119 विदेह १ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २३ 'विदेह' १दिसम्बर २००८ ( वर्ष १ मास १२ अंक २२ ) एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ २.६. दैनिकी-ज्योति/ कथा- प्रेमचन्द्र मिश्र २.७. रिपोर्ताज- नवेन्दु झा/ ज्योति . २.८. मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल-मौन ३.पद्य ३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा ३.२. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर ३.३.-एक युद्ध देशक भीतर-ज्योति ३.४. १.भालचन्द्र झा 2.विनीत उत्पल ३.५. 1. पंकज पराशर 2.अंकुर ३.६. कुमार मनोज कश्यप ३.७. रूपेश झा "त्योंथ" ४. मिथिला कला-संगीत-लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत-हृदय नारायण झा ५. बालानां कृते- १.प्रकाश झा- बाल कविता २. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर ३. देवीजी: ज्योति झा चौधरी ६. भाषापाक रचना लेखन- पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) ७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- ७.१.Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR ७.2.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti विदेह (दिनांक १ दिसम्बर २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१२ अंक:२३) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक २३, दिनांक १ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ई अंकक समर्पण गर्वक-संग ओहि 16 बलिदानीक नाम जे मुम्बईमे देशक सम्मानक रक्षार्थ अपन प्राणक बलिदान देलन्हि। केसर श्वेत हरित त्रिवार्णिक मध्य नील चक्र अछि शोभित चौबीस कीलक चक्र खचित अछि अछि हाथ हमर पताका ई, वन्दन, भारतभूमिक पूजन, करय छी हम, लए अरिमर्दनक हम प्रण। अहर्निश जागि करब हम रक्षा प्राणक बलिदान दए देब अपन सुख पसरत दुख दूर होएत गए छी हम देशक ई देश हमर अपन अपन पथमे लागल सभ करत धन्य-धान्यक पूर्ति जखन हाथ त्रिवार्णिक चक्र खचित बिच बढ़त कीर्तिक संग देश तखन। करि वन्दन मातृभूमिक पूजन, छी हम, बढ़ि अरिमर्दनक लए प्रण। समतल पर्वत तट सगरक गङ्गा गोदावरी कावेरी ताप्ती, नर्मदाक पावन धार,सरस्वती, सिन्धु यमुनाक कातक हम छी प्रगतिक आकांक्षी देशक निर्माणक कार्मिक अविचल, स्वच्छ धारक कातक बासी, कीर्ति त्रिवार्णिक हाथ लेने छी, वन्दन करैत माँ भारतीक, कीर्तिक अभिलाषी, आन्धीक बिहारिक आकांक्षी।
१.एन.एस.जी. मेजर सन्दीप उन्नीकृष्णन् २.ए.टी.एस.चीफ हेमंत कड़कड़े ३.अशोक कामटे ४.इंस्पेक्टर विजय सालस्कर ५.एन.एस.जी हवलदार गजेन्द्र सिंह "बिष्ट" ६.इंस्पेक्टर शशांक शिन्दे ७.इंस्पेक्टर ए.आर.चिटले ८.सब इंस्पेक्टर प्रकाश मोरे ९.कांस्टेबल विजय खांडेकर १०.ए.एस.आइ.वी.अबाले ११.बाउ साब दुर्गुरे १२.नानासाहब भोसले १३.कांसटेबल जयवंत पाटिल १४.कांसटेबल शेघोष पाटिल १५.अम्बादास रामचन्द्र पवार १६.एस.सी.चौधरी संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ २९ नवम्बर २००८) ६६ देशक ६३० ठामसँ १,२७,०८० बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें कहानी-संग्रह रेल की बात : हरिमोहन झा मू. सजिल्द १२५.०० पे.बै. ७०.०० छछिया भर छाछ : महेश ·टारे मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० नाच के बाहर : गौरीनाथ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० आइस-पाइस : अशोक भौमिक मू. सजिल्द १८०.०० पे.बै. ९०.०० भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ९०.०० कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० बड़कू चाचा : सुनीता जैन मू. सजिल्द १९५.०० कविता-संग्रह या : शैलेय मू. १६०.०० कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव मू. १५०.०० कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा मू. २२५.०० जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा मू. ३००.०० लाल रिज्बबन का फुलबा : सुनीता जैन मू. १९०.०० लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन मू. १९५.०० फैंटेसी : सुनीता जैन मू. १९०.०० दु:खमय अराकचक : श्याम चैतन्य मू. १९०.०० उपन्यास मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ८०.०० इतिहास, स्त्री-विमर्श और चिंतन डिजास्टर : मीडिया एण्ड पालिटिकस : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३००.०० पे.बै. १६०.०० एंकर की नज़र से : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३५०.०० पे.बै. १७५.०० पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी मू. २२५.०० स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम मू. २००.०० अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय मू. १८०.०० शीघ्र प्रकाश्य बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा माइक्रोस्कोप (उपन्यास) : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र (उपन्यास) : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर (उपन्यास) : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ (उपन्यास) : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन ज्या कोई है (कहानी-संग्रह) : शैलेय एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे प्रकाशित होएत। प्रकाशकक, प्रकाशन तिथिक, पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्वपूर्ण सूचना (५): १५-१६ सितम्बर २००८ केँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, मान सिंह रोड नई दिल्लीमे होअयबला बिहार महोत्सवक आयोजन बाढ़िक कारण अनिश्चितकाल लेल स्थगित कए देल गेल अछि। मैलोरंग अपन सांस्कृतिक कार्यक्रमकेँ बाढ़िकेँ देखैत अगिला सूचना धरि स्थगित कए देलक अछि। २.गद्य २.१.कथा 1.सुभाषचन्द्र यादव २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४. १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.५.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ २.६. दैनिकी-ज्योति/ कथा- प्रेमचन्द्र मिश्र २.७. रिपोर्ताज- नवेन्दु झा/ ज्योति . २.८.पाबनि-तीर्थ-मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल-मौन कथा १. सुभाषचन्द्र यादव चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। ओ लड़की एक-दोसराक सोझा-सोझी बनल तीन टा होस्टल रहै, दू टा लड़काक आ एकटा लड़कीक । ओहि तीनूक बीचोबीच एक टा छोट सन मकान रहै ।ओहि मकान मे छात्र-छात्राक मनोरंजन लेल टेबुलटेनिस, चाइनीज चेकर, शतरंज सन खेलक व्यवस्था रहै । मकानक अगुअइत मे चाह, पान अफलक एक-एक टा दोकान रहै । होस्टल शहर सँ हटि क’ एक टा सुरम्य पहाड़ी पर बनायल गेल रहै । ओहिठामक वातावरण एकदम शांत आ अध्ययन-मनन के अनुकूल रहै । ओतय अबाध स्वतंत्रता रहै । कोनो चट्टान पर बैसि कए अहाँ घंटाक घंटा चिन्तन मे लीन रहि सकैत छलहुँ या प्रेमिका संगे रभसल सपनामे डूबल रहि सकैत छलहुँ । मुदा एहि आधिदैविक आ रूमानी वातावरण पर दिनकें उदासी पसरल रहैत छलै । लड़का-लड़की पढ़ै-तढ़ै लए निकलि जाइ अ होस्टल भकोभन्न आ सून पड़ि जाइ ।मुदा साँझ पड़िते ओहिमे जीव पड़ि जाय । लड़का-लड़कीक चहल-पहल आ गनगनी कोनो पाबनि-तिहार सन लगै ।हैलो, हाय आ हाउ आर यू सन कथनी हवामे उड़ैत रहै ।धनीक घरक ईलड़का-लड़की बेसी कए अंगरेजी बाजइ आ तखन एहन लगै जेना अहाँ हिन्दुस्तान मे नहि, लंदन या न्यूयार्क मे होइ । साँझ पड़िते होस्टलक्क बीच ओह छोटका मकानक चारूकात लड़का-लड़कीजमा हुअय लागै। किछु ठाढ़े ठाढ़ आ किछु सिमटी वला बेच पर बैसि कए गप्प करै आ बहस करै । कोनो-कोनो बेंच पर खाली प्रेमीक जोड़ा बैसल रहै ।ए ई क्रम बड़ी राति धरि चलैत रहै । एहनो होइ जे साँझ पड़िते मोटरसाइकिल आ कार सँ शहरक लड़का आबै आ अपन –अपन प्रेमिका के ल’क’कतहु निकलि जाइ आ दू-चारि घंटामे छोड़ि जाइ । क्यो-क्यो होस्टले लग कार लगा क’ कारे मे अपन प्रेमिका सँ गप्प करैत रहैत छलै । एहने कोनो साँझक गप्प छियै । ओहि दिन नवीन भरि दिन होस्टलक अपन कोठलीमे बैसल पढ़ैत रहल छल । पढ़ैत-पढ़ैत ओकर माथ भारी भ’ गेलै ।गोसांइ डूबि गेल रहै आ पछबरिया क्षितिज पर ओकर लाली पसरल रहै ।नवीन बिना स्वेटर पहिरने चाह पीबा लेल निकलि गेल । होस्टलक मेसमे खाली भोरे टा कें चाह भेटै । तें नवीन धीरे-धीरे अहि मकान दिस बढ़य लागल, जतय चाहक दोकान रहै । होस्टल सँ बाहर निकलिते ठंढा हवाक झोंक सँ ओकर देह सिहरि उठलै । मुदा स्वेटर पहिरय ल’ ओ छूरल नहि । दलकी वला जाड़ नहि रहै । हवा सँ ओकरा ताजगी भेटलै आ माथ जे भारी रहै से हल्लुक होब’ लगलै। मकानक आसपास अखन भीड़ नहि रहै । बेंच पर किछु जोड़ा रहै आ दोकान पर किछु लोक । एकटा कार लागल रहै ।कारमे एकटा लड़का आ एकाटा लड़की बैसल चाह पिबैत रहै । भरिसक चाह खतम भ’गेल रहै आ ओ दुनू खलियाहा कप थामने बैसल रहै । बुझेलै जेना लड़काकें एकाएक ई बोध भेलै ज ओ अनेरे हाथमे खलियाहा कप ल’क’ बैसल अछि आ ओहि बेकारक बोझ हटाब’ लेल कपकें कारक सीटपर राखय चाहलक । लेकिन लड़की ओकरा एना करय नहि देलकै । ओ लड़का वला कप ल’ क’ अपन कप पर राखि लेलकै । नवीन कें लगलै जेना ओलड़की आब कार सँ निकलतै आ अँइठ कप राख’ चाहक दोकान पर जतैक । मुदा ओ ओहिना बैसल रहल । जखन कि सम्हारय कातिर ओ बेर-बेर कप दिस देखै आ एना कयलासँ ओकर ध्यान गप दिस सँ हटि जाय, तइयोजानि नहि कते रसगर गप्प चलैत रहै जे छोड़ल नहि जाय । कार लग पहुँचि क’ नवीन उड़ती नजरि सँ दुनूकें देखलक आ उदासीन भावें आगू बढ़ि गेल । ’एक्सक्यूज मी !’- पाछूसँ लड़कीक आवाज आयल।ओ नवीनकें बजबैत रहै ।आवाज सुनि क’ नवीन कें आश्चर्य भेलै । कियैक बजा रहल छैक ई अपरिचित लड़की ? ओ पाछू घूमि क’ आश्चर्य सँ लड़की कें देखलकै । लड़की जींस आ उजरा कुरता पहिरने रहै ।घूमिते लड़की पुछलकै-’अर यू गोईंग टू दैट साइड ?’ सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़्कीक चेहरा सँ उतरि क’ ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल । ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै । की ओ ओहि दुनूक अँइठ् कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै-’नो’ ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा एहि बातक खौंझ हुअय लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै ।ओ कियैक नहि कहि सकलै-निम्नवगीयि दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै । नवीन पान वला दोकान पर जा क’ ठाढ़ भ’ गेलै । ओ ऊपर सँ शांत बुझाइतो भीतरे-भीतर बहुत उत्तेजित रहै । ओ खाली ठाढ़ रहै । बाहरी दुनिया सँ निर्लिपृ । ’क्य लोगे साहब ?’-विचित्र नजरि सँ तकैत पानवला पुधलकै त’ ओ अकबका गेल ।ओकरा की लेनाइ रहै ? कनी काल धरि ओ किधु सोचिये नहि सकल । ’हँ, सिगरेट।’-ओ दोकनदार कें कहलकै । सिगरेट ध्राए क’ नवीन सोचय लागल ओकरा त’ चाह पिबै लेल जेनाइ रहै फेर एतय कियैक रूकि गेल। की ई देखाब’ लेल जे देख हम ठीके ओम्हर नहि जा रहल छी ? कते फोंक आ डेरबुक अछि ओ ? तोरा हिम्मत कोना भेलौ ? कियैकनहि कहि सकलै ओ! की ओ ठीके दब्बू अछि ? आदब्बूपनीए कारणे ओकरा मुँह सँ निकलि गेलै-नो भरिसक ई बात नहि छैक । मरजाद आ शालीनताक लेहाज नहि होइतै त’ चाहक बदला ओ पानक दोकान पर किए ठाढ़ होइत । मुदा ई शालीनताक ढोंग नहि भेलै ? नवीन बेचैन रहै आ जल्दी-जल्दी सिगरेटक सोंट मारैत रहै ।ओकरा ई बात परेशान कयने रहै जे लड़कीक मनमे एहि तरहक प्रस्ताव करबाक विचार अयलै कियैक । की ओ अपनाकें श्रेष्ठ आ हमरा नीच आ तुच्छ बूझि लेने रहै ?हँ, साइत यैह बात रहै । नवीन सोच मे पड़ल रहै । सिगरेट जरि क’ आब ओकर अंगुरी जरबय लागल रहै । सिगरेट फेकि क’ ओ चाहक दोकान पर चलि गेल । नवीन ढील भेलै आ लड़कीक ओहि समयक चेहरा ओकर बिधुआयल मुहेंठक लेल नवीन कें अफसोस भेलै ।ऊ सोचय लागल जँ कप लइये लितियै त’ की भ’ जइतियै । एहि सँ ओकर चरित्रक उदारता आ भद्रते सोझाँ अबितै । ओ छोट नहि भ’ जाइत, ई ओकर बड़प्पन होइतै । ओहिठमक जीवनमे ककरो कोनो छोट-मोट मदति करब आम बात रहै आ ई ककरो खराब नहि लागै । सहयोगक एहन भावना सँ नवीन अपरिचित नहि रहय । तइयो पता नहि की रहै जे ओ भड़कि गेल रहै । नवीन कें लगैत रहै ओकर दुनिया अलग छै आ ओहि लड़कीक दुनिया अलग । दुनूमे कोनो मेल नहि छैक । ओहि लड़कीक दुनिया चाहियो क’ नवीनक दुनिया नहि भ’ सकैत छलै आ नवीनक दुनिया लेल ओहि लड़की मे कहियो कोनो चाहत नहि भ’ सकैए । नवीन कें बुझेलै साइत सम्पन्नताक चिक्कन चाम आ रौद-बसातक सुक्खल चामक अन्तरे ओकरा भड़का देने होइ । ओ निश्चय नहि क ‘ पाबैत रहै । कही एहन त ‘ नहीं जे ओ लड़की अकारण ओकरा नीक नहीं लागल होइ आ ओ भभकि उठल हो ? मुदा से बुझाइत नहीं रहै । भरिसक ओकर भंगिमा, ओकर स्वरमे किछु रहै । ओकर अनुरोध मे अधिकारक भाव रहै, याचनाक नहीं । नवीन ओकर आकृतिकें मोन पाड़्य लागल । ओकर चेहरा मरदाना रहै । जनीजाति मे जे लाज आ कोमलता होइ छै, ओकरामे से नहि रहै । ओहि लड़कीमे किछु एहन रहै जे कठोर रहै आ विकर्षित करैत रहै । नवीन सोचैत रहल । ककरो ने ककरो गलती जरूर रहै । या त’ ओहि लड़की के प्रस्ताव ठीक नहि रहै या नवीनक प्रतित्र्किया उचित नहि रहै । दुनूमे क्यो दोषी रहल हएतै या दुनू दोषी हेतै या दुनूमे क्यो नहि । कोनो कारणो जरूर रहल हेतै । कारण आरो भ’ सकैत छल । ठीक-ठीक किछु नहि कहल जा सकैए । खाली एतबे साँच छै जे लड़की उदासभ’ गेल छलै आ नवीन दुखी रहैआ सोचने चल जाइत रहै । वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट«ीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल स्टेशनसँ बाहरक दृश्यकेँ घुरिघुरि कऽ देखैत हम मिसरजीक पाछँा चलय लगलहुँ । अनगिन्ती एक्का, सम्पत्तिक लेखे नहि । बुझाइत छलैक जेना बैलगाड़ीसभक तोड़ सड़कपरसँ कखनो समाप्त नहि होयत । स्टेशनक हत्तासँ सटले उत्तर–दक्षिणदिसि गेल सड़कपर सुर्खी आ’ माटिक गर्दा निरन्तर उड़ि रहल छलैक ।तखने एकगोट गाढ़ हरियर पेन्ट कयल चमकैत फिटिन आयल जाहिमे पयरसँ दबादबाकय टन–टन घण्टी बजाओल जाऽ रहल छलैक । सड़कपर चलैत यान–वाहन आ’ लोकसभपर गर्वसँ टनटनाइत धड़फड़ाकय कात होइत मिसरजी हमरो पिचायसँ बचबैत कहलाह — “ कात होउ, कात होउ राजदरबारक फिटीन गाड़ी छैक । ” दड़िभङ्गा ठीके बहुत बड़का छल, बहुतो नहि सोचल चीज–वस्तु देखि हम उत्सुक आ’ भयग्रस्त भऽ गेल छलहुँ । स्टेशनसँ सटले बाहर ओहिपार एकगोट विशाल पोखरि रहैक जकर स्टेशन दिसुका कातमे एकलाइनसँ मोदीसभक दोकानसभ छलैक ।दोकानसभ अर्थात फूसक झोपड़ीसभ । आगाँमे काठक चौकी तैपर ढ़ाकीसभमे भरल छल चूड़ा, भुज्जा, बदाम (चना) अथवा गहुँमक सतुआ, गुड़ आ’ किछु पुरान लड़ू, नोन, मिरचाई, आ’ कोनो–कोनो दोकानमे दही सेहो सजाकय राखल रहैक । हमसभ ओही दोकानसभमेसँ एक कातक एकगोट दोकानमे पैसलहुँ जकर कर्त्ताधर्त्ता एकगोट नाम आ’ हृष्टपुष्ट कदकाठीक सुन्नरि आकर्षक मोदिआइन छलि । मोदी छल दुब्बर–पातर प्राणी । नीच्चा असोराक ओरीयानीमे बीच–बीचमे खोकैत नारियलक गट्टावला हुक्का सुड़कैत रहैत छल । मोदिआइन अपन दोकानक भोज्यसामग्रीसभक ठीक पाछाँ पलथी मारि बैसलि व्यग्र आ’ चिन्तित स्वरमे पिताकय बाजि रहलि छलि — “ वैद्यलग जा कऽ दवाई लाबक छह कि नहि ? कयबेर कहलियैक जे हुक्कासँ दम आओर फुलतैक मुदा धनसन ” मोदिआइन बीच–बीचमे अपन बड़का डण्टाबला ताड़क पंखासँ एक हाथेँ अपन देहकेँ होंकैत भोज्यसामग्रीसभपर झिनकैत माछी आ’ बिढ़नीसभकेँ सेहो भगा रहलि छलि । मिसरजी ओकर पतिप्रतिक एकाग्रताकेँ भङ्ग करैत जोरसँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन ” दूगोट गहिंकी ( हमरासभकेँ ) देखि ओकर स्वर एकदम कोमल भऽ गेलैक — “ आउ, आउ बहुत दिनपर अयलहुँ ” ओकर उज्जर सुन्नर दाँतसभ चमकि उठलैक । मुँहपरक मुस्की आत्मीयताक भावक सङ्केत प्रेषित कऽ रहल छलैक । हमरा देखिते अत्यन्त भावपूर्ण सिनेहसँ ओ बाजलि — “ बौआकेँ बड्ड भूख लागल हएतन्हि । ़़़ देखू तऽ, ठोर कोना सुखा गेल छैक ” हम चट्ट दऽ अपन ठोरकेँ जीभसँ चाटि भिजयबाक प्रयत्न कयलहुँ । मोेदिआइन हमरासभक स्वागतमे चौकीसँ उतरलि । ओकर नमहर काठी तखन खुलि कऽ स्पष्ट भ कऽ आयल । स्थूल नमहर शरीर, ढ़ोढ़ीसँ उपरेक बिना बटमबला बड़का गलाक छिटक बलाउज पेटक कनेक नीच्चे एकगोट गिरहपर अँड़ल एगारह हाथक नील साड़ी, चाकर–चाकर तथा विभिन्न आकार–प्रकारक कानमे, गड़मे आ’ पएरमे चानीक गहनासभ, हातमे बरोबरि नीच्चा सड़कैत बाजुबन्द आ’ बेरबेर फुजैत खोपा सम्हारयलेल उठैत हाथ — एहन रहय मोदिआइन । एहन नाम मौगी प्रायः नहिये भेटत । सेहो विहारक उत्तरी भागमे जतय मनुखक आकार सामान्यतया मझोल होइत छैक भेटक तऽ गप्पे व्यर्थ । कनेक काल हम टकीटकी लगाकय देखिते रहलहुँ । ओ झुकलि आ’ हमर काँखतरक मोटरी लऽ लेलकि । ओकर बडका–बड़का कारी–कारी आँखि, सुन्नर आ’ समटल कारी भौं तथा पपनी, मुँहक रंग तऽ कारिये मुदा गढ़नि अत्यन्त नीक रहैक । स्वस्थताक चमकिसँ भरल–पूरल चमकैत मुँह बीच–बीचमे ओकर हँसनाईसँ आओर निखैरि जाइत छलैक । मोदिआइनक सामान्य मुस्कीयोमे ओकर पातर लाल ठोर आओर लाल भऽ जाइत छलैक जाहिसेँ ओकर सौन्दर्य आओर बढ़ि जाइक । हाथ–पयर, बाँहि सभ पुष्ट आ’ आकर्षक छलैक । ओतहि नीचा खोंकैत चोटकल गाल घोकचल कल्लाबला बैसल आदमीक धँसल छाती आ’ हड्डी–हड्डी देखाइत शरीरकेँ देखि बुझाइत छलैक जेना ओ दुनू सँयबहु नहि भिन्न काल तथा स्थानक प्राणीसभ होय । हमरा एखन मोन पड़ैयऽ, ओकरासभकेँ धियापुता नहि रहैक । किएक तऽ हम ओतय कोनो नेनाभुटकाकेँ नहि देखलहुँ । शायद तैं मोदिआइनपर उमेरक तेहन प्रभाव नहि पड़ल छलैक । पता नहि, मोदिआइनक उमेरे कम छलैक अथवा बेशी होइतो बुझयमे नहि आबि रहल छलैक । इहो भऽ सकैछ जे ओकर उमेर यथार्थमे कम रहल हेतैक मुदा देखयमे कनेक बेशीये बुझाइक । बात चाहे जे होउक मुदा ओकरामे दुनू चीज देखाइक — परिपक्वतो आ’ जुआनीक कोमलतो । हमराप्रतिये ओकर व्यवहार अत्यन्त आत्मीय छलैक । ओ हमरा पुछलकि — “ बौआ, दड़िभङ्गा पहिलबेर अयलहुँ अछि ? ” हम मुड़ी डोलबैत ‘ हँ ’ कहि देलिऐक । एखनतक मिसरजी अपन मोटरीसँ धोती बाहर निकालि कोंचिया नेने छलाह । मोदिआइन हमरो कहलकि — “ अहूँ नहायलेल चलि जाउ उ लगेक हड़ाहा पोखरिमे चलि जाउ । पानि शीतल आ’ निर्मल छैक, मुदा कातेमे नहायब उ बेशी दूर नहि जायब । बड्ड गहींर अछि हड़ाहा ” मोदिआइनक बातपर अनायासे हमर मुँह फुजि गेल । हम गर्वसँ कहलिऐक — “ हमरा हेलय अबैत अछि । ” ओ हमरा समझओेलकि — “ हेलय अबैत अछि से घमण्ड पोखरि, नदी, मोन्हि, बड़का खधिया, दह लग नहि करी ।एहिसभमे देवताक वास रहैत छैक । गर्वक बोली पसिन्न नहि होइत छन्हि हिनकासभकेँ उ अही हड़ाहा पोखरिमे कतेक अपनाकेँ बुझयबला ” मिसरजी ओम्हर पहुँच गेल छलाह, हमरा सोर कएलन्हि — “ कतेक अबेर करैत छी, बौआ जल्दी आउ । ” मोदिआइन बाजलि — “जाउ, नहाकय जल्दी आउ उ तावत हम चूड़ा, दही, गुड़ आ’ मिठाई परसिकय राखि दैत छी । हे, कातेमे नहाएब उ कातेमेऽ ” ठीकेमे ओहन पोखरि हम कहियो नहि देखने रही । पूर्वरिया भीड़पर ठाढ़ भऽ पछबारी भीड़दिसि तकलापर ओम्हुरका लोककेँ ठीकसँ चिन्हनाई मुश्किल छलैक । ओहिपार आम आ’ सिसोक एकटा घन फुलवारी रहैैक । हड़ाहा वास्तवमे अथाह आ’ गहींर छल होयत । पूर्वरिया भीड़ स्टेशनदिसि भेलाक कारणेँ प्रयोगमे छल । उतरबरिया भीड़पर दने सड़क भेलाक कारणेँ ओम्हरो घाट बनल रहैक, मुदा पछबरिया आ’ दछिनबरिया भीड़पर जङ्गल–झार आ’ फुलवारीयेटा छलैक । घाटपर अङ्गा निकालैत काल हमरा मोदिआइनक चेताओनी मोन पड़ि गेल । ओ स्पष्टे ईहो झलकोने छलि जे बहुतो आदमी एहिठाम डुबि कऽ मरि गेल अछि । हेलयमे तेजसभ सेहो । ओ एहिमे बसल देवतासभक बारेमे सेहो चेतओेने छलि । हमहुँ एहि अपरिचित स्थानमे कातेमे नहाएब उचित ठनलहुँ । आकाशमे एकबेर मेघक छोटका टुकड़ी पोखरिपर छाहरि दैत ससरलैक । पोखरिक पानि अनायास ककरो तमसायल मुँह जकाँ कारी भऽ गेलैक । तखने बसातक झोंकसँ सेहो ओहि पोखरिक अथाह जलराशि आन्दोलित जकाँ भऽ गेल । लाखों लघु लहरिसभ पूरा पोखरिमे व्याप्त भऽ हिलोरि मारय लागल जेना केओ ककरो एकाग्रता भङ्ग कऽ देने होइक आ’ तैं केओ विक्षुब्ध भऽ गेल होय ।साँचे, हमरा डर लागि गेल । कातेमे चटपट नहाकय हम सोझे मोदिआइन लग फिरि अयलहुँ । मोदिआइन प्रसन्न मुद्रामे भोजन–सामग्री ओड़िओने ओकर रखवारी करैति हमर प्रतीक्षा कऽ रहलि छलि । पातर पितरिया थारीमे धोअल फुलायल चूरा तथा ओहीमे दूगोट लड्ड़ू नोन आ’ गुड़ सेहो राखल छल । दही छाँछिमे छलैक । मोदिआइन बाजलि — “ लियऽ, नीकसँ बैसि कऽ खाउ उ मिसरजीक रस्ता देखब आवश्यक नहि । ओ सन्ध्या कऽ कऽ अओताह । देरी लगतन्हि । बच्चासभमे एकर विचार आवश्यक नहि । ” ओ फेरो बाजलि — “ हड़ाहा पोखरि कतेक नमहर अछि उ ़़़ नहि ? केहन लागल बौआ, अहाँकेँ ? आ’ फेरो पानि कतेक कञ्चन तथा शीतल छैक नहि ? ” हम पुछलिऐक — “ मोदिआइन, हड़ाहा पोखरिमे देवता रहैत छथिन्ह ? घमण्डीपर तमसा जाइत छथिन्ह ? कतेक आदमी डूबल हएत एखनतक ओहि पोखरिमे ? ” “ कतेक ने कतेक के कहि सकत ? ओ कोनो हलहा आ’ नवका पोखरि अछि से ओहिमे बड्ड उग्र देवतासभक वास छन्हि । एहि जिल्लामे एहन दोसर पोखरि नहि छैक ” हमहुँ उत्सुकतापूर्वक समर्थन करैत कहलिऐक — “ हँ, से तऽ ठीके । एहन नमहर पोखरि हमहु कतहु नहि देखने छलहुँ उ ” हमरा खाइत देखि मोदिआइन अत्यन्त सिनेहपूर्वक देखैति आगाँ बाजलि — “ बौआ, अहाँ की करैत छी ? पढैत छी कि नहि ? ” हम कहलिऐक — “ पढ़ैत छी ।” ओ घुसकिकय लग आबि फेर पुछलकि — “ की पढ़ैत छी, बौआ ?” “ ए़ बी़ सी़ डी़ ” “ पढ़िकय की करब ? ” घरमे जेना हम अखनतक कहैत आयल छलिऐक तहिना निर्भिक भावेँ हम ओकरो कहलिऐक — “ बड़का आदमी बनब । ” ओ फेरो पुछलकि — “ केहन बड़का आदमी ?” हमरा एहन प्रश्नक उत्तर ज्ञात नहि छल । चुपचाप खाइत रहलहुँ । ओ लगेमे स्थिरसँ बैसलि रहलि आ’ बाजलि — “ बडका आदमीसभ नहि जानि कतेक किसिमक होइत अछि ? मुदा नीक आदमी सभतरि एक्के प्रकारक भेटत उ बड़का बनय दिसि नहि जाउ । बौआ, नीक बनक कोशिश करु । नीक ” कातसँ खोंकैत मोदी नकिआइत कहलकैक — “ मोदिआइन, ई तोहर कोन आदति छौक ? सभकेँ ई उपदेशे देमय लगैत अछि उ ” तावत मिसरजी सेहो नहा–धो कऽ आबि गेल छलाह । मोदिआइन फुरफुराकय उठलि आ’ हुनका सम्बोधित करैत बाजलि — “ बौआ भूखायल होयताह से सोचि हम हिनका दही चूरा खायलेल देलियन्हि । अहाँ भानस अपने करब तऽ चाउर, दालि, घी, तेल, जारनि आदि सभ ठीकठाक कऽ कऽ राखि देने छी । चुल्हि सहो फुकि दैत छी । आ’ नहि तऽ दहीये चूड़ा खा लियऽ ” मिसरजी कहलखिन्ह — “ आब अखन हमरा भानस करक आँट नहि रहि गेल अछि । ” हुनकालेल दही–चूराक व्यवस्था करयहेतु मोदिआइन चौकीपर चढ़लि । मिसरजीकेँ खुआ–पीआकय ओ भीतर अपन घरमे गेलि । तखने मोदी सेहो खों–खों करैत ओकरहि पाछाँ भीतर गेलैक । प्रायः ओहोसभ दिनुका भोजन करय लागल छल । मुँहमे कौर देनहिं मोदिआइन भीतरसँ बाजलि — “कौआ–चील ने कहीं आबि जाई । कने देखबैक । हम तुरत्ते अबैत छी । ” (अगिला अंकमे) उपन्यास- चमेली रानी जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी कष्ट भेलनि तकर हाल की कहल जाय। सुपती गाँथबला बनबिलाड़ बनल। मुदा ओहि सभ काज मे दू वर्षक समय बीति गेलनि तखन चिनगारीजी केँ एकाएक मोन पड़लन्हिशनिचरी। शनिचरी मोन पड़िते ओ ब्याकुल भमोदियानिक अड्डाक हेतु प्रस्थान केलनि। कनही मोदियानि हुलास सँ चिनगारीजीक स्वागत करैत बाजलरे चिनगारी! तोहर अमानत केँ हम ओरियाकराखल। मुदा गारल असर्फी केँ लेबा सँ पहिने अगिला-पिछला हिसाब चुकता कदे। चिनगारीजी भावुक भउठलाआँखि सँ नोर टपकय लगलनिकंठ अवरुद्ध भगेलनि। ओ गड्डीक गड्डी नोट कनही मोदियानिक पयर पर पसारि देलनि। फेर एकटा पैघ सूटकेश केँ आगाँ करैत बजलाहअहि मे अगेली-पिछेली सोनाक गहना आ वस्त्रा भरल अछि। कनही मोदियानिक आँखि फाटि कबाहर निकललगलै। ओ आश्चर्य सँ चिनगारी केँ निहारय लागलि। चिनगारी अत्यन्त नम्र वाणी मे बजलाहम जे किछु छी से अहाँक परसादे। अहाँ ई किएक बुझलियैक जे हम अहाँक स्वागत मे खाली हाथे आयब। हयै मोदियानि! चिनगारी अहाँक सेवकअहाँक अज्ञाकारी। कनही मोदियानि केँ सुइद-मूर सँ कइएक गुणा बेसि भेटि गेलै। ओ हँसैत बाजलिएकटा औरो बात जानल जाए हे मनीस्टर साहेब! गंगा-कात सँ एकटा मनुक्ख केँ आनिजकर नाम छियै कीर्तमुखशनिचरीक बियाह करा देलियैक अछि। आखिर समाज सँलोक-लाज सँ अहाँक रक्षा करब आवश्यक छल। कीर्तमुख केँ सहवास करैक लूरि नहि छैक। शनिचरी सँ बच्चा अहाँ जन्माउ आओर बाप बनत कीर्तमुख। हेएकरा कहै छैक बुद्धि। कनही मोदियानिक सोचबभविष्य केँ काया-कल्प बनेबा मे के सकत। चिनगारीजीक विभागक गाड़ीबडीगार्ड आ पीए आदि सभ कियो पटना वापस भेल। चिनगारीजी बहुतो दिन तक कनही मोदियानिक अड्डा मे अटकल रहलाह। मध मे घोरल शुद्ध शिलाजीतक बुकनीमिसरी देल ललका अरहुलक मोरब्बा आओर गिलासक गिलास बकरीक दूध मे बादामकेसर आ हफीम फेंटल पेय केँ चिनगारीजी उदरस्त करैत रहलाह एवं कनही मोदियानिक व्यवस्था मे जमकल रहलाह। परिणाम भेलयुधिष्ठिरक आगमनक सूचना। बिदाह हेबाकाल चिनगारीजी कनही मोदियानि केँ बुझा ककहलनि जेशनिचरीक खरचाहोइबला बच्चाक खरचाकीर्तमुखक खरचा आ आन सब खरचा मासे मास पटना सँ आयल करत। कोनो बातक चिन्ता जुनि करब। सत्त्ोमनीस्टर की ने कसकैत अछि कालक्रमे युधिष्ठिरक अहि भूलोक मे पदार्पण भेलनि। मुदा हुनक जन्मक बाद चिनगारीजी फेर कनही मोदियानिक अड्डा पर वापस नहि आबि सकलाह। पटनाक नेतागणक बीच यद्यपि चिनगारीक कीर्ति-पताखा बड़ उच्च मे फहराइत रहैन्हमुदा ओ एकटा पैघ पाप कबैसलाहतकर प्रायश्चितो नहि कसकलाह। सबटा नसीबक दोष। पहिल केबिनेटक मीटिंग। सीएम गुलाब मिसिरक भाषण भेलभाइ लोकनिहम जो कुछ बोलता हूँ उसको आप सभी धियान से सुनने का कष्ट करें आऊरो सचेत हो जायें। हमरा एक मंत्रा हैसातू खाते रहोराज करते रहो। कँग्रेसिया सातू छोड़ाखाने लगा पोलाव। नतीजा क्या हुआसब मैटर आपके सामने है। हम फिर दोहराता हूँ सातू जिन्दाबाद! सातू जिन्दाबाद! मुदाचिनगारीजी अपन नेताक गुरुवाणी बिसरि गेलाह। पोलावबिरयानीमूर्ग-मोसल्लम कटिया भरल ठर्रा। पहिने हुनका ब्लड प्रेसर धक्का देलकनिफेर डाइभीटिज। डाक्टर भेटलनि चाइबासाक सेडूल्ड ट्राइब्सक नम्बर दूक डा. पी. के. मूरमूर। डाक्टर मूरमूर जखन पहिल मेडिकल परीक्षा मे दाखिल भेल छलाह तकुल मार्क्स एलनि एगारह। हुनकर सहोदर भ्राता हेल्थ मनीस्टर छलथीन। हुनका परम आश्चर्य भेलनिकुछ होएग्गारह नम्बर तो लाया। अब मेरा भाई डाक्टर बनकर रहेगा। डाक्टर मूरमूर चिनगारीजीक जाँच केलथिन्ह आओर उपदेश देलथिन्हबड़ा आदमी का निसानी है ब्लड प्रेसर और डाइबीटिज। दवा लिख दिया हैखाते रहिए और देश का काज करते रहिए। एलोपैथी दवाइ खाइबला केँ जँ भोरुका उखराहा मे मुँह मे खटमिट्ठीक स्वाद अबैक तसचेत भजेबाक चाही। मुदाचिनगारीजी मनीस्टर। हुनका चेतबाक फुर्सति कहाँ ओहि दिन चिनगारीजी रतुका खुमारी तोड़ैक लेल पहिने ललका रमक एक गिलास पिलनि। फेर ब्रिटानिया बिस्कुट केँ चिकेन सूप मे भिजा कमुँह मे रखलनि की पेट मे हूक उठलनि। कनिएँ कालक बाद पेट मे मरोड़। पेटक वस्तु बाहर हेबालेल भगवान मनुक्खक शरीर मे दूटा द्वार देने छथिन्ह। चिनगारीक दुनू द्वारक पट एकहि संग खुजि गेलनि। पछिला रतुका खेलहाअखरोटछहोड़ाकिसमिस साबुत निकलय लागल। डा. मूरमूर एलाह आ चिनगारीजी केँ देखिते बजलाहइसको तुरंत अस्पताल भेजो। मरीज बहुत गन्दा है। अस्पतालक नाम भेल अभावक पराकाष्ठा। चिनगारीजी अस्पतालक अव्यवस्थाक कौतुहल मे फंसि गेलाह आ मुँह-बाबि दम तोड़ि देलनि। कियो कहलक हार्ट फेल हो गया। दोसर कहलकनहीनहीपेट मे भुरकी हो गया।कियो किछु तकियो किछु। किछु होउकमनीस्टर बला बात। आध दर्जन डाक्टर गहन छान-बीन केलाक बाद निर्णय देलकचिनगारीजी मर चुके हैं। सच तो यह है कि अस्पताल आने के मार्ग में ही इनकी मृत्यु हो चुकी थी। संध्याकाल सीएम रेडियो पर भाषण देलनिचिनगारीजी एक करमठइमानदारत्यागी और प्रान्त के महान नेता थे। हमलोगों को भवसागर में छोड़कर चले गए। उनके रिक्त स्थान की पूर्ति कोई नहीं कर सकता है। हम उनके आत्मा की शान्ति का प्रार्थना करता हूँ। कनही मोदियानि केँ जखन चिनगारीक मृत्युक समाचार भेटलै तओ आकुल भकबफारि तोड़ब शुरू केलक। नवका नोटक फरफराइत गड्डी ओकरा आँखि मे स्वप्नवत घुमलगलै। मुदाबहुत जल्दीए ओ अपन ध्ौर्य केँ बाकुट मे समेटलक। अरे! विधाताक बनाओल विधि व्यवस्था सबसँ ऊपर। कनही मोदियानि शनिचरी केँ बजा ककहलकैचूड़ी नहि फोड़रहदेसेनूर नहि पोछललका-पिअरका नुआ पहिरते रह। आइ तक तूँ परतंत्रा छलह। आब हे रूपवती शनिचरी! तूँ स्वतंत्रा छह। सौंसे संसार मे उड़। अपनो प्रसन्न रहआ हमरो प्रसन्न करैत रह। शनिचरी केँ स्वतंत्रा होइत देरी कनही मोदियानिक आमदनी मे इजाफा भेलैक। ओम्हर आमदनी बढ़ैत गेल आ एम्हर शनिचरी क्रमशः चारिटा आओर बेटाक जन्म देलक। मुदाअन्तिम बेटाक जन्म-कालबुझू धरती फाटि गेलै आ शनिचरी ओहि मे समा गेलि। कीर्तमुख आब पाँच सन्तानक पिता छल। कनही मोदियानि जामे तक जिअल ओकर सिनेहओकर देख-भाल मे कोनो कमी नहि आयल। कीर्तमुखक नकुलवाबला गप सुनि कअर्जुन केँ प्रचण्ड तामस भेलैक। क्रोधसँ ओकर आँखि लाल भउठलै। पिछला दू अन्हरियाक पाँच हजार टाका थानाक बाँकी छैक। कतेक नेहौरा केलाक बाद थाना प्रभारी एक आओर अन्हरिया उधार देलक। डकैतीक काज मे की कोनो लज्जत रहि गेलै हेंट्रकबला सब पलटनक गाड़ी जकाँ कतार मे चलैत छै। इलाका ओहिना दरिद्दर। तखन तबाहरक कोनो भुतिआयल मुसाफिर फँसल तकिछु झड़ल। अर्जुन आइ एक घंटा चूल्हाइक महावीर मंदिर मे मनौती केलकतखन डकैतीक धन्धा पर विदा भेल छल। बीचहिं मे टोक। हे महावीर! एहन निर्दयी बाप ककरो ने हो। रे हे अरजुनमा! किछु बाजै नहि छएँ। टुकुर-टुकुर तकला सँ की हेतौकपोसि-पालि कसबकेँ पैघ केलिऔक। आब नकुलबा के रास्ता पर अननाइ तोहर फर्ज बनै छौ। छोटकासहदेवा एखन चरबाही करै अछिठीके अछि। आब हम बूढ़ भेलिऔ। अपन जिम्मेदारी केँ कम करचाहैत छी। अर्जुन फेर घूमि केँ बाप दिस तकलकबाजलबेसी टेएँ-टेएँ करबने तअखुन्ते आबि कगर्दनिक हड्डी तोड़ि देब। कीर्तमुख अपन गरदनि पर हाथ रखलक तओकरा मोन पड़लै जे ओकरा गरदनि छलैहे नहि। सही मेकीर्तमुखक शरीरक बनाबट अजीब रहैक। लग्गा सन नम्हर-नम्हर दुनू टांगघोंकचल पेट आ छातीकन्हा पर पौड़ल मूड़ी गरदनि नदारत। पीठ पर कुब्बर। तें भीख मंगै काल कियो ओकरा घेंचू त कियो ढेँचू कहैक। कीर्तमुख केँ कनिओ बुझल नहि रहैक जे ओकर माय-बाप केगंगा-कात मे भीख मंगैत ओ पैघ भेल आ गंगा-कातक पण्डा ओकर नामकरण केलकैकीर्तमुख। भगवान सबकेँ देखै छथिन्ह। सभहक इन्तजाम करैत छथिन्ह। कीर्तमुख जखन चेस्टगर भेल तगंगा नदीक कछेर मे माँछ पकड़ए लागल। आध-आध मनक रहु आ भाकुर ओ हाथे सँ पकड़ि लिअए। ई गुण ओकरा अपने-आप आबि गेल छलै। ओही माँछ के बेचैक क्रम मे ओकरा कनही मोदियानि सँ परिचय भेलै। आ एक दिन कनही मोदियानि कीर्तमुख केँ बुझा-सुझा ककहलकैकतेक दिन तक बौआइत रहब। आब ठेकाना पकड़ि लैह। ठेकाना भेल कमचीबला मचानपत्नी भेटलै शनिचरी आ बेटा भेलै पाँच। कोनो चीजक मिसियो भरि कमी नहि। बुझल जाउपूर्व जन्मक कमायल नीक कर्मक भोग कीर्तमुख केँ अनायास प्राप्त होबलगलै। मुदाआइ अर्जुनक गरदनिक हड्डी तोड़ै बला गप सुनि कओकरा बड्ड दुख भेलै। एहन मर्माहत बला दुख ओकरा कहिओ ने भेल रहैक। ओ चारू कात नजरि खिरौलकओकर बतारीक कियो नहि छैक। अर्जुन केँ ओ निहारि कदेखलक। कीर्तमुखक आँखि मे चोन्हा-मोन्हा लागि गेलैक। साँस सेहो ठमकि गेलैक। असल मेकीर्तमुख अइँठ कमुँह बाबि देलक। खैरकीर्तमुख केँ की भेलैक से तसहदेवा जखन राति मे ओकर खेनाइ लकआओत तखन पता चलतैक। सहदेवाकीर्तमुखक सबसँ छोट नेनाचिनगारीजीक असलिका बेटाक ओहिठाम चरबाही करैत छल। भोरका पनपिआइदिनका कलउ आ रतुका खेनाइ ओकरा जे भेटैक ओहि मे सँ आधा ओ खाइ छल आओर आधा कीर्तमुख केँ खुआबै छल। मजाल की जे कीर्तमुख एको साँझक भूखल रहि गेल हो। सहदेवा केँ अपन बापक प्रति जे ममता छलै से संसार मे व्याप्त सिनेहक उत्तम उदाहरण छल। आब सब किछु केँ छोड़ू। चलू अर्जुनक संग डकैतीक अभियान पर। अर्जुन सबसँ पहिने गोपियाक पसिखाना पहुँचल। जाहि दिन सँ ताड़ी पर सँ एक्साइज हटलैताहि दिन सँ डिबियाक स्थान पर पेट्रोमेक्स जड़ैत अछि। चारू कात भकभक इजोत। अर्जुनक शागिर्द मे पहिल नम्बर पर छल भूल्ला। अर्जुन केँ देखिते भूल्ला बाजि उठलआह! ओस्ताद आबि गेलाह। भूल्ला एक गिलास मे उज्जरफफनाति ताड़ी लकअर्जुन लग पहुँचल आ रिपोट देबलागलबेगुसराय बला उधार गोली नहि देलक। कहलक पिछला उधार चुकातखन अगिला उधार ले। अर्जुनक गिरोह मे सात नौजवान छलै। मुदाताहि मे कुल पाँच देशी रिभालवर आ तकर मात्रा तीनटा गोली। आब अहीं कहूडकैतीक काज कोना हैतसब काज मे पूंजी चाही। पूंजीक अभाव अर्जुन केँ पनपै मे महाबाधक छल। तखनअर्जुन ताड़ीक गिलास भूल्लाक हाथ सँ लैत प्रश्न केलकै। तखन की। सरपट मुसरीघराड़ी पहुँचलहुँ। अहाँक भैयाक गोर छूलऊँ। दुखड़ा कहलियै। ओ भरल एक पॉकिट गोली दविदा केलनि आ कहलनिअर्जुन से कहनाउसका भतीजा पैदा हुआ है। फुर्सत मिले तो आकर देख जाय। अर्जुनक मोन गदगद भउठलैक। ओ भूल्लाक पीठ ठोकलक। ताड़ी केँ चुरुक मे लआचमनि केलकएक घोंट ताड़ीक कुरुर केलक आ थोड़ेक ताड़ी हाथमे लय सम्पूर्ण देह पर छिटि लेलक। अर्जुन ताड़ी नहि पिबैत अछि। असल मे अर्जुन कोनो निशा करिते ने अछि। मुदाडकैतीक काज मे भभकैत ताड़ीक गन्ध जरूरी होइत छैकतेँ ई टोटमा। अर्जुन हाथ मे लागल ताड़ीक चिपचिपाहटि कात करोट मे पोछैत भूल्ला सँ कहलकतों सब तैयार रह। हम हेड अॉफिस केँ खबरि ककतुरंत वापिस आबि रहल छी। हेड अॉफिस यानी चमेलीरानीक अड्डा। कनही मोदियानि अपन एकमात्रा सन्तान चमेली केँ बरौनी रिफाइनरीक इंगलिस स्कूल मे नाम लिखा कहॉस्टल मे राखि देने छलैक। ओ जखन मरल तचमेली दसमाक परीक्षा ददेने छलै। कनही मोदियानिक मृत्युक बादचमेली पुरना डीह-डाबर केँ बेचि हाइवे पर फैल जगह देखि नवका अड्डा बनेलक। नवका जमानानवका विचार। चमेलीक पक्का दूमंजिला मकान। रहैकसूतैकखाइ-पिबैक आ गुलछर्ड़ा करैक अलग-अलग कमरा। सब इन्तजाम फस्ट-क्लास। किछुए मास मे हाकिम हुक्काममंत्राी-संतरीचोर-उचक्कापंडित-कसाइ सबहक माइ डियर चमेली। चमेलीक माथ पर भूखन सिंहक बरदहस्त। रिफाइनरी सँ हथिदह तकसबसँ खूंखार डकैत भूखन सिंहचमेलीक धर्म-पिता छल। दिआराक चन्हाईक्यूलक बच्चा भाइ आ मोकामाक धोहरलाल तोपबालासब भूखन सिंहक मातहतमानू भूखन सिंहक आगू खपटा। चमेली केँ ककरो परबाहि नहि। ओकर जवानी अंगार भकदहकि रहल छलै। ऊपर सँ पढ़ल-लिखलफटाफट अँग्रेजी बजैबालीतेज-तर्रार आ मुँहफट। परगना भरिक डकैत पहिने चमेलीक अड्डा पर जेबे करतहरी झण्डी लेतफेर आगाँ पयर उठाओतसैह नियम छलैक। अर्जुन जखन चमेलीक अड्डा पर पहुँचल तखन मात्रा सात बाजल रहैक। ओना अन्हरियाअन्हार केँ झंपने किछु बेसिए अन्हार भचुकल छलै। दू टा पावरफूल लैम्पक बीच बैसलि चमेली। कान मे झुमकानाक मे नथियागरदनि मे सोनाक हारनहि किछु नहिएकोटा गहना चमेली नहि पहिरने छल। ने पाउडरने स्नो आ ने काजर। किछु नहिमात्रा एकटा बिन्दी ललाट पर दमकैत रहैक। अर्जुन चमेलीक सपाट चेहरा पर नजरि अँटकेलक। ओकर नजरि पिछड़िगेलै। मुदाओकरा स्पष्ट भान भेलै जे एकटा हँंसीक लहरि चमेलीक आँंखि मे काँपि गेल होइक। ओना अर्जुन केँ धोखा सेहो भसकैत छै। किंतुचमेलीक बिन्दी सँ एकटा ज्योति पसरि रहल छलैअहि मे कोनो धोखा नहि छलै। अर्जुन दिस चमेली एकटक निहारि रहल छलीह जाहि मे कोनो विशेष निमंत्राणक अन्दाज छलै। चमेली बजलीहकौन हैरेकुकुरमुत्ता तुम हो कुकुरमुत्तासम्बोधन अर्जुनक लेल छलै। कनही मोदियानि जीबिते रहै। चमेलीक उमिर तेरह-चौदह। अर्जुन बुझू पन्द्रह-सोलह। ओहि काल बज्र दुपहरिया रहैक। चमेली कनखी मारि अर्जुन केँ इशारा केलकै। फेर पछबरिया अन्हार कोठरी मे एसगरे लगेलैकबिलैया सेहो चढ़ा देलकै। तकरा बादभीतर कोठरी मे की भेल से तप्रायः देवतो केँ पता नहि लगलनि। बाहर आबि चमेली बिहुँसैत अर्जुन दिस ताकि कबजलीहकुकुरमुत्ता। कुकुरमुत्ता सम्बोधन सुनि अर्जुनक नजरि झुकि गेलैक। ओ चुपचाप ठार रहल। तुम्हारे वास्तेकुकुरमुत्तादूसरा अॉडर है। कुछ देर पहले हुकुम आया है। आज रात को सेभेन्टी वन अप के स्लीपर में डकैती का कार्यक्रम है। तुमको उसमें जाना है। हाइवे डकैती में कुछ माल नहीं है। थाना को भी खबर है कि दो अन्हरिया का पहुँचौआ तुमने नहीं पहुँचाया है। तुम पर बड़े साहब ददू की आँख है। तुम युधिष्ठिर के सगे भाई होजवान होदिलदार होतभी तो चान्स मिला है। इस काम में तुम्हारा टेस्ट है। सफल होने पर एक धाकड़ मर्डर का काम मिलेगा। समझो तुम्हारे किस्मत का दरवाजा खुल गया है। चमेलीक मुँह सँ फहरी लाबा बनल शब्द निकलय लागल। एम्हर अर्जुनक माथ मे घंटी बाजब शुरू भगेल। मर्डरबला चान्स बड़ कठिने भेटैत छैक। भूखन सिंहक एहन कृपाक लेल सैकड़ों लाइन मे ठारे रहि जाइत अछि। बोलोतैयार हो एकदम सँ तैयार छी। कहू तगोपियाक पसिखाना सँ हम अपन गिरोह केँ बजा लाबी। फिर कुकुरमुत्ता जक्ती बात बोलता है। अरेट्रेन डकैती का काम अलग हैजोखिम का है। सड़क डकैती करने वाला उसमें फेल हो जाएगा। यहाँ जथ्था तैयार है। छोकड़ा-छोकड़ी मिलाकर बीस और तुम आ गया तो एक्कीस। रात के बारह बजे रबाना होना है। अभी चार-पाँच घंटा का देरी है। तुम अन्दर जाओ औरतैयारी मे जुट जाओ। अर्जुन भीतर प्रवेश केलक। विशाल आंगन। साफ-सुथराइजोत मे झलकैत। चारू कात काज भरहल छैक। एके सैंतालिस राइफलक ढेरी एक कात। एक गोटे ओकर चेकिंग मे लागल। दोसर कात छोटका-बड़का बमक नुमाइस। खेबा-पिबाक सामग्री दिस थोड़ेक छौंड़ा-छौंड़ी बैसल खा-पी रहल अछि। बहुत कात मेमुदा पूर्णतः इजोत मे एक जोड़ा अपन बैटरी चार्ज करमे मस्त छल। अर्जुनक मददिक लेल एकटा छौंड़ी आयल। ओकरा अपन काज सँ मतलब। कपड़ा बदलना हैहथियार कहाँ रखना हैएक्सट्रा मैगजीन जरूरी है। सबटा काज केँ निष्पादन ककवैह छौंड़ी एकटा मुँह झँपना आनि कअर्जुन केँ देलकै आ ताकीत केलकैइसको इस तरह टाइट बाँधो कि आँख छोड़कर पूरा चेहरा ढक जाय। ठीक बारह बजे राति। सन-सन बहैत हवा अन्हरियाक छाती केँ विदीर्ण करहल छल। चमेलीक टाइट पेन्ट-सर्ट मेपाँछा लटकल चमड़ाक चमौटी मे रिवाल्बर। चमेली अर्जुनक मुआयना करैत बाजलिमेरे पीछे बैठ जाओ। अर्जुन मोटर साइकिल पर चमेलीक पाँछा बैसल। ठीक ओहीकालवैह छौंड़ी जे पछिला चारि घंटा सँ अर्जुनक देहक समस्त पूर्जा केँ टीप-टाप ककओकरा तैयार केने छलअर्जुनक पाँछा मे आबि मोटर साइकिल पर बैसि गेलि। चमेली अर्जुन केँ फेर टोकलककुकुरमुत्तामुझे कसकर पकड़ लो। मोटर साइकिल फरफरा कस्टार्ट भेल। संगहि औरो मोटर साइकिल स्टार्ट भेल। अर्जुन कृष्णा आ कावेरीक बीच फँसल जा रहल छल। अर्जुन पजिया कचमेली के ध्ोने छल आ सोचै छल। की कहलियैअर्जुन ट्रेन डकैती दसोचै छल जी नहिओ एतबे सोचै छल जे जखने चमेली अवसर देत ओ कुकुरमुत्ता सँ छोड़ि घोड़मुत्ता बनि कदेखा देतैक। पछिला छौंड़ी अलगे अर्जुनक देह मे घुसियेबाक बियोंत मे छल। मुदाअर्जुन कइये की सकैत छलचुपे रहल। जमाना बदलल जा रहल छल। सब काज मे छौंड़ा सँ छौंड़ी आगू। ओ सब जखन कटवासाक गुमती लग पहुँचल तअर्जुन सबटा मोटर-साइकिल केँ गनलककुल दस टा। गुमती मैन रेलवेक लालटेनक ललका बत्ती केँ तेज करैत बाजलबसपाँच मिनट। ट्रेन आने ही वाली है।ट्रेन आयल। आस्ते भेल। फटाफट सब चढ़ि गेल।डकैती शुरू भेल। तीनटा स्लीपर लुटल गेल। केवल कैशगहना आ दामिल असबाव। पाँच बोड़ा में सबटा पैक। कुल बीस मिनट लागल। कोनो बिरोध नहिकोनो अवरोध नहि। पसिन्जर सब डेरायलनुकायलऔंघायल आ चुपचाप। मात्रा चमेलीक रिभाल्वरक खलिया फायरक प्रतिध्वनि चारूकात पसरल छल। फेर ट्रेन आस्ते भेलबहुत आस्ते भेल। एकैसो व्यक्ति उतरि गेल। ट्रेन स्लो सँ फास्ट भेल आ आँखि सँ ओझल भगेल। उतरै काल चमेलीक वामा पायर मे मोच पड़ि गेलैक। ओ नंगराए लागलि। अर्जुन केँ अपन वीरता देखेबाक सुअवसर भेटलैक। ओ चमेली केँ कन्हा पर लदलक आ फूल-सन सुकुमारि केँ नेने दुलकी चालि मे चलैत वापस कटवासा गुमती लग पहुँचल। सब जा चुकल छल। गुमती मैन अर्जुनक कन्हा पर चमेली केँ देखि बिफरि कहँसि पड़ल। ओकर अगिला दाँत में सोनाक कील ठोकल रहै। बिना किछु कहने अर्जुन मोटर-साइकिल स्टार्ट केलक। चमेली पाँछा मे बैसि अर्जुन केँ पजिया कपकड़ि लेलक। ओहि मोटर-साइकिलक तेसर सवारी पहिने जा चुकल छलै। डकैतीक कानूनवापसी मे किसी के लिए रुको नहींभागकर अड्डा पर पहुँचो। चमेलीक शरीर सँ एकटा अत्यंत अजूबा मादक सुगंधि विसर्जित भरहल छलैक। अर्जुन केँ ताड़ीक भभकैत गन्धक कतौ अत्ता-पत्ता नहि रहलैक। ओ आपसी मे मोटर-साइकिल बहुत तेज चला रहल छल। चमेलीक गर्म सांस ओकर पीठक हड्डी केँ छलनी केने जाइत छलै। जखन अर्जुन आ चमेली अड्डा पर आपस आयल तभोर भेल नहि छलैभोर होबहिबला छलै। चमेली एकटा कोठरी मे जा कटेलीफोन सँ ककरो पूरा रिपोट पहुँचौलकफेर आदेश ग्रहण केलक आ आपस अर्जुन लग आयल। यह है दस हजार रुपैयातुम्हारा हिस्सा। साहेब यानी ददू का हुकूम है वापिस घर जाओ। अगिला आदेश का इन्तजार करो। अर्जुन रुपैया केँ दहिना पेन्टक जेबी मे ठुसलक आ टकटकी लगा कचमेली दिस ताकय लागल। अर्जुनक नजरि मे एकटा पैघ नजरिया साफ देखमे आबि रहल छलै। भोरुका समयपुरबा बसात मे सिहरनअतृप्त कामक प्रचण्ड वेग। ताहि पर सँ कामदेव देशी पिस्तौल सँ ताबड़तोड़ फाइरिंग करहल छलाह। चमेली एकटकअर्जुनक आँखि मे देखि रहल छलीह। प्रकृति पुरुष मे समर्पणक लेल आतुर भरहल छलीह। एक क्षण तएहनो अभास भेल जे डकैतीक सरदारीनचमेली बेबस भरहलीह अछि। मुदावाह रे चमेली! ओ कामक वेग केँ मूलाधर चक्र पर बजारि एक अद्भुत विवेकक परिचय देलनि। हुनक मुखाकृति पर आभाक विस्तार होमय लागल। शायद भविष्यक गर्त मे नुकायल कोनो पैघ कार्यक सम्पादन होयत तकर आभास सहजहिँ दृष्टिगोचर होबय लागल। चमेली अँटकल ओ फँसल अबाज मे बजलीहजानते हो अर्जुनमैं तीन वर्षों से डकैती का काम कर रही हूँ। सैकड़ों डकैती का अनुभव मुझे बतला रहा है कि यहाँ के लोग आलसी किंतु शांतिप्रिय हैं। मैं भी इन्हीं लोगों के बीच से आई हूँ। इस तरह के लोगों की भलाई इन पर शासन करके ही किया जा सकता है। और यह भी सच है कि इन पर शासन करना कुछ भी कठिन नहीं है। चमेली पढ़लि-लिखलिअर्जुन मूर्ख। चमेली की बाजि रहल छथिअर्जुन केँ बुझै मे किछु नहि ऐलैक। चमेली फेर बजलीहइस सपाट मैदान मे सिर्फ घास ही घास है। लेकिनबहुत जल्द एक विशाल पेड़ उगने वाला है। वह पेड़ मैं बनूँगी। सभी मेरी छाया में आयेंगे। मैं सबका भाग्य लिखूँगी। सच पूछो तो मैं इस प्रान्त की रानी बनने वाली हूँ। जिस रास्ते मैं चल रही हूँ और चलने वाली हूँमुझे अच्छी तरह पता है कि वह कहाँ तक पहुँचता है। हाँयह भी सच है कि मुझे एक मर्द की जरूरत होगी। समय आने पर मैं तुमको अपने पास बुला लूंगी। मेरी आवाज सुनकर तुम आओगे क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ। तुम ही मेरा पहला और आखिरी प्यार हैसमझे। एखन अर्जुन किछु नहि बुझलक। ओकर समझक आगाँ एकटा पाथर छलपियासल ओ पसरल। ओकर कान मे चमेलीक आबाज फेर टकरेलैऔर अभी की बात जान लो। तुम औरत के गले का गहना नहीं छीन सका। डकैती के उसूल के विरुद्ध। इसी से तुमको मर्डरवाला काम नहीं दिया जाएगा। तुम इस काम को करने की योग्यता नहीं रखते हो। तुमको अभी और निडर-निष्ठुर बनना पड़ेगा। तुम्हारे अंदर कोई देवता है जिसे मारपीट कर भगाना पड़ेगा। सफलता के लिए जो भी काम करो उसमें इमानदारी का होना जरूरी है। अर्जुन के मोन पड़लैकट्रेन मे डकैती काल ओहि नववधुक गरदनि मे सोनाक गहना पर हाथ देलक तओ बाजि उठल छलैई मंगल सूत्रा थिक। एकराजुनि लैह। फेर ओहि नववधुक आँखि सँ करुणाक इनहोर नोर ओकरा हाथ पर खसलैक। ओ हाथ छीप नेने छल। अर्जुनक मोने ई बात कियो ने देखलक आ ने बुझलक। मुदासे नहि। डाकूक मुखियाचमेलीक नजरि सँ किछु नुकायल नहि रहि सकैत छलै। अर्जुन केँ अपन गलतीक एहसास भेलैक। ओकर आँखि आओर कातर भउठलैक। अर्जुनक दयनीय दशा देखि चमेलीक हृदय मे कतहु सँ एक आना दयाक भाव जगलैक। ओ चुचकारी दैत बजलीहखैरजो हुआ सो हुआ। तुम दुखी मत होओ। एक बैंक लूटने का प्लान बन रहा है। अभी फाइनल नहीं हुआ है। फाइनल होते ही मै उसमें तुमको शामिल करने का प्रयास करूँगी। अब तो खुश! अब सीध्ो घर जाओ। खिसिआयल महादेव केँ परचारैत अर्जुन अपन गाम मिरचैया लेल विदा भेल। आकाश मे चकमैत भोरुकवा तारा दिस तकैत ओ सोचि रहल छल जे चमेलीक अन्तिम बात जँ सत्य हेतैक तखने ओकर भाग्य जगतै। तामे बहुत रास दुख ओकरा छपने रहत। पहिल दुख जे बहुतो प्रयास केलाक बादो ओ कुकुरमुत्ता सँ घोड़मुत्ता नहि बनि सकल। दोसर दुख जे मात्रा एकटा मंगलसूत्राक कारणें ओकरा मर्डरबला काजक चान्स हाथ अबैत-अबैत खिसकि गेलैक। आओर तेसर दुख! गाम पहुँचि कतेसर दुख परिलक्षित भेलैक। कमचीवाला मचानक नीचाउत्तर मुंहें सिरमा केनेकीर्तमुख मुँह बौने मरल पड़ल छलाह। उज्जर नवका कपड़ा सँ हुनक देह झाँपल छल आ सिरमा लग गोइठाक धुआँ आकाश मे बिलीन भरहल छल। अर्जुन केँ देखिते नकुल आ सहदेवाभैयाहोउ भैयाकहैत ओकरा सँ लेपटा गेलै। अर्जुनक ठोर पटपटा उठलैबापबाप मरि गेल। आइ हम टुअर भगेलहुँ। अदू रघुपति राघव राजा रामपतित पावन सीताराम। अजीओ महाराज जीतनी हटू। हमारा अन्दर जाए दिअ। कहबला व्यक्ति गेरुआ वस्त्राधारीट्रेनक फस्ट-किलास डिब्बा मे चढ़ैक प्रयत्न करहल छथि। मुदा डिब्बाक दरबज्जा लग एक व्यक्ति हाथ मे स्टेनगन नेने ओहि महात्मा केँ चढ़ै सँ रोकि रहल अछि। अभागल प्रान्तक अति अभागल टीसननिर्मली। भोरुका करीब आठ बजेक समय। जेठक रौद्र सूर्यआकाश मे फनैत आगि उझील रहला अछि। एखन एहन गर्मी तदुपहरिया मे केहन रौद तकर मात्रा कल्पना सँ देह काँपि उठैत अछि। अठबज्जी ट्रेन निर्मली सँ खुजय लेल तैयार। ट्रेन मे लार्ड डलहौजी समयक बनल एक मात्रा फस्ट किलासक डिब्बा। डिब्बाक एक बर्थ पर एकटा स्मार्ट करीब बीस वर्षक युवकटाइट पेन्ट-शर्ट मे। हुनका संगे करीब चौदह वर्षक परम रूपवती एकटा नवयुवती। ओहो टाइट पेन्ट-शर्ट मेमुदा शर्टक ऊपरका दूटा बटन खुजल। दोसर बर्थ पर एकटा केचुआयलकरीब साठि वर्षकमोटरी जकाँ तोंद आ लगातार तीन एसेम्बलीक इलेक्शन जीतै बला विधायकउज्जर जाजीम पर लम्बा-लम्बी पड़ल। विधायकजीक समग्र ध्यान सामने टाँग पर टाँग रखने नवयुवतीक सौन्दर्य मे केन्द्रित छल। विधायकजीक बर्थक ठीक नीचाहुनक राजस्थानी कमानीदार जूताक बगल मेहुनकर बडीगार्ड एक हाथ मे गिलास तथा दोसर हाथ मे तौलिया मे लपटाओल स्कॉचक बोतल नेने बैसल छल। बडीगार्डक हथियार यानी स्टेनगन ओहि ठाम ओकर बगल मे पड़ल छलै। विधायकजीक दोसर बडीगार्डडिब्बाक दरबज्जा लगस्टेनगन तनने आगन्तुक महात्माजीक रास्ता रोकने कहि रहल छलैदेखता नहीं हैयह फस्ट क्लास हैदूसरे में जाओ। नवयुवतीक ध्यान महात्मा दिस गेलै। ओ मूड़ी झुका खिड़की सँ महात्मा केँदेखबाक प्रयास केलक। मुदा अही प्रयास मेओकर उपरका दूटा खूजल बटनबला कमीज सँ गोल-मटोलचिक्कनविधायकजीक करेज मे बरछी भोंकैबलाविद्यापतिक जुगल कुच छहलि कबाहर आबि गेलनि। नवयुवती झपटि कअपन वस्त्रा दुरुस्त केलनि आ खिड़की सँ मुँह सटा कजोर सँ बाजि उठलीहस्वामीजी! जेना वीणाक सब तार एके बेर झंकृत भउठल होअयतहिना ओहि युवतीक स्वर-ध्वनि सम्पूर्ण निर्मली टीसनक प्लेटफार्म केँ झनझना देलक। टीसन पर लोकक भीड़ जमा भगेलै। लोक सबहक एक बिताक गरदनि मे तुलसीक कण्ठीठरका चाननफहराइत टीक आओर फाटल आँखि। सब कियो ओहि फस्ट किलास डिब्बा दिस ताकय लागल। ओहि विरान टीसन पर एहन अजगुत बात। विधायकजीक बडीगार्ड अपन कर्तव्य वहन करैत ओहि स्वामीजी केँ डिब्बा मे चढ़ै मे पूर्ण बाधा उपस्थित केने छल। युवतीक खिड़की दिस घुमलाक कारणे विधायकजीक तंद्रा एकाएक भंग भगेलनि। जखन सँ ओ अहि डिब्बा मे आयल छलाहहुनक समग्र चिंतनसांख्यमार्गी जकाँओहि युवतीक उठैत-खसैतनोकदार खूंटी मे टाँगल छलन्हि। व्यवधानक कारणे प्रान्तक महान आ यशस्वी नेता केँ क्रोध भउठलनि। ओ खिसियाति बजलाहकाहे रोकते होआने दो। स्वामीजी डिब्बाक भीतर आबि खाली तेसर बर्थ पर पलथी मारि कबैसि रहलाह। गाड़ी सीटी देलक आ धकधका कधक्का दैत विदा भेल। स्वामीजीकतके यात्राा में प्रस्थान कलियै अछिप्रश्न पुछैत युवती सुभ्यस्त भकसोझ भेलीह। विधायकजीक आँखिक दूरबीन ठीक एंगिल मे आबि गेल। आब कोनो चिन्ता नहि। ओ नीचा मे दाँत निपोरने बैसल बडीगार्डजे किछु काल पूर्व विधायकजी सँ आँखि बचा केँ स्कॉचक बोतल सँ पैघ दू घोंट उदरस्त कचुकल छलसँ कहलनिरहमानदवा दो। (अगिला अंकमे) १.मैथिली भाषा आ साहित्य - प्रेमशंकर सिंह २.स्व. राजकमल चौधरी पर-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) १.प्रोफेसर प्रेम शंकर सिंह डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मैथिली भाषा आ साहित्य मिथिलाक भाषा मैथिलीक एहि व्यापकताकेँ सर्वप्रथम डॉ. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन लक्ष्य कयलनि। १८८० ई. मे अपन “बिहारी भाषा”क व्याकरणक भूमिका ओऽ लिखलनि जे “निकट भूतमे मिथिलाक भाषापर पश्चिमसँ भोजपुरी अधिकार कऽ लेलक अछि आऽ बदलामे ई गंगा पार कऽ गेल अछि आर उत्तर परगना तथा मुंगेर एवं भगलपुरक ओहि भागपर अधिकार कऽ लेलक जे गंगाक दक्षिणमे पड़ैत अछि। ई कोशीकेँ पार कऽ पूर्णियाँ धरि पसरि गेल अछि”। ओऽ पुनः १९०३ ई. मे गंगाक दक्षिण भागलपुर एवं मुंगेरक अतिरिक्त संथाल परगनाक पश्चिमोत्तर भागकेँ मैथिली कहलनि। अतएव मैथिल संस्कृति आऽ मैथिली भाषा मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ विशेष व्यापक अछि। मैथिली भाषा सम्बन्धी सीमापर जखन विचार करब तखन पायब जे मैथिलीक पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी तथा दक्षिणी सीमापर क्रमशः भोजपुरी, बाङला, नेपाली आऽ मगही भाषा स्थित अछि। अपन निजी क्षेत्रमे मुण्डा आऽ संताली एहि दुनू अनार्य भाषासँ मिलैत अछि। ई कहब निरर्थक अछि जे अपन पड़ोसक भाषासँ सीमापर ओहिसँ मिश्रित भऽ जाइत अछि आर ओहि क्षेत्रमे ई कहब कठिन अछि जे बाजल गेनिहार भाषा ओहि भाषादिसँ प्रभावित मैथिलीक उपभाषा थिक वा नहि। मैथिली मुख्यतया उत्तर-पूर्वक बिहारक आदिवासी लोकनिक मातृभाषा थिक। बिहार प्रान्तक मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण, बेगुसराय, खगड़िया, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णियाँ, किशनगंज, कटिहार, मुंगेर, भागलपुर, लखीसराय, शेखपुरा, बाँका, आर झारखण्ड प्रदेशक संथाल परगना, गोड्डा, देवघर, जामताड़ा इत्यादि जिलामे ई भाषा बाजल जाइत अछि। एहि भाषाकेँ ई श्रेय छैक जे ई अन्तर्राष्ट्रीय भाषाक रूपमे नेपालक रोतहट, सरलाही, सप्तरी, महोत्तरी आऽ मोरंग आदि जिलामे बाजल जाइत अछि। एहि भाषा-क्षेत्रक उत्तरमे मगही आर ओड़िया तथा पश्चिममे हिन्दी अछि। प्राचीन कालसँ लऽ कए आधुनिक काल धरि भाषातत्वविद् लोकनि एकर बोली उपरूपक तालिका प्रस्तुत कएलनि अछि। एकर निम्नांकित उपरूप अद्यापि उपलब्ध अछि: मानक मैथिली, दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, पश्चिमी मैथिली, छेका-छीकी मैथिली, जोलही बोली आऽ केन्द्रीय वर्त्तात्मक मैथिली। (अगिला अंकमे) २. डॉ. देवशंकर नवीन डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। सम्प्रति नेशनल बुक ट्रस्टमे सम्पादक। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) (आगाँ) मैथिली तँ आब संविधान स्वीकृत भाषा भ' गेल अछि, सन् १९५७मे, जहिआ ई उपन्यास लिखल गेल छल, से बात नहि छलै; मैथिली भाषाक अधिकार लेल खूब-बर्चा होइ छलै। प्रवासी मैथिल लोकनि शहर-शहरमे भाषाई समिति बनबै छलाह। ओही समितिक माध्यमे किछु गोटए अस्तित्व रक्षा करै छलाह, किछु अस्मिता निर्माण; किओ अपन राजनीतिक उत्थान करै छलाह, किओ अकादमीक उन्नति; किओ कुण्ठा मेटबै छलाह, किओ रास-विलास; मुदा थोड़े लोक लेल धन्न सन। किऐ तँ ओ भूखसँ व्याकुल रहै छल। कहाँ दन कुरुक्षेत्रामे भूख लगला पर गान्धारी अपन बेटा सभक लहासक ढेरी पर चढ़ि फल तोड़ए लागल छलीह। भूख, मनुष्यक विवेक आ सम्वेदनाकें एहि तरहें आन्हर करैत अछि। एहना स्थितिमे भाषाक लड़ाइ लड़' लेल के जाएत? सोलह आना सत्य वचन थिक जे हरेक एहि तरहक आन्दोलनमे मुख्य रूपें लोक अपन-अपन लड़ाइ लड़ैत रहल अछि। संयोग थिक जे ई भाषाई आन्दोलन छल। जँ नहिओ रहितए तँ लोक कोनो आओर बाट ताकि लितए, जेना एखन लोक ताकि रहल अछि। भारतीय स्वाधीनताक बाद भारतीय नागरिकक विवेक एते बेसी आत्मकेन्द्रित भ' गेल, जे ओ समस्त आन्दोलनमे अपनाकें जोड़ि कए अपन लिप्सा आ कुण्ठामे तल्लीन भ' गेल। अपन स्थान तकबामे आ सुरक्षित करबामे लीन भ' गेल। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय लेखक मनुष्य जातिक अही वृत्तिकें उजागर करबामे लागल रहलाह अछि। कलकत्ताक मैथिल समितिक भाषाई आन्दोलन, एहने आन्दोलन थिक, जाहिमे भुवनजी सगरो समाजमे बेस प्रतिष्ठित आ निविष्ट मानल जाइ छथि; मैथिल, मैथिली, आ मिथिलाक हित लेल बेस उदारतासँ काज करै छथि; लोक सब खूब मान-आदर करै छनि। मुदा ओएह लोक सभ जहिना सभा सोसाइटीक प्रेमिका, उदात-यौवना निर्मलाजीकें भुवनजी संग उठैत बैसैत देखै छथि कि सगरो मैथिल समाज चर्चा कर' लगैत अछि जे हुनकर अपन स्त्राी महान कुरूपा छथिन तें निर्मलाजीक आँचर कसि क' धएने छथि। नीलू, विष्णुदेव ठाकुर संग सिनेमा देखब पसिन नहि करै छथि, मुदा अन्हार रातिमे जखन देह व्याकुल करै छनि, तँ निर्वस्त्रा भेल कमलजीक अन्हार कोठलीमे पहुँचि जाइ छथि। सामाजिक यथार्थ आ दैहिक यथार्थक एहि तरहक निरूपण आन्दोलन उपन्यासकें ठोस, आ महत्त्वपूर्ण साबित करैत अछि। उपन्यासक कथाभूमि कलकत्ता थिक, मुदा कथाक जीवन पूर्ण रूपें मैथिल थिक। जीवन-यापन आ आत्म-स्थापन हेतु कलकत्ता शहरमे संघर्षरत मैथिलक स्वभाव, जागरूकता, आलस्य, उदारता, राग-द्वेष, मनोवेग, उन्माद, भाषा-प्रेम, स्वार्थ-सिद्धि हेतु चलाओल भाषाई आन्दोलनक र्छंि, आत्मविज्ञापन हेतु यत्रा-कुत्रा पाँखि पसारबाक ललक, फैंटेसी... समस्त स्थितिकें सूक्ष्मता आ मार्मिकतासँ एतए रेखांकित कएल गेल अछि। मैथिलीमे एहि कृतिकें पहिल राजनीतिक उपन्यास घोषित करबामे कोनो कोताही नहि हेबाक चाही। उपन्यासकार स्वयं एकरा प्रथम राजनीतिक उपन्यास अथवा राजनीतिक पर्यवस्थितिमे लिखल गेल प्रथम वृतान्तक उपन्यास' कहलनि अछि। समाज-व्यवस्थाक नियम अछि जे मनुष्य ÷प्रभुत्व' आ ÷प्रतिष्ठा' अर्जित करए चाहैत अछि। अही दुनूमे कतहु ÷चरित्रा' सेहो नुकाएल अछि। ÷प्रभुत्व', ÷प्रतिष्ठा' आ ÷चरित्रा'--ई तीनू पद व्यावहारिक जीवनमे बड़ अमूर्त्त सन अछि। ई तीनू वस्तुतः की थिक? केहन चरित्राक मनुष्यकें केहन प्रतिष्ठा भेटतनि? कतेक प्रतिष्ठा अर्जित केलासँ मनुष्यकें कतेक प्रभुत्व हएत? कतेक प्रभुत्व आ प्रतिष्ठाधारी व्यक्तिक चरित्रा केहन हएबाक चाही?--अइ प्रश्नावलीक उत्तर कोनो समाजक आचार संहितामे स्पष्ट नहि अछि। मुदा लोक निरन्तर फिल्मिस्तानक ÷मुन्ना भाइ' जकाँ लागल रहै'ए। अपन आचरणक श्रेष्ठताक व्याख्या अपना तरहें करैत रहै'ए। आन्दोलन उपन्यासक कमलजी, भुवनजी, निर्मलाजी, सुशीला, नीलू, हेम बाबू... सबहक आचरण देखि उपन्यासकार राजकमल चौधरीक मोनमे जे ओझराहटि उपजै छनि, तकरे उघार करबाक प्रयास एहि उपन्यासमे कएल गेल अछि। धन्य छथि ओ समीक्षक, जिनका अइ उपन्यासमे एकसूत्राताक अभाव बुझाइ छनि।...वस्तुतः मनुष्यक मूल प्रवृत्ति थिक जिजीविषा; आ तकर प्राथमिक शर्त थिक--रोटी, सेक्स, सुरक्षा। एहि तीनू आश्यकताक पूर्ति हेतु दुनियाँक प्रत्येक प्राणी चुट्टीसँ बाघ, बाघसँ नढ़िया, नढ़ियासँ मनुक्ख भ' जाइए। जीवनक समस्त छल, र्छंि, ईर्ष्या, द्वेष, उदारता, ईमानदारी, त्याग, तल्लीनता, भय, साहस, स्पष्टता, प्रवंचना, खोशामद, ललकार, टोप-टहंकार, धर्म-पाखण्ड, नीति-विचार, दान-दक्षिणा, लूट-बटमार... आदिक स्वांग अही निमित्त करै'ए; सफल-असफल होइ'ए। सफलताक अहंकारमे उन्मादित रहै'ए, असफलताक कुण्ठामे गन्हाइत रहै'ए। बिसरि जाइ'ए जे अइ सफलातक मार्गमे ओ कतेक हीन भेल अछि, अथवा असफल होइत केतक नमहर भेल अछि। सम्पूर्ण ÷आन्दोलन' उपन्यास मानव जीवनक अही जटिल-गुत्थीक गाथा थिक। हमरा जनैत अइ उपन्यासक आश्रय-वृक्ष ÷मैथिल समिति' टा नहि रहितए तँ भाषा परिवर्त्तन क' कए एकरा सम्पूर्ण संसारक अथवा सम्पूर्ण मानवीय वृत्तिक कोनहुँ भाषाक उपन्यास कहल जा सकै छल। मैथिलीमे तँ निश्चिते आन्दोलन उपन्यास एकटा नव शुरुआत थिक। आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल जएबाक अछैत एहिमे कतहु आत्मश्लाघा अथवा आत्मसंकोचक स्वाभाविक त्राुटि नहि आएल अछि। कथावाचक कमलजी कलकत्ता महानगरमे आत्म-स्थापनरत छथि, भाषाई आन्दोलनमे सहभाग-सहकार द' रहल छथि, आन्दोलनी परिवारक हरेक व्यक्ति लेल तटस्थ आ ईमानदार आचरण रखै छथि। सम्पूर्ण उपन्यासमे कतहु स्पष्ट नहि होअए दै छथि जे ओ स्वयं किनका पक्षमे छथि। जे भुवनजी हुनका कलकत्ता महानगरमे पैर रोपबाक आधार देलकनि, नैतिक समर्थन देलकनि, स्नेह-प्रेम देलकनि, मान-सम्मानक मार्ग प्रशस्त केलकनि, तिनकहु लेल ओ कतहु पक्षपातक स्थिति अपन कथावाचनमे नहि आबए देलनि। नीलू, निर्मला, सुशीला... तीनू तीन आचणक स्त्राी छथि; तीनूक खोंइचा छोड़ा क' राखि देलनि, मुदा किनकहु पर अपन निर्णायक वक्तव्य नहि देलनि। स्वयं बदनाम गली धरि गेलाह, तकरहु उजागर करबामे संकोच नहि केलनि। लक्ष्य संधान छलनि मानवीय वृत्तिक स्पष्ट नक्शा उतारबाक, से अइ तटस्थ भावे टासँ सम्भव छल। इएह कारणो थिक जे आइ आ आइसँ पहिनहुँ अइ उपन्यासमे मूल मानवीय वृत्तिक एते रास छवि देखाइत अछि, देखाइ छल। महानगरीय परिवेशक प्रवासी मैथिल द्वारा चलाओल जा रहल भाषाई आन्दोलन एहि उपन्यासक आश्रय-वृक्ष भने रहल हो, मुदा सम्पूर्णतामे ई मिश्रित चित्रा खण्डक कथ्य-बहुल उपन्यास थिक, जाहिमे क्षुधा, आत्म-सुरक्षा आ यौन-पिपासाक चारू भर चित्राखण्डक समायोजन भेल अछि। तथापि कथ्य एकटा सुगठित कौशलसँ रचल यथार्थ उद्बोधित, समाज सम्मत, विश्वसनीय वृत्तान्तक रूपमे सोझाँ आएल अछि। रचनाकालक दृष्टिएँ ÷आन्दोलन' ÷आदिकथा'सँ पूर्वक उपन्यास थिक, मुदा विषय आ शिल्पक दृष्टिएँ ई बेसी प्रगतिशील, आधुनिक, आ ऊर्ध्वोन्मुखी अछि। कोनो उपन्यास मनुष्य, मानवीय जीवन, जनजीवनक सामाजिक व्यवस्था आ ओकर वातावरणक कथा कहैत अछि। एहि अर्थमे उपन्यासमे ठाढ़ मनुष्यक क्रिया-कलापहिसँ उपन्यासक गरिमाकें चीन्हल-बूझल जा सकैत अछि आ उपन्यासकारक रचना-दृष्टिक मूल्यांकन कएल जा सकैत अछि। अर्थात् चरित्रा-चित्राण जाहि कृतिमे जतेक सन्तुलित आ स्पष्ट हएत ओहि कृतिक उद्देश्य आ वातावरणकें ओतेक स्पष्टतासँ बूझल जा सकत। सामान्यतया रचनाकार लोकनि अपन सृजित पात्राक चरित्रा पर समग्रतामे अपन टीका दै छथि। केहन लोक छथि, कते पढ़ल छथि, कोना कमाइ छथि, कोना खाइ छथि, की करै छथि...। चाही तँ सुविधा लेल एकरा व्याख्यापरक चरित्रा-चित्राण कहल जा सकैत अछि, मुदा एहिसँ बेसी सुविधा होइत अछि, पात्राक आचरण आ कथोकथनक आधार पर ओकर चरित्रा बुझबामे। एहिमे भावक लोकनि पात्राकें अपना नजरिएँ चिन्हबाक चेष्टा करै छथि। प्रायः इएह कारण थिक जे नाटक, अथवा नाटकीय शैलीक कृतिमे चरित्रा चित्राणक सुविधा बेसी भेटैत अछि। खास क' कए मनोविश्लेषणात्मक चरित्रा-चित्राण करबाक पर्याप्त सम्भावना रहैत अछि। इहो कहब समीचीन होएत जे राजकमल चौधरीक रचनामे अकारणे एते कथोपकथन नहि रहैत अछि। नाटकीय शैलीक एहि उपन्यासमे पात्राक मनोविश्लेषणक प्रभूत व्यवस्था अछि। रचनाक नायक-नायिका आ सहयोगी लोकनि पारस्परिक वार्तालाप आ अपन क्रिया-कलापसँ जते तरहें अपन चारित्रिाक सीमा अंकित करैत'छि रचनाकार स्वयं टीका द' कए ओते विस्तारसँ कहिओ नहि कहि सकै छथि। एहिसँ कृति संक्षिप्त, दीप्त आ प्रभावकारी सेहो होइत अछि। सम्भवतः इएह कारण थिक जे राजकमल चौधरीक उपन्यास आकारमे एते छोट होइत अछि आ प्रभावमे एते विराट। वार्तालापसँ मनुष्यक सम्पूर्ण व्यक्तित्व ठाढ़ भ' जाइत अछि। शिल्प, शैली, वाक्य-संरचना, शब्द-चयन, सम्बोधन-अभिवादन, विषय आ विषयानुरक्तिसँ कोनहुँ व्यक्ति अपन सम्पूर्ण सोच-समझ-आचरण, कौलिक आ व्यावहारिक संस्कार, आर्थिक-शैक्षिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करैत अछि। जेना आन्दोलन उपन्यासक पात्रा सब कएने छथि। भाँगक निशाँमे मातल कमलजीक कोठलीमे अल्पवयस नीलू अर्धनग्न अवस्थामे पहुँच जाइत अछि। ओहि अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे नीलू, कमलजीकें ÷भैया' कहैत अछि, मुदा सर्वस्व अर्पित करए चाहैत अछि। स्पष्ट अछि, जे किशोर वयक उन्माद आ उत्तेजनामे नीलू ÷सम्बोधन' आ ÷क्रिया'क बीचक समन्वय बिसरि गेल अछि। जे कमलजी यौन पिपासा मेटएबा लेल देह-व्यापारमे लिप्त स्त्राीक खोली धरि पहुँचि जाइ छथि, से कमलजी भाँगक घनघोर निशाँमे मातल छथि, आ अन्हार गुज्ज रातिमे बन्द कोठलीमे समर्पित नीलूकें बुझा-सुझा क' आपस क' दै छथि (आन्दोलन/पृ. ५०-५१)। मैथिलानी वेश्याक ताकमे जखन कमलजी बनगामबालीक खोलीमे पहुँचै छथि तँ सम्पूर्ण नक्शा उनटि जाइत अछि, हुनक विषय-वासना करपूर जकाँ बिला जाइत अछि (पृ. ३५-३७)। अइ वार्तालापमे आ एहने कतोक वार्तालापमे व्यक्ति, समाज, व्यवस्था, वातावरण आ मनोवेगक जतेक स्पष्ट छवि अंकित भेल अछि, ततेक स्पष्ट करब आन कोनो माध्यमे असम्भव छल। एतए नीलूक किशोरावस्था आ काम-पिपासा नीलूकें आन्हर क' देने अछि। ÷भैया' सम्बोधनक बादहु यौनाचार प्रतिवेदन अनर्गल थिक, मुदा एतए नीलूक वयसोचित उन्माद आ अपरिक्वतामे उचितानुचितक विवेक नुका गेल अछि, जे सहज अछि, सम्भाव्य अछि। मुदा तें, नीलूक चरित्रा घृणित नहि कहल जा सकैत अछि। अपरिपक्व रहितहुँ ओ सर्वस्व-अर्पण हेतु पात्रा-चयनमे असावधान नहि अछि, भुवनजीक आवासीय परिसरमे आओर कतोक पुरुख, मैथिल पुरुख बिलमल छथि, तिनका संग ओ एना नहि केलनि; महानगरीय वातावरणक विकृतिमे ओ निर्मलाजी अथवा सुशीला नहि बनि गेलीह। नीलूक समर्पणकें अस्वीकार करबाक अर्थ कमलजीक नपुंसकता अथवा निष्काम वृत्ति नहि थिक। से रहितथि तँ कमलजी वेश्यालय नहि जैतथि। मुदा कमलजी कामातुर राक्षस नहि छथि। से रहितथि तँ ओ सुशीलाक राति किनलनि, हुनका संग सब किछु कइए क' आपस होइतथि। समस्त मानवीय दुर्बलताक अछैत मनुष्यक विवेक ओकरा नैतिक रूपें विराट बनबैत अछि। समस्त दुर्बलता आ सबलताक सीमा बूझब समयक नायककें वास्तविक स्वरूप दैत अछि आ ओकर चारित्रिाक वैशिष्ट्य समकालीन समाजकें जीवन जीबाक दृष्टि आ नैतिक बल अनुसंधानक बाट देखबैत अछि। आन्दोलन उपन्यासक चरित्रा चित्राण तकरहि उदाहरण थिक। (अगिला अंकमे) 1.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 2. मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा-प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 21.01.1990-पहिल सगर राति दीप जरय,मुजफ्फरपुर 64म-सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति रहुआ-संग्राम-11 नवम्बर, 2008 डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) संकलन-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ क.सं. स्थान तिथि संयोजक अध्यक्षता/उदघाटन पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य 1 2 3 4 5 6 7 8 9 1 मुजफ्फरपुर 21.01.1990 प्रभास कुमार चौधरी रमानन्द रेणु - - शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्रा-डा.रमानन्दझा रमण' 2 डेओढ़ 29.04.1990 जीवकान्त प्रभास कुमार चौधरी - - - - 3 दरभंगा 07.07.1990 डा.भीमनाथ झा/प्रदीपमैथिली पुत्र, व्यवस्था-विजयकान्त ठाकुर गोविन्द झा 1.सामाक पौती 2.मोम जकाँ बर्फ जकाँ गोविन्द झा अमरनाथ डा.मुनीश्वर झा प्रभासकुमारचौधरी 4 पटना 03.11.1990 गोविन्द झा व्यवस्था-दमनकान्त झा उपेन्द्रनाथ झा‘व्यास' एवं राजमोहन झा - - - - 5 बेगूसराय 13.01.1991 प्रदीप बिहारी प्रो.रमाकान्त मिश्र 3.हमर युद्धक साक्ष्य मे डा.तारानन्द वियोगी उपेन्द्र दोषी - 6 कटिहार 22.04.1991 अशोक उपेन्द्र दोषी 4.ओहि रातुक भोर 5.अदहन अशोक शिवशंकर श्रीनिवास डा.भीमनाथ झा डा.रमानन्दझा रमण विभूति आनन्दक कथा यात्रा-डा.रमण 7 नवानी 21.07.1991 मोहन भारद्वाज प्रो.सुरेश्वर झा 6.समाड. रमेश कुलानन्द मिश्र - 8 सकरी 22.10.1991 प्रो.सुरेश्वर झा व्यवस्था-डा.राम बाबू ए.सी.दीपक 7.साहित्यालाप डा.भीमनाथ झा गोविन्द झा - 9 नेहरा 11.10.1992 ए.सी.दीपक मन्त्रेश्वर झा - - - - 10 विराटनगर 14.04.1992 जितेन्द्र जीत डा.गणेश प्रसाद कर्ण उद- गोविन्द झा - - - नेपालमे मैथिली कथा - डा.रमण 11 वाराणसी 18.07.1992 प्रभास कुमार चौधरी मायानन्दमिश्र/गंगेश गुंजन उद-ठाकुर प्रसादसिंहएवं पं.रमाकान्त मिश्र - - - - 12 पटना 18.10.1992 राजमोहन झा स्ुाभाषचन्द्र यादव - - - - 13 सुपौल 09.01.1993 केदार कानन बुद्धिनाथ झा 8.पुनर्नवा होइत ओ छौंड़ी विभूति आनन्द महाप्रकाश - 14 बोकारो 24.04.1993 बुद्धिनाथ झा गोविन्द झा - - - - 15 पैटघाट 10.07.1993 डा.रमानन्द झा‘रमण‘ प्रो.उमानाथ झा 9.विद्यापतिक आत्मकथा गोविन्द झा प्रभासकुमारचौधरी - 16 जनकपुरधाम 09.10.1993 रमेश ंरंजन गोविन्द झा उद-डा.रामावतार यादव 10.श्वेतपत्र 11.मिथिलावाणी-पत्रिका 12.गामनहि सुतैत अछि 13.मर्सिनी-उपन्यास स.ंवियोगी एवं रमेश मिलाप,जनकपुरधाम महेन्द्र मलंगिया डा.अरुणकुमार झा डा.धीरेन्द्र धूमकेतु गोविन्द झा डा.रामावतार यादव - 17 इसहपुर 06.02.1994 डा.अरविन्द कुमार ‘अक्कू' डा.भीमनाथ झा - - - - 18 सरहद 23.04.1994 अमियकुमार झा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम' - - - - 19 झंझारपुर 09.07.1994 श्यामानन्द चौधरी जीवकान्त - - - - 20 घोघरडीहा 22.10.1994 जीवकान्त राजमोहन झा 14.कथा कुम्भ सं.बुद्धिनाथ झा गोविन्द झा - 21 बहेरा 21.01.1995 कमलेश झा श्यामानन्द ठाकुर उद-चन्द्रभानु सिंह 15.सत्य एकटा काल्पनिक विजय सारस्वत जीवकान्त - 22 सुपौल,दरभंगा 08.04.1995 कमलेश झा प्रो.रामसुदिष्ट राय ‘व्याधा उद-गोविन्द झा - - - - 23 काठमांडू 23.09.1995 धीरेन्द्र प्रेमर्षि डा.धीरेन्द्र 16.नख दर्पण गोविन्द झा डा.यादव - 24 राजविराज 24.01.1996 रामनारायण देव डा.धीरेन्द्र उद-डा.योगेन्द्र प्र.यादव- मुख्य-गजेन्द्रनारायणसिंह, मन्त्री, नेपाल सरकार - - - - 25 कोलकाता रजत जयंती 28.12.1996 प्रभास कुमार चौधरी गोविन्द झा उद-यमुनाधर मिश्र 17.निवेदिता 18.कथाकल्प सुधांशु‘शेखर' चौधरी डा.देवकान्त झा गोविन्द झा प्रभासकुमारचौधरी - 26 महिषी 13.04.1997 डा.वियोगी/रमेश- प्रायोजित मायानन्द मिश्र 19.अतिक्रमण 20.हस्तक्षेप 21.शिलालेख 22.परिचिति डा.तारानन्द वियोगी डा.तारानन्द वियोगी डा.तारानन्द वियोगी सुस्मिता पाठक गोविन्द झा कुलानन्द मिश्र सुभाषचन्द्र यादव मोहन भारद्वाज - 2 सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) कसं. स्थान तिथि संयोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य 1 2 3 4 5 6 7 8 9 27 तरौनी 20.06.1997 यात्रीजन्मदिन शोभाकान्त जीवकान्त - - - - 28 पटना 18.07.997 प्रभास कुमार चौधरी हरिनारायणमिश्र/रामचन्द्र खान 23.समानान्तर रमेश प्रभास कुमार चौधरी - 29 ब्ेागूसराय 13.09.1997 प्रदीप बिहारी प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन' 24.कुक्करूकू आ कसौटी चन्देश प्रभास कुमार चौधरी प्रभास कुमार चौधरीक अन्तिम सहभागिता 30 खजौली 04.04.1998 प्रदीप बिहारी रमानन्द रेणु - - - - 31 सहरसा 18.07.1998 रमेश डा.महेन्द्र 25.ओना मासी डा.देवशंकर नवीन कुमारी ऋचा - उद-गोविन्द झा 26.चानन काजर डा.देवशंकर नवीन मायानन्द मिश्र - 27.प्रतिक्रिया रमेश गोविन्द झा - 32 पटना 10.10.1998 श्याम दरिहरे राजमोहन झा उद-गोविन्द झा 28.भरि राति भोर के.डी.झा,श्यामदरिहरे एवं प्रदीप बिहारी उपेन्द्रनाथझा‘व्यास' 33 बलाइन, नागदह 08.01.1999 पदम सम्भव जीवकान्त - - - - 34 भवानीपुर 10.04.1998 डा.जिष्णु दत्त मिश्र कामिनी 29.काल्हि आ आइ डा.धीरेन्द्र जीवकान्त - 35 मधुबनी 24.07.1999 सियाराम झा ‘सरस‘ व्यवस्था-डा.कुलधारी सिंह राजमोहन झा उद-डा.जयधारी सिंह 30.काजे तोहर भगवान शैलेन्द्र आनन्द विभूति आनन्द - 36 अन्दौली 28.10.1999 क्मलेश झा चन्द्रभानु सिंह - - - 37 जनकपुरधाम 25.03.2000 रमेश रंजन डा.धीरेन्द्र उद-डा.राजेन्द्र विमल - - - - 38 काठमांडू 25.06.2000 .धीरेन्द्र प्रेमर्षि डा.रमानन्द झा‘रमण‘ 31.मकड़ी प्ा्रदीप बिहारी महेन्द्र मलंगिया उद-महेन्द्र कुमार मिश्र, सांसद 32.मिथिलांचलक लोक क्रथा डा.गंगा प्रसाद अकेला डा.रमानन्दझा‘रमण‘ 33.शिरीषक फूल-‘अनुवाद अकेला डा.रमानन्दझा‘रमण‘ 34.हम मैथल छी-कैसेट सियाराम झा‘सरस‘ डा.रामावतार यादव 35.मंडनमिश्र अद्वैतमीमांसा रमेश/दीनानाथ/सुरेन्द्रनाथ डा.रामावतार यादव 39 धनबाद 21.10.2000 श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास राजमोहन झा उद-कीर्तिनारायण मिश्र 36.मनक आड.नमे ठाढ़ डा.भीमनाथ झा राजमोहन झा 40 बिटठो 21.01.2001 डा.अक्कू बलराम 37.मातवर अशोक डा.धीरेन्द्र म्ैाथिली कथाक व्यवस्था-प्रो.विद्यानन्द झा उद-कुलानन्द मिश्र 38.दृष्टिकोण सुरेन्द्रनाथ डा.भीमनाथ झा समस्या डा.भीमनाथ झा 41 हटनी,घोघरडीहा 19.05.2001 प्रो.योगानन्द झा/अजित कुमार आजाद सोमदेव - - - - 42 बोकरो 25.08.2001 गिरिजानन्दझा‘अर्धनारीश्वर दयानाथ झा 39.निष्प्राण स्वप्न दयाकान्त झा हरेकृष्ण मिश्र व्यवस्था-मिथिला सां.परिषद उद-हरेकृष्ण झा,भा.आ.सेवा 40मिथिलादर्पण(1925/2001) पुण्यानन्दझा स.डारमानन्द झा ‘रमण‘ फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण‘ 43 पटना किरण जयन्ती 01.12.2001 अशोक सोमदेव 41.प्रलाप गोविन्द झा सोमदेव च्ेातना समिति, पटना 42युगान्तर विश्वनाथ गोविन्द झा 43एकैसम शताब्दीकघोषणा पत्र रमेश/श्याम दरिहरे/मोहन यादव राजमोहन झा 44 राँची 13.04.2002 कुमार मनीष अरविन्द साकेतानन्द 44चानन घन गछिया विवेकानन्द ठाकुर मोहन भारद्वाज उद -परमानन्द मिश्र 45.शुभास्ते पन्थानः परमानन्द मिश्र साकेतानन्द 45 भागलपुर 24.08.2002 धीरेन्द्र मोहन झा योगीराज 45.कथा सेतु सं.प्रशान्त डा.बेचन उद-डा.बेचन 47.प्ृाथा नीता झा राजमोहन झा 48.आउ, किछु गप्प करी कुलानन्द मिश्र डा.करुणाकर झा 3 सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) क.सं. स्थान तिथि संयोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य 1 2 3 4 5 6 7 8 9 46 विद्यापतिभवन, पटना 16.11.2002 अजित कुमार आजाद मोहन भारद्वाज उद.राजनन्दन लाल दास 49.काठ विभूति आनन्द डा.तारानन्द वियोगी - 50.एक फाँक रौद योगीराज गोविन्द झा - 51.तीन रंग तेरह चित्र डा.सुधाकर चौधरी सोमदेव - 52.उदयास्त धूमकेतु सोमदेव - 53.सांझक गाछ राजकमल, सं.डा.दे.नवीन रामलोचन ठाकुर - 54.सर्वस्वांत सकेतानन्द सोमदेव - 55.अभियुक्त.. राजमोहन झा सोमदेव - 56.यात्री समग्र सं.शोभाकान्त गोविन्द झा - 57.मैथिलीबाल साहित्य डा.दमन कुमार झा गोविन्द झा - 58.ज्ीम ब्वसवदपंस च्मतपचीमतलरू प्उंहपदह डपजीपसं ; 1875.1955द्ध डा.पंकज कुमार झा डा.हेतुकर झा - 59.मैथिल समाज पत्रिका, नेपाल स.ंधीरेन्द्र प्रेमर्षि - - 47 कोलकाता 22.01.2003 कर्णगोष्ठी, कोलकाता डा.रमानन्द झा‘रमण‘ उद-रमानन्द रेणु 60.आत्मालाप गोविन्द झा रमानन्द रेणु मैथिली कथाकवर्तमान समस्या-.डा.वियोगी 48 खुटौना 07.06.2003 डा.महेन्द्रनारायण राम सोमदेव/उद-खुशीलाल झा एवं रामलोचन ठाकुर 61.लाख प्रश्नअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर सोमदेव 49 बेनीपुर 20.09.2003 कमलेश झा डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘ उद-प्रो.रामसुदिष्ट राय ‘व्याधा‘ - - - - 50 दरभंगा स्वर्ण जयन्ती 21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्द झा उद-चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘ 62.दिदबल प्रभास कुमार चौधरी गोविन्द झा - 63.चितकावर हंसराज सोमदेव - 64.गंगा यन्त्रनाथ मिश्र गोविन्द झा - 65बाबाक विजया उमाकान्त मार्कण्डेय प्रवासी - 66.सरिसब मे भूत श्याम दरिहरे राजमोहन झा - 67.गहवर डा.महेन्द्रनारायण राम जयनारायण यादव - 68.हाथी चलय बजार डा.देवशंकर नवीन राजमोहन झा - 69.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा‘सरस' डा.रमानन्द झा‘रमण‘ - 70.आदमी के ँ जोहैत कीर्तिनारयण मिश्र मोहन भारद्वाज - 71.ओना कहबा लेल बहुत किछु हमरा लग कुलानन्द मिश्र कीर्तिनारयण मिश्र - 72.गाछ झूलझूल जीवकान्त गोविन्द झा - 73.खंजन नयन निरंजन अनंत बि.लाल.इन्दु' चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘ - 74.हम भेटब मार्कण्डेय प्रवासी गोविन्द झा 75.चिन्तन प्रवाह डा.धीरेन्दनाथ मिश्र्र राजमोहन झा 76.दुर्वासा जयनारायण यादव गोपाजी त्रिपाठी 77.पाथर पर दूभि रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास 78.कोशी घाटी सभ्यता रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास 79जागि गेल छी डा.महेन्द्र ना.राम डा.रामदेव झा 4 सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) क.सं. स्थान तिथि संयोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य 1 2 3 4 5 6 7 8 9 50 दरभंगा 21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्द झा उद-चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘ 80.हमरा मोनक खंजन चिडैया फूलचन्द्र मिश्र प्रवीण‘ मार्कण्डेय प्रवासी 81.जयमाला जयानन्द मिश्र चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर‘ 82.माटिक आबाज मंजर सुलेमान मोहन भारद्वाज 83.इजोरियरक अंगैठी मोर स.ं माला झा अशोक 84.बेसाहल डा.रमानन्द झा‘रमण मार्कण्डेय प्रवासी 85.यदुवर रचनावली डा.रमानन्द झा‘रमण गोविन्द झा 86सगरराति दीप जरयक इतिहास डा.रमानन्द झा‘रमण रमेष 87.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘ डा.रमानन्द झा‘रमण 88.विमर्श डा.भीमनाथ झा डा.देवेन्द्र झा 89.स्मरणक संग डा.विभूति आनन्द रतीष चन्द्र झा 90.कथा काव्य आ द्वादशी डा.अरुण कुमार कर्ण रमानन्द रेणु 91.तात्पर्य डा.अशोक कुमार मेहता अंजलि मेहता 92हेमलेट प्ा्रेा.रमाकान्त मिश्र नीलमणि बनर्जी 93.लोरिक मनियार चन्दे्रश गोविन्द झा 94.कनुप्रिया अनु.श्याम दरिहरे श्यामसुन्दर मिश्र 95.मन्दाकिनी प्रभास कुमार चौधरी चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर‘ 96.सीता व्यथा कथा अनन्त बि.लाल दास‘ इन्दु' डा.रामदेव झा 97.नागार्जुन के उपन्यास मोहित ठाकुर डा.सुरेश्वर झा 98.ैमसमबजमक च्वमउे वि ।उंत रमम म्ुारारि मधुसूदन ठाकुर . 99.अंतरंग हिन्दी पत्रिका.मैथिली विशेषाक स.ंप्रदीप बिहारी रमानन्द रेणु 51 जमशेदपुर 10.07.2004 डा.रवीन्द्र कुमार चौधरी स्ुारेन्द्र पाठक उद-राजनन्दनलाल दास मु.अति..सत्यनारायण लाल - - - - 52 राँची 02.10.2004 विवेकानन्द ठाकुर डा.रमानन्द झा‘रमण 100.स्वास स्वास मे विश्वास विवेकानन्द ठाकुर डा.रमानन्द झा‘रमण उद-राजनन्दन लाल दास 101.सम्पर्क-4 स.-सियाराम झा ‘सरस‘ राजनन्दन लाल दास 53 देवघर 08.01.2005 श्याम दरिहरे एवं अविनाश दयानाथ झा उद-यन्त्रनाथ मिश्र - - - - 54 बेगूसराय 09.04.2005 प्रदीप बिहार रामलोचन ठाकुर उद-सत्यनारासयण लाल 102.भजारल डा.रमानन्द झा‘रमण कीर्तिनारयण मिश्र 103.सरोकार प्रदीप बिहार राजमोहन झा 104.औरत म्ेानका मल्लिक ज्योत्सना चन्द्रम 105.अन्तरंग पत्रिका स.ं प्रदीप बिहारी डा.आनन्दनारायण शर्मा 55 प्ूार्णियाँ 24.06.2005 रमेश साकेतानन्द 56 पटना 03.11.2005 अजीत कुमार आजाद उद.गोविन्द झा 106.अतीतालोक गोविन्द झा राजमोहन झा डा.फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण' 107.गामक लोक शिवशंकर श्रीनिवास डा.रमानन्दझा‘रमण' 108.मैथिली कविता संचयन सं.डा.गंगेशगुंजन छठज् गोविन्द झा 109.मैथिली कथासंचयन छठज् स.ंशिवशंकरश्रीनिवास राजमोहन झा 110.बड अजगुत देखल शरदिन्दु चौधरी फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण' 111.किछ ुपुरान गप्प ,किछु नव गप्प कीर्तिनाथ झा गोविन्द झा 57 जनकपुरधाम 12.08.2006 रमेश रंजन महेन्द्रमलंगिया,उद-डा.रेवतीरमण लाल वि.अ.-डा.रमानन्दझा‘रमण‘ - ' - - 5 सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) क.सं. स्थान तिथि संयोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य 1 2 3 4 5 6 7 8 9 58 जयनगर 02.12.2006 श्री नारायण यादव अध्य.-डा.कमलकान्त झा उदघाटन-रामदेव पासवान मु.अ.-भगीरथप्रसाद अग्रवाल . . . . 59 बेगूसराय 10.02.2007 प्रदीप बिहारी नवीन चौधरी 112.स्नेहलता डा.योगानन्द झा डा.तारानन्द वियोगी 60 सहरसा 21.07.2007 किसलय कृष्ण उद.डा.मनोरंजन झा अध्य.डा.रमानन्द झा‘रमण‘ 113.अक्षर आर्केस्ट्रा अनु-प्रदीप बिहारी डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 61 सुपौल 01.12.2007 अरविन्द ठाकुर उद-डा.धीरेन्द धीर अध्य. अंषुमान सत्यकेतु 114.अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर अजित कुमार आजाद 62 जमष्ोदपुर 03.05.2008 डा.रवीन्द्र कुमार चौधरी उद-विद्यानाथ झा‘विदित' अध्यक्ष-विवेकानन्द ठाकुर - - - - 63 राँची 19.07.2008 कुमार मनीष अरविन्द उद-.डा.विदित अघ्य. विवेकानन्द ठाकुर एवं डा.रमानन्द झा‘रमण' 115.समय षिला पर सुरेन्द्रनाथ डाविद्यानाथझा‘विदित' 64 रहुआ संग्राम 08.11.2008 डा.अषोक कुमार झा‘ अविचल' (अगिला अंकमे) ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति उपसंहार : कलकत्ता शैक्षणिक यात्रा, १९९० - ९१: टिस्को स्कूल सऽ जे एजूकेश्नल टूर अर्थात् शैक्षणिक यात्राक व्यवहार छल से किताबी ज्ञानके वास्तविक रूपसऽ सिखाबऽमे सहायक तऽ छल। संगे अहि सऽ अपन चरित्रनिर्माण मे सेहो सहायता होइत छल।सब संगे मिलिकऽ रहैमे बहुत किछु सिखैके सेहो अवसर भेटै छल।उदाहरणार्थ किछु विद्यार्थी एहेनो छलैथ जे अपने मे मस्त रहैत छलैथ। हुनका सबके विद्यालय सऽ घरक रस्ता के अतिरिक्त आर किछु बाहरी दुनियाक खबरि नहि रहैत छलैन।एहेन लोकसब जखन ऑल राउण्डर विद्यार्थी सबसऽ भेंट करैत छथि तऽ हुनका सबके आन कार्यमे र रुचि बढ़ै छैन।किछु विद्यार्थी सबके अपन अभिभावक पर आश्रित रहैके अतिशय अभ्यास होएत छैन । एहेन बच्चासबमे आत्मनिर्भता आबैत छै।अपन कैरियर आदिक चयन स्वयम् करैके क्षमता आबैत छै।तथा आकस्मिक आब वला विषम परिस्थिति सऽ भीड़क आत्मविश्वास आबै छै। ई तऽ भेल शैक्षणिक यात्राक विशेषता। आब हम अपन अनुभव कहै छी।हमरा अहिबेरका टूर वास्तव मे शैक्षणिक यात्रा लागल। इण्डियन म्यूज़ियम सऽ इतिहासमे, बॉटेनिकल गार्डेन सऽ वनस्पति विज्ञानमे, चिड़ियाखाना सऽ जीवविज्ञानमे, बिरला म्युज़ियम सऽ तकनीकमे, तथा पलैनेटोरियम सऽ खगोलशास्त्रमे जानकारी बढ़ल।हमरा सबके भोजनमे कोनो दिक्कत नहि भेल।जॅं कोनो छात्र छात्राके स्वास्थ्य खराब होएत छलैन तऽ शिक्षक सब पूरा ध्यान राखै छलखिन।ओ सब कखनो अभिभावक सऽ दूर हुअ के अनुभूति नहिं हुअ दैत छलैथ।शिक्षक सबके जीवनमे तऽ कतेक छात्र सब आबैत छैन।लेकिन हम विद्यार्थी सब लेल ई शिक्षकसब अविस्मरणीय छैथ।हुनकर सबसऽ जे मार्गदर्शन हमरासबके भेटैत अछि से आजीवन याद रहैत अछि आऽ काज आबैत अछि। अनाम कथा- प्रेमचन्द मिश्र पी. सी. मिश्र गामक एकटा कम प्ढ़ल-लिखल युवक छथि, उम्र करीब २४ वर्ष। ६ साल पहिने गामसँ दिल्ली आयल छलाह। संघर्षरत जीवनसँ सफर करैत आब ठीक-ठाक अवस्थामे छलाह यानि ताहि समयमे एकटा मध्यम् वर्गक युवककेँ तनख्वाह जे हैत से तनख्वाह पावैत छलाह आ संगे गामसँ अयलाक बाद दिल्लीमे किछु नीक लोकक संपर्कमे रहलासँ अंग्रेजी फर्राटेसँ बजैत छथि यानि कि अंग्रेजी बजैत काल कियो नहि कहि सकैत छनि जे ओ पढ़ल-लिखल कम छथि। ताहि कारण लोककेँ कहैत छथिन सत्यता- जे हम पढ़ल-लिखल कम छी- तँ लोक मजाक बुझैत अछि। एकटा प्राइवेट कम्पनी, जे ट्रैवेल एजेन्टक काज करैत अछि, मे पी.सी.मिश्र रंजीतक, जे हुनकर रिश्तामे भागिन छथिन मुदा कम्पनीमे उच्च पदपर छथिन्ह, केर संग कज करैत छथि। पी.सी.मिश्र विवाह योग्य भऽ गेल छथिन, पिताजी बुढ़ापामे प्रवेश कऽ लेने छथिन। ओऽ चाहैत छथि जे जहिना पैघ भाई सभक विवाह भऽ गेल छनि, हुनको विवाह कऽ देल जाय। कारण एकटा छोट भाई सेहो छनि, रुपैय्या पाइ कमा लैत छथि आऽ अपन आब कोन भरोस। कखन छी कखन नहि छी। चुंकि जमाना बदलि गेल छैक, ताहि हेतु पी.सी.मिश्रासँ संपर्क केलन्हि जे लोक सभ बहुत परेशान करैत छथि अहाँक विवाह लेल, से की कहैत छी। हुनकर जवाब छलनि, जे पिताजी हमर किछु शर्त अछि विवाहमे। तँ पिताजी कहलखिन- ठीक छै, रातिमे भौजीसँ गप्प करायब, ठीक छै। रातिमे भोजनक बाद पी.सी.मिश्रा जी भौजीक द्वारा अपन शर्त पठेलन्हि- एक विवाहमे रुपैय्या पैसाक आदान-प्रदान नहि, यानि बिना पैसाक विवाह-आदर्श विवाह। दोसर लड़की पढ़ल-लिखल आऽ अंग्रेजी बजनाय अनिवार्य ताकि बच्चाक शिक्षा उच्च होय। तेसर द्विरागमन जल्दी होय ताकि साल भरि जे अपन संस्कार यानी विध-विधानमे कम खर्च होयत। चारिम जिनका ओहिठाम विवाह होय ओ हमर तुलनामे गरीब होय ताकि हुनका ओहिठाम सम्मान बेसी भेटत। ई सभ शर्त सुनि हुनकर पिताजी कहलनि- हम शर्तसँ बहुत प्रसन्न छी, लेकिन सभ शर्त हमरासँ भऽ सकत मुदा दोसर शर्त हमरा विश्वास नहि अछि की गामक लोक पूरा करए देत वा नहि। ताहि हेतु कहबनि जे एहन कुनू भेट जानि तँ ओऽ हमरा कहि देत। ई बात रंजीतकेँ पता लगलनि, तँ ओहो सोचलन्हि जे कोनो सम्पर्कक आदमीसँ पी.सी.मिश्राक विवाह करल जाय तँ उत्तम। ई दू-चारि ठाम बजलाह जाहिमे “श्रीमति महारानी मिश्रा” जे रंजीतक भाभी आऽ पी.सी. मिश्राक रिश्तामे भौजी छलथिन केँ सेहो पता लगलन्हि। अपन छोट बहिन अनीता झाक ननदि छलथिन सोनी आ हुनकर उम्र १९ साल रहनि। ओऽ अपन बाबूजी श्री भरत झाकेँ कहलथिन जे ई कथा मुफ्तमे भऽ जाएत। ओऽ अपन जमाय दिलीप झाकेँ फोनसँ संपर्क केलन्हि। दिलीप झाक बाबूजी १० साल पहिने स्वर्गवासी भऽ गेल छथिन, ताहि हेतु बहिन सोनीक विवाह दिलीप झा आऽ विनय झाकेँ करबाक छनि। ई सभ बात सुनि दिलीप झा अपन पत्नी अनीताकेँ कहलथिन जे ई काज बुझू मँगनीमे भऽ जाएत। ई बात सुनिते अनीता कहलथिन जे अहाँ देरी नहि करू आऽ जयपुर जाऊ। बुझू लक्ष्मी चलि कऽ आबि गेल छथि। ई बात ओऽ विनय झाकेँ सेहो कहलन्हि आऽ सोनीक दूटा नीक फोटो लऽ जयपुर आबि गेलाह। आब महारानी रंजीतक द्वारा पी.सी.मिश्राकेँ जयपुर बजेलन्हि। होलीक बहन्ना बना कय अपन दफ्तरसँ रंजीत आऽ पी.सी.मिश्रा जयपुर गेलाह। साँझक हवाई जहाजसँ जयपुर पहुँचलाह। पहुँचलाक उपरान्त चाय-पानिक बाद महारानी पी.सी.मिश्रासँ बजलीह- बौआ विवाह कहिया करब, आब तँ लगन आबय बला छैक आऽ विवाह योग्य भय गेल छी। हम काकासँ बात करू? पी.सी.मिश्र हँसैत कहलन्हि- जे भौजी हमर किछु शर्त अछि, से जँ पूरा भय जायत तँ हम विवाह एखन कय लेब। ई गप सुनि महारानी कहलथिन बुझू बौआ जे अहाँक विवाह भऽ गेल आऽ अपन बातसँ पलटब नहि। पी.सी. एकरा एकटा मजाक बुझि ठहक्का लगा कऽ हँसऽ लगलाह। तावत लगभग रातिक ११ बाजि गेलैक। महारानी कहलथिन- चलू खाना खाऽ लिअ, रुकू हम खाना लगावैत छी। रातुक भोजनमे दू तोर भेल, एक बेर भोजनक लेल बैसलाह पी.सी.मिश्रा, रंजीत ठाकुर आऽ रामानन्द मिश्रा। भोजनक उपरान्त ओऽ तीनू गोटे पहिल तलपर गेलाह सुतक लेल। दोसर बेर फेर भोजन लागल जाहिमे भरत झा, दिलीप झा, राजू झा व नूनू झा – राजू आ नूनू झा महारानीक छोट भाई छथिन-, फेर सभ अपन-अपन बिस्तरपर सुतक लेल गेलाह। भोर भेल चायक आयोजन भेल। सातू गोटे भरत झा, दिलीप झा, रामानन्द मिश्रा, राजू झा, नूनू झा, रंजीत ठाकुर, पी.सी.मिश्रा व महारानी चायक पश्चात् गप्प करए लगलाह। महारानी बजलीह-बौआ विवाह कहिया तक करब। मजाकक स्वरमे पी.सी.मिश्रा बजलाह- देखियौक आब जल्दी करब, कारण जे बाबूजीक फोन आयल छल जे लोक सभ परेशान करैत अछि विवाहक लेल, तँ आब जल्दी भऽ जाएत। ई सुनिते भरत झा बजलाह जे कतेक पैसा लेताह। पी.सी.मिश्रा कहलथिन जे एहन कोनो बात नहि छैक। ई शब्द पूरा होइसँ पहिने बीचेमे रंजीत बजलाह- लड़की जँ नीक भेटत तँ कोनो पाई-रुपैया नहि। ई शब्द सुनिते पाछूसँ महारानीक माय बजलीह- जे कही तँ अनीताक ननदिसँ करा दियौन, लड़की तँ बड़ भव्य छथिन, सज्जन-भव्य व धार्मिक प्रकृतिक घरक, सभटा काज आ लूरि-व्यवहार जनैत छथिन्ह। ई बात पूरा भेलाक बाद महारानी बजलीह जे ओझा ओतेक पाई कतएसँ देथिन्ह। ताहिपर रंजीत बजलाह- पाइक कोनो प्रश्न नहि छैक, हुनकर किछु शर्त छन्हि ओऽ चारूटा शर्त दोहरेलन्हि। ताहिपर दिलीप झा बजलाह- हम चारू शर्तसँ परिपूर्ण छी। ई बात सुनि रामानन्द मिश्र बजलाह जे जल्दीमे काज नहि होयबाक चाही। पहिने ई शर्तपर चिन्तन कैल जाऊ। कारण जे सवाल दू टा जिनगीक अछि आ शर्तक कोनो जवाब नहि अछि। एहन सोच तँ बहुत कम लोकक होइत छनि, ताहि हेतु पुनर्विचार करू। ई बात पूरा भेलाक बाद दिलीप झा बजलाह जे लड़कीक फोटो देख लेल जाओ आऽ हमहु पढ़ल-लिखल छी आऽ पेशासँ एकटा प्राइवेट शिक्षक छी ताहि हेतु शिक्षाक महत्व बुझैत छी। ई बात सुनिते भरत झा बजलाह- रंजीत ई (फोटो दैत) लिअ आऽ अहाँ सभ देख लिअ। हम भीम बाबू (समधि) सँ बात कऽ लैत छी। बिच्चेमे रंजीत फोटो लैत आऽ पी.सी.मिश्राक हाथ पकड़ैत पहिल तलसँ ऊपर छतपर गेलाह आऽ मजाकक तौरपर बजलाह जे देखू भाई जँ अहाँ नहि करब तँ हमही दोसर विवाह कय लेब। हमरा तँ लड़की बहुत पसन्द अछि। ई कहैत पी.सी.मिश्रकेँ हाथ फोटो पकड़ेलन्हि। फोटो बहुत आकर्षक छल। पी.सी.मिश्र कहलथिन- फोटो तँ बहुत आकर्षक अछि, हमरा किछु सन्देह भऽ रहल अछि। रंजीत उत्तर देलन्हि- भाभी झूठ नहि कहतीह। संदेहक मतलब अछि भाभीपर शक करब। ताहिपर पी.सी.मिश्रा जवाब देलन्हि- हम शकक नजरिसँ नहि देखैत छी, चलू जे छथि, ई तँ हमर शर्तमे नहि शामिल अछि। लेकिन लड़की पढ़ल-लिखल अवश्य चाही। सुन्दर-खराब कोनो बात नहि अछि ई बात करैत दुनू नीचाँ अएलाह। एतबामे महारानी पुनः चाह अनलन्हि, फेर चाहक चुश्की लैत रंजीत बजलाह- देखू सभ बात बुझू भऽ गेल। आगू बात जे बरियाती ६५-७५ तक जाएब आऽ सत्कारमे कोनो तरहक शिकायत नहि। ई बात सुनैत दिलीप झा बजलाह जे सरकार हम गरीब छी, हमरासँ संभव नहि अछि ७५ टा बरियाती, हमरा किछु छूट देल जाऊ! लेकिन सत्कारमे कोनो त्रुटि नहि होएत। ई बातक बिच्चेमे महारानी बजलीह जे लड़काकेँ एकटा अंगूठी आऽ दू भरीक सोनाक चेन (सीकरी) आऽ लड़कीक नामसँ ५१,०००/-क फिक्स डिपोजिटक कागज ओझाजी दऽ देथिन, बरियाती ५१ टाक बात फाइनल, बस आब ने बौआ। ने ई किछु बजताह आऽ ने ओझा किछु बजताह! आर खान-पीन दिन घरक प्रत्येक सदस्यकेँ नीक आऽ ५ टूक कपड़ा। बस रंजीत आब किछु नहि बाजू आऽ ओझाजी अहूँकेँ एतेक तँ करए पड़त। रंजीत किछु बजैक उत्सुकता देखबैत छलाह की बिचमे भरत झा बजलाह जे फेर विवाहसँ एक साल तक दुनू दिस लड़की वलाक काज छैक, रंजीत ताहि हेतु आब बुझू जे ई बहुत महग भऽ गेल। (अगिला अंकमे) Top of Form १. नवेन्दु कुमार झा पटनासँ आऽ २. ज्योति लन्दनसँ Bottom of Form नवेन्दु कुमार झा (१९७४- ), गाम-सुवास, भाया-केवटसा बरुआरी, जिला-मुजफ्फरपुर। समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना। शिक्षा दिवस समारोह-छात्र-छात्रा आ बाल वैज्ञानिक देखौलनि अपन प्रतिभा देशक पहिल शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलामक १२०म जन्म दिवस बिहारमे शिक्षा दिवसक रूपमे मनाओल गेल। मौलाना आजादक जन्म दिवस मनेबाक लेल सरकारी स्तरपर कतेको कार्यक्रम सम्पन्न भेल। राजधानी पटनाक गाँधी मैदानमे दू दिवसीय शिक्षा दिवस सेहो सम्पन्न भेल। दू दिनक एहि कार्यक्रमक अन्तर्गत सरकार द्वारा शिक्षाक क्षेत्रमे कएल जाऽ रहल काज आऽ सरकारक उपलब्धि जनताक सोंझा आनल गेल। स्कूली छात्र सभक कला सांस्कृतिक कार्यक्रमक माध्यमसँ आऽ हुनक प्रतिभा एहिमे लागल विज्ञान प्रदर्शनीमे दृष्टिगोचर भेल। आकर्षक ढंगसँ बनल कतेको पैवेलियनमे विभिन्न संस्थान अपन प्रकाशन आऽ पाठ्यक्रमक जानकारी सेहो उपलब्ध करौलक। सरकार द्वारा एहि कार्यक्रमक आयोजनक उद्देश्य पछिला तीन सालक सुशासनमे शिक्षा क्षेत्रकेँ प्राथमिकता दऽ जे सभ काज कएलक अछि ओहिसँ बिहार जनताकेँ अवगत करा प्रदेशमे शिक्षाक नव वातावरणबनाएब छल। एहि अवसरपर विविध क्षेत्रमे अपन उत्कृष्ट प्रतिभासँ देश-विदेशमे बिहारक नाम रौशन कएनिहार छात्रकेँ सम्मानित कएल गेल जाहिमे आइ.आइ.टी.क टॉपर शिति कंठ, सी.एल.टी.क पी.जी.मे प्रथम स्थान प्राप्त भावना सिंह, ए.आइ.आइ.एम.एस.मे सफल मधुकर दयाल, आइ.आइ.टी. जमशेदपुरक परीक्षामे तेसर स्थान प्राप्त प्रणव कुमार सिंह, निफ्टमे तृतीय स्थान प्राप्त रोहित कुमार, यू.पी.एस.सी. सी.पी.एफ.२००८क परीक्षामे द्वितीय उत्तम कश्यप आऽ अन्तर्राष्ट्रय ज्योतिष ओलम्पियाडमे स्वर्ण पदक विजेता शांतनु अग्रवाल “बिहार गौरव सम्मान”सँ अलंकृत भेलाह। एकर अतिरिक्त बिहार संयुक्त प्रवेश परीक्षामे एकसँ तीन रैंक प्राप्त करऽबाला छात्र, आइ.आइ.टीमे नामांकित तेरह टा छात्र आऽ माध्यमिक परीक्षामे प्रदेश आऽ जिला स्तरपर टॉपर नौ टा छात्रकेँ सेहो प्रशस्ति-पत्र आऽ टाका दऽ सम्मानित कएल गेल। एहि वर्षक माध्यमिक परीक्षाक टॉपर कुणाल प्रतापकेँ सरकार पचीस हजार टाका दऽ सम्मानित कएलक। सभकेँ शिक्षा देएबाक लेल चलाओल जाऽ रहल सर्व शिक्षा अभियानमे उत्कृष्ट काजक लेल “प्रथम मौलाना आजाद शिक्षा पुरस्कार” श्रीमती रुक्मिणी बनर्जीकेँ देल गेल। माध्यमिक आऽ इंटरमीडिएट परीक्षाक एहि वर्षक सभ संकायक टॉपरकेँ प्रशस्ति पत्र आऽ २५-२५ हजार टाका दऽ सम्मानित कएल गेल। दू दिनक एहि कार्यक्रमक क्रममे गोटेक १५० सँ बेसी आयोजित शैक्षिक गतिविधि आऽ प्रतियोगिता सभमे चयनित डेढ़ दर्जन छात्रकेँ स्मृति चिन्ह आऽ प्रशस्ति-पत्र दऽ पुरस्कृत कएल गेल। एहि मेलामे आयोजित राज्य स्तरीय विज्ञान प्रतियिगिताक विजेता नीतेश, क्वीज प्रतियोगिताक विजेता शिवानन्द गिरी आऽ अनुराधा कुमारीकेँ पुरस्कार स्वरूप लैपटाप प्रदान कएल गेल। एहि समारोहक अवसरपर ३६म राज्य स्तरीय जवाहर लाल नेहरू बाल विज्ञान प्रदर्शनीक आयोजन सेहो कएल गेल जाहिमे बाल वैज्ञानिक सभ द्वारा बनाओल गेल गोटेक १०० मॉडलक प्रदर्शन कएल गेल। राज्य शिक्षा शोध आऽ प्रशिक्षण परिषद् द्वारा आयोजित एहि प्रदर्शनीक विषय छल “वैश्विक संपोषणीयता के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी”। विज्ञानक प्रति छात्र-छात्रा आऽ जनसामान्यमे सहज आऽ स्वाभाविक अभिरुचि उत्पन्न करैत एहि प्रदर्शनीमे बाल वैज्ञानिक सभ खूब उत्साहित छल। एहि माध्यमसँ सर्वश्रेष्ठ तीन मॉडलक बाल वैज्ञानिकक चयन पूर्वी भारत विज्ञान मेला आऽ राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी लेल कएल गेल। एहि ठाम लागल मैथिली, भोजपुरी, हिन्दी, मगही आऽ उर्दू अकादमीक स्टॉलपर लोक सभ भाषा अकादमी सभक प्रकाशन आऽ गतिविधिक जानकारीक संग किताबक खरीद सेहो कएलनि। चाणक्य लॉ युनिवर्सिटी, चन्द्रगुप्त प्रबंधन संस्थान, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना विश्वविद्यालय, इग्नू, माइक्रोसाफ्ट, इंटेल, एडुकैम्प आदि कतेको संस्थान अपन पाठ्यक्रम आऽ गतिविधिक जनतब देलक। बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक स्टॉलपर माध्यमिक आऽ इंटरमीडिएटक कला, विज्ञान आऽ वाणिज्यिक टॉपर छात्रक उत्तरपुस्तिका सेहो पैघ संख्यामे छात्र सभ खरीदलनि। पछिला किछु वर्षसँ प्रदेशक शिक्षा-व्यवस्था ध्वस्त भऽ गेल छल। प्रदेशमे नीतीश सरकारक सत्तारूढ़ भेलाक बाद एहिमे सुधारक आश बनल छल, जाहिमे प्रगति देखल जाऽ रहल अछि। प्रतिभासँ भरल एहि प्रदेशक छात्रकेँ शिक्षा दिवसक अवसरपर सरकारक उपलब्धि आऽ कार्यक्रमसँ एकटा किरण देखाई पड़ल अछि, मुदा ई उपलब्धि मात्र कार्यक्रमक आयोजन धरि सीमित नहि रहए एकर ईमानदारीसँ सरकारी स्तरपर प्रयास चलैत रहल तँ शिक्षाक क्षेत्रमे बिहार गौरव फेरसँ लौटि सकैत अछि। ३२म राष्ट्रीय पुस्तक मेला-पुस्तक प्रेमीमे भेल नव उत्साहक संचार बिहार सरकार आऽ पटना जिला प्रशासनक सहयोगसँ नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित ३२म राष्ट्रीय पुस्तक मेलामे उमरल पुस्तक प्रेमी सभक भीड़सँ एक बेर फेर साबित भेल जे प्रदेशक जनतामे पढ़बाक जिज्ञासा एखनो बनल अछि। ई पुस्तक मेला छात्र-युवा नेनासँ बुजुर्ग धरि सभ पुस्तक प्रेमीमे एकटा नव उत्साहक संचार कएलक। जखन कि पहिनहिसँ एकटा आन पुस्तक मेला एहि गाँधी मैदानमे चलैत छल तथापि एहि पुस्तक मेलामे जाहि तरहक भीड़ उमड़ल ओहिसँ लगैत छल जे पाठक कतेक दिनसँ किताबक भूख मेटेबाक लेल बेचैन छलाह। एहि मेलामे लागल स्टॉल सभपर पुस्तक प्रेमीक भीड़ देखि प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयीक ई टिप्पणी जे “साहित्यक पाठक आऽ रसिक एखनो बिहारमे छथि आऽ बिहार नहि होइत तँ हमरा सभमे सँ कतेकोकेँ ई पता नहि चलैत जे हमरा सभक लिखल केओ पढ़बो करैत अछि” स्पष्ट करैत अछि जे गरीब बिहार शैक्षणिक रूपसँ एखनो अमीर अछि। एहि मेलामे विविध विषयक पुस्तक प्रकाशक द्वारा तँ उपलब्ध कराओल गेल संगहि एन.बी.टी. हिन्दी, उर्दू, मैथिली आऽ आन भाषाक कतेको लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारसँ सोझां-सोझी अनौपचारिक गप-सप करा पाठक आ लेखकक बीच संवाद स्थापित करा लेखक साहित्य रचना, प्रक्रिया आऽ हुनक साहित्यिक यात्रा आऽ पाठकक मनक जिज्ञासाकेँ शान्त करौलक। ट्रस्ट अधिकारी देवशंकर नवीन जनतब देलनि जे एहि मेलामे देशक गोटेक १५० प्रकाशकक पुस्तक १७५ स्टॉलपर पुस्तक प्रेमीक लेल उपलब्ध कराओल गेल। एहि मेलामे सभक लेल हुनक मन पसन्दक पुस्तक उपलब्ध छल। महान् विभूतिक जीवन यात्रा हो कि आत्म-कथा, नव-पुरान साहित्यकारक संग कालजयी साहित्यकारक कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, उपन्यास सभ एक संग मेलामे पुस्तक-प्रेमीकेँ अपना दिस ध्यान आकृष्ट कएलक। पाठक सेहो एहि अवसरक पूरा लाभ उठौलनि आऽ अपन रुचिकर पुस्तकक खरीददारी कएलनि। मेलामे आधा आबादीक प्रतिनिधित्व सेहो पैघ संख्यामे देखल गेल। महिला साहित्यकार आऽ लेखकक साहित्यिक कृति तँ उपलब्ध छल संगहि हुनक रुचिवाला खान-पान, सौंदर्य आदिसँ संबंधित पुस्तक लेनाई प्रकाशक नहि बिसरल छलाह। प्रतियोगी छात्र आऽ नेना सभक लेल सेहो पुस्तक पर्याप्त उपलब्ध छल। जहिना साहित्य प्रेमी एहि मेलाकेँ गंभीरतासँ लेलनि तहिना प्रकाशक सेहो साहित्यिक पुस्तकक पूरा सेटक प्रदर्शन कएलनि। मेलामे विज्ञान संकायक पुस्तकक अभाव विशेष रूपसँ छात्र सभकेँ खटकल। मैथिली भाषीक लेल ई पुस्तक मेला पुस्तक खरीदबाक लेल नीक अवसरपर रहल। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पुस्तक अकादमीक स्टॉलपर पचास प्रतिशत छूटक संग उपलब्ध रहल आऽ एकर लाभ उठबैत मैथिली प्रेमी पैघ संख्यामे पुस्तकक खरीद कएलनि। मैथिली अकादमीक सेहो नव रूप एहि मेलामे देखल गेल। एहि सभक मध्य हरियाणा पुलिस अकादमीक स्टॉल आकर्षणक केन्द्र बनल रहए जतए संवेदी पुलिस सजग समाजक नारा बुलन्द करैत अकादमीक अधिकारी पुलिस आऽ जनताक मध्य संवाद स्थापित करबाक लेल कएल जाऽ रहल अभ्यास आऽ विभिन्न कानूनक जानकारी उपलब्ध कराओल गेल। प्रकाशक सभक लेल सेहो ई पुस्तक मेला एकटा नव अनुभव दऽ गेल। मेलामे भेल बिक्रीसँ उत्साहित प्रकाशक कहलनि जे जतेक पाठक बिहारमे छथि ओतेक आर कतहु नहि अछि। गरीबी आऽ अशिक्षाक बावजूद पुस्तकक प्रति भूख अपना आपमे एकटा मिशाल अछि। ओऽ आशा जतौलनि जे अगिला साल एहि ठाम अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेलाक आयोजन भऽ सकैत अछि। एहि पुस्तक मेलामे बंग्ला भाषाक साहित्यकार नजरुल इस्लाम, तेलुगु कवि बरबर राव, हिन्दीक अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, गंगा प्रसाद विमल, अशोक वाजपेयी, उर्दूक हुसैनुल हक, अब्दुस्समद, मैथिलीक मोहन भारद्वाज, पं गोविन्द झाक अलावा जुबैर रिजवी, कीर्ति नारायण मिश्र, अवधेश प्रीत, कर्मेन्दु शिशिर आदि कतेको साहित्यकार पुस्तक प्रेमी सभसँ संवाद कएलनि। मेलाक समापनक अवसरपर बहुभाषी कवि गोष्ठीमे हिन्दी, मैथिली उर्दू आऽ भोजपुरीक कतेको कवि अपन कविताक पाठ कएलनि। २. ज्योति लन्दनसँ लन्दनक चित्रकला प्रदर्शनी लन्दनक एक प्रसिद्ध आर्ट गैलेरीमे ईलिंग आर्ट ग्रुपक ९३म वार्षिक चित्रकला एवम् हस्तकला प्रदर्शनीमे माननीय सदस्यगण सहित हमहुं अपन चित्रकला शामिल केने रही।हम तीनटा मधुबनी मिथिला चित्रकला आ एकटा महाकवि स्वर्गीय विद्यापतिजीक पेसिंल स्केच प्रदर्शित केने रही।ओतय २०० सऽ बेसी अनेको प्रकारक उत्कृष्ट नमूना उपलब्ध छल।अहिमे लगभग ३' बाइ ५' के विशाल आकारक कैनवास पर बनल ऑयल पेण्टिग एक्रिलिक पेण्टिग आदि मिडियासऽ बनल आकर्षक चित्र सब उपस्थित छल। किछु मात्र प्रदर्शनी लेल छलै आ बेसी विक्रय हेतु उपस्थित छलै। न्युनतम दाम £ ५० छल। देखनाहरक भीड़ सेहो खूब छल।अंग्रेज सब सेहो मिथिला पेण्टिग लग रूकै छलैथ आ हमरा सऽ किछु जानकारी प्राप्त करैके कोशिश सेहो केलैथ। विदेशमे अहि कलाक प्रति लोकक रूचि सराहनीय अछि। मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (१९३८- )- ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। पिता स्व. वीरेन्द्र नारायण सिँह, माता स्व. रामकली देवी। जन्मतिथि- २० जनवरी १९३८. एम.ए., डिप.एड., विद्या-वारिधि(डि.लिट)। सेवाक्रम: नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। १.म.मो.कॉलेज, विराटनगर, नेपाल, १९६३-७३ ई.। २. प्रधानाचार्य, रा.प्र. सिंह कॉलेज, महनार (वैशाली), १९७३-९१ ई.। ३. महाविद्यालय निरीक्षक, बी.आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, १९९१-९८. मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली अंग्रेजी आऽ हिन्दीक ज्ञाता। मैथिलीमे १.नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास(विराटनगर,१९७२ई.), २.ब्रह्मग्राम(रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ ई.), ३.’मैथिली’ त्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर,नेपाल १९७०-७३ई.), ४.मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ ई.), ५.नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ ई.), ६. प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- १ आऽ २ (अनुवाद), ७. वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ ई.)। प्रकाशनाधीन: “विदापत” (लोकधर्मी नाट्य) एवं “मिथिलाक लोकसंस्कृति”। भूमिका लेखन: १. नेपालक शिलोत्कीर्ण मैथिली गीत (डॉ रामदेव झा), २.धर्मराज युधिष्ठिर (महाकाव्य प्रो. लक्ष्मण शास्त्री), ३.अनंग कुसुमा (महाकाव्य डॉ मणिपद्म), ४.जट-जटिन/ सामा-चकेबा/ अनिल पतंग), ५.जट-जटिन (रामभरोस कापड़ि भ्रमर)। अकादमिक अवदान: परामर्शी, साहित्य अकादमी, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय नृत्य कला मन्दिर, पटना। सदस्य, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर। भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली। कार्यकारिणी सदस्य, जनकपुर ललित कला प्रतिष्ठान, जनकपुरधाम, नेपाल। सम्मान: मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ई., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम,नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता- इम्फाल (मणिपुर), गोहाटी (असम), कोलकाता (प. बंगाल), भोपाल (मध्यप्रदेश), आगरा (उ.प्र.), भागलपुर, हजारीबाग, (झारखण्ड), सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, पटना, काठमाण्डू (नेपाल), जनकपुर (नेपाल)। मीडिया: भारत एवं नेपालक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे सहस्राधिक रचना प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शनसँ प्रायः साठ-सत्तर वार्तादि प्रसारित। अप्रकाशित कृति सभ: १. मिथिलाक लोकसंस्कृति, २. बिहरैत बनजारा मन (रिपोर्ताज), ३.मैथिलीक गाथा-नायक, ४.कथा-लघु-कथा, ५.शोध-बोध (अनुसन्धान परक आलेख)। व्यक्तित्व-कृतित्व मूल्यांकन: प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन: साधना और साहित्य, सम्पादक डॉ.रामप्रवेश सिंह, डॉ. शेखर शंकर (मुजफ्फरपुर, १९९८ई.)। चर्चित हिन्दी पुस्तक सभ: थारू लोकगीत (१९६८ ई.), सुनसरी (रिपोर्ताज, १९७७), बिहार के बौद्ध संदर्भ (१९९२), हमारे लोक देवी-देवता (१९९९ ई.), बिहार की जैन संस्कृति (२००४ ई.), मेरे रेडियो नाटक (१९९१ ई.), सम्पादित- बुद्ध, विदेह और मिथिला (१९८५), बुद्ध और विहार (१९८४ ई.), बुद्ध और अम्बपाली (१९८७ ई.), राजा सलहेस: साहित्य और संस्कृति (२००२ ई.), मिथिला की लोक संस्कृति (२००६ ई.)। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि। मिथिलांचलक सूर्य पूजन स्थल भारतीय सनातन समाजमे प्रत्येक आनुष्ठानिक सत्कर्मक आरम्भ पंचदेवताक पूजनसँ होइछ। ओ पंचदेव छथि- दुर्गा (शक्ति), शिव, विष्णु, सूर्य एवं गणेश। पंचदेवताभ्यो नमः। परब्रह्म परमात्माक प्रत्यक्ष पूजोपासना सूर्यसँ होइछ। श्रुति, स्मृति, पुराणादि सम्मत सूर्यसँ जीव सभ उत्पन्न होइछ। हिनकेसँ यज्ञ, मेघ, अन्न ओ आत्मा अछि। अतः हे आदित्य, अहाँकेँ नमस्कार! आदित्ये प्रत्यक्ष ब्रह्म छथि, साक्षात् विष्णु छथि, प्रत्यक्ष रुद्र छथि। हिनकेसँ भूमि, जल, ज्योति, आकाश, दिक्, देवगण एवं वेद उत्पन्न होइछ। अतः आदित्य ब्रह्म छथि (वृहदारण्यकोपनिषत् ३.७९)। “आदित्य हृदय” (श्लोक ३६, ४४-५३) मे सूर्यकेँ सर्वयज्ञ स्वरूप, ऋक्, यजु एवं सामवेद, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रधारी, ओ सर्वतंत्रमय कहल गेल अछि। “आदित्य हृदय” (श्लोक ५९-६१) मे द्वादश आदित्यक उल्लेख भेल अछि- विष्णु, शिव, ब्रह्मा, प्रजापति, महेन्द्र, काल, यम, वरुण, वायु, अग्नि, कुबेर एवं तत्वादिक स्रष्टा ओ स्वतः सिद्ध अधीश्वर। उदयकालमे ओ ब्रह्मा, मध्याह्नमे महेश एवं अस्तवेलामे विष्णु स्वरूप सूर्य त्रिमूर्ति छथि। जेना शिवस्वरूप त्रिमूर्तिमे सदाशिवक संगे सौम्य ओ रौद्र रूप (भैरव) उत्कीर्ण होइत छथि। शिवलिंग ओ विष्णुलिंग जकाँ सूर्यक पूजोपासना ब्रह्म लिंगक रूपमे कयल जाइछ। सूर्यकेँ गगनलिंग सेहो कहल जाइत छनि। सूर्यमण्डलमे गायत्रीक ध्यानक विधान अछि। विष्णु सेहो एकटा आदित्य छथि- भगवत आदितश्च। सूर्यक लाक्षण (चक्र) विष्णुक सुदर्शन चक्र बनि गेल। प्राचीन सिक्का (वृष्णि ओ गणराज्यक) पर अंकित चक्रक अभिप्राय सूर्यसँ अछि। प्रायः देवी-देवताक प्राथमिक लक्षण प्रतीक रूपेँ अभिव्यंजित भेल। कालान्तरमे बोधगम्यताक दृष्टिसँ हुनक स्वरूपक विधान कयल गेल। तदनुसार सूर्य सप्ताश्वक रथपर ठाढ़ छथि। आगाँमे सारथि अरुण बैसल छथि। माथपर उन्नत किरीट (मुकुट) शोभित छनि। दुनू हाथमे कमल पुष्प अछि। डाँरमे तरुआरि लटकल छनि। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्युषा उत्कीर्ण छथि। सूर्यक देह जिरह बख्तरसँ अलंकृत अछि। कोनो कोनो मूर्तिमे पार्श्वदेवताक रूपमे कलम लेने पिंगल ओ दण्ड लेने दण्डी सेहो ठाढ़ छथि। सूर्य पैरमे नमहर बूट पहिरने छथि। ई सभ शक-ईरानी लक्षण मानल जाइछ। भारतीय सूर्य मूर्ति विज्ञानपर कुषाण कालमे इरानी प्रभाव बढ़ि गेल छल। बोधगयाक पाथरक बेष्टन वेदिका (रेलिंग) पर एवं कुम्हरार (पटना) क माँटिक पट्टी (मृण्फलक) पर सूर्यक सबसँ प्राचीन प्रतिमांकन भेल अछि। बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण सूर्य चारो दिशा सभक सूचक चारिटा अश्वक रथपर आरुढ़ छथि। सूर्यक दुनूकालमे उषा ओ प्रत्युषा हाथमे धनुष-वाण लेने अंधकारक बेधन करैत छथि। आलोच्य सूर्यक प्राचीनतम मूर्ति “अंधकार पर सूर्यक विजय” सूचक अछि। सूर्यक पाछाँ वृत्ताकार आभामंडल बनल अछि। एहिसँ संकेत प्राप्त होइछ जे सूर्यक पूजा शकस्थानसँ भारतमे आयल। मुदा बोधगया रेलिंगपर उत्कीर्ण उदीच्य वेषधारी सूर्य मूर्ति विदेशी परम्परासँ भिन्न ओ प्राचीन (शुंगकालीन) अछि। इरानी प्रभावसँ पहिने एहि ठाम सूर्य मूर्तिक भारतीय अवधारणा सुनिश्चित छल (भारतीय कला को बिहार की देन, बी.पी.सिन्हा, पटना, १९५८, पृ.८१-८३)। कुम्हरार (पटना) क सूर्य (मूर्ति) चारिटा घोड़ाक रथपर आरुढ़ छथि। माटिक गोल पट्टीपर बनल एहि सूर्यकेँ भारतीय सूर्य मूर्ति परम्परामे सर्वप्राचीन मानल जाऽ सकैछ। शाहाबाद एवं मुंगेरसँ प्राप्त सूर्य उदीच्य वेषधारी छथि। पार्श्वदेवता कलमधारी पिंगल त्रिभंग मुद्रामे ठाढ़ मनुष्यक सुकृत्य ओ कुकृत्यक लेखन कऽ रहल छथि एवं दहिन दिस विधर्मी सभकेँ दण्डित करबाक लेल हाथमे दण्ड लेने दण्डी तत्पर छथि। वाम भागमे सूर्यक पत्नी उषा ओ दहिनमे प्रत्युषा अंधकारक बेधन कऽ रहल छथि। शाहाबाद जिलासँ प्राप्त सूर्यमूर्ति संभवतः गुप्तकालीन कलाकृति थिक। गरामे एकावली (माला) शोभित छनि एवं कृपाण वाम भागमे लटकल छनि। दक्षिण बिहारमे सूर्य मन्दिर, सूर्यमूर्ति ओ सूर्योपासनाक केन्द्र उत्तर बिहारक अपेक्षा अधिक अछि। सत्यार्थीक सर्वेक्षणक अनुसार सांस्कृतिक मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक प्राचीन ऐतिहासिक केन्द्रक रूपमे विष्णु बरुआर (मधुबनी) क द्वादश आदित्यक रूपेँ पूजित पालकालीन सूर्यमूर्ति अछि। मूल सूर्यमूर्तिक प्रभावलीमे बारहटा आदित्यक स्वरूप उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक अन्यान्य सूर्यमूर्ति जकाँ सूर्यक देहपर जिरह-बख्तरादि नहि छनि। ओ भारतीय भेषभूषा ओ आभूषणसँ विन्यस्त छथि। यद्यपि स्थलक नाम विष्णु बोधक अछि। एहि ठाम सूर्य विष्णु रूपेँ पूजित छथि। सत्येन्द्र कुमार झाक अनुशीलन (मिथिला की पाल प्रतिमाएँ) क अनुसार मधुबनीक झंझारपुर-मधेपुर पट्टीक कोशी-बलानक पुरान प्रवाह क्षेत्रक सूर्य नाहर-भगवतीपुर ओ भीठ भगवानपुरक अतिरिक्त राजनगर, पस्टन एवं पटलामे प्राप्त अछि। एहि पट्टीसँ कनेक हटिकऽ एकटा सूर्यमूर्ति जगदीशपुर (मनीगाछी प्रखण्ड, दरभंगा)सँ सेहो उपलब्ध भेल अछि। एहि सूर्य पूजन पट्टीक सर्वाधिक आकर्षक ओ प्रभावशाली सूर्य मूर्ति (आकार ४८ इन्च गुणा २४ से.मी.) परसा (झंझारपुर, मधुबनी) क अछि। तेरहम सदीक बनल ई मूर्ति सूक्ष्म अलंकरणसँ भरल अछि। एहिसँ एकटा धारणा ई बनैत अछि जे सूर्य मूर्तिक पूजन एकटा सीमित क्षेत्र धरि छल। मुदा हिनक अवधारणाक खंडन देवपुरा (बेनीपट्टी प्रखण्ड, मधुबनी), रघेपुरा (असगाँव-धरमपुर), डिलाही, कोर्थ, देकुली, अरई, रतनपुर, छर्रापट्टी, कुर्सो-नदियामी, हाबीडीह (दरभंगा), भोज परौल, भीठ भगवानपुर, अकौर, अन्धराठाढ़ी, रखवारी, गाण्डीवेश्वर, झंझारपुर (मधुबनी) एवं वीरपुर, बरौनी, नौलागढ़ (बेगुसराय), सवास (मुजफ्फरपुर), कन्दाहा (सहरसा), बड़ीजान (किशनगंज) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थल सभसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्तिसँ भऽ जाइछ। लौकिक स्तरपर सूर्योपासनाक परिदृश्य गाम-गाममे पसरल छठ पर्व सर्वाधिक लोकप्रियताक उदाहरण अछि। अजय कुमार सिन्हा (बड़ीजान का पुरातात्विक महत्व, कोशी महोत्सव २००३ ई.) किशनगंज जिला मुख्यालयसँ प्रायः पचीस कि.मी.उत्तर-पश्चिम दिशामे अवस्थित बड़ीजान दुर्गापुरक विशाल सूर्यमूर्ति (५फीट ७ इन्च गुणा २ फीट ११ इन्च) क अपन शोधपत्रमे उल्लेख कयने छथि। बड़ी जान दुर्गापुर पुरातात्विक भग्नावशेषसँ भरल अछि, जाहिमे दसम शताब्दीक भव्य मन्दिरक स्थापत्य प्रमुख अछि- सूर्यक विशाल दू खण्डित पाथरक मूर्ति, मन्दिरक अलंकृत चौखट, बहुतरास शिवलिंग, पाथरक एकटा सोहावटी (लिन्टेल) मध्य गणेश एवं दोसरक केन्द्रमे उत्कीर्ण त्रिशूल। दुर्गापुर नामक संलग्नता आदिकेँ देखैत बड़ीजान पंचदेवोपासक क्षेत्र छल। बहुतरास मन्दिर सभ भग्नावशिष्ट अछि। मूर्ति विज्ञानक दृष्टिसँ एहि ठामक सूर्य मूर्तिकेँ अजय कुमार सिन्हा एगारहम सदीक कहने छथि। एहि क्षेत्रमे शैवमतक प्रधानता छल। मुदा सीमान्त क्षेत्रमे अवस्थित भेलाक कारणे एहिठाम सूर्य मन्दिरक होएब स्वाभाविक अछि। कोशी क्षेत्रक (सुविदेह, अंगुत्तर आदिक रूपेँ ख्यात) दोसर सूर्य मन्दिरक साक्षात कन्दाहा (सहरसा) मे कयल जाऽ सकैछ। कन्दाहाक सूर्यमन्दिर सहरसा जिला मुख्यालयसँ चौदह कि.मी. पश्चिम वनगाँव-महिषी क्षेत्रमे अवस्थित अछि। वनगाँव, महिषी एवं कन्दाहाकेँ जँ त्रिभुज बनाओल जाय तँ ओऽ सभ स्थल समकोणपर अवस्थित अछि। हवलदार त्रिपाठी सहृदय (बिहार की नदियाँ)क मतेँ एहि ठामक बुद्धक समकालीन कोणियवाहक जटिल ब्राह्मण छल। कन्दाहाक सूर्यमन्दिरक गर्भगृहमे स्थापित भगवान सूर्यक मूर्तिकेँ भवादित्य (द्वादश आदित्यक एकटा प्रकार) कहल गेल अछि। सूर्यक संग उषा एवं प्रत्युषा सेहो उत्कीर्ण छथि। मन्दिरक द्वार स्तंभ (चौखट) पर उत्कीर्ण शिलालेखक अनुसार (१४५३ ई.) वर्तमान सूर्यमन्दिरक निर्माता ओइनवार वंशीय हरसिंहदेवक पुत्र नरसिंहदेव छलाह। शिलालेखक प्रशस्तिमे नरसिंहदेवकेँ भूपतिलक, महादानी, धीरवीर आदि कहल गेल छनि। विद्यापतिक पदावलीक भणिता (सुभद्र झा द्वारा सम्पादित पदांक ४४-४५)सँ नरसिंहदेवक ऐतिहासिक अवस्थितिक सेहो पुष्टि होइछ। सूर्यमन्दिर लगक कूपजलक सेवनसँ चर्मरोग समाप्त भऽ जाइछ। सूर्योपासनासँ चर्मरोग, कुष्टादि रोगसँ मुक्तिक अनेक पौराणिक अनुश्रुति अछि। एहि तरहेँ कन्दाहाक सूर्य मन्दिर सूर्योपासनाक प्रसिद्ध केन्द्र बनल अछि। नाहर भगवतीपुर (मधुबनी)क प्रसिद्धि जतेक महिषासुर मर्दिनी भगवतीक तेजस्विताक कारणे अछि ओतबे ख्याति पाथरक अनेक सूर्यमूर्ति (मध्यकालीन)क कारणे अछि। मूर्ति सभमे धनुष धारिणी पार्श्वदेवीक अपेक्षा पैघ पार्श्वदेवक रूपेँ पिंगल ओ दण्डी उत्कीर्ण अछि। सिरोभूषणक स्थान सिमरौनगढ़ (घोड़ासाहन, चम्पारणसँ उत्तर नेपालक तराइक सीमान्त क्षेत्र) क सूर्यमूर्ति जकाँ अलगसँ मुकुट लगयबाक स्थान खाली छोड़ल गेल अछि। नाहर भगवतीपुरक सूर्यमूर्ति कर्णाटकालीन थिक। सिमरौनगढ़सँ प्राप्त एवं काठमाण्डूक राष्ट्रिय संग्रहालयमे संरक्षित एकटा अभिलेखांकित कर्णाटकालीन सूर्यमूर्तिक सूचना तारानन्द मिश्र (प्राचीन नेपाल -२४- काठमाण्डौ, नेपाल) देने छथि। एहि सभसँ किंचित भिन्न ओ विशिष्ट सूर्यमूर्ति सवास, गायघाट प्रखण्ड (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त अछि। सूर्यमूर्ति पाँच फीट नमहर अछि, जे ओहिठामक एकटा मन्दिरमे स्थापित एवं लक्ष्मीनारायणक नामे पूजित छथि। सूर्यक प्रतिरूप विष्णुकेँ मानल गेल अछि। सूर्य सप्ताश्वक रथपर स्थानुक मुद्रामे ठाढ़ छथि। ठेहुनधारी अधोवस्त्र ओ वामकंधसँ आवक्ष बन्हैत उत्तरीय एवं वस्त्राभूषणसँ सूर्य आच्छादित छथि। कान्हपर यज्ञोपवीत एवं डाँरमे कटार छनि। कर्णाटवंशी राजा लोकनि सूर्यवंशी क्षत्रिय छलाह। अतः पंचदेवोपासक भूमि मिथिलाक अनेक कर्णाट शासित क्षेत्रसँ सूर्य मूर्तिक प्राप्ति स्वाभाविके मानल जायत। कर्णाटकालीन तिरहुतक राजधानी सिमरौनगढ़ (सिमरौनगढ़ को इतिहास, मोहन प्रसाद खनाल, काठमांडौ, नेपाल, २०५६ वि.), अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थान (मधुबनी), भीठ भगवानपुर (मधुबनी) मूर्तिया (नेपाल तराइ), कुर्सो नदियामी (दरभंगा), कोर्थ (दरभंगा) आदि ऐतिहासिक ओ धार्मिक स्थान सभसँ प्राप्त अछि। सिमरौनगढ़क सूर्य मूर्तिक निर्माण याज्ञिक श्रीपतिक लेल हरसिंहदेवक मंत्री गणेशक आदेशपर कयल गेल छल (प्राचीन नेपाल-२४)। कर्णाटवंशी राजालोकनि पंचदेवोपासक छलाह। मिथिलांचलक बरौनी-बेगुसराय क्षेत्रमे सूर्योपासनाक ऐतिहासिक अवशेष सभ उपलभ्य अछि। वीरपुर-वरियारपुर ओ कैथसँ सूर्यक अलावा हुनक पुत्र रेवन्तक पाथरक प्राचीन मूर्ति प्राप्त भेल अछि। बरौनी ओ चकबेदौलियाक सूर्य मन्दिर दर्शनीय अछि। एहि भूभागक किछु सूर्यमूर्ति जी.डी.कॉलेज, बेगुसरायक संग्रहालयमे संरक्षित अछि। डॉ. सत्यनारायण ठाकुर ( मिथिला में मंदिरों का प्रादुर्भाव एवं स्वरूप, मिथिला की लोकसंस्कृति विशेषांक, दरभंगा, २००६ ई.) मिथिलांचलक अकौर, झंझारपुर, राजनगर ओ कंदर्पीघाटक सूर्य मन्दिर सभक उल्लेख कयने छथि। मुदा सत्येन्द्र कुमार झाक अनुसार नाहर भगवतीपुर सूर्योपासनाक पैघ केन्द्र छल जाहि ठाम चारिटा महत्वपूर्ण सूर्य मूर्ति उपलभ्य ओ पूजित अछि। उपर्युक्त सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे सांस्कृतिक मिथिलांचलक पूर्वी छोड़ बड़ीजान दुर्गापुर (किशनगंज)सँ पश्चिममे अकौर (मधुबनी), उत्तरमे सिमरौनागढ़ (मिथिला नेपाल सीमान्त) एवं दक्षिणमे बरौनी-बेगुसराय धरि सूर्यमन्दिर ओ सूर्योपासनाक क्षेत्र विस्तृत छल। ओकरा राजकीय संरक्षण एवं लोकाश्रय प्राप्त छल। आर्य सूर्यप्रतिबद्ध लोक छलाह। मिथिलांचलक दक्षिणी सीमान्तक गंगातटवर्ती क्षेत्र (जढुआ, हाजीपुर, वैशाली)क सूर्योपासना यदुवंशी लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदाय अवशिष्ट अछि। एहि जनपदक ज्योति एवं कारिख पंजियार सन लोकदेवता सूर्योपासक छलाह। हुनक स्वरूप वेदनिष्ठ ब्राह्मणक अछि। हुनक पैरमे खराम, अधोवस्त्रमे धोती, कान्हपर जनेउ, माथपर तिलक, हाथमे पोथी-पतरा एवं सोनाक चाभुक (किरणक प्रतीक) शोभित छनि- पैर खरमुआ हो दिनानाथ, हाथ सटकुन। देह जनेउआ हो दिनानाथ, तिलक लिलार॥– मैथिली प्रकाश, (शोध विशेषांक, मैथिली लोकसाहित्यक भूमिका, प्रो. मौन, कलकत्ता, जनवरी-फरवरी १९७६)। मैथिली लोकसाहित्यक संदर्भमे सूर्य पूर्वदिशाक अधिपति छथि। बिहारक धरतीपर सूर्यक प्राचीनतम स्वरूप कुम्हरार (पटना) सँ प्राप्य अछि जाहिमे सूर्य एकचक्रीय अश्वरथपर सवार (ई.पू. पहिल सदी) छथि। एकर विकास बोधगया रेलिंग (शुंगकालीन) पर उत्कीर्ण चारि घोड़ावाला रथपर आरुढ़ सूर्य मूर्तिमे भेल अछि, जाहिमे पार्श्वदेवी उषा ओ प्रत्युषा सेहो अभिशिल्पित छथि। कुषाणकालक सूर्य मूर्तिक विशिष्ट पहचान पैरमे इरानी बूट, देहमे जिरह-बख्तर ओ माथपर किरीट बनि गेल। एहिमे सूर्य सप्त अश्व रथी छथि। मुदा गुप्तकालमे सूर्यक स्वरूप क्रमशः भारतीय वस्त्राभूषणमे बदलैत गेल। मिथिलांचलक पाल, कर्णाट ओ ओइनवार कालीन शासनकालमे समानरूपेँ सूर्यमूर्ति ओ मन्दिरक निर्माण होइत रहल। सूर्य मूलतः अश्वारोही देव छथि, जनिक प्रभुत्वसूचक रथक चारिटा अश्व दिक् दिगन्त बोधक अछि त सप्ताश्व सप्तलोकक विस्तारकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। एतबे नहि सप्ताश्व सप्तरंगी किरणक द्योतक सेहो बनि गेल अछि। सूर्य आर्य लोकनिक वैद्इक देवता छथि। अतः मिथिलांचलमे निर्मित सूर्यमूर्ति भारतीय परम्परा (वस्त्राभूषण) मे अछि। ओ वैष्णव धर्मी तिलक मण्डित छथि, अर्थात् आदित्य ब्रह्म ओ वेदज्ञ ब्राह्मणक प्रतीक बनि गेल छथि। हुनक हाथक कमल सृष्टि मूलक थिक। कमल फूल सूर्योदयक संग प्रस्फुटित होइत अछि एवं सूर्यास्तक संग सम्पुटित होइत अछि। दुनू हाथक कमल सूर्योदय एवं सूर्यास्तक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे नवोदित सूर्य ओ अस्ताचलगामी सूर्यदेवकेँ अर्घ्य देल जयबाक परम्परा अछि। एवं प्रकारें मध्यकालीन मिथिलामे सूर्य पूजन एकटा प्रबल धार्मिक प्रवृत्ति छल। कमल सभ देवी देवताक आसन बनल अछि। भारतीय मूर्तिकला परम्परामे सूर्य अपन शक्तिद्वय उषा एवं प्रत्युषा, पार्श्वदेवता पिंगल एवं दण्डीक अतिरिक्त सूर्यपुत्र रेवंतक एकटा मूर्ति पचम्बा (बेगुसराय) एवं देवपुरा (मधुबनी) सँ प्राप्त भेल अछि। मिथिलांचलमे सूर्य मूर्तिक निर्माणक्रममे शास्त्रीयतासँ किंचित् भिन्न अभिनव प्रयोग सेहो देखना जाइछ, जकरा जनपदीय आस्थाक अभिव्यक्ति कहल जाऽ सकैछ। उदाहरणार्थ विष्णु बरुआरक द्वादश आदित्य (सूर्य)क मूर्तिक पाछाँ अग्नि शिखा सभक प्रत्यंकनकेँ देखल जाऽ सकैछ। सूर्य अग्निक प्रत्यक्ष प्रतिरूप छथि। सूर्यक गणना नवग्रहमे होइत अछि। दिकपालमे ओ पूर्वक दिग्पति छथि। भारतीय मूर्तिकलामे नवग्रहक अवधारणा गुप्तकालीन परिवेशमे मूर्त भेल मुदा मिथिलांचलक धरतीपर हुनक पूजन परम्पराक पुरातात्विक अवशेष पाल ओ सेनकालमे विशेष देखना जाइछ। मध्यकालीन शिवमन्दिरमे प्रायः नवग्रहक मूर्ति अवशेष प्राप्त होइछ। वीरपुर (बेगुसराय) एवं चेचर (वैशाली)सँ नवग्रहक पालकालीन प्रस्तर पैनेल प्राप्त भेल अछि जाहिमे सूर्य प्रथम अनुक्रममे छथि। हुनक दुनू हाथमे कमल पुष्प शोभित छनि। मुदा लखीसरायक अष्टग्रह पैनेलमे सूर्य कमलासनपर प्रतिष्ठित छथि। बिहारशरीफ, नालन्दाक नवग्रह पैनेलमे सूर्य दण्ड ओ पिंगलक संगे उत्कीर्ण छथि। अंतीचक (विक्रमशिला, भागलपुर)क नवग्रह पैनल सबसँ पैघ (११८*६२ से.मी.) अछि। नवग्रह क्रम एवं प्रकारेँ निर्मित होइछ- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु एवं केतु। कोनो कोनो पैनेलक आरम्भ उलटाक्रम (केतु, राहु...)सँ होइछ। मिथिला लोकचित्रकलामे नवग्रहक प्रतीकांकन हरिशयन एकादशीक अरिपनमे देखना जाइछ। मांगलिक अनुष्ठानमे नवग्रहक पूजन आवश्यक मानल जाइछ। शिवलिंगमे सूर्य: कन्दाहा (सहरसा)क चतुर्मुखी शिवलिंग सूर्य प्रमुख छथि एवं अन्यान्यमे ब्रह्मा, विष्णु ओ शिव छथि। तहिना रानीघाट (पटना)क दुधेश्वर मन्दिर (शिव) क पंचमुखी शिवलिंगमे ब्रह्मा, सरस्वती, सूर्य ओ गणेशक अलावा शीर्षपर नृत्यमूर्ति उत्कीर्ण (नवम-दसम सदी) अछि। अरेराज (प.चम्पारण)क सोमेश्वर शिव मन्दिरक प्रांगणमे स्थापित चतुर्मुखी शिवलिंगमे एकटा सूर्यक मुखाकृति उत्कीर्ण अछि। सर्वेक्षणात्मक अनुशीलनसँ ई स्पष्ट होइछ जे प्रत्येक शिवलिंगमे देवस्थानक मुख्य मूर्तिक अनुरूप एकटा देवता प्रमुख होइछ। उदाहरणार्थ कन्दाहाक शिवलिंगमे सूर्यक, भच्छीमे ब्रह्माक (त्रिमूर्ति)क इत्यादि। एहि तरहेँ कन्दाहा (सहरसा), बड़ी जान दुर्गापुर (किशनगंज), बरौनी (बेगुसराय), झंझारपुर, कंदर्पीघाट, अकौर, चकबेदौलिया, परसा, अन्धराठाढ़ी, राजनगर (मधुबनी) आदिक सूर्य मन्दिर एवं अन्यान्य स्थल सभसँ प्राप्त प्राचीन सूर्यमूर्ति सभक उपलब्धता मिथिलांचलमे सूर्योपासनाक महत्ताकेँ रेखांकित करैत अछि। आर्य लोकनिक अभिजात्य संस्कृतिक समानान्तर लोकक अपन सम्प्रदाय अछि, अपन देवी-देवता, पूजोपासना पद्धति, पावनि-तिहार आदि छैक। आभीर लोकनिक सुरजाहा सम्प्रदायक सूर्योपासक लोकदेवता ज्योति ओ कारिख, उषा-प्रत्युषाक समानान्तर गहिल षष्ठी आदिक पूजोपासना प्रकारान्तरसँ सूर्योपासना थिक। सौर संस्कृतिक केन्द्रीय देवता सूर्य छथि। आर्यलोकनिक सूर्य प्रतिबद्धताक उदाहरण अछि सूर्यक वाहन सप्ताश्व रथ। आर्य अश्वप्रिय छलाह आर अश्व हिनक संस्कृतिक संवाहक देवी-देवताक वाहन बनल अछि। छठि व्रतक परम्परा पुराणयुगसँ पहिनेक थिक। सुकन्या एहि कठिन व्रत साधनासँ अपन पति च्यवन ऋषिक नेत्रक ज्योति घुरौने छलीह। षष्ठी वा छठी मइया लोकजीवनक आंचरमे संतति, आरोग्य व सुख-समृद्धि देइत छथि। सूर्यक सम्बन्ध ऋतुचक्रसँ अछि। बारह मास (द्वादश आदित्य), छह टा ऋतु (षष्ठी माता) एवं सात दिन (सप्ताश्व रथ) सभटा सूर्यसँ सम्बद्ध। हिनक गति प्रक्रिया अयन (गति क्रिया) मे विभाजित अछि- उत्तरायण एवं दक्षिणायन। सूर्यक दुनू अयनमे अर्थात् कार्तिक एवं चैत्रमे छठि मइयाक पूजोपासना कयल जाइछ। अश्वारोही सूर्यकेँ जलाशयक तटपर हस्तिकलश, चौमुख दीप, मौसमी फल-फूल, मेवा-मिष्टान्न आदिसँ अर्घ्य देल जाइछ (लोकायत और लोकदेवता, डॉ. रामप्रवेश सिंह, मुजफ्फरपुर, १९८६ ई.)। हिनक पूजोपासनाक लेल लोक श्रद्धावनत भऽ ठाढ़ रहैत अछि- ब्राह्मण बेटी जनेऊ, अहीर बेटी गायक दूध, कुम्हार बेटी हस्तिकलश आदि, तेली बेटी तेल, माली बेटी फूल-पात आदि लऽ कऽ उदयाचल दिस सूर्योन्मुख भऽ अर्घ्य देइत छनि। जापानकेँ सूर्योदयक देश ओ अरुणाचलकेँ उदयाचलक प्रदेश कहल जाइत अछि। मिथिलांचलमे उगैत एवं डुबैत (अस्ताचलगामी) सूर्यकेँ लोकपूजन परम्परित अछि। सूर्यक छठी व्रतानुष्ठान बहुत कठिन मानल जाइछ। एहि ठामक स्त्रीगण सूर्यक अर्घ्यक केराक रक्षाक लेल ब्रह्मास्त्र धरि उठयबाक लेल कृतसंकल्पित रहैत अछि- “मारवउ रे सुगवा धनुष से, ई घउर, रौना माइ के जाए”। छठी माइकेँ मिथिलांचलमे रौना माइ सेहो कहल जाइछ। षष्ठी लोकायत संस्कृतिक देन थिक मुदा सूर्य वैदिक संस्कृतिक। अतः रौनामाइ सूर्यक सतरंगी अश्वरथपर सवार भऽ कऽ मिथिलांचलक धरतीपर अबैत छथि एवं लोकजीवनक दुख-दारिद्र्यक हरण कऽ अपन “लोक”मे घुरि जाइत छथि। एवं प्रकारेँ सूर्योपासना सम्पूर्ण लोकजीवनकेँ श्रद्धाभिभूत कयने अछि। वैदिक एवं लोकायत संस्कृतिक समाहार एहि ठाम प्रत्यक्ष देखना जाइछ। ३.पद्य ३.१.1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा ३.२. बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर ३.३.-एक युद्ध देशक भीतर-ज्योति ३.४. १.भालचन्द्र झा 2.विनीत उत्पल ३.५. 1. पंकज पराशर 2.अंकुर ३.६. कुमार मनोज कश्यप ३.७. रूपेश झा "त्योंथ" 1.रामलोचन ठाकुर 2.कृष्णमोहन झा श्री रामलचन ठाकुर, जन्म १८ मार्च १९४९ ई.पलिमोहन, मधुबनीमे। वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी, सम्पादक, समीक्षक। भाषाई आन्दोलनमे सक्रिय भागीदारी। प्रकाशित कृति- इतिहासहन्ता, माटिपानिक गीत, देशक नाम छल सोन चिड़ैया, अपूर्वा (कविता संग्रह), बेताल कथा (व्यंग्य), मैथिली लोक कथा (लोककथा), प्रतिध्वनि (अनुदित कविता), जा सकै छी, किन्तु किए जाउ(अनुदित कविता), लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता), जादूगर (अनुवाद), स्मृतिक धोखरल रंग (संस्मरणात्मक निबन्ध), आंखि मुनने: आंखि खोलने (निबन्ध)। अनुजक नाम/ काज अहींक थिक खएबामे जत्ते किएक ने होउक तीत औषध फल होइते छैक नीक रोगी कें बुझा देब ई बात काज अहींक थिक कृष्णमोहन झा (1968- ), जन्म मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाममे। “विजयदेव नारायण साही की काव्यानुभूति की बनावट” विषयपर जे.एन.यू. सँ एम.फिल आ ओतहिसँ “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में प्रेम की परिकल्पना” विषयपर पी.एच.डी.। हिन्दीमे एकटा कविता सँग्रह “समय को चीरकर” आ मैथिलीमे “एकटा हेरायल दुनिया” प्रकाशित। हिन्दी कविता लेल “कन्हैया स्मृति सम्मान”(1998) आ “हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार”(2003)। असम विश्वविद्यालय, सिल्चरक हिन्दी विभागमे अध्यापन। दुनूकेँ माछकेँ देखैत अछि स्त्री स्त्री केँ देखैत अछि माछ अहाँ दुनू केँ देखि रहल छी बुद्ध चरित बुद्ध चरित- गजेन्द्र ठाकुर माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक, ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक, भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ, मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आस्वस्त दुनू गोटे पाबि कए। महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म, चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त, वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक, बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत, राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक। बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर, देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर, बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल, उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब। वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक, भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि। दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार, फेर ढ़ेर रास होम जाप, करि गायक दान सिघ स्वर्णसँ छारि, घुरि नगर प्रवेश कएल माया, हाथी-दाँतक महफा चढ़ि। धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य, अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग, सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ। मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता, मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा। उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर, अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक, शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक। सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह, समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म। उत्सवक संग बितैत रहल दिन किछु दिन, सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक, सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक, सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक, क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बट ने घाट। एक युद्ध देशक भीतर- ज्योति एक युद्ध देशक भीतर अन्तर की लड़ैवला सैनिक संग सामान्य जन सीमाक जनजीवनक बदले अहिमे उच्चवर्ग भुक्तभोगी उपाय की कनिक त्याग आ संयम सऽ प्रमाणकेँ जगजाहिर कऽ समस्याक समूल नाश करी अन्यथा सदैव आशंकित रही एक एहेन शत्रु सऽ जे निरन्तर पीठ पर छुरी चलाबैत रहल सीधे सामनाक जकरामे ताकत नहिं चिन्हो कऽ जकरा दोषी कहक हमरा सबके अधिकार नहिं जान लुटाबैत सेना मान लुटाबैत राजनेता प्रजातंत्रक शानमे अधीर होएत जनता एहेन भयावह समयमे बनल रहै देशमे शान्ति आ एकता शब्द सऽ अति दरिद्र कोना सान्त्वना दिअ शहीद आ’ निर्दोष मृतकक परिवारकेँ बस इर्श्वरक असीम कृपा होए सैह अछि प्रार्थना आवश्यक अछि सुरक्षाकेँ आर दृढ़ करी हर नागरिक केँ तैयार करी अहिंसक दानवक दमन लेल कानूनकेँ कठोर करी सीमाक नियम ठोस करी नरसंहारकेँ रोकैलेल १. भालचन्द्र झा २.विनीत उत्पल ए.टी.डी., बी.ए., (अर्थशास्त्र), मुम्बईसँ थिएटर कलामे डिप्लोमा। मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आऽ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आऽ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। महाराष्ट्र राज्य उपाधि १९८६ आऽ १९९९ मे। थिएटर वर्कशॉप पर अतिथीय भाषण आऽ नामी संस्थानक नाटक प्रतियोगिताक हेतु न्यायाधीश। आइ.एन.टी. केर लेल नाटक “सीता” केर निर्देशन। “वासुदेव संगति” आइ.एन.टी.क लोक कलाक शोध आऽ प्रदर्शनसँ जुड़ल छथि आऽ नाट्यशालासँ जुड़ल छथि विकलांग बाल लेल थिएटरसँ। निम्न टी.वी. मीडियामे रचनात्मक निदेशक रूपेँ कार्य- आभलमया (मराठी दैनिक धारावाहिक ६० एपीसोड), आकाश (हिन्दी, जी.टी.वी.), जीवन संध्या (मराठी), सफलता (रजस्थानी), पोलिसनामा (महाराष्ट्र शासनक लेल), मुन्गी उदाली आकाशी (मराठी), जय गणेश (मराठी), कच्ची-सौन्धी (हिन्दी डी.डी.), यात्रा (मराठी), धनाजी नाना चौधरी (महाराष्ट्र शासनक लेल), श्री पी.के अना पाटिल (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( नशा-सुधारपर), आहट (एड्सपर), बैंगन राजा (बच्चाक लेल कठपुतली शो), मेरा देश महान (बच्चाक लेल कठपुतली शो), झूठा पालतू(बच्चाक लेल कठपुतली शो),
टी.वी. नाटक- बन्दी (लेखक- राजीव जोशी), शतकवली (लेखक- स्व. उत्पल दत्त), चित्रकाठी (लेखक- स्व. मनोहर वाकोडे), हृदयची गोस्ता (लेखक- राजीव जोशी), हद्दापार (लेखक- एह.एम.मराठे), वालन (लेखक- अज्ञात)।
लेखन-
बीछल बेरायल मराठी एकांकी, सिंहावलोकन (मराठी साहित्यक १५० वर्ष), आकाश (जी.टी.वी.क धारावाहिकक ३० एपीसोड), जीवन सन्ध्या( मराठी साप्ताहिक, डी.डी, मुम्बई), धनाजी नाना चौधरी (मराठी), स्वयम्बर (मराठी), फिर नहीं कभी नहीं( हिन्दी), आहट (हिन्दी), यात्रा ( मराठी सीरयल), मयूरपन्ख ( मराठी बाल-धारावाहिक), हेल्थकेअर इन २०० ए.डी.) (डी.डी.)।
थिएटर वर्कशॉप- कला विभाग, महाराष्ट्र सरकार, अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद, दक्षिण-मध्य क्षेत्र कला केन्द्र, नागपुर, स्व. गजानन जहागीरदारक प्राध्यापकत्वमे चन्द्राक फिल्मक लेल अभिनय स्कूल, उस्ताद अमजद अली खानक दू टा संगीत प्रदर्शन।
श्री भालचन्द्र झा एखन फ़्री-लान्स लेखक-निदेशकक रूपमे कार्यरत छथि। दू गो कविता १.अपन अस्तीत्वक असली मोल बुझबाक हुअए यदि अपन अस्तीत्वक असली मोल त पुछियौक सुकरातकें देखबियौक ओकरा विश्वक नक्शा पर पहिने अपन “देसक” अस्तीत्व ओहि देस मे अपन “राज्यक” अस्तीत्व राज्य मे अपन “जिलाक” अस्तीत्व जिला मे अपन “गामक” अस्तीत्व गाम मे अपन “घरक” अस्तीत्व आ तहन घर महुक “अपन” अस्तीत्व आ ई सभ “विश्वक नक्शा” पर से बूझि लियौक... २. हमर माय गर्भगृहक सुखासन सँ बहरेलहुँ त हमर जन्मदात्री अपसियाँत रहय भनसिया घर मे तीतल जारैन कें धूआँ मे करैत रहय धधराक आवाहन देहक धौंकनी कऽकऽ आ तहिया सँ लऽ कऽ आइ धरि ओकरा आन कोनो ठाम नहिं देखलियैक देखलियैक त बस कोनटा घरक ऐंठार पर सभक ऐंठ पखारैत कखनो अँगना बहारैत त कखनो जारैन बीछैत कखनो कपड़ा पसारैत त कखनो नेन्नासभक परिचर्या करैत खिन मे जाँत पर, त खिन मे ढेकी पर, चार पर, चिनमार पर अँगनाक मरबा पर, घरक असोरा पर दिन-दुपहर, तीनू पहर जोतल कखनो दाईक चाइन पर तेल रगड़ैत त कखनो छौंरी सभक जुट्टी गूहैत राति मे पहिने दाईकें आ तहन बाबूकें पएर दबबैत एहि तरहें ओकर जीवनक आध्यात्म भनसिया घर सँ शुरू भऽ कऽ भनसिये घर मे समाप्त भऽ गेलैक झुलसैत देखलियैक चूल्हिक आगि मे नारीक स्वतंत्रता, ओकर अस्मिता ओकर मान आ स्वाभिमानकें कहाँ भेटलैक पलखतियो ओकरा एहि सभ दिसि ताकहो कें आइ सोचै छी सेहो नीके भेलैक अगिलुका पीढ़ी सचेत भऽ गेलैक भलमनसियत सँ जँ नहिं भेटलैक त छिनबाक ताकति भेटि गेलैक मुदा ताँहिं की हमर मायक त्याग आ बलिदान ईब्सेन कें नोरा सँ अथवा गोर्कीक माय सँ रत्तियो भरि कम कहाओत? हमरा जनितबे रत्ती भरि बेसिये बूझू ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक। सपना अधूरे रहि गेल आकाश मंडल साफ़ सूर्यक तापमान मध्यम-मध्यम लोक नीक कए एक अलगे रोमांसक भाव आबैत रहैत ओहि दिन जखन हम आउर अहां एक-दोसर कए आगोश मे सिमैट गेलिह सूर्यक ताप कम भए गेल वायुक वेग उद्वीग्न भए गेल एक-दोसर कए निहारैत, निखारैत दूई सांस एक भए गेल एक दोसर मे पूर्णरुपेण समाबईक लेल रोआं-रोआं पुलकित छल मुदा, जना सूर्य आ चांद, आसमान आ धरती एक नहि होइत तहिना हमर सपना अधूरे रहि गेल और सभ लोग चिर निद्रा मे आलीन भए गेल. सामाजिक प्राणी पहिलुख बेर अहां सं भेल जखन भेंट नहि अहां मे किछु एहन गुण भेटलाह जकरा याद करतियैथ मुदा, धीरे-धीरे सबंध प्रगाढ़ भेल नहि रहलों हम आउर अहां अनजान कनि-कनि कए एक दोसरा कए चिनलहुं सुख-दुख मे संग काज-बेकाजक गप सेहो शेयर भेल दिन होइत या राति जखन मोन परत तखने फ़ोन सं गप भए जाइत छैक जीवनक यात्रा कखन तक साथ चलत कियो नहि जानैत छैक मुदा, एक टा गप मानैये परत जे मोन कए कोनो कोन एक-दोसरक बिना खाली छैक अरस्तु कहलक रहैक "मनुख एक टा सामाजिक प्राणी छैक" तहि सं सामाजिकताक ख्याल करि हम दूर-दूर छी नहि तए कहिया एक भेल गेल रहतियै. जीवनक पथिक हम जीवनक पथिक छी जहिना रेलगाड़ी चलैत काल अपन पाछं प्लेटफ़ार्म कए छोड़ित चलैत छैक तहिना जीवन मे पड़ाव आबैत रहैत छैक अहां हमरा लेल जीवनक कोनो पड़ाव पर नीक करलहुं या अदलाह हम अहांक लेल अदलाह करलहुं या नीक जखन हम वा अहां एक बेर शांत दिमाग आ शांत दिल सं सोचबै या सोचब जखन विकट परिस्थिति कए सामना करै परत तखन जे दोषी होइत ऊ अपन चेहरा आइना मे नहि देखि सकत अपना कए कहियो माफ़ नहि कए सकत मुदा, हे पथिक ओहि काल हुनकर हाथ मे किछु नहि रहत नहि ओहि ठाम नहि हाथ मे समय. 1.डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। खयाल श्मशानमे फुलायल फूलक गंध मिज्झर होइत रातरानी फूलक गंधमे पसरैत अछि दहो-दिस तीव्रगंधी चिरायंध गंध जकां भैरवी केर तान जकां तबला मिलबैत काल क्यो हमरा हाक दऽ रहल अछि कइक युगसँ ओलतीमे ठाढ़ घोघ तानसँ उतप्त श्वास केर परागकण सन्हियाइत अछि मोनक कोनमे उठैत बोल खसैत अछि स्मृतिक तीव्र धारमे आ भसियाइत चलि जाइत अछि हमर अधजरु लहास सरगम केर तान जकां कपरजरू केर विशेषण सुनैत-सुनैत अहाँक एहि यमन-कालमे हम नहि क सकलहुँ नीक जकां संगत से ठीके भेल बहुत असंगत कहरवा बजबैत ठोह पाड़िकेँ कनैत एहि मरुभूमिमे मुखड़ा केर मृगतृष्णाक पाछाँ बौआइत रहि जाइत छी संतापित संलापित कइक योजन धरि अवरोहणक प्रवाहमे। 2. अंकुर काशीनाथ झा- गाम कोइलख, जिला मधुबनी। नेपाल-1 टेलीविजनक मैथिली समाचार वाचक पश्चाताप असत्यक धार मे, पापक पथ पर, अधर्मक दिशा मे, अविरल चलैत रहलौं । किछु करबाक आश मे, आगू निकलबाक प्रयास मे, सैदखन लड़ैत रहलौं । दोसरक दुख दर्द सऽ दूर, सफलता के नशा मे चूर, जीतबाक लेल, की - की नहि केलौं । मुदा जखन हम धारक पार पहुंचल छी, असगर थाकल छी, शरीर सऽ हारल छी, अंतःवेदना सऽ ग्रसित पड़ल छी, तऽ आत्मा पूछि रहल अछि, जे उपर संग की लऽ जैब, हम निरूत्तर, पश्चातापक संग नोर बहा रहल छी॥ कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। गजल आदमी छल - छद्मक मोहरा बनल । आब गामो पर शहरक पहरा पड़ल । मनुक्खे रहल, मनुक्ख्ता लुटि गेलई। लट पांचाली के फेर सँ खुजले रहल । रंग अपनहुँ के आब जर्द सन भऽ गेलई। जिनगीक महल आई खंडहर सन ढ़हल। आब ककरा सँ कहतई मोनक व्यथा। कान मालिको के तऽ छई पाथरे बनल। अपनो पर कोना आब कोई भरोसा करय। सांस-सांसो मे माहुर आछ भरल पड़ल। बाटक धूरा जकाँ उड़िते रहि गेलहुँ। आँखि कानल मुदा मोन नहिये भरल। रूपेश कुमार झा 'त्योंथ',ग्राम+पत्रालय-त्योंथा,भाया-खिरहर, थाना-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी,सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक स्तर मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सेहो सक्रिय, दर्जन भरि रचना पत्र-पत्रकादि मे प्रकाशित। बूथ कैप्चरिग कोन पाप लागल से ने जानि घुरि अयलहुँ मोनक बात मानि नोकरी सँ ने भेटैत अवकाश ने करितहुँ हम ई गाम वास अयलहुँ तऽ लागय सभटा नीक अछि ने मुदा किछुओ ठीक आब गामक हवा अछि बिगड़ल अछि स्वार्त जल सँ सभ भीजल तथापि रहैत छलहुँ हर्षित भेल समाजक हेतु समर्पित मुदा आयल बइमनमा चुनाव बढ़ल लोक सभक आब भाव ग्रामीण सभ मिलि कयलक बैसार भेल ओ जे छल ने आसार सभ क्यो कयलक आग्रह प्रगाढ़ जे होऊ अहाँ एहि बेर ठाढ़ सोचल दी कोना लोकक बात काटि सेवाक अवसर देलक आइ माटि बनि एहि पंचायतक हम मुखिया रहय देबै ने ककरो दुखिया सोचि बनल मुखियाक प्रतिनिधि कल जोड़ि पोस्टर छपओलहुँ सविधि प्रचार मे जुटलहुँ दिन-राति विरुद्ध मे ठाढ़ भेल कतेको पछाति भेल शुरू मारामारी-गड़ागड़ौवल कएक ठाम भेल लठा-लठौवल भेटल सभ केँ दू-चारि गोट नोट खसलहि दोसरेक हक मे वोट तइयो नहि भेटलै संतोष छपलक बूथ मिलि सभ दोस परिणाम सुनि भेलहुँ स्तब्ध भऽ गेल छल हमर जमानत जब्त घर सँ निकलैत आब होइछ लाज किएक कयलहुँ हम एहन काज बैसब ने मुदा निश्चित आब हेबे करतै फेरो चुनाव होयब ठाढ़ हम फेर जा पोसब गुंडा आब कएकटा उगि गेलैछ हमरो दू गोट सिंग करब हमहुँ आब बूथ कैप्चरिग कला आ संगीत शिक्षा हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत प्राती ,गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा,सोहर,खेलउना, कुमार,परिछन ,चुमान, डहकन ,बिषहारा गीत , झूमरि ,बटगमनी,मलार चैमासा ,लगनी ,समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि । जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ बाचल अछि तकरा संग्रहित कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि । संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक संस्कार ,रीति रिवाज , पर्व त्योहार ओ )तु पर आधारित गीतक समृ( परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि । मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक प्रशंसा में वृहद्विष्णुपुराणक उक्ति अछि धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने । विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः ।। सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता । तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता ।। अर्थात् हे मुनीश्वर ! ओ धन्य छथि जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम घूमइ छथि । ई मिथिला सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसि( अछि । ते तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल । पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी , पिप्पलीवन , फुलहर ,गिरिजास्थान , विलावती , हरित्वेकी , कूपेश्वर ;कुशेश्वरस्थान द्ध , सिंहेश्वर , जनकपुर ,वनग्राम ,सिन्दूरेश्वर , त्रपनायनवन , विषहर , मंगला, मंगलवती विरजा , पापहारिणी , सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक मिथिला माहात्म्य में वर्णन कएल गेल अछि । मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि । ब्राह्मवेलाक, पराती , श्रमगीत;लगनीद्ध ,गोदना , भगवतीक आवाहन गीत ;गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध , कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । ओहि लुप्तप्राय गीत सभक शब्द रचना ,धुन ,स्वर ,लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि । सब तरहें ज्ञान कें बढ्ऱाब बला , संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक अछि ओ गीत सभ । एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि । प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में - अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन अजहु भजन चित चेत ।। बालापन तरूणापन बीतल , केस भये सभ सेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। जा मुख राम नाम ने आबत , मानहु सो जन प्रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ , परए नरक के रेत मुगुध मन । अजहुॅ ।। साहेबदास तोहि क्या लागत , राम नाम मुख लेत मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत ।। परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि - जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल । परातीक भास आ भाव लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल । ओहि भासक पराती केहन होइत अछि ,देखल जाय - प्राण रहत नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। काहि पुछओ कोई मोहि ने बताबए , कहाॅ गेल नन्द किशोर । श्याम बिनु ।। छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन , नैन झझाइछ नोर । श्याम बिनु ।। साध्यौ मौन कानन पशु पंछी , कतहु ने कुहुकए मोर । श्याम बिनु ।। हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब , साहेब जीवन दि न थोर । श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर ।। मधुबनी में श्री दुर्गास्थान ,कोइलख में भद्रकाली,श्री दुर्गाशक्तिपीठ , मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे राजराजेश्वरी ,जितवारपुर मे सि(काली पीठ ,ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान , खोजपुर में तारामंदिर , सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा , विराटपुर मे चण्डिका ,बदलाघाट मे कात्यायनी , पचगछिया मे श्री कंकाली , पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या ,देवनाडीह मे वनदुर्गा , दरभंगा मे श्यामामंदिर , म्लेच्छमर्दिनी , गलमा मे तारास्थान ,पचही मे चामुण्डा , अहल्यास्थान ,ककरौल मे शीतला स्थान , पूर्णियां मे पूरनदेवी , अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर , मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी , सखरा मे सखलेश्वरी , उच्चैठ मे छिन्नमस्तिका , चम्पारन मे वैराटी देवी , चण्डी स्थान , सहोदरा स्थान सन कतेको देवी तीर्थ सॅ सम्पन्न मिथिलाक जन जन मे देवी शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि । मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल। संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ । कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत । यथा 1पारंपरिक जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी । सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी ।। कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे । घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे ।। 2 म0म0मदन उपाध्याय जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर माले । परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले । । पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले । त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले ।। शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले । अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले ।। मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे । हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे ।। रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे । श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे ।। अतिशय हासिनि कमल विलासिनि तिमिर विनासिनि वर सारे । हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे ।। जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले ।। 3 पारंपरिक करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार । के मोरा नैया के मोर खेबैया के मोरा उतारत पार हे जननी ।। अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी ।। के मोरा माता पिता मोर के छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी ।। अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी ।। 4 कालिकान्त अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी ।। अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा , नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी ।। रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा , प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी ।। विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी ।। विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी ।। 5 पारंपरिक सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा ।। जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी , आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा ।। केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल , हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा ।। दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए , सुखमय जग करू दान हे मा ।। काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ , मुक्तिक देहु वरदान हे मा ।। 6 पारंपरिक हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे ।। प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे । अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे ।। विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे । सबटा अहाॅ जनै छी हे माता ,हम त किछु ने जनै छी हे ।। मात पिता हित मित कुल परिजन माया जाल बझल छी हे । जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे ।। 7 पारंपरिक हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय ।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय ।। युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।। दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय ।। अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी ,एहन ने जिनगी सोहाय ।। 8 महाकवि विद्यापति आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष ।। बाम लेल खपर दहिन लेल काति , असुर के बधए चललि निशि राति ।। आदि भवानी विनय तुअ पाय ,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय ।। तुअ भल छाज देवि मुण्डहार , नूपूर शबद करए छनकार ।। भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि ।। आदि भवानी 9 कवीश्वर चन्दा झा तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान ।। जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान ।। परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान । मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब आन ।। जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम । नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम ।। शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे थिर पति अनुराग । तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग ।। इ नवो गीत नौ धुन मे अछि । एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक बेवहार नहि देखल जाइछ । परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि । एकर अतिरिक्त गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृ( परंपरा रहल अछि । मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि । नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी प्रगट होइत छथि । बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि । बतहू यादव सन भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाॅचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे । मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाॅस जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे ।। गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा आइ मइया गहबर अबियउ हे । मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाॅ पड़इ छी हे ।। जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे , भवानी माता के गोदिया हे । मइया जी हे तहिना खेलाबहु जग बीच जगदम्बा आब मइया गहबर अबियउ हे ।। नामो ने जनइ छी मइया पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे । मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे ।। गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे मइया अद्या जलामुखी हे । मइयाजी हे राखि लिअउ अरज केर लाज जगदम्बा सेवक कलजोड़इए हे।। (अगिला अंकमे) बालानां कृते 1.प्रकाश झा- बाल कवित 2. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर 3. देवीजी: ज्योति झा चौधरी 1.प्रकाश झा, सुपरिचित रंगकर्मी। राष्ट्रीय स्तरक सांस्कृतिक संस्था सभक संग कार्यक अनुभव। शोध आलेख (लोकनाट्य एवं रंगमंच) आऽ कथा लेखन। राष्ट्रीय जूनियर फेलोशिप, भारत सरकार प्राप्त। राजधानी दिल्लीमे मैथिली लोक रंग महोत्सवक शुरुआत। मैथिली लोककला आऽ संस्कृतिक प्रलेखन आऽ विश्व फलकपर विस्तारक लेल प्रतिबद्ध। अपन कर्मठ संगीक संग मैलोरंगक संस्थापक, निदेशक। मैलोरंग पत्रिकाक सम्पादन। संप्रति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्लीक रंगमंचीय शोध पत्रिका रंग-प्रसंगक सहयोगी संपादकक रूपमे कार्यरत। ( मिथिलामे सभस’ उपेक्षित अछि मिथिलाक भविष्य ; यानी मिथिलाक बच्चा । मैथिली भाषामे बाल-बुदरुक लेल किछु गीतमय रचना अखन तक नहि भेल अछि जकरा बच्चा रटिक’ हरदम गावे-गुनगुनावे जाहिसँ बच्चा मस्तीमे रहै आ ओकर मानसिक विकास दृढ़ हुऎ । एहि ठाम प्रस्तुत अछि बौआ-बच्चाक लेल किछु बाल कविता । ) १. प्रकाश झा बाल-बुदरुकक लेल कविता बाल कवित : फूलडाली में फूल छै, पूजा हेतैन देवान के। गेंदा, गुलाब, कनैल छै, माला बनतैन भगवान के। लाल लाल गुलाब छै, अड़हुल सेहो लाल । तीरा सेहो लाल छै , माधुरियो होए छै लाल । सुन्दर फूल कनैल के, पीयर ओकर रंग । फर तोड़ि क’ खेलै छै , बच्चा बुच्ची ओकर संग । 2. बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर १.गरीबन बाबा कमला कातक उधरा गाममे तीनटा संगी रहथि। पहिने गामे-गामे अखराहा रहए, ओतए ई तीनू संगी कुश्ती लड़थि आऽ पहलमानी करथि। बरहम ठाकुर रहथि ब्राह्मण, घासी रहथि यादव आऽ गरीबन रहथि धोबि। अखराहा लग कमला माइक पीड़ी छल। एक बेर गरीबनक पएर ओहि पीड़ीमे लागि गेलन्हि, जाहिसँ कमला मैय्या तमसा गेलीह आऽ इन्द्रक दरबारसँ एकटा बाघिन अनलन्हि आऽ ओकरासँ अखराहामे गरीबनक युद्ध भेल। गरीबन मारल गेलाह। गरीबनकेँ कमला धारमे फेंकि देल गेलन्हि आऽ हुनकर लहाश एकटा धोबिया घाटपर कपड़ा साफ करैत एकटा धोबि लग पहुँचल। हुनका कपड़ा साफ करएमे दिक्कत भेलन्हि से ओऽ लहाशकेँ सहटारि कए दोसर दिस बहा देलन्हि। चित्र ज्योति झा चौधरी एम्हर गरीबनक कनियाँ गरीबनक मुइलाक समाचार सुनि दुखित मोने आर्तनाद कए भगवानकेँ सुमिरलन्हि। आब भगवानक कृपासँ गरीबनक आत्मा एक गोटेक शरीरमे पैसि गेल आऽ ओऽ भगता खेलाए लागल। भगता कहलन्हि जे एक गोटे धोबि हुनकर अपमान केलन्हि से ओऽ शाप दैत छथिन्ह जे सभ धोबि मिलि हुनकर लहाशकेँ कमला धारसँ निकालि कए दाह-संस्कार करथि नहि तँ धोबि सभक भट्ठीमे कपड़ा जरि जाएत। सभ गोटे ई सुनि धारमे कूदि लहाशकेँ निकालि दाह संस्कार केलन्हि। तकर बादसँ गरीबन बाबा भट्ठीक कपड़ाक रक्षा करैत आएल छथि। २.लालमैनबाबा चित्र ज्योति झा चौधरी नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आऽ लालमैन बाबा। दुनू गोटे चमार जातिक रहथि आऽ संगे-संगे महीस चरबथि। ओहि समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतहि एक दिन लालमैनक महीसकेँ बाघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबएमे बाघिनसँ लड़ए तँ लगलाह मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नहि केलन्हि आऽ मारल गेलाह। मनसारामकेँ ओऽ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो नहि ई गप कहलन्हि। एहिसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आऽ ओऽ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कए लालमैन बबाक दाह संस्कार कएलन्हि आऽ हुनकर भगता मानल गेल, एखनो ओऽ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करैत छथि। 3. देवीजी: ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी राजेन्द्र प्रसाद जन्मदिवस परीक्षाक समाप्ति भेलापर सब बच्च सब बहुत निश्चिन्त छल।लेकिन देवीजी परिणाम घोषित हुअ तक के समय के व्यर्थ नहिं बिताबऽ चाहैत रहैथ।ताहि पर सऽ बिहारके महान स्वतंत्रता सेनानी एवम् देशके प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के जन्मदिवस छल ३ दिसम्बर कऽ।तैं ओ बच्चा सबके विद्यालय बजेली। चित्र ज्योति झा चौधरी देवीजी सबके बतेलखिन जे डॉ राजेन्द्र प्रसादके बच्चेसऽ धार्मिक एकताक ज्ञान भेटल छलैन।माय हुनका रामायण पढ़िकऽ सुनाबै छलखिन आ पिता मौलवी लग पठा फारसी सिखाबई छलखिन।बारह साल तक गणतंत्र भारतके प्रथम राष्ट्रपतिक पदके सम्मानित केलाक बाद ओ स्वेच्छा सऽ २८ फरवरी १९६३मे पद सऽ इस्तिफा दऽ देलैथ।ओ अति विलक्षण बुद्धिक स्वामी छलाह आ गॉंधीजीक विचारसऽ प्रेरित भऽ अपन वकालत छोड़ि स्वतंत्रता संग्राममे कुदि गेलाह। धार्मिक एकताक बात उठल तऽ सब बच्चा सब अपन-अपन धर्मक विषेशता पर तथा अपन पाबनिके मनाबक ढ़ंग पर अपन विचार व्यक्त केलक।अहि तरहे सामुदायिक एकता पर विचारविमर्श कऽ सब अहि महान नेताके श्रद्धांजली देलक। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) जय गणेशाय नम: (1) प्रथ पत्र पन्जी लिखते: अथ सरिसब ग्राम: देवादित्य रतनाकपत्य छादन प्रजाकरापत्य बनौली रम समेत निविकर सन्तति केशव पत्य दनाद गंगश्वरा पत्य गौरि शौरि कुलपति बधवाम् महिपाणि सन्तित खांगुड़ गयड़ा समेत ग्रहेश्वरापत्य जोंकी गणेश्वरा पत्य सकुरी सोने सन्तति कटमा ओ सकुरी भवदित्य पत्य सतैढ़ रघुनाथापत्य उल्लू कौशिक उल्लू गिरीश्वरापत्य सतैढ़ वास्तु सुत ऋषि सवेढ़ सम्प्रति फरकीया शिवादित्यापत्य रवाल मतहनी हरादित्यापत्य बलिवास श्री करापत्य ननौरे शुचिकरा पत्य जगन्नाथ पूर हल्लैश्वर रूद्र पुर पैक टोल केवब बागे वसुन्धर नरघोघ रामदेवापत्य सिंडोला काम देवापत्य डीगरी गढपति सन्तित गौर वोड़ा दाश नजिबाक ग्राम भासे सन्ति वनिआ रातु दिगल्ध कान्ह सन्तित गोविन्द श्राड़ाम सोय सन्तिति नाटस सुपन वालू देहथि नारायण पुराइ ब्रहमपुर मिश्र रामापत्य अचौही शुचिकरा पल लिया ब्रह्म पुर छीतू पारू पीलखा शिवाई महु लिया जहरौली ईवश्वर नारू नोटड़ श्री धरापत्य दिमन्दरा एते जजिवाल गान अय स्वान्द पल ठ हराइ सन्तति भखराइन सोमेश्वरा पत्य बुल्लन कधुंवा समेत ठ. अनन्त हरि लखनौर भोगीश्वर पत्य गोपल सन्तित बथई हरड़ी गढाघरा पल्टा पौराम रतनाकरापत्य हलधर ते तरिआ हरिड़ी खाडबसा ठ; इबे सन्तति भौर लाखू महिमकति बेहर यमुगाम योगीश्वरापत्य सोन्दपुर सरपना कुरहनी वासी श्रीर स्पष्टता शुभद्रका पत्य देशुआल झाम सन्तित हैयाश गुरदी सोन करमे वास्तु लागू हिस् देउरी गोपालपत्य गढ़ देने सन्ति चतुआरी पक्षधरा पल तेतरिआ दिन करायल्प प्रोराग बधरी बिहारी अगय गोरदी साधु सन्ति बधयी लक्षमीमति सन्तित सरसा गणेश्वरा पत्य गुलदी हल्लेश्वर पत्य केलारी जीवेश्वर पत्य आलय (2) ''अ'' पोमकंठ सरपरब रबि सन्तति गौर ब्रह्मपुर जयकर सन्तति सजनी भासे डीह देवेश्वरापत्य देशुआल पक्षीश्वरा पत्य यमुगाम गिरीश्वर मत्य देशुआल विन्ध्येश्वर पत्य वैकुण्ठपुर शितिकंठसन्तति खुली। रतनेश्वर परन गुलदी अथ गंगोली ग्राम महामहो सुपट सन्तित गोम कटमा होरे सन्तति बिसपी हारू सन्तित देशुआल हरि सन्तित डुमरा दिवाकरापत्य दिगुन्ध गौरीश्वर सन्तति जगनाथा पत्य धर्मपुर कुमर गंगोली वासी कमल पानि वैगनी 93 ग्राम डालू सन्तति सकुरी गयन सन्ति खरसौनी एते गंगोली ग्राम ग्राम पबौली ग्राम रवि सन्तित बिरौलि उदयकर सन्ति सपता देशुआल महिपति सन्तति कोशीपार डुमराही हरियाणि सन्तित गोधनपुर लक्ष्मीदत्तापत्य गोनोली नारू सन्ति मतौनी डहुआ रूद सन्तति बछौनी रूद सुत पाठक भीम मीरगोआ जागू सन्तति रथपुरा विशो सन्तति चणौर बासु गौरि सन्तति महरैल केशव गोविन्दापत्य राजे दामोदरापत्य राजे शिवदत्ता पत्य बढ्यिाना गोगे सन्तिति सहुड़ी यशोधरापत्य मेयाम दामू सन्तति सम्मा पुण्याकरपत्य पैकटोल पनिहथ उँदयी सन्तति धेनु मधुकर तनाकर प्रजा कर दियाकर पत्य जगति एबे पर्वमललीगा्रम अथ सोदपुर ग्राम:-ग्रहेश्वरापत्य धउल :दे्रवश्परापत्य विरपुर धीरेश्वरापत्य सुन्दर विश्वश्रापत्य माधव टसौली रामापत्य रमौली बाटू बड़साम रूचि बासुदेव कुसौली यताधरापत्य पचही गयनापत्य: रोहाड़ बहेड़ा रति हरि टाटी वास्तु सन्तति तेतरिहार रूपे सन्तति सिमर वाड़ बसाडनापत्य कन्हौली कामेश्वर सुरेश्वर राम (3) नाथापस: भौआल कान्हापत्य सुखैत त्रिपुरे अकडीहा रतिनाथा पत्य डालू कटका बाटू हलधर केडटगामा सुधावरा पत्य गौर म म रविनाथ सुत मामतुर जीवानापत्य दिगुन्ध म म उठ भवनाथ प्र अयाचीयुत ममडा शंकर मटो महादेव महो मासे महोदारी सन्ति सरिसन अपरा भवनाथ प्र अचाचीसुत शम्भुनाथ रूद्रनाथापत्य बालि महामही देवताधापत्य दिगानुन्ध महो रघुनाधापात्य रैयाम जोर सन्तति विठौली मिसरौली गोपीनाथा पत्य मानी, जगौर म स उ जीनेश्वर सुत गणपति हरिपति महिया लोकनाथापत्य माझियाम खोरि। हरदन्त माधदापत्य राहड़ सुहगरि देवे सन्तति मयि एते साद पुर ग्रामा जुथ गंगोरग्राम बीनू बालू कुरूम भैआल केशवापत्य भुहियारी पोनद सनाथ सन्तति विरनी वासी भारे सन्तति महिन्द्र पुर विटू फदि बेकक अय पल्ली ग्राम:-हलधर सन्तति = बनाइनि।। मह यहां उँमापति समौलि, वारी, जरहरिया।। रूपनाथ सन्तति गिरपति = समौलि। पशुपति = समौलि।। महाप्रबंधक।। रघुनाथापत्य: दड़मपुरा नरहरि, रघुपति सन्तति = समोलि।। देवधरापत्य = कछरा, देउरी।। गांगु सन्तति=दोउरी।। दिवाकरापत्य=देउरी, सकुरी, मोहरी=कटैया घोटक रवि सन्तति=कटैया।। ग्रहेश्वरापत्य: कछरा।। रामकरापत्य=भालय।। जितिवरापत्य राजेसतिश्वरापत्य=सिम्मुनाम ।। कान्हापत्य= पड़ौतिन।। विरममिश्रापत्य=ततैल।। रामदत्त सुत केशव सन्तति=कान्ह=हाटी।। महार्ड सन्तति=अतयी।। वंशधरा पत्य=अलय।।गोविन्दा पत्य=रैयम।। कीखे सन्तति राम सन्तति वाटू सन्तति=नंगवाल मिमाकरापत्य= पर्जुआरि हिताई सन्तति विरूपाक्षा पल कैसुता =बैकुंठपुर।। हारू सन्तति= नैकंधा।। कविराज (4) ''आ'' सन्तित=मछैटा।। सिंहश्ेवरापत्य=ननौर।। मित्रकरापत्य=ननौर-राजखड़, पाली ।। जयकरापत्य=पिण्डाघर, क रहता, रनाहास पानी कछरा।। माधका।। पत्य गौरीश्वरापत्य अहियारी, दूपामारी।। गणपति गांगु सन्तित=अहियारी।।यशु, डगरू सन्तति=कुरूम।। बागू सन्तति=रोहाल, कटैया।। गोविन्दा।। पत्य हचलू सुत दिवाकरा पत्य=सुदई षनिहथ।। होराइ सन्तति=अडि़यारी।। रूद्रश्वरा पत्य=भड़गामा। बाटू सन्तित=सन्दसाही, परली पाली, विशानन्द पत्य=ब्रहमपुर थेतनि सन्तित= जलकौर पाली।। चन्दौत पाली दुर्गादित्य पत्य=भड़गामा।।बाटू सन्तति=सन्दसाही, पाली पाली।। विशानन्द पत्य ब्रहमपुर।। थेतनि सन्तित=जलकौर पाली।। चन्दौत पाली दुर्गादित्य पल =महिषी देवादित्यपत्य= बिहार महिषी समेत।। रतनू प्रजना दित्य पपत्य महिषी।। रतनाकरापल=यशी।।ततो जलकौर पाली।। चन्दौत पाली दुर्गादित्यपल=महिषी देवादित्स पत्य= बिहारा महिषी समेत।। रतनू प्र तनादित्य पत्रू=महिषी।। रतनाकरा पत=याशी।। ततो धोधनि सन्तति=याशी।। दिशो, झीकर शुचिकए पल=पुरोठी।। जीवे सन्तति=मोनी।।बाद ऋतति आठी ससुधारापत्य मागु सन्तति=मोनी भवदन्तापत्य=पुरोही (100/105) शुभकर। पत्य=जमदौली।। पौथू सन्तति=परसौनी, जरहटिया सकुरी।। कसमाकर सन्तति जमदौसी ।।यहा धरा पत्य =सकुरी।। जीवधर वशीधरापत्य=सकुरी।। बुद्धिघर। पत्य=ततैस।। कान्हापत्य=अलय, सकुरी।। इन सन्तति सकुरी।। मुरारी सन्तति समापत्य=महिन्द्रवाड़ विशो सन्तति रूद्रवश्वरपत्य कोलहट्टा गणेश्वर नन्दीश्वर पत्य =महिन्द्रवाड़ गोविन्दापत्य=हरिपुर।।विरश्वर नरसिंहापत्य=रादी।। श्रीधरापत्य बेहउँठ राढ़ी।। गुणीश्वर पत्य। कोउलाव।। ग्रहेश्वरापत्य चहुँटा।। शोपालापत्य=समैया हरिपाणि सन्तति=समैया।। बाहरे सन्तति होरेश्वर मतिश्वर मंगरौनी।। बाट सन्तति=कटउना ।।जसू, रातू सन्तति=अकुरी।। गणपति सन्तति भगवसन्तति=पचाढ़ी।। गुणाकरा पत्य बरेहता सोन्दवाड़।। पुरदित्या पत्य=मृगस्थनी एते पल्ली ग्राम (5) हरड़ी।।धनेश्वर-मझियाम, कनईल, लोटना समेत।। लाखू सन्तति-कनइल।। चाण सन्तति रतिश्वर छामू।। रामकर कृष्णाकर थुगाम बाहरी।। भोड़ो सन्तति शंकर गूढ़-दिवड़ा।। इबे-जरहटिया ।।देवे सन्तति-रहड़ा।। गोढ़े-रहड़ा।। गोन्दन चाण-।। पुरोहित गोपाल सन्तित माह वरूआड़ सुपे संखवाड।। श्रीकर पेकटोल गौरीश्वर -तेकुना।।भगव -पुरामनिहरा।। चक्रेश्वर सन्तति-दुहुड़ा कटरा। देहरि ततैत।। सोम-तेतेल सान्हि सन्ति गोधनपुर।। देवे सन्तति-कादिक पूर। (ताइ-तत्रेव ।। ।। गोना एकराढ़ी-थितिकएपत्य-आड़ावासी-मझियाम समेत।। बुधौरा सकरादी, दूबा-सबुराढ़ी अन्हार बरगामा समेत।। एके सेकराढ़ी ग्राम।। अथ ढरिहरा ग्राम:-त्रिपुरारि सन्तति-सिंहाश्रम।। हरिकर बुद्धिकर सपनादि विजनपुर।। यशस्पति सन्तति गणपति गड़ैली गुणपति सन्तति-पठोड़ी)।। विद्यापति = पुडरीक=मछली। केशव-अमरावती। शिरू-कुरूम सोने सन्तति औजाल।। शिव-यमुग्राम ।। गुणाकर पद्यकर मधुकरपट्टो प्रजाकररापत्य कुसुमाक 9उगाम ।। मित्रकरापत्य=जरहरिआ।। प्रसाद गौरीश्वरपत्य-भाडड़ सन्ह समेत।। दिवाकरापत्य= असई। दिनकरापत्रू सोनतौला।। रतिशर्म्मा वस -सकुरी।। इन्द्रपति= हरिनगर। आग्नेय।। झोंटपाली दरिहर सिमसिक कोइला विश्वनाआपत्य-महिसान-कोइलख समेज।। दिघुपति-तत्रैव।। होरे उराढ़ वासी।। गांगू-कघरा।। रघुपति सेठय कठरा।। कान्ह= कटैया।। जादू सरहरा वाही कृष्णपति-गुणीश्वर=फूलमती।। सुन्दर-गांगू=तत्रैव।। मतीश्वरापत्य= सुन्दर असई समेत।। सुरपति=गोलहटी, अलय समेत।। गिरीश्वरापत्य-उडिसम।। पण्डोलि दरिहरा=हरिकर सन्तति सिहौली शंक मरनामक गोढ़े-नवहथ।। कान्हा पत्य=आसो-चिलकौरि।। भादू सन्तति=ततैल, तेतरिआ, सिमार (6) ''उ'' कनसम।। गोढि़ सन्तति=बढि़याम। सुपन सन्तति=गांगू मिट्टी।। विशो=तत्रैव।। हिक सावे=दीघीया।। धीरेवश्वर सन्तति=तारडीह जलकौर=तरिहोश। मिश्र कान्हापत्य= मतडना।। गंगेश्वर सन्तति मिश्र दुर्गादित्यापत्य=चदुआल।। देवधरापत्य।। अग्निहोत्रिक महामहोहरि सन्तति= नेतवाड़ ।। नारू सुत रूचि=मठुआल।।विभाकारापत्य=सिंधिया।। प्रभाकर सुत जुधे= पटसा।। नोने-जगवाल।। नारू सुत बाटू प्रभृति=अन्दोली।। गोढि सन्तति= धनकौलि मिश्र हरि सुत चण्डेश्वर= चंटुगामा।। नारायण=उने।। मिस मतिकर= बघोली।। धामू सन्तति= पोजारी।। शूलपाणि=रतौली नीलकंठ=पोखरिया रूपन=रतौली।।खांतर=बड़गाम।। बासू सन्तति=बाली मुनि विरश्वरपत्य दिवाकर=राजनपूरा।। रविकर=छत्रनध राजनपुरा, सीसब समेत।। गुणाकर सिढि़बाला।। हरिकर=जरहटिया, ततैत समेत।। समेत।। ब्रहमेश्वरपत्य रजनाकरापत्य पभ्रारी।। विश्वरूपसन्तति=पनिहारी।। शूलपाणिभ्राता नीलकंठ= बोथरिया।। रूपन सुत भोग गिरी=रतोली।। यवेश्वर= जरहरिया=ब्रहमेश्वर तत्रैव।।एते दरिहए ग्राक।। 112 पथ माण्डर ग्राम:-गढ़ माण्डर कामेश्वरापत्य=बथया।। महत्तक जोर सन्तति= बघांत।। सुइ भवादित्रूया पत्य= कनैल, बुठौली समेत।।दिवाकरापत्य= जोंकी, मढिझमना।। हरदत्त सन्तति सनतिया।। गुणाकर, जयकर खनतिया।। माधवापत्य=अरडि़या।। रति,डालू-भौखाल, दोलमान पुर।। बेगुडीहा।। खांतू। ठाकुर, सरवाइ, कउटू सन्तति=भौआल।। गदाई=दोलमानपुर=केशवापत्य=असमा।।कानहापत्य=आसमा।। सूपे, विभू= कटमा विभू, भानुकर दिलरवा।। कविराज शुभंकराएल = कटमा।। वागीश्वरापत्य=महिषी, गांगे।।रूपधरा पत्य=मड़रौनी।। रविदन्तापत्य विशो= देउरी।। (7) हरिकर=विजहरा।।खांत=जरहटिया।। हरि=मडरौना।। हौरे= केउंट गामा।। सुधाकर=वारी।। शुभंकर=सकुरी।। पशुपति सन्तति गुणपति=ओकी।। (18/09) शिवपति इन्द्रपति=रजौर। कृष्णपति=पतौनी।।रघुपति=जगौरा।।प्रजापति=अमरावती।। छीतर= जगौर।। आड़नि सन्तति कुलपतिक कटैया।। नशपति =दहुला।। रविपति=कटका।।महादेव=सिर खडि़या (श्रीखंड)।। रतिपति (18/03) =सिहौलि)। दूबे=दुबौली।। पौखू= बिठुआला।। धनयात्यां =सरहद।। विधूपति=पतनुका।। सुरपति, रतन=कनखम।। सोम=बेहद।। भवे, महेश= कटैया ।। गुणीश्वर=कटाई ।। पीताम्बरा पत्य= कटाई, जमुआल।। देवनाथ शीरू=जरहरिया, मकुरी।। लक्षमीकांतापत्य= त्रिपुरौली।। हरिकान्तापत्य दहिला।। उमाकन्ता पत्य ब्रहम्पुर सुगन्ध सन्तति=कनसी।। हमेश्वरातस्य मझौली।। गुणे मिश्रा पत्य=थुबे, खरका ।। सोरि मिआपत्य=ब्रहमपुर।। गयन मिश्रा पत्य, वीरमियापत्य= वारी, सकुरी।। हरिशर्मापटन सुधाकरादि= मृगस्थली छेद मिश्रायटन=अन्दौली।। सुरेश्वरापत्श् ग्रहेश्वरापत्य=कटउना।।हरि मिश्रा पत्य=कटउना।। ऋषि मिश्रायत्म= बेलउजा।। यति मिश्रा पत्य= कल्डना ।। कीर्ति मिश्राा ममीश्वरपत्य= गोआरी।।गिरीश्वर पट=मिथरौली।। हरे मिश्रा पत्य= खपरा ।। बाढंमिथापत्य=टखौली।। हेसन, नरदेव= लेखटिया।। शिवाई सन्तति=वत्ययास, धमपुरा।। सर्वानन्द= दलवय, सकुरी।। दलवय स्थित=असगन्धी।। चन्द्रकरायस=केवड़ा।। कुलधर, रमरायस= दिपेती, बेतावड़ी।। चोचू मोचू= पीहारपुर गोआरी समेज गोपाल सज्जन= ब्रहमपुर, जगतपुर।। मित्रकरापत्य, रूपनापत्य= महिषी, सकुड़ी ।। सुधमय सन्तति= अपोरवारि, जहरौली।। रतिधरशुमे= कमपोरकी तरौनी ।। ही सन्ततति= निकासी, मुगाम।। एते माण्डर ग्राम: (8) ''ऊ'' अथ बलियास ग्राम:-।। भिखे, चुन्जी, नितिकारपत्य= चुन्नी।। दूबे सकुरी ।। सुरानन्द=बैकक वासी।। रति सन्तति=खढ़का।। शिवादित्या पत्य मुराजपुर, ओगही, यमुधरि।। शुभंरापत्य=ततैत, कमरौली 11 नन्दी सन्तति= भौजाल, अलप, सतलखा।। सुधारकरापत्य=जरहरिमा।। राम सझपिप्त=जादू धरौरा।। केशव=यमसम।। शक्ति श्रीधर=सकुरी मटि समेत ।। मद्ध सन्तति नारायण सिमरी, जालए, कड़का।। महन्थ सतृति माडर शिरू सप्तति=रूद्रादित्यापत्य=विसौली।। रूचि सप्तति उदयकरापत्य नरसाम।। एते बलियास ग्राम:।। अथ सतलखा ग्राम: गुणाकर=डोक्टरवासी ।। विभूसप्तित भाष्करापत्य= सतौषिा दिवाकरापत्य= सतौलि।। चन्द्रश्वर पत्य= कमोली।। शंकरापत्य=सतसरवा लोहरा पत्य, नन्दीश्वरापत्य, यवेश्वरा पत्य=कछरा।। अथ एकहरा ग्राम:-श्रीकर=तोड़बय।। जादू सन्तति= सरहद ।। शुभेसन्तति= मैनी।।सोने सन्तति=मण्डनपुरा लक्षमीकरापत्य=संग्राम।। रूद सन्तपित=आसी।। धाम=नरोध,जमालपुर।। गढकू=कसरउढ़।। बाटू= सिंधाड़ी।। थिते=खड़का ।। मिते=कन्हौली।। गणपति पतउना।। जाने= ओड़ा।। कोचे=रूचौलि।। शुचिकरापत्य मुराजपुर।। चित्रश्वरपत्य=नरौंछ।। एते एकहरा ग्राम।। अथ विल्पचंक (बेलउँच) ग्राम: धर्मदित्यापत्य=सिसौनी ।। रामदत्त हरदत्त नोना दित्या सन्तति= रतिपाढ़।। सुधे सन्तति= सुदई।। शिरू=द्वारम।। गयादित्यपत्य= ओगही।।महादिस कर्म्मपुर बछौनी समेत।। जीवादित्य=उजान।। रूद्रदित्य=दीप सुदई।। सर्वादित= तडि़याड़ी।। देवादिल= ब्रह्मापुर।। स्तनादित्य= काको।। मिचादियात्मका काको वासू=देड़ारिया प्रजादित्य हरिगयन=कन्होली।। शुपे=कोलहट्टा।। रूकमादित्य=ओझौली।। केन्द्र सकुरी।। महथू= सकुरी।। चौबे सन्तति= सतसरना (9) अथहरिअम ग्राम -लाख सन्तति=रखबारी।। केशव-दामू=मंगरौना।। मांगू-नरसिंह=शिवां।। हारू (18/09=शिवा।। (27/05 नरहरिसन्तति ज्वतिरराजपुर चाण दिन कटमा।। परम लाख= आहिल।। रति गुणे=कटमा।। माधव सुत सन्तति=अच्छी ।। अते हरिजन ग्रामा अप संकर ग्राम कविराज लक्ष्मीपाणि=नीमा।। सुरेशपल, दामोदरापत्य=पटनिया गंगोली।। रवि शर्मा वंग लक्ष्मी शर्मा ब्रहमापुर।। पतरू, शीरू= पटनियॉं पोरबरौनी और सकुरी ।। जागे सन्तति= रतनपुरा।। महाई सन्तति=परिहार।। देवतन्तापत्य=पीलरवाड़ा।। इविन्दता पत्य= बहेड़ा।। पॉंरबूसन्तति=सिरखंडिया (श्री खंड) ।। सुपन, मारू सन्तति= नरधोध।। हराई, शुचिकर, प्रतीकएपल= अकुसी।। हरिप्रश्न= पोराम।। दोमोदर पत्य=बेहरा।। उँमापति सनतति= ततैत।। खंड तक वाल गामा ।। अथ धोसोत ग्राम रति कानह=पचही।। रूचिकरापत्य= नगवाड़।।रूद्र सन्तति=यमुथरि।। रूद सन्तति= गन्धराइनि।। गणपति सन्तति=धनिसमा।। कृष्णपति सन्तति= खगरी।। पृथ्वी धारापत्य- सकुरी।। रूद्र चन्द्र=डीह।।एते धोसोत ग्राम: अथ करन्वल ग्राम इन्द्रनाथ पल कोई लख।। शोरि नाथा पत्य=दीघही।। रामशम्पतित्य= प्ररनापुर।। रतिकरापत्य= मफियाना बुद्धिक रैव।। बुद्धि का सन्तकी कष्का पत्य ककरोड़।। हचलू सन्तति=कनपोखरि।। गणेश्वरापत्य=केडरहम।। लान्ही सन्ताते=गोंढिं=शैतत्ल वायी।। सदु=रूचि अन्तनि हरस्तपत्य=धनकौलिनिक्त परन बछांत ।। नोनं सन्तति=बेला।। लान्हि सन्तति मुरदी।। सादू सन्ति=ककरौड़।। मांगू स्तुति=सोन, कोलखू, मछेवा समेत।। मधुकरादोलमानुा गिरीश्वर सन्तति नरसिहं नडुआर श्री वत्स सन्तति=बेस्ट।। सदु केशव=सिरखंडि़या (श्रीखंड)।। वराह सनतति=तरोजी।। रामाध्त्य= तरौनी कान्ह श्रीधर=तरौनी।। रघुदन्त रूचिस्त रूचौलि।। नदुपाध्याद (10) ''इ'' माधवापत्य=सझौरा।। सटु रामापत्य= झंझारपुर।। गुणीश्वरपत्य=झंझारपुर।। गुणीश्वरपत्य=झंझापुर।। सतु भवेश्वरापत्य= हरवंशापात्य मुजौनिआ।। शिवशापत्य=रोहड़।। धूर्त्तराज म प पु गोनू सन्तति=पिण्डोखडि़।। एते करम्बहा ग्राम:।। अथ बूधवाल ग्राम: रविकरापत्य=खड़रटन सुरसर समेत ।। सुए सन्तति=ब्रहमापुर।। राम चाण=मझियाम।। ढोढ़े=बेलसाम।।उगरू= सतलखा कान्हापत्र= वेतसाम दूबे हरिकर=हरिना।। दामोदर= सकुरी।।राम दिनू= सुन्दर पाल।। गंगादित्य विकम सेतरी।। सदु भानुसुत गणेश्वरपत्य=परिणाम ।। गुणीश्वरापत्य जजान।। कोने=पीलखा।।गंगेश्वर=मलिछाम।।रूचिकर रतिकर=गंगौरा।। महेश्वर फरहरा।। गौरीश्वर=मदिनपुर।। विशो सुधकर=डुमरी ।। सूर्यकर सन्तित=सिउरी।। ग्रहेश्वर=महिषी ।। भोगीश्वर=चिलकौलि बालू बोधाराम।। उदयकर आड़ी।। पौथे धरम= मुठौली।। कान्हापत्य=बुधवाल।। जगन्पापत्य=सिंधिया।। एके कुछ वात ग्राम।। अथ सकौना ग्राम-वाटन सन्तति सिधियाना हरिश्वर पत्य=दिवड़ा।। सोमेश्वरापत्य=बघांत।।बाबू सन्तति डीहा।। रति गोपाल दिनयति=तरौनी।। रूद सन्ति=जगन्नाथपुर।। गणे महिपति=सरिरम।। शुचिनाथपत्य परसा।। गुणे मासे ततैल।। एते सकौना ग्राम: अथ निसउँत ग्राम: पणित सुपाइ सन्तति=तरनी तरौनी।। रघुपति=पतउना।। जीडसर सजाति कुआ।। इतितिसॉं अथफनन्दह ग्राम: श्रीकरापत्य= बथैया।। कुसुमाकर, मधुकर, किठो सन्तन्ति विठो प्रहनपुर।।हाठू=चाण।। बसौनी=ब्रहमपुर 11 सुखानन्द गुणे=सिसौंजी गांगू=सकुरी।।सदु गोंढि़=खनाम।। मतीश्वर, पौखू=चोपता शंकर=शंकर=रवयरा।। महेश्वर=डीहा सोम गोम माधव केशव= भटगामा।। विशेश्वरसहा सिंहवाड़, सिन्हुवार 11लक्ष्मी सेवे =सकुरी।। भवाईरूद=बोरबाड़ी, भदुआल, दरिअरा, सिमरवाड़ मुजौना समेत अनन्हह राम: (11) अथ अलय ग्राम।। प्रलय, उसरौली, बोड़वाड़ी, सुसैला, गोधोण्डीच।। शंकरापत्य=गोधनपुर समेत।। श्रीकरापत्य=उजरा।। हेतू सन्तित=सुखेत मिश्र (मिमांशक) हरि देवधरापत्य=सिंधिया।। बासू सन्तति: जरहटिया बाढ़ वाली। रविशर्म्म=जरहटिया।। धारू सन्तति=बेहरा।। शिरू=धमडिहा, कादेपूरा गोविन्द सन्ति बेहद।। म. म. उ. गदाघर=उमरौली।। परम बुद्धिकर=बैगनी।। रतनघर सन्तति भवदत्त= भटपूरा।। शिवदत्त=अजवन्ता।। मिश्रा राम वाड सुधार मात्य उसरौली।। लक्ष्मीधएपत्य हलधर सन्तति यमुगम।।शशिधर, रघु, जाटू=अलयी।।यवेश्वर=अलयी।। गंगाधरापत्य=यमुगाम।। लाख मूड़ी गणेश्वर=परम गढ़।। सिधू=वाड़वन।। दो दण्ड अल्पयी लोआमबाती गसाई= डीह।। रूद= खड़हर।। रमाई=राजे वासी विश्वेश्वर मतिश्वर उसरौली।। वेद सन्तति=मलंगिया नान्यपुर अलई, सिमरी, रोहुआ समेत गंगुआल बाथ राजपुर वासी।। किचिधरापत्य=सकुरी जयकरापत्य= कड़रायिनि।। सुधाकरापत्य कड़रायिनि, मुराजपुर।। गोनन-कटमा गंगोली बेकक समेत। कोठों कतमा।। साठ विशाही दोलमानपूर।। रूद्र=गंगोली।। कुशल गुणिया= जरगाना जालय समेत एते बभनियाम ग्राम:।। अथ खौआल ग्राम: श्रीकरापत्य=महनौरा।। रतिकर सुधाकरपत्य=महुआ।। चन्द्रकर पत्य= महुआ।।रूचिकरपत्य=महुआ मतिनुपुर।। स्थितिकारासं महिन्द्रा दिवाकरापत्य=कोबोली।।हरिकरापत्य-महुआ।।आदावन=परसौनी।।बाधे ढोढ़े सन्तित=सोहुआ।। वेणी सन्तति रोहुआ।। उमापति सन्तति=नाहस ।। विश्वनाथस अहित।। बुद्धिनाथ रूचिनापात्य=खड़ीक।। रघुनाथापत्य=द्वारम।। विष्णु सन्तित=द्वाछगम।। नोने जगनाथापत्य=बुसवन।। राम मुरारी शुक्र सन्तित= पण्डोली।। (12) ''ई'' बाटू सन्तति=ब्रहनपुर तिरहर मोडु।। साधुकरापत्य=दडि़मा।। हरानन्द, सन्तति=अहियाई।। भवादित्यापत्य=नाहस देशुआल।। पॉंखू=बेहटा।। भवे सन्तति धर्मकरापत्य=देशुआल।।डालू सन्तति=दडि़मा।। दामोदरा पत्य= तरहट ब्रहमपुर।। राजनापत्य=ययुआल।। प्रितिकरा पत्य=पचाडीह (पचाढ़ी।। पतौना खौआल दिवाकरापल = घुघुआ।। भवादित्यापत्य=ककरोड़ स्वंगरैठा समेत।। बैद्यनाथ प्रजाकारक रघुनाथ कामदेव-मौनी, परसौनी।।गोपालायह कृष्णापत्य =कुर्मार, खेलई।। शशिघरापत्य नरसिंहपत्य= बोढ़वाड़ी कोकडी, छतौनिया।। दामोदरपत्य=कोकडीह ।। नयादित्या पत्य=बेजौली।। दूरि सन्तति जयदित्यापत्य सुखेत, सर्दसीमा।। शुचिकरापत्य=दिगुन्ध।। आड़ू सन्तति रघुनाथ पत्य= मुराजपुरब्रहपुर।। जीवश्ेवरपत्य= दिगुम्ध।। भवेसन्तित= मिट्टी, सतैढ़, बेहर।। इबे=सन्तति=ब्रहमपुर।।हेलु सन्तति =सतैढ़ रविकर सन्तति तत्रैव प्रसाद मधुकर सन्तति बेहदा।। दिवाकरापत्य पिथनपुरा।। गंगेश्वर पत्य=कुरमा, लोहपुर।। लम्बोदर सन्तति=कुरमा।। नादू सन्तति= पिथनपूा।। राजपण्डित सह कुरूमा रामकर सन्तति मिट्ठी खंगरैठा गनाम।। आड़नि सन्तित=सौराठ।। मनि गहाई, के उँदू सन्तति=सिम्बरवाड़।। एते खैआल ग्राम:। अथ संकराढी ग्राम:-महामहोकारू सन्ति भगद्धर गोविन्द सकुरी।। प्रितिकर=कादिगामा।। शुमे सन्तति=अलय महाम्हो हरिहापत्य= सुन्दरे गोपालपुर।। जयादित्या पत्स=मतुनी सरावय।। परमेश्वर=नेयाम।। सदु सुपे हरडी।। रामधरापत्य= अलय ।। हरिशर्मा सन्तति=सिधन मुरहदीन रे कोरा संकखढ़ी-होरे-चांड़ी-परहट।। सोम-गोम=शक्रिरायपुर।। हरिश्वर=सकराढ़ी वासी।। जीवेश्वर 1 पत्य=बेला अधगाठ।। शयन इरिकादि (13) नोने विभू सिंधिया=गढ़ बेलउँच=सुपन भकुनौली।। कौशिक=कुसौली 11 लक्षमीपाणि=सुशरी।। पॉंपू=देयरही।। एते बेलउँच ग्राम: अथ नरउन ग्राम: बेलमोहन नाउन ज्यटाधरातल=मदनपुर।। रातूसनतति=कडियन।।। गर्ब्बेश्वरापत्य:सिंधिया ।। डालू सन्ति रूचिकर: मलिछाम।। चन्द्रकर टुने सन्तति =सुलहनी।। विशोसन्ति= त्रिपुरौली।। हेनसन्त्रति भखरौली।। दिवाकर पता: सुरसर, कवयी।। दिनकरापत्य=पुड़े।। खांतू कोने=वत्सवाल।। शक्रिरायपुर नाउन=दामोदरपत्य=जरहटिया। मुरारी=तेघरा।। योगीश्वरापत्य=अवेश्वरा पत्य नयगामा भरवरौलीसमेत।। एते नाउन गाम:।। अथ पनिचोभ ग्राम:-मधुकरापत्य=तरौनी, झाौआ, पदमपुर।। शिवपति, गुणेश्वरापत्य=सुलहनी।। विशो हातू सन्तति= असौली भवेश्वरापत्य मैलाम।। जौन सन्ति=आहिता।। पशु आदितू= डीह आहिल।। बाबू पाठकादि= मैलाम, कटउना विसपी समेत।। कामेश्वरापस पौनी, सकियाल। देहरि सन्तति= कनौती, तरौनी लान्हसन्तति=उल्लू।। जगन्नाथपत्य हरदत्त= खड़का, बगड़ा बयना समेत।। आउनिसुत पदमादितपत्य= मंगनी, सिररूडि़या, महालठी, लोही, चकरस्ट, कर्नमान तरकीस समेत ।। हरिनाथपत्य मखनाहा कमोली।। चण्डेश्वर पत्य हरिवंश सुत रतनाक रायपत्य=बथैया ।। चक्रेश्वर= कुरमा।। बाटू सन्तति=चक्रहद, सिउली बाठी।। विरपुर पनिचोम= रातू सन्ति= सुन्दवान।। हारू सन्तति करियन।। वास्तु सन्तति=मिट्टी।। महेश्वरापत्य= देशुआल।। दिनकर मधुकरापत्य=जरहरिया ।। रामेश्वर सन्त्रति चन्द्रकरापत्य=अलदाश।। विर सन्तति केशवापत्य = भरौर, शहजादपुर, वलिया समेत।। वासुदेव सन्तति ददरी।। सोने सन्तति= ब्रहमौलि।। धराई सन्तति=अमरावती = रात सन्तति= करहिया, उसरौली आदित्य डीह।। हरिश्वरापत्य=डीहा।।सोमेश्वर=बधांतडीह।। रधु: रामपुर डीटा रवि गोपाल=तरौनी।। हरिशर्मापत्य= महुआ।। बाटनापत्य=तरौनी, बैगनी।। रूचिशर्म्मा= जगन्नाथ, मटिराम।। शुचिनाथा यत्य= ततैल ।। शीशधर= ब्रहमापुर नेहरा, भवनापापत्य पुरसौली।। देवादित्यापत्य=पुरूषौली।। ऐते पनिचोभ ग्राम:।। अथ कुजौली ग्राम:-गोपाल सन्तित= यशोधर= बेहटा।। सुपन, नाँथू लक्ष्मीकर=मरबहरौलीं।।जीवे, जोर= मलंगिया।। मेधाकर=वनकुजौली।। रातू सिम्मुनाम कन्धराइन।। सुरपति।। गणपति=दिगउन्ध।। दिगउन्ध।। लक्ष्मी पति महिन्द्रबाड़।। चण्डेवर हरि=दिगउन्द साने-लोड़ाक, महारनी।। विष्णुकर=परसौनी।। रूपन कनधरानि।। सोम=लोआम।। राजूसन्तति सुधाकर= सरावय।। लक्ष्मीकर सुत प्रजाकर अमृतकर=बजौली। (14) ''14'' अथ गोत्र पन्जी लिखाते।।:-शाण्डिल्ये दिघोष: सरिसन, महुआ, पर्वपल्ली (पबौली) खगुबला, गंगोली, समुगाम, करियन, मोहारी, सझुआल, भंडार:।। पण्डोली जतजवाल, दहिमत, तिलई, माहब, सिम्मुनाम सिहांश्रम, ससारव: (सोठारपुर) स्तलित कड़रिया, अल्लारि, होईया, समेत तल्हनपुर, परिसरा, परसंड, वीर नाम, उन्तमपु कोदरिया, धतिमन, बरेबा मधवाल, गंगोरश्रय, भटौरा, बुधौरा ब्रहमपुरा कोइगार, केरहिवार, गंगुआलश्च, धोसियाम, छतौनी, मिगुआल ननौती, तपनपुरश्वाइति शक्ति अथ वत्स गोत्र:-पल्ली (पाली) हरिअम्ब, तिसुरी, राउढ़ टंकबाल धुसौत, जजुआल, पहद्दी जल्लकी (जलाय) मन्दवाल, कोइयार, केरहिवार, ननौर, उढ़ार प्रथि करमाहा बुधवाल, भड़ार लाही, सोइनि सकौना फनन्दह, मोहरी, बढ़वाल तिसउँत वह आली पण्डोलि, बहेरादी, बरैवा, भण्डारिसम, बमनियाम, उचित, तमनपुरा, बिढुआ नरवाल, चित्रपल्ली, जरहटिया, रतवाल, ब्रहमपुरा सरौनी।। एते वता गोत्रा अपकार्यक गोत्र-दानशौर्य प्रतापैक्ष प्रसिद्ध यत्र पर्थिका ओडनिसा सर्वत: श्रेष्ठा स्वस्व र्ध्म प्रर्तिका ओइनि, खौआला संकराढ़ी, जगति, दरिहरा, माण्डर बलियास, पचाउट, कटाई, सतलखा पण्डुआ, मानिद्व मेरन्दी मडुआल सकल पकलिया बुधयल, पिमूया मौरि जनक मूलहरी महा काशमे छादनश्च थरिया, दोस्ती, मरेहा, कुसुमालंच, नरवाल, नगुरदहश्रय ।। एते काश्यय शोत्रा।। (15) अथ पराशरं गोत्र:-नरउन सुरगन सकुरी सुइरी पिहवाल, नदाम महेशरि सकरहोन सोइनि तिलै करेवा का का पिभाएते पत्रशर गोत्रा अथ कात्यायन गोत्र: कुर्जीली, ननोत, जल्लकी, व्रतिगामध्य।। एते कात्यायन गोत्रा:।। अध सावर्ण गोत्र: सोन्दपुर पनिचोभ करेवा नन्दोर मेरन्दी।। अय अलाम्बुकाक्ष गोत्र:वस्माम्प्रलाम्बुकाक्ष कटज्ञई ब्रहमपुरा आदि। ।।अथ कौशि गोत्रे-निखति अथ कृष्णात्रय गोत्र लोहना बुसवन सान्द्र पोदोनी च ।। अथ गौतम गोत्र:-ब्रहमपुरा उचितमपुर कोइयां चादि गौतमो।। अथ भादद्वाज गोत्र: एक हरा बेलउल (विस्वपंचक) देयामश्रयापि कलिगाम मूतहरी गोढ़ार गोधोलिन्द एते भारद्वाज गोया अथ मोडल्य गोत्र: कौशिल्ये पुनश्च को थुआ विष्णुव़द्धि वाल ।। एते वशिष्ठ गोत्रा:। अद कौण्डल्य गोत्र:-एक द्रयर्यूपश ल्यु पाउन रूपी गोत्राजन्य एते कौण्डिल्य गोत्र।। अथ परसातंडी गोत्रे=कटाई।। 16 ''ऐ'' 17 विशाद कुसुम तुष्टा पुण्डरी कोप विष्टा धवल वसन वेषा मालती वद्ध केशा।। राशिघर कर वर्णा शुभ्रजा तुड़ वस्त्र जयति जीत समस्ता भाखी वेणु हस्ता।। सरस्वती महामायै विद्याकमल लोचिनी। विश्व रूप विशालाक्षि विधान्देरि परमेश्वरी।। एक दन्त महावुद्धि सर्वाजोगणनाय: सर्वसिद्ध करादेवों गौरीपुत्र विमानन गंगोली सँ बीजी गंगाधर: ए सुतो वीर (110511040) नारायणों। तत्र नारायण सुत: (111811021) ए सुतो हाले शॉंई कौ।। थरिया संकान्ह दौ।। खण्डबला गा्रमोपार्यक: साउँक: शकर्षण परनामा ए सुता भद्रेश्वर दामोदर 1105/06।। बैकुण्ठ नील कंठ श्री कंठ ध्यानकंठा ।। तत्र 1109/010 दामोदर एकमावासी बैकुण्ठ सन्तति पाठक वासी।। नीलकंठ संतित संसारगुरदी वासी।। श्री कंठ संतति गुरदी, हरड़ी सरपरब, और वासिन्य:।। श्री कंठ सुता ध्यानकंठा।। तत्र 1109/01 दामोदर एकमावासी बैकुण्ठ सन्तित पाठक वासी नीलकंठ संतति संसार गुरदी वासी।। श्री कंठ संतति गुरदी, हरड़ी सरपरक और वासिन्य:।। श्रीकंठ सुता श्यामकंठ हरिकंठ नित्यान्द गंगेश्वर देवानन्द हरदत्त हरिकेशा: तत्रादयो पन्चज्येष्ठ सकराढ़ी में डालू सुत दौपतौनाखामासॅ गणपित छोणा। अन्यो पतऔना खौआल सँ गणपति दो।। तत्र गंगेश्वर सुता हल्लेंवर चक्रेवश्र पक्षीवरा: सँ सुत दो सँ छो तल्ले श्वरों गुरदीवासी।। चक्रश्वरों हड़री वासी।। ए सुतो पदमनाम: डीह भण्डरिसम सँ शोरि दौ।। तत्र पदमनाम सुतो पुरूषोतम: गढ़ बेल उँच अभिन्नद हौ 18 पुरूषोत्तम सुतो ज्ञानपति: मांडबेस्ट स हरिकर सुत बाटू दो।। ज्ञान पति सुतो उँमापति सुरपति एकमा बलियास सँ आडनिसुत बाढ़ दौ।। एकमा बब्यिास सँ बीजी वरणीधर। एक सुता पदमनाम श्री निधि श्री (1115/0411) नाया:।। इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली। १.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए। 2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। 3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। 4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। 5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। 6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। 7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। 8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। 9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। 10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। 11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। 12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। 13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। 14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। 15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। 16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। 18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। 19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। 20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय। 21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय। ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत। कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य/अग्राह्य 1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब .VIDEHA FOR NON RESIDENTS .1.Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR and Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR .2.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated by Jyoti. Ramlochan Thakur (1949- ) Senior Poet, theatre artist ,editor and critic of Maithili language. "Itihashanta" and "Deshak nam chhal son chrai", "Apoorva", "Mati Panik Geet"(collection of poems), "Betal Katha"(Satire), "Maithili Lok Katha (Folk Literature), "Ankhi Munane Aankhi Kholane" (Essays). Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Original Maithili Poem by Sh. Ramlochan Thakur translated into English by GAJENDRA THAKUR To younger brother/ its your work While eating May be sour in taste These medicines The result always good Tell the diseased Explain the fact Its your work. Sh. Krishnamohan Jha (1968- ), "Ekta Herayal Duniya", collection of poems in Maithili, "Samay Ko Chirkar" collection of poems in Hindi. For Hindi poems "Kanhaiya Smriti Samman" in 1998 and "Hemant Smriti Kavita Samman" in 2003. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Original Maithili Poem by Sh. Krishnamohan Jha translated into English by GAJENDRA THAKUR To both Women see Fish Fish sees women I’m watching you both. English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti The drama of Danveer Dadhichi was started on the scheduled date. We had reached school before the opening time. On a corner of corridor a bed sheet was hung to make the screen of the stage. The rope couldn’t be tied properly so it was decided that screen would be pulled up and down manually. After that artists started dressing up. Dressing up was very easy. They put dhoti and gamacha on and put powder on face as a make up. Additionally, some other accessories were worn too. The teacher responsible for directing the drama had suddenly remembered some urgent work and had not attended school that day. The elder boys of the village came to know that artists are students of primary school so they started teasing them by passing comments. I warned the artists that they would destroy our drama but younger brother resisted that he would manage even if he was in drama dress he would not mind fighting when it was needed. He shouted that he would take the drama dress off and start reacting if people would keep on doing so but that threatening couldn’t stop the excited boys. Then younger brother had declared that the drama would not be played any more on that day. To teach the lesson to the disturbing elements he ran towards them with a stick. And very soon the environment was filled with the noise of fighting and defending voices. By drama that was to be played by us and was to be directed by me came to an end without completion. I was crossed with the younger brother for a while and he used to say that he just lost my temper but he also insisted that it was not his fault but the environment made by those naughty boys made him to do so. Time passed and my anger was cooled down too. I too lost the enthusiasm of doing Ramleela and other drama. I never read any subject repeatedly except Maths and Science. Nor did my teacher suggest me to do so. If any student was caught reading History and other subjects twice or thrice then he was given the name of that subject. Whenever such students were seen reading Maths then they had to listen to the comment passed by the teachers that Math was not History so he shouldn’t try it to learn by heart. During rainy days making umbrella from the mat and murmuring countdown while running towards home; in holidays while playing Kabaddi if Master Saheb was seen passing by on cycle then greeting him by continuing game- Kabaddi kabaddi master sahib pranaam kabaddi kabaddi etc. are memories to be treasured. And in one of such incidents I was caught by the opposition team as I breathed in order to greet Master Sahib which was against the rule. That Mater Sahib of Koilakh was so happy that he talked about that incident in the school. (continued) (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ दिसम्बर २००८ (वर्ष १ मास १२ अंक २३) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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