'विदेह' १५ जुलाई २००८ ( वर्ष १ मास ७ अंक १४ ) एहि अंकमे अछि:- श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' (१९२८- ) प्रसिद्ध ' अभिनव भातखण्डे' केर जीवन आऽ कृतिक विषयमे विस्तृत निबंधक अगिला भाग विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभमे। गजेन्द्र ठाकुर द्वारा लेल गेल साक्षात्कार सहित। .संपादकीय २.संदेश: १. नाटक नो एंट्री: मा प्रविशश्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ' रहल अछि। सर्वप्रथम विदेहमे एकरा धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित कएल जा रहल अछि। पढ़ू नाटकक चारिम कल्लोलक पहिल खेप। महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना 'विदेह' द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। एहिसँ संबंधित नवीनतम सूचना पाठककेँ 'विदेह'क सूचना-सम्पर्क-अन्वेषण स्तंभमे भेटैत रहतन्हि। नो एन्ट्री मा प्रविश (४ अकीय मैथिली नाटक) (c) श्री उदय नारायण सिंह "नचिकेता" प्रकाशक: श्रुति पब्लिकेशन (एहि पुस्तकक ISBN No. शीघ्र 'विदेह'क सूचना-सम्पर्क-अन्वेषण स्तंभमे देल जायत) २. गद्य - अ.१. कथा कनियाँ-पुतरा-श्री सुभाष चन्द्र यादव २. प्रबन्ध- डॉ पालन झा (साहेब रामदास) आ. आध्यात्म-श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप २. दैनिकी- ज्योति इ. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ) ईशोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ) संगमे श्री मायानन्द मिश्रजीसँ डॉ शिवप्रसाद यादवजी द्वारा लेल गेल साक्षात्कार। ३. पद्य विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी,गजेन्द्र ठाकुर श्री गंगेश गुंजन ज्योति झा चौधरी महाकाव्य महाभारत (आगाँ) ४.. संस्कृत मैथिली शिक्षा(आगाँ) श्री आद्याचरण झा ५. मिथिला कला(आगाँ) ६.पाबनि-संस्कार- तीर्थ -पंचदेवोपासक भूमि मिथिला--डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ रक्षा-बन्धनपर विशेषनूतन झा (मिथिलाक पाबनि-तिहारक कैलेंडर) ७. संगीत शिक्षा -श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' ८. बालानां कृते- १.नैका बनिजारा २. देवीजी (भाग तीन) ९. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी ) १०. संस्कृत मिथिला ११. पोथी समीक्षा: पंकज पराशर: समयकेँ अकानैत १२.मैथिली भाषापाक १३. रचना लेखन (आगाँ) 14. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 1.Videha Mithila Tirbhukti Tirhut... 2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by Jyoti महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ' रहल अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर मैथिली-अंग्रेजी आऽ अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश (संपादक गजेन्द्र ठाकुर आऽ नागेन्द्र कुमार झा) प्रकाशित करबाओल जा' रहल अछि। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना 'विदेह' द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। नो एन्ट्री मा प्रविश (४ अकीय मैथिली नाटक) (c) श्री उदय नारायण सिंह "नचिकेता" प्रकाशक: श्रुति पब्लिकेशन (एहि पुस्तकक ISBN No. शीघ्र देल जायत) महत्त्वपूर्ण सूचना (५): मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) संस्था द्वारा ६ अगस्त २००८ केँ श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ साढ़े छ बजेसँ राति ९ बजे धरि मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोन भए रहल अछि। फेर ७ सितम्बर २००८ केँ मिथिलांगन संस्था द्वारा श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ पाँच बजेसँ मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोजन होएत। विदेह (दिनांक १५ जुलाई २००८) १.संपादकीय २.संदेश १.संपादकीय वर्ष: १ मास: ७ अंक:१४ मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक १४, दिनांक १५ जुलाई सन् २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अंकमे नचिकेताजीक नाटक नो एंट्री: मा प्रविश चारिम कल्लोलक पहिल खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। गगेश गुंजन जीक पद्य आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री सुभाषचन्द्र यादव, श्री पालन झा आऽ श्री आद्याचरण झा जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर पहिल भाग सेहो प्रस्तुत अछि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर ३८९, पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०.फैक्स:०११-४१७७१७२५ ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व। ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- "विदेह"क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। १. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे। १९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आऽ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) चारिम कल्लोलक पहिल खेप जारी....विदेहक एहि चौदहम अंक १५ जुलाई २००८ सँ। नो एंट्री : मा प्रविश चारिम कल्लोल पहिल खेप चतुर्थ कल्लोल [जेना-जेना मंच पर प्रकाश उजागर होइत अछि त’ देखल जायत जे यमराज चित्रगुप्तक रजिष्टर केर चेकिंग क’ रहल छथि। आ बाँकी सब गोटे सशंक चित्र लए ठाढ़ छथि। किछुये देर मे यमराजक सबटा ‘चेकिंग’ भ’ जाइत छनि। ओ रजिष्टर पर सँ मुड़ी उठौने अपन चश्मा केँ खोलैत नंदी केँ किछु इशारा करैत छथि।] नंदी : (सीना तानि कए मलेट्रीक कप्तान जकाँ उच्च स्वरमे) सब क्यो सुनै.... भृंगी : (आर जोर सँ) सुनू....सुनू...सनू- उ-उ-उ ! नंदी : (आदेश करैत छथि) “आगे देखेगा....! आगे देख !” (कहैत देरी सब क्यो अगुआ कए सचेत भेने सामने देखै लागैत छथि ; मात्र यमराज आ चित्रगुप्त विश्रान्तिक मुद्रा मे छथि।) भृंगी : (जे एक-दू गोटे भूल क’ रहल छथि हुनका सम्हारैत छथि---) ‘हे यू ! स्टैंड इरेक्ट... स्टैंड इन आ रो !’ (जे कनेको टेढ़-घोंच जकाँ ठाढ़ो छलाह, से सोझ भ’ जाइत छथि, सचेत सेहो आ लगैछ जेना एकटा दर्शक दिसि मुँह कैने ठाढ़ पंक्ति बना नेने होथि।) नंदी : (पुनः सेनाकेँ आदेश देबाक स्वर मे) सा-व-धा-न! (सब क्यो ‘सावधान’ अर्थात् ‘अटेनशन’ केर भंगिमा मे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) वि-श्रा-म! (सब क्यो ‘विश्राम’ क अवस्थामे आबि जाइत छथि।) भृंगी : (दहिना दिसि ‘मार्च’ क’ कए चलबाक आदेश दैत) दाहिने मुड़ेगा--दाहिने मोड़ ! (सभ क्यो तत्क्षण दहिना दिसि घुरि जाइत छथि।) नंदी : (आदेश करैत) आगे बढ़ेगा ! आ-गे-ए-ए बढ ! (सब क्यो बढ़ि जाइत छथि।) एक-दो-एक-दो-एक-दो-एक ! एक ! एक ! [सब गोटे मार्च करैत मंचक दहिना दिसि होइत यमराज-चित्रगुप्त केँ पार करैत संपूर्ण मंचक आगाँ सँ पाछाँ होइत घुरि बाम दिसि होइत पुनः जे जतय छल तत्तहि आबि जाइत छथि। तखनहि भृंगीक स्वर सुनल जाइछ ‘हॉल्ट’ त’ सब थम्हि जाइत छथि.... नहि त’ नंदी एक - दो चलिये रहल छल।] चित्रगुप्त : (सभक ‘मार्च’ समाप्त भ’ गेलाक बाद) उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सँ हम कहै चाहैत छियनि जे एत’ उपस्थित सब क्यो एकटा मूल धारणाक शिकार भेल छथि—सभक मोन मे एकटा भ्रम छनि जे पृथ्वी पर सँ एतय एक बेरि आबि गेलाक मतलबे इयैह जे आब ओ स्वर्गक द्वार मे आबि गेल छथि। आब मात्र प्रतीक्षा करै पड़तनि... धीरज ध’ लेताह आ तकर बादे सभकेँ भेटतनि ओ पुरस्कार जकरा लेल कतेको श्रम ,कतेको कष्ट—सबटा स्वीकार्य भ’ जाइछ। नेताजी : (आश्चर्य होइत) तखन की ई सबटा भ्रम मात्र छल, एकटा भूल धारणा छल---जे कहियो सत्य भ’ नहि सकैत अछि ? चित्रगुप्त : ठीक बुझलहुँ आब---ई सबटा भ्रम छल। नंदी : सपना नहि... भृंगी : मात्र बुझबाक दोष छल... वामपंथी : तखन ई दरबज्जा, दरबज्जा नहि छल....किछु आन वस्तु छल....? चित्रगुप्त : ई दरबज्जा कोनो माया- द्वार नहि थिक....आई सँ कतेको युग पहिने ई खुजतो छल, बंदो होइत छल...! नेताजी : मुदा आब? अनुचर 1 : आब ई नञि खुजैत अछि की ? अनचर 2 : जँ हम सब सामने जा कए तारस्वर मे पुकारि- पुकारि कए कही—‘खुलि जो सिमसिम्’ तैयहु नहि किछु हैत! नंदी : ई कोनो ‘अलीबाबा चालीस चोर’ क खिस्सा थिक थोड़े… भृंगी : आ ई कोनो धन-रत्नक गुफा थिक थोड़े ! वामपंथी : त’ ई दरबज्जाक पाछाँ छइ कोन चीज ? नेता : की छइ ओहि पार ? अनुचर 1 : मंदाकिनी ? अनुचर 2 : वैतरिणी ? अभिनेता : आ कि बड़का टा किला जकर सबटा कोठरी सँ आबि रहल हो दबल स्वरेँ ककरहु क्रन्दनक आहटि...नोर बहाबैत आत्मा सब...! चोर : आ कि एकटा नदी-किनारक विशाल शमशान - घाट,जतय जरि रहल हो हजारक हजार चिता...हक्कन कानैत आत्मीय जन...? बाजारी : नहि त’ भ’ सकैछ एकटा बड़का बजारे छइ जतय दिन-राति जबरदस्त खरीद-बिक्री चलि रहल हो। भिख-मंगनी : इहो त’ भ’ सकैछ जे घुरिते भेटत एकटा बड़का टा सड़क बाट काटैत एकटा आन राजपथक आ दुनूक मोड़ पर हाथ आ झोरा पसारैत ठाढ़ अछि लाखो लोग- भुखमरी, बाढ़ि , दंगा फसाद सँ उजड़ल उपटल लोग.... रद्दीवला : नञि त’ एकटा ब-ड़-की टा केर ‘डम्पिंग ग्राउंड’ जतय सबटा वस्तु व्यवहार क’ क’ कए लोग सब फेकै जाय होइक—रद्दी सँ ल’ कए जूठ-काँट, पुरनका टूटल भाँगल चीज सँ ल’ कए ताजा बिना वारिसक लहास... प्रेमिका : कि आयातित अवांछित सद्यः जनमल कोनो शिशु... प्रेमी : कन्या शिशु, हजारोक हजार, जकरा सबकेँ भ्रुणे केँ कोखिसँ उपारि कए फेंकल गेल हो... वामपंथी : अथवा हजारो हजार बंद होइत कारखानाक बजैत सीटी आ लाखो परिवारक जरैत भूखल-थाकल चूल्हि-चपाटी.... नेताजी : ई त’ अहीं जानै छी जे दरबज्जाक ओहि पार की छइ... हम सब त’ मात्र अन्दाजे क’ सकै छी जे भरिसक ओम्हर हजारोक हजार अनकहल दुःखक कथा उमड़ि-घुमड़ि रहल छइ अथवा छइ एकटा विशाल आनन्दक लहर जे अपनाकेँ रोकि नेने होइक ई देखबाक लेल जे दरबज्जा देने के आओत अगिला बेरि... चित्रगुप्त : ई सबटा एक साथ छैक ओहि पार, ठीक जेना पृथ्वी पर रचल जाय छइ स्वर्ग सँ ल’ कए नर्क - सबटा ठाम ! जे क्यो नदीक एहि पार छइ तकरा लागै छइ ने जानि सबटा खुशी भरिसक छइ ओहि पार ! नंदी : भरिसक नीक जकाँ देखने नहि हैब ओहि दरबज्जा आ देबार दिसि ! भृंगी : एखनहु देखब त’ ऊपर एकटा कोना मे लटकि रहल अछि बोर्ड—“नो एन्ट्री!” नेताजी : (आश्चर्य होइत) आँय! (सब क्यो घुरि कय दरबज्जा दिस दैखैत छथि) सब क्यो : “नो एंट्री ?” (प्रकाश अथवा स्पॉट-लाइट ओहि बोर्ड पर पड़ैत अछि) नेताजी : ई त’ नञि छल पता ककरहु.. नहि त’... चित्रगुप्त : नहि त? नेताजी : (विमर्ष होइत) नहि त’....पता नहि....नहि त’ की करितहुँ.... वामपंथी : मुदा आब ? आब की हैत ? अभिनेता : आब की करब हम सब ? नेता : आब की हैत ? (चित्रगुप्त किछु नहि बाजैत छथि आ नंदी-भृंगी सेहो चुप रहैत छथि । एक पल केर लेल जेना समय थम्हि गेल होइक।) अनुचर 1 : यमराजेसँ पूछल जाइन ! अनुचर 2 : (घबड़ा कए) के पूछत गय ? अहीं जाउ ने ! (केहुँनी सँ ठेलैत छथि।) अनुचर 1 : नञि-नञि.... हम नञि ? (पछुआ अबैत छथि।) अनुचर 2 : तखन नेताजीए सँ कहियनि जे ओ फरिछा लेथि ! अनुचर द्वय : नेताजी ! (नेताजीकेँ घुरि कए देखैते देरी दुनू जेना इशारा क’ कए कहैत होथि पूछबा दय। नेताजी : (विचित्र शब्द बजैत छथि- कंठ सूखि जाइत छनि) ह..ह...! [नेताजी किछु ने बाजि पबैत छथि आ ने पुछिए सकैत छथि। मात्र यमराजक लग जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज रजिष्टर मे एक बेरि दैखैत छथि, एक बेरि नेताजी दिस] यमराज : बदरी विशाल मिसर ! नेताजी : (जेना कठघरामे ठाढ़ अपन स्वीकारोक्ति दैत होथि) जी ! यमराज : आयु पचपन ! नेताजी : (अस्पष्ट स्वरेँ) साढ़े तिरपन ! नंदी : असली उमरि बताउ ! भृंगी : सर्टिफिकेट-बला नञि ! नेताजी : जी पचपन ! यमराज : जन्म भाद्र मासे, कृष्ण पक्षे, त्रयोदश घटिका, षड्-त्रिशंति पल, पंचदश विपल... जन्म-राशि धनु...लग्न-वृश्चिक, रोहिणी नक्षत्र, गण-मनुष्य, योनि-सर्प, योग-शुक्ल, वर्ग मार्जार, करण- शकुनि! [जेना-जेना यमराज बाजैत चलि जाइत छथि—प्रकाश कम होइत मंचक बामे दिसि मात्र रहैत अछि जाहि आलोक मे यमराज आ मुड़ी झुकौने नेताजी स्पष्ट लखा दैत छथि। बाँकी सभक उपर मद्धिम प्रकाश। नंदी यमराजक दंड केँ धैने हुनकर पाछाँ सीना तानि कए ठाढ़ छथि, भृंगी टूल पर पोथीक विशेष पृष्ठ पर आँगुर रखने रजिष्टरकेँ धैने छथि। चित्रगुप्त लगे मे ठाढ़ छथि, यमराजक स्वर मे धीरे-धीरे जेना प्रतिध्वनि सुनल जाइत छनि-एना लागि रहल हो।] नेताजी : जी ! यमराज : (हुंकार दैत) अहाँ केँ दैखैत छी ‘शश योग’ छैक...(श्लोक पढ़ैत छथि अथवा पाछाँ सँ प्रतिध्वन्त स्वरेँ ‘प्रि रिकॉर्डेड’ उच्चारण सुनल जाइत अछि-) “भूपो वा सचिवो वनाचलरतः सेनापतिः क्रकूरधीःधातोर्वाद-विनोद-वंचनपरो दाता सरोषेक्षणः। तेजस्वी निजमातृभक्तिनिरत: शूरोऽसितांग सुखी जातः सप्ततिमायुरेति शशके जारक्रियाशीलवान् अर्थात—नेता बनब त’ अहाँक भागमे लिखल अछि आ सदिखन सेवक आ अनुचर-अनुयायी सँ घेरल रहब सेहो लिखल अछि.... छोट-मोट अन्याय नहि कैने होइ—से नहि...मुदा बहुत गोटे अहाँक नाम ल’ कए अपराध करै जाइ छल—से बात स्पष्ट। वैह जे कतेको जननेता केँ होइ छनि..कखनहु देखियो कए अनठा दैत छलहुँ। बाजै मे बड़ पटु छी से त’ स्पष्टे अछि.. मुदा ई की देखि रहल छी—नुका चोरा कए विवाहक अतिरिक्तो प्रेम करबा दय.. सत्ये एहन किछु चलि रहल अछि की?” नेता : (स्पष्टत: एहन गोपनीय बात सब सुनि कए अत्यंत लज्जित भ’ जाइत छथि। हुनक दुनू बगल मे ठाढ़ दुनू अनुचर अकास दिसि मूड़ी उठा कए एम्हर-ओम्हर देखै लागै छथि जेना ओसब किछु नहि सुनि रहल छथि) नहि...माने ..तेहन किछु नहि.. चित्रगुप्त : (मुस्की दैत) मुदा कनी-मनी...?.नहि? नेता : हँ, वैह.... बुझू जे... यमराज : सब बुझि गेलहुँ.... चित्रगुप्त : मुदा ओ कहै छथि हुनकर उमर भेलनि पचपन और शश-योग कहै छइ जीवित रहताह सत्तरि सँ बेसी उमरि धरि तखन ? यमराज : तखन बात त’ स्पष्ट जे समय सँ पहिनहि अहाँ कोनो घृण्य राजनैतिक चक्रांतक शिकार बनैत एतय पठाओल गेल छी। (मोटका रजिष्टर केँ बन्न करैत छथि--) नेता : तकर माने ? यमराज : तकर माने ठीक तहिना जेना एहि चारि गोट सैनिक केँ एत’ ऐबाक आवश्यकता नहि छल... ओहो सब अहीं जकाँ .. माने इयैह जे अहाँ मुक्त छी, घुरि सकै छी राजनीतिक जगत मे... एतय कतारमे ठाढ़ रहबाक कोनो दरकारे नहि... नेता : आँय ! (कहैत देरी दुनू अनुचर आनन्दक अतिरिक्त प्रकाश करैत हुनका भरिपाँज पकड़ि लैत छथि। संगहि कनेक देर मे नारेबाजी सेहो शुरू क दैत छथि।) [नेताजीक आगाँ दूटा सैनिक सेहो मंच सँ निष्क्रांत होइत छथि।] यमराज : (नेताजीक संगहि खिसकि जा रहै चाहै छथि से देखि कए, दुनू अनुचर सँ) अहाँ सभ कत’ जा रहल छी ? (दुनूक पैर थम्हि जाइत छनि।) की ? नहि बाजलहुँ किछु ? अनुचर 1 : आ.. जी.. हम सब..नेताजी... जा रहल छथि तैं... यमराज : कोनो तैं-वैं नहि चलत..(घुरि कए) चित्रगुप्त ! चित्रगुप्त : जी ? यमराज : नीक जकाँ उल्टा-पुल्टा कए, देखू त’ रजिष्टर मे हिनका सब दय की लिखल छनि... चित्रगुप्त : जी !....(अनुचर 1 केँ देखा कए) राजनीतिक जगतमे बदरी विशाल बाबू जतेक मार-काट कैने- करौने छथि—से सबटा हिनके दुनूक कृपासँ होइ छलनि.... अनुचर 1 : (आपत्ति जताबैत) नहि... माने... यमराज : (डाँटैत) चोप! कोनो-माने ताने नहि... चित्रगुप्त : (आदेश दैत) सोझे भुनै केर कड़ाही मे ल’ जा कए फेंकल जाय ! (कहैत देरी नंदी आ भृंगी अनुचर 1 आ अनुचर 2 केँ दुनू दिसि सँ ध’ कए बाहर ल’ जाइत छथि—ओम्हर बाँकी मृत सैनिक मे सँ दू गोटे हिनका ल’ कए आगाँ बढ़ैत छथि आ नंदी-भृंगी अपन-अपन स्थान पर घुरि आबैत छथि।) प्रेमी युगल : (दुनू आर धीरज नहि राखि पबैत छथि) आ हम सब ? प्रेमी : हमरा दुनूकेँ की हैत ? प्रेमिका : ई हमरा कतेको कालसँ घुरि चलबा लेल कहैत छलाह... मुदा हमही नहि सुनि रहल छलियनि ! प्रेमी : की एहन नहि भ’ सकैत अछि जे..... बाजारी : (आगाँ बढ़ैत) हे.... हिनका दुनू केँ अवश्य एकबेर जिनगी देबाक मौका देल जाइन... चित्रगुप्त : से कियै ? बाजारी : देखू...एत त’ हम कन्यादान क’ कए विवाह करबा देलियनि... मुदा वस्तुतः त’ ई दुनू गोटे अपन-अपन परिवारक जे क्यो अभिभावक छथि तनिका सभक आशीर्वाद नहि भेटि सकलनि। भद्र व्यक्ति 2 : ...आ तैं दुनू गोटे निश्चित कैने छलाह जे जीयब त’ संगहि आ मरब त’ संगहि..मुदा आब त’ हम सब विवाह कैये देने छी... बाजारी व्यक्ति : तैं हमरा लगैछ जे दुनू परिवारो आब मानि लेताह... भद्र व्यक्ति 1 : भ’ सकैछ आब पश्चातापो क’ रहल छथि। यमराज : बड़ बेस... चित्रगुप्त : आ जँ एखनहु अक्खड़ दैखौता त’ अहाँ सब हुनका लोकनिकेँ समझा बुझा’ सकबनि कि नहि ? भद्र व्यक्ति 1,2 : अवश्य...अवश्य ! यमराज : बेस... तखन (नंदी-भृंगीकेँ) एहि दुनू बालक-बालिका आ हिनका दुनूक एतहुका अभिभावक लोकनिकेँ रस्ता देखा दियन्हु... [नंदी-भृंगी प्रेमी-प्रेमिका आ ओहि तीनू गोटेकेँ (दुनू भद्र व्यक्ति आ बाजारी वृद्धकेँ) रस्ता देखा कए बाहर ल’ जाइत छथि...पाछू-पाछू ढोल-पिपही बजा कए ‘मार्च’ करैत बाहर ल’ जाइत छथि। तखन रहि जाइत छथि जेसब ताहि सबमे सँ अभिनेता अगुआ आबै छथि।] चित्रगुप्त : (जेना यमराज केँ अभिनेताक परिचय द’ रहल छथि) ई विवेक कुमार भेलाह... (नंदी सँ) पृष्ठ पाँच सौ अड़तीस... अभिनेता : (आश्चर्य-चकित होइत, चित्रगुप्त सँ) अहाँ केँ हमर पृष्ठो मोन अछि...करोड़ो मनुक्खमे....? ई त’ आश्चर्यक गप्प भेल... चित्रगुप्त : एहि मे अचरजक कोन बात? एतेक किछु करैत रहैत छी जे बेरि-बेरि ओहि पृष्ठ पर ‘एन्ट्री’ करै-टा पड़ै अछि...तैं..... नंदी : (जेना घोषणा क’ रहल होथि...) पृ. 538, विवेक कुमार उर्फ.....? अभिनेता : (टोकैत) हे कथी लय दोसर-दोसर नाम सब लै जाइ छी ? बड़ मोसकिल सँ त’ अपन जाति-पाति केँ पाछाँ छोड़ा सकल.... आ तखन एत्तहु आबि कए....? चित्रगुप्त : आगाँ बढ़’! नाम छोड़ि दहक ! नंदी : आगाँ रिकार्ड त’ ई कहै अछि जे ओना ई छलाह त’ बड्ड मामूली व्यक्ति, तखन अपन कुशलता सँ, आओर सौभाग्यो सँ, पहुँचि गेल छथि शिखर पर... पाइ बहुत कमौलनि.. (झुकि कए नीक जकाँ रजिष्टर मे सँ पढ़ैत...) दान-ध्यान सेहो कैने छथि... ततबा नहि जतबा क’ सकैत छलाह अनेक महिला सँ हिनक नाम केँ जोड़ल जाइ छनि...अफवाहि केँ अपने पसिन्न करै छथि... एहि मामलामे बदनामे रहलाह... आ तैं पारिवारिक जीवन सुखद नहि छलनि... निःसंतान छथि, पत्नीकेँ त्यागि देताह ताहिसँ पहिनहि वैह छोड़ि कए चलि गेलीह...वस्तुतः पत्नीक कहब छलनि ई असलमे नपुंसक छलाह... अभिनेता : (नंदी केँ थम्हबैत) की सभक सामने अंट-संट पढ़ि रहल छी पोथासँ ? पत्नी छोड़ि कए चलि गेलीह… नीक कैलीह, एखन सुखी छथि एकटा अधेड़ उमरक नवयुवकक संगे.... मीडिया बला सभसँ पाइ भेटलनि आ कि कहानी बनबै लगलीह... ‘अफसाना’.... जे बिकत बड्ड बेसी। चित्रगुप्त : से ओ सब जाय दहक ...ई कह आर कोन विशेष बात सभ दर्ज छैक.. भृंगी : (ओहो झुकि कए देखि रहल छलाह रजिष्टर मे, आब रहल नहि गेलनि---) हिनक जत्तेक मित्र छनि, शत्रुक संख्या ताहिसँ बहुत गुना बेसी छनि। यमराज : से त’ स्वाभाविके..... भृंगी : हिनक शत्रुपक्ष कहैत अछि ई नुका–चोरा कए कतेको वामपंथी गोष्ठी केँ मदति करैत छलाह.... बहुतो ताहि तरहक संगठन केँ .... वामपंथी : (प्रतिवादक स्वरमे) कथमपि नहि... ई सब फूसि बाजि रहल छी अहाँसब.... भृंगी : बाजि कहाँ रहल छी यौ कामरेड? हम त’ मात्र पढ़ि रहल छी--! वामपंथी : हिनका सन ‘बुर्जोआ’ गोष्ठीक सदस्य कखनहु करत गै मदति कोनो साम्यवादीक ? असंभव ! अभिनेता : कियै ? साम्यवाद पर अहींसभक जन्मसिद्ध अधिकार छै की ? आन क्यो ‘साम्य’ क कल्पना नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : (व्यंग्यात्मक स्वरें) कियैक नहि ? कल्पनाक घोड़ा पर के लगाम लगा सकैत अछि ? करू, जतेक मर्जी कल्पना करै जाऊ ! मुदा हम सब छी वास्तविक जगत् मे वास्तव केँ भोगि रहल छी... अभिनेता : वास्तवमे भोगी छी अहाँ सब, भोगक लालसा मे ‘साम्य’ दय गेलहुँ बिसरि ‘वाद’टा मोन रहल ... वाद-विवाद मे काज मे आबैत अछि....! चित्रगुप्त : वाद-विवाद सँ काज कोन ? कहबाक तात्पर्य ई जे विवेक कुमार जीक विवेक भरिसक बड़ बेसी काज करैत छनि...तैं..... यमराज : (गंभीर मुद्रामे) हुम्-म्-म् ! (नंदी सँ) तखन देखै छी विपक्ष सँ बैसी सपक्षे मे सबटा पढ़ि रहल छी... चित्रगुप्त : तकर अलावे ...ई हिनक अकाल आगमन थिकनि.... स्टंटमैनक बालक छल अस्वस्थ, गेल छल छुट्टी ल’ क’ अपन घर... त’ ई अपनहि स्टंट करै लगलाह... अभिनेता : (बिहुँसैत) कनियें टा चूक भ’ गेलैक कि पहाड़ी पर सँ खसि पड़लहुँ.... यमराज : कनिये-कनिये भूल-चूक मे बदलि जाइत अछि इतिहास आ पुराण...सबटा पुण्य बहा जाइत अछि तनिके पापसँ ! मुदा जे हो (नंदी सँ) हिनका एखनहुँ अनेक दिन जीबाक छनि.. पठा दियौक पृथ्वी पर... वामपंथी : (अगुआ कए) आ हम ? हमर की हैत ? (एक बेरि यमराज तँ एक बेरि चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि। मात्र भृंगी ससम्मान अभिनेताकेँ बाहर पहुँचाबै जाइत छथि।) यमराज : अहाँक कथा मे तँ स्वर्ग-नर्क कोनो टा नहि अछि...ने छी हम आ ने चित्रगुप्त... वामपंथी : जी, से त’...(कहै जाइत छलाह ‘अवश्य !’ मुदा ताहि सँ पहिनहि टोकल जाइत छथि।) चित्रगुप्त : सैह जखन बात छैक त’ अहाँ अपने विचार करू अपन भविष्य....(पॉकिट सँ एकटा मुद्राकेँ ‘टॉस’ करबाक भंगिमा मे.....) कहु की कहै छी ‘चित’ की ‘पट’? वामपंथी : हमर विश्वास आ हमर शिक्षा किछु आने तरहक छल, मुदा जे प्रत्यक्ष क’ रहल छी (कहैत देवार....यमराज...चित्रगुप्त आदि केँ देखाबैत छथि) तकरे अस्वीकार कोना करू ? यमराज : कियैक ? ईहो त’ भ’ सकैछ जे आँखि धोखा द’ रहल अछि...ई सबटा एकटा दुःस्वप्न मात्र थिक... कल्पलोक मात्र थिक...ई, जतय घुसै जायब त’ देखब बोर्ड पर टांगल अछि---‘नो एन्ट्री’! वामपंथी : तखन ? चित्रगुप्त : तखन की ? वामपंथी : तखन हम की करू ? यमराज : (गंभीर मुद्रामे) पहिने ई कहू... विषम के थिक ? मनुक्ख कि प्रकृति ? वामपंथी : दुनू... यमराज : के कम के बेसी ? वामपंथी : प्रकृति मे तैयहु कत्तहु ‘प्राकृतिक न्याय’ (नैचरल जस्टिस) काजक’ रहल अछि, मुदा मनुक्खक स्वभावक आधारे अन्याय पर ठाढ़ अछि... यमराज : की अहाँक राजनीति एहन अन्याय केँ दूर नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : प्रयास करैत अछि... यमराज : ठीक अछि... तखन हिनको तीनू गोटे केँ नेने जाऊ ! (चोर उचक्का आ पॉकिट-मारक दिसि देखा क’ बाजैत छथि) आ देखू हिनका सब केँ बदलि सकै छी वा नहि ? वामपंथी : बेस.... [कहैत पॉकिट-मार आ उचक्का हुनका लग चलि आबै छथि। चोर कनेक इतस्ततः करैत छथि आ अंत मे पूछि दैत छथि जाय सँ पूर्व…] चोर : तखन एहि सँ आगाँ ? यमराज-चित्रगुप्त-नंदी : (एक्कहि संग) ‘नो एनट्री’... [कहैत देरी तीनू गोटे केँ साथ ल’ कए वामपंथी युवा वाहर जैबाक लेल उद्यत होइत छथि कि तावत् अभिनेता केँ छोड़ि कए भृंगी घुरि कए मंच पर प्रवेश क’ रहल छलाह।] यमराज : मा प्रविश.... चित्रगुप्त : कदाचन! [चारू गोटे एक पलक लेल चौंकैत थम्हैत छथि ....तकर बादे निष्क्रांत होइत छथि। हुनका सभक प्रस्थानक पाछाँ भृंगी आगाँ बढ़ैत छथि यमराजक दिसि।] (क्रमश:) गद्य अ.१.कथा सुभाषचन्द्र यादव २.प्रबन्ध (साहेबरामदास-डॉ.पालन झा) आ.१. मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध २.दैनिकी ज्योति इ. सहस्रबाढ़नि ई. शोध लेख संगहि मायानन्द मिश्रजीसँ डॉ शिवप्रसाद यादव जीक लेल गेल साक्षात्कारक पहिल भाग १. कथा- श्री सुभाषचन्द्र यादव २. प्रबन्ध डॉ. पालन झा (साहेब रामदास) १.श्री सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। सम्प्रति अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। छह टा पोथी प्रकाशित। मैथिलीमे लगभग सत्तरिटा कथा प्रकाशित। मिथिली, बंगला तथा अंग्रेजीमे परस्पर अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी मैथिली परामर्श-मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकार सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। कथा कनियाँ-पुतरा जेना टांग छानै छञि, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँजमे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटकि गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बामे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाकि कऽ चूर भऽ गेल रहय। कनियें काल पहिने नीचेमे कहुना बैठल आऽ बैठलो नञि गेलए तऽ लटकि गेल। डिब्बामे पएर रोपएके जगह नञि छञि। लोग रेड़ कऽ चढ़ए-ए, रेड़ कऽ उतरए-ए। धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानए छै। सबहक जी व्याकुल छञि। लोग छटपटा रहल-ए। हम अपनो घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही। ठाढ़ भेल-भेल पएरमे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ। तखैनियें दू टा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल। तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससरि कऽ हमरा लग चलि आयल। पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल। फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटकि गेल। जखनि ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहिमे लटकल रहय। ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ। ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छञि। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगलमे नीचेमे बैठल औंधा रहल छञि। ऊ जे टांग छानने अछि, से हमरा बिदागरी जकाँ लागि रहल-ए। जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छानि लञि छञि, तेहने सन। ने ऊ, कानञि-ए, ने हम कानञि छी। लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-ए। हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी। होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नञि जाइ। हाथ ससरि जाइ छञि तऽ ऊ फेर टांग पकड़ि लञि-ए। लड़की दुबड़-पातर आऽ पोरगर छञि। हाथमे घड़ी। प्लास्टिकक झोरामे राखल मोबाइल। लागै छञि नौ-दस सालक रहय। मगर कहलक जे बारह सालके अछि। सतमामे पढ़ै-ए आऽ ममिऔत भाइक बियाहमे जा रहल-ए। बेर-बेर जे हाथ ससरि जाइत रहए से आब ऊ हमर ठेंहुन पर मूड़ी राखि देलक-ए। जेना हम ओकर माय होइअइ। ओकर माय संगमे नञि छञि। कतय छञि ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतओ ऊ मूड़ी राखि सकैत रहय। हम ओकर माथपर हाथ देलिऐ। ऊ अओर निचेन भऽ गेल जेना। एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससरि गेल; सोझ भेल आऽ आँखि खोललक। एक गोटय कललकए- “दादा कय कसि कय पकड़ने रह”। अंतिम टीशन आबि रहल छञि। सब उतरै लय सुरफुरा लागल-ए। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आऽ सामान कय लोग ओजियाबय लागल-ए। राति बहुत भऽ गेल छञि। सब कय अपन-अपन जगहपर जाइके चिन्ता छञि। बहुत गोटे ठाड़ भऽ गेल अछि। ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा ऊपर सऽ उतारै छी। तखैनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ। हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नञि, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो। ओकर जोबन फूइट रहल छञि। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की द्रौपदी? ओकरा के बेचतै? हमरा राबन आ दुर्जोधनक आशंका घेरने जा रहल अछि। टीशन आबि गेलै। गाड़ी ठमकि रहल छञि। लड़की हमरा देख बिहुँसै—ए; जेना रुखसत माँगि रहल हो। ई केहन रोकसदी अछि। ने ऊ कानञि छञि, ने हम कानञि छी। ऊ हँसञि-ए, हमहूँ हँसञि छी। लेकिन हमर हेँसीमे उदासी अय। २.डॉ पालन झा, ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान। एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष। सन्त साहेब रामदास साम्प्रदायिक अर्थें मैथिली साहित्यमे सन्त कविक रूपमे साहेब रामदासक प्रमुख स्थान अछि। पचाढ़ी स्थानक महंथ बंशीदासजीक सानिध्यमे कवीश्वर चन्दा झा हिनक पदावलीक संकलन कए १९०१ ई. मे प्रकाशित कएने छथि। एहि पदावलीमे परिचयक क्रममे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि: “शिवलोचन मुख शिव सन जखन, साहेब रामदास तिथि तखन। प्रबल नरेन्द्र सिंह मिथिलेश, शासित छल भल तिर्हुत देश॥“ अर्थात् ११५३ साल (१७४६ ई.) मध्य महाराज नरेन्द्र सिंहक राज्यकालमे ई रहथि। छादनसँ न्याय-तत्त्व-चिन्तामणि कर्ता गंगेश उपाध्याय वंश कुलोद्भव साहेब रामदास “कुसुमौल” ग्रामक ( जरैल परगना, जिला- मधुबनी ) एक मैथिल ब्राह्मण छलाह।हिनक छोट भाइक नाम कुनाराम ओऽ एकमात्र प्राणसमप्रिय पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। हिनक पूरानाम साहेब राम झा छलनि, मुदा अन्य सन्त कवि जकाँ ईहो अपन नामक आगाँ भक्ति-भावनासँ ’दास’ शब्द जोड़ि लेलनि। साहेब रामदासक पदावलीमे लगभग ४७८ टा पद संकलित अछि। एहि कविता मध्य ई अपन नाम साहेबराम, साहेबदास, साहेब, साहेबजन सेहो रखने छथि। साहेब रामदास आरम्भहिसँ भक्ति-प्रवण विचारक लोक छलाह। ई सदिखन ईश्वरहिक ध्यान-चिन्तनमे लीन रहैत छलाह। सन्यास ई बादमे ग्रहण कएलनि। एहि पाछाँ एकटा दुखद घटना घटित भेल- हिनका एकमात्र पुत्र ’प्रीतम’ छलनि। ओऽ अधिक समय दुखित रहए लगलाह। उवावस्था छलनि। एकबेर प्रीतम अधिक दुखित भए गेल छलाह। हिनक जीवनक अन्तिम कालक भान भए जएबाक कारणेँ साहेबरामदासविकल भए कानए लगलाह। मरण शय्या पर रहितहुँ प्रीतमकेँ एहन दुःखद दृश्य देखि नहि रहल गेलनि आऽ ओऽ अपन पितासँ पुछैत छथिन, “बाबूजी! अपने एतेक विकल किएक भए रहल छी? पिता उत्तर दैत छथिन “पुत्रक आवश्यकता एहि चतुर्थ अवस्थामे होइत छैक, से तँ अपने हमरा पहिने छोड़ि कए जाए रहल छी, तैँ ई सोचि-सोचि खिन्न चित्त भए व्याकुल भए रहल छी”। पुत्र प्रीतम प्रत्युत्तर दैत कहैत छथिन, “ई संसार असार थिक, क्षणभंगुर थिक, एहिमे स्त्री-पुत्र-पुत्री केओ अपन नहि थिक, ई सभटा अनित्य थिक, माया-मोह थिक। सभटा स्वार्थमूलक थिक तेँ एहि सभसँ माया-मोह रखनाइ अनुचित थिक। हम तँ अपनेक भगवन्-भजनमे विघ्न मात्र छलहुँ, आब अपने निर्विघ्नपूर्वक भगवन्-भजनमे लागि जाऊ”। एतेक बात कहैत देरी प्रीतमक प्राण-पखेरू उड़ि गेलनि। साहेब रामदास विकल भए कानि-कानि कए गाबए लगलाह- “प्रीतम प्रीति तेजि भेल परदेसिआ हो” साहेब रामदासकेँ प्रीतमक देहावसानसँ बड़ आघात लगलनि, प्रीतमक उपदेशकेँ धारण कए परिवार-समाजकेँ तिलाञ्जलि दए सन्यास ग्रहण कए लेलनि। १. मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध २. ज्योति झा चौधरी-दैनिकी १. श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि। ॐ (मा) एकटा प्रश्न उठि सकैछ, जे मोक्ष कामीक लेल वैदिक कर्मक प्रयोजन? एकर उत्तर ई भऽ सकैछ जे यज्ञ यागादि कर्मक फलश्रुतिमे स्वर्ग प्राप्त करबाक बात कहल गेल अछि। मुदा जे व्यक्ति स्वर्ग नहि चाहैत होथि, मोक्षेटा चाहैत होथि, हुनका लेल वैदिक कर्मक आवश्यकता, ई वृहदारण्यकोपनिषद केर वचनसँ पुष्ट होइत अछि। यथा- “ तमेतं वेदानु वचनेनं ब्राह्मणाः विविदिषन्ति यज्ञेन, दानेन तपसा नाशकेन”। अर्थात्- ब्राह्मणगण वेदाध्ययनसँ कामनारहित यज्ञ, दान एवं तपसँ ओहि ब्रह्मकेँ चिन्हबाक इच्छा करैत छथि। एहि वचनमे अनाशकेन अर्थात् कामनारहित “यज्ञ, दान, तप” विशेष महत्त्व रखैत अछि। तात्पर्य जे वेदोक्त यज्ञादि कर्म जखन आशक्तिक संग कएल जाइत अछि, तखन ओहिसँ मात्र स्वर्गक भोग प्राप्त होइत अछि। परन्तु जखन बिना आशक्ति रखने निःस्वार्थ भावसँ कयल जाइत अछि, तखन काम-क्रोधसँ मुक्त भऽ कऽ कार्य केनिहारक चित्त शुद्ध भऽ जाइत अछि। ओऽ मोक्षक अधिकारी भऽ जाइत छथि। श्रीमद्भगवदगीतामे भगवान् श्रीकृष्णक उक्ति अछि- अध्याय १८ (५-६) यज्ञदान तपः कर्म न साज्यं कार्यमेव तत। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥ एतान्यापित कर्माणि संगं त्यक्त्वा फलानि च। कार्व्यानीति मे पार्थं निश्चितं मतमुत्तमम॥ अर्थात्- यज्ञ, दान, तप आदि कर्मक त्याग नहि करबाक चाही। मुदा ई समस्त कर्म निष्काम भावसँ करबाक चाही। अतएव उपनिषदक ’अनाशकेन’ एहि पदकेँ एहिठाम गीताक संगं त्यक्त्वा फलानि च पुष्ट करैत अछि। अतएव जे मनुष्य अपन आन्तरिक कल्याण चाहैत छथि अर्थात् जन्म-मृत्युक बन्धनसँ मुक्त हेबाक इच्छा करैत छथि, हुनका वैदिक कर्मकाण्डक फलस्वरूप स्वर्गक भोग केर इच्छा नहि राखि कऽ निष्काम भावसँ भगवानक प्रसन्नताक लेल मात्र कार्य करबाक चाही। ई बात मुण्डकोपनिषदमे सेहो आयल अछि। १,२,७. मनुष्यक चित्त अनेक प्रकारक कुकर्मसँ मलिन भऽ गेल रहैत अछि। एहि सभ मैलकेँ हटेबाक लेल सत् कर्म करब आवश्यक अछि। एहि सत्कर्मकेँ करबाक उद्देश्य होइत अछि वैदिक कर्म काण्ड। वेदोक्त कर्म कएलासँ चित्त शुद्ध होइत अछि। जकर बाद ब्रह्म विद्या अथवा ज्ञानक बात सुनलासँ सुफल भेटैत छैक। उपनयन संस्कारक बाद वेदोक्त कर्म करबाक लोक अधिकारी होइत छथि। वेदक अन्तिम लक्ष्य मोक्षे प्राप्त करब थीक। ईश्वरक उपासना योगक अभ्यास, धर्मक अनुष्ठान, विद्या प्राप्ति, ब्रह्मचर्य व्रतक पालन तथा सत्संग आदि मुक्तिक साधन गानल गेल अछि। कर्मफलक प्राप्तिक हेतु पुनर्जन्मक प्रतिपादन आत्मोन्नत्तिक लेल संस्कारक निरूपण, समुचित जीवन-यापन हेतु वर्णाश्रमक व्यवस्था एवं जीवनक पवित्रता हेतु भक्ष्या-भक्ष्यक निर्णय करब वेदक मुख्य विशेषता थीक। कर्मकाण्ड, उपासना-काण्ड तथा ज्ञान-काण्ड एहि तीनूक वर्णन मुख्यतया वेदमे भेटैत अछि। यज्ञान्तर्गत देवताक पूजा, ऋषि-महर्षिक सत्संग तथा दान ई तीनू क्रिया एक संग होइत अछि। तहिना ब्रह्मचर्य पालनसँ ऋषि-ऋण, यज्ञ द्वारा देव-ऋण तथा संतानोत्पत्तिसँ पितृऋण मुक्त हेबाक आदर्श वाक्य वेदेमे प्राप्त होइत अछि। (अनुवर्तते) २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति शिक्षा मानवसभ्यताक मूलमंत्र होइत अछि। मुदा प्रतियोगिताक समयमे पढ़ाईक नामपर मोट-मोट पोथीक भारसॅं विद्यार्थी सबहक जीवन कारावासमे पराधीन जीवन काटैत कैदी सनक भऽ जाइत अछि। अहि बातक ध्यान राखि हमरा सभकेँ शैक्षणिक यात्रामे पठायल जाइत छल। एहि यात्रामे हमरा सभकेँ दैनिकी सभ दिन लिखऽ पडै़त छल आऽ कतबो थाकल रहैत छलहुँ हमरा सभकेँ ओहिये दिन संगे जायवला शिक्षक - शिक्षिका सॅं हस्ताक्षर करबाबऽ पड़ैत छल। टिस्कोक दस विद्यालयमे कक्षा छह, सात, आठ आऽ नौमे प्रथम स्थान पाबवला एवम् प्रत्येक विद्यालयसॅं एकटा बहुमुखी प्रतिभाशाली छात्र-छात्राकेँ ई सुअवसर प्राप्त होइत छल। हमरा ई सौभाग्य चारू कक्षामे भेटल। चारिम बेर सुअवसर तऽ भेटल किन्तु ६ दिसम्बर १९९२ क राजनैतिक हलचलक कारण हमर सबहक कार्यक्रम रद्द- भऽ गेल। पहिल बेर जून १९८९ मे उत्तर भारतक महत्वपूर्ण स्थान गेलहुँ लेकिन दैनिकी हेरा गेल। दोसर बेर दिसम्बर १९९० मे कोलकाता आऽ आसपासक जगह घूमलहुँ। जाहिमे निम्नलिखित स्थानक दर्शन भेल १. मेट्रो रेल २ अलीपुर जू़ ३ विक्टोरिया हाउस ४ बिरला प्लानेटोरियम ५ बिरला टेकनिकल एण्ड इण्डस्ट्रियल म्यूज़ियम ६ नेहरू चिलड्रेन्स म्यूजियम ७ दक्षिणेश्वर मन्दिर ८ बॉटेनिकल गार्डेन ९ इण्डियन म्यूज़ियम १० तारकेश्वर ११ शान्ति निकेतन १२ तारापीठ १३ बकरेश्वर १४ दिग्घा पहिल दिन : २५ दिसम्बर १९९० मंगलवार : आइ ठीक आठ बजे भोरे हमर सबहक यात्रा एक बसमे प्रारंभ भेल। सबहक अभिभावक आयल रहथि आऽ बड चिन्तित बुझाइत छलथि। हमसभ अपन खुशी नहि नुका पाबि रहल छलहुँ लेकिन खुलि कऽ तहन हॅंसलहुँ जहन बस शहर पार कऽ पहाड़ी आ जंगलाह रस्ता पकड़लक। रस्ता भरि एक दोसराक परिचय एवम् अपन-अपन स्कूलक टॉप स्कोरक तुलना करैत रहलहुँ। दुनु तरहे –एग्रीगेट(पूर्णांक)आऽ अलग-अलग विषयमे। फेर गाना बजाना अंतराक्षरीक अंतर्गत सेहो भेलै। करीब 1 बजे दुपहरियामे खड़गपुर पार केलहुँ। अढ़ाई बजे कोलाघाट पर ठहरि भोजन केलहुँ। विशाल हावड़ा ब्रीजकेँ पार करैत जहन बस कोलकाता शहरमे प्रविष्ट केलक हम सभ खिड़कीपर भीड़ लगेने छलहुँ, ओहि शहरक मकान सभकेँ देखऽ लेल। मकान सभ ब्रिटिश स्टाइलक बेसी देखायल। सड़कक भीड़ तऽ अतिशय छल। हम सभ ६ बजे सॉंझमे अग्रसेन स्मृति भवन नामक लॉजमे अपन घर जमेलहुँ। ओकर पॉंचम महलापर सभ लेल पॉंचटा कक्ष अनुबंधित छल। बालिका सभ लेल दू टा कक्ष देल गेल। ओतऽ अपन समान पाती व्यवस्थित कऽ अगिला दिनक इंतजाम कऽ हमसभ रातिक साढ़े आठ बजे भोजन लेल होटल दिस विदा भेलहुँ। एतेक बड़का टोलीकेँ देखि सभ चौकि जाइत छल। भोजनोपरान्त दैनिकी लिखि शिक्षकसँ हस्ताक्षर करा सुइत गेलहुँ। दोसर दिन : २६ दिसम्बर १९९० बुद्धवार : २.शोध लेख मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आँगा) प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। १. पहिने साक्षात्कारक पहिल भाग साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार -डॉ शिव प्रसाद यादवद्वारा।डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि। भागलपुरक नामी-गामी विशाल सरोवर ’भैरवा तालाब’। जे परोपट्टामे रोहु माछक लेल प्रसिद्ध अछि। कारण एहि पोख्रिक माँछ बड़ स्वादिष्ट। किएक ने! चौगामाक गाय-महींसक एक मात्र चारागाह आर स्नानागार भैरबा पोखड़िक महाड़। दक्षिणबड़िया महाड़ पर मारवाड़ी महाविद्यालय छात्रावास। छात्रावासक प्रांगणमे हमर (अधीक्षक) निवास। आवासक प्रवेश द्वार पर लुक-खुक करैत साँझमे बुलारोक धाप। हॉर्नक ध्वनि सुनि दौड़ि कए घरसँ बहार भेलहुँ। दर्शन देलनि मिथिलाक त्रिपूर्ति, महान विभूति- दिव्य रूप। सौम्य ललाट। ताहि पर चाननक ठोप, भव्य परिधान। ताहि पर मिथिलाक पाग देखितहि मोन भेल बाग-बाग। नहुँ-नहुँ उतरलनि- साहित्य मनीषी मायानन्द, महेन्द्र ओऽ धीरेन्द्र। गुरुवर लोकनिक शुभागमनसँ घर-आँगन सोहावन भए गेल। हृदय उमंग आऽ उल्लाससँ भरि गेल। मोन प्रसन्न ओऽ प्रमुदित भए उठल। गुरुवर आसन ग्रहण कएलनि, यथा साध्य स्वागत भेलनि। तदुपरान्त भेंटवार्ताक क्रम आरम्भ भए गेल। प्रस्तुत अछि हुनक समस्त साहित्य-संसारमे समाहित भेंटवार्ताक ई अंश:- प्र. ’मिथि-मालिनी’ केँ अपने आद्योपान्त पढ़ल। एकर समृद्धिक लेल किछु सुझाव? उ. ’मिथि मालिनी’ स्वयं सुविचारित रूपें चलि रहल अछि। स्थानीय पत्रिका-प्रसंग हमर सभ दिनसँ विचार रहल अछि जे एहिमे स्थापित लेखकक संगहि स्थानीय लेखक-मंडलकेँ सेहो अधिकाधिक प्रोत्साहन भेटक चाही। एहिमे स्थानीय उपभाषाक रचनाक सेहो प्रकाशन होमक चाही। एहिसँ पारस्परिक संगठनात्मक भावनाक विकास होयत। प्र. ’मिथिला परिषद’ द्वारा आयोजित विद्यापति स्मृति पर्व समारोहमे अपनेकेँ सम्मानित कएल गेल। प्रतिक्रिया? उ. हम तँ सभ दिनसँ मैथिलीक सिपाही रहलहुँ अछि। सम्मान तँ सेनापतिक होइत छैक, तथापि हमरा सन सामान्यक प्रति अपने लोकनिक स्नेह-भाव हमरा लेल गौरवक वस्तु भेल आऽ मिथिला परिषदक महानताक सूचक। हमरा प्रसन्न्ता अछि। प्र. अपने साहित्य सृजन दिशि कहियासँ उन्मुख भेलहुँ? उ. तत्कालीन भागलपुर जिलाक सुपौलमे सन् ४४-४५ मे अक्षर पुरुष पं रामकृष्ण झा ’किसुन’ द्वारा मिथिला पुस्तकालयक स्थापना भेल छल तकर हम सातम-आठम वर्गसँ मैट्रिक धरि अर्थात् ४६-४७ ई सँ ४९-५० ई.धरि नियमित पाठक रही। एहि अध्ययनसँ लेखनक प्रेरणा भेटल तथा सन् ४९ ई. सँ मैथिलीमे लेख लिखऽ लगलहुँ जे कालान्तरमे भाङक लोटाक नामे प्रकाशितो भेल सन् ५१ ई. मे। हम तकर बादे मंच सभपर कविता पढ़ऽ लगलहुँ। प्र. अपने हिन्दी एवं मैथिली दुनू विषयसँ एम.ए. कएल। पहिल एम.ए. कोन विषयमे भेल? उ. मैट्रिकमे मैथिली छल किन्तु सन् ५० ई. मे सी.एम. कॉलेज दरभंगामे नाम लिखेबा काल कहल गेल जे मैथिलीक प्रावधान नहि अछि। तैँ हिन्दी रखलहुँ। तैँ रेडियो, पटनामे काज करैत, सन् ६० ई. मे पहिने हिन्दीमे, तखन सन् ६१ ई. मे मैथिलीमे एम. ए. कएलहुँ। प्र. हिन्दी साहित्यमे प्रथम रचना की थीक आऽ कहिया प्रकाशित भेल। उ. हिन्दीक हमर पहिल रचना थिक, ’माटी के लोक: सोने की नया’ जे कोसीक विभीषिका पर आधारित उपन्यास थिक आऽ जे सन् ६७ ई. मे राजकमल प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल। प्र.अपनेक हिन्दी साहित्यमे १. प्रथम शैल पुत्री च २. मंत्रपुत्र ३. पुरोहित ४. स्त्रीधन ५. माटी के लोक सोने की नैया, पाँच गोट उपन्यास प्रकाशित अछि। एहिमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास कोन अछि आओर किएक? उ. अपन रचनाक प्रसंग स्वयं लेखक की मंतव्य दऽ सकैत अछि? ई काज तँ थिक पाठक आऽ समीक्षक लोकनिक। एना, हिन्दी जगतमे हमर सभ ऐतिहासिक उपन्यास चर्चित रहल अछि। अधिक हिन्दी समीक्षक प्रशंसे कएने छथि। गत वर्षसँ हिन्दीक सम्राट प्रो. नामवर सिंह जी हिन्दीक श्रेष्ठ उपन्यास पर एकटा विशिष्ट कार्य कऽ रहल छथि, जाहिमे हमर प्रथम शैल-पुत्री नामक प्रगैतिहासिक कालीन उपन्यास सेहो संकलित भऽ रहल अछि। एहि उपन्यास पर विस्तृत समीक्षा लिखने छथि जयपुर युनिवर्सिटीक डॉ शंभु गुप्त तथा हम स्वयं लिखने छी एहि उपन्यासक प्रसंग अपन मंतव्य। ई पुस्तक राजकमल प्रकाशनसँ छपि रहल अछि। असलमे प्रथम शैलपुत्री’ मे अछि भारतीय आदिम मानव सभ्यताक विकासक कथाक्रम- जे कालान्तरमे हड़प्पा अथवा सैंधव सभ्यताक निर्माण करैत अछि जकर क्रमशः अंत होइत अछि। हम स्वयं एकरा अपन सफल रचना मानैत छी, समीक्षको मानि रहलाह अछि। एना, पुरोहित अपना नीक लगैत अछि। ’स्त्रीधन’ मिथिलाक इतिहास पर अछि। (अनुवर्तते) २. आब धारावाहिक शोधलेखक आगूक भाग। मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे स्त्रीधन ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी (अखन धरिक) अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आऽ ई उपन्यास सूत्र स्मृतिकालीन मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि। मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आयल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि। ई ग्रन्थ प्रथम आऽ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आऽ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि। प्रथम अध्याय प्रथम सत्र एहिमे सृंजय द्वारा कएल जाऽ रहल धर्म-पश्चात्तापस्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि। “द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि। द्वितीय सत्र राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि। तृतीय सत्र एतए पुरान आऽ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी। चतुर्थ सत्र एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आऽ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आऽ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि, तँ सँगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्य खण्डक उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह, मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह। पंचम सत्र प्रणिपात, आशीर्वचन आऽ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आऽ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आयल अछि। ईहो वर्णन आयल अछि, जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल, आऽ भारत-युद्धमे ओऽ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त तक कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि। षष्ठ सत्र पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आऽ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि, आऽ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकायभारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आऽ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि, जेना कोनो विशेष तथ्य होए। फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि। सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आऽ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि। सप्तम् सत्र सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि। अष्टम् सत्र राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आऽ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि। नवम् सत्र सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि। पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आऽ ताहिसँवन्यजन आऽशूद्रजनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि।सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा करल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि।चिकित्साशास्त्र नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि, ओऽ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आऽ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आऽ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आऽ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि। द्वितीय अध्याय प्रथम सर्ग सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि । आऽ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि। द्वितीय सर्ग सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आऽ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिहि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि, आऽ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि। तृतीय सर्ग अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आऽ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आऽ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि। चतुर्थ सर्ग आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आऽ द्रविड़ शब्द दुनू पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आऽ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि।मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि। पञ्चम सर्ग दिनमे एकभुक्त आऽ रातिमे दुग्धपान मिथिला आऽ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आऽ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर आऽ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब। षष्ठ सर्ग अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनकासभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आऽ पशुचर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आऽ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि। विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत,तकर चर्च अछि। सप्तम सर्ग उसना चाउरक अधिक सुपाच्य आऽ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आऽ ताहि लेल आवास-भूमि आऽ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि। अष्टम सर्ग कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आयल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आऽ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आऽ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल। उपसंहार दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल।वैशाली आऽ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आऽ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आऽ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल। (अनुवर्तते) ३.उपन्यास सहस्रबाढ़नि-गजेन्द्र ठाकुर एहि तरहेँ समय बितैत गेल। बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल। तकर बाद दूटा घटना भेल। एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन। आऽ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह। एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह। ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि। आब ओऽ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आऽ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाईमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आशक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि। सभ परिणामक कारण होइत छैक आऽ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत छन्हि। आऽ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह। “नन्द छथि”? एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि। “नहि। ऑफिससँ नहि आयल छथि, मुदा आबैये बला छथि। भीतर आउ, बैसू”। नन्दक बालक कहलखिन्ह। “हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”। किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओऽ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह। पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह- “शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”। “चिन्हि गेलहुँ”। शोभा बाबू बजलाह। आऽ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आऽ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लगलन्हि। “एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल। शोभाबाबू छलाह कछबी गामक। नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर। बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी नन्दक गाम मेहथक मामागाममे पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह। नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह। मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि। कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि। आऽ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि। “ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”। “आब ओऽ पुरान चास-बास खतम भए गेल। जमीन्दारी खतम आऽ चास-बास सेहो। मुदा खरचा वैह पुरनके। से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल। मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”। शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आऽ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह- “से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ। रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आऽ सोहमे पटना पहुँचि गेलहु। पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ। ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि।अवस्थो कम छल। फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल। जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा। फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जाऽ कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक। आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी। ओतहि पानक सेहो स्टॉल लगा देने छियैक”। “सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”। “चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल। मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल। मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आऽ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”। एहि गपपर नन्द आऽ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह। फेर गप-शप चलए लागल। शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा जौँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा जे विपत्ति आएल तँ सभटा एके बेर। नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी केलाइत छलीह पड़ोसमे आऽ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि जे फलना-अँगनाक फलना पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आऽ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आऽ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमयी मृत्यु भए गेलैक। ६. पद्य 1. अ.पद्य विस्मृत कवि स्व. श्री रामजी चौधरी (1878-1952)आ.गजेन्द्र ठाकुर इ. श्री गंगेश गुंजनई.ज्योति झा चौधरी 2. महाकाव्य- महाभारत १.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) २. गजेन्द्र ठाकुर १. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य । जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि: 1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि। मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि। प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:- 22. भजन विहाग विपति मोरा काटू औ भगवान॥ एक एक रिपु से भासित जन, तुम राखो रघुवीर, हमरो अनेक शत्रु लतबै अछि, आय करू मेरो त्राण॥ जल बिच जाय गजेन्द्र बचायो, गरुड़ छड़ि मैदान, दौपति चीर बढ़ाय सभामे, ढेर कयल असमान॥ केवट वानर मित्र बनाओल, गिद्ध देल निज धाम, विभीषणके शरणमे राखल राज कल्प भरि दान॥ आरो अधम अनेक अहाँ तारल सवरी ब्याध निधान, रामजी शरण आयल छथि, दुखी परम निदान॥ 23. महेशवानी हम त’ झाड़ीखण्डी झाड़ीखण्डी हरदम कहबनि औ॥ कर-त्रिशूल शिर गंग विराजे, भसम अंग सोहाई, डामरु-धारी डामरुधारी हरदम कहबनि औ॥ चन्द्रभाल धारी हम कहबनि, विषधरधारी विषधरधारी हरदम कहबनि औ॥ बड़े दयालु दिगम्बर कहबनि,गौरी-शंकर कहबनि औ, रामजीकेँ विपत्ति हटाउ, अशरणधारी कहबनि औ॥ 24. चैत नारदी जनानी बितल चैत ऋतुराज चित भेल चञ्चल हो, मदल कपल निदान सुमन सर मारल हो॥ फूलल बेलि गुलाब रसाल कत मोजरल हो, भंमर गुंज चहुओर चैन कोना पायब हो॥ युग सम बीतल रैन भवन नहि भावे ओ, सुनि-सुनि कलरव सोर नोर कत झहरत हो॥ रामजी तेजब अब प्राण अवधि कत बीतल हो, मधुपुर गेल भगवान, पलटि नहि आयल हो॥ 25. भजन लक्ष्मीनारायण लक्ष्मीनारायण हमरा ओर नहि तकय छी ओः॥ दीन दयाल नाम अहाँक सब कहैये यौ हमर दुखः देखि विकट अहूँ हरै छी योः॥ ब्याध गणिका गृध अजामिल गजके उबाड़ल यो कोल किरात भीलनि अधमके ऊबारल यो कतेक पैतके तारल अहाँ गनि के सकत यो रुद्रपुरके भोल्मनाथ अहाँ धाम गेलायोः॥ जौँ नञ हमरा पर कृपा करब हम की करब यौ रामजी अनाथ एक दास राखू योः॥ (अनुवर्तते) (अनुवर्तते) १. श्री गंगेश गुंजन २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी १.. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। आयुर्दा ' ई बात नहि जे पकड़वाक प्रयास मे बात-बसात, छूटल के छुटले रहि जाइत अछि- अतीत जेबी-झोरा वा किताब-कॉपी पर दकचल झगड़ाक साक्षी। आब इहो नहि जकरा देब' पड़य मजूरी मामिला-मोकदमाक पक्ष आ विपक्ष मे गवाही देवाक दाम। दाम ल'क' ठाढ़ भइयो क' कहां भेटत बजारक आंखि, दोकानक आकृति, दोकानदारक आगत-भागत, पहिले पहिल बुझाइत छैक सब कें थिक सबटा बेकार। सबकिछु छोड़ि क' चलि गेल सुखाएल बालु पर पुरीक समुद्र। द' मुदा गेल केहन सुनिश्चित भरोस बूझल अछि मन अहांकें कनिके काल मे ओकर उद्दाम उत्ताल लहरिक घुरि क' फेर छू लेबाक धोखाड़ि क' छोड़ि जयवाक स्नेह। सबकिछु छुटलाहा, सभकिछु छुटिये नहि जाइत छैक जेना सब किछु बांचल सबटा बांचले मे नहि, भीतरे भीतर खिया गेल, चनकि गेल आ कए बेर रिक्त भ' गेल सरबा सं झांॅपल सुखाएल घैल जकांॅ भरि दुपहरिया बांचल खुचल-जएह जतवे से साफ देखार घैलची पर धएल रहैए। मन ! अहां की छी आब ? घैल, घैलची , कि दुपहर ? सांॅझ ? पुरीक समुद्र कि भुवनेश्वरक बजार ? कोणार्कक भग्न प्रस्तर पहियाक अवसादग्रस्त सूर्य, एकान्त मे बैसल गर्भगृहक पार्श्व मे लैंड स्केप बनबैत पटनाक युवक, बा सागरक बालु सं तट पर बना रहल बालुक शृंगार सौंदर्य दीप्त तरहत्थी पर गाल, आ केहुनी बले करोट पड़लि वज्रस्तनी मांसल स्त्री, गढ़ि रहल ओड़िया बालु-मूर्त्तिकार सुदर्शन पटनायक ? कनिको नहि उदास सूर्योदय मात्र धरिक आयुर्दाक अपन दिव्य कलाक अकाल काल कवलनक प्रसंग! ं की छी अहां मन ? कहियो ने छोड़लहुं हमरा एकहु क्षण ने भेलहुं जीवन कें एकहु पल आइ अहां छी- हेरायल कि भेटल ? २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति मिथिलाक विस्तार हम सब ओहि समूहक लोक इतिहास छानब जकर भाग संस्कृति बड़ धनी मुदा संरक्षणक अभाव जहिया सभक नींद खुजत तहिया करब पश्चाताप ओहि सभ्यताकेँ ताकब जे अखन लगैअ श्राप उन्नतिक पथ पर चलऽ लेल पहिरलहुँ आधुनिकताक पाग जिनकासॅं ई सुरक्षित अछि से गाबैत बेरोजगारीक राग जे गरीबीक सीमा पार कएलाह से व्यस्त प्रतियोगितामे दिन राति एक संजीवनी बुटीक अभिलाषा जे सभ्यताकेँ दिअए सुरक्षित आधार विश्वस्तरीय संस्थाक निर्माण होए एकर विशेषताक जे करए विस्तार ६.भीष्म-पर्व भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव सेना सहित आगाँ भीष्म कौरवक पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण सहित। भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह, पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह। युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ, सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर। कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम, स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ। अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य। विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे, जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि, कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह, चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः। फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ, आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित। युढिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेलाह, गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल। भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल, धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल, युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद। अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा, आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल, युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल। भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख, बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन। पहिल दिनक युद्धसँ पाण्दव शोकित दुर्योधन हर्षित। दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय। कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग। हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष। दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल काँपि सकल। भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दुगल, सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल, खसल भूमि तखन ओऽ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए। साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल। तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर टूटल, द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल, दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल, ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ, कौरव सेना बुझल भागल छल ओऽ युद्ध छोड़ि कए। भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण, साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भेल। भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय पक्षमे अछि पांडवक, भीष्म कहल छथि ओऽ अजेय परञ्च युद्ध भरिसक करब। 7. संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च श्री आद्याचरण झा (१९२०- )।मंगरौनी। संस्कृतक महान विद्वान। मैथिलीमे मिहिर, बटुक, वैदेहीमे रचना प्रकाशित। दरभंगा संस्कृत वि.वि. केर प्रतिकुलपति। राष्ट्रपतिसँ सम्मान प्राप्त। भगवत्याः सीतायाः संरक्षकोजनकः- “विदेह”- एकं महनीयं विवरणम् - श्री आद्याचरण झा १.मिथिला राजधान्यां जनकपुरे एकदा महर्षिः अष्टावक्रः समायातः। तेषां वकू शरीरं दृष्ट्वा तत्र समुपस्थिताः जनाः हसितवन्तः। तं दृष्ट्वा महर्षिः उक्तवान्- अत्रत्याः जनाः केवलं व्आह्य रूपं शरीरं पश्यन्ति।आत्मानं न जानन्ति। एतेषां नागारिकाणां भवान् कथं “विदेहः” इति ज्ञातुं न शक्नोति। २.महाराजः जनकः उक्तवान्- यथार्थता इयं नास्ति। केवलं वक्र शरीरम् अवलोक्य विद्वांसः हसितवन्तः, किन्तु सर्वे महान्तः ज्ञानिनः सन्ति। ३.”विदेह” उक्तवान्- भवन्तां मस्तके जटायां एकस्मिन् पात्रे जलं प्रपूर्य स्थापयामि। भवता सह एकः मनीषी गच्छति। भवन्तः सम्पूर्णं राजभवनं भ्रमन्तु (पश्यन्तु)। किन्तु पात्रस्थं जलं यदि एकं विन्दुं यत्र पतिष्यति ततः एव परावर्तयिष्यति स विद्वान्। ४.महर्षिः अष्टावक्रः समग्रं राजप्रासादं पश्यन्-भ्रमन् परावर्तितः। महाराजेन जनकेन पृष्टम्। किं राजभवनं दृष्टवन्तः भवन्तः? महर्षिणा कथितम्- ’राजभवनं न भ्रमितं, किन्तु मम ध्यानं जलविन्दु पतने आसीत्, न किमपि दृष्टम्। ५.विदेहः जनकः कथितवान्- ’भवन्तः जिज्ञासायाः समाधानं तु जातम्। भवन्तः समग्रं राजभवनं भ्रमन्तः न किमपि दृष्टवन्तः। तर्थेवाहं सर्वाणि कार्याणि कुर्वन् न तत्र मनसा- आत्मना च संलग्नः अस्मि। महर्षिः समायाचनां कृत्वा परावर्तितवान्। उपर्युक्त घटनाचक्रं प्रमाणयति यत् मनः एव सर्वं करोमि। ’मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयोः”- श्रीमदभगवद्गीता..” संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) (आगाँ) -गजेन्द्र ठाकुर वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः। यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया। चित्ते वाचि क्रियायां च महता मेकरूपता॥ इदानीम श्रुतस्य सुभाषितस्य तात्पर्यम् एवम् अस्ति। लोके विविधाः जनाः भवन्ति- सज्जनाः-दुर्जनाः च। सज्जनानां विचारः यः भवति सा एव वाणी भवति यथा विचारः भवति तथा वाणी भवति-यथा वाणी भवति तथा तेषां व्यवहारः भवति- ते यथा चिन्तयन्ति तथैव वदन्ति- यथा वदन्ति तथैव व्यवहारे आचरन्ति- अतः सज्जनानां विचारः वाणी अनन्तरं व्यवहारः च समानाः भवन्ति। एतएव सज्जनानां लक्षणः अस्ति। यदि तपं करोति तर्हि मोक्षं प्राप्नोति। यदि तप करब तँ मोक्ष प्राप्त होएत। अहं दशवादने निद्रां करोमि। हम दस बजे सुतैत छी। षड्वादने उत्तिष्ठामि। छःबजे उठैत छी। अहं दशवादनतः षड्वादनपर्यन्तं निद्रां करोमि। हम दसबजेसँ छः बजे धरि सुतैत छी। भवान् कदा निद्रां करोति। अहाँ कखन सुतैत छी। भवान् कदा अध्ययनं करोति। अहाँ कखन अध्ययन करैत छी। भवती कदा क्रीडति। अहाँ कखन खेलाइत छी। गजेन्द्रस्य दिनचरी ०५०० – ०६०० योगासनं अध्ययनम् स्नानम् पूजा जलपानम् गृहकार्यम् विद्यालयः क्रीडा अभ्यासः भोजनम् १००० निद्रा सोमवासरतः शुक्रवासरपर्यन्तं विद्यालयः अस्ति।सोमदिनसँ शुक्रदिन धरि विद्यालय अछि। फेब्रुअरीतः मईमासं पर्यन्तं विद्यालयः अस्ति। फरबरीसँ मई मास धरि विद्यालय अछि। भारतदेशः कन्याकुमारीतः कश्मीरपर्यन्तम् अस्ति। भारतदेश कन्याकुमारीसँ कश्मीर धरि अछि। राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीतः मुम्बईनगरंपर्यन्तम् गच्छति। राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीसँ मुम्बइ धरि जाइत अछि। धन्यवादः। पुनर्मिलामः। धन्यवाद। फेर भेँट होएत। सुन्दरः कुत्र अस्ति। सुन्दर कतए अछि। आगत् श्रीमन्। आऊ श्रीमान्। जानाति-कः समयः। जनैत छी- की समय अछि। कुत्र गतवान। कतए गेलाह। सार्ध पंचवादनम्। एतावत कालपर्यन्तम्। साढ़े पाँच। एखन धरि? किं कुर्वन् आसीत्? की करैत छलहुँ? अत्रैव आसन्। श्रीमन्। बहिः। एतहि छलहुँ। श्रीमान्। बाहरमे। हन्यतं मा वदतु। झूठ नहि बाजू। कदा कार्यालयं आगतवान्। कखन कार्यालय अएलहुँ? सार्ध नववादने। साढ़े नौ बजे। तदा किं कृतवान्? तखन की कएलहुँ? स्वच्छतां कृतवान्। साफ-सफाई कएलहुँ। कदा। कखन? नववादनतः सार्धनववादनपर्यन्तम्। नौ बजेसँ साढ़े नौ बजे धरि। ततः किं कृतवान्। तकर बाद की कएलहुँ? ततः सार्धएकादशवादने चायपानार्थं गतवान्। तकर बाद चाहपानिक लेल गेलहुँ। ततः कदा आगतवान्। तकर बाद कखन अएलहुँ? सपादद्वादशवादने। सबाबारह बजे। तन्नैव सार्धएकादशवादनतः सार्ध द्वादशवादनपर्यन्तम् अपि चायं पीतवान् वा। तकर बाद साढ़े एगारह बजेसँ साढ़े बारह बजे धरि सेहो चाहे पिबैत रहलहुँ की? ततः किम् कृतवान्? तकर बाद की कएलहुँ? द्विवादनतः त्रिवादनपर्यन्तं भोजनविरामः तदा भोजनं कृतवान् खलु। दू बजेसँ तीन बजे धरि भोजनविराम छल तखन भोजन कएलहुँ नञि? आम् सत्यम्। हँ ठीक। त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं स्वस्तानि एव मित्रा कृतवान्, उद्याने विहारं कृतवान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि मित्रत कएलहुँ, उद्यान विहार कएलहुँ। तथा नैव श्रीमन्। त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं पत्राणि संचिकाषु स्थापितवान्। तेना नञि अछि श्रीमान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि पत्रसभ संचिकामे रखलहुँ। सर्वमपि जानामि। सभटा जनैत छी। स्वारभ्यां अहं सार्धनववादनतः भवान् किं किं करोति इति अहम् एव परीक्षां करोमि। काल्हिसँ हम साढ़े नौ बजेसँ अहाँ की की करैत छी ई हम अपनेसँ निरीक्षण करब। यदि आलस्यं दर्शस्यसि तर्हि उद्योगात् निष्कासयामि। यदि आलस्य देखायब तँ रोजगारसँ हम निकालि देब। गच्छतु। जाऊ। भवत्सु प्रतिदिनं योगासनं के के कुर्वन्ति। अहाँमे सँ के के सभ दिन योगासन करैत छी। अहं करोमि। हम करैत छी। भवान् करोति। अहाँ करैत छी। अवश्यं करोतु। अवश्य करू। अद्यारभ्य प्रतिदिनं योगाभ्यासं करोतु। आइसँ शुरू कए सभदिन योगाभ्यास करू। अद्यारभ्य मास्तु। आइसँ नहि। श्वःआरभ्य योगासनं करोतु। काल्हिसँ शुरू कए योगासन करू। अद्यारभ्य भवन्तः किं किं कुर्वन्ति। आइसँ आरम्भ कए अहाँ सभ की की करब। अहम् अद्यारभ्य अधिकं न क्रीडामि। हम आइसँ बेशी नहि खेलाएब। अहम् अद्यारभ्य आलस्यं त्यजामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब। अहम् अद्यारभ्य सत्यं वदामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब। अहम् अद्यारभ्य योगासनं करोमि। हम आइसँ योगासन करब। परश्वः आरभ्य। प्रसूसँ आरम्भ कए। अहम् अर्जुनस्यकृते चमषं ददामि। हम अर्जुनकलेल चम्मच दैत छी। अहं यतीन्द्रस्य कृते सुधाखण्डं ददामि। हम अर्जुनक लेल चॉक दैत छी। अहं जयन्तस्य कृते कारयानं ददामि। हम जयन्तक लेल कार दैत छी। अहं विदिशायाः कृते दूरवाणीं ददामि। हम विदिशाक लेल टेलीफोन दैत छी। अहं पत्रिकां ददामि। हम पत्रिका दैत छी। भवन्तः मम कृते किं किं यच्छन्ति। अहाँसभ हमरा लेल की की दए रहल छी। अहं शिक्षिकायाः कृते चमषं ददामि। हम शिक्षिका लेल चम्मच दैत छी। अहं भवत्याः कृते पत्रिकां ददामि। हम अहाँक लेल पत्रिका दैत छी। जयन्त-जयन्तस्य कृते। जयन्त-जयन्तक लेल। विदिशा-विदिशायाः कृते। विदिशा-विदिशाक देल। लता गोपालस्य कृते मधुरं ददाति। लता गोपालक लेल मधुर दैत अछि। लता शिक्षकस्य कृते पुस्तकं ददाति। लता शिक्षकक लेल पुस्तक दैत अछि। लता पुष्पायाः कृते सूचनां ददाति। लता पुष्पाक लेल सूचना दैत अछि। लता भगिन्याः कृते धनं ददाति। लता बहिनक लेल धन दैत अछि। लता श्रीमत्याः कृते उपायनं ददाति। लता श्रीमतिक लेल पहिरना दैत अछि। लता मित्रस्य कृते संदेशं ददाति। लता मित्रक लेल संदेश दैत अछि। माता पुत्रस्य कृते किं किं ददाति? माता पुत्रक लेल की की दैत छथि? कस्य कृते किं किं यच्छन्ति? ककरा लेल की की दैत छथि? अहं यथा करोमि भवान् तथा करोतु। हम जेना करैत छी अहाँ तेना करू। अहं लिखामि। हम लिखैत छी। विदिशे आगच्छतु। विदिशा आऊ। अहं यथा लिखामि तथा लिखति वा। हम जेना लिखैत छी तेना लिखब की। आम्। हँ। लिखतु। लिखू। अहं यथा लिखामि तथा विदिशा लिखति। हम जेना लिखैत छी तेना विदिशा लिखैत छथि। चैत्रा उत्तिष्ठतु। चैत्रा उठू। अहं यथा वदामि तथा भवती करोति वा। हम जेना बजैत छी अहाँ तेना करब की? क्षीरः हस्पृश्यतु। कण्डुयनं करोतु। खीरकेँ हाथसँ डोलाऊ। उपनेत्रं सम्यक करोतु। चश्मा ठीक करू। कर्णं स्पृश्यतु। कान स्पर्श करू। कालिदासः यथा काव्यं लिखति तथा कोपि न लिखति। कालिदास जेना काव्य लिखैत छथि तेना क्यो नहि लिखैत छथि। यथा चित्रकारः चित्रं लिखति तथा कः लिखति। जेहन चित्रकार चित्र बनबैत छथि तेहन के बनबैत छथि। यथा चित्रा अभिनयं करोति तथा यतीन्द्रः न करोति। जेहन अभिनय चित्रा करैत छथि तेहन यतीन्द्र नहि करैत छथि। अहं वाक्यद्वयं वदामि। भवन्तः यथा तथा योजयन्ति। रमा गीतं गायति। गीता अपि गायति। रमा गीत गबैत छथि। गीता सेहो गबैत छथि। यथा रमा गीतं गायति तथा गीता अपि गायति। जेना रमा गीत गबैत छथि तेना गीता सेहो गबैत छथि। भीमः खादति। कृष्णः न खादति। यथा भीमः खादति तथा कृष्णः न खादति। जेना भीम खाइत छथि तेना कृष्ण नहि खाइत छथि। सुरेशः चित्रं लिखति। रमेशः अपि चित्रं लिखति। सुरेश चित्र बनबैत छथि। रमेश सेहो चित्र बनबैत छथि। यथा सुरेशः चित्रं लिखति तथा रमेशः अपि चित्रं लिखति। जेना सुरेश चित्र लिखैत छथि तेना रमेश सेहो चित्र लिखैत छथि। नर्तकी नृत्यं करोति। भवती नृत्यं करोति। नर्तकी नृत्य करैत छथि। अहाँ नृत्य करैत छी। यथा नर्तकी नृत्यं करोति तथा भवती नृत्यं करोति। जेहन नर्तकी नृत्य करैत छथि तेहन अहाँ नृत्य करैत छी। कथा रामपुरे सुब्रह्मण्यं शास्त्री इति कश्चन् गृहस्थः आसीत्। तस्य पत्नी शान्ता। तद्द्वौयो अपि सर्वदा अपि कलहः कुरुतः स्म। एतेन् पार्श्वगृहस्याः सर्वे बहुकष्टः अनुभवन्ति स्म। एकदा तम् ग्रामं कश्चन् योगीश्वरः आगतवान्। सः सिद्धिम् प्राप्तवान् इति वार्त्ता सर्वत्र प्रश्रुता। तदा शान्ता तत्र गत्वा योगीश्वरं दृष्टवती। सा वदति- भोः महात्मन्। अस्माकं गृहे सर्वदा कोलाहलः भवति। एतेन् अहं बहुकष्टम् अनुभवामि। पार्श्वे सर्वे जनाः माम् उपहसन्ति। अतः एतस्य निवारणं कृपया वदतु। तदा योगीश्वरः नेत्रे निमील्य किंचित् कालम् उपविष्टवान्। अनन्तरम् उक्तवान्- भद्रे चिन्तां न करोतु। एतस्य परिहारम् अहं वदामि। अहं भवत्यै दिव्यं जलं ददामि। भवती गृहं गत्वा एतद् जलं पत्युः आगमनात् पूर्वं मुखे स्थापयित्वा उपविशतु। अनन्तरं योगीश्वरः जलं दत्तवान्। शान्ता गृहं गतवती। पत्युः आगमनात् पूर्वं जलं मुखे स्थापयित्वा उपविष्टवती। सायंकाले सुब्रमन्यः सर्वाणि कार्याणि समाप्य गृहम् आगतवान्। यदा गृहम् आगतवान् तदा शान्ता तस्मै पानीयं दत्तवती। पानीयं पीत्वा सः कोपेन् उक्तवान्- एतद् किं पानीयम्- एतद् पातुम् एव न शक्यते। अनन्तरं सः बहिः गतवान्- उपविष्टवान्। यद्यपि शान्तायाः कोपः आगतः तथापि सा मौनम् उपविष्टवती- यतः तस्याः मुखे योगीश्वरेण दत्तं दिव्यं जलम् आसीत्। एवमेव कानिचन् दिनानि अतीतानि। तेषां गृहे कोलाहलः एव न श्रुयति स्म। एतेन् पार्श्व गृहस्याः सर्वे संतोषम् अनुभवन्ति स्म। एक मासानन्तरं योगश्वरं दत्तं जलं समाप्तम्। अनन्तरं शान्ता योगीश्वरस्य समीपं गतवती- उक्तवती- भोः स्वामी। जलं सर्वं समाप्तम् अस्ति। अतः पुनः दिव्यं जलं ददातु। तदा योगीश्वरः मन्दहासपूर्वकम् उक्तवान्- मया दत्तं जलं सामान्यं जलम् एव। भवती यदा जलं पूरयित्वा उपविशति स्म तदा किमपि वक्तुम न शक्नोति स्म। एतेन भवत्याः पतिः अपि किमपि वक्तुं न शक्नोति स्म। यथा एकेन् हस्तेन् करतारणं न भवति तथा एकेन् अपि कलहं न कर्तुं शक्यते। तथा एव अहं श्रेष्टः, अहं श्रेयाम् इत्यपि स्पर्धा अपि न भवति। एतेन् गृहे शान्तिः भवति। योगीश्वरस्य एतद् वचनं श्रुत्वा संतुष्टा शान्ता गृहं प्रत्यागतवती। (अनुवर्तते) ८. मिथिला कला (आगां) 7. मिथिला कला(आँगा) चित्रकार- तूलिका, ग्राम-रुद्रपुर, भाया-आन्ध्रा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी। देवोत्थान एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ मनाओल जाइत अछि, एहि दिन क्षीरसागरमे भगवान निन्नसँ जागल छलाह। गोसाउन घरमे आऽ तुलसी लगमे अरिपन होइत अछि। अरिपन पिठारसँ होइत छैक, सिन्दूर सेहो लगाओल जाइत छैक। तुलसी लगमे मखान, नारिकेर, मिश्रीक प्रसाद चढ़ैत अछि। भादव मासक एकादशीक दिन भगवान शंखासुर राक्षसकेँ मारि कए गाढ़ निन्नमे सूति गेलाह, आऽ कार्तिक शुक्ल एकादशीकेँ उठलाह, देवोत्थान ईएह अर्थ अछि।तुलसी तरक देवोत्थान अरिपन नीचाँक रीतिए बनाओल जाइत अछि। अनुवर्तते) अनुवर्तते) ९. पाबनि संस्कार तीर्थ डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। पंचदेवोपासक भूमि मिथिला भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि। संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि। आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि। मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि। पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि। शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि। शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि। शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि। -डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” रक्षाबन्धन रक्षाबन्धन के पाबनि, जे भाई बहिनक पाबनि के रूपमे मानल गेल अछि, मिथिलामे मूलतथ अहि रूपमे नहि अछि लेकिन, देखा-देखीमे ई पाबनि मिथिलामे भाय- बहिनक पाबनिक रूपमे बहुप्रचलित भय गेल अछि।साओन पूर्णिमा दिन राखी भगवान-भगवती के अर्पित कऽ लोक में बान्हके प्रथा अपन सबहक राखी कहाइत अछि।स्त्री पुरुष के राखी बान्हैत छैथ आ' बदले में हुनका ओहि पुरुष सॅं संकटमे रक्षाक वचन भेटैत छनि। एक मैथिल पुस्तकक अनुसारे राखी बान्ह बेरमे निम्न मंत्र पढ़ल जाइत अछि- ''येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्र महाबल:। तेनत्वां प्रातिबध्नामि रक्षे माचल माचल:॥ राखीक प्रथाके उत्पत्ति स सम्बन्धित अनेक कथा प्रचलित अछि।एक कथानुसार इन्द्रदेव वृत्र इन्द्र संग युद्ध केला जाहिसॅं हुनका किछु हानि भेलनि। तखन हुनकर पत्नी हुनका राखी बन्हलखिन जकर बाद हुनका विजय भेटलैन।दोसर कथा प्रसिद्ध अछि द्रौपदी आ' कृष्णक।शिशुपालक बद्ध केलाक बाद कृष्ण भगवानक हाथ सॅं रक्त बहय लगलैन त द्रौपदी के नहि रहल गेलैन ओ अपन ऑंचर सॅं कपड़ा फाड़िक हुनकर हाथमे बॉंधि देलखिन। भगवान हुन्कासॅं ई उधार चुकाबऽ के वचन देलखिन।बादमे जखन छलसॅं कौरव पॉंडवक राजपाट छीन द्रौपदीके अपमानित करऽ चाहल त कृष्ण भगवानक कृपा सॅं हुनकर सारी अनन्त भऽ गेल। तहिना जखन राक्षस राज बलि के भगवती लक्ष्मी राखी बान्हलाक बाद भगवान विष्णु के वापस मंगलखिन तऽ बलि के हुनकर आग्रह मानऽ पड़लैन। अहि वर्ष राखी अर्थात् साओन पूर्णिमा १६ अगस्त, शनिदिन कऽ अछि। १०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि। राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित) मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना। स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान। अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥ स्थायी - रेग॒म॑प ग॒रेसा ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑ ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ अन्तरा पप नि॒ध निसां सांरें मिथि लाऽ ऽऽ कोकि सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ *गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध। ११. बालानां कृते- बालानां कृते १.नैका बनिजारा-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी: गरीबक सहायता- ज्योति झा चौधरी १.नैका बनिजारा चित्र: ज्योति झा चौधरी नैका बनिजारा शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि, आऽ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओऽ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह, तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओऽ राति बड़ शुभ छल आऽ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक। ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आऽ चलि गेलाह मरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि, आऽ तेरहम बर्ख बिदा भेला घरक लेल। एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओऽ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओऽ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलकैक आऽ सभ हँसी खुशी रहए लागल। तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना। दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने केलही रे ना। कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना रहबइ रे ना। २. देवीजी: गरीबक सहायता चित्र: ज्योति झा चौधरी देवी जी : गरीबक सहायता एक बेर देवीजी विद्यालय आबि रहल छलीह तऽ द्वार लग हुनका एकटा चिनिया बदाम बेचऽवला बड उदास देखेलनि। हुनका सऽ नहि रहल गेलनि। ओऽ ओकरा लग जा कऽ पुछलखिन '' एहि उदासीक की कारण? जवाबमे जे सुनऽ भेटलनि ताहि सऽ हुनकर मोन क्षोभसॅं भरि गेलनि। हुनकर विद्यालयक किछु छात्र ओकरा सऽ चिनियाबदाम खरीदकऽ पाई नहि देलकै। अगिला दिन ओऽ खुमचावला ओहि बेईमान सभकेँ समान बेचऽ सॅं मना कऽ देलक। ताहिसॅं उकता कए बच्चा सभ आर उग्र भऽ गेल आर ओकरा सब समानकेँ लुटि पाटि कऽ छिड़िया देलक। ओऽ खुमचावला गरीब छल, ओकर बड नुक्सान भेलैक। ताहि लऽ कऽ ओऽ बड दुःखी छल। देवीजी ओकरा प्रधानाध्यापक लग लऽ गेलखिन। प्रधानाध्यापककेँ सेहो अपन विद्यालयक बच्चा सबहक ई कुकर्म बड क्षोभित केलकनि। ओऽ देवीजी संगे मिलिकऽ उपद्रवी बच्चा सभकेँ अपन अभिभावक संगे बजेलखिन। सभ उपद्रवी बच्चा सभकेँ विद्यालयसँ निष्कासित करबाक बात भेल। तहन बच्चा सभ माफी मॅगलक। देवीजी ओकरा सभकेँ बुझेलखिन जे गरीबी द्वारे ओऽ खुमचावला विद्यालय लग खुमचा लगाकऽ दू पाई कमाइत अछि जाहि सॅं ओकर परिवार चलैत छञ। एहि घटनासॅ ओकर बड हानि भेलैक। ओकरा खेनाइ पिनाइ तकक कष्ट भऽ गेलैक। तखन बच्चा सभ अपन एहि गलतीक पश्चाताप करबाक विचार केलक। देवीजीक आज्ञा लऽ ओऽ सभ टूटल खुमचाक मरम्मति केलक आऽ चंदा जमाकऽ जतेक समान लुटने रहए तकरा कीनि लौटेलक। सभ कियो ई शपथ लेलक जे कहियो फेर एहेन काज नहि करत आऽ गरीबक यथासम्भव सहायता करत । बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ ------------------------------ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर पञ्जी प्रबंध पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। तृतीय छठि कन्याक प्रपितामहक श्वसुरक – जेना माण्डर मूलक सिहौली मूलग्रामक १.रघुबर झा पुत्र २.फेकू झा तनिक जमाए ३.कंटीर झा, तनिक पुत्र ४.पीताम्बर झा तनिक पुत्र ५.शशिनाथ झा ६.कन्या। एहि मध्य माण्डर सिहौली रघुवर झासँ कन्या छठि छथि चारिम छठि- फेकू झाक श्वसुर- पाली महिषी मूलक हर्षी झा, यथा (१) हर्षी झा- (२)जामाता-फेकू झा (३) जामाता कंटीर झा (४)पुत्र-पीताम्बर (५) शशिनाथ (६) कन्या. एहि तरहेँ कन्या हर्षी झासँ छठम स्थानमे छथि तैय हेतु ई चारिम छठि भेल। पाँचम छठि- कन्याक पितामहक श्वसुरक पितामहसँ कन्या छठम स्थान-जेना सकराढ़ी मूलक परहट मूलग्रामवाला (१) ब्रजनाथ झा (२) हुनक बालक हर्षनाथ झा (३) हिनक बालक सिद्धिनाथ झा (४) हिनक जमाय पीताम्बर झा (५) तनिक बालक शशिनाथ झा (६) हिनक कन्या- अस्तु, सकराढ़ी परहट ब्रजनाथ झा पाँचम छठि कहौताह। (अनुवर्तते) १३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर श्रीकर- श्रीकर प्रथम मैथिल निबन्धकार छलाह। विज्ञानेश्वर, हरिनाथ, जीमूतवाहन चण्डेश्वर ठाकुर ई सभ श्रीकरक विचारक उल्लेख कएने छथि। श्रीकर एहि हिसाबसँ सातम शताब्दीक बुझना जाइत छथि। श्रीकर याज्ञवल्क्य आऽ लक्ष्मीधरक बीचक सूत्र छथि। ओऽ कल्पतरु लिखलन्हि, जाहिमे १४ भाग छल, मुदा हुनकर कोनो कार्य एखन उपलब्ध नहि अछि। श्रीकरक अनुसार आध्यात्मिक लाभ उत्तराधिकारक लेल आवश्यक अछि। चण्देश्वर ठाकुर अपन राजनीतिरत्नाकरमे श्रीकरक सिद्धांत ई सिद्धांत रखने छथि, जे गरीबक अधिकार राजा आऽ राज्यक सम्पत्तिमे छैक। १४. पोथी समीक्षा श्री पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। पराशरजी एखन हिन्दी पत्रिका ’कादम्बिनी’मे वरिष्ठ कॉपी सम्पादक छथि। समयकेँ अकानैत १९. रातिक तेसर पहरमे गामसँ गेल लोक फेर नहि घुरल गाम गाम आब दिनोमे लगैत अछि मसान आऽ फेर असोथकित भेल ग्रामदेवता टुकुर-टुकुर तकैत छथिन बाट गामसँ भेल पलायनक टीस अछि ई पद्य। २०.अन्हारक मुरुत मुरुत ... छोड़ि दैत अछि नियन्त्रण अपनो परसँ --------------------------------------- -------------------------------------- मूर्तिपूजक एहि देशमे मूर्तिक ई इतिहास बड़ पुरान अछि। हमरा बुझने एहि पद्य संग्रहक ई सभसँ गंभीर आऽ नीक पद्य अछि। मुरुतक स्वप्नक पोटरी देखायब आऽ बिनु प्रकाशक अन्तहीन अन्धकार दिशि बढ़ैत जाएब। मुरुत करैत अछि परम्पराक परिक्रमा आऽ फेर फेंकि देल जाइत अछि घिनाएल डबड़ामे। २१.मृत्युक बोझ चारि वर्षक आँखिमे खचित बाबाक नोराएल आँखि गामक अबाल-वृद्ध सबहक अँतड़ी सुखाएल लहास श्राद्धक, भोज खयबाक उत्साहोसँ नहि मेटाएल म्त्युक तांडव विभिन्न कारणसँ कविक हृदय रसहीन भए गेलन्हि स कविताक नीरस हैब उचिते छन्हि से कवि कहैत छथि। २२. हमर बाट (अग्रज अफसर कचि रमेशजी लेल) पोथीक बात उद्वेलित करैए से नीक बात मुदा सुविधाभोगी जीवन कए की करबै आऽ फेर- चलबै हमरा संग हमर बाट पर मीता? २३.मनोहर पोथी जकर शिक्षा नहि बना सकतै ओकरा जीवनकेँ मनोहर आऽ कि हम बचा सकबै एकरा दुनूकेँ एहि उदारवादी आ बाजारवादी बिहाड़िसँ? २४. हे हमर पिता! हमरा दिक् लगलासँ भुतियाइयो जाइ आ हम क’ सकी पूर्ण अहाँ अपूर्ण यात्रा २५.माटि माटि चूल्हिक लेल होइ कि कोठीक लेल आऽ मैञा माटि चीन्हैत छथिन हम माटि नहि चीन्ह पबैत छी २६.माटिक गाड़ी उसरल अछि दिवारी थान कतय भेटत आब २७.पूर्वज इतिहासक कोन चक्कीमे पिसा गेलाह हमर पूर्वज २८.रखैल ओ ककर तकैत अछि बाट २९.सर्वनाम ठीक अछि सबटा वस्तु जात आऽ खेत जोतबाक लेल ट्रैक्टर अछि बड़द पोसबाक जरूरति नहि रहल आब तखन शहरमे संज्ञाक संकट गाममे सर्वनाम सन हालति ३०.कान्ह पर सवार बैताल कमलाक कथामे मिलैत बलानक कथा आऽ कान्ह पर लदने चलि रहल छी विशाल प्रश्नवाचक जकाँ ३१.सवयंसँ संवाद यक्ष्मासँ जर्जरित छाती स्वयंसँ स्वादक बात आब टारल नहि जा सकैए बेशी दिन ३२. छोट-छोट चीजक मादे एकालाप पोथीक बीचमे राखल मोरक पंख पद्य पढ़नहारकेँ सेहो बहुत किछु मोर पाड़ि दैत छथिन्ह कवि। ३३. बीसम शताब्दीक श्वेतपत्र पत्नी कहैत गेलि वस्तु अबैत गेल आऽ हम पड़ल छी मृत्युशय्यापर बीसम शताब्दी जकाँ ३४. द्विज मूल ठामसँ उखड़ल लोक कोना जमि जाइत अछि आन ठाम बहिन गेल छलीह सासुर आ संग हमहूँ रही सोचैत कि बहीन रहि सकतीह एहि ठाम ३५.हम घर कोना घुरब कुहरैत छी मुक्तिक लेल के करत हमरा मुक्त ३६. कुरुक्षेत्र नागा आ कूकीक संघर्ष बढ़ले जा रहल अछि आऽ टाकाक रिमोटसँ संचालित अभिनेत्रीक देह ३७.प्रश्नकालमे कालाहांडीक निवासीक भोजन आ मुसहरीक निवासीक जलखै बेर-बेर नचैए आँखिक आगूमे ३८. तुलसी चौरा पर जरैत दीप रोज साँझकेँ दीप जरबैत माय दीप जरबैत छलीह आ कि स्वयंकेँ? ३९. मोसकिल भ’ गेल अछि इजोरिया रातिक निःशब्दामे विरहा सुनब ४०.अभिशप्त निज गामकेँ पिकनिक स्पॉट बुझि ओ अबैत छथिन गाम कोनो काज निकाल’ वा मोन बहटार’ मुदा आबतँ ताहू लेल लोक गाम नहि अबैत छथि। दुर्गा पूजामे छागरक बलि चढ़ेबाक कबुलाक पूर्तियो लेल कहाँ क्यो अबैत अछि आब। ४१. खुट्टी पर टाँगल झोरा हरदम बोध करबैत छल पिताक उपस्थितिक। ४२.साँझ होइत गाममे निरन्तर अस्पष्ट होइत जा रहल साँझक गाछ तर साँझमे घुरल सुग्गा जकाँ ४३. मायक लेल किछु कविता काँकोड़ सन होइत अछि माय जकरा प्रसवक बाद ओकर बच्चे खा जैत छैक ४४. सप्पत आबतँ साँचे लगैए झूठ सन आ झूठे साँच सन ४५. प्राक् इतिहास अदौ कालसँ दिमागक खोहमे नुड़िआइत हमर असंख्य प्राक इतिहास ४६. रामभोग आब चुनाव-नाथसँ शुरू करैए अयोध्या नाच ४७.संबंध हम कोना कहि सकब अहाँ हमर किछु नहि लगैत छी मीता ४८.समयकेँ अकानैत एहि संग्रहक टाइटिल पद्य अछि ई कविता। जतए छल कलमदान ओतए एतेक रास शालिग्राम किछुए दिनक बाद गायब भ’ जाइत अछि हमर अपूर्णकविता अपूर्ण लेख मेहनतिसँ ताकल किछु महत्वपूर्ण साक्ष्य हिन्दी कवि मुक्तबोध मोन पड़ि जाइत छथि एहि पद्यसँ। एहि संग्रहक सभटा पद्य भावना आऽ स्मृतिसँ जुड़ल अछि। आब किछु तकनीकी विषय। एहि संग्रहमे मैथिलीक मानकताक विषय किछु पाछाँ रहि गेल अछि, जेना मैथिलीमे विभक्ति संगहि बाजल आऽ लिखल जाइत अछि, मुदा संग्रहक नामसँ लए सभटा पद्यमे कवि अपन हिन्दी शिक्षाक अनुरूपेँ विभक्ति हटा कए लिखने छथि। अगिला संस्करणमे ई भाषायी असुद्धि दूर होएबाक चाही। जेना सुभाषचन्द्रजीक लेखनीमे सेहो मानकता किछु दोसर रूपेँ आयल अछि। मुदा ध्वनि विज्ञानसँ ओऽ संबंधित अछि। श्री सुभाष जी ऐछ लिखैत छथि, मुदा मैथिलीमे “अछि” एकर उच्चारण होइत अछि “अ इ छ”, हिन्दीमे ह्रस्व इ लिखल पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि, देवनागरी वर्णक जेना लिखल जाइत अछि, तहिना बाजल जाइत अछि, ह्रस्व इ एकर अपवाद अछि। मुदा मैथिलीमे से नहि अछि। तहिना छै केँ छैक वा छञि, नै केँ नञि लिकल जएबाक चाही। पराशर जी मैथिलीक मैञा केर प्रयोग कएने छथि, मायक जे उच्चारण माञ कहने लिखने अबैत अछि, तकर दृष्टिसँ ई प्रयास स्तुत्य अछि। मुदा श्री सुभाषजी ( हुनकर कथा “विदेह” क एहि अंकमे ई-प्रकाशित अछि) अपन लेखनीमे मैथिलीक असल स्वरूप अनबाक लेल किंचित् प्रयोग कएने छथि, तकर किछु उद्देश्य अछि, मुदा पराशरजीक विभक्ति हटा कए लिखब मात्र टाइप दोष बनि रहि गेल अछि। फेर दोसर गप जे ई पद्य संग्रह भावना आऽ स्मृतिक विस्फोट अछि, मुदा कखनो काल कए लगैत अछि जे हमरा सभ पद्य नहि गद्य पढि रहल छी, जापानी “हैबून” जेकाँ। से अपन पहिल पद्य संग्रहमे एतेक प्रतिभाक प्रदर्शन देने छथि पंकजजी जे हमरा सभ आसमे छी जे दोसर संग्रहमे ओऽ अपन लयबद्ध पद्यसँ हमरा सभकेँ झमारि देथि। तेसर गप जे एहि पोथीमे आइ एस बी एन नम्बर नहि अछि। मैथिली प्रकाशनक सूचीबद्धता नहि भए पाबि रहल अछि, मुदा ई प्रायशः एहि दू-चारि सालमे प्रकाशित सभ मैथिली ग्रंथ सभक संग अछि। आशा अछि कविक नव रचना शीघ्रा आयत। १५.मैथिली भाषापाक इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। १६. रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर (अनुवर्तते) ज्योतिरीश्वर शब्दावली गोण्ठि- मलाह कबार- तरकारी बेचनिहार पटनिआ- मलाह लबाल- लबरा लौजिह- ललचाइत जीह बला पेटकट- जकर पेट काटल छैक/ अनकर पेट कटैत अछि। नाकट- नककट्टा बएर- बदरीफल बाबुर- बबूर खुसा- शुष्क चुसा- चोष्य फरुही- मुरही/ लाबा करहर- कुमुदक कन्द मलैचा- मेरचाइ सारुक- भेँटा (श्वेत कुमुदक) कन्द बोबलि- घेचुलि –खाद्य कन्द बाँसी- वंशी हुलुक- हुडुक्का (वाद्य यंत्र) जोहारि – प्रणाम तोरह – तौलह बराबह- फुटा कए राखह खुटी- महिला द्वारा कानक ऊर्ध्वभागमे पहिरए जायबला खुट्टी सिङ्कली- सिकड़ी चुलि- चूड़ी त्रिका- माँग टीका खञ्जरीट- खंजन पक्षी मैथिलीक मानक लेखन-शैली जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं। पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। ग्राह्य अग्राह्य होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक आ’/आऽ आ क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला बला वला आङ्ल आंग्ल प्रायः प्रायह दुःख दुख चलि गेल चल गेल/चैल गेल देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि चलैत/दैत चलति/दैति एखनो अखनो बढ़न्हि बढन्हि ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ जे जे’/जेऽ ना-नुकुर ना-नुकर केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि तखन तँ तखनतँ जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए की फूड़ल जे कि फूड़ल जे जे जे’/जेऽ कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद इहो/ओहो हँसए/हँसय हँस’ नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस सासु-ससुर सास-ससुर छह/सात छ/छः/सात की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) जबाब जवाब करएताह/करयताह करेताह दलान दिशि दलान दिश गेलाह गएलाह/गयलाह किछु आर किछु और जाइत छल जाति छल/जैत छल पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल जबान(युवा)/जवान(फौजी) लय/लए क’/कऽ ल’/लऽ कय/कए एखन/अखने अखन/एखने अहींकेँ अहीँकेँ गहींर गहीँर धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए जेकाँ जेँकाँ/जकाँ तहिना तेहिना एकर अकर बहिनउ बहनोइ बहिन बहिनि बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ नहि/नै करबा’/करबाय/करबाए त’/त ऽ तय/तए भाय भै भाँय यावत जावत माय मै देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि द’/द ऽ/दए किछु आर शब्द मानक मैथिली_३ तका’ कए तकाय तकाए पैरे (on foot) पएरे ताहुमे ताहूमे पुत्रीक बजा कय/ कए बननाय कोला दिनुका दिनका ततहिसँ गरबओलन्हि गरबेलन्हि बालु बालू चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) जे जे’ से/ के से’/के’ एखुनका अखनुका भुमिहार भूमिहार सुगर सूगर झठहाक झटहाक छूबि करइयो/ओ करैयो पुबारि पुबाइ झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि पएरे-पएरे पैरे-पैरे खेलएबाक खेलेबाक खेलाएबाक लगा’ होए- हो बुझल बूझल बूझल (संबोधन अर्थमे) यैह यएह तातिल अयनाय- अयनाइ निन्न- निन्द बिनु बिन जाए जाइ जाइ(in different sense)-last word of sentence छत पर आबि जाइ ने खेलाए (play) –खेलाइ शिकाइत- शिकायत ढप- ढ़प पढ़- पढ कनिए/ कनिये कनिञे राकस- राकश होए/ होय होइ अउरदा- औरदा बुझेलन्हि (different meaning- got understand) बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) चलि- चल खधाइ- खधाय मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह कैक- कएक- कइएक लग ल’ग जरेनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ होइत गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि चिखैत- (to test)चिखइत करइयो(willing to do) करैयो जेकरा- जकरा तकरा- तेकरा बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ हारिक (उच्चारण हाइरक) ओजन वजन आधे भाग/ आध-भागे पिचा’/ पिचाय/पिचाए नञ/ ने बच्चा नञ (ने) पिचा जाय तखन ने (नञ) कहैत अछि। कतेक गोटे/ कताक गोटे कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई लग ल’ग खेलाइ (for playing) छथिन्ह छथिन होइत होइ क्यो कियो केश (hair) केस (court-case) बननाइ/ बननाय/ बननाए जरेनाइ कुरसी कुर्सी चरचा चर्चा कर्म करम डुबाबय/ डुमाबय एखुनका/ अखुनका लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ कएलक केलक गरमी गर्मी बरदी वर्दी सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ एनाइ-गेनाइ तेनाने घेरलन्हि नञ डरो ड’रो कतहु- कहीं उमरिगर- उमरगर भरिगर धोल/धोअल धोएल गप/गप्प के के’ दरबज्जा/ दरबजा ठाम धरि तक घूरि लौटि थोरबेक बड्ड तोँ/ तूँ तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) तोँही/तोँहि करबाइए करबाइये एकेटा करितथि करतथि पहुँचि पहुँच राखलन्हि रखलन्हि लगलन्हि लागलन्हि सुनि (उच्चारण सुइन) अछि (उच्चारण अइछ) एलथि गेलथि बितओने बितेने करबओलन्हि/ करेलखिन्ह करएलन्हि आकि कि पहुँचि पहुँच जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) से से’ हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) फेल फैल फइल(spacious) फैल होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय फेका फेंका देखाए देखा’ देखाय देखा’ सत्तरि सत्तर साहेब साहब VIDEHA FOR NON RESIDENTS 1.VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT 2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti. YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार Year 2008 ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ navan parvan 4 dec. नवान पार्वन vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी Year 2009 makar sankranti 14 january मकर संक्रांति narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत ramnavmi 3 april रामनवमी mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी gangadashhara 2 june गंगादशहरा somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा १७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT--- Before King Nanyadeva Kirtivarma and Nrigavarma of the Karnat family ruled over some parts of Mithila.King Nriga was patron of Vachaspati. Kirtivartnan I reigned from A.D. 567-68 to 597-98 and conquered Vatiga, Anga, Kalinga and other provinces of North India, later on Nrigvarman occupied a portion of Mithila. Inscriptions relating to the Kadamb Kings of Goa .An inscription calls him descended from Trilocanakadamba.Kamala-devi the wife of the Permadi established seats of learning in many parts of the kingdom where Vedas, Vedangas, Nyaya, Mimamsa. Sankhya-yoga, Vedanta, Smriti, Itihasas and Puranas were taught besides astronomy. Nanyadeva (A D 1097-1143) obtained the kingdom of Mithila in return for a tribute of I lakh, he calls himself " Mithilesvara " in his work on music. With founding of village Koili-Nanhapura (Nanyapura) near NehraRaghopur ,Sakri his seat of government was Sivarampura-Simraon a village situated in Nepal 10 kms. North of the Purnahia factory in the Motihari Sub-division. He ruled for thirty six years in Mithila between the powerful Gahadwalas of Kasi and Senas of Magadha and Bengal. He clashed with Vijayasena, battle near Supaul and Nanyadeva was defeated in it. But his son Gangadeva and Malladeva defeated Vijayasena and towns of Malladiha and Gadgapar Rajani were established. Nanyadeva’ s minister was Sridhara Kayastha. Nanyadeva wrote Sarasvati-bridaya Kanthahara, a work on music.Gangadeva (A.D. 1133-1174) secceded Nanyadeva. He introduced the system of fiscal divisions or parganas for the purposes of revenue administration. One tank near Laheriaserai and another in Anhara-Tharhi were constructed by him. His brother ruled over Nepal.Malladeva another son of Nanyadeva is known through Vidyapati's Purushapariksha, the Yuddhavira. Malladeva served under Jayachandra of Kanauj . Narasimhadeva I (A.D 1174-1226)succeded Gadgadeva. Called Satyavira by Vidyapati in his Purushapariksha. He quarreled with his kinsman, the king of Nepal and Mithila and Nepal were separated.Tughril Tughan (A.D. 1232-44) raided Tirhut. Ghias-ud-din I Uddin undertook an expedition to Mithila. Ramasimhadeva came to the throne in 1226 A D. During his time commentaries on the Vedas were compiled. Village officers were appointed.Shaktisimhdeva (AD.1284-12.96) succeeded his father in 1284 A.D. his seat of government was near modern Sakri Railway Station. Harisimhadeva (A. D. 1296-1323) He was one of the most famous kings of Mithila. He reorganised the social hierarchy of Maithil Brahmanas.In 1323 the Emperor of Delhi, Ghiyasuddin Tughlaq (A.D. 1320-1325) conquered Tirhut.Sultan Haji Shamsuddin of Bengal founded Hajipur and Shamsuddinpur (Samastipur) extended his conquests to Tirhut and Champaran while going to Nepal. In A.D. 1352 Firuz Tughlaq became angry and crossed Kosi and drove out Ilyas from Tirhut.Matisinha, Saktisinha and Syatirasimha ruled Mithila. The daughter of Syamasidhadeva is said to have been married to a descedant of the family of Mallas, who took over the rule of Nepal from the Karnata dynasty.The Sarqui rulers of Jannpur ruled over the greater part of North Bihar in the first half of the 15th centuries. English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period. SahasraBarhani:The Comet Year 1885: A boy was born in Jhingur Thakur’s house. It was the same year when an historical event of formation of Congress Party was to be held later on. British rule could be said successful in establishing itself strongly in India. It was the period when the Indian rulers started feeling proud of being associated with British. Congress was noticeable in those days because of its disturbing attitude in the field of education. Ultimately, Congress had got recognition as assurer of undisturbed future to an Indian government compromising its freedom to British rule. To change its image of acceptor of the on going interference rather dominance of British rule, the Congress was to immerge as a revolutionary reformer. However, Sanskrit was dominating language but it was impossible to get a government job without learning English. The scope of government jobs rendered by Indians were related as well as limited to collecting money from Indian rulers. And, a post called Kirani Babu occupied by British people also immerged later on. In such social condition the boy was kept away from the language of Sanskrit. English was not in use in Maithil families and that is why they were one generation backward in those days. But Jhingur Babu arranged a teacher from Kolkata to educate his son. A Bengali Teacher taught the boy English in Darbhanga afterwards. It was the effect of such education that Kalit became an expert orator with enchanting wittiness. The boy whom Jhingur Babu had seen as a newborn infant smiling while sleeping, then crawling and then toddling is now being educated. He remembered how the baby Kalit was bumping like a frog while learning how to crawl. That memory of his son brought a smile in his face. His wife asked him about the reason of that smile. After being failed in hiding the reason he told everything to his wife. That was enough reason to make the couple exploring the past, the childhood of their son. “Once Kalit was crawling in the courtyard and after crossing the courtyard when he found pebbles he started crawling by lifting his knees up”, recalled his wife. “One day I found him trying to stand on window by holding the wall. I decided to leave him trying. He couldn’t succeed two times and fell down on the bed. His hands couldn’t reach the windows but in his third attempt he jumped high enough to get a grip in widow and stood straight”, Jhingur Babu remembered. “I was counting something oneday, suddenly a sound of oo followed when I said two. I repeated the word and my sound was followed by that sound again then I realised that Kalit was copying me.” “One day after returning from field, I took bathe and ate lunch, and then I cleared my throat by making some sound. Kalit copied the same sound. When I looked back I found him playing with ball. I repeated my sound and he again copied me. I didn’t tell him anything but I understood that he is copying me. Everyone in guest hall started laughing. They started making such sound and Kalit didn’t stop copying them each time in his unique style. How old was he at that time- nine or ten months” “And what I told you, at that time he must be six or seven months old”, said his wife. She was speaking to him directly when only two of them were having their private conversation; she was talking in different way in front in front of her in-laws or other person. Jhingur Babu was also not different from her and he was also talking in third person in presence of others. Everything remains normal in privacy. Jhingur Babu smiled again, vowed to keep Kalit out from this culture, afterall he should realise how backward is his father. Wife again questioned about his laughter but he didn’t disclose anything this time and went to outside. (c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। (c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। 'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आऽ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ’विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १५ जुलाई २००८ (वर्ष १ मास ७ अंक १४) http://www.videha.co.in/मानुषीमिह संस्कृताम् 78
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