विदेह १ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २१ 'विदेह' १ नवम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ११ अंक २१ ) एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव(असुरक्षित) 2.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" (हुगलीपर बहैत गंगा) २.२.मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना-धीरेन्द्र प्रेमर्षि २.३.प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन- महेन्द्र मलंगिया २.४. १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)२.स्व. राजकमल चौधरी पर - डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र (लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार) २.६. १.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप २. दैनिकी- ज्योति ३. उपन्यास २.७. चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा २.८. १.नवेन्दु कुमार झा छठिपर २.नूतन झा भ्रातृद्वितियापर ३.पद्य ३.१.१.रामलोचन ठाकुर २.निमिष झा ३. जितमोहन झा ३.२. १.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (छठम खेप)२. श्यामल सुमन ३.३. १.राजेन्द्र विमल २.रेवतीरमण लाल ३.दिगम्बर झा "दिनमणि"४.बुद्ध-चरित ३.४. १.रूपा धीरू २.ज्योति ३.५. १.विद्यानन्द झा २.नवीननाथ झा ३.विनीत उत्पल ३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३. विभूति ३.७. १. रामभरोस कापड़ि २. रोशन जनकपुरी ३.पंकज पराशर ३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी ४. मिथिला कला-संगीत(आगाँ) ५. महिला-स्तंभ ६. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी ७. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ) 8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 8.1. Original Maithili story "Sinurhar" by Shri Shivshankar Srinivas translated into English by GAJENDRA THAKUR 8.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.) विदेह (दिनांक १ नवम्बर २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:११ अंक:२१) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक २१, दिनांक १ नवम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | पहिल कीर्तिनारायण मिश्र सम्मान कवि हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह "एना कतेक दिन" पर ११.११.२००८ केँ विद्यापति पर्वक अवसरपर देल जएतन्हि। एहि बेरक यात्री चेतना पुरस्कार श्री मन्त्रेश्वर झाकेँ भेटलन्हि। कीर्तिनारायण मिश्रक जन्म १७ जुलाई १९३७ ई. केँ ग्राम शोकहारा (बरौनी), जिला बेगूसरायमे भेलन्हि। हुनकर प्रकाशित कृति अछि सीमान्त, हम स्तवन नहि लिखब (कविता संग्रह)। आखर पत्रिकाक लब्धप्रतिष्ठ सम्पादक। मंत्रेश्वर झा-जन्म ६ जनवरी १९४४ ई.ग्राम-लालगंज, जिला-मधुबनीमे। प्रकाशित कृति: खाधि, अन्चिनहार गाम, बहसल रातिक इजोत (कविता संग्रह); एक बटे दू (कथा संग्रह), ओझा लेखे गाम बताह (ललित निबन्ध)। मैथिली कथा संग्रहक हिन्दी अनुवाद “कुंडली” नामसँ प्रकाशित। दि फूल्स पैराडाइज (अंग्रेजीमे ललित निबन्ध), कतेक डारि पर। हरेकृष्ण झा, जन्म १० जुलाई १९५० ई. गाम- कोइलखमे। अभियंत्रणक अध्ययण छोड़ि मार्क्सवादी राजनीतिमे सक्रिय। अनेक कविता आ आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित। अनुवाद एवं विकास विषयक शोध कार्यमे रुचि। स्वतंत्र लेखन। प्रकृति एवं जीवनक तादात्म्य बोधक अग्रणी कवि। एना कतेक दिन (कविता संग्रह)। बुकर पुरस्कार: आस्ट्रेलियन पिता आऽ भारतीय माताक सन्तान ३३ वर्षीय बैचेलर श्री अरविन्द अडिग ऑक्सफोर्डसँ शिक्षा प्राप्त कएने छथि आऽ सम्प्रति मुम्बईमे रहैत छथि। हिनकर पहिल अंग्रेजी उपन्यास छन्हि द ह्वाइट टाइगर जाहि पर बिटेन, आयरलैण्ड आऽ कॉमनवेल्थ देशक वासी केँ देल जा रहल अंग्रेजी भाषाक उपन्यासक ५०,००० पौन्डक “मैन बुकर” पुरस्कार भेटलन्हि अछि आऽ बेन ओकेरीक बाद ई पुरस्कार प्राप्त केनिहार ई सभसँ कम उम्र केर लेखक छथि। द ह्वाइट टाइगर- ई उपन्यास हार्पर कॉलिन्स-रैन्डम हाउस द्वारा प्रकाशित भेल आऽ प्रकाश आऽ अन्हारक दू तरहक भारतक ई वर्णन करैत अछि। एकटा फर्मक मालिक बलराम जे शुरूमे गयासँ आयल बलराम हलवाई छलाह चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओक भारत आगमनपर अपन अनुत्तरित सात पत्र (हरिमोहन झाक पाँच पत्र आ ब्यासजीक दू पत्र जकाँ) केर माध्यमसँ अपन खिस्सा कहैत छथि। ओऽ एकटा रिक्शा चालकक बेटा छथि जे चाहक दोकानपर किछु दिन काज केलाक बाद दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनैत छथि। फेर ओकरा मारि कय उद्योगपति बनि जाइत छथि। ड्राइवर सभ गप मालिकक सुनैत रहैत अछि, कलकत्ताक रिक्शाबला सभक खिस्सा सेहो अडिग सुनलन्हि आऽ दिल्लीक ड्राइवर लोकनिक सेहो आऽ खिस्साक प्लॊट बना लेलन्हि। समालोचनाक स्थिति: हिन्दीक अखबार सभ ई पुरस्कार प्राप्त भेलाक बादो एहि पुस्तकक समीक्षा एकटा चीप टी.वी. सीरियलक पटकथाक रूपमे कएलन्हि। मैथिलीक समालोचनाक तँ गपे छोड़ू, अंग्रेजीक अखबार सभ मुदा नीक समीक्षा कएलक। दिल्लीक चिड़ियाघरमे एकटा ह्वाइट टाइगर छैक गेनेटिक म्युटेशनक परिणाम जे एक पीढ़ीमे एक बेर अबैत छैक नहियो अबैत छैक। बलराम हलवाईक खिस्सा सेहो ह्वाइट टाइगर जकाँ विरल भेटत बेशी तँ कमाइ-खाइमे जिनगी बिता दैत छथि। एकर हार्डबाउन्ड किताब २०,००० कॉपी बिका चुकल अछि। पेन्गुइन इण्डिया जे ई किताब छपबासँ इन्कार कएने छल कहलक जे क्रॉसवर्ड पुरस्कारसँ किताबक बिक्रीमे १००० कॉपीक वृद्धि होइत छैक, बुकर भेटलापर १०,००० कॉपी बेशी बिकाइत छैक आऽ साहित्य अकादमी भेटलापर अंग्रेजी किताब १० कॉपी बेशी बिकाइत अछि! एहि अंकमे: श्री गगेश गुंजन जीक गद्य-पद्य मिश्रित "राधा" जे कि मैथिली साहित्यक एकटा नव कीर्तिमान सिद्ध होएत, केर छठम खेप पढ़ू। सुभाष चन्द्र यादव आऽ भ्रमर जीक कथा, महेश मिश्र "विभूति"-श्री पंकज पराशर- विनीत उत्पल- श्यामल जीक पद्य आऽ प्रेमशंकर सिंह जीक शोध लेख अछि।, जितमोहन, रामलोचन ठाकुर,निमिष झा,राजेन्द्र विमल, रेवतीरमण लाल, दिगम्बर झा "दिनमणि", रूपा धीरू, ज्योति,विद्यानन्द झा, नवीननाथ झा, विनीत उत्पल,वृषेश चन्द्र लाल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि,विभूति,महेन्द्र मलंगिया, कुमार मनोज कश्यप, कृपानन्द झा. रामभरोस कापड़ि रोशन जनकपुरी, पंकज पराशर,वैकुण्ठ झा, प्रकाश झा आ हिमांशु चौधरी जीक रचनासँ सुशोभित ई अंक अछि। श्री राजकमल चौधरीक रचनाक विवेचन कए रहल छथि श्री देवशंकर नवीन जी। ज्योतिजी पद्य, बालानांकृते केर देवीजी शृंखला, बालानांकृते लेल चित्रकला आऽ सहस्रबाढ़निक अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत कएने छथि। शिवशंकर श्रीनिवास केर मैथिली कथाक अग्रेजी अनुवाद सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि। भारतक विश्वनाथन आनन्द वर्ल्ड चेस प्रतियोगिता जितलन्हि तँ भारत अपन चन्द्रयान-१ यात्रा सेहो शुरु कएलक। मुदा संगमे असमक बम विस्फोट, उड़ीसाक नन बलात्कार आ मालेगाँव विस्फोट मोरक पएर सिद्ध भेल। शेष स्थायी स्तंभ यथावत अछि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० अक्टूबर २००८) ६२ देशसँ १,०८,३१२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें कहानी-संग्रह रेल की बात : हरिमोहन झा मू. सजिल्द १२५.०० पे.बै. ७०.०० छछिया भर छाछ : महेश ·टारे मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० नाच के बाहर : गौरीनाथ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० आइस-पाइस : अशोक भौमिक मू. सजिल्द १८०.०० पे.बै. ९०.०० भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ९०.०० कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० बड़कू चाचा : सुनीता जैन मू. सजिल्द १९५.०० कविता-संग्रह या : शैलेय मू. १६०.०० कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव मू. १५०.०० कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा मू. २२५.०० जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा मू. ३००.०० लाल रिज्बबन का फुलबा : सुनीता जैन मू. १९०.०० लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन मू. १९५.०० फैंटेसी : सुनीता जैन मू. १९०.०० दु:खमय अराकचक : श्याम चैतन्य मू. १९०.०० उपन्यास मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ८०.०० इतिहास, स्त्री-विमर्श और चिंतन डिजास्टर : मीडिया एण्ड पालिटिकस : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३००.०० पे.बै. १६०.०० एंकर की नज़र से : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३५०.०० पे.बै. १७५.०० पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी मू. २२५.०० स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम मू. २००.०० अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय मू. १८०.०० शीघ्र प्रकाश्य बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा माइक्रोस्कोप (उपन्यास) : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र (उपन्यास) : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर (उपन्यास) : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ (उपन्यास) : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन ज्या कोई है (कहानी-संग्रह) : शैलेय एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 (विज्ञापन) २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर 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NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि। मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव(असुरक्षित) 2.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" (हुगलीपर बहैत गंगा) २.२.मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना-धीरेन्द्र प्रेमर्षि २.३.प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन- महेन्द्र मलंगिया २.४. १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ)२.स्व. राजकमल चौधरी पर - डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.यायावरी- कैलाश कुमार मिश्र (लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार) २.६. १.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप २. दैनिकी- ज्योति ३. उपन्यास २.७. चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा २.८. १.नवेन्दु कुमार झा छठिपर २.नूतन झा भ्रातृद्वितियापर कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। असुरक्षित ट्रेनसँ उतरि कs ओ स्टेशनमे टांगल घड़ी देखलक। पौने दू। ओ ठमकि कs सोचय लागल । की करय ? चलि जाय ? या राति एत्तहि बिता लिअय? भरि रस्ता ओ अही गुनधुन मे पड़ल रहल आ अखनो छ पाँच कS रहल अछि। स्टेशन सँ घरक बीस-पच्चीस मिनटक रस्ता ओकरा बड्ड भारी लागि रहल छलै। जाड़क एहि निसबद राति मे सड़क़ एकदम सुनसान हेतै। समय साल बड्ड खराब छै। कखन की भS जेतै तकर कोनो ठेकान नहि। ओना ओकरा लग तेहन किछु नहि रहै। पचास-साठि टा टाका, एगो दामी चद्दरि आ पिन्हनावला कपड़ा। लेकिन जँ ईहो सब छिना गेलै तऽ फेर ओ जल्दी कीनि नहि सकत। ओ स्टेशनक सिमटीवला ठरल बेंच पर बैसि गेल आ सोचय लागल। परसू खन जाइतो काल ओ रातिए मे गेल रहय। जतय गेल रहय, ओतुक्का सीधा गाड़ी रातिए मे भेटै छै आ ओतय सँ साँझमे चलि कS एतय अखन दू बजे रातिमे पहुँचल अछि। जहिया जाइत रहय, तहिया साँझे सँ ओकर मन भारी रहै। मनमे अनेक तरहक आशंका आ भय समा गेल रहै। ट्रेन एक बजे रातिमे रहै। एहि जड़कालामे एतेक रातिकेँ स्टेशन गेनाइ ओकरा पहाड़ बुझाइत रहै। ओना ओ जतेक बेर निकलैत अछि, ओकरा लगैत रहैत छैक भS सकैत छै ई ओकर अंतिम यात्रा होइ। जाइत काल ओ बहुत चिन्तित आ उद्विग्न रहय । घरक लोक ओकरा खा-पी कS थोड़े काल सूति रहS कहलकै। फेर बारह बजे उठत आ चल जायत। लेकिन ओ बुझैत रहय ओकरा निन्न नहि हेतै। जँ कदाचित निन्न पड़ियो गेल तS बारह बजे उठि जायत तकर कोन गारंटी! आ जँ उठियो गेल तS सीड़क तर गरमा गेला पर बिछौन छोड़ S मे कतेक आलस आ कष्ट हेतै ! मुदा ई सब बात कोनो तेहन बात नहि रहै। ओकरा सबसँ बेसी चिन्ता एहि बातक रहै जे एतेक राति कS ओ जायत कोना? जाड़क एहि सुनसान रातिमे असकरे स्टेशन जायब ओकरा भयावह बुझाइत रहै। एतेक राति कS ने रिक्शा भेटै छै, ने सड़क पर एक्को टा आदमी। ओ तय केलक जे आठ बजे निकलि जायत। स्टेशनक बगल वला हॉलमे आखिरी शो सिनेमा देखत आ ट्रेन पकड़ि लेत। हॉलमे जाड़ो सँ बचल रहत। घरक लोक ओकर एहि निर्णय सँ अचंभित भेल। पहिने कहियो ओ एना नहि कयने रहय। ओकर चिंता आ डर देखि कS घरक लोक विरोध नहि केलकै। ओ अपन निश्चित कयल कार्यक्रमक अनुसार घरसँ आठ बजे निकलि गेल। सितलहरी तेहन रहै जे एतेक सबेरे सबटा दोकान बन्न भऽ गेल छलै। सड़क पर ओकरा दुइए टा आदमी भेटलै। एकटा के भेदी दृष्टि सँ तऽ ओ डेराइयो गेल रहय। हॉल पर ओ सवा आठ बजे पहुँचि गेल आ नौ बजे धारि टौआइत रहल। घर पर रहितय तऽ आराम करैत रहितय। हॉल पर बइसइयोक ठहार नहि रहै। ओ देबालक टेक लेने ठाढ़ रहल। आब ओकरा ट्रेन छुटबाक चिंता हुअय लगलैक। खोंचावला, पानवला आ गेटकी सँ पता लगेलक सिनेमा कखन खतम हेतै; फ़िलिम लंबा तऽ ने छै? शो टुटिते एक गोटय सँ टाइम पुछलक। सवा बारह। गाड़ी नहि छुटतै । तइयो ओ अपन चालि तेज केलक आ स्टेशन दिस जाइ वला रेलामे सन्हिया गेल। स्टेशन पहुँचि कऽ ओकरा पता चललै गाड़ी बहुत लेट छै। दू सँ पहिने नहि खुलतै। ओ टिकट कटेलक आ सिमटी वला बेंच पर बइस कऽ प्रतीक्षा करय लागल। भरिसक इएह बेंच रहै, जइ पर अखन बइसल सोचि रहल अछि। आ सोचि की रहल अछि, परसुक्का बात मोन पाड़ि रहल अछि। सोचबाक लेल छइहो की? गुंडा-बदमाशक डर। पहिने कोनो डर नहि रहै। ओ बहुत-बहुत राति कऽ कतयसँ कतय गेल अछि। नि:शंक। बेधड़क। लेकिन आब राति कऽ निकलबाक साहस नहि होइत छै। अखबारमे रोज लूटपाट आ हत्याक समाचार पढ़ि-पढ़ि कऽ आ लोकक अनुभव सुनि-सुनि कऽ जी मे डर समा गेल छै। ओ उधेड़बुन मे पड़ल किछु तय नहि कऽ पाबि रहल अछि जे की करय। घर चलि जाय कि स्टेशने पर भोर कऽ लिअय। रिक्शा भरिसक्के भेटतै। भेटियो जेतै तऽ रिक्शावलाकेँ गुंडा की गुदानतै ! जँ रिक्शेवला गुंडा निकलि गेल, तखन ओ की करत ? आब ककरो पर भरोस नहि रहलै। ढील पड़ि गेल मफलरकेँ ओ कसि कऽ लपेटलक आ चद्दरिसँ मूड़ी आ टांगकेँ नीक जकाँ झाँपलक । मुदा एहि झाँप-तोपसँ जाड़ नहि भागलै। निफाह प्लेटफार्म पर पछिया सट-सट लगै आ सौंसे शरीर केँ छेदने चल जाइत रहै । पोन ठरि कऽ पानि भऽ गेल छलै । ओ छने-छन अपन आसन बदलि रहल छल। पछिला दू राति सँ ओ सूति नहि सकल आ ट्रेनमे झमारल गेल। थकनी आ जगरनामे और बेसी जाड़ होइ छै। घर चल जइतय तऽ सीड़कमे गरमा कऽ सूति रहियत। ओ विचारलक जे टहलि कऽ रिक्शा देख आबय । भेटलै तऽ चल जायत । लेकिन रिक्शा पड़ाव पर क्यो कत्तहु नहि रहै । अन्हारमे एकटा रिक्शा लागल छलै । देखलक सीट पर एक गोटय घोकड़ी लगा कऽ पड़ल अछि । ओ एक-दू बेर हाक देलकै । मुदा ओ आदमी नहि उठलै । ओ फेर पेशोपेश मे पड़ि गेल । कनेक दूर पर एक आदमी असकरे चलल जाइत रहै । ओकरा पर नजरि पड़िते ओ झटकि कऽ विदा भेल जेना ओकरा पकड़ि लेत आ संग-संग घर धरि पहुँचि जायत । ओ थोड़बे दूर झटकल गेल होयत कि ओकर चालि मंद पड़ि गेलै । कोनो जरूरी नहि जे ओ आदमी ओम्हरे जेतै, जेम्हर ओकरा गेनाइ छै । लेकिन कोनो अज्ञात प्रेरणावश ओ धीरे-धीरे बढ़ैत गेल । आगाँ जा कऽ एकटा मोड़ रहै । जखन ओ मोड़ पर घूमल आ हियासलक तऽ ओहि आदमी के दूर-दूर धरि कोनो पता नहि रहै । नहि जानि ओ आदमी कतय अलोपित भऽ गेलै । कतहु नुकायल ओकर प्रतीक्षा तऽ ने कऽ रहल छै ! अचानक ओकर देह डरसँ सिहरि उठलै । ई डर बेसी काल टिकलै नहि । ओ कनेक और आगाँ बढ़ल तऽ ओकर कलेजा थिर हुअय लगलै । जाड़क पीयर मलिन इजोरिया पसरल छलै । भरिसक पछियाक कारणे कुहेस नहि रहै । स्टैण्ड मे लागल भोरका बस दूरे सँ देखा रहल छलै । अपराधक एकटा अड्डा ईहो रहै । एहिठाम कैक बेर कैक आदमी के सामान धिनायल रहै । स्टैण्डक घेरा लग पहुँचिते ओकर आशंका बढ़ि गेलै । स्टैण्ड निर्जन आ सुनसान पड़ल छलै । राति कऽ ई जगह बड़ भयाओन लगैत रहै । स्टैण्ड सँ निकलि गेला पर ओकर डर कमि गेलै ।लेकिन अखन ओ अदहे दूर आयल छल । बचलहा रस्ता बहुत दूर बुभाइत रहै । पुलिसो कतहु नहि छलै । सड़क कातक दोकान दौड़ी, घर-दुआर सब बंद रहै । एक्को टा कुकूरो नहि देखाइत रहै । जाड़मे ओहो सब दुबकल होयत । नमडोरिया सड़क पर ओ असकरे चल जा रहल छल । कैक बेर अपनो जुत्ताक आवाज सुनि कऽ लगै क्यो पछुअयने आबि रहल अछि आ जी सन्न सिन रहि जाइ । खट-खट सुनि कऽ छाती धड़कि उठै । ओकर घर अदहोक अदहा रहि गेल छलै । ओकरा भरोस भेल चल जाइत रहै जे आब ओ बचि गेल । आब किछु नहि हेतै । ओ सकुशल घर पहुँचि जायत । ठीक तखने ओ आवाज सुनलक । आवाज पाछाँ सँ आयल छलै । क्यो किछु बाजल रहै । ओकर जी सनाक सिन उठलै । ओ पलटि कऽ ताकलक। मुदा क्यो देखेलै नहि । ओकरा भेलै क्यो अपन घरमे किछु बाजल होयत। ओ बढ़ैत गेल। ’ “के छी ?” - पाछाँ सँ क्यो पुछलकै । ओ धुमि कऽ देखलक । एक आदमी ठाढ़ छलै । ओ कोनो जवाब नहि देलक आ बढ़ैत रहल। ’अय के छिअय ? ठाढ़ रहऽ।’ - ओकर एहि आदेशसँ ओ भयभीत भऽ गेल आ अपन चालि तेज कऽ देलक । ओ आदमी अपराधी बुझा रहल छ्लै । अखन जँ ओ आदमी आबिकऽ ओकरा घेरि लै तऽ ओ कतबो चिचिआयत क्यो नहि एतै। आब राति-बिराति मुसीबत मे पड़ल लोकक लेल क्यो नहि निकलै छै । ओ दसे डेग आगू बढ़ल होयत कि पलटि कऽ ताकलक। ताकिते ओ आतंकित भऽ उठल। ओ आदमी दौड़ल आबि रहल छलै । ओ भागल । ओ भागल जा रहल अछि । श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” (१९५१- ) जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। सम्प्रति-जनकपुरधाम, नेपाल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पी.एच.डी. (मानद)।
हाल: प्रधान सम्पादक: गामघर साप्ताहिक, जनकपुर एक्सप्रेस दैनिक, आंजुर मासिक, आंगन अर्द्धवार्षिक (प्रकाशक नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी)।
मौलिक कृति: बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)।
नेपाली कृति: आजको धनुषा, जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरु (आलेख-संग्रह), भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरु (अनुवाद)।
सम्पादन: मैथिली पद्य संग्रह (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान), लाबाक धान (कविता संग्रह), माथुरजीक “त्रिशुली” खण्डकाव्य (कवि स्व. मथुरानन्द चौधरी “माथुर”), नेपालमे मैथिली पत्रकारिता, मैथिली लोक नृत्य: भाव, भंगिमा एवं स्वरूप (आलेख संग्रह)। गामघर साप्ताहिकक २६ वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन, “अर्चना” साहित्यिक संग्रहक १५ वर्ष धरि सम्पादन-प्रकाशन। “आँजुर” मैथिली मासिकक सम्पादन प्रकाशन, “अंजुली” नेपाली मासिक/ पाक्षिकक सम्पादन प्रकाशन।
अनुवाद: भयो, अब भयो (“नहि आब नहि”क मनु ब्राजाकीद्वारा कयल नेपाली अनुवाद)
सम्मान: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा पहिल बेर १९९५ ई.मे घोषित ५० हजार टाकाक मायादेवी प्रज्ञा पुरस्कारक पहिल प्राप्तकर्ता। प्रधानमंत्रीद्वारा प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार प्रदान। विद्यापति सेवा संस्थान दरिभङ्गाद्वारा सम्मानित, मैथिली साहित्य परिषद, वीरगंजद्वारा सम्मानित, “आकृति” जनकपुर द्वारा सम्मानित, दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाद्वारा सम्मानित, जिल्ला विकास समिति धनुषा द्वारा दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल पुरस्कृत एवं सम्मानित, नेपाली मैथिली साहित्य परिषद द्वारा २०५९ सालक अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्वई द्वारा “मिथिला रत्न” द्वारा सम्मानित, शेखर प्रकाशन “पटना” द्वारा “शेखर सम्मान”, मधुरिमा नेपाल (काठमाण्डौ) द्वारा २०६३ सालक मधुरिमा सम्मान प्राप्त। काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधित्व।
सामाजिक सेवा : अध्यक्ष-तराई जनजाति अध्ययन प्रतिष्ठान, जनकपुर, अध्यक्ष- जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपाध्यक्ष- मैथिली प्रज्ञा प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपकुलपति- मैथिली अकादमी, नेपाल, उपाध्यक्ष- नेपाल मैथिली थाई सांस्कृतिक परिषद, सचिव- दीनानाथ भगवती समाज कल्याण गुठी, जनकपुर, सदस्य- जिल्ला वाल कल्याण समिति, धनुषा, सदस्य- मैथिली विकास कोष, धनुषा, राष्ट्रीय पार्षद- नेपाल पत्रकार महासंघ, धनुषा। हुगली पर बहैत गंगा- रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” हीरामन आइ फंसि गेल अछि ठेठर बाली बाईक संग। ओहि ठाम तं हीरामनक प्रेम एक तरफा रहैक, ठेठरबाली बाई मात्र सहानुभुति देखौने रहैक। एत्त तं बात बीगड़ि गेल छै। दुनू दिश आगि लागि गेल छै आ हीरबाके भितर छट-पट्टी उठि गेल छै- आब कोना कऽ रहत ग सोनाबाईके विना ओ...। कएकटा सिनेमा देखने रहय जाहिमे बाइक प्रेम बरोवरि असपल होइत गेलै आ कतेक त एहि संसारे सं विदा भऽ गेल रहय। आ तएँ एम्हर टपबासं पहिने ओ कएक बेर सोचने रहय। कतौ मन मीलि गेल तं...। दुत्-हमरा सन सनके के पतिअएतै। कनी मनोरंजन करब आ घुरि आएब- हीरा मनके तोष दैत...स्ट्रीटक वंगला नं.४ मे पैसि गेल रहय। समय अपरान्हक तीन बजेक रहैक। दरबज्जा पर एकसरि ठाढ़ि सोना ओकरा किए नीक लागल रहैक। सम्भवतः एहु दुआरे जे आन दरबज्जाक बाई सभ बटोहीकेँ जवर्दस्ती हाक पाड़ैक। नहि आब चाहवलाक देहमे रगड़ा लैक, जेबीमे हाथ धरैक, धक्का मारैक मुदा जखन ओ एहि दुहारि पर आएल त गुम सुम ठाढ़ अठार- उन्नैस वर्षक पीण्डश्याम सन अत्यन्त सुभग हीरा ओकरा अपना दिश आकर्षित कऽ लेलकै आ ओ ओत्त ठमकि गेल रहय। हीराके एखनो मोन गुद-गुदा जाइछै सोनाक तखनका मुस्कीके स्मरण करैत। ओ लोटपोट भऽ गेल रहय आ आंखिक दरबज्जा दऽ सोनाक हृदयमे जेना पैसि जाए चाहने रहय। सोना ओकरा लऽ दू महला पर सजाओल एकटा कोठरीमे लऽ गेलै। ओ कोठरीमे जएबासं पूर्व घरक वातावरणके जंचबाक लेल नजरि खिरौने रहय- आठ, दश कोठरी आर रहैक, जाहिमे हंसी, मजाकक स्वर आबि रहल छलैक। माने ग्राहक ओम्हरो फंसल रहैक। सोना वांचल छलीह एहु दुआरे जे ओकर रंग ओतेक साफ नहि रहैक, आ ने आन छौड़ी जकां लब-लब ओ करैत छल। ग्राहककें बुझाइक एहि मन्हुआएल छौड़ीमे कोनो जान नहि हयतैक सम्भवतः, तएं ओ चुपचाप ग्राहकक प्रतीक्षामे सभसँ अन्त धरि बैसल करए। बादमे ओकरा सोना सँ पता चललै, सभ के ग्राहक भेटि गेलाक वादे हारल-फुरल लोक ओकरा लग अबैक। एहिसं एक बात त जरूर रहैक- सोना आन बाई जकां तोड़ल-मचोड़ल नहि गेलि रहय, वांचल छलीह। ओकर अनुहारक तेज एखनो दपदप करैक आ सएह तेज हीराके ओकरा दिश आकर्षित कएने रहैक। पहिल सांझ सोनाक संग महज ग्राहक भऽ वीतबऽ चाहैत रहय हीरा। थाकि हारि गेल छल एहि महानगरमे। बाप मायके कमाएक नाम पर दू हजार टका लऽ कलकत्ता आबि गेल रहय। ओकर गौंआ सभ एत्त कमाइ छै, कहने रहैक कोनो सेठक बंगलापर लिखापढ़ी के काम छै दिआ देबौ। मन त रहै जे विदेशे उड़ि जाइ, बड़ लोक ओकरो गामके अरब गेलैए। विदेशमे पाइ त होइ छै, मुदा कष्टो कम नहि छैक। घर-परिवार सँ दूर। ओ सोचने रहय- उड़ानक बात बादमे देखल जएतै। एक बेर गौंएँ सभक बातके भजा ली आ कलकत्ता चलि आएल, से आइ पन्द्रह दिन भऽ गेल छै, मुदा ओइ सेठक ओइ ठाम काम नहि भऽ सकल। ओ आबे-आबे ताबे दोसरके रखि लेने रहय। ओ बौआ गेल रहय आ फेरसं सरिआ कऽ काम खोजऽ पड़ि रहल छलैक। रहबालेऽ गौआक खोली रहैक आ खएबा ले सेहो कहियो काल ओकरे सभके ओहि ठाम खा लैक। मुदा कलकत्तामे खर्च त होइते छैक। काम नहि भेटौक त कतेक दिन टिकत ओ...। सोना बाई टोकैत छै त ओकर तंद्रा भंग भऽ जाइत छै- की सोचऽ लगलहु। आउने, आनो ग्राहक खोज पड़तै ने। हीरा बच्चेसं भावुक स्वभावक रहल अछि। चौबीस-पच्चीस वर्षक उमेर भऽ गेलै, बाप-माय कतबो वीआहक लेल कहैत छैक ओकरा अपन मनमे की फुरै छै की नहि, वरोबरि मना करैत आएल अछि। नारीक प्रति अत्यन्त सम्मान रखैत अछि हीरा...। आइ उएह नारीक संग...। “की भेल बाबू साहेब, आउ सेज पर”- कहैत सोना अपन साड़ी खोलऽ लागल। साड़ी खोललाक बाद ब्लाउज खोललक आ निचांक साया सेहो। हीरा एखनो चुपचाप ठाढ़ सोनाक देहयष्टि निहारि रहल छलै। ओ भरल। बजैत अछि- ओहने हवसी सभ अबैत अछि। दारु पीबैत अछि, सिकरेट जड़बैत अछि आ ठुठ्ठा कखनो कऽ सम्वेदनशील अंग पर रगड़ि छिलमिला दैत अछि। नोचैत अछि, निछोड़ैत अछि आ घंटो तबाह कएने रहैछ। ओकरा ने हम किछु कहि सकैत छिऐक ने हमर बाई। मोट पाइ देने रहैछ ओ। इएह छै एहि गल्लीक जीवन आ सत्य...।’ कनेक काल चुप्प भऽ सोना हीरा दिश तकैत बजैत अछि- अहाँ एहि थालो कादोसँ भरल विशाल दलदली मैदानमे अपना वैसबाले एक हाथ सुक्खल ठाम खोजऽ आएल छी- ई अहांक भोलापन अछि आ अहांक इएह भोलापन हमरा भितर धरि हिला देलक अछि। हम एखन धरि सिहरन महशूस कऽ रहल छी। ई सुखानुभूतिक सिहरन थिक जे आइ धरि हमरा नहि भेटल छल, पता नहि अहाँमे की अछि, आइसँ अहाँ हमर गहिंकी छी, हम चाहब अहाँ नित्य आबी, कमसँ कम एक बेर। हीरा त आर सर्द भऽ जाइत अछि। ई की भऽ रहल छैक। उनटा हुगली बहऽ लगलै एत्त। हम कोना एत्त आबि सकै छी। आइ एक दिन अएबाले कतेक हिम्मत जुटौने छी, ई त सभ दिन कहैत अछि। नहि, कतहु फेर सँ त्रिया चरित देखाओत त ने ई...। सोना हीराके गुनधुन करैत देखि फेर टोकैत छैक- अहाँ सोचैत हयब, हमर फीश दिनहुं कोना दऽ सकब। बाबूजी, हमरा लेल आनो ग्राहक सभ छैक ने। हम ताहि महक अपन हिस्सासँ बाइके अहाँक हिस्साक पाइ दऽ देबै, अहाँ ओहिना अबियौ, हमरा नीक लागत। आब हीराके मोन मानि जाइत छैक जे कोनो लाइ-लपेट सोनाक मनमे नहि छै। सांचे ओ बाघ, सिंहक हेंजक विच कोनो अपने सन हरिन खोजऽ चाहैत अछि, जकरा संग सुख दुखक गप कऽ सकए, मोनक पीड़ाकेँ बाँटि सकए। ओ आश्वस्ति दऽ दैत छैक। ओकर नोकरी, संगमे घटल जाइत पाइ, किछु सुधि नहि रहैछ ओकरा। ओ सोनाकें छातीसँ सटा लैत अछि। पहिल बेर सोनाकें छातीसँ लगा ओकरा अपनत्वक बोध होइत छैक, राहत भेटैत छैक। मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना-धीरेन्द्र प्रेमर्षि रूप-रङ्ग एवं चालि-प्रकृति देखलापर गीत आ गजल दुनू सहोदरे बुझाइत छैक। मुदा मैथिलीमे गीत अति प्राचीन काव्यशैलीक रूपमे चलैत आएल अछि, जखन कि गजल अपेक्षाकृत अत्यन्त नवीन रूपमे। एखन दुनूकेँ एकठाम देखलापर एना लगैत छैक जेना गीत-गजल कोनो कुम्भक मेलामे एक-दोसरासँ बिछुड़ि गेल छल। मेलामे भोतिआइत-भासैत गजल अरबदिस पहुँचि गेल। गजल ओम्हरे पलल-बढ़ल आ जखन बेस जुआन भऽ गेल तँ अपन बिछुड़ल सहोदरकेँ तकैत गीतक गाम मिथिलाधरि सेहो पहुँचि गेल। जखन दुनूक भेट भेलैक तँ किछु समय दुनूमे अपरिचयक अवस्था बनल रहलैक। मिथिलाक माटिमे पोसाएल गीत एकरा अपन जगह कब्जा करऽ आएल प्रतिद्वन्दीक रूपमे सेहो देखलक। मुदा जखन दुनू एक-दोसराकेँ लगसँ हियाकऽ देखलक तखन बुझबामे अएलैक-आहि रे बा, हमरासभमे एना बैर किएक, हम दुनू तँ सहोदरे छी! तकरा बाद मिथिलाक धरतीपर डेगसँ डेग मिला दुनू पूर्ण भ्रातृत्व भावेँ निरन्तर आगाँ बढ़ैत रहल अछि। गीत आ गजलक स्वरूप देखलापर दुनूक स्वभावमे अपन पोसुआ जगहक स्थानीयताक असरि पूरापूर देखबामे अबैत अछि। गीत एना लगैत छैक जेना रङ्गबिरङ्गी फूलकेँ सैँतिकऽ सजाओल सेजौट हो। मिथिलाक गीतमे काँटोसन बात जँ कहल जाइछ तँ फूलेसन मोलायम भावमे। एकरा हम एहू तरहेँ कहि सकैत छी जे गीत फूलक लतमारापर चलबैत लोककेँ भावक ऊँचाइधरि पहुँचबैत अछि। एहिमे मिथिलाक लोकव्यवहार एवं मानवीय भाव प्रमुख भूमिका निर्वाह करैत आएल अछि। जाहि भाषाक गारियोमे रिदम आ मधुरता होइत छैक, ओहि भूमिपर पोसाएल गीतक स्वरूप कटाह-धराह भइए नहि सकैत अछि। कही जे गीतमे तँ लालीगुराँसक फूलजकाँ ओ ताकत विद्यमान छैक जे माछ खाइत काल जँ गऽरमे काँट अटकि गेल तँ तकरो गलाकऽ समाप्त कऽ दैत छैक। गजलक बगय-बानि देखबामे भलहि गीतेजकाँ सुरेबगर लगैक, एहिमे गीतसन नरमाहटि नहि होइत छैक। उसराह मरुभूमिमे पोसाएल भेलाक कारणे गजलक स्वभाव किछु उस्सठ होइत छैक। ई कट्टर इस्लामीसभक सङ्गतिमे बेसी रहल अछि, तेँ एकर स्वभावमे “जब कुछ न चलेगी तो ये तलवार चलेगा” सन तेज तेवरबेसी देखबामे अबैत छैक। यद्यपि गजलकेँ प्रेमक अभिव्यक्तिक सशक्त माध्यम मानल जाइत छैक। गजल कहितहिँदेरी लोकक मन-मस्तिष्कमे प्रेममय माहौल नाचि उठैत छैक, एहि बातसँ हम कतहु असहमत नहि छी। मुदा गजलमे प्रेमक बात सेहो बेस धरगर अन्दाजमे कहल जाइत छैक। कहबाक तात्पर्य जे गजल तरुआरिजकाँ सीधे बेध दैत छैक लक्ष्यकेँ। लाइलपटमे बेसी नहि रहैत छैक गजल। मिथिलाक सन्दर्भमे गीत आ गजलक एक्कहि तरहेँ जँ अन्तर देखबऽ चाही तँ ई कहल जा सकैत अछि जे गजल फूलक प्रक्षेपणपर्यन्त तरुआरिजकाँ करैत अछि, जखन कि गीत तरुआरि सेहो फूलजकाँ भँजैत अछि। मैथिलीमे संख्यात्मक रूपेँ गजल आनहि विधाजकाँ भलहि कम लिखल जाइत रहल हो, मुदा गुणवत्ताक दृष्टिएँ ई हिन्दी वा नेपाली गजलसँ कतहु कनेको झूस नहि देखबामे अबैत अछि। एकर कारण इहो भऽ सकैत छैक जे हिन्दी, नेपाली आ मैथिली तीनू भाषामे गजलक प्रवेश एक्कहि मुहूर्त्तमे भेल छैक। गजलक श्रीगणेश करौनिहार हिन्दीक भारतेन्दु, नेपालीक मोतीराम भट्ट आ मैथिलीक पं. जीवन झा एक्कहि कालखण्डक स्रष्टासभ छथि। मैथिलीयोमे गजल आब एतबा लिखल जा चुकल अछि जे एकर संरचनाक मादे किछु कहनाइ दिनहिमे डिबिया बारबजकाँ लगैत अछि। एहनोमे यदाकदा गजलक नामपर किछु एहनो पाँतिसभ पत्रपत्रिकामे अभरि जाइत अछि, जकरा देखलापर मोन किछु झुझुआन भइए जाइत छैक। कतेकोगोटेक रचना देखलापर एहनो बुझाइत अछि, जेना ओलोकनि दू-दू पाँतिवला तुकबन्दीक एकटा समूहकेँ गजल बूझैत छथि। हमरा जनैत ओलोकनि गजलकेँ दूरेसँ देखिकऽ ओहिमे अपन पाण्डित्य छाँटब शुरू कऽ दैत छथि। जँ मैथिली साहित्यक गुणधर्मकेँ आत्मसात कऽ चलैत कोनो व्यक्ति एकबेर दू-चारिटा गजल ढङ्गसँ देखि लिअए, तँ हमरा जनैत ओकरामे गजलक संरचनाप्रति कोनो तरहक द्विविधा नहि रहि जएतैक। तेँ सामान्यतः गजलक सम्बन्धमे नव जिज्ञासुक लेल जँ किछु कहल जाए तँ विना कोनो पारिभाषिक शब्दक प्रयोग कएने हम एहि तरहेँ अपन विचार राखऽ चाहैत छी- गजलक पहिल दू पाँतिक अन्त्यानुप्रास मिलल रहैत छैक। अन्तिम एक, दू वा अधिक शब्द सभ पाँतिमे सझिया रहलहुपर साझी शब्दसँ पहिनुक शब्दमेअनुप्रास वा कही तुकबन्दी मिलल रहबाक चाही। अन्य दू-दू पाँतिमे पहिल पाँति अनुप्रासक दृष्टिएँ स्वच्छन्द रहैत अछि। मुदा दोसर पाँति वा कही जे पछिला पाँति स्थायीवला अनुप्रासकेँ पछुअबैत चलैत छैक। ई तँ भेल गजलक मुह-कानक संरचनासम्बन्धी बात। मुदा खालि मुहे-कानपर ध्यान देल जाए आ ओकर कथ्य जँ गोङिआइत वा बौआइत रहि जाए तँ देखबामे गजल लगितो यथार्थमे ओ गीजल भऽ जाइत अछि। तेँ प्रस्तुतिकरणमे किछु रहस्य, किछु रोमाञ्चक सङ्ग समधानल चोटजकाँ गजलक शब्दसभ ताल-मात्राक प्रवाहमय साँचमे खचाखच बैसैत चलि जएबाक चाही। गजलक पाँतिकेँ अर्थवत्ताक हिसाबेँ जँ देखल जाए तँ कहि सकैत छी जे हऽरक सिराउरजकाँ ई चलैत चलि जाइत छैक। हऽरक पहिल सिराउर जाहि तरहेँ धरतीक छाती चीरिकऽ ओहिमे कोनो चीज जनमाओल जा सकबाक आधार प्रदान करैत छैक, तहिना गजलक पहिल पाँति कल्पना वा विषयवस्तुक उठान करैत अछि, दोसर पाँति हऽरक दोसर सिराउरक कार्यशैलीक अनुकरण करैत पहिलमे खसाओल बीजकेँ आवश्यक मात्रमे तोपन दऽकऽ पुनः आगू बढ़बाक मार्ग प्रशस्त्र करैत अछि। गजलक प्रत्येक दू-पाँति अपनहुमे स्वतन्त्र रहैत अछि आ एक-दोसराक सङ्ग तादात्म्य स्थापित करैत समग्रमे सेहो एकटा विशिष्ट अर्थ दैत अछि। एकरा दोसर तरहेँ एहुना कहल जा सकैत अछि जे गजलक पहिल पाँति कनसारसँ निकालल लालोलाल लोह रहैत अछि, दोसर पाँति ओकरा निर्दिष्ट आकारदिस बढ़एबाक लेल पड़ऽ वला घनक समधानल चोट भेल करैत अछि। गीतक सृजनमे सिद्धहस्त मैथिलसभ थोड़े बगय-बानि बुझितहिँ आसानीसँ गजलक सृजन करऽ लगैत छथि। सम्भवतः तेँ आरसीप्रसाद सिंह, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ महेन्द्र, मार्कण्डेय प्रवासी, डॉ. गङ्गेश गुञ्जन, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र आदि मूलतः गीत क्षेत्रक व्यक्तित्व रहितहु गजलमे सेहो कलम चलौलनि। ओहन सिद्धहस्त व्यक्तिसभक लेल हमर ई गजल लिखबाक तौर-तरिकाक मादे किछु कहब हास्यास्पद भऽ सकैत अछि, मुदा नवसिखुआसभकेँ भरिसक ई किछु सहज बुझाइक। मैथिलीमेकलम चलौनिहारसभमध्य प्रायः सभ एक-आध हाथ गजलोमे अजमबैत पाओल गेलाह अछि। जनकवि वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” सेहो “भगवान हमर ई मिथिला” शीर्षक कविता पूर्णतः गजलक संरचनामे लिखने छथि। मुदा सियाराम झा “सरस”, स्व. कलानन्द भट्ट, डॉ.राजेन्द्र विमल सन किछु साहित्यकार खाँटी गजलकारक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। ओना सोमदेव, डॉ.केदारनाथ लाभ, डॉ.तारानन्द वियोगी, डॉ.रामचैतन्य धीरज, बाबा वैद्यनाथ, डॉ. विभूति आनन्द, डा.धीरेन्द्र धीर, फजलुर्रहमान हाशमी, रमेश, बैकुण्ठ विदेह, डा.रामदेव झा, रोशन जनकपुरी, पं. नित्यानन्द मिश्र, देवशङ्कर नवीन, श्यामसुन्दर शशि, जनार्दन ललन, जियाउर्ररहमान जाफरी, अजितकुमार आजाद, अशोक दत्त आदिसमेत कतेको स्रष्टाक गजल मैथिली गजल-संसारकेँ विस्तृति दैत आएल अछि। गजलमे महिला हस्ताक्षर बहुत कम देखल जाइत अछि। मैथिली विकास मञ्चद्वारा बहराइत पल्लवक पूर्णाङ्क १५, २०५१ चैतक अङ्क गजल अङ्कक रूपमे बहराएल अछि। सम्भवतः ३४ गोट अलग-अलग गजलकारक एकठाम भेल समायोजनक ई पहिल वानगी हएत। एहि अङ्कमे डा. शेफालिका वर्मा एक मात्र महिला हस्ताक्षरक रूपमे गजलक सङ्ग प्रस्तुत भेलीह अछि। एही अङ्कक आधारपर नेपालीमे मैथिली गजल सम्बन्धी दूगोट समालोचनात्मक आलेख सेहो लिखाएल अछि। पहिल मनु ब्राजाकीद्वारा कान्तिपुर २०५२ जेठ २७ गतेक अङ्कमे आ दोसर डा. रामदयाल राकेशद्वारा गोरखापत्र २०५२ फागुन २६ गतेक अङ्कमे। छिटफुट आनहु गजल सङ्कलन बहराएल होएत, मुदा तकर जानकारी एहि लेखककेँ नहि छैक। हँ, सियाराम झा “सरस”क सम्पादनमे बहराएल “लोकवेद आ लालकिला” मैथिली गजलक गन्तव्य आ स्वरूप दऽ बहुत किछु फरिछाकऽ कहैत पाओल गेल अछि। एहिमे सरससहित तारानन्द वियोगी आ देवशङ्कर नवीनद्वारा प्रस्तुत गजलसम्बन्धी आलेख सेहो मैथिली गजलक तत्कालीन अवस्थाधरिक साङ्गोपाङ्ग चित्र प्रस्तुत करबामे सफल भेल अछि। समग्रमे मैथिली गजलक विषयमे ई कहि सकैत छी जे मैथिली गीतक खेतसँ प्राप्त हलगर माटिमे गुणवत्ताक दृष्टिएँ मैथिली गजल निरन्तर बढ़िरहल अछि, बढ़िएरहल अछि। गजल १ झुट्ठो जे नहि डाइन नचौलक ओ भगता ओ धामी की एको गाम जँ डाहि ने सकलहुँ तँ ओढ़ने रमनामी की अक्षत-चानन धूप-दीपसँ जतऽ यज्ञ सम्पूर्ण हुअए- ततऽ जँ क्यो हड्डी रगड़ैए, ओ कामी ओ कलामी की बाप-माएपर्यन्त परोसै स्नेह जखन बटखारासँ- नकली सभक दुलार लगैए, से काकी, से मामी की सोनित सेहो शराब बनै छै शासनकेर सनकी भट्ठी दियौ घटाघटि जे भेटए से, फुसियाही की दामी की पोखरिक रखबारी पएबालए कण्ठी खालि बान्हि लिअ फेर गटागटि घोँटने चलियौ, से पोठिया से बामी की पाग उतारिकऽ कूदि गेल “प्रेमर्षि” सेहो अखाड़ामे ढाहि सकल ने जुल्म-इमारत करतै ओहन सुनामी की (वि.२०६२/०५/३०) गजल २ मोन जँ कारी अछि तँ चमड़ी गोरे की करतै? ममते जँ अरुआएल तँ माएक कोरे की करतै? गगनसँ उतरै मेघ नयनमे जखन साँचिकऽ शङ्का केहनो अन्हार चीरिकऽ जनमल भोरे की करतै? नीम पीबिकऽ माहुर सेहो पचाबैत आएल छी तँ काँटकेँ धाङैत डेगकेँ थोड़े अङोरे की करतै? घामक सिँचल धरती छोड़ि ने जकरा कतौ भरोसा तकरा लेल बनसीक सुअदगर बोरे की करतै? आगि पीबिकऽ बज्र बनौने छै जे अप्पन छाती तकरा आगाँ गोहिया आँखिक नोरे की करतै? तैयो लागल “प्रेमर्षि” अछि बस प्रेमक खेतीमे प्रेमक धन भेल घरमे जाबिड़ चोरे की करतै? (वि.२०६२/०५/२०) शुभकामना दिआबातीक- धीरेन्द्र प्रेमर्षि चमकैत दीपकेँ देखिकऽ जेना झुण्ड कीड़ा-मकोड़ा कऽ दैछ न्यौछावर अपन अस्तित्व दुर्गुण वा खलतत्त्वरूपी कीड़ा-मकोड़ाकेँ नष्ट करबाक लेल चाही ने आओर किछु अपना भीतरक मानवीय इजोतक टेमी कने आओर उसका ली अपनाकेँ सभक मन-मनमे मुसका ली इएह अछि शुभकामना दिआबातीक- देहरि दीप जरए ने जरए मनधरि सदति रहए झिलमिल किएक तँ अपना मात्र इजोतमे रहने मेटा नहि सकैछ संसारसँ अन्हार (अगिला अँकमे धीरेन्द्र जीक गजल पद्य स्तंभमे) महेन्द्र मलंगिया प्रकाश झापर महेन्द्र मलंगिया : मैथिलीक सुपरिचित नाटककार, रंग निर्देशक एवं मैलोरंगक संस्थापक अध्यक्ष । लोक साहित्य पर गंभीर शोध आलेख । मैथिलीमे 13टा नाटक, 19टा एकांकी, 14टा नुक्कड़ आ 10टा रेडियो नाटक प्रकाशित आ आकाशवाणी सँ प्रसारित । सीनियर फेलोशिप (भारत सरकार), इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिच्यूट (नेपाल), प्रबोध साहित्य सम्मान आदि सँ सम्मानित । संप्रति ज्योतिरीश्वर लिखित मैथिलीक प्रथम पुस्तक वर्णरत्नाकर पर शोध कार्य । श्री महेन्द्र मलगियाक जन्म २० जनबरी १९४६ मे मधुबनी जिलाक मलंगिया गाममे भेलन्हि। मलंगियाजी मैथिली हिन्दी, अंग्रेजी आ नेपाली भाषाक जानकार आ थियेटर शिक्षण, पटकथा लेखन आ तत्सम्बन्धी शोधक फ्रीलान्स शिक्षक छथि। सम्मान, उपाधि आ पुरस्कार: २००६(सीनियर फ़ेलो, मानव ससाधन विकास विभाग, भारत सरकार), २००५ ई. मे मैथिली भाषाक सर्वाधिक प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान, उनाप सम्मान, परवाहा (उवा नाट्य परिषद, परवाहा), भानु कला पुरस्कार (कला जानकी संस्थान, जनकपुर), २००४- पाटलिपुत्र पुरस्कार ( प्रांगन थिएटर, पटना), इप्टा पुरस्कार (कटिहार इप्टा, कटिहार), २००३- गोपीनाथ आर्यल पुरस्कार (इन्टरनेशनल थिएटर इन्स्टीट्यूट, नेपाल), यात्री चेतना पुरस्कार (चेतना समिति, पटना), बैद्यनाथ सियादेवी पुरस्कार (बी.एस.डी.पी. काठमाण्डू), २०००- चेतना समिति सम्मान (चेतना समिति, पटना), जिला विकास धनुषा साहित्य पुरस्कार (जिला विकास समिति, जनकपुर), १९९९- विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान (विद्यापति सेवा संस्थान सम्मान, दरभंगा), १९९८- रंग रत्न उपाधि (अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली साहित्य परिषद, राँची), १९९७- सर्वोत्तम निर्देशक पुरस्कार (सांस्कृतिक संस्थान, काठमाण्डू), १९९१- भानु कला पुरस्कार, विराटनगर (भानु कला परिषद, बिराटनगर),१९९०- सर्वनाम पुरस्कार (सर्वनाम समिति, काठमाण्डू), १९८५- आरोहण सम्मान, काठमाण्डू, १९८३- वैदेही पुरस्कार (विद्यापति स्मारक समिति, राँची), शोध कार्य: सलहेस: एकटा ऐतिहासिक अध्ययन, विरहा: मिथिलाक एकटा लोकरूप, सामा चकेबा: लोकनाट्यक एक अवलोकन, सलहेसक काल निर्धारण, व्इद्यापतिक उगना, शिवक गण, मधुबनी एकटा नगर अछि, हम जनकपुर छी, ई जनकपुर अछि। हिनकर दू टा पोथी “ओकरा आँगनक बारहमासा” आ “काठक लोक” ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगाक मैथिली पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर दू टा पोथी त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमाण्डू केर एम.ए. पाठ्यक्रममे अछि। हिनकर कैकटा आलेख आ किताब सेकेण्डरी आ हायर सेकेण्डरी पाठ्यक्रममे अछि। प्रकाशित पोथी: नाटक: ओकरा आँगनक बारहमासा, जुआयल कंकनी, गाम नञि सुतय, काठक लोक, ओरिजनल काम, राजा सलहेस, कमला कातक राम, लक्ष्मण आ सीता, लक्ष्मण रेखा खण्डित, एक कमल नोरमे, पूष जाड़ कि माघ जाड़, खिच्चड़ि, छुतहा घैल, ओ खाली मुँह देखै छै। ई सभटा कैक बेर आ कैक ठाम खेलाएल गेल अछि। एकाङ्की: टूटल तागक एकटा ओर, लेवराह आन्हरमे एकटा इजोत, गोनूक गबाह, हमरो जे साम्ब भैया, “बिरजू, बिलटू आओर बाबू”, मामा सावधान, देहपर कोठी खसा दिअ, नसबन्दी, आलूक बोरी, भूतहा घर, प्रेत चाहे असौच, फोनक करामात, एकटा बताहि आयल छलय, मालिक सभ चल गेलाह, भाषणक दोकान, फगुआ आयोजन आ भाषण, भूत, एक टुकड़ा पाप, मुहक कात, प्राण बचाबह सीता राम, ओ खाली घैल फोड़य छै। ई सभटा मंचित भऽ चुकल अछि। २५ टा चौबटिया नाटक: चक्रव्युह, लटर पटर अहाँ बन्द करू, बाढ़ि फेर औतय, एक घर कानन एक घर गीत, सेर पर सवा सेर, ई गुर खेने कान छेदेने, आब कहू मन केहेन लगैए, नव घर, हमर बौआ स्कूल जेतए, बेचना गेलए बीतमोहना गबए गीत, मोड़ पर, ककर लाल आदि। ई सभटा चौबटिया वीथीपर खेलायल गेल अछि। ११ टा रेडियो नाटक: आलूक बोरी, ई जनम हम व्यर्थ गमाओल, नाकक पूरा, फटफटिया काका आदि। ई सभटा टा पटना, दरभंगा आ नेपालक रेडियो स्टेशनसँ प्रसारित भेल अछि। सम्पादन: मैथिली एकाङ्की (साहित्य अकादमी, नई दिल्ली), विदेहक नगरीसँ (कविता संग्रह), मैथिली भाषा पुस्तक (सेकेण्डरी स्कूल पोथी), लोकवेद (मैथिली पत्रिका)। कथा: प्रह्लाद जड़ि गेल, धार, एक दिनक जिनगी, बनैया सुगा, बालूक भीत, बुलबुल्ला आदि। लघुकथा: डपोरशंख, मुहचिड़ा आदि। सदस्यता: अध्यक्ष, मैथिली लोक रंग, सदस्य कार्यकारी बोर्ड, मिनाप, जनकपुर, यात्री मधुबनी, मिथिला सांस्कृतिक मंच, मधुबनी। राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार सभमे सहभागिता। प्रकाश चन्द्र झा : मैथिली रंगकर्ममे थ्री-इन-वन- महेन्द्र मलंगिया प्रकाश झा १९७५ ई. मे हम जुआयल कनकनी नामक एकटा नाटक लिखने रही, जे ओही साल प्रकाशित भेल रहय । एहि नाटकक प्रसंगमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जीवकांतजी अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत लिखने रहथि – मलंगियाजी, मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि, जे एकर तेजकेँ सम्हारि सकत । ई बात हम अपनहुँ महसूस कएने रही आ तहिए सँ हमर आँखि एहि बातक खोज करैत रहल, जे ओहि नाटकक अनुरूप कोनो अभिनेता भेटितए । ओना मिथिलांचलमे अभिनेताक कमी नहि रहलैक अछि, मुदा सभक जिनगी अल्पकालीन । किएक तँ एहिठाम एकरा टाइमपासक रूपमे देखैत अछि । तेँ जहाँ कतहु नोकरी भेटि गेलैक कि ओ रंगकर्म केँ तिलांजली द’ दैत अछि । दोसर कोनो गार्जियन ई नहि चाहैत छैक, जे हमर बेटा रंगमंचसँ जुड़ल रहय । किएक तँ मैथिली रंगमंच केँ ओ सामर्थ्य नहि छैक जे ओकरा रोजी – रोटी द’ सकतै । तेँ रंगमंच के छोड़’ बाला नाम अनगिनत अछि आ जुटल रह’ बाला नाम आँगुरे पर गनल । एहन आँगुरेपर गन’ बाला नाम अछि – अभिषेक, चन्द्रशेखर, मुकुल, संतोष ( मधुबनीसँ ), रवीन्द्र, ओमप्रकाश, रंजू, प्रियंका ( जनकपुरसँ ), संजीव, किशोर केशव, गुड़िया, स्वाति, जितेन्द्रनाथ, प्रियंका ( पटनासँ ), मुकेश, उत्पल, प्रकाश, ज्योति, जीतू, कमल, दुर्गेश, भास्करानंद ( दिल्लीसँ ) आदि । एहि सभमे प्रकाश कहिया हमरा भेटल - स्मरण नहि अछि, मुदा एतेक धरि अवश्य स्मरण अछि, जे ओ कहने रहय- “सर, हमर घर घोंघौर अछि आ हम आर. के. कॉलेज मधुबनी में पढैत छी” । “ कोन कक्षामे ?” “ बी.एस सी.क फर्स्ट पार्टमे ” । हमरा दिससँ कोनो प्रतिक्रिया नहि अएबाक कारणें किछु कालक बाद पुन: बाजल – “ हम नाटकसँ सेहो जुड़ल छी ” । “ कोन संस्थासँ ?” “ मधुबनी इप्टासँ ” “ बहुत खुशीक बात ” प्रकाश कोन अपेक्षा ल’ क’ हमरा लग आएल रहय से ओ ने कहि पओलक आ ने हम बूझि सकलिऎ । मुदा, एतेक अवश्य जानकारी भेटैत रहल जे नुक्कड़ नाटककेँ मधुबनी जिलामे बहुत लोकप्रिय बना देलक अछि । एक्केटा बिजुलिया भौजीक पचासटा शो कएलक अछि आ सभमे एकर अनिवार्य सहभागिता छैक । मुदा, ई हमर दुर्भाग्य रहल जे एकर एकोटा शो हम नइ देख सकलिऎ । तथापि एतेक विश्वास भैए गेल जे नाटकक प्रति एकर लगन बेजोड़ छैक । हमहूँ रहबे कएलहुँ आ इहो नाटक करिते रहल आ तखन जँ मंच पर भेट नइ होइतए तँ इहो असंभवे बाला बात भ’ जइतै । से भेलैक नहि, एकरासँ मंचपर भेट भैए गेल, मुदा कहिया से स्मरण नहि अछि । हँ, एतेक अवश्य स्मरण अछि जे प्राय: 1995 ई. मे मिथिला सांस्कृतिक पर्व समारोहक अवसर पर हमरे नाटक ओरिजनल कामक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे दरोगाक भूमिका प्रकाशे केने छल । ओहि नाटकमे ई प्रशंसाक पात्र बनल रहय जकर उल्लेख दैनिक जागरण आ दैनिक हिन्दुस्तान सेहो कएने रहैक । किछु दिनक बाद गाम नइ सुतैए’क मंचन देखलियैक ओहो मे गामक तीनटा बिगड़ल युवकमे सँ एकटा बिगड़ल युवकक भूमिका यैह कएने छल । ओही दुनू मे कयलगेल अभिनयक बदैलत ई हमरो मोन मे बैसि गेल । बादमे बिहार सरकार युवा मंत्रालय, पटना दिस सँ आयोजित कार्यक्रम मे एक बेर फेर हमरे लिखल नाटक हमरो जे साम भैयाक मंचन नगर भवन, मधुबनीमे होइत रहय । हमहूँ आमंत्रित रही । जाहि मे चारुवक्य के भूमिका मे प्रकाश रहै । मंचपर एकरा देखलाक बाद हमरा बड़ अपसोच भेल रहय जे जीवकांतजी एहिठाम नइ छथि । ओ जँ आइ एहिठाम रहितथि तँ एकर अभिनय देखिक’ निश्चित अपन बात घुरा लितथि जे ‘मिथिलांचलमे एखन ओहन अभिनेता नहि जन्म लेलक अछि’ । बहुत विलक्षण आ मुग्ध कर’ बाला अभिनय कएने रहएअ । तेँ हमरा कह’ पड़ल जे चारुवक्य के भूमिका एहन दोसर नइ क’ सकैए । एकर बाद करगिल समस्यापर आधारित नाटक दुलहा पागल भ’ गैलै मे सेहो अभिनय कएलक जे हम नइ देख सकलिऎक । हँ, मधुबनीक डिप्टी कलक्टर श्री दीपनारायण सिंह जी सँ जखन बात भेल तँ कहलनि जे खासक’ प्रकाशचन्द्र बड्ड नीक अभिनय कएने छल । ओना एहि बातक घमर्थन कखनो-कखनो उठिए जाइत अछि जे अभिनेता तँ निर्देशकक हाथक कठपुतली होइत अछि । ओकरा जेना-जेना निर्देशक कहैत छैक तेना-तेना ओ मंचपर करैत अछि । जँ इएह बात सत्य छैक तँ एक्केटा भूमिका जखन दू आदमी करैत अछि तखन किएक ककरो नीक आ ककरो बेजाए भ’ जाइत छैक ? एहि आधार पर तँ सृजनात्मक प्रतिभा अपन होइत छैक से मानहिटा पड़त । आ तेँ ओ ओहन चारुवक्य क सृजन कएने रहय । फेर 2005 ई. मे रामाननद युवा क्लब, जनकपुर धाम ( नेपाल ) द्वारा आयोजित नाट्य समारोह मे नेपालक अतिरिक्त कोलकाता , दिल्ली, दरभंगा आ मधुबनीक टीमसभ भाग लेने छल । मधुबनीक यात्री संस्था , दिल्लीक यात्री संस्थाक रूप मे प्रवेश पओने छल । कारण , ओहि समयमे अधिकांश यात्रीक अभिनेतासभ दिल्लीए मे रहैत छल तेँ किछुए नवकेँ समावेश कर’ पड़लै आ काश्यप कमलक नाटक गोरखधंधा तैयार भ’ गेलै । एहि नाटक मे ओ सूत्रधारक भूमिका कएने रहय जे काफी चर्चित रहलै । मैथिली रंग जगतमे नव पीढीक कतेको लोक छथि, जे लगातार काज क’ रहल छथि मुदा, ओहि जमातमे प्रकाश कतेको कारणे सभहक ध्यान अपना दिस खींचैत अछि । एक त’ अपन रंग कालमे , प्रकाशक रंग प्रवाह बड्ड महत्वपूर्ण छैक । दोसर ई जे – प्रकाशक द्वारा जराओल गेल सर्वरंग अभियानक दीपक जे प्रभाव मैथिली रंग जगत पर पड़ल अछि ओ आरो बेसी प्रशंसाक पात्र छैक । प्रकाशक रंग प्रवाहक शुरुआत मिथिलाक एकटा छोट छीन गाम घोंघौर स’ शुरु होइत छैक । अपन नेनपने सँ गामक रंगमंच सँ जुड़ैत, अपन जिला मधुबनीक नगर इप्टाक कार्यालय सचिव बनल आ इप्टा मे एकर पाँच सालक कार्यकाल अखन तक के ओकर स्वर्णकाल कहल जा सकैत छैक । ओत’ सँ निकलिक’ विश्वविद्यालय स्तर पर अभिनय मे प्रथम सम्मान सँ सम्मानित होइत राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली मे प्रवेशक चयन प्रक्रियाक अंतिम प्रक्रिया तक शामिल भेल । ओहो कोनो नामी-गिरामी निर्देशकक संग कार्य करबाक अनुभवक बिना । फेर संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा प्रशिक्षण ल’क’ ओकरे बाकी कार्यशाला मे कार्यशाला सहायकक रूप मे कतेको राज्य मे अपन ज़िम्मेदारी केँ सफलतापूर्वक निभाबैत, साहित्य कला परिषद, दिल्लीक रंगमण्डल सँ गुजरैत, सॉग एण्ड ड्रामा डिविजन, नई दिल्ली मे कैजुअल आर्टिस्टक रूप मे चुनबैत आई राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नाई दिल्ली द्वारा अखिल भारतीय स्तरक श्रेष्ठतम रंगशोध पत्रिका रंग प्रसंगक संपादन सहयोगीक रूपमे अपन महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभा रहल अछि । ई त’ छल प्रकाशक अपन रंगपक्ष , जे कि हमरा सभ केँ सीधे-सीधे देखाइत अछि । जे दोसर रूप छै ओ ई जे मधुबनी सन छोट जगह मे प्रकाश जे रंगदीप जरौलक अछिओकर परिणाम ई छैक जे आई एहि छोट शहर मे सात-सात टा रंगकर्मी रंगकर्म मे प्रशिक्षणक लेल राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति ल’ चुकल अछि । कतेको रंगकर्मी राष्ट्रीय स्तरक रंगप्रशिक्षण संस्थान सँ प्रशिक्षण प्राप्त केलन्हि अछि । 2006 ई. मे मैथिली लोक रंग, दिल्ली ( मैलोरंग ) त्रिदिवसीय नाट्य सहोत्सवक आयोजन कएने रहय जाहिमे सहरसा, पटना आ दिल्लीक टीम ( मैथिली लोक रंग ) भाग लेने रहैक । ई तीनू टीम क्रमश: कनियाँ-पुतरा, पारिजात हरण आ काठक लोक क्रमश: उत्पल झा, कुणाल तथा प्रकाश झा क निर्देशनमे प्रस्तुत कएने रहय । उत्पल झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सँ उत्तीर्ण छात्र, कुणाल केँ दस-पन्द्रह नाटकक निर्देशनक अनुभव आ प्रकाश झा केँ अभिनय छोड़ि निर्देशनक कोनो अनुभव नहि । तेँ लागल जे एहि दुनू निर्देशकक बीचमे प्रकाश ओहिना दरड़ा जाएत जहिना जाँतक दुनू पट्टाक बीचमे दालि । मुदा से भेलैक नहि, प्रकाश झा आँकड़ जकाँ अड़ले रहि गेल । प्रेक्षक गुम्मी लाधिक’ नाटक देखैत रहलाह । मुदा, जत’ हँस’क अवसर छलैक ओत’ हँसबो कएलाह । नाटक समाप्त भेलाक बाद प्रकाश दू शब्द कहबाक हेतु हमरा मंच पर बजा लेलक । ओ किएक हमरा बजौलक तकर अनुमान एहि रूपमे लगौलिऎक – प्राय: नाटक मे कएल गेल किछु फेर-बदलक मादे किछु कहताह । मुदा ताहि प्रसंगमे हम किछु कहि नइ सकलिऎक । कारण, प्रेक्षक हमर मुँह बन्द क’ देने छल । तेँ हम ई बात कहबाक लेल बाध्य भ’ गेल छलहुँ जे दुलहन वही जो पिया मन भाए अर्थात नाटक वएह नीक वा निर्देशक वएह नीक जकरा प्रेक्षक गम्भीरता सँ देखलक आ बुझलक । एतेक कहलाक बाद ओ राम गोपाल बजाज जी केँ बजा लेलकनि । हुनका मंचपर बजएबाक दूटा कारण भ’ सकैत अछि – पहिल, ओ भारतीय रंगमंचक एकटा दिग्गज रंगकर्मी छथि जे मिथिलांचलक सपूत छथि आ दोसर, पहिल बेर निर्देशनक क्षेत्रमे आयल छल तेँ हुनक आशीर्वाद प्रकाशक लेल आवश्यक छलैक । तेँ बजाजजी मंचपर अएलाह आ हमर बातक समर्थन करैत कहलथिन – मलंगियाजी जे बात कहलनि अछि ताहिसँ हम सहमत छी । प्रकाश केँ जखन दर्शके सर्टिफिकेट प्रदान क’ देलकै तखन हम ओहिपर हस्ताक्षर नइ करिऎ से उचित नइ होएत । एहि प्रस्तुति के देखलाक बाद हिन्दीक युवा आ संवेदनशील रंगदृष्टि रखनिहार रंग समीक्षक संगम पाण्डे जनसत्ता में लिखने रहथि - ... मंच पर ये सभी पात्र चरित्र के कई बारीक विन्यासों के साथ दिखाई देते हैं । उनके भदेस में कहीं भी कुछ बनाबटी नहीं लगता । और यही वजह है कि कथावस्तु में स्थितियाँ कई बार दोहराई जाकर भी अपनी रोचकता नहीं खोतीं । मंच पर पीछे की ओर दाएँ मंदिर का चबूतरा है । बाईं ओर एक पूरा का पूरा वृक्ष, और चबूतरा एक पूरा परिवेश बनाते हैं । इस परिवेश में साधु की पीतांबरी वेशभूषा एक दिलचस्प कंट्रास्ट बनाती है” । संगम पाण्डेक उपर्युक्त कथन निश्चित रूपे प्रकाशक नाट्य निर्देशक संग ओकर मंच परिकल्पना आ वस्त्र विन्यासक दृष्टिक सेहो मजबूती प्रदान करैत छैक । 2005 ई. मे स्वास्ति फाउण्डेशन, दिल्ली हमरा प्रबोध साहित्य सम्मान देने छल, जे कलकत्तामे प्रदान कएल गेल । उक्त सम्मानक अवसर पर डॉ. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ द्वारा रचित एक छ्ल राजा नामक नाटकक मंचन कोकिल मंच, कोलकाता द्वारा कएल गेल छल । हमरा बगलमे बैसलि हमर पत्नी जिनका साक्षर मात्र कहल जा सकैए पूछि बैसलीह “कखन नाटक समाप्त होएतैक” ? एहिपर हम कहलिएनि जे एक चौथाई बाँकी अछि । अवलोकनजन्य थकान सँ ओ अपने-अपने बाजि उठलीह “एह, तखन तँ आधा घंटा सँ बेसिए बैस’ पड़त” । आब कोनो प्रेक्षकक मुँहसँ निकलल “बैस’ पड़त” शब्द नाटक प्रदर्शनपर एकटा पैघ प्रश्नचिन्ह लगबैत अछि । इएह सम्मान 2007 मे मयानन्द मिश्र केँ भेटलनि । ओहि सम्मानक अवसरपर डॉ. नचिकेता द्वारा रचित नायकक नाम जीवन, एक छल राजा , रामलीला, प्रत्यावर्तन आदिमे सँ कोनो एकटा नाटकक मंचन होएबाक चाही से विचार कएल गेल छल । संगहि स्थान बदलिक’ दिल्ली पर मोहर लागि गेल छल । उक्त आयोजनक सम्पूर्ण अभिभारा प्रकाश चन्द्र झा केँ भेटल छलैक । तेँ ओ नचिकेताक सभ नाटक मंगौलक । गम्भीरता सँ पढलक आ अंतमे एक छल राजापर आबिक’ केन्द्रित भ’ गेल । नचिकेताक जतेक नाटक छैक ओहिमे सँ सभसँ नीक नाटक एक छल राजा अछि जे प्राय: 1970 क दसकमे प्रकाशित भेल रहैक । एकरा जँ एना बूझी तँ कहि सकैत छी जे जहिया प्रकाश जन्मों नहि लेने होयत तहिए ई नाटक प्रकाशित भेल रहैक । तेँ जतेक जे एहि नाटकक मादे प्रकाशित भेल छल होएतैक ताहिसँ ओ परिचित नहि छल । तथापि ओहिमे सँ एक छल राजा केँ चूनि लेलक से ओकर निर्देशकीय दृष्टिक प्रमाण दैत छैक । कारण, निर्देशक वास्ते नाटक चयन एकटा अहम मुद्दा रखैत छैक । जँ सत्य पुछल जाए तँ ओ नाटक प्रकाश चन्द्र झाक हेतु एकटा चुनौती भरल काज छलैक । एखन धरि जतेक निर्देशक ओकरा प्रस्तुत कएने छल ओकरा कओमा आ पूर्णविराम सहित मंचपर उतारि दैत छल तेँ प्रेक्षककेँ पुछ’ पड़ैत छलैक जे आब कतेक नाटक बाँकी अछि । एहन स्थिति उत्पन्न होएबाक कारणपर विचार करबासँ पहिने हमरा नाटक कथानकपर विचार सेहो कर’ पड़त । एहि नाटकमे राजा साहेब नामक एकटा जमीन्दार अछि जकर जमीन्दारी पुर्खेक समयसँ धीरे-धीरे कमल जाइत छै । राजा साहेब लग आबिक’ विपन्नता पराकाष्ठापर पहुँच जाइत छै । कर्जक बोझ ततेक ने बढि जाइत छै जकरा सधाएब मश्किल भ’ जाइत छैक । फजूल खर्ची आ विलासिताक कारणेँ एहि स्थितिमे पहुँचब एकटा नियति छैक । फेर ओही जमीन्दारीमे पलल राजा साहेबक पिताक अवैध संतान धनिकलाल शहर जाइत अछि । ओहिठाम अपन लगन आ परिश्रमसँ काफी धनोपार्जन करैत अछि आ राजा साहेबक हवेली कीनैत अछि । फेर ओहो वएह काजसभ कर’ लगैत अछि जे राजा साहेब करैत छलाह । आब प्रश्न ई उठैत अछि जे एकटा जमीन्दारकेँ तोड़िक’ दोसर जमीन्दारकेँ ठाढ करबाक की औचित्य छैक ? जँ ठाढ भइए जाइत छैक तँ दरबारमे राजा साहेब जकाँ हवेलीमे मोजराक आयोजन करबाक की प्रयोजन छैक ? जखन ई बात स्पष्ट भ’ जाइत छैक जे राजा साहेब अपन बेटी मोहिनीक विवाह आर्थिक तंगीक कारणेँ नइ करा रहल छथि तखन ओकर प्रेम प्रसंगक एतेक दृश्यसभ रखबाक कोन प्रयोजन छैक आ अंतमे ओकरा प्रेमीकेँ खलपात्र बनएबाक कोन औचित्य छैक ? कोनो नियतिक विरुद्ध बेर-बेर धनिक लालक मुँह सँ प्रतिशोध लेब कहयबाक कोन जरूरी छैक ? राजा साहेब तँ अपन करनीक फल पाबिए गेल छलाह जे हवेली बेचिक’ सड़कपर आबि गेल छलाह । उपर्युक्त सभ प्रश्नपर प्रकाश नीक जकाँ विचार कएने छल । ओकर प्रदर्शन स्क्रिप्ट देखिक’ हमरा लागल जे ओकरामे नाटक प्रदर्शनक समझदारी छैक । नाटकसँ एक दिन पहिने हमरा डेरापर एकटा कार्ड आएल रहय । ओहिपर सपरिवार लिखल रहैक । तेँ हम पत्नीसँ पुछलियनि - “नाटक देख’ जएबैक” ? “कोन नाटक छै” ? प्रश्नपर प्रश्न ओ रखलनि । “एक छल राजा” “नइ जाएब”। “किएक”? “कलकत्ता मे देखने छी । हमरा नइ नीक लागल रहय” । “चलू ने, निर्देशक बदलल छै, अभिनेता बदलल छै” । “मुदा नाटक तँ वएह रहतै ने” । “तैयो देखि लियौ ने” । नाटक भेलैक । नाटक समाप्त भेलाक बाद नचिकेताजी केँ काफी खुश देखलियनि । एकर मतलब छलैक जे नाटक अपन ऊँचाई पाबि गेल छल । वस्तुत: हमरो बड्ड नीक लागल रहय ई प्रस्तुति । हमर मोन मानि गेल छल जे एकरा नीक निर्देशकक पाँतीमे राखल जा सकैए । जँसे बात नइ रहितै तँ नाटक एहि रूपमे नइ चमकितै । रास्तामे हम पत्नीसँ पुछ्लियनि - “केहन लागल नाटक” ? “बहुत बढियाँ” “तखन कहै छलिऎ जे नइ जाएब” । “हमरा थोड़बे बुझल छल जे एहन नाटक हेतै” । ई छलैक एकटा साक्षर मात्र लोकक मूल्यांकन । श्री मायानंद मिश्र, डॉ. गंगेश गुंजन, डॉ. देवशंकर नवीन, डॉ. ओमप्रकाश भारती आदि दिग्गज विद्वान लोकनि एहि प्रस्तुतिक प्रशंसा कएलथिन । ओना दशरथ जखन भार जनकपुर पठौलथिन तँ जनकपुरबासी मेसँ क्यो बाजि ऊठल— भार तँ बहुत बढियाँ छनि, मुदा अंकुरीक अखुआ टेढ छनि । एहन अखुआ टेढबाला लोक प्रेक्षकक प्रतिक्रिया देखिक’ अपनाकेँ चुप्पे राखब उचित बुझलक । एहि ठाम एकटा बात कह’ चाहब—आदमीक क्षमताक स्थानांतरण दोसर क्षेत्रमे सेहो होइत छैक । यदि हम दहिना हाथसँ ‘अ’ लिखैत छी तँ बामा हाथसँ ‘अ’ सेहो लिखि सकैत छी । कारण, दहिना हाथक क्षमता बामा हाथमे स्थानांतरित भ’ जाइत छैक । एही अवधारणापर लोक कहैत छैक जे बी.ए. भ’ क’ घास छिलतै तँ मूर्खसँ बढिए जकाँ छिलतै किएक तँ ओ अपन पढ’–लिख’ बाला क्षमता घास छील’ मे लगा देतैक । एहि मनोवैज्ञानिक तथ्यक सत्यापन प्रकाश चन्द्र झाक अभिनयात्मक एवं निर्देशकीय क्षमतासँ जोड़िक’ संगठनात्मक क्षमताकेँ सेहो देखल जा सकैए । ओ जतबए नीक अभिनेता तथा निर्देशक अछि ओतबए एकटा सफल संगठनकर्ता सेहो । आ हम सभ कियो जनैत छी जे रंगकर्म मे संगठनात्मक क्षमताक विशेष महत्व छैक । एहिठाम संगठनात्मक क्षमताकेँ रंगकर्मसँ जोड़िएक’ देखल जा सकैत अछि कारण, भरतक नाट्यशास्त्रक पैंतिसम अध्यायमे नाट्यदलक चर्चा आएल अछि जाहिमे सूत्रधार, अभिनेता, काष्ठकार, माली(माल्यकार), स्वर्णकार(मुकुट एवं गहना बनब’बाला), सूचिकार(दर्जी), चित्रकार आदिक चर्चा अछि । हमरा जनैत एहि सभ केँ मिलाक’ राख’बाला सूत्रधार छल होएतैक । ईसभ अपन-अपन योगदान नाट्य प्रदर्शनमे दैत छलैक । जँ एकरा सभकेँ मिलाक’ नहि राखल जैतैक तँ नाट्यप्रदर्शन असंभव भ’ जइतैक । अत: एकटा सम्पूर्ण रंगकर्मीक हेतु संगठनात्मक क्षमता आवश्यक भ’ जाइछ । 2005 ई. मे जनकपुर नाट्य महोत्सवक आयोजन कएल गेल रहैक । एहि आयोजन मे यात्री टीम भाग लिअय से हमर हार्दिक इच्छा रहय । मुदा कलाकारसभ बिखरल रहैक । सभ एकठाम जमा होएत आ नाटक करत से संभव नहि बुझाय । तथापि एकबेर जानकारी देब आवश्यक छल । एतदर्थ बीस-बाइसटा मेम्बरमे सँ प्रकाश केँ टेलीफोन कएलिऎक । कारण, ओकर संगठनात्मक क्षमतासँ हम परिचित छलहुँ । दोसर जँ गछियो लितएअ तँ संगठनात्मक क्षमताक अभावमे जएबो करितएअ कि नहि ताहिपर हमर विश्वास नहि छल । खैर, ओ हमर इच्छाकेँ सहर्ष स्वीकार क’ लेलक आ पन्द्रह-सत्रह आदमीक टीम ल’ क’( दिल्ली सँ ) जनकपुरधाम (नेपाल) पहुँच गेल । सम्प्रति प्रकाश दिल्लीमे मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) नामक संस्था चला रहल अछि । एहि संस्थाक एकटा सदस्य दिल्ली रहैत अछि तँ दोसर देवगिरी मे, माने एकटा उत्तरी दिल्ली तँ दोसर दक्षिणी दिल्ली । एहना स्थिति मे मैथिली रंगकर्म केँ जियाक’ राखब एकटा कठिन काज भ’ जाइत छैक । तथापि ओ एकरा जिआए क’ नहि, बल्कि जगजियार क’ क’ रखने अछि । इम्हर, जहिया सँ प्रकाश रंग प्रसंग सँ जुड़ल अछि आ डॉ. ओमप्रकाश भारती, स्व. जे.एन. कौशल, महेश आनंद, देवेन्द्र राज अंकुर, प्रतिभा अग्रवाल आदि सन शोधकर्ताक सानिद्ध पौलक अछि ओकर रंग-दृष्टि आरो खुजलैक अछि । मैथिली लोकनाट्य आ रंगमंच पर ओकर शोध आलेख उल्लेखनीय होइत छैक । बाल रंगमंच पर भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय फैलोशिप प्राप्त करनिहार प्रकाश कहियो कहियो कथा सेहो लिखैत अछि । एकरा द्वारा लिखल कथा पाथर बेस चर्चा मे छल । ई कथा बुच्चीक मनोरथ नाम सँ अंतिका मे आ पाथर नाम सँ हिन्दी मे समकालीन भारतीय साहित्य मे प्रकाशित भेल रहै । हमरा जनैत कर्मठ आ सफल व्यक्ति ओ नहि होइत अछि जे समयक पाछाँ-पाछाँ चलैत अछि, सफल व्यक्ति तँ ओ होइत अछि जे अपन कर्मठतासँ समय केँ अपना लग खींच लैत अछि । इएह गुण हम मृदुभाषी आ मिलनसार प्रकाश मे पबैत छी । किएक तँ एकरासँ पहिने मिथिलांचल सँ कतेको मैथिलीक विद्वानलोकनि दिल्ली अएलाह, मुदा मैथिली रंगकर्मक जड़ि एना भ’ क’ रोपल नहि भेलनि । प्रकाशक लेल दिल्ली मे हिन्दी रंगमंच मे काज करनाइ बहुत आसान छल मुदा ओ मैथिली रंगकर्म के अपनैलक ई बेसी महत्वपूर्ण अछि । हमरा तँ ओहो दिन देखल अछि जहिया मैथिली रंगकर्म कलकत्तामे बहुत जगजियार छलैक, एकरा बाद ई जगजियारी ऊठिक’ पटना आ जनकपुर अएलैक सेहो देखलहुँ आ आइ लगैत अछि जे एहि जगजियारीक एकटा प्रबल दावेदारक रूपमे दिल्ली सेहो ठाढ़ भ’ गेल अछि जकर श्रेय निश्चित रूपे प्रकाश चन्द्र झा केँ जाइत छैक । आइ पटना हो, चाहे जनकपुर, चाहे सहरसा, सभकेँ अपन-अपन क्षमता देखएबाक हेतु दिल्लीमे प्लेटफार्म मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) प्रदान कएअलक अछि जकर संचालन प्रकाश चन्द्र झा क’ रहल अछि । हम मैथिली रंगकर्मक हेतु ओकर दीर्घायु आ सफलताक कामना करैत छी । १.जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २. स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) १.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ जीवन झाक नाटकक सामाजिक विवर्तन (आगाँ) सामवती पुनर्जन्ममे नाटककार समाजमे प्रचलित नवलोकक बीच मदिरापानक परम्परासँ क्षुब्ध भऽ एकर बहिष्कार करबाक उद्घोषणा कयलनि। एहि प्रसंगमे सुमेधाक कथन छनि, “एहि सभ कारणसँ राज्य निषिद्ध थिक। देखू तँ मदिरापान कयनेँ केहन लाल लाल आँखि छलैकय। दीदी आब मन प्रसन्न भेल अछि मह अवग्रहमे पड़ल छलहुँ”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-१९)। मिथिलांचल निवासीक प्रमुख भोज्य वस्तुमे रहल अछि रेडीमेड चूड़ा आ दही जकर चर्चा पौराणिक साहित्यमे सेहो यत्र-तत्र उपलब्ध होइछ। नर्मदा सागर सट्टकमे एहि भोज्य-सामग्रीक विश्लेषण नाटककारक प्रमुख प्रतिपाद्य अछि जखन घटकराज भोजन करैत छथि: केव नथर्बै अछि नाकक पूड़ा। ककरहु केव आगाँ बैसौलेँ थकड़ि बन्है अछि जूड़ा॥ झट झट गट गट घटक गिड़ै छथि सब दही संग चूड़ा। दुइ एक बेर पानि दै मलि मलि कात पसौलन्हि गूड़ा। धड़ि एक विछलन्हि पुनि अगुतैला सह-सह कर इछ सूड़ा॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-९९) कीर्तिपुरुष जीवन झाक नाटकादिक वैशिष्ट्य एहि विषयकेँ लऽ कए अछि जे मिथिलांचलक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवनक चित्रणक क्रममे वैवाहिक अवसरपर होम आदिक व्यवस्थाक निमित्त लावा, जारनि, धान, घी, जल, कुश, आगि आदिक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। जटिलकेँ सारस्वत आज्ञा दैत छथिन: लावा जारनि धान धिउ जल कुश विष्टर आगि। माङव पर सञ्चित करह सब पुरहित सङ्ग लागि॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-४७) वैवाहिक विधिमे लौकिक एवं वैदिक दुनू रीतिक परिपालन कयल गेल अछि एहि नाटकान्तर्गत। चतुर्थीक विधि सम्पन्न होइछ संगहि संग भार-दोरक चर्चा सेहो नाटककार कयलनि अछि। अक्षर पुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक चित्रण अत्यन्त कुशलताक संग कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे सामाजिक रीति नीतिक चर्चा करैत नाट्यकार जाहि वैवाहिक प्रथाक उल्लेख कयलनि अछि से अत्यन्त प्राचीन परम्परा अछि। मिथिलांचलमे एहि प्रकारक प्रथा एवं परम्परा प्रचलित अछि जे वैवाहिक अवसरपर वर एवं कन्या पक्षक घटक पजिआड़क मिलान होइछ, जाहिमे पर्याप्त टाकाक प्रयोजन पड़ैछ जाहिसँ विवाहक उचित प्रबन्ध कयल जाऽ सकय। सामवती पुनर्जन्म एहि प्रसंगक विश्लेषण पूर्वमे कयल गेल अछि। नर्मदा सागर सट्टकमे सेहो एहि स्थितिक चित्रण भेल अछि। घटकराज नर्मदाक विवाहार्थ ओ सागरक ओतय प्रस्तुत होइत छथि तँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि परम्पराक निर्वाह कोना करैत छथि तकर अवलोकन तँ करू, “भौजी! एहना ठाम घटक जे हयत से लगले कोना विचार देत? पजिआड़केँ जे इच्छा होइन्ह से बूझि लै जाउ”। (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-९७)। सामाजिक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनयबामे आर्थिक स्थिति दृढ़ता अत्यन्त प्रयोजनीय बुझना जाइछ। वित्त विहीन व्यक्तिक सामाजिक जीवनमे कोनो मूल्य नहि रहि जाइछ। अतएव जाहि समाजक आर्थिक जीवन जतेक सबल रहत ओ उन्नतिक पथपर अग्रसर भऽ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबामे सक्षम भऽ सकैछ। जतेक दूर धरि मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक आर्थिक स्थितिक प्रश्न अछि ओ सदा सर्वदा आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त रहल जकर फलस्वरूप कन्या-विक्रय सदृश कुप्रथाक जन्म भेलैक। जीवन झा अपन नाटकादिमे आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन अनेक स्थलपर करौलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सामवान एवं सुमेधाक वैवाहिक प्रसंगमे सामाजिक आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन होइत अछि जे विवाहक नियोजनार्थ प्रचुर टाकाक प्रयोजनार्थ समाजक विपन्नताक दिग्दर्शन करौलनि अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन समसामयिक समाजक विपन्नताक चित्र दर्शबैत अछि जखन ओ कहैछ, “घरमे तैखन सुख जौं पर्याप्त धन हो। हमरा तँ सतत सभ वस्तुक व्ययता लगले रहैए”। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-२०)। आर्थिक विपन्नताक कारणेँ समसामयिक समाजान्तर्गत भीख मङनी प्रथाक जन्म भेल। नाटककार सामवती पुनर्जन्ममे एहि प्रथाक यथार्थताक संग चित्रण कयलनि अछि। भिक्षुक ब्राह्मणक ओतय भीखक हेतु प्रार्थित होइत छथि किन्तु परिस्थिति वसात हुनका भीख नहि भेटैत छनि। शलाका पुरुष जीवन झाकेँ सामाजिक जीवनक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ स्थल-स्थलपर नारी दोस दिस समाजकेँ साकांक्ष करैत देखल जाइत छथि। सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमिमे नारीकेँ सामाजिक मर्यादाक पालनार्थ मद्यपान, निरर्थक भ्रमणशील बनब, तन्याक आह्वान, पतिपर निष्प्रयोजन रोष, दुर्जन व्यक्तिक संग प्रवास गमन आदिकेँ ओ कुलललनाक निमित्त वर्जित कयलनि। एहि प्रसंगमे ओ नर्मदा सागर सट्टकमे अपन अभिमत प्रगट कयलनि: मद्यपान पर्य्यटन पुनि तन्द्रा पतिपर रोष। दुर्जन सङ्ग प्रवास यैह छवटा नारिक दोष॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-११२) बीसम शताब्दीक प्रथम दशकक मैथिली नाट्य सहित्यक जनक अक्षर पुरुष जीवन झा अपन समयक प्रकाश स्तम्भ रहथि जनिक नाटकादिमे मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक जाहि स्वरूपक प्रदर्शन करैछ तकर सार्थकता एहिमे अछि जे नाटककार ओकर समुचित समाधान ओही समस्यान्तर्गत कयलनि। युग विधायक जीवन झा एहि विचारधाराक अत्यन्त व्यापक प्रभाव हुनक समसामयिक साहित्यकार लोकनिपर पड़लनि जे परवर्ती युगक नाटककार लोकनिक हेतु एक प्रकाश-पुञ्ज प्रमाणित भेल। एकर श्रेय आ प्रेय कविवर जीवन झाकेँ छनि जे मिथिलांचलक तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिकेँ नीक जकाँ जानि बूझिकऽ युगक आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखिकऽ अपना सम्मुख जनसाधारणक दृष्टिकोणकेँ समन्वित कऽ कए मौलिक नाट्य-रच्नाक सूत्रपात कयलनि तथा नाट्य-प्रणालीक सन्दर्भमे नवीन दृष्टिकोण अपनौलनि। हुनका नाट्य-रचनाक ज्ञान निश्चये विस्तृत छलनि। ओ समसामयिक समाजमे घटित होइत घटनाकेँ अपन अनुभवक आधारपर विश्लेषण कयलनि। आधुनिक मैथिली नाट्य साहित्यान्तर्गत अक्षर पुरुषजीवन झा नाटकक क्षेत्रमे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थितिक प्रसंगमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे एहि साहित्यक निमित्त एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक जे अधुनातन सन्दर्भमे मैथिल समाजक हेतु दिशा-बोधक प्रमाणित भेल। २. डॉ. देवशंकर नवीन डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ) भय होइ छनि। मर्यादा आ सामाजिक आदर्शक। आदर्श आ मर्यादा रक्षाक चपेटमे जरैत रहबाक ई उत्कट विवरण वस्तुतः पाठकक मोनमे अइ अयथार्थ आ फोंक परम्पराक प्रति घृणा उत्पन्न करैत अछि।...तुलना करैत देखी तँ अइ मामिलामे सुशीला मुखर छथि, देवकान्त परम लजकोटर, संकोची आ डरपोक छथि, सुलतानगंजमे अजगैबीनाथ मन्दिरक सीढ़ी चढ़ैत एकहि संग सुशीला सोचै छथि कहुना पण्डाक मँुहसँ बहराए जे ÷पति-पत्नीक ई जुगल जोड़ी अमर हो', मुदा देवकान्त भयभीत छथि जे जँ पण्डा एहेन बात कहि देलक तँ लाजें मारि जाएब।... सम्पूर्ण उपन्यासमे एहेन प्रसंग कतोक बेर आएल अछि, जतए देवकान्त संकोची आ सुशीला मुखर बुझाइ छथि। उपन्यासकारेक पंक्तिमे कही तँ वस्तुतः --सुशीलाक जीवन भेलइन, समुद्रक मिलनाकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगाक जीवन। देवकान्तक जीवन भेल, अशान्त चिरप्रतीक्षा विमग्न, तरंगायित किन्तु बाह्यरूपें परम अचंचल समुद्रक जीवन। दुन्नू जीवन एक अबहू आशाक पातर तागसँ बान्हल...उपमा देबाक ई कौशल परम व्याख्येय आ परम प्रशंसनीय अछि। दरअसल अइ कथामे पात्रो टा नहि, प्रेम शास्त्राक सूक्ष्मतम मनोविज्ञानक चित्राण सेहो अत्यन्त व्यापक, चमत्कृत आ प्रभावकारी रूपें भेल अछि। देवकान्त सोना मामीसँ तते बेसी प्रेम करए लागल छथि, जे आओर ठाम ओ जते बेसी व्यावहारिक आ बुद्धिमान होथु, अइ प्रेम-कथामे अत्यन्त डरपोक, तर्कवादी आ संशयवादी भ' गेल छथि। सौंसे कथामे सुशीलाक समर्पण, सुशीला पर अपन अधिकार, समर्पणक संकेत आ आदर्श-मर्यादाक गुणा-भाग करैत रहि जाइ छथि। खन सोचै छथि जे सुशीला पर हुनकर की अधिकार छनि? फेर सोचै छथि, अधिकार नहि छनि तँ अपन बीमार पतिकें छोड़ि, हुनकर सेवा-सुश्रूषा लेल ओ किऐ पहुँचि गेलीह? खन सोचै छथि--नारी कोनो पुरुखसँ प्रेम नइं क' सकइए? एक पुरुख पर विश्वास नइं क' सकइए? की नारी मात्रा छलना थीक?--ओना विरह आ व्यथाक उद्रेकमे एहि तरहक बात कोनो व्यक्ति जँ सोचि लिअए तँ तकरा स्त्राीक प्रति अमर्यादित धारणा नहि बुझबाक थिक। ओ स्वयं एकर उत्तर दै छथि जे सोना मामीक आचरण मिथिलाक ÷सभ्यता, संस्कृति, परम्परा आ धर्मक एकटा परम उदाहरणक अभिव्यक्ति' थिक। ÷सोना मामी पूर्णतः भारतीय सम्पूर्णतः मैथिल नारी छलीह... जे अपने टूटि जाएत, मुदा, परम्पराक पातर सँ पातर तागकें नइं तोड़त...।' अलगसँ कहबाक प्रयोजन नहि जे कोनो प्रवृत्ति, आचरण आदिकें राजकमल चौधरी जातिवादी, सम्प्रदायवादी अथवा लिंगवादी नहि मानै छथि। एक दिश सोना मामीक प्रति एतेक उच्च धारणा रखै छथि दोसर दिश अपन मामक दोसर स्त्राी हरिनगरवालीक कनबाक कला देखि सोचै छथि--कहब असम्भव अछि जे हरिनगरवाली कानि रहल छलीह, अथवा अभिनय कए रहल छलीह, नाटक पसारि रहल छलीह। प्रत्येक मैथिल-स्त्राी जकाँ इहो कानब-शास्त्रामे पूर्ण सुरक्षा, पारंगता छथि। ओहुनाँ कानब-खीजब, घाना पसारब, नाटक करबाक अभ्यास सभ स्त्राीकें रहइ छइ। स्त्राी चाहे इन्द्रजीत मेघनादक, शव लग विलाप करइत दानव कन्या सुलोचना सुन्दरी हो, अथवा अर्जुन पुत्रा अभिमन्युक शव लग विलाप करइत पाण्डव कुलवधू उत्तरा-सुन्दरी, सभ स्त्राीकें कानब अबइ छइ, कलात्मक ढंगसँ रुदन करए अबइ छइ। अइ उपन्यासमे जतबे विविधता पुरुष पात्रामे अछि, ताहिसँ कनेको कम स्त्राी-पात्रामे नहि अछि। मुख्य स्त्राी पात्रा सब छथि -- सुशीला, हरिनगरबाली (अनिरुद्ध बाबूक तृतीया आ द्वितीया), द्रौपदी (कुलानन्दक पत्नी)। हरिनगर वालीक उपस्थिति सौंसे उपन्यासमे ओहने कुटिल आ नाटकीय अछि, जकर चर्चा उक्त उद्धरणमे अछि। मैथिल स्त्राीक समस्त दुर्गुण हिनकर आचरणमे भरल छनि। फूटल ढोल, बिन पेनीक लोटा, चुगलखोरनी, भाभट पसारैमे दक्ष, सौतिनकें दुष्चरित्राा साबित करबामे तल्लीन स्त्राी छथि, हरिनगरवाली। सौतिया डाह, दुष्ट स्त्राीक आचरण, दोसरकें बदनाम करबाक नेतसँ एकसँ एक दुर्वृत्तिक कल्पना आ आरोपन मिथिलाक कतोक स्त्राीमे पाओल जाइत अछि, सौतिया डाहमे तँ ई कला आओर निखरि उठैत अछि। हरिनगरवाली सुशीला पर कलंक मढ़ै छथि--धरमपुरवाली त डाइन अछि, डाइन! गाछ हँकइए!...दुइयो दिन भिन्न भेनाँ नइं भेल छलइ आ स्वामीकें खा गेल...आब सुतन्त्रा भए गेल अछि...खूब छिड़हड़ा खेलाएत... भागिनक संगे पटना-दिल्ली करत...के रोकइबला छइ...कुलानन्दो त' तेहने छथि। अपन स्त्राीकें नैहर पठा देलइन...आब सतमाइक सेवामे रहइ छथि।--एहेन अश्रद्ध आ अवांछित गारि बर्दाश्त कइयो क' सुशीला कोनो तरहें विचलित नहि होइ छथि। विपरीत परिस्थिति अएला पर मिथिलाक बुझनुक स्त्राी सागर सन गहींर आ गम्भीर भ' जाइ छथि। सुशीला बड्ड गहींर आ बड्ड गम्भीर स्त्राी छथि। समयक उतार-चढ़ाव आ हवा-पानिक रुखि निके ना बुझै छथि। उपन्यासकार अइ उपन्यासमे हुनकर इएह छवि प्रस्तुत कएने छथि। सामाजिक बन्धन आ वैयक्तिक क्रूरता वस्तुतः एते कठोर होइत अछि, जे बिना कोनो दया-धर्मक ओ फूल सन कोमल इच्छाकें मोचारि क' राखि दैत अछि। कुटिल आदर्शसँ भरल सामाजिकता इएह थिक, जाहिमे मानवीय सम्वेदनाकें अक्षुण्ण रखबाक तर्क ताकब व्यर्थ थिक। आदि कथाक इतिवृत्ति एकर उदाहरण थिक। सुशीला अइ कथाक आधार चरित्रा थिकीह। कथाक आरम्भमे जखन देवकान्त आदर्श, मर्यादा, प्रतिष्ठा, पाप-पुण्य, नेत-नियम सभसँ डेराएल मामि संगें प्रेम निवेदनमे संकोच करै छलाह; समस्त उत्कट आकांक्षाक अछैत इत-उतमे फँसल छलाह; सुशीला चारि डेग आगू बढ़ि कए मुखर भेलीह; आ अपन कतोक आचरणसँ पूर्ण समर्पणक कतोक संकेत स्पष्ट रूपें देलनि। मुदा विधवा भेलाक बाद कौलिक परम्पराक अनुकूल हुनकर सतौत बेटा कुलानन्द हुनक रक्षक, प्रतिपालक भेलखिन; आ सुशीलाक भावना, मनोवेग, आन्तरिक इच्छा, साहस सब पर सामाजिक अयथार्थ आदर्शक बन्धन विजय प्राप्त क' लेलक; ओ कुलानन्द संग रहि कए अपने टुटैत रहलीह, जर्जर मर्यादाक पातर सूतकें नहि तोड़ि सकलीह। वृद्ध, अशक्य जमीन्दार अनिरुद्ध बाबूक तेसर पत्नी सुशीला अनिन्द्य सुन्दरी छथि; आ दावानलक ज्वाला सन, अथवा समुद्री तूफान सन, अथवा भदबरिया कोसीक प्रवाह सन वेगमय यौवनक स्वामिनी छथि; अइ वेगकें सम्हारि सकबाक सामर्थ्य हुनका पतिमे नहि छनि। देवकान्तक यौवन, शिष्टता, सौन्दर्य आदि देखि ओ हुनका दिश अनुरक्त भेलीह। एहि अनुरक्तिमे अभिलाषा दैहिके टा नहि, प्रेमक आदर्श स्वरूप सेहो अर्थवन्त छलनि। इमानदारीसँ देखी तँ एहि उपन्यासमे राजकमल चौधरी द्वारा सृजित कथाक नायिका सोना मामी, अर्थात् सुशीला सन स्त्राी; कोनो कल्पना-लोकक स्त्राी नहि छथि, समाजमे एहेन कैकटा सोना मामी ओहि समयमे अही विवरणक संग भेटि सकै छलीह; एहेन स्त्राीक मनोविश्लेषण कोन मनोवैज्ञानिक करत? सुशीलाक जीवन की छल? सुन्दरि, स्वस्थ, जवान, साहसी, बुझनुक, सच्चरित ... की छथि सुशीला? एक दिश देवकान्त सन समुद्रमे मिलनक आकांक्षामे मग्न तीव्रगामिनी गंगा छथि; देवकान्तकें पैघ-पैघ प्रेमाभिसिक्त पत्रा लिखै छथि; अपन अनेक आरचरणमे अनुरक्तिक संकेतो दै छथि; रुग्ण पतिकें अस्पतालमे छोड़ि देवकान्तक परिचर्यामे पहुँचि जाइ छथि; हफीम खएलासँ अथवा कामोन्मादसँ बेहोश हएबाक कथा अपन प्रेमी देवकान्तसँ नुकएबाक प्रयास करै छथि। वृद्ध पति अनिरुद्ध बाबूक प्रति पूर्ण समर्पणक भाव स्पष्ट करै छथि। हुनका रुग्णावस्थामे देखि गाड़ी-बरद पर लादि अस्पताल ल' जाइ छथि; पति जखन अपना लेल वृद्ध वयसक चर्चा करै छथिन तँ विरोध करै छथि-- ÷सै बेर अहाँकें कहि देलऊँए, हमरा सोझाँमे अपनाकें वृद्ध नइं कहल करू...।' अर्थात अपन जवानी पर एतेक आत्मगर्विता जे वृद्ध पतिक पत्नी नहि कहाबए चाहै छथि। वैधव्य प्राप्तिक पश्चात जखन सतबेटा कुलानन्द संग तीर्थवासमे जाइ छथि, तँ धर्मशालाक मैनेजरक मुँहें अपन उच्छृंखल सतबेटाक अनाचारक कथा सुनि कुपित होइ छथि आ मैनेजरकें धोपि कए विदा करै छथि। देवकान्त जखन बलजोरी अपन बासा पर आनि लै छथिन, तँ एकहि संग प्रतिवाद आ विलाप करै छथि।... एकटा सच्चरित्रा स्त्राीकें मर्यादा आ मनोवेगमे; जीवनक सार्थकता आ सामाजिक आदर्शमे तालमेल बैसब'मे कोन-कोन यातना भोगए पड़ै छनि -- एकट अनुमान कते कठिन अछि! सुशीलाक जीवनक पर्यवस्थिति पर उपन्यासकार नशेरी, विलासी, कुलानन्दक विचार व्यवस्था अत्यन्त सटीक आँकने छथि। सुशीला जखन बेहोश भेलीह, आ लोक हल्ला केलक जे ओ आत्महत्याक निमित्त माहुर खा नेने छथि, तखन सद्पात्राक कोटिमे नहि रहलाक अछैतो भाँगक निशाँमे भसिआएल सुशीलाक सतौत बेटा कुलानन्द, जे हुनकर समवयसी छथिन, सोचै छथि--किअए नइं सुशीलाकें मरि जाए दिअनि? जीबिए कए ओ कोन सुख काटि रहल छथि? जीवनक कोन आशा, कोन इच्छा कोन आवश्यकता आइ धरि हुनका पूर भेल छनि? आबे कोन पूर हेतइन? एहेन अपूर्व सुन्दरी छथि, जेना साक्षाते सरस्वती अथवा लक्ष्मी रहथि। मुदा, भाग्य केहेन दैबक मारल। एकटा बेटा-बेटी नइं छनि, जे तकरे मूँह देख कए जीबि लितथि।... सतमाय बाँचि कए की करती...? कुलानन्द सन कुपात्राक मोनमे जाहि स्त्राीक प्रति एते व्यथा छनि, तिनका मादे ओहि कालक समाजकें आ सामाजिक मर्यादाकें कोनो दरेग नहि भेलनि। जेना कि पहिनहुँ कहल गेल, एहि पाछू मिथिलाक सामाजिक पर्यवस्थितिक पैघ योगदान छल। राजकमल चौधरी सेहो कथाक पृष्ठभूमिक संकेत दैत सूचना देने छथि जे मिथिलाक लोककें कथा एखनहुँ मोन छै जे एक दिश बंगालक तुर्क नवाब आ दोसर दिश दिल्लीक फिरोजशाह तुगलकक सेना मिथिलाकें घेरि कए सब वस्तु अपहृत, बलत्कृत करै छल। दिल्लीक सेनाक, बंगाल-आसाम-जएबाक बाट आजुक सहरसा-पूर्णियाँ छलै। बंगालक नवाबी पलटन बिहार, अवध आ दिल्ली दिश धावा देबा लेल अही बाटें जाए। अइ इलाकामे कोनो पैघ युद्ध कहियो नहि भेल मुदा बंगालक नवाबी सल्तनत आ दिल्ली शासनक संघर्षसँ सर्वाधिक हानि अही क्षेत्राकें भेलै। जीतल सिपाही प्रसन्नताक आवेगमे इनार पर पानि भरैत ग्रामवधूकें उठाकए घोड़ा पर चढ़ा लिअए; हारल सिपाही दुखक उद्वेगमे खरिहानमे काज करैत किसानकें तरुआरिसँ छपाठि दिअए। पराजयक पीड़ा आ विजयक उल्लास अइ क्षेत्राक जनताकें बिना कोनो युद्धमे गेनहि भेटल छै। अइ क्षेत्रामे यायावरी संस्कृति, बताह निश्चिन्तता, ग्राम देवी पर अथाह भरोस, जीवनक प्रति उन्मुक्त आलस्य भाव अही कारणें विकसित भेल; आ से उत्तरोत्तर एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे अबैत गेल। घनघोर आपद स्थितियहुमे अथाह निश्चिन्तता, धार्मिक आ ईश्वरीय शक्ति पर निश्चेष्ट मुदा दिढ़ आस्था, उत्कट आलस्य, भोजन-मैथुन-दरबारी वृत्ति दिश आसक्ति, चुगलखोरी, चाटुकारिता, दमित वासनाक विकृति, दुष्टाचारसँ भरल मनोवृत्ति, स्त्राी-जातिकें भोगक यन्त्रा बुझबाक प्रवृत्ति, शिथिल चरित्रा...सबो टा आचार मैथिल लोकनिकें अपन अही इतिहाससँ भेटल हो--से बहुत सम्भव अछि। सुशीला सन स्त्राीक कमी ओहि समय धरि नहि छल मिथिलामे। मुदा पर्यवस्थितिक की कएल जाए! प्रेमातुर सुशीला, देवकान्तक प्रति प्रेम निवेदनक कतोक संकेत भरि उपन्यासमे दैत रहलीह अछि। देवकान्त जखन मातृक अबै छथि, तँ घर-आँगनमे सभक समक्षे दुनूक सम्भाषण आ कथोपकथनमे ई स्पष्ट होइत अछि। देवकान्त बड़े चतुराइसँ ठोकि बजा क' अपन वक्तव्य दै छथि, मुदा सुशीलाक वाक्चातुर्य देवकान्तकें अनुत्तरित क' दै छनि। जखन देवकान्त कहै छथि -- ÷आब मामी जतबा दिन कहतीह, रामपुर रहि जाएब।' तँ सुशीला तत्काल देवकान्तक आँखिमे अपन दून्नू आँखि रखैत जवाब दै छनि--÷हम कहब जे भरि जन्म अही ठाम रहि जाउ त रहि हएत?' देवकान्त निरुत्तर भ' जाइ छथि। एक उखराहा बितलाक बाद हुनका जवाब सूझै छनि, आ तखन साँझमे आबि क' कहै छथिन -- ÷सत्त मोनसँ किओ ककरो राखए चाहत त' ओ कहिओ भागि नइं सकइ छइ।' अइ सम्भाषण पर सोना मामी लजाइ छथि; अपन समस्त जमा-पँूजी भागिनकें अर्पित करैत रहै छथि। ई समर्पण वस्तुतः महादेवक प्रति पार्वतीक सर्वस्वार्पणसँ कम प्रशस्त, कम पवित्रा, कम मूल्यवान नहि अछि। मुदा समाजक नजरिमे ई परकीया समर्पण थिक, अनाचार आ व्यभिचारक समर्पण थिक। समाजक नजरिमे सुशीला आ अनिरुद्ध बाबूक विवाह बर्बरता, अनाचार आ व्यभिचार नहि थिक। हाय रे मिथिला, हाइ रे मैथिल! मुदा समस्त चातुर्य, समस्त धैर्य, समस्त शीलक अछैत सोना मामी अपन मान-सम्मानक प्रति सावधान आ कतोक बेर उग्र सेहो देखाइ छथि। हफीम खएबाक हिनकर कथा जखन हरिनगरवाली देवकान्तकें सुनबए लगै छथिन, तँ सुशीला तामसें तरंगि उठै छथि, ज्वालामुखी जकाँ आगि-अंगोरा मुँहसँ निकल' लगै छनि; मुदा क्रोधमे प्रेमाधारकें कोनो तरहें आहत नहि करै छथि। शरबत पीबाक हिनकर आग्रह जखन देवकान्त नहि मानै छथिन, तँ ई अपमानित होइ छथि। चोटाएल नागिन सन उधिआइ छथि, मुदा देवकान्तकें आहत नइं करै छथि, लोटा गिलास फेकि कए क्रोध शान्त क' लै छथि। मिथिलाक स्त्राी जीवनक जतेक सूक्ष्म अध्ययन राजकमल चौधरीकें छलनि, आ हिनकर रचना संसारमे जतेक सूक्ष्म विवरण उपस्थिति अछि, हमरा जनैत कोनो स्त्रिायो एते सूक्ष्मतासँ ओहि मनोविज्ञानकें नहि पकड़ि सकल हेतीह। सुशीलाक विवरणमे तँ लगैत अछि लेखक अपन सम्पूर्ण कला लगा देने छथि। सम्पूर्ण कथामे सुशीलाक चरित्राक बहुमुख अंकित करैत कतहु एकटा खोंच-नोछाड़ नहि लागए देने छथि। जे सुशीला भागिनक प्रति एहि तरहें समर्पित छलीह जे पति-पत्नीक रूपमे अमर हएबाक आशीर्वाद चाहै छलीह, से पतिक देहावसानक पश्चात, कुलानन्दक आश्रित भ' गेलीह। कुलानन्दक कोनो बात पर ÷नइं' कहब बिसरि गेलीह। स्वामीक मुँहें कहियो वर्जना नइं सुननिहारि सुशीला, कुलानन्दक समस्त वर्जनाक पालन करए लगलीह।... (अगिला अंकमे) १.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप २. दैनिकी- ज्योति कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। बी०डी०ओ० ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज धरि अवश्य करबैत छलीह। प्रधान मंत्रीक मधुबनी आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ सक्षात दर्शनक पुण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?'' ''के अबैत छथिन?''- माने पुछलनि। ''प्रधान मंत्री।'' - हम उत्तर देलियै। ''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम'(वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की देखऽ जाऊ हुनका ?'' हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ। २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति आठम दिन : 1 जनवरी १९९१, मंगलवार : वर्षक पहिल दिन हम ७ बजे उठलहुं। सब छात्रसब मजाकमे कहलक जे हम साल भरि सुतैत रहब। पर उठैत देरी हम अतेक जल्दी तैयार भऽ गेलहुं जे सब हमरा ऑंधी तूफान के उपाधि देलक। पहिने हमसब बकरेश्वर के मंदिर गेलहुं। मंदिरके बाहरी दृष्य देखकर हमसब मुग्ध भऽ छलहुं। अन्दरमे पंडित सब अपना दिस आमंत्रित करैत छल लेकिन हमसब अपने सऽ घुमनाइ पसन्द केलहुं। आगां जाकऽ देखलहुं जे एकटा गर्म कुण्ड अछि। हमसब पहिने तऽ नहा लेने रहुं तैयो नहिं रहल गेल आ किछु सहेलीके अपन कपड़ा आनैलेल पठाकऽ ओतऽ फेर सऽ स्नान केलहुं। अकर बाद नास्ता कऽ दीग्घा दिस विदा भेलहुं। हमर किछु संगीसब ओतऽ पहुंचैलेल ततेक उत्साहित छलैथ जे ओ सब बीचमे रुकिकऽ भोजन करैके कार्यक्रम छोड़ि देबाक बात करै छलैथ। परन्तु ई नहिं भऽ सकल।भोजनोपरान्त हमसब फेर विदा भेलहुं। राइतके साढ़े एगारह बजे दीग्घाके एक लॉजमे रूकलहुं। ई लॉज समुद्र तट सऽ नजदीक रहै आ बहुत सुविधा सऽ युक्त रहै। पॉंच-पॉंच टा विद्यार्थीके एक टा डबलबेडरूम अटैच्ड बाथरूम आ बालकोनी भेटल रहै। हमसब निश्चय केलहुं जे आई राति भरि जागल रहब जाहिसऽ सुर्योदय देखि सकी लेकिन पता चलल जे आकासमे बादल हुअके कारण सुर्योदय नहिं देख सकब। तखन हमसब सुतैके तैयारीमे लागि गेलहुं। Top of Form रिपोर्ताज- Bottom of Form कृपानन्द झा (1970- ), जन्म- समौल, मधुबनी, मिथिला। गणितमे स्नातकोत्तर (एल.एन.एम.यू, दरभंगा), बी.लिब. (जामिया मिलिया इस्लामिया) आऽ सोचाना विज्ञानमे एसोसिएटशिप, आइ.एन.एस.डी.ओ.सी., नई दिल्ली। कृपानन्द जी मीरा बाइ पोलीटेकनिक, महारानी बाग, नई दिल्लीमे व्याखाता छथि। कृपानन्दजी यूथ ऑफ मिथिलाक अध्यक्ष छलाह आऽ एखन अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक जेनरल सेक्रेटरी छथि। हिनकर ६ टा शोध पेपर सूचना प्रबन्धनक क्षेत्रमे प्रकाशित छन्हि, संगहि हिन्दी आऽ अग्रेजीमे एक-एकटा कविता सेहो प्रकाशित छन्हि। चौकपर आणविक समझौता:- कृपानन्द झा साँझ काल गामक चौकपर गहमा-गहमी छलैक। टोनुआँक दोकानपर चाहक गिलास खनखना रहल छलैक मंडलजी पान लगेवमे व्यस्त छलाह। कनीक दूरपर दुर्गा मन्दिरक पुवरिया कात बनल चबुतरापर दस-बारह युवा आ वृद्ध सम सामयिक चर्चामे मग्न छलाह। बीचमे मन्नू भाइक आवाज जोड़सँ आयल। “हौ! एहन कोन आफद आबि गेलैक अपन देशपर जे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंहजी अपन देशक वैज्ञानिकक लगभग पछिला पचास वर्षक तपस्या आ अनुसंधान तथा भविष्यक आणविक सामरिक अनुसंधानकेँ अमेरिकाक हाथ बंधकी रखबापर उतारु भय गेल छथि। गगनजी चबुतरापर सँ उचकि पानक पीक कातमे फेकैत कहि उठलाह, “कक्का! एहन बात नहि छैक। ई समझौता मात्र अपन देशक महज ऊर्जा आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल-हँ!.. मन्नू भाई तम्बाकू ठोढ़मे दैत कहलखिन, “है। ई ऊर्जा आवश्यकता महज बहाना छैक। अमेरिका एहि बहाने अपन देशक स्वतन्त्र आणविक कार्यक्रममे टाँग अड़ेबाक फिराकमे बहुत दिनसँ छल। आब ओ अपन मनशामे १२३ समझौता आ ओहिमे हाइड एक्टक प्रावधान सौँ सफल भय रहल अछि”। गगन जी थोड़ेक चिन्तित मुद्रामे कहलखिन- “देखियौ कक्का, जहाँ तक १२३ समझौता आ भारतक आणविक सामरिक कार्यक्रमक प्रश्न छैक तँ मात्र ओ सब रियेक्टर अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सीक देखरेखमे आनल जेतैक, जे सब रियैक्टर, भारत सरकार चाहतैक। तेँ बाकी कार्यक्रमपर एकर असर नहि परतैक”। “हाँ हौ! लेकिन ई अनबाक कोन जरूरी छैक?” मन्नू भाई आवेशमे बजलाह। ताधरि बैंकर सैहैब सेहो सहटि कय चबुतरा दिश आबि गेल छलाह। गम्भीर आवाजमे मन्नू भाईकेँ सम्बोधित कय कहलथिन- “भाई, किछु एहन प्रावधान सभ जरूरी छैक एहि समझौतामे, परन्तु ई सभ निर्भर करैत छैक जे भविष्यमे भारतक स्थिति अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर कतेक मजबूत रहैत छैक आ हमर राजनीतिज्ञ सब परिस्थितिसँ कतेक फायदा उठबैत छथि। कारण जे ड्राफ्ट एखन प्रस्तुत कएल गेल छैक ताहिमे कोनो कन्फ्लिक्टक स्थितिमे की कदम उठायल जायत आ ओ भारतक फायदामे होयत वा नुकसानमे से ओहि समयक देशक कूटनीतिज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितिपर निर्भर करत। परंच, वर्तमान परिस्थितिकेँ अगर देखल जाय तँ हमर देशक आणविक विद्युत उत्पादनक वर्तमान क्षमता मात्र ४०-५०% उत्पादन भय रहल अछि बाँकी आगू जे योजना छैक ओकरो अगर ध्यानमे राखल जाय तँ कहल जा सकैत अछि जे आणविक इन्धन एवं शान्तिपूर्व आणविकौपयोगसँ जुड़ल किछु तकनीककेँ यथाशीघ्र आवश्यकता छैक। “हौ बैंकर! ई पक्ष तँ छैक परंच एखनहु अगर सरकार आंतरिक संसाधनकेँ सही ढंगसँ दोहन करय तँ ई आणविक इंधनक समस्या अल्पकालिक साबित होयत”। मन्नू भाई किछु शान्त मुद्रामे बजलाह। अपन बातकेँ आगू बढ़बैत कहलखिन जे – “हौ, एखनहु जे योजना सब झाड़खण्डक (जादूगुड़ा, बन्दूहुरंग, तुरमडीह) आन्ध्र प्रदेशक (तुम्मालापल्ली) कर्णाटक, मेघालय आ राजस्थान आदि राज्यमे चलि रहल छैक ओ अगर सही ढंगसँ कार्यान्वित कयल जाय तँ आणविक इन्धनक ई वर्तमान समस्याक समाधान आसानीसँ कयल जा सकैछ”। चबुतराक उतरवरिया-पछवरिया कोनापर बैसल टुन्ना बाजि उठल, “यौ कक्का, मंडलजी पानक दोकान आब बन्द करताह! ८ बाजि रहल छैक”। बैंकर सैहैब जोड़सँ कहलखिन- “यौ मंडलजी! आठटा पान लगाकऽ एमहर पठाऊ”। चबुतराक पछवरिया कातमे मजहर सोचपूर्ण मुद्रामे साँझेसँ बैसल सबहक गप सुनि रहल छलाह। बैंकर सैहैब मजहरकेँ कहलखिन- “हौ मजहर! तूँ तँ एखन कम्पीटिशन सबहक तैयारी कए रहल छह। तूँ एहि सम्पूर्ण प्रकरण पर बहुत मंथन कयने हेब। आखिर तोहर सोच की छह”? खखसि गरदनि साफ कय खखाड़ कातमे फेकैत बजलाह- “भाईजी! अंतर्राष्ट्रीय आ आर्थिक नीति काफी संकीर्ण विषय छैक। पहिल बात अछि जे हमरा लोकनि एन.पी.टी.पर हस्ताक्षर केने बिना अंतर्राष्ट्रीय आणविक बाजारमे सेंह मारवाक कोशिश कय रहल छी। एहि हालतमे किछु ने किछु अंतर्राष्ट्रीय बंधन तँ स्वीकार करहिये परत। परन्तु हम एकरा एकटा अवसरक रूपमे देख रहल छियैक। आणविक क्षेत्रक किछु एहन पक्ष छैक जाहिमे हमर देशक अनुसंधान शायद अमेरिकोसँ ऊपर अछि। हालमे एकटा रिपोर्ट पढ़ने रही, जाहिमे कहल गेल छैक जे भारतक वैज्ञानिक २००५ आ २००६ मे प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्टक आधारपर तकनीकी रूपसँ समृद्ध देश सबकेँ सेहो पाछू छोड़ि आगू बढ़ि गेल अछि। एहि स्थितिमे आणविक इन्धन आ किछु तकनीकक आयात तँ महज अल्पकालिक छैक। दीर्घकालिक असर हमरा जनैत ई हेतैक जे भारत किछु दिनका बाद आणविक क्षेत्रमे एकटा पैघ निर्यातक भऽ कऽ उभरत। एकरामे तकनीकी क्षमता छैक आ अन्तरि आणविक साधन, जे किछु काल पहिने चर्चा भेल जेना, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, मेघालय आदिमे उपलब्ध छैक तथा अंतर्राष्ट्रीय आणविक सहयोगक माध्यमसँ एकटा पैघ निर्यातक भेनाइ सम्भव छैक। तेँ हेतु हमर तँ एतबय कहब अछि जे जौँ एहि समझौताकेँ सही ढंगसँ उपयोग कयल जाय तँ ई अपन देशक लेल वरदान साबित होयत”। १.नवेन्दु कुमार झा छठिपर २.नूतन झा भ्रातृद्वितियापर नवेन्दु कुमार झा, समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना १.बिहारक लोक पर्व – छठि पावनि-तिहार हमर सभक सभ्यता-संस्कृतिक परिचायक अछि। हिन्दू धर्ममे पाबनिक विशेष महत्व अछि। हिन्दू धर्मावलम्बी सभक कतेको पाबनिमे छठिक विशेष महत्व अछि। ई पाबनि बिहारक लोक पाबनिक संग महापाबनि सेहो अछि। ई सम्पूर्ण बिहारक संग पूर्वी उत्तर प्रदेश आ महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आ दिल्लीक बिहारी बहुल क्षेत्र सभमे श्रद्धाक संग मनाओल जाइत अछि। पड़ोसी देश नेपालक मैथिली बहुल क्षेत्रमे सेहो एहि पाबनिक आयोजन कएल जाइत अछि। अगाध श्रद्धा, कड़गर व्रत साधना, एकान्त निष्ठा आ आत्म संयम बाला एहि पाबनिक बिहारमे ओतबे महत्व अछि जतेक महाराष्ट्रमे गणपति महोत्सव, पश्चिम बंगालमे दुर्गापूजा तथा पंजाबमे वैशाखीक अछि। बिहारक किछु क्षेत्रमे एहि पाबनिकेँ “डाला छठि” सेहो कहल जाइत अछि। ई पाबनि सूर्योपासना आ साधनाक महापाबनि अछि। शक्तिक देवी दुर्गाक आराधनाक समाप्तिक बाद प्रदेशमे छठि पाबनिक आगमनक अभास होमए लगैत अछि आ प्रकाशक पाबनि दीया बातीक समाप्तिक बाद लोक एकर तैयारीमे लागि जाइत छथि। एहि पाबनिमे भगवान सूर्य देव आऽ षष्ठी माय (छठि माता)क आराधना एक संग कएल जाइत अछि। ओना तँ सूर्य देवक पूजाक परम्परा अति प्राचीन अछि आऽ कतेको हजार वर्षसँ हमर सभक सांस्कृतिक विरासत अछि मुदा सूर्य देवक संगहि षष्ठी मायक पूजा एक संग कहियासँ शुरू भेल से एखनो रहस्य बनल अछि। छठि पाबनिक आयोजन वर्षमे दू बेर होइत अछि। पहिल बेर चैत मासमे आ दोसर बेर कार्तिक मासमे छठिक पाबनि होइत अछि। कार्तिक मासमे एहि पाबनिक आयोजन विस्तृत रूपमे होइत अछि। एहि अवसरपर प्रवासी बिहारी आवश्यक रूपसँ अपन प्रदेश आऽ गाम अबैत छथि आऽ अपन घरपर रहि सम्पूर्ण परिवारक संग एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि। श्रद्धा आऽ आस्थाक संग एहि पाबनिकेँ कएलासँ मनोबांक्षित फलक प्राप्ति होइत अछि। धार्मिक ग्रन्थ सभमे ई जनतब देल गेल अछि जे सूर्य देवक पूजा प्राचीन कालसँ प्रसिद्ध अछि आऽ बिहारमे एकर प्रसिद्धि सहज रूपमे देखल जाऽ सकैत अछि। चारि दिन धरि चलै बाला ई धार्मिक अनुष्ठान कार्तिक शुक्ल चतुर्थीसँ शुरु होइत अछि आऽ सप्तमीकेँ समाप्त होइत अछि। पहिल दिन “नहाय-खाय” होइत अछि। एहि दिन पबनैतिन सुविधानुसार नदी, पोखरि आऽ इनार आदिमे स्नान कऽ अरबा चाउरक भात, बुटक दालि आऽ सजिमनिक तरकारी भोजन करैत छथि। पबनैतिनक भोजन कएलाक बाद घरक आन सदस्य भोजन ग्रहण करैत छथि। एहि दिन छठि पाबनि करबाक संकल्प लेल जाइत अछि। दोसर दिन पंचमीकेँ खरना होइत अछि जाहिमे पबनैतिन भरि दिन उपास रहि नदी, पोखरि आ इनारसँ पानि आनि पीतल, ताम्बा अथवा माटिक बर्तनमे खीर, चाउरक आटाक गुलगुला बनबैत छथि आऽ सांसमे नव वस्त्र पहिर चाँद देखि बनल सामग्री, केरा आऽ दूध सूर्य भगवानकेँ समर्पित कऽ शान्त-चित्त भऽ प्रसाद ग्रहण करैत छथि। खरनाक समय कोनो आबाज नहि होमए क चाही। खरनाक विधि विभिन्न स्थानपर बदलैत अछि मुदा मूल रूपमे कोनो परिवर्तन नहि होइत अछि। एकरा बादसँ पबनैतिन उपासमे रहैत छथि आऽ चारिम दिन उगैत सूर्यकेँ अर्घ्य दऽ प्रसाद ग्रहण कऽ उपास तोड़ैत छथि। खरनाकेँ किछु क्षेत्रमे “लोहंडा” सेहो कहल जाइत अछि। तेसर दिन षष्ठीकेँ पबनैतिन नदी, पोखरि आ इनारमे पानिमे ठाढ़ भऽ कतेको तरहक पकबान, फल-फूल, सुपारी, पान आदिकेँ कांच बासक बनल सूपमे सजा ओहिमे दीप जड़ा डुबैत सूर्य दिस मूँह कऽ भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य चढ़बैत छथि। परिवारक आन सदस्य सेहो सूपक आगाँ पानि अथवा दूध ढ़ारि अर्घ्य दैत छथि। षष्ठी दिन भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देलाक बाद प्रदेशक किछु क्षेत्रमे “कोसी भरबाक” परम्परा सेहो अछि। एहि दिन अर्घ्य देलाक बाद स्त्रीगण अपन अंगनाकेँ गोबरसँ निपैत छथि आ ओहिपर अरिपन दैत छथि। एकर बाद चारि टा पैघ कुसियारसँ मंडप बना एकर बीचमे माटिक बनल हाथी रखैत छथि जकर चारु कात दीप बनल रहैत अछि। सभ दीपकेँ मालासँ सजा ओहिमे घी ढ़ारि जड़ाओल जाइत अछि। हाथीक ऊपरमे भगवान भाष्करकेँ अर्पित कएल जाए बाला प्रसाद, ठकुआ, केरा आऽ आन फलकेँ माटिक बर्तनमे राखल जाइत अछि। दीप राति भरि जड़ैत रहैत अछि आ स्त्रीगण मंडपक चारूकात बैसि भरि राति जागल रहि छठि माइक गीत गबैत छथि। भरि राति दीप जड़बऽ आऽ गीत गाबएमे बितैत अछि। षष्ठी जकाँ चारिम दिन सप्तमीकेँ उगैत सूर्यक भिनसरमे समर्पित कएल जाइत अछि। एकर बाद कोसी उठा लेल जाइत अछि। अर्घ्य देलाक बाद सभ लोक पबनैतिनकेँ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लैत छथि। लोक पबनैतिनक आशीर्वादकेँ सूर्यदेवक आशीर्वाद मानैत छथि। अमीर-गरीब, बूढ़-जवान, मालिक-नोकर, स्त्री-पुरुष सभ भेदभाव बिसरि पबनैतिनसँ आशीर्वाद लैत छथि। तेजीसँ बदलैत परिवेशक बावजूद ई परम्परा निरन्तर चलि रहल अछि। सप्तमी अर्घ्यक बाद छठि मायक प्रसाद ग्रहण कऽ पबनैतिन अपन उपास समाप्त करैत छथि आ भोजन ग्रहण करैत छथि। एहिक संग चारि दिनक ई धार्मिक अनुष्ठान समाप्त होइत अछि। अन्तिम दिनकेँ पारन सेहो कहल जाइत अछि। बिहारमे ई पाबनि हिन्दूक संगहि मुसलमान आ सिख सेहो मनबैत अछि। कटिहार जिलाक लक्ष्मीपुर आऽ भोजपुर जिलाक कोइलवर गाममे तीनू धर्मक लोक एहि पाबनिकें मनबैत छथि। लक्ष्मीपुर गामक पश्चिम स्थित नदीक किनारमे तीनू समुदायक श्रद्धालु एकट्ठा होइत छथि आऽ एक संग सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि, ओतहि, कोइलवर गाममे हिन्दू रोजा रखैत छथि तऽ मुसलमान छठिक पाबनिमे हिन्दू सभक घरमे सूप पठा कऽ एहि पाबनिकेँ मनबैत छथि। प्रदेशक सांस्कृतिक सम्पन्नताक उदाहरण प्रस्तुत करैत एहि पाबनिमे उपयोगमे आबए बाला वस्तु सभ खेतीक व्यवस्थाक अर्थशास्त्रीय स्वरूप प्रस्तुत करैत अछि। ई एकमात्र एहन धार्मिक अनुष्ठान अछि जाहिमे पंडितक कोनो हस्तक्षेप नहि होइत अछि। बिना पंडितक सम्पन्न होमएबाला एहि पाबनिमे भगवान आऽ भक्तक संग सीधा सम्पर्क होइत अछि। एहि पाबनिमे स्त्रीगणक महत्वपूर्ण भूमिका होइत अछि जे अपन शरीरकेँ तपा कऽ पूरा भक्तिक संग नियम-निष्ठा आऽ पवित्रताकेँ बनाएल रखबाक प्रति विशेष रूपसँ सतर्क रखैत छथि। एहन धारणा अछि जे एहि पाबनिकेँ नियम निष्ठा आऽ पवित्रताक संग नहि कएलासँ एकर विपरीत असरि पबनैतिन आऽ ओकर निकट सम्बन्धी आऽ परिवारपर तुरत पड़ैत अछि। ई मान्यता अछि जेऽ पवित्रताक संग ई पाबनि नहि कएलासँ असाध्य रोग उत्पन्न होएबाक संभावना रहैत अछि। दोसर दिस ईहोमानब अछि जे एहि पाबनिकेँ नियमित रूपेँ कएलासँ सफेद दाग जेहन रोगसँ मुक्ति सेहो भेटैत अछि। एहि पाबनिक बढ़ैत लोकप्रियताकेँ देखि आब पुरुष सेहो ई पाबनि करए लगलाह अछि। भगवान सूर्यक पूजा भारतक संगहि इन्डोनेशिया, जावा, सुमात्रा आदि कतेको देशमे कएल जाइत अछि, मुदा अन्तर अतबा अछि जे स्थानक परिवर्तनक संग एकर स्वरूप बदलि जाइत अछि। सूर्योपासनाक चरचा विश्वक प्रायः सभ प्राचीन साहित्यमे अलग-अलग रूपमे कएल गेल अछि। एकर चर्चा वेदमे तँ अछिए संगहि सूर्योपनिषद, चाक्षुपोपनिषद, अक्ष्युपनिषद आदिमे सेहो अछि मुदा सूर्य देवक संग सूर्य देवक संग षष्ठी देवी पूजा एक संग कहियासँ कएल जाऽ रहल अछि एकर प्रमान एखन धरि अनुपलब्ध अछि। कार्तिक मासक षष्ठी तिथि षष्ठी देवी कऽ अछि जे भगवान कार्तिकेयक पत्नी छथि। ई पाबनि सूर्य देव आ षष्ठी देवी एक संग करबाक पाबनि अछि जे पूरा भक्तिक भावक संग मनाओल जाइत अछि। छठिक गीतमे सेहो सूर्य देव आऽ षष्ठी मायक स्तुति एक संग कएल गेल अछि। सूर्योपासनाक संग एहि धार्मिक अनुष्ठानक संबंधमे कतेको कथा प्रचलित अछि। एकटा मान्यता ई अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। ऋषिक पत्नी सुकन्याक पिता जंगलमे शिकार खेलऽ गेलाह तँ हुनका द्वारा छोड़ल गेल तीर च्यवन ऋषिक एकटा आँखिमे लागि गेल जाहिसँ हुनक एकटा आँखि चलि गेल। एहि घटनासँ सुकन्या व्याकुल भऽ गेलीह आऽ जंगलक भ्रमण करए लगलीह। जंगलमे एक दिन एकाएक सूर्य देवक पूजामे लागल एकटा नाग कन्यासँ हुनक भेँट भेल। ओ एहि सम्बन्धमे नागकन्यासँ जनतब लेलनि तँ नागकन्या जनौलक जे षष्ठी आऽ सप्तमीकेँ सूर्य देवक पूजा कएलासँ भक्तक सभ मनोकामना पूरा होइत अछि। एहन चरचा होइत अछि जे च्यवन ऋषि आऽ सुकन्या सूर्य देवक पूजा कएलनि आऽ हुनक आँखि ठीक भऽ गेल। प्राचीन साहित्यसँ ईहो जनतब होइत अछि जे औरंगजेब सेहो औरंगाबाद स्थिति देवक प्रसिद्ध सूर्य मन्दिरमे १६७७ सँ १७०७ ई. धरि नियमित रूपसँ छठिक अवसरपर सूर्य देवक आराधनामे लागि जाइत छल। एहनो चरचा भेटैत अछि जे महाभारतक समय पांडव जखन सभ किछु हारि गेलाह आऽ जंगलमे घुमैत छलाह जखन विपत्ति एहि समयमे द्रौपदी सूर्यदेवक १०८ नामसँ सूर्यक पूजा कएलनि आऽ छठिक व्रत कएलाक बाद पांडवकेँ अपन राज-पाट वापस भेटि गेल। एहि घटनाक बाद लोक सभ एकटा “महाभारत पर्व” सेहो कहए लगलाह। आम जन समूहक मध्य ई धारणा अछि जे एहि धार्मिक अनुष्ठानकेँ निष्ठाक संग कएलासँ मनोवांक्षित फलक प्राप्ति तँ होइते अछि संगहि संतानोत्पत्ति आऽ पारिवारिक शान्ति आऽ चैनक संग असाध्य रोगक निवारण सेहो होइत अछि। सम्पूर्ण बिहारमे पूरा उत्साह आऽ भक्तिभावक संग मनाओल जाएबाला एहि पाबनिक अतेक महत्व अछि जे गरीब सेहो भीख माँगि कऽ ई पाबनि करैत अछि। कतेको लोक आऽ संगठन एहि अवसरपर फल-फूल आऽ पूजाक सामान बाँटि पुण्यक भागी बनैत छथि। खरना आऽ सप्तमीक दिन लोकसभ माँगियो कऽ प्रसाद जरूर ग्रहण करैत छथि। पबनैतिन सेहो बिना कोनो भेदभावक प्रसाद बँटैत छथि। एहि अवसरपर पूरा प्रदेशमे नदी, पोखरि, कुआ आदिक सफाई कएल जाइत अछि। सम्पूर्ण प्रदेशक शहर गामक सड़क, गली, मोहल्लामे अद्भुत सफाई आऽ प्रकाशक व्यवस्था कएल जाइत अछि। शहर सभमे नदी-पोखरिपर बढ़ैत भीड़ देखि आब लोक सभ अपन मोहल्ला आऽ घरक छत अथवा लग पासमे खाली स्थानपर पोखरि जकाँ संरचना बना ओहिमे पानि जमा दैत छथि आऽ पबनैतिन ओहिमे ठाढ़ भऽ सूर्यदेवकेँ अर्घ्य समर्पित करैत छथि। ई एकमात्र अवसर अछि जखन लोक सभ साक्षात अराध्य देवक पूजा करैत छथि। एहि अवसरपर सम्पूर्ण बिहारमे अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आऽ मालिक-मजूरक बीच दूरी समाप्त भऽ जाइत अछि। सभ केओ तन, मन, धनसँ एहि पाबनिमे लागि जाइत अछि आऽ सम्पूर्ण वातावरण छठिमय भऽ जाइत अछि। २. बिहारमे सूर्योपासनाक प्रमुख केन्द्र- नवेन्दु कुमार झा, समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना छठि पाबनि बिहारक एकटा लोक पर्व अछि जे प्रायः सभ घरमे मनाओल जाइत अछि। पूरा प्रदेशमे आस्था आऽ श्रद्धाक संग ई चारि दिवसीय अनुष्ठान सम्पन्न होइत अछि। बिहारमे सूर्योपासनाक कतेको केन्द्र अछि। बिहारमे स्थित कतेको सूर्य मन्दिर श्रद्धालु सभकेँ भगवान सूर्यक अर्घ्य देबाक लेल आकर्षित करैत अछि। प्रदेशक संगहि देशक कतेको आन क्षेत्रसँ श्रद्धालु एहि मन्दिर सभमे आबि सूर्य देवक आराधना करैत छथि:- देवक सूर्य मन्दिर:- औरंगाबाद जिला मुख्यालयसँ बीस किलोमीटरपर देवमे स्थित सूर्य मन्दिर मगध विशिष्ट संस्कृति, आस्था आऽ विश्वासक सर्वाधिक सशक्त आऽ विराट प्रतीक अछि। ई प्राचीन सूर्य मन्दिर अपन शिल्प आऽ स्थापत्यक प्रभावशाली सौम्यक अभिव्यक्त करैत अछि। सूर्य देवक ई विशाल मन्दिर पूर्वाभि,उख नहि भऽ पश्चिमाभिमुख अछि। बिना सिमेन्ट या गार चूनाक आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार आऽ त्रिभुजाकार आदि कतेको रूप आऽ आकारमे काटल पत्थरकेँ जोड़िकऽ बनाओल गेल अछि। गोटेक सौ फीट ऊँच एहि सूर्य मन्दिरमे सूर्य देवक तीन रूपक उदयाचल, मध्यांचल तथा अस्ताचलमे विद्यमान छथि। एहि मन्दिरक कारी पाथरिक नक्कासी, अभिषेक करैत अस्ताचलगामी सूर्यक किरण आऽ एहि मन्दिरक महिमाक कारण लोक सभमे अटूट श्रद्धा अछि। एहि कारण प्रति वर्ष चैत आऽ कातिक मासमे देशक कतेको क्षेत्रसँ पबनैतिन एहि ठाम आबि सूर्यदेवकेँ अर्घ्य दैत छथि। पोखरामाक सूर्य मन्दिर- लखीसराय जिला सूर्यगढ़ा प्रखण्डक पोखरामा गाममे स्थापित सूर्य मन्दिर सूर्य पंचायतन मन्दिर अछि जतए पाँचो देवता शिव, गणेश, विष्णु आऽ देवी दुर्गाक संग सूर्यदेव विराजमान छथि। एहि तरहक प्रदेशक ई पहिल मन्दिर अछि। एकर निर्माण सूर्य देवक प्रेरणासँ भेल अछि। १२०० फीटमे बनल एहि मन्दिरक बगलमे एकटा पोखरि सेहो अछि जतए भगवान सूर्यकेँ अर्घ्य देल जाइत अछि। लोक सभक मान्यता अछि जे सच हृदय, स्वच्छ भाव आऽ पवित्र मनसँ एहि मन्दिरमे छठिक पूजा कएलासँ दैहिक, दैविक आऽ भौतिक पापसँ मुक्ति तँ भेटैते अछि, सूर्य नारायण मनोनुकूल फल सेहो दैत छथि। पोखरामा गाम किउल-भागलपुर रेल खण्डपर कजरा स्टेशनसँ पाँच किलोमीटर उत्तर पश्चिममे तथा सड़क मार्गसँ ई गाम लखीसराय –मुँगेर पथपर लखीसरायसँ पन्द्रह किलोमीटर आऽ अलीनगरसँ चारि किलोमीटरपर अवस्थित अछि। उलारक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ पचास किलोमीटर दूर दुल्हिन बाजार आऽ पालीगंजक मध्य उलार मोड़सँ एक किलोमीटर दूर अवस्थित उलारक सूर्य मन्दिर अपन विशिष्ट पहचानक कारण प्रसिद्ध अछि। द्वापर कालमे भगवान श्रीकृष्णक वंशक राजा एहि मन्दिरक निर्माण करौने छलाह। गोटेक तीस फीट ऊँच एहि मन्दिरक इतिहास आऽ महत्वक कारण आइयो सभ रवि दिन कतेको हजार श्रद्धालु पैदल चलि कऽ एहि ठाम पूजा-अर्चना करैत छथि। छठिक अवसरपर एहि ठाम पैघ संख्यामे लोक छठि करऽ अबैत छथि। मधुश्रवाक सूर्य मन्दिर- राजधानी पटनासँ सटल अरवल जिलाक मधुश्रवामे सेहो एकटा प्राचीन सूर्य मन्दिर अछि। कहल जाइत अछि जे मधुश्रवामे च्यवन ऋषिक आश्रम छल। पौराणिक कथाक अनुसार सुकन्या आऽ च्यवन ऋषिक देवार लागल शरीर एहि ठाम ठीक भऽ गेल छल आऽ हुनक फूटल आँखि पूर्ववत भऽ गेल। सुवासक सूर्य मूर्ति- मुजफ्फरपुर जिलाक गायघाट प्रखण्ड अन्तर्गत दरभंगा-मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय उच्च पथपर लढ़ौर पंचायतक सुवास गाममे सेहो भगवान सूर्यक एकटा प्राचीन मूर्ति अछि। एहि गामक लोक एकर पूजा अपन ग्राम देवताक रूपमे करैत छथि। जानकारीक अभावमे ई मूर्ति एकटा छोट मन्दिरमे एखनो स्थापित अछि। हालाँकि एखन धरि प्रदेशक सूर्योपासनाक केन्द्रमे एकर पहचान नहि बनि सकल अछि। उमगाक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक मदनपुर उमगा पर्वत श्रृंखलापर चौदह सौ वर्ष पूर्व एकटा सूर्य मन्दिरक निर्माण कराओल गेल छल जकर शिल्प देवक सूर्य मन्दिरसँ मिलैत अछि। गोटेक साठि फीट ऊँच ई मन्दिर बिना सिमेन्टक प्राचीन पाथरसँ बनल अछि। एहि ठाम सात टा घोड़ापर सवार भगवान सूर्यक प्रतिमा स्थापित अछि। देवसँ गोटेक बारह किलोमीटरपर ई मन्दिर अवस्थित अछि। बेलाउरक सूर्य मन्दिर- भोजपुर जिलाक उदवन्तनगर प्रखण्डक दक्षिण-पूर्व कोनपर आरा-सहार सड़कपर स्थित बेलाउर सूर्य मन्दिरक लेल प्रसिद्ध अछि। बेलाउरक नयनाभिराम एहि मन्दिरमे सूर्य देवक भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित कएल गेल अछि। एहि ठाम प्रदेशक कोन-कोनसँ लोक सभ मनता मानए अबैत छथि। औंगारीक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक एकंगरसराय प्रखण्डक एकंगरडीह बजारसँ गोटेक पाँच किलोमीटर दक्षिण ऐतिहासिक औगारी गाममे बनल सूर्य मन्दिरमे सूर्य देव आऽ भगवान विष्णुक उनीस टा प्राचीन प्रतिमा अछि। भगवान सूर्यक बारह टा राशि अछि। एहि सभ राशिक प्रतीक देश भरिक बारह टा सूर्य मन्दिरमे सँ एकटा औंगारीक सूर्य मन्दिर अछि। मन्दिरक लग एकटा विशाल पोखरि सेहो अछि। एहि पोखरिमे स्नान कऽ सूर्य देवकेँ एहि ठाम अर्घ्य देबाक विशेष महत्व अछि। छठिक अवसरपर औंगारीमे पैघ मेला सेहो लगैत अछि। हवेली खड़गपुरक सूर्य मन्दिर- मुंगेर जिलाक हवेली खड़गपुर मुख्यालयसँ गोटेक तीन किलोमीटर उत्तर पश्चिम जमुई-मुंगेर रोडपर अवस्थित सूर्य मन्दिरक निर्माण पाँच दशक पूर्व छात्र सभक पूजा-अर्चनाक लेल बनाओल गेल छल। एकर निर्माण पंडित देवदत्त शर्मा छात्र-छात्रा सभक लेल कएने छलाह जाहिसँ छात्र सभ भगवानक सजीव रूपकेँ महसूस करथि। हालाँकि आब ई मन्दिर भक्त सभक लेल आराधनाक प्रमुख केन्द्र बनि गेल अछि। ई मन्दिरक बाहरी भाग एखनो अर्द्धनिर्मित अछि आऽ स्थानीय जनताक अपेक्षाक शिकार अछि तथापि छठिक अवसरपर पैघ भीड़ एहि ठाम लगैत अछि आऽ चारि दिवसीय एहि अनुष्ठानक अन्तिम दिन “पारण” केँ भगवान सूर्यक प्रतिमापर अर्घ्य चढ़ैबाक लेल होड़ लागल रहैत अछि। बड़ीजानक सूर्य मन्दिर- किशनगंज जिलाक अररिया-बहादुरगंज रोडसँ दक्षिण बड़ीजानमे भगवान सूर्यक भव्य पुरान मन्दिर अछि। एहि मन्दिरक गर्भ गृहमे उत्तर पालकालीन छओ फीटक सूर्यदेवक प्रतिमा स्थापित अछि। बड़गावक सूर्य मन्दिर- नालन्दा जिलाक प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालयक खंडहरसँ गोटेक दू किलोमीटर उत्तर-पश्चिममे स्थित बड़गाव नामक स्थानपर भगवान सूर्यक प्राचीन आऽ भव्य मन्दिर अछि। मन्दिरसँ सटल सूर्य तालाब सेहो अछि। मान्यता अछि जे एहि तालाबमे स्नान कएलासँ कुष्ट रोगक निवारण होइत अछि। बेशी संख्यामे लोक एहि ठाम छठि करैत छथि। देव कुण्डक सूर्य मन्दिर- औरंगाबाद जिलाक पंचरुखिया मोड़सँ पाँच किलोमीटर उत्तर हंसपुरा नामक गामसँ तीन किलोमीटर पूरबमे स्थित अछि देवकुण्डक सूर्य मन्दिर। एहि मन्दिरक दरबाजा पूर्व दिस अछि। चैत आऽ कातिक दुनू मासक छठिमे एहि ठाम भव्य मेला लगैत अछि। पंडारक सूर्य मन्दिर- पटना जिलाक बाढ़ अनुमंडलसँ गोटेक दस किलोमीटर दूर पंडारक गामक पश्चिम भागमे गंगा नदीक कातमे सूर्य देवक मन्दिर स्थित अछि। एहि मन्दिरक निर्माण द्वापर युगमे श्री कृष्णक अष्ट महिषिमे सँ एक सभसँ सुन्दरी जावन्तीक पुत्र साम्बा करौने छलाह। मन्दिरक गर्भगृहमे कारी पाथरपर पुरान शैलीमे सूर्य देवक सम्मोहक आऽ दुर्लभ प्रतिमा अछि। देशक बारह टा प्रमुख सूर्य मन्दिरमे सँ ईहो एकटा सूर्य मन्दिर अछि। नूतन झा; गाम : बेल्हवार, मधुबनी, बिहार; जन्म तिथि : ५ दिसम्बर १९७६; शिक्षा - बी एस सी, कल्याण कॉलेज, भिलाई; एम एस सी, कॉर्पोरेटिव कॉलेज, जमशेदपुर; फैशन डिजाइनिंग, एन.आइ.एफ.डी., जमशेदपुर।“मैथिली भाषा आ' मैथिल संस्कृतिक प्रति आस्था आ' आदर हम्मर मोनमे बच्चेसॅं बसल अछि। इंटरनेट पर तिरहुताक्षर लिपिक उपयोग देखि हम मैथिल संस्कृतिक उज्ज्वल भविष्यक हेतु अति आशान्वित छी।” मिथिलांचलक भ्रातृद्वितीया भ्रातृद्वितीया हिन्दु समाज मे प्रचलित पाबनि अछि । मिथिलांचल मे सेहो अकर विशिष्ट महत्व अछि । कार्तिक मास मे शुक्ल पक्ष के द्वितीया तिथि क ई पाबनि मनाओल जाइत अछि । ई दिन भाय - बहिनक अटूट प्रेम के समर्पित होइत अछि । अहि पाबनि सऽ जुड़ल एक पौराणिक कथा अछि जाहि अनुसारे जमुना अप्पन भाय यम के अहि दिन नोतने रहैथ । बहिन सब अप्पन भाय के पूजा करैत छथि । बहिन अपन घरक ऑंगन नीप कऽपीठार सऽ षष्ठदलक अड़िपन बनाबैत छैथ । भाय के आसन अथवा पीढ़ी पर बैसाबैत छैथ । अड़िपन पर एक गोट बाटी राखै छैथ ।लोटा मे अछिंजल लैत छैथ । पूजा के लेल छह गोट कुम्हरक फूल, पिठार, सिन्दूर, छह गोट डॉंट सहित पानक पात, छह गोट सुपाड़ी, दुनु प्रकारक इलायची आर हरीर आवश्यक होइत अछि । कुम्हरक फूल नहिं भेटला पर गेंदाक फूल सऽ काज लेल जाईत अछि । बहिन अपन भाय के आसन पर बैसाकऽ पिठार आ सिन्दूर सऽ तिलक करैत छैथ । तकर बाद भाय दुनु कर पसारिकऽ बाटिक ऊपरि राखैत छैथ आ' बहिन भाय के हाथ मे पिठार सिन्दूर सहित पूजाक सब सामग्री राखैत छथि । पुन जलसॅं भायके हाथ धो दैत छैथ । जलसऽ हाथ धोईत काल बहिन निम्नलिखित फकरा गाबैत छथि ''यमुना नोतली यम के़ हम नोतै छी भाय के, जते दिन यमुनाक धार रहै तते दिन भाय के अरूदा रहै" तकर बाद बहिन अपन भाय के वैभवानुसार उपहार दैत छथि । मान्यता अछि जे ई पूजा करै वाली स्त्री वैधव्य एवम् अन्य क्लेश सऽ दूर रहैत छथि ।बचपन मे जतऽ ई पाबनि बहिन सभ लेल उपहारक लालसा आ' भाई सभ लेल पूजा कराबऽ के खुशी दैत अछि ओतई पैघ भेलापर ई पाबनि भाय बहिन के भेंट करबाक अवसर बनि जाईत अछि । ३.पद्य ३.१.१.रामलोचन ठाकुर २.निमिष झा ३. जितमोहन झा ३.२. १.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (छठम खेप)२. श्यामल सुमन ३.३. १.राजेन्द्र विमल २.रेवतीरमण लाल ३.दिगम्बर झा "दिनमणि"४.बुद्ध-चरित ३.४. १.रूपा धीरू २.ज्योति ३.५. १.विद्यानन्द झा २.नवीननाथ झा ३.विनीत उत्पल ३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३. विभूति ३.७. १. रामभरोस कापड़ि २. रोशन जनकपुरी ३.पंकज पराशर ३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी १.रामलोचन ठाकुर २.निमिष झा ३. जितमोहन झा श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। पास करबाक लेल उत्तर पुस्तिका आपस रखिते पुछि बैसैत छथि मैम अर्धवसना बाब्ऽकेशी वय विलम्वित नवल वेशी सोनाक वर्ग शिक्षिका- देखलहुँ, बड़ कमजोर अछि नेना अहाँक कने नीक जकाँ करिऔक गाइड... - कमजोर त ई नहि अछि मैम आ जहाँधरि छैक बात करबाक गाइड से स्कूल त ताही लेल पठाओल जाइत अछि अंग्रेजीक एक पत्र मे पचासी आ दोसर मे किएक अबैत छैक पचीस सोचबाक बात इहो की नहि थिक? विहुँसैत बजैत छथि मैम पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृतिक सेविका वैश्वीकरण मेनका- खाता त देखबे कएल लिखने अछि मात्र दूटा पेज -तें ने कहल हम कमजोर ओ नहि अछि पढ़बैत छिऐक स्वयं हम लिखबे नहि कएलक से बात भेल अन्य परंच एहिठाम नम्बर नहि देल गेलैक से भेल नहि बोधगम्य... ओहिना बिहुँसैत पुछैत छियनि हम देखबैत पुस्तिकाक पंक्ति विशेष आश्चर्य चकित सन भेल कहै छथि मैम- गलती लिखने अछि संयुक्त परिवार सुखी परिवार! - त एहि मे गलती की छैक? रिक्तस्थान मे ओ लिखि देलक संयुक्त मैम, संयुक्त परिवार आ बसुधैव कुटुम्वकम् केर संस्कारमे पालित हमर पौत्र केना लिखि पाओत छोट परिवार नीक... - मुदा - पोथी मे सएह छैक इएह ने कहब अहाँ आ पास करबाक लेल उएह सिखए पड़तैक आर की-की सिखए पड़तैक एकरा जिनगी मे करबाक लेल पास? मैम चुपचाप निहारैत रहि जाइत छथि हमर मुह निर्निमेष विदा लैत छी हम कहैत- वेश!! (२६.१०.२००८) हर्जे की चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की। आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥ आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी। आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥ शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ। शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥ देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स। संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥ सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ। राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥ रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ। जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥ गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण। मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥ नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा। देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥ (२६.१०.२००८) किछु क्षणिका (हाइकू) १.भोजक पान सासुरक सम्मान पुनिमाक चान २.हाथीक कान नटुआक बतान एक समान ३.दूरक चास गामक कात बास कोन विश्वास ४.बाँझीक फूल महकारीक फल के कहै भल ५.दादुर-गान डोकाक अभियान वेथे गुमान ६.हिजरा-नाच ओकिल केर साँच की ६ की पाँच (२६.१०.२००८) २. निमिष झा हाइकू चाँदनी राति नीमक गाछ तर जरैछ आगि। गरम साँस छिला गेलैक ठोर प्रथम स्पर्श। परिचित छी जीवनक अन्तसँ मुदा जीयब। बहैछ पछबरिया जरै उम्मिदक दीया उदास मोन। पीयाक पत्र किलकिञ्चत् भेल उद्दीप्त मोन श्रम ठाढ़ छै श्रमिक पड़ल छै मसिनि युग। मृत्युक नोत जीबाक लेल सिखु देब बधाइ। ३. जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। दिलक कलमसँ पॉँच गोट शेरो शायरी (भाग-१) चाँदक लेल सितारा हजार छैन ! मुदा सितारा के लेल चाँद एक !! ओहिना अपनेक लेल हेता हजारो ! मुदा हमरा लेल अहि सिर्फ एक !! हाथक लकीर पर एतवार क लेब ! भरोसा हुवेंतँ हर हदकेँ पार क लेब !! हरेब आर पेब सभ नशीवक खेल अछि ! दिल जिनका अपनाबे हुनकेसँ प्यार क लेब !! दिलजे डूबलतs आशाके गाम आँखमs मचैल गेल ! एक चिराग की बुझल सौ चिराग जैल गेल !! हमर आर हुनकर राह बस एतबे देर एक छल ! दुई कदम चललों की राहे बदैल गेल !! नोरसँ पलक भींगे लैत छलो ! याद हुनकर आबैत अछितँ कैन लैत छलो !! सोच्लों की बिसैर जै हुनका ! मुदा हर बेर ई फैसला बदैल लैत छलो !! अपन आगाजसँ आजू तलक जिंदगी, अहिकें याद मs गुम छल ! तयों पता नै किये ई एहसास अछि, जेना की चाहत हमर कम छल !! Top of Form १. गगेश गुंजन २. श्यामल सुमन . श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि। श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक पढबाक लेल बुधिबधिया, गुंजनजीक नाटक आइ भोर पढ़बाक लेल आइ भोर आऽ गुंजनजीक दोसर उपन्यास पढ़बाक लेल पहिल लोक क्लिक करू। ( हुनकर पहिल उपन्यास "माहुर बोन"क मूल पाण्डुलिपि मिथिला मिहिर कार्यालयसँ लुप्त भए गेल, से अप्रकाशित अछि। गुंजनजी सँ अनुरोध केने छियन्हि जे जतबे मोन छन्हि, ततबे पाठकक लेल पठाबथि, देखू कहिया धरि ई संभव होइत अछि।) गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। राधा (छठम खेप) प्राणाधार, से ई सात इनार गहींर सं सबोधि रहलौंहें, बचाब' लोक लज्जा ! केहन ई मनक पराभव ल' सकी ने नाम अहांक पुकारि, भ' स्वच्छन्द लोकक सोझां मे निर्धोख आ साधिकार, सिनेहोक धरु केहन जरल कपार केहन भेल हमरो अदृष्ट अपरम्पार । मन कोना बौआइत रहैत अछि खुजल बाछी जकां एकसर बने-वन, तकैत माय, यमुनाक काते कात, हुकड़ैत व्याकुल भेल, वन-झांखुर सं चंछबैत देह तकैत मायक नेह , दुखबैत कांच-कोमल सीप सन-सन खूर अपन, आ मनुक्खक नेनेक ठोढ़ सन सुन्नर-सरस चुम्बन ल' लै योग्य कंपैत अपन शिशु-थुथून ई सोचि मन लाजो करैये जे केहन सन ई कामना हमरो बताहि, अहां तं अहां भेलौं, हमर कोनो की माय अहा? आ कि संतान हम आहांक, ने हम बाछी ने अहां गाय, कोना आयल-ए, भाव एहन हृदय मे, कत' सं जानि नहि, किछु ने ज्ञात, मुदा ई बात केहन दिव्य-विचित्र, एखनहि भ' रहल अनुभूतिक आनन्द जे हम स्वयं छी गौ अहां हमरा पर ओंगठल ठाढ़ भ' अपन परिचित विशेष भंगिमा मे एक दिसि केने गर्दनि टेढ़ दोसर दिसि दुनू हाथें ध' क' मुनने आंखि, लागल ठोर सं तन्मय भनें बंसुली रहल टेरि, हमर से देह गायकेर आ अहांक आत्मीय पीठक, इहो की संयोग केहन विचार, ईह मुदा हमहूं छी कतेक बकलेल केहन बताहि की सब भाव आबय आबि क' अन्हर उठाबय, हमर एहि असकर मनक पसरल ब्रजक भरि आंगन पड़ल सभ किछु जेना हो दुखित हो उदास जेना सुखा रहल हो कंठ कएक कए युग सं प्रतीक्षा मे प्रतीक्षा मे अशाबाटी मे, टंगल हो ताही पर गनि गनि क' देह-प्राणक एक-एक धुकधुकी आयुक सभटा उत्कंठ सीदित क्षण! सौंसे प्रकृति मे मात्र एक ई मन
इयेह टा गुम्म गीत गबैत मिलनक भरि उमेरक वियोगी अंगना मे बैसलि, कुसमय कान मे घोरैत कौआ कुचरबाक मधु बोल! आशाक केहन तुन्नुक डोरि तहि पर टंगल हमर शरीर भारी, तथापि नहि टुटैये नहि टुटैये, धन्य आसक डोरि, एहि चित्तक प्रतीक्षा आशाबाटीक ई विलक्षण खेल देल सिखाय, केहन कारी हृदय भेल, कृष्ण ?
किछु पड़ैये मन अहूं के एको मिसिया एको मिसिया स्नेह ,सम्बोधन ? अहीं कें टुटैत रहैत छल मुंह- अनन्तो नाम ल क' फुसफुसा क' कहब , गे ब्रजवासिन छौंड़ी !आदिवासिन कत' छलें नुकायलि? कोन जंगल-पहाड़ मे भ'गेल रहें अलोप भरि दिन, भ' गेलौंहें अकच्छ तोरा ताकि-ताकि... बा अचानक आबि पाछां कान मे कू-उ-उ क' देब ठोढ़ सटाय हमर जीवन कें देहक बाटे , भरि देब तेहन दुर्लभ अलौकिक झुरझुरी सर्वांग, जे बनि महातीर्थक भोरहरियाक दिव्य मंदिर गनगनाय लागय भक्त सबहक अनवरत बजाओल जाइत मंदिरक घंटी सं टनाटन हमर सम्पूर्ण अस्तित्वे निनादित क', पल खसिते ने जानि सत्ते कत' भ' जाइत रही अलोप... हमरा प्राण कें विकलताक एकपहिया टुटल बएलगाड़ी पर बैसा क' जेना कही-ताकू आब हमरा, ताकि लिय', हम छी कोन ठाम, कत्त ? केहेन बैसलि शान्तचित्त हमरा, अनेरे ई उपद्रव क' कोना क' दी अशान्त अछि किछु एको मिसिया यादि, एकहु रत्ती मन ? से कियेक हएत, आब ताहि सं अहांक कोन संबंध तकरा सं कोन अहां कें काज, विकल जे भेल, होइत रहओ।छटपटाइत रहओ, अहांक नाटक अपन अगिला-अगिला दृश्य सबहक करैत रहओ ओरियाओन, निरन्तर। नव-नव निर्मम रसक अनुसंधान मे लागल रही, बड़ दिव । कहां किछु लोक लेल चिन्ता कोनो मुंहछुआओनो एक बेर "कियेक छौ मन हूस छौंड़ी" ?'' छौंड़ी !'' नाम तं अछिये ने कोनो हमर राधा, केहन मायावी केहन अभिनय असंभव लोक अहां यौ, मोहि बैसब बेबस भेल अपनहि स्नेही, आप्तक अनवरत करब हरान हिनकर भ' गेलय हिस्सक, बड़े आबय मजा लोक के क' विकल अस्थिर कोनहुं प्रकारें क' दी किछु बेचैन आ अपने पार । नाटक अहुंक धरि अछि कृष्ण अपरम्पार, हे सरकार ! कखनो उठितो अछि मनक महासागरमे अपनेक, हमर नामक कोनो टा पोठीयोक तरंग ? कत' सं किछु छूटि जाइत छैक जीवन कोन क्षण मनक महल ढनमना ढहि जाइछ आ सब किछु बुझाय लागत-व्यर्थ, होयवाक अपन किछु मतलब सौंसे पृथ्वी पर भेटत ने तकने ,ने इच्छे रहत बांचल शेष जे ताकी अपन से संसार , पछिलो पहर धरि छल अपने संग मनक सजल सपना सब कें अप्पन मखमले सन आस-विश्वासें भरल आंचर सं झारैत ओकरा पर पड़ल अवहेला उपेक्षाक गर्दा सस्नेह बड़ मने बहुत भावें भरल संपूर्ण सभकें ल' चल जाए उधिया जेना अनचोखे कोनो बिहाड़ि, आंगन मे सुखाइत डोर पर कोनो आंगी जेकां नहि जानि कोन दिशा आ कोन ठाम, ने बूझल हो मुदा बिसरबो ने हो संभव ओहि आंगीक अर्थ जे नहि छल मात्र एकटा वस्त्र कुंडाबोर लाल स्नेह सिंचित कोनो छुच्छे देहक झंपना ओकर तानी भरनीक एक-एक ताग, तागक तंतु, लालीक संग आयुक छन अनन्त भरि भुवनक अनन्तो रंग-रस-भीजल आ आंगी अंगिये नहि, ल कृष्णक स्पर्श हुनके दिव्य आंगुर हाथ आ ठोढ़क कहैत किछु शब्द, बजैत बंसुरीक ध्वनि-प्रतिध्वनि, चेतनामे सतत लगबैत गुदगुद्दी ओ छल स्वर्गिक क्षणक संगक स्पर्श हुनकहि अमृत ओएह छथि हमर पहिरन , कृष्णें पहिरने रही हम, उड़ा देलक जे बिहाड़ि आंगनक डोरि सं नहि, जेना देहे सं, भेल छी उघार ,लाजें छी नुकायल, भेलि दोबरि एहि टटघर मंडैया मे, जे अछि स्वयं दस ठाम सं भूरे भूर अपने उघार हमर की देह झांपत, की करत लज्जाक रक्षा ? कहै लेल तं अपने मड़ैया ई खास मुदा सेहो भेल कोन कार्यक , मामूली विरड़ो-वसात सं पर्यन्त ने बचा सकल, केहन अजगुत ! तं कि कृष्णे छथि से हमर आंगी हरण कर्ता बिहाड़ि ? कियेक क' गेला एना उघार । भने धेलनिहें ई ढब नव, ककरो सतयवाक उपद्रव-उपाय... मुदा की भ' जाइछ एहि मन कें अनेरे ? के अपन, ककरा लेल एतेक उदास, श्रीकृष्ण ? १७/४/०५.न.दि. Bottom of Form २.श्यामल किशोर झा, लेखकीय नाम श्यामल सुमन, जन्म १०।०१।१९६० चैनपुर जिला सहरसा बिहार। स्नातक शिक्षा:अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र एवं अंग्रेजी, विद्युत अभियंत्रणमे डिपलोमा। प्रशासनिक पदाधिकारी,टाटा स्टील, जमशेदपुर। स्थानीय समाचार पत्र सहित देशक अनेक पत्रिकामे समसामयिक आलेख, कविता, गीत, गजल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित, स्थानीय टी वी चैनल एवं रेडियो स्टेशनमे गीत गजल प्रसारण, कैकटा कवि सम्मेलनमे सहभागिता ओ मंच संचालन। प्यास हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! भूख लागल अछि एखनहुँ, उमरि बीत गेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! नौकरी की भेटल, अपनापन छूटल! नेह डूबल वचन केर आश टूटल!! दोस्त यार कतऽ गेल, नव-लोक अपन भेल! गाम केर हम बुधियार, एतऽ बलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! आयल पावनि-त्योहार, गाम जाय केर विचार! घर मे चर्चा केलहुँ तऽ, भेटल फटकार!! नहि नीक कुनु रेल, रहय लोक ठेलम ठेल! कनियाँ कहली जाऊ असगर, आ बन्द करू खेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! की कहू मन के बात, छी पड़ल काते कात! लागय छाती पर आबि कियो राखि देलक लात!! घर लागय अछि जेल, मुदा करब नहि फेल! नवका रस्ता निकालत, सुमन ढ़हलेल!! हमर गाम छूटि गेल, पेट भरवाक लेल! १.राजेन्द्र विमल २.रेवतीरमण लाल ३.दिगम्बर झा दिनमणि राजेन्द्र विमल (1949- )।चामत्कारिक लेखन-प्रतिभाक स्वामी राजेन्द्र विमल नेपालक मैथिली साहित्यक एक स्तम्भ छथि। मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि। सुललित शब्द चयन एवं भाषामे प्राञ्जलता डा. विमलक लेखनक विशेषता रहलनि अछि। अपन सिद्धहस्त लेखनसँ ई कोनहु पाठकक हृदयमे स्थान बना लैत छथि। कथा आ समालोचनाक सङ्गहि मर्मभेदी गीत गजल लिखबामे प्रवीण डा. विमलक निबन्ध, अनुवाद आदि सेहो विलक्षण होइत छनि। कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। खास कऽ मानवीय संवेदनाक अभिव्यक्तिमे हिनक कलम बेजोड़ देखल जाइत अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.ब. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि। जनकपुरधामक देवी चौक स्थित हिनक घर सदति साहित्यक जिज्ञासुसभक अखाड़ाजकाँ बनल रहैत अछि। डा. राजेन्द्र विमलक गजल १. नयनमे उगै छै जे सपनाकेर कोँढ़ी फुलएबासँ पहिने सभ झरि जाइ छै कलमक सिनूरदान पएबासँ पहिने गीत काँचे कुमारेमे मरि जाइ छै चान भादवक अन्हरिये कटैत अहुरिया नुका मेघक तुराइमे हिंचुकै छल जे बिछा चानीक इजोरिया कोजगरामे आइ खेलए झिलहरि लहरिपर ओलरि जाइ छै हम किछेरेपर विमल ई बूझि गेलियै नदी उफनाएल उफनाएल कतबो रहौ एक दिन बनि बालू पाथरक बिछान पानि बाढ़िक हहाकऽ हहरि जाइ छै के जानए कखन ई बदलतै हवा सिकही पुरिवाकेर नैया डूबा जाइ छै जे धधरा छल धधकैत धोंवा जाइ छै सर्द छाउरकेर लुत्ती लहरि जाइ छै रचि-रचिकऽ रूपक करै छी सिंगार सेज चम्पा आऽ बेलीसँ सजबैत रहू मुदा सोचू कने होइ छै एहिना प्रिय सींथ रंगवासँ पहिने धोखरि जाइ छै २.. जगमग ई सृष्टि करए तखने दिवाली छी प्रेम चेतना जागि पड़ए तखने दिवाली छी जीर्ण आ पुरातनकेँ हुक्का-लोली बनाउ पलपल नव दीप जरए तखने दिवाली छी स्नेहकेर धार बहत बनत जग ज्योतिर्मय हर्षक फुलझड़ी झरए तखने दिवाली छी अनधन लछमी आबए दरिदरा बहार हो रङ्गोली रङ्ग भरए तखने दिवाली छी रामशक्ति आगूमे रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए तखने दिवाली छी डा. रेवतीरमण लाल मधुश्रावनी मधुश्रावनी आएल मन-मन हर्षए चहुँदिस साओन सुन्दर घन वर्षए काँख फुलडालि मुस्कथि कामिनी मलय पवन सुगन्धित शीतल दमकए दामिनी नभ मंडलमे घनघोर मानू जल नहि वर्षए ई विरही यक्षक नोर झिंगुर बेंङ्ग गुञ्जए जल थल अछि चहुँओर। दिगम्बर झा “दिनमणि” १ चल रौ बौआ चलै देखऽले घुसहा सब पकड़ेलैए घुसुर घुसुर जे घुस लैत छल, से सब आइ धरैलैए मालपोत, भन्सार, पुलिस कि, कर अदालत जेतौं घूसखोरक संजाल पसारल छै बाँच नै पबितौं अनुसन्धानक कारवाइमे सवहक होस हेरेंलैए विना घूसके कहियो ककरो, जे नै कानो काज करै बैमानी सैतानी करबा, मे नै कनिको लाज करै क्यो कानूनके चंगुलमे फँसने परदेस पड़ेलैए २ हम सुना रहल छी तीन धार भारी सहैत अछि भार कहथि सभ खेती सहिते अछि उजाड़। गिद्दड़ सन सुटकओने नाङरि आगू पाछ जे छल करैत। जे भोर साँझ, दश लोक माझ, हमरे दिश छल रहि-रहि बढ़ैत। हम आङुर पकड़ि जकरा पथपर अति शिघ्र चलाऽ देलौं हमरे प्रगतिक पथकेँ आगाँ, से ठाढ़ भेल बनिकऽ पहाड़॥ हम सुना ककरा कहबै के सुनत आब, पओ कतौ छैक छै कतौ घाव, हम भेलौं आब हड्डी समान, कहियो हमहीं रुचिगर कवाव। हम घास खाअकऽ पालि-पोसि, जकरा कएलौं दुधगरि लगहरि, तकरा लगमे जँ जाइत छियै, तऽ हमरे मारैए लथार॥ हम सुना, हम तोड़ि देबै झिक-झोड़ि देबै शाखा फल-फूल मचोड़ि देबै, स्वार्थक छै जे जड़िआएल बृक्ष तकरा जड़िस हक कोड़ि देबै। मनमे जे चिनगी सुनगि रहल, से कहियाधरि हम झाँपि सकब, तें ई मन जहिया लहरि जेतै, तहिया खएतै धोविया पछाड़॥ हम सुना ३ चलैमन जगदम्बाक द्वारि चलैमन जगदम्बाक द्वारि। सब दुःख हरती झोड़ी भरती, बिगड़ल देती सम्हारि॥ चलै मन... मधु कैटभक डरे पड़एला जटिया स्वयं विधाता। पूजन ध्यान बन्दना कएलनि कष्टहरु हे माता॥ बोधल हरि मारल मधु कैटभ बिधिकेँ कएल गोहारि। चलै मन.. महिषासुरक त्राससँ धरती थर-थर काँपए लागल छोड़ि अपन घर द्वारि देवता ऋषि मुनि जंगल भागल। हुनका सबहक कष्ट हरि लेलनि महिषासुरकेँ मारि। चलै मन.. हुँ कारक उच्चरित शब्दसँ धुम्र गेल सुरधाम। चण्ड-मुण्ड आ रक्तवीजकेँ मिटा देलनि माँ नाम। शुम्भ-निशुम्भ मारि धरतीसँ दैत्य कएल निकटारि॥ चलै मन... शशि कुज बुध गुरु शुक्र शनिश्रवर की दिनमणिक तारा। सर, नर मुनि, गन्धर्व अप्सरा सबहक अहीँ सहारा। हमरो नैया पार करु माँ, भबसँ दिय उबारि। चलै मन... १.रूपा धीरू २.ज्योति रूपा धीरूकेँ मैथिली साहित्यमे कम्मो लिखि कऽ सुयश प्राप्त छन्हि। गृहणीक भूमिका कुशलतासँ निभाबयबाली रूपाक साहित्य साधारण महिलाक सजीवतासँ चित्रण करैत अछि। लेखनक अतिरिक्त रूपा संगीतसँ सेहो जुड़ल छथि। नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे रहैत ई मैथिली, नेपाली, भोजपुरी आऽ हिन्दी भाषाक सयसँ बेशी गीतकेँ अपन स्वरसँ सजओने छथि। गायन क्षेत्रमे हिनका प्रतिष्ठाक संग-संग साधारण लोकक गीतकेँ गाबए वाली गायिकाक रूपमे चिन्हल जाइत छन्हि। रेडियो कार्यक्रम प्रस्तुतकर्ताक रूपमे हिनकर ख्याति सर्वाधिक छन्हि। “हैलो मिथिला” नामक रेडियो कार्यक्रमक माध्यमसँ रूपा मैथिली उद्घोषणाकेँ एकटा नव परिचय आऽ ऊँचाई देलन्हि अछि। अङ्गेजल काँट- रूपा धीरू नहि जानि बहिना किएक आइ तोँ बड़ मोन पड़ि रहल छह आ ताहूसँ बेसी तोहर ओ छहोछित्त कऽ देबवला मर्मभेदी वाण। बहिना तोँ कहने रहऽ हमरा ऐँ हइ बहिना! एहन काँट भरल गुलाबकेँ अपन आँचरमे एना जे सहेजने छह तोरा गड़ैत नहि छह? तोँ उत्तर पएबाक लेल उत्सुक छलह मुदा हम मौन भऽ गेल रही आ तोँ मोनेमोन गजिरहल छलह। हँ बहिना, ठीके हमरो तोरेजकाँ अपन जिनगीमे फूलेफूल सहेजबाक सपना रहए आ अगरएबाक लालसा रहए तोरेजकाँ अपन जिनगीपर मुदा की करबहक...! मोन पाड़ह ने छोटमे जखन अपनासभ ती-ती आ पँचगोटिया खेलाइ बेसी काल हमहीँ जीतैत रही मुदा जिनगी जीबाक खेलमे हम हारि गेल छी बहिना। काँट काँटे होइ छै बहिना गड़ै कतहु नहि मुदा हम काँटेकेँ अङेजि लेने छी मालिन जँ काँटकेँ नइ अङेजतै बहिना तँ फेर गुलाब महमहएतै कोना? 2. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति वृद्धक अभिलाषा एक वृद्ध रोपि रहल छल गाछ आमके कियो पुछलकै जे की लाभ हैत अहॉंके अपने छी जीवनक अंतिम छोर पर फरनाइ तऽ हैत अहॉंक मरलापर ओ वृद्ध जवाब देलैथ विनम्रता सऽ अपन काज सऽ बिना अडिग भऽ बाप दादाक रोपल कलम जे भोग केलहुं बस सैह ऋणके लौटाबक प्रयास केलहुं आगामी पीढ़ीके अपन हाथे खुआयब की नहिं कम सऽ कम ई गाछ फरैत रहत जा धरि अपन बाल बच्चामे मिठास घोरैत रहब भने ताबे अपने जीवैत रहब नहिं रहब १.विद्यानन्द झा २.नवीननाथ झा ३.विनीत उत्पल १.श्री विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आऽ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। ॐ ॥श्री गणेशाय नमः॥ कोशीक ताण्डव पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँदिशि करै किलोल। अन्न-वस्त्रसँ वंचित भए बसथि केम्प धनजोर॥ नेना-भूटका ओ समरथुआ क्यों नहिं रहल सरपोक। पतिएँ पत्नी, पुत्र पौत्रसँ छिन्न-भिन्न चहुँओर।। विपदा मारल देह नचारी गेल अन्न-अन्न बेहाल। जल विचि बसिकऽ प्यास मरै अछि प्राण पावि दुत्कार॥ नर ओ नर रिपु संग निभै किनको मुख नहिं मपान। विधिना स्पलैन्हि अपर विधान हुनकर नहिं परिमाण॥ कष्टक अन्त नहिं कहुखन देखलहुँ कष्टहिं वितय प्राण। भूखक ज्वाला दग्ध करै अछि- स्नेह-प्रेम-सम्मान॥ पिता पुत्रसँ झपटि खाए छथि- रोटी-नोन महान। जठरानल धधकल अछि सभतरि नहिं बुझथि संतान॥ सर्व स्वांत कएलैन्हि कोशी माता नहिं किछु बांचल जोर। पूर्व मिथिला कोशी कातक चहुँ दिशि करए किलोल॥ एहि विचि देखलहुँ अद्भुत “ देखना” “मारिचक” भरमार। मौका पावि लूटि रहल अछि सेवा भेल व्यापार॥ दुनियाँ दौड़ल बाँहि पसारिक, बैसोलक घड़जोड़ि, अन्न-वस्त्र ओ आलिङ्गन दए, कएलक भाव-विहोर॥ सचमे! दुनियाँ एखनहुँ बाँचल- सत्य भेल नहिं थोड़। श्रृष्टि विधाता रक्षा करता, नहिं होउ कमजोर- नहिं होउ कमजोर। १.केम्प- शिविर २.धनजोर- सम्पन्न, धनी ३.सरपोक- खतरा मुक्त, चिन्तामुक्त ४.नर-रिपु- सर्प इत्यादि ५.मारिच- मायावी राक्षस ६.घड़जोड़ि- एक संग २.नवीन नाथ झा (नवनीत)- जन्म २०.०१.१९४०, बी.ए.ऑनर्स सह एल.एल.बी., पिता- श्री बैद्यनाथ झा, गाम- भटोत्तर (चकला), जिला पूर्णिया १. दया करू माँ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽ केँ अपनाबू माँ। अहीँके चरण-कमलमे रमल छी माँ, दुःखी मन दोसर राह नै, सुझै अछि माँ चोट बहुत खायल छी माँ, दुनियासँ ठुकराईल माँ दया करु माँ, दया कऽ केँ अपनावू माँ॥१॥ अहाँ... माँ अपन आँचरक शीतल, सुरभित, हवासँ ताप एवम् कष्ट हरु माँ, परञ्च, मिलल नहि प्रतिदान कनेको, हर पगपर स्वार्थक लीला, चलन जगतक निराले माँ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ॥२॥ (जगत) संसार माया जालमे फँसल अछि माँ, दुनियां आतंकसँ आक्रान्त अछि माँ, अज्ञानताक-अंधकारसँ भरल अछि माँ अनुशासनक कमी खलै अछि माँ॥ अहाँक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनाबू माँ...॥३॥ अपन परायाक ज्ञान घटल अछि, अधर्मक, अकर्मक बाजार गर्म अछि एहि जगसँ अज्ञानताक-अंधकार दूर करू माँ- अहींक शरणमे आएल छी माँ, ताप रहहोँ...॥४॥ दुखी जनक दुःख दूर करू माँ सत्कर्मक भाव जन-जनमे अविलम्ब आबिकेँ अहीं भरू माँ। अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ॥५॥ विश्व कल्याणक भाव सभमे जगा दियो माँ, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् क ज्ञान सभमे भरि दियो माँ वसुधैव कुटुम्बक विचार सन्चारित कऽ दियो माँ अहींक शरणमे आएल छी माँ, दया कऽकेँ अपनावू माँ “अस्तु” ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक। १.मिथिला हमर देश मिथिला हमर देश अछि हमर रग-रग मे मिथिलाक पाइन वा हवा बसल अछि तहि सं जखन मोन परैत अछि बड़ाई करि दैत छी निंदा करहि सं पाछुओ नञि रहैत छी ई मिथिला हमर जन्मस्थान छी ई मिथिला हमर पूर्वजक पहचान छी नीक वा अदलाह ई मिथिला हमरे सं नाम छी अहां जेहन काज करब अहां जेहन संस्कार पायबि अहां जेहन संस्कार देब ओहि सं मिथिलाक जान छैक ताहि सं नहि ओहेन काज करू ताहि सं नहि ओहेन आस करू जकरा सं नहि सिर्फ मैथिल आ मिथिलाक मुदा, मिथिलावासीक मन कs ठेस लागे। २.वंशक चिराग गाम-घरक जखन हालचाल जनैत छी सुनैत छी फलां मातृक मे छैक नाना-नानी कs संग कोनो घर नहि भेटता जे अपन पाइर पर अपन बच्चाक पालन-पोषण कs सकता 'दैत छी गप लिय लपालप' फेकरा ओत-प्रोत सब घर भेटता दस मिनटक मजा कs सजा माई आ मातृक लोक भोगता जखन अहां जमाई बनि कs सासुर मे अधिकार जमबैत छी तखन अपन कर्तव्य कs किया बिसरि जाइत छी अहां देले छी बच्चाक जन्म अहांक वंशक चिराग अछि ओ अपनहि सं पालन-पोषण करहि मे संतुष्टिक लेल करहि परत मेहनत आ दिनराति एक। ३.फूइस आ सत फूइस, फूइस आ फूइस एकटा कs नुकाबै लेल हजार टा फूइस बाजय परत मुदा, सत गप मे अहिने गप किया नहि होइत अछि एहन होइत अछि एकटा सत बाजबाक संग हजार सत आगू आबैत अछि एहन लोक मे दूई टा गप होइत अछि सत या फूइस अहां कोन दिस ठाढ़ छी या होइब ई अहांक विवेक, बुद्घि वा निर्णयक क्षमता पर अछि ई गप सत अछि जे फूइसक महल भूरभूरा कs खसि जाइत सतक एकहि झोंक सं। ४.बिकाइत छैक कहियो अहि देश मे कमला बिकाइत छथि खबर छपलाक बाद बवाल मचि गेल छल राजस्थानक कमला एक महीस सं कम दाम मे बिक गेल रहथि लोक वेद एकटा स्त्रीगणक बिकबा पर हायतौबा मचौउलथि आइ सेहो स्मरण मे अछि ओ गप मुदा, एखनो मिथिलाक पुरुषक दशा देखियऊ लड़की सं ब्याह नहि करैत छथि दहेजक नाम पर बिका जाइत छथि लड़कीक बाप हाथे। ५.महागरीब एक दिनक गप अछि छोटका नुनू आ भौजी मे बताबती भs गेल भौजी कहलखिन ई धुर, अहां सभ गरीब छी नहि अछि मकान नहि भेटैत अछि भइर पैट भोजन हमर नहियर गप कछु आओर अछि छोटका नुनू कs नहि रहल गेल ओहो किया पाछु रहितथि मिथिलाक बड़बोलापन मे डुबकी लगौने कहलखिन सुनू भौजी, सब बाप अपन बेटीक ब्याह अपन सं ऊंच मे करैत छैक यदि हम गरीब छी त अहांक नहियर अछि महागरीब। १.वृषेश चन्द्र लाल २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३. विभूति १.वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। मैथिलीमे हिनक “आन्दोलन” कविता संग्रह प्रकाशित छन्हि। नजरि अहाँक चितकेर जूड़ा दैत अछि। घुराकए एक क्षण जिनगी देखा दैत अछि। धँसल डीहपर लोकाकए फेर स्वप्न महल पाङल ठाढ़िमे कनोजरि छोड़ा दैत अछि॥ बजाकए बेर-बेर सोझे घुराओल छी हम हँसाकए सदिखन हँसीमे उड़ाओल छी हम बैसाकए पाँतिमे पजियाकए लगमे अपन लतारि ईखसँ उठाकए खेहारल छी हम सङ्केत एखनो एक प्रेमक बजा लैत अछि जरए लेले राही जड़िसँ खरा दैत अछि उठाकए उपर नीच्चा खसाओल छी हम जड़ाकए ज्योति अनेरे मिझाओल छी हम लगाकए आगि सिनेहक हमर रग-रगमे बिना कसूर निसोहर बनाओल छी हम झोंक एक आशकेर फेरो नचा दैत अछि उमंगक रंगसँ पलकेँ सजा दैत अछि २. धीरेन्द्र प्रेमर्षि चहकऽ लागल चिड़िया-चुनमुन पसर खोललकै चरबाहासुन नव उत्साहक सनेस परसैत करै कोइलिया सोर उठह जनकपुर भेलै भोर दादीक सूनि परातीक तान तोड़ल निन्न सुरुज भगवान सूतलसभकेँ जगबऽ लए पुनि गूँजि उठल महजिदमे अजान कहैए घण्टी मन्दिरक मनमे उठबैत हिलोर उठह जनकपुर भेलै भोर हम्मर-तोहर इएह धुकधुक्की फैक्ट्रीक साइरन, ट्रेनक पुक्की खालि कर्मक जतऽ भरोसा दुख-सुख जिनगीक चोरानुक्की घरसँ बहरैहऽ पाछाँ जा ता मन करह इजोर उठह जनकपुर भेलै भोर अन्यायक संग लड़बालए तोँ प्रगतिक पथपर बढ़बालए तोँ मिथिलाकेर अम्बरपर बिहुँसैत चानक मुरती गढ़बालए तोँ गौरवगाथा सुमिरैत अप्पन हिम्मत करह सङोर उठह जनकपुर भेलै भोर ३. महेश मिश्र “विभूति” (१९४३- ),पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक। बाबा-स्तुति बाबा बटेश पूजित वशिष्ठ, अपनेक सदिखन दरकार औ। औढ़रदानी गङ्गाधर बाबा, जन-जनके सरकार औ॥...॥ बाबा बटेश, गङ्गातटवासी, दुःखियाके सुनू पुकार औ। जन्मल-बाढ़ल, दुःखदैन्य भेटल, मनमे गङ्गाक दरकार औ॥ औढ़रदानी दरजू झट दऽ, भक्तक करु उद्धार औ। जाकड़-जमा कतहि कछु नाहिं, चाहक अछि भरमार औ॥...॥ विमल “विभूति” दऽ के बाबा, करु विलटल उपकार औ। होयत हँसारति जगमे बाबा, विश्वम्भर सरकार औ॥ औढ़रदानी अर्थ घटे नहिं, एतवहि अछि दरकार औ। आशुतोष-औढ़रदानी भऽ, भक्तक करु उद्धार औ॥...॥ १. रामभरोस कापड़ि २. रोशन जनकपुरी ३.पंकज पराशर १.रामभरोस कापड़ि गजल करिछौंह मेघके फाटब, एखन बाँकी अछि चम्कैत बिजलैँकाके सैंतब, एखन बाँकी अछि उठैत अछि बुलबुल्ला फूटि जाइछ व्यथा बनि पानिके अड़ाबे से सागर, एखन बाँकी अछि बहैत पानिआओ किनार कतौ खोजत ने अगम अथाह सन्धान, एखन बाँकी अछि फाटत जे छाती सराबोर हएत दुनियाँ “भ्रमर” ई झिसी आ बरखा प्रलय, एखन बाँकी अछि। २.रोशन जनकपुरी डर लगैए नाचि रहल गिरगिटिया कोना, डर लगैए साँच झूठमे झिझिरकोना, डर लगैए कफन पहिरने लोक घुमए एम्हर ओमहर शहर बनल मरघटके बिछौना, डर लगैए हमरे बलपर पहुँचल अछि जे संसदमे हमरे पढ़ाबे डोढ़ा-पौना, डर लगैए आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए आँखि खोलि पढ़िसकी तऽ पढ़ियौ आजुक पोथी घेँटकट्टीसँ भरल अछि पन्ना, डर लगैए चलू मिलाबी डेग बढ़ैत आगूक डेगसँ आब ने करियौ एहन बहन्ना, डर लगैए ३.डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। पएर बेमायसँ कांट बनल जकरा लेल नहि जुड़ल कहियो केहनो सन पनही नहि किनुआं नहि दनही २. चाननक ठोप लगौने कहैत छथिन पंडितजी मुँहसँ ब्राह्मण आ पएरसँ शूद्रोत्पत्तिक कथा एकटा केर उगलल आ दोसर केर मर्दनक कथा ३. बाध-बोन, खत्ता-खुत्ती बाजार-हाटसँ गाम-गमाइत बौआइत कतय-कतय नहि जाइत अछि पएर मुदा पाहुन बनल भरि पोख नौ-छओ पबैत अछि मुँहें टा ४. पएर दुक्खीक कथा कहैत कतेक मधुराह भऽ जाइत छनि आइ-माइक बोल आ अपन मथदुक्खीक व्यथाकेँ मोनेँमे नुकौने रहि जाइत छथिन सासुक पएर जँतैत सोहाग-सुन्नरि बहुआसिन हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोरपर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत रहैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहानसँ फराक बनल अंततः बनि जाइत छथि हिसाबक किताब सरकार एक तम्मा चाउर मँगबा लेल अंगने-अंगने बौआइत बाबी लोकतंत्रक महान (!) “मतदान पर्व” दिन सेहो उपासले जाइत छथि वोट खसाबऽ लेल बुढ़ारियोमे मरौत काढ़नेँ कोन सरकार बनैत अछि बड़का नगरमे? कतयसँ अबैत अछि एतेक रास पुलिस-दारोगा? एतेक हरबा-हथियार एतेक रास घरतोड़ा मशीन? एतेक रास चसकल राकस सबहक झुंड? जे कोनटा-फरकामे हहारोह मचौने निधोख ब्यौंत लगबैत अछि घरढुक्कीक निमित्त बाबीक एकमात्र पुत्र मुइलनि हैजा-फौतीमे जमीन गेलनि कोशी बान्हमे- भेटलनि दूध महक दाढ़ी आ बाबी रहलीह सब दिन छुच्छक-छुच्छे पछिला एक माससँ प्रखण्डक सरकार सबकेँ वृद्धा पेंशनक लेल निहोरा करैत बाबी काल्हि मुखिये लग बन्हकी लगाकेँ अपन हँसुली कोनहुना कयलनि वृद्धा पेंशनक जोगाड़ आ उपासल पेटक ओरियाओन मुखिया सरकार, सरपंच सरकार, गामक सबटा नमधोतिया सरकार अओ सरकार! कथी लेल पुछैत छी कोन कलमसँ लिखैत छी आइयो ओहिना निधोख हमरा सबहक कपार? १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा- शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। धोखा (१७.०९.९१) दुनियाँ तँ ई धोखा अछि उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ऊगि रहल पनिसोखा अछि। दुनियाँ... कौआ कर्र-कर्र करकराय रहल, आँगनमे धान सुखाय रहल। पेपर रेडियो टी.वी.पर नेतहुँ तँ शोर मचाय रहल। हो जिन्दा मुर्दा गाय-महीश वृद्धा-पेंशन हो या खरात- हर ठाम कमीशन खाय रहल, हँसि-हँसि कय गाल बजाय रहल। आजुक युग के ई शोभा अछि, ई मान बराईक नोभा अछि। दुनियाँ.. दुनियाँमे अछि सब चोर-चोर, जकरा हिस्सा नईं भेंटि रहल- मचबै सगरो तऽ वैह शोर। काटय केउ सेन्ह अन्हरियामे, लूटय तऽ केउ इजोरियामे केउ ठूसय हीरा वोरियामे बन्दूक बनैत अछि गोहियामे अछि सबहक सरदार सिपाही ऊठय निश्चिन्त ओढ़ढ़ियामे ईमान जतय घर टाटक अछि ई महल अटारी पापक अछि दुनियाँ तँ ई धोखा अछि पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण ऊगि रहल पनिसोखा। (१६.०९.९१) लिखलौं कतेक पत्र कर जोरि जोरि कऽ बूझब ओ छल नोरक जगहकेँ छोड़ि-छोड़ि कऽ लिखलौं... झहरै तऽ बूँद सावनमे, खुब झूमि-झूमि कऽ बरसै तऽ नोर नित, कपोल चूमि-चूमि कऽ लिखलौं... मुरझाय बन तराग बाग तऽ ओ गृष्ममे, पावस उमंग घोरि रहल, आईपवनमे, लिखईत छी पाँति हम, ई कलम बोरि-बोरि कऽ। लिखलौं कतेक... भेटत नम बूँद फेर, जखन हिम जे पिघलि जैत, आओत कोना ओ बाढ़ि औ! सरिता सेहो सुखैत ई लिखि रहल छी आई, आँखि फोड़ि-फोड़ि कऽ। लिखलौं कतेक... तोरि-गेरि-तोरि कऽ मुहब्बतमे तऽ तरपब भाग्यमे लिखला प्रभुसबके रही जौं दूर प्रियतमसँ सजाये मौत त ओ थिक। रही...२ यक्षक विरह छल वर्षकेँ जनलक जगत सगरो- जहाँ वर्षो विरह के बात छै- वनवास त ओ थिक। जहाँ...२ ई उपवन ओ शिखा पर्वत आ कल-कल बहि रहल सरिता अगर अली अछि नज उपवनमे त सुन्दरता कतय ओ थिक। मुहब्बत... चितवन हो यदि चंचल आ तन यौवनसँ हो भारी मगर पावसमे पहु परदेश हो यौवन कहाँ ओ थिक। मुहब्बत... परदेश रुन-झुन बाजय पायल हमर फूजल बान्हल केश औ मोर पाहुन धेलहुँ योगिन वेश। डाढ़ि-डाढ़िपर फुद-फुद्दी सभ फुदकि रहल, खढ़-खढ़केँ समटि बनौने केहन महल करै परिश्रम मिल कय दुनू नईं छन्हि कोनो क्लेश।औ.. बिजुलीसँ चमकै घर, मुदा अन्हरिया यौ। टिम-टिम दीप करै छै ओतय अन्हरिया औ दिन गनैत छी बीति रहल अछि राति कहाँ अछि शेष औ... सीता शक्ति राम सौम्य जग-प्राण बनल। पौलनि जगमे नाम घूमि जंगल-जंगल॥ महल त्यागि वनवाश गेलन्हि बना तपस्विन वेश! औ मोर... जतबय दुःख हम कहब अहाँ ततबै बुझबै नहिं पहुँचत जौं पत्र अहाँ नहिंये जनबै जड़तै तेल कोना नईं घरमे पहु जकर परदेश। औ मोर... (२०.१०.९१) रहि-रहि आँचर उड़ि जाय किया अहाँ आँचर समटि लजई किया। रहि-रहि.. देखि बागमे सुमन व्यवहार करू, उठा निज नयनकेँ चारि करू, अली हर कलीसँ फुस-फुसाय किया। रहि रहि.. चमन छी अहाँ खिलि रहल अय सुमन। लटसँ लिपटि घूमि चूमन पवन पड़य जतय नजरि लिपटि जाय किया! रहि रहि... भार सहय कोना करि केहरि अहाँक राग माधुरी सुनाबय पायल के झनक देखि अहाँ के हिरदय जुराय किया। रहि रहि आँचर.. परदेश गेलहुँ हमरो छोड़लहुँ, छोड़लहुँ माय के छोड़ि देलहुँ घरद्वार परदेश गेलहुँ… सोनू-मोनू झगड़ा कय-कय हमरो माथ भुकाय रहल बहिकिरनी तऽ नईं अछि घरमे, कहू करत के हमर टहल? बौआ सब बौआय रहल अछि, पढ़तै कथी कपार! परदेश गेलहुँ.. जन-वन किल्लौल करै छै, कोना जेबै हम दरबज्जा बौआ दौड़ल छल सड़कपर, गेलहुँ रोटी भेल भुज्जा माय छथि बूढ़, छी एसगर घरमे कोना उठत ई भार! परदेश गेलउँ। हमरो... अहाँ जनै छी लोक केहन अछि, के कऽ देतै हाट-बजार, साल-साल त बाढ़ि अबै छै,उजरै छै सबके संसार, हेतै समुद्र आँगन-घर सगरो,के कउ देतै पार! परदेश गेलउँ। हमरो छोड़लौ... २.हिमांशु चौधरी विष-वृक्ष धरतीमे आबि आकाश दिश ताकऽ बला स्थितिसँ काँपि रहल छी हसोन्मुख प्राप्तिकँ लऽ कऽ दुःखक अन्तिम परीक्षा भऽ रहल अछि देवता रहितौ देवता मरि गेलाक कारणें आस्था मन्दिरमे सूतल अछि सुषुप्त आस्थाकेँ जगओनाइ कठिन भऽ रहल अछि दिनानुदिन आ उपचारहीन युगक अवैध घाओक पीजमे पिछड़ि कऽ हरेक अंगकेँ क्यान्सर कहि नियतिमे दिन बिताबऽ पड़ि रहल अछि घाओक टनकनाइसँ बेसी घाओक परिकल्पनासँ अवरुद्ध अछि- कण्ठ आ छाती आड़ि-आड़िमे शरीरक अंग भेटऽ लागल अछि हर जोतबाक सहास नहि भऽ रहल अछि मानचित्रसँ हिमालक छाह भागल जा रहल अछि पहाड़ आ मधेशमे अन्हार बढ़ल जा रहल अछि पीयर गजुरक नीचाँ हवाक वेगसँ बुर्जाक घण्टीमे सेहो घृणा चिचिया रहल अछि उड़ैत परबाक पाँखिमे सेहो बारुद बान्हल अछि फरिच्छेमे मृत्युदण्डक क्रम बढ़ैत गेलासँ मृत्युक खातामे मूल्यवान छाती छाउर भेल जा रहल अछि भोर आ राति गर्भाधान कएनाइ छोड़ने जा रहल अछि छीः छीः एहनेमे विष वृक्ष रोपनाइ नहि बन्द भऽ रहले अछि। कला आ संगीत शिक्षा चित्रकार : ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। छठि पूजापर विशेष बालानां कृते १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा । मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक लेल किछु गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे जाहिसँ बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा बाल-बुदरुकक लेल कविता चित्र: प्रीति ठाकुर चिड़ै/जानवर सुग्गा, मेना, कौआ, बगरा, चिड़ै-चुनमुन के नाम छै । गैया, बरद, बिलाड़ि, कुतबा सभके दादी पोसै छै कौवा चार पर बैसलौ कार कौआ, कारी खटखट देह कौआ । कॉव-कॉव कुचरौ कौआ , रोटी ल’ क’ उड़तौ बौआ ॥ सुग्गा हरियर सुग्गा पिजड़ामे राम राम रटै छै । कुतरि-कुतरि क’ ठोर स’ मिरचाई लोंगिया खाई छै ॥ मेघ कारी-कारी मेघ लगै छै, झर-झर झिस्सी झहरै छै । लक-लक लौका लौकै छै, झमझम-झमझम बरसै छै । फह-फह फूँही पड़ै छै, टपटप-टपटप टपकै छै । दीयाबाती सुक-सुकराती दीयाबाती, दादी सूप पिटतै । छुड़छुड़ी, अनार, मिरचैया, खूब फटक्का फोड़बै । जगमग जगमग दीप जराक’ हुक्का लोली भँजबै । नानी माँ के माँ हमरे नानी, मामा के माँ हमरे नानी । मौसी के माँ हमरे नानी, खिस्सा सुनाबै हमरा नानी । २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर बड़ सख सार पाओल तुअ तीरे चित्र ज्योति झा चौधरी मिथिलाक राजाक दरबारमे रहथि बोधि कायस्थ। राजा दरमाहा देथिन्ह ताहिसँ गुजर बसर होइत छलन्हि बोधि कायस्थक। दोसाराक प्रति हिंसा, दोसरक स्त्री वा धनक लालसा एहि सभसँ भरि जन्म दूर रहलाह बोधि कायस्थ। आजीविकासँ अतिरिक्त जे राशि भेटन्हि से दान-पुण्यमे खरचा भऽ जाइत छलन्हि। भोलाबाबाक भक्त छलाह। जेना सभकेँ बुढ़ापा अबैत छैक तहिना बोधि कायस्थक मृत्यु सेहो हुनकर निकट अएलन्हि आऽ ओऽ घर-द्वार छोड़ि गंगा-लाभ करबाक लेल घरसँ निकलि गेलाह। जखन गंगा धार अदहा कोसपर छलीह तखन परीक्षाक लेल बोधि कायस्थ गंगाकेँ सम्बोधित कए अपनाकेँ पवित्र करबाक अनुरोध कएलन्हि। गंगा माय तट तोड़ि आबि बोधि कायस्थकेँ अपनामे समाहित कएलन्हि। बोधि कायस्थकेँ सोझे स्वर्ग भेटलन्हि। बोधि कायस्थ विद्यापतिसँ पूर्व भेल छलाह कारण ई घटना विद्यापति रचित संस्कृत ग्रंथ पुरुष-परीक्षामे वर्णित अछि। फेर विद्यापति अपन मैथिली पद बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे लिखलन्हि- आऽ बोधि-कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ कएलन्हि। ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : बाल-दिवस १४ नवम्बर कऽ बाल दिवस समारोह छल। अहि दिन गामक विद्यालयमे विशेष आयोजन कैल गेल छल।सब अध्यापक अध्यापिका सब मिलिकऽ बच्चा सबलेल सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कऽ रहल छलैथ। देवीजी बच्चा सबके ईश्वरक रूप मानैत बहुत सुन्दर गीत सुनौली। ओ कहलथि जे बच्चा सब देशक भविष्य होइत छथि । तैं हुन्का सबके अपन जिम्मेवारीक अनुभव रहैके चाही। बेकार मे समय नष्ट केनाई छोड़ि ध्यान सऽ पढ़ाई कऽ अपन विद्यालय व अपन अभिभावक के गर्वित करैके चाही। जे विद्यार्थी पढ़ाईके समयमे मज़ा करैमे व्यस्त रहैत छैथ तिनका भविष्यमे कानऽ पड़ै छैन आऽ जे विद्यार्थी जीवनमे मिहनत करै छैथ से भविष्यमे सुख करै छैथ। तकर बाद प्रधानाध्यापक अहि बातक उल्लेख केला जे गॉंधीवादी विचार सऽ उत्प्रेरित महान स्वतंत्रता सेनानी एवम् स्वतंत्र भारतके प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के बच्चा सबसऽ बहुत प्रेम छलैन। तैं हुनक जन्मदिवस के भारतमे प्रतिवर्ष बाल दिवसके रूपमे मनाओल जाइत छै। नेहरूजी के स्नेहसऽ चाचा नेहरू कहल जाइत छलैन। हुनक जन्म १४ नवम्बर १८८९ के दिन आ मृत्यु २७ मई १९६४ के दिन भेल रहैन । ओ सबसऽ लम्बा अवधि तक भारतक प्रधानमंत्रीक पद पर रहलैथ। हलांकि यूनाइटेड नेशन्स २० नवम्बर के युनिवर्सल चिल्ड्रेन्स डे के रूपमे घोषित केने अछि लेकिन बहुत देश अलग तिथि कऽ ई मनाबैत छैथ। जेनाकि चीन आऽ हांगकांगमे ४ अप्रिल कऽ मेक्सिकोमे ३० अप्रिल कऽ जापानमे ५ मई क तथा मलेशियामे 1 अक्टूबर कऽ बाल दिवस मनायल जाएत अछि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली
१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।
१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन
१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।
२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।
३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।
४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।
५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।
६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।
७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।
८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।
९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।
१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।
कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा
आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य/अग्राह्य
1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Maithili story "Sinurhar" by Shri Shivshankar Srinivas translated into English by GAJENDRA THAKUR 8.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti. Sri Shivshankar Srinivas (b.02.07.1953), village-Lohana, Madhubani| Famous story writer| Published works: Trikona, adahan, gaachh paatha (story-collections). SINURHAR (putting vermillon on married women by host) It was occasion of investiture ceremony of Rambhadra Jha’s son. The family came to village from Hyderabad. Kalyani also came with them. Kalyani was only daughter of Rambhadra jha, ten year younger was the son whose investiture ceremony was occasioned. Kalyani had come, the discussion was there all over the Tola of village. That had a reason. Reason was that the Brahmin-daughter re-married after being widowed. She has come to village! And that for participating in the investiture ceremony? That has reason of amazement. Those members of Tola among whom widow-remarriage was permissible were also amazed! Different types of gossip was in vogue. Much gossip was among the women folk. Alongwith different arguments and logical deductions the major point of discussion turned towards her groom. Someone was talking-“Groom is excellent.Smiling face.” Second one asking-“To which caste you belong.” On that third one telling-“whatever be, when married with a widow itself, then whatever he be.” “what type of job you do?” “He is in Bank.” “Then it is good.” “Whatever be, Kalyani would remain happy.” In that way different types of talk and gossip was prevailing in society. Kalyani’s this type of marriage was not something that was never-happened incident but for this lineage it was certainly a new type event. That marriage was solemnized not in village but in Hyderabad. Rambhadra is working there, lives their with family. Kalyani’s first marriage was solemnized five year’s ago, wedding took place in village only. With much pomp and gaity. Good groom of a respectable family but the luck was not in favour. Only after four months the groom died in a rail accident. Died on spot. Rambhadra alongwith his family was at village itself. Upheaval like situation arose as soon as the news came. The whole family dipped into mourning. Understand that the whole village was weeping. Variegated situation was that! Rambhadra Jha did not think to leave Kalyani at village for any reason. Only three day after the incident all left for Hyderabad, were much critisised by society. After some time mother of Kalyani started creating an environment in which Kalyani should understand that her marriage itself had never took place. What happened, happened. That was like a dream. But Kalyani was finding it uneasy to remain straight. She remained trembling for quite some time. As she was living in Hyderabad town, the place has its own activity. A separate environment was their that started constantly giving freshness to Kalyani . Slowly-slowly she started getting life. Those days she was studying in B.A. , was attending college. One day her classmate Preeta introduced her to her (Preeta’s) elder brother. First Kalyani winced, but Preeta impressed her softly and slowly, gave her energy to come out, breaking the shackles of nurture. Preeta’s family was from Uttar Pradesh. Earlier they were all Brahmins but now for them there was no caste bondage. For this marriage of choice the whole family consented. The matter got forward. Kalyani’s mother took the proposal in an ecstatic way. She always wanted to re-marry Kalyani. She came forward. The environment of enthusiasm became aromatic. Kalyani got married. The news travelled to Village without delay. Many people of this village reside there. Some of the people came to village during those days. They all told this. In a flash the news spread over the village. For some time great discussion ensued and that not only in the village but in the whole area, but after some time everything started to be calmed. Some people spoke this thing-that thing but most took it in right spirit. The same discussion has re-surfaced when Rambhadra Jha’s family had came here for ceremony of investiture with sacred thread. In Hyderabad, when the date for investiture ceremony was fixed then itself the matter of inviting or not Kalyani came in front. It was amazing that the mother herself did not want that Kalyani should go to village. Internally she feared village people. In the mind was the fear that the people may outcast them at the time of investiture ceremony. In the ceremonial rituals the participation of people is necessary and then for eight-bhrahmin feast also people are required. She put her fear before Kalyani’s father, husband. Rambhadra was not in agreement with wife’s viewpoint. He gave logic- “Even when Kalyani would not accompany us even then people would outcaste us if they had decided. The more we would fear the more they would threaten.” But the heart of wife was not solaced. Rambhadra Jha kept silence then. Time came nearby. One day, in the morning, Rambhadra was reading newspaper. Inquisitive wife came and sat near him. Rambhadra knew what she would tell and she told same thing- “When you go to office today then return by Kalyani’s house. Tell her about the investiture ceremony of Bauwa and tell also to come with us. How could we leave her? She is our child. Bauwa is sibling of her’s and that also the only one. She would accompany, whatever be…”. While speaking tear came to her eyes, could not speak any further. When in the evening he returned wife asked- “what she answered? You went there or not?” Rambhadra Jha spoke in pleasant mood- “You know after hearing the news she started dancing with excitement, started making programmes of different types.” “And he!” wife asked with certain fear. “who?” Rambhadra Jha questioned. “Son-in-Law!” “Not ask that , on his face I felt a distinct type of contentment. he is gem, really.” Rambhadra Jha while replying looked at his wife. He saw that expression of her face has changed suddenly. He felt that wife had not become happy on the news of son-in-law also going. She wants to take along only her daughter, but he did not say anything. That only when Rambhadra Jha and all came to village, people saw that Kalyani and her husband both had come. They saw it, then why they would remain silent? Gossiping started. Different types of talking was in air but all was within. Rambhadra did not get any non-cooperation from anybody. Not say about the feast and feast servers. All work started with the help of the people. Despite getting social harmony Kalyani’s mother felt that whenever a man or women comes his or her eyes look for Kalyani. Look towards Kalyani’s husband. Feeling this she feared people from her inner, felted restlessness. Had it been in her capacity, had she known some magic-spell she would have turned both of them invisible so that they would see all without being seen by anybody. But that was not possible for her. Powerless, she would start imbalancing. She would start thinking many type of things and would fear. For Kalyani all this was nothing. She was completely normal. Her husband was enjoying by being care-free. People were coming, mostly the daughters and ladies and joke and comic topics took rounds. Kalyani would become hilarious. The hight-pitch laughing would make mother startled. Like hunter being hit at her head. Thinked in mind- “Somebody would feel uneasy at her laugh and would start putting hurdles. She should remain calm and disciplined but it would not be. When she would go to Hyderabad should live in whatever way she likes.” After sometime her mind started becoming abashed. And one day could not control and told, “ You would not remain disciplined. You are swallowing poison and sleeping in east-wind. This is village, that you understand. People may object to all this any time, think of that.” Hearing mother’s talk Kalyani became surprised. Seeing and thinking of her new face she became exhausted. The enthusiasm like rice-soup started cooling down. Suddenly she became lazy, and likewise time started being passed. The work relating to investiture ceremony of sacred thread began. The preparation ensued. The sacred Marba (rostrum) was erected. The ceremony of bringing clay for auspicious rite was performed. The rostrum was repaired, smeared and polished with dung. Then rostrum was written and painted. The day was the day before the sacred investiture ceremony. On that day was to be held the sacred bathing ceremony. The drum was being drummed and pipe was being blown. The preparation for worship and invocation of family deity was underway. The ladies old and young were singing good-omen songs. The fragrance of festivity had spread all over. The whole environment became musical. Here now the rite of Sinurhar (putting vermillon on married women by host) was to be performed. The preparation was underway for putting oil and vermillon by host to the women who took part in the ceremony. The ladies would be given gift in their saree and rice cooked in milk alongwith fried chapati would be given in their hands. The married participates in this and feel the happiness about the well-being of their husband, therefore the nearest and dearest relatives are called for this ceremony. So the boy’s mother invited the nearest clans-women. Any newly-married, daughter-bride would not generally come. But why anyone should feel neglected? Minimum five married are essential, if all are called then also it would be seventeen. She invited one and all. She invited all but among them Kalyani’s name did not figure. She was not invited. The function of Sinurhar was to be held before the room of home-goddess., the boy’s mother was busy in arrangements. Kalyani was in eastern house’s southern partition. Kalyani was sitting in front of window. From there she was hearing and looking everything. The newly-weds, daughters, women were making line for Sinurhar. The joyous mood was all-over and was resulting in springs of laughter now and then, was enough for changing mood of anyone to a pleasant one. Onlooking and overhearing Kalyani now and then was trembling. She could not imagine that in Sinurhar function of his own brother’s investiture ceremony she would not be present. She stoods and stands up in front of mirror. Other day she would feel shy by looking at her own image. That look today seemed unrecognizable. She thought- “Why came here? For what enjoyment?” Her concentration moved towards her mother. At once she remembered her grand mother. By her name she remembers more of silly rituals then of her affection. Everybody, her mother and aunt including, were in dominance of her disciplinary rituals! What would got touched? On what matter she would get angry! Her grand mother thought that the unmarried and married having husband both were contaminated. She ate food cooked by men or widow only. Among men the widowed were also not debarred. She remembers that when she was child, during her arrival and departure to village from Hyderabad, when she would visit other’s home on invitation, people would indulge after indicating towards her in slow-voice talking. Although she was a little child even then she understood that they had been talking about her also. Later on she knew that they were talking about her grand mother. Among the whisper maker were all the married women whose husband were alive. Those days she was not that much mature but later on she knew that in her society people regard widow as bad-omen. So most of the time, among themselves, those married women whose husband were alive criticized widows . They regarded the look of widows as bad-omen. No men look towards other man in this way nor do the women look towards widower in this manner. Today Kalyani remembers the hawk of a story of a fowler which hunted and brought fowls for the fowler. Even later on when the fowler remained asleep then also would hunt even without getting any provocation The hawk hunted fawls. She thought that men were fowlers and the ladies were hawks. The women hunting the women. She felt uneasiness. She felt that somebody has enflamed her body. See, mother did not invite her? Who cares. From this what is going to happen? But in the investiture ceremony of her brother itself she was not invited? Not for any other reason, but simply for the sake of enjoyment, for feeling the satisfaction to have participated in the function alongwith the brides and daughters, this continued haunting her. Not only haunted but now she felt awkward. Then her eyes moved towards her husband. He too was seeing the Sinurhar episode. She felt what her husband had been feeling! At then she saw her mother was coming towards her. Her heart started beating fast. The whole body became lighter. She felt suddenly that she had transformed into a child. But mother did not come to her. She stopped at aeves, Kalyani stood and came near door, saw that her father was standing there. Kalyani stood behind an obstruction. “What are you asking”? She heard her mother asking. His father said- “I am not seeing Kalyani in the Sinurhar function.” “Oh God, You will not get intelligence ever.” The wife told in high-pitch and angrily. “That’s how?” The husband also asked in high-pitched voice. “She is my daughter. Her fate was bad that we repaired. We did not think over the Dharma and Adharma.” She told angrily to her husband- “This is a pooja of home-Goddess for those married whose husband has not died.” “But Kalyani is not in that category.” The Wife’s voice became harsh- “Not ask any false queries. Because of her I will not allow any wrong to happen to my son.” The wife left while replying. Rambhadra Jha’s senses came to a halt. The whole courtyard came to standstill. Many did not like Kalyani’s mother’s attitude but mere whispering and no protest came forward. But Kalyani became restless. Her mother thinks of her as bad-omen. Her head felt like cracking. What should she do? She should not stay here any more. She resolved internally. But that resolve did not remain as such for long. Before she would take any decision, her eye looked to her brother who was sitting on verandah. She onlooked him from there itself. She remembered the events right from his childhood to till date. The sibling bondage trembled her heart. She thought like weeping in the laps of her father. The tears came out of her eyes. But how should she weep? How should she weep on the auspicious day of his brother? She wiped her eyes with saree. She looked towards her mother. Mother was performing the rites of Sinurhar. Mother once turned towards one side for putting something and then Kalyani saw that Mother’s face also there was no peace. Kalyani saw that she moved downwards and took the vermillon. After putting oil in head of the married she would now put vermillon. Kalyani turned and came in front of mirror, saw the vermillon line at her head and this enthused energy into her. She thought- “She won’t go. She won’t go leaving the function of her brother?” Looking towards the innocent face of her brother her heart got filled with affection. She thought- her mother thinks that she is bad-omen. But her father does not thinks so. And brother? What would he think at this tender age? He is a boy. He is her sibling. She won’t go. But how she would remain as such? Thinking of this she onlooked the Sinurhar function for some time. Her mother was putting vermillon on the heads of the lucky married ones. She thought that the function of Sinurhar would be performed by some married whose husband is alive! She got strengthened at this thought. From room she came to courtyard and moved towards Sinurhar. She took in hand the plate containing rice cooked in milk and fried chapati. She moved forward and gave rice cooked in milk and fried chapati in the hands of her sister-in-law who was lined up in front. The sister-in-law accepted it joyfully. Then Kalyani’s cousin sister Lalita took hold of her and put her in line. She took the vermillon plate from Kalyani’s mother and put vermillon on Kalyani’s head. The mother felt awkward. The people also. But the glaring face of Kalyani standing in the row filled her with emotion. See everybody liked it. Kalyani’s mother surprisingly looked backwards and saw her husband smiling with closed lip looking at his daughter. Kalyani onlooked and saw that her husband ‘s face is full with affection. He was seeing at her joyfully. Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti They said that the boy they quarrelled with was approached for the marriage of Buchia by an old man of our village and they denied that. That was the reason behind the created reason of quarrel for the quarrel. I said that if that marriage were successful then he would be son-in-law of this village and would be respected by us but everyone said that I am diverting the fact. Again my friends attempted to create quarrel with people of other villages while watching the drama. He was teasing those people in that function. He was speaking ruthlessly about them. And if other side was responding anything then he used to threaten them that he would call Naren bhaiya. Then the other side replied that they were not scared of Naren bhaiya. That was not the end of his naughtiness. He started crying loudly unnecessarily. He complained to Naren bhaiya that other people had hit him and said that they didn’t bother about Naren bhaiya. Naren bhaiya came and asked him to point out who was that discourteous person. As soon as my friend pointed that person with torch Naren bhaiya told “ Oh! Bhayar you! I cannot believe this. If he had said this about anyone else then I could have believed but how can I trust this rubbish about you?” Then he asked me whether that boy’s complain was correct or not. I denied. As soon as I confirmed his falsehood his all tears vanished all of a sudden. My friend had to listen to Naren bhaiya’s scold very generously and at the time of leaving Naren bhaiya announced that he was his friend so no one should tell him anything and whispered to me that he was saved today. ENGLISH SAMSKRIT MAITHILI In which college do you study. कस्मिन् महाविद्यालये पठति भवती? कोन कॉलेजमे अहाँ पढ़ैत छी? I study in the Vishweshwaraiya Engineering College. अहं विश्वेश्वरैय्य-अभियान्त्रिक-महाविद्यालये पठामि। हम विश्वेश्वरैय्या अभियान्त्रिक महाविद्यालयमे पढ़ैत छी। Our physics teacher is very good. अस्माकं भौतिकशास्त्रस्य अध्यापकः उत्तमः अस्ति। हमरा सभक भौतिकीक शिक्षक बड्ड नीक छथि। You did not come for the first period? प्रथमकालांशं न आगतवान्? अहाँ पहिल कक्षामे नहि अएलहुँ? I got up late today. अद्य उत्थाने विलम्बः अभवत्। हम आइ देरीसँ उठलहुँ। I couldn’t get the bus. लोकयानं न प्राप्तम्। हम आइ बस नहि पकड़ि सकलहुँ। Economics lecturer has not come. अर्थशास्त्रस्य व्याख्याता न आगतवान्। अर्थशास्त्रक व्याख्याता नहि अएलाह। Today there is a debate-competition in the college. अद्य महाविद्यालये परिचर्चा-स्पर्धा अस्ति। आइ महाविद्यालयमे परिचर्चा-स्पर्धा अछि। Are you participating? भवती भागं गृह्णाति किम्? अहाँ भाग लऽ रहल छी की? No, my friend is participating. न, मम सखी भागं गृह्णाति। नहि, हमर संगी भाग लऽ रहल छथि। I should return this book today, otherwise I’ll have to pay fine. एतत् पुस्तकम् अद्य प्रत्यर्पणीयं भोः, नो चेत् दण्डः दातव्यः भवेत्। हमरा ई पोथी आइ वापस करबाक अछि नहि तँ हमरा फाइन भरय पड़त। Shall we go for a movie today? अद्य चलच्चित्रं द्रष्टुं गच्छामः किम्? हमरा सभ आइ सिनेमा देखब चली की? Tomorrow we have Biology practical exam, friend. श्वः जीवशास्त्रस्य प्रात्यक्षिक-परीक्षा अस्ति सखे। काल्हि हमर सभक जीव विज्ञानक प्रायोगिक परीक्षा अछि। Will you give me your notes? भवत्याः टिप्पणीं ददाति किम्? अहाँ अपन नोट हमरा देबकी? But Girish took them away yesterday. ह्यः एव गिरीशः स्वीकृतवान्? मुदा गिरीश ई काल्हिय्रे लऽ गेलाह। Again I left them at home today. अद्य गृहे एव त्यक्त्वा आगतवती। आइ सेहो हम हुनका सभकेँ घरपर छोड़ि अएलहुँ। I had not come to class on that day. तद्दिने अहं वर्गं न आगतवान् आसम्। हम ओहि दिन वर्ग नहि आएल छलहुँ। Please give me your pen for a minute friend. एक निमेषार्थं लेखनीं ददातु मित्र। मित्र अपन पेन एक मिनट लेल दिअ। Don’t forget to give it back. प्रतिदातुं मा विस्मरतु। वापस केनाइ नहि बिसरू। Come on, let’s play. आगच्छतु भोः क्रीडतु। आउ, हमरा सभ खेलाइ। Do we have Mr.Joshi’s class today? जोशीमहोदयस्य कक्ष्या अस्ति किम् अद्य? जोशी महोदयक वर्ग आइ अछि की? Did you complete graduation in the year 1993? पदवी त्रिनवतितमे वर्षे समापिता किम्? अहाँ १९९३मे स्नातक भऽ गेल छलहुँ? I don’t remember well. सम्यक् न स्मरामि भोः। ठीकसँ मोन नहि अछि। Did you read this novel. एतां दीर्घकथां पठितवान् किम्? ई उपन्यास पढलहुँ की? I read it long back. बहु पूर्वमेव पठितवान्। हम ई बहुत पहिनहिये पढ़ने छी। Today there won’t be any classes. अद्य कक्ष्याः न भविष्यन्ति। आइ आब आर कोनो कक्षा नहि होयत। The Principal is very strict. प्राचार्यः बहु कठोरः अस्ति भोः। प्रिन्सिपल बड़ कठोर छथि। 70% attendance is compulsory if you want to appear for the examination. परीक्षा लेखनीया चेत् ७०% उपस्थितिः अनिवार्या एव। परीक्षामे बैसबाक लेल ७०% उपस्थिति अनिवार्य अछि। We are staging a Samskrit-drama in the annual function. वार्षिकोत्सवे वयम् एकं संस्कृतनाटकं कुर्मः। हमरा सभ वार्षिकोत्सवमे एकटा संस्कृत नाटक कऽ रहल छी। Tomorrow there will be elections for the student’s council. श्वः च्छात्रसंघस्य निर्वाचनं भविष्यति। काल्हि छात्रसंघक चुनाव होएत। This year the tuition-fees have been increased. एतस्मिन् वर्षे पाठनशुल्कं वर्धितम् अस्ति। एहि साल पाठनशुल्कमे वृद्धि भेल अछि। पुरातन काले एकः महाराजः आसीत्। सः चित्रकलां बहु –विशेषतः प्राकृतिक चितं तस्य बहि इष्टम्। एकदा सह चित्रं लेखितुम् पर्वतस्य आरोहणं करोति-पर्वतस्य उपरि उपविशति, परितः सुन्दर प्राकृतिक दृश्यं तस्य संतोषः भवति- सः लेखन्-सामग्रीः स्वीकरोति-सर्वम् सम्यक् स्थापयति, चित्रलेखनस्य आरम्भं करोति- बहु सुन्दरतया चित्रम् भवति- इतोपि वर्णः यत आवश्यकः तत्र सर्वत्र वर्णम् लेपयति- महाराजस्य संतोषः भवति, परन्तु दूरतः कथम् दृश्यते चित्रम्- इति द्रष्टुम् पृष्ठतः गच्छति, महाराजः एकं पदं, पद द्वयं, त्रीणि पदानि इति पृष्ठतः-पृष्ठतः गच्छति, महाराजः चित्रमेव पश्यन् अस्ति, बहु सुन्दर दृश्यं, आनन्दः भवति, इतोपि पृष्ठतः गच्छामि- इति चिन्तयति, इतोपि पदद्वयं गच्छति, पश्यति, सुन्दरं दृश्यते, इतोपि पृष्ठतः गच्छति, परन्तु पृष्ठतः किंचित् दूरे एव एकः महान् खातः अस्ति, महान् खातः, यदि महाराजः पदद्वयं स्थापयति, महाराजः पतति, परन्तु तत्र एकः मेषपालः आगच्छति, सः पश्यति, अरे महाराजः पृष्ठतः-पृष्ठतः गच्छति, तत्र महान् खातः अस्ति, इतः परम् महाराजः पतिष्यति- अहं किमपि करोमि, इति मेषपालकः चिन्तयति, किम् करोमि, तदा तस्य प्रत्युत्पन्न मतित्वम् कार्यम् करोति। तस्य हस्ते दण्डः अस्ति। सः मेषपालकः दण्डम् गृहित्वा सम्यक् क्षिपति, चित्रस्य उपरि एवं क्षिपति, चित्रम् भग्नम् भवति, महाराजस्य कोपः आगच्छति, मया बहुसुन्दर चित्रम् लिखति, बहु प्रयत्नम् कृत्वा लिखितवान, परन्तु येषः दुष्टः मेषपालः मम सुन्दर चित्रम् नाशितवान्- तम मारयामि, इति कोपेन मेषपालम् पश्यति, मेषपालः भीत भीते समीपे आगच्छति, तस्य भयं, महाराजस्य कोपः, इदानीम् मा मारयति, इति चिन्तयति, परन्तु तस्य अंतरंगे एकं धैर्यम् अस्ति, महाराजा भवान् सुन्दर चित्रं लिखितवान्, परन्तु भवतः पृष्ठतः एव महान खातः अस्ति, परन्तु भवान् न दृष्टवान् , यदि एकम् पदम् पृष्ठतः स्थापयति भवान् महती खाते पतति, भवान् मृतः भविष्यति, तादृश्य प्रसंगे मया किं करणीयम् अहं चिन्तितवान। दण्डं स्वीकृत्य चित्रं ताडितवान्- चित्रम् नष्टं भवतु , परन्तु अस्माकं महाराजः जीवतु, यदि महाराजः जीवति, सुन्दर चित्राणि बहूणि लेखितुम् शक्नोति, यदि महाराजः न भवति, अस्माकं सर्वेषाम् महत् दुःखम् भवति। महाराजस्य जीवरक्षणम् अस्माकम् महत् कर्तव्यं, तदर्थं अहं दण्डेन चित्रं ताडितवान, यदि दोषः अस्ति, क्षामयतु भोः, मेषपालस्य वचनं श्रृत्वा महाराजस्य महान् संतोषः भवति, सः चिन्तयति, भगवान् एव एतं मेषपालं प्रेषितवान्। मम जीवरक्षणार्थं मेषपालं भगवान् एव प्रेषितवान् इति। संतोषम् अनुभवति, मेषपालं गृह्णाति, मेषपाल, भवान् सामान्यः न, अद्भुत् कार्यम् कृतवान्, मम जीवरक्षणं कृतवान्, मम महान आनन्दः जातः, भवते अहं पुरस्कारं ददामि, इति तस्य पुरस्कारं करोति, मेषपालस्य वचनं श्रृत्वा महाराजस्य महान् आनन्दः अभवत्, सः मेषपालम् अभिनन्दितवान्, स्वस्थानं नीतवान्, बालकस्य पितरम् अपि आहूतवान्, बालकं पितरञ्च सत्कृतवान्, तयोः प्रोत्साहनं दत्तवान्, बालकं विद्याभ्यासार्थं प्रेरितवान, अग्रे बालकः उत्तम् विद्वान भवति, स एव बालकः अग्रे महाराजस्य स्थाने सचिवः अपि भविष्यति। भवतां हार्दं स्वागतम्। अहं वाक्यद्वयं वदामि। भवन्तः एकं वाक्यं कुर्वन्तु। उदाहरणार्थम्- बालकः शालां गच्छति (गत्वा) पुस्तकं पठति। सः भजनं करोति (कृत्वा) भोजनं करोति। सज्जनः श्लोकं पठति (पठित्वा) आहारं स्वीकरोति। अहं फलं खादितवान् (खादित्वा) जलं पीतवान्। सा पत्रं लिखितवती प्रेषितवती। भवान् धनं ददातु पुस्तकं नयतु। वयं पठामः लिखामः। सः स्नानं करोति भोजनं करोति। सः धनं ददाति पुस्तकं स्वीकरोति। सः क्रीडति पठति। सः श्लोकं वदति (उक्तवा) उपविशति। सः चित्रम् पश्यति संतुष्टः भवति। बालकः विद्यालयं गत्वा पुस्तकं पठित्वा गृहं आगच्छति। अहं स्नानं कृत्वा पूजां कृत्वा विद्यालयं गच्छामि। इदानीं वयं मिलित्वा एकैकं वाक्यं दीर्घं वदामः। भवान् आरम्भं करोतु, रामस्य पिता दशरथः रामस्य माता कौशल्या। मम पिता कृपानन्दः, भवतः पिता कः/ माता का भवत्याः पिता कः/ माता का मम माता लक्ष्मीः द्रौपदी द्रुपदराजस्य पुत्री, का कस्य पुत्री लवस्य पिता रामः, लवस्य पितामह दशरथः। लवस्य पितामही कौशल्या/ पाण्डुराज्य पौत्र अभिमन्युः। रावणस्य अनुजा शूर्पनखा। अग्रजः/ अनुजः। बहि- किञ्चित् ह्रस्वः-दीर्घः स्थूलः-कृशः पुरातन् युतकम्/ नूतन पुस्तकम् नूतन घटी/ पुरातन घटी मम गृहे नूतनं कारयानं अस्ति। मम कारयानं नूतनं अस्ति। एषा पुरातनं लेखनी। पुरातनम्- नूतनम् चषके किंचित् जलम् अस्ति। कूप्याम् बहु जलम् अस्ति। अहं किंचित् जलं पिबामि। जलम् इच्छति वा आम् इच्छति। किंचित् भवती किंचित् जलं पिबति वा। बहु जलं पिबति वा एषा बहु क्रीडति। अद्य बहु गृहपाठः अस्ति। अहं बहु खादामि, किंचित् कार्यं करोमि। नगरे बहुजनाः सन्ति। समुद्रे/ नद्यां बहु जलम् अस्ति। मम अग्रजस्य नाम् गुरुप्रसादः। एष दण्डः ह्रस्वः/ दीर्घः अस्ति। रज्जुः ह्रस्वा/ दीर्घा अस्ति। एतस्याः वेणी ह्रस्वा/ दीर्घा अस्ति। कस्याः वेणी दीर्घा अस्ति। किम् किम् दीर्घम् अस्ति। रामायणकथा दीर्घा अस्ति। गङ्गा नदी दीर्घा अस्ति। सर्पः दीर्घः अस्ति। गजस्य शुण्डा दीर्घा अस्ति। दण्डदीपः दीर्घः अस्ति। गजः/ भवान् स्थूलः अस्ति। शारदयाः शाटिका दीर्घा अस्ति। मम अनुजा कृशा अस्ति। गणेशस्य उदरम् स्थूलम् अस्ति। भीमः कथम् अस्ति। भीमः स्थूलः अस्ति। हस्तम् उपरि करोतु। अरुणस्य हस्तः कृशः अस्ति। मम हस्तः स्थूलः अस्ति। सुभाषितम् यस्य कृत्यं न जानन्ति मंत्रं वा मंत्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति सर्वै पण्डिते उच्यते। सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। महापुरुषाः किम् कुर्वन्ति इति न वदन्ति। ते किम् कार्यं कुर्वन्ति इति न वदन्ति। तेषाम् चिन्तनदिक् का इति न ज्ञायते। तेषाम् चिन्तन् क्रमः इति न ज्ञायते। परन्तु कार्यस्य अनन्तरम् महत् फलं भवति। तद्दृष्टवा तेषां कृतं ज्ञायते। ते किम् कृतवन्तः इति फलस्य दर्शन अनन्तरं ज्ञायेत्। Top of Form रिपोर्ताजTop of Form (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ नवम्बर अक्टूबर २००८ (वर्ष १ मास ११ अंक २१) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् 1
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