'विदेह' १५ जून २००८ ( वर्ष १ मास ६ अंक १२ ) एहि अंकमे अछि:- महत्त्वपूर्ण सूचना: २० म शताब्दीक सर्वश्रेष्ठ मिथिला रत्न श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' जिनका लोक 'अभिनव भातखण्डे' केर नामसँ सेहो सोर करैत छन्हि, 'विदेह' केर हेतु अपन संदेश पठओने छथि आऽ ताहि आधार पर हुनकर जीवन आऽ कृतिक विषयमे विस्तृत निबंध विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे ई-प्रकाशित करबाक हमरा लोकनिकें सौभाग्य भेटल अछि। १.नो एंट्री: मा प्रविशश्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ' रहल अछि। सर्वप्रथम विदेहमे एकरा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि। पढ़ू नाटकक तेसर कल्लोलक पहिल खेप। २. शोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ) ३. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ) ४. महाकाव्य महाभारत (आगाँ) ५. कथा - गंगेश गुंजन- गोबरक मूल्य गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति ६. पद्य मैथिली हैकू पद्य- रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे पहिल बेर जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। पद्य: अ. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी, आ.ज्योति झा चौधरी आऽ इ. गजेन्द्र ठाकुर ७. संस्कृत मैथिली शिक्षा(आगाँ) ८. मिथिला कला(आगाँ) ९.पाबनि-संस्कार- तीर्थ - डिस्कवरी ऑफ मिथिला १०. संगीत शिक्षा -श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' ११. बालानां कृते- मूर्खाधिराज/देवीजी: पिंजराक पक्षी १२. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी ) १३. संस्कृत मिथिला १४.मैथिली भाषापाक १५. रचना लेखन (आगाँ) 16. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS -Videha Mithila Tirbhukti Tirhut... महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ' रहल अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर मैथिली-अंग्रेजी आऽ अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश (संपादक गजेन्द्र ठाकुर आऽ नागेन्द्र कुमार झा) प्रकाशित करबाओल जा' रहल अछि। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): श्री आद्याचरण झा, श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मौन' , श्री प्रेमसकर सिह, श्रीमति विभा रानी, श्री मैथिली पुत्र प्रदीप,श्री कैलाश कुमार मिश्र (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र), श्री श्याम प्रकाश झा आऽ डॉ. श्री शिव प्रसाद यादव जीक सम्मति आयल अछि आऽ हिनकर सभक रचना अगिला १-२ अंकक बादसँ 'विदेह' मे ई-प्रकाशित होमय लागत। विदेह (दिनांक १५ जून, २००८) १.संपादकीय २.संदेश १.संपादकीय वर्ष: १ मास: ६ अंक:१२ मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक १२ दिनांक १५ जून २००८) ई पब्लिश भ’ रहल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | नचिकेताजीक नाटक नो एंट्री: मा प्रविश तेसर कल्लोलक पहिल खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। गगेश गुंजन जीक कथा आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे पहिल बेर जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर ३८९, पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०.फैक्स:०११-४१७७१७२५ ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व। ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे। १९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आऽ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) तेसर कल्लोल जारी....विदेहक एहि बारहम अंक १५ जून २००८ सँ। नो एंट्री : मा प्रविश तेसर कल्लोल पहिल खेप तेसर कल्लोल [भाषण - मंचपर नेता आ वामपंथी युवा पूर्ववत ठाढ़ छथि—हुनके दुनू पर प्रकाश पड़ैत छनि। बाकी मंच पर लगइत अछि एखनहु भोरूका कुहेस अछि—सब क्यो अर्ध- जाग्रत अर्ध-मृत जकाँ पड़ल छथि। मात्र चारि टा मृत सैनिक बन्दूक तानने भाषण - मंचक आस - पास पहरा दैत नजरि आबि रहल छलाह। तीनटा स्पॉट लाईट—दूटा भाषण-मंच पर आ एकटा बुलंद दरबज्जा पर पड़ल।] वामपंथी : (क्षुरधार स्वरमे) एकटा बात साफ-साफ बाजू त’... नेता : कोन बात ? वामपंथी : इयैह, ई चोरबा जे किछु बाजि रहल छल... नेता : से ? वामपंथी : अहाँ तकर सभटा विश्वास करै छी ? (नेता हँसि दैत छथि। से देखि वामपंथी युवा खिसिया जाइत छथि।) हँसि कियै रहल छी ? नेता : कियै ? हँसी पर पानंदी छैक की ? वामपंथी : हँसी पर कियैक रहत पानंदी ? मुदा आर कतेको बात पर पानंदी त’ छैक.. अहाँक पार्टी तकरा मानत तखन ने ? नेता : हमर पार्टी जकरा मानलक अछि, हमरा ताहि पर कोन आपत्ति ? वामपंथी : (बातकेँ काटैत) झूठ ! सबटा फूसि ! नेता : से कोना ? वामपंथी : (तर्क दैत) कियैक ? ई नञि निश्चित भेल जे हमसब बान्हल रहब एकटा बंधन मे ? नेता : हँ, गठ-बंधन त’ भेल छल, जेना मिलल-जुलल सरकार मे होइ छइ...? वामपंथी : (व्यंग्य करैत) आ तकर कैकटा असूल सेहो होइत छैक.... नेता : जेना ? वामपंथी : जेना सबटा महत्वपूर्ण बात पर आपसमे बातचीत क’ कए तखन दुनियाक सामने मुँह खोलब... की ? एहन निश्चय भेल छल वा नञि ? नेता : हँ...! वामपंथी : आ ताहि बातपर हमसब सरकार केँ बाहर सँ समर्थन द’ रहल छी... छै कि नञि ? नेता : बेशक ! ठीके बात बाजि देलहुँ। वामपंथी : मुदा अहाँ की क’ रहल छी ? नेता : की ? वामपंथी : (आर धीरज नञि ध’ पबैत छथि--) तखन बात - बात पर हमरा सब सँ हँटि कए बिल्कुल आने बात कियै करै लागै छी ? सदिखन विरोध कियै करै चाहै छी ? नेता : “वाह रे भैया ! वाह कन्हैया— जैह कहै छी जतबे टा हो— सब मे कहि दी ता-ता-थैया ?” की बुझै छी , अहाँ सबक नाङरि धैने चलत हमर पार्टी ? वामपंथी : प्रयोजन पड़त त’ सैह करै पड़त ! नेता : हँ ! से हिंछा त्यागिये दी त’ नीक ! की त’ हम सरकार केँ नैतिक समर्थन दै छी ? तकर माने की, इयैह जे अहाँ अंट - संट जैह किछु बाजब , हँ-मे-हँ कह’ पड़त ? (वामपंथी किछु कह’ चाहैत छथि) बात त’ ओ कलाकार लाख टाकाक कहि रहल छल। चोरी करैत छल तैं की ? तर्क त’ ओ ठीके देने छल...झूठ त’ नञि बाजि रहल छल ओ ! वामपंथी : तखन आर की ? चोर उचक्के केँ अपन पार्टी मे राखि लियह। नेता : कियै ? राजनीति मे एत्तेक बड़का-बड़का चोरी क’ कए कतेको गोटे त’ प्रख्यात भैये गेल छथि। आब हुनका सभक पास हैरैबाक योग्य कतेको वस्तु हेतनि ! मुदा तकरा लेल अहाँ आ अहाँक पार्टी कियै डरै छी ? वामपंथी : हम सब कियै डरब ? हम सब की सरकार चलबै छी जे डर हैत ? नेता : (हँसैत) ठीके कहलहुँ ! सब सँ नीक त’ छी अहीं सब-ने कोनो काज करबाक दायित्व ने कोनो हेरैबाक दुश्चिन्ता, मात्र बीच-बीच मे हिनका सवाल पूछू त’ हुनका खेदाड़ि केँ भगाउ ! नहि त’ हमरा सभक पार्टिये केँ खबरदार करै लागै छी...... डरा धमका क’ चाहै छी बाजी मारि ली--- वामपंथी : ई त’ अहाँक सोच भेल। हम सब त’ मात्र सदर्थक आलोचना करैत छी—“कॉन्सट्रक्टिव क्रिटिसिज्म” ! नेता : आ हम सब अहाँ लोकनिक पाछाँ घुरिते फकरा कहै छी— “वाह रे वामा बम-बम भोले ! दाहिना नञि जो बामा बोलै ! दच्छिन घुरने प्राण रहत नञि ! अंकक जोरो साथ रहत नञि ! कतय चकेवा, सामा डोलै, “वाह रे वामा बम-बम बोलै !” वामपंथी : (एसगरे व्यंग्य करैत थपड़ी पाड़ैत छथि) वाह ! कविता त’ नीके क’ लै छी। नेता : हम सब छी राजनीतिक उपज, हमरा सब बुते सबटा संभव अछि..... वामपंथी : छी त’ नेता, मुदा भ’ सकैछी.... नेता : (बात केँ जेना लोकि लैत छथि) अभिनेता सेहो ! [कहिते देरी बाहर हल्ला मचै लागैत अछि—जेना उच्च-स्वरमे फिल्मक गीत बाजि रहल हो ; तकरहि संगे तालीक गड़गड़ाहटि, सीटीक आवाज सेहो । हो-हल्ला होइत देरी मंचो पर सुस्तायल लोग सबटा मे जेना खलबली मचि गेल हो। सब क्यो हड़बड़ा कए उठैत एक–दोसरा सँ पूछि रहल छथि—‘की भेल, त’ की भेल ?’ तावत एकटा नमहर माला पहिरने एकटा फिल्मी हीरो प्रवेश करैत छथि। पाछाँ-पाछाँ पाँच-दसटा धीया-पुता सब ‘ऑटोग्राफ’क लेल धावित होइत छथि। दू-चारि गोटेक खाता पर गर्वक संग अपन हस्ताक्षर करैत—“बस, आब नञि, बाँकी बादमे....” कहैत अभिनेता मंचक दिसि अगुआ आबैत छथि। आँखिक करिया चश्मा खोलि हाथ मे लैत छथि। मंच परक लोक सब तालीक गड़गड़ाहटि सँ हुनकर स्वागत करैत छथि—तावत् धीया-पुता सभ धुरि जाइछ।] अभिनेता : (भाषण-मंच पर चढ़ैत) नमस्कार बदरी बाबू, जय सियाराम ! नेता : नमस्कार ! मुदा अहाँ केँ की भेल छल जे एत’ आब’ पड़ल ? अभिनेता : वैह... जे होइते छैक... अपन ‘स्टंट’ अपनहि क’ रहल छलहुँ मोटर साइकिल पर सवार भ’ कए ....आ कि ऐक्सिडेंट भ’ गेल... आ सोझे एत’ चल अयलहुँ... नेता : अहो भाग्य हमरा सभक। अभिनेता : (हाथ सँ हुनक बात केँ नकारबाक मुद्रा दैखबैत) जाय दिअ ओहि बात केँ, (वामपंथी युवा केँ देखा कए) मुदा.. हिनका नहि चिन्हलियनि। नेता : ओ-हो ! ई छथि नवीन निश्छल ! कॉमरेड हमर सभक समर्थक थिकाह। अभिनेता : (सलाम ठोकैत) लाल सलाम, कॉमरेड ! वामपंथी : (हाथ जोड़ि कए नमस्कार करैत छथि—ततबा प्रसन्न नहि बुझाइत छथि।) नमस्कार ! नेता : (अभिनेताक परिचय कराबैत) हिनका त’ चिन्हते हैबनि....! [वामपंथी युवा केँ माथ हिलाबै सँ पहिनहि बाँकी जनता चीत्कार करैत कहैत अछि—“विवेक कुमार !”आ पुनः ताली बजा कए हिनक अभिनन्दन करैत अछि। आभिनेता अपनहु कखनहु झुकि कए, कखनहु आधुनिक भंगिमामे हाथ हिला कए त’ ककरहु दिसि “आदाब” करबाक अभिनय करैत छथि—हुनक हाव-भाव सँ स्पष्ट अछि जे अपन लोकप्रियताक खूब उपभोग क’ रहल छथि।] वामपंथी : हिनका के नहि जानत ? टी.वी. केर छोट पर्दा सँ ल’ कए फिल्मक पर्दा धरि ई त’ सदिखन लखा दैत छथि--- अभिनेता : (एकाधिक अर्थमे) छी त’ हम सबटा पर्दा पर, मुदा पर्दाफाश करबा आ करैबा लेल नञि... मात्र अभिनय करबा लेल ! वामपंथी : ‘पर्दाफाश’ कियै नञि.. अभिनेता : (वाक्य केँ पूरा नहि करै दैत छथि) हम तँ मात्र सैह बाजै छी जे बात आने क्यो गढ़ैत अछि.... नेता : ठीक ! पर्दाफाश त’ ओ करत जकरा सदिखन किछु नव कहबाक आ नव खबरि बेचबाक ‘टेनशन’ रहल हो ! (‘हेडलाइन’ दैखैबाक लेल दुनू हाथ केँ पसारि कए-) ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नवका खबरि, टटका खबरि, हेडलाइन ! अभिनेता : औ बाबू—हम ने नव बात कहै छी आ ने कहि सकै छी... हमर डोरि त’ कथाकार आ निर्देशकक हाथ मे रहैत अछि... ओ कहैत छथि ‘राम कहू’ त’ ‘राम’ कहै छी, कहै छथि ‘नमाज़’ पढ़ू त’ सैह करै छी। अनुचर 1 : कहल जाइ छनि, बाम दिसि घुरू आ खूब नारा लगाउ.... अनुचर 2 : त’ शोर कर’ लागैत छथि “मानछी ना” “मानबो ना” ! अनुचर 1 : मानब नञि, जानब नञि... तोरा आर केँ गुदानब नञि... अनुचर 2 : हम जे चाही मानै पड़त, नञि त’ राज गमाबै पड़त ! (नेता आ दुनू अनुचर हँसि दैत छथि। अभिनेता सेहो कौतुकक बोध करै छथि) वामपंथी : (व्यंग्य करैत) माने ई बुझी जे अहाँ जे किछु करै छी, सबटा घीसल-पीटल पुरनके कथा पर....? अभिनेता : घीसल हो वा पीटल, तकर दायित्व हमर थिक थोड़बे ? वामपंथी : त’ ककर थिक ? अभिनेता : तकर सभक दायित्व छनि आन-आन लोकक... हमर काज मे बाँकी सबटा त’ पुराने होइ छइ...कहियहु- कखनहु ‘डायलॉग’ आ गीतक बोल सेहो ...मुदा किछु रहिते छइ नव, नञि त’ तकरा पब्लिक कियै लेत ? (एतबा सुनतहि चोर उठि कए ठाढ़ होइत अछि) चोर : अरे, इहो त’ हमरहि बात दोहरा रहल छथि...जे... अनुचर 1 : नव नञि, किछु नञि, किछु नव नञि... अनुचर 2 : बात पुराने, नव परिचय... अनुचर 1 : सौ मे आधा जानले बात... अनुचर 2 : बाँकी सेहो छइहे साथ ! चोर : (दुनूक कविता गढ़बाक प्रयास केँ अस्वीकार करैत आ अपन तर्क केँ आगाँ बढ़बैत) नञि, नञि हम ‘मज़ाक’ नहि करै चाहै छी...इयैह त’ हमहूँ कहै चाहै छलहुँ जे संसार मे सबतरि पुराने बात पसरल अछि...नव किछु होइ छइ... मुदा कहियहु - कखनहु... बाजारी : (गला खखारि कए...एतबा काल, जागि जैबाक बादो मात्र श्रोताक भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छलाह) हँ-हँ, आब मानि लेलियह तोहर बात नव- पुरान दय... मुदा कहै छह ‘संसार’ सँ बाहर निकलू तखन नव-पुरानक सबटा हिसाब बदलि जाइ छइ ? चोर : हमरा सन चोर की जानत आन ठामक खबरि ? अनुचर 1 : ठीक ! अनुचर 2 : चोर की जानत स्वर्गक महिमा ? चोर : जतय हम सब एखन छी, भ’ सकैछ एतहुका नियम किछु आर हो... अभिनेता : ठीक कहलह हौ ! भ’ सकैछ, एतय ने किछु नव होइ छइ, आ ने कछु पुरान ! नेता : ने क्यो दच्छिन रहि सकैछ आ ने बाम ! चोर : आ ने नेता आ अभिनेताक बीच मे कोनो फर्क रहि जाइछ... अभिनेता : (हँसैत) ओहुना, हमरा सभक पृथ्वी पर नेता थोड़े कोनो नव बात कहै छथि... खाली हमरे सब पर दोष कियै दै जाइ छइ लोक ? वामपंथी : आ बिनु अभिनेता भेने कि क्यो नेता बनि सकैत अछि ? चोर : किन्नहु नञि ! नेता : ओना देखल जाय त’ दुनियाँ मे एखन ‘कॉम्पीटीशन’ बड़ बेसी छैक...सबटा अभिनेता चाहै छइ जे हमहूँ नेता बनि जाइ... हमहूँ कियै नञि देश चला सकै छी ? चोर : खाली हमरे सभक जाति-बिरादरी छइ जे कखनहु सपनो नञि दोखि सकै छइ नेता बनबाक....चोर- उचक्का-भिखारी- रद्दीवला छी...छलहुँ आ सैह रहि जायब... वामपंथी : मुदा अहूँ सब केँ मोसकिल होमै वला अछि.... चोर : कियै ? वामपंथी : कियै त’ चोर नहियो नेता बनि सकय, नेता-लोकनि त’ चोरी करै मे ककरहु सँ पाछाँ नञि होइ छथि। जेम्हरे देखू... सब ठाम ‘स्कैंडल’ एक सँ बढ़ि कए एक... नेता : (खौंझैत) मोन राखब...अहूँक पार्टीमे गुंडा-बदमाश भरल अछि....सब छटल चोर-उचक्का...(एहि बात पर चोर-उचक्का-भिख-मंगनी आदि सब हँसि दैत छथि।) अभिनेता : (वामपंथी, नेता केँ किछ कटु शब्द बाजै लगताह से बूझि , तकरा रोकैत) औ बाबू ! हम त’ एत’ नव छी , मुदा हमरा त’ लागैये .... एत’ ने किछु ‘हम्मर’ थीक आ ने कछु अनकर तैं ने चोरीक प्रश्न उठै छइ आ ने सीना जोरीक ! चोर : ठीक...ठीक ! बिल्कुल ठीक कहलहुँ। (अभिनेताक बात शुरू होइत देरी मंच पर एक गोट उच्च- वंशीय महिला प्रवेश करैत छथि आ अभिनेताक बाद चोर केँ उठि कए ठाढ़ भए बात करैत देखि सोझे चोरेक लग चलि आबै छथि अपन प्रश्न पूछै।) महिला : (चोर सँ) एकटा बात कहू... एत’ स्वर्गक द्वार त’ इयैह थिक कि नहि ? (बंद दरबज्जा केँ देखा कए) चोर : आँय ! महिला : स्वर्गक दरबज्जा.... ? रमणी मोहन : (उत्सुकता देखबैत, उठि कए लग अबैत) हँ-हँ ! इयैह त’ भेल स्वर्गक प्रवेश द्वार ! महिला : (रमणी-मोहन दिस सप्रश्न) त’ एत’ की कोनो क्यू- ‘सिस्टम’ छइ ? बाजारी : (उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि, जेना पुन: कतार बनाबै लेल जुटि जैताह) हँ से त’ छइहे.... (क्रमश:) २.शोध लेख मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे पुरोहित पुरोहित हिन्दीमे अछि आऽ शृखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तिममे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव”॥ एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि, आऽ एहि अन्तिम दू श्लोकसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि। कारण यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि। तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि। विनियोगमे पूर्व आऽ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आऽ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आऽ उपनिषद आऽ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आऽ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आऽ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि, जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भरत आऽ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ओऽ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह। पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आऽ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्यनगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशाला, साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आऽ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आऽ बादमे जाऽ कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि। दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आऽ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि। तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य, आऽ बिना लग्नक कृषि आऽ वाणिज्य कार्यमे होय बला भाङठक वर्णन अछि। चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आऽ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आऽ एतय मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्ध कथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र। पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि, मुदा क्षत्रिय पुत्र आऽ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जाऽ रहल छलीह आऽ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि। छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि। सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आऽ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि। आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आऽ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि, आऽ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आऽ सृंजय मिश्रित जनक आर्यव्त्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि। नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आऽ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि। दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आऽ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आऽ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि। एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि। बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि। तेरहम सर्गमेक्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आऽ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि। समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आऽ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि। क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आऽ दूर्वादल लए आऽ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आऽ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि, जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आऽ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होए लागल। पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आऽ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेष आख्याण आऽ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आऽ मगध् द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि। (अनुवर्तते) ३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि-गजेन्द्र ठाकुर नन्दक दुनू बेटा वर्गमे प्रथम अबैत छलन्हि। किछु दिन धरि सभटा ठीक-ठाक चलैत रहल। पुरनका सभटा चिन्ता-फिकिर लगैत छल जेना खतम भए गेल होए। गामक एक दू गोटे सेहो पटनामे रहैत छलाह। महिनामे एकटा रवि निश्चित छल, जाहि दिन सभ गोटे कतहु घुमए लेल जाइत छलाह। एक रवि कोनो गौँआक अहिठाम तँ कोनो आन बेर चिड़ियाखानाक यात्रा। एक बेर चिड़ियाखाना गेल रहथि सभ गोटे तँ आरुणि नन्दकेँ पुछलखिन्ह- “हमरा सभ आयल छी चिड़ियाखाना, बाहरमे बोर्ड लागल अछि बोटेनिकल गार्डेनक आऽ गेटक ऊपरमे लिखल अछि बायोलोजिकल गार्डेन”। “पहिने सोनपुरमेला सभमे अस्थायी चिड़ै सभक प्रदर्शन होइत छल आऽ लोकक जीह पर ओकरा लेल चिड़ियाखाना शब्द आबि गेल। मुदा एतए तँ कताक बीघामे वृक्ष सभ लागल अछि, प्रत्येक वृक्ष पर ओकर नाम आऽ वनस्पतिशास्त्रीय विवरण सेहो लिखल अछि, आऽ ताहि द्वारे एकर नाम अंग्रेजीमे वनस्पति उद्यानक लेल बोटेनिकल गार्डन पड़ि गेल। मुदा बादमे अनुभव कएल गेल जे जन्तु आऽ वनस्पतिक रूपमे दू तरहक जीवविज्ञान अछि। एहि उद्यानमे वनस्पति, चिड़ै आऽ बाघ-सिंह इत्यादि सेहो प्रदर्शित अछि। ताहि द्वारे एकर नाम बायोलोजिकल गार्डन वा जैविक उद्यान दए देल गेल। पुरनका बोर्ड जतए-ततए रहिये गेल”। एक बेर सभ गोटे गेल रहथि एकटा गौँआक अहिठाम। ओतए चर्चा चलए लागल जे गंगा पुल केर उद्घाटन दू तीन सालसँ एहि साल होयत, अगिला साल होयत एहि तरहक चरचा अछि। नन्दसँ ओऽ लोकनि पुछलखिन्ह, “अहाँक बुझने कहिया धरि एहि पुलक उद्घाटन भए जएतैक। मुख्यमन्त्री तँ कहने छथि जे एहि साल एकर उद्घाटन भए जएतैक”। “कहियो नहि होएतैक। दू-तीन सालसँ तँ सुनि रहल छियैक। यावत एकटा पाया बनैत छैक, तँ ओहिमे ततेक न बालु देने रहैत छैक जे किछु दिनमे दरारि पड़ि जाइत छैक। फेर राता-राती ओकरा तोड़ि कए फेरसँ नव पाया बनेनाइ शुरू करैत जाइत अछि”। गंगा पुलक चरचा सुनि नन्दक सोझाँ पाया परसँ गंगाजीमे खसैत जोन-मजदूर सभक चित्र नाचि जाइत छलन्हि। नन्दक विवाद ओहि समय ठिकेदार आऽ संगी अभियन्ता सभसँ काजक संबंधमे होइत रहैत छलन्हि। एकटा पायाक कार्यक संबंधमे नन्द अपन विरोध प्रकट कएने छलाह, किछु दिनुका बाद ओऽ पाया फाटि गेल, एकटा पैघ दरारि पड़ि गेल छल बीचो-बीच। राता-राती ठिकेदार-अभियन्ता लोकनि ओकरा तोड़बेलन्हि। रातिमे कतहुसँ ओतेक विशाल पाया टूटि सकैत छल? से अगिला दिन दरारिक स्थान पर तिरपाल बिछाओल गेल, जे ककरो नजरि नहि पड़ि जाइ। (अनुवर्तते) (अनुवर्तते) ४.महाकाव्य महाभारत –गजेन्द्र ठाकुर(आगाँ) ------ सैरन्ध्रीक प्रति भए श्रद्धा दुनू पसरल, दुर्योधन छल बुझल अज्ञातवासक कथा, छल ताकिमे तकबाक पाण्डवक पता, छी ई द्रौपदी सैरन्ध्रीक भेषमे अभरल। पाण्डव छद्म-भेष बनओने छथि गांधर्वक, कीचकसँ अपमानित राजा त्रिगर्त देशक, मिलि दुर्योधनसँ कए गौ-हरणक विचार विराट राजसँ ओऽ लेत बदला आब। दुर्योधन लए संग भीष्म,द्रोण,कृप, कर्ण, आक्रमण विराट पर लए अश्वत्थामा संग। त्रिगर्त राज सुशर्मा घेरि गौ-विराटराजक, बान्हि विराटकेँ जखन ओऽसोझाँ आयल। ललकारि कएल भीमकेँ सोर युधिष्ठिर-कंक, वल्लभ-भीम ग्रंथिक-नकुल तंत्रिपाल-सहदेव। खोलि बन्धन विराटक बान्हि देल सुशर्मन्, वृहन्नला बनि सारथी पुत्र विराटराज उत्तमक। रथ आनल रणक्षेत्र उत्तमकुमार भेल घबरायल, गेल अर्जुन शमी गाछ लग उतारि शस्त्र आयल, गाण्डीव अक्षय तुणीर आनि परिचय सुनाओल। उत्तमकुमार बनल सारथी वृहन्नला-अर्जुनक संग, वेगशाली रथ देखि दुर्योधन पुछल हे भीष्म। अज्ञातवासक काल भेल पूर्ण वा न वा कहू, भीष्म कहल पूर्ण तेरह वर्षक अवधि भेल औ। अर्जुन उतारल अपन रोष कर्ण पुत्र विकर्ण पर, मारि ओकरा बढ़ल आगाँ कर्णकेँ बेधल सेहो। द्रोण भीष्मक धनुष काटल मूर्च्छित कएल सेना सकल, द्रोण-कृप-कर्ण-अश्वत्थामा-दुर्योधनक मुकुट वस्त्र सभ, उत्तमकुमार उतारल सभटा गौ लए नगर तखन घुरल। मूर्च्छा टूटल सभक जखन कहल करब युद्ध पुनः, भीष्म नहि मनलाह दुर्योधन घुरु बहु भेल आब अः। उत्तमकुमार नहि करब प्रगट भेद हमर अर्जुन कहल, विराट भेल प्रसन्न वीरता सुनि उत्तमक आबि घर। पञ्च पाण्डव द्रौपदीक तखन परिचय हुनका भेटल, प्रस्ताव कएल पुत्री उत्तराक विवाह अर्जुनसँ करब। अर्जुन कहल पढ़ेने छी हमर शिष्या अछि ओऽ रहल, पुत्र अभिमन्युसँ होयत विवाहित उत्तरा ई प्रस्ताव छल। कृष्ण-बलराम द्वारकासँ बरियाती अभिमन्युक लए अएलाह, उत्तराक विवाह अभिमन्युक संग भेल बड़ टोप-टहंकारसँ। ५.उद्योग पर्व छलाह आएल राजा वृन्द अभिमन्युक विवाह पर, भेल राजाक सभा जतए कृष्ण कएल विनती ओतए। द्यूत खेल शकुनीक अपमान द्रौपदीक कएल जे, दुर्योधन छीनल राज्य युधिष्ठिरक अधर्मसँ से। बाजू प्रयत्न राज्य-प्राप्तिक कोना होयत वा, दुर्योधनक अत्याचार सहैत रहथु पाण्डव सतत। द्रुपद उठि कहल दुराचारी कौरवकेँ सभ जनञ छथि, कर्तव्य हमरा सभक थिक सहाय बनी पाण्डव जनक। (अनुवर्तते) ५कथा 1. गंगेश गुंजन -गोबरक मूल्य 2. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति 1. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। गोबरक मूल्य भागलपुर मे एकटा उनटा पुल कहबैत छैक। उनटा पुलसँ दक्षिण मुँह जे सड़क जाइत छैक, तकरा बौंसीे रोड कहल जाइत छैक। बौंसी रोड पर कएक टा बस्ती-मोहल्ला लगे-लग पड़ैत छैक। बहुत रास दोकान आ लोकक, ट्रक-बस, टमटम, रिक्शा सभक खूब घन आवाजाही। सुखायल मौसम मे भरि ठेहुन ध्ूरा आ भदवारि मे भरि ठेहुन पानि-कादो। शहरी नाला सभक कारी गंदगीसँ सड़क भरल-पूरल। कैक समय तं पयरे आयब-जायब कठिन । मुदा सड़क छैक पीच। मोजाहिदपुर मिरजान हाट चौक, हबीबपुर आ हुसैनाबाद तथा अलीगंज। कैक जाति आ पेशाक लोक । काठ गोदामसँ ल क तसरक उद्योगी ध्रि आ जानवरक गंध् तोड़ैत हड्डीक टालसँ ल क हरियर टटका तरकारी सभक हाट ध्रि । तहिना टिक टिक घोड़ासँ ल क बड़दोसँ बत्तर ठेलासँ छातीतोड़ श्रम करैत घामे-पसेने तर माल उघैत मजूर सेहो। बच्चा, सियान सभक भीड़ भेटत । कतहु दोकानमे लागल पफलकल कोबीक छत्ता जकाँ कतहु अलकतराक उनटल पीपा जकां। ई दृश्य थिक सड़कक दुनू कातक उनटा पुलसँ ता अलीगंज। अलीगंजसँ किछुए आगाँसँ सड़क खूब पकठोस छैक। चिक्कन कारी। तेहन जे कैक टा परिवार ओहिपर मकै-गहूम पर्यन्त पथार द क सुखबैत भेटत। ओही इलाकाक एकटा घटना थिक। आने बीच सड़क परक अलीगंज बस्ती जत खतम होइत छैक ताही ठाम सड़कक कातमे एकटा आर कल छैक जे हरदम अबन्ड छौँड़ा जकाँ छुरछुरबैत रहैत छैक। यद्यपि भागलपुर मे पीबाक पानिक कष्ट बड़ सामान्य बात अछि, मुदा एत पानिक उदारता देखिक से समस्या अखबारी पफूसि बनि जाइत छैक। खैर, ताहू दिन खूब तेजीसँ पानि छुरछुरा रहल छलैक। क्यो भरनिहार नहि रहैक। खूब रौद रहैक। चानि खापड़ि जकाँ तबैत। तेहन सन जे चानि पर यदि बेलिक रोटी ध् देल जाइक तँ पाकि जयतैक। एहना मौसम मे कलसँ सटले दस गोटे बीस गोटे अपन चानि तबबैत यदि घोलिमालि करैत ठाढ़ हो तँ ध्यान जायब स्वाभाविके। हमहूँ अपनाके ँ रौद, लू आ उमसमे उलबैत पकबैत ओहि द क ल जाइत रही। एकटा उपयुक्त कारण बुझायल सुस्तयबाक। भने किछु लोक घोँघाउज क रहल छलैक। लगमे कलसँ ओतेक प्रवाह सँ जल झहरि रहल छलैक से एकटा मनोवैज्ञानिक शीतलता पसारि रहल छलैक मने। जखन ओहि गोल लग पहुँचलहुँ तँ ईहो देखबा योग्य भेल जे ओहि घोँघाउजि मण्डलीसँ आगाँ एक टा मिनी बस ठाढ़ छैक। सन्देह नहि रहल जे कोनो दुर्घटना सँ पफराक किछु बात नहि छैक। एहन दुर्घटना मे सड़कपर ककरो मृत्यु सामान्य बात थिक। डेग अनेरे किछु झटकि गेल। लग पहुँचलहुँ आ ओहि घरेलू घोंघाउजिक कन्हापरसँ हुलकि क देखलहुँ तँ बीचमे दू पथिया गोबर हेरायल बीच सड़कपर। एक टा छौंँड़ा हुकुर-हुकुर करैत...। घोंघाउजि खूब जोरसँ चलि रहल छल। ओही लोकक गोलमे एक कात करीब १०-१२ बर्षक दूठा छौंड़ी आदंकेँ चुप्प ठाढ़ि आ कनैत... खरफकी पहिरने खूजल देह, छिट्टा सन केश...। ओहिमे सँ एक टा छौंड़ीक जमड़ी लागल अगंिह मे पफाटल पैंट, ताहिपर टटका गोबर लेभरल। दुनू छौँड़ीक गालपर हाथमे, सौँसे देहपर गोबर लागल आ दुर्घटनाग्रस्त छौँड़ाक छातीपर गोबर लागल । दू टा नान्हि टा हाथक छाप यद्यपि ओहि कड़ा रौदमे सुखा गेल रहैक, मुदा स्पष्ट रहैक। आदंकमे पड़लि दुनू छौँड़ी, अंदाज करैत छी, गोबरबिछनी छैक। बाट-घाट जाइत अबैत गाय-महींसक गोबर जमा अछि, भरि दिन तकर गोइठा थोपैत अछि, माय वा परिवारक क्यो लोक तकरा सुखबैत अछि आ बड़का पथियामे सजाक शहर जाक बेचैत अछि । जीविकाक एक साध्न यैह गोइठाक आमदनी। गोइठा जाहिसँ बनय से गोबर आबय कतसँ एहिना अनिश्चित। कहियो एको पथिया कहियो किछु नें। तेेँ एहि सड़कपर गोइठा बिछनी छौँड़ी सभक आपस मे होइत झोंटा-झोंटीक दृश्य बड़ आम घटना रहैत छैक। आ ओकरा माय-बाप केँ गारि-सराप देलक, ओ ओकरा माय बहिनके ँ घोड़ासँ वियाह करौलक... एकहि दिन पहिने दूटा छौँड़ी बीच सड़कपर तेना पटकम-पटकी करैत रहय आ एक दोसराक झोंटाके ँ तेना नोचि रहल छल जे दया आ क्रोध् दुनू आबय मनमे, मुदा समाधन की। गोबर जकर जीविका छैक ताहि परक आपफत तँ ठीके नै सहल हेतैक ओकरा ताहूमे एक दिन हम एकटा छौँड़ी के ँ पुछने रहिऐक-÷तोरा सिनी केहने एना झगड़ा करै छे ँ, जरी टा गोबर के वास्ते?' - ÷जरी टा छलै? एतना छलै, हम्मे जमा करी क रखलिऐ आरू ई रध्यिा मोटकी-ध्ुम्मी ने अपने छिट्टामे ध्री लेलक। आय हमरा केतना मारतै माय ? माय तँ इहे ने कहतै जे हम्मे गोबर नहि बीछय छलियै, कहीं दिन भर खेली रहल छलियै? की खयतै लोगें?' हमर प्रश्न हमरे खूब भारी चमेटा जकाँ बुझायल, हम चोट्टहि ससरि गेल रही। मुदा ओहि दिनुका दृश्य बड़ भार्मिक छलैक। आदंके ँ चुपचाप दहो-बहो कनैत दुनू छौँड़ी एक बेर चारू कातक लोकके ँ एक बेर शोणित बहैत बच्चाके ँ देखैत ठाढ़ि रहैक। - ÷की होलै भाइ जी?' हम एकटा सज्जनसँ पुछलियनि। - ÷अरे कलियुग छौं भाई जी। बताब जरी टा गोबर के वास्ते एकरा सिनी मे आपसे मे झगड़ा होलै आरू हौ छौ ँड़ी एकर छोट भाइके ँ ध्केली देलकै मिनी बसके आगूमे। देखै नै छहौ जे घड़ी मे दम टुटल छै छौँड़ाके आहा... - ÷जरी टा गोबर छलै उफ? माय किरिया खा के कही तँ लछमिनियाके ँ जे हमर एक चोत गोबड़ छलय कि नै ?' अचानक जेना खूब साहस करैत आदंकित एक टा छौंड़ी कनिते बाजलि- हमरा अकस्मात लोकसभपर खासक ओही भाइ साहेबपर क्रोध् उठल। - ÷विचित्रा बात तोरा की नहि देखाइ रहल छ जे ई बुतरू मरि रहल दै आ अस्पताल पहुँचाबै के पिफकिर नै करीक दबकि बनल खाड़ छ ध्क्किार।' सभ जेना हमरेपर गुम्हर लागल। - ÷आब की ई बच पाड़तै? की पफयदा लय गेलासँ।' - ÷तैयो लै जायमे की हर्जा? भाइ-साहेब ठीके तँ कही रहल छै हौ।' एक गोटे अपन विचार देलकैक। मुदा तकर कोनो प्रयोजन नहि भेलैक। घोल-पफचक्का मचिते रहलैक, ओ दुनू गोबरबिछनी छौंड़ी आदंके ठाढ़िए रहलि लोकसँ घेरायलि। बीच बाटपर ओहि घायल नेनाक प्राण छुटि गेलैक। एक चुरफक पानियो ने देलकै क्यो। एहि संदर्भमे एकटा लेखकक टिप्पणी प्रस्ताव करैत छी जे ई दृश्य छल एकटा नहि, कैकटा गोबर पर जिनहार परिवारक बच्चाक संघर्षक। एक बहिन ककरो एक चोत गोबर चोरा लेलकै तँ तामसमे ओ चौरौनिहारक छोट भाइके ँ सड़कपर ध्क्का द देलकै आ मिनीबस ओकरा पीचि देलकै। पीचपर शोणित आ गोबर बराबरि दामक भेल जे रौदमे सुखाइत रहलैक। बौंसी रोडक ई दृश्य जे देखने होयता सैह बुझने होयता - एतबे कहब। हमरा तँ ईहो नहि बुझल अछि जे मुइल छौंड़ाक मायो-बाप छलैक कि नहि? छलैको तँ ओकरा कखन खबरि भेल होयतैक जे ओकर बेटा मिनीबसमे पिचा क मरि गेलैक। वा मिनीबसक ड्राइवर कोन थानामे जाक कहने होयतैक जे हम एकटा निरीह छौंड़ाके ँ खून क क आबि रहल छी? हमरा तँ नहि बूझल अछि ओहि दुनू छौंड़ियो क, मुदा ओहि घटनाक बादसँ मनमे एहि बातक अंदेशा अवश्य होइत रहैत अछि जे कतहु दुनू छौंड़ी पफेर ने एहि बौंसी रोडपर गोबर बीछैत भेटि जाय... कतहु पफेर ने भेटि जाय।..... आ, सत्य पूछी तँ आब हमरा सभटा गोबर बिछनी एक्के रंग लगैत अछि। 2.. गजेन्द्र ठाकुर- पहरराति “सुनू। प्रयोगशालाक स्विच ऑफ कए दियौक”। चारि डाइमेन्शनक वातावरणमे अपन सभटा द्वि आऽ त्रि डाइमेन्शनक वस्तुक प्रयोग करबाक लेल धौम्य प्रयोगशालामे प्रयोग शुरू करए बला छथि। हुनकर संगी-साथी सभ उत्सुकतासँ सभटा देखि रहल छथि। “दू डाइमेन्शनमे जीबए बला जीव तीन डाइमेन्शनमे जीबए बला मनुक्खक सभ कार्यकेँ देखि तऽ नहि सकैत छथि, मुदा ओकर सभटा परिणामक अनुभव करैत छथि। अपन एकटा जीवन-शैलीक ओऽ निर्माण कएने छथि। ओहि परिणामसँ लड़बाक व्यवस्था कएने छथि। तहिना हमरा लोकनि सेहो चारि डाइमेन्शनमे रहए बला कोनो सम्भावित जीवक, वा ई कहू जे तीनसँ बेशी डाइमेन्शनमे जिनहार जीवक हस्तक्षेपकेँ चिन्हबाक प्रयास करब”। धौम्य कहैत रहलाह। एक आऽ दू डाइमेन्शनमे रहनहारक दू गोट प्रयोगशालाक सफलताक बाद धौम्यक ई तेसर प्रयोग छल। “एक विमीय जीव जेना एकटा बिन्दु। बच्चामे ओऽ पढ़ैत छलाह जे रेखा दू टा बिन्दुकेँ जोड़ैत छैक। नञि तऽ बिन्दुमे कोनो चौड़ाइ देखना जाइत अछि आऽ नहिये रेखामे। रेखा नमगर रहैत अछि, मुदा बिन्दुमे तँ चौड़ाइक संग लम्बाइ सेहो नहि रहैत छैक। एक विमीय विश्वमे मात्र अगाँ आऽ पाछाँ रहैत अछि। नञि अछि वान दहिनक बोध नहिये ऊपर नीचाँक। मात्र सरल रेखा, वक्रता कनियो नहि। आब ई नहि बुझि लिअ जे अहाँ जतय बैसल छी, ओतए एकटा रेखा विचरण करए लागत। वरण ई बुझू जे ओऽ रेखा मात्र अछि, नहि कोनो आन बहिः। “द्वि बीमीय ब्रह्माण्ड भेल जतए आगू पाछूक विहाय वाम दहिन सेहो अछि, मुदा ऊपर आऽ नीछाँ एतए नहि अछि। ई बुझू जे अहाँक सोझाँ राखल सितलपाटीक सदृश ई होयत, जाहिमे चौड़ाइ विद्यमान नहि अछि।“ “ मुदा श्रीमान् ई चलैत अछि कोना। गप कोना करत एक दोसरकेँ संदेश कोना देत”। “आऊ। पहिने एक विमीय ब्रह्माण्डक अवलोकन करैत छी”। धौम्य एक विमीय प्रयोगशालाक लग जाइत छथि। ओतए बिन्दु आऽ बिन्दुक सम्मिलन स्वरूप बनल रेखा सभ देखबामे अबैत अछि। ई जीब्व सभ अछि। एक विमीय ब्रह्माण्डक जीव, जे एहि तथ्यसँ अनिभिज्ञ अछि जे तीन विमीय कोनो जीव ओकरा सभकेँ देखि रहल छैक। “देखू। ई सभ जीव एक दोसराकेँ पार नहि कए सकैत अछि। आगू बढ़त तँ तवत धरि जाऽ धरि कोनो बिन्दु वा रेखासँ टक्कर नहि भए जएतैक। आऽ पाछाँ हटत तावत धरि यावत फेर कोनो जीवसँ भेँट नहि होयतैक। एक दोसराकेँ संदेश सेहो मात्र एकहि पँक्त्तिमे दए सकत, कारण पंक्त्तिक बाहर किछु नहि छैक। ओकर ब्रह्माण्ड एकहि पंक्त्तिमे समाप्त भए जाइत अछि। “आब चलू द्वि बीमीय प्रयोगशालामे”। सभ क्यो पाछाँ-पाछाँ जाइत छथि। “एतय किछु रमण चमन अछि। पहिल प्रयोगशाला तँ दू तहसँ जाँतल छल, दुनू दिशिसँ आऽ ऊपरसँ सेहो। मात्र लम्बाइ अनन्त धरि जाइत छल। मुदा एतय ऊपर आऽ नीचाँक सतह जाँतल अछि। ई आगाँ पाछाँ आऽ वाम दहिन दुनू दिशि अनन्त ढरि जा रहल अछि। ताहि हेतु हम दुनू प्रयोशालाकेँ पृथ्वीक ऊपर स्वतंत्र नभमे बनओने छी। एतुक्का जीवकेँ देखू। सीतलपाटी पर किछुओ बना दियौक। जेना छोट बच्चा वा आधुनिक चित्रकार बनबैत छथि। एतय ओऽ सभ प्रकार भेटि जायत। मुदा ऊँचाइक ज्ञान एतए नहि अछि। एक दोसरकेँ एक बेरमे मात्र रेखाक रूपमे देखैत अछि ई सभ। दोसर कोणसँ दोसर रेखा आऽ तखन स्वरूपक ज्ञान करैत जाइत अछि। लम्बाइ आऽ चौड़ाइ सभ कोणसँ बदलत। मुदा वृत्ताकार जीव सेहो होइत अछि। जेना देखू ओऽ जीव वाम कातमे। एक दोसराकेँ संदेश ओकरा लग जाऽ कए देल जाइत अछि। पैघ समूहमे संदेश प्रसारित होयबामे ढ़ेर समय लागि जाइत अछि”। “श्रीमान, की ई संभव अछि, जेना हमरा सभक सोझाँ रहलो उत्तर ओऽ सभ हमरा लोकनिक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ अछि तहिना हमरा सभ सेहो कोनो चारि आऽ बेशी विमीय जीवक अस्तित्वसँ अनभिज्ञ होञि”। “हँ तकरे चर्चा आऽ प्रयोग करबाक हेतु हमरा सभ एतए एकत्र भेल छी। अहाँने सँ चारि गोटे हमरा संग एहि नव कार्यक हेतु आबि सकैत छी। ई योजना कनेक कठिनाह छैक। कतेक साल धरि ई योजना चलत आऽ परिणाम कहिया जाऽ कए भेटत, तकर कोनो सीमा निर्धारण नहि अछि”। पाँच टा विद्यार्थी श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा एहि कार्यक हेतु सहर्ष तैयार भेलाह। धौम्य पाँचू गोटेकेँ अपन योजनामे सम्मिलित कए लेलन्हि। “चारि बीमीय विश्वमे तीन बीमीय विश्वसँ किछु अन्तर अछि। तीन बीमीय विश्व भेल तीन टा लम्बाइ, चौड़ाइ आऽ गहराइ मुदा एहिमे समयक एकटा बीम सेहो सम्मिलित अछि। तँ चारि बीमीय विश्वमे आकि पाँच बीमीय विश्वमे समयक एकसँ बेशी बीमक सम्भावना पर सेहो विचार कएल जायत। मुदा पहिने चारि बीमीय विश्व पर हमरा सभ शोध आगाँ बढ़ायब एहिमे मूलतः समयक एकटा बीम सेहो रहत आऽ ताहिसँ बीमक संख्या पाँच भए जायत। समयकेँ मिलाकए चारि बीमक विश्वमे हमरा सभ जीबि रहल छी। जेना वर्ण अन्धतासँ ग्रसित लोककेँ लाल आऽ हरियरक अन्तर नहि बुझि पड़ैत छैक, ओहिना हमरा सभ एकटा बेशी बीमक विश्वक कल्पना कए सकैत छी, अप्रत्यक्ष अनुभव सेहो कए सकैत छी”। धौम्य बजलाह। सभा समाप्त भेल आऽ सभ क्यो अपन-अपन प्रकोष्ठमे चलि गेलाह। सैद्धांतिक शोध आऽ तकर बाद ओकर प्रायोगिक प्रयोगमे सभ गोटे लागि गेलाह। त्रिभुज धरातल पर खेंचि कए एक सय अस्सी अंशक कोण जोड़ि कए बनएबाक अतिरिक्त्त पृथ्वीकार आकृतिमे खेंचल गेल त्रिभुज जाहि मे प्रत्येक रेखा एक दोसरासँ नब्बे अंशक कोण पर रहैत अछि, मुदा रेखा सोझ नहि टेढ़ रहैत अछि। ओहिना समय आऽ स्थानकेँ तेढ भेला पर एहन संभव भए सकैत अछि जे हमरा सभ प्रकाशक गतिसँ ओहि मार्गे जाइ आऽ पुनः घुरि आबी। प्रकाश सूर्यक लगसँ जाइत अछि तँ ओकर रस्ता कनेक बदलि जाइत छैक। श्वेतकेतु आऽ रैक्व एकटा सिद्धान्त देलन्हि- जेना कठफोरबा काठमे वृक्षमे खोह बनबैत अछि, तहिना एकटा समय आऽ स्थानकेँ जोड़एबला खोहक निर्माण शुरू भए गेल। अपाला एकटा ब्रह्माण्डक डोरीक निर्माण कएलन्हि, जकरा बान्हि कए प्रकाश वा ओहूसँ बेशी गतिसँ उड़बाक सम्भावना छल। सत्यकाम एकटा एहन सिद्धान्तक सम्भावना पर कार्य शुरू कएने छलाह, जकर माध्यमसँ तीन टा स्थानिक आऽ एकटा समयक बीमक अतिरिक्त्त कताक आर बीम छल जे बड़ लघु छल, टेढ छल आऽ एहि तरहेँ वर्त्तमान विश्व लगभग दस बीमीय छल। घोषा स्थान समयक माध्यमसँ भूतकालमे पहुँचबासँ पूर्व देशक विधिमे ई परिवर्त्तन करबाक हेतु कहलन्हि जाहिसँ कोनो वैज्ञानिक भूतकालमे पहुँचि कए अपन वा अपन शत्रुकेँ जन्मसँ पूर्व नहि मारि दए। घोषा विश्वक निर्माणमे भगवानक योगदानक चरचा करैत रहैत छलीह। जौँ विश्वक निर्माण भगवान कएलन्हि, एकटा विस्फोट द्वारा, आऽ एकरा सापेक्षता आऽ अनिश्चितताक सिद्धांतक अन्तर्गत छोड़ि देलन्हि बढ़बाक लेल, तँ फेर समयक चाभी तँ हुनके हाथमे छन्हि। जखन ओऽ चाहताह फेरसँ सभटा शुरू भए जायत। जौँ से नहि अछि, तखन समय स्थानक कोनो सीमा, कोनो तट नहि अछि, तखन तँ ई ब्रह्माण्ड अपने सभ किछु अछि, विश्वदेव, तखन भगवानक कोन स्थान? घोषा सोचैत रहलीह। आब धौम्यक लेल समय आबि गेल छल। अपन पाँचू विद्यार्थीक सभ सिद्धांतकेँ ओऽ प्रयोगमे बदलि देलन्हि। आऽ आब समय आबि गेल। पहरराति। पुष्पक विमान तैयार भेल स्थान-समयक खोहसँ चलबाक लेल। ब्रह्माण्डीय डोरी बान्हि देल गेल पुष्पक पर। धौम्य सभसँ विदा लेलन्हि। प्रकाशक गतिसँ चलल विमान आऽ खोहमे स्थान आऽ समयकेँ टेढ़ करैत आगाँ बढ़ि गेल। ब्रह्माण्दक केन्द्रमे पहुँचि गेलाह धौम्य। पहरराति बीतल छल। आगाँ कारी गह्वर सभ एहि समय आऽ स्थानकेँ टेढ़ कएल खोहमे चलए बला पुष्पकक सोझाँ अपन सभटा भेद राखि देलक। भोरुका पहरक पहिने धौम्यक विमान पुनः पृथ्वी पर आबि गेल। मुदा एतए आबि हुनका विश्व किछु बदलल सन लगलन्हि। श्वेतकेतु, अपाला, सत्यकाम, रैक्व आऽ घोषा क्यो नहि छलाह ओतए। विमानपट्टी सेहो बदलल सन। विश्वमे समय-स्थानक पट्टी सभ भरल पड़ल छल। “यौ। समय बताऊ कतेक भेल अछि”। “कोन समय। सोझ बला वा स्थान-समय विस्थापन बला। सोझ बला समय अछि, सन् ३१०० मास...”। ओऽ बजिते रहि गेल छल मुदा धौम्य सोचि रहल छलाह जे स्थान-समय विस्थापनक पहररातिमे हजार साल व्यतीत भए गेल। ककरा बतओताह ओऽ अपन ताकल रहस्य। आकि एतुक्का लोक ओऽ रहस्य ताकि कए निश्चिन्त तँ नहि भए गेल अछि? ६. पद्य 1. मैथिली हैकू पद्य- रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो हैकू लिखलन्हि, मुदा मैथिलीमे पहिल बेर जापानी पद्य विधाक आधार पर "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि ई विधा। 2. अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952) आ.पद्य ज्योति झा चौधरी इ.पद्य गजेन्द्र ठाकुर मैथिली हैकू हैकू सौंदर्य आऽ भावक जापानी काव्य विधा अछि, आऽ जापानमे एकरा काव्य-विधाक रूप देलन्हि कवि मात्सुओ बासो १६४४-१६९४। एकर रचनाक लेल परम अनुभूति आवश्यक अछि। बाशो कहने छथि, जे जे क्यो जीवनमे ३ सँ ५ टा हैकूक रचना कएलन्हि से छथि हैकू कवि आऽ जे दस टा हैकूक रचना कएने छथि से छथि महाकवि। भारतमे पहिल बेर १९१९ ई. मे कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर जापानसँ घुरलाक बाद बाशोक दू टा हैकूक शाब्दिक अनुवाद कएले रहथि। पुरनोपुकुर व्यंगेरलाफ जलेर शब्द आऽ पचाएडालि एकटा के शरत्काल। हैकूक लेल मैथिली भाषा आऽ भारतीय संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आऽ समस्त उत्तर-पश्चिमी आऽपूर्वी भारतीय लिपि आऽ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आऽ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व 'इ' एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि? मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि? तँ ई की अछि- आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छैक , आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आऽ बाजल जाइत अछि। जापानमे ईश्वरक आह्वान टनका/ वाका प्रार्थना ५ ७ ५ ७ ७ स्वरूपमे होइत छल जे बादमे ५ ७ ५ आऽ ७ ७ दू लेखक द्वारा लिखल जाए लागल आऽ नव स्वरूप प्राप्त कएलक आऽ एकरा रेन्गा कहल गेल। रेन्गाक दरबारी स्वरूप गांभीर्य ओढ़ने छल आऽ बिन गांभीर्य बला स्वरूप वणिकवर्गक लेल छल। बाशो वणिक वर्ग बला रेन्गा रचलन्हि। रेन्गाक आरम्भ होक्कुसँ होइत छल आऽ हैकाइ एकर कोनो आन पंक्त्तिकेँ कहल जाऽ सकैत छल। मसाओका सिकी रेन्गाक अन्तक घोषणा कएलन्हि १९म शताब्दीक प्रारम्भमे जाऽ कए आऽ होक्कु आऽ हैकाइ केर बदलामे हैकू पद्यक समन्वित रूप देलन्हि। मुदा बाशो प्रथमतः एकर स्वतंत्र स्वरूपक निर्धारण कए गेल छलाह। हैकू निअम १. १७ अक्षरमे लिखू, आऽ ई तीन पंक्त्तिमे लिखल जाइत अछि- ५ ७ आऽ ५ केर क्रममे। रचना लिखबासँ पहिने स्तंभमे मात्रिक छन्दक वर्णन क्रममे हम लिखने रही जे संयुक्त्ताक्षरकेँ एक गानू आऽ हलन्तक/ बिकारीक/ इकार आकार आदिक गणना नहि करू। हैकू निअम २.व्यंग्य हैकू पद्यक विषय नहि अछि, एकर विषय अछि ऋतु। जापानमे व्यंग्य आऽ मानव दुर्बलताक लेल प्रयुक्त विधाकेँ "सेर्न्यू" कहल जाइत अछि आऽ एहिमे किरेजी वा किगो केर व्यकरण विराम नहि होइत अछि। हैकू निअम ३. प्रथम ५ वा दोसर ७ ध्वनिक बाद हैकू पद्यमे जापानमे किरेजी- व्याकरण विराम- देल जाइत अछि। हैकू निअम ४. जापानीमे लिंगक वचन भिन्नता नहि छैक। से मैथिलीमे सेहो वचनक समानता राखी सैह उचित होएत। हैकू निअम ५. जापानीमे एकहि पंक्त्तिमे ५ ७ ५ ध्वनि देल जाइत अछि। मुदा मैथिलीमे तीन ध्वनिखण्डक लेल ५ ७ ५ केर तीन पंक्त्तिक प्रयोग करू। मुदा पद्य पाठमे किरेजी विरामक ,जकरा लेल अर्द्धविरामक चेन्ह प्रयोग करू, अतिरिक्त्त एकहि श्वासमे पाठ उचित होएत। हैकू निअम ६. हैबुन एकटा यात्रा वृत्तांत अछि जाहिमे संक्षिप्त वर्णनात्मक गद्य आऽ हैकू पद्य रहैत अछि। बाशो जापानक बौद्ध भिक्षु आऽ हैकू कवि छलाह आऽ वैह हैबुनक प्रणेता छथि। जापानक यात्राक वर्णन ओऽ हैबुन द्वारा कएने छथि। पाँचटा अनुच्छेद आऽ एतबहि हैकू केर ऊपरका सीमा राखी तखने हैबुनक आत्मा रक्षित रहि सकैत अछि, नीचाँक सीमा ,१ अनुच्छेद १ हैकू केर, तँ रहबे करत। हैकू गद्य अनुच्छेदक अन्तमे ओकर चरमक रूपमे रहैत अछि।- सम्पादक प्रस्तुत अछि ज्योतिक ९५ टा मैथिली हैकू। हुनकर ९६ सँ १०० धरि हैकू अंग्रेजीसँ मैथिलीमे सम्पादक द्वारा अनुवादित अछि, तकर अंग्रेजी अंश सेहो देल गेल अछि। तकरा बाद गजेन्द्र ठाकुरक १२ टा हैकू आऽ एकटा हैबुन देल गेल अछि। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति (१) तारा दूरसँ बुझाइत कतेक शीतल वास्तवमे जड़ैत (२) शाखासँ लागल पुष्प आऽ पत्रसॅं आच्छादित अछि झूलैत लता (३) पक्षी विश्राम कएल बड़का यात्राक उपरान्त एखनो जे अपूर्ण (४) अद्रभुत अपवाद छैक नागफनीक कॉँटक बीच कुसुम खिलायल (५) नीलांबरमे मेघ विचरैत अछि कोना जेना सागरमे होए शार्क (६) भावी संकट केर पशु पक्षीमे पूर्वाभास प्रभुक दिव्य आशिष (७) कोमल पंखुड़ी सुगन्धक संग सजाओल एक पुष्पक रूपमे (८) नदीक तरंग ओहिना लागैत अछि जेना ओकर घुरमल केश (९) दू टा पसरल पाँखि बाज उड़ऽ लेल तैयार अछि पूर्ण रूपसॅं जागरूक (१०) पहाड़ीक ढलान ताहि पर एकमात्र गाछक छाह भेल यात्रीक विश्राम (११) संध्याक बेला सुनसान आऽ शान्त पोखरिक कात एक एकान्त स्थान (१२) मेघ रूपी बर्फमे अछि हवाई जहाज पिछड़ैत आकाशमे विचरैत (१३) कठोरतम भूमि समुद्रक छोर पर बसल अछि पाथरक किनार (१४) विलक्षण अपवाद आकाश जरैत संध्याकाल समुद्रक उपरि (१५) पहाड़सॅं उदित सूर्यसॅं आकाश भेल जागृत ज्वालामुखी सन (१६) उगैत सूर्य संगे आयल अंधकारक उपरान्त अंतहीन दिनक आस (१७) दिवस आब थकल रातिक स्वागतमे लीन साँझ मिझाइत सूर्य दीप (१८) गाछ भने हरियर ग्रीष्मोमे देखु पतझड़ भोरक आकाशमे (१९) पक्षीक चहक आऽ आकाशक लाली संग प्रकृति जागल (२०) अतिसुन्दर जाड़ मेघक घिस घिस छिड़यौलक हिमपातक रूपमे (२१) तैयार उड़ऽलेल पक्षी विश्रामसॅं जागल वा अछि शुरूआत (२२) पक्षीक निरीक्षण छूटल अन्नक फेरमे कटनी भेलाक बाद (२३) फूलक हुँजक बोझ शाखा केँ झुका रहल बसंत आयल अछि (२४) तितलीक पंख अंकित रंग बिरंग आकार प्रभुक चित्रकला (२५) मनुष लेल कठिन किन्तु जीवन ओतहु अछि शीतलतम स्थान (२६) उच्चतम शिखरसॅं धुन्ध भरल हरियर घाटी निहारक इच्छा (२७) विभिन्न प्रकारक घास पात जमीन पर उगल आइरसँ दूर बॅंचल। (२८) ओसक बूँद पाबि अछि घासक फुनगी आह्लादित हीरा सन चमकैत (२९) बाहर घूमऽ निकलल बतख अपन बच्चा संग गर्मीक दिनमे (३०) बतख हेल रहल अछि पानिक ऊपरी सतह पर लक्ष्यक दिस निरंतर (३१) स्प्रेसो आस्ते पिब लेल गर्म देल गेल (३२) ईश्वर केँ तकनाइ नहि कठिन पाबू ओकरा पवित्र हृदयमे (३३) दृष्टि भ्रमणमे घाटी पर दूर दूर धरि भटकि सकैत अछि (३४) घोड़ा भटकि रहल उद्देश्यहीन बिन घुड़सवार भेल अनुशासनहीन (३५) स्थिर पानिमे प्रकृतिक प्रतिबिम्ब साफ लेकिन उलटा (३६) प्राकृतिक दृष्य पानिक प्रतिरूप बिना अपूर्ण बुझाइत अछि। (३७) पतझड़क पात पसारलक अप्पन सतरंजी हरियर घास बदला। (३८) समुद्रक तहमे विभिन्न आकार प्रकारक रंग बिरंग जीवन। (३९) नटखट समुद्र तटक आरामसँ वंचित कएने बेर बेर तंग। (४०) पहाड़क चोटी आर बेसी ऊँच लागैत अछि गहीँर घाटीक बीच (४१) पोखरिमे देखु प्रकृतिक प्रतिबिम्ब उलटल बुझाइत अछि (४२) तितलीगण उतरल पंखरूपी पैराशूट लऽ फुलक झुण्ड पर। (४३) उच्चतम शिखर पर गुफासँ दृष्टिगोचर होइत रमणीय दृष्य (४४) बच्चाक संग खेलमे एकेटा खुशीक आभास ओकर किलकारी (४५) टेढ़ मेढ़ रेखा अछि बरसातक बहैत पानिसँ खिड़कीक काँच पर बनल (४६) बादलसँ छनल समुद्रक लहरिक तरंग उपर चमकैत किरण (४७) पानिक तरंग केँ पक्षी बदलि रहल अछि कलरवक लयमे (४८) मरुस्थलमे रेत अछि हवासँ बहारल सतह भेल समतल (४९) कतेक बेसी ध्यान पातक प्रारूप देबऽमे ईश्वर देने छथि (५०) बरसात खतम भेल पानि तइयो झरि रहल अछि गाछक पात सब सऽ ५१ समुद्रक लहरि लगातार टकरा रहल पाथर तइयो स्थिर ५२ मनोरम दृष्य जेना चिन्नीक चाशनीमे लिप्त अछि गाछ जाड़मे ५३ अपने रंगहीन अछि गाछ केँ रंगीन बनौलक नीचा गड़ल जड़ि ५४ शीतल प्रकाश युक्त सुर्योदयक पहिनेक समय सर्वोत्तम काल ५५ पाँखिक शाल ओढ़ने प्रकृतिक भ्रमण हेतु पक्षी निकलल जाड़मे ५६ चिडैय़ाक बच्चा माए बाप संगे अछि ताबञ जाबञ पंख नहिक छैक। ५७ प्रवासी पक्षी मीलक मील उड़िक आयल गर्मीक आनन्द लय। ५८ उछलैत पानि नदीसँ भेँट लेल खसल झरनाक रूपमे । ५९ नागफणीक गाछ सभ मरुस्थल्मे सेहो अछि मजबूतीसँ ठाढ़। ६० कठोर पातसँ लिप्त नागफनीक चोटी पर अछि कोमल फूलक ताज ६१ आर सजायल गेल कैक रंगक फूल आऽ लाइटसॅं क्रिसमसक साँझमे ६२ एक नारिकेरक फल कठोर केशयुक्त कवचमे मीठ उज्जर फल अछि ६३ भुखाएल बगुला नदीक कातमे ठाढ़ अछि माछक ताकिमे ६४ अतिथिक आगमन कौआक कर्कश काँव काँवसँ पूर्वसूचित भेल अछि ६५ सागरमे डॉलफिन खतरनाक जीवक बीचमे मनुषक साथी ६६ जिग ज़ैग ध्वनि केँ गाड़ी दोहरा रहल अछि भीजल सड़क पर ६७ भूकम्पक श्राप अछि अज्ञात अपराधक सजा मनुषकेँ भेटल ६८ छोट किन्तु तेज अछि अपन लक्ष्य चिनहऽमे भड़ल भीड़क बीच ६९ समुद्रक नीचाँ कतओ जायकाल रहैअ छोट माछ सब झुण्डमे ७० अंगूरक फल अछि मीठ जेल जमाकऽ रखने छोट छोट आकारमे ७१ स्वर्ग सदृश दृश्य हरियर प्राकृतिक संग चिड़ैआक कलरव ७२ राति हुअक पहिने आकाश दहकि रहल सूर्यास्तक पहिने ७३ खिलखिलाइत झरना मधुर ध्वनि घोरि रहल चारू दिशामे ७४ सूर्यक अएलापर रातिक अन्हार भागि गेल आऽ भोर शुरु भऽ गेल ७५ छाया उपर्युक्त अछि गोबरछत्ता केँ उगऽ आऽ पसरऽ लेल (७६) एकटा पओलाक बाद खरहा फेर भागि रहल अछि आर भोजन लेल (७७) गाछक स्वर्णिम रंग पतझड़क आगमनक घोषणा अछि करैत । (७८) गरमीक ऋतु कहॉँ ओतेक दुखद अछि शुरुक दिनमे (७९) स्वयम् सिद्ध मकरा अपन सुरक्षा हेतु जाल अछि बुनैत (८०) कोनो आकारमे ढलि जाएत पानि मुदा गहराई एकर अपन गुण (८१) आकाश अखनो ऊँच बादल पहुँचमे बुझाएल ई धुन्धक रूपमे (८२) रातिमे इजोत दैत बर्फसँ परावर्तित होइत प्रकाशपुँज जाड़मे (८३) लुक्खी सब निकलल अपन घड़सँ आलस त्यागि वसन्त ऋतुमे (८४) सोन सन सूरज भेल उज्जर चमकैत हीरा सन दिनकेँ अएला पर (८५) गाछ सब अछि होड़मे सबसँ पहिने पाबऽ लेल सूरजक रोशनी (८६) एकटा मन्दिर अछि खजूरक गाछ भीड़मे एक पोखरि कातमे (८७) सुखाएल छोट पातसभ गाछसँ नीचाँ खसैत अछि नबकेँ अवसर दैत (८८) गाछक शाखासभ अतेक ऊँचाई पर पसरल जड़ि ततब्बे गहिँर (८९) भोरक अयला पर गाछ पर लादल ओस भेल अछि चमकैत हॅँसी सन (९०) सोन सन कम्बल अछि ओढ़ने गहुमक खेत सभ कटाइक पहिने (९१) चक्रवातीय पवन जीवनसंहारक बनि गेल जीवनरक्षक छल। (९२) प्रदान करैत अछि पक्षी आऽ हिरण सभकेँ गाछ आऽ वृक्ष आश्रय (९३) फूलसँ भरल अछि एकटा घाटी एहन अछि जेना खुशी मुस्काइत। (९४) पानि बढ़ि रहल रस्ताक गाछ आऽ पाथर सभ विदा करैत ठाढ़ (९५) जाड़क गाछ अछि ठाढ़ वसन्तक प्रतीक्षामे पात सभसँ भिन्न भऽ (९६) Illusion of eye Colourful appearance of Rainbow in the sky आँखिक भ्रम, आभास वर्णमय पनिसोखा द्यौ (९७) Rainbow declares Beginning of bright days and End of rainy ones पनिसोखाक, शुभ्र दिन आबह खिचाहनि जाऽ (९८) Filled with smoky fog The wood seems to be burning Thou' it is winter धुँआ कुहेस जेना जड़ैत काठ, अछि ई जाड़ (९९) The words sound so sweet imitated by parrots Like baby babbles गुञ्ज मधुर सुग्गाक अभिनय, तोतराइत स्वर (१००) The sky is bright The wind has cleared the clouds Some still needs force अकाश श्वेत वायु टारैत मेघ, कनेक बल (९६ सँ १०० धरि इंग्लिशसँ मैथिली अनुवाद संपादक द्वारा कएल गेल) गजेन्द्र ठाकुरक १२ टा हैकू १.वास मौसमी, मोजर लुबधल पल्लव लुप्ता २.घोड़न छत्ता, रेतल खुरचन मोँछक झक्का ३. कोइली पिक्की, गिदरक निरैठ राकश थान ४.दुपहरिया भुतही गाछीक सधने श्वास ५.सरही फल कलमी आम-गाछी, ओगरबाही ६.कोलपति आऽ चोकरक टाल, गछपक्कू टा ७.लग्गा तोड़ल गोरल उसरगि बाबाक सारा ८.तीतीक खेल सतघरिया चालि अशोक-बीया ९.कनसुपती, ओइधक गेन्द आऽ जूड़िशीतल १०.मारा अबाड़ डकहीक मछैड़ ओड़हा जारि ११.कबइ सन्ना चाली बोकरि माटि, कठफोड़बा १२.शाहीक-मौस, काँटो ओकर नहि बिधक लेल हैबून १ सोझाँ झंझारपुरक रेलवे-सड़क पुल। १९८७ सन्। झझा देलक कमला-बलानक पानिक धार, बाढ़िक दृश्य। फेर अबैत छी छहर लग। हमरा सोझाँमे एकठामसँ पानि उगडुम होइत झझात बाहर अछि अबैत। फेर ओतएसँ पानिक धार काटए लगैत अछि माटि। बढ़ए लगैत अछि पानिक प्रवाह, अबैत अछि बाढ़ि। घुरि गाम दिशि अबैत छी। हेलीकॉप्टरसँ खसैत अछि सामग्री। जतए आयल जलक प्रवाह ओतए सामग्रीक खसेबा लए सुखाएल उबेड़ भूमिखण्ड अछि बड़ थोड़। ओतए अछि जन- सम्मर्द। हेलीकॉप्टर देखि भए जाइत अछि घोल। अपघातक अछि डर हेलीकॉप्टर नहि खसबैत अछि ओतए खाद्यान्न। बढ़ि जाइत अछि आगाँ। खसबैत अछि सामग्री जतए पानि बिनु पड़ैत छल दुर्भिक्ष, बाढ़िसँ भेल अछि पटौनी। कारण एतए नहि अछि अपघातक डर। आँखिसँ हम ई देखल। १९८७ ई.। पएरे पार केने कमला धार, आइ विशाल विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य । जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि: 1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि। मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि। प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:- 14. महेशवानी विधि बड़ दुःख देल, गौरी दाइ के एहेन वर कियाक लिखि देल॥ जिनका जाति नहि कुल नहि परिजन, गिरिपर बसथि अकेल, डमरू बजाबथि नाचथि अपन कि भूत प्रेत से खेल॥ भस्म अंग शिर शोभित गंगा, चन्द्र उदय छनि भाल वस्त्र एकोटा नहि छनि तन पर ऊपरमे छनि बघछाल, विषधर कतेक अंगमे लटकल, कंठ शोभे मुंडमाल, रामजी कियाक झखैछी मैना गौरी सुख करती निहाल॥ 15. विहाग वृन्दावन देखि लिअ चहुओर॥ काली दह वंशीवट देखू, कुंज गली सभ ठौर, सेवा कुंजमे ठाकुर दर्शन, नाचि लिअ एक बेर॥ जमुना तटमे घाट मनोहर, पथिक रहे कत ठौर, कदम गाछके झुकल देखू, चीर धरे बहु ठौर॥ रामजी वैकुण्ठ वृन्दावन घूमि देखु सभ ठौर, रासमण्ड ल’ के शोभा देखू, रहू दिवस किछु और।। 16. विहाग मथुरा देखि लिअ सन ठौर॥ पत्थल के जे घाट बनल अछि, बहुत दूर तक शोर, जमुना जीके तीरमे, सन्न रहथि कते ठौर॥ अस्ट धातुके खम्भा देखू, बिजली बरे सभ ठौर, सहर बीच्मे सुन्दर देखू, बालु भेटत बहु ढ़ेर॥ दुनू बगलमे नाला शोभे, पत्थल के है जोर कंशराजके कीला देखू देवकी वो वसुदेव॥ चाणूर मुष्टिक योद्धा देखू कुबजा के घर और, राधा कृष्णके मन्दिर देखू, दाउ मन्दिर शोर॥ छोड़ विभाग रामजी मधुबन, घूमि लिअ अब, कृष्ण बसथि जेहि ठौर॥ गोकुल नन्द यशोदा देखू कृष्ण झुलाउ एक बेर॥ 17. महेशवानी भोला केहेन भेलौँ कठोर, एक बेर ताकू हमरहुँ ओर॥ भस्म अंग शिर गंग विराजे, चन्द्रभाल छवि जोर।। वाहन बसहा रुद्रमाल गर, भूत-प्रेतसँ खेल॥ त्रिभुवन पति गौरी-पति मेरो जौँ ने हेरब एक बेर, तौँ मेरो दुःख कओन हरखत सहि न सकत जीव मोर॥ बड़े दयालु जानि हम अयलहुँ, अहाँक शरण सूनि शोर, राम-जी अश्रण आय पुकारो, दिजए दरस एक बेर॥ (अनुवर्तते) Bottom of Form Top of Form Bottom of Form इ.पद्य ज्योति झा चौधरी ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति मेघक उत्पात कनिक काल दऽ पानिक फुहार फेर लेलक अपन ऑँजुर सम्हारि देखू मेघक उत्पात लोकक आशाक उपहास करैत कखनो दर्शन दऽ बेर-बेर नुकाइत मौलाऽगेल गाछ आऽ पात कखनो गरजि भरि कऽ रहि गेल कखनो बरसि-बरसि कऽ भरि गेल डूबल पोखरिक कात कोसीक प्रवाह सब बॉँन्ह तोड़लक गामक गाम जलमग्न कएलक ततेक भेल बरसात किसानक भविष्य मेघपर आश्रित मेघक इच्छा पूर्णतः अप्रत्याशित सभसालक अनिश्चित अनुपात गजेन्द्र ठाकुर पथक पथ स्मृतिक बन्धनमे तरेगणक पाछाँसँ अन्हार गह्वरक सोझाँमे पथ विकट। आशासँ! पथक पथ ताकब हम प्रयाण दीर्घ भेल आब। विश्वक प्रहेलिकाक तोड़ भेटि जायत जौँ इतिहासक निर्माणक कूट शब्द ताकब ठाँ। पथक पथ ताकब हम प्रयाण दीर्घ भेल आब। विश्वक मंथनमे होएत किछु बहार आब समुद्रक मंथनमे अनर्गल छल वस्तु-जात पथक पथ ताकब हम प्रयाण दीर्घ भेल आब। 7. संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) (आगाँ) -गजेन्द्र ठाकुर सुभाषितम् वयम् इदानीम एकं सुभाषितं श्रुण्मः। आयत्यां गुणदोषज्ञः तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः। अतीते कार्यशेषज्ञो विपदा नाभिभूयते॥ वयम् इदानीम यत सुभाषितम् श्रुतवन्तः तस्य अर्थः एवम् अस्ति। कश्चन् उत्तम कार्यकर्ता कथं व्यवहारं करोति। भविष्यत् काले यत् कार्यं करणीयम्। कार्यस्य गुणाः के अवगुणाः के इति सः चिन्तयति तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः। यदा कार्यं सन्निहतं भविष्यति तदा अनुक्षणं निर्णयं करोति। अतीते कार्यशेषज्ञः यद कार्यं शिष्टं भवति, तस्य किम् इति चिन्तयति, एवं यद् कार्यम् अतीतम् अस्ति तत्र किम् शिष्टम् इति चिन्तयति- विपदा नाभिभूयते। कथा पूर्वं रायगढ़ दुर्गम् आसीत्। शिवाजी महाराजः तस्य पालनं करोति स्म। एका महिला आसीत्। सा प्रतिदिनं क्षीरविक्रयणं करोति स्म। रायगढ़ दुर्गस्य अन्तः आगत्य क्षीरविक्रयणं करोति स्म। तस्याः लघु पुत्रः आसीत्। तम् गृहे तिक्तवा दुर्गस्य अंतः आगत्य क्षीरविक्रयणं करोति स्म। प्रतिदिनम् अंधकारात् पूर्वं क्षीरविक्रयेण समापयित्व बहिः आगच्छति स्म। एकस्मिन् दिने सा क्षीरं विक्रयेण कुर्वति आसीत् तदा विलम्बः जातः। अंधकारः जातः। यदा महिला क्षीर विक्रयेणं समाप्य द्वार समीपम् आगतवती- तदा दुर्गस्य द्वारं पिहितम् आसीत्। सा तद्दृष्टवा रक्षकवटम् उक्तवती- कृपया द्वारम् उद्घाटयतु। मम शिशुः गृहे अस्ति। रक्षकवटः द्वारम् उद्घाटयतुं निराकृतवान्। पुनः सा महिला प्रार्थितवती। रक्षकवटं सा प्रार्थितवती- कृपया उद्घाटयतु। अहं बहिः गच्छामि। गृहे मम लघु-शिशुः अस्ति। तस्मै भोजनं दातव्यम् अस्ति। कृपया उद्घाटयतु। भवान् किमर्थं न उद्घाटयति। सा पृष्टवती। रक्षकवटः उक्तवान्- शिवाजी महाराजस्य सूचना अस्ति। अंधकारस्य अनन्तरं द्वारस्य उद्घाटनं न करणीयम्। इति। तद् श्रुत्वा सा महिला दिग्भ्रान्ता जातः। अहम् इदानीम गृहं कथं गच्छामि। सा तत्रैव मार्गस्य अन्वेषणं कृतवती। सर्वत्र अटितवती। एकत्र दुर्गस्य भित्तिः शिथिला आसीत्। सा महिला भित्तिम् आरूढ़वती। पार्श्वे एकः वृक्षः आसीत्। वृक्षस्य शाखां गृहित्वा उत्तिर्य सा कथमपि दुर्गात् बहिः आगतवती। अनन्तर दिने शिवाजी महाराजः एतां वार्तां श्रुतवान। सः ताम महिलाम् आहूतवान। ताम सः पृष्टवान। भवती कथं गतवती। तदा सा उक्तवती। अहं किमपि न जानामि। तदा मम कर्णयोः केवलं मम शिशोः क्रन्दनं श्रुयति स्म। अहं कथमपि दुर्गात् बहिः गतवती। तत श्रुत्वा शिवाजी महाराजः संतुष्टः अभवत्। तस्यै महिलायै सः पारितिषिकं दत्तवान। सम्भाषणम् एकवचनतः बहुवचनं प्रति परिवर्त्तनं कृतम् अस्ति। बालकः विद्यालयं गतवान। बालक विद्यालय गेलाह। बालकाः विद्यालयं गतवन्तः। बालक लोकनि विद्यालय गेलाह। इदानीम् एकवचनतः बहुवचनं प्रति परिवर्तनं कुर्वन्ति एव। युवकः योगाभ्यासं कृतवान। युवक योगाभ्यास कएलन्हि। युवकाः योगाभ्यासं कृतवन्तः। युवक लोकनि योगाभ्यास कएलन्हि। नर्तकः नृत्यं कृतवान। नर्तक नृत्य कएलन्हि। नर्तकाः नृत्यं कृतवान। नर्तक लोकनि नृत्य कएलन्हि। अलसं निद्रां कृतवान। आलसी निद्रा कएलन्हि। अलसाः निद्रां कृतवन्तः। आलसी लोकनि निद्रा कएलन्हि। सैनिकः जयं प्राप्तवान। सैनिक जय प्राप्त कएलन्हि। सैनिकाः जयं प्राप्तवन्तः। सैनिक लोकनि जय प्राप्त कएलन्हि। बालकः ग्रन्थं स्मृतवान। बालक ग्रंथ यादि कएलन्हि। बालकाः ग्रन्थं स्मृतवान। बालक लोकनि ग्रन्थ यादि कएलन्हि। बालिका पाठं पठितवती। बालिका पाठ पढ़लन्हि। बालिकाः पाठं पठितवत्यः। बालिका लोकनि पाठ पढ़लन्हि। बालिका विद्यालयं गतवती। बालिका विद्यालय गेलीह। बालिकाः विद्यालयं गतवत्यः। बालिका लोकनि विद्यालय गेलीह। वैद्या चिकित्सालयं गतवती। वैद्या चिकित्सालय गेलीह। वैद्याः चिकित्सालयं गतवत्यः। वैद्या लोकनि चिकित्सालय गेलीह। सखी नगरं गतवती। सखी नगर गेलीह। सख्याः नगरं गतवत्यः। सखी लोकनि नगर गेलीह। लेखिका लेखं लिखितवती। लेखिका लेख लिखलन्हि। लेखिका लेखं लिखितवत्यः। लेखिका लोकनि लेख लिखलन्हि। भगिनी गानं गीतवती। बहिन गीत गओलन्हि। भगिन्यः गानं गीतवत्यः। बहिन लोकनि गीत गओलन्हि। नटी नृत्यं कृतवती। नर्तकी नृत्य कएलन्हि। नट्यः नृत्यं कृतवत्यः। नर्तकी लोकनि नृत्य कएलन्हि। अहं रामायणं, महाभारतं, भगवतगीतां च पठामि। हम रामायण, महाभारत आऽ भगवतगीता पढ़ैत छी। अहम् अन्नं, पायसं, लड्डूकं च खादामि। हम अन्न, पायस आऽ लड्डू खाइत छी। सुब्रमण्यं लेखनीं, करवस्त्रं च आनयतु। सुब्रमण्यं कलमअ आऽ रुमाल आनू। सुब्रमण्यं लेखनीं, करवस्त्रं च नयतु। सुब्रमण्यं कलमअ आऽ रुमाल लए जाऊ। मम गृहे माता, पिता, भ्राता च सन्ति। हमर गृहमे माता, पिता आऽ भ्राता छथि। भवतः गृहे के के सन्ति। अहाँक गृहमे के के छथि। भवत्याः गृहे के के सन्ति। अहाँसभक गृहमे के के छथि। भवत्याः किम् किम् खादन्ति। अहाँ सभ की की खाइत छी। भवत्याः कां कां भाषां जानन्ति। अहाँ सभ कोन कोन भाषा जनैत छी। भवन्तः किम् किम् कुर्वन्ति। अहाँ सभ की की करित छी। भवती किम् किम् करोति। अहाँ की की करैत छी। इदानीं भवन्तः च योजयित्वा वाक्यानि वदन्ति एव। आम् वदामः। अहं चेन्नै नगरं, मुम्बइ नगरं, दिल्ली नगरं च दृष्टवान। हम चेन्नै नगर, मुम्बइ नगर आऽ दिल्ली नगर देखलहुँ। अहं चेन्नै नगरं, मुम्बइ नगरं, दिल्ली नगरं च दृष्टवती। हम चेन्नै नगर, मुम्बइ नगर आऽ दिल्ली नगर देखलहुँ। भवन्तः किम् किम् दृष्टवन्तः। अहाँ लोकनि की की देखलहुँ। अभिषेकः कोलाहलं करोति- अतः अहं ताडयामि। अभिषेक कोलाहल करैत छथि- ताहि द्वारे हम मारैत छियन्हि। मम बहु पिपासा अतः अहं जलं पीबामि। हमरा बड़ प्यास लागल अछि ताहि द्वारे हम जल पिबैत छी। मम बहु बुभुक्षा अस्ति, अतः भोजनं करोमि। हमरा बड़ भूख लागल अछि, ताहि द्वारे भोजन करैत छी। वाहने ईंधनं नास्ति, अतः वाहनं न चलति। वाहनमे ईंधन नहि अछि, ताहि द्वारे वाहन नहि चलैत अछि। अतः- उपयोगं कृत्वा वाक्यानि वदन्ति एव। गोपालः रुग्नः अस्ति, अतः सः शालां न गच्छति। गोपाल दुःखित अछि, ताहि द्वारे पाठशाला नहि जाइत अछि। गोपालः रुग्नः अस्ति, अतः निद्रां करोति। गोपाल दुःखित अछि, ताहि द्वारे सुतैत अछि। गोपालः रुग्नः अस्ति, अतः चिकित्सालयं गच्छति। गोपाल दुःखित अछि, ताहि द्वारे चिकित्सालय जाइत अछि। गोपालः रुग्नः अस्ति, अतः न क्रीडति। गोपाल दुःखित अछि, ताहि द्वारे नहि खेलाइत अछि। मंत्री आगच्छति, अतः कार्यक्रमः भवति। मंत्री अबैत छथि, ताहि द्वारे कार्यक्रम होइत अछि। मंत्री आगच्छति, अतः सर्वे तम नमन्ति। मंत्री अबैत छथि, ताहि द्वारे सभ हुनका नमस्कार करैत छथि। मंत्री आगच्छति, अतः सर्वे उत्तिष्ठन्ति। मंत्री अबैत छथि, ताहि द्वारे सभ उठैत छथि। परीक्षा अस्ति, अतः छात्राः निद्रां न कुर्वन्ति। परीक्षा अछि, ताहि द्वारे सभ छात्र निद्रा नहि करित छथि। परीक्षा अस्ति, अतः सर्वे छात्राः शालां आगच्छन्ति। परीक्षा अछि, ताहि द्वारे सभ छात्र पाठशाला अबैत छथि। परीक्षा अस्ति, अतः वयं सर्वे अधिकः पठामः। परीक्षा अछि, ताहि द्वारे सभ छात्र अधिक पढ़ैत छथि। उत्सवः अस्ति, अतः अहं सम्यक् मधुरं खादामि। उत्सव अछि, ताहि द्वारे हम बहुत रास मधुर खाइत छी। उत्सवः अस्ति, अतः सर्वे जनाः उत्सुकाः भवन्ति। उत्सव अछि, ताहि द्वारे सभ लोक उत्सुक होइत छथि। उत्सवः अस्ति, अतः सर्वे जनाः देवालयं गच्छन्ति। उत्सव अछि, ताहि द्वारे सभ लोक देवालय जाइत छथि। मम हस्ते नानकम् अस्ति। हमर हाथमे पाइ अछि। नानकम वाम हस्ते अस्ति वा दक्षिण हस्ते अस्ति वा? पाइ बाम हाथमे अछि आकि दहिन हाथमे अछि? वदन्तु। बाजए जाऊ। वाम हस्ते। न दक्षिण हस्ते। बाम हाथमे। नहि दक्षिण हाथमे। नानकं वाम हस्ते एव अस्ति। पाइ बाम हाथहिमे अछि। अहं चायम् एव पिबामि। हम चाहेटा पिबैत छी। मम पिता कार्यालय एव अस्ति। हमर पिता कार्यालयअहि मे छथि। अहं सत्यमेव वदामि। हम सत्ये टा बजैत छी। अहं प्रातः रोटिकां खादामि। हम भोरमे सोहारी खैत छी। अत्र एव योजयित्वा वाक्यं वदन्ति एव- यथा अहं प्रातः एव रोटिकां खादामि। सायंकाले खादन्ति। न। मध्याह्णकाले खादन्ति। न। मालती। आम। मम उपनेत्रं कुत्र अस्ति। मालती। हँ। हमर चश्मा कतए अछि। तत्रैव अस्ति। ओतहि अछि। अत्र कुत्रापि नास्ति एव खलु। एतए कतहु नहि अछि। तत्रैव अस्ति भः। ओतहि अछि, यौ। अत्र नास्ति एव। एतए नहि अछि। अहं जानामि भोः। तत्रैव अस्ति। हम जनैत छी। ओतहि अछि। अत्र नास्ति एव भोः। एतए नहि अछि। अहो पश्यतु। अत्रैव अस्ति। अहा। देखू। एतहि अछि। अहं प्रतिदिनं शालां गच्छामि। हम सभ दिन पाठाशाला जाइत छी। अहं न श्रुतवान। सः किम् इति उक्तवान। हम नहि सुनलहुँ। ओऽ की बजलाह। सः अहं प्रतिदिनं शालां गच्छामि इति उक्तवान। ओऽ हम सभ दिन पाठशाला जाइत छी ई बजलाह। सा किम् इति उक्तवती। ओऽ की बजलीह। सा रमा प्रतिदिनं देवालयं गच्छति इति उक्तवती। ओऽ रमा प्रतिदिन विद्यालय जाइत छथि ई बजलीह। अहम् एकं शब्दं लिखामि। हम एकटा शब्द लिखैत छी। अहं किम् इति लिखितवान। हम की लिखलहुँ। भवान् परीक्षा इति लिखितवान। अहाँ परीक्षा ई लिखलहुँ। सः कर्णे किम् वदति। ओऽ कानमे की बजैत छथि। एषः अहं शालां गच्छामि, इति उक्तवान। ई हम पाठशाला जाइत छी, ई बजलाह। साधयतु अथवा विनश्यतु, इति महात्मा गाँधी उक्तवान। करू वा मरू ई महात्मा गाँधी बजलाह। (कः किम् इति उक्तवान। के की बजलाह।) अहं पत्राणि प्रदर्शयामि। शरीर माध्यं खलु धर्म साधनम् इति कालिदासः उक्तवान। शरीर मात्र धर्मक साधनक माध्यम ई कालिदास बजलाह। जय जवान जय किसान इति लाल बहादुर शास्त्री उक्तवान। जय जवान जय किसान ई लाल बहादुर शास्त्री बजलाह। गृहे माता अस्ति। माता सम्यक पठतु इति वदति। गृहमे माता छथि। माता मोनसँ पढ़ु ई बजैत छथि। मम माता अधिकं दूरदर्शनं न पश्यतु इति उक्तवती। हमर माता बेशी दूरदर्शन नहि देखू ई बाजल/ बजलीह। मम पिता सत्यं वद इति उक्तवान। हमर पिता सत्य बाजू ई बजलाह। गृहे अन्य के के किम् वदन्ति इति वदतु। घरमे आन के के की की बहैत छथि से बाजू। ८. मिथिला कला (आगां) श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर, उम्र 60 वर्ष, ग्राम- हैँठी-बाली, जिला मधुबनी। नीचाँक चित्र अँगनाक पश्चिममे बनल कुल-देवताक घर जे ’गोसाउनि घर’ कहबैत अछि, ओतए बनाओल जाइत अछि। पश्चिम देबाल पर कारी छोड़ि दोसर रंगसँ ई चित्र बनाओल जाइत अछि। एकरे सरोवर कहल जाइत छैक। अनुवर्तते) ९. पाबनि संस्कार तीर्थ डिस्कवरी ऑफ मिथिला १.गौरी-शंकर स्थान- मधुबनी जिलाक जमथरि गाम आऽ हैंठी बाली गामक बीच ई स्थान गौरी आऽ शङ्करक सम्मिलित मूर्त्ति आऽ एहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल पालवंशीय अभिलेखक कारणसँ विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। ई स्थल एकमात्र पुरातन स्थल अछि जे पूर्ण रूपसँ गामक उत्साही कार्यकर्त्ता लोकनिक सहोयोगसँ पूर्ण रूपसँ विकसित अछि। शिवरात्रिमे एहि स्थलक चुहचुही देखबा योग्य रहैत अछि। बिदेश्वरस्थानसँ २-३ किलोमीटर उत्तर दिशामे ई स्थान अछि। २.भीठ-भगवानपुर अभिलेख- राजा नान्यदेवक पुत्र मल्लदेवसँ संबंधित अभिलेख एतए अछि। मधुबनी जिलाक मधेपुर ठानामे ई स्थल अछि। ३.हुलासपट्टी- मधुबनी जिलाक फुलपरास थानाक जागेश्वर स्थान लग हुलासपट्टी गाम अछि। कारी पाथरक विष्णु भगवानक मूर्त्ति एतए अछि। ४.पिपराही-लौकहा थानाक पिपराही गाममे विष्णुक मूर्त्तिक चारू हाथ भग्न भए गेल अछि। ५.मधुबन- पिपराहीसँ १० किलोमीटर उत्तर नेपालक मधुबन गाममे चतुर्भुज विष्णुक मूर्त्ति अछि। ६.अंधरा-ठाढ़ीक स्थानीय वाचस्पति संग्रहालय- गौड़ गामक यक्षिणीक भव्य मूर्त्ति एतए राखल अछि। ७.कमलादित्य स्थान- अंधरा ठाढ़ी गामक लगमे कमलादित्य स्थनक विष्णु मंदिर कर्णाट राजा नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दास द्वारा स्थापित भेल। ८.झंझारपुर अनुमण्डलक रखबारी गाममे वृक्ष नीचाँ राखल विष्णु मूर्त्ति, गांधारशैली मे बनाओल गेल अछि। ९.पजेबागढ़ वनही टोल- एतए एकटा बुद्ध मूर्त्ति भेटल छल, मुदा ओकर आब कोनो पता नहि अछि। ई स्थल सेहो रखबारी गाम लग अछि। १०.मुसहरनियां डीह- अंधरा ठाढ़ीसँ ३ किलोमीटर पश्चिम पस्टन गाम लग एकटा ऊंच डीह अछि।बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली, बौद्धकालीन मूर्त्ति, पाइ, बर्त्तनक टुकड़ी आऽ पजेबाक अवशेष एतए अछि। ११.भगीरथपुर- पण्डौल लग भगीरथपुर गाममे अभिलेख अछि जाहिसँ ओइनवार वंशक अंतिम दुनू शासक रामभद्रदेव आऽ लक्ष्मीनाथक प्रशासनक विषयमे सूचना भेटैत अछि। १२.अकौर- मधुबनीसँ २० किलोमीटर पश्चिम आऽ उत्तरमे अकौर गाममे एकटा ऊँच डीह अछि, जतए बौद्धकालक मूर्त्ति अछि। १३.बलिराजपुर किला- मधुबनी जिलाक बाबूबरही प्रखण्डसँ ३ किलोमीटर पूब बलिराजपुर गाम अछि। एकर दक्षिण दिशामे एकटा पुरान किलाक अवशेष अछि। किला पौन किलोमीटर नमगर आऽ आध किलोमीटर चाकर अछि। दस फीटक मोट देबालसँ ई घेरल अछि। १४. असुरगढ़ किला- मिथिलाक दोसर किला मधुबनी जिलाक पूब आऽ उत्तर सीमा पर तिलयुगा धारक कातमे महादेव मठ लग ५० एकड़मे पसरल अछि। १५.जयनगर किला- मिथिलाक तेसर किला अछि भारत नेपाल सीमा पर प्राचीन जयपुर आऽ वर्त्तमान जयनगर नगर लग। दरभंगा लग पंचोभ गामसँ प्राप्त ताम्र अभिलेख पर जयपुर केर वर्णन अछि। १६.नन्दनगढ़- बेतियासँ १२ मील पश्चिम-उत्तरमे ई किला अछि। तीन पंक्त्तिमे १५ टा ऊँच डीह अछि। १७.लौरिया-नन्दनगढ़- नन्दनगढ़सँ उत्तर स्थित अछि, एतए अशोक स्तंभ आऽ बौद्ध स्तूप अछि। १८.देकुलीगढ़- शिवहर जिलासँ तीन किलोमीटर पूब हाइवे केर कातमे दू टा किलाक अवशेष अछि। चारू दिशि खाइ अछि। १९.कटरागढ़- मुजफ्फरपुरमे कटरा गाममे विशाल गढ़ अछि, देकुली गढ़ जेकाँ चारू कात खधाइ खुनल अछि। २०.नौलागढ़-बेगुसरायसँ २५ किलोमीटर उत्तर ३५० एकड़मे पसरल ई गढ़ अछि। २१.मंगलगढ़-बेगूसरायमे बरियारपुर थानामे काबर झीलक मध्य एकटा ऊँच डीह अछि। एतए ई गढ़ अछि। २२.अलौलीगढ़-खगड़ियासँ १५ किलोमीटर उत्तर अलौली गाम लग १०० एकड़मे पसरल ई गढ़ अछि। २३.कीचकगढ़-पूर्णिया जिलामे डेंगरघाटसँ १० किलोमीटर उत्तर महानन्दा नदीक पूबमे ई गढ़ अछि। २४.बेनूगढ़-टेढ़गछ थानामे कवल धारक कातमे ई गढ़ अछि। २५.वरिजनगढ़-बहादुरगंजसँ छह किलोमीटर दक्षिणमे लोनसवरी धारक कातमे ई गढ़ अछि। २६.गौतम तीर्थ- कमतौल स्टेशनसँ ६ किलोमीटर पश्चिम ब्रह्मपुर गाम लग एकटा गौतम कुण्ड पुष्करिणी अछि। २७.हलावर्त्त- जनकपुरसँ ३५ किलोमीटर दक्षिण पश्चिममे सीतामढ़ी नगरमे हलवेश्वर शिव मन्दिर आऽ जानकी मन्दिर अछि। एतएसँ देढ़ किलोमीटर पर पुण्डरीक क्षेत्रमे सीताकुण्ड अछि। हलावर्त्तमे जनक द्वार हर चलएबा काल सीता भेटलि छलीह। राम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी) आऽ जानकी नवमी (वैशाख शुक्ल नवमी) पर एतए मेला लगैत अछि। २८.फुलहर-मधुबनी जिलाक हरलाखी थानामे फुलहर गाममे जनकक पुष्पवाटिका छल जतए सीता फूल लोढ़ैत छलीह। २९.जनकपुर-बृहद् विष्णुपुराणमे मिथिलामाहात्म्यमे जनकपुर क्षेत्रक वर्णन अछि। सत्रहम शताब्दीमे संत सूर किशोरकेँ अयोध्यामे सरयू धारमे राम आऽ जानकीक दू टा भव्य मूर्त्ति भेटलन्हि, जकरा ओऽ जानकी मन्दिर, जनकपुरमे स्थापित कए देलन्हि। वर्त्तमान मन्दिरक स्थापना टीकमगढ़क महारानी द्वारा १९११ ई. मे भेल। नगरक चारूकात यमुनी, गेरुखा आऽ दुग्धवती धार अछि। राम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी),जानकी नवमी (वैशाख शुक्ल नवमी) आऽ विवाह पंचमी (अगहन शुक्ल पंचमी) पर एतए मेला लगैत अछि। ३०.धनुषा- जनकपुरसँ १५ किलोमीटर उत्तर धनुषा स्थानमे पीपरक गाछक नीचाँ एकटा धनुषाकार खण्ड पड़ल अछि। रामक तोड़ल ई धनुष अछि। एहिसँ पूब वाणगंगा धार बहैत अछि जे लक्ष्मण द्वारा वाणसँ उद्घाटित भेल छल। ३१.सुग्गा-जनकपुर लग जलेश्वर शिवधामक समीप सुग्गा ग्राममे शुकदेवजीक आश्रम अछि। शुकदेवजी जनकसँ शिक्षा लेबाक हेतु मिथिला आयल छ्लाह- एहि ठाम हुनकर ठहरेबाक व्यवस्था भेल छल। ३२.सिंहेश्वर- मधेपुरासँ ५ किलोमीटर गौरीपुर गाम लग सिंहेश्वर शिवधाम अछि। ३३.कपिलेश्वर-कपिल मुनि द्वार स्थापित महादेव मधुबनीसँ ६ किलोमीटर पश्चिमम्,मे अछि। ३४.कुशेश्वर- समस्तीपुरसँ उत्तर ई एकटा प्रसिद्ध शिवस्थान अछि। ३५.सिमरदह-थलवारा स्टेशन लग शिवसिंह द्वारा बसाओल शिवसिंहपुर गाम लग ई शिवमन्दिर अछि। ३६.सोमनाथ- मधुबनी जिलाक सौराठ गाममे सभागाछी लग सोमदेव महादेव छथि। ३७.मदनेश्वर- मधुबनी जिलाक अंधरा ठाढ़ीसँ ४ किलोमीटर पूब मदनेश्वर शिव स्थान अछि। ३८.बसैटी अभिलेख- पूणियाँमे श्रीनगर लग मिथिलाक्षर ई अभिलेख मिथिलाक पहिल महिला शासक रानी इद्रावतीक राज्यकालक वर्णन करैत अछि। एकर आधार पर मदनेश्वर मिश्र ’एक छलीह महारानी’ उपन्यास सेहो लिखने छथि। ३९.चण्डेश्वर- झंझारपुरमे हररी गाम लग चण्डेश्वर ठाकुर द्वारा स्थापितचण्डेश्वर शिवस्थान अछि। ४०.बिदेश्वर-मधुबनी जिलामे लोहनारोड स्टेशन लग स्थित शिवधाम स्थापना महाराज माधवसिंह कएलन्हि। ताहि युगक मिथिलाक्षरमे अभिलेख सेहो एतए अछि। ४१.शिलानाथ- जयनगर लग कमला धारक कातमे शिलानाथ महादेव छथि। ४२.उग्रनाथ-मधुबनीसँ दक्षिण पण्डौल स्टेशन लग भवानीपुर गाममे उगना महादेवक शिवलिंग अछि। विद्यापतिकेँ प्यास लगलन्हि तँ उगनारूपी महादेव जटासँ गंगाजल निकालि जल पिएलखिन्ह। विद्यापतिक हठ कएला पर एहि स्थान पर गना हुनका अपन असल शिवरूपक दर्शन देलखिन्ह। ४३.उच्चैठ छिन्नमस्तिका भगवती- कमतौल स्टेशनसँ १६ किलोमीटर पूर्वोत्तर उच्चैठमे कालिदास भगवतीक पूजा करैत छलाह। भगवतीक मौलिक मूर्त्ति मस्तक विहीन अछि। ४४.उग्रतारा-मण्डन मिश्रक जन्मभूमि महिषीमे मण्डनक गोसाउनि उग्रतारा छथि। ४५.भद्रकालिका- मधुबनी जिलाक कोइलख गाममे भद्रकालिका मंदिर अछि। ४६.चामुण्डा-मुजफ्फर्पुर जिलामे कटरगढ़ लग लक्ष्मणा वा लखनदेइ धार लग दुर्गा द्वारा चण्ड-मुण्डक वध कएल गेल। ओहि स्थान पर ई मन्दिर अछि। ४७.परसा सूर्य मन्दिर- झंझारपुरमे सग्रामसँ पाँच किलोमीटर पूर्व परसा गाममे सढ़े चारि फीटक भव्य सूर्य मूर्त्ति भेटल अछि। ४८.बिसफी- मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी थानामे कमतौल रेलवे स्टेशनसँ ६ किलोमीटर पूब आऽ कपिलेश्वर स्थानसँ ४ किलोमीटर पश्चिम बिसफी गाम अछि। विद्यापतिक जन्म-स्थान ई गाम अछि। एतए विद्यापतिक स्मारक सेहो अछि। ४९.मंदार पर्वत-बांका स्थित स्थलमे मिथिलाक्षरक गुप्तवंशीय ७म् शताब्दीक अभिलेख अछि। समुद्र मंथनक हेतु मंदारक प्रयोग भेल छल। ५०.विक्रमशिला-भागलपुरमे स्थित ई विश्वविद्यालय बौद्ध नालन्दा विश्वविद्यालयक विपरीत सनातन धर्मक शिक्षाक केन्द्र रहल। ५१.मिथिलाक बीस टा सिद्ध पीठ- १.गिरिजास्थान(फुलहर,मधुबनी),२.दुर्गास्थान(उचैठ, मधुबनी),३.रहेश्वरी(दोखर,मधुबनी),४.भुवनेश्वरी स्थान(भगवतीपुर,मधुबनी),५.भद्रकालिका(कोइलख, मधुबनी),६.चमुण्डा स्थान(पचाही, मधुबनी),७.सोनामाइ(जनकपुर, नेपाल),८.योगनिद्रा(जनकपुर, नेपाल)९.कालिका स्थान(जनकपुर स्थान),१०.राजेश्वरी देवी(जनकपुर, नेपाल),११.छिनमस्ता देवी(उजान, मधुबनी),१२.बन दुर्गा(खररख, मधुबनी),१३.सिधेश्वरी देवी(सरिसव, मधुबनी),१४.देवी-स्थान(अंधरा ठाढ़ी,मधुबनी),१५.कंकाली देवी(भारत नेपाल सीमा आऽ रामबाग प्लेस, दरभंगा)१६.उग्रतारा(महिषी, सहरसा), १७.कात्यानी देवी(बदलाघाट, सहरसा),१८.पुरन देवी(पूर्णियाँ),१९.काली स्थान(दरभंगा),२०.जैमंगलास्थान(मुंगेर) १०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि। अभिनव गीतांजलि, हुनकर उच्चकोटिक शास्त्र रचना अछि, जे पाँच भागमे अछि। अपन साहित्यिक वाणी, शाब्दिक रूप जे होइत अछि कोनो संगीत रचनाक, आऽ धातु जे अछि स्वरक लयक रचना आऽ एहि सभ गुणसँ युक्त्त छथि “रामरंग”। रामरंगक बंदिश वा रचनामे अहाँकेँ भेटत स्वर, शब्द आऽ मात्राक लयबद्ध बंधन। पुरान ध्रुपद जेकाँ पद्य आऽ स्वरकेँ ओऽ तेनाकेँ बान्हि दैत छथि, जे दुनू एक दोसरमे मिलि जाइत अछि। हुनकर रचना हुनकर उच्चारणसँ मिलि कए मौलिक तात्त्विक स्थायी भरण, सभ बितैत दिन एकटा नव आत्मनिरीक्षण एकटा नव स्थायी। रामरंगमे संगीतक लाक्षणिक तत्त्व प्रखर होइत छन्हि। संगीतक व्याकरणक सम्पूर्ण पकड़ छन्हि, जाहिसँ उचित शब्दक प्रयोगक निर्णय ओऽ कए पबैत छथि। छन्द शास्त्रक, कोषक, अलंकारक, भावक आऽ रसक वृहत् ज्ञान छन्हि रामरंगकेँ। संगहि स्थानीय संस्कृतिक, विभिन्न भाषाक आऽ ललित कलाक सिद्धान्तक सेहो गहन अध्ययन छन्हि रामाश्रय झा जीकेँ। वादन, गाय आऽ नृत्यक, साधल-कण्ठ, लय-ताल-काल, देशी राग, दोसराक मनसमे जाऽ कए बुझनिहार, नव लय आऽ अभ्व्यक्त्ति, प्रबन्धक समस्त ज्ञान, कम समयमे गीत रचना, विभिन्न मौखिक संरचना निर्माण, आलापक प्रदर्शन आऽ गमक एहि सभटामे पारंगत छथि रामरंग। ११. बालानां कृते-गजेन्द्र ठाकुर बालानां कृते -गजेन्द्र ठाकुर १.मूर्खाधिराज-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी: पिंजराक पक्षी- ज्योति झा चौधरी १.मूर्खाधिराज चित्र: ज्योति झा चौधरी एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओऽ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओऽ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओऽ विवाहो बिसरि गेल। बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओऽ बुझा-सुझाकेँ ओकरा कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओऽ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ। लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल, मुदा बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो। आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओऽ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओऽ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए। आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आऽ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओऽ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आऽ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आऽ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहो होए तँ ओऽ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलकन्हि जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू। बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक, कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओऽ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आऽ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आऽ ओकरा भँगलाहा कपार बला कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाय ओऽ की करत। ओऽ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आऽ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओऽ ओकरा अपन दूध दए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओऽ बच्चा सुस्ताए लागल आऽ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओऽ ओकरा हाट लए गेल आऽ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओऽ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओऽ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू। २. देवीजी: पिंजराक पक्षी चित्र: ज्योति झा चौधरी एकटा शिक्षिका छलीह, जिनका गाम पर सभ देवी जी कहैत छलन्हि। हुनकासॅं सभ विद्यार्थी डेराइतो छल, मुदा सम्मान सेहो करैत छल। एक दिन ओऽ एकटा कक्षामे गेलीह तँ हुनका एकटा छात्र पिंजरामे बंद एकटा सुग्गा देलकन्हि, जकरा 'देवी जी’ बजनाइ सिखा देल गेल छल । ओकरा बजैत सुनि सभ छात्र प्रसन्न भऽ हॅंसऽ लागल। देवीजी ओकरा तत्काल स्वीकार कऽ पढाबऽ मे लागि गेलीह । बादमे ओऽ ओहि बालकसँ पुछलखिन्ह जे '' जौं अहाँकेँ क्यो अपन शौक पूरा करऽ लेल सभसँ अलग कऽ छोट जगह पर बान्हि कऽ राखए तँ केहन लागत। हमरा एहि भेँटसँ कोनो खुशी नहि भेल”। बालककेँ अपन गलतीक अनुभव तुरत भऽ गेलैक। ओऽ तुरत ओहि पक्षीकेँ पिंजरासॅं मुक्त कऽ देलक। अगिला दिन देवी जी सभकेँ पक्षी देखबाक अलग तरीका सिखेलखिन्ह। पाठशालाक प्रांगणक एकान्त स्थान पर एकटा पुरान टेबुल राखि देलखिन्ह। ताहि पर मकई, चाउर, गहुम, अंकुरैल चना, रोटीक टुकड़ा, कटोरीमे पानि आदि राखि देलखिन्ह। सभ क्यो दूर बैसि कऽ प्रतीक्षा करऽ लगलैथ। कनिके देरीमे तरह-तरहक पक्षी ओतए हलचल करय लागल। ई दृष्य सभक लेल ओहि पिंजरामे पक्षी देखबासँ बेसी सुखद छलैक। तखन देवीजी कहलखिन्ह ''असली खुशी दोसराक खुश करबामे छैक। अपन स्वार्थ मात्र लेल दोसराकेँ कष्ट देनाइ पाप कहाइत छैक। सभ बच्चा शपथ लेलक जे आब कोनो पक्षीकेँ पिंजरामे बन्द नहि करत। ------------------------------ बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर पञ्जी प्रबंध पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। संस्कृत श्लोकक अर्थ एवं प्रकारे अछि- *वरक मातृकुलक पुरुषसँ कन्या पाँचम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि।वरक पितृकुलक छठम पीढ़ी धरिक सन्तान नहि होथि। *जे कन्या वरक मातृ कुल ओऽ पितृकुलक सपिण्ड अहि होथि से द्विजाति वरक हेतु उद्वाह कर्मक लेल प्रशस्त। *मातृकुलमे पाँच आऽ पितृकुलमे सात पीढ़ी धरि सपिण्ड रहैछ। कोनो कन्याक छठिक अन्वेषण हेतु ३२ मूलक उतेढ बनाबए पड़ैत छैक। ताहिमे सर्वप्रथम उतेढ़क वाम भागमे कन्याक ग्राम, मूल ग्राम लिखल जाइत छैक। तहिसँ अव्यवहित दहिन भागमे मूल आऽ तकर नीचाँ कन्याक अति वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह, वृद्ध पितामह, प्रपितामह, पितामह आऽ तखन पिताक नामोल्लेख अवरोही क्रमसँ लिखल जाइत छैक। एहि मध्य वृद्ध प्रपितामह पहिल छठि कहओताह, जनिकासँ कन्या छठम स्थानमे पड़ैत छैक। प्रस्तुत उदाहरणमे करमहा मूलक बेहट मूलग्रामक विट्ठो ग्रामवासी (दरभंगा) पीताम्बर झाक पौत्री श्री शशिनाथ झाक पुत्री भौर ग्रामवासी खण्डबला मूलक भौर मूलग्रामक नारायणदत्त ठाकुरक दौहित्री- धरमपुर दरभंगा- क अधिकार दरिहरा मूलक रतौली मूलग्रामक लोहनावासी गोपीनन्द झाक पौत्र श्री कृष्णानन्द झाक बालक करमहा मूलक बेहट मूल ग्रामक बिट्ठो निवासी कन्हैय्या झाक दौहित्रसँ जँचबाक अछि। द्वितीय छठि- (अनुवर्तते) १३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर संस्कृत मिथिला -गजेन्द्र ठाकुर जनक ’वैदेह राजा’ ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह। ऋगवेदमे वर्णन अछि। ओऽ इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध आऽ ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि। पुरोहित गौतम राहूगण ऋगवेदक एकटा महत्त्वपूर्ण ऋषि छथि। शुक्ल यजुरवेदक लेखक रूपमे याज्ञवल्क्य प्रसिद्ध छथि। शतपथ ब्राह्म्णक माथव विदेह आऽ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छाथि आऽ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ देखल जाऽ सकैत अछि। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आऽ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक २ केर समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त आऽ मिथि जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। ’सीरध्वज जनक’ सीताक पिता छथि आऽ एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि। ’कृति जनक’ सीरध्वजक बादक 18म पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह, आऽ जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल आऽ जनक राजवंश समाप्त भए गेल (अश्वघोष-बुद्धचरित आऽ कौटिल्य-अर्थशास्त्र) १४.मैथिली भाषापाक इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। १५. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आऽ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आऽ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आऽ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भए पहुँचैत अछि श्वासमे आऽ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल ’अघोष’ , आऽ नाद प्रकृतिक भेल ’घोषवान्’। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि ’अल्पप्राण’ आऽ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल ’महाप्राण’। कचटतप केर पहिल, तेसर आऽ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आऽ दोसर आऽ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप केर पहिल आऽ दोसर भेल अघोष आऽ तेसर, चारिम आऽ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आऽ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर ओइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आऽ स्वरित। (अनुवर्तते) मैथिलीक मानक लेखन-शैली जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं। पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। ग्राह्य अग्राह्य होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक आ’/आऽ आ क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला बला वला आङ्ल आंग्ल प्रायः प्रायह दुःख दुख चलि गेल चल गेल/चैल गेल देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि चलैत/दैत चलति/दैति एखनो अखनो बढ़न्हि बढन्हि ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ जे जे’/जेऽ ना-नुकुर ना-नुकर केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि तखन तँ तखनतँ जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए की फूड़ल जे कि फूड़ल जे जे जे’/जेऽ कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद इहो/ओहो हँसए/हँसय हँस’ नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस सासु-ससुर सास-ससुर छह/सात छ/छः/सात की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) जबाब जवाब करएताह/करयताह करेताह दलान दिशि दलान दिश गेलाह गएलाह/गयलाह किछु आर किछु और जाइत छल जाति छल/जैत छल पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल जबान(युवा)/जवान(फौजी) लय/लए क’/कऽ ल’/लऽ कय/कए एखन/अखने अखन/एखने अहींकेँ अहीँकेँ गहींर गहीँर धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए जेकाँ जेँकाँ/जकाँ तहिना तेहिना एकर अकर बहिनउ बहनोइ बहिन बहिनि बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ नहि/नै करबा’/करबाय/करबाए त’/त ऽ तय/तए भाय भै भाँय यावत जावत माय मै देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि द’/द ऽ/दए किछु आर शब्द मानक मैथिली_३ तका’ कए तकाय तकाए पैरे (on foot) पएरे ताहुमे ताहूमे पुत्रीक बजा कय/ कए बननाय कोला दिनुका दिनका ततहिसँ गरबओलन्हि गरबेलन्हि बालु बालू चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) जे जे’ से/ के से’/के’ एखुनका अखनुका भुमिहार भूमिहार सुगर सूगर झठहाक झटहाक छूबि करइयो/ओ करैयो पुबारि पुबाइ झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि पएरे-पएरे पैरे-पैरे खेलएबाक खेलेबाक खेलाएबाक लगा’ होए- हो बुझल बूझल बूझल (संबोधन अर्थमे) यैह यएह तातिल अयनाय- अयनाइ निन्न- निन्द बिनु बिन जाए जाइ जाइ(in different sense)-last word of sentence छत पर आबि जाइ ने खेलाए (play) –खेलाइ शिकाइत- शिकायत ढप- ढ़प पढ़- पढ कनिए/ कनिये कनिञे राकस- राकश होए/ होय होइ अउरदा- औरदा बुझेलन्हि (different meaning- got understand) बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) चलि- चल खधाइ- खधाय मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह कैक- कएक- कइएक लग ल’ग जरेनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ होइत गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि चिखैत- (to test)चिखइत करइयो(willing to do) करैयो जेकरा- जकरा तकरा- तेकरा बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ हारिक (उच्चारण हाइरक) ओजन वजन आधे भाग/ आध-भागे पिचा’/ पिचाय/पिचाए नञ/ ने बच्चा नञ (ने) पिचा जाय तखन ने (नञ) कहैत अछि। कतेक गोटे/ कताक गोटे कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई लग ल’ग खेलाइ (for playing) छथिन्ह छथिन होइत होइ क्यो कियो केश (hair) केस (court-case) बननाइ/ बननाय/ बननाए जरेनाइ कुरसी कुर्सी चरचा चर्चा कर्म करम डुबाबय/ डुमाबय एखुनका/ अखुनका लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ कएलक केलक गरमी गर्मी बरदी वर्दी सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ एनाइ-गेनाइ तेनाने घेरलन्हि नञ डरो ड’रो कतहु- कहीं उमरिगर- उमरगर भरिगर धोल/धोअल धोएल गप/गप्प के के’ दरबज्जा/ दरबजा ठाम धरि तक घूरि लौटि थोरबेक बड्ड तोँ/ तूँ तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) तोँही/तोँहि करबाइए करबाइये एकेटा करितथि करतथि पहुँचि पहुँच राखलन्हि रखलन्हि लगलन्हि लागलन्हि सुनि (उच्चारण सुइन) अछि (उच्चारण अइछ) एलथि गेलथि बितओने बितेने करबओलन्हि/ करेलखिन्ह करएलन्हि आकि कि पहुँचि पहुँच जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) से से’ हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) फेल फैल फइल(spacious) फैल होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय फेका फेंका देखाए देखा’ देखाय देखा’ सत्तरि सत्तर साहेब साहब १६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT--- The site near Darbhanga Railway Station, Harahi, meaning in Maithili language, the site of bones is still unclassified and unstudied. The study of primitive castes and tribes of Mithila may however be conducted. As early as the 5th century A. D. several tribes made up the Vajjian Confederacy one of the constituent was Lichhavis, for a long time they were considered as foreign stock Jyotirisvara's Varnaratnkara enumerates various other tribes, namely, Tatama, Dhanukha, Goara, Khatbe, Amata. The Brahmanas did not cross Sadanira. When Malhava reached the Sadanira he asked the Agni, where shall be his abode. Agni replied that to the east of Sadanira. Agni did not burnt the Paurava territory including N. Panchala and the Ayodhya as these were and they remained cultivated regions even in early times which is absurd. 1f it enshrines any historical truth, it might mean that the reformed Brahmanism passed from the Bharata Kingdom to Ayodhya and then to Vidcha. Videha country was following Vedic culture long before the Brahmana age in the early Samhita age of the Rigveda. Yajurveda Samhita mentions the cows of Videha as particularly famous in Ancient India. In Brihadaranyaka Upanishad Samrat Janaka is mentioned as a great patron of Vedic culture and the Videha Brahmanas were superior to the Kuru Panchalas in the Upanishadic phase of the development of Vedic culture. A particular sacrificial rite fire adds, Gautama Rahugana is credited with the discovery of the Mitravinda sacrifice, further revived by Emperor Janaka, through Yajnavalkya. Nami Sapya Vaideha Raja performed elaborate sacrifices and reached heaven, the name of this King appears in several passages in the Rigveda , e.g., Nami was the friend and associate of Indra in quarelling the Asura Namuci and in the fight with Namuci Indra protected Nami Sapya. Maithila Raja learnt the science of fighting with mace from Duryodhana. When the centre of power shifted from the city of Mithila to the city of Vaisali about 34 kms. north of Muzaffarpur, here the Videhan princes formed one of the eight important clans of Vajjian confederacy. During the age of Mauryas Mithila became subject to the suzerainty of Magadh but Lichchhavis were not completely exterminated. Their name ,however, is conscpicious by its absence at the Second Buddhist council held in c 377 B.C or when Asoka installed an uninscribed pillar at this place in 250 B.C. But after two centuries from then Kautilya speaks about Sangha form of government and advises King Chandragupta Maurya of Magadha to seek the help of these Sanghas which, on account of their unity and concord were almost unconquerable. During the age of the Guptas the Lichchhavis appear to have possessed considerable political power in North East India. Chandragupta has Lichehhavi wife Kumaradevi. Chandragupta II ‘s son Govindgupta was the governor appointed over the Province which came to be known as Tirabhukti. Excavations at Basarh, the ancient site of Vaisali have yielded a hundred and twenty varieties of seals, and a variety of coins of the Gupta Age. The seals are those of Officials, which were attached to the governors or chiefs of that district residing at Vaisali. The number of seals attached to letters sent by merchants and bankers, point to the large commercial transactions that were conducted in these days between the chiefs and important traders from Patliputra and other cities. It seems that a chamber of commerce like institution was in force. (c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। (c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। 'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आऽ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 63 Videha ’विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १५ जून २००८ (वर्ष १ मास ६ अंक १२) http://www.videha.co.in/मानुषीमिह संस्कृताम्
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