'विदेह' ०१ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक ११ ) एहि अंकमे अछि:- महत्त्वपूर्ण सूचना: २० म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मिथिला रत्न श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' जिनका लोक 'अभिनव भातखण्डे' केर नामसँ सेहो सोर करैत छन्हि, 'विदेह' केर हेतु अपन संदेश पठओने छथि आऽ ताहि आधार पर हुनकर जीवन आऽ कृतिक विषयमे विस्तृत निबंध विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे ई-प्रकाशित करबाक हमरा लोकनिकें सौभाग्य भेटल अछि। १.नो एंट्री: मा प्रविशश्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ' रहल अछि। सर्वप्रथम विदेहमे एकरा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि। पढ़ू नाटकक दोसर कल्लोलक दोसर खेप। २. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ) ३. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ) ४. महाकाव्य महाभारत (आगाँ) ५. कथा (संगीत) ६. पद्य अ. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी, आ. श्री गंगेश गुंजन, इ.ज्योति झा चौधरी आऽ ई. गजेन्द्र ठाकुर ७. संस्कृत शिक्षा(आगाँ) ८. मिथिला कला(आगाँ) ९.पाबनि-संस्कार-तीर्थ- नूतन झा १०. संगीत शिक्षा -श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' ११. बालानां कृते- गोनू झा आऽ दस ठोप बाबा १२. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी ) १३. संस्कृत मैथिली मिथिला १४.मैथिली भाषापाक १५. रचना लेखन (आगाँ) 16. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS -Videha Mithila Tirbhukti Tirhut... महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ' रहल अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर मैथिली-अंग्रेजी आऽ अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश (संपादक गजेन्द्र ठाकुर आऽ नागेन्द्र कुमार झा) प्रकाशित करबाओल जा' रहल अछि। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): श्री आद्याचरण झा, श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मौन' श्री कैलाश कुमार मिश्र (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र), श्री श्याम झा आऽ डॉ. श्री शिव प्रसाद यादव जीक सम्मति आयल अछि आऽ हिनकर सभक रचना अगिला १-२ अंकक बादसँ 'विदेह' मे ई-प्रकाशित होमय लागत। महत्त्वपूर्ण सूचना (५): महत्त्वपूर्ण सूचना: अगिला अंकमे मैथिली हैकू पद्य देल जायत। विदेह (दिनांक ०१ जून, २००८) संपादकीय वर्ष: १ मास: ६ अंक:११ मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक ११ दिनांक ०१ जून २००८) ई पब्लिश भ’ रहल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | नचिकेताजीक नाटक नो एंट्री: मा प्रविश दोसर कल्लोलक दोसर खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। गगेश गुंजन जीक कविता आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। एहिमे कोनो संदेह नहि जे २०म शताब्दीमे जतेक मिथिला विभूति भेलाह ओहिमे श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ सर्वोपरि छथि। विदेह हेतु हुनकर स्पठाओल संदेशक आधार पर हुनक जीवनी आऽ कृतिकेँ विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे पाठकक समक्ष अनबामे हमरा सभ गर्व अनुभव कए रहल छी। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। अपनेक रचना आ’ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर 389,पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०. फैक्स:०११-४१७७१७२५ ०१ जून २००८ नव देहली http://www.videha.co.in ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ’ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ’ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। १. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे।१९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’ | १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’(कविता संकलन) आ’ ‘नायकक नाम जीवन’(नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/’नाटकक लेल’(नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आ’ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आ’ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एह.डी. आ’ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आ’ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) दोसर कल्लोलक दोसर भाग जारी....विदेहक एहि एगारहम अंक ०१ जून २००८ सँ। नो एंट्री : मा प्रविश दोसर कल्लोल दोसर खेप नेताजी : (अनुचर 1 सँ चोर केँ देखा कए) ई के थिकाह ? (दुनू अनुचर की कहताह से बुझि नहि पबैत छथि।) चोर : (अपनहि अगुआ कए अपन परिचय दैत) जी, हम एकटा सामान्य कलाकार छी...? नेताजी : (उठि कए अपन बात कहैत चोर केँ आलिंगन करैत) अरे...अरे.... अहोभाग्य हमर...! चोर : (अपनाकेँ छोड़बैत) नञि, नञि अहाँ जे बुझि रहल छी से नञि... नेताजी : माने ? चोर : हमर कलाकारी त’ बड़ साधारण मानक थीक। बाजारी : औ नेताजी... अहूँ कोन भ्रम मे पड़ि गेलहुँ ‘चोर’ थिकाह ई.... ‘चोर’! ...(चोर माथ झुका लैत अछि)। नेताजी : (चौंकैत मुदा अपन विस्मय पर प्रयास क’ कए काबू पाबि) आँय...ताहिसँ की, ई त’ हमरे गाम-घरक पाहुन छथि.... (कनेक ‘मुस्की’ दैत) क्यो जनमे सँ त’ ‘चोर’ नहि होइत अछि....हमर समाजक स्थितिये ककरो चोर त’ ककरो ‘पॉकिट-मार’ आ ककरहु-ककरहु ‘उचक्का’ बना दैत अछि। (जखन ओ ‘पॉकिट-मार’ आ ‘उचक्का’ दय बजैत छथि तखन एक-एक क’ कए पॉकिट-मार एवं उचक्का उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि) पॉकिट-मार : हुजूर ! हम छी पॉकिट-मार ! उचक्का : हम एकटा उचक्का छी... लफंगा कही त’ सेहो चलि सकैछ… गली-मोहल्लाक ‘दादा’ छी ! नेताजी : ( जेना संतुष्ट भेल होथि) वाह ,वाह.... एत’ त’ देखि रहल छी सब तरहक लोक उपस्थित भेल छथि। हमर माथा फोड़ैत काल विरोधी पक्षक नेता ठीके कहने छलाह जे स्वर्ग आ नर्कक बीचमे हमरा अपन संसारक एकटा छोट- छीन सजिल्द संस्करण भेटि जायत....हमरा ऊकडू नञि लागत दुनियाँ छोड़ि कए जायमे...! (थम्हैत) एत त’ देखि रहल छी क्यो बाजारक झोरा नेने छथि त’ क्यो प्रेमक जीवैत पोथा नेने आ क्यो - क्यो रणभूमिसँ सोझे बन्दूक नेने उपस्थित भेल छथि, बस जे किछु कमी अछि से.... [हिनका बाजैत-बाजैत एकटा युवक प्रवेश करैत अछि, हाथमे एकटा ललका झंडा नेने—वामपंथी बातचीत हाव भाव तेहने] वामपंथी : जे किछु कमी अछि से हम पूरा क’ दैत छी। (सभ क्यो चौंकि कए हुनका दिसि देखैत छथि) उचक्का : (जेना चिन्हल लोक होथि) रौ जीतो छीकेँ रौ ? जितेन्दर ? वामपंथी : (उग्र स्वरमे) जीतो ? के जीतो ? कतहुका जीतो? हम त’ सब दिन हारले लोकक दिसि झुकल छी। नेता : हँ, हँ से सब त’ ठीके छैक—त’ अहाँ एत’ आउ ने मंच पर ....(वामपंथी युवक प्रसन्न भ’ कए मंच पर चढ़ैत छथि—दुनू अनुचरसँ आप्यायित भ’ कए आर अधिक प्रसन्न होइत छथि।) एत’ सत्ते अहाँ सन् महान युवा नेता केर अभाव खटकि रहल छल अहाँ भने हारल लोकक नेता होइ, अहाँ लोकनिक झंडाक रंग जे हो – लाल कि हरियर, हमरा सभक पीढ़ीक सबटा आशा, अहीं सब छी... वामपंथी : से सब त’ ठीक अछि, मुदा (चोर केँ देखा क’) ई के थिकाह ? नेता : ई एकटा पैघ कलाकार थिकाह। चोर : (टोकैत) हम चोर थिकहुँ सरकार। वामपंथी : आँय ? पॉकिट-मार : (भीड़मे ठाढ़ होइत) हम पॉकिट-मार ! उचक्का : (ओहो लगलहि उठि कए ठाढ होइत छथि) आ हम उचक्का ! भिख-मंगनी : (उठि कय) हम भिख-मंगनी ! रमणी मोहन : हम बलात्कारक सजा भोगि रहल छी—जनताक हाथे पीटा क’ एत’ आयल छी। वामपंथी : (आक्रोश करैत) छी,छी, छी ! एहन सभ लोक छैक एतय... (नेताकेँ पुछैत) आ’ अहाँ चोर-चोट्टा लोकनिक नेता थिकहुँ ? अफसोस अइ..... नेता : आ- हा-हा ! एतेक अफसोस किएक क’ रहल छी ? जखन दुनियाँ मे हर तरहक लोक होइत छैक, तखन ई स्वाभाविक छैक जे एत्तहु एकर पुनरावृति हैत । आ ईसा मसीह की कहैत छथि ? अनुचर 1 : चोरीक निन्दा करू ! अनुचर 2 : चोरक नहि ! चोर : ई बात ईसा मसीह नहि कहने छथि..... अनुचर 1 : तखन ? अनुचर 2 : की कहने छलाह ? चोर : पापक त्याग करू, पापीक नहि.....! वामपंथी : जाय दिअ धार्मिक गप-शप....! (चोर सँ) त’ अहाँ की कह’ चाहै छी ? चोरी पाप नहि थिक ? चोर : (बिहुँसैत) ‘पाप’ आ पुण्यक चिन्ता वामपंथीक सीमासँ बाहरक गप्प भेल। हम कहै छलहुँ दुनियाँक सबटा जीबैत कवि-कथाकार मुइल कवि-कथाकारक कंधे पर अपन इमारत ठाढ़ करैत छथि....के केहन कलाकारीसँ अनकर बात केँ परोसत तकरे खेल छइ सबटा.....! अनुचर 1 : ई कहै छथि पीढी-दर-पीढी सब क्यो अनकहि बात आ खिस्सा पर गढैत अछि अपन कहानी..... अनुचर 2 : कहि छथि—किछु नहि नव अछि एहि दुनियाँमे.... सबटा पुराने बात ! नेता : अर्थात् चोरायब एकटा शाश्वत प्रवृति थिक । वामपंथी : नॉन-सेन्स ! नेता : कियैक ? पृथ्वीराज संयुक्ता केँ ल’ कए चम्पत नहि भेल छलाह ? आ अर्जुन चित्रांगदाकेँ ? (युवा केँ माथ डोलबैत देखि) आ किसुन भगवानकेँ की कहबनि ? कतहु ‘माखन’ चोराबैत छथि त’ कतहु ‘कपड़ा लत्ता’… वामपंथी : (खौंझैत) इयैह भेल अहाँ सब सन नेताक समस्या... अहिना मारल गेल हिन्दुस्तान! मौका भेटतहि ब्रह्मा- विष्णु-महेश केँ ल’ आबै छी उतारि क’ ताखा पर सँ.... बाजारी : (मजाक करैत) हे... आब आबि गेल छी हमहीं सब ताखा पर सँ उतरि स्वर्गक द्वार मे...चलब ओहि पार तँ ई सब भेंट हैबे करताह। नेता : मानू, आ कि नहि मानू.... छी त’ जाहि देशक लोग तकर नामो मे त’ इतिहासे–पुराण लेपल अछि कि नञि ? ‘भारत’ कही त’ ‘भरत’ क कथा मोन पड़त आ ‘हिन्दुस्तान’ कही त’ ‘हिन्दू’ केँ कोना अलग क’ सकै छी ? बाजारी : (व्यंग्यक स्वरमे) हे - ई सब अपन देश मे थोड़े ओझरायल रहताह ? ई सब त’ बस बामे कात दैखैत रहैत छथि—ने भारत कहता आ ने हिन्दुस्तान ! ई सब त’ ‘इण्डिया’ कहताह ‘इण्डिया’ ! पॉकिट-मार : (कमर डोला कए दू डेग नाचियो लैत छथि) “आइ लव माइ इण्डिया.... आइ लव माइ इण्डिया” ! वामपंथी : (डपटैत) थम्हू ! (पॉकिट-मार जेना अधे नाचि कए प्रस्तरीभूत भ’ जाइत छथि।) ई सब ‘चीप’ बात कतहुँ आन ठाम जा क’ करू (नेतासँ) देश-प्रेम अहीं सभक बपौती नहि थिक ! नेता : नञि - नञि से हम सब कत’ कहलहुँ ? अनुचर 1 : हम सब त’ कहि रहल छी— देश-प्रेमो सँ बढि कए भेल अहाँ सब लेखे-विश्व-प्रेम ! अनुचर 2 : ‘यूनिवर्सल ब्रदरहूड’ ! अनुचर 1 : (जेना नारा द’ रहल होथि) दुनियाँक मजदूर ...! अनुचर 2 : एक हो ! (एकबेर आर नाराकेँ दोहराबैत छथि। तेसर बेर जखन अनुचर 1 कहैत छथि—दुनियाँक किसान तखन उचक्का, पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, रद्दीवला अपन-अपन मुट्ठी बन्न कएने सीना तानि कए कहैत छथि ‘लाल सलाम’) वामपंथी : बंद करू ई तमाशा ! नेता : (हाथसँ इशारा करैत) हे सब गोटे सुनू त’ पहिने ओ की कह’ चाहै छथि....! वामपंथी : (गंभीर मुद्रामे) अहाँ मस्खरी करू कि तमाशा.... देशक बाहर दिस देखबामे हर्जे की ? अनुचर 1 : हर्ज कोनो नहि। वामपंथी : बाहरसँ जँ एकटा हवा केर झोंका आओत त’ अहाँ की खिड़की केँ बन्न क’ कए रखबै ? अनुचर 2 : कथमपि नहि ! वामपंथी : कार्ल मार्क्स सन महान व्यक्तिक बात हम सब किएक नञि सुनै लै तैयार छी ? अनुचर 1 : कियै नहि सुनब ? वामपंथी : दुनियाँक सबटा मजदूर-किसान जँ एक स्वर मे बाजै त’ एहिमे अपराध की ? अनुचर द्वय : (एक्कहि स्वरमे) कोनो नहि ! वामपंथी : लेनिन जे पथ दैखौलनि, ताहि पर हम सब कियै नञि चलब ? वामपंथी : इन्कलाब ! अनुचर द्वय : जिन्दाबाद ! वामपंथी : (मुट्ठी तानैत) जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! अनुचर द्वय : ( नारा देबाक स्वरमे) इन्कलाब जिन्दाबाद ! (कहैत –कहैत दुनू अनुचर जेबी सँ छोटका सन कैकटा लाल पताका निकालि क’ एक-एकटाकेँ हाथमे धरैत तथा धराबैत मंचक चारूकात नाराबाजी करैत चक्कर काटय लागै छथि। दुनूक पाछाँ - पाछाँ पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, उचक्का, रद्दीवला सेहो सब जुटि जाइत छथि, सभक हाथमे छोट-छोट लाल झंडी, सभ क्यो तरह-तरहक नारा दैत छथि। एकटा चक्कर काटि कए जखन ओ सभ पुन: भाषण मंचक लग आबि जाइत छथि। मुदा भाषण- मंचक लग पहुँचि कए नारा केर तेवर दोसरे भ’ जाइत अछि।) उचक्का : (जेना मजाक करै चाहैत छथि) “हम्मर नेता चेयरमैन माओ” बाँकी लोग : “बाँकी सब क्यो दूर जाओ !” चोर : (भाषण मंच पर सँ) एक मिनट ....थम्हू, थम्हू ! (सब क्यो चुप भ’ जाइत छथि, आब वामपंथी युवा आ नेताजी दिसि घुरि कए बाजैत छथि--) इयैह त’ हमहूँ कह चाहैत छलहूँ... ने हमरा लेलिन सँ शिकायत छनि ने चेयरमैन माओ सँ..... दुनू अपन देश, अपन लोगक लेल अनेक काज कयलनि अथक श्रम कयने छलाह भरि जिनगी ; ने गीतासँ शिकायत ने गुरूवाणी सँ दुनू अप्पन अप्पन जगह मे अत्यंत महत्वपूर्ण अछि... मुदा एतबे कहै छलहुँ जे एहिमे सँ क्यो अथवा किछुओ हवा सँ नञि बहि कए आयल छल.... शून्य सँ नहि उगल छलाह क्यो ! (सभ क्यो चुप्प भ’ कए चोरक दलील केँ सुनै छथि आ तकर तर्क केँ बुझक’ प्रयास करैत छथि।) सब एक दोसरासँ जुड़ल छथि । मार्क्स नञि होइतथि त’ भरिसक लेलिनो नञि, आ ओ अयलाह तैं माओ सेहो... प्रत्येक घटनाक पूर्वपक्ष होइ छैक..... वामपंथी : (हँसैत) माने क्यो ‘ओरिजिनल’ नञि सबटा ‘डुप्लीकेट’, क्यो नहि असली सबटा नकली ! (सभ हँसि दैत छथि) चोर : हम कत’ कहलहुँ..... ‘सब क्यो नकली, सबटा चोर !’ ई सब त’ अहाँ लोकनि कहि रहल छी। (थम्हैत) हम मात्र कहल, कोनो बात पूर्ण रूप सँ नव नञि होइत अछि... ओहिमे कत्तेको पुरनका प्रसंग रहैत अछि ठूसल ! नेता : (सभक दिसि देखैत) तर्क त’ जबरदस्त देने छथि (वामपंथी युवाक व्यंग्य करैत) नीक-नीक केँ पछाड़ि देने छथि । अनुचर 1 : मुदा हिनकर थ्योरीक नाम की भेलनि ? अनुचर 1 : कोन नामसँ जानल जायत ई....? नेता : कियै ? ‘चोर पुराण’! (सब क्यो हँसैत छथि—वामपंथी युवाकेँ छोड़ि—हुनका अपन पराजय स्वीकार्य नञि छनि) बाजारी : त’ सुनै जाउ हमर गीत.... नेता आ दुनू अनुचर: हँ ,हँ, भ’ जाय...! बाजारी : (गाबैत छथि आ कनी-मनी अंग संचालन सेहो करैत छथि) एत’ चोर कोतवाल केँ डाँटै, गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! कतबा नव छै कतेक पुरनका, के छै ज्ञानी के अज्ञान ? गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! गर्तक भीतर शर्त्त रहै छइ, शर्त्तक भीतर भूर पुरान ! नाच नचै छै गीत गबै छइ, सब केर बाहर भीतर ठान ! गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! नव त’ किछुओ नञि छइ बौआ, सबटा जानल छइ पहिचान ! एक-दोसराकेँ जोड़ि दैत अछि, धोख् धिनक-धिन् चोर पुरान! गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! (जखन ओ एकक बाद एक पाँति गाबि रहल छलाह, धीरे- धीरे आनो लोग सब गाबै - नाचै मे अपनाकेँ जोड़ि रहल छलाह। अनुचर 1 कतहु सँ एकटा गेंदा केर माला ल’ क’ चोरक गरा मे पहिरा दैत छथि। अनुचर 2 एकटा थारी मे कर्पूरक दीप बारैत चोरक आरती सेहो क’ दैत छथि भिख-मंगनी आगाँ बढि चोर केँ तिलक सेहो लगा दैत अछि। धीरे-धीरे चोर मंच सँ उतरि कए नचैत-गबैत लोग सभक बीच आबि जाइत अछि—तावत् गीत चलिए रहल छल) बाजारी : हम छी चोर आ चोर अहूँ छी, साधु-संत घनघोर अहूँ छी ! च-छ-ज-झ छोर अहीं छी, नदी किनारक जोर अहीं छी ! झोर बहइ यै करै बखान, गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान ! नऽव तनिक छै दऽ ब तकर गर, परखि-झरकि कए राख बराबर, प-फ-ब-म मोर अहीं छी, अन्हारो केर छोर अहीं छी ! करै छी अहींकेँ कपट-प्रणाम! गाबै जाय जाऊ चोर पुरान ! [नाचैत-गाबैत, ढ़ोल पिपही बजबैत सब क्यो गोल-गोल घुमै छथि। भाषण मंच पर मात्र नेता आ वामपंथी युवा एक बेरि नचनिहार सभक दिसि आ एक बेरि एक-दोसराक दिसि देखि रहल छलाह धीरे-धीरे प्रकाश मद्धिम भ’ जाइत अछि आ अंतमे कल्लोलक समाप्ति भ’ जाइछ।] ********* (क्रमश:) २.शोध लेख मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्त्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतत्र पूर्ण रूपसं पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमतु छल आऽ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओऽ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आऽ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आऽ व्यक्त्तिगत आऽ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आऽ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओऽ बिसरल नहि छलाह, कारण ओऽ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आऽ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आऽ उपासना करैत छथि। आब जाऽ कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छ्ल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि, आऽ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आऽ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार(काष्ठकार), लोहार आऽ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल, ओऽ लोकनि एकर उपासक छलाह, मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आऽ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आऽ इन्द्र आऽ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आऽ असुरक सदृश असुर एकट भिन्न वर्ग छल, मुदा असुर श्वास लैत छला मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्रचीन छथि, ताहि द्वारे असुर वरुण देव आऽ मनुष्य दुहूक राजा छथि। पुरोहित पुरोहित हिन्दीमे अछि आऽ शृखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। (अनुवर्तते) ३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि-गजेन्द्र ठाकुर नन्दक अव्यव्स्थाक विरुद्ध शुरू कएल गेल संघर्ष किछु दिनका विराम लेने छल। गाममे बच्चा सभ डेढ़ साल रहल छलन्हि, दरमाहा बहुत दिन धरि बन्द छलन्हि। गाममे पैघ भाय एकटा भावी राजनीतिज्ञकेँ कहि कए नन्दक पदस्थापन क्षेत्रीय काजसँ हटा कए ऑफिसमे चित्र परियोजना डिजाइनमे करबाए देने छलखिन्ह। संगे ईहो कहने छलखिन्ह जे अपन ऑफिस जाऊ आऊ आऽ बच्चा सभ पर ध्यान दिअ। सभसँ मिलि जुलि कए रहू। नन्द पटना आबि कए भायक सभ गप पर ध्यान देने छलखिन्ह। पटनामे बेटीक कॉलेजमे नामांकन करबाए महाविद्यालयक पार्श्वमे किराया पर घर ताकलन्हि। दुनू बेटाक नामांकनक हेतु प्रवेश परीक्षा केर फॉर्म सभ भरबाय सभकेँ पटना बजा लेलखिन्ह। भातिजकेँ कहलखिन्ह जे सभकेँ लए कए आबि जाऊ, आऽ पहलेजाघाटमे बिहार सरकारक स्टीमर पकड़बाक सेहो आदेश देलखिन्ह। कारण एकटा निजी स्टीमर बच्चा बाबूक सेहो चलैत छल, मुदा ओऽ बेशी पसेन्जर लए कऽ चलैत छल, संगहि सरकारी स्टीमर अपन समयसँ चलैत छल, ओहिमे पैसेंजर होए वा नहि। सरकारी स्टीमरमे यात्रीक संख्या सीमित छल ताहि हेतु टिकट केर नियमित हिसाब छाल आऽ सभ यात्रीक बीमा होइत छल, ई बात निजी स्टीमरमे नहि छल। भातिजक सग पत्नी आऽ पुत्र-पुत्री सभ आबि गेलखिन्ह। गंगा ब्रिज कॉलोनीमे नन्द एकाकी रहैत छलाह। परिवारक लोककेँ सेहो आसपड़ोससँ बेशी मेल-जोल करबाक अनुमति नहि देने छलाह। मुदा पटनामे सभटा उनटि गेल छल। पड़ोसमे एकटा रिटायर्ड फौजी छलाह, एकटा बिहार सरकारक पुलिस छलाह आ एकटा बिहार सचिवालयक कर्मचारी। नन्द दुनू बेटाकेँ लए अगिला दिन तीनू गोटेक घर गेला आऽ सभसँ नमस्कार-पाती करबओलखिन्ह। बेटा-बेटी सभ स्कूल जाए लागल छलन्हि। नन्द पाँच किलोमीटर ऑफिस पएरे जाथि आऽ घुरती काल घरक काज-उद्यम सेहो करैत आबथि, जेना बृहस्पतिकेँ हाट लगैत छल, तँ ओतएसँ हरिएर-तरकारी, चाउर दालि इत्यादि आनब ई सभ। हाट रविक छुट्टीक दिन सेहो लगैत छल, आऽ ओहू दिन अपने जाऽ कए सभ टा घरक काज करैत छलाह। बच्चा सभक काज मात्र पढ़बा धरि सीमित छल। दूध पैकेट बला अबैत छलन्हि, कारण उठाना दुहबाए कए अनबामे बच्चा सभक पढ़ाईमे भाँगठ पड़ैत। बड़का बेटा जे गगा ब्रिज कॉलोनीमे कहियो ककरो फूल उखाड़ि लैत छल आऽ कहियो ककरो खिड़की पर गिट्टी फेंकि दैत छल, डेढ़ सालक ग्राम प्रवासक बाद शान्त भए गेल छलन्हि। नन्दकेँ मोन छन्हि जे कॉलोनीमे एक बेर बेटाकेँ लए कए पड़ोसीक ओहिठाम गेल छालाह आऽ पड़ोसीक पत्नीसँ बेटा क्षमा याचना कएने छलखिन्ह, कारण कार्यालयसँ अएला उत्तर ज्ञात भेल छलन्हि, जे बेटा हुनका पर गिट्टी फेँकने छलखिन्ह, जखन ओऽ बेचारी खिड़की लग ठाढ़ि बाहर दिशि किछु देखि रहल छलीह। छोट बेटा कोनो पैघ बच्चाकेँ पाथर फेंकि कए मारने छलखिन्ह, जखन ओऽ बच्चा साइकिल पर चढ़ल छल, भेल ई छल जे ओऽ पैघ बच्चा कॉलोनीक एक चक्कर काटि कए सायकिल लौटेबाक अपन वचनक पालन नहि कएने छल आऽ घुरलाक बाद दोसर चक्कर लगाऽ कए अबैत छी ई बजैत-बजैत सायकिल लए आगू बढ़ि रहल छल। छोटका बेटा क्षमा याचना करबासँ सेहो मना कए देने छलखिन्ह कारण ओऽ सोचैत छलाह जे हुनकर कोनो गलती नहि छलन्हि। बेश तखन एहि बेर बच्चा सभकेँ जखन नन्द पड़ोसी सभसँ भेँट करबाबए लेल गेल छलाह तावत धरि बड़का बेटा तँ पूर्णतया पन चञ्चल स्वभावक विपरीत स्वभावक भए गेल छलाह, मुदा छोट बेटा अपन स्वभाव पर दुराग्रह करैत स्थिर छलाह। (अनुवर्तते) ४.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------ ४.विराट पर्व पूर्ण भेल वनवासक वर्ष बारह अतीत, एक वर्षक छल अज्ञातवास बड़ कठिन, दुर्योधनकेँ यदि हुनक संकेतक चलए पता, पुनि द्वादश वर्षक वनवासक छल प्रथा। प्रातःकाल सभ विदा भेलाह विराट नगर दिशि, कंक नाम्ना धर्मराज ब्राह्मण वेश धारित मिलि। कौड़ी आऽ चतुरंग गोटीसँ विराटराजक मोन लगाएब, भीम बनि पाचक नाम वल्लभक पाकशाला सम्हारथि। विराटक पुत्रीकेँ संगीत नृत्य अर्जुन, नारी वृहन्नला बनि सिखाबथु, ग्रंथिक नामसँ नकुल अश्वक करए रखबारि, सहदेवक नाम तंत्रपाल भेल करथि चरबाहि। रानीकेँ सजाबथि द्रौपदी नाम धरि सैरन्ध्रीक। सभ ई सोचि नुकाओल अस्त्र-शस्त्र, शाखा बिच शमी-वृक्ष एकटा विशालमे। जखन वेश धरि पहुचलाह विराट राजा लग, स्वीकारलन्हि ओऽ सभटा प्रार्थना स्वतः। दिन छल बीति रहल मुदा रानी सुदेष्णाक, भाय छल कीचक दुष्ट देखि सैरन्ध्री भेल मुग्ध। बहिनसँ पूछल कोन देशक राजकुमारी छथि ई, कहल बहिन नहि, छी निकृष्ट दासी ई। मुदा कीचक पहुँचि द्रौपदी लग बाजल, सुन्दरी दास बनाऊ हम मुग्ध पागल। सैरन्ध्री कहलन्हि, हम विवाहिता एकदासी, अहाँक पालिता छी नहि पुनि गप ई बाजी। मुदा कीचक बहिनिसँ पुनि अनुरोध कएलक। पर्व दिन सुदेष्णा किछु वस्तु अनबा हेतु कहलक, सैरन्ध्रीकेँ कीचक लग जाए तकरा आनए पठेलक। मुदा ओतए देखि वासनाक आँखि भागलि, भीमसँ जाए बाजलि धिक पाण्डवकेँ कहलि। भीम बाजल आब जे ओऽ भेँट होअए, नाट्यशालामे बजाऊ आध राति सोचब फेर ई, हमरा की करबाक अछि ओहि दुष्टकेँ ओतए। कीचक विराटक सेनाक प्रमुख सेहो छल, सैरन्ध्रीक आमंत्रणकेँ नहि बूझि पहँचल अभागल। स्त्री वेष धरने भीम ओतए प्रतीक्षित, केश पकड़ि पटकल, लात हाथ मारल खीचककेँ ओतहि। भोर होइत ई गप पसरि गेल चारू दिशि, कीचककेँ मारल गंधर्वपति सैरंध्रीक। (अनुवर्तते) ५. कथा ११. संगीत “गबैया परिबार छैक। तान जँ चढ़ैत छैक तँ उतरिते नञि छैक”। “एकसँ एक कबिकाठी सभटा, परिबारमे क्यो गप छोड़बामे ककरोसँ कम नहि”। “से की कहैत छियैक। परिबारक कोन कथा, सौँसे टोल मे सभटा कबिकाठिये भेटत”। उदितक हारमोनियमक तानक विवेचन सौँसे गाम कए रहल छल। उदितक बाबू आऽ काका दुनू गोटे बड्ड पैघ गबैय्या रहथि। खानदानी गायन आऽ वादन प्रतिभा हुनका लोकनिक रक्त्तमे छलन्हि। उदित पाँचे वर्षसँ संगीत सीखय लागल छलाह, हुनकर स्वरक स्वाभाविक उदात्त आऽ अनुदात्त स्वरूपसँ पिता मुग्ध भए जाइत छलाह। मुदा गामक लोकक संगीतक ज्ञान अष्टजाममे मृदंग, झाइल आऽ हारमोनियम बजेबा तक आऽ निर्दिष्ट वाक्यकेँ गएबा तक सीमित छल, आऽ से प्रायः सभ गोटे सहज रूपेँ कए लैत छलाह। आङ्ल लोकनिक राज्य छ्ल, मैकाले महोदय संस्कृत शिक्षाक स्थान पर आङ्ल भाषा अनबा पर उतारू छलाह। उदितक पिताजी एहिसँ संबंधित एकटा कथा कहैत छलाह। मैकाले महोदय जखन भारत अएलाह तँ एकटा गेस्ट हाउसमे ठहरल छलाह। खिड़कीसँ बाहर देखि रहल छलाह तँ देखलन्हि जे गेस्ट हाउसक मैनेजर परिसरमे प्रवेश कए रहल छलाह, आऽ प्रवेश कएला उत्तर गेस्ट हाउसक दरबानकेँ पैर छुबि कए प्रणाम कएलन्हि। बादमे जखन मैकाले हुनकासँ पुछलन्हि, जे अहाँ मैनेजर छी आऽ तखन सामान्य दरबानकेँ पैर छुबि किएक प्रणाम कए रहल छलहुँ। एहि पर हुनका प्रत्युत्तर भेटलन्हि, जे ओऽ सामान्य दरबान नञि छल वरन् संस्कृतज्ञ सेहो छल। ताहि दिन मैकाले सोचि लेलन्हि जे भारतकेँ पराजित करबाक लेल भारतक संस्कृतिकेँ नष्ट करए पड़त। आऽ एहि लेल संस्कृतकेँ नष्ट करबाक प्रण लेलन्हि, जकर अछैत भारतीय कला संगीत आऽ संस्कृतिसँ पराङमुख भए जएताह। अस्तु तावत, उदित एहि तरहक वातावरणमे आगाँ बढ़ए लगलाह। अङरेज लोकनि द्वारा पाश्चात्य सङ्गीतकेँ अनबाक प्रयासक पलुस्कर, भातखण्डे आऽ रामामात्य द्वारा देल गेल समीचीन उत्तर शिक्षाक क्षेत्रमे किएक नञि भए सकल, उदितक बाल मोन अकुलाइत छल। अस्तु तावत उदित संगीतोद्धारक भातखण्डेकेँ आदर्श बनाए आगाँ बढ़ए लगलाह। लोक गबैय्या कहए तँ कोनो बात नहि, एक दिन आएत जखन एहि गबैय्याक सोझाँ समस्त अखण्ड भारतक मनसि श्रद्धासँ देखत, अस्तु तावत। काका आऽ पिताक संरक्षणमे गामक रामलीला मंडली द्वारा प्रस्तुत कएल जायबला नाटकमे सेहो उदित भाग लैत छलाह, हुनकर गाओल गीत गाममे सभक ठोर पर आबि गेल छल। मुदा खेती बारी तेहन सन नहि छलन्हि। एक बीघा बटाइ करैत जाइत छलाह, सेहो सुनए पड़न्हि जे गबैय्याजी बुते की खेती कएल होएतन्हि, मुँहसँ गओनाइ आऽ हाथसँ काज करबामे बड्ड अंतर छैक। जीवनक रथ आगाँ बढ़ैत रहैत मुदा विदेशीक शासनमे सेहो धरि संभव नहि होइत छल। कखनो हैजा तँ कखनो प्लेग तँ कखनो मलेरिआ। अहिना एक बेर गाममे प्लेग पसरल। लोक एक गोटाकेँ डाहि कए आबय तँ गाम पर दोसर व्यक्ति मृत पड़ल रहैत छल। उदितक मायकेँ सेहो पेट आऽ नाक चलय लगलन्हि, देह आगि जेकाँ जड़ैत रहन्हि, मुदा बेटाकेँ लग नहि आबय देथिन्ह जे कतहु हुनको प्लेग नहि भए जाइन्ह। दू दिनुका बाद बेचारी दुनियाँ छोड़ि देलन्हि। दुनू-बाप बेटा दाह संस्कार कए अएलाह। दुनू गोटेक आँखिमे नोर जेना सुखा गेल छलन्हि। पिता गुम-सुम रहए लगलाह। कण्ठसँ स्वर नहि निकलन्हि, मुदा हस्त परिचालनसँ बेटाकेँ अभ्यास कराबथि। दू-तीन बर्ष बीतल उदितक बयस वैह १०-११ साल होएतन्हि आकि पिताकेँ मलेरिआ पकड़ि लेलकन्हि। रातिमे निन्द नहि होइन्ह। सिरमामे भातखण्डे स्वरलिपि रहैत छलन्हि, ताहि आधार पर बेटाकेँ किछु गाबि सुनाबए कहैत छलखिन्ह। उदितकेँ आभास भए गेलन्हि जे माताक संग पिता सेहो दूर भए जएताह। ई सोचि कोढ़ फाटि जाइन्ह। कुनैनक प्रभाव सेहो आब पिता पर नहि होइत छलन्हि। रातिमे थरथरी पैस जाइत छलन्हि। उदित सभटा केथरी-ओढ़ना सभ ओढ़ा दैत छलखिन्ह, मुदा तैयो थरथरी नहि जाइत छलन्हि। लोक सभ दिनमे आबि खोज-पुछाड़ी कए जाइत छलन्हि। गामक नाटक मण्डली सेहो बन्दे छल कारण मुख्य कार्यकर्त्ता हर्षित नारायण छलाह आऽ ओऽ बनारस चलि गेल छलाह कोनो नाटक मण्डलीमे। ओऽ गाम आयल छलाह आऽ जखन सुनलन्हि, जे उदितक पिताक मोन खराप छन्हि तँ पुछाड़ी करए अएलाह। “हर्षित। हम तँ आब जाऽ रहल छी। उदित नेना छथि। काका पर बोझ बनताह ताहिसँ नीक जे अपन पैर पर ठाढ़ भए जाथि, संगीत साधना करथि। ई देवक लीला अछि जे एहि समय पर अहाँ गाम आबि गेलहुँ। गामक हबामे जेना रोगक कीटाणु आबि गेल छैक। एतए मत्यु टा निश्चित छैक आर किछु नहि। एहना स्थितिमे संगीतक मृत्यु भए जाए ताहिसँ नीक जे उदित अहाँक संग बनारस नाटक मण्डलीमे चलि जाथि। अहाँ बुते ई होएत हर्षित”? “की कहैत छी गुलाब भाइ। उदित अहाँक पुत्र छी आऽ हमर क्यो नहि? मुदा संगीतक पारखीक प्रतिभा नाटक मण्डलीमे कुण्ठित नहि भए जएतैक। नाटक मण्डली तँ हमरा लोकनिक सनक अल्प ज्ञानीक लेल छैक”। “नहि हर्षित। ओतए उदितकेँ हनुमानक आऽ रामक आशीर्वाद भेटतन्हि। संगीतक कतेक रास पक्ष छैक। नव-नव बाधा पार करताह आऽ अल्प समयमे संगीत फुरेतन्हि। ओतएसँ हिनकर साधना आगाँ बढ़तन्हि”। गुलाब जेना हर्षितक बाट जोहि रहल छलाह। बजिते-बजिते प्राण जेना उखड़ए लगलन्हि। बेटाक माथ पर थरथराइत हाथ रखलन्हि, तँ दौगि कए हर्षित गंगा जल आनि मुँहमे एक दिशिसँ देलन्हि मुदा जल मुँहक दोसर दिशिसँ टघरि कए बाहर आबि गेल। काशीक तट पर विद्यापतिक बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे सँ लऽ कए भिन्न-भिन्न धार्मिक आऽ लौकिक गीत गाबथि ओकर सुर बनाबथि आऽ ताहि लेल उदितकेँ प्रशंसा सेहो भेटन्हि। आयुक न्यूनता सेहो कहियो काल उपलब्धिक मार्गकेँ रोकि दैत छैक। उदित मात्र ११ वर्षमे काशी गेलाह आऽ ताहि द्वारे हुनकर स्वरक आऽ सुरक बहुत गोटे ग्राहक बनि गेलन्हि, ग्राहक नञि शोषक कहू। सभटा परिश्रम हिनकासँ करबाए लैत छलन्हि आऽ नाम अपन दऽ दए जाइत छलाह। मुदा उदित समय, आयु आऽ गुरुक आसमे दिन काटि रहल छलाह। दिन बड़ मुशकिलसँ कटैत छैक मुदा फेर लागए लगैत छैक, मुदा जौँ एकहि ढर्रा पर चलैत जाइत छैक तँ लागए लगैत छैक जे सालक साल कोना बीति गेल। उदित ११ वर्षसँ २६ वर्ष धरि नाटक कम्पनीमे काज करैत रहलाह। “शास्त्री जी। ई सुर तँ हमही बनओने छी, मुदा मोन कनेक विचलित अछि ताहि द्वारे दोसर सुर नञि बनि पाबि रहल अछि। उदितकेँ बजाऽ लैत छी। ओहो हमरासँ किछु सिखने अछि, किछु समाधान निकालि लेत”। महान संगीत उपासक भट्ट जीक सोझाँ हर्षित बाजि रहल छलाह। “हँ हँ। अवश्य बजा लिऔक”। भट्ट जी बजलाह। मुदा उदित जखन आबि कए संगीतकेँ जाहि सरलतासँ सिद्ध कए सुर गाबि देलन्हि, ताहिसँ भट्टजीकेँ बुझबामे भाँगठ नहि रहलन्हि, जे वास्तविक कलाकार हर्षित नहि उदित छथि। भट्ट जी एकटा एहन शिष्यक ताकिमे छलाह जे प्रतिभावान आऽ साधक होथि, जिनका भट्टजी अपन सभटा कला सौँपि निश्चिन्त भए दए सकथि। आइ से शिष्य भेटि गेलन्हि हुनका। उदितकेँ अपना आश्रममे चलबाक जखन ओऽ नोत देलन्हि तँ उदित दौगि कए अपन प्रकोष्ठ चलि गेलाह, आऽ पिताक फोटोकेँ निकालि कए जे कननाइ शुरू कएलन्हि, तँ १५ सालसँ रोकल धार छहर तोड़ि बहराए लागल। नाटक कम्पनीमे जेहन एकरूपता छल, तकर विपरीत गुरुआश्रममे वैविध्यता छल। सभ दिन उदित सूर्योदयसँ पूर्व उठैत छलाह आऽ संगीत साधनामे लीन भए जाइत छलाह। शिष्य गुरुकेँ पाबि धन्य छल आऽ गुरु शिष्यकेँ पाबि कए। दिन बीतए लागल मुदा भातखण्डे आऽ पलुस्कर महाराज द्वारा संस्कृत साहित्यक आधार पर संगीतक कएल गेल पुनुरोद्धार तँ गङ्गाक धार जेकाँ निर्मल आऽ चिर छल। जतेक गँहीर उदित ओहि धारमे उतरथि, मोन करन्हि जे आर गँहीर जाइ। २५ साल धरि गुरुक आश्रममे उदित रहलाह। ५१ वर्षक जखन भेलाह तँ गुरु ई कहि बिदा कएलन्हि जे उदित आब अहाँ शिष्य नहि गुरुक भूमिका करू। संगीतशास्त्रक पुनरोद्धार भए चुकल छैक, आङ्ल लोकनिक पाश्चात्य संगीत पद्धति अनबाक प्रयास विफल भए चुकल अछि, आऽ आब भारत स्वतंत्र सेहो भए चुकल अछि। जाऊ आऽ शास्त्र द्वारा प्रदत्त संगीतक दोसर पुनर्जागरणक योद्धा बनू। ५१ वर्षक आयुमे स्वतंत्र भारतमे उदित नोकरी तकनाइ शुरू कएलन्हि। काशीक एकटा संगीत विद्यालय सहर्ष हुनका स्वीकार कए लेलकन्हि। मुदा ३६ वर्षक संगीत साधनाक साधल स्वर काशी विश्वविद्यालय तक पहुँचि गेलैक। शिष्यक पंक्त्ति लागए लगलन्हि। श्रद्धाक प्रतीक, मुदा भारतक नव स्वरूपमे कतेको गोटे शास्त्रीय संगीतक व्यापार सेहो शुरु कएलन्हि, मुदा प्रचारसँ दूर मात्र गुरु शिष्य परम्पराकेँ आधार बनाऽ कए आगू बढ़बैत रहलाह् उदित। हुनकर शिष्य सभ देश विदेसमे नाम करए लागल। तखन काशी विश्वविद्यालय शिक्षक रूपमे हिनका नियुक्त्त कए लेलकन्हि। मुदा ओतए नियम छल जे बिना पी.एच.डी. कएने ककरो विभागक अध्यक्ष नहि बनाओल जाऽ सकैत अछि। मुदा विभागमे उदितसँ बेशी श्रेष्ठ तँ क्यो छल नहि। जेना आङ्ल जन कए गेल छलाह, गुरुकुलसँ पढ़निहारकेँ कोनो डिग्री नहि भेटैत छल आऽ ओऽ सरकारी नोकरीक योग्य नहि होइत छल। उदितक लगमे सेहो ताहि प्रकारक कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि। विश्वविद्यालयक सीनेटक बैसकी भेल आऽ ताहिमे विश्वविद्यालय अपन नियमकेँ शिथिल कएलक, आऽ उदितकेँ संगीतक विभागाध्यक्ष बनाओल गेल। ओतए सेवानिवृत्ति धरि उदित अपन प्रशासनिक क्षमताक परिचय देलन्हि। भातखण्डेक अनुरूप कतेक खण्डमे संगीतक शास्त्रक परिचय देलन्हि उदित। उदितक शिष्य सभक दृश्य-श्रव्य रेकार्ड बहरा गेल छलन्हि, मुदा उदित स्टुडियो आऽ जनताक समक्ष अपन कार्यक्रमसँ अपन साधना भंग नहि करैत छलाह। भोरक साधनासँ साँझक सुर भेटन्हि आऽ साँझक साधनासँ भोरक। हुनकर शिष्य सभ उदितकेँ बिना कहने एकटा अभिनन्दन कार्यक्रम रखलन्हि। ओतए रेकार्डिङ्ग केर व्यवस्था छल। उदित अभिनन्दन कार्यक्रममे अएलाह। आयु ७५ वर्षक छलन्हि हुनकर। श्रोता रहथि देशक सर्वश्रेष्ठ शास्त्रीय संगीतकार लोकनि आऽ उदितक शिष्य-मण्डली। जखन उदित शुरू भेलाह तखन हुनकर शिष्य लोकनि चारू दिशि ताकि रहल छलाह। हुनकर लोकनिक गुरुक स्वर हुनका सभकेँ छोड़ि सद्यः आर क्यो नहि सुनने छल। मुदा शिष्य लोकनिकेँ सुनला उत्तर सभकेँ अभिलाषा छलैक जे जखन शिष्य लोकनि एहन छथि तखन गुरु केहन होएताह। ७५ वर्षक एहि योद्धाकेँ सुनैत सुनैत सगीतक महारथी नव रसक संग हँसथि आऽ कानथि, मुदा शिष्य लोकनि विभोर भए मात्र कानथि। ६. पद्य अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952) आ.पद्य गंगेश गुंजन इ.पद्य ज्योति झा चौधरी ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य । जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि: 1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि। मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि। प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:- 8. भजन विनय लक्ष्मीनारायण हमर दुःख क्खन हरब औ॥ पतित उधारण नाम अहाँके सभ कए अछि औ, हमरा बेर परम कठोर कियाक होइ छी औ।। त्रिविध ताप सतत निशि दिन तनबै अछि औ॥ अहाँ बिना दोसर के त्राण करत औ॥ देव दनुज मनुज हम कतेक सेवल औ, कियो ने सहाय भेला विपति काल औ॥ कतेक कहब अहाँके जौँ ने कृपा कर औ, रामजीके चाड़ि अहाँक के शरण राखन औ॥ 9. भजन विनय एक बेर ताकू औ भगवान, अहाँक बिना दोसर दुःख केहरनाअन॥ निशि दिन कखनौ कल न पड़ै अछि, कियो ने तकैये आन केवल आशा अहाँक चरणके आय करू मेरे त्राण॥ कतेक अधमके तारल अहाँ गनि ने सकत कियो आन, हमर वान किछु नाहि सुनए छी, बहिर भेल कते कान॥ प्रबल प्रताप अहाँक अछि जगमे के नहि जनए अछि आन, गणिका गिद्ध अजामिल गजके जलसे बचावल प्राण॥ जौँ नहि कृपा करब रघुनन्दन, विपति परल निदान, रामजीके अब नाहि सहारा, दोसर के नहि आन॥ 10. महेशवानी सुनू सुनू औ दयाल, अहाँ सन दोसर के छथि कृपाल॥ जे अहाँ के शरण अबए अछि सबके कयल निहाल, हमर दुःख कखन हरब अहाँ, कहूने झारी लाल॥ जटा बीच गंगा छथि शोभित चन्द्र विराजथि भाल, झारीमे निवास करए छी दुखियो पर अति खयाल॥ रामजीके शरणमे राखू, सुनू सुनू औ महाकाल, विपति हराऊ हमरो शिवजी करू आय प्रतिपाल॥ 11. महेशवानी काटू दुःख जंजाल, कृपा करू चण्डेश्वर दानी काअटू दुःख जंजाल॥ जौँ नहि दया करब शिवशंकर, ककरा कहब हम आन, दिन-दिन विकल कतेक दुःख काटब जौँ ने करब अहाँ खयाल॥ जटा बीच गंगा छथि होभित, चन्द्र उदय अछि भाल, मृगछाला डामरु बजबैछी, भाँग पीबि तिनकाल॥ लय त्रिशूलकाटू दुःख काटू, दुःख हमरो वेगि करू निहाल, रामजी के आशा केवल अहाँके, विपति हरू करि खयाल॥ 12. महेशवानी शिव करू ने प्रतिपाल, अहाँ सन के अछि दोसर दयाल॥ भस्म अंग शीश गंग तीलक चन्द्र भाल, भाँग पीब खुशी रही , रही दुखिया पर खयाल। बसहा पर घुमल फिरी, भूत गण साथ, डमरू बजाबी तीन नयन अछि विशाल॥ झाड़ीमे निवास करी, लुटबथि हीरा लाल, रामजी के बेर शिव भेलाह कंगाल॥ 13. महेशवानी शिवजी केहेन कैलौँ दीन हमर केहेन॥ निशिदिन चैन नहि चिन्ता रहे भिन्न, ताहू पर त्रिविध ताप कर चाहे खिन्न॥ पुत्र दारा कहल किछु ने सुनै अछि काअ ताहू पर परिजन लै अछि हमर प्राण॥ अति दयाल जानि अहाँक शरण अयलहुँ कानि, रामजी के दुःख हरू अशरण जन जानि॥ (अनुवर्तते) आ.पद्य गंगेश गुंजन गंगेश गुंजन(1942- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। ३. गाम चारि पाँती मातृभूमि मिथिलाक नाम पाँच फूल देश केर शहीदक नाम नोर चारि ठोप हमर श्रम केर स्मतृतिमे अव्यतीतक नाम माटि, मेघ, वायु, सौँस पर्वतकेँ नदी, वृक्ष, पक्षी आऽ निर्झरकेँ अपन सूर्य तारा आऽ चन्द्रमा, ग्राम नगर गली केर बसातक नाम गुंजनक सश्रु स्वाधीन प्रणाम गढ़ि रहल छथि फेरसँ एखन ओऽ मुरुत हुनक मन, बांहि आँखि अथक हौँसला चकचक देहक श्रमकणकेँ सादर प्रणाम हे हमर विवेक, हमर दुःख-सुख, हे हमर गाम! Bottom of Form Top of Form Bottom of Form इ.पद्य ज्योति झा चौधरी ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति बालश्रम बालपनक किलकारी भूखक ताप सऽ भेल मूक, पोथी बारि कोदारि पाडैत हाथक मारि अचूक। कादो रौद बसातमे श्रम केनाइ भेल मजबूरी; गरीबीक पराकाष्ठा ! पेट आ पीठक घटैत दूरी, किछु धनहीनता आ’ किछु माता पिताक मूर्खता, मुदा, सभसँ बेसी स्वार्थी समाजक संवेदनहीनता, जे बालक केँ माताक आश्रय सॅं वञ्चित केलक, लेखनि के छीन कोमल हाथमे करची धरेलक, माल जालक सेवा करैत बाल्य जीवन कुदरूप, अपने भविष्यकेँ दरिद्र करैत अज्ञान आ' अबूझ, विद्योपार्जनक ककरा फुर्सति ? स्थिति तऽ तेहन भेल, चोर बनक आतुर अछि बालपन दू दाना अन्न लेल। ई.पद्य गजेन्द्र ठाकुर मोनक जड़िमे पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च नञि जानि किए सेजल मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल। पर्वत शिखर सोझाँ अबैत हियाऊ गमाबथि, बल घटल जेकर पार दुःखक सागर करैत। करबाक सिद्धि सोझाँ छथि जे क्यो विकल, भोथलाइत प्यासल अरण्यपथ मे हँ बेकल। मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल, पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च नञि जानि किए सेजल। हाथ दए तीर आनि दए करोँट तखन तत, मनसिक अन्हारक मध्य विचरणहि सतत। प्रकाशक ओतए कए उत्पत्ति ठामहि तखन, विपत्तिक पड़ल क्यो आब नञि होएत अबल। मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रम भेटल, पंक्त्तिबद्ध कए पुनः किञ्च जानि किए सेजल। करबाक अछि लोक कल्याणक मन वचन कर्महि , नञि अछि अपन अभिमान छोड़ब अधः पथ ई। घुरत अभिमान देशक तखन अभिमानी हमहुँ छी, नञि तँ फुसियेक अभिमान लए करब पुनः की। मोनक जड़िमे राखल सतत कार्यक क्रमक ई, पंक्त्तिबद्ध पुनः किञ्च जानि कए सेजल छी। 7. संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) (आगाँ) -गजेन्द्र ठाकुर गते शोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेषु कालेषु वर्तयन्ति विचक्षणाः। वयं इदानीम यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवं अस्ति- गते शोकं न कुर्वीत। वयं गत विषये प्रौर्त विषये दुःखम न करणीयं तथैव भविष्ये अपि स्वपनः न द्रष्टव्यः। भविष्ये एवं भविष्यति एवं करिष्यामि- इति स्वप्नः अपि न द्रष्टव्यः। दुखम् अपि न करणीम्- भूते यत् प्रवृत्तम् अस्ति- पूर्वम् यत् प्रवृत्तम् अस्ति- तत्र दुःखम् अपि न करणीयम्- अग्रे यत् भविष्यति तस्य स्वप्नः अपि न द्रष्टव्यः। वर्तमानकाले एव व्यवहर्णीयं- वर्त्तमानकाले एव तातव्यं- तस्मिन् विष्ये एव यद करणीयं यत न करणीयं तदविषये चिन्तनीयम्- एवं विचक्षणाः नाम बुद्धिमान्- बुद्धिमन्तः एवं कुर्वन्ति। कथा एकम् अरण्यम् अस्ति। अरण्ये एकः संन्यासी अस्ति। सः प्रतिदिन भिक्षायाचनं कृत्वा जीवनं करोति। तस्य हस्ते एकं सुवर्ण कङ्कणम् अस्ति। सः चिन्तयति सुवर्णकङ्कनस्य दान करोमि- इति। सः एकस्मिन् दिने जनान् आह्वयति- घोषणां करोति। बहवः जनाः सम्मिलिताः भवन्ति। तदा संन्यासी घोषयति- अहम् अत्यन्त निर्धनाय सुवर्णकङ्कणं ददामि। अत्र कः निर्धनः अस्ति- इति। तदा बहवः जनाः- अहं निर्धनाः, अहं निर्धनाः इति संन्यासी समीपम् आगच्छति। परन्ति संन्यासी कस्मै अपि सुवर्णकङ्कणं न ददाति। एकस्मिन् दिने तस्य देशस्य महाराजः तेन् मार्गेन् आगच्छति। सः संन्यासी वचनं श्रुणोति। सः संन्यासी आश्रमं गच्छति। संन्यासी महाराजं समीपं आह्वयति- सुवर्णकङ्कणं महाराजाय ददाति। सः संन्यासीं पृच्छति। अहं महाराजा अस्मि। मम समीपे प्रभूतम् ऐश्वर्यम् अस्ति। परन्तु भवान् मम कृते किमर्थं सुवर्णकङ्कणं ददाति। तदा संन्यासी वदति- यस्य आशा अधिकम् अस्ति तस्मै एव अहं सुवर्णकङ्कणं ददामि। यद्यपि भवान् महाराजः अस्ति- तथापि भवतः आशा अधिका अस्ति। भवतः इच्छा अस्ति- अहम् अन्यस्य राजस्य उपरि आक्रमणं करोमि- जयं सम्पादयामि- इतोपि अधिकम् ऐश्वर्यं सम्पादयामि। अतः भवान् निर्धनः एव। अतः अहम् एतद सुवर्णकङ्कणं भवते दातुम् इच्छामि। संन्यासिनः वचनं श्रुत्वा महाराजस्य ज्ञानोदयः भवति। सः लज्जया स्वराज्यं प्रति गमिष्यति। सम्भाषणम् नमोनमः। केचन् प्रश्नार्थकाः सन्ति। किछु प्रश्नार्थक शब्द अछि। तत्र सप्त प्रसिद्धाः सन्ति। ओतए सात टा प्रसिद्ध छथि। यथा। किम् कुत्र कति कदा कुतः कथम् किमर्थम् अहम् इदानीम् उत्तरं वदामि। हम आब उत्तर बजैत छी। भवन्तः सर्वेपि एतेषाम् अर्थं जानन्ति। अहाँ सभ सेहो एहि सभक उत्तर जनैत छी। अहम् उत्तरं वदामि। हम उत्तर बजैत छी। भवन्तः प्रश्नं पृच्छतु। अहाँ सभ प्रश्न पूछू। यथा- रामः पुस्तकं पठति। राम पुस्तक पढ़ैत छथि। रामः किम् पठति? राम की पढ़ैत छथि। भवती किम् वदन्त? अहाँ (स्त्रीलिंग) की बजैत छी? तत कृष्णफलकम्। ओतए कृष्णफलक अछि। तत किम्? ओतए की अछि। लखनऊ उत्तरप्रदेशे अछि। लखनऊ उत्तरप्रदेशमे अछि। लखनऊ कुत्र अस्ति? लखनऊ कतए अछि? अधिकारी कार्यालये अस्ति। अधिकारी कार्यालयमे अछि। भवती कुत्र वसति? अहाँ (स्त्रीलिंग) कतए बसैत छी? अत्र नव बालकाः सन्ति। एतए नौ टा बालक छथि। अत्र दश दण्डदीपाः सन्ति। एतए दस दण्डदीप अछि। मार्गे नववाहनानि गच्छन्ति। मार्गमे नौ टा वाहन जाइत अछि। मम समीपे दश पुस्तकानि सन्ति। हमरा लग दस टा पुस्तक अछि। भवत्याः गृहे कति जनाः सन्ति? अहाँक (स्त्रीलिंग) लग कैकटा पुसतक अछि? चत्वारः। चारिटा। सूर्योदयः प्रातः काले भवति। सूर्योदय प्रातःकालमे होइत अछि। सूर्यास्त सायंकाले भवति। सूर्यास्त सायंकालमे होइत अछि। रमेशः दशवादने विद्यालयं गच्छति। रमेश दस बजे विद्यालय जाइत अछि। भवती कदा पाकं करोति? अहाँ (स्त्रीलिंग) कखन भोजन बनबैत छी? मित्रः विदेशतः आगच्छति। मित्र विदेशसँ अबैत छथि। सखी चेन्नईतः आगच्छति। सखी चेन्नईसँ अबैत छथि। गङ्गा हिमालयतः प्रवहति। गङ्गा हिमालयसँ प्रवाहित होइत छथि। भवती कुतः मोदकम् आनयति। अहाँ (स्त्रीलिंग) कतएसँ मोदक अनैत छी। स्वास्थ्यं उत्तमम् अस्ति। स्वास्थ्य उत्तम अछि। भवत्याः स्वास्थ्यं कथम् अस्ति? अहाँक (स्त्रीलिंग) स्वास्थ्य केहन अछि? अनीता पाठनार्थं विद्यालयं गच्छति। अनीता पढ़ेबाक लेल विद्यालय जाइत छथि। अनीता औषधार्थम् औषधालयं गच्छति। अनीता औषधिक लेल औषधालय जाइत छथि। गृहणी भोजनार्थं पाकशालां गच्छति। गृहणी भोजनक लेल भनसाघर जाइत छथि। भवती किमर्थं पठति? अहाँ किएक पढ़ैत छी? भवन्तः एतेषाम् अर्थम् सम्यक ज्ञातवन्तः। इदानीम् भवन्तः माम् प्रश्नं पृच्छन्तु। अहम् उत्तरं वदामि। इदानीं भवतु एकः आगच्छतु। अनन्तरं भवन्तः सर्वे तम् प्रश्नं पृच्छन्तु। राजा उत्तिष्ठतु। भवान् आगच्छतु। इदानीं भवन्तः प्रश्नं पृच्छन्तु। सः उत्तरं वदति। भवान् कदा निद्रां करोति। अहाँ कखन निद्रा करैत छी। भवान् कुतः आगच्छति। अहाँ कतएसँ अबैत छी। भवान् किम खादति। अहाँ की खाइत छी। भवतः अध्ययनं कथं प्रचलति। अहाँक अध्ययन केहन चलि रहल अछि। भवान् किमर्थम् गीतं गायति। अहाँ किएक गीत गबैत छी। भवान् कुत्र वसति। अहाँ कतए बसैत छी। मञ्जुनाथः गच्छति। मञ्जुनाथ जैत अछि। गृहं गतवान। गृह गेल। मञ्जुनाथः गृहं गतवान। मञ्जुनाथ गृह गेल। मञ्जुनाथः न गतवान। मञ्जुनाथ नहि गेल। मञ्जुनाथः आगतवान। मञ्जुनाथः आबि गेल। मञ्जुनाथः उपविष्टवान। मञ्जुनाथ बैसि गेल। पठति- पठितवान पढ़ैत अछि- पढ़लक लिखति- लिखितवान लिखैत अछि- लिखलक करोति- कृतवान करैत अछि- कएलक अम्बिका पीतवती/पीतवती अम्बिका पिबैत आचि/ पीलक अम्बिका लिखति/ लिखितवती अम्बिका लिखैत अछि/ लिखलक अम्बिका गच्छति/ गतवती अम्बिका जाइत अछि/ गेल अम्बिका आगच्छति/ आगतवती अम्बिका अबैत अछि/ अम्बिका आबि गेल बालकः गतवान बालक गेल बालिका गतवती बालिका गेलि क्रीडितवान/ क्रीडितवती खेलेलक/ खेलेलीह पृच्छामि- श्रुणोमि पुछैत छी (हम) / सुनैत छी (हम) वदामि- उक्त्तवान –उक्त्तवती बजइत छी/ बजलहुँ/ बजलीह अहम् अद्य पश्यामि हम आइ देखैत छी अहं श्वः द्रक्ष्यामि हम काल्हि देखब मञ्जुनाथः गमिष्यति मञ्जुनाथ जायत। वेदवती गमिष्यति वेदवती जयतीह भवन्तः किम् किम् करिष्यन्ति अहं काव्यं लेखिष्यामि हम काव्य लिखब वयं काव्यं लिखिष्यामः हम सभ काव्य लिखब तस्य नाम ओमः ओकर नाम ओम अछि ओम उपविशतु ओम बैसू तस्याः नाम आस्था ओकर नाम आस्था अछि आस्थे उपविशतु आस्था बैसू गीतम् बालोऽहम वर्ण प्रसारयतु होली आयाति बालोऽहम जगत् भ्रमयामि वर्णं स्नेहं सुखं प्रसारयतुम दुःखेन निवारयतुम गच्छामि। बालोऽहम जगत् भ्रमयामि। वाणी मधुरा परन्तु प्रखरा मेलयतुम उच्चैः स्वरे शान्तं समृद्धिं उन्नतः मार्गे सर्वे मिलित्वा गच्छामः बालोऽहम जगत भ्रमयामि। (अनुवर्तते) ८. मिथिला कला (आगां) षडदल अरिपन मिथिलामे भगवती पूजाक अवसर पर ई अरिपन पाड़ल जाइत अछि।एतय देवी भागवत पुरानक षटकोण यंत्र पारल गेल अछि। छः टा कमल दल एहिमे अछि। आदिशक्त्ति भुवनेश्वरीक पद चिन्ह आऽ पञ्चोपचार पूजाक सामग्रीसँ युक्त्त ई अरिपन अछि। अनुवर्तते) ९. पाबनि संस्कार तीर्थ नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” निबंध - नूतन झा बारातीसत्कार आजुक आधुनिक परिवेशमे विवाहक पुरान मान्यता आर विधि विधान अपन प्रतीकात्मक स्वरूपमे शेष बचल अछि। दिन पर दिन ओकर स्थान अपव्यय सँ परिपूर्ण परिपाटी लऽ रहल अछि। हम सब पौराणिक आ’ तर्कसंगत विचारक अवशेष मात्र देखि रहल छी। आब निरंतर जीवनशैलीमे आधुनिकताक समावेष भऽ रहल अछि। एकर किछु प्रत्यक्ष लाभो अछि, जेनाकि बढ़ियाँ शिक्षा आ' स्वास्थ्य व्यवस्था। किन्तु आधुनिकताक दुष्परिणामक सूचि बनाबी तऽ ओ’ अनन्त रहत। विवाहादिमे जे आडंबर आ' विलासितापूर्ण प्रदर्शन होइत अछि ओकर निर्वाह सर्व साधारणक लेल काफी कठिन अछि।पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा कएलाक बाद एक साधारण कन्यापक्ष विवाह समारोहक उच्चवर्गीय प्रदर्शनक आर्थिक आघात केँ कोना सहत? विभिन्न प्रकारक ताम-झाम युक्त महग व्यवस्थाक निर्वाह बहुत कष्टकारी होइत छैक। किछु घंटाक शोभा बढ़ाब’ लेल वा विवाह समारोह केँ कथित रूप सॅं अविश्वसनीय बनाबए केर दवाब सॅं लोग हजारों लाखों रूपैया पानिमे बहा दैत अछि। नब पीढ़ीक सुशिक्षित लोक केँ बुझबाक चाही जे विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक दू परिवारक आपसी स्नेह आ' सम्बन्ध। विवाहकेँ अविस्मरणीय बनाबैत छैक ओकर सफलता जाहि लेल मात्र निष्ठा आ' विश्वासक प्रचुरता चाही, टेंट हाउस भोज व्यवस्था वा महग कपड़ा लत्ता आर गहना जेवर नञि। ई सभ कृत्रिम साधनक मॉँग मध्यम वर्गीय परिवारक लेल सीमित रहय तखने कल्याण अछि। अपव्यय सॅं बचि कऽ यदि नवयुगक वर कन्या अपन सूझ बूझ सॅं गरिमामय सम्बन्धक शुरूआत करथि तऽ ई सभक हितमे होयत।कन्यापक्ष पर वरपक्ष द्वारा बारातीक भव्य स्वागतक दबाब देखि बड़ा दुख होइत अछि। स्वागत तऽ हृदय सॅं हुअक चाही रूपैया पैसा सॅं नहिं। एकटा गरीब परिवारक व्यथा संवेदनशील व्यक्तिकेँ आडंबरक प्रति आर कठोर बनाबए लेल पर्याप्त अछि। एक कविक कविताक किछु पंक्ति उल्लेखित अछि : ''कोना करू बरियाती जी अहॉंक सत्कार यौ । धानो नहि भेल हमरा रब्बियो के नञि आस यौ ॥ कठिन समय छैक सुनियउ भारी परिवार यौ। रूख सुख जे भेटए कऽ लियउ स्वीकार यौ॥ सम्बन्ध बनाबऽ एलहुँ अहॉं राखू हमरो लाज यौ। घर द्वारो टूटल फाटल दलान पर नहि खाट यौ॥ दिन राति पेट भरय लय करि कऽ रोजगार यौ। खानपियनि दऽ नहि सकलहुँ छी बहुत लाचार यौ॥” आउ हम सब अहि आडंबरक समूल नाश कऽ मिथिलाक गरिमा बढ़ाबी। १०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’ भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’ केर जन्म ११ अगस्त १९२८ ई. तदनुसारभाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि। हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झा छन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र ५ वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि। १५ वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झा जी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ २५ वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि। पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पं बी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि। पं झा १९५४ सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि। १९५५ ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। १९६० ई.मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए १९७० धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। १९७०मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पं झाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि। हिनकर अनेक शिष्य-शिष्या आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार आऽ उत्तम शिक्षक छथि, जेना- डॉ. गीता बनर्जी, श्रीमति कमला बोस, श्रीमति शुभा मुद्गल, श्रीकान्त वैश्य,श्री शान्ता राम कशालकर, श्री शान्ता राम कशालकर, श्री कामता खन्ना, श्रीमति सत्या दास, डॉ. रूपाली रानी झा, डॉ इला मालवीय, श्री अनिल कुमार शर्मा, श्री रामशंकर सिंह, श्रीमति संगीता सक्सेना, श्री राजन पर्रिकर, श्रीमति रचना उपाध्याय, श्री नरसिंह भट्त, श्री भूपेन्द्र शुक्ला, श्री जगबन्धु इत्यादि। पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे २००सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि। मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति, राग वैदेही भैरव, आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल ’रंजयति इति रागः’ केर अनुरूप अछि। १९८२ मे उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारक संगे ’रत्न सदस्यता’ सेहो देल गेलन्हि। संगीत लेखनक हेतु काका हाथरसी पुरस्कार, आऽ भारतक सर्वोच्च संगीत संस्था आइ.टी.सी. केर सम्मान सेहो हिनक भेटि चुकल छन्हि। २०० ई. मे स्वर साधना रत्न अवार्ड, २००५ मे संगीत नाटक अकादेमीक राष्ट्रीय पुरस्कार, भारत संगीत रत्न, राग ऋषि, संत तुलसीदास सम्मान, प्रायाग गौरव एवं सोपरी अकादेमीक ’सा म प वितस्ता’ इत्यादि सम्मान श्री झाकेँ प्राप्त छन्हि। श्री रामरंग जी प्रयागमे ’वारिन दास संगीत परिषद’ केर स्थापना कए अनेकानेक संगीत समारोहक आयोजन सेहो कएने छथि। ’इलाहाबाद विश्वविद्यालय संगीत सम्मेलन’ ३० वर्षसँ बन्द पड़ल छल जकरा वार्षिक रूपसँ १९८० मे पुनः श्री झा आरम्भ करबओलन्हि। किएक तँ श्री झा लग कोनो औपचारिक डिग्री नहि छलन्हि, इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपन नियममे परिवर्त्तन कएलक आऽ हिनका ओतए संगीत विभागाध्यक्ष बनाओल गेलन्हि, जतएसँ ओऽ १९८९ ई. मे सेवानिवृत्त भेलाह। तुलसीक मानसक आधार पर श्री झा सात काण्डक संगीत रामायणक सेहो रचना कएलन्हि। पं झा मुख्य रूपसँ खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आऽ संगहि ध्रुवपद, धमार, तराना, तिरवट, चतुरंग, रागमाला, रागसागर, रागताल सागर, भजन आऽ लोकगीत गायनमे सिद्ध छथि। अखन ८० वर्षक आयुमे प्रयागमे श्री झा संगीत साधनामे रत छथि। ११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर बालानां कृते -गजेन्द्र ठाकुर गोनू झा आ’ दस ठोप बाबा चित्र ज्योति झा चौधरी मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढ़ोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत। एकटा विशालकाय बाबा दस टा ठोप कएने राजाक दरबारमे ई कहैत अएलाह जे ओऽ सय वर्ष हिमालयमे तपस्या कएने छथि आऽ यज्ञसँ वर्षा कराऽ सकैत छथि। साँझमे हुनका स्थान आऽ सामग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतहु पहुनाइ करबाक लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरलाह तखन कनिञाक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित हुनका दर्शनार्थ विदा भेलाह। एम्हर भोर भेलासँ पहिनहि सौँसे सोर भए गेल जे एकटा बीस ठोप बाबा सेहो पधारि चुकल छथि। आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब”। “हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आऽ वर्षा होएत”। “ओतेक टाक बाँस रखैत छी कतए”। “अहाँ एहन ढोंगी साधुक मुँहमे”। आब ओऽ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कए विदा भेला। “औऽ। अपन खराम आऽ कमण्डल तँ लए जाऊ”। मुदा ओऽ तँ भागल आऽ लोक सभ पछोड़ कए ओकर दाढ़ी पकरि घीचए चाहलक। मुदा ओऽ दाढ़ी छल नकली आऽ ताहि लेल ओऽ नोचा गेल। आऽ ओऽ ढ़ोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ दाढ़ी हटा कए अपन रूपमे आबि गेलाह। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान कएलन्हि। ------------------------------ बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर पञ्जी प्रबंध पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। वैवाहिक अधिकार निर्णय नियम १. कोनो कन्या अपन १६ पुरुषा (पितृकुल आऽ मातृकुल मिलाकेँ) सँ छठम स्थानमे रहैत छथि- जिनका छठि कहल जाइत छन्हि। एहि छठिक निर्धारण निम्न प्रकारसँ होइत अछि। १.क्न्याक प्रपितामहक पितामह प्रथम छठि २.कन्याक प्रपितामहक मातामह द्वितीय छठि ३.कन्याक पितामहक मातामह तृतीय छठि ४.कन्याक प्रपितामहीक मातामह चतुर्थ छठि ५.कन्याक पितामहीक प्रपितामह पञ्चम छठि ६.कन्याक पिताक मातामहक मातामह छठम छठि ७.कन्याक पितामहीक प्रमातामह सातम छठि ८.कन्याक पितामहीक मातृमातामह आठम छठि ९.कन्याक मातामहक प्रपितामह नवम छठि १०.कन्याक प्रमातामहक मातामह दसम छठि ११.कन्याक मातामहक प्रमातामह एगारहम छठि १२.कन्याक मातामहीक मातृमातामह बारहम छठि १३. कन्याक मातामहीक प्रपितामह तेरहम छठि १४.कन्याक मातामहीक पितृ मातामह चौदहम छठि १५.कन्याक मातामहीक प्रमातामह पन्द्रहम छठि १६.कन्याक मातामहीक मातृ मातामह सोलहम छठि उपरोक्त्त समस्त छठिक समान महत्त्व अछि। एहिमे सँ कोनो छठि वरक पितृ पक्षमे अएला पर उक्त्त वर कन्याक मध्य वैवाहिक अधिकार नहि होएत। ओऽ छठि यदि वरक मातृकुलमे अबैत छथि तँ अधिकार होएत। नियम२. वर कन्याक गोत्र एक नहि होए। नियम ३. वर कन्याक प्रवर एक नहि होए। नियम ४. वरक मातामह ओऽ कन्याक मूल ओऽ मूलग्राम सहित एक होए तँ सात पुस्त धरि मातृ सापिण्ड्यक कारणेँ अधिकार नहि होएत। नियम५.वरक विमाताक भायक सन्तान कन्या नहि होए। मातृतः पञ्चमी त्यक्त्तवा पितृतः सप्तमीं भजेत्- मनुस्मृति असपिण्डाय या मातुः असपिण्डा च या पितुः सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार कर्मणि मैथुने। पञ्चमात् सप्तमात् सप्तमात् उर्ढ्वं मात्रूतः पित्रूतस्थत। सपिण्डा निवर्तेत कर्तुम् व्यतितिसम्। (अनुवर्तते) १३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर चाणक्य...कौटिल्य चाण्क्य भारतकेँ एकटा सुदृढ़ आऽ केन्द्रीकृत शासन प्रदान कएलन्हि, जकर अनुभव भारतवासीकेँ पूर्वमे नहि छलन्हि। चाणक्यक जीवन आऽ वंश विषयक सूचना अप्रामाणिक अछि। चाणक्यक आन नाम सभ सेहो अछि। जेना कौटिल्य, विष्णुगुप्त, वात्स्यायन, मालांग, द्रामिल, पाक्षिल, स्वामी आऽ आंगुल। विष्णुगुप्त नाम कामंदक केर नीतिसार, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस आऽ दंडीक दशकुमारचरितमे भेटैत अछि। अर्थशास्त्रक समापनमे सेहो ई चर्च अछि जे नन्द राजासँ भूमिकेँ उद्धार केनिहार विष्णुगुप्त द्वारा अर्थशास्त्रक रचना भेल। अर्थशास्त्रक सभटा अध्यायक समापनमे एकर रचयिताक रूपमे कौटिल्यक वर्णन अछि। जैन भिक्षु हेमचन्द्र हिनका चणकक पुत्र कहैत छथि। अर्थशास्त्रमे उल्लिखित अछि जे कौटिल्य कुटाल गोत्रमे उत्पन्न भेलाह। पन्द्रहम अधिकरणमे कौटिल्य अपनाकेँ ब्राह्मण कहैत छथि। कौटिल्य गोत्रक नाम, विष्णुगुप्त व्यक्तिगत नाम आऽ चाणक्य वंशगत नाम बुझना जाइत अछि। धर्म आऽ विधिक क्षेत्रमे कौटिल्यक अर्थशास्त्र आऽ याज्ञवल्क्य स्मृतिमे बड्ड समानत अछि जे चाणक्यक मिथिलावासी होयबाक प्रमाण अछि। अर्थशास्त्रमे(१.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनक केर पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...। अर्थशास्त्रमे १५ टा अधिकरण अछि। सभ अधिकरण केर विभाजन प्रकरणमे भेल अछि। कौटिल्यक राज्य संब्धी विचार सप्तांग सिद्धांतमे अछि।स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, दंड आऽ मित्र केर रूपमे राज्यक सातटा अंग अछि। कऊतिल्यक संप्रभुता सिद्धांतमे राज्यक प्राशसनिक विभा वा तीर्थक चर्च अछि- ई १८ ट अछि। १.मंत्री२.पुरोहित३.सेनापति४.युवराज५.दौवारिक६.अंतर्वांशिक७.प्रशास्त्र८.संहर्त्ता९.सन्निधात्रा१०.प्रदेष्टा११.नअयक१२.पौर व्यावहारिक१३.कर्मांतिक१४.मंत्रिपरिषदाध्यक्ष१५,.दंडपाल१६.दुर्गपाल१७.अंतर्पाल१८.आत्विक। विधिक चरिटा श्रोत अछि- धर्म, व्यवहार, चरित्र आऽ राजशासन। कौटिल्यक अतरराज्य संबंध केर सिद्धांत मंडल सिद्धांत केर नामसँ प्रतिपादित अछि। विजिगीषु राजा- विजय केर इच्छा बला राजा- केर चारू कात अरिप्रकृति राजा आऽ अरिप्रकृति राजाक सीमा पर निम्न प्रकृति राजा रहैत छथि। विजुगीषु राजाक सोझाँ मित्र, अरिमित्र, मित्र-मित्र आऽ अरिमित्र-मित्र रहैत छथि आऽ पाछाँ पार्ष्णिग्राह९फीठक शत्रु), आक्रंद (पीठक मित्र), पार्ष्णिग्राहासार (फार्ष्णिग्राहक मित्र) आऽ अक्रंदसार (आक्रंदक मित्र) रहैत छथि। विजिगीषुक षाड्गुण्य सिद्धांत अछि, संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय आऽ द्वैधीभाव। कऊटिल्यक अर्थशास्त्रक प्रथम अधिकरणक पन्द्रहम अध्यायमे दूत आऽ गुप्तचर व्यवस्थाक वर्णन अछि। भारतीय शिलालेखसँ पता चलैत अछि जे चन्द्रगुप्त मौर्य ३२१ ई.पू. मे आऽ अशोकवर्द्धन २९६ ई.पू. मे राजा बललाह। तदनुसार अर्थशास्त्रक रचना ३२१ ई.पू आऽ २९६ ई.पू. केर बीच भेल सिद्ध होइत अछि। १४.मैथिली भाषापाक मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। १५. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आऽ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आऽ उपध्मानीय केर उच्चारण ऒष्ठसँ होइत अछि। व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आऽ तालुसँ होइत अछि। ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आऽ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जेकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जेकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श(वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कए छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आऽ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आऽ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आऽ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आऽ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आऽ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नहि होयबाक चाही। (अनुवर्तते) मैथिलीक मानक लेखन-शैली जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं। पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। ग्राह्य अग्राह्य होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक आ’/आऽ आ क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला बला वला आङ्ल आंग्ल प्रायः प्रायह दुःख दुख चलि गेल चल गेल/चैल गेल देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि चलैत/दैत चलति/दैति एखनो अखनो बढ़न्हि बढन्हि ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ जे जे’/जेऽ ना-नुकुर ना-नुकर केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि तखन तँ तखनतँ जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए की फूड़ल जे कि फूड़ल जे जे जे’/जेऽ कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद इहो/ओहो हँसए/हँसय हँस’ नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस सासु-ससुर सास-ससुर छह/सात छ/छः/सात की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) जबाब जवाब करएताह/करयताह करेताह दलान दिशि दलान दिश गेलाह गएलाह/गयलाह किछु आर किछु और जाइत छल जाति छल/जैत छल पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल जबान(युवा)/जवान(फौजी) लय/लए क’/कऽ ल’/लऽ कय/कए एखन/अखने अखन/एखने अहींकेँ अहीँकेँ गहींर गहीँर धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए जेकाँ जेँकाँ/जकाँ तहिना तेहिना एकर अकर बहिनउ बहनोइ बहिन बहिनि बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ नहि/नै करबा’/करबाय/करबाए त’/त ऽ तय/तए भाय भै भाँय यावत जावत माय मै देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि द’/द ऽ/दए किछु आर शब्द मानक मैथिली_३ तका’ कए तकाय तकाए पैरे (on foot) पएरे ताहुमे ताहूमे पुत्रीक बजा कय/ कए बननाय कोला दिनुका दिनका ततहिसँ गरबओलन्हि गरबेलन्हि बालु बालू चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) जे जे’ से/ के से’/के’ एखुनका अखनुका भुमिहार भूमिहार सुगर सूगर झठहाक झटहाक छूबि करइयो/ओ करैयो पुबारि पुबाइ झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि पएरे-पएरे पैरे-पैरे खेलएबाक खेलेबाक खेलाएबाक लगा’ होए- हो बुझल बूझल बूझल (संबोधन अर्थमे) यैह यएह तातिल अयनाय- अयनाइ निन्न- निन्द बिनु बिन जाए जाइ जाइ(in different sense)-last word of sentence छत पर आबि जाइ ने खेलाए (play) –खेलाइ शिकाइत- शिकायत ढप- ढ़प पढ़- पढ कनिए/ कनिये कनिञे राकस- राकश होए/ होय होइ अउरदा- औरदा बुझेलन्हि (different meaning- got understand) बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) चलि- चल खधाइ- खधाय मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह कैक- कएक- कइएक लग ल’ग जरेनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ होइत गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि चिखैत- (to test)चिखइत करइयो(willing to do) करैयो जेकरा- जकरा तकरा- तेकरा बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ हारिक (उच्चारण हाइरक) ओजन वजन आधे भाग/ आध-भागे पिचा’/ पिचाय/पिचाए नञ/ ने बच्चा नञ (ने) पिचा जाय तखन ने (नञ) कहैत अछि। कतेक गोटे/ कताक गोटे कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई लग ल’ग खेलाइ (for playing) छथिन्ह छथिन होइत होइ क्यो कियो केश (hair) केस (court-case) बननाइ/ बननाय/ बननाए जरेनाइ कुरसी कुर्सी चरचा चर्चा कर्म करम डुबाबय/ डुमाबय एखुनका/ अखुनका लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ कएलक केलक गरमी गर्मी बरदी वर्दी सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ एनाइ-गेनाइ तेनाने घेरलन्हि नञ डरो ड’रो कतहु- कहीं उमरिगर- उमरगर भरिगर धोल/धोअल धोएल गप/गप्प के के’ दरबज्जा/ दरबजा ठाम धरि तक घूरि लौटि थोरबेक बड्ड तोँ/ तूँ तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) तोँही/तोँहि करबाइए करबाइये एकेटा करितथि करतथि पहुँचि पहुँच राखलन्हि रखलन्हि लगलन्हि लागलन्हि सुनि (उच्चारण सुइन) अछि (उच्चारण अइछ) एलथि गेलथि बितओने बितेने करबओलन्हि/ करेलखिन्ह करएलन्हि आकि कि पहुँचि पहुँच जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) से से’ हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) फेल फैल फइल(spacious) फैल होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय फेका फेंका देखाए देखा’ देखाय देखा’ सत्तरि सत्तर साहेब साहब १६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT--- the pre-Kushana period, c. 120 B.C.-A.D. 80, the period of Kushana domination in Bihar, A.D. 50-140, the post-Kushana period, A.D. 140-319. In second-century B.c. Vaisali forts were constructed e.g. Lauriya-Nandangarh ,fort of Katragarh , Muzaffarpur in Sunga period. Garb area of Basarh , baked brick defence wall was built at the Garb. In the Sunga period the Abhishcka-Pushkarni at modern Kharauna, was surrounded by a wall. Terracotta unassociated with the Northern Black Polished Ware of the Sungas only Gupta period exceeds the number of seals, sealings and tokens. Migration of Lichehhavi Supushpa of Pushpapura Pataliputra to Nepal-(Nepal Inscription. Pataliputra King's Surrender to Kanishka of the Buddha's Alms Bowl -Chinese Tradition. Chinese tradition –he demanded a large indemnity 9,00,000 pieces of gold, but agreed to accept Ashvaghosha, the Buddhist poet and dramatist , Buddha's alms bowl ,compassionate cock-aken away by Kanishka to Purushapura corroborated from a Sanskrit work of Kumaralata -Kalpanbmanditika. sovereign ruler of Pataliputra and Vaisali was one and the same, the masters of the Pataliputra-Vaisali region on the eve of the Kushana conquest were the Lichchhavis. The masters of Vaisali and Videha now controlled the other side of the Ganges as well. No tradition favours Kusharia control over Vidcha, nor any coins have been found and continued to be ruled by Lichchhavis.Hiuen Tsiang came to North Bihar in A. D. 637 and visited Vaisali, Svetapura and -the Vriji Country-Madhubani-Janakpur Area. His mention of Vriji as a sub-province of North Bihar- Tirabhukti-migration of the Vrijis to the Madhubani-Janakpur area duringg the period of the Kushana occupation of Vaisali (A.D. 80-140). The script current in the region of Videha, which was one of the madhrama janapadas of Jambudvipa in the opinion of the Lalitavistara was Brahma, one and the very first of the sixtyfour scripts listed in that book .Mithila, the ancient capital of Videha ceased to be the capital when Mahapadma Nanda occupied it. The legend Lichhvi found in the coins of Kumaradevi-Chandragupta throws interesting light on the nature of the government of Vaisali-Videha. Kumaiadevi was the Lichvi princess of Vaisali married to Chandragupta I. The fact that on the reverse of the coins of Chandragupta I the Lichchhavis appears in the plural. Tira and Trrabhukti stand for the province of Tirabhukti- found on the Basarh seals of the Gupta period. Tirabhukti in its career had three capitals one after the other, Vai sali (A.D. 319-550), Svetapura (AD. 550-1097) and Simaramapattana (A.D. 1097-1324). The first two are in the Vaishali District while the last is in the Nepalese Terai. (opp. Ghorasahan Railway Station in East Champaran District of Bihar). The bigger province of Tirabhuktia comes at A.D. 319. (c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 44 Videha ’विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ०१ जून २००८ (वर्ष १ मास ६ अंक ११) http://www.videha.co.in/मानुषीमिह संस्कृताम्
Tah HMO eA A ala ॥ Hi ne Tau ॥ | at ( hal Hit NA eh ॥ | Hi | MN - ince _— Ww = 4 i| | | ie 2 aa - mS ee Vane q i i Vs Se S25 4 ही Wo st ee sy OT Agee है “कि aes - aie i कि | a a7) gi aX Ces) i Tt i ) Pow * i lf . Z बा हि 2 ‘ Al} mY: ( ©.) ie Dy) | OS ol sees Laas /\e है ‘i | & ( fi zy Fae “ : i ELL ELLE aa AST, हि रण 4 lk me | aii ye हा = ap re eee | A ) Set) | 0 ni का की A / a5 @ j \ te hee zag Ne ea oe 3) W i ip) NE 2 ses me OAS ey N i ‘| per be: ee eee ) oye pe Wh. गढ़ I 4 | iA 0 ey ew iy ee
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