अछि । *३ - गिरगिट (CHAMELEON) अपना सुरक्षाक लेल चामक रंग बदलि छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) केर सहारा लैत अछि । जखनि कि ठिकठिकिआ (HOUSE LIZARD / COMMON HOUSE GECKO) आवश्यकता पड़ला पर अपन नाङ्गरिक पछिला हिस्साकेँ अपन शरीरसँ अलग कऽ दैत अछि । धऽरसँ अलग भेल नाङ्गरि कने काल धरि छटपटाइत रहैत अछि जाहिसँ ठिकठिकिआक दुश्मन शिकारी जीव ओहिमे ओझराए जाइत अछि आ ठिकठिकिआ अपन जान बचाए भागि जाइत अछि । बादमे किछु दिन वा महीनामे ओ कटलाहा नाङ्गरि पुनः बढ़ि पहिने जेकाँ भऽ जाइत अछि । *४ - ई रातिचर प्राणी अछि आ दिनमे अन्हार जगह पर कोण-दोगमे नुकाएल रहैत अछि । तेँ अंग्रेजीमे एकरा “मून लिजार्ड / लिजर्ड” (MOON LIZARD) सेहो कहल जाइत अछि । ई एक प्रकारक ध्वनि निकालैत अछि जे सुनबामे मैथिलीक “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि सन लगैत अछि । तेँ मैथिलीमे एकर नाम ठिकठिकिआ (या ठिकठिकिया) पड़ल होयत । मिथिला सहित पुबारी ओ उतरबारी भारतक आन बहुत रास क्षेत्र सभक जन सामान्यमे ई धारणा अछि कि कोनहु बातकेँ बजबा काल जँ ठिकठिकिआ “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि बहार करैत अछि तँ ओ बात या तँऽ सत्य अछि या भविष्यमे सत्य होयत । ओना एहि धारणाक कोनहु वैज्ञानिक आधार नञि अछि, एहि ठाम बस प्रसंगवश उल्लेख कएल गेल अछि । अंग्रेज आ यूरोपीय लोक सभ ठिकठिकिआक ध्वनिकेँ “Gecko,Gecko,Gecko” सन बुझैत छथि आ तेँ एकर नाम GECKO / GEKKO राखि देल । - गोहि (बाल कविता) संस्कृतक जे “गोधिका”, ताहिसँ निकसलि “गोधि”। ताहि गोधि केर रूप छी, मिथिलाभाषाक “गोहि” ।। पैघ-पैघ गिरगिटक नाँओ, सामुहिक रूपसँ गोहि । संसारक हर-एक भागमे, भाँति-भाँति केर गोहि ।।*१ थलचर जीव ई गोहि छी, प्रायः बिलमे रहैछ । बाढ़ि आ बरखा कालमे, बेसी ओ अभरैछ ।।*२ किछु एहनहु छी गोहि जे, पानिक कात रहैछ । गोंता मारि शिकार करैछ, पानिमे खूब हेलैछ ।।*३ बाध - बोन केर बीचसँ, सड़क - बाट जे जाइछ । तकरा पार करैत ओ, बहुधा देखल जाइछ ।। गोहिमे किछु विषहीन छी, आ किछु छी विषयुक्त । तेँ जनमानस धारणा, गोहि लेल भययुक्त ।।*४ इण्डोनेसियाक गोहि एक, नाम “कॉमोडो ड्रेगन” । गोहिमे सभसँ छी विशाल, “दैत्य गोहि” ओ ड्रेगन ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । *२ - विश्वक बेसीतर गोहि थलचर (TERRESTRIAL) होइत अछि, आ जमीन पर बिल (बियरि) बनाए अथवा प्राकृतिक रूपसँ बनल बिलमे अथवा आन प्राणीसभ द्वारा बनाओल आ छोड़ल बिलमे रहैत अछि । *३ - किछु गोहि वृक्षाश्रयी (ARBOREAL) ओ आन किछु उभयचरी (AMPHIBIOUS) अर्थात् थल ओ जल दूनूमे विचरण करएबला होइत अछि । उभयचरी गोहि सेहो जमीनहि पर बिल बनाए रहैत अछि, मुदा पानिमे हेलि शिकार करबामे माहिर होइत अछि । *४ - विश्वक बेसीतर गोहि विषहीन होइत अछि, मुदा किछु प्रजाति विषयुक्त । मुदा मिथिला सहित पूरा भारतक जनमानसमे ई धारणा प्रबल अछि जे गोहि अतिशय विषयुक्त ओ बयानक प्राणी अछि । जकर कारणमेसँ किछु निम्न प्रकारेँ भऽ सकैत अछि - गोहि केर हवामे लपलपाइत द्विभाजित जीह, साँप सदृश भयोत्पादक लगैछ गोहि केर आकार गिरगिटसँ बहुत पैघ होयब गोहि ओ साँपक अवास क्षेत्रमे समानता होयब विषहीन ओ विषयुक्त गोहि केर पहिचान जन सामान्यक बीच नयि होयब सम्भवतः ऐतिहासिक समएमे विषयुक्त गोहिक संख्या आजुक समएसँ बहुत बेसी होयब, आदि । किछु लोकक कहब अछि जे गोहि जँ मनुक्ख वा सूतल नेनाकेँ फूकि दैत अछि तँऽ ओहि मनुक्ख वा नेनाक शरीर फुलि जाइत अछि जाहिसँ बादमे ओकर मृत्यु भए जाइछ वा जँ जिउतहु अछि तँऽ कोनहु काजक नञि रहि जाइछ । मुदा, यथार्थमे से नञि (अपवाद - दैत्य गोहि, मुदा भारतमे ओ ने तँऽ कहियो छल आ ने आइ अछि) होइत अछि । *५ - इण्डोनेसिया नामक देशक एक गोट निर्जन द्वीप पर “कॉमोडो ड्रेगन” (COMODO DRAGON) नामक विशालकाय ओ महाविषयुक्त गोहि पाओल जाइत अछि जकरा मैथिलीमे “दैत्य गोहि” कहि सकैत छी । ई दुनिञाक सभसँ पैघ गोहि अछि मुदा ओहि तथाकथित द्वीपक अतिरिक्त दुनिञामे आन कतहु नञि पाओल जाइत अछि । सनगोहि (बाल कविता) बहुविध पैघ - पैघ गिरगिटसभ, कहल जाइछ मिथिलामे गोहि । ताहि गोहिमे किछु पीयर सनि, सएह कहाबैत अछि सनगोहि ।।*१ थलचर जीव छी गोहि समूहक, पानिमे नञि ओ हेलि पाबैतछि । बाढ़ि आ बरखाक पानि बियरिमे, तेँ मनुक्ख दिशि ओ भागैतछि ।।*२ गोहि साँप दूनू सरिसृप अछि, जीह कटल अछि तेँ आगाँसँ । सएह देखि कए लोक डेराइछ, मारि दैछ बरछी - भालासँ ।।*३ कटल जीह केर कारण कए ठाँ, “सनगोहि साँप” एकर छी नाम । एखनहु खूब भेटैतछि जाहि ठाँ, बाध - बोन केर संग छी गाम ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । एहि मे सँ एकटा विशेष प्रकारक गोहि जकर चामक रंग किछु पीयर सनि वा सोनाक रंग सनि होइत अछि, से सनगोहि कहबैत अछि । सनगोहिकेँ अंग्रेजीमे यॅलो या गोल्डेन मॉनीटर लिजार्ड (YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD) कहल जाइत अछि । एकर जैव वैज्ञानिक नाँओ वैरानस फ्लॅवेस्सेन्स (Varanus flavescens) अछि । *२ - ई थलचर प्राणी अछि आ प्रायः नम (आर्द्र) ओ छाहरियुक्त जमीन पर बियरि (बिल) बनाए रहैत अछि । बाढ़िक समय बियरिमे पानि भरि जएबाक कारणेँ प्रायः मनुक्कक आवास-क्षेत्र दिशि बौआइत भेटैत अछि । *३ - सनगोहि साँप जेकाँ विषयुक्त नञि होइत अछि मुदा साँपहि जेकाँ ओकरहु जीह आगाँसँ कटि दू भागमे बँटल रहैत अछि । तेँ लोक विशेष डेराइत अछि आ बहुधा भाला, बर्छीसँ मारि दैत अछि । *४ - द्विभाजित जीहक (Bifid tongue) कारण सनगोहिकेँ मिथिलाक किछु भागमे “सनगोहि साँप” सेहो कहल जाइत अछि । डोकहर ओ - जे डोका हेरए, या ताकए जे डोका । डोकहर जाहिठाँ देखल जाइए, पसरल सौंसे डोका ।। इएह डोका देखि लोक बुझइए, डोकहरकेँ प्रिय डोका । नाम देलक डोकहर, पर बूझू छी किछु हद से धोखा ।।*१ डोकहर केर आवास - क्षेत्रमे, हँसुआ - दाबी संगे । हँसुआ - दाबीकेँ प्रिय डोका, डोकहर माथ कलंके ।।*१,२ डोकहर पैघ चिड़ै - तइयो ओ, उड़ए अकाशेँ ऊँच । ऊँच गाछ पर खोंता बनबए, उतरए झुण्डक - झुण्ड ।। डोकहर केर मजगूत टाँग आ, लोल सेहो मजगूत । बेङ्ग साँप काँकोड़ डोका सभ, चिबा जाइछ साबूत ।।*२ एकर शिकार वर्ज्य भारत भरि, छी संरक्षित प्राणी । तइयो लोक कहाँ मानैत अछि, करैछ अपन मनमानी ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - डोकहर आ हँसुआ-दाबीक आवास क्षेत्र (HABITAT) एक्कहि होइत अछि । ओहि ठाम जे मुइल डोकाक खोल (EXOSKELETON OF PILA) पसरल रहैत अछि जे वास्तवमे हँसुआ-दाबी द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक अवशेष थिक, नञि कि डोकहर द्वारा खाएल गेल डोकाक । *२ - डोकहर आ हँसुआ-दाबी दुनु डोका (PILA) खाइत अछि पर हँसुआ-दाबीकेँ डोका विशेष पसिन्न छैक । ओकर लोल केर अगिला भाग एना बनल छैक जे ओ डोकाक खोलकेँ बिना तोड़नहि डोकाक अगिला भागकेँ पकड़ि डोकाक भीतरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि आ खा जाइत अछि । डोकहर सेहो डोका खाइत अछि पर हँसुआ-दाबी जेकाँ ओकरा डोकासँ विशेष प्रीति नञि छै । दोसर बात जे डोकहर अपन मजगूत लोलसँ डोकाक उपरुका कवचकेँ तोड़ि कऽ डोका खाइत अछि, तेँ ओकरा द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक कवच टूटल रहैत अछि - साबुत नञि । *३ - एहि चिड़ै केर शिकार करब प्रतिबन्धित थिक पर गामक लोककेँ नियम-कानून कहाँ पता आ जँ बताओल जाइतो अछि तँऽ ओ से कहाँ मानैत छथि । ग्रामीण भागमे - विशेष कऽ जन-जातीय आ अशिक्षित वर्गमे - डोकहरक मांसु विशेष प्रचलित अछि । अंग्रेजीक GREATER ADJUTANT आ LESSER ADJUTANT दुनु मैथिलीक डोकहर शब्दक अन्तर्गत अबैत अछि । आइ काल्हि LESSER ADJUTANT बेशी देखबामे अबैत अछि कारण जे GREATER ADJUTANT केर संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम भऽ गेल अछि । डोकहरक दुनु प्रजाति संकटग्रस्त अछि । LESSER ADJUTANT असुरक्षित (VULNERABLE) श्रेणीमे अबैत अछि जखनि कि GREATER ADJUTANT विलुप्तप्राय (ENDANGERED) श्रेणीमे । ढीलो रानी, ढीलो रानी, कतऽ जाइ छी । सभ केओ मारलक तेँ रूसल जाइ छी ।। आब एहेन फकड़ा पुरान भऽ गेलै । ढील ताकब बात अनजान भऽ गेलै ।।*१ साबुन एलै शैम्पू आ दबाई बहुते । ढीलक करै छै ओ बिदाई तुरुते ।।*१ ढील परजीवी छी आ खून चूसए छै ।*२ माथक जे केश, तकर जड़ि धऽ रहै छै ।। धियापुता केश जे साफ ने करए छै । ओकरहि केशमे ढील सोहड़ै छै ।। ढील केर अण्डा ओ ढील केर बच्चा । मैथिलीमे लीख छै आ संस्कृतमे लिक्षा ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पहिने धियापुता जखन स्थिर भऽ माथमे ढील ताकए नञि दैत छलै तँऽ तकनिहारि दाइ-माए लोकनि एहने फकड़ा सभ सुनाए परतारि कऽ ढील ताकै जाइ छलखिन्ह (-थिन्ह) । आब बहुविध मेडिकेटेड साबुन, शैम्पू आ किछु गोटी ढील मारबाक लेल सद्यः रामबाण जेकाँ काज करैछ तेँ ढील तकबाक प्रथा आ ओहि संगहि एहेन फकड़ा सभ बहुत कम भऽ गेल अछि । पर गाम-घरमे एखनहु से भेंटि जाएत । *२ - परजीवी = PARASITE; रक्तचूसक परजीवी = SANGUIVOROUS PARASITE *३ - ढील (मैथिली) = (संस्कृत) = जूँ (हिन्दी) = HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी), तथा लीख (मैथिली) = लिक्षा (संस्कृत) = OVUM (Sing.) / OVA (Pl.) & LARVA (Sing.) / LARVAE (Pl.) / NYMPH OF HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी) ढील एकटा परजीवी (PARASITE) थिक । ओ मनुक्खक माथमे रहैत अछि आ मनुक्खक खून चूसि मात्र ओएह पर जीवैत अछि, तेँ ओ रक्तचूसक परजीवी (SANGUIVOROUS PARASITE) भेल । ढील केर मात्र एक्कहिटा ज्ञात पोषक अछि तेँ ओ मनुक्खक लेल अधिबद्ध या अविकल्पी पजीवी (OBLIGATE PARASITE) आ मनुक्ख ढीलक लेल अधिबद्ध या अविकल्पी पोषक (OBLIGATE HOST) भेल । आन परजीवी कीड़ासभ जेकाँ ढीलकेँ बहुत मजगूत टांग या पाँखि नञि होइत अछि तेँ ओ एकसँ दोसर मनुक्खमे मात्र माथक सीधा सम्पर्कसँ (DIRECT HEAD TO HEAD CONTACT) - जेना कि सूतए काल, एक्के कंघीक प्रयोग कएलासँ - पसरैत अछि । कतबहु हो मजगूत मकान । चाहे हो परोपट्टाक शान । भूकम्प - बाढ़ि - अन्हररोधी । या तड़ितपात - ठनकारोधी । पर तइयो ने अजर - अमर बुझियौ, कारण एक्कर छी दिबाड़ ।। छी दिबाड़ बड़ ढीठ जीव । बड़ असंजाइत नाशी ई जीव । भीजल - भू छाहरि एकर डीह । नञि सुखलहुमे ई करैछ पीठ । ओ रक्षित नञि स्थान कोनहु, पहुँचए नञि जाहि ठाँ ई दिबाड़ ।।*१ छी भाँति - भाँति केर रंग रूप । जल - थल सभठाँ भेटै ई भूप । किछु लागै उजरा चुट्टी सनि । किछु उड़ैबाला कीड़ी सनि ।*२ हर निर्माणक ढाहैछ अहं, जे छोट जीव कहबैछ दिबाड़ ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - दिबाड़ यद्यपि भीजल (वा नम वा आर्द्र) आ छाहरियुक्त स्थान पर बेसी भेटैत अछि मुदा सही कही तँऽ धरतीक दूनू ध्रुवीय (आर्कटिक ओ अण्टार्कटिक) प्रदेशकेँ छोड़ि विश्वमे सभठाँ भेटैत अछि । *२ - दिबाड़केँ अंग्रेजीमे व्हाइट ऑण्ट (WHITE ANT = उजरा चुट्टी) कहल जाइत अछि । सम्भवतः तेँ कल्याणी कोशमे एकरा चुट्टीक एक प्रकार कहल गेल अछि मुदा जीव विज्ञानक अनुसारेँ ई चुट्टीक प्रकार नञि अछि अपितु जैविक क्रमविकाशमे चुट्टीसँ बहुत दूर अछि । उनटहि दिबाड़ जैविक क्रमविकाशमे सनकिड़बाक बेसी नजदीक अछि । अपनहि खेत खरिहान रहैए, ई तँऽ छी धानछुआ । उच्चारण करबामे बाजी, एकरे तँऽ धनछुआ ।। तार पर बैसए, मेह पर बैसए, बैसए ओ खुट्टा पर । धानक ढेरी चट छू आबए, बैसए जा ठुट्ठा पर ।। शायद इएह गुणक कारण, ओ धानछुआ कहबैए । गौरसँ देखबै, तखने बुझबै, एना किएक करैए ।। छोट छोट कीड़ा आ फतिङ्गा, धानक ढेरीमे बहुते । खा कऽ तकरा पेट भरैए, छोड़ि धानकेँ अगबे ।। एकरे देखि कऽ कहबी बनलै, अगराहीक धनछुआ । लोक बजैए अर्थ ने बूझए, चीन्हए ने धनछुआ ।। एकरहि एगो छै भैय्यारी, ओ करिया धनछुआ । लोक बुझैए ओकरा कोइली, पर छी ओ धनछुआ ।। भेटत जोतला खेतमे या फेर, जाहिठाँ जमकल पानि । खा कऽ जीबए कीड़ा−मकोड़ा, करए जे उपजा हानि ।। बड़ हल्लुक, खऽढ़क ऊपरमे, देखबै एकरा बैसल । बस कारी भेने की कोइली, गाबैत कहिया देखल ?? संकेत आ किछु रोचक तथ्य - धानछुआ या धनछुआ - धूसर-मटियारी या किछु−किछु छाउरक रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ऐशी ड्रोङ्गो (ASHY DRONGO) कहल जाइत अछि । करिया धनछुआ - कारी रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ब्लॅक ड्रोङ्गो (BLACK DRONGO) कहल जाइत अछि । सामान्य लोक आ धियापुता कारी रंगक कारण एकरहि कोइली बुझि लैत अछि । संस्कृतमे एहि चिड़ैकेँ धुत्त कारी होएबाक कारण “भृंगराज” नामक पक्षी कहल गेल अछि । कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । “रॉबिन” छी नीलकण्ठ, “आर”सँ होइए “रॉबिन” ।*१ नञि योरोप केर आ ने अमेरिकी, “इण्डियन रॉबिन” ।।*२ हे असली नीलकण्ठ ! अहाँ जा कतऽ छी बैसल । लोक कहैतछि जतरा शुभ, जँ अहाँकेँ देखल ।। बहुतहु लोक बिसरि बैसल अछि, अहँक रूपकेँ । भ्रममे बूझए नीलकण्ठ, कोनहु आन भूपकेँ ।।*३ “नीलकण्ठ” जे शब्द, स्वयं ओ परिचय दैतछि । शेष काय छै आन रंग, ग्रीव नील कहैतछि ।। एक तरफ सब कहथि, अलोपित “नीलकण्ठ” छै । सुलभ “सिरौली” देखि कहए, इएह नीलकण्ठ छै ।।*४ केहेन विरोधाभास छै पसरल, एहि दुनिञामे । जएह बजैछ, उनटे करैछ, सब एहि दुनिञामे ।। नीलकण्ठमे कण्ठ - नील, बस नर केर होइतछि । तेँ शायद हिन्दू - समाज, “शिव-रूप” बुझैतछि ।।*५ साँझक गोधूलि - बेलामे, अक्सर भेटैत छल । जतरा प्रात, तेँ जतरा - दर्शन, शुभ बुझैत छल ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आर”सँ होइए “रॉबिन = “R” for “ROBIN” *२ - अंग्रेजीक रॉबिन (ROBIN) शब्द बहुत व्यापक अछि जाहिमे योरोपीय रॉबिन (EUROPEAN ROBIN), अमेरिकी रॉबिन (AMERICAN ROBIN), इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN) आ इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) समाविष्ट अछि । मात्र इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN) केर किछु जाति वा प्रजाति (SPECIES / SUB-SPECIES) नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि कारण कि ओकर कण्ठ “नील” रंगक (INDIGO / INDIGO BLUE / ROBIN-BLUE) होइछ आ शेष शरीर कारी, गाढ़ भूरा वा आन रंगक रहैछ । इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) सेहो नीलकण्ठ नञि अछि किएक तँऽ ओकर पूरा शरीर नीला होइत अछि, नञि कि कण्ठमात्र । एहि सन्दर्भमे भारतीय “नील वा लील” शब्द आ अंग्रेजीक “ब्ल्यु” शब्द पर विचार सेहो परमावश्यक अछि - BLUE (in British Eng.) - प्राचीन भारतमे वा सही रूपेँ कही तँऽ आइसँ ३०-४० वर्ष पहिने इएह अंग्रेजी सम्पुर्ण भारत मे बाजल आ बूझल जाइत छल । एहि अंग्रेजीमे - INDIGO = नील (तत्सम) वा लील (तद्भव) रंग BLUE = आसमानी रंग या स्वच्छ आकाशक रंग यथा इन्द्रधनुषक वर्णपट्टमे (SPECTRUM OF VISIBLE LIGHT) देखू VIBGYOR = बैनीआहपीनाला अर्थात INDIGO = नीला आ BLUE = आसमानी BLUE (in American Eng.) = पछिला करीब ५० साल सँ धीरे-धीरे अमेरिकी अंग्रेजीक प्रचार-प्रसार बढ़ल अछि । इण्टरनेटक प्रसारक संग-संग अमेरिकी अंग्रेजी सम्पुर्ण भारतमे पसरि गेल अछि आ ओ ब्रिटिश अंग्रेजीकेँ धकिआए बैसल अछि । अमेरिकी अंग्रेजीमे - BLUE = नील ओ नीलाभ समस्त रंगक परिचायक ब्रिटिश अंग्रेजीक INDIGO = अमेरिकी अंग्रेजीक INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE ब्रिटिश अंग्रेजीक BLUE = अमेरिकी अंग्रेजीक SKY-BLUE / LIGHT-BLUE = आसमानी अमेरिकी अंग्रेजीमे MARINE-BLUE / OCEAN-BLUE = समुद्री नील या हरिताभ नील अमेरिकी अंग्रेजीमे AQUA-BLUE / MARINE = नीलाभ हरियर, आदि । इएह कारण शब्दार्थमे बहुत बेर भ्रम केर स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत अछि । तहिना नीलकण्ठ संगे सेहो भेल अछि । नीलकण्ठक “नील” रंगकेँ ब्रिटिश अंग्रेजीक अनुसार INDIGO बुझबाक चाही आ अमेरिकी अंग्रेजीक अनुसार INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE, तखन कोनहु भ्रम नञि होयत । दोसराक वा दोसर भाषामे कयल गेल अनुवादकेँ सीधे मैथिलीमे नञि उतारि देबाक चाही । *३ - लोक सभ (आ किछु अनुवादक लोकनि सेहो) नील माने आसमानी या चटक नील (फिरोजी) मानि एकटा दोसर चिड़ैकेँ - जकरा मैथिलीमे सिरौली (सिरोली नञि) कहल जाइत अछि - प्रबल रूपसँ नीलकण्ठ वा लीलकण्ठ मानए लगलाह अछि । ई भ्रम इण्टरनेट पर पसरल भ्रमक कारण बहुत तेजीसँ अपन जड़ि जमा चुकल अछि । *४ - अलोपित = एहि ठाम “दुर्लभ” अर्थमे, नञि कि “विलुप्त” अर्थमे प्रयुक्त । एक दिशि कहल जाइत अछि कि “नीलकण्ठ” केर दर्शन आब दुर्लभ अछि (खास कऽ मिथिलामे) आ दोसर दिशि सर्वसुलभ दर्शन देनिहार “सिरौली” केर पहिचान नीलकण्ठक रूपमे करबैत छी - से कोना ? रॉबिनक ओ प्रकारसब जे नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि से पहिने पूरा भारतमे भेटैत छल आब उत्तर भारत दिशि बहुत कम भऽ गेल अछि । *५ - मात्र पुरुष वा नर नीलकण्ठक कण्ठ केर रंग नील होइत अछि । स्त्री वा मादा नीलकण्ठ गौर वर्णक (रंगक) होइत अछि । *६ - नीलकण्ठ प्रायः साँझखन (सूर्यास्तक समयसँ किछु पहिने; गोधूलि बेलामे) उड़ैत कीड़ासभकेँ खएबाक लेल बिजलीक ताड़ पर या कोनहु गाछक पछबरिया ठाढ़िसभ पर बैसल देखल जाइत छल । साटा पर कत’ मैच खेललियै कतहु खेललियै, कतहु देखलियै जीत – हारि (उच्चा॰ – हाइर) दुनु खूब मनेलियै पएर तर बगरा, बाप रौ बाप !*१ आब की करियै, आहि रौ बाप ! ! नओमाकेँ हम किछु ने बुझलियै । भरि नओमा हम खेलि गमेलियै । कहुना नओमा पास भऽ गेलियै । छओ महिना फेर खुशी मनेलियै । मैट्रिकमे दसमेक पुछै छै, नओमामे तेँ बेपरवाह ।*२ पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! दूर्गापूजा खूब घुमलियै । नाटक, थेटर, नाच देखलियै । दियाबाती छठि*३ मनेलियै । फॉर्म बोर्ड केर, सेहो भरलियै । दसमा केर सिलेबस एतबे, चारि मासमे दस – दस चास । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! ठण्ढी आ शीतलहरी एलै । साटा पर कत’ मैच खेललियै । कतहु खेललियै, कतहु देखलियै । जीत – हारि दुनु खूब मनेलियै । पढ़बा कालमे ठण्ढी लागय, ट्वेण्टी – ट्वेण्टी केर उछाह । पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! नऽव बरख, बनभोजो केलियै । मंगलमयक सनेश पठेलियै । लाई, चुड़लाई आ तिलबा खेलियै । खिच्चरि – दऽही संगे देलियै । प्रात भने बुझना गेलै, छै मास एक मैट्रिक केर – आह ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! “एटम बम” कण्ठस्थ रटलियै ।*४ “गेस पेपर” केँ खूब चटलियै ।*५ महाबीरजीकेँ गोहरेलियै ।*६ जोड़ा - छागर कबुला केलियै ।*७ हाथ परीक्षाफल आयल तँऽ, जेना सूँघि नेने हो साँप ! पएर तर बगरा, बाप रौ बाप ! ! *१ - पएर तर बगरा, बाप रौ बाप – ई एकटा बुझौअलि अछि जकर मतलब होइत अछि “आगि” । *२ – आइ काल्हि बहुत रास धियापुता मोनमे ई विचार बहुत दृढ़तासँ पोषने रहैत छथि कि मैट्रिक केर पाठ्यक्रममे मात्र दशमे वर्गक पाठ्यक्रमसँ पूछल जाइत अछि । ई विचार अत्यन्त भ्रामक अछि । उदाहरणार्थ जँ नओमाक रसायनशास्त्रमे परमाणु संरचना, संयोजकता आदि नञि पढ़ने छथि तँऽ हुनिकालोकनिकेँ दशमाक रासायनिक बन्धन, रासायनिक समीकरण संतुलन आदि कोना कऽ बुझबामे अओतन्हि । *३ - उच्चारण भेल “छइठ” । *४ – “एटम बम” – एक प्रकारक अति सम्भावित प्रश्न सभक पुस्तिका थिक, जकर नाँव सँ मिथिलाक बच्चा – बच्चा (आ तेँ पैघलोकनि सेहो) चिर – परिचित छथि । ई कोनो “बम” वा “बम बनएबाक पुस्तिका” नञि अछि । *५ – “गेस पेपर” – एहि नाम सँ तँऽ पूरा देशे सुपरिचित अछि । *६ आ *७ – महाबीरजी वा अप्पन – अप्पन आन आराध्य देवी – देवता सभक परिचायक । पपीहा, देखू देखि रहल अछि पपीहा । पपीहा, जा कऽ सभसँ कहत पपीहा । पपीहा, देखू चुप नञि रहत पपीहा ।*१ पपीहा, मुदा केहेन होइछ पपीहा ?? कू - कू - कू - कू कोइली गाबए । पी - पी पपीहा राग अलापए । किछु कोइली सनि लागि रहल ओ, लोल बाज केर भ्रम उपजाबए ।।*२ बहुत किछु कोइलीसँ मिलए पपीहा । लागए खन एक्के कोइली - पपीहा । बहुत केओ कह पर्याय पपीहा । मुदा छी अलगे कोइली - पपीहा ।।*३ भरण-परजीवी कोइली सनि ओहो । आन चिड़ैकेँ धोखबै छै ओहो । अपन ने खोंता बनबै छै आ, अनकहि खोंता अण्डा दैछ ओहो ।।*४ बहुत धोखेबाज चिड़ै छै पपीहा । केवल नर गाबए गीत पपीहा ।*५ गीत, धोखा केर गीत पपीहा ।*६ अहाँ देखितहुँ ने चिन्हब पपीहा ।।*७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - ई तीनू पाँती एक टा पुरान हिन्दी फिल्मी गीतक मैथिली अनुवाद थिक । फिल्मक नाम छल “फरियाद” जे सन १९६४ ई॰मे बनल छल । एहि गीतमे कहल गेल बातकेँ वास्तविकतासँ कोनहु सम्बन्ध नञि थिक । पर मोनमे एक टा जिज्ञासा अवश्य होइत अछि कि आखिर ई “पपीहा” नामक चिड़ै देखबामे केहेन होइत अछि । *२ - कोइली आ पपीहा एक्कहि परिवारक चिड़ै अछि । दुनुकेर आवाज मनुक्खक लेल कर्णप्रिय थिक । पपीहा केर लोल “बाज” नामक चिड़ै जेकाँ आगाँसँ मुड़ल होइत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा HAWK CUCKOO कहल जाइत अछि । *३ - बहुत लोक कोइली आ पपीहाकेँ एक-दोसराक पर्यायी नाँओ बुझैत छथि पर से नञि - दुहु भिन्न चिड़ै थिक । *४ - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि । *५ - नर/पुरुष कोइली जेकाँ केवल नर/पुरुष पपीहा “पी - पी” केर आवाज निकालैत अछि, मादा/स्त्री पपीहा नञि । *६ - पपीहा “पी - पी” केर आवाज वास्तवमे कौआ आदि केँ खौंझएबाक लेल निकालैत अछि । कौआ खौंझा कऽ अपन खोंता छोड़ि नर/पुरुष पपीहाकेँ खेहाड़ैत अछि आ ताहि बीचमे मादा/स्त्री पपीहा अपन अण्डा ओहि कौआक खोंतामे धऽ दैत अछि । कोइलीक “कू - कू” केर आवाज सेहो इएह तरहक आवाज अछि । *७ - कएक बेर पपीहा सामने रहितो अछि तँऽ साधारण लोक ओकरा नञि चीन्हि पाबैत अछि, ओकरा “बाज” बुझबाक धोखा कऽ बैसैत अछि । पपीहा, कोइली आ मएना भूआ खाए मे माहिर (EXPERT) होइत अछि । ओकरा बूझल रहैत छै कि भूआ (CATERPILLARS / CATERPILLAR LARVAE) केर कोन भाग विषाह छै । भूआक विषाह भागकेँ ओ अपन चाङ्गुरसँ दाबि कऽ आ गाछक ठोस डाढ़ि पर रगरि कऽ हटा दैत छै आ खा जाइत अछि । सोन चिड़ैञा, सोन चिड़ैञा, कोन देशसँ आबैत छी । पीयर देह आ कारी पाँखिमे, बहुतहि सुन्नर लागैत छी ।। आँखि छी कारी, मूरी कारी, लोल गुलाबी सुन्नर छी । ककरो-ककरो पर देखैत छी, मूरी सेहो पीयर छी ।। हमरा दिशि आबी बसन्तमे, ठण्ढी अबितहि भागैत छी । प्रायद्वीप*१ भारत कि अफ्रिका, ठण्ढी जाए बिताबैत छी ।। मएना सनक आकार अहँक, तेँ नाम “पहाड़ी मएना” छी । सोन चिड़ैञा नाम आन केर, अहँ केर तँऽ बस उपमा छी ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ द्वीप (ISLAND / ISLET) ओ स्थलखण्ड थिक जे चारू कात सँ पानिसँ घेरल होअए आ प्रायद्वीप (PENINSULA) ओ स्थल खण्ड थिक जे तीन कातसँ पानिसँ घेरल हो पर एक कातसँ कोनो आन स्थलखण्डसँ जुड़ल हो; जेना कि भारतक दक्षिणी भू भाग । (प्रायद्वीप = प्रायः + द्वीप = जे द्वीप तँऽ नञि अछि पर लगभग द्वीप सदृश अछि = चारि नञि पर तीन भाग पानि हो जाहि स्थलखण्डक) । *२ एहि चिड़ैकेँ मैथिलीमे “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि, जकर कारण सम्भवतः मएनासँ मिलैत - जुलैत एकर अकार - सुकार छी । पीयर रंग हएबाक कारण एकरा सोन - चिड़ैञा केर उपमा देल गेल अछि जे कि एकर नाम नञि अछि । “सोन-चिड़ैञा” नामसँ मैथिलीमे एकटा दोसर चिड़ै केर बोध होइत अछि । ई हिन्दीक “पहाड़ी मैना”सँ बिल्कुल भिन्न अछि तेँ दुहु भाषामे एक्कहि नामक कारण भ्रमित नञि होउ । कारी माथबला पीयर रंगक चिड़ै जे ऊपरुका चित्रमे देखाओल गेल अछि तकर अंग्रेजी नाँओ BLACK HEADED GOLDEN ORIOLE थिक आ प्राणिशास्त्रीय या जैववैज्ञानिक (BIOLOGICAL / SCIENTIFIC) नाँओ Oriolus larvatus अछि । एहने चिड़ै जकर माथ सेहो पीयर रंगक होइत अछि से INDIAN GOLDEN ORIOLE कहबैत अछि आ एकर प्राणिशास्त्रीय नाँओ Oriolus kundoo अछि । मैथिलीमे ई दुहु प्रजाति “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि आ दुहुक लोलक रंग मांसक सदृश गुलाबी होइत अछि । कहियो - कहियो सभ किछु ठीक रहितहुँ, पर्याप्त समय रहितहुँ, लाख प्रयासक बावजूदहु किछु नञि लिखाइत अछि । कहियो तकर ठीक विपरीत, मोन चहुचङ्ग रहितहँ, बिना कोनो खास प्रयत्नक, बहुत कम समयमे अनायसहि बहुत किछु लिखा जाइत अछि । सएह भेल १० जून २०१६ ई॰क भोरमे । फेसबुक फोलल, श्री बिभूति आनन्दजीक (मैथिली वरिष्ठ लेखक) प्रोफाइल फोटोक रूपमे आमक झब्बाक छवि लागल छल । झब्बामे चारिटा आम छल आ ताहिमे एकटा पाकल (पीयर ढाबुस), एकटा अधपक्कू आ शेष दू टा काँच (किंवा डम्हाएल) छल । झब्बा नीक लागल - ताहि सन्दर्भ पर एक टा कविता लीखल । तकरा बाद पाँचटा आओरहु कविता धरा-धर अपनहि-आप लिखा गेल । ०१ एक अधवयसू − दू टा जुआन । संगहि एक गोट “पाकल आम” । सुन्नर समय − विहंगम दृश्य, तीन पीढ़ी केर भेल मिलान ।। जिनगीक गति छी एहने भैय्या, सब अबटीमे “पाकल आम” । समयक चालि ने बदलल कहियो, तूबत बनि सब पाकल आम ।। समय हाथ - जीबू मस्तीमे, जिनगी केर नञि कोनहु ठेकान । कनितहि रहब, हँसब कहिया फेर, उलहन − देव भेलाह बेइमान ।। ०२ एक परम पाकल प्रबुद्ध, दोसर पकबा लए प्रेरित अछि । तेसर - चारिम से देखि रहल, खेला देखि अचम्भित अछि ।। पहिलुक अछि सत्ता हथिअओने, आनक सत्ता लए काल बनल । दोसर सोचए, तूबए पाकल, तखनहि तँऽ गुरूघण्टाल बनब ।। तेसर - चारिम छी मूक प्रजा, सब देखि रहल आ सोचि रहल । सत्ताक समर नञि प्रतिभागी, परिणाम मुदा सब भोगि रहल ।। ०३ एक गुरू छथि दीप्त ज्ञानसँ, दोसर किछु अवभासित छथि । तेसर - चारिम नव शिष्य हुनक, संगति बैसल आह्लादित छथि ।। कहथि गुरू - ई ज्ञान थिकहि, बँटलासँ कहियो नञि घटैछ । अज्ञानक अम्मत टिकुला, ज्ञानहि बल मधुर रसाल बनैछ ।। सद्-ज्ञान गुरूक छी झलकि रहल, पीताभ मधुर आमक फल सनि । संगतिमे अम्मत काँच आम सेहो, बदलि रहल पाकल फल सनि ।। ०४ एक दूइर दोसरहुँकेँ करैछ, से संगति केर प्रभाव छै । पाकल देखि कऽ काँच पकैए, फऽड़क सहज स्वभाव छै ।। एक जँ उजिआएल, दोसरहुमे उजिअएबा केर भाव भरैछ । जँ केओ बुड़िआएल समूहमे, सभक भविष्यक काल बनैछ ।। एक शराबी इएह चाहैत अछि, मित्रहु बैसि शराब पिउबए । मुदा तपस्वी सदिखन चाहैछ, संगीक तप - जंजाल तजए ।। संगति केर महिमा छी भारी, एहि झब्बामे से बुझा रहल । पाकल देखि पकैए दोसर, तेसर-चारिम छी डम्हा रहल ।। ०५ देखि सुपुक - पाकल - गोपीकेँ, मोन करय खएतहुँ ओकरा । बहुत ऊँच छी, चढ़ि नञि तोड़ब, फेंकि रहल छी तेँ झटहा ।। गछपक्कू तँऽ गछपक्कू छी, दोसर पालहु पर पका लेबै । संगमे कँचका सेहो खसल तँऽ, गोड़ि अनाजमे पका देबै ।। ई की भेलै ! गछपक्कू तँऽ, अपनहि तूबल आओर खसल । हमर मोन भगवानहु बुझलन्हि, हापुस आम ओ बिहुँसि रहल ।। सुपुक = सुपक = सुपक्व गोपी = सुपक्व निदग्ग पीयर वा लाल-पीयर गछपक्कू आम हापुस = रत - रत करैत सुपक्व गछपक्कू आम (मराठी आदि भाषामे "हापुस" आमक एक गोट प्रकारक नाम थिक, मुदा मैथिलीमे ताहि अर्थमे नञि प्रयुक्त भऽ कऽ निर्दिष्ट अर्थमे प्रयोग होइछ) आमक बिहुँसब = गछपक्कू आम जखन बेसी ऊँचाईसँ तूबि कऽ माटि पर खसैछ तँऽ ओ एक वा एकाधिक स्थान पर (प्रायः ऊपरमे या बगलमे/पार्श्वमे) फाटि जाइछ । एहि घटनाकेँ आमक बिहुँसब ओ एहेन आमकेँ बिहुँसल आम कहल जाइत अछि । ०६ पाँचहु आङ्गुर नञि छी समान, नहिञे दू गोटे संसारमे । भाँति - भाँति केर लोक भेटैए, अप्पन सभक समाजमे ।। एक्कहि आमक झब्बामे छै, काँच, डम्हाएल आ पाकल । तहिना समाजमे लोक थिकै, अपना - अपनी काजेँ पागल ।। किछु प्रबुद्ध, किछु अतिप्रबुद्ध, सामान्य तथा किछु निर्बुद्धी । सुजन - सुबुद्धि सेहो बहुतहि, किछु रहैछ अनेरहु दुर्बुद्धी ।। ओहुना ई सभ किछु बदलैत छै, समय - वयस - अनुभव संगे । सबहक अप्पन अलगहि महत्त्व, आ काज आबैछ अपना ढंगे ।। पाकत जञो सभटा आम संग, एक्कहि बेर भऽ जायत ढेरी । तेँ तकर व्यवस्था प्रकृति करैछ, पकबैछ ओ आम बेरा - बेरी ।। पाछाँ कौआ सनि छै कारी, या कारी नर कोइली सनि । आगाँ ककरो कारी - उज्जर, या छाउरक छै रंग जेहेन ।।*१ कोनो जलाशय, जतऽ मनुक्खक, आबाजाही कम हो । ताहि भीड़*२लग, गाछ बाँस पर, पानिकौआ हरदम हो ।। आँखि गड़ओने, पोखरिक पानिमे, बैसल एकटक ताकए । देखिते माछ, ओ आबए चट दऽ, लूझि लोलमे भागए ।। बहुधा माछ पकड़बा लए ओ, पानिमे गोंता मारए । भीजल पाँखिकेँ, ऊँच गाछ पर, फोलि हवामे सुखाबए ।।*३ पानिमे हेलबासँ पहिने, ओ करैछ क्षेत्र सर्वेक्षण । दूरी उचित मनुक्खसँ तखनहि, पानिक बीच पदार्पण ।।*४ कारी हंस वा बत्तख सनि ओ, पानिमे हेलैत लागैछ । मनुखक आहटि दूरहुसँ जँ, चट दऽ उड़ि कऽ भागैछ ।। जलकर - माछक व्यवसायीकेँ, करैछ बहुत नोकशान । बान्हि छकाबए करिया पन्नी, बूझए उतड़ल आन ।।*५ एहि धरती केर एक द्वीप पर, पानिकौआ छी एहनो । उड़ि ने सकै ओ पंख अछैतो, उड़ै छल पहिने कखनो ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पानिकौआ (उच्चारण - पैनकौआ) या पानिकौर (उच्चारण - पैनकौर) केर पछिला भाग (पीठ दिशका भाग) भीजल रहला पर एकवर्णी कौआ सनि कारी लागैत अछि जखनि कि सुखाएल रहला पर कारी तँऽ अवश्ये रहैत अछि पर कारीक मात्रामे तर-तम भाव बुझना जाइछ । अगिला भाग (पेट दिशका भाग) कोनहु प्रजातिमे कारी, कोनहुमे उज्जर वा कोनहुमे छाउरक रंग सनि कारी होइत अछि । लोल सेहो छाउरक रंग सनि होइत अछि । *२ - भीड़ - ई शब्द मैथिलीमे अनेकार्थक अछि - भीड़ - पहिल अर्थ भेल “मेला-रेला” या “जनसमूह” भीड़ - दोसर अर्थ भेल “पोखरिक भिण्डा” एहि ठाम दोसर अर्थ (भिण्डा) अभिप्रेत अछि । *३ - पानिकौरक लेल पानिसँ भीजल अपन पंखकेँ सुखाएब आवश्यक थिक । ताहि हेतु ओ कोनहु गाछक ऊँच डाढ़ि पर वा बाँसक छुपुङ्गी पर अपन पंखकेँ पसारि कऽ बैसि जाइत अछि आ हवामे ओकरा सुखबैत अछि । *४ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ । *५ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु माछ खाइत अछि आ तेँ व्यावसायिक रूपेँ माछ पोषनिहार लोकक लेल हानिकर अछि । तेँ ओसभ डोरीमे बीच-बीचमे करिया पन्नीकेँ (पॉलीथीन) बान्हि पोखरिक एक भीड़सँ दोसर भीड़ धरि टाँगि दैत छथि । आकाशीय सर्वेक्षण करए काल पानिकौआ आ सिल्ली एकरा पहिनेसँ उतरल आन पानिकौआ या सिल्लीक समूह बूझि धोखा खाए जाइत अछि आ ओहि जलाशयक पानिमे नञि उतड़ैत अछि । *६ - प्रशान्त महासागरक (GALAPAGOS ISLANDS) गॅलापॅगॉस द्वीपसमूह पर पानिकौरक एक टा एहेन प्रजाति थिक जकरा पाँखि तँऽ छै पर ओ उड़ि नञि सकैत अछि । मतलब कि उड़नाइ बिसरि गेल अछि आ तेँ ओकर पंख बहुत छोट भऽ गेल छै आ देह भारी । एकरा गॅलापॅगॉस पानिकौआ या गॅलापॅगॉस पानिकौर (GALAPAGOS CORMORANTS) कहल जाइत अछि । एकर वैज्ञानिक नाँओ फॅलॅक्रॉकॉरेक्स हॅरीसी (Phalacrocorax harrisi) थिक । मत्स्यरंक संस्कृतक छी हम, अंग्रेजीक किंगफिशर । पानिडुब्बी सभ लोक कहैए, मिथिला माटिक ऊपर ।।*१ मछरेंगा सेहो हमरे नाम छी, संस्कृतहिसँ निकलल । दच्छिन-पूब विदेहक भू पर, नाम ईहो अछि भेटल ।।*१ नील-हरित छी पीठ-पंख, आ श्वेत श्याम वक्षोदर । लाल-नारंगी चटक रंग सेहो, बीचमे फेंटल फाँटल ।।*२ लाल-नारंगी-कत्थी-कारी, चटक रंग छी लोलक । कायक तुलना पैघ लोल छी, से अपनहुँकेँ बूझल ।।*३ कएटा जाति-प्रजाति हमर, सौंसे संसारमे पसरल । पर मिथिलासहिते भारतमे, बेशी एहने भेटत ।।*४ माछ प्रिय हमरा छी बहुत, तेँ एहने सभटा नाम । बेरि - बेरि काटी हम डुम्मी, पानिडुब्बी तेँ नाम ।।*१ कोनहु जलाशय नहरि-नदी वा पोखरि-डबरा-खत्ता । काते-काते बैसल देखब, झुकल गाछ वा खुट्टा ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीमे एकर दू टा नाम अछि । पहिल अछि “पानिडुब्बी चिड़ै” (उच्चारण - पैनडुब्बी) जे कि माछ पकड़बा लेल बेर - बेर गोंता लगएबाक (वा झपट्टा मारबाक) कारण पड़ल होयत । दोसर पर्यायी नाम अछि “मछरेंगा” जे कि सम्भवतः संसकृत नाम “मत्स्यरंक” केर तद्भव रूप थिक । *२ - एकर किछु प्रजातिमे लालछौंह पीयर वा नारंगी रंग सेहो भेटैछ आन किछु प्रजातिमे नञि । *३ - पूरा शरीरक तुलनामे एकर लोल बेस नमगर, मोट आ ठोसगर बुझना पड़ैछ । *४ - विश्वमे पानिडुब्बी चिड़ै केर कएक टा जाति - प्रजाति पाओल जाइत अछि जाहिमे कोनहु पीयर रंगक तँऽ कोनहु नारंगी, कोनहु भूरा तँऽ कोनहु चितकाबर रंगक सेहो होइत अछि । कहियो ने कहियो तोँ सुनने तँऽ हेबही । मारए गेलै परबा, मारि लेलकै पोरकी ।। इएह छियै पोरकी, चिन्हीन्ह बौआ । दूरसँ कखनो कऽ, लागै जेना परबा ।।*१ शान्त स्वभाव छै जेना लजबिज्जी । घोल - अनघोलसँ होइ कछमच्छी ।। ऊँचका गाछ पर, खोंता ओ लगबए । दुहु - प्राणी शान्तसँ, खोंतामे विचरए ।।*२ खेत - खरिहानमे दाना लेल उतरए । मनुक्खक आहटि पबितहिं उड़ि जाए ।। परबाक स्त्रीलिङ्ग बूझू जुनि पोरकी । परबा फराक आ फराके छै पोरकी ।। परबा आ पोरकी − दुहुमे दू लिङ्ग छै । भ्रम दूर भेल, दुहु शब्द उभयलिङ्ग छै ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - दूरसँ देखला पर परबा (परेबा) आ पोरकी (पौड़की) एकरंगाह लगैत अछि पर दुनु अलग - अलग चिड़ै अछि । *२ - ई चिड़ै प्रायः जोड़ामे अपन खोंतामे या कोनहु गाछक डाढ़ि पर बैसल भेटैछ । *३ - पोरकी शब्द परबाक स्त्रीलिङ्ग नञि अछि । एहिसँ नर पोरकी आ मादा पोरकी दुनुक बोध होइत अछि । बगरा, बगरी आओर बगेड़ी, तीनू अलग चिड़ै छी । बगरी-बगेड़ी बादमे कहियो, बगरा एखन कहै छी ।। घऽर आङ्गन खरिहानमे पहिने, बगरा खूब भेटै छल । बाँसक कोरो - धरणि - बरेड़ी, खोंता ओ लगबै छल ।। धिय-पुता के छल एहेन जे, देखने नञि हो बगरा । नञि देखने बगरा केर खोंता, आ बगरा केर बच्चा ।। एक समय छल जहिया बगरा, चहचहाइत छल सौंसे । घऽर आङ्गनमे जँ कोनो खोंता, बगरा होयत अवश्ये ।। आब तँऽ शहरक क्षेत्रसँ बूझू, बगरा भेल निपत्ता । जञो पथार तखनहि गामहुमे, छोट झुण्डमे बगरा ।।*१ एना किए भेल पता ने ककरहु, पर जँ रहलै एहिना । संग्रहालयमे काल्हि देखत यौ, बगरा सगरो दुनिञा !! *२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - अनाजक पथार सुखएबा काल जे बगरा अबैत अछि से प्रायः “घरैया बगरा” (HOUSE SPARROW) रहैत अछि जखनि कि खेत सभक आढ़ि पर या बाधसँ जाए बला कच्चा सड़क वा बान्ह पर जे बगरा भेटैत अछि से “बनैया बगरा” (TREE SPARROW) रहैत अछि । *२ - बगराक संख्या ताहूमे खास कऽ घरैया बगराक संख्यामे पछिला १० - २० सालमे बहुत कमी भेल अछि जकर कारण पुर्ण रूपसँ नञि ज्ञात अछि । पर ओकर आवास क्षेत्र (HABITAT) केर समाप्त होयब या कम होयब एकर कारण बताओल जा रहल अछि । पोखरिक भीड़ ई, एम्हर घाट । ओम्हर नञि छी आबरजात ।। ओहि भीड़ पर जंगल - झाड़ । देखू ! पानिमे लटकल गाछ ।।*१ ताहि गाछ पर अजगुत खोंता । कोना बनओलक, होइछ छगुन्ता ।।*२ खोंता डाढ़िसँ लटकि रहल छै । बीच फूलल, मूँह गोल ओकर छै ।। ओहिमे सँ उड़लै जे चिड़ै । बगरा सनि देखबामे छै ।। किछु केर माथ छै सुन्नर पीयर । पर दोसर किछु, नञि छै पीयर ।।*३ झुण्डक - झुण्ड आबै छै, देखू ! खेतहि - खेत घुमै छै, देखू !! जखनि झुण्ड बड़ पैघ रहै छै । फसिलक बड़ नोकशान करै छै ।।*४ चिड़ै-बझौआ जाल बिछओलक । पकड़ि बगेरी पिञ्जरा धएलक ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - एहन स्थान जाहि ठाम मनुक्खक पहुँच सुलभ नञि हो (प्रायः कोनहु जलाशयक परित्यक्त भीड़ परक कोनहु पैघ गाछ पर) ई चिड़ै अपन खोंता लगबैत अछि । *२ - एक खोंता विशिष्ट प्रकारक होइत अछि । खोंताक उपरुका शिर्ष गाछक कोनहु डाढ़िसँ बान्हल रहैत अछि आ निचलुका भाग हावामे झुलैत रहैत अछि । खोंताक बीचक भाग फुलल रहैत अछि जाहिमे चिड़ै केर अएबा - जएबा लेल गोलाकार मूँह बनल रहैछ । प्रायः एक गाछ पर कतेकहु एहि तरहक खोंता रहैत अछि । *३ - बगेरी देखबामे बहुत किछु बगरा सनि लागैत अछि । बरखाक समयमे पुरुष बगेरीक माथक रंग टुहटुह पीयर भऽ जाइत अछि जखनि कि स्त्री बगेरीमे से नञि होइत अछि । *४ - ई चिड़ै खेतमे अन्नक दाना चुनि कऽ अपन पेट भरैत अछि । तेँ बहुत अधिक संख्यामे भेला पर खेतक जजातिकेँ नोकशान सेहो पहुँचबैत अछि । *५ - चिड़ै बझओनिहार लोकनि एकरा जालमे बझाए बजारमे बेचैत छथि । किछु लोक पिञ्जरामे पोषबाक लेल तँऽ किछु लोक एकर मांसु खएबाक लेल एहि चिड़ैकेँ किनैत छथि । हंस आ हंसकसँ हम छोट । ओकरा सभसँ कम्मे मोट । तइयो उड़ि नञि पाबैत छी ।।*१ हमरामे बहुते वैविध्य । बेसीतर नहिञे उड़ैछ । जलक्रीड़ा केर आदति छी ।।*२ नञि उड़ैछ बत्तख संज्ञा । जँ उड़ैछ हंसक उपमा । उड़बासँ हंस कहाबैत छी ।।*३ चितकाबर उज्जर कारी । पीयर भूरा मटियाही । पएर पीयर - नारंगी छी ।।*४ पानिमे हेलएमे माहिर । डुम्मी काटएमे माहिर । उड़बा केर बदला इएह सही ।।*५ अंडा छी कम्मे स्वादिष्ट । पर बूझू बहुते पौष्टिक । तेँ अहँ पोषैत - पालैत छी ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हंस ओ हंसक केर तुलनामे बत्तख बहुत छोट आ हल्लुक होइत अछि पर तइयो बेसीतर बत्तख उड़ि नञि पाबैत अछि । *२ - अंग्रेजीक DUCK शब्द केर क्षेत्र बहुत व्यापक अछि; तहिना मैथिलीक “बत्तख” केर क्षेत्र सेहो । एकर अन्तर्गत कतेको वंशक जलीय पक्षीक बहुतो जाति ओ प्रजाति आबेत अछि जाहिमे बेसीतर नञि उड़ि सकैत अछि । *३ - DUCK या “बत्तख” शब्दक अन्तर्गत आबए बला बेसीतर चिड़ै उड़ि नञि पाबैत अछि । पर एकरहि अन्तर्गत उपविभाग SHELDUCK मे आबए बला चिड़ै नीक उड़ान भरैत अछि आ प्रवासी प्रकृतिक होइत अछि । मैथिलीमे प्रायः नञि उड़ि सकए बला DUCK केँ “बत्तख” कहल जाइत अछि पर उड़ए बला DUCK केँ व्यापक स्वरूपमे “हंस” कहि देल जाइत अछि । एहेन किछु DUCK केर लेल मैथिलीमे विशिष्ट नाम सेहो अछि, यथा - चकेबा, सिल्ली आदि । *४ - देहक रंग जे हो पर अपना दिशि प्रायः बत्तखक पएरक रंग पीयर वा नारंगी सनि होइत अछि । *५ - ओना तँऽ प्रायः हर बत्तखमे कमोबेश हेलबाक आ गोंता लगएबाक क्षमता होइत अछि, पर समुद्री परिवेशमे भेटए बला बत्तख बहूत गँहीर गोंता लगाबएमे माहिर होइत अछि । *६ - जे केओ अण्डा खाइत छथि तनिका कथनानुसार बत्तखक अण्डा मुर्गीक अण्डाक अपेक्षा कम स्वादिष्ट होइत अछि । यूनानी आ पारम्परिक चिकित्सामे एकरा विशेष पौष्टिक ओ औषधीय गुण सम्पन्न मानल जाइत अछि । कोना करै छेँ - “बागर” सनि, बागर की होइ छै - से बता । बागर - बागर लोक बाजैए, बागर की - ककरो ने पता ।। जे कहबेँ - पएबेँ ईनाम, सोचै जाइ जो सभ धियापुता । हारि गेलेँ, तखने हम कहबौ, नञि तँऽ छी हमरो ने पता ।। एहिना बहुते शब्द मैथिलीक, हेरा गेल ककरो ने पता । जे बाँचल, पैघो ने बाजए, सीखतै कोना धियापुता ।। नेनपनमे सुनलहुँ, पूछल, पर अर्थ ने बूझल छल ककरो । उत्कण्ठा तकबाक हिलोरल, तेँ किछु बूझल अछि हमरो ।। “बागर” परबा केर प्रजाति, सन्दर्भ भेटल हमरा एक ठाँ ।*१ उकपाती आ बड़ झगड़ौआ, बड़ हल्ला रहितए जाहि ठाँ ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - CSIR (आब NISCAIR) NEW DELHI द्वारा प्रकाशित पोथी WEALTH OF INDIA : BIRDS केर अनुसार “बागर” परबाक एक प्रजाति छल । कल्याणी कोशक अनुसार “बागर” एक प्रकारक बकरी थिक । सम्भवतः दुहु अपना - अपना अनुसारेँ सही छथि आ “बागर” अनेकार्थी शब्द थिक । *२ - एहि ठाम हम परबाक एकटा प्रजातिक रूपमे बागरकेँ लेल गेल अछि जे स्वभावसँ बहुत झगरौआ, उकपाती आ हल्ला मचबए बला होइत छल आ परबाक प्रतियोगिता (परबाबजी) केर उद्देश्यसँ पोषल जाइत छल । ई बिढ़नी, ओ बिढ़नीक खोंता, बुझलह की ने बौआ । दूरे रहिहह, काटि लेतह, कटिते बनि जएबह कौआ ।। बिढ़नी कटतह, थुम्हा फुलओतह, करए ने जाह उकाठी । सम्हरि कऽ खहिहह आमक गाड़ा, देखलक बिढ़नी बाटी ।। आमक महिना अबितहि बिढ़नी, जानि कतऽसँ आबए । आमक चोभा लगबए बुच्ची, काटि कऽ तखने भागए ।। मधुमाछी सनि देखबामे अछि, पर नञि मऽध बनाबए । पर खोँतामे एक्कहि रंगक, कोठरी कोना बनाबए !! कम बिषाह पीयर बिढ़नी, कहबए “साधारण बिढ़नी”। लाल आ कारी देहमे धारी, इएह “पचहिया बिढ़नी”।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - बिढ़नी आ पचहिया दुहु एकरँगाह होइतहुँ एक-दोसरासँ किछु विशिष्ट अन्तर रखैछ । अंग्रेजीमे वास्प (WASP) शब्दसँ उड़एबला कीड़ाक एकटा बहुत पैघ समुदायक बोध होइत अछि जाहिमे बिढ़नी ओ पचहियाक अतिरिक्त आन बहुत तरहक सम्बन्धित कीड़ासभ अबैत अछि । बिढ़नी गाछ-पातमे उपस्थित सेल्युलोज (CELLULOSE) नामक पदार्थकेँ अपना थूक या लेरमे (SALIVA) सानि अपन खोंताक (NEST) निर्माण करैछ । सेल्युलोज ओएह पदार्थ अछि जाहिसँ कागत (PAPER) बनैत अछि । तेँ एकरा अंग्रेजीमे पेपर वास्प (PAPER WASP) कहल जाइत अछि । एकर खोंतामे २०० सँ ५०० धरि कोठरी भऽ सकैत अछि आ हरेक कोठरी आकारमे एक समान रूपसँ षटकोणीय (HEXAGONAL) होइत अछि । एकर खोंताकेँ एकटा विशिष्ट छत्ता सनि आकार होइत अछि तेँ एकर खोंताकेँ छत्ता (COMB) आ बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे अम्ब्रेल्ला वास्प (UMBRELLA WASP) सेहो कहल जाइत अछि । समान्य रूपसँ भेटए बला पीयरका बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे यॅलो पेपर वास्प (YELLOW PAPER WASP) कहल जाइत अछि । एकरअतिरिक्त आन कतेको तरहक बिढ़नी होइत अछि किछु एक रंगक तँऽ किछु पर दोसर रंगक धारी (BANDS) रहैत अछि । मुख्य रंग (पीयर या नारंगी या आन) पर दोसर रंगक (कारी या भूरा) धारी (BANDS) पचहियामे सेहो भेटैत अछि पर पचहिया सामान्य बिढ़नीसँ आकारमे किछु पैघ होइत अछि । पचहियाकेँ अंग्रेजीमे हॉर्नेट (HORNET) कहल जाइत अछि । ई बिढ़नीएक किछु पैघ आ विशिष्ट रूप मानल जाइत अछि तेँ कतेक ठाम एकरा वास्प (WASP) या हॉर्नेट वास्प (HORNET WASP) कहि सेहो संबोधित कएल जाइत अछि । सामान्यतः पचहियाक दंश बिढ़नीक दंशसँ बेशी खतरनाक होइत अछि । पचहियाक दँशसँ मनुक्खक मृत्युक घटना बेशी सोझाँ आयल अछि । देखू ! देखू ! ई छै बेङ्ग । टर्र-टेँ, टर्र-टेँ करइछ बेङ्ग ।। हरियर - पीयर ढाबुस बेङ्ग । गाल फुला कोना बाजए बेङ्ग ।। खत्ता - डबरा - पोखरि बेङ्ग । मेघक लगितहि कुदकए बेङ्ग ।। बेङ्गहि सनि देखू ई भेंक । पर ने टर्र - टर्र करइछ भेंक ।। बौआ फेंकलक जुमा कऽ ढेप । डुम्मी काटि कऽ भागल बेङ्ग ।। बेशी सर्दी, बेशी घाम । सहि ने पाबए ओक्कर चाम ।। तेँ बरिसातक पहिने - बाद । माटिक तऽर रहए निर्बाध ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - देखबामे एकरंगाह होएबाक कारण भेंक आ दादुर मैथिली साहित्यमे − विशेषतः काव्य साहित्यमे − बहुधा बेङ्ग केर पर्यायवाचीक रूपमे प्रयुक्त होइत अछि परञ्च ई दुहु वास्तवमे अलग - अलग जीव थिक । बेङ्ग केर त्वचा स्निग्ध आ चिक्कन होइत अछि, ओकर जबड़ामे दाँत होइत अछि, नर बेङ्ग टर्र -टेँ केर अबाज निकालि सकैत अछि जखनि कि भेंक केर त्वचा सुखाएल आ खरखर होइत अछि, ओकरा दाँत नञि होइत अछि तथा ओ बेङ्ग जेकाँ अबाज नञि निकालि सकैत अछि । बेङ्गक बच्चाकेँ “बेङ्गची” आ भेंकक बच्चाकेँ “भेंकशिशु” कहल जाइत अछि जकर प्रारम्भिक अकार माछक बच्चा सनि होइत अछि आ विभिन्न स्तरक कायान्तरण प्रक्रिया (METAMORPHOSIS) केर बाद चिरपरिचित वयस्क स्वरूपकेँ प्राप्त करैत अछि । बेङ्ग / बेंग (मैथिली) = मेढक (हिन्दी) = FROG (ENGLISH) = Rana spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) भेंक / दादुर (मैथिली) = भेंक / दादुर (हिन्दी) = TOAD (ENGLISH) = Bufo spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) बेङ्ग आ भेंक - ई दुहु उभयचर वर्गक जन्तु अछि अर्थात पानि आ माटि दुनु स्थानमे विचरण करैछ ( उभय = दुहु / दुनु तथा चर = विचरण कएनिहार / रहनिहार) । उभयचर वर्गकेँ अंग्रेजीमे क्लास एम्फिबिया (Class AMPHIBIA) (Amphi = Both & Bion/Bios = Life) कहल जाइत अछि । उभयचर वर्गक जन्तुसभ शीतरक्तीय / अनियततापी / बाह्यतापी (COLD BLOODED / POIKILOTHERMIC / ECTOTHERMIC) जीव होइत अछि यानि कि ओकरसभक शरीरक तापमान वातावरणक तापक्रमक अनुसार घटैत बढ़ैत अछि । तेँ वातावरणक तापमानक बहुत बेशी कम होएब आ बहुत बेशी बढ़ब एहि तरहक जीव सभक लेल जानमारुक होइत अछि । एहना अवस्थामे ओ सभ जमीनक भीतर नुका जाइत अछि । चुँकि जमीनक भीतरक तापमान जमीनक ऊपर जेकाँ घटैत - बढ़ैत नञि अछि तेँ ओ एतए सुरक्षित रहैत अछि । एहि समय ओ जीवसभ बेशी हलचल नञि करैत अछि आ जिउबाक लेल पुर्व सञ्चित भोजन (चर्बी) पर निर्भर करैछ । गर्मीक समयमे एहेन प्रक्रियाकेँ गृष्मनिद्रा (AESTIVATION / ESTIVATION) आ ठण्ढीक समयमे शीतनिष्क्रियता (HIBERNATION) कहल जाइत अछि । शरीरक तापसन्तुलनक (THERMOREGULATION) एहि तरहक प्रक्रिया सरिसृप वर्ग (Class REPTILIA) केर प्राणीसभमे (यथा - साँप आदिमे) सेहो देखल जाइत अछि । पक्षी आ स्तनपायी वर्ग (Class AVES & MAMMALIA) केर जीव (मनुक्ख सेहो) ऊष्णरक्तीय / नियततापी / स्थिरतापी / अन्तःतापी / अन्तर्तापी (WARM BLOODED / HOMEOTHERMIC / ENDOTHERMIC) होइत अछि अर्थात ओकर सभक शरीरमे एहेन व्यवस्था रहैत छै कि वातावरणक तापक विरुद्ध ओ सभ अपन शरीरक तापमानकेँ एकटा निश्चित सीमामे बनओने रहैछ । गे भगजोगनी, बड़ चमकै छेँ ! कतएसँ बिजुरी छेँ । घुप्प अन्हरिया, बाटक कातेँ, चकमक चकमक कएने छेँ ।। आबि गेलेँ हमरा सोझाँ, हमरा हाथक तरहत्थी पर । बिजुरीसँ ने हाथ जरैतछि, छौ इजोत तोहर शीतल ।।*१ पेटक निचुला भाग पता नञि, केहेन माया रचने छेँ ! डिबिया - टेमी बिना तोँ सौंसे, भुक्-भुक् भुक्-भुक् कएने छेँ ।। पीच सड़क केर कातेँ - कातेँ, जमकल पानि आ गाछ छै । ताहि गाछ पर सत्ता - सोड़े, भगजोगनी केर बास छै ।।*२ भारी बरखा आ ठण्ढीमे, पतनुकान लए लैत छै । बरखक शेष समएमे ओ तँऽ, भुक् - भुक् - भुक् चमकैत छै ।।*३ भगजोगनीकेँ पकड़ि - पकड़ि, बन्न करैत छी शीशीमे । भूर छी कएने मुन्नामे, साँस लेबा लेल शीशीमे ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - भगजोगनीक उदर भाग (VENTRAL SURFACE) केर नीचाँमे विशिष्ट अवयवी संरचना होइत अछि जकरा प्रकाश उत्पादक अंग (LIGHT EMITTING ORGANS) कहल जाइत अछि । एहिमे ल्यूसीफेरेज (LUCIFERASE) नामक एकटा किण्वक या एञ्जाइम (ENZYME) होइत अछि जे ऑक्सीजन आ मैग्नेशियम आयनक (Mg++) उपस्थितिमे ल्यूसीफेरीन (LUCIFERIN) नामक रासायनिक पदार्थ पर क्रिया कऽ कऽ प्रकाश या इजोत उत्पन्न करैछ । एहि तरहेँ इजोतक उत्पत्ति जैव संदीप्ति (BIOLUMINESCENCE) केर उदाहरण अछि । भगजोगनीक एहि इजोतकेँ शीत इजोत (COLD LIGHT) कहल जाइत अछि । एहि इजोतमे पराबैगनी (ULTRA VIOLET) ओ अवरक्त (INFRA RED) किरण नञि रहैत अछि । अवरक्त किरणक अनुपस्थितिक कारणेँ एहिमे उष्णता या गर्मी नञि रहैत अछि आ तेँ छुअबा (छूबा) पर हाथ नञि पाकैत अछि । विश्वमे भगजोगनीक करीब दू (दुइ) हजार जाति (SPECIES) होइत अछि । भगजोगनीक विभिन्न जाति-प्रजातिक अनुसारेँ एहि इजोतक रंग पीयर, हरियर या पिरौंछ लाल भऽ सकैत अछि । *२ - भगजोगनी दलदली अथवा पानि लागल ओ गाछ-बिरिछसँ युक्त जगह सब पर रहैत अछि । एहि तरहक आवास क्षेत्र (HABITAT) अपना दिशि पीच (पक्का) सड़कक कातेँ-कातेँ आसानीसँ भेटि जाइत अछि कारण अछि ओहि सड़कक दूनू कात माटि कटलासँ गँहीर भेल स्थानमे बरख या बाढ़िक पानिक जमाव आ संगहि - संग भेल वृक्षारोपण । *३ - आन सन्धिपाद प्राणी (Arthropods) सब जेकाँ भगजोगनी सेहो शीतरक्तीय प्राणी (Cold blooded / Poikilothermal animal) अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे ओ पतनुकान लऽ लैत अछि अर्थात् शीतनिष्क्रिय अवस्थामे (Hibernating Stage) चलि जाइत अछि । किछु तँऽ बेङ्ग आ भेंक जेकाँ माटिक भीतर नुकाए रहैत अछि । तहिना बेसी तेज बरखा भेला पर सेहो । *४ - बहुतहु लोक अपन नेनपनमे भगजोगनीकेँ पकड़ि शिशीमे किछु काल वा किछु दिनक लेल बन्न कएने होएताह आ एखनहु धियापुता सब करैत अछि । कारी भेम्ह, कारी भेम्ह, भम्हरा हमरे नाम छी । हम तँऽ होइ छी आनो रंगक, चर्चित बहुते श्याम छी ।।*१ हमहूँ मधुमाक्षी - बिढ़नी सनि, सामाजिक छी प्राणी । हम ने काटी अनेरो ककरो, करी ने हम मनमानी ।। हमरो समाजमे श्रमिक रहैछ, नेतृत्व करैतछि रानी । हमर आकार पैघ बहुते छी, नञि बिढ़नी केर सानी ।।*२ भम्-भम् केर सुन्नर आबाज छी हम्मर नामक कारण । हमर पंख केर गतिसँ निकसए, ई आबाज मनभाओन ।।*३ कारी पर पीयर, नारंगी, लाल या उज्जर धारी । कखनो फेंट - फाँट रंगक आ कखनो अगबे कारी ।।*१ मधुमाक्षी सनि हमहूँ फूलक, रसहिं बस पीबै छी । पी - पराग मदमस्त रही, आ अपनहि धुनिमे रहै छी ।। पर जँ केओ हमरा खोंतामे, करइछ जाए उकाठी । नानी याद अवश्ये आओतीह, तकरा जँ हम काटी ।। मधुमाक्षी आ आन बन्धु सनि, हमहूँ करी परागण ।*४ फूले-फूले विचरए सटि कऽ, कतेक परागक मधुकण ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - अपना दिशि आ अपना दिशि केर वाङ्गमयमे अगबे कारी रंगक भेम्ह बड़ प्रशिद्ध थिक । पर संसारमे भेम्हक बहुत रास प्रजाति भेटैत अछि जकर रंग निम्न प्रकारेँ भऽ सकैछ - एकवर्णी कारी, कारी रंगक देह पर पीयर नारंगी या उज्जर रंगक धारी या धब्बा बला, पीयर या उज्जर रंगक देह पर कारी धारी या धब्बा बला *२ - मधुमाक्षी (-छी) आ बिढ़नी जेकाँ भेम्हक हरेक झुण्ड या छत्तामे एक टा रानी भेम्ह (QUEEN BUMBLE BEE), किछु पुरुष या नर भेम्ह (DRONE/S BUMBLE BEE) आ बहुत रास श्रमिक या मजूर भेम्ह (LABOUR BUMBLE BEE) रहैत अछि । *३ - इएह अबाज केर कारण प्रायः हरेक भाषामे एकर नामकरण भेल अछि । *४ - भेम्ह सेहो फूलक रस चूसैत अछि । फूलक रस चूसबा काल फूलक पराग कण (POLLEN GRAINS) ओकरा शरीरक विभिन्न भागसँ सटि कऽ एक फूलसँ दोसर फूल पर पहुँचि जाइत अछि । एहि तरहक परागणक (POLLINATION) प्रक्रियाकेँ कीट-परागण (ENTOMOPHILY) कहल जाइत अछि । कीट-परागण वस्तुतः पर-परागणक (CROSS POLLINATION) एक प्रकार छी । दुनिञामे मनुक्खक आगमसँ, बड़ पहिनेसँ मच्छर अछि ।*१ छोट जीव, मुदा पैघ जीवकेँ, कएने बहुत उछन्नर अछि ।। मच्छर केर जे पुरुष रूप से, पुष्प - परागकेँ चूसैत अछि । मच्छर केर स्त्रैन रूप मुदा, खून पीबि कऽ जीबैत अछि ।।*२ मच्छर अपनहि छोट अछैतहुँ, सूक्ष्मजीव केर आश्रय अछि । ओक्कर लेड़ - ग्रण्थिमे कएटा, परजीवी केर प्रश्रय अछि ।।*३ खून चूसबा काल लेड़ संग, परजीवी प्रस्थान करैछ । जकर खून चूसल जा रहलए, तकर काय स्थान धरैछ ।। नऽव कायमे ओ परजीवी, रोगक अछि निर्माण करैत । संग मनुक्खक आनहु पशुमे, नूतन ब्याधि-विधान करैछ ।।*४ जापानी एनसिफेलाइटिस ओ, डेङ्गू आओर मलेरिया । चिकेन गुनिञा सनक बेमारी, अथवा रोग फलेरिया ।।*५ मच्छर छी बड़ असञ्जाति, ओ हर युक्तिक प्रतिरोध गढ़ैछ । मशहरीक नञि तोड़ कोनहु छी, मच्छर केर अवरोध करैछ ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - एहि धरती पर जीवनक क्रमविकाशमे (Organic Evolution) नवीन मतानुसार मच्छरक उद्गम कमसँ कम 2 अरब 30 करोड़ वर्ष पहिने भेल छल जखनि कि आधुनिक विज्ञानानुसार मनुक्ख वंशक (Genus - Homo) उद्भव करीब 2 करोड़ वर्ष पहिनहि भेल अछि । आधुनिक मानव (Homo sapiens) केर उत्पत्ति तँऽ मात्र 2 लाख 50 हजार वर्ष पहिने बताओल जाइत अछि । *२ - पुरुष वा नर मच्छर पुष्प पराग पीबि (पिउबि) कऽ अपन जीवन निमाहैत अछि जखनि कि स्त्री या मादा मच्छर मनुक्खक अतिरिक्त किछु आन जन्तु सभक खून पीबि (पिउबि) जीवन निर्वाह करैछ । एकर पोषक जन्तु सबमे (Host animals) किछु रीढ़धारी आ किछु आन सन्धिपाद प्राणी सभ रहैत अछि । रीढ़धारी प्राणी सभमे स्तनपायी (Mammals), चिड़ै (Birds), सरिसृप (Reptiles), उभयचर (Amphibians), मत्स्य (Fishes) आदि वर्गक प्राणी सभ एकर पोषक जन्तु (Host animals) भऽ सकैत अछि । *३ *४ - स्त्री मच्छरक लेर ग्रण्थिमे (Salivary gland) बहुत रास अन्तः परजीवी सभ (Internal Parasites) निवास करैत अछि । जखन कोनहु परजीवीसँ संक्रमित वा व्यापित स्त्री मच्छर (Infected or Infested Female Mosquito) कोनहु पोषक जन्तु केर खून चूसैत (चूषैत) अछि तँऽ ओ परजीवी मच्छरक लेर (Saliva) केर संग ओहि पोषक जन्तुक रक्त परिसंचरण तन्त्रमे (Haemo Circulatory system) प्रवेश पबैछ । तकर बाद अपन विशिष्ट जीवन चक्रक (Specific Life Cycle) अनुसार ओहि पोषक जन्तुकेँ विभिन्न तरहक रोगसँ आक्रान्त करैछ । *५ - मनुक्खक मच्छर जनित बेमारी सबमे किछु प्रमुख अछि मलेरिया (Malaria) फलेरिया (Filariasis / Elephantiasis) जपानी मस्तिष्क शोथ (Japanese Encephalitis) डेङ्गू या डेङ्गी (Dengue) चिकनगुनिञा (Chickengunya) जिका वायरस बोखार (Zika Virus Fever) पच्छिमी नील वायरस बोखार (West Nile Fever) आदि । *६ - कोनहु प्रकारक मच्छरनाशी वा मच्छररोधी रसायनक प्रति मात्र किछुअहि साल वा महीनामे मच्छर प्रतिरोध (Resistance) उत्पन्न कऽ लैत अछि ओ ओकरा बेअसरि कऽ दैत अछि । मच्छरसँ बचबाक लेल मशहरीक प्रयोग सस्ता आ रामबाण तरीक अछि । मैथिलीमे “मच्छर” ओ “मशहरी” दूनू तद्भव शब्द भेल जकर मूल संस्कृत शब्द क्रमशः “मत्सर” आ “मशकहरी” अछि । बैसल - बैसल माटि खोधै छेँ, माटिमे की तोँ ताकै छेँ ? गाछ लोलसँ ठक - ठक करइत, कठखोद्धी सनि लागै छेँ ।।*१ हम ने अनेरो माटि खोधै छी, कीड़ा − खएबा लेल तकै छी । गाछक छालकेँ खोधि-खाधि कऽ, सेहो अपन आहार तकै छी ।।*२ काठ खोधि ने धोधरि बनबी, कठखोद्धीसँ भिन्न छी हम ।*३ हमर लोल पातर - नमगर छी, माटि खोधक उपयुक्त जेहेन ।।*४ माथ - वक्ष - गर्दनि छी पीयर, पीयर - नारंगी अछि कलगी । खोधए काल माटि − पंखा सनि, शोभए माथ हमर कलगी ।।*५ पछिला भाग पाँखि आ नाङ्गरि, श्वेत - श्याम एकान्तर छी । कठखोद्धी देखब ने माटि पर, हमरा - ओकरामे अन्तर छी ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - नमगर आ पातर लोलसँ माटि वा गाछक अलगल छाल पर बेरि - बेरि आघात करबाक कारण अपना दिशि सामान्य लोक एकरा प्रायः कठखोद्धी बूझि लैत अछि । *२ - माटिखोद्धी माटिक तऽरसँ आ गाछक छालक भीतरसँ कीड़ा-मकोड़ा आ ओकर अण्डा बच्चाकेँ ताकि कऽ खा जाइत अछि । *३ - माटिखोद्धी गाछक छालक भीतरसँ मात्र कीड़ा-मकोड़ाकेँ ताकि भक्षण करैत अछि; कठखोद्धी जेकाँ काठकेँ खोधि कऽ धोधरि नञि बनबैत अछि । *४ - माटिखोद्धीक लोल कठखोद्धीक लोलक अपेक्षा बहुत पातर आ नमगर होइत अछि जे किछु नम (भीजल) माटि आ गाछक अलगल छाल खोधबाक लेल विशेष उपयुक्त अछि नञि कि मजगूत काठ खोधबाक लेल । *५ - माटिखोद्धीक माथ पर नारंगी-पीयर रंगक कलगी (CROWN) होइत अछि । ई कलगी मुर्गाक कलगी जेकाँ अविभक्त नञि भऽ कऽ अरीय ढंगसँ (RADIALLY) विभक्त वा खण्डित रहैत अछि । माटि खोधबा काल ई कलगी पंखा जेकाँ फुजि जाइत अछि (FANNING) वा पसरि जाइत अछि । *६ - माटिखोद्धीक पछिला भाग पर एकान्तर क्रममे कारी आ उज्जर रंगक पट्टी रहैत अछि । माटिखोद्धी जेकाँ कठखोद्धीकेँ माटि खोधैत नञि देखब । खेतमे आ बाड़ी - झाड़ीमे । पड़ती - गाछी - बँसबिट्टीमे । कूदए - फानए एक चिड़ै ।। बेशी ओकरा उड़ल ने होइछ । कूदए - फानए - कने उड़ैछ । लाल आँखिबाला ओ चिड़ै ।। देह आ नाङ्गरि कारी - कारी । कौआ सनि केर बूझू कारी । लाल पाँखिबाला ई चिड़ै ।। कीड़ा - मकोड़ा डोका गिरगिट । बेङ्ग साँप भूआ आ की - की ! खा कऽ पेट भरैछ ओ चिड़ै ।। एतबहिसँ ने पेट भरैत छै । अण्डा - चुज्जा फऽड़ ठुसैत छै । ताड़ - खजूरक शत्रु चिड़ै ।। सौंसे भारतमे भेटैत अछि । पर्वत पठार मैदान फिरैतछि । “मोहखा या मोखा” जे चिड़ै ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - कुक्कू (CUCKOO) गण आ परिवार (Order - Cuculiformes & Family - Cuculidae) केर सदस्य होइतहुँ मोहखा एहि परिवारक आन सदस्यसभ सनि शिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) नञि अछि । ओ अपन खोंता बनबैत अछि, अपन अण्डाकेँ अपने सेअइत अछि आ बच्चाक देखभाल सेहो अपनहि करैत अछि । एहि परिवारक आन बहुत रास सदस्य जेना कि कोइली, पपीहा, चातक आदि शिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) होइत अछि । हउए देखियौ “अरुण - क्रुञ्च”, वाह ! केहेन रमणगर लागैत छै ! *१ सागर तट पर झुण्डक - झुण्ड ओ, केहेन सोहनगर लागैत छै !! *२ खन सारस सनि ठाढ़ भेल छै, खन हंसहि सनि हेलैत छै ।*३ हंसहि सनि देखियौ गर्दनि, ओ पानिसँ अनुखन खेलैत छै ।। केओ कहैछ - छै “राजहंस” इएह, केओ कहैछ - “हंसावर” छै ।*४ अपना दिशि नञि छै भेटैत, ओकरा बड़ रुचिगर सागर छै ।।*२ हंसहि सनि एकरहु तँऽ मूँहमे, छन्नी सनि किछु लागल छै । कादो सानल पानिसँ सेहो, स्वच्छ आहार ओ छानैत छै ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - प्राचीन हिन्दू धर्मग्रण्थसभमे जाहि “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ैकेँ अग्निदेवताक वाहन बताओल गेल अछि से इएह चिड़ै थिक । *२ - ई चिड़ै समुद्र तट पर रहब पसिन्न करैत अछि आ तेँ अपना दिशि नञि भेटैत अछि । भारतमे विशेष कऽ पछबारी समुद्रतटीय घाट पर ई चिड़ै आबैत अछि आ किछु संख्यामे पुबारी समुद्रतटीय घाट केर क्षेत्रमे (यथा - उड़ीसाक चिल्का झीलमे) सेहो । ई प्रबासी चिड़ै (MIGRATORY BIRD) थिक । गर्मीमे अफ्रिकाक समुद्री तटसँ भागि प्रायः दच्छिन-पच्छिम एसियाक आ यूरोपक समुद्र तट पर आबैत अछि आ ठण्ढीमे पुनः ओतहि चलि जाइत अछि । *३ - ठाढ़ भेल ई चिड़ै लाल रंगक सारस (क्रुञ्च या क्रौञ्च) जेकाँ लागैत अछि आ तेँ संस्कृतमे एकर एकटा नाम “अरुण क्रुञ्च” अछि । पानिमे हेलबा काल ई अनमन्न हंस सदृश लागैत अछि, हंसहि सनि एकर गर्दनि अंग्रेजीक “S” वर्ण जेकाँ देखाइ दैत अछि । एकर आबाज सेहो हंसहिसं मिलैत अछि । इएह कारणेँ “राजहंस” सेहो कहबैत अछि । *४ - किछु लोक “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ै केर पर्यायी नाँओ “राजहंस” सेहो मानैत छथि तँऽ किछु लोक एकरा “हंसावर” कहि सम्बोधित करैत छथि । *५ - एहि चिड़ै केर लोलक भीतर एकटा छन्नी सनि संरचना (SIEVE LIKE STRUCTURE) होइत अछि जकर मदतिसँ कादो भरल पानिमेसँ सेहो अपन खएबा जोग बस्तुकेँ स्वच्छ स्वरुपमे प्राप्त कऽ लैत अछि आ बाँकी अनावश्यक पदार्थकेँ बाहरहि छोड़ि (छाड़ि) दैत अछि । एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्राचीन शास्त्रसभमे वर्णित “नीर - क्षीर विवेक” (नीर = कादो वा निर्माल्ययुक्त पानि; क्षीर = पोषक तत्त्वसभ) केर गुण राजहंसमे पाओल जाइछ । किछु विशेष बात - ई चिड़ै अपना दिशि (सम्पुर्ण मिथिलामे) नञि भेटैत अछि । तेँ एकर कोनहु आन मैथिली नाम नञि अछि । एहना स्थितिमे हम एहि ठाँ ओकर संस्कृतहि नामकेँ तत्सम स्वरूपमे मैथिली नामक रूपमे प्रयोग कयल अछि । मैथिली तँऽ मैथिली, संस्कृतहुमे “राजहंस” नाम केर सन्दर्भमे बहुत मत - मतान्तर अछि । परञ्च, संस्कृतक प्रशिद्ध ग्रण्थ “अमरकोश”मे देल गेल राजहंसक विवरण एहि चिड़ैसँ बेसी मेल खाइत अछि । संगहि आनहु बहुत रास गुण-धर्म केर मिलानक आधार पर आइ-काल्हि बेसीतर विद्वान एकरहि “राजहंस” मानैत छथि । अमरकोशक अनुसार राजहंसक विवरण निम्न प्रकारेँ अछि - ……… राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैर्लोहितैः सितः ……….।। अर्थात्, राजहंस ओ थिक जे सित वर्ण (किछु धूसर उज्जर; नञि कि स्वच्छ उज्जर) केर अछि आ जकर चक्षु (आँखि) ओ चरण (पएर) लोहित (लाल वा ललौन) वर्णक अछि । जाहि ठाम ई चिड़ै नञि पाओल जाइत अछि (मिथिलामे सेहो) ओहि ठामक सहित्यकारलोकनि आ लोकसभ राजहंस चिड़ै केर रूपमे अपना मन केर कल्पनाक अनुसार गढ़ि लैत छथि । अथवा, राजहंस शब्दक प्रयोग तँऽ करैत छथि पर राजहंसकेँ प्रत्यक्षतः चिन्हबाक झंझटिसँ दूरहि रहैत छथि । हिन्दीमे देल गेल एकटा आओर नाम अछि - “हंसावर” । ई नाम फादर कामिल बुल्के (अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश) द्वारा देल गेल छल । पर, हिन्दीअहुमे आब एहि शब्दक प्रयोग कम भऽ गेल आ एहि चिड़ै लेल “राजहंस” शब्दक प्रयोग होइत अछि । लॅमिङ्गो (राजहंस) केर विश्वमे कुल छओ (बेसीतर प्रणीशास्त्री द्वारा मान्य) जाति अछि- GREATER FLAMINGO - Phoenicopterus roseus - बड़का राजहंस / गुलाबी राजहंस LESSER FLAMINGO - Phoenicopterus minor - छोटका राजहंस CHILEAN FLAMINGO - Phoenicopterus chilensis - चीलीक राजहंस JAMES’ (or JAMES’S) FLAMINGO - Phoenicopterus jamesi - जेम्सक राजहंस ANDEAN FLAMINGO - Phoenicopterus andinus - एण्डीज पहाड़क राजहंस AMERICAN FLAMINGO - Phoenicopterus ruber - अमेरिकाक राजहंस उपरोक्त जातिसभमेसँ (BIOLOGICAL SPECIES) पहिल दू गोट भारतमे भेटैत अछि । राजहंसक छओ जातिसभमेसँ पहिल केर संख्या विश्वभरिमे सभसँ बेसी अछि । छोट जीव, बड़ मोट छै नाङ्गरि, पर ओ खिखीर नञि छै । अपना दिशि सौंसे भेटैत छै, बाड़ल कत्तहु नञि छै ।। पैघ छै पछिला टाङ्ग दुहु, अगिला बड़ छोट रहै छै । छोटकी कंगारू सनि लागए, पर कंगारू नञि छै ।। फऽल - फूल - दाना खाइए, ने घास - पात रूचै छै । अगिला पएरकेँ हाथ बना ओ, फऽल - फूल पकड़ै छै ।।*१ भूरा रंगक देह ओकर, वा रंग जेना मटियाही । पाँच या तीन टा भेटत पीठेँ, उज्जर - उज्जर धारी ।।*२ टी - टी, टी - टी ध्वनि तीव्र, ओ बेर - बेर करै छै । संगहि नाङ्गरि उठा कऽ ऊपर, हावामे ओ डोलबै छै ।।*३ आबहु ने चिन्हलहुँ तँऽ कहै छी, “लुक्खी” ओ कहबै छै । धारीबाला भारतमे आ, आस - पड़ोस भेटै छै ।। विश्वमे सौंसे पसरल लुक्खी, बहुत प्रकारक होइ छै । रंग जे हो, पर पीठ पर धारी, अन्तऽ नञि भेटै छै ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - एहि जीवक अगिला दुहु पएर छोट - छोट होइत छै जकर उपयोग ओ खएबा काल कोनहु बस्तुकेँ पकड़बाक लेल करैत अछि । *२ - प्रायः उतरबारी भारतमे भेटए बला लुक्खीक (NORTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus pennantii) पीठ पर पाँच टा उज्जर रेखा (धारी) होइत अछि जखनि कि दक्षिनबारी भारतक लुक्खीक (SOUTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus palmarum) पीठ पर तीन टा । *३ - ई जीव (लुक्खी) बैसल - बैसल “टि - टि” केर एक टा विशिष्ट ध्वनि निकालैत अछि आ संगहि अपन नाङ्गरिकेँ ऊपर उठाए हवामे झुलबैत रहैत अछि । *४ - मात्र भारतीय लुक्खीक पीठ उज्जर धारीसँ युक्त होइत अछि । विश्वमे भेटए बला आन लुक्खीक पीठ पर धारी नञि रहैत अछि । मटियाही गात छै । दस - पाँच - सात छै । तेँ ओ कहाइत छै सतबहिनी ।।*१ छोट छिन समाज छै । खाइत ओ अनाज छै । दाना चुगि खाइत छै सतबहिनी ।। देखने जरूर छी । चिन्हबासँ दूर छी । गुण ने विशेष कोनहु सतबहिनी ।। मैथिली कि अंग्रेजी । बंगाली या हिन्दी । सभतरि कहाबैछ ओ सतबहिनी ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - ई चिड़ै प्रायः पाँच सँ सात धरिक छोट समूहमे रहैत अछि । तेँ एकर नाम सतबहिनी (सप्त = सात; शत = सए) पड़ल । *२ - अंग्रेजीमे एकर नाम सेवेन सिस्टर्स (seven sisters) बंगाली भाषाक नाम “सातभाई” सँ पज़ल अछि — से बताओल जाइत अछि । मुदा ध्यातव्य जे पहिने मिथिला सेहो अंग्रजक अनुसारेँ बंगाल प्रॉविन्सक भाग छल आ ग्रियर्शन महोदयक काजसँ पहिने मैथिलीक स्वतन्त्र अस्तित्व अंग्रेजक डाटाबेसमे नञि छल । मिथिलामे ३, ५, ७, ११ आदि विषम संख्याक किछु अलगहि महत्तव रहल अछि; जेना कि - सतभैंया, पंचभैंया आदि । साहीक काँट तँऽ सुनने हएबहक । सुनने की - देखने सेहो हएबहक । साहीक काँटमे “साही” की ?? “साही” मूस - गणक छी प्राणी ।*१ मूससँ बहुते पैघ - से जानी । सौंसे देहे “काँट” बुझी ।। दिन भरि बियरिमे रहैत अछि । बाहर रातिएमे निकसैत अछि ।*२ रक्षा-कवच ई “काँट” कही ।। कारी - उज्जर काँट छियै ।*३ उपनयनहुमे काज छियै ।*४ पहिलुक लेखनी इहो बुझी ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मूस आ साही − दुहु एक्कहि कुलक सदस्य अछि । ओहि कुलक नाम अछि रॉडेण्शिया (RODENTIA) । *२ - ई बिलेशय प्राणी अछि आ माटिक नीचाँमे बिलमे रहैत अछि । संगहि रातिचर (NOCTURNAL) प्राणी सेहो अछि । *३ - साहीक काँट (QUILS / SPINES) परिवर्तित रोइयाँ (MODIFIED HAIR) थिक जकर रूप-रंग ओ आकार साहीक प्रकार तथा सहीक वयस पर निर्भर करैछ । *४ - उपनयनमे शिखा-विभाजनक विधमे (बरुआक टीककेँ ३ भागमे बँटबाक बिधमे) साहीक काँटक काज पड़ैछ । *५ - पहिने अपना दिशि भीत (माटिक देबाल) पर चित्र बनएबा काल चित्रक खाका (OUTLINE / ROUGH DIAGRAMME) बनएबा हेतु सेहो प्रयुक्त होइत छल । यूरेसिया (यूरोप आ एसिया) तथा अफ्रिका महादेशकेँ पुरना दुनिञा (OLD WORLD) आ उतरबारी तथा दछिनबारी अमेरिका महादेशकेँ नवका दुनिञा (NEW WORLD) कहल जाइत अछि । साहीक जे जाति (SPECIES) जाहि ठामक मूल निवासी अछि ताहि अनुसारेँ ओकरा सभकेँ पुरान दुनिञाक साही (OLD WORLD PORCUPINES - ORDER HYSTRICIDAE) आ नऽव दुनिञाक साही (NEW WORLD PORCUPINES - ORDER ERETHIZONTIDAE) कहल जाइत अछि । साही रहितहुँ दुनु समूहमे बहुत बेसी अन्तर अछि । छी मएने सनि, वा मएने छी, पर चितकाबर रंग हमर । बोली मीठ छी, सएह कारणेँ, एहेन सनि छी नाम हमर ।।*१ केओ कहथि स्थान “सिरोई”, ताहिसँ बनल “सिरोली” छै ।*१ पर मीठगर बोलहि कारण, हम्मर तँऽ नाम “सिरोली” छै ।।*१ साधारण मएना सनि ने हम, भेटब घर - आङ्गन बेसी । ढीठ ओतेक नञि तेँ हमरा, देखब ओत्तहि, नञि जन बेसी ।।*२ हल्लुक - पीयर लोल हमर छी, नेने जड़िमे किछु लाली । सुग्गा सनि अनुकरण करी, हमहूँ तँऽ मनुक्खक बोली ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पुर्वोत्तर भारतक मणीपुर राज्यमे एकटा स्थान अछि “सिरोई / सिरोही” जाहि ठाम सिरोई राष्ट्रिय उद्यान (SIROHI / SHIRUI NATIONAL PARK) या यैंगैंगपोक्पी लोकचाओ वन्यजीव अभयारण्य थिक जकर स्थापना सन् 1982 ई॰मे कयल गेल छल । अन्तर्जाल पर उपलब्ध जानकारी इएह कहैत अछि कि “सिरोई” नामक स्थानक आधार पर एहि मएनाक नाम “सिरोई मएना” पड़ल जे कि बादमे “सिरोली मएना” भऽ गेल । परञ्च हमरा ई बात पचि नञि रहल अछि कारण कि - “सिरोली मएना” पूरा दछिनबारी एसियामे मैदानी (PLAINS) आ निचला तराई (LOWER FOOTHILLS) क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि, तखन फेर मात्र मणीपुरहि के “सिरोई” केर विशेषण किएक ? सिरोई राष्ट्रिय उद्यान केर स्थापना सन् 1982 मे भेल पर मिथिलामे एहि चिड़ै केर नाम “सिरोली” बहुत पहिनहिसँ अछि (मिथिलाक किछु अतिवृद्ध महिला लोकनि बतओलन्हि) । अपना दिशि लोक सभक (विशेष कऽ किछु अतिवृद्ध जानकार महिला लोकनि) अनुसारेँ “सिरोली” (सिरोली मएना) केर बोली “मएना” (साधारण घरैया मएना) केर बोलीक अपेक्षा मधुर होइत अछि तेँ एकर एहेन नाम अछि । ई चिड़ै गाबएबला पक्षीक (SINGING BIRDS) श्रेणीमे आबैत अछि जे कि किछु सीमा धरि नामकरणक पाछाँ ओकर आबाजकेँ कारण होयबाक पुष्टि करैछ । *२ - “सिरोली” “साधारण मएना” जेकाँ ढीठ नञि होइत अछि आ तेँ घर आङ्गनमे जाहि ठाम मनुक्खक आबर-जात बेसी हो ताहि ठाम नञि देखाइ देत । गाम-घऽरमे कने कात -करौटमे आ प्रायः छोट-छोट झुण्डमे सिरोली देखबामे आओत । *३ - पिञ्जरामे पोषला पर सिरोली सेहो सुग्गा जेकाँ मनुक्खक बोलीक नकल करैत देखल गेल अछि । हे नकली नीलकण्ठ ! तोहर छह गजब पिहानी । असली भेल अलोपित, तोँही राजा - रानी ।।*१ नील-हरित तोर पाँखि, तोँहूँ बैसए छऽ ताड़ पर ।*२ गर्दनि छह ने नील तोहर, मटियाही - पीयर ।।*३ नकली अशोक जे, दुनिञा तकरा असली बूझए । सीता-अशोक जे छी असली, से केओ ने चीन्हए ।।*४ तहिना तोहर साम्राज्य बहुत, पसरल छह सौंसे । असली दुर्लभ, नकली सर्वसुलभ, सब लोके ।। नाम “सिरौली” तोहर छियऽह, बूझल से हमरा । अलग “सिरोली मएना” से जानए भरि मिथिला ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - असली नीलकण्ठ नञि देखाइ देबाक कारण लोक एकरे नीलकण्ठ मानि बैसल अछि । भ्रमक आओरो बहुत रास कारण अछि । *२ - एकर पाँखि नील रंगक होइत अछि जे उड़बा काल चमकैत हरिताभ-नील रंगक बुझि पड़ैछ । मिथिलामे पहिने असली नीलकण्ठ सेहो बिजलीक ताड़ पर बैसल भेटैत छल तहिना ईहो चिड़ै भेटैत अछि । *३ - एकर गर्दनि नील नञि भऽ कऽ पीयर सनि होइत अछि । एहि चिड़ैकेर बिदेशी किछु प्रजातिसभमे (SUB-SPECIES) पीयर गर्दनि पर नील आभा रहैत अछि पर ओ सभ उत्तर भारतमे नञि पाओल जाइछ आ नहिञे कहियो पहिने पाओल जाइत छल । तेँ ओ नीलकण्ठ नञि भऽ सकैछ । तेलुगू भाषामे एकर नाम “पलपित्त” अछि जखनि कि कन्नर भाषामे “नीलकण्ठी” कहबैछ । सम्भवतः कन्नर भाषाक नीलकण्ठीसँ ई भ्रम उपजल कि इएह संस्कृतक नीलकण्ठ अछि । पर जे हो, मैथिलीक नीलकण्ठ ई नञि अछि । *४ - आइ - काल्हि जाहि शोभा वृक्षकेँ अशोक नामसँ जानल जाइत अछि से वस्तुतः नकली अशोक छी । रावणक अशोक वाटिकाक अशोक जकर कि चिकित्सकीय प्रयोग आयुर्वेदमे बताओल गेल अछि, से अलग अछि । ओकरा आइ - काल्हि “सीता अशोक” कहल जाइत अछि आ इएह असली अशोक अछि जकर प्रयोग अशोकारिष्ट आदि बनएबामे होइत अछि । *५ - मिथिलामे एकरा “सिरौली” नामसँ जानल जाइत अछि (सिरोली नञि) । सिरोली एकटा अलग चिड़ै अछि, ओ एक तरहक मएना अछि । झुण्डक - झुण्ड आबै छै, उतरए पोखरि - डबरा - खत्ता । सर्वेक्षण कऽ पहिने देखैछ, कत्तऽ मनुक्ख निपत्ता ।।*१ जाहि ठाम मनुखक सञ्चर, ने उतड़ए ओ ताहि ठाम । आबादीसँ दूर जलाशय, ठण्ढी - सिल्ली - धाम ।। उतड़ए शान्त जलाशय, खेलए - कूदए - भूख मेटाबए । कनिञे कालमे उड़ए झुण्ड, ताकए फेर नऽव जलाशय ।। बत्तख सनि लागए धरती पर, दूर - गगन पानिकौआ । सिल्ली हेंजक-हेंज आबैछ, एकसरि प्रायः पानिकौआ ।।*२ मिथिलामे बुझले अछि सभकेँ, जीहक बड़ चटकार । मांसु लेल सिल्ली केर होइतछि, गामे - गाम शिकार ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ । *२ - पानिमे हेलैत काल सिल्ली बत्तख सनि लागैत अछि जखनि कि आकाशमे उड़ैत काल पानिकौआ सनि । पर बत्तख एतेक ऊँच कखनहु नञि उड़ैत अछि आ पानिकौआ एतेक पैघ झुण्डमे कहियो नञि देखाई दैत अछि । पोखरिक भीड़, लतामक गाछ । ताहि पर सुग्गा करैए नाच ।। जहिना पात लतामक हरियर । तहिना सुग्गाक रंगो हरियर ।। बैसि नुकाएल खाए लताम । मनुजक आहटि, चौंकल कान ।। हेंजक - हेंज अबैए बेस । खाए लताम ओ खेपक - खेप ।। ककरहु गर्दनि लाल लकीर । केओ बिना लालहि अछि कीर ।। लाल लोल सुन्नर लागैए । खोधि-खाधि सब फऽड़ चीखैए ।। ऊँचगर गाछक बेस क्षुपुङ्ग । धोधरिमे सब रहए उत्तुङ्ग ।। छै स्वतन्त्र उड़बाक सिहन्ता । मनुक्खक हाथ अभागक चिन्ता ।। पकड़ाएल, की करत उपाए ? पिञ्जरा नञि छै रहल सोहाए ।। सुग्गाक विश्वमे बहुत रास जाति ओ प्रजाति पाओल जाइत अछि । एकर रंग हरियर, लाल, पीयर, नील, धूसर-मटियारी आ एहि रंगक विभिन्न प्रकारक फेंट-फाँट भऽ सकैत अछि । एहि कवितामे सामान्य रूपसँ भारत ओ खास कऽ मिथिला क्षेत्रमे पाओल जाएबला सुग्गाक वर्णन कएल गेल अछि । गहूमक संग देखू “सूरा” पिसाइत छै ।*१ फोकला बना कऽ गहूम खा जाइत छै ।। देखियौ, ई जीव केहेन असञ्जाइत छै ! एकरा पानि ने मिसियो सोहाइत छै ।।*२ गहूमहि टा नञि, आनहु जजाइत छै ।*३ जेहने अन्न रूचए, तेहने प्रजाइत छै ।।*३*४ चाउर, मकई सभ सेहो खा जाइत छै । धानक सूराकेँ उड़बा लए पाँइख छै ।।*३ धानक सूरा - वयस्क भऽ जाइत छै । पाँइख जन्मै छै “फाड़ा” कहाइत छै ।।*३*५ उपजल अन्नक करइत बड़ नाश छै । भेटैछ दबाइ आब तेँ किछु उसास छै ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीक ई एकटा पुरान कहबी थिक जाहिमे सूरा आ ओकर बासस्थानक चर्च अछि । *२ - “सूरा छेँ जे पानि नञि पिबैत छेँ” − मैथिलीक दोसर पुरान कहबी । वास्तवमे सूरा कहियो पानि नञि पिबैत अछि । शरीरमे भोजनक चयापचय क्रियासँ उत्पन्न पानि (METABOLIC WATER) सूराक जीवन निर्वाहक लेल पर्याप्त होइत अछि । *३ - बहुत लोकसभ लिखल वा टंकित मैथिलीक उच्चारण वा पाठ मैथिली जेकाँ नञि कऽ कऽ हिन्दी जेकाँ करैत छथि । तेँ किछु शब्द सभक मैथिली वर्तनी वा उच्चार स्वरूपकेँ उपरोक्त कवितामे स्थान देल गेल अछि । एहि शब्दसभक लिखबाक सही स्वरूप निम्न अछि - क्र॰सं॰ लिखबाक सही स्वरूप मैथिली उच्चार वा वर्तनी १ जजाति जजाइत २ प्रजाति प्रजाइत ३ पाँखि पाँइख नियमानुसार उपरोक्त सब्द सभक सही स्वरूपहि लिखल जएबाक चाही आ पढ़बा काल उच्चार उपरोक्त प्रकारेँ होयबाक चाही । पर पाठक लोकनिक हिन्दीपरक उच्चार कविताक अभिप्रेत उच्चारकेँ विकृत कऽ सकैत छल तेँ एहि कवितामे सीधा अभिप्रेत उच्चारकेँ स्थान देल गेल अछि । *४ - विभिन्न प्रकारक अन्नमे सूराक विभिन्न प्रकार (प्रजाति) लागैत अछि । *५ - धानमे लागए बला सूराकेँ वयस्कावस्थामे पाँखि जनमि जाइत अछि आ तेँ ओ उड़ि सकैत अछि । एहि उड़ए बला सूराकेँ मैथिलीमे फारा (फाड़ा) कहल जाइत अछि । फारा या फाड़ा - धानमे लागए बला सूरा । फाँरा या फाँड़ा - अँचार बनएबाक लेल काटल आमक (प्रायः लम्बवत काटल गेल) टुकड़ी । *६ - उपजाक भण्डारण काल ई अन्नक बहुत नाश करैत अछि । यद्यपि एखन सूरा मारबाक बहुत रास दबाई (गोली आ पाउडर) बजारमे उपलब्ध छै जाहिसँ किछु उसास भेल छै तथापि एखनहु ओ उपजल अन्नक बहुत नाश करैत अछि । बड़की टा केर चिड़ै उड़ै छै, नाम तँऽ “हँसुआ दाबी” छै । लोलक किछु छी बात विशेषें, नाम तेँ “हँसुआ दाबी” छै ।। जञो राखी सोझाँमे परस्पर, दू टा कचिया - हाँसूकेँ । बिनु दाँतक लागत जेहेन, बूझू लोल छै ‘दाबी’ केर ।।*१ नाँओ पहिल बेर सुनल, भेल एहनो होइतछि की नाम ? गौरसँ देखल, तखन बुझल, वाह ! केहेन सुन्नर नाम ।। पर हँसुआ-दाबी किछु एहनो, लोल जकर दुहु सटल रहैछ । किछु तँऽ एक्कहि रंग देखबामे, किछु विशेष ओ अलग रहैछ।।*२ पड़ती - जमकल पानि, नहरि, वा पोखरि - डबरा कातमे । पैघ गाछ पर झुण्डे - झुण्डे, रहैछ बाद बरसातमे ।।*३ ठण्ढी - शीतलहरी पछाति ओ, धीरे - धीरे कम भऽ जाइछ । कादो - पानि सुखाए जाइत छै, तेँ कत्तहु अन्तऽ चलि जाइछ ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हँसुआ दाबीक दुनु लोल बाहर सँ भीतर दिशि हल्का मुड़ल रहैत अछि, तेँ बन्न भेलाक बादहुँ बीचमे कने रिक्त वा खाली स्थान रहि जाइत अछि । देखला पर एहेन सनि लगैत अछि जे दू गोट कचिया हाँसू (जकर भीतरी भागमे दाँत नञि हो) परस्पर सोझाँ राखल हो । लोलक इएह गुण एहि चिड़ै केर मैथिली नामकरणक कारण बनल होयत । लोलक इएह गुणक कारण अंग्रेजीमे ओ ऑपेन बिल्ल्ड स्टॉर्क (OPEN BILLED STORK) कहबैत अछि । *२ - हँसुआ दाबीक लोलक ई विशिष्ट स्वरूप बाल्यावस्थासँ नञि रहैत अछि । बाल्यावस्थामे बन्न भेला पर ओकर दुहु लोल परस्पर सटि जाइत अछि । लोलमे एहि तरहक वक्रता (अन्तर्वक्रता) किशोरावस्थामे विकसित होइत अछि आ जीवनपर्यन्त रहैत अछि । अंग्रेजीक स्टॉर्क कहाबए बला किछु आओर जाति-प्रजाति जे देखबामे हँसुआ-दाबी सनि लगैत अछि पर जकर लोलकेँ बन्न भेला पर बीचमे रिक्त स्थान नञि रहैछ, सेहो मैथिलीक हँसुआ-दाबीक अन्तर्गत आबैत अछि । यथा - व्हाईट स्टॉर्क (WHITE STORK) आदि । *३ - ई बरसातक अन्तिम समयमे बहुत संख्यामे अपना दिशि देशक आन भाग ओ विदेशसँ अबैत अछि । ऊँच-ऊँच गाछ सभ पर खोंता बनबैत अछि आ पोखरि, डबरा, खत्ता, नहरि, नदीक कछेड़ अथवा कोनहु चऽर-चाँचरि जतऽ पानि जमकल हो आदि ठाम पर झुण्डक-झुण्ड देखाई देत । ओ कीड़ा-मकोड़ा, बेङ्ग आदि खाइत अछि परञ्च डोका (PILA) ओकरा बड़ पसिन्न छै । डोकाकेँ खएबाक लेल प्रायः ओ डोकाक खोलकेँ (कवचकेँ) तोड़ैत नञि अछि । ओ अपन लोलक विशिष्ट आकार आ संरचनाक मदतिसँ खोलकेँ (CONK SHELL / EXOSKELETON) बिना तोड़नहि डोकाक मूँह लऽग पकड़ि भितरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि । *४ - बेशी ठण्ढी वा शीतलहरी केर बाद अपना दिशि क्रमशः जलाशयक पानि कम होमए लगैत अछि, कादो बला स्थान केर कम भेलासँ हँसुआ-दाबी आ एहि तरहक आन चिड़ै लेल भोजनक प्रतिद्वन्द्विता बढ़ि जाइत अछि । तेँ ओ सभ आन जगह पर पलायन कऽ जाइत अछि । पर तइयो पुर्ण अलोपित नञि होइत अछि, थोड़-बहुत सलो भरि देखल जा सकैत अछि । यद्यपि अपना ओहि ठाँ मात्र एशियाई ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (ASIAN OPENBILL STORK) पाओल जाइत अछि पर अफ्रिकी ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (AFRICAN OPENBILL STORK) सेहो मैथिलीक “हँसुआ दाबी” नामक चिड़ै केर अन्तर्गत आओत । हंसक बीच ने बगुला शोभए, बड़ पुरान ई कहबी छी ।*१ बगुला खेत - पथार भेटैतछि, हंस केहेन − नञि देखने छी ।।*२ सरस्वती माएक वाहन अछि, चित्रमे हम से देखने छी ।*३ अंग्रेजी केर ‘एस’ सनि गर्दनि, बस किताबमे पढ़ने छी ।।*४ सुनै जो बौआ ! सुनै गे बुच्ची ! एहि ठाँ हंस प्रवासी छी । उत्तर दिशि अतिशीत क्षेत्र जे, ताहि ठामक ओ वासी छी ।।*५ एहि ठाँ जे आबैत हंस छल, देह - पाँखि उज्जर होइ छल । लोलक उद्गम - स्थल कारी, लोल गाढ़ - पीयर होइ छल ।।*६ शीत समयमे छल आबैत, कहियो ओ उड़ैत हिमालयसँ । अपनहुँ ठाँ देखना जाइत छल, सटल जे क्षेत्र हिमालयसँ ।।*७ चर्चा अछि साहित्यमे सौंसे, मानसरोवर - श्वेत हंस केर । करैछ ईशारा टपि हिमगिरि, ने बेसी काल रहैछ हंस फेर ।।*८ विश्वक छै मौसिम बदलि गेल, पहिनुक सभटा छै उनटि गेल ।*९ बीतल कए बरख, कतेक पुस्त, ने हंसक छी आगमण भेल ।।*१० सए बरख - हजार पता नञि से, कहियासँ हंस निपत्ता अछि । साहित्यमे सौंसे धवल - हंस, पर दर्शन हएब सिहन्ता अछि ।।*१० हंसक ई अर्थ विशिष्ट भेल, सामान्य अर्थ बड़ व्यापक अछि । बहुविध जलीय पक्षी शामिल, कलहंस, राज आ जलपद अछि ।।*११ ओना तँऽ अप्पन शास्त्र कहैतछि, हंस होइत अछि उज्जर । मुदा हंस किछु कारी सेहो, भेटैछ एहि धरती पर ।। किछु एहनो छी हंस जकर बस, गर्दनि टा कारी होइए । जँ बूझी अहँ हंस धवल बस, तँऽ विश्मयकारी होइए ।।*१२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - ‘न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा’ - संस्कृतहि युगक कहबी छै । *२ - छोटकी बगुला सभ तँऽ बहुतायतमे पानि लागल खेत - पथारसभमे देखबामे आबैत अछि । पर हंस अपना दिशि केओ नञ देखने अछि । जँ केओ देखने अछि तँऽ मात्र चित्रमे वा प्राणी उद्यानमे अथवा जँ केओ कीनि कऽ पोषने हो । *३ - धवल-श्वेत होयबाक कारण हिन्दू धर्म शास्त्रक अनुसार हंसकेँ माए सरस्वतीक वाहन मानल गेल अछि । देवी सरस्वतीक चित्र वा प्रतिमाक संग प्रायः हंसक चित्र वा प्रतिमा सेहो रहैत अछि । यद्यपि ओ चित्र वा प्रतिमा काल्पनिक होइत अछि पर परम्पराक आधारेँ बनैछ तथा ओ परम्परा अति प्राचीन अछि - हजारों वर्ष पुरान । *४ - किताबसभमे वर्णन रहैछ कि हंसक गर्दनि अंग्रेजी वर्णमालाक “एस” (S) आखर सनि होइत अछि । *५ *७ - अतिप्राचीन कालहिसँ भारतीय साहित्यमे हंसक प्रवासी होयबाक बात कहल गेल अछि जे कि हिमालयसँ सटल भू-भागमे हिमालय शिखरसँ उतरि मात्र शीतऋतुमे आबैत छल । *६ - पारम्परिक जनश्रुति ओ संस्कृत आ आन संस्कृतेतर साहित्यसभसँ ज्ञात होइत अछि कि हंसक धऽर आ गर्दनि धवल श्वेत वर्णक होइत छल जखनि कि लोल गाढ़ पीयर रंगक । लोल जाहि ठाम मूरीसँ जुड़ल रहैत छल ओहि ठामसँ आँखि धरिक स्थान कारी होइत छल । *८ - कैलास पर्वत पर मानसरोवरमे हंस रहैत अछि, ओतहिसँ ठण्ढीमे आबैत अछि आ फेर ओतहि चलि जाइत अछि । ई एकटा ईशारा थिक कि हिमालय वा हिमालयसँ आओरो आगाँ (उत्तर वा उत्तर-पच्छिम दिशि) हंस सभक मूल निवास स्थान अछि । *९ - विश्वक जलवायू आ मौसिम निरन्तर बदलैत रहैत अछि । केवल आजुक ‘हरित गृह प्रभाव’ तथा ‘वैश्विक गर्मी’ केर बात नञि अछि । किछु हजार वर्ष पहिनहु मौसिमक बदलावक संकेत आयुर्वेदक महान कृति “सुश्रुत संहिता”मे भेटैछ । जखनि कि हंसक प्रथमोल्लेख ऋग्वेदमे भेटैछ । आयुर्वेद अथर्ववेदक उपांग मानल जाइत अछि जे कि निश्चित रूपेँ ऋग्वेदसँ नऽव अछि । *१० - विगत कतेको सए अथवा हजार वर्षसँ हिमालयक दच्छिनमे आ खास कऽ दच्छिन-पूबमे हंसक प्राकृतिक रूपसँ आगमण नञि भेल अछि । ओहिसँ पहिने सम्भवतः “मूक हंस / म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) ठण्ढीमे भारतक हिमालयसँ सटल क्षेत्रसभमे आबैत छल किएक तँऽ भारतीय वाङ्गमयमे वर्णित हंस केर विवरण ओकरहिसँ मेल खाइत अछि । ई हंस विश्व केर आन हंस आ जलपदक अपेक्षा कम हल्ला मचबैत अछि तेँ ओकरा अंग्रेजीमे “म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) कहल जाइत अछि जकर मैथिली अनुवाद भेल “मूक हंस” । ई हंस पुर्ण रूपसँ बौक नञि होइत अछि अपितु अपेक्षाकृत कम बजैत अछि । *११ - “हंस” शब्द जखन अगबे प्रयुक्त होइत अछि तँऽ ओहि शब्दसँ जाहि विशिष्ट चिड़ै केर बोध होइत अछि से अंग्रेजीमे “स्वान” (SWAN) कहबैत अछि जकर गर्दनि अंग्रेजीक “एस” आखर सनि होइत अछि । ई “हंस” शब्दक विशिष्ट अर्थ भेल । “हंस” शब्द जखन हंस सदृश समस्त जलीय पक्षीक बोध करबैत अछि तखन ओहि मे हंस केर अलावे आन जलीय पक्षी (जेना कि - हंसक वा जलपद) सेहो आबैत अछि । ई “हंस” शब्दक सामान्य अर्थ भेल । जखन हंस शब्द आन कोनहु विशेषण या उपसर्गक संग (यथा - कलहंस, राजहंस आदि) आबैत अछि तँऽ ओहिसँ तदनुरूप आन कोनहु जलीय पक्षीक बोध होइत अछि । *१२ - भारतीय वाङ्गमयमे यद्यपि मात्र धवल-श्वेत हंस केर चर्च भेटैत अछि पर पृथिवीक दच्छिनी गोलार्ध केर महाद्वीप सभमे कारी हंस सेहो भेटैत अछि । दच्छिनी अमेरिका महाद्वीपमे हंसक जे प्रजाति भेटैछ तकर गर्दनि आ मूरी कारी तथा धऽर उज्जर होइत अछि । ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपमे भेटए बला हंस केर मूरी, गर्दनि आ धऽर पूरा कारी होइत अछि । हम हंसक, जलपद सेहो कहबी, लोक तँऽ हमरो हंस कहैए ।*१ हंस भेल भारतसँ अलोपित, लोक तँऽ हमरे हंस बुझैए ।।*२ हंस ओ बत्तख दुहुक बीचमे, हमरहि तँऽ स्थान आबैए । की बेजाए हंसहि सनि हमरो, जगमे जञो सम्मान भेटैए ?? ओहुना जगमे कहाँ कतहु छै, “नीर - क्षीर - विवेकी” हंस ? *३ ग्रीवक वक्रता आ आकारकेँ, बिसरि जाइ तँऽ छीहे हंस ।।*४ ओहुना हंसक प्रतिनिधि रूपमे, हमरहि अहँ सब बूझी हंस । ने विशिष्ट तँऽ, व्यापक अर्थमे, हमरा मानि सकै छी हंस ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आकार-सुकार आ आन गुणधर्मक आधार पर “हंसक” समूहक जलीय पक्षी “हंस” तथा “बत्तख” केर बीचक जैव श्रृंखलामे अबैछ । तेँ साहित्यमे बहुधा स्पष्ट नामकरण ओ वर्गीकरणक अभाव देखल जाइछ आ उपरोक्त तीनू शब्द भ्रामक रूपेँ परस्पर पर्यायी जेकाँ प्रयुक्त होइत आयल अछि । *२ - भारतमे (विशेष कऽ पुबारी भारत ओ नेपालमे) कतेको सए किंवा हजार वर्षसँ हंसक प्रवास नञि होयबाक कारण उपरलिखित तथ्य क्रमशः आओरो बलगर होइत गेल अछि । *३ - नीर-क्षीर विवेकी हंस अर्थात दूध आ पानिकेँ फेंटला पर पृथक करएबला हंस विश्वमे कतहु नञि होइत अछि । ई मात्र साहित्यिक गल्प थिक, वास्तविकता नञि । *४ - ग्रीवा सुरेबगर वक्रता आ देहक आकारकेँ जँ छोड़ि देल जाए तँऽ हंस ओ हंसकमे बेसी अन्तर नञि । *५ - ओहुना सम्पुर्ण भारतीय उपमहाद्वीपमे वास्तविक “हंस” केर अनुपस्थितिक कारण सैकड़ों बरखसँ प्रतिनिधिस्वरूप हंसकेकेँ हंस मानल जाइत रहल अछि । सत्यनारायण झा ठुठ पीपर ठाढ़ अछि ,पत्र विहीन , एकोटा ठाइढ़ नहि ,पात नहि , फूल टुस्साक त कोनो कथे नहि, याद करैत अछि अपन पछिला जिनगी , मुदा कहाँ याद अवैत छैक ? सोचबाक शक्ति त लोप भ’ गेल छैक , पुछबो केकरा करतैक ,? असगरे चौर मे ,बिना बाटक जगह पर , कहुना क’ ठाढ़ अछि | कान एखनो खराब नहि छैक , सुनैत अछि लोकक हँसी, सुनैत छैक लोकक ठटटा, जे ओकरा देखैत छैक ,कंटेरिये मुस्काइत छैक एहन सन जे बुझह आब , केहन बूरि बनलाह , तोरे शीतल छाँह मे सभ आनंद केलक , मुदा आब कियो तोरा दिस तकैत छह? तोरे जइर मे बैसैत छल’ , थाकल, प्यासल, रौदायल,सभ तोरे छाह मे आराम करैत छलौंह , पहिने तोहू कतेक बलिष्ट छलाह ,सुन्दर ,कांतिमय काया | जरि बलिष्ट ,कतेक ठाइढ़ ,ठाइढ़ मे सुन्दर ,कमनीय सुललित पात | दुरे सं लगइक जे कतेक नीक पीपरक गाछ अछि | सन सनाइत,हनहनाइत ,कतेक बिहारि के देखने , तखनो असगरे ठाढ़ ,मुदा समुद्रक लहरि जकाँ, कनकन,-सनसन करैत , लगैक समय सं आगू बढ़बाक पराक्रम फूल पात सभ लहलह करइत, लोकक भीड़ ,कियो पायर पर खसइत , कियो हाथ जोड़ने ठाढ़ ,सभ नतमस्तक | मुदा आब तू कतयछह ? विरान स्थान मे , ठुठ गाछ लग जाकय की हेतैक |जरि सुखा गेल छैक | ठाइढ त’सभटा काइट लेलकै | बिचला भाग कोकना गेल छैक ,केखन खसतै तेकर ठेकान नहि अनका शीतल वायु देबय बाला,अपने रौद मे ठाढ़, ठुठ ,कोकनल | जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ (मूल नाम- जगदीश चन्द्र ठाकुर), जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999 गजल घरसँ होउ बहार बेटी बाट तकैछ पहाड बेटी | खपटा थिक सोना आ चानी उत्तम स्नेहक धार बेटी | गेल जमाना तिलक दहेजक सरस्वतीक संसार बेटी | नैहर सासुर तीर्थ धाम सब भ’ गेल आइ बजार बेटी | आब पताल ने जेती सीता सुन्दर यैह विचार बेटी। गजल हम तमसायब गजल सुनायब अहाँ अगुतायब गजल सुनायब | ई सौंसे आकाश हमर छी उडि-उडि आयब गजल सुनायब | माइक करजा माटिक करजा हमहूँ चुकायब गजल सुनायब | पाप कते भरि गेल मोनमे गंगा बनायब गजल सुनायब | लगतै आगि अहू जंगलमे कतहु पड़ायब गजल सुनायब | अहाँक हृदयमे घ’र हमर अछि घुरि– घुरि आयब गजल सुनायब | ताकब बाट अहाँक जीवन भरि सपन सजायब गजल सुनायब | गजल गाछी लुबधल आम साढू चलू चलै छी गाम साढू | हम नहि जायब वरियातीमे मोने अछि ओ जाम साढू | लोक बहुत छोट-सन लागल जकर बड़ीटा नाम साढू | एकेटा अछि घ’र रावणक भरि गाँ अछि बदनाम साढू | हमरा खातिर गाम स्वर्ग थिक आ घर चारू-धाम साढू | गजल पढबाक मोन होइए, लिखबाक मोन होइए किछु ने किछु सदिखन सिखबाक मोन होइए । अन्हड जे रातिखन एलै, सब गाछ डोलि गेलै टिकुला कतेक खसलै, बिछबाक मोन होइए । सासुर इनार होइए आ डोल थिकहुं हमहूं किछु ने किछु एखनहुं झिकबाक मोन होइए । अहां आबि जे रहल छी, सुनिक’ बताह भेलहुं गोबरसं आइ आंगन निपबाक मोन होइए । दुइ ठोर थीक अथवा तिलकोर केर तडुआ होइत अछि लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए । कोनो ऑफिसक चक्कर लगब’ ने पडै ककरो ई बीया विचार-क्रान्तिक छिटबाक मोन होइए । आजादीक लेल एखनहुं संघर्ष अछि जरूरी व्यर्थ गेल सब मांगब, छिनबाक मोन होइए । गजल जै खातिर मारा-मारी अछि भात-दालि-तरकारी अछि । छात्र गरीबक धीया-पूता विद्यालय सरकारी अछि । ई जे उल्लू देखि रहल छी लक्ष्मी मैयाक सबारी अछि । सदाचारके शिक्षा सबठां सबठां चोरबजारी अछि । भोज करत रसगुल्लाके बडका ई भ्रष्टाचारी अछि । घूस, दहेजक चस्का बूझू छूआछूतक बीमारी अछि । देश द्रौपदी, हम भीष्म छी हमरहुँ ई लाचारी अछि । गजल गीत गजलमे लागल छी ओ बुझैत छथि पागल छी । हम रातिकें राति कहै छी तें भरि गामसं बारल छी । अहां बाढिएसं तबाह छी हम रौदी केर मारल छी । हम स्वयंकें नहि चिन्हलौं देखू केहेन अभागल छी । अहां कहैछी कविता सूनू हम यात्राक झमारल छी । ऐ खेलाके यैह नियम छै सब जीतल आ हारल छी । पाइ प्रतिष्ठा पद नै चाही प्रेमक हम पियासल छी । गजल कुदने की, फनने की अन्हराकें जगने की । सडक आ ने बिजली कुरसी पकडने की । पाप बढि गेल अछि गंगाजीकें बहने की । शासन बहीर अछि कहने की,सुनने की । मोन अछि झमेलामे राम राम रटने की । सब ठाम सुखराम अन्नाजीकें सहने की । शीलक विचार करू कुंडली टा देखने की । गजल जिनगी कें अखबार बनौने बैसल छी हम घरकें बाजार बनौने बैसल छी । श्रद्धा, ममता, स्नेह, प्रेम, आनंद पूज्य थिक हम सबकें ऐंठार बनौने बैसल छी । सोझां केर संसारकें माया मानी हम हम मायाकें संसार बनौने बैसल छी । गांधी दुनिया जितलनि सत्य, अहिंसासं प्रेम कें हम व्यापार बनौने बैसल छी । ब्याह थीक दू अंतरात्मा केर मिलन हम जातिक ओहार लगौने बैसल छी । शिक्षा मैया हरती सब दुख जीवन केर हम मूर्तिक अंबार लगौने बैसल छी । नियम बहुत अछि भष्टाचारसं लडबा लए हम सबकें लाचार बनौने बैसल छी । गजल भूख अशिक्षा आओर अन्हार अछि मिथिलामे गर्म बहुत ब्याहक बजार अछि मिथिलामे । गाम कते अछि बिला गेल कोसीक धारमे अनगिनती सूखल इनार अछि मिथिलामे । जाति,पांजि, कुल, शील, मूल आ गोत्र,गाम तिलक-दहेजहु के विचार अछि मिथिलामे । पेट भरैले’ लोक हजारो भागल दिल्ली सय बीमार आ एक अनार अछि मिथिलामे । पोल गडायल गाम-गाममे कानि रहल अछि बिनु बिजली गरमी,गुमार अछि मिथिलामे । खेबा ले’ एखनहुं अल्हुआ,मडुआ,बिसांढ सुतबाले’ एखनहुं पुआर अछि मिथिलामे । कोन कृष्ण कहिया अओता से के जानय दुख केर गोवर्द्धन पहाड अछि मिथिलामे । गजल सत्य अहिंसा केर जय हो नव वर्श मंगलमय हो । तिमिर नष्ट हो भ्रष्टाचारक जन-मनमे सूर्योदय हो । कां ट-कूश मुक्त बाट हो सभ सज्जन-मन निर्भय हो । शिक्षा-शील-स्वभाव जाति हो मूल-गोत्र नहि परिचय हो । हो दहेज सं मुक्त धरा ई सभ तरि पावन-परिणय हो । जीवन हो संगीत प्रेम केर सुगम ताल, सुमधुर लय हो । अभिनयमे जीवन-दर्शन हो जीवन सुन्दर अभिनय हो । गजल चालनिमे नित पानि भरै छी हम-अहां कते बरख सं संग रहै छी हम-अहां । अपन-अपन दुनियामे हम सभ हेरा गेलहुं एक दोसरकें कहां चिन्है छी हम-अहां । कते जतन सं सींचै छी नवगछुलीकें सभ दिन सपना नव देखै छी हम-अहां । भिनसर, दुपहर, सांझ, राति केर नाटक ई हंसि क’ कानी, कानि हंसै छी हम-अहां । माथक मोटा हल्लुक कहियो भेल कहां रोज मरै छी, रोज जिबै छी हम-अहां । काल्हुक दिन होयत शुभ दिन हमरो सभ ले’ यैह सोचि सभ राति सुतै छी हम-अहां । नोर आंखि केर, एक दोसरक पोछब हम चलू आइ संकल्प करै छी हम-अहां । गजल टूटल छी तें गजल कहै छी भूखल छी तें गजल कहै छी. ऑफिस-ऑफिस हमहूं गेलहुं लूटल छी तें गजल कहै छी. घरमे बैसल दुनिया देखू गूगल छी तें गजल कहै छी. खापड़ि सं परिचय अछि हमरो भूजल छी तें गजल कहै छी. उखड़ि आओर समाठ जनैए कूटल छी तें गजल कहै छी. यात्रीजीक अहां ‘बलचनमा’ सूतल छी तें गजल कहै छी. हम ‘खट्टर कक्का’ केर तबला फूटल छी तें गजल कहै छी. गजल नदी छोड़ि क’ नहरमे एलहुं गाम छोडि क’ शहरमे एलहुं. कहलक लोक शराब ने पीबू हम नहि ककरहु कहलमे एलहुं. तीन साल धरि रहलहुं मंत्री चारिम साल जहलमे एलहुं. जय हो जय हो के बी सी जी खोपड़ी छोड़ि महलमे एलहुं. बाट तकैत छलहुं फगुआमे आखिर जूड़शीतलमे एलहुं. आइ राति भरि करू तपस्या आइ कथी ले’ सहलमे एलहुं. रूसल रहलहुं अहां कते दिन आइ हमर एहि गजलमे एलहुं. गजल ई जे पोथी पतरा थीक सभटा कनियां-पुतरा थीक । परिजन-पुरजन, हीत-अपेक्षित जाल बहुत,एक मकरा थीक । दूर सं देखल नदी बुझायल लग जा देखल,डबरा थीक । फूलक माला बहुत पहिरलहुं कांटहु हमरहि बखरा थीक । धोती लाल, घुनेस माथ पर चलल कटैले, बकरा थीक । भोंट ने एकरा दिय’ एकहुटा इ तं चिन्हले लबरा थीक । करनी देखब मरनी बेरिया गारि ने थिक इ फकरा थीक । गजल पहिने एकटा काज करू सभकें बांटू ,राज करू । सदनमे जा कऽ सूति रहै छी किछु तं बौआ लाज करू । अहांक पुरखा छथि विद्यापति हुनका पर तं नाज करू । जाति,धर्म सब जेल बनल अछि अपना कें आजाद करू । कहि गेलाह हरिमोहन बाबू शिक्षित अपन समाज करू । पचपनमे बचपन नहि आओत कतबो अहां रियाज करू । अपनहि माय-बहिन सन बूझू हमरा जुनि बरबाद करू । गजल कांट-कूस अछि भरल बाट पर जहां-तहां नढिया,कूकुर मरल बाट पर जहां-तहां । ए राजा,कनिमोझी आ कलमाडीक युग इ केने छथि सभ दखल बाट पर जहां-तहां । हेय दृष्टि सं देखि रहल अछि नर-नारी कें सांढ आ महिशा पडल बाट पर जहां-तहां । ऐंठन एखनहुं धरि ओहिना के ओहिना अछि जौड कते अछि जडल बाट पर जहां-तहां । खोपडी ठाढ छलै अनगिनती,बिला गेलै ठाढ भेल अछि महल बाट पर जहां-तहां । बूझि पडैये जीत गेल छथि पुत्र पिता सं रंग बहुत अछि उडल बाट पर जहां-तहां । आइ हजारो अन्ना केर आवश्य्यकता अछि सत्य बहुत अछि गडल बाट पर जहां-तहां । गजल अपने छी एत्त’आ मोन कतहु टांगल अछि जानि नहि देख’ ले’ की की सभ बांचल अछि । सभठां बिलाइ छै आ सभ ठाम रस्ता घूरब कतेक बेर सभ बाट काटल अछि । कर्जा पर कर्जा आ रसगुल्लाक भोज ओझा बताह आ कि भरि गाम पागल अछि । मुंबईमे बेटा आ दिल्लीमे कनियां बूढ मोन दूटा हजार ठाम बांटल अछि । जीवकान्त,गौहर,वियोगी,विहंगम देखू असंख्य फूल मालामे गांथल अछि । गाम-गाम देखू ई दृश्य महाभारतक शतरंजक खेलमे सभ हाथ बाझल अछि । जहिया समयलीह सीता एहि धरतीमे तहिया सं धरती हजार बेर फाटल अछि । गजल अगहन के धान छी अहां पूर्णिमाक चान छी अहां। दौड़ि-दौड़ि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहां। बेर-बेर छी पढ़ैत हम वेद आ पुराण छी अहां। कांट अछि भरल बाट पर दूभि आओर धान छी अहां। जीबितहिं स्वर्ग देखि लेल पान आ मखान छी अहां। जिनगीमे प्रश्न अछि कते सभहक निदान छी अहां। गजल कर्जाक मोटा माथ पर उठेलहुं कतेक बेर बैंकक गाड़ी देखि क’ पड़ेलहुं कतेक बेर। जमायक बात सूनि आइ करेज फटैए सासु-ससुर कें हमहूं कनेलहुं कतेक बेर। बांचि गेलहुं चोर आ उचक्का सं दिल्लीमे मुदा अपनहि घरमे ठकेलहुं कतेक बेर। नियारि कतहु जायब से पार नहि लागल तत्कालहि के टिकट कटेलहुं कतेक बेर। सुंदर सं सुंदर शब्दक तलाशमे रहलहुं लीखि-लीखि अपनहि मेटेलहुं कतेक बेर। आइ चुरूक भरि पानिमे डूबैत छी किए’ बाढ़िमे कतेक लोक कें बचेलहुं कतेक बेर। गजल हमर-अहांक कसूर बहुत अछि दिल्ली एखनहुं दूर बहुत अछि। कीट नियंत्रण अछि आवश्यक एहि घरमे झिंगूर बहुत अछि। डाकनि द’ क’ सुनब’ पड़तै बहुत कानमे तूर बहुत अछि। बास सांप केर निष्चित बूझू एहि कोठलीमे भूर बहुत अछि। जहां-तहां सोहरल अछि चुट्टी घरमे छीटल गूर बहुत अछि। नोर भरल मैथिलीक आंखिमे एखनहुं महग सिन्दूर गहुत अछि। गजल आगि बोनमे पसरि गेल अछि लोक सड़क पर उतरि गेल अछि। कुरूक्षेत्रमे देव, दनुज छथि उठापट्टक बजरि गेल अछि। रंग विरंगक छल फुलवारी असमय सभटा उजरि गेल अछि। चौंसठि बरखक वरक गाछ ई झखड़ि गेल अछि,हहरि गेल अछि। नौजवान चौहत्तरि बरखक थाकब, सूतब बिसरि गेल अछि। भारत मां केर आंखि नोरायल नोर गाल पर टघरि गेल अछि। गजल मन्दिर सं हम उतरि गेलहुं सत-सत बाजब बिसरि गेलहुं। दू टा कन्यादान शेष अछि एकहिटामे उजड़ि गेलहुं। आबि रहल छल चन्दा मांग’ बाध दीस हम ससरि गेलहुं। कजरी लागल छलै बाट पर नहि देखलियै, पिछड़ि गेलहुं। अहांक आंखि केर नोर भेलहुं हम अहंक गाल पर टघरि गेलहुं। हमहूं हाट छलहुं भरि गामक सांझ पड़ल तं उसरि गेलहुं। गजल आएब नीक लागल, छिड़ियैब नीक लागल दू-चारि दिन बिताक’ घुरि जैब नीक लागल। सत्य बाजि क’ कियो मुइल कहां कहियो ईशा जकां शूली चढि जैब नीक लागल। जहां-तहां गहुमन सोझांमे ठाढ़ भेटल कात द’ क’ आगां बढ़ि जैब नीक लागल। भाफ जकां कखनहुं सागर सं उड़ि गेलहुं मेघे जकां कखनहुं झड़ि जैब नीक लागल। हंसिए क’ कटलहुं पताल केर जीवन आकाश जखन भेटल, उड़ि जैब नीक लागल। ओम्हर छल परसल छप्पन प्रकार व्यंजन एम्हर अहांक चिट्ठी, पढ़ि जैब नीक लागल। गजल पूजैछी हम भगवान कें मकइ,गहूम आ धान कें। हम बूझैछी काशी-मथुरा खेत आर खरिहान कें। गुन-धुन मे छी, ककरा ताकू कौआ कें कि कान कें। अपनहि करनी केर फल भेटल दोष देलहुं आसमान कें। बिसरि गेलहुं सम्मानक सभ सुख नहि बिसरल अपमान कें। ठकुआ-केरा लय देखी हम एखनहुं चौठी-चान कें। गजल जे सोचैत छी से बजबाक समय आएल अछि जे बजैत छी से करबाक समय आएल अछि। धूर तरक गप्प सड़क पर ल’ चलू एखन त एक पांतमे बढ़बाक समय आएल अछि। पाग डोपटा छोड़ि एखन बान्हू मुरेठा एखन देश-कोस ले’ लड़बाक समय आएल अछि। ई देश थिक ककर आ के देश केर छथि छै देश-प्रेम ककरा बुझबाक समय आएल अछि। आब जे हेतै, से हेतै, नीके हेतै जे मंगैत छी से छिनबाक समय आएल अछि। गजल लोक जते छथि गाम पर सभहक मोन लताम पर। शिक्षा,शील,स्वभाव स्वर्ण थिक लोक मरैए’ चाम पर। भारी पड़ि गेल बर्गर-पिज्जा मुरही आर बदाम पर। कनिते भागि गेला कन्यागत बात अटकि गेल दाम पर। देव विराजथि बाध-बोनमे मेला होइए धाम पर। दुर्वाक्षत केर मंत्र पढथि सभ गांधी-सेतुक जाम पर। यश,अपयश आ हानि-लाभ सभ छोड़ि देलहुं हम राम पर। सुन्दर सपना सभ क्यो देखू मोती बरसत घाम पर। गजल आगूमे इनार भ्रष्टाचार के पाछूमे पहाड़ भ्रष्टाचार के। भूखल छी अहां, किरकेट देखू मनमोहक संसार भ्रष्टाचार के। जल- थल-नभमे शोर मचल अछि सभठां जय -जयकार भ्रष्टाचार के। सभ गााछ पर लतरल - चतरल बड़का कारोबार भ्रष्टाचार के। एक दीस बाबा आ अन्ना केर अनशन दोसर दिस सरकार, भ्रष्टाचार के। प्रेम,शांति,सुख,सत्य आर आनंदक क्षण सभटा भेल आहार भ्रष्टाचार के। गजल पोखरिमे मखान गामे-गामे दारू के दोकान गामे-गामे। दिनमे पूजा राति बिताबय चोरीमे रावण के खरुहान गामे-गामे। कबुला केलक, पूर मनोरथ भेलै लोकक गेल छागर के जान गामे-गामे। लोक मुतैए ठाढे-ठाढे माथे पर टाका केर मचान गामे-गामे। ब्याहक दू दिन बाद एलैए वर-वरियाती सभ रस्ता पर जाम गामे-गामे। रमा कान्त झा, सौराठ मधुबनी (बिहार ) देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात, चारा खा गेल मानुस कुपात, हवा पीगेल राजा ,कोना बहत बसात , खेल बना देल तमासा , सिनेमा घरमे लागि गेल सिला के जबानी , ओ बनि सर्वस्व, जेल के बनि बसी , नर्तक भेल जनता , गैस तेलपर चालक डंडा , बिजली रानी बरी सियानी , चूपेसँ लगेलक झटका , देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात!! देलही बनल ददल के आड़ा , राजनीत के खोदल खड़ा , जनता नोर पोछि रखत दुपट , टोकी कपार सौँसे राखी सिलबटिआ , राजनीतिक नेता सभक अपना बाटा, देखू भर्ष्टाचारक बहल बसात , ओकर किसानसँ नाता , लोनइहर सभ कटै बैंकक चक्र , भासल जनता बनल मुँह तक , मुख्य मंत्री बनि , नेनोमे देल टाटा केँ टकर , भाषण देय भऽ गेली महरानी , सिंगुर केँ बना देल सुन्दुर क कहानी , रोजगार सभ भेल चौपट , भाषण देल फटाफट फेर टाटा , आब ने आयत फेर टाटा , ओ बनल फ़िल्मी एक्टर , आ बनल फ़िल्मी डाइरेक्टर , दुनु कहल एक्सन बनल तिहार जेल सलेक्सन , सुन बन जीवन हमर , बाबूक नै चलल कुनु कनेक्सन देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात !! सन्तोष कुमार मिश्र इतिहासहिन इतिहास हवाके कलम आ हल्लाके मसिसँ लिखल एकटा इतिहास ओ इतिहास जे शब्दहिन, अर्थहिन, विश्वाशहिन अछि । तैयो, ओ इतिहास किताबमे सिमित यार्थाथसँ बञ्चित मुदा परिवर्तनक शिल्लानास कैनिहार अछि । परिवर्तन एकटा आशके, विश्वासके, भविश्यके आ उच्चकोटीक परिचयके आशा रखने अछि । मुदा ओ विश्वास अनुशासनहिन, ब्यवहारहिन, दण्डहिन आ ब्यवस्थापनहिन भगेल अछि । ओ इतिहास, जे कामक नहि नामक इतिहास परिवर्तनक कल्पनाके इतिहास किताबक पन्नामे सीमित रहिगेल अछि । मुदा, चलैत हवा द्वारा सुनाइत हल्ला पुनः प्रयासरत अछि एकटा इतिहासके जे अर्थहिन, दण्डहिन, आओर कि कि मुदा इतिहास, एहन इतिहास जे इतिहासहिन अछि । जगदानंद झा 'मनु', पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान आ पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल , जिला मधुबनी, शिक्षा : प्राथमिक -ग्राम हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय रुबाइ-१ आँचर नहि उठाबू आँखि सँ तँ पिबअ दिय हम जन्म सँ पियासल करेज जुड़बअ दिय केँ कहैत अछि निसाँ शराब में बड अछि कनीक अपन प्रेमक निसाँ तँ पाबअ दिय रुबाइ-२ छी हम पिबैत सभ कहलक शराबी अछि हमरो आँखि सँ देखू की खराबी अछि बुझलौं अहाँ सभ दुनियाक ठेकेदार आबू संग पीबि केँ नहि शराबी अछि रुबाइ-३ पीबू नै शराब हम जीबू कोना क' फाटल करेज केँ हम सीबू कोना क' सगरो जमाना भेल दुश्मन शराबक सबहक सोंझा तँ आब पीबू कोना क' रुबाइ-४ पीलौं शराब तँ दुनिआ कहलक बताह नहि पिने ई दुनिआ लगैत अछि कटाह बिन पिने सभतरि मचल अछि हाहाकार तँ पिबिए क' किएक नहि बनि जाइ घताह रुबाइ-५ ढोलक धम-धमा-धम बजैत किएक छै घुघरू खन-खना-खन खनकैत किएक छै दुनू भीतर सँ छैक एक्केसन खाली दुनू अपन गप नहि बुझहैत किएक छै रुबाइ-६ भेटल नहि स्नेह तँ हम शराबे पीलौं रहितौं अहाँक संग तँ जुनि किछु छुबितौं केँ कहैत अछि छथि भगबान मंदिर में हुनकर दर्शन अहाँक स्नेह में पेलौं रुबाइ-७ पीलौं नहि शराब तँ हम किछ बूझब की बिन पीने दुनिआ में करब तँ करब की एक दोसर केँ सभ अछि खून पिबैत नहि पीने खूनक घोंट पी क' रहब की बाल गजल हे मए नहि चरबै लए गाए जेबौ हम पठा हमरा इस्कूल कोपी पेन लेबौ हम अपन भाग्य आब हम अपने सँ लिखबौ कुकूर जकाँ नै माँडे तिरपीत हेबौ हम रोगहा-रोगहा सभ कियो कहए हमरा एक दिन बनि डाक्टर रोग हरेबौ हम टूटल- फूटल अपन फुसक घर तोरि सुन्नर सभ सँ पैघ महल बनेबौ हम हमरा कहैत अछि 'मनु' मुर्ख चरबाहा पढि कए सभ चरबाहा केँ पढेबौ हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १६) बाल गजल बिनु पानिक नाउ चलाएब हम बिनु चक्काक गाडी बनाएब हम हमर मोन में तँ जेँ किछु आएत बिन सोचने सभ सुनाएब हम अपन ब्याह में हम नहि जाएब सराध दिन बजा बजाएब हम कनियाँ केँ लय ओकर नैहर सँ सासुर सँ खूब कतियाएब हम 'मनु' मन चंचल टोनए सभकेँ केकरो हाथ नै घुरि आएब हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३) बाल गजल मएगै हमर फुकना की भेल दाई हमर झुनझुना की भेल बाबा कें कहबैन सब हरेलौं सबटा हमर खिलौना की भेल दूध-भात आब हम नहि खेबौ पेटमुका हमर सन्ना की भेल हम जे बुललौं बाबा-बाबी संगे रातिक हमर सपना की भेल चंदामामा कईल्ह जे अनलैंह हमर निकहा चुसना की भेल (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१२) हजल लाल धोती केश राँगि समधि चुगला बनला ना बेटा बेचि आनि बरयाती ई पगला बनला ना सभ बिसरि आँखि मुनि ध्यानसँ ताकथि रुपैया भीतर कारी बाहर उज्जर बोगला बनला ना खेत खड़ीहान बेच बेच पीबथि बभना तारी आब लंगोटा खोलि खालि ई तँ हगला बनला ना तमाकुल चूनबैत पसारने दिनभरि तास घर आँगनक चिंता नहि ई खगला बनला ना जेल छोरि बाहर आबि हाथ जोरि माँगथि भोट जितैत देरी 'मनु'केँ बिसरि दोगला बनला ना (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८) गजल हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज तँ आरा लेबै छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ विश्व मंचपर एकबेर फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२) गजल हमर कमाई कोन कोनामे परल अछि मंत्री घरमे बैमानीक सोना गरल अछि गरीब बनि गेल आई जब्बहकेँ बकरी चिकबा धनिकाहा गामे गाम फरल अछि डाका परै परोसमे जँ सुतलौं निचैनसँ ई निश्चय बुझू आत्मा हमर मरल अछि ढोंगी भक्तकेँ नहि निकलै रुपैया दानमे भरि थारी लेने खंड माछक तरल अछि शहर नहि 'मनु' गाम गामकेँ चौकपर मनुखसँ सजि शराबखाना भरल अछि (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६) गजल बाबा पोखरिकेँ रौहक की कही यादि अबैए बाबी हाथक दही अशोक ठाढ़िसँ कूदि पोखरिमे जाईठ छुबि कोना पानिमे बही बनसी बनाबी कोना नूका कए पूल्ली बनाबै लेल काटी खरही छीन कs नानी हाथक मटकूरी छोट-छोट हाथसँ छाल्ही मही जखन अबैत गामक इआद कनि-कनि कs हम नोरेमे बही सभ सुख रहितो परदेशमे माटिक बिछोह कते हम सही मैरतो 'मनु' सभ सुख छोरि कs मिथिलाक माटिपर हम रही (सरल वार्णिक वर्ण, वर्ण-१२) गजल घर-घर रावन आई बसल अछि सौभाग्यक सीता कतए भसल अछि करेजाक स्नेहकेँ मोल ने रहि गेल सभहक प्रेम पाईमे फसल अछि कर्तव्य बोध बिसरा गेल सभतरि भ्रष्टाचारमे सभ कियो धसल अछि बैमान बैसल अछि राजगद्दीपर इमानक मीटर कते खसल अछि देश समाज 'मनु' नहि कुशल आब जमाए बनल आतंकी असल अछि जगदानन्द झा 'मनु' (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) गजल किछु एहन काज करब हमहुँ नै फोटोमे टाँगल रहब हमहुँ एलहुँ जन्म लए कए दुनियाँमे एक नै एक दिन मरब हमहुँ कुकूर बिलाई जकाँ पेट पोसैट आब जुनि ओहेन बनब हमहुँ आगु बढ़ि नबका समाज बनाबि नै पाछु आब आगू चलब हमहुँ खाख छनि 'मनु' बहुत बौएलहुँ आब अपने घर रहब हमहुँ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण -१३) गजल रंग देखू भरल अछि सभतरि तँ खूनसँ देश गेलै गैल बैमानीक घूनसँ साग तरकारी कते भेलै महग यौ आब छी पोसैत नेना भात नूनसँ नामकेँ लत्ता गरीबक देहपर अछि लदल कबिलाहा कते छै गरम ऊनसँ छैक भिसकी रम बहै भरपूर सबतरि एखनो हम गुजर केलौं पान चूनसँ मारि गर्मी लेल 'मनु' बेबस कते छी ओ तँ अछि पेरीसमे पोसाति जूनसँ (बहरे रमल, मात्राक्रम-२१२२) गजल घर घरमे चक्कू पिजाबैत देखलौं नेनाकेँ तमाकुल चूनाबैत देखलौं बेगरता निकालि कs आजुक घड़ीमे नीक नीककेँ ठेंगा देखाबैत देखलौं मोनक दोष मोनेमे नूका कs सबटा कपटसँ करेज लगाबैत देखलौं दियादक फसादमे अपने मोलमे घरमे धिया पुता नुकाबैत देखलौं पाईकेँ जमाना छै पाईकेँ हिसाबमे पानिमे मनुखता डुबाबैत देखलौं नहि रहिगेल मोल प्रेम आ स्नेहकेँ प्रेमकेँ डबरामे बहाबैत देखलौं "मनु" मन कोमल सहि नहि सकलौं किए माएकेँ नोर खसाबैत देखलौं (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) गजल गीत आ गजलमे अहाँ ओझराति किएक छी हुए मैथिलीक विकास अंसोहाति किएक छी परती पराँत जतए कोनो उपजा नहि है तीन फसल ओतएसँ फरमाति किएक छी जतए सह सह बिच्छू आ साँप भरल होई ओतए बिना नोतने अहाँ देखाति किएक छी अप्पन चटीएसँ नै फुरसैत भेटे अहाँकेँ सिलौटपर माथ फोरि कs औनाति किएक छी आँखि पथने बरखसँ अहीँक रस्ता तकै छी प्राणसँ बेसी 'मनु' मनकेँ सोहाति किएक छी (सरल वार्णिक बहर, वर्ण- १७) गजल हम चान लेबैलए बढ़लौं अहाँ रोकब तैयो तारा लेबै मैथिलकेँ बढ़ल डेग नहि रुकत आब जयकारा लेबै मिथिलाराज मँगै छी हम भीखमे नहि अधिकार बूझि चम्पारणसँ दुमका नहि देब किशनगंज तँ आरा लेबै छोरलौं दिल्ली मुंबई अमृतसर सूरतकेँ बिसरै छी अपन धरतीपर आबि नहि केकरो सहारा लेबै गौरब हम जगाएब फेरसँ प्राचीन मिथिलाक शानकेँ विश्व मंचपर एकबेर फेर पूर्ण मिथिलाक नारा लेबै उठू 'मनु' जयकार करू अपन भीतर सिंघनाद करू फेरसँ निश्चय कए सह सह अवतार बिषहारा लेबै (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२) गजल देख मुह मूंगबा बहुतो बटाई छै नाम ककरो गरीबक नहि सुहाई छै चाहि निर्धन कए नहि योगरा बाबा पेट भरि जाइ सब दीनक दबाई छै मीठ भाषण बरख पाँचे कते दै छै जीत केँ बाद नेतो सब नुकाई छै घूस खा 'खा ' कँ बनलै भोकना पारा आन दमड़ी सँ चमड़ी बड चबाई छै भ्रष्ट नेता घुमे बीएमडब्लू में एखनो हक गरीबक 'मनु' बटाई छै ( बहरे-मुशाकिल, २१२२ १२२२ १२२२) गजल कान नै अपन देखब कौआ खिहारब कहु-कहु कोना आहाँ मिथिला सुधारब घोघ तर कनियाँ कोठी तरहक माछ मोन होइतो कहु कियो कोना निघारब लागल आगि जीवनक मिझाएब कोना की जीवन भरि खड़ेल खड़े पजारब कहियो तँ बसब आ ककरो बसाएब भटकैत सीथ कतेक आरो उजारब पानि केखनो 'मनु' पियासलो केँ पियेब की बनि नादान परती पर टघारब (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५) गजल सभकेँ हम करि सम्मान सभ बुझैत अछि गदहा सभकेँ गप्प हम सुनै छी सभ कहैत अछि गदहा सभतरि मचल हाहाकार मनुख खाय गेल चाडा भ्रष्टाचार में डूबि आई देश चलबैत अछि गदहा नवयुवक फँसल भमर में साधू करए कबड्डी देखू गाँधी टोपी पहिर किछ कहबैत अछि गदहा भगवा चोला पहिर-पहिर आँखि में झोँकै मिरचाई धर्माचार बनल बैसल धर्म बेचैत अछि गदहा जंगल बनल समाज में, सोनित सँ भिजल धरती शेर सगरो पडा गेलै चैन सँ सूतैत अछि गदहा (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०) गजल हमर अहाँकेँ प्रीतक खिस्सा आब दुनियाँ बिसरत नहि युग-युग तक लोकक मोन सँ अपन नाम घटत नहि सूर्य चान केँ प्रेमालाप सँ ई दुनियाँ प्रकाशित अछि भेल हुनकर संग बिनु कखनहुँ ई दुनियाँ चमकत नहि भोला शंकर डमरू बजाबथि पारवती नाचैत अँगना हुनकर दुनू केँ इक्षा बिनु कएखनो श्रृष्टि चलत नहि कृष्ण नचाबथि सगरो गोकुल गोबरधन पर्वत उठा बिनु राधिका संग कएखनो हुनक मुरली बजत नहि फूल भोंडा केँ प्रीतक खिस्सा सभतरि बहुत पुरान भेलै 'मनु' 'सुगँधाक' नाम बिनु प्रेम कथा आब गमकत नहि (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२२) गजल घोड कलियुग घडी केहन आबि गेलै एकटा कंस घर घर में पाबि गेलै बनल अछि रक्षके भक्षक आब सगरो विवश जनताक हक सबटा दाबि गेलै अन्न खा ' थाह पेटक किछु नै पएलक मालकेँ सगर भूस्सा चुप चाबि गेलै शहर नै गाम आ घर- घर आब देखू पूव देशक हबा में सभ आबि गेलै आजु फेशन कए नव पोसाक में डुबि एक गज में अरज देहक पाबि गेलै (बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२) गजल मारी माछ नहि ऊपछी खत्ता भरि समाज घोडन केँ छत्ता परचट्ट बनल जनता छी खाई छी गरदनि पर कत्ता कांकोड बिएल कांकोडे खए भय गेल देशक लत्ता-लत्ता सगरो नाँघल जाईत अछि छन छन मरीयादा केँ हत्ता रहब भरोसे कतेक दिन भेटे एक दिन हमरो भत्ता (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-११) गजल भ्रष्टाचार केँ ठेका आजुक सरकार लेने कारी रुपैयाक करमान धर्माचार लेने बोगला भगत छै बैसल घाट-घाट पर खून पिबैक लेल तैयार हथियार लेने कर्तव्य बिसरल अछि मिडिया समाज में नीक बेजाए छोरि कमाऊ समाचार लेने प्रेमक भाषा सिमैट गेल अछि पाई तक पाई अछि एक दोसर सँ सरोकार लेने सुनलौं कोयला दलाली में मुँह कारी हैछै सगरो मुँह कारी छैक मिथ्या प्रचार लेने (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६ ) गजल सोना दहेल जाइए जुनि काँटी केँ पकरू छोरि अपन भाषा नहि खराँटी केँ पकरू दोसर घर धेने भेटत नहि ओ सनेह छोरि आनक बोझ अपन आँटी केँ पकरू आदी काल सँ अपन शिक्षा लेने विश्व अछि नवीनता केँ धार में नहि काँटी केँ पकरू संपन्न हमर संस्कृति मधुर भाषा अछि लात मारि टल्हा केँ अपन खाँटी केँ पकरू छोरु दिल्ली मुंबई घुरि आऊ अपन घ 'र आब दरभंगा मधुबनी राँटी केँ पकरू (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६) गजल छुपि-छुपि क' सदिखन कनै छी हम घुटि-घुटि क' दिन राति मरै छी हम लगन एहन है छै छल नै बुझल विरह के आगि में आब जरै छी हम छन भरि के दूरी सहलो नै जाइए छन-छन घुटि-घुटि क' कनै छी हम सब त बताह कहैत अछि हमरा हुनक ध्यान में रमल रहै छी हम जाहि बाट पर चलि प्रियतम गेला मनु ओ बाट के निहारि तकै छी हम (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१४) गजल ज' नाराज छी मानि जाऊ पिया प्रेम बिधि जानि जाऊ महिस भेल पारी तरे अछि घरक खीरसा सानि जाऊ मरल माछ पौरल दही अछि हिया हमर सभ गानि जाऊ करीया बडद मुइल परसू किछो नै कनी कानि जाऊ छिटल रोपनी हेत कोना घरो घुरि अहाँ जानि जाऊ (बहरे-मुतकारिब, 122 -122-122) गजल हम जन्म कें टुगर छी प्रेमक लेल तरसैत रहलौं भेटल किरण एक आसक तकरो त' मिझबैत रहलौं दुख एहि कें केखनो नै की प्रेम किछ नै पएलौं अफसोस की एहि दुनिआ में हमहुँ जीबैत रहलौं चमकैत सभ बस्तु कें हम अनजान में सोन बुझलौं सोना जखन हम पएलौं नै बुझि क' हरबैत रहलौं किछु नै रहल आब अपने कें बिसरि में लागि गेलौं लोटा भरल भाँग में सब किछु अपन गमबैत रहलौं आँखिक बिसरि गेल आसा,अनुराग सबटा बिसरलौं गेलौं हराएब दुख तन-मन अपन बिसरैत रहलौं ( बहरे मुजस्सम वा मुजास 2212-2122, दु-दु बेर सभ पांति में ) गजल खून सँ भिजलै धरती मिथला बनबे करतै आब जोड लगाबे कियो झंडा फहरेबे करतै सुनु बलिदानी सुनु शैनानी आब दिन दूर नै विश्वक नक्सा में मिथिलाक नाम देखेबे करतै कतबो चलतै बम निकलै चाहे हमर दम क्रांति बढल आगु आब जुनि इ रुकबे करतै बहुत छिनलक सभ नै सहबौ आब ककरो गर्म सोनित त आब हिलकोर मारबे करतै एक खुनक बूंद सँ सय-सय रंजू जन्म लेतै आताताई सँ बदला ओ चूनि-चूनि लेबे करतै (सरल वर्णिक बहर, वर्ण-१८) गजल हमर जीवन भरि करेजा तुटिते रहल सब कियो हमरा सँ आई फुटिते रहल जेकरा हम अपन तन मन सब सोपलौं मोन कें ओ हमर सदिखन लुटिते रहल हमर भागक कनिक लिखलाहा देखियौ किछ जए लिखलौं छने में मिटिते रहल पीठ पाँछा आब रेतै गरदैन अछि प्रेम एक दोसर सँ सबतरि छुटिते रहल आब बैसल मनु झमारल हारल कनै जोडलौं कतबो मुदा मन तुटिते रहल बहरे जदीद -2122-2122-2212 गजल हाथी दाँत खे केँ आर, देखाबै कए छै आर नेता कें कहैक तँ बात आर करै कए छै आर केलक भोज जे नै दालि बड सुडके, इ जग-जाहीर भोजक बात आरो छैक, बात किनै कए छै आर दोसर कें फटल मे टाँग, सब कीयो अडाबै छैक फाटल अपन सार्बजनिक देखाबै कए छै आर सासुर कें मजा बहुते होइ छै, अपने बुझल सब नीक कनियाँ सन्ग सासुर मे मजा तँ रहै कए छै आर भाई धन कए गौरब तँ गौरबए बताहे छैक आ सम्पैत-गौरब बाप जँ कमेलै कए छै आर (दीर्घ,दीर्घ,दीर्घ,हस्व SSSI, चारि-चारि बेर सभ पांति मे ) गजल बेटी नहि होइ दुनिआ मे, कहु बेटा लाएब कतए सँ जँ दीप मे बाती नहि तँ, कहु दीप जलाएब कतए सँ आबै दियौ जग मे बेटी के, के कहे ओ प्रतिभा,इन्द्रा होइ भ्रूण-हत्या करब तँ कल्पना,सुनीता पाएब कतए सँ मातृ-स्नेह, वात्सलके ममता, बेटी छोरि कें दोसर देत बिन बेटी वर कें कनियाँ कहु कोना लाएब कतए सँ धरती बिन उपजा कतए, घर बिनु कतए घरारी बिन बेटी सपनो मे, नव संसार बसाएब कतए सँ हमर कनियाँ, माए बाबी हमर किनको बेटीए छथि बिन बेटी एहि दुनिआ मे, मनु हम आएब कतए सँ (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२१ ) गजल आई काल्हि तँ राजनीतिक बाजार बहुत गर्म अछि देखू नेता सभहँक हाल बनल बड्ड बेशर्म अछि चानन टिका लगा कs ओ बनल बडका-बडका भक्त नहि पुछू एहि संसार मे केने कतेक कुकर्म अछि जए अछि कर्मयोद्धा धीर बीर, ओ बजैत नहि अछि चुप्प भs करैत सदिखन अपन-अपन कर्म अछि भैय्यारी आ सद्भावना इ तँ सबसँ बड़का प्रेम अछि जे लडाबए एक दोसर सँ ओ नहि कोनो धर्म अछि हम छी मैथिल, आ नहि कोनो आन हमर धर्म अछि सपनो मे एकरा त्यागि,सबसँ बडका अधर्म अछि (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-२०) गजल नरहीया भुकैए हमर घराडी पर बसलौं परदेश मे हम खोबाडी पर दूध-दही पान मखान सब छोरि एलौं छी पेट पोसने तs दु-टुक सुपारी पर जे किछ कमेलौं हाथ-पएर तोरि कय साँझ परैत खर्च भेल छूछे तारी पर बचेलौं बर्ख भरि पेट काति-काति कय गमेलौं गाम जए-आबक सबारी पर छोरु दोसरक आसा अपन बसाऊ यौ घुरि आउ मनु सोनसन घराडी पर (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१५) गजल किस्त-किस्त मे जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर घर मे रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी परदेश मे बनि कतेक दिन रहब परबा अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी अपन लोकक मन-मन मे मनु अहाँ बसुयौ परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१८) गजल किस्त-किस्त मे जिनगी बिताबै लेल मजबूर छी माटि पानि छोरि अपन, किएक एतेक दूर छी आबै जाए जाउ घुरि-घुरि अपन-अपन घर घर मे रोटी नै, रखने माछ-भात भरपूर छी तिमन-तरकारी बेच-बेच करू नै गुजरा यौ घुरि आऊ अपन गाम, एतुका अहाँ हजूर छी परदेश मे बनि कतेक दिन रहब परबा अपन घर आऊ, एतए के अहाँ तs गरूर छी अपन लोकक मन-मन मे मनु अहाँ बसुयौ परक द्वारि पर बनल किएक मजदुर छी गजल करेजा मे अहाँक छबी बसल,मोन हमर ह्टैत नहि अछि अहाँके स्नेह सागर मे नहेलौं,एकर पानि घटैत नहि अछि सुतै-जागैत ध्यान अहींक केने, हम सदिखन रमल रहै छी अहाँके अछि सुन्नर काया कतेक, कतौ मन ह्टैत नहि अछि सगर संसार देलहुँ त्यागि हम, केने वरण छी आब अहीं के अहाँके संग छोरि कतौ, मिसीयो भरि उसास अबैत नहि अछि अहींके नाम लिखल अछि, मनु कए एक-एक धरकन पर पुछूनै हमर हाल अहाँ, बिनु अहाँ जीबन कटैत नहि अछि (वर्ण-२४, बहरे-ह्जज ) गजल अहाँ कखनो तँ बाट हमर घरक धरबै अहाँक हाथे ओहि दिन हम वरक धरबै लाली सेनुर टुकली श्रृंगार हमर सबटा अहाँ बिनु एकरा हम कोनो सरक धरबै एही जीबन मे सिनेहिया अहाँ नहि भेटबै जिबते जीबैत हम तs बुझु नरक धरबै अहाँ हमर जिबनक पूर्निमाक इजोरिया अहीं हमर मोन मे इजोत भोरक धरबै अहाँ आब त फूसीयो सँ आबियो घर जाउ यौ मनु कखनो त कनिको कोनो सरक धरबै गजल खूर देलखिन्ह ओ सोधि लेलखिन्ह ओ देख मोका नीक सँ चाभि पेलखिन्ह ओ माय-बेटा के देखू फूट केलखिन्ह ओ नीक-नीक साडी मे फीट भेलखिन्ह ओ गाम-गाम घूमी क नाम केलखिन्ह ओ गजल धुप-आरती हम कएलहुँ नहि जप-तप करब जनलहुँ नहि सैदखन कर्तव्यक बोझ उठोने अहाँक ध्यान किछु धरलहुँ नहि की होइत अछि माय-पुत्र के नाता एखन तक हम जनलहुँ नहि हम बिसरलहुँ अहाँ के लेकिन अहुँ एखन तक देखलहुँ नहि आब हमरो ध्यान लियअ हे माता स्नेह अहाँक हम पएलहुँ नहि गजल कहलन्हि ओ मंदीर मे, नहि पिबू एतए शराब कोनठाम घर हुनक नहि, पिबू जतए शराब इ नहि अछि खराप, बदनाम एकरा केने अछि ओ की बुझत, भेटलै नहि जेकरा कतए शराब मरलाबादो हम नहि पियासल जाएब स्वर्ग मे जाएब जतए सदिखन भेटए ओतए शराब मारा-मारि भs रहल अछि जाति-पातिक नाम पर मेल देखक हुए तs देखू भेटए जतए शराब सब गोटे कए निमंत्रण सस्नेह मनु दैत अछि आबि जाए-जाउ सबमिल पियब एतए शराब गजल टूटल करेज राखब नहि हम एखन सिखने छी किछु अपने एकडा तोरलौं किछु भागक लिखने छी जिनका लुटेलहुँ हम अपन स्नेह भरल करेज हुनका सँ दूर होबाक, माहुर अपने सँ चीखने छी सोचने त छलहुँ एक दिन जीबन मे होयत रंग ओहि रंग भरल दुनियाँ सँ कतेक दूर एखने छी दोसर सँ करू की शिकाति जँ अपने नहि बुझलक जिनका केलौं नेह करेज तोरैत हुनका देखने छी गजल केहन-केहन दुनियाँ, केहन-केहन रंग एकर कियो हँसैए कियो कनैए,कियो झुमैए संग एकर कियो मरैए दुधक द्वारे,कियो भाँग मे डुबल अछि बुझि नहि पएलहुँ आइतक कनिको ढंग एकर लक्ष्मीके देखलौं पथैत चिपड़ी,कुबेड चराबे पारी गंगा-यमुना पानि भरैत,की हमहुँ छी अंग एकर भोट मांगे पोहला-पोहला कs,गदहो के बाप बना कs जितैत देखु गिरगिट जेकाँ बदलैत रंग एकर 'मनु' छल कारिझाम चिन्हार बनोलन्हि अनचिन्हार घरी-घरी मे बदलैत देखु आब तs उमंग एकर - - - - - - - - - - - -वर्ण-२० - - - - - - - - - - - गजल दर्द करेजक देखाएब तs अहाँ जानब की हमर बात कनी सपनो मे अहाँ मानब की अहाँ कहलौं पुरुषक प्रेम गोबर आ रुई करेज चीरो कs देखायब तs अहाँ कानब की दोख एकेटा मे होई छैक सबमे कत्तौ नहि सबके संग हमरो अहाँ ओहि मे सानब की अहाँ कहैत छी सबठाम अन्हारे-अन्हारे छै इजोरियाके आँखि मुनि अन्हरिया मानब की एक बेर हमरो पर भरोसा कय कs देखु प्रेम केकरा कहैत छैक 'मनु' सँ जानब की गजल जरि-जरि झाम बनलहुँ हम सोना नहि बनि पएलहुँ हम कतेक अभागल हमर भाग अपन सोभाग हरेलहुँ हम अपन जीबन अपने लेलहुँ किएक लगन लगेलहुँ हम सुगँधा अहाँ के विरह मे देखु की की जरलाहा बनलहुँ हम अहाँ विरह के माहुर पिबैत मरनासन आब भेलहुँ हम जतेक हमर मनोरथ छल संगे सारा मे ल अनलहुँ हम मातल प्रेमक जडित आगि मे खकसिआह मनु भेलहुँ हम गजल अहाँक चमकैत बिजली सन काया ओई अन्हरिया राति मे आह ! कपार हमहुँ की पयलौंह मिलल जए छाति छाति मे सुन्नर सलोनी मुंह अहाँ कए, कारी घटा घनघोर केशक होस गबा बैसलौंह हम अपन, पैस गेल हमर छाति मे बिसरि नहि पाबी सुतलो-जैगतो, ध्यान मे हरदम अहीं के अहाँक कमलिनी सुन्नर आँखि, देखलौं जए नशिली राति मे ओ बनेला निचैन सँ अहाँ के, पठबै सँ पहिले धरती पर मिलन अहाँ कए अंग-अंग मे जे, नहि अछि दीप आ बाति मे सुन्नर अहाँ छी सुन्नर अछि काया अंग-अंग सुन्नर अहाँ के नहि कैह सकैछी एहि सँ बेसी अहाँक बर्णन हम पांति मे गजल लाल-दाई के ललना लाले लाल लगैत छथि लाली अपन माय के चोरा कs लजाबैत छथि छैन आँखि मे हिनकर काजरक बिजुडिया माइयो सँ सुन्नर झिलमिल झलकैत छथि लटकल माथ पर सुन्नर लत हिनकर देखु-देखु चंद्रमा कए इ त नुकाबैत छथि सुनि-सुनि बहिना सब हिनकर किलकाडि कियो खेलाबैत कियो हिनका झुलाबैत छथि रंग-रूप चाल-चलन सबटा निहाल छैन मुस्की सँ इ अपन मनु कए लुभाबैत छथि गजल टीस उठैए करेज मे कोना कहु बितैए की कोन लगन लगेलौं अहाँ सँ याद अबैए की जतय देखु जिम्हर देखु अहाँ कए देखै छी कोना बितत दिन-राति कोना कय बितैए की रहि-रहि याद अहाँ के हमरा बड आबैए कि करू कोना करू आब नै किछ फुराईए की प्रियतम मनु के किएक इना तरपाबै छी मोन मे लहर उठल से अहुँ के लगैए की गजल निर्धन जानि अहुँ बिसरलौन्ह माँ कोन अपराध हम कएलौन्ह माँ निर्धन छी हम हमर नै गलती इ निक सनेस अहीं दएलौन्ह माँ मुल्यक तराजू मे नै हमरा तौलु ममता कए प्यासल रहलौन्ह माँ दर-दर भटकैत खाक छनै छी आँचर अहाँक नहि पएलौन्ह माँ मनु के नै अपन स्नेह देलौं किछु चरणों सँ आब दूर कएलौन्ह माँ गजल कि-कि बनब चाहै छलौं हम की बनि गेलौंह सुगंधा अहीं कए स्नेह मे हम सनि गेलौंह आस हमर करेज के करेजे मे रहि गेल अहाँ के छोइर दुनियाँ मे कतौ जुनि गेलौंह रहल नहि होश हमरा दुनियाँ के गम के अहाँ कए स्नेह मे भय पागल कनि गेलौंह सैदखन ख्याल मे अहीं कए बसेने रहै छी सब कुछ हम अपन अहीं के मनि गेलौंह हमर स्नेह जे अहाँ सँ स्नेह नहि रहि गेल हमर मोन मे बसि अहाँ प्राण बनि गेलौंह गजल भाइ आब हमहूँ लिखब अपन फुटल कपार पर जेना इ भात-दालि तीमन ओकर उपर अचार पर सोन सनक घर-आँगन,स्वर्ग सन हमर परिवार छोड़ि एलहुँ देस अपन दू-चारि टकाक बेपार पर कनियों आटा नहि एगो जाँता नहि करछु कराही नहि नून-मिरचाइ आनि लेलहुँ सभटा पैंच-उधार पर चिन्हलक ने केओ ने जानलक टुग्गर बनि रहलहुँ गेलहुँ इ अपन माटि-पानि छोड़ि दोसरक द्वार पर हम कमेलहुँ धन ओ भरि लेलक हमर घर खालिए आब बैसल हम कनै छी अपन फुटल कपार पर गजल सुगँधसँ सराबोर सुगन्धित सुंदर सजनी सुगंधा हमर ह्रदय ओ जा बसली अदभुत सुंदरी सुगंधा जिनक सुगंध चहुदिस नभ-थल कए कण-कण मे रोम-रोम मे हमर ओ बसल छथि प्राणेश्वरी सुगंधा सुर कए श्याम जेना राधाकेँ नटवर मुरली वजैया श्वाँस-श्वास मे ओ छथि समायल हमर सजनी सुगंधा जिनक नशा मे ई रचलौंहेँ हम सुर-सुगन्धित सुगंधा ओ छथि हमर ह्रदयक रानी प्राण सँ प्यारी सुगंधा ध्यानमे मानमे जिनकर आनमे अर्पित अछि 'सुगंधा' भूल हुअए त मानियो जाएब 'मनु' मनके रानी सुगंधा गजल किनका कहियौन्ह पतियौता कए हमर मोनक व्यथा बुझता कए दिन भ्रि हम फर-फराइत छी बुझु जेनाँ पंछी बंद पिंजरा कए हम मकड़ा जाल मे ओझरैल छी ने बुझहु हम नारी मिथिला कए दुनियाँ कए तँ बात नहिये पूछू लोक-व्यवहार केलक कोना कए मुनलएन केबार विधाता सेहो अबितए कोइखमे ममता कए गजल पुत्र अहीं कए हमहूँ छी हे माँ नजरि किएक फेरैत छी हे माँ अहाँ जगत जननी छी भवानी अहाँ सँ छिपल किछु नै छी हे माँ दिन-हिन् हम बालक अज्ञानी अहाँ केँ सुमरि कऽ कनै छी हे माँ सरधा भाव छी अहाँ वस देने अर्पित ओकरे कएने छी हे माँ नहि हम जानै छी पूजा-अर्चना जप तप किछु नहि जानी हे माँ माया मे हम घेरावल भवानी ध्यान लगावए नहि जानी हे माँ अहाँ मैया हम पुत्र अहीं कए वस एतबे तँ हम जानी हे माँ गजल पहड राईत बीत गेल निन्द नहि आबैए हमरा रैह-रैह कs अहाँक सुन्नर याद सताबैए हमरा सुन्नर-मोहनी छवि अहाँक,आँखि मे जए बसोने छी सिनेहिया सलोनी हमर,बड्ड तरसाबैए हमरा घरी-घरी बजाबै छी,अहाँ अपन चंचल इशारा सँ मुइन लिय कोना कs आँखि अपन,काचोतैए हमरा जुनि खसाबू एतेक अहाँ,अपन दाँतक बिजुडिया एतेक इजोरिया अहाँक ,आब तरपाबैए हमरा मधुर मिलन होएत अपन,कखन कोन बिधि सँ ओही के विचारे सँ,करेजा हमर जुराबैए हमरा गजल ज्ञानी नहि हम किछु जानी नहि अल्प वुद्धि हम पहचानी नहि हम छी मैथिल मिथिला हमर मैथिली छोइर किछु जानी नहि इतिहास भूगोल सँ अनभिक राजनीती किछु पहचानी नहि कविता-गजल कए ज्ञान नहि गद्य-पद्य विधा हम जानी नहि मोनक भाब राखि कागज पर स्नेह कि भेटत सए जानी नहि गजल प्रियतम अहाँ कए याद मे जिनाई भेल मुस्किल जीवैत त हम छीये नहि मरनाई भेल मुस्किल किना सुनाऊ हाल करेजाक खंड कै हजार भेल सब मे अहाँक नां लिखल पढनाई भेल मुस्किल लाख समझेलौंह मोन के ई बनल अछि पागल आबि अँहि समझा दिय समझेनाई भेल मुस्किल केखनो-केखनो सोची पाहिले त हाल इना नै छल जखन सँ भेटलौं अहाँ सँ रहनाई भेल मुस्किल हमर मोनक मंदिर मे मूरत अहीं कए अछि बिना ओकर पूजा कए 'मनु' जिनाई भेल मुस्किल गजल जखन-जखन सोचब हमरा अपने मे अहाँ पायब हमरा हमर शव्द गीत बैन कान मे कचोटे तं अहाँ सोचब हमरा हम दूर छी त कोनो बात नहि मोन मे अपन पायब हमरा दू काया एक प्राण छी हम दुनु भेतब त अहाँ बुझब हमरा अहाँ कहलौं जे हम अहाँ के छी मरला बादो निभायब हमरा गजल छुइप-छुइप क हम अहाँ कए छवि निंघारै छी एक अहाँ छी कि नहि हमरा करेजा सँ लगबै छी एक दिन पूरा होयत हमरो करेजक कामना अहुँ कि याद करब की ककरा सँ नेह लगाबै छी एक दिन ओहो एतै जहिया हमर स्नेहिया एबै तखन अँहि के निंघारब एखन छबि निंघारै छी नहि मिलन कए ओ घडी आब अहाँ रोकल करू ओ मधुर घडी जल्दी आबे हम इंतजार करै छी हमर जे चाहत अछि से सुनायब हम जरुर नै रोकने अहाँ हमरा आब कहै सँ रोकी सकै छी मोनक व्यथा किनका कहियौन पतिएता केँ हमर मोनक व्यथा बुझता केँ बंद पिंजरा केँ चीडै जेकाँ दिन भरि हम फरफराईत छी जुनि बुझु हम नारी मिथिला केँ हम त ' मकड जाल में ओझरेल छी दुनियाँ केँ त ' बात नइँ पुछू कोना की केलक व्यबहार यौ जननी केँ गर्भ में अबिते देखू बिधाता मुनलैन्ह केबार यौ मयो बाबू हमरे दूख सँ पिचा गेला जीवनक पहाड़ में नैन्हेंटा सँ पैन्ख गेल काटल उडियो नइँ पएलहुँ संसार में बाबू केँ आँगुर छोडियो नइँ पएलहुँ पति केँ हाथ धराए गएलहुँ नइँ किछु बुझलहुँ रित दुनिआ केँ अपन किएक सभ बिसराए गएलहुँ नव घर आँगन नव समाज में जल्दी कियोक कोना अपनेता दोख नइँ किछु हुनको छनि लेकिन हमरा किएक कियोक बुझता घर सँ कहियो नइँ बाहर निकललहुँ ऊँच -नीच केँ ज्ञान नइँ पएलहुँ अर्जित छल नइँ बुद्धि-बिद्या किछु नैन्हेंटा में सासूर हम एलहुँ कोन अपराध जन्मे सँ कएलहुँ बाबू अहाँ अपन संग नइँ रखलहुँ नइँ पतिएलहुँ हमरो में जीवन मोटरी बुझि क ' दूर भगएलहुँ सभसँ आगु आगु छी के कहैत अछि निर्धन छी हम थाकल हारल मारल छी हम छी मैथिलपुत्र दुनियाँ मे सभ सँ आगु-आगु छी देखू श्रृष्टिक संगे देलौंह विदेह, जनक, जानकी हम आर्यभट्ट, चाणक्य दोसर नहि, बनेलौंह हम पहिल कवी श्रृष्टिक वाल्मीकि बनौलक के कालिदासक कल-कल वाणी छोड़ि मिथिला दोसर देलक के विद्यापति आ मंडन मिश्र सँ छिपल नहि ई विश्व अछि दरभंगा महाराजक नाम भारतवर्ष मे बिख्यात अछि राष्ट्रकविक उपाधि भेटल जिनका मैथिलीशरण मिथलेक छथि दिनकरकेँ जनै छथि सब यात्री छुपल नहि छथि कुवर सिंह आ मंगल पाण्डे फिरंगीक सिर झुकौने छथि गाँधीजी असहयोग आन्दोलन एहिठाम सँ केने छथि देशक प्रथम राष्ट्रपति भेटल मिथिलाक पानिक शुद्धि सँ दिल्लीकेँ बसेलक कहू ए.एन.झाक बुद्धि सँ आई.आई.टी.मे अधिकार केकर अछि मेडिकल हमरे अन्दर अछि विश्वास नहि हुअए तँ आंकड़ा देखू सभटा आई.ए.एस हमरे अछि | गीत (आलु कोबी मिरचाई यै, कि लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२ कोयलख कए आलु,राँची कए मिरचाई यै बाबा करता बड ,बड़ाई यै / बड़ाई यै आलु कोबी - - - - - - -दाय यै नहि लेब तs कनी देखियो लियौ देखए कए नहि कोनो पाई यै / पाई यै आलु कोबी - - - - - - - - दाय यै दरभंगा सँ अन्लौंह विलेतिया ई कोबी खाय कs तs कनियाँ बिसरती जिलेबी कोयलख कए आलु ई चालु बनेतै धिया-पुता कए बड ई सुहेतै राँची सँ अन्लौंह मिरचाई यै कि लेबै यै दाय यै / दाय यै ( आलु कोबी मिरचाई यै, कि लेबै यै दाय यै / दाय यै )-२ गीत - लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए हिनकर बर मोल छैन,ई त दूल्हा आजु कए हिनकर बाबु बिकेलखिन लाखे,बाबा कए हजारी लगबयौन मिल जुइल कए बोली ई दूल्हा आजु कए हिनकर गुण छैन बरभारी,ई रखै छथि दू -टा बखारी दरबज्जा पर जोड़ा बडद,रंग जकर छैन कारी भैर दिन ई पौज पान करैत छथि,जेना करे पारी भोरे उठी ई लोटा लs कs पिबए जाए छथि तारी साँझु-पहर चौक पर जेता,चाहियैंह हिनका सबारी ई छथि मएक बर-दुलरुआ,हिनका दियौंह एकटा गाड़ी हिनकर गुण छैन बरभारी ई पिबई छथि खाली तारी हिनका पहिरए आबै छैन नहि धोती,दियौन जोर भैर साडी लगबयौन-लगबयौन हिनकर बोली ई,दूल्हा आजु कए हिनकर बर मोल छैन,ई त दूल्हा आजु कए मिथिलाक गुणगान सुनु मिथिलाक गुणगान अहाँ, हम की कहु अपन मोनेसँ सभ किछु तँ अहाँ जनिते छी मुदा, हम कहैत छी ओरे सँ उदितमान ई अछि अति प्राचीन, ज्ञानक अति भंडार अछि ऋषि-मुनिक पावन धरती, महिमा एकर अपार अछि ड्यौढ़ी-ड्यौढ़ी फुलबारी, आँगनमे तुलसी सोभती कोसी-कमला मध्य वसल ई, भारतक सुंदर मोती भक्ति-रस सँ कण-कण डुबल, अछि महिमा एकर अपार शिव जतए एला चाकर बनि कऽ, सुनि भक्तक करुण पुकार कलि विष्णु पूजल जाइ छथि, मिथिलाक एके आंगनमे छैक कतौ आन ई सामर्थ कहू, होइ जइ आँखिक देखनेमे एहि धरतीसँ जानकी जनमलि, सृष्टिक करै लेल कल्याण श्रीराम संग व्याहल गेलि, पतिवर्ताक देलनि उदाहरण महान आजुक-काइल्हुक बात जुनि पुछू, भ्रष्ट बनल अछि दुनियाँ मुदा मिथिलामे एखनो देखू, सुरक्षित घरमे छथि कनियाँ माए-बापकेँ आदर दै छथि, एखनो तक मिथिले वासी पूज्य मानी पूजा करैत छथि, घर आबैत जँ कियो सन्यासी आजुक युगमे धर्म बचल अछि, जँ किछु एखनो मिथिलेमे आँखिक पानि बचल अछि देखू, जँ किछु एखनो मिथिलेमे की कहु आब मिथिलाक महिमा,समावल जाएत ने लेखनीमे हमरामे ओ सामर्थ नहि अछि, बान्हि सकी जँ पंक्तिमे मैथिलीक विकासक बाधा मैथिलीक विकासक बाधा थिक आजुक युवाशक्ति मिथिलाक पढि लिख कऽ बनि जाइ छथि डाक्टर आ कलक्टर मुदा नहि पढि-लिख सकैत छथि मिथिलाक दू अक्षर घर सँ निकलैत ओ कहथिन "चलो स्टेशन" लागैत छनि संकोच कहै मे की "चलु स्टेशन" जेता जखन गामक चौक पर लागत जेना बैस रहला मैथिलीक कोइख पर सदिखन दुगोट समभाषी बाजत अपने भाषा परंच दूगोट मैथिल जतबै लेल अपन पर्शनेल्टी मैथिली तियागि कऽ बाजए लगता सिसत्मेती अपन मायक भाषा सँ प्रेस्टीज पर लागैत छनि बट्टा लोक की कहतनि संस्कारी सँ भऽ गेला मर्चत्ता संस्कारी सँ भए गेला मर्चत्ता | मायक भूमि बजा रहल अछि जुनि हमरा जकरु महामाया, मायक भूमि बजा रहल अछि जाहि माटी कए देह बनल हमर,ओमाटी बजा रहल अछि रुन-झुन संगी-साथीक हमरा, याद बहुत शता रहल अछि काका-ककिक मधुर वोल ओजे,कानमे घंटी बजा रहल अछि जुनि हमरा जकरु महामाया, मायक भूमि बजा रहल अछि सोंधी-सोंधी मुरहीक खुशबु,गामक हमरा खीच रहल अछि कनियाँ-काकीक कडकड कचड़ी,मोन कए डोला रहल अछि लहलह झुमैत खेतक धान, शीश हिलाके बजा रहल अछि चौरचन, छैठक सनेसक स्वाद, हमरा कचोत रहल अछि हुक्का-लोलिक उक जे फेकल,सुमैर हमरा कना रहल अछि नै सैहसकै छी दुरी एते आब, ह्रदय-बांध टूट रहल अछि जुनि हमरा जकरु महामाया,मायक भूमि बजा रहल अछि पाई आई पाई सँ प्यार खरीदल जाएत छैक सम्मान खरीदल जाएत छैक वस् ! जेबी मे हेबाक चाहि पाई हमरा नहि चाहि ई पाईयक दुनियाँ हमरा नहि चाहि ई भाराकए दुनियाँ हम तs वसायव् अपन एक नव आशियाँ जाहिठाम प्यार कए अहमियत होई सम्मान कए पूजा होई जाहिठाम ठोड पर हँसी लावैक लेल ह्रदय सँ आह! नहि निकलै शब्द बजैक सँ पाहिले लाबा मे नहि बदलै जाहिठाम अर्थ कए अर्थ समझल जाए सबके भीतर एक प्यारक आशियाँ बसायल जाई | कथा अमर अपन मिथिला कए कथा अमर अपन मिथिला कए एकरा जुनि बिसरू | समस्त बिहार मैथिलीमय हुए आब ओ दिन सुमरु || बहुत पिसेलौंह सत्ताक जांत मे आब जुनि पिसल जाउ | बहुत पछुएलौन्ह पाँछा चैलकए आबो आगु डेग बढाउ || निरादर किएक मायक भाषा कए एकरा जुनि बिसराउ | आबो जागू होश सम्हारु मैथिलि कए बचाउ || उठू सुतल सिंह जगाबु अपन स्वाभिमान कए | आसमान सs ऊँच उठाबु अपन मिथिलाक पहचान कए || मिथिला स पलायन खेत -खडीहान उजार भेल सबटा मिथिला हमर आई बेगार भेल सबटा| नहि गामक हाट ओ नहि कुजर्निक हक़ ओ नहि ककाक ठाठ ओ मिथिलाक रित हेराय गेल सबटा| नहि बजैत पैजनियाँ नहि बाबी कए खेलौनियाँ बाबा कए लाठी हेरायगेल सबटा मिथिला हमर आई उजार भेल सबटा | पेटक आइग मे आधुनिकता कए खाई मे बेरोजगारी कए है मे मिथिला हमर आई पलायन भेल सबटा मिथला हमर आई उजार भेल सबटा | धन हमर मिथिला जुनि हमरा चाहि, धनक गठडिया | दए दिय हमरा,हमर माटी कए पुडिया || लए लियअ हमरा सँ,हमर कमायल धन | धन हमर मिथिला, माटी एकर धन || मायक आँचर सँ,हमर मिथिलाक धरती | पायब एहन कहु, दोसर कतए धरती || दूर भए कए बुझलौंह, मोल एकर हम | कि थिक हमर, आ कि एकर हम || जाहि आँगन मे, जनमलौंह खेलेलौंह | दाबा पकैर जतए, चलब हम सिखलौंह || आई ओही आँगन सँ,एतेक दूर भएलौंह | कचोतैए मोन कए,दर्शनों नहि कएलौंह || गीत- ऐ सुंदर-सुंदर कनियाँ ऐ सुंदर-सुंदर कनियाँ , अहाँ के बाजे बर निक पैजनियाँ | ई झुमकी,लाली,बिंदियाँ,चम्-चम् चमके अहाँ के ओधनियाँ|| कनियों त संभारू अपन, ओ मुस्की चौबन्नी बाली | नै त ल लेट हमर जान , ऐ कनियाँ -झिट्की बाली || ई कल्पतरु सन बिखरल , मनोहारी कंचन-वेश | बिषधर सँ बेसी मादक , ई सुंदर अहाँक केश || रहितों जे हम कवी , रैचतौ बरनिक कविता | बस मोने -म़ोन देखै छी, हम अहाँक छबिता || हम मौन किएक छी हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी निष्ठुर हमर समाज बनल अछि निराकार सरकार निर्लज सोनित आताताइ निर्भीक गुंडा राज हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी परवाशी बनि हम रहब कतेक दिन दूर - पड़ायब कतेक दिन हमर समाज हमहि सुधारब हमर सरकार हमहि बनायब आताताइ गुंडा केँ आब हमहि सतायब हम मौन किएक छी हम चुप किएक छी | मिथिला राज हम धीर-वीर बलवान मैथिल मिथिला राज चाहैत छी, ई हमर भीख नहि बुझु अधिकार अपन माँगै छी, जाहि दिन धीर हम अधीर भेलौंह वीर हम वीरता देखा देब नहि, फेर विश्वास करू हमर की एक चाणक्य हम आर बना देब। गुमान बहुत गुमान अछि हम मैथिल छी मिथिला हमर शान अछि उदितमान ई अछि धरती पर कोनो स्वर्ग समान अछि ! कण-कण खल-खल कोसी कमला बुझु एकर पहचान अछि जनक-जानकी आ विद्यापति मिथिलाक सिर केर पाग अछि ! भक्ति रसक कथा की कहू स्वयं संकर चाकरी केने छथि एकर विद्वता जुनि कियो पुछू मंडनमिश्र आ अजानी भारतीक नाम बिख्यात अछि ! नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म -१५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममेरूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. ) आजाद गज़ल (प्रेम रस) अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२ गुण प्रीतम क बाट गबैत चलि जाउ !!२ मोनक बेगरता अछि , प्यासल अछि कंठ घुट- घुट नै जिबू एना बनू नै चंठ ........२ अछि ललसा जे मोनक कहैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३ मानलौं जे पीने हएब बहुतो जहाँ क प्यासल अछि मोन जे तैयो अहाँ क.......२ अछि प्रेमक ई धारा बहैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३ ससरल ने कंठ सँ एहन कोन पिबै छी पिबते उतरि गेल , तेहन की पिबै छी........२ लिअ चस्का ई प्रेम क डूबैत चलि जाउ !!२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !! अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२ गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !! ५ काल-दिशा समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ तैयो समय नै भेटल हमरा, एखनो समय सँ लैर रहल छी .../२/ अपनों सँ अल्गेलक हमरा ! दियादी फैंटी मे बैंटि रहल छी ...., ततेक मोन भट्केल्क हमरा , समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ तैयो समय नै भेटल हमरा, मोन मसोरने हांफी रहल छी ...../२/ भैर जिनगी दौरेलक हमरा , की पेलहूँ हम की छुटल अछी ...., सब्किछ ई बिसरेलक हमरा ! समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ तैयो समय नै भेटल हमरा, भेलहुँ ज्ञानी समय अनुरूपे....../२/ तेहन पाठ पढेलक हमरा , भैर दुनियां के ज्ञान बंटई छी ....., अपना सँ पिटबेलक हमरा ! समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ तैयो समय नै भेटल हमरा, अंत काल समय फेर भेटल....../२/ काया साथ नै देलक हमरा , जै काया लेल समय गवेलहूँ....., समय साथ छोरबेलक हमरा ! समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ तैयो समय नै भेटल हमरा, गंगा कल.कल ..करैत बहैत नीर चुबैत ममता होइत अधीर पतित पावनी निर्मल गंगा जन्भूमिक बहैत रुधिर तारैत सब निस्कंट पापकेँ एहि सँ जीवन आ शरीर छुबैते ह्रदय द्रवित भऽ जाएत गगन नयन भरि जायत नीर एहन पवित्र जल नै कोनो जहिना विष्णु सागर क्षीर दर्शन कऽअहाँक मैया पुलकित भऽ उठल शरीर कल्पना नै बिन गंगा क लागत भूमि हमर पूर्ण बिहिर !! गुटखा माने मावा -- गली गली आ गाँव गाँवमे एहन देखेलक झटका , मतवाला भऽ किनऽ लागल रंग बिरंगक गुटखा ! रंग बिरंगक पन्नीमे जहरीला अछि पान मसल्ला केंसरक प्रयोगशाला बनि गेल एही कऽ सेवन करऽवला भेल लाचार युवा पीढ़ी, मुँह क केंसर केलक अट्टहास दांतों सबहक भेल कबाड़ा, सेहत केलक सत्यानास तबाह, यमराज, कफन -दफन, काल पसंदी एकर नाम जाहिमे जतेक बेसी जहर , सभसँ कम ओकर दाम हँसि कऽकहल गुटका सभसँ , हम छी कतेक सर्वव्यापी सुन रे मुर्खबा खा वला, हम छी यमराजक कार्बन कापी कहत जवाहर सुन भाइ स्वादु धूम मचा -रंग जमा , चलिते -फिरते कऽअर्थी उठा! अक्लक आन्हर खाइ वला , जहर किनि कऽखाइए जेकरा पास अक्ल अछि , जहरो सँ माल कमाइए एखुनका मास्टरक व्यथा सोचलहुँ अध्यपक बनि कऽ हमहू ड़ेंगाएब दिन राति...! मुदा मोनक भरम छल ई जखने स्कूल पहुचलौं देख विद्यार्थी हँसऽ लागल पुछलक कोन गृह सँ एलौं! एगो विद्यार्थी ठाढ़ भऽकऽ सुनबऽ लागल खिस्सा ........! अहाँसँ पहिने जे मास्टर छल हुनकर की भेल दशा !! एगो विद्यार्थीक गलती पर देलखिन डंडा मारि ..... तेहन उछन्नर देलियनि हुनका भगलथि मानि कऽ हारि! अहाँ जनि एहन गलती करब नै करब एहन शैतानी नै तँ दइये दिनमे सभ मिल कऽ याद परा देब नानी ...! कल जोरि कहिलिऐ, बौआ नै अहाँक कोनो दोख ई परिवर्तन पहिने लवितहुँ तँ हमहूँ रहितौं निधोख .....! हमहूँ रहितौं निधोक लितौं डंडा चारि बीत.....! तोड़ितहूँ दुनु टांग मॉसटरबा क फेर जिनगी मंगबितहूँ भीख...!! गीत-१ सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा ) एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......!२ कुचरैत छल कौवा आइ -बड जोर सँ..................(अंतरा ) एता जे कियो ई आस छल भोर सं......! २ देखते मुखड़ा .... हो देखते मुखरा अंहक मोन बेभोर भऽ गेलै ....! २ एला पाहून हमर सौंसे....................... अंगना दुआरि नीप, रखलहुँ सकाले तरुवा - तरकारी अछि सभटा तरैले ! २ कने दही ला ...हे हे ... कने दही ला किए अनघोल भऽ गेलै ......!२ ...एला पाहून हमर ......... कनिया - पुत्रा सभ हुल्की मारैए टाटक दोग दऽ कऽ चुटकी मारैए ! २ किए जाईते ..... हो किए जाईते हमर मोन केँ चितचोर लऽ गेलै एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ...... सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा ) एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......! एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ......! ३ गीत-२ किए जिनगीक आशा अहाँ सँ केलहुं / ........................(मुखरा) अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ// किए जिनगीक................................// मोनक बाते मोने रहि गेल , ..............................(अंतरा ) उपजल जे ललसा कोना मरि गेल // कंठ अधीर भऽ सुखाएल जाइए, अपन अधरक जाम सँ वंचित केलहुँ / किए जिनगीक...............................// जनलहुँ ने दोख जे हमरा सँ भेल , प्रेमकेँ जं दोख बुझी हमरा सँ भेल // प्रेमक परिभाषा बुझलिऐ ने कहियो ~ धनक बेगरता अहाँ प्रेममे सिखलहुँ / किए जिनगीक ..................................// बैसिते फुलवारीमे याद पड़ि गेल टिशक दू संझा सँ आँखि भरि गेल // प्राणक बिना कोनो जिनगी भेलैए ~ अहाँ देहकेँ बिसरि हमर प्राण लऽ गेलहुँ / किए जिनगीक ..................................// अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ // किए जिनगीक ..................................//// गीत-३ केलहुं कतबो जतन तैयो धेलक नै दम , कनियो निर्लज्जा के नै एलई शर्म —-, !! आब त अपनों मोन घिच - पिच करैया .. सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया …………….!! कैहता किछ कियो लैगता बड आइन ओकरा घर फेर हम पिबतौं नै पैन आब त गढ़ियो स आत्मा जुराईया सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया……………..!! नै जानी दुनिया नै जानी संसार हमरा त धेलक जे अलगे बोखार बुझी जहरों के अमृत पिबैया सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया……………..!! बुझितुं जे छीन लेत कियो चोरी मे धरित्हूँ जियरा बंद क तिजोरी मे जेना हाथो -पैर आब नै सुझैया सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया……………..!! पकरै छि मोन के जुन्ना लगाम स ससरैया तैयो जे जियरा दालान स देखि आत्मा हमर खहरैया सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया …………….!! केलहुं कतबो जतन तैयो धेलक नै दम , कनियो निर्लज्जा के नै एलई शर्म —-, !! आब त अपनों मोन घिच - पिच करैया .. सबटा प्रेमे के भाषा बुझाईया …………….!! ३ अनुकम्पा ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा ,त हमरो किछु देनाय सिख्बाके !! अपन हित त पशुओ जिबैया,अनकर हित जिनाय सिख्बाके !! हवा ,प्रकाश, धरती, दैया,भैर दैया मेघ समूचा खेत मे पानी ! जदी बदला मे हम किछु नै देलिए ,त ई भेल बरका बैमानी ! एही स जे हम दुःख भोगैछी , दुःख के दूर भगेनाय सिख्बाके ! ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा ,त हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! ! जरैत धरा पर चलैत पथिक के, गाछो दैया सब्दीन छाया ! अपन फल अपने नै खा क , सब जिव के जुरबैया काया ! प्रभु के पहिने भोग अर्पण क, पश्चात अपने भोजन करबाके ! ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा , त हमरो किछु देनाय सिख्बाके !! अनपढ़ के बिन दान पढाबू ,भूखल प्यासल के भोजन कराबू ! बुढ- पुरान, समाज के सेवा , मात,पिता, गुरु आज्ञा स्विकारू ! जे किछु भेटल अछि ईश्वर स , हमरा ओ बाँटनाय सिख्बाके ! ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा ,त हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! ! मानव तन अति दुर्लभ अछि भेटब ,एकरा मैल रहित बनाबू ! गमक पसारू फुल सन संउसे ,ज्वलित दीप स अन्हार मेटाबू ! धन्य भाग एही मानव तन के ,आब नै मौका फेर चुकबाके ! ईश्वर दैया सब्कुछी हमरा ,त हाम्रो किछु देनाय सिख्बाके ! ! अपन हित त पशुओ जिबैया,अनकर हित जिनाय सिख्बाके ! ! अस्तित्व हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल ! जे कुछी अपना संग अछि सबटा अछि अनकर देल देब बला देलक ओहो, देलक अपना शान स हमर अछि ई लेब बला कही उठल अभिमान स मोनक बात सुन वला मोन ककरो अनकर देल हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल ! जे संग अछि एखन तक ,ओ सैदख्न रैह सकैया नै कखन बिछुइर जायत लग स ई कियो जनैया नै जिनगी के उपजल मधुबन अछि ककरो अनकर देल हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल ! जग के सेवा खोज अपन प्रीत ओकरे स करू जिनगी के गूढ़ अछि, बिन बुझने कस्ट नै करू साधना के राह मे साधन अछि अनकर देल हम नै हमर नै इ तन अछि ककरो अनकर देल ! वियोग केलहुं कतेको प्रयत्न,किया सुनैया नै राइत बीतल मुदा निन किया अबैया नै कनैया रैत – रैत भैर मोन हमर धैर आइंख स नोर बहैया नै ! सोचै छि सब्दीन आई सुतब चैन स ओईढ चदैर आई एरी तक तैंन क पैर पसारे छि जखने पूरा फाटल चदैर पैर तक पुरैया नै ! देख अचंभित छि हम अपने आप के दोख अनकर कहू की अपन कपार के टूटल भरोसा जे छल आन पर आब त अपनों पर भरोसा होइया नै ! मन्ल्हूँ छल हमरो ख़ुशी ओकरे ख़ुशी मे मुदा हमरो त हंसी छल ओकरे हंसी मे प्रेम केलहुं दिल के मज़बूरी पर मुदा प्रेम कहियो मजबूर भेलैया नै ! जाढ़ (एगो अनुभूति) आयल सिहरैत सिस्कैत सुग्बुगैत कुन कोण स ! नै जानी आयल कहिया अन्हरिया आ इजोर स ! केलक गुदगुदी एना याद परल पिछला शाल ! कोण भोज खेने रही याह ठंडी मे ओढ़ने दुशाल ! पितमर काका के भोज पोरका भेल रहा अनमोल ! उझैल देलकैन पैन कियो पोनतर मैचगेल अनघोल ! ठिठुरैत छल पैर हाथ , मिल करैत छल सब घुर ! घुर तर बैस क , सब गनैत छल गामक बुढ कतेक छोऊ बुढ गाममे जग्तोऊ कतेक भोज ! फलना के बरखी के आब गणले छऊ दिन सोझ ! भोरका पहर मे कहियो ओछेन नै छोरल जाएत छल ! मारने रहित्हूँ गबदी चाहे कतबो बाबु डिरियात छल ! स्कुल जेबाक लेल सब्दीन मैरतहूँ बहाना ! बाबु के डरे माँ लग पसारैत छलहूँ घाना ! जाढ़क महिना मे भरल सबहक घर बखारी ! भोरे क खाऊ सब्दीन भात-अलुकोबी तरकारी ! ओना त सब दिन हमरा जार बढ होयत छल ! मुदा तिला –सकरैत दिन चुरलाई पर भर छल ! ससरैत-भोरहरबा मे मुस्की मारैत निकेल गेल ! फगुवा के अबिते ने जानी कत फेर ससैर गेल ! जाहिठाम स आयल, ओहिठाम फेर चैल गेल ! अबैतछि अगला साल कैह याद अपन छोइर गेल ! मिथिला दर्पण १ चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखू क्लेश ! ! ने बिसरू संस्कृति ने बदलू व्यवहार मैथिल के देखिते नै बनू अनचिन्हार संगठन बिन एकताक ने पूर्ण हएत उद्देश्य ! चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश, मिथिलाक संतति छी जुनि राखू क्लेश !! अपना धरोहरकेँ कए बुझैत छी बेकार दोसराक उत्सवमे जा पुरैत छी हकार धियो - पुता केँ उनटा - सीधा दैत छी उपदेश चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! ! धर्म केर ई भूमि अछि मिथिला महान हमर बुद्ध, जानकी, महावीर क धाम छी गाम हमर सहेजू पुलकित भऽ एहन दुर्लभ सन्देश चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! ! ने छी कम किनको सँ, छी ने किछुमे पाछू भ्रान्ति जे मोनक अछि तकरा मेटाबू अपने दहीकेँ खट्टा कहि, करैत छी खुदसँ द्वेश चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! ! छी नै अनभिज्ञ अहाँ मिथिलाक इतिहास सँ बुझितो जे मुहं फेरै छी अपना विकाश सँ मिथिलाक उत्थान हेतु बन परत मिथिलेश चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश , मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! ! मिथिला दर्पण २ परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! पटुवा ,बथुवा और खेसारी साग बड छल अनमोल बारीक़ कोबी आर कदीमा छोटका बरका ओल ! मति मारलक जे हमरा लागल बारीक़ पटुवा तीत परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! ! भोजक दिनमे भोरे सँ भरि दिन मचबैत छलहुँ हल्ला कियो कहैत सकरौरी छै कियो कहैत छल रसगुल्ला देखिते चुरा - दही पात पर , मुहं सँ छुबैत छल नीर परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! ! आमक महिना गाछी बिरछी बाध-बोन बौएतौं कृष्णभोग , बम्बैया ,मालदह चोभा मारि कऽ खैतों किछुओ जे छुबतौं हमर आमकेँ होइतौं हम अधीर परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! ! छैठ, दिवाली , दुर्गा पूजा , भरदुतिया सन नै पाबैन जे कियो नै बुझला मिथिला दर्पण हुनका के बुझाबैन आस्था मिथिलाक प्रेममे बंधने अछि हमरा जंजीर परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर ! भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! ! अमित मिश्र १५ अगस्तपर एकटा गजल गजल तीन रंगक सजल फहरेबै आइ हम गीत झंडा के लिखल गेबै आइ हम गाम मे घुमबै कहै छथि मास्टर हमर अमर नारा सबसँ लगबेबै आइ हम हाथ मे झंडा परेडक चल संग मे मंचपर भाषण अपन देबै आइ हम भगत गाँधी कहब गाथा आजाद के तीन रंगक भेद समझेबै आइ हम तानि छातीके सलामी हम देब रौ भेटतै टाँफी "अमित" खेबै आइ हम फाइलातुन-फाइलातुन-मुस्तफइलुन 2122-2122-2212 बहरे-जदीद १५ अगस्तपर एकटा गजल आ एकटा कविता तीन रंगक पताका तीन रंगक पताका फहरेबै आकाशमे ता धरि लड़ब जा धरि ताकत अछि साँसमे नुका गेला माँ-बाबु एकने बदलि लहाशमे जानपर खेल रोक लगेलौँ दुश्मनक विकाशमे कतेक नव कनियाँ भेली विधवा मुदा खुश छथि उज्जर लिवाशमे आइ 1947 अगस्त पनरह आजादी भेँटि गेलै धरती सजल जेना मधुमासमे आइ 2012 मे फेरसँ गुलाम छी भ्रष्टाचार घुसखोरी , दहेजक आशमे चोरी अपहरण ,बम धमाका फँसल छै सब लचारीके फाँसमे कहिया भेटत आजादी के सब लड़त सेँध लागल "अमित" हम्मर विश्वासमे मखानक पात जहिना मखानक पात नया मे काँट सँ भरल होइ छै , आ पुरान भेला पर कोमल भ' जाइ छै , एकटा छोट बच्चा एक्के हाथे मसैल सकै छै . ओहिना मनुष्यक जीवन होइ छै , जखन धरि जुआनी तखन धरि बड़ बलगर , जखने देह खसल आँखि धसल दाँत बाहर , बस लाति-मुक्का सँ स्वागत शुरू भ' जाइ छै , जुआनी मे जे पाँच-पाँच सेर दुध पिबै छल , आब आधा कप चाह गारिक बिस्कुट संग भेटै छै , जीवन भरि जे अपन कपड़ा नै खिचलक , पुतहु कए साड़ी चुप-चाप खिच' लागै छै , जकर चरणक धुल इलाका कए लोग माथ लगबै छल , अपन बेटा कए चरण पकड़ै लए विवश भ' जाइ छै , ताहि पर जै कोनो बिमारी भ' जाइ , सोचू जौँ लकवा मारि जाइ , त' केहन हाल हेतै , सच मे मनुष्यक जीवन मखानक पात छै , कविता -हरियर गाछ बाबा हरियर गाछ होइ छै , हुनक बेटा डाढ़ि-पात होइ छै , सुरूजक रौद सब पर पड़ै छै , फल-फुल पोता-पोती होइ छै , तैयो हरियर गाछ काटै छी , अपने हाथे बाबा कए मारै छी , गाछ काटि प्राणवायु कम करै छी , मौसम कए मारि अपने सहै छी , बेटा-पोता लए मौत लिखै छी , समाजक नाश अपने करै छी , " अमित " किय हरियर गाछ काटै छी . . . । । बाल गजल १ कुकुर उनटल पड़ल लार पर बंदरो बैसलै चार पर मूस दौगै गहुँम भरल घर कोइली तन दै तार पर नादि पर गाय दै दूध छै नजर देने श्रवन ढार पर स्वागत लेल बौआ कए फूल मुस्कै गुथल हार पर भोर भेलै उठल राजा यौ अमित बौआ चढ़ल कार पर दीर्घ- हर्स्व -दीर्घ 3 बेर बहरे -मुतदारिक २ आइ तारा केर नगरीसँ एथिन माँ अपन कोरा झट द' हमरा उठेथिन माँ खेलबै माँ संग आ रूसबै हँसबै पकड़ि आँङुर गाम-घर मे बुलेथिन माँ थाकि जेबै जखन भोजन करा हमरा गाबि लोड़ी आँचरक त'र सुतेथिन माँ राम कक्का के परू छैक मरखहिया सुरज के बकरी सँ हमरा बचेथिन माँ हमर संगी संग माँ के घुमै सर्कस आबि घर हमरो सिनेमा ल' जेथिन माँ कत' सँ एलै मेघ कारी इ अंबर मे अमित मन डेराइ यै कखन एथिन माँ फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन बहरे-कलीब ३ कोइली कहलकै सूगासँ हम बड पैघ छी तोरासँ सूगा कहलकै जुनि बाज तोड़िये देबौ लोल रोड़ासँ गाछी-बिरछी तूँ घुमै छहीँ कारी रूप देख ले ऐनासँ कोइली तुनकि क' बाजल मीठ बाजै छी हम तोरासँ हम घुमै छी अप्पन मोनेँ बान्हल रहेँ तूँ पिँजरासँ उठम-बजड़ा , धक्का -मुक्की खूने-खूनाम भेल पैनासँ मोर जी तखन कहलनि नै ल'ड़ तूँ अपने भैयासँ सूगा अमित राम गाबै छेँ सीख ले कोइली गबैयासँ वर्ण- 10 ४ माँटिक चाउर पानिक दूध पातक थारी बनेबै माँटिक चुल्हि पर खीर राइन्ह तरकारी बनेबै बालुक चिन्नी कादो के दही गेना फूलक चूरा हेते घैलक चकुला सनठी के बेलना सँ पूरी बनेबै मैया के फोटो आनि झूठ-मूठ के पूजा-पाठ करब बाबी सँ एकरंगा माँगि कुमारि लेल साड़ी बनेबै फेर करब गुड्डा के वियाह गुड़िया खूब सजेबै साजि एतै बरियाती बाबा के लाठी के गाड़ी बनेबै नै डर मास्टर के आइ छुट्टी छै चल मीता खेलब आइ अमित नाचबै-गेबै बड़का खेलाड़ी बनेबै वर्ण -१९ ५ संग चल ने मिल क' सब खेल खेलेबै एक दोसर के पकड़ि रेल देड़ेबै कोइली के गीत बंदर नचेबै हम चान तारा धरि पहुँचि आइ देखेबै कागजक नैया बना फूल कमलक चल चल बड़ी पोखरि भसा नाव नेहेबै दीप माटिक गढ़ि क' सब देबता पूजब रोपि अरहुल खेत मे चल पटा एबै माँटि लोटाएब आ साँझ धरि खेलब अमित पढ़बै मन सँ बड़का त' बनि जेबै फाइलातुन-फाइलातुन-मफाईलुन बहरे-कलीब ६ बौआ एहिठाम कानै छै माँ जलखइ बनबै छै बाबा आनलनि टिकुला बाबी चटनी बनबै छै कक्का लगाबै छथि सानी काकीयो अंगना नीपै छै बलहा बाली पानि भरै जुगेसरो चेरा फारै छै पापा छथि परदेश मे ट्रिन-ट्रिन फोन बाजै छै दीदी पढ़' गेल इस्कुल सोनू भैया खेत जोतै छै सब लागल छै काज मे तेँ अमित बौआ कानै छै वर्ण-9 ७ भोरे-भोरे मुर्गा बाजै छै सोना बौआ के उठाबै छै नबकी बाछी दूध देतै तीरो कक्का दूध दूहै छै माँ देलनि चुसनि भरि गुटुर-गुटुर पिबै छै दूये दाँत के हँसै बौआ आ हपकुनियाँ काटै छै भरल कठौत पानि मे बौआ नहाइ छै कूदै छै पाउडर काजर ठोप्पा नव कपड़ा चमकै छै हाथी घोड़ा आ झुनझुना अमित बौआ बजबै छै वर्ण-9 ८ डरकडोरि मे झुनझुना बड मीठ बाजै छै जुता मे लागल पिपहू पीँ पीँ राग सुनाबै छै तीन टंगा गुरकुन्ना धेधै बौआ घूमै अंगना बकरी के बच्चा देखिते कूदि कूदि क' नाचै छै भालू वला नाच देखाबै बौआ के दलान पर दू टाँग पर नाचल भालू बौओ नाचि हँसै छै भरि कटोरी दूध पिबै लेए ढंग ध' कानै छै जखन पूछौँ नाम त' माएक नाम बताबै छै नाचैत रहैए सब ललना एहि संसार मे बोआ के हँसी देख अमित कलम चलाबै छै वर्ण-17 ९ आइ नौला* मे माछ चल मारब कने जाल मच्छरदानी वला फेकब कने बहुत टिकुला छै खसल गाछी भरल छै ओकरो झोरी भरि क' चल आनब कने माछ चटनी खाएब रोटी भात रौ डोलपाती चल संग मे खेलब कने छोट बौआ छी पैघ सन छै सोच रौ आब कखनो संसार नै बाँटब कने एक छी हम सब एक थारी मे रहब अमित नवका मिथिला अपन माँगब कने फाइलातुन-मुस्तफइलुन-मुस्तफइलुन बहरे-हमीम *नौला{पोखरि के नाम} १० सूगाके आइ वियाह हेतै मैना रानी कनियाँ बनलै पेड़ा वर्फी और रसगुल्ला पूरी सब्जी पलाऊ बनतै कोइली बहिन गीत गेतै जुगनू संगी बाँल्ब जरेतै बंदर मामा ढोल बजेतै मोर चाची झूमि क' नाचतै हाथी दादा लड़का ल' जेतै खरहा खूब बम फोड़तै जंगल के सब बरियाती भालू भैया सब के बैसेतै शेर देतै आशीष अमित गीदर सब मंत्र पढ़ेतै सरल वार्णिक बहर वर्ण-10 ११ सखी सब चल तोड़ब आमके गै सफेदा गाछपर फेकब झामके गै बहै छै पवन केहन मीठगर छै मन भयानक रौद जड़बै छै चामके गै कने ले बरफ बोतल मे पानि भरि ले करब वनभोज छै बड़का जामके गै झहड़तै मारतै चोभा जखन कौआ ठकै छै फेँकि ढेपा नव नामके गै अपन झोरी भरल हेतै साँझमे गै अमित कतरा कते हेतै दामके गै मफाईलुन-मफाईलुन-फाइलातुन वहरे-करीब १२ पीठ पर छै बैग बौआ चलल इस्कुल लाल पियर ड्रेस चमकै भरल इस्कुल मांथ टोपी घेँट मे छै लंच लटकल दाइ संगे चलल मोने रमल इस्कुल खेल सेहो नीक खेलै छोट बौआ वर्ग छै मैदान खेलक बनल इस्कुल चित्र पाड़ै मे लगै छै मोन ओकर मीठ झगड़ो पर त' खूबे हँसल इस्कुल नै पहाड़ा पढ़ब नै सीखब ककहरा आब छै कंपुटर सीखा रहल इस्कुल भेल छुट्टी संग हल्ला घर चलल ओ नाम जहिया अमित अपनो लिखल इस्कुल फाइलातुन I-U-I-I तीन बेर बहरे-रमल १३ माँ धरा मामा चान छै सूर्य दादा नै आन छै छै बिलाई मौसी चतुर लैत मूसा के जान छै कुकुर खेहारे चोर के उड़ल चोरक त' प्राण छै आम सब बनरा खेलकै डाढ़ि तोड़ै शैतान छै चलल हाथी जी ट्रेन चढ़ि सूढ़ बड़का टा कान छै बाघ छै हम सब छी तखन शेर जंगाल के शान छै फाइलातुन-मुस्तफाइलुन १४ दौरू कक्का दौरू काकी देखू बौआ छीनै बाटी दाँतो काटै केशो घीचै मारै छै लेने ओ लाठी चिन्नी लेतै चूरा लेतै छाली लेए माँगै चाभी दीदी छी तोरे रौ बौआ तोरे लेए कीनै राखी कोरा मे तूँ शोभै छेँ रौ मानेँ खेबै संगे रोटी आठ टा दीर्घ सब पाँति मे १५ बौआ पानि बरसै कखन फाटै जखन मेघक वसन नाचै मोर बजबै ढोल गाबै कोइली नव भजन हरियर गाछ फूलाएत देता रौद दिनकर जखन खरहा तखन जीतत दौड़ आलस छोड़ि काजे मगन छै एरोपलेनक आश पढ़ि लिख लिअ त' चानो अपन धरती के बसेलनि राम भोरे भोर करियौ नमन आँङुर पकड़ि बढ़बै डेग राखू "अमित" खुजले नयन मफऊलातु{2221} दू बेर सब पाँतिमे १६ फूलल कचौरी छै मीठगर छै खीर सुअदगर छै छोला छौँक मे छल जीर रूसल किए सोना आब खेबै संग जल्दी चलू खा जाएत कौआ खीर टाँछी ल' इस्कूलो चलब खेलब पढ़ब ओतौ अहाँ सन नेनाक लागल भीड़ छै लाल कक्काके लाल पाकल आम जामुन खसल कारी , भेल कारी चीर दिनकर अहाँ चन्ना राम आ लक्षमण जीतब अहाँ माँछक आँखि मारू तीर मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मफऊलातु 2212-2221-2221 बहरे-- सलीम १७ उड़ल सबटा चिड़ैयाँ गाछपर फुर्रसँ जँ बैसल चारपर चारो खसल चुर्रसँ हमर गाड़ी लतामक डाढ़ि आ सनठी चलै छै तेज अपने मुँह करै हुर्रसँ गिलासक दूध मिसियो नीक नै लागै भरल तौला दही आँङुर लगा सुर्रसँ अपन बाछी अपन गैया त ता थैया अपन झबरा करै अपनपर नै गुर्रसँ फटक्का फूटलै ब्राम ब्रम ब्रूमसँ जड़ै छै छूरछूरी छूर्र छू छुर्रसँ मफाईलुन 1222 तीन बेर बहरे हजज १८ कारी महिस के दूध उज्जर छै कते भरि मोन पारी पीबि दुब्बर छै कते रसगर जिलेबी गरम नरमे नरम छै लड्डू बनल बेसनक बज्जर छै कते छै पात हरियर फूल शोभित गाछ छै जामुन लिची आमक इ मज्जर छै कते दू एक दू आ चारि दूनी आठ छै अस्सी कते नै जानि सत्तर छै कते भालू बला देखाब' सबके नाँच हौ झट आगि छड़पै दौड़ चक्कर छै कते मुस्तफइलुन 2212 तीन बेर बहरे रजज १९ फाटले पहिरब भूखले हम रहब गै माइ गै हम इस्कूल जेबे करब गै महिस पोसब सब दिन चराएब साँझक' बैस ओकर पीठपर पोथी पढ़ब गै खेत जोतब कोरब पटाएब मोनसँ मस्त पानिक धारा जकाँ हम बहब गै चान के पूजै छै सगर लोक जग मे नाम चमकाबै लेल चन्ना बनब गै छीन ले खेलौना हमर ढोल डमरू आब हम काँपी कलम बिन नै रहब गै फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे-खफीफ २० रानी मेघ सगरो जल पटाएत ना बौआ हमर खेलत आ नहाएत ना चलतै ढेह पानिक बीच सड़कपर ना तै पर कागजक नैया बहाएत ना देहसँ घाम चूबै रौद छै काल ना हीटर आब तन के नै बनाएत ना रोपत धान बैसल खेत के आड़ि ना कादो करत पालो ह'र चलाएत ना हेलत साल भरि पोखरि भरल पानि ना बौआ "अमित" माँछक झोर खाएत ना मफऊलातु-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2221-2221-2212 बहरे--कबीर २१ पाकल पियर पियर केरा खाएत सब मीठ पेड़ा खाजा मिठाई जिलेबी बौआ भरल छै चगेँरा मुँह मोर राजाक सुन्नर चन्ना लजा गेल डेरा डाँरक त' घुँघरु छनकलै लेलक जखन घरक फेरा माएक ओ करत सेबा फाड़त "अमित" खूब चेरा मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2212-2122 बहरे मुजस्सम २२ चल रे बटोही निनियाँक नव गाम चल सुतल हमर बौआ चल परी धाम चल खिस्सा कहेँ गोनू झाक तू चान रे पवना सिहकि सूखाबैत तूँ घाम चल मिथिलाक पाहुन सीताक तू भाग क'ह टूटल घनुष कोनो ब'र बनल राम चल माटिक त' छै एते मोल एलनि शिवम ई जनम के चूकाबैत तू दाम चल लोड़ी जपै छी निनियाँक बजबैत छी श्वप्न परी बनि बैसल "अमित" बाम चल मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2212-2221-2212 २३ हमर कटहर खाइ लेए देब तोरा अपन टाका छै लतामक पात जोड़ा दौड़ कखनो सड़कपर तूँ नै लगा रौ आगि छूबेँ हाथ मे जेतौ भ' फोड़ा खेल खेलाएब तीती आ कबड्डी चोर पुलिसक खेल मे के बनत चोरा सुरज दादा भोर मे सबके जगाबै सीतबै छै सगर रातिक' माँ ल' कोरा फिलम बाबू संग देखब हँल जेबै "अमित" चलिहेँ करब बाबू के निहोरा फाइलातुन 2122 तीन बेर बहरे-रमल २४ देखियौ छै इ केहन अजनास बच्चा लोक के ओ बनेनै छै दास बच्चा छै बहसि गेल नेना सबहक दुलारसँ साग फेकै कहै कतरा घास बच्चा खेल मे मस्त सदिखन गर्दासँ पोतल पढ़त नै नै बनेतै इतिहास बच्चा ककर हिम्मत इ मेला ठेला घुमेतै जीद मे कानतै एकै भास बच्चा डांस मे गीत मे नंबर एक छै ओ "अमित" तेँ मानलौँ सब खटरास बच्चा फाइलातुन-मफाईलुन-फाइलातुन 2122-1222-2122 बहरे-- असम २५ पंखी लगा उड़ि जाएब आकाश मे बनि कोइली हम गाएब नव भास मे नै जो पढ़ाबै के लेल इस्कूल माँ तू जाइ छेँ बदलै घर त' वनवास मे बाबा अपन खैनी खाइ छथि क'ह किए की छै मजा जे बाबू रमल ताश मे हम बीच आँगन एगो बनेबै महल सोना बहुत उपजेबै अपन चास मे खरहा पकड़ि रोटी चाह देबै "अमित" एतै मजा बानर के सफल रास मे मुस्तफइलुन-मफऊलातु-मुस्तफइलुन 2212-2221-2212 २६ भेल मामा के शगुन हमरो करा दे सेँट काजर आ पाग पौडर लगा दे लूटबेँ लेमनचूष आ गीत गाबेँ सर्ट नवका दे जीँस नवके अना दे चल फिलम हमरो कैमरा मे बना दे आब बाबी काकी कने माँ चुमा दे बंद घर मे नाना कहू की करै छी कत'सँ एलौ नानी इ टाका बता दे हम त' बुझलौँ छै खेल कोनो इ नवका आब नै मानब "अमित" गाड़ी सजा दे फाइलातुन-मुस्तफइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे--खफीफ २७ पढ़तै लिखतै बौआ डाँक्टर बनतै गामे गामे सबहक सेबा करतै रोगसँ लड़तै रोगी हँसतै गेतै एकर नामसँ सबटा रोगो डरतै अपनो बोखारक चिन्ता नै करतै फर्जी डाँक्टर के चोरी नै चलतै नामी लोकक किछु कहलो नै करतै कमजोरो के ओ भैयारी बुझतै टाका के लोभी कहियो नै बनतै आशीर्वादे टा के इच्छा रहतै मिथिला माँ के मैथिल बेटा छी ने संकट हटतै दुश्मन संगे लड़तै दस टा दीर्घ सब पाँति मे २८ आइ मेला मे माँ झुनझुना किने दे चल सिया झा के मीठ पेड़ा किने दे कह कटै छै छागर किए खून पसरल लिखल छै जत' कटनाइ पतरा किने दे लाल पूक्का दे गै पियर फूल छापल लाल देबै मिरचाइ सूगा किने दे नाच नाचै नटुआ कते भीड़ लागल हमहुँ सीखब बजेनाइ बाजा किने दे दीप चल बारब हमहुँ मंदीर जगमग "अमित" करबै उपवास केरा किने दे फाइलातुन-मुस्तफाइलुन-फाइलातुन 2122-2212-2122 बहरे-खफीफ शिव कुमार यादव बाल गजल पूर्णिमा मेला ऐलए गे माँ मेला देखऽ हमहुँ जेबए गे माँ इस्कुल मे सेहो छुट्टी देलकए गे माँ दोस-मीत मेलाक ओरिओन कैलकए गे माँ बड़की दैया के संग लऽ लेबए गे माँ दाए-बाबा के सेहो कहि देबए गे माँ गामक कतेक लोक मेला चलतए गे माँ काका-काकी आ बौआ सेहो तैयार भेलए गे माँ मेला गाम सँ दुर लगए गे माँ पैरे-पैर नए, तोरा कोरा मे बैठबए गे माँ मेला मे बड़ भीड़ लगलए गे माँ आँगुर तोहर धरने रहबए गे माँ खुब जतन सँ मेला देखबए गे माँ "शिकुया" घिरनी-मिठाइ-झिल्ली कीनबए गे माँ विकास झा रंजन रुबाइ १ ईशा आ पैगम्बरक झगरा सुनलौं, अन्हरा जिहादक फतबा सुनलौं, सुनलौं निछा गेलइ लादेन परसू , आइ फेर केदन लादेन भेल ई की सुनलौं ! २ हुनक सोह टीसइए काँट बबूर जेना , आँखि भिजैए तारी खजूर जेना , हुनके रूपक चिप्पी लगेलौं करेजमे, ओ अघाइ छथि कछहरिक हजूर जेना ! ३ अहाँ रूपक भेरिया-धसान लागल अइ, छौड़ा संग बुढबोक आन जान लागल अइ आबो समेटू अपन भाभट दसगरदा आँगनमे घट्कक दलान लागल अइ ! ४ जिनगी अमोल तोहर कोंख भेटल माँ, तोरे आँचरमे हमरा भरोस भेटल माँ, सब आफद अनेरे उड़ल कपूर सन , तोहर ममता केँ जखने बसात भेटल माँ गजल हमर घरक भीत लाईग छोट सन बाट बाटक ध कगनी हुनक ताकि हम बाट चान सुरुज देखि देखि घोर भेल नैना जिनगीक चान आई उगती ई बाट हसोथब कोना हुनक रूपक इजोत के टहाटही अभरत आई इजोर ई बाट हमरे सन हुनको भेल हेतैन धकमकी देखि देखि इ सब मुसुकी देत ई बाट हुनके गछेर हम कह्बैन निजगुत जरे जरे काटब जिनगीक ई बाट गजल काल्हि आँखिक हम तरेगन छलौं, आइ तरेगन बना किए दूर केलौं ! सब आखर सिनेहक हम गुनैत छलौं आइ आखर किए आहाँ बिसरा गेलौं ! हम एसगर अहीं संग दोसर भेलौं आइ तेसर बना किए आन केलौं ! ठोर अहाँक ने कहियो हम चुम्मा केलौं आइ नोरक किए ठोर चुम्मा देलौं ! तीर तरकस जकाँ संग सदिखन छलौं, आइ तीरे लगा किए पीर देलौं !! झा हेमन्त बापी अभिलाषा सौसे घर चहैक रहल छै , सब के मूख पर नव उल्लास। मुदा ओ दुखनी बुढ़िया कोन मे, बैसल मूहँ लटकोने भेल उदास्। आय ओकर पोता के मुंडण, ओकरा केउ नै पुइछ रहल छै। घर के सब जन खा पी उठल, ओ अप्पन बेरक बाट जोहि रहल छै। देख कै गरम कचौड़ी तीमन, भ गेलै दुखनि के मोन अधीर। सोचलक डेग बढ़ा ल लै छी, अपने सॅ कनि पुरी खीर। जखने हाथ सॅ उठबै लागल, दू टा पुरी सेरायल। तखने चिकरैत पगहा वाली, दौड़ल आयल हनहनायल। देखियो सेखी चटोरी बुढ़िया के, कैनको लाज नै आबै छै। पाहुन सब लेल बनल पुड़ी सॅ, खाइ ले कोना चोराबै छै। कतए गेलौ यो देख रहल छी, अप्पन माय के करतुत। कनिञा के हाँ मे हाँ मिलेला, सोन सनक ओ पूत। गट्टा पकैर क पगहा वाली, दुखनि के खिचैत ल गेल। पछुऐत बनल कोठली मे ल जा, दुखनि के बन्द क देल। पछता क बुढ़िया काइन रहल ऐ, इ भूल किए कएलो। पहुन सब लेल बनल भोज मे, अप्पन हाथ लगएलो। पगहा वालि जे केलक , तेकर नै मोन मे अघात। सोईच नोर के धार बहैया , किया बौआ नै देलक साथ। बूढ़ छी, बुद्धी हरा गेल छल, तईयो एना नै कऽरैत्। सभक लॅग किया बेजती कएलक, असगरे मे बुझअबैत। किछे देर मे मोन ठंढेतै , आयत बजआबऽ हमरा। कहत चलै माँ मुंड़न देखऽ, नै जएबै आ करबै झगड़ा। मान मनौअल खुब्बे करत, तखने संगे जएबै। देखबै मुंडन गेबै गीत, आ मोन भैर आशिश देबै। सोइच , पुरनका कोना मे धरल , खोललक जा कऽ पेटी। बान्हल पोटली ओहि मे सॅ काढ़लक , खोललक ओकर गेंठी। बाजल देब अपन पोता के ,लऽ सोना के सिकरी हाथ । देख सब के सेहन्ता हेतै , बैसऽरतै पैछ्ला बात। सोचैत-सोचैत दिन बितल ,नै बौआ नै आयल समाद। कछ्मछ दुखनि करए लागल, सांझक दीया बाती बाद्। सोचलक काज के घर छै, परल नै होएतै मोन्। अपने ज आशिश दऽ आबै छी , चलल हाथ धऽ सोन। लटपटायत केहुना डेग बढ़ोलक , आङान दिस ओ जखने। पगहा वालि फेर नै मारै , सोइच घुरल ओ तखने। कनि काल तऽ कलमच बैसल , फेर लागल चहुँ दिस ताकऽ। कतौ केउ नै सुइझ परलै तऽ , पऽइर रहल केथरि पर जा कऽ। बाट जोहैत-जोहैत केहुना , आधा राइत त बितल। हारल थाकल नैन बन्द भेल ,जे रऽहे नोर सॅ तीतल। दु दिन के बद जखन सबके , कोनो चीजक दुर्गन्ध लागल्। पछुऐत दिस सॅ आइब रहल ऐ , ओम्हरे सब केओ भागल्। पहुँच जखन सब केओ खोललक, कोठली के केवाड़। परल चीर निन्द्रा मे दुखनि, देह लुधकल चुट्टी केर धार्। अखनो बाट ओ जोहि रहल ऐ, लऽ सोना सिकड़ी हाथ। केउ बुझलक केउ नै बुझलक बापी, दुखनि मोन के बात। सत्येन्द्र कुमार झा पाँच गोट लघु कविता 1 पािनक खर्च तँ छैहे लोककेँ बिनु पानि बहुतो काज नै छै संभव, मुदा तैयो किछु पानि राखि लिअ बचा कऽ अपनाकेँ बेपानि होएबासँ बचेबाक लेल। 2 अकासमे मेघ/ कारी-कारी मेघ झहरतै मोती सन बुन्न कखनो अवश्ये पृथ्वीक धधकैत करेज भऽ जेतै शीतल मुदा भूखल आगि कोना हेतै ठंढ़? सोचि रहल छै, रमुआ रिक्शाबला बरखामे कोना भेटतै सवारी। 3 एकटा स्थायी सरकारक कामना ओ भिखमंगा सेहो करै छै चुनावक दिन जेकरा जीबए पड़ै छै मात्र पानिक संग। 4 क सँ कबुतर देखने छिही? नै ख सँ खरगोश देखने छिही? नै प सँ पेस्तौल देखने छिही? हँ.... काल्हिये देखिऐ- गामक्काक उपर तानि देने छलै गामभैया पेस्तौल जमीनक कोनो टुकड़ीक लेल। सुतैत काल माए खिस्सा कहने छल जे ओइ पेस्तौलसँ मारि देने छलै गाम भैया सभटा खरगोश आ तहिये उड़ि गेल छलै गामसँ सभटा कबूतर। 5 अहाँ नै पढ़बै तैयो लिखले जेतै कविता अहाँ नै सुनबै तैयो पढ़ले जेतै कविता अहाँ नै रूकबै तैयो चलिते रहतै कविता एखन धरि अहींक लेल लिखल, पढ़ल आ चलल जा रहल अछि कविता भविष्यक कविता लेल जुनि बनाउ स्वयंकेँ अप्रासंगिक। विवेकानन्द झा हाइकू चित्रलिपि ई प्रकृतिकुमारिक मानू न मानू विद्यानन्द झा “विदू” शिक्षाक मौलिकता शिक्षाक साहचर्य सऽ सम्भव विकास हटए अन्हार अज्ञानक पसरए ज्ञान प्रकाश॥ मानवक मौलिकता शिक्षा सभ्य समाजक अछि पहचान हर समाज आओर हर मानवकेँ शिक्षामे अछि बसल प्राण॥ ज्ञान आओर विज्ञानक सीमा शिक्षा सऽ अछि बढ़ि रहल छूबि सकल छी चांद गगनकेँ अनेको खोज अछि चलि रहल॥ कृषि कार्यमे हरित क्रान्ति शिक्षाक परिणाम भेल वृक्षारोपणक की महत्व अछि शिक्षा सऽ ई ज्ञान भेल॥ जीवनकेँ साकार करू शिक्षाक प्रसार करू अनपढ़ बचए ने एको मानव सब मिलि ई प्रयास करू॥ राष्ट्र समाज आओर हर मानवक ई प्रथम कर्तव्य हो बच्चा-बच्चा हो सबल ई हमर संकल्प हो॥ विकासक परिभाषा शिक्षा उत्थानक आयाम बनत मूलभूत अति आवश्यक ई सम्मानक आधार बनत॥ सुख शान्तिक श्रोत ई शिक्षा हर समाजक मान बढ़त अध्ययन-अध्यापन सऽ बच्चा-बच्चा महान बनत॥ शिक्षा तऽ अछि असीमित सरोवर चाही जते से जल भरि ली बँटला सऽ विस्तारे होयत ई मनमे विश्वास करी॥ जन-जनक हितकारी शिक्षा आउ एकर प्रसार करी धन्य करी हम अपनहुँ जीवन अहूँ किछु प्रयास करी॥ बिनोद मिश्र, डॉ. बिनोद मिश्र सम्प्रति आइ. आइ. टी. रूड़की, उत्तराखंडमे अंग्रेजी पढ़बैत छथि आ हिनक रचना सभ अंग्रेजी आ हिंदीमे प्रकाशित भेल छन्हि। ऐ वर्ष हिनक कविता संग्रह Silent Steps and Other Poems प्रकाशित भेल छन्हि। एकर अतिरिक्त ई अंग्रेजीमे आलोचनाक क्षेत्रमे आठ टा पोथी संपादित केने छथि। हिनक पोथी Communication Skills for Engineers and Scientists बहुतो इंजीनियरिंग संस्थानमे पाठ्य पुस्तक केर रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। गामक सनेस ऐ बेर गाम सँ एलौं तँ बच्चा सभ नै पुछलक पापा, की अनलौं अछि सनेस ? बुझल छन्हि आब सभ भऽ गेल छथि भिन्न चूल्हा भऽ गेल छल तीन फाक कहलियैन खेत सब खासले छल नै भेलन्हि मंगनू केँ फेर होस कोसिक कहर सँ उबड़बाक हिम्मत आब कहाँ पुछैत छन्हि भौजी कोनो दिक्कत तँ नै अछि बाऊ ? कनिया ठीके देल्थिन्ह सद्बुद्धि ओहो पांच सेर कथी लेल करब नाश रहत तँ धिया पुता केँ होयत दू सन्झाक आश आब कोनो आओत मासे मासे ड्राफ्ट नै जानि ककर लागि गेल नजरि हमर धियो पुताक कपार अछि फुटले कतेक धुनब हम सभ कहने रही राखी लिअ हमर अशर्फी बन्हक आ फोली लिअ एक टा किराना हमहूँ कहुखन - कहुखन कऽ देब संग आब कतेक दिन हम रहब घोघक तर मे नुकायल ? बच्चा मात्र पुछलक की मुन्नू भेला पास हम कहलियन्हि आब छन्हि कोन आस हम रही उदास मोंनं परल छल; मुन्नूक लटकल मुँह आ मैझ्लीक घोघ तरक सिस्कब जहिना छल बेग सिरागू लग तहिना उठा लेने रही फेर कहैलियन्हि बौआ नै अनलौं किछु सनेश ककरो नै भेलन्हि विश्वास हम तँ छोड़िये देने रही आस भऽ गेल शुरू हमर बेग उकटबाक प्रयास कनिया कहलैन्ह ई कथिक छी पोटरी ? आ भरभरा गेल अदौरी, तिलौरी, मुरौरी, खुद्दिक, मरुआक चिक्कस आ अनन्तक डोर झरझरा लागल सम्हारल सनेस कखनहुँ माय केर मौलाय्ल मुँह कखनहुँ मंगनूक उतरल देह मैझ्लीक चुप्पी आ मुन्नु -चुन्नुक धधकैत भविष्य प्रकाश प्रेमी ,जनकपुर बौवा करबा की? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? नेता बनल बैमान बौवा करबा की ? जीत पठाओल बौवा जकरा संसदमे वाएह बनल गद्दार बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? नङ्गरी सुटका बैसल सभासद संसदमे बनि बडका बुधियार बौवा करबा की ? कएने छै अगोरिया एखनो पद्देके लेल बेच अपन ईमान बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? लेस रहल छै जाति धरम आ भाषा भेषक कोने कोन पसाही बौवा करबा की ? कना रहल छै जनता के हक्कन लगा द्वन्द अगराही बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? जरा रहल छै स्वार्थक खातिर टोल टोल आ गाम बौवा करबा की ? नै छै धधकैत देशक चिन्ता छै कुर्सी पर ध्यान बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? रक्तमय धर्तीक चितकार कोनाक सुुुुनत के मुनि बैसल सब कान बौवा करबा की ? सिंचल जकरा सोनित भैर भैर सएह बनल आइ आन बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? बन्दी बना अधिकार जे बैसल नेता शिर्ष महान बौवा करबा की ? खोलि कोना स्वतन्त्रता बांटत बटनाहर सैतान बौवा करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? कहि रहल छै बुत्ता छ त ला अधिकार शासन हमर पुस्तैनि तु करबा की ? मोछ पिजा उठोने मmण्डा जिद्दक लेल लरबा लेल ललकारै बौव करबा की ? लरबा लेल ललकारै बौव करबा की ? देशक हाल बेहाल छै बौवा करबा की ? विनीत उत्पल गजल अहाँ क आहटि लेल, ठाढ़ अछि जिनगी निनाएल आँखि भेल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँले तड़पि रहल छल रोम रोम सिहकाबैत आएल, ठाढ़ अछि जिनगी अहाँ क हम सदिखन बाट जोहैत छी बाइ मे बनलौं रेल, ठाढ़ अछि जिनगी चांद सन ई चेहरा, हिरणी सन चालि नाटकक ई छै खेल, ठाढ़ अछि जिनगी सोचने रही अहाँ ताकब ऐ उत्पलकेँ मिथिला भेलि कुभेल, ठाढ़ अछि जिनगी (१५ वर्ण) गजल बाट जोगैत तँ आँखि पथराएल नै कहियो प्रेम बिना जे जिनगी सरियाएल नै कहियो अहाँक सुनि कऽ नाम किछु फुरैत नै हमरा लिखै-पढ़ौक लेल किछु फुराएल नै कहियो अहाँक आवाज सुनि थरथराबैत छी हम एहन मीठ बोल कियो सुनाएल नै कहियो देखि कऽ अहाँक ओ मुखड़ा आ ओ सुनर नूर चोन्हराबैत छै आँखि बिसुराएल नै कहियो कहैत अछि उत्पल भाव लऽ कऽ ओ प्रेम संग प्रेम करू वा नै करू, ई नुकाएल नै कहियो सरल वार्णिक बहर वर्ण -१७ गुटू रानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी पी लिअ नारियल पानी आबैत होयत अहांक नानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी चाकलेट खायब, खायब नेमनचूस मामा अछि अहां कऽ कंजूस गुटिया पियत खाली जूस गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी पढए लिखय मे मन न लागए खेलय-धूपय मे सभसँ आगए दादा-दादी के आंखिक तारा गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी कियो बजै तँ कसि कऽ कानी मम्मी, मम्मी, गरजे मम्मी कियो नै सुनए ओकर बानी गुटू रानी, गुटू रानी, गुटू रानी नै कानी, नै कानी, नै कानी रामकृष्ण मण्डल ‘छोटू’ कविता- माइ यै माइ अहाँ कतए गेलिऐ अहाँकेँ देखैले हम्मर, आँखि बरसि रहल ये अहाँसँ बात करैले, हम्मर दिल तरसि रहल ये अहाँ तँ पूर्णिमाक चान छी मनमे बसल, एकटा भगवान छी। यै माइ......। बचपनक ओ दिन गोदमे खेलल ओ दिन लोरी सुनैत ओ दिन साँच कहुँ मन नै लगैए आब अहाँ बिनु यादि अबै छी जखैन अहाँ आँखिसँ मोती गिरैए प्यार-ममता भरल ओ दिन यादि आबैए यै माइ अहाँ बिनु..... अहाँ बिनु ई जिनगी अधूरा अछि सभकुछ रहैत हमर घर सूना अछि अहाँ ममताक ओ मूरत छी देवतोकेँ अहाँ जरूरत छी यै माइ......। मनमे बसल ओ, तस्वीर छी अहाँ प्यारक ओ जंजीर छी अहाँ दुनियाँसँ ठोकर लालग भरि दुनियाँ कहलक पागल माइ, हम पागल छी ओ बताह अहाँ, हमरा ओतने प्यार देलिऐ यै माइ.....। कविता- रेल सकरीसँ चलल, िनर्मलीक रेल झंझारपुरमे, लेलक मेल सुनबै छी, आइ ट्रेनक खेल बीमे भाइकम, बोगीमे चोरी भेल मंगलाक कपड़ा, आ पैइसो गेल किनका कहब निक आ चारे बोगीमे मचल अछि शोर चाेर-चारे-चाेर पकड़ चाेर, पकड़ चोर मुदा कत्त गेल चाेर इंजनपर बैसल, तरकारीवाली फटल य जिनकर साड़ी बौगलीमे पैसा, मुँहमे पान चलबैए तेज जुबान कि कहब, हिनकर कहानी अपनाकेँ बुझैए राजधानी जी.आर.पी आकि सी.आर.पी सभ छथि एकरा आगू फेल ई य सकरीसँ िनर्मलीक रेल। आह! चोर आइ पकड़ा गेल जेल उ भेजल गेल खतम भऽ गेल, चोरीक खेल मुदा, बेलहीमे फेर भाइकम भेल रेल-रेल-रेल, ई कि? बोगीमे य ठेलम-ठेल बुदरूक, बच्चा, बुढ़बो गेल ई य सकरीसँ िनर्मलीक रेल। रूसनी गै रूसनी, एना नै कर लोक मारैए ताना गै बाहर घूमनाइ मोसकिल भेल बदलि गेल जमाना गै डाॅर हिला कऽ चलै छेँ गाबैत नवका गाना गै कपड़ा केर थाह नै आधा देह उघारे गै गै रूसनी एना नै कर बदलि गेल जमाना गै ठोरक लिपिस्टिक, केशमे गजरा मुँहपर पाउडर आँखिक कजरा नै छै एकर कोना मोल तोरा देख कऽ ठहाका मारैत चूटकी लइए पूरा टोल। छोड़ि दही ई झेल-झमेला पढ़बीही तँ पढ़ैबो करबौ काओलेजमे नाओं लिखेबौ गै सरकारसँ दिएबौ टाका पैसा साथे साइकिल दिएबौ गै तइसँ बेसी और चाहमे स्कूल ड्रेस सेहो दिएबौ गै माइ-बापक इज्जत बढ़तौ जीवन तोहर सुधरतौ गै गै रूसनी एना नै कर लोक मारैए ताना गै बाहर घूमनाइ मोसकिल भेल बदलि गेल जमाना गै। मुन्नाजी हाइकू १ पजेबा काँच ठीकाक मकान भसैक गेल २ पीड़ित नारी प्रमोशन रुकै नै तेँ मुँह बन्न ३ नोकरी नीक भीतरमे गञ्जन एयर होस्ट ४ हाक सूनल मारि खेबाक डरे नै बचौलक ५ भोगने बिना जीवनक दर्शन सत्यसँ दूर ६ अग्नि पीढ़ीमे होहल्ला भेल बेसी काजमे शून्य ७ मैथिली मध्य ओलि वसूलीकेँ समीक्षा बुझू ८ जाति पातिक भेदभाव घटल समरसता ९ इलाज भेल हास परिहाससँ एक माध्यम १० आब अछि नै जीवनक विक्षोभ कमौआ लेल अन्जनी कुमार वर्मा बहैत बसात प्रासाद बनि जाएत अछि निर्दोष पीड़ितक नोर सं गजराज मरी जाएत अछि नन्हकी चुट्टीक क्रोध सं शीर्ष पद पर बैस करैछ रावण सन हुंकार मुदा एकटा बानर जारि देने छल लंका.. बजा देने छल डंका... अरब लोकक भावना नहि बुझब त चल जायत सुख,सुविधा आ शांति...... परिभाषा आवेदन,अंतर्विक्षा आ अपव्यय सं थाकि गेल अछि मन बेकार बुढायत अछि उच्च शिक्षाक प्रमाणपत्र, आब सबके समेटि बंद क देलियेक अछि पेटी म पैसा,प्रतिष्ठा आ पैरवीक लेल शुरू क देलों अछि स्वरोजगार कुरता पैजामा आ बंडी पहिरी बन गेलोंहअछि..नेता..... रवि मिश्रा ’भारद्वाज’, ग्राम : ननौर, जिला : मधुबनी आजाद गजल जिनगी की कहु एहेन अंजान बाट मे चलल जा रहल अछि भोर ठीक सों भेल नहि मुदा सांझ ढलल जा रहल अछि मोजर त खूब लागल छल गाछ मे टुकला ठीक सों भेल नही मुदा मोजर झरल जा रहल अछि कियो अन्न बिन तरपै अछि त कियो पानी बिन ककरो पानी भेटल नई मुदा ककरो गिलास मे मदिरा भरल जा रहल अछि ककरो चूल्हा अन्न बिन बुझायल अछि महगा बेचे के चक्कर मे ककरो कोठी मे अन्न सरल जा रहल अछि बाहारक लगाल आगी देखी सब कियो बुझायात के बुझायेत मोनक आगी जे बिन धधरे जरल जा रहल अछि कियो मरि के जिब रहल अछि कियो जी के जेना मरल जा रहल अछि अमित मोहन झा, ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत। काश काश विश्व मे पुनः चिरशांति स्थापित कय पबितौं हम। काश बितैत समय केँ रोकि पबितौं हम, मित्रक संग बितायल समय पुनः आनि पबितौं हम, नहि कहि कतेको काज देलथि मित्र सब हमर, हुनका लेल ई जीवन केँ पाछु मोड़ि पबितौं हम। काश आकाश मे स्वछंद उड़ान भरि पबितौं हम, पंख पसारि हिमालय केँ लांघि पबितौं हम, अगाध सागर केँ पार कऽ पबितौं हम, काश अपन जीवन निर्भीक जी पबितौं हम। काश डोरी संग अपनहि पतंगो बनितौं हम, अपन डोर अपनहि संग राखि पबितौं हम, मेघक संग अनवरत विचरि सकितौं हम, काश रश्मि-सूर्य क स्पर्श कय पबितौं हम। काश मानसरोवरक हंस बनि पबितौं हम, समुद्री सीपक ओ अनमोल मोती बनि पबितौं हम, एरावतक गजमुक्ता बनि पबितौं हम, शेषनागक मस्तक-मणि बनि सजि सकितौं हम। काश दीनजनक आंखिक आशा बनि पबितौं हम, हुनक दुर्भाग्य, अपन सौभाग्य सँ बदलि पबितौं हम, असंख्य अबोधक चिर-बोध बनि पबितौं हम, प्राणी मात्र क जीवन मे शीतल छांह आनि पबितौं हम। काश अहांक कपोल कल्पना बनि पबितौं हम, अहांक मधुर स्वप्न मे आबि पबितौं हम, अहांक कान मे मधुर प्रेमगीत गुनगुना पबितौं हम, अहांक हृदय मे चिर रिक्त स्थान छोड़ि पबितौं हम। काश समग्र नारी जाति केँ माँ क स्थान दिया पबितौं हम, भाइ बहिनक ओ अमर प्रेम जगा पबितौं हम, पतिव्रता महिला सन, पुरूषो केँ एक पत्नीव्रती बना पबितौं हम, प्रेमक एक नव आयामक निर्माण कय पबितौं हम। काश मिथिलाकेँ शीर्ष पर पहुँचा सकितौं हम, मैथिली(मधुर भाषा)केँ जन जन आवाज बना पबितौं हम, अरिपनकेँ पुनः सजा सकितौं हम, बाबा अयाची मिश्रकेँ फेर सँ बजा सकितौं हम। काश मंडन मिश्रकेँ फेर सँ जगा सकितौं हम, सुगासँ वेद पाठ करबा सकितौं हम, बनि विदुषी भारती पुनः जगतगुरुकेँ हरा पबितौं हम, मिथिलाकेँ भारतक सिरमौर बना पबितौं हम। काश मानवताकेँ पुनः जगा पबितौं हम, विश्वकेँ पुनः भाईचारा क पाठ पढ़ा सकितौं हम, अन्यायकेँ न्यायसँ बदलि पबितौं हम, “अमित” विश्वकेँ किछु आर आगू लय जा सकितौं हम। काश ब्रहांडकेँ उद्भाषित कय पबितौं हम, महाकालसँ पुनः तांडव करबा पबितौं हम, बनि महाकाली, असुर-दुष्ट-दुर्भाग्य क भक्षण कय पबितौं हम, “अमित” विश्व मे पुनः चिर शांति स्थापित कय पबितौं हम। पहिलुक दिन हम यादि करई छी। पहिलुक दिन हम याद करई छी, नबकी भीर पर माछ मारई छी, पहिलुक दिन हम याद करई छी, ई पैनपीबी ओ पुरहित्ता, पोखईर मखानक बिढ़नी के छ्त्ता, मारल माछ उपइछ के खत्ता, जामुनक गाछ पर घोरणक छत्ता, आम लतामक की पुछई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। पापाजी कमाबईथ बड्ड थोड़, पर हुनकर इच्छा बड्ड ज़ोर, हमहू पढ़ही थोरबों थोर, सुइन सुइन हमर माथा घोर, हुनक प्रयास नहि बिसरी सकई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। नहि देखला जहन तनिको सुधार, मन मे सब क्यो केलइन विचार, स्कूल हमर बदलबाक चाही, प्राइवेट स्कूल सबहक उर माही, सब बुझलइथ आब सुधईर सकई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। भरि दिन गाछी मे बौएनाइ, नहि स्कूलक टास्क बनेनाइ, मित्रक संगे दिन बीतेनाइ, गामे गामे खूब छिछिएनाइ, यादि करैत ओ सिहरि उठई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। सिंगही बिल मे हाथ घुसेनाइ, सुग्गा पकरई शीशो पर चढ़नाई, ब्योंत लगा कांकोर बहरेनाइ, ओरहा बादामक बना के खेनाई, यादि करैत आब हम शरमाई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। कल्याणी के गुढ़ विचार, क्षुब्ध देखि हमर ई व्यवहार, ओ सदिखन केलैन प्रयास, बदलब हम हुनका छल भास, बड़की बहिन मे माँ के पबई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। बाबा हमर विद्वताक खान, ओ नहि छेला किछ से अनजान, तकला क्षण मे एक उपाय, पापा के कहलाइन समझाय, हिनका अहाँ ल जाउ अररिया, रन-बन घुमईथ भरि दुपहरिया, हाथ से कहीं ई निकलि नै जाय, ततत्काल ई करू उपाय, ओ वचन अखनों तक सुनई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। एकर छेलइन्ह पापा के भान, लय जाइथ संगे वाणेश्वरी स्थान, रास्ता भरे बुझाबईथ जाइथ, ई नहि करी ओमहर नहि जाइ, सब दृशतांटे यादि करई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। पापा संगे अररिया गेलौ, अपन आदत ओतहु नहि छोरलौ, पापा जेबी से पाई चोराय, रॉयल टाकीज़ सिनेमा देखय जाय, कॉमिक्सक ते खान बनेलौ, गलत राह पर किछ आर चललौ, पापाक बेबसी यादि करई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। स्कूल से कतेक बेर भगलौ, तुइत इमली तर समय बीतेलौ, पहिल विचारल नहि हम पढ्बइ, नगर नगर मे घुमबे करबई, अन्न्पूर्णा के गोल मिठाई, मित्रक सब संग तास खेलाई, यादि करैत हम खूब बिहूसई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। पापा अपनहि खेनाई बनाबईथ, घर-बजारक काज सरियाबईथ, ओजपूर्ण कविता ओ सुनाबईथ, हमर सुतल आत्मा के जगाबईथ, रोम रोम पापाक ऋणी पबई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। आंखि हमर तुरंत फुजि गेल, भेलहु जहन दसवीं मे फेल, माँ-पापाक आंखिक नोर, पिघलल हमर हृदय कठोर, प्रण केलौ आब करब ईजोर, चाहे सूरज बदलईथ छोर, ई बातक आइ गांठ बनहई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। लक्ष्य अखनि धरि अइछै दूर, प्रण अछि जे करबई ओ पूर, करईथ शारदे कृपा अपार, हमर लगाबईथ बेरा पार, हे माँ कल जोरि नमन करई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। माँ हमर जनमहि नहि देल, भाग्य विधाता सेहो भेल, छईथ दुर्गा के ओ अवतार, करय एली हमर उध्धार, माँ पापा लेल “अमित” लिखई छी, पहिलुक दिन हम यादि करई छी। हमर प्रेयसी काश हम कविता बनि पबितहु, अहांक उर के छू पबितहु, बनि भ्रमित भ्रमर अहांक यौवन के, लव पंखुरी पर छा पबितहु । अहांक आँखिंक काजल होईतहु, अहांक पलक पे बसि पबितहु, ओइ नीला मान सरोवर के, ओ श्वेत हंस हम बन पबितहु । अहां प्रेम काव्य के मूरत छी, रति कामदेव के सूरत छी, वाणी मे वीणा वास करे, हर एक कला स पूरित छी। देख अहांक छम से चलनाई, वन के हिरनी शर्मावैत अछि, यौवन घट एना छलक रहल, जेना घटा उमर कय आवैत अछि। श्यामल मुख पर झिलमिल बिंदिया, लय चोरा गेल नैनन निंदिया, लय कपोल पर वो खनक हंसी, अहां बनि गेलौ हमर मनबसिया। हमर श्वेत धवल मन मंदिर मे, अहां सुर-सुरम्य अहां वीणा छी, एही श्यामल सुंदर यौवन के, हे मानिनी हम ते याचक छी। अधखुला केश के देख देख, सावन की घटा शर्मा जायत , अहांक नैनक काम वाण, हमर हृदय तरसा जायत। अहांक कदम के चूमि चूमि, निर्जीव धरा अति हर्षित अछि, अहांक मोहिनी छवि देख, ऋतु वसंत शर्मिंदित अछि। कारी लट अहाँ बिखरा जाउ, घनघोर घटा सन अहाँ छा जाउ, क्षुधित अंक मे प्रेम से लय,, प्रेमक सावन अहाँ बरसा जाउ। अधरक ओ सुधा पिलाबु ने, नैनन से नैन मिलाबु ने, अपन अहाँ सर्वस्व सोंपि, हमर अस्तित्व मिटाबु ने। प्रेम भाग्य के बनि रेखा, हमर हाथ मे अहाँ छा जाउ, बन प्रेम पथिक हमर राधा, “अमित” हृदय मे अहाँ समा जाउ। आब जमाना बदलि गेलै यौ आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आब सिस्टर सब सिस कहाइ छथि, भैया दैया नाम झमाइ छथि, बाबूजी तँ डैड भेला, बेटी संग ओ क्लबो गेला, नवयुगक ई रीत निराला, संस्कार कोसी भसिएला, छौंरी सबहक टाइट जींस देखि, छौड़ा सभटा बहकि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। बुढ़ा-बुढ़ी मॉल जाइत छथि, आइसक्रीम एक संगे खाइ छथि, एक दोसराक डाँड़ हाथ दय, नैन-मट्ट्क्का सेहो करै छथि, रॉक एन रॉलक मस्त धुनपर, बुढ़बा बूढ़ा डांस करए लगलै, बुढ़ाक टनगर डांस देखि, बुढ़बापर बुढ़िया छड़पि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। पहिने घोडा चना खाइ छल, चनों आब सपना भऽ गेलै, रुखल-सुखल घास-फूसपर, हड्डी सभटा निकलि गेलै, टीसन जाइ काल बीच राहमे, घोडा बहुते हकमि गेलै, घोडा लय टमटमक संगे, जोतला खेत मे गुरकि गेलै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आब गुरुजी सर कहाइ छथि, सरक सर कते बेर फुटलै, गुरु तँ गुरे रहि गेला, चेला सभ चिन्नी भेलै, टास्क बनेने नै छल मुसरी, सरकेँ ओकरा डेंगबय पड़लै, मुसरी तँ मुसरिए छलखिन, छनहि क्रुद्ध भय प्रण एक लेलखिन, सरक साइकिलक चक्कामे, लाठी ओकरा घुसबऽ पड़लै, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। छौड़ियो सभ सिगरेट पिबैए, छौड़ा सभ संग पार्क घुमैए, बाइकक पाछूमे बैसल, ब्रेकक लाथे मजा मारैए, एक्कर सभक चालि ने देखु, बीसो टा बॉयफ्रेंड रखैए, आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। आइ काल्हिक छौड़ाकेँ देखियौ, टीक कटा जुल्फी रखैए, पढ़ाइ-लिखाइमे साढ़े बाइस, मोछ मुड़ेने देखियौन ताइस, गप सुनबै तँ भऽ जाएब दंग, लेकिन सरस्वती छन्हि मंद, बैंग्लोरक नामी मंत्री मॉल दिस, “अमित” केँ सेहो मोन गेलैए, आब जमाना बदलि गेलैए, आब जमाना बदलि गेलै। आब जमाना बदलि गेलै यौ, आब जमाना बदलि गेलै। शिवशंकर सिंह ठाकुर कोह्बरक हाल कहलो ने जाय कोह्बरक हाल कहलो ने जाय , पटिया परक सुतब ,घाममे भीजल देह , नवबिवाहिते टा बुझै छथि , चतुर्थी दिनक बात तँ किछु अलगे होइए, पटिया परक रगरघस ,चमरियो छिला जाइए, मौहकक खुशी सभ मांटि मे मिलि जाइए दू चारी दिनक खुशी आ,बाकी सभ तँ बुझले अइ, आजुक नवकनियाँ "दिल्लीक लड्डुए" बनि जाइत छथि , मुदा ईहो सत्य अछि जे किछु गनल-चुनल कनियाँ , जिनगी मे मिठांस भरि दैत छथि ,जिनगी स्वर्ग बनि जाइए , किछु गोटे कहता जे विवाह जुनि करू , मुदा हम तँ कहब जे विवाह अवश्य करू, विवाह अनुशासन अछि, आदमी केँ काबू मे करबाक साधन अछि , विवाह यदि नै हएत,हरैद लगबे करत , मोनक मनोरथ पूरा हेबे करत , तैं जिनकर विवाह अखन तक नहि भेल , कोह्बरक आस जुनि छोडू,मोनक उम्मीद केँ नहि तोडू , एहि लगन मे अहाँक विवाह जरूर हएत, कोहबरक आनंद अहांके जरूर भेटत !!!!!!!!!!!!!! आँजन सँ आंजित आंखि हुनकर आँजन सँ आंजित आंखि हुनकर सोन सँ बढ़ी क रूप हुनकर , सिनुर भरल माँग हुनकर , ललका साडी मे लिपटल देह हुनकर !!!!! लाज भरल मुस्कान अधर पर , फूल सँ कोमल काया हुनकर, प्रेम सँ छालकैत नयन हुनकर, मेहदी रचल हथेली हुनकर !!!!!! छम-चम् बाजैत पायल हुनकर, मिसरी सनक बोल हुनकर, गुलाबक पंखुरी सन ठोर हुनकर, खिलल यौवन मदमाईत हुनकर !!!!!!! मोन के लुभाईत नजरि हुनकर, अविरल धार प्रेमक हुनकर, रमैत शिव शंकर देखि क हुनका, रसपान करैत रूप हुनकर !!!!!!! लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ रहि-रहि क हमरा सताबय छथि, यौवन अपन ओ देखाबय छथि, हम विवश छि अपने हाथें , प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि !!!!!!! यौवन अपन ओ ............ कखनो ओ कहती जे चलु सिनेमा, कखनो ओ मेला देखाबै छथि, कखनो क हमरा गाडी मे घुमाबैत, कखनो ओ बाईस्कोप देखाबै छथि !!!!!! यौवन अपन ओ .......... कखनो कहती जे मांथ दुखाईये, कखनो क पैर ओ दबवाईत छथि, कहियो कहियो जाँ प्रसन्न रहै छथि, रस्गुल्लो ओ हमरा खुआबई छथि !!!!!!!!! यौवन अपन ओ ........... हमहू सोचै छि जे हर्जे की अई , प्रेमो त हमरा सँ ओ करै छथि, कखनो कहै छथि 'हम केहन लगई छि', कखनो ओ ठेंगा देखाबै छथि !!!!! यौवन अपन ओ ............. कखनो ओ कहती जे बाड़ी मे चलु, कखनो ओ गाछी घुमावई छथि, मने मने हमहूँ त राजिये रहै छि, की की ने हमरा देखाबै छथि !!!!!! यौवन अपन ओ .......... एक दिन भेँट गेली रस्ते मे ओ , पईत गेली बुझु सस्ते मे ओ , फेर की की भेल से कहलो ने जाय , लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ !!!!!!!!! ठका गेलौंह हम त सस्ते मे यौ, यौवन अपन ओ देखावै छथि, प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि, गूड़क माईर बुझु धोकरे जनैया, की की ने हमरा संग करइ छथि !!!!!!!!!! किए दूरेसँ झांकि कऽ देखै छी यै कनियाँ किए दूरेसँ झांकि कऽ देखै छी यै कनियाँ, किए हीया हमर अहाँ सालइ छी यै कनियाँ , हमर तकलीफ अहाँ कनिको ने बुझी , रहि -रहि अहाँ किए तड़पाबै छी यै कनियाँ , साथी संगतिया सभ हरदम चिढाबय , दूरे सँ अहाँ प्रीत जगाबै छी यै कनियाँ, मोन मारि कऽ हरदम निठुरले रहै छी, किए अहाँ हमरा सताबै छी यै कनियाँ , जिनगी हमर आब निरर्थक बुझाइए , प्रेमक दरस आबो देखाबू यै कनियाँ, कतेक बुझाऊ हम एहि पागल दिल केँ , बेर -बेर अहीँ पर आबै अइ यै कनियाँ, हमर अहाँक मिलन बुझु कतेक खुशी देत , प्रेमसँ अहाँक आंचर भरि देब यै कनियाँ, प्रेम तँ मूल अइ एहि जीवन केर , प्रेम बिना सभ निरर्थक यै कनियाँ, कहथि शिव शंकर बुझू ई सत्ते , जिनगी बना देब अहाँकेँ यै कनियाँ। हे स्वर्णमयी, अहाँ छी कतऽ हे स्वर्णमयी, अहाँ छी कतऽ अहाँक बिना हमर अन्तःस्थल जानि किए रूसि गेल हमरा सँ आर हमर कलम ने जानि किए शब्द उगलनाइ बंद कऽ देलक। मूक,उदास आ क्षुब्ध भेल छी, जानि कोन सोच मे उलझल छी, हमर अन्तरात्मा ने जाने किए, सुतल अछि ,रूसल अछि अओर गीत हमर बन्द भऽ गेल अछि I छन -छन अहाँक पायलक गूंज , धड़कि रहल अछि हमर धड़कनमे, आ अहींक स्वर्णमयी आभामे कतऽ बिलुप्त भऽ गेल छी हम I रहि-रहि कऽ अहींक स्वर बेर बेर कान मे गुंजि रहल अछि, मानू मिसरी घुलल अहँक वाणीमे, हमर जड़ता केँ झंकृत कऽ रहल अछि I मोन हमर उद्विग्न अइ तैयो अहँक हाथ हमर छाती पर धीरे -धीरे सरकि रहल अइ आ हमर उद्विग्न मोन केँ शान्त करबाक प्रयास कऽ रहल अइ , हमर सहिष्णुता केँ ललकारि रहल अइ I हम शान्त रहितो अधीर भऽ जाइ छी, एहन बुझाइत अछि जेना की अहाँ एतहि कतौ छी, आ शून्य दिशि ताकैत अहाँकेँ चिन्हबाक प्रयासमे लागल छी, अहँक भीतरक ब्यथा मानू हमरा सँ किछु कहि रहल अइ I हँ , ई अवश्य अछि जे कहियो हम अहाँ एक दोसराक लेल जन्म- जन्मान्तारक शपथ खेने रही, एक दोसराक प्रति सत्य आ सनेह सँ प्रेमक बंधन मे बन्हि गेल रही, से की हम बिसरि जाएब ?? कथमपि नहि , कथमपि नहि, ईएह तँ हमर प्रेमक आधार अइ I मुदा एक दिन ! एहन की भेल जे अहाँ अपने सँ ओइ शपथ केँ तोड़ि देलौंह , आ हमरा अइ मर्त्यलोकमे डरल ,सहमल घुटि -घुटि कऽ जीबाक लेल विवश छोड़ि देलौंह हम कोना कऽ जिबू ? किए जिबू ? कोना हम बिसरि जाउ जे अहाँ हमर कन्हा पर अपन माथ राखि कऽ अपन वेदना केँ प्रकट केने रही आ हमहूँ तँ अहाँ केँ भरोसा देने रही, तखन हमर कन्हा मजबूत छल I ओ सामर्थ्य आब हमरा मे नहि रहि गेल, हम मजबूर भऽ गेल छी, विवश भऽ गेल छी, अहँक शपथक खातिर हम कहुना कऽ जीब रहल छी I कहियो कहियो जखन हम बड़ दुखी भऽ जाइ छी, अहँक कन्हा पर माथ राखि कऽ कनबाक मोन करैए , मुदा किछु नहि कऽ सकैत छी, की करू ? कतऽ जाउ ? अहाँ ई सभ तँ देखते हैब , हमर ब्यथा केँ बुझिते हैब I कहियो कहियो अहँक फोटो दिस देखि लैत छी , अहँक छवि केँ मानू निहारि लैत छी, फेर हम शून्य दिस देखऽ लगैत छी, अनन्त कल्पनालोक मे डूबि जाइत छी.........I मिहिर झा सामा गीत (संकलन) कोने भाय्या अनथिन आलेर झालेर, कोने भाय्या अनथिन पटोर कोने भाय्या अनथिन संखा चूडी, कोने भाय्या अनथिन सिंदूर कोने बहिनो पिनहथीं आलेर झालेर कोने बहिनो पिनहथीं पटोर कोने बहीना पिनहथीं संखा चूडी कोने बियाहिनो पिनहथीं सिंदूर बड़का भैया अनथिन आलेर झालेर मझला भाय्या अनथिन पटोर सैनझला भाय्या अनथिन संखा चूडी छोट्का भाय्या अनथिन सिंदूर बड्की बहिनो पिनहथीं आलेर झालेर मनझली बहिनो पिनहथीं पटोर सैनझली बहिनो पिनहथीं संखा चूडी छोट्की बहिनो पिनहथीं सिंदूर ------------------------------------------------------------- गाम के अधिकारी तोहे मझला भाय्या हो भाईय्या हाथ दस पोखरि खुनाई दहो चंपा फूल लगाई दहो हे फूलवा लोरहेई त बहिनी घमी गेली हे आहे घाम गेलनी सिर के सिंदूर नैना केर काजर घमली हे छ्टवा लाना दौड़ाल ऐल्खिन बड़का भाईय्या हे बैसो बहिनो ईहो जुड़ी छाहरि की हमारो के आशीष दियो कथी बाझायब बनतित्तिर हे आहे कथी बाझायब राजा हंस चकेवा जाले बझायेब बहिनो तित्तिर हे आहे रौब सा बझायेब राजा हंस चकेवा खेल करू हे बहिनो खेल करू हे भाइय्या झटायल फूल बहिनो हार गुथु हे आहे सहो हार पिनहथीं भौजो बहिनो खेल करू हे ------------------------------------------ बृंदावन म आगि लागे कोई ना मिझावे हे हमर भाईय्या फलना भैया दौड़ दौड़ मिझावे हे --- छौड, छौड, छौड हमरा भाय्या कोठी छौड. छौड, छौड, छौड चुगला घर मे छौड चुगला करे चुगली बिलयईया करे मीयौ चुगला के जीभ हम नोंच नूच खाओं ---------------------------- समा हे चकेवा हे ऩहिरा नई बिसरैह हे ससुरा म पूजा पाईह हे कोडल खेत मे रहिह हे जोतल खेत मे रहिह हे रंगेई रंग पटिया ऊछाबि ह हे ढेपा फोडि फोडि खाईह हे ओस पिबि पिबि रहीह हे हमर भाई क आसीस दिह हे आगिला साल फेर आइह हे हे भगीरथ, पुनः आउ ई सडल गलल धरा के मरल मानवीय संस्कार के आबि अहां फेर जियाउ हे भगीरथ, पुनः आउ एक भागीरथी अहां आनल अपन संतति अहां जियाओल रक्तबीज सन पसरल ओ पूर्ण धरा मे छाओल अपन कर्म रत निरंतर गंगा श्वेत रूप गमाओल आब अहां भागीरथी बचाउ हे भगीरथ, पुनः आउ दिनचर्या हो वा राजनीति साहित्य हो वा वाणिज्य क्रीडा हो वा हो शिक्षा सगरे पाओल एके दीक्षा लालच अहां मेटाओ हे भगीरथ, पुनः आउ पसरल अधर्म सब जाग जानी मिथ्या भेल आब कृष्ण वाणी कतय छथि भगवती से ने जानी खूने आब ने रंगाओ हे भगीरथ, पुनः आउ असमंजस बॅंटल छी दू टुकड़ा मे आधा एम्हर आधा उम्हर संघर्षरत अछि सतत मोन हमर एम्हर - उम्हर की छोडी की राखी हम लालच अछि फैलल सगर ग़ामे जन्म बचपन बीतल व्यवसाय विदेश डगर सुख सुविधा रहितो सदिखन मोन बसल स्वदेश अपन किया जाउ गाम हम वापस उन्नति छोडि अवनति डगर दिया सलाई फेक के नेसी पाथर घसि चुल्हि भन्साघर इंटरनेट छोडि ली समाचार बैसि दलान चौपाडि पर नोत पुरै के नाम पर अपन टांगी नौकरी खुट्टी पर ई सब बुझितो मोन गडल अछि गड्चुन्नि के झोरे पर बाधक ताज़ा बसात भोरूकबे की भेटत ओ पार्क मे ? गपास्टक अध्याय दलान पर की भेटत ई मीटिंग मे ? फेन्टब तास जमा चौकड़ी की भेटत ई पार्टी मे ? घूर मे पाकल अल्हुआ अल्लू स्वाद भेटत ई ओवेन मे ? सोचि सोचि हम बिखरल छी आधा एम्हर आधा उम्हर | गजल सन हृदयक उमंग-दर्द निकलल बनि गजल एहेन गजल पर तेँ वाह वाह हेबाक चाही | अनकर लिखल पाँति यदि खूब नीक लागल ओहि कृति केँ सदिखन "साभार" लिखबाक चाही | ज्ञान प्रसार छैक धर्म एहि मे तृप्ति छै भरल किंतु एहि अंजाम लेल ज्ञान, ज्ञान हेबाक चाही | --वर्ण ९ गजल मिलत जखन आन्खि से आन्खि तखन पता चलत हिलत जखन करेज कनी तखन पता चलत एखन त बौराई टौवाइ छी मदमस्त भेल रहू कन्छी मुस्की जे बेधत हृदय तखन पता चलत दियौ गप उडाउ खिल्ली अहां छी मनमत्त अबूझ आन्खि से जखन निन्न उडत तखन पता चलत मुस्काई छी उधियाय छी त अबढन्ग बनल रहू अधर से जे अधर मिलत तखन पता चलत बिसरब दुनिया ओ भज़ार ई ठीक सत्य वचन जखन होएत वाक हरण तखन पता चलत गजल फेर से ओ जिनगी घुरि आयल फेर अहां क याद घुरि आयल छोडल छल सबटा याद अदौ विस्मृत स्मृति फेर जुडि आयल लकधक साड़ी खनखन हँसी लाजक लाली कोना मुडि आयल आमक गाछी चुप चुप अधर डभ्कैत आन्खि मोन चुडि आयल छल विदा करेज पर पाथर बिसरब सब से फुरि आयल किएक भेटल ओ पुरना पोथी आखर देखि याद घुरि आयल गजल नहि जाएब परदेश, अहाँ एहिना तकैत रहू खोलब हृदय के तार अह एहिना तकैत रहू सखा भजार चुटकी लय के करैथ हँसी ठिठोली अहां लेल दुनिया बिसरब एहिना तकैत रहू सर समाजक कोनो चिंता ने अहाँक रूपक आगू दीन ईमान सेहो बिसरब एहिना तकैत रहू गीत ग़ज़ल छन्द ओ कविता लिखब देखैत रहू प्रणय निवेदन करू स्वीकार नैना तकैत रहू ज़मीन जथा किछु नहि चाही नहि चाही रंजो-द्वेष सुगम सिनेह केर पावन महिना तकैत रहू गजल मोनक आखर मुहे परसितहु आई यदि अहां रुकिये जयतहु अहां चल जायब नहि बुझलाहु की जैते जे हम झुकिये जयतहु किछु गॅप झांपल विश्वास तोड़ल की होएते यदि बुझिए जयतहु गेलहु विदेश देलहु नहि ध्यान की होएते यदि रुकिये जयतहु पता जे रहितय प्रेम नगर के कहुना कय के घुसिये जयतहु गजल स्वर्गक नाम जपैत सगरे नर्क पसरल छै साधुक भेष धरि सगरे रावण अभरल छै सब छे घिचने लक्ष्मण रेखा अपन चारू कात लंका दहन केर नाम पर सब ससरल छै रूप गेलै बदलि जमाना संग बानरोक आब हनुमानक स्थान पर आब मारीच भरल छै नियमबद्ध होएब लगै आब करैला सों तीत एहि बात पर सगरे आब आगि धधकल छै किछु भाव १ गुलाबक फूल लाल सुंदरिक ठोढ लाल कनियाँक लाज लाल प्रेमक रंग लाल २ क्रोधक मुँह लाल रक्तक वर्ण लाल आतंक सँ नभ लाल हृदयक घाव लाल ३ क्रांतिक रंग लाल रणक माटि लाल योद्धाक तरुआरि लाल विजेताक तिलक लाल ४ देह क आगि पुरबा मिझबय मोनक आगि सत्संग हृदय के आगि पिया मिझबय जखन होथि ओ संग | ५ पत्रहीन नग्न वृक्ष प्रकृति बहुरंग कलाकारक ई कूची की करैत अछि व्यंग ? ६ जमाना आब नहि सोहाइये अपना से गॅप करै मे डर लगैये विचार सब मोन से निकलि मुह मे अछि ओकरा मुह से बजै मे डर लगैये | ७ जमाना छल खूब ठिथीयायत छलहु सभ से खूब गपियायत छलहु मोन रहैत छल प्रसन्न अनको प्रसन्न रखैत छलहु | ८ धीरे धीरे चुप्पी आयल अपन लोक सब छिरियाल बजेलो पर आब कोई नई अबेयै जमाना आब नहि सोहाइये | ९ जीवन मे चलैत चलैत कखनो ठमकबाक चाही जिंदगी मे आगू बढैत साँस लेबा ले रुकबाक चाही आगू बढैत बढैत कौखन पाछू तकबाक चाही बीतल जीवन एलबम के कोनो चित्र देखबाक चाही रेस के घोडा जेका हरदम पडेबाक नहि चाही बीतल मधुर स्मृति के जीवन शक्ति बनेबाक चाही | १० हम छी एक टा तूक्ष मना पडल रही कोनो कात कोना ताक पर राखल धूरा जमल सोचलहू जिनगी बीतल एहिना मस्ती करैयत घुमैत छलहु नेट सर्फिंग करैत छलहु देखल एक ग्रूप मनोहर विदेह नाम छल ओकर सुन्दर ओहि रोज बदलल सोच पारसमणी छुआएल जेना सम्मान नहि करू पाथर के सम्माननीय मात्र पारसमणी छोड़ू रंज ओ रण बौद्धिक प्यास मिझाइत छैक आबि साहित्य केर शरण अलग अलग पेय छैक पीबू जे होइए मन संतुष्टि उद्देश्य छैक भिड़ू नै छने छन आत्म सात करू प्रेमकेँ छोड़ू रंज ओ रण जमींदारी गेल राइयाई गेल/ सभटा गेल सोतियाइ नै गेल जमींदारी गेल राइयाई गेल भोजन कय दिन विश्राम गेल खेत गेल खलिहान गेल बचल आमक गाछी गेल गाम छोरि कएल शहर बसेरा नौकरी कऽ करै छी गुजारा चिड़िया चुनमुन सपना भेल माछ मासिक भोजन भेल गप्प दै छी अछि नई मेल सभटा गेल सोतियाइ नै गेल भोज बदरी बाबू आयल छलाह केश अपन कटेने छलाह कहलन्हि बाबूक बरखी छी नोत देमऽ आयल छी नोत पूरा बहरी केँ अछि चूड़ा दहीक व्यवस्था अछि। भेलै सांझ पड़ै छल बुन्नी बिदा भेलहुँ लऽ लोटा टुकनी उप्पर मेघ नीचाँ थाल अनहरियाक पसरल जाल कहुना पहुँचलहुँ पुबरिआ टोल बुझि गेलहुँ हम भोजक मोल पएर धोलहुँ पाँतिमे बैसलहुँ चूड़ा पड़साइत देखैत रहलहुँ तावत आएल जोरक बसात उड़ि गेल हमर असगर पात लोटा उठा अन्तह बैसलहुँ चूड़ा दही सँ शुरुआत केलहुँ।| खाइते छलहुँ फछक्का भेल पड़सनिहारक मटकूडी फूटि गेल सौंसे देह दही लेभरायल हँसैत हँसैत कानब बहरायल गोर लागि हम पकड़ल कान भोजपर नहि देब कहियो ध्यान। मनीष झा बौआभाई, ग्रा+पो-बड़हारा,भाया-अंधरा ठाढी, जिला-मधुबनी(बिहार) नव बरखक नव बरखक नव आगमन पर नव रचना के संग अहिना लिखि लिखि परसैत भेटब कविता रंग बिरंग कहाँ बिसरलहुं पोरकां सालक देल अहाँके नेह ह्रदय बीच मे पैस गेल छी सब पाठक आ विदेह मोनक बात कोना क' लिखब से भेटल अछि अधिकार मीन मेख नै कहियो देखल तै बेर बेर विदेहक आभार सिद्धहस्त रचनाकारक संगे देल नवसिखु के सेहो स्थान तालमेल क' छपने गेला आ बूझल सब के एक समान महिमामंडित माँ मिथिले के धन्य अहाँ सब पूत परसि रहल ई स्नेह पत्रिका बनि क' मिथिला दूत हम ऋणी छी (कविता) मुँह लटकल छल फूलल गाल पोन छल सगरो छौंकी स' लाल माय कहली बाऊ कि भेल आइ भोक्कासी पारि कहल सब हाल कब्बिर काने क' कान्चुन का' नै छल याद तैं देलक डेंगा' एहि मस्टरबा स' आब नै पढ़बौ नहि त' काल्हि स' मारत ठेंगा भावुक भेली माइओ सुनि क' कहली बाउ अहाँ जुनि कानू रूसी नहि कखनो अन्न छोडि क' खा' लिय' आ बात हम्मर मानू बाबू आइ साँझ मे जाकय हुनका बुझा देथिन्ह नै मारता आब अहूँ पनपियाय क' बैसू पढबा लेल काल्हि देखा देबन्हि सब बनल हिसाब हिचकि-हिचकि क' क'र उठाबी भ' गेल ए'क भात आ नोर माइअक आश्वासन सुनि हम्मर अपनहि सटि गेल दुन्नू ठोर जहिना जहिना भेलौं गिअनगर तहिना तहिना पढ़लौ इस्कूल कॉलेज मास्टर डांटथि प्रोफ़ेसर बुझबथि हुनकहि प्रसाद स' जे किछु अछि नॉलेज ऋण नहि सधा सकब हे गुरुजन अपनें लोकनि देल उधार जे "मनीषक" श्रद्धा सुमन स्वीकारू नहि बिसरब एहि उपकार के शिक्षक दिवस पर हम अपन प्रथम गुरु (बाबा-बाबूजी-माँ), शैक्षिक गुरु (जिनका स' प्रत्यक्ष ज्ञान/शिक्षा लेने छी) आ आदर्श गुरु (जिनकर अनुसरण करैत जीवन के समस्त यश-कीर्ति-ख्याति के आकांक्षा रखैत अग्रसर भ' रहल छी) ओहि सभ गुरुजन कें श्रद्धा सुमन रुपी ई एक छोट आ अदना सन रचना समर्पित क' रहल छी I इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। जीवन जीवन अछि, आह, कराहक सिलसिला , पीड़ा आ दर्द के रंगीन, मनमोहक कथा! सब किछ, भ्रम, स्वप्न, मिथ्या, प्रवँचना! दुनियाँक सब रिश्ता अछि, ममताक मृगतृष्णा! जीवन के , सिर्फ अपना लेल जिनाय. अपन लेल सोचनाय, हमर जीवन, बस हमरे लए? नहिँ नहिँ, एना सोचब तै. होयत स्वार्थ हमर, नितांत स्वार्थ ! जीवन के किछ अर्थ भेनाइ, ते जरुरी छैक, जीवन के एक लछ्य भेनाइ, ते बेहद जरुरी छैक। ओ लछ्य, भए सकैत अछि, भिन्न भिन्न । ककरा हम कहबै, सत्य. ककरा हम, असत्य ठहरा सकैत छी। किन्तु एक सत्य , मानव जीवन मेँ, आनि सकैत अछि, अथाह शान्ति. असीम आनन्द! ओहि सत्य के बुझबाक , हम प्रयास करैत छी निरंतर! हमरा लए हमर जीवन मेँ, सबसे पैघ वैभव, ओ स्वर्गिक सुख अछि, जे दैत अछि अपूर्व सँतोष, मानव सेवा मेँ छिपल अछि, हमर अँतर्मन के ओ , अलौकिक सत्य! मानव सेवा आ परोपकार सँग, जी उठैत अछि , हमर आत्मा, तृप्त भs जायत अछि मोन, ओहि आत्मिक सुख के आगू, दुनियाँ के सब सुख . बुझायत अछि छोट , छोट, बहुत छोट!!! मानव सेवा आ परोपकार, यैह अनँत निधि अछि , यैह निताँत सत्य अछि, यैह एक लछ्य अछि, हमर जीवन के!! भौजी लाल साड़ी पहिरने भौजी, मिथिला आँचर ओढ़ने, चिक्कन चुनमुन गोर माथ पर, लाल टिकुली छथि सटने। छनछन पएरक नेपुर बाजे, हाथक चूड़ी खनकए , भौजी शोभा छथि , हमर घर के। बाजब हुनकर मधुर मधुर छन्हि, अधर मुस्कैत सदिखन, घर मे सभक ध्यान रखै छथि, थकैत नहि छथि कौखन, घरक साज सँभार करैत, गृहिणी बनि मान बढ़ाबथि, भौजी शोभा छथि, हमर घर के। बाबीक छथि चित्रसुन्नैर, माँजीक भव्यारानी, भोर भिनसर उठि , भौजी पहिने, बाबी आ माँ क, चरण छुबै छथि। हमसभ भाइ बहिन ले भौजी, जननी रुप धरै छथि, भौजी शोभा छथि हमर घर के। स्वजन बन्धु सर कुटुंब मे भौजी, मैथिल बेबहार खूब निभाबथि, पावनि तिहारमे हम्मर भौजी, नीक नीक पकवान पकाबथि, भार्यारुपमे ओ तँ , भैयाक मान बढ़ाबथि, घरमे प्राण संचार करै छथि, भौजी शोभा छथि हमर घरक। बड़ अजीब मँहगाइ छै! आटा चाउर तेल शक्कर, मँहगी केँ छूलक आसमान, गृहिणी भनसाघर मे देखू, कतेक भऽ गेलि परेशान, बड़ अजीब मँहगाइ छै! एतेक मोट तनखाक गड्डी, मासांत पति घर अनै छथि, दस दिनमे हालत गड्डीक देखू, कतेक पातर दुब्बर भs जाइ छै, बाँकी महिनाक बीस दिन, कोना चलत, की करथि उपाय, बड़ अजीब मँहगाइ छै! पनपियाइ बेरहटक व्यंजन, सुनु! सभ फीका फीका भऽ गेल, भोर साँझक चाह संग बिसकुट, सेहो गिनतीमे कम भेल, एतेक कतर व्योँतमे घरनी, अतिथि केँ कोना करती सत्कार, बड़ अजीब मँहगाई छै! पावनि तिहारक बात नै पूछू, घरनी कोना करती ओरिआन, कपड़ा सियेती या उपहारमँगेती, कोना पकेती पुआ पकवान, बड़ अजीब मँहगाइ छै!!! प्रवीण नारायण चौधरी १ जाड़मे प्यार! एहेन कठोर कनकनी से आउ मोरा हृदय लागू ना.. ललना हे! बड़ खन भेल इ दूरी से आउ मोरा हृदय लागू ना! माघक जाड़ो बड़ा जुल्मी से आउ मोरा हृदय लागू ना... ललना हे! सदिखन सुमिरी ओ गर्मी जे आउ मोरा हृदय लागू ना! धैन इ अन्हरिया हे राति जे अहाँके हम जी भैर देखी ना... ललना हे! नींद के मारिके गोली से आउ मोरा हृदय लागू ना! बड़-बड़ सोचल परखल कहिया इ जाड़ो औतै ना... ललना हे! एहेन प्रेम केर पलमे से आउ मोरा हृदय लागू ना! एहेन सुहावन संगी के स्नेह केर मौसम इहो ना.. ललना हे! जी भैर देखु न हमरो से आउ मोरा हृदय लागू ना! समय के धार अनुसार चलैत छी हम सभ, शिक्षा के महत्त्वके आत्मसात करी हम सभ, संसार मे सभ के अपन-अपन भूमिका छैक, अपन कर्तब्य के आत्मसात् करी हम सभ। २ चोर के चित्त अछि चान पर! कोन चान प्रिय? जेहि चान के चिन्हय चोर टा, ओ चान के चिन्हू चित्त सँ प्रिय! धूर छोड़ू मजाक! सीधा कहु ने! जुनि चित्त के चंचल एना बनाउ प्रिय जे चोर भागय जान सँ! इ चोर-चोर करिते-कहिते, मन हमर आर ने दुखाउ प्रिय! सुनु प्रिय! इ चोर केओ आन नहि बस मन के भीतर प्रेम थीक! ओ चोर हमरा चिन्हल अछि, एहि चोर के संग हमहुँ थीक! बस मन मिलय - ओ चोर कि, कि हम कि, कि आर कि! बस अहाँ छी, बस हम छी, नहि आर किछु, नहि आन कि! प्रेमी-प्रेयसीके बीच वार्तालाप के मैथिली रूप! सप्रेम भेंट! नव-विवाहित युगल-प्रेमी सभकेँ प्रति समर्पित! ३ तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, बिन हुनकर रे कि तू हम कि? बाजब मोरा तोरा प्री लागौ, वा अप्रि लागौ, पर बाजी हम तऽ सच बाजी!! सच वैह होइत अछि जेकरा सभ माने, यदि तू मानें वा नहि मानें!! पर सच अछि कि आ झूठे कि, बिन हुनकर रे कि तू हम कि? तुँ तूही रे, हम हमहीं छी, बिन हुनकर रे कि तू हम कि? ४ सभ सँ सस्ता कविता! देखि रहल छी हाट-बाजार - घूमि रहल छी गाम-शहर, धूम मचल अछि, शोर मचल अछि, सभ सँ सस्ता कविता! इ कविता जे केवल रचब, केवल वाचब, केवल लिखब, करय बेर मे नाँगरि सुटका कैँ-कैँ करैत पछुवैत परायब, एहेन भूस के बखाड़ी सँ नहि पेट भरत यौ मैथिल कवि, रचनामे जँ दम नहि होइ तऽ अजगर बनल अजोधक भीड़, धूम मचल अछि.... जहाँ दू दिनक फुर्सत भेटत लिखब कोनो रचना नीक, अपना दही के खट्टा सुनि के पियब मेर्चाइ के झोरे तीख, इ नहि सोचब जे रचना सँ रचल जैछ सुन्दर संसार, लोकके जीवन के हर क्षण मे जेकर बनैछ सुन्दर आधार, धूम मचल अछि..... पथियामे जेना काँकौड़ खिंचय टाँग दोसरके सुनु यौ मीत, अगबे गप के भंडारा सऽ अनोन बनल मिथिलाक सब रीत, जौं कर्ता आब वक्ता बनता कहू जे करतै के सभ काज, अहिना सभ दिन कविता रचबै कहू जे चलतै कोना के राज.... धूम मचल अछि..... ५ नीक लगै तोहर मुस्कान आँखि खोलि कि हम आइ देखी प्रिय, बन्द आँखि अहाँके हम देखैत छी। सुन्नरि हे सलोनी संगिनी प्रिय, ... नीर प्रेमक अहींके हम पिबय छी। पहिले देखल हम सपना मे, ताकि-ताकि थकल मन विपना मे। चुपचाप रही बस नयन हेरी, कहियो तऽ देखब हम विपना मे। जीवन के अनेको पल बितल, बस आइ देखि हम फूलल छी। आँखि खोलि कि हम..... जानी नै एहेन कोन जादू छै, आँखि देखि एना हम डूबल छी। इ केश घना रेशम अछि प्रिय, मदमस्त छटा सँ पागल छी। आइ सभ सुख के ओ सागर मे, भरने हम सुधा केर गागर छी। आँखि खोलि कि हम.... प्रेमक मन्दिर अछि अहीं सँ बनल, मूर्ति देवी के निहारैत रही। कल जोड़ि विनय बस एतबी टा, जिनगी भैर जे सिधारैत रही। कहियो जँ मिलन केर आश टूटय, तैयो हमरे संग नेह भरी। आँखि खोलि कि हम.... देखू आइ कपारो ‘किशोर’क, जीवन रहितो ज्योति चलि गेल। तैयो ‘ज्योति’ केर ज्वाला सँ, जीवन के रौशनी अछिये बनल। ईशक लीला अछि एहेन अजीब, जिनगी के मोल लेल कायल छी। आँखि ....... ६ माय माँगैथ खून जखन खून हेतैक विश्वास के, जखन अपमान होयत मायकेर अस्मिताके, जखन लूटत केओ स्वाभिमान के, तखन माय के आँखि सँ ज्वाला निकलय, आह्वान करय सभ पुत्र सँ, जागे बेटा आब जुनि रहे सुतल, उठा हाथ मे सत्यके हथियार, बचा मान तों माय के, हमलावर के कर पहचान, राख स्मिता निज-भूमि के, बहुत भेलहु रखलें बन्धक तों, मायके लहठी ओ चूड़ी, आबो ला एकरा तों वापस, पटना के बेईमान से, जुनि बिगड़े अपन इच्छा सँ, नून-तेल मे कय ले गुजर, कोनो जरुरी नहि छौ तोरा, पटना-मगध-भोजपुर मजबूर, अपनहि धरती सोना उपजय, बनो अपन सुन्दर भरपूर, आब बिहार के माया छोड़े, बनो मिथिला राज के पुर, कर सभ नाका बन्द ओकर जे, मानय नहि छौ बात, चलो प्रशासन अपनहि अपन, छोड़ हेहर के बाट, बन्द करे सभ मौगापन, बुझ पहचान के असली मोल, पूर्वाग्रही पड़ोसी सभ छौ, कर ने एकर आगू विश्वास, तोरे संपदा सऽ बनल व्यापक, तोरहि सभ पर करे ओ राज, एहेन राज के जंजीड़ तोड़े, बचो माय के आबो लाज, एहि लेल बहो आब रक्तके धार, मिथिला माय मनतौ आभार, बेर-बेर हमर क्रन्दन सुन, माँगय माय आब तोहर खून। ७ अटल अटल अहाँके अटलता सऽ बनल भारत के नव ओ रूप, काश! एक बेर फेर बनितौं एहि पैघ प्रजातंत्रके अहीं भूप! पहिले बेर जखन १३ दिनक राज आयल छल अपनेक हाथ, मुश्किल मे राखल गेल घेर अपनेकेँ नहि भेटल सभके साथ! लेकिन ओहि अपमान के स्मृतिमे रखलक देशक जनता, बहुमत सँ अपनेकँ जिता के देलक प्रधानमंत्रीके मान्यता! अबिते देरी जखन पोखरण परीक्षण कयलहुँ अपने शानसँ, विस्मित फाटल अचरज सँ तकलक सभ बड़का ध्यानसँ! रुकलहुँ कहाँ अपने, राखि समेट सभकेँ चलेलहुँ नीक राज, घरके हो वा बाहर के हो देलहुँ नव गठबन्धन के नीक राह! आइयो राष्ट्र चलि रहल अछि अहींक पथ-प्रदर्शन पर श्रीमान्, सदिखन सुन्दर बनल रहय आ दहिन रहैथ ओ ईश महान्! लगले रहल एक शख हमर जे देखितहुँ अपनेकेँ हिया-जी भैर, जानि कतय छी अपने कि अछि हाल इ जाने तरसी बेर-बेर! बस एक बेर - बस एक बेर, दर्शन दियऽ यौ नेता महान्, बुझब जे दर्शन भेट गेल - श्री कृष्ण आ श्री राम भगवान्! अपनेक स्नेही आ प्रशंसक - प्रवीण चौधरी ‘किशोर’ परमादरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रति समर्पित! ८ जागल छी कहिया सँ आदरणीय अहाँके आदर के बड रास भेटल छल कारण यौ! गुण बुझि अहींकेर जीवन के कयलहुँ बहुत किछु धारण यौ!! पग-पग जीवनके बाँचि रहल हमहुँ जागल छी कहिया सँ! माय-बाप, श्रेष्ठ सभ अपने सन देखि रहल छी जहिया सँ!! बच्चामे नहि इ बूझि पेलहुँ कि नीक हेतै - कि बेजा हेतै! बढिते रहलहुँ बुझितो रहलहुँ कि रजा हेतै - कि सजा हेतै!! स्वाध्यायक समुद्रमे जखनहि लागल पहिलुक गुरकुनियाँ! कि जलमे थलमे नभ मे अछि से भेटय लागल खुरचनियाँ!! गीता के गीत बड़ मूल्यवान्, सीखबय छै के छथि ईश महान्! नियत थीक कि, कि अछि नियति दर्शन भेटैछ एक भगवान्!! जौं कर्म हमर कोनो घटल होय तँ बस क्षमा करब तुच्छ बुझिके! बड़ चूक होइछ जँ हमरो सँ बस बिसैर जेबै हमर छूच्छ देखिके!! अपनेक अनुज ओ पुत्रवत् - प्रवीण ठाड़्ह अछि कल जोड़ि के! बस माथ हाथ अपनेकेँ होइ - पूर्वाग्रह के सभ बान्ह तोड़ि के!! ९ अपन गीत रहैत छी अपनहि मे डूबल, अक्सरहाँ बेसी काल, कनिको फुर्सत होइते देरी, ताकय लगै छी माल। ओ माल केहेन, जे केओ हमरा, पूछय हमर हाल, गीत हमरहि गाबय, छोड़िके सभ अपनहु जंजाल। रहैत छी अपनहि... ई दुनिया बनियां अछि बनल, बिसरी ई हर बार, होशियारी हमरो सऽ बेसी, सभ के लगल अछि द्वार। रहैत छी अपनहि..... एक रती के बात होइ तऽ, खींची खिंचबाबी हम फोटो, अपन बखानी अपनहि गाबी, बिसरी बाकी सब संसार। रहैत छी अपनहि.... केओ पूछय वा नहि पूछय, अपनहि बाजै छी हर बात, पसिन्न पड़ल तऽ खूब नीक लागल, वरना मारी लात। रहैत छी अपनहि..... इ हम नहि हमर अहं छी भैया, बनैत अछि हंस्सा रार, खुब मजा लूटय अछि हरदम तेकरे बुझय ई संसार। रहैत छी अपनहि..... समय सीमित बुझू मूढ प्रवीण - जुनि बहू अहिना बेकार, करू जतेक संभव अछि एहिठाम, बिसरि अहं दूमुँहा धार। रहैत छी अपनहि..... १० विडंबना इ अन्हरिया एहेन किऐक जे आँखि निपोरि सुतय लेल मजबूर करैछ? रात्रि अबैत शरीर थकैत बिछाओन मे जा नींद गाबय लेल मजबूर होइछ? भिनसर होइते सुरुज उगैते पुनः इ निंद्रा जानि कतय अछि भगैत सभके, जागृति होइत पुनः दिन भैर घूर-दौड़ होइछ सभ नित्यकर्म आ धर्म होइछ। कि चाँद अपन चन्द्ररस सँ बजबैछ निनिया आ सूर्य आनैत सौर्य अछि? कि निष्क्रियता झुझुवान करैछ आ सक्रियता सभ कीर्ति महान् करैछ? हे मैथिल! जुनि बनू कुंभकर्ण, बरु जोगी बनि करू नित्य घूर जाइग राइत भैर; जराउ झूठ शान ओ दंभ जे हरदम चान मलिन बनि हरण जागृति के करैछ। ११ मैथिल! अहाँ जुनि पड़ू पाछू। स्मृति करू ओ कीर्ति महान्, जाहिसँ अयलाह मिथिला राम, जतय विदेह सम् नृप छथि भेल, से मैथिल कोना पाछू भेल? सरस्वती जतय बसि हर कंठ, मैथिली बोली सरस ओ मीठ, समृद्ध पुरखा सबहक शान, से मैथिल कोना सहय अपमान? सुसंगठित समाजिक संरचना, आपसी प्रेम ओ मधुर सम्बन्ध, पछड़ैत जन के सम्हारैत बढनै, से मैथिल कोना सिखलैन टूटनै? घर फूटै तऽ लूटै गंवार, भाइ-भाइ सभ अपन संसार, मिथिला बनि गेल सुन्न मशान, से मैथिल कोना राखब जान? जागू यौ जागू! मैथिल बनू होशियार, जुनि बेचू अपन मायके दुष्टक हाथ, सभ दिन दुर्जन मिथिला के विरुद्ध, तेहेन संग कोना गढी संगत शुद्ध? आइ बँटल दू देशक बीच, तैयो अस्मिता बनले रहतै, केवल बनू अहाँ होशियार, तखनहि उतरब पार मझधार। मैथिल! जुनि पड़ू पाछू। १२ मिथिला माय करैथ पुकार बेटा! जागु आबो बनु होशियार! दुश्मन के करू खबरदार! दोसर भावे जड़ैछ अहाँ सँ, हुनका संग करू मृदु व्यवहार। स्वयंमे जे अछि कायर घनघोर, माइर भगाबू कर्महि धार। दूर भगाबू दहेज के कूरीति, मानू बेटी सभ के सुन्दर नाज। मातृ ऋण सँ उऋण बनू, करू जगत् मे सुन्दर काज। मिथिला सदिखन उपमा बनल, आइयो चलय सब उच्च संस्कार। राखू लाज माय के आबो, एकत्रित बनि राखू ताज। मिथिला माय करैथ पुकार! १३ माँ, धन्य तू जे हम छी! धन्य हमर भाग जे तू हमर जननी छें। धन्य तोहर तप गै माय जे जीवन बनल सफल अछि। बिना तोहर कर्ज हम तऽ दुनिया के नहि देखितौं माय। तोहरे दूध के अमृत सऽ अमरता भेटल लगैछ आय। दुःख मे रहि तू कोना के पोसलें इ हम कि बखान करी। एक बात हम बुझैत छी, तू सदिखन रहलें एक समान। त्याग करैत बलिदान करैत अपन मन के रखलें तू सम्हारि। यैह तपस्या तोहर गै माय आय बनेलक हमरो शान। माँ, धन्य तू जे हम छी। बाप हमर रहलथि बड़ अयाची, नहि रखलन्हि कोनो मान-अपमान। समत्व योग के गुण सँ भीजल, जपलन्हि सदा मन सऽ ईश-महान। माँ, धन्य तू जे हम छी। १४ माय माँगैथ खून जखन खून हेतैक विश्वास के, जखन अपमान होयत मायकेर अस्मिताके, जखन लूटत केओ स्वाभिमान के, तखन माय के आँखि सँ ज्वाला निकलय, आह्वान करय सभ पुत्र सँ, जागे बेटा आब जुनि रहे सुतल, उठा हाथ मे सत्यके हथियार, बचा मान तों माय के, हमलावर के कर पहचान, राख स्मिता निज-भूमि के, बहुत भेलहु रखलें बन्धक तों, मायके लहठी ओ चूड़ी, आबो ला एकरा तों वापस, पटना के बेईमान से, जुनि बिगड़े अपन इच्छा सँ, नून-तेल मे कय ले गुजर, कोनो जरुरी नहि छौ तोरा, पटना-मगध-भोजपुर मजबूर, अपनहि धरती सोना उपजय, बनो अपन सुन्दर भरपूर, आब बिहार के माया छोड़े, बनो मिथिला राज के पुर, कर सभ नाका बन्द ओकर जे, मानय नहि छौ बात, चलो प्रशासन अपनहि अपन, छोड़ हेहर के बाट, बन्द करे सभ मौगापन, बुझ पहचान के असली मोल, पूर्वाग्रही पड़ोसी सभ छौ, कर ने एकर आगू विश्वास, तोरे संपदा सऽ बनल व्यापक, तोरहि सभ पर करे ओ राज, एहेन राज के जंजीड़ तोड़े, बचो माय के आबो लाज, एहि लेल बहो आब रक्तके धार, मिथिला माय मनतौ आभार, बेर-बेर हमर क्रन्दन सुन, माँगय माय आब तोहर खून। १५ एखन हम कतय रही, एखन हम कतय एलहुँ एखन हम कतय रही, एखन हम कतय एलहुँ, आकाश सऽ सीधा धरती, धरती सऽ पुनः पाताल, इ मन हमर कत चञ्चल अछि, जानि कतेक भागय ई, मातृभूमिक सेवा - संस्कृति लेल कर्म - धरोहर के संरक्षण, क्षण मे बदलि गेल सभ विचार, देखि एक नग्न तस्वीर, कि हम एतेक धृष्ट छी? कि हम एतेक भ्रष्ट छी? जीवन के किछु होइछ अर्थ बुझू, मिथ्याचारके बंद करू। १६ अहं करैछ दुइर। एक रत्ती नाम भेल, बिसैर न एलौं घूइर, याद राखू फल्लाँ बाबु, अहं करैछ दुइर!! दुनिया के छल, आश इ लागल, बनला गौंआ बड़का लोक, पलटि नहि सुनलौं, रखले रहल, हुनक प्रेम के रंग अनमोल। एक बेर - दु बेर किछु बेर अपन संग दैत जे कर्ज देलहुँ, अवसरपर सभ बिसैर के कर्तब, कैलो पर पैन फेरि देलहुँ। हरदम अपन नाम के मदमे चूर रहब तऽ खसब एक दिन, तहिया कतबू बजेबै लोक के देखत सभ नजैर सिर्फ घिन। बड़का लेखक कलाकार या विद्वानो के एहसास इ अछि, जीवन के क्षण अलग रूप मे बदलैत अन्त अवश्ये अछि। सोचू! किछु नहि जाय संग मे, केवल रहय कीर्ति अजीब, धनिकाहा के सभ केओ मित्र, श्याम मित सुदामा गरीब!! १७ जयकारा चारू कात मातारानी के जयकारा के शोर छै। शक्तिदात्री माँ जगत् के जननी, हिनकहि सगरो जोर छै॥ अहु जगह ऊपर सभ केओ, पूजा करैत मगन छथिन। एक-दोसरके शुभकामना दैत, सुमिरन सभ करैत छथिन॥ चारु कात .... नारी शक्ति के देवी शक्ति, मानय जाउ यौ भाइ सभ। स्वच्छ समाज के निर्मात्री के, पूजै जाउ यौ भाइ सभ॥ चारु कात.... दहेज के मारि सँ नारीके, अपमान करैत अहाँ लाज करू। जनिक संग सँ अगिला पीढी, त्राण करैत अहाँ लाज करू॥ चारु कात.... मातृभूमि मिथिला वा कोनो, तेकरो अहाँ निज माय बुझू। जहिना माय के पूजा करी, जन्मभूमि लेल किछुओ करू॥ चारु कात..... अपन जननी सत् शक्ति स्वरूपा, दूधके कर्ज केँ मान बुझू। हिनक वृद्धापन या होथि ऊपर, सेवा मिलि सपरिवार करू॥ चारु कात.... अन्तमे हमर इ विनती यौ बाबु, बेटा बेटी एक बुझू। भेद केने ओ दबल बनल अछि, दुर्गा जी के भक्ति करू॥ १८ अफसोस अफसोस जे केओ सच मंशा नहि बुझैत किछु बाजि देलक। जे गैर देलक ताहु लेल नहि बल्कि धमकी सऽ झाड़ि देलक॥ अफसोस जे केओ सच .... सच के शक्ति नहि बुझय केओ, बस मन के बुद्धि महान् बुझैथ। पर सद्कृपा सत् सदिखन होय, शरणागत के भगवान् सुनैथ॥ अफसोस जे केओ सच.... मन कानि उठल के मैथिल आइ, मन हमर बहुत हद तोड़ि देलाह। हम कि सोचलहुँ, ओ कि सोचलाह, विश्वास के पूरा घोरि देलाह॥ अफसोस जे केओ सच.... मन गढंत बात के दाम नहि होइछ, कतबू चिचियाय बजैथ केओ। असली के शान कथमपि नहि घटैछ, कतबू घिसियौर कटैथ केओ॥ अफसोस जे केओ सच.... ईश्वर के कृपा सच कवच बनय, शिव त्रिशूल सदा त्रिताप हरय। आगू सदिखन हरि-हर जी हमर, पाछू सऽ सहारा आप बनय॥ अफसोस जे केओ सच.... हम हृदय सऽ गोहारी ईश्वर के, सुनि लैथ हमर ओ करुण पुकार। करि सत्य जीत, बचे भक्ति मीत, सुधि लैथ सदा दुर्जन दुश्तार॥ अफसोस जे केओ सच.... १९ गप्पी मैथिल छोड़ि दिअ यदि गप मारय लऽ, तऽ सभ सऽ बड़का हमहीं छी। बिन पाँइख उड़ैते-उड़ैते हम, नभ विचरि-विचरिके थाकल छी॥ जेहो छल सत् बल तंत्र-मंत्र, सभटा के तक्खा पर छोड़ने छी। हम ढीठ बनल आ बनल हेहर, लत बत रगड़ा थरकौने छी॥ छोड़ि दिअ यदि.... केओ नीक कहय से ललसा मे, अपनहि सँ मुँह चमकौने छी। बिन बोलाहटे के पंच बनि, मुँह-पुरुख बनल झमकौने छी॥ छोड़ि दिअ यदि.... केओ काज कहय कोनो करय ले, लाख बहाना जानैत छी। कोढिया भीतर बैसल यऽ हमर, पर फुर्सत नहि हम कानय छी॥ छोड़ि दिअ यदि..... हम ई करी या ओ करी - हा करी या ना करी, बात बड़ा भरियौने छी। असलीमे हमर कोनो शक्ति नहि यऽ, दिन-समय केनाहू काटैत छी॥ छोड़ि दिअ यदि.... २० संग यदि काज के बेर मे अहाँ संग नहि तऽ कहू अहाँ के कि कहू? यदि लाज बचाबय लेल ढंग नहि तऽ कहू अहाँके कि कहू? भले एसगर होइ, बस आगू बढी, कतबू किछु होइ पथ विचार चली, यदि सोच हमर कोनो नीक नै लागे तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि संग चलै के मोंन नै होय तऽ कहू अहाँके कि कहू? प्रकृति अपन अछि रुचि अपन, लगन अपन अछि साधन अपन, यदि संग दरिद्री कम नहि होय तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि बुझितो सभटा बेहोश रही तऽ कहू अहाँके कि कहू? जतबी संभव ओतबी करू, मुदा लाज बचु यदि काज करू, यदि निर्लज्ज बनै के बैन बनल तऽ कहू अहाँके कि कहू? यदि कर्म अपन सभ छोड़ि बसय तऽ कहू अहाँके कि कहू?? २१ अपन सोच अपन, विचार अपन, काज अपन, जहान अपन, जीवन अपन, मरण अपन, शान अपन, मान अपन॥ संसार अपन, सभ अपन, ईश अपन, दोष अपन, रोष अपन, होश अपन, जोश अपन, नेह अपन॥ अपन यदि छी स्वयं अपन, सभ केओ अपन रहतै अपन! २२ छी ना!! कतेक बेर एकहिगो गप बजबाबै छी... यौ घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना!! कहलहुँ मैथिलीमे एतय बाजू... कहलहुँ मैथिलीमे एतय लिखू... तैयो जानि-बूझिके बातो के ओझराबैत छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥ कहबी छै सभ सच्चे छैक.. अपन त्यागि पहिरी अनेक... कौआ कतबू पहिरय पाँखि मयुरक नाटक छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥ सुधरू पहिले अपन चालि... देखब बाद मे रजनीति डाइर... भ्रष्टाचार या आरक्षण के झमारल छी, घूरि-घूरि घूरियाबैत छी ना॥ २३ झुंगनी कोना गेलौ सैड़? रे ठकबा कुजरा - झुंगनी कोना गेलौ सैड़। यौ मालिक, कीड़ा गेलै फैड़॥ हम नहि बूझी कि होइछ कीड़ा, खाली जानी खायब खीड़ा, यदि लगलौ खेतो मे कीड़ा, सह तू एकसरि सभटा पीड़ा... झुंगनी कोना गेलौ सैड़.... रे ठकबा कुजरा.... यौ मालिक..... ईशके हाथ मे फल के जिम्मो, हमर काज छल कैल ने कमो, धूप-बरखा के माटिपर धमो, झुंगनी गेलै जे सैड़, यौ मालिक... रे ठकबा कुजरा.... २४ गाम कनै यऽ गाम कनै यऽ ग्रामीण हंसै यऽ, सोचियौ कनि ओरे सँ। मिथिला माटि के शान घटै यऽ, देखियौ कनि ओरे सँ॥ गाम कनै यऽ .... एहि भूमि के मान बढेली, जगजननी सिया जन्म लेली। पुरुषोत्तमके चरण रखैत एतय, अभगदशा सभ दूर भेली॥ कहु यौ भैया, कहु हे बहिना - २, मन के भीतर छोरे सँ। गाम कनै यऽ.... अंगना निपैत अहिपन पारैत, केराके पातो पर देव आबैथ। ऋषि-मुनि के भूमि रहल ई, रिद्धि-सिद्धि अपनहि आबैथ॥ आइ दरिद्रा घून लागल अछि - २, घटल छटा अछि नोरे सँ। गाम कनै यऽ.... कतबू रहियौ देश-परदेश, गाम पठबियौ अपन सनेश। कंजूसी के छोड़ियौ आबो, आ आन्दोलन करू श्रीगणेश॥ मिथिला राज्य वा दहेज उन्मूलन - २, बचबू धरोहर जोरे सँ। गाम कनै यऽ.... छिटफूट सभ केओ कतबू कुदबै, एहि सऽ नहि चलतै कोनो काज। गाम-गाम के संगठित करबै, तखन बनेबै सुच्चा मिथिला राज॥ आब बहाना नहिये चलत - २, लगियौ दिल के पोरे सँ। गाम कनै यऽ..... २५ तुकबंदी कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू! करमे अपनो नहि कोनो काज, अगबे शान के झारमे राज, मन मे एतहु से सभ बाज, चोट्टा तोरा नै कोनो लाज॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! १०० मे ८० भेलौ बेईमान, तैयो कहतौ देश महान्, एहेन फुसियांही के आन, कह कोना चलतौ फेरो शान॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! कहबौ खूलि के सभटा बात, तहियो देमे नहि तू साथ, बघारमे बुद्धि के तू साज, चुप करमे कर्मठ के आवाज॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! छोड़लें गामो के तू बाट, रहै छें परदेशे मे ठाठ, नहि कोनो मतलब माइयो-बाप, भेलौ करनी तोर सपाट॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! यदि इ भेलौ कोनो गैर, तखन तू खोले बन्द नजैर, ‘प्रवीण’ आबो जो सुधैर, नहि तऽ मिथिला देतौ मैर॥ कोयलिया कुहू-कुहू, निकम्मा इहू-इहू!! २६ इन्सान-महान जनैत छी अपने लोकनि जनता, जनैत छथि भगवान्। अपने मुँह सऽ कि हम कही, किऐक माँगी सम्मान॥ सत्य अगर अछि धर्म हमर आ कर्म करब सब महान। त्याग करब यदि सदिखन हमहुँ कीर्ति बनत जगजान॥ अभ्यासे सऽ विद्या बढैछ, परोपकार सँ बढैछ मान। सम-दृष्टि जँ सदिखन राखब पायब आत्मसम्मान॥ याचक बनि आयल एहि धरापर, पाबय लेल जे ज्ञान। मार्ग मुक्ति के जँ चाही तऽ, भक्ति के मार्ग सँ त्राण॥ संसारक सांसारिकतामे जुनि उलझू अन्जान। प्रेमके लेना - प्रेमके देना केवल बनू इन्सान॥ २७ किछु बात करी मोंन कहैछ किछु बात करी, अपने सँ - अपन हाल पूछी। ‘कोना चलत जीवन’ इ राज बुझी, द्वंद्वरहित समत्व सही॥ मोंन कहैछ किछु बात करी.......... जन्म-मरण के धारा, ईशके नाम आधारा। समय बीतैत बेचारा, के बनैछ सत्य सहारा। हर तीर सही, न अधीर बनी, निज आत्मरूप के बोध करी। मोंन कहैछ किछु बात करी...... देखि समग्र इ शासन, लौकिक राज्ञ प्रशासन। रोग-शोग के राशन, मिथ्या केवल भाषण। नहि नोर भरी, नहि शोर करी, देखी ओ सनातन हर और हरी! मोंन कहैछ किछु बात करी...... ओ चलिये गेल, देखैत सभ खेल आ संगक ओ मेल। तहियो हमर पड़ि गेल नकेल, पटरी सँ उतरल जीवन के रेल। आब कि तकैछ कि रहि अछि गेल, जीवनके लेल सभ भेल अलेल। मोंन कहैछ किछु बात करी....... २८ भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! कतबू देखय झूठ नौटंकी, मेघक घटा घनघोर, मुदा बुझे जे सत्य इ छैक जे डरा रहल छौ चोर!! भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! आरोपक अंबार लगौलक, उल्टहि चोर कोतवाल के डटलक, मुदा नहि लागल ओर! भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!! चन्दाके धन्धा कहि दमसल, भीखमंगा के संज्ञा देलक, पर न डिगल मुँह मोर, भाइ रे! डरा रहल अछि चोर!! बाबु ओकर खुबे पढेलकै, एहि आशमे जे पाइ बड भेटत, मुदा नहि छोड़बै पछोड़, भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! सोचैत अछि जे भभकी सँ, धमकी सँ आ गुम्हरी सँ, बन्द होयत ई घोष, भाइ रे!! डरा रहल अछी चोर!! जे किछु करब से शरण हुनक रहि, सभटा अगुवा हुनकहि पर छोड़ि, लागी हुनकहि गोर, भाइ रे!! डरा रहल अछि चोर!! २९ स्वार्थी दुनिया स्वार्थी दुनिया सऽ रहू सदिखन सावधान ओ मोलके नहि करैछ कथमपि सम्मान, डेरायल रहैछ केवल भ्रान्ति सऽ हरदम, भरत दंभ जेना मालिक रहय ओ संसारके, लेकिन ओ अपनहि भीतर रहैछ कमजोर, प्रश्नके बौछाड़ ओकरा रखैत अछि परेशान। ३० हेरै! सिखमे कि नहि!! मैथिली बजमे कि नहि!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ परेशान!! जानि कतय छथि ईश्वर महान्!! देखू नऽ, कहैत-कहैत हम गेलहुँ थाकि, तैयो नहि बुझैछ इ नवका तुरिया, लिखैत - बाजैत अछि अंग्रेजी-हिन्दी, पकड़ि-पकड़ि स्पीकर माइक!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ ...... :) ऐँ यौ! कहीं पेटहिमे तऽ नहि इ सिखलक, माइयो एकर अंग्रेजी बजलक, तखन कहीं इहो अछि बदलल, कोना करब एकरा हम सोझ, ओझरी लागल बुझैछ बोझ... भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ ..... :) शपथ खाइ छी, एकरा पढैब! बाजब सिखैब, लिखब सिखैब!! जतेक सकब अपनहि हम करब, बाकी करता भाइ-बहिन, काका-काकी, मामा-मामी, पिसी-पीसा, ईश्वर दहिन!! भाइ रे! बाबु यौ!! हम भऽ गेलहुँ .... शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), पिता: श्री श्यामानन्द झा, ग्राम+पोस्ट: गोविन्दपुर, भाया: प्रतापगंज, जिला: सुपौल। गजल सोचै छी हम एकबेर बनि जैतिहौं जँ फेर सँ नेनाभुटका बच्चा टहैलि आबितिहौं बाड़ि-झाड़ि, खादि-खन्नर, पोखरि, डाबर, चभच्चा खेलैबतिहौं नरकैटक बन्दुक, बजैबितौं केरापातक पिपही, घसि-घसि बनैबतिहौ सीटी-बाजा, उखारि ओंकरल आमक बिच्चा उछैलितौं, फाँनितौं, घुमितिहौं घुमरि, खेलैबितिहौं करियाझुम्मरि करितौं हो-हो, बनितौं मरूआक ढ़ेरी, उरैबितौं थालक फुरकुच्चा चढ़ितिहौं जँ आम, लताम, जामुनक गाछ, झुलितिहौ डारिक झुल्ला कुतैरतिहौं टिकुला आ फुल्ली-बाति फर, मारितिहौं कच्चा पर कच्चा घिचितिहौं झोटा-चोटी,, घोलैटितौं भुइयाँ, कनितिहौ हकपुत्तर साँझ-बाति जँ घुरि अबितिहौं अँगना, मारिते माय, बौसतिहै चच्चा मनक सेहन्ता मुदा घुमरि-घुमरि रहि जाइ ये मोनेक भीतर सभटा भs गेल आब ई दुःसपना, जेँ चढ़ल ई यौवन अधखिच्चा "शांतिलक्ष्मी" शहर-गाम मे देखय बस एक्के रंगक रंगल छीछ्छा छेटगर होइते पाछु पड़ि जाइ छै टोलक बूरल लफुआ लुच्चा वर्ण २५........ गजल कोबी, टमाटर, भट्टा, ये लय आर जाय जैइबै मिरचाय ये लहसुन हरदि उहो छै, ये सुनय आर जाय छीयै माय ये ये गिरहतनी लय जैइबै त बाजु सुभिते मे दै देब आइ चिजो भेटत एकलम्बर, एक्को चिज नै भेटत अधलाय ये कोबी टमाटर धानक तीन खुटे, भट्टा मिरचाय फाँटि कय अल्लु चलु बरोबरि, मुदा हरदीक लागत नकत पाय ये हे गिरहतनी फाs लत तै लइये लेबय की करी दाम कम आढ़त जेइबै पता चलत कोना आगि फेकय मँहगाय ये हे माय कटहर नै किनलियै ओतहे चालीस के रहै किल्लो अहाँसीन सेहो एक-दुइ किनै पुज्जी कोना दितिहै फँसाय ये " शांतिलक्ष्मी" सोचय काल्हि चाहा-चिड़ै जकाँ भल्हों होइ अलोपित कुजरनीक बोली आइ गामक छीये बड़ अनुप मिठाय ये वर्ण २३......... गजल शिशु सिया उपमा उपमान छियै हमर आयुष्मति बेटी मैत्रेयी गार्गीक कोमल प्राण छियै हमर आयुष्मति बेटी टिमकैत कमलनयन, धव-धव माखन सन कपोल पुर्णमासीक चमकैत चान छियै हमर आयुष्मति बेटी बिहुसैत ठोर मे अमृतधारा बिलखैत ठोर सोमरस शिशु स्वरुपक श्रीभगवान छियै हमर आयुष्मति बेटी नौनिहाल किहकारी सरस मिश्री घोरल मनोहर पोथी दा-दा-ना-ना-माँ सारेगामा गान छियै हमर आयुष्मति बेटी सकल पलिवारक अलखतारा जन्मपत्रीक सरस्वती अपन मैया-पिताश्रीक जान छियै हमर आयुष्मति बेटी ज्ञानपीठक बेटी छियै सुभविष्णु मिथिलाक दीप्त नक्षत्र मातृ पितृ कुलक अरमान छियै हमर आयुष्मति बेटी "शांतिलक्ष्मी" विदेहक घर-घर देखय इयह शिशुलक्ष्मी बेटीजातिक भविष्णु गुमान छियै हमर आयुष्मति बेटी ..................वर्ण २२................ गजल गुनगुनाइत प्रेमक गीत लs कंठ भेल सधुन सितार पिया सिनेह खेल काल कियैक ऐना देखबैत छी लटमझार पिया काटु जुनि एहन जोर सँ बड्ड दुखाइत अछि ई लहरचुट्टी देखु सम्हैर चलु सुकुमार आंगुर नै आबि जाय मोचार पिया कचोर हरियर गभाइत धान सन गम्हरैत ई स्त्री-यौवन एहन तन तरुण केर भुखायल छैक सगर संसार पिया सुमधुर अहाँक प्रीत संग गमकैत अछि हमर सुबदन प्रेम-पाशक बान्हु जुनि छान खसब हम धड़मबजार पिया अनुराग-बिराग आतिपाति खेलि कतैक स्नेह-कलह करब उढ़ैर रहल आब मोन मे उठल सभ मधुरस शृंगार पिया "शांतिलक्ष्मी" कहैत छथि ऐना जुनि विचलित मोन हौउ हे सखि भरि आँखि सुप्रीतरस लs मुस्कैत भावैं भs गेलाह देखार पिया ................वर्ण २४............. गजल धधकलै सौंसे घरक लोकवेद डिविया लुक्का भs गेलय फेरो बेटीये भेलय सुनिते अगिलग्गिक धुक्का भs गेलय सौस ससुर दुनुप्राणिक मुँह बिधुयैल बकोर लागल अधकचरुस तमाकु सन धुयैन मुँह हुक्का भs गेलय बर हुनकर ओम्हर तामस सँ बोतलैल घुरै सगरे लागय घरमे एखने चोरी चपाटी घरढुक्का भs गेलय परसौतीक बाप माय केँ सभ दिस सँ हुरकुचैन पड़ै माँझघऱ लतियाति गरकैत लतिकुच्च चुक्का भs गेलय दर दुश्मनक करेज जुरैले तेँ ते हँस्सै-बाजै मुस्कियावै मुँह लाल सिनुरिया आम डम्हकैत देखनुक्का भs गेलय अपना बेचारी प्रसवक पीड़ो सँ बेशी मोनक बेथै मरै मुँह फूल मौलायल वा फुलिकेँ-चुटकल फुक्का भs गेलय ’शांतिलक्ष्मी’ तेँ समाजक आचार देखि भालरि सन काँपय कलपैत छाति पर दनदन बरसैत मुक्का भs गेलय .........................वर्ण २२......................... गजल लोकपाल! लोकपाल! जनलोकपाल! जनलोकपाल! देसधर्म रक्षा लेल घुरि आउ हे गोविन्द! हे गोपाल! कुरुक्षेत्र मे ता बाकयुद्ध केर घमासान मचल छै अधर्म कपटी-भूप जनताकेँ पटकवा मे बेहाल गोंगियाइत राजाक बेलज्ज प्यादा फुच-फुच उछलै राज-मोहक आन्हर धृष्टराष्ट्रक घिचपिच घौंचाल दुर्योधन-दुसाशन राष्ट्रक चीरहरण लs आतुर राजलक्ष्मी केँ नग्न नचेताह मातृभुमियेक भुपाल भीष्म द्रोण कर्ण पदत्यागि केँ धर्मक संग ठाढ़ भेल लs लोकतंत्रक अस्त्र, सत्य-अहिंसा उपासक सुढ़ाल "शांतिलक्ष्मी" कलजोड़ि अनुनय सुविनय करै अछि हौइयौ आबो प्रगट हे कृपाल! हे प्रभु दीन-दयाल! .................वर्ण २०............. गजल सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय जखन चुट्टी केँ घरघरावै मौत निकैल आबै छै पाँखि आकि नढ़ियाक पैइर जे शहर दिस पराबी रे भाय राखै देने छियौ बंदुक तँ देखवै छै हवलदारी रौव पदक निंशा मे एना भँगेरी जकाँ जुनि बौराबी रे भाय नागरिक अधिकार मान केँ मरदें भs गेल छै हिंसक हमरे पोसल बिलाय हमरे मिआँऊ सुनाबी रे भाय देसक दहिण करूआरी धs तुँ हमरे प्रतापेँ बैसल हमरे किचकिचावै की फ़ुरलौ जे मल्हार गाबी रे भाय "शांतिलक्ष्मी" अहुँ नै करी अमोघ अस्त्रक अभद्र प्रयोग पाकिस्तानक हाथ जेना अणुशक्ति शालाक चाबी रे भाय ................वर्ण २१........... गजल पले पल प्रेमक प्यास लागय आब फ़ेर कहिया मिझायब यौ रूइसकेँ तँ जाइत छी परायल पिया फेर कहिया आयब यौ पचासे हजारक लेल ऐना तामसायल छी कथी लय पीतम काज अस्सल फेरसँ हम अपन माय बाबुजी केँ बुझायब यौ परुके साल एल.सी.डी. आओर फ़ीज बाबुजी रहैथ कीन देने कहै छलाह अपन जमायक एहिना सभ सsख पुरायब यौ मोटरोसाइकिलक सsख अहाँक ओहो जल्दीये कय देता पुरा बस आब दसे हजार रुपैया बचल आरो छैक बचायब यौ बाबुजीक आय छैक बड़ कम खर्चा अथाह अपरम पार यौ तैपर मासेमास भायकेँ पढ़ेवाक खर्चा होस्टल पढ़ायब यौ साल दुई साल तक छैक सेहो दस लाख दान-दहेजक खर्चा वयस बितल जाइत छोटकी बहिन केँ पहिने बिहायब यौ बर हाथ लगैल बेटीक ऐतै करैथ बाबुजीयेक बड़प्पन बुझनुक लोक स्वयं अहाँ छीहै हम गमारीन की बुझायब यौ कहै छी हम बेचि लिय हमर सभटा गुड़िया गहना जेब़र सोन शृंगार नय रहत तेँकि पिया हम उढ़ैर नै जायब यौ हम अहाँकेँ छौड़ि कतय जायब पिया, छौड़ि कतय जायब यौ चाहे मैरि-जैरि आब वा सदेह सिते जकाँ मैटिये समायब यौ "शांतिलक्ष्मी" कहैत छथी यौ अहाँ तिरहुतक सर्वपुज पाहुन और कतैक दिन धरि विदेहक बेटी जाति केँ सतायब यौ ....................वर्ण २४.................. गजल विकासक आगु विचार देखियौ कोना खसल जाइत छै लिअ’ लोगबाग आब प्रगतिक पथ चढ़ल जाइत छै बुढ़-पुरान सँ सिनेह-भावक भs रहलै अभाव आब स्थुल माय-बापक निमेराक तँ रीते उठल जाइत छै बुढ़वा-बुढ़िया केँ भिन कs बेटा गप भँजे छथि सुभ्यस्त आब कोवरे सँ गिरथैनि बहराति देखल जाइत छै कोर पोसल स्वपुत जखन भs रहल छै कर्तव्य च्युत भावक धर्मपुत पाबि बुढ़ाकेँ नोर ढ़रल जाइत छै खड़ खड़ जोड़ि जे ठाढ़ केयलनि आश्रम घर गृहस्ती वैह बुढ़ घरसँ निकैलि बृद्धाश्रम ढ़ुकल जाइत छै बुढाक स्वर्ग सिधारैक पसरल छै भोरे सँ घुनसुन मुदा कनना-आरोहैटक आइ लाजो उठल जाइत छै "शांतिलक्ष्मी" हँसै सोचि सोचि चौथापनक अहाँक दुर्गति इहो वयस बुढ़ापाकेँ तँ ओहिना गुड़कल जाइत छै .....................वर्ण २१................ गजल मैथिलिये केँ सभ दिन तँ खोरि-खोरि खाइत छी तैयौ हुनके सेवा मे एना कियै नितराइत छी जे दिये दही-चुरा दिस तकरे के राखै छी नीति अपना मुंहेँ सैह बाजय मे किये चोराइत छी जाधरि खेलौ ताधरि गेलौ के रखने छी नियत राखिकेँ भरि मुंह मधुर कियै गोंगियाइत छी बुझलौ जे पाग बदलै मे अछि बड्ड चट्टकैति अछि सभ तेँ बुझिते तखन कियै औनाइत छी पैर छुबि-छुबि सभ दिन बढ़लौ ये अहाँ आगु सत कही तेँ हमरा पर कियै खिसियाइत छी निकाललौ बेगरता तँ टीक पकड़ै के आदत कियै घाट-घाटक पानि पिवै एना बौवाइत छी "शांतिलक्ष्मी" बुझैत अछि अहाँक सभटा अस्सल झटकल डेग मे कोना आगु बढ़ल जाइत छी .......................वर्ण १८.................. गजल अपने पुरखाक मानदानक जड़ि कोड़य मे सभ लागल छै कियो ककरो कहै घताह कियो ककरो कहै निटट पागल छै बाँसक बंश केँ उकनै बाँसे देखू कुढ़ैड़क पोन मे छै पैसल फ़ाटैत मानक चद्दरि केँ सिबै सुईक पोन कियै नै तागल छै अपने लोकक टाँग घिचैत बेंग केर बनल सभकियो खिस्सा माय सुमैथिलीक करमे बुझाइत आइ भs गेल अभागल छै बरदक कान्हक पालो जनु बुझाइत धीयापुता केँ बड़ भारी छुट्टा खाइत बौआइत एनाहैत जेना अड़िया बछ्छा दागल छै अपन लोकवेद केँ आगु करय आइ जखन दुनियाँ चेतल हमसभ निभेर भेल तैयो सुतल, कहु के कतय जागल छै अहंकारक धाह तापैत मैथिल जनगण छथि अगरमस्त समाजक एहन विचित्र स्वभाव सेँ "शांतिलक्ष्मी"यो नै बागल छै ..........वर्ण २४........ गजल पेट मे भल खड़ नै हिनका मुदा सिंघ मे तेल छै माय कहै बौआ हमर नुनुआगर, बुरलेल छै जीटजाट फ़ीटफ़ाट, मारय सीटल बिछान सन मारल कंघी लटुरिया जुल्फ़ मे गमकै फुलेल छै जेहने चढ़ल पंथ बौआ तेहने होइन्ह संगति तीन खेप मैटरिक फेल दोस, फेलो मे फलेल छै लभ लिखल फ़ोनटेन लभे उकारल कुंजी-झावा लभ घसल तरहैत तँ कामदेवक गुलेल छै तीर तरकस सँ लैस बोआ चलला शिकार पर कान्ह पर हाथ देनय संगबै भजारी टंडेल छै अंगना घरक नुनुआ छथि सड़क पर उचक्का भरल चालि ढ़ालि मे अवरपनीक अटखेल छै "शांतिलक्ष्मी" देखय छत पर षोडषीक काकचेष्ट बाट ठाढ़ बौआक आंखि मे बकोध्यानक झमेल छै .........वर्ण १९........ वियाह मैथिल धराक मुइल सभागाछी, जनमलाह नवरूपक अवतार लs इन्टरनेटक ’मेट्रीमोनियल साइट’ आ प्रिंट-मिडियाक रविवारीय पन्नाक वैवाहिक विज्ञापन/कथा-उथान मेl तयौ सभ पर भारी छै आइयो घरकथाl गान्धर्व वियाह छै एखनो झाँपले-तोपल, शरशय्या सौराठक अपन करूण व्यथाl मिथिलाक सुयोग कहावै वाला वरगण केँ चाही मनपसंद अधुना-अर्वाचीन कनियाँ, तकै जाइत छथि वैवाहिक-विज्ञापन सँ सुन्नरि, अंग्रेजी स्कुल-कालेज शिक्षित, मुदा अपन ’कल्चर-ट्रेडिशन’ मे ’वेल-ट्रेन्ड’l आधुनिक वर मे पसरैत ई छै नव ’ट्रेन्ड’l पुरुखगण पकरै छथि बदलैत समयक नब्ज़, कनियाँ देशी वयना मे फ़ेटल अंग्रेजी शब्दl सुन्नरिक अटपट परिभाषा छैक जटीलl वरक अप्पन आ घरक लोकक पसिन्न- होइ छैक अकसर मुरी मुरी मतरभिन्नl कटगर मुँह-कान, होइ पतरका नाक-ठोर, ललकी गोराइ होइ आकि दक-दक गोरl आमक फ़ारा आ डोका सन-सन आँखि, नमगर-छहरगर, मुँहक खिलता पानिl घिचल-घिचल आंगुर, हाथ-पारि सुकुमार, शैलज्ज, शालिन, सददि हँसमुख व्यवहारl सुचेष्टा, चलव-बुलब, पहिरव-ओढ़व आर- गप्पे-सप्प सँ बुझाइत नीक आचार-विचारl बढिया होइक जवानियो केर लहरैत उफान, छौड़ीक देह मे होइ देखनुगर वयसक चढ़ानl यौवन धन होइक उत्तम/सवोत्तम, सोहनगर, लड़की भेटय परम सुपवित्र, देहक रौनकगरl अंग्रेजी स्कुल-कालेजक शिक्षिता चाहीl नोकरिया वरक बेशीतर नोकरिये मन, तहु मे जेहने अपन नोकरी तेहने पसन्नl वा पढ़ैत इंजीनियर, डाक्टर, एम.बी.ए., आकि एम.ए.सी. इन माइक्रोबाइलोजीl मास्टर डिग्री इन सोसलसाइंस/सोसलवर्क, वा स्पेसल ट्रेनिंग इन ह्युमेन-साइकोलोजीl नहि तँ कम सँ कमतर इयह सेहन्ता- बी.एड. होइ, आनि कि स्कुली शिक्षिकाl ग्रेजुएट तकैत जाइत छथि केहनो ग्रेजुएट मास्टर धारी केँ चाही साइंस/आर्ट मास्टरl गाम-घरक मुरखो-मोचन्ड आब माँग करै हमर कनियाँ हुअय पढ़ल-लिखल साक्षरl अपन ’कल्चर-ट्रेडिशन’ मे ’वेल-ट्रेन्ड’l एहि मादे बिना दुविधे बुझु जे ऐहन- सीता, सावित्री, गौरी सनक हुअय पतिव्रता, भारती, मैत्रेयी, गार्गी सनक सुबुद्धिमताl सास-ससुरक सेवा सँ कखनो नै औगताय, कुल-मान हेतु केहनो बिपत्तिये नै घबरायl पर-पाहुन संग करैथ उचित व्यवहार, माय बाप सिखेनै हेथीन मिथिलामक आचारl बुझैथ पुजा-पाठ, उपास-हरिवास, पावनि-तिहार, आर आनो-आन छै मैथिलाक मेहका सँस्कारl गोसौनीघर, पंचमुख/कृतमुख/पार्थिव महादेव, शुभ/अशुभक अरिपैन, आ जनैथ सामा-चकेवl सौहर, समदौन, रास, गवैथ फ़ागु, चेतार, गोसाउनिक गीत, बुझैथ मैयाक सोलहो श्रृंगारl हवाबड़ी, अदौरी, कुम्हरौरी बनैब मिथिलामेक अंग, बिलिन नै हुअए जनउ बाँटब, माजब, रंगैय तंतl मैथिल ’कल्चर-ट्रेडिशन’क ओना बड़-बड़ गुण, कनिया हुअय एहि सभ कला मे अधछिधो निपुनl वरक विज्ञापन मे ओना नै भेटत दहेजक चरचा, पाय खरच नै हैत- ताहि लेल नै रहु दुमरजाl बेटी जँ जनमेने छी तँ ई स्पष्ट बनै छै आधार, दहेज पुरुखक पिताक थिकै जनमसिद्ध अधिकारl बुधियार बेटीक बाप केर तेँ अगिते अभियर्थना, "डिसेन्ट मैरेज"क पहिने दs दैय छथि सुचनाl लड़कीक रूप, गुण, सुसंस्कृति, नोकरी, शिक्षा- तय करै इयह दहेजक लेन-देनक गुण आ मात्राl तैयो कलक्टर/एस.पी दहेज लै छैथि पुरा करोड़, डाक्टर/इंजीनियर सेहो अक्सर मँगै अधा करोड़l बी.डी.ओ./पी.ओ./मेनेजर छथि डाक्टरे पदक साख, किरानी, पुलिस, मास्टर माँगेय पाँच सँ आठ लाखl आदर्शो वियाह मे बेशीठाम भेटत अजगुत रीत, कथा तय भेलाक बाद भेटत समानक फ़ेहरिस्तl "नो डाउरी" लिख बेटाक बाप पसारय छथि जाल, किछ तँ ठीक छथि, मुदा बेशी लोक रंगल सियारl परिणय संस्कार केर बाद शुरु हैत अटपट माँग, मनक दबल अपेक्षा खुजत तखन लागत उटपटाँगl ई नै देलहु, ओ नै देलहु, सभ सेहन्ताक भेल सराध- लिअ सुनैत रहु ताजीवन आब जरल-जरल उपरागl निरीह गाय सन भल बेटी मे ताकत तेहन नै अपाय, हक्कन कानैत रहैक सिवा नै बचै तखन कोनो उपायl बेटीक हँसब गेल, तन गेल, फेर मानसिक स्वास्थ्य, मुरूत सन बेटी देखते-देखते भs गेली जिन्दा लहासl तलाक, पुनर्विवाह नै छियै मिथिला मे एकर उपचार, एक बेर ओझरेलौ तँ बुझु जिनगी भs जाइत पहाड़l केहनो मजगूत हृदयक बेटी तखन लगावै छथि आगि, बेटीक एहने चिता मे जड़ै अछि बेटी जनमावैक लागिl पहिल कन्या धरि भरोस धरे, दु बेटीक बाद हहरै कोढ़, एक्केटा लक्ष्मीक बाद डरैल बापक दस दिस दौड़ै मोनl देखै दिल्ली, कोलकाता, पटना, दरभंगा, दुनियाँ जहान, गुम्मे-गुम करै लिंग परीक्षण आ गर्भपातक ओरीयानl दहेजक राकस पेटे मे दै नवपीढ़ीक कनिया केँ मरौरी, भावी सीता-सावित्री, भारती-मैत्रेयी केँ अंडे मे घिकौरिl दिनोंदिन लड़की केँ कम होइ पर लोक करै बाप-बाप, तैयौ मिथिला मे पसरले जाइ छैक दहेजक अभिशापl मोगीक जीवन थैरक गोवर-करसी, खेतक ठोकरा-कूर जैड़ जेती कोनो आड़ि-मेड़, तापि लेल जेती कोनो घूरl आकि सड़ैत गलैत बढ़वैत रहती अपन धराक उपजा, सीते लग सँ सहैत एलि, सहि लेति अजुको विपदाl अथवा काली तारा दुर्गा भs कs लेती प्रचंड अवतार तैरि जेति मिथिलाक नारी आ तारि देति जग-संसारl मैथिलक बढ़ैत समवेत डेग, सपना छै दहेज मुक्त मिथिलाl पापी-सुर कहिया हैत हंत, शिकार पर छथि नवतुर-युवाll बेरोजगारी एहि शहर मे छथि सभ व्यस्त l लोक एहिना अपने काजे पस्त ll अहाँ जीबु आकि भs जाउ नष्ट l ककरो छैन्हि क्षणिके तै लै कष्ट ll माय बाप नित दिन हरकैलैन्हि l मामा-मौसी सभ सेहो उबियेलैन्हि ll घरक जीनगी सँ जखन ओगतेलौह l देस-कोस छोड़ि शहर दिस एलौ्ह ll लs कs एतय आइल छलौ बड़ आस l मुदा भेटैये कहाँ कत्तो कोनो निसास ll दै ये सभकिओ ओएह एक्के अश्वासन l थम्हु नै आइ लगवै छी कोनो आसन ll गेलौ जतय कतहुँ लोक बुझेयै भार l दू महिना सँ तैयो घुमै छी द्वारे द्वार ll कैलिये सभ जनतव केर जा जा भैट l कत्तौ कियो लगेता कोनो-नै-कोनो बैंत ll फाइल मे भरि केँ सभ कागत जात l भरि-भरि दिन घुमै छी घाटे घाट ll नित दिन मरै छी हम दुःखै-ग्लानि l दैख केँ ओतैक नमहर-नमहर लाइन ll हजार-पाँच सौ केर आब तँ करजो भेल l जेबीक टाका कहिये-नै-कहिये उड़ि गेल ll जँ ली हम कत्तौ कोनो टेकनीकल ज्ञान l फ़ीसे सुनि केँ छुटैयै बचल-खुचल प्राण ll इतस-तीतस मे पड़ल छी तेहन नै आइ l मोन होइये घुमि फेरि गामे चलि जाइ ll मुदा सोचि केँ फेर वोएह गारि आ बात l मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात l मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll तिलकोर छी विदेह बाड़ीक ई अखंड सोहाग भाग मिथिला-संस्कृति पर पलरल अमरलत्ती घरक पछुआर मे ओहिना कचरैत भेटैत तरूआपातक तिरहुतिया तिलकोर लत्ती बलबूत बाला महराजा दरभंगा होइ कि गाम समाजक किओ कमजोर सभक लिलसा पुरेवाक उदार-दानी भरिसाल सुलभ रहताह ई तिलकोर चौंका मे तरूआ अल्लुक होइ आकि कदीमाफूल, तग्गर, कुम्हर-सिस्कोढ़ रमतोरय, भाटा, वा कि मिरचाइ होइ बुझु सब छै सुन बिन एक तिलकोर गरम गरम करूगर माछक तीमन होइ की कबकब ओल, बुटक-बड़ी, कुम्हरोर सभहक स्वाद तखने शोभय उत्तम सन जखन संग उपलब्ध होइ एक तिलकोर सुन्दर हींग देल कदीमाक तरकारी होइ वा कि सरिसौं देल अरिकंचनक झोर चिकना देल सजमैनि खाहे केहनो बनै सभक सुलाज राखै छथि एक तिलकोर समधि, जमाय सन गरिष्ठ पाहुन होइथ वा कि मुहल्ग्गु भोजीक भाय मुँह्चोर मामा, मोसा, पीसा, सभक सुमान अधुर पाहुन केँ जँ नै परसलियै गरम तिलकोर गरम गरम लोहिये मे तरूआ टुभटुभ सुगंधे सँ मोन मे होएत रहत हिलकोर मिथिलावासीक छैक ई खोज अनुप-सन नै पता मिथिला ऐला कोना ई तिलकोर नीम-हकीमी के तँ आब गप्पे छोड़ु आब तँ पहुँचलाह ई ’एम्स’-आरोग्य बड़का पढ़लका एम.डी. केर कान काटै बाड़ी-बैसल चीनीक डाक्टर ई तिलकोर दरीदरी ई गरीबी, दरीदरी निसरर, जखन घुसय छै ककरो घर ओ पुछै की तू हो-- रैजपूत छिअ की मुसहर? बाभन छिअ की मेहतर? काल्हियेसँ छी छिछियाइत, दू तम्बा आटा ले बेकल; ठारो जाइये नञ आब रहल भासयै देह... डेग करै डगमग, दू दिन सँ निरभुक्त, छी भुखल, दू धीया सेहो निसूआयल सुतल. कोरलगुआ घिचैये सुखल दूध, चिलका चिचियावै अनहद. धीया-पूताक देखि आंखिक नोर आब हहरै जिया, मन इन्होर. पैचो नञ भेटय, नय उधार; भगवानो के कहाँ छै कत्तो ठौर. भीखमंगनी बभिनियाँ विधवा सँ, टोल-पड़ोसक लोक छै आजीज. नोतो-उपकार मे कतैक खुओथिन बातो तँ छै ईहो एकदम वाजीव. दू पाई बचबैक छै जमाना, तै पर दूनियाँ भरिक महगाई. सदावर्त मे कतय सँ खुओथिन वस्तूक दाम फेकय छै आगि. ई सरकारो जुआएल सियार, कुरसीक भुक्खा, छपकछोर. सुनय छै निछछ बस तकरे जे लड़ै, अड़दर करे अनघोल .रोहियारक ’अगिता’ ’पछिता’ मिलि अपन गरीब लेल उठाबै छै आवाज. ई ’अगिता’ केर ’बड़का’ केँ कियै अपन दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज? ई ’पछिता’ केर ’छोटका’-’बड़का’ केँ कियै हर दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज? बथुआ जेना गामक जीमीदार सरकार, उजारि दैत छथि जकरा मोन तकरा. गहूँम, सरसौं, रैंचीक किसान, उपाड़ि दैत छथि समुल-जड़ि हमरा. तैयो हम अस्तित्व बचौने छी ओलती, कोनटा, बाड़ी मे. मिथिला केर तरकारी मे. बाधबन मे जगह अछि मुस्किल गहुम सरसौं छथि बोल वला पाक-सुकला मे जगह मुदा ऐहन के छथि ओतय सँ भगवै वला सम्मान पेनै छी हम एखनो सग्ग-भट्टा, सतसग्गा, झुरी मे मिथिला केर तरकारी मे. छौंकल मूर-भाटा-अदौरी तीमन लs स्त्रीगन सुनै छी गिरवै छथि लहास सग्गभट्टाक तीमन केँ तँ सेहो बाँटी खाइ छथि पड़ोसिया दियाद स्वादु व्यंजन छी हम एखनो खेनिहारक आगुक थारी मे मिथिला केर तरकारी मे चुट्टीकट्टा अगिमुत्ताक डर कम चुट्टीकट्टाक हारि मानी अगिमुत्ता जँ खिसियावै ओ वार करय अगाति सँ मुँह खोखरै, दाँत देखावै, हबकै, कार-बान्है देखाती सँ, जँ छी सम्हरल तँ- अगिमुत्ताक डर कम चुट्टीकट्टाक हारि मानी। चुट्टीकट्टा जँ खिसियावै ओ वार करय पिछाति सँ हूर मारै, माथ फारै, घोपै गुपती जँ, पिठाती सँ, कतबो छी सम्हरल तँ- चुट्टीकट्टाक डर बर चुट्टीकट्टाक हारि मानी. भाड़ाक घर दिल्ली शहरमे छै जकर अपन घर रे भाइ ओइ घर मालिकक तेवर कहल नै जाइ थोड़े गोटय छथि बसंतक सिहरैत पवन-गण बचल-जन जड़ैत जेठक दुपहरी पहर रे भाय दिल्ली शहरमे....... "पैसा पाँच धरि लेब, बिजली-पानी अलग हएत, गेस्ट-वेस्ट एकदम नै, एगरीमेट के बनैत?" चुप-चाप गच्छि ले हुनकर सभ कहल रे भाइ दिल्ली शहरमे....... ’बूरल लोक’ तँ बुझू हिनका एकदमे बरदास्त नै, सरकारी नौकरी जँ तखन, गारेन्टरक बहस नै" ओकिल, पुलीसपर छन्हि तिछन नजर रे भाइ! दिल्ली शहर मे....... "झारू नै देलौं, ओतए पोछा नै केलौं देखू सीढ़ीक बगल ओ, गंदा कते केलौं" छुबि छुबि देखतौ फरसक हर पथर रे भाइ दिल्ली शहरमे....... "उठै छी बर देरी, कनी सबेरे उठि जाउ सप्लाइ जखन आबै, तखने झटपट नहाउ" उचितो गप्पमे घोरतौ बिच्छा लहर रे भाइ दिल्ली शहरमे....... "मिलनिहार कम करू, जन एतै नै लाउ, रातिक दस बाजै जँ, तँ बस सीधे घुमाउ" छने-छन देखैतौ घर खाली के डर रे भाइ! दिल्ली शहरमे....... "पछिला महीना पानिक मीटर बर उठेलौं", "यौ ऐ महीना गेस्ट एतेक किए अड़ेलौं", बेर-बेर देतौ बस एहने एहन उलहन रे भाइ! दिल्ली शहरमे....... जँ कहियो घर खालीक ओडर दय देलकौ, बहैत बड़दक अड़ूआरिमे पेनाठ कय देलकौ, देखै धुँऐन-मुँह, सतति गप्प धीपल जहर रे भाइ! दिल्ली शहरमे....... "कम पैसा दैत छी, छोड़ब ऐठाम किएक, मन सँ जँ खोजब, घर भेटत नै किएक" अटरपैंचिये ढाहतौ अदभूत कहर रे भाइ! दिल्ली शहरमे...... ओन-लाइन बदतमिजी भैया यौ, किओ कहियौन हिनका नंगटपनीक धन्धा छोड़ि दिअ धी-बहिनक संग अबरपनीक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... देखते देरी ओन-लाइन मधुक पाछु माछिक लाइन ई लाइन-वाइनक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ.. देखते देखते पाँच, छौ, सात! भरल स्क्रीन देखब की आब ई बलजोड़ी चैटिंगक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... ’हाय!’ ..’हाय डियर!’ सँ तुरते बाद ’आइ मिस यू!’ कहि बढ़ेता बात ई मिस-विस केर धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... जँ कनिओटा रिसपांस केलिऐ हाथ छोड़ि पहुचा पकड़ेलिऐ ई पहुँचा पकड़ैक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... तेसर पोस्ट ’कतेक जल्दी...हम...!’ शेष बात बुझु तहन अपने दम ई बुझोअल बुझेबाक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... जँ निर्लज्जकेँ लेसन पियेलिऐ मेरिड-अनमेरिडक प्रश्न पुछबेलिऐ तखनो तँ निर्लज्जइ धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... तामसमे कहि ’प्रोफाइल देखू’ रहू ओफ-लाइन, तँ ’सेफ़’ रहू अपनहि ओन-लाइनक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... की मनीष, की राजेश एक्के रूप गन्हायले भेष आबो गन्हकीड़ीक धन्धा छोड़ि दिअ भैया यौ... श्वेता झा (सिंगापुर) गुंजन कर्ण, राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा। प्रवीण कुमार ठाकुर, जन्म तिथि -31 दिसम्बर 1977; जन्म स्थान -कन्हौली , सकरी , मधुबनी ; शिक्षा- सूर्य नारायण हाई स्कूल - नरपतिनगर , बी . एस . सी - मेमोरिअल कॉलेज - दरभंगा , डिप्लोमा इन फैशन डिजाईन (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन डिजाईन - नयी दिल्ली ) , चित्रकला आओर फैशन पूर्वानुमानमे विशेष योग्यता, निवास स्थान- दिल्ली , इंडिया; पिता- श्री सत्य नारायण ठाकुर , सकरी - कन्हौली ; माता- श्रीमती मालती ठाकुर , सकरी - कन्हौली । वर्तमानमे अपन एक्सपोर्ट बिज़नस एस्थेट क नामसँ शुरुआत , पूर्वमे प्रोडक्ट डेवेलोप्मेंट आओर मर्चंटक रूपमे कार्यरत। गणेश ठाकुर, पिता श्री विनोद ठाकुर, पोखड़िभीरा (कक्षा आठक विद्यार्थी) कैलाश कुमार कामत, पिताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरिया , थाना- मधेपुर, जिला- मधुबनी , (बिहार), मधुबनी जिलाक बेरमा गामक मध्य विद्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि। मोना पाण्डेय पल्लवी मण्डल गाम-बेरमा, जिला- मधुबनी दसटा कविता १ अनुभव हमर अप्पन जे किछु हमरा देलैन तहिमे सभसँ महत्वपूर्ण अछि हुनक अप्पन अनुभव हमरा नहि लगैत अछि जीवनमे जीवन हेबाक लेल अनुभवसँ बेसी किछु आर महत्व रखैत अछि अनुभव एकटा बितल सत्य छी जे जीवनकेँ जीवन प्रदान करैत अछि! समुच्चा जिनगी बिताकऽ जे अन्तमे प्राप्त भेल वएह तँ छी अनुभव! "ऐ काजकेँ करैमे ई समस्या आएत।" जे अहाँकेँ पहिनहि सचेत करैए ओ भलेँ अछि एकटा रूपेँ फेलियर मुदा तजुर्बाकेँ समटैत कहैत रहैए- "डरि कऽ नहि केलौं हम किछु सोचने छेलौं जे हएत नीक हएत। अन्तमे बुझलौं, सोचलासँ नहि केलासँ काज हएत!!" २ नदीक धारा सन जखन कियो साथ नइ दिअए तखन एकटा काज करब अपनासँ नै हारब जँ गलत नहि छी तँ अपनाकेँ नहि बदलब अप्पन संग नहि छोड़ब बाँकी सभ ठीक हएत जहि सफ़रपर चलि रहल छी ओ एकटा खोज हएत लोकक एकटा आयाम हएत जखन बिसरैत अछि नदी अपन रस्ता तयौ ओ अपन धाराक संग चलैत चिरैत बनबैत अछि एकटा आर रस्ता ओ मोन नहि रखैत अछि अपन सीमितता ओ बहैत अछि बहैत रहैत अछि अनवरत... किएक तँ बहबे ओकर काज छी अहूँ अपन काजकेँ अही रूपेँ लिअ कियो साथ दिए वा नहि तैयो अपन काज करैत चलू बहैत चलू ओही नदीक धारा सन!! ३ लड़की जखन ओ हँसैत अछि अल्हर जकाँ तँ लोक ओकरा पागल कहैत अछि आ जखन चुप रहैए तँ बेचारी जँ बाजए ओ बेबाकीसँ तँ ऐपर टिप्पणी करैत अछि "बेसी पढ़ि-लिख लेलक अछि" बुझैयोक उत्सुकतासँ जँ किछु पुछैए "तूँ नै बुझबिही।" अहिना ओ चुप कराओल गेल की कही ओकरा कोन-कोन गप्प लेल कनाएल गेल तैयो ओ ठानलक तितली सदृश उड़ब मुदा... जखन ओ उड़ए चाहलक तितली जकाँ लोक देखैलके पारम्परिक पायल ऐ मोड़पर घरक लोक सेहो संग नहि आएल सम्हारलक पढ़ल-लिखल लड़कीकेँ कागज-कलम जे नै पढ़ि सकल कोनो कारणवश ओकरा भेटल एकटा कोणा जेतए ओ कानल मन भरि! अखनो नै सोहाइत अछि बेटी सभ गोटेकेँ नै लोग अपन नज़र बदलैत अछि नै नजरिया!! ४ कागज-कलम कागज-कलमसँ दोस्ती केलासँ किस्मत बदैल जाइ छै स्याहीमे रंगि ई, इतिहासमे परिस्कृत भऽ जाइ छै अप्पन गप्प जे कहि दियौ गप्पकेँ गप्प बुझि अपना धरि राखि ई मुस्काइ छै किछु ग्लानि लिखू वा लिखु किछु तबवज्जो ओ बस लिखैत जाइ छै केकरो किछु साबित करबाक ओकरा चिन्ता नहि ने गलत आ ने सही बस लिखि-लिखि ओ किछु कहए चाहै छै "करबाक अछि अहाँके अपन काज तखने अहाँके मिलत अपन आवाज़" ई विचार ई रखैत सदिखन किछु गुनगुनाइ छै ऐतेक स्पष्टता सहेजने व्यवहार कतेक मिलनसार अछि अहिना नहि कहै छी जे हिनकासँ दोस्ती कऽ कए किस्मत बदैल जाइए ई जे सदिखन हमरा सभकेँ हमर यथार्थसँ भेँट कराबैए हिनका जकाँ दोस्ती कहाँ कियो निमाहैए भेँट करू हिनकासँ तखन बुझब ई केतेको क्रान्तिकारीकेँ साहसक संग लिखै-बजैक क्षमताकेँ बढ़ाबैए!! ५ अपन नजैरिक दुनियाँ सभ देखैत छै अपन नज़रिये दुनियाँकेँ सभकेँ अपने नज़रिये दुनियाँ लगितो छै अपना सन कनी-कनी बुझि पड़ै छै जेते लोक तेते नज़ैर आ तेते रंगक दुनियाँ सभक लेल अहाँ नीक नहि भऽ सकै छी आ ने सबहक लेल बेजाए सज्जनता सस्ता छै लोक दूटा मीठ गप्प बाजि फुसला लइए मुदा असज्जनता ओतबे महग लाख नीक काज केलाक बादो स्नेह, प्रेम कियो नहि पाबि सकैए ओना तँ लोक अहाँक नीक काजकेँ झाँपैत अछि आओर अहाँक कमीकेँ उजागर किछु कमी तँ सभमे होइते छै मुदा एतए तँ मोटिवेट कम डिमोटिवेट ज्यादा कएल जाइ छइ! ६ दृष्टिकोण ऐ दुनियाँमे प्राकृत द्वारा निर्मित सभ चीज़ सुन्दर छै ओ चाहे मनुक्ख हो वा अन्य जीव-जन्तु पर्यावरण आकि आभामण्डल धरती आकि आसमान सभ सुन्दर छइ! सुन्दरता निर्भर करैए अपन-अपन दृष्टिकोणपर माने देखैक अपन नजैरपर ऐमे आशा-निराशा सेहो अछि मुदा दृष्टिकोण तँ दृष्टिएक समावेश छी जे अप्पन-अप्पन रहने सभकेँ अद्वितीय बनबैए सभ अछि सुन्दर ऐ गप्पक पुष्टि करबैए अही दुआरे दृष्टि बदलू अपनहि सृष्टि बदैल जाएत आ लाख कमी रहितो अहाँकेँ सभ किछु सुन्दर बुझाएत!! ७ समय अहाँकेँ बनबाके अछि तँ समय जकाँ बनूँ जे निरन्तर चलैत अछि! चलैत रहैत अछि सदिखन ने किनको लेल रूकैत अछि आ ने किनकोसँ नफ़रत करैत आरो तेज चलैत अछि अपन काज ओ इमानदारीसँ करैत अछि चलि जाएत जे एक बेर अहाँ कानू वा माथा पीटू ओ आपस नहि आएत जँ चलब अहाँ समयक संग ई अहाँकेँ समयक दौड़मे परिवर्तित कए अहाँकेँ सफ़ल बनाएत समयक कियो खास नहि ओकर कियो अपन विश्वास नहि ने किनको बैसी, ने किनको कम समय अछि ई जे अछि सभक लेल एक रंग!! ८ अपना ले अपनहि लड़ए पड़त अपना ले अपनहि लड़ए पड़त बजैत रहता लोक मुदा अपन जे काज अछि तेकरा तँ अपनहि करए पड़त आगाँ बढ़बाक अछि अहाँकेँ अपने बितल बातकेँ बिसरए पड़त समय स्वयं पुछैए अहाँकेँ जवाब तँ ओकरा देबए पड़त.! कहिया धरि बुझैत रहब अपनाकेँ बेचारी तालीम अहाँक की, ई तँ बुझए पड़त केतबो करए कियो कात अहाँकेँ स्वतंत्र अहाँकेँ हुअ पड़त नव राह, नव डेगक संग अपना ले अपनहि लड़ए पड़त! अपना ले अपनेहि करए पड़त!! ९ बेटी नै अहाँ ओकरा पढ़लौं नै किछु बतेलौं जखन ओकर मन भेल किछु बुझबाक ओकरा "लड़की" कहि कऽ घर बैठेलों! दहेज़मे गिन देलिऐ लाखों रूपैआ गलती खाली दहेज़ ले बलाकेँ बतोलिऐ प्रश्रय देलिए अहूँ ओतबे किछु कम आ किछु बेसी मुदा अहूँ केलिऐ दहेज़केँ अहाँ जमा कऽ लेलिऐ लाखो रूपैआ पढ़ाब काल ओकरा अपनाकेँ ना समर्थ बतौलिऐ... ऐ समाजक गप्पक चिन्ता अहाँ लेत-लेत अपन अपन बेटीक अधिकारक गप्प नै सुनि पेलिऐ! पढ़ब अखुनका अपराध ब्यूरोक परिणाम तँ मनमे कचोट हएत हर घन्टा मरैत अछि अहीं सभक बीस टा बेटी कियो दहेजक उलहना तँ कियो मुर्खक तानासँ आबो बुझियो ओकरा आबो बुझियौ ओकरा!!!! १० समाज सभक लेल सभ तरहक नियम बनबैत अछि समाज ई जेम्हरे धर तेम्हरे भर खसबैत अछि! बेटीकेँ आज्ञाकारी संगे संस्कारी बनबै छै आ बेटाकेँ शिक्षित ऑफ़िसर बना अप्पन काज ससारै छै जरूरत भेला पर एक-दोसरक संगो पुड़िते छै ओतइ किछु नव काजमे असगरो छोड़ै छै समाजक सांचामे सब तरहेँ लोक बनए की राम एहि ऐ समाजें तँ रावणो अहिँ समाजसँ निकलय! ओना... समाजक सांच सभक लेल समान नै होएत नै तँ झूठ भगवान आ सच बदनाम होएत समाजक बीच अप्पन रास्ता बनाएब कठिन छै मुदा ओकर बनाइल रास्ता पर चलब आसान मुदा जखन बहैत अछि पानि बिनु बनाइल रास्तासँ तखन सहजहि हुअ लगै छै नव धाराक संग धारक निर्माण! [विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ।] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाष चन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://videha.co.in/archive.htmपर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। ७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना। 2192 || विदेह सदेह:३६ विदेह सदेह:३६|| 2193
i कर ् x =, ; a — x 5 2a: or ve * i \ ‘Ve an ज दा. ., — Deg I = oa. f a. ; | x. yet के कर a8 हे की जी ~ a” Ses, SPS “ o* 7 a - ~ AO Dr. Shashidhar Kunst ‘Videha" WOrst. शशि 7 “विदेह्म' OCT Pt maa > ~~ | . = yl . यु ee x A 4 न रा — , 4 i Bn . ae sal > मैंथिली - पोरकी / पौड़की हिन्दी - पंडुई / फारूता / पंडुक संस्कृत - कपोत , कलकण्ठ, सूज़कण्ठ अंग्रेजी - DOVE (भारतम विशेषत: SPOTTED DOVE) aslo जाम - Spilopelia spp. (भारतमे FAM: Spilopelia chinensis/sinensis) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँ ओ स्वत: मैथिली भाषामै पर्यायी नाँ ओ Hs जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमै)
के | fy Wiz तय or! Aa re >a <= ’ B \\ y a ‘St बा 22 हक नि Ds Ge — oo ih acon ero "| मैथिली - बगरा या बगड़ा FRA बगरा या बगड़ा) Rosin again संस्कृत - चटक (गृढचटक), कलविड्क अंग्रेजी - स्पैंसे (हाउस AAA - SPARROW (HOUSE SPARROW) जैववैज्ञा० नाम - Passer spp. (Passer domesticus) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे eats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Q Yay g.= * स्थान - रैयाम (दरिभंगा) Lan ee कि, थे, 2.०. गा ty % me का की कर, SHER > a $ i _ eh See a4 es ii ey | aM छाए, अन्दर, 00० aN + Oat शशिधरे कुमेर BE , ORT “Pica =a दर कं > “ 4 er डोरीमे करिया पल्नी (पॉलीशील) aries पोसरिक gg कातसेँ बाल्हि देल गेल अछि जाहिसेँ पानिकीं आ आ Rech जे उतरबासेँ पहिने सर्वेक्षण करैत अछि ताहिमे ओ छक्ति जाए ता धोखाए जाए |
‘ G dt 2 | he सी & LZ ie far: te oA f Be SV ut--_4im, / YY रु, Ae. % Sawa ah, at <a SEO ONL). | न + te 2: पु | Be. bes » के < cf vf res Le ee ‘a न 6, Oe io / } ee | £ rege Gelato? हिल्दी - राम चिड़ैया अंग्रेजी - KINGFISHER (COMMON / EURASIAN / RIVER) Gadsilo नाम - Halcyon smyrnensis, Alcedo atthis, Alcedo azurea etc. (अपना दिशि सामान्यतः) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
wR iON x a = welt sae ae ee ae, ) . ae ee foe. : SS ot A a Pie aie oe 8 ee Bis 6; ba oa ae —— 2 ee. — = :... नहरिक पं लत SS = = = बगेरीक
hoy - 9 दर 2 ps ~ WN \ मैंथिली - बगेरी हिल्दी - बया संस्कृत - पीतमुण्ड कलविड्क अंग्रेजी - BAYA / BAYA WEAVER / WEAVER BIRD जैववैज्ञा० oid - Baya philippinus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नाँओ Sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
RG SE 4 a 7 > me SS ib a दी y ‘A १५ के बन a ted eS न आज २ joven bi eo Ost. ait ga Ree” <6 eT Ata aa ‘Tie मम mane a bial i ५: 4 , हर झपड्टा माड़ि माछ पकड़ि ws ssid पानिकौंआ / पानिकौर
व... पट ee BE = | A ag Ze <a ae ee ee ae ee ae if og tober | Bec os ae Cae ee ae wee See की लि. Qa cheee seer « हिल्टी - Aria Wed - wid, मराल आदि (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
| | 5 eS han <4 i Xi: a a pea . की * © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शशिष्र कुमर eager MPaageaa ‘face? f war किए भरेत्र पता ने ककरहु, पर जैँ we एहिना। ६. संग्रहालयमे काल्हि देखत याँ, बगरा सगरों दुनिजा !! \. "बिहार संग्रहालय” पटनामे "aR केर प्रतिमा
pve tal iA Ce = कि ३ कि \ 2 के; Tay. ane oR Le — = \ eK we 5. ay” pane \ ae ae Act / deep Sy PShashidhar Kur Me ay = ae —3 ra ON Bey ee Y A cg ‘ SO ae Rad vee eff oe कद oe eZ? मूक, : | a, ae Se oak ce - = 2 Se मैंथिली - पानिकौआ / पानिकौर (उच्चारण - पैंनकौआ / पैनकौर) हिन्दी - पनकौंवा संस्कृत - पानीयकाकिका, जलकाक, पिचुल, मत्स्यवेधनी अंग्रेजी - CORMORANT(S) / SHAG(S) (पानिकौंआ / पानिकौर) जैववैज्ञा८ नाम - Phalacrocorax spp. (मुख्यतः); उपरुका चित्रमे Phalacrocorax fuscicollis (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
दर Ar Oe ae - Oe ae सिर... व S a4 i ते Naas ie आर... ae YA, has Z ges जि लि" se स्थान #गन्धतारि (गल्ठवारि) वाध (मधुल्ती। drake जाहि भीड़ (भिण्डा) पर लोकक आबा-जाही कम छै ओहि ठामक ones पर पानिकौंआ या पानिकौर सभरक आश्रय स्थली |
हा री माटालीतकण्ठ (लेकली) का अर कक cd Fy — i See aan 4 C5 a “2 = = tn ae ee कप ~ oo Ga मैंथिली - जीलकएण्ठ (असली) हिन्दी - जीलकण्ठ (असली) संस्कृत - नीलकण्ठ अंग्रेजी - INDIAN ROBIN (इण्डियन रॉबिन) जैववैज्ञा०८ नाम - Saxicoloides spp. (5, fulicatus, 5. intermedius etc.) tte संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
लक ने बा r € _ La = ; x + - ae i © -_ bh Tn = eS as: SE a दर 55/22/2004 02:02PM
{ Nee ७. BPS लि Sates ४ है 2 =, ue s | 7 29 a!) हर / pack Ht: | mie. g SH \ . Ff © wo ais gi (i डॉ. शशिधर ar का न एक: हो पहन ७5 goRM
eo Po cg Fares जु < is % = + Ee J Se Ac के on "व 2 अर Le = fae AES BOs = we 4 - “nl (| Gi oF : $ SS =P . न S © vo नंशिथव waa “facre i I © Dr. Shashidhar Kumar ~Videha™ iS) © st. शशिधर कुमर "विदेह
; “ , ae i द्र 4 भर te, ~*~, मैथिली - पपीहा हिन्दी - पणीहा / पणीहरा संस्कृत - पपीढा अंग्रेजी - COMMON HAWK CUCKOO or BRAINFEVER BIRD जैंववैज्ञा० जाम - Hierococcyx varius ett संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम A)
a conde. ShashidhiF Kumar Videha HO Seep at विद" ORT aid ag विनर” मैथिली - पहाड़ी मएना (ई हिल््दीक पहाड़ी dion जजनि अछि, ओहिसेँ Bron अंग्रेजी - GOLDEN ORIOLE (INDIAN + AFRICAN + OTHERS) जैववैज्ञा८ जाम - Oriolus spp. (ओरिओलस वंश az fafsroor जातिक HAS)
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4, ) oe & 4 ही ही . का ¥ 4} r= + \ % “es ४ # CSIR (आब NISCAIR) asa दिल्ली, द्वाय प्रकाशित एडि पोथीक अनुसार "बागर" एक तरहक UAT (GAN) ez नाँओ थिक |
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है, Ke ; a i a ow 2. st BS a "= tg केन रन a "aig कर fie oo. ae “teas - a> के थे बिढ़नीक स्वॉता an sift खॉताक कोठरीक षटकोणीय संरचना मधुमाक्षी (-छी) सँ मिलैत - जुलैत अछि पर ओहिमे ase नजि रहैछ कारण कि fast ase afr बनवबैत अछि |
कु A a = मैंथिली - राजहंस (चित्रमें - बड़का गुलाबी राजहंस) हिल्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण क्ुज्च अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेरस) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) (नोट -संस्कृत आषामे आयल हरेक नाओ या पर्यायी नाओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ is जाइत अछि -तत्सम STA)
मकर रु meer | teach eo at a > fea मे मैंथिली - राजहंस (चित्रमें - बड़का गुलाबी राजहंस) हिल्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण क्ुज्च अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेमिड्गो (ब्रिटिश So), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेरस) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) (नोट -संस्कृत आषामे आयल हरेक ash या पर्यायी नाओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि -तत्सम STA,
« “ है \ —\ 5 ) a ay मैंथिली - राजहंस = (चित्रमे - छोटका / छोटकी राजहंख) अंग्रेजी - FLAMINGO (fepidl- LESSER FLAMINGO) [उच्चारण - लेमिड्गो (ब्रिटिश So), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेरस) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoeniconaias minor) (नोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे प्यौयी नाँओ Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे)
~ a दर ~ a. ‘ 2 bs सम, Re ee? ; ya $n at ee” ae 2S A ee a a % es | Fi \I जाझार सौजल्य - gofreeddWvnioad.net_ - gofreedoWnload.net बड़की (गुलाबी) राजहंसक AVS GREATER PINK FLAMINGO Phoenicopterus roseus
2 “= ASHI (गुलाबी) राजहंस / GREATER (PINK) FLAMINGO Phoenicopterus roseus
करिए - _ TE yi * ७ Dr Shashidhar Kumar “deh” © डॉ. अधिकार “विदेह © जान नियन = acre हि ng a thing tal 38 . मैंथिली - लुक्खी हिल्दी - गिलहरी संस्कृत - वृक्षशायिका, रोमशी, कलन्दक, वृक्षमर्कटिका, शाखामूग ("शाखामृग" शब्दक अर्थ "बानर" Wel - अनेकार्थक शब्द) अंग्रेजी - SQUIRREL (चित्रमे - NORTH INDIAN PALM SQUIRREL - 5 STRIPED) जैववैज्ञा०८ नाम -Family - SCIURIDAE (लुकखी कुल) केर समस्त जाति ओ प्रजातिस्रभ्न (SPECIES & SUB SPECIES) (चित्रमे - Funambulus pennanitii) नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
दि कि). aT न i ot ela ge 3 jae oe Ae re wee) e. ee एम eS ae Ee Til VY a = d. Ps ii ‘as दि कर १ e te \ Rad yg 2 ld / PR dig 44 | A ae @ W of eae SS Ge. ea दी हाथ (अगिला पएर) दाना उठा DS खाइत dad
as = == bes Ser ime : oe sd EE GS ees oe <= Se a s ee Ni git “3 a i a6 J Pe oe 3 : IK 3 OSE, Sf. Je Sa ae [as Py te E << Y _ 4 eo i ah oe) eee ‘= कै =i 2 मैथिली - सतबहिनी अंग्रेजी - SEVEN SISTERS, JUNGLE BABBLER जैववैज्ञा० जाम - Turdoides striata / striatus (चित्रमें - T. striata striata/T. striatus triatus) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः AIH भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
Se one NY SS SS: et हू २-३५ WS “ DS . Sry ONS ? ६४. em BENS ES oe - “Sess! दे £ न कक. © Dr. Shashidh@t Kumar “Videlat “Sen, SN be -—e- “ax y YS NY GS. आदिम “Rar ow va aaa mae SS Se A x ९५३ mA NS 2 wes aS कि के के LAS मैथिली - मोहखा / ear हिन्दी - महोस्त संस्कृत - महोक / काकोल / वनकाक अंग्रेजी - CROW PHEASANT / GREATER COUCAL जैंववैज्ञा८ नाम - Centropus sinensis (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
ee J ae a ww —_ aan I Ee Fr FD " 7, हू. 7 Fy we | 7 na “डी . 3 Shy Pa a Roe a ge 4 ही / ४ ZS |. F * 5h) % = ‘ 5 > हर. जज rR, Te A aay “3 Se tr ee Bete j ay aN a न: TE v4 vy ie J fi VOM Ee AY PRON RO पक ely, 7 EA NT SS NOS Ne हड 22 ४. -जपारिसलतिव रिक्रिपान्यि हित ta. मैथिली - माटिखोद्धी / माटिखोधी (उच्चा० - मैंटखोद्धी / मैंटरवोधी) हिन्दी - Base संस्कृत - ora अंग्रेजी - HOOPOE जैंववैज्ञा८ नाम - Upupa spp. (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
मलेरिया आ फलेरिया डेड्गू (डेड्गी), पीत saz, (किछु प्रकार) आदि फलेरिया (फाइलेरिएसिस), _ चिकन गुनिजा, जिका saz, बेमारीक परजीती सभ्क जपानी एलसिफेलाइटिस _... इक्तिन (घोड़ा केर) ताहक (VECTOR) आदि बेमारीक परजीती 'एनसिफेलाइटिस आदि ee WAP ताहक (VECTOR) ... बैमारीक परजीती uw va c8 वाहक (VECTOR) Anopheles spp. cai af 5 “ = एनॉफलीज मच्छर maa as Culex spp. \ क्यूलेक्स मच्छर Aedes spp. एडीज मच्छर
| Soa को eee rad : = ves r; if Se et Sir ol SE a 22 न | Beg AS Sey कक 9 मैथिली - करिया धनछुआ (करिया धानछुआ) है | 4 feedl-ypien _ संस्कृत - भ्रृंगयाज . अंग्रेजी - BLACK DRONGO i | t जैववैन्ञा० नाम - Dicrurus macrocercus (डाइक्रुरस मैक्रोसकस) हैं i lassie leat
re © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” ार कु ¥ देह” = . : चित्र प्रदत्त (साभार) - प्रकाश कुमार चाँधरी, दुलारपुर (रुचौँल-दुलारपुर), दछ्निबारि-पछबारि टोल, दरिभेगा मैथिली - भगजोगनी / भरकजोगनी हिल्दी - जुगनू , खद्योत संस्कृत - प्रभाकीट, चिलमीलिका, ज्योतिरिड्ग, ज्योतिरिड्गण, ज्योतितरड्गिणी, ध्वान्तमणि आदि अंग्रेजी - FIREFLY / LIGHTING BUG / GLOW WORM (More specifically LARVA of a firefly = GLOW WORM) जैववैज्ञा० नाम - LAMPYRIDAE कुल (Family) केंर बहुत रास सदस्य वंश (GENUS) केर जाति (SPECIES) सभक कीट (कीड़ा) Ws; यथा - Photuris spp., Lampyris spp., Cyphonocerus spp., Luciola spp. amie | (चित्रमें - COMMON GLOW WORM - Lampyris noctiluca) नोट - (संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) क - भगजोगनीक पृष्ठभ्रागीय (DORSAL) EW (फ्लैंशलाइटक प्रयोग संग) ख - भ्रगजोगलीक उदरभ्ागीय (VENTRAL) हष्य (फ्लैंशलाइटक प्रयोग संग) ग॒- भगजोगलीक उदरभ्रागीय (VENTRAL) हष्य (फ्लैंशलाइटक प्रयोग बविला) tee srrafela अछि याने कि चित्रक आकार भ्रगजोगनीक वास्तविक store fee गुणा
eS रतन ee ee ee ee ee ee रू... Tea प्रदत्त (साभार) - प्रकाश कुमार चाँधरी, दुलारपुर (रुचौँल-दुलारपुर ), 'दकछिनबारि-पछबारि टोल, chiar | (कैमराक फ्लैशक बिना लेल मैल चित्र)... भगजोगनीक Sat भंग (VENTRAL ASPECT) केर ofr (आवर्थित छवि, Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © a © © “faa a farcry’ * ¥ & “ ३ स्थान - दुलास्पुर (रुचील - दुलास्पुर),
चित्र प्रदत्त (साभार) - प्रकाश कुमार dhe, दुलारपुर | (रुचौल-दुलारपुर), दछिनबारि-पछबारि टोल, cei f £ भगजोगनी - पृष्ठ आग (DORSAL ASPECT) झगजोगनी - उदर आग (VENTRAL ASPECT) (आवर्धित छवि) (आवर्धित छवि) स्थान -दुलास्पुर्थ रुचौंल - दुलास्पुर), efor
कि जी जे ~~ wi 7 हर a @ | ay ‘se we re mat. gf 0 mn ~ जे Sz ey, y na q e by पे ५ . मैथिली - Nase / भग्हरा / शैंवरा / भौंरा हिन्दी - start / भौंरा संस्कृत - श्रमर / अलि / मधुप xfer / मिलिन्द / मधुकर आदि अंग्रेजी - HUMBLE BEE (Old Eng.), BUMBLE BEE, BLACK BEE / BEETEL (New Eng.) जैववैज्ञा० नाम - Bombus spp. are संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वसपमे)
छु* | - fe. (PROBOSCIS) = - संस्पर्शक fori (HEAD) t \ (ANTENNA) वक्ष (THORAX) न. 2 ~ te. पाँखि (WING) | उदर (ABDOMEN) fa) SS : | ३ जोड़ी टाइग, की स्थान -दुलास्पुर (रुचौल - दुलारपुर), दरभंगा मैथिली - मच्छर हिल्दी - मच्छर संस्कृत - AWG, मत्सर, भ्रम्भरालिका, SET, रात्रिजागरद आदि अंग्रेजी - MOSQUITO जैववैज्ञा० नाम - क्युलिसाइडी कुल (Family - CULICIDAE) केर सदस्य सन्धिपाद प्राणी सभ | किछु मुख्य वंश (GENERA) अछि - Aedes spp., Anopheles spp., Culex spp., Culiseta spp., Haemagogus spp., Lutzia spp., Mansonia spp., Psorophora spp. ete. (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे) मैथिलीमे "मच्छर" ओ "मशहरी" शब्द AGA LUD; मूल संस्कृत शब्द क्रमशः "ACA" ओ "मशकहरी" अछि |
Ed r 4 . a ie ra? te i I uw" - ia ‘ a ae .. ies rs ' हू ने री | i #4 nell मे स i ©. | \.\ } nd | at il 9 कि दर ढ़ Dia? ana ऋ '. मैंथिली - विढ़ली (साधारण / पीयरकता आ आन रूंग-रूपक बिढ़ली) ar uaféar (फचडहिया बिढ़ली) हिल्दी - ततैंया, ay, ESI संस्कृत - Ne, Ne, aa, तृषसूक्किनु, विषशूक्त, विषशृड्गिनु, दंशिनु, कोष्ठागारिनू अंग्रेजी - PAPER WASP/S (विढ़ली) & HORNET/S or HORNET WASPS (पचहिया) जैतवैज्ञा० जाम - Polistes spp. , Ropalidia spp. etc. (बिढ़ली) & Vespa spp. (पचहिया)
सा a oe ge ee Hai 4 Sik 4 ह बलमीक (TERMITE HILL) - fears द्वारा बनाओल माटिक घउर
aaa Sas Se es मर ~ pe 5 hice cae ——s 2 +> साभार ttatew" pixabay.com.(free'download) ( r I रू | (
£ # | “ o g ‘ Bg < z ‘se Kans) मे न SS J al dae. TEP sae a es ges ही 4 { i ld “4 - कि फ़िर J मम eg Se Oe ही 4 4 yo साभारसॉजतय - विकिपीडिया पब्लिक site मैथिली - घियारी कीड़ा / घियारी कीड़ी / weer भेम्ह / बौका sss हिल््दी- __.............. संस्कृत- ___.............. अंग्रेजी - 3. MUD DAUBER WASPS (Most species) & 2. POTTER WASPS / MASON WASPS जैंववैज्ञा८ नाम - . Family SPHECIDAE & Family CRABRONIDAE केर बेसीतर जाति (SPECIES) 2. Subfamily EUMENINAE (Family VESPIDAE) ®2 करीब 200 वंशक (GENERA) 3200 जाति (SPECIES) (चित्रमें - पिउरा घियारी कीड़ी / YELLOW POTTER WASP / Delta campaniforme) (नोट - संस्कृत भाषामे आयन हरेक नाँजो या पर्यायी aad स्वतः मैथिली आषामे पर्यायी नाँजो Ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Y ( है . i es eed "है व व. (. & es ss e Se (कि “ae | ; 2 - भा +
भा हज |. he oo 73 * oS =. S| रख = a > Pi Zee eo सर. rs ID ० eae . 5... जि: = rad ci: ao oe Sox set =< @ = थे te eo. fr aa ee. 4 ae a i ee a aca के a अधपच WIS (SEMIDIGESTED CELLULOSE) बनल विभिन्न प्रकारक घियारी
x . P= a | ‘ a, जस्ल् . A rea " 6 ji VP [FL Ber : R हर videha” ae cen: leila) ie hI ae म्रेंथिली - घोरन हिन्दी - बड़ी लाल चींटी संस्कृत - रक्त पिपीलक / रक्त पिपीलिका अंग्रेजी - WEAVER ANT / GREEN ANT* (NOT GREEN HEADED ANT) जैववैज्ञानिक नाम - Oecophylla smaragdina (भारत सहित दच्छिन-पूब ससिया ओ उतरबारी ऑस्ट्रेलियामे) Oecophylla longinoda (अफ़िका महादेशक मध्यभागमे) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे) * एहि ठाम "GREEN" माने "जंगल" ; जजि कि "afk" |
मिल जन is LL: a wl सी Se Wess, का हे है er =P ge Oy y \ a i Ses. रू Rb che ao SF “ Ne ee BA = Va — { ४ Ta = 7, PMR PL Be 2. मि, नि, ie Siew ae “ 3 ne aa "Rol छत्ता (WEAVER / GREEN ANT SWARM / COMB)
ye न —— a = —— मैथिली - चकबा / चकेबा / चकवा हिन्दी -चकवा संस्कृत - चक्रवाक, ब्राह्मिणी हंस अंग्रेजी - RUDDY SHELDUCK / BRAHMINY DUCK जैववैन्ञा० जाम - Tadorna ferruginea नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Wy “pf Mh, Py J वि । ? हि ny ee . कै A WGI Lae - \<Z ce BSS डर लि ae oe ye pel 4. मैथिली - चकोर अंग्रेजी - CHUKAR / CHUKAR PARTRIDGE / INDIAN CHUKAR जैंववैज्ञा० जाम - Alectoris chukar (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
एररूररुण/ Te ~~ =o oF er Pes Ske ra Be भर मी RS अर weet dee Sis «अर उस aaa te hy AED py" कै श्र हा a a, A, < \ $ कै मैथिली - टिटही (विशेष ws Lapwincs केर अर्थमि प्रयुक्त) feodt - टिटहरी (विशेष ws sanppirers केर अर्थमि प्रयुक्त) संस्कृत - fetes, कोयष्टि, यष्टिक अंग्रेजी - LAPWINGS & SANDPIPERS जैंववैज्ञा० नाम - LAPWING - Vanellus spp. (लाल गलचर्म - V.indicus, पीयर गलचर्म - V. malabaricus) SANDPIPER - स्कॉलॉपिंसाइडी गण (Order - SCOLOPACIDAE) केर २० वंशक (Genera) सब जाति (Species) हनौट- संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आषामें पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
a fe ee ©, we’ t DEER SWAN? दर Cerws duvaucelli . V4 Vass 27 es
* iad बाराएसिंगा) SWAMP DEER lus duvaucelic) श इसके सिर पर बारह छोटे सिंगो के कारण इसे बारह सिंगा कहा जाता है। यह कीचड़ वाले स्थान पर रहना पसंद करता हैं। ~4 अत Videha” Ose शशिधर gar “विदेह” © wl मलियव ORES Lcd डा. है स्थानें -संजय गाँधी जैविक उद्यान, पंटना
mY _ 5 _ } कर ् o> © Or. Shashidhgll ही f डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” 6 छा Pa बूभव rr 7 | ह | Lal Aw _ oF s 4 J & ve \\ gf rd — aa “a " _ पहिने ब्रम्हपुत्र 3 सिन्धु नदी af समस्त उतरबारी भारतक मैदानी भागक दलदली क्षेत्रमे "sist" पाओल जाइत छल | संस्कृतक "गण्डक" नाम ओकर गण्डक नदीक कछेरक दलदली भागमे एहि प्रणीक उपस्थिति दिशि इशारा करैछ | एसव्नडु नेपालक "ORT याष्ट्रिय निकुज्ज" ओ "चितवन या०्नि०"मे sistp उपस्थिति एडि बातक समर्तक अछि | पर भारतक मिथिला क्षेत्रसँ आब ई प्राणी विलुप्न भ5 चुकल अछि | उपयेक्त छायाचित्रमे sigh प्रतिमा आ ताहि ऊपर दू cr मवेशी बगुला (CATTLE EGRET) आ पाछाँमे गेंड़ा GA कएल गेल गोबर देखाओल गेल अछि 3 प्रतिमा "बिहार अंतर्राष्ट्रिय संग्रहालय, पटना" मे अछि जाहिमे प्रतिमाक संगहि ठाढ़ि छथि श्रीमति सुप्रिया कुमारी (हमर धर्मपत्नी) |
oka ieee J Wa ee eae el Kays! + ale cat iy ye aay ; RS y NY Ege sf \ ! i | Hd) tae ES एज. W805 Dae aan ya G ता. ay 34 MU 4 avi), Sate cD न 3 वि 85° ial Y bey ९५ i nat Dr, Shas I ee ° iz. > Pe Se Be BOSS ap ae Pte eae’ 4 y ) a hia fi vile aly न कण: थी ae ही मैथिली - कड़ाडइकुल / कड़ांकुल / Papal (तत्सम), WAZ (अर्ध तत्सम), कंकूर / OHS aga हिन्दी - काला बुज्जा संस्कृत - कथंकुल , कालकण्टक , कृष्ण आटि, रक्तशिर्ष आटि अंग्रेजी - RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS जववज्ञा० नाम - Pseudibis papillosa syn. Pseudibis davisoni syn. Inocotis papillosus (नोट - संस्कृत झाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नाँओ Sis जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
\ C , गैंतीक बेंत
\ दि “ अर साभार सौजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन अंग्रेजी - SILVER FISH जैंववैज्ञा० नाम - Lepisma saccharina नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या ee नाँओ स्वतः मैंथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भर जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
तप we rate ae =, ‘eal 7 सपस ~ Pass =i Ww न efi ey हि, ‘s feaepUlis AP Ufecta? डॉ मेठ i . | Ie vy |) मैथिली - कोइली Cader) हिन्दी - कोयल संस्कृत - कोकिल, पिक आदि अंग्रेजी - cucKOO (INDIAN, ASIAN, AUSTRALIAN, PACIFIC) & KOEL / TRUE CUCKOO, Gaasilo नाम - Eudynamys spp., Cuculus spp. (मुख्यतः) the - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)
stare टिकला केर भाग Hare मैथिली लॉओो है. ह.-कोयली (COTYLEDON/ EMBRYO) _, ia — 3 2.- Reprarefler कोशा (DEVOLOPING SEED COAT) maf ge “fetes ड 3, - गुद्दा या फलमज्जा (MESOCARP / PULP / FLESH) Rou gesaitiere ४.-स्वॉइवा / छिलका (PERICARP /SKIN) कोयली + कोशा - आँठी / अस्थि/ फलास्थि ENDOCARP/ SEED /STONE)
croc eit Ae N ES गे हर if (ieee Ve ee eee re —_——_ पर * डा =" *+ se स्थान - संजय गाँधी जैविक उद्यान; पटना मैंथिली - गेंड़ा (चित्रमें एकसिंघी भारतीय sist) हिन्दी - गैंण्डा (चित्रमे एकसिंगी भ्रारतीय गैण्डा) संस्कृत - गण्डक, गण्ड, गण्डाड्ग, तैतिल, खड्ग, रखड्गगिनू आदि अंग्रेजी - RHINOCEROS / RHINO (Short abbreviated form) जेववैज्ञा० नाम - Rhinoceros spp. (चित्रमे Rhinoceros unicornis) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ots जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Piso 7 “ 4 i, i Eee: ‘ oye ही हे ahh भी . 3 ‘= . 4 i St ihr omar i " Osh शशिधर gat “विदेह” © ul xf = co कं | vim ck all ore Be eS घास खाइत एकसिंघी भारतीय sist (Rhinoceros unicornis)
; कट oes Os सन eS eee Se om aes दर ee oe. oe es Dr. Shashidhar Kumar “Vide OGIO कमर “Pea” रा ? iy स्थाल-संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना (Rhinoceros unicornis syn. Rhinoceros indicus)
स्थान - दुलास्पुर water - दुलारपुर), दरिक्ंगा स्थान - राजे (मंीगांछी), दरिक्न॑गा मैंथिली - कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती हिन्दी - वनस्पति को नष्ट करनेवाला एक प्रकार का घोंघा * अंग्रेजी - SLUG / LAND SLUG / GARDEN SLUG जैंववैज्ञा८ नाम - Limax spp., Ambigolimax spp., Tandonia spp. ete [a polyphylactic group of apparently shell-less terrestrial Gastropod molluscs] (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) * किछु बिहारी पत्रकार लोकनि द्वारा Rodd wa aa प्रयुक्त "सितुआ" शब्द वास्तवमे मैथिलीक शब्द थिक
द् हि कु दा we गण fo 4 pete gitar Kumar "Videha” © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” © UT. AP ¥ a स्थान - ast pre पे Spat एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (पृष्ठ भाग / DORSAL ASPECT)
a 5 mI Si a? ¢ ee थे ’ oe Be ae 4 % 4 एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (उदर भाग/ VENTRAL ASPECT)
yy ..... साभारसौजन्य - pixabay-fém लिन pax has जीव विज्ञानमें गोहि ओ साँप gol सरिसूप वर्ग (Class - Reptilia) केर प्राणी अछि आओर टुलूक ofle आरगाँ्सँ द्धिभाजित (Bifid) रहैंत अछि | तेँ मिथिलामें बडुतो ora "गोहि" केँ "गोहि Bia" कहल जाइत अछि | (चित्रमें - दैत्य गोहि वा कॉमोडो ड्रेंगन) |
एखन फोटो उपलब्ध नजि अछि। मैंथिली - सनगोहि / सनगोहि Bla (उच्चा० - सनगोहि / सनगोइह) हिन्दी - पीला aie संस्कृत - स्वर्णगोधिका अंग्रेजी - YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD जैंववैज्ञा८ नाम - Varanus flavescens (Hardwick & Gray, 827) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
as Ed, ag, Pag ad ay /\ हि aa ‘ ro pee aah | मैथिली - डोकहर हिन्दी - राजबक की प्रजाति... संस्कृत - आस्वनिकवक,वक,सारस अंग्रेजी - ADJUTANT STORK (LESSER & GREATER) जैंववैज्ञा८ नाम - Leptoptilos javanicus (LESSER ADJUTANT STORK) & Leptoptilos dubius (GREATER ADJUTANT STORK) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
BES “| ८ = ZZ ‘ a S LP AG A ~N “ee Zs मैथिली - ढील, ढीलक अण्डा आ लीस्व हिल्दी - जूँ संस्कृत - यूका (ढील), पिपिलिका / लिक्षा fa) अंग्रेजी - HEAD LICE / HEAD LOUSE (Ie), NYMPH (€f&a) जैंववैज्ञा० जाम - Pediculus humanus capitis ate - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी ना ओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ ats जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)
> ey 2 ग््णया —-«@ _— d ‘ ~ io q © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. orf fe ora tage Ga आ लीख उपटएबाक Yio ओ पारम्परिक तरीका "sla ताकब" | ढील तकाबए काल 'जस्वन RIGA Neto करैत छल वा see चाहित छल तस्वन ढील तकनिडारि लोकनि ओकरा पड़तारि ws, पोल्हा5 ws, स्विस्सा-पिद्ानी सुना ws ढील ताकित Geils | ताहि क्रममे विभिल््न प्रकारक स्वसचित वा स्वसंशोधित गीतसभ Ral ZA छल, यथा - "lei Boil, ढीलो राली, DAS TIS छी .................."। Te ai a
ah ag ask a Sa 7 on ae \y \ हर i - me 3 Zi मैंथिली - fears / cars हिन्दी - दीमक संस्कृत - पुत्तिका, फुट्टिका, मत्कोटक, वत्मीक* अंग्रेजी - TERMITE / WHITE ANT GAAS नाम - ब्लेंटिरियआ गण (Order - BLATTARIA) 2 समस्त १२ कुल (2 Families) केर सदस्य BH (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे) * प्तल्मीक" शब्द संस्कृतमे दिबाड़ ओ fears द्वारा बलाओल माटिक sz, gqkw लेल प्रयुक्त होइत अछि तथा 'एकरहि apd रूप "बत्मीक" शिक जाहिसैँ "तात्मीकि"' ता "बात्मीकि" शब्द निष्पल््न भेल अछि |
कि है § été - oes feals Cals) Hz एक गोट प्रकार
४ हर ae vA © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © उ xe Peo Cl Ps ——— i — : = स्थान: दुलास्पुर (रुचौल* दुलास्पुर): sion सतबहिनी चिड़ै केर झुण्ड
Deed, ite Re a aes eee hh ee eee be ९५ os फेज, स्ट्ि J Sie.) |S साभार सजिन्यें pixabay.com (free downlogd)® "कॉमोडो Soret" - विध्वक wai Ga आ विषयुक्त गोहि, Hel मात्र इन्डोनेसियाक एकटा द्वीप पर पाओल जाइत अछि। Sea गोहि = COMODO DRAGON = Varanus komodoensis
€ = ; Aa | 4 mer: t ae. / , मैंथिली - गोहि या गोहि aia (उच्चारण - गोहि ar aise) हिन्दी - गोह संस्कृत - गोधा, गोधिका अंग्रेजी - MONITOR LIZARDS / VARANUSES जैववैज्ञा० नाम - Varanus spp. (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
रद्द पर | uals ws खाइत ठिकठिकिआ वा ठिकठिकिया
- eI i rr ii , = Pepa rar "00८0 : ie He ‘ ssi ge OP akg 5; Fit — ae ise a pee ae कड़रिक
कु कं” ch bate” © Ul. “M4 =a मैंथिली - Wafer (उच्चारण - सुर्चैन) सितुआ / Wafer शितुआ अंग्रेजी - UNIO (A type of FRESHWATER BIVALVE MOLLUSC) जैंववैज्ञा८ नाम - Unio spp. (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ Hs जाइत HTS - तत्सम स्वरूपमे)
_ जलाशयक पेनीक माटिमे आधा गड़ल "Water खितुआ" (खुर्चनिक मुँह आंशिक रूपयेँ फुजल अछि)
साभार सौजन्य - pixabay.com (free download) पर, “ys Sen ya ee os = सा के Es . ee ९.७ Gp जा प्र a Re Be: [मै सामार फेज: (free download) मैथिली - गिरगिट हिल्दी - गिरगिट संस्कृत - कृकलास, कृकवाकु, शरण्ड, प्रतियूर्य, प्रतियूर्यशयान, गलगति (2) अंग्रेजी - LIZARD (including COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON, IGUANA & OTHERS) जैववैज्ञा० नाम - SAURIA SUPERGROUP of SUBORDER LACERTILIA (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नाँओ ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
साझार सौजन्य - pixabay.com (free download) yo he की Pg a Pe SF \ मर भर . a, - é “a e साभार सी - = (free याद बहुतडु गिरगिटक (खास DS CHAMELEON समूहक गिरगिटक) जीह सरिसूप वर्गक आन सदस्यक (यथा - साँप, गोहि आदि) site spy द्धिभाजित (BIFID) नजि होइत अछि | ओकर सभक जीहक संरचना Jaa वर्गक (AMPHIBIANS) बेड्ग आदिक BE होइत अछि। एकर जीह शिकार पकड़बाक प्रमुख अंगक रूपमें रुपान्तरित रहैत अछि।
2 © x. x 3S ee अंग्रेजी - HOUSE LIZARD / पलभी, गृहगोधिका, भित्तिका आदि जैंववैज्ञा८ जाम - Hemidactylus spp., Gekko spp. (चित्रमे Gekko gecko) (कुल 5i वंशक लगभ्रग 950 जातिक (नोट - संस्कृत भाषामे आयलर हरेक नाँओ या TAH नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
| © 0: Saldana “hie” Hg > 2 eI +P ye मैंथिली - धनछुआ (धानछुआ) अंग्रेजी - एशी ड्रॉन्गो (ASHY DRONGO) ७ ही जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus leucophaeus \ (डाइक्रुरस cAwlbay)
“न eS प्र Se SY eye ie - 9 a > ae ie © के 3 भर Gee दि बन थे... ‘ bes ‘ Ace 3 SS भर © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” O = " ? . ; eae - * Y ed हि Z <=) - a = + Sm ‘ ye GEL E*Ee a Bee ee 5 Senge *- aX हल रे ६... i a A td Sy, A vd ” . a मैथिली - सिशेली / सिशेली मएना (Rich ay हिल्दी - अबलक dion / सिशेली dion / सिरोई मैंला संस्कृत - शबल सारिका / भरत शबल सारिका अंग्रेजी - ASIAN PIED STARLING / ASIAN PIED MYNA जैववैज्ञा० नाम - Gracupica contra syn. Sturnus contra (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
कि... = — ee — <q —— — a = कक... या साहीक विभिन्न तरहक wic (साभार साँजन्य - विकिपीडिया पब्लिक sida)
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—— ——— ae <. ae a — “2 Si ae Bd, A aS jpn pe g ict . i | न हे aan se 3; he J yj 3. _--. पटिपोडर नल sa Re Ne * eae, fp eae | ni Lainey मैथिली - हंसक, Siew! हंस, बत्तख - हंस हिन्दी - हंस संस्कृत - जलपद अंग्रेजी - GANDER (Male), GOOSE (Female, Singular), GEESE (Female, Plural) जैववैज्ञा० olla - Anser spp. (भारतमें AE) , Branta spp. & Chen spp. इनौट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँ ओ स्वतः मैथिली sey पर्यायी नाँओ अड Saga अछि - तत्सम स्वरूपमे)
oe Shot DL ee Sy ee | | aa le siti ne lis his ee ee j oT oem © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” a “Rag © छा “fad wae face” स्थान - संजय गाँधी जैंविक उद्यान, पटना करिया हंस (Cignus atratus) - ऑस्ट्रेलियाक मूल निवासी
——— मा — —_— — =. =: SS —— —_ >> _ — -_ > = — =—— ६... व . कस [Sz > I |= <a + डी के = —— रे =5 कि Ss = | . pistes =fafcuifeeitutccier डामेल _ मैथिली - हंस (ora देखाओल गेल जाति "मूक हंस" या "म्यूट स्वान") हिन्दी - हंस संस्कृत - हंस (विशिष्ट अर्थमे) अंग्रेजी - SWAN जैववैज्ञा० नाम - Cygnus spp. (चित्रमें देखाओल गेल अछि Cignus olor) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक tt या पर्यायी नॉँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी ate जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
दुडु लोलक बीचमे खाली स्थान एना बुझि || Ss x * ] A + 7 = _ ©] thar Kui gga = 4 ate हु क्र x, fA, s » : \ है... अल भ जज a कै 2 Rex we के मैथिली - हँसुआ दाबी हिल््दी - बक की एक प्रजाति संस्कृत - dw, सारस अंग्रेजी - oPENBILLS / OPENBILLED STORKS (ASIAN & AFRICAN) जैंववैज्ञा० जाम - Anastomus oscitans (ASIAN) & Anastomus lamellegerus (AFRICAN) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
ey “8 ७ सन 2 Sea peg | 7s, = ~y a ~ — ५ . i Ny Sys keer - साभारंसौजन्य - pixabay.com (free dowtilowd)y मैथिली - par हिन्दी - छोटा बुज्जा, कोवर संस्कृत - कवार अंग्रेजी - GLOSSY IBIS जैंववैज्ञा८ जाम - Plegadis falcinellus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
SOL ME ..नज्टूर कर eae कि Gn बला en Se भी है a ea “he Shige Heer on iinet. eee oe ee | LT LOOP दे aie लो. रो Noes मैथिली - सिरैली ifr कि सिरोली) / नकली नीलकण्ठ हिल््दी - नकली नीलकण्ठ संस्कृत - नीलाड्ग, चलपुच्छ अंग्रेजी - INDIAN ROLLER (इण्डियन 3ici) / BLUE JAY (ब्ल्यू / ब्लू जे) जैंववैज्ञा० जाम - Coracias indica syn. Corvus bengalensis syn. Coracias bengalensis (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
f डर ¥ it ae i a / | , a « a a ROLLER | INDIAN ROLLER | INDIAN ROLLER | गर्देलि - आस्रमाली aréfor - मटियाही पीयर aréfer - मटियाही पीयर (ait कि लील) (नील रंग लेंशो otf, (संगहि जीलाभ) प्राप्ति स्थाल - यूज़ोप (योरोप) | प्राप्ति स्थान - पच्छिमी एशिया, |... प्राप्ति स्थान - दच्छिल-पूब Wand भारत (पच्छिम-उत्तर- एशिया यथा - थाइलैंण्ड, पूब-दच्छिल आ Hors gatas म्यांमार, कम्बोडिया, भाउरतमें Bah लाओस, वियतलाम, सिंगा- प्रजातिः- प्रजातिः- पुर आदि; संगहि सटल Coracia bengalensis होयबाक कारण पुर्वोत्तिर Coracia garrulus garrulus bengalensis भारतक किछु भागमें & & प्रजातिः- | Coracia garrulus seminowi Coracia bengalensis indicus | Coracia bengalensis affinis
2 or का 77 & J thr f € eee f me. ft! iP. मैथिली - सिल्ली / सील्ली हिल्दी - सिलाही / सिल्ही / सील्ही _ संस्कृत - प्रस्ौ्यात शरली अंग्रेजी - LESSER WHISTLING DUCK / LESSER WHISTLING TEAL / INDIAN WHISTLING DUCK जैववैज्ञा० नाम - Dendrocygna javanica ete संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
| x Te te 2 * =» == 3 मर जज थे मकर ie © पं ‘Shashidhar Kumar 0803". © डॉ. शशिधर हमर“ बिदर: " © छा “faa maa facne” * कम = , aco पोखरिक पानिमे सिल्लीक जलावतरण
है . y ii na ; \ © Dr. Shashithar Kumar “Vide २ डी- लिप व कर ee Saas xa face मैंथिली - सुग्गा हिन्दी - तोता संस्कृत - शुक, कीर अंग्रेजी - Osi / पैयाकीट (PARROT / PARACHAET/ PARAKEET) | Gado नाम - सिट्टाकुला आदि (Psittacula spp. & Others) | eee VG! 4 oS Oe
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: a : J NI साभार सौँजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन मैथिली - BA (गडूमक, धानक, चाउरक, Hes Wz आदि) WRI या फाड़ा (धानक वयस्क पाँखियुक्त AWD हिल्दी - घुन (गेहूँ का, अनाज का) संस्कृत - ...................८. अंग्रेजी - GRANARY WEEVIL (WHEAT-, RICE-, MAIZE-, GRAIN-) जैववैज्ञा० नाम - Sitophilus granarius (गढूमक सूखा) (उपरुका चित्रमे) Sitophilus zeamais (मकई केर सूखा) Sitophilus oryzae (चाउर आ धालक सूखा आ फाड़ा) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
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i "ead Mes i. —— = ce = Pee © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © T. शशिधर इस स्तर CHR” <@ . जँखि अगिलापएर ara) मैथिली - साही (OEY हिल्दी - Bat / साहिल संस्कृत - शल्लकी, शल्यक, शल्य, शलाका, शर्या, कमठ, शल्यलोमनू, कण्टकागार, कण्टकश्रेणी, वज़शल्य अंग्रेजी - PORCUPINE (NEW WORLD P.+ OLD WORLD P.) GASH o नाम - OLD W. PORCU. - Hystrix spp., Atherurus spp. & Trichys spp. NEW W. PORCU. - Erthizon spp., Coenduou spp. Sphiggurus spp., Chaetomys spp. & Echinoprocta spp. (चित्रमे - भारतीय साही / INDIAN PORCUPINE / INDIAN CRESTED PORCUPINE / Hystrix indica - an OLD W. P.) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या ee नाँओ स्वतः मैंथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Ch: hat. सह CANS re २ ही ante Ps Lo hs, रस ५ Sea TT) Gen j Neat \ WOVEN TAS AN | PATA aN Ni UF EN BAN eS ९. WN दिल ९११ है) कड़ाड्कुल / कयाड्कुल / PAD / कंकूड़ / कंकूर fers केर AVS FLOCK OF RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS Pseudibis papillosa
‘ig wt ms नि # . ‘AN N m4 4 by © De. Shashidhar Kumar Videho" © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” (© नै Pree = ag cum a“. Es उ स्थान - दुलास्पुर gata gan, न ७ मैंथिली - भ्रूरा या मटियाही माथ बला कठसुग्गी हिन्दी - भ्रूण सिर वाला aol संस्कृत - चण्डिल अंग्रेजी - BROWN HEADED BARBET / LARGE GREEN BARBET जैववैज्ञा० नाम - Psilopogon zeylanicus syn. Megalaima zeylanica (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः AH भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
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ड SIMPLIFIED STAGE OF BHARATA (Not according to measurements) DOOR N DOOR , he Rs j= RS rig C. Back Curtain of Theatre N. Nepathya (make-up room) SC. Special Curtain (to cover up entry and exit) Doors (2) with Curtains and wall-for entry and exit V. Vedika (central platform meant for Kutapa or orchestra) . RS. Rangasirsa (rear stage) M. Mattavaranis (2) (supplementary acting areas) RP. Rangapitha (main acting area)
सूचना मैथिलीमे So ferco उपाधि प्राप्त: so नरेन्द्र नाथ झा ग्राम+पत्रालय- मेघौल,भाया- सकरी, जिला मधुबनी, बिहारक निवासी छथि, जे सम्प्रति अध्यक्ष मैथिली विभाग do यमुना कार्यी जयन्ती कॉलेज बगाही (ढ़ोली) मुजफ्फरपुर, बी0आर0ए0 बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुरमे कार्यरत छथि। जनिक पी-एच0डी0 उपाधि जून 2006 ई0मे “मिथिला-भाषा रामायणमे शक्ति तत्त्व” विषय पर डा0 रमण झा लएनाएमि0वि0 दरभंगाक शोध निर्देशनमे भेलनि | हिनका Slofeco उपाधि “मैथिली साहित्यमे सीतातत्त्व-निरूपण” डॉ0 नीता झा, विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष मैथिली विभाग, ल0नाएमि0वि0 दरभंगा शोध- निर्देशनमे 03.09.2042 (Viva-Voce) सुसम्पनन भेलनि। जकर वाह्यपरीक्षक रूपमे so वासुकीनाथ झा पटना एवं <io भगवानजी चौधरी, साहिबगंज (झारखंड), विषय-विशेषज्ञ उपस्थित छलाह | हिनक Sloferco परीक्षाफल i009.20:2 सोमदिन प्रकाशित भेल तथा डी0लीट0 . मूल उपाधि प्रमाण पत्र ल0नाएमि0वि0 दरभंगा चतुर्थ dent समारोह दिनांक 03 अक्टूबर 20(2 20h भारतक राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जीक अध्यक्षतामे प्रमुख रूपमे प्राप्त भेलनि | ः प्रेषक i श्री राम नरेश राय ; रे | NET/J.R.F (U.G.C) t विश्वविद्यालय .. विभाग a i B.R.A.B. University मुजफ्फरपुर नह ९० मो0- 9709728 हि Teg Te का
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(प्रधान मध्यान्ह रेषा / रेखा) Ae fear देशान्तर रेषा / रेखा. अफ़्रिका महादेश rs ५ y Heat महासागर [Ee (Atlantic Ocean) हिन्द महासागर yor (Indian Ocean) i हा दक्षिण अमेरिका महांदेंश अण्टार्कटिका महादेशक i | अण्टार्कटिका महादेशक मुख्य भाग iy < | भाग बा [ae = देशान्तर रेषा / रेखा... दक्षिणी ध्रुव देशान्तर tor / रेखा (90 डिग्री q. अक्षांश रेखा. ऑस्ट्रेलिया महादेश / महाद्वीप cap प्रशान्त महासागर महासागर / (Pacific Ocean) t (Indian Ocean * svenicn ga (66.5 डिग्रीं द- अक्षांश रेषा / डी ——e देशान्तर रेषा / रेखा
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कक <i _ न tee, cel a nS ee नि ऊद या SolacifS/ EURASIAN OTTER / Lutra lutra
दा =o sae if उम्र ww - —S e 2 ‘© Dr. Shashidhar Kumar Icha "OST. शशिघधर pat lage ee i वे. “विटम हु - in 2 4 ८... . S AL —_— an t ( ~ दर gil लल दर पानिमे हेलैंत 2 cl Se या ऊदबिलाड़ि EURASIAN OTTER / Lutra lutra
3 (eam 7 Ne मैथिली - कठसोद्धी / कठस्वोधी हिन्दी - कठफोड़ता संस्कृत - दार्वाघाट, दारूदार्वाघाट, काष्ठकुट्ट, शतच्छद अंग्रेजी - WOODPECKER (pra - BLACK RUMPED FLAMEBACK WOODPECKER) जैववैज्ञा० नाम - Picidae परिवार किछु वंशसभक (Genera) समस्त जाति (Species) ओ प्रजाति (Sub species); (चित्रमे - Dinipium bengalensis) he संस्कृत माषामे आयल हरेक नॉगी या पर्याय नॉगो स्वतः मैथिली aT पर्योगो aa as जाइत अखि- TET स्वस्पने)
= 4 ty = ay a sl A NN ; a शी b FAN || 4, y | ih ty hi ! u , | थी iy मैंथिली - लाल माथ बला कठसुग्गी अंग्रेजी - COPPERSMITH / COPPERSMITH BARBET / CRIMSON BREASTED BARBET जैववैज्ञा० नाम - Psilopogon haemacephalus syn. Xantholaema haemacephala syn. Bucco indicus syn. Megalaima haemacephala (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
कण cag iY - =~ ii) तु ey . x7 A, kK %) । ¢ yy ७ , 4 - - oy Ry Ad ही an Me Ay 3 i 4 | /, Pac AS मैथिली - भ्रूरा या मटियाही माथ बला कठसुग्गी हिन्दी - भ्रूण सिर वाला बसन्ता संस्कृत - चण्डिल अंग्रेंजी - BROWN HEADED BARBET / LARGE GREEN BARBET जैववैज्ञा० नाम - Psilopogon zeylanicus syn. Megalaima zeylanica (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः AIH भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
BE} oS , mY 3 Ad Z F on 4 जय @ ye 4 4 १, कि a * ; ‘ 4 € i wi, ‘ ‘gg Po, Silda Lanse “Wie 2 ei. gore ete 26 i लाल माथ बला कठसुग्गी (वयस्क) COPPERSMITH BARBET / CRIMSON BREASTED BARBET
। ¥ कु Sige i | Yan ta rN ‘4 » #+) कर 'लाल माथ बला कठसुग्गी (शिशु) (माथ ait गर्दनि पर लाल रंगक लेंशमात्र दरश GIN,
en ee, ta ek = रस जे. शाशपर अ थी कि न के a 2 मैंथिली - ऊद या ऊदबिलाड़ि (उच्चा० - ऊदबिलाइर / ऊदबिलाड़) अंग्रेजी - OTTER (चित्रमे - EURASIAN OTTER) जैववैज्ञा० नाम - Aonix, Lutra, Lontra, Hydrictis, Enhydra आदि वंशक जातिसभ् (चित्रमे - Lutra lutra) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओो या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी Aish Ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
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मैथिली - sec, मुँढदुस्सा, कचबचिया हिन्दी - उल्लू... संस्कृत - उलूक अंग्रेजी - आउल (OWL) Piggy ab ’ ny iL be v/ जैतवैज्ञालिक लाम - Tyto, Strix, Otus, Megascopes, Bubo, Ninox, Asio, Glaucidium, आदि 26 वंशसभक (Genus / Genera) करीब 230 जाति (Species) DI सामुहिक जाम |
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\ 4 fe ही ot रे की कप ५ - मैथिली - उड़ीस हिन्दी - खटमल संस्कृत - मत्कुण अंग्रेजी - BED BUGIS (बेड बैग) जैववैज्ञा० नाम - Cimex lectularis (मुख्यतः) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल Rw लॉंओ या पर्यायी लॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी जाओ भर जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)
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ली हक 4 ' के चल के अं... दक्षिणी गंगोत्री : पी Be (Re, 982) pica “feet: °° (anea,202) सागर हर 30 CTq bg 5 (निर्माणाधीन) अमृण्डसेन : oy ae - सागर ’ < रु अँण्टार्क, Ue सागर टिका 2%
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i | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वास प्रायोजित डर i ~ | ae i ॥0 — ॥2 फरवरी, 20:2 a7 4 वे४4- «reba थताब्दीक पहिल दशक में मैथिली भाषा-साहित्यः स्थिति आओर अपेक्षा” | ली त उदघाटन - uo श्री ताराकान्त Sar अध्यक्षता- डा. wees प्रताप fae ने न gl 5 2. A >» कह : Pat. 4 a = ae. ie ye a rm i = < SS : * = - ps Ps Sy J: : 5 : A . = “ $ - # . Ce = thee Rd ij g ‘ 5 पत्र = = = % Ell T056Ar% z 3 . * = = - § a s शा बी -
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4 aa; कविपाति विद्ञापातिक सर्वभान्य चित्र-किरुपण ie = निर्धारित कयल गेल छल तकर किकरण Get जाय। ee: i96t ई० सँँ पूर्व हमरा लोकनि विद्यापतिक स्मरण निराकार रूपें करत रहलहूँ। परिषद एहिं अभावक पूर्ति कयलक। विद्यापतिक वंशज लौकनिक देहक गढ़नि, मुखाकृति आदिक आधार पर विद्यापतिक काल्पनिक चित्रक निर्माण 'कयल गेल । चित्रकार were मुँगेर जिला निवासी रामानन्द सिंह, स्थानीय निवास 9, गुप्ता लेन, कलकत्ता 6। चित्रक उद्घाटन दिनाक भव तक 980 कें भेल, उद्घादनकर्ता wae Ss oe a wo शशिभूषण पाण्डेय ( भारती पुस्तक मंदिर) । समारोहक है के ae = : e अध्यक्षता कयलन्हि विश्व विश्वुत विद्वान Sto सुकुमार सेन। अपन a 44 गे ४. a अध्यक्षीय भाषण में कहलन्हि - “मैथिली, बंगला, असमिया, 225 Re मा का se उड़िया आदि मागधी प्रसुत भाषाक आदि कवि विधापति छथि। PS Oa ge) oN कवि, निबन्धकार, Teva, इतिहासज्ञ आदिक रूप में भारत afer ae Set pig Si हिनकर महत्व के नहि fare" डा० प्रबोध नारायण सिंह FF pent Deen ee Se विद्यापति चित्र निरूपण हेतु परिषदक 'भूरि-भूरि प्रशंसा parce) ara दा: 'विद्यापतिक चित्रक उद्घाटनक बाद विभिन्न पत्र-पत्रिका में चित्र... विद्यापति wert समारोहमे do शशिभूषण पाण्डेय प्रकाशित कराओल गेल, विधिन्न मैथिली सेवी संस्था Poa विश सावंत फोर See है. के पठाओल गेल । एक वर्षक समय सीमा राखल गेल संशोधन परिवर्द्धन हेतु । कतहु सँ कोनो प्रकास्क i विचार नहि अएला पर परिषद डाक on विभाग, भारत सरकार a विद्यापतिक डाक टिकट हेतु पत्राचार Z (= 3. आरम्भ कयलक। आरहर्निश प्रयासक बाद 77 नवम्बर, 4965 go क$ विद्यापतिक डाक टिकट बहार ee 4 4. भेल। विचार-विमर्श हेतु दिनांक 28 fer, i965 ई० aS परिषद कार्यालय में आयल रहथि श्री ry iowa. पी. चटर्जी, फिलेटेलिक आफिसर, डाक तार विभाग, भारत सरकार आ ओ अपन मन्तव्य द5 i AN) गेलाह- मम i ‘It has a greal pleasure for me to record the activities taken by the Mithila 0७ 5: Sanskritik Parishad, Calcutta for bringing out a commemorative postage stamp अप to honour the great poet of Mithila, Vidyapali.” Sid - S. P, Chatterji, Phila. Officer अस्त ; जनगणता मे मैथिली लिखवकाक अनुरोध कहिया सँ कहिया धारि चलल आछि 2 उत्तर ; १95। ई० क जनगणनाक रिपोर्ट देखलाक बाद जाहि में मैथिली -भाषीक संस्था मात्र तत्कालीन दरभंगा जिलाक जनसंख्याक लगधक छल, 7967 go सँ भेल जे हेमनि तक चलल | भ$ सकें अछि भविष्यो में चलए। ued; मैंधिलीक युवा साहित्यकार कें प्रोत्साहित करबाक भाविष्य मे की योजना अछि 2 उत्तर ; भविष्णु युवा साहित्यकारक प्रति परिषद सदा सहदयता रखेंत अछि आ भविष्यों में राखत । परिषदक प्रकाशन कें अपन 'एकटा मानदण्ड GH तथापि युवा साहित्यकार कें प्रौत्साहन स्वरूप कनेक झूसो रचनाक प्रकाशन परिषद करत | एहि बेर : श्री अनमोल झाक लघुकथा संग्रह * टेकनोलजी ' प्रकाशित ETA | प्रश्न / नव-पीड़ीक लेल अपने की सन्देश aay चाहबन्हि 2 उत्तर ; युवा पीढ़ी हिन्दी एवं अंगरेजी परस्त ae गेल छथि । अपना घर में अंगरेजी माध्यम सँँ वार्तालाप करए में सक्षम aie छथि तैं हिन्दीक शरण में जाइ छथि। दुधमुँहो बच्चा कें gard feds मे करताह। ओना आजुक परिपेक्ष मे अंगरेजी आवश्यक अछि हिन्दी नहि, ओना जेतेक भाषा सीखी से नीक | मैथिली के बन्हक राखि एवं बेचि ops नहि। शिक्षाक माध्यम जे हो परंच घरक एवं गामक भाषा मैथिली रहए। मनीषी लोकनि कें दृष्टि मे राखि धीया- पूता के आगू aga में अभिभावक लोकनि सहयोग करथि, जे मनीषी कहियों हिन्दी on अंगरेजीक शरण में अपन मातृभाषा त्यागि नहिं गेलाह। जेना -- सर गंगानाथ झा, Slo अमरनाथ झा, Ho Fo उमेश मिश्र, डा० जयकान्त मिश्र, श्री योगेन्द्र पाठक *वियोगी' आदि।
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fee tte =nt cus 'लोकार्पण, चर्चा आ नाट्य-प्रस्तुति 4 = am (उपन्यास) : गौरीनाथ प्रमुख वक्ता: सुकान्त सोम, सुरेन्द्र स्निग्ध, हृषीकेश सुलभ, प्रेम कुमार मणि 'तारानन्द वियोगी, मोना झा, डॉ. विनय कुमार “दाग 'क पहिल अध्याय ' ब्रहम-शक्ति 'क नाट्य-प्रस्तुति ye आन रूपांतरण आ निर्देशन : कुणाल Ss SPs स्थान: आई एम ए हॉल, दक्षिण गांधी मैदान, पटना ¥ तिथि आ समय : 25 नवम्बर, 2072, संध्या 04:30 बजे F 7:00 बजे आराम दि विशेष: अंतिका प्रकाशनक पुस्तक आ पत्रिका प्रदर्शनी mer 7 'एहिं अवसर पर मित्र सहित अपने सादर आमंत्रित छी। g निवेदक om wage मिश्र, सचिव आ समस्त भंगिमा परिवार, भंगिमा पटना, दूरभाष संपर्क : 9334339348
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अर्द्शतान्दी सँ बेसी (गत 50 वर्ष) सँ मिथिला-मैथिलीक सेवा कएनिहार श्री किशोरी कान्त मिश्र, पूर्व अध्यक्ष मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कोलकाता सँ लेल गेल साक्षात्कार । श्री नबोनारायण मिश्र, aes, कोकिल मंच, कोलकाता =r eI - Ue : अपने कलकत्ता कहिया अयलहँ 7 fea उत्तर : (956 Fo क जून मे हम कलकत्ता अएलईैं। अर्थ उपार्जनक संग शिक्षा 4 Scher Tem करब उद्देश्य छल । = : aed: सिधिला-मैधिली af कहिया आ किनका औरणा सँ जुड़लईँ 2 तदनुकूल x की उद्देश्य छल ? के उत्तर : गणित में कमजोर रहबाक कारणे विद्यालय में विज्ञान विभाग fe 4 See | कला विभागक शरण में अएलहूँ sr गणितक स्थान पर मैथिली I विषय भेटल। विद्यालय में प्रत्येक शनिकः$ ताद-विल्राद प्रतियोगिता | 4° : होड wee | एहिं में जे कियो भाग as सके छल — पक्ष या विपक्ष मे । हमहूँ भाग लेब शुरू कएल | उपप्रधान अध्यापक स्व० शिवनारायण मिश्न, मुँठ प्राम निवासी प्रतियोगिताक अध्यक्ष छलाह। मातृभाषा प्रेमी, विद्यालयीय विज्ञान विषय aie प्रत्येक विषय में निष्णात। विद्यार्थी लोकनि बाजवाक माध्यम हिन्दी या अंगरेजी रखैत sere शिवनानू हमरा लोकनि कें मैंधिलीयों में बाजक छूट tate । ओही om सँँ मैथिलीक प्रति प्रेम जागल छल । कलकत्ता मे 959 go क जनवरी मे मिथिला सांस्कृतिक परिषदक स्थापना भेल । हम एवं स्व० राजकुमार मल्लिक साहित्य प्रेस मे काज करँत रही | de हमरा एहिं संस्था सै sae करौलन्हि | उद्देश्य छल मात्र मातृभाषाक प्रति आदरभाव आ atte सेवा केनाइ | We: साहित्य कँँ अपने कोन दाष्टिएँ देखैंत oF 2 उत्तर : मैथिली साहित्य के हम श्रद्धा भाव dade छी । साहित्य संगे व्यावसायिक दृष्टिकोण रखनिहारक प्रति हमरा घृणा भाव उत्पन्न होइत अछि। साहित्य अकादमी मे मैथिलीक स्थान प्राप्त करबा में हमरा लोकनि fag व्यक्ति अथक परिश्रम कएलहूँ। मिथिला सांस्कृतिक परिषद कें मैंधिलीक मान्यता Safe साहित्यिक संस्था रूपें साहित्य अकादमी मान्यता देलक | साहित्य अकादमी मे अपना कें satel दूझे छथि sh लोकनि ओहि समय में साहित्य अकादमीक नामों नहि जनै छलाह। आइ ओ पैघ मैथिली सेवक आ साहित्यकार कहने ole | साहित्य अकादमी मे आन भाषाक संग मैधिलीक मान घटत Ue बात पर ध्यान नहिं दए मात्र मुद्रा उपार्जन में लागल रहै छथि। साहित्य अकादमीक मैथिली सेमिनार & प्राथमिक पाठशाला qa छथि आ sits मंच पर नव लेखक के लेखनक अ-आ - क-ख सीखक अवसर प्रदान करै छथि | कथन छन्दि — नव साहित्यकार कें प्रोत्साहन दए रहल छथि | Wet: eT प्रकाशनक क्षेत्र मे मिशिला सांस्कृतिक Ties महत्वपूर्ण भूमिका रहलैक ais एवस् अफनेक सम्पादन में सेहों बोथी-पजिका अकाशित ter अछि तकर विवरण कोना की arf 2 उत्तर : परिषदक स्थापना कालहि सँ परिषद पोथी एवं स्मारिक्राक प्रकाशन करैत रहल। मुद्रण व्यवसाय af जुड़ल रहबाक 'कारणे हम आ स्त्र० राजकुमार मल्लिक परिषदक प्रकाशन Te मुद्रणक व्यवस्था करूँ छलहूँ। जैं कि हम युवक छलहूँ सल्लिकजी अधिकांश भार हमरे पर छोड़ि दैत were | ओहि दिन में मिथिला मिहिरक प्रकाशन बिना व्यतिक्रम के 'होइत छल। स्व० सुधांशु शेखर चौधरी मिहिर में छपए वाला सामग्रीक वर्तनी एक रखे ware) मैधिलीक वर्तनी निर्धारण में मिहिर् एवं सुधांशुजीक काज स्तुत्य रहल । आब पुन: Sd रचनाकार ओतेक तरहक वर्तनी | हमहूँ हुनके अनुसरण करैत परिषदक तमाम प्रकाशन में वर्तनीक एकरूपता रखें vad! हमरा देखरेख में प्राय: ates पोधी छपैत रहल on ओकर चर्तनी एक रहल । मिहिरक अनुकरण करैत उल्टा कौमाक स्थान पर अर्द्धकार प्रयोग करैत रहलहूँ। स्वनामधन्य स्व० ब्रजकिशोर ant 'मणिपदाक ' वर्तनी के ठीक करत परिषद द्वारा प्रकाशित oer पोधी में परिषद द्वारा व्यवहत मानक वर्तनी भेटत । paristial
विदेह सदेह:३६|| 97 सूचना Ae Go लिट्0 उपाधि प्राप्त io नरेन्द्र नाथ झा ग्राम+पत्रालय- मेघौल,भाया- सकरी, जिला मधुबनी, बिहारक निवासी wf, जे waft अध्यक्ष मैथिली विभाग पं0 यमुना कार्यी waa कॉलेज बगाही (ढ़ोली) मुजफ्फरपुर, बी0आर0ए0 बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुरमे कार्यरत 'छथि। जनिक पी-एच0डी0 उपाधि जून 2006 ई0मे “मिथिला-भाषा रामायणमे शक्ति तत्त्व” विषय पर डा0 रमण झा ल0ना0मि0वि0 दरभंगाक शोध निर्देशनमे Fafa | हिनका डीएलिट0 उपाधि “मैथिली साहित्यमे सीतातत्त्व-निरूपण” io नीता झा, विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष मैथिली विभाग, 'लएना0मि0वि0 दरभंगा शोध- निर्देशनमे 03,09.2042 (Viva-Voce) GIA मेलनि। जकर वाह्यपरीक्षक wot डॉ0 वासुकीनाथ झा पटना एवं <io भगवानजी चौधरी, साहिबगंज (झारखंड), विषय-विशेषज्ञ उपस्थित woe | fee डीएलिट0 परीक्षाफल 7009.20I2 FF प्रकाशित भेल तथा डी0लीट0 मूल उपाधि प्रमाण पत्र aA eam चतुर्थ दीक्षान्त समारोह दिनांक 03 अक्टूबर 20:2 ई0क भारत Safe प्रणव मुखर्जीक अध्यक्षतामे प्रमुख रूपमे प्राप्त भेलनि | ही. Ee _ राम नरेश राय 3 NET/R (U.G.C) 8. विश्वविद्यालय मैथिली विभाग B.R.A.B, University मुजफ्फरपुर मो0- 97097728 gh obey TT सा
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244 || विदेह सदेह:३६ ae "| 6.4 = । * 0, 2 हर liz ca e | Pacer tt y ag } i
250 || विदेह सदेह:३६ कलम BAS By Duel पािकक hagd ESE eee ee जनादन्त (Bath eel 6H [ATR al BMG Da wl MIG कट NG!) |QiLue" yy e छत acre” Bad नदी |G ON — cena Jaa!) 26 \D — << ei) waite) Sadan थे का एव q<ang ad— Hi न्वीमकूमि 29) nr) विद Jey, Vern ereare a, SPY ching kok | KAaIE Bday Aue Merely SA~ WBea Aprer <eu , PKb_ Me caraSd gihs sda [Gro अर्थ (RCH सता Her 40% BE भा HD yoo Oni eae iGtaot Bsn asa BS , £57 BO RS Dot Ane ub | 42) UHL Gaot जे WF Grote four GA) Diet MBH मीलंग Weve Ay alley 4) BP Aig काडि | aH @arel Dard, Gon aw~ale wet | खुद Ode syaeid) Bong क्रम BT FOEN Beal May en) कान vr | one Br (Re 42 — Gd Ba ,<aic) Farhad SPuel Wb Mya aI का YI~B/B) Fook erase Bra eck छपगेनछि। aia Doi de, HG oka gu सिव्यदिढ़ ठेठु BY vicw< eI) oD) hi se exe Ade Ghats Beas Be MeS कद Bor Sra <a — FHANH) SIC [एंड oe GALES! GR AY BID, Byer «Puee)~ satan Brea D2 (REE OP effolTRUEE oh aren AYN MYTH BLAS काश ou Sa ao alah on ala (Rencta, ong Bx gnu i op waar) देव idly कि नि, Y vias BPS - are Jaa AS मेड कवि: Sir ole न lla, anor aya~ SO) yal KBE रात ABE DIP पटि केपीनकिट GUNS Lew Zodeov 50 Ae aire फिर AH AGA Lohr Divert पा2% के <br SnD) faumgaie shad) orolS) बड़ा ने) by Fadwe ade i? Wea KASEALE UG Bt मापन np? go ay) Kfe BIAS dy Glad Bg APs हार Ol ESQ OL छोजिनि। hare aco aay | ot Et ee ‘ane Bye Seen Bese MrKapare@® ROM. oH
विदेह सदेह:३६|| 473 है ) जितेन्द्र झा _ नेपाली आ मैथिली भाषाक दूटा साहित्यिक कृति विमोचित =~ — << हे सवा जाए | Ee. ‘ \ bi BS ows N
584 || विदेह सदेह:३६ फ v bet " 5 : Dm Ws fh Se 7 , a : . ff pe if" iy मिक es j yn cps i ™ nS y कै 4 0 ह | एजगाएही राह एही काली | / (डर) 2 G) in | ae किन कि रु hd
विदेह सदेह:३६|| 585 शत = -_ AN 8 re ie Te ay ¥ Na व iy f ° is oh iy! (| कक 4 . ef दि 4 A ad (| | 4 rai b iy | _ \ 2 ही | = ee eo उद कक ea
928 || विदेह सदेह:३६ it~ पारसमणिए peer , रंडुआ <a Rete उन aI oh wus, age शिनिर समापन wate ag wa पुरस्कार BF ससम्मानित् a] sorte ware Fees GFA GATE - 2०2 RTH -o-osi.d Boe 5 बने से (फिपिनद कार्यक्रम शुऊ्ध sin) Gau ot Set सभा cma TeX sree जरुरी डोर @e ave 2 Ba arena पद पर xd porar भा के aaa eum SH) rus 3स्थ्यक्षक ae et कार्यक्रम syn ats ata Rem) sna HY el ste लाल को मंचडड्घीवक कारी wR atte Sry Raw के am Aes, sor rq =p जान FEA सेनाइ बाद: लि डुष्पी पक GET शी stam A कर ands "eae सौदा चुशक af awe Sm) qa; wl sree gray शा जी. कहें sod मैडल जी के बारे जे बात saa As 2स््छदीखन पोजससिनंत BAK oe ah tae AS सन ay ae as Ste I gaa GIT Fay tw Taree wh नाराघरा om हारा owl we of a सम्माम में ae wa are Sto) eR eve ATee Pant af ates aa com am great भा A ser पांज - Saat dy पारिदरौचिक से. सम्मान NS) gece शव जजदीडा मंडल के मेंस पर अजा, aka करना me कहल जेल । कारियि wae शी tae भी मंच पर अति starr aa के वर्क में at कर sata करोलबखिन्ट | अप्पन gag से SWAT 7 Gam arr aaa डुनका qt कथन ey
विदेह सदेह:३६|| 929 ज्ञाहि मे YM STA Bey: dus प्राराजिकता ,कखलन्टि । आह tar te dst Gg wow Sat मोना Ga कमाए oy ol ur re Hew ate sway कंवि,/कचाकार पर्नचित्ह । उन: समा et fey ah Ver ae ae i AR. Ad cat लीकमि Ta पारलमनि yaramy Grey असर, Tol-aoe Gag Geer ने HU er xia tas Am) ईद HMR ATM ea wor 5० daa FR बात waa जैल 7 पुन a4 साराधण पका के ar gras SITE am हक मीट कविता at करेला tm) पुन: मंच पर tar Saga ofl कट ars why) मेजर Gad dae anf वक्ता Reha Gar ay TATE GE GR Gh afte Fa@) Oy sate ste, rata Aa Tg Fe Hee बचना te 35) wars सभा er wa atta gran SraT Ue Mice of) Gear मे बदलि ts) Oy सम्पपानीपरान्त परीक्षा , ae Gare जी 3श्षम रुलभ Ter Gun, फितसिय Tey आजर् Viel पुरस्कार Yate Sa eR जज के ब्यन am सै. आरप्िक dey Joe मै. yan me aR, ST AR को Beare aD ate । ota जे शी Treat का A डरा Breathe आचरण Wats) seme sgt eds 4 किशन कुमार भा oa sie ST ay She) ear जपायभोपरोन्् id at aur Gu ay ae ate) => aaa सैकरूनक्ती — RTT oh There aga - सजा, Ws md ge Coreyerdly Oe eer od ee 2
विदेह सदेह:३६|| 047 नबोनारायण मिश्र जी द्वारा लेल साक्षात्कार- किशोरीकान्त मिश्र जी सं अद्धंशतान्दी सै बेसी (गत 50 वर्ष) A मिथिला-मैथिलीक सेवा कएनिहार श्री किशोरी कान्त पिश्र, yo oven मिथिला सॉस्कृतिक परिषद् कोलकाता से लेल गैल साक्षात्कर। Be - | AG) art = t956 do क जून में हम ऊलकता UR | अर्थ उपार्जनक संग शिक्षा कद अत: सिकिता-मैथिली of कहिया on किनका अरभा a zt ? Teg कं “ की उद्देश्य हल 2 “Se उत्तर : गणित में कमजोर रहबाक कारणे विद्यालय में विज्ञान विभाग af 4 मेटल । कला विभागक शरण मे अएलहूँ आ गणितक स्थान पर मैथिली विषय Tea विद्यालय में प्रत्येक शनिकः वाद fang प्रतियोगिता pa de wit एहिं मे जे कियो भाग लघ सके छल — पक्ष या विपक्ष 2 aad भाग लैब शुरू कएल | उपप्रधान अध्यापक ere शिवनारायण मिश्र, ste निवासी प्रशियोगित्राक अध्यक्ष छताह। मादृभाषा प्रेमी, चिधयालयीय विज्ञान विषय छोड़ि प्रत्येफ विषय में निष्णात। विशार्थी लोकनि बाजवाक माध्यम हिन्दी या ओगिजी रखैत wae शिववानू हमरा लोकनि a Rtas में बाजक छूट देलन्हि sed ama Ate प्रति प्रेस जागल ‘Wal कलकत्ता 4 t999 go क जनवरी में मिथिला सांस्कृतिक परिषदक स्थापना भेल । हम एवं स्व० राजकुमार मल्लिक साहित्य dre में काल करत रही । तैह हमरा एहि संस्था से समझ करौलन्द । उद्देश्य छल सात्र सादृ भाषाक प्रति आदरभाव भा! ओकर सेवा केनाइ | ser: साहिता # अपने aha gitar dea oF ? उत्तर ; मैथिली साहित्य के हम श्रद्धा भाव से देखैत छो। साहित्य संगे व्यावसायिक दृष्टिकोण रखनिहारक प्रति हमरा घृणा भाव उत्पन्न tea ae साहित्य अकादमी ये मैधिलीक स्थान re करना से हमरा लोकनि Peg व्यक्ति अथक परिश्रम करलँ। मिथिला सांस्कृतिक परिणद के मैथिलीक मान्यता संगहि सादित्िक संस्था रूपें साहित्य अकादगी मान्यता देलक। साहित्य अकादमी में अपना कें कर्ताधर्ता ad ote ओ are ओहि समय में साहित्य अकादमीक नामों नहिं जनै were | आइ आओ de मैथिली सेवक on साहित्यकार कहे छाथि । साहित्य अकादमी में आन भाधाक संग वैशविलोक सान घटत एहिं बात पर ध्यान नहिं दर मात्र मुठ उपार्जन में लागल रहे छथि। साहित्य अक्तादमौक ‘feel सेमिनार कें प्राथमिक पास्शाला a ofa आ she मंच पर नव लेखक कें लेखनक अ- शा - क-ख सीखक अवसर प्रदान करें छंध | कथन wy — तव साहित्यकार कें प्रोत्साइन दए रहल BT | अस्त; helt एकालनक es से Par atts Pema महत्वपूर्ण भूमिका रहलैंक af एवम् अनेक TET में हों चौथी फतिका अकाजित Stew अछि लकर Prove कोना की arte 2 उत्तर : परिभदक स्थापना arate सँ परिषद पौथी एवं स्मारिकाफ प्रकाशन Ra रहल। मुद्रण व्यवसाय al जुड़ल eae कारण हम आ स्व० राजकुमार मल्लिक परिषदक प्रकाशन एवं मुद्रणक व्यवस्था को. छलहूँ। जें कि इम en wa मल्लिकजी अधिकांश भार हमे पर छोड़ि दैत छलाह shi दिन मे मिथिला मिहिरक प्रकाशन बिता ब्यतिक्रम के होइत Ba ete uty शेखर चौधरी सिहिर में छपए वाला सामग्रीक बतंनी एक रखे छलाह। fee वतन निर्धारण में मिहिए एवं सुाशुजीक काज स्तुत्य रहल | आब पुन: जैतेक रचनाकार ओतेक तर्क बर्तनी हमहूँ हुनके अनुसरण ata परिषदक तमाम प्रव्माशन में बर्तनौक एकरूपता रखें vag) हमरा देखरेख में प्राय परिषद ded छपैत रहल on ओकर बर्तनों एक रहल। मिहिरक अनुकरण करत उल्टा कौमाक स्थान पर arate srt करत रहलहूँ। स्बनामधन्य स्व० त्रजकिशोर वर्मा 'मणिपदाक' वर्तनी & ठीक कौत fe द्वार प्रकाशित eae पोथी में परिषद द्वारा व्यबहत सानक बरतनी भेरत। मोना
048 || विदेह सदेह:३६ {4] ea: alert Pravin सर्वसान्य Fa-Frese परिपदे are निर्धारित कयल गेल छल तकर fare देल जाय। com: t960 ई० सं पूर्व हमरा लोकनि विद्यापतिक स्मरण Pere रूपें eta cee) परिषद एहिं अभावक पूर्ति कचलक 'विद्यापतिक वंशज लोकनिक देहक गढ़नि, मुखाकृति आदिक आधार पर विदधापतिक काल्पनिक चित्रक निर्माण 'कयल गेल। चित्रकार छलाइ मुँगेर जिला निवासी रामानन्द सिंद, स्थानीय निवास 9, गुप्ता लेन, कलकत्ता 6। चित्रक eae दिनाक 4 Tem, 960% गेल, ore cae RRR खत eo शशिभूषण पाण्डेय (भारती पुस्तक मंदिर) । समारोहक तु हा अध्यक्षता aes विश्व tage विद्वान डा० सुकुमार सैन। अपन eh bag aa a अध्यक्षीय भाषण A कहलन्हि - “मैथिली, बंगला, असमिया, Zee ees eee om oe 'उड़िया आदि मागधी प्रसुत्त भाषाक आदि कि बिधापति छथि। ee SE Pian dies कवि, निनन्धकार, गल्पकार, इतिहासन आदिक रूप में भारत कहियों Ny eae हिनकर महत्व कीं नहिं विसरत।” डा० प्रबोध नारायण सिंह Pe tec fararafa चित्र निरूपण हेतु परिपदक 'पूरि-भूरि प्रशंसा कयलन्हि। ही मिस सनम बिद्यापतिक feos उद्पाटनक बाद विभिन्न पत्र-पत्रिका में चित्र. फियापति amet emda do शशिभूषण पाण्डेय sents कराओल गेल, fair मैथिली सेवी संस्था... Reefer sere tn aay के पठाओल te | एक वर्षक समय सीमा राखल गेल संशोधन परिवर्धन हेतु। कतहु सै कोनो प्रकारक i विचार नहिं अएला पर परिषद डाक तार चिभाग, भारत सरकार सैँ विद्यापतिक डाक टिकट हेतु पत्राचार दि = |. आरम्भ कयलक। अहर्निश प्रयासक बाद 47 नवम्बर, 7965 ई० ams विद्यापतिक डाक टिकट बहार 4 Aji पेल। विचार-विमर्श हैतु दिनांक 28 सितम्बर, i965 to कड5 परिषद कार्यालय में आयल रहथि श्री हनन Ay) 3. एस. ae, फिलेटेलिक safer, डाक तार foe, 'भारत सरकार आ ओ अपन मन्तव्य दर 0 arene — 4 oe | Shse-aaraatipleasue Grenadin moorditiawiitisetion byline िविसिल bei i Sanskritix Parishad, Calcutta for bringing out 2 commemorative posiage stamp ===] tp honour the great poet of Mithila, Vidyapati” Sid - 5. P. Chatter, Phila, Officer परत: जरणपना में मैथिली लिखयवाक अनुरोध कहिया at कहिया थारिं चलल tis? उत्तर 4964 ई० क जनगणनाक रिपोर्ट देखलाक वाद जाहि में मैंथिली- भाषीक संस्था मात्र तत्कालीन दरभंगा जिलाक जनसंख्याक लगधक छल, 0967 ई० सैं मेल जे हेमनि तक wae भ$ सके अछि भतिष्यो में चलए। ee: मैंधिलीक sen साहित्यकार कै प्रोत्साहित करबाक भविष्य मे कौ योजना अछि 7 उत्तर : भविष्मु युवा साहित्यकारक प्रति परिषद सदा संइदयता रखेंत अछि an भविष्यों में राखत। परिषदक प्रकाशन के अपन Waa मानदण्ड Bs तथापि युवा साहित्यकार कें प्रौत्साहन स्वरूप HH BM रचनाक प्रकाशन परिषद करत । एहिं बेर श्री अनमोल झाक लघुकथा संग्रह ' टेकनोलजी ' प्रकाशित sera Wey: तब पीज़ीक Get 370) को सन्देश dary nearer 7 OR: युबा पीढ़ी हिन्दी एवं अंगरेजी परस्त भए Aa छाथि । अपना घर में अंगरेजी माध्यम सं वार्तालाप करए में सक्षम नहि ofa 3 हिन्दीक शरण में जाइ छथि । दुधमुँहो जच्चा के gard fe मे करताह। ओना आजुक परिपेक्ष मे अंगरेजी आवश्यक site हिन्दी aie, ओना जेतेक भाषा सीखी से नीक | मैथिली के बन्हक राखि एवं बेचि as नहि । शिक्षाक माध्यम जे हो परंच aca एवं गामक भाषा मैथिली रहए। मनीषी लोकनि के दृष्टि मे राखि थीया ga के am बढ़ में अभिभावक craft सहयोग करथि, जे मनीषी कहियों हिन्दी on अंगरेजीक शरण में अपन मातृभाषा त्यागि नहि गेलाह। जैना wows जा, So अमरनाथ झा, म० Ho उमेश मिश्र, wo जयकान्त मिश्र, श्री che पाठक *चियोगी ' ante
विदेह सदेह:३६|| 607 foe's se 2 3८. ६: >> = a ie ne eee Spee SS a. Se zee A 0 ny ora . ee Se as ieee 5 sit 3. Sci sip ape Me eee Cat ee Pid =. ee a sy 3 € eee ee a मैंथिली - So या ऊदबिलाड़ि (उच्चा० - ऊदबिलाइर / ऊदबिलाइ) अंग्रेजी - OTTER (fepii - EURASIAN OTTER) जैंववैज्ञा० नाम - Aonix, Lutra, Lontra, Hydrictis, Enhydra आदि वंशक जातिसभ्र (चित्रमे - Lutra lutra) ite - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँजो Hs जाइत ITS - तत्सम स्वरूपमे)
विदेह सदेह:३६|| 609 ~Z मद 2 * +. ne {92 2 a f © Dr. Shashidhar Kumar “Videha" © डॉ. शशिषर fan डर ——. sae S co बच ड ऊद या ऊदबिलाड़ि / EURASIAN OTTER / Lutra lutra
60 || विदेह सदेह:३६ न रु Ay it WY = ty उलवद x दि = उन मन a aes > : — wes BES oe eS ऊद या ऊदबिलाड़ि/ EURASIAN OTTER / Lutra lutra = अब = ae | ge oe. a _| हि टट —é 2a | = दर Lm SF - ; = — eae se Dr. Stshidhor Kuntar “Videhar are eRe Gane ee © बन: aed ideha’ .©'ST. शशिघर ee oe Bake A OS Ex किला J < पानिमे eld 2 टा ऊद या ऊदबिलाड़ि EURASIAN OTTER / Lutra lutra
66 || विदेह सदेह:३६ T 4 vf के ू “4 % भ © Ye iA / हि \ भर “i » F , h\ Ae न. pif i oO व मैथिली - लाल माथ बला कठसुग्गी अंग्रेजी - COPPERSMITH / COPPERSMITH BARBET / CRIMSON BREASTED BARBET जैववैज्ञा० नाम - Psilopogon haemacephalus syn. Xantholaema haemacephala syn. Bucco indicus syn. Megalaima haemacephala (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
विदेह सदेह:३६|| 679 wae - a rin y 4 ls é तक की नदी : Me उल्डट गण 4 aM «| है दम + हे asec /' 0. डॉ. शर्शिधर, कुमर देह + तल =n geld =. लाल माथ बला कठसुग्गी (ALD) COPPERSMITH BARBET / CRIMSON BREASTED BARBET
620 || विदेह सदेह:३६ a» > <a = a cs al लाल माथ बला Payeoht (शिशु) (AISI ail गर्दनि पर लाल रंगक लेंशमात्र दरश ननि)
विदेह सदेह:३६|| 624 " गे, SBE | | 4 e ow by © Dr Sjashidhar Kumar “Videha © डॉ. शशिधर कुमर “fete © aA face ४ a’ सके, ३ . Q स्थान - दुलास्पुर (रुचौल - दुलासपुर), दरिभंगा ना ७ मैथिली - st या मटियाही माथ बला कठसुग्गी अंग्रेजी - BROWN HEADED BARBET / LARGE GREEN BARBET जैंववैज्ञा८ जाम - Psilopogon zeylanicus syn. Megalaima zeylanica (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ss जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
विदेह सदेह:३६|| 642 “2 e ‘ 3४. — Be a Ka (Rhinoceros unicornis syn. Rhinoceros indicus)
650 || विदेह सदेह:३६ निर्माणक साहित्य विविध 3, agate रूप घियारी Bi 3 © Dx Shashidhar Kumar "विधा कि " a5 oe qin © Dr. Shashidhor Kure बनी Ay © “+ v7 6 डा fa aaa Fare विभिन्न प्रकारक anes (माटिकें थुक्तमे सानि ws बनाओल) बनल घियारी
664 || विदेह सदेह:३६ जि ‘ . . SSIS a न me. Sa) २ ् y ° ~ 4 \ 7 ८2 मैथिली - टिटही (विशेष ws Lapwines ez अर्थमि प्रयुक्त) हिल्दी - टिटहरी (विशेष as sanppirers केर अर्थमि प्रयुक्त) संस्कृत - fee, कोयछ्टि, यष्टिक अंग्रेजी - LAPWINGS & SANDPIPERS जैववैज्ञा० नाम - LAPWING - Vanellus spp. (लाल गलचर्म - V.indicus, पीयर गलचर्म - V. malabaricus) SANDPIPER - स्कॉलेपिंसाइडी गण (Order - SCOLOPACIDAE) केर २० AVI (Genera) सब जाति (Species) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) fe - fe - fe - टि बाजए टिटही | we - der am टिटही
668 || विदेह सदेह:३६ ता EEE Fi हर स्थान - दुलास्पुर रुचौल - दुलास्पुर), दरिश्ंगा स्थान -राजे arian), दरिष्ंगा मैंथिली - कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जॉंकती हिन्दी - वनस्पति को नष्ट करनेवाला एक प्रकार का घोंघा * अंग्रेजी - SLUG / LAND SLUG / GARDEN SLUG जैंववैज्ञा८ नाम - Limax spp., Ambigolimax spp., Tandonia spp. ete [a polyphylactic group of apparently shell-less terrestrial Gastropod molluscs] (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) * किछु बिहारी पत्रकार लोकलनि द्वारा हिल््दीमि एकरा लेल प्रयुक्त "सितुआ" शब्द वास्तवमे मैंथिलीक शब्द थिक
विदेह सदेह:३६|| 669 . er FE ae Bee ee OS eles von] एक प्रकारक कड़रिक Ras / कड़रिक शितुआ / जोंकती (पृष्ठ भाग / DORSAL ASPECT)
680 || विदेह सदेह:३६ » % - *, a . 2 कै ve 4 पएर (उज्जर WI) बाहर निकालने खुस्चनि सितुआ / Wrafer शितुआ j as ae ot जलाशयक पेनीक माटिमे आधा गड़ल "रुरचनि सितुआ" (खुरचनिक मुँह आंशिक रूपसेँ फुजल अछि)
विदेह सदेह:३६|| 683 ee ~ Se Sal. ee Re तक oe Se Woe, Real a Sic. (कक ae Bs कि test cf 3 Wes vce sao TSG, न कर एन a < ys cm Me मैंथिली - गिरगिट हिन्दी - गिरगिट संस्कृत - कृकलास, pou, शरण्ड, प्रतिसूर्य, प्रतिसूर्यशयान, गलगति (7) अंग्रेजी - LIZARD (Including COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON, IGUANA & OTHERS) जैंववैज्ञा०८ नाम - SAURIA SUPERGROUP of SUBORDER LACERTILIA (नोट- संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नांओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी नांओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) गिरगिट & की ?
विदेह सदेह:३६|| 689 ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया (बाल कविता) एक दे 4 = is oe | हि लए हिल्दी - छिपकली संस्कृत - पलभी, गृहगोधिका, भित्तिका आदि अंग्रेजी - HOUSE LIZARD / GEKKO जैववैज्ञा० नाम - Hemidactylus spp. Gekko spp. (चित्रमे Gekko gecko) (कुल 5i वंशक लगभ्रग 950 जातिक aT) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः APA भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
विदेह सदेह:३६|| 697 ~~ nf : x ry SPE > MEAS od gee * 28 Tee: : 4s — ar पक दि .> _ oe —— ar Fel मात्र इन्डोनेसियाक एकटा द्वीप पर पाओल जाइत अछि | दैत्य गोहि = COMODO DRAGON = Varanus komodoensis
74 || विदेह सदेह:३६ कि thee iS ae Xx | = “a \ > \ o ? \ x < ह | साभार States - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन दिबाड़ Gals) केर एक sie प्रकार bert ata ee Bat ‘$e a Recon 4 ¥ ik Es 3h साभार सौजन्य * pixabay.com (fee download) थी i. ees i ee बल्मीक (TERMITE HILL) - fais द्वारा बनाओल माटिक Asz
76 || विदेह सदेह:३६ a" हूँ मैथिली - धनछुआ धानूछुआ) © अंग्रेजी - एशी ड्रॉन्गो (ASHY DRONGO) \ . N जैंववैज्ञा० नाम - Dicrurus leucophaeus के (Sepa ल््युक्तोफेकस) - व ae 7 a4 a PRCA DRIES Rt कि BG Wee oe whose ech ely ieee ease na r Cy ay eee © ASA shidhar Kumange idol = नें het, SE Bat cae ae Wy eS ves Peaks se a oy: J Oo ORS Bae BO SE ng | मैथिली - करिया erorgsait (करिया धानछुआ) 7 { डिन्दी - शुजंगा _ संस्कृत - श्रृंगराज sidlell-BLACKDRONGO है 8 जैंववैज्ञा० नाम - Dicrurus macrocercus (डाइक्रुरस मैक्रोसर्कस) है किन. + जय न न ee ee अर न —- अपनहि खेत खरिहान wy, ई. ds छी
720 || विदेह सदेह:३६ zg = al = i ९ दर - Bt a oe | Sas ges मैंथिली - नीलकएण्ठ (असली) हिल्दी - नीलकण्ठ (असली! संस्कृत - नीलकण्ठ अंग्रेजी - INDIAN ROBIN (इण्डियन रॉबिन, जैववैज्ञा० नाम - Saxicoloides spp. (S. fulicatus, S. intermedius etc.) इनौट - संस्कूत भाषामे आयल हरेक aia या a aa स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँ ओ भ& जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
विदेह सदेह:३६|| 767 का , कै, ‘ - “ CSIR (आब NISCAIR) न5व दिल्ली, द्वारा प्रकाशित एहि पोथीक अनुसार "बागर" एक तरहक UAT (परेबा) केर नाँओ थिक | कोना करे छेँ - “बागर” सनि,
770 || विदेह सदेह:३६ a =e ae anit = साधारण बिढ़ली ow “eee ca = ma ‘ é + r =~ . जे Tie : pe ed | —— ~~. , ; <a है न दे हक .#- पचद्धिया विढ़ली a - Re ae न््यद: चल नि. 3 — = pO डॉ. rf / दे री (water विढ़ली मैंथिली - बिढ़ली (साधारण / पीयरका आ आन रंग-रूपक विढ़ली) आ फचहिया (फ्चडहिया बिढ़ली) संस्कृत - ae, ae, तरटी, तृषसृक्किनु, fag, विषशुड्गिनु, दंशिनु, कोष्ठागारिनू अंग्रेजी - PAPER WASPS (बिढ़लनी) & HORNET/S or HORNET WASP/S (फपचहिया) Gadsile लाम - Polistes spp. , Ropalidia spp. etc. (बिढ़ली) & Vespa spp. (पचहिया) Ly poz d - pie | eS ~ “2, 4 ——- है से Eo अक . तक. | Bee ) a * c P | रा जग ? oe बिद्रनीक खोंता आ ओहि Glare कोठरीक षटकोणीय संरचना मधुमाक्षी (-छी) सँ मिलैत - जुलैत अछि पर RA ase नजि रहैछ कारण कि बिद्रनी ase नजि ada अछि । ई बिढ़नी, ओ बिढ़नीक खोंता, बुझलह की ने बौआ |
778 || विदेह सदेह:३६ SS D के ९ > Es Kumar” Videha” ™ मे श्र + रे <् ? > ~~ omnia oe है * ig के ‘ कं ५.७ % मैंथिली - भ्रगजोगनी / भरकजोगनी हिन्दी - जुगनू , खद्योत ज्योतितरड्गिणी, ध्वान्तमणि आदि अंग्रेजी - FIREFLY / LIGHTING BUG / GLOW WORM (More specifically LARVA of a firefly = GLOW WORM) जैववैज्ञा८ नाम - LAMPYRIDAE कुल (Family) केंर बहुत रास सदस्य वंश (GENUS) केर जाति (SPECIES) सभक कीट (कीड़ा) Bs; यथा - Photuris spp., Lampyris spp., Cyphonocerus spp., Luciola spp. आदि। (चित्रमें - COMMON GLOW WORM - L ampyris noctiluca) नोट - (संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) क - भगजोगलीक पृष्ठश्नागीय (DORSAL) EW (फ्लैंशलाइटक प्रयोग संग) ख - भगजोगनीक उदरभागीय (VENTRAL) हष्य (फ्लैंशलाइटक प्रयोग संग) ग॒- भरगजोगलीक उदरभागीय (VENTRAL) EW (फ्लैंशलाइटक प्रयोग बिना) पैंघ अछि)
विदेह सदेह:३६|| 787 SS ARS २) ©). ,— संचूघक eros sCIS) fore (HEAD) ~ ANTENNA) agi (THORAX) acy | उदर (ABDOMEN) i —> 3 जोड़ी % हा + कल ७. a $' aa | स्थान -दुलास्पुर (रुचौल - दुलास्पुर), दरिभगा | मैंथिली - मच्छर हिन्दी - मच्छर संस्कृत - मशक, मत्सर, भम्भयलिका, FE, यत्रिजागरद आदि अंग्रेजी - MOSQUITO जैववैज्ञा० नाम - क्युलिसाइडी कुल (Family - CULICIDAE) केर सदस्य सम्धिपाद प्राणी सभ्न | किछु मुख्य वंश (GENERA) 3ife5 - Aedes spp., Anopheles spp., Culex spp., Culiseta spp., Haemagogus spp., Lutzia spp., Mansonia spp., Psorophora spp. ete. atte - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे) [मैथितीमे "मच्छर" ओ "मशहरी" शब्द तद्भव थिक; मूल संस्कृत शब्द PAM: "मत्सर" ओ "मशकहरी" अछि | दुनिआमे मनुक्खक orn, बड़... पहिनेसँँ... मच्छर
विदेह सदेह:३६|| 799 दर कक मर क् ‘an i 4 a Pig wk P| 4 Hg Epia ha ae है: a i ’ भार 5: ine ee fe Ary भर = : है (हाजिर: 25: Ht, साभार सॉजन्य - gotreedownload.net हिल्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण SPF अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लैँमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा० नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेर्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) (नोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक Aish या प्यौयी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे wah नाँओ Hs जाइत अछि -तत्सम Sas,
800 || विदेह सदेह:३६ = gees. | oa a ay - er हर & न 7 4 4 ४ . ; के टला पर SSE” अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश $o), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेर्स) & Phoeniconaias spp. (Ferdi - Phoenicopterus roseus) te -संस्कृत आषामे आयल हरेक नाँओ या aah नाँओ स्वतः: मैथिली भाषामे warh नाँओो Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,
विदेह सदेह:३६|| 802 . Lm. a = Nei” मे कर, } } साभार सौजन्य - gofreedownload.net मैथिली - राजहंस = (चित्रमे - छोटका / छोटकी राजहंस) अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - LESSER FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश Fo), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] HAAS नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेर्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoeniconaias minor) Ale - संस्कृत seat aera हरेक लॉजो या पर्याणी afst स्वतः मैथिनी set फर्योगी asa sc जाइत Hie -तत्सम रूपमे,
विदेह सदेह:३६|| 845 अर ण्वतव्स् © Dr. Shashidhar Kumar “808” © डॉ. शशिधर कुमे aaa Seo - . SSS Se — eat - wWaeor _ पछिला पएर ari) dis . आँखि अगिला uez ait) न : sort pete मैथिली - साही (grt) feodt - Hat / साहिल संस्कृत - cai, शल्यक, शल्य, शलाका, शर्या, कमठ, शल्यलोमनू, कण्टकागार, कण्टकश्रेणी, वज़्शल्य अंग्रेजी - PORCUPINE (NEW WORLD P. + OLD WORLD P.) जैववैज्ञा०८ नाम - OLD W. PORCU. - Hystrix spp., Atherurus spp. & Trichys spp. NEW W. PORCU. - Erthizon spp., Coenduou spp. Sphiggurus spp., Chaetomys spp. & Echinoprocta spp. (चित्रमे - भारतीय स्राही / INDIAN PORCUPINE / INDIAN CRESTED PORCUPINE / Hystrix indica - an OLD W. P.) ote - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)
विदेह सदेह:३६|| 825 का Fe) है ‘ a AS - elle eee iS fafgiitarcieoresiter विकिपीडिया पड़लिक डॉमेन विकिपीडियां पब्लिक डॉमेल = aaa f [EUROPEAN ROLLER [ INDIAN ROLLER [ INDIAN ROLLER ] गर्देलि - आसमाजी गर्दैनि - मटियाही पीयर oréfer - मटियाही de (cif कि नील) (नील रंग लेंशो जि) (संगहि oftenan प्राप्ति स्थाल - यूरोप aa | प्राप्ति स्थाल - पच्छिमी एशिया, |... प्राप्ति स्थान - दच्छिल-पूब समस्त भारत (पच्छिम-उत्तर- 'एशिया यथा - थाइलैण्ड, भारतमें BED | लाओस, वियतनाम, सिंगा- प्रजातिः- प्रजातिः- पुर आदि; Bors सटल Coracia bengalensis डोयबाक कारण पुर्वत्तिः Coracia garrulus garrulus bengalensis भारतक किछु भागमों Coracia garrulus seminowi_ | Coracia bengalensis indicus Coracia bengalensis affinis
विदेह सदेह:३६|| 847 न कारी गर्दनि बला श्वेत हंस (Cignus melancoryphus) गर्दनि बला श्वेत हंस (Cignus melancoryphus ) Go अमेरिका महादेशक मूल निवासी)
विदेह सदेह:३६|| 887 जे इतिहासहिन अछि | oa जिगदानंद झा Ad, Mar श्री राज कुमार gM, जन्य स्थान
विदेह सदेह:३६|| 2027 Go झा BER चित्रलिपि ई प्रकृतिकूमारिक मानू न मानू
258 || विदेह सदेह: ३६ a i 2% aa झा (सिंगापुर) x. सिर egos, २:22: हे ae } Cy Ga Bi hee अर eS 4 ‘ Lee >> Sed सन दा: 5. He SOI ae Let i Seyi oe ONG eS Yoel पर ही ७ नर मास» सनी २ पड AG san RS od & 2," ee Si Po) \¢
विदेह सदेह:३६|| 259 | oS क्र rf है गा <- जा डे थे रद जुट os रमन =
260 || विदेह सदेह:३६ ce पम्प NN ell ° ONO ९१९ लि al कद cn हे chase tea lew. =F i ie | (CU Yh Pe | | / 4 ss ? i F 5 = ay ees सु | नस ! cee | FAY 9 Jaa. i an 4 7. | h i as |
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विदेह सदेह:३६|| 269 ay कर्ण, रॉटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। > > | @. < ae 5 Lf —_ “न SS ait | by (eos SSIS ee ita | # fe ox =F
2470 || विदेह सदेह:३६ $ — 3 oS z= A = » ३५४३ १३. || SS (OX ye a5 ey SNe ) fe @ j Ui fe eau x aX ak SH डर ते SES aSZ ae: 7 Sy ve Th कि Cos Sy ey =a) के U दर Ft ety Eh pat teed Peirce |? PA ed rie) Sa —- o> पड S pe Tb ee y थे) a = SE जे | ) Ses = Ra Pee Sericeirsiisitii के 4 WOE कक अप ह € se कर: ] A BSG लि. जिगर at OA re Tg aes + eek Ne ~
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2472 || विदेह सदेह:३६ न रे a Ss ps = . ep . ही हा तो पक मी टिक Pale oe i“ ye 455 2 WANE OS GN ce Re i “Be SN ONC UMD ee sis OF, | PA ete ee ligt a 72 vole ©MadhubaniiArts:€O.UK ea Er & <a 3b eae ी डा a a co AY Se es a) », es <3): कि ० yy, aN i b » oe . ) “oe 6 Pac लि के 2). | pus tee ats कक. a es oS eee ne @ | Ke h nl Es, Rs ee 4 |
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280 || विदेह सदेह: ३६ loll WS fe के ही =i iN OY ee Le » Ke SAG | a bial ENR ee गा us | बल “al at: a Ne : a ae Tur NG C2 ie bo व हा (जि a के) हा. % : थे Miah. ih
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विदेह सदेह:३६|| 285 LJ दर, रा SO eta ere ४ a ३ Mints ie | po ee! x % a eae toe KELL weve 3 लाल At j TP , ; me ला: ; A : Os हज ४ . , J 4° Ay iu 7 , 25.0 oe की So भर (2. 3 : a» a Sablal! iy + DLs. 27 भी हर 4 * ara als . a ¥ YS ES ee 4 ay ही , a a 4 ate o i . न |
286 || विदेह सदेह:३६ नि दी ate: ANGE मद why के PBR =o, OF ea GUS yr , _<~@ —~ SY 2g) d Sig : : GA Ry Wie Loy” ge ;
विदेह सदेह:३६|| 287 — ’ »> a गणेश ठाकुर, पिता श्री विनोद ठाकुर, पोखड़िभीरा (कक्षा आठक विद्यार्थी) ः \ AT #.5. J Sh eh रे = We 0
288 || विदेह सदेह: ३६ | . \ Gy Mt Ry hy? Ly
विदेह सदेह:३६|| 289 x a | ५ की a ' पद न न a
विदेह सदेह:३६|| 294
292 || विदेह सदेह: ३६ 33 पाण्डेय शी