VIDEHA — Issue 22 / अंक २२

Publication: VIDEHA · Issue: 22
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140 विदेह १५ नवम्बर २००८ वर्ष १ मास ११ अंक २२ 'विदेह' १ नवम्बर २००८ ( वर्ष १ मास ११ अंक २१ ) एहि अंकमे अछि:- एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव  2.अनलकांत २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र २.६. 1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति २.७. रिपोर्ताज- 1.अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ 2. नवेन्दु कुमार झा 3. नेपाल चिन्हएबाक अभियान - जितेन्द्र झा . २.८. 1.विचार-राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत,श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार2. विद्यापति-निमिष झा ३.पद्य ३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा 3. अशोक दत्त 4.निमिष झा ३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (सातम खेप) ३.३. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर ३.४. टेम्स नदीमे नौकाविहार-ज्योति ३.५. १.विद्यानन्द झा २.अजीत कु. झा ३.विनीत उत्पल ३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. पंकज पराशर ३.७. 1.धीरेन्द्र प्रेमर्षि 2. धर्मेन्द्र विह्वल 3.जितमोहन झा ३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी (आगाँ) ४. महिला-स्तंभ ५. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी ६. भाषापाक रचना लेखन (आगाँ) 7. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 7.1Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR 7.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti 8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.) विदेह (दिनांक १५ नवम्बर २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:११ अंक:२२) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक २२, दिनांक १५ नवम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता “परछाइयाँ”(कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे। बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि। भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओऽ २ वर्ष धरि रहत। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ नवम्बर २००८) ६३ देशसँ १,२०,९२३ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें कहानी-संग्रह रेल की बात : हरिमोहन झा मू. सजिल्द १२५.०० पे.बै. ७०.०० छछिया भर छाछ : महेश ·टारे मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० नाच के बाहर : गौरीनाथ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० आइस-पाइस : अशोक  भौमिक  मू. सजिल्द १८०.०० पे.बै. ९०.०० भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ९०.०० कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० बड़कू चाचा : सुनीता जैन मू. सजिल्द १९५.०० कविता-संग्रह या : शैलेय मू. १६०.०० कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव मू. १५०.०० कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा मू. २२५.०० जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा मू. ३००.०० लाल रिज्बबन का फुलबा : सुनीता जैन मू. १९०.०० लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन मू. १९५.०० फैंटेसी : सुनीता जैन मू. १९०.०० दु:खमय अराकचक : श्याम चैतन्य मू. १९०.०० उपन्यास मोनालीसा हँस रही थी : अशोक  भौमिक  मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ८०.०० इतिहास, स्त्री-विमर्श और चिंतन डिजास्टर : मीडिया एण्ड पालिटिकस : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३००.०० पे.बै. १६०.०० एंकर की नज़र से : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३५०.०० पे.बै. १७५.०० पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी मू. २२५.०० स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम मू. २००.०० अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय मू. १८०.०० शीघ्र प्रकाश्य बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक  भौमिक किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा माइक्रोस्कोप (उपन्यास) : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र (उपन्यास) : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर (उपन्यास) : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ (उपन्यास) : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन ज्या कोई है (कहानी-संग्रह) : शैलेय एक  साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेपोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि। मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव  2.अनलकांत २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र २.६. 1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति २.७. रिपोर्ताज- 1.अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ 2. नवेन्दु कुमार झा 3. नेपाल चिन्हएबाक अभियान - जितेन्द्र झा . २.८. 1.विचार-राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत,श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार2. विद्यापति-निमिष झा कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. श्री अनलकांत चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। आतंक ओ कहियो हमरा संग बी. ए. मे पढ़ैत रहय । ओकरा सँ जँ फेर भेंट नहि होइत तऽ मनो नहि पड़ितय जे ओ कहियो संग-संग पढ़ैत छल। हम ओकरा चिन्हबो नहि कयलिऐक । वैह चिन्हलक आ नाम लैत टोकने रहय — ’चिन्है छी ?’ ओकर आत्मविश्वास आ मैत्रीपूर्ण स्वरसँ कनेक चकित आ प्रसन्न होइत हम मोन पाड़य लागल रही जे ओ के अछि । एम. पी. क एलेक्शन होमय बला रहैक । हम एलेक्शन ड्यूटीमे आयल रही। ओहो एलेक्शने ड्यूटी मे होयत । ढेरी लोक एहि काजसँ आयल रहय । ओ स्नेह-भाव सँ मुस्किआइत रहय जेना बिसरि जेबाक उलहन दैत हो । ओकर मुस्कीसँ हम अपनाकेँ असहज आ हास्यास्पद अनुभव करऽ लागल रही । एहन स्थितिमे ओकरा चिन्हब आ ठेकनायब मुश्किल छल । ’नहि चीन्हि सकलहुँ।’ - हम हारि कऽ कहलिऐक। ओकरा नहि चीन्हि सकबाक हमरा ठीके अफसोस भेल रहय । ’हम हरिवंश !’ - ओ अपन परिचय देलक । ’अरे, हरिवंश ! ओह, एकदम्मे नहि चीन्हि सकलहुँ । ततेक दिन भऽ गेलै आ एहि बीच अहाँ ततेक बदलि गेलहुँ जे चिन्हब कठिन छल । हम कहियो अंदाजो नहि कऽ सकैत रही जे अहाँ सँ एतेक दिनक बाद आ सेहो एहिठाम भेंट भऽ जायत । कतऽ छी ?’ - अपन न्यूनता केँ झाँपक लेल हम एक्के साँसमे ई सभ कहि गेल रही । हरिवंश हमर मित्रक मित्र रहय। ओकर संग-साथमे कतेको समय बीतल होयत । मुदा ने हम ओकर आत्मीय बनि सकलिऐक ने वैह हमर आत्मीय बनि सकल । हमर आ हरिवंशक बीचक सम्बन्धकेँ फरिछायब कठिन अछि । ओकरा औपचारिके कहब बेसी ठीक होयत । भेंट तऽ होइत रहय, किन्तु भेंटक आवृत्तिक अनुपातमे जे घनिष्ठता हेबाक चाही से नहि भेल । सिल पर पड़त निसान बला कहबी टा चरितार्थ भेल । हम एक-दोसराकेँ चीन्हि गेलहुँ फेर कहियो नहि बिसरबाक लेल । तखन ई सभ कोना घटित भेल ? हम कोना ओकरा बिसरि गेलिऐक ? भरिसक हरिवंश सँ भीतरी लगाव नहि हेबाक कारणे एना भेल हैत वा जीवनमे आयल अनेक परिवर्त्तनक कारणे भेल होइ। लेकिन तखन ओ किएक ने बिसरल ? ओकरा बिसरब भरिसक हमरे स्मृति-दोषक परिणाम छल । हरिवंश जे कहलक ताहिसँ पता चलल जे ओ हमरे कामत वला ब्लॉकमे  बी. डी ओ. अछि आ अखन एलेक्शनमे ट्रांसपोर्टबला काज सम्हारय आयल अछि। ई जनिते हमर स्वार्थ-बुद्धि सक्रिय भऽ उठल । कामतबला ब्लॉकमे कैक सालसँ लसकल दाखिल खारिजबला काज मोन पड़ि गेल आ अखन जे ट्रांसपोर्टबला काजसँ आयल छी से हरिवंशक रहने कोनो बढ़ियाँ जीप भेटि जायत । नहि तऽ कोन ठेकान जे जीपक बदलामे ट्रेक्टरे दऽ दिअय। हमरा दिमागमे ईहो बात तुरंत आबि गेल जे आब एलेक्शनक एहि  हूलिमालि आ बालु-गरदासँ जान बचत; जल्दिए छुटकारा भेटि जायत । अपन ई सभ फायदा देखि हरिवंशक प्रति जेना अतिरिक्त स्नेह उमड़ि आयल । ओहि स्नेह-प्रवाहमे हम ओकरा कहलिऐक - ’अरे वाह ! अहाँ तऽ हमर कतेको काज कऽ सकैत छी । एकटा तऽ ई जे अहींक ब्लाक मे हमर दाखिल-खारिज वला काज कैक सालसँ अटकल अछि आ दोसर जे हमरा नीक सन जीप दिआ दिअऽ।’ ई सभ सुनि हरिवंशक चेहरा पर जे स्नेहसिक्त दोस्ताना मुस्की रहैक से लुप्त भऽ गेलैक आ तकर बदलामे एकटा कामकाजी उबाऊ भाव आबि गेलैक । ओ बाजल — ’कहियो ब्लाक आउ, भऽ जेतै ।’  आ गाड़ीवला कागज हमरा हाथसँ लैत एकटा टेबुल दिस बढ़ि गेल । हम ओकर पछोर धऽ लेने रही । हरिवंशक मुँह-कान आ देह-दशा सम्पन्न लोक जकाँ गोल-ठोल आ भरल-पूरल रहैक । ओकर फूलपैंट-कमीज साफ झकझक आ क्रीजसँ तनल रहैक । जूता चमचमाइत रहैक। ओकर पहिरावा उच्चपदस्थ पदाधिकारीक अनुरूप दर्प आ प्रभुत्व बला प्रभाव  छोड़ैत रहैक । टेबुल लग लग पहुँचि टेबुलक चारूकात घोदिआयल लोककेँ ठेलैत आ ’हटू’ कहैत हरिवंश कुरसी पर जा कऽ बैसि गेल । हम कुरसीक कातमे ठाढ़ भऽ गेल रही । ओहिठाम और कोनो कुरसी नहि रहैक जे हरिवंश हमरा बैसऽ लेल कहैत । कागजी औपचारिकता पूरा केलाक बाद ओ हमरा जरूरी कागज सभ दऽ देलक । हम ओहि स्थान दिस विदा भऽ गेलहुँ जतय जेबाक लेल ओ कहने रहय । गाड़ीक ड्राइवर कोम्हरो चल गेल छलै आ ओकर प्रतीक्षा मे हमरा आध घंटा आरो बिलमय पड़ल । ओहि आध घंटामे हरिवंश सँ एक बेर और भेंट भेल आ कनेक काल घरौआ गपशप होइत रहल । बाल-बच्चा, ओकर पढ़ाइ-लिखाइ आ आन दोस्त मित्रक सम्बन्ध मे । वोटक गिनतीक समय हरिवंश सँ देखा-देखी भेल, गप्प नहि भऽ सकल । यद्यपि ओकरा देखिते हमरा भीतर बिजली जकाँ एकटा भावावेग चमकल , मुदा परिचय आ मित्रताक सुखायल स्त्रोतक कारणे ओ भावावेग बिला गेल । हरिवंश किछु नहि बाजल । ओ मौका अनौपचारिक गपशप लेल रहबो नहि करैक । ओ अपन वरिष्ठ पदाधिकारी सभक बीच बैसल रहय । एहि सुखायल भेंटक कैक मास उपरान्त एक दिन ओ बजारमे टकरा गेल । ओ हाथमे झोरा लेने तरकारी   कीनय जाइत रहय । ओहि दिन ओ हमरा व्यस्त आ अन्यमनस्क बुझायल। जल्दी-जल्दी मूर-टमाटर बेसाहलक आ चलि गेल । हम ओकरासँ हालचाल पूछितिऐक,  लेकिन ओकर चेहरा देखि कऽ हालचाल पुछनाइ नीरस आ फालतू बुझायल। मुदा निरर्थकताक अनुभव करितो जे गप हम शुरू कयलहुँ सेहो निरानंदे छल । हम ओकरा कहलिऐक - ’एहि बीच कतेको बेर सोचलहुँ जे ब्लॉक जाइ, लेकिन सोचिए कऽ रहि गेलहुँ।’ ’आउ । कोनो सोम वा बुधकेँ आउ, जहिया कर्मचारी रहैत छैक ।’ – नितान्त व्यावहारिक आदमी जकाँ कारोबारी अंदाजमे ई कहैत ओ चल गेल । बहुतो दिन बीतल । हम सोचि कऽ रहि जाइ । लेकिन एक दिन ठानि लेलहुँ जे आइ जेबाक अछि । ब्लॉक पहुँचैत छी तऽ हरिवंशक पते नहि । ओ राँची चलि गेल रहय । दुर्भाग्य ! बादमे जहिया कहियो ब्लॉक जाय दिआ सोची तऽ हुअय जे नहि जानि हरिवंश ओतय होयत कि नहि आ एहि दुविधामे गेनाइ टरैत रहल । किन्तु एनामे काज कहियो नहि भऽ सकत, ई सोचि विदा भेलहुँ । भरि रास्ता मन भारी रहल । ब्लॉकक गेट पर जे पहिल व्यक्ति  भेटल  तकरा सँ पुछलिऐक जे हरिवंश अछि कि नहि । हरिवंश अछि ई जानि मन हल्लुक भेल । हरिवंशकेँ ताकय लगलहुँ । ब्लॉक वला मकानक आगू मैदानमे हरिवंश कुरसी-टेबुल लगौने बैसल रहय आ करीब डेढ़ सौ आदमी ओकरा घेरने रहैक । ओ वृद्ध लोककेँ भेटय वला पेंशनक सत्यापनमे लागल रहय । एहन समयमे लोककेँ ठेलि-धकिया कऽ ओकरा लग पहुँचब कठिनाह छल आ उचितो नहि बुझाइत रहय । पता नहि ओहिठाम बैसक लेल फाजिल कुरसियो हेतैक कि नहि । तेँ प्रतीक्षे करब श्रेयष्कर बुझायल । चाह पीलहुँ , पान खेलहुँ आ तकर बाद भीड़ छँटबाक बेचैन प्रतीक्षामे एम्हरसँ ओम्हर टहलैत रहलहुँ । हरिवंश अपन चेम्बरमे बैसि गेल रहय । जखन हम ओकर चेम्बर मे प्रवेश केने रही तखन एक व्यक्ति और कुरसी पर बैसल छल । हाथ मिलबऽ लेल हाथ बढ़ाबी  आ एकरा अपन हेठी बूझि जँ ओ हाथ नहि बढ़ौलक तऽ भारी अपमान होयत, ई सोचि हम एकटा हाथ उठा ओकर अभिवादन केलिऐक । जेना मोन पड़ैत अछि, जवाबमे ओ भरिसक हाथ नहि उठौने रहय ने बैसऽ लेल कहने रहय । अभिवादन करैत आ ओकर संकेतक प्रतीक्षा केने बिना हम बैसि गेल रही । स्निग्ध आ कोमल किंतु अल्पजीवी मुस्की संगे ओ हमरा सँ पुछने रहय - ’कोना छी ?’ ’बस चलि रहल छै ।’ - हमर एहि शुष्क औपचारिक उत्तरसँ वार्त्तालाप भंग भऽ गेल । खाद-बीज, सीमेंट, पंपसेट आ बोरिगं बला आवेदक सभ एक-एक कऽ आयब शुरू कऽ देलकैक । ’खाता नंबर की अछि ?’ - बोरिगं बला एकटा आवेदकसँ हरिवंश प्रश्न केलकै । ’नहि मोन अछि।’ ’खेसरा नंबर ?’ ’नहि मोन अछि ।’ ’कतेक रकबा अछि?’ ’पता नहि ।’ ’भागू एतय सँ ।’ – कहैत ओकर आवेदनकेँ हरिवंश नीचा फेकि देलकै । ओ व्यक्ति हतप्रभ भेल किछु काल ठाढ़ रहलै आ दरखास्त उठा धड़फड़ाइत निकलि गेलै । लोक एहिना आबय, हरिवंश किछु पूछै आ ओकर दरखास्त फेकि दैक। एहि समस्त कार्य-सम्पादनमे ओकर आवाज अत्यन्त कर्कश आ चेहरा कठोर रहैक । ई देखैत-देखैत हमरा घबराहटि होअय लागल । बुझायल जेना हमहीं आवेदक छी आ हरिवंश हमरे डाँटि आ अपमानित कऽ रहल अछि । हरिवंश अज्ञात  ढँगसँ भीतरे-भीतर हमरा आतंकित कऽ देने छल । अंत मे ई कहि दी जे हरिवंश दाखिल खारिज लेल सी. ओ. सँ हमर परिचय करा कऽ चल गेल, लेकिन ओ काज अखन धरि नहि भेल अछि । हरिवंशक आदमी हेबाक कारणे घूस नहि देत, भरिसक यैह सोचि सी. ओ. काज नहि कऽ रहल अछि । हम फेर जा कऽ हरिवंश केँ नहि कहलिऐक । हरिवंश सँ भेंट करबाक इच्छे नहि होइत अछि । ब्लॉकक नाम लैते हरिवंशक ओ रूप मोन पड़ैत अछि आ घबराहटि होअय लगैत अछि। अनलकांत(1969- ), मैथिली त्रैमासिक "अंतिका"क सम्पादक। हिन्दीमे दूटा कथा संग्रह प्रकाशित। असोथकित-अनलकान्त प्राइवेट वार्डक बिस्तर पर पड़ल-पड़ल ओ सामनेक टेबुल पर राखल एक मात्र खाली गिलास मे बड़ीकाल सँ ओझरायल छल। काँचक ओ मामूली सन गिलासओकरा देखैत-देखैत रूप बदल' लागल छलै। एक बेर ओकरा लगलै जे ओहि खाली गिलास मे नीचाँ सँ अनायास पानिक सतह ऊपर उठ' लगलै आ अगिले क्षणगिलासक चारूभर पानि खसैत सेहो ओकरा प्रत्यक्षे जेना बुझेलै! ओ झट आँखि मूनिलेलक। बड़ीकाल पर आसते-आसते फेर ओ आँखि खोललक। गिलास पूर्ववत खाली छलै। ओ फेर निश्चेष्ट गिलास पर नजरि गड़ा देलक। कोठली मे देबालघड़ीक टिक्-टिक् केर हल्लुक-सन आभास छलै। किछुए क्षण बीतल हैत कि ओ देखलक गिलासक आकृति एक लय-क्रम मेपैघ होअय लगलै! एक बेर ओकरा लगलै, ई तँ कुंभकरणक पेट थिक! तत्क्षणे फेरबुझेलै, ई विशाल बखारी थिक!...भरि पेट भात लेल रकटल मोन-प्राण मे पेटक संग बखारीक स्मृति ओकरा नेनपने सँ खेहारने आबि रहल रहै। परेशान जकाँ भ'क' ओ अपन नजरि ओकहर सँ हटाब' चाहलक कि ओकरा बुझेलै जे माथ मे किछु चनकि रहल छै आ देह मे तागति सन किछुओ ने रहि गेल छै। ओ अपना केँ बड़असहाय-असोथकित बुझि फेर आँखि मूनने रहय कि तखने एक टा सर्द-सन हाथओकरा माथ पर बलबला आयल घाम पोछ' लगलै। कोठली मे तखन ओकर पत्नीमात्र छलि, मुदा ओकर हाथ ओहन सर्द हेबाक अनुमान नइँ छलै ओकरा। ई फराक जे ओकर आत्मा मे खरकटल खरखर हाथक धन्नी-हरदि वला गमक आँखि नइँ खोल' देलकै। हठात् हल्लुके सँ केबाड़ ठकठका क' ककरो भीतय अयबाक आभास भेलै,तँ नइँ चाहैतो ओ आँखि खोलि देलक। नर्स छलि। नर्सक आगू-आगू ओकर मुस्कीछलै। ओकरा मन मे स्फूर्ति जकाँ अयलै। नर्सक मुस्कीक उतारा मुस्किए सँ देलक।एक नर्से टा तँ छलै जकर आयब ओकरा बड़ सोहाबै छलै। डाकटरो सँ बेसी। एक टामधुर-सन धुन ओकर धिरछायल मोन केँ छुबलकै। एक खास किसिमक निसाँ मेआँखिक पल झपा गेलै। कनेकाल बाद 'मनोहर कहानियाँ' मे डुबलि पत्नीक पन्ना पलटबाक स्वरओकरा कर्कश जकाँ लगलै। भीतर सँ कचकचा गेल छल। पत्रिका मे डुबलि पत्नीदिस तकबा सँ बचैत, नइँ चाहैतो फेर सामनेक टेबुल पर राखल खाली गिलास दिसताक' लागल। किछुए क्षण बीतल हैत कि गिलास फेर रंग-रूप बदल' लगलै। ओकराअपन दिमाग पर बेस दबाव बुझेलै। ओ नइँ चाहैतो बाजल, ''टेबुल पर सँ एहिगिलास केँ हटाउ!...'' पत्नी पछिला तीन दिन सँ बेसी खन ओकरा संग छलि। पहिल दिन तँ मारतेफजहति करैत भरि दिन ओ बड़बड़ाइते रहि गेल छलि। कतेको केओ बुझारति कि अनुनय-विनय कयलकै, ओकरा पर तकर असरि नइँ भेलै। एकदमे झिकने जाइतरहलि, ''सब हमरे घर बिलटाबै पर लागल यए। धियापुता केँ के देखतै? अयँ! जकरा कपार पर दू-दू टा अजग्गि बेटी रहतै तकर ई किरदानी?... काज-धंधाक चिंते ने! हरखन दोसे-मीत! सब दिन नाटके-साहित्य आ दरुबाजीक मोहफिल! देखौ, आइ केओ ताकहु अयतै!...'' एहने-सन मारते रास बात! मुदा ओ एको बेरमुँह नइँ खोललक। दोसर दिन पत्नीक बाजब स्वाभाविके रूपेँ कने कम भेलै, मुदा ओकर मुँह सिबले रहलै। तेसरो दिन ओकरा ओहिना गुमसुम देखि पत्नीक भीतरआतंक जकाँ किछु पैस' लगलै। से ओहि दिन गुकमी जकाँ लधने ओ ओकराबजबाक बाटे ताकि रहल छलि। एहन खन पतिक आदेश ओकरा नीक लगलै। ओ उठलि आ गिलास हटा बगलक अलमारी मे रखै सँ पहिने पानि लेल पूछलक। ओमुड़ी डोला नासकार कयलक। पत्नीक भीतर किछु कचकि जकाँ उठलै। आँखि डबडबा गेलै।... एकरा एहि अस्पताल मे भर्ती दोसे-मित्र सभ करौने छलै। ओकरे सभक समाद पर ओ बताहि जकाँ छोटकी बेटीक संग भोरे-भोर भागलि आयलि छलि।ओकर लाख फजहति आ बड़बड़ाहटिक बादो इलाजक सभ टा व्यवस्था वैह सभ क' रहल छल। ओकरा बेसी बजबाक साफल ई भेलै जे कैक गोटे बाहरे सँ हालचाल ल', सभ टा व्यवस्था बुझि-गमि, घुरि जाइ छल। से थाह पाबि गेलि छलि ओ। क्षण भरिक लेल तँ ओकरा अपन कड़ैती आ बजबाक प्रभाव पर गौरवे जकाँ भेलै। ओकरा लगलै जे एहि तरहेँ ओ अपन घरवला केँ मुट्ठीमे क' सकै अछि। मुदापतिक पीयर चेहरा देखिते ओकरा भीतर पैसल अदंक आशंकाक झड़ी लगा देलकै। ओ चोट्ïटे उठलि। पयर मारि आस्ते सँ बाहर भेलि। पैघ सन गलियारा पार क' ओ रिसह्रश्वशनक आगूक गुलमोहर लग ठाढ़ भेलि। अस्पताल प्रांगणक सामनेवला छोर पर बेरू पहरक रौद मे बैसल किछु गोटे पर ओकर नजरि गेलै। ओ दूरे सँ चिन्हैक प्रयास क' रहलि छलि कि ओकहर सँ दू गोटेलपकि क' ओकरा लग अयलै, ''की, कोनो बात?" ई दुनू ओकरा पतिक सब सँ पुरान मित्र छलै। ओकरा बियाहो सँ पहिनेक सहमना, लंगोटिया!...जकरा सभक ताधरि किछुओ फराक नइँ छलै। बियाहक बादो चौदह-पंद्रह वर्ष धरि प्राय: ओहिनारहलै। शुरूक पाँच साल तँ आश्रमो संगे रहलै जावत्ï अलग-अलग ठाम चाकरी नइँ भेटलै। एहि मे पहिल ओ छल जे ओकरा 'कनियाँ गै' कहै छलै आ 'वर बाबू' कहैत जकरा सँ ओ हँसी-मजाक मे सदति साँय-बौहुक अदला-बदली करबाक गपशप करै छलि। मुदा तखन ओकरा मुँह सँ बहरायल वाकय संबोधनहीन छलै। दोसर, छात्र-जीवन मे भनसाघरक इंचार्ज रहबाक कारणेँ शुरूहे सँ ओकरा सौतिन कहै छल। मुदा तखन तीनूक संबंधक कोनो टा पहिचान नइँ छलै। ई स्थिति ओकराबड़ दारुण जकाँ बुझेलै। एक बेर ओकरा मोन मे अयलै जे वैह ओहि संबोधन सँ पुकारय, मुदा से भेलै नइँ। ओ अपन भावना पर कठोरता सँ लगाम लगौलक, ''की करबै आब, हमर तँ घरे बिलटि गेल। तै पर सँ ओकर गुमसुम रहब!..." सेरायलआ घबड़ायल सन स्वर बहरेलै। कनेक असमंजसक बाद पहिल दोस्त जे कह' चाहैत छल, से नइँ कहिओहिना किछु बाजि देलक, ''ठीक भ' जयतै। डॉकटर सँ हमरा गह्रश्वप भेल यए।" ''नइँ! ...कोनो चिंताक बात नइँ!" दोसर तोस देब' चाहलक। एहन जवाब ओ नइँ सुन' चाहने छलि। मुदा ओकरा बस मे किछु ने छलै।आब ओ पहिनेक स्थिति मे नइँ घुरि सकै छलि जकरा सँ कहियो पिण्ड छोड़बैतनीक लागल छलै। ओकरा मुँह सँ बहरेलै, ''घुटनाक अलावा डॉकटर तँ कहै छै, सब कुछ नॉर्मल है! ''हँ, सैह तँ! ..." पहिल जल्दी सँ जवाब ताकलक, ''रसेरस सब ठीक भ' जयतै।' ''हँ! हँ!..." दोसरक चेहरा पर टार'क भाव बेसी साफ छलै। हारिक' ओ वार्ड दिस घुरलि, ''आउ ने, कनेकाल हुनके लग.." गाछ ओकरा लगीच अयलै। सिरमा लग। दुनूक नजरि मिललै। ओ निहालभ" गेल। ओ किछु बाज' चाहलक, तँ ओकरा अपन पत्नीक उपस्थितिक भान भेलै। गाछ सेहो किछु बाज' चाहलक, मुदा कोठली मे ओकरा मीतक कयाहता छलि। गाछओकरा बेडे पर सटिक; बैसि रहल। दुनूक हाथ एक-दोसराक हाथ मे छलै। दुनूक हाथ गरम छलै। ''चाह-ताह बाहर सँ एत' आबि सकै छै ने?" दोसर बुदबुदायल। तखने ओकर पत्नी उठलि, ''लगले अबै छी"' आ कोठली सँ बाहर भ'गेलि। ओकरा पाछाँ लागल दोसर मीत सेहो बहरायल। किछु पल बीतल कि ओ पड़ले-पड़ल फुसफुसायल, ''ककर्यू मे ढील बुझाइ छौ!.." ''नइँ-नइँ!... अपना सब घर-परिवार लेल सही समय पर किछु ने सोचलौं।तकर सब टा दु:ख एकरे सब केँ भेलै।" गाछ आब झुकि जकाँ आयल छल। ओ किछु क्षण चुपचापे रहल। फेर एकहर-ओकहर ताकि बाजल, ''रौ बुडि़! हमरा सभक लेल अपने टा घर कहिया घर छल? हमसभ तँ सभक घर-परिवार केँ अपने बुझैत रहलौं।" बेड पर पड़ल देह जेना मोन संग उड़' चाहै छल। ''जँ सैह रहि जाइत शुरू सँ अंत धरि तँ कोनो दु:ख नइँ छल मीत! मुदा एक एहन मोड़ पर आबि हम सभ अपन आरि बेराब' लगलौं जत' पछिलुको कयलधयल सभ टा पर पानि फिरि गेल। ने घरक रहलौं ने घाटक।..." आब गाछ साक्षात मनुकख भ' गेल छल। ''ई तों की कहै छें?... हम तँ एखनो एकरे पाछू सब किछु न्योछावर कयनेछी। के अछि आइ हमरा सँ बेसी कयनहार?' ''यैह!... यैह भेलौ सीमा! दोसर केओ तोरा सँ बढि़ नइँ किछु करै यए तेँ तों आगू किएक बढबें!... आ ई त्याग-न्योछावर-कथा मंचे टा सँ शोभै छै। हम-तों जतेक ने न्योछावर करबाक गपशप करै छी, से सब वास्तव मे आब कैरियर चमकाबैक साधन भ' गेल यए। जेँ केओ दोसर हमरा सब सँ आगू बढि़ सक्रिय नइँ अछि, ते हमरासभक ई अधकचरा प्रयास पैघ अभियान कहाबै यए। मुदा ई जानि ले जे हमरासभक ई प्रयास एक टा बिजुका सँ बेसीक ओकाति नइँ रखै अछि जकरा सँ बड़ीकाल पर ओ आँखि फोललक। सामनेक खाली टेबुल पर ओकर नजरि गेलै, तँकिछु चिड़ै-चुनमुनी डराइत होइ तँ होइ, सुग्गर-हरिन आकि नीलगाय पर कोनोओकरा टेबुलक सतह सहाराक रेगिस्तान बुझेलै। टेबुलक पार बैसल लोकक आकृति असरि नइँ पड़ै छै।' मीत आवेश मे आबि गेल छलै।रेगिस्तानक छोर परक गाछ लगलै। ओ ओहि गाछक हरिअरी पर नजरि टिकौलक। जवाब मे एखनो ओ बहुत रास तर्क द' अजेय रहि सकै छल। यैह तँ ओकरआँखि तृप्त भ' गेलै। शकित छलै। मुदा एक तँ ओहि बातक कने असरि पड़ल छलै आ दोसर, पत्नीक घुरिक'  आब' सँ पहिने ओकरा किछु आर जरूरी बात पूछबाक छलै। से शांत होइतमद्धिम स्वर मे बाजल, ''एखन से सब बतायब जरूरी नइँ छै। कहले बात कते कहबौ? ...सुन, एक टा जरूरी बात!..."आ फुसफुसायल, ''ओत' रंगशालाक हॉल मे हमर किछु भेटबो कयलौ?" ''की?" गाछक पात-पात खिलखिला क' हँसल। ''हमर कुञ्जी?" ''हँ! ...ओ कत' जायत? मंचक काते मे छल।" ''दे!..." ''बाकस मे बंद क' राखि देने छियौ। पहिने ठीक तँ हो!" ''शहर मे कोनो चर्चा?" ''हँ, कल्पना मंचक छौंड़ा सब एक टा रीमिकस तैयार कयलक अछि— कुञ्जी हेराय गेल भाँगक बाड़ी मे..." क्षणभरि बिलमि फेर नहुँए बाजल, ''आचार्यक 'मुसल आ मुसलमान" कथाक मंच प्रस्तुति आइ मुजकफरपुर मे छिऐ जत' सहरसा सँ जनकपुर धरिक लोक जमा भ' रहल छै। एत' सँ कल्पनो वला सभ गेल छै!.." ओकरा पर तनाव जकाँ बढि़ गेलै। क्षणेभरि कोठली मे भारीपन रहलै! तखने चाहक ट्रे लेने एक टा छौंड़ाक संग ओकर पत्नी आ दोसर मीत घुरि अयलै। रसेरस फेर टेबुल पर रेगिस्तान पसरि गेलै आ गाछ तकर ओहि पार चलि गेल। ओ दोसर मीतक मदति सँ गेड़ुआक सहारें ओठङि गेल छल। पत्नीक हाथ सँ कप पकड़लक। फेर एक टा बिस्कुट लÓ नहु-नहु कुतरैत कतहु हेरा गेल छल। चाहक घोंट लैत ओतÓ शुरू भेल बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ, कयाह-दान आमहँगाइक संग-संग क्रिकेटक गह्रश्वप ओकरा जोडि़ नइँ पाबि रहल छलै। साँझक अन्हार जखन बाहरक वातावरण केँ गाढ़ कर' लागल छलै आ साँझुक राउण्ड पर आयल डॉकटर देखिक' जा चुकल छलै, घर सँ टिफिन बॉकसवला झोड़ानेने एक टा नवोदित कवि मित्र आबि गेल छलै। राति मे ओहि नवतुरिए केँ रुकबाक छलै। किछु काल बाद ओकरा पत्नीक संगे ओकर दुनू मीत घर विदा भेल।नवतुरिया कवि सेहो पानिक बोतल आन' लेल बहरायल छल कि पहिल मीत गेटक बाहर सँ घुरिक' ओकरा लग अयलै आ एक टा कने पैघ सन कुञ्जी हाथ मे दैत कहलकै, ''ले! ...एकरा बिना तोरा नीन नइँ हेतौ!" आ झट बहराय गेल। ओ एक बेर ठीक सँ ओहि कुञ्जी केँ देखलक। बड़ पुरान होइतो सब तरहें नव छलै। पुलक सँ भरि तुरंत जेब मे राखि लेलक। पानि ल'क' घुरल नवतुरिया प्रेम सँ भोजन लगौलकै। नवतुरियाक आवेशभोजन मे रुचि बढ़ा देलकै। तेँ खाय क' पड़ल तँ नवतुरियाक दू गोट कवितोसुनलक। चाबसी द' सब चिंता सँ ध्यान हटा आगू मे जे फिल्म छलै तकरसफलताक कल्पना मे झिहरि खेलाय लागल। नीन किछु जल्दिए आबि गेलै। ओ देखलक जे ओकर किताब लोकसभ लाइन लगाक' कीनि रहल छै।मारते रास चैनलवला सभ घेरने छै। ओ जल्दी-जल्दी किछु बाजि एक टा उज्जररंगक कार मे बैसि जाइ अछि। कार अज्ञात दिशा मे जा रहल छलै कि नीन टूटि गेलै। ओ फेर आँखि मूनि जल्दी सँ जल्दी ओहि सपना मे जयबाक चेष्टा कर' लागल। एहि बेर ओ देखलक जे ओकरा ढाइ लाखक कोनो पुरस्कार भटलै। ओकरासकमान मे पुरस्कार प्रदाता नौकरशाह सभक दिस सँ रंगमंडलक समस्त सदस्यक संगहि वरिष्ठ पत्रकार आ साहित्यकार लोकनिक बीच भव्य पार्टी चलि रहल छै।...अचानक ओहि बीच ठाढ़ एक टा अद्र्धविक्षिह्रश्वत सन युवक चिचिया लगै छै, ''अहाँ सभ अवसरवादी छी! पूजीपतिक दलाल छी!..." कि तमसाक' ओत' जमा सभ केओ अपना-अपना गिलासक दारू ओहि युवक पर फेकि दैत छै।... आ ततेक दारू ओकरा पर खसै छै जे ओ युवक बगलक नाली मे बहि जाइ छै!... अचानक फेर ओकर नीन टूटलै। एहि बेर ओकर छाती जोर-जोर सँ धड़कि रहल छलै।कनेकाल मे ओकर मोन स्थिर भेलै, तँ ओ नवतुरिया कवि दिस ताकलक। ओओकरा बेडक दहिना कातक सोफा पर नीन छलै। ओकर बामा हाथ अनायास पेंटक जेब मे गेलै आ अगिले पल कुञ्जी ओकरा आँगुरक बीच छलै। बड़ीकाल धरि ओ ओहि कुञ्जी केँ देखैत रहल। कुञ्जीदेखैत-देखैत ओकरा अपन वियारंगक ओ अन्हार मोन पडि़ अयलै जे ओकर कुञ्जी तँ गिडऩहि छलै, ओकरा एहि बेड धरि पहुँचा देलकै। वियारं ओहि विद्यापति यात्रीरंगशालाक संक्षिह्रश्वत नाम छलै जकर ओ अध्यक्ष आ निर्देशक छल। जतÓ पछिला दससाल मे सभ सँ बेसी नाटक ओकरे निर्देशन मे भेल छलै। जतÓक ओ सभ सँ सकमानित आ सर्वेसर्वा छल। जत' पहिल मंजिल पर ओकरा एक टा पैघ सन कक्ष भेटल छलै। ओहि कक्ष सँ नइँ मात्र वियारंक सभ टा गतिविधि संचालित करैत छलओ, ओकर समस्त हित-मीतक चौपाल वैह छलै। मुदा ओहि रातुक अन्हार!... ...असल मे ओइ दिन बेरू पहर अशोका मे बालीबुडक एक टा पैघ प्रोड्ïयूशरसंग ओकर मीटिंग सफल भेल छलै। भूमि समस्या आ सशस्त्र आन्दोलन सन विषय पर ओ एक टा मसालेदार फिल्मक लेल स्क्रीह्रिश्वटंग आ सह-निर्देशनक एग्रीमेंट साइन कयने रहय। तकरा बाद शैकपेनक दौर जे शुरू भेलै से प्रोड्ïयूशरक उड़ान-समयक कारणें सँझुका आठे बजे धरि चललै। ओतÓ सँ ओ बाहर भेल तँ ऑटो मे बैसैतअपन सभ सँ करीबी कॉमरेड दासक मोबाइल पर पहिल सूचना देलक। दास नगरक सभ सँ बेसी प्रसार संकयावला दैनिक समाचार पत्रक कयूरोचीफ रहय। ओ तत्कालओकरा अपन दकतर बजा लेलकै। दासक केबीन मे ओकरा पहुँचिते तय भेलै जे एहि उपलकिध केँ खास दोस्तसभक बीच सेलिब्रेट कयल जाय। से ओतहि सँ फोन कÓ चारि-पाँच गोट 'हमह्रश्वयालाÓसाहित्यकार-पत्रकार-रंगकर्मी केँ साढ़े दस बजे धरि वियारं पहुँचबाक सूचना देल गेलै। फेर ओ दासेक खटारा एलएमएल वेस्पा पर पाछाँ बैसि विदा भेल छल। रस्ता मे महात्मा गांधी चौक पर चारि-चारि ह्रश्वलेट चिकन आ पनीर फ्राइ पैक करबौलक। काजू, मूँगफली आ दालमोटक संगे सलादक व्यवस्था कÓ चारि डिकबासिगरेट सहित दू टा पैघ-पैघ पॉलिथीन पैकेट मे लेलक। दासक डिककीक झोड़ा मेरमक बड़का-बड़का बोतल रखैत आधा सँ कमे बचल अद्धा टकरेलै। ओकराबगलक जूस दोकानक पाछाँ दुनू मीलि खाली करैत अमेरिकन पॉलिसीक चर्चा करÓलागल छल। अपन-अपन सिगरेट जराय जखन ओतÓ सँ विदा भेल, तँ साहित्यअकादेमी आ मनुवादक व्याकया शुरू भेल छलै। कनेक तेज सन चलैत बसात जाड़क प्रभाव बढ़ाबÓ लागल छलै। मुदा ओ दुनूमौसम केँ ठेङा देखबैत वियारं दिस जाइत अपना मे मस्त छल। तेहन मस्त जे साँझेसँ शुरू झिस्सी केँ 'इन्जॉयÓ कÓ रहल छल। तखन ओ सभ वियारं सँ किछुए दूर नेहरू स्टेडियम वला मोड़ पर छल कि दूटा घटना एक संग घटलै। एक, बुनिआयब तेज हेबाक संगे बसात बिहाडि़ जकाँ रूपलÓ लेलकै आ दोसर, दासक जेब मे राखल मोबाइल अंग्रेजी धुन पर चिचियाबÓलगलै। कात मे स्कूटर रोकि दास एको मिनट सँ कमे गह्रश्वप कयलक आ पाछाँ घुमिबाजल, ''रौ, समान सभ लÓकÓ तों जो वियारं। एखन साढ़े नौ भÓ रहल छौ। हम एक घंटा मे अयबौ। संपादकक आदेश छै, की कÓ सकै छी?... चल गेटक बाहरछोडि़ दै छियौ।" खराब मौसमक बादो गेट सँ दूरे पॉलिथीन पैकेट आ झोड़ा थमा दास स्कूटरमोडि़ फुर्र भÓ गेलै। ओ वियारं बिल्डिंग दिस तकलकै। सभ किछु अन्हार मे डूबल छलै। गेटक दुनू कात स्थित विद्यापति आ यात्री बाबाक प्रतिमा धरि देखा नइँ पडि़ रहल छलै, तँ कालिदास-शैकसपीयर सन-सन मारते रास नाटककारक देबाल मेजड़ल छोट-छोट पाषाण मूर्ति कतÓ लखा दैतै। हवा प्रचंड भÓ गेल रहै आ बुन्नीआर तेज। ओ धतपत आगू बढ़ल। ग्रील-गेट फोलि अन्हार पैसेजक मुँहथरि परठमकल। चिकरिकÓ रमुआ चौकीदार केँ दू-तीन बेर शोर पाड़लक। मुदा कोनो उतारा नइँ भेटलै। एहन मौसम मे राति-बिराति ककरो नइँ अयबाक अनुमान कÓ ओसरबा साइत घर पड़ा गेल रहय! बिजली नइँ रहै आकि स्वीचे लग सँ काटि देनेछलै ढोहरीक सार, से नइँ कहि। ओकरा अपना हाथक पॉलिथीन पैकेट धरि नइँ सुझि रहल छलै। आखिर कहुनाकÓ सीढ़ी तकबाक साहस कÓ ओ एक टा पयर आगू बढ़ौनहि रहय कि गेटक सटले कतेको युग सँ ठाढ़ बडग़ाछक एक टा पैघ सनडारि टूटिकÓ हड़हड़ाइत गेट पर खसलै। ओकरा लगलै, पृथ्वी दलमलित भÓ गेलैआकि ओहि गाछ संग पूरा वियारं बिल्डिंग भरभराकÓ खसि पड़लै! कतÓ गेलै पॉलिथीन पैकेट सभ, कतÓ खसलै झोड़ा आ कोकहर अपने ढनमनायल; तकर कोनो ठेकान नइँ रहलै!...बड़ीकाल बाद होश अयलै, तँ ओ कराहि जकाँ रहल रहय। ओकरा पयरलग भीजल सन किछु डारि-पात बुझेलै आ माथ लग सर्द देबाल। देबाल टोबÓक क्रम मे ओकर हाथ अपना माथ पर गेलै। ओतÓ लसलस सन किछु सटल जकाँ बुझेलै। ओ ओकरा रगडि़कÓ पोछबाक प्रयास कयलक, तँ भीतर सँ पातर सन दर्दहुल्की मारलकै। तखन ओकरा ई बुझबा मे भाँगठ नइँ रहलै जे ओकर कपार फुटि गेलै आताहि पर शोणितक थकका जमि गेल छै। मुदा तैयो ओकरा ई भान नइँ भÓ रहल रहैजेे ओ कतÓ, किऐ आ कोन परिस्थिति मे पड़ल छलै।... किछु क्षण आरो बीतलै तखन ओकरा नीचाँ सीमेंटक सतहक भान भेलै। कि पयर मोडि़ हड़बड़ाकÓ बैसल आ घबड़ाकÓ चारूकात हथोडिय़ा मारÓ लागल।अचानके ओकरा हाथ मे काँचक एक टा चोखगर टुकड़ी गड़लै आ दर्द सँ सिसिया उठल। मुदा क्षणे बाद ओ फेर हथोडिय़ा दÓ रहल छल। हथोडिय़ा मारैत ओबदहवाश छल। कि एक ठाम फर्श पर किछु तेजगंधवला तरल पदार्थ बुझेलै। ओहि गंध केँ परखÓ मे थोड़ समय लगलै, मुदा जहिना ओकरा गंधक पहिचान भेलै कि सभ किछु स्मरण भÓ अयलै।आब ओ जल्दी-सँ-जल्दी सीढ़ी ताकबा लेल व्यग्र छल। ओकरा कोनोहालति मे शीघ्र पहिल मंजिल पर स्थित अपन कक्ष मे पहुँचबाक छलै। ओहि कक्षमे जतÓ इजोतक कैक टा वैकल्पिक साधन रखने छल ओ। ओकर कुञ्जी ओकराजेब मे छलै। बामा जेब मे हाथ दÓ कुञ्जी छूबिकÓ ओ आश्वस्त भेल। कि ओकरा कोना क्षण अपन संगी सभक आबि जयबाक आशंका भेलै। अन्हार मे घड़ीअकाजक छलै, से झट ओ दहिना जेब मे राखल मोबाइल निकालÓ चाहलक जाहिसँ अन्हारो मे समयक ज्ञानक संग क्षीण-सन इजोत सेहो भेटि सकै छलै। मुदा जेबसँ बहरेलै दू-तीन भाग मे अलग-अलग भेल मोबाइलक पार्ट-पुर्जा! आब ओकरघबड़ाहटि आरो बढि़ गेल छलै। अन्हारक सोन्हि मे ओ तेना भुतिया गेल जे दिशाक कोनो ज्ञाने ने रहि गेल छलै। आरो किछु काल धरि बौअयलाक बादो जखन थाह नइँ लगलै, तँ अन्हारक कोनो अज्ञात स्थल पर ओ सुस्ताबÓ लागल छल। सुस्ताइत-सुस्ताइत ओकरा भीतरहँसी जकाँ किछु फुटलै। ओकरा मोन पड़लै जे एतबे टा जिनगी मे ओ कतेक बिहडि़धाँगि आयल छल। लगभग एक दशक तँ अण्डरग्राउण्डे रहल छल। केहन-केहन कठिन ऑपरेशन सफल कयने छल। कतेक मुठभेड़, कतेक काउन्टर मे बमगोलीक बीच सँ निकलि आयल छल ओ!... ओकर ई इतिहास आइयो कतेको युवा केँ प्रेरणा दैत छलै।अपन स्वर्णिम अतीतक स्मरण सँ ओकरा भीतर साहसक संचार भेलै।उठिकÓ सावधान मुद्रा मे ठाढ़ भेल आ दृढ़ निश्चय कÓ एक सीध मे थाहि-थाहिकÓबढ़Ó लागल। किछुए क्षण बाद सहसा ओकरा ठेहुन सँ किछु टकरेलै। हाथ सँ छूबिकÓ ओ परखलक—आगू मे कुर्सी छलै। फेर हाथ बढ़ाय कÓ ओ एकहर-ओकहर टटोललक—कुर्सीक पतियानी लागल छलै। तत्काल ओकरा बुझबा मे आबि गेल छलै जे ओ फुजले रहि गेल दुआरि सँ मेन हॉल मे आबि गेल छल। तखन कुर्सीदर-कुर्सी पकड़ैत ओ बीचक रस्ता धÓकÓ सभ सँ आगूक कुर्सी धरि पहुँचि गेल।एतÓ पहुँचि ओकरा सब किछु सुरक्षित जकाँ बुझेलै। से ओ ततेक आश्वस्त भÓ गेलजे आराम सँ ओहि कुर्सी पर बैसि पयर पसारि देलक।आब ओकरा मेहमान मित्र सभ सँ पकड़ेबाक कोनो चिंता नइँ रहलै। तेँ धीरे धीरे ओ ओकरा सभ केँ बिसरय लागल छल। कि तखने सेलिब्रेट करबाक अवसरक महकाा मोन पड़लै। मोन मे कनेक कचोट भेलै। मुदा एते पैघ नाट्ïय-अनुभव ओकरासभ स्थिति मे तालमेल बैसायब सिखा देने छलै। आब ओ सहज भÓ जयबाक स्थिति मे आबि रहल छल कि ठीक तखने मंचक बीचोबीच खसैत प्रकाशक एक फाँक मे ओकर प्रतिरूप ठाढ़ देखा पड़लै।क्षणभरि मुरुत जकाँ ठाढ़ रहलाक बाद प्रतिरूप अचानक बाजल, ''रौ मीत, किऐदु:खी छें?ÓÓ ''अयँ!... तों के?" ओ अकचकाइत पूछलकै। ''नइँ चिन्हले हमरा?... कोनो बात ने! चिंता नइँ करय, दुनिया एहिना चलै छै!" प्रतिरूप मुस्किआइत कहलकै। ''मुदा छें के तों?" ओ फटकारैत पूछलकै आ उठिकÓ ठाढ़ भÓ गेल। ''हमरा चिन्हि कÓ की करबें? दुनिया तोरा चिन्है छौ! दोसर खेमाक लोक के गरियाबैत रह! ओ सभ पतीत छै, कुपमंडुप छै, समाज केँ पाछाँ लÓ जायवला छै।ओकरा ई सभ कहला मात्र सँ समाज बदलि जयतै आ तों महान भÓ जयबै! फेरअंग्रेजी बोहु-बेटी घर अयतौ। स्टेटस बदलि जयतौ! बेचारी बहिन हिंदी बड़अलच्छी, बाड़हनि झाँट!...ÓÓ प्रतिरूपक स्वर संयत छलै। ''तों हमरा पर व्यंग्य करै छें?" ओ फेर बिगड़लै। ''व्यंग्य?... एहि सभ पर तँ तोरा महारत छौ। बस लिखैक फुर्सति नइँ छौ। नेतँ आलोचक जीक गुरुद्वारा मे माथ टेकिते कोर्स मे लागि गेल रहितौ। आचार्यक प्रसाद पबिते साहित्य अकादेमी भेटि गेल रहितौ!" ''हम कोर्सक भूखल नइँ छी। आचार्य आ आलोचक जी केँ ठिठुआ!... साहित्य अकादेमी चाहबे ने करी हमरा! हम ओहि पर थुको फेकÓ नइँ जायब। हमतँ व्यापक सामाजिक परिवर्तनक आकांक्षी छी। समातामूलक वैज्ञानिक सोचक आग्रही। सदिखन जनते टा हमरा नजरि मे रहै अछि।" ओ आक्रोश सँ भरल स्वर मे गरजलक। प्रतिरूप थपड़ी पाडय़ लगलै, ''वाह! वाह! कतेक कर्णप्रिय लगैत अछि ईसब! अद्ïभूत!... जँ सरिपहुँ एना होइतय!...सय मे निन्यानबे टा मैथिली भकत दुमुँहेबहराइतय?..." ओ छड़पि कÓ मंच पर चढि़ गेल छल, ''तोरा बुझल नइँ छौ, मंच परडायरेकटरक इच्छाक विरुद्ध केओ एको क्षण ने रहि सकै अछि! जल्दी भाग! हम की कÓ सकै छी से बुझले ने छौ तोरा!" ''डायरेकटर छें तों?... धुर्र! अपन कोठलीक ताला तँ खोलिए ने सकै छें! जोतँ अपन कोठली?..." प्रतिरूप ओहिना ठाढ़ रहलै। ओ तामसे कँपैत कुञ्जी निकालि लेलक, ''देख, देख कुञ्जी हमरा हाथ मेअछि। देख!..." कि तखने ओरा हाथ सँ छिटकि क' दर्शकदीर्घा दिस गेल कुञ्जीअन्हारक समुद्र मे डूबि गेलै। अचानक प्रतिरूप जोर-जोर सँ हँसैत ठहाका लगब' लागल। अपमान सँ माहुर होइत ओ प्रतिरूप केँ मारै लेल दौड़ल। प्रतिरूप अलोपितभÓ गेलै। मुदा अन्हार मंच पर ओ बताह जकाँ दौडि़ रहल छलै। कि हठात चारि फुटनीचाँ मंचक आगू मे ओ अरर्रा कÓ खसल—धड़ाम! ... अस्पतालक बेड पर पड़ल-पड़ल ओकरा लगलै, भीतर सँ ओ खुकख भÓ गेल, एकदम कोढि़ला!... देह पसेना-पसेना छलै! कंठ सुखाय लागल छलै। बामा हाथक कुञ्जी दहिना जेब मे नुकबैत बड़ प्रयास कÓ ओ बगलक सोफा पर सूतल नवतरिया कवि केँ आवाज देलक। अकचकाइत जागल ओ कवि ओकरा संकेत पर गिलास मे पानि भरि आनलक।ओकरे सहारा पाबि माथ अलगा कÓ ओ दू घूट पानि पीबि असोथकित जकाँ पडिऱहल। नवतुरिया दया भरल नजरिएँ एकटक ओकरा देखैत रहलै। सामनेक खिड़कीक साफ होइत काँच भोरक आभास दÓ रहल छलै। बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल बात बहुत पहिनेक थिक , हम बच्चे छलहु“ । बाल्यकालक लगभग बातसभ लोक प्रायः बिसरिये जाइत अछि । मुदा स्मृतिमे किछु एकदम स्पष्ट बैसल रहि जाइत छैक । जेना कि कोनो दूर ठाढ मनुख स्पष्ट नहि देखयलोपर ओकर कद–काठी,  लत्ता–कपडा,  भाव–भङ्गिमा आ’ जाहि घर–बारीमे ठाढ भद्र ओ अपन जन–बनिहारके“ देखि रहल अछि तैसभके“ मिलाकय हमरासभ ओहि ठाढ≥ व्यत्तिmके“ ठेकानि लैत छिऐक जे ओ तद्र परमपरिचित फलाना छथि । तहिना किछु स्मृति धोंकाएलसन देखाइत अछि जकरा ठेकानयलेल कल्पनाक मदति लेबय पड≥≥ैत छैक । स्मृतिक आधारपर कोनो पहिलुका घटनाके“ त्रmमबद्ध तथा अर्थयुत्तm बनाबयहेतु कल्पनाक सहयोग आवश्यक भद्र जाइत छैक से बुझना जाइछ । उदाहरणार्थ, जेना पुरातववेत्तालोकनि कोनो खडहरमे उपलब्घ र्इंट, पाथर, भूमिक बनौट, किछु आकारमय काठक रचनासभ आ’ गृहनिर्माणमे प्रयुत्त आवश्यक अन्य सामग्रीसभक आधारपर बहुत पहिने ठाढ कोनो राजप्रासादक वर्णन कद्र दैत छथि । लोकसभ पूछत — ई कथा ठीके साचे छैक ? ... अथवा  एकगोट गल्प मात्रे अछि ई ? एहि सन्दर्भे हमरा एतबा कहबाक अछि जे ई ४० बर्ष पहिने हमर बाल्यकालक भावनामय दुनिया“मे घटल एकगोट घटना थिक आ’ एतेक दिनक बाद अपन स्मृतिक दूरबीनस“ आई हमरा ई जेहन देखाइत अछि तथा वत्र्तमानस“ संयोजनक पश्चात् जेहन एकर आकार बनि कद्र भद्र गेल छैक, हम तकरेटा ओहिना ओही रुपमे वर्णन कद्र रहल छी । ह“,  त कहि रहल छलहु“,  बात बहुत पुरान थिक । हमरासभक गुमस्ता आ’ घरक परम हितैषी मिसरजीके“ अपन कोनो काजस“ दडिभङ्गा जएबाक तैयारी करैत देखि हमहु“ जीद्द करय लगलियन्हि — मिसरजी,  हमहु“ जायब † अहा“ कतय जाएब, बौआ ? हमरा एकगोट काज अछि । काल्हिये तद्र हम  दौडले फिरि जाएब †  बेकारे हरान  होमए कथीले जाएब ? ” हम अपन जीद्द नहि छोडलहु“,  कहलियन्हि — हम दडिभङ्गा कहियो नहि गेल छी । ” ओहिठाम देखय लायकक किछुओ  छैक,  बौआ ? ” कहादोन दडिभङ्गा महाराजक दरबार छन्हि, हथिसार छन्हि, बडका अस्तबल छन्हि, कचहरी छन्हि आ’ बडका–बडका घरसभ छैक ... नहि मिसरजी,  हमहु“ जाएब । ” हमर जीद्द जीतल । हमहु“ एकगोट छोटका मोटरी लद्र कद्र मिसरजीक संगे दडिभङ्गा अयलहु“ । तहियाक दडिभङ्गा स्टेशन बुझू तद्र कङ्काले जका“ छल । निच्चामे पातर अलकतरा बिछायल बडका प्लेटफारम आ’ भितरस“ सटल एकगोट नाम टेबुलपर बाहरक कोलाहलस“ एकदम निद्र्वन्द्व भद्र मुडी गोंतने स्टुल–स्टुलपर बैसि अपन काज करैत  स्टेशनक कर्मचारीसभ । दोसरकात जिल्लाक बडका–बडका पदाधिकारीसभ ( जे तखने स्टेशनपर आयल रहैत छलाह । ) विश्राम करैत छलाह जतए कोरमे लाल मगजी लागल बेंतक गोनरिसनक बडका पंखा लटकल रहैत छल जकरा  एकगोट करिकबा कुल्ली  डोरी नेने बाहर भीतमे अडेंस लगोने औंघाइत घिचैत आ’ छोडैत रहैत छलैक । जेना–जेना डोरी तनाइत छलैक तेना–तेना भीतर कोठरीमे पंखाक डण्टी मचमचाइत हिलैत छलैक । भीतरक लोहाक घिरनी सेहो ओही सुरमे आब खसत तब खसत होइत खिर्र करैत नचैत रहैत छलैक ... एकटा प्लेटफारमस“ दोसरपर जाएबला बडका पुल तद्र निःसन्देह कङ्काले सन छल, गणितक गुणन चिन्हक आकारमे बनाओल ओकर घेरा लाल रंगमे रङ्गल रहैत छलैक । ...  ओना भरिदिन कोनो दैत्य जका“ ठाढ आ’ स्टेशनक सम्पूर्ण वातावरणक घोरल अस्तित्वके“ छपने ओ पुल रेल अबिते लोकसभक अकारणक व्यग्रतास“ थरथराय लगैत छल । ...  ओहिना स्टेशनोपर ... जखन गाडी अबैत छलैक तखन अत्यन्त चहलपहल, दौडधूप, भागमभाग, असंख्य कण्ठक तुमुल हाहाकार आ’ ताहिपर पान–सिगरेट–बीडी बेचयबलासभक कण्ठफोरबा चिकडनाईक साम्राज्य भद्र जाइत छलैक । गाडी स्टेशनपर पहुचिते कतय ने कतयस बेहिसाब असंख्य कुल्लीसभ बरबराकय पूरा प्लेटफार्मपर आ’ डिब्बा–डिब्बामे भरि जाइत छल तथा पसिंजरक मोटासभपर हाथ धरैत बुझू ने कब्जे करैत कहैत छल — एक्के पैसामे बाहर ...  पहुचा देब । ” दडिभङ्गा स्टेशनपर पहुचयस“ बहुत पहिनहिं पसिंजरसभ अपन–अपन मोटरी–चोटरी मिलाबय लागल छल । डिब्बामे हलचल मचि गेल छलैक । ... मिसरजी सेहो उठिकय अपन मोटाके देखलन्हि । सुरक्षित छलन्हि । बहुतो पसिंजर अपन–अपन समान गनय लागल — जम्मा कएगोट छल, अय ... ? एहिठाम त सातेटा देखैत छी । ... हू“  भेटल, एकटा मोटरी ओम्हर छल ।” बूढपुरानसभ धियापुताके“ सम्झाबय लगलखिन्ह —  हे रौ, एम्हर–ओम्हर नहि करिहे  हेरा जएबे । ...  दडिभङ्गामे बड्ड भीडभाड रहैत छैक । हमरासभके“ पकडने रहिहे ... नहि छोडिहे  ” घोघस झापि–तोपिकय अपनाके“ समेटने महिलासभ असंयत भद्र हडबडायल दृष्टिये“ चारुकात देखय लागलि छलि । ... हम तद्र पहिनहिस“ हडबडायले छलहु“, डिब्बामे चञ्चलता अबिते चटपट अपन मोटरीसहित उठि ठाढ भ तयार भ गेलहु“ । मिसरजी बजलाह — बौआ, कथिलए हडबडा गेलहु“ ? ... एखन बड्ड देरी छैक । भल त राजदरबार देखायल अछि । ... हे वा  देखियौक † ” ओ दहिना खिडकीलग आबिकय दूर देखाइत ललका दरबारदिसि आङगुर देखोलथि । हमहु व्यग्रतास गर्दनि उचका–उचकाकय दरबारदिसि ताकय लगलहु“ । रेल बेगस“ दौडि रहल छलैक सिसो, बास आ’ आमक फुलबारी दरबारके छेकि देलकैक । ... एक–दूटा कद्र छोटका–छोटका शहरिया सनक घरसभ देखाय लागल — ईंटाक दिवाल मुदा उपर खर वा खपडाक एकतल्ला घरसभ । एकचारी खसाकय बनाओल काम चलाउ दलानहेतु बरमदा निकलल घरसभ सेहो देखाय लागल । मिसरजी हमरा सम्झाबय लगलथि — बुझलिऐक, ओ ललका नौलक्खा दरबार थिकैक । ... नौ लाख रुपैया लागल छैक बनाबयमे” गोलगला गञ्जी पहिरने एखनतक एकदम निश्चल भ क एकगोटे श्लोक पाठ करैत बैसल छलाह । जेना हुनका असह्य भ गेल होइन्हि ओ चट् प्रतिकार करैत कहलखिन्ह — के कहलक जे ई नौलक्खा दरबार थिकैक ? ...  ओ दरबार त राजनगरमे छैक । एकरा बनाबयमे डेढ करोड रुपैया लागल अछि, डेढ करोड  ” अपन बात समाप्त करैत ओ एकबेर डिब्बामे चारुकात सगर्व दृष्टि घुमोलथि, जेना ओ दरबार हुनक अपन निजी निवास स्थान होन्हि आ’ लागत कम आ“कि मिसरजी हुनक हैसियतक अपमान कएने होइथिन्ह । यात्रीसभक ध्यान अपनादिसि सहजे आकृष्ट पाबि ओ महानुभाव अत्यन्त कुशलतापूर्वक खैनीक थूक खिडकी दने पिच्च द थूकैत आगा“ बढलाह — महाराजाधिराज बड्ड शौखस एहि दरबारक निर्माण करोलथि । हिन्दुस्तानमे ओहन कारीगरसभ नहि छलैक, तैं इटलीस कारीगरसभ मगाओल गेल । भीतरमे सभतरि ललका संगमरमर छाडल अछि,  ... आ’ सेहो इटलीयेस मगाकय  ... बडका–बडका ऐना छैक, आदमीस दोब्बर कदक ऐनासभ  ... शीशाक सभ समान बेल्जियमस“, पर्दा आ’ टेबुल–कुर्सी तथा  पलङ्गपरक कपडा, ओछाओन आ’ चद्दरिसभ प्रान्सिसी सिल्क, मखमल आ’ साटिनक थिकैक । काठक सम्पूर्ण समान फर्निचरसभ इङ्गल्याण्डस“ आयल छैक, बुझलिऐक ? ... डेढकरोड पडल छैक, डेढ करोड ” आखि फाडने सभ हुनकर गप्प सुनि रहल छलन्हि कि गाडीक गति किछु मध्यम भ गेलैक । यात्रीसभ फेर हडबडकय अपन मोटरी–चोटरीसभ मिलाबय लागल । हम फेरु ठाढ भ गेलहु“ । मिसरजी हमरा अन्तिम चेतावनी देलन्हि — हमरा किन्नहु नहि छोडब । ...   बड्ड हुलि रहैत छैक स्टेशनपर ” साचे स्टेशनपर बड्ड धक्कमधुक्का रहैक । डिब्बामे अकस्मात् कुल्लीसभक प्रवेश हुलिके आओर कसमकस बनाय देलकैक । कोलाहल एहन जेना कतहु अकस्मात् अगिलग्गी भ गेल होइक । एकटा छोटका कुल्ली हमरालग आयल आ’ कहलक — ई मोटा हम बाहर पहुचा देब । ... अधे पैसामे  ” बड्ड कलपि क ओ हमरा कहने छल । ओकरा देहपर एकगोट चिथडीयेटा रहैक । हम मिसरजीदिसि तकलहु । ओ बडी जोडस चिकरलखिन्ह — भाग ...  π ” सभस कठीन छल प्लेटफारमस बाहर निकलनाई । एकटा छोटका फाटक, सेहो अधे खोलल ।  बीच्चेमे ... पूर्ण अधिकारयुत्त भंङ्गमा लय एकगोट कर्मचारी ठाढ छल । ओकर ट्वीलक उजरा पेन्ट आ’ कोट रौदमे खूब चमकि रहल छलैक जेना प्लास्टर लगाकय चून पोतल होइक । कपडास“ बेशी ओकर कारीझाम मुहमे लागल तेल आ’ कपारपर बाहर निकलल माथक नाइट कैपक लोलपरक पेटेन्ट चमडा रौदमे खूब चमकि रहल छलैक । एकबेर त दहिना कातस निकलल हुलि हमरा धकेलैत मिसरजीक हात छोडा देलक । हम खूब जोडस““ मिसरजीक माथदिसि तकैत चिचिअयलहु““ —  मिसरजी... ..  ” फाटकपर ठाढ टिकटचेकर एकबेर पूर्ण अधिकारयुत्त गम्भीर वाणीमे सभके डटलक — एक–एक क क आउ ...  ठेलमठेल नहि करु ” कहुना क मिसरजीके“ पकडयमे सफल भ गेल छलहु“ मुदा एकबेर फेरो बडी जोरस धक्कमधुक्का आ’ ठेलमठेल भेलैक । हमरा फेरो धकिया क अलग ठेल देलक । अपन जान आ’ काख तरक मोटरी कहुना क बचबैत हम फाटकस बाहर निकललहु“ । मिसरजी कहलन्हि — आब मोदियाइन ओतय चलू । ...  ओहिठाम स्नान–ध्यान करब, ... खायब–पिअब आ’ ... फेर हम अहाके शहर देखाबय ल जायब । ” स्टेशनस बाहर ओतेक भीडभाड आ’ ठेलमठेल त नहि मुदा नीक चहल–पहल, हल्ला–गुल्ला आ’ दौड–धूप अवश्ये रहैक । स्टेशनक पछबरिया इनारपर चारुकात सयो आदमी रहल हएतैक — केओ पानि घिचैत त केओ भरैत, ... केओ नहाइत त केओ  दातके दतमनिस रगडैत । ... बहुतो ओहिना बहुत व्यस्त जका घोलघालमे लागल चिचिया रहल छल । इनारेलगक एकगोट हलुवाईक दोकानपर पुरी छना रहल छलैक । एकटा छौंडा हात घुमाघुमाकय बीच–बीचमे गहिंकीसभके सोर क रहल छलैक — आउ ... आउ शुद्ध घीकेर पुरी खाउ पंेडा, लड्डू ... ” सटले हलुवाई स्टुलपर बैसल कराहीमे खौलैत घीस“ फटाफट खूब फूलल गमगम करैत पुरीसभ छानि रहल छल आ’ उपर काठक चौकीपर बैसलि प्रायः ओकर कनिया“ पुरी तौलि रहलि छलैकि । मिसरजी शायद हमर लोभायल भावके“ तारि गेल छलाह । ओ हमरा कहलन्हि — मोदियाइन ओतय खूब स्वादिष्ट भोजनसभ भेटैत छैक । ... दामो कम  ” (अगिला अंकमे) उपन्यास- चमेली रानी जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी एक

”रे हे अरजुनमा! नकुलवा कँ संग नेने ने जाहिन्ह! देखै नहि छिहिन्ह जे ओकरा दाढ़ी-मांछ पनैप गेलैहें। ओ कहिया बालिग हेतै?“ अर्जुन घुमि कँ पाछां तकलक। ओकर बाप कमचीबला मचान पर बैसल बड़बड़ा रहल छैक। बाप यानी कीर्तमुख। कीर्तमुख कँ सात वर्षक भीतर पांचटा बेटा जनम लेलकै। ताहि कारणे ओकर जिगरी यार कन्टीर विचार देलकै जे पांचो पाण्डव बला नाम बेटा सबहक राखि दहक। सुभिता हेतौ। पहिल बेटा युधिष्ठिर छलै। युधिष्ठिर मुसरी घराड़ी पर अड्डा बनौलक आ सब बंदोबस्त क’ ठीक-ठाक क’ लेलक। उड़ैत चिड़ैया पकड़ि क’ बियाहो क’ लेलक। आब मुसरी घराड़ी सँ जीरो माइल तक ओकर एकछत्रा राज छैक। दोसर बेटा भीमा। निसानक पक्का। एक माणिकचंद सुपारी राखि दियौ। पाइन्ट टू टू पिस्तौल होइ वा एके सैंतालिस राइफल। मजाल की जे निसान चुकि जाए। पछिला इलेक्शन मे कानू सिंह, जे स्वयं पैघ अनुभवी डकैत रहि चुकल छल, ओकर जौहर कँ चिन्हलक। कहलकै”मेरा बडीगार्ड बन जाओ।“ भीमा आब सरकारी नौकरी मे सरकारी आवास मे रहैत अछि। कानू सिंहक मनीस्टर बनलाक बाद भीमाक रुतबा बहुत बढ़ि गेलैक अछि। ओ मालदह जिलाक रतुआ धोबिके बेटी रधिया पर आँखि गरौने अछि। एक ने एक दिन बियाह हेबे करतैक। भीमाक गलमोच्छा मे घी चुपड़ल रहैत छैक आओर देहाती लोक ओकरा देखिते डरि क’ पाथर बनि जाइत छै। तेसर बेटा अर्जुन। देखब त’ मोन होयत कि देखिते रही। परम सुन्दर कायाक मालिक। मजबूत कद-काठी, लम्बा बरछीसन जुल्फी आओर गरदनि मे झुलैत चानीक तमगा। अर्जुन हाइवे पर डकैतीक काज करै अछि। एखन तक कोनो बड़का माल हाथ नहि लगलै अछि। मुदा, आस पर दुनिया जीवै अछि। चारिम बेटा नकुल। कद-काठी मे ठमकल। थोड़ेक तोतराइत सेहो अछि। बाप के कहलकै”चिन्ता नहि करह। तोहर पाँचो बेटा मे हमही नामबला हेब।“ हमर काटल अहुरिया काटि क’ प्राण त्याग करत। पाँचम बेटा सहदेवा। सबसँ बेसी सुन्नर। पान सन कोमल। कीर्तमुखक आँखि मे सिनेहक नोर। हे परमेश्वर! एकर जीवन कोना कटतैक। जन्मेकाल ओकर माय शनिचरी मरि गेलैक। नीके भेलै। जाहि स्पीड सँ ओ बेटा सबहक जन्म द’ रहल छल से अधिक दिन जिबैत रहैत त’ कीर्तमुख कँ बेटा सबहक नाम पाण्डव बला छोड़ि धृतराष्ट्र बला राख’ पड़ितैक। आब शनिचरीक खिस्सा सुनू। बेतिया मे एकटा अंग्रेज हाकिम छल डेम्सफोर्ड। ओकर एक खबासिन छलै रूपकुम्मरि। साहेबक मोन, अंग्रेजक राज, शराबीक नजरि आ ताहू पर रूपकुम्मरिक लहकैत जवानी। रूपकुम्मरि कँ एकटा बेटी जन्म लेलकै। चमड़ी अंग्रेज सन, रूप हिन्दुस्तानी। आजादीक समय जखन डेम्सफोर्ड इंग्लैंड वापस जाय लागल त’ रूपकुम्मरि कँ बीच बाजार मे एकटा घर कीनि देलकै। ऊपर सँ चानीवला एक सौ रुपया द’ क’ ओ अपन पाप कँ हल्लुक केलक। रूपकुम्मरिक बेटी कँ बड़का-बड़का आँखि। ओकर नाम की हौउक? डेम्सफोर्ड गेलाक बाद बहुतो वीर रूपकुम्मरिक दलान मे कुश्ती केलक। ओही मे सँ कियो ओकर बेटीक नाम राखि देलकैसुनयना। सुनयना कनेक चेस्टगर भेल, दोकान-दौरीक काज करए लागलि, तखनहि ओकरा पर विधाताक लाठी बजैर गेलैक। रूपकुम्मरि डेम्सफोर्डक वियोग बहुत दिन तक नहि सहि सकलि। चटपट विदा भ’ गेलि। आब की होअए? मुदा सुनयनाक गात मे अंग्रेजक सोनीत। ओ कनेको ने घबड़ायल, ने ओझड़ायल। ओ बीच बाजारक घर बेचि, बेतिया शहरक एक कात मे, एक छोट सन घर कीनि लेलक। संगहि सतुआक दोकान सेहो खोलि लेलक। आब सतुआक सोहनगर गमक आ सुनयनाक रूपक पसाही, दोकान नीक जकाँ चलय लगलै। समय बितैत गेलै। सुनयना कँ एकटा बेटी भेलै। बेटी कोना भेलै से ककरो नहि बुझल छैक आओर अहूँ के बुझक काज की? बेटीक जन्म शनि दिन भेलैक आ ओकर नाम पड़लै शनिचरी। ओहि काल मे दिन-दुनिया कंग्रेसियाक पाँजर मे दबकल छल। सुस्लीस्ट पार्टीबला कखनहँू झोपड़ी मे त’ कखनहँ गाछ पर नुकायल रहैत छल। हँ, बेतियाक सुनयनाक सातुक दोकान सुस्लीस्ट भाइ लोकनिक अड्डा बनि चुकल छल। आठ आनाक साउत-नोनक घोर पीबि ओ सब विचार करैत छलाह, जुगुत लगबै छलाह जे अगिला इलेक्शन मे कोना कंग्रेसिया कँ पछाड़ब। समय ककरो रोकने ने रूकै छै। आब सुनयना पचासक धक मे आ शनिचरीक बुझू सोलहम। सुस्लीस्ट भाइ सब ओहिना थाकल-चूरल। मुदा, ओहि दिन एकटा विलक्षण बात भेलै। साँझक समय, कनिएँ काल पहिने बिहारि उठल छलै, फेर एक अछाड़ पानि सेहो बरसल छलै। ओहीकाल एक कम उमिरक सुस्लीस्ट भाइ सुनयनाक दोकान पर आयल। सुनयना परिचय-पात पुछलकै, आगत-स्वागत केलकै त’ पता चललै जे हिनकर नाम रामठेंगा सिंह ‘चिनगारी’ छनि। चिनगारीजीक गाम मिरचैया, बछबाड़ा टीसन सँ आध कोस पच्छिम। गाम मे हुनका सात बीघा जमीन आओर दूरा पर दूटा महीस। चिनगारीजी पहिने कम्युनिस्ट बनलाह। मुदा चक्काजामक मिटिंग मे सिपाहीक से ने डांग हुनका पीठ पर पड़लनि जे तत्काल कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ि चिनगारीजी सुस्लीस्ट बनि गेलाह। ओ पार्टीक मीटिंग मे बेतिया आयल छलाह। एतए अबिते पता लगलनि जे बैकुण्ठ भगत, माने सुस्लीस्टक शिरोमणि, एकटा धाकर कँग्रेसिया नेताक चालि मे फंसि क’ पार्टी छोड़ि काँग्रेस मे प्रविष्ट क’ गेल छथि। आब की होअय? चिनगारीजी भुतियाति-भुतियाति सुनयनाक सातुक दोकान मे पहुँचि गेलाह। सुनयना चिनगारीजी कँ देखिते मोने-मोन किछु निश्चय केलनि आ पुछलकनि”औ चिनगारीजी, रौआ ठीक-ठाक बोलब। रौआक बियाह भेल हए कि ना?“ चिनगारीजी टकटकी लगाक’ शनिचरी कँ निहारि रहल छलाह। इच्छा भेलैन्ह जे आध-मन भारी झूठ बाजी। कहियैक जे हमर की, हमर बापोक बियाह नै भेल रहन्हि। मुदा सम्हरि गेलाह। मात्रा एक पावक झूठ बजलाह जे एखन तक कुमारे छथि। सुनयना आओर शनिचरी मिलि क’ चिनगारीजीक खातिर करै लागलि। राति मे सुतै सँ पहिने सुनयना चिनगारीजी कँ बुझबैत कहलकनि”रौआ, हमर बात के धियान से सुनल जाओ। सुस्लीस्टक जमाना आ गेल बा। उचक्का, जेबकतरा आ डकैत सब अही देश के नागरिक। सबकँ समान अधिकार। तू बड़ काबिल त’ एक भोट, हम मूरख त’ एक भोट। रौआ भोट कँ संग-संग जात कँ चिन्ही, पाँत कँ चिन्ही। बाध-बोन मे गोइठा छिड़िआल बा। ओकरा जमा करी आ सब चैक-चैराहा पर जला दीं। समूचा प्रदेश मे आग अपने-आप पसरि जाइ।“ सुनयना थोड़ेक सुस्ता क’ फेर बाजलि”रौआ, सुनली की ना? आजादीक तपतपायल एकटा बुढ़बा नेता राजधानी मे आ गेल वा। जा, जाके ओकरा गोर मे नोर बहाब’। ओकर आशीर्वाद पड़ी त’ पटना के साथ-साथ दिल्लीक राज तोहार।“ औरो सुनल जाओ। सुनयनाक फिरंगी भूत ओकर माथ पर चढ़ि के बाजि रहल छल। दृ”पुरना कँग्रेसिया मर-खप गेल। ओकर लड़िकन नेता बनैक वास्ते मैदान मे उतरल वा। सरौं सब आँखि मे सुरमा लगाबयबला, सोना कँ चेन मे रूद्राक्षक माला पहिरैबला आऊर मौगिक माफिक माथक बीच मे सौंथ करैबला, आब राजनीति का करिहेएँ। कँग्रेसियाक जमाना खत्मे बुझीं आओर सुस्लीस्टक जमाना दमकैबला बनल बा।“ चिनगारीजी सुनयना सन महान गुरुआनिक उपदेश सुनि नतमस्तक भ’ गेलाह आ एक दिन सुनयनाक बेटी शनिचरीक हाथ पकड़ने बछबाड़ा टीसन पर पहुँचि गेलाह। बछबाड़ा टीसन पर पहुँचलाक बाद चिनगारीजी कँ होश भेलनि‘अरौ बाप रौ बाप। गाम कोना जायब। घर मे कनियाँ आ तकर एकटा बेटा।’ चिनगारीजी बछबाड़ा टीसनक उतरबरिया सिगनल लग शनिचरी संग बैसल तम्बाकू थूकै छलाह आ सोचैत छलाह‘मानलहुँ नेतागिरी मे थोड़ेक जोश हेबो करैत छैक। मुदा, ई कोन जोश भेलै? गाम जाइत देरी बुझू जे नाम गेल, जाइत-पाति मे धाख गेल आ नेता बनबाक सपना चूर-चूर भऽ गेल। शनिचरी कँ अपना संग आनि बड़का आफद बेसाहि लेल।’ राति एक पहर बीति गेलै। चिनगारीजी कँ ओहुना चारू कात अन्हार देखाइ पड़ैत छलनि। कहबी छै, भगवान बेर पर सबहक मददि करैत छथिन्ह। खास क’ ओकर जकरा नेता बनैक होइक, देशक बागडोर संभारक होइक। चिनगारीजी कँ एकाएक मोन पड़लनिकनही मोदियानि। कनहि मोदियानिक डेरा हाइवे सँ पाव भरि जमीन पाँछा आओर रेलवे पटरी सँ कनिकबे हटल, तीन बटिया रस्ताक मोहार पर बेस पाँच-छः कट्ठा जमीन मे पसरल रहैक। पाँचटा महींस, सात-आठ टा गाय आओर बोतू संगे एक दर्जन बकरी। एखन तक लाइन होटलक चलती नहि भेल छल। कनही मोदियानिक ओहिठाम खेबा-पिबाक सब इन्तजाम। सोनहाइत दूधक खीर वा पच्चहतरि नम्बर बला दारू। जे चाही से भेटत। नगद सेहो, उधार सेहो। रात्रि-विश्राम, नेवारबला खाट, गंगाकातक पवित्तर छौंड़ी, सब किछु ओतए उपलब्ध छलै। ट्रक ड्राइवर, पनपैत छोटका बड़का नेता, सबहक जमघट छल कनही मोदियानिक लग। जखन शनिचरीक हाथ धेने चिनगारीजी कनही मोदियानिक डेरा पर पहुँचला त’ राति एके पहर बाँकी छलैक। इजोरिया उगि गेल रहैक। इजोरिया मे शनिचरी ओहिना चमकैत रहअय जेना सिनेमा मे हिरोइन। कनही मोदियानि मे सबसँ बेसी खूबी छलै ओकर धैर्य आ अकाश तक देखैक गुण। ओ धियान लगाक’ चिनगारीजीक सब गप सुनलक। फेर बाजल”वाह! तूँ सरिपों चिनगारी छह। नेता बनैक सबटा नक्षत्रा तोहर कपार मे लिखल छह।“ फेर कनही मोदियानि शनिचरीक चतरायल जवानी कँ निहारि मुँह मे मिसरी घोरैत बाजलि”ताँ एकरा हमरा जिम्मा छोड़ि जा। तुरंत पटना जा क’ ओहि बुढ़वा नेताक शरणागत हुअ’। हम शनिचरी कँ पेटार मे झांपि क’ राखब। ताँ जखन विधायक बनि जेबह, त’ अबिह। शनिचरी कँ तहतर्ज हम वापिस क’ देबह। तोरा कोनो खरचा नहि लगतह। हँ, पटना जेबा लेल, नेता बनै लेल, एखन एक सौ टाका दैत छिअ। घट’ त’ औरो मांगि लिह’।“ चिनगारीजी गदगद भ’ क’ कनही मोदियानिक चरण धूलि माथ मे लगौलनि आ बिदा भ’ गेलाह। कनही मोदियानिक उधारी मे सब दिन बरक्कत भेलैए। चिनगारीजी पटना पहुँचलाह। ओहि बुढ़बा, अजादीक लड़ाइक विख्यात सिपहसलारक चरण मे समर्पित भेलाह। ओना, पहिने सँ ओहि नेताजीक अपियारी मे बहुतो बुआरी, सौउरा आ कबई सब कुदि रहल छलै। चिनगारीजी ओही झुंड मे सन्हिया गेलाह। प्रान्तक राजनीति कँ के कहअय, देशक राजनीति मे भयंकर भूकम्प एलैक। अहि देशक प्रजातंत्रा अपन असली तंत्रा कँ प्रगट केलक। सुस्लीस्ट भाइ लोकनि सब दिन तिरस्कृत रहला, एलेक्शन जीत गेलाह। कँग्रेसिया पिछड़ि गेल, बुझू रसातल मे चलि गेल। चारू कात एकेटा गप। होली बीतल गाली मे, कँग्रेसिया खसल नाली मे। ठक्कन मोची, चनमाँ साफी, किरांइ मुसहर, जगुआ केऔटक संगहि संग राम ठेंगा सिंह ‘चिनगारी’ सब विधायक आ फेर मनीस्टर। चिनगारीजी विधि मंत्री बनलाह। शपथ लेबा काल हुनक ठोंठ मे बग्घा लागि गेलनि। मंत्रीक कुर्सी पर बैसलाह त’ पोनक गिरगिट माथ मे पैसि गेलनि आ विधिक अर्थ बुझै मे हुनका जे  (अगिला अंकमे) १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) १.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मैथिली भाषा आ साहित्य ऋगवेदक भाषाक अध्ययन-अनुशीलन, चिन्तन-मनन, विवेचन-विश्लेषणसँ अवबोध होइत अछि जे वैदिक युगमे तीन उपभाषा प्रचलित छल- “उत्तरक भाषा”, “मध्यक भाषा”, आ “पूर्वी मध्यक भाषा”। ब्राह्मण ग्रन्थक अवगहनोपरान्त एहन प्रतीत होइत अछि, ओही भाषा सभकेँ क्रमशः “उदीच्च”, “मध्यदेशीय”, एवं “प्राच्य” भाषाक नामसँ सम्बोधित कएल गेल। प्राच्य बोली अर्द्ध मागधी आ मागधी प्राकृतक साक्षात माय छलीह। “पूर्वी हिन्दी” आ “कौसली” क स्रोत अर्द्ध मागधी थिक। एखन मागधी अपभ्रंशक अत्याधुनिक प्रतिनिधित्व बाङ्ला, असमिया, ओद्इया, मैथिली, मगही आ भोजपुरी कऽ रहल अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे स्पष्ट भऽ जाइछ जे मैथिली आर्यभाषा परिवारक एक प्राचीनतम भाषा थिक। एकर उत्पत्ति पूर्वी प्राकृतक पूर्वी कोष्ठ मगध विदेह प्राकृतसँ भेल अछि। प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे एकर अनेक नाम प्रकाशमे आयल अछि। विश्वकवि विद्यापति (१३५०-१४५०) एकरा “अवहट्ठ”, लोचन (१६५०-१७२५), “मिथिला अपभ्रंश”, बेलिगत्ती (beligatti),”तिरहुतिया”, वा “तिरहूतियन” आ सुभद्र झा (१९०९-२०००), “मिथिला अपभ्रंश” नामे सम्बोधित कयलनि। मिथिलाक भाषाक उल्लेख “आइने अकबरी”मे सेहो भेल अछि जतय एकरा पृथक भाषाक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। आधुनिक कालमे मैथिली नाम सर्वाधिक प्रचलित अछि। ई नाम जे लोकप्रियता अर्जित कएलक तकर सब श्रेय छनि हेनरी थॉमस कोलव्रुककेँ जे सर्वप्रथम एशियाटिक रिसर्चेज भाग-७, पृष्ठ १९९ पर हुनक संस्कृत आर प्राकृत सम्बन्धी निबन्धक अन्तर्गत भेटैत अछि। तत्पश्चात् सिरामपुर मिशनरी द्वारा अपन सोसायटीक १८१६ ई.क छठम मेम्वायरमे अन्य आर्य भाषा सभक संग तुलना करैत मैथिली शब्दक उल्लेख कयलनि अछि(इण्डियन एण्टीक्वेरी १९०३, पृ.२४५)। पाछाँ जा कऽ एस.ड्ब्लू. फेलन, विशप कैम्पबेल (१८१४-१८९१), डॉ. हार्नेले (१८४१-१९१५) आऽ केलाग आदि विद्वत्-वृन्द स्थल-स्थलपर मिथिलाक भाषा मैथिलीक चर्चा कयलनि अछि। पाश्चात्य विद्वत्-वृन्दमे मैथिलीक सबसँ उल्लेखनीय सेवा डॉ. जार्ज अव्राहम ग्रियर्सन (१८५१-१९४१) कयलनि। वस्तुतः ग्रियर्सन द्वारा मैथली शब्दक प्रचार कयल गेल आ मिथिलाक भाषाक अर्थमे कयल जाय लागल। (अगिला अंकमे) २. डॉ. देवशंकर नवीन डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ) सोनामामी संग देवकान्तक वार्तालाप, मानवीय मनोवेग, प्रेमपाशमे बान्हल दू व्यक्ति, आ सामाजिक मर्यादा, पारम्परिक सम्बन्धक खुट्टीमे जकड़ल मानवक मोनक उद्वेगकें रेखांकित करैत अछि। व्यवस्था आ मर्यादाक बन्धन आ मनोवेगक स्वच्छन्द-कामनामे कतहु एक आरि-खेत नहि होइत अछि। एहि दृश्यकें ÷आदिकथा'क घटना-सूत्रा रेखांकित करैत अछि। सुशीलाक एहेन चरित्राांकन मिथिलाक अयथार्थ आदर्श आ अव्यावहारिक  मर्यादाकें नाँगट केलक अछि, एहिसँ रूढ़ि-पोषक लोकनि व्यथित जते भेल होथि, मुदा मैथिलीमे नव-चिन्तन पद्धतिसँ उपन्यास-कथा लिखबाक परम्पराक नव सूत्रापात भेल आ नव पीढ़ीक, नव दृष्टिक उद्योगसँ मिथिलाक ई बर्बरता समाप्त भेल--से प्रसन्नताक बात थिक। राजकमल चौधरीक दोसर उपन्यास थिक -- आन्दोलन। एहिमे नाटकीय शैली पर विशेष जोर अछि। मुदा उपन्यास इहो मनोविश्लेषणात्मके अछि। नाटकीय शैलीक गद्यमे मनोविश्लेषणक सुविधा ताकब आसान नहि होइत अछि, मुदा राजकमल चौधरीक कथा-कौशलकें ई सब सुविधा तकबामे कोनो तरद्दुत्त नहि होइ छनि। सुगठित शिल्पमे सामाजिक यथार्थक मौलिक चित्रा अंकित करब हिनकर रचनाक मूल स्वभाव थिक। व्यतीत आ वर्त्तमानक घटना-चक्रक आश्रयसँ सम्भाव्य दिश इशारा एहेन कौशलसँ करै छथि जे ओ रचना एकदम सहज आ नागरिक जीवनक दैनिक व्यवस्था जकाँ लगैत अछि। कथानक एकटा बेरोजगार युवक ÷कमल'क कलकत्ता महानगरमे रोजगार प्राप्ति हेतु प्रवेश आ कलकत्ता प्रवासक क्रममे उपस्थित विभिन्न दृश्यावलोकनक क्रमबद्ध नियोजन पर आधारित अछि। मूल कथा भाषा-प्रेमसँ ओत-प्रोत मैथिली आन्दोलनक विविध चरणकें रूपायित करैत अछि। विवरण-विस्तारमे एहि आन्दोलनक नग्न स्वरूप सोझाँ अबैत अछि। मैथिल जातिक मत-भिन्नता, ईर्ष्या-द्वेष, धोखाधरी इत्यादि अपूर्व कलात्मकतासँ चित्रिात भेल अछि। कथा-सूत्राक विस्तारमे पात्राक अवतारणा आ उपकथाक समावेश परम विश्वसनीय आ सहज यथार्थक संग भेल अछि। उपन्यासकारक कहब छनि जे आजुक मनुक्खमे तीन प्रवृत्ति मुख्यतः देखल जाइ'ए-- क्षुधा, आत्मरक्षा आ यौनपिपासा। एहन तीन प्रवृत्तिक चित्राांकन लेखकक प्रधान प्रयत्न रहल अछि। -- वस्तुतः एहि उपन्यासमे ई तीनू प्रवृत्ति बेस फरिच्छ भेल अछि। उपन्यासक पात्राकें जाहि जीवन्त रूपें रचनाकार एतए ठाढ़ कएने छथि, ताहिमे मैथिल चरित्रा आ मिथिलाक परिदृश्य पूर्ण विवरणक संग उपस्थित भ' जाइत अछि। राजकमल चौधरीक सृजन-कर्मक ई खास विशेषता थिक जे हुनका ओतए व्यक्ति आ व्यक्तित्व बड़े महत्त्वपूर्ण भ' उठैत अछि। व्यक्तिक जीवन-लीला, रहन-सहन, सोच-विचार, आहार-व्यवहारकें अंकित करैत ओ सम्पूर्ण परिदृश्य गढ़ि दै छथि। तें राजकमल चौधरी द्वारा सृजित चरित्राक मानसिक उद्वेग आ भौतिक करतब पर विवेकपूर्ण दृष्टि राखि ली, तँ हुनकर सम्पूर्ण रचनाक समालोचना भ' जाएत। हिनकर सकल पात्राक आचरण आ मनोवेग, ओकर आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, मानसिक हैसियतक परिचायक होइत अछि। कोन परिस्थितिक कोन मनोवेगमे मनुष्य कोन आचरण करै'ए--से पूरापूरी एतए व्यक्त होइत अछि। एहि तरहें चारित्रिाक विश्लेषण करैत उपन्यासक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बूझल जा सकैत अछि। राजकमल चौधरीक सगरो रचना-विधानमे पात्राक सृजन आ चरित्राांकन स्पष्ट आ विलक्षण अछि, मनोविश्लेषण आधारित क्रिया-कलाप आ आहार-व्यवहार तार्किक आ समीचीन अछि। समस्त पात्राक जीवन-प्रक्रिया आ रहन-सहनमे मनोविश्लेषणक सुविधा छिड़िआएल रहैत अछि, जकर आधार पर ओकर अर्जित जीवन-दृष्टिक सूक्ष्म अध्ययन कएल जा सकैत अछि। कोनो व्यक्तिक चिन्तन-व्यवस्था कोन विवशता आ व्यवस्थामे निर्मित भेल; कोन क्रिया-कलाप ओ कोन परिस्थितिमे पूर्ण केलक-- से जानि सकबाक सुविधा मनोवैज्ञानिके धरातल पर स्पष्ट होइत अछि। चरित्राांकनक इएह उत्कर्ष आ इएह कौशल एहि उपन्यासक प्रभावकें वैराट्य दैत अछि। भाषा, विषय, विवरण, शिल्प...सब किछु मानवीय, सहज, सामाजिक, जीवन्त, प्रामाणिक आ विश्वसनीय! आन्दोलन उपन्यासक नायक ÷कमल' मिथिलाक सुशिक्षित, परम विवेकशील आ प्रतिभावान युवक छथि। आत्म-स्थापनक उद्देश्यें कलकत्ताक महानगरीय परिवेशमे बौआ रहल छथि। नीलू सन अल्प वयस किशोरी अथवा नवयुवतीक उन्मादित समर्पण अथवा अल्हड़ आमन्त्राण नकारि देलनि; मुदा वासनाक राक्षससँ मुक्ति पाब' लेल अन्हार आ बदनाम गली धरि चल गेलाह। आदर्श आ सद्पात्राताक प्रतिमूर्ति भुवनजी मातृभाषा आ मातृभूमिक प्रसार-प्रगतिमे तल्लीन छथि, मुदा कोनो खास कारणें हुनकहुमे विचलन आबि गेल छनि। निर्मला सन अत्याधुनिक सुकामा, सुवर्णा स्त्राी भुवनोजीकें हिला दै छनि। भुवनजीक पत्नी निरक्षरा आ कुरूपा छनि। निर्मला जी सन सुकामा स्त्राीक यौवन, रूप लावण्य, आधुनिक चटक-मटक पर हुनकर लहालोट हैब स्वाभाविक आ यथार्थ थिक। मानव सभ्यताक इतिहासक कहै'ए जे मनुष्य अपन विराट छवि ठाढ़ कर'मे तल्लीन रहै'ए, विराट भ' जाइ'ए, मुदा मानवीय कमजोरी ओकरा संग रहै छै। अइ उपन्यासमे उपन्यासकार भुवनजीक छवि अति विशिष्ट आ निविष्ट रूपमे ठाढ़ कएने छथि। मुदा जँ सएह टा रहितए, तँ भुवनजी कोनो दन्तकथाक नायक बनि जैतथि। समस्त वैशिष्ट्यक अछैत मानवोचित दुर्बलता रेखांकित क' कए उपन्यासकार वस्तुतः भुवनजी आ कमलजी--दुनूकें यथार्थसँ जोड़लनि अछि। सुशीला बहुगामिनी स्त्राी छथि, नित्य प्रति नव-नव पुरुखक बाँहिमे झूलए चाहै छथि। दोसर स्त्राी छथि सुशीला, ओहो अनेक पुरुखक संगें समागम करै छथि। मुदा तें, दुनू स्त्राी समान नहि छथि। पर-पुरुख समागम सुशीलाक विवशता छनि, अर्थोपार्जनक आधार छनि, जीवन-यापनक ठहार छनि, माइ-बाप संग अपन भरण-पोषण हेतु अन्न-वस्त्रा चाही। देहे टा पूँजी छनि, तकरहि भेजबै छथि, कूटि-पीसि गुजर करै छथि। मुदा निर्मलाक विवशता अर्थाभाव नहि छनि। ओ कामातुरा छथि। यौन-पिपासासँ व्याकुल रहै छथि। कोनो सम्पूर्ण पुरुखक सम्पूर्ण भोग लेल तत्पर रहै छथि। ... एकटा देह बेचै छथि, एकटा देह बिलहै छथि। एकटा आत्मबुभुक्षाक तृप्तिमे कोनो नैतिक-अनैतिक काज लेल तत्पर छथि, दोसर यौनपिपासा शान्त करबा लेल उताहुल। आन्दोलन उपन्यासक केन्द्र-बिन्दु थिक आत्मबुभुक्षा, यौनपिपासा, आत्मसुरक्षा। सत्य थिक, आ राजकमल चौधरीक मान्यता छनि, जे मानव जीवनक आदिम आवश्यकता इएह तीन होइत अछि। ओना मनुष्य की, प्राणी मात्राक आदिम प्रवृत्ति इएह तीन टा होइत अछि। शेष सभ प्रवृत्ति--ईर्ष्या, द्वेष, राग-विराग, लोभ-लालच, पक्ष-विपक्ष, झंझट-फसाद, खून-खुनामय... सब किछु लोक एतए आबि कए, जीवन जीबाक क्रममे विकसित करै'ए; उल्लिखित तीनू प्रवृत्ति मनुष्य जन्महिसँ संग नेने अबैत अछि। अही तीनू प्रवृत्तिक निपटानमे किओ अपन छवि कुतुबमीनार सन ऊँच क' लैत अछि, किओ अपन कुतुबमीनार सन छविकें सड़ल पानिक नाली बना लैत अछि। आन्दोलन उपन्यासकें अइ आलोकमे देखब समीचीन थिक। उपन्यास उत्तम पुरुषमे लिखल गेल अछि। कथानायक कमलजी जीवन-संग्राममे जुटल छथि, आत्म-स्थापनमे लागल छथि; भाषाई आन्दोलनमे अपनाकें बलिदानी घोषित केनिहार मैथिल लोकनिक समस्त र्छंिकें प्राथमिक आ मौलिक अनुभव जकाँ देखि-भोगि रहल छथि। मैथिल जातिक र्छंि-पाखण्ड, राग-द्वेष, वासना आ नपुंसकताकें, आ एहि वृत्तिकें छपा रखबाक मनुष्यक कौशलकें निकेनाँ चीन्हि रहल छथि; इएह कथानायक अइ उपन्यासक कथावाचक छथि। कलकत्ता महानगरमे जीवन-यापन करैत विभिन्न आय-वित्त आ बुद्धि-वित्तक प्रवासी मैथिलक क्रिया-कलापसँ परिचित छथि। निर्मलाजी आ सुशीलाजी जाहि वर्गक मैथिल स्त्राीक प्रतिनिधि छथि, ताहि दुनू वर्गकें निकटसँ देखने छथि। कमलजीक नजरिमे निर्मलाजी छथि क्लयोपैट्रा, रूपोद्धता, प्रति निशि नव प्रेमीकें साँपसँ कटबा क' मरबा दै वाली विकटकामा। सुशीला छथि निश्छल, निस्पन्द, क्रिया-शून्य, सभ किछु हेरएने बिसरएने रस्ता पर ठाढ़ि, जे केओ पुरुख आबए आ किछु टाका द' जाए! सुशीला छथि ओ नारी, जे नुका-चोरा क' नहि, धोखा-धड़ीसँ नहि, एकदम सफा-सफी अपन अस्तित्वकें बेचि रहल छथि! श्यामा नयनाभिरामा कुसुम-सुषमा-रंजिता सौख्यधामा नहि, देह पर मैल, फाटल साड़ी, ओछान पर पुरान, मँहकैत चद्दरि, आँखिमे निर्लज्जता, भाव-शून्य, निष्काम, पाथर बनि गेल पुतली। छिः छिः, सुशीला आ निर्मलाजीमे कोनो तुलना भ' सकैछ (आन्दोलन/पृ०. ३९)! राजकमल चौधरीक रचना संसार पर बहुतो गोटए बहुत तरहक बात कहलनि अछि। हिनकर औपन्यासिक-कौशल पर कतोक गोटएकें एकसूत्राताक अभाव देखेलनि।... समग्रतामे देखी तँ भारतीय नागरिक, अथवा मैथिल नागरिकक सम्पूर्ण जीवन परिदृश्य हिनका नजरिमे कौड़ी जकाँ जगजिआर अछि। सामाजिक जीवन व्यतीत करबा लेल संस्थापित समाज-व्यवस्था, भारतीय लोकतन्त्रा, मानवीय जीवन-पद्धति, जीवन-यापनक बुनियादी सीमा-शर्त, जिजीविषाक अपरिहार्य वृत्ति, मानवीय मनोवेग, मनुष्यक अभिलाषा, अस्तित्वक अविचल यथार्थ... सब बिन्दु, पर विरोधाभास आ विडम्बनाक जुलूस देखाइत अछि। राजकमल चौधरी अही जुलूसमे देखलनि जे सिद्धान्त आ व्यवहार, वचन आ आचरण, जीवन आ लेखनमे कोनो तरहक पारस्परिक सम्बन्ध-बन्ध, स्थापित नहि अछि। लोकतान्त्रिाक व्यवस्थामे मानवीय सम्वेदनाक रक्षा हेतु जे आचार संहिता घोषित भेल अछि; अथवा मिथिलाक नैतिक शिक्षामे जे पाठ पढ़ाओल गेल अछि; तकर अनुपालन अइ भाग्य विधाता वर्गक कोनहु टा आचरणमे नहि भ' रहल अछि; आ व्यावहारिक स्तर पर जे भ' रहल अछि, से मानवीय जीवन पद्धति लेल कोनो अर्थें उपयोगी नहि अछि। एहि विचित्रा विडम्बनाकें राजकमल चौधरी उठबैत रहलाह आ जस के तस रखैत गेलाह; अही कारणें हिनकर उपन्यास विडम्बनासँ भरल, परस्पर विरोधाभासी आचरणसँ भरल समाज-व्यवस्थाक चित्रा-खण्डक कोलाज लगैत अछि। पारम्परिक पद्धतिसँ शिक्षित-दीक्षित समीक्षक लोकनिकें जें कि राजकमल चौधरीक उपन्यास अथवा कथामे कथासार अथवा कथानक नहि भेटै छनि, तें हुनका लगै छनि, जे एहि रचनामे एकसूत्राताक अभाव अछि। एहेन समीक्षक लोकनिकें प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय द्वारा नवसाक्षर लेल प्रकाशित  कहानीक पोथी पढ़बाक चाही, जाहिमे समस्या, समस्याक कारण आ समस्याक समाधान खोंसैत कहानी लिखल जाइत अछि आ अन्तमे पूछल जाइत अछि--त' अहाँकें एहि कहानीसँ की शिक्षा भेटल? सत्य थिक जे वस्त्राक भीतर हरेक मनुष्य नाँगट होइत अछि। वस्त्रा पहिरैत अछि परदा लेल। ओना तँ सबहक सब बात लोककें बुझले रहै छै। हरेक सन्तानकें बूझल रहै जे हम अइ दुनियाँमे कोना एलहुँ आ हरेक माइ-बापकें बूझल रहै छै जे ओ अपन सन्तानक विवाह किऐ करौलनि अछि। मुदा एकटा मर्यादाक खुट्टी छै, जाहिमे सामाजिक पशु बान्हल रहैत अछि। स्वातन्त्रयोत्तर कालमे, आ एम्हर आबि कए त' आओर बेसी, ई बात लागू भ' गेल अछि। मनुष्यक भौतिक नग्नता पर नहि, मानसिक आ वैचारिक नग्नता पर। सब व्यक्तिक स'ब बात स'ब कियो जनैत अछि, मुदा स'ब व्यक्ति अपन ओहि समस्त आचरण पर, वृत्ति पर परदा देबा लेल कोनो ने कोनो नैतिक बातक परदा देब' चाहै छथि। कहि नहि, मनुष्य स्वयंकें ठकबा लेल एते बेसी बिर्त्त किऐ रहै छथि! दुनियाँक लोक तँ सबटा बात बुझिते रहै छै। (अगिला अंकमे) 1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल। शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेलडा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि। मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रतिजग्गापिकनीकके बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपनाकेँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे  जरैत रखबा लेल ओ ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सबएकरा अजगू त बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास भेलनि। सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत करब।सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा केँ साकारकरबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने केँ विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिकआवास पर होअय। पहिल आयोजन 24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमेअशोकक डेरा पर राखल गेल छल जेस्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणेँ। आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहिआयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयकस्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21 जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखकेँ भोरे दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहकअसुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष चर्चा होएत।अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक विचार अछि। अहाँक आगमुनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कमार चैधरी। एही प्रकारेँ सगर रातिक अवधारणाकेँ प्रभास कुमार चैधरी साकार कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाआगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहिसाँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल। डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त, भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक पाठ कएल।साहित्यकारकस्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जेसमाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएलजाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यककए देल गेल।एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल। एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वाराप्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाककथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीकाविश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँकथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपेँ आयोजनक भार लेल जे श्री विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेलअछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखलजा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि। दरभंगाक आयेजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहिअवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं। प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सनकार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसारदरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवशआयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाकेँ सौपि देने छलाह। प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि। ओना मजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि। कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल।संयोजक मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाकेँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्दचैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमकेँ मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह। विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र प्रकाशित भेल। श्वेत पत्रमे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमकेँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ विराटनगर,नेपाल पहुंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना। पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुंचि गेल। सुपौलसँ बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल। ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल । किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटेअपनाकेँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण अछि- 1.अस्वास्थ्य, 2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘ 3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं 4.कार्यालयीन व्यस्तता। एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणेँ आब सम्मिमलित नहि भए पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु, सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट मंतव्यसँ चर्चाकेँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाकेँ पूर्णतःसमेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणेँ डा.भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद  कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी एवं अनुत्पादक भए गेल अछि।  सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछतेँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि- 1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि, 2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘ 3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर। पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाकसंख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर बहेरामे संग भेलाह।ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँकए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि। एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त विचारकेँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चाबहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब खटकैत रहैत अछि।कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गाण छक। तेँ कवि लोकनि गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवंअपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणेँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि। एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूकेँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगतपोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक प्रभाव। रचनाकारकेँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर। कवि सम्मेलनमे आयोजककेँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि । सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकारजकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माकेँ भरि राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारकबीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुचैत छथि। कथा पढैत आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि। जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरणबनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभलक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह। सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची, जमदेशपुर देवघर पूर्णियां आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,इहो शुभ लक्षण थिक।मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही। सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 केँ भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट। ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि- ‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलनबढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेँबुू जे लेखकीय ल तझअस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराकेँ बल देल। सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।मैथिली निरपवाद रूपे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत। साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। - (अगिला अंकमे) प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र(१९४५- ), पूर्व अध्यक्ष, इतिहास विभाग, ल.ना.मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा। अनुवादक, निबन्धकार। प्रकाशन: तमिल साहित्यक इतिहास, भवभूति (दुनू अनुवाद)। मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र पूर्णियाँ जिलाक पंजीकार परिवारमे उत्पन्न पं. मोदानन्द झा आधुनिकताक कसौटीपर अनुदार मुदा पारम्परिकताक कसौटीपर उदार, विद्वान आ विद्वत्ताक सत्संगति लेल आतुर, विलक्षण प्रतिभासँ सम्पन्न व्युत्पन्नमतित्व वाला मिथिलाक अत्यन्त सम्मानित पंजीकार छलाह। पंजीशास्त्र हुनका पूर्णतः अधिगत छलनि आ ओ पंजीसँ जुड़ल ककरहु कोनो जिज्ञासाक समाधान लेल सदैव तत्पर रहैत छलाह। ओ वस्तुतः मिथिलाक विभूति छलाह जनिकर स्मृतिक संरक्षणार्थ जे किछु कयल जायत से थोड़ होयत। पूर्णियाँ जिलाक रसाढ़ ग्रामक रहनिहार पं मोदानन्द झा पड़वे महेन्द्रपुर मूलक ब्राह्मण छलाह आओर विस्तृत कृषि-भूमिक कारणे बादमे शिवनगर ग्राममे रहय लगलाह। रसाढ़ आ शिवनगर दुनू धर्मपुर परगनान्तर्गत अवस्थित अछि। १९१४ ई.मे उत्पन्न ओ अपन माता-पिताक एक मात्र पुत्र छलाह। परम्परासँ हुनकर परिवार पंजीकारहिक छलनि आ हुनक पिता भिखिया झा ई व्यवसाय करितो रहथिन। ओ मुदा नीक कृषक रहथि आ हुनकर बेसी समय ओहिमे लगनि। हुनका २०० एकड़सँ बेशीक जोत रहनि। ओ अपने प्रायः शिक्षितो नहियें जकाँ रहथि, मुदा अपन पुत्रकेँ नीकसँ नीक शिक्षा दिआयब हुनकर अभीष्ट रहनि। मोदानन्द झा स्वयं बुझबा जोगरक भेलापर अपन कौलिक व्यवसाय आ प्रतिष्ठाक पुनरुद्धार करबा लेल कृतसंकल्प भेलाह। अपन बाल्यावस्थाक संस्मरण बजबाक क्रममे ओ प्रायः बाजथि जे ओ बड़ए प्रसन्नता आ आह्लादक समय छल। ओ माता-पिताक दुलरुआ त छलाहे, काका-काकी तथा आन सम्बन्धी आ कुटुम्बी जनक स्नेह सेहो हुनका प्रचुर प्राप्त छलनि। ओ दैनिक कृत्य आ विद्यालयसँ बाँचल समयमे माछ मारथि आ ई बहुत दिन धरि हुनकर प्रिय मनोरंजन रहनि। ओ एक बेर बहुत गम्भीर रूपेँ बीमार पड़लाह। वस्तुतः तहिया पूर्णियाँ जिलामे मलेरिया आ कालाजार महामारीक रूपमे पसरल छल। आ कहबी छलैक जे “जहर खाउ ने माहुर खाउ, मरैक होइ तऽ पूर्णियाँ जाउ”। हुनकर माता एक सम्पन्न कुलक महिला रहथिन आ ओ अपन पुत्रक रुग्णताक समाप्ति लेल किछु करबा लेल तत्पर छलीह। हुनकहि जिदपर २०० रुपया पीस दऽ कलकत्तासँ डाक्टर मँगाओल गेल। चारि पंडित अहर्निश हुनकर रुग्णावस्थामे दुर्गा सप्तशती आ गीताक पाठ करैत रहलाह। हुनकर माता स्वयं ताधरि अन्न ग्रहण नहि कयलथिन जा हुनकर पुत्र पथ्य ग्रहण करबा जोगरक नहि भेलनि। कलकत्तासँ आयल डॉक्टरक तऽ अन्य विदाइ कैले गेलनि, पाठ केनिहार ब्राह्मणो लोकनिक आ पुत्रक आरोग्य-लाभक उपलक्ष्यमे गाम-टोलक लोक सभकेँ भोज सेहो खोआओल गेल। मुदा पिताक आकांक्षा छलनि पुत्रकेँ विद्वान् देखबाक आ विद्यार्थीक लेल गण्य करक-चेष्टा, वक ध्यान, श्वान-निद्रा तथा अल्पाहारी आदि लक्षणसँ जन्मतः परिपूर्ण मोदानन्द झा लेल समय अयलनि गृह-त्यागी होयबाक। (अगिला अंकमे) 1.संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा 2.लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप 3. दैनिकी- ज्योति संविधानसभा, संघीय संरचना आ मिथिला राज्यक औचित्य-शीतल झा,जनकपुर, नेपाल

हिमालय पर्वत ऋंखलाक करिब मध्य भागमे चीनक तिब्बतसँ दक्षिण, भारतक बिहार आ उत्तर प्रदेशसँ उत्तर आ पूर्व तथा पश्चिम बंगालसँ पश्चिम एकटा आयताकार देश नेपाल अछि । २४० वर्षपूर्व गोराखक एकटा लडाकू राजा पृथ्वीनारायण शाह हिंसक बलसँ दक्षिण–पूर्व आ पश्चिमक देशसभपर आक्रमण करैत गेल आ सुन्दर उपत्यका काठमाण्डूसहित एकटा नमहर देश बनौलक । एकर सीमा दक्षिणमे कतऽ धरि रहैक, तकर आधिकारिक रुपसँ कतहु उल्ल्ेख नहि अछि । खस शासकद्वारा शासित गोरखा राज्यक दमनपूर्ण विस्ताकरक वाद एकर नाम कहिया नेपाल रहल से निर्णायक प्रमाण नहि भेटैछ । दक्षिणमे मिथिला आ अवधसन ऐतिहासिक गणराज्यपर सेहो ई हिंसापूर्ण ढंगसँ षडयन्त्रपूर्वक आक्रमण कएलक । एहि क्रममे व्रिटिशकालीन भारतकद्वारा प्रतिरोध आ युद्ध कएल गेलाक वाद १८१६ क सुगौली सन्धिसँ ई वर्तमान सीमाङ्कित देश, बनल जाहिमे १८६० क सन्धिसँ दानस्वरुप प्राप्त पश्चिमक ४ जिलासँ एकर वर्तमान स्वरुप निर्धारित भेल ।

ड्ड देशक राजनीतिक शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक छैक आ एकर राज्य–संरचना एकात्मक । एकर शासकीय प्रवृति निरंकुशात्मक छैक आ सामाजिक आर्थिक व्यवस्था सामन्ती छैक ।

ड्ड एकर सामाजिक मानवशास्त्रीय संरचना ९क्यअष्य(बलतजचयउययिनष्अब िक्तचगअतगचभ० मंगोलाइड केकेशियन प्रजातिसँ बनल अछि, जाहिमे निग्रोवाइड आ एस्टोल्वाइड प्रजाति सेहो अल्प संख्यामे बसल अछि । कैकेरियनक आर्य शाखा तँ मुख्य रहैत अछि ।

ड्ड हिमालय क्षेत्र आ पहाड क्षेत्रमे लिम्बु, राई, तामाङ, नेवार, मगर, गुरुङ, शेर्पा जाति तथा जनजातिक वास छैक तँ दक्षिणक समतल मैदानी भूभाग तराइृमे आर्यमूलक जाति जनजातिसभक वास छैक । दुनू क्षेत्रमे पिछड़ल जनजाति, आदिवासीसभक वास सेहो छैक, जाहिमे मिश्रित मूलक संख्या उल्लेखनिय छैक ।

मूख्यतः कर्णाली प्रदेशक आर्य मूलक खस जातिक गोरखा राज्य वर्तमान सम्पूर्ण नेपालपर शासन करैत अछि । तेँ ई राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक प्रभाव विस्तारक क्रमे प्रत्येक जातीय क्षेत्रमे प्रवेश कऽ सामाजिक, भाषिक, जातीय संरचनाकेँ तोड–मडोर कऽ देने छैक आ नेपालकेँ कथित रुपेँ राष्ट्र कहि प्रस्तुत करैत छैक । वस्तुतः सामाजिक विकासक अध्ययनमे देखल जाए तँ नेपाल एकटा नहि, विभिन्न राष्ट्रसँ बनल एक देश अछि, जतऽ एक्कहिटा खस जातिक एकल राज्यशासन छैक ।

२. मिथिला

नेपालक दक्षिणी समतल भूभागकेँ तराई अथवा मधेश कहल जाइत छैक । एतऽ अवध आ मिथिलासन पौराणिक महिमामण्डित ऐतिहासिक समृद्धताप्राप्त गणराज्य छल, जकरा मुगल व्रिटिश शासन दमन करैत गेल आ अन्ततः शाहवंशीय राजाक सङ्ग वाँटि लेलक । १८१६ क सन्धि मिथिलाकेँ खण्डित कएलक । जाहि मिथिलाक सीमा कोशीसँ पश्चिम, गण्डकसँ पूर्व, गंगासँ उत्तर आ हिमालसँ दक्षिण छलैक, तकर आइ इतिहास छैक, भूगोल नहि छैक । जेँ कि एकर भाषा, संस्कृति, जीवित छैक तेँ बाटल–बाँटल शरीरक आधारपर कहि सकैत छी–सिमरौनगढ़सँ पूर्व, झापासँ पश्चिम आ महाभारत महाड़सँ उत्तर मिथिला जीवित अछि–अहिल्याजकाँ जीर्णोद्धारक प्रतीक्षामे अछि, उद्धारक बाट जोहि रहल अछि ।

३. संविधान

देशमे शासन व्यवस्था कायम करबाक लेल बनाओल गेल मूल कानूनकेँ संविधान कहल जाइत छैक । सभ कानून, ऐन, नियम एकरे सीमाक भीतर रही बनाओल जाइत छैक । लोकतन्त्रक मुख्य आधार आ एकटा प्रमाण संविधान होइत छैक ।

नेपालमे २००४ सालमे पहिलबेर कोनो संविधान नामक चीज प्रस्तुत भेल रहैक । ओना ताहिसँ पूर्व १९१० मे एकटा ऐन सेहो बनल रहैक । तत्पश्चात २००७ सालमे अन्तरिम शासन विधान आ २०१५ सालमे नेपाल अधिराज्यक संविधान आएल । २०१५ सालक संविधान एकदलीय पञ्चायती व्यवस्था देलक आ तकर अन्त्य २०४६ सालक आन्दोलन कएलक । २०४७ सालमे एकटा अन्तरिम सरकार बनाकऽ तकराद्वारा नेपाल अधिराज्यक संविधान २०४७ लागू कएल गेल । ई सभ संविधान राजतन्त्रात्मक एकात्मक, एकात्मक अछि आ राज्य सत्तापर, राज्यपर, प्रशासनपर एक धर्म, एक भाषा, एक जातिकेँ प्रमुखता आ अधिकारक मान्यता देने छल । राजाद्वारा प्रदत्त ओ संविधानसभ राजाक अधिकारकेँ सर्वोपरि मानैत आएल छल । मुदा ०६२÷०६३ मे भेल जनआन्दोलन भाग–२ सँ ई मान्यता ढहैत गेल आ एखन देश संविधानसभाद्वारा अर्थात जनताक प्रतिनिधिद्वारा निर्मित संविधानक निर्माण करत ।

४. संविधानसभा

संविधान बनएबाक लेल जनताद्वारा चुनल प्रतिनिधिसभक समूह एवं सभाकेँ संविधानसभा कहल जाइत छैक । सार्वभौमसत्ता सम्पन्न जनता अपनाकेँ अनुशासित आ शासित रहबाक लेल जाहि तरहक शासन–व्यवस्थाकेँ चलएबाक लेल अपने पठाओल प्रतिनिधिद्वारा कानूनक ग्रन्थ तैयार करबाबैक आ घोषणा करबबैक, ताहि जनप्रतिनिधिमूलक सभाकेँ संविधानसभा कहैत छैक ।

५. संविधानसभाक अनुभव

(क) उत्तर अमेरिका ः ब्रिटेनद्वारा शासित अमेरिकाक १३ राज्य स्वतन्त्र भेलापर ५५ सदस्यीय संविधानसभा निर्माण कऽ तकर अनुमोदन अमेरिकी जनतासँ करबाकऽ अप्रिल ३०, १९८९ मे घोषणा कएलक ।

(ख) फ्रान्स ः अपनहि देशक सामन्ती नायक सम्राट सोलहम लुइक विरुद्ध संविधानसभा वना १७९१ मे लागू कएलक ।

(ग) रुस ः १९१८ मे संविधानसभा तँ बनल मुदा संविधान लागू नहि भऽ सकल ।

(घ) भारत ः ब्रिटिस शासनसँ मुक्तिक लेल ३८९ सदस्यीय संविधानसभा बनल मुदा पाकिस्तानक विभाजनक बाद रहल २९९ सदस्यीय सभाद्वारा आ डा.राजेन्द्र प्रसादद्वारा ई घोषित भेल ।

(ङ) दक्षिण अफ्रिका ः गोर आ कारीक बीच भेल संघर्ष संविधानसभाक मार्फत अन्त्य भेल । सर्वपक्षीय सम्मेलनमार्फत ४९० सदस्यीय संविधानसभाक निर्माण भेल आ संविधान बना जनअनुमोदन कराओल गेल आ घोषणा कएल गेल । विभिन्न देशक अनुभवक आधारपर नेपालमे बननिहार संविधानसभामे निम्न तरहक विशेषता होएब वाञ्छनीय रहितैक –

(क) जनसंख्याक अनुपातमे निर्वाचन क्षेत्र निर्कारण कएल जाइक आ प्रत्येक जाति, जनजाति, अल्पसंख्यक, दलित, महिला, मधेशीक ओहि अनुपातमे क्ष्ोत्र आरक्षित कऽ प्रतयक्ष निर्वाचनसँ जनप्रतिनिधिक पठा संविधानसभाक निर्माण कएल जइतैक ।

(ख) अन्तरिम संसदसँ संविधान मस्यौदा तैयार कऽकऽ ओकरा जनमतसंग्रहद्वारा निर्माण कएल जइतैक, मुदा प्रत्यक्ष मतादान वा समानुपातिक प्रणाली दुनू कायम कएल गेलैक । एहिसँ अत्पविकसित देशक जनतामे भ्रम आ अनावश्यक गड़बड़ी उत्पन्न मऽ सकैत छैक । आब पूर्ण समानुपातिक प्रणाली बहुतो राष्ट्रिय दलक संगहि प्रत्येक जातीय, जनजातीय, क्षेत्रीय समूहकसभक सेहो मांग रहलाक कारण ओकरे लागू कएनाइ सार्थक संविधानसभाक आधार तैयार कऽ सकैत अछि ।

६. समावेशीकरण तथा समानुपातिक समावेशीकरण

सत्ताक स्वरुप, शासन, प्रशासनमे देशक प्रत्यक जाति, जनजाति, अःल्पसंखयक जाति, विभिन्न भाषिक समूह, सांस्कृतिक समूह, आदिवासी, महिला, क्षेत्र आदि सभक प्रवेश नहि भेल तँ शासन पद्धति जनासँ दूर रहि जाइत अछि आ ताहूमे लोकतन्त्र तँ मात्र कथित सभ्रान्त वर्गक खास जातिक हाथक दमनक माध्यम बनि जाइत अछि । तेँ जातीय, भाषिक संख्याक समानुपातिक समावेशीकरणसँ मात्र लोकतान्त्रि शासन पद्धति मजबूत आ दीर्घजीवी भऽ सकैत अछि ।

(क) जनसंख्याक समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण कऽ ओहि क्षेत्रसँ ओहि ठामक मूल जाति, भाषाभाषीक मात्र प्रतिनिधित्व कराओल जाए ।

(ख) जनसंख्याक समानुपातिक रुपमे सरकारक प्रत्येक अंगमे अथवा न्यूनाधिक रुपमें सभ क्षेत्र, वर्ग, जाति, लिगंक उपस्थित कराओल जाए ।

(ग) सुरक्षा, प्रहरी, प्रशासन, राजनीति, राजनीतिक संस्था प्रत्येकमे समानुुपातिक रुप्मे प्रवेश कराओल जाए वा न्यूनाधिक रुपमे प्रारम्भ कराओल जाए आ किछु जातिक लेल प्रारम्भमे आरक्षित कएल जाए । एहि तरहेँ देखलापर आगामी शासन पद्धति समानुपातिक होएबाक लेल संविधानसभा समानुपातिक भेनाइ आवश्यक अछि आ तकरा लेल अन्तरिम संसद आ अन्तरिम सरकार, निर्वाचन आयोगकेँ सेहो समानुपातिक भेनाई आवश्यक अछि आ ओअि तरहक सुरक्षाक व्यवस्था कएनाइ सेहो आवश्यक अछि ।

७. एहि तरहेँ वनल संविधानसभा नेपालक नव राज्य संरचना कऽ सकैत अछि आ संघीय संरचनादिस लऽ जा सकैत अछि – (क) राज्य (प्रान्त, प्रदेश) ः भाषा, संस्कृति, जाति, धर्म आदिक आधारपर बनल अथवा बनाओल राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक अधिकारसम्पन्न राजनीतिक भूक्षेत्रकेँ राज्य कहैत छैक ।

(ख) संघ – एहन, राज्य सभस वनल राजनीतिक शक्ति सम्पन्न केन्द्रीय सत्ता के संध कहै छ । आंशिक सार्वभौमिकता, स्वतन्त्रता, आत्म निर्णयक अधिकार प्राप्त सभ मिल क सार्वभौम सत्ता केन्द्रके प्रदान करैछ आ एहि राज्य संरचना के संघीय संरचना कहल जाइत अछि ।

८. नेपाल संघीय होएबाक आवश्यक अछि – कारण ः–

(क) नेपाल विभिन्न प्रजाति, जाति, जनजाति, धर्म, भाषा, संस्कृति के देश छै । एहि सभ के देशक मूलधारमे लएवाक लेल ।

(ख) लोकतान्त्रिक व्यवस्थाके समानुपातिक समावेशीकृत करबाक लेल ।

(ग) संघीय सरकार आ राज्य सरकार भेला स प्रत्येक नागरिक अपन योग्यता व्यवस्था अनुकूल उपयोग करबाक लेल ।

(घ) राज्य भीतर अनेक प्रशासनिक न्यायिक निकाय विकेन्द्रित विकाश राज्य क्षेत्रक कार्य सम्पादन ओहि राज्यक जनताके निर्णय अनुसार हौइछै ।

(ङ) ओहि राज्यक भीतरक प्राकृतिक सम्पदा जल, जमिन, जंगल खनिज पदार्थ पर ओहि राज्यक जनताक अधिकार होइछ, ओकर अधिकतम प्रयोग ओतहिक जनता करैछ ।

(च) उदयोग आदि विकास कार्य पर राज्यक नियन्त्रण रहैछ आ ताहि के लेल अन्य राज्य स, विदेश स सम्बन्ध स्थापित क सकैअ ।

(छ) ओहि राज्यक प्रमुख भाषा प्रशासन, न्यायिक क्षेत्र आदि मे निर्वाध रुपमेँ प्रयोग क सकैअ जहि स राज्यक जनता सामाजिक न्याय, मानवीय विकास स वंचित नहि भ सकैअ ।

(ज) अपन मातृभाषा, स्वत ः कायम भेल सम्पर्क भाषा, ग्रहित शिक्षाक भाषाक सुविधा भेल स प्रशासनिक, शैक्षिक वैदशिक सुरक्षा सेवा आदि मे निक संख्या मे राज्यक युवा, शिक्षित वर्ग प्रवेश होएत ।

(झ) कोनो खास प्रजातिक, राष्ट्रक, जातिक, जनजातिक, भाषाभाषिक, धार्मिक, सांस्कृतिक समुदायक इतिहास, संस्कृति, भाषा, भेष, कला , साहित्य, परम्परा केँ सरक्षण आ सम्बर्धन कए पहिचान के सुनिश्चत आ सुरक्षित करबाक लेल ।

(ञ) कोनो प्रजातिय, जातीय, धार्मिक, भाषिक समुदाय के दोसर वर्ग स शोषण दमन स मुक्ति के लेल ।

(ट) पृथकवादी आन्दोलन के रोकवाक लेल ।

(ठ) एकात्मक राज्य व्यवस्था परुर्ण रुप स असफल भगेल अछि । तै संघीय संरचना आवश्यक अछि ।

९. संघीय संरचनाक आधार ः–

संघक भीतर राज्यक संरचना क आधार निम्न होइछ

(क) ऐतिहासिक रुप स निर्मित राष्ट्र (.....–जाति ) के आधारपर (ख) प्रकृतिक रुपस निर्मित भूखण्डके आधार पर । (ग) जातीय वाहुल्यता के आधारपर (घ) धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदायक अधार पर (ङ) संस्कृति के आधार पर अथवा सांस्कृतिक सामिम्प्यता के आधार पर । (च) भाषा क आधार पर (छ) प्रकृतिक सम्पदाक आवण्टन के आधार पर । (ज) विकसित नया अवस्था, सोचक, आधारपर ।

१०. एहि आधारसभ के देखैत आ नेपालमेँ चलैत जातीय आन्दोलन सभ केदेखैत आ ओकर मांग सभ के देखैत नेपालके निम्न संघीय राज्यमे विभाजित कएनाई आवश्यक छै ः–

(क) लिम्बुवान किरांत राज्य (ख) खुम्बुवान (ग) नेवा राज्य नेवार राज्य (घ) तामाङ साम्बलिंग (ङ) तमुवान गुरुङ राज्य (च) मगरात मगर राज्य (छ) खसान खस राज्य (ज) थरुहट थारु राज्य (झ) अवध अवधी राज्य (ञ) भोजपुरी भोजपुरी (ट) मिथिला मिथिला (विदेह)

संघीय विधाजनक लेल नया, तथ्यपूर्ण जनगणना आवश्यक अछि, आ ऐतिहासिक रुप स वसल जाति के सामुहिक निर्णय के आधारपर राज्यक नामाकरण कएनाई आवश्यक अछि ।

सम्पूर्ण नेपाल मे खस जातिक मिश्रित अवस्था भेलो स कोनो जातीय क्षेत्रक इतिहास आ ओकर भावना नहिं मेटाएल अछि ।

११. मिथिला – संघीय संरचनामे मिथिला राज्य किएक चाहि ः–

(क) मिथिला प्राग्ऐतिहासिक भूमि अछि आ पुराणवर्णित देश अछि । (ख) मिथिला आर्यजातिक आधार क्षेत्र आ आर्य संस्कृतिक निर्माण भूमि अछि । (ग) कोशी गण्डक, गंगा, हिमालय के विचमेँ स्थित ई भूमि निश्चित भूखण्ड प्राप्त कएने अछि । (घ) ऐतिहासिक कालखण्डमे एकरापर अनेक आक्रमण होइतोमे ई आर्य जातिक वाहुल्यताक क्षेत्र छै । (ङ) एकर अपन वहुत समृद्ध संस्कृति छै । (च) एकर भाषा हजारौं वर्ष पूर्वक इतिहास देखवैत अछि आ वहुत समुद्ध अछि । (छ) मिथिला गणराज्यक इतिहासक साक्ष्य अछि । (ज) एकर खस आर्थिक जीवन प्रणाली छैक । (झ) सामुहिक, देवी देवता स ल “क” पारिवारिक देवता प्रति आस्थाक संस्कार छै । (ञ) मिथिलामे अखनो लोक निर्मित, नियम कानून छै समग्रमेँ मिथिला के एकटा सझिया मनोभावना छैक जाहिस ई एकटा राष्ट्र छै आ एकरा संघीय संरचनामे राज्य होएबाक पूर्ण नैसर्गिक अधिकार छै ।

११.....

(क) मिथिलाक सम जातीके, राजनीतिमे, प्रशासनमे समानुपातिक उपस्थिति के लेल । (ख) उद्योग, कृषि, पर्यटन, जंगल, जल सभ स अधिकतम् लाभ, लेबाक लेल । (ग) नदी नियन्त्रण, सिंचाई सडक वाँध, विद्युत आदि के लेल संघीय सरकार स आ विदेश स सम्बन्ध स्थापित कए मिथिला वासी के उत्थान लेल । (घ) मिथिला स उठाओल कर ... के उचित व्यवस्थापन कए राज्यक द्रुत विकाश केल । (ङ) मिथिलामे प्रयोग होइत सभ भाषा मे सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यालय सभमेँ कामकाज करवाक लेल । (च) सरकारी सेवामे कामकाज करबाक अवसर के लेल । अर्थात वेरोजगारी समस्या समाधानमे सहयोग कएवाक लेल । (छ) मिथिलाक पावनि तिहार मे छुट्टि पएवाक लेल । (ज) मिथिलाक दलित, उत्पीडित, पिछडल वर्ग, जनजाति आदिवासी, महिला, अल्प संख्यक केँ लेल विशेष अवसर के लेल । (झ) मिथिलाक लोकगाथा (सहलेश, लोरिक) लोकनृत्य लोकधुन लोककला, लोकगीत, लोकनाट्य आदि के रक्षा आ प्रचार प्रासरक लेल । (ञ) पौराणिक मिथिलाक राजधानी जनकपुर सहित मिथिलाक एक खण्ड, एकर लिपि, साहित्य भाषा, संस्कृति जीवन शैली सभ जीवित अछि तै रक्षाक लेल आ विश्वस्तर मे एकर सभ्यताके, विशेषताके फैलावक लेल । (ट) नेपाल मे भेल कोनो लोकतान्त्रिक आन्दोलन, जातीय मुक्ति के आन्दोलनमे मिथिलाके अग्र, उग्र भूमिका रहलैक, सपूत वलिदान देल कै तै संघीयता के लेल अधिक रक्त श्राव रोकवाक लेल ।

१२. मिथिला राज्यक सीमा ः–

(क) प्राचीन, मिथिलाक सीमा छलैक –उत्तरमे हिमालय, दक्षिणमे गंगा, पूर्वमे कोशी, पश्चिम मे गंडक । ई मिथिला १८१६ क सुगौली सन्धि पश्चात् खंडित भेल । अखन एकर जीवित भूगोल पर जीवित इतिहास छै, जीवित लिपि भाषा, जीवित संस्कृति जीवन्त जिवन शैली, जीवन्त मनोभावनाक अधिकार अनुसार सीम्रौन गढ स पूर्व, झापा स पश्चिम महाभारत पर्वत श्रृंखला स दक्षिण आ नेपाल भारत वीचक सीमा स उत्तर मिथिला छैक, आ मिथिला राज्य होएबाक चाहि ।

(ख) झापा मधेश मे रहितो मे एत सतार, राजवंशी जनजातिक बसोवास छैक, आ ओकर अपन इतिहास, संस्कृति, मांग आ संघर्ष छै तै ओतए, नव आगन्तुक खस भाषी के छोडि ओकर सभके आत्म निर्णयके अधिकार अनुसार मिथिलामेँ समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए । (ग) वारा, पर्सा भोजपुरी भाषाक क्षेत्र छै । मैथिली भाषा स फरक छै परन्तु एकर संस्कृति, आर्थिक जीवन मिथिला के समान छै । खसवादी सत्ताके दृष्टिकोण व्यवहार एकरो प्रति ओहने छै तै एकरो आत्मनिर्णय के आधारपर मिथिला मे समाहित कएल जाए अथवा स्वायत्तता देल जाए ।

१३. मधेश आ मिथिला ः–

(क) मेची स महाकाली तकके सम्पूर्ण समतल मूमि – मधेश एकहि सत्तास दमित अछि, दलित अछि, उत्पीडित अछि, प्रताडित अछि, उपेक्षित अछि । सम्पूर्ण मधेशी एकहि मनोविज्ञान एकहि मनोदशा लक जीवित अछि । एकरा प्रतिक शोषणक स्वरुप समान छैक तै तकर संघर्षक निशाना एकहिटा भाषीक वर्ग छै । (ख) खस प्रभुत्ववादी सत्ता, मैथिली , भोजपुरी अविधि कहिक उपेक्षा, अवहेलना नहि करे छै समष्टिमे मात्र मधेशी कहै छै । (ग) थारु जातिके खस शासक पहाडी नहि बुझै छै आ थारु अपना के मधेशी बुझ स भय महसुस करै छै । तथापी ओ संघीयता के संघर्षमे प्रमुख शक्ति भसकै छै । आ इएह सोच स मधेशमे वसल प्रत्येक जनजाति, द्रोणवार, सतार राजवंशी, झागड सभके देखनाइ आवश्यक छै आ ओकरा सबके एहि संघर्षमे स्थापित कएनाई आवश्यक छै । (घ) मधेशक आन्दोलन खस सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन छै आ मिथिलाक आन्दोलन माथिक, सांस्कृतिक, जातीय आन्दोलन निहित राजनीतिक अन्दोलन छै तै संघीयता के आन्दोलन के अन्तरवस्तु लेने छै । (ङ) मधेश आन्दोलन केन्द्र स्थल मिथिला क्षेत्र रहैत अछि आ मानव अधिकार राजनीतिक अधिकरा प्राप्तिके आन्दोलन के केन्द्र सेहो मिथिला क्षेत्र रहैत अछि । तै मधेश आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडनाई आ मिथिला आन्दोलन के मधेश आन्दोलन के रुपमेँ विकसित कएनाई रणनीतिक सोच राखव आवश्यक छै ।

१४. मिथिला आ गणतन्त्र ः–

मिथिला राज्यक लेल अथवा मिथिलाक मुक्तिके लेल नेपालमे संघीय शासन आवश्यक शर्त छै । संघीय शासन के लेल गणतन्त्र आ लोकतन्त्र आवश्यक शर्त छै आ अन्तत ः लोकतन्त्र के स्थापनाके लेल, एकर सशक्तता के लेल, एकर दीर्घायु के लेल गणतन्त्र आवश्यक छै ।

१. गणतन्त्र – जन्मक आधारपर विशेषाधिकार सहित शासक विना के शासन पद्धति सत्ताक स्वरुप के गणतन्त्र कहैत छै । सार्वभौमिक जनता जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र प्रमुख निर्माणक पद्धति के गणतन्त्र कहैत छैक अर्थात् राजा विना के शासन पद्धति ।

२. नेपाल गणतन्त्रात्मक देश हाएवाक चाहि – कारण ?

(क) कथित एकिकरण वलातु सैनिक वल स हिंसा द्वारा भेल छै । (ख) राजतन्त्रक मूल चरित्र निरंकुश, निर्मम, अत्याचारी होइत आएल छै । (ग) सत्तामे ,सेनामे, प्रशासनमे, न्यायलयमे दमनकानरी नीति स पकड वना क आम वर्ग केँ निर्मम शोषण दमन करैत छै । (घ) कोनो प्रकारक, नया सोच, वैज्ञानिक चिन्तन जनअधिकार आ प्रगति विरोधि भेनाई राजतन्त्रक मूल ऐतिहासिक चिन्तन आ चरित्र छै । (ङ) एक देश–एक राज्य, एक राज्य –एक राष्ट्र, एक राष्ट्र – एक जाति, एक जाति – एक धर्म, एक धर्म – एक संस्कृति, एक संस्कृति– एक भाषा, एक भाषा – एक भेष आदि प्रकारक निरंकुश एकात्मक नीति लैत आएक छै । (च) लोकतन्त्रके स्थायित्व, मानवअधिकारक वहाली, कानूनी राज्यक स्थापना स्वतन्त्र, न्यायपालिका के लेले राजतन्त्र उच्छेदन आवश्यक छै । (छ) जनतके बलीदानी संघर्ष स आएल लोकतन्त्र के साथ सदा घोर षडयन्त्र करैत आएल छै । (ज) निम्न जाति आ वर्ग के सन्तान दुर राखि दानवीय व्यवहार कएनाई के दैविक अधिकार बुझै छै । (झ) कोनो प्रजाति जाति , जनजाति, भाषाभाषी के पहिचान के दमन करैत आएल छै आ दमन मे सेना, प्रशासन, अदालत, मातृहन्त केँ प्रयोग करैत आएल छै । (ञ) मधेशी के सदा विदेशी सावित करै मे व्यस्थ रहै त आएल छै । (ट) मिथिला के साथ वहुत वडका धोखा, षडयन्त्र, गद्दारी करैत आएल छै , जहन मिथिलाक सेना स सहयोग ल क भंग कए देने छै । (ठ) जातीय अधिकार के सुनिश्चित, सुरक्षित रखवाक लेल आवश्यक संघीय संरचनाके स्थापनाक लेल गणतन्त्र आवश्यक छै ।

१५. सघीयता आ वर्गीय आन्दोलन ः–

किछु राजनीतिक आ बौधिक वर्गमे भ्रम रहैंछ आ भ्रम श्रृजना करैछ जे संघीय आन्दोलन वर्गीय आन्दोलनकेँ कमजोर करैत छै आ संघीय आन्दोलन जातीय सम्प्रदायिक सद्भाव के दूषित छै । मुदा ई भ्रम मात्र अछि । शोषण के स्वरुप आ गति जतेक स्पष्ट आ तीब्र होइछ आ वर्गीय आन्दोलन के गुण लैत जाइत अछि आ सम्पन्न वर्ग आ “सभ्य” जाति के भितर निर्मित शोषण आ शोषितक चरित्र लबैत अछि त ओ मात्र अधिकार आन्दोलन नहिं, जाति, क्षेत्र हितक आन्दोलन मात्र नहिं मानव विकाशके क्रम मे भेल वर्गीय आन्दोलन अछि । (आ कोनो वर्गीय आन्दोलनकारी के संघीय आन्दोलनके समर्थन करबाक चाहि) मिथिला आन्दोलन सेहो वर्गीय आन्दोलन अछि जतए एकटा राष्ट्र, समृद्ध संस्कृति, भाषा, साहित्य, शोषण आ दमनके शिकार अछि ।

१६. मिथिला आ जातीय आन्दोलन ः–

जाति स्वरुप, चरित्र, इतिहास, आ ओहि जातिपर होइत शोषण दमके मात्रा, जातीय आन्दोलनके दिशा र स्वरुप निर्धारण करैछ । (सामाजिक संरचनाके भित्ररके विभिन्न जातिकै तह, हिन्दु धर्माबलम्बीके विभिन्न जातपर होइत भेदभाव, आ शोषण सेहो आन्दोलन के समय आ स्वरुप निर्धारण करैछ । तथापि छोट आ सामयिक अन्तर विरोध एकर मुख्य आन्दोलन के असर नहिं क सकैछ आ प्रधान अन्तर विरोध के समाधान मात्र ओहि अन्तर विरोध के समाधान क सकैछ । मिथिलाके भित्तरकेँ विभिन्न द्वन्द्व मुख्य द्वन्द्व के समाधान कर में आएल वाधा राजनीतिक वैचारिक आन्दोलन के मार्फत मात्र अन्त्य कएल जाए सकैछ ।

१७. मिथिला आ जनजातीय आन्दोलन ः–

जनजाति स्वतः शोषित दमित आ अविकसित होइत अछि । ओकरा पर सदियौं स शोषण भ रहल अछि । मुदा आब आहो अपना अधिकार के लेल अनवरत संघर्ष क रहल अछि । नेपालमेँ जनजाति कोनो विकसित आ कोनो अविकसित अछि । दुनु के स्वायत्तता चाही । किछु जनजाति सैनिक प्रहरी सेना स जुडल अछि । मुदा अधिकारस वंचित । ओ पहाड मे आ मे आ मधेश मे सेहो अछि । मधेशक आन्दोलन दुनु के अधिकारके लेल कएल संघर्ष मे सहयोग कएलक अछि । मिथिला क्षेत्र मे जे जनजाति अछि तकरा मिथिला राज्य समानुपाति अधिकारस वंचित नहिं करत से ओकरा विश्वास नहिं भैरहल छै आ पहाडके जनजाति स मिथिला तथा मधेश आन्दोलन के निक जकाँ नहिं जोडल जा रहल अछि । दुनु ठामक जनजाति के विश्वास मे लेनाई आवश्यक अछि ।

१८. मधेश, मिथिला आ थारु आन्दोलन ः–

जनजाति में थारु क संख्या वेसी छै आ मात्र मधेश में लगभग पूर्व स पश्चिम तक अधिकांश जिल्लामें । ई जाति अलग पहिचानक जाति छै क एकर अपन भाषा आ किछु संस्कृति अलग छै । जाहि क्षेत्र में स्थित छै ताहि ठामक भाषा स जुडल छै । शारिरिक बनौट मंगलाइड सन छै मुदा सांस्कृतिक सम्बन्ध मधेश के साथ जुडल छै । ई स्वतन्त्र आन्दोलन नहिं क सकैअ आ मधेशी आन्दोलन स जुड स डराइछै । मधेशी आन्दोलन के अंगा खस सत्ता एकरा प्रयोग करै छै । कहिओ आ कोनो आन्दोलन के विरुद्ध में उतारि दैत छै । वहुत सज्जन जनजाति भेला के कारण ई आसानी स ओहि षडयन्त्र में फंसि जायत छै आ मधेश आ मधेशी कें विरुद्धमे ठाढ भ जाइत छै । एकरा जनजाति आन्दोलन स निक जकाँ जोडनाई वहुत जरुरी छै, तहन एकरा मिथिला आन्दोलन में समानुपाति अधिकार आ समानुपाति अधिकार क्षेत्र के लेल विश्वास में ल एकर विश्वास प्राप्त केनाई आवश्यक छै ।

१९. नेपालक मिथिला आ भारतक मिथिला ः –

सुगौली सन्धि मिथिला के दु खण्डमें त वांटि देलक, मुदा राजनीतिक सीमा स मिथिलाक भाषा, संस्कृति साहित्यक सम्बन्ध नहि तोडि सकल । आई दुनु देशमें मिथिला राज्यक मांग उठि रहन छै । अइस हुनु देशक शासक वर्ग के किछु भय भरहल छै । दुनु देशक मिथिला आन्दोलन के भावनात्मक सम्बन्ध छै आ दुनु के नैतिक समर्थन छै जे नैसर्गिक छै । दुनु राजनीतिक स्वतन्त्रता कायम राखए चाहैछै, दुनु अखण्डता के सम्मान करै छै । ई वात दुनु देशक सत्ता के वुझक चाही आ हमरा सभ के कर्तव्य जे दुनु सत्ताके बुझा देवक चाही । संघीय संरचनामें दुनु मिथिला अलग अलग राज्याधिकार चाहेछै, जेना वंगाल, पंजाव इत्यादि वंगला देशकें आ पाकिस्तान में सेहो छै ।

२०. आत्म निर्णय के अधिकार आ मिथिला ः–

व्यक्तिगत, जातिगत क्षेत्रगत, राष्ट्रगत रुपमें स्वतन्त्र पहिचानकें साथ राजनीतिक प्रशासनिक निर्णय के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकार अछि । आर्थिक जीवन अपने शैली में संचालन केनाई आत्मनिर्णय के अधिकार क्षेत्र छै, अनुशासित स्वतन्त्रता के अधिकार आत्मनिर्णय के अधिकारके मूल मर्म छै । कोनो व्यक्ति दोसर व्यक्ति पर, कोनो जाति दोसर जाति पर कोनो राष्ट्र दोसर राष्ट्र पर अनाधिकार के प्रयोग कएनाई के पूर्ण नियन्त्रण आत्मनिर्णयक अधिकार कै । क्षेत्रीय, जातीय, राष्ट्रिय दमन, शोषण, शासन, प्रशासन स मुक्ति के अधिकार मात्र आत्म निर्णय के आत्म निर्णायक अधिकार छै । मिथिला एकटा स्वतन्त्र ऐतिहासिक राष्ट्र छलै तै एकरा आत्मनिर्णय के अधिकार छै, जे राजनीतिक सीमा मे प्रशासनिक शासकीय दमन स मुक्त होएक ।

२१. मिथिला आ जातीय स्वायत्तता ः–

सीमित राजनीतिक आर्थिक अधिकार सहित के खास क्षेत्र में खास जाति अर्थात राष्ट्र के प्रादेशिक शासन के जातीय स्वायत्तता कहल जाइछै । ई आत्म निर्णय के अधिकार के अर्ध तथा नियन्त्रित प्रयोग छै । आत्म निर्णय के अधिकार के स्वायत्तता में घेर देनाई आ स्वायत्ततताके जातिगत रुपमें प्रयोग केनाई अव्यवहारिक छै खासक मिश्रित सामाजिक संरचनाके देशमें आ क्षेत्रमें । मिथिला संघीय संरचनामे पूर्ण राज्यधिकार प्रयोग करए चाहैत अछि कोनो केन्द्रीय सत्ता स निर्धारण कएल सीमित अधिकार सहित कें कथित स्वायत्तता नहिं ।

२२. मिथिला आ दलित आन्दोलन ः–

ई हरेक दमन आ उत्पीडन स मूक्ति के युग छै । राजनीतिक आर्थिक शोषण मात्र नहिं, सामाजिक उत्पीडन स मुक्ति के लेल प्रत्येक देश में, प्रत्येक राष्ट्र मे, प्रत्येक समाज में आन्दोलन तीव्र भगेल छै । एकरा समयमे स्वीकार कएनाई प्रत्येक लोकतन्त्रवादीके कर्तव्य छै । सामाजिक न्याय उपलब्ध करबैत राजनीतिक रुपमे प्रत्येक अंग में सम्मानपूर्वक उपस्थित कएनाई राज्य के कर्तव्य छै । मिथिला स्वयं उपेक्षित उत्पीडित अछि । तैं एकरा कतहु के दलित आन्दोलनके हार्दिक समर्थन सहयोग करैत मिथिलाक दलित मुक्तिके आन्दोलन में सामेल होइत, ओकर अगुवाई करैत मिथिला राज्य के स्थापना में गति स अगा बढत ।

२३. मिथिला आ राजनीतिक दल ः–

देशमें वर्तमान में सकृय राजनीतिक दल सभ मे संघीय संरचना के विषयमे स्पष्ट धारणा वाहर नदि आएल अछि । संविधानत ः स्वीकार कएले पर एहि विषय मे पार्टीक संघ विरोधी धारणा बाहर अवैत अछि । संघीय संरचना बनाएब, ताहिमे कपटपूर्ण अभिव्यक्ति अबैत अछि । किछु दल के नीति इ रहि आएल अछि जे सम्पूर्ण मधेश के एकटा राज्यके रुपमे आवक चाही । ई संघीय मान्यता नेपाल मे कतेक व्यवहारिक हेतै ? पौराणिक मिथिला के संशोधनसहित के एकटा राज्य बना कए मधेश में अन्य राज्य सेहो उपयुक्त होएत । हरेक क्षेत्र के आन्दोलित कए समग्र मे मधेश के खसवादी प्रभुत्व स मुक्त कएल जा प्रत्येक दल आ कथित वुद्धिजिवी संघीय संरचना के स्वीकार करैत, मुक्त मधेश के मान्यता दैत मिथिला राज्यके स्थापना मे सहयोग करैक, ईहए संघीय मान्यता अनुकुल हेतै ।

२४. मिथिला आ महिला आन्दोलन ः–

मिथिला सदा नारी के सम्मान करैत आएल अछि । तै नारी अधिकार के कुण्डित नहिं कए सकैअ । महिला अधिकार, महिला सशक्तिकरण द्वारा महिला आन्दोलन के मिथिला आन्दोलन स जोडिक ल जेनाई जरुरी छै । किछ दशक स मिथिलाके महिला के अनावश्यक अन्तरमुखी वनावल गेल छै आ एहि मे नेपालक जडिआएल सामन्ती सामाजिक राजनीतिक व्यवस्थाक खास भूमिका छै । तैं मिथिला के लोकतान्त्रिक राज्य निर्माण मे अधिकार सम्पन्न महिलाके भूमिका अति आवश्यक छै । २५. मिथिला आ कथित पिछडल आ आगा बढल वर्ग ९ द्यबअपधबचम ायच धबचम ० ः– मिथिलाक डोम सेहो सम्पत्तिशाली छल । एकरा साथ अछुत क व्यवहार नहिं छलै । गणराज्यक नायक जनकक कालमे समतामूलक समाजक प्रमाण भेटछ । तथापि मिथिला एकटा देश छल जतए सब जाति जातक बसोबास स्वभाविक छल आ अछि । अखन लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे सभ जाति जातके समानुपातिक समावेशीकृत उपस्थिति मिथिला राज्यके प्रत्येक अंग आ निकाय में रहत से घोषित नीति अछि । मिथिला कोनो एकटा जाति के नहिं, कथित उच्च जाति के कथमपि नहिं । योग्यता क्षमता अनुसार समानुपातिक रुपमें सहभागी केनाई आवश्यक अछि । इएह मिथिला निर्माण के आधार रहत ।

२६. मिथिला आ मानक मैथिली ः –

मानव शास्त्री आ भाषा शास्त्रीक अनुसार केव भाषा नहिं बजैअ, सब बोली ९मष्बभिअतक० बजैअ । समरुप बोली के समग्र रुप भाषा होइछ । मुदा जाहि बोलीक बेसी संचार होइछ जाहि बोली मे विशेष रचना प्रकाशित होइछ, जाहि बोली के बेसी पाठक होइछ जाहि बोलीक व्यक्ति सत्ता पर नियन्त्रण करैछ जाहि बोली द्वारा प्रकाशन, न्याय सम्पादन होइछ, जाहि बोलीके विद्धान व्याकरणक रचना करैछ, वएह बोली भाषा बनिक समाजपर प्रभाव पारैत अछि । तै कोनो बोली कथित उच्च वर्गके भए सकैछ, तै ओकरा मानक भाषा बुझनाई ओतेक उचित नहिं आ अइस कोनो जाति के राज्ययन्त्रपर नियन्त्रण के शंका केनाई उचित नहि । तै मिथिला में वर्तमान में वाजए जाए बाला प्रत्येक बोली के सम्मान करत, सभ भाषाके सम्मानकरत आ वहु भाषिक नीति राखि राज्य संचालन करत ।

२७. मिथिला राज्य स्थापना के लेल नीतिगत कार्यक्रम ः–

(क) जनता, लोकतन्त्र, मानवअधिकार के विरोधी, जाति, भाषाक अधिकार के प्रधान शत्रु राजतन्त्र अछि । तै जनताके मित्र शक्ति लोकतन्त्रवादी, मानव अधिकारवादी, कानूनी राज्यक पक्षधर आदि शक्ति आ संगठन स मिलक गणतन्त्र लएवाक लेल अथक संघर्ष आवश्यक छै ।

(ख) प्रत्येक जाति, जनजाति, आदिवासी, दलित उत्पीडित वर्ग पिछडल वर्ग, अल्प संख्यक जाति, मानव अधिकरावादी सबस मिलक, संघीय संरचना केल कठोर संघर्ष आवश्यक अछि ।

(ग) मधेशक प्रत्येक जाति, जनजाति, भाषा भाषीक समुह, महिला मुस्लिम सभके साथ कार्यगत एकता करैत खस सत्ता स सम्पूर्ण मधेश के मुक्त कएनाई बेसी आवश्यक छै ।

(घ) संघीय संरचनाक मर्म, भावना अनुसार मधेशमे आत्म निर्णायक आधार पर मिथिला क्षेत्रक प्रत्येक वर्ग के आन्दोलित कए मिथिला राज्यके लेल सहमति जुटएनाय आवश्यक अछि ।

२८. कार्यदिशा ः–

१. संघीय संरचना विना मुक्त मधेशक कल्पना तथा मुक्त मधेश विना मिथिला राज्यक कल्पना असम्भव होएत से बुझि चेतना मूलक कार्यक्रम सम्पूर्ण मधेशमे आवश्यक अछि ।

२. खस सत्ता वर्गिय समुदाय के दिमाग स ई भय हटैनाई जरुरी छै आ चेतना देनाई जरुरी छै जे कोनो जाति, भाषा के संरक्षण, सम्मान संघीय संरचनामे मात्र संभव छै । जन अधिकार सम्पन्न लोकतन्त्र संघीय संरचनामे मात्र संभव छै ।

३. कोनो सत्ता, दलीय सरकारक निरंकुशता के न्यून करवाक लेल संघीय संरचना मात्र आधार छै ।

४. संघीय शासन प्रणाली सं देश खण्डित नहिं होइछ । अर्थात संघीय शासन देश के विखण्डन स बचवैत अछि । अर्थात् संघीय संरचना विखण्डनवाद के स्थायी समाधान अछि ।

२९. मिथिला राज्य निर्माण वाधक चिन्तन ः–

अन्तरिक

१(क) मिथिला के लेल कोनो राजनीतिक संगठन नहि अछि । आ एहके लेल कोनो संघर्ष नहिं अछि । (ख) भाषा संस्कृति करे लेल कोनो एकिकृत संगठन नहि अछि । (ग) कोनो स्थापित नेतृत्व नहिं अछि । (घ) भाषा, संस्कृति के आन्दोलन के लोकतान्त्रिक आन्दोलन, मानव अधिकार वादी आन्दोलन स जोडक, लएजवाक चिन्तन या प्रयास नहिं अछि ।

(ङ) एहिके लेल किछ भ रहल आन्दोलन, वौद्धिक व्यक्तित्व सभक मात्र अछि, जिनकामे स्वाभिमान कम, अहंकार वेसी, संयोजन करवाक क्षमता कम फुट करवाक क्षमता वेसी छन्हि ।

वाह्य

(क) खस जाति समग्र संघ के विरोधी चिन्तन रखैत अछि अपना के सदा केन्द्रीय सत्ताके भागी बुझैछथि आ नेपाल के अपन पुर्खा के अर्जन सम्पत्ति बुझै छथि ।

(ख) समग्र मधेश एकराज्यक नारामे सत्ताधारी वर्ग विखण्डन के गंध देखैत अछि आ मिथिला तथा संघीय संरचना के विरुद्ध सोचेत अछि ।

(ग) संघीय आन्दोलन के नेतृत्व कएनिहार, दल या व्यक्ति के हिन्दी भाषा प्रति आसक्ति स मातृभाषा प्रेमी विचकैत छथि आ खसवादी सेहो एहिमे किछु रहस्मय दुर्गन्ध सुंधवाक प्रयास करैत अछि ।

निश्कर्ष ः–

नेपाल के सत्ताधारी, वर्ग संकट के घडि स गुजरि रहल अछि । देश अखन अधिकार प्राप्तिकँ नयाँ मोडपर ठाढ अछि । अधिकार स वंचित उत्पीडित वर्ग, जाति आन्दोलनमे कुद पडल अछि । संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र माग एकर अचूक औषधि छेक । प्रत्येक प्रभुसत्तावादी सामन्ती चिन्तन एहि आन्दोलन के पाछा धकेल चाहैत अछि आ आन्दोलन ओकरा किनार पर खसवैत आगा बढि रहल अछि । आउ, समाजक स भ वर्ग, आन्दोलन मे भाग लिअ आ नैसर्गिक अधिकार स्थापित करु ।

शीतल झा जनकपुर

सन्दर्भ सामाग्री ः–

(क) संविधानसभा, संघीय संरचना, मिथिला राज – अवधारण १– शीतल झा (ख) संघीय स्वशासन तिर ...............वृषेश चन्द्र लाल (ग) संघीय शासन व्यवस्थाको आधारमा राज्यको पुन ः संरचना – अमरेश नारायण झा (घ) मूल्यांकन मासिक । कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। नव-वर्ष शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद़ कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ । धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल अछि नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ । मुदा सब केयो थोड़बे? शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा  पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' ''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प्रयास केलक सुकना । चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लगा देने छलई छौंड़ा - ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि ? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक? हम सभ कहिया मनेबई नया साल?'' सुकना एहि अबोध कें कोना बुझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक। बोनिहारी भेटलई तऽ नूने-रोटी सही, परिवारक सभ व्यत्तिक पेट भरलैक ; नहि तऽ भुखले रहि गेल सभ गोटे । एना मे कोन सीमा-रेखा मजूरक लेल नया आ पुरानक भऽ सकैछ़ ज़ँ भऽ सकैछ तऽ एक मात्र मजूरी भेटब़ भेट गेल तऽ नया सालक खुशी; नहि भेटल तऽ पुरान साल सन दुख़ तै सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल । बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक। २. ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति नवम दिन : २ जनवरी १९९१, बुद्धवार : भोरे पॉंच बजे उठीकऽ नित्यक्रियासऽ निपटि हम सबसऽ पहिने तैयार भेलहुं।समान ठीक केलाक बाद सबके उठेलहुं।तकर बाद अपन समान बसमे राखि एलहुं।फेर जाबे सब तैयार होइत छल ताबे बगानमे खेलाइ छलहुं।कनिक देर बाद सबकियो समुद्रतट दिस विदा भेलहुं।कतेक लोक पैरे चलि गेल किन्तु हमसब बसमे गेलहुं। शिक्षक सब कनी पैघ रस्ता सऽ लऽ कऽ गेला उड़िसाके सीमामे सेहो प्रवेश करेला।तकर बाद समुद्र देखैत देरी हम ओहिमे घुसि गेलहुं।ई हमर पहिल अवसर छल जहन हम सागरक लहर सऽ खेल रहल छलहुं। तकर बाद हमरा सबके नास्ता लेल बजायल गेल।फेर हमसब लौटि गेलहुं लॉजमे।आब हमरा सबके सामान बसमे राखक छल।अहिमे हम सबके सहायता करैमे सबसऽ आगॉं रही।आधा रस्तामे रूकिकऽ हमसब भोजन केलहुं।भोजनोपरान्त पुनथ जमशेदपुर दिस विदा भेलहुं।यद्यपि अपन अभिभावक सबस भेंट हुअके खुशीतऽ छल किन्तु सबसऽ अलग हुअके दुथख सेहो छल।तुरत हमसब निर्णय लेलहुं जे एक पिकनिक करब आ ताहि लेल पाई शिक्षक अभिभावक के मीटिंगमे जमा करक छल। तुरत हमसब शिक्षक सबके सेहो आमंत्रित कऽ देलहुं। जहन जमशेदपुर पहुंचलहुं तऽ सबहक अभिभावक पहिने सऽ ओतऽ पहुंचल छलैथ।अहि तरहे हमर सबहक जीवनक ई महत्त्वपूर्ण नवम्‌ दिन समाप्त भेल। Top of Form रिपोर्ताज- 1.अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ 2. नवेन्दु कुमार झा 3. नेपाल चिन्हएबाक अभियान - जितेन्द्र झा . श्री रामभरोस कापड़ि “भ्रमर” (१९५१- ) जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। सम्प्रति-जनकपुरधाम, नेपाल। त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ एम.ए., पी.एच.डी. (मानद)।

हाल: प्रधान सम्पादक: गामघर साप्ताहिक, जनकपुर एक्सप्रेस दैनिक, आंजुर मासिक, आंगन अर्द्धवार्षिक (प्रकाशक नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी)।

मौलिक कृति: बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)।

नेपाली कृति: आजको धनुषा, जनकपुरधाम र यस क्षेत्रका सांस्कृतिक सम्पदाहरु (आलेख-संग्रह), भ्रमरका उत्कृष्ट नाटकहरु (अनुवाद)।

सम्पादन: मैथिली पद्य संग्रह (नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान), लाबाक धान (कविता संग्रह), माथुरजीक “त्रिशुली” खण्डकाव्य (कवि स्व. मथुरानन्द चौधरी “माथुर”), नेपालमे मैथिली पत्रकारिता, मैथिली लोक नृत्य: भाव, भंगिमा एवं स्वरूप (आलेख संग्रह)। गामघर साप्ताहिकक २६ वर्षसँ सम्पादन-प्रकाशन, “अर्चना” साहित्यिक संग्रहक १५ वर्ष धरि सम्पादन-प्रकाशन। “आँजुर” मैथिली मासिकक सम्पादन प्रकाशन, “अंजुली” नेपाली मासिक/ पाक्षिकक सम्पादन प्रकाशन।

अनुवाद: भयो, अब भयो (“नहि आब नहि”क मनु ब्राजाकीद्वारा कयल नेपाली अनुवाद)

सम्मान: नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा पहिल बेर १९९५ ई.मे घोषित ५० हजार टाकाक मायादेवी प्रज्ञा पुरस्कारक पहिल प्राप्तकर्ता। प्रधानमंत्रीद्वारा प्रशस्तिपत्र एवं पुरस्कार प्रदान। विद्यापति सेवा संस्थान दरिभङ्गाद्वारा सम्मानित, मैथिली साहित्य परिषद, वीरगंजद्वारा सम्मानित, “आकृति” जनकपुर द्वारा सम्मानित, दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाद्वारा सम्मानित, जिल्ला विकास समिति धनुषा द्वारा दीर्घ पत्रकारिता सेवाक लेल पुरस्कृत एवं सम्मानित, नेपाली मैथिली साहित्य परिषद द्वारा २०५९ सालक अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन मुम्वई द्वारा “मिथिला रत्न” द्वारा सम्मानित, शेखर प्रकाशन “पटना” द्वारा “शेखर सम्मान”, मधुरिमा नेपाल (काठमाण्डौ) द्वारा २०६३ सालक मधुरिमा सम्मान प्राप्त। काठमाण्डूमे आयोजित सार्कस्तरीय कवि गोष्ठीमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधित्व।

सामाजिक सेवा : अध्यक्ष-तराई जनजाति अध्ययन प्रतिष्ठान, जनकपुर, अध्यक्ष- जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपाध्यक्ष- मैथिली प्रज्ञा प्रतिष्ठान, जनकपुर, उपकुलपति- मैथिली अकादमी, नेपाल, उपाध्यक्ष- नेपाल मैथिली थाई सांस्कृतिक परिषद, सचिव- दीनानाथ भगवती समाज कल्याण गुठी, जनकपुर, सदस्य- जिल्ला वाल कल्याण समिति, धनुषा, सदस्य- मैथिली विकास कोष, धनुषा, राष्ट्रीय पार्षद- नेपाल पत्रकार महासंघ, धनुषा। Bottom of Form अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन आ नेपाल रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’

चारिम वर्ष हम पटना गेल रही । चेतना समितिमे बैजू बाबू भेटलथि । विद्यापति स्मृति पर्व भ’ गेल रहै । कोनो आने सन्दर्भमे रही । ओ आवेशपूर्वक दिल्लीमे आयोजन होब बला अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे अएबाक हेतु आमंत्रण देलनि । हमरा सभ लेखें पहिल आयोजन रहैक–हम आ डा. विमलकें जएबाक रहैक, मुदा जं कि ओ बड हडबडीमे आ अस्पष्ट रुपें अएबाक बात बाजल रहथि, हम सभ जा नहि सकल रही । बरु काठमाण्डूसं धीरेन्द्र आ कमलेश झा गेल रहथि । ‘मिथिलारत्न’ सं सम्मानित होइत गेलाह आ ओत्तहि घोषणा कएलनि–अगिला साल ई समारोह काठमाण्डूमे हयत । तालीक गडगडाहटि भेल । जे से हम सभ जा नहि सकलहुं । बादमे बैजू बाबूकें भेलनि जे नेपाल सं किछु आरलोकनि छुटि गेलाह, अएबाक चाहियनि । ओ जनकपुर अएलाह आ धीरेन्द्र आदिसं सम्पर्क कएलखिन्ह जे एहि वर्ष काठमाण्डूमे आयोजनक की तैयारी अछि । जे हुनका संग रहनि हुनक कथन अनुसार धीरेन्द्र आदि जे केओ गछने रहनि साफ पाछां हटि गेलनि । ओ मर्माहत भ’ जनकपुरसं घूरि गेलाह । तखन ओम्हर जा मुम्वईमे आयोजन करबाक ब्योंत धरौलनि । आब मुम्वईमे अएबालेल पुनः बैजू बाबूक आमंत्रण, आग्रह आ स्नेहपूर्ण दवाव आएल । रेवती जीकें सेहो आग्रह भ’ गेल रहिन–विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसर पर दरिभंगेमे । ई तेसर सालक गप थिक । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन नेपाल–भारतक विद्वान, मैथिली सेवी सभक सझिआ मंच होएबाक हमर विश्वास मुम्वई चलबाले’ प्रेरित कएलक आ तखन दरिभंगासं टिकट रिजर्बक व्यवस्था चन्द्रेशजी जिम्मा देल गेल । जेना बैजु बाबूक मुंहकहबी कार्यक्रम तहिना अस्पष्ट चन्द्रेशजीक ओरिआओन । हम सभ दरिभंगा पहुंचि दोसर दिन भेने मुम्वईक हेतु प्रस्थान कएने रही । मुम्वईक सम्पूर्ण कार्यक्रमक सन्दर्भमे पुस्तकमे आनठाम हमर विचार आबि चुकल अछि । तहिना गत वर्ष कलकत्ताक तैयारी रहैक । एहि बेर हमरा पर थप भार द’ देलनि बैजू बाबू–‘मिथिला रत्न’क हेतु व्यक्तित्व चयनक । रेवती जीसं सल्लाह कएल–ओ वदरी नारायणवर्माक नाम बतौलनि । हम डा. रामदयाल राकेशकें एकरा लेल उपयुक्त वूझि दुनूक नाम बैजूबाबू लग पठा देलियनि । डा. राकेश कें काठमाण्डूसं बजाओल गेलनि । हम सभ निर्धारित तिथिकें ‘गंगासागर’ सं कलकत्ताक हेतु विदा भ’ गेल रही । ओत्त पहुंचलाक बाद स्टेशन पर ठाढ बैजू बाबू मोनकें गदगद क’ देने रहथि । तकरा बाद अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनमे नेपालक हमरा चारि गोटकैं फूटे कोठरीमे आवास देल गेल आ सम्मान सेहो । मैथिली सम्मेलनक अन्तराष्ट्रिय स्वरुप प्रदान करबा लेल हमरा सभक उपस्थिति जहिना अनिवार्य देखल गेल तहिना डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजूक व्यवहार ततबे सहज आ अपनत्व भरल । आब चारिम चेन्नईमे अछि । तैयारी चलि रहल छैक । ओत्तहु नेपाल एकटा महत्वपूर्ण सहभागी रुपमे उपस्थित हयत तकर आशा करैत छी । अनुभूति आ औचित्य हमरा बूझल नहि अछि बैजू बाबू कोन उद्देश्य राखि ई अन्तराष्ट्रिय स्वरुपमे एकरा शुरु कएलनि । ओ एकर शुभारंभ मैथिलीकें अष्टम अनुसूचिमे स्थान भेटलाक बाद ताही तिथि २२ दिसम्वरकें कएलन्हि । जकरा अधिकार दिवसके रुपमे मनाओल जाइछ – २२ ता.क’ अधिकार दिवस आ २३ ता.क’ अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन । पहिल बेर दिल्लीक हेतु आमंत्रण भेटला पर हमरा सभक हिचकिचाहट, आयोजनमादे शंका ढेर सन छल । बैजू बाबूक संघर्षशील व्यक्तित्व प्रभावित त करैत छल, मुदा हरफन मौला काम काजसं आशंका उठैत छल, पता नहि जे कहैत छथि, करबो करैत छथि वा नहि तए“ दिल्लीक ओ सम्मेलन छुटल तकर हमरा काफी अफशोच अछि । बादमे मुम्वई आ कलकत्ताक अनुभब काफी सकारात्मक, प्रशंसनीय आ अनुकरणीय रहल । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक समस्त गरिमाकें निर्वाह करबाक प्रयास ओ करैत छथि । कतौ स्थानीय आयोजक अपनासं उन्नैस वुझाइत छनि तं कतौ वीस । तए“ परेशानी त हुनके उठब’ पडैत छनि । मुदा हम सभ जे अनुभव कएलहुं ओ अत्यन्त काजक छल । मैथिली संसारक बहुतो साहित्यकार, सेवी, भाषाशास्त्री, संगीत एवं नृत्यकलाकार सभसं भेंटघांट होइत अछि । सभक विचारक आदान–प्रदान होइत छैक । नव संसारक निर्माण होइत छैक । भाषा, साहित्य, संस्कृतिक हेतु सेहो एहि सम्मेलनक उपादेयता स्पष्ट अछि । मैथिली भाषाक उत्थानक हेतु नव–नव योजना बनैत छैक । नव–नव पोथी प्रकाशित एवं विमोचित होइछ । विद्वान एवं प्रेमी लोकनि सम्मानित होइत छथि । सांस्कृतिक कार्यक्रममे नव–नव प्रतिभा आगां अबैत छथि । सम्पूर्ण मैथिल समाजसं ओ प्रतिभा जुडैत अछि, जाहिसं बादमे ओकर विकासक अवसर प्रदान होइछ । ‘राखी’ एकटा अपाहिज लडकी एहने प्रतिभा अछि जे सभकें प्रभावित कएने रहए । अमता धरानाक कलाकार लोकनि मुग्ध करैत छथि । नेपाल आ भारतक विचक सम्वन्धक नीक सूत्रपात ई सम्मेलन करैत अछि । नेपालक प्रतिनिधिके मंचपर उपस्थितिसं दुनू देशक प्राचीन सम्वन्धमे ताजापन अबैछ । मुम्वई आ कलकत्तामे पंक्ति लेखकक भाषणसं हजारोंक दर्शक दीर्धामे भेल तालीक गडगडाहटि तकर प्रमाण छैक । नेपालमे होइत मैथिली गतिविधिसं सम्पूर्ण मिथिलाञ्चलकें, खास क’ प्रवासी मैथिलकें जानकारी करएबाक ई सुन्दर अवसर होइत अछि, जकर उपयोग मुम्वई आ कलकत्ता दुनूठाम कएल गेल । कलकत्तामे नेपालमे मैथिली, नामक वूकलेट छपा वांटल गेल रहय तं राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’क सद्यः प्रकाशित पुस्तक” राजकमलक कथा साहित्यमे नारी’ विमोचित भेल । ओत्त गामघर साप्ताहिक विशेष अंक, नेमिकानन’क अंक सभ वांटल व विक्रय लेल उपलव्ध कराओल गेल । बहुतो साहित्यकार रुचिसं नेपालक भाषा, साहित्यक वारेमे जानकारी लेलनि । जानकारीक आदान प्रदान भेल । ज्ञान समृद्ध भेल । तखन एखन धरि सहभागी भ’ जे किछु अनुभव कएल अछि ओ एकर औचित्यकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि । ई सम्मेलन निरन्तर जारी रहबाक चाही । वैजू बाबू जुझारु लोक छथि, आयोजनकें सफल बनएबा लेल अहर्निश खटैत छथि । हाथ, पएर, मुंह सभ धरबामे संकोच नहि करैत छथि मां मैथिलीक प्रतिष्ठाक हेतु । एहन विराट हृदयी, समर्पित आ लगनशील व्यक्तित्व भेने मैथिली समादृत भेलीह अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक अनुभूति किछु किछु सुझाव देबाक लेल हमरा उत्प्रेरित करैत अछि । जं ई भ’ जाइत त सोनमे सुगन्ध भ’ जइतैक – ई हमरा लगैत अछि । सूझाओ १. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन हयबाक कारणें एकर वैनर जे बनैक ताहिमे नेपालक किछुओ प्रतीक चिन्ह अवश्य रहैक । २. कार्यक्रम सभ व्यवस्थित आ पूर्व निर्धारित होएबाक चाही । कार्यक्रम चलैत बेरमे व्यवस्थापन करब अस्तव्यस्तता लबैत अछि । ३. सभ कार्यक्रम, सहभागी वीच एकदिन पूर्वे वितरीत भ’ जाए तं उत्तम ४. अधिकार दिवस दिन मात्र भाषण नहि, कार्यपत्र प्रस्तुति आ टिप्पणीक कार्यक्रम राखल जाए । नेपालक प्रतिनिधिकें कार्यपत्र आ बजबाक अवसर अवश्य देल जाइछ । ५. मूल समारोहमे नेपालक प्रतिनिधित्व मंच पर अवश्य हयबाक चाही । ओ उपस्थिति आ वक्ता दुनू रुपमे होए । ६. आवासक व्यवस्था प्रति सतर्क रहल जाए । ७ स्मारिकाक स्तरीय प्रकाशन हो, जाहिमे विगतक सम्मेलन सभक सन्दर्भमे आलेख आ चित्रवाली अवश्य देल जाए । ८. कलकत्ता सम्मेलनमे एकर निर्वाह भेल अछि, एकरा आगूओ एही रुपमे बढाओल जाए । ९. अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक सहभागि सभक सूची १५ दिन पूर्व अन्तिम रुप द’ सार्वजनिक क’ देल जाइक आ संगहि ‘मिथिला रत्न’ पौनिहारक जीवनी फूटसं प्रकाशित क’ औचित्य प्रमाणित कएल जाए । नेपालक साहित्यकार, मैथिली प्रेमी सभकें अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनसं बहुत किछु आशा छैक । दुनू देशमे मैथिली अपन अस्तित्व लेल लडि रहल अछि । एहनमे ई भेंटघांट, अप्पन–अपनौती, दुख–दुखक वंटवारा आपसी सम्वन्धकें सुदृढ त करबे करैत अछि, लक्ष्य प्राप्तिक हेतु मोनकें मजवूत सेहो बनबैत अछि । अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलनक महासचिव डा. वैद्यनाथ चौधरी बैजू एहि सम्वन्धक सूत्रकें गसिआ क’ पकडने छथि । हुनक इएह स्नेह, सद्भाव आ अपनैती नेपालीय राजनीतिक इतिहासमे मिथिलाराज्य’क स्थापनार्थ शक्ति आ वातावरण निर्माणमे सहायक भ’ रहल अछि । हुनक जुझारु व्यक्तित्व एत्त प्रेरणाक स्रोत रहलए । हमसभ एहि सम्वन्धक निरन्तरताक अपेक्षा करैत छी । आ नेपाल–भारत विचक आपसी आ प्रेमक प्रतीक रुपमे चलैत आबि रहल एहि सम्मेलनक सफलताक कामना करैत छी । नवेन्दु कुमार झा, समाचारवाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना विद्यापति स्मृति दिवस (११ नवम्बर २००८) पर विशेष-यशस्वी कवि छलाह महाकवि विद्यापति मिथिलांचलक पावन भूमि कतेको महापुरुषकेँ जन्म देलक अछि जकर यश अपना देशक अलावा विदेशमे सेहो पसरल। एहने महान विभूतिमे सऽ एक छलाह “महाकवि विद्यापति” जिनक रचनामे कल्पनाक बदला यथार्थक दर्शन होइत अछि। ओ ओहि गीतकारमे सऽ एकटा छलाह जिनक रचित गीतकेँ मिथिलांचलेमे नहि अपितु बंगाल, आसाम, उत्तर प्रदेश आदिक संगहि सम्पूर्ण विश्वक रसिक मंडली सम्मान देलक अछि। उत्तर भारतमे प्रचलित आर्यभाषा क्षेत्रमे विद्यापति सनक सम्मान प्रायः ककरो नहि भेटल अछि। असमिया, हिन्दी, बंग्ला आ मैथिली एहि चारि टा भाषाकेँ हिनक गीत एकटा नव प्रेरणा देलक अछि। महाकवि विद्यापति एकटा सुयोग्य कवि, लेखक, भक्त, राजनयिक, समाज सुधारक, स्मृतिकार, संगीतज्ञ आ ज्योतिषविद् छलाह। एहि सभ गुणक कारण आइयो हुनक नाम एहि तरहे लेल जाइत अछि जेना ओ आईयो हमरा सभक मध्य उपस्थित छथि। छह सहस्त्राब्दीक बादो आईयो हुनक विद्वता आ गुणक प्रसिद्धि मिथिलांचलक संगहि सम्पूर्ण भारत आ विश्वमे पसरल अछि। महाकविक जन्म दरभंगा जिलान्तर्गत बिस्फी गाममे भेल छल। ओ सम्पन्न परिवारक छलाह। हुनक जन्मक सम्बन्धमे विद्वान सभक मध्य मत भिन्नता अछि। विभिन्न उपलब्ध सामग्रीक आधारपर विद्वान लोकनि हुनक जन्मक संबंधमे अनुमान लगबैत छथि। स्व. नागेन्द्रनाथ गुप्तक अनुसार महाकविक जन्म १३५७ ई. मे भेल छल। जखन कि स्व. हर प्रसाद शास्त्री हुनक जन्म १३५० ई. मानैत छथि। मुदा मिथिलांचलक विद्वान् महाकविक जन्म अनुसंधानक आधारपर १३६० ई. मानैत छथि तथापि बहुमत अछि जे महाकवि १३६० ई. सँ १४४८ ई. क मध्य विराजमान छलाह। कहल जाइत अछि जे ओ पैघ आयु पएने छलाह। कतेको राजघरानाक उतार-चढ़ावकेँ ओ अपना आँखिसँ देखने छलाह। बुढ़ राजा-रानीसँ लऽ कऽ राजकुमार-राजकुमारी सभक संग हुनक निकटवर्ती संबंध रहल। हुनक पिता गणपति ठाकुर दरभंगा राजक राज मंत्री छलाह। हुनक पितामह जयदत्त पैघ विद्वान आ उच्च कोटिक संत छलाह। स्वयं विद्यापति सेहो जन्महिसँ ओइनवार वंशक राजा सभपर आश्रित छलाह। ओ महाराजा शिव सिंहक प्रधान पार्षद आ विश्वसनीय अमात्य छलाह। महाराज शिव सिंह अपन राज्याभिषेकक समय हुनक जन्मभूमि “बिस्फी” गाम हुनका दानमे दऽ देने छलाह। शिव सिंहक बाद सेहो विद्यापति, महारानी विश्वास देवी, महाराजा नरसिंह तथा महाराजा धीर सिंहक दरबारमे प्रधान राज पण्डितक रूपमे छलाह। अपन दीर्घकालिक जीवनमे महाकवि कतेको ग्रन्थक रचना कएलनि। हुनक एहि ग्रन्थ सभक अध्ययन कएलासँ हुनक बहुमुखी प्रतिभा स्पष्ट होइत अछि। हुनक समयमे आबा जाहीक अतेक सुविधा नहि छल एकर बावजूद ओहि समयक मिथिलांचलक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सभक विवरण “भू परिक्रमा” नामक ग्रन्थमे प्रस्तुत कऽ आबए बाला पीढ़ीक लेल पैघ उपकार कएलनि। संस्कृत भाषामे सेहो हुनक लेखनी चलल जाहिमे “शैव सर्वस्वसार”, “शैव सर्वस्वसार प्रमाण”, “पुराण संग्रह”, “दान वाक्यावली” आ “वर्षकृत्य” आदि प्रमुख अछि। संस्कृतमे ओ “मणिमञ्जरी” नामक नाटक सेहो ओ लिखलनि। “गोरक्ष विजय” नामक दोसर नाटक जे नेपालसँ भेटल अछि, ओहिमे संस्कृतसँ अलग मैथिली भाषामे सेहो गीत अछि। एकर अलावा अपभ्रंशमे ओ “कीर्तिलता” आ “कीर्ति पताका” नामक ग्रन्थक रचना कएलनि। कीर्तिलता हुनक पहिल रचना मानल जाइत अछि। अपभ्रंश आ संस्कृतक अतिरिक्त हुनक काव्यक विशाल भण्डार मैथिली भाषामे सेहो विद्यमान अछि। हुनक यश मुक्त रचनामे सुरक्षित अछि, जकर प्रचार-प्रसार हुनक मरलाक बाद आइयो घरे-घर अछि। हुनक मृत्युक संबंधमे सेहो विद्वान सभ एकमत नहि छथि। जनश्रुति ई अछि जे हुनक मृत्यु १४५० ई. मे भेल मुदा नेपालक दरबार पुस्तकालयमे उपलब्ध “ब्राह्मण सर्वस्व” नामक ग्रन्थक आधारपर हुनक मृत्यु १४६० ई. मानल जाइत अछि। ओना सम्पूर्ण मिथिलांचलमे ई कहबी प्रचलित अछि जे- “विद्यापतिक आयु अवसान कार्तिक धवल त्रयोदशी जान” उपेक्षित अछि सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर बिहारक पहचान देएबामे सोनपुर प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेलाक महत्वपूर्ण स्थान अछि। प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमासँ शुरू भऽ ई मेला एक मास धरि चलैत अछि। ई मेला देशमे जानवरक सभसँ पैघ मेला अछि। एहि ठाम जानवरक अलावा दैनिक उपयोगी वस्तुक बिक्री सेहो होइत अछि। मेलामे मनोरंजनक विशेष व्यवस्था सेहो रहैत अछि। चारूकात नदी आ जलाशयसँ वेष्ठित एहि ठामक बाबा हरिहर नाथक मंदिरक सभसँ पैघ विशेषता ई अछि जे हरि आ हरक एक संग पुण्य दर्शन भक्त सभकेँ होइत अछि। ई क्षेत्र पौराणिक आ धार्मिक महत्व बाला होएबाक संगहि ऐतिहासिक सेहो अछि। एहि ठामक माटिमे संगम आ समन्वयक भावना सेहो अछि। हरिहर क्षेत्रक स्वर्णिम इतिहास आइयो पूर्ण रूपेण जन साधारणक सोंझा नहि आबि सकल अछि। आइयो ई शोध आ अनुसंधानक अभावमे भूगर्भमे पड़ल अछि। एकर उज्जवल भविष्यक स्मृति चिन्ह आइयो एहि ठाम जमानासँ गौरव स्तम्भ आ प्रकाश कुंजक रूपमे विद्यमान अछि। कतेको ऋषि-महर्षिक साधनाक ई भूमि ज्ञानक तपोभूमि अछि। एकर पौराणिक गौरव गाथा पद्मपुराण सहित आन ग्रन्थमे सेहो सगौरव वर्णित अछि। बाबा हरिहरनाथक मन्दिर अति प्राचीन अछि जकर स्थापना स्वयं ब्रह्माजी अपना हाथे हरि आ हरक एकीकार लिंगक रूपमे एहि ठाम स्थापित कएने छलाह। हरि आ हरक एहन एकाकार संगम भारतवर्षमे कतहु नहि भेटैत अछि। एहि ठाम गंगा आ गंडक नदीक अभूतपूर्व संगम सेहो अछि। हरिहर क्षेत्रक महातम्यक संदर्भमे कतेको कथा लिखल गेल अछि। पुराणक अनुसार एक बेर ब्रह्मा जीक पुरोहितीमे देवता सभ एकटा यज्ञक आयोजन कएलनि। कतेको कारणसँ ई यज्ञक विध्वंश भेल, तखन देवता सभ “हर”क स्थापना कएलनि आ यज्ञकेँ सफल बनौलनि। तखनसँ हरिहर क्षेत्र लोक विश्रुत भेल। पद्म पुराणमे व्व्हो वर्णन अछि जे शालग्रामीसँ उत्तर हिमालयसँ दक्षिण पृथ्वी महाक्षेत्र अछि। एहि ठाम बाबा हरिहरनाथक मंदिर अछि। ओहि स्थानपर भगवती शालिग्रामीक पतित-पावनि गंगामे आबिकऽ मिलन भेल अछि। संगम क्षेत्र होएबाक कारण एहि क्षेत्रक माहात्म्य बहुत बढ़ि गेल अछि। इहो कथा अछि जे शालिग्रामी तथा गंगाक संगम होएब आ महाक्षेत्रक अंतिम भाग होएबाक कारण एहि ठाम “हरि” आ “हर”क स्थापना भेल। सोनपुरमे एहि स्थानपर कतेको मठ आ मन्दिर अछि जे स्थानीय प्रशासन आ सरकारक उफॆख्षाक शिकार बनल अछि। गंडक नदीक किनारपर ठीक सामने अछि गोटेक अढ़ाई सौ गज पश्चिम बाबा हरिहरनाथक मुख्य मन्दिर। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर कतेको लाख श्रद्धालु प्रति वर्ष संगम स्नान कऽ बाबाकेँ जल चढ़ा श्रद्धा सुमन अर्पित करैत छथि। मन्दिरक प्रांगणमे कतेको आन छोट-छोट मन्दिर सेहो अछि जाहिमे विभिन्न देवी-देवता सभक मूर्ति स्थापित अछि। एहि मन्दिरक ठीक सोझाँ अछि एकटा महावीर मन्दिर जाहिमे उज्जर संगमरमरक गोटेक दस फीटक विशाल राम भक्त हनुमानक मूर्ति स्थापित अछि। हरिहरनाथ मन्दिरक पाछाँ मुगल बाड़ी अछि जाहिमे सेहो मन्दिर बनल अछि। मंदिरसँ सटल दक्षिण भागमे पुरान ठाकुरबाड़ी मन्दिर अछि, जखन कि मुख्य मन्दिरक सोझाँ पूरब दिश एकटा ऐतिहासिक तालाब अछि जकर निर्माण च्यवन ऋषि कुष्ठ रोगक निवारण लेल करबैत छलाह, मुदा किछु बाधा आबि गेलासँ एकर निर्माण नहि भऽ सकल। एकरा च्यवन ऋषिक तपस्थल अथवा च्यवन तालाबक नामसँ जानल जाइत अछि। मन्दिरसँ भरल एहि क्षेत्रमे गंडक किनारमे अछि प्रसिद्ध ऐतिहासिक मन्दिरमे दक्षिणमुखी माँ कालीक प्रचण्ड रूप वाला दुर्लभ मूर्ति। एहि मूर्तिक ठीक सोझाँ सत्ताइस हाथपर शिवलिंग विराजमान अछि। मन्दिरक दक्षिणमे श्मसान अछि। मान्यता अछि जे ई काली मन्दिर सिद्धपीठ अछि जतए पहिने तंत्र-मंत्रक सिद्धि कएल जाइत छल। एहि काली मन्दिरक पाछाँ एकटा पुरान मन्दिर अछि जाहिमे कतेको मूर्ति विराजमान अछि। मन्दिरक प्रांगणमे पाल कालक कतेको महत्वपूर्ण अवशेष देखल जाऽ सकैत अछि। गीता बाबाक एहि मन्दिरमे हुनक जीवन कालमे रौनक रहैत छल, परञ्च बाबाक मृत्युक बाद सभ परम्परा ध्वस्त भऽ गेल। काली मन्दिरक उत्तर दिस अति प्राचीन गौरी शंकर मन्दिर अछि जाहिमे भगवान शिव आ माँ पार्वतीक सुन्दर आ ऐतिहासिक दक्षिण रुखक मूर्ति अछि। तंत्र साधक सभक मानब छनि जे एहि ठाम लागल मूर्ति काम विजय मुद्रामे अछि। एहि मन्दिरक प्रांगणमे एकटा विष्णु मन्दिर सेहो अछि जकर गुम्बदपर पाल काल आ मौर्य कालक कलाकृति उत्कीर्ण अछि। हरिहर नाथक मुख्य मन्दिरसँ पश्चिम  गोटे दू सौ गजक दूरीपर विशालनाथ आ बालनाथक समाधि स्थल अछि जकर भीतरक भागमे अद्भुत कलाकृति अंकित अछि। महान तपस्वी स्वामी त्रिदण्डीजी महाराज द्वारा गजेन्द्र मोक्ष देव स्थानपर आकर्षण मन्दिरक नव निर्माण कराओल गेल अछि। भगवान विष्णुक ई मन्दिर हरिहर क्षेत्रक अद्भुत नमूना अछि। ऐतिहासिक हरिहर क्षेत्र आ ओकर लगपास स्थित मन्दिर आ मठ लोक सभक आस्थाक केन्द्र अछि मुदा देखभाल उचित रख-रखावक अभावमे जीर्ण-शीर्ण भऽ रहल अछि। सभ साल हरिहर क्षेत्र मेलाक अवसरपर किछु साफ सफाई होइत अछि आ स्थानीय प्रशासन आ लोक सभ सेहो सक्रिय होइत छथि, मुदा एकर बाद ई अपेक्षित रहैत अछि। प्रतिवर्ष एहि मेलाक घटैत स्वरूप आ लोकक घटैत आकर्षणसँ एहि क्षेत्रक ऐतिहासिक आ पौराणिक स्वरूप संकटमे पड़ल जाऽ रहल अछि। एहि मेलाक विकासक लेल सरकार द्वारा मेला प्राधिकरणक घोषणा मात्र बयानबाजी साबित भेल अछि। पछिला वर्षसँ एहि मेलामे खरीदल जानवर सभक प्रदेशक बाहर लऽ जयबासँ प्रतिबन्धक कारण व्यापारपर असरि पड़ल अछि। सभ वर्ष उद्घाटन आ समापनपर मेलाक विकासक लेल भाषण होइत अछि जे मेलाक समाप्तिक बाद बिसारि देल जाइत अछि। औद्योगिक रूपसँ पिछड़ल बिहारमे आय अर्जित करबाक लेल पर्यटन उद्योग संभावनासँ भरल अछि। एहि ठाम कतेको ऐतिहासिक, पौराणिक आ प्राकृतिक स्थल अछि जे पर्यटककेँ अपना दिस खिचि सकैत अछि। एहिमेसँ सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला सेहो एकटा अछि। जरूरत अछि जे एकर योजनाबद्ध विकास कऽ एकरा देशक पर्यटनक मानचित्रपर आनल जाए आ ई भाषण आ घोषणासँ नहि होएत एहि वास्ते सरकार, स्थानीय प्रशासन आ स्थानीय जनताकेँ एक संग प्रयास करक होएत। जितेन्द्र झा, जनकपुर नेपाल चिन्हएबाक अभियान मिथिला नाटय कला परिषद, जनकपुर तीनटा जिलामे विभिन्न ४० स्थानमे नव नेपालक निर्माणमे राजनीतिक दल आ नागरिक समाजक जिम्मेवारी बुझएबाक अभियानमे चिन्हियौ नेपाल नामक सडक नाटक मन्चन कएलक अछि । धनुषा, महोत्तरी आ सर्लाही जिलामे मन्चित सडक नाटकमे समाजक सभ समुदाय, वर्गके अपन उन्नति लेल जिम्मेवारी बोध हएब आवश्यक रहल बताओल गेल अछि। नव नेपालक लेल इएह कर्तब्यबोधक सन्देश दैत चिन्हियौ नेपाल नाटकके पहिल खेप सम्पन्न भेल नाटय निर्देशक रमेश रंजन बतौलनि अछि । कोशीक बाढि जेना जाति आ वर्ग बिना देखने अपन त्रास मचओलक तहिना कोनो राष्ट्रिय संकट सभके लेल समान रुपे चिन्ताक विषय रहल नाटकमे देखाओल गेल अछि । महेन्द्र मलंगिया लिखित आ रमेश रंजन निर्देशित इ नाटक राष्ट्रिय भावनाके मजबुत बनएबा दिश केन्द्रित अछि । हिंसा, आतंक,, आम जीवनक कठिनाईके जीवन्त नाटय प्रस्तुतिक माध्यमसं युवा पिढीक मनोविज्ञानके उतारबाक प्रयास कएल गेल अछि । युवामे पलायनवादी मनस्थिति आ श्रम बिना सुविधाभोगी जीवन जिबाक सपना अपराध करबालेल उक्सारहल नाटकमे देखाओल गेल अछि । नाटकमे सुनिल मिश्र, रमेश रंजन झा, मदन ठाकुर, राम नारायण ठाकुर, विष्णुकान्त मिश्र, परमेश झा, रविन्द्र झा, रन्जु झा, प्रियंका झा, गंगाकान्त झा, राम अशिष ठाकुर, राम कैलाश ठाकुर अभिनय कएने अछि। 1.विचार-राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत,श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार2. विद्यापति-निमिष झा

श्यामसुन्दर शशि,दोहा, कतार श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत। राष्ट्रप्रमुखके उपेक्षा,अनिष्टक संकेत लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालक प्रथम राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव अधिर भऽ अपन मोनक विहाडि बाहर कएलनि अछि । सम्भवतः मनक पीडा वेसम्हार भेलाक बाद ओ अपन पूर्व सहकर्मीसभक बीच सीधा आ सपाट शब्दमे कहि गेलाह —राजनितीस“ बेसी डाक्टरी पेसामे ईज्जति अछि(छल) । असलमे ओ अपन निजी अवस्थाक चित्रण कएने छलाह । यदि ईहे बात अन्य दोसर नेताक मूहस“ निकलल रहैत त ओ अभिव्यक्ति कोनो खास महत्व नहि पावि सकैत कारण देशक अधिकांश नेतालोकनि दर्शक र श्रोताक मूड पढिक अपन भाषण लिखैत आ पढैत छथि । मुदा किचेनस“ लऽ कैविनेटधरि , मधेस“लऽ पहाडधरि एक्कहि बोली बोलएवला डा.यादवक“े यी अभिव्यक्तिक भीतर वास्तवमे गम्भिर पीडा नुकाएल अछि । मर्यादाक लिहाजस“ देशक सभस“ उ“च्च पदक व्यक्तिक यी अभिव्यक्ति लोकतान्त्रिक गणतन्त्रक मुखियाक प्रतिष्ठा उपर प्रश्न खाढ कएलक अछि । जनताक बेटा राष्ट्रप्रमुख बनि सकओ ई परिवर्तनकामी नेपालीक सर्वोच्च सपना छल जाहि सपनापर राष्ट्रपतिक ई वक्त्व्य सवाल खाढ करैत अछि । प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहालक“े लन्ठैई आ सत्तासाझेदार अन्य दलसभक उपेक्षाक सिकार राष्ट्रपति यादवक“े यी भावुक अभिव्यक्ति आम नेपालीके चिंतित बनौलक अछि । मधेसीके आओर अधिक । संगहि अनेकानेक जिज्ञासा सेहो उब्जौलक अछि । अपनाके“ राष्ट्रपतिक रुपमे घोषणा कए संविधानसभाक निर्वाचनमे जाएवला लोकतान्त्रिक नेपालक प्रथम कार्यकारी प्रमुख पुष्पकमल दाहाल एहने निरास राष्ट्रपतिक कल्पना कएने छलाह कि ? राज्यक कार्यकारी प्रमुखद्वारा सेहो राष्ट्रप्रमुखके मानमर्दन कएल जएवाक घटनासभ आम नेपालीके सोचवालेल वाध्य क रहल अछि — कहीं माओवादी एकतन्त्रीय शासन प्रणाली लएवाक षडयन्त्र त ने करहल अछि ? वा राष्ट्रपतिक पदके उपेक्षित बना सा“डामे दफन राजसंस्थाके पुर्नस्थापित कएल जएवाक अघोषित षडयन्त्र त ने भ रहल अछि देशमे ? मधेसवादी आन्दोलन जहन उत्कर्षमे छल तहन नेपाली काग्रेसक महामन्त्रीक रुपमे डा.रामवरण यादव एहि महान आन्दोलनके“ “मास हिस्टीरिया” कहने छलाह । एक चिकित्सकके रुपमे हुनका एहि गाडिक अर्थ नीक जका“ बूझल छनि । जहन वास्तविकता ई अछि जे आई जाहि पदपर ओ आसीन छथि से पद हुनका ईहे हिस्टीरियाक रोगीसभक बलिदानस“ प्राप्त भेल छनि । देशी विदेशी राजनयिक,राजनितीक विष्लेशक एवं शक्ति केन्द्रसभ एहि आन्दोलनके आन्तरिक उपनिवेश विरुद्धक स्वाभाविक विद्रोह कहि रहल समयमे एक मधेसी नेताक यी अभिव्यक्ति राजधानीमे वेस चर्चा पौलक आ राष्ट्रिय राजनितीमे डाक्टर यादवके कद सेहो बढल । यद्यपि मधेस भरि एहि वक्तव्यक कडा विरोध भेल छल आ आक्रोशित आन्दोलनकारीसभ जनकपुरक“े ब्रह्मपुरी स्थित हुनकर घरमे आगजनी सेहो कएने छल । मुदा महामानव विपीक अनुयायी डा.यादव लोकतन्त्र,समाजवाद आ मानवअधिकारक पक्षमे पहाड जका“ अडिग रहलाह । अपन घरमे अपमानित भईयो कऽ ओ राष्ट्रिय एकताक पक्षमे अविचल रहलाह । राष्ट्रवादी राजावादीसभसंग समेत सहकार्य करवाक सार्वजनिक प्रतिवद्धता व्यक्त करैत आएल माओवादी अध्यक्ष दाहाल प्रधानमन्त्रीक शपथ लेबाक लेल सुट टाईमे सजि धजिक आएल छलाह मुदा राष्ट्राप्रमुखक“े रुपमा ओ कथित राष्ट्रियताक प्रतीक दाउरा सुरुवालमे देखल गेलाह । गृहनगर जनकपुरमे सेहो ओ माथपर भादगाउ“ले टोपी आ ताहि उपर मिथिलाक प्रतीक पाग लगौने देखल गेलाह । अपन गाममे सेहो राष्ट्रियता हुनकर माथपर छलनि । ओ हुनकर बाध्यता छल वा पदक मर्यादा हुनके बूझल हएतनि । मुदा एतवाधरि साफ अछि जे ओ राष्ट्रिय एकताक मूलमन्त्रस“ कोनो ठाम एको तिल विचलित नहि भेलाह । वा कहल जाय त अपनाके सार्वजनिक व्यक्तित्व प्रमाणित करवालेल ,कथित राष्ट्रियताक प्रतीक टोपी धारण कएनाई कखनो नहि छोडलाह । भादगाउ“ले टोपीउपर मिथिलाक पवित्र पाग लगबैत कालक हुनकर मनोदशा वर्णनातीत भ सकैछ । भादगाउ“ले टोपी उपरके पागक रहस्य खुजए नहि ताहिपर खस मानसिकताक वर्तमान शासकके विशेष सचेष्ट रहवाक चाही । कारण देशमे पुनः ववाल भ सकैत अछि । ईएह राष्ट्राप्रमुख डा.रामवरण यादव “राजनितीस“ डाक्टरीक पेसा बेसी ईज्जतदार ” कहि अपन हारल मोनक व्यथा वखान कएलनि अछि । काग्रेसक महाधिवेशन प्रतिनिधीस“ लऽ महामन्त्रीधरिक पदमे रही काज कएनिहार डा.यादव एक बेर चुनाव भलेहि हारि गेल होथि मुदा हारल कहियो नहि छलाह । एखन ओ राजनितीक रुपस“ सर्वोच्च शीखर पर छथि । देशक सबस“ उच्च ओहदापर छथि मुदा देशक प्रथम राष्ट्रपतिक मुहस“ आएल यी अभिव्यक्ति चिन्ताक विषय जरुर अछि । जनआन्दोलन २ के प्रथम उद्येश्य छल जे जनताक बेटा राष्ट्रप्रमुख बनि सकओ । सम्प्रति जनताक बेटा राष्ट्रप्रमुख बनल अछि मुदा जनताक बेटाके उचित प्रतिष्ठा नहि द हमरालोकनि पुरने राजसंस्थाके“ त ने प्रतिष्ठित क रहल छी ? राष्ट्राप्रमुखद्वारा अपने देशमे प्रतिष्ठाक अपेक्षा राखब अनुचित नहि अछि । राष्ट्रपतिक उपेक्षाके“ माओवादी नेतृत्वक वर्तमान सरकारक“े निती मानल जाय ? आई यदि गिरीजाप्रसाद कोईराला,माधव नेपाल वा प्रचण्ड राष्ट्रपति रहितथि तथापि ईएह अवस्था रहतैक ? एखन ई प्रश्न खासक मधेसमे विशेष चर्चाक विषय बनल अछि । कही डा.यादवके मधेसी होएवाक दण्ड त ने देल जा रहल छनि ? यदि डा.यादवके“ जातीय,क्षेत्रीय,भाषिक वा अन्य कोनो कारणस“ अपेक्षित प्रतिष्ठा नहि भेटि रहल छनि त ई देशक वास्ते प्रतिउत्पादक होएत । यदि सत्ताधारी दलसभ एवं प्रतिपक्षी नेपाली काग्रेस विनु अधिकारक आ विनु मर्यादाक राष्ट्रपतिक परिकल्पना कएने हो त कहवाक किछु नहि अछि यन्यथा राष्ट्रपति आ उपराष्ट्रपति उपर महाभियोग लगाओल जाएवला कानून बनैबाक तैयारीमे लागल जम्बो सभासदलोकनि देशक सभस“ पैघ राष्ट्रपति आ उपराष्ट्रपतिक अधिकार आ कर्तव्यक विषयमे किए ने किछु बाजि रहल अछि ? डा.यादव सदृश्यक सच्चा राष्ट्रवादीसभमे कोनो प्रकारक कुन्ठा वा हिन भावना नहि पनपए चाही कारण देशक एकताक सम्पर्क सूत्र छथि ओ लोकनि आ हुनकासभक मोनमे हिन भावना टुसाएव माने देशक एकताक वास्ते अनिष्टक संकेत अछि ।

विद्यापति- निमिष झा कोनो साहित्यमे किछ साहित्यकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्म कोनो घटनाक रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बन्धित सम्पूर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत अछि । ओहन साहित्यकारक साहित्यिक व्यक्तित्व ओहि साहित्यक सर्वाङ्गीण विकासमे वरदानसिद्ध होइत अछि । ओहन साहित्यिक महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यिक परम्परा आदिक सम्यक अनुशीलन पश्चात अपन मान्यता एवम साहित्यिक योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन कार्यसभक माध्यमसँ युगान्तकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्व प्राप्त करैत छथि । मैथिली साहित्यक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि । सम्पूर्ण मैथिली साहित्य हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण करबाक साहित्यिक क्षमता भेल व्यक्ति मैथिली साहित्यक इतिहासमे अखन धरि किओ नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कवि छथि । हुनकेमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण गौरव आधारित अछि । इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्दमे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम कवि छथि । ओ संस्कृत साहित्यक अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे काव्य रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव, चण्डीदास, रामानन्द राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान स्रष्टासभ अपन भक्ति भावनाक माध्यमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि । मैथिली साहित्यमे विद्यापति युग ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी साहित्यमे शेक्सपियर युग, नेपाली साहित्यमे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्र युग तथा हिन्दीमे भारतेन्दु युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टय भक्तिभावना, शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुटित भेल आभाष कयलक अछि । ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ व्याप्त असमानताक अन्त करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वरक रूप ग्रहण कऽ सकल । वास्तवमे विद्यापति युगद्रष्टा रहथि । ओ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिक लेल अथक प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कालीन समयमे पतनोन्मुख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि । विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपका प्रायः हरेक भागक सभ्यता आ संस्कृति सङकटपूर्ण अवस्थामे छल । मुसलमानी शासकसभक आतङक चरमोत्कर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृतिक रक्षा आवश्यक भऽ गेल छल । ओहन अवस्थामे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल महत्वपूर्ण वरदान सिद्ध भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यक मनस्थितिसँ आक्रान्त मैथिल सभ्यता आ संस्कृति अपन उन्नयनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्त कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे सक्षम भेल । विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्यमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक उपज अछि शृङ्गगारिक रचनासभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्कालीन मिथिलाक युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तित्व रक्षा करबाक लेल विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल । तत्कालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे देखल जा सकैया । समाजमे व्याप्त असमानाता, कुरीति, अन्धविश्वास सहित विभिन्न विसङगतिसकेँ मानव प्रेम एवम भाषा उत्थानक भरमे विद्यापति अन्त करबाक काजमे सफल छथि । विद्यापतिक सम्पूर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि । कतेको विद्वानसभ विश्व साहित्यमे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि रहल कहैत छथि । महाकवि विद्यापति तत्कालीन समाजमे प्रचलित संस्कृत, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्त रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि । यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युक सम्बन्धमे विभिन्न विद्वानसभक विभिन्न मत अछि । तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठ रहथि । अहि तथ्यक आधार पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दा झा विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू वर्ष पैघ रहथि उल्लेख कयने छथि । जँ ई तथ्यकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे राज्यारोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्म सन् १३५० मे भेल निश्चित अछि । डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ स्वीकार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्त मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि । अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि अछि । अपन मृत्युक सम्बन्धमे मृत्यु पूर्व विद्यापति स्वयंद्वारा रचित पद विद्यापतिक आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मक रूपमे अन्य मत सभसँ अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल अछि । विद्यापतिक जन्म हाल भारतक बिहार राज्यक मधुवनि जिल्ला अन्तर्गत बिसफी गाममे भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वे लाइनक कमतौल स्टेसन लग अवस्थित अछि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक वंशजसभ सौराठमे रहति छथि । विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान पिताक सम्पर्कमे ओ प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्ड विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि । तहिना प्रकाण्ड विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली साहित्यक धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृतक सेहो प्रकाण्ड विद्वान रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृतमे सेहो अनेको रचना कयने रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि । क) संस्कृत ग्रन्थ ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वसार, शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्यावली, विभागािर, दान वाक्यावली, गया पत्तलक, दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जरी, वर्ष, व्रत्य, व्यादिभक्ति तरङ्गिणी । ख) अवहठ्ठ ग्रन्थ ः कृतिलता, कृतिपताका ग) मैथिली ग्रन्थ ः गोरक्ष विजय महाकवि विद्यापति तीन भाषाक ज्ञाता रहथि । ओ दू दर्जनसँ बेसी ग्रन्थसभक रचना कयने छथि । हुनकर बहुतो कृति सभ अखन बजारमे उपलब्ध अछि । प्रस्तुत अछि विद्यापतिक ग्रन्थसभक संक्षिप्त विवरण १) गंगावाक्यावली ः अहि ग्रन्थमे गंगा नदी आ एकर तट पर होबय बला धार्मिक कार्य अर्थात कर्म काण्डक विषयमे विस्तृत जानकारी अछि । गंगा वाक्यावलीक रचना विद्यापति रानी विश्वास देवीक आज्ञासँ कयने रहथि । कृतिमे गंगा नदीक स्मरण, कीर्तन, गंगा तट पर प्राण विसर्जनक महात्म्य वर्णन अछि । २) दानवाक्यावली ः राजा नरसिंह दपंनारायणक पत्नी रानी धीरमतीक आज्ञासँ ई ग्रन्थक रचना भेल अछि । अहिमे सभ प्रकारक दान विधि विधान विस्तार पूर्वक कयल गेल अछि । ३) वर्षकृत्य ः अहि ग्रन्थमे वर्ष भरि होबयबला प्रत्येक पावनि तथा शुभ कार्यक विस्तृत विधान प्रस्तुत अछि । तहिना पूजा, अर्चना, व्रत, दान आदि नियमक सम्बन्धमे सेहो चर्चा कयल गेल अछि । ४) दुर्गाभक्तितरंगिणी ः दुर्गाभक्तितरंगिणीकेँ दुर्गोत्सव पद्धतिक नामसँ सेहो जानल जाइत अछि । विद्यापति एकर रचना राजा भैरव सिंहक आज्ञासँ कयने रहथि । अहि ग्रन्थमे कालिका पुराण, देवी पुराण, भविष्य पुराण ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय तथा दुर्गा पूजाक पद्धति संग्रहित अछि । ५) शैवसर्वस्वसार ः राजा पद्मम सिंहक पत्नी विश्वास देवीक आज्ञासँ रचित अहि ग्रन्थमे महाकवि विद्यापति भगवान शिवक पूजासँ सम्बन्धित सभ विधि विधानक वर्णन कयने छथि । अहि ग्रन्थकेँ शम्भुवाक्यावली सेहो कहल जाइत अछि । ६) गयापत्तलक ः गयापत्तलक ग्रन्थक रचना कोनो राजा या रानीक आदेशसँ नहि भेल अछि । अहि ग्रन्थक सम्बन्ध सामान्य जनतासँ अछि । गयामे श्राद्ध एवम पिण्ड दान तथा गया जा कऽ पितृ ऋणसँ मुक्त होबाक महात्म्य ग्रन्थमे अछि । ७) विभागसार ः विद्यापति विभागसारक रचना राजा नरसिंह देव दपंनारायणक आदेशसँ कयलनि । अहिमे दायभागक संक्षिप्त मुदा सुन्दर आ आकर्षक विवेचन अछि । मिथिलामे तात्कालीन दायभाग आ उत्तराधिकार सम्बन्धी विधानक लेल ई प्रमाणिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । ८) लिखनावली ः राजा शिवसिंह तिरोधान भेलाक बाद विद्यापति रजाबनौलीमे राजा पुरादित्यक आश्रममे अहि ग्रन्थक रचना कयलनि । ई ग्रन्थमे पत्राचार करबाक विधिकेँ स्पष्ट व्याख्या कयल गेल अछि । अपनासँ पैघ, छोट, समान तथा नियम व्यावहारपयोगी सहित चारि प्रकारक पत्रक उल्लेख अछि । ग्रन्थसँ मिथिलाक तात्कालीन सामाजिक आ सांस्कृतिक अवस्थाक परिचय भेटैत अछि । ९) शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत संग्रह ः शैवसर्वस्वसारक रचनाक बाद विद्यापति अहि ग्रन्थक रचना कयने रहथि । अहिमे शैवसर्वस्वसारक प्रमाणभूत पौराणिक वचनक संग्रह अछि । १०) व्याडिभक्तितरंगिणी ः ई लघु ग्रन्थमे सर्पिणीक पूजाक वर्णन अछि । विभिन्न पौराणिक कथा सभ उल्लेख अछि । ११) द्वेतैनिर्णय ः ई एक तन्त्र शास्त्रीय लघु ग्रन्थ अछि । जाहिमे तन्त्र शास्त्रक गुप्त चर्चा कयल गेल अछि । अहि ग्रन्थसँ विद्यापतिकेँ तन्त्रक सेहो विशद ज्ञान रहल प्रमाणित होइत अछि । १२) पुरुषपरीक्षा ः राजा शिव सिंहक निर्देशन पर रचित ई ग्रन्थकेँ विद्यापतिक उत्तम कोटिक ग्रन्थ मानल जाइत अछि । पुरुषपरीक्षामे वीर कथा, सुवुद्धि कथा, सुविद्य कथा आ पुरषार्थ कथा नामक चारि वर्गक पञ्चतन्त्रक शिक्षाप्रद कथा सभ समाविष्ट अछि । समाजशास्त्री, इतिहासकार, मानवशास्त्री, राजनीति शास्त्री सहित दर्शन एवम साहित्य विधाक व्यक्तिक लेल ई अपूर्व कृति अछि । १३) भूपरिक्रमा ः ई विद्यापतिक अत्यन्त प्रभावकारी ग्रन्थ अछि । राजा देव सिंहक आज्ञासँ भूपरिक्रमाक रचना कयल गेल अछि । ग्रन्थमे वलदेवजीद्वारा कयल गेल भूपरिक्रमाक वर्णन अछि । तहिना नैमिषारण्यसँ मिथिला धरिक सभ तीर्थ स्थलक वर्णन सेहो अछि । १४) कीर्तिलता ः कीर्तिलताक रचना विद्यापति अवहठ्ठमे कयलनि अछि आ अहि ग्रन्थमे राजा कीर्ति सिंहक कीर्ति कीर्तन अछि । मिथिलाक तात्कालीन राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक लेल ई ग्रन्थ महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि । ग्रन्थसँ विद्यापतिक प्रौढ़ काव्य कलाक प्रमाण भेटैत अछि । तहिना विकसित काव्य प्रतिमाक दर्शन सेहो होइत अछि । १५) कीर्तिपताका ः अहि ग्रन्थमे राजा शिवसिंहक बहुत चतुरतापूर्वक यशोवर्णन अछि । ग्रन्थक रचना दोहा आ छन्दमे अछि । ग्रन्थक आरम्भमे अद्र्धनारीश्वर, चन्द्रचूड शिव आ गणेशक बन्दना अछि । कीर्तिपताका खण्डित रूपमे मात्र उपलब्ध अछि । एकर ९ सँ २० धरिक जम्मा २१ टा पृष्ठ अप्राप्त अछि । तीसम पृष्ठमे राजा शिव सिंहक युद्ध पराक्रमक वर्णन अछि । १६) गोरक्षविजय ः ई एक एकांकी नाटक अछि । अहिमे विद्यापतिक नूतन प्रयोग सेहो अछि । गोरक्षनाथ आ मत्स्येन्द्रनाथक कथा पर नाटक आधारित अछि । ग्रन्थक रचना राजा शिव सिंहक आदेशसँ कयल गेल छल । १७) मणिमंजश नाटिका ः ई एक लघु नाटिका अछि । नाटिकामे राजा चन्द्रसेन आ मणिमंजरीक प्रेमक वर्णन अछि । १८) मैथिली पदावली ः विद्यापतिक मैथिलीमे रचित पदावलीक संग्रहित ग्रन्थ अछि मैथिली पदावली । लिखित संकलनक अभावमे विद्यापतिक गीत अपन माधुर्यक कारण लोक कण्ठमे जीवित छल आ बहुत बाद एकर समग्र रूपमे संकलित करबाक प्रयास कयल गेल । यद्यपी अनेक संग्रहसभमे विद्यापतिक गीतक संकलित भेल अछि । पदावलीमे राधा एवम कृष्णक प्रेम प्रसंग गेय पदमे प्रकाशित अछि । ३.पद्य ३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा 3. अशोक दत्त 4.निमिष झा ३.२.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (सातम खेप) ३.३. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर ३.४. टेम्स नदीमे नौकाविहार-ज्योति ३.५. १.विद्यानन्द झा २.अजीत कु. झा ३.विनीत उत्पल ३.६. १.वृषेश चन्द्र लाल २. पंकज पराशर ३.७. 1.धीरेन्द्र प्रेमर्षि 2. धर्मेन्द्र विह्वल 3.जितमोहन झा ३.८. १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी 1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा 3. अशोक दत्त 4.निमिष झा श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। व्यवस्थाक नाम/ चेतौनी बिना कुनू संकेतक वा समयक प्रतीक्षा कें सूतल ज्वालामुखी कखनहुं गरजि सकैछ गिरि शिखरक आरोही कखनहुं पिछड़ि सकैछ कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन। एक दिन आइ नहि तँ काल्हि काल्हि नहि तँ परसू परसू नहि तँ तरसू नहि तरसू नहि महिना... किछु बरखक बाद एक दिन अहाँ घूरि कऽ आयब अही चौकठि पर आ बेर-बेर अपनहि सँ कहब अपना- धन्यवाद! धन्यवाद!! अशोक दत्त , जनकपुर, नेपाल दू टप्पी पतुरियासन मुस्की मगरसन नोर नेने भोरसं सांझधरि फ़ुसिएटा परसैए गिरगिट त दुनियांमे ब्यर्थे बदनाम अछि गिरगिटसं बेशी मनुक्ख रंग बदलैए लुत्ती करेजपर चोट लगै छै त लुत्ती जनमै छै केओ जं घात करै छै त लुत्ती जनमै छै फ़ाटल चाहे जत्ते हो देहके वस्त्र मुदा चीर पर हाथ बढै छै त लुत्ती जन्मै छै रहओ केहनो अपन मडैया बडा नीक लगैछ बास उपट' लगै छै त लुत्ती जनमै छै ल कर्मक रङकुच्ची बनबैया अपन फ़ोटो ओ फ़ोटो डहै छै त' लुत्ती जनमै छै सोनित या पानि धर्ती होइछै समान सभके भेदके रङ चढ़ैछै त लुत्ती जनमै छै बुझि छाउर सर्द चाहे जत्ते खेल करए बात जं हकके अबैछै त लुत्ती जनमै छै निमिष झा,समाचार प्रमुख,हेडलाइंस एण्ड म्यूजिक एफ.एम.,97.2, ललितपुर, नेपाल वेदनाक तरङ्ग

निरश आ उचाट वातावरण विरक्त आ विरान दृश्य निर्मम सन्नाटा तीतायल चेहरा विक्षिप्त मोन भूतलायल आकृति आक्रोशसँ पाकल आँखि उच्छ्वाससँ जरल ठोर रागसँ पिसायल चित्रवृत्ति परस्पर टूटल सम्बन्ध जकाँ निरीहता नहि फूल जकाँ मधुर मुस्कान नहि मोनक निस्तब्धतामे स्निग्ध जागरण मात्र गड़ैत अछि हृदयमे वेदनाक तरङ्ग ग‍गेश गुंजन . श्री डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम  नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका  “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।  श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ,  मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस  "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"क पहिल खेप।-सम्पादक। मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक पढबाक लेल बुधिबधिया, गुंजनजीक नाटक आइ भोर पढ़बाक लेल आइ भोर आऽ गुंजनजीक दोसर उपन्यास पढ़बाक लेल पहिल लोक क्लिक करू। ( हुनकर पहिल उपन्यास "माहुर बोन"क मूल पाण्डुलिपि मिथिला मिहिर कार्यालयसँ लुप्त भए गेल, से अप्रकाशित अछि। गुंजनजी सँ अनुरोध केने छियन्हि जे जतबे मोन छन्हि, ततबे पाठकक लेल पठाबथि, देखू कहिया धरि ई संभव होइत अछि।) गुंजनजीक राधा विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। राधा  (सातम खेप) राधा

ऑगी हेराएब कोनो तेहन दुर्घट बात नहि। राधा तें उदासो नहि भेलीह। उदास तं ओ आनो आन कए कारणें छलीह। जेना ,शरीरे दुखित पड़लि छलीह। कोनो टा सखि, क्यो बहिना कए दिन सं देख' पर्यंत नहि अयलनि। हुलकियो देब' नहि। दुखित कें होइत छैक आशा आग्रह। बल्कि स्पृहा। स्पृहा ई जे क्यो आबए, आबि क' दू क्षण लग मे बैसय, दःख पूछय। गप करय। किछु कहय, किछु सुनय। मन कें बहटारय। सैह तकरे अभाव आ संबन्धक जोर।जे अप्पन नहि तकरा पर अधिकारे कोन ? जे अपनो अछि आ अधिकारो बुझाइत अछि, वास्तव मे से कतेक अपन ? ई अधिकार आ प्रयोजनक प्राथमिकताक अपन-अपन वृत्त होइत छैक। मनुक्ख-मनक ई लाचारी छैक। ओकरा अपन एहि सीमाक ध्यान राख' पड़ैत छैक आ तहिना संपर्कित-संबंधित समस्त समाजक ध्यान राख' पड़ैत छैक। से जकरा बुतें एकर, एहि बुद्धिक संतुलन नहि रहल ,तकर जीवन कनीक आर मोशकिल।अर्थात्‌ जीवनक     मोशकिली धरि अपरिहार्य। राधाक ई सोचब आ दुखी हएब स्वाभाविके जे जीवन मोशकिलीक सवारी थिक। चिक्कन चुनमुन बाट पर पहिया सब गुड़कैत आगां बढ़ैत रहल तं बड़ दिब। सबटा मन विरुद्धो अनुभव पाछां छुटैत गेल आ मनलग्गू अनुभव  अपना संग आगां बढ़ैत रहल। कतहु कोनो ठाम पहुंचि गेलाक बाद कए तरहें संतुष्ट कयलक आ कए तरहें अतृप्त राखि देलक। आब फेर एत' सं अनुभवक अतृप्त प्रसंग जे एकहि क्षण पहिने मात्र नगण्य बुझाइत छल, से भ' जाइत अछि खोंचाड़ल मधुमाछी... खोंचाड़ल मधुमाछीमक खोंता । बिना बिन्हनहुं अनेरे ठेहुन सं मूड़ी धरि घनघनौने रहत बड़ी-बड़ी काल। हरदम डेरायल मन-काटत,आब काटत...। कोनो क्षण लुधकत आ काटि लेत। यद्यपि कि काटियो लेत तं कोन ओ अहांक गर्दनि छोपि लेत ? दंश देत। से मुदा भने मधु जकां नहि, विष विशाइत दंश। कोनो गर्दनिकट्ट नहि होइत अछि- मधुमाछी ! -बरु गर्दनियें काटब सुभीतगर, ओ सोचलनि। भने मनुक्ख कें छुटकारा तं भेटि जाइ छैक। आ दिन दिनक विस विसाइत भोग-अनुभूतिक अनवरत क्रम जे संपूर्ण अस्तित्वे के बेचैन कयने रहत। देह-प्राणक किछु टा आन वातावरण नहि बनब' देत। घिसियौर कटबैत रहत। ओही अपन स्वभावक परिधि आ तकर प्रयोजन मे बन्हने रहत। मात्र बन्हनहुं टा रहि जाय, तैयो सुकुर, मुदा ओ तं अहांक बुद्धि सं आर सब किछु कें काटि-बारि क' फराक क' देत। अहीं कें अपन तेहल्ला बना क' छोड़त। लैत रहू। आब एहि मन मे किछुओ क्षण रहि गेलौं कि ओ अहां सं अहींक परिचय तलब करत। यावत-यावत तैयार भ' क' अहां उपयुक्त सोचब आ बाजब, तावत-तावत ई बात, अहांक मनक  ई मामूली घटना एकटा समाचार बनि जायत। ई समाचार बिना कोनो माध्यम कें रौद आ बसात पर सवार भ' क' पहुंचि जायत ओत' धरि जत' अहां सोचियो ने सकैत छी। आब बैसि क' कपार पीटैत रहू। ककरा-ककरा आ की-की बुझयबैक ? आ से जकरा बुझयबैक से कतेक दूर धरि ,की मानत ? जतवा मानियो लेत तकरा सं अहांक जीवन कें की सुभीता आ कोन सुख ? हॅं, सुख ? की थिक ? केहन होइत छैक ? कोना होइत छैक ? कतवा होइत छैक ? ककरा होइत छैक ? मुदा... मुदा, किछु छैक तं अवश्ये ई सुख! सुखक अनुभव अवश्ये छैक एहि पृथ्वी पर-मनुक्ख सं ल' क' सब जीवधारी मे।तें रहैए एकरा पाछां व्याकुल-बेहाल!  परंतु से केहन छैक-लाल ,पीयर, हरियर ,उज्जर, कारी -केहन ? अर्थात्‌ सुखक कोनो रंगो होइत छैक ? कोनो खास रंग ? -की स्वाद छैक ? केहन स्वाद ? कोनो फलक स्वाद ? चाउर-दालि-गहूमक स्वाद ? तीमन-तरकारीक ?इनारक टटका जलक स्वाद ?एक संगे दू गोटेक इजोरियाक चन्द्रमा बा एकान्त अन्हरिया मे तारा गनवाक स्वाद ? कोनो अनचिन्हार चिड़ैक अपरिचित बोल अकानि चीन्हवाक कोसिसक स्वाद? बा भोरे भोरे जन्मौटी बच्चाक मिलमिलाइत आंखि जकां बाड़ीक कोनो नान्हि टा गाछ मे नव पनगल दिव्य ललाओन दुपत्ती कें देखि अह्‌लाद होयवाक स्वाद ?....घन अन्हार मे ककरो कंठ सं अपन नामक सम्बोधन सुनवाक ? कोनो गंध होइत छैक ? अत्तर-गुलाब सन, बेली-चमेली सन , तेजपात सं छौंकल दालि, कढ़ी पातक बा औंटवा काल लोहिया लागि गेल दूध सन, सोन्हायल डाबा सन,-कथी सन ? जन्मौटी बच्चा सन, तुरंत बियाहलि स्त्री सन आ कि बाध सं घुरल हरवाह-गृहस्थ सन, यमुना जल मे खीचल नूआ-वस्त्र सन बा पाकल कदंब सन बा श्रीकृष्णक सांस सन ? सांस मे केहन निसां छैक ! कृष्णक सांस मे केहन निस्सां छनि ? कृष्ण मे अपने केहन निसां छनि ! कृष्ण निस्सें छथि । कृष्ण माने  निसां...। बेचैनी राधाक ,बेबस मनक प्रवाह मे, बहैत रहल, यमुना धार सन, राति, रातुक अन्हार काल मे । सब सूतल अपन-अपन ठाम। धेने सब रातुक विश्रामक स्थान। चिड़ै चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता। माल जान अपन थैर-बथान। आ मनुक्ख अपन-अपन चौकी-खाट-मचान ! निसभेर निन्न मे डूमल जीयैत। मात्र ई एकटा एकसर मनक विकल नियति, चुपचाप सूतल रातिक अन्हार मे अपन निस्बद्द चलैत रहल-बहैत गेल! राधाक मनक प्रवाह यमुना भ' गेल। एतवो पर रच्छ छल , मुदा कहां बांचल समयक इहो एहनो सुभीता, सेहो तं आंजुरक जल भेल। कतबो यत्ने बचा क' रखवा मे कहां भेलहुं सकारथ ? सबटा बहि गेल। कनीक काल रहल भने भीजल तरहत्थी-माने स्निग्ध , सेहो अगिले पल ऋतुक उष्ण प्रभावक वेग मे निठ्ठाहे सुखा गेल।

जानि नहि ओ आंजुर आ आंजुरक जल कोन क्षण अलोप भेल कोना बिला गेल, कत' गेल ? सूर्य लग गेल ? चन्द्रमा लग गेल कि तारा लग ? वा माटि मे, पोखरि-इनार-धार, कोनो मे फेर सं घुरि गेल, जा क' मीलि गेल जल- अपन उद्गम सं, उत्स सं वा भाफ बनि क' बन' गेल मेघ ? कर' गेल बरखा,? जल कत'गेल ? आंजुर भरि जल कत' गेल ? ई किछु विलाप जकां राधाक मनक परिताप अपनहि अभ्यंतर मे मुखर चलि रहल- अपनहि कहैत-अपने कें सुनैत । अपने सं सभटा पूछैत। ई केहन विचित्र आत्म सम्बोधन ? अपनहि मन सोर पाड़य अपने मन ! सौंसे गाम-टोल अछैत , टोलक लोक, संबंधी, सखि-बहिनपाक एहि पसरल समाज आ संसार मे कोनो एकटा मन, एहन असकर एतेक एकान्त काटि रहल व्याकुल पल-पल जीवन । अपनहि विडंबना कें स्वयं करैत आत्म सम्बोधन.... -"राधा'' ....!! एं ई की भेल कत' सं कोन आकाशवाणी -"आब केहन मन अछि अहांक राधा !'' के पूछल ? बाजल के ? के आयल पूछ'-कुशलक्षेम, ककर थिक ई प्राणबेधी वाणी ? दुर्लभ स्वर्गिक संगीत स्वर थिक ककर ? रातिक एहि निस्बद्द एकान्त अन्हार मे के बाजल, ककरा भेलैक हमर चिन्ता ? के आयल पूछय-हालचाल,... अच्छा, तं... ई थिक हुनके ताल ? राधा कें कानमे स्पष्टे क्यो पुछलकनिहें। किछुओ संदेह नहि, सत्य छैकः 'केहन मन अछि अहांक राधा...' ई थिक सद्य : अनुभव, कोनो टा भ्रम नहि। मुदा तखन राधा कें कियेक लगलनिहें ई जिज्ञासा, पुरुष-कंठक नारी-स्वर मे प्रतिध्वनि ? यदि पुछलनिहें कृष्ण तं पछाति सैह प्रश्न करैत स्त्री के छल ई जकर स्वर छल ? ई अछि कोना संभव ? मुदा थिक तं ई सत्य ,संदेह कथमपि नहि। सत्य तं होइत अछि सत्ये। ज्वरे परजरित एहि देहक ताप पर जमुना जल भीजल पीतांबरी जकां के एना पसरि रहल-ए, आलसे निनियाइल बसात... जमुना मे झिलहरि खेलाइत, निस्बद्द राति। गंगेश गुंजन/राधा- सातम खेप/ प्रेषित २३ अक्तूबर-२००८. गजेन्द्र ठाकुर (1971- ) कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य,शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन) प्रिंटमे। बुद्ध चरित ई पुरातन देश नाम भरत, राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज। एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन, पत्नी माया छलि, कपिलवस्तुमे राज करथि तखन। माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल, एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे, पैसि छल रहल हाथी मुदा, मायाकेँ भए रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट, वरन् लगलन्हि जे आएल अछि मध्य क्यो गर्भ। गर्भक बात मुदा छल सत्ते, भेल मोन वनगमनक, लुम्बिनी जाय रहब, कहल शुद्धोधनकेँ। दिन बीतल ओतहि लुम्बनीमे एक दिन, बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक, आकाशसँ शीतल आऽ गर्म पानिक दू टा धार, कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल, बरसि आकाशसँ। यक्षक राजा आऽ दिव्य लोकनिक भेल समागम, पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी। धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल, छोड़ि “मार” आनन्दित छल सकल विश्व, “मार” रुष्ट आगमसँ बुद्धत्वप्राप्ति करत ई? माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक, ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक, भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ, मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कए। महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म, चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त, वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक, बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत, राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक। बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर, देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर, बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल, उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब। वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक, भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि। दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार, फेर ढ़ेर रास होम जाप, करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि, घुरि नगर प्रवेश कएल माया, हाथी-दाँतक महफा चढ़ि। धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य, अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग, सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ। मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता, मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा। उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर, अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक, शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक। सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह, समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म। उत्सवक संग बितैत रहल दिन किछु दिन, सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक, सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक, सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक, क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट। सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र, निकलि आयल पथपर दर्शनक सिद्धार्थक, चारू कात छल मनोरम दृश्य, मुदा तखने आएल पथ एक वृद्ध। हे सारथी सूतजी के अछि ई, आँखि झाँपल भौँहसँ श्वेत केश, हाथ लाठी झुकल की अछि भेल? कुमार अछि ई वृद्ध, भोगि बाल युवा अवस्था जाय अछि भेल वृद्ध आइ, की ई होएत सभक संग, हमहू भए जाएब वृद्ध एक दिन? सभ अछि बुझल ई खेल, फेर चहुदिस ई सभ करए किलोल, हर्षित मुदित बताह तँ नहि ई भीड़, घुरि चलू सूत जी आब, उद्यानमे मोन कतए लाग! महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न, पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र, मुदा एहि बेर भेटल एकटा लोक, पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास, रोगग्रस्त छल ओऽ पूछल सिद्धार्थ, सूत जी छथि ई के की भेल? रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल, कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन, सूत जी घुरू भयभीत भेलहुँ हम आइ, घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन, शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम। आमोद प्रमोदक कए आर प्रबन्ध, रथ सारथी दुनू नव कएल प्रबन्ध। फेर एक दिन पठाओल राजकुमार, युवक-युवती संग पठाओल करए विहार, मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक, हे सूतजी की अछि ई दृश्य, सजा-धजा कए चारि गोटे धए कान्ह, मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नहि जान। हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख, नहि बाजि सकत, अछि ई काठ समान। कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक, छोड़ए ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त। घुरू सारथी नहि होएत ई बर्दाश्त, भय नहि अछि एहि बेर, मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर, अज्ञानी सन कोना घुमब उद्यान। मुदा नव सारथी घुरल नहि द्वार, पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम। युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी पुरोहित पुत्र, करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन, मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति, पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की? हे मित्र क्षणिक ई आयु, बुझितो हम कोना गमाऊ, साँझ भेल घुरि युवतीसभ गेल, सूर्यक अस्तक संग सांसारक अनित्यताक बोध, पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न, शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन। किछु दिनक उपरान्त, माँगि आज्ञा बोन जएबाक, संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार, देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग, दुखित बैसि उतड़ल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ, बैसि जोमक गाछक नीचाँ धए ध्यान, पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु। छल ओऽ मोक्षक ताकिमे मग्न, सुनि ओकर गप देखल होइत अन्तर्धान। गृह त्यागक आएल मोनमे भाव, बोन जएबाक आब एखन नहि काज। घुरि सभ चलल गृहक लेल, रस्तामे भेटलि कन्या एक, कहल अहाँ छी जनिक पति, से छथि निश्चयेन निवृत्त। निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग, सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा, रहथि ओतए शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच। कहल - लए संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल, करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव। हे पुत्र कएल की गप, जाऊ पहिने पालन करू भए गृहस्थ, संन्यासक नहि अछि आएल बेर, तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक, तखन दूर करू चारि टा हमर भय, नहि मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय, धन सेहो क्षीण नहि होए संगहि। शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात, तखन हमर वियोगक करू नहि पश्चाताप। कहि सिद्धार्थ गेलाह महल बिच, चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकललि बाह्य, सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान, कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाऊ, सभ भेल निन्नमे भेर कंथक आएल, चढा सिद्धार्थकेँ लए गेल नगरसँ दूर, नमस्कार कपिलवस्तु, घुरब जखन पाएब जन्म-मृत्युक भेद। सोझाँ आएल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ, लेलन्हि रत्नजटित कृपाण काटल केश, मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ। अश्रुधार बहल छंदकक आँखि, जाऊ छंदक घुरु नगर जाऊ, नहि सिद्धार्थ हम नहि छी सुमन्त, छोड़ि राम घुरल अयोध्या नगर। घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर, तखने एक व्याध छल आयल, कषाय वस्त्र पहिरने रहए कहल सिद्धार्थ, हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र, अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहिर, छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि। सिद्धार्थ अएलाह आश्रम सभ भेल चकित, देखि नानाविध तपस्या कठोर, नहि संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग, अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि, निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि, स्वर्ग नहि मोक्षक अछि हमरा खोज, जाऊ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ, नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाऊ, सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचल आगु। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति टेम्स नदीमे नौकाविहार टेम्स नदीमे कर चललौं नौकाविहार स्टीमरमे उपरिक मंजिल पर सवार मन्द - मन्द चलैत शीतल बयार॥ वस्तुकलाक कते उत्कृष्ट उदाहरण तकनीकी विकासक प्रत्यक्ष दर्शन तटमे ठाढ़ ऊंच - ऊंच भव्य भवन॥ कलकलाइत जल स डोलैत नाव मानव प्रयाससऽ अनुशासित बहाव जगा देलक अपन बिसरल घाव॥ कतेक पॉंछा अछि अपन प्रान्त नैसर्गिक आपदा स आक्रान्त कहिया हैत बाढ़िक समस्या शान्त॥ रातिक बात तऽ आरो अद्भुत बस मंत्रक उद्घोष छल विलुप्त स्थानो नहिं छल ओहेन भक्तियुक्त॥ अन्यथा कहितौं अकरा हरिद्वार बत्तीक प्रतिबिम्ब स चमकैत धार जेना होय छठिक अर्घ्यदीपक भरमार॥ १.विद्यानन्द झा २.अजीत कुमार झा ३.विनीत उत्पल १.श्री विद्यानन्द झा पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी) जन्म-09.04.1957,पण्डुआ, ततैल, ककरौड़(मधुबनी), रशाढ़य(पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) आ’ सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 ई.सँ 1979 ई. धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। कृति- पञ्जी शाखा पुस्तकक लिप्यांतरण आऽ संवर्द्धन- 800 पृष्ठसँ अधिक अंकन सहित। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज(दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 ई. जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक म.म. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह। ॐ ॥श्री गणेशाय नमः॥ “श्रृष्टि चक्र” आदिमे शुन्य छल शुन्यसँ शान्ति छल। शुन्य केर सत्ता दिग-दिगन्त व्याप्त छल। शून्यक विधाता शून्यसँ आक्रान्त छल। शून्यसँ प्रारम्भ भए शून्यहिसँ विराम छल। विधिना विधान कएल रचना संसार कएल। खेत पथार पोखरि ओ जीवक संचार कएल। दिति ओ अदितिसँ श्रृष्टिक विस्तार कएल। कर्म सभक बान्हि बान्हि धरतीपर आनि धएल। शुन्यक विखंडनसँ वृत्तक विस्तार भेल। पोखरि ओ झांखड़ि पर्वत पहाड़ भेल। नदी-नद तालाब ओ वनस्पति हजार भेल। जीव जङ्गम स्थावर ओ गतिमान संसार भेल। चन्द्र सूर्य नक्षत्र ओ वायु वारिद नीर। धरा-गगन धरि व्याप्त भेल विद्युत ओ समीर। सभतरि पसरल तेज पुञ्ज चकाचौंध गम्भीर। तम-तम करइत दिन दुपहरिया नयन भरल ओ नीर। जल चर- थलचर- नभचर नाना। अप्पन-अप्पन धएलक बाना। विविध भेष ओ भाषा नाना। कएलक निज-निज गोत्र बखाना। विष ओ अमृत संग जनमि गेल। स्नेह-प्रेम-आघात प्रगट भेल। दोस्त-महिम कुटुम्ब अमरबेल। चतरि-चतरि चहुँओर पसरि गेल। एक दिशि जनमल चोर-उचक्का। दोसर दिशि भलमानुष सुच्चा। श्रृष्टि हेतु- समधानल सभटा। प्रभु सभ करथि हुनक ई छिच्छा। गोङ बधिर बजबैका नाङ्गर। श्वेत-श्याम सत्वर ओ अजगर। दीर्घकाय ओ दुव्वर पातर। सभटा रचलैन्हि ओ विश्वम्भर। भूख रचल प्यास रचल। श्रम ओ संधान रचल। रोग रचल व्याधि रचल। औषध अपार रचल। काम भूख दाम भूख वासनाक उग्रभूख। शान-मान-दान भूख भूखक हजार रूप। ई भूख ओ भूख भूखक विद्रूप रूप। भूख मुदा बढ़िते गेल धधकैत विकराल रूप। शाम-दाम-दण्ड भेद शासन कुशासन। काम-क्रोध-लोभ-मोह विरचल “महाशन”। राग-द्वेष-प्रेम-वैर पसरल हुताशन। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।....। घर बनल गाम बनल नगर ओ धाम बनल। जनता जरल सन नेता भगवान बनल। देशक खेवैया झुठ्ठा बेइमान बनल। भक्तिक भभटपन पण्डा शैतान बनल। श्रृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।... पाद-टिप्पणी: १.वारिद-मेघ २.समधानल-ओरियाकऽ ३.छिच्छा-स्वभाव ४.संधान-अन्वेषण,खोज ५.महाशन-विष्णु ६.हुताशन-अग्नि. २.दहेज दानव पुत्र हुनक अभियन्ता छन्हि। मनमे बहुत सेहन्ता छन्हि। बेटी बापक टिक पकड़िकऽ। शोणित चूषक इच्छा छैन्हि। विन दामक नहिं बेटा वियाहब। वरु कुमार रहि जाथि। व्यापारी छी व्यापार करब। वरु बेटे विक जाथि। वरक बाप ओ ओढ़ङ्गल वैसल। क्षण-क्षणमे फुचियाथि। जे किछु मङ्गलनि से बड़ कम अछि। कन्या दाता स्वयं विकाथि। कन्यादाता अरमान करथि। भलमानुष भेटि जाथि। माय बन्धु ओ कुटुम वेरागन। द्वार-द्वार घुरियाथि। की मांगी ओ की नहिं मांगी। एहिपर नहिं किछु सोच-विचार। जे फूरय ओ सब किछु मांगी। माँगक अन्त नहि, कतऽ उदार। लोलूप जीव किछु नहिं वूझय। सब बूझय- धनपोषनिहार। अनकर धनपर लूटि मचावथि। संसारक सब चोषनिहार। कन्या दाता भए वेगर्तित। अंट-शंट गछि लेथि। मिथ्यालाप कखनहुँ नहिं हितकर। तकर करथि निर्लेख। विवाह एक धर्म थिक विवाह एक कर्म थिक। धर्म-कर्म राखि सकी समाजक ई मर्म थिक। दहेज एक लोभ थिक दहेज एक रोग थिक। लोभ-रोग छोड़ि सकी हमर ई धर्म थिक। हमर ई धर्म थिक... 2.अजीत कुमार झा, गोवराही, दुहबी-6, धनुषा, कनकपुर नेपाल। सम्प्रति, हानवेल, यूके.मे अध्ययन काका काकी दहेज लेलथि

कक्का भोरे बिदा भेलाह जीट-जाट आ कान्हि छटा पुछलहुँ कक्का एना कतए कहल जे जाइ काल टोक नञि ने अबए छी कने बजार भेने मीठ पकवान आ मिठाई नेने एम्हर काकी घरकेँ नीपल सर सफाई कका चमका रहल कोन अवसर जे एना भ’ की रहल पुछलहुँ जे काकीसँ कहलनि बौआ आइ घटक आबि रहल

अच्छा तँ दोकानक सजावट छी ई ग्राहकक स्वागतक तैयारी छी ई सभ किछु आइ नव तेँ लागि रहल भाइजीयोक मुँह चमकि रहल कान्हि छटाक’ केश रँगा क’ पान चबाबैत कुर्तामे बान्हल जतेक बढ़िया समान ततबे बढ़िया दाम बनीमाक राज कक्काक’ खूब नीकसँ बुझल

घटक जी अएला निहारि क’ देखला ठोकि बजा क’ सभ किछु परखला भाइजीपर ओ’ फेर बोली लगेलथि मोल तोल केँ ल’ क’ खूब भेल घमर्थन सवा चारि लाखमे भेल बात पक्का देखू आजु हम्मर भैयि बिकेलथि लागनिक सूद-मूर सभ उप्पर भेलन्हि जमा-पूँजीकेँ खूब नीकसँ भजओलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि निमुख बरद जेकाँ भैय्या बिकेलथि कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ  इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक। चुनावक गप चुनावक मौसम आबि गेल सबटा नेता जे चुनावक मैदान मे ठार होइत छथि अपन सम्पतिक लेखा-जोखा लोकक आगू रखैत छथि केकरो एकटा वाहन नहि केकरो अप्पन मकान नहि कियो एहनो अछि जेकरा लग छैक कुबेर सनक सम्पति मुदा, आम जनताक दिस स हम पूछैत छी ओहि सम्पतिक लेख-जोख मे कतेक सत रहैत छैक कतेक फ़ूइस अदालत मे त धर्मग्रंथक शपथ खाईके फ़ूइस बाजैत जा रहल छै सदियों से. पप्पू केकरा देत वोट दिल्ली मे एहि बेर एकटा नारा कए खूब प्रचार-प्रसार भए रहल अछि 'पप्पू कान्ट वोट' माने ई जे चुनाव मे वोट नहि दैत अछि ओ 'पप्पू' छैक माने ई जे चुनाव मे वोट नहि दैत अछि हुनका अपन अधिकारक आ कर्तव्यक ज्ञान नहि छैक एकर मतलब ई भेल इलेक्शन कमीशन कए पता छैक जे बेसी लोक अपन अधिकार आ कर्तव्य स विमुख छैक तहि मे विज्ञापन वा प्रचारक की जरूरत जेकरा ई ज्ञान नहि छैक कि हम कि करि एकरा स लोकतंत्र कए की फ़र्क परैत ओहिनो, पागल वा दिवालियाक वोट देबै कए अधिकार नहि छैक ई लोकतंत्र मे. नहि करू घोषणा जहिया स होश सम्भालने छी देखैत छी हर चुनाव मे हम नेताजी कए करैत घोषणा सड़क बनबा देब घर बनबा देब रोजगारक सुविधा घर-घर पहुंचा देब आउर त आउर एक टका मे चाउर भेटत आम जनता कए एहन दिवास्वप्न देखा बैत छी ई नेता जे हुनकर सरकार की एता राइतों राइत दुनिया बदलि जाइत साठ साल भs गेल भारत कए लोकतंत्र बनल साठ साल भए गेल नेताक आश्वासन मे जीयब जागू जनता-जनार्दन जागू एक बेर कहियो ई नेता सभ कए अहि बेर नहि दियो कोनो आश्वासन नहि करियो कोनो घोषणा हुनका स एतबे टा कहियो अहांक पार्टी पिछला बेर तक जेतबा घोषणा करल छैक ओहि टा कए पूरा कए दियो एतबे टा पूरा करैत दशकों बीत जाइत एक पीढ़ीक नेता कि करत दोसर पीढ़ीक नेता उ घोषणा कए पूरा कए सकत कि नहि एकरो मे संदेहे छैक. दिए परत वोट लोकतंत्रक लेल ई बड़ शर्मनाक छैक जे चुनावक मौसम आबैक संग नेता वा गधा मे कोनो अंतर नहि रहि जाइत छैक जहि उम्मीदवार कए जे दल स टिकट कए जुगाड़ लागैत छैक ओहि दलक जना रंग मे रंगल लबादा ओढ़ि लइत छैक नहि कोनो भरोस नहि कोनो सम्मान बस जनता कए मूर्ख बनाइबैत छैक ई नेता गिरगिटो एतेक तेजी स अपन रंग नहि बदलैत छैक जेना नेत बदलैत छैक पार्टी वा सिद्धांत आब समय आबि गेल नेता कए सिखा बए परत सबक जनता जखन जागत तखन ई गप हेत संभव एकरा लेल अपन अधिकारक प्रयोग कए दिए परत वोट. बदलि गेल वैशाली वैशाली छल पहिलुक गणतंत्र जतहि जनता द्वारा जनता कए आउर जनता पर शासन छल सदियों बाद जब एक बेर तथागत देखए लए आइलखिन ई भारतवर्ष कए शर्म आ तामस स पसीना-पसीना भए गेल एक गोटे स पूछलखिन कि रौ ई भारतवर्ष मे लोकतंत्र छैक हमर समय मे अहि ठाम रहैक वैशाली, जतय छल गणतंत्र तथागत अपन गप जातक खत्म करितथि एकटा लोक कहि देलखिन हुजूर, एतै लोकतंत्र कए परिभाषा बदलि गेल आब, ई लोकतंत्र मे जनता कए बिसरि जाऊ गोली-बारूद द्वारा गोली बारूद के आउर गोली बारूद पर शासन होइत छैक ई वैशाली मे. १.वृषेश चन्द्र लाल २. पंकज पराशर १.वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव।  हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट«ीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। फेकनाक दिआबाती—बृषेश चन्द्र लाल

दिआबातीमे फुलझडी, अनार भुइँपटका आ कनफर्रा फटक्कासभसँ कात आँखि बचा—बचाकय फेकना ताकि रहल अछि तेल बुताएल दिआसभमे एक मुठि भातपर सुअदगर तिलकोरक तरुआ लोभेँ! क्षणक छनाक...! १ चाही सभके शासन चलबएला अनुशासन ! २ लाल पहाड महाभारतबला ? खूनक ढेरी ! ३ मीत अपने हएबन्हि, ओ किछु अओर छथि ! ४ ‘एकता’ माने सभलेल नै खाली ‘एकटा’लेल ! ५ गढैअछि शब्द काबिलसभ, बात चिबबैलेल ! ६ सफल भेल अपनेस ? जरुर फेरल हैत ! ७ सनकी अछि दोष देखोनिहार धरतीपर ! ८ बरिआतमे छिटल गेल इत्र गन्हाइ छलै ! ९ पुरान मन रचतै युग नव ? नइ हेतै ! १० गैंडाक खाक ओकर शिकारक कारण थिक ! 2.डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। ध्रुपद घरवलाक मारि वा सासुक तेखायल बातपर खौंझा कए बोनगाम वाली भौजी कांख तर नुआ लऽ कए विदा होइत छलीह नैहरक लेल आ गामक क्यो ने क्यो आइ-माइ घुरा अनैत रहनि हुनका किरिया-सप्पत दैत, नेहोरा-मिनती करैत बौंसि कऽ बीच बाटसँ नैहरक बाटपर जखन जनमि गेलनि दूबि तँ तामसे आन्हर भेल धी-पूतसँ भरल परिवारक बोनगाम वाली भौजी धारमे डुबबाक लेल बहराइत रहथिन घरसँ दहो-बहो भेल आ तकर बादो क्यो ने क्यो कहि-सुनिकेँ हुनका घुरा अनैत छलनि बीच बाटसँ एकटा दीर्घ आलापक आरोह उठैत छल नादक ओर धरि टहंकारसँ जकर छोर पकड़िकेँ घुरा लैत छलनि अवरोह केर मान स्त्रीत्व केर आहत मोनपर सम्मानक लेपन करैत सुदीर्घ सरगमसँ अंतरा केर अंतराल भसिआइत चल जाइत अछि दूर-दूर धरि समंधक रेगिस्तानमे पानिक दू बुन्न लेल “टप्पा” दिस घीचैत जीवन-रागक तान कोनहुना घुरैत अछि समपर एहि विषम युग केर अजगुत थाटकेँ मोन पाड़ैत आइ मोतियाबिन्नसँ आन्हर भेल बोनगाम वाली भौजी थाहैत छथिन स्वर-धार पार करबाक निमित्त साधंसी पानिमे कोनो बिसरल तराना केर एको क्षणक असरा मुदा जीवन पंचमक थालमे लसकल बदलि रहल छनि एक गोट अनन्त आकुल पुकारमे विलम्बित केर बिसरल तालकेँ मोन पाड़ैत आब ओ गनैत रहैत छथिन मृत्युशय्यापर पड़ल-पड़ल एक...दू...तीन...एक...दू...तीन... 1.धीरेन्द्र प्रेमर्षि 2. धर्मेन्द्र विह्वल 3.जितमोहन झा धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। गजल ३ घसाइत आ खिआइत चोख फार भेल छी गला-गला गात गजलकार भेल छी शब्दकेर महफामे भावक वर-कनियाँ लऽ सदिखन हम दुलकैत कहार भेल छी धधराक धाह मारऽ पोखरि खुनाएल अछि स्वयं भलहि प्यासल महाड़ भेल छी हमरे फुनगी लटकल धानक जयगान- मुदा, हमधरि तिरस्कृत पुआर भेल छी भावक व्यापार मीत पुछू ने भेटल की मलहम दऽ दर्दक अमार भेल छी दुखियाक गीत जेँ गबैत अछि गजल हमर लतखुर्दनि होइत तेँ पथार भेल छी रूप-रङ्ग हम्मर आकार किए निरखै छी? निज आखरमे हम तँ साकार भेल छी अबियौ सहभोज करी बन्हन सभ तोड़िकऽ प्रेमक हम परसल सचार भेल छी गजल-४ जँ बजितहुँ हम फूसि तँ भगवाने छलहुँ अछि आदति खराब जे कि साँच बजै छी देश दलदल छै भेल फूटि नीतिक जे घैल बुझू तकरे सुखएबा लेल आँच बजै छी कियो कतबो कहौक शिवक ताण्डव छियै हम तँ सत्ताकेँ नटुवाक नाँच बजै छी भलहि झूलि जाइ ब्रह्म लेल फँसरी सही तैयो पाकलकेँ कथमपि ने काँच बजै छी मुक्तक सुरेन्द्रक लऽ गजल गढ़ि लेल मुदा दू आ दू कहियो नइ पाँच बजै छी गजल-५ आबि गेल गजलोमे रोशनसँ रोशनी बढ़िते जेतैक एकर पोषणसँ रोशनी हाथ सैंति मीत हमर मूहक उदार महा मुदा कोना बरतै उद्घोषणसँ रोशनी? आगिएमे जरिकऽ सोना हम चमकै छी दुनियाभरि तेँ चतरल शोषणसँ रोशनी भने सागपात खोंटब छोड़ि देल जनकपुरी कहियो की भेल छै इमोशनसँ रोशनी! बरू मोनक घाओमे लगा दियौ प्रेमर्षि पसरत अवश्य प्रेम-लोशनसँ रोशनी गजल-६ हम कहब ने कथमपि हथियार निकालू कने धरगर यौ मीता अखबार निकालू दासत्वक सिक्कड़िसँ जे अइ जकड़ाएल जङ्ग खुरचैत ओ असली विचार निकालू मुहदुब्बर भेल छी तेँ सभक्यो लुलुअबैए लाल सोनितसन आखर ललकार निकालू गौरवकेर गीत हमर गर्भहिमे मरिरहल आब तकरोलए साँठल सचार निकालू टकटकी लगौने पिआसल चकोर लेल थोड़े चानहिसन मिठका दुलार निकालू स्वर्णिम बिहान काल्हि बिहुँसत जरूर बस गुजगुज एहि रातिसँ अनहार निकालू केहनो हो तख्त-ताज जकरालग नतमस्तक ओहनेसन कलमक तरवार निकालू गजल-७ हम्मर सरकारक महा ने साफ नीयत छै झूठ नइ बजैत अछि, साँचक कब्जीयत छै गमलामे धान रोपि धान्याञ्चल यज्ञ करए डण्ड खीचि मुसरीधरि खोलैत असलीयत छै जनताक फोड़नसँ तेल कपचि टोइयामे- बारए मशाल, जे इजोतक अहमीयत छै लाख-लाख दीपक ई पसरल प्रकाश कहै- आजुक एहि सुरुजमे जरूरे कैफीयत छै कोरामिन लगा-लगा कोरमे सुतओने अछि देश तेँ दुरुस्त छैक, सुस्त बस तबीयत छै सभक मोनमे छैक मात्र आब प्रश्न एक- हमर स्वप्न-आस्था की ओकरे मिल्कीयत छै! गजल-८ जीवनकेर डोर छोड़ि हाथक लटाइमे जुनि पुछू स्वाद की छै गुड्डीक कटाइमे इतराएब-छितराएब कहू कोन गुमानपर नान्हिटा शरीरो अछि भेटल बटाइमे फटैत तँ दूधे छै, नेनक जे खानि छियै खट्टा जाए दूधमे वा दूधहि खटाइमे प्रेम छोड़ि संसारक रङ्ग सभ धोखड़ि जाइ छोड़ू अगधाएब बैसि चकमक चटाइमे कर्मक खड़ाम पहिरि शतपथपर चलबासन पुण्य कतहु पाएब नहि रामक रटाइमे जन्म आओर मृत्यु थिकै सृष्टिक विधानटा मजा छैक जिनगीक सङ्घर्ष छटपटाइमे गजल-९ बोल रे मन एकतारा बोलै टनन-टनन-टन-टन धनुषक जनु टङ्कार छुटैछै झनन-झनन-झन-झन कतबो घुमरैत आबै बदरा अपने जाएत बिलाकऽ जेना तप्त ताबापर जल होइ छनन-छनन-छन-छन प्रेमक डिबिया बचाकऽ राखी साँचक आँचर तरमे बड़ उकपाती पवन बहैए सनन-सनन-सन-सन जाधरि छौ साँसक घण्टी बस ताधरि छौ बजबाके गनगनाइत रह तेँ रे मीता गनन-गनन-गन-गन तोरे चुप्पीके मलजलसँ नित्य जे चतरल जाइछौ जरा दही ओहि अकाबोनकेँ हनन-हनन-हन-हन तोहर सुर-गर्जनसँ जरूरहि, ठाढ़ देबाल दरकतै तखने चहुँदिस हँसी खनकतै खनन-खनन-खन-खन गजल-१० सिहकैत कनकन्नीमे सीटर छी, जर्सी छी मखा-मखा प्रेम करी, मोनक प्रेमर्षि छी चानक धियानमे धरती नहि छूटए, तेँ डिहबारक भगता हम दूरक ने दर्शी छी थाहैत आ समधानैत काँटोपर जे बढ़ैछ फाटल बेमाएवला चरणक स्पर्शी छी हम्मर वैदेहीक कुचर्च कएनिहार लेल अँखिफोड़बा टकुआ छी, जिहघिच्चा सड़सी छी गन्ध जँ लगैए तँ मूनि लिअ नाक अहाँ तिरहितिया खेतक हम गोबर छी, कर्सी छी जिनगीक कखहरबामे साँसक जे मात्रा अछि दहिना दिर्घी नहि, बामाक हर्षि छी गजल-११ मुक्तिगीत अम्मल अछि, जीयब हम अमलेमे रचि-रचि सजाएब नेह-गीत मोन-कमलेमे धूर-धूर खेत पड़ल शासनकेर मोहियानी निष्ठाक अन्न तैयो उपजाएब गमलेमे दूभिजकाँ चतरल अछि जे मोनक कणकणमे उपटत धरखन्ने ओ धुरफन्दीक हमलेमे! पघिलत जे बर्फ़ तखन ढाहि देत आरि-धूर नाचि लिअए नङटे ओ भने एखन जमलेमे शासनकेर भाथीसँ चिनगी अछि रञ्ज भेल जुटिअबियौ खढ़-पात मेहनतिसँ घमलेमे गजलक ई पनही पहीरि बाट चलैत काल पओलहुँ जे हेआओ तेँ समर्पित ई विमलेमे धर्मेन्द्र विह्वल-जन्म विक्रम सम्वत २०२३-१२-०४, बस्तीपुर सिरहा,शिक्षा : एम ए ( मैथिली/राजनीतिशास्त्र ),डिप्लोमा ईन डेभलपमेन्ट जर्नालिज्म,प्रकाशित कृति : एक समयक बात (वि स २०६१ मैथिली हाईकु संग्रह ),रस्ता तकैत जिनगी (वि स २०५०/ कविता संग्रह ),एक सृष्टि एक कविता (२०५७/ दीर्घ कविता ),हमर मैथिली पोथी ( कक्षा 1 सं ५ धरिक पाठय पुस्तक ),सम्प्रति : सभापति, नेपाल पत्रकार महासंघ किछु छौंक

१) बदनामी–

प्रेम आ सिनेहकेँ सरेबजार निलाम नहि करू गौरवमय इतिहासकेँ एना बदनाम नहि करू ।

२) विज्ञापन

जानि नहि आदमीक जंगलमे हम कतय हेरा रहल छी अखवारक ढ़ेरमे हम जिनगीक विज्ञापन ताकि रहल छी ।

३) इज्जत

खुलेआम इज्जत बिका रहल अछि दाम दऽ झट कीनि दिअ जल्दि करू स्टक सीमित अछि । जितमोहन झा घरक नाम "जितू"  जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। दुनियाँक सभ फूल,खुशबू, आर बहार ! अपनेक मिले इ सभ उपहार !! आसमाँ के चाँद, आर सितारा ! एय सब सँ अपने करू श्रृंगार !! अपने खुश रही, आवाद रही ! ख़ुशी के एहेंन हुवे फुहार !! हमर एहेंन दुवा अछि हजार ! दामन अपनेक कम परे .... जीवन मेंs अपनेक मिले एतेक प्यार !! मंजिल आसान सभटा, मुस्किल बेनूर हुवे ! दिलक जे भी अछि तम्मना ओ हमेशा दूर हुवे !! होठ पर होथक बात हुवे, ख़ुशी मेंs समटल जिन्दगी ! गम भरल परछाई अपनेक आँचल सँ लाखो दूर हुवे !! फूलक तरह मह्कैत रहू, सितारा के तरह चमकैत रहू ! हमर एतबे दुवा अछि अपनेक लेल .... अपने जाते भी रही, हरदम चाह्कैत रहू !! लौटक आयब एक दिन, जरुर हमर यकींन करब ! हमर याद आबे तँ आइख अपन नै कहियो नम करब !! दुनियाँ साजिश केs कs जुदा नै के दिए हमरा ! कियो किछ भी कहे अपने भरोसा नै करब !! फुरसत के लम्हा मेंs ख़त लिखब अपने कs मुदा ! हर दिन अपने हमर खतक इंतजार नै करब !! हाथ मेंs पहिरने कंगना छी, आर कान मेंs पहिरने बाली ! हम विदेहक लेल अहिना लिखेत रहब, चाहे नव वर्ष होई या दिवाली !! १.वैकुण्ठ झा २. हिमांशु चौधरी श्री बैकुण्ठ झा,पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा),शिक्षा-स्नात्कोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा-  शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ  लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन। (१०/०२/९१) चलू देखैब अपन गाम अय ये बम्बई के कनियाँ देखल अहाँ दुनियाँ चलू देखैब अपन गाम अय- गाम ये तूबय जतय महु-आम ये। ये बम्बई... पहिरी तऽ बेल बाँट ओढ़ी नई ओढ़नी घोघमे अहाँ सँ सुन्नर नोकरनी वैह थिक सीताक गाँम अय-गाँम ये। तूबय... भेटत जौं पोखरि मन्दिर देखू ओतय भावहु भैंसुरसँ छुआई छै जत्तय लै नञ पतिक केउ नाम अय- नाम ये। तूबय जतय... भैंसुर ससुर देवर बुझि नञ पड़ै एतय देखबै पुरनियों मरौतो काढ़ै ओतय पीबै छै भाँग, नई जाम अय, भाँग अय। तूबय.. जकरा कही रोटी ओ छै सोहारी तीमन कही हम अहाँ तरकारी पहिरै छै पुरुख खराम अय- खराम अय। भरिमन कनियाँ घुमू अहाँ बम्बई आँगनसँ  ओतय त कोनटामे जे बई चलबै निहुरि नई, उदाम अय, उदाम अय! तूबय... सिनेमा २०.०९.९१ अछि प्रभाव पसरल सगरो, डिस्को धुनमे नाचय नङरो। भारत भूषण के रोल एखन, होइछ पसन्द, ककरो-ककरो। अछि प्रभाव... अछि देखा रहल अमिताभ नाच, गाबय जहिना हो झूठ साँच। अभिनेत्रीक कपड़ा बनल नाप, दू-दू मिलि कय भय जाइछ पाँच। मुक्का , लोटा, सोटा सँ नई बाँचि कय होय आब झगड़ो अछि.. भारत नाट्यम बिसराय रहल, बाजा एहनो केकियाय रहल स्रोताकेँ कान उड़ाय रहल, बुझू ओहिना जे वज्र खसल मुदा सुनत के अहाँक बात? भय रहल प्रशंसा तऽ ओकरो। अछि प्रभाव... हमर सभ्यता जाय रहल, पाश्चात्य सभ्यता छाय रहल, संग एक टेबुलपर बैसि देखू , अछि खाय रहल भावहु भैंसुरो। अछि प्रभाव.. दहेज १८.०९.९१ प्रण तऽ कयल बार-बार, पाओल अहाँक मधुर प्यार। संग छोड़ि मझधार, गेलउँ कतय, कतय गेलउँ। कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय  कतय गेलउँ रे जो हवा तोँ कहि कऽ आ, संवाद किछु जरूर ला, छी अवला तऽ नारी हम, की यैह छी हमर बला? कहब ई दर्द ककरा हम, कहब सुनत हँसत भला। कहिहैं ई जरूर तूँ, एहन केना निठुर भेलउँ। निठुर भेलउँ निठुर भेलउँ कतय गेलउँ कतय गेलउँ दहेज तऽ दहेज छै, की प्रेमसँ प्रहेज छै। कमलकेँ रौँदि कऽ कतउ , की वीर केउ बनल ओ छै। बालु के दिवाल जौँ बनल,  ढहल ओ छै। करू प्रयास खुद अपन, दहेज लय की प्रण केलउँ। कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय कतय गेलउँ होइछ विवाह प्यार लय, उठबय घरक तऽ भार लय, सोचनहुँ नञ छल हमर तऽ मन, छोद्अब अहाँ तँ कार लय, हवा ठिठकि मुसकि कहय, नञ छल असल प्रणय। दोष अछि तँ ई कार केँ, जगत के भार हम भेलहुँ कतय गेलउँ कतय गेलउँ गेलउँ कतय कतय गेलउँ परदेश- २७.१२.८९ एवं ८.१.९० पाहुन बनि निज गृह त्यागि अहाँ कतबा दिन रहबै परदेशी। बाबा बाबू सब छला वैह होयत बेटा पुनि परदेशी॥ निज उद्यमके उत्थान करू, मिलि शासक लग अभियान करू। होयब गरीब नईं कोना हम? हमरो श्रमपर अभिमान करू॥ भूमिक महिमा गुणगान केने दुनियाँमे ककरा की भेटल? गुणगान आर श्रमदान करू वनि वीर जगतमे नाम करू। सब किछु रहैत हम छी गरीब, की बनल रहत एहिना नशीब? पढ़ि-पढ़ि बच्चा ठोकर खायत लय नाम अयाचिक जल पीब? दुनियाँमे ककरा के देलक? यदि देलक तऽ ओ भिक्षा थिक। आश्रित बनि रही अगर सब दिन थिक नई यथार्थ, नईं शिक्षा थिक॥ जागू-आ’ जगा दियौ सबकेँ सुनू आ सुना दियौ सबकेँ। निज पौरुष जे नईं चीन्हि सकल ओऽ तऽ जगमे कायरता थिक सड़क १९.०९.९१ हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक मिथिला हो मद्रास मगध मथुरा मदुरै मुम्बई (बम्बई) रोहतक। हम छी कानी हकन्न मीलि कऽ हम सब ढेकरि-ढेकरि ओ पीबय आशक, मना रहल अधिकारी उत्सव। जकरा घर लागल छल फाटक, उड़ा रहल ओ मजा तऽ महलक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। के देखैत अछि हमर ई दशा टायर हो या लोकक आँगुर- फटि-फुटि कय भय रहल दुर्दशा। जनताकेँ तऽ अछि ई शोचक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। परतन्त्र देश छल हमर मान छल, छी चिक्कन हमरा गुमान छल, स्नान करी नित हमर शान छल अस्सी प्रतिशत भाग एखन हमरा बनबयमे अछि चोरक। हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। घरबैया जौं जागि जाईत अछि, चोर फुर्र सँ भागि जाइत अछि, आन्हरो बाजी मारि जाईत अछि। जनतामे हिम्मत नई शोरक, हम छी सड़क स्वतन्त्र भारतक। २.हिमांशु चौधरी-पिता : स्वर्गीय कामेश्र्वर चौधरी,माताः श्रीमती चन्द्रावती चौधरी,जन्मः वि स २०२०/६/५ लहान, सिरहा,शिक्षाः स्नातकोत्तर(नेपाली),पेशाः पत्रकारिता (सम्प्रति : राष्ट्रिय समाचार समिति ),कृति : की भार सांठू ? (मैथिली कविता संग्रह ),विगत दू दशकसं नेपाली आ मैथिली लेखन तथा अभियानमे निरन्तर क्रियाशील आ विभिन्न संघ संस्थासं आबद्ध । की भार सांठू ?......... लाते लातसं घायल लाशे लाशसं गन्हाएल सङक्रान्तिक पीडामे की भार सांठू ?......... थुराएल चानी फ़ुफ़डिआएल अहिबक फ़ड शोकाएल चाउर, पीपाएल आंजुर दन्त्यकथाक पात्र जकां कचोट द' रहल अछि गत्र गत्रमे बेधल भाला-गडांस टीसे-टीसे द' रहल अछि फ़ाटल चिटल कपडा-लत्ता मूंह कतहु, हाथ कतहु स्ट्रेमे राखल सिगरेटक ठुट्टीसन लावारिस भ' गेल इतिहासमे बहल नोर फ़ेर एहिबेर सेहो बहि गेल गन्हाएल लाशक भार कोनाक' साठू ?......... अनिष्टकारी अमरौती पीने अछि ओकरा लेल सत्यम,शिवम आ सुन्दरमक सर्जक बाधकतत्व बाधकतत्व मरि जाए/माहुरे माहुर भ' जाए अन्यायक अमरलत्ती/द्रोपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती कखनो बारुद फ़ेकैए/कखनो धराप रखैए बारुद आ धरापमे पोस्तादाना कत' ताकू जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब क्यानभासमे फ़ाटल गाछ देखि अन्हडि-बिहाडि अएबे करत विश्र्वासक जयन्ती अङकुरित भेल अछि परन्च बहुतो धोएल सींथक सेनुरक कारुणिकताक भार कोनाक' साठू ?......... नियति बिछानरुपी मशानमे अर्थहीन भ' अपन लाशक कठियारी स्वयमसन भ' गेल छी इच्छासभमे पूर्णविराम लागि गेल अछि तें एकटा नियति भ' गेल छी हंसलासं मात्र नंहि कनएटा पडैत अछि कनैत कनैत थाकि जाइत छी तखनो शान्ति नहि किछु मनोविनोद करएटा पडैत अछि बनाबटी मुस्की छोडएटा पडैत अछि धन्य कथा ! धन्य यथार्थ !! तें जीवन मृत्युमे लीन होइत जा रहल अछि जीवन आ मॄत्यु मन्जिल होइत जारहल अछि मैथिली साहित्य आ रंगमंच क्षेत्रक महिला विभूति अणिमा सिंह (१९२४- )—समीक्षिका, अनुवादिका, सम्पादिका।प्रकाशन: मैथिली लोकगीत, वसवेश्वर (अनु.) आदि। लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज, कलकत्तामे पूर्व प्राध्यापिका। लिली रे जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार।मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित।विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। प्रबोध सम्मान प्राप्त। शांति सुमन जन्म 15 सितम्बर 1942, कासिमपुर, सहरसा, बिहार, प्रकाशित कृति, “ओ प्रतीक्षित, परछाई टूटती, सुलगते पसीने, पसीने के रिश्त, मौसम हुआ कबीर, समय चेतावनी नहीं देता, तप रेहे कचनार, भीतर-भीतर आग, मेघ इन्द्रनील (मैथिली गीत संग्रह), शोध प्रबंध: मध्यवर्गीय चेतना और हिन्दी का आधुनिक काव्य, उपन्यास: जल झुका हिरन। सम्मान: साहित्य सेवा सम्मान, कवि रत्न सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान। अध्यापन कार्य। शेफालिका वर्मा जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान :  बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी.  (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति  :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह,                 यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह । इलारानी सिंह जन्म 1 जुलाई, 1945, निधन : 13 जून, 1993, पिता: प्रो. प्रबोध नारायण सिंह सम्पादिका : मिथिला दर्शन, विशेष अध्ययन: मैथिली, हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी, भाषा विज्ञान एवं लोक साहित्य। प्रकाशित कृति: सलोमा (आस्कर वाइल्डक फ्रेंच नाटकक अनुवाद 1965), प्रेम एक कविता (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विषवृक्ष (1968) बंगला नाटकक अनुवाद, विन्दंती (1972), स्वरचित: मैथिली कविता संग्रह (1973), हिन्दी संग्रह। नीरजा रेणु जन्म: ११ अक्टूबर १९४५,नाम: कामाख्या देवी,उपनाम:नीरजा रेणु,जन्म स्थान:नवटोल,सरिसबपाही ।शिक्षा: बी.ए. (आनर्स) एम.ए.,पी-एच.डी.,गृहिणी ।प्रकाशित रचना:ओसकण (कविता मि.मि., १९६०) लेखन पर पारिवारिक, सांस्कृतिक परिवेशक प्रभाव।मैथिली कथा धारा साहित्य अकादेमी नई दिल्लीसँ स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथाक पन्द्रह टा प्रतिनिधि कथाक सम्पादन ।सृजन धार पियासल कथा संग्रह,आगत क्षण ले कविता संग्रह, ऋतम्भरा कथा संग्रह,प्रतिच्छवि हिन्दी कथा संग्रह,१९६० सँ आइधरि सएसँ अधिक कथा, कविता, शोधनिबन्ध, ललितनिबन्ध,आदि अनेक पत्र-पत्रिका तथा अभिनन्दनग्रन्थमे प्रकाशित ।मैथिलीक अतिरिक्त किछु रचना हिन्दी तथा अंग्रेजीमे सेहो। उषाकिरण खान जन्म:१४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात।मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल (उपन्यास), नाटक, उपन्यास। प्रेमलता मिश्र ’प्रेम’ जन्म:१९४८,जन्मस्थान:रहिका,माता:श्रीमती वृन्दा देवी,पिता:पं. दीनानाथ झा,शिक्षा:एम.ए., बी.एड.,प्रसिद्ध अभिनेत्री दू सयसँ बेशी नाटकमे भाग लेलनि ।भंगिमा (नाट्यमंच) क भूतपूर्व उपाध्यक्षा, पत्रिकाक सम्पादन, कथालेखन आदिमे कुशल । ’अरिपन’ आदि अनेक संस्था द्वारा पुरस्कृत-सम्मानित। आशा मिश्र जन्म:६-७-१९५० ई.,प्रकाशित कथा मे मैथिकीक संग हिन्दी मे सेहो । सभसँ पैघ विजय मैथिली कथा संग्रह। नीता झा जन्म : २१-०१-१९५३,व्यवसाय:प्राध्यापिका । लेखन पर समाजक परम्परा तथा आधुनिकताक संस्कार सँ होइत विसंगतिक प्रभाव।प्रकाशित कृति : फरिच्छ, कथा संग्रह १९८४, कथानवनीत १९९०,सामाजिक असन्तोष ओ मैथिली साहित्य शोध समीक्षा। ज्योत्स्ना चन्द्रम मूल नाम: कुमारी ज्योत्स्ना ,उपनाम : ज्योत्स्ना आनन्द ,जन्मतिथि: १५ दिसम्बर, १९६३,जन्मस्थान :  मरूआरा, सिंधिया खुर्द, समस्तीपुर,पिता:  श्री मार्कण्डेय प्रवासी,माता: श्रीमती सुशीला झा,कार्यक्षेत्र :  अध्ययनाध्यापन ।,रचना प्रकाशित : झिझिरकोना (कथा-संग्रह), एसगर-एसगर (नाटक),बीतक संग संकलन एवं सम्पादन।एकर अतिरिक्त दर्जनाधिक कथा ओ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित तथा आकाशवाणीक पटना, भागलपुर, दरभंगा केन्द्रसँ प्रसारित।शिक्षा   : पटना विश्वविद्यालयसँ हिन्दी साहित्यमे एम.ए,। सुस्मिता पाठक जन्म:२५ फरवरी, १९६२,सुपौल, बिहार । परिचिति कविता संग्रह प्रकाशित । कथावाचक, कथासंग्रह प्रकाशनाधीन । राजनीति शास्त्रमे एम.ए.। संगीत, पेंटिंगमे रुचि । मैथिलीक पोथी पत्रिका पर अनेक रेखाचित्र प्रकाशित । समकालीन जीवन, समय, आ तकर स्पंदनक कवयित्री । अनेक भाषामे रचनाक अनुवाद प्रकाशित। बालानां कृते १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा ।  मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक  लेल किछु  गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे  जाहिसँ  बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा बाल-बुदरुकक लेल कविता छैठ परमेसरी आइ छै खड़ना खीर रातिमे, दादी सबके देतै ढाकी, केरा,कूड़ा ल’ क’, घाट पर हमहू जेबै भोरे – भोर  सूरज के ,अरघ हमहू देखेबै ठकुआ, मधूर, केरा, भुसवा हाउप हाउप खेबै . २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर छेछन चित्र ज्योति झा चौधरी डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज बड्ड बलगर छलाह। मुदा हुनकर संगी साथी सभ कहलकन्हि जे जखन ओ सभ सहिदापुर गेल छलाह, बाँसक टोकरी आऽ पटिया सभ बेचबाक लेल तखन ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलन्हि। ओ एकटा अखराहा बनेने रहथि आऽ ओतए एकटा पैघ सन डंका राखल रहय। जे ओहि डंकापर छोट करैत छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, जकर नाम चटिया छल तकरासँ लड़ए पड़ैत छलैक। मानिकचन्द प्रण कएने रहथि कि जे क्यो चटियासँ जीत जाएत से मानिकचन्दसँ लड़बाक योग्य होएत आऽ जे मानिकचन्दकेँ हराएत से मानिकचन्दक बहिन पनमासँ विवाहक अधिकारी होयत। मुदा ई मौका आइ धरि नहि आएल रहए जे क्यो चटियाकेँ हराऽ कए मानिकचन्दसँ लड़ि सकितय। दिन बितैत गेल आऽ एक दिन अपन पाँच पसेरीक कत्ता लए छेछन महराज सहिदापुर दिश विदा भेलाह। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि माँगलन्हि आऽ अपन चिलममे आगि आऽ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेलाह आऽ झुमैत डंकापर चोट कए देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आऽ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कए आयल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आऽ मानिकचन्द ओकरा ललकारा देलन्हि तँ चटिया दौगि कय छेछनपर झपटल मुदा छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि देलखिन्ह। फेर मनिकचन्द आऽ छेछनमे दंगल भेल आऽ छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि। दिन बितैत गेल आऽ आब छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटए लगलाह। एहिना एक बेर यादवक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ ओऽ बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि अएलाह आऽ आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि। सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आऽ छेछनक गरदनिपर राखि देलक आऽ अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक। ३. देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी : परीक्षाक तैयारी परीक्षा लऽग आबि गेल छल।सब विधार्थी सब सचेत भऽ रहल छल। लेकिन ओहिमेसऽ किछु तेहेनो छल जे अतिशय चिन्तित छल जाहि कारण ओकरा सबके स्वास्थ्य सेहो बिगड़ि रहल छल। जखन देवीजीके अहि बातक जानकारी भेलैन तऽ ओ सबके परीक्षाक तैयारी करैके उचित तरीका सिखाबक निर्णय लेली।एक बड़का कोठलीमे सब बच्चा सबके बजौली आ अपन पाठन शुरू केली।पहिने तऽ ओ कहली जे साल भरि बैसल रहिकऽ अंतिम समय मे अधीर भेने किछु नहिं होइत छै।तकर बाद ओ मुख्य रूपसऽ तीन शीर्षक मे अपन विचार रखली : 1 परीक्षाक समय स्वास्थ्यक ध्यान: अहिलेल देवीजी निम्नलिखित परामर्श देली-(1) पर्याप्त भोजन करू।पढ़ाई के चिन्तामे खेनाइ-पिनाइ नहि बिसरू।समय बचाबै लेल दोसर काज बन्द करू जेनाकि कतौ घुमनाई, अनेरो लोक स गप करैमे समय बितौनाई।(2) बाहर के कीनल समान नहिं खाऊ।(3) बीच-बीच मे चलनाई-फिरनाई करैत रहू।भऽ सकैतऽ योग आ ध्यान करू।(4)  हमेशा आशावादी रहू।मनुष के मस्तिष्क के क्षमता अपार छै।तैं किछु असम्भव नहिं छै मनुष लेल। (5) पर्याप्त मात्रामे सूतू।छऽ सऽ आठ घंटा जरूर सूतू।नींदके कमीसऽ एकाग्रतामे कमी आबैत छै। २ पाठ स्मरण करक तरीका: (1) पाठके स्मरण करैलेल ओकरा बुझनाई आवश्यक अछि।अहिलेल शिक्षक सऽ सहायता लिय।एक दोसर के सेहो सहायता करू।गणित लेल अभ्यास आवश्यक छै। (2)  स्मरण कैल पाठके बेर-बेर दुहराऊ तऽ ओ बिसरत नहिं। (3) एकरसता हटाबै लेल कनिक काल एकटा विषय पढ़लाक बाद फेर दोसर विषय पढ़ु। ३ अंतिम कालक पढ़ाई: (1) सब पाठके संक्षिप्त नोट बनाकऽ राखू आ परीक्षा लेल जायसऽ पहिने ओकरा पढ़ू,  (2) जे प्रश्न कठिन लागैत अछि तकरा एक जगह लिखिकऽ राखू आ जायकाल पढ़ू,  (3) रस्तामे सुरक्षाक ध्यान राखू , आ  (4) कक्षामे बैसिकऽ कनिक काल ऑंखि मुनिकऽ वा अपन हाथ दिस ताकि  ध्यान करू।अहि सऽ एकाग्रता आबैत छै। देवीजीक अहि परामर्श सऽ सब बच्चाक बढ़िया मार्गदर्शन भेल।सब आगामी वार्षिक परीक्षाक तैयारीमे लागि गेल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ इंग्लिश-मैथिली कोष  मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य/अग्राह्य

1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR 7.2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti. Ramlochan Thakur (1949- ) Senior Poet, theatre artist ,editor and critic of Maithili language. "Itihashanta" and "Deshak nam chhal son chrai", "Apoorva", "Mati Panik Geet"(collection of poems), "Betal Katha"(Satire), "Maithili Lok Katha (Folk Literature), "Ankhi Munane Aankhi Kholane" (Essays). Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR Addressed to the system/ warning- Without any indication Or Any wait for time The sleeping volcano Could thunder anytime The mountaineer Anytime could lag behind Sh. Krishnamohan Jha (1968- ), "Ekta Herayal Duniya", collection of poems in Maithili, "Samay Ko Chirkar" collection of poems in Hindi. For Hindi poems "Kanhaiya Smriti Samman" in 1998 and "Hemant Smriti Kavita Samman" in 2003. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR ONE DAY If not today then tomorrow If not  tomorrow then on a day after tomorrow If not  on a day after tomorrow then on two days after tomorrow Not on two days after tomorrow not even after a month… Then after a couple of years One day You would  return to this threshold And time and again would tell to yourself- Thanks! Thanks!! English Translation of Gajendra Thakur's(Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in ) Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti  received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). She had been honorary teacher at National Association For Blind, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti Examination of all art was held in the primary schools of the village- music, drawing, drama etc. There were lots of talented people in the village who can play drums, harmonium etc. Earlier drama was played in Durga Puja only but later on it became trend of celebrating Krishnashtami, Kali Puja etc. Harsha’s Ramleela party had also performed drama for one month. Conflicts rose during that drama too. Then ramleela was played without inviting any drama company from outside every now and then. However people kept on sponsoring Ramleela by outsider. Bearing expenses of hiring the Ramleela party was termed as holding mala. People used to announce for sponsoring the drama out of excitement for a moment but later on considering enthusiasm of the drama party and interest of villagers a systematic collection of money for hiring the drama party was established. There was a craze of the Ramleela in those days and I too had dream of having my career as an artist. With consent of teachers we started practicing drama on Saturdays in the school. To solve the problem of finding source of good drama book I wrote a drama named “Daanveer Dadhichi”. I gathered the child-artists. The child-artists had names too casual to suit to the famous characters of Indian mythology. Let’s have a look- potaha, lulha, lengra, potsurka, lelha, dhahibala, kanha, anhra, totraha, bauka, bahira etc. Those names meant deaf, blind, handicapped etc. The children who were considering themselves very sophisticated and respectful weren’t interested in participation of drama. If someone pronounced dhahi in place of dahi (yogurt) in his childhood then his name was kept dhahiwala. One child got their name Potaha as he had runny nose in winter. If the second child too had caugh then he had name potsurka. One child got his name Anhara (blind) as he couldn’t see the object and hit it during moving in darkness. If any child started speaking late then he became Bauka (dumb). An innocent child got name of Lelha, ignorant to people got name of Bahira(deaf), if the child kept his hand straight after wearing new Ghari (a watch made up of the Mango leaf) in the Ghari Pabani he got the name lulha (handicapped). The stuttering child got name of Totala. His habit of seeing with cunning eyes or frightening other kids by folding eyelids could give him name of Kanha. If any child walked limpingly due to some problem in legs he got the name of langara (cripple). But if a child belonged to a rich family and his mother was quite bold then even though he had some real defect nobody could dare to tease him. Ok, my drama ‘Danveer Dadhichi’ was to be played on next Saturday by that group of child-artists. (continued) VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR तेषाम् बिन्दुनां पुनः स्मरणं किंचित् कुर्मः। अहम् किञ्चित् कार्यं करोमि- अकबर मार्गः ह्रस्वः अस्ति। नवदेहल्यां मार्गः दीर्घः अस्ति। मम वेणी दीर्घा अस्ति। मम उत्तरीयम् दीर्घम् अस्ति। अहं बहु जानामि किञ्चित् वदामि। एषः वृक्षः उन्नतः/ वामनः अस्ति। पुरुषः उन्नतः/ वामनः अस्ति। कः उन्नतः/ वामनः अस्ति। इदानीम् वर्ण वाचकानाम् परिचयम् संपादयामः। -शुकस्य वर्णः हरितः। -शुकस्य वर्णः कः? -पर्णस्य वर्णः कः? -पर्णस्य वर्णः हरितः। -पुष्पस्य वर्णः पीतः। -सेमन्ती पुष्पस्य वर्णः पीतः। -काकस्य वर्णः कृष्णः। -कृष्णफलकस्य वर्णः कृष्णः। पत्रस्य वर्णः श्वेतः। दंतस्य वर्णः श्वेतः। क्षीरस्य वर्णः श्वेतः। आसन्दस्य वर्णः रक्तः। स्वादुफलस्य वर्णः रक्तः। अंतः रक्तम् अस्ति। रक्तस्य वर्णः कः। रक्तस्य वर्णः रक्तः। वस्त्रस्य वर्णः नीलः। भित्तः वर्णः नीलः। आकाशस्य वर्णः नीलः। र्ष्ट्रध्वजे त्रयः वर्णाः सन्ति।–हरितः/ श्वेतः/ कासायः वर्णः चक्रस्य वर्णः नीलः। कस्य कः वर्णः- केशस्य वर्णः कृष्णः। श्रीकृष्णस्य नीलः। (वर्णमूलशब्दः पु.) अहम् ईदृश फलम् इच्छामि। अहं तादृश फलं न इच्छामि। मम समीपे ईदृश घटी अस्ति। मम समीपे तादृश घटी नास्ति। भवत्याः समीपे कीदृश घटी अस्ति। मम समीपे तादृश घटी नास्ति। कस्यापि गृहे ईदृश कपिः अस्ति वा। भवत्याः गृहस्य कपिः ईदृश/ तादृश शब्दम् करोति वा। ओ महामर्कटः। इदानीम् अहं वस्तु प्रदर्श्य भिन्न-भिन्न नाम वदामि। तादृश वस्तु भवताम् गृहे अस्ति वा नास्ति वा। इति वदन्तु- मम गृहे तादृश पाञ्चालिका/ लेखनी अस्ति। ईदृश कङ्कणं कस्यापि (कस्याः अपि) समीपे नास्ति। इदानीम् एकं नूतनम् अंशं जानीमः। सन्दीपः क्रीडाङ्गनं गच्छति। क्रीडति। सन्दीपः क्रीडितुम् क्रीडाङ्गनः गच्छति। बालक पठितुम् विद्यालयं गच्छति। किमर्थम्? खादितुम्- जानीतुम्- वक्तुम् पीबति-पातुम् गच्छति-गन्तुम् आगच्छति-आगन्तुम् उत्तिष्ठति-उत्थातुम् उपविशति- उपवेष्टुम् जानाति- ज्ञातुम् करोति- कर्तुम् श्रुणोति- श्रोतुम् वदति- वक्तुम् ददाति- दातुम् पश्यति- द्रष्टुम् इदानीम् अन्यविध अभ्यासं कुर्मः। -बालकः विद्यालयं गच्छति। -बालकः विद्यालयं गन्तुम् इच्छति। -रमेशः क्रिकेट क्रीडति। -रमेशः क्रिकेट क्रीडितुम् इच्छति। -मुकेशः वदति। -मुकेशः वदितुम् इच्छति। चालयति- चालयतुम् शन्मुखः गृहे वासम् करोति। शन्मुखः गृहे वासम् कर्तुम् इच्छति। वासुदेवः देहलीम् गच्छति। धरति-धर्तुम् गायकः गीतम् गायति। सुभाषितम् मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः। श्रुतस्य सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। सर्वदा पण्डितः उदारदृष्टया पश्यति। पण्डितः इत्युक्ते सज्जनः। सज्जनः अन्य भगिनीः। महिलाः। कथम् पश्यति। अन्य भगिनीः सः मातरः इत्येव चिन्तयति। तथादृष्ट्या एव पश्यति। एवमेव बहुनाम् समीपे धनम् संपद् भवति। सज्जनः कया दृष्ट्या पश्यति। सः तत् धनं परेषां धनं मृत्तिकाम् इव पश्यति। तत धनं मृत्तिका समाना। इत्येव चिन्तयति। एवमेव प्राणिनः जीवन्ति। प्रपञ्चे। प्राणीनां विषये सज्जनस्य व्यवहारः कथं भवति। यदा स्वस्य विषये मृदुतया/ श्रेष्ठतया व्यवहारं करोति। तथैव सर्वप्राणिभिः सः व्यवहारं करोति। एवं पण्डितस्य दृष्टिः सर्वदा विशाला भवति। तादृशः एव पण्डितः इति उच्यते। कथा एकः ग्रामः- ग्रामे एकः सत्पुरुषः- सः बहु सज्जनः- सः जीवनार्थं धनस्य संग्रहं न कृतवान्। भिक्षाटनवृत्या जीवनं करोति स्म। भिक्षाटनं करोति- जीवनं करोति। धनसंग्रहं न करोति। प्रतिदिनं तपः करोति। प्रातःकाले/ मध्याह्ने/ रात्रौ/ एवं तदा तदा तपः करोति। मनसः संस्कारः भवति। तत कारणतः तस्य मनः शुद्धं सात्विकम् अस्ति। एका शक्तिः आगता- तपसः प्रभावेन् तस्य मनसः एका शक्तिः आगता। का सा शक्तिः- अनस्याः मनसि अथवा अनस्य मनसि यः भावः भवति तम् भावं सः सज्जनः ज्ञातुम् शक्नोति। सः सत्पुरुषः तपसः प्रभावेन् एव तत सर्वं ज्ञातुम् शक्नोति स्म। एकदा सः अन्यं ग्रामं गच्छति। सः ग्रामः दूरे अस्ति। मार्गे आयासः भवति। समीपे एकं कुटीरं पश्यति। तत्र गच्छति। स्वामिनं पृच्छति- कृपया किञ्चित् जलं ददातु। यजमानः आगच्छति- जलं ददाति। यदा किञ्चित् पिबति तस्य मनसि किमपि भवति। सः चिन्तयति। जलं पर्याप्तम्। गच्छामि। इति त्वराम् करोति। तदा गृहस्य स्वामी वदति- भोः। न गच्छतु। किञ्चित् क्षीरम् ददामि। क्षीरं स्वीकरोतु। परन्तु एषः सज्जनः वदति- नैव। अहं गच्छामि। परन्तु गृहस्वामी बहु आग्रहं करोति- अन्तः गच्छति-क्षीरम् आनयति। बहु आग्रह कारणतः सः सज्जनः तिष्ठति। क्षीरं गृह्णाति। सज्जनः स्वीकृतवान्। आग्रहकारणतः। परन्तु हस्तेन् किंचिदेव् क्षीरं पीतवान्। तदा एव तस्य मनसि एक विध स्पंदनं अभवत्। सः गृहस्वामिनं पृष्टवान्- भवतः गृहे धेनुः अस्ति वा। गृहस्वामी वदति- आम् अस्ति। पुनः सत्पुरुषः पृच्छति- एकवारं द्रष्टुम् इच्छामि। अस्तु। आगच्छतु। इति सत्पुरुषं गृहस्वामी नयति। सत्पुरुषः धेनुं पश्यति। धेनुः कण्डे बंधनम् अस्ति। धेनुः बहिर्गमन् मार्गम् अपि पश्यति। तदा गृहस्वामी पृच्छति। किमर्थं भवान् तथा पश्यति। तदा किमपि नास्ति- इति सत्पुरुषः वदति। तदा पुनः एषः गृहस्वामी आग्रहं करोति- वदतु-वदतु। अस्तु। इति सत्यं वदति। एषा धेनुः भवदीया धेनुः न्। कुतश्चित् चोरिता धेनु:। सत्यं वा न वा। तदा गृहस्वामिनः मुखं म्लानं भवति। सत्यं। परन्तु भवान् कथं ज्ञातवान्। तदा एषः वदति- सत्पुरुषः- भोः गृहस्वामि। भवान् क्षीरं दत्तवान्। तदा मम मनसि विकारः समुत्पन्नः। मम मनसि- अहं चोरयामि- इति भावः उत्पन्नः। तदर्थम् अहं गोष्ठं गत्वा सर्वं दृष्टवान्। परन्तु यदा चौर्यम् करणीयमेव इति महती इच्छा अभवत्। अहं गन्तुम् त्वरां कृतवान्। एवम् आहारस्य प्रभावः मनसः उपरि भवति। चोरः यदि आहारं ददाति- मनुष्यस्य अपि चौर्यबुद्धिः भवति। एवमेव एतस्मिन् संदर्भे अभवत्। अहं चिन्तितवान्। एषा धेनुः चोरिता धेनुः। तदर्थं मम मनस्य अपि चौर्यं करणीयम्- इति बुद्धिः उत्पन्ना। सत्यं वा न वा। एषा धेनुः चोरिता वा न वा। तदा गृहस्वाम स्वात्मनः दोषम् अङ्गीकरोति। सत्यम् इतः परम् अहम् एतां धेनुः मम गृहे स्थापयामि- एतस्य यजमानाय प्रत्यर्पयामि- इति वदति। प्रत्यर्पयति च। ENGLISH संस्कृतम् मैथिली Do you know when the examination begins? परीक्षारम्भः कदा इति ज्ञातं किम्? अहाँकेँ बुझल अछि परीक्षा कहियासँ शुरू होएत? Yes, the time-table came just yesterday. आं, वेलापत्रिका ह्यः एव आगता। हँ, टाइम-टेबुल काल्हिये आएल। Is there any gap between two papers? प्रश्नपत्रयोः मध्ये अवकाशः अस्ति किम्? दू परीक्षाक बीच विराम अछि की? Only two days. केवलं दिनद्वयस्य अस्ति। मात्र दू दिनक अछि। The examination has been postponed. परीक्षा अग्रे नीता। परीक्षाक तिथि आगाँ बढ़ि गेल अछि। How is the preparation? सज्जता कथम् अस्ति? तैयारी केहन अछि? I don’t remember anything that I read. पठितं किमपि न स्मरामि भोः। हम जे पढ़ैत छी से एकोरत्ती मोन नहि रहैत अछि? The portions of the third paper have not been completed. तृतीय-पत्रस्य पाठ्यांशः एव न समाप्तः। तेसर पत्रक पाठ्यक्रमक किछु अंश सेहो बाँकी अछि। The admission card will be given day after tomorrow. प्रवेशपत्रं परश्वः लप्स्यते। प्रवेश-पत्र परसू देल जाएत। What time is the examination? परीक्षासमयः कः? परीक्षाक समय की अछि? From 8 to 10 in the morning. प्रातः अष्टतः दशवादनम्। भोरमे ८ सँ १० बजे धरि। Which examination centre did you get? किं परीक्षा-केन्द्रं प्राप्तवती भवती? कोन परीक्षा-केन्द्र अहाँकेँ भेटल? The centre is near my house. केन्द्रं मम गृहस्य समीपे अस्ति। केन्द्र हमर घरक लगेमे अछि। How was the question-paper? प्रश्नपत्रं कथम् आसीत्? प्रश्नपत्र केहन रहए? It was very easy. अतीव-सुलभम् आसीत्। बड्ड हल्लुक रहए। It was very difficult. बहु क्लिष्टम् आसीत्। बड्ड भारी रहए। It was alright. सामान्यम् आसीत्। सामान्य रहए। The time was not enough. समयः अपर्याप्तः अभवत्। समय पर्याप्त नहि रहए। There was no option among the questions. प्रश्नेषु विकल्पः एव न आसीत्। प्रश्नमे विकल्प सेहो नहि छलए। I could not write answers of two questions. अहं प्रश्नद्वयस्य उत्तरं लेखितुं न शक्तवती। हम दू टा प्रश्नक उत्तर नहि लिखि सकलहुँ। The practical-exam is over. प्रात्यक्षिक-परीक्षा समाप्ता। प्रायोगिक परीक्षा समाप्त भेल। The examiner for practical-exam was a nice man. प्रात्यक्षिक-परीक्षायाः परीक्षकः उत्तमः आसीत्। प्रायोगिक परीक्षाक परीक्षक नीक लोक रहथि। How was the viva-voce? मौखिक-परीक्षा कथम् अभवत्? मौखिक परीक्षा केहन रहल? Not very good. सम्यक् न आसीत्। नीक नहि रहल। When will the result be declared? फलितांशः कदा प्रकटितः भविष्यति? परिणाम कहिया धरि आएत? There’s still one month. इतोऽपि एक मासः अस्ति। एखनो एक मास अछि। It will be declared in the next week. अग्रिम-सप्ताहे प्रकटितः भविष्यति। अगिला सप्ताह भऽ सकैए निकलत। How many percent marks did you get? प्रतिशतं कति अङ्काः प्राप्ताः? कतेक प्रतिशत अंक अहाँकेँ भेटल? I got 80% marks. मम ८०% अङ्काः आगताः। हमरा ८०% अंक भेटल He has failed in one subject. सः एकस्मिन् विषये अनुत्तीर्णः। ओऽ एक विषयमे अनुत्तीर्ण भऽ गेल। I lost the first rank by two marks. अङ्कद्वयेन मम प्रथम-स्थानं गतम्। दू अंकसँ हम पहिल स्थानसँ वंचित रहि गेलहुँ। His result has been withheld. तस्य फलितांशः निरुद्धः अस्ति। ओकर परिणाम रोकि लेल गेल। She is applying for revaluation of this paper. सा एतस्य पत्रस्य पुनर्मूल्याङ्कनार्थम् आवेदनं करिष्यति। ओऽ अपन उत्तर-पत्रक फेरसँ परीक्षण लेल आवेदन देने अछि। Two month’s holidays from now on. इतःपरं मासद्वयस्य विरामः। एखनसँ दू मासक विराम अछि। Next year I will study well. अग्रिमवर्षे अहं सम्यक् अध्ययनं करिष्यामि। अगिला साल हम नीक जेकाँ पढ़ब। Top of Form रिपोर्ताजTop of Form (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १५ नवम्बर २००८ (वर्ष १ मास ११ अंक २२) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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