'विदेह' ०१ सितम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ९ अंक १७ ) एहि अंकमे अछि:- श्री रामाश्रय झा 'रामरंग' (१९२८- ) प्रसिद्ध ' अभिनव भातखण्डे' जीक मैथिली रचना "विदेह"क लेल। १.संपादकीय २.संदेश ३.मैथिली रिपोर्ताज- जितेन्द्र झा रिपोर्टिंग-(बाढ़िपर विशेष)- मैथिली रिपोर्ताज- नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक- आर्थिक- राजनीतिक- सांस्कृतिक समाचार। लन्दनसँ ज्योतिक रिपोर्ट ४. गद्य - कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर "शशि" २. श्री कुमार मनोज कश्यप श्री प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्य यायावरी- कैलास कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी शोध लेख:हरिमोहन झा समग्र जितमोहन झा-महिला-स्तंभ कोसी गद्य (बाढ़िपर विशेष)1.डॉ गंगेश गुञ्जन 2. सुशांत झा 3. बी.के.कर्ण. 4. शक्ति शेखर 5. ओमप्रकाश झा ५.पद्य १.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) १. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा ३. श्रीमति ज्योति झा चौधरी पंकज पराशर शैलेन्द्र मोहन झा महाकाव्य महाभारत (आगाँ) प्रकाश झा कोसी पद्य (बाढिपर विशेष)-स्व.रामकृष्ण झा “किसुन”, विनीत उत्पल, कोसी लोकगीत. ६. मिथिला कला-संगीत(आगाँ) ७.पाबनि-संस्कार-तीर्थ -श्री प्रफुल्ल कुमार सिंह "मौन" आऽ नूतन झा ८. महिला-स्तंभ- कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृतिक संग खिलवार- जितमोहन झा ९. बालानां कृते- १०. पञ्जी प्रबंध (आगाँ) पञ्जी-संग्राहक श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी ) ११. संस्कृत मिथिला १२. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ) 13. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- Videha Mithila Tirbhukti Tirhut... The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani and poem by Jyoti 14. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.) Bottom of Form VIDEHA MITHILA MAITHIL MAITHILI NEWS SERVICE Mithila SportsMaithili AcademyRadhika JhaRajkamal JhaMithila SanskritNyayaNavya NyayaJnanapithaYajnavalkyaLalitKarpooriKarpuriVaidehiVidehSitaJhaKanthKarnLabhVaisaliAngaPanjikarMithilaSaptariMaithiliPurniaSaharsaPurneaBhagalpurJanakpurDarbhangaJhanjharpurMadubaniJhanjharpurkantipurBiharSamastipurBegusaraiMonghyrMungerMaithilBiratnagarMadhepuraSitamarhiRajbirajSupaulMithila PaintingMadhubani PaintingChamparanMuzaffarpurCiil MysoreSahitya AkademiSahitya AcademyBaghmatiGandakBagmatiKosiKamlaBalanMaithilaKarn KayasthaMaithil BrahminChamparanKhagariaVidyapatiChetna SamitiMuzaffarpurVidehaTirbhuktiTirhutRohtaraSarlahiMobitarimohitariSaptariMotihariMorangMadheshDhanushDhanushaBanailiMadhepurTamuriaMonghyrAndhra TharhiThadhiGonghardihaNirmaliLaukhaJaynagarLokhiVidyapati NagarKatiharRohataraSarilahiMohitariSaptariMorang American Chronicle - Lalu Prashad Yadav now in Land scam ! powered by Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi http://www.videha.co.in 'রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা विदेह मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Maithili Fortnightly e Magazine Top of Form विदेहक नव-पुरान अंकमे ताकू (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा रोमनमे टाइप करू)। Bottom of Form Top of Form एहि पृष्ठ पर देल गेल मिथिला आऽ मैथिलीसँ संबंधित साइट सभमे ताकू (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा रोमनमे टाइप करू)। Bottom of Form मिथिला रत्न मिथिलाक खोज विदेह पुरान अंकक आर्काइव रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एतय प्रकाशित रचना/संग्रह सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ संस्कृत-अंग्रेजी अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार विदेह ई पत्रिकाकेँ छैक। महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे नवम अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ' रहल अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल, एकर सूचना 'विदेह' द्वारा श्री नचिकेताजीकेँ देल गेलन्हि। अहाँकेँ ई सूचित करैत हर्ष भए रहल अछि, जे श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। महत्त्वपूर्ण सूचना (५): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्वपूर्ण सूचना (६): ७ सितम्बर २००८ केँ मिथिलांगन संस्था द्वारा श्रीराम सेन्टर, मण्डी हाउस, नई दिल्लीमे साँझ पाँच बजेसँ मैथिली नाटक-गीत-संगीत संध्याक आयोजन होएत। १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि। मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। १२ सितम्बर २००८ केँ कोशी, बाढ़ि आऽ दिल्ली एहि विषयपर संस्था राजेन्द्र भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्लीमे एकटा सेमिनारक आयोजन कए रहल अछि। विदेह (दिनांक १ सितम्बर सन् २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:९ अंक:१७) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक १७, दिनांक १ सितम्बर सन् २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ आइ काल्हि जूझि रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओऽ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। ओतुक्का लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओऽ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता, चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आऽ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक एहि बेरक प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि! पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आऽ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आऽ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन आएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक? सामयिक घटनाक्रम- कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्धक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त। एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्धमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ध लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आऽ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल अछि। आऽ ई करण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आऽ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आऽ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आऽ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल अछि। भीमनगर बैरेज आब एकटा कोशीक सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल। राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौरा करैत अछि आऽ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आऽ ओऽ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौरा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आऽ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे, नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आऽ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ, एहिसँ पार पाएब संभव अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जाऽ रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि। उपाय की हो? कुशेश्व्रर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की हो? दामोदर घाटीक आऽ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आऽ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि। नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब। एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ध बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आऽ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आऽ त्वरित समाधन। आऽ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब। आऽ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आऽ ओऽ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत। कमला धार नहरिसँ लाभ हनि- एक तँ कच्ची नहरि आऽ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि? ई बान्ह बनि जाइत अछि आऽ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आऽ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे पिपराघाटमे १९५४ मे मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी तक बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आऽ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए! स्कूल कॊलेजमे छुट्टी गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? एहि अंकमे: बाढ़िपर विनीत उत्पलक पद्यक संग कोसी लोकगीत आऽ स्व.श्री रामकृष्ण झा "किसुन" केर पद्य सेहो देल गेल अछि। बाढिपर सुशान्त झाक आऽ शक्ति शेखर जीक निबन्ध सेहो देल गेल अछि। श्री गगेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर दोसर खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो। वरिष्ठ साहित्यकार वैकुण्ठ झाजीक पद्य सेहो अछि। कवि रामजी चौधरीक अप्रकाशित पद्य सेहो ई-प्रकाशित भए रहल अछि। श्री कैलाश कुमार मिश्र जीक "यायावरी", मित्रनाथ झा जीक पद्य, नूतन जीक चौठचन्द्र पूजापर लेख, श्याम सुन्दर शशि आऽ कुमार मनोज कश्यपक लघु-कथा आऽ श्री शम्भू कुमार सिहक आऽ अनलकान्त जीक कथा सेहो अछि। श्री शम्भू कुमार सिह जीक पद्य सेहो ई-प्रकाशित भऽ रहल अछि। बी.के कर्णक मिथिलाक विकासपर लेख, श्री ओमप्रकाश जीक लेख., श्री मौन जी, श्री पंकज पराशर, श्री सुशान्त, प्रकाश, जितमोहन, विनीत उत्पल शैलेन्द्र मोहन झा आऽ परम श्रद्धेय श्री प्रेमशंकर सिंहजीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। मैथिली रिपोर्ताज लिखने छथि पुण्यधाम जनकपुरधामक युवा पत्रकार श्री जितेन्द्र झा संगमे ज्योतिजी सेहो लंदनसँ रिपोर्ताज पठेने छथि। श्री हरिमोहन झाजीक सम्पूर्ण रचना संसारक अवलोकन सेहो आगाँ बढ़ल अछि। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। पोथी समीक्षा: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि सालक दोसर पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद। “भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व। ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- "विदेह"क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। १.मैथिली रिपोर्ताज-जितेन्द्र आऽ २.मैथिली रिपोर्ताज-ज्योति १.मैथिली रिपोर्ताज-जितेन्द्र झा नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार "रे नोर एना तोँ नञि टपक" कोशी नेपाल आऽ भारतक जनता लेल एकटा अभिशापसँ कम नञि । १८ अगस्तक कोशी नदी पुर्वी तटबन्धकेँ पश्चिम कुशहा लग तीन सय मीटर भत्थन करैत बाट बदलने छल । तञि के बाद नेपालक लगभग १ लाख जनता विस्थापित भेल। वएह पानि जहन बिहारमे आएल तँ आओर विकराल रुप ल लेलक । बिहारमे पानिसं ३० लाखसं बेशी जनता प्रभावित अछि, जाहिमे २० लाख कोशी इलाकाके अछि । मृतकक संख्या हजारोमे हेबाक आशंका कएल जाऽ रहल अछि। बिहार सरकारक तथ्यक अनुसार कोशी बाढिसँ ७ सय ७५ गामक २२ लाख ७५ हजार जनता प्रभावित अछि । कोशीक कोप चीनक तिब्बत उदगमस्थल रहल कोशी नेपाल होइत बिहार कुर्सेला धरि सात सय २० किलमीटर दुरी पार करैत गंगानदीमे मिलैत अछि। कोशी नदी वार्षिक ५० अरब घन लिटर पानि गंगानदीमे पंहुचाबै-ए। कोशी नदीक वर्तमान जलाधर क्षेत्र ९२ हजार ५ सय ३८ वर्ग फ़िट मिटर अछि, जाहिमेसँ ४१ हजार ३ सय ३३ वर्ग किलोमीटर नेपालक भीतर पड़ैत अछि। कोशी योजना संचालनक ४५ वर्ष होइतो कोशी पीडितक समस्या जहिनाक तहिना अछि । नेपाल आऽ भारत दुनु देशकेँ एहि प्रश्नक उत्तर देव आवश्यक अछि- किए टुटल बान्ह ? बाढिसँ गरीब किसान भूमिहीन भऽ गेल अछि, ने लत्ता कपडा ने पेटमे अन्न आऽ ने पीबालेल पानि । किसान टकटक्की लगौने अछि कोशीक पानि पर, जे कखन घटत? जमिनदार पानिदार भऽ गेल, गाय महिष सबटा दहाऽ गेल छैक, आव बाँकी छञि मात्र जीवाक आश,,,,,। दोष ककर नेपाल आऽ भारत दुनु पक्ष एक दोसराके दोषारोपण कऽ रहल अछि । 'भारतीय प्राविधिक तटबन्ध मरम्मतिक लेल गेल छल मुदा, ओत्त काज करबाक वातावरण नञि बनलाक बाद तटबन्ध निर्माण नञि भऽ सकल, भारतीय पक्ष कहैत अछि। कोशी नदीक समझौता अनुसार नेपाल किछु नञि कऽ सकैत अछि, तेँ हमसभ मुक दर्शक छी, दोष भारतक अछि नेपाली पक्षके दाबी। भारतीय प्रधानमन्त्री डा मनमोहन सिंह बाढ़िक बिभीषिका देखिते राष्ट्रीय विपत्तिक घोषणा कऽ देलनि। बहुत रास पाई आऽ खाद्यान्न सहयोग करबाक आश्र्वासन सेहो। मुदा कोशी तटबन्ध टुटल किए, एकर सरकारी स्तरपर कोनो तरहक जाँच-बुझक आदेश नञि देल गेल अछि। हँ नेपालसँ एहि बिषयमे बातचीत करबालेल एकटा उच्चस्तरीय कमिटीक गठन कएल गेल अछि। ओऽ समिति की बातचीत करत आऽ की निष्कर्ष निकालत भविष्यक गर्भमे अछि। क्षतिपुर्ति कोशी समझौताक अनुसार कोशी तटबन्धक सभ तरहक काज भारतक जिम्मामे अछि । तटबन्धक मरम्मति मात्रे नञि तटबन्ध टूटलासँ होबऽ बला क्षतिपुर्ति सेहो भारते देत, से सन्धिमे उल्लेख अछि । नेपालक परराष्ट्रमन्त्री उपेन्द्र यादव कोशी समझौता अनुसार भारत सरकारकेँ सभ तरहक क्षतिपुर्ति देबऽ पडतै, से कहैत छथि। सन्धिक अनुसार इलाज, पुनर्वास आऽ खाद्यान्न जेहन सहयोग भारत सरकारकेँ करक चाही। भारतीय प्रधानमन्त्री आऽ विदेशमन्त्रीसँ सहयोगक आग्रह कएल गेल आऽ ओऽ सभ एहि प्रति सकारात्मक रहल, मन्त्री यादव कहलनि। आब देखऽ के बाँकी अछि, कोशी पीडित धरि कहिआ पडोसी देशसँ सहयोग पंहुचैत छञि। नञि रुकल कटान कोशी कटान नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल गेल सभ प्रयास असफ़ल भेल अछि। कोशीक सभसँ महत्वपुर्ण मानल जाएबला स्पर बहऽ लागल अछि। नेपाल आऽ भारतीय प्राविधिक टोलीद्वारा कटान नियन्त्रणलेल कएल गेल प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। संयुक्त प्राविधिक टोलीक निगरानीमे बीस हजार बोरा बालु, गिटी राखि कऽ नदिकेँ पश्चिम दिश घुमएबाक प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। बर्षाक कारण सेहो बाढि नियन्त्रण दुरुह बनल अछि। नेपाल सरकार कोशी कटानसँ बिस्थापित भेनिहारक प्रति परिवार १५ हजार टका सहयोग देत। ई १५ हजार ब्यथित कोशीपीडितके कत्तेक सहयोग भऽ सकत ओऽ सहजहि अनुमान लगाओल जा सकै-ए। किछु मरल बहुतो निपत्ता सप्तकोशी नदी गामेक बाटसँ बह लगलाक बाद विस्थापित भेनिहारसभ एखनो अपन परिजनक खोजिमे अछि । हरिपुर, श्रीपुर आऽ पश्चिम कुशाहासँ विस्थापित सभ अपन घर परिवारक सदस्यके ढुंढि रहल अछि। सुनसरी प्रशासन एखनधरि ५ गोटेक मृत्युक पुष्टि कएलक अछि। मुदा एखनो चारि सय गोट सम्पर्कविहीन अछि। दोसर दिश कोशी बाढ़िसँ विस्थापित आब पेटझरीक चपेटमे आबि गेल अछि। पानि गन्दा भऽ गेलाक बाद विस्थापित शिविरमे पेटझरी आऽ मुँहपेट जाएव विकराल रुप लऽ लेने अछि। विस्थापित एक बालक सहित दु गोटक पेटझरीसँ मृत्यु भेल अछि। मृत्यु भेनिहारमे श्रीपुर-३ के ५६ वर्षीयय तेजन सदा आऽ ६ वर्षिय रम्बा सदा अछि। सुनसरीक विभिन्न २९ शिविरमे एक हजार ५ सय गोट एखन बिमार अछि। अधिकांशमे पेटझरी, निमोनिया, बोखार आऽ छातीमे इन्फ़ेक्सन देखल गेल अछि। रोगीमेसँ १२ गोटक अवस्था चिन्ताजनक रहल, उपचारमे संलग्न चिकित्सक जनौलक अछि । कत्तेक बिपत्ति ! बाढ़िसंगहि सप्तरी जिलामे सर्पदंश बढि गेल अछि। सर्पदंशसँ शुक्रक राति आओर एक गोटेक मृत्यु भेल अछि। भादव महिनामे सांप कटलासँ मरनिहारक संख्या ६ भऽ गेल स्थानीय जनस्वास्थ्य कार्यालय जनौलक। खेतमे काज कऽ रहल स्थानीय रामकृष्ण यादवकेँ सांप कटने रहन्हि। इलाजक लेल सगरमाथा अंचल अस्पताल लऽ जाइत काल हुनक मृत्यु भेल। एहिसँ पहिने फ़किरा ३ क ४५ बर्षीय रामअशिष यादव, पत्थरगाडा ७ क १४ बर्षिय बमभोला यादव आऽ महादेव ८क १२ बर्षीय घनश्याम इसरक मृत्यु भऽ चुकल अछि । बिहारक बाध्यता कोशीक जलस्तर बढ़लाक बाद बिहारक स्थिति आओर असहज भऽ गेल अछि। बिहार सरकार वायु सेनाक ४ हेलिकप्टर, ८ सय ४० नाव आऽ सेनाक मदतिसँ युद्ध स्तरमे राहत कार्य भऽ रहल बतौलक अछि। मुदा बाढिपीडित लाखो जनता एखनो बाढिमे फ़ंसल अछि। सरकारी सहयोग समेत अपर्याप्त रहल, बाढिपीडितक कहब छञि। बिहार सरकार एखन धरि कोशी क्षेत्रमे २८ आऽ समुचा राज्यमे ७६ गोटेक मृत्यु भेल जनौलक अछि। मुदा प्रभावित इलाकामे स्थानीयवासी बहुतो शव दहाइत देखल गेल कहैत अछि। बिहार सरकारक तथ्यांकमे कोशी बाढ़िसँ ७ सय ७५ गामक २३ लाख जनता प्रभावित भेल कहल गेल अछि। मातृभाषाक मोह २३ अगस्त । नेपालमे मैथिली भाषा साहित्य पाछु हेवाक कारण शाहवंशीय राजाक गलत प्रवृति रहल बताओल गेल अछि। नेपालमे शाह वंशीय राजाक शासन शुरु होइते मैथिली भाषा साहित्य आऽ संस्कृतिसँ भेदभाव शुरु कएल गेल कहल गेल अछि। मैथिली साहित्य परिषद सप्तरीक अध्यक्ष हरिकान्त लाल दास शाह वंशक शुरुवातेसँ मैथिली भाषा साहित्यक विकासमे अवरोध सॄजना भेल बतौलनि। गणतन्त्र नेपालमे जँ सभ भाषा साहित्यक उत्थान हएत तहने नव नेपालक सार्थकता हएत हुनक कहब छन्हि। मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार दिवसमे आयोजित कार्यक्रममे प्रमुख अतिथि दास शाहवंशपर मैथिलीसँ भेदभाव करबाक आरोप लगौलनि। तहिना मैथिली साहित्य परिषद्क उपाध्यक्ष देवेन्द्र मिश्र मातृभाषा मैथिली होइतो अंग्रेजी, नेपाली, हिन्दी सहितके अन्य भाषा दिश आकर्षित हएव मैथिलीक लेल हितकर नई अछि कहलनि। "आब त गामक अशिक्षित, दलित आऽ गरिव वर्ग मैथिलीके जीवन्तता द रहल अछि" मिश्र आगु कहलनि। मधेशी कानुन व्यवसायी समाजक केन्द्रिय अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी भाषिक क्रियाकलापमे दलित वर्गकेँ सेहो समेटल जाए से सुझाव देलनि। कार्यक्रममे मैथिली पत्रकार परिषदक अध्यक्ष श्यामसुन्दर यादव, उद्योग वाणिज्य संघ सप्तरीक महासचिव सुरेश कुमार सिंह, पत्रकार हेमशंकर सिंह मन्तव्य ब्यक्त कएने रहथि। मैथिली बाल प्रतिभा पुरस्कार दिवसक अवसरमे शनिदिन राजविराजमे सात गोट मैथिली बालकविकेँ पुरस्कृत कएल गेल अछि। मैथिली कवि परिषदक अध्यक्ष महेन्द्र मण्डल "बनवारी" कृष्णजन्माष्टमी तथा अपन जन्मदिवसक अवसरमे बालप्रतिभा पुरस्कार स्थापना कएने छथि। एहि बेरक बाळ प्रतिभा पुरस्कार श्यामसुन्दर साह, विकास कुमार मण्डल, राघवेश देव, आकाश कुमार मण्डल, अन्जु यादव, सोनु दास आऽ विवेक कुमार मण्डलके देल गेल । २.मैथिली रिपोर्ताज-लन्दनसँ ज्योतिक रिपोर्ट ब्रिटिश लाइब्रेरी मे रामायणक परचम इंगलैण्डके राजधानी लन्दनके ब्रिटिश लाइब्रेरीमे आइ काल्हि रामायणके परचम फहरायल अछि।१६ मई सॅं १४ सितम्बर २००८ तक चलऽ बला अहि प््रादर्शनीक विज्ञापन लाइब्रेरीक बाहरी देवारक उपरि बीच लन्दनके मुख्य सड़क पर लागल पैघ बैनर के रूपमे विश्वके सबसऽ पैघ महाकाव्य रामायणक महत्त्व उद्घोषित कऽ रहल अछि। रामायणक समीक्षा तथा इतिहासक संसोधन पर विभिन्न विद्वानक लिखल अनेको पुस्तक सेहो प्रदर्शित अछि। पुस्तक सहित भारतीय चित्रकला सऽ शोभित विभिन्न वस्तु जेनाकि कप, छत्ता, कुशन, ग्रीटिंग कार्ड, बैच सब राखल अछि।अन्दर के गैलेरी मे प््रावेशे मे एक पैघ स्क्रीनपर सम्पूर्ण रामायण कहल गेल अछि तथा प्रसंगक अनुसारे मेवारक चित्रशैलीमे चित्रक स्लाइड देखायल गेल अछि। ई मेवाड़के राणा जगत सिंह (१६२८-१६५२) रामायणक मेनुस्कृप्ट पर आधारित अछि।मेवाड़क राजघराना सऽ ताल्लुक राखऽ वला ससोदिया राजपूत सबहक कहब छै जे ओ सब रामक वंशज छैथ।ताहि हिसाबे ई रामायण हुनकर सबहक पारिवारिक कथा छैन। अहि स्क्रीनक बगलमे रामायणक महत्व एवम् ओकर कथाके छोट रूपमे बताबऽके सराहनीय प्रयास सेहो कैल गेल अछि।करीब बारह प्रसंग उल्लेखित अछि-रामक बाल्यकाल, रामक वनवास, वनमे जीवन, भरत मिलाप, सीताहरण, सुग्रीव मिलन, सीताक ताक, हनुमान द्वारा सीताक भेटनाइ, लंकामे प्रथम आक्रमण, राक्षस एवम् मायावी सबसऽ युद्ध, अंतिम युद्ध, एवम् सीताक वापसी। अन्दरके माहौल त मानू पूर्णत: सतयुग पहुँचा देत। लाल़ संतरा पीयर रंग सॅ भरल स्थान ताहिपर सऽ मध्यम रौशनी तकर बीच दशमुख रावणक पुतला आ सबतरि सौ स बेसी कागज पर कैल चित्रकारी पत्थड़क नक्काशीक फोटो किछु कपड़ा पर कैल १९सम शताब्दीक चित्रकारी सेहो। चाऊ नाचमे उपयोग हुअ बला कागज के लुगदी सऽ बनल मुखौटा छलजे काफी चकमक रंग सऽ रांगल छल। चाउ नाचक विडियो सेहो छल।चाउ नाच झारखण्ड उड़िसा आ पश्चिम बंगालक मिलक स्थान पर के जनजाति सबहक संस्कृति छै।तकर बाद कत्थकलीक मुद्रामे पुतला राखल छै।केरलमे प््रासिद्ध शैडो प्ले के विडियो चलैत रहै छै। अनेको शैडो पप्पेट राखल अछि।शांगरी रामायण के दसटा प््रासंगक चित्र अछि जे हिमाचल प्रदेशक कुलु प्रदेश सऽ आयल छल। अहिमे अंगद द्वारा श्रीरामके लंकाक विवरणक प्रसंग दुहरायल छल। तकर बाद अनेको मैनुस्कृपटमे वाल्मिकी रामायणक कश्मीरी मैनुस्कृप्ट तथा पटना के वैष्मन दास द्वारा १७८५ ईसवीमे बनायल चित्र शामिल अछि। सबसऽ पैघ आकर्षण छल उन्नीसम शताब्दीक बनल कपड़ाक पेटिंग।करीब ७' लम्बा आ ७' चौड़ा सूती कपड़ामे आन्ध्रा शैलीमे पेटिंग कैल अछि जाहिमे बामा कात नीचासॅ रामक जन्मसॅ रामायणक क्रमिक प््रासंगके वृताकार रूपस देखायल गेल अछि।बीचमे पैघ चित्र अछि राम सीता सहित रामक राजदरबारके।तहिना ७' बाइ ५' आर ७' बाइ १०' लम्बा कपड़ापर सेहो पेटिंग कैल गेल अछि।अहिसब मे रामायण तेलुगु मे लिखल अछि।श्रीलंकासऽ प््रााप्त कपड़ाक पेण्टिग सेहो अछि।परन्तु सब पेटिंगमे रामायणक उत्तरकाण्ड नहिं देखायल गेल अछि। लव-कुशक मूर्तीक फोटो जरूर अछि। मूर्तीक फोटोमे आठम शताब्दीक एलोराके गुफाक फोटो सेहो अछि।रामायणक थाई रूपान्तरण रामाकिन देखल जा सकैत अछि।कम्बोडिया एवम् थाइलैण्डके हनुमानक फोटो एवम् मुखौटा देखल जा सकैत अछि। भारतसँ लऽ कऽ विश्वक सभ शैलीक चित्रकलासँ सज्जित एतए सीतादेवीक एकटा मिथिला चित्रकला सेहो विराजमान छल। ई छल नुका कए राम द्वारा सीताक लंकाप्रवासक दौरान पतिव्रता रहबापर अयोध्यावासीक संदेह सुनबाक प्रसंग।लव-कुशक मूर्तीक फोटो जरूर अछि। मूर्तीक फोटोमे आठम शताब्दीक एलोराके गुफाक फोटो सेहो अछि।रामायणक थाई रूपान्तरण रामाकिन देखल जा सकैत अछि।कम्बोडिया एवम् थाइलैण्डके हनुमानक फोटो एवम् मुखौटा देखल जा सकैत अछि। भारतसँ लऽ कऽ विश्वक सभ शैलीक चित्रकलासँ सज्जित एतए सीतादेवीक मिथिला चित्रकला सेहो विराजमान छल। लाइब्रेरी यूस्टन ट्यूब स्टेशन सऽ २ मिनट आर किंग्स क्रॉससऽ ५ मिनट आरामसऽ पैरे चलिकऽ पहुॅंचल जा सकैत अछि।झटकि क चली त दुओ मिनट नहि।कैम्पसके अन्दर सेहो रामायणक बैनर लागल भेटत।हॉलमे जायकाल बैगके चेकिंग होइत छै।अन्दर फोटोग्राफी के अनुमति नहिं अछि। (आभार: श्री अजित कुमार झा, लन्दन) गद्य - कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर "शशि" २. श्री कुमार मनोज कश्यप श्री प्रेमशंकर सिंह बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्य यायावरी- कैलास कुमार मिश्र उपन्यास सहस्रबाढ़नि (आगाँ)ज्योतिक दैनिकी शोध लेख:हरिमोहन झा समग्र बूढ़-बुजुर्ग समस्यापर लेख कोसी गद्य 1.डॉ गंगेश गुञ्जन 2. सुशांत झा 3. बी.के.कर्ण. 4. शक्ति शेखर 5. ओमप्रकाश झा कथा 1.शम्भू सिंह 2. अनलकांत शंभु कुमार सिंह, जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, मैट्रिक धरि गामहि सँ, आइ.ए., बी.ए.मैथिली सम्मान, एम.ए.मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु] उत्तीर्ण 1995, “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर वर्ष 2008, ति.माँ.भा.वि.वि.भा.बिहार में शोध-प्रबंध जमा (परीक्षाफल प्रतीक्षारत)। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता आ निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे, शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे कार्यरत। दूभि 09 मई 2008 क बात थिक। गाम गेल रही। साँझ चारि बजे तरकारी किनबा आ घुमबाक लाथे तिरंगा चौक दिस चलि गेलहुँ, घुरैत काल स्कूल लग अबैत-अबैत दीया-बातीक बेर भ’ गेलैक। गरमीक दिन छलैक मोन भेल कनी काल स्कूलक ओहि प्रांगणमे सुस्ता ली जतय कहियो बैसि हम अपन पाठ याद करैत रही। जहिना बैसबाक उपक्रम कयलहुँ कि एकटा अप्रत्याशित स्वर सुनबामे आयल... हे बाउ! ओतय नहि एमहर आउ। हम चौंकि गेलहुँ, देखैत छी तँ सरिपहुँ एकटा स्त्री हमरा सोझामे ठाढ़ छलीह आ बैसबाक आग्रह क’ रहल छलीह। हम बैसि गेलहुँ, हमरा सम्मुख ओ स्त्री सेहो बैसि गेलीह। हम साश्चर्य ओहि स्त्रीकेँ देखय लागलहुँ जिनक रूप-रंग किछु एना रहनि---हरितवर्णक शरीर ताहिपर हरियर रंगक मैल,पुरान-सन साड़ी जे कहुना हुनकर स्त्रीयांगकेँ झाँपने रहनि, ताहूमे कतोक ठाम पियन लागल, शेष शरीर उघारे बुझू। सम्पूर्ण शरीरमे छोट-पैघ घाव जाहिसँ पीज बहैत रहनि। एक-दू ठाम मैला सेहो लागल, जे दुर्गन्ध करैत छल। बामा जाँघ पर ढ़ल-ढ़ल करैत फोका, दहिना जाँघ पर गोदना जकाँ कोनो विशिष्ट आकृति, दुनू हाथ नोछड़ल जकाँ, माथक केश गोबरछत्ता जकाँ जाहिमे शिखर, पान-पराग, तुलसी, रजनीगंधा, माणिकचंद गुटखा, आदिक फाटल-चिटल पुड़िया, अखबार, कागदक टुकड़ी, जड़लका सिगरेटक पुत्ती आ टुकड़ी, सुखल गोबर, सूगरक मैला आदि-आदि सभ ओझरायल। एहि नारीक विचित्र ओ दयनीय दशा देखि हमर उत्कंठा बढ़ि गेल। हम पुछलियनि-- अहाँ के छी? ओ कहलनि-- हम दूभि थिकहुँ। वैह दूभि जाहि पर अहाँ एखन बैसल छी। वैह दूभि जतय बैसि अहाँ नेनपनमे नीरजक कविता पढ़ैत छलहुँ “यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनो तीरों से चल रहा राह मनमानी है...।” हम फेर पुछलियनि –अहाँक एहन दुर्दशा किएक ? ओ बजलीह--- बाउ, हम देखि रहल छी जे अहाँ तखनसँ हमर अंग-प्रत्यंगकेँ खूब नीक जकाँ निहारि नेने छी। पहिने अहाँ बताउ, हमरा सुनबामे आयल अछि जे अहाँ साहित्यमे उच्च शिक्षा प्राप्त केने छी, ओहुमे मैथिली सन सरस साहित्यमे। हम कहलियनि—सत्ते कहलहुँ। तखन संभव भ’ सकय त’ हमर एहि दयनीय दशाकेँ अहाँ कोनो पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित करबा दिऔक। आ ओ आश्वस्त हैत बाजय लगलीह—बाउ, हमर शरीर स्कूलक एहि हातामे पसरल दूभिक प्रतीक थिक तैँ हरियर। हमरा माथ पर जे अहाँ गुटखा, सिगरेटक टुकड़ी, अखबार आ कागदक टुकड़ी देखैत छी से एहि स्कूलक छौंड़ा-छौंड़ी सभक किरदानी थिक, हम अहाँकेँ कहैत जाइत छी आ अहाँ एमहर-ओमहर नजरि दौड़ा-दौड़ा क’ देखने जाउ....। हमर देह जे घावसँ दागल अछि से सिगरेटक जड़लका पुत्तीसँ, हाथ जे नोछड़ल देखैत छी से थिक मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकरक किरदानी, ओ सभ दिन एतय आबि छिल्ला छिलैत अछि, दिनमे कैक बेर सूगर, महिस, गाय, बकरी आदि हमरा दूषित करैत रहैत यै, बाम जाँघ पर ई ढ़ल-ढ़ल फोका थिक वैह मंगरूआक लोकक किरदानी, ओ काल्हि राति चूल्हिक अँगोरा हमरा देह पर फेंकि देलक, आ हमरा दहिना जाँघ परक ई चेन्ह जकरा अहाँ गोदना बुझि रहल छी से वस्तुतः कोन चीजक आकृति थिक से हमरा कहितहुँ लाज लागि रहल ऐ, साँझहिकेँ, माने एखनसँ कनी कालक पश्चाते देखबैक जे एहि गामक गँजेरी छौंड़ा सभ हेज बनाकेँ आओत, सिगरेटमे भरि कए गाँजा पीयत आ हमरा झरका-झरका कए एहन अश्लील आकृति बनबैत अछि, हे! ओहिठाम देखियौक..., ई जे मैला देखि रहल छी, से थिक एहि आस-पड़ोसक स्त्रीगणक काज, कने रतिगर भेलाक बादे एक दिस सँ पथार जकाँ बैसि जाइत छथि। हे! ओमहर देखियौक हत्ताक कछेड़मे... की कहू बाउ, जीयब दूभर भ’ गेल अछि। (एकटा दीर्घस्वास लैत) ओ फेर बाजय लगलीह--बाउ, अहाँकेँ अपन नेनपनक बात स्मरण अछि ने ? ताहि दिन प्रातः 10 बजे (प्रायः) स्कूल पहुँचलाक पश्चाते सभसँ पहिने सरस्वती वन्दना होइत छलैक जाहिमे शिक्षक-छात्र सभ क्यो भाग लैत छलाह। तकरा बाद श्रीवास्तव मास्टर साहेब सभ नेनाकेँ एक पतियानीसँ बैसा दैत छलाह, आ ओसब नेना एकहक टा कागद आ आन-आन सभ प्रकारक गंदगी सभ चुनि-बीछि लैत छल। हमर काया एकदम साफ भ’ जाइत छल। कक्षा सभमे जखन हाजरी होइत छलैक तँ नाम पुकारल जाइत छलैक, हरेराम, युगलकिशोर, शंभु, कुमारसंभव, चन्द्रकला, रहीम, कौशल्या, कतेक मधुर आ सार्थक नाम! सुनि कए मोन तृप्त भ’ जाइत छल। साँझ के नेना सब कबड्डी आ खो-खो खेलाइत जखन गिर जाइत छल तँ हम ओकरा बेसी चोट नहि लागय दियैक, वात्सल्यक अनुभव करैत छलहुँ तहिया। शनि केँ विशेष आयोजन होइत छलैक। शनिचराक गुर-चाउर बाकुटक-बाकुट नेना सभ खाइत छल, की कहू बाऊ, अहाँ सभक हाथ सँ गिरलाहा गुर-चाउर खयबा लेल हमहुँ शनि दिनक प्रतीक्षा करैत छलहुँ। दोसर पहरमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक। “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस ककर...। कखन हरब दुःख मोर हे भोला बाबा... । दुनियाँ मे तेरा है बड़ा नाम, आज मुझे भी तुमसे पर गया काम....।” अहाँकेँ तेँ स्मरण हेबे करत बाउ रमाकान्त एकबेर गयने छलाह “चल चमेली बाग मे मेवा खिलाऊँगा.....” ताहिपर मोलवी मास्टर साहेब हुनका चुत्तर पर ततेक ने छौंकी मारने रहनि जे बेचारेक सभटा मेवा घोसड़ि गेल रहनि। आ अहाँकेँ ओ अन्त्याक्षरी वला बात याद अछि की नहि? तहिया अन्त्याक्षरी मे कविताक पद्य सभ पढ़ल जाइत छलैक, अहाँ एकबेर ‘य’ पर अटकि गेल रही, गाब’ लगलहुँ—“ये मेरा दीवानापन था....”अहाँकेँ मोलवी साहब बजा कए पुछने छलाह “यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ......अहाँ काल्हिये ने याद केने छलहुँ, तँ बिसरि कोना गेलहुँ ? ” आ तकरा बाद हुनक छड़ी आ अहाँक दुनू हाथ। एकदिन रविशंकरक चुगली एकटा नेना क’ देने रहैक जे “मास्टर साहेब ई अपन ककाक जड़लका बीड़ी पीबैत रहय” एहि लेल श्रीवास्तव मास्टर साहेब रविशंकरकेँ रौद मे एक घंटा धरि अहीठाम मुरगा बना देने रहथि। ताहिदिन ककर मजाल रहैक जे एहि स्कूलक हाता मे क्यो गाय, महीस, आ बकड़ी-छकड़ी ल’ कए घुसि जायत। यैह मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकर एतय एकबेर छिल्ला छिलय बैसल रहय, मुखियाजी हुनका ततेक ने गारि-बात दलकैक, तकर ठेकान ने। ओ बजने जाइत छलीह आ हम अपन अतीतलोकमे विचरण क’ रहल छलहुँ। अचानक हम हुनका टोकि देलियनि-- अच्छा एकटा बात कहू, आइ काल्हि की एहन व्यवस्था नहि छैक एतय ? आब तँ देखै छियै जे ताहि दिन सँ बेसी सरकारक ध्यान शिक्षा पर छैक। लोक सेहो जागरूक भेल अछि शिक्षाक प्रति। हम त’ देखि रहल छी जे नीक भवन अछि, पानि पीबा लेल कल अछि, मूत्रालय अछि, शौचालय अछि, उचित संख्यामे शिक्षकगण छथि, आब की चाही ? ओ बजलीह-- औ बाउ! अहाँ जे किछु बजलहुँ सेहो साँचे थिक मुदा अहाँ आइ एलहुँ काल्हि चलि जायब। हम तँ कतोक बरखसँ एतहि छी आ प्रत्यक्षदर्शी छी, तैँ हमहुँ जे कहल आ जे कहब से फूसि नहि। एतय दूई भवन मे चारि टा कक्ष छैक आ विद्यार्थी 400 सयक करीब, एक तिहाई बच्चा कक्षमे बैसैत छैक आ शेष एहि हातामे आ ओहि बड़क गाछतर घुड़दौड़ करैत रहैत छैक, क्यो गुटखा, क्यो....., क्यो चरैत महिसक सींग पर दय ओकरापर चढ़बाक अभ्यास करैत अछि तँ क्यो........। शौचालय, मूत्रालयकेँ अहाँ एकबेर देखि अबियौक एकोटामे पल्ला नहि लागल छैक, उपरसँ ततेक दुर्गन्ध जे राम कहू ! कल अहाँ काल्हि आबि कए देखि लेब। ई तँ परसू जलघर बाबूक बेटीक बियाह छलनि ताहिलेल ओ अप्पन कल एतए लगौने छलाह, आ शौचालयमे बोराक चट्टी। काल्हिए कलो खुलि जेतैक ? एतय गड़लाहा पाइपे टा स्कूलक छैक। की कहू, कल जहिना लागै छैक पाँचे-दस दिनमे क्यो चोरा लैत छैक। हे लियह! कुकुरक झौहड़ि सुनि रहल छी ने अहाँ ? बराती सभ जे काल्हि भोरमे चूड़ा-दही खा-खा क’ पात सभ स्कूलक पछुआड़ि मे फेकने छल ततहि कुकुर सभ लड़ि रहल अछि। खैर! छोडू ई सब बात। आब पढ़ाईक व्यवस्था सुनू--- अहाँ केँ तँ बुझले हैत जे हमरा सभक दयानिधान मुखमंत्रीजी कॉन्ट्रेक्ट पर कैक लाख लोककेँ बिना कोनो परीक्षे-तरीक्षे नेने मास्टर बना देलथिन, सेहो की जे गामक लोक गामहिमे शिक्षक हेताह। तैँ ढ़ोरहाय-मंगड़ू सब शिक्षक बनि-बनि एतय आबि गेल छथि, जिनकामे सँ कतोक केँ तेँ अपन नामो.....। प्रार्थना आब नहि होइत छैक। जँ कहियो काल होइतो छैक तँ चारि सय मे सँ चारिये टा नेनाक मुँहसँ स्पष्ट शब्द बहराइत छैक बाँकी सब आऊँ-आऊँ, ऊँ-ऊँ करैत रहैत छैक। हाजरी मे नाम पुकारल जाइत छैक-–डबलू, बबलू, डेजी, रोजी, स्वीटी.....। शनिचराक प्रथा उठि गेल छैक। सांस्कृतिक कार्यक्रम एखन धरि होइत छैक, एखनो गीत गाओल जाइत छैक—“एक आँख मारूँ तो पर्दा हट जाये, दूजा आँख मारूँ कलेजा फट जाये.........। तनी सा जींस ढीला कर.... आदि।” एक दिनक बात कहैत छी, एकटा विद्यार्थी गाना शुरू कएलक—“चोली के पीछे क्या है......” आकि सबटा मास्टर ठेठिया-ठेठिया क’ हँस’ लागलाह। मंजय मास्टर साहेब केँ नहि रहल गेलनि ओ नेनाकेँ डाँटि कय बैसा देलथिन। ताहिपर, मंतोष मास्टर साहेब आ मंजय मास्टर साहेबमे नीक जकाँ बाझि गेलनि। मंजय मास्टर साहेब कहलैथ—मेरा मानना है कि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है, अगर यही गाना गाना उस बच्चे की मजबूरी है, तो हम एक शिक्षक होने के नाते इसी गाने के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल सकते हैं, बस एक वाक्य में समझाकर की, “चोली के पीछे, ‘माँ’ होती है, जिसका अमृतपान करके हम, आप, सबके शरीर को जीवन मिला है।” एहि घटनाक बाद सभ शिक्षक मिलि कए मंजय बाबूक नव नामकरण कय देलकनि ‘मायराम’। तहिया सँ ओहि कागमंडली मे हंस सदृश्य मंजय बाबूक बुधिये हेरा गेलनि। एकटा आर गप्प सुनू, यैह पिछले शनि दिनक बात छैक, अन्त्याक्षरी चलैत रहैक, एक सँ बढ़िकए एक कटगर फिल्मी गाना सब नेना लोकानि गबैत छल, अचानक ‘य’ पर एकटा दल अटकि गेलैक….. एकटा बच्चा उठल आ कहलक, “यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल.......।” एकटा मास्टर साहेब ओहि बच्चकेँ लगमे बजौलकनि आ कहलथि-- “अहाँ काल्हिये ने अपन मम्मी-पप्पाक संग सिनेमा देख’ सहर्षा गेल रही, ओहि सिनेमाक गाना, ये गोरी गोरी बाँहे, ये तिरछी तिरछी.......,बिसरि गेलहुँ ? बड़ भोदू छी अहाँ।” दुभि रानीक कथा चलितहि रहनि की एहि बीचमे हमरा एकटा आर नारीक कर्कश स्वर सुनाए पड़ल... “गै माय के छियै ई मुनसा! ऐतेक कालसँ एतय की क’ रहल छैक? बुझैत नहि छैक जे ई लोक-बेदक, बाहर-भीतर करबाक बेर छैक?” हमर ध्यान ओमहर गेल, अन्हारमे बुझा पड़ल जे तीन-चारिटा स्त्रीगण एम्हरे बढ़लि चलि आबि रहल छलीह। हम जा एमहर ताकी ताधरि दूभिरानी निपत्ता ! हमहुँ उठि कए घर दिस चलि देलहुँ। ओहि भरि राति हमरा निन्न नहि भेल। कारण छल जे हम ई निर्णय नहि क’ सकलहुँ जे ओ सरिपहुँ दुभिए छलीह आ कि हमरा मोनक भ्रम ? जतेक सोचैत गेलहुँ ओतेक ओझराइते गेलहुँ, मुदा एकटा बात हमरा मोनमे घर क’ लेलक जे ई घटना एकटा कथाक रूप अवश्य ल’ सकैत अछि। काल्हिए हमरा मैसूर जेबाक रहय। सोचलहुँ एकर पांडुलिपि बना कए कोनो पत्रिकाक संपादक लग प्रेषित क’ देबैक, जँ ई कथा छपि गेल तँ हमहुँ अपन सीना तानि कए कहब जे “हम मैथिलीक कथाकार छी” सोझे-सोझ मैथिलीक एम.ए., पी-एच.डी. कहयलासँ कोनो प्रतिष्ठा नहि। मैथिली पढ़ि जँ मैथिलीक कथाकार, साहित्यकार नहि कहयलहुँ, तँ मैथिली पढ़बे किएक कएलहुँ ? हँ एकटा समस्या तँ रहिये गेल, एहि कथाक शीर्षक की दिऐक ? चलू जेहने कथा तेहने शीर्षक, ‘दूभि’। अनलकांत- मैथिली त्रैमासिक पत्रिका अंतिकाक सम्पादक। हिन्दीमे गौरीनाथ नामसँ लेखन। तर्पण गामक छिच्छा आब एकोराी नीक नइँ लागि रहल छै डॉタटर कामना यादव केञ्ँ। लोकेञ् अधタकी होइ छै, वंशउजाड़ौन होइ छै! अपने हाथ-पयर भकोसि कृञ्तमुख बनि जाइ छै!...मुदा एना तँ नइँ जे गामक कोनो चीन्हे-पहिचान नइँ रहय? कत' गेल ओ गाम जे उजडि़-उपटि गेल अपन भूतपूर्व गौआँ लोकनिक स्वप्ने टा मे अबै अछि?... तखन ओ अपना आँगनक क'ल लग बाथकीट आ कपड़ा राखि पछुआडि़ धरि आयल छलि। ई पछुआडि़ ओकरा पोखरिक पूबारि महार पर छलै। जत' एक टा कागजी नेबोक गाछ छलै आ ओहि मे मारतेरास नेबो लुधकल छलै। किछु पीयर-पीयर नेबो खसि क' सडि़ गेल छलै। कने हटि पतियानी सँ पाँच टा अड़रनेबा गाछ रहै। ओहू मे कैञ्क टा अड़रनेबा तेहन पीयर सँ ललौन जकाँ भ' रहल छलै जे खसेला पर भタका-भタका भ' जयतै। किछु मे तँ चिड़ै-चुनमुनी भूर सेहो तेना पैघ-पैघ क' देने छलै जे भितरका लाली लखा दै छलै। ओ भूर सब केञ्ँ ध्यान सँ देखि रहलि छलि। कि एक टा अड़रनेबाक भूर देखि ओ चिड़ैक कलाकारी पर मुग्ध भ' गेलि। ओहि अड़रनेबा मे ऊपर-नीचाँ पातर आ बीच मे कने चाकर भूर तेहन ढंग सँ बनायल छलै जेना अंग्रेजीक एक टा 'वी' अक्षर पर दोसर 'वी' उनटि क' राखल हो!...ओहि पर एक गो बगिया राखि देने पूरा भूर मुना जयतै! ओहि भूर देखि बगिया मोन पड़ला सँ ओकर अरुआयल-अरुआयल सन मोन ओस नहायलि दूबि जकाँ लहलहा गेलै। एहि बेर गाम अयलाक बाद पछिला तीन दिन मे ई एहन पहिल क्षण छलै जखन ओकर ठोर पर मुस्कीक पातर-सन रेह जगजियार भ' अयलै। पछिला तीन दिन सँ ओ एक टा ढंगक रखबार आकि चौकीदार लेल परेशान छलि। कैञ्क टा एजेंसीक दलाल सँ गप्प क' चुकलि छलि। सब कैञ्क टा ने रखबार ल' क' आयलो छलै, मुदा कामना यादव केञ्ँ जेहन ग्रामीण टाइपक काजुल आ अनुभवी रखबार चाही छल, से नइँ भेटि पाबि रहल छलै। ओकर दादा कारी यादवक अमल सँ रहि रहल बुढ़बा रामजी मंडल आब अपन बेटा-पोता लग रहय चाहै छल। ओकर पैरुख सेहो थाकि गेल छलै। जेना-तेना कारी यादव सँ मंगनी यादव धरिक जीवन तँ पार लगा देलकैञ्, मुदा तकरा बाद कामना लग हाथ जोडि़ देलकैञ्, ''नइँ बुच्स्न्ची, आब पैरुख नइँ छौ। किछु दिन हमरो बेटा-पोता संग रहैक सख पुरब' दे। '' एहि पर की कहैत कामना?...ते ँ ओ ससミमान बुढ़वाक विदाइ कर' चाहै छलि, मुदा कोनो दोसर रखबार भेटतै तखने ने?... पछिला दू मास मे ई ओकर तेसर यात्रा छलै। लगले लागल ई यात्रा ओकरा परेशान कयने छलै, मुदा ओकर समस्याक निदान नइँ भ' रहल छलै। ओミहर पूना मे ओकर タलीनिक एक-एक दिन बन्न भेला सँ जे परेशानी आबि रहल छलै, से अलगे। बापक जीबैत कामना गामक बाट बिसरिए जकाँ गेलि छलि। कैञ्क बेर तीन वा चारि साल सँ बेसी पर आयलि छलि। तहिना दू मास पहिने मंगनीलाल यादवक मुइलाक बाद जे ओ गाम आयलि छलि सेहो प्रायः दू साल सँ बेसीए पर। ई रच्छ रहलै जे ओकर बाप ओकरा タलीनिक मे मुइलै आ तत्काल गाम अयबाक झंझटि सँ बचि गेलि। नइँ तँ एसगरि जान की-की करितय? एहने ठाम भाय-भातीज, कタका-पीसा, बहिन-गोतनी आकि जाउत-जयधी बला पुरना परिवार मोन पडि़ जाइ छै लोक केञ्ँ। जे-से, ओ एसगरुआ छलि ते ँ कहियो ओकरा पर कोनो दबावो नइँ देलकैञ् ओकर बाप। तीन सँ चारि मास नइँ बीतै कि बुढ़वा अपने पहुँचि जाइ पूना। फोन पर तँ गप्प होइते रहै छलै।... बापक मादे सोचैत-सोचैत कामनाक ठोर परक मुस्की कखन ने बिला गेल छलै। ओकर नजरि चारूञ्भर सँ भटकि क' पोखरिक अँगनी दिस झुकल लताम गाछ पर चलि गेल छलै। एहि गाछक रतबा लताम तेहन ने लाली लेने रहैत रहै जेना सुग्गाक लोल कि ओकर अपने तहियाक ठोर बुझाइत रहै। लताम गाछक पात कोकडि़या गेल छलै। ड्डूञ्ल-फर एखन नइँ छलै। मुदा किछुए मास मे, कने गरमी धबिते, एकर पात ड्डेञ्र नव तरहे ँ लहलहा जयतै आ ड्डूञ्ल-फर सँ लदि जयतै एकर डारि। ड्डेञ्र-ड्डेञ्र एहि पर लुधकि जयतै डミहा आ पाकल लताम। तखन ड्डेञ्र बहरेतै एहि रतबा लतामक भीतर सँ वैह लाली। मुदा ओकर ठोर? नइँ, आब तँ बाजारक महँग-सँ-महँग लिपिस्टिको नइँ सोहाइ छै ओकरा। गाछक आत्मा डिホबा मे केञ् भरि सकैञ्ए? पछुआडि़क मारतेरास अड़हर-बड़हर, अाा-शरीफा, अनार-बेल, केञ्रा-मुनिगा सन गाछ पर सँ नजरि हटा कामना यादव पोखरिक पानि मे खेलाइत माछ दिस ताक' लागलि। चारि-पाँच टा रोहुक एक टा झुंड पैघ-पैघ सुंग डोलबैत झिहरि खेला रहल छलै। पानिक सतह पर दूर धरि खूब-खूब हलचल पसरि रहल छलै। एहि हलचल मे हेरायलि कामना दू डेग आगू बढि़ दूबिक निर्मल ओछाओन पर टाँग पसारि बैसि गेलि। ओहि दूबि पर कचनारक किछु ड्डूञ्ल खसल छलै। एक ड्डूञ्ल उठा हाथ मे तँ ल' लेलक, मुदा ओकर नजरि पानिक हलचले पर रहलै। ई हलचल ओकरा भीतर एक टा नव हलचल अनलकैञ्। ओहि हलचल संग बहैत-भसिआइत कामनाक भीतर कतेक ने अतीतक पन्ना फडफ़ड़ाब' लगलै।... ...ई पोखरि ओकर दादाक खुनायल छलै। अपन पूरा जीवन गाय-महीसक बीच गुजार' बला ओकर दादा एहि परोपट्टस्नक अंतिम अँगुठाछाप छलै। ओना रोज-रोज गाय-महीस दूहैत ओकर अँगुठाक निशान मेटा जकाँ गेल छलै। ताहि पर, गोबर-गोंत गिजलाक बाद, सदिखन ओ तीन किलोक हरौती आकि गेन्हवाँ लाठी जे पकड़ने रहैत छल, से ओकर हाथक रेखा खाय गेलै। मुदा ओकर कपारक रेखा जगजियारे होइत गेलै। खदबद करैत पंडित-पजियार आकि बाबू-बबुआन सभ सँ भरल गामक एक मात्र 'अहूठ गुआर' कहाब'बला कारी यादव ओहिना 'मड़र' नइँ कहाब' लागल छल! दूध-घीक पैसा आकि गाछ-बाँस आ उपजा-बारी सँ कैञ् गोटे सुマयस्त भेल अछि? ओहि सँ पैत-पानह बचि जाय, तँ बड़का बात!...से जेना-तेना पैत-पानह बचबैत कारी यादव स्वयं अँगुठाछाप होइतो अपन एकमात्र मँगनिया बेटा मंगनी यादव केञ्ँ शहर-नगरक कॉलेज-यूनिवर्सिटी धरि पढै़ मे कोनो कमी नइँ होअय देलक। कारी यादव सुधंग लोक छल। ओकरा नजरि मे दरोगा आ बीडीओ सँ बढि़ दुनिया मेे कोनो हाकीम नइँ छलै आ सैह ओ अपन बेटो केञ्ँ बनब' चाहै छल। मुदा मंगनी यादव से नइँ बनि सकल। ओ काशीक नामी विश्वविद्यालय मे प्रोड्डेञ्सर बनल तँ की? बापक लेल मास्टरे छल!...ओ रंगमंचक मशहूर कलाकार भेल तँ की? बापक लेल नचनिञे छल!...बियाहो ओミहरे कयलक। मुदा कारी यादव लेल धनसन। मायक चेहरा मोन नइँ छलै मंगनी केञ्ँ। बापेक रान्हल खाइत अपना हाथें बनायब सीखलक। ते ँ बापक दुःख ओकरा बेसी छटपटाबै, मुदा बाप लेल ओ किछु क' नइँ पाबय। ई फराक जे हरसाइत मंगनी बाप केञ्ँ खुश करैक खूब प्रयास क' रहल छल। ओ जखन-जखन गाम आबय, बाप लेल मारतेरास कपड़ा-लाा आ अनेक सामान आनय। मुदा ओकर बाप केञ्ँ तकर दरकारे ने रहै छलै! खरपा पहिरय बला कारी यादव केञ्ँ चप्पल-जूता सँ गोड़ मे गुदगुदी लागै। गोलगला छोडि़ कुर्ञ्ता पहिरब ओकरा कोनादन ने बुझाइ। मंगनीक आग्रह पर बाबा विश्वनाथक दर्शन करबाक लोभ ओकरा बनारस जयबा लेल उसकाबै तँ जरूञ्र, मुदा माल-जाल आ गाछ-बिरिछक चिन्ता पयर रोकैञ्। ते ँ ओ बेटा लग बनारस कहियो ने जा सकल। गाछ-बिरिछ सँ बुढ़वाक बेसी लगावक एक टा खास कारण ईहो छलै जे बेसी गाछ बुढि़याक लगायल छलै। ड्डेञ्र बुढि़याक सारा सेहो सरौली आम आ बुढ़वा धात्री गाछक बीच मे छलै जे गोहाल सँ ओकरा सुत' बला मचानक ठीक सोझाँ पड़ैत छलै तहिया। ओइ सारा पर एक टा ने एक टा तुलसी गाछ सब दिन रहै छलै। गाय-महीस दुहलाक बाद बुढवा ओही तुलसी गाछ दिस घुरिक' धार दैत छल। ड्डेञ्र नहेलाक बाद ओहि तुलसी आ धात्रीक जडि़ मे पानि ढारब सेहो नइँ बिसरै छल। मंगनी जहिया ठेकनगर भेल छल तहिया सँ बाप केञ्ँ अपने हाथे ँ भानस करैत देखने छल। ओकर कनियाँक गौनाक बाद ई सब किछु दिन लेल छुटबो कयलै, मुदा कामनाक जन्मक किछुए मास बाद ओ अपन परिवार बनारस आनि लेलक। ड्डेञ्र बुढ़वाक वैह हाल भ' गेल रहै। मंगनी एक टा चाकर रखबाब' चाहलक, तँ बुढ़वा डाँटि-धोपि थथमारि देलकैञ्, ''धुर बुडि़! हमरा देह मे कोन घुन लागल जे हम दोसरा सँ चाकरी खटायब?... एहने ठाम कहै छै, माय करय कुञ्टौन-पिसौन बेटाक नाम दुर्गादा!...'' किछु दिनुका बाद मंगनी तातिल मे गाम आयल तँ बुढ़वा केञ्ँ कने बीमार देखलक। बुढ़वा डाँड़ कने टेढ़ क'क' चलै छल आ सूतल मे कुञ्हरैत रहै छल। दिन मे कैञ्क ने बेर लोटा ल' बहराइत छल आ ढंग सँ किछु खाइतो ने छल। मंगनी कतबो पूछै, ''हौ, की होइ छअ?'', मुदा बुढ़वा सही-सही किछु बतबैते ने छलै। बुढ़वा केञ्ँ शहरक डॉタटर लग चलै लेल मंगनी कतबो जिद्द करै, बुढ़वा तैयारे ने होइ। अंत मे मंगनी खायब-पीबि छोडि़ रुसि रहल। तखन बुढ़वा मंगनी केञ्ँ मनबैत कहलकैञ्, ''रौ मंगनी, चल खाय ले। तों किऐ जान दै छही! हम मरिये जेबै तँ की बिगड़तै? आब जीविक' कोनो बान्ह-पोखरि देबाक छै हमरा?'' ''किऐ हौ बाबू, मरिक' तों हमरा कपूत कहबेबहक? कह' तँ जीविक' बान्ह-पोखरि किऐ ने दए सकैञ् छहक तों?'' मंगनीक स्वर भखरि गेलै। ''रौ मंगनी, ओइ लेल एक बोरा टाका चाही। से ने हमरा दूध-घी सँ हैत, आ ने गाछ-बाँस आकि उपजा-बारी सँ। तोहर मास्टरियो सँ नहिऐं हेतौ। कोनो दरोगा-बीडीओ भेल रहितय तखन ने!...'' कारी यादव गंभीर स्वर मे बाजल। ''हौ बाबू, तों नइँ बुझै छहक! हम दरोगा-बीडीओ सँ पैघे छिऐ हौ। तों बाज' ने जे कोन बान्ह देबहक आकि पोखरि खुनेबहक!...'' ''ठीकेञ् कहै छही रे?'' ''हँ हौ!...हम तोरा ड्डूञ्सि कहबह?'' ''बान्हक तँ एहि जमाना मे कोनो खगते नइँ छै। एक टा पोखरिए खुना तँ बड़की टा, अपना घरक पश्चिम दू बिगहा मे। मरियो जायब तँ, जुग-जुग धरि नाम तँ रहतै जे कारी जादब पोखरि खुनेलक।...'' बुढ़वा भावना मे बह' लागल छल। ''चलह, पहिने तोहर दवाइ करा दै छियह। ठीक होइते तों मटिकट्टस्न मजूर सब सँ बात करह। जहियाक दिन तों ठीकबहक तहिए सँ काज शुरूञ् भ' जेतै।'' आ से ठीकेञ् भ' गेलै। आ ओही संग एक टा चौकीदार, टेहलुक, भनसिया आकि मैनेजर जे बूझी, ताहि रूञ्प मे रामजी मंडल केञ्ँ ओ रखबौने छल। ई फराक जे तकरा बादो बूढ़वा जावत जीयलै माल-जाल रोमब, दुहब-गारब आकि गोबर-करसी; किछु ने छोड़लक। रामजी मंडल ओकरा घर-परिवारक अपन समाँग जकाँ भ' गेल छलै।...आ कारी यादवक मान-मर्यादा ततेक बढि़ गेलै जे ओ पूरा परोपट्टस्न मे 'मड़र' कहाबय लागल छल। कामना केञ्ँ ई सब बेसी सुनले छै। ओहि पोखरिक जाग जे भेल छलै तकर भोज कने-मने मोन छै ओकरा। मुदा दादाक हाथक तीन किलोक लाठीक ओ लाली एखनो खूब मोन छै ओकरा। ओहि लाठी मे चुरु भरि तेल पचाबैत कालक दादाक मालिश सेहो ओकरा मोन छै। ओ लाठी एखनो ओकरा घरक कोनो कोन मे राखल छै ठीक सँ, जुगताक'। ओकर दादा कारी यादवक मुइलाक बादे एत' ड्डुञ्सिघरक जगह पタका मकान बनल छलै। मुदा ओहि मे रह'बला रामजी मंडल टा छलै। ओकरा सँ मारते बबुआनक बीच एक गुआरक घरक ठीक सँ देखभाल नइँ भ' पबै। ताहि पर किछु मालोजाल छलै। सभ छुट्टस्न्ी मे मंगनी अबै तँ किछु ने किछु नव बिदैत भ' गेल रहै। हारिक' ओ आँगन-दलान संगे पोखरि-गाछ-माने पूरा सात बिगहाक रकबाक चारूञ् कात खूब न्नँञ्च देबाल द'क' तकरा ऊपर खूब न्नँञ्च धरि काँटबला तारक बेढ़ सँ बेढ़बा देलक। एक जोड़ा करिया गाय छोडि़ बाकी मालजाल हटा देलक। तकरा संग रामजी मंडल केञ्ँ सチत आदेश भेटलै जे गाछक कोनो फल आकि तीमन तरकारी ओ जते चाहय खाय सकैञ्त अछि, मुदा एタको पाइक किछु बेचि नइँ सकैञ् अछि। तकर पालन करैत रामजी मंडल ओकर बाग-बगीचा, बाड़ी-झाड़ी सँ पोखरि धरि केञ्ँ सब दिन खिलखिल हँसैत जेना बनौने रहल। अपने मंगनी दू-तीन मास पर आबि तकतान क' जाय। ओना ओकरा सभक सब छुट्टस्न्ी गामे मे बीतै छलै आ ओहि छुट्टस्न्ी मे माय-बापक संग कामना सेहो अबै छलि। जे-से, समय-साल बीतैत गेलै। आ एक दिन मंगनी यादव विश्वविद्यालय सँ सेवामुタत भ' सपत्नीक गाम आबि गेल। तखन कामना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली मे एमबीबीएस फाइनल क' रहलि छलि आ दुनियाँ साधारण सँ साधारण आदमीक मुट्ठस्न्ी मे अँट' लागल छलै। ओहि समय धरि दुनियाँक सब शहर मे एक तरहक बसात बह' लागल छलै आ अपना ठाँक गाम-घर खाली भ' रहल छलै। ककरो बेटा शहर बसलै, तँ बापक मरिते डीह पर नढि़या भुक' लगलै। किओ चारो दिसक कर्ज आ उकबा मे घेराय आकि दबंगक प्रताड़ना सँ डराय राता-राती गाम छोडि़ देलक, तँ किओ भूखक आवेग मे जत'-तत' पड़ा गेल। बाबू-भैया लोकनि कोनो ने कोनो कंञ्पनीक स्थानीय मैनेजर भ' अपना केञ्ँ शहरी बनाब' लगलाह, तँ किछु गोटे वातानुकूञ्लित लाक्षागृह मे सेन्ह लगेबाक प्रयास मे धोती-कुर्ञ्ता उज्स्न्जर कर' लगलाह। गाम-गामक खेत-पथार बड़का-बडक़ा कंञ्पनीक फॉर्म हाउस मे बदल' लागल छल। सस्ता कार सनक कारखाना आ केञ्मिकल्स हौज लेल पैघ-पैघ रकबा हथियाओल जा लागल छल। किसान नामक प्राणी मे सँ किछु अपने अपन लीला खत्म क' लेलक, किछु शहर-नगरक मशीन चलब' चलि गेल आ जे बचल छल तकरा मे सँ किछु मारल गेल, किछु केञ्र जीन बदलि एहन मजूर बना देल गेल जे ने शहरी रहल आ ने देहाती आ जकर ने कोनो भाषा रहल आ ने कोनो आने चीन्ह-पहिचान। सगरे नव-नव कन्वेंट, नव-नव ढाबा, नव-नव चकलाघर मिल्क-बुथ आ टेलीफोन-बुथ जकाँ खुज' लागल छलै। आ साधारण लोक 'मैन-पावर' कहाब' लागल छलै। एहने सन आफत-बसात मंगनी यादवक गाम मे सेहो आयल छलै। एही आफत मे रामजी मंडलक बेटा-पोता ओकर काजुल घरवाली धरि केञ्ँ ल'क' दिल्लीक झुग्गीवास कर' चलि गेल। मंगनी यादव जहिया सेवामुタत भ' बनारस सँ गाम घूरल छल, ओकरा अपन स्टेशन कातक दोकान मे बेसी अपरिचिते लोक भेटल छलै। साँझक झलअन्हारी मे घर पहुँच' धरि कतौ किओ एहन नइँ भेटलै जकरा सँ दूटप्पियो कुञ्शल-क्षेम भ' सकैञ्त। रामजी मंडल केञ्ँ छोडि़ ओकर आगमन ककरो लेल कोनो खबरि नइँ छलै। अगिला भोर गामक सड़क धयने टोलक एहि कात सँ ओहि कात गुजरि गेल मंगनी, केञ्ओ हाल-चाल नइँ पुछलकैञ्। ओत' कतहु ओकरा अपन ओ गाम नइँ भेटलै जकरा ओ चिन्है छल। जत' पहिने पंडित दीनबंधु झाक घर छलै, ओहि ठाम शून्य-सपाट एक टा मैदान बनि गेल छलै आ तकरा चारूञ्कात खूब न्नँञ्च देबाल रहै जकरा गेट पर एक टा पैघ सन बोर्ड टाँगल छलै, 'भटिंडा फार्म हाउस'। पंडितजीक बेटा आब जामनगर मे बैसि गेल छनि। बेटी अमेरिकी नागरिकता ल' लेने छनि। मंगनी कने आरो आगू बढ़ल, तँ देखलक जेミहर पहिने धनुकटोली छलै, ओत' पैघ सन कोनो ड्डैञ्タट्री खुजि गेल छलै जकरा छतक ऊपर तीन टा मोट-मोट चीमनीनुमा पाइप मारतेरास धुआँ छोड़ैत आसमान कारी करबाक अभियान मे लागल छलै। आ टोलाक कात सँ कलकल हँसैत बह'बला स्वच्छ-निर्मल जलधारा बला मिरचैया मे जमुना सन गन्हाइत कारी पानि तेना जमकल छलै जेना कोनो नाला। मंगनी केञ्ँ थकान भेलै आ घर घुरय लागल। घर घुरैत ओ जगह ध्यान मे अयलै जत' पहिने विशाल-विशाल बर आ पाकडि़क गाछ छलै। ओहि ठाँ लगे-लग कोनो दू गोट मोबाइल कंञ्पनीक विशाल-विशाल टावर ठाढ़ छलै। ओ रुकिक' चारूञ्भर ताक' लागल। दूर-दूर धरि देखलाक बादो ओकरा नजरि पर अपना घर लगक गाछ छोडि़ कतहु एタको टा तेहेन पैघ गाछ नइँ अयलै। जेミहरे देखलक सब किछु एकदम उजड़ल-उजड़ल सन बुझेलै। बीच टोल मे आबि एक ठाम ठमकल। बगलक दासजीक डीह पर कोनो टैंट हाउसक बोर्ड लागल छलै। कने हटि एक टा ट्रैवेल एजेंटक साइन बोर्ड टँगल छलै जकरा नीचाँ शीशाक गेटक भीतर एक टा पगड़ीवला सरदार जी कुर्ञ्सी पर बैसल छलै। तकरा दस डेग आगुक ग्राम देवता स्थान पर बजरंगबलीक एक टा पैघ सन मंदिर ठाढ़ छलै जकर दछिनबरिया देबाल पर कामोोजना जगब'बला कोनो टिकियाक विज्ञापन छलै। तकरा बाद मंगनी किछु ने देखलक आ सोझे अपना घर आबि गेल। घर मे ओकर पत्नी मुनिगाक तरकारी रान्हि रहल छलि। ओ ओकरा लग जाय अकबका गेल। रसे-रस मंगनी अपन घर आ सात बिगहाक रकबा मे घेरायल पोखरि-गाछ, पछुआडि़-महार धरि अपना केञ्ँ समेटि लेलक। बेटी कामना आ बाकी हित-मित सँ संपर्कञ् लेल ओकरा घर मे फोन आ मोबाइल छलै, रंगीन स्क्रञ्ीनबला कंञ्प्यूटर छलै जकर तार सミपूर्ण दुनियाँ सँ जुड़ल छलै। घरक पाछाँ पैघ सन आयताकार आँगन छलै। आँगनक पश्चिम-उार कोन मे चापाकल छलै। तकर पछुआडि़ मे पोखरिक महार पर मारते गाछ-बिरिछ छलै। ओहि पर सँ कखनो कोयली, तँ कखनो पड़ौकी केञ्र सुपरिचित स्वर आबै।...माने ओकर गाम ओकरा सात बिगहाक रकबा मे बन्हायल छलै। जेना-तेना समय कटि रहल छलै। कामना दिल्ली छोडि़ पूना मे प्रैタटिस शुरूञ् क' देने छलि। मुदा मंगनीक घर पर एक टा एहन कार कौआ बैसि गेल छलै जे जखने ओ दुनू प्राणी शांति सँ आराम कर' चाहय कि ओ जोर-जोर सँ टाँहि मार' लागै। भोर होइ कि साँझ, दिन होइ कि राति-कार कौआक टाँहि मारब बन्न नइँ भेलै। आ एक राति कामनाक मायक छाती मे तेहेन ने दर्द उठलै जे डॉタटरकञ् अबैत-अबैत बेचारी चलि गेलि। आ तकरा बाद एसगर मंगनी कारी यादव जकाँ बाड़ी-झाड़ी मे लागल रहय आ बीच-बीच मे कामना लग पूना चलि जाय।...मुदा रामजी मंडल तँ एहन शापित यक्ष छल जकरा लग ने किओ अबै छलै आ ने ओ कतौ जाय छल।... अनचोकेञ् कामनाक भक टूटलै । पोखरिक उतरबरिया महार परक कोनो गाछ पर नुकायल कोयली बाजि रहल छलै। कामनाक भीतर किछु उमडि़ अयलै। मुदा ओ तत्काल उठि गेलि। स्नान केञ्ँ अबेर भ' रहल छलै। भोजनक बाद ओ आराम क' रहलि छलि कि ओकर मोबाइल बजलै। एक टा नव एजेंटक कॉल छलै, ''मैडम, ऐसा कीजिए कि चौकीदार और माली केञ् रूञ्प में दो अलग-अलग आदमी को रख लीजिए। यहाँ ऐसा कोई चौकीदार नहीं मिल रहा जो आपकी प्रॉपर्टी केञ् साथ पेड़-पौधों की भी देखरेख कर सकेञ्। यूँ पोखर की मछली की देखरेख केञ् लिए मछुआरे की जरूञ्रत फिर भी रह जाएगी।'' ''नहीं, तीन-तीन आदमी रखना मुश्किल है हमारे लिए।'', कामना बाजलि। ''चौकीदार तो नेपाली ही है मगर माली जो मिल रहा है, वह एक उडि़या भाई है। ये दोनों हमारे पटना सेंटर केञ् मार्ड्डञ्त आ रहे हैं और उनकी शर्त है कि वेतन केञ् अलावा हाउसिंग ड्डैञ्सिलिटी भी चाहिए।'' बिना कोनो जवाब देने कामना कॉल डिस्कनेタट क' देलक। मुदा भीतर सँ ओकर परेशानी आरो बढि़ गेल छलै। आब एहि गाम मे गाम भने नहि रहि गेल हो मुदा ओकर बाप-दादा, माय-दादी सभक स्मृतिक गाम सात बिगहाक एहि रकबा मे बेड़हल घर-आँगन, गाछ-बिरिछ, पोखरि-कल सभक बीच छै। कारी यादव सँ मंगनी यादव धरिक नाल एतहि गड़ल छै। कारी यादवक माल-जालक गोबर-गोंत एत'क माटिक कोनो ने कोनो कण मे एखनो खादक रूञ्प मे बचल हेतै। प्रोड्डेञ्सर मंगनी यादवक कलाकार मोन एहि रकबा मे जाहि गामक लघु संस्करण केञ्ँ समेटने छल, से जरूञ्र एही ठाम कतहु ने कतहु नुकायल हेतै।... की एकरा सब केञ्ँ ओ लुटा देत?...की ओ अपन जिनगी भरिक कमाइ सँ एकर रक्षा नइँ क' पाओत? कामना केञ्ँ मोन पडै़ छै जे एक बेर ओकर पिता मंगनी यादव बड़ व्यथित मोन सँ कहने छलै, ''गाम मे जेहो गाम देखाइ छलै, से तोरा मायक मुइलाक बाद नइँ बुझाइ छै। कखनो-कखनो तँ मोन करैए जे हमहूँ सब किछु बेचि-बिकीनि ली। मात्र घर-आँगन आ गाछ-पोखरि सँ गाम नइँ होइ छै, बौआ। जखन पहिने जकाँ केञ्ओ गौएँ नइँ रहल तँ कोन गाम आ की गाम?...'' कामना किछु जवाब नइँ द' सकलि छलि तखन। मुदा एखनो मोन छै ओकरा जे ओ अपन बापक ओहि हेरायल-बेचैन आकृञ्ति केञ्ँ बड़ी काल धरि देखैत परेशान भ' रहलि छलि। एタको शホद एहन नइँ भेटल छलै तखन ओकरा जाहि सँ अपन कलाकारमना बापक मोन केञ्ँ राहत द' सकैञ्त छलि। तखन ओकरा अपन डॉタटरीक ज्ञान अकाजक बुझायल छलै। सहसा एक कोन मे राखल अपन दादा कारी यादवक कारी खटखट लाठी देखा पड़लै ओकरा। ओ उठलि ओहि लाठी केञ्ँ छुबिक' देखबाक लेल, मुदा तखने कॉलबेल जोर सँ बजलै। ओ गेट दिस पलटलि। गेट पर सी सी मिश्रा नामक एक टा मैथिली भाषी सेタयुरिटी एजेंटक दलाल छलै जे पछिला दू दिन सँ नव-नव रखबार ओकरा लेल ताकि रहल छलै। ओहि दलाल केञ्ँ ड्राइंग रूञ्म मे बैसा ओ दू मिनट बाद दू गिलास पानि ल' घुरलि। कि विनम्र सन बनैत ओ दलाल बाजल, ''डॉタटर यादव, सुनियौ! अहाँ बड़ सौभाग्यशालिनी छी जे एखनो अपन बाप-दादाक डीह पर अबै छी। हम तँ नोकरीयेक क्रञ्म मे एミहर आबि गेलहुँ। कोशीक पूबे सही, मुदा ईहो कहाइ तँ छै आइयो मिथिले ने। हम डीही छी कमला कातक। हमर जनम भेल हिमाचल मे व्यास नदी कातक एक टा अस्पताल मे। बचपन बीतल दिल्लीक यमुनापार मे आ नोकरी भेल कोलकाता मे। मैथिली तँ हम कोलकाता आबि सिखलहुँ सेहो एहि लेल जे हमर दादा मैथिलीक प्रसिद्घ लेखक छलाह आ हुनकर किताब सभक अंग्रेजी अनुवाद एखनो खूब लाभ दै अछि।...एखन कोलकतेक एजेंसीक काजें तीन मास लेल एहि क्षेत्र मे अयबाक अवसर भेटल। एहि क्षेत्र मे कैञ्क टा कंञ्पनी अपन कल-कारखाना शुरूञ् क' रहल छै, से बहुत जल्दी एत'क प्रॉपर्टीक कीमत उछल'बला छै।...'' कामनाक धैर्य चुकि रहल छलै। ओ बाजलि, ''अहाँ कह' की चाहै छी?... साफ-साफ बाजू!'' ''अहाँ अन्यथा तँ नइँ लेबै?'' ''बाजू ने!...'' ''अहाँ यैह ने चाहै छी जे अहाँक ई गाछ-पोखरि बचल रहय, सुरक्षित रहय आ अहाँक बाप-दादाक नाम...'' ''तँ?...'', कामनाक माथ पर बल पड़लै। ''देखू, ओहेन रखबार बड़ महँग पड़त जे अहाँक इच्छा अनुकूञ्ल हो। एहि लेल रखबार, माली, मल्लाह आ मारतेरास मजदूर पर खर्च कयलाक बादो भेटत तँ किछु ने, उनटे चिन्ता आ परेशानी बेचैन कयने रहत।'' ''तँ की करी?... हम बड़ परेशान छी। ओझराउ जुनि।'' ''सैह ने कहै छी!...आ लाभक बात कहै छी।...'' क्षण भरि बिलमि ओ बाजल, ''एहि ठाम एक टा भव्य रिजार्ट खोलै केञ्र अनुमति जँ दी तँ अहाँ केञ्ँ एक खोखा पूरा भेटि जायत। संगे पोखरि-गाछक सुरक्षाक गारंटी सेहो। मात्र एहि घर-आँगन केञ्ँ तोडि़ नव बहुमंजिला बनब'क अनुमति देब' पड़त। गाछ सब लग मुタताकाश मे टेबुल-कुर्ञ्सी लगा देल जयतै आ डारि सब पर जगमग लाइट टँगा जयतै। पोखरि मे दू-चारि टा छोटका नाह खसा देल जयतै जाहि पर लोक सब अन्हरियो मे इजोरिया रातिक मजा लैत नौका-विहार करत। पोखरिक बीच मे जाठिक जगह एक टा छोट सनक सुइट बनि जायत, जकर डिमांड पर्यटन स्थल सभ पर सब सँ बेसी होइत छै। से एतहु हेबे टा करतै। किएक तँ एतहु रसे-रस बड़का-बड़का कंञ्पनीक डायरेタटर, सीईओ, एनआरआई आ विदेशी मेहमानक आगमन शुरूञ् होबए बला छै।...'' ''हम अहाँक गप्प खूब नीक जकाँ बुझि गेलहुँ।... अहाँ तँ बड़ बुधियार लोक छी यौ!...तत्काल अहाँ जा सकैञ् छी, दान-पत्र हम शीघ्रे पठा देब!...'' कामना अपन आवाज सप्रयास संयत रखलक। कनेक सकपका जकाँ गेल मृदुभाषी मैथिल दलाल सी सी मिश्रा चालीस सँ बेसीक नइँ छल। गेट पार क' ओ एकबेर ठमकल, ''कने इत्मीनान सँ विचार करबै मैडम। डॉタटर छी अहाँ, ओल्ड थिंक आ भावुकता सँ किछुओ फायदा नइँ हैत। हानिए-हानि!...''आ हीं-हीं क' ठिठिआब' लागल। चालीस पार क' चुकलि डॉタटर कामना यादव मे प्रौढ़ता आ धैर्य आबि गेल छलै, मुदा तैयो ओ अपना जगह पर बैसलि नइँ रहि सकलि। ओ उठिक' दुआरि दिस आयलि। तेज-तर्रार दलाल सी सी मिश्रा लपकिक' अपन विदेशी मॉडलक गाड़ी मे बैसि गेल छल। कदमक गाछ तर थोड़ेक गरदा उडि़याबैत ओकर गाड़ी तुरंते ड्डुर्ञ्र भ' गेलै। कामना बाहरक ओसारा पर नहुँ-नहुँ बुल' लागलि छलि। कदम गाछक बाद देबालक काते-कात लागल जिミहड़, अमड़ा आ अशोक पर बेरियाक रौद खसि रहल छलै। ओहि रौद मे गाछ सभक पात-पात पर जमल गरदाक मोटका परत नीक आर की हेतह?'' रामजी मंडलक बूढ़ चेहरा पर लाजक संग हँसीक फाहा छिडि़या गेलै। ओ खिलखिलाइत उठिक' आँगन चलि गेल। तखने घर मे राखल कामनाक मोबाइल बजलै। पूना सँ ओकर タलीनिकक फोन छलै। ओ उठबैते बाजलि, ''डोंट वर्री! सुबह की ヘलाइट से आ रही हूँ। एक-डेढ़ बजे तक タलीनिक में रहूँगी।'' आ एतबा कहैत ओकर नजरि एकबेर ड्डेञ्र अपन दादा कारी यादवक तीन किलोक हरौती लाठी पर चलि गेलै। ओ लपकिक' लाठी उठौलक। लाठी मे पहिनेक लाली आ चमकि नइँ छलै। कारी खटखट ओहि लाठी पर झोल-गरदा जमि गेल छलै। भावावेश मे कामना ओहि लाठी केञ्ँ चूम' चाहलक। मुदा रुकि गेलि।... कामनाक हाथ चीन्ह' जोग नइँ छलै। पूरा हाथ कारी भ' गेल छलै। तखने ध्यान अयलै जे ओकर ओजनो आब तीन किलो तँ नहिये टा हेतै। कि एक ठाम लाठी पर कनेक दबाव पडि़ते ओकर आँगूर धँसि जेना गेलै! कि ओकरा बुझेलै जे ई लाठी कोकनि क' फोंक भ' गेल छलै आ जोर सँ पटकि देने टुकड़ी-टुकड़ी भ' जयतै!... अचांचकेञ् डरा गेलि ओ। डराइते-डराइत ओ ओहि लाठी केञ्ँ पूर्ववत घरक कोन मे राखि हाथ धोअ' कल पर चलि गेलि। बड़ी काल धरि बेर-बेर हाथ धोयलाक बादो ठीक सँ हाथ साफ नइँ भेलै। साबिकक तेल पीयल लाठी सँ आओल एक टा अजीब तरहक गंध हाथ मे समा गेल छलै। हारिक' तोलिया सँ हाथ पोछैत क्षण भरिक लेल पछुआडि़ दिस गेलि कामना। ओत' ओकरा लगलै, सब गाछ पर जोर-जोर सँ केञ्ओ कुञ्ड़हरि चला रहल छलै। पोखरि दिस तकबाक साहस नइँ भेलै ओकरा। ओ सोझे पड़ायलि घर आ जल्दी-जल्दी अपन ब्रीफकेञ्स सैंत' लागलि। लघुकथा १. श्री श्याम सुन्दर "शशि" २. श्री कुमार मनोज कश्यप श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत। मरदे कि बरदे भगवान भाष्करक प्रचण्ड प्रतापकेँ सम्हारि सकब धरती मैआक वास्ते कठिन भऽ रहल छलनि। मैञा अपरतीव छलीह। चण्डलवाक प्रलयंकारी रौद्र अवतारसँ अपने बाचथु कि अपन सखा सन्तानकेँ बचाबथु? “अपन मथा साहुर, साहुर” करबाक अवस्था सेहो नहि छल। मिथिलाक धरती थोरै छैक जे यत्र तत्र सर्वत्र हरियरी रहतै। लोक अपनो जुराएत आऽ लोकोकेँ जुरौतैक? ई कतार छै भाई। कतार। एत्त गाछ वृक्ष कत पावि? धनीमानीलोक ऐजुवा (वगैचा) लगबैत छथि। जेना लोक धीया पूताकेँ दूध पियाकऽ पोसैत अछि। तहिना पोसैत अछि एतुका सेखसभ गाछ-वृक्ष। ककरो मजाल छै जे ओहि गाछक नीचाँ सुस्ता लेत..। तुरन्त वन-विनाश कानूनक अन्तर्गत शख्त कार्यवाही भऽ जएतैक। आऽ ओऽ गाछ वृक्ष होईतो नहि अछि सुस्तैवा योग्य। एक कविक कवित जकाँ “वड़ा हुआ तो क्या हुआ लम्बे पेड़ खजुर। पंछीको छाया नही फल लागे अति दूर..” डार मोरवाक योग्य छाहरि नहि। बूझि परैत छल, दोहाक समुद्र वाफ भऽ कऽ उड़ि जाएत। सड़क उपरके अलकत्रा पघलि रहल छल। सरकार एहि गरमीक महिनामे दुपहरमे काज करबापर पाबन्दी लगौने छैक। तथापि देश विदेशक मजुरसभ अपन-अपन ओभर टाईम पका रहल छल। भगवान भाष्करसंगक महासमरमे लागल छल। धरती पुत्रलोकनि। धरती तँ आखिर धरती छैक ने। अपन जनम धरती हो कि करम धरती...। एहि रौदसँ बेपरवाह लक्ष्मण पैघ-पैघ डेग मारैत आगाँ बढ़ि रहल छल। कोनो अभेद्य लक्ष्यकेँ भेदन करबाक योजनामे आगू बढ़ि रहल चोटाएल, हारल योद्धा जेकाँ। एहि बेरक समरमे विजयश्री प्राप्त करबाक दृढ़ सन्कल्पित छल ओऽ। ओकरा ठेकान नहि छलै जे ओकर समग्र देह घामे पसिने भिजी गेल छैक। ओऽ कारी झामर भऽ गेल अछि। ओऽ बस आगू बढ़ि रहल छल, अपन गंतव्य दिस। ओकर गन्तव्य छलै, दोहाक अतिव्यस्त इलाकामे अवस्थित नेपाली दूतावास। जतए ओकर प्रेयसी गत एक सप्ताहसँ शरणागत छैक। मुदा किछुए किलोमीटरक दूरीपर अवस्थित रहलाक बावजूदो ओऽ हुनकासँ भेटि नहि सकल अछि। ओऽ सीधा दूतावासमे प्रवेश कएकऽ मुदा तुरन्ते पाछाँ घुमि गेल। चार दिवालीक ओटमे ठाढ़ भऽ जिन्सपेन्टक पछिला जेबीसँ कंघी निकाललक। केस सीटलक। कपड़ा मिलौलक। आऽ कनेक सतर्क कदमसँ दूतावासक मेन गेटकेँ पार कएलक। दूतावास परिसरमे रहल नेबोक गाछक ओटमे बैसि ओकर प्रेयसी केस झारि रहल छलै। ओएह घुरमल-घुरमल केस। सुराही सन कमर आऽ सुडौल शरीर। पीठपर करिकवा तिलसँ ओऽ आओर निधोख भऽ गेल। ओऽ ओकरे रेशमा छैक। आगूसँ देखू कि पाछोसँ। ईस्स...। ओकरा मोनमे टिस जेकाँ उठलै। मोन भेलै जे पाछेसँ जाऽ भरि पाजकँ पकड़ि ली आऽ गत ९ महिनाक हिसाब-किताब माँगी। ओऽ आगू सेहो बढ़ल मुदा रेश्माक केश जखनसँ खुजल रहैक तखनेसँ दूतावासक चौकीदार सेहो ओकरे दिस ताकि रहल छलै। लक्ष्मणकेँ हिम्मति नहि भेलै अपने प्रेयसीक हाथ धरि पकड़बाक। जहन दुनूक आँखि मिललैक तँ दुनूक नयनसँ अनन्त अश्रुधारा बहि गेलै। एक दिस लक्ष्मण छल, दोसर दिस रेशमा आऽ बीचमे रहैक गाछ। जकरा साक्षी राखि दुनू ९ महिनाक हिसाब किताब फरियौलक। लक्ष्मण एतबे बाजल “हम तँ बरद जेकाँ बहिए रहल छी, एहि मरुभूमिमे, अहाँ दुधपिया बौवाकेँ छोड़िकऽ किया आबि गेलौ?” कुमार मनोज कश्यप जन्म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आऽ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आऽ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। थाकल बाट ''सर, हमर मीटरक फाईल कहा तक पहुचलई?'' ''उपर सँ नहि लौटलै'' - बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेᆬकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आऽ यैह उत्तर सुनैत । ''अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना 'सेवा' के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ'' - अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब - अनायास,अनर्थक,आनश्रचत़। बिजली विभागक कर्मचारी 'सेवा' पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम 'सेवा' महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र कें देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -''रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।'' भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो। बीसम शताब्दी मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग -प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ बीसम शताब्दी: मैथिली साहित्यक स्वर्णिम युग (आगाँ) कथा साहित्यिक विधानमे कथा नवीनतम अछि। मैथिली कथा-साहित्यक इतिहास पूर्णरूपेण बीसम शताब्दीक देन थिक, जकर विकास तीतीय दशकक पूर्व नहि भऽ सकल छल। प्रारम्भमे संस्कृत कथाक रूपान्तरण प्रकाशित भेल। मैथिली कथा-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय अछि मैथिलीक पत्रिकादिकेँ। मैथिली कथामे परिवर्तनक सूत्रपात होइत अछि विगत शताब्दीक द्वितीय दशकक पश्चात् जाऽ कऽ। मैथिली कथा साहित्यपर विचार करैत एकरा निम्नस्थ कालखण्डमे विभाजित कयल जाऽ सकैछ। १. प्रारम्भ युग- १९२० ई.सँ १९३५ ई. २. प्रगति युग १९३६ ई. सँ १९४६ ई. ३. प्रयोग युग १९४७ ई.क पश्चात् स्वाधीनता पूर्वमे कतिपय कथाकार साहित्यमे प्रवेश कयलनि, किन्तु हुनक परिपक्व कथा स्वाधीनताक पश्चात् प्रकशमे आयल। देशक स्वाधीन भेलाक पश्चात् मैथिली कथामे तीव्र विकास भेल। मैथिली गल्प-साहित्यक विकासमे पत्रिकादिक योगदान सर्वाधिक रहल अछि। प्रत्येक पत्रिकक रुझान साधारणतः कथा दिस रहल अछि। अतः नव-नव कथाक रचनाक संगहि-संग नव-नव कथाकारक आविर्भाव अत्यन्त द्रुत गतिएँ भेल। अति आधुनिक कथा-साहित्यमे जाहि नवयुवक कथाकारक अवदान अछि ओऽ गल्प वाङमयक जे मानदण्ड अछि ओकर सम्यक् परिचय रखैत गल्प रचनामे संलग्न भेलाह। शनैः-शनैः सामाजिक जीवनमे घटित भेनिहार साधारण घटनाकेँ आधार बना कऽ कथाक रचना भेल तथा यथार्थवादी आऽ कल्पना प्रसूत कथाक दुइ धारा जकर प्रवर्तक हरिमोहन झा एवं व्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” कयलनि जाहिमे राजकमल (१९२९-१९६७), ललित (१९३२-१९८३), मायानन्द (१९३४), प्रभास कुमार चौधरी (१९४१-१९९८) आदि कतिपय कथाकार योगदान छलनि। उपर्युक्त कथाकार लोकनिमे सामाजिक चेतना छलनि आऽ हुनका सभक कथा-आदर्श पूर्ण संवेदनशीलताक विशेष गुण आऽ मनोविज्ञानक हल्लुक पुट अछि। परवर्ती कथाकार लोकनि रोमांसपूर्ण कथाक सर्जन कयलनि। युग-संधिक उत्कर्ष बेलाक कथाकार जीवनक कथानक चुनलनि, मध्यवर्गक जीर्ण-जीवनक वर्णन कयलनि, व्यक्तिक मनक विश्लेषण कयलनि, स्त्री-पुरुषक प्रेमक चित्रण कयलनि आऽ आधुनिक जीवनक मानसिक आऽ भौतिक विषमताक पार्श्वभूमिपर अपन कथाकेँ आधारित कयलनि। मैथिली कथा साहित्यक क्षेत्र व्यापक भेल त्तथा मूल्य एवं दृष्टिकोणमे परिवर्तनक संग विषय-वस्तुमे अधिक वैविध्य आयल अछि। सत्तरिक दशकमे कथा सभमे यथार्थवादी एवं व्यक्तिवादी स्वर तीख आऽ सुस्पष्ट भेल। मैथिली कथाक प्रमुख भाग सामाजिक कथा थिक। सामाजिक जीवन एवं विचारधारामे परिवर्तनकेँ चित्रित कयनिहार कथाक रचना भेल। सामाजिक संरचना, परिवार एवं व्यक्तिगत जीवनक विभिन्न पक्षमे भऽ रहल परिवर्तनक यथार्थ निष्ठ चित्रण कथाकार लोकनि कयलनि अछि। मैथिलीमे लघु कथा, व्यंग्य कथा, लोक कथा इत्यादि विविध रोपक रचना सेहो भेल अछि। सर्वविध मैथिली कथा साहित्यक सम्वर्द्धक कथाकार लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप ई एक सुविकसित विधाक रूपमे अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेलक अछि। नाटक-एकांकी विगत शताब्दी मैथिली नाटक-एकांकीक हेतु एक क्रान्तिकारी युगक रूपमे प्रस्तुत भेल। आधुनिक मैथिली नाट्य जगत जखन अन्धकारमे टापर-टोइया दऽ रहल छल तखन युग-पुरुष जीवन झा गद्यक नव-ज्योतिसँ सम्पूर्ण मैथिली नाट्य-साहित्यकेँ आलोकित कयलनि। आधुनिक मैथिली नाटकक जन्म एही शताब्दीमे भेल जकरा प्रवर्तन कयलनि कीर्ति-पुरुष जीवन झा। ई मैथिली गद्यक महान उन्नायक रहथि। ओऽ गद्यकेँ नवीन स्वरूप प्रदान कयलनि। अपन नाट्यादिक माध्यमे मैथिली गद्यक मंगल द्वारकेँ खोललनि तथा भविष्यक नाटककारकेँ एक नव प्रेरणा देलनि। मैथिलीमे उच्च कोटिक नाट्य-साहित्यक निर्माण कार्य विगत शताब्दीक अनुपम उपहार एहि साहित्यकेँ भेटलैक। विगत शताब्दीक नाटककार जीवनक विभिन्न क्षेत्रसँ सामग्री ग्रहण कऽ कए सामाजिक, धार्मिक, विशुद्ध साहित्यिक, पौराणिक आऽ राष्ट्रीय एवं राजनीतिक नाटकक परम्पराकेँ जन्म देलनि आऽ भारतीय नवोत्थानकालीन भावनाक प्रचार कयलनि। जीवन झाक पश्चात् मैथिलीक दोसर नाटककार साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दास आऽ पण्डित लालदास आऽ हुनका सभक पश्चातो नाटकक क्षेत्रमे एहि परम्पराक निर्वाह होइत रहल। देशक आवश्यकतानुसार विगत शताब्दीमे ऐतिहासिक नाटकक रचना भेल। पौराणिक कथाकेँ नव-ढ़ंगे प्रतिपादित कयल जाय लागल। मैथिलीक किछु नाटककार प्रतीकात्मक नाटकक रचना कयलनि, किन्तु ई परम्परा अधिक पुष्ट नहि भऽ सकल। यद्यपि गीति नाट्यक रचना सेहो विगत शताब्दीमे भेल तथापि मैथिलीमे सुन्दर गीति-नाट्यक रूपमे सोमदेव (१९३४-) क “चरैवेति” (१९८२) एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। विवेच्य कालावधिमे समस्या नाटकक रचना भेल अछि। यूरोपीय प्रभावक अन्तर्गत समस्या नाटकमे बुद्धिवादक आधारपर सामाजिक, व्यक्तिगत तथा जीवनक अन्य क्षेत्रमे व्यर्थक आडम्बर आऽ वाह्याचार तथा परम्परा पालनक विरोध कयल गेल अछि। किन्तु मैथिलीक समस्या नाटकक बुद्धिवाद कूंडित आऽ ओकर क्षेत्र सीमित अछि, जाहिमे जार्ज बर्नाड शॉ आऽ हेनरिक इब्सनक तीक्ष्ण दृष्टिक अभाव अछि। ओहुना ई परम्परा मैथिलीमे विकसित नहि भेल अछि। आलोच्यकालमे रंगमंचक अभावक कारणेँ एकर प्रगतिमे बाधक सिद्ध भेल अछि। मैथिलीमे एक साधु अभिनयशाला नहि भेलासँ पाठ्य साहित्यक विकासक गति एक विशेष दिशामे झुकि गेल अर्थात् एहन नाटकक निर्माण होइत रहल जे साहित्यिक आनन्दक दृष्टिएँ सुन्दर रचना थिक, किन्तु रंगमंचीय विधानक दृष्टिएँ दोषपूर्ण अछि। विगत शताब्दीक नाट्य-साहित्यपर विवेचन करबाकाल मात्र रंगमंचपर ध्यान नहि देबाक चाही। जँ रंगमंचकेँ नाटकक कसौटी मानि लेल जाए तँ विश्वक अनेक प्रसिद्ध नाटकादिकेँ नाटकक श्रेणीसँ निष्कासित करए पड़त। शैलीक दृष्टिसँ मैथिली नाट्य साहित्य पूर्व आऽ पश्चिमकेँ लऽ कए चलल छल, किन्तु शनैः-शनैः ओऽ पश्चिमाभिमुख अधिक भऽ गेल अछि आऽ भारतीय तत्त्व नगण्य भेल जाऽ रहल अछि। विगत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे साहित्य रत्नाकर मुंशी रघुनन्दन दासकेँ श्रेय आऽ प्रेय दुनू छनि जे मैथिलीमे एकांकी रचनाक शुभारम्भ कयलनि जे पश्चात् जाऽ कऽ एक सबल प्राणवन्त विधाक रूपमे पल्लवित भेल। वर्तमान समयमे एकांकी लिखल जाऽ रहल अछि अवश्य, किन्तु किछु अपवादकेँ छोड़ि कऽ एकांकीक वास्तविक कलाक कसौटीपर खरारहनिहार एकांकीक अनुसंधान करबा-काल निराश होमए पड़ैछ। पृष्ठभूमि, वातावरण आऽ कार्य व्यापारक अभाव प्रायः सभ एकांकीमे भेटैछ। एकर उद्देश्यक परिधि विस्तृत अछि। ओऽ सामाजिक, ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, मनोवैज्ञानिक, हास्य-व्यंग्यपूर्ण आदि अनेक उद्देश्यकेँ लऽ कए लिखल गेल अछि। वैश्वीकरणक फलस्वरूप आधुनिक जीवनक विडम्बनापर गम्भीर प्रहार करब एकांकीकारक कर्तव्य भऽ गेलनि अछि। रेडियो आऽ टेलीभीजनक कारणेँ नाटकक नवीनतम रूप ध्वनि रूपकमे भेटैछ, जकर टेकनिक एकांकीक टेकनिकसँ भिन्न होइछ। रंगमंचीय कलाक दृष्टिसँ एकांकीक ध्वनि रूपककेँ आघात पहुँचबाक पूर्ण सम्भावना अछि, ओहिना जेना फिल्मक प्रचारसँ नाट्यकलाकेँ क्षति पहुँचल अछि। निबन्ध भारतीय समाजमे एक नव सांस्कृतिक आऽ राजनैतिक चेतनाक उदय, पत्रिकाक प्रकाशन, साधारण विषय, सामाजिक आन्दोलनक फलस्वरूप पत्रिकाक संग जाहि साहित्यरूपक जन्मक संगहि ओकर स्वाभाव पत्रकारिताक विशेषताक झलक भेटैछ। विषय वैविध्य, सामाजिक आऽ राजनैतिक, शैलीक रोचकता आऽ गांभीर्य, गौरवक अभाव आदि आरम्भिक निबन्धक एहन गुण अछि जे पत्रकारितासँ सम्बद्ध अछि। निबन्ध तँ ज्ञान राशिक संचित कोश थिक। निबन्धकार समाजक भाष्यकार आऽ आलोचक सेहो होइत छथि। अतएव सामाजिक परिस्थितिक जेहन प्रभाव निबन्धमे देखबामे अबैछ ओऽ साहित्यक अन्य रूपमे नहि। विवेच्य कालावधिमे निबन्धक विषय जीवनक अनेक क्षेत्रसँ लेल गेल तुच्छसँ तुच्छ तथा गम्भीरसँ गम्भीर विषयपर निबन्ध उपलब्ध होइछ। यद्यपि ओहिमे चिन्तन-मननक गम्भीरताक अभाव अछि तथापि ओकर सामाजिक चेतना व्यापक छल। समयानुकूल विविध विषयपर बिनु कोनो पूर्वाग्रहक स्वच्छन्द भऽ कए निबन्धकार आत्मीयताक संग अपन हृदय पाठकक समक्ष रखलनि। बिनु कोनो संकोचक विदेशी शासक वा शोषककेँ डाँटि-फटकारि सकैत रहथि तँ अपना ओतयक पण्डित मुल्ला आऽ पुरान शास्त्रकार धरि हुनक कठहुज्जतिपर नीक अधलाह कहलनि। निबन्धकार एक भाग आतुर वा प्रवाह पतित परिवर्त्तनवादी अंग्रेजी सभ्यताक गुलामक खबरि लेलनि तँ दोसर भाग नूतनता भीरू रुढ़िवादीक भर्त्सना कयलनि। विगत शताब्दीमे गद्य शैलीक निर्माण निबन्धकारक वैयक्तिक प्रयासक प्रतिफल थिक। भाषाक दृष्टिएँ तत्कालीन निबन्धकार लोकनिमे सामूहिक भाव –कॉरपोरेट सेन्स- क अभाव छल। गद्यक कोनो स्वीकृत रूप नहि भेलाक कारणेँ ओकर भाषा सार्वजनिक रूप नहि प्राप्त कऽ सकल। आलोच्य्कालक आरम्भिक निबन्धमे विषय आऽ शैलीक दृष्टिएँ वैविध्य भेटैछ। शनैः-शनैः निबन्धमे पत्रकारिताक स्वच्छन्दता क्षीण होमय लागल। पत्रिकाक संख्या बढ़लाक कारणेँ साप्ताहिक, मासिक एवं त्रैमासिक पत्रक दूरी बढ़ैत गेल आऽ निबन्धकार शनैः-शनैः शिक्षित आऽ शिष्ट समाजक समीप अबैत गेलाह। पश्चात् जाऽ कऽ गम्भीर विषयपर निबन्ध लिखल जाय लागल जाहिसँ ओकर रूप-रंग गम्भीर भऽ गेलैक। साहित्यिक समालोचनात्मक निबन्धक धारा जतेक पुष्ट भेल ओतेक रचना विषयक नियमानुवर्तिता छोड़ि कऽ नव ढ़ंगसँ कम अधिक स्वच्छन्दतापूर्वक शैलीमे निबन्ध नहि लिखल गेल। हरिमोहन झा प्रचुर परिमाणमे व्यंग्य प्रधान निबन्धक रचना कयलनि जकर विकास युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे भऽ रहल अछि। व्यंग्यक मूल वृत्ति सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे आलोचना भऽ रहल अछि। एकरा मूलमे नव सामाजिक चेतना आऽ ओहिसँ उत्पन्न आलोचना वृत्ति प्रखर व्यंग्यक रूप धारण कऽ कए एहन निबन्धमे अबैत अछि। एहन निबन्धकार लैंब आऽ लूकसक अपेक्षा, प्रवृत्तिक विचारसँ चेस्टरटन, प्रत्युत स्विफटक अधिक समीप छथि। मैथिली निबन्ध अपन अत्यल्प जीवनकालमे कोन प्रकारेँ विविध रूप-रंगमे विगत शताब्दीसँ विकसित होइत आयल जे आगाँ साहित्यमे विषय-नैविध्य जहिना-जहिना विकसित होइत जायत तहिना-तहिना भावी पीढ़ीक निबन्धकार बढ़ैत जयतह। पठन-पाठनमे स्वीकृति एकर प्राचीन साहित्यक गौरव-गरिमासँ अवगत भऽ कए विगत शताब्दीक द्वितीय दशकमे आधुनिक भारतक प्राचीनतम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे प्रथमे-प्रथम मैथिली भाषा आऽ साहित्यक एम.ए. स्तर धरि पठन-पाठनक शुभारम्भ कएलनि सर आशुतोष मुखर्जी (१८६४-१९२४) आधुनिक भारतीय भाषा विभागक अन्तर्गत। तत्पश्चात् आलोच्य शताब्दीक शष्ठ दशकक पूर्वार्द्धमे पटना विश्वविद्यालयक संगहि संग बिहारक अन्यान्य विश्वविद्यालयमे सेहो एकर पठन-पाठनक व्यवस्था भेलैक। शिक्षण संस्थानमे मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् साहित्यकार लोकनिक दायित्व बढ़लनि जे एहि निमित्त तदनुरूप पाठ्य-ग्रन्थक निर्माणार्थ ओऽ सभ सक्रिय भेलाह आऽ सहित्यान्तर्गत नव स्पन्दनक प्रादुर्भाव भेल। पत्रिका पुनर्जागरणक एहि प्रवृत्तिक मैथिलीक सचेष्ट मनीषी तपः सपूत संघर्षरत भऽ साहित्यक नव निर्माणक दिशामे उन्मुख भेलाह। एहिमे सन्देह नहि जे प्रगतिशील आऽ सामान्य पूर्वाग्रह मुक्त शिक्षित समाजकेँ वाणी देबाक निमित्त प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्प्रयाससँ जयपुरसँ “मैथिल हितसाधन” (१९०५) तथा काशीसँ “मिथिला मोद” (१९०६) क प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक, जकरा एक क्रान्तिकारी डेग कहल जाऽ सकैछ, जे गद्य साहित्यक गतिविधिसँ पाठककेँ परिचय करौलनि। एकरा माध्यमे सामयिक साहित्यिक परम्पराक अध्ययन, चिन्तन आऽ मननक क्रम स्वाभाविक आऽ वांछनीय नहि, प्रत्युत भविष्यक हेतु मार्ग निर्देश करबाक, रुढ़ि आऽ विश्वास, शास्त्रीय मान्यतादिक मूल्यांकन करबाक, युगक नवीन आवश्यकता आऽ परखबाक दृष्टिएँ अत्यावश्यक छ्ल। एहि दृष्टिएँ साहित्य निर्माता आऽ अध्येता एक दोसराक समीप आबि गेलाह आऽ कोनो ठोस वस्तु प्राप्ति करबाक प्रशस्त मार्गक निर्माण कयलनि। एक नव शक्ति उद्भाषित भेल, पर्युषितक स्थान अपर्युषितक जन्म भेल। एकर जोरदार प्रभाव पड़लैक मिथिलांचलक मैथिल समुदायपर जे ओऽ सभ एहिसँ अनुप्राणित भऽ दरभंगासँ “मिथिला मिहिर” (१९०९-) क प्रकाशनक शुभारम्भ कयलनि जे विगत शताब्दीक नवम दशक धरि अनवरत चलैत रहल जे पाठकक संगहि लेखक वर्गक सबल दल तैयार कयलक आऽ ओकर नवीनतम अंक देखबाक निमित्त जहिना पाठकमे उत्सुकता रहैत छलनि तहिना लेखक लोकनि में सेहो औत्सुक्य रहैत छलनि जे हुनक कोन रचना प्रकाशित भेल अछि। मैथिली पत्रकारिताक दोसर चरणक प्रारम्भ प्रथम विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) क पश्चात् प्रारम्भ भेल। एहि समयमे सामाजिक, बौद्धिक आऽ औद्योगिक विकासक रचनात्मक कार्यक्रम हेतु मेधावी जनशक्तिक लोप भऽ गेलैक। विश्व-युद्धक समाप्तिक पश्चात् लोकक मोह भंग भऽ गेलैक जे विदेशी आधिपत्यक चापसँ किछु आशा कऽ रहल रहथि। एहि निराशासँ १९२० ई. मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा समाज सुधार आऽ असहयोग आन्दोलनक शुभारम्भ मिथिलांचलक चम्पार्णसँ भेल। एहि आन्दोलनक हेतु परिस्थिति अनुकूल भेल अपन किछु गम्भीर मन, देशी लोकक विपरीत एहि आन्दोलनक स्वागत सोत्साह कयलनि आऽ मैथिली पत्रिका आलोच्य कालक तृतेय दशाब्दमे प्रकाशनक पथपर अग्रसर भेल। मैथिली पत्रिकाक तेसर चरणक शुभारम्भ आलोच्य शताब्दीक चतुर्थ दशकमे गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट (१९३५) द्वारा देशमे संवैधानिक परिवर्तनसँ भेल। एहि समयक अवसान बेलामे द्वितीय विश्व-युद्ध (१९३९-१९४५) प्रारम्भ भेलैक तथा कतिपय नव-नव पत्रिका साहित्य जगतमे प्रवेश कयलक। विगत शताब्दीक षष्ठ दशकमे अनेक पत्रिका प्रकाशित भेल जाहिमे वैदेही (१९५०) एवं मिथिला दर्शन (१९५३) मैथिली साहित्यक नव-निर्माण अहम् भूमिकाक निर्माणे नहि कएलक प्रत्युत रचनाकारक संगहि पाठक वर्गक निर्माण कयलक। युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे गोट बीसेक पत्रिका चलि रहल अछि जाहिमे कोलकातासँ प्रकाशित कर्णामृत विगत २६ वर्षसँ अनवरत चलि रहल अछि, किन्तु शेष पत्रिकादि कखन काल कवलित भऽ जायत ओऽ तँ भविष्यपर निर्भर करैछ। प्रकाशन विगत एवं वर्तमान सहस्राब्दी मैथिलीक जे उत्कर्ष जनमानसक समक्ष प्रस्तुत अछि तकर ज्वलन्त साक्षी थिक जे साहित्य निर्माताक संगहि संग प्रकाशनक सौविध्यक फलस्वरूप मैथिली साहित्यमे विपुल परिमाणमे गद्य-पद्य साहित्यक प्रकाशन भेल अछि, तकर श्रेय आऽ प्रेय मैथिली अकादमी आऽ साहित्य अकादमीकेँ छैक। मैथिली अकादमी द्वारा विविध विधादिक स्तरीय ग्रंथ अद्यापि लगभग अढ़ाय सय तथा साहित्य अकादेमी द्वारा डेढ़ सय ग्रन्थक प्रकाशन भऽ सकल अछि। एहि दृष्टिसँ कोलकाताक प्रवासी संस्थादिकेँ छैक जे ओतएसँ विविध-विधादिक सहस्राधिक मौलिक अनूदित पुस्तकक प्रकाशन संभव भऽ सकल अछि जे एक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। एहि दिशामे चेतना समिति अर्द्ध शतकसँ बेशी पुस्तकक प्रकाशन कयलक अछि जे उल्लेख्य योग्य अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे अन्यान्य संस्थादि जे पुस्तक प्रकाशनमे सक्रिय अछि तकर सिलसिलेवार ढ़ंगसँ पुस्तक-प्रकाशनमे सहयोग देथि। एहिसँ अतिरिक्त कतिपय साहित्यिक संस्था तथा लेखक लोकनि अपन रुचिक अनुकूल साहित्यिक प्रकाशन कऽ कए एकरा सम्वर्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि जे एहि साहित्यक रीढ़केँ सुदृढ़ कयलक अछि। युग-सन्धिक उत्कर्ष बेलामे जेना पुस्तक प्रकाशनक बाढ़ि आबि गेल अछि। महिला साहित्यकारक प्रादुर्भाव स्वातन्त्र्योत्तर साहित्यान्तर्गत जनजागरणक जे मन्त्र फूकल गेल तकर महिला साहित्यकारपर अत्यन्त तीव्र प्रभाव पड़ल। विगत शताब्दीमे पुरुष लेखकक समानहि महिला लेखक प्रचुर परिमाणमे साहित्यक प्रत्येक विधामे अपन उपस्थिति दर्ज करौलनि जकरा नहि अस्वीकारल जाऽ सकैछ। शताब्दीक सन्धि बेलामे महिला साहित्यकारक कृतित्वक अवगाहनोपरान्त स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि, जे हुनकामे साहित्य साधनाक अपरिमित सम्भावना छनि। हुनका सभक रचनाक क्षमता एवं गुणवत्ता दुनू दृष्टिएँ उल्लेखनीय अछि। साहित्यक क्षेत्रमे मिथिलांचलक नारी समाजक जागरण विगत शताब्दीक अर्द्धशतकक पश्चात् भेल जे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक। महिलामे साहित्यिक अभिरुचि जगयबाक श्रेय छैक मैथिली पत्रिकादिकेँ जकर कतिपय उदाहरण अछि। साहित्यक कोनो एहन विधा बाकी नहि अछि जाहिमे ई लोकनि अपन हस्ताक्षर नहि कयलनि। हमरा दृष्टिएँ हुनका सभमे साहित्य-साधनाक अपरिमित सम्भावना युग सन्धिक उत्कर्षमे स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल अछि। विविध गद्य युग सन्धिक उत्कर्ष बेलामे मैथिलीमे आत्मकथा, जीवनी, यात्रा, संस्मरण, साक्षात्कार आऽ परिचर्चा विषयपर साहित्य पाठकक समक्ष आयल अछि। विभिन्न पत्रिकादिमे समय-समयपर एहन रचनादि अवश्य प्रकाशित भेल अछि, किन्तु ओऽ सभ प्रकाशनाभावक कारणेँ धूल-धूसरित भऽ रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक प्रथम दशाब्दमे ब्रजलिशोर वर्मा “मणिपद्म”क एक अनमोल संस्मरण प्रकाशमे आयल अछि, “हुनकासँ भेट भेल छल”(२००४) जकर सम्पादन कयलनि प्रेमशंकर सिंह एवं इन्द्रमोहन लाल दास, जे अत्यधिक चर्चित-अर्चित भेल अछि। एकरा माध्यमे मिथिलाक अनेक कीर्तिपुरुषक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संगहि मिथिलाक सांस्कृतिक चेतना तथा गौरवमय परम्पराक चित्रण कऽ मैथिली पाठककेँ अनुप्राणित कयलनि अछि। संस्थादिक सक्रिय सहभागिता मैथिली साहित्यक उत्कर्ष बेलामे विगत शताब्दीमे मातृभाषानुरागी लोकनिक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप मैथिली भाषा आऽ साहित्यक उन्नयनार्थ भारतक विभिन्न क्षेत्रमे यथा- मैथिल महासभा (१९१०), मैथिल छात्र सम्मेलन (१९१०), मैथिली क्ल्ब (१९१८), मैथिल शिक्षित समाज (१९१९), मैथिल सम्मेलन (१९२३), मैथिल युवक संघ (१९३०), मैथिली साहित्य परिषद (१९३०), मिथिला लोक संघ (१९४७), अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समिति (१९५०), चेतना समिति (१९५४), कर्णगोष्ठी (१९७४) आदि-आदि साहित्यिक संस्थादिक प्रादुर्भूत भेल जे योजना वद्ध रूपेँ मनसा वाचा कर्मणा दत्तचित्त भऽ कार्यरत भेल, जकर फलस्वरूप एकर विकासक अवरुद्ध मार्ग शनैः-शनैः प्रशस्त होइत गेल। सन् १९४७ ई.मे विश्व लेखक सम्मेलन पी.ई.एन.मे, १९६० ई. मे इलाहाबादमे एवं १९६३ ई. मे दिल्लीमे पुस्तक प्रदर्शनीक फलस्वरूप १९६५ ई. मे साहित्य अकादेमीमे आऽ वर्तमान शताब्दीमे भारतीय संविधानमे एहि भाषा आऽ साहित्यकेँ अष्टम अनुसूचीमे एक प्राचीन भाषाक रूपमे मान्यता भेटलाक तत्पश्चात् एकर विकासक गति तीव्रतर होइत गेल। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रयोजन अछि जे समग्र संस्थादिक सिलसिलेवार ढ़्गसँ अनुसंधान कऽ कए तथ्योपलब्ध ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयल जाय जे भावी पीढ़ीकेँ ई दिशा निर्देश करत। एहि प्रकारक संस्थादिक संख्या बड़ विशाल अछि तेँ ऐतिहासिक वृत्तिक लेखा-जोखा करब आवश्यक अछि। निःसारण युग-सन्धिक उत्कर्षबेलामे बीसम शताब्दीकेँ स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक पाछाँ कतिपय आर्थिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक तत्त्वक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली साहित्यक उन्नयनार्थ जे क्रिया-कलाप भेल तकर वास्तविक रूपेँ विवरण प्रस्तुत करब एक दुर्वह कार्य थिक तथापि साहित्यिक गवाक्षसँ उल्लेख योग्य परिस्थिति एवं परिवेशमे एकरा स्वर्णिम काल उद्घोषित करबाक उपक्रम कयल गेल अछि। विगत शताब्दीक मैथिली साहित्य जाहि सजीवता, प्रतिभा आऽ विभिन्न विचारादर्श आऽ गतिविधिक परिचय दैत अछि ओकर जड़िमे जाहि प्रकारेँ उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्धमे जमल ओहिना बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक बौद्धिक क्रियाशीलताक पूर्वाभास हमरा भेटैछ। वर्तमान परिप्रेक्ष्यमे ई श्रेय आऽ प्रेय बीसम शताब्दीकेँ छैक जे आलोच्य कालक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक गद्य-साहित्य। जतय एक भाग परम्परागत मैथिली साहित्य अपन बन्धनमे बरोबरि बन्हने रहल आऽ अपनाकेँ मेटबैत रहल ओतय निश्चये अभूतपूर्व आऽ निस्सन्देह गद्यक रूपमे प्रतिष्ठित भेल। आलोच्य कालीन गद्य मैथिली साहित्यमे एक नव युगक अवतरण कयलक। साहित्येतिहासमे क्रमबद्ध परम्परा एहि शताब्दीक महत्वपूर्ण अवदान थिक जे अपन भविष्यक प्रति आशाक सम्बल लेने साहित्यमे प्रवेश कयलक आऽ ओकर शब्दकोशमे आश्चर्यजनक वृद्धि भेलैक। वस्तुतः आलोच्य शताब्दी गद्य-युग थिक जे अवतारणा आलोच्यकालीन गद्य थिक। युगसन्धिक उन्मेषबेलामे गद्य जगतक संगहि संग काव्य जगतक अभूतपूर्व समागम एहि कालावधिमे भेल जे मैथिली साहित्यान्तर्गत कतिपय नव-नव विधादिक जन्म भेलैक, ओकर संस्कार भेलैक आऽ ओकर प्रचार-प्रसार द्रुतगतिएँ भेलैक आऽ भऽ रहल अछि जे वर्तमान सन्दर्भमे ओऽ साहित्यक सर्वाधिक प्रमुख अंग बनि कऽ अपन अस्तित्वकेँ सुरक्षित कयलक आऽ लोकप्रिय भऽ गेल अछि। वर्तमानमे साहित्यक कोनो एहन विधा नहि अछि जाहिमे तिल-तिल नूतनताक संचार नहि भऽ रहल हो आऽ साहित्य नव स्पंदनसँ भरि गेल अछि। वर्तमान समयमे हमरा लोकनि अपन मातृभाषाक अत्यन्त समीपमे छी आऽ एहिमे कतिपय उलझन आऽ सन्देहपूर्ण स्थल अछि। तथापि निस्सन्देह कहल जा सकैछ जे मैथिली जीवनक सहस्राब्दीक कालावधि मानसिक उथल-पुथल आऽ बौद्धिक क्रान्तिक संधि-स्थल थिक। विविध-धारा अन्तर्धाराक बीच वर्तमानमे हम मैतिली साहित्यक संधि स्थलपर स्थिर भऽ नवयुगक आशा भरल प्रतीक्षा कऽ रहल छी। गेटेक कथन छनि “वी बिड यू होप”- इतिहास हमरा एहिसँ नीक संदेश नहि दऽ सकैछ। (अगिला अंकमे स्व जीवन झाक कृतिक विवेचन, श्री प्रेमशंकर सिंह द्वारा।) डॉ कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलास जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप। यायावरी नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र -हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आऽ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आऽ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आऽ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि। एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आऽ वर्णनकेँ पढ़थि आऽ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि। यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आऽ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी। अपन संस्था – इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आऽ विरासत केर रक्षा कएल जाऽ सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल। लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आऽ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आऽ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक। असम केर अधिकांश ऑफिस आऽ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी। स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक। शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आऽ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जाऽ सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आऽ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आऽ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। हमेशा ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि। गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आऽ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आऽ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जाऽ सकैत अछि: १.अपर असम २.लोअर असम ३.बराक घाटी ४.नॉर्थ कछार घाटी शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आऽ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी। शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब। गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आऽ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह। गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आऽ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह। समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आऽ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक। खैर! शर्माजीक प्रयास आऽ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जाऽ सकैत अछि। हमर कमरा काफी पैघ आऽ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आऽ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आऽ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आऽ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”। हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”। हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”। एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ। अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल। किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आऽ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आऽ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ। स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आऽ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आऽ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक। अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आऽ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक। नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि: १.दीमासा (Dimasa or Cachari) २.ह्मार (Hmar) ३.जेमि नागा (Zeme Naga) ४.कुकी (Kuki) ५.बंइते (Baite) ६.कार्बी (Karbi) ७.खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar) ८.ह्रांगखल (Hrangkhals) ९.वइफी (Vaiphies) १०.खेलमा (Khelma) ११.रोंगमई (Rongmei) एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आऽ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आऽ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि। अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक। रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आऽ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आऽ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए। उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक। १८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक। नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आऽ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक। नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आऽ मइबांग)मे विभक्त अछि। अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आऽ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आऽ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर) ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आऽ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आऽ गाम सेहो चलब”। गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छञि? आऽ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ। जटींगा पहाड़ी आऽ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आऽ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक। अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आऽ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक। अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आऽ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक। आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आऽ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक। जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कहिं कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए। १९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आऽ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:. घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह। सभ कियो हमरा माध्यमसँ आऽ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आऽ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आऽ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आऽ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”। लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक। जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी: A harmonious game of hide and seek Behind the bushes, marshy meadow Under shadow with clouds view, Ever ready for worthwhile, cherish at dawn, The blues make enchanting heart of lovers Midst of covers white Changing scene that lively for romance Beauty and bounty of brooks that flow. Moments of joy, love to cherish Insight the harmony game of hide and seek Behind thick trespasses of white and blue With narrow path of zig-zag. The beauty of hills under cover Orchids, white fall, violet at hills Every moment thrilled with behalf Nature disposal at North Cachar Hills. (अनुवर्तते) सहस्रबाढ़नि-गजेन्द्र ठाकुर भ्रष्टाचारीकेँ दण्ड दिआ सकबाक, बच्चा सभक रिजल्ट नीक करेबाक, सभकेँ स्वस्थ रखबाक आऽ आर आर तरहक समस्या सभक। ई सभटा समस्याक समाधानक आधार छल तंत्र विज्ञान, जकर विश्वसनीयतापर कोनो प्रकारक अविश्वास नन्दकेँ कहियो नहि छलन्हि। ओऽ तान्त्रिक नन्दसँ गुप्त पूजा-पाठ लेल पाइ-कौड़ीक माँग करए लागल। ओऽ तान्त्रिक कहियो कहन्हि जे माता सपना देलन्हि अछि, जे आब दुष्टक नाश होएत। आबए दिऔक आसिन, शारदीय नवरात्रमे सम्पूर्ण सिद्धि भए जायत। फेर मारि रास पूजा पाठक विधि, शवासन-योग आदि बता देलकन्हि नन्दकेँ आऽ नन्द ओहि सभ विधिक अनुसरण ओहिना करए लगलाह जेना एकटा विद्यार्थी अपन गुरुक पाठक अभ्यास निअमक अनुसार करैत अछि। आसिन भरि सभ काज छोड़ि नन्द एहि सभमे लागल रहलाह मुदा आसिन आएल आऽ चलिओ गेल, मुदा नञि किछु हेबाक छल आऽ ने किछु भेल। आसिनमे कहल गेल जे आब भ्रष्ट अभियन्ता सभकेँ सजा भेटबे करतैक, आबए दिऔक बरखा। एहिना साल बीति गेल मुदा सजा दिएबाक जे समय सीमा छल से आगाँ बढ़ैत रहल। पंडितजीकेँ किछु आर्थिक समस्या सेहो अएलन्हि आऽ नन्दकेँ तकर भार वहन करए पड़लन्हि। घर-द्वारपर पंडितजीक बच्चा सभ सेहो तांत्रिक विद्या शुरू कए देलक। पलंगक नीचाँ भगवती- ई शब्द पंडितजी वा तांत्रिकजीक बच्चा बाजल आऽ नन्द पलंगक नीचाँ भगवतीकेँ ताकए लागथि। फेर पंडितजी विवाह-दानक प्रस्ताव अपन पुत्र-पुत्रीक राखए लगलन्हि, नन्दक इंजीनियर भातिजसँ अपन पुत्रीक आऽ अपन पुत्रसँ नन्दक पुत्रीक। आब नन्दक मोन उचटि गेलन्हि, यावत अपना धरि गप सीमित छलन्हि तावत धरि स्वीकार छलन्हि, मुदा बाल-बच्चाक अहित हुनका कहियो स्वीकार नहि भेलन्हि। एम्हर गामक एक-दू गोट नन्दक भातिज आऽ नन्दक भैया सेहो तांत्रिककेँ घरपर जाए रबाड़ि देलखिन्ह, से ओहो अन्तमे स्वीकार कए लेलक जे ओकरा कोनो तंत्र-मंत्र नहि अबैत छैक आऽ नहिये ओऽ एहि विधिसँ ककरो सजा दिआ सकैत अछि। नन्दसँ लेल पाइ ओऽ घुराऽ देत, ओऽ ई गप सेहो कहलक, मुदा कहियो पाइ घुरा नहि सकल। नन्दक लेल ई एकटा पैघ आघात छलन्हि। तांत्रिकक घरक बगलसँ जाथि मुदा नहि तँ वैह टोकैत छलन्हि आऽ नहिये नन्द ओकरा टोकैत छलखिन्ह। एम्हर नन्दक पुत्रीक विवाह भए गेलन्हि आऽ नन्द जेना सभ दिससँ आसरा छोड़ि बिना लक्ष्यक जिनगीक पथपर आगाँ बढ़य लगलाह। (अनुवर्तते) २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति चारिम दिन : २८ दिसम्बर १९९०, शुक्रवार : हमसब यथावत साढ़े पॉंच बजे भोरे उठिकऽ अपन पूर्वसूचित कार्यक्रमक अनुसारे तैयार भऽ गेलहुं।पहिने बेलुर मठ गेलहुं। बेलुर मठ : ओतऽप्रवेश करैत देरी मोन निर्मल भऽ जाइत छै। ओतके स्वच्छ वातावरण आ शान्ति अलौकिक शक्ति के प््राति श्रद्धा आर बढ़ा दैत छै।धर्मगुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी सब हुन्कर मरणोपरान्त अहि संस्थाक निर्माण केने छथि।भागमभाग सॅ भरल शहर के एक कोन में स्थित ई स्थान महावतार रामकृष्ण परमहंस, हुनकर पत्नी शारदा देवी आ हुनकर शिष्य विवेकानन्द के मन्दिर आ प्रतिमा सऽ भरल अछि।अत विराजित प्रतिमा के मुख पर जे भक्तिभाव आ आत्मसंतोष परिलक्षित होइत छै तकर दर्शनमात्रके लेल दुनियाभरि सऽ लोकसब आबैत अछि।आस्तिकताक प्रति आस्था बढ़ाबऽमे पूर्णत: सक्षम अछि।अतऽ सऽ हम सब दक्षिणेश्वर मन्दिर गेलहुं। दक्षिणेश्वर मन्दिर : गंगाक कछार पर स्थित ई मन्दिर एक अछूत स्त्री रासरानी उारा निर्मित अछि। कथानुसार रासरानी के सपना में स्वयम् देवी कालीजी आदेश देलखिन मन्दिर निर्माण लेल।अहि ठाम बारहटा शिवके मंदिर चारू दिस छल आ इकटा कालीजीक मंदिर बीचमे। धार्मिक स्थानक दर्शन होइ आ शैक्षणिक यात्रा पर निकलल टोली में विज्ञान आ ईश्वरक अस्तित्वके चर्चा नहिं होई से कोना भऽ सकैत छल। बहुत सामान्य विषय परन्तु हमसब काफी देर तक अहि पर बाजैत रहलहुं।आश्चर्य ई छल जे केकरो सौ प्रतिशत हिम्मत नहिं छल जे ईश्वर के अस्तित्वके पूर्णतथ झूठ मानय। हॉं सब अहि पर सहमति छलैथ जे ईश्वर ओकरे सहायक छथिन जे अपन सत्कर्म पर अडिग रहैया। “God helps him who helps himself” (गॉड हेल्प्स हिम हू हेल्प्स हिमसेल्फ) अर्थात् ईश्वरो ओकरे सहायक होइत छथिन जे अपन सहायता स्वयम् करैत अछि। आब अगिला लक्ष्य छल नैशनल बॉटेनिकल गार्डेन। इंडियन बॉटेनिकल गार्डेन : अकरा कलकत्ता बॉटेनिकल गार्डेन आर रॉयल बॉटेनिकल गार्डेन के नाम सॅ सेहो चिन्हल जाइत अछि।अपन नामक अनुरूपे इ बगान अनेको तरहक गाछ पात स भरल छल।कलकत्तासऽ लगले शिवपुर, हावड़ा में स्थित १०९ हेक्टेयर में पसरल ई स्थान करीब १२००० प्रजातिक वनस्पति के संरक्षित केने अछि। बबूल, रोइन, बॉंस, अशोक, पाम के अनेक प्रजाति, महुआ, जंगली बादाम, सुप्ति आदि।अकर स्थापना १७८७ ईसवीमे ईस्ट इंडिया कम्पनीके एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर द्यरॉबर्ट किड' उारा वनस्पतिके नव प््राजाति के चिन्हैलेल कैल गेल छल। उद्देश्य व्यापार छल। अतऽके मुख्य आकर्षण छल विश्वके सबसऽ पैघ बड़क गाछ द्यफाइकस बेंघालेसिंस'(Ficus Bengalhensis) ।ई गाछ २२५ वर्ष पुरान अछि। १८६४ आऽ १८६७ के भयंकर बवंडर सेहो अकरा नहिं नष्ट कऽ सकल।१९२५ में फफूंदी उारा रोगग्रस्त भेलाक बाद अकर मुख्य जड़ि काटि देल गेल। किन्तु वर्तमान में स्थित १८२५ जड़ि में सऽ कोन सबसऽ बलगर अछि से कहनाई मुश्किल।अकर उच्चतम् शाखाक ऊॅंचाई २४.५ मीटर छै।ई अपनेमे एकटा जंगल जकॉं छै।अकर परिधि लगभग ४२० मीटर छै ।अतऽ सऽ बहरा भोजन कैल।तदोपरान्त कलकत्ताक दोसर (मेट्रो रेलक बाद) सबसऽ रोमांचक यात्रा हमरा सबलेल हुगली नदीके स्टीमर सऽ पार केनाई छल।हमरा सबलेल पर्याप्त सीट रिजर्व छल लेकिन हमसब ठाढ़े भऽ कऽ नदीक धारक वेग अवलोकित केलहुं। हरिउारक गंगामे स्नान केने रही आ अतऽ सागर में विलीन होइकाल सेहो देख लेलहुं।घुरैकाल हावड़ा ब्रिजके पैरे पार केलहुं। ओहिमें वॉकवे बनल छल।ओहि सेतुके नजदीकसॅ देखके एहिसऽ नीक अवसर नहिं भेट सकैत अछि।अतऽ सऽ निकलि हमरा सबके एकटा मैदानमे करीब एक घंटा लेल छोड़ि देल गेल छल। ओतऽ सऽ अपन लॉज लौट गेलहुं। काल्हि हमरा सबके कलकत्तासऽ विदा भऽ जायके अछि। ओहि हिसाबसऽ अपन समान पाती सैंत लेलहुं। फेर भोजनोपरान्त किछु मनोरंजन कैल गेल। किछुगोटए गीत सुनेलक, किछु चुटकुला, तऽ किछुगोटय शायरी सुनेलक। हम एकटा स्वरचित हास्य कविता सुनेलहुं जाहिमें सब विषय आऽ ओहि विषयक शिक्षक-शिक्षिका सबसऽ बचके ईच्छा व्यक्त केने छलहुं।ई हम अपन विद्यालयमे शिक्षक दिवस पर सुनेने छलहुं। अतौ सबके हॅंसाबऽ में सक्षम भेलहुं। अहिप्रकारे आहिके दिनचर्या समाप्त भेल। हरिमोहन झा समग्र २.महिला-स्तंभ -जितमोहन झा . हरिमोहन झा स्व. श्री हरिमोहन झा (१९०८-१९८४) जन्म १८ सितम्बर १९०८ ई. ग्राम+पो.- कुमर बाजितपुर , जिला- वैशाली, बिहार, भारत। पिता- स्वर्गीय पं. जनार्दन झा “जनसीदन” मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दीक लब्धप्रतिष्ठ द्विवेदीयुगीन कवि-साहित्यकार। शिक्षा- दर्शनशास्त्रमे एम.ए.- १९३२, बिहार-उड़ीसामे सर्वोच्च स्थान लेल स्वर्णपदक प्राप्त। सन् १९३३ सँ बी.एन.कॉलेज पटनामे व्याख्याता, पटना कॉलेजमे १९४८ ई.सँ प्राध्यापक, सन् १९५३ सँ पटना विश्वविद्यालयमे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष आऽ सन् १९७० सँ १९७५ धरि यू.जी.सी. रिसर्च प्रोफेसर रहलाह। हिनकर मैथिली कृति १९३३ मे “कन्यादान” (उपन्यास), १९४३ मे “द्विरागमन”(उपन्यास), १९४५ मे “प्रणम्य देवता” (कथा-संग्रह), १९४९ मे “रंगशाला”(कथा-संग्रह), १९६० मे “चर्चरी”(कथा-संग्रह) आऽ १९४८ ई. मे “खट्टर ककाक तरंग” (व्यंग्य) अछि। “एकादशी” (कथा-संग्रह)क दोसर संस्करण १९८७ ए. मे आयल जाहिमे ग्रेजुअट पुतोहुक बदलाने “द्वादश निदान” सम्मिलित कएल गेल जे पहिने “मिथिला मिहिर”मे छपल छल मुदा पहिलुका कोनो संग्रहमे नहि आएल छल।श्री रमानथ झाक अनुरोधपर लिखल गेल “बाबाक संस्कार” सेहो एहि संग्रहमे अछि। आऽ हुनकर “खट्टर काका” हिन्दीमे सेहो १९७१ ई. मे पुस्तकाकार आएल। एकर अतिरिक्त हिनकक स्फुट प्रकाशित-लिखित पद्यक संग्रक “हरिमोहन झा रचनावली खण्ड ४ (कविता)” एहि नामसँ १९९९ ई.मे छपल आऽ हिनकर आत्मचरित “जीवन-यात्रा” १९८४ ई.मे छपल। हरिमोहन बाबूक “जीवन यात्रा” एकमात्र पोथी छल जे मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित भेल छल आऽ एहि ग्रंथपर हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार १९८५ ई. मे मृत्योपरान्त देल गेलन्हि। साहित्य अकादमीसँ १९९९ ई. मे “बीछल कथा” नामसँ श्री राजमोहन झा आऽ श्री सुभाष चन्द्र यादव द्वारा चयनित हिनकर कथा सभक संग्रह प्रकाशित कएल गेल, एहि संग्रहमे किछु कथा एहनो अछि जे हिनकर एखन धरिक कोनो पुरान संग्रहमे सम्मिलित नहि छल। हिनकर अनेक रचना हिन्दी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु आदि भाषामे अनुवादित भेल। हिन्दीमे “न्याय दर्षन”, “वैशेषिक दर्शन”, “तर्कशास्त्र”(निगमन), दत्त-चटर्जीक “भारतीय दर्शनक” अंग्रेजीसँ हिन्दी अनुवादक संग हिनकर सम्पादित “दार्शनिक विवेचनाएँ” आदि ग्रन्थ प्रकाशित अछि। अंग्रेजीमे हिनकर शोध ग्रंथ अछि- “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी”। प्राचीन युगमे विद्यापति मैथिली काव्यकेँ उत्कर्षक जाहि उच्च शिखरपर आसीन कएलनि, हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली गद्यकेँ ताहि स्थानपर पहुँचा देलनि। हास्य व्यंग्यपूर्णशैलीमे सामाजिक-धार्मिक रूढ़ि, अंधविश्वास आऽ पाखण्डपर चोट हिनकर लेखनक अन्यतम वैशिष्ट्य रहलनि। मैथिलीमे आइयो सर्वाधिक कीनल आऽ पढ़ल जायबला पीसभ हिनकहि छनि। हरिमोहन झा समग्र कन्यादानक समर्पण- जे समाज कन्या कैं जड़ पदार्थवत् दान कय देबा मे कुंठित नहि होइत छथि, जाहि समाजक सूत्रधार लोकनि बालक कैं पढ़ैबाक पाछाँ हजारक हजार पानि मे बहबैत छथि और कन्याक हेतु चारि कैञ्चाक सिलेटो कीनब आवश्यक नहि बुझैत छथि, जाहि समाजमे बी.ए. पास पतिक जीवन-संगिनी ए बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन्ह, जाहि समाज कैं दाम्पत्य-जीवनक गाड़ी मे सरकसिया घोड़ाक संग निरीह बाछी कैं जोतैत कनेको ममता नहि लगैत छन्हि, ताही समाजक महारथी लोकनिक कर-कुलिश मे ई पुस्तक सविनय, सानुरोध ओ सभय समर्पित। प्रणम्य देवताक समर्पण- आइ सँ सात वर्ष पूर्व जे कार्तिकी पूर्णिमाक करार पर हमरा सँ पैंच लऽ गेलाह और तहियासँ पुनः कहियो दर्शन देबाक कृपा नहि कैलन्हि, जनिक चिर-स्मरणीय कीर्ति-कलाप प्रथमे कथा मे विशद रूप सँ वर्णित छैन्ह, जे “प्रणम्य देवता” क मध्य सर्वश्रेष्ठ आसन पर अधिकार जमा सकैत छथि, जनिक वन्दनीय बन्धुवर्ग ई पुस्तक देखि विनु मङनहि अपन स्वत्व स्थापित कय लऽ सकैत छथि, तेहन प्रमुख चरित-नायक, विकट पाहुन भीमेन्द्रनाथ क सुदृढ़ विशाल मुष्टिमे ई विचित्र-चरित्र-पूर्ण पोथी विवशतापूर्वक अर्पित छैन्ह! खट्टर ककाक तरंगक समर्पण- जे भंगक तरंगमे काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा बहा दैत छथि; जनिक प्रवाहमे थोड़ेक कालक हेतु वेद-पुराण, धर्मशास्त्र, सभटा भसिया जाइत अछि; जे बात-बातमे अद्भुत रस ओ चमत्कारक चाशनी घोरि दैत छथि; जे मर्मस्पर्षी व्यंग्य द्वारा लोकक अन्तस्तल मे पहुँचि गुदगुदी लगा दैत छथि; तेहन चिर आनन्दमूर्ति, परिहास-प्रिय खट्टर कका कैं- त्व्दीयं वस्तु पितृव्य! तुभ्यमेव समर्पितम्। रंगशालाक समर्पण- जे अक्षययौवना नटी एहि अनादि अनन्त रंगशालाक प्रवर्तिका थिकीह, जे मनोहर वीणा-वादिनी सम्पूर्ण चराचर विश्वकैं अपना आंगुरक अग्रभाग पर नचा रहल छथि, जे रहस्यमयी अपन मोहिनी लीलाक झलक देखाय ककरो स्पर्श नहि करय दैत छथिन्ह, जे कल्पनाक रंगीन पाँखि पर आबि कलाकारक कलामे रसक संचार करैत छथिन्ह, तेहन आश्चर्यकारिणी चिरसुन्दरी त्रैलोक्य-विजयिनी माया देवी कैं। जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृति के साथ खिलवार पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ। जहिया गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बचपनक दोस्तक बहुत जोर मोन ख़राब छनि ! आर ओ अस्पतालमे भरती छथि ! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि ! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्तकेँ) छुट्टी मिल जेतनि, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनी चारू दिस घुमि - फिरि ली। मनमे अस्पतालक लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्तक वार्डसँ बाहर निकललहुँ, हमर नज़रि अपन चचेरा भैया - भाभी पर पड़ल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़र एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल .....पुछलियनि की बात ... मुदा ओ किछु जबाब नञि देलीह। हमर पत्नी कातमे बजा कए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलकि उठलनि, पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्याकेँ नञि बर्दाश्त करैक चेतावनी भैया हुनका पहिने द् चुकलकिन-ए ....पता चलल गर्भ परिक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पोसा रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासँ उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ - साफ देख्अलहुँ ! बादमे हमरा आर हमर पत्नी केँ कतेक बुझेलापर भैया भाभीकेँ वापस घर लए गेलखिन ! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि .... ओना भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनो बनेने छथि ! मुदा ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नञि छोड़ने अछि, तखने तँ भैया बहुत आसानीसँ भाभीकेँ गर्भ परीक्षण करबाबए लेल चलि देने छलथि। हम तँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जा तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि हएबक समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल ? नञि ! आर यदि अपने ई नञि हेबाक कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतहु ने कतहु कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक संग कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फेरमे नए रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ के कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबए परए .... हम सब चुकय नञि छी ! हम तँ पूछे छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मूह सिकोरल जाइत अछि ? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार कएल जाइत अछि ! मुदा कि लड़काक जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि ? लड़कोकेँ तँ परवरिश करए परए-ए ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए पड़ैत अछि ! आर विवाह ........! यदि एहि गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़काकेँ कुंआरे रहए पड़त ! उदाहरण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज कएल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटए छनि। ओहि ठामक लोकनीकेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि ..... कनी सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जाएत तँ की होएत ? हम नीक जेकाँ जनैत छी जे अपने एहि बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण देबाक लेल ! लेकिन कि अपने स्वयं कन्या भ्रूण हत्या रोकएमे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल एहि गाड़ीक दुनु पहियाक समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! एहि खिलवाड़केँ रोकए लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए पड़त कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही रूपामे आधुनिक कहाएब .... 1.श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )।विचार टिप्पणी- गंगेश गुंजन भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ “भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी। हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आऽ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से। पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आऽ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि। अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह! 2.सुशांत झा,ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मधुबनी(बिहार),हिनकर पिता श्री पद्मनारायण झा 'विरंचि' ताहि समयक मिथिला मिहिर आऽ आर्यावर्तक प्रसिद्ध स्थाई स्तंभकार। पठन-लेखन विरासतमे भेटल छन्हि सुशान्तजीकेँ। सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि,-मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक(इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी(भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा(2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आऽ न्यूज वेबसाईटमे काज,दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल| बिहार में प्रलय, लेकिन की छैक निदान ? बिहार में एहिबेर बाढ़ि प्रलय बनि कऽ आयल अछि। ई ओऽ बाढ़ि नहि छी जे पहिनउ अबैत छल आऽ दस-पांच दिन रहि कऽ चलि जाइत छल। अहि विभिषिका के तँ ककरो उम्मीदो नहि छलैक। ऐहेन आपदा तँ हजार दू हजार सालमे एक बेर अबैत छैक। लेकिन पैघ सवाल ई जे कि एकर कोनो निदान छैक या बिहार के एकटा हिस्सा एहिना बीरान भय जेतै? इतिहासकार सभक मत छन्हि जे दुनिया के कय टा सभ्यता एहिना बाढ़ि वा भुकंप के कारणे खत्म भऽ गेलैक। किछु लोक केँ इहो कहब छन्हि जे सिंधु घाटी सभ्यता सेहो एहने कोनो बाढ़िक कारणेँ खत्म भऽ गेलैक। बहुत दिन पहिने प्रख्यात नदी विशेषज्ञ अनुपम मिश्रक लेख पढ़ने रही जाहिमे ओऽ कहने रहथि जे विशाल बांध बनाकऽ बाढिक जबर्दस्ती निदान नहि कयल जा सकैत अछि। हमरा लोकनि केँ नदीक संग जिनाई सीखय पड़त।ओकर पानि केँ बिना कोनो छेड़छाड़ के समुद्र तक जाई के रास्ता देबय पड़त।अगर एहिमे कोनो रुकाबट हेतई तँ प्रकृतिक कोप हमरा सबके झेलय-ए पड़त। आऽ अगर ध्यान सँ देखल जाय तँ पिछला सय सालमे यैह भेलैक अछि। बाढ़िक सबसँ पैघ कारण छैक नदीक सिल्टींग। जाबेकाल तक एहि सिल्टींग के दूर नहि कयल जायत ताबेकाल तक बाढ़ि पर प्रभावी ढ़ंग सँ रोक नहि लगायल जाऽ सकैत अछि। पानि केँ जखन-जखन समुद्रमे जाईमे अवरोध हेतई- ओकर पानि किनारमे पसरि जायत। गौरसँ देखल जाए तँ सिल्टिंग हटेनाई कोनो बड्ड मुश्किल नहि। खास कऽ बिहार एहेन प्रान्तमे तँ एहिसँ कतेक रास रोजगार सेहो सृजन कयल जा सकैत अछि। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना केँ पाई सेहो अहि मे लगायल जाऽ सकैत अछि। दोसर बात ई जे नदीक कछेरमे सिल्ट सँ ऊंच तटबंध आऽ सड़क बनायल जाऽ सकैत अछि, पर्यटन आऽ दोसर कतेको काज कायल जाऽ सकैत अछि। बिहारमे बहय बला नदीक स्रोत नेपालमे छैक। ओहि पानिपर हमरा लोकनिक कोनो बस नहि आऽ ने ओहि पानिकेँ नेपालमे रोकल जाऽ सकैत छैक। पुरना जमानामे नेपालक तराईमे आऽ पहाड़क ढ़लानपर खूब बोन छलै- जे पिछला सय-दू सय सालमे खत्म भय गेलै। आब पहाड़मे कनियो पानि होई छै कि मैदानमे पसरि जाई छैक। पहिने ओऽ जंगलक कारणे आस्ते-आस्ते मैदानमे अबैत छलै। बिहार सरकार अहि मामलामे किछु नहि कऽ सकैत अछि, सिवाय केंद्र पर दबाव दै के। हँ, भारत सरकार चाहे तँ नेपालक संग मिल कय बाढिकेँ रोकय के लेल छोट-छोट बांध आऽ वनीकरणक एकटा दीर्घकालीन नीति बना सकैत अछि । एहि के लेल हजारो करोड़ रुपैया के निवेश के जरुरत छैक आऽ ई काज दूनू देशक आपसी सहयोगसँ कयल जाऽ सकैत अछि। दोसर बात ई जे हमरा सबके अपन गलती के सेहो ध्यान में राखय चाही। छोट-2 धार जे कमला-बलान में मिल जाईत छलैक ओकरा पिछला शताब्दी में भरि कय़ खेत आ घराड़ी बना लेल गेलै।जे जमीन, सरकारी मानल जाईत छलैक ओकर बड़ पैघ पैमाना पर लूट भेलैक।एकरा कड़ा कानून बना कय रोक पड़त। पानि के संग छेड़छाड़ के जघन्य अपराध घोषित कर पड़त।इम्हर जे विकास के योजना बनलैक ओहो बाढ़ के बढ़ावा दै में कोनो कसर नहि छोड़लकै।उदाहरणार्थ, उत्तर बिहार में जमीन के ढ़लान उत्तर सं दक्षिण दीस आ दक्षिण बिहार में दक्षिण सं उत्तर दीस छैक। लेकिन के टा एहन हाईवे आ रेलवे बनलैक जे पानि के प्राकृतिक बहाव में अवरोध भय गेलैक। जेना, दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाईवे आ दरभंगा-निर्मली रेलवे लाईन।एतय कहैक ई मतलब नहि जे विकास नहि हुअक चाही-लेकिन विकास आ प्रकृति के बीच में पूरा सामंजस्य हुआ के चाही। दोसर बात ई जे बिहार में जे नदी परियोजना सब में पिछला पचास साल सं लूट भेलैक ओहिलेल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के अध्यक्षता में एकटा आयोग बनय के चाही।पूरा देश में हमरा हिसाब सं बिहार में जतेक लूट भेलैक ओते कतौ नहि। कोसिये के बात कयल जाय त -पश्चिम कोसी नहरि जे हमरा गांव के बीच सं निकलैत अछि ओकरा सरकारी घोषणा के हिसाब सं 1983 में बनि जाय के चाही छलैक।लेकिन एखन पचीस साल बीतला के बादों कोनो उम्मीद नहि। हमरा जनैत जे यदि नदी परियोजने सब के ढ़ंग सं लागू कयल जैयतैक त बाढ़ि के पूरा नहि त आधा समाधान त जरुर निकलि जयतैक। शायदि एखनो पूरा तबाही नहि भेल अछि,एहि बेरक जलप्रलय़ हमरा सबके सूतल सं जगेलक अछि। कुल मिलाकय जाबेतक बाढ़ि जनता आ राजनेता सबके एजेंडा में शामिल नहि होयत ताबेत तक एकर समाधान संभव नहि अछि। 3.बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)। संकट गुणक (रिस्क फैक्टर) आऽ मैथिल मिथिलाक विकास क़ेना आऽ कखन विकासक बिना जिनगी बड कठिन। विकासक रस्ता बड उबड ख़ाबड । संघर्ष सदिखन। डेग डेगपर। बिना संघर्षक विकासो संभव नहि। सर्वांगीन विकासक हेतु़ व्यक्तिगत विकासे आधार होइछ । बहुत किछु गमेलहुँ मुदा आब नहि। मैथिल युवा मोर्चा तैयार भए रहल अछि। विकसित वा अविकसितक बिच-बिचवामे छी।एतवा तॅ तए अछि जे आर्थिक विकासक लेल सुर सार भए रहल अछि। आर्थिक विकास एकटा गति होइछ जे कखनो कम वा बेशी। आर्थिक उपार्जनक लेल़ हम सब सकारात्मक प्रयासमे सुतल छी। जहिया उठब़ तहिया सिंह जकां दहारब वा सांप जकां फूफकारब। जय श्री हनुमानजी एक समयमे अपन शक्ति बिसरि गेल छलाह, तहिना हम सब मैथिल अपन शक्ति बिसरौने छी। बहुतो मैथिल प्रवाशी जीवनमे़ अपन आर्थिक सक्षमता मे वृद्धि केलाह, परञ्च हुनक धिया पूता मिथिला मैथिल सॅं कोसो दुर !!! पैघ संकट। ग्रेट रिस्क!!! मैथिलक सम्मान मैथिली थीक आओर एकर अपमान मैथिले कऽ रहल छथि। अपने परिवारमे मैथिलीपर मतांतर। मैथिली घरेमे टूअर। मैथिल पलायनसॅं मैथिलीक आकस्मिक अन्त। केऽ विलाप कडत। पलायन दुइ स्थितिमे- १. जीवन भरण पोषणक लेल २. व्यक्तिगत उद्देश्यक पूर्तिक लेल मिथिलामे की कमी डेग डेग पर पोखरि घर घरमे पतरा-पोथी। गाम गाममे जाति पॉति छोटका पॉति लैऽ कऽ एके परिवारमे शानक घमासान। मैथिली संकटमे, आवश्यकत अछि कोमल स्पर्शक। कतेको बेर बिहार सरकार द्वारा मैथिली भाषापर सीधा प्रहार भेल। परम दुखक बात ई अछि जे किछु मैथिल मैथिलीकेँ तोड़यमे लागल रहल छथि। परञ्च चिंताक कोनो बात नहि़। मैथिली अछि अटल़-अविचल। मैथिलीक जड़ बड़ मजगूत। हम मैथिलसब अपन मौलिक कर्तव्य बूझि आऽ अपन भाषा सॅं अथाह लगन लगावी। बंगाली-पंजाबी-मराठी केँ देखु जे अपन मातृभाषाक प्राणोंसॅं ऊपर स्थान देने छथि। एतबाऽ नहि हर मंचपर अपन भाषाक प्रति स्नेह तथा सम्मान कन्निको कट्टौती नहि करैत छथि। परञ्च़ हम मैथिल कतेक निष्ठा रखैत छी। एहन किछुए मैथिलके देखल जा सकैछ। बंगालमे बंगाली, पंजाबमे पंजाबी। एहिना बहुतो प्रादेशिक राज्यमे़ अपन-अपन भाषाकेँ अपन जीऽ जान सॅं पैध लगाव रखने छथि। बंगालीक भाषा बंगाली पंजाबीक भाषा पंजाबी मराठीक भाषा मराठी बिहारीक भाषा की? हिन्दी़-भोजपुरी आऽ मैथिली हिन्दी़ तॅं राष्ट्रभाषाक अस्तित्वमे अछि। भोजपुरी काफी लोकप्रियता हासिल कय रहल अछि। भोजपुरी सिनेमा उद्योगकेँ काफी सफलता भेटल। मुदा मैथिलीक स्थिति बिहारमे केहन अछि से की कहल जा्इछ। मैथिलीक स्थिति मिथिलामे बड़ कमजोर। गैरमैथिल बिहारी कतेक प्रतिशत मैथिलीक इज्जत करैत छी।अनुमानित प्रतिशत बड़ कम होयत। मैथिल अपनाकेँ गोद लेल मैथिल जेकाँ आचरित कहिआ धरि करताह? मैथिली सशक्त भाषा अछि। एकर अपन इतिहास अछि। परञ्च हम सब मैथिली बाजय वालाकेँ आऽ लिखय वालाकेँ पिछड़ल बुझैत छी।अनेक भाषा सीखू़ बाजू़ मुदा मैथिलीकेँ छोड़ि कऽ नहि। मैथिलीकेँ बोझ नहि बुझियौक। अगिला अंकमे 4.शक्ति शेखर, पिता-श्री शुभनाथ झा, गाम- मोहनपुर, भाया-हरलाखी, जिला-मधुबनी। कखन बदलब हम-शक्ति शेखर बहुत तामस होइए भगवानक एहि कृत्यसँ जे ओऽ अपन उपस्थिति मिथिलांचलमे दर्ज केनाय शायदे कोनो साल बिसरै छथि। मुदा हमरा सबकेँ एहि भयावह स्थितिसँ लड़बाक अलावा आओर कोनो रस्तो तँ नहि अछि। जी, हम बात कऽ रहल छी, एखन बिहारमे आयल बाढिक संदर्भमे। अनुमान लगायल जाऽ रहल अछि, जे अहि बाढिक चपेटमे करीब 50 लाख लोक आयल छथि। सभ साल जुलाई-अगस्तक मास अबिते बिहारक लोक आतंकित भऽ जाइत छथि।सबहक मोनमे ई डर रहै छनि, जे एहि बेर केकर घर उजरतौ। लोकसब भरि साल दिन राति मेहनत कऽ एकटा घर बनाबैत छथि, किछु पूंजी जमा करैत छथि,मुदा की होइए एहि सभसँ? ई बाढि तँ कोनो आतंकवादीसँ बेसी भयावह होइत अछि जे हर बेर कतेको गामकेँ, कतेको बिगहा जमीनकेँ अपन अंदर समेट लैत अछि। संबधित विभाग बाढिकेँ लऽ कऽ सब जानकारी राखितो कोनो तरहक कदम नहि उठाबैत अछि। शायद ई बाढि हुनका सभक लेल आमदनीक एकटा श्रोत जे होइ-ए। पछुलका बाढि सभक राहत-अनुदानपर नजर दौड़ाबी तँ निधोक एक बात कहनाइ अनुचित नहि होयत, जे बाढिसँ कतेको लोक करोड़पति सेहो भऽ गेलाह। ईश्र्वरक लीला देखियौक, जे एक दिस एहि बाढिसँ सभ बेर कतेको लोक (शायद अनुमान लगेनाय असंभव अछि) केर सब चीज लुइटे जाय छनि, तँ दोसर दिस बाढि घोटालाक अभियुक्त आओर कतेको लोक करोड़पतिक गिनतीमे आबि गेलाह। ओहि दृश्यक बारेमे सोचल जाय, जे पूर्णियामे बाढिक डरे अपन छत पर बैसल चारि सालक बच्चा भूखसँ अपन दम तोड़ि देलक, ओहि लोकक बारेमे सोचि, जिनका खेनाय तँ दूर पिबऽ के लेल पानि तक नहि भेटि रहल छनि। लोकक चापाकल बाढिक पानिमे डुबि गेल छनि। हिनका सभ लग किएक नहि पहुंचि पाबि रहल छनि राहत सामाग्री। कहिं एहन तँ नहि जे फ़ेर सँ कतेको लोक एहि बाढिमे करोड़पति बनए वला छथि। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बिहारक बाढिकेँ राष्ट्रीय आपदा घोषित तँ कऽ देलन्हि मुदा पीड़ितक लेल ई सांत्वना मात्र अछि। केन्द्र सरकार दिससँ बिहारक बाढि पीड़ितक लेल 1000 करोड़ रुपया अनुदानक राशि देल गेल अछि। मुदा एहि अनुदानक राशिक विषयमे अखनो कतेको बाढि पीड़ित केँ मालूम नहि चलि सकल अछि। जिनका अहि बारेमे जानकारी भेटबो कैल तँ निश्चित ओऽ सोचने हेताह कि शायदे एहि राशिमे सँ हुनका सभकेँ किछु भेटत। केन्द्र सरकार ई राशि तँ दऽ कऽ अपन बाढि पीड़ितसँ तँ अपन पल्ला झाड़ि लेलाह, मुदा बाढि पीड़ित तक ई राशि कोना पहुंचि सकत, एहि बारेमे हुनकर ध्यान नहि गेल अछि। एक बेर फ़ेरसँ कहब जे ई अनुदानक राशि सब विभाग तक बटैत बटैत दस प्रतिशतो बाढि पीड़ित तक नहि पहुंचि सकत। आओर हँ, बाढिक दोगमे जे सभसँ पैघ चीज होइत अछि ओऽ अछि राजनीति। कतेको नेता सभ एहि बाढि पीड़ितक लेल आगिमे घी देनाय जेहेन काज करैत छथि। राज्य सरकार केँ दोषी ठहराबैत नेता सब ओहि जगह अपन सीट सुनिश्चित करबाक फ़िराकमे रहैत छथि। हेलीकाप्टरसँ बाढि क्षेत्रक सर्वेक्षण करैत बहुतो नेतासभकेँ अतबो जानकारी नहि रहैत छनि जे ओऽ कोन क्षेत्रक दौड़ा कऽ रहल छथि। पता एहि बातसँ लगायल जाऽ सकैत अछि जे नेतासभ ओहि क्षेत्रक कतेक ज्ञान रखने छथि। इमहर राज्य सरकार सेहो कहां चुप रहए वला। ओऽ केन्द्रपर निशाना साधैत छथि तँ केन्द्र राज्य सरकार पर। एहि राजनीतिमे पिसाइत तँ बाढि पीड़ित छथि। कोनो बात नहि, समय आबि गेल अछि एकजुटता देखाबएबाक आऽ मदति करबाक....बाढि पीड़ितक संग, बाढि पीड़ितक लेल। तखने हम स्वतंत्र भारतक कर्तव्यनिष्ठ नागरिक भऽ सकए छी। 5.ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी। मिथिले तक नहि छथि मैथिल-ओमप्रकाश झा गप्प अछि नवंबर 2007 केर, एहि समयमे हम गोवा न्यूज (जे कि गोवा अवस्थित अंग्रेजी क्षेत्रीय न्यूज चैनल छ्ल) मे काज करैत रही। गोवामे सोलहम अंतराष्ट्रीय मैथिली परिषदक सम्मेलन भेल छ्ल, जकर अध्यक्षता श्री विनय कुमार झा ,चीफ़ विजिलेंस,गोवा स्टेट केलथि। एहि कांफ़रेंसक एकटा छोट सनक अंश यू-टयूब साइट पर सेहो उपलब्ध अछि। एहि कार्यक्रमकेँ कवर करबाक भार अपन संस्थासँ हमरे भेटल छ्ल। एहि कार्यक्रमक दौरान बहुत रास चित्र जे स्पष्ट भऽ कऽ सोझाँ आयल ओऽ ई सभ छल....... 1.बहुत रास मैथिल छतीसगढ आऽ मध्य प्रदेशमे बसल छथि। हालांकि आब हुनका सबहक मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल अछि। यदि आओर तहमे जाई तँ ओऽ लोकनि मैथिली भाषा बिसरि चुकल छथि, तथापि मिथिलासँ ओतबेक स्नेह आऽ लगाव छन्हि, जतबाक हमरा सबकेँ अछि। हुनकर सबहक पुस्त बहुत पहिने ओतए चलि गेल रहथिन्ह। गप्प करीब 4-5 पुस्त पहिनेक अछि। 2. दिल्लीक नांगलोई इलाकामे सेहो किछु रास मैथिल छथि, जे कि अपन जीवन-यापनक क्रममे कतेक रास आन आन व्यवसाय सब अपना लेने छथि। संगहि देशक भिन्न- भिन्न भागमे कतेको ठाम मैथिल लोकनि वृहद समुदायक संग रहि रहल छथि। ओना भाषा एहिमे सँ बहुतो गोटेक हरा गेल अछि। 3. एकटा आरो गप्प जे कि सामने आयल ओऽ छल, जे कि गोवाकेँ मैथिले ब्राहम्ण सब बसेने छथि आऽ एकर प्रमाण स्कन्द पुराणमे भेटैत अछि। हम अहाँ केँ ई बात कहि दी, जे कि गोवन (गोवाक वासी) सबहक मातृभाषा कोंकणी अछि मुदा एहि भाषाक बहुतो रास शब्द मैथिली भाषाक अछि। किछु शब्दक बारेमे हम अहाँ सबकेँ कहि रहल छी, जेना कि अदहन (भातक लेल गरम कएल गेल पानि), पाहुन (गेस्ट), मधुर आदि। ओहो सब कोजगरा दिन लक्ष्मी पूजा करैत छथि। रहन-सहनक स्तर अपना सबसँ बहुत हद तक मिलैत अछि। आओर तहमे गेनाय अखन उचित नहि अछि। कार्यक्रममे कतेको मिथिला-विभूति सब उपस्थित छलाह। वर्तमानमे दिल्ली पुलिसमे वरिष्ठ अधिकारी श्री उज्जवल मिश्र ओहि ठाम तत्कालीन डी.आइ.जी. छलाह। भारतक विभिन्न भागक संगे नेपालक किछु रास प्रतिनिधि सब सेहो पहुंचल छलाह। एहि कार्यक्रमक कवर करबाक लेल गोवा न्यूज आऽ नेपाल टीवी (नेपालक) चैनल पहुंचल छल, जखन कि बड़का-बड़का मैथिल पुरोधा सब गोवामे विभिन्न मीडिया लेल काज करैत छथि। बादमे जहन हुनका सबसँ जिज्ञासा बस पुछलियन्हि तँ कुनू ने कुनू ओहने बहाना बना लेलाह, जेना कि जखन प्रधानमंत्री स्व० राजीव गांधीक समयमे मधुबनी के एम०पी० हनान अंसारी लोक सभामे मैथिली केँ अष्टम सूचीमे जोरबाक लेल आवाज बुलंद केलथि तँ श्री भोगेन्द्र झा जी जे कुनू बहान्ना बनेने रहथि। हम एकर तहमे नहि जाय चाहब, सब गोटे बुझि रहल छी। अल्पज्ञ कहु वा किशोर हमरा मोनमे कतेको प्रश्न उठए लागल जे एनामे मैथिली कोना बचल रहत। हयऔ, हमर भाषा कुनू अन्य भाषा सँ कनिको कमजोर नहि अछि। हमरा लोकनि अंग्रेजी बाजैत छी, आधुनिक परिधान पहिरैत छी, सबटा बड्ड नीक बात अछि। मुदा एहि तमाम चीजक मूल्यक रुपमे अपन भाषा आऽ संस्कृति केँ उत्सर्ग केनाय हमरा नहि पचि रहल अछि। ई तँ ओहने गप्प भेल जेना किछु रास लोककेँ आर्थिक तंगी नहि रहलाक बादो दोसरसँ कर्ज लेबाक प्रवृति होय छन्हि। परिवर्तनक फ़ेज सँ गुजरि रहल अपन समाज कहीं त्रिशंकु तँ नहि बनि रहल अछि।एखन बस एतबे। पद्य १.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) १. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी पंकज पराशर शैलेन्द्र मोहन झा महाकाव्य महाभारत (आगाँ) प्रकाश झा कोसी पद्य -स्व.रामकृष्ण झा “किसुन”, विनीत उत्पल, कोसी लोकगीत. १.श्री मित्रनाथ झा .२. श्री शम्भू कुमार सिंह ३.विनीत उत्पल ४.विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (१८७८-१९५२) डॉ मित्रनाथ झा, १९५६- , पिता स्वनामधन्य मिथिला चित्रकार स्व. लक्ष्मीनाथ झा प्रसिद्ध खोखा बाबू, ग्राम-सरिसब, पोस्ट सरिसब-पाही, भाया- मनीगाछी, जिला-मधुबनी (भारत), सम्प्रति मिथिला शोध संस्थान, दरिभङ्गामे पाण्डुलिपि विभागाध्यक्ष ओ एम.ए. (संस्कृत) कक्षाक शिक्षार्थीकेँ एम.ए. पाठ्यक्रमक सभ पत्रक अध्यापन। लेखन, उच्चस्तरीय शोध ओ समाज-सेवामे रुचि। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, अंग्रेजी, भोजपुरी ओ उर्दू भाषामे गद्य-पद्य लेखन। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर सुप्रतिष्ठित अनेकानेक पत्र-पत्रिका, अभिनन्दन-ग्रन्थ ओ स्मृति-ग्रन्थादिमे अनेको रचना प्रकाशित। राष्ट्रीय ओ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर आयोजित अनेको सेमिनार, कॉनफेरेन्स, वर्कशॉप आदिमे सक्रिय सहभागिता। विदेह-वैभव विद्या-वैभव केर गरिमासँ सर्वथा पुक्त जे सिद्ध भूमि। अन्तर कदापि नहि जे कएलक अप्पन वा आनक थातीमे॥ देलक सदिखन जे पूर्ण ज्ञान निश्छलता ओ कर्मठतासँ। मद्धिम कखनहुँ नहि पड़य देल, दय तेल ज्ञान केर बातीमे॥ हवि ज्ञानक अप्पन सतत बाँटि, हो बुद्धिक कोनो अनुष्ठान। शिक्षाक भनहि हो कोनो विधा, वर्जित नहि हिनकर पातीमे। अक्षुण्ण राखि निज-मर्यादा, अन्यहु क्षेत्रक कएलक विकास। मिथिला केर तापस ज्ञान-भानुसँ, के-के नहि लेलक प्रकाश॥ मतवैभिन्यक अप्पन महिमा, के नहि जनैछ ई दिव्यभूमि। तमसँ आच्छादित मार्ग कोनो, त्वरिते पाओल ज्ञानक प्रकाश॥ रहि मध्य मार्ग केर अनुगामी, कामी नहि कोनहु तुच्छ फलक। कएलक प्रयास विध्वंसक बड़, पर कए न सकल किञ्चित् विनाश॥ होता कोनहु हो, यजमानक ज्ञानक मानक हो ध्यान सदा। मिथिला केर पावन धरतीपर, गुञ्जित हो ज्ञानक गान सदा॥ भग्न चिन्तन चिन्ताक तप्त दावानलमे हम की रचनात्मक कार्य करू। हियमे तँ अबैछ लहरि भावक, पर धार कोना ई पार करू॥ त्रिभुवन केर प्रायः कोनो वस्तु, मानव-चिन्तनसँ दूर नञि। की भावनाक ई दिव्य महल, होएत हमरासँ पूर नञि॥ लेखनी हमर ई बाजि रहल, की हमरा अपनहि भरि रखबेँ। मानस पट से धिक्कारि रहल, की समय एतबहि भरि रखबेँ॥ खाली हाथेँ जाएत सभ क्यो, ई नीक जेकाँ हम जनैत छी। लेखनीक आइ दुर्दशा देखि, एकान्त मौन भए कनैत छी॥ कारण जनैत छी नहि जाएत भूतलसँ संग एक्कोटा कण। पर मित्र भाग्यसारणी हमर नहि देलक एहन कोनो यक्षण॥ जेहि अनुपमेय क्षणमे अप्पन भावना अतीतकेँ दोहराबी। भग्ना वीणा केर रुग्ण तारपर दू आखर हमहूँ गाबी। २.शंभु कुमार सिंह, जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, मैट्रिक धरि गामहि सँ, आइ.ए., बी.ए.मैथिली सम्मान, एम.ए.मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु] उत्तीर्ण 1995, “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर वर्ष 2008, ति.माँ.भा.वि.वि.भा.बिहार में शोध-प्रबंध जमा (परीक्षाफल प्रतीक्षारत)। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता आ निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे, शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर मे कार्यरत। आह्वान भारत भूमिक नवतुरिया हमर कविताक आह्वान सनू भ’ तन्मय अपन कान खोलि छथि बाजि रहल भारती से सुनू हे भारत ! ई भारती थिक अति विवश भाव भंगिमा नेने हिल रहल ठोर किछु कहबा लेल प्रेरित क’ रहल किछु करबा लेल कखनहुँ अहाँक कखनहुँ हमर एहि लेल बाट निहारैत छथि बस त्राहि-माम पुकारैत छथि छथि कहथि देखू हमर ई दशा शोणित सँ रंजित श्वेत वसन नखसँ शिख धरि अछि जख्म भरल लूटि रहल हमर अछि अमन-चैन पंजाब,असम,गुजरात,आँध्र कश्मीर सहित अन्यान्य प्रान्त अछि सिसकि रहल भ’ भयाक्रान्त छल कहियो उत्तुंग गर्वसँ हम्मर सिर प्रकृति प्रदत्त पावन कश्मीर केसरिया सेब क’ रहल श्रृंगार लहलह-हरियर बाग निशात उज्जर बर्फशिला बाँटि रहल छल शांतिकेर संदेश उधार छल बहैत जतय शीतल समीर चहुँदिस आब बरसैत अछि गोली नहि खेलू, नहि खेलू रोकू ई खूनक होली जाति-धर्मक उन्माद भड़का जे उन्मादी अहाँकेँ लड़ाबैत छथि हुनकर तँ कुरसीक प्रश्न छैक मुदा की यैह अहाँक मानवता थिक ? (18-08-2008,मैसूर) ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। अंगप्रदेश बिसरि जाउ ओ कर्णक नगरी अंगप्रदेश जतय , जाहि सं जे मंगतहुं स भेटतहि कहियो विक्रमशिलाक सन रहै अहि ठाम विश्वविद्यालय चारों दिशक लोक आबथि शिक्षा लेबा लेल एहि ठाम छैथ मंदार पर्वत जे अछि समुद्र्मंथनक निशानी अहि ठाम आयल रहथि कवि रविन्द्रनाथ ओ शरतचंद्रक नेनपन एहि ठाम बीतल मुदा अंगप्रदेश क s ककर नजरि लागल जे नहि ओ शान नहि ओ शौकत दलमलित होइत छथि अंगप्रदेशक आत्मा आ बजबैत छथि तारणहार उधारकर्ताक क s. परीक्षा कहू वा नहि कहू अलबल रीति -रिवाज युग -युग सs अपन समाजक कोइढ़ छथि एक पावनि अछि मधुश्रावणी पत्नीक पतिव्रताक सर्टिफ़िकेट लेल होइत अइमे टेमी जकरा कहैत छी हम अर्धांगिनी बारंबार दैत छथि परीक्षा त्रेता मे सीता ओ अहिल्या कलयुग मे होइत नित अग्निपरीक्षा छी हम पुरुष मुदा छी बड़ डरपोक तहि स परीक्षा नहि दैत छी नहि फ़ेलक चिंता नहि पासक ४ विस्मृत कवि स्व. रामजी चौधरी (1878-1952)पर शोध-लेख विदेहक पहिल अँकमे ई-प्रकाशित भेल छल।तकर बाद हुनकर पुत्र श्री दुर्गानन्द चौधरी, ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी कविजीक अप्रकाशित पाण्डुलिपि विदेह कार्यालयकेँ डाकसँ विदेहमे प्रकाशनार्थ पठओलन्हि अछि। ई गोट-पचासेक पद्य विदेहमे एहि अंकसँ धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भ’ रहल अछि। विस्मृत कवि- पं. रामजी चौधरी(1878-1952) जन्म स्थान- ग्राम-रुद्रपुर,थाना-अंधरा-ठाढ़ी,जिला-मधुबनी. मूल-पगुल्बार राजे गोत्र-शाण्डिल्य । जेना शंकरदेव असामीक बदला मैथिलीमे रचना रचलन्हि, तहिना कवि रामजी चौधरी मैथिलीक अतिरिक्त्त ब्रजबुलीमे सेहो रचना रचलन्हि।कवि रामजीक सभ पद्यमे रागक वर्ण अछि, ओहिना जेना विद्यापतिक नेपालसँ प्राप्त पदावलीमे अछि, ई प्रभाव हुंकर बाबा जे गबैय्या छलाहसँ प्रेरित बुझना जाइत अछि।मिथिलाक लोक पंच्देवोपासक छथि मुदा शिवालय सभ गाममे भेटि जायत, से रामजी चौधरी महेश्वानी लिखलन्हि आ’ चैत मासक हेतु ठुमरी आ’ भोरक भजन (पराती/ प्रभाती) सेहो। जाहि राग सभक वर्णन हुनकर कृतिमे अबैत अछि से अछि: 1. राग रेखता 2 लावणी 3. राग झपताला 4.राग ध्रुपद 5. राग संगीत 6. राग देश 7. राग गौरी 8.तिरहुत 9. भजन विनय 10. भजन भैरवी 11.भजन गजल 12. होली 13.राग श्याम कल्याण 14.कविता 15. डम्फक होली 16.राग कागू काफी 17. राग विहाग 18.गजलक ठुमरी 19. राग पावस चौमासा 20. भजन प्रभाती 21.महेशवाणी आ’ 22. भजन कीर्त्तन आदि। मिथिलाक लोचनक रागतरंगिणीमे किछु राग एहन छल जे मिथिले टामे छल, तकर प्रयोग सेहो कविजी कएलन्हि। प्रस्तुत अछि हुनकर अप्रकाशित रचनाक धारावाहिक प्रस्तुति:- विविध भजनावली ६. भजन भैरवी आब मन हरि चरनन अनुराग। त्यागि हृदयके विविध वासना दम्भ कपट सब त्याग॥ सुत बनिता परिजन पुरवासी अन्त न आबे काज। जे पद ध्यान करत सुर नर मुनि तुहुं निशा आब जाग॥ भज रघुपति कृपाल पति तारों पतित हजार बिनु हरि भजन बृथा जातदिन सपना सम संसार रामजी सन्त भरोस छारि अब सीता पति लौ लाग॥ ७. ॥ राग विहाग ॥ को होत दोसर आन रम बिनु॥ जे प्रभु जाय तारि अहिल्या जे बनि रहत परवान॥ जल बिच जाइ गजेन्द्र उबारो सुनत बात एक कान॥ दौपति चीर बढ़ाई सभा बिच जानत सकल जहान॥ रामजी सीता-पति भज निशदिन जौ सुख चाहत नादान॥ ८. चैत के ठुमरी चैत पिया नहि आयेल हो रामा चित घबरायेल।। भवनो न भावे मदन सताबे नैन नीन्द नहि लागल॥ निसिवासर कोइल कित कुहुकत बाग बाग फूल फूलल॥ रामजी वृथा जात ऋतुराजहि जौंन कन्त भरि मिललरामा॥ चित घबरायेल चैत पिया नहि आयल॥ ९. चैतके ठुमरी आबि गेल चैत बैरनमा हो रामा विधि भेल वामा॥ लाले-लाले चून्दरी लगाय पलंगपर पियवा न अयल सपनमा॥ जौवन जोर आर भैल दिन दिन विष सन लागत भवनमा॥ रामजी जीवन वृथा एहि तनमे प्रभु कोन देखलो नयनमा॥ १०. चैतके ठुमरी आबि गेल सियाक खोजनमा हो रामा पवन सुअनमा॥ वरजि वरजि हारे सब निसिचर लड़त कौ न सयनमा॥ उपवन नास रिसाय लंकपति मेघवासे कहत बयेनमा॥ मारसि जनि सुत बान्हिके लाऊ रामजी बुझत कारनमा हो रामा॥ ११. महेशवाणी सुनु सुनु चण्डेश्वर नाथ कृपा दृष्ट से एक वेर ताकहु हम छी परम अनाथ॥ देव दनुज भूपति कत सेबल कियो न दुखके साथ, बड़े निरास आश धय रोपल अहाँक चरणमे माथ॥ भटकि-भटकि सबके रुचि बूझल सब स्वारथके साथ जे छथि मित्र अपेक्षित परिजन सभै रखै छथि क्वाथ॥ नहि किछ वेदपुराण जनए छी नहि पूजाके भाव निसि दिन चिन्ता उदरके फूसिफटकके बात।। अहाँ दयालु दीनेपर सब दिन जनैत अछि संसार रामजीके सकल मनोरथ पूर वहु भोला नाथ॥ (अनुवर्तते) १. श्री गंगेश गुंजन २.श्री वैकुण्ठ झा २. श्रीमति ज्योति झा चौधरी १. श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक पढबाक लेल क्लिक करू बुधिबधिया। गुंजनजीक नाटक आइ भोर पढ़बाक लेल क्लिक करू "आइ भोर"। गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। राधा (दोसर खेप) देह भेल पिजड़ा केहन निर्मम कतेक लाचार ई मन सोन चिड़ै उड़वा लेल व्याकुल व्यग्र, प्रतिपल झांटि-झांटि क' पांखि करइत शोनिते-शोनिताम कोमल माधुरी फूल सदृश अपन देह। चांगुर सुकोमल, तुरंत जनमल नेना सन सुन्नर आ जीवन-सृष्टि केर सद्यःसृजित आशा मनोरथक नवीन मृदु माटि, पानि ,प्रकाश, पवन आ आगि धधकि रहले देह पहरक पहर एक-एक श्वांस केहन वज्रक देह केर पिजड़ा तथापि जरि छुटितय क' दिअय फेर सं मुक्त ओएह आकाश, मेघक श्याम स्निग्ध सतरंग मास धोअल फहराइत सघन कारी केशराशि झूमैत डारि-पातक हिड़ला-स्पन्दन ! स्वाधीन संगीतक मुक्ताकाश स्वच्छ धोअल वस्त्रसन ई तन जेना उधिया रहल वेग मे बहि रहल दिव्य बसात पर निर्बंध निर्भय मुक्त आत्मालीन किन्तु असह जे ई सब, स्वप्नवत भ' जाइत अछि सब बेर खुजय नहि पिजड़ाक ई फाटक से पर्यंत आ हमर ई मन ,कोमल पांखिक सामर्थ्य पर सहैत सबटा लोक-समाज-सम्बन्ध केर बोराक बोरा ऊघि रहल छी अनेरे जे अनन्त तेकर करय के हिसाब, इस्स कियेक नहि टुटैये पिजड़ा ने जरिये जाइत अछि एहि देहक मुक्ति केर अकांक्षा आ उताप! एकरा मे सं अनुपस्थित भ' गेलय की सबटा ज्वाला सबटा आगि ? एहि दुर्बल देह व्याकुल मनक ल' लेलक की आश्रय ? भ' गेलय निश्चिन्त चलि गेलय कुटमैती मे कोनो गाम तेहन भेल आब समय जे प्रकृति सेहो छोड़ि रहले धर्म जल करय नहि तृप्त प्यासल कंठ, करय ने शीतल बसातो तन अग्नि छोड़ल धर्म नहि तं जरा ने दितय हमर पिजड़ाकें, ई जीवन धन्य धरि आकाश अछि टीकल अनोन-बिसनोन, धनिसन महाश्वेती आक्षितिज नीलाभ छाता तनल अछि आद्यन्त, ककरा लेल कहि नहि ल' लेने अछि गंहीर दीर्घ शवासन ओहो नहि रहि गेल कोनो कार्यक एहि लाचार लेल बनि गेलए जेना कोनो अथबल माय, करैत विलाप मनेमन अपन असक्त ममता निष्प्रयोजन निरुपाय होयवाक नियति पर ... (८/४/०५) २.श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। दुनियॉं दुनियॉं कृतघ्नक डेरा छै, पापी - अधमक इ बसेरा छै। उपकार करु अपकार करत, खायत मधुर कुप्रचार करत। बाजय जे झूठ सगरो - सदिखन, स्वयं सत्यक ओ अवतार कहत॥ देखू जे सत्य अछि बाजि रहल, ओकरे खातिर ई घेरा छै। दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै, पापी - अधमक ई बसेरा छै। पापी - कृतघ्न के देखि देखि, दुनियॉं नहि एखनो चेत सकल। सत्युग, त्रेता, द्वापर, कलियुग मे, देखि रहल छी वैह विकल। धन शांति क्ऽ माध्यम होयत कोना, त्रेता मे देखलहुं सोन जरल। विद्या - बल सत्य सं दूर रहल, रावण - कौरव बेमौत मरल। जे दूर सत्य सं भागि रहल, दुनियॉं इ कांट क घेरा छै। दुनियॉं कृतघ्न के डेरा छै, पापी - अधमक ई बसेरा छै। ३. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति कल्पनालोक कल्पनालोकमें विचरण करै छलहुँ उन्मुक्त सबतरहक विषाद जतऽ भऽ गेल छल लुप्त आह्लादित हृदय सेहो रहय विस्मयसॅं युक्त प््राशंसामें स्वर्ग शब्द लागल सबसऽ उपर्युक्त कोनो भूमि नहि भेटल जे छल कलह सॅ लिप्त थम्हलहुँ जत कतौ छल स्नेहक जलसॅंऽ सिक्त आरोग्यक कचोर रंग सर्वत्र छल पल्लवित ताहि पर खुशी कोमलतापूर्वक रहय पुष्पित शान्ति तेहेन जे देलक अपूर्व आत्मसंतोष दूर-दूर तक नहिं कतौ देखायल आक्रोश एहनो दुनिया हैत कतौ से नहिं छल भरोस जाहि सॅं दुखी छलहुँ से मेटायल सब रोष वास्तविकता अछि अलग से तऽ स्वयंसिद्ध समस्या सॅं जूझैत सब, की बच्चा की वृद्ध कल्पनाक साकार भेनाई अछि अहिमें निमित्त घर-घर जहन लोक हैत शिक्षित आ समृद्ध। 1.भक्तिगीत 2. महाभारत प्रकाश झा, ग्राम+पो.- कठरा, भाया-पुटाई, थाना- मनीगाछी, दरभंगा, बिहार (भारत) हाल बचपनसँ पचपन तक ॐ छोट-छोट धीया पुताक चंचलता, पूरा परिवारक प्रसन्नता, देख-देख खुशीक नयनसँ खसए अछि नोर बुझबामे नञि आबए अछि कखन भेल साँझ कखन भेल भोर, * * नाना-नानी, मामा-मामी, बाबा-मैञा, कक्का-काकी, हिनकर लोकनिक एकटा प्यार मा-पिता, संग पूरा समाज मिल रखने छथि हजारो नाम कियो कहए नवनीत-निराला, कियो कहे मिकुन्द कुमार, हिनकर छोट भऽ कनिओ कम नञि हिनकर नाम छन्हि दर्शन पढ़ाईमे छथि एकदम जीरो पैघ भऽ बनता डॉक्टर एन्डरसन। बचपनमे तोतराइत बोली सुनबालेल लगेने रहए छथि सभ आस मुदा एहि युगक नेना जनमैते पहिलेसँ रहए यऽ बी.ए. पास। हाट-बजार लगेने बौआक फरमाइस रहए छनि सभसँ भिन्न भात-दालि सभसँ पैघ दुश्मन सदिखन खएता मैगी-चौमीन जिन्स पैन्ट कारी चस्मा पहिरि अपनाकेँ बुझए पैघ हीरो अपन आगूमे दोसर बच्चाकेँ बुझता एकदम जीरो स्कूलक चरचा ज्यौँ करियौ तँ हिन्दी मीडिअमसँ नञि पढ़ताह अंग्रेजी स्कूलमे पढ़ि ओऽ इन्जीनिअर-डॉक्टरक सपना देखताह आइ काल्हिक बच्चाकेँ छञि स्कूल जाइ लेल एसिसटेन्स आऽ कार पापा कपड़ा, जूता पहिराबथि माँ केक टॉफी भरि कऽ रहल छथि टिफिन तैयार बौआ स्कूलमे पढ़ए छथि बुझिऔ सभटा भगवान भरोसे परीक्षामे फेल भेलाऽ पार पेरा-लड्डू भेटए छनि सौँसे बच्चाक असफलता देखि माँ-बाप पित्ते कपार एखन तँ शुरुआते भेल अछि पैघ भऽ पिअत शराब बेटा कहिआ रुपैआ कमाएत तकर रहए छनि , सभ गोटेकेँ इन्तजार नीक पुतोहु, नीक परिवार आर पाँच लाख दहेज लेबा लेल बरका रहए छनि बोगली तैयार जखन आबए छनि, पुतोहु हेमामालिनी सन देखबनि हुनकर साज-शृंगार थोर लिपिस्टिक, आँखिमे काजर बिच अँगनामे माथ-उघार एखन आबि गेल मोबाइलक जमाना मिनटे-मिनटे घण्टी बाजए अपने-कमाइत छथि दिल्ली-मुम्बई बिन बात केने किए छनि भेटे बुरहारीमे माँ-बाप के कहए अहाँ सभ बनल छी कण्ठक घेघ अर्द्धांगिनीकेँ प्रसन्न रखबाऽ लेल पकड़ाबथि हस्ताक्षर कएल ब्लैंक चेक आब कतेक वर्णन करी जमानाक सभ मिलि दुयओ बातपर ध्यान माँ-बाप भगवानोसँ पैघ हुनका लोकनिक करियन्हु सम्मान सभक एक दिन आएत बुरहारी जेहने करबए तेहने फल पाएब स्वर्ग नरक एतए भेटत कतबू करब तीर्थ वा गंगा नहाएब लिखते-लिखिते कलम रुकए कऽ नञि लए कखनो नाम प्रकाशक बातपर ध्यान देलापर अहाँ कहब मिथिला महान 2. महाभारत महाभारत (आँगा) -गजेन्द्र ठाकुर ७. द्रोण-पर्व रात्रिमे दुर्योधन कएलक प्रण अर्जुनक मृत्युक भेल आवाहन, कर्णकेँ सेनापति बनाए कएलन्हि कौरवक गण सोलहम दिनक युद्धक प्राअरम्भ। कर्णक शंखध्वनिसँ भेल युद्ध शुरू, कर्णक तापसँ युद्धभूमि स्तब्ध, नकुल सोझाँ पाबि अपघात छोड़ल प्राण कुन्तीक देल कर्णक वर प्राणदान। कृष्णक आवाहन अर्जुन अहाँकेँ छोड़ि, क्यो नञि कए सकत विजय कर्णक ऊपरि, वीगसँ जे बढ़ल अर्जुन आगाँ भेल शुरु बरखा, बरखा वाणक कौरवगणक अर्जुनक समक्ष, मुदा अर्जुनक सोझाँ सभ भेलाह पस्त, मुदा तखने भेल सोलहम दिनक सूर्यास्त। रात्रिमे कर्ण कहलन्हि हे मित्र दुर्योधन, अर्जुनक रथमे होइछ ढेर-रास शस्त्रक अटावेश, गाण्डीव आऽ अक्षय तूणीरक नहि कोन्पो जोड़, हुनकर अश्वक गति नहि कोनो थोड़ कृष्ण सन सारथी। शल्य बनथि हमर सारथी यदि होएताह ओऽ कृष्णक तोड़, मुदा शल्य कहलन्हि अछि हमर मुँहपर नहि जोड़, कर्णकेँ से होए स्वीकार तँ हमरा कोनो हर्ज नहि। सत्रहम दिनुका युद्ध भेल शुरू कर्णक आक्रमण शुरू, अर्जुन बढ़ल आगू शल्य कहल भिरू महाप्राक्रमीक अर्जुनसँ, कर्ण देखलन्हि भीमकेँ करैत संहार चलू शल्य ओहि पार, भीमक रूप आइ प्रचण्ड छोड़ल वाण चीड़ि कवच कर्णक गाँथल देह, अचेत कर्णकेँ लए भगलाह शल्य रणभूमिक कात-करोट। देखि ई दृश्य भीम भेलाह आर तीव्र, दुर्योधन हुनकर सोझाँ पठाओल दुःशासन वीर। गदा युद्ध दुहुक मध्य छल भेल भयङ्कर, भीमक मस्तक प्रहार खसल मूर्छित दुःशासन। भीम हाथ उखाड़ि पीबय लागल छातीक रक्त, भागल कौरवसेना देखि दृश्य एहि तरहक। आब सोझाँ-सोझी अर्जुन कर्णक युद्ध आइ शुरू, कर्ण काटल गांडीवक प्रत्यंचा यावत दोसर चढ़ाबथि, कएल वाणसँ आक्रमण अर्जुन कोहुना कए प्रत्यंचा चढ़ाओल, वाण-वर्षा अर्जुनका जखन भेल शुरू, कर्ण शल्य भेलाह चोटिल, कर्णक सहायक सेना भेल नष्ट कर्ण अति व्याकुल। छोड़ल कर्ण वाण दिव्य अर्जुनपर कृष्ण कएलन्हि अश्वकेँ ठेहुनपर ठाढ़, अर्जुनक मुकुटकेँ छुबैत ओऽ अर्जुनक प्राणक संकट भेल पार। तखनहि कर्णक रथक पहिया धँसल युद्ध मध्य, कर्णक पुकार कनेक काल वाण नहि चलएबाक धर्मक ई युद्ध, विराटक गौक चोरि अर्जुन कहलन्हि आऽ अभिमन्युकेँ मारैत काल, धर्म आऽ धर्मयुद्धक बिसरल छलहुँ अहाँ पाठ, प्राणक भिक्षा मँगैत लगितहु अछि नहि लाज। कर्ण उतरि लगलाह रथक पहिया निकालए, अर्जुनक वाण काटल मस्तक कौरवमे हाहाकार भारी। दुर्योधनक सभ भाँयकेँ मारने छालाह भीम तावत, एगारह अक्षौहिणीमे सँ बड़ थोड़ कौरव छल बाँचल, कृपाचार्य बुझओलन्हि दुर्योधन आबो करू सन्धि, मुदा ओऽ कहल हम अहाँ कृतवर्मा अश्वत्थाम आऽशल्य अछैत, सन्धिक गप छी अहाँ करैत। शल्य बनथि सेनापति युद्ध अठारहम दिन रहत जारी। ९.शल्य-पर्व शल्यक भेल उद्घोष ओकर बढ़ल पग युधिष्ठिर छल रोकल। शल्य जखनहि काटल हुनकर एक धनुष, युधिष्ठिर उठाए दोसर धनुष मारल शल्यक अश्व आऽ सारथीकेँ, भेल तखन घमासान युधिष्ठिर लेलन्हि शल्य प्राण, सहदेव छुटलाह शकुनि आऽ ओकर पुत्र उलूकपर, लेलन्हि बाप-बेटाक प्राण जुआरीक प्राणान्त। गदा लए दुर्योधन निकलि गेलाह छोड़ि रण, एकटा सरोवर मध्य छल स्तंभ नुकाएल ओतए दुर्योधन, देखलन्हि जाइत हुनका किछु ग्रामीण। पाण्डवक संग कृष्ण पहुँचलाह ओतए, किछु ग्रामीण जे देलन्हि पता ओतएक, भीम देलक ललकारा दुर्योधन निकलि आएल, तीर्थसँ घुरैत बलराम सेहो पहुँचलाह ओतए आइ। शिष्य दुर्योधनकेँ दए आशीर्वाद कएल गदा युद्धक शुरुआत, भीम दुर्योधनक बीच बाझल युद्ध घनघोर, कृष्ण देल जाँघपर थपकी मोन पाड़ल भीमकेँ ओकर प्रतिज्ञाक, तोडि जाँघक हड्डी कए मस्तकपर दुर्योधनक गदा-पएरसँ प्रहार, भीमक ई कृत्य छुटलाह बलराम ओकरा पर मार-मार, कृष्ण रोकि दाऊकेँ मोन पाड़ल द्रौपदीक अपमान, भीमक प्रण। छोड़ि दुर्योधनकेँ असहाय, गेलाह सभ पाण्डव भाय। संध्या समय कृतवर्मा कृपाचार्य आऽ अश्वत्थामा पहुँचि देखल दुर्योधनक दुर्दशा आऽ प्रलाप, भीमक पादसँ दुर्योधनक मस्तकपर प्रहार, सुनि ई कथ्य अश्वत्थामा लेल पाण्डवक वधक व्रत, दुर्योधन कएल अश्वत्थामाक सेनापति रूपमे अभिषेक, कृतवर्मा कृपाचार्य आऽ अश्वत्थामा बढ़लाह पाण्डव-शिविर समक्ष। १०.सौप्तिक पर्व कृष्न लए पांचो पांडवकेँ गेलाह कतहु अन्यत्र। पाण्डव-शिविरक समक्ष एकटा वृक्ष,नीचाँ सुतलाह कृपा आऽ कृत, अश्वत्थामाक आँखिमे निन्नक नञि लेष, देखल एकटा पक्षी अबैत, ओहि वृक्षपर कौआसभ सुतल मारि रास, केलक ओऽ पक्षी सभक ग्रास। देखि ई दृश्य अश्वत्थामा उठाओल कृपाचार्य ओऽ कृत, भोरक बाट ताकब नहि सुबुद्धि, ई अधर्म कहल कृप, मुदा अश्वत्थाम चलि पड़ल शिविर दिश, हारि पहुंचल पाछाँ-पाछाँ कृत-कृप, हम पैसैत छी भीतर शिविर, बाहर होइत सभकेँ प्राण लिअ अहाँ दुनू गोटे, एतए ठाढ़ लग द्वार। सभ पांचाल धृष्टद्युम्न शिखण्डी समेत, द्रौपदीक पाँचू पुत्रकेँ बुझि पाण्डव देल मारि, अश्वत्थामा देल शिविरकेँ आगिसँ जराए। फेर पहुँचि लए द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ, दुर्योधन देखि माँगल भीम माथ, ओकर मुष्टिकाक प्रहारसँ मस्तक भेल फाँक, नहि ई नहि भीमक माथ, भोरमे देखल द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ, कानैत हाक्रोश करैत भेल दुर्योधनक प्राणान्त। भोरमे कॄष्ण पहुँचलाह पाण्डव-द्रौपदीक संग, देखि विनाश भीम चलल अश्वत्थामाक ताकिमे, छल ओऽ गंग तटपर ब्यासक समक्ष, युधिष्ठिर-अर्जुन संग कृष्ण पहुँचल जाए, पाण्डवक नाशक संकल्प संग अश्वत्थामा छोड़ल ब्रह्मशिरा अस्त्र, अर्जुनक छोड़ल पाशुपत महास्त्र अग्नि वृष्टि सँ सृष्टिक विनाश, बीचमे अस्त्रक अएलाह नारद आऽ ब्यास, आग्रह करैत जे दुनू गोटे लिअ अपन-अपन अस्त्र सम्हारि, अर्जुन लेलन्हि अपन अस्त्र सम्हारि मुदा, अश्वत्थामा कहल नहि घुरि सकत हमर अस्त्र आइ, ऋषिक प्रतिकार ब्रह्मशिरासँ होएत उत्तराक गर्भक नाश, मुदा अश्वत्थामकेँ देमए पड़त मस्तकक मणि, भेल ओऽ निर्बल तपस्वी ब्यासक आश्रममे जीवन सकल। ११.स्त्री पर्व दुर्योधनक पत्नी भानुमति छलि अचेत, गांधारी करथि विलाप, धृतराष्ट्र मूच्छित विदुरक हाक्रोश, पाण्डव घुरल अश्वत्थामाक मणि संग, कृष्ण लेलन्हि लौहक भीमक स्वांग धृतराष्ट्र पहुँचल कुरुक्षेत्र वधू सभक संग। भीमकेँ गर लगाए कएल ओकरा चूर्ण भेल भीम-भीम कहैत प्रलाप, कृष्ण कहल नहि कानू हे धृतराष्ट्र, छल ई लौहक भीम मात्र, गांधारी देल कॄष्णकेँ शाप, जेना कएल अहाँ हमर वंशक नाश, होएत अहूँक कुल नष्ट। मृतकक दाह संस्कारक संग एक पक्ष समाप्त। १२. शान्ति पर्व युधिष्ठिरक मोन विखिन्न, छोड़ल राज-पाटक विचार, ब्यास आबि देलन्हि उपदेश, पलयन नहि अहाँक मार्ग। धौम्य कए वेद मंत्रक गाण राजतिलक युधिष्ठिरकेँ लगाएल। फेर पहुँचि भीष्मक समक्ष लेल अनुशासनक शिक्षा, राजधर्म,लोकधर्म मोक्षधर्मक ज्ञान, प्रजापालन, उठि प्रदेश जातिक विचारसँ ऊपर, राजाक व्रतक करू परिपालन। १३.अनुशासन पर्व आएल ओऽ काल जखन सूर्य भेलाह उत्तरायण, पहुँचलाह युधिष्ठिर संग माता-गांधारी-कुन्ती, धृतराष्ट्र भ्राता संग, अट्ठावन दिनक शर-शय्याक अन्तिम उपदेश आऽ महाप्रयाण, चाननक चितापर भीष्मकेँ युधिष्ठिर देल आगि सभ आक्रान्त। १४.आश्वमेधिक पर्व हस्तिनापुरक राज्यमे आएल सुख समृद्धि, युधिष्ठिरक कौशल कएल आशाक वृद्धि, उत्तराकेँ तखने भेल मृत-पुत्रक प्राप्ति, सुभद्रा खसलि कृष्ण लग जाए। कृष्ण उठाए बालकेँ कहल हम नहि कएल पलायन, सत्यसँ सम्बन्ध रहल बनल, पराजित शत्रु कए नहि भेलहुँ हिंसक, यदि ई सत्य तँ बालक जीबि उठथि। ई सुनितहि शिशु भेल जीवित नाम पड़ल परीक्षित। फेर कएल युधिष्ठिर यज्ञ अश्वमेध, सिलेबी अश्वक गरमे स्वर्णपत्र, जिनका युधिष्ठिरक राज्यसँ परहेज, से पकड़ि घोटक करथि एकर विरोध। मुदा घुरि आएल अश्व निष्कंटक, यज्ञ भेल समाप्त निर्विघ्न। १५.आश्रमवासिक पर्व बरख पन्द्रह बीतल तखन अएलाह ब्यास, देल उपदेश धॄतराष्ट्र लेल वानप्रस्थ धर्मक ज्ञान, गांधारी, कुन्ती विदुर संजयक संग हिमालय प्रयाण, विदुर लेलनि वनहिमे समाधि, दावाग्नि लेलक शेष सभक प्राण। १६.मौसल पर्व कृष्ण युद्धक बाद गेलाह द्वारका, छलथि प्रप्त कएने सम्मान, मुदा यादव राजकुमार, करथि अपमान विद्वानक, मारि-काटि करथि आपसमे खत्म, देखि दुखित बलराम प्रभासतीर्थ जाए, ओतहि लेल दाऊ समाधि, कृष्ण पहुँचि देखि हुनकर प्राणान्त, गाछ पकड़ि रहथि ठेहिआए, ब्याध जकर छल जरा नाम, हरिण बुझि पैरक तलवामे मारल वाण, भेल कृष्णक प्राणान्त, सुनि ई समाचार मृत्युक वसुदेवक, पिता वासुदेव सेहो कएल जीवनक अन्त। १७.महाप्रास्थानिक पर्व कृष्णक मृत्युक समाचार, पाण्डवराज युधिष्ठिर देल परीक्षितकेँ राज, सुभद्रा केँ दए उपदेश, संग द्रौपदी पहुँचल द्वारका पाँचू भाए। ओतए डूबल समुद्रमे छल ओऽ नगरी, घुमैत फिरैत चललाह हिमालय सभ गोटे। एक कुकुड़ छल संग चलैत ओतए, हिमालय वृहदाकार हिमपातक मारि, द्रौपदी खसलि मरलि , फेर सहदेव, नकुल अर्जुन भीम खसि मरल फेर-फेर। आगाँ देवलोकक रथ छल ठाढ़, इन्द्र कहल चलू असगर सशरीर युधिष्ठिर, ई कुकुड़ नहि रहए साथ। युधिष्ठिर नहि मानल घुरि जाऊ इन्द्र, बिन एकर नहि जाएब ओतए होए स्वर्ग अहि। छल ओऽ कुकुड़ यमराज स्वयं, प्रकट भए देल ओऽ आशीर्वाद ओतए। १८. स्वर्गारोहण पर्व पहुँचि स्वर्ग देखल कौरव गण सभ ओतए, इन्द्र हमर भ्राता छथि कतए। तखन एकटा दूत लए गेल हुनका नर्कक द्वारपर, द्रौपदी संग पाँचू भाए छलाह ओतए। कहल युधिष्ठिर हम रहब एतहि हे दूत, छोड़ि हिनका जाएब नहि कतहु। इन्द्र यम पहुँचि गेलाह ओतए। यम कहल यक्ष कुकुड़ बनि हम अहाँ परीक्षा लेल, आइ एहि तेसर परीक्षामे सेहो अहाँकेँ उत्तीर्ण कएल। ई अछि देवलोक मुदा सदेह राजाकेँ, एतुक्का कष्ट देखक लेबाक चाही शिक्षा तेँ, किछु कालक कष्ट हम अहाँक देल। छोड़ू ई शरीर लिअ दैवी रूप आब, कहैत यमक भेल ई परिवर्तन, कर्ण सेहो ओतए बारह आदित्यक संग, रत्नजटित सिंहासनपर छल विराजमान भारतक युद्धक काव्यक समापन। (समाप्त) बुद्ध चरित ई पुरातन देश नाम भरत, राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज। एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन, पत्नी माया छलि, कपिलवस्तुमे राज करथि तखन। (अनुवर्तते) 1.श्री डॉ. पंकज पराशर 2. शैलेन्द्र मोहन झा श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। न्याय जारी अछि (सद्दाम हुसैनकेँ देल गेल मृत्युदण्डपर) सुभाषितानि आ नीतिश्लोकाः मे आब नहि बाँचल एक्को टा न्यायाधीश वानर अपन इनसाफी बटखराक संग आब ओ सब देखल जा रहल-ए आख्यानसँ बहरा कऽ सुच्चा वर्तमानमे वर्तमानक अर्थ जँ सुपरसोनिक विमानसँ गणेशजीक दुग्धतृषा धरि जोड़ि सकी आ अर्थ लगा सकी कोनहुना उच्च तकनीकसँ संपन्न सुपर कंप्युटरपर लागल सेनुरक ड़ाँड़ि के बीच तँ शायद वर्तमान शब्दक किछु अर्थ ताकल जा सकैत अछि कलस्टर बमक प्रहारसँ दुनिया भरिमे लोकतंत्र स्थापित करबाक प्रयासमे अपस्याँत महाशक्ति क्षणे-क्षण अपन बयान बदलैत एकर कारण कहुखन ईश्वरीय आदेशक पालन कहैत अछि तँ कहुखन व्यापक विनाशक हथियारक उत्पादन जानि नहि कोन-कोन न्यायाधीशक निर्णय आयब एखन बाँचल अछि जानि नहि हमरा सबहक छाती ककरा-ककरा बंदूकक लेल आरक्षित अछि आ घर पेट्रोल बमक घेरामे आबि चुकल अछि लोकतंत्र स्थापनाक प्रयासपर कोनो तरहक टिप्पणी न्यायालयक गंभीर अवमानना मानल जायत आ न्यायाधीश केर नियोक्ताक संग नहि देब-शत्रुता सावधान! दुनियाक खास-ओ-आम न्यायाधीशक न्याय जारी अछि। बोनिहारि मोनक आर्तनाद डिल्ली-पैंजाबक लेल जहिया-जहिया निकलैत अछि झुंडक-झुंड युवक सब बटखर्चाक लेल बान्हल दालिपुड़ी आ ठकुआ-पकमानक संग तँ नोसि जकाँ भरि लैत छी नाकक पूरामे सबटा गंध लाहक लहठीसँ भरल हाथसँ बान्हल मोटरीपर हड़बड़ीमे अभरल हरदियाएल हाथक आँगुरक छाप भरिसक सओन-भादवक रातिमे हेतैक कनेँ-कनेँ मलिन वा सेहो नहि कोना कहि सकब बाटक बाँचल दुटप्पी जे टमटमपर टीसन धरि चलैत अछि अनवरत ताहिमे बेर-बेर हुलकी मारैत अछि पैंजाबक चर्च के बीच मासूलवला टाकाक कर्जा आ पछिले वर्षसँ सूदभरना लागल अगदुआरिवला खेतक हियास मोन कइक युगसँ कऽ रहल अछि आर्तनाद बाटसँ बेशी मोनमे चलैत अछि अगदुआरिवला खेतक चर्च जहिया-जहिया हफीमक निसांमे बड़द जकाँ खटैत अछि तीन बहीन परक दुलरुआ हमर दोस जिला संगरूरक साकिन जस्सियामे * * * शौचालयक कातमे कोनहुना ठाढ़ हेबाक ठाम तकैत ओ जखन नाकक क्रियाशीलताक सँ होइत अछि पीड़ित तँ तकैत अछि गामसँ लऽ कए ट्रेन धरि कनेकोँ टा स्थान मुदा स्थानासीन लोकक शंकित दृष्टिसँ विद्ध ओ बिलमैत अछि गामहि जकाँ एतहु कोनो करौटमे भरि राति मोनमे कइक युगसँ दमित अछि स्थानक आस पिंडदानक संदर्भमे सुनल पिंडक अर्थ जखन ओ सुनैत अछि-गाम तँ गामक बाहर बसनिहार ओकरा एतहु जगह भेटैत छैक पिंडसँ बाहर खेतक बीचमे बनाओल “कोठा”मे पुरना ट्रैक्टरक टायर आ खाद-बियाक बोरा सबहक बीच दुनिया मायक कोर नहि होइत अछि आ नहि घरक बिछाओन जतय कोनो तरहक चिन्ताक स्थान नहि छल ओ सोचैत अछि अपन राज्यक संज्ञाकेँ एकटा गारि जकाँ सुनैत कोनो अताहि हरवाह जकाँ ओकरा बड़द बुझि जखन मारैत अछि पैंजाबक किसान जल्दी करो, जल्दी करो- केर पेना तँ अदार बाछा सन मोनपर अभरि अबैत अछि- दाग ओ सोचैत अछि करनिनिया रातिमे सब लोक सबहक लेल लोके नहि होइत छैक घरमुहाँ मोन बेर-बेर ढरैत अछि बितलाहा समय केर बाट जाहि गाममे ओ जनमल-बाढ़ल जाहि माटिमे लोटबैत भेल जुआन ताहि ठाम ककर-ककर नहि कयलक बेगारी आ हरवाही मुदा तइयो नहि भेटलैक कोनो स्थान, कोनो मान आ गाममे भरि पेट भोजन दुनू साँझ मासूलवला टाका अगदुआरिवला खेतमे मिज्झर होइत ट्रेनक यात्रा संग हरदियाएल हाथक कँपकँपी घिंघोरल रंग जकाँ ओकरा आँखिमे नचैत रहैत छैक आ निन्नकेँ फुसलयबाक ओकर सबटा प्रयास व्यर्थ भऽ जाइत अछि अक्सरहां तेरह मासक ओकर कन्हकिरबा आब कतेक टा भेल हेतैक कतेक बदलल हेतैक ओकरा परोक्षमे गामक मोनक भूगोल चिन्हार चीज सब कतेक भऽ गेल हेतैक अन्चिन्हार आ आस्ते-आस्ते कतेक भेल हेतैक टोलक पसार कतेक रास स्वप्न आ कतेक रास प्रश्नक संग ओ घुरैत अछि मोनमे बसल गाम असंख्यक रातिक हियास लेने माथपर भारी बक्शाकेँ फूल सन हल्लुक बुझैत बुढ़ियाक खिस्सा सुनू... बुढ़ियाक खिस्सा... ने ओ नगरी ने ओ ठाम... ने ओ नगरी ने ओ ठाम... मोन अहर्निश करैत रहैत अछि आर्तनाद बरगंडीसँ सोलगंडी सेरक यथार्थ धरि बढ़ल गाम शनैः शनैः होइत गेल अनचिन्हार आ बोनिहारी मोनक गाम घुरबाक आकुलतापर होइत गेल वज्रपात। 2. शैलेन्द्र मोहन झा रसमय कवि चतुर चतुरभुज- विद्यापति कालीन कवि। मात्र १७ टा पद्य उपलब्ध, मुदा ई १७ टा पद हिनकर कीर्तिकेँ अक्षय रखबाक लेल पर्याप्त अछि। उदाहरण देखू-दिन-दिन दुहु-तन छीन, माधव,एकओ ने अपन अधीन। हे कृष्ण! दिनपर दिन दुनूक तन विरहसँ क्षीण भेल जाऽ रहल अछि, आऽ दुनूमे केओ अपन अधीन नहि छथि। "विदेह" प्रस्तुत कए रहल अछि आधुनिक रसमय कवि शैलेन्द्र मोहन झाक रचना। सौभाग्यसँ हम ओहि गोनू झाक गाम, भरवारासँ छी, जिनका सम्पूर्ण भारत, हास्यशिरोमणिक नामसँ जनैत अछि। वर्तमानमे हम टाटा मोटर्स फाइनेन्स लिमिटेड, सम्बलपुरमे प्रबन्धकक रूपमे कार्यरत छी। हम तऽ छी परदेशमे -किछु दिन पहिने हमर विवाह भेल छल आर ई गीत हम अपन कनियाँ लेल, जेना लिखल आर गायल बुझाइत छल, लिखि पठाओल। मुदा दुःखक गप ई जे प्रचंड बाढ़िक कारण हुनका प्राप्त नहि भेल। हम तऽ छी परदेशमे, गामपर निकलल होएत चाँद अपन रातिके छतपर कत्तेक, असगर होयत चाँद यौ हम तऽ छी... जाहि आँखिमे काजर बनि कयऽ हेलै अन्हरिया राति ओहि आँखिमे, नोरक एकटा बूँदे होयत चाँद यौ राति तऽ ऐहन पेंच लगौलक, छूटल हाथसँ डोरि अपन आँगनक नीममे जा कयऽ अटकल होएत चाँद यौ चाँद बिना दिन अहिना बीतै जेना युग बितल हमरा बिना कोन हालमे होएत केहन होएत चाँद यौ हम त छी परदेशमे, गामपर निकलल होयत चाँद गे गे छौड़ी कनि तकिहैं गे, एम्हर कनि तकिहैं गे.... तोरा लऽ हृदय बेकरार गे ऽऽऽऽ केश छौ कारी-कारी ई यौवन भारी-भारी असगर सम्हरतौ कोनाऽऽऽऽ आँखि मदिराक प्याला ठोढ़ तोहर मधुशाला पीबय दे हमरो कनिऽऽऽ बातसँ मिसरी चूबै मन तऽ आँखिमे डुबै पार उतरबै कोनाऽऽऽऽ चाल छौ हिरणी जेहन जहर तोहर, बिढ़नी जेहन जहर उतरतै कोनाऽऽऽ गालमे सूरज उगै केशमे सूरज डुबै दिन राति बशमे तोराऽऽऽ गें छौड़ी कनि तकिहैं गे एम्हर कनि तकिहैं गें एम्हर कनि तकिहें गें तोरा लेल हृदय बेकरार गेऽऽऽ १.(कोसी लोकगीत)(बिहार की नदियाँ, सहृदय, १९७७, पृ.३७२-७३) मुठी एक डँड़वा गे कोसिका अलपा गे बयसवा गे भुइयाँ लौटे नामी-नामी केश कोसी मय लोटै छौ गे केश॥ केशवा सम्हारि कोसी जुड़वा गे बन्हाओल कोसी गे खोपवा बन्हाओल ओहि खोपवा कुहुकै मजूर। उतरहि राज से एलेँ हे रैया रनपाल से कोसी के देखि-देखि सूरति निहारै सूरति देखि धीरज नै रहै धीर॥ किये तोरा कोसिका चेकापर गढ़लक किये जे रूपा गढ़लक सोनार॥ नै हो रनपाल मोहि चेकापर गढ़लक नै रूपा गढ़लक सोनार अम्मा कोखिया हो रनपाल हमरो जनम भेल सूरति देलक भगवान गाओल सेवक जन दुहु कर जोरि गरुआक बेरि होउ न सहाय, गे कोसी मैया होउ न सहाय॥ २. (कोसी लोकगीत, मोरंग, नेपाल)(नदियाँ गाती हैं, ओमप्रकाश भारती, २००२, पृ.१०८) सगर परबत से नाम्हल कोसिका माता, भोटी मुख कयेले पयाम आगू-आगू कोयला वीर धसना खभारल, पाछू-पाछू कोसिका उमरल जाय नाम्ही-नाम्ही आछर लिखले गंगा माता, दिहलनि कोसी जी के हाथ सात रात दिन झड़ी नमावल चरहल चनन केर गाछे ये चानन छेबि-छेबि बेड़ बनावल, भोटी मुख देव चढ़ी आय ये गहिरी से नदिया देखहुँ भेयाउन तहाँ देल झौआ लगाय रोहुआक मूरा चढ़ी हेरये कोसिका, केती दूर आबैय छे बलान मार-मार के धार बहिये गेल, कामरू चलल घहराय पोखरि गहीर भौरये माता कोसिका, कमला के देल उपदेस माछ-काछु सब उसरे लोटाबय, पसर चरयै धेनु गाय गाइब जगत के लोक कल जोरी, आजु मइआ इबु न सहाय। ३.(कोसी लोकगीत)(कोसी लोकगीत- ब्रजेश्वर,१९५५) रातिए जे एलै रानू गउना करैले, कोहबर घरमे सुतल निचित! जकरो दुअरिया हे रानो कोसी बहे धार सेहो कैसे सूते हे निचित॥ सीरमा बैसल हे रानो कोसिका जगाबै सूतल रानो उठल चेहाय॥ काँख लेल धोतिया हे रानो मुख दतमनि माय तोरा हंटौ हे रानो बाप तोरा बरजौ जनु जाहे कोसी असनान॥ हँटलौ ने मानै रानो दबलौ ने मानै चली गेलै कोसी असनान॥ एक डूब हे कोसी दुइ डूब लेल तीन डूब गेल भसियाय॥ जब तुहू आहे कोसिका हमरो डुबइबे आनब हम अस्सी मन कोदारि॥ अस्सी मन कोदरिया हे रानो बेरासी मन बेंट आगू आगू धसना धसाय॥ स्व.रामकृष्ण झा “किसुन” (१९२३-१९७०) कोशीक बाढ़ि(किशुन रचनावली, तेसर खण्ड, मैथिली अकादमी) आबि रहलै बाढ़ि अछि उद्दाम कोशीक धार आबि रहलै बाढ़ि ई अति क्षुब्ध/ मर्यादा-रहित सागर सदृश उछलैत/ लहरिक वेगमे भसिया रहल छै काश वा कि पटेर, झौआ, झार गाछ, बाँस कतहु कतहु अछि खाम्ह, खोपड़ि खढ़ कोरो सहित फूसिक चार आबि रहलै बाढ़ि अछि उछाम कोशीक धार बचि सकत नहि एहिसँ डिहबार बाबा केर उँचका थान वा कि गहबर सलहेसक आ रामदासक अखराहा वा डीह राजा साहेबक ड्योढ़ी, हवेली, अस्तबल, हथिसार बाभनक घर हो कि डोम दुसाध गोंढ़िक तुच्छ खोपड़ि पानि सबकेँ कऽ देतै एकटार आबि रहलै बाढ़ि अछि उद्दाम कोशीक धार। ऊँच-ऊँच जतेक अछि सब नीच बनि जयतैक नीच अछि खत्ता कि डाबर भरत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत हैत सबटा/ ऊँच ओ बनि जैत हैत सबटा एक रंग समभूमि ऊँच नीचक भेद नहि किन्नहु रहत जे ऊँच अछि पहिने कटनियांमे कटत आ नीच सभकेँ ऊँच होमक सुलभ भऽ जयतै सहज अधिकार कोढ़मे छक दऽ लगय तँ की करब आब ई सब तँ सहय पड़बे करत बाप-बाप करू कि पीटू सब अपन कपार आबि रहलै बाढ़ि अछि उद्दाम कोशीक धार। आरि धूर ने काज किछुओ दऽ सकत सब बुद्धि नियमक सुदृढ़ बान्ह ने किच्छु टिकि सकत किछु काल बस सब पर पलाड़ी पानि उमड़ि कऽ चढ़ि जैत सबकेँ भरि बरोबरि कऽ देतै आ पुरनकी पोखरि कि नवकी अछि जतेक खसि पड़त ई पानि बाढ़िक हहाकऽ नहि रोकि सकबै रोकि नहि सकतैक ऊँच महार जे बनल अछि पोखरिक रक्षक भखरिकऽ वा कि कटिकऽ निपत्ता भऽ जैत आ पानि जे खसतै तखन ई बहुत दिनसँ बान्हि कऽ राखल महारक शृंखलामे अछि जते युग-युग प्रताड़ित प्रपीड़ित फुसिऐल पोसल नैनी, भुन्ना आ कि ललमुँहियाँ प्रभृति ई माछ सब एहि पोखरिक नहि रहि सकत सब बहार उजाहिमे जयबे करत पाग आब रहय कि नहि वा बचि सकय नहि टीक ककरो की करब? एहि बाढ़िमे अछि ककर वश? ककरा कहू जे के नै हैत देखार आबि रहलै बाढ़ि अछि उद्दाम कोशीक धार। आबि रहलै बाढ़ि जे कोशीक ई बचि सकत नहि घर आ कि दुआर सड़क-खत्ता/ ऊँच-नीच पोखरि कि डाबड़/ गाम-गाछी आ कि खेत-पथार आबि रहलै बाढ़ि अछि उद्दाम कोशीक धार। विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। गाम डूबि गेल भोरम -भोर चन्दन भैयाक फ़ोन आयल कहलखिन हालचाल समाद दलखिन अपन गाम डूबि गेल सुनक सन्न रहि गेलो ओहि जन्मभूमि ओहि मिथिलाक त्रासदी सुनि कs सिलेमा जना गामक सबटा दृश्य आखिंक सामने घुरै लागल अपन फ़ूसक घर कक्काक पक्का मकान द्वार ओ भंसाघर याद आ कुकुर ओ मालजाल बाड़ी ओ कटहलक गाछ भैया कहलखिन चाइर सं पांच फ़ुट पैन छै आंगन मे अपन गाम रहैथ सबसे ऊंच कहियो नहि डूबैत छैक बाढ़ मे देखू, चकाचक भs रहल छैथ राजधानी एतअ सं दूर गाम-घर मे भढ़ल छैक पानी. 1. कला 2. संगीत शिक्षा मिथिला कला(आँगा) चित्रकार- तूलिका, ग्राम-रुद्रपुर, भाया-आन्ध्रा-ठाढ़ी, जिला-मधुबनी। अनुवर्तते) 2.संगीत शिक्षा श्री रामाश्रय झा ’रामरंग’(१९२८- ) राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित) मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना। स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान। अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥ स्थायी - - रेग॒म॑प ग॒रेसा ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑ ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ अन्तरा पप नि॒ध निसां सांरें मिथि लाऽ ऽऽ कोकि सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ *गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध। ३.श्री गणेश जीक वन्दना राग बिलावल त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: विघन हरन गज बदन दया करु, हरु हमर दुःख-ताप-संताप। अन्तरा: कतेक कहब हम अपन अवगुन, अधम आयल “रामरंग” अहाँ शरण। आशुतोष सुत गण नायक बरदायक, सब विधि टारु पाप। स्थाई नि ग प ध नि सा नि ध प ध नि॒ ध प म ग म रे वि ध न ह र न ग ज ब द न द या ऽ क रु ग ग म नि॒ ध प म ग ग प म ग म रे स सा ग रु ऽ ह म र दु ख ता ऽ प सं ता ऽ प ऽ अन्तरा नि रें प प ध नि सां सां सां सां सां गं गं मं गं रें सां – क ते क क ह ब ह म अ प न अ व गु न ऽ रे सां सां सां सां ध नि॒ ध प ध ग प म ग ग प प अ ध म आ य ल रा म रे ऽ ग अ हां श र ण ध प म ग म रे सा सा सा सा ध - ध नि॒ ध प आ ऽ शु तो ऽ ष सु त ग ण ना ऽ य क व र धनि संरें नि सां ध नि॒ ध प पध नि॒ ध प म ग म रे दाऽ ऽऽ य क स ब बि ध टाऽ ऽ रु ऽ पा ऽ ऽ प ४.मिथिलाक वन्दना राग तीरभुक्ति झपताल स्थाई: गंग बागमती कोशी के जहँ धार, एहेन भूमि कय नमन करूँ बार-बार। अन्तरा: जनक याग्यवल्क जहँ सन्त विद्वान, “रामरंग” जय मिथिला नमन तोहे बार-बार॥ स्थाई रे – ग म प म ग रे – सा गं ऽ ग ऽ बा ऽ ग म ऽ ती प सा नि ध़ – प़ नि नि सा रे सा को ऽ शी ऽ के ज हं धा ऽ र सा म ग रेग रे प ध म पनि सां सां ए हे नऽ ऽ भू ऽ मि कऽ ऽ य प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न क रुँ बा ऽ र बा र अन्तरा प पध म – प नि नि सां – सां ज नऽ क ऽ ऽ या ग्य व ऽ ल्क रें रें गं – मं मं गं रें – सां ज हं सं ऽ त वि ऽ द्वा ऽ न ध प सां नि प ध म प नि सां सां सां रा म रं ऽ ग ज य मि थि ला प सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा न म न तो हे बा ऽ र बा र ५.श्री शंकर जीक वन्दना राग भूपाली त्रिताल (मध्य लय) स्थाई: कतेक कहब दुःख अहाँ कय अपन शिव अहूँ रहब चुप साधि। अन्तरा: चिंता विथा तरह तरह क अछि, तन लागल अछि व्याधि, “रामरंग” कोन कोन गनब सब एक सय एक असाध्य॥ स्थाई प ग ध प ग रे स रे स ध सा रे ग रे ग ग क ते क क ह ब दुः ख अ हाँ कय अ प न शि व ग ग – रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा – अ हूँ ऽ र ह ब चु प साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ अन्तरा प ग प ध सां सां – सां सां ध सां सां सां रें सां सां चिं ऽ ता ऽ वि था ऽ त र ह त र ह क अ छि सां सां ध - सां सां रें रें सं रे गं रें सां – ध प त न ला ऽ ग ल अ छि व्या ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ सां – ध प ग रे स रे सा ध स रे ग रे ग ग रा ऽ म रं ऽ ग को न को ऽ न ग न ब स ब ग ग ग रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा – ए क स य ए ऽ क अ साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ध्य ऽ Top of Form 1.मौन-मिथिलाक शाक्त क्षेत्र 2.हरितालिका/ चौरचन्द्र/ अनंत चतुर्दशी 3. चौठचन्द्रपर नूतन झा डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८. मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”। भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)। अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल। सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)। मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित। अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)। व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)। चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। मिथिलांचलक शाक्त क्षेत्र- डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” सृष्टि रहस्यावृत्त अछि आर ’धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां’ , मुदा सृष्टिक मूलमे पृथ्वी (क्षिति), जल, अग्नि (पावक), आकाश (अंतरिक्ष) एवं वायुक तात्विक अवस्थिति सर्वमान्य अछि। वैदिक साहित्यमे पृथ्वीकेँ माता ओऽ मनुष्यकेँ पृथ्वीपुत्र कहल गेल अछि। ऋगवेदक “पृथ्वी सूक्त” ओ “नदी सूक्त” मे हुनक देवीत्वक स्तुतिगान भेल अछि। पृथ्वी ओ जलक प्रजनन शक्ति अर्थात् ओहिसँ उद्भूत चेतनशील जीवन जगत मनुष्यक लेल कौतुहलक विषय छल, श्रद्धा ओ भक्तिक विषय छल। अहिठामसँ शक्तिक प्रति निरन्तर चिन्तनक परिणामस्वरूप हुनकासँ आरोग्य, संतति, सुख-समृद्धि एवं संरक्षणक कामना कयल जाइछ। मातृदेवीक रूपमे पृथ्वी (भूदेवी)क परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। विश्वक प्रायः समस्त प्राचीन सभ्यता ओ संस्कृतिक उद्गम नदी-धारी मानल गेल अछि, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, काली-बंगा, मिश्र, मेसोपोटामिया आदिसँ प्राप्त मातृदेवीक प्राक् ऐतिहासिक मृणमूर्तिसभक पुरावशेष एकर ज्वलंत उदाहरण अछि। एवं प्रकारे पृथ्वी ओ जलमे देवत्वक अवधारणा पूर्व वैदिक युगक आर्येतर अवधारणा थिक। आर्य लोकनिकेँ अपन प्रभुत्व विस्तारक क्रमे अनेक युद्ध (देवासुर संग्राम अर्थात् इन्द्र-वृत्रासुर, महिषासुर वध, कालिय-दमन, राम-रावण युद्ध, गजासुर वध आदिक परम्परित श्रुति ओ साहित्यिक अंतः साक्ष्य उपलभ्य अछि। तदनुसार आर्यलोकनि आर्येतरक शाक्त अवधारणाकेँ समूल नष्ट नहि कऽ ओकरा परिष्कृत कऽ अंगीकार कयलनि। पृथ्वी ओ नदी (गंगा, यमुना, सरस्वतीक समानान्तर मिथिलांचलक कमला, कोशी, जीबछ) मे देवीत्व एवं अग्नि ओ वायुमे देवत्वक प्रतिष्ठापन कयल गेल। आकाश (अंतरिक्ष) तँ अहि देवी-देवताक विहार क्षेत्र अछि। आजुक वैज्ञानिक लोकनिक लेल अंतरिक्ष शोध-बोधक विहार क्षेत्र बनि गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक अंतः साक्ष्यक अनुसार वैदिक आर्यलोकनि अग्निपूजक छलाह। आध्यात्मिक चेतनाक विकासक क्रममे शक्तिक विकास एवं विस्तार सप्तमातृका, दशमहाविद्या, चौसठ योगिनी आदिक रूपमे भेल देखना जाइछ। भारतीय मूर्तिकलाक इतिहासमे एक फलकपर सप्त मातृकाक शिल्पांकन कुषाणकालमे आरम्भ भऽ गेल छल- ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, वाराही, कौमारी, इन्द्राणी ओ चामुण्डा। एकर समानान्तर मिथिलांचलक जन-जीवनमे पूजित सप्तमातृकाक नामावली भिन्न छैक एवं हुनक लोकोपासना सातटा पिण्डक आदिम रूपमे प्रचलित अछि, जे सप्तपिण्डी अथवा सप्तवेदीक रूपमे अभिज्ञात अछि। दोसर विकासक्रममे अबैत अछि दशमहाविद्या अर्थात् काली, तारा, षोड़सी (त्रिपुर सुन्दरी), छिन्नमस्ता, बगला, कमला (लक्ष्मी), मातंगी, भुवनेश्वरी, भैरवी ओ धूमावती- काली तारा छिन्नमस्ता सुन्दरी बगला रमा। मातङ्गी भुवनेश्वरी सिद्धविद्या च भैरवी। धूमावती च दशमी महाविद्या दशस्मृता॥–पुरश्चर्यार्णव शाक्त सम्प्रदायमे जाहि दस प्रधान रूपक ब्रह्मक उपासना होइछ, ओकरा महाविद्या कहल जाइछ। अहि विद्याक दू टा प्रधान मार्ग अछि, योग एवं तंत्र। तेसर विकासक्रममे अबैत अछि चौसठ योगिनी। चौंसठ योगिनीक मध्यकालीन मन्दिर वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भेड़ाघाट (मध्य-प्रदेश), हीरापुर (उड़ीसा) आदि स्थानसभमे पाओल जाइछ। मिथिलांचलक सहरसाक (मत्स्यगंधा परिसर) पिरामिडनुमा स्थापत्य (मन्दिर)मे निम्नलिखित चौंसठ योगिनीक संग बटुक भैरवक मूर्तिसभ प्रतिष्ठापित अछि- माया, कुष्माण्डा, नर्मदा, यमुना, क्रान्ति, वृद्धि, गौरी, ऐन्द्री, वाराही, रणवीरा, मूरति, वैष्णवी, ज्वालामुखी, अजिता, चर्चिका, मार्जारी, डाकिनी, घण्टकर्णा, घटवरा, विकराली, जयन्ती, सरस्वती, कावेरी, मालुका, नारसिंही, श्री, विकटा, व्रजेश्वरी, कौमारी, महामाया, सुरपूजिता, ईश्वरी, सर्पस्या, यशा, वैवस्वती, रुद्रकाली, मातंगी, जयावती, अभया, माहेश्वरी, कामाक्षी, मयूरी, कपालिनी, तुष्टि, काली, उमा, रौद्री, अम्बिका, ब्रह्माणी, अश्वमुखी, आग्नेयी, अग्निहोत्री, अदिति, चन्द्रकान्ता, चामुण्डा, गंगा, मारुति, धूमावती, गान्धारी, अपराजिता, विमोहिनी, सूर्यपुत्री एवं वायुवेगा। कालिकापुराणक अनुसार भगवती स्वेच्छया भिन्न-भिन्न उद्देश्यसँ विभिन्न अवसरपर चौंसठ रूपमे अवतरित भऽ योगिनीक रूपमे पूजित भेलीह। सृष्टिक सृजन, पालन एवं संहार हेतु त्रिधारूपमे अवधारित महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकालीसँ उद्भूत नाना शक्तिरूपा योगिनी सभ धन, यश, विद्या, बुद्धि, शौर्य-पराक्रम, आरोग्य ओ मोक्षदायिनी मानल जाइत छथि। उपरोक्त नामावलीमे ऐन्द्री, वाराही, वैष्णवी, माहेश्वरी, ब्रह्माणी ओ चामुण्डा, दशमहाविद्यामे एवं किछु सप्तमातृकामे सेहो परिगणित छथि। गंगा, यमुना, सरस्वती ओ कावेरी मूलतः नदी देवी छथि। कामाक्षीक स्वतंत्र तांत्रिक पूजोपासना कामरूप (असम)क कामाख्या एवं नेपाल उपत्यकाक गुह्येश्वरीमे परम्परित अछि। कुष्माण्डा, नवदुर्गाक एकटा रूप थिक मुदा योगिनीरूपेँ प्रतिष्ठित वराहविष्णुक शक्ति वाराहीक स्वतंत्र पालकालीन प्रस्तर मूर्ति पुनामा प्रतापनगर (नौगछिया, भागलपुर), ज्वालामुखी बनाम जालपाक मूर्ति लगुराँव (महुआ, वैशाली), डाकिनीक पूजन खुरहान (आलमनगर, मधेपुरा) आदि माता अम्बा बनाम अम्बिकाक पूजन आमी (दिघवारा, सारण), चामुण्डा पूजन कटरा (मुजफ्फरपुर), पचही, वरैपुरा, पचम्बा (बेगुसराय) आदिक प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभमे उपलभ्य अछि। जयावतीक पूजा नाग देवी जयाक रूपमे एवं नदी देवीक रूपमे गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र पूजन परम्परा, बरसाम (मधुबनी), नगरडीह (दरभंगा), मंझौल (बेगुसराय) आदिक अलावा अन्धराठाढ़ी (मधुबनी) ओ महिषी (सहरसा)क मन्दिर स्थापत्यक एवं अलंकरणक रूपमे प्राप्य अछि। स्थापत्य अलंकरणक रूपमे गंगा-यमुनाक प्राचीनतम मूर्ति अवशेष भरहुत ओ सांची (मध्य-प्रदेश)सँ प्राप्त अछि, जकर शिल्पांकन ई.पू. दोसर-तेसर शताब्दीमे भेल छल। कौमारी कुमार कार्तिकेय शक्ति छथि। सभटा शक्ति स्वरूपा देवी अपन-अपन देवताक वाहन ओ आयुध धारित कयने छथि। ध्यातव्य अछि जे आलोच्य शक्ति स्वरूपाक उद्भावना उद्देश्य विशेषक कारणेँ भेल छल। असुर शक्तिक संहारक हेतु सप्तमातृकाक संयुक्त शक्ति प्रतिकार हेतु प्रत्यक्ष भेल छल। दशमहाविद्याक प्रत्येक देवी शक्ति-सम्पन्न, मोक्षदायिनी, कल्याणकारिणी एवं स्वयंमे नानारूपा छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव ओ शक्तियुक्त भेलासँ शिव छथि। दोसर शब्दावलीमे शक्तिहीन शिव शव समान छथि अर्थात् निष्क्रिय ब्रह्मक सक्रिय, चेतन ओ जाग्रत स्वरूप काली छथि- “महाकालक शक्ति महाकाली”- परमात्मा कालश्च परः संविदि वर्तते। काली नाम पराशक्तिः सैव देवस्य गीयते”।– तंत्रलोक (बम्बई, १९२० ई.)। मिथिलांचलमे दस महाविद्याक पूजोपासना गढ़-बरुआरी (सहरसा), भीठ भगवानपुर ओ राजनगर (मधुबनी)मे होइछ। कर्णाटकालीन मूर्तिकलामे ओ सभ विन्यस्त छथि। पं राजेश्वर झ मिथिलांचलक शक्ति-साधनाक एकटा उपक्रम मालिन कल्टक उल्लेख कएने छथि, जे लौकिक धरातलपर परम्परित अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक तांत्रिक पूजा योगिनी ओ मालिनीक रूपमे होइछ। तांत्रिक साधनामे हिनक भूमिका महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। तांत्रिक प्रक्रियामे ओ मार्गदर्शनक काज करैत छथि। कालान्तरमे योगिन ओ मालिन एकार्थक भऽ गेलीह। चौसठ योगिनीमे “मालिन” सेहो प्रतिष्ठित छथि। कल्याण, गोरखपुर, शक्ति उपासना अंक, जनवरी १९८७ ई. पृ.२३६)। ओऽ सिद्धिदायिनी, मोक्षदा एवं वरदायिनी मानल जाइत छथि। लौकिक अवधारणाक अनुसार मालिन भगवतीक प्रिय सेविकाक संगे तंत्र-मंत्र, योग-टोम, चमत्कारादिक माध्यमे अभीष्ट साधनमे निपुण होइत छथि। डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’ मिथिलाक लोकप्रसिद्ध मालिनसभमे कुसुमा मालिन, दौना मालिन, कोसा मालिन, रूपना मालिन, रमण अभिनन्दन ग्रन्थ, खुटौना, मधुबनी, २००४ ई. पृ.२२६-२३४)। मिथिलांचलक झिझिया नृत्य वस्तुतः तांत्रिक नृत्य थिक। वैदिक एवं औपनिषदिक साहित्यमे अन्तर्निहित आद्याशक्तिक आश्रय लऽ पुराणसभमे शक्ति (देवी)क स्वरूप, महिमा ओ पूजोपासना-प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि। शाक्त उपासनाक दृष्टिसँ पुराणकाल एवं शक्ति सभक भव्य शिल्पांकन दृष्टिसँ गुप्तकालकेँ स्वर्णयुग कहल जाइछ। पुराणसभक व्यापक प्रसारसँ शक्ति उपासनाकेँ एतेक बल भेटलैक जे जनजीवनमे ब्रह्मक पूजोपासना परब्रह्म एवं मातृब्रह्म दुनू रूपमे होमऽ लागल। देवी भागवत (३.६.२) क अनुसार मातृब्रह्म समस्त दैवीशक्तिक मूलमे छथि। मध्यकालमे आबि शक्तिक तंत्रोपासना बेस लोकप्रिय भऽ गेल। फलतः आभिजात्य स्तरपर कंकाली (भारदह, भीमनगर बराज, नेपाल, राजपरिसर, दरभंगा आदि) छिन्नमस्ता (सखरा, राजविराज, नेपाल; खुरहान, मधेपुरा; रजरप्पा, झारखंड आदि), तुलजा (नेपाल उपत्यका, राजा हरिसिंहदेव द्वारा स्थापित), हैहट्ट देवी (हावी डीह, कर्मादित्य द्वारा स्थापित), वाणेश्वरी (भंडाअरिसम, दरभंगा), त्रैलोक्य विजय (मंगरौनी, मधुबनी), उग्रतारा (महिषी, सहरसा) आदिक अतिरिक्त लोकस्तरपर बामती, गहिल, रक्तमाला, चम्पा डमौनी, नयना योगिन, गढ़ीमाइ, लुकेसरी (लोकेश्वरी) आदि देवी सभक प्रादुर्भाव भेल देखना जाइछ (हमारे लोक देवी-देवता, डॉ मौन, मुजफ्फरपुर, १९९९ ई.)। हिन्दू धर्मक अन्तर्गत तंत्रयानक विकास बज्रयानी परम्परासँ प्रभावित अछि। अधिकांश बौद्ध देवी हिन्दू देवीक प्रतिरूप अथवा समानान्तर विकसित छथि। बौद्ध देवी तारा दशमहाविद्याक द्वितीया तारा छथि। वनगाँव (सहरसाक) भगवती ओ महिषीक उग्रतारा, एवं वारी (सिंधिया, समस्तीपुर)क भगवती ओ तारा समानान्तर विकसित छथि। मंगरौनी (मधुबनी)क त्रैलोक्यविजय अष्टभुजी शक्तिरूपा छथि, मुदा शिव ओ पार्वती हुनक पैरक तर मर्दित छथि। आलोच्य मूर्तिमे बौद्धदेवीक श्रेष्ठता प्रदर्शित अछि। मुदा बौद्धदेवी प्रज्ञापारमिता हिन्दू देवी सरस्वतीक प्रतिरूप थिकीह। मिथिला बंगाल ओ असम शक्ति साधनाक एकटा सशक्त त्रिकोण अछि। मिथिलाक धरतीपर एहि त्रिकोणकेँ महिषी (तारा), विराटपुर (चण्डी) ओ बदलाधमहारा (कात्यायनी)मे देखि सकैत छी। अधोमुखी त्रिकोण शाक्त ओ उर्ध्वमुखी त्रिकोण शैव लोकनिक साधना प्रतीक थिक। जखन विपरीत स्थितिमे आबि षटकोषक सृजन होइत अछि तखन ओ महाकाली ओ महाकालक संयुक्त भेने कामकलाक रूप होइत अछि। ब्रह्मक कामशक्ति द्वारा कलाक सृष्टिक नाम कामकला थिक। (प्रतीक विद्या, डॉ जनार्दन मिश्र, पटना, १९५९ ई., पृ.१९८) अर्थात् सदाशिवक ऊपर रहि (मर्दिनी काली) शक्ति ब्रह्माण्डक सृजन करैत अछि- “सदाशिवोपरि स्थिरवा ब्रह्माण्डं क्षोभमानयेत” कालीविलासतंत्र, लंडन, १९१७ ई. २४.२३)। त्रिकोण त्रिशक्तिक रूपमे चेतनाक आत्मप्रसार थिक। उर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव, अधोमुखी त्रिकोण शक्ति (शिवा) एवं षटकोणीय त्रिकोणकेँ शिव-शक्त्यात्मक त्रिकोण कहल जाइछ। त्रिकोणक केन्द्रमे विन्दु सृष्टिक मूल थिक। तंत्रमूलक यंत्रक संरचनाक क्रमे ई आधार मानल जाइछ। मिथिलांचलमे मंगरौनी (मधुबनी) एवं हरौली (वैशाली) आद्याशक्ति (मातृब्रह्म)क साधना पीठ थिक। देवताक भेदें आगमक वर्गीकरण निम्नरूपेँ भेल अछि- शैवागम, शाक्तागम, वैष्णवागम एवं बौद्धागम। महाकालसंहिताक अनुसार शाक्तागमक चारिटा उपभेद अछि- कापालिक, मौलेय, दिगम्बर एवं भाण्डिकेर। कापालिक डामरतंत्रक, मौलेय यामल तंत्रक, दिगम्बर भैरव-भैरवी तंत्रक एवं भाण्डिकेर क्षावरतंत्रक अनुसरण करैत अछि। मिथिलामे वेदहि जकाँ तंत्रोकेँ अपौरुषेय कहल गेल अछि।(मिथिलामे तंत्र, डॉ त्रिलोकनाथ झा श्रीअमर अर्चना; दरभंगा,२००१ ई.पृ.२९५)। तांत्रिक पद्धतिसँ उपासना सरल होइछ। प्रागैतिहासिक कालसँ पूर्वी भारतक असम, बंगाल, मिथिला ओ नेपालमे शाक्ततंत्रक प्रचार-प्रसार रहल अछि। असमक कामाख्या, बंगालक दक्षिणकाली, नेपालक गुह्येश्वरी एवं मिथिलांचलक उग्रतारा (महिषी)सहरसा। बरांटपुरक चण्डी, कटरागढ़ (मुजफ्फरपुर)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल)क कंकाली, आमी (सारण)क अम्बिका स्थान, उच्चैठ (मधुबनी)क भगवतीथान, थावे (गोपालगंजक)क भगवती मन्दिर आदिक अतिरिक्त बेतियाराज, दरभंगाराज ओ राजनगरक भगवती मन्दिर आदि। तंत्रोपासनाक उद्भव बंगालमे भेल छल मुदा ओ साधना बलेँ मिथिलामे प्रवलीकृत भेल- “गौड़े प्रकाशित विद्या मिथिले प्रवलीकृता”। कलियुगमे संसार सागरसँ पार उतारनिहार एवं जन्म-मरणक बंधनसँ मुक्ति दियौनिहार मात्र दू टा आराध्य छथि- शिव ओ शक्ति। मिथिलांचलमे शिवक अपेक्षा शक्तिक महत्व अधिक अछि। मैथिल लोकनिकेँ कहल गेल अछि- “अन्तः शक्ताः”। शक्ति उपासनाक दू टा मार्ग- वाम एवं दक्षिण- दुनू पक्ष सैद्धांतिक ओ प्रायोगिक अपन उत्कर्षकेँ प्राप्त कयलनि। दरभंगाक खण्डवलाकुलक राजालोकनि शाक्तधर्मी ओ तंत्रोपासक छलाह। सामान्यतः वैदिक अवधारणाक अनुसार जतऽ भोग छैक ततऽ मोक्ष नहि आर जतऽ मोक्ष छैक ओतऽ भोग नहि। मुदा दश-महाविद्याक अन्तर्गत पूजिता त्रिपुरसुन्दरीक पूजनसँ भोग एवं मोक्ष दुनू प्राप्त भऽ जाइछ। एहि तरहेँ नानारूपधारिणी शक्तिक पूजोपासना शास्त्रीय एवं लौकिक दुनू रूपेँ सम्पूर्ण मिथिलांचलमे परिव्याप्त अछि। एहिठाम आध्यात्मिक ऊर्जासँ उर्जस्वित अनेक सिद्ध शक्तिपीठ ऐतिहासिक साक्ष्यसँ प्रमाणित, पौराणिक कथासँ समन्वित एवं लोक-आस्थासँ सूत्रबद्ध अछि। गोसाउन घरसँ लऽ कऽ शक्ति (भगवती) कतहु पिण्डरूपमे, कतहु पाथरक मूर्ति रूपमे तँ कतहु तांत्रिक चक्र रूपमे पुजाइत छथि। नवरात्रक अवसरपर सम्पूर्ण मिथिला शाक्तमय भऽ जाइछ। अतः मिथिलाक सुदूर ग्रामांचलमे विशृंखलित शक्ति साधनाक किछु प्रतिनिधि स्थलसभकेँ बानगीक रूपमे “हेरिटेज मिथिला”क अन्तर्गत प्रकाशमे आनब एकटा धार्मिक कृत्य थिक। उच्चैठक भगवती: मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी अनुमंडल मुख्यालयसँ प्रायः पाँच किलोमीटर दिशामे अवस्थित उच्चैठक (उच्चैःस्थ) भगवती स्थान सुप्रसिद्ध शक्ति साधना स्थल अछि। मिथिलामे प्रत्येक देवीकेँ भगवती कहल जाइछ। श्रुति-परम्पराक अनुसार उच्चैठक भगवतीक सम्बन्ध कालिदाससँ सूत्रबद्ध अछि। भगवती स्थानक लगपासमे कालिदासक डीह कहल जाइछ। मुदा उच्चैठक भगवती कालिदास कालीन (गुप्तकाल) नहि अछि। मंदिरमे स्थापित भगवतीक कारी पाथरक मूर्ति तैंतीस ईंच नमहर अछि। भगवतीक चतुर्भुजी मूर्ति दोहरा कमलासनपर ललितासनमे निर्मित अछि। भगवतीक सिरोभाग ओ वाम भुजा खण्डित अछि। एकटा समकालीन भगवती मूर्तिक वाम हाथ (निम्न)मे कलश ओ ऊपरी हाथमे त्रिशूल एवं दहिन हाथ (निम्न)मे फल ओ ऊपरी हाथमे दर्पण उत्कीर्ण अछि। शिरोभूषण, कर्णफूल, गृमहार, यज्ञोपवीत, वाजुवन्द, कंगन, कटिबन्ध ओ पायल आदिक संग कंचुकी ओ अधोवस्त्रसँ सुसज्जित अछि। पादपीठमे वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। रूप विन्यासक दृष्टिसँ उच्चैठक भगवती सिद्धेश्वरी पार्वती छथि। अहि तरहक भगवतीक दोसर प्रस्तर मूर्ति मधुबनी जिलान्तर्गत कपिलेश्वरस्थानसँ पाँच किलोमीटर पश्चिम-दक्षिणमे अवस्थित भोजपरौलसँ (पैंतीस ईंच नमहर) प्राप्त अछि, जे पूर्णतः अक्षत अछि। रूप ओ भंगिमा सादृश्यक अलावा उच्चैठ भगवतीक मुखाकृति आर्यत अछि तँ भंडारिसमक भगवतीक मुखाकृति गोल अर्थात् मंगोलन अछि। मुदा अमृतकलश, त्रिशूल, फल ओ दर्पण समान अछि। सत्यनारायण झा सत्यार्थीक (मिथिलाक पुरातात्विक सम्पदा, दरभंगा, २००३ ई.) संकेतानुसार एहि वर्गक एकटा भगवती मूर्ति वनगाँव (सहरसा)मे सेहो पूजित अछि। भगवतीक तीनू मूर्ति पालकालीन कलाकृति मध्ययुगीन सांस्कृतिक दर्पण बनि गेल अछि। अमृतकलश हुनक मातृदेवीत्वक एवं दर्पण पार्वतीक प्रतीक थिक। आलोच्य भगवती-मन्दिर सभ प्राचीन भवनावशेष क्षेत्रमे बनल अछि। स्पूनर सूबेगढ़क (मुजफ्फरपुर) भगवती मंदिरकेँ तिरहुत शैलीमे बनल कहने छथि।एहि कड़ीक एकटा षटभुजी भगवती समस्तीपुर जिलान्तर्गत सिंघिया प्रखण्ड मुख्यालयसँ आठ किलोमीटर उत्तर वारीक भगवतीस्थानमे पूजित अछि। कारी पाथरक ई आलोच्य भगवती मूर्ति चौंतीस ईंच नमहर कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भगवतीक वाम हाथ सभमे क्रमशः नीचासँ ऊपर कलश, घण्टा, ढाल ओ दहिन हाथसभमे क्रमशः अभयमुद्रा, खड्ग ओ अक्षमाला सुशोभित अछि। भगवती कमलासनपर ललितासनमे प्रतिष्ठित छथि। पादपीठमे सिंह वाहनक रूपमे उत्कीर्ण अछि। वारी ऋषि-मुनि एवं तपसी-साधक लोकनिक साधना-स्थल छल मध्यकालमे। उच्चैठ, भोजपरौल, वनगाँव ऊ वारीक अतिरिक्त ओ भंडारि सभ (दरभंगा)मे सेहो परम्परासँ पूजित छथि। भोजपरौल एवं भंडारिसभक भगवती चतुर्भुजी छथि। भंडारिसभक भगवतीक वाम (निम्न) हाथमे त्रिशूल ओ पद्म पुष्प एवं दहिन हाथमे फल ओ खड्ग अछि। भगवती वाणेश्वरीक नामे विशेष प्रसिद्ध छथि। मूर्ति अड़तालीस ईंच नमहर अछि, नदी अवशेषक पश्चिमी तटपर अवस्थित एकटा मंदिरमे पूजित छथि। भंडारिसम दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखण्डसँ तीन कि.मी. दक्षिणमे अछि। देकुलीक अष्टभुजी भगवती कर्णाटकालीन छथि। अध्यात्मिक चेतना ओ कलात्मक भव्यतासँ समन्वित ई मध्यकालीन भगवती मूर्तिसभ अपन युगक सांस्कृतिक दर्पणे नहि अपितु तत्युगीन जीवनक धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, कलात्मक सोच, सामाजिक ओ आर्थिक अवस्थितिकेँ प्रतिबिम्बित करैछ। मूर्ति विज्ञानक अनुसार भगवतीक शास्त्रीय स्वरूप निर्धारित अछि, मुदा एकहि युगक बनल भगवतीक मूर्ति सभमे शैलीगत भिन्नता पाओल जाइछ। पाल साम्राज्यक पतनोन्मुख अवस्थामे राजकीय संरक्षण ओ निर्देशक अभावक कारणे शैलीगत शैथिल्य स्वाभाविक अछि। मूर्तिशिल्पक शास्त्रीयतासँ बन्हल रहितो मूर्तिकार स्वतंत्र चेता सेहो होइत छथि। फुलहरक भगवती गिरिजा: मधुबनी जिलान्तर्गत हरलाखी प्रखण्ड मुख्यालयसँ पश्चिम-दक्षिण दिशामे अवस्थित फुलहर गाममे प्राचीन भग्नावशेषपर बनल नवनिर्मित मंदिरमे स्थापित एवं पूजित भगवती गिरिजाक भव्य प्राचीन प्रतिमा सैंतीस ईंच नमहर अछि। जनश्रुतिक अनुसार रामचरितमानसक गिरिजास्थान यैह थिक, जे जानकीक आराध्या छलीह आर आइयो कुमारि कन्या लोकनिक आराध्या बनल छथि। गिरिजाक चतुर्भुजी प्रतिमा कमलासनपर स्थानक मुद्रामे बनल अछि। वाम हाथमे केराक हत्था ओ गदा एवं दहिन हाथमे दर्पण ओ सनाल कमलपुष्प सुशोभित छनि। माथपर मुकुट, कानमे कुण्डल, गरामे हार, कान्हसँ लटकैत यज्ञोपवीत, बाँहिमे बाजूवन्द, कलाइमे आभूषण, डाँरमे अधोवस्त्रकेँ कसैत कटिभूषण ओ पैरसभमे पादाभूषण। भगवतीक वाम पार्श्वमे कार्तिकेय एवं दहिनमे गणेश कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक प्रतिमा वात्सल्यक भावात्मक परिवेशमे निर्मित अछि। पार्वती जगन्माता छथि। गिरिजा वस्तुतः पर्वतकन्या पार्वती छथि। विवाह पंचमीक अवसरपर एहिठाम विशाल मेला लगैत अछि। नवरात्रमे तांत्रिक साधना सेहो प्रचलित अछि। भगवती गिरिजा अर्थात् पार्वतीक दोसर भव्य कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) मूर्ति दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लाक देवी मन्दिरमे प्रतिष्ठापित अछि। दरभंगाक सांस्कृतिक क्षितिजपर उद्भासित भगवती पार्वतीक (बत्तेस इंच नमहर) कर्णाट (पालोत्तर) शैलीमे निर्मित छथि। मूर्तिक प्रभावली बेस अलंकृत अछि। भगवती कमलासनपर वस्त्राभूषणसँ विन्यस्त स्थानक मुद्रामे ठाढ़ छथि। वाम पार्श्वमे कार्तिक ओ दहिनमे गणेश ठाढ़ छथि। दुनूकेँ भगवतीक अभय प्राप्त छनि। भगवतीक दहिन हाथ (उपरका) मे बाँसुरी उत्कीर्ण भेने सत्यार्थी एहि प्रतिमामे गिरिजा, राधा एवं लक्ष्मीक समाहार देखने छथि। मुदा बाँसुरी शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि, शिवक डमरू जकाँ। मिर्जापुरक भगवती म्लेच्छमर्दिनीक नामे लोकख्यात छथि। श्रुति साक्ष्यक अनुसारे भगवती जाहि पोखरिक जीर्णोद्धारक क्रमे उत्खनित भऽ प्रकट भेलीह, ओऽ कब्रगाह छल। मुजफ्फरपुर कोर्टक फैसलाक अनुसार ओहि भूभागक स्वामित्व हिन्दू लोकनिकेँ भेटलनि। ओहि स्थानपर आइ भगवतीक एकटा भव्य ओ दर्शनीय मंदिर शक्ति-साधना ओ लोक आस्थाक केन्द्र बनि गेल अछि। सत्यार्थी (मिथिलाक पुरातात्विक संपदा, २००३ ई.) अपन सर्वेक्षणमे अन्धराठाढ़ी (मधुबनी), देकुली, कुर्सी नदियामी (दरभंगा), करियन (समस्तीपुर) ओ फुलहर (दरभंगा)क भगवती पार्वतीक उल्लेख कएने छथि। भगवतीक रूप कमनीय, वस्त्राभूषण ललित एवं देहयष्ठि आनुपातिक बनल अछि। फलतः भगवती पार्वतीक प्रतिमा प्राणवंत भऽ गेल अछि। नाहरक महिषासुर मर्दिनी: मधुबनी जिला मुख्यालयसँ बारह कि.मी. पूर्व दिशामे अवस्थित भगवतीपुरक मंदिरमे महिषासुर मर्दिनीक पाथरक मूर्ति (२५”*१२”आकार) स्थापित एवं पूजित अछि। दसभुजी भगवती त्रिभंगी एवं स्थानक मुद्रामे कमलफूलक दोहरा आसनपर महिषासुरकेँ शूल (बरछी)सँ बेधैत बनल अछि। वस्त्राभूषणसँ सुसज्जित भगवतीक हाथसभमे दश दिक् पालक अस्त्रसभ शोभित छनि। इन्द्रक बज्र, अग्निक शक्ति, यमक दण्ड, नैऋतक खड्ग, वरुणक पाश, ईशानक शूल, वायुक अंकुश, कुबेरक गदा, विष्णुक चक्र ओ ब्रह्माक पद्म। महिषासुर महामोह अथवा अविद्याक प्रतीक अछि, जकर बध लोककल्याणार्थ भगवतीक हाथेँ भेल छल। दश भुजा भगवतीक दिग-दिगंत परिव्याप्त शक्तिक प्रतीकाभिव्यक्ति थिक। भगवतीक मूर्ति कर्णाटकालीन कलाशैलीमे निर्मित अछि। मुखाकृति आर्यन, देहयष्ठि संतुलित ओ आनुपातिक बनल अछि। नाहरक भगवतीक प्रसिद्धिक कारणेँ शक्ति-साधना स्थल नाहर भगवतीपुरक नामे लोक प्रसिद्ध अछि। एहि ठामक पार्श्ववर्ती मंदिरसभमे सूर्य ओ विष्णुक प्रस्तर मूर्ति पूजित अछि मुदा नाहरक प्रसिद्धि महिषासुर मर्दिनीक कारणे अधिक अछि। मूर्तिक पादपीठमे भक्तगणक छोट-छोट मूर्तिसभ विनीत मुद्रामे उत्कीर्ण अछि। हावीडीहक भगवती: दरभंगा जिलान्तर्गत बहेड़ा प्रखण्ड मुख्यालयसँ पाँच कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित हावीडीहक प्रसिद्धि यद्यपि महारानी सौभाग्यवतीदेवी (सुहब देवी)क आज्ञासँ प्रतापी मंत्री कर्मादित्य द्वारा स्थापित हैहट्ट देवी भगवती पार्वतीक कारणे अधिक अछि (१३म शती), मुदा देवी मंदिरक गर्भगृहमे स्थापित महिषासुर मर्दिनीक महत्व कम नहि होइछ। श्रुति अछि जे भगवतीक मूर्तिक पादपीठ नवादा (दरभंगा) मे पूजित अछि, मुदा यत्र-तत्र उद्धृत अभिलेख कतहु नहि अछि। हाबीडीहक महिषासुर मर्दिनी अष्टभुजी छथि। हैहट्ट देवीक नामे पूजित पार्वती ललितासनमे एवं महिषासुरमर्दिनी स्थानुक मुद्रामे निर्मित अछि। कर्मादित्यक काल १२२५-७५ ई. मानल जाइछ। हावीडीह पंचदेवोपासक भूमि अछि मुदा प्रभुत्व भगवतीक छनि। महिषासुरमर्दिनीक तेसर साधना केन्द्र दरभंगासँ नौ कि.मी. पूर्व-दक्षिण दिशामे अवस्थित अन्दामामे (२२”) प्राची नदी अवशेषक पश्चिमीतटपर बनल मन्दिरमे स्थापित भगवती ओ पूजित अछि। अष्टभुजी भगवतीक हाथसभमे नाग, धनुष, ढाल, शूल, चक्र ओ खड्ग धारित अछि। नाना वस्त्रालंकारसँ सुशोभित भगवती दोहरा कमलासनपर ठाढ़ छथि। भगवतीक दहिन पार्श्वमे एकटा ढाल खड्ग धारिणी सहदेवीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि। भगवतीक मूर्ति संरचना मैथिल अवधारणाक अनुसार भेल अछि। मिथिलांचलमे भगवतीक महिषासुर मर्दिनी रूप समसामयिक परिवेशमे बेस लोकप्रिय छल। महिषासुर मर्दिनीक प्राचीन ऐतिहासिक मूर्तिसभ वैद्यनाथपुर (चतुर्भुजी), उजान (मधुबनी). डोकहर, जरैल-परसौन, देवपुरा (मधुबनी), कुर्सो-नदियामी, बरसाम, पोखराम (अष्टभुजी), नेहरा, बहेड़ी (अष्टभुजी), चौगामा (दरभंगा), मदरिया, बुढेव (७२*३०” अष्टभुजी), भवानीपुर, सहमौरा, नया नगर (कोशी प्रमण्डल), खोजपुर (दरभंगा) आदिक अतिरिक्त भजनाहा (मधुबनी) ओ गन्धवारि (दरभंगा)सँ प्राप्त सिंहवाहिनी अष्टभुजी दुर्गाक प्राचीन, पूजनीय एवं ऐतिहासिक मूर्तिसभ पहाड़ी शैलीमे निर्मित अछि। मिथिलांचलमे अनेक नामधारिणी भगवतीक मूर्तिसभ राजेश्वरी, परमेश्वरी, सिद्धेश्वरी, भुवनेश्वरी वाणेश्वरी, गुह्येश्वरी जयमंगला आदिक नामे पूजित अछि। सिमरिया भिण्डी (समस्तीपुर)मे सेहो महिषासुरमर्दिनीक प्राचीन पाथरक मूर्ति प्राप्त भेल अछि। नदियामीक चतुर्भुजी मूर्ति पार्वती (गिरिजा)क थिक, जनिक पार्श्वमे कार्तिक ओ गणेश उत्कीर्ण छथि। पार्वतीक एकटा विलक्षण प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा (पाली) निसंदेह अद्वितीय अछि। पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक संगे बैसल छथि। गुप्तकालक ई मूर्ति भगवतीक वात्सल्य भावक अभिव्यंजक अछि। पार्वतीक एकटा चतुर्भुजीमूर्ति करियन (समस्तीपुर)सँ सेहो प्राप्त अछि। मिथिलाक इतिहास पुरातत्व ओ सांस्कृतिक क्षेत्रमे विजयकान्त मिश्र- मिथिला आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर- एवं सत्येन्द्र कुमार झा (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन (कर्णाटकालीन मूर्तिकला), सत्यनारायण झा सत्यार्थी (दर्शनीय मिथिला, १-१०), डॉ नरेन्द्र नारायण सिंह निराला- मधुबनी अंचलक मूर्ति-, डॉ हीरानन्द आचार्य (राजनगरक ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व) आदिक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन-अनुशीलन उल्लेखनीय अछि। मिथिलांचलक नवरात्रमे महिषासुर मर्दिनीक लोकपूजन सर्वाधिक लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। आलोच्य प्रतिमा एकटा सामाजिक प्रतिक्रियाक धार्मिक अभिव्यंजना थिक। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहास आक्रमण-प्रत्याक्रमण एवं संघर्षपूर्ण स्थितिसँ भरल अछि। विशेष कऽ मुस्लिम आक्रमण ओ घात-प्रतिघातसँ मिथिला आक्रान्त छल। एहि स्थितिमे म्लेच्छमर्दिनी दुर्गाक रूपगत संरचनाक अर्थवत्ता बढ़ि जाइछ। म्लेच्छ असुरक पर्याय अछि। देव लोकनि असुरक वध कयलनि मुदा म्लेच्छ सभक वध भगवतीक हाथे भेल आर हुनक एहि रूपकेँ म्लेच्छमर्दिनी मानल गेल, जे शक्ति-साधनाक एकटा प्रतीक बनल अछि। मिथिलाक मध्यकालीन इतिहासक पृष्ठभूमिमे हिन्दू धर्मक अन्तर्गत धार्मिक सद्भावक विकास भेल। पाल राजालोकनि यद्यपि बौद्धधर्मी छलाह, मुदा ओ हिन्दू धर्मक देवी-देवता सभक सेहो उदारतापूर्वक संरक्षण देलनि। एहि संक्रमणकालमे बौद्ध लोकनि हिन्दू देवी-देवता एवं हिन्दू लोकनि बौद्ध देवी-देवताकेँ अंगीकार कएलनि। तारा, छिन्नमस्ता, मनसा आदि हिन्दू जगतमे ओ तारा, चण्डी, कंकाली, डाकिनी, वज्र-वाराही, वज्रतारा आदि बौद्ध जगतमे प्रतिष्ठा पौलनि। भिन्न साधना प्रक्रिया एवं रूपविन्यासक अलावा बलि निषेध छल बौद्ध-साधक लोकनिमे। मुदा विक्रमशिलाक सिद्ध-साधनामे पंचमकारक समावेशसँ मिथिलांचलक शक्ति-साधना प्रभावित अवश्य भेल। एहि भूभागमे हिन्दू ओ बौद्ध धर्म संगे-संग विकसित भेल। उदाहरणार्थ वनगाँव महिषी (सहरसा) एवं वारीक (समस्तीपुर) हिन्दू ओ बौद्ध ताराक पूजोपासनाकेँ राखल जाऽ सकैछ। कोर्थक काली: दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर प्रखण्डक अन्तर्गत सांस्कृतिक कोर्थ (पौराणिक कोर्थ, सत्यनारायण झा सत्यार्थी, लहेरियासराय, दरभंगा)क गोसाउनिक स्थानमे स्थापित एवं पूजित पाथरक काली मूर्ति (३ फीट ६ इंच) चतुर्भुजी अछि। आद्याशक्ति काली दशमहाविद्यामे प्रथमा एवं महाकाल (शिव)क शक्ति छथि। कला (साकार जगत)कें आत्मसात करऽबाली काली दिग्वस्त्र छथि। हुनक वाम हाथ (निम्न)मे छिन्नमस्तक ओ खड्ग एवं दहिन हाथमे पोथी (शास्त्र) ओ वरमुद्रा बनल अछि। मुण्डमालिनी काली शवरूप शिवक हृदय स्थलपर ठाढ़ छथि। शक्तिहीन ब्रह्म शव अछि आर शक्तियुक्त भऽ ओ शिव कहबैत अछि। कालीक माथपर मुकुट, डाँर ओ हाथ-पैर सभ आभूषण मंडित अछि, कालीक जिह्वा बाहर निकलल छनि। कोर्थक एहि कालीक पूजामंत्र अछि- “हंसौः सदाशिव महाप्रेतपद्मासनाय नमः”।– तारा रहस्य, १८९६ ई., पृ.४१. “पुरश्चर्यार्णव” (बनारस, १९०१ ई.-पृ.१७)क अनुसार कालीक नौटा भेद अछि- दक्षिणकाली (कलकत्ता), भद्रकाली (कोइलख), श्मसानकाली (दरभंगा), कालकाली, गुह्यकाली (काठमाण्डू), कामकलाकाली (कामरूप), धनकाली, सिद्धिकाली ओऽ चण्डकाली (बिराटपुर)। लक्ष्मीतंत्रक अनुसार मित्र व शत्रुक सत-असत रूपक विभुकेँ मायागुणयुक्त भेलाक कारणे ओ भद्रकाली कहबैत छथि। ओ कल्याणरूपा छथि। मिथिलांचलमे भद्रकालीक पूजोपासना कोइलख (मधुबनी) मे होइछ। “मिथिला तत्व विमर्श” (परमेश्वर झा) मे कोइलखक भगवतीकेँ भद्रकाली ओऽ काकिलाक्षी कहल गेल अछि। भगवती मधुबनीसँ तेरह कि.मी. पूर्व दिशामे स्थित कोइलखक भव्य मन्दिरमे पूजित छथि। एकर अतिरिक्त सहरसाक मत्स्यगंधा परिसरक पगोडा शैलीमे बनल मंदिरमे रक्तकालीक भव्य ओऽ आकर्षक मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। त्रिभंगी नृत्य मुद्रामे निर्मित द्विभुजी मुण्डमालिनी रक्तकालीक वाम हाथमे कपाल ओ दहिनमे खड्ग धारित छनि। रक्तकालीक एहि नृत्यमे असत तत्वादिक दमन ओ कपालमे सृष्टि बीजक संरक्षणक भाव अन्तर्निहित अछि। राजनगर (मधुबनी)क राजपरिसरक काली मन्दिरमे स्थापित कालीक सौम्य मूर्ति, मधुबनीक भओरागढ़मे महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित काली, राजदरभंगाक श्यामा, दरभंगाक बागमती तटक शसान काली, चैनपुर (कोशी अंचल)क महाकाली, धरान (नेपाल)क दंतकाली, बेतिया राजक काली आदि विभिन्न रूपेँ पूजित छथि। जनपदक ग्रामांचलमे वनकाली, रणकाली आदिक लोकपूजन सेहो परम्परित अछि। दशमहाविद्याक अन्तर्गत द्वितीया महाविद्याक रूपमे प्रतिपादित भगवती तारा ब्राह्मण धर्मक वैदिक परम्परा ओ बौद्धिक धर्मक तांत्रिक परम्परामे वनगाँव-महिषी ओ वारीमे स्थापित एवं पूजित छथि। डॉ जनार्दन मिश्र (भारतीय प्रतीक विद्या, पटना, १९५९ ई. पृ.२०७)क अनुसार सनातनी तारा एवं बौद्ध ओ जैन तारामे स्वरूपगत आर सिद्धान्ततः कोनो भेद नहि अछि। मुदा बौद्ध देवी ताराक रूपगत विस्तार देखना जाइछ- उग्रतारा, नीलतारा, पीततारा, हरिततारा, धनद तारा, महाचीन तारा, बज्रतारा, वरद तारा, श्वेत तारा आदि। वारी (सिंघिया समस्तीपुर) क रामजानकी मन्दिरमे रक्षित द्विभुजी बौद्धदेवी तारा (३१ इन्च)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्तिमे मुख्य तारक अतिरिक्त सम्पूर्ण प्रभावलीमे एगारह टा विभिन्न तारा सभक मूर्ति अभिशिल्पित अछि। भगवती तारा कमलासनपर ललितासनमे बैसल छथि। दहिन हाथ वाममुद्रामे बनल अछि। भगवतीक प्रतिमा वस्त्राभूषणसँ अलंकृत अछि। हम प्रायः तीन दशक पूर्व बहेड़ा (दरभंगा)क एकटा व्यक्तिगत पूजागृहमे नीलतारा (सरस्वतीक प्रतिरूप)क पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। सत्यार्थी वनगाँव महिषीक तारामूर्तिकेँ पूर्णतः (मुखाकृतिकेँ छोड़ि) वस्त्राच्छादित पोटरी कहने छथि। महिषीक वर्तमान तारामन्दिरक निर्माण नरेन्द्र ठाकुर (१७४३-६०)क रानी पद्मावती करौने छलीह। ओ महिषीक छलीह। प्रत्यक्षदर्शीक अनुसार उग्रताराक पार्श्वदेवक रूपमे नीलतारा ओ एक जटा मूर्तित अछि। महिषीक उग्रताराकेँ वशिष्टाराधितारा कहल जाइत छनि। एहि क्षेत्रक धर्ममूला (धेमुरा) नदीक तटवर्ती क्षेत्रसँ प्राप्त बौद्धदेवी ताराक एकटा प्रस्तर मूर्ति सम्प्रति पटना संग्रहालयमे संरक्षित अछि। वैशालीक नीरभुक्तौ ताराः चर्चित अछि। जगतपुर बरारी क्षेत्रसँ प्राप्त ताराक द्विभुजी स्थानक मूर्ति दशम-एगारहम शताब्दीक थिक। ताराक पार्श्वमे दू टा देवी मूर्ति त्रिभंगी मुद्रामे अंकित अछि। एहिसँ ई ज्ञात होइछ जे मिथिला सतत ब्राह्मण धर्मक प्रवर्तक छल, सेहो बौद्ध धर्मक देवी-देवताक प्रभावसँ वंचित नहि रहि सकल। (मिथिला भारती, पटना, मार्च-जून १९६९ ई.)। मूर्ति २ फीट चारि इन्च गुणा १ फीट ३ इन्च आकारमे बनल अछि। मूर्ति अभिलिखित अछि- “यं धर्मा हेतु प्रभवा...”। महायानमे देवी तत्वक प्रधानता छल- तारा, चण्डी, हारीति आदि। भगवती ताराक एकटा प्राचीन मन्दिर तिलकेश्वर (दरभंगा)मे अछि। स्मरणीय अछि वनगाँव-महिषीक पहिचान बुद्धकालीन आपण निगमसँ भेल अछि। कटराक चामुण्डा: गुप्तकालीन इतिहासमे कटरा तीरभुक्तिक चामुण्डा एकटा “विषय” छल आर कटरागढ़ (वर्तमान मुजफ्फरपुर जिला अन्तर्गत)क चामुण्डा एहि तांत्रिक शक्तिपीठक अधिष्ठात्री देवीक रूपमे पूजित छथि- विदेह नगरी स्थित्वा सर्वशक्ति समन्विता चामुण्डेति ततो ख्याता लक्ष्मणातर वासिनी। कटराक प्राचीन ऐतिहासिक गढ़क भग्नावशेषपर चामुण्डाक नवनिर्मित मन्दिर लखनदेड़ (लक्ष्मणा) तटपर अवस्थित अछि। चामुण्डा क्षेत्रक कटैयाक कटीश्वरी ओ चकौतीक चक्रेश्वरी उपशक्ति पीठ अछि। चामुण्डा तांत्रिक पूजावशेष वीरपुर, पचम्बा(बेगुसराय), पचही (मधुबनी) आदि स्थान सभसँ प्राप्य अछि। विराटपुरक चण्डी: सहरसा जिलाक सोनवर्षा प्रखण्डक अंतर्गत जिला मुख्यालयसँ पैंतीस कि.मी. पूर्वमे स्थित विराटपुर गामक शक्तिपीठ चण्डीस्थानक नामसँ लोकख्यात अछि। विराटपुरक चण्डी, धमहारा (धर्मधारा)क कत्यायिनी एवं महिषीक उग्रतारा स्थान एकटा तांत्रिक त्रिकोणपर अवस्थित अछि। चण्डी मन्दिर अष्टकोणीय आधारपर बनल मन्दिरक गर्भगृहमे भगवती चण्डीक मूर्ति, मन्दिरक प्रवेश द्वारपर बुद्धक मूर्ति (बुधाय स्वामी), शिल्पांकित तांत्रिक चक्र, प्रांगणमे तिरहुतामे अभिलेखादि शक्तिपीठक ऐतिहासिकताक प्रमाण अछि। चण्डी दुर्गाक एकटा रूप थिक। हिन्दू प्रतिमा विज्ञानक अनुसार ओऽ दसभुजी एवं सिंह अथवा बाघपर आरुढ़ रहैत छथि। ओऽ महिषासुर मर्दिनी जकाँ उग्ररूपा छथि। चण्डीक एकटा गुप्तकालीन मन्दिर गाजीपैता (कोशी क्षेत्र) गाममे अवस्थित अछि। मन्दिरक पाथरक चौखटिमे एकटा अस्पष्ट अभिलेख उत्कीर्ण अछि (बिहार की नदियाँ, हवलदार प्रसाद त्रिपाठी, पटना, १९७७ ई., पृ.४१०)। बेहट ओ लक्ष्मीपुरमे सेहो चण्डीमन्दिर शक्ति-साधनाक केन्द्र बनल अछि। जयमंगलागढ़ (बेगुसराय)क भगवती मंगलाकेँ “मंगल चण्डी” (देवी भागवत) कहल गेल अछि। एवं प्रकारे चण्डीक पूजन परम्पराक अवशेष विराटपुर (वीरहट्ट), गाजीपैता, लक्ष्मीपुर (कोशी क्षेत्र), बेहट, जयमंगलागढ़ एवं अरेराज (प.चम्पारण) क्षेत्रक चण्डीस्थानमे उपलभ्य अछि। सिमरौनगढ़क कंकाली: तिरहुतक कर्णाटवंशीय राजा नान्यदेवक राजधानीनगर सिमरौनगढ़ (सम्प्रति नेपाल तराइमे अवस्थित)क कुलदेवी कंकालीक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति (खण्डित) एकटा मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित ओ पूजित अछि। मन्दिरक प्रांगणमे विष्णु, उमामाहेश्वर सूर्य आदिक विशाल- पाथरक कलात्मक मूर्तिसभ कर्णाटशैलीमे निर्मित एवं लोकपूजित अछि। कर्णाट राजा लोकनि पंचदेवोपासक रहितो शक्तिक उपासक छलाह। कर्णाट राजा शक्र सिंह द्वारा स्थापित सखराक भगवतीक शक्रेश्वरी एवं राजा हरिसिंहदेवक कुलदेवी तुलजा भवानीक (नेपाल उपत्यकाक तीनू राजधानी नगरमे स्थापित एवं पूजित मूर्ति सभ शक्ति उपासनाक उदाहरण बनि गेल अछि। कंकालीक एकटा मन्दिर राजपरिसर, दरभंगामे अछि। कंकालीक तेसर सांस्कृतिक मिथिलांचलक भारदह (भीमनगर बराजसँ पश्चिम, वर्तमान नेपाल तराइ)क मन्दिरमे एकटा तेजस्विनी पाथरक मूर्ति स्थापित अछि। कंकाली भगवती चतुर्भुजी छथि, जे निसंदेह कर्णाटकालीन (१२-१३म सदी) थिक। कंकालीक पार्श्वमे अष्टभुजी दक्षिणकाली, वाम दिस चतुर्भुजी विष्णु आदि प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभक ऐतिहासिक महत्व अछि। कंकालीक उदर भाग गहीर धरि तराशल अछि आर हाथसभमे दण्ड ओ पाश बाँचल अछि। शेष खण्डित अछि। आमीक अम्बिका स्थान: हाजीपुर-सोनपुरसँ छपरा मार्गमे दिघवारा (सारण) लग गंगाक वाम तटपर आमीमे अम्बिका भगवतीक एकटा प्राचीन मूर्ति स्थापित ओ पूजित अछि। आमी मही ओ गंगाक संगम क्षेत्र अछि। एहि भूभागकेँ संगमतीर्थ सेहो कहल जाऽ सकैछ। श्रुति अछि एहिठाम दक्ष प्रजापतिक यज्ञमे शिवा अपन प्राणाहुति देने छलीह। राजा सुरथ एहिठाम भगवतीक उपासना कयने छलाह। दुर्गा-सप्तशतीक अंतः साक्ष्यक अनुसार ओ एहिठाम भगवतीक मंदिरक मूर्ति बनाकऽ पूजने छलाह। आमी जाग्रत शक्तिपीठ अछि। अम्बिकाक रूप विन्यासमे कहल गेल अछि जे ओ कमलासनपर आसीन छथि। हुनक हाथमे पाश, अंकुश आदि छनि एवं वाहन सिंह छनि। अम्बिकाक पूजोपासना समान रूपसँ शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि लोकनि करैत छथि। जैन सन्दर्भमे ओ नेमिनाथक यक्षिणी ओ शासनदेवी सेहो छथि। सखराक छिन्नमस्ता: कुनौलीसँ (निर्मली, सहरसा) मात्र दू मील पश्चिमोत्तर दिशामे अवस्थित सखरामे छिन्नमस्ताक प्रसिद्ध मन्दिर अछि। मन्दिरक गर्भगृहमे कर्णाट राजा शक्रसिंह (१२८५-९५) भगवतीक मूर्तिक स्थापना कयने छलाह। फलतः सखराक छिन्नमस्ताकेँ शक्रेश्वरी सेहो कहल जाइत अछि। ओऽ तांत्रिक पूज्या भगवती छथि, मन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित पंचदेवीमे छिन्नमस्ता प्रमुख छथि। सखरा सांस्कृतिक मिथिलांचलक नेपाल तराइ राजबिराज, सप्तरीमे पड़ैत अछि। भगवती छिन्नमस्ता द्विभुजी रूपमे रति-कामक युगनद्ध आसनपर ठाढ़ छथि। दहिन हाथमे काता एवं वाम हाथमे स्वहस्ते मुण्डित मस्तक छनि। ओ दिगवस्त्रा छथि, मुक्तकेशा छथि। हुनक दुनू पार्श्वमे योगिनी ओ भोगिनी (डाकिनी) योनिमुद्रामे ठाढ़ भगवतीक कण्ठसँ निःसृत रक्तक धारकेँ पीबैत छथि। रक्तक पहिल धार भगवतीक अपने मुँहमे जाइत छनि। यैह सृष्टिक जीवनचक्र थिक। योगिनी ओ डाकिनीक हाथ सभमे कपाल ओ काता छनि। रजरप्पा (झारखण्ड) मे भगवतीक भव्य मन्दिर दर्शनीय अछि। भगवतीक शास्त्रविहित एवं लोकविहित रूपसाधनाक सन्दर्भमे निम्नलिखित स्वरूपक प्रसिद्धि उल्लेखनीय अछि- लक्ष्मी (अन्धराठाढ़ी, मधुबनी; परानपुर, कटिहार), गजलक्ष्मी (भीठ-भगवानपुर, मधुबनी; रोसड़ा, समस्तीपुर आदि), सहोदरा माई (नरकटियागंज, प.चम्पारण), गढ़ी माइ (नेपाल तराइ), बुढ़िया माइ ( मंगरौनी, मधुबनी;कन्हौली, वैशाली आदि) आदिक अतिरिक्त परमेश्वरी (अन्धराठाढ़ी), वाणेश्वरी (मकरन्दा), भुवनेश्वरी (भवानीपुर), राजेश्वरी (डोकहर), सिद्धेश्वरी (सरिसव), जटेश्वरी (लोहट), विषहरी (दियारीथान, सहरसा) आदि। मिथिलांचलक गाम-गाममे पसरल पिण्डस्वरूपा सप्तमातृका एवं घर-घरमे पिण्डित गोसाउनि भगवतीक रूप विस्तारक सांस्कृतिक सर्वेक्षण ओ अनुशीलन आवश्यक अछि। एकर अतिरिक्त जलशक्ति पूरित नदी देवी सभमे गंगा, यमुना, कोशी, कमला ओ जीवछक शक्ति स्वरूपक पूजोपासना सेहो विशिष्ट अछि। 2.हरितालिका/ चौरचन्द्र/ अनंत चतुर्दशी- गजेन्द्र ठाकुर हरितालिका पूजा व्रत (तीज) तिथि भादव शुक्ल तृतियाकेँ कुमारि कन्या सोहागक लेल व्रत करैत छथि। कथा एहि प्रकारेँ अछि। सूतजी- पार्वती शिवसँ शिवसन वरप्राप्तिक व्रतक विषयमे पुछैत छथि तँ ओऽ उत्तर दैत छथि जे हिमवान पहाड़पर अहाँ भादव शुक्ल तृतियाकेँ ई व्रत कएने रही बारह वर्ष उल्टा टांग मात्र धुँआ पीबि कए, मघमे जलमे बैसि, श्रावनमासमे वर्षामे आऽ बैसाख दुपहरियामे पंचाग्निमे। तखन अहाँ पिता नारदकेँ कहलन्हि जे ओऽ पार्वतीक विवाह विष्णुसँ करओताह। ई सुनि अहाँ सखीक घरपर कानए लगलहुँ जे हम तँ पात्र शिवकेँ अपन पति बनाएब आऽ अपन सखेक संग गंगाकात खोहमे चलि गेलहुँ आऽ भादव शुक्ल तृतियाकेँ हमर बालूक प्रतिमाक पूजा कएलहुँ तखन हम आबि अहाँकेँ पति होएबाक वर देलहुँ। तखन अहाँ हमर बालुक प्रतिमाक विसर्जन कए पारण केलहुँ, तखने अहाँक पिता सेहो पहुँचि गेलाह आऽ अहाँकेँ घर अनलन्हि आऽ हमरासँ अहाँक विवाह भेल। अहाँक सखी अहाँकेँ हरिकए लए गेल छलीह तैँ एहि व्रतक नाम हरितालिका पड़ल। चौरचनक कथा सनत्कुमारकेँ नन्दिकेश्वर योगीन्द्र कथा सुनबैत छथि- कृष्ण मिथ्या आरोपसँ दुखित भए गणेश आऽ चन्द्रमाक पूजा कएलन्हि। पृथ्वीक भार उतारए लेल बलराम, कृष्ण आऽ कमलनाभ उत्पन्न भेलाह। कंसक वध कृष्ण कएलन्हि। मुदा कंसक ससुर जरासन्धक आक्रमण संकट देखि छप्पन करोड़ यदुवंशीक आऽ सोलह हजार आठ स्त्रीवर्गक संग द्वारका अएलाह। संत्राजित सूर्यक उपासना द्वारका तटपर कए स्यामन्तक मणि- जे सभ दिन आठ भार सोना उत्पन्न करैत छल- पओलन्हि। ओऽ एकरा अपन भाइ प्रसेनकेँ दए देलन्हि। राजा उग्रक दुनू सन्तान छलाह- संत्राजित आऽ प्रसेन। एक दिन कृष्ण आऽ प्रसेन शिकार खेलाए लेल बोन गेलाह तँ एकटा सिह प्रसेन कए मारि मणि लए विदा भेल तँ जाम्बवान भालु ओहि सिंहकेँ मारि मणि अपन पुत्रकेँ खेलाए लेल दए देलन्हि। कृष्ण जख्न असगरे आपिस भेलाह तखन सभ हुनकापर प्रसेनक हत्या मणिक लोभमे करबाक आरोप लगओलक। तखन कृष्ण सभकेँ लए बोन गेलाह तँ सिंह आऽ प्रसेनकेँ मुइल देखलन्हि आऽ जाम्बवानक पुत्र सुकुमारक झूलामे लटकल मणि देखलन्हि। जाम्बवानक पुत्री कृष्णकेँ मणि लए भागए कहलन्हि, मुदा कृष्ण शंख फुकि सात दिन खोहमे भेल युद्धक बाद द्वारकावासी द्वारका घुरि कृष्णक अन्तिम संस्कार मृत बुझि कएल, मुदा २१ म दिन जाम्बवान हारि मानि पुत्रीक विवाह हुनकासँ कराए मणि उपहारमे देलन्हि। कष्ण ओहि मणिकेँ संत्राजितकेँ दए देलन्हि। संत्राजित हुनकापर मिथ्या आरोपसँदुखी भए अपन पुत्रीक विवाह कृष्णसँ कराओल आऽ स्यामन्तक मणि कृष्णकेँ देल मुदा कृष्ण नहि लेलन्हि। फेर कृष्ण-बलराम जखन बाहर छलाह तखन शतधन्वा सत्राजितकेँ मारि मणि लए लेलक आऽ अक्रूर यादवकेँ दए अपने भागि गेल। सत्यभामाक कहलापर कृष्ण-बलराम ओकरा खेहारलन्हि, कृष्ण ओकरा मारल मुदा मणि नहि भेटल, ई कथा सुनिते बलरामकेँ ई शंका भेल जे कृष्ण कपट करैत छथि, से ओऽ कृष्ण द्वारका अएलाह मुदा बलराम विदर्भ चल गेलाह, अक्रूर तीर्थयात्रापर निकलि गेलाह, मणि धारण कए काशीमे सूर्यक उपासना करए लागल। तखन नारद कृष्णकेँ भाद्र शुक्ल चौठमे चन्द्रमाक दर्शन कएलाक कारण ई कलंक लागल, से कहलनि, कारण रूपक गर्वमे चन्द्रमाकेँ गणेशजी श्राप देलन्हि जे एहि दिन हुनकर दर्शन करएबलाकेँ कलंक लागत। ब्रह्मा-विष्णु-महेश निर्विघ्नदेवक अष्टसिद्धि पूजा कएल आऽ जखन ओऽ घुरि रहल छलाह तँ चन्द्रमा हुनकर हाथी बला मस्तक, पैघ पेट देखि कए हँसि देलन्हि आऽ ई श्राप पओलन्हि। तखन एहि चतुर्थी तिथिकेँ ब्रह्माक कहल अनुसार गणेशक पूजा भेल फेर चन्द्रमाक अनुनय-विनयपर ई वर देल जे जे क्यो भाद्र शुक्ल चौठमे हथमे फल-फूल लए मंत्रक संग अहाँ दर्शन करत ओकरा कलंक नहि लागत। अनंत पूजा अनन्त भादवमास शुक्ल पक्ष चतुर्दशीकेँ अनन्त पूजा होइत अछि। कथा- जुआमे हारल युधिष्ठिरकेँ बोनमे कृष्ण एहि व्रत करबाकलेल कहलन्हि आऽ कथा सुनओलन्हि। सत्ययुगमे सुमन्त नाम्ना ब्राह्मण भृगुक कन्या दीक्षासँ विवाह कएलन्हि। मुदाक शील जन्मक बाद दीक्षाक मृत्यु भए गेलन्हि। फेर सुमन्तक विवाह कर्कशासँ भेलन्हि ओऽ शीलाकेँ कष्ट देमए लागलि। फेर शीलाक विवाह कौण्डिन्यसँ भेलन्हि। दुनू गोटे अनन्त चतुर्दशीक दिन यमुना तटपर घुरैत कल जाइत छलाह तँ स्त्रीगण लोकनि हुनका बाँहिपर अनन्तक ताग बान्हि देलन्हि जाहिसँ हुनकर सभक घर गृहस्तीमे समृद्धि आयल। घरमे माणिक्य रहितहुँ ई ताग देखि एक दिन पति ओकरा तोड़ि आगिमे फेंकि देलन्हि। शील जरल डोरकेँ निकालि दूधमे राखि लेल। आब विपत्ति शुरू भए गेल आऽ घरमे आएल दरिद्रताकेँ देखि कौण्डिन्य बोन चलि गेलाह। ओतए अनन्त भगवान हुनका विष्णु लग लए गेलखिन्ह। ओऽ हुनका अनन्त व्रत १४ बरख धरि करबाक लेल कहलन्हि। नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” Bottom of Form चौठचन्द्र पूजा भादवमासक शुक्लपक्षक चतुर्थी तिथिकऽ ई पूजा होइत अछि।मनोकामना पूर्ण भेलापर ई पाबनि कैल जाइत अछि। अहि दिन चन्द्रमाक पूजा भॉंति प््राकारक पकवानक नैवेद्यसॅ कैल जाइत अछि।मिंथिलानरेश हेमांगद ठाकुर जे कि ज्योतिषी सेहो छलाह अपन कोनो मनोकामना पूर्ण भेलापर अहि पूजाक आरम्भ केने छलाह।अहि पाबनिमे दिन भरि निराहार रहिकऽ सॉंझमे विभिन्न प््राकारक पूरी पकवान सहित दहीक मटकुरी के अड़िपन पर उचित स्थान पर राखि पूजा प््राारम्भ कैल जाइत अछि।गणपत्यादि पंच देवता सहित गौरीजीक पूजा पहिने होइत अछि। जे विधवा स्त्री होइत छथि से गौरीक स्थानपर विष्णुक पूजा करैत छैथ।तकर बाद चतुर्थीचन्द्रक पूजा चानन, रक्त चानन, सिन्दुर, यज्ञोपवीत, अक्षत, फूल, फूलमाला, दूबि, बेलपात, जल, अर्घ्य इत्यादि लऽ पूजा कैल जाइत अछि।तकर बाद डाली लऽ तथा दही मटकुरी लऽ कऽ चन्द्रमाक दर्शन कैल जाइत अछि। डालीलऽ दर्शन करैके मन्त्र - नमो सिंह: प््रासेनमवधीतसिंहो जाम्बवताहत: । सुकुमारक मारोदीपस्तेह्यषव स्यमन्तक:॥ दही मटकुरी लऽ दर्शन करक मन्त्र - नमो दधि शंखातुषाराभम् क्षीरोदार्णव सम्भवम्। नमामिशशिनं भक्त्या शंभोर्मुकुट भूषणम्॥ अर्धपात्रमे सब वस्तु राखि अन्तमे ''ब्रह्मणे नम:”। तकर बाद कथा सुनि विसर्जन कैल जाइत अछि।कथा सुनैत काल हाथमे जे फूल रहैत अछि तकरा निम्न मंत्र पढै़त विसर्जित कैल जाइत अछि। ''रूपं देहि जयं देहि भाग्यं भगवान देहिमे। धर्मान देहि धनं देहि सर्वान् कामान प््रादेहिमे॥ च्च् तकर बाद दक्षिणा दऽ प््रासाद वितरण कैल जाइत अछि। जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा दास मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। कन्या भ्रूण हत्या, प्रकृतिक संग खिलवार पिछला छुट्टीमे एक सालपर हम गाम गेल छलहुँ, जहियाँ गाम पहुँचलहुँ ओकर दोसरे दिन पता चलल की हमर बच्चपनक दोस्तक बहुत जोर तबियत ख़राब छनि ! आर ओऽ अस्पतालमे भरती छथि! खबर जहिना हम सुनलहुँ अस्पतालक लेल चलि देलहुँ ! हमरा संग हमर पत्नी सेहो चलि देलीह, अस्पताल पहुंचला पर पता चलल जे कुनू चिंताक बात नै सब ठीक ठाक अछि! एक घंटाक बाद हुनका (हमर दोस्त) छुट्टी मिल जेतेंन, बहुत दिनक बाद अस्पताल आयल छलहुँ, इच्छा भेल कनि चारो तरफ घुमि - फिर ली मनमे अस्पताल के लेल बहुत जिज्ञासा छलए ! हम आर हमर पत्नी जहिना दोस्त के वाडसँ बाहर निकललहुँ हमर नज़रि अपन पितयौत भैया- भाभी पर परल, अचानक हुनका सभकेँ अस्पतालमे देखिकेँ हम चौक गेलहुँ ! हमर नज़रि एकाएक भाभीक उदास, कनमुँह चेहरा पर परल .....पुछलियनि की बात ... मुदा ओ किछ जबाब नञि देलीह, हमर पत्नी कातमे बजाकए हुनकर पीड़ा सुनलन्हि ! दुबारा पुछलासँ भाभी अपन पीड़ा नञि रोकि सकलीह, हुनकर पीड़ा हुनकर आँखिसँ छलैक उठ्लैन पता चलल जे दू गोट कन्याक जन्मक बाद आब तेसर बेर फेरसँ कन्या कs नै बर्दाश्त करबाक चेतावनी भैया हुनका पहिने दऽ चुकल्खिन-ए ....पता चलल गर्भ परीक्षण लेल भैया भाभीकेँ अस्पताल अनने छथि ! गर्भमे पलि रहल बच्चाक प्रति पिताक खौफनाक इरादासें उपजल भयक भाव भाभीक चेहरा पर साफ-साफ देखलहुँ! बादमे हमरा आर हमर पत्नीक कतेक समझेला पर भैया भाभीकेँ वापस घर लऽ गेलखिन! संयोगवश अगला संतानक रूपमे हुनका बालकक प्राप्ति भेलनि .... बेशक भ्रूण परिक्षण प्रतिबंधित अछि आर सरकार एकरा लेल बाकायदा कानूनों बनने अछि! लेकिन ई की ? लागैत अछि पिछला दरवाजाक संस्कृति अस्पतालों के नै छोरने छनि, तखनेतँ भैया बहुत आसानीसँ भाभी केँ गर्भ परिक्षण कराबए लेल चलि देने छलथि, हमतँ कहए छी चाहे सरकार लाखो कानून बनबथि, लाखो कड़ासँ कड़ा सजा तय करथि लेकिन जाऽ तक हम सब स्वयं अपना तरफसँ कुनू कदम नञि उठायब ई कानूनक हेब नञि ह्एब एके समान अछि ! आइ तक भ्रष्ट्राचार, बालश्रम, शोषणक विरुधो सरकार बहुत कानून लागू केलथि, मुदा कि समाजमे एकर रोकथाम भs सकल? नञि! आर यदि अपने एकर कारणक पता करब तँ पायब कि शायद हम खुद कतो न कतो कुनू न कुनू प्रकारे एकर दोषी छी ! हम सब परिस्थितिक साथ कुनू तरहक समझौता करबाक वजाय ओकरा सदा बदलबाक फिराकमे रहैत छलहुँ चाहे ओकरा लेल हमरा सभ केँ कुनू तरहक हथकंडा कियेक नञि अपनाबऽ परए .... हम सब चुकए नञि छी्! हमतँ पूछए छी जे कि कारण अछि जे लड़कीक जन्म भेला पर आइयो मुँह सिकोरल जाइत अछि? शायद हुनकर परवरिश, शिक्षा, विवाह आदिमे आबै वाला तमाम मुश्किलक कारण एहि तरहक व्यवहार केल जैत अछि ! मुदा कि लड़का के जन्म भेनेसँ ई तमाम समस्या समाप्त भs जाइत अछि? लड़को केँ तँ परवरिश करए परै यऽ ? हुनकरो शिक्षा,नौकरीक लेल दर-दर भटकए परैत अछि ! आर विवाह ........! यदि ईएह गतिसँ कन्या भ्रूण हत्या होइत रहत तँ बूझि लिअ जे सब लड़का के कुंआरे रहए परत ! उदहारण स्वरूप अपने हरियाणामे लड़कीक संख्यामे लगातार दर्ज केल गेल कमी देख सकैत छी, हरियाणामे विवाह लेल लड़की नञि भेटैत छन्हि ओई ठामक लोककेँ दोसर राज्यमे लड़कीक तलाश करए पड़ैत छनि ..... कनि सोचु अगर पूरा देशमे ईएह स्थिति भs जैत तँ कि हैत ? हम निक जेकाँ जानैत छी जे अपने ई बातकेँ ध्यानमे नञि राखब आर यदि राखबो करब तँ दोसर केँ उदाहरण दैक लेल ! लेकिन कि अपने खुद कन्या भ्रूण हत्या रोकेऽ मे दोसरकेँ जागरूक करब ? अपनेकेँ नञि लागैत अछि जे प्रकृति द्वारा निर्धारित जीवनकेँ सुचारू रूपसँ चलबै लेल ई गाड़ीक दुनु पहियाँ समान रूपसँ आवश्यक अछि ! आर कन्या भ्रूण हत्या यानी कि प्रकृतिक संग खिलवाड़ अछि ! अई खिलवाड़केँ रोकऽ लेल हमरा सभकेँ एकजुट हेबअए परत आर एतबे नञि एहि मानसिकतोकेँ बदलए परत कि वंशबेल खाली आर खाली लड़के चलेता, तखने हम सही मायनेमे आधुनिक कहाएब। बालानां कृते १.जट-जटिन-गजेन्द्र ठाकुर २. देवीजी:शिक्षक दिवस- ज्योति झा चौधरी चित्र: ज्योति झा चौधरी जट-जटिन महाराज सिव सिंह (१४१२-१४४६) मिथिलाक राजा छलाह। विद्यापति हुनके शासनकालमे भेल छलाह आऽ राजा शिव सिंह आऽ हुनकर रानी लखिमा रानी हुनकासँ बड़ प्रेम करैत रहथि। एक टा जयट वा जट नाम्ना बड़ पैघ संगीतकार सेहो छलाह ओहि समयमे। राजा शिव सिंह हुनकासँ विद्यापतिक गीतकेँ राग-रागिनीमे बन्हबाक लेल कहने रहथि। वैह जयट जट-जटिन नाटकक रचना कएलन्हि आऽ जटक भूमिका सेहो कएने छलाह। साओन-भादवक शुक्ल-पक्षक रातिमे ई नाटक स्त्रीगण द्वारा होइत अछि। जट छथि पहिरने पुरुष-परिधान आऽ जटिन पहिरने छथि छिटगर नूआ। आऽ देखू दुनू गोटे अपना संग अपन-अपन संगीकेँ लए आबि गेल छथि। बियाहक पहिल सालक साओन, जटिन जाए चाहैत छथि नैहर मुदा धारमे बाढ़ि छैक, हे माय कोनो नौआ-ठाकुर-ब्राह्मण आकि पैघ भाए केर बदलामे छोटका भायकेँ पठबिहँ बिदागरीक लेल नञि तँ सासुर बला सभ बिदागरी आपिस कए देत। जाहि नवकनियाँकेँ नैहर नहि जाय देल गेल ओऽ अपन पतिकेँ कहैत छथि जे जट-जटिनक नृत्यमे तँ भाग लेबए दिअ। मुदा वर झूमर खेलाएबसँ मना कए दैत छथि, तखन ओऽ घामक बहन्ना बनाए दूर भए जाइत छथि। जट-जटिन बीचमे छथि आऽ दुनूक संगीमे बहस चलि रहल अछि। -चलू झूमर खेलाए। -कोन पातपर चढ़ि कए। -पुरैनीक। जट-जटिनमे विआह होए बला अछि, मुदा जट किछु बातपर अड़ि गेल, जेना धानक शीस जेकाँ लीबि कए चलत जटिन, किछु देखावटी विरोधक बाद जटिन सभटा मानि जाइत छथि। फेर दुनू गोटे विआह कए लैत छथि। फेर भोर होइत अछि, जटिन कहित छथि जे जाए दिअ, अँगना बहारबाक अछि, मुदा जटा कहैत छथि जे अँगना मए-बहिन बहाड़ि लेत। फेर दिन बितैत अछि तँ जटिन कहैत छथि जे गहना किएक नहि बनबाए रहल छी हमरा लेल, आर बहन्ना करब तँ हम सोनारक घर चलि जाएब। जटिन ततेक खरचा करबैत छन्हि जे जटाक हाथी तक बिकाऽ जाइत छन्हि आऽ हाथीक सिकड़ि मात्र बचल रहि जाइत छन्हि। जटिन कहैत छथि जे हमरा नैहर जएबाक अछि, तँ जटा कहैत छथि जे धानक फसिल तैयार अछि, तकरा काटि कए जाऊ। जटिन नहि मानैत छथि कहैत छथि जे एहि बेर जे हम जाएब तँ घुरि कए नहि आएब। मुदा सौतिनक गप सुनि कए डेराए जाइत छथि। बीचमे स्वांग जेना कोनो रोगीक इलाज आदि सेहो होइत रहैत अछि। जट मोरंग बिदा भए जाइत छथि कमाए। जटिनकेँ सोनार प्रलोभन दैत छन्हि गहनाक, मुदा जटिन जटाक सुन्दरताक वर्णन करैत छथि। फेर जटा घुरि अबैत अछि। एक दिन दुनू गोटेमे कोनो गप लऽ कए झगड़ा भए जाइत छन्हि। जट छौँकीसँ जटिनकेँ छूबि दैत छथि। जटिन रूसि कए घर छोड़ि दैत छथि। जटा गोपी, मनिहारिन आऽ आन-आन रूप धरि ताकैत छथि हुनका। मुदा जटाक घरमे झोल-मकड़ा भरि जाइत छन्हि आऽ अंगनामे दूभि उगि जाइत छन्हि। तखन जटिन हुनका लग आबि जाइत छथि। फेर स्त्रीगण लोकनि बेंगकेँ एकटा खद्धा खुनि कए ओहिमे दए दैत छथि आऽ ऊपरसँ ओकरा कूटैत छथि आऽ मरल बेंगकेँ झगराहि स्त्रीक दरबज्जपर फेकि अबैत छथि। ओऽ स्त्री भोरमे मरल बेंगकेँ देखला उत्तर जतेक गारि पढ़ैत छथि, ततेक बेशी बरखा होइत अछि। २. देवीजी: ज्योति झा चौधरी देवीजी : शिक्षक दिवस चित्र: ज्योति झा चौधरी देवीजी : शिक्षक दिवस आई ५ सितम्बर कऽ विद्यालयमे शिक्षक दिवसके आयोजन छल। सब शिक्षक-शिक्षिका अतिथि रहैत आ सब कार्यक्रम विद्यार्थी उारा प्रस्तुत छल। तरह - तरहक रंगारंग कार्यक्रम देखायल गेल जाहि स सब अध्यापक बहुत प्रसन्न भेलैथ।अहिबातक चर्चा विस्तृत रूपसऽ भेल जे ई तिथि देशकेप्रथम उपराष्ट्रपति एवम् उितीय राष्ट्रपति स्वर्गीय सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मतिथि छैन।भारतीय दर्शनके पश्चिमी सभ्यतामे मान्यता दियाबऽमे हुनकर योगदान अविस्मरणीय छैन।1952 – 1962 मे उपराष्ट्रपति रहला आ १३ मई १९६२ सॅअगिला पॉंच साल तक राष्ट्रपति रहला।जहन ओ राष्ट्रपति भेला तऽ हुनकर विद्यार्थी हुनकर जन्मदिवस मनाबऽके अनुमति मॉंगऽ गेलैन।ओ कहलखिन जे हमर जन्मदिन के आडम्बर के बदले अहि दिनके शिक्षक दिवस के रूपमे मनाकऽ हमरा गर्वित करू। तहियासॅं ई प््राथा प््राारंभ भेल। अहि दिन सब विद्यार्थी अपन शिक्षकसभके प््राति अपन आभार प््राकट करैत छथि। करैयो के चाही कारण कहल गेल अछि - ''गुरु गोविन्द दोनो खड़े़,काको लागूं पाय। धन्य गुरु आपणो ,गोविन्द दियो दिखाय॥ सबकियो अन्य शिक्षक - शिक्षिका संगे देवीजीके प्रति विशेष आभार प्रकट केलक ।अंतमे प्रधानाचार्य अपन भाषणमे विद्यार्थीक प्रशंसाक अतिरिक्त अहि बात पर विशेष जोर देलखिन जे शिक्षक देशक भविष्यक निर्माता होइत छैथ तैं हुनका विद्यार्थी लग इक आदर्श प्रस्तुत करैके चाही। शिक्षकके जिम्मेवारीक महत्व पर जोर देलाक बाद कार्यक्रम समाप्त भेल।सब सहर्ष अपन घर दिस विदा भेला कारण आहि अवकास छल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १२. पञ्जी प्रबंध-गजेन्द्र ठाकुर पञ्जी प्रबंध पंजी-संग्राहक- श्री विद्यानंद झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) श्री विद्यानन्द झा पञीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा | पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आ' संरक्षणमे संल्गन। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आ' संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। पञ्जी नगरमिक लिप्यान्तरण ओ' संवर्द्धन- लगभग 600 पृष्ठसँ ऊपर(तिरहुता लिपिसँ देवनागरी लिपिमे)। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। शाखा पञ्जीक विशेषता शाखा पञ्जी एक अभूतपूर्व पुस्तक छी। एहि तरहक पुस्तक हमरा बुझने संसारक कोनो देश कोनो सम्प्रदाय वा कोनो वर्गमे नहि पाओल गेल अछि। यद्यपि ई वर्ग विशेषक पुस्तक थिक, परञ्च एहि प्रकारक पुस्तक कोनो सम्प्रदाय वा कोनो वर्गक लेल शुरू कएल जाऽ सकैत छैक। मिथिलाक ई अद्वितीय देन सिद्ध भऽ सकैछ, जाहिमे १००० वर्षसँ परिचयक जाल जकाँ निर्मित कएल गेल अछि। जेना कवि कोकिल विद्यापति ठाकुरक परिचय हुनक पुरुषाक उल्लेख ७ पीढ़ी पहिनेसँ लऽकेँ विद्यापतिक वंशधर वर्तमान धरि, सभक साङ्गोपाङ्ग (विद्या, उपाधि, विशिष्टता, कार्य परिवर्तन, मातृकुलक परिचय) परिचय भेटत। एहन परिचय मात्र विद्यापतिये नहि समस्त मैथिल ब्राह्मणक भेटत, एहि प्रकारक आधारपर विभिन्न विद्वान ब्राह्मणक काल निर्धारण सेहो कएल जाऽ सकैछ। शाखा पञ्जीक मादे: हम पञ्जीकारक वंशज थिकहुँ। संगहि ग्यारह वर्ष धरि मैथिल पञ्जी प्रबंधक साङ्गोपाङ्ग अध्ययन कएलहुँ। गुरु छलाह स्वयं हमर पिता पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड धौत परीक्षामे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान पाबि महाराजाधिराज कामेश्वर सिंहक हाथें दोशाला पओनिहार स्वनाम धन्य पञ्जीकार मोदानन्द झा- हुनक मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक छलाह महामहोपाध्याय डॉ सर गङ्गानाथ झा। पञ्जी प्र्बन्धक जे इतिहास अछि ताहिमे वर्णित अछि जे पञ्जी प्रबंधक वर्तमान स्वरूपक प्रणेता छलाह सदुपाध्याय गुणाकर झा, जनिक हम उन्नैसम पीढ़ीमे छी। आइसँ उन्नैस पुस्त पहिने जे मैथिलक वंशावलीक संकलन संवर्द्धन ओऽ संरक्षणक व्रत दृढ़ निष्ठासँ सदुपाध्याय गुणाकर झा लेलन्हि वा तत्कालीन विद्वत वर्ग द्वारा विश्वासपूर्वक देल गेलन्हि, से अद्यावधि निष्ठापूर्वक हमरा धरि सुरक्षित ओ संवर्द्धित अछि। पञ्जीक समस्त पुस्तक मिथिलाक लिपि तिरहुतामे लिखित अछि/ लिखल जाऽ रहल अछि। आऽ बुझू तँ तिरहुता लिपिक प्राणाधार थिक पञ्जी प्रबन्ध। परन्तु वर्तमान पञ्जीक कार्य करैत अनुभव कएल जे एहि शास्त्रसँ सम्बद्ध पक्ष एहि लिपिक ज्ञानक अभावमे सामने बैसियौकऽ विषय वस्तुसँ अनभिज्ञ रहि जाइत छथि। फलस्वरूप एकर संरक्षणक प्रति सहयोग घटल जाऽ रहल छैक। एहिना स्थितिमे भेल जे कियैक नहि देवनागरीमे अनुवाद कएल जाए। सोचि तँ लेलहुँ मुदा कार्य बड्ड दुरूह। संगहि आबादीक विस्तार संग शाखाक विस्तार सेहो आवश्यक तँय ई एकटा पूर्णकालिक कार्य भेल लगभग ६-७ वर्ष धरि एहिना स्थितिमे पारिवारिक दायित्वक निर्वहन करैत एहि गुरुतर कार्यक सम्पादन करब एकटा असाध्य साधने भेल एहि युगमे। परञ्च उत्साही युवक लोकनिक श्रीमान् गजेन्द्र ठाकुर, मेहथ, मधुबनीक आऽ श्री नागेन्द्र कुमार झाक सहयोग एहि कार्यमे भेटल। धर्मपत्नी श्रीमति गीता झा द्वारा देल गेल मानसिक संवलक कारणेँ हम यथा संभव एहि कार्यकेँ सम्पन्न कऽ सकलहुँ। सुधीजन त्रूटिक हेतु क्षमा करताह एहि आशाक संगे। शाखा पुस्तक देखबाक अवगति शाखा पुस्तकमे सभसँ पहिने -वर्णाक्रमसँ अ सँ ऐ धरिक पातमे पत्र पञ्जी अछि। जकर विषय थिक कतेक गोत्र- गोत्रक अधीन कतेक मूल, मूलक विभेद मूलग्राम ओ तकर- ताहि मूलग्रामक अछि पुरुष। पृ. १ सँ ३३८ धरि शाखाक विस्तार अछि, प्रारम्भ भेल अछि शाण्डिल्य गोत्रक गंगोली मूलसँ आऽ जकर आदि पुरुष थिकाह गंगाधर। अगलहि पीढीमे हुनक एक विवाहक दू संतान १.वीर झा आऽ २.नारायण। वीरक सन्तान पर्व पल्ली/ पवौली मूलक बीजी। आऽ नारायणक संतान आगाँ संकर्षणसँ खण्डवला (खडौरे) मूलक संस्थापक भेलाह। एहिना क्रमे प्रायः प्रल्लित मूलक बीजी पुरुष ठाम-ठाम भेटताह- यथा पृष्ठ-संख्या १/३- गंगोली बीजी गंगाधर पृ.सं. १/१२- एकमा वलियारु वीजी धरनीधर पृ.सं. १/१४- वरुआली मराढ़ वीजी- दिवाकर पृ.सं.- १/१७- मंगरौनी माण्डर वीजी त्रिनयन भट्ट इत्यादि। शाखा पुस्तकक मुख्य विशेषता अछि- प्रयोजनक अनुसार विस्तार, पूर्वापरक ज्ञान हेतु अंकनक व्यवस्था कएल गेल अछि। यथा पृष्ठ संख्या- ८३/०६ (पंजीकार वाला अंक) १८१-६ (श्री ठाकुरजी वाला अंक) मे कमल मणि ठाकुरक विवाहक उल्लेख अछि- हुनका एक बालक- कुलमणि प्रसिद्ध फेकन ठाकुर। कमलमणि ठाकुरक विवाह दरिहरा मूलक रतौली शाखामे अभयनाथ झाक बालक भीखर झाक पुत्रीसँ। आब पढ़निहारकेँ समस्या हेतन्हि जे ई अभयनाथ सुत भीखरक पूर्व परिचय की छन्हि तँ हम देखैत छी जे भीखरक आगाँ मे ३८/५ लिखिकऽ हरिनन्दन झाक पिता रामचन्द्र झा छथि, जिनकर विवाहक उल्लेख ३८ पत्रक पहिल पारमे ५म पंक्ति रामचन्द्र झाक विवाह लिखल छन्हि। रामचन्द्र झाक दू गोट बालक रघुनन्दन आऽ दोसर हरिनन्दन। ई दुनू भाय खण्डबला मूलक रतिनाथ ठाकुरक दौहित्र छथि। एहि रतिनाथक परिचयक हेतु ३३॥२ अर्थात् पात संख्या ३३क दोसर पृष्ठ पर तेसर पंक्तिमे जीवे छथि खण्डबला मूलक। एहि जीवेकेँ उठाकऽ ३८ पातक पहिल पारक पाँचम पंक्तिमे अनैत छियन्हि। एहि ठाम देखैत छी जे जीवेक बालक छथि रामनाथ आऽ पाँथू। एहि पाँथूक बालक छथि रतिनाथ। एहि रतिनाथक विवाह छन्हि महिषी बुधवाल मूलक डालूक पौत्री ओऽ श्रीदत्तक पुत्रीमे। रतिनाथक विवाहक वर्णन एहि ३८ पातक पहिल पारक आठम पंक्तिमे। अस्तु एहि प्रकारेँ सभटा अंकक सहारासँ परिचय आगाँ बढ़ैत अछि। जाहि ठामसँ उद्धरण लेल जाइत छथि। ताहि ठाम नामक ऊपरमे माथपर अंक लिखल जाइत अछि। ई अंक थिक, जतऽ नाम लए जएबाक अछि ओहि पातक संख्या ओऽ पंक्ति जतऽ नाम आनल जाएत अछि। ओहि ठाम नामसँ पहिने जतऽ सँ नाम आनल गेल ओहि पत्रक संख्या ओ पंक्ति। यदि परिचय् पूर्ण अछि तऽ नाम अनबाक प्रयोजन नहि, मात्र जतऽ पूर्व परिचय लिखल अछि, ओहि पातक संख्या ओ पंक्तिक अंक मात्र लिखि देल जाइत अछि। जेना ११४ पातक पहिल पृष्ठपर चारिम पंक्तिमे अर्थात् ११४/४ मे वलियास मूलक राव शंकरक विवाहक उल्लेख भेल अछि। हुनक विवाह छल पवौली मूलक प्रितिनाथक कन्यामे। प्रितिनाथक विवाहक वर्णन १०३/२ मे भऽ चुकल अछि। हुनक विवाह छल कुजौली मूलक गोपीनाथक कन्यामे तँ मात्र १०३/०२ लिखि परिचय पूरा कऽ देल गेल, आब जिनका परिचय बुझबाक होएतन्हि तँ ओ १०३/०२ मे जाऽ कऽ देख लेताह, अस्तु। बहुत ठाम पूर्ण परिचय नहि रहलासँ अंकक उपयोग नहि कएल गेल अछि। एहि प्रकारेँ अंक लिखबाक प्रयोजन सिद्ध होएत अछि। किछि सांकेतिक शब्द: दौ- अर्थात् मातामह (नानाक नाम) सँ- मूलक परिचायक दौहित्र दौ (द्दौ.) माइक (मायक) नाना मातृ मातामह सदु.- सदुपाध्याय म.म.उ.- महामहोपाध्याय वैया.- वैयाकरण वै.- वैदिक ज्यो.- ज्योतिष शास्त्रक ज्ञाता बीजी- अर्थात् कोनो मूलक प्रारम्भिक ज्ञात पुरुष हरिनाथ (१३००-१४०० ई.) हरिनाथ गंगौर मूलक मैथिल ब्राह्मणक छलाह आऽ हुनकर पौत्र शिवनाथक विवाह पाली मूलक ज्योतिरीश्वर ठाकुरक पुत्रीसँ भेल छलन्हि। हिनकर विवाह गलतीसँ अपन पुरखाक वंशजसँ भऽ गेलन्हि, ताहि द्वारे हरसिंहदेव पञ्जी व्यवस्थाक प्रारम्भ केलन्हि। हरिनाथ स्मृतिसार लिखलन्हि, जे धर्मशास्त्रक विभिन्न अध्यायपर आधारित छल। हरिनाथ संस्कारक ८ भेद करैत छथि। आचार खण्डमे संस्कारक अतिरिक्त आह्निका- द्विजक नित्यकर्म, श्राद्ध आऽ प्रायश्चितक विवरण अछि। विवाद, व्यवहार आऽ उत्तराधिकारपर सेहो हरिनाथ लिखने छथि। ज्येष्ठ पुत्रकेँ जेठांश, स्त्रीधन, पुत्रक विभिन्न प्रकार, विभिन्न प्रकारक दण्ड इत्यादिक वर्णन हरिनाथ कएने छथि। विधिमे कोना कम्प्लेन फाइल करी, ओकर उत्तर, न्याय आऽ न्यायक आधार आऽ न्यायक पुनरीक्षण, एहि सभक चरचा अछि। विवादक १८ टा प्रकार आऽ सिविल आऽ आपराधिक विधि जे न्यायालयमे अपनाओल जाइत अछि, तकर विवरण हरिनाथ देने छथि। संस्कृत मिथिला -गजेन्द्र ठाकुर लक्ष्मीधर कृत्यकल्पतरुक लेखक लक्ष्मीधर भट्ट हृदयधरक पुत्र छलाह। हुनकर पिता राजा गोविन्दचन्द्रक दरबारमे शान्ति आऽ युद्धक मंत्री छलाह। लक्ष्मीधर मीमांसक छलाह। चण्डेश्वर, वाचस्पति आऽ रुद्रधर अपन-अपन रचनामे लक्ष्मीधरक उद्धरण प्रचुर मात्रामे देने छथि। लक्ष्मीधर एगारहम शताब्दीक दोसर भाग आऽ बारहम शताब्दीक पहिल भागमे अवतरित भेल छलाह। लक्ष्मीधरक कृत्यकल्पतरु महाभारतक एक तिहाइ आकारक अछि आऽ जीवन जीबाक कला आऽ निअमक वर्णन करैत अछि। मैथिल-स्मृतिशास्त्रक ई श्रेष्ठतम योगदान अछि। चण्डेश्वरक विवाद रत्नाकर पूर्ण रूपसँ कृत्यकल्पतरुपर आधारित अछि, विद्यापतिक विभागसार सेहो कल्पतरुक विषयसूचीक प्रयोग करैत अछि। लक्ष्मीधरक विचार- राजाक कार्य कानून आऽ न्याय प्रदान केनाइ छैक। व्यवहार तार्किक रूपसँ राजधर्मक रूपमे बुझल जाऽ सकैत अछि। राज्यक सात टा पारम्परिक तत्त्वक सेहो चरचा अबैत अछि। राजाक कर्तव्यक छह प्रकारक षडगुण्यम केर सेहो चर्च अछि। राजशाहीकेँ ओऽ सरकारक एकमात्र विकल्प कहैत छथि। मुदा लक्ष्मीधर राजाक दैविक उत्पत्तिमे विश्वास नहि करैत छथि। राजा जनताक ट्रस्टी अछि, न्यायी अछि आऽ धर्मक अनुसार कार्य करैत अछि। मुदा राजाकेँ धार्मिक-कानून बदलबाक कोनो अधिकार नहि छल। सर्वभौमिकताक अभिषेकक बाद राजाक शिक्षा-दीक्षा आऽ जनताक प्रति आदरपर ओऽ बहुत जोड़ देलन्हि। लक्ष्मीधर राजकर्मचारीक आचार-संहितापर बड़ जोर दैत छथि। दुर्गक विवरण ओऽ राजमहल आऽ किलाक रूपमे करैत छथि। इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। गोविन्ददास (१५७०-१६४०) शब्दावली (साभार-गोविन्ददास-भजनावली, सम्पादक गोविन्द झा) अंगुलिवलय- औँठी अंचल- आँचर;कोर अकरुण- निर्दय अकाज- विघटन अगुसरि- आगाँ बढ़ि अछोरब- त्यागब अतनु- कामदेव अतसी- तीसी अनंग- कामदेव अनत- अन्यत्र अनल- आगि अनुखन- हरदम अनुगत- सेवक अनुबन्ध- संगति अनुसय- पश्चात्ताप अनुसरब- पाछु चलब अन्तराय- विघ्न अपरूप- अपूर्व अबगाह- पैसब अवतंस- मनटीका अवधान- होस अवनत- झुकल अवश- विवश, बाध्य अविरत- लगातार अविरल- घनगर अविराम- निरन्तर अबुध- बकलेल अभागि- अभाग्य अभिसार- प्रेमीसँ मिलए जाएब अमरतरु- कल्पवृक्ष अमिअ- अमृत अम्बर- आकाश, वस्त्र अरविन्द- कमल अरुणिम- लाल, ललाओन अरुण-लाल अलक- लट तिलक- पसाहिन अलखित- अलक्षित, अनचोक अलस- अलसाएल, शिथिल अलि- भ्रमर असार- आसार, वर्षा अहनिस- दिनराति अहेर- आखेटक, शिकारी आकुर- ओझराएल; घबराएल आगर- आकर, भंडार, खजाना आतप- रौद आनआन- अन्योन्य, परस्पर आनन- मुख, चेहरा आमोद- सौरभ आरकत- आरत, आलता आरति- आर्ति, आतुरता आसोआस- आश्वास इन्द्रफाँस- एक प्रकारक बन्धन इन्दु- चन्द्रमा इषदवलोकन- अझकहि देखब उजागरि- जागरण उजोल- प्रकाश उतपत- उत्तप्त, धीपल उतरोल- कोलाहल उर- हृदय, छाती, स्तन उरु- जाँघ उरोज- स्तन उलसित- उल्लसित ऊजर- उज्जवल कंज- कमल कंटक- काँट कटाख- कटाक्ष, कनखी कनकाचल- सोनाक पर्वत कनय- कनक, सोन कपाट- केबाड़ कबरी- खोपा कमान- धनुष कम्बु- शंख करहाथ- सूढ़, हाथ करतल- तरहत्थी करतँह- करैत छथि करयुग- जोड़ल हाथ कल- शान्ति; मधुर (ध्वनि) कलप- कल्प कलप तरु- पारिजात कलरव- घोल कलहंस- एक पक्षी कलावती- रसिक रमणी कल्पतरु- पारिजात कहतहँ- कहैत छथि कांचन- सोनाक कातर- दीन कान- कृष्ण; कार्ण कानन- वन काँबलि- साँगि कामिनि- रमणी कालिन्दी- यमुना नदी कालिय- एक नाग जकरा कृष्ण नथलनि काहिनी- कथा किंकिर- चाकर, सेवक किंकिणि- घुघरू किसलय- नब पात, पल्लव कुंकुम- सौन्दर्य प्रसाधनक लाल लेप वा चूर्ण कंटक- काँट कुंचित- संकुचल कुंजर- हाथी कुच- स्तन कुन्दल- लट कुन्दल- खराजल, सोधल कुवलय- नील कमल कुमुद- श्वेत कमल, भेँट कुमुदिनि- श्वेत कमलक लता कुसुम- फूल कुसुमबान कामदेव कुसुमसर- कामदेव कुसुमसायक- कामदेव कुहू- अमावस्या कुल- तीर केलि- काम-विलास केसरि- सिंह कोक- एक पक्षी, चकबा खचित- खोँसल खर- तेज, तीक्ष्ण खरतर- तीक्ष्णतर गंड- गाल; हाथीक मस्तक गगन- आकाश गज- हाथी गजमोति- ओ मोति जे हाथीक मस्तिष्कमे रहैछ गणक- जोतखी गरगर- गद् गद, विह्वल गरब- घमंड गरल- विष गरुअ- भारी गलित- नमड़ल गहन- नव गहीन- गँहीर गात- देह गाहनी- प्रवेश कएनिहारि गिम- ग्रीवा, गरदनि गुनगाम- गुणग्राम, गुणावली गुनि- बिचारि, सोचि गुहक- ओझा-गुनी गेह- घर गैरिक- गेरु गोए –छिपाए गोचर- बाध ग्रीम-ग्रीवा, गरदनि धन- प्रबल,तेज ;अविरल, लगलग, लगले लागल घनरस- जल; गाढ़ रस घनसार- कर्पूर घाघर- झाँप घामकिरन- सूर्य घुमाएब- सूतब घूम- निद्रा घोर- विकट घोस- गोप चकोर- एक पक्षी चतुरानन- ब्रह्मा चन्द्रक- मयूरक पाँखि चरमाचल- अस्ताचल चलतँह- चलैत अछि चाँचर- चञ्चल चारु- सुन्दर चाह- निहारनाइ, अवलोकन चाहनी- अवलोकन चाहब- निहारब चिबुक- दाढ़ी चिर- दीर्घकाल चीतपुतरि- चित्रमे लिखल मूर्ति चूड़- शिखर, जूड़ा चूड़क- पुरुषक खोपा चेतन- चैतन्य, होस चोआ- धूमनक तेल जे सुगन्धित होइत अछि छन्द- गति, प्रवृत्ति, इच्छा; शोभा छाँद- शोभा जघन- जाँघ जदुपति- कृष्ण जर- ज्वर, सन्ताप जलजात- कमल जसु- जकर जानु- ठेहुन जाबक- आरत, आलता जाम- याम, पहर जामिनि- राति जामुन- यमुना जूथ- दल जूथि- जूही फूल जोर- युगल, जोड़ा जौबति- युवती झंक- दीन वचन, दुःख झंझर- झटक, वृष्टि झपान- खटुली झष- माछ झामर- श्यामल, कारी झिल्ली- एक कीड़ा झूर- विखिन्न टलमल- अस्थिर ठान- स्थान डमक- डम्फा डम्बर- आटोप ढरढर- निरन्तर (प्रवाह) ढलमल- डगमग तटिनी- नदी तड़ितलता- बिजुलोका तन्त्री- वीणा तपन- सूर्य तमाल- एकवृक्ष तरंगिनी- नदी तरल- द्रुत तरुकोर- गाछक स्तंभ तरुन- टटका; युवा तरुणी- युवती ताटंक- तड़का, कानक एक गहना ताड़- एक गहना तापनि- यमुना ताम्बूल- पान तार- तारा तिआस- पिपासा तिमित- स्थिर तिमित- अन्धकार तिरिवध- नारीक हत्याक पाप तिलतिल- छन-छन तुंग- ऊँच तमुल- तेज (ध्वनि) तुषदह- भूसाक आगि तुहिनकर- चन्द्रमा तूण- तरकस तोरित- तुरन्त, शीघ्र त्रिवलि- नारीक पेटपरक सिकुड़न त्रिभंग- नाचक एक मुद्रा दन्ती- हाथी दन्द- द्वन्द, भिड़न्त; झगड़ा; चिन्ता दरस- दर्शन दलितांजन- एक प्रकारक अंजन दसन- दाँत दसबान- दस बेर गलाए शुद्ध कएल सोन दहन- आगि दादुर- बेङ दाम- डोरी दामिनि- बिजुली दारिद- दरिद्र दारुन- भयानक दिगम्बर- नाङट; शिव दिठि- दृष्टि, नजरि दिनमणि- सूर्य दीगभरम- दिग् भ्रम दीघ- दीर्घ, पैघ दुरगह- दुर्धारणा, भ्रान्ति दुरदिन- अधलाह दिन; वर्षाबाला दिन। दुलह- दुर्लभ दैव- जोतखी दोषाकर- चन्द्रमा; अनेक दोषबाला (व्यक्ति) द्विजराज- चन्द्रमा धनि- धन्य; सजनी, नारीक शिष्ट सम्बोधन छन्द- चिन्ता धबल- उज्जर धवलिम- उज्जर धरनि- धरणी, पृथ्वी धराधर- पर्वत धाब- दौड़नाइ धूसर- भुल रंग नखपद- नखसँ स्तनपर कएल चिन्ह नखर- नह नखरंजनि- नहरनी नखरेख- नखच्छद नन्दन- पुत्र नवल- नूतन नबेलि- नवीना नभ- आकाश नयान- नयन, आँखि नलिनी- कमल-लता नागदमन- कालियनागकेँ नथनिहार (कृष्ण) नागर- रसिक (पुरुष) नाह- नाथ, पति निअ- निज, अपन निअर- निकट निकर- समूह, बहुत्वसूचक निकरुन- निष्करुण, निर्दय निकुंज- लतावृक्षसँ घैरल स्थान निकेतन- घर निगमन- निमग्न, डूबल निचोर- चोली निछोरि- छीन (लेब) निज- अपन नितम्बिनि- पुष्ट नितम्ब वाली सुन्दरी निदान- दुरवस्था, दुखद स्थिति निधुवन- रति, सम्भोग निनाद- ध्वनि निविड़- घनगर, गहन निभृत- छिपल निमिष- छन निरखब- निहारब निरुपम- अनुपम, अपूर्व निसान- ध्वनि निसित- पिजाओल, तेज नीति- नित्य नीप- कदम्ब नीवी- जारबन्द नीलिम- नील रंगक नीर- पानि नीरद- मेघ नीलमणि- नीलम पउरब- हेलिकेँ पार करब पखान- पाषाण, पाथर पखावज- एक बाजा पतनि- चादर पद- पाएर पदतल- तरबा पदुमनि- कमललता; उत्कृष्ट,नायिका पन- पण, पारिश्रमिक पवार- प्रवाल, मूँगा पय- पाएर पयान- प्रयाण, प्रस्थान पयोधर- मेघ;स्तन परजंक- पर्यंक, पलंग परतेक- प्रत्यक्ष परबोधब- बौँसब परमाद- प्रमाद, चूक परमान- प्रमाण; साक्षी परस- स्पर्श परसंग- चर्चा परिबादसि- आरोपह परिमल- सौरभ परिरम्भ- आलिंगन परिहार- त्याग पहु- प्रभू, स्वामी पात- जयपत्र, डिक्री पादुक- खड़ाओँ पानि- हाथ पिक- कोइली पीछ- मयूरक पाँखि पीन- पुष्ट पुनफल- पुण्य़क सुपरिणाम पुलक- रोमांच पुलकायित- रोमांचित पुलकित- रोमांचित फटिक- स्फटिक, एक प्रकारक पाथर फनिमनि- ओ मणि जे नागक फेँच मे उत्पन्न कहल जाइछ। फागु- अबीर फुलधनु- कामदेव फुलसर- कामदेव फूर- सत्य; मन मे आएब फोइ- खोलिकेँ बंजुल- एक लता बकुल- एक फूल, भालसरी बजर- वज्र बदरिकोर- बैरक गाछक जड़ि बदि- बूझिकेँ बन्धुक- मधुरी वयन- वचन, बोल वलय- कगना, माठा, औँठी बलाकिनी- बकक पाँती वलित- वेष्टित वल्लरि- लता वसन- वस्त्र, परिधान बहुवल्लभ- बहुत नारीसँ प्रेम कएनिहार बाए- वायु बात- हवा वाद- झगड़ा बादर- मेघ बानि- वाणी वारि- जल वासित- सुरभित विकच- विकसित, फुलाएल विगलित- खसल, नमड़ल बिछेद- वियोग बिजन- बीअनि, पंखा वितान- चनबा बिथार- विस्तार बिदग्ध- रसिक विधु- चन्द्रमा विधुन्तुद- राहु विपथ- कुमार्ग विपाक- कुफल विपिन- वन विलुलित- लटकल, डोलैत विलोकन- नजरि विशिख- बाण विषम- विकट, दुखद विहंग- पक्षी बिहि- विधाता बीजन- बीअनि, पंखा बीजुरि- बिजलोका बेणि- जूटी बेल- तट बेलि- बेर बेश- सिङार, प्रसाधन भंग- भंगिमा भनतँह- कहैत छथि भव- संसार भमइ- भ्रमण करैछ भाबिनि- कामिनी, भद्र महिलाक सम्बोधन भाल- ललाट भास- शोभा पाएब भीतपुतरि- भित्तिमे बनाओल मूर्ति भुज- बाँहि भुजंग- साप भुजमास- पाँज भूरि- बहुत भूषित- अलंकृत भोर- भ्रान्ति; सुधिहीन मंजुल- सुन्दर मगन- मग्न, डूबल मणि- बीचमे छेदबाला रत्न मणिमन्त्र- जड़ी-बूटी आ झाड़फूक मत- मत्त, आकुल मधु- वसन्त मधुकर- भ्रमर मधुप- भ्रमर मधुपुर- मथुरा मधुरिपु- कृष्ण, मधूसूदन मधुरिम- मधुर, मनोरम मनमथ- कामदेव; मनकेँ मथनिहार मनसिज- कामदेव मनोभव- कामदेव मन्थर- मन्द मन्दिर- घर, निवासगृह मरकत- एक रत्न मरजाद- सीमा मरम- हृदय, अन्तर्मन मराल- हंस मलयज- चन्दन मल्लि- बेली फूल मसृण- चिक्कन, कोमल महि- पृथ्वी महितल- धरती महिपंक- कादो मही- धरती माधवि- एक फूल मान- नारीक स्वाभिमान मानि- मान्य मानिनि- मानवती मारग- मार्ग, बाट मालति- एक फूल मिछहि- फुसिए मिहिरजा- यमुना मीन- माछ मुकुटमणि- श्रेष्ठ मुकुर- दर्पण मुकुलित- कोँढिआएल, संकुचित मुखर- अधिक बजनिहार मुदिर- मेघ मुगुधि- मोहित, अल्पमति मुन्दरी- मुद्रिका, औँठी मृगयति- जोहब मृदु- कोमल मेह- मेघ मोतिम- मोतिक बनल मौलि- शिखर, सिर रंग- केलिविलास रंगिनि- विलासिनी रजनीकर- चन्द्रमा रणित- झमझम ध्वनि रत- प्रेमासक्त रति- सम्भोग; कामदेवक स्त्री रव- शब्द रबाब- एक बाजा रभस- हठकेलि रसना- जीह; मेखला रसनारोचन- उत्कृष्ट रसक कारणेँ रुचिकर रसबति- रसिक (रमणी) रसायन- रसक भंडार; सुखद प्रभावबाला रसाल- रसयुक्त, रसिक राइ- राधिका राग- आसक्ति, प्रेम रातुल- लाल राव- ध्वनि राही- राधिका रितुपति- वसन्त रुचि- अनुराग रुचिर- प्रिय, आनन्ददायक रेणु- धूरा, गरदा रेह- रेखा रोचन- रुचिकर, प्रिय रोमाबलि- नारीक नाभिलगक रोइआँ रोष- तामस ललित- सुन्दर लाज- लाबा; लज्जा, संकोच लाबनि- लावण्य लालस- लालच लोभ लोचन- आँखि लोल- चंचल संकेत- इशारा, इंगित संघात- ढेर संघाति- मेल संवरु- समेटक सचकित- विस्मित सजल- नोराएल, भीजल सति- सत्य सन्धान- निशाना सफरी- पोठी माछ समागम- संगम समाधि- ध्यान लगाएब समीर- वायु सयान- सज्ञान- बुधिआर सरबस- सर्वस्व सरम- श्रान्ति सरसिज- कमल सरूप- सत्य सरोरुह- कमल ससधर- चन्द्रमा साखि- साक्षी, प्रत्यक्षद्रष्टा साति- शास्ति, सजाए, कुपरिणाम साद- शब्द, साध, मनोरथ साध- मनोरथ, कामन सामर- शामल, श्यामवर्ण सारि- मएना सारी- मएना शिखंड- मयूरक पाँखि शिखंडक- मयूरक पाँखि शिखिचचन्द्रक- मयूरक पाँखि सिरिस- सिरीष वृक्ष सिसिर- शिशिर ऋतु सुधाकर- चन्द्रमा सुधीर- स्थिर, गम्भीर सुरतरु- पारिजात वृक्ष सुरपति- इन्द्र सीकर- फुहार, जलकण शेखर- शीर्ष स्थान सेल- शल्य, आन्तरिक वेदना सोहन- शोभन, सुरूप सोहागि- सौभाग्य स्रवन- कान श्रमजल- धाम श्रील- श्रीयुत श्रुति- कान हरि- सिंह, कृष्ण हाम- हम हिअ- हृदय, उर हिमकर- चन्द्रमा हुतास- अग्नि हेम- सोन हेमन्त- पाँचम ऋतु, अगहन-पूस बद्रीनाथ झा शब्दावली मिलिन- मधुमक्खी, भौरा रसाल- आमक गाछ, कुसियार अतन्द्र- सावधान, जागरूक खद्योत- भगजोगनी दुर्वार- कठिन यति- प्रतिबंध, जतेक बेर अचलसेतु- अदृष्टलेख विपिन- जंगल तरणि- नाओ अवाम- दहिन गरुड़केतु- विष्णु बौड़ि- उन्मत्त तुषार- शीतल ब्रह्मर्षिसुत- कश्यप वारुणी- पश्चिम दिशा कश्यप- मुनि ओ मद्यप प्रतीची- पश्चिम दिशा कुलाय- खोंता साँझ- समाधि वा समुच्चय जीव-अभिदान- नाम कमान- धनुष विधु- चन्द्रमा हय- थोड़ा नमि- नमस्कार नीराजन- प्रातःकालक आरती मानर- मृदङ काहल- वाद्यविशेष चतुविध- आङ्गिक, वाचिक, सात्विक, आहार्य उड़ुगण- तारा दैवज्ञ- ज्योतिषी पाटल- लाल पाटल- व्याप्त भेल अविद्या- अज्ञान अधित्यका- पर्वतक ऊपरक देश कुशण्डिका- वेदिसम्मार्जनादि मेधा- धारणावती बुद्धि सम्भार- सामग्री कज्जल- कारी (काजर) भूयसी- एक प्रकारक दक्षिणा दीठि- दृष्टि नृपदार- रानी परिचार- परिचर्या फुलहरा- कोढ़िलाक झाड़ राजीव- कमल मुदवारि- आनन्दक नोर तृष- तृष्णा पाञ्चजन्य- शङ्ख जगत्ताताक- विष्णु प्रत्यभिवादन- प्रतिप्रणाम जूटिका- शिखा गोए- नुकाए गुरु-सन्तोख- दक्षिणाद्रव्य अवसित- पूर्ण श्रुतिवेध- कर्णवेध प्रभाक- प्रतिभा गुरु-शुद्धि- बृहस्पतिक शुद्धि औड़ि- आग्रहविशेष शिविका- पालकी पूर्वाङ्ग-कृत्य- मातृकापूजादि अदम्भ- निश्छल वैजयन्त- इन्द्रक कोठा कौशेय वसन- पाटक वस्त्र भक्ष्य चतुर्विध- भक्ष्य-भात आदि भोज्य लाबाआदि, लेह्य चटनी आदि, चोस्य आमाअदि नीवार- ओइरी अनुताप- पश्चाताप बद्धकर- कृपण विमति- विरक्ति वैमत्य- मतभेद प्रसाद- प्रसन्नता अनुरोध- रोच आर्य- श्रेष्ठ जाचल- परीक्षित सुभगप्रक्रिय- सुयश सुव्यवहार अचलेश- भूपति बिहान- प्रभात पट्टपटसार- उत्तम पाटक वस्त्र विभूतिवत- ऐश्वर्य एकतान- एकाग्र वनी- वानप्रस्थ और्ध्वदैहिक- परलोकोपकारक श्राद्ध भोज-ओज- कृपणता चञ्चरीक- भ्रमर सोहल- शोभित भेल छान- कलङ्क अदक्षिण- प्रतिकूल इन्दीवर- नील कमल कीर- सूगा अकानल- सूगा अकानल- सुनल पोषक-द्वेषक- पोसनिहार (कौआक) द्वेषी श्मश्रु- दाढ़ी-मोछ शैवाल-लतिका- सेमारक लत्ती कुण्डलित- लपेटल कर्णिकार- कनैल ग्रीवा- गरदनि इन्द्रायुध- वज्र तमाल-साल- साँखु शम्पा- विद्युल्लता सहकार- आम वकुलमुकुल- भालसरीक कली पखान- पाथर दमनक- दोनाफूल अंसयुगल- दुहूस्कन्ध अश्मसार- लोह मणिबन्ध- पहुँचा अबलासव- विरोध दुहिण- ब्रह्मा जम्भरिपु- इन्द्र ऊरु- जाँघ आरत- विरोध नीरज- जलमे अनुत्पन्न, धुलि रहित, विरोध इलातनय- पुरुरवा सुरवैद्ययुगल- दुहू अश्विनीकुमार क्षितिहरिहम- पृथ्वीन्द्र परपुष्ट- कोयल, कोकिल, पसान्तरमे परिपुष्टा वैश्या मधुप- भ्रमर, मद्यप आतङ्करङ्क- निर्भय काव्यक- शुकक मधुभरि- बसन्तपर्यन्त सुरभिमग- कामधेनुक मार्ग अनीति- अतिवृष्ट्यादिरहित शिक्षालोक- प्रकाश तास्रव- उच्चध्वनि जनपद- अपन देश साभिनिवेश- आग्रहपूर्वक धारणा-ध्याण- अष्टाङ्गयोगक छठम ओ सातम अङ्ग प्रकृति- स्वभाव, प्रजा पीयूष-यूष- अमृतसार मार्तण्ड- सूर्य सत्वक- सत्वगुण सौम्य- बुधग्रह वाक्पति- बृहस्पति रवि-कल्प- सूर्य-सदृश याचना-परायण- याचक अभियोगी- अभियोग कएनिहार कैरवामोद- कुमुदक सौरभ, शत्रुक आनन्द अनुदार- स्त्रीसँ अनुगत पुत्रेष्टिक- पुत्रोत्पादक यज्ञ एकावली- मोतीक माला मत्सरिता- अन्यशुभद्वेष लालनसुहिता- लालने तृप्त वा अनुकूल परिणाह- वृद्धि प्रमत्त- असावधान वा उन्मत्त बालवशामे- नवीन हथिनी आविल- पङ्किल अर्धचन्द्र- चन्द्रक ओ गड़हत्था शिखिकलाप- मयूरक पिच्छ, विषम बलाहक- मेघ सरणी- आकाश जड़भाव- शैत्य वा जलत्व मेचक- नील द्विरद- हाथी धम्मिल्ल- केशपाश विलक्ष- लज्जित पथिक-चक्र- चक्रबाक ओ समुदाय काली- कारीरङ्ग तारा- आँखिक पुतड़ी काली- प्रथमा महाविद्या तारा- द्वितीया चतुश्रुति- श्रुतिवेद, पढ़निहार ब्रह्मा श्रुति- कान, सुनब विश्रुति- सिद्धि छीजक- नष्ट होएबाक कलकण्ठी- कोकिला तप्त-तपनीय- सोना, स्वर्ण चिवुक- दाढ़ी परिस्फुर- चञ्चल लेखा- गणना जूझल- लड़ल महायति- अतिविस्तीर्ण आहित- स्थापित स्तूप- माटिक ढेरी लिकुचक- बड़हड़क श्रीफल-मद- विल्वफलक गर्व गर्त- खत्ता कुलाल- कुम्हार नाभिभव- ब्रह्मा शारदा- अदृश्या सरस्वती नदी (अलखरूप शारदा) त्रिदिवस सारिणी- गङ्गा वली- उदररेखा (तीनिवली) बली- बलवान पाटच्चर- चोर केहरि- सिंह नितम्बक- पर्वतक मध्य भागक विधिओजक- प्रतापक कृष-नीच- नीचाँदिसिसँ क्रमहि पातर (जङ्घा-क्रम-कृष-नीच) वेत्र-दण्ड- सोनाक अधिकार दण्ड हंसक- नुपूर दश-शशधर- नखरूप-दशचन्द्रक लाजें बीतल- संकुचित भेल अनृत-दूषण-कृपाणी- मिथ्यादोषक छुरी जेकाँ नाशक कथाऽवशेष- अवशिष्ट वक्तव्य हर्ष-नृत्त- गात्रविक्षेप सभीक- भीत सागर-परिपन्थी- सागरक प्रतिस्पर्धा कएनिहार सम्पुटित- सङ्कुचित विगेय- निन्दनीय विजीहीर्षा- विहारक इच्छा दलतर- पातक नीचाँ अतिसुकवि- ऊह- सुकवि तर्कक अगोचर कुवलय-रम्भा-समान- पृथ्वी-मण्डलक रम्भा सदृश देवाङ्गनीय- देवाङ्गना-सम्बन्धी रास- मण्डलाकार नृत्य श्यामा- प्रियङ्गु व्यामोहक- सम्मोहक काल- यमराज सारग्ङ- हरिण कृतयुग- सत्ययुग रण-एकतान- युद्धमे सर्वदा विजय पओनिहार नृपति-पताकिनीक- राजसेनाक विकटप्रतीक- दारुणाकार पुण्डरीक- बाघ दिनेन्दु-दीन- दिनक चन्द्र सदृश मलिन सर्वसहाक- पृथ्वीक लीन- प्रलयमे प्राप्त विलीन- विलाएल गोए- राखि तदनुसार- पाछाँ विदग्धताक- रसिकताक गरुअ- पैघ भूरमाक- भूतल लक्ष्मीक शर्म- सुख दलितपांशु- निष्पाप वा निर्दोष भवितव्यवश्य- भाग्याधीन अननुरूप- प्रतिकूल प्रणिधानलीन- ध्यानमग्न द्विजदत्त- सिद्धब्राह्मणसँ देल दत्त-प्रदत्त- दत्तत्रेयसँ देल उदेष- अन्वेषण स्वरति- स्वविषयक प्रेम धैर्य-कदर्य- अधीर चरमदशाक- मृत्युक अवगाह- आलोड़न ओज- तेज यशस्य- यशोजनक अलेश- निश्छल विजिगीषा- विजयक इच्छा पुटपाक- दुइ सरबाक सम्पुटमे वस्तुकेँ मूनि पक हयग्रीव- राक्षस जेकरा विष्णु मारल अनन्त- अन्त-रहित व्यपाय- परिपूर्ण भङ्ग- पराजय सङ्गर- युद्ध तनु- कोमल आश्रित-दुर्ग- दुर्गोपासक दुर्ग- दैत्यसँ सेवित दुर्गम सर्वसहा- पृथ्वी, तितिक्षा, सभ सहनिहारि पृथ्वी मनु- मन्त्र शिव- कल्याणकारक कूर्च- ह्रीँ शिखिजाया- स्वाहा आखर- ह्रीँ गौरि! रुद्रदयिते! योगेश्वरी। हूँ फट स्वाहा अन्वर्थाख्य- यथार्थनामा सिद्धि- सिद्धिकेँ प्राप्त, सम्पन्न ब्राह्मण-भोज-पञ्चाङ्ग पुरश्चरण (तर्पण मार्जन ब्राह्मण भोज नृसोम) वैन्य- राजा पृथु फलक- ढाल शिशुमार- सोँस धन-शाद- पाँक क्षेपणी- करुआर पटमण्डप- तम्बू यादस्स्वन- जलजन्तुक शब्द पूत- पवित्र द्विरदकाँ- हाथीकेँ दानजल- मदजल मन-अवसाद- दुःख भव्य- शुभ, सुन्दर आयुधराजि- चञ्चला, विद्युत चैत्य- प्रसिद्ध गृह दुर्ग- किला सुचतुष्पश- चौबट्टी अहम्पूविका- हम पहिने तँ हम पहिने एहि स्पर्धासँ दौगब पवि- वज्र अर्थ- प्रयोजन प्रभूत- बहुत लाघव- शीघ्रता दनुज-तनुज- शरीरमे उत्पन्न अर्भ- नेना सुरसरणी- आकाश शारिका- मएना मेकल- नर्मदा नदीक उत्पादक पर्वत परिपाटी- परम्परा उत्कोच- घूस वितान- विस्तार प्रकोष्ठ- पहुँचा अङ्गुरीय- अङ्गुठी केतन- ध्वजा निर्मम- ममताहीन उदिखर- उदित दीधिति- चन्द्रकिरण दक्षिण- अनेकमे समानानुरागी ओ दहिन मत्सरी- द्वेषी विनिपातोन्मुख- अवनति दिस प्रवृत्त मधु-सञ्जेँ- नामसँ नृपदारक- राजकन्या प्रमोद-निबन्धन- कारण वन्दी- कैदी पुरुषार्थ चतुष्ट्य- धर्म, धन, काम ओ मोक्ष दीधिति-माली- सूर्य नरनाथ- परिकर औरस-सुत- अपनासँ धर्मपत्नीमे उत्पन्न पुत्र चक्रधर- नारायण ईषत्कर- सुकर कुलिशायुधसँ- इन्द्रसँ प्रमा-सालित- यथार्थज्ञानसँ स्फीत उक्ति-प्रगल्भ- बजबामे प्रौढ़ शमन- यमराज विधेय- कर्तव्य दुर्विपाक- अधलाह फल सङ्कल्प-कल्पना- मानस कर्मक रचना स्तम्भित- जड़ीभूत सकल-करण-परिवारक- इन्द्रिय वर्गक भव-झरिणी- संसार नदी शशिकान्त- चन्द्रकान्त मणि रजनिकर- रुचिएँ- कान्तिएँ निष्कपट- रुचिएँ-प्रीतिएँ द्रुत- शीघ्र विद्रुत- पघिलल मानसिक- व्यतिक्रमहुक-मानस-व्यभिचारहुक उन्मिषित- बढ़ल प्रकृतिस्थ- चैतन्य-युक्त कालासुर- कालकेतु राक्षस अमान- अपरिमित अमानव- अलौकिक कुरङ्गित- हरिण जेकाँ उछलैत विक्रम- विलक्षण वा विगत छैक क्रम जाहिमे पञ्चानन- सिंह आरभटी- आडम्बरपूर्ण चेष्टा दुरभिसन्धि- दुराशय कान्दिशीक- भयसँ पढ़ैनिहार अनाथ- विधवा धृष्ट- प्रौढ़ निकृष्ट- नीच, छोट उपरोधन- धैरव अनारम्भ- आरम्भ नहि करब भानुमान- सूर्य कृकलाश- गिरगिट सन्नाह- युद्धक उद्योग मधु-मधुरिमार्ह- द्राक्षासदृश-मधुर सम मधुर, दाखसन सर्वज्ञम्मन्य- अपनाकेँ सर्वज्ञ माननिहार वीरमानी- अपनाकेँ वीर माननिहार नृशंस- क्रूर (वातक) अपलापपरा- लाथ करबामे तत्पर प्राथमिक- पहिलेबेरुक प्रकार- दिवारक अज- बत्तू कुरङ्ग- हरिण गवय- गो सदृश नीलगाय शार्दूल- बाघ साम्हर- हरिणसन जन्तु भूतनाथ- महादेव प्रमथराजि- गणसमूह शृङ्गी- शृङ्गवाला जटी- जटाधारी वारणरद- हाथीकसन दाँतबाला पुच्छी- नाङ्गरि कृत्तिपटी- बाघक चाम पहिरनिहार चत्वर- चट्टान भीरुभीमा- भीरुक भयङ्कर पटल- पटि गेल जन्य- युद्ध राजन्य- क्षत्रिय भिन्दिपाल- ढेलमासु सन गुल्ली फेंकबाक अस्त्र तोमर- मन्थन दण्डसन अस्त्र कृपाण- तरुआरि परशु- फरुसा असि धेनु- खाँड़, छूड़ा भुशुण्डी- अग्निप्रधान अस्त्र परिध- हथौड़ी दनुजभुवन- पाताल जलद-छाया- मेघक छाहरि,तत्सदृश अस्थिर मृत्युशक्ति-उत्क्रान्तिदा- मृत्युकेँ ’उत्क्रान्तिदा’ नामक शक्ति छन्हि जाहिसँ जीवोत्क्रमण करैत छथि वृन्दारक-वृन्दक- देवसमूहक निजचमू- सेना पताल- अतल, वितल, सुतल,तलातल,महातल, रसातल,पाताल सन्देश- संवाद (समाद) त्रिदिवहुँ- स्वर्गहुँ प्रत्यूष- प्रातः काल दानव-भोगिनी- राजाक सामान्य स्त्री अभ्यास- योगाभ्यास क्लेश- अविद्या-स्मिता-राग-द्वेष ओ अभिनिवेश जनि- जन्म भोगभू- भोगस्थान वा भूमि भुजगभुवन- पाताल नाक- स्वर्ग सहस्रार- शिर स्थित सहस्रदल- कमलाकार चक्र निर्मन्तु- निरपराध (निर्दोष) फेरि- घुमाए फेरि- पुनि अन्तराय- विघ्न याचकपटलीकल्प- याचकसमूहजेकाँ रहस्योद्भेदसँ- गुप्तप्रीतिक प्रकाशसँ लोकपति- नरेश मध्यमलोक- मर्त्यभुवन अधोभुवन- पाताल नररिक्त- मनुष्यसँ रहित तूर्ण- शीघ्र उद्देश- उच्चारण उपेन्द्र- वामन भगवान् कन्याक- शुक्रक पुत्री देवयानीक अर्थना- याचना सपरिकर- परिवार परिजन सहित पुरुषसूक्त- “ओँ सहस्रशीर्षा” इत्यादि सोड़ह ऋचा दुइ- नारायण ओ तुर्वसु (निज दुइ बापक परिचय) प्रतिग्रह- दान लेब लाजहोम- लज्जाक हवन लाजहोममे- लावासँ हवनमे प्रणयकोपक- मानक अपसारण-गति- हटएबाक उपाय परमाणु- सूर्यक प्रभामे दृश्य रेणुक छठम भाग द्वयणुक- दू परमाणु पूगीफल- सुपारी व्यङ्गयवचन- व्यङ्ग्यार्थ-बोधक वचन दिवसचतुष्टय- चारि गानचातुरी-विवरण- प्रकाशन कान-सुधारस-वितरण- दान चारिमशुचि- चारुतासँ भूषित पाँकल- पाँकमे लागल निमीलित- सङ्कुचित कीलित- बद्ध (पीड़ित) मदन-रुजा- रोग निर्वांप- शान्ति करब समाजित- पूजित उद्भेद- विकास चलदल- पीपड़ मन्मथ-घर्षण- प्रगल्भता कल्पकल्प- कल्पसदृश आशा-दिशा विदग्ध- विकल, रसिक सुरतवितान- क्रीड़ा-कलाप वितानल- विस्तीर्ण कएल संभोग- शृंगारक पूर्वाङ्ग वा केलि विप्रलम्भ- शृङ्गारक उत्तराङ्ग वा विरह अवसित- समाप्त विधुर- विरहित (दीपक-विधु-विधुर) अनवम- निर्दोष विरस- निःस्पृह (विमुख) पञ्चयज्ञ-ब्रह्मयज्ञ(वेद अध्ययन-अध्यापन),पितृयज्ञ (पितरक तर्पण ओ नित्यश्राद्ध),देवयज्ञ(हवन),भूतयज्ञ(वैश्वदेववलि), नृपज्ञ (अतिथि-सत्कार) पर्व- पाबनि आन्तरिक- अन्तःकरण मञ्जूषा- पेटी भूमिनेता- पृथ्वीपति जरती- बृद्धा वैजयन्त- इन्द्राणीसँ भूषित इन्द्रप्रासादक पति-परिचार- स्वामीक सेवा मन्त्र- विचार कान्त- प्रिय श्लाधापरायण- प्रशंसामे तत्पर धव- धावा मधुपा- मद्यपायिनी भूरि- बहुत सर्वसहासमेत- सभ (दुःखकेँ) सहनिहारि पृथ्वी सहित कासर- महिसा हिण्डोर- मचकी शैलूष-कुहना- नटक माया मैथिलीक मानक लेखन-शैली 1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- 1. ग्राह्य अग्राह्य एखन अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठाम ठिमा,ठिना,ठमा जकर,तकर जेकर, तेकर तनिकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) अछि ऐछ, अहि, ए। 2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय: 2.भ गेल, भय गेल वा भए गेल। 2.जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। 2.कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। 2. 3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। 3. 4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। 4. 5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: 5.जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। 5. 6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। 6. 7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। 7. 8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। 8. 9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। 9. 10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- 10.हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। 10.’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। 10. 11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। 11. 12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। 12. 13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय(अपवाद-संसार सन्सार नहि), किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। 13. 14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। 14. 15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। 15. 16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि।यथा- हिँ केर बदला हिं। 17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। 17. 18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। 18. 19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। 20. ग्राह्य अग्राह्य 1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला 1.होयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 2. 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ 3.ल’/लऽ/लय/लए 3. 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 4. 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 5. 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 6. 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 7. 8. बला वला 8. 9. आङ्ल आंग्ल 9. 10. प्रायः प्रायह 10. 11. दुःख दुख 11. 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 12. 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 13. 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 14. 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 15. 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 17. 18. बढ़न्हि बढन्हि 18. 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 19. 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 23. 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 24. 25. तखन तँ तखनतँ 25. 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 26. 27. निकलय/निकलए लागल 27. बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 27. 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 28. 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 29. 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 31. 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 33. 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 34. 35. सासु-ससुर सास-ससुर 35. 36. छह/सात छ/छः/सात 36. 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 37. 38. जबाब जवाब 38. 39. करएताह/करयताह करेताह 39. 40. दलान दिशि दलान दिश 40. 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 41. 42. किछु आर किछु और 42. 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 43. 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 44. 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 45. 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 47. 48. एखन/अखने अखन/एखने 48. 49. अहींकेँ अहीँकेँ 49. 50. गहींर गहीँर 50. 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 51. 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 52. 53. तहिना तेहिना 53. 54. एकर अकर 54. 55. बहिनउ बहनोइ 55. 56. बहिन बहिनि 56. 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 57. 58. नहि/नै 58. 59. करबा’/करबाय/करबाए 59. 60. त’/त ऽ तय/तए 60. 61. भाय भै 61. 62. भाँय 63. यावत जावत 63. 64. माय मै 64. 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 65. 66. द’/द ऽ/दए तका’ कए तकाय तकाए पैरे (on foot) पएरे ताहुमे ताहूमे पुत्रीक बजा कय/ कए बननाय कोला दिनुका दिनका ततहिसँ गरबओलन्हि गरबेलन्हि बालु बालू चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) जे जे’ से/ के से’/के’ एखुनका अखनुका भुमिहार भूमिहार सुगर सूगर झठहाक झटहाक छूबि करइयो/ओ करैयो पुबारि पुबाइ झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि पएरे-पएरे पैरे-पैरे खेलएबाक खेलेबाक खेलाएबाक लगा’ होए- हो बुझल बूझल बूझल (संबोधन अर्थमे) यैह यएह तातिल अयनाय- अयनाइ निन्न- निन्द बिनु बिन जाए जाइ जाइ(in different sense)-last word of sentence छत पर आबि जाइ ने खेलाए (play) –खेलाइ शिकाइत- शिकायत ढप- ढ़प पढ़- पढ कनिए/ कनिये कनिञे राकस- राकश होए/ होय होइ अउरदा- औरदा बुझेलन्हि (different meaning- got understand) बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) चलि- चल खधाइ- खधाय मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह कैक- कएक- कइएक लग ल’ग जरेनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ होइत गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि चिखैत- (to test)चिखइत करइयो(willing to do) करैयो जेकरा- जकरा तकरा- तेकरा बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ हारिक (उच्चारण हाइरक) ओजन वजन आधे भाग/ आध-भागे पिचा’/ पिचाय/पिचाए नञ/ ने बच्चा नञ (ने) पिचा जाय तखन ने (नञ) कहैत अछि। कतेक गोटे/ कताक गोटे कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई लग ल’ग खेलाइ (for playing) छथिन्ह छथिन होइत होइ क्यो कियो केश (hair) केस (court-case) बननाइ/ बननाय/ बननाए जरेनाइ कुरसी कुर्सी चरचा चर्चा कर्म करम डुबाबय/ डुमाबय एखुनका/ अखुनका लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ कएलक केलक गरमी गर्मी बरदी वर्दी सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ एनाइ-गेनाइ तेनाने घेरलन्हि नञ डरो ड’रो कतहु- कहीं उमरिगर- उमरगर भरिगर धोल/धोअल धोएल गप/गप्प के के’ दरबज्जा/ दरबजा ठाम धरि तक घूरि लौटि थोरबेक बड्ड तोँ/ तूँ तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) तोँही/तोँहि करबाइए करबाइये एकेटा करितथि करतथि पहुँचि पहुँच राखलन्हि रखलन्हि लगलन्हि लागलन्हि सुनि (उच्चारण सुइन) अछि (उच्चारण अइछ) एलथि गेलथि बितओने बितेने करबओलन्हि/ करेलखिन्ह करएलन्हि आकि कि पहुँचि पहुँच जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) से से’ हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) फेल फैल फइल(spacious) फैल होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय फेका फेंका देखाए देखा’ देखाय देखा’ सत्तरि सत्तर साहेब साहब VIDEHA FOR NON RESIDENTS 1.VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT 2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti.- poem by Jyoti. YEAR 2008-09 FESTIVALS OF MITHILAमिथिलाक पाबनि-तिहार Year 2008 ashunyashayan vrat- 19 july अशून्यशयन व्रत mauna panchmi- 23 july मौना पंचमी madhusravani vrat samapt 4 august मधुश्रावनी व्रत समाप्त nag panchmi 6 august नाग पंचमी raksha bandhan/ sravani poornima 16 august रक्षा बन्धन श्रावनी पूर्णिमा kajli tritiya 19 august कजली त्रितीया sri krishna janmashtami- 23 august श्रीकृष्ण जन्माष्टमी srikrishnashtami 24 august श्रीकृष्णाष्टमी kushotpatan/ kushi amavasya 30 august कुशोत्पाटन / कुशी अमावस्या haritalika vrat 2 september हरितालिका व्रत chauth chandra 3 september चौठ चन्द्र Rishi panchmi 4 september ऋषि पंचमी karma dharma ekadasi vrat 11 september कर्मा धर्मा एकादशी व्रत indrapooja arambh 12 september इन्द्रपूजा आरम्भ anant pooja 14 september अनंत पूजा agastya ardhdanam 15 september अगस्त्य अर्धदानम pitripaksh aarambh 16 september पितृपक्ष आरम्भ vishvakarma pooja 17 september विश्वकर्मा पूजा indr visarjan 18 september इन्द्र विसर्जन srijimootvahan vrat 22 september श्री जीमूतवाहन व्रत matrinavmi 23 september मातृनवमी somaavatee amavasya 29 september सोमावती अमावस्या kalashsthaapana 30 september कलशस्थापन vilvabhimantra/ belnauti 5 october विल्वाभिमंत्र/ बेलनौति patrika pravesh 6 october पत्रिका प्रवेश mahashtami 7 october महाष्टमी mahanavmi 8 october महानवमी vijayadasmi 9 october विजयादशमी kojagra 14 october कोजगरा dhanteras 26 october धनतेरस deepavali- diyabati-shyamapooj a 28 october दीयाबाती/ श्यामापूजा/ दीयाबाती annakuta-govardhan pooja 29 october अन्नकूट गोवर्धन पूजा bratridvitiya/ chitragupt pooja 30 october भ्रातृद्वितीया khashthi kharna 3 november षष्ठी खरना chhathi sayankalika arghya 4 navamber छठि सायंकालिक अर्घ्य samaa pooja arambh- chhathi vratak parana 5 november सामा पूजा आरम्भ/ छठि व्रतक पारना akshaya navmi 7 november अक्षय नवमी devotthan ekadasi 9 november देवोत्थान एकादशी vidyapati smriti parv11 november विद्यापति स्मृति पर्व कार्तिक धवल त्रयोदशी kaartik poornima 13 november कार्तिक पूर्णिमा shanmasik ravi vratarambh 30 november षाणमासिक रवि व्रतारम्भ navan parvan 4 dec. नवान पार्वन vivah panchmi 2 december विवाह पंचमी Year 2009 makar sankranti 14 january मकर संक्रांति narak nivaran chaturdasi 24 january नरक निवारण चतुर्दशी mauni amavasya 26 january मौनी अमावस्या sarasvati pooja 31 january सरस्वती पूजा achla saptmi- 2 february अचला सप्तमी mahashivratri vrat 23 february महाशिवरात्रि व्रत janakpur parikrama 26 february जनकपुर परिक्रमा holika dahan 10 march होलिका दहन holi/ saptadora11 march होली सप्ताडोरा varuni yog 24 march वारुणि योग vasant/ navratrarambh 27 march वसंत नवरात्रारम्भ basant sooryashashthi/ chhathi vrat 1 april बसंत सूर्यषष्ठी/ छठि व्रत ramnavmi 3 april रामनवमी mesh sankranti 14 april मेष संक्रांति jurisital 15 april जूड़िशीतल akshya tritiya 27 april अक्षय तृतिया shanmasik ravivrat samapt 3 may षणमासिक रविव्रत समाप्त janki navmi 3 may vatsavitri 24 may जानकी नवमी gangadashhara 2 june गंगादशहरा somavati amavasya 22 june सोमवती अमावस्या jagannath rath yatra 24 june जगन्नाथ रथयात्रा saurath sabha arambh 24 june सौराठ सभा आरम्भ saurath sabha samapti 2 july सौराठ सभा समाप्ति harishayan ekadashi 3 july हरिशयन एकादशी aashadhi guru poornima 7 july आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा VIDEHA MITHILA TIRBHUKTI TIRHUT--- Hussin Shah won Tirhut in A.D. 1466. At Sambhal he arrested Tatar Khan Lodi and sent him to Saran in Tirhut. Saran was a Sirkar of Tirhut. Contribution of Oinivara Dynasty During Oinivara Dynasty there was development of Sanskrit learning notable among the scholara being Jagaddhara, Vidyapati and Vardhamana. Sivasimha and Lakhima, Padmasimha and queen Visvasa Devi, Chandrasimha and his wife were friendly with eminent men of letters. Between 1527 A.D. to 1557 A.D., when the New Dynasty was established by Maharaja Mahesia Thakura centre shifted to Nepal. One Kayastha Majumdar ruled for a year A• D. 1544 there was no ruler till A D. 1557. During Akbar the fort of Hajipur fell and later Bihar was lost to the rebel Daud Khan. Tirhut was included in the Subah of Bihar. Mahesa Thakura (c. 1557-71 A.D.), Akbar set up a native Hindu family as the ruler of Mithila, he wrote a history of Akbar's reign in Sanskrit. Governor of Bihar, Hajipur and Bengal in those days was Man Singh It has been pointed out that the actual man to please the Emperor and got the sailed for Mithila Raj was Raghunandana Raya. His regin started on Ramanavnmi Sake 1478, March 1557 A. D. Chanda Jha writes in the Introductory portion of his Ramayana that Mahesa Thakura ascended the throne in Sake 1478 i.e. 1557 A. D. whereas Mahavaiyakarana Harshanatha Jha has written in his Samakara Dipika 1479 Sake i.e. 1556 A.D. for the same. Mahesa Thakura established himself at Bhaura. Mahesa Thakura had six wives. He was author of Darpana- A commentary on Jayadeva's commentary called 'Aloka' on Gangesha's celebrated work Tattvachinramani, wrote Aticharanirnaya. Started the Dhautapariksha. Gopala Thakura (1571-84 A.D.)- While Maharaja Mahesa Thakura was alive, Gopala Thakura, his second son, assumed the charge of the administration, however, abdicated later on, in favour of his youngest brother. In 1585 Raja Todarmal fixed the annual revenue receipt of Tirhut after measurement at Rs. 11,63,020/-per annum Rajarshi Paramananda Thakura the younger son of Mahesa Thakura a great poet encouraged Sanskrit learning, Anandavijaya of Ramadasa and Ragatarangini by Lochana was writeen under his patronage. Shubhankar Thakur wrote Hastamuktavali, a work on Nritya ,changed the capital of the kingdom from Bhairva to Bhaura. Purushottama Thakura (1619-1626 A.D.) suppressed rebellious chiefs of Sugauna. He ruled only for six years because he was treachorously murdered by Mirza. , the Imperial Revenue Collector. Narayana Thakura (1625-1644 A.D ). Raja Sundara Thakura alias Pritinatha Thakura, was a patron of art and letters patronised one poet namely, Ramadasa Jha and encouraged the traditions set up by his father. Mahinatha ,Thakura (1670/1-1692/3 A.D.) faught in a battle with Raja Gajasimha of Sugama ,suppression of a revolt in Moranga by his brother Narapati Thakura. Mahinatha himself composed a prayer to goddess Kali in Maithili. Narapati Thakura (1692-1704 A. D.)’s wife Urvasi Thakura constructed a temple of Saiva. Raghavasithha (1704-1740 A. D.) received the Khillat and other honours from the Emperor through Subehdar Mahabat Jang and extended favour to his departed father by undertaking a journey to JagannathaPuri and by utilzing the opportunity to visit the Nawab of Bengal. Alivardi Khan, at Murshidabad, obtained the then proud title of Raja surname of Simha for himself. The Bhaura-garhi was turned into an impregnable garrison and the contemporary poet Gopala Kavi eulogises the prowess of the fort of Bhaura in enthusiatic terms ; its invulnerable character, its four gates, its heights, its temples, its brave warriors and its excellent management. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. The Dawn Of One Summer Day Before the birds start chirping And people will begin rushing Moments for merely breathing Not far away from the morning Tranquilized time of dawn of the day Diligently waiting for the first sun ray The sky is yet black and dark grey Will be brightened without delay Stars have not gone out of sight Moon is shining still very bright But it is not the time of night The most halcyon time to indite Cold wind defeating the summer The dew point is ready to occur Traffic of the city is at its leisure Usualy crowded, when day’s sizzler SahasraBarhani:The Comet To solve the problem of irrigation Nand installed water boring system. But that was unsuccessful. After digging up to a depth he found that the land he selected for that didn’t have enough water. Due to failure in finding right layer the installation of boring was not completed and the pipes were left there drying. Children started calling that field “boring bala khet” that means a field having boring. Afterwards the Government declared to arrange boring system. When people came to know through Nand’s brother that this boring system would be arranged in those fields having sufficient water instead of fields those need that then they sent their representatives to the Chief Minister with an application. Then the problem was solved. A seven feet tall English man arrived with peculiar machines and finished the installation within two days. But later on someone said that the white man was an American not British. Every white person didn’t need to be British. The dams were constructed in Kamala and Balan rivers. Everything was going very smoothly for next some days but after that sand was filled in dams. The boundary walls were reconstructed higher but that was in vain. The sand level rose up to the bridge of Jhanjharpur. A little flow of water in the river was enough to cross the line of danger and overflow to submerged the path, fields, and ponds. The useless fields of highlands became fertile and the most fertile fields of the low land became useless. The sandy fields between two boundaries of dams had to be sowed twice for a single harvest. People started growing parwals (pointed gourds) and sweet potatoes in sandy grounds. The surrounding area of the Dakahi pond was used to grow rice in informal manner without proper sowing process as that was expensive. The old fertile fields were filled with water. The village of Bhoraha was in very low land between Kothia and Mehath. Perhaps it was a diverted stream of Koshi. The fact stated above may seem incredulous considering present geographical position of the river Koshi. The bank of the Bhoraha stream had witnessed the fight between villagers of Kothia and Mehath. The story of one old man from the Bhomihar community of west side- people used to tie him with pillar of the house but he used to come out of that to fight with the people of neighbour village. He used to have an axe tied with long bamboo stick for this purpose. Around 60 kilos of churi were broken in that fight. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION ENGLISH SAMSKRIT MAITHILI Etiquettes शिष्टाचारः शिष्टाचार Hello हरिः ओम् के बजैत छी/ की समाचार Good morning, Good afternoon/ Good Evening सुप्रभातम्/ नमस्ते/ नमस्कारः सुप्रभात्/ नमस्कार Good night शुभरात्रिः शुभरात्रि Thank you धन्यवादः धन्यवाद Welcome स्वागतम् स्वागत अछि Excuse/ pardon me क्षम्यताम् क्षमा करब Don’t worry चिन्ता मास्तु चिन्ता नहि करू Please कृपया कृपया कनी Let us meet again पुनः मिलामः फेर भेंट हएत All right/ Okay अस्तु ठीक Sir/ Madam (while addressing only) श्रीमन् श्र्रीमान् Sir/ Madam (while addressing only) आर्ये/ महोदये श्रीमन्/ महोदया Very Good साधु-साधु/ समीचीनम् बड्ड नीक INTRODUCTION परिचयः परिचय What is your name? (masc.) भवतः नाम किम्? अहाँक नाम की छी? What is your name?(fem.) भवत्याः नाम किम्? अहाँक नाम की छी? My name is… मम नाम... हमर नाम.. This is my friend… एषः मम मित्रं.. ई हमर मित्र.. What do you do? भवान् किं करोति? अहाँ की करैत छी? I am a teacher.(m) अहम् अध्यापकः अस्मि।(पु.) हम अध्यापक छी। This is my friend. एषा मम सखी..। ई हमर सखी..। What do you do? भवती किं करोति?(स्त्री.) अहाँ की करैत छी। I am a student.(f) अहं विद्यार्थिनी अस्मि।(स्त्री.) हम विद्यार्थी छी। Where do you work? भवान्/ भवती कुत्र कार्यं करोति? अहाँ कत्तऽ काज करैत छी? I work in a factory. अहं यन्त्रागारे कार्यं करोमि। हम फैक्टरीमे काज करैत छी। In which class do you study? भवान्/ भवती कस्यां कक्ष्यायां पठति? अहाँ कोन कक्षामे पढ़ैत छी? I am studying in I/II/III year of graduation. अहं स्नातक प्रथम/ द्वितीय/ तृतीय वर्षे पठामि। हम स्नातक पहिल/ दोसर/ तेसर वर्षमे पढ़ैत छी। What do you study? भवान्/ भवती किं पठति? अहाँ कोन विषय पढ़ैत छी? I study science/ commerce/ arts. अहं विज्ञानं/ वाणिज्यं/ कलां पठामि। हम विज्ञान/ वाणिज्य/ कला पढ़ैत छी। Where is your house? भवतः/ भवत्याः गृहं कुत्र अस्ति? अहाँक घर कतए अछि? My house is also in Jayanagar. मम गृहमपि जयनगरे अस्ति। हमर घर जयनगरमे अछि। Where in Jayanagara? जयनगरे कुत्र? जयनगरमे कतए? In the lane beside the court-building. न्यायालयभवनस्य पार्श्वे या वीथी अस्ति तस्याम्। न्यायालय भवनक बगलमे जे गली अछि ओत्तय। Come to my house sometime. आगच्छतु कदापि मम गृहम्। कखनो हमर घर आऊ। Yes, I’ll certainly come. आम्, अवश्यम् आगमिष्यामि। हँ, अवश्य आएब। How are you? कथम् अस्ति भवान्/ भवती? केहन छी अहाँ? I am fine. अहं कुशली/ कुशलिनी अस्मि। हम कुशल छी। How are you? कुशलं किम्? की समाचार? Yes, I am fine. आम्, कुशलम्। हँ, सभ नीक। Is everyone fine at home? गृहे सर्वे कुशलिनः किम्? घरपर सभ ठीक छथि ने? Yes, all are fine. आम्, सर्वे कुशलिनः। हँ, सभ ठीक छथि। What news? कः विशेषः/ का वार्ता/ कोऽपि विशेषः? कोनो नव समाचार? You only tell. भवान् एव वदतु। अहीँ बाजू। Where are you coming from? भवान्/ भवती कुतः आगच्छति? अहाँ कत्तऽ सँ आबि रहल छी? I am coming from school. अहं शालातः आगच्छामि। हम स्कूलसँ आबि रहल छी। Where are you going? भवान्/ भवती कुत्र गच्छति? अहाँ कत्तऽ जाऽ रहल छी? I am going to office. अहं कार्यालयं गच्छामि। हम ऑफिस जाऽ रहल छी। I’ve heard about you. भवतः/ भवत्याः विषये श्रुतवान् आसम्। हम अहाँक विषयमे सुनने छी। Happy to meet you. मेलनेन बहु सन्तोषः। अहाँसँ भेँटसँ बड्ड संतोष भेल। I’ve seen you somewhere. भवन्तं/ भवतीं कुत्राऽपि दृष्टवान्। हम अहाँकेँ कतहु देखने छी। Did you come from Samskrit conversation class? भवान्/ भवती संस्कृतशिबिरम् आगतवान्/ आगतवती किम्? अहाँ संस्कृतशिविरसँ आएल छी की? Then where did I see you? तर्हि कुत्र दृष्टवान्? तखन हम अहाँकेँ कतए देखने छी? Yes, then I saw you there only. आम्, तर्हि तत्रैव दृष्टवान्। हँ, तखन हम अहाँकेँ ओत्तहि देखलहुँ। संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) (आगाँ) -गजेन्द्र ठाकुर सुभाषितम् अकृत्वा परसन्तापम् अगत्वा खलनमताम्। अनुत्सृज्य सतां वर्त्म यत् स्वल्पमपि तद् बहु॥ इदानीम यत् सुभाषितं श्रुतवन्तः तस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। जीवने सज्जनैः कथं व्यवहारतव्यम् इति एतस्मिन् सुभाषिते उक्तम् अस्ति। यदि एतत् सर्वम् अपि अकृत्वा जीवने अत्यधिकं संपादयति चेदपि तस्य मूल्यमेव न भवति। एका पत्रिका/ सञ्चिका/ दूरवाणी/ कर्त्तरी/ अङ्कणी एकटा पत्रिका/ संचिका/ टेलीफोन/ कैंची/ पेन्सिल एकम् पुस्तकम्/ कारयानम् अस्ति। एकटा पुस्तक/ कार अछि। एकः दंतकूर्चः/ सुधाखण्डः/ दण्डः/ चमषः/ ग्रंथः/ बालकः/ युवकः/ दण्डदीपः/ विडालः/ दर्पणः/ लेखनी/ मापिनी/ बालिका/ कूपी/ उपनेत्रम् एकटा दातमनि/ चॉक/ डंटा/ चम्मच/ ग्रन्थ/ बालक/ युवक/ ट्यूबलाइट/ बिलाड़/ अएना/ कलम/ स्केल/ बालिका/ पात्र/ चश्मा इदानीम वयं पूर्वतन पाठस्य पुनःस्मरणम् कुर्मः। एकवचन- आसीत् बहुवचन- आसन् एक.व.- छलए-हँ बहु.व.- छलए-हँ अहम् एकवचने वदामि भवन्तः बहुवचने परिवर्तनं कुर्वन्तु। बालकः विद्यालये आसीत्। बालक विद्यालयमे छलए। बालकाः विद्यालये आसन्। बालक सभ विद्यालयमे छलाह। कर्मकरः वाटिकायाम् आसीत्। जोन वाटिकामे छलाह। कर्मकराः वाटिकायाम् आसीत्। जोनसभ वाटिकामे छलाह। गृहिणी मन्दिरे आसीत्। गृहिणी मन्दिरमे छलीह। गृहण्यः मन्दिरे आसन्। गृहिणीसभ मन्दिरमे छलीह। बालिका क्रीडाङ्गणे आसीत्। बचिया खेलक मैदानमे छलि। बालिकाः क्रीडाङ्गणे आसन्। बचियासभ खेलक मैदानमे छलीह। महिला गृहे आसीत्। महिला घरमे छलथि। महिलाः गृहे आसन्। महिलासभ घरमे रहथि। फलम् वृक्षे आसीत्। फल गाछपर छल-ए। फलानि वृक्षे आसन्। फलसभ गाछपर छल-ए। मीनः नद्याम् आसीत्। माछ धारमे छल-ए। मीनाः नद्याम् आसन्। माछसभ धारमे छल। कर्मकरी मार्गे आसीत्। बोनिहारि रस्तामे छलि। कर्मकरयः मार्गे आसन्। बोनिहारिसभ् रस्तामे छलीह। अहं मन्दिरे/ नगरे/ गृहे/ मार्गे/ आसम्। हम मन्दिरमे/ नगरमे/ घरमे/ रस्तामे छलहुँ। वयं मन्दिरे/ नगरे/ गृहे/ मार्गे/ आस्म। हमसभ मन्दिरमे/ नगरमे/ घरमे/ रस्तामे छलहुँ। पुनः एकवचने अहं वदामि, बहुवचनं परिवर्तनं कुर्वन्तु। अहं सुधाखण्डेन लिखामि। दण्डेन् अहं न ताडयामि। चषकेन् जलं पिबति। चमषेण शर्कराम् खादति। हस्तेन स्पर्शं करोमि। अहं कङ्कतेन् केश प्रसाधनं करोमि। अहं करवस्त्रेण मार्जनं करोमि। बालाः कन्दुकेन् क्रीडन्ति। उपनेत्रेण पश्यामि। अहं छुरिकया फलं कर्तयामि। वयं मापिकया मापनं कुर्मः। अहं कुञ्चिकया तालम् उद्घाटयामि। मालया अलंकारः कुर्मः। अहं कर्तर्या कर्तयामि। अङ्कण्या चित्रं लिखामः। दर्व्या परिवेशनं करोति। लेखन्या लिखामः। मार्जन्या मार्जयामः। द्रोण्या जलं नयामः। कृष्णः- कृष्णेन चमषेण लेखकः- लेखकेन् स्यूतेन चषकेण फलेन् पाठेन् पुस्तकेन् कलशेन् रमा रमया दंतकूर्चेन राधया सीतया मापिकया संचिकया पत्रिकया छुरिकया पार्वत्या मालया भगिन्या द्रोण्या अङ्कन्या लेखन्या घट्या कूप्या गदया वयम् इदानीम् एतेषां शब्दानाम् उपयोगं कृत्वा वाक्यं रचयामः। बालिका द्विचक्रिकया विद्यालयं गच्छति। बचिया साइकिलसँ स्कूल जाइत अछि। सचिवाः विमानेन विदेशं गच्छन्ति। सचिवसभ हवाई जहाजसँ विदेश जाइत छथि। नौकया कूर्चेण स्यूतेन कुञ्चिकया लेखन्या लोकयानेन विमानेन दण्डेन तुलया तोलयामि व्याधः बाणः शौचिकः कर्तरी शिक्षकः सुधाखण्डः माता वेल्लनी लोहकारः मुद्गरः अर्चकः माला सैनकः गदा सुरेशः कुञ्चिका वर्णकारः कूर्चः जना वाहनः सर्वः जिह्वा सम्भाषणं अभ्यासः -भो इन्द्राक्षी। आगच्छतु। उपविशतु। सर्वं कुशलं किम्? -सर्वं कुशलं। किं करोति भवति। -अहं पाकं करोमि। -कः विशेषः। -अद्या बान्धवाः आगच्छन्ति। अतः विशेषः पाकः। -एवं वा। -भवती किम् किम् करोति। -अहम् आलूकं व्यञ्जनं करोमि। कुशमाण्डेन क्वथिनं करोमि। -बहु मरीचिकाः सन्ति खलु। मरीचिकया किम् करोति भवती। -एषा महामरीचिका। एषा कटुः नास्ति। एतया भक्ष्म करोमि। -भवति रोटिकां न करोति वा। -करोमि। रोटिकया सह दालम् अपि करोमि। -किमपि मधुरम्। -करोमि। पायषम् करोमि। -पायसम वा। घृते पायसस्य रुचिः अधिका भवति। इदानीम् वदतु। अहं किम् सहाय्यं करोमि। -सहाय्यम् किमपि मास्तु भोः। मया सह सम्भाषणं करोतु। पर्याप्तम्। -तर्हि भवती एव सर्वं करोतु। अहं सर्वेषां रुचिं पश्यामि। इदानीम् वयम् एकं सुभाषितं श्रुण्मः। सम्भाषणं अभ्यासः-२ -वैद्य महोदयः। महती उदरवेदना। -उदरवेदना वा। शयनं करोतु। परीक्षां करोमि। -अत्रा वा वा। किञ्चित् उपरि। अत्र वा। -तत्र ज्ञातम्। उपविशतु। -दीर्घं श्वास उच्छवासं करोतु। -ह्यः उदरवेदना आसीत् वा। -न ह्यः उदरवेदना ना आसीत्। अहं स्वस्थमेव आसन्। -अद्य प्रातः। अद्य प्रातः अपि न आसीत्। अपराह्ने प्रारब्धम्। -तदा किम् कृतवान भवान्। -मम समीपे काश्चन् गुलिकाः आसन्। ताः सर्वाः खादितवान्। -कति गुलिकाः। -पञ्च गुलिकाः। -ताः सर्वाः खादितवान्। -मादृशाः मूर्खाः पूर्वम् अपि अत्र आगताः आसन् , जानातु। वैद्यस्य परामर्शविना औषधसेवनम् अपायकरम्। पुनः कदापि एवं न करोतु। एतद् औषधं स्वीकरोतु। तथैव भवतु। (c)२००८.सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। 'विदेह' (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/आर्काइवक/अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx .txt वा .rtf फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आऽ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आऽ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु 106 Videha ’विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ०१ सितम्बर २००८ (वर्ष १ मास ९ अंक १७) http://www.videha.co.in/मानुषीमिह संस्कृताम्
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