VIDEHA — Issue 20 / अंक २०

Publication: VIDEHA · Issue: 20
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विदेह १५ अक्टूबर २००८ वर्ष १ मास १० अंक २० 'विदेह' १५ अक्टूबर २००८ ( वर्ष १ मास १० अंक २० ) एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय २.संदेश ३.मैथिली रिपोर्ताज- १. जितेन्द्र झा  /  २. प्रीति /  ३. नवेन्दु कुमार झा ४.गद्य ४.१.कथा १.सुभाषचन्द्र यादव(अपन-अपन दुख) २.विभारानी (आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक) ४.२.१. रिस्क आऽ मैथिल- ब्रज कु. कर्ण २. कोना बचत मिथिलाक स्मिता?-ओमप्रकाश झा ४.३.१. महाप्रकाश श्री सुभाषचन्द्र यादव पर, २. जितेन्द्र झा सुश्री अंशुमालापर ४.४. १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.स्व. राजकमल चौधरी पर - डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) ४.५. दैनिकी-ज्योति ५.पद्य ५.१.श्यामल सुमनक-अभियान ५.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (पाँचम खेप) ५.३.डॉ पंकज पराशरक ४ टा कविता आऽ ज्योतिक कविता-पतझड़क आगमन ५.५.विनीत उत्पलक ५ गोट कविता ५.६. महेश मिश्र "विभूतिक" कविता गङ्गा-स्तुति ६. मिथिला कला-संगीत(आगाँ) ७.पाबनि-संस्कार-तीर्थ -प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन- मिथिलांचलक शैव क्षेत्र/ आऽ दीयाबाती पर जितमोहन झा / नूतन झा ८. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. गांगोदेवीक भगता- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी ९. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ) 10. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 10.1. 1.Worn- out fifty paise coin- Maithili poem "Ghasal Athanni" by Late Sh. Kashikant Mishra Madhup 2. The Fundamentals-maithili short story “moolbhoot” by Sh. Taranand Viyogi 10.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani 11. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.) विदेह (दिनांक १५ अक्टूबर २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१० अंक:२०) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक २०, दिनांक १५ अक्टूबर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियो (1940-)केँ एहि सालक साहित्यक ८ लाख १५ हजार पौंडक साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। मानवतापर राज कए रहल सभ्यतासँ नीचाँ आऽ आगू जाऽ कए देखबाक प्रवृत्ति छन्हि क्लाजियोक। न्यू-डिपार्चर्स,पोएटिक एडवेंचर आ सेंसुअल एक्सटेसीक लेखक छथि क्लाजियो।

ली क्लाजियो मूलतः फ्रांसीसी भाषाक उपन्यासकार छथि, ओना हिनकर पिता अंग्रेज आऽ माता फ्रांसीसी छथिन्ह, दुनू गोटे मारीशससँ सम्बन्धित। आऽ क्लाजियो नाइजीरियाक समुद्री यात्रासँ नेनपनहिमे साहित्यिक जीवनक प्रारम्भ कएलन्हि। १९६३ ई. मे हिनकर पहिल उपन्यास प्रकाशित भेल जे आधुनिक समाजक प्रति एक तरहक विद्रोह छल। फ्रेंच लेखक सभमे क्लाजियो स्वीकृत नहि भऽ सकलाह आऽ एखन ओऽ न्यू मेक्सिकोमे रहैत छथि।

थर्ड वर्ल्डक नजरिसँ देखब हिनकर रचनाक एकटा विशिष्टता छन्हि। मारीशसक उपन्यासकार अभिमन्यु उनुथक आ ताहि क्रममे रामायणक चरचा सेहो क्लाजियो करैत छथि।

हिनकर पहिल उपन्यास ले-प्रोसेस-वर्बल- द इनटेरोगेशन (जांचक पूछताछ)१९६३ ई. मे आयल जे अस्तित्ववादक बादक समयक उपन्यास छल। दिन-प्रतिदिनक भाषणबाजीक बदला सत्याताकेँ देखबय बला शक्ति ओ शब्द सभकेँ देलन्हि। फेर आयल हुनकर दू टा कथा संग्रह ला-फीवर आ ला-देल्यूज, एहि दुनू संग्रहमे पाश्चात्य नगरक समस्या आ ओतुक्का डरक यथार्थ चित्रण भेल अछि। टेरा-अमाटामे हुनकर पारस्थितिकी-तंत्रसँ जुड़ाव स्पष्ट अछि तँ डेजर्टसँ ओ उपन्यासकारक रूपमे स्थापित होइत छथि, एहिमे ओ उत्तर अफ्रीकाक लुप्त होइत संस्कृतिक चित्रण करैत छथि। क्लाजियो दार्शनिक लेख सेहो लिखने छथि आऽ बच्चा लोकनिक लेल लुलाबी सेहो। अमेरिकी साहित्य जाहि प्रकारेँ अनुवादसँ दूर आऽ अपनामे मग्न भऽ गेल अछि सैह कारण अछि फिलिप रॉथक एहि रेसमे हाइपक रूपमे शामिल होएबाक बावजूद पाछू छूटि जएबाक। अर्थशास्त्रमे अमेरिकाक मोनोपोलीक विपरीतक ई साहित्यक क्षेत्रक घटनाक्रम अछि। एहि अंकमे: श्री ग‍गेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर पाँचम खेप पढ़ू संगमे हुनकर विचार-टिप्पणी सेहो।  सुभाष चन्द्र यादव आऽ विभा रानी जीक कथा,  महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर-  विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह, मौनजी, जितमोहन, प्रकाश झा, ओमप्रकाश जीक रचना सेहो ई-प्रकाशित कएल गेल अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। सुभाषचन्द्र यादव जी पर श्री महाप्रकाश लिखि रहल छथि। जितेन्द्र झा, नवेन्दु आ  प्रीतिक रिपोर्ताज छन्हि तँ युवा प्रतिभा अंशुमालाक विषयमे लिखने छथि जितेन्द्र। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। मधुप जीक "घसल अठन्नी" आऽ तारानन्द वियोगी जीक "मूलभूत" केर अ‍ग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १२ अक्टूबर २००८) ५९ देशसँ ८५,२०१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co. २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- "विदेह" ई जर्नल देखल। सूचना प्रौद्योगिकी केर उपयोग मैथिलीक हेतु कएल ई स्तुत्य प्रयास अछि। देवनागरीमे टाइप करबामे एहि ६५ वर्षक उमरिमे कष्ट होइत अछि, देवनागरी टाइप करबामे मदति देनाइ सम्पादक, "विदेह" केर सेहो दायित्व। ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- "विदेह"क निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि। मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। Top of Form रिपोर्ताजTop of Form रिपोर्ताज- १. जितेन्द्र झा  /  २. प्रीति /  ३. नवेन्दु कुमार झा Bottom of Form १. जितेन्द्र झा (साल भरिक लेखा-जोखा) मधेशी श्रमिक फ़ोरम शुक्र दिनसं नेपालमे एकमात्र रेलवे सर्विसकेँ बंद केलक अछि। ई रेलवे सर्विस नेपालमे जनकपुरसं भारतके जयनगर तक चलइत छई। मधेशी श्रमिक फ़ोरम अपन सात सूत्री मांग पूरा करय के ल क एहि रेलवे सर्विस के बंद करय के फैसला केलक अछि। गौरतलब छई जे मधेशी श्रमिक फ़ोरम रेलवे ईकाई द्वारा अपन सात सूत्री मांग के ल क पछिला 30 अक्टूबर क मुसाफ़िरखाना मे सेहो धर्ना पर बैसल छलाह संगहि महा प्रबन्धक कार्यालय घेराव कयने छलाह। पूर्वांचल के उधोग व्यवसायी सब वर्षो स भारतक जोगवनी धरि रेलवे परिचालनक आवश्यकता महसूस करैत छलाह। हुनकर सबहक ई इच्छा अगिला मार्च महिनामे पूरा भऽ जायत जखन भारतक जोगवनी धरि ब्राडगेज रेल सेवा शुरु होयत। विराटनगर सँ जोड़ि जोगबनि धरि ब्राडगेज रेलसेवा चालू भेला के बाद आयात-निर्यात व्यापार ढोनाई खर्च सस्ता भेला सँ पूर्वांचलक उधोग व्यवसायी केँ बहुत फ़ायदा होयतन्हि। बारा के पत्रकार बीरेन्द्र साहक अपहरण लेल गठित संसदीय छानबीन समिति अपन प्रतिवेदन सभामुख सुभाष नेबांग के सौंपि देलक अछि। प्रतिवेदनमे पत्रकारक अपहरणमे माओवादी के जिम्मेवार मानल गेल अछि। समिति अपन प्रतिवेदनमे कानूनक अनुसार दोषी पर कारवाई कराबक सिफारिश कएलक अछि। गौरतलब छई जे वृहस्पतिक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सेहो बतेने छल जे बाराक पत्रकार बिरेन्द्र साहक अपहरण नेकपा माओवादी द्वारा कैल गेल अछि। सरकार के कहब छैक जे माओवादी द्वारा अपहरित पत्रकार बिरेन्द्र साहक अवस्थाक बारेमे किछु महत्वपूर्ण सूचना भेटल अछि मगर ओकरा तत्काल सार्वजनिक नहि कयल जायत। व्यवस्थापिका संसदक महिला समूहक बैठकमे गृह मंत्रालयक सचिव उमेश प्रसाद मैनाली कहलनि जे पत्रकार साह केँ ताकबा लेल सरकार हर संभव प्रयास कऽ रहल अछि आ अपहरणक आशंका मे चारि गोटा के पकड़ल गेल अछि। संगहि बैठकमे पेट्रोलियम पदार्थक मूल्यवृद्धिक बारेमे उधोग वाणिज्य आ आपुर्ति मंत्रालयक अधिकारी के कहब छलनि जे मूल्यवृद्धि बाध्यात्मक अवस्थामे कयल गेल। गृह और उधोग दूनू मंत्रालयक कार्यभार सम्भारिनिहार कृष्ण प्रसाद सिटौला~केँ सेहो बैठकमे बजाओल गेल छलन्हि मुदा राजनीतिक व्यस्तताक चलते ओ नहि आबि सकलाह। अंतरिम व्यवस्थापिका संसदक विशेष अधिवेशन~केँ सकारात्मक ढंगसं संपन्न करबा लेल शीर्ष नेताक बीच विचार विमर्श चलि रहल अछि। अंतरिम व्यवस्थापिका संसदक विशेष अधिवेषनकेँ सकारात्मक ढंगसँ संपन्न करबा लेल शीर्ष नेताक बीच विचार विमर्श संपन्ना भऽ गेल। मोटरसाइकिल दुर्घटनामे परल पत्रकार रोशन कर्णक उपचारक क्रम मे वृहस्पति दिन भोरे पटनामे निधन भ गेल अछि। 29 वर्षीय कर्णक कार्तिक 3 गते के राति सिर्सिया मे मोटरसाइकिल दुर्घटना भऽ गेल छलनि। उपचारक लेल भारतक बिहार राज्यक सीतामढीसं पटना गेल रहथि। जनकपुरक स्थानीय एफ एम आ स्थानीय पत्रिका मे ओ काज करैत आएल रहथि। पत्रकारिता विकास प्रतिष्ठान एकटा प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित कऽ कय पत्रकार कर्णक असामयिक निधन प्रति शोक प्रकट कएलक अछि। कपिलवस्तु घटनाक पीड़ित सभ अपन मांग केँ पूरा करवाबए लेल सरकार द्वारा ध्यान नहि देबाक कारणे काल्हि सँ महेन्द्र राजमार्ग बंद करबाक चेतावनी देने छथि। ओ सभ अइ घटनाक मृतककेँ शहीद घोषित करबाक. मृतकक परिवार केँ उचित क्षतिपूर्ति देबाक आ विस्थापित केँ पुर्नस्थापना आ दोषीक उपर कारवाई जेहन पाँच सूत्री माँग रखने छथि। घटनाक पीड़ित सभ असोज बारह गते~केँ सरकारकेँ पत्र लिखि अपन माँग रखने छलाह। गत भादव तीस गते~केँ अज्ञात समूह द्वारा कपिलवस्तुक मोइद खाँक हत्या कयलाक बाद ओतय भेल हिंसात्मक घटनामे दू दर्जन आदमीक जान गेल छल। घटनामे सौओ घरमे आगजनी लूटपाट आ तोड़फ़ोड़ सँ  करोड़ो रुपयाक क्षति भेल छल। एखन तक हजारो लोक सभ विस्थापित भेल छथि। बीरगंजमे वृहस्पतिकेँ भेल बम विस्फोटक जिम्मा दोश्रो जनतांत्रिक तराई मुक्ति मोर्चा लेलक अछि। दोश्रो मोर्चा के कार्यकर्ता सभ बीरगंज कुकर बम विस्फोट केलक, ई जानकारी दोश्रो मोर्चाक प्रमुख विस्फोट सिंह टेलीफोनसं जानकारी देलथि। सर्लाही बरहथवा बजारमे  सांझमे एक आदमीक गोली मारि कय घायल कऽ देल गेल। बरहथवा बजारमे किरानाक समान बेचए आओल बरहथवा वार्ड नंबर 8 घर रहल 40 वर्षीय वीरेन्द्र साह केँ बजारे~मे सांझ साढे 6 बजे गोली मारल गेल प्रहरी जनौलक अछि। घटनामे संलग्न रहल आशंकामे प्रहरी एक गोटे के पकडबाक संगहि पेस्तोल सेहो बरामद कएलक अछि। एहि तरहे बरहथवामे बितल सप्ताह तीन दिनक अंतरमे दू गोटेक हत्या भऽ चुकल अछि। भारतीय दूतावासक सहयोगसँ पाँच महिना पहिने निर्माण भेल झापाक भद्रपुर स्थित सुविधा समपन्न प्रसुति गृह अखन तक संचालित नहि भऽ सकल अछि। करीब सत्तर लाखक लागत सँ बनल ई हास्पिटल चिकित्सक अभावमे नहि चलि रहल अछि। पाकिस्तानक सूबा सरहदक स्वात घाटीमे चरमपंथी आ सुरक्षाबलक बीच घमासान जारी अछि। वृहस्पति केँ सेना दिस सं 70 टा चरमपंथी केँ मारय के दावा करय के बाद चरमपंथीक दिस सं दावा कएल गेल छई जे ओ 40 टा सैनिक केँ बंदी बना लेने छई। चरमपंथी किछु सुरक्षाकर्मी के मारय के बात सेहो कहलक अछि। वृहस्पतिक राति भरि स्वातक विभिन्न इलाकामे गोलीबारीक आवाज आबइत रहलई मुदा कोनो बडका कारवाई के खबरि नहि अछि। दूनू ओर सं ई कारवाई दू दिन पहिने भेल अनाधिकारिक संघर्ष विराम के बाद भेलैया। पश्चिमी तैवानमे एकटा गैरकानूनी तरीका सँ चलि रहल पटाखा फ़ैक्ट्रीमे आगि लागि गेल जाहि सँ चारि गोटे मारल गेल आर छह लोग घायल भऽ गेल। ई धमाका हाउलोंग शहरमे भेल अछि। धमाकाक बाद छोट-छोट कै टा विस्फ़ोट भेल। धमाका सँ आसपासक बिल्डिंगक शिशा सभ सेहो टुटि गेल। ई पटाखा फ़ैक्ट्री जतय अवस्थित अछि ओतय चारु तरफ़ धानक खेत होय के कारण बचाव काजमे काफ़ी दिक्कत भऽ रहल छल। स्थानीय वासिन्दा सभ के कहब अछि जे विस्फ़ोट सँ  पहिले ई फ़ैक्ट्री मे कि बनैत अछि एकर जानकारी हुनका सभ के नहि छलनि। एखन तक अहि बातक जानकारी नहि भेटल अछि जे अहि विस्फ़ोटक की कारण छल। एखन तक प्रशासन आर जाँच आयोग सँ  अहि बातक जानकारी नहि भेटल अछि जे ई विस्फ़ोट स्वनियोजित तँ नहि ने छल। ओना तँ घरमे गाए या महीषक बच्चा भेलासं ओकर पालनकर्ता व्यक्ति खुश होइत छथि। एनाहिते भैरहवामे सेहो एकटा कृषकक घर मे महीष , एकटा नहि बल्कि जुडवा बच्चा देलक मुदा दूनू बच्चा केँ पाडा रहबाक कारणे महीषक मालिक वासुदेव यादव दुखी छथि। भैरहवा मे '' नया बेंजिग नया ओल्मपिक'' नामक चीनक फ़ोटो प्रदर्शनी शुरु भेल अछि। चीनक राजदूत चंग सियांगलिन एहि फ़ोटो प्रदर्शनीक उद्घाटन केलनि। एहि अवसर पर चीनक राजदुत कहलनि जे आदिए काल सँ चीन नेपालक हित प्रगति आ उन्नति देखय चाहैत अछि। सिद्धार्थनगर नगरपालिकाक सभाकक्षमे आयोजित एहि प्रदर्शनीमे 79 टा फ़ोटो राखल गेल अछि। प्रदर्शनीमे 2008 मे चीनक बेजिंगमे आयोजित होयवाला ओलम्पिक  खेलकूद लेल ओत्तहि भऽ रहल विभिन्न गतिविधिक जानकारी फ़ोटो द्वारा देबाक प्रयास कयल गेल अछि। ई नेपाल चीन मैत्री समाज लुम्बिनी द्वारा आयोजित ई प्रदर्शनी शनि दिन धरि चलत। प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला गणतंत्र आ समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली के बारे मे संसद सं होबय बला निर्णय के प्रजातांत्रिक हेबाक बात कहलाह।  काठमांडूमे महिला पत्रकार सभहक राष्ट्रीय सम्मेलन के संबोधित करैत प्रधानमंत्री कोइराला संसद के निर्णय के प्रजातांत्रिक प्रक्रिया द्वारा मजबूत बनेबाक विश्र्वास व्यक्त कयलाह। प्रधानमंत्री कोइराला विभिन्न क्षेत्र सं प्रेस के उपर होबय बला दमनक चर्चा करैत सरकार के अई तरहक प्रवृति नहि सहबाक बात सेहो कहलाह। ओ कहलाह जे संसद द्वारा संविधानक तिथिक घोषणा होयत। नेकपा माओवादी के कार्यकर्ता सब नुवाकोट काँग्रेसक कार्यकर्ता के वृहस्पति दिन अपहरण केला के बाद मारि पीट के छोड़ि देलक। नुवाकोट काँग्रेसक कार्यकर्ता रामकुमार धिमिरे के माओवादी कार्यकर्ता स्थानीय विकास मंत्रालय सँ अपहरण कएने छल। रामकुमार धिमिरेक कहब छैक जे नुवाकोट ओखरपौवा चारि के सार्वजनिक जमीन कोनो खास व्यक्त्तिक नाम पर अहि करय देबाक दुश्मनी मे हुनका पर आक्रमण कयल गेल छलन्हि। ओहि सार्वजनिक जमीन के अपना नाम पर करय चाहिनिहार राममणि धिमिरे आ माओवादी कार्यकर्ता नवराज दुंग़ाना आदि पर आरोप लगबैत ओ कहलनि जे YCL कार्यालय लऽ जा कऽ हमरा मारल -पीटल गेल। धिमिरे पर भेल माओवादीक ज्यादती के विरोधमे आई बालाजुमे प्रदर्शन कयल गेल। नेपाली महिला उध्मी सभ द्वारा तैयार कयल गेल समान केँ बाजार भेटलाक बाद आब महिला उधमी सभ अलग सँ औधोगिक क्षेत्रमे उतरऽ के सोच बना रहल छथि। नेपाल उध्मी महासंघक नवनिर्वाचित अध्यक्ष प्रमिला रिजाल महासंघ के पन्द्रह महिना पहिले संचालन मे आनि, सार्क महिला क्राफ्ट भिजेल द्वारा महिला उध्मी सभ सेहो अंतर्राष्ट्रीय बाजारमे जा सकैत छथि एकरा प्रमाणित केली। पैसा के अभावमे उपचारक लेल शहर नहि जा बिमारी दबेनाई अधिकांश ग्रामीणक बाध्यता अछि। मुदा आब घर आँगनमे डाक्टर के ऐला सँ ऐहन लोक सभ राहत महसूस कऽ रहल छथि। पर्वत के दुर्गम फ़लेबास खानी गाँवमे आयोजित निशुल्क स्वास्थय शिविरमे दू हजार सँ बेसी लोक उपचार करा चुकलाह। नेपाल स्थित राष्ट्रसंघीय मिशन अनमिन प्रमुख इयान मार्टिन अनमिनक कार्य अवधि बढेबाक लेल प्रधानमंत्री समेत सम्बन्धित पक्ष संग विचार विमर्श करताह। राष्ट्रसंघीय सुरक्षा परिषद के बैठक सँ वापस अएला के बाद मार्टिन कहला जे पूस महिना के मध्यमे अनमिन के कार्यकाल खत्म भेला के बादो समया अवधि बढेबाक लेल राष्ट्रसंघीय सुरक्षा परिषद इच्छुक अछि। ओ कहलनि जे नेपाल मे शान्ति प्रक्रिया के आंगा बढेबाक लेल राष्ट्रसंघीय महासचिव बन की मून, प्रतिबद्ध छथि। नेकपा माओवादी के भातृ संगठन YCL विघटित राजपरिषद के सदस्य द्वारिकामान सिंह प्रधान के मारी पीट कऽ अपहरण कऽ लेलक अछि। पचास-साठि के समूहमे आयल YCL कार्यकर्ता जनहित नागरिक समाजक श्यामकृष्ण मास्के के घर सँ हुनक अपहरण केलकन्हि। चैत्य स्तूप के जीर्णोद्धार करबा लेल दोलखा के भेल मीटिंग के बाद ओ मास्के के घरमे रुकि गेल छलाह। इटालियन चैत्य स्तूप नामक संस्था के सहयोग सँ दोलखा के पुरान चैत्य स्तूपक जीर्णोद्धार करबाक टोली संग दोलखा पहुँचल सिंह पर दरबारक नाम पर सामाजिक काज करबा के आरोपमे YCL हुनकर अपहरण केने अछि। YCL कार्यकर्ता द्वारा तैयार दरबारिया अपराधी के सूचिमे सिंहक नाम सब सँ उपर होयबाक कारणे पूर्व योजना के तहत हुनक अपहरण कयल गेल। माओवादी द्वारा सिरहा मे आयोजित अनिश्चितकालीन बंद आई सं वापस ल लेल गेल अछि। अपन दू जिला स्तरीय नेता के गिरफतार केलाक विरोध मे मंसिर 4 गते सं माओवादी बंदक आहवाहन केने छल। बंदक कारणे पूर्व पश्चिम राजमार्ग के लहान खंड मे सवारी साधन के अवरूध्द भेला सं ह.जारो यात्री के भारी असुविधा भ गेल रहनि। सिरहा मे माओवादी द्वारा अपिश्चितकालीन बंद वापस करिते रौतहट के माओवादी सेहो बंद वापस करबाक घोषणा क देलनि। आई स्थानीय प्रशासन आ माओवादी जिला कमिटि केबीच भेल सहमति के बाद बंद वापसी के घोषणा कएल गेल। राजमार्ग आ सहायक राजमार्ग पर बंद हड़ताल नहि करबाक कानूनक बादो एकर कार्यान्वयन नहि भेला सं यातायात मजदूर नाराज छथि। हुनका सभहक द्वारा राजमार्ग मे अवरोध आ यातायात साधन पर हमला आ अगिलगी जारी रहला सं जानक खतरा पर ध्यान दियाबैत सरकार सं हस्तक्षेप करबाक मांग कएल गेल अछि। अपराधी आ भूमिगत समूह द्वारा फोनक मार्फत चंदा के नाम पर पैसा मांगबा आ नहि देला पर जान सं मारबाक धमकी भेटलाक बादो प्रशासनक लापरवाही के विरोध मे आंदोलन पर उतरल बीरगंजक सोना चानी व्यवसायी आई टायरा जरा अपन विरोध प्रदर्शित केलनि। व्यवसायी के कहब छन्हि जे प्रशासन के बेर बेर आग्रह करेलाक बादो मामला के गंभीरता के प्रति प्रशासन के धियान नहि देला सं हमरा सबके ई कदम उठाबई पड़ल अछि। भरदुतिया के दिन सं शुरू भेल भए बहिन के स्नेह के पाबइन के रूप मे प्रख्यात पावइन सामा चकेबा संपन्न भेल। मधेशक बहिन बेटी सब द्वारा बड़ महत्वक संग माइटक मूर्ति के आई धइर पूजा क क सामा के भंसाओल गेल। तराई के थारू समाजक महिला सब सामा पावइन के बड़ धूमधाम के संग मनाओल करै छइथ। अपन अपन गाम सं काठमांडू मे आइब क रहि रहल थारू महिला समाज आ मैथिल महिला समाज आई हटले कार्यक्रम के आयोलना क क सामा पर्व काठमांडू मे मनौलक अछि। कार्तिक पूर्णिमा के दिन जनकपुर गंगासागर,अरगजा पोखरि दशरथ तलाउ लगायतक पोखरि सभ नेपाल आ भारतक विभिन्न स्थान सं आयल श्रध्दालु भक्तजन सभ स्नान क जानकी मंदिर, राम मंदिर, जनक मंदिर आ दर्शन आ पूजापाठ कैलथि। कार्तिक स्नान कैल सं भूतप्रेत डायन जोगैनि सं होबई बला कष्ट सं मुक्ति हेबाक विश्र्वास अछि। तहिना प्रत्येक साल जंका धनुषा आ सिरहा सीमा पर रहल कमला नदी तट पर हजारो डायन आ धामी मेला लागल छल। एहि मेला के भूत मेला के नाम सं सेहो जानल जाइत अछि। एहि बेर 10 ह.जार सं बेसी धामी सभहक सहभागिता रहल बात जनाओल गेल अछि। मेला मे नेपाल के धनुषा, महोत्तरी, सिरहा आ सर्लाही लगायत के विभिन्न जिला एवं भारत के मधुबनी आ दरभंगा जिला के धामी, डायन, जोगिन आ श्रध्दालु भक्तजन के सहभागिता रहल बात कमला मेला आयोजक समिति जनौलक अछि। आधुनिक युग मे जत कानूनी रूप मे डायन के आरोप लगौनाई अपराध मानल जाइत अछि त प्रत्येक साल लागैय बला ई मेला विज्ञान आ कानून दुनु के चुनौती बनल अछि। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सं जनकपुरक जानकी मंदिर के प्रांगन मे श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ पुर्णाहुति के बाद संपन्न भेल अछि। समापन के अवसर मे जनकपुर मे शोभा यात्रा मे नेपाल आ भारत के विभिन्न स्थान सं आएल साधु संत, बुध्दीजीवी एवं समाजसेवी सभहक अपार सहभागिता छलै। झापा जिला के महिला जिनका ईलाजक लेल भारत या धरान आ विराटनगर जाए पड़ैत छलन्हि हुनक समस्या के अस्थायी समाधान भेल अछि। भद्रपुरक मेची अंचल अस्पताल मे प्रसूति डाक्टरक व्यवस्था रहलाक बादो डाक्टर उपलब्ध नहि छलथि। मुदा आब स्वास्थ्य मंत्रालय एक महीना लेल डाक्टर मिथिला शर्मा के ओहिठाम पठा क अस्थायी समाधान केलक अछि। अस्पताल मे महिला डाक्टर के एला सं प्रसूति मरीज के अस्पताल मे भीड़ शुरू भेल अछि। भारतीय दूतावास द्वारा 2 करोड़ 74 लाख रूपैया के लागत सं 25 सैया के सुविधा संपन्न भवनक निमार्णक बादो डाक्टरक अभाव मे ई अस्पताल बेहाल अछि। चूल्हा पर भानस क अपना परिवार के खुएनाइ, अपन बाल बच्चा के पोसनाई एवं पालनाई आ अपन घरक देखभाल करैत अपन जीवन बितौनिहार अधिकांश मधेश मे रहि रहल मधेशी महिला के दिनचर्या अइछ। मुदा आब किछु दिन सं विभिन्न संघ संस्था के प्रयासक बाद, मधेशक महिला सब सेहो अपन आ अपना परिवार के बारे मे सोचबाक लेल सजग भ रहल छइथ। गाम गाम मे चलाओल जा रहल बचत समूह मे नियमित रूप मे उपस्थित हेबाक एकटा प्रमुख काज भ गेल छइन्ह हुनका सबके। पूर्वांचल के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र झापा के बिर्तामोड़ शहर गंदगी साफ करबा लेल स्थानीय लोक जागरूक नहि अछि आ नहिए स्थानीय निकाय सेहो क्रियाशील अछि। एहन स्थिति मे एक सामाजिक संस्था द्वारा बिर्तामोड़क साफ सफाई शुरू कएल गेल अछि। बारा नीजगढ़ स्थित पूर्व पश्चिम राजमार्ग पर ट्रक मे बस ठोकर मारि देलक। जाहि मे बसक ड्राइवर समेत आठ गोटे घायल भ गेलाह। घायल सब मे सं बस चालक सिंधुली के तारा तामांग, हेल्पर दिपेश आचार्य आ एक टा अंजान यात्री के हालत गंभीर छन्हि। हुनकर सबहक उपचार बीरगंज के नारायण क्षेत्रीय अस्पताल मे भ रहल छन्हि। पर्सा के सेढ़वा सं तीन ह.जार किलोग्राम गांजा सशस्त्र प्रहरी बल क्षेत्र नबंर पांचक टोली बरामद केलक अछि। चेकजांच के क्रम मे शुक्र के राति संढ़वा जाइत समय सशस्त्र के टोली के देखला के बाद गांजा लोड क रहल लोक सब भगि गेल। प्रहरी के शंका भेला पर जांचक पश्चात भारी मात्रा मे गांजा बरामद केलक। सीमा सुरक्षा बल के प्रमुख सशस्त्र प्रहरी उपरीक्षक कमान सिंह जानकारी देलनि जे घटनास्थल सं एक थान नलकटुवा बंदूक सेहो पड़ल छल। भारतीय राजदूत शिवशंकर मुर्खजी दावी केलनि अछि जे तराई क्षेत्र मे भ रहल आपराधिक गतिविधि मे भारतीय समूहक कोनो संलग्नता नहि अछि। प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा सीमा पार सं आबई बला अपराधी सब नेपाली सशस्त्र समूह संग मिल क तराई मे हिंसा मचेबाक अभिव्यक्ति देलाक तुरंते बाद भारतीय राजदूत मुखर्जी एहि तरहक वक्तव्य देलनि। दूतावास के सहयोग सं संचालित योजना सब के निरीक्षण के लेल भोजपुर पंहुचल भारतीय राजदूत तराई हिंसा मे भारतीय तत्वक संलग्नता नहि रहबाक बात कहलनि। ओ कहलनि जे नेपाल जे अखन आंतरिक समस्या के सामना क रहल अछि, ओकर सामाधान मे सरकार के सहयोग करबाक लेल भारत तत्पर अछि। पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर मे भेल दू टा विस्फोट मे कम सं कम 35 लोक के मारई जाए के ख़बर छई। दूनू विस्फोट सैन्य ठिकाना के निशाना बना क कएल गेलई। पहिल विस्फोट सेना के छावनी के बाहर एकटा नाका पर आत्मघाती हमलवार केलकै। एहि मे सेना के एकटा जवान मारल गेलई। दोसर विस्फोट सेना के मुख्यालय के बाहर तखन भेलई जखन सेना के कर्मचारी के ल जा रहल एकटा बस के पाछां कार ल जा क ओहि मे विस्फोट क देल गेलई। तीन महीना मे ई तेसर बेर छई जखन सेना के मुख्यालय पर हमला कएल गेल छई। एहि हमला के .जिम्मेदारी कियौ नहि लेलक अछि। अधिकारी शक .जाहिर केलक अछि जे इ हमला तालेबान समर्थक चरमपंथी केने हेतई। हुनक मानब छई जे तालेबान समर्थक सेना के ओहि कारवाई के बदला लेबई के कोशिश क रहल छई जे ओ उत्तर पश्चिमी प्रांत मे क रहल छई। हालक महीना मे पाकिस्तान मे कतेको बड़का आत्मघाती हमला भेलया। कराची मे एक टा बड़का विस्फोट मे कम सं कम 135 लोक के जान गेल रहई। पूर्व प्रधानमंत्री नवा.ज शरीफ घोषणा केलैथ जे ओ रविवार यानी 25 नबंबर क लाहौर वापस लौटताह। नवा.ज शरीफ के राजनीतिज्ञ भाए शाहबा.ज शरीफ लंदन सं एहि ख़बर के पुष्टि केलैथ। दूनू भाए एकै संग पाकिस्तान पंहुचई बला छइथ। ओना अखन ई तय नई छई जे पाकिस्तान मुस्लिम लीग जनवरी मे होभई वला चुनाव मे हिस्सा लेताह कि नहि। गौरतलब छई जे नवा.ज शरीफ पछिला 10 नबंबर क पाकिस्तान लौटल छलाह मुदा हुनका सउदी अरब भेज देल गेल रहई। मु दा किछु दिन पहिने पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट हुनका स्वदेश लौटई के अनुमति द देने रहई। 1999 मे नवा.ज शरीफ के तख्ता पलटि देल गेल रहई। आ अगिला साल हुनका पाकिस्तान सं निर्वासित क देल गेल रहई। पूर्व प्रधानमंत्री आ नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देउबा गणतंत्रक मुख्य बाधक हेबाक आरोप नेकपा माओवादी पर लगेलनि अछि। ओ मंसिर छह गते क निर्धारित कएल गेल संविधान सभा चुनाव नहि हेबई देबाक आ माओवादी द्वारा गणतंत्र के आयु बढ़ेबाक आरोप लगेलनि। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर के कहब छन्हि जे अहि ठामक अधिकांश राजनीतिक दल आ समुदाय त गणतंत्रक पक्ष मे अछि मुदा अहि लेल वैधानिक तरीक़ा स्थापित करई पडत। प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला संग भेंट मे कार्टर हुनका जल्दी सं जल्दी संविधान सभा के निर्वाचन करबाक सुझाव देलखिन। प्रधानमंत्री के विदेश मामला संबंधी सलाहकार आदित्य बराल के अनुसार प्रधानमंत्री कार्टर के स्वयंम संविधान सभा के चुनाव लेल आतुर आ चुनाव के बाद गणतंत्र संबंधी निर्णय लेबाक बात कहलखिन। अमेरिकी पूर्व राद्वट्रपति जिम्मी कार्टर राजनीतिक दल आ सरकार के सुझाव देलखिन अछि जे राजनीतिक गतिरोध के समाप्त क 2064 साल के भीतरे संविधान सभा के चुनाव करा क नेपाल मे दीर्घ शान्ति के स्थापना करथि। कार्टर कहलनि जे नेपालक माओवादी सं संबंध सुधारबाक लेल ओ अमेरिकी सरकार सं बात करताह। चीन के थाई जार्जस डैम सोर्ड के नजदीक भेल भूस्खलन मे एकटा बस के चपेट मे एला सं ओहि मे सवार 31 लोकक मौत भ गेलई। भूस्खलन के घटना मंगलवार क भेलई आ ओहि के तीन दिन बाद इ बस भेटलई। भूस्खलन के समय बस मे 31 लोक सवार रहइथ। अधिकारी के मुताबिक दुघर्टना के तीन दिन बीत गेलाक बाद ककरो जीबई के संभावना नहि छई आ बस पूरा तरहे क्षतिग्रस्त छई।  संगहि बोडांग काउंटी के हुबई प्रांत मे भेल भूस्ख्लन मे रेल निमार्ण स्थल के नजदीक के सड़क के सेहो एकर चपेट मे आबई के बात कहल गेल छई। प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला 2064 साल के भितरे संविधान सभा चुनाव करेबाक बात कहलाह। नेपाल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल संग बात करैत प्रधानमंत्री ई प्रतिबध्दता व्यक्त केलनि। ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी सब प्रधानमंत्री के ज्ञापन पत्र द क आई बालुबाटार पंहुचल छलाह। एहि अवसर पर संविधान सभा निर्वाचन के बाद पहिल बैठक सं गणतंत्र के घोषणा करबाक लेल आ एहि सं पहिलका सहमति के अनुसार मिश्रित निर्वाचन प्रणाली लागू करबाक लेल प्रधानमंत्री के सुझाव देबाक बात ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष लक्ष्मण बस्नेत कहलाह। ज्ञापन पत्र मे संविधान सभा चुनाव के निश्चित तिथि तकबाक श्रम आयोग गठन करबाक युनियन के एकीकरण करबाक लेल आ शांति बहाली करबाक लेल सरकार सं मांग कैल गेल अछि। ब्राजील मे एकटा 15 वर्षीय किशोरी के चोरी के आरोप मे एकटा अनोखा आ दर्दनाक स.जा देल गेलई। 15 वर्षीय एहि लड़की के स.जा के तौर पर कतेको हफता तक 21 लोक के संग जेल मे राखल गेलई जे ओहि किशोरी के खाए लेल तखने दई जखन कि बदला मे ओकरा संग संबंध स्थापित कएल जाए छलई। एहि कम उम्रक लड़की के संग .जबरदस्ती बलात्कार कएल जाई छलई आ अधिकारी किछो नहि क पेलैथ जाधरि कि राष्ट्रीय मिडिया मे ई ख़बरि नहि एलई आ ब्राजीलवासी एहि लड़की के रिहाई के मांग नहि केलकै। एहि लड़की के उंगली पर आ तलवा पर जलइत सिगरेट लगा क किशोरी के प्रताड़ित कएल जाई छलई आ ओकरा संग राखल गेल 21 टा बलात्कारी लड़का जंका ओकर केस काटि देने रहई, ताकि ओकर पहचान नहि भ पाबई। लड़की आ ओकर परिवारवाला के मुताबिक हुनका सबके लगातार जान सं मारई के धमकी भेटई छलई। शुक्रवार क संघीय सरकार, मानवाधिकार अधिकारी के एकटा प्रतिनिधि मंडल के एहि मामला के जांच के लेल भेजलक अछि। रूपन्देही के कृषक सब के बीच एखन बेमौसमी प्याजक खेती ख़ास लोकप्रिय बनल अछि। कनीके ख़र्च सं मोनक अनुरूप आमदनी भेला सं कृषक सब एहि दिस आकर्षित भेल अछि। २. प्रीति (प्रीति नेपाल १ टी.वी. मे दैनिक मैथिली कार्यक्रमक होस्ट छथि।) १. वियाह एकटा रिश्ता के एहन अटूट बंधन अछि जकरा सामाजिक मान्यता प्राप्त छैक आ एक खास अवस्था में सब स्वेच्छा सअ अहि बंधन में बंधय चाहैत अछि। प्राचीनकाल में स्वयंबर के प्रचलन छल। यानि महिला के स्वयं वर चुनवाक सामाजिक आजादी छलन्हि। कालांतर में सामाजिक स्थिति में बदलाव आयल। बहु विवाह या दोसर वियाह पहिनुहुं व्याप्त छल मुदा महिला के नहि भेटल ई आजादी। आइयो कमोवेश दोसर वियाह पर समाज महिला के प्रति ओतेक उदार शायद नहि अछि जतेक उदार ओ पुरूषक दोसर वियाह पर अछि। दोसर वियाह के बारे में जौं सच पुछी त समाज पुरूख के संग दैत अछि। पहिने त समाज में बहु वियाहक प्रथा छल मुदा आब यद्यपि एकरा मानयता नहि छैक तथापि समाज सअ ई प्रथा पूर्णत: खत्म नहि भेल अछि। दोसर वियाह जौं विधुर द्वारा या कोनो खास विशेष परिस्थिति में कयल जाय त एकर कारण बुझवा में अबैत अछि पर यदि मात्र शौक, दहेजक लोभ या छद्म आधुनिकता के होड़ में कयल जाय त ई अक्षम्य अपराध अछि। अहि मादे समाज आ स्वयं पुरूष के अपन सोच बदलबाक आवश्यकता अछि । समय बदलल संगहि लोक के सोच सेहो बदलल अछि। मुदा एखनो नहि बदलल अछि महिला के मादे पुनर्विवाह या दोसर वियाह पर समाजक नजरिया। जौं पुरूष क सकैत छथि दोसर वियाह त किएक नहि परित्यक्ता, विधवा महिला के सेहो भेटबाक चाही ई अधिकार। कतेक नींक महिला होयत जौं जवान के संतानहीन विधवा के पुनर्विवाह के अनिवार्य बना देल जाय आ बाकियो के स्वेच्छा पर छोड़ि देल जाय। जौं ई भ सकय संभव त नहि सिर्फ समाज सअ महिला आ पुरूषक भेदभाव किछु कम होयत अपितु बल्कि समाज द्वारा उपेक्षित आ एक तरहे त्यागल महिला पुन: समाज के मुख्यधारा में शामिल भय अपन जीवनक नैराश्य सअ मुक्ति पाबि सकलीह। २. कोजागरा पावनि आश्र्िवन शुक्ल पूर्णिमा के मनाओल जाइत अछि। नवविवाहित लड़का लेल अहि पावनि के विशेष महत्व अछि या कहू त ई पावनि खासकय हुनके सभक लेल छन्हि। नवका बरक लेल ई पावनि तहिने महत्वपूर्ण अछि जेहन नवविवाहिता लेल मधुश्रावनी। फर्क यैह अछि जे मधुश्रावनी कतेको दिन लम्बा चलैय बला पावनि अछि आ अहि में नव कन्या लेल बहुत रास विधि-विधान अछि जखनकि कोजागरा मुख्यतःमात्र एक दिन होइत अछि। जहिना मधुश्रावनी में कनिया सासुरक अन्न-वस्त्रक प्रयोग करैत छथि तहिना कोजागरा में बर सासुर सं आयल नव वस्त्र धारण करैत छथि। कोजागरा के अवसर पर बर के सासुर सं कपड़ा-लत्ता, भार-दोर अबैत छन्हि। अहि भार में मखानक विशेष महत्व रहैत अछि। यैह मखान गाम-समाज में सेहो बरक सासुरक सनेस के रूप में देल जाइत अछि। सासुर सं आयल कपड़ा पहिरा बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। बरक चुमाओन पर होइत अछि बहुत रास गीत-नाद। कोजागरा में नींक जकां घर-आंगन नीपी-पोछि दोआरी सं भगवतीक चिनवारि धरि अरिपन देल जाइत अछि। भगवती के लोटाक जल सं घर कयल जाइत अछि। चिनबार पर कमलक अरिपन दय एकटा लोआ में जल भरि राखि ओहि पर आमक पल्लव राखि तामक सराई में एकटा चांदी के रूपैया राखि लक्ष्मी के पूजा कयल जाइत अछि। राति में अधपहरा दकखि बरक चुमाओन कयल जाइत अछि। आंगन में अष्टदल अरिपन द ओहि पर डाला राखि कलशक अरिपन द ताहि में धान द कलश में आमक पल्लव राखल जाइत अछि। एकटा पीढ़ी पर अरिपन देल जाइत अछि जे अष्टदलक पश्चिम राखल जाइत अछि। चुमाओनक डाला पर मखान, पांच टा नारियल, पांच हत्था केरा, दही के छांछ, पानक ढोली, गोटा सुपारी, मखानक माला आदि राखि पान, धान आ दूबि सं वर के अंगोछल जाइत अछि तहन दही सं चुमाओन कयल जाइत अछि। चुमाओन काल में बर सासुर सं आयल कपड़ा पहिरि पीढ़ी पर पूब मुंहे बैसैत छथि। पुरहरक पातिल के दीप सं वर के चुमाओन सं पहिने सेकल जाइत छथि। फेर कजरौटा के काजर सं आंखि कजराओल जाइत छन्हि। तकर बाद पांच बेर अंगोछल जाइत छन्हि। तखने होइत छन्हि चुमाओन। चुमाओनक बाद वरकें दुर्वाक्षत मंत्र पढ़ि कम सं कम पांच टा ब्राह्मण दूर्वाक्षत दैत छन्हि। फेर पान आ मखान बांटल जाइत अछि। आ अगिला दिन धरि मखान गाम घर में बांटल जाइत अछि। ३.नवेन्दु कुमार झा आब प्रवासक आश- कोसी क्षेत्रमे आएल भीषण बाढ़िसँ ई क्षेत्र तबाह भऽ गेल अछि। वर्तमान परिदृश्य महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणुक “परती परिकथा” दिस लोक ध्यान खींचि रहल अछि। कोसीक मारि सहैत कतेको लाखक आबादीकेँ ओहि दिन राहत भेटल छल जखन कि बिहारक शोक कहल जाएवाला नदी कोसीपर तटबंधक निर्माण भेल छल। आशा जागल जे ई क्षेत्र आब सोना उगलत। ई भेबो कएल। मुदा १८ अगस्त २००८ केँ पूरा परिदृश्य बदलि गेल। सरकारक लापरवाही चाहे ओ केन्द्र सरकारक हो कि राज्य सरकारक ई क्षेत्र एक बेर फेरसँ बालूक ढेर बनि गेल। जे नदी एहि क्षेत्रकेँ बसौलक ओहि नदीक कारण एक बेर फेर क्षेत्र विरान भऽ गेल। विकास दौरसँ ई क्षेत्र चलि गेल पचास वर्ष पाछाँ। एशिया क्षेत्रमे सभसँ उपजाऊ मानल जाएबला एहि क्षेत्रमे एखन बाँचल अछि तँ ओऽ छथि अपन घर-घरारी छोड़ि शरणार्थी बनल बाढ़ि पीड़ित आ पसरि रहल बिमारी आ बाँचल अछि जिनगी कटबाक आशा। मलेरिया सन महामारीक लेल बदनाम एहि क्षेत्रमे किछु वर्षसँ जे हरियरी देखाइत छल ताहिपर पानि पसरि गेल। गहूम, मकई आ धानक लहराइत खेत देखबाक चिन्तामे लागल अछि लोक। खेतीपर निर्भर एहि क्षेत्रक अर्थव्यवस्थापर जे घाव भेल अछि से कतेक दिनमे भरत से निश्चित नहि बुझि पड़ैत अछि। ओना तँ एहि क्षेत्रक एकटा पैघ आबादी एखनो प्रवासी छल मुदा जे एखन छलाह तिनको ई बाढ़ि प्रवासी बनबापर विवश कएलक अछि। खेतीक बाद जाहिसँ एहि ठामक अर्थव्यवस्था चलैत छल ओ अछि मनीआर्डर। मनीआर्डरक भरोसे लोक कहुना जिनगी कटैत छल। आब ओकरो अपन जिनगी पहाड़ लागि रहल अछि। राहत शिविर आ सुरक्षित स्थानपर शरण लेने एकटा पैघ आबादीकेँ अपन भविष्य प्रवसी बनबामे बुझि पड़ैत अछि। ओऽ आब बिचारि लेने अछि जे घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनब बिनु प्रवासी बनने संभव नहि अछि। कोसी क्षेत्रक कतेको रेलवे-स्टेशनपर लगातार बढ़ि रहल भीड़ एकर प्रमाण अछि। कतेको माय-बाप-भाइ-बहिन अपन-अपन परिजनकेँ घर-घरारीक चिन्ता नहि करबाक आशा देआ प्रदेशक लेल बिदा कऽ रहल छथि। किएक तँ जिनगी कटबाक एकमात्र रास्ता ओकरा मनीआर्डर बुझि पड़ैत अछि। एहि ठाम तँ सभ किछु उजड़ि गेल अछि। आब एकमात्र आशा प्रवासी बनि रहल परिजनक मनीआर्डर मात्र अछि जाहिसँ फेरसँ घर गृहस्थीकेँ पटरीपर आनल जाऽ सकैत अछि। ओकरा एहि बातक कोनो चिन्ता नहि अछि जे देशक कतेको भागमे बिहारी सभक विरुद्ध गतिविधि चलाओल जा रहल अछि। ओऽ तँ आब ई मानि लेलक अछि जे एहि ठाम एखन कोन जिन्दा छी जे प्रदेशमे कोनो अनहोनी घटनाक शिकार भऽ जाएब। ई एहि बातक प्रमाण अछि जे पेट आगिक सोझाँ प्रदेशमे होमए वाला कोनो तरहक अनहोनीक कोनो मोल नहि अछि। अपन आँखिसँ कोसीक धारमे बहैत अपन लोक, आर-परोस आ परिचितक लहाससँ एहि क्षेत्रक लोक हृदय पाथर भऽ गेल अछि। बाँचल जिनगी कटबाक लेल मृत्युक सामना करएसँ आब कोनो घबराहटि ओकरा नहि छै। कोसीक तटबन्ध टुटलाक बाद आब सरकारी स्तरपर जाँच, कार्वाई आ आयोगक गठन आदि खानापूर्ति भऽ रहल अछि आ होएत एहिसँ ओकरा कोनो माने मतलब नहि रहि गेल छै। आब चिन्ता छै तँ बस अपन घर-घरारी बसेबाक आ अपन परिवारक भविष्य रक्षा करबाक। बाढ़ि पीड़ितक लहासपर राजनीति, राहत आ बचाव काजक नामपर सरकारी खजाना लुटाएत, वोटक लेल गोलबन्दी होएत मुदा अगिला साल फेर कोसीक तांडव नहि होएत आ राजनेता, अधिकारी आ सरकार अपन जिम्मेदारी निर्वाह करताह एकर कोनो गारंटी नहि अछि। बिहारमे क्रिकेट भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा बिहारकेँ एसोसिएट सदस्य बनेबाक घोषणाक बाद क्रिकेट खिलाड़ी आ क्रिकेट प्रेमीक मध्य खुशीक लहरि पसरल अछि। मुदा प्रदेशमे कतेको वर्षसँ असली संघ होएबाक दावा करएवला क्रिकेट संघक मध्य वाक युद्ध तेज भऽ गेल अछि। बिहारमे एखन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादवक नेतृत्व बला बिहार क्रिकेट एसोसिएशन, पूर्व भारतीय क्रिकेटर कीर्ति आजादक नेतृत्व बला एसोसिएशन आफ बिहार क्रिकेट तथा पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी सभक क्रिकेट एसोसिएशन आफ बिहार सक्रिय भऽ अपन-अपन संघक मान्यता देएबाक प्रयास कऽ रहल छल। झारखण्ड प्रदेश अलग भेलाक बाद क्रिकेट एसोसिएशनक सेहो बँटवारा भेल। मुदा न्यायालयक लड़ाइक चक्करमे छह वर्षसँ बिहारक प्रतिभाशाली कतेको क्रिकेटरकेँ अपन प्रतिभा देखेबाक अवसर नहि भेटि सकल छल। लालू प्रसादक नेतृत्व बाला बी सी ए केँ कन्ट्रोल बोर्ड द्वारा मान्यता देबाक घोषणाक संगहि एक बेर फेर विवाद बढ़बाक संभावना देखाई दऽ रहल अछि किएक तँ कीर्ति आजादक नेतृत्व वाला एबीसी एहि मामलाकेँ न्यायालयमे लऽ जएबाक बात कहलक अछि। वर्ष दू हजार एक मे बी. सी. सी. आइ. क तात्कालिक अध्यक्ष ए.सी.मुथैय्या द्वारा लालू प्रसादक बी.सी.ए.केँ बोर्डक पूर्ण सदस्यता बहाल कएने छल मुदा तकर बाद बी. सी. ए. क सचिव द्वारा जगमोहन डालमियाक विरुद्ध मतदान करबाक कारण श्री डालमिया अध्यक्ष बनिते बिहारकेँ पूर्ण सदस्यता समाप्त कऽ देलनि आऽ तहियासँ क्रिकेट खिलाड़ी आऽ क्रिकेट प्रेमी सदस्यताक बहाली करबाक लेल संघर्ष करैत छलाह। एहि मामिलाक जल्दी निपटारा करबाक बदला गुटमे बटल क्रिकेट संघ अपना-अपना केँ असली क्रिकेट चिन्तक जनबैत न्यायालयक पीचपर लड़ाई लड़ैत छलाह आ एहि बहाने कन्ट्रोल बोर्ड एहि मामिलापर मूकदर्शक बनल रहल जाहिसँ प्रतिभाशाली क्रिकेटरक नोकसान भेल। बोर्डक ७९म वार्षिक आम बैसकमे बिहारकेँ भेटल मान्यतासँ बिहारक क्रिकेट प्रेमी राहत महसूस कऽ रहल छथि। हालाँकि जाऽ धरि पूर्ण सदस्यक मान्यता नहि भेटत खिलाड़ीक संग न्याय नहि होएत। एखन बिहारकेँ बोर्ड द्वारा आयोजित १७, १९ आऽ २२ वर्षक वाला प्प्रतियोगितामे भाग लेबाक अवसर भेटत। बोर्ड आर महत्वपूर्ण प्रतियोगिता रणजी ट्राफी आदिमे ओ तखनहि भाग लऽ सकत जखन कि पूर्ण सदस्यता भेटि जाएत। बोर्डक एहि निर्णयपर अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत बी.सी.ए.क कोषाध्यक्ष अजय नारायण शर्मा कहलनि अछि जे एहिसँ बिहारक खिलाड़ीकेँ प्रतिभा देखएबाक अवसर भेटत। एखन धरि जे नोकसान भेल अछि ओकरा पूरा करबाक प्रयास लालू प्रसादक सहयोगसँ करब। दोसर दिस कीर्ति आजादक नेतुत्व बाला ए.बी.सी. बोर्डक एहि निर्णयसँ असंतुष्ट अछि। एसोसिएशनक महासचिव मिथिलेश तिवारी कहलनि अछि जे बोर्ड द्वारा गठित तीन सदस्यीय स्टीयरिंग कमिटि जखन ए.बी.सी.केँ प्रदेशमे क्रिकेट गतिविधिक संचालनक जिम्मेदारी देने छल तँ बोर्ड द्वारा पक्षपात कएल गेल ई निर्णय अस्वीकार अछि आ एकर विरुद्ध न्यायालयक शरणमे जेबाक अलावा कोनो उपाय नहि अछि। ओ दुर्गापूजाक बाद ए.बी.सी.क विशेष आम सभा बजेबाक बात सेहो कहलनि अछि। देरीसँ सही बिहार क्रिकेटकेँ आधा न्याय तँ भेटल अछि। आब १९३५क बिहार क्रिकेट एसोसिएशनक बँटवाराक बात सेहो होएत। जाहि तरहेँ राज्यक सभ किछुक बँटवारा भेल तहिना बी.सी.ए. जकर मुख्यालय जमशेदपुरमे छल, बँटवारा होबाक चाही। सभ क्रिकेट संघकेँ अपन हठधर्मिता छोड़ि प्रदेशमे क्रिकेटक गतिविधिकेँ पटरीपर अनबाक प्रयास करबाक चाही। ज्योँ फेर विवाद उठल तँ एक बेर फेर क्रिकेटपर ग्रहण लागि जाएत। आब क्रिकेटक मठाधीश संघर्ष छोड़ि भारतीय टीममे बिहारक प्रतिनिधित्व देयबाक संगठित भऽ प्रयास करथि जाहिसँ बिहारमे क्रिकेटक भविष्य बनि सकए। ४.गद्य ४.१.कथा १.सुभाषचन्द्र यादव(अपन-अपन दुख) २.विभारानी (आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक) ४.२.१. रिस्क आऽ मैथिल- ब्रज कु. कर्ण २. कोना बचत मिथिलाक स्मिता?-ओमप्रकाश झा ४.३.१. महाप्रकाश श्री सुभाषचन्द्र यादव पर, २. जितेन्द्र झा सुश्री अंशुमालापर ४.४. १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.स्व. राजकमल चौधरी पर - डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) ४.५. दैनिकी-ज्योति कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. विभारानी चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। अपन-अपन दुख ओहि राति पत्नी दुखित छ्लीह । पीठ मे दर्द होइत रहनि। घरक भितरिया बरंडा पर खाट पर पड़ल छलीह। निन्न नहि होइत छलनि। धीयापूता क आवाजाही, गपशप, खटखुट निन्न नहि होअय दनि। ओ अति ध्वनिग्राही छथि। सेंसिटिव माइक्रोफोन जकाँ छोट-छोट ध्वनि-तरंग सँ कम्पित भs जाइत छथि। धीयापूता केँ बरजैत धथिन — अनेरो टहल-बूल नहि, हल्ला-गुल्ला नहि कर, रेडियो नहि बजा। कतेको बेर अड़ोस-पड़ोस सँ अबैत टी.वी. या रेडियोक आवाज सुनि कs पुछैत छथिन—‘अपन रेडियो बाजि रहल अछि ?’ सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। धीयोपूतोक अपन संसार छैक। ओ सभ कखनो मायक बात सुनैत अछि, कखनो नहि सुनैत अछि आ संसारक अपन कल्पनाक रमणीयता मे डूबल रहैत अछि। अवहेलना सँ पत्नीक खौंझ बढ़s लगैत छनि। तनाव चरम सीमा पर पहुँचि जाइत छनि तs चिकरि उठैत छथि आ धीयापूता केँ सरापS लगैत छथि। धीयापूताक कोमल भावुक संसार आइना जकाँ चूर भs जाइत अछि। ओहि राति हम कनेक देरी सँ घर घूरल रही। देर सँ घुरब पत्नीकेँ पसिन्न नहि छनि। हमर ई दिनचर्या हुनका लेल घोर आपत्तिजनक आ विपतिजनक। देर सँ घुरबाक अर्थ अछि देर सँ सूतब आ देर सँ सुतबाक अर्थ अछि पत्नीकेँ देर धरि कम्पित करैत रहब। तs ओहि राति घर पहुँचला पर परिस्थिति बूझबा मे भांगठ नहि रहल जे भानस –भात नहि भेल अछि, पत्नी कोनो कारणे सूतलि छथि। एना कतेको बेर भेल अछि। सूतलि रहथु , विघ्न नहि होनि ई चेष्टा करैत धीयापूताक सहयोग सँ हम भानसक उधोग मे लागि गेल रही । मुदा पत्नी निन्न्मे नहि छलीह; कलमच पड़ल छलीह। एहि परिस्थितिक लेल जेना सफाइ दैत आ अपन जागरण तथा कष्ट केँ जनबैत पत्नी अचानक चनकि उठलीह — ‘आब अखन सँ शुरू भs गेलैक गाँड़ि घुमौनाइ। हौ बाप, ई सभ कखनो चैन  नहि दैत अछि। भगवान, मौगति दैह !’ एकटा सनसनाइत तीर सन शांति पसरि गेल । पत्नी उठि कs दोसर कोठली चल गेलीह। घंटा- दू घंटा बीतल। ओहि दिन बहुत थाकल रही। सोचलहुँ खा कs सूति रही। पत्नी केँ जखन निन्न टुटतनि, खा लेतीह। निन्न मे उठा देला पर हुनका फेर निन्न आयब कठिन होइत छनि। तेँ हुनक भिड़काओल केबाड़ केँ आस्ते-आस्ते ठेलि चछरि लेबा लेल भीतर गेलहुँ। मुदा हमर पदचाप आ उपस्थिति सँ हुनक निन्न टूटि गेलनि। हुनका जागल बूझि हम कहलियनि- ’खा लियs।’ ओ करोट फेरलीह, बजलीह किहु नहि। हम दोसर कोठली मे जा कs सूति रहलहुँ। पता नहि कतेक राति भेल हेतैक । हमरा क्यो जगा रहल छल । निन्न केँ ठेलैत हम अख्यास करs लगलहुँ के अछि, की कहि रहल अछि। ठीक-ठीक मोन नहि पड़ैत अछि, मुदा लगैत अछि हमर आँखि नहि खुजल रहय। कान मे पत्नीक स्वर आयल, लेकिन बुझायल नहि ओ की कहि रहल छथि । पुछलियनि – ‘की कहैत छी?’ कहलनि— ‘की भेल अछि? एना कियैक करैत छी?’ हम सोचय लगलहुँ , हमरा की भेल; हम कोना करैत रही। तखन ध्यान गेल, गला मे कफ फँसल अछि। खखारि कs ओकरा गीड़ैत अन्दाज कयलहुँ हम घर्राइत रहल होयब आ पत्नी डरि गेल हेतीह। हम फेर लगले निन्न पड़ि गेलहुँ। पता नहि कतेक समय बीतल हेतैक। घंटा कि आध घंटा । पत्नीक आवाज कानमे आयल- ‘सुनै नइँ छिऐ ?’ पुछ्लियनि—‘की?’ कहलनि—‘लोककेँ सूतs देबैक कि नहि ?’ देखलियनि चौकी सँ कने हटि कs ठाढ़ि छलीह । हमरा भेल हम फेर घर्राय लागल होयब। गरामे अटकल कफ केँ घोंटैत स्नेह सँ पत्नी केँ पुछलियनि- ‘भोजन कयलहुँ?’ पत्नी कोनो जवाब नहि देलनि आ चल गेलीह। भेल जे खा लेने हेतीह तेँ नहि बजलीह। एहि बेर निन्न तुरन्ते नहि आयल। चिन्ता भेल कफ किएक बढ़ि गेल अछि । मोन पड़ल पत्नी कतेक डेरा गेल छलीह। फेर पता नहि कखन निन्न पड़ि गेल । भोरमे पत्नी सँ पुछलियनि— ‘रातिमे दू-दू बेर किएक जगौने छलहुँ’, तs कहलनि- ‘पारा जकाँ डिकरैत छलहुँ तेँ।’ हमरा एहि जवाबक आशा नहि रहय, तेँ एहि पर हठात विश्वास नहि भेल । पहिने एना कहियो नहि  भेल रहय । हमर ठड़ड़ सँ अकच्छ भs कs ओ कहियो जगौने नहि छलीह । तखन हमर ओ कफ आ घरघरी कोनो भ्रम रहय ? हमरा भीतर जेना किछु कचकल। कने चुप रहि पुछलियनि— ‘खयने छलहुँ कि नहि ?’ कहलनि— ‘हँ, लोक ताला मारने रहैत छैक आ हम खा लैत छिऐक।’ हमरा बुझा गेल रातिमे धीयापूता खा-पी कs सूति गेल होयत आ भनसाघर मे ताला लगा देने हेतैक। पत्नी अपन भूख आ हमर फोंफसँ कुपित भs कs हमरा उठबैत छल हेतीह। हम उठि गेल रहितहुँ तs ओ खइतथि आ खइतथि तs निन्न पड़ि जइतथि । ओ तामसे भेर भेल भूखल रहि गेलीह। ठड़ड़ आघरघरीक दू टा संसार अछि। सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। संसारक अपन-अपन सुख होइत छैक, अपन-अपन दुख होइत छैक । २.विभा रानी (१९५९- )लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता-बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।

विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि। 'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।

श्रीमति विभारानी सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। प्रस्तुत अछि विभाजीक कथा आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक। एहि कथापर हिन्दीमे विभाजीक नाटक लिखल गेल "आओ तनिक प्रेम करें" जकरा २००५ ई. मे मोहन राकेश सम्मानसँ सम्मानित कएल गेल। आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक 'हे ये..., कत' गेलहुँ? आऊ ने एम्हर।' 'की कहै छी? एम्हरे त' छलहुँ तखनी स'। कहू, की बात?' 'किछु नञि! मोन होइय' जे अहाँ अईठाँ बैसल रही।' 'धुर जाऊ! अहूँ के त' ... एह! एतेक काज सभ पसरल छै। बरखा-बुन्नीक समय छै। दिन मे अन्हार भ' जाइ छै। तइयो अहाँ कहलहुँ त' बैसि गेलहुँ आ देखियौ जे लग मे बैसल-बैसल अनेरे कएक पहर निकलि गेलै। ताबतिमे त' हम कतेको काज छिनगा नेने रहितह।ँ!' 'आहि रे बतहिया ! सदिखन काजे-काज, काजे-काज ! यै, आब के अछि, जकरा लेल एतेक काज करै छी। सभ किओ त' चलि गेल हमरा-अहाँ के छोड़ि के, जेना घर स' बाहर जाएत काल लोग घरक आगू ताला लटका दै छै। हे बूझल अछि ने ई कहबी जे सभ किओ चलि गेल आ  बुढ़बा लटकि गेल। तहिना हम दुनू लटकि गेल छी अई घर मे।' 'एह! छोड़ू आब ओ गप्प सभ। आ हे, अपना धिया-पुता लेल एहेन अधलाह नञि बाजबाक चाही। आखिर हुनको आओरक अपना-अपना जिनगी छै। बेटी के त' अहां ओहुनो नञि रोकि क' राखि सकै छी। आनक अमानति जे भेलै। बाकी बचल दुनू बेटा त' बूझले अछि जे जामुन तडकुन खेबाक आब हुनकर उमिर नञि रहलन्हि। एहेन-एहेन गप्प पर त' ओ सभ भभा क' हँसि पड़तियैक।' 'नञि! से हम अधलाह कत' सोचलहुँ आ कियैक सोचब। एतेक बूड़ि हम थोड़बे छी। मुदा, जे मोनक पीड़ा अहूँक संगे नञि बाँटब त' कहू, जे हम कोम्हर जाइ।' 'कतहु नञि! अहि ठाँ बैसल रहू। हम अहाँ लेल चाय बना क' आनै छी। अहाँ जाबति चाय पियब, ताबति हम भन्सा-भात निबटा लेब।' 'ठीक छै, जाऊ! अहाँ आओर के त' चूल्हि-चौकी आ भन्सा भात स' ततेक ने फैसिनेशन अछि जे किओ किछु कहैत रहय, अहाँसभ स' ओ छूटि नञि सकैय'। 'से नञि कहू। आई कोनो लड़की कि जनीजात चूल्हि मे सन्हियाय नञि चाहै छै। मुदा ओकरा आओर के त' जन्मे स' पाठ पढ़ाओल जाइ छै जे गै बाउ, बेटी भ' क' जनमल छें त' चूल्हि स' नाता त' निभाबहि पड़तौ। कतबो पढ़ि-लिखि जेबें, हाकिम-कलक्टर भ' जेबें, मुदा भात त' उसीनही पड़तौक। आब हमरे देखि लिय'। हम की पढ़ल-लिखल नञि छी कि नौकरी मे नञि छी। माय-बाउजी भने पाइ स' कने कमजोर छलाह, मुदा मोन स' बहुत समृद्घ। तैं त' पढ़ौलन्हि-लिखौलन्हि। नौकरी लेल अप्लाई केलहुँ त' नीके संयोगे सेहो भेंटि गेल। आर नीक कही अपन तकदीर के जे अहाँ सन जीवन साथी सेहो भेटल जे डेगे-डेग हमर संग रहलाह। मुदा तइयो देखियौ जे बेसिक फर्क जे छै, से अहूँ की बिसरि सकलहुँ? आइ धरि कहियो कहलहुँ जे सपना, रह' दियऊ अहाँ भानस-भात । हम क' लेब कि घर ठीक क' लेब कि धिया-पुता के पढ़ा लेब।' 'आब लगलहुँ अहूँ रार ठान'। ताइ स' नीक त' सएह रहितियैक जे अहाँ किचन मे जा क' अपन काज करू। हँ, चाय सेहो द' दिय'।' 'से त' अहाँ कहबे कहब। बात लागल जे छनाक स'। अहिना त' अहाँ आओर हमरा आओरक अबाज के बंद करैत एलहुँए।' 'सपना, अहाँ एना जुनि सोचू। आई तीस बरख स' हम दुनू एक संगे छी। पूर्ण भरोस स', संपूर्ण आत्मसमर्पण, विश्र्वास आ सहयोग स'। हमरा बुते जे भ' सकल, कहियो छोड़लहुँ नञि। ठीक छै जे हम कहियो एक कप चायोटा नञि बनेलहुँ, मुदा आदमी आओरक सहयोग देबाक माने की खाली भन्से मे घुसनाई होई छै? अहाँ मोन पाडू, हम कहियो कोनो बात पर टोकारा देलहुँ? अहाँ जे पकाबी, जे खुआबी, जे पहिराबी, जेना अहाँ राखी। कहियो कोनो आपत्ति कएल की।' 'हमरा हँसी आबि रहलए अपन एहेन समर्पित पति पर।' 'मुदा हमरा नञि आबि रहलए। हमरा गर्व अछि अपन एहेन सहयोगी पत्नी पर जे हमर कन्हा स' कान्हा मिला क' हमरा संगे-संगे चललीह। मुदा, आई ई सभ उगटा-पुरान कियैक?' 'टाइम पास कर' लेल आ अहाँ जे कहलहुँ, अई ठाँ बैस' लेल, त' बैसि के अहाँक मुंह त' नञि निरखैत रहि सकै छी ने।' 'निरेखू ने, किओ रोकलकए अहाँ के कि टोकलकए अहाँके।' 'धुर जाऊ, अहूँ त...! आब ओ सभ संभव छै की? अरे, जहिया उमिर छल, जहिया समय छल, तहिया त' कहियो हमर मुंह निरेखबे नञि कएलहँु आ नहिए निरखही देलहुं। चाहे हम किछुओ पहिरि-ओढ़ि ली, चाहे बाहर स' हमरा कतेको प्रशंसा भेटि जाए, अहाँक मुंह स' तारीफक एकटा बोल सुन' लेल तरसि गेलहुँ। बोल त' बोल, एकटा प्रशंसात्मक नजरियो लेल सिहन्ता लागले रहि गेल। आ तहिना अहांक पहिरल ओढ.ल पर कहियो एपी्रशिएट कएलहुँ, तइयो मुंह एकदम एके रस - शून्य, भावहीन ...' 'एह! एना जुनि कहू। अहाँक सज-धज देखिक' हमरा जे प्रसन्नता होइत छल, से हम कहियो नञि शेयर कएलहुँ अहाँ स', से कोना कहि सकै छी। दिनभर अहाँक रूप आँखिक सोझा नचैत रहैत छल आ राति मे ओ सभटा प्रशंसा रूपाकार लेइत छल। तहिना अहांक मुंह स' अपन, प्रशंसाक बोल भरि दिन चानीक घंटी जकाँ मोन मे टुनटुन बाजत रहैत छल आ मोन के उत्फुल्ल बनौले रहै छल। मुदा, अहाँ कहियो ओहि समय कोनो सहयोगे नञि देलहुँ या कहियो संग देबो केलहुँ त' बड्ड बेमोन से'। हम कहियो पूछलहुँ जे अएं यै, एना कियैक करै छी अहाँ? अहींक मर्जी मुताबिक हम ओहूठाँ चलैत रहलहुँ।' 'हे! सरासर इल्जाम नञि लगाबी। देखियौ, हमरा लेल जेना अहाँ महत्वपूर्ण छी, तहिना अहाँक प्रत्येक बात हमरा लेल महत्वपूर्ण अछि। हम अहाँक संग नञि देलहुँ अथवा बेमोन स' देलहुँ त' कियैक ने अहाँ पूछलहुँ कहियो, अथवा हम झँपले-तोपले किछु कहबो केलहुँ त' कियैक ने तकरा पर बिचार केलहुँ, कहियो खुलिक' चर्च केलहुँ.। ... हे लिय'..., चाय लिय'... अपनो लेल बना लेलहुँ। भन्साघर स' चिकरि चिकरि क' बाज पड़ै छल। किओ सुनितियैक त' कहतियैक जे बतहिया जकाँ एकालाप क' रहल छै कि ककरो संगे झगड़ि रहल छै।' 'चाय त' बड्ड दीब बनलए।' 'एह! याहि टा गप्प पहिनहुँ कहियो कहने रहितहुँ। अई तीस बरख में आइए नीक चाय बनलैय' की?' 'छोड़ू ने पुरना गप्प सभ! आब धीया-पुताक घर में ई सभ कथा-पेहानी नीक लागतियैक की?' 'कियैक ने नीक लागतियैक? ई सभ त' जीवनदायी धारा सभ छै जाहि स' जीवनरूपी वृक्षक डाल-पात सभके भिन्न भिन्न स्रोत स' जीवनशक्ति भेटैत रहै छै। अरे, धिया-पुताक सोझा अहाँ कहिये दितहुँ त' अई मे कोनो ऐहन अधलाह कर्म त' नञि भ' जइतियैक जाहि स' ओकरा आओरक आगाँ हमरा आओर के शर्म कि झेंप महसूस होयतियैक!' 'अहाँ बात के तूल द' रहल छी।' 'नञ! स्थितिक मीमांसा क' रहल छी। चीज के रैशनलाइज क' रहल छी।' 'हमरो दुनूक जिनगी केहेन रहलए। नेना छलहुँ त' पढ़ाई, पढ़ाई, पढ़ाई! माय-बाउजी कहैत छलाह जे बाउ रौ, इएह त' समय छौक तपस्याक। एखनि तपस्या क' लेबें त' आगाँ एकर मधुर फल भेटतौ। पढ़ बाउ, खूब मोन लगाक' पढ़ ! आ हम पढ़ैत गेलहुँ - फर्स्ट अबैत गेलहुँ। नीक नोकरीयो लागि गेल। बाउजी सत्यनारायण भगवानक कथा आ अष्टयाम सेहो करौलन्हि। हुनका बड्ड सौख छलै जे हुनकर पुतौहु पढ.ल-लिखल, समझदार आ मैच्योर्ड हुअए। तकदीरक बात कहियौ जे हुनकर ईहो सेहन्ता पूर्ण भ' गेलै। हुनका अहॉँ सन पुतौहु भेटलै, रूप आ व्यवहारक गरिमा स' परिपूर्ण। 'चाय त' सठि गेल। आओरो ल' आबी की?' 'नञि! हमरो जिनगी सोगारथ भेल अहाँ के पाबि क'। कतेको परेशानी भेल, अहाँ सभस' निबटैत गेलहुँ, एकदम स' धीर थिर भ' क'।' 'त' की करितहुँ! जहन हम दुनू प्राणी एकटा बंधन में बंधा गेलहुँ त' तकर मान मरजाद त' निभाबही पड़तियैक ने! आ कथा खाली हमरे आ अहाँटाक संबंध धरि त' सीमित नञि रहै छै। एकर विस्तार अहाँक परिवार, हमर परिवार आ फेर अपन बाल-बच्चा धरि होइत छै, आ हे, एहेन नञि छै जे हम सीता-सावित्री जकाँ मुंह सीने सबकुछ टॉलरेट करैत गेलहुँ। कएक बेर हम अपन टेम्पर लूज केलहुँ। मुदा अहाँक तारीफ, अहाँ अपन टेम्पर कहियो नञि लूज केलहुँ।' 'महाभारत स' बच' लेल। आह! पत्नीक आघात स' कोन एहेन मनुष्य अछि जे बाँचि सकलए।' 'मजाक जुनि करू! अहँू सीरियस छी त' हमहूँ सीरियस छी। हमर अपन इच्छा छल नान्हिटा स' जे पढ़ब-लिखब। पढ़ि लिखिक' अपना पएर पर ठाढ़ होएब। आर्थिक परतंत्रता अस्वीकार्य छल। हमरा अई बात पर पूर्ण संतोख अई जे हमर ई इच्छाक पूर्ण आदर आ सम्मान भेटल अहां स'। हमर नौकरी पर हमरा स' बेसी प्रसन्नता अहाँक बाउजी के भेल छल। हमर एकगोट संगी हमरा चेतौने छल जे देखब, बुढ़बाक खुशी अहाँक पगार ओसुलबा स' त' नञि अछि। हमरो लागल छल। मुदा धन्न कही हुनका, नञि कहियो पुछलन्हि जे हमरा की आ कतेक दरमाहा भेटैय' आ नञि कहियो ओकरा मादे कोनो खोजे-पुछारी कएलन्हि। सएह अहँू संगे भेल। अहँू कहियो नञि पूछलहुँ जे हम की सभ करै छी। अपन पगार के कोना खर्चै दी॥ हमरा त' कएक बेर इएह होइत रहल जे अहाँ पूछै छी कियैक ने? तहन ने हम अपन आमदनी आ आमद स' बढ़ल खर्चाक हिसाब अहाँ के दितहुँ। नतीजा, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कएलो सन्ता कहियो आर्थिक रूपे स्वतंत्र नहिं भ' सकलहुँ। कहियो अपना मोने अपना ऊपर किछु खर्च नञि क' सकलहुँ। अहाँ संगे ई नञि छल। अहाँ त' 'ईट, ड्रिंक आ बी मेरी' मे यकीन करैत एलहुँ आ एखनो करै छी।' 'अई मे अधलाहे की छै? मनुक्खक अई जिनगी मे अछिए की? खाई, पीबि, मस्त रही।' 'भने ओहि मे सभ किओ सफर करी।' 'से कोना? कहियो अहाँके हम कोनो कष्ट देलहुँए?' 'किऐक ने? कोनो समय एहेन नञि भेल जे कोनो खास खास बेर पर हमर नोर नञि खसल हुअए। कहियो कोनो काज-परोजन भेल, कि तीज तेवहार कि ककरो बर्थ डे कि वेडिंग, सभठाँ त' पल्ला झाड़ि लेइत अएलहुँ जे पाई नञि अछि।! तहन हम की लोकक ओहिठाँ खाली हाथे पहुँचतहुं आ कहितहुं जे हमर हस्बैंड कहै छथि जे हुनका लग पाइ नञि छै तैं हम आओर हाथ झुलबैत चलि ऐलहुँए। किओ पतियैतियैक।' 'अहाँ लग त' रहै छल ने।' 'हँ, कियैक ने कहब। ई बुझलहुँ जे ई 'छल' के मेंनटेन करबा लेल हम कतेक बेर अपन मोन के मारि-मारि के राखलहुँ।' 'एह छोड़ू ई सभ गप्प। खाएक लेल की बनाएब?' 'जे कही अहाँ? हमरा आओर के त' ईहो कहियो स्वतंत्रता नञि रहल जे अपना मोने, अपन पसीनक खाना बनाबी।' 'फेर ब्लेम! आइ अहाँ के भ' की गेलए?' 'अहाँ संग लड़ियाएबक खगता। जिनगी भर जकरा लेल अहां पलखतियो भरि समय नञि देल।' 'हम अहाँके संतुष्ट नञि क' सकलहुँ कहियो, अहाँ से कह' चाहै छी?' 'हँ, सएह कह' चाहै छी?' 'बाई एवरी पॉसिबल वे?' 'यस, बाइ एवरी पॉसिबल वे?' 'फिजिकली, मेंटली, मौनेटरली, सेक्सुअली।' 'हँ, सभतरहें।' 'अहाँ हमरा कमजोर बना रहल छी।' 'अहसास करा रहल छी।' 'अपन परिस्थिति पर गौर नञि क' रहल छी। हम बिजी, अहां बिजी। हमर अएबाक-जेबाक कोनो निश्चित समय नञि। अहाँके ऑफिसक संगे-संगे घरक, धिया-पुताक जिम्मेवारी। बखत कत' छल जे प्रेम-मुहब्बतक मादे सोचितहुँ।' 'तैं त' जीवन झरना सुखा गेल ने? व्यस्तता त' जिनगीक अभिन्न अंग छियै। तैं, अई व्यस्तताक कारणे हम आओर कहियो की नहाएब-धोएब आ कि कपड़ा पहिरब छोड़ि देलियै, वा बिसार गेलियै?' 'धिया-पुताक घर मे, आई कुंड बी सो फ्रैंक ...' 'व्यर्थ इल्जाम द' रहल छी। फ्रैंकनेसक माने ई नञि जे अहाँ हमरा कोरा मे बैसेने रहू सभ समय। फ्रैंकनेस माने छै फुल व्यवहारक, फुल अप्रोचक फ्रैंकनेस। अहाँ से फ्रैंक नञि भेलहुँ, नतीजा हम नञि भ' सकलहुँ, नतीजा धिया-पुता सभ नञि भ' सकल।' 'धिया-पुता के त' बड्ड नीक जकाँ राखलहुँ। बेटीयो जीन्स आ मिनी पहिरि क' घूमल, फ्रेंड्स सभक संगे सिनेमा गेल, पार्टी कएल, कहियो टोकारा नञि केल।' 'मुदा, कहियो फ्रैंक भ' क', खुलिक' गप्प-सप्प सेहो त' नञि कएल। एकदम फॉर्मल फैमिली बनिक' रहि गेल अपन परिवार। ई हमर कहबा नञि, अहाँक बेटीयेक कहब अछि।' 'अही स' सभ किओ सभ किछु कियैक कहैत अछि। हमरा स' त' आइ धरि किओ किछु नञि कहलक?' 'अहाँ से मोके कोम्हर देलियै? तैं त' कहलहुँ, बेहद फॉर्मल फैमिली।' 'चलू छोड़ू, आब फेर स' शुरू करब जिनगी - सभटा शौख पूरा क' देब।' 'जिनगीक ओ बीति चुकल 30 साल आ तीस वर्षक पल-पल पहिने घुरा दिय'।' 'जे भ' सकै छै से कहू।' 'त' कहू जे भन्सा की बनाबी? छीमीक खिचड़ी कि छीमीक परोठा।' 'आब जे अहाँ खुआबी। बजला पर कहब जे हम अहाँ के मौके नञि देइ छी।' 'से त' कहबे करब। अपरोक्ष रूप स' अहाँक पसीन-नापसीन पूरा घर पर हावी रहलै।' 'से कोना?' 'चलू, भन्से से शुरू करी। अहाँ के सौंफ देल मलपुआ पसीन नञि, इलाइची देल खीर, सेवई पसीन नञि। आ हमरा आओर के ओ सभ बड्ड पसीन। हमरा बिन सौंफक पुआ आ बिनु इलाइचीक खीर सेवई बनेबाक आदत पार' पड़ल।' 'त' ई त' नञि कहलहुँ जे अहाँ आओर नञि खाई।' 'ईहो त' नञि कहल जे ठीक छै, कहियो-कहियो हमहूं सौंफ-इलायचीबला पुआ, खीर, सेवई खा लेब, तहन ने बुझितहुं? आ अपना स्वादक अनुसारे अलग स' चीज बनाबी, ई कोनो जनीजात स' पार लागलैये जे हमरा स' लागितियैक।' 'अच्छा, आगां बढू।' 'बढ़ब, पहिने भन्सा चढ़ाइए आबी।' 'आइ उपासे पड़ि जाइ त' केहेन रहत। तखनि स' अहाँक मुंह स' भानस-भानस सुनि क' कान पथरा गेल आ पेट अफरि गेल।' 'उहूँ! एखनि त' डिनर गोल क' देब आ अधरतिया के हाँक पाड़ब जे हमरा भूख लागलए। उठू, किछु अछि बनल त' दिय'। किछु नञि अछि त' ऑमलेटे ब्रेड सही।' 'जाऊ तहन, जे मर्जी हुअए, करू।' 'हे, हम एखने गेलहुँ आ एखने एलहुँ। ताबति अहाँ बउआक ई मेल पढ़िक' ओकरा जवाब पठा दियऊ।' 'हँ, ओहो लिखलकए जे बड्ड नीक लागि रहलए। अपन देश स' एकदम अलग, सभकिछु एकदम व्यवस्थित। मर्यादित, संतुलित। आखिर अमेरिका छियई ने। धन्न कही आईटी बूम के जे बच्चा सभक रोजगारक नव अवसर भेंटि रहल छै। भारतीय कंप्यूटर इंजीनियर्स के कतेक डिमांड छै फॉरेन कंट्री मे। देखबै जे दस मे स' तीन टा इंजीनियर अमेरिका त' आन आन देशक रूख क' रहल अछि।' 'प्रतिभाक पलायन थिकै ई। इंर्पोटेस ऑफ टेक्नॉलाजी संगे इंपोटेंसी ऑफ अवर टैलेंट छै। बाहरी टेक्नॉलॉजी पर बिढ़नी जकाँ लूझै छी। ओ सभ रोटी देखबैत अछि, हम सभ कुकुर जकाँ बढ़ि जाइ छी।' 'अहाँक बेटो बढ़ल अछि, से जुनि बिसरी।' 'हम इन जेनरल कहि रहल छी। अपन देशक त' ई स्वभावे बनि गेल छै, घरक जोगी जोगड़ा, आन गामक सिद्घ। इंटर्नल टैलेंट के पहिचान' लेल, रिकग्नाइज कर' लेल पहिने कोनो बुकर प्राइज, ऑस्कर अवॉर्ड, नोबल प्राइज चाही, नञि त' सभ किओ फ्रॉड, धोखेबाज ...' अपने ओहिठां त' लोक आओर एतेक तरहक एक्सपेरिमेंट करैत अछि। लोक कतेक महत्व दइत छै।' 'से सभ त' छै। ई नियति हमही आओर बनाक' राखल अछि। तैं त' आइ अनिमेष हमरा आओर लग नञि अछि। अमेरिका मे अछि। पता नञि कहिया घुरत? 'आ जौं नञि घुरलै आ ओम्हरेक मेम ल' आनलक तहन?' 'तहन की? अहाँ सासु पुतौहु रार मचाएब। हमर काज त' आशीर्वाद देबाक धरि अछि। से भूमिका हम निबाहि लेब।' 'त' सभटा सासु अपना पुतौहु स' रारे मचबै छै? हमही दुनू सासु-पुतौहु मे ई देखलहुँ कहियो? आब अनिमेष जकरा स' विवाह करौ, हमरा लेल धन सन! हमरा कोना आपत्ति नञि!' 'भन्सा भ' गेल त' दइए दिय'। खाअक' सूतब।' 'एतेक जल्दी? 'थकान लागि रहल अछि।' 'पहिल बेर एतेक बतियौलहुँए ने? हरारति त' लागबे करत। घरवाली संग एतेक बेसी गपियेनाइ कोनो मजाक बात छै!' 'हे, एके प्लेट मे निकालू ने।' 'आई एतेक प्रेम कथी लेल ढरकि रहल अछि?' 'सभटा पिछला हिसाब रफा-दफा कर' लेल।' 'त' पुरनका तीस बरख पहिने घुराऊ!' 'से त' नञि भ' सकैय', मुदा पुरना तीस बरख के अगिला तीस बरख मे मिलाक' जिनगीक ताग के आओर मजबूत करबै। आऊ! बैसू एम्हर। हे, लिय। हमरा हाथे खाऊ!' 'हमरा डर होइयै जे हमर हार्ट फेल नञि भ' जाए।' 'नञि होएत। आ हेएबो करत त' हमहूँ संगे-संगे चलि जाएब। हे, लिय' ने। खाऊ ने। अहींक हाथक बनाओल त' भोजन अछि।' 'हम अपने हाथे खाएब। दोसराक हाथे खएला स' पेट नञि भरत।' 'मोन भरत। आई पेट भर' लेल नञि', मोन भर' लेल खाऊ।' 'तहन त' आओरो नञि खाएब। मोन जहन भरिए जाएत त' जीबि क' की करब? मोनक अतृिप्त त' जिनगी जिबाक बहाना होइ छै।' 'ई सभ फिलॉसफी छोडू आ खाना खाऊ। अरे, अरे, दाँति कियैक काटलहुँ।' 'भोजन में चटनी नञि छल नें, तैैं...' हे, भ' गेल। आब नञि खाएल जाइत हमरा स'।' 'ठीक छै। चलू तहन।' 'कत'।' 'चलू त' पहिने। आई चलू, हमर कन्हा थाम्हि क' चलू। अइ्‌ दुनू बाँहक घेरा मे चलू।' 'व्हाई हैव यू बीकम सो रोमांटिक?' 'कहलहुँ ने जे पछिला तीस बरख के अगिला तीस बरख मे शामिल कर' जा रहल छी। हे, इमानदारी स' कहब', अहां के नीक लागि रहलए हमर ई स्पर्श!' 'कोनो भावना नञि उमड़ि रहलए। अहाँ ईमानदारीक प्रश्न उठाओल, तैं कहि रहल छी।' 'आब?' 'ऊँहूँ।' 'आब? मोनक दरवज्जा बंद क' क' नञि राखू। कनेक फाँफड़ि छोड़ि दियौक। भावनाक बयार के घुस' दियौक।' 'हमरा रोआई आबि रहलए।' 'त' कानि लिय' अई ठाँ, हमर छाती पर माथ राखिक'। मोन हल्लुक भ' जाएत।' 'बेर-बेर सोचना आबि रहल अछि पुरना दिन। तखन कियैक ने ... एतेक व्यस्तताक की माने भेलै जहन हमही दुनू अपना के अपना दुनू स' अलग ल' गेलहुँ।' 'माने छलै ने? अपन जिनगी बनेबाक। धिया-पुताक जिनगी बनेबाक। ई सभ लक्ष्य छल आ अर्जुन जकाँ हम सभ ओहि लक्ष्यक प्राप्ति लेल चिड़ैक आँखिक पुतली धरि तकैत रहलहुँ।' 'हमर पलक मिझा रहलए।' 'मिझाए दियऊ। बन्द पलक, फुजल अलक। एखनो अहाँक केश ओतबे नरम, आ मोलायम अछि।' 'आब त' सभ टा' झड़ि गेलै।' 'जे छै से बहुत सुंदर छै। आह! मोनक कोन्टा मे ठेलि-ठूलि क' राखल सुषुप्त भावना सभ... जेना छोट-छोट फूँही बनिक' रोम-रोम के भिजा रहल अछि। रोम-रोम भुलुकि रहल अछि। ई की अछि?' 'अहसास। हमहँू अई अहसासक फूंही मे भीजि रहल छी। अहाँक तन स' माटिक सोन्हपनि आबि रहल अछि। थाकल दकचाएल जिनगी मे एकगोट नव संचार आबि रहलए। नस-नस वीणाक तार जकाँ झंकृत भ' रहलए। सृष्टिक ई अमूर्त आनंदक क्षण अछि, दिव्य, भव्य, अलौकिक !' 'एक-एक साँस स' बजैत स्वर्गीय संगीत। आइ धरि कहियो नञि अनुभव कएने छलहुँ। आई अनुभव क' रहल छी।' 'आऊ, अई अनुभव सागर मे डूबि जाइ- गहीर, आओर गहीर, कामनाक सीपी फोली! भावनाक मोती बटोरी। आसक ताग मे ओइ मोती के गँूथि माला बनाबी आ दुनू एकरा पहीरि ली।' 'जिनगी एतेक सुंदर नञि लागल पहिने कहियो।' 'मौने मुखर रहल सदिखन। आई शब्द मौनक देबाल के ढाहि रहल अछि।' 'ढह' दियऊ ! सभटा वर्जना ढह' दियऊ !' 'जिनगीक बदलइत रूप किओ नञि बूझि सकलए। अहाँक रोम-रोम स' झरैत ओस बुन्न ! एक-एक श्र्वास स' अबैत जुही, गुलाब, मौलश्रीक सुगंधि। आऊ, डूबि जाइ अइ मे!' '---------' '---------' '---------' '---------' 'जिनगी पहेली अछि, बुझौअल अछि।' 'ऊँहूँ! जिनगी जिनगी अछि।' 'माने?' 'माने की? एखनि धरि मतलबे बूझ' मे लागल छी? धुर जाऊ! अहाँ बड्ड ओ छी।' 'ओ छी, माने केहेन छी?' 'ओ माने ओ। आओर किछु नञि!' 'अहूँ एकदम नेन्ना जकाँ करै छी।' 'नेन्ना त' बनिये गेलहुँ। अहाँ नञि बनलहुंए की?' 'बनलहुँए ने।' 'तहन?' 'तहन की?' 'तहन माने जिनगीक रूप देखी आ मस्त रही।' १. रिस्क आऽ मैथिल- ब्रज कु. कर्ण 2. कोना बचत मिथिलाक स्मिता ?- ओमप्रकाश झा बी.के कर्ण(1963-),पिता श्री निर्भय नारायण दास गाम- बलौर, भाया- मनीगाछी, जिला-दरभंगा। पैकेजिंग टेक्नोलोजीमे स्नातकोत्तर आऽ यू.एन.डी.पी. जर्मनी आऽ इग्लैण्डक कार्यक्रमक फेलोशिप, २२ वर्षक पेशेवर अनुभव आऽ २७ टा पत्र प्रकाशित। डायगनोस्टिक मिथिला पेंटिंग आऽ मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक समस्यापर चिन्तन। सम्प्रति इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग, हैदराबादमे उपनिदेशक (क्षेत्रीय प्रमुख)। रिस्क आ मैथिल मुद्दा व्यवसाय विकसित देश वा विकसित राज्यक पाछु यदि सुक्ष्म रूपसॅं देखु तॅं भेटत जे ओहि क्षेत्रक व्यवसाय विकासक मुल कारण अछि। मिथिलामे विद्वान वा ज्ञानी मैथिलक कमी नहि। व्यापारी वर्ग नोइसो बराबरि नहि। मैथिल व्यापारो करताह ? सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी समाज मिथिलामे अपन व्यवसायमे मैथिल जकॉं संस्कार अपनोने के साथ केवल ५० सालमे बढ़िया धाक जमा लेलाह, परन्तु हम मैथिल जे छी जे डींग हकैसॅं फुर्सतेऽ नहि भेट रहल अछि। मैथिल मिथिलामे की करताह ? मिथिलामे किछु मैथिलके देखबाऽ मे आयत जे़ मिथिलाक सिन्धी़ माड़वारी आ पंजाबी के व्यवसायमे नौकरी करताह। हिन्दी अखबार मॉंगि कए पढ़ताह़ परञ्च मिथिलाक विद्वान वा ज्ञानी अखबार प्रिन्ट आ बाजार मे आनबाक जोखिम नहि ऊठैऽताह। मिथिलामे चाहक दुकान पर प्रतिदिनक दिनचर्यामे लालु के लालूवाणी पर अखण्ड बहस करताह। मिथिलामे सुइदसॅं किछु मैथिल सुइदखोर व्यवसायमे वृद्धि केलाह हऽ। कोनो नियमके पालण नहि़ कए रहल छथि। अपन नियम बना कऽ अपराध मे रमल छथि। मिथिला बैंकक शुरआत होए अपराधी सुइदखोर मैथिल के झेलनाइ एकटा बढ़ पैघ अपराध अछि। !!!!Great Risk !!!! मुदा बहुतो अछि़ पर रिक्सो सॅं ज्यादा भयावह। सन २००१क जनगणणा के अनुसाऱ मिथिलाक आबादी करीब ६ करोड़ छल। जाहिमे़ व्यवसायिक वर्ग २ प्रतिशतो कम। बहुतोसॅं पुछलहु़ जे एतबा प्रतिशत कियाक कम अछि़ परञ्च एकर कारण की से नहि जानि सकलहुं। मिथिलासॅं आयात आ निर्यातक बातेऽ छोड़ू,  व्यापार तॅं बद सँ बदतर मिथिलाक पाँच जिलाक केस स्टडी: पांचो जिलाक कुल आबादी सन २००१ जनगणनामे करीब एक करोड़ अठाइस लाख छल। जनसंख्या अनुमानित ५ वा ७ प्रतिशतसॅं प्रतिसाले वृद्धि भऽ रहल अछि। एकटा बात महसूस भऽ रहल अछि जे मिथिलामे गरीबी कम भेल अछि। यदि़ सन १९८० सॅं पहिने हरेक गॉवमे हरेक दिन ४ या ५ घरमे उपवास रहैत छलैक़ परञ्च से उपवास आब गरीबीक उपवास पुजा पाठक उपवास होइत अछि। मुदा भौतिक सुविधाक पिछड़ापन तॅ पारकाष्ठा पर अछि। जिनगी भगवानक भरोसे। पांचो जिलाक मैथिल पर यदि ध्यान देल जाए तॅं एकटाक सदस्य परिवारमे नौकरी करयबाला बॉकी आश्रित सदस्य किछु नहि करयबाला बल्कि गप छटय बाला आ शान बघारय वाला। पर आश्रित भेनाए अपनेमे एकटा रिक्स एहन जे भावुक जरूरतसॅं ज्यादा आ कर्मठहीन ज्यादा बनाबैत अछि। !!!!ग्रेट रिस्क !!!! जनसंख्याक वृद्धि मानु जे कष्टक पहाड़। हर क्षण हरेक दिस स्थिति दयनीय हेबे कड़त। मिथिलामे मैथिल रिक्स लेताह ? मिथिलामे मैथिल तॅं अपन जिनगीक रिक्स लेबाऽमे सर्वोपरि छथि। जेना की़ सोचु ऩदि के ऊपर जड़ जड़ हालमे पुल ओहि पर खचाखच बस़ आ रेल गाड़ी जाहिमे छत सेहो भड़ल। फोटो देखल जाए। सोचु कनिऽ जे जिनगी आओर मौत के बीच केवल एकटा रिक्स फैक्टर अछि। मैथिल जिनगीक रिक्स हर क्षण। मिथिलामे जिनगीक रिक्स बड़ आसान पऱ व्यापारक रिक्स बड़ कठिन अछि। शेष मंथन अगला अंकमे। 2. कोना बचत मिथिलाक स्मिता ?- ओमप्रकाश झा ओमप्रकाश झा, गाम, विजइ, जिला-मधुबनी। कोना बचत मिथिलाक स्मिता ? आई जहन  अपना सबहक चहुतरफ़ा विकास भ रहल अछि त हम सब अपन महत्वांक्षा के पाबि के अत्यधिक प्रसन्न भ रहल छी,हेबाको चाही। मुदा कि महत्वाकांक्षा के रथ पर सवार भ कअ हम सब कतेक मगरुर नहि भ गेल छी जे अपन स्मिता अपना स कोसो दूर पाछु छुटि रहल अछि। मुदा तकरा समेतनिहार कियो नहि अछि। आय अपना अहिठामक युवा वर्ग अत्यधिक दिग भ्रमित भ रहल अछि,ओकरा कियो सहि मार्ग दर्शक नहि भेट पाबि रहल अछि। अखुनका समय कतेको पाबनि तिहार क महिना आबि गेल अछि आ कतेको गाम मे दुर्गा पूजा के अवसर पर सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कैल जायत अछि मुदा किछु वर्ष पूर्व मे चलु-आइ सअ आलो पहिले हर गाम मे युवक सब नाटक खेलाय छलाह,महिनोतक रामलिला ले आयोहन होयत छल,ओ सब आय कतह चलि गेल छथि। कि आर्केस्ट्रा आ परोसी (तवायफ़) के नाच मे ओ सब हरा गेल छथि। परोसजी के कार्यक्रम इ असर पड़ैत अछि जे मंदिरक कार्यकर्ता सब सेहो एकर मजा उठाबअ लागैत अछि। इमहर मौका पाबि कुकुर,बिलाड़ि मैया के प्रतिमा के सेवा मे लागि जाइया। देखने हैब जे कुकुर मुर्ती के चाटि रहल अछि। उमहर हम सब अपन तीन पुस्तक (पुरुखा) संग माने बाप- बेटा आ पोता समेत बाईजी पर पाई लुटाबय के अवसर के नहि गवांबैत छी। अधिकतर गोटे अहि स अवगत होयब। दोसर कतअ जा रहल अछि अपन संस्कार? हयउ,आब शायद कतौ महिनो तक चलैबला रामलिलाक तम्बु गाम मे देखायत होयत? हम अपन छोट सनक अनुभव अपने संग बांटअ चाहब। पहिले रामलीला के टोली के कियो माला (मने एक दिनक भोजन) उठेनिहार नहि होइ,माने इ जे मात्र पेटे पर जे टीम सबहक मनोरंजनक वास्ते तैयार रहैत छल,ओकरा अपन समाज नकारि देलक मुदा आखन प्रायःहर छोट पैघ शहर अतह तक कि देशक राजधानी मे दुर्गा पूजा के अवसर पर लाखो आदमी रामलीलाक खुब लुफ़्त उठबैत छैथ। कतो कतो तअ रामलीला देखै के लेल टिकट सेहो लागैत अछि,कि हम झूठ बाजि रहल छी। एना मे दु टा गप्प जे हमरा स्पष्ट भेल-पहिल जे लोक के ओहि प्रति ओ रुझान नहि रहलन्हि जे कि बाईजी के नाच मे वा कौआल-कौआली मे जे कि राति भरि सबके गरिया क चलि जाइया आ हजारो आदमी मंदिरक आस पास ततबाक गोत गोबर कअ दैत छथि जे अगिला किछु महिना तक उमहर नहिये जाय मे कुशल बुझैत छी। अहि स गामक कलाक ह्रास खूब पैघ स्तर पर भेल अछि,सब गोटे बुझिति अंजान छी। तेसर आ गंभीर गप्प इ जे समाज मे जे भाई चारा प्य््रव मे छल कि ओ खत्म भ गेल अछि। कि अपन समाज ततेक गरीब तअ नहि भ गेल अछि जे आहिठम दस गोटे के भोजन करेनाय आय कठिन भ गेल अछि। एकर एकटा छोट सनक उदाहरण हम देबअ चाहैत छी जे जौं अंहा सब मे स किछु आदमी दिल्ली-बंबई स कमा क मास दिनक लेल गाम जायत होय तअ अनुभव करैत होयब जे गाम मे बीतल समय के संगे संग अपनेक मेंटिनेन्स पर होय वला खर्च मे कटौति सेहो सबगोटे व्यक्तीगत अनुभव के गहराई स देखु। अखन बस अतेबैक। इति महाप्रकाश (१९४६- ), जन्म वनगाँव, सहरसा। १९७२ ई. मे पहिल कविता संकलन "कविता संभवा"। आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा नाम जे सर्वाधिक स्वीकृत आ प्रसिद्धि पौलक अछि, ओ थिक- सुभाष चन्द्र यादव। सुभाषक कथा-यात्रा पर दृष्टिपात करैत ई लगैत अछि जे ओ कथाक अन्वेषण कयलनि अछि। प्रायः लेखनक आरम्भ करिते ओ अनेक स्थान आ अनेक भाषाक यात्रा शुरू कयलनि। ई यात्रा वा भटकाव, जे हुनक नियति सेहो रहल अछि, हुनका अनुभव सँ लैस कयलक, तीक्ष्ण दृष्टि देलक आ अपन समकालीन सँ अलग विशिष्ट सांचामे ढालि देलक। चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द ओ एकटा अलग भाषा-संस्कार, शब्द-संस्कार ग्रहण कयलनि जे अपन स्वरूप मे व्यासजन्य अछि। लेकिन ई स्वरूप कतहु सँ ओझराबैत नहि अछि, अपितु कलाक सहजता आ सहजताक कला केँ विलक्षण ढंगेँ उद्घाटित करैत अछि। ओ अपन कथा मे परिवेशक कोनो पैघ आयोजन कि पसारमे नहि फँसैत छथि; हुनक अनुभवसिद्ध भाषा, अविकल्प शब्द सहजहि अपेक्षित परिवेश आ यथार्थ केँ एकटा पैघ फलक दऽ दैत अछि। सुभाष कोनो राग-विरागक उत्तेजनामे जतेक लिप्त छथि, ओतबे निर्लिप्तो। सुभाषक जीवन आ साहित्य ऊपर सँ जतेक शांत आ स्थिर बुझाइत हो, भीतर सँ ओतबे अशांत आ अस्थिर अछि। हुनक अन्तर्दृष्टि स्याह आ सफेदकेँ निर्ममता सँ उद्घाटित करैत अछि। हुनक रचनाकार समयक समुद्र मे डूबि-डूबि मोती-माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्य दस्तावेज बनि जाइत अछि। २.स्वरक माला गँथती अंशु-  जितेन्द्र झा हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि । ई कहब छन्हि अंशुमालाक । अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि। अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि । दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक  माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि । तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल' रहल छथि । बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ' क' मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि । एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि । मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि । दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं । ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक' रह' पडलनि । मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, 'जनता जे सुनऽ' चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि । पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि । मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान' लेल तैयार नहि छथि ।  धुन वा लयक अभाव नहि,  स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि । एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि । मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासं सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि । 'सभसँ पैघ कमजोरी स्रोतामे छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया' प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि । मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि । मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे स्रोतासँ भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही । मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि । मैथिली कलाकारकेँ आब' बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि । मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि । अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब' लेल आगु नञि आओत। १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २. स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) १.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (आगाँ) रङ्ग रस होरी हो। गाबह सब मिलि रङ्ग॥ रहसि-रहसि सब फागु सुहागिन गाबय मनक उमङ्ग। पहु परदेश विताओल हमरा (सरिवहे) भेल मनोरथ भङ्ग॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-१४) एहि नाटकक होलिकोत्सवक दृश्य अत्यन्त मनोरम अछि। रंग अबीरक प्रयोग होरीक हुड़दंग मचल अछि। ओहि अवसरपर राजसभाक प्रत्येक पात्र रंग अबीरसँ बोरल अछि। लोक होरीक हुड़दंग मचयबा आ उधम मचयबामे अस्त-व्यस्त अछि। राज्यादेश अछि जे एहि अवसरपर जे अनैच्छुक होथि तनिका एहिसँ फराके राखल जाय अन्यथा रंग-अबीरक सराबोर राज्याधिकारी लोकनि राजभवनमे उपस्थित छथि। राजभवन दिस जाइत नगरक शोभा ओ होलिकोत्सवक विकृत रूप दृष्टिगत होइछ। सभ एक दोसराक संग हँसी-मजाकमे व्यस्त देखल जाइछ। एहि अवसरपर बसन्तक राजाकेँ आशीर्वाद दैछ: महाराजक मन हरलक नटी, कहो लोक अपवाद। सयवर्षसँ जनि जीवी हारी हम दैछी आशिर्वाद। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-१४) शलाका पुरुष जीवन झाकेँ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ अपन नाटकमे एकर पालनार्थ उपयुक्त अवसर बहार कऽ लेलनि। कीर्ति पुरुष जीवन झा अपन नाटकादिमे धार्मिक भावनाक चित्रण सेहो अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि जे हुनक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक पृष्ठपोषक हैबाक प्रमाण दैछ। सामवती पुनर्जन्ममे अर्थोपार्जनार्थ सामवान आ सुमेधा विदर्भराजक ओतय दम्पत्ति-रूपमे पूजनार्थ नियुक्त होइत छथि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे सुन्दर-संयोगक कथानकक श्रीगणेश वैद्यनाथधामक प्रांगणसँ आरम्भ होइछ तथा ओकर अन्त सेहो ओतहि भऽ जाइछ। नर्मदासागर सट्टकमे नाटककार कपिलेश्वरमे शिवार्चनाक चर्चा कयलनि अछि। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर लोक स्नानार्थ गंगा-कमला जाइत अछि जे हमर सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवनक अविभाज्य अंगक रूपमे चित्रित अछि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टिएँ जखन हिनक नाटकादिक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे ई परम शिवभक्त परायण रहथि जे हिनक नाटकादिमे प्रयुक्त नचारी आ महेशवाणीसँ भऽ जाइत अछि। मिथिलांचलक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि ठामक निवासीक वैशिष्ट्य रहल अछि जे सात्विक भोजनक पक्षपाती रहलाह अछि। एतय तामसी भोजन सर्वथा वर्जित मानल जाइछ। एहि परम्पराक पालन नाटककार स्थल-स्थलपर अपन नाटक मे कयलनि। २. डॉ. देवशंकर नवीन डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ) नायक देवकान्त सुशिक्षित, निविष्ट, कर्मनिष्ठ आ ज्ञानी युवक छथि। हाइ कोर्टमे कार्यरत विशिष्ट व्यक्तिक पुत्रा आ प्रतापी रईसक पौत्रा छथि। कलाप्रेमी, कलाकार, प्रतिष्ठित, साहसी, उदार आ परोपकारी। सुशीलाक रुग्न पति अनिरुद्ध बाबूक टूटल गाड़ी कमलदहमे फँसल छलनि, ओ लोकनि के छथि, तकर सूचना देवकान्तकें नहि छलनि, तथापि हुनका सहयोग देब; सुलतानगंजमे नाहसँ डूबैत दम्पतिकें बचाएब; कुलानन्दक संग सुशीलाक प्रवासक जानकारी रहितहु, हुनका आर्थिक सहयोग देब -- ई सब आचरण देवकान्त उदारता आ मनुष्यताक परिचायक थिक। एकर अलावा देवकान्तक गम्भीर आ जिद्दी स्वभावक चित्राण सेहो भेल अछि। मुदा देवकान्तक जिदसँ हुनकर अपन जे किछु बिगड़ि गेल हो, आनक किछु नहि बिगड़लनि। परंच मूल बात अछि सुशीला आ देवकान्तक अनुरक्तावस्थाक मनोविश्लेषण। अइ विश्लेषणमे उपन्यासकार सहजहिं चमत्कृत करै छथि। अइ अनुरक्तिक कथाकें माँसल आ उन्मादक बना क' पाठकक कामेच्छा आ कुत्सा बढ़बै लेल नहि; समाज व्यवस्थामे चलैत अयथार्थ आदर्श आ मर्यादाक प्रति पाठक/भावककें उद्वेलित करै लेल। एहि चित्राणमे राजकमल चौधरीक मनोविश्लेषणात्मक शिल्प अत्यन्त प्रभावकारी साबित भेलनि अछि। उपन्यासतँ मानव जीवनक यथार्थक आख्यान होइत अछि, जाहिमे घटना चक्र आ स्थान-काल-पात्राक आश्रय लेल जाइत अछि। मूल कथाक संग-संग कतोक आनुषंगिक कथा अबैत अछि आ अइ सब क्रियामे चरित्रा-चित्राणक अमूल्य योगदान होइत अछि। चरित्रा-चित्राणेक माध्यमे कथानकमे प्रवाह अबैत अछि आ लक्ष्य प्राप्तिक बाट सोझराइत अछि। उपन्यासक पात्राक चारित्रिाक फलक जतेक सोझराएल रहत, ओकर अभिक्रिया आ आन पात्राक संग कथोपकथन स्पष्ट आ गत्यात्मक हैत। जें कि कोनो व्यक्तिक एक-एक आचरण ओकर मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि, चरित्रा चित्राणमे मनोविश्लेषणक महत्व सर्वोपरि होइत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय साहित्यमे एहेन देखल गेल अछि जे रचनाकार लोकनि अपन हरेक पात्राक आचरण ओकर मनोविश्लेषण करैत अंकित केलनि अछि, राजकमल चौधरी अइ काजमे सर्वाधिक अग्रगामी, प्रयोगधर्मी आ नवतामूलक साबित भेलाह अछि। चरित्रा चित्राणक प्रसंग प्रेमचन्द सेहो एहि तथ्यक समर्थन दै छथि जे चरित्रा चित्राण जतेक स्पष्ट, गतिशील आ विकासमान रहत, उपन्यास ओतबे बेसी प्रभावकारी हैत। प्रेमचन्द इहो स्वीकारलनि जे मनोवैज्ञानिक सत्यक आधार पर कथा उत्तम कोटिक हैत। राजकमल चौधरीक सम्पूर्ण कथा संसार तँ मनोविश्लेषणसँ भरल अछि, आलोच्य उपन्यास ÷आदिकथा'क तँ मूल आधारे मनोविश्लेषण अछि। कहै लेल ई कथा सुशीला आ देवकान्तक प्रेम कथा थिक, मुदा दू मेसँ एको कखनहुँ किनकहु मुँह फोड़ि कए नहि कहलखिन जे हम अहाँसँ प्रेम करै छी। सौंसे समाजमे केओ ई नाहि घोषित केलनि जे दुनूमे प्रेम अछि। समाज, आ कि कुलानन्द, आ कि हरिनगर वाली (अनिरुद्ध बाबूक दोसर पत्नी, सुशीलाक माँझिल सौतिन, महानन्दक माइ, कुलानन्दक सतमाइ) अइ अनुरक्तिकें मोने मोन छिनरपन मानलनि। मुदा, ई कथा एकटा दुखान्त प्रेम-कथा थिक। सम्पूर्ण कथा सबहक मोनेमे बनैत, बढ़ैत रहल। पात्राक व्यक्तित्व, प्रवृत्ति, क्रिया-कलाप, रागात्मक मनोवेग आदिक चित्राणसँ घटना चक्र, परिस्थिति आ परिवेश सुगठित आ प्रभावकारी भेल अछि। पात्राक इच्छा-अनिच्छा, पसिन-नापसिन, क्रोध-घृणा-प्रेम, राग-अनुराग, भोगेच्छा आदिसँ कथानकमे स्वाभाविकता आ विश्वसनीयता आएल अछि। कोनो मनुष्य प्रेम करए, घृणा करए, मारि करए, समर्थन आ विरोध करए, पूजा करए, व्याभिचार करए--ई सबो टा आचरण ओकर जीवन दर्शनसँ निर्धारित होइत अछि, जकर जानकारी ओकर मनोविश्लेषणसँ भेटैत अछि। परिवेश, प्रशिक्षण, संस्कार, प्रतिभा, अनुभव आदिक समन्वित प्रभावमे कोनो व्यक्तित्व अपन जीवन दर्शन दिढ़ करैत अछि; मुदा मनुष्य जाति जें कि सामाजिक पशु थिक, कतोक परिस्थितिमे ओकर समस्त जीवन-दर्शन विवश भ' जाइत अछि। मनोविज्ञान कहैत अछि जे कोनहुँ क्रियाकें निष्पादित करबामे कर्त्ताक धारणा महत्वपूर्ण होइत अछि। मनुष्यक आजन्मक संस्कार, अतीतक समस्त बिसरल घटना, जीवन भरिक अनुभूति ओकर अवचेतनमे विराजमान रहैत अछि, समय पाबि कए ओएह सब बात ओकर प्रवृत्ति, आचरण आ धारणाकें निर्देशित करए लगैत अछि। आदिकथा उपन्यासक विभिन्न चरित्राक मनोविश्लेषणमे ई समस्त तत्व प्रभावी अछि। एहि उपन्यासक रचनाकाल धरि भारतीय स्वाधीनताक एक दशक बीत चुकल छल। मुदा मिथिलाक लोक--की पण्डित, की मूर्ख; की सामन्त, की मजूर...आदिम सभ्यताक मानसिकतामे जी रहल छल। पुरुषवादी अहंकारक एहेन फोंक प्रदर्शन तँ आदिमो युगमे नहि छल, जतए स्त्राीकें बच्चाक जन्म देब' बला मशीन; पुरुषक कामेच्छा अथवा कुत्सा शान्त कर' बाला यन्त्रा; घर-अंगना सम्हार' वाली परिचारिका; आ पुरुषक मुँहें प्रशंसा सूनि पुलकित रह' वाली पोसुआ पशुक अलावा आओर किछु नहि बूझल जाइत हो। आसुरी भोग-विलास आ ढोंग-पाखण्ड-अन्धविश्वास-धर्मभीरुताक प्रवंचनामे सौंसे मिथिला डूबल छल। जखन कि सौंसे देशक प्रगतिशील समाजमे जीवनक जटिलता, विचित्राता पर चिन्तन-मनन फैलसँ भ' रहल छल। लोक आधुनिक भावबोधसँ जीवनकें देखए लागल छल। मानव जीवनक उज्ज्वल आ कलुष भाव पर तुलनात्मक चिन्तन होअए लागल छल। एहना समयमे मैथिलीमे प्रभावकारी उपन्यास लिखबाक एकहि टा शिल्प भ' सकै छल--से छल मनोविश्लेषणात्मक चरित्राांकनसँ वस्तु स्थितिकें नाँगट करबाक कौशल। हमरा मनोविश्लेषण केने हरिमोहन झा ÷कन्यादान'मे मैथिलक विदूषकीय आचरणक धज्जी उड़ा देलनि, मुदा मैथिल लोकनिकें ओहेन प्रहारक व्यंग्य, हास्य बुझेलनि। आचार्य प्रवर लोकनि उदारतापूर्वक हुनका हास्य सम्राटक उपाधि द' देलखिन। वस्तुतः ÷आदिकथा'क कथ्यो एहने अछि जे मनोविश्लेषणक अलावा दोसर कोनो सरिआएल बाट ताकलो नहि जा सकै छल। यौवनक अटट दुपहरियामे कोनो स्त्राीकें निश्चित रूपें कोनो सम्पूर्ण पुरुषक छाहरि चाही; पुष्पवती-फलवती हेबा लेल आतुर अथवा मुदित-पुलकित हेबा लेल उत्सुक-उत्फुल्ल कोनो हरियर लताकें कोनो मजगूत डारिक आसरा चाही। सुशीला एहने उत्तप्त स्त्राी आ एहने अलसाएल लता छथि; हुनका देवकान्त चाही छलनि मुदा अनिरुद्ध भेटलखिन; चाननक गाछ चाही छलनि, मुदा भाँटि-भँगरैया भेटलखिन। स्त्राीक जीवनमे अर्थसँ बेसी सार्थक बहुत किछु होइत अछि, से बात मैथिल प्रतिनिधि अनिरुद्ध, हुनकर स'र-कुटुम, सम्बन्धी-सरोकारी नहि बूझि रहल छलखिन; एते धरि जे कुलानन्दोकें तकर खाहिस नहि भेलनि। गम्भीरतापूर्वक देखल जाए तँ अइ उपन्यासक अधिकांश घटनाचक्र चरित्राक मोनहिमे घटित भेल अछि। सभ क्यो अपन मन्तव्य संकेतहिमे व्यक्त केलनि अछि, किनकहु धारणा स्पष्ट बोलीमे स्पष्ट नहि भेल अदि। अनिरुद्ध बाबू सन अशक्य आ वृद्ध जमीन्दारक भौतिक सम्पदा, सांसारिक असार-पसार, सतौत सन्तानक कारणें बेटा, पुतोह, धी, जमाइ, नाति-पोतासँ भरल-पुरल घर पाबियो कए कामदग्धा सुशीला अतृप्त छथि। अतृप्त कामेच्छाक दमन हेतु हफीमक सेवन करए लगै छथि। उत्तेजनामे कएल आचरणक सूचना पाबि लजा जाइ छथि, कामातुरा प्रवृत्तिक होइतहु सामाजिक आदर्श आ कौलिक मर्यादाक पालनमे अपनाकें ध्वस्त करैत रहै छथि, नहुँ-नहुँ जरबैत रहै छथि। रुग्ण पति संग यात्राा करैत अचानक देवकान्तसँ भेंट होइ छनि। देवकान्तक यौवन, स्वास्थ्य, पराक्रम, कला प्रेम, उदारता आ सौहार्द देखि हुनकासँ मोने प्रेम करए लगै छथि। परम शिष्ट, धीर, प्रशान्त सुशिक्षित, उदार आ दृढ़ प्रतिज्ञ देवकान्त मोनमे सेहो प्रेमक तरंग अहिना उठैत अछि। आ, दुनूक प्रेमांकुर तीव्र गतिसँ पसर' लगैत अछि। मुदा जहिना दुनूक मामि-भागिनक सम्बन्ध-कथा सुनिश्चित होइत अछि। प्रेमक उद्वेग भीतरे-भीतर सुनग' लगैत अछि। किन्तु प्रेम होइत अछि आगि, ओकरा पर काँच-कोचिल जते झाँपन देल जाए ओ आओर तीव्रतासँ, अधिकाधिक उत्तापसँ प्रज्ज्वलित होइत अछि। पे्रमक ई तीव्र उत्ताप सामाजिक मर्यादाक जर्जर सूत्राक कारणें अन्नतः सुखान्त परिणति धरि नहिएँ पहुँचैत अछि। मुँह फोरि कए अइ प्रेमाभिव्यक्तिक अवसर धरि दुनूकें हाथ नहि अबै छनि। दुनू भीतरे-भीतर सुनगैत रहै छथि। मनोविश्लेषणक आधार पर दुनूक आचरणमे देखल जा सकैत अछि जे दुनूक मोनमे आगि कोन गतिसँ धधकि रहल अछि। सौन्दर्यक प्रति आकर्षण मनुष्यक स्वाभाविक आचरण होइत अछि। चाहिओ क' कोनो व्यक्ति सौन्दर्यक उपेक्षा नहि क' सकैत अछि। सौन्दर्य बोध, आ अनुरक्ति कर्मक अपन शास्त्रा आ विधान होइत अछि, जे अलग-अलग प्राणीक आन्तरिक-बाह्‌य परिस्थिति आ मनोदशासँ निर्देशित होइत अछि। भूखसँ व्याकुल कोनो बरदकें लहलहाइत घास, आ कि सूखल नार-पुआरमे सौन्दर्य भेटतै, अनुरक्ति हेतै। मुदा घास अथवा नार-पुआरक घेराव, आ कि बरदक गरदनिक पगहा, आ कि मुँहमे लागल जाबी...अइ भोगक बाधक बनि सकैत अछि।...सुशीला परम सुन्दरी छथि। वयस, तदनुकूल सौन्दर्य, यौवन, आचरण, ओज, भाव आदि भादबक बाढ़ि जकाँ, उमड़ैत मेघ जकाँ उपरौंझ क' रहल छनि। ब्राह्म मूहूर्त्तमे निश्चिन्त निद्रा आ अलस मुद्रामे हुनका सूतल देखि देवकान्त दिव्य-दर्शनक अनुभव केलनि। नारी-सौन्दर्यक एहन दिव्य-दर्शन हुनका जीवनक पहिल अवसर छल, एकटा सुमधुर स्वप्न छल। वस्तुतः --हृदय कोनो सीमा-बन्धन नहि मानै'ए। कहियो नहि मानि आएल अछि।-- देवकान्तक मोनमे प्रेमक लहरि उमड़ैत रहै छनि। सुशीला मामीसँ भेंट करबाक इच्छा होइत रहै छनि, तै ले' मातृक (रामपुर) जाए पड़तनि। मुदा रामपुर नहि जेताह। इच्छा होइ छनि, मुदा अपनहि इच्छासँ भय होइ छनि। मातृक-पैतृक मर्यादा पर, अथवा सुशीला मामीक शील पर, अथवा अपन व्यक्तित्व पर आँच लागि जेबाक भय होइ छनि। मोने-मोन सुनगैत रहै छथि, मुदा मातृक जा क' सोझाँ-सोझी सुशीलाकें कहि नहि अबै छथि--मामी, सोना मामी, हमरा अहाँसँ प्रेम भ' गेल अछि। हम अहाँ बिना नहि रहि सकब। अहाँ सन ऊर्वर ऊर्जस्वित, उत्तेजनामयी, कामातुरा रूपवतीक वेगमय ज्वारकें हमर वृद्ध, अशक्य मामा नहि थाम्हि सकताह, हम थाम्हि लेब। अहाँ हमरा संग चलू। संग-संग रहब। जीवनकें जराएब नहि, स्वाहा नहि करब, जीब...। (अगिला अंकमे) २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति सातम दिन : ३१ दिसम्बर १९९०, सोमवार : आहि भोरे जहन हम उठलहुं तऽ सब पहिनेहे उठि गेल छल।हम जल्दीसऽ तैयार भऽ गेलहुं। फेर सब संगे मंदिर पहुंचलहुं।विभिन्न देवी देवताक दर्शन भेल।तकर बाद हम इम्हर उम्हर घुमति रहुं।तकर बाद पुनःभोजन आऽ फेर  बकरेश्वर दिस विदा।रस्तामे शिक्षक सब बतेला जे विद्यालय के संचालनमे हुनकासबके की की दिक्कत होएत छैन।अहि तरहे हमसब अपन अपन परेशानीक आदान प्रदान करैत रहलहुं।हमरा सबके तहन अनुभव भेलजे कखनो काल सामनेक परिस्थिति सऽ उत्तेजित भऽ हम छात्रगण शिक्षक सबदऽ गलत धारणा बना लैत छी।जे की बहुत गलत छै।हॅं तऽ हमसब बकरेश्वर पहुंचलहुं।सॉंझक ६ बाजल छल।आहि १९९० के आखिरि दिन छल ताहि द्वारे हम सब अपन अपन समान सैंतकऽ सांस्कृतिक कार्यक्रमक तैयारीमे लागि गेलहुं। ताहि बीचमे हमरा सबके हेडमास्टर के तरफ सऽ बुलावा आयल।हमसब डेरा गेलहुं जे हमर सबमे सऽ एकटा छौड़ी ककरो समान फेक देने रहै तैं सबके डपटै लेल बजायल जा रहल अछि।अहि तरहक आशंका सऽ डेरा हमसब जहन ओतऽ पहुंचलहुं तऽ सब छौड़ा सब बहुत खुश छल तहान हमसब कनिक खुश भेलहुं। लेकिन फेर मुड गड़बड़ा गेल ।कियो बाजल जे छौड़े सब शिकायत केलक तैं ओ सब तऽ खुश हेबे करत।हमसब बैसकऽ शिक्षक के प््रातीक्षा करऽ लगलहुं।मुदा जखन ओ एला तऽ हुन्कर हाथमे छड़ीके स्थान पर एक कॉपी छलैन आ ओ मुस्कुरा रहल छलैथ।आबिकऽ ओ घोषित केलैथ जे मृगांक नामक एक छात्रक आहि जन्मदिवस अछि तैं हम एकटा स्वरचित कविता सुनायब।ई सुनैत देरी हमसब खुशीसऽ उछलि पड़लहुं।आब की छल हमसब कविता सुनलहुं मिठाई खेलहुं आ भोजन कऽ पुनथ नाटकके तैयारीमे लागि गेलहुं। ठीक  एगारह बजे हमसब एक कोठलीमे जमा भऽ कार्यक्र्रम प्रारंभ केलहुं।हमहु एक नाटकमे भाग लेलहुं जाहिके डाइरेक्टर आ राएटर सेहो हम रही।फेर बारह बजे रातिकऽ समूहगान संगे नववर्षक स्वागत केलहुं।शिक्षक सब सेहो अपन कार्यक्रम प्रस्तुत केलैथ।अन्ततः हम सब सुतै लेल जाय लगलहुं। जाय सऽ पहिने हमसब गुडनाइट' वा शुभरात्रि'के स्थानपर हैपी न्यू इयर' वा द्यनववर्षक शुभकामना' बाजि रहल छलहुं। ५.पद्य ५.१.श्यामल सुमनक-अभियान ५.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (पाँचम खेप) ५.३.महाकाव्य- बुद्ध चरित ५.४.डॉ पंकज पराशरक 4 टा कविता ज्योतिक -पतझड़क आगमन ५.५.विनीत उत्पलक ५ गोट कविता ५.६. महेश मिश्र "विभूतिक" कविता गङ्गा-स्तुति श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर  जिला  सहरसा  बिहार। स्नातक शिक्षा:अर्थशास्त्र  राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा। प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर। स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन। अभियान देश-प्रेम के भरल भाव सँ, नित निर्माण करै छी! सहज-भाव सँ संविधान के, हम सम्मान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! सड़क, रेल, बिजली जुनि पूछू, बाढ़ भेल सौभाग्य हमर! विद्यालय बिनु पढ़य नै बच्चा, छी बड़का दुर्भाग्य हमर! आजादी सँ भेटल की हमरा, सब किछु ध्यान धरै छी! बिना विकासक कष्ट मे रहितहुँ, राष्ट्रक गान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! सब चुनाव के बेर मे पूछथि, बाकी सब दिन रहता कात! आजिज छी आब सुनि-सुनिकय, हमसब हुनकर मीठका बात! एक अंग मिथिला भारत के, व्यंग्यक बाण सहै छी! सहनशीलता हमर एहेन जे, एखनहुँ मान रखै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! हरेक साल मिथिलावासी मिलि, जाइछी जेना बाबाधाम! तहिना चलू एक बेर संसद, किछु नै किछु भेटत परिणाम! उन्नत मिथिला के खातिर हम ई अभियान करै छी! राश्ट्र-भक्ति मे मिलिकय श्रद्धा-सुमन प्रदान करै छी! तखनहुँ पिछड़ल कियै हमर मिथिला, पूछै छी हम दिल्ली सँ!! . श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम  नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका  “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।  श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ,  मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस  "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक। गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। राधा  (पाँचम खेप) अहां चुप छी चुप्प अछि संसार अहां नहि तं सब किछु चुपचाप ओना तं चलिये रहल सब नित्य मुदा नहि बूझब इयेह अछि सत्य मनहि मन लोकक मिझायल दीप राति तं राति, दिन सेहो भ' गेल छैक निष्प्राण नीरस आ उदास अन्हार ! बजैये बड़दिव चलैये-फिरैये लोक किन्तु नहि किछु लसि बोली मे ने रस करबा मे कोनो काज, हम तं सहजहिं पड़ल छी ओछाओन तें एकर अलावे जे अहंक मानस-संग मात्र अवलंब श्वांसक ओना सब टा बन्द, हमरा लेल आशा आ मनोरथ केर सब केबार ओना तं चलिये रहले समय भोर दुपहरि सांझ, रातिक चालि जगतक नित्य केर सब कारबार ! हमर सबकिछु बन्द अछि, सप्पत अधमृत ई संसार, प्राणाधार ! १४/४/०५ Top of Form 1.डॉ पंकज पराशर 2.ज्योति श्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। १. बखरी गै दाइ बखरी! बखरी के तँ बकरियो होइत छैक हक्कलि डाइन आ बूझल नहि छौक जे निःशब्दा रातिमे कोना गाछ हँकैत छैक ओहिठामक मौगी! कानमे जड़ी दऽ कए बंगालिन सब राखि लैत छैक भेंड़ा बना कए पुरुख-पातकेँ से तँ बूझले हेतौ ने! एहि लोकाख्यानक बीच हम बौआइत हम सोचैत छी जँ बखरीक बकरियो धरि होइत छैक डाइनि तँ बखरीक अस्मितासँ जुड़ल सलोना कोना एखन धरि बाँचल अछि एतेक सलोना! जा हे बखरी-सलोना! अनंत कालसँ अभिशापित बखरीक अतीत खाहे जे रहल हो मुदा आजुक बखरी तँ भाइ! एकदम अछि खखरी! खखरी-पटभड़ भेल बखरी आइ छुछुआइत अछि बकरी-छकरी जकाँ एहि बाधसँ ओहि बाध एहि खेतसँ ओहि खेत दू गाल अहरा लेल अपस्याँत बखरीक चिल्का सब देसक कोन-कोनमे भूगोलमे रहितो मिथिलाक इतिहाससँ अभिशापित मैथिल-संस्कृतिक अवैध संतान बखरी किएक नहि भऽ सकल कहियो तेहेन जेहेन अछि सकरी? जेहेन कोइलख जेहेन राँटी जेहेन मँगरौनी सलोनाक अछैतो तेहेन किएक नहि बखरी? खखरी सन आइयो किएक फटकल अछि बखरी मिथिलाक इतिहाससँ बाहर? २. धानक खेत गम्हरल धानक खेतमे जखन बहराइत अछि पहिल शीश दुधमुँह नेना सन तन्नुक-तन्नुक आ बसातक पहिल झोंक जकाँ खसैत अछि खेतमे लाखक-लाख भंख तँ दू टा पुत्रकेँ जन्म दइयो कऽ निःपुत्र भेल मुनिया मायक मुँहपर पिरी छिटकि जाइत छनि एतय हम बेटीक कन्यादानक चिन्तामे डूबल छी मुदा मुनिया बापक करेज देखियनु बाऊ जे बैसल छथिन निश्चिन्त भऽ कए डेढ़ बरखसँ डिल्लीमे ने कोनो चिट्ठी-पतरी ने गाम अयबाक गप छुच्छे फोन टा करैत छथि पल्टी मायक ओहिठाम मासक कोनो रविकेँ ओंघायल जकाँ गाम-घरक चिन्तासँ उदासीन बटेदारक कृपासँ कोनहुना रोपायल एहि बेर दस कट्ठा खेत जे जीबैत छी अगहनक आसमे नहि तँ सिदहा के चिन्तामे पड़ल रहितहुँ बाले-बच्चे उपास -एहि सबटा खेरहाक बीच उड़ैत रहल मुनिया मायक आँखिमे हेंजक-हेंज भंख शीशसँ आच्छादित दूध भरल धानक खेतमे ३. एमहर गाम एमहर कइक बरखसँ नहि सुनगल अछि सोनाय कमारक भाठि कचिया-खुरपीमे बेंट आ हरक फाड़ पिटयबाक लेल धुरियायले पएरे कोनो हरबाह नहि आयल अछि एमहर कहलनि बीसो बाबू-के जोतत हर एहि ट्रैक्टर युगमे अटंट दूपहरमे पितायल बड़दक संग सुखायल देह लेने के घुरत आब हराठसँ कान्हपर कटही हरमे लाधल पालो केर बोझसँ स्वयं बड़द भेल जखन हर नहि तँ हरबाहक कोन बेगरता फाड़ पिटयबाक कोन चिन्ता एहि ट्रैक्टर युगमे मनुक्खक कोन आवश्यकता? ...से कहैत छी भाइ जे एहि बेर नहि मानलक ककरो बात आ चलि गेल पंजाब हमरा गामक एकघरा हज्जाम कंतलाल ठाकुर मायपर तामसेँ बड़बड़ाइत- कमाय नहि धमाय अनेरो फाटय बेमाय बड़की काकी केर श्राद्धमे एहि बेर जखन नहि आयल क्यो हज्जाम तँ आन गाम विदा होइत झूर-झमान हमर पित्ती कालबिद्ध उदासीक खोहमे पानक सरंजाम मोटरी बन्हनेँ खेते-खेत बौआइत सुमरित तमोली आब नहि करैत अछि ढोनि एमहर विलुप्त भेल अछि गामक भाषासँ सेहो जऽन आ बोनि थथमारिकेँ किछु चीजकेँ जोगयबाक प्रयासमे उपहासक पात्र बनल हमर बाबा लिखलनि अछि चिट्ठी जे ओहो अओताह दिल्ली किछु काज-उदेम करताह एहू उमेरमे किछु नहि तँ पानिये भरताह ककरो चिल्केकेँ डेबताह मुदा गाममे आब किन्नहु नहि रहताह भकोभन्न देहरिपर जरैत माटिक दीप केर इजोतमे तकैत छी हम सुन्न घरक नीरवतामे सुकरातीक ओरियाओन ज्योतिक्षीण आँखिक प्रत्याशा केर खंड-खंड चिनगी अपन गाममे सिरपंचमीमे आब ठाढ़ नहि होइत अछि ककरो हर आ ने जाइत अछि लऽ कए कमरसारि ककरो हरबाह एमहर कइक बरखसँ एहिना बीतल अछि सिरपंचमी कहलनि बीसो बाबू-लोथ भेल भोथ भेल कोदारि-खुरपी आ हर-फाड़क मादे जूड़शीतलमे आब जुड़ाइत अछि ट्रैक्टरक पहिया आ गाममे नहि बाँचल अछि एहेन कोनो घर जकर खेत नहि लागल हो भरना आ नहि बटैया ४.भूत घैलक-घैलक पानि उघि कए जे किसुन महतो लगेलनि मालदह आमक गाछी आ एतेक टाक परिवार- से हुनके लेल आब भऽ गेलनि दिनकेँ गाछी रातिकेँ भूत। 2. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति पतझड़क आगमन पतझड़क आगमन दहैक रहल वातावरण संतरा, पीयर, लाल, भूरा रंग सऽ भरल पूरा प्रकृति जेना भेल जीर्ण मौलाएत झड़ैत तृण-तृण विविध रंगके त्यागिकऽ गेरूवा वस्त्र धारिकऽ विदा भेल लेबऽ सन्यास ताहि पर सुर्योदयक आकाश धरतीपर जे आगि छल ताहिमे ओहो लिपटल आकि अछि दर्पण जकॉं पृथ्वीक रूप देखाबैत जेना अकरा शीतल करैलेल साधु तपस्यामे लीन भेल जहिया हिमक बरखा हैत अस्वच्छता जखन दूर हैत तहिया सऽनवजीवनक प्यास लायत सुखद वसंतक अभिलाष। १.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ  इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक .। १. इन्द्रप्रस्थक कथा युग-युग सं लिखल जा रहल छैक इन्द्रप्रस्थक कथा द्वापर मे अहि ठाम छल पांडवक राजधानी जकरा पावैक लेल अठाराह दिन तक भएल महाभारत मारल गेल हजारों लोक समय बदलल आब नहि छथि ओ पांडव नहि ओ कौरव मुदा, आबो मारल जाइत अछि लोक तहिया उजड़ि गेल छल गामक-गाम आई कामनवेल्थक नाम पर उजड़ि रहल छैक गरीबक झोपड़ी हम पूछैत छी शिखंडीक आगू कs रचल गेल छल षड्यंत्र सत्ताक लेल भाई-भाई कs दुश्मन भेल मारि-काटि कs करलक वंशक नाश आब अहि इन्द्रप्रस्थ मे वर्ल्ड क्लासक नाम पर रचल जाइ अछि षड्यंत्र गरीब कए भगाबैक लेल. २. नौकरी उर्फ़ आजीवन कारावास नेना मे अहां घोइट-घोइट कs याद करैत रहियै किताबक पन्ना सोचैत रहियै खूब पढ़ि-लिख कs नीक सन नौकरी पाइब तहि लेल दिन-रात घिसैत रहि कलम क्लास मे आबैत रहि प्रथम मुदा, जखन नहि भेटल सरकारी नौकरी तs प्राइवेट नौकरी करै परल एहि समय मे नहि अपन लेल समय नहि परिवारक भरण-पोषणक लेल पाई एहि ठाम विकट परिस्थिति मे मन परैत छैक बरटोल्ड ब्चेस्ट हुनकर कहब छ्ल एक गोटा कs कम तनख्वाह देब माने छल आजीवन कारावास हम पूछैत छी अहां कहू या बताऊ कोन नीक कम तनख्वाहक नौकरी वा आजीवन कारावास एक ठाम, अहां कs दुनिया भरिक दायित्व मुदा, नहि रहैत शांति दोसर ठाम, अहां क दुनिया भरिक शांति मुदा, नहि रहैत कोनो दायित्व. ३. जाइत-पाइत जाइत-पाइत धर्म-संप्रदायक लकए जखन ताहि एक-दोसर कs देखए नहि चाह्बै तखन धरि आहंक कल्याण नहि होइत जखन अहां जनइत अछि कर्मक आधार सं बांटल गेल रहए जतिक भेद तखन अहांक ई भड़ास आओर ई तामस वा चिचियाइब देखि कs हंसी आबैत छी हमरा जहि जुग मे जेकरा जे नीक लागल अहिने धर्म वा संप्रदाय बनौउने छैक जकरा जाहि सं चित जुड़्लाह तहि सं जुड़ल जकरा जाहि सं चित नहि जुड़ल से नहि जुड़ल ओहिना मे अहां जे दोसरा कs गाइर-फ़जीहत करैत छी आहि सं केकरो नहि बस अप्पन पहचान बताबैत अछि. ४. एक धुर जमीन एक धुर जमीनक लेल जे अहां चिचिया रहल छी की सोचैत छी अहां संगे लs जाइब एक धुर जमीन सं किछु नहि होइत सालों कि हजारों साल सं जमीन ओहि ठाम छैक आई छी अहां काइल नहि रहब जे अहांक जमीन छेकेन छथि ओ सेहो नहि रहताह मरलाहक बाद चारि हाथ जमीन चाहि अंतिम संस्कार लेल तकरा बाद सब छी माइट तखन एक धुर माइट लेल कथि ले मरैत छी कथि ले चिचियाइत छी कथि लेल मन मलिन करैत छी तs सुनु, नहि करू ई माइट लेल हाय-हाय कोनो एहन काज करू माइट कि सभक दिल मे बैइस जाऊ. ५. चंद्रमुखी अंगप्रदेशक लोक नहि जनैत अछि चंद्रमुखी कs सुखी अछि जे सभ कियो ओकरा नहि जनैत अछि दुखी अछि जे कियो ओकरा जनैत अछि जे जनैत अछि शरतचन्द चट्टोपाध्याय कs देवदास कs ओ जनैत अछि जनैत छैक सेहो अंगप्रदेश क अंगप्रदेशक निवासी छलीह चंद्रमुखी नगरवधू नहि मुदा ओकरो सं कम नहि छलीह जोगसर मे हुनकर कोठा छलाह शरतचन्द गेलाह हुनकर संग चंद्रमुखीक आत्मा अंगप्रदेश कs छोड़ि देलखिन आब नहि ओ ठाम, नहि ओ ठिकाना जे पारो व देवदास कs जनैत अछि चंद्रमुखीक तकलीफ़ जनैत अछि जे नहि जनैत अछि अनजान बनल अपने मे रमल अछि. महेश मिश्र “विभूति” महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक। गङ्गा-स्तुति जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे, जय माँ गङ्गे। बड़ भागी नर, कल्पवास कर, नित दिन सुलभ विमल तरङ्गे।। जय माँ गङ्गे.. सदिखन दर्शन, नित दिन मज्जन, नित दिन निर्मल काया अङ्गे। मानस विमल वो निर्मल काया, चिन्तन, मनन, भजन नित सङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... कथा-श्रवण , कीर्तन मनमोहक, पल-पल कटते अनुपम ढङ्गे। चिन्तन, मनन, भजन सुखदायक, निशिवासर लभते बहुरङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... मन-मल-रेचन, भव-भय-मोचन, त्रिविधताप भवसागर भङ्गे। विमल “विभूति” मोक्षदायिनी, सादर सुलभ; होहु नहिं तङ्गे॥ जय माँ गङ्गे... चित्रकार: ज्योति झा चौधरी ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८. मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”। भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)। अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल। सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)। मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित। अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)। व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)। चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। मिथिलांचलक शैव क्षेत्र देवाधिदेव शिव सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्म छथि। आदिदेव महादेव छथि। प्राचीनतम देवता पशुपति छथि। वैदिक साहित्य (यजुर्वेद, अध्याय-१६)क शतरुद्रिय सूक्त तथा पौराणिक साहित्य (वायुपुराण)मे हिनक पूजोपासनाक विस्तृत सिद्धांत विवेचित अछि। सूर्य, चन्द्र आओर अग्निक त्रिनेत्रधारी शिवकेँ प्रणाम- चन्द्रार्क- “वैश्वानर लोचनाय नमः शिवाय”। शिवक हाथ सभमे त्रिशूल, डमरू, मृग ओ परशु शोभित छनि। ज्ञान, इच्छा ओ क्रिया शक्तिक क्रियाशील रूप त्रिशूल थिक। डमरु शब्द ब्रह्मक प्रतीक अछि। शिवकेँ मृगधर कहल गेल अछि। मृग वस्तुतः वेद अछि- “अत्र वेदो मृगः”। परशु संहार सूचक अछि। पशुपति शिवक प्रत्यक्ष रूप थिक। वेद, उपनिषद एवं पुराण साहित्यमे प्राणिमात्रकेँ पशु कहल गेल अछि। अतः शिवक पशुपति नाम सार्थक अछि। पशुपति शिवक प्राचीनतम मूर्ति (मृ.मोहर) मोहनजोदड़ो-हड़प्पा संस्कृतिमे प्राप्त भेल अछि। द्विभुजी पशुपति योगासीन छथि। हुनक मूर्तिक चारू दिस अनेक पशु  चित्रित अछि। हुनक माथपर दू टा सिंगवला सिराभूषण शोभित छनि। आलोच्य पशुपतिक रूपांकन एखन धरि अद्वितीय अछि। शैव क्षेत्रमे नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू) क विख्यत पशुपति चतुर्मुखी शिवलिंगक रूपमे विख्यात अछि। एहि पशुपति शिवलिंगक एकटा मध्यकालीन प्रतिमूर्ति अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वरनाथ महादेवक मन्दिर परिसरमे दर्शनीय अछि। नटराज सहस्रनाम भाष्य (मद्रास १९५१ ई.) क अनुसार द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिमात्रक देवता पशुपति छथि। वराहपुराण एवं विष्णुपुराणक अंतः साक्ष्यक अनुसार शिव हिरण्याक्षपुत्र अन्धकासुरक बध काशीमे कयने छलाह। ओ त्रिपुरासुर ओ गजासुरक बध सेहो कयने छलाह। ओ सभ महामोह (अविद्या)क प्रतिरूप छल। भारतीय मूर्तिकलामे गजासुर बधक प्रस्तर मूर्ति मिथिलांचलमे प्राप्य अछि। शिव संहारक देवता छथि। ओ अविनाशी सर्वात्मा छथि। शिव लीलाधर छथि। ओहि लीलाधर शिवक एकटा स्वरूप नटराजक थिक।शिवक नृत्य सृष्टि विधान थिक एवं निवृत्तिकेँ प्रलय मानल जाइछ। जगतक रक्षा हेतु ओ नित्य सायंकाल नृत्य करैत छथि। ओहि समय देवादि उपस्थित रहैत छथि। जगतक सृष्टि प्रवर्तनक लेल शिव लास्य ओ संहारक लेल शिव ताण्डव करैत छथि। “ताल”क शाब्दिक रचना “ता” ओ “ल” सँ भेल अछि। अतः शिव ओ शिवा नृत्यमय छथि, संगीत-नाट्यादिक आदि प्रवर्तक छथि, डमरू ध्वनिसँ निनादित माहेश्वर सूत्र अर्थात् शब्दशास्त्रक निर्माता छथि। शिवकेँ नटराज, नटेश नृत्यनाथ अथवा नटेश्वर सेहो कहल जाइछ। चिदम्बरमक नटराज मूर्ति सर्वप्रसिद्ध अछि। मिथिलांचलसँ नटराज शिवक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति प्राप्त अछि जाहिमे ओ अपस्मारक कान्हपर आरुढ़ भऽ नचैत छथि। नटराजक जटामे अमृतक प्रतीक चन्द्रमा अछि। प्रभावली सहित अथवा प्रभावली रहित नटराजक मूर्तिक विधान अछि मुदा ओ स्फुलिंगमयी ज्वालसँ घेरायल रहैत छथि। मिथिलांचलक प्रसिद्ध शिवमन्दिर सभमे लोक रुद्राक्ष ओ त्रिशूल धारण कऽ डमरुक संग नचैत छथि। मैथिलीक प्राचीन नाटक सभ एहि नृत्यनाथक नामे समर्पित अछि। मिथिलांचलमे शिवभक्तिक लेल नचारी, महेशवाणी, हरगौरी सम्मरि, हरगौरी विवाह आदि संगीत-नाट्यादि बेस लोकप्रिय एवं परम्परित अछि। तारालाही (दरभंगा) एवं मखनाहा (तराई)क अष्टभुजी नटेशक मूर्ति कर्णाटयुगीन अछि। शिवक तीनटा रूप विशिष्ट अछि- अर्धनारीश्वर, हरिहर ओ त्रिमूर्ति। त्रिमूर्ति शिव वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु, महेशक शक्तिक समाहार अछि- ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् प्रधाना ब्रह्मशक्तयः।– विष्णुपुराण। एहिमे सृष्टि (ब्रह्मा), स्थिति (विष्णु) ओ विनाश (शिव)क तत्व सभ निहित अछि। सृष्टि, स्थिति ओ प्रलयक कारक शिवे छथि। त्रिमूर्तिक विशाल गुप्तकालीन प्रतिमाक साक्षात एलफेण्टामे कयने छलहुँ। मिथिलांचलक भच्छी (दरभंगा)मे त्रिमूर्तिक अभिलेखांकित मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति भद्रेश्वर महादेव मन्दिर (बहेड़ी प्रखण्ड)मे पूजित अछि। त्रिमूर्ति सत्, रज ओ तमोगुणक प्रतिनिधित्व करैत अछि। सिद्धांततः हरि (विष्णु) ओ हर (शिव) अभेद छथि अर्थात् संयुक्त रूपेँ हरिहर छथि। विद्यापतिक निम्नलिखित पदसँ स्थिति आर स्पष्ट भऽ जाइछ- खन हरि खन हर भल तुअ कला। खन पित वसन खनहि बघछला॥... एक शरीरे लेल दुइ बास। खन बैकुण्ठ खनहि कैलास॥ हरिहरक मूर्तिक अर्द्धांगमे व्याघ्रचर्म, त्रिशूल, जटामुकुटादि एवं अर्द्धांगमे पीताम्बर, शंख-चक्र, किरीट मुकुटादि शोभित छनि। हरिहरक विशाल प्रस्तर प्रतिमा गंगा-गंडक-संगमपर अवस्थित हरिहरनाथ मंदिरमे स्थापित अछि। हरिहरक एकटा पालकालीन भव्य प्रस्तर (कसौटी पाथर) मूर्ति हम वाल्मीकिनगर (भैंसालोटन) मे देखने छलहुँ। ओ ओहिठाम अन्यान्य मूर्ति सभक संगे संरक्षित अछि। हरिहरक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण छथि। शिवक तेसर स्वरूप अछि अर्धनारीश्वर अर्थात् आधा देह शिवक ओ आधा पार्वतीक। शिवक जटापर चन्द्रमा ओ हाथमे त्रिशूल शोभित अछि एवं आर्धांगिनी पार्वतीक हाथद्वयमे दर्पण ओ कमल पुष्प। अर्धनारीश्वरक परिकल्पना सृष्टि बोधक अछि। लिंग ओ वेदीक एकस्थ भेने अर्धनारीश्वरक रूप प्रत्यक्ष होइछ। “लिंगवेदी समायोगादर्धनारीश्वरो भवेत”।–लिंगपुराण.९९.८.१. मिथिलांचलक कुर्सो नदियामी (दरभंगा)सँ अर्धनारीश्वरक मध्यकालीन प्रस्तरमूर्ति पाओल गेल अछि। मूर्ति षटभुजी अछि। शिव गृहस्थ देव छथि। हुनक अर्द्धांगिनी ओ शक्ति शिवा एवं गणेश ओ कार्तिकेय पुत्र छनि। वृषभ शिवक एवं सिंह पार्वतीक वाहन छनि। हुनक परिणयक परिकल्पना “कल्याण सुन्दर” मे कयल गेल अछि। पौरोहित्यक काज ब्रह्मा करैत छथि एवं साक्षीत्व अग्निक छनि। ब्रह्मा यज्ञ ओ वेदक देवता सेहो छथि। कल्याणसुन्दरक मूर्तिक परिकल्पना स्थानुक रूपमे कयल गेल अछि। वस्त्राभूषणसँ अलंकृत शिव-पार्वती पाणिग्रहण कयने त्रिभंगी मुद्रामे ठाढ़ छथि। शिव-पार्वतीक बीचमे चतुर्भुज ब्रह्मा पुरोहित रूपेँ बैसल छथि। पूरा भावात्मक परिवेश गतिमय ओ मंगलमय अछि। कल्याणसुन्दरक मूर्ति मिथिलांचलसँ अप्राप्य अछि मुदा मिथिलांचलक कोहबर चित्रमे आदर्श वर-वधूक रूपमे ओ परम्परासँ चित्रित छथि। शिव-पार्वतीक दाम्पत्य जीवनक सुखद, रसमय एवं कलात्मक परिकल्पना। उमा-माहेश्वरक अभिशिल्पनमे भेल अछि- शिव ओ पार्वती ललितासनमे आसीन छथि। पादपीठमे शिवक वाहन वृषभ ओ पार्वतीक वाहन सिंह उत्कीर्ण अछि। शिव चतुर्भुजी छथि। तन्वंगी पार्वती शिवक वाम जंघापर बैसल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वाम हाथ पार्वतीक वक्षस्थलपर स्थित अछि। शिव वाम हाथे एवं पार्वती दहिन हाथे एक दोसराकेँ आलिंगबद्ध कयने छथि। पार्वतीक दहिन हाथमे दर्पण छनि। शिव दहिन हाथसँ पार्वतीक लज्जावनत मुखकेँ उठा रहल छथि। मिथिलांचलमे उमामाहेश्वरक पाथरक मूर्तिसभ भीठभगवानपुर, डोकहर (मधुबनी), सिमरिया भिण्डी, करियन (समस्तीपुर), नावकोठी (बेगूसराय), बाथे, राजेश्वरस्थान (मधुबनी) तिरहुता, बेलामोड़, वनवारी, कोर्थ, भोजपरौल, सौराठ, मंगरौनी, महादेवमठ, बसुदेवा, गाण्डवीकेश्वर, परानपुर (कटिहार) सिमरौनागढ़ (वारा, नेपाल) आदि ऐतिहासिक स्थलसभसँ प्राप्त अछि एवं ओहिठामक मंदिरसभमे संरक्षित ओ पूजित अछि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे उमा-माहेश्वरक ललित मूर्तिक परिकल्पना सुखद दाम्पत्य दिस उत्प्रेरित करवामे सक्षम अछि। दाम्पत्यक सुखद परिणति संततिक रूपेँ फलित होइछ। शिवक पुत्र गणेश कार्तिकेयक अपेक्षा अधिक लोकप्रिय एवं पंचदेवोपासकमे परिगणित छथि। पाली (दरभंगा)क एकटा मंदिरमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेश (बाल गणेश) वात्सल्य पूरित छथि। मुदा हाजीपुर (वैशाली)क एकटा मठसँ जब्त शिव-पार्वतीक कांस्य मूर्तिमे बालगणेश पार्वतीक गोदमे छथि। कांस्य प्रतिमा स्थानुक मुद्रामे बनल अछि। पार्वतीपुत्र कार्तिकेयक एकटा स्वतंत्र पालकालीन पाथरक प्रतिमा वैशालीगढ़ एवं दोसर बसुआरा (मधुबनी) सँ प्राप्त अछि। पालीक पार्वती-गणेश गुप्तकालीन थिक मुदा अन्यान्य सभ पाल-पालोत्तरकालीन थिक। पुण्ड्रवर्धन (पूर्णियाँ) मे कार्तिकेयक एकटा मन्दिर छल (राजतरंगिणी)। लिंग ओंकार ब्रह्मक स्थूल रूप थिक। शिवलिंग ब्रह्मबोधक थिक। ओ पद्मपीठ (वेदी) पर स्थापित रहैत अछि। शिवलिंगक निम्न भाग भूमिस्थ, मध्य भाग वेदीमे एवं तृतीय भाग पूज्य मानल जाइछ। शास्त्रानुसार लिंगक अनेक प्रकार अछि जाहिमे शिव लिंगक पूजोपासना सर्वाधिक लोकप्रिय धार्मिक कृत्य मानल जाइछ। ज्योतिर्मय शिवलिंगक महत्ता विशिष्ट अछि जे भौगोलिक दृष्टिसँ राष्ट्रिय एकताकेँ सूत्रबद्ध करैत अछि। तहिना मिथिलाक सांस्कृतिक दिग्सूचक शिव (मंदिर) छथि। मिथिला परिक्रमामे एहि शिवमंदिर सभक धार्मिक महत्व बढ़ि जाइछ। कल्याणेश्वर, जलेश्वर, क्षीरेश्वर एवं सप्तरेश्वर। जनकपुरक उत्तरमे अवस्थित क्षीरेश्वर शिवक वृहदविष्णु पुराण (मिथिला माहात्म्य)मे एवं दक्षिणमे स्थित जलेश्वर शिवक स्कन्दपुराणमे (नेपाल माहात्म्य) विस्तृत वर्णन उपलभ्य अछि (जनकपुरधाम, भ्रमर, जनकपुरधाम, नेपाल, १९९९ ई.)। शिवलिंगोक अनेक प्रकार अछि- एकमुखी, चतुर्मुखी, पंचमुखी एवं सहस्रमुखी। एकमुखी शिवलिंगक परिकल्पना सर्वप्राचीन अछि। चण्डीस्थान (अरेराज, प.चम्पारण)सँ प्राप्त कुषाणकालीन एकमुखी शिवलिंगमे शिवक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। हुनक जटाजूटसँ गंगा प्रवाहित अछि। शिवलिंग अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। सर्वेक्षण क्रममे देखने छलहुँ। छायाचित्र उपलब्ध अछि। मुदा सामान्यतः एकमुखी शिवलिंगमे पार्वतीक मुखाकृति उत्कीर्ण होइछ, जकरा गौरीशंकर सेहो कहल जाइछ। लिंग भावनाक आधार शैव ओ शाक्त दर्शन अछि। एलफेंटाक त्रिमूर्तिक मध्यमुख शिव, वाममुख पार्वती एवं दहिन मुख रौद्र रूप शिव अर्थात् भैरवक थिक। अर्थात् त्रिमुखी शिव (गुप्तकालीन) शिवत्वक विस्तार अछि। मुदा चतुर्मुखी शिव शिवशक्तिक दिग् दिगन्त व्यापकताक सूचक थिक। पशुपतिनाथ (नेपाल) ओ अरेराजक (चम्पारण) चतुर्मुखी शिवलिंगमे कतहु श्रीराम, बुद्ध, शक्ति (पार्वती), सूर्य आदिक मुखाकृति जनपदीय मान्यतानुसार उत्कीर्ण अछि। बसाढ़ (वैशाली)क गुप्तकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग अभिलेखांकित अछि। वैशालीमे कैकटा पालकालीन चतुर्मुखी शिवलिंग सेहो मंदिरसभमे स्थापित अछि, चौगामा (दरभंगा), शाहपुर (सहरसा) एवं गढ़पुरा (बेगुसराय)क शिवमन्दिरमे सेहो चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित अछि। पंचमुखी शिवलिंगमे एकटा आकाशतत्व बढ़ि जाइछ। मिथिलांचलमे एकादश रुद्रक पूजन परम्परा मंगरौनी (मधुबनी) ओ बगहा (प.चम्पारण) मे अवशिष्ट अछि। मुदा सहस्रमुखी शिव लिंगक पूजनक प्राचीन उदाहरण वारी (समस्तीपुर), कटहरिया (विदुपुर, वैशाली), हजारीनाथ (वागमती तटीय दरभंगा) आदिमे प्रत्यक्ष अछि। वरुआरी (सहरसा), हाजीपुर (वैशाली), जमथरि (मधुबनी) आदिक ऐतिहासिक शिवलिंग अभिलेखांकित अछि। हिमालयसँ गंगाधरि पसरल मिथिलांचल प्रकारान्तरसँ शिवलोक बनल अछि। भागलपुर ताम्रपत्र (सेलेक्टेड इंस्क्रिपशंस आफ बिहार, प्रो. आर.के.चौधरी)क अनुसार ओहि समय (पाल युग) तिरहुतमे हजारटा शिव मन्दिर छल। अधिकांशशिव मन्दिर आइ भग्नावशिष्ट अछि। पुरातात्विक उत्खननसँ प्राचीन शिवमंदिर सभक भग्नावशेष भगीरथपुर, चौगामा, करियन आदि ऐतिहासिक स्थल सभसँ प्राप्त भेल अछि। तिलकेश्वर शिवमंदिरक ऐतिहासिकता कर्मादित्य प्रस्तर अभिलेखसँ भऽ जाइछ। एकर अलावा ऋषि-मुनि द्वारा स्थापित शिवलिंग लोकख्यात अछि- श्रृंग ऋषि द्वारा स्थापित सिंघेश्वर शिव (सहरसा), कपिल मुनि द्वारा स्थापित कपिलेश्वर (मधुबनी), शुकदेव मुनि द्वारा स्थापित शुकेश्वरनाथ (सीतामढ़ी), कुश ऋषि द्वारा स्थापित कुशेश्वर (दरभंगा) आदि। आब प्रश्न उठैत अछि जे कि ओ ऋषि-मुनि लोकनि शिवभक्त छलाह? अथवा शिव हुनक आराध्य छलनि? मिथिलांचलमे एक विशिष्ट प्रकारक घुर्णित (घुमैत) शिवलिंगक प्राप्ति अद्भुत ओ अद्वितीय अछि। जमथरि (मधुबनी)क शिवमंदिरमे एकटा अभिलेखांकित किन्तु घुमइवला शिवलिंग स्थापित अछि। बाइस ईंच नमगर शिवलिंगक वामपार्श्वमे शिवगायत्री ओ दहिन पार्श्वमे  रामगायत्री उत्कीर्ण अछि। एहि तरहक एकटा आर घूर्णित शिवलिंग हैठीवालीक शिवमंदिर (मधुबनी) मे सेहो स्थापित अछि। तांत्रिक उपासनाक दृष्टिएँ ई शिवलिंग स्थापित अछि। कथित अछि जे तांत्रिक विधिसँ सिद्धि प्राप्ति होइछ कलियुगमे। शिवपार्वतीक एकटा आर तांत्रिक मूर्ति (कर्णाटकालीन) शैवजगतमे विशिष्ट अछि- सद्योजात। एहिमे पार्वती माताक रूपमे एवं शिव शिशुक रूपमे बनल अछि। पार्वती वाम करोटे लेटल छथि। एहि तरहक मध्यकालीन मूर्ति सभ अलौली (खगड़िया), जनकपुरक राममंदिर (नेपाल) आदिमे प्रत्यक्ष उदाहृत अछि। मिथिलांचलमे ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्वक अनेक शिवालय प्राचीन साहित्य, अभिलेख ओ लोक आस्थामे युग-युगसँ प्रतिस्थापित अछि। शिवालय निर्माण एवं ओहिमे शिवक स्थापना प्रथमतः व्यक्तिपरक उद्देश्यसँ कयल गेल, मुदा कालांतरमे ओ लोक कल्याण मूलक प्रमाणित भेल। आइ ओ शिवालय लोक आस्थाक आध्यात्मिक ऊर्जाक केन्द्र बनि गेल अछि। शिवरात्रिक अवसर हो अथवा श्रावण मास प्रायः प्रत्येक महत्वपूर्ण शिवालय धार्मिक लोकोत्सवसँ स्फुरित भऽ जाइछ। शिवरात्रिक परिकल्पनाक कलात्मक अभिव्यक्ति “कल्याणसुन्दर” (शिव-पार्वती परिणय) मे उत्कीर्ण भेल अछि। मुदा मास भरि शिवक जलाभिषेक एकटा धार्मिक कृत्य रूपेँ मान्य अछि। एकर मूलमे यद्यपि देवघरक वैद्यनाथ (ज्योतिर्लिंग) छथि, मुदा मिथिलांचलोक अपन सोमेश्वरनाथ (अरेराज), गरीबनाथ (मुजफ्फरपुर), सिंहेश्वर (सहर्षा), कपिलेश्वर (मधुबनी), कुशेश्वर (दरभंगा), हलेश्वर, शुकेश्वर (सीतामढ़ी), भुवनेश्वर (शिवहर), माधवेश्वर, वर्धमानेश्वर (दरभंगा) आदि शैव तीर्थ प्रत्यक्ष रूपेँ सुलभ अछि। जितमोहन झा घरक नाम "जितू"  जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। दिवालीक  सार्थकता (ज्योतिपर्व पर विशेष) हमरा नीक जेकाँ याद अछि की दिवालीसँ दुई - चारि सप्ताह पहिने परिवारक गामसँ बाहर रहए वला सभ परिजन अपन - अपन रिजर्वैशन करबा लैत छलाह ! घरक सभ सदस्य हर साल दिवाली गामेमे मनबैत छलाह ! ओइ समय दादाजी आर दादीजीक ख़ुशीसँ उद्दभासित चेहराक वर्णन नञि करल जाऽ सकैत अछि ! घर चहल - पहलसँ भरि जाइत छल ! दादाजी आर दादीजीकेँ पूरा साल खाली दिवालीमे सबहक लम्बा छुट्टिक इंतजार रहैत छलनि ! दिवालीक शु - अवसर पर समस्त परिवार एकत्रित होइत छलए ! मुदा पता  नञि एकाएक समय बदलि गेल ! दिवालीक क्रम छुटल तँ दुबारा शुरु नञि भs सकल आगाँ जा कए गामसँ बाहर रहै वला परिजन दादाजी - दादीजीकेँ अंतिम विदाइ दै लs एकत्रित भेलाह ! हम आइयो ओय दिन कs बहुत याद करैत छलहुँ जखन लक्ष्मीपूजनक समय दादाजी - दादीजी आर बाबूजी - चाचाजी सभ एके संग पूजा अर्चना करैत छलाह ! आइ हर परिवारमे ई परंपरा पूर्ण रूपसँ विखण्डित भs गेल अछि ! त्यौहार,व्याहेतँ अछि जे रिश्ताकेँ रेशमक धागासँ पास खिचैत अछि ! कियो माता - पिता नञि चाहैत छथि की हुनकर लाल (धिया - पुता) हुनकासँ दूर रहथि ! व्यवसाय आर विकासकेँ द्वारे आइ - काल्हि माता - पिताकेँ अपन धिया - पुतासँ दूर रहय कऽ आदति  डालय परैत छनि ! मुदा त्यौहार पर ओ सभक आबय  केर प्रतिक्षा करैत छथि ! कारण एक सप्ताहक लेल धिया - पुतासँ भरल पूरा घर हुनका साल भरि  एकाकी  जीवनक लेल यादक गुच्छा हुनका हाथमे थमाऽ जाइत छनि ! मुदा दुःखक बात ई जे एकांकी परिवार वला मानसिकता अपन मिथिला समाजकेँ स्वार्थ कs हद तक खोखला कए देने अछि ! हमर सभक रिश्ताक बंधन तँ कमजोर भइये रहल अछि संगे सामाजिक जरुरतक कारण परिवार अलग - अलग भागमे बँटि रहल अछि, तकर बावजूदो किछु - किछु परिवारमे भावनात्मक जुराव देखल गेल अछि ! हम सभ मिल कs अपन  मिथिलाक संस्कृतिकेँ अंतिम कड़ीकेँ बिखरय सँ  बचा सकय छी, यदि हम सभ परिजन पर्व त्यौहार एक संग गाममे मनाबय के नियम बनाऽ ली, अही कहू ने नौकरी, व्यवसायक कारणसँ सात - समंदर पार रहै वला परिजनकेँ पावैन तिहार खासकऽ केँ दिवाली पर बनै वला पकवान, तोरीक तेलसँ प्रज्वलित दीपक महक हुनका विकलित नञि करैत हेतैन ? ! सच तँ ई अछि की गामसँ दूर रहए वला परिजन केँ हर पावैन तिहार पर अपन के बहुत याद आबै छनि ! ऐनामे सभ पाबनि तिहार तँ नञि कम सँ कम दिवाली एक एहेंन त्यौहार अछि जकरा हमरा सभ केँ अपन माता - पिता, भाई - बहिन, सभ परिजनक संग मनेबाक चाही ! कारण दिवाली साल भरि प्रतिक्षा करै वला वृद्ध दादाजी - दादीजी, माँ - बाबूजिक ख़ुशीक पर्व अछि ! अलग - अलग रहए वला परिजन सभ सँ साल भरिक बाद मिलै के पर्व अछि ! ताहि हेतु अपन तमाम व्यस्तताक वावजूद किछु समय निकालिकेँ अइ पर्व कs सभ केँ संग मना कए सार्थक करवाक चाही ! कनि सोचु वृद्ध दादाजी - दादीजी, माँ - बाबूजिक जीवन बचबे कतेक करल छैन ?! हुनकर बाँकी दीन प्रसन्नता सँ बितैन अयसँ बेसी हुनकर ममताक ऋणक बदला हम सब की दऽ सकैत छलहुँ ! तँ आबू एहि बेर प्रण करी की जा तक कुनू खास विवशता नञि  हुअए हम सभ हर दिवाली हुनका अपना पास बजा कए या खुद हुनका पास जाऽ कए मनायब, आत्मासँ आत्मामे प्रसन्नताक दीप जरायब, आबू सभ मिलकेँ ख़ुशीक ई अनूठा पर्व केँ सार्थक करी ..... समस्त विदेह परिवार  काँ ज्योतिक पर्व दिवाली के हार्दिक शुभकामना ..... नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” दीपावली:२८अक्टूबर२००८मंगलदिन दिवाली हिन्दू सिक्ख एवम्‌ जैन सबहक बड़ महत्वपूर्ण पाबनि अछि।मिथिलांचलमे सेहो जगमगाएत दीप सऽ अहि पाबनि के मनाओल जाएत अछि।अहि पाबनिक पाछा अनेक कथा अछि।मानल गेल अछिजे विजयादशमी दिन रावणक अन्तक बाद आहिये दिन भगवान राम देवी सीता, भाय लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अंगद आदि संगे अयोध्या लौटल रहथि।हुनक स्वागतमे अयोध्यावासी दिया बातीसऽ पूरा अयोध्या जगमगेने रहैथ।दोसर किस्सा अछि जे भगवान श्रीकृष्ण अहिये दिन नरकासुरके नरक धाम पहुंचेने रहैथ।अकर अतिरिक्त इहो कथा प्रचलित अछि जे राजा बलि अहि दिन भगवान विष्णुक आज्ञा पाबि अपन राज्य दिस विदा भेल रहथि।अहि तरहे अहि दिनके दुःख आऽ अज्ञानता अन्हार सऽ मुक्ति भेटक एवम समृद्धिक प्राप्तिक अभिलाषासऽ मनाओल जाएत अछि।कतौ-कतौ किछु विशेष पशुके भोजन कराबक नियम सेहो छै जेनाकि कौआ, कुक्कुर, गै आऽ बड़द। घरमे गोसाउनिक पूजा संगे लक्ष्मीजी एवम गणेशजीक पूजा होएत अछि। तकर बाद घरक सबसऽ बुजुर्ग दीप लऽ कऽ बाहर निकलैत छैथ। फेर सबतरि दीप लेशल जाएत अछि।अहिवर्ष दिवाली २८ अक्टूबर, २००८, मंगलदिन कऽ अछि। बालानां कृते १.प्रकाश झा- बाल कविता २. गांगोदेवीक भगता- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा ।  मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक  लेल किछु  गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे  जाहिसँ  बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा 1. बिलाड़ि बाघक मौसी तूँ बिलाड़ि म्याऊँ  म्याऊँ बजै बिचारि, मुसबा के हपसि क’ खाई कुतबा देख भागि जाई । 2. बाघ मौसी तूँ बिलाड़ि के बाघ छौ तोहर नाम , जंगल के तूँ राजा छेँ बा’’’ बा’’’ केनाइ तोहर काम । 3. गैया बाबा यौ! अबै यै गैया हरियर घास चड़ै यै गैया , मिठगर दूध दै यै गैया हमर सभहक मैया गैया । 4.  कुतबा दिन मे सुतै, राति मे जगै, चोर भगाबै कुतबा । रोटी देखिक’ दौड़ल अबै, नागैड़ डोलाबै कुतबा । अनठिया के देखिते देरी, भौं’’’ भौं’’’ भुकै कुतबा । 5. हाथी झूमै-झामैत अबै हाथी, लम्बा सूढ़ हिलाबै हाथी, सूप सनक कान, हाथी, कारी खटखट पैघ हाथी । २. गांगोदेवीक भगता- गजेन्द्र ठाकुर गांगोदेवी मलाहिन छलीह। एक दिन हुनकर साँय, अपन भाय आऽ पिताक संग माछ मारए लेल गेलाह। साओनक मेला चलि रहल छलैक आऽ मिथिलामे साओनमे माँ खाइ आकि बेचएपर तँ कोनो मनाही छैक नहि। गांगोदेवीक वर सोचलन्हि जे आइ माछ मारि हाटमे बेचब आऽ साओनक मेलासँ गांगो लेल चूड़ी-लहठी आनब। धारमे तीनू गोटे जाल फेकलन्हि सरैया पाथलन्हि मुदा बेरू पहर धरि डोका, हराशंख आऽ सतुआ मात्र हाथ अएलन्हि। आब गांगोक वर कनियाँक नाम लए जाल फेकि कहलन्हि जे ई अन्तिम बेर छी गांगो। एहि बेर जे माँछ नहि आएल तँ हमरा क्षमा करब। आब भेल ई जे एहि बेर जाल माँछसँ भरि गेल। जाल घिंचने नहि घिंचाए। सभटा माँछ बेचि कए गांगो लेल लहठी-चूड़ीक संग नूआ सेहो कीनल गेल। अगिला दिन गांगोक वर गांगोक नाम लए जाल फेंकलन्हि तँ फेर हुनकर जाल माँछसँ भरि गेलन्हि मुदा हुनकर भाइ आऽ बाबूक हिस्सा वैह डोका-काँकड़ु अएलन्हि। ओऽ लोकनि खोधिया कए एकर रहस्य बूझि गेलाह फेर ई रहस्य सौँसे मिथिलाक मलाह लोकनिक बीच पसरि गेल। गांगोदेवीक भगता एखनो मिथिलाक मलाह भैया लोकनिमे प्रचलित अछि। सभ जाल फेंकबासँ पहिने गांगोक स्मरण करैत छथि। ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी यूनाइटेड नेशन्स डे ( २४ अक्टूबर) देवीजी इतिहासमे द्वितीय विश्वयुद्ध के विषय मे पढ़ा रहल छली।ताहि स आगॉं बढ़ि ओ युनाइटेड नेशन्स के स्थापनाक विषय मे बताबऽ लगली।ओ कहलखिन जे भारत सहित पचास टा देश २४ अक्टूबर १९४५ मे न्याय आ कानून के प्रति अपन आस्था एवम्‌ आदर के सिद्धान्तक संग अहि संस्थाक निर्माण केलक जाहिके मुख्य उद्देश्य छल जे कोनो राष्ट्रमे ओकर सामरिक क्षमता, आर्थिक कमजोरी वा क्षेत्रफल अन्तर के आधार पर बिना भेद-भाव केने मनुषके मौलिक अधिकारके स्त्री वा पुरुषके समान रूपसऽ उपलब्ध कराबऽ मे सहायता करत।ताहि लेल बहुत तरहक नियम-कानून बनल जाहि के मानैके सब सदस्य राष्ट्र प्रतिज्ञा लेलक आ सब साल सेन फ्रेनसिसको, अमेरिका मे एकत्रित भऽ दुहराबैत अछि। अहि सबहक लक्ष्य छल सम्पूर्ण विश्वमे शान्ति, शिक्षा आ आरोग्यक प्रसार।अकर झण्डामे विश्वक मानचित्रके ऑलिव नामक गाछक पात स घेरल देखल गेल छै।ऑलिव के शान्तिक प्रतीक मानल गेल छै।वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन सेहो अकरे शाखा अछि जे अहि वर्ष अर्थात्‌ ७ अप्रैल, २००८ कऽ अपन साठम वर्ष पूरा केलक। अहि वर्ष ओकर लक्ष्य अछि विश्वके ग्लोबल वार्मिंग' वा पर्यावरणके बढ़ैत तापमान' के दुष्प्रभावसऽ परिचित करेनाई। युनिसेफ सेहो अकरे शाखा अछि जे मूलतः बच्चा सबके स्वस्थ व शिक्षित एवम्‌ सुरक्षित समाज प्रदान करलेल प्रतिबद्ध अछि।यूनिसेफ के स्थापना ११ दिसम्बर क कैल गेल अछि।भारतमे सेहो ओकर ऑफिस अछि।जे ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ द्वारा प्रकाशित होएत अछि तकर पाई ओ संस्थाके जाइत अछि तैं ओ सबसऽ आग्रह केलखिन जे ईद, दिवाली, थैंक्स गीविंग डे, हैलोवीन, क्रिसमस,  नववर्ष, मकरसंक्राती आदि के लेल  ग्रीटिंग कार्ड युनिसेफ प्रिंट वला खरीदू। देवीजी इहो ज्ञात करेलखिन जे अहि संस्थाके अन्तर्गत कतेको कल्याणकारी अभियान सफल भेल अछि।जेनाकि, स्मॉल पॉक्स तथा पोलियो के प्रायः सब देशसऽ हटाबक कार्य, कतेको बच्चाके प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करेनाई, सुनामी जकॉं आयल प्राकृतिक प्रकोपमे सहायता आदि केने अछि। हलांकि कतौ-कतौ ओकरा असफलता सेहो भेटल छै लेकिन ओ निरन्तर नश्लवाद, रंगभेद, आतंकवाद आदि के हटाबऽमे प्रयत्नरत अछि। देवीजी विद्यालयमे २४ अक्टूबर कऽ युनाइटेड नेशन्स डे मनाबक विचार बनेली।ओहि दिन ओना तऽ छुट्टी रहैत छल लेकिन बच्चा सबहक आग्रह तथा प्राधानाध्यापक के सहमति सऽ देवीजी विद्यालयमे ओहि दिन प्रश्नोत्तर(क्वीज़ ), भाषण, वाद- विवाद, निबन्ध लेखन आदि प्रतियोगिताक आयोजन कएली।अहि सबहक मुख्य विषय यू एन संस्थाक इतिहास एवम्‌ कार्यप्रणाली छल जाहि सऽ सबके बहुत जानकारी बढ़ल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ इंग्लिश-मैथिली कोष  मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब Bottom of Form 10. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 10.1. 1.Worn- out fifty paise coin- Maithili poem "Ghasal Athanni" by Late Sh. Kashikant Mishra Madhup 2. The Fundamentals-maithili short story “moolbhoot” by Sh. Taranand Viyogi 10.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani 1. Original Maithili song "Ghasal Athanni"Kashikant Mishra MadhupWorn- out  fifty paise coin 2. The Fundamentals-by Taranand Viyogi (1966- ) The maithili short story “moolbhoot” by Sh. Taranand Viyogi Kashikant Mishra Madhup (1906-87)

Original Maithili song "Ghasal Athanni" translated into English by GAJENDRA THAKUR Worn- out  fifty paise coin Noon of  Jyeshtha month, With all his twelve mouths  vomiting fire-ball Up-stooping The Sun Burning the three worlds aflaming Violent western wind The tempest The san-san-san sound of it Like fire particle Anguished blowing  the dust. The birds in nest, composed Not shaking the wings Not opening the eyes Under the tree Animals puffing with tearful eyes The herdsman went home unwillingly Pond water turns  hot The water and land habitants tremble The surrounded husk-bamboo enclosures, doors, windows of houses shut This fire-rain! No wayfarer to be seen on road Will  the world create the nature This fire-rain! The hi-fis Having  Big bellies Relaxing supported on big cushions, Making and filtering Sherbet Sugar-candy, nut and ice mixed Beneath the dancing electric-fan They too peace starved asking –Hari! Hari! What to tell about the Living The shadow also asking for shadow The noon of Jyeshtha-month! Though at this time Even then  Buchni Left the courtyard of house Is  digging the field of Landowner What can do the poor-women! Having been beaten by the lord-of-bad-fate, through all the eight portions of day-night The widow without family without any standing Only child of six months The hope for future Who is weeping beside the road adjacent to the field How can she console him? Even the blood within her is in scarcity Then how the milk will come out? After fasting three times in a row (of  morning-evening) Became labourer  @ fifty paise From sunrise to sunset Will do work Will not get even the labourer’s breakfast! Evening time World now fearless The moon rose with compassion By cold light did the universe ecstatic The cow caring for her child raced by echoing hukara-sound Tun-tun-tun-tun sound Tan-tan-tan-tan sound The sound of bell The  smoke coming out of houses Even that time starved-thirsty Buchni Bosom drawn covering his son with saree Torn faded clothes The bones coming out The beauty burnt, marked by poverty Fearing  for being burnt by the fire of hunger The youth of her fled as soon as it came Even more than that of riped betel-leaf Yellowish and thin body Cracked and split lips Eyes like mango cut to size In the ditch is whose ill-fate-thief Bitch-anxiety stepping to the tip of saree Burning her body Every moment oh! Hope becoming fireball “give some grain-water” whose life Speaking through treachery of tear That becoming helpless Telling with fear somehow With folded hands: That rubbed fifty-paise coin was not accepted (in market) I went to all the shops Coming Please give another fifty-paise coin I came am only for this Has become night Landowner, do not take time With hunger and thirst I am dying Buy with that Will thresh and crush grain The child is weeping since morning Restless and taking out my life. She again came disturbing my forehead Changing the real fifty-paise coin somehow Clearly doing mischief Hey! Hold her neck and push beside She is witch See the eyes How onlooking Swallowed such person as her master (husband) Budhna  when she came Chewed suddenly At the time of Goddess LakShmi doing lending business Nobody here? Took beside this ill-fated women? Master! I am not asking debt Or came for begging The cultivated labour-charge be given I am your subject-son Many times came here Legs crumbling For grain my body starving The third-class-god not assigns even death to me What time has come Ha! Did work with all body-strength That good-line even then the labour-charge not coming That’s why this famine in world has appeared I will not be able to go When I step up the legs it seems dark in-front Will die here only To whom I will tell? Nobody is my own The wrong-doing is also the splendor of the powerful God! Oh! Hey you have no fear? Many murder I have done and lived Not even my body-hair got damaged Long live the Daroga (police-incharge) Will murder you Flee women flee By giving enough wage to labourer I will put a blemish to my ancestry? This false-acting do before someone else I am black-cobra will she go simply? The lord of death is dancing over her head O, what you are looking at my face That much courage the third-class people will show? Cath-cath-cath-cath Even more heavy than the heaviest With slap of Makhna she became helpless Both mother-son fell on earth Became senseless she Even then with anger By doing heavy-echo Bhutkanbabu stood roaring: Makhna! Makhna! She is doing false-acting Bring my stick What will you know about women’s character? My whole life dealt with all these. Dan-dan-dan-dan Stick thrashing on the senseless body Only once unrecognizable weeping With child left Buchni this Creation! With sorrow amidst laughter of Moon That rubbed-worn-out fifty-paise-coin spoke: “where should I” go To get shelter Who will give? Worn-out is whose fate! 2. The Fundamentals -by Taranand Viyogi (1966- ) The maithili short story “moolbhoot” by Sh. Taranand Viyogi translated into English by Gajendra Thakur. Once upon a time it happened. The almighty could not tolerate the mismanagement in the country. He posed like a Tantric and came before the Leader of the Nation.  He could have come in his real form but as this Leader of the Nation believed more in the Tantrics so he thought  it more appropriate to pose like a Tantric and came to the Leader of the Nation. After worship and sacred-reading (by the Leader of the Nation)  he (Tantric) asked for corruption in donation from the Leader of the Nation. A unique light of corruption came out of the body of the Leader of the Nation and went away. After the departure of Corruption the chastity and character of the Leader of the Nation also departed. Then Dharma went away. After that good-habits also came out and went on its way. The efficiency of the clerk vanished. The healing-touch of the Doctors fell flat. The Engineers became perplexed. The political leaders and ministers started dying. The religious places became empty. There was none who will pour water on to the Gods. The prospective and the brilliant left  study and started street-rowdism and started inhaling cannabis. The whole country became lonely crematorium. Then again the Almighty could not see the misfortune of the nation. Again a Tantric came to the Leader of the Nation. And again asked for coruuption for the welfare of all from the Leader of the Nation. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti  received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet Translated by Jyoti Jha Chaudhary I used to write same sequence of daily routine like I got up, after being fresh took bath then had breakfast, then sat for studies, had lunch, went to school, returned from school, had supper, played with friends, returned home, cleaned glass of lamp, read, had dinner, went to bed etc. We had to submit two days diary on Monday as there was holiday on Sundays. The eagerness to celebrate 15th August, the independence day used to be different in those days. We used to cheer for independence and the great freedom fighters. I couldn’t understand why he told us not to fight at that time however I got it in the next morning when I heard the crowd cheering while crossing the border of the village. There was a big fight took place when children of Mahinathpur were crossing the village. After a great effort it was stopped. When I came to village then senior students started telling their story about the quarrel how they beated the children of other village by pushing them into the pond. They were looking to take revenge next time again but this time too................ Next year, same meeting to establish peace and all but that time the neighbour villager had changed their way. Fighting was a kind of  festival. The fight could begin on very little things like breaking of bottle of chocolate in the shop in Durga Puja fair. Once an old man had slapped a youngster but after that no one continued the story. Every one started confirming that it was that story. No one was telling that story.  I couldn’t hide my eagerness and asked them what was that  story that was known to everyone except me. VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR अहं मार्गे गच्छामि स्म एकः सर्पः आगतः। हम रस्तासँ जा रहल छलहुँ आकि एकटा साँप आयल। बालकः गच्छति स्म। बालकाः पठन्त स्म। बालक जाइत रहय। बालक सभ पढ़ैत रहय। गायकाः गायन्ति स्म। सेवका कार्यं कुर्वन्ति स्म। गायक गबैत रहथि। सेवक सभ कार्य करैत रहथि। शिक्षकाः पाठयन्ति स्म। वयं लिखामः स्म। शिक्षक लोकनि पढ़ाबैत रहथि। हम सभ लिखैत रही। वयं श्लोकः वदामः स्म। वयं हसामः स्म। हम सभ एकटा श्लोक पढ़ैत छलहुँ। हम सभ हसैत छलहुँ। वयं उपविशामः स्म। वयं खादामः स्म। हम सभ बैसल छलहुँ। हम सभ खाइत छलहुँ। वयं खादामः स्म। वयं पश्यामः स्म। हम सभ खाइत छलहुँ। हम सभ देखैत छलहुँ। सुधाखण्डः अस्ति। सुधाखण्डः भग्नं अभवत्। चॉक अछि। चॉक टूटि गेल। श्री विद्ययाः हस्ते क्षतः अभवत्। मम स्नानम्/ भोजनम्/ पूजा/ जन्मदिनम् अभवत्। श्री विद्याक हाथसँ क्षति भऽ गेल। हमर स्नान/ भोजन/ पूजा/ जन्मदिन भेल। मम परीक्षा न अभवत्। भारतदेशः स्वतंत्रः अभवत्। हमर परीक्षा नहि भेल। भारत देश स्वतंत्र भेल। मम विद्यालये वार्षिकोत्सव अभवत्। हमर विद्यालयमे वार्षिकोत्सव भेल। मम आनन्दः भवति। मम आनन्दः अभवत्। हमरा आनन्द होइत अछि। हमरा आनन्द भेल। तस्याः दुःखं भवति। तस्याः दुःखम् अभवत्। हुनका(स्त्री.) दुख होइत छन्हि। हुनका दुख भेलन्हि। सः मम पुस्तकं पठितवान्। एतत् स्थाने अन्य शब्दस्य प्रयोगः करणीयः। गणेशः/ नरेशः मम पुस्तकं पठितवान्। गणेश/ नरेश हमर पुस्तक पढ़लन्हि। सः गिरीशस्य पुस्तकं पठितवान्। सः कस्य पुस्तकं पठितवान्। ओ गिरीशक पुस्तक पढ़लन्हि। ओ ककर पुस्तक पढ़लन्हि। सः तव पुस्तकं पठितवान्। सः तस्य पुस्तकं पठितवान्। ओ अहाँक पुस्तक पढ़लन्हि। ओ ककर पुस्तक पढ़लन्हि। सः मम कथां पठितवान। सः मम ग्रन्थं पठितवान्। ओ हमर कथा पढ़लन्हि। ओ हमर ग्रन्थ पढलन्हि। सः मम कादम्बरी/ उपन्यासं/ टिप्पणीं/ प्रश्नं पठितवान्। ओ हमर कादम्बरी/ उपन्यास/ टिप्पणी/ प्रश्न पढ़लन्हि। सः मम पुस्तकं लिखितवान/ दत्तवान/ चोरितवान/ नीतवान/ दृष्टवान/ / स्थापितवान/ पाठितवान/ प्रेषितवान/ नाशितवान/ खादितवान। ओ हमर पुस्तक लिखलन्हि/ देलन्हि/ चोरेलन्हि/ लऽ गेलाह/ देखलन्हि/ राखलन्हि/ पढ़ेलन्हि/ पठेलन्हि/ नाश केलन्हि/ खेलन्हि। छात्रः ग्रंथालयं गच्छति, पुस्तकं पठति। छात्रः ग्रंथालयं गत्वा पुस्तकं पठति। छात्र ग्रन्थालय जाइत छथि, पुस्तक पढ़ैत छथि। छात्र ग्रन्थालय जा कय पुस्तक पढ़ैत छथि। पुस्तकं पठित्वा निद्रां करोति। पुस्तक पढ़ि कऽ सुतैत छथि। स्नानं कृत्वा पूजां करोति। स्नान कऽ कय पूजा करैत छथि। श्लोकम् उक्त्वा क्षीरं पिबति। श्लोक बाजि कऽ दूध पिबैत छथि। छात्रः विद्यालयं गच्छति। पाठं पठति। छात्र विद्यालय जाइत छथि। पाठ पढ़ैत छथि। छात्रः विद्यालयं गत्वा पाठं पठति। छात्र विद्यालय जाऽ कय पाठ पढ़ैत छथि। पुस्तकं पठित्वा गृहपाठं लिखति। पुस्तक पढ़ि कऽ गृहपाठ लिखैत छथि। क्रीडित्वा- पठित्वा वदति- उक्त्वा खादति- खादित्वा करोति- कृत्वा श्रुणोति- श्रृत्वा बालकः गृहपाठं लिखित्वा निद्रां करोति। बालक गृहपाठ लिखि कऽ सुतैत छथि। सत्यं कृत्वा महापुरुषः भवति। सत्य बाजि कए महापुरुष होइत छथि। मन्दिरं गत्वा देवं नमति। स्नानं कृत्वा पूजां करोति। मन्दिर जाऽ कय देवक प्रार्थना करैत छथि। स्नान कऽ कय पूजा करैत छथि। दुर्गुणं त्यक्त्वा सज्जनः भवति। दुर्गुण त्यागि सज्जन बनैत छथि। चन्द्रभूषणः कार्यालयं गत्वा कार्यं करोति। चन्द्रभूषण कार्यालय जा कऽ काज करैत छथि। वयं इदानीम् एकं सुभाषितं श्रृण्वः- सदयं हृदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम्। कायः परहिते यस्य कलिस्तस्य करोति किम्॥ यस्य हृदयं सदयम् (दयापूर्णम्) अस्ति यस्य भाषितं (वचनं) सत्यभूषितम् (पूर्णम्) अस्ति। यस्य शरीरं परहिते निरतं कायः (शरीरम्) अस्ति- यस्य शरीरं सर्वदा पर (अन्यस्य) हिते निरतम् अस्ति- तादृश्य पुरुषस्य कलिः किं करोति- किमपि कर्तुं न शक्नोति, तादृशस्य पुरुषस्य उपरि कलेः प्रभावः न भवति। कथा श्रद्धापूर्वक् श्रृणवन्तु। एकः भिक्षुकः अस्ति। भिक्षुकः प्रतिदिनं भिक्षाटनं करोति। प्रतिगृहं गच्छति- भिक्षां देहि भवती- इति वदति- गृहिणी भिक्षां ददाति। भिक्षा रूपे किम् किम् ददाति, अन्नं ददाति, धनं/ पुरातन् वस्त्रं ददाति- भिक्षुकः भिक्षां स्वीकरोति- आहारः अस्ति अन्नम् अपि भिक्षुकः खादति, वस्त्रम् अस्ति- धरति- भिक्षुकस्य गृहं नास्ति। भिक्षुकः धर्मशालायां वासं करोति। भिक्षाटन अनन्तरं भिक्षुकः धर्मशालां गच्छति। भिक्षुकस्य समीपे एकं ताम्रपात्रम् अस्ति। भिक्षाटन अनन्तरं भिक्षुकः धर्मशालां गच्छति। धनम् अस्ति, भिक्षु किं करोति- धनं ताम्रपात्रे स्थापयति। किंचित् कालानन्तरं ताम्रपात्रं पूर्णं भवति। तदा भिक्षुकः विचारं करोति- बहुधनम् अस्ति- किम् करोमि। सः चिन्तयति- अहं काशीनगरं गच्छामि- विश्वनाथस्य दर्शनं करोमि। पुण्यं सम्पादयामि। इति भिक्षुकः चिन्तयति। भिक्षुकः ताम्रपात्रं स्वीकृत्य काशीनगरं गच्छति। ताम्रपात्रं स्यूते अस्ति। काशी नगरे एका नदी (गङ्गा) नदी अस्ति। प्रवास कारणतः भिक्षुकः शरीरं मलिनम् अस्ति। अहं प्रथमं स्नानं करोमि अनन्तरं देवदर्शनं करोमि। इति भिक्षुकः चिन्तयति। किन्तु स्यूते ताम्रपात्रम् अस्ति। स्नानसमये भिक्षुकः ताम्रपात्र कुत्र स्थापयति। यदि नदी तीरे स्थापयति- अन्यस्य हस्ते ददाति- परिचयः/ विश्वासः नास्ति। भिक्षुकः बहुविचारं करोति। नदी तीरे सर्वत्र सिक्ताः सन्ति- भिक्षुकः सिक्ताषु एकं गर्तं करोति- तत्र ताम्रपात्रं स्थापयति- उपरि सिक्ताम प्रसारयति- पुनः चिन्तयति- स्नानानन्तरम् अहं कथं जानामि- ताम्रपत्रं कुत्र अस्ति- इति। सिक्तानां वर्णः सर्वत्र समान वर्णः पुनः चिन्तयति- एकम् उपायम् करोति- सिक्ताभिः एकं शिवलिंगम् करोति। निश्चिन्तितया स्नानार्थं गच्छति। नमस्कारं करोति। किंचित् कालानन्तरं तत्र अन्य एक यात्रीकः आगच्छति। सः पश्यति। नदी तीरे एकः शिवलिंगः अस्ति। काशी नगरे एका पद्धति अस्ति। प्रथमं शिवलिंग निर्माणम् अनन्तरं गंगा स्नानम्। सः अपि एकं शिवलिंगं करोति स्नानार्थं गच्छति। बहु जनाः आगच्छन्ति- सर्वे अपि एक-एकं शिवलिंगं कुर्वन्ति स्नानार्थं गच्छन्ति।किंचित् कालानन्तरं भिक्षुकस्य स्नानं समाप्तं भवति। भिक्षुकः नदीतीरम् आगच्छन्ति। अत्र तत्र सर्वत्र शिवलिङ्गानि श्वेन कृतं शिवलिङ्गं ज्ञातुम् न शक्नोति। तस्य ताम्रपात्रं नष्टं भवति। सः कारणं चिन्तयति। “लोकः गतानुगतिकः अस्ति”। गतानुगतिकोलोकः न लोकः पारमार्थिकः गङ्गासैक्त लिङ्गेन नष्टं मे ताम्रभाजनम्। SAMSKRIT संस्कृतम् मैथिली When did you come? कदा आगतवती (स्त्री.)। कखन अएलहुँ। I came this morning. अद्य प्रातः आगतवती। आइ भोरे अएलहुँ। By which train did you come? केन यानेन आगतवती। कोन गाड़ीसँ अएलहुँ। I came by the Himachal-express. अहं हिमाचल-एक्सप्रेस यानेन आगतवती। हम हिमाचल एक्सप्रेस गाड़ीसँ अएलहुँ। How was the journey? कथम् आसीत् प्रवासः। प्रवास केहेन रहल। It was fine. उत्तमम् आसीत्। नीक रहल। How many days did it take? कति दिनानां प्रवासः आसीत्। कतेक दिनुका प्रवास रहय। Ten days. दशदिनानाम्। दस दिनुका। I stayed there for three days. तत्र अहं दिनत्रयं स्थितवती। हम ओत्तऽ तीन दिन रहलहुँ। Did you go alone? एकाकिनी गतवती किम्? असगरे गेल रही की? No, I went with my family. न, अहं मम परिवारेण सह गतवती। नहि, हम अपन परिवारक संग गेल रही। I am very tired. बहु श्रान्तः अस्मि भोः। हम बड्ड थाकल छी। There was an accident on the way. मार्गे दुर्घटना अभवत्। मार्गमे दुर्घटना भऽ गेल। No one was seriously injured. विशेषतया कोऽपि न व्रणितः। तेना भऽ कय ककरो चोट नहि लगलैक। Let us go by bus. लोकयानेन गच्छामः। बससँ हमरासभ चली। Who waits for that? कः तदर्थं प्रतीक्षते भोः? के ताहि लेल प्रतीक्षा करत? Let us take a three wheeler. त्रिचक्रिकया एव गच्छामः। हमरा सभ तिनपहिया पर चली। When did you start? कदा प्रस्थितवान्? कखन चलल छलहुँ? I started day before yesterday at night. परह्यः रात्रौ प्रस्थितवान्? परसुका रातिमे बिदा भेल छलहुँ। What places did you see? किं सर्वं दृष्टवान्? की सभटा देखलहुँ? Gangotri is very beautiful. गाङ्गोत्री बहु सुन्दरी अस्ति भोः। गंगोत्री तँ बड्ड सुन्दर अछि। That waterfall is just fanatic. सः जलप्रपातः नाम महत् अद्भुतम्। ओ जलप्रपात तँ अद्भुत अछि। I couldn’t see that. तत् अहं द्रष्टुं न शक्तवती। हम ओ नहि देखि सकलहुँ। Due to Deepavali the train was very much crowded. दीपावलीकारणतः याने महान् सम्मर्दः आसीत्। दीपावलीक कारण गाड़ीमे बड्ड भीड़ छल। It was a memorable journey. अविस्मरणीयः प्रवासः आसीत्। अविस्मरणीय प्रवास छल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १५ अक्टूबर २००८ (वर्ष १ मास १० अंक २०) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् 128

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