'विदेह' १ अगस्त २००८ ( वर्ष १ मास ८ अंक १५ ) एहि अंकमे अछि:- श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' (१९२८- ) प्रसिद्ध ' अभिनव भातखण्डे' जीक मैथिली रचना "विदेह"क लेल। १.नेपालवन आ मधेश स्पेशल २.संपादकीय ३.संदेश २. नाटक नो एंट्री: मा प्रविशश्री उदय नारायण सिंह 'नचिकेता' मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भेल। पढ़ू नाटकक अन्तिम खेप। ३. गद्य - अ.१. कथा विभा-रानी आऽ भालचन्द्र झा आ. आध्यात्म-श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप २. साहेब रामदास-श्री पालन झा/ दैनिकी- ज्योति इ. श्री प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्य उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ) ईशोध लेख: मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध (आगाँ) संगमे श्री मायानन्द मिश्रजीसँ डॉ शिवप्रसाद यादवजी द्वारा लेल गेल साक्षात्कार। ४. पद्य विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी,गजेन्द्र ठाकुर श्री गंगेश गुंजन ज्योति झा चौधरी श्री पंकज पराशर, महाकाव्य महाभारत (आगाँ) श्री जितमोहन -भक्ति गीत ५. संस्कृत मैथिली शिक्षा(आगाँ) ६. मिथिला कला(आगाँ) ७.पाबनि-संस्कार- तीर्थ -पंचदेवोपासक भूमि मिथिला--डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ मधुश्रावणीपर विशेष मिथिलाक पाबनि-तिहारक कैलेंडर) ८. संगीत शिक्षा -श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' ९. बालानां कृते- १०. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी ) ११. संस्कृत मिथिला १२.मैथिली भाषापाक १३. रचना लेखन (आगाँ) 14. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 1.Videha Mithila Tirbhukti Tirhut... 2.Goa and Maithils by Ajay Thakur The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by Jyoti महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ' रहल अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर मैथिली-अंग्रेजी आऽ अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश (संपादक गजेन्द्र ठाकुर आऽ नागेन्द्र कुमार झा) प्रकाशित करबाओल जा' रहल अछि। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना 'विदेह' द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। नो एन्ट्री मा प्रविश (४ अकीय मैथिली नाटक) (c) श्री उदय नारायण सिंह "नचिकेता" प्रकाशक: श्रुति पब्लिकेशन (एहि पुस्तकक ISBN No. शीघ्र देल जायत) महत्त्वपूर्ण सूचना (५): मैथिली-भोजपुरी अकादमीक तत्त्वाधानमे ६ अगस्त २००८ केँ श्रीराम सेन्टर, सफदर हाशमी मार्ग, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ साढ़े पाँच बजेसँ राति लगभग ९ बजे धरि मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोजन भए रहल अछि। मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) संस्था द्वारा एकर अंतर्गत साढ़े छह बजेसँ सवा आठ बजे धरि महेन्द्र मलंगियाक नाटक "काठक बनल लोक" मंचित कएल जाएत- एकर निर्देशक छथि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामाक श्री प्रकाश झा। फेर ७ सितम्बर २००८ केँ मिथिलांगन संस्था द्वारा श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ पाँच बजेसँ मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोजन होएत। विदेह (दिनांक १ अगस्त सन् २००८) १.नेपाल वन आ मधेश स्पेशल २.संपादकीय ३.संदेश नेपाल वन आ मधेश स्पेशल -जितेन्द्र झा पताः जनकपुरधाम, नेपाल एखन ; नई दिल्ली टेलिभिजनमे जं मैथिलीक मादे बात करी त नेपाल वन टेलिभिजनके एकटा अलग स्थान बनि चुकल अछि । नेपाल वन टेलिभिजन राति पौने ८ बजे प्रसारित होब' बला मधेश स्पेशलक माध्यमसं मैथिली बहुतो मैथिल धरि पंहुच रहल अछि । नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाए बला दोसर भाषा मैथिली रहितंहु ओत्त ताहि अनुपातमे संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान नई भेट सकल छइ । एहन अवस्थामे पडोसी देश भारतसं सन्चालित नेपाल वन टेलिभिजन मैथिलीमे कार्यक्रम प्रसारण क मैथिलीभाषा भाषी मध्य अपन अलग स्थान बनालेने अछि । नेपालमे सरकारी स्तरपर संचालित नेपाल टेलिभिजन सहित निजी टेलिभिजन च्यानलमे मैथिली एखनो उपेक्षिते अछि । यद्यपि बेर बेरके मधेश आन्दोलन आ संचारमाध्यमपर लाग बला साम्प्रदायिकताक आरोपक कारणे काठमाण्डुकेन्द्रित टेलिभिजनसबमे आब मैथिलीके स्थान भेट लागल छइ । काठमाण्डुसं प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सेहो सभदिन मैथिलीमे समाचार देल करैत अछि । नेपाल वन टेलिभिजनक मधेश स्पेशल नामक 1 घण्टाक कार्यक्रममे समाचार, नेपालक समसामयिक राजनीति, नेपालक प्रमुख मुद्दापर बातचित आ गीत संगीत समेटल गेल अछि । समसामयिक वस्तुस्थिति पर लोक अपन धारणा द क परिचर्चाके महत्वपूर्ण बना देल करैत अछि । ई कार्यक्रम राति पौने आठ बजेसं पौने नओ बजेधरि प्रसारित होइत अछि । नेपाल केन्द्रित समाचार रहितो नेपाल सं बाहर इ कार्यक्रम देखिनिहार मैथिल कमी नई अछि । नेपालक सीमावर्ती मधुवनी, दरभंगा, सीतामढी, सुपौल, सहरसासहितके जिल्लासभमे सेहो एकर दर्शकके कमी नहि अछि । नेपालक मैथिल जत्त मैथिलीमे समाचार, गीत, आ परिचर्चा सुनि क सुसूचित होइत छैथ ततई भारत आ आन ठामक दर्शक मैथिली गीत आ संचारमाध्यममे मैथिलीक बोली सुनि हर्षित भेल करैत अछि । मधेश स्पेशल नेपालक मधेशीके एकटा अन्तर्राष्ट्रिय संचारमाध्यममे मुंह खोलि क बजबाक अवसर देलकै, सेहो अपने भाषामे । नेपालक संचारमाध्यमसं सेहो कटल कट्ल रहबला मधेशके छोट छिन घटना सेहो प्रमुख समाचार बन लागल । मधेशीक मुद्दापर खुलिक बहस शुरु भ गेल । मधेशक नेता सेहो धोती कुर्ता पहिरिक काठमाण्डुएमे बैसि क कोनो टेलिभिजन पर प्रत्यक्ष रुपें जनतासं बातचित कर लगला। टेलिभिजनमे जत्त मैथिली शुन्यप्राय छल ताहि अबस्थामे एक्कहिबेर एक घण्टा मैथिलीक कार्यक्रमके लोकप्रिय होब मे बेशी समय नइ लगलै । एखन इ कार्यक्रम दू बर्ष पुरा कर लागल अइ। नेपाल 1 टेलिभिजन डिस टिभी आ टाटा स्काइपर उपलब्ध हएबाक कारणे इ देश विदेशमे रह बला मैथिललग सहजहिं पंहुच बनालेने अछि । एहिद्वारे लगभग ७० टा देशमे रहबला मैथिल भाषी मधेश स्पेशलके माध्यमसं मैथिलीमे सुचना आ मनोरन्जन ल रहल छैथ । मधेश स्पेशल मैथिली आ भोजपुरीक मिश्रित कार्यक्रम अछि । एहिमे मैथिली भाषाक गीत नादक अतिरिक्त भोजपुरीक चौकी तोड आ आधुनिक गीत सेहो प्रसारण होइ छै । ई कार्यक्रम तीन भागमे बाटल अछि। पहिलमे नेपाल आ अन्तर्राष्ट्रिय समाचार रहैछै त दोसरमे समसामयिक चर्चा(टक शो) आ तेसरमे मैथिली/भोजपुरी गीत । दृश्य संचारमे मधेश स्पेशल मैथिलीके जगजियार करमे बड पैघ भूमिका निर्वाह क रहल अछि आ क सकैत अछि से कहनाई अतिशयोक्ति नई हएत । डोम कछ आ जट जटिनक नाचसं जं माटिक सुगन्ध लेब चाहैत हुवए त हुनका सभहक लेल मधेश स्पेशल सहायक भ सकैत छै । मेधेश केन्द्रित कार्यक्रम होइतो इ मिथिलान्चलके सर्वाङिण विकासमे कत्तेक सहायक हएत से त आव बला दिने बताओत मुदा एतवा निश्चित जे टेलिभिजनमे मैथिलीक नियमित प्रसारणसं मैथिलके अपन बोली अपन भाषा याद दियबैत रहैतै । २.संपादकीय (वर्ष: १ मास: ८ अंक:१५) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक १५, दिनांक १ अगस्त सन् २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अंकमे नचिकेताजीक नाटक नो एंट्री: मा प्रविश अन्तिम खेप ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। गगेश गुंजन जीक पद्य आऽ विस्मृत कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री मौन जी, मैथिलीपुत्र प्रदीप, श्री पालन झा श्री पंकज पराशर आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री मायानन्द जीक इन्टरव्यू लेलन्हि श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव। तकर दोसर भाग सेहो प्रस्तुत अछि। नेपाल १ टी.वीक मैथिली कार्यक्रमक विषयमे विवरण दए रहल छथि जितेन्द्रजी आऽ भक्ति-गीत प्रस्तुत कएने छथि जितमोहनजी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। वरिष्ठ रचनाकार अपन रचना हस्तलिखित रूपमे सेहो नीचाँ लिखल पता पर पठा सकैत छथि। गजेन्द्र ठाकुर ३८९, पॉकेट-सी, सेक्टर-ए, बसन्तकुंज,नव देहली-११००७०. ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in ३.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व। ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- "विदेह"क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आ’ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। १. नाटक श्री उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ जन्म-१९५१ ई. कलकत्तामे। १९६६ मे १५ वर्षक उम्रमे पहिल काव्य संग्रह ‘कवयो वदन्ति’। १९७१ ‘अमृतस्य पुत्राः’ (कविता संकलन) आऽ ‘नायकक नाम जीवन’ (नाटक)| १९७४ मे ‘एक छल राजा’/ ’नाटकक लेल’ (नाटक)। १९७६-७७ ‘प्रत्यावर्त्तन’/ ’रामलीला’(नाटक)। १९७८मे जनक आऽ अन्य एकांकी। १९८१ ‘अनुत्तरण’(कविता-संकलन)। १९८८ ‘प्रियंवदा’ (नाटिका)। १९९७-‘रवीन्द्रनाथक बाल-साहित्य’(अनुवाद)। १९९८ ‘अनुकृति’- आधुनिक मैथिली कविताक बंगलामे अनुवाद, संगहि बंगलामे दूटा कविता संकलन। १९९९ ‘अश्रु ओ परिहास’। २००२ ‘खाम खेयाली’। २००६मे ‘मध्यमपुरुष एकवचन’(कविता संग्रह। भाषा-विज्ञानक क्षेत्रमे दसटा पोथी आऽ दू सयसँ बेशी शोध-पत्र प्रकाशित। १४ टा पी.एच.डी. आऽ २९ टा एम.फिल. शोध-कर्मक दिशा निर्देश। बड़ौदा, सूरत, दिल्ली आऽ हैदराबाद वि.वि.मे अध्यापन। संप्रति निदेशक, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। नो एंट्री : मा प्रविश (चारि-अंकीय मैथिली नाटक) नाटककार उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ निदेशक, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर (मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत २५ वर्षक मौन भंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ’ रहल अछि।) चारिम कल्लोलक पहिल खेप जारी....विदेहक एहि चौदहम अंक १५ जुलाई २००८ सँ। नो एंट्री : मा प्रविश चारिम कल्लोल पहिल खेप चतुर्थ कल्लोल [जेना-जेना मंच पर प्रकाश उजागर होइत अछि त’ देखल जायत जे यमराज चित्रगुप्तक रजिष्टर केर चेकिंग क’ रहल छथि। आ बाँकी सब गोटे सशंक चित्र लए ठाढ़ छथि। किछुये देर मे यमराजक सबटा ‘चेकिंग’ भ’ जाइत छनि। ओ रजिष्टर पर सँ मुड़ी उठौने अपन चश्मा केँ खोलैत नंदी केँ किछु इशारा करैत छथि।] नंदी : (सीना तानि कए मलेट्रीक कप्तान जकाँ उच्च स्वरमे) सब क्यो सुनै.... भृंगी : (आर जोर सँ) सुनू....सुनू...सनू- उ-उ-उ ! नंदी : (आदेश करैत छथि) “आगे देखेगा....! आगे देख !” (कहैत देरी सब क्यो अगुआ कए सचेत भेने सामने देखै लागैत छथि ; मात्र यमराज आ चित्रगुप्त विश्रान्तिक मुद्रा मे छथि।) भृंगी : (जे एक-दू गोटे भूल क’ रहल छथि हुनका सम्हारैत छथि---) ‘हे यू ! स्टैंड इरेक्ट... स्टैंड इन आ रो !’ (जे कनेको टेढ़-घोंच जकाँ ठाढ़ो छलाह, से सोझ भ’ जाइत छथि, सचेत सेहो आ लगैछ जेना एकटा दर्शक दिसि मुँह कैने ठाढ़ पंक्ति बना नेने होथि।) नंदी : (पुनः सेनाकेँ आदेश देबाक स्वर मे) सा-व-धा-न! (सब क्यो ‘सावधान’ अर्थात् ‘अटेनशन’ केर भंगिमा मे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) वि-श्रा-म! (सब क्यो ‘विश्राम’ क अवस्थामे आबि जाइत छथि।) भृंगी : (दहिना दिसि ‘मार्च’ क’ कए चलबाक आदेश दैत) दाहिने मुड़ेगा--दाहिने मोड़ ! (सभ क्यो तत्क्षण दहिना दिसि घुरि जाइत छथि।) नंदी : (आदेश करैत) आगे बढ़ेगा ! आ-गे-ए-ए बढ ! (सब क्यो बढ़ि जाइत छथि।) एक-दो-एक-दो-एक-दो-एक ! एक ! एक ! [सब गोटे मार्च करैत मंचक दहिना दिसि होइत यमराज-चित्रगुप्त केँ पार करैत संपूर्ण मंचक आगाँ सँ पाछाँ होइत घुरि बाम दिसि होइत पुनः जे जतय छल तत्तहि आबि जाइत छथि। तखनहि भृंगीक स्वर सुनल जाइछ ‘हॉल्ट’ त’ सब थम्हि जाइत छथि.... नहि त’ नंदी एक - दो चलिये रहल छल।] चित्रगुप्त : (सभक ‘मार्च’ समाप्त भ’ गेलाक बाद) उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सँ हम कहै चाहैत छियनि जे एत’ उपस्थित सब क्यो एकटा मूल धारणाक शिकार भेल छथि—सभक मोन मे एकटा भ्रम छनि जे पृथ्वी पर सँ एतय एक बेरि आबि गेलाक मतलबे इयैह जे आब ओ स्वर्गक द्वार मे आबि गेल छथि। आब मात्र प्रतीक्षा करै पड़तनि... धीरज ध’ लेताह आ तकर बादे सभकेँ भेटतनि ओ पुरस्कार जकरा लेल कतेको श्रम ,कतेको कष्ट—सबटा स्वीकार्य भ’ जाइछ। नेताजी : (आश्चर्य होइत) तखन की ई सबटा भ्रम मात्र छल, एकटा भूल धारणा छल---जे कहियो सत्य भ’ नहि सकैत अछि ? चित्रगुप्त : ठीक बुझलहुँ आब---ई सबटा भ्रम छल। नंदी : सपना नहि... भृंगी : मात्र बुझबाक दोष छल... वामपंथी : तखन ई दरबज्जा, दरबज्जा नहि छल....किछु आन वस्तु छल....? चित्रगुप्त : ई दरबज्जा कोनो माया- द्वार नहि थिक....आई सँ कतेको युग पहिने ई खुजतो छल, बंदो होइत छल...! नेताजी : मुदा आब? अनुचर 1 : आब ई नञि खुजैत अछि की ? अनचर 2 : जँ हम सब सामने जा कए तारस्वर मे पुकारि- पुकारि कए कही—‘खुलि जो सिमसिम्’ तैयहु नहि किछु हैत! नंदी : ई कोनो ‘अलीबाबा चालीस चोर’ क खिस्सा थिक थोड़े… भृंगी : आ ई कोनो धन-रत्नक गुफा थिक थोड़े ! वामपंथी : त’ ई दरबज्जाक पाछाँ छइ कोन चीज ? नेता : की छइ ओहि पार ? अनुचर 1 : मंदाकिनी ? अनुचर 2 : वैतरिणी ? अभिनेता : आ कि बड़का टा किला जकर सबटा कोठरी सँ आबि रहल हो दबल स्वरेँ ककरहु क्रन्दनक आहटि...नोर बहाबैत आत्मा सब...! चोर : आ कि एकटा नदी-किनारक विशाल शमशान - घाट,जतय जरि रहल हो हजारक हजार चिता...हक्कन कानैत आत्मीय जन...? बाजारी : नहि त’ भ’ सकैछ एकटा बड़का बजारे छइ जतय दिन-राति जबरदस्त खरीद-बिक्री चलि रहल हो। भिख-मंगनी : इहो त’ भ’ सकैछ जे घुरिते भेटत एकटा बड़का टा सड़क बाट काटैत एकटा आन राजपथक आ दुनूक मोड़ पर हाथ आ झोरा पसारैत ठाढ़ अछि लाखो लोग- भुखमरी, बाढ़ि , दंगा फसाद सँ उजड़ल उपटल लोग.... रद्दीवला : नञि त’ एकटा ब-ड़-की टा केर ‘डम्पिंग ग्राउंड’ जतय सबटा वस्तु व्यवहार क’ क’ कए लोग सब फेकै जाय होइक—रद्दी सँ ल’ कए जूठ-काँट, पुरनका टूटल भाँगल चीज सँ ल’ कए ताजा बिना वारिसक लहास... प्रेमिका : कि आयातित अवांछित सद्यः जनमल कोनो शिशु... प्रेमी : कन्या शिशु, हजारोक हजार, जकरा सबकेँ भ्रुणे केँ कोखिसँ उपारि कए फेंकल गेल हो... वामपंथी : अथवा हजारो हजार बंद होइत कारखानाक बजैत सीटी आ लाखो परिवारक जरैत भूखल-थाकल चूल्हि-चपाटी.... नेताजी : ई त’ अहीं जानै छी जे दरबज्जाक ओहि पार की छइ... हम सब त’ मात्र अन्दाजे क’ सकै छी जे भरिसक ओम्हर हजारोक हजार अनकहल दुःखक कथा उमड़ि-घुमड़ि रहल छइ अथवा छइ एकटा विशाल आनन्दक लहर जे अपनाकेँ रोकि नेने होइक ई देखबाक लेल जे दरबज्जा देने के आओत अगिला बेरि... चित्रगुप्त : ई सबटा एक साथ छैक ओहि पार, ठीक जेना पृथ्वी पर रचल जाय छइ स्वर्ग सँ ल’ कए नर्क - सबटा ठाम ! जे क्यो नदीक एहि पार छइ तकरा लागै छइ ने जानि सबटा खुशी भरिसक छइ ओहि पार ! नंदी : भरिसक नीक जकाँ देखने नहि हैब ओहि दरबज्जा आ देबार दिसि ! भृंगी : एखनहु देखब त’ ऊपर एकटा कोना मे लटकि रहल अछि बोर्ड—“नो एन्ट्री!” नेताजी : (आश्चर्य होइत) आँय! (सब क्यो घुरि कय दरबज्जा दिस दैखैत छथि) सब क्यो : “नो एंट्री ?” (प्रकाश अथवा स्पॉट-लाइट ओहि बोर्ड पर पड़ैत अछि) नेताजी : ई त’ नञि छल पता ककरहु.. नहि त’... चित्रगुप्त : नहि त? नेताजी : (विमर्ष होइत) नहि त’....पता नहि....नहि त’ की करितहुँ.... वामपंथी : मुदा आब ? आब की हैत ? अभिनेता : आब की करब हम सब ? नेता : आब की हैत ? (चित्रगुप्त किछु नहि बाजैत छथि आ नंदी-भृंगी सेहो चुप रहैत छथि । एक पल केर लेल जेना समय थम्हि गेल होइक।) अनुचर 1 : यमराजेसँ पूछल जाइन ! अनुचर 2 : (घबड़ा कए) के पूछत गय ? अहीं जाउ ने ! (केहुँनी सँ ठेलैत छथि।) अनुचर 1 : नञि-नञि.... हम नञि ? (पछुआ अबैत छथि।) अनुचर 2 : तखन नेताजीए सँ कहियनि जे ओ फरिछा लेथि ! अनुचर द्वय : नेताजी ! (नेताजीकेँ घुरि कए देखैते देरी दुनू जेना इशारा क’ कए कहैत होथि पूछबा दय। नेताजी : (विचित्र शब्द बजैत छथि- कंठ सूखि जाइत छनि) ह..ह...! [नेताजी किछु ने बाजि पबैत छथि आ ने पुछिए सकैत छथि। मात्र यमराजक लग जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज रजिष्टर मे एक बेरि दैखैत छथि, एक बेरि नेताजी दिस] यमराज : बदरी विशाल मिसर ! नेताजी : (जेना कठघरामे ठाढ़ अपन स्वीकारोक्ति दैत होथि) जी ! यमराज : आयु पचपन ! नेताजी : (अस्पष्ट स्वरेँ) साढ़े तिरपन ! नंदी : असली उमरि बताउ ! भृंगी : सर्टिफिकेट-बला नञि ! नेताजी : जी पचपन ! यमराज : जन्म भाद्र मासे, कृष्ण पक्षे, त्रयोदश घटिका, षड्-त्रिशंति पल, पंचदश विपल... जन्म-राशि धनु...लग्न-वृश्चिक, रोहिणी नक्षत्र, गण-मनुष्य, योनि-सर्प, योग-शुक्ल, वर्ग मार्जार, करण- शकुनि! [जेना-जेना यमराज बाजैत चलि जाइत छथि—प्रकाश कम होइत मंचक बामे दिसि मात्र रहैत अछि जाहि आलोक मे यमराज आ मुड़ी झुकौने नेताजी स्पष्ट लखा दैत छथि। बाँकी सभक उपर मद्धिम प्रकाश। नंदी यमराजक दंड केँ धैने हुनकर पाछाँ सीना तानि कए ठाढ़ छथि, भृंगी टूल पर पोथीक विशेष पृष्ठ पर आँगुर रखने रजिष्टरकेँ धैने छथि। चित्रगुप्त लगे मे ठाढ़ छथि, यमराजक स्वर मे धीरे-धीरे जेना प्रतिध्वनि सुनल जाइत छनि-एना लागि रहल हो।] नेताजी : जी ! यमराज : (हुंकार दैत) अहाँ केँ दैखैत छी ‘शश योग’ छैक...(श्लोक पढ़ैत छथि अथवा पाछाँ सँ प्रतिध्वन्त स्वरेँ ‘प्रि रिकॉर्डेड’ उच्चारण सुनल जाइत अछि-) “भूपो वा सचिवो वनाचलरतः सेनापतिः क्रकूरधीःधातोर्वाद-विनोद-वंचनपरो दाता सरोषेक्षणः। तेजस्वी निजमातृभक्तिनिरत: शूरोऽसितांग सुखी जातः सप्ततिमायुरेति शशके जारक्रियाशीलवान् अर्थात—नेता बनब त’ अहाँक भागमे लिखल अछि आ सदिखन सेवक आ अनुचर-अनुयायी सँ घेरल रहब सेहो लिखल अछि.... छोट-मोट अन्याय नहि कैने होइ—से नहि...मुदा बहुत गोटे अहाँक नाम ल’ कए अपराध करै जाइ छल—से बात स्पष्ट। वैह जे कतेको जननेता केँ होइ छनि..कखनहु देखियो कए अनठा दैत छलहुँ। बाजै मे बड़ पटु छी से त’ स्पष्टे अछि.. मुदा ई की देखि रहल छी—नुका चोरा कए विवाहक अतिरिक्तो प्रेम करबा दय.. सत्ये एहन किछु चलि रहल अछि की?” नेता : (स्पष्टत: एहन गोपनीय बात सब सुनि कए अत्यंत लज्जित भ’ जाइत छथि। हुनक दुनू बगल मे ठाढ़ दुनू अनुचर अकास दिसि मूड़ी उठा कए एम्हर-ओम्हर देखै लागै छथि जेना ओसब किछु नहि सुनि रहल छथि) नहि...माने ..तेहन किछु नहि.. चित्रगुप्त : (मुस्की दैत) मुदा कनी-मनी...?.नहि? नेता : हँ, वैह.... बुझू जे... यमराज : सब बुझि गेलहुँ.... चित्रगुप्त : मुदा ओ कहै छथि हुनकर उमर भेलनि पचपन और शश-योग कहै छइ जीवित रहताह सत्तरि सँ बेसी उमरि धरि तखन ? यमराज : तखन बात त’ स्पष्ट जे समय सँ पहिनहि अहाँ कोनो घृण्य राजनैतिक चक्रांतक शिकार बनैत एतय पठाओल गेल छी। (मोटका रजिष्टर केँ बन्न करैत छथि--) नेता : तकर माने ? यमराज : तकर माने ठीक तहिना जेना एहि चारि गोट सैनिक केँ एत’ ऐबाक आवश्यकता नहि छल... ओहो सब अहीं जकाँ .. माने इयैह जे अहाँ मुक्त छी, घुरि सकै छी राजनीतिक जगत मे... एतय कतारमे ठाढ़ रहबाक कोनो दरकारे नहि... नेता : आँय ! (कहैत देरी दुनू अनुचर आनन्दक अतिरिक्त प्रकाश करैत हुनका भरिपाँज पकड़ि लैत छथि। संगहि कनेक देर मे नारेबाजी सेहो शुरू क दैत छथि।) [नेताजीक आगाँ दूटा सैनिक सेहो मंच सँ निष्क्रांत होइत छथि।] यमराज : (नेताजीक संगहि खिसकि जा रहै चाहै छथि से देखि कए, दुनू अनुचर सँ) अहाँ सभ कत’ जा रहल छी ? (दुनूक पैर थम्हि जाइत छनि।) की ? नहि बाजलहुँ किछु ? अनुचर 1 : आ.. जी.. हम सब..नेताजी... जा रहल छथि तैं... यमराज : कोनो तैं-वैं नहि चलत..(घुरि कए) चित्रगुप्त ! चित्रगुप्त : जी ? यमराज : नीक जकाँ उल्टा-पुल्टा कए, देखू त’ रजिष्टर मे हिनका सब दय की लिखल छनि... चित्रगुप्त : जी !....(अनुचर 1 केँ देखा कए) राजनीतिक जगतमे बदरी विशाल बाबू जतेक मार-काट कैने- करौने छथि—से सबटा हिनके दुनूक कृपासँ होइ छलनि.... अनुचर 1 : (आपत्ति जताबैत) नहि... माने... यमराज : (डाँटैत) चोप! कोनो-माने ताने नहि... चित्रगुप्त : (आदेश दैत) सोझे भुनै केर कड़ाही मे ल’ जा कए फेंकल जाय ! (कहैत देरी नंदी आ भृंगी अनुचर 1 आ अनुचर 2 केँ दुनू दिसि सँ ध’ कए बाहर ल’ जाइत छथि—ओम्हर बाँकी मृत सैनिक मे सँ दू गोटे हिनका ल’ कए आगाँ बढ़ैत छथि आ नंदी-भृंगी अपन-अपन स्थान पर घुरि आबैत छथि।) प्रेमी युगल : (दुनू आर धीरज नहि राखि पबैत छथि) आ हम सब ? प्रेमी : हमरा दुनूकेँ की हैत ? प्रेमिका : ई हमरा कतेको कालसँ घुरि चलबा लेल कहैत छलाह... मुदा हमही नहि सुनि रहल छलियनि ! प्रेमी : की एहन नहि भ’ सकैत अछि जे..... बाजारी : (आगाँ बढ़ैत) हे.... हिनका दुनू केँ अवश्य एकबेर जिनगी देबाक मौका देल जाइन... चित्रगुप्त : से कियै ? बाजारी : देखू...एत त’ हम कन्यादान क’ कए विवाह करबा देलियनि... मुदा वस्तुतः त’ ई दुनू गोटे अपन-अपन परिवारक जे क्यो अभिभावक छथि तनिका सभक आशीर्वाद नहि भेटि सकलनि। भद्र व्यक्ति 2 : ...आ तैं दुनू गोटे निश्चित कैने छलाह जे जीयब त’ संगहि आ मरब त’ संगहि..मुदा आब त’ हम सब विवाह कैये देने छी... बाजारी व्यक्ति : तैं हमरा लगैछ जे दुनू परिवारो आब मानि लेताह... भद्र व्यक्ति 1 : भ’ सकैछ आब पश्चातापो क’ रहल छथि। यमराज : बड़ बेस... चित्रगुप्त : आ जँ एखनहु अक्खड़ दैखौता त’ अहाँ सब हुनका लोकनिकेँ समझा बुझा’ सकबनि कि नहि ? भद्र व्यक्ति 1,2 : अवश्य...अवश्य ! यमराज : बेस... तखन (नंदी-भृंगीकेँ) एहि दुनू बालक-बालिका आ हिनका दुनूक एतहुका अभिभावक लोकनिकेँ रस्ता देखा दियन्हु... [नंदी-भृंगी प्रेमी-प्रेमिका आ ओहि तीनू गोटेकेँ (दुनू भद्र व्यक्ति आ बाजारी वृद्धकेँ) रस्ता देखा कए बाहर ल’ जाइत छथि...पाछू-पाछू ढोल-पिपही बजा कए ‘मार्च’ करैत बाहर ल’ जाइत छथि। तखन रहि जाइत छथि जेसब ताहि सबमे सँ अभिनेता अगुआ आबै छथि।] चित्रगुप्त : (जेना यमराज केँ अभिनेताक परिचय द’ रहल छथि) ई विवेक कुमार भेलाह... (नंदी सँ) पृष्ठ पाँच सौ अड़तीस... अभिनेता : (आश्चर्य-चकित होइत, चित्रगुप्त सँ) अहाँ केँ हमर पृष्ठो मोन अछि...करोड़ो मनुक्खमे....? ई त’ आश्चर्यक गप्प भेल... चित्रगुप्त : एहि मे अचरजक कोन बात? एतेक किछु करैत रहैत छी जे बेरि-बेरि ओहि पृष्ठ पर ‘एन्ट्री’ करै-टा पड़ै अछि...तैं..... नंदी : (जेना घोषणा क’ रहल होथि...) पृ. 538, विवेक कुमार उर्फ.....? अभिनेता : (टोकैत) हे कथी लय दोसर-दोसर नाम सब लै जाइ छी ? बड़ मोसकिल सँ त’ अपन जाति-पाति केँ पाछाँ छोड़ा सकल.... आ तखन एत्तहु आबि कए....? चित्रगुप्त : आगाँ बढ़’! नाम छोड़ि दहक ! नंदी : आगाँ रिकार्ड त’ ई कहै अछि जे ओना ई छलाह त’ बड्ड मामूली व्यक्ति, तखन अपन कुशलता सँ, आओर सौभाग्यो सँ, पहुँचि गेल छथि शिखर पर... पाइ बहुत कमौलनि.. (झुकि कए नीक जकाँ रजिष्टर मे सँ पढ़ैत...) दान-ध्यान सेहो कैने छथि... ततबा नहि जतबा क’ सकैत छलाह अनेक महिला सँ हिनक नाम केँ जोड़ल जाइ छनि...अफवाहि केँ अपने पसिन्न करै छथि... एहि मामलामे बदनामे रहलाह... आ तैं पारिवारिक जीवन सुखद नहि छलनि... निःसंतान छथि, पत्नीकेँ त्यागि देताह ताहिसँ पहिनहि वैह छोड़ि कए चलि गेलीह...वस्तुतः पत्नीक कहब छलनि ई असलमे नपुंसक छलाह... अभिनेता : (नंदी केँ थम्हबैत) की सभक सामने अंट-संट पढ़ि रहल छी पोथासँ ? पत्नी छोड़ि कए चलि गेलीह… नीक कैलीह, एखन सुखी छथि एकटा अधेड़ उमरक नवयुवकक संगे.... मीडिया बला सभसँ पाइ भेटलनि आ कि कहानी बनबै लगलीह... ‘अफसाना’.... जे बिकत बड्ड बेसी। चित्रगुप्त : से ओ सब जाय दहक ...ई कह आर कोन विशेष बात सभ दर्ज छैक.. भृंगी : (ओहो झुकि कए देखि रहल छलाह रजिष्टर मे, आब रहल नहि गेलनि---) हिनक जत्तेक मित्र छनि, शत्रुक संख्या ताहिसँ बहुत गुना बेसी छनि। यमराज : से त’ स्वाभाविके..... भृंगी : हिनक शत्रुपक्ष कहैत अछि ई नुका–चोरा कए कतेको वामपंथी गोष्ठी केँ मदति करैत छलाह.... बहुतो ताहि तरहक संगठन केँ .... वामपंथी : (प्रतिवादक स्वरमे) कथमपि नहि... ई सब फूसि बाजि रहल छी अहाँसब.... भृंगी : बाजि कहाँ रहल छी यौ कामरेड? हम त’ मात्र पढ़ि रहल छी--! वामपंथी : हिनका सन ‘बुर्जोआ’ गोष्ठीक सदस्य कखनहु करत गै मदति कोनो साम्यवादीक ? असंभव ! अभिनेता : कियै ? साम्यवाद पर अहींसभक जन्मसिद्ध अधिकार छै की ? आन क्यो ‘साम्य’ क कल्पना नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : (व्यंग्यात्मक स्वरें) कियैक नहि ? कल्पनाक घोड़ा पर के लगाम लगा सकैत अछि ? करू, जतेक मर्जी कल्पना करै जाऊ ! मुदा हम सब छी वास्तविक जगत् मे वास्तव केँ भोगि रहल छी... अभिनेता : वास्तवमे भोगी छी अहाँ सब, भोगक लालसा मे ‘साम्य’ दय गेलहुँ बिसरि ‘वाद’टा मोन रहल ... वाद-विवाद मे काज मे आबैत अछि....! चित्रगुप्त : वाद-विवाद सँ काज कोन ? कहबाक तात्पर्य ई जे विवेक कुमार जीक विवेक भरिसक बड़ बेसी काज करैत छनि...तैं..... यमराज : (गंभीर मुद्रामे) हुम्-म्-म् ! (नंदी सँ) तखन देखै छी विपक्ष सँ बैसी सपक्षे मे सबटा पढ़ि रहल छी... चित्रगुप्त : तकर अलावे ...ई हिनक अकाल आगमन थिकनि.... स्टंटमैनक बालक छल अस्वस्थ, गेल छल छुट्टी ल’ क’ अपन घर... त’ ई अपनहि स्टंट करै लगलाह... अभिनेता : (बिहुँसैत) कनियें टा चूक भ’ गेलैक कि पहाड़ी पर सँ खसि पड़लहुँ.... यमराज : कनिये-कनिये भूल-चूक मे बदलि जाइत अछि इतिहास आ पुराण...सबटा पुण्य बहा जाइत अछि तनिके पापसँ ! मुदा जे हो (नंदी सँ) हिनका एखनहुँ अनेक दिन जीबाक छनि.. पठा दियौक पृथ्वी पर... वामपंथी : (अगुआ कए) आ हम ? हमर की हैत ? (एक बेरि यमराज तँ एक बेरि चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि। मात्र भृंगी ससम्मान अभिनेताकेँ बाहर पहुँचाबै जाइत छथि।) यमराज : अहाँक कथा मे तँ स्वर्ग-नर्क कोनो टा नहि अछि...ने छी हम आ ने चित्रगुप्त... वामपंथी : जी, से त’...(कहै जाइत छलाह ‘अवश्य !’ मुदा ताहि सँ पहिनहि टोकल जाइत छथि।) चित्रगुप्त : सैह जखन बात छैक त’ अहाँ अपने विचार करू अपन भविष्य....(पॉकिट सँ एकटा मुद्राकेँ ‘टॉस’ करबाक भंगिमा मे.....) कहु की कहै छी ‘चित’ की ‘पट’? वामपंथी : हमर विश्वास आ हमर शिक्षा किछु आने तरहक छल, मुदा जे प्रत्यक्ष क’ रहल छी (कहैत देवार....यमराज...चित्रगुप्त आदि केँ देखाबैत छथि) तकरे अस्वीकार कोना करू ? यमराज : कियैक ? ईहो त’ भ’ सकैछ जे आँखि धोखा द’ रहल अछि...ई सबटा एकटा दुःस्वप्न मात्र थिक... कल्पलोक मात्र थिक...ई, जतय घुसै जायब त’ देखब बोर्ड पर टांगल अछि---‘नो एन्ट्री’! वामपंथी : तखन ? चित्रगुप्त : तखन की ? वामपंथी : तखन हम की करू ? यमराज : (गंभीर मुद्रामे) पहिने ई कहू... विषम के थिक ? मनुक्ख कि प्रकृति ? वामपंथी : दुनू... यमराज : के कम के बेसी ? वामपंथी : प्रकृति मे तैयहु कत्तहु ‘प्राकृतिक न्याय’ (नैचरल जस्टिस) काजक’ रहल अछि, मुदा मनुक्खक स्वभावक आधारे अन्याय पर ठाढ़ अछि... यमराज : की अहाँक राजनीति एहन अन्याय केँ दूर नहि क’ सकैत अछि ? वामपंथी : प्रयास करैत अछि... यमराज : ठीक अछि... तखन हिनको तीनू गोटे केँ नेने जाऊ ! (चोर उचक्का आ पॉकिट-मारक दिसि देखा क’ बाजैत छथि) आ देखू हिनका सब केँ बदलि सकै छी वा नहि ? वामपंथी : बेस.... [कहैत पॉकिट-मार आ उचक्का हुनका लग चलि आबै छथि। चोर कनेक इतस्ततः करैत छथि आ अंत मे पूछि दैत छथि जाय सँ पूर्व…] चोर : तखन एहि सँ आगाँ ? यमराज-चित्रगुप्त-नंदी : (एक्कहि संग) ‘नो एनट्री’... [कहैत देरी तीनू गोटे केँ साथ ल’ कए वामपंथी युवा वाहर जैबाक लेल उद्यत होइत छथि कि तावत् अभिनेता केँ छोड़ि कए भृंगी घुरि कए मंच पर प्रवेश क’ रहल छलाह।] यमराज : मा प्रविश.... चित्रगुप्त : कदाचन! [चारू गोटे एक पलक लेल चौंकैत थम्हैत छथि ....तकर बादे निष्क्रांत होइत छथि। हुनका सभक प्रस्थानक पाछाँ भृंगी आगाँ बढ़ैत छथि यमराजक दिसि।] अ.१. कथा विभा-रानी आऽ भालचन्द्र झा आ. आध्यात्म-श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप २. श्री पालनविदेह नूतन अंक प्रदीप दैनिकी रामदास झा/ दैनिकी- ज्योति इ. उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)श्री प्रेमशंकर सिंह कथा भालचन्द्र झा आऽ विभा-रानी श्री भालचन्द्र झा, ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो), टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)। लेखन- बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)। थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन। श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि। चूल्हि ---: भालचन्द्र झा '... चूल्हि आ स्त्री - दुनूक प्रारब्ध एके जकाँ होइत छैक, बुझलहक? जरैत-जरैत जीबइए में दुनूक गुजरि होइत छैक... गै दाई !' जाबैत जियलै - ई गप्प, माय हमरा सदिखन कहिते रहलै। ई कह' में जे मर्म नुकाएल छलै, से बुझबाक उमिर त' नहिंए रहय, मुदा जाहि तरहैं उसाँस ल' क' माय ई बात कहय, ताहि स' ई त' लागबे करय जे ई गप्प अबस्से कोनो तरहक जीवन-मंत्र हेतैक - अहि तरहक विचार मोन मे आबि आबि जाय। ... आ देखियौ भाग्यक खेला, जे हमर आ चूल्हिक संग कहाँदनि जनमिते देरी कि धरा गेलै। माइये कहथिन्ह जे हमर जनम अहिना जाड़ स' कनकनाइत राति मे भेलै। हे दाई - जनम त' भ' गेलै, मुदा मुँह स' पहिल केहां निकाल' लेल चुल्हिएक सहारा लेब' पड़लै। अपन गरमी द' क' चूल्हिए हमरा बचा लेने रहय। आ ताहि लेल वा की, जे घर-आँगनक लोक आओर हमर नामे ध' देलकै चुल्हिया' ...। आब कहियौ त' भला, इहो कोनो रीत भेलै नाम जोड़बाक ! ओ त' धन्यभाग हमर, जे बबा के की फुरेलन्हि आ नामकरणक दिन हमर नाम राखि देलखिन्ह - 'सिया सुन्नरि'। तैयो घर-आँगन के त' बूझिते छियै ने' ... एक बेर जे कह' लगलै 'च्ुूल्हिया' त' ओ कियो बदलै भला! हे दाई, 'सिया-सुन्नरि'। ई नाम त' मात्र कागजे लेल रहि गेलै। बबा त' बड्ड खिसियैथिन्ह मुदा लोको सभ थेथर भ' गेल रहै। हुनका सोझा मे त' सभ किओ दम साधि लै, मुदा जखने परोछ भेलाह कि फेर सभके कोनो झरकबाही लागि जाय छलै... चुल्हिया, चूल्हियाक से किलोल मचि जाय जे की कही ... आई त' हँसियो लागि जाइयै । मुदा छोटपन मे हमरा बड़्ड खराब लागय, बुझलहुँ की? आई बैसल-बैसल जहन ओ गप्प सभ मोन पड़ेैयै त' विचार' लागै छी जे वास्तव में, एहन आगांक बिचार करयबला पुरूख पात्र के रहब घर में कतेक जरूरी होई छै। नञि त' घूमैत रहू जनम भरि अपन एहने जरल धनकल सन नाम ल' क' ... चुल्हिया ..पनबसना दाई ... ताबा कुमारी ... चकला देबी ...!!! धुर्र जाउ, अहाँ के हँस्सी लगैय' ... आ हम सोचै छी जे देखियौ त'। बेटी आओर के एक गोट नीक नामो टा नसीब नञि होई छै अइ समाज मे... तहन आर कथीक आस धरै ओ...? कोन भरोस पर जीबय ओ? ... त' कह' जे लगलहुँ ... जे कनि बूझ' सूझ' जोगर भेलहुँ त' देखियैक जे हमरा घरक चूल्हि जहाँ कनिको करियैलै कि हमर माय ओकरा लीप-पोइत क' ओकरा चिक्कनि चुनमुन बना दैक। चूल्हि सेहो ओकरा लेखे एकटा नान्हि टाक बच्चे टा रहै। जाहि माया आ ममति स' ओ हमरा आओर के धोबै-पोछै छलै, ओहि स' कम माया ममति नञि देखलियै हम ओकरा चूल्हि लीपैतकाल। आ, कने नीक स' सोचियौ, त' चूल्हि स' जे ओकर सिनेह रहय से अनर्गल नञि छलै ने! यै! जे चूल्हि आजन्म जरि धनकि क' लोग आओरक पेट भरै छै, ओकरे प्रति लोक एतेक कृतघ्न कोना क' भ' जाइत छैक? ... माउगि के ल' क' सेहो अपना समाज मे अहिना होबैत एलैये आई धरि। भरि जिनगी दोसरे लेल जरितहु-धनकितहु बेर पडला पर ओकरो अही चूल्हि जँका कात क' दै छैक लोक आओर। जिबिते जी मुँह में छाउर भरने पड़ल रहैत अछि अपन भनसाघर क एकटा कोन्टा मे...। धुरि जो। हमहूँ ई कोन जरल धनकल सनक कथा ल' क' बैसि गेलहँु। त'...कहैत जे छलहुँ ...। रसे - रसे ई चूल्हि लीप' पोतक काज हमरे जिम्मा लागि गेल। आ ओहि में हमर मोने सेहो लाग' लागल। बुझलहुँ ! फूसि कियैक बाजब? आहि रे बा। ले बलैय्या के। एकटा बात त' कहब बिसरिए गेलहुँ। हमर माय बड्ड लुरिगर आ तैं अपना लूरि-ढंगक कारणे पूरे परोपट्टा में नामी। सत्यनारायण भगवानक पूजा मे ओ जे अरिपन दै से की कहू। देखितहुँ त' आँखि चोन्हरा जयतियैक। केहनो खरकट्टल बासन कियैक नञि रहौ - से कहै छी जे यदि ओ माँजि दैक त' बर्तन चानी जकां झलमल क' उठै छलै। हे, छठि मे अहिबातक पातिल जे ढेरितै - तँ एहन, जे गाँम के लोक कहै छी, भकचन्ह रहि जाइत छलै। माउगि बला कोनो एहेन लुरि बाँकी नञि छलै, जाहि मे ओ ककरो स' पाछां भ' जइतियैक, कहै छी जे से । सिआइयो-कढ़ाई सीख' लेल परोपट्टाक नवकनिञा सभ के कहै छी जे से सिहंता लागल रहैत छलै जे कहिया ओ हुनकर अंगना मे आबथु आ कहिया ओ सभ हुनका स' अपन मनपसीनक चीज बतुस आओर बनाबय के सीखि लियए। माय मे बस कमी छलैक त' एकेटा, जे ओ नैहरक बड्ड गरीब छलै ! आ गाँम-घर मे त' बुझले अछि, जे जकरा लग टाका पूँजीक ढेर छै, सएह लोक मातबर कहल जाइत छैक। ओ मनुक्ख मे गनल जाइत छैक। आ कि नञि? लूरि-बेबहार त' बादक गप्प भेलै। टाका पूँजी रहलै त' बींगलो-बताह सभ बुधियार भ' जाइ छै। आ से जे नञि रहलै त' आँखि-कान रहितहु लोक आन्हरे-लांगड़ बुझल जाइ छै। यै, जौं सच-सच पूछी त' अपना सभ मे माउगि-मनुक्ख स' बियाहदान थोड़बे कएल जाइत छैक? बियाह-दान त' होइत छैक जर-जमीन स', टाका-पूँजी स', किंवा धन-संपत्ति, मान-मरातब स'। माउगि त' ओहि बियाहक उललक्ष्य मे देल गेल एकटा सनेसे (भेंटवस्तु) छैक। से कियैक त' पूँजी-टाका कतबो कियैक नञि रहौक, एकदिन त' खतम भइए जाइत छैक। तहन मोन कोना क' रहतैक जे अई घर मे बियाहो भेल छै ककरो! से बस, माउगि नामक सनेस के देखि क' ई बुझल जाइत रहैत छैक जे अहू घर मे एकटा बियाह भेल छैक। तैं बूझियौ जे माउगि भ' गेलै यादगारक एकटा समान। बुझलहुँ कि नञि। बस अहिना एकटा समान रहै हमर माय। से कियैक त' हमर दाई जे रहथिन - कहै छी जे बड्ड लोभी। हुनका भगवान संतोषक नामक वस्तु जेना देनेहि नञि रहथिन्ह जिनगी मे। बार रौ बाप। चानी परक तेलो चाट' लेल तैयार रह' बला एहन लोभी स्त्री हम नहीं देखलहुँ आई धरि, से जे कहै छी। ओ त' हमर बाबा जाबति समंगगर रहथिन्ह, ताबति हिनकर जितुए नञि चलैन्हि तैं, वरना हमर माय एहि घर मे अबितियैक भला? बाबा अपना जुतिए माय के पुतोहु बनाक' ल' त' एलखिन, मुदा अँगना मे त' जे हाल ओकर करथिन दाई से दलान पर बैसल ओ बेचारे की जान' गेलथिन्ह। आ गरीबी जे आदमी के सहनशीलता सिखा दैत छै, से त' अहां के बुझले अछि। हमर माय अपन करमक लेख बुझि क' सभकिछु चुपचाप सहन कएने जाइ। ककरा कहितियैक! के रहै ओकर अपन, जकरा कहिक' दू छनक दु:खो बाँटि लितियैक? नैहर बला सभ तँ छौंरी सभके ब्याह-दान करबा क' कहुना क' अपन पतिया छोड़ा लैये ने। तकर बाद त' कहबी छै जे ओ आ ओकर तकदीर। जे जे पा्ररब्ध छै ओकरा लेल, तकरा स' ओकरा सभके कोन सरोकार । आ दैबक रचना देखियो, एकरे ओ सभ हिन्दू धर्मक महादान 'कन्यादान' कहै छथि। दानो कर' लेल कन्ये भेटलन्हि भगवानक ई भक्त लोकनि के। बुझलहूँ। ओहि काल मे की अखनो। आस्त्तिकता-नास्तिकताक सवाले नञि! मात्र कर्तव्य दुधारी चलेनाई आ नामे भ' गेलै ई दानक कन्यादान त' अहि मे किओ की क' सकैय'? बेटा के दान कर' के बात नहिं फुरैलनि। हँ, बेटाक बिक्री त' होइते छलै, आइयो होइते छै। ओह, बिक्री नञि, कन्यादान जकाँ एकरो सम्माननीय नाम छै - तिलक दहेज। बेटीक सुख लेल बेटीक भावी घर के खलिहान आ कोठी जकाँ भरि देबाक कर्तव्य बोध ! नञि जानि हम सब कहिया धरि एकरा सभके करमक लेख कहि-कहि के अपना आओर के बहटारैत रहबै। त' कह' जे लगलहुँ ... हमरा माय मे आ गाय मे कोनो अंतर नञि रहै, बुझलहँु? सभ लाथे। हम जखन-जखन गाय के नबेद खुआब' जइयै - अकस्माते कहै छी जे हमर ध्यान ओकर आँखि दिस चलि जाय। सदिखन लागय जेना ओहि आँखि में करूणा भरल रहै छै। करूणा छोड़ि क' जेना दोसर कोनो भाव भगवान भरनैये नञि रहथिन्ह गायक ऑखि मे! आ एम्हर हमरा माय के आँखि मे सेहो कोनो भय आ करुणाक मिश्रित भाव एहन रचि-बसि गेल रहै जे भय ओकर देहक दोसर नाम भ' गेल रहै आ करुणा आंखिक। जखन देखितियै, जेना डेराएले रहै आ दयनीये बनल रहै। लागै जेना अहि घर मे सदिखन ओ अपना के असुरक्षिते बुझै। आ सरिपहुं अही डरक खातिर ओकरा मे चौबीसो पहर खटैत रहबाक ताकति आबि गेल छलै। कखनो जे बैसल देखितीयै माय के! ओह! कहियो, कखनो, पलखतियो लेल! हे... मुदा एकटा बात जे कहलहुँ - आँखि बला। सँाचे कहै छी, आँखि कहियो झूठ नञि बाजि सकैयै। अहाँक मोनक छोट स' छोट छीन उथल-पुथल के देखार क' दइत छै ई आँखि। तैं देखै नै छियै जे अइ पुरूष-प्रधान समाज मे नियमे बनि गेल छै जे कोनो माउगि पुरूषक सोझा मे आबि क' ठाढ़ नञि भ' सकैय', ठाढ़ भ' क' नञि रहि सकैये। डर बनले रहै छै आ कि नै। सदिखन तकरा नुकौने रही जे कतहु आँखि मे किओ किछु देखि लेलक, तहन तँ उधारे भ' जायब। कत' नुकाएब अपन ढ़ोंगी स्वरूप...? तैं नियमे बना देलकै धोधक आ नाम द' दैलकै संस्कृति आ परंपराक। यदि संस्कृति आ परंपराक एतबे धेयान रहै छै त' पुरूष पात्र कियैक नञि करै छथि ई सभ' परहेज, पाबनि तिहार, व्रत उपवास, कोखि सेनूर लेल सभ थान-भगवती थान, दुर्गाथान, महावीर थान गोहरबैत, हरतालिकाक निर्जला उपास करैत, बटसाइतक बड़ भगवानक 108 फेरा लगबैत। कहू त' भला जे इहो कोनो नियम भेलै जे पुरूष पात्र अपने त' सांढ़ जँका छुट्टा, अंबड बनल घूमैत रहौक आ माउगि आओर जोताएल रहौक अपन चूल्हा-चौकी मे...। धुर्र जो, हमहूँ की अनर्गल बात ल' क' बैसि गेलहुँ। त' कह' लगलहुँ जे हमर माय बेदसा बेदसा भ' भ' क' काम करै। आ हमर दाई जखन अबै त' ओकरा संहारे करबाक पाछू लागल रहैक। कियैक... त' नैहर स' किछु दान-दहेज नञि आनलकै ने, तैं! आ ताहू पर देखियौ, कतबो राति बीत जाए... तैयो हमर माय दाई के चानि पर तेल रगड़ने, हुनक गोड़ हाथ जाँतने बगैर नञि सूतै। बुझलहुँ। अपन ई कर्तव्य ओ मरितो दम धरि नञि छोड़लकै। आ तैयो ई हडासंखनी के कहै छियै जे करेज नहिं पसिजलै। आ... ई सभ देख क' हमर एकटा विचार पक्का भ' गेलै जे माउगिक मोजरि ओकर लूरि सँ बेसी कीमती छै ओकर नैहर स' आब' बला बिदाईक समान के। बियाह दान आई काल्हि स्त्री पुरूष मे नञि ने कएल जाई छै। ओ त' कयल जाई छै जर-जमीन सँ... टाका-पूँजी सँ ... धन-दौलति सँ... मान मरजाद सँ... मातबरी स'। ओत' हमर भागक लेख जे हमर बियाह माय के रहिते भ' गेलै। बाबू त' नहिंए रहथिन्ह। सासुर अयलाक बाद कहियो किओ गाम घर से एम्हर-ओम्हर स' आबि जाय, त' माय के समाचार कने-मने बुझि जइयैक। मोन हुअए, जे भरि पोखि हुनका आओर स' गप्प करी। मुदा सासु बीच मे मचिया ल' क' बैसि जातथि। त' जे आएल छल, ओकरा स' भेंट घांट करबाक लेल हम जे भीतर स' छन भर लेल दलानक कोठरी मे आबी त' मात्र औपचारिक हाल-चालि पूछलाक अतिरिक्त कइए की सकै छलहुं। तइयो किओ-किओ सासुक परबाहि नञि क' क' मायक व्यथा बखानिए जाए आ ई सभ सुनिक' त' हमर कोंढि फाटि जाय...। सुनि क' हेहरू भ' भ' क' कान' लागी। बुझलहुँ। आर कइये की सकतियैक? हमहूँ त माउगे रहियै ने ? ओम्हर जेना ओ बन्हाएल... ओहिना एम्हर हम बन्हाएल...। कोनो लाथे कोन्टाबला घर मे चलि जाइ आ मुंह मे अँचरा कोंचि क' खूब... भरि मोन कानी। कहू त'... जाहि घर मे अपन दु:खो के नुकाए क' भोग' पड़ै... ओकरा घर कहल जेतै। याहि टा होई छै अपन घर? माउगि लेल, माउगक अपन घर लेल, जाहि लेल शास्त्र सम्मत शिक्षा, जे जाहि घर मे डोली उतरौ ताहि घर स' अर्थीए उठौ गै बाउ। एहन एहन घर । मुदा उपाय? थू, एहन अपनापन पर! हे दाई, अहिना होइते-होइते एक दिन इहो सुनि लेलियैक जे माय अपन असावधानीक कारणे चूल्हि मे जरि क' मरि गेलै...। अँ ... यै .. जाहि चूल्हि के ओ अपन संतानों स' बढ़िक परिचर्या केलकै, सएह चूल्हि ओकरा जरा देलकै। के पतियेतै एहेन-एहेन कथा पर। आओर किओ पतियाओ वा नञि, हमरा त' रत्तीयो भरि विश्र्वास नहिं भेलै अइ बात पर। बूझि त' गेलियै सभ किछु, मुदा जकर हेराई छै, ओकरा बाजब के अधिकार त' नहिंए रहि जाइ छै ने यौ! के सुनतै ओकर आक्रोशक कथा? के बूुझतै ओकर मोनक व्यथा। भीतरे-भीतरे दाँत पर दाँत गस्सा क' क' इहो आघात पचा लेलहुँ...। बुझा देलियै मोन के जे अहू लाथे जरैत-जरैत जीब' स' त' ओ बचि गेलै। जीबिते में कोन सुख रहै जे मरला स' कम भ' जयतयन्हि ! सोचै छी जे चूल्हियो के नै देखल गेलै ओकर अवस्था। तैं ल' लेलकै ओकरा अपना कोरा में... जेना साीता के अग्नि माता ल' लेने छलीह! सीता त' तइयो घुरा देल गेल छलीह अग्नि द्वारा, मुदा चूल्हि त' धरती माता जकाँ ओकरा अपना मे समेटि लेलकै - सदिखन लेल। सुता देलकै चिर-निद्रा मे... आ मोनक एकटा गप्प कहू.. आब त' हमरो ओहि चूल्हि स' ऐतेक नेह भ' गेल अछि से की कहू ! कनिको झरकल देखलियै ने कि बस, लीप' लेल बैसि जाइत छियै...। हर खन लगैत रहैये जे कतहु माय देख लेतै त' की कहतै - देखियो त' कने। एना किओ चूल्हि के राखैए! कहै छी जे जाबति लीपबै नै ताबति कान में जेना माइयेक आवाज गॅूंजैत रहैत अछि - 'हे सिया-सन्ुनरि... कने देखहक त'... केहेन करिया गेल छह चूल्हि... लीप देबहक से नै !' आ हम चाभी लागल मशीन जँका उठै छी... आ नूरा ल' क' चूल्हि के लीप' लागै छी। अँगना घर में सभ किओ हँसियो उड़बैत छथि जे - ई कतहु बताहि त' नहिं भ' गेलीहए। चूल्हि के किओ एतेक जल्दी-जल्दी लीपय? मुदा हमरा कनिको रोष नै लगैये लोक आओर अइ हँसी ठट्ठा पर...कियैक त' हम जनैत छी जे माउगि आ चूल्हिक एके प्रारब्ध होईत छै... जरू आ जरि -जरि क' जीबैत रहू। अहीे में ओकरा आओरक बास छै...।' जे कथा ई सभ किओ नहिं बुझलखिन्ह, सएह कथा कहै छी जे नान्हि टाक हमर छोटकी बेटी अही उमिर मे बुझि गेल छै। एखने किछु देर भेलै, हमर छोटकी आ ननटुनवा दुनू खेलाई छलै। की से बुझलहुँ ... घर-घर ! दुनू आपस मे खेलौना बाँटे छलै आ हम अहिना कोनियाँ घर मे बैसल-बैसल देखै छलियै जे देखियो की करै जाई छै ओ सभ! थारी लेलकै ननटुनमाँ त' बाटी लेलकै हमर छोटकी। लाठी लेलकै ननटुनमा त' चकला-बेलनी लेलकै छोटकी। ननटुनमाँ पँजिएलकै अपन सन्दूक, तँ छोटकी सम्हारलकै अपन घैल-तमघैल। अहिना करैत-करैत ननटुनमा के हाथ पड़ि गेलै, कहै छी जे चूल्हि पर...। आ ननटुनमाक हाथ पड़लाक देरी से कहै छी जे हमर छोटकी तेहेन ने चील जकाँ झपट्टा मारलकै आ खींच लेलकै चूल्हि के अपना दीस जे हम ताकिते रहि गेलहुँ ओकरा। ओ कह' लागलै ननटुनमा के -'हे... चूल्हि कतहु पुरूष पात्र लेल भेलैये। लेबइये के अछि त' दियासलाई ल' लीय'। अहाँ के काज आओत कतहु, कखनो ! चूल्हि त' मौगी आओरक काज अबै छै ...। अहाँक कोन मतलबि एकरा आओर स' ! ओ सुनि क' जेना सुन्न रहि गेलहँु... बुझलहँु। कतके जल्दी बूझि गेलै हमर ई नन्हकी, अपन ई नान्हिपने में अइ दुनियाँक रीति रेबाज ! यै, आइ ओ एतेक बुझि गेलैये त' भ' सकैये जे प्रारब्ध हेतै त' एकरा स' सावधानो हेबाक रस्ता खोजि लेतै ओ। जतेक अधिकार स' ओ चूल्हि के अपना दिसि क' क' दियासलाई ओकरा दिसि बढ़ा देलकै, भ' सकै छै, तहिना एक दिन ओहि दियासलाइक जरैत तीली अपना दिसि बढैत देखि सएह अधिकार स' ओकरा फँूकि क' मिझा देतै आ जरैत काठी बढ़ब' बलाक गस्सा ओतबे कसि क' पकड़ि लेतै, जतेक कसिक' चूल्हिक परिपाटी ओकरा धएने छै। मुदा एखनि त' चली... उठी। आब नोर त' सुखा गेलै। देखियै, चूल्हि सुखेलै की नहिं... । २. विभा रानी (लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता) बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक -प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा। विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि। 'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि। माउगि - विभा रानी. माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि, बुझै छैं कि नञि गै! हँ यो! तैं त' हम भेलहुँ माउगि - माने ओकलाइन, डाक्टराइन, मास्टराइन - आ हड़ही-सुड़ही सभ भेल मौगी, जनी जाति, हमरा आओर स' हीन। नञि बुझलियै। धुर्र जाऊ! हमरा आओर स' ऊपर भेलीह स्त्रीसभ, जेना किरण बेदी, मेधा पाटकर, फ्लेविया एग्नेस त' ई सभ, त' ओ सभ आ सभ स' ऊपर नारी - आदरणीया, परमादरणीया; जेना सीता, जेना सावित्री, जेना गांधारी, जेना कुंती, जेना द्रौपदी ... उँह! द्रौपदीक नाम नञि ली। हे! बड़ खेलायल मौगी छली। ओकरा नारीक पद पर प्रतिष्ठित केनाई! सत्तरि मूस गीड़ि के बिलड़ो रानी चललीह गंगा नहाए। ऋषि-मुनि आओर के कोन कथा - एतेक ताप-तेजबला साधु महातमा सभ आ माउगि के देखतही वीर्य चूबि जाइ छै; घैल में त' पात पर त' माछक पेट मे त' कहाँ दनि, कोम्हर दनि दान द' देइत छथि जेना हुनक वीर्य-वीर्य नञि भेलै कोनो रत्नक खान भ' गेलै। छोडू ई सभ कथा-पेहानी। आऊ असली बात पर - माने माउगि पर। की कहू, कतबो ई नारी, स्त्री, माउगि, मौगीक वर्गीकरण भ' गेल हुअए, मुदा वास्तविकता त' ई छै जे मूलत: हम सभ माउगे छी - माउगि। अहिना दू गोट माउगि छली, माने मध्यवर्गीय परिवारक दू गोट माउगि। अहाँ चाही त' सुभीता लेल हुनक नाम राखि सकै छी - दीपा आ रेशमा। दुनू पड़ोसिया। एकदम दूध मे चीनी जकाँ बहिनपा, दुनू के एक-दोसराक घरक हींग हरदिक पता, ई दुनूक घर में एक एकटा मौगी छल, कहि लिय' जे ओकर दुनूक नाम छल भगवती आ जोहरा आ ओ दुनू ई दुनूक ओहिठाम चौका बासन करैत छली। संयोग छल, जोहरा दीपा ओहिठाम काज करै छलै आ भगवती रेशमा ओहिठाम. हौजी, बड़का शहर मे ई सभ चलै छै। ओहिना, जेना आइ काल्हि शहर मे दंगा आ खून-खराबा फटाखा जकाँ फुटैत रहै छै आ लोक आओर तीमन-तरकारी जकाँ कटाएत रहै छै। की कहू जे जाहि शहर मे ई चारू माउगि रहै छली, ओहि शहर मे दंगा संठीक आगि जकाँ धधकि उठलै। आ सभ माउगि एके जकाँ भ' गेलै - मांगि आ कोखिक चिन्ता स' लहालोट। आब जेना दीपे के देखियौ। शहर मे तनाव छलै। तइयो लोग अपन-अपन ड्यूटी पर निकलि गेल छलै। मुदा बेरहटिया होबैत-होबैत पता लागलै जे शहरक स्थिति आओर खराब भ' गेलै त' सभ किओ 'जइसे उडि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पै आयौ' बनि बनि अपन अपन जहाज दिस पडाए लागल। रेशमा स' दीपा के ई समाचार भेटलै, ओम्हर ठीक दू बजेक बेरहटिया मे मनोज बाबू घर स' बहिरा गेलाह। दीपा टोकबो कएलकै - 'शौकत भाइक फोन आएल छलै रेशमा कत' जे शहरक हालति आओर खराब भ' गेल छै। लोग-बाग घर घुरि रहल अछि आ अहाँ सभ किछु जानि-बुझिक' तहयो बाहरि निकलि रहल छी। जुनि जाऊ।' आब ओ मरद मरदे की जे अपना घरवालीक कहल राखि लियए। आ दीपा त' माउगि स' एक कदम आगां छली - स्त्री छली - पढ़ल-लिखल, सुंदर, स्मार्ट आ अपन बिजनेस सेहो चलब' बाली, जकरा मे सभटा आभिजात्य भरल रहनाइ अपेक्षिते नयिं, परम आवश्यक अछि। मुदा बावजूद एकटा सफल स्त्रीक, ओ छली त' माउगे। सत्ते, कहियो कहियो के मायक कहल ई कथा मोन पडिये जाइत अछि जे माउगि कतबो पढ़ल हुअए कि सुंदर कि स्मार्ट कि बिजनेसवुमन, रहत त' माउगे आ तैं चूल्हि त' फूंकैये पडतै आ घर वा घरबलाक चिंता मे सुड्डाहि होबैये पडतै ओकरा। तैं रातुक एगारह बाजि गेलाक बादो मनोज के नहिं घुरलाक कारणे ओ अत्यन्त चिंतित आ परेशान छलै। ओकरा रहि-रहि क' बुझाए जे कॉलबेल बजलै, खने दरबज्जा फोलए त' खने खिड़की पर जा क' ठाढ़ भ' जाए। सांस भांथी जकाँ चलि रहल छलै आ मोनक सभटा परेशानी मुंह पर लिखा गेल छलै। मना कएलो पर जहन मनोज नञि रूकल छलाह त' कहने छलै - जल्दीए आएब। जवाब भेटल छलै -'आइ त' फल्ना डेलीगेशन आएल अछि।' 'माने रातिक एक-डेढ़ बजे धरिक छुट्टी।' दीपाक माउगि ओकर भीतरे-भीतरे बाजलै। तहन कियैक एगारहे बजे स' एतेक बेचैनी छै? ओकरा त' दू बजे रातिक बाद परेशान होएबाक चाही। मनोज बाबू लेल दू बजे रातक घुरनाई कोनो नव कथा त' छलै नञि! मुदा दंगा जे नएं कराबए। हारि-थाकि क' ओ घर स' निकललै आ अपना बगले बला कॉलबेल दबेलकै। अहू मे एकटा माउगि छलै - रेशमा। परेशानी ओकरो संपूर्ण देह पर अक्षर-अक्षर लिखाएल। ओकरो घरबला घुरल नञि छलै। मुदा फोन कएने छलै -'हालति बड्ड खराब छै। दरबज्जा आदि नीक स' लगाक' राखने रहब। हाथ मे सदिखन एकटा चक्कू वा एहेने कोनो चीज सेहो राखने रहब। पतियाएब नञि ककरो पर चाहे ओ कतबो नजदीकी हुअए।' दुनू माउगि एक-दोसरा के देखि क' तेना चेहैली जेना एक-दोसरक सोझा मे दूध चीनी सनक संबंधवाली दीपा आ रेशमा नञि, गहुँमन आ बिज्झी हुअए। रेशमा एतेक देर राति मे ओकर आएब पर चेहैली त' दीपा रेशमाक गस्सा मे फंसल चक्कू देखि क'। माउगि त' माउगे होइत छै - एतेक अविश्र्वास स' काज थोडबे छलै छैक। आ ई स्त्री माने दीपाक त' सौंसे देहे पर परेशानी छपाएल छलै। शौकत त' फोनो क' देने छलाह। मुदा मनोज के त' तकर कोनो परवाहिए नञि छलै। रहितियैक त' एतेक प्रतिकूल परिस्थिति मे ओकरा मना करबाक बादो जयतियन्हि की? आ मानि लिय' जे बड्ड खगता छलैन्हे जेबाक, तें चलि गेलाह। मुदा चलि गेलाक माने ई त' नयिं जे एकदमे स' निश्चिन्त भ' क' बैसि जाइ; बेगर ई महसूस कएने जे दीपा कतेक चिंतित आ परेशान हेतीह। धुर्र? माउगि आओर लेल किओ एतके परेशान हुअए! दुनक दुनू माउगिक मुंह मे जेना बकार नञि छलै। अंतत: रेशमा सेहे चिनियाबदाम जकाँ एक-एक टा शब्द चिट चिट क' क' तोडैत-भांगैत बाजलै - 'बच्चे सो गए? मेरे तो अभी-अभी सोए हैं।' 'हँ! हुनका आओर के की पता जे दंगा-फसाद की सभ होइ छै। स्कूल नञि गेनाई त' ओकरा आओर लेल पिकनिक भ' गेलै'। भरि दिन ऊधम मचा-मचाक' थाकि-हारिक' एखने सूतल अछि।' 'मनोज भैया लौटे?' 'घुरि गेल रहितियन्हि त' हम की अईठां रहितहुँ?' स्त्री मोने मे बाजलै। प्रत्यक्षत: मूड़ी नयिं मे डोला देलकै।' 'ये भी अभी तक नहीं लौटे हैं। मगर फोन कर दिया है कि लौटेंगे। फिर भी गर हालात ज्यादा खराब हुए तो उधर ही कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ रूक जाएंगे।' माउगि बाजलै। स्त्री चुपचाप ओकर मुंह तकैत रहि गेलै। ओहि दीपा रूपी स्त्रीक चेहरा पल-पल बदलि रहल छलै। माउगि रेशमा कहलकै - 'उनका फोन नहीं आया है तो तू ही पता कर ले न?' 'कत'? ओ कत छथि, हमरा कहि के जाइ छथि जे कहै छी जे फोन करी आ की दनि करी, कहाँ दनि करी।' स्त्री अपन विवशता मे खौंझैली।' 'हौसला रखो। सब ठीक हो जाएगा।' मुदा सभ ठीक नञि भेलै। माउगिक मरद आबि गेलै। शौकत भाइ के देखि क' रेशमाक मुंह मुरझाएल फूल पर मारल पानिक छींटा जकाँ तरोताजा भ' उठलै। दीपाक चेहरा पर सेहो आंशिक आश्र्वस्तिक भाव उभरलै। बेस! एक गोट त' सकुशल आबि गेलाह। आब दोसरो आबि जाथि त' आ निश्चिंत भ' जयतियैक। अहिना सबहक सर समांग सकुशल अपना अपना बासा घुरथि जाथु त' सबहक घरक जनी जाति के कतेक आश्र्वस्ति भेंटतैक! ओ शौकत भाइ स' शहरक मूड पर कनेक गप सप कर' चाहै छलै। मोन मे छलै जे आकर परेशानी आ चिंता स' शौकत भाइ सेहो कनेक सरोकार राखति। पूछथि कनेक मनोजक मादे, कहथि कनेक शहरक हालचालि। मुदा शौकत भाइ त' तेहेन ने सख्त नजरि स' घूरि क' रेशमा के देखलनिह कि ओहि नजरिक कठोरता आ बेधकता दीपा सेहो बूझि गेलै आ कहलकै -'चलै छी रेशमा, बच्चा सभ असगरे छै।' बाहर मे दंगा आ घर मे भूकंप आबि गेलै। मर्द प्रतिवादक गाड़ी पर फर्राटा स' सवार भ' गेलै -'कहा था न कि किसी अपने कहे जानेवाले पर भी भरोसा मत करना। क्या जरूरत थी इतनी रात को इसे बिठाए रखना? इन काफिरों का कोई भरोसा है क्या?' 'रेशमा, ई कोफ्ता शौकत भाइ लेल। दिने मे बनौने छलहुं। हमरा बूझल अछि जे हिनका कोफ्ता बड्ड पसंद छै।' स्त्रीक फेर प्रवेश भेलै। माउगि फेर सहमि गेलै। मर्द फेर तनतना गेलै।ओ अई लल्लो-चप्पो स' प्रसन्न नञि भेलै। स्त्रीक गेलाक बाद गरजलै -'फेंक दो इसे डस्टबिन में। क्या ठिकाना, कुछ मिला-विला कर लाई हो।' माउगिक करेज कनछलै -'अहीं सभ एक-दोसरा लेल दुश्मन भ' सकै छी। माउगि त' माउगे होइत छै। सभटा दुख त' ओकरे माथ पर बजरै छै। ओकर मरद के किछु भ' जेतै त' ओकरा अहिना अपन सगरि जिनगी काट' पड़तै। आ अहाँ आओरक घरवाली मरतै त' कब्र मे देह गललो नञि रहतै कि दोसर निकाहक मुबारकबाद बरस' लागतै। यौ - माउगि हिन्दू-मुसलमान आ कि क्र्रिस्तान नञि होई छै। ओ खाली माउगे होइत छै।' मुदा नञि! माउगि खाली माउगे नञि होइ छै। ओ नारी, स्त्री, माउगि, मौगी सभ भ' जाइ छै। आ सेहो कठपुतरी बनिक'। आब देखियौ ने! शौकत भाइ एम्हर पहिने आगि जकां बररसलन्हि आ फेर कने प्रेमक फूंही खसबैत आस्ते आस्ते क' क' तेना ने बुझेलखिन्ह जे कि रेशमा सेहो पतिया गेलै आ तय क' लेलकै जे ई कोफ्ता काल्हि भिन्सर मे बर्तन मांजयबाली के द' देल जेतै। ओम्हर दू बजे राति मे घुरल मनोज बाबू नामक मरदक फरमान सेहो निकललै जे आओर कतहु जाइ त' जाइ, बगल बला घर मे कथमपि नञि। ठीक पुरना जमानाक राजकुमार बला कथा जकाँ - पूब जाउ, पच्छिम जाउ, उत्तर जाउ मुदा दक्षिण कहियो नञि जाउ आ अहि अतिरिक्त सावधानी मे ओ सभस' पहिल काज कएल जे अपन दरबज्जा पर साटल 'ऊँ' स्टिकर के नोंचि-चोथि क' उजाड़ि देलन्हि। आबी, कनेक एम्हर ईहो दुनू गोट मौगीक खोज खबरि ल' ली। ई दुनू मौगी ऊपरका दुनू स्त्री आ माउगि स' जुड़ल छली से त' अहां अओर के मोने हएत। ई दुनू छल भगवती आ जोहरा जे दीपा आ रेशमाक घर मे बर्तन चौका करै छल। ईहो एकटा संयोगे छल जे भगवती नामक मौगी रेशमा नामक माउगिक घर मे काज करै छलै आ जोहरा नामक मौगी दीपा नामक स्त्रीक घर मे। ईहो दुनू मौगी उपरकी दुनू माउगे जकां पड़ोसिया छलै। आइ भगवतीक घर मे भम्ह लोटै छलै। आध सेर आटा बांचल छलै। तकरे रोटी बनाक' अपन चारू धिया-पुता के खुआ देने छलै - भिन्सरे मे। आब बेरहटिया स' ई अधरतिया भ' गेलै। दोकान बंद आ पाइक खूँट खुल्ला। कोनो दिस स' रस्ता नञि! धिया-पुता के ठोक-ठाकि क', एक-दू चमेटा खींचि क' सुता देने छलै। आब जागल-जागल भरि पोख पहिने अपन मरद के गरियौलकै जे ठर्रा आ अढ़ाई सौ रूपैयाक लालचि मे दंगा फोड़'बला लेल काज कर' चलि गेल छलै। ओहि स्त्री दीपे जकाँ ईहो भगवती मौगी अपना मरद के रोकबाक प्रयास कएने छलै आ मनोजे बाबू जकाँ ओकरो मरद ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे रोपैत चलि गेल छलै आ बाद मे चेथड़ी भेल देह ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे स' निकालि क' माथ मे राखि देलकै। मुदा एखनि त' माथ मे राखल अक्किल सेहो भुतियाएल छलै। हारि थाकि क' ओ धिया-पुता लग ढेर भ' गेलै जे आब त' भिन्सरे मे भ' सकै छै किछु। करफू लागल रहौ कि किछु। पुलिसबला गोली मारौ कि डंडा। मेम साब ओहिठां त' जाइए पड़तै। दू गोट लोभ - पगार भेटबाक आ सदिखन जकाँ अहू बेर ततेक बचल-खुचल भेटि जेबाक आस जाहि स' चारू धिया-पुताक खींचखाचि क' जलखई त' भइये जाइ छै। मुदा भिन्सर त' हुअए पहिने! हे सुरूज महराज! जल्दी बहार आबथु!' सुरूज महाराज त' प्रकट भेलाह, मगर दोसर मौगी ई मौगीक रस्ता छोपि देलकै -'तुम बच्चावाली औरत! तुम किधर कू जाएगा ये आफत में। मेरे कू जाने दो। अपुन का क्या है? अकेला औरत। पुलिसबाला गोली मार भी दिया तो क्या हो जाएंगा। और जो नहीं मारा तो तेरा मेम साब का भी काम अपुन करके आ जाएंगा आउर तेरा पगार आउर खाने-पीने का जो कुछ भी देंगा वो सब लेके आ जाएंगा। ठीक?' आ अंचरा मे स' गरम-गरम चारि टा भाखरी निकालि क' थम्हा देलकै - एतबे बचल छलै, तैं एतबे ... जाबथि भगवती किछु सोचय, किछु बाजय, जोहरा नामक ई दोसरकी मौगी चिड़ै जकाँ फुर्र स' उड़ि गेलै। भगवती मौगी थकमकाएले रहि गेलै, जेना जोहराक मरद दंगा बलाक बीच मे फंसल थकमकाएले रहि गेल छलै आ पछाति मे अपन टूटल - भांगल फलक ठेला आ ओहि पर सजाओल सभटा फले जकाँ पिचा-पिचू के थौआ-थौआ भ' गेल छलै। दीन ईमानक पक्का, पाँचो बेरक नमाजी आ सभटा जनानी के दीदीए आ भाभी कहैबला ओकर मरद जोहरा हिरदै में जिनगी भर लेल कांट छोड़ि गेलै - ओकर देह भरि पोख देखबाक साध मोने मे रहि गेलै आ तहिये स' ई काँट कहियो ओकर पूरा देह मे गड़' लागै छै आ कहियो अपन मरदे जकाँ मौगीक अपनो सौंसे मोन आ देह थौआ-थौआ भेल बुझाए लागै छै। नुका-चोरा क', झटकारि क' जोहरा दुनू स्त्री आ माउगिक घरक काज कर' पहुँचि गेलै। वाह रे पुलिसबलाक चौकस नजरि! अल्लाह! जोहरा शुक्र मनौलकै। जाए बेर सेहो नञि पडए ओह दरिंदा सभक नजरि त' बेस। आएल त' असगरे छलै, जाएत त' भगवतीक दरमाहा आ खाए-पियक समान सेहो रहतै। खेनाइ-पिनाइ त' रोड पर चलि जेतै आ पाइ जानि नञि ककरा पाकिट मे - दंगाबलाक कि पुलिसबलाक। माउगि आ स्त्री कतेक बेर दुनू मौगी स' ठट्ठा केने छलै - "गै, दुनू अपन-अपन मेमसाब बदलि ले। मियां मियांक घर मे आ हिंदू हिंदूक घर मे। तहियाक मजाक आइ दुनू माउगि आ स्त्री के वास्तविक लागि रहल छलै - दुनू मरद जे झोटैंला पंचक ई मजाक पर कहियो कान नञि देलन्हि, आइ गंभीर फैसलाक तीर, कटार ई दुनू माउगि पर संधानि देलन्हि। फर्मान बंदूक स' गोली जकाँ बहिरा गेल छलै आ ई दुनू के आब ओहि गोली के अपना-अपना करेज मे धँसा क, धँसलाक बाद अपना-अपना के जीवित, चालू पुर्जा राखैत ओहि फर्मान पर अमल करबाक छलै। जहिया ठेला छलै, फल छलै आ फलक ताजगी जकाँ मुस्की मारैत ओकर मरद छलै, तहिया जोहरा के काजक कोनो दरकार नञि छलै। दीपा ओकर चेहराक मासूमियत आ खबसूरती देखि क' सोचै बेर-बेर - जे कोनो नीक घरक स्त्री रहितियैक त' रूप-रंग झाड़-फानूस जकाँ चमकतियैक। मुदा एखनि त' ओकर उदास मुंह, उड़ल रंग आ बेजान कपड़ा। हठात ओकरा जोहरा मे रेशमाक झलक भेटलै त' बड़ी जो स' ओ चेहा उठलै। मोने मोन अपना के लथाड़लकै। जतेक गारि अबै छल, सभटा अपना मोनक ऊपर खाली क' देलकै। जोहरा काज क' क' रेशमा ओहिठां चलि गेल छलै। मनोज बाबू सुतले छलाह। दीपा फ्रिज मे स' झब-झब समान सभ बाहर कर' लागलै। फेर कॉलबेल। फेर दीपाक मुंह। फेर रेशमाक बदलैत रंग। रेशमा स' कोनो औपचारिक रिश्ता त' छलै नञि! तै धड़ाधड़ि भन्से मे चलि गेलै -'जोहरा! ई खाए पियक समान सभ छै। भगवती के द' दिहें।' 'लेकिन मैं जो ये सब तुझे दे रही हूँ, ये सब केवल तेरे लिए हैं। किसी काफिर-वाफिर को नहीं देगी तू और सुन! कल से तू उधर नहीं, इधर काम करेगी। दस रूपए ज्यादे ले लेना। चलेगा। वो चाहे तो उधर करले। कल साहब यही कह रहे थे।' थकमक भेल स्त्री दीपा देखलकै - भन्साघरक स्लैब पर जोहराक देल खाद्य सामग्री मे रतुक्का कोफ्ता। ओम्हर कोफ्ता ओकरा अंगूठा देखा रहल छलै आ एम्हर रेशमाक गप्प ओकर करेज पर आड़ी चला रहल छलै। त', कतेक पतिव्रता स्त्री छै। पति जे कहलकै, तुरंत ओकर ताबेदारी मे लागि गेलै। आ ओ? दू बजे राति मे घुरल मनाज् बाबू स' फिरकापरस्ती पर बहस केलकै आ जोहरा भगवतीक प्रसंग पर मना क' देलकै जे ओ नञि करतै काज कर' बालीक अदला-बदली। मुदा आब? जौं ई मौगी मानि गेलै त' ओकरा त' डबल फैदा। आ ओम्हर बेचारी भगवतीक काजक नोकसान। तहन त' नीके छै ई अदलाबदली। तैं ओहो दही में सही मिलेलकै। ओना त' ओहो अदला-बदली के व्यावहारिकताक जामा त' पहिराइये देने छलै जहन कि फ्रिज से खाद्य सामग्री निकालि क' ओ भगवती लेल आनने छलै। कहियो ई नञि देखल-सुनल जे काज करए किओ आन आ खाएक पियक भेटै कोनो आन के। मुदा ई मौगी ! जोहरा मौगी! केहेन खरदार! केहेन जबर्दस्त! केहेन जोरगरि! ओ चकचक करैत दुनू माउगिक मुंह देखलकै। बाजलै किछु नञि। खाली रेशमा स' कहलकै -'करफू लगा हुआ है। भोत मुश्किल से आया मैं। कल आने को होएंगा कि नेई, मालूम नेई। भगवती अपना पगार वास्ते बोला है। आप दे देंगा तो मैं ले जाके उसकू दे देंगा।' 'बोल उसे वो खुद आकर ले जाएगी। जब तू आ सकती है तो वो क्यों नहीं। और अच्छा है न! पुलिस की नजर चढ़ गई तो एक काफिर तो घटेगा कम से कम।' कि माउगि गै माउगि! हम माउगि, तों माउगि, ई माउगि; ओ माउगि - सभ माउगे-माउगि! इहो चारो माउगे माउगि। मुदा ई मौगी - छोटहा लोग - मसोमात जोहरा त' जेना पुलिसक गोली आ दंगाबलाक ईंट, पत्थर, बोतल घासलेट तकरो सभ स' बेसी आक्रांत भ' उठलै। काली जकाँ, दुर्गा जकाँ, चंडी जकाँ ! 'मेम साब! आप दोनों अपना-अपना सामान रख लो। मेरे कू नेई चाहिए ऐसा खाना, जिसमें शैतानी खून बोलता हो। ई दंगा - आप दोनों का मन मे इतना फरक पैदा किएला है कि आप दोनों एक मिनट में अपना से गैर बना दिया। भगवती तो बच्चा लोग का खातिर आने को तैयार था। मईच रोका उसकू कि मेरा क्या! मइ अकेला माणस। पुलिस गोली मारेंगा तो भी क्या चला जाएंगा मेरा। पण उसकू कुछ होएंगा तो उसका बच्चा लोग यतीम हो जाएंगा, जैसे मइ हो गया अपना मरद का जाने से। आपलोग बड़ा लोग। इसलिए आपलोग का बड़ा बात। बड़ा समझदारी। मेरे कू तो खोपड़ी नेई। आपको भगवती को नेई रखना, मति रखो। उसका पगार नेई देने का, मति दो। लेकिन कल से मइ भी काम पर नेई आने का। लेकिन उसका पहिले अभी आपका घर मे मइ जो काम किया, वो पइसा मेरे कू अब्भी का अब्भी देने का। वो मेरा हक्क है। मइ उसकू लेके जाएंगा आउर जो मर्जी आएंगा, करेंगा। आपका ई भीख नेई चाहिए मेरे कू।' मौगियो आओर बाजि सकै छै, सोचि-समझि सकै छै! एहेन अजगुत कथा ! बाप रौ बाप! दुनू माउगि के साँप सुंघा गेलै। ई मौगी भ' क' एतेक नाटक! माउगिक सोझा मे एकर एतेक टनटनी छै ने। कनेक साहेबक सोझा मे पड़' दियौक। सभटा बिलाडिपन एके क्षण मे घुसडि जेतै आ ओ फेर केथरी जकां गुड़िया-मुड़िया जेतै। रेशमा सोच लागलै। यदि शौकत मियां उठि क' आबि जाथु त' एकर मुंहक टनटनी एखने बंद भ' सकै छै। नीक भेलै। शौकत मियां आबि गेलाह! भन्साघरक स' भोरुक्का चाहक गन्धक बदला ई खिच-खिचक गंध बर्दाश्त नञि भेलै आ अधकचरा भेल नीनक खौंझ स' भरल ओ बाहर निकललाह! 'क्या हुआ? सुबह-सुबह चाय देने के बदले घर को कर्बला का मैदान क्यों बना रखा है?' ड्राइंग रूम भड़कलै। रेशमाक चेहरा चमकलै। दीपा शरीर स' एम्हर छलै आ मोन स' मनोज कत'। तैं ओ संभ्रमित सेहो भेलै। मुदा जोहरा ओहीठां छलै - तन आ मोन दुनू स'। कतहु कोनो तरहक बनावटी चमक नञि, मुंह पर कोनो तरहक भ्रमक चेन्हासी नञि। ओ माथ पर ओढ़नी धेलकै आ भन्साघरक खिचखिच के ओतहि छोड़ैत ड्राइंगरूम में पहँुचि गेलै -'साब! मेरे कू बताओ, ये दंगा हम और आप कराया क्या? आओर जो कराया, उसका बदन का एक बाल भी गिरा क्या? भगवती का आदमी गया, मेरा मरद गया। तो क्या ये सब उसका, मेरा या आपका चाहने से हुआ? कल को खुदा न करे, आपको या वो साब को कुछ हो जाता तो वो सब आपका या आपका मेमसाब लोग का चाहने से होता था क्या? आओर ये मारामारी का फरक किसका पर गिरेंगा साब। हम औरत लोग पर। बेवा तो अपुन लोग होता है न साब! और बेवा खाली बेवाइच कहलाता - हिन्दू बेवा आ मुसलमान बेवा नेई। साब, मइ जाता। बस मेरा आज का काम का पइसा दे दो। उस पइसा से मेरे जो मर्जी करेंगा, जिसके लिए मन करेगा सामान खरीदेंगा।' ड्राइंगरूम गरजलै -'क्या बकवास लगा रखी है। रेशमा, तुम इनलोगों को यहाँ से भगाती क्यों नहीं? भन्साघर फेर डेराएल चिड़ई भ' गेलै। दीपा स' आब सहन नञि भेलै। ओ जाए लेल डेग उठेलकै। जोहरा एक पल भन्साघर मे मोजद दुनू माउगि के देखलकै। फेर ओकरो डेग उठलै। आ भन्साघर जेना भूकंप स' डोल' लागलै। आब कनेक स्थिर भेलै। स्वरक अरोह-अवरोह मे सेहो स्थिरता अएलै। उठल डेग स्वर स' मिलान कर' लागलै -'जोहरा, ये सब ले जाओ और भगवती की पगार भी। हालात ठीक होने पर ही उसे घर से निकलने देना और तुम भी तभी आना। और दीपा, बैठो न! चाहो तो तबतक शौकत मियां से बात करो या फिर यहीं किचन मे मेरे साथ। मैं तुरंत चाय बनाती हूँ। जोहरा, तुम भी पीकर जाना।' वाह रे तिरिया चरित्तर वाह! ऋषि मुनि सभ कहिये गेलैन्हिए जे देवो नञि जानि सकलाह त' पुरूषक कथे कोन? किन्तु अईठां एहेन कोनो गुंफित रहस्य नञि छलै, नञि त' काम केलिक कोनो नुका छिपी छलै, ने नैनक कटाक्ष आ बैनक मुस्कान छलै। अईठाँ त' एकेटा चीज पसरल छलै - चाह मे, पत्ती में, चीनी मे, कप मे - माउगे -माउगि। चाह, दूध, चीनी आगिक गरमी स' एके रंग ध' लेइत छै, एकमेक भ' जाएत छै। बनल चाह मे से चाहक रंग, दूध, चीनी के अलग-अलग करब मोश्किल। ईहो माउगि सभ चाहे जकाँ एक मेक भ' गेल छलै। शौकत साहब ड्राइंगरूम में चाहक चुस्की ल' रहल छलाह। चाहक भाफ ड्राइंगरूम ठरल, बर्फ भेल सर्दपना के तोड़लकै कि नञि, पता नञि; मुदा सौंसे भन्साघर मे भाफक नरम गरमी पसरि गेलै। आ ओहि नरम-गरम माहौल मे देखाई पड़लै जे एकटा मौगी चीज बतुस आ भगवतीक पगार ल' क' झटकल चलल जा रहल छै। एक गोट स्त्री आ दोसर माउगिक आँखिक पानि टघरि क' चाहक प्याली मे खसि रहल छलै। चाह नमकीन भेलै कि मीठे रहलै, सेहो नञि बुझेलै। खाली एक गोट स्वर ओहि भन्साघर मे बरकि गेलै - बरकैत गेलै - 'दीपा हम औरतों के दुख कितने एक समान होते हैं न!' 'भगवान नञि करथु ककरो माँगि आ कोखि उजड़ै।' 'आ श्मशानक मनहूसियत ककरो घर मे पैंसए।' लोक आओर कहे छै, माउगि-माउगि अलग होई छै - नारी, स्त्री, महिला, माउगि, मौगी, जनी - हौ जी ई एतेक नाम द' देने ओ सभ बदलि जाइ छै की ? कहू त' ! एहनो कतहु भेलैये ! १. मैथिलीपुत्र प्रदीप- आध्यात्मिक निबन्ध २. ज्योति झा चौधरी-दैनिकी३.डॉ पालन झा-सन्त साहेब रामदास १. श्री मैथिली पुत्र प्रदीप (१९३६- )। ग्राम- कथवार, दरभंगा। प्रशिक्षित एम.ए., साहित्य रत्न, नवीन शास्त्री, पंचाग्नि साधक। हिनकर रचित "जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर’ आऽ ’सभक सुधि अहाँ लए छी हे अम्बे हमरा किए बिसरै छी यै" मिथिलामे लेजेंड भए गेल अछि। ॐ (मा) यज्ञ दू प्रकारक होइत अछि। एक नित्य यज्ञ दोसर नैमित्तिक यज्ञ। नित्य यज्ञ केलासँ कोनो प्रत्यक्ष फल देखबामे तँ नहि अबैत अछिमुदा नहि केलासँ पाप लगैत अछि। जेना सन्ध्या वन्दनमे स्नान, ध्यान, गायत्री, जप, सूर्योपासना आदि नित्यकर्म थिक। पञ्च-महायज्ञमे पवित्र ग्रन्थक अध्ययन, हवन, देवार्चन, माता-पिताक सेवा, गुरु-पितरक प्रति श्रद्धा आदि भूत यज्ञमे सभ प्राणीक प्रति दया एवं भूखलकेँ भोजन आदि। पितृ यज्ञ जेना पिण्डदान, श्राद्ध एवं तर्पण आदि। मनुष्य यज्ञ जेना अतिथि सेवा आदि। नैमित्तिक यज्ञ दू प्रकारक होइत अछि- (1) श्राद्ध- ई श्रुति प्रतिपादित यज्ञ थीक। एहिमे मात्र वैदिक मन्त्र द्वारा कर्म होइत अछि। (२) स्मार्त यज्ञ- एहिमे वैदिक ओऽ पौराणिक एवं तांत्रिक एहि तीन मन्त्रक प्रयोग होइत अछि। वेदमे वैदिक देवताक स्तुतिक संगहि लौकिक एवं धार्मिक विषयसँ सम्बन्धित अनेक आध्यात्मिक एवं महत्त्वपूर्ण शक्ति अछि। एहिमे नासदीय सूक्तक विषेष महत्त्व अछि। जतऽ सृष्टिक मूल तत्त्व केर गूढ़ रहस्य प्रतिपादित भेल अछि। एकर प्रथम भागमे सृष्टिसँ पूर्वक स्थितिक वर्णन अछि। जाहि समयमे सत्, असत्, मृत्यु, अमरत्व एवं राति-दिन किछु नहि छल। ने अन्तरिक्ष छल ने आकाश छल। ने कोनो लोक छल ने जल छल। ने कोनो भोगक वस्तु छल ने कियो भोग केनिहार छल। मात्र सर्वस्व अन्हारे अन्हार छल। किन्तु नाम रूपादि विहीन एक मात्र अदृश्य सत्ता छल। ओहि अदृश्य सत्ताक महिमासँ संसारक कार्य प्रपञ्चक प्रादुर्भूत भेल। एकर तेसर भागमे सृष्टिक दुर्ज्ञेयताक निरूपण अछि। समस्त ब्रह्माण्डमे एहन कियो नहि छथि, जे ई कहि सकथि जे ई सृष्टि कोना उत्पन्न भेल। सृष्टिक पल गूढ़ तथ्यक रहस्यकेँ जे कियो जनैत छथि तँ मात्र ओऽ जे एहि समस्त सृष्टिक अधिष्ठाता थिकाह। ओऽ स्वयं वेद स्वरूप ब्रह्म छथि। एहि नासदीय सूत्रक गणना विश्वक शिखर साहित्यमे होइत अछि। एहिमे आध्यात्मिक धरातल पर ब्रह्माण्ड केर एकताक भावना स्पष्ट रूपसँ अभिव्यक्त भेल अछि। भारतीय क्षितिज पर मिथिलाक संस्कृतिमे ई धारणा निश्चित अछि जे ब्रह्माण्डमे एकेटा सत्ता विद्यमान अछि। जकर ने कोनो नाम अछि, ने रूप अछि। एहि सूक्तमे एहि सत्ताक अभिव्यक्ति भेल अछि। गायत्री मंत्र जे वेदक मूल रूप थीक तकरा आइ ईर्ष्यावशात् प्रतिस्पर्धी भावनासँ विद्रूप कएल जाऽ रहल अछि। जहिना अनभिज्ञ अनधिकारिक हाथमे आइ विज्ञानक दुरूपयोग भऽ रहल अछि। तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् – ऋगवेदक एहि मन्त्रक अर्थ होइत अछि जे “ हे सच्चिदानन्द परमात्म, अपनेक प्रेरणादायी विशुद्ध तेजकेँ हम अपन हृदयमे नित्य ध्यान करैत छी। जाहिसँ हमर सद्बुद्धि निरन्तर अपनेसँ प्रेरित होइत रहय एवं हमर कुमार्गसँ रोकि कऽ प्रकाशमय शुभ मार्ग दिस प्रेरित करैत रहय।ई समस्त वेद मन्त्रमे सर्वोपरि अछि। श्रेष्ठ ऋषिगण अधिकार प्राप्त ब्राह्मणकेँ एहिसँ विभूषित कऽ जीव सेवाक निमित्त तैयार केलनि। एहिमे आदेश अछि जे ब्राह्मणकेँ एहि महान साधनाक फलसँ समस्त समाजक कल्याण कामना करबाक चाही। कारण जे एकर् अधिकारी नहि छथि, मुदा अधिकारीक प्रति श्रद्धा रखैत छथि तथा ओहि अधिकारीकेँ अपन शारीरिक सेवासँ सहयोग करैत छथि हुनको कल्याण हेबाक चाही। एकर संगहि वेदमे किछु एहन व्यावहारिक मन्त्र सभ अछि जे समस्त समाजक लेल परम उपयोगी अछि। जेना ऋगवेदक १०, ३४/१३ मे अछि अश्वैर्मादीव्यः। अर्थात् जुआनदिग्रहनक तात्पर्य जे जुआ नहि खेलेबाक चाही। हिन्दू शिरोमणि सम्राट युधिष्ठिर जुआ खेलेलाह, समस्त राजपाटक संगहि पत्नी तककेँ दाओ पर लगा देलनि आऽ हारि गेलाह। भगवान् श्रीकृष्ण जे भक्तक प्रेममे रथक सहीस तक बनि गेल छला से मूक-दर्शक रहलाह। किये जानि-बूझि नर करहि-ढ़िठाई- ताको नर्क लिखा है भाई॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं क्रितेक शुभाशुभम्। अशुभ कर्म करबैक तँ फल अशुभ हेबे करत। पवित्र कर्म करब तँ भगवान् मदति करबे करताह। तहिना यजुर्वेदमे अछि- ४०/९/ मा गृधः कस्यस्विद्धनम। अर्थात्- ककरो वस्तु नहि चोरेबाक चाही। पुनः अथर्ववेदमे अछि ६/२ “मा हिंसी पुरुषन्पशूंश्च” अर्थात्- मनुष्य सहित कोनो जीवकेँ (पशु, पक्षी, कीट, पर्वतादि) केँ कष्ट नहि दी। तहि सामवेदमे अछि-१५/६० मे जे भद्रं मनः कृणुष्न। हे प्रभु! अपने हमर मनकेँ कल्याण मार्ग दिस प्रेरित करी। एतावता भारतीय वेदमार्गक परिशुद्द रूप मिथिला ग्रहण कयने छल। तकरे प्रतिफलमे वेदजननी गायत्री स्वयं सीता बनिकए मिथिलामे अवतरित भऽ गेल छली। २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति दोसर दिन : २६ दिसम्बर १९९०, बुद्धवार : आई हम सब भोरे साढ़े पॉंच बजे उठलहुँ।सब तैयार छलहुँ शिक्षक सबहक आज्ञाक प्रतीक्षामे। जखने आदेश भेटल हमसब दनदनाकऽ बसमे बैस गेलहुँ। आइ दुगुना उत्साह छल। एकतऽ टूरक पहिल दिन ताहि परसॅं मेट्रो रेलवेक दर्शन।जाबे ट्रेनके आबमे देर रहए ताबे हम सब बेर बेर एस्कलेटर पर चढ़ैत उतरैत रहलहुँ। स्टेशनक नाम एस्प्लाण्ड छलै।ओहि स्टेशन पर अण्डरग्राउण्ड रेलवे पर चढ़लहुँ आ' आठम स्टेशन टॉलीगंजमे उतरि गेलहुँ। ट्रेन अतेक तेज चलैत रहए जे ठाढ भेनाई मुश्किल छलै।अहि यात्रा लेल जतबै उत्साहित छलहुँ ततबे जल्दी ई समाप्त भऽ गेल। अगिला स्थान छल अलीगढ़ जू़। अहि चिड़ियाखानामे विभिन्न प्रकारक पशु - पक्षी सहित अनेकों विचित्र सॉंप सेहो रहए। पशु - पक्षीक नाम निम्नलिखित अछि : (1)याक, (2)सरपेण्ट इगल, (3)सियार, (4)इण्डियन फॉक्स, (5)व्हाइट आइबीज, (6)हॉमर पीजन, (7)गयल, (8)सारस, (9)एमू, (10)कंगारू, (11)ब्रेकिंग डीयर, (12)रंगीन सुग्गा, (13)उदविलाव, (14)विभिन्न प्रकारक बतख, आऽ (15)नीलगाय। अकर बाद सॉंपक सिलसिला शुरु भेल। (1)विशाल अजगर, (2)कोबरा अर्थात् नाग, (3)साधारण कोबरा, (4)टुक्टू - ई देवार पर छिपकली जकॉं सटल छल, (5)वाटर मॉनीटर - ई देखमे मगरमच्छ जकॉं छल, (6)बैण्डेड करैत अर्थात् धारीदार करैत - करैतक नाम तऽ गामो में खूब सुनने छलहुँ। अकर पीठ पर कारी आऽ पीयर के धारी छलै आ अकरा विषैला सॉंप मानल गेल छल। (7)वाइन स्नेक - ई सॉंप हरियर आ' एकदम पातर छल जेना कोनो लत्ती हुए।इहो कनी विषवला सॉंप छल आ अंगूरक गाछमे भेटैत छल।गामदिस सुगवा सॉंपक नाम सुनने छलहुँ।(8)रैट स्नेक - ई सॉंप विषहीन होइत अछि आ मूसक जनसंख्या कम करमे सहायक अछि।(9) ब्रॉंजबैक ट्री स्नेक - ई सॉंप कॉंसा जकॉं भूर रंगक होइत अछि आऽ गाछक डारिमे मिलक नुकायल रहैत अछि।(10) रेड सैण्ड स्नेक बलुइ, (11)ऑर्नामेंटल स्नेक -मिडिल इहो गाछपर भेटैत अछि आऽ अकर मुंह छिपकिली जकॉं होईत अछि। अकर बाद हम सब दू टा हाथी आ किछु बानर देखलहुं।हनुमान, पिगटेल्ड मैसेक्वी आर बबून मुख्य बानर छल। हनुमानक मुंह कारी आ पूंछ नमहर छलै।पिगटेल्ड मैसेक्वीके पूंछ छोट छलै आऽ मुंह चपटल छलै।बबूनक मुंह उगल छलै मुदा कारी नहिं छलै।हम सब ओकरा संगे खूब खेलेलौं।फेर चिल्ड्र्रेंस ज़ू गेलहुं।ओतऽ हाथीक कंकालक पड़ल निशानयुक्त पाथर छल। तरह -तरहक पक्षीक अंडा देखलहुं। जेना सुगाक अंडा, ऑस्ट्रीचके अंडा, हंसक अण्डा आदि।ओतय हमसब उज्जर बाघ, उज्जर मूस आर उज्जर कौआ सेहो देखलहुं।अंतमे ज़िराफ आ विदेशी पक्षी सबहक आवास स्थान झीलक लग स होइत लौट गेलहुं। ओतऽसऽ लौटि भोजन कऽ फेर विक्टोरिया मेमोरियल विदा भेलहुं।विक्टोरिया मेमोरियल के फाटक पर दू टा पैघ सिंहक मूर्ति छल। मानू हमरे सबहक स्वागत लेल राखल छल।तकर बाद एकटा तोप राखल छल।कहै छै जे होनहार वीरवान के होत चीकने पात।अग्रेजीमें सेहो कहल गेल छई “morning shows the day” हमरा पहिने सऽ नहिं बूझल रहै तैयो अंदाज लागि गेल जे अत वीर-रसक दर्शन हैत।महल सदृश मकान भव्य छल।अन्दर मैरी, डलहौजी, हेंस्टिंग्स, वेलेस्लीक विशाल मूर्त्ति स्थापित छल।अनेको प्रकारक हथियार विराजमान छल।औरंगजेब, मीरज़ाफर, टीपू, हैदर आदि महान् योद्धा सबहक तलवार राखल छल।ऑस्ट्रिया स अंग्रेज द्वारा छीनल टर्किश मशीन गन राखल छल।अब्दुल फ़जलक रचित एतिहासिक पुस्तक अकबरनामा सेहो देखलहुँ।उपर के महलके देवार पर रानी विक्टोरिया के विलासिता दर्शायल गेल छै। अहि ठाम सऽ निकलि हम सब बिरला तारामण्डल पहुंचलहुं। कनिक देर पंक्तिमे ठाढ़ भेलाक बाद अन्दर जाय भेटल।सब मजाक करैत छल जे अतऽ दिनोमें तारा देखायल जाइत छै। ओहिमे खगोलीय जानकारी देल गेल। लागल जेना आकाशक नीचा बैसल छी।अहि सब के लेल जाइल्स प्लानेटोरियम प्रोजेक्टर नामक उपकरणके उपयोग कैल गेल छल। अहि तरहे हमर सबहक आहि के भ्रमण सम्पन्न भेल।हमसब अपन लॉजमे लौटि सुस्ता भोजन कर होटल गेलहुं।रस्ता भरि हमरा सभके यैह चर्चा रहल जे अत हिन्दीक महत्त्व कतेक कम छैक। सभ जगह जानकारी या त बंगाली या अंग्रेजीम लिखल छल।भोजनोपरान्त हम सभ डायरी लिखि शिक्षक सॅं हस्ताक्षर करा सूतक कार्यक्रम बनेलहुं। ३.डॉ पालन झा, ग्राम-हरौली, कुशेश्वरस्थान। एम. ए. ( मैथिली ), सन्त साहेब रामदास पर डॉ दुर्गानाथ झा ’श्रीश’ केर निर्देशनमे पी.एच.डी.। संप्रति बी. डी. जे. कॉलेज, गढ़बनैलीमे मैथिली विभागाध्यक्ष। सन्त साहेब रामदास पुत्र-वियोगक कारणेँ ई पक्का बैरागी भए गेलाह। गामसँ बाहर भए जंगले-जंगल एकान्तमे वास कए भजन-कीर्तन करए लगलाह। गामक लोकसभ बहुत दिन धरि पाछाँ कएलकनि जे अपने घुरि जाऊ, हमहु सभ अपनेक पुत्रक समान छी, अपनेकेँ कोनो कष्ट नै होएत। मुदा साहेब रामदास पर तकर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, उनटे जतए लोकक आवागमन देखथिन्ह, स्थानकेँ बदलि पुनः निर्जनस्थानमे चलि जाइत छलाह। लोकसभ किछु दिन धरि पाछाँ तँ केलकनि, मुदा अन्तमे हरि-थाकि कए जे ई आब पक्का बैरागी भए गेल छथि, तेँ हिनका आब तंग नहि कएल जाए, विचारि कए पाछाँ करब छोड़ि देलकनि। बैरागी भेलाक बाद ई देशक बहुतो भागमे भ्रमण कएलनि। भजन-कीर्तनक संग योग-साधनामे सेहो लीन भए गेलाह। योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कएलाक पश्चात् केओटीक निवासी बलिरामदासजीसँ दीक्षा ग्रहण कएलनि। दीक्षा ग्रहण कएलाक पश्चातो ई अनेक धर्म स्थानक भ्रमण करैत रहलाह। कहल जाइत अछि जे साहेबरामदास दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। बाटमे बड़ कष्ट सहए पड़लनि, घाओ भए गेलनि, घाओमे पीब आबि गेलनि, मुदा दण्ड-प्रणाम ओऽ नहि छोड़लनि। दण्ड-प्रणाम करैत-करैत जगन्नाथपुरी तक गेलाह। जकर प्रमाण हुनकहि एक कवितासँ भेटैत अछि- साधुके संगत धरि गुरुक चरण धरि, आहे सजनी हमहु जाएब जगरनाथहि रेकी। नहि केओ अन्नदाता संग नहि सहोदर भ्राता, आहे सजनी माँगि भीखि दिवस गमाएब रे की। सभ जग भेल भाला गुरुआ अठारह नाला, आहे सजनी ओहिठाम केओ नहि छोड़ाओल रे की। सिंह दरबाजा देखि मन मोर लुबधल, आहे सजनी ओहिठाम पंडा पंडा बेंत बजारल रे की। साहेब जे गुनि धुनि बैसलहुँ सिर धुनि, आहे सजनी जगत जीवन निअराएल रे की। गुरु बलिरामदास मुरिया रामपुरक एक महात्मा शिष्य छलाह तथा अपन गाम केओटा (केओटी)क घनघोर जंगलमे योग साधना करैत छलाह। ई योग साधनामे निष्णात् छलाह। कहल जाइत अछि जे गुरुक बिना वास्तविक ज्ञान असम्भव अछि आऽ तेँ साहेबरामदास एक योग्य गुरुसँ दीक्षा लए, योग-साधनामे सिद्धि प्राप्त कए लेलनि। योग क्रिया पर सिद्धि प्राप्त कए लेलाक बाद जन्म-मरणसँ छुटकारा पाबि जेबाक पूर्ण विश्वास भए गेलनि, से गुरुक प्रसादहिसँ। मोक्ष प्राप्तिमे आब कोनो सन्देह नहि रहि गेलनि, जे जीवनक चरम लक्ष्य थिक। बलिरामदास हिनक दीक्षा गुरु छलथिन, तकर प्रमाण हिनकहि एक कवितासँ भेटैछ- “गुरु बलिराम चरण धरि माथे, साहेब हरि अपनाया है। अब तौ जरा-मरण छुटि जैहे, संशय सकल मेटाया है”। कृष्णक ई अनन्य भक्त छलाह। जगन्नाथपुरीक यात्राक क्रममे बाटहिमे हिनका स्वयं भगवान श्री कृष्ण दर्शन देने छलथिन। आब तँ ई कृष्णक ध्यानमे दिन-राति लागल रहैत छलाह। समाधिस्थ कालमे तँ दुनियाँक कोनो वस्तुक ध्यान नहि रहैत छलनि, ध्यान रहैत छलनि तँ एक मात्र भगवान श्री कृष्ण। जन-श्रुति तँ ईहो अछि जे भगवानक भजनक कालमे जखन ई नाच करैत छलाह तँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण सेहो उपस्थित भए संग दैत छलथिन। साहेब रामदास अनेक तीर्थ-स्थलक दर्शन कएलनि। सांसारिक मोह-मायाकेँ त्यागि वैरागी भए गेलाह, मुदा मिथिला भूमिकेँ नहि त्यागि सकलाह। एक पदमे ओऽ लिखैत छथि, “मिथिला नगरी तोर दान बिनु साहेब होइछ बेहाल” तथा दोसर पदमे “साहेब करुणा करए शीश धुनि मिथिला होइछ अन्धेरि”। एहि पद सभसँ मिथिलाक प्रति हुनक प्रेमक सहज अनुमान लगाओल जाए सकैत अछि। धन्य ई मिथिला भूमि ओऽ धन्य महात्मा साहेब रामदास। पहिने कहि चुकल छी जे ई जंगलमे एकान्त वास कए भजन-कीर्तन कएल करथि। जतए-जतए ई जाथि ताहि-ताहि ठाम ई अपन खन्ती गारि कुटियाक निर्माण कए एक पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अनेक जगह पर योगमढ़ी छल आऽ सबहि ठाम ई पाकड़िक गाछ अवश्य रोपि दैत छलाह। हिनक अन्तिम योगमढ़ी दरभंगा जिलाक ’पचाढ़ी’ गाममे अछि, जे पूर्वमे बूढ़वनक नामे विख्यात छल। एहू ठाम पाकड़िक गाछ रोपने छलाह, जे अद्यावधि वर्तमान अछि। पल्लवित एहि गाछक शोध मानवशास्त्री लोकनि एखनहु कए रहल छथि। कमलाक तट पर स्थित पचाढ़ी गामक वन आऽ वृन्दावनक तुलना करब कठिन भए जाइत छल। वृन्दावनसँ एको रत्ती कम शोभा पचाढ़ी (बूढ़वनक) नहि छल। मोरक नाच, सुगाक गान, नाना प्रकारक वन्यजीव प्राणीक निर्भय विचरण करब, भिन्न-भिन्न लता-पुष्पसँ शोभित वनक दृश्य लोककेँ सहजहि आकृष्ट कए लैत छल। एहि स्थानक प्रशंसामे कवीश्वर चन्दा झा लिखैत छथि— “पाकड़ि वृक्ष सएह कमला तट जएह भजन कुटी विश्राम। चन्द्र सुकवि मन धरम परमधन धन्य पचाढ़ी ग्राम”॥ पचाढ़ी स्थानक शोभा आब नहि रहि सकल, जे पहिने एक निर्जन स्थान छल, ताहि ठाम आब ग्राम अछि, खेती-पथारी कएल जाइत अछि। वनक तँ आब निशानो नहि रहि गेल अछि, तथापि साहेब रामदासजीक समाधि-स्थलक चारूकात मन्दिर सेहो एक-दू नहि छओ-सातटा अछि। सभमे भोग-रागक व्यवस्था, पुजेगरीक संग-संग सहायकक व्यवस्था सभ मन्दिरमे फराक-फराक अछि। लगभग पाँच कट्ठा जमीनमे फुलबारी अछि। आगत-अतिथिक स्वागत यथासाध्य एखनहु कएल जाइत अछि। साहेब रामदासक नाम पर एकटा संस्कृत महाविद्यालय अछि, जाहिमे निर्धन छात्रकेँ स्थान दिससँ रहबाक व्यवस्था ओ मुफ्त भोजनक व्यवस्था कएल जाइत अछि। पचाढ़ीस्थान मिथिलाक वैभवशाली स्थानमेसँ सर्वप्रमुख अछि। एकर वैभवशालीक पाछाँ राजदरभंगाक महत्वपूर्ण योगदान अछि। तत्कालीन दरभंगा मिथिलेश नरेन्द्रसिंह निःसन्तान छलाह। हुनक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आऽ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि। साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आऽ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि। राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आऽ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि- “साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख, करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”। एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आऽ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि- “अब न चाहिए अति देर प्रभुजी, अब न चाहिए अति देर। विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन, लियो है असुरगण घेरि”। गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आऽ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल। एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि। साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आऽ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि। “निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”। “धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”। साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि। मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ- “प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण। कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥ जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार। धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”। हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि- “ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम। कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥ हाथ भसम केर गोला हे राम। वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥ विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि: “कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक। कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥ के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल। लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥ जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम। हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥ आदि” मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि। साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आऽ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि। बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग -प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह अतीत आऽ भविष्यक संग सम्बन्ध स्थापित कऽ कए साहित्य अपन अस्तित्वक सत्यताक उद्घोषणा करैछ। विश्व-मानव अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक साहित्यक गवाक्षसँ अतीतक गिरिगह्वरक गुफामे प्रवाहित जीवन-धाराक अवलोकन करैछ आऽ अपन गम्भीरतम उद्देश्यक विविध प्रकारक साधन भूल आऽ संशोधन द्वारा प्राप्त करैत अपन भावी जीवनकेँ सिंचित होइत देखबाक उत्कट अभिलाषा रखैछ। अतीतक प्रेरणा आऽ भविष्यक चेतना नहि तँ साहित्य नहि। अतीत, वर्तमान आऽ भविष्यक कड़ीक अनन्त शृंखलाक रूपमे भावक सृष्टि होइत चल जाइछ आऽ मानव अपन प्रगतिक नियमादि, सिद्धान्तादिकेँ अपन वास्तविक सत्ताक विकासक मंगल कंगन पहिरि कए अपन दुनू हाथसँ आवृत्त कयने रहैछ। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (१८६१-१९४१)क कथन छनि जे विश्व-मानवक विराट जीवन साहित्य द्वारा आत्मप्रकाश करैछ। एहन साहित्यक आकलनक तात्पर्य काव्यकार एवं गद्यकारक जीवनी, भाषा तथा पाठ सम्बन्धी अध्ययन तथा साहित्यक विविध विधादिक अध्ययन करब मात्र नहि, प्रत्युत ओकर सम्बन्ध संस्कृतिक इतिहाससँ अछि, मानव-मनसँ, सभ्यताक इतिहासमे साहित्य द्वारा सुरक्षित मनसँ अछि। उन्नैसम शताब्दीमे भारतवर्षमे नवजागरणक प्रबल ज्वार उठल। तकर कोनो प्रभाव मिथिलांचलपर नहि पड़ल, कारण मिथिलावासी प्राचीन परम्पराक पृष्ठपोषक रहलाक कारणेँ संस्कृत शिक्षामे लागल रहलाह आऽ अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य विचारधाराक महत्वकेँ नहि स्वीकारलनि। नवजागरणक फलस्वरूप षष्ठ दशकमे भारतीय परतन्त्रताक बेड़ीसँ मुक्त होएबाक निमित्त सन् १८३७ ई. मे सिपाही विद्रोह कएलक। मिथिलाक नव शासक मैथिलीकेँ कोनो स्थान नहि देलनि। एहि दशकक अन्तिम बेलामे मिथिलाक प्रशासन “कोर्ट ऑफ वार्ड्स”क अधीन चल गेल जकरप्रभाव मिथिलापर पड़लैक। जे एहिठामक निवासीकेँ प्रथमे-प्रथम पश्चिमक स्पर्शानुभूति भेलनि। किन्तु दुर्भाग्य भेलैक जे “कोर्ट ऑफ वार्ड्स” द्वारा मिथिलाक भाषा मैथिली आऽ ओकर लिपिकेँ बहिष्कृत कऽ कए ओकरा स्थानापन्न कयलक उर्दु आऽ फारसी तथा देवनागरी। मिथिलेश महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह (१८५८-१९९८)क गद्देनशीन भेलापर उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे मिथिलावासीक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतनाक संचार भेलैक। हुनक चुम्बकीय व्यक्त्तित्व, कृपापूर्ण व्यवहार, विद्या-व्यसन आऽ असीम देशभक्ति एवं दानशीलताक फलस्वरूप विद्वान साहित्य सर्जककेँ आकृष्ट कएलक। हुनक उत्तराधिकारी मिथिलेश महाराज रमेश्वर सिंह (१८९८-१९२९) सेहो उक्त परम्पराकेँ कायम रखलनि। उन्नैसम शताब्दीक अष्टदशकोत्तर कालमे भारतीयमे अभूतपूर्व जनजागरण भेलैक, जकर फलस्वरूप स्वतन्त्रता संग्रामक नव स्फुलिंग जागृत भेल आऽ ओऽ सभ स्वतन्त्रताक निमित्त अत्यधिक सचेष्टताक संग सन्नद्ध भेलाह, जकर प्रभाव साहित्य सृजनिहारपर पड़लनि। यद्यपि शताब्दीक अन्तिम वर्ष धरि धार्मिक आऽ सांस्कृतिक चिन्तनपर रुढ़िवादिताक पुनः प्रकोपक विस्तृत छायासँ बौद्धिक आऽ साहित्यिक प्रगतिक समक्ष अवसादपूर्ण वातावरणक परिव्याप्त भऽ गेलैक। तथापि मैथिली साहित्य जगतमे उत्कर्ष अनबाक निमित्त अपन परम्परागत परिधानक परित्याग कऽ नव प्रवृत्तिक रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल जाहिमे मातृभाषानुरागी आऽ प्रकाशनक सौविध्यसँ साहित्य नव रूप धारण करय लागल जकर नेतृत्व कयलनि कवीश्वर चन्दा झा (१८३०-१९०७), कविवर जीवन झा (१८४८-१९१२), पण्डित लालदास(१८५६-१९२१), परमेश्वर झा (१८५६-१९२४), तुलापति सिंह (१८५९-१९१४), साहित्य रत्नाकर मुन्शी रघुनन्दन दास (१८६८-१९४५), मुकुन्द जा बक्शी (१८६०-१९३८), जीवछ मिश्र (१८६४-१९२३), चेतनाथ झा (१८६६-१९२१), खुद्दी झा (१८६६-१९२७), मुरलीधर झा (१८६८-१९२९), जनार्दन झा “जनसीदन”, सर गंगानाथ झा (१८७२-१९४१), दीनबन्धु झा (१८७३-१९५५), रामचन्द्र मिश्र (१८७३-१९३८), बबुआजी मिश्र (१८७८-१९५९), गुणवन्तलालदास (१८८०-१९४३), कुशेश्वर कुमर (१८८१-१९४३), विद्यानन्द ठाकुर (१८९०-१९५०), कविशेखर बद्रीनाथ झा (१८९३-१७४), पुलकितलालदास (१८९३-१९४३), गंगापति सिंह (१८९४-१९६९), उमेश मिश्र (१८९६-१९६७), धनुषधारीलालदास (१८९६-१९६५), भोलालालदास (१८९७-१९७७), अमरनाथ झा (१८९७-१९५५), राजपण्डित बलदेव मिश्र (१८९७-१९६५), कुमार गंगानन्द सिंह (१८९८-१९७०), ब्रजमोहन ठाकुर (१८९९-१९७०) एवं रासबिहारीलालदास आदि-आदि जे विविध साहित्यिक विधादिक जन्म देलनि आऽ एकरा सम्वर्धित करबाक दृढ़ सन्कल्प कयलनि। वस्तुतः विगत शताब्दी मैथिली साहित्यक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। अंग्रेजी राज्यक स्थापना देशक साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक, आर्थिक आऽ सामाजिक क्षेत्रमे एक नव स्फूर्ति प्रदान कऽ कए मिथिलांचलक जीवन-शैली आऽ सोचक पुनर्संस्कार कयलक। एहि शताब्दीमे आधुनिक शिक्षा, छापाखाना आऽ सरल यातायातक सुविधाक अभाव रहितहुँ मैथिलीमे साहित्य सृजनक परम्परा वर्तमान रहल। बहुतो दिन धरि मैथिली साहित्य संस्कृत साहित्यक प्रतिछाया सदृश रहल। एहिमे साहित्यिक एवं अन्य प्रकारक लेखन निरन्तर होइत रहल। दुइ विश्व युद्धक बीचक कालमे मैथिली साहित्यक सर्वांगीन समुद्धारक चेतना अनलक। एहि कालक लेखनमे ई नव मनोदशा प्रतिफलित भेल आऽ साहित्यक विभिन्न विधामे उल्लेख्य योग्य परिवर्तन भेल। सहस्रबाढ़नि -गजेन्द्र ठाकुर एहि तरहेँ समय बितैत गेल। बाहर एनाइ-गेनाइ किछु कम भैये गेल छल। तकर बाद दूटा घटना भेल। एक तँ छल गङ्गा पुलक उद्घाटन। आऽ दोसर छमाही परीक्षामे नन्दक दुनू बेटा पहिल बेर प्रथम स्थान प्राप्त नञि कए सकल छलाह। एकर बाद नन्द असहज होमए लगलाह। ओना एहि दुनू घटनामे कोनो आपसी सम्बन्ध नहि छल मुदा नन्दक अन्तर्मनक जे हुलिमालि छलन्हि से बढ़ए लगलन्हि। आब ओऽ किएक तँ सरकारी तन्त्रसँ न्याय नञि पाबि सकल छलाह आऽ पुत्र लोकनि सेहो पढ़ाईमे पिछड़ि गेल छलन्हि, से अदृश्य शक्तिक प्रति हुनक आशक्ति फेरसँ बढ़ए लगलन्हि। सभ परिणामक कारण होइत छैक आऽ कारणक निदान जखन दृश्य तन्त्र द्वारा नञि होइत अछि, तखन अदृश्यक प्रति लोकक आकर्षण बढ़ि जाइत छन्हि। आऽ नन्द तँ अदृश्यक प्रति पहिनहिसँ, बाल्यकालेसँ आकर्षित छलाह। “नन्द छथि”? एक गोट अधवयसू, मुँहक दाँत पान निरन्तर खएलासँ कारी रंगक भेल, पातर दुबर पिण्डश्याम रंगक, नन्दक घरक ग्रील खटखटा कए पुछलन्हि। “नहि। ऑफिससँ नहि आयल छथि, मुदा आबैये बला छथि। भीतर आउ, बैसू”। नन्दक बालक कहलखिन्ह। “हम आबि रहल छी कनेक कालक बाद”। किछु कालक बाद नन्द सुरसुरायल अपन धुनमे, जेना ओऽ अबैत छलाह, बिना वाम-दहिन देखने, घर पहुँचलाह। पाछाँ लागल ओहो महाशय घर पहुँचलाह। नन्द हुनका देखि बाजि उठलाह- “शोभा बाबू। कतेक दिनुका बाद”। “चिन्हि गेलहुँ”। शोभा बाबू बजलाह। आऽ एकर उत्तरमे नन्द बैसि गेलाह आऽ हुनकर आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबय लगलन्हि। “एह बताह, अखनो धरि बतहपनी गेल नञि अछि”। शोभाबाबूक अन्तर्मन एहि तरहक आदर पाबि गदगद भए रहल छल। शोभाबाबू छलाह कछबी गामक। नन्दक सभसँ पैघ बहिनक दिअर। बहिन बेचारी तँ मरिए गेल छलीह, भगिनी नन्दक गाम मेहथक मामागाममे पेट दुखएलासँ अकस्माते काल-कवलित भए गेल छलीह। नन्दक बहिनौउ बढ़िया चास-बला घोड़ापर चढ़ि लगान वसूली लए निकलैत छलाह। मुदा भगिनीक मुइलाक बाद बहिनौउसँ सम्बन्ध कम होइत गेल छलन्हि। कोनो जानि बुझि कए नहि वरन् अनायासहि। आऽ आइ पचीस सालक बाद शोभाबाबूसँ पटनामे भेँट भेल छलन्हि। “ओझाजी कोना छथि। हमरासभ बहुत कहलिअन्हि जे दोसर विवाह कए लिअ मुदा नहि मानलन्हि”। “आब ओऽ पुरान चास-बास खतम भए गेल। जमीन्दारी खतम आऽ चास-बास सेहो। मुदा खरचा वैह पुरनके। से खेत बेचि-बेचि कतेक दिन काज चलितए। सभ बाहर दिस भागए लागल। मुदा हम कहलिअन्हि जे अहाँ हमरा सभसँ बहुत पैघ छी, बहुत सुख देखने छी, से अहाँ बाहर जाए कोनो छोट काज करब से हमरा सभकेँ नीक नहि लागत”। शोभा बाबू कंठमे पानक पात आबि जएबाक बहन्ना कए चुप भए गेलाह मुदा सत्य ई छल जे हुनकर आँखि आऽ कंठ दुनू भावातिरेकमे अवरुद्ध भए गेल छलन्हि। किछु काल चुप रहि फेर आगाँ बाजए लगलाह- “से कहि बिना हुनकर औपचारिक अनुमति लेने घरसँ चूड़ा-गूड़ लए निकलि गेलहुँ। रने-बने सिमरिया स्नान कए नाओसँ गंगापार कएलहुँ आऽ सोहमे पटना पहुँचि गेलहु। पहिने एकटा चाहक दोकानपर किछु दिन काज कएलहुँ। ओहि दिनमे पटनामे अपन सभ दिसका लोक ओतेक मात्रामे नहि रहथि।अवस्थो कम छल। फेर कैक साल ओतए रहलहुँ, बादमे पता चलल जे एहि बीच गाममे तरह-तरहक गप उड़ल। जे मरा गेल आकि साधु बनि गेल शोभा। फेर जखन अपन चाहक दोकान खोललहुँ तखन जाऽ कए गाम एकटा पोस्टकार्ड पठेलियैक। आब तँ बीस सालसँ बी.एन.कॉलेजिएट स्कूल लग चाहक दोकान चला रहल छी। ओतहि पानक सेहो स्टॉल लगा देने छियैक”। “सभटा दाँत टूटि गेल शोभा बाबू”। “चाहक दोकानमे रहैत-रहैत चाह पीबाक हिस्सक भए गेल। मुदा ताहिसँ कोनो दिक्कत नहि भेल। मुदा जखन पानक दोकान आबि गेल तखन गरम चाह पिबियैक आऽ ताहिपरसँ ठंढ़ा पान दाँत तरमे धए दियैक से ताहिसँ गरम-सर्द भेलासँ सभटा दाँत टूटि गेल”। एहि गपपर नन्द आऽ शोभा बाबू दुनू गोटे हँसि पड़लाह। फेर गप-शप चलए लागल। शोभाक भौजी तँ मरि गेल छलीह मुदा जौँ भतीजी जिबैत रहितथि तँ मेहथ कछबीक बीच संबंध जीवित रहैत, मुदा जे विपत्ति आएल तँ सभटा एके बेर। नन्दकेँ मोन पड़लन्हि जे भगिनी केलाइत छलीह पड़ोसमे आऽ आबि कए नन्दक माएकेँ कहलन्हि जे फलना-अँगनाक फलना पेटपर हाथ राखि देलकन्हि आऽ तखने तेहन पेट-दर्द शुरू भेलन्हि जे कतबो ससारल गेलन्हि तैओ नहि ठीक भेलन्हि आऽ नन्दक आँखिक सोझाँमे बचियाक रहस्यमयी मृत्यु भए गेलैक। (अनुवर्तते) शोध लेख संगहि मायानन्द मिश्रजीसँ डॉ शिवप्रसाद यादव जीक लेल गेल साक्षात्कारक पहिल भाग श्री मायानान्द मिश्रक जन्म सहरसा जिलाक बनैनिया गाममे 17 अगस्त 1934 ई.केँ भेलन्हि। मैथिलीमे एम.ए. कएलाक बाद किछु दिन ई आकाशवानी पटनाक चौपाल सँ संबद्ध रहलाह । तकरा बाद सहरसा कॉलेजमे मैथिलीक व्याख्याता आ’ विभागाध्यक्ष रहलाह। पहिने मायानन्द जी कविता लिखलन्हि,पछाति जा कय हिनक प्रतिभा आलोचनात्मक निबंध, उपन्यास आ’ कथामे सेहो प्रकट भेलन्हि। भाङ्क लोटा, आगि मोम आ’ पाथर आओर चन्द्र-बिन्दु- हिनकर कथा संग्रह सभ छन्हि। बिहाड़ि पात पाथर , मंत्र-पुत्र ,खोता आ’ चिडै आ’ सूर्यास्त हिनकर उपन्यास सभ अछि॥ दिशांतर हिनकर कविता संग्रह अछि। एकर अतिरिक्त सोने की नैय्या माटी के लोग, प्रथमं शैल पुत्री च,मंत्रपुत्र, पुरोहित आ’ स्त्री-धन हिनकर हिन्दीक कृति अछि। मंत्रपुत्र हिन्दी आ’ मैथिली दुनू भाषामे प्रकाशित भेल आ’ एकर मैथिली संस्करणक हेतु हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेलन्हि। श्री मायानन्द मिश्र प्रबोध सम्मानसँ सेहो पुरस्कृत छथि। पहिने मायानन्द जी कोमल पदावलीक रचना करैत छलाह , पाछाँ जा’ कय प्रयोगवादी कविता सभ सेहो रचलन्हि। १. पहिने साक्षात्कारक पहिल भाग साहित्य मनीषी मायानन्द मिश्रसँ साक्षात्कार -डॉ शिव प्रसाद यादवद्वारा।डॉ. श्री शिवप्रसाद यादव, मारवाड़ी महाविद्यालय भागलपुरमे मैथिली विभागाध्यक्ष छथि। प्र. मैथिली साहित्यमे प्रथम प्रकाशित पोथी कोन अछि आऽ कतएसँ प्रकाशित भेल? उ. हमर मैथिलीक प्रथम प्रकाशित पोथी थिक ’भाङक लोटा’ जे हास्य रसक कथा-संग्रह थिक। जकर प्रकाशन सन् ५१ ई. मे दरभंगाक वैदेही प्रकाशनक दिससँ भेल छल। ई सामान्य कोटिक रचना थिक, मुदा पहिल थिक। प्र. मैथिलीमे अपनेक लेल विशेष रुचिगर विधा कोन अछि आऽ किएक? उ. मैथिलीमे गीत, कविता, ओऽ गीतल लिखलहुँ आऽ ओऽ सभ मंचपर प्रशंसितो भेल। सन् साठि ई.मे मैथिलीमे नवीन काव्यांदोलनकेँ प्रोत्साहित करबाक लेल ’अभिव्यंजना’ नामक पत्रिकाक संपादन प्रकाशन सेहो कयल, स्वयं सन् ५९ ई.सँ एहि प्रकारक काव्यक रचना सेहो कयल। किन्तु हमर प्रिय ओ मनोनुकूल विधा रहल कथा साहित्य ओ उपन्यास, जाहिमे मानवीय संवेदनाक संगहि अन्तर्मनक सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करबाक लक्ष्य रहैत छल। तैँ हमर कथा-संग्रह ओ उपन्यास बेसी प्रकाशित भेल। प्र. मैथिलीमे अपनेक ११ गोट प्रकाशित पोथी उपलब्ध अछि, एहिमे सर्वाधिक संतुष्टि कोन पोथीसँ भेटल? उ. लेखककेँ अपन रचनासँ पूर्ण संतोष नहि होइत अछि, तैँ ओऽ नरन्तर लिखैत जाइत अछि, लिखबाक इच्छा निरन्तर बनल रहैत अछि। ओकर श्रेष्ठताक निर्णय तँ पाठक ओ समीक्षक होइत छथि। हमरा लगैत अछि जे हमर चरित्र कथा संग्रह जे एखन धरि अप्रकाशित अछि, हमर प्रिय रचना होयत। एना- एखन धरिक प्रकाशनमे ’चन्द्र बिन्दु’ कथा-संग्रह ओ ’मंत्रपुत्र’ उपन्यास अपेक्षाकृत अधिक संतोष दैत अछि। प्र. अपनेक पहिल उपन्यास कहिया आऽ कतएसँ प्रकाशित भेल? उ. हमर पहिल मैथिली उपन्यास थिक, “बिहाड़ि, पात आऽ पाथर” जकरा हम सन् ५४ ई.मे लिखलहुँ, आऽ जे सन् साठि ई.मे कलकत्ताक मिथिला दर्शनक मैथिली समितिक दिसिसँ प्रकाशित भेल। मैथिली समिति अन्य अनेक महत्वपूर्ण कृति सभक प्रकाशन केलक जे एकटा इतिहास बनि गेल। प्र. मंत्रपुत्रपर साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल। की एकर पूर्वानुमान छल? उ. लेखक पुरस्कारक लेल नहि लिखैत अछि, ओऽ लिखैत अछि, ओऽ लिखैत अछि स्वान्तः सुखाय, अपन आत्म संतोष लेल। किन्तु काव्यक उद्देश्यसँ ’यशे अर्थकृते ...’ कहल गेल अछि। वस्तुतः हम पुरस्कारक लेल कहियो उत्सुक नहि भेलहुँ आऽ ने कोनो तकर चेष्टो कयलहुँ। तखन लोकसभ चर्च करैत रहैत छलाह, से सुनबामे अबैत रहैत छल, से फूसि कोना कहू, नीके लगैत छल। प्र. सुनैत छी जे पुरस्कार हेतु पोथी चयनमे गोलेशी चलैत अछि, कतए धरि अपने सहमत छी? उ. हौ! शिवप्रसाद! ई बात हमरहुँ सुनबामे अबैत अछि, एकाध बेर अखबारोमे ई बात देखबामे आयल अछि। बस, हमरहुँ एहि प्रसंग कोनो आधिकारिक ज्ञान नहि अछि, आऽ ने हम एहि सभमे समये दऽ पबैत छी। तैँ जहिना तोँ सुनैत छह, तहिना हमहूँ सुनि लैत छी। प्र. अपनेक अनुसारेँ मैथिली जगतमे की एहन कोनो साहित्यकार छथि? जे अहर्ता रहितहुँ साहित्य अकादमी पुरस्कार पएबासँ वंचित छथि? उ. विशिष्ट साहित्यकारकेँ तँ ध्यानमे राखले जाइत अछि, किन्तु पुरस्कार तँ कृति विशेषपर भेटैत अछि, जकर प्रकाशनक निश्चित अवधि निर्धारित रहैत अछि। कृति चयनक सेहो एकटा निश्चित निअम अछि। प्र. बिहार सरकारक ग्रियर्सन पुरस्कार कहिया भेटल आऽ कोन पुस्तक पर? उ. ई पुरस्कार हमरा ’मंत्रपुत्र’ नामक ऋगवैदिक कालीन उपन्यासपर सन् १९८८-८९ ई.मे भेटल छल। एहि उपन्यासमे आर्यावर्तक जनभाषाक संगहि आर्य अनार्यक संस्कृतिक मिलनक कथा अछि। एहिमे राष्ट्रीय एकता ओ भावात्मक एकताक सङहि विश्व शांतिक प्रसंग सेहो प्रासंगिक चर्च भेल अछि। प्र. मैथिली जगतमे बिहार सरकारक ग्रियर्सन पुरस्कार आओर किनका भेटल अछि? उ. पुरस्कार प्रसंग हम बहुत उत्सुक नहि रहैत छी, तैँ ई बात हमरा ज्ञात नहि अछि। प्र. १९६० ई. मे अपनेक सम्पादकत्वमे ’अभिव्यंजना’ पटना-सहरसासँ पत्रिका प्रकाशित भेल। चारि पाँचटा अंकक बाद बंद भए गेल। किएक? उ. हौ शिव प्रसाद। मिथि मालिनीक सम्पादन प्रकाशन तँ तोहूँ कऽ रहल छह, ग्राहक संख्या भेटबामे कतेक असुविधा होइत छैक ज्ञाते हेतह। ताहूमे तखन, जखन तोरा पीठपर एकटा अति उत्साहित ओ सुसंचालित मिथिला परिषद सन् संस्थाक हाथ छह। हमहूँ ग्राहक संख्या नहि बढ़ा सकलहुँ तैँ बन्द भऽ गेल। प्रायः यैह स्थिति मैथिली-पत्रकारिताक रहल अछि, तैँ अधिक पत्र-पत्रिका अल्पकालिके रहल। प्र. ’अभिव्यंजनवाद’ सँ की अभिप्राय अछि? उ. सन् साठि ई. मे ’अभिव्यंजना’ प्रकाशन-योजनाक पाछू हमर उद्देश्य छल मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलनकेँ गति ओ प्रोत्साहित करब। एहि प्रकारक काव्यकेँ मैथिलीक किछु विद्वान्, ’नव कविता’ अथवा प्रयोगवादी कविता कहऽ लागल छलाह, जे वाद-परम्परा हिन्दीमे चलि रहल छल। हम हिन्दीक अनुकरणक विरोधी रही वा छी। तैँ मैथिलीक एहि प्रकारक नवीन काव्यकेँ हम अभिव्यजनावादी काव्य कहलहुँ आऽ लिखलहुँ। एहि प्रसंग हम अभिव्यंजनाक सम्पादकीय ओ दिशान्तर भूमिकामे विस्तारसँ लिखनहुँ छी। संक्षेपमे एतबहि जे हमर अभिव्यंजनावादक संबंधमे क्रोचेक अभिव्यंजनासँ अछि आऽ ने अभिनवगुप्तक अभिव्यंजनावादसँ अछि। मैथिलीक एहि प्रकारक नवीन काव्यमे अभिव्यक्ति-शिल्प विशेषता रहैत अछि आऽ से अभिव्यंजना पत्रिका द्वारा प्रोत्साहित कएल गेल, तैँ अभिव्यंजनावाद। प्र. “दिशान्तर” आऽ “अवान्तर” कविता-संग्रहसँ की ध्वनित होइत अछि? उ. सन् साठि ई.क आसपास अनुभव भेल जे प्रचलित काव्य-लेखन-परम्परामे एकटा दिशा परिवर्तन भऽ रहल अछि, जे नवीनताक लेल ओ युगधर्मक लेल अनुकूल अछि तैँ दिशान्तर। पाछू अनुभव भेल जे अंततोगत्वा काव्यमे काव्यात्मकता तथा ओकर गीति-तत्व अति अनिवार्य तत्व थिक तैँ पुनः अवान्तर। आऽ तैँ ई दुनू संग्रह प्रकाशित कएल। अवान्तरमे हम गजलकेँ गीतल कहल अछि जे उर्दू ओ मैथिली भाषा संस्कारपर आधारित अछि। ई बात हम अपन अवान्तरक भूमिकामे विस्तारसँ लिखने छी। प्र. साहित्यिक रचना स्वान्तः सुखायक लेल करैत छी अथवा समाजक लेल? उ. साहित्यिक रचना “स्वान्तः सुखाय” क लेल होइत अछि, किन्तु अंततोगत्वा ओकर उद्देश्य भऽ जाइत अछि समाजे। साहित्य, समाजेक परिणाम थिक आऽ तैँ ओ समाजेक हित चिन्तनकेँ अपन लक्ष्यो मानैत अछि। प्र. कोशी अंचलमे जन्म भेल। कोशीक उत्थान-पतन देखल, कोशीक विनाश-लीला देखल, मुदा लिखल नहि? उ. लिखलहुँ नहि कोना? मैथिलीमे सन् ५९-६० ई.मे “माटिक लोक” नामक उपन्यास लिखलहुँ जे प्रकाशन-व्यवस्थाक अभावमे छपि नहि सकल, आब तँ ओकर पाण्डुलिपियो नष्ट भऽ गेल। पुनः ओकर हिन्दीमे पुनर्लेखन कयल “माटी के लोक: सोने की नैया” क नामसँ जे राजकमल प्रकाशन दिल्लीसँ प्रकाशित भेल आऽ व्यापक स्तरपर हिन्दीमे चर्चितो भेल। प्र. आकाशवाणी, पटनामे कतेक दिन सेवा कएल? उ. पटनाक आकाशवाणीमे हम सन् ५७ ई. सँ ६१ ई.क १४ नवम्बर धरि रहलहुँ। लगभग पाँच वर्ष। प्र. किछु मैथिली पत्रिकामे अश्लीलताक चित्रण भए रहल अछि। तकर की प्रतिफल? उ. साहित्यमे अश्लील चित्रण सर्वथा अवांछनीय।एहिसँ अप-संस्कृतिकेँ प्रोत्साहन भेटैत अछि, से ने काम्य आऽ ने क्षम्य। साहित्यक उद्देश्ये थिक सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। जहाँ धरि पत्रिका सभक प्रश्न अछि ओहिमे आरो सतर्कताक प्रयोजन अछि। कारण, पुस्तकक अपेक्षा पत्रिका सभ जनजीवनमे अधिक प्रवेश करैत अछि, विशेषतः आजुक व्यस्त जीवन क्रममे। तैँ एहन साहित्यसँ अपसंस्कृतिये केँ प्रोत्साहन भेटत। प्र. भावी लेखन-योजना की अछि? उ. किछु लेखन-योजना एखनहुँ अछि, मुदा वार्धक्य आब बाधा देबऽ लागल अछि, तखन देखा चाही भविष्यमे की कऽ पबैत छी। मैथिलीमे किछु अप्रकाशित पांडुलिपि अछि। पांडुलिपि प्रकाशित होइत जाइत छैक तँ लेखनमे सेहो गतिशीलता अबैत रहैत छैक। २. आब धारावाहिक शोधलेखक आगूक भाग। मायानन्द मिश्र जीक इतिहास बोध प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ /पुरोहित/ आ' स्त्री-धन केर संदर्भमे स्त्रीधन ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी (अखन धरिक) अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आऽ ई उपन्यास सूत्र स्मृतिकालीन मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि। मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आयल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि। ई ग्रन्थ प्रथम आऽ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आऽ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि। प्रथम अध्याय प्रथम सत्र एहिमे सृंजय द्वारा कएल जाऽ रहल धर्म-पश्चात्तापस्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि। “द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि। द्वितीय सत्र राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि। तृतीय सत्र एतए पुरान आऽ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी। चतुर्थ सत्र एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आऽ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आऽ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि, तँ सँगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्य खण्डक उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह, मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह। पंचम सत्र प्रणिपात, आशीर्वचन आऽ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आऽ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आयल अछि। ईहो वर्णन आयल अछि, जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल, आऽ भारत-युद्धमे ओऽ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त तक कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि। षष्ठ सत्र पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आऽ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि, आऽ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकायभारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आऽ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि, जेना कोनो विशेष तथ्य होए। फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि। सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आऽ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि। सप्तम् सत्र सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि। अष्टम् सत्र राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आऽ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि। नवम् सत्र सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि। पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आऽ ताहिसँवन्यजन आऽशूद्रजनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि।सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा करल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि।चिकित्साशास्त्र नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि, ओऽ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आऽ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आऽ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आऽ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि। द्वितीय अध्याय प्रथम सर्ग सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि । आऽ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि। द्वितीय सर्ग सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आऽ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिहि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि, आऽ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि। तृतीय सर्ग अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आऽ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आऽ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि। चतुर्थ सर्ग आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आऽ द्रविड़ शब्द दुनू पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आऽ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि।मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि। पञ्चम सर्ग दिनमे एकभुक्त आऽ रातिमे दुग्धपान मिथिला आऽ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आऽ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर आऽ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब। षष्ठ सर्ग अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनकासभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आऽ पशुचर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आऽ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि। विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत,तकर चर्च अछि। सप्तम सर्ग उसना चाउरक अधिक सुपाच्य आऽ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आऽ ताहि लेल आवास-भूमि आऽ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि। अष्टम सर्ग कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आयल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आऽ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आऽ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल। उपसंहार दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल।वैशाली आऽ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आऽ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आऽ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल। एहि प्रबन्धक अंतिम खण्डमे ई स्पष्ट करब आवश्यक जे एहि शोध-लेखक एकटा सीमा निर्धारित कएल चल, इतिहास-बोध। से मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आऽ प्रथम शैलपुत्री च एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आऽ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल। साहित्यिक रूपसँ ई चारू ग्रन्थ अपन विशिष्ट स्थान रखने अछि आऽ एहिमे मंत्रपुत्र पोथीक मैथिली संस्करणपर मायानन्दजी केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो भेटि चुकल छन्हि। भाषा विज्ञान- ऋगवैदिक ऋचामे प्राकृतक किछु विशेष शब्द, ध्वनि, प्रत्यय आऽ वाक्य रचना भेटैत अछि। संस्कृतकेँ मानक भाषा आऽ प्रादेशिक तत्त्वसँ मुक्त भाषाक रूप ओऽ देने छलाह। कर्णाटकमे पानिकेँ नीरू आऽ एम्हर जल कहल जाइत अछि। पानिक ई दुनू रूप संस्कृतमे भेटत। प्राकृतिक तत्त्वसँ मुक्त भाषा बनेबाक लेल पाणिनी कोनो क्षेत्रक अवहेलना नहि कएने छलाह वरण सभक्षेत्रक शब्दकोष लए उच्चारणक भेदकेँ खतम कएने छलाह। बहुत रास प्राकृत शब्द संस्कृतमे लेल गेल ध्वन्यात्मक संशोधन कए आऽ ताहिसँ बादमे ई धारणा भेल जे प्राकृतक शब्द सभ तद्भव छल। संस्कृतमे तद्भव ताहि कारणसँ नहि देखबामे अबैत अछि। तहिना अपभ्रंश आऽ प्राकृत भाष सौँसे देशमे घुमए बलाक भाषा छल। भारतमे देवतंत्रक विकास पानि संबंधी धारणासँ जुड़ल अछि। यावत विश्व अव्यक्त अछि तँ अन्धकारमय अछि, अकास अछि, व्यक्त भेलापर ओऽ जल बनि जाइत अछि। अकास आऽ जल दुनू भारतीय चिन्तनमे तत्त्व अछि। मूर्तिपूजनक जे चित्र मायानन्दजी चित्रित करैत अछि ओऽ सरलीकरण अछि। भाषा-प्रसारक जे विधि ओऽ स्त्रीधनमे देखबैत छथि सेहो अति सरलीकरण अछि। एहि प्रबन्धक अंतिम खण्डमे ई स्पष्ट करब आवश्यक जे एहि शोध-लेखक एकटा सीमा निर्धारित कएल चल, इतिहास-बोध। से मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आऽ प्रथम शैलपुत्री च एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आऽ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल। साहित्यिक रूपसँ ई चारू ग्रन्थ अपन विशिष्ट स्थान रखने अछि आऽ एहिमे मंत्रपुत्र पोथीक मैथिली संस्करणपर मायानन्दजी केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो भेटि चुकल छन्हि। (समाप्त) सूचना: अगिला अंकसँ स्व. श्री हरिमोहन झा जीक समग्र रचनापर विवेचन शुरु कएल जाए रहल अछि। ६. पद्य विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी,गजेन्द्र ठाकुर श्री गंगेश गुंजन ज्योति झा चौधरी श्री पंकज पराशर, महाकाव्य महाभारत (आगाँ) श्री जितमोहन -भक्ति-गीत १.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) २. गजेन्द्र ठाकुर १. विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य । जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि: 1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि। मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि। प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:- 26. महेशवानी शिव हे हेरु पलक एक बेर हम छी पड़ल दुखसागरमे खेबि उतारु एहि बेर॥ जौँ नञ कृपा करब शिवशंकर हम ने जियब यहि और॥ तिविध ताप मोहि आय सतायो लेन चह्त जीव मोर॥ रामजीकेँ नहि और सहारा, अशरण शरणमे तोर॥ 27. समदाउन गौनाके दिन हमर लगचाएल सखि हे मिलि लिअ सकल समाजः॥ बहुरिनि हम फेर आयब एहि जग दूरदेश सासुरके राजः॥ निसे दिन भूलि रहलौँ सखिके संग नहि कएल अपन किछु काजः। अवचित चित्त चंचल भेल बुझि मोरा कोना करब हम काजः। कहि संग जाए संदेश संबल किछु दूर देश अछि बाटः॥ ऋण पैंच एको नहि भेटत मारञमे कुश काँटः॥ हमरा पर अब कृपा करब सभ क्षमब शेष अपराध रामजी की पछताए करब अब हम दूर देश कोना जाएबः॥ 28. महेशवाणी कतेक कठिन तप कएलहुँ गौरी एहि वर ले कोना॥ साँप सभ अंगमे सह सह करनि कोना, बाघ छाल ऊपरमे देखल, मुण्डमाल गहना॥ संगमे जे बाघ छनि,बरद चढ़ना, भूत प्रेत संगमे नाचए छनि कोना॥ गंगाजी जटामे हुहुआइ छथि कोना, चन्द्रमा कपार पर शोभए छथि कोना। भनथि रामजी सुनुए मैना, शुभ शुभ के गौरी विवाह हठ छोड़ू अपना॥ (अनुवर्तते) १. श्री गंगेश गुंजन २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी १.. गंगेश गुंजन श्री गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक। उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। एकर अतिरिक्त्त हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोट (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आ' शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। भेटताह अनन्त ?' हमरे थिक ओ मात्सर्य-अर्जक मुरूत। हमरे , हमर स्त्रीक ममताक चूर्ण द्रवित हृदयक अवयव ढेरीक पुनर्रचनाक प्रक्रिया थिक। खण्ड-पखण्ड भावत्वक ध्वस्त काया ,माया। भूमि पर जाहि घड़ी बलिप्रदानक छागर भेल छल- सीरा आ धर दू कात छर छर शोनितक फुचुक्का मे , ओ समस्त मनस्तत्व भेल छल-चूर चूर, धूरा गर्दा। तं ओकरे ढेरी पर ठाढ़ भ' क' दुनू गोटय माने हम आ हमर स्त्री, माने एकटा पिता आ माय, अपने दुख आ नोर सं चूर कें सानि-सानि, बना लेने रही कोनो गणेश दुर्गाक मूर्त्तिक माटि। बड़ मनोयोग सं गढ़ने रही, बैसल-बैसल ओहि माटिक मुरूत। हमरा दुनू गोटय दुनू गोटय भ' गेल रही ओही मे, सोझांक ,पएर तरक, आ मन महक सभटा ममताहत क्लेश कें, उपछि-उपछि क' बाहर करैत जीवन सं ,बड़ी काल अनुभवैत रहि गेल रही अपस्यांत, तथापि बना रखवा लेल संघात कें मुरूत, लागल रही लगातार लागल रही, केहन पागल रही ? अपनहि दर्पाहत अस्तित्वक तौला सं खसि पड़ल सबटा सुक्खा प्रसाद कें समेटि क' बैसि गेल रही माटि जकां बनाबय मुरूत। बुकनी-बुकनी क' देल गेल मन-प्राण-संवेदना कें समटैत, सानैत आ फेर गढ़ैत काल केहन भ' गेल रही तखन असकर-असहाय । आ आब आइ ? अपनहि ध्वस्त ममताक मुरूत रचि क' सोझां मे रखने, केहन छी निर्द्वन्द्व, निश्चिन्त, दुःख मुक्त ! उताहुल । करवा लेल फेर, नव मूर्त्तिक प्राण प्रतिष्ठा ! स्त्रीक रिक्त कोरा कें नवजात शिशु सं भरवा लेल थर-थर देहप्रयोग मे निसर्ग व्याकुल ! दिल्ली नगर बस मे तामस :एक मानल जे ई ६८० नंबर बस लोक सभ सं कोंचल भरल छैक, पैर ध्'क' निचैन ठाढ़ भ' सकवाक नहि छैक मिसियो भरि जगह, तों सीट पर बैसल निपिफकिर-निश्चिन्त छ' ? जखन कि भरिसक अवस्से पेंशन उठाब' जा रहल ओइ बूढ़ कें एहन ध्क्कम ध्ुक्की खाइत, हाथक मैल कुचैल अपन झोरीक रक्षा करैत डगमग ठाढ़ बुढ़ा कें देखि रहलाक बादो, बैसले रहि जाय लगलहए तों आब गंगेश गुंजन ! नहि होअ' लगल'हए बूढ़ो लोक कें अपन सीट देबा लेल आब ठाढ़! सावधन, खबरदार ! दिल्ली नगर बस मे तामस : दू ई बस! नरको मे ठेल्लम ठेला ! आ ओ बुढ़ा कहुना करैत अपन प्राण-रक्षा पछिला कतोक स्टॉप सं क' रहल छथि दुर्बल पएर पर संतुलित करैत अपन ई कष्टक यात्राा ! ओ बालिग स्त्राी ! ठामहि बैसलि छथि निश्चिन्त, महिलाएंक सुरक्षित खास अपन सीट पर सुव्यवस्थित। सोझहिं मे संघर्ष क' रहल छथि वृद्ध्, बेचैन, अस्थिर कोनहुं अगिला ब्रेक पर ध्किया क' खसि पड़वा लेल चिंतित स्त्राी कें देखाइत नहि छनि बृद्ध्क लेल किछुओ टा कर्तव्य। आरक्षित स्त्राी-सीट पर निस्संग बैसि सकयवाली अपना अध्किार बोध्क एहन चेतना पर किएक ने उठओ क्रोध्, कोना ने होअओ पिफकिर ? २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति ईशक अराधना 1 हे ईश एहन हाथ दिअ जे कर्मठ आ कुशल होई अहॉं लग मात्र जोड़िक कर्म के तिलांजली नहि दई पूजाक संग काजक संगम जकरा लेल ग्राह्य होई २ हे ईश एहन पैर दिय जे अपन भार सहि सकय आनक जहन प्रयोजन होई तऽ सभसॅं आगॉं बढ़ि सकै औचित्य सॅं विचलित जकरा कोनो बाधा नञ कऽ सकै ३ हे ईश एहेन वाणि दिअ जाहि में निवास करैथ शारदा मिठास होए आ' शीतल होय नहिं होए भय आ' लोलुपता अहॉंक अराधना भक्तिभावसऽ देववाणिमे करक दिअ क्षमता ४ हे ईश एहेन दृष्टि दिअ अहॉंक रूपके कराबै चिन्हार अहॉंक बास जखन घट-घट मे फेर कियै जाउ हिमालय पहाड़ सत्कर्मके हम पूजा मानी नहिं रहै अज्ञानताक अन्हार ५ हे ईश एहन बुद्धि दिअ अहॉं पर सदैव रहै विश्वास संतोष आ' शान्ति पाबि बेसी के नहिं हुए आस प््रााणिमात्रक कल्याण लेल कऽ सकी आमरण प्रयास ***** श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। पराशरजी एखन हिन्दी पत्रिका ’कादम्बिनी’मे वरिष्ठ कॉपी सम्पादक छथि। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। राग माल-कोष दूपहर राति धरि लैपटापपर अपस्यांत ओऽ बिसरि चुकल अछि अपन पत्नीक सेहन्ता आऽ गर्भस्थ शिशुक आगमनक चिन्ता योग्यताक समुद्र-मंथनमे एखन एकाग्रचित्त ओऽ अंतरिक्षोसँ आगू जेबापर अछि बिर्त खेनाइ बनेबामे नितान्त अपटु ओकर रोबोट फोन कऽ चुकल छैक फास्ट फूड केर दोकानकेँ त्वरित होम डिलिवरीक निमित्त उच्च तकनीकसँ सम्पन्न संचार व्यवस्थाक बीच ओकर मुट्ठीसँ बिलाइत रहैत छैक समय समय-प्रबंधनक उच्च डिग्री केर अछैतो ओकर किन्नहु सक्क नहि चलैत छैक समयपर नहि देन बिलमैत अछि नहि राति रुकैत अछि कोनो अदृश्य लोकपर ओऽ अनेरो खौंझाइत अछि थ्री-जी मोबाइलपर अठबारेँ-अठबारेँ फोन कयनिहारि ओकर निरक्षर मायक आवाज जेना कोनो नरहा इनारसँ अबैत अछि आह्लादित- हाई लेवल मीटिंगक व्यंग्योत्रीक बीचमे निराशाक सीमान्त धरि व्यथित मायक स्वर पुत्र केर एक्सक्यूज मीक खिसियायल द्रुत विलम्बित भासमे हेरा जाइत अछि जकरा लेल चोरि कयलहुँ सएह कहलक चोरा... आऽ तकर तुरत्ते पंचम स्वर बाट धरैत अछि धैवत दिस.. हमर अभाग हुनक नहि दोष..हमर अभाग... बिहाड़िक बीच बाट तकैत कोना हहाइत आयल काल-वैशाखी जे अनसम्हार कऽ देलक अछि ठाढ़ो रहब- मांझ बाधमे आड़ि बन्हैत कहलनि जामुन महतो रंग-बिरंगक पतक्का सभ-जे उड़िया रहल अछि एहि बिहाड़िमे देखार भऽ गेल जे किछु छल झाँपल-तोपल एतेक दिनसँ केहेन-केहेन मोटगर गाछ नहि थम्हि सकल गाछीक बीचोमे एहि रच्छछा जोर मुदा एकसरुआ भेल गोटेक टा पीपर गाछ आइयो अछि ओहिना ठाढ़ गामक सीमान्तपर कइक बरखसँ हओ बाबू! गामक ठाम तँ छियह ओएह मुदा लोक सभ कतय जाइ गेलैक हओ? -चकोन्ना होइत कहैत छथिन जामुन महतो आऽ गाबऽ लगैत छथिन अकस्मात् आइ-माइ जकाँ चिकरि-चिकरि कए एक-पर-एक सोहर आऽ मूड़न-उपनयनक गीत बेश टहंकारसँ चकबिदोर भेल हम देखैत छी हुनकर सभटा किरदानी ..आकि ताऽ हरो-हरो कऽ आबऽ लगैत छथि कुहेसक धोन्हि फाड़ि कऽ हेरायल-भुतियायल हमरा गामक साकिन सभ लोककथासँ बहरा-बहराकेँ ओहिना करे-कमान अन्हरिया रातिमे गोरिल्ला युद्धक ओरियाओनमे अपस्यांत गामक युवक सभ सकपंज भेल लोकक दिस तकैत अछि तेहन नजरिसँ जेना फेर नहि घुरि सकत ओऽ अपन गाम-ठाममे कहियो जानि नहि कहिया होयत उग्रास हओ दिनकर-दीनानाथ! कहिया शान्त होयत काल-वैशाखीक रच्छछा जोर- पेटकुनिया देने हमर बाबी लिबलाहा एकचारीमे गोहरबैत छथिन देवता-पितरकेँ जानि नहि कतय-कतयसँ अबैत अछि ई काल-वैशाखी कोन हवा केर दाब क्षेत्रमे साजैत अछि ई एहेन-एहेन मारूख साज-बाज हम बहार होइत छी तकर उत्स केर खोजमे मुदा भेटैत नहि अछि कोनहुना बाट मारु(ख) विहाग श्मशानसँ घुरि कऽ लोह-पाथर छुबैत बारंबार करैत छी प्रयत्न एहि असार संसारमे हृदयकेँ पाथर बनेबाक मुदा चचरीमे बान्हल एकटा आओर लहास हमर कान्ह केर प्रतीक्षामे पहिनहिसँ रहैत अछि रुदनांजलिसँ सिक्त भेल कोना फड़फड़ाएल बमवर्षक विहग सभ महाशक्ति केर विरोधी आकाशमे- तड़ित लयमे खसैत रहल कलस्टर बम सभ निरीह जन-अरण्यमे आऽ घर्षित होइत रहलाह हाहाकारी स्वर-साधनामे निष्णात घराना केर गायकवृन्द! मृत्यु-रागमे निष्णात नाटो देशक संगतिया सभ अपन-अपन तानपुराक संग मात्र एकटा संकेतक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि पहिनहिसँ तैयार मन्चपर बैसल तबला मिलेबाक ठकठकीसँ दलमलित होइत रहैत अछि मानवता केर आत्मा ठाटक बाट बिसरल अपन अश्वमेधी टैंकसँ मीडियाकेँ जवाब दैत सभटा कोमल स्वरकेँ बजेबाक भार दैत अछि “एंबेडेड जर्नलिज्म” केर नव-नव स्वरोत्सर्गी साधक लोकनिकेँ संपूर्ण विश्व केर संगीत-पिता(ह) कहरवापर कुहरबाक साधनामे दीक्षित करौनिहार संगीताचार्य नगर-नगरमे पहिनहि खोलि चुकल छथि हँसी मापक दोकान धोधि लुप्तक मशीन सभसँ भरल अनेक तरहक अंगतराश एम्हर कइक बरखसँ खाली अफ्रीका आऽ एशियामे ताकि रहल छथि विश्व-सुन्दरी आऽ ब्रह्माण्ड-सुन्दरी सितारक तारपर सुता कऽ अखबारक पेज-थ्रीपर कोन-कोन राग बाबा हरिदास नहि सिखौलखिन तानसेनकेँ मुदा अतृप्त अकबर आब ठोंठपर चढ़ि कऽ निकालि रहल छनि सभटा राग पेटेंटक अपन सॉफ्टवेअरमे संरक्षित करबाक लेल छोट-छोट तानसेन सभ आँखि मुननेँ निमग्न भऽ कए गाबि रहल अछि मिनट-मिनटपर राग-मारू(ख) विहाग गुरुहंत दिवस केर पूर्व संध्यापर विकासशील श्रोता समूह केर नव-नव सेनाध्यक्षक फरमाइशकेँ ध्यानमे रखैत। सोहर हहारोह करैत कोशीक कछेरमे गुड़गुड़िया कटैत पानिकेँ देखि नहि जानि मोन कतेक दिनसँ गाबि रहल अछि साओन मासक एहि बेकालमे दू बीत रुक्ख ठाम तकैत समदाओनक भासमे सोहर कहरवा तालपर कूही होइत ककरा देबैक छठिहारक हकार बाउ, जनविहीन भेल एहि जल प्लावित गाममे जतय डेग-डेगपर चारि टा कान्हक लेल कंकालवत लहास जन्मोत्सवी सोहरक ध्वनि तरंगमे एहि असार संसारमे आगमन आऽ प्रस्थानक बीच बीतल जिनगी केर अर्थ तकैत रहैत अछि मृत्युक भृतकवीथीमे बौआइत.. एहि अर्थोत्कर्षी समयमे हमरा गामक कतेक लोक छथि अर्थ संपन्न? शेयर बाजारमे उठैत सें-सेक्सी लहरिक किछु अर्थांश जेना कोनो प्लूटो ग्रहसँ चलल प्रकाश जकाँ कइक युग पहिनहि चलल छल आओर कइक युग धरि बाटेमे रहत तकर कोन ठेकान? जकरा सबहक भाषा आँखिक कोर बाटे सभ दिन बहैत रहैत अछि जकरा सबहक जीवने एकटा अनन्त सओन बनल अछि जकरा सबहक कंठसँ फूटल बकार हाहाकारमे बदलि जाइत अछि जकरा सबहक औंठा कबालापर निशानक पर्याय बनि गेल अछि तकरा सबहक कइक पुरखाक जन्मोत्सवी सोहर समदाओनक पर्याय बनि जाइत अछि नहि जानि कोन बाटे अबैत अछि पानि पानि-पानि भेल जिनगी सबहक शेष दिवसकें गलेबाक लेल सभ बेर रहरहाँ जे हूक उठैत अछि खराँतक बहीमे गमछी ओछबैत सीधे पंचममे आऽ बाबू-भैयाक लठैत बहा दैत कोशी पुत्रक कंकालवत लहास उदारतासँ वृद्धाक कंठसँ कतेक प्रयत्नक पश्चात् निकसैत सोहरक खाँटी धुन कमला-कोशीक कछेरमे नोरक संग मिज्झर होइत समदाओनमे बदलि रहल अछि नहि जानि ओऽ के छथि जे आइयो मिथिलामे गाम-गाममे पाग पहिरने जनम अवधि रूप निहारैत अछि आऽ कहियो तिरपित नहि होइत अछि? मूल बियाहक वेदीपर आतुरतासँ पुछैत छथिन पंडित धुरंधर झा गोत्रक पश्चात् हमर मूल, हमर पूर्वजक मूल स्थान पुछैत छथिन शनैः शनैः उच्च होइत स्वरमे कर्मकांडज्ञताक अहंकारसँ भरल पंडितजी पंडितजी बेर-बेर दौड़बैत छथिन हमरा धरि प्रश्नश्व ..मूल कहू बाऊ, मूल, अपन कुलक मूल केहेन छी अहाँ जे पिता मूलो धरि नहि सिखौलनि शिक्षा देखू अंगरेजिया युवक सबहक केहेन आबि तुलायल अछि दुष्काल कनेक सोचैत हम कहलियनि- सुनू पंडितजी, सुनू ओना हमर पिता मानैत छथि पंचोभ करियौन अपन मूल मुदा हम कोना कहि सकब ठीक-ठीक कि इएह टा थिक हमर मूल? कोना कहब पंडितजी कि सृष्टिक आरम्भेसँ पंचोभे छलाह हमर पूर्वज कोना कहब कि दू कौर अन्न आऽ पाँच हाथ वस्त्र लेल कतहु आन ठामसँ नहि आयल हेताह हमर पूर्वज? कोना कहि सकब पंडितजी कि हमर पंचोभेवला पूर्वजक पूर्वज मौर्य आ शुंग वंशक पश्चात् नान्यदेवक कालसँ हरिसिंहदेव आऽ अहमद खाँ केर सूबेदार बनबा धरि पंचोभेमे छलाह? ओइनवार वंशक उत्थानसँ लऽ कए दिल्ली सल्तनत केर उठा-पटक वला समयमे कतय छलाह, कतय-कतय गेलाह से कोना कहि सकब हम एकदम ठीक-ठीक? हमर पूर्वज आर्य छलाह कि अनार्य हम नहि जनैत छी जँ ओ आर्य छलाह तँ ईरान दिस होयत कतहु हमर मूल आऽ ओतहुसँ पूर्व तँ कतहु रहल हेताह हमर पूर्वज जाहि मूलक नाम विलुप्त अछि हमरा सबहक स्मृति-कोषसँ हमर ओऽ पूर्वज लोकनि जे बकरी-छकरी जकाँ ठोंठिया कए चढ़ाओल गेलाह कुसियारक खेतीक लेल मॉरीशस फिजी आऽ सूरीनामक जहाजमे गदर केर विद्रोहक पश्चात् हुनका हम कोना अलग कऽ देबनि अपन मूलसँ? सामूहिक सांस्कृतिक इतिहासमे कुहरैत हमर पूर्वज कोना अलग हेताह हमर मूलसँ पंडितजी? पंचोभ मूलक हमर पुरखा कहाँदन पंचोभसँ अयलाह महिषी आऽ ओतयसँ परगना फरकिया केर एकटा गाम मोहनपुर, हम पटना-दिल्ली होइत एखन काशीमे बिलमल एकटा डेग हरदम उठौनहि रहैत छी कोनो आन नगरक लेल जाहि-जाहि नगरक बसातमे साँस लेलहुँ जाहि ठामक अन्न-पानिसँ पोसायल अछि ई देह जाहि नगरक संस्थान दू कौर भातक लेल दैत अछि मुद्रा ओऽ सभटा स्थान मात्र पंचोभे टा मूलमे कोना समाहित हेतैक पंडितजी? पंचोभ-करियौनसँ बहुत-बहुत विशाल अछि हमर आन-आन मूल सभ एखन बहुत ठाम जयबा लेल विवश करत पेट आऽ जाधरि जीयब ताधरि कतय-कतय जायब कोन-कोन नगरक थारीमे खायब से कोना कहि सकब हम ठीक-ठीक? मात्र एक्के टा मूल पंचोभ-करियौन कहि कए एतेक रास मूल सभसँ हम कोना पिंड छोड़ा सकब पंडितजी? शनिचरा गपे-गपमे हमरा मुँहसँजखन निकलि जाइत अछि अपन स्कूलक कथा आऽ मोन पड़ैत अछि शनिचराक जोगाड़मे अहुरिया कटैत मायक व्यथा तँ बुझायब कठिन भऽ जाइत अछि बेटीकेँ शनिचरा शब्दक अर्थ आऽ औचित्य माउंट कारमेलक विद्यार्थी हमर बेटी जखन तैयार होइत अछि स्कूलक लेल हाथमे थर्मस पीठपर बस्ता आऽ सुस्वादु जलखइ भरल टिफिनक संग तँ अनायासे हीनभावसँ ग्रस्त हमर मोनक नेना तुलना करऽ लगैत अछि बेटीक नेनपनसँ अपन नेनपनक चीनीक मोटका बोरापर पीपरक गाछ तर बैसल शनिचरा नहि देबाक अपराधमे जहिया खजूरक कड़ची खा कए घुरी तँ प्रण करी फेर कहियो स्कूल नहि जयबाक मुदा बलजोरी पठाओल जाइ स्कूल जेलसँ भागल कोनो दुर्दांत अपराधी जकाँ मिसरी नाम धरेबाक लेल गुरुजीक गंजन सहबाक हेतु व्याकरणसँ लऽ कए जोड़-घटाव आऽ बाल भारती धरि एक्के संग पढ़बैत भरौलीवला मास्टर शनिचरा नहि देनिहार विद्यार्थीक ममरखाग्रस्त देहपर जखन मारैत छलखिन खजूरक कचका कड़ची तँ दस पैसा हमरा दुनियाक सभसँ पैघ पाइ बुझाइत छल जाहि लेल अगिला छओ दिन महाग मोसगिलमे बीतैत छल हमर ओऽ दोस सभ जे शनिचरा देबामे असमर्थ छल आऽ परीक्षा फीसक जोगाड़ तँ महाग मोसकिल से सभ कड़चीक आदंकसँ बिसरैत चल गेल स्कूलक बाट आदंकसँ कपसैत नोर-झोर भेल हमर ओऽ दोस सभ जे फीसक बदलामे पा~म्च टा घैल एकटा कचिया वा दू टा पगहा सेर भरि दूध वा एकटा परबा देबाक प्रस्ताव मायक सिखौलापर गुरुजी लग रखैत छल आइ यक्ष्माग्रस्त भेल दिल्लीमे रिक्शा घीचैत अछि प्रवासक कष्टप्रद जिनगी आऽ देहक अशक्तताक कथाक बीच नंगोटिया दोस सभ जखन चर्च करैत अछि स्कूल आऽ शनिचरा कांडक तँ हँसैत अछि यक्ष्मा जर्जरित पाँजरकेँ नुकबैत उकासीक सीमांत धरि शनिचराक खिस्सा सुनैत जखन देखैत अछि बेटी हमरा मुँहपर वएह असहायता आऽ चिन्ता तँ हँसैत अछि भभा कए हमर जीवनक खिस्सापर एहि अर्थ-संपन्न युगमे जनमल हमर बेटी एखन नहि जनैत अछि अर्थाभावक अर्थ जतेक दरमाहा लेल भरि मास खटैत छलाह हमर पिता घर-आश्रम चलबैत बेर-बेगरतामे सर-कुटुमक संग ठाढ़ ओतबा टाका आइ बेटीक एक मासक स्कूलक फीस होइत अछि जहिया-जहिया पुछैत अछि बेटी शनिचरा शब्दक अर्थ तँ हमरा बेर-बेर मोन पड़ैत अछि एहि अर्थ युगमे यक्ष्मा जर्जरित दोस सबहक छाती आऽ पिताक एक मासक दरमाहा। 1.भक्तिगीत 2. महाभारत 1.भक्तिगीत- जितमोहन झा मात पिता गुरु प्रभु चरणमे प्रणवत बारम्बार हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। माताजी जे कष्ट उठेलखिन्ह ओऽ ऋण कहियो नञि चुकलऒ, आंगुर पकड़ि कs चलब सिखेल्खिन्ह ममताक देलखिन शीतल छाया, जिनकर कोरामे पलिकए हम कहेलहुँ होशिया॥ हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। पिताजी हमरा योग्य बनेलथि कमा-कमा कऽ अन्न खुएलथि, पढा लिखा गुणवान बनेलथि, जीवन पथ पर चलब सिखेलथि, जोड़ि-जोड़ि अपन सम्पति केँ बनाऽ देलथि हक़दा। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। सत्य ज्ञान गुरूजी बतेलथि, अंधकार सभ दूर हटेलथि, ह्रदयमे भक्तिक दीप जरेलथि,हरी दर्शनक मार्ग बतेलथि, बिना स्वार्थ्क कृपा केला ओऽ कतेक पैघ उदार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। प्रभु कृपासँ नर तन पेलहुँ संत मिलनक साज सजेलहुँ, बल बुद्धि आर विद्या दऽ कs सभ जीवमे श्रेष्ठ बनेलहुँ, जे कियो हिनकर शरणमे एल्खिन,भेलन्हि हुनकर उद्धार। हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार, हमरा पर कएलहुँ बड़ उपकार। 2. महाभारत महाभारत (आँगा) -गजेन्द्र ठाकुर ६.भीष्म-पर्व भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव सेना सहित आगाँ भीष्म कौरवक पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण सहित। भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह, पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह। युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ, सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर। कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम, स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ। अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य। विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे, जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि, कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह, चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः। फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ, आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित। युढिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेलाह, गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल। भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल, धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल, युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद। अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा, आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल, युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल। भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख, बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन। पहिल दिनक युद्धसँ पाण्दव शोकित दुर्योधन हर्षित। दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय। कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग। हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष। दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल काँपि सकल। भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दुगल, सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल, खसल भूमि तखन ओऽ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए। साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल। तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर टूटल, द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल, दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल, ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ, कौरव सेना बुझल भागल छल ओऽ युद्ध छोड़ि कए। भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण, साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भेल। भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय पक्षमे अछि पांडवक, भीष्म कहल छथि ओऽ अजेय परञ्च युद्ध भरिसक करब। (अनुवर्तते) संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) (आगाँ) -गजेन्द्र ठाकुर वयम् इदानीम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः। यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया। चित्ते वाचि क्रियायां च महता मेकरूपता॥ इदानीम श्रुतस्य सुभाषितस्य तात्पर्यम् एवम् अस्ति। लोके विविधाः जनाः भवन्ति- सज्जनाः-दुर्जनाः च। सज्जनानां विचारः यः भवति सा एव वाणी भवति यथा विचारः भवति तथा वाणी भवति-यथा वाणी भवति तथा तेषां व्यवहारः भवति- ते यथा चिन्तयन्ति तथैव वदन्ति- यथा वदन्ति तथैव व्यवहारे आचरन्ति- अतः सज्जनानां विचारः वाणी अनन्तरं व्यवहारः च समानाः भवन्ति। एतएव सज्जनानां लक्षणः अस्ति। यदि तपं करोति तर्हि मोक्षं प्राप्नोति। यदि तप करब तँ मोक्ष प्राप्त होएत। अहं दशवादने निद्रां करोमि। हम दस बजे सुतैत छी। षड्वादने उत्तिष्ठामि। छःबजे उठैत छी। अहं दशवादनतः षड्वादनपर्यन्तं निद्रां करोमि। हम दसबजेसँ छः बजे धरि सुतैत छी। भवान् कदा निद्रां करोति। अहाँ कखन सुतैत छी। भवान् कदा अध्ययनं करोति। अहाँ कखन अध्ययन करैत छी। भवती कदा क्रीडति। अहाँ कखन खेलाइत छी। गजेन्द्रस्य दिनचरी ०५०० – ०६०० योगासनं अध्ययनम् स्नानम् पूजा जलपानम् गृहकार्यम् विद्यालयः क्रीडा अभ्यासः भोजनम् १००० निद्रा सोमवासरतः शुक्रवासरपर्यन्तं विद्यालयः अस्ति।सोमदिनसँ शुक्रदिन धरि विद्यालय अछि। फेब्रुअरीतः मईमासं पर्यन्तं विद्यालयः अस्ति। फरबरीसँ मई मास धरि विद्यालय अछि। भारतदेशः कन्याकुमारीतः कश्मीरपर्यन्तम् अस्ति। भारतदेश कन्याकुमारीसँ कश्मीर धरि अछि। राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीतः मुम्बईनगरंपर्यन्तम् गच्छति। राजधानी एक्सप्रेस दिल्लीसँ मुम्बइ धरि जाइत अछि। धन्यवादः। पुनर्मिलामः। धन्यवाद। फेर भेँट होएत। सुन्दरः कुत्र अस्ति। सुन्दर कतए अछि। आगत् श्रीमन्। आऊ श्रीमान्। जानाति-कः समयः। जनैत छी- की समय अछि। कुत्र गतवान। कतए गेलाह। सार्ध पंचवादनम्। एतावत कालपर्यन्तम्। साढ़े पाँच। एखन धरि? किं कुर्वन् आसीत्? की करैत छलहुँ? अत्रैव आसन्। श्रीमन्। बहिः। एतहि छलहुँ। श्रीमान्। बाहरमे। हन्यतं मा वदतु। झूठ नहि बाजू। कदा कार्यालयं आगतवान्। कखन कार्यालय अएलहुँ? सार्ध नववादने। साढ़े नौ बजे। तदा किं कृतवान्? तखन की कएलहुँ? स्वच्छतां कृतवान्। साफ-सफाई कएलहुँ। कदा। कखन? नववादनतः सार्धनववादनपर्यन्तम्। नौ बजेसँ साढ़े नौ बजे धरि। ततः किं कृतवान्। तकर बाद की कएलहुँ? ततः सार्धएकादशवादने चायपानार्थं गतवान्। तकर बाद चाहपानिक लेल गेलहुँ। ततः कदा आगतवान्। तकर बाद कखन अएलहुँ? सपादद्वादशवादने। सबाबारह बजे। तन्नैव सार्धएकादशवादनतः सार्ध द्वादशवादनपर्यन्तम् अपि चायं पीतवान् वा। तकर बाद साढ़े एगारह बजेसँ साढ़े बारह बजे धरि सेहो चाहे पिबैत रहलहुँ की? ततः किम् कृतवान्? तकर बाद की कएलहुँ? द्विवादनतः त्रिवादनपर्यन्तं भोजनविरामः तदा भोजनं कृतवान् खलु। दू बजेसँ तीन बजे धरि भोजनविराम छल तखन भोजन कएलहुँ नञि? आम् सत्यम्। हँ ठीक। त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं स्वस्तानि एव मित्रा कृतवान्, उद्याने विहारं कृतवान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि मित्रत कएलहुँ, उद्यान विहार कएलहुँ। तथा नैव श्रीमन्। त्रिवादनतः चतुर्वादनपर्यन्तं पत्राणि संचिकाषु स्थापितवान्। तेना नञि अछि श्रीमान्। तीन बजेसँ चारि बजे धरि पत्रसभ संचिकामे रखलहुँ। सर्वमपि जानामि। सभटा जनैत छी। स्वारभ्यां अहं सार्धनववादनतः भवान् किं किं करोति इति अहम् एव परीक्षां करोमि। काल्हिसँ हम साढ़े नौ बजेसँ अहाँ की की करैत छी ई हम अपनेसँ निरीक्षण करब। यदि आलस्यं दर्शस्यसि तर्हि उद्योगात् निष्कासयामि। यदि आलस्य देखायब तँ रोजगारसँ हम निकालि देब। गच्छतु। जाऊ। भवत्सु प्रतिदिनं योगासनं के के कुर्वन्ति। अहाँमे सँ के के सभ दिन योगासन करैत छी। अहं करोमि। हम करैत छी। भवान् करोति। अहाँ करैत छी। अवश्यं करोतु। अवश्य करू। अद्यारभ्य प्रतिदिनं योगाभ्यासं करोतु। आइसँ शुरू कए सभदिन योगाभ्यास करू। अद्यारभ्य मास्तु। आइसँ नहि। श्वःआरभ्य योगासनं करोतु। काल्हिसँ शुरू कए योगासन करू। अद्यारभ्य भवन्तः किं किं कुर्वन्ति। आइसँ आरम्भ कए अहाँ सभ की की करब। अहम् अद्यारभ्य अधिकं न क्रीडामि। हम आइसँ बेशी नहि खेलाएब। अहम् अद्यारभ्य आलस्यं त्यजामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब। अहम् अद्यारभ्य सत्यं वदामि। हम आइसँ आलस्य त्यागि देब। अहम् अद्यारभ्य योगासनं करोमि। हम आइसँ योगासन करब। परश्वः आरभ्य। प्रसूसँ आरम्भ कए। अहम् अर्जुनस्यकृते चमषं ददामि। हम अर्जुनकलेल चम्मच दैत छी। अहं यतीन्द्रस्य कृते सुधाखण्डं ददामि। हम अर्जुनक लेल चॉक दैत छी। अहं जयन्तस्य कृते कारयानं ददामि। हम जयन्तक लेल कार दैत छी। अहं विदिशायाः कृते दूरवाणीं ददामि। हम विदिशाक लेल टेलीफोन दैत छी। अहं पत्रिकां ददामि। हम पत्रिका दैत छी। भवन्तः मम कृते किं किं यच्छन्ति। अहाँसभ हमरा लेल की की दए रहल छी। अहं शिक्षिकायाः कृते चमषं ददामि। हम शिक्षिका लेल चम्मच दैत छी। अहं भवत्याः कृते पत्रिकां ददामि। हम अहाँक लेल पत्रिका दैत छी। जयन्त-जयन्तस्य कृते। जयन्त-जयन्तक लेल। विदिशा-विदिशायाः कृते। विदिशा-विदिशाक देल। लता गोपालस्य कृते मधुरं ददाति। लता गोपालक लेल मधुर दैत अछि। लता शिक्षकस्य कृते पुस्तकं ददाति। लता शिक्षकक लेल पुस्तक दैत अछि। लता पुष्पायाः कृते सूचनां ददाति। लता पुष्पाक लेल सूचना दैत अछि। लता भगिन्याः कृते धनं ददाति। लता बहिनक लेल धन दैत अछि। लता श्रीमत्याः कृते उपायनं ददाति। लता श्रीमतिक लेल पहिरना दैत अछि। लता मित्रस्य कृते संदेशं ददाति। लता मित्रक लेल संदेश दैत अछि। माता पुत्रस्य कृते किं किं ददाति? माता पुत्रक लेल की की दैत छथि? कस्य कृते किं किं यच्छन्ति? ककरा लेल की की दैत छथि? अहं यथा करोमि भवान् तथा करोतु। हम जेना करैत छी अहाँ तेना करू। अहं लिखामि। हम लिखैत छी। विदिशे आगच्छतु। विदिशा आऊ। अहं यथा लिखामि तथा लिखति वा। हम जेना लिखैत छी तेना लिखब की। आम्। हँ। लिखतु। लिखू। अहं यथा लिखामि तथा विदिशा लिखति। हम जेना लिखैत छी तेना विदिशा लिखैत छथि। चैत्रा उत्तिष्ठतु। चैत्रा उठू। अहं यथा वदामि तथा भवती करोति वा। हम जेना बजैत छी अहाँ तेना करब की? क्षीरः हस्पृश्यतु। कण्डुयनं करोतु। खीरकेँ हाथसँ डोलाऊ। उपनेत्रं सम्यक करोतु। चश्मा ठीक करू। कर्णं स्पृश्यतु। कान स्पर्श करू। कालिदासः यथा काव्यं लिखति तथा कोपि न लिखति। कालिदास जेना काव्य लिखैत छथि तेना क्यो नहि लिखैत छथि। यथा चित्रकारः चित्रं लिखति तथा कः लिखति। जेहन चित्रकार चित्र बनबैत छथि तेहन के बनबैत छथि। यथा चित्रा अभिनयं करोति तथा यतीन्द्रः न करोति। जेहन अभिनय चित्रा करैत छथि तेहन यतीन्द्र नहि करैत छथि। अहं वाक्यद्वयं वदामि। भवन्तः यथा तथा योजयन्ति। रमा गीतं गायति। गीता अपि गायति। रमा गीत गबैत छथि। गीता सेहो गबैत छथि। यथा रमा गीतं गायति तथा गीता अपि गायति। जेना रमा गीत गबैत छथि तेना गीता सेहो गबैत छथि। भीमः खादति। कृष्णः न खादति। यथा भीमः खादति तथा कृष्णः न खादति। जेना भीम खाइत छथि तेना कृष्ण नहि खाइत छथि। सुरेशः चित्रं लिखति। रमेशः अपि चित्रं लिखति। सुरेश चित्र बनबैत छथि। रमेश सेहो चित्र बनबैत छथि। यथा सुरेशः चित्रं लिखति तथा रमेशः अपि चित्रं लिखति। जेना सुरेश चित्र लिखैत छथि तेना रमेश सेहो चित्र लिखैत छथि। नर्तकी नृत्यं करोति। भवती नृत्यं करोति। नर्तकी नृत्य करैत छथि। अहाँ नृत्य करैत छी। यथा नर्तकी नृत्यं करोति तथा भवती नृत्यं करोति। जेहन नर्तकी नृत्य करैत छथि तेहन अहाँ नृत्य करैत छी। कथा रामपुरे सुब्रह्मण्यं शास्त्री इति कश्चन् गृहस्थः आसीत्। तस्य पत्नी शान्ता। तद्द्वौयो अपि सर्वदा अपि कलहः कुरुतः स्म। एतेन् पार्श्वगृहस्याः सर्वे बहुकष्टः अनुभवन्ति स्म। एकदा तम् ग्रामं कश्चन् योगीश्वरः आगतवान्। सः सिद्धिम् प्राप्तवान् इति वार्त्ता सर्वत्र प्रश्रुता। तदा शान्ता तत्र गत्वा योगीश्वरं दृष्टवती। सा वदति- भोः महात्मन्। अस्माकं गृहे सर्वदा कोलाहलः भवति। एतेन् अहं बहुकष्टम् अनुभवामि। पार्श्वे सर्वे जनाः माम् उपहसन्ति। अतः एतस्य निवारणं कृपया वदतु। तदा योगीश्वरः नेत्रे निमील्य किंचित् कालम् उपविष्टवान्। अनन्तरम् उक्तवान्- भद्रे चिन्तां न करोतु। एतस्य परिहारम् अहं वदामि। अहं भवत्यै दिव्यं जलं ददामि। भवती गृहं गत्वा एतद् जलं पत्युः आगमनात् पूर्वं मुखे स्थापयित्वा उपविशतु। अनन्तरं योगीश्वरः जलं दत्तवान्। शान्ता गृहं गतवती। पत्युः आगमनात् पूर्वं जलं मुखे स्थापयित्वा उपविष्टवती। सायंकाले सुब्रमन्यः सर्वाणि कार्याणि समाप्य गृहम् आगतवान्। यदा गृहम् आगतवान् तदा शान्ता तस्मै पानीयं दत्तवती। पानीयं पीत्वा सः कोपेन् उक्तवान्- एतद् किं पानीयम्- एतद् पातुम् एव न शक्यते। अनन्तरं सः बहिः गतवान्- उपविष्टवान्। यद्यपि शान्तायाः कोपः आगतः तथापि सा मौनम् उपविष्टवती- यतः तस्याः मुखे योगीश्वरेण दत्तं दिव्यं जलम् आसीत्। एवमेव कानिचन् दिनानि अतीतानि। तेषां गृहे कोलाहलः एव न श्रुयति स्म। एतेन् पार्श्व गृहस्याः सर्वे संतोषम् अनुभवन्ति स्म। एक मासानन्तरं योगश्वरं दत्तं जलं समाप्तम्। अनन्तरं शान्ता योगीश्वरस्य समीपं गतवती- उक्तवती- भोः स्वामी। जलं सर्वं समाप्तम् अस्ति। अतः पुनः दिव्यं जलं ददातु। तदा योगीश्वरः मन्दहासपूर्वकम् उक्तवान्- मया दत्तं जलं सामान्यं जलम् एव। भवती यदा जलं पूरयित्वा उपविशति स्म तदा किमपि वक्तुम न शक्नोति स्म। एतेन भवत्याः पतिः अपि किमपि वक्तुं न शक्नोति स्म। यथा एकेन् हस्तेन् करतारणं न भवति तथा एकेन् अपि कलहं न कर्तुं शक्यते। तथा एव अहं श्रेष्टः, अहं श्रेयाम् इत्यपि स्पर्धा अपि न भवति। एतेन् गृहे शान्तिः भवति। योगीश्वरस्य एतद् वचनं श्रुत्वा संतुष्टा शान्ता गृहं प्रत्यागतवती। (अनुवर्तते) मिथिला कला(आँगा) चित्रकार- तूलिका, ग्राम-रुद्रपुर, भाया-आन्ध्रा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी। एक बेर कुबेर कोनहुना लक्ष्मीकेँ पत्नीक रूपमे प्राप्त कए लेलन्हि आऽ हुनका लेल समुद्रमे एकटा’कोवर’ घर बनेने रहथि। कोबर चित्रमे पुरैनक पात, पुष्पित बांस, मत्स्य,सांप, काछु, नवग्रह, शंख आदिक प्रयोग होइत अछि। धारावाहिक रूपें विभिन्न प्रकारक कोबरक चित्र देल जायत। एहि अंकमे कोबर (पुरैन) देल जाऽ रहल अछि। अनुवर्तते) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि। संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि। आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि। मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि। पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि। शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि। शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि। शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि। अनुश्रुतिक अनुसार शिव मिथिलांचलक सर्वलोकप्रिय देवता छथि। गामे-गाम शिवक पूजन होइत अछि। ओ प्रागेतिहासिक, पौराणिक ओ लोकदेवता छथि। शास्त्र, पुराण, तंत्र, योग आदि ग्रंथसभमे हिनक माहात्म्य ओ दर्शन पाओल जाइछ। शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिलिंगसभक विशाल भारतक धार्मिक एकताकेँ रेखांकित करैत अछि, तहिना काशी ओ मिथिलाक परिकल्पित परिक्रमाक अवधारणा आलोच्य शिवक्षेत्रकेँ महिमामंडन करैत अछि। शिवक पश्चात् विष्णुपूजनक प्रधानता मिथिलांचलमे अछि। तद्विषयक पुरातात्विक प्रमाणस्वरूप स्थापत्य (मंदिर) ओ मूर्तिसभ एहि विशाल भूभागमे उपलभ्य अछि। एहिठामक जनजीवनमे वैष्णवधर्मिताक साक्षात् दर्शन पंचदेवोपासनामे विष्णुपूजन भस्मी त्रिपुण्डक संगे चन्दन तिलक, रामनवमी, विवाह-पंचमी, जन्माष्टमी, सत्यनारायणपूजा आदि वैष्णवधर्मी अनुष्ठान, चतुःशंख अरिपन, अष्टदल अरिपनक विन्यास, वैष्णवधर्मी कीर्तनिया नाच आदिमे होइत अछि। गुप्तकालमे वैष्णव धर्मकेँ राजकीय संरक्षण प्राप्त भेने ओ अपन उत्कर्षपर छल। तत्युगीन वैष्णवधर्मी पुराणसभमे हिनक महिमा मंडन भेल अछि। विष्णु द्विभुजीसँ चतुर्भुजी भेलाह। समुद्रमंथनसँ प्राप्त लक्ष्मीकेँ हुनक सेवामे लगाओल गेलनि। लक्ष्मीनारायणक परिकल्पना कयल गेल। शेषशायी विष्णुक परिकल्पनाकेँ प्रस्तर शिल्पमे उत्कीर्ण कयल गेल। दशावतारक महिमा मंडनक क्रममे वराह अवतार ओ नरसिंह अवतारक मूर्तिसभ अपेक्षाकृत बेसी पाओल जाइछ। गुप्त राजा लोकनि वराह अवतारक माध्यमे पृथ्वी (साम्राज्य) उद्धारक रूपेँ प्रतीकित कयलनि। मिथिलांचलमे वराह अवतारक एकटा मध्यकालीन सुन्दर प्रस्तर मूर्ति तिलकेश्वरगढ़ (दरभंगा)सँ प्राप्त भेल अछि, जे सम्प्रति चन्द्रधारी राजकीय संग्रहालय (दरभंगा)मे संरक्षित अछि। तहिना नरसिंह अवतारक अभिशिल्पन दुष्टदलनक संदर्भमे कयल गेल, मुदा मिथिलांचलसँ एहि तरहक मूर्ति अप्राप्त अछि। मिथिलांचलमे गुप्त शासनकालसँ पाल-सेन ओ कर्णाट काल धरि वैष्णवधर्मी मूर्ति सभक निर्माण ओ प्रतिष्ठा व्यापक रूपेँ कयल गेल। पालवंशी राजा लोकनिक शासनकालमे यद्यपि सर्वधर्म समभावक (बौद्धमूर्ति अभिशिल्पनक कारणे) प्रधानता छल, मुदा सेन ओ कर्णाट शासन कालमे वैष्णव धर्मकेँ धार्मिक नवजागरणक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। जयदेव, चैतन्य, विद्यापति, चण्डीदास, शंकरदेव आदि एहि सांस्कृतिक युगक साक्षात् वैष्णवधर्मी चेतना पुरुष छलाह, जनिका माध्यमे जनजीवन धरि आन्दोलित भेल। विष्णुक उल्लेख वेदमे पाओल जाइछ। मुदा पहिने ओ सूर्यक एकटा रूप छलाह। पाछाँ चलि कए एकटा प्रमुख देवता बनि गेलाह। बसाढ़ (वैशाली)क पुरातात्विक उत्खननसँ प्राप्त एकटा माटिक मोहरपर उत्कीर्ण त्रिशूलक अगल-बगलमे शंख ओ चक्र उत्कीर्ण अछि, ई निसंदेह विष्णु प्रतीक थिक। सम्भवतः ओ शिव ओ विष्णुक साहचर्यक सद्भाव प्रतीक अछि। एकटा दोसर मोहरपर उत्कीर्ण वेदीपर राखल चक्रक दुनूदिस शंख उत्कीर्ण अछि, जे निसंदेह वैष्णवधर्मी प्रतीक अछि। ई सभ गुप्तकालीन पुरावशेष अछि। विष्णुक मूर्ति विभिन्न आकार-प्रकारमे बनल मिथिलांचलमे प्राप्त होइछ।, जाहिमे द्विभुजी विष्णुक एक हाथमे शंख ओ दोसर वर मुद्रामे अछि। एहि रूपमे लोकपाल कहल जाइछ। एहितरहक एकटा विशाल विष्णुमूर्ति तिरहुतक कर्णाटकालीन राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ)मे प्राप्त अछि। सिमरौनागढ़मे विष्णुक बहुतरास आदमकद चतुर्भुजी प्रतिमा सभ कंकाली मन्दिरक परिसरमे राखल अछि। विष्णुक माथपर किरीट ओ हाथसभमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्म छाजीत छनि। मिथिलांचलमे चतुर्भुजी विष्णुक पाल, सेन ओ कर्णाटकालीन पाठरक मूर्तिसभ हुलासपट्टी, भीठभगवानपुर, अन्धरा ठाढ़ी, बिदेश्वर, भवानीपुर, जितवारपुर, जयनगर, नरार, अकौर, हावी भौआर, हावीडीह, पोखराम, लदहो, रखवारी, कनहई, कोर्थ, सोनहद, वोरवा, तुमौल, नेहरा, कुर्सो नदियामी, मदरीया, केवटी, भैरव बलिया, बसुदेवा, हाजीपुर, सोनपुर, सेहान आदिक अतिरिक्त सांस्कृतिक मिथिलांचलक सीमान्त क्षेत्र वाल्मीकिनगर (नेपाल तराइ) मे बहुतरास आदमकद विष्णु मूर्ति सभ प्राप्त भेल अछि। संख्यात्मक ओ गुणात्मक दृष्टिसँ विष्णुक सर्वाधिक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभ मिथिलांचलक अकौर नेपाल तराइक समरौनागढ़ ओ वाल्मीकिनगरमे प्राप्त अछि, जाहिसँ ई निष्कर्ष निकालल जा सकैछ जे ओ सभ वैष्णवधर्मक क्षेत्रमे प्रमुख स्थल छल। अकौर गाममे विष्णुक छहटा प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभ सहजेँ उत्खनित भए प्राप्त भेल अछि। डॉ. सत्येन्द्र कुमार झा डुमरा परसा (मधुबनी)क एकटा विलक्षण विष्णु मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। चारि फीटक एहि मूर्तिक माथपर किरीटक स्थानपर नागफण (सत्ताइस)क अलंकरण कयल गेल अछि, जे शेषनागक प्रतीक अछि। एहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि। सभटा प्रतिमामे विष्णु स्थानक मुद्रामे बनल छथि ओ हुनक पार्श्ववाहिनी रूपेँ चँवरधारिणी लक्ष्मी ओ वीणाधारिणी सरस्वती उत्कीर्ण छथि। पूर्व मध्यकालमे वैष्णव धर्म एहि क्षेत्रक एकटा लोकप्रिय सम्प्रदाय छल। विष्णुक एहि परम्परित स्वरूपक क्रममे किछु ऐतिहासिक विशिष्ट मूर्ति शिल्प प्राप्त भेल अछि। पहिल वसुदेवा (सिंगिया, समस्तीपुर)सँ प्राप्त विष्णुक वासुदेव रूप। चतुर्भुजी वासुदेवक हाथसभमे अग्निपुराण (अध्याय चौवालिस)क अनुसार उपरक हाथसभमे शंख-चक्र ओ निचलकामे गदा-कमल बनल अछि। माथपर किरीट ओ गलामे ठेहुन धरि वनमालाक अलंकरण। मुख्य मूर्तिक पार्श्व भागमे अनेक देवी-देवता सभ उत्कीर्ण छथि। दोसर अछि अवाम (उजान लग, दरभंगा)क शेषशायी विष्णु (४७” * २६”)। एहिमे शेषशय्यापर विश्राम करैत विष्णुक पैर दाबि रहल छथिन लक्ष्मी। नाभिसँ निकलल नाल कमलपर बैसल छथि ब्रह्मा। तेसर प्रतिमा अछि तिलकेश्वर ( दरभंगा)सँ प्राप्त वराह विष्णु (३४”)। वीर भावमे ठाढ़ एहि चतुर्भुजी मूर्तिक चारूहाथमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्मक अतिरिक्त वाम स्कंधपर पृथ्वी बैसल छथि, जनिक उद्धार विष्णु वराह अवतारक रूपेँ कयलनि। वराहविष्णुक पादभागमे नागदेवी सभ हाथमे क्षत्र ओ कमल धयने छथि। वराह अवतारक एकमात्र स्वतंत्र प्रतिमा एकटा दुर्लभ ओ ऐतिहासिक उपलब्धि मानल जाइछ। तिलकेश्वर महादेव मन्दिरक द्वारखण्डपर कर्मादित्यक शिलालेख तिरहुतामे उत्कीर्ण अछि। संगमपर स्थापित एहि महादेवस्थानमे शिवरात्रिक मेला लगैत अछि। चारिम विष्णु-मूर्तिक एकटा ऐतिहासिक स्वरूप सेहान (वैशाली)सँ प्राप्त अछि, जे मध्यकालीन तिरहुत शैलीमे निर्मित मंदिरमे स्थापित ओ पूजित अछि। सेहानक विष्णु श्रीरामक रूपमे पूजित छथि। रामनवमीक अवसरपर एकटा विशाल मेला लगैत अछि। मूर्ति पालकालीन अछि। जनश्रुतिक अनुसार नरसिंह अवतारक एकटा स्थान पूर्णियाँ जिलाक मानिकथंभ (माणिक स्तंभ) नामक ग्राममे प्राप्त अछि, मुदा मूर्ति नहि अछि। मुदा कटिहार जिलाक वेलंदाक प्राचीन विष्णु मंदिर अपन जर्जर अवस्थामे प्राप्त अछि। एहि तरहेँ वैष्णव धर्मक व्याप्ति वाल्मीकि नगरीसँ लऽ कऽ कटिहार धरि देखना जाइछ। एहि क्रमे पाँचम उपलब्धि सोनपुर (सारण)क कालीमन्दिरक भीतमे अवस्थित एकटा मूर्ति फलक गरुड़वाही विष्णुक अछि, जाहिमे भगवान विष्णु गरुड़पर आरुढ़ भए हरिहरक्षेत्रक गजग्राह युद्धक समापनक लेल गजक आर्तपुकारपर आयल छलाह। सोनपुर हरि (विष्णु) हर (शिव)क नामित क्षेत्र मानल जाइछ। एवं प्रकारे मिथिलांचलमे विष्णुपूजन अनेक रूपमे उपलब्ध अछि। सूर्य वैदिक देवता ओ विष्णुक एकटा प्रतिरूप जकाँ पूजित छथि, मुदा ओ पंचदेवोपासनामे विशेष रूपमे प्रतिष्ठित छथि। मिथिलांचलमे सूर्यक वैदिक, पौराणिक ओ लौकिक तीनोक समन्वित रूप जनमानसपर अंकित अछि। सूर्यक स्थानक रूपक परिकल्पना मुख्यतः कुषाणकालमे मूर्त भेल। तदनुसार रथारूढ़ सूर्यक माथपर किरीट, दुनू हाथमे कमल-पुष्प, वाम भागक कमरसँ लटकैत तलवार हुनक मुख्य रूप छनि। कालान्तरमे पार्श्वदेवी देवताक अलंकरण सेहो विन्यस्त छल। पार्श्व देवताक रूपमे एक दिस दवात लेने पिंगल ओ दोसर दिस दण्ड लेने दण्डी। पैरमे लम्बा बूट ओ देह रक्षार्थ कवच, पैरक आगाँ बैसल रथवाहक अरुण। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्यूषा उत्कीर्ण अछि। मिथिलंचलमे अनेक मध्यकालीन सूर्य मूर्ति सभ बरौनी जयमंगलगढ़ (बेगुसराय) भीठ भगवानपुर (मधुबनी), अन्धरा-ठाढ़ी (कमलादित्य, मधुबनी), देकुली, असगाँव-धर्मपुर (दरभंगा), कुर्सो नदियामी, रखबारी, परसा, भोज परौल, रतनपुर, विष्णु बरुआर, गाण्डीवेश्वर स्थान, सवास, छर्रापट्टी, अरई, कोर्थ, हावीडीह, डिलाही, नाहर भगवतीपुर, राजनगर, पस्टन, पटला, जगदीशपुर, देवपुरा आदिक अलावा चकवेदौलिया (बेगुसराय), तैयबपुर (वैशाली) आदि स्थान सभमे पाओल गेल एवं ओ प्रतिष्ठित-पूजित छथि। एहि ऐतिहासिक सूर्य प्रतिमा सभमे विशेष उल्लेखनीय अछि- परसा (झंझारपुर, मधुबनी)क सूर्य मूर्ति (४८*२४ सेमी.) जे प्रायः तेरहम सदीक कलाकृति अछि। ओ पालकालीन अलंकरणसँ बनल अछि। दोसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति विष्णु बरुआर (मधुबनी)क अछि, जकरा द्वादश आदित्यक संज्ञा देल जाइछ। एहि मूर्तिमे द्वादश आदित्य उत्कीर्ण छथि। तेसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति अछि, देवपुरा (बेनीपट्टी, मधुबनी) ओ रघेपुरा (दरभंगा)क जाहिमे देवपुराक मूर्तिमे उषा-प्रत्यूषा, दण्ड-पिंगलसँ अलंकृत तथा रघेपुराक सूर्यमूर्ति पालमूर्ति कलासँ भिन्न मिथिला शैलीमे निर्मित अछि। ई सभटा सूर्यमूर्ति पंच्देवोपासनाक एकटा प्रतीक रूपमे पोजित छथि, यद्यपि जनजीवनमे सूर्य पूजा छठीमइयाक रूपमे परम्परीत अछि। मिथिलांचलक चक वेदौलिया (बेगुसराय)मे एकटा प्राचीन सूर्यमन्दिरक प्राप्तिसँ ई धारणा बनैत अछि, जे ओ स्वतंत्र रूपेँ सेहो पूजित होइत छलाह। कन्दाहा सहरसा)मे सेहो एकटा स्वतंत्र ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर अवशिष्ट अछि। सूर्य मूर्तिक प्रभावलीमे उत्कीर्ण अभिलेख स्वयं अपन ऐतिहासिक अस्तित्वक चर्च करैत अछि। अभिलेख नरसिंहदेवक अछि। ओऽ ओइनवार वंशीय छलाह। पंचदेवोपासनाक मूलमे भगवती केन्द्रित छथि आर मिथिलांचल शाक्तभूमि अथवा शाक्तपीठक रूपमे साधनाभूमि शताब्दियहुसँ बनल अछि। मिथिलांचलमे भगवती अपन अनेक रूपमे मूर्त भए पूजित छथि। वनगाँव-महिषीक उग्रतारा, विराटपुरक चण्डी, धमदाहाक कात्यानी (सहरसा जिलान्तर्गत) क अतिरिक्त उच्चैठ, फुलहर (मधुबनी), करियन समस्तीपुरक गिरीजा, मिरजापुर-दरभंगाक म्लेच्छमर्दिनी, कोइलखक भद्रकाली भगवती, वारी(समस्तीपुर)क भगवती तारा, अन्दामा (दरभंगा)क म्लेच्छमर्दिनी, जरैल-परसौन, कोइलख, भवानीपुर, भण्डारिसम (दरभंगा), भोजपरौल (मधुबनी), कोर्थ (दरभंगा)क काली, देकुली (दरभंगा)क भगवती, बहेड़ी ओ नाहरक महिषासुर मर्दिनी, कटरा (मुजफ्फरपुर) ओ कोइलख (महुबनी)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ) ओ वीरपुर (सहरसा)क कंकाली, सखड़ाक (नेपाल तराइ) छिन्नमस्ता एवं गढ़बरुआरी (सहरसा) ओ भीठभगवानपुर (मधुबनी)क दशमहाविद्यामे परिगणित देवी सभ प्रतिष्ठित ओ पूजित छथि। हम पुनामा-प्रतापनगर (नवगछिया)मे वाराहीक एकटा भव्य, विशाल ओ स्वतंत्र मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। भीठ-भगवानपुर ओ गढ़ बरुआरीक दशमहाविद्या कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भीठ-भगवानपुर कर्णाटराजा मल्लदेवक राजधानीनगर छल एवं गढ़वरुआरी कर्णाटवंशीय गन्धवरिया परमार राजपूत सभक क्षेत्र अछि। डॉ. हीरानन्द आचार्य राजनगर (मधुबनी)मे सेहो दशमहाविद्या भगवतीक मन्दिरक सूचना देने छथि। दशमहाविद्याक पूजोपासना तांत्रिक विधियेँ कयल जाइछ। जयनगरक मन्दिरक ऊपरी भागमे श्रीयन्त्र राखल छल। ध्यातव्य अछि जे खण्डवला कुलक राजा लोकनि शाक्तधर्मी छलाह। दरभंगा राज परिसरक श्यामा मन्दिर “मिथिलेश रमेशस्य चितायां सुप्रतिष्ठा’ चर्चिता साधना पीठ बनल अछि। मिथिलांचलक शाक्त साधनाक्षेत्रमे पूजित एवं प्रतिष्ठित अन्यान्य देवी सभमे गंगा-यमुनाक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्तिसभ सेहो उपलभ्य अछि। ओना तँ गंगा-यमुनाक मूर्ति प्रायः राजकीय स्थापत्यमे निर्मित होयबाक परम्परा रहल अछि, अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थानमे राखल भग्न लक्ष्मीनारायणक अभिलिखित कर्णाट कालीन प्रस्तर मोर्तिक पार्श्वमे गंगा ओ यमुनाक उत्कीर्ण मूर्ति अवशिष्ट अछि। अभिलेखमे कर्णाट वंशक संस्थापक जेना राजा नान्यदेवक प्रशस्ति श्रीधर लिखने छथि। ठाढ़ीक प्रसिद्धि परमेश्वरी भगवतीक लेल सेहो अछि। गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र प्रस्तर मूर्ति नगर डीह (दरभंगा) ओ बरसाम (मधुबनी)मे प्राप्य अछि। गंगा मकरवाहिनी ओ यमुना कच्छप वाहिनी रूपेँ निर्मित छथि। वाम हाथमे कलश छनि एवं नाना आभूषणसँ अलंकृत अछि। शाक्त भूमि मिथिलांचलसँ भगवतीक प्रस्तर मूर्तिसभ उच्चैठ (मधुबनी), भोज परौल (मधुबनी), भंडारिसम (दरभंगा) ओ वारी (समस्तीपुर)सँ प्राप्त भेल अछि। उच्चैठक भगवतीक एकान्त साधक कालिदास छलाह। मूर्ति (३३”) चतुर्भुजी अछि। वाम हाथ सभमे त्रिशूल ओ अमृतकलश एवं दहिन हाथमे दर्पण (कमल पुष्पाकार) ओ लघुपात्र अछि। सिर, गला, कान, बाँहि, कलाइ, कमर ओ पैर आदि आभूषण सभसँ अलंकृत अछि। देहमे यज्ञोपवीत ओ वाहनक रूपमे सिंह उत्कीर्ण अछि। भगवती कमलासनपर आसीन छथि। भोज परौलक भगवतीमूर्ति (३५”) उच्चैठक भगवतीक समतुल्य अछि। भगवतीक तेसर प्रस्तर मूर्ति भंडारिसम (दरभंगा)क मन्दिरमे प्रतिष्ठित अछि। एहि चतुर्भुजी मूर्तिक (४८”) दहिन हाथमे खड्ग अछि। भगवती कमलपुष्पपर ललितासनमे बैसल छथि। पादपीठमे सिंह उत्कीर्ण अछि। आर सभटा विन्यास पूर्वत अछि। हिनका भगवती वाणेश्वरी सेहो कहल जाइछ। चारिम मूर्ति वारीर (समस्तीपुर)मे स्थापित ओ पूजित अछि। मुदा भगवती षटभुजी छथि (३४”)। वाम हाथमे ढाल, छतरी ओ अज्ञात पदार्थ एवं दहिन हाथसभमे अक्षमाला, खड्ग ओ अभय मुद्रामे अछि। शेष विन्यास पूर्ववत अछि। पंचम षटभुजी मूर्ति देकुली (दरभंगा)मे स्थापित अछि। एहि भगवती सभमे उच्चैठक भगवतीक स्थान सर्वोपरि अछि। भगवतीक सौम्य रूप गिरीजाक मूर्तिसभ फुलहर (गिरीजास्थान, मधुबनी, ३७”), मिर्जापुर (दरभंगा, ३२”) ओ कुर्सो नदियामी (दरभंगा)क मन्दिरसभमे संपूजित अछि। पुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक पार्श्वमे गणेश एवं कार्तिकेय उत्कीर्ण अछि। दुनू चतुर्भुजी एवं स्थानक मुद्रामे निर्मित अछि। सत्यार्थीक अवलोकनक अनुसार आलोच्य मोतिमे गिरीजा, राधा ओ लक्ष्मी समन्वित छथि। गिरीजाक मुरलीक अंकन विशिष्ट अछि। हिनक ख्याति म्लेच्छमर्दनीक रूपमे विशेष अछि। भगवतीक महिषासुर मर्दनीक रूप सर्वाधिक लोकप्रिय अछि। मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे महिषासुरमर्सिनी वनाम म्लेच्छमर्दिनीक परिकल्पित शिल्पांकन बेस उपयुक्त छल। मध्यकाल संघर्षक काल छल। एहि परिस्थितिमे महिषासुर मर्दिनी उत्प्रेरक भेलीह। एहि तरहक मूर्तिसभ बरसाम, कुर्सोनदियामी, नाहर, अन्दामा, वैद्यनाथपुर, उजान, बुढेव, पोखराम, नेहरा, हावीडीह, बहेड़ी, सिमरिया भिण्डी, जरैल-परसौन, चौगाम, लावापुर आदि स्थानसभसँ प्राप्त भेल अछि। नवरात्रक अवसरपर प्रायः गामसभमे महिषासुर मर्दिनी दुर्गाक लोकपरिकल्पित मूर्तिसभ प्रतिवर्ष बनैत अछि, पूजित होइत छथि एवं विसर्जित होइत अछि। मूर्तिक परिकल्पना “दानवत्वपर देवत्वक विजय” केन्द्रित अछि। भगवतीक अन्यान्य रूप सभमे नागदेवी मनसा (भैरव स्थान, मुजफ्फरपुर), विषहरी (नाथनगर, भागलपुर), वशिष्टाराधिता तारा (महिषी, सहरसा), सरस्वती (जयनगर, मधुबनी), काली (कोर्थ, दरभंगा), गजलक्ष्मी (भीठभगवानपुर, मधुबनी), तारा (बौद्धदेवी, वारी,समस्तीपुर) जगतपुर वरुआरी (सहरसा), जयमंगला (बेगूसराय), सहोदरा(नरकटयागंज, प. चम्पारण), पार्वती (करियन, समस्तीपुर), भरवारी, समस्तीपुर आदिक प्राचीन ओ ऐतिहासिक पाथरक मूर्तिसभ मिथिलांचलसँ प्राप्त भेल एवं ओऽ सभ पूजित अछि। मिथिलाक मध्यकालीन सांस्कृतिक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे पंचदेवोपासनाक परिकल्पना विभिन्न साम्प्रदायिक सद्भावक अनुक्रममे कयल गेल छल, ओ बहुत किछु सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरातलपर फलीभूत भेल। बहुतरास मन्दिरसभ एकर उदाहरण बनल अछि। मधुश्रावणी-गजेन्द्र ठाकुर श्रावण मास कृष्ण-पक्षक पञ्चमीसँ शुक्लपक्ष तृतिया धरि नाग आऽ गौरीशंकरक अभ्यर्थना कएल जाइत अछि। मौना पञ्चमी-श्रावन मास कृष्णपक्ष पञ्चमीकेँ साँपक माए बिसहराक बर्थडे मनाओल जाइत अछि। नवविवाहिताक प्रथम वर्षक मधुश्रावणीक ई प्रथम दिन थिक । धुरखुरपर गोबरक नाग-नागिनपर सिन्दूर-पिठार लगाओल जाइत अछि आऽ पञ्चमीक माटिक थुम्हा घरमे साँप कटला उत्तर झाड़ा-फूकी लए राखि देल जाइत अछि। गोसाउनिकेँ खीर-घोरजाउड़क पातरि आऽ बिसहराकेँ नेबो,झौआ,नीमक पातरि देल जाइत अछि। गोसाउनिक, गौरीक आऽ बिसहराक गीत होइत अछि, पूजा-पाठक बाद पाँच बीनी (फकड़ा-कवित्त) तीन-तीन बेर सुनलाक बाद कथा सुनल जाइत अछि, ई सभदिन कथाक बाद दोहराओल सेहो जाइत अछि। प्रथम दिनक कथा- एकटा बूढ़ीकेँ धारमे नहाए काल पुरैनी पात पर पाँचटा जीव देखाइ पड़ैत छन्हि आऽ ओऽ हुनका मौना-पञ्चमीक मोन पाड़ि गाममे लोकसभकेँ पूजा करबाक लेल कहैत छन्हि। किछु गोटे गप मानैत छथि, मुदा किछु गोटे ओकरा फूसि-फटक मानैत छथि। जे सभ पूजा नञि कएलन्हि से रातियेमे मरि गेलाह। सभ दौड़ि कए पाँचो बहिन बिसहरा लग जाइ गेलाह, आऽ हुनका कहलासँ बचल खीर-घोड़जाउड़ मृतकेँ चटा देलन्हि, ओऽ सभ जीबि गेलाह आऽ मरड़ए नाम पड़लन्हि। पाँचो बिसहरा महादेव सन्तान छलीह। साँपक पोआकेँ देखि एकदिन तमसा कए गौरी हिनकासभकेँ थकुचि देलखिन्ह। साँझमे साँझक आऽ कोबरक गीत होइत अछि। दोसर दिनक-कथा मनसा महादेवक पुत्री छलीह जे जनमितहि युवती भए गेलीह आऽ लाजक रक्षाक हेतु साँप हुनका देहमे लपटाए गेल। गौरी तमसा गेलीह से हुनका कैलास छोड़ि जाए पड़लन्हि आऽ मृत्युलोकमे सभसँ पैघ व्यापारी चन्नू-चन्द्रधर हुनकर पूजा करन्हि से ओऽ इच्छा कएलन्हि, मुदा ओऽ छल महादेवक भक्त से ओऽ वाम हाथे पूजा करबाक गप कहलन्हि। ओकर छओ बेटाकेँ साँप डसि लेलक, मरि जाइ गेल। बुढारीमे चन्नूकेँ बेटा भेलन्हि मुदा ज्योतिषि कहलकन्हि जे हुनका विवाहक दिन कोबरघरमे साँप डसि लेतन्हि। ओहि बच्चाक नाम लक्ष्मीधर-बाला-लखन्दर राखल गेल, छहे-मासमे ओकर विवाह चिर-सोहागनि योगक कान्याँसँ होएब निश्चित भेल। पहाड़पर कोठामे बिज्जी आऽ बिढ़नीक पहराक बीच कान्याँ बिहुलासँ विवाह भेल। मुदा कोहबरमे साँप आयल आऽ हुनका डसि लेलक। बिहुला पतिकसंग केराक थम्हपर गंगाधारमे चलि पड़लीह आऽ प्रयाग पहुँचि गेलीह। ओतए एकटा धोबिनकेँ ओकर बच्चा तंग कए रहल छल, ओऽ ओकरा मारि नुआसँ झाँपि देलन्हि आऽ कपड़ा खीचलाक बाद ओकरा जिआ देलन्हि। दोसर दिन जखन ओऽ अएलीह तखन बिहुला हुनकासँ अपन व्यथा सुनओलन्हि। फेर हुनका संग इन्द्रक दरबार गेलीह आऽ बिसहराक पैर पकड़ि कहलन्हि जे यदि हुनकर पति आऽ छबो भैंसुर जीबि जएताह तखन ओऽ बिसहरा पूजा करबो करतीह आऽ मृत्युलोकमे ओकर प्रचार सेहो करतीह। सभ जीबि गेल आऽ बिसहराक पूजा शुरू भेल। बिसहरा कथा-कश्यप मुनिकेँ कद्रूसँ एक हजार साँप भेल आऽ कशप मुनि विष झारबाक मन्त्र बनओलन्हि, तपस्या कए मनसँ बिसहरा बनओलन्हि से भेलीह मनसा। ओऽ कैलास आऽ पुष्कर गेलीह फेर बूढ़ तपस्वीसँ हुनकर विवाह भेलन्हि, ताहिसँ आस्तीक नामक पुत्र भेलन्हि। राजा जनमेजयक सर्प-यज्ञमे जड़ल सर्पसभके आस्तीक बचा लेलन्हि। आषाढ़क संक्रान्तिसँ नाग-पंचमी धरि बिसहराक पूजा पसीझक डारिपर होइत अछि। मंगला-गौरी कथा- श्रुतकीर्ति राजाकेँ बेटा नहि छलन्हि, भगवतीक उपासना कएल। भगवती कहलन्हि जे सर्वगुणी बेटा १६ वर्ष आयुक होएत आऽ महामूर्ख बेटा दीर्घायु होएत, से केहन वर चाही। राजा सर्वगुणी बेटाक वर मँगलन्हि। मन्दिरक सोझाँक आमक गाछसँ आम तोड़ि ओऽ अपन पत्नीकेँ खुआ देलन्हि आऽ पुत्र जे प्राप्त भेल ओकर नाम चिरायु राखल। १६ वर्ष पूर्ण भेलापर रानीक भाए संगे राजकुमार चिरायु काशी चलि गेलाह। माम भागिन जे काशी लेल बिदा भेलाह तँ रस्तामे आनन्दनगर राज्यमे बीरसेन राजाक पुत्री मंगलागौरीक विवाह होमए बला छल। ओऽ सखी-बहिनपा संग फूल लोढ़ए लेल फुलवारीमे आयल छलीह तँ गपे-गपमे एकटा सखी हुनका राँड़ी कहि देलखिन्ह, तँ ओऽ कहलन्हि जे हम गौरकेँ तेना गोअहरने छी जे जाहि वरक माथपर हमर हाथक अक्षत पड़त से अल्पायु रहबो करत तँ दीर्घायु भए जाएत। ओहि राजकुमारेक विवाह बाह्लीक देशक राजा दृढ़वर्माक बेटा सुकेतुसँ हेबए बला रहए। ओही फुलबारीमे माम-भागिन रहथि, आऽ साँझमे बर-बरियाती सभ सेहो अएलाह। वर महामूर्ख आऽ बहीर छल से ओऽ लोकनि राति भरि लेल चिरायुकेँ वर बनबाक आग्रह कएलन्हि। चिरायु गौरी-शंकरक प्रतिमाक समक्ष सिन्दूर-दान कएलन्हि। कोहबरमे वर कनिआ अएलाह तँ ओही राति चिरायुक १६म वर्ष पुरि गेलन्हि आऽ तखने गहुमन साँप डसबाक लेल आबि गेल। राजकुमारी जगले छलीह आऽ ओऽ गहुमनक सोझाँ दूध राखि देलखिन्ह आऽ पतिकेँ नहि मारबाक आग्रह कएलन्हि। गहुमन दूध पीबि पुरहरमे पैसि गेल, राजकुमारी आँगीसँ पुरहरक मुँह बन्न कए देलन्हि। राजकुमारक निन्द खुजलन्हि तँ ओऽ किछु खाए लेल मँगलन्हि। राजकुमारी हुनका खीर-लड्डू देलन्हि, हाथ धोबाक काल राजकुमारक हाथसँ पञ्चरत्न औँठी खसि पड़लन्हि से राजकुमारी उठा लेलन्हि। वर पान-सुपारी खाए सुतलाह आऽ पुरहरिक साँप रत्नक हार बनि गेल आऽ से राजकुमारी गरामे पहिरि लेलन्हि। भोरमे माम भागिनकेँ लए गेलाह मुदा सुकेतुकेँ राजकुमारी कोबरमे नहि पैसए देलखिन्ह। साल भरिक बाद प्राय विन्ध्याचलसँ जे माम-भागिन घुरि रहल छलाह तँ राजकुमारी कोठापसँ हुनका चीन्हि गेलीह। धूमधामसँ सभ घर कनिआँ लए पहुँचलाह आऽ गौरी आऽ नाग पूजाक महत्व ज्ञात भेल। तेसर दिनक कथा पृथ्वीक जन्म- पापसँ पृथ्वी पाताल चलि गेलीह, तखन ब्रह्मा, विष्णु प्रार्थना कए हुनका ऊपर अनलन्हि, फेर ओऽ डगमगाइत छलीह, तखन विष्णु काछु बनि नीचाँ चलि गेलाह, अपन पीठपर राखि लेलन्हि, तैयो ओऽ जल-पर भँसैत छलीह, तखन आगस्त्यक जाँघ तरसँ माटि आनल गेल, विष्णु सेहो माछ बनि माटि अनलन्हि, तकर जोड़न दए पृथ्वीकेँ स्थिर कएल गेल, जे कमी छल से भगवान वराह बनि उत्तर माथसँ पृथ्वीकेँ ठोकि कए ठीक कए देलन्हि। समुद्र-मन्थन- देवता-दानव सुमेरुपर एकत्र भए समुद्र-मन्थनक हेतु बासुकीनागकेँ मन्दार पर्वतमे लपटाए समुद्रमे उतारल।कूर्मराजकेँ आधार बनाए मूँह दिसनसँ दानव आऽ पुच्छी दिसनसँ देवता नागकेँ पकड़ि मन्दारक मथनीसँ मंथन शुरू कएलन्हि। रगरसँ पर्वतपर गाछ-वृक्षमे आगि लागि गेल। इन्द्र वर्षा कएलन्हि, समुद्रक नूनगर पानि दूध-घी भए गेल, लक्ष्मी, सुरा आऽ उच्चैःश्रवा घोड़ा निकलल से चन्द्रमा-लोकनि लए लेलन्हि। अमृत लेने धन्वन्तरि बहार भेलाह, विष निकलल से महादेव कण्डमे लेलन्हि। गौरी बिसहरा,साँप,बिढ़नी,चुट्टीक मदतिसँ विश महादेवक देहसँ निकाललन्हि। अमृत लेल झगड़ा बझल, विष्णु मोहिनी बनि गेलाह। दैत्य मोहित भए अमृत-कलश हुनकर हाथमे राखि देलन्हि आऽ देवतासँ लड़ए लगलाह। विष्णु सभ देवताकेँ अमृत पिआ देलन्हि। दैत्य राहु भेष बदलि अमृत पीबए चाहलक मुदा चन्द्रमा सूर्य हुनका चीन्हि गेलखिन्ह, अम्र्त मुँसँ कंठ धरि यावत जाइत तावत विष्णु ओकर गर्दने चक्रसँ काटि देलन्हि। मुदा अमृतक जे स्पर्श ओकरा भए गेल छल से ओऽ मरल नहि, मुण्ड भाग राहु आऽ शेष भाग केतु बनि गेल, एखनो कोनो अमावस्यामे सूर्यकेँ तँ कोनो पूर्णिमामे चन्द्रमाकेँ गीड़ैत अछि, मुदा कटल मुण्ड-धरक कारण दुनू गोटे किछु कालक बाद बहार भए जाइत छथि। बचल अमृत विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्रकेँ दए देल गेल।बासुकी नागकेँ माइक श्राप नहि लगबाक आऽ जनमेजयक यज्ञमे भागिन आस्तीक द्वारा सपरिवार प्राणरक्षा होएबाक वर भेटलन्हि। चारिम दिनक कथा सतीक कथा- ईश्वरकेँ विश्वक सृष्टि करबाक छलन्हि, से ओऽ पहिने विष्णु, फेर शिव आऽ तखन ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलन्हि। ओऽ तखन देवता-ऋषि-मुनि, शतरूपास्त्री, स्वायंभुव मनु, दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि, दहिना पाँजरसँ दक्ष-प्रजापतिक रचना कएलन्हि। मरीचीसँकश्यप, अत्रिसँ चन्द्रमा, मनुक प्रियव्रत एवं उत्तानपाद बेटा आऽ आकृति, देवहूति आऽ प्रसूति बेटी भेलन्हि। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ आऽ ताहिसँ साठि कन्या भेल। साठिमे आठक विवाह धर्म, एगारहक कश्यप, सत्ताइसक चन्द्रमा आऽ एक गोट जिनकर नाम सती छलन्हि हुनकर विवाह महादेवसँ भेलन्हि। चन्द्रमाकेँ जे सताइस टा पत्नी भेलन्हि ताहिमेसँ ओऽ रोहिणीकेँ सभसँ बेशी मानैत छलाह, से २६ टा बहिन अपन पिता दक्षकेँ कहलनि, ओऽ शाप देलकिन्ह आऽ चन्द्रमाक शरीर घटए लगलन्हि। तखन ओऽ महादेव लग गेलाह तँ ओऽ हुनका अपन कपार पर चढ़ा लेलन्हि। एहिसँ दक्ष महादेवकेँ बारि देलखिन्ह। फेर दक्ष एकटा यज्ञ कएलन्हि आऽ शंकरकेँ नोत नहि देलन्हि। सती नैहर जएबाक लेल जिद पकड़ि लेलन्हि तँ वीरभद्रक संग शिव हुनका पठा देलन्हि। सती चलि तँ गेलीह मुदा अपमान देखि यज्ञकुण्डमे कूदि पड़लीह। वीरभद्र ई देखि दक्षक गरदनि काटि लेलन्हि।महादेवकेँ तमसायल देखि कए देवता सभ प्रार्थना कएलन्हि जे बिना जिअओने यज्ञ पूर्ण नहि होएत से यज्ञक काटल छागरक मूरी दक्षक धरपर महादेव लगा देलन्हि, आऽ ओ जीबि कए बो-बो करए लगलाह, से माहादेव ई देखि प्रसन्न भेलाह। तहियेसँ महादेवक पूजाक अन्तमे बू कहल जाए लागल। महादेव सतीक मृत शरीर लए बताह भेल फिरथि से देखि विष्णु चक्रसँ सतीक टुकड़ा कए देलन्हि आऽ जतए-जतए ओऽ टुकड़ा खसल से सभटा सिद्धपीठ भए गेल। महादेव कैलाश छोड़ि जंगलमे तपस्या करए लगलाह। पतिव्रताक कथा- एकटा राजा छालाह। हुनका दूटाबेटी छलन्हि- कुमरव्रता आऽ पतिव्रता। कुमरव्रता नन्दनवनमे कुटीमे रहए लगलीह आऽ पतिव्रता विवाह कए सासुर चलि गेलीह। एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक तँ ओऽ शाप दए ओकरा भसम कए देलक। नन्दनवनमे आगि लागल रहए। पतिव्रता अपन बहिन कुमरव्रताक कुटी बचेबाक लेल तुलसीक बेढ़ देलन्हि ताहिमे योगीकेँ भीख देबामे देरी भए गेलैक। योगी तमसाएल तँ पतिव्रता देरीक कारण कहलन्हि। योगी बोनमे गेल तँ देखलक जे सौँसे बोनमे आगि लागल अछि मुदा कुमरव्रताक कुटी बचल अछि। ओऽ कुमरव्रताकेँ एकर रहस्य बतेलक तँ ओहो निर्णय लेलन्हि जे हमहुँ विवाह कए पतिव्रता बनब। भोरमे एकटा कुष्ठरोगीकेँ ओऽ देखलन्हि तँ हुनकेसँ विवाह कए लेलन्हि। पति हुनका कहलखिन्ह जे हमरा तीर्थ कराए दिअ। ओऽ हुनका पथियामे लए बिदा भेलीह तँ रस्तामे जखन पथिया उतारि रहल छलीह तँ चोट लागि कए एक गोट सूली पर लटकल ऋषिकेँ चोट लागि गेलैक। ओऽ भोर होइते पतिक मृत्युक शाप हुनका दए देलन्हि। से सुनि बेचारी सूर्यक उपासना करए लगलीह से पति मृत्यु पाबि फेर जीबि उठलखिन्ह आऽ एहि बेर बिना रोग व्याधिक घुरि अएलन्हि। सती,सावित्री, अनुसूया आऽ बिहुला जेकाँ सतीक अनेक उदाहरण अछि। पाँचम दिनक कथा दक्षक पुनर्जन्म भेलन्हि हिमालयक रूपमे, आऽ एहि जन्ममे हुनका उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आऽ सन्ध्या ई पाँचटा कन्या भेलन्हि। हिमालय आऽ मनाइनक बेटी उमा महादेवकेँ प्राप्त करबाक लेल तपस्या करए चलि गेलीह, माय उमा कए रोकलन्हि, से नाम उमा पड़ि गेलन्हि ओऽ वरक रूपमे महादेवकेँ प्राप्त कए लेलन्हि। दोसर पुत्री पार्वती एकदिन कनकशिखरपर गेलीह आऽ बसहापर चढ़ि हुनका संग चलि गेलीह। तेसर पुत्री गंगा रहथि। एक दिन महादेव भिक्षुक भेष धए अएलाह आऽ गंगाकेँ जटामे नुकाए चलि गेलाह। छठम दिनक कथा सगर राजाक पत्नी रहथि शैब्या आऽ हुनकासँ असमंजस नामक पुत्र भेलन्हि। दोसर पत्नी वैदर्भीसँ कोनो बच्चा नञि भेलन्हि। वैदर्भी महादेवक तपस्या केलन्हि तँ सए बरखक बाद एकटा लोथ जन्म लेलकन्हि। महादेव अएलाह आऽ लोथकेँ साठि हजार खण्डमे काटि ओतेक तौलामे राखि झाँपि देलनि। ई सभटा किछु दिनमे पुत्रक रूप लए लेलकन्हि। सगर राजाक सएम अश्वमेध यज्ञक इन्द्र व्रोधी भेलाह कारण तखन सगर शतक्रतु इन्द्र भए जएताह। इन्द्र यज्ञक घोड़ाकेँ लए भागि गेलाह आऽ कपिलक आश्रममे बान्हि देलखिन्ह। साठियो हजार पुत्र कपिलपर दौगलाह, ओ तपस्यालीन छलाह आऽ अपन क्रुद्ध आँखि खोलि सभकेँ जरा देलन्हि। वैकुण्डसँ गंगाकेँ अनबाक लेल असमंजस आऽ तकर बाद हुनकर पुत्र दिलीप आऽ तकर बाद तिनकर पुत्र अंशुमान तपस्या करैत-करैत मरि गेलाह। अंशुमानक पुत्र भगीरथक तपस्यासँ विष्णु प्रसन्न भेला आऽ गंगाकेँ मृत्युलोक लऽ जएबाक अनुमति दए देलन्हि। महादेव हिमालयपर जाए स्वर्गसँ उतरैत गंगाकेँ अपन जटामे राखि सम्हारि लेलन्हि, मुदा जे आगू बढ़लीह तँ जहु ऋषिक कुटी दहाए लागल। जहु ऋषि गंगाकेँ पीबि गेलाह। मुदा आग्रह कएलापर ओऽ गंगाकेँ छोड़ि देलन्हि आऽ तहियासँ गंगा हुनकर पुत्री जाह्नवीक रूपमे विख्यात भेलीह। आऽ फेर अन्तमे सगरक पुत्र लोकनि द्वारा, घोड़ाक खोजमे खुनल ओहि खाधिमे खसलीह जे आब सागर कहाबए लागल आऽ एहि तरहेँ सगरक पुत्रसभकेँ सद्गति भेटलन्हि। गौरीक जन्म- सतीक मृत्युक बाद महादेवकेँ विरक्ति भए गेलन्हि। तखन ताड़कासुर ब्रह्माकेँ प्रसन्न कए महादेवक पुत्रक अतिरिक्त ककरो आनसँ नहि मरबाक वर लए लेलक, देवताकेँ स्वर्गसँ भगा देलकन्हि। तखन देवता लोकनि महामाया दुर्गाक आराधना कएलन्हि आऽ ओ हिमालयक घरमे जन्म लेलन्हि। ओऽ बड़ गोर-नार छलीह से हुनकर नाम पड़ल गौरी। नारद एकदिन हिमालयक ओहिठाम अएलाह आऽ गौरीक हाथ देखि कहलखिन्ह जे हिनकर विवाह महादेवसँ होएतन्हि। हिमालय गौरीकेँ दूटा सखीक संग महादेवक सेवामे पठा देलखिन्ह। देवतागण कामदेवकेँ मित्र वसन्त आऽ स्त्री रतिक संग ओतए पठेलन्हि। गौरी जखन पहुँचलीह तखन कामदेव वाण चलेलखिन्ह। महादेव आँखि खोलि गौरीकेँ देखल। गौरी पूजा कएलन्हि। महादेव हुन्का देखि उपमा देलन्हि, मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन। मुदा तखने हुनका होश अएलन्हि ओऽ झाँकुरमे कामदेवकेँ देखलन्हि तँ तेसर नेत्र क्रोधित भए खोलि देखल तँ ओऽ जरि गेलाह। रति मूर्छित भए गेलीह। रतिक विलाप देखि देवतागण अएलाह आऽ कहलन्हि जे ताड़कासुरक वध लेल ई सभटा रचल गेल। महादेव कहलन्हि जे रति समुद्रमे शम्बर दैत्य लग जाथि। कृष्णक पुत्र प्रद्युम्नकेँ ओऽ दैत्य उठा कए लए जायत। जखन प्रद्युम्न पैघ होएताह तखन ओऽ शम्बरकेँ मारि रतिकेँ बियाहि द्वारका लए जएताह। वैह प्रद्युम्न कामदेव होएताह। सातम दिनुका कथा गौरी कामदेवक दहन देखि डराए गेलीह। नारद गौरीकेँ तपस्या करए लेल कहलखिन्ह। तपस्याक लेल हिमालय अपन पत्नी मैनासँ पुछलन्हि। गौरी फेर पटोर खोलि देलन्हि आऽ कृष्णाजिन आऽ बल्फर पहिरि सखी संग गौरीशिखर चोटीपर चलि गेलीह। घोर तपस्या देखि ऋषि-मुनि संग नारद महादेव लग पहुँचलाह। महादेव गौरीक परीक्षा लेल भेष बनाए गौरीशिखर पहुँचलाह आऽ महादेवक ढेर-रास निन्दा कएलन्हि। गौरी तमसाए गेलीह तँ ओऽ सोझाँ आबि गेलाह आऽ विवाहक लेल तैयार भए गेलाह। आठम दिनक कथा काशीमे सप्तऋषि , वशिष्ठ आऽ वशिष्ठक स्त्री अरुन्धती अएलीह। महादेव हुनका लोकनिकेँ कथा लए हिमालयक ठाम पठओलन्हि। हिमालय आऽ मैनाक आँखिसँ खुशीसँ नोर झड़ए लगलन्हि। कथा स्थिर भए गेल। नारद देवता लोकनिकेँ हकार देलन्हि। चारिम दिन बरियाती लगल। गन्धर्वराजकेँ देखि मैनाकेँ नारदकेँ पुछलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि जे ई तँ देवताक गबैया छी। फेर धर्मराज, इन्द्र सभ अएलाह। नारद सभक परिचए देलन्हि। मैना सोचलन्हि जे ई सभ एतेक सुन्दर अछि तँ महादेव कतेक सुन्दर होएताह। महादेव मैनाक मोनक गप बुझि किछु तमाशा कएलन्हि। महादेव, हुनकर गण, भूत-पिशाचकेँ देखि मैना बेहोश भए गेलीह। नवम दिनक कथा मैनाकेँ जखन होश अएलन्हि तँ ओऽ नारद-गौरी सभकेँ बहुत रास बात कहलन्हि आऽ विवाहसँ मना कए देलन्हि। सभ मनबए अएलन्हि तैयो नहि मानलीह। तखन महादेव अपन भव्यरूप देखेलन्हि, तँ मैना देखिते रहि गेलीह। विवाहक कार्य शुरू भेल। परिछनि, अठोंगर, गोत्राध्यायक बद कन्यादान सम्पन्न भेल आऽ ताड़कासुरकेँ मारबाक बाट सोझाँ प्रतीत भेल। दशम दिनुका कथा महादेव आऽ गौरीक संभोगसँ जे बच्चा होएत ओऽ पृथ्वीक नाश कए देत, ब्रह्माक ई वचन सुनि देवता लोकनि हल्ला मचा देलन्हि आऽ महादेवक अंश पृथ्वीपर खसि पड़ल। गौरी देवताकेँ सरापलन्हि जे आइ दिनसँ हुनका लोकनिकेँ सम्भोगसँ सन्तान नहि होएतन्हि। पृथ्वी अंशकेँ आगिमे आऽ आगि सरपतवनमे भार सहन नहि होएबाक कारण दए देलन्हि। ओतए छह मुँहबला बच्चा भेल, ओकरा कृत्तिकसभ पोसलन्हि तेँ नाम कार्तिकेय पड़ि गेलन्हि। गणेशक जन्मक बाद महादेव हुनका बजा लेलन्हि, देवतालोकनि हुनकर अभिषेक कए अपन सेनाध्यक्ष बना लेलन्हि। ओऽ ताड़कासुरकेँ मारि इन्द्रकेँ राज्य घुरा देलन्हि आऽ साठिसँ विवाह कएलन्हि। गणेशक जन्म- माघसूदि त्रयोदशी सुपुष्य विष्णुव्रत एक मासमे समाप्त कए कैलाशमे गौरी-महादेव रमण करए लगलाह। विष्णु तपस्वीक भेष बनाए अएलाह आऽ भूखसँ प्राण रक्षाक गप कहलन्हि। ओछाओनपर अंश खसि पड़ल आऽ गणेशक जन्म भए गेल। समारोहमे सभ अएलाह, शनिकेँ गौरी देखए लेल कहलन्हि, मुदा हुनका देखलासँ गणेशक गरदनि कटि कए खसि पड़ल। विष्णु एकटा हाथीक गरदनि काटि लगा देलन्हि आऽ अमृत छींटि जिआ देलन्हि। गणेशक विवाह दक्षप्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलन्हि। गौरीक नागदन्त कथा-हिमालयक आऽ मनाइनक चारिम बेटी गौरीक विवाह महादेवसँ भेल। महादेव भाभट पसारि फेर हटा लेलनि।बेटी-जमाएकेँ पुष्ट भार साँठि बिदा कएलन्हि, से सठबे नहि करन्हि। भड़कनि छुलाहि जखन धुरखुर सटि ठाढ़ भेल, तखन सभटा भार बिलाएल। एकबेर गौरी कहलन्हि जे सभक ननदि अबैत छैक, भागिन अबैत छैक। महादेव बहिन अशावरीकेँ बजेलन्हि। हुनका बेमाय फाटल छलन्हि, बेमायमे गौरीकेँ नुका लेलन्हि। गौरी कानथि तँ क्यो सुनबे नहि करन्हि। म्हादेव पुछाड़ि कएलन्हि तँ ओऽ पैर झाड़लन्हि। गौरी भटसँ खसलीह। तहिना ननदि लेल माँछ रान्हलन्हि। सभटा माँछ ननदि खाऽ गेलखिन्ह। गौरी अकछ भए ननदिकेँ बिदा कएलन्हि। गौरी गंगा जल भरए गेलीह तँ पुरबा आऽ पछबा दुनू भागिन जोरसँ बहए लागल। गौरी हाथ जोड़ि हँसी बन्न करए लेल कहलन्हि। गौरी छिनारि/चोरनी- गौरी कहलन्हि जे छिनारिकेँ माथपर सिंह आऽ चोरनीकेँ नाङरि दए दिऔक। महादेव तथास्तु कहलन्हि। गौरी माछ आनए गेलीह तँ धारक कातमे महादेव भेष बदलि माँछ बेचबाक लेल ठाढ़ भए गेलाह। गौरीकेँ माँछ बेचबासँ मना कए देलन्हि, कहलन्हि जे हँसी-ठट्ठा करब तखने हम अहाँकेँ माँछ देब। गौरीकेँ महादेव लेल माँछ लेब जरूरी छलन्हि से ओऽ हँसी कए माछ आनि, रान्हि महादेवकेँ खोआबए बैसलीह तँ माथपर सिंघ उगि गेलन्हि। दोसर दिन महादेव गौरीकेँ जल्दीसँ खेनाइ बनाबए लेल कहलन्हि, तखने गौरीकेँ दीर्घशंका लागि गेलन्हि। ओऽ जखन दीर्घशंका कए ओकरा पथियासँ झाँपि देलखिन्ह। जखन महादेव ओम्हर अएलाह आऽ पुछलखिन्ह तँ ओऽ लजा गेलीह आऽ गप चोरा लेलन्हि। जखन महादेवकेँ ई कहलन्हि तँ हुनका नाङरि भए गेलन्हि। गौरी छिनारि आऽ चोरनीक चेन्ह मेटएबाक अनुरोध कएलन्हि। तहियासँ ई चेन्ह मेटा गेल। एगारहम दिनुका कथा गौरीसँ छोट आऽ हिमालयक पाँचम बेटी संध्यासँ विवाहक लेल महादेव चोरा कए चलि गेलाह। गौरीकँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि। घामे-पसीने भए गेलीह। देहसँ मैल छुटए लगलन्हि तकरा ओऽ जमा केलन्हि आऽ साँप बनाए पथपर छोड़ि देलन्हि। महादेव जखन संध्याक संग विवाह कए अएलाह तखन ओहि साँपमे प्राण दए देलन्हि। गौरीकेँ कहलन्हि जे ई साँप, लीली, अहाँक बेटी छी आऽ एकरासँ खेलएबाक लेल संध्याकेँ अनने छी। गौरी भभा कए हँसि देलन्हि। नाहर राजा आऽ ताँती रनिक सए बेटामे सभसँ पैघ् बेटा बैरसी महादेव लग नोकरी करए लेल गेलाह। महादेव हुनका कहलखिन्ह जे लीलीकेँ धर्मकुण्डमे स्नान कराए दियौन्ह आऽ सोहागकुण्डमे औँठा डुबा दियौन्ह। मुदा ओऽ उलटा कए देलन्हि। सोहाकुण्डमे डुबलाक कारण सोहाग बड़ पैघ भेलन्हि। मुदा धर्मकुण्डमे मात्र औँठा डुबलन्हि से ओकर लेशमात्र रहलन्हि। से ओऽ बेरसीसँ विवाह करबाक गप कहलन्हि आऽ हुनकेसँ हुनकर विवाह भेल। रवि दिनुका पतिव्रता सुकन्याक कथा एकटा राजा- आऽ चरिटा हुनकर रानी छलन्हि। छोटकी रानीटासँ एकटा बचिया सुकन्या भेलन्हि। एक दिन राजा सुकन्या संगे टहलैत छलाह तँ सुकन्या एकटा दिबड़ाक भीड़ देखलन्हि। ओहिमे दूटा चमकैत वस्तु सेहो छल। ओऽ ओहिमे कटकीसँ भूड़ करए चाहलन्हि, तँ ओहिमेसँ शोनित बहार भए गेल आऽ चीत्कार उठल। एकटा मुनि तपस्या कए रहल छलाह आऽ हुनकर दुनू आँखि फूटि गेल छलन्हि। राजा हाथ जोड़ि क्षमा माँगलन्हि तँ ओऽ सुकन्याकेँ सेवाक लेल माँगि लेलन्हि। राजा कुमोनसँ सुकन्याक विवाह ओहि बूढ़ ऋषिसँ करबाए देलन्हि। फेर एक दिन अश्विनीकुमार सुकन्याकेँ भेटलखिन्ह आऽ हुनका लोकनिक संग पतिकेँ गंगा स्नान करेबाक लेल कहलखिन्ह। जखने तीनू गोटे स्नान कए निकललाह तँ एके रंग-रूपक युवा आँखि सहित बाहर आबि गेलाह। आब सुकन्या हुनका चिन्हतथि कोना। तखने ओऽ देखलन्हि जे दुनू देवताक पिपनी तँ खसिते नहि छन्हि से ओऽ अपन पतिकेँ चीन्हि गेलीह। राजा बेटी-जमाएक खुशीमे भोज देलखिन्ह। देवता सभ सेहो अएलाह मुदा देवता सभ श्वनेकुमारकेँ पाँतीमे बैसि कए खाए नहि देमए चाहैत छलाह मुदा राजाक कहलापर हुनका सभकेँ एके पाँतीमे बैसए देलखिन्ह। बारहम दिनुका कथा एकटा ब्राह्मणीक सात टा बेटा छलन्हि। छोटकी पुतोहु गरीब घरक छलीह से ससु-ससुर नहि मानैत छलन्हि। हुनका गर्भ भेलन्हि तँ खीर पूरी खएबाक इच्छा पतिकेँ कहलखिन्ह। पति कहलखिन्ह जे माय हम खेत जाइत छी हमर पनपिआइमे आइ खीर-पूरी कनिआक हाथे पठा दिअ। मायकें बुझेलन्हि जे हो नञि हो, ई अपन कनिआकेँ खीर-पूरी खुआओत। से ओऽ पुतोहुक जीहपर लिखि कहलन्हि, जे घुरि कए आबी तँ ई लिखल रहबाक चाही। पुतोहु खीर-पूरी लए खेत पहुँचलीह तँ पति आधा-आधा खाए लेल कहलखिन्ह। मुदा ऒऽ जीह देखा देलखिन्ह। तखन ओऽ पीपरक धोधरिमे खीर-पूरी राखि कहलन्हि जे जाऊ, मायकेँ जीह देखा कए घुर्रि आऊ। जखन ओऽ घुरलीह तँ ओहि धोधरिक बीहड़िमे रहएबला बासुकी साँपक कनिआ, जे गर्भवती छलीह से सभटा खीर-पूरी खाऽ गेल छलीह। ओहि सापिनकेँ बाल आऽ बसन्त दूटा पोआ भेलैक। एक दिन चरबाहा सभ ओकरासभकेँ मारए लेल दौगल तँ छोटकी पुतोहू ओकरा बचेलक। फेर एकर उत्तरमे बाल-बसन्त हुनका वर मँगबाक लेल कहलखिन्ह। पुतोहू वर मँगलन्हि जे एहन कए दिअ जे हमरो नैहरक आस रहए। सैह भेल। बाल-बसन्त विदागरी करेबाक लेल पहुंचि गेलाह मनुष्यरूप धारण कए। सासुरमे बाल-बसन्त रूपमे परिचए दए कहलन्हि जे हमरा सभक जन्म बहिनक द्विरागमनक बाद भेल छल। बिदागरी कराए रस्तामे बीहरिमे पैसि कए जे निकललाह तँ पैघ घर आबि गेल। बासुकीनि स्वागत कए साँझमे सुआसिनक काज साँझमे दीअठिपर दीप जरेनाइ अछि- से कहलन्हि। बासुकीनागक फनपर ओऽ दीप जरबथि तँ ओऽ खौँझाकए पत्नीकेँ कहलन्हि जे एकरा हम डसि लेब। पत्नी मना कएलन्हि जे अजश होएत से बिदा करए दिअ। ससुर चलि जाएत तँ जे मोन होए से करब। बसुकिनी नूआ-लहठी दए बिदा करैत काल धरि ई केलन्हि जे साँप रक्षकमंत्र कनिआकेँ सिखा कए बाल-बसन्तक संग बिदा कए देलन्हि। कहलन्हि जे ई मंत्र सूतएकाल पढ़ि सूतब। दीप-दीपहरा आगू हरा मोती मानिक भरू धरा। नाग बड़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन, विषहरा बढ़थु। बाल बसन्त भैय्या बढ़थु, डाढ़ि-खोढ़ि मौसी बढ़थु। आशावरी पीसी बढ़थु, खोना-मोना मामा बढ़थु। राही शब्द लए सुती, काँसा शब्द लए उठी। होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ। साँझ सुती, प्रात उठी, पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी। ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट। भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे आओत। ईश्वर महादेव, पड़ए गरुड़केँ ठाठ। आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक। बासुकी डसए लए आबथि मुदा ई मंत्र सुनि घुरि जाथि। चारिमदिन सासुकेँ डसि तीन बेर नाङरि पटकि घर सोना-चानीसँ भरि देलखिन्ह। गोसाउनिक कथा- मधस्थ राजाक एकसए एक बेटीक विवाह नाहर राजाक एकसए एक बेटासँ भेलन्हि।सभसँ पैघ भाए बैरसीक विवाह सभसँ पैघ कान्या गोसाउनीसँ भेलन्हि।विवाहकालमे बैरसीक पागसँ पहिल कनिआ महादेवक पुत्री लीली खसि पड़लन्हि। लीली लाबा बिछि खए लागलि।गोसाउनिक पिता मधस्थ सरापलन्हि जे बैरसी डेग पाछाँ पानक बिड़िया खएताह आऽ कोश पाछाँ तिरियासँ गप करताह तँ जीताह नहि तँ मरि जएताह। मुदा बैरसी लीलीकेँ मानथि। सासुरमे गोसाउनि अपन व्यथा दिअर चनाइकेँ कहलन्हि। ओऽ भाइकेँ कहलन्हि जे बाहर घुमि फिरि आऊ। तँ बैरसी ससुरक सरापक कथा कहलन्हि। मुदा चनाइ सभटा व्यवस्था कए भौजीकेँ कहलन्हि जे हम पाँच्-पाँच कोसपर ठरबाक व्यवस्था करब अहाँ भायसँगे भेष बदलि रहू आऽ संगमे पासाक गोटी लए लिअ आऽ तकरा प्रमाण रूपमे गाड़ैत जाएब। सैह भेल। पाँच विश्रामक बाद जखन सभ घुरि अएलाह, तखन गोसाउनिकेँ ओधु, कछु, महानाग, श्रीनाग, आऽ नग्नश्री नमक पाँचटा पुत्र भेलन्हि। लीली बैरसीकेँ कहलन्हि जे ई चनाइक सन्तान छी। मुदा गोसाउनि पासाक गोटी देखेलन्हि। तखन बैरसी लीलीकेँ मालभोग चौर आऽ खेड़हीक दालि आऽ गोसाउनिकेँ लोहाक चाउर आऽ पाथरक दालि सिद्ध करए कहलन्हि। मुदा तैयो लीली बुते सिद्ध नञि कएल भेलन्हि, मुदा गोसाउनि सुसिद्ध कए देलन्हि। ई देखि कए गोसाउनिक शरीर गौरवे फाटि गेलन्हि। तेरहम दिनुका कथा राजा श्रीकरक कन्याक टीपणिमे छाती लात, झोँटा हाथ आऽ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब लिखल छल। हुनकर मुइलाक बाद हुनकर बेटा चन्द्रकर जंगलमे एकटा सोन्हि बना कए एकटा चेरीसंगमे दए राजकुमारीकेँ ओतए राखि देलन्हि। जंगलमे सुवर्ण राजाकेँ ओऽ भेँट भेलीह तँ दुनू गोटे जाए लगलाह तँ राजकुमारी साओन सूदि तृतियाकेँ मधुश्रावणी पाबनिक लेल सासुरक अन्न खएबाक आऽ वस्त्र पहिरबाक प्रथाक मोन पाड़ि कहलन्हि जे ई दुनू वस्तु अवश्य पठायब। राजा राज्य जाए कारीगरकेँ वस्त्रलेल कहलन्हि तँ बड़की रानी सुनि लेलन्हि आऽ वस्त्रमे छाती-लात आऽ झोँटा हाथ लिखि देबाक लेल कहलन्हि। कौआकेँ जखन ई वस्त्र पहुँचेबाक भार राज देलन्हि तँ ओऽ रस्तामे कतहु भोज-भात खए लागल आऽ सनेस पहुँचेनाइ बिसरि गेल। राजा सेहो सभटा बिसरि गेलाह। मधुश्रावणी दिन राजकुमारी गौरीक पूजन उज्जर चानन-फूलसँ कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे जहिया राजा भेँटा होथि तहिआ हम बौक भए जाइ। जखन चन्द्रकरकेँ पता चलल जे राजकुमारी विवाह कए लेलन्हि तँ ओऽ खरचा बन्द कए देलन्हि। आब दुनू गोटे राजकुमारी अऽ चेरी सुवर्ण राजाक बड़की रानी द्वारा खुनाओल जाए रहल पोखड़िमे माटि उघए लगलीह। सुवर्ण एक दिन हिनका लोकनिकेँ देखलखिन्ह तँ हुनका सभटा मोन पड़ि गेलन्हि। ओऽ हुनका राज्य लए अनलन्हि। मुदा राजकुमारी बजबे नहि करथि। चेरी सभटा गप बुझेलन्हि तँ राजा कहलन्हि जे ई कौआक गलती अछि। तखन रानी अगिला मधुश्रावणीमे लाल चाननसँ गौर पुजलन्हि आऽ हुनकर बकार घुरि गेलन्हि आऽ सुखसँ जीवन बिताबए लगलीह। श्रीगणेशजी मधुश्रावणी दिन मए गौरीसँ कहलन्हि जे आइ हम सोहाग मथब आऽ बाँटब। धान-धन्य, काठक तामा, नीम बेल आऽ आमक काठीसँ ओऽ सोहाग मथि सभकेँ बँटलन्हि। झूलन साओन मासक शुक्लपक्ष पुत्रदा एकादशीसँ प्रारम्भ भए पाँच दिनक बाद सलौनी पूर्णिमा धरि काठक झूला, आङी, टोपी, चद्दरि , रेशमी डोरीसँ सजावट कए झूला गाओल जाइत अछि। १०. संगीत शिक्षा-गजेन्द्र ठाकुर रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि। राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित) मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना। स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान। अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥ स्थायी - रेग॒म॑प ग॒रेसा ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑ ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ अन्तरा पप नि॒ध निसां सांरें मिथि लाऽ ऽऽ कोकि सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ *गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध। बालानां कृते १.डोका-डोकी-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी: साक्षरता अभियान ज्योति झा चौधरी १.डोका-डोकी चित्र: ज्योति झा चौधरी १.डोका-डोकी एक टा छल डोका आऽ एकटा छल डोकी। दुनूमे बड्ड प्रेम। डोकी कहए तरेगण लए आऊ, तँ डोका तरेगण आनएमे सेकेण्डक देरी भए जाए तँ ठीक मुदा मिनटक देरी नञि होमय दैत छल। सियारकेँ रहए ईर्ष्या दुनूसँ। से ओऽ कनही सियारिनसँ मिलि गेल आऽ एक दिन जख्नन डोका आऽ डोकी एक्के थारीमे भोजन कए रहल छल, तखन डोकाकेँ बजेलक। एम्हर-ओम्हरक गप कए ओकरा बिदा कए देलक। फेर डोकीकेँ बजेलक ओऽ सियरबा। पुछलक जे अहाँ दुनू गोटेमे बड़ प्रेम अछि, मुदा डोका जे कहलक ताहिसँ तँ हमरा बड़ दुःख भेल। लागए-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छैक। आर किछु पूछए लागल डोकी तावत ओऽ सियरबा पड़ा गेल। आब डोकी घरमे हनहन-पटपट मचा देलक। डोका लकड़ी काटय बोन दिशि गेल। घुरल नहि। भोरमे एकटा जोगी आएल तँ ओकरासँ डोकी पुछलक जे ई की भेल? जोगिया कहलक जे ई अछि पूर्व जन्मक सराप। जखने अहाँ डोकी पर विश्वास छोड़ब डोका छोड़ि कए चलि जाएत मुदा सातम दिन भेटि जाएत। मुदा डोकी निकलि गेलि डोकाकेँ ताकए। बगुला भेटलैक डोकीकेँ कहलकैकरुकि जाऊ एहि राति। फेर सियरबा, वटवृक्ष, मानसरोवरक रस्तामे बोनमे हाथी सभ कहलकैक जे एक एक राति रुकि कए जाऊ मुदा डोकी नहि रुकलि। फेर भेटल मूस। ओऽ कहलक जे हमरा संग चलू, हम महल लए जायब, खिस्सा सुनाएब छह रातिक बाद सातम राति बीतत आऽ डोका भेटत। खिस्सा सुनबैत महल दिशि विदा भेल दुनू गोटे। मूस कहलक जे अहाँ हँ-हँ कहैत रहब खिस्साक बीचमे। मूसक खिस्सा कनेक नमगर रहए। डोकी बीचमे हँ कहब बिसरि गेलि। आऽ तकर बाद मूस सेहो खिस्सा बिसरि गेल। कतबो मोन पाड़य चाहलक मुदा मोन नहि पड़लैक। फेर आगू बढ़ल दुनू गोटे। एकटा दीबारिमे भूर कए दुनू गोटे सुरंगमे पहुँचल, तँ दू राति धरि चलैत रहल तखन महल आयल। ओतए डोकी हलुआ बनबए लेल लोहियामे समान देलक आऽ कनेक पानि आनए लेल बाहर गेल तँ मूसकेँ रहल नञि गेलैक आऽ ओऽ लोहियामे मुँह दए देलक आऽ मरि गेल। डोकी घुरि कए ई देखलक तँ कुहड़ि उठल। बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल छोड़ल वटक वृक्ष हाथी सन बलगर पकड़ल ई मूस। मूस भैयाक संग लेल बीतल छह राति, सातम रातिमे ओऽ प्राण गमेलन्हि आऽ ओकर साँस टुटए लगलैक, मुदा तखने दरबज्जा खुजल आऽ कुरहड़ि लेने डोका हाजिर। २. देवीजी: साक्षरता अभियान देवीजी : साक्षरता अभियान विद्यालयमे आइ बहुत हलचल छल। बड़का सरकारी गाड़ी सामने ठाढ़ छल। बच्चासभ उत्सुक भऽ विद्यालयक अन्दर घुसल। सभकेँ किछु बुझा नहि रहल छल। बादमे प्रार्थनाक समयमे प्रधानाध्यापक सभकेँ सूचित केलखिन ''सरकारक दिस सँ ई निर्देश आयल अछि जे हम सभ देशसॅं निरक्षरता हटाबएमे योगदान करी। ताहि लेल सरकारक दिससॅं पुस्तक आऽ अन्य सामग्री प्रदान कएल गेल अछि। भारतवर्ष निरक्षरतामे विश्वमे सभसॅं आगॉं अछि। आर बिहार राज्य अपन देशमे साक्षरता आऽ स्त्रीशिक्षामे सभसॅं पाछाँ अछि। हमरा सभकेँ एकरा हटाबएमे योगदान करबाक चाही। विद्यार्थी सभ एहिमे काज करए लेल तैयार छल। सभ देवीजीसॅं पुछलक जे एहि लेल की करए पड़तैक। तऽ देवीजी सभकेँ पढ़ाबए केर तरीका सिखेलखिन। अगिला दिन सौंसे गाममे बात आगि जकॉ पसरि गेल जे रोज सॉंझकऽ स्कूलपर बुजुर्गसभकेँ आऽ जाहि बच्चा सभकेँ आर्थिक कमजोरीक कारण शिक्षा नहि भेट रहल छैक तकरा सभकेँ बिन खर्चाक साक्षर बनाओल जायत। सभकेँ आमंत्रित कएल गेल। आब प्रतिदिन सॉंझमे भीड़ लागए लागल। विद्यार्थी सभ शिक्षक संगे पढ़ाबएमे व्यस्त भऽ गेलाह। गर्मीक छुट्टीमे सेहो सभ एहि काजमे लागल रहल। दुइए तीन महिनाक प्रयाससॅं गामक सभ बुढ़ बुजुर्गसँ लऽ कऽ उमरगर बच्चा सभ साक्षर भऽ गेल। सभसँ बेसी लाभ स्त्री सभकेँ भेलन्हि, जिनका सभकेँ ई सुविधा भेटबाक कोनो आशा नहि छलन्हि। गाममे अखबारक खपत बढ़ि गेल। आब बुढ़ियो सभ बात करए लगलीह जे देशमे कोन पार्टीक बहुमत अछि आऽ के प्रधानमंत्री अछि। गीत नाद सेहो लिखि कए राखए लगलीह। आऽ अपन नातिन सभकेँ पढ़बाक लेल प्रोत्साहित करए लगलीह। मिथिलांचल, जतए स्त्री सर्वथा सम्मानित रहलि, मुदा शिक्षाक क्षेत्रमे ओकर भाग्य कनिक कमजोर छल, ताहुकेँ दूर करबाक ई प्रयास, आगामी उज्ज्वल भविष्यक प्रतीक छल। स्त्रीशिक्षाक एहेन दीप प्रज्वलित करबाक लेल विद्यालयकँ सरकार दिससँ सम्मानित कएल गेल। प्रधानाध्यापक आऽ सभ शिक्षक सभ अपन विद्यालयक छात्रसभक बहुत प्रशंसा केलखिन जे ओकर सबहक तन्मयतासॅं ई काज सम्पन्न भेल। फेर अगिला अवकासमे एहि कार्यक्रमकेँ आगॉं बढ़ेबाक विचार कएल गेल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर पञ्जी प्रबंध पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। तृतीय छठि कन्याक प्रपितामहक श्वसुरक – जेना माण्डर मूलक सिहौली मूलग्रामक १.रघुबर झा पुत्र २.फेकू झा तनिक जमाए ३.कंटीर झा, तनिक पुत्र ४.पीताम्बर झा तनिक पुत्र ५.शशिनाथ झा ६.कन्या। एहि मध्य माण्डर सिहौली रघुवर झासँ कन्या छठि छथि चारिम छठि- फेकू झाक श्वसुर- पाली महिषी मूलक हर्षी झा, यथा (१) हर्षी झा- (२)जामाता-फेकू झा (३) जामाता कंटीर झा (४)पुत्र-पीताम्बर (५) शशिनाथ (६) कन्या. एहि तरहेँ कन्या हर्षी झासँ छठम स्थानमे छथि तैय हेतु ई चारिम छठि भेल। पाँचम छठि- कन्याक पितामहक श्वसुरक पितामहसँ कन्या छठम स्थान-जेना सकराढ़ी मूलक परहट मूलग्रामवाला (१) ब्रजनाथ झा (२) हुनक बालक हर्षनाथ झा (३) हिनक बालक सिद्धिनाथ झा (४) हिनक जमाय पीताम्बर झा (५) तनिक बालक शशिनाथ झा (६) हिनक कन्या- अस्तु, सकराढ़ी परहट ब्रजनाथ झा पाँचम छठि कहौताह। (अनुवर्तते) १३. संस्कृत मिथिला –गजेन्द्र ठाकुर श्रीकर- श्रीकर प्रथम मैथिल निबन्धकार छलाह। विज्ञानेश्वर, हरिनाथ, जीमूतवाहन चण्डेश्वर ठाकुर ई सभ श्रीकरक विचारक उल्लेख कएने छथि। श्रीकर एहि हिसाबसँ सातम शताब्दीक बुझना जाइत छथि। श्रीकर याज्ञवल्क्य आऽ लक्ष्मीधरक बीचक सूत्र छथि। ओऽ कल्पतरु लिखलन्हि, जाहिमे १४ भाग छल, मुदा हुनकर कोनो कार्य एखन उपलब्ध नहि अछि। श्रीकरक अनुसार आध्यात्मिक लाभ उत्तराधिकारक लेल आवश्यक अछि। चण्देश्वर ठाकुर अपन राजनीतिरत्नाकरमे श्रीकरक सिद्धांत ई सिद्धांत रखने छथि, जे गरीबक अधिकार राजा आऽ राज्यक सम्पत्तिमे छैक। १५.मैथिली भाषापाक रचना लेखन-गजेन्द्र ठाकुर इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। रसमय कवि चतुर चतुरभुज शब्दावली रसमय कवि चतुर चतुरभुज- विद्यापति कालीन कवि। मात्र १७ टा पद्य उपलब्ध, मुदा ई १७ टा पद हिनकर कीर्तिकेँ अक्षय रखबाक लेल पर्याप्त अछि। उदाहरण देखू- दिन-दिन दुहु-तन छीन, माधव एकओ ने अपन अधीन। हे कृष्ण! दिनपर दिन दुनूक तन विरहसँ क्षीण भेल जाऽ रहल अछि, आऽ दुनूमे केओ अपन अधीन नहि छथि। विहि- विधाता सञानि- युवती तनु- वयश, देह आँतर- अन्तर, भीतर गोए- नुकाएब वेकत- व्यक्त गेहा- ठाम परि- प्रकारे विरहानल- विरहक आगि काँती- कान्ति धमित- धिपाओल निरूपए- निरीक्षण परिहर- उपेक्षा अचिरहिँ- अल्पकालहि वामे- प्रतिकूल निअ- निज, अपन मलयज- चानन सयानि- विरह विदग्धा नायिका धनि- धन्या-नायिका हेरसि- निहारैत हरषि- हर्षित भए परिहरि- मेटाय नखत- तरेगण मधुरि-दल- उभय-ओष्ठ मनसिज- कामदेव अवनत- नीचाँ झुकनाइ हुतासन- ज्वाला (अनुवर्तते) मैथिलीक मानक लेखन-शैली 1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- 1. ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। मैथिलीक मानक लेखन-शैली जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं। पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। ग्राह्य अग्राह्य होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला होयबाक/होएबाक आ’/आऽ आ क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ ल’/लऽ/लय/लए भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला बला वला आङ्ल आंग्ल प्रायः प्रायह दुःख दुख चलि गेल चल गेल/चैल गेल देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि चलैत/दैत चलति/दैति एखनो अखनो बढ़न्हि बढन्हि ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ जे जे’/जेऽ ना-नुकुर ना-नुकर केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि तखन तँ तखनतँ जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए की फूड़ल जे कि फूड़ल जे जे जे’/जेऽ कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद इहो/ओहो हँसए/हँसय हँस’ नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस सासु-ससुर सास-ससुर छह/सात छ/छः/सात की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) जबाब जवाब करएताह/करयताह करेताह दलान दिशि दलान दिश गेलाह गएलाह/गयलाह किछु आर किछु और जाइत छल जाति छल/जैत छल पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल जबान(युवा)/जवान(फौजी) लय/लए क’/कऽ ल’/लऽ कय/कए एखन/अखने अखन/एखने अहींकेँ अहीँकेँ गहींर गहीँर धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए जेकाँ जेँकाँ/जकाँ तहिना तेहिना एकर अकर बहिनउ बहनोइ बहिन बहिनि बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ नहि/नै करबा’/करबाय/करबाए त’/त ऽ तय/तए भाय भै भाँय यावत जावत माय मै देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि द’/द ऽ/दए किछु आर शब्द मानक मैथिली_३ तका’ कए तकाय तकाए पैरे (on foot) पएरे ताहुमे ताहूमे पुत्रीक बजा कय/ कए बननाय कोला दिनुका दिनका ततहिसँ गरबओलन्हि गरबेलन्हि बालु बालू चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) जे जे’ से/ के से’/के’ एखुनका अखनुका भुमिहार भूमिहार सुगर सूगर झठहाक झटहाक छूबि करइयो/ओ करैयो पुबारि पुबाइ झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि पएरे-पएरे पैरे-पैरे खेलएबाक खेलेबाक खेलाएबाक लगा’ होए- हो बुझल बूझल बूझल (संबोधन अर्थमे) यैह यएह तातिल अयनाय- अयनाइ निन्न- निन्द बिनु बिन जाए जाइ जाइ(in different sense)-last word of sentence छत पर आबि जाइ ने खेलाए (play) –खेलाइ शिकाइत- शिकायत ढप- ढ़प पढ़- पढ कनिए/ कनिये कनिञे राकस- राकश होए/ होय होइ अउरदा- औरदा बुझेलन्हि (different meaning- got understand) बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) चलि- चल खधाइ- खधाय मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह कैक- कएक- कइएक लग ल’ग जरेनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ होइत गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि चिखैत- (to test)चिखइत करइयो(willing to do) करैयो जेकरा- जकरा तकरा- तेकरा बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ हारिक (उच्चारण हाइरक) ओजन वजन आधे भाग/ आध-भागे पिचा’/ पिचाय/पिचाए नञ/ ने बच्चा नञ (ने) पिचा जाय तखन ने (नञ) कहैत अछि। कतेक गोटे/ कताक गोटे कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई लग ल’ग खेलाइ (for playing) छथिन्ह छथिन होइत होइ क्यो कियो केश (hair) केस (court-case) बननाइ/ बननाय/ बननाए जरेनाइ कुरसी कुर्सी चरचा चर्चा कर्म करम डुबाबय/ डुमाबय एखुनका/ अखुनका लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ कएलक केलक गरमी गर्मी बरदी वर्दी सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ एनाइ-गेनाइ तेनाने घेरलन्हि नञ डरो ड’रो कतहु- कहीं उमरिगर- उमरगर भरिगर धोल/धोअल धोएल गप/गप्प के के’ दरबज्जा/ दरबजा ठाम धरि तक घूरि लौटि थोरबेक बड्ड तोँ/ तूँ तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) तोँही/तोँहि करबाइए करबाइये एकेटा करितथि करतथि पहुँचि पहुँच राखलन्हि रखलन्हि लगलन्हि लागलन्हि सुनि (उच्चारण सुइन) अछि (उच्चारण अइछ) एलथि गेलथि बितओने बितेने करबओलन्हि/ करेलखिन्ह करएलन्हि आकि कि पहुँचि पहुँच जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) से से’ हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) फेल फैल फइल(spacious) फैल होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय फेका फेंका देखाए देखा’ देखाय देखा’ सत्तरि सत्तर साहेब साहब VIDEHA FOR NON RESIDENTS 1.VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT 2.Maithils and Goa THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti. YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार Year 2008 ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ navan parvan 4 dec. नवान पार्वन vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी Year 2009 makar sankranti 14 january मकर संक्रांति narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत ramnavmi 3 april रामनवमी mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी gangadashhara 2 june गंगादशहरा somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT--- Basarh seal shows that in Tirabhukti, the Kumaumatya was entrusted with the district administration to the provincial governors called uparika. The Panchobh copper-plate grant deed of Ramagupta appears to continue the dominance of Later Guptas over the Southern part of the province . Sangramagupta granted a village Vanipama in district Jambuvani to a Brahmana called Kumira Swami of Sandilya Gotra,.learned in Yajurveda and belonging to Kola chanula. After the Guptas, Mithila formed a part of Harsha's Empire which included Lord of Five Indies have been interpreted as, Lord of Punjab, Kanyakubja, Mithila, Bengal and Orissa. Harsha left no son to succeed him, Arjuna or Arunusva, incharge of Tirabhukti, claimed imperial status and forced neighbouring provinces to submit to him. Madhavagupta who became independent, must have resisted the pretensions of Arjuna. A chinese mission was going to Magadha and Arjuna attacked the mission. This assault brought about the invasion of his kingdom by the Tibetan army swooped down upon Tirhut, the kingdom of Arjuna and stormed his capital and also other towns of the kingdom. He was captured and it was quite possible that Tirabhukti was brought under Tibetan imperialism aided by the Nepalese army. King of Tibet, established his sway over Mithila, along with Nepal. Tibetan rule in Tirhut lasted only for about half a century A. D. 647-8 to 703 A.D. Arjuna attacked a Chinese mission killed most of the members of the mission and plundered their property. Want hiuen-tse fled to Nepal, secured 7,000 soldiers from Nepal and 1200 from Tibet and returning to Indian plains, disastrously defeated and imprisoned Arjuna and took him a captive to China. Gopala : The palas of Bengal extended their influence over the whole of Eastern India. The Palas inscriptions of earlier times do not allude at all to any glorious and legendry descent as they were Buddhists. The foundation of the Pala dynasty in Bengal goes back to Gopala, put an end to the state of anarchy which prevailed in Bengal after the death of Sasanka. Gopala is also credited with the foundation of the Nalanda Vihara , reduced Magadha also under his power. Dharmapala (c, 783-818 A. D.) really raised the glory of Palas to Imperial heights, Mithila was an integral part of its central structure being directly administered by the king himself. Dharmapala fought with the Pratiharas and made himself the real master of Kanauj and installed his protege chakrayuddha to the throne as a vasal ruler. The Karnatas and the Latas are mentioned among royal officers in the Nalanda Inscription of Dharmapala. Devapala (c. 818-850 A D.) continued his hold over Mithila, Mudgagiri (Munger) became an important administrative centre. Badal pillar inscription of Narayanapala- the victories of the time of Devapala are credited to the hereditary ministerial family, Darbharai and his grandson Kedara Mishra who were Maithil. Devapala's reign is the high water mark of the Pala imperialism. Bhagalpur Inscription definitely uses the word Tribhukti for Monghyr. Vigrahapala I is the sams as Surapala mentioned in the Hadal Pillar inscription of Guravamisra,, because it is the only name mentioned between Devapala and Narayanpala, and again in the Bhagalpur grant. Narayanpala (c. 863-916 A.D.) again Pala domination over Mithila. granted from Mudgagiri (Monghyr) a village in Tirabhukti to the Shrine of Siva. The Bhagalpur copper Plate of Narayanapala - Guravamigra was holding a high office-that of a dutaka of a royal grant. After his accession Narayanapala became reconciled with the ministerial family and pardoned Guravamisra for the part that he or his father might have played during the internal troubles in the family. The Dighwa-Dubauli plate was issued by Mahendrapala -a village grant about 40 Kms. South east of Gopalaganj in the Saran District- , hold of Mahendrapala over North Bihar. His last known date is 907-08 A.D. Mahipala's authority over Tirabhukti is proved by two identical images inscriptions found in the village of Imadpur in the Muzaffarpur. In 1019 A.D. Kalachuri Gangeyadeva was ruling over Tirhut, and therefore Mahipala I must reconquered it from Kalachuris . Nanyadevaof Mithila who came to the throne in 10th century AD. "Gaudadlivaja" -the correct reading being " Garudadhvaja", few possibility of identifying Gatigeyadeva of Tirabhukti with the Kalachuri King.Ganga or Gahga-deva, son of Nanyadeva (1097-1147 A. D.). Mithila might have passed into the hands of some other ruler than the Palas. Ramapala attempted a partial rejuvenation. Chedis of Tripuri, the Karnata's of Mithila, the Raivartas of North Bengal. the Rashtrakuta of Pithi (in Bihar), the Chandisis of Kanauj and the Senas of Eastern Bengal hammered at the Pala kingdom, which ultimately disappeared by 12th century A. D. Ramapala (c. 1084-1130) conquered Mithila from Raja king of Kaivartas. Vaidyadeva's Kanauli copper-plate refer to the conquest of the land of Rampala's father by the expression "Janakabhu " and not that of Mithila. Dharmapala founded the famous Vikramasila Vihara . The History of the 84 Siddhas and that of the celebrated Maithili poems called Chariapadas clearly show how valuable the influence of the Pala rulers was in the history of Buddhism and its thought. By storming the capital of the Paramara King Bhoja I , destroying the Kalachuri King Karma, the Chalukya king Somesvara I paved the way for the Karnatic domination in North Indian politics like Gahadavalas of Kanauj (or Kashi), the Senas of Bengal and Nanyadeva of Mithila. Vijayasena (c 1095-1158 A.D.) made an attempt to conquer Mithila also. Nanyadeva claimed to have broken the power of Ganda and Venga- Nanyadeva's son Gangedeva, claimed to be the lord of Gauds , encounter of Vijayasena and Nanyadeva was indecisive and that Vijayasena's attempt to bring under his domination, the whole of the basic Pala Empire met with a failure in so far as Mithila was concerned Vallalasena Vallalasena (c. 1158-1179 A. D.)-Vallala Charita - dominations of Vallalasena comprised five province, viz., Vanga, Varendra, Radha, Bagdi and Mithila. Lakshmanasenu (c. 1179-1205 A. D) was perhaps one of the greatest Kings of Bengal. His court was adorned by emiment poets- Umapatidhara Maithil ,Govardhanuclrarya was certainly a Maithil. Vidyapati records the story of an actor who died while impersonating Rama's viraha before his court , an-era in Mithila after him- one Lakhanackanda in the Ragatarangini of Lochana. Chronicle of one Mukunda Sena is preserved in Nepal Durbar Library. Karnata kings were in the modern province of Bihar from even the 6th Cen. A. D,brought with him Karnatic pandits to propagate their culture. Nanyadeva brought scholars rldharadasa, the author of the Saduktikarpamrita. A great .scholar and Vidyaguru of Vachaspati, Trilochana might have come to Mithila along with the Kings of Karnata . Ajay Thakur, presently living at Vasco da Gama, Goa.is associated with Broadcast Journalism. Presently he is doing research study on Goa and Maithils. GOA IS PARASHURAM’s MITHILA
It is Sunday. About 6 pm in the evening. It is raining outside the Saibaba Temple on the outskirts of Cuchelim in Mapusa, Goa. Inside Lalan Jha clears his throat “laale laale arhul kerka aabait achi”. There is a hush. A lone voice “Bhaiya, hum sunn ney to cheliyaah, muda ahaa pher sau kahiyon”. Lalanji breaks into the song as the 25 strong crowd accompanies him. The song Maithili, the place Konkan. What is the connection. This is no ordinary temple, this is no ordinary place, this is no ordinary land. And this is no ordinary connection.
If I say Goa to You, what will come to your mind. Beautiful white beaches, white skinned angrez wearing less or no clothes lying or swimming in sea, people wearing skirt and blouse, drinking wine-beer-whisky, indulging in all vices. Let Me disappoint You. And take You to a Goa that is a part of Mithilaanchal. And it would not be wrong to say Goans are from Mithilaanchal.
The famous singer, Lata Mangueshkar comes from a small village called Mangueshi. This village is named after the resident God Shri Mangesh. An avatar of Shiva. The history of Shri Mangesh or (Shri Mangueesh or Shri Mangireesh) dates back to the Puranas. In the Ramayana we know of how Lord Parashuram wiped the Kshatriyas off the face of Earth thrice was doing penance when Rama broke Shiva’s Bow in Janakpur (Capital of Mithila / Tirhut), Parashuram stormed in to Janak's (Sita's Father) Court to kill Rama as he (Parashuram) had sworn to wipe all Kshatriyas from Earth. But when Rama told him that his (Parashuram's) time was over and that he (Ram) was his (Parashuram's) own next Avatar (both Parashuram and Ram are Vishnu's Avatar or reincarnation)...Parashuram apologised and left the court.
The Sahyadri Khand of Skand Purana says that Parshuram invited 66 Panch Gaud Brahmins belonging to 10 gotras from Trihotra (believed to be Tirhut in Bihar) to Kushasthal (now known as Kutthal or Cortalim, Goa) for performing the Yagya after wiping out the Kshatriyas. 96 families of the Goud (meaning northern) Saraswats came to the southern half of India and hence carried the appellation of 'northern' in the form of the word Goud. In view of the 96 families who formed 96 settlements in Goa - Sasashti (66) is now called Salcette, then Tissuari (30) which is now known as Tiswadi. There were further settlements in Baradesh (12 settlements) now known as Bardez where the 16th International Maithili Conference was held.
The Gowd Saraswats have built many temples in Goa like the Ramnathi temple in Loutolim, and the Mangueshi and Shantadurga temples in Kushasthali and Quellosim along with people from the other Hindu castes. Each group had brought with it the idol they used to worship and installed it in the villages donated by Parshuram out of the land reclaimed by him from the sea. The legend has it that his arrow hit Banahalli (Benaulim in Goa) where Lord Varuna (Sea) stepped back and released a fertile land. Even today, Benaulim has acres of fertile land where paddy is grown which is the only area, which has proofs of being retrieved from sea.
While the Tiswadi commune was migrants from Kanyakubja, Shashatis were from Mithila. There is a view that these settlements together were 96 and referred as Sahanavis (Saha means six and Navi means ninety) and later as Shenvis. These settlers belonged to 10 Gotras - Bhardwaja, Koushika, Vatshya, Kaundinya, Kashyapa, Vasishtha, Jamdagni, Vishwamitra, Gautam and Atri.
Those belonging to the Vatsa and Kaundinya gotra received Kushasthal as gram dan and installed in the village their family deity, Shri Mangireesh. The Purana explains that the Bramha had established the Shivalinga at Monghir in Trihotra (Tirhut) and it came to be known as Mangireesh or Mangeesh.
Once settled down, they all continued in their traditional professions of administration and education. Those Saraswats who were intelligent and lucky got royal patronage and positions in governance in due course of time. But the opportunities in these familiar professions were limited in Goa at that time. So some enterprising Saraswats branched out into the practice of trading. The successes of these pioneering Saraswat traders encouraged many other Saraswats to whole-heartedly adopt trading as a mainstream profession.
So while we are yet to see a Maithil Tata or Birla, Goa is actually led by Salgaocars, Dhempos, Timblos & Chowgule all Goud Sarwaswat Brahmins from Tirhut or Mithila. Today there are more than 2000+ Maithils who stay in Goa and can be found mostly in and around Mapusa, the shipyards dotting Zuari and in the Indian Navy. But there is a lot of commonality that still exists if not culturally then definitely genetically. Just like our Kuldevi they have a Kuldevata in each household. A lot of stress is given in the practise and understanding of vedic rituals just like us.
In habits they love the fish as we do. Just like us they lay more stress ineducation first then getting into profession. Respect to elders, joint family system above nuclear families and stress on karmakaand. Goans are quite like us.
This place is as peaceful as Mithila (all of us agree it is that part of Bihar which has very low crime rate). The umpteen number of ponds and water bodies of Goa reminds Maithils of the umpteen pokhars (pond) and dhars (streams) of the Kamala Balan plains.
So when Railway Minister Lalu Yadav announced the starting of Vasco - Patna Express on our demands, the thought that crossed my mind was isn’t it strange that our forefathers followed the same route years ago to discover Go-rashtra or Goa now, generations will take a train to recreate the historic journey”? I took the route long ago, Why don’t You? English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet Environment of outside was warm with the discussion of maintenance of wrestling spot. The game of wrestling in morning was really enjoyable. Children and youths of all ages used to gather in the morning. The ground of wrestling place was as soft as a mattress. It was made by ploughing and filtering the soil. Jhingur Babu was missing his son not finding him in the group of other children. People used to console him by reminding how important the study of his son was because of what he is apart from him. Earlier there was only one wrestling loving Thakur family in the village that came from Akkour years ago. Now there are five such families. The Thakurs have now got an equal share in the distribution of fish of dakhi pond, equivalent to a tola of village. Now there are eight families participating in wrestling considering children belonging to the same age group of Kalit. These boys had already achieved the dignity of being recognised as wrestlers. A messenger reached with a message written in Tirhuta on a bhojpatra. After giving one small bucketful of water and a lota to the messenger Jhingur Babu read the letter. It was probably an invitation for sacred thread ceremony called upanayan sanskaar. “Don’t forget to visit the fair of Paratapur”, He insisted to the messenger. He felt a true affection towards the relative related to the old generations of his family through mool and gotra. He started reading letter in his courtyard: Respected Jhingur Babu! As adorable as Lord Vishnu! Please accept Gulab’s millions pranaam (great respect) to your sacred feet. Everything is fine here. I am very pleased to announce the sacred thread ceremony of my two sons – Shree Ganesh and Shree Chandramohan. Your great grandfather and my great grandfather were classmates. My grandfather had instructed me to be in touch with people of same gotra. Any news whether it is good news or sad news should be exchanged within our villages otherwise ignorance of maintenance of ashauch may prove harmful for both of us in future. At present I would like to request presence of five of you respected thakurs in this auspicious ceremony. You are supposed to be aacharya of my elder son. The area around Partapur was visited by you so lots of people are curious to talk to you. Your arrival on the first Monday of the next month will assure the flawless continuation of all preparation. The ceremony will be started from the following Wednesday. Good bye. The sabhagachhi- the famous meeting place used to be under dense woods of Partapur at the bank of the river Balan. The river of Balaan was very deep and calm. Once a huge tree from Himalayas fell into it and blocked its way. The river was split into two parts. In this way a new river Kamala was born. The river of Balaan is flowing towards Jhanjharpur and Kamala is directed towards Maihath, Narua and Gariyar. Balan is very deep and clear. No sand peep through it; on the contrary, Kamala is not so deep but very wavy and very destructive. Sand and water started disturbing the land adjacent to this river in flood. Depth of Balan is same throughout the year. Crossing it without boat is not possible even in summer. But, Kamala is shallow enough to be crossed by pedestrians in summer. The previous spot of sabhagachhi in Partapur was destroyed by one of such destructive floods by Kamala and the sabhagachi place was shifted to the village of Saurath. But, in the age of Jhingur Babu, Partapur used to be the centre of panchkoshi- the area that conserves the authentic Mithila culture. Although Sabhagachi was shifted to Saurath later on, Partapur remained as the centre of panchkoshi. “Kalit is returning on day after tomorrow, I will take him to Akkour. The poor boy! He has been apart from family for a long time. I will take him to his maternal uncle’s place and my sister’s place this time.” Jhingur Babu thought. As per plan both father and son reached Ekkour. Jhingur Babu didn’t find this himself a stranger in this village in any respect. The usual tradition of intellectual discussion was going on in gathering of scholars there too. The topic was the British rule and Indian Army structure. Being a part of army Mangaru Babu had witnessed many wars in his red uniform. He started describing his experience of accompanying Sir Charles Napier in the British 1867-68 expedition to Abyssinia. He also described how lack of time was resulted in faded uniform in lieu of red uniform to the soldiers in the second war of Afghanistan. The same uniform became famous as khaki uniform after that. The Enfield rifles used in 1857 revolt of Indians struggling for freedom are replaced by bigger snider rifles in 1887. Mangaru Babu also talked about Congress. On the other hand Jhingur Babu became busy in listing and estimating things for coming feast. Kalit too found companions to play with. Fannu Babu from Raje village was also present among those scholars. His sister and brother-in-law were living in Ekkour so he used to visit the village quite frequently. He had not seen Kalit in that village earlier. He became curious about Kalit. When Fannu Babu came to know that Kalit was Jhingur Babu’s son he went to him. There he came to know that getting permanent employment in Jamindari, Kalit got the authority to collect cess in Mithila region on behalf of Darbhanga Raja and he was to go to Katihar for that work. Meanwhile, Kalit had also completed study of Farsi and English. As long as Kalit’s marriage was concerned, Fannu Babu was also looking for an appropriate groom for his daughter. Then it was agreed that Fannu Babu would visit Partapur Sabhagachi and give Jhingur Babu a chance to host him. But as soon as that marriage proposal was known relatives of Jhingur Babu they forced him to finally fix the marriage and complete the formality of Siddhant in Bharam. He was suspecting his wife’s refusal but, against his anticipation, his wife was filled with ecstasy when she heard that. All her worries, that had been for last four days, seemed to be disappeared at once. There were only two options of transportation- walking of feet or bullock cart. The barat started its auspicious journey- Groom in a mahfa, young people on feet and other elders on bullock cart. The group of servants were following them. A warm welcome was performed in arrival of barat at the door by the people from bride-groom side. As soon as they reached the bride-groom’s house a barber washed their feet; perfume was spread; posies were presented; and snacks were served. And then chatting was started - intellectual as well as humorous. The courtyard was venue for all rituals of marriage and the guest-area in outside place of social meeting. The conversation of barat was interrupted by some querries like “where is jewellery?”, “who will present gift to bride at the time of ghoonghat”, and “where is sari for ghoonghat?” every now and then. In this way, the environment of courtyard as well as the environment of outside of the house was filled with joy till 5 o’clock of the morning. The sacred thread of marriage was tied on the couple’s arms that remained for four days. After that marriage was completed. After few days passed, Jhingur Babu informed the auspicious day and Kalit returned to his parent’s place from in-law’s house. Now he had to start for Katihar. It was an emotional moment for Kalit to apart from his mother and other people of the village. He started to Katihar after bidding them bye. Crossing the area destructed by the river of Koshi Kalit reached Katihaar and became expert in his work very soon. Due to overburden of work he called his cousin and nephew to share the work. It didn’t take time to gain good fame for Kalit. People living in that area had very bad experience regarding the final settlement of Jamindari. Kalit had removed the corruptions in the work. But the destiny had decided something else for him. Kalit’s mother died before the second marriage that is arrival of bride in her in-laws house. She had many dreams about her daughter-in-law. Sometimes she used to say that she would fight with her daughter-in-law to test Kalit that whom he would support. Jhingur Babu stared being very miserable. Kalit told him to come with him. But it was not easy for him to leave the place where he had spent all his life yet. Kalit’s second marriage ceremony was settled on third year of first marriage. Jhingur Babu was little bit relaxed after that. He told to Kalit that when Kalit had been living out of house most of the time for his studies, Buchia was taking care of the parents. He was thinking that he would find a groom for Buchia himself but death of his wife had made him very weak. He added, “As you are self-dependent now. If someone has a son as young as five years old people use to tell him that he shouldn’t worry as he has a five year old son. And you’re well educated and earning son.” After handing Buchia’s hand over to his daughter-in-law Jhingur Babu died. Kalit had never seen him in so hurry. He used to be cool and patient. He used to worry about the fruits of his harvest. But separation from his life partner made him so impatient that he didn’t wait for crop harvest. While staying in Katihaar, Kalit kept on worrying about marriage of Buchia. He never had such worries when his father was alive. But now he had to prove that Buchia was not an orphan in absence of her parents. Marriage proposal couldn’t be raised till first death anniversary of Kalit Babu. After giving a grand feast to villagers on the first death anniversary of his father Kalit had started the searching the groom for Buchia. He had visited the Paratapur Sabhagachhi but he didn’t find any groom suitable for Buchia. The leave of fifteen days from work was wasted. While working he came to know about some Maithil families from Giddhhaur, Baarh etc. the villages situated on the south of the river of Ganges. He liked a boy from Baarh who was working in estate of Giddhaur. He visited Giddhaur to meet the boy without delaying. The boy possessed impressive personality. Seeking address from the boy he reached Baarh and talked to boys father. The marriage proposal from Panchkoshi had reached the village after a long time so none was intended to refuge it. After fixing everything and completing the formality of registration called Siddhant in Bharam he reached Mehath. Everyone was shocke to know this. So was the father, so is the son. Jhingur Babu had done the same thing when he fixed Kalit’s marriage; after doing Siddhant he informed everyone. Same thing is repeated by Kalit. However marriage was fixed outside the familiar area but since Kalit had been living in that area so having faith in Kalit’s experience and decision everyone in village accepted this marriage happily. The entire Tole started preparation of that marriage. Buchia would not have any problem. She was blessed with all good qualities. Either it is question of singing song or cleaning worship place she was expert. She could make thousands of Mahadev so efficiently in a minute. Wherever she would go she would enlighten the place. Marriage ceremony was finished in the best traditional way. The groom side has proposed the second marriage to be followed immediately but Kalit didn’t agree so they had to return with the print of hand of the bride. Kalit’s wife was very good and she had established sisterhood with Buchia. Buchia was also fond of her sister-in-law. The second marriage was fixed in the third year. The maid who was sent with Buchia to her in-laws place started explaining about that place. Kalit’s wife became emotional. She used to ask Kalit about the village of Barh. Everything can be settled by time. Buchia had come twice or thrice from her in-law’s place, her sister-in-law became relaxed. In this way Kalit had become alone again. He had to spent the threatening nights with his wife, two daughters and a son on the bank of the Mahadev pond during the earthquakes of 1934. After that he went to Katihaar again. The reason was the consequences of several earthquakes that had been occurring for a month. But wife had started worrying about the house. His old house was destroyed in the earthquake so Kalit had made a new house on the side of the fulwadi. He established his new house in the new land after giving the old land to his relatives. He got one more son and one more daughter afterwards. Family life of Kalit had started going on as usual. Good days don’t take time to pass. His daughters grew as well. However own child always seems to be a child but it was time to arrange marriages for daughters. His first daughter got married to Kachhabi and the second one to Kharak. Family of Kachhabi was also employed in Raja’s place. It was a royal ceremony, horse, mahfa etc. etc. But the first daughter died while giving birth to her daughter who started living with Kalit’s family. However, she was also not blessed with long life and died at the age of five years after being suffered by a stomach pain. Kalit Babu kept on witnessing all this facts of life and deaths. Sometimes the villagers were suffering Cholera sometimes Plague and many more. As soon as one dead body was burned another death used to be noticed. But Kalit’s family was untouched. Kalit had been rewarded by promotion and growing fame every now and then. His cousin and nephew’s family were living with him as usual. His both sons were studying in Kejariwar High School. After finishing marriage ceremony of his third daughter in Aamarupi, a village near Tamuria, he became relaxed. His elder son got married and he had full confidence in his younger son’s academic talents. But he also knew that his younger son was very superstitious. Because once a rumour spread that in dense fields of gram some miserable things used to happen then his younger son went to see that. When it was time to select one subject from Science and Arts Kalit Babu agreed with his younger son to opt Science. Many people told him that Satyanarayan Babu and many boys couldn’t pass in science so they had to restart by selecting Arts. But Nand didn’t agree. Rather, he had opted for Maths amongst other Science subjects. Kalit thought that by studying science Nand would not believe in the invisible but omnipresent God anymore. Kalit seemed to be very carefree after that. Once he returned from Katihaar and was washing his hands after coming from toilet , suddenly lota fell out from his hand and he himself fell down on the ground. His wife ran to him but it was too late. Life comes once and goes once as well. Nand had witnessed his father’s death. This form of death had always remained unique and mysterious for Nand. The authenticity of Scientific principles were diminishing in front of the power of almighty God for Nand. (c) २००८ सर्वाधिकार सुरक्षित। (c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। 'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx आऽ .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ’विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ अगस्त २००८ (वर्ष १ मास ८ अंक १५) http://www.videha.co.in/मानुषीमिह संस्कृताम् 81
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