166 विदेह १५ दिसम्बर २००८ वर्ष १ मास १२ अंक २४ 'विदेह' १५ दिसम्बर २००८ ( वर्ष १ मास १२ अंक २४ ) एहि अंकमे अछि:- एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१.कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. भ्रमर ३.गजेन्द्र ४.परमेश्वर कापड़ि आ ५.शुशान्त २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ २.५. 1.आलेख-महेन्द्र कुमार मिश्र/ 2.दैनिकी-ज्योति/ २.६. रिपोर्ताज- मनोज मुक्ति- 1.अवैद्य नागरिकताः सिक्कमीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोलनः लूटमे लटुवा नफ्फा,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास २.७. जितिया/ मकड़ संक्रांति-मनोज मुक्ति २.८. धीरेन्द्र प्रेमर्षि-नव भोर जोहैत मिथिला ३.पद्य ३.१. १.राम नारायण देव २.निमिष झा ३.२. १.अमरेन्द्र यादव २.मनोज मुक्ति ३.३.-१.ज्योति-२.गजेन्द्र ३.४. १. सच्चिदानन्द यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन ३.५. १.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप ३.६. कुमार मनोज कश्यप ४. गद्य-पद्य भारती ५. बालानां कृते ६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 8.१.The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti ९. मानक मैथिली विदेह (दिनांक १५ दिसम्बर २००८) १.संपादकीय (वर्ष: १ मास:१२ अंक:२४) मान्यवर, विदेहक नव अंक (अंक २४, दिनांक १५ दिसम्बर २००८) ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | ४१म आ ४२म ज्ञानपीठ पुरस्कारक घोषणा- हिन्दीक नवीन कविता आन्दोलनक सशक्त कवि श्री कुँवर नारायणकेँ ४१म ज्ञानपीठ पुरस्कार (२००५) आ कोंकणीक श्री रवीन्द्र केलेकर आ संस्कृतक श्री सत्यव्रत शास्त्रीकेँ संयुक्त रूपसँ ४२म ज्ञापीठ पुरस्कार (२००६) देबाक घोषणा भेल अछि। श्री कुँवर नारायणक जन्म १९२७ ई. मे भेलन्हि। अज्ञेय द्वारा सम्पादित "तीसरा सप्तक"क सशक्त कवि कुँवर नारायणकेँ एहिसँ पहिने साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। श्री रवीन्द्र केलेकरक जन्म १९२५ ई.मे भेलन्हि, हिनकर कोंकणी भाषा मण्डलक निर्माणमे प्रमुख भूमिका रहल छन्हि। श्री सत्यव्रत शास्त्री संस्कृतमे तीन गोट महाकाव्यक रचना कएने छथि। रवीन्द्र केलेकर आ सत्यव्रत शास्त्रीकेँ सेहो साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ दिसम्बर २००८) ६८ देशक ६५४ ठामसँ १,३२,७९७ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें कहानी-संग्रह रेल की बात : हरिमोहन झा मू. सजिल्द १२५.०० पे.बै. ७०.०० छछिया भर छाछ : महेश ·टारे मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० नाच के बाहर : गौरीनाथ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० आइस-पाइस : अशोक भौमिक मू. सजिल्द १८०.०० पे.बै. ९०.०० भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ९०.०० कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. १००.०० बड़कू चाचा : सुनीता जैन मू. सजिल्द १९५.०० कविता-संग्रह या : शैलेय मू. १६०.०० कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव मू. १५०.०० कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा मू. २२५.०० जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा मू. ३००.०० लाल रिज्बबन का फुलबा : सुनीता जैन मू. १९०.०० लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन मू. १९५.०० फैंटेसी : सुनीता जैन मू. १९०.०० दु:खमय अराकचक : श्याम चैतन्य मू. १९०.०० उपन्यास मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक मू. सजिल्द २००.०० पे.बै. ८०.०० इतिहास, स्त्री-विमर्श और चिंतन डिजास्टर : मीडिया एण्ड पालिटिकस : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३००.०० पे.बै. १६०.०० एंकर की नज़र से : पुण्य प्रसून वाजपेयी मू. सजिल्द ३५०.०० पे.बै. १७५.०० पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी मू. २२५.०० स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम मू. २००.०० अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय मू. १८०.०० शीघ्र प्रकाश्य बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा माइक्रोस्कोप (उपन्यास) : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र (उपन्यास) : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर (उपन्यास) : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ (उपन्यास) : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन ज्या कोई है (कहानी-संग्रह) : शैलेय एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे -१.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक 'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे- कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्त्वपूर्ण सूचना (५):मैलोरंग २५ दिसम्बर २००८ कें सेमिनारक आयोजन एन.एस.डी. कैम्पस, भगवानदास रोड, नई दिल्लीमे आयोजित कएने अछि। २.गद्य २.१.कथा १. सुभाषचन्द्र यादव २. भ्रमर ३.गजेन्द्र ४.परमेश्वर कापड़ि आ ५.शुशान्त २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी २.४.सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ २.५. 1.आलेख-महेन्द्र कुमार मिश्र/ 2.दैनिकी-ज्योति/ २.६. रिपोर्ताज- मनोज मुक्ति- 1.अवैद्य नागरिकताः सिक्कमीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोलनः लूटमे लटुवा नफ्फा,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास २.७. जितिया/ मकड़ संक्रांति-मनोज मुक्ति २.८. धीरेन्द्र प्रेमर्षि-नव भोर जोहैत मिथिला चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। एकटा अंत समदियाकेँ देखिते माथ ठनकल । कतहु ससुरकेँ ने किछु भऽ गेलनि ! ओ बहुत दिनसँ दुखित रहथि । डाक्टरो जवाब दऽ देने रहनि । हम एक मास पहिने देखि आयल रहियनि । हमर पत्नी सात-आठ मास पहिने गेल छलीह । फेर आनो बेटी सभ भेंट कऽ अयलनि । सभ क्यो हुनक मृत्युक प्रतीक्षामे रहय । 'कका खतम भऽ गेलथिन’-समदिया बाजल । 'कहिया हौ ?'-पत्नी चकित होइत पुछलथिन आ जा समदिया 'चारि दिन पहिने’ बाजल ता पत्नीक क्रंदन शुरू भऽ गेलनि । ओ कनैत रहलीह आ बीच-बीचमे अपन उलहन, अपन पछतावा जनबैत रहलीह । बाकी सब शोकाकुल मौनमे डूबि गेल । बुझाइत अछि ससुर देह त्यागि एत्तहि चल आयल छथि आ हमर सभक मन-प्राणमे बसि गेल छथि । चेतनामे हुनक स्मृति निरन्तर चलि रहल अछि ।खाइत-पिबैत, उठैत-बैसैत दिन-राति हुनके चर्चा होइत अछि। हमरासँ पत्नी केँ शिकायत छनि जे हमरे कारणे ओ अपन पितासँ अंतिम समयमे भेंट नहि कऽ सकलीह । हम कहि देने रहियनि जे ठीक छथि । आइसँ एक मास पहिने ओ ठीके नीक रहथि । लेकिन एकटा बात हम नहि कहने रहियनि । ओ कहऽ वला बात नहि रहै । मात्र एकटा पूर्वाभास । जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तऽ हुनकर आँखिमे ताकने छलियनि । ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह । आ हमरा दुनूकेँ बुझायल रहय जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होयत । सएह भेल । ओ चल गेलाह । आब नहि भेटताह । लेकिन ओ दृष्टि मनमे अखनो ओहिनाक ओहिना गड़ल अछि आ हुलकी मारैत रहैत अछि । अइ अनुभव दिआ हम पत्नी केँ किछु नहि कहलियनि । गोपनीय नहि होइतो ई ततेक व्यक्तिगत रहै जे एकरा बँटबाक इच्छा नहि भेल। व्यक्तिक जीवनमे एहन बहुत रास अनुभूति होइत छैक जे ओ ककरो नहि कहैत अछि; जे ओकरे संग चल जाइत छैक। हमसभ ससुर संग बीतल समय आ प्रसंग मोन पाड़ैत रहैत छी; एक-दोसरकेँ सुनबैत छी। वात्सल्य स्नेह आ प्रेमसँ भीजल क्षणकेँ स्मरण करैत पत्नी भावुक भऽ जाइत छथि, कंठ अवरूद्ध भऽ जाइत छनि आ आँखि नोरा जाइत छनि । ओ बजैत छथि-'बाबू कहियो हमरा बेटी नहि कहलनि; सभदिन बेटा कहैत रहलाह । पछिला बेर चलैत काल भेंट करऽ गेलियनि तऽ पुछलथिन-चूड़ी नहि पिन्हलह ?आब के एतेक निहारि-पिहारि कऽ देखत जे चूड़ी नव अछि कि पुरान ?’ पत्नी सोगमे डूबि जाइत छथि । हमसभ हुनक अंतिम अवस्थाक कष्ट, उपेक्षा आ निराशाक चर्च करैत छी । परिवारक के कतेक सेवा केलकनि, के कतेक अवहेलना, तइपर टीका-टिप्पणी करैत छी आ सोचैत छी हमहीं सभ की केलियनि, किछु नहि । नह-केशसँ एकदिन पहिने सासुर पहुँचैत छी ।मृत्यु जे शून्यता आ नीरवता छोड़ि गेल अछि, कन्नारोहटि तकरा तोड़ैत रहैत अछि। भोज-भातक गप आ ओरिआन चलि रहल अछि । हमरा लगैत अछि श्राद्धक कर्मकांडमे व्यस्त भऽ कऽ लोक सोग बिसरि जाइत अछि । कर्मकांडक और कोनो सार्थकता नहि छैक । हमर एकटा साढू अखने आयल छथि-केश कटेने । जहिया समाद गेल हेतनि, तहिये या अगिला दिन कटेने हेताह । हमरा सन सम्बन्धी लेल तीन दिन पर केश कटेबाक विधान अछि। हमरा चारि दिन पर खबर भेटल रहय आ हम सोचने रही जे केश नहि कटेबा लेल एकरा ढाल बनाओल जा सकैत अछि। लेकिन साढूक मूड़ल माथ देखि बुझायल जेना ई तर्क ठठऽ वला नहि अछि। हम चिन्तित भऽ जाइत छी ।एहि लेल नहि जे बेलमुंड भऽ गेलापर देखऽ मे नीक नहि लागब । केश तऽ हम नहिए कटायब । तँइ बेलमुण्ड हेबाक तऽ प्रश्ने नहि अछि । लेकिन विरोध बहुत होयत । हम उठल्लू भऽ जायब । एकरे चिन्ता अछि । नह-केश दिन ठाकुर भोरे चल आयल अछि । केशकट्टी चलि रहल छैक । हम दू-तीन बेर टहलि कऽ एहि कर्मकेँ देखि आयल छी । एकबेर एक गोटय पुछबो केलक—'कटेबै ?’ हम हाथसँ अस्वीकृतिक मुद्रा बना घूमि गेलहुँ । ओ सोचने होयत बादमे कटेताह । हमर एकटा आर साढू आबि गेल छथि। आ केश कटवा रहल छथि । एकटा क्षण एहन अबैत अछि जखन घरक सभ पुरूखक माथ छिलायल अछि आ एकमात्र हम विषम संख्या सन बचल छी । आब कतेको गोटय पूछऽ लागल अछि-'केश नहि कटेबै ?' 'की हेतै ?' कहैत हम टरि जाइत छी । आब ककरा-ककरा बुझौने घुरियौ जे हमरा एहि कर्मकांडमे विश्वास नहि अछि। बुझेबो करबै तऽ क्यो बुझऽ लेल तैयार होयत ? लेकिन हमर केश सभक आँखिमे गड़ि रहल छैक ; अनटेटल आ अनसोहाँत लागि रहल छैक । हम दाढ़ी बना रहल छी । सोचने छी तकर बाद नह काटि लेब । सासुक नजरि हमरा पर पड़ैत छनि । बेटीसँ पुछैत छथिन-'दुल्हा केश नहि कटेलथिन ?’ हमर पत्नीकेँ खौंत नेस दैत छनि । हमरा दिस तकैत फुफकार छोड़ैत छथि—'आ गय, पापी छै, पापी । पता नहि बाप मरल रहै तबो केश कटेने रहै कि नहि !' हमरा तामस उठैत अछि; दुख होइत अछि, लेकिन चुप रहि जाइत छी। केश कटा कऽ हमर दुनू साढू निश्चिन्त छथि । एकटा तऽ पी रहल छथि आ कखनो आयोजन तऽ कखनो सारि-सरहोजिक आनंद उठा रहल छथि । केश कटा लेने रहितहुँ तऽ हमरो लेल सब किछु आसान आ अनुकूल रहितय ।लेकिन विश्वास आ आत्माक खिलाफ कोनो काज करब हमरा बूते पार नहि लागि सकैत अछि। केश कटेने मृतात्माकेँ मुक्ति आ स्वर्ग भेटि जेतैक आ नहि कटेने नरक ? एहन विचार हमरा लेल हास्यास्पद अछि । तखन केश कटेबाक कोन तुक? की एहि लेल जे देखू हम हुनक सम्बन्धी छी आ शोकाकुल छी ? सम्बन्ध आ सोगक एहन प्रदर्शन हमरा बहुत अरुचिकर बुझाइत अछि । हमर वश चलितय तऽ सब कर्म आ भोज-भात बंद करबा दितियै ।सोचि लेने छी जे लिखि कऽ चल जायब जे हमर मृत्युक बाद ई सभ नहि हो । बुझाइत अछि हमर पितिऔत सारकेँ क्यो हुलका देने छनि ।ओ धड़धड़ायल अबैत छथि आ हमर डेन पकड़ि घीचने ठाकुर लग लऽ अनैत छथि—‘ठाकुर, छिलह तऽ ।' ठाकुर आदेश सुनियो कऽ उठैत नहि अछि। सार हमर कनहामे लटकि जोर लगा कऽ हमरा बैसाबऽ चाहैत छथि । हम बूझि नहि पबैत छी जे ओ चौल कऽ रहल छथि कि गंभीर छथि ।हम छिटकि कऽ एकटा कुर्सी पर बैसऽ चाहैत छी ।लेकिन जा-जा बैसी ताहिसँ पहिनहि ओ कुर्सी खींचि लैत छथि आ हम खसैत-खसैत बचि जाइत छी । लोक हाँ-हाँ ‘ करैत अछि । हम क्रोध आ अपमानसँ तिलमिला उठैत छी—‘बहानचोद, चोट्टा, उल्लू !’ ‘ईह रे बूड़ि, बुधियार बनैत छथि !भोज परक पात छीन लेब सार ।'- कहैत ओ चल जाइत छथि। क्यो कुर्सी पर बैसा दैत अछि । हम बैसि जाइत छी । भीतरसँ खौलैत। 'की भेलै ? की भेलै?’—पूछैत आँगनसँ कैक गोटय आबि गेल अछि। हम उठि कऽ आँगन चलि दैत छी । फ्लैश बैक-रामभरोस कपडि भ्रमर नरेश पाछां चलि गेल अछि, बहुत पाछां । प्रायः पचास वर्ष पाछां । गामक सहपाठी सभक संगे खेलए ओ । बहादुर नोकर रहैक – वावूजी जंगलकातसं लओने छलाह । एक बोलिआ, आदेश चाही, काम फत्तह कइएक दम लैत छल । से बाबूजीकें आदेश रहैक – गुरुजीलग पढ ल जएबाक छै से बहादुर लाख चिचिऔलो पर नरेशकें कान्हपर बोकि कन्हाइ साहुक दलान पर गुरुजी लग दइए अबैक । ओत्त गेला पर गुरुजीक कांच करची अथवा खजूरक छडी ओकर सभ जीद हेरा दैक । ओ चुपचाप हाथमहक पाटीपर कारिख पोति कचरासं साफ क चमकाब लागए आ तखन भठासं लिखबाक प्रयास करए – क ख ग घ...। “इस्स....” गुरुजीक छडी जखन बांहि पर पडैक तं ओ लोहछि जाए । मन होइ भागि जाइ मुदा... वहादुरक डीलडौल आ पिताक आदेश मन पडितो मनमारि क पाटी पर आंखि गडा कखरा लिखबाक प्रयास कर लगए । गुरुजीक ओहिठाम बटखरा कंठस्थ रहैक । ई कंठस्थ करब ओकर मजवूरी रहैक, ओना हिसावमे ओ ओहुना कमजोरी महशूस करए । चौठचन्दमे गुरुजीक संग घंटी बजबैत, काठक डंटाकें बजबैत घरे–घरे घुमनाई आ गुरुजीक डेरापर जा गुडचाउरक प्रसाद खएनाईक अपन आनन्द रहैक । आनन्द तं पानि नहि पडने हर हर महादेव बना गाम घुमबै काल सेहो अबैक । कोनो सहपाठीकें सौंसे देहमे छाउर रगडि देल जाइत छलैक । माथपर आ बांहिमे सेहो अशोक पात सभ लपेटि देल जाइत छलैक । माथ पर जूट आ सनसं जटा ताहिपर टीनकें कैंचीसं काटि चान लटका देल जाइक । हाथमे वावाजीके त्रिशूल आनि क ध देल जाइक । वस–वनि जाइक महादेब । छौडा सभक हेंज पाछां–पाछां हाक परैत जाइक – हर, हर महादेव पानी देऊ अलिकती पुगेन, बढी देउ ! भाव रहैक महादेव पानी दीअ, कम सं नहि भेल, बेसी दीअ.... । जकरा दरबज्जा पर जाइक पानि उझलि दैक । मान्यता रहैक पानि देलापर वर्षाक संभावना बढि जाइत छैक । वेचारे महादेव बनल बौआ बादमे थर–थर कांपए, वच्चा सभ ताली पिटैत हंसैक । वाल सुलभ प्रताडना ओहि समयमे खूब प्रचलित रहैक । नरेश ओहि हेंजमे अगुवा रहय....। नरेशक ठोढ पर अपने आप मुस्की दौडि जाइत छैक । वितलाहा क्षणक स्मरण कतौसं गुदगुदा दैत छैक ओकरा । वालशोषणक विरुद्ध ओहो कतेक आलेख लिखि चुकल अछि, कतेको सेमिनार मे भाग ल भाषण छांटि चुकल अछि । मुदा नेनामे नेनेद्वारा कएल ई अपराध शोषण नहि रहैक ! नरेश वाल सुलभताक ओ क्षण फेरसं स्मरण करैत सिहरि उठैत अछि आ कतौ भोतिआ जाइछ पुन.......। मुश्किलसं ७–८ वर्षक छल हयत । गामेक स्कूलमे पढए, मुदा संगति रहैक अपने टोल महल्लाक धीआपूतासं । ताही मंडलीमे एकटा छौरी रहैक इजोतिया । ओकरे लगुआक वेटी । नीक रहैक कि अधलाह ओकरा तहिया ज्ञान नहि रहैक मुदा ओकरा संगे इजोरिया रातिमे अन्हरिया–इजोरिया खेलैत ओ खूब प्रशन्न रहल करए । आंगनेमे दुनूपयर आगां पसारि वैसि , वांहिके केहुनी लगसं मोडि आगां पाछां करैत आ ताही लयमे दुनू पयरके सेहो आगां पाछां करैत पाछा मुंहे घुसकैत इजोतिया खेलल करए आ गाओल करए–“आगेमाई ककरी के बतिआ...” त ओकरा नीक लगैक । इजोरिया रातिमे चानक चारुकात बनल गोल घेराकें कौतुहल सं देखैत काल माय रहस्यमय बोलीमे समझबैक – ई हमरा सभक पुरखा सभक वैसार छै इन्दर भगवान लग । कहै है निचां पानि विना अकाल पडल छै, पानि दिऔ । आब पानि हयबे करत....। नेनामे ई बात सत्य लगैक आ आश बन्हाई जरुर वर्षा हयत । तेहने समयमे जट–जटिन गीत होइक । टोलक महिला सभ जटा आ जटिन कनए आ गीत गाबि–गाबि झूमए । ओहिमे पुरुष नहि, नेनाकें छुट रहैक । नरेश नियमित ओकर दर्शक रहए, ओकर संगी इजोतिया ओहि मंडली मे सामेल रहैक, ओ एकटक ओकरा सभकें झूकि क आगां बढैत आ तहिना माथ उठा क पाछां अबैत देखैत रहय..... । नरेशकें फेर किछु मोन पडैछै, ठोढ पर हंसी अबैत–अबैत रुकि जाइछै । भतखोखरि बुढिआक अंगनामे वेंग कुटि मैलाक संग पतली फेकि देल जाइ छल आ ओ वुढिआ भरि राति फेकनिहारिकें पुरा खनदानकें उराहि दैत छलैक । वेटी–रोटी करैत रहैत छली । वास्तवमे वेंट कुटि क तए ओकरे आंगनमे फेकल जाइत छलै जे ओ बेसी गाडि पढि सकैत छलीह । राति भरि जुआन छौडी सभक धुमगज्जरिक संग वालसुलभ उत्सुकतासं पाछां – पाछां दौगब महज खुशी दैत छलै । लगै दिनमे बहादुरक घीसिआ क गुरुजी के चटिसारमे ल जएबाक डरसं मुक्त रातुक ई माहौल स्वच्छन्द छैक । ने वावूजीक डर, ने वहादुरके उठा ल जएबाक चिन्ता । वात वुझौक कि नहि, नरेश रमल रहैत छल ओहि खेलमे । ओकरा तं तखनो ने किछु बुझायल रहै जखन इजोतिया ओकर घरक पछुआर बला गाछी आ भुसा घरलग एकटा प्रस्ताव कएने रहैक – नरेश,खेलबे अर्थ त ओकरा ओतेक नै वुझल भेलै मुदा ओकर इशारासं आशय वुझने रहय आ डेरा गेल रहैक – नहि, हम नहि खेलबौ । ठाढे ओ नासकार चलि गेल रहय । जं कि इजोतिया ओकरा उमेर सं बेसीक वुझाइक, ओ वातकें वुझैक, मुदा नरेश....। पता नहि नरेशकें किए आइ पुरना बात मोन पड लागल छै । ओ भोरेसं अपन पोताक उदण्डपनीसं फिरिशान भेल अछि । एक तं भोरमे देरीसं उठत, उठि कत्त पडायत ठेकान नहि । स्कूल जएबाक कोनो जरुरी जेना नहि होइक । कुण्डलिया छौडा सभक संगत आ पता नहि गुटका, भांग, सिगरेट किंवा आनो कोनो नशा खाइत हो ,त मनमे आशंका उठल छै । खौंझायल मोने वरण्डाक खुरसीपर बैसि गेल । तखने ओकरा वुझएलै – एक ई दिन अछि आ एक ओ दिन रहय ।फेर भसिया गेल रहय । एखनो मोन थीर कहां भेलैए...। माय जखन ओकरा दुनू मोडलहबा टांगपर लादि दुनू हाथ पकडि घुघुमना खेलबै तं हिल्ला झुलबाक मजा ओ लेल करए । गीतकलय संगे झुलैत नरेशक वालपन महज देहमे गुदगुदी आ आनन्द मात्र उठा सकैत रहय वुझए किछु नहि । मुदा जखन ओ टेल्हगर भेल त मायक नक्कल करबाक मोन होइक । अपन भातिजकें ओहिना टांगपर ध झुलब लागय आ पढ लागय–घुघुमना घुघुमना, बौआकें गढा देब दुनू कान सोना । ओकरो झुलबैत आनन्द लगैक आ बौआ सेहो हंसि, हंसि क अपन आनन्दक अनुभूति करबैत छल । ओना ओकर छोट–छोट पयर–हाथ बौआके बेसी काल सम्भारबाक अवस्थामे नहि रहैक, ओ उतारि दैक तुरते । अपन नेनपनक उछल–कुदक दूटा घटना मन पडिते सौंसे देह सीहरि जाइत छैक । बड मुश्किलसं बचल रहैक आंखि ओकर.. । आंगन मे दुनू भाइ खेलैत रहय । भैया तीर धनुष बना चलौल करए । एक बेर भेलै ई जे तीर सोझे नरेशकें आखिएमे लगलै–वाम आंखिमे । सौंसे हाहाकार मचि गेलै, माय त बताह भ गेल छलीह । ओकरा कनैत–कनैत बेहाल रहैक । गामेक टोटकासं आंखि ठीक भेल रहैक । पता नहि माय कोन–कोन दैब पीतरकें एहि लेल मानि देने छलीह । तहिना एकबेर गछुलीमे आम लुट बेरमे अन्धाधुन्ध दौगल रहय नरेश, त गाछीमे गाडल एकटा खुट्टाक नोक सोझे कपारमे गरि गेल रहैक । माथ सुन्न भ गेल रहैक । मायके जखन पता लगलै त ओ हकासल–पिआसल दौगलि रहय घराडी पर आ ओकरा समेटि क गामक बैध लग लजा उपचार करौने रहैक । वाल सुलभ जीवन शैली, गामसं जनकपुर धरिक यात्रा, पढाइ आ डिग्री सभक अपन–अपन कथा रहैक । धन–खेती जे होइक, शिक्षामे पछुआएल परिवारक प्रत्येक ओ संघर्ष ओकरा भोग पडलै जे एकटा सभ्य समाजक अंग बनबा ले जरुरी होइत छैक । आइ जखन उमेरक चारिम प्रहरमे जएबा ले तैयार अछि ओकरा लगैछै ओ फेरसं बचपन दिश लौट चाहैए । दिन रातिक षडयन्त्र, राजनीतिक विद्रुपतता, चन्दा, अपहरण, हत्या किंवा दिन दिन बढैत असुरक्षाक भय आ आतंकसं त्रसित समाजमे तनावक जिनगी जीबाक अर्थेकी? मुदा फेरसं ओ स्वयं प्रश्न करैत अछि की ओ नेनपनक स्वच्छन्द, सहज स्नेहसं भरल किछु साल घूरि सकत ! चलु ओ वितलहा वर्ष नहि घूरत ई सत्य थिक, अपने तं ओहि युगमे जा सकैछी ने ! हं, ई संभव छैक । भ सकैछ एना भेने तनावमे कमि अबैक, मुंहपर चापलुसीक वोल झाडैत, परोक्षमे चरित्र हत्याले उताहुल सरसमाजक व्यक्तित्वक दोगला मुंह देखबाक दुर्भाग्यसं बंचि त सकै छी । हमहीं किएने अपनाकें नेना बनाली ! नरेशकें अपने सोचपर हंसी लगै छी । की ई संभव छैक । ओहुना साठिक बाद लोक नेनपनमे पुनः प्रवेश क जाइए कहांदन । ओकरो अवस्था तं आबिए रहल छैक । चलल जाए एक बेर सएह सही....। नरेशकें जेना सौंसे देह हल्लुक लगैत छैक । वरण्डासं उठैत अछि । आंगन मे अबैत अछि । पोता आबि गेल छै । ओकरा डंटबाक इच्छा रहितो ओ चुप रहैत अछि । प्रारंभ एत्तहिसं हुअए तं हर्जे की? शिक्षा अभियान- गजेन्द्र ठाकुर “हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबय चाहैत छी । “ बुछन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे रिक्शा चलबैत छथि । गाममे खेती – बारीमे किछु नहि बचलैक । छोटका भाय सम जनमिते मरि जाइत रहय से डोमक हाथसँ एकटा छोटका भायकेँ जनमलाक बाद माय – बाप बेचलन्हि आऽ फेर पाइ दऽ किनलन्हि । ई समटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक । आऽ छोटका भाय जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहए बचि गेलाह । आऽ ताहि द्वारे ओकरा सम डोमा कहि सोर करए लगलाह । बुधन अपन बाप – मायक संग हरवाही करथि मुदा भायकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि । सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि – लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक । एकरा जरूर पढायब, चाहे ताहि लेल पेट काटय पड़य आकि भीख माँगय पड़य । मुदा गाममे जे स्कूल रहय ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नहि पढ़ैत रहथि। सरकार एकटा योजना चलेलक , दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जाऽ कए यादव जी मास्टर साहेब बच्चा सभकेँ स्कूल बजेलन्हि , नाम बिना फीसक , मासूलक लिखओलन्हि । सम हफता – दस दिन अएबो कएल स्कूल दुसधटोलीसँ , चमरटोलीसँ , धोबिया टोलीसँ । सभकेँ किताब भेटलैक आऽ सभ सप्ताहक-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेलाह । देखा –देखी कमरटोली आऽ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़य, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफत, किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नहि छैक । “बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आऽ पैघ – पैघे । स्टेटक आइ तकक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ढाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा “ । जयराम ठाकुर असीन जीक केश अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर कटैत बजलाह। “ से तँ बाबू ठीके “ । असीन बजलाह । से गाममे फेर ब्राहाण आऽ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़ए बला नहि बँचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह । “ हे अदहरसँ बेसीमे नहि देब , मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि “। आऽ दुसध टोली चमरटोली आऽ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल । पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि। अपन अपन माय-परमेश्वर कापडि सबके नव नेपाल, समृद्ध आ संघात्मक नेपालक सुन्दर चित्र बनएबाक बेगरता रहनि । उमटुमाएल त’ बहुतो गोटे रहथि धरि चुनुआ बिछुआ, नामी—गरामी सातटा कलाकारके अपन बुमि ई भार देल गेलनि । भार अबधारि सब एहि निहुछल काजमे लागि जाइत गेला । केओ धर— मुडी, केओ हाथ त’ केओ टाङ्ग, केओ पयर त केओ बाहिँहाथ बनाबऽमे तन्मय भ गेलाह । देखिते देरि सब सबआग बना बनाक अनलनि । आहिरेबा । जखनि जे सबके द्धारा बनाएल नेपाल मायक आगके एकठाम जोडिक देखलनि त ओ आकृति कुरुपे नहि विद्रुप आ राक्षसी लगैत छल । ई चित्र देखिते निर्माणक आग्रही संरचनावादी लोक भडकिक आन्दोलन पर उतारु भगेल । असलमें ई नरी चित्र भेलै कि नहि सेहे विवादक विषय बनि गेल । भेल कि रहै त जे पयर बनएने रहथि से रहथि माटिक मूर्तिकार आ पएर एहन सुकोमल माने परी रानीक सुन्नर पयरसन रहै । माय माये हाइछै । मायक पयर धरती परक लोकक रेहल खेहल आ कर्मठ पयर होएबाक चाही ने से रहबे नहि करए । मुँह जे बनएने रहथि से अमूर्त पेन्टिङ्गक रहैक । आँखि किदन त नाक निपत्ता । केश दोसरे रङ्गके, पश्चिमी कटिङ्गके । फडफरायल ठाढ, किछु लट ओम राएल बेहाल । हाथ धातु मूर्तिकारद्धारा बनाएल रहैक त धर काठ मुर्तिकारद्धारा बनाएल कोकनल, निरस । लगै जेना मेहन जोदर्डो सभ्यताक वा पाषणकालक उत्खनन कएल गेल हो । तहिना कटि आ ओद्रभाग हिन्दी फिल्मक आइटम गर्लक कपचि छपटिक ल आएल सनके । बेनङ्गन निर्लज । बात निर्विवाद छलै जे समरसताके अभावमे ई मूर्तिपूर्णे नहि भेलै । गढनिसब बेमेल बानि उबानि । बेलुरा रहैक । असफलता पर पछताबा कोनो कलाकारके नहि रहैक । अहँकारी हेठी सबके मनमे । आब ऐ बात पर घोंघाउज कटाउँज होइत होइत अरारि आ मारि पीट धरिक नौबत आबि गेलै । से केना त जेना एखनि नेपालक क्षेत्रीय मुद्दाक बलिधिङ्गरोक विवाद । काष्ठकलाबाला कहथि हपरा के अदुस अधलाह कहत, तेकरा हम बसिलेस पाङ्गि देबै । पेन्टर रङ्गकर्मीके अपन हठ हमर सृजनाके चिन्ह बुमके एकरा सबके दृष्टिए दम नै छन्हि । चित्रकारके अपने राग । पाषाणमुर्तिकारक अपने ठक ठक । सब अपन बातके इर बान्हि, गिठर पारि अडल जे मायक चित्र हमरे कल्पना भावना अनुसार बनए । सह लहके बाते कोन अपना आगूमे सबके सब अदने, निकम्मे बुमथि । घोल घमर्थन, गेङ्ग छेंटके वैचारिक दर्शन कहैत सब हुडफेर फेरने घुमए । अपना अपनीके सब तानहिबला, सुनबाला निठाहे नइ । लोकमे सब रङ्गके, सब तौंतके लोक रहैछ ने । ओइमेस एगोटे आगू अएलाह आ थोडथम्ह लगबैत कालाकार सहित सबके बम्बोधित करैत कहलन्हि हमर बात पहिने ध्यानस सुनैत जाऊ । बात हम पयरस सुरु करैत छी, मूहँस नहि । पहिने पयरेस एहि दुआरे जे हमरासबके सँस्कृतिमे सबसँ पहिने पयरे पूजल जाइत अछि । पयरे चलिक केओ अबैत अछि । पयरेपर केओ ठाढ होइत अछि । पयरै लक्ष्मी होइत अछि । आगत अतिथिके पयरे पवित्र मानल जाइत अछि । प्रवेशके पयर देव कहल जाइत अछि । माने पयरे प्रथम अछि । कर्मशील भेने बन्दनीय आ ई लक्ष्मीपात्र अछि । ताहि दुआरे पयरेस चित्रक निर्माण शुरु हुअओ । छोटकी काकी —कुमार शुशान्त गामक माटिक सुगन्ध, गामक बसमे बैसिते लागऽलागल । चौबीस वर्षक विछोडक बाद आइ ई सौभाग्य भेटल । जौं कही चौबीस वर्षक बनवासक बाद तहन कोनो अतिश्योक्ति नई, हमरालेल त बनवासे अछि गाम सँ दूर । जेना–जेना आन–आन गामके पार करैत बस अपन गामक लगमे अबैत गेल, तहीना–तहीना हृदयमे एकटा हटले प्रकारक उमँगक सँचारके अनुभूति होबऽ लागल । हौजी, गाममे प्रवेश आ अपन घरक दूरी दश डेगक, मूदा दू मिनट पहाड सन लगैत छल । उठल डेग रुकिगेल जहिना एकटा आवाज कानके स्पर्श कैलक, “छोटकी काकी गै, पाइ दहिने धान कुटबऽ ले ।” एहने बिसराह छलथि हमर छोटकी काकी । पुछलाबाद ओहो अपन परिचय “छोटकीए काकी” कहिकऽ दैत छलीह । हूनक नाम त हमरो सबके नहि बुमल अछि, लगतीह दाइ मूदा बजवैत छलियैन्हि “छोटकी काकी” नाम सँ । ओना हमर अपने नई भऽ पटिदारीक दाइ छलीह “छोटकी काकी”, मूदा अप्पन एतेक कि आँखि खुजिते छोटकी काकीक हँसैत चेहरा देखैत छलहुँ आ बाल सुलभ हठ शुरु भऽ जाए “छोटकी काकी गै ?” “बउवा ?” “नीन्नी( चीनी )बला रोटी बनएने कि नई ?” “बाबु हमर बिसराह भऽ गेलहुँ, बिसरि गेलऊँ, नेन्ना हमर अखने बना दैत छी ।” वाह रे शब्दक अमृत, एतेक मधुरता ! छोटका बबा परदेश कमाइत छलथि, बड सलज लोक । एही पृष्ठभूमिमे छोटकी काकीक धियापुताक चर्चा नई देखि अपने पाठक लोकनि जरुरे बुमिगेल हायब कि “भगवानो सँ चूक होइत छन्हि”, मूदा जौं हमर विचार पुछि त हम एकरा न्याय कहब भगवानके, छोटकी काकी सन लोक जे उपमा छथि स्नेहक, प्रेमक, हुनकर घेरा सिमीत नई होए ताँए । सत्ते कहबी छैक, बचपनके घटना जे बच्चाके मानस पटल पर आकीत भऽ जाइत छैक ओ मेटौला सँ नई मेटाऽ सकैया । प्रित दीदी नइहर आएल छलिह, हमर छोटकी काकी बेचैन, “गै छोटकी काकी किया बेचैन छें ?” “नेन्ना रे प्रित वऊआ आएल छथिन्ह ।” “गै छोटकी काकी, ओतेक पैघ आजन, हूनकर माए प्रित दीदी तखन बऊवा कोना भेलखुन्ह ?” मोतीसन बतीसो दाँत छोटकी काकीक चमकल, कहलीह, “हमर त बऊवे छथि ।” “कि कहलहुन प्रित दीदी ?” “बऊवा रे जतऽ रहैत छथिन्ह प्रित बऊवा ओतऽ ताजा माछ नईं भेटैत छैक” एहि बातक मर्म तखन हमरा बुमबामे नई आएल छल, मूदा वेसी समय सेहो नई लागल । सुतली रातिमे छोटकी काकीके हिंचकी हमरा भित्तर सँ मकमोरिकऽ जगा देलक । छोटकी काकी कनैत छलीह । “किया कनैत छें छोटकी काकी ?” “नई किछ, सोना सुति रहू” “नईं जो कह नेऽ ?” नोर पोछैत अपन अनुरोध रखलहुँ । “नेन्ना रे, प्रित बऊवा काल्हि जाइ छथिन्ह, हुनका माछ खुअवितहुँ । पैंच नेने छलहुँ, किछु पाई बाकसमे रखने छलहुँ, हरा गेल ।” “छोटकी काकी गै नई कान, हम कमाएब त तोर खूब पाई देबऊ तू हूनका माछ खुवा दियहुन”, भरि पाँज धऽ कऽ माथ चुमि लेलथि छोटकी काकी । वात्स्ल्यक छहारीमें समय कोना कटल नई बुमाएल । कखनो काल बाबुजी, माँपर बड तमसाथि, “बिगडि रहल अछि, देखू ध्यान दियऊ”। ई शब्द, शब्द नई सँकेत छल, भेंटऽबला सजायके । किछु दिनमे परिणाम देखाई देलक, हम जिद्दपर अडि गेल छलहुँ “नई कि नईं जाएब”, जिद्द निरर्थक नई छल, हमरा हिसाब सँ, बात छल छोटकी काकी सँ दूर होयबाक । पढऽवास्ते बेबी दीदी ठाम जएबाक । “बच्चा के बल कानव ” एहि कहविके चरितार्थ करैत, छोटकी काकीके कोरामें माथ राखिकऽ खूब कानी । नोर नुकवैत छोटकी काकी कहथि,“नई “जाएब त हाकिम कोना बनव ?” “हमरा नई बनवाक अछि हाकिम” फेर सँ हिचकी लैत सवाल पुछि बैसियैन,“हमरा कोन जरुरी अछि हाकिम बनऽके ?, नीक बला पैन्ट शर्ट पहिरलाकबाद तोहीं त कहैछें कि हमर नेन्ना हाकिम सन लगैया”, शब्द नोरक बान्ह तोडि देलक, भरि पाँज कऽ धऽ दुनु गोटा फफक्का मारिकऽ कानऽ लगलहुँ । फेर कहलथि,“आहाँके हम्मर सपत जौं नई गेलहुँ त हम्मर मरल मुहँ देखब ।” पट सँ कोरा छोडि उठलहुँ आ प्रस्थान कऽ गेलहुँ अपना घर दिस, ओइ घर दिस जकरा काल्हि धरि हम मदनबाबुक घर कहियैन (हमर बाबुजीक नाम मदनबाबु अछि )। चारिए डेग आगु बढल छलहुँ की फेर सँ सुनाई परल छोटकी काकीक आवाज “घुरब तखने जखन हाकिम बनि जाएब ।” माँ सँग सूतब माँके आश्चर्यमे रखने छलन्हि, बेरबेर पुछथि, “कि भेल बाऊ ?” “नई किछु, हम जाएब बेबी दीदी ओतऽ पढऽ ।” भ्ाोर सँ भोर बाबुजी सँगे तैयार भ कऽ विदाह भेलहुँ पढि लिखिकऽ हाकिम बनवाक लेल । विदाह बेर बाबुजी कहलथि, छोटकी काकीके गोर लागि कऽ आबऽलेल । हम अपन हिसाबक बहन्ना बना लेलहुँ, मूदा गेलहुँ नई । बसमे बैसति काल बाबुजी कहलथि, “देखु वाएह छथि छोटकी काकी” तका गेल, सत्त्ते छोटकी काकी छलीह । “किया आएल छथिन्ह एत्त ?” बाबुजी सँ पुछलिऐन्हि । प्रश्नक जबाव बाबुजी नई देलथि, हमरा चाहबो नई करैत छल बाबुजीक जबाव, किया त हम बुमैत छलहुँ छोटकी काकीके अएबाक कारण । हँ, ई नई बुमल छल जे छोटकी काकीके अन्तिमबेर देखि रहल छी । जौं ई बुमल रहैत त जतेक देर बस रुकल छल ओतेक देर कम सँ कम हुनके देखितहुँ । “शुश भाई एतऽ किया रुकल छी ?, कखन अएलहु” चचेरा भाईएक ई शब्द हमर तन्द्रा तोडलक । जे नोर छोटकी काकीके सँग रहलापर हमरा सँग छल, हूनका बिदाह भेलाकबाद विदा भऽगेल छल । अखन..... हूनकर याद फेर सँ नेने आबिगेल छल..नो...र... । डटके जलपान- कुमार शुशान्त एकटा कविताक भाव निश्चितरुपसँ स्मरण हायत, “सात समुद्रक जलके स्याही बनादेलजाए, वनक जँगलके लेखनी, समस्त धर्तीकेँ कागज बनादेलजाए, तखनो भगवानक महिमा पूर्णरुपसँ नहि लिखल जाऽसकैया” भगवानक महिमा त छोडि दिय एतबा में त डटकेजलपानेक महिमा नई अटत । डटकेजलपान हूनक वास्तविक नाम छन्हि दिबसलाल । जे हुनकर कर्मेन भेटल छन्हि हूनक किछु महिमा प्रस्तुत अइछ, क्ीऋ परिक्षाक सेंन्टर गामसँ ७० कि.मि. दूर एकटा स्कूल में रहें, आवत–जाबत नई संभव हाएत ई विचार कऽक गामक १० टा जे परिक्षार्थी छल सबगोटे एके ठाम डेरा लेनहुँ । पहिलबेर अभिभावकके नजरसँ दूर स्वच्छंद लंगोटिया यार–दोस्त संग रहबाक मौका भेटल । उमंग–उत्साह त एते कि बर्णने उचित नई । ओम्हर अभिभावकके कि फुरौलनि से भगवान जानथि । देख–रेखलेल संग लगौलनि डटकेजलपानके । एक त राकश मंडलि उपर स न्योत से भेट गेल, डेरामें समानसब राइखकऽ फ्रेश होयबाकलेल कोका–कोला पिबाक निर्णय भेल मंइलिके । दोकानपर पहुँचिते हुकुम भेल दोकनदारके, “दसटा खूब ठंढा कोका–कोला दऽ” डटकेजलपान लगा कुल संख्या छल एग्यारह, मुदा जानि–बूझकऽ मंगनऊ दशेटा । आवशुरु भेल विवेचन एकटा मित्र “ जा हुनका नइ भेटलनि ” दोसर “ नई–नई हुनका देबो नइ करबनि ” तेसर “ से किया ?” चौथा “ बड़ कडा निशा होइत छैक अइ में” सब गोटे जाहि मंशासँ गप्प नारने छलहुँ से पुरा भेल, डटकेजलपान बजलथि । डटके “ उबारु सब, माँए बाप परिक्षा देबला पढएने छन्हि आ ईसब एतऽ दारु पिबइ छथि ” एक मित्र “ तोहरा अपन ँबतजभच के शपथ छह, कतौ बजिहऽ नई ” अंगूठा द्दाप, ँबतजभच के मतलब नई बूझलथि ताएँ झगड़ा नई कएलथि, एतबे बजलनि “ ठिकछई–२ नइ कहब ” । किछुदेर सऽबके पिबैत देख नइ रहलगलन्हि, पूछि बैसलथि,“ कते कड़ा होइछै एकर निशा ?” मित्र “ नइ पूछह, झूमा देतौ ” डटके “(मूंह बिचकबइत) हूँह, केहन–२ भाँग–धतूर के त सिधें घोंटि जाइ छियनि त ई कि झूमाओत ?” मित्र “ कहैत छिओ ने , भूलियोकऽ नई पिविहऽ ” डटके “ एहन बात छइ तहन लबही तरे ” लेलथि कोका–कोला; मुश्किलसँ आधा बोतल पिने रहथि कि लड़बड़ाईत आवाजमें कहैछथि “ हमरा कान में फहऽहऽहऽ करईया ” एक मित्र “ हौ, ई कोन बिमारी भेल ” दोसर मित्र “ बिमारी नई, हिनका निशा लागि गेल छन्हि ” हौजी एतवा सुनिते आधा बोतल कोका–कोला हाथमें नेने ओङ्घराए लगलथि रोडपर । आबत भेल भीड़, जे तुरत्ते आएल रहथि हूनक एकैटा प्रश्न रहन्हि– “ कि भ गेल छन्हि ” “ निशा लागल छन्हि ” “ कि लऽ लेलथि ” “ कोका–कोला ” “ बड़ नौटंकियाह लोक छथि, ओइसँ कोनो निशा लगइ छइ ” जइन एतबे जवाब धिरे–धिरे जम्मा भेल पचासटा लोकसँ सुनलथि तइन ठाढ भऽ क देहपर लागल माटि झाड़ैत बजलथि,“ उबारु सब, झूठे किया बजैजाइत गेले हऽ जे निशा बला चिज छइ से, करा देले ने बेइज्जति” । एकटा मित्र “ तों किया चिंता करैत छऽ बेइज्जतिके ?, ओकरा करऽ दहक ने जकरा ठाम इज्जत छई ” । “ बोनि निक भेटल” चर्चा करैत सब गोटे पहुँचनऊ डेरामें । आब निर्णय भेल भोजन लेल जएबाक ।बेरा–बेरी भोजन कऽक आएल जाए । २ रुपैयामे भरिपेट भोजन पहिनहिं एकटा होटलमे तय कऽ क एडभान्स १० रुपैया जमा सेहो करा चुकल छलहुँ । होटलके नाम कहिकऽ सबसँ पहिने भोजन करबाकलेल पठाओलगेल डटके जलपानकेँ । घन्टा दू घन्टा, चारि घन्टा भऽगेल मूदा डटके जलपान अएलथि नहि । चिन्ता सँ बेसी कौतुहुलतावश हुनक तलाशमे सबगोटे निकललहुँ । होटल आगा पहुँचलहुँ त फेर सँ नजर पडल किछु लोकक भीडपर । पहुचिते देखैत छी जे डटकेजलपान आओइ होटल मालिक बीच गर्मागरम बहश भऽरहल अछि । होटल मालिक “हम कोनहुँ किमतपर नईं खुवा सकैत छी” डटके– “अपने मने नई खुएबे, पाई देने छियौ, फोकटमे नईं” बीच बचाव करैत होटल मालिकसँ प्रश्न पुछि बसिलहुँ–“की बात ” जबावमे खाना बनाबऽवला महराज बडका हण्डाके करछुसँ पिटैत पहुँचल ओतऽ जतऽ हमसब ठाढ छलहुँ । दोकानदार–(खाली हण्डा दिस ईशारा करैत)“आब बुमाएल बात” किछुदेरक चुप्पीक बाद, फेरसँ हाथ जोडिकऽ बजलथि–“सरकार हम मनुख्खक भोजनके बात कएने छलहुँ” हमसब कहलियैन्हि–“ई त ऊचीत नई भेल ! हमसब त एडभान्स देने छी ” दोकानदार गल्लामेसँ १२ टका निकालिकऽ, लगमे आबि हाथमे पकडा देलक आ कानमें धिरेसँ कहैया–“बारह टका देलहुँ, १० टका जे अपने एडभान्स देने छलहुँ से आ सुनु–ऊ जे सामनेके होटल अछि(सामनेके होटल दिस ईशारा करैत) ओकरा मालिकसँ बड कसिकऽ दू दिन पहिने हमरा मगडा भेल छल, उपरका जे फाजिल दू टका अछि ओ हमरा तरफसँ घूसभेल, अई आदमिके काल्हिसँ ओही होटलमें पठाऊ” दोकानदार सँगे सब मित्रके हँसैत–हँसैत पेट दुखाए लागल । डटकेजलपान अर्थात दिवसलालजीक एक एकटा काजक वर्णन लिखऽमे जौं समुद्रक पानिके मसी बनादेल जाए त भलेही समुद्र सुखा जाए मूदा दिवसलालजीक कारनामा नई लिखा सकत । धन्यछथि....दिवसलालजी ! वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव। हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल हठात् अपन दडिभङ्गा आबक प्रयोजनक मोन पडि≥ते हम व्यग्र भद्र गेलहु“ । प्रायः तखन दिनक एगारह बजैत छलैक हएत । शहरबजारक कोलाहल किछु पहरक हेतु शान्त भेल छलैक । स्टेशन शून्यसन छल, सडकपर गाडी वा पैदल यात्री एकाधेटा देखयमे अबैत छलैक आ’ सेहो कखनोकाल । चारुकात प्रचण्ड रौदक साम्राज्य छल । आकाशमे उपर बहुत उपर चीलसभ उडि रहल छल । दोकानक नीम गाछपर कौआसभ कखनो–कखनो आबिकय कुचरि जाइक । कखनो–कखनो एकगोट बिलाडि दोकाने–दोकाने घुमैत छडपैत नजरि पडैक । ... हडाहा पोखरिपर सूर्यक प्रखर रौद अनवरत पडि रहल छल, मुदा अखनो मेघक छाह पडिते पानि करिक्का रोसनाई जका कारी भ जाइत छलैक आ’ बसातक छोटको झोंक ओहिमे असंख्य हिलकोरि उठाय पानिके चञ्चल बना दैत छलैक । हम मिसरजी लग जा क जीद्द करय लगलहु“ — शहर देखय चलू न. ” ओ आश्चर्यस बजलाह — बाप रे, एहन रौदमे... ” हम जीद्दपर उतरि गेलहु तखन ओ दिकिआकय एकगोट एक्का भाडापर लेलन्हि । शहरक पूरा परित्रमाहेतु नहि ... नगरदर्शनक पहिल पडावधरिक लेल मात्रहिं एक्का हमरासभके राजदरबारतक पहुचा देलक । ओहिठाम हमसभ उतरि गेलहु आ’ तकरबाद पैदले देखैत–सुनैत आगा बढलहु। बडीटाके विशाल लोहाक फाटक लगस हमसभ ओहि लालदरबारके निहारलहु जकरा बारेमे रेलगाडीमे ओ बूढा कहैत रहथि जे बनाबयमे डेढ करोड लागत पडल छैक । जाधरि ताकि सकलहु तकैत रहलहु ओहि विशाल दरबारके आ’ तहिना ओकर बडकी फूलक बगीचाके जाहिमे रङ्गविरङ्गक शोभा बढबयबला गाछ तथा फूलसभ रोपि सजाओल गेल छलैक । फाटक लग ठाढ बन्दूकधारी सिपाही हमरासभके डपटलक — कथी देखैत छह, भागह एहिठामस की ... ” तकरबाद हमसभ हथिसार, घोडसार, असबाबखाना आदि देखलहु। एकस एक चमत्कारिक वस्तुसभ देखैत सुनैत हमरासभ अन्तमे दडिभङ्गाक बजारदिसि पैसलहु । तहिया दडिभङ्गा शहर एक्के ठाम स्थित नहि रहैक — मोहल्ला–मोहल्ला, टोल–टोल आ’ सेहो सभ अलग–अलग छुटल छिडिआयल जका रहैक । एक ठामस दोसर ठाम जायलेल छोटछीन ग्रामीण खण्डके पार करहिं पडैत छलैक — खेत, बारी, ताडक बडका–बडका गाछक पातिसभ आ’ ओहिमे सटल ताडीखानाक एकचारीसभ बीच–बीचमे बडका–बडका नालीसभमे खदबदाइत गजगज करैत टोल मोहल्लाक गन्दगी । ... शहरक बाबूसभ खपडाबला विशाल बङ्गलाक बरन्डामे भारी, चाकर आ’ बडका–बडका आराम कुर्सीपर, जाहिमे आधा शरीर सुताकय आराम कएल जाइत छैक, सुतल दूपहरियाक शून्य निहारि रहल छलाह । कखनो–कखनो एकाधटा एक्का अथवा बैलगाडी सडकक माटिके आओर महीन गर्दा बनबैत पास करैत रहैत छल । दडिभङ्गा शहरक दिनभरिक लम्बा भ्रमणस आखिमे विभिन्न नव–नव दृश्यसभ संजोगैत मुदा एकदम थाकल ठेहिआयल साझखन हमरासभ फेरो मोदिआइन लग पहुचलहु। मिसरजी चौकीपर बैसिते ठेहीक कारणे नमहर सास तनलनि । मोदिआइन एक बाल्टीन पानि आ’ लोटा दैित कहलकन्हि — अहासभ थाकि गेल छी । ... हात–पयर धो क ठेही उतारु देखू त एहि बौआके, ... बेचारा... ” मोदिआइनक वचन अत्यन्त स्नेहपूर्ण रहैक । ततबे स्निग्धता नजरि आ’ भावमे सेहो छल । मिसरजी उठि हाथमे लोटा लैत बजलाह — हम कनेक पोखरिदिसि जाइत छी । ओतहि सभ त्रियास निवृत भ जल्दीये आयब । तकराबाद हमरा काजस बाहर जयबाक अछि । ” हमहु पोखरिदिसि जायलेल उठलहु । मुदा मोदिआइन हमरा रोकि लेलकि — एखन पोखरि जयबाक जरुरी नहि छैक । ... सेहो कुबेरमे । ... आ’ फेर अहा थाकलो छी ” हम ओही ठाम पीढीयेपर बैसिकय हाथ–पयर धोयलहु आ’ लगेक अखरे चौकीपर जा क पलथी मारि बैसि गेलहु । मोदिआइन एकगोट बडका लालटेन लेसलकि आ’ लोहाक एकगोट पातर कडीमे ओकरा लटका देलकैकि । तकरबाद एक–एक क सभ दोकानसभमे इजोत होइत गेलैक । एक्के रत्तीमे साझ मुन्हारि भ गेलैक । कीडा–फटिङ्गासभक तीख ध्वनि चारुभरिक वातावरणके हडहोडय लगलैक । अन्हारमे हडाहा पोखरि लुप्त भ गेल जेना निस्तब्धताक कारी धुधुर चद्दरि ओहि पोखरिपर चढिक पसरि गेल होइक । ओहि कारी निस्तब्धताक चद्दरिपर असंख्य भगजोगनीसभ भक–भक करैत उडय लगलैक । हमरा लागल किंवा साझक अन्हार हडाहा पोखरिपर कनेक बेशीये मोटगर भ गेल छलैक । हम कनेक डेरायल आ’ शिथिल स्वरमे पुछलिऐक — मोदिआइन, हडाहा पोखरि साझ होइतहिं ... सभ दिन साझखन क एहने कारी भ जाइत अछि ? ” ओ एकबेर हमरादिसि धुमिकय देखलकि । अन्हारक कारणे शायद, हमरा बुझायल जेना ओ बहुत दूर होय आ’ दूरहिंस एकटक हमरा निहारि रहलि होय । कनेक दोसरे रङ्ग लागल । मुदा लगलेक ओकर स्नेहयुत्त स्निग्ध वाणीस हम आश्वस्त भ गेलहु —बौआ, हडाहा एकगोट विशेष प्रकारक पोखरि अछि ” हम पुछलिऐक — केहन विशेष प्रकारक... ? ” ओ बाजलि — बहुत प्राचीन पोखरि अछि ई ... ... महाभारतेक समयक थिक । तहिया एतय आटव्य जङ्गल रहैक जकरा बीचमे रहैक एकगोट छोट डबडा ” तखन ?” धीरे–धीरे जङ्गल फडाइत गेलैक । गामक बढैत क्षेत्र आ’ लोकसभ जङ्गलके कटैत ठेलैत गेल । कालान्तरमे अहूठाम वस्ती बैसि गेलैक । बादमे दडिभङ्गाक एखुनका महाराजक पुरखासभ एकरा अपन जिमदारीमे समावेश क लेलन्हि । ” मोदिआइन एकहि सुरमे सुरआयल बजैति गेलि । हम अत्यन्त थाकल छलहु तथापि ओकर सुरआयल स्वरस सम्मोहित जका होइत गेलहु । ओ बजैति गेलि — जहिया ई चारुकात झारेझारस घेरल एकटा छोट डबडा जका छलैक, नित्य अही पोखरिक मोहारपर बैसिकय एकगोट मलाहिन माछ बेचैति छलि । ... मलाहिन नाम, ह्ष्ट–पुष्ट, सुन्नरि आ’ आकर्षक छलि । जेना तहिया प्रचलित रहैक ओकर पूरा देह चानीक गहनास छाडल रहैत छलैक । ओकर घर कतय रहैक, ओ कतय माछ मारैति छलि से ककरो ज्ञात नहि रहैक मुदा ओकर माछ होइक नीक ... तैं ओकरा ओहिठाम बैसिते देरी माछ फटाफट बिका जाइक । ओ हमरा चुपचाप निसायल टकटकी लगाकय देखैत आ’ सुनैत देखि बीच्चेमे रुकि गेलि आ’ पुछलकि — सुनैत छिऐक, बौआ ” हम कहलिऐक — तखन फेर, मोदिआइन ? ” जेना कि सभ दिन ओ करैति छलि एकदिन ओ माछ ल क पोखरिक मोहारक अपन निश्चित स्थानपर आबिकय बैसलि । ओहि दिन ओकर डालामे एकटा बडका रोहु माछ रहैक । तखने दडिभङ्गा राजाक एकगोट नामी तान्त्रिक पोखरिमे नहाकय दुर्गा कवच पाठ करैत ओही द क जा रहल छलाह । ओ लाल धोती, लाल कमीज आ’ टोपी सेहो लाले पहिरने छलाह । मलाहिनक डालीक बडका जुआयल रोहु हुनका खूब नीक लगलन्हि । ओ ओहि रोहु माछके किनि लेलन्हि । एतेकटा बडका माछ एक्के आदमीके किनैत देखि मलाहिन बड्ड हर्षित भेलि । ओ हसैति अपन खुशी व्यत्त करैति पण्डितजीके कहलकन्हि — आई त अहाक भरि घरक हेतु ई पर्याप्त आ’ भरिपोख हएत । ” मलाहिन जखन हसलि त ओकर सजल मिलल सुन्नर चमचम करैत दातसभ ओकर सौन्दर्यके आओर चमका देलकैक । ठोरसभ रसायल आ’ लाल भ गेलैक । तान्त्रिक ओहि सुन्नरि नारीके एकटक देखिते रहि गेलाह । तखने एकटा चील तान्त्रिकक हातक माछके झपटिकय छिनि लेलक आ’ उडि गेल । मुदा माछ भरिगर रहैक तैं चील दूर नहि ल जा सकल । पचासे डेगधरि ल गेल होयतैक कि माछ खसि पडलैक । मलाहिन फेर एकबेर हसलि । तान्त्रिक खूब निहारिकय ओहि मलाहिनके देखलन्हि । हुनका लगलन्हि जेना हसीक पाछा नुकायल चेहराक मुख्य भाग वेदनास भरल कोनो प्राचीन नारीक छलैक खाली हसीयेटा ताजा आ’ अखुनकाक ... । ” जेना तान्त्रिकके एकाएक कोनो गम्भीर रहस्य बुझा गेल होइन्ह ओ मलाहिनदिसि तकैत पुछलखिन्ह —मलाहिन, तो किएक हसलह ? ... तो के छह ?” मलाहिन बाजलि — हम केओ होइ ताहिस अहाके की ? हसलहु एहि दुआरे जे कलियुगमे आदमीयेटा नहि खियायल पशुपक्षी सेहो खिया गेल । देखियौक ने, ओहि एकटा रोहुके चील उडाकय नहि ढोऽ सकल । तहियाक मनुखसभ परात्रमी आ’ हाथी जका“ शत्तिशाली होइत छलाह । पशुपक्षीसभ सेहो ओहने बलुआर होइत छलैक । महाभारतक कालमे एकटा चील कुरुक्षेत्रस एकगोट योद्धाक शरीरके उठाकय अही ठाम खधियामे फेंकने छल । ... कहा कुरुक्षेत्र आ’ कहा“ दडिभङ्गा कतेक दूर आ’ सेहो एकगोट योद्धाक भारी शरीर उधैत एतय तक उडब कतेकटाक चील होइत छल हएत तहिया । कतेक बलशाली रहल हएत ” तान्त्रिक फेर पुछलखिन्ह - तो छह के ? तो ईसभ बात कोना बुझलह ? ” मलाहिनक मुस्कान हठात् हेरा गेलैक आ’ मुह विषादस कारी भ गेलैक । ओ अपन डाला उठा लेलकि — हम केओ होइ ताहिस अहाके कोन प्रयोजन ... ?” तान्त्रिक किंचित अधिकारपूर्वक किछु बाजक प्रयत्न करिते छलाह मुदा मलाहिन अटेरैत आगा बढि गेलि । तान्त्रिक आगास बाट घेरैत रहस्य उद्घाटित करक उद्देश्यस कडकैत बजलाह — मलाहिन, थमह तो के छह से बिना बतओने नहि जा सकैत छह तोरा हम नहि जाय देबह ।” मुदा ताधरि मलाहिन बिला गेलि छलि । ने त ओतय कोनो मलाहिन रहैक ने ओकर डाली । खाली तान्त्रिकक कडकैत ध्वनि किछु कालधरि वातावरणमे गुञ्जैत रहल आ’ किछुअे आगा खसल पडल ओ रोहु माछ बीच–बीचमे चमकैत रहलैक । ” हम अत्यन्त व्यग्रतास“ पुछलिऐक — तखन फेर की भेलैक, मोदिआइन ? ” की होइतैक ? ओतयस तान्त्रिक धडफडाइत सोझे राजदरबार गेलाह, राजाके सम्पूर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड भेटतैक की से सोचि पाच हजार जन छौ (अगिला अंकमे) उपन्यास- चमेली रानी जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी रहमान नामक बडीगार्ड बोतल सँ आधा गिलास स्कॉच ढारलकफेर थर्मस सँ बर्फ निकालि कमिलेलक आ गिलास विधायकजीक हाथ मे पकड़ा देलक। किछु काल पहिलका झंझट सँ विकल विधायकजी सम्पूर्ण गिलासक पेय केँ एकहि सांस मे घोंटि गेलाह। फेर पूर्ववत अपन सुरमादार आँखि केँ युवतीक मनचुम्भी मारूक स्थान पर केन्द्रित कनिश्चिन्त भेलाह। हम तहरिद्वार जा रहल छी। स्वामीजी पलथी पर राखल मोटका किताब सँ नजरि हटा कयुवती केँजबाब देलथिन आ फेर प्रश्न केलनिमुदा ओ अइ मैनाअहाँ काकेक संग अहि अतिकाल मे कतविदाह भेलऊँ अछि अर्थात युवतीक नाम मैना आ युवकक नाम काके। ओहि तीनूक बीच वार्तालाप होबय लागल। ट्रेन अपन फुल स्पीड अर्थात पाँच-छः किलोमीटर प्रति घंटाक गति मे जा रहल छल। अँग्रेजक बनाओल पटरी आ बिनु बजाओल प्रत्येक वर्षक कोशीक जानलेबा बाढ़ि। समस्त इलाका मे अभाव आ दरिद्रताक साम्राज्य। भविष्य मे कोनो परिवर्तन होयत तकर दूर-दूर तक कोनो आशा नहि। धहधह जरैत बाध बोन। कतौ-कतौ गाछ वृक्षक दर्शन। ओना चारू कात तअकाले पसरल रहै। सत्य वा झूठ। स्वामीजीकाके आ मैनाक गप-सप सँ पता चलल जे ओ सब भारदाक सटल कटकी ग्रामक निवासी छलाह। काके मेडिकल टेस्ट दिअ पटना जा रहल छल। मैना जिद्द पसारि देलक आओर काकेक संग विदा भगेलीह। ओ सब मौसीक डेरा पर दू दिन रहि वापस होयत। स्वामीजी समस्तीपुर सँ हरिद्वारक बोगी पकड़ि कप्रस्थान करताह। ट्रेन एक-दू टीसन रुकैत आगाँ बढ़ल। ओहि फस्ट-क्लासक डिब्बा मे धीरे-धीरे आलस्य पसरि गेल छलै। सब कियो गुमसुम। मैना काकेक गरदनि पर मूड़ि रखने चुपचाप पड़ल छलीह। हुनक काजर पोतल आँखि बन्द छलनि। काके कखनोकाल एम्हर-ओम्हर ताकि लैत छल। स्वामीजी एकाग्र भकिताबक पन्ना मे अध्यात्मक तत्त्व केँ ताकि रहल छलाह। मुदाविधायकजी मे कोनो परिवर्तन नहि भेल। हुनक समस्त वासना जे हुनक साठि वर्षक उमेरक कारण आँखियेटा मे रहि गेल छलनिमैनाक सौन्दर्यक निर्लज्ज अवलोकन मे व्यस्त छल। बारम्बार विधायकजीक चर्चा भरहल अछि। ताहि कारणें हुनक जीवनक देदीप्यमान इतिहास जानब आवश्यक। लार्ड कर्नवालिसक चलाओल जमींदारी व्यवस्था बहुतो प्रथाक जन्म देलक। ओहि मे भेल खबास-खबासिनक प्रथा। भखरांइवाली अपन समयक प्रसिद्ध खबासिन छल। ओकरा दूटा बेटी छलै चानो आ मानो। चानो सासुर मे बसैत छल। मानोक बियाह पछिला अगहन मे भेलै बियाह कपाहुन कलकत्ता गेलाह से आब एगारह मासक बाद एकटा बैरन चिट्ठी पठौलनि बाद समाचार जे कोठीक मलकाइन बिस्वास देलक हें जे अगिला मास फागुन मे एक महीनाक छुट्टी देत। हम भरिसालक दरमाहा आ जिनिस-पत्तर लकफगुआ तक आयब। भखरांइबालीक करेज खुशी सँ फाटलगलैक। ओ हिसाब जोड़लकआब तफगुआक दिन बीस दिनक भितरे। ओ अपन बेटी मनियाँक केश मे गमकौआ तेल देलककाजर केलक आ स्नो-पाउडर लगा कओकरा परी बना देलक। फेर मनियाँ केँ बुझबैत कहलकजोजाके बाबू साहेब सँ एक सय मंगने आ। मास भरिक सिदहा एखने कीनि लेब से ठीक। पाहुन कलकत्ता सँ पहिने एतहि औताह। हुनका अबिते की कोनो वस्तुक कमी रहत! मनियाँ जखन बाबू साहेबक दलान पर पहुँचलि तओ मसनद पर ओंगठल अखबार पढ़ैत रहथि। आंगन सँ हुनकर तेसर पत्नीजे भागलपुर जिलाक बौंसी सँ आयल छलखिनतिनकर कर्कश आबाज आबि रहल छलै। ओ अपन दुनू सौतीन संगे वाक्युद्ध करहल छलीहगइतोहें की बजै छौहमे छी राजाक बेटी आ तोहें छौंदरिदरक बेटी। चुपे रहौंनहि तआबि केँ झोंटा नोचि लेबहौं। बाबू साहेब अर्थात ठाकुर त्रिलोकीनाथ सिंह। भारत स्वतंत्रा भचुकल छलैमुदा जमींदारी नहि गेल रहैक। बाबू साहेब तीस-पैंतीस तौजीक मालिक। महराजक सम्बन्धीदुमहला भवनचारूकात कइएक बीघा मे पसरल आमलीचीकटहरजामुन आ फूलक बगान। अपन पोखरि आ पिराभिट महादेव मन्दिर। तीन बिआह केलनि मुदा सन्तानक मुँह एखन तक नहि देखि सकल छलाह। आब चारिम बिआहक जोगार मे रहथि कि भखरांइबाली खबासिनक छोटकी बेटीमनियाँ सोझा मे ठार भगेलनि। अच्छाएक सय टाका चाहीबाबू साहेब आँखि सँ मनियाँ केँ तजबीज करलगलाहमुदा कान पथने रहथि आंगन मे। समय आ अवसरक पारखी बाबू साहेब केँ निश्चय भगेलनि जे आंगन मे पसरल वाक्-युद्ध जल्दी समाप्त होबबला नहि। ओ मनियाँ केँ दलानक भीतरबला कोठरी मे लगेला। ओकरा हाथ पर सय टाका राखि देलनिसंगहि चारिम बियाहक कल्पना मे कंपैत संतानक सम्पूर्ण इच्छा केँ सेहो मनियाँक कोखि मे उझील देलनि। मनियाँ छिड़िआयल टांग केँ समटैतआँचर सँ आँखिक काजर केँ पोछैत आ माथक बिन्दी केँ तकैत जखन अपन आँगन मे पहुँचलि तओकर माय भखरांइबाली सूप मे चाउर फटकै छलै। पुछलकैटाका देलकौ हँकहैत मनियाँ मायक हाथ मे सय टाका राखि देलकै आ फेर फूटल चूड़ी आ मसकल आंगी दिस सेहो इशारा केलकै। भखरांइबाली टाका केँ खूट मे बन्हैत कहलकैजे भेलौ से बिसरि जो। डिगडिगिया पिटैक कोनो काज नहि। ई सब कने-मने होइते रहै छै। मुदा ध्यान दकसुन। ओहि कोढ़ियाक दलान दिस फेर मुँह नहि करिहएँ। पाहुन केँ कलकत्ता सँ आबै मे आब दिने कतेक छैक। पाहुन केँ अबिते सब किछु सरिया जेतौकनिश्चिन्त रह। मुदापाहुन कोनो कारणें नहि आबि सकलाह। बाबू साहेबक सन्तानक चरम इच्छा मानियाँक पेट मे परिलक्षित होबलागल। आबएहन अवस्था मे कयले की जा सकैत छलै। मनियाँ ठीक समय पर गोर-नारएकटा सुन्नर बेटा केँ जन्म देलक। मुदाबेटाक जन्मकाल ओकरा किछु भगेलैक। बंगाली डाक्टर बाद मे कहलकै जे मनियाँ टिटनस बिमारीक चलते मरि गेल। टिटनसक कोनो दबाइ नहि छै। भखरांइबाली जेना-तेना ओहि नेनाक सेवाक-खेबाक इन्तजाम केलक। नेना टनमनाइत पाँच-छह वर्षक भेल। भखरांइबाली आब शरीर सँ लचरि गेल छल। ओ हिम्मत हँसोति कएक दिन बाबू साहेबक ओहिठाम पहुँचलि। ओहि दिन ठाकुर त्रिलोकीनाथ सिंह अपन सतमायक सराधक जयवारी भोज मे बाझल रहथि। हजारो नोतहारी पंघति मे बैसल सटासट जीम रहल छल। बासमती अरबा चाउरक भातआमिल देल राहरिक दाइलसात तरहक तरकारीबेस फूलल-फूलल बड़ी आ ओरिका सँ परसल देशी घी। बुझू बहुत दिनक बाद एहन रमनगर भोज हाथ लागल छल। की हल्ला भेलै। भखरांइबाली हाथ नचबैत चिचिया-चिचिया कबाजि रहल छलैऔ बाबू साहेबहम सत्य बजै छी। ई अहींक जनमाओल बेटा छी। भोज मे लूटन झा अदौरी-भाटा परसैत छलाह। ओ दालिक बारीक बिलट झा केँ रोकि पुछलनिकथिक हल्ला छैअँए हौकी बात छै बिलट झा सविस्तार सब बात लूटन झा केँ बुझबैत जवाब देलकनि जे बाबू साहेब एकर प्रमाण माँगि रहलखिन अछि। उचिते की ने। बिना प्रमाणक ई गप्प सिद्ध कोना हैत। हौप्रमाणे सँ अदालत चलै छै ने। बारिक अपन काज में व्यस्त भगेलाह। भखरांइबाली लोहछल नेनाके पहुँचा पकड़ने वापस भगेलीह। ओ टोले-टोलगाम-गाम सबकेँ सविस्तार सूचना दएलै। मुदाओ प्रमाण नहि जुटा सकलि। प्रमाण तकैत-तकैत भखरांइबाली एक दिन अहि धरती केँ त्यागि देलक। ओनेना आब टोल-पड़ोस मेफेर गाम-गाम घुमि भीख मांगि कसमय बितबलागल। ओ प्रायः सदिखन नांगट रहै छल। ताहि कारणे कियो ओकर नामकरण कदेलकै ठाकुर नांगटनाथ सिंह। किछु समयक बाद भीख मांगैक क्रम मे नांगटनाथ झंझारपुर पहुँचल। झंझारपुर मे बिर्रो अधिआइ छलै। दू वर्षक बाद बटेर सिंहक दिलबहारनौटंकीक आगमनक सूचना झंझारपुर केँ अपन गिरफ्त मे लनेने छलै। सब ठाम एकेटा गप्प। दालमण्डीक तीन आओर चतुर्भुज स्थानक दूकुल पाँच नवकी नर्तकी इजोतक पूरा इन्तजामनवका परदाजंगल-सीन अलग आ महल-सीन अलग। आब आरो की चाहीअइ बेर चौआनियाँ टिकटबला पाछाँ बैसत आ अठनियाँ आगाँ। सबसँ आगाँ ठीक हरमोनियम आ तबला मास्टरक बगल मे थोड़ेक कुर्सी रहतै जाहि पर जिलाक हाकीम फ्री मे नौटंकी देखताह। बटेर सिंह पहिल दिन �लैला-मजनूंखेलायत। फेर सिरी-फरहादनल-दमयन्तीकटी पतंगआदि खेलाइत अन्त मे सुल्ताना डाकू। नौटंकीक महीना भरिक प्रोग्राम झंझारपुरबला केँ हर्षित आ प्रफुल्लित केने रहत। ओही हरबिर्रो मे नांगटनाथ भीख मंगैत-मंगैत बटेर सिंहक सोझा मे आबि ठार भगेल। बटेर सिंहक उमिर साठिक धक मे। छपरा दिसका रहनिहार। ओ चौकी पर बैसल छल। ओकर खास नोकर झरोखिया ओकर घुट्ठीक मटर फोड़ि रहल छलै। बटेर सिंह किछु काल तक अपलक नांगटनाथ केँ देखैत रहल। फेर झरोखिया केँ हुकुम देलकैलौंडा को नौटंकी मे भर्ती कर लो। नांगटनाथ बटेर सिंहक दिलबहार नौटंकी मे की भर्ती भेल जे ओकर नसीबक पेटार खुजि गेलैक। नीक आ भरिपेट भोजनसाल-दू साल जाइत-जाइत नांगटनाथ केँ पुरुष बना देलकै। बटेर सिंहक जवानीक प्रेमिका छलै पटोरमणि। आब पटोरमणि कोनो पाट नहि करै छैमुदा रहै छै नौटंकीए मे। कखनहुँ काल जखन बटेर सिंह मूड मे आबय तँ पटोरमणि सँ हँसी-मजाक कलिएबस। नांगटनाथ पटोरमणिक दुलरुआ बनि गेल। तकर कारण छलै पटोरमणिक गठिया दर्द। नांगटनाथ मोन लगा क घंटो पटोरमणिक गठियाबला स्थान केँ जाँत-पीच करै छल आओर पटोरमणिक हिस्सा सँ सेर भरि दूध ओकरे हाथे पिबैत छल। परिवर्तन तसमयक विधान थिक। सालक साल समय बितैत गेल आगाम-गामनगर-नगर घुमैत दिलबहार नौटंकी पूसा रोड सँ कनिकबे पश्चिम कटोरिया गाम मे अपन खुट्टा गाड़लक। नांगटनाथक नौटंकीक प्रत्येक विभाग पर पूर्ण आधिपत्य रहैकमुदा आमद खर्च पर एखनो बटेर सिंहक कब्जा छलैक। पांजरक हड्डी जागलकोहासन पेटचोटकल गालआ कंकाल बनल बटेर सिंह जखन सबकेँ महिना बाँटय तनांगटनाथक मिजाज मे पसाही लागि जाइकहे परमेसर! कहिया बटेरबा मरत। बटेर सिंह मरल। नांगटनाथक मददगार भेलैक झरोखियाक बेटा ननखेसरा। ननखेसरा नांगटनाथ केँ बुझबैत कहलकैकहिया तक बाट तकब। ई बटेरबा तनेने मे कौआक जी पीस कपी नेने अछि। बाप रौ बाप। एतेक दिन कियो मनुक्ख जीबए। रातिक अन्तिम पहर छल। मसनद सँ चांपिबटेर सिंहक इहलीला केँ समाप्त कदेलक आ कन्तोर सँ लगभग बीस हजार टाका लए नांगटनाथ आ ननखेसरा सरपट भागल। भगैत-भगैत गंगाकात जा कसाँस लेलक। गंगाकात मे एकटा मलाह चिचियाति छलैपाँच रुपैया खेबा मेगंगा पार जेबा मे। आबि जाउनाव खुजैबला छै। बीच गंगा मे लहरि भौर मारै छलै। नांगटनाथ आ ननखेसरा केँ डर सँ घिग्घी उठि गेलैक। ओकरा दुनू केँ अपन पाप कर्मक बोध होमलगलैक। बटेर सिंहक बहरायल आँखिक पीड़ा डिम्हा आगाँ मे नाचलगलै। आब जे करथि गंगा माता। वाह रे गंगा माइ। हिनकहिं असीम कृपा सँ दुनू गोटे पटनाक रानीघाट पर सकुशल पहुँचि गेल। दुनू स्नान केलकफेर भरिपेट जिलेबी खेलक। एक कात एकान्त मे जा कआधा-आधा रुपैया बँटलक। फेर ननखेसरा नांगटनाथ सँ बाजलहम एक कात जाइत छी। तों दोसर दिस जो। आब एकर आगाँ अपन-अपन नसीबक भरोसा। ननखेसराक गेलाक बादनांगटनाथ बिदा भेल। जेम्हर-जेम्हर सड़क ओकरा लगेलैक ओ जाइत रहल। पैघ शहरचौड़ा रस्तालोकक भीड़मोटरक पीं-पां। नांगटनाथ केँ किछुओ ने पता रहैक जे कोन पूव आ केम्हर पश्चिम। बसचलैत गेल। विधाता मनुक्खक कपार पर भाग्यरेखा अंकित केने छथिन्ह। सब काल आ सब दशा मे भाग्य संगे रहैत छैक। नांगटनाथ बौआइत-ढहनाइत एकटा पैघ मैदान मे पहुँचल। ओतलोकक अपार भीड़। सबहक हाथ मे दूरंगा झंडामाथ पर दूरंगाटोपी आ पयर हलचल। नांगटनाथ केँ भान भेलैकहो न हो इहो कोनो नौटंकिए ने होअए। किछु कालक बाद लोकक भीड़ पंक्तिबद्ध भएक कात सँ सड़क पर प्रस्थान केलक। देश का नेता कैसा होगुलाब मिसिर जैसा होमेरा छाप कबूतर छापआदिक नारा आरम्भ भेल। नांगटनाथ ओहि लोकक झुण्ड मे सन्हिया गेल। थोड़ेक कालक बादनौटंकीक माजल बटेर सिंहक लौंडाअपन समस्त प्रतिभा केँ उजागर करलागल। किछुकालक बाद नांगटनाथ गुलाब मिसिरक बिन हुडबला जीप पर उल्टा मुंहे ठार छल आ गरदनिक सिरा केँ फूलौने आगाँ-आगाँ बाजि रहल छलैदेश का नेता कैसा होफेर समग्र भीड़ बजैत छलैगुलाब मिसिर जैसा हो! राति मे एरिगेशन डिपार्टमेंटक रेस्ट हाउस मेएकटा पलंग पर थाकल-चूड़ल गुलाब मिसिर पट पड़ल छलाह। आओर नांगटनाथ पूर्ण मनोयोग सँ हुनका जाँति रहल छल। पोटरमणिक गठिया जाँतपीच करैत-करैत नांगटनाथ केँ जाँतैक पूर्ण दक्षता प्राप्त भचुकल छलैक। जीवन मे प्राप्त अनुभव कहियो व्यर्थ नहि होइत छैक। नांगटनाथ गुलाब मिसिरक प्रत्येक मांसपेशी मे सन्हिआयल तनाव केँ विश्रामक स्थिति मे आनि देलक। गुलाब मिसिर केँ निन्न भएलै। गुलाब मिसिर प्रातःकाल जखन उठलाह तपूरा फ्रेस छलाह। हुनका आगाँ नांगटनाथ चाहक कप नेने ठार छल। गुलाब मिसिर मे नेताक गुण। एकहि नजरि मे ककरो चिन्हैक निपुणता। बिना कोनो प्रश्न पुछनेबिना कोनो परिचय प्राप्त केने ओ अपन नजरि सँ नांगटनाथक अवलोकन केलनि आ मोने-मोन बजलाहसालावर्णशंकर लगता है। मेरे काम का है। इसे साथ मे रखना ठीक होगा। नांगटनाथ गुलाब मिसिरक खासम-खास खबास बनि गेल। नांगटनाथक जाँतैक कला मे दक्षता ओकर जीवन केँ उच्च शिखर पर पहुँचेबा मे मुख्य कारण बनल। गुलाब मिसिर जखन मुख्यमंत्राीक कुर्सी पर आसीन भेलाह तनांगटनाथ आओर प्रभुताबला बनि गेल। पी. ए. केँ के कहएगुलाब मिसिरक पत्नियो केँ भेंट करैक परमिशन नांगटनाथ सँ लिअ पड़ैक। एक समयक गप थिक। गुलाब मिसिर पानक पाउज करैत कुर्सी पर बैसल छलाह। हुनक नजदीकी सम्बन्धी जे पार्टीक महामंत्राी सेहो छलअगामी इलेक्शनसँ पार्टीक कैन्डिडेटक फाइनल लिस्ट बना रहल छल। तइमे एक सीट पर जीच भगेलै। गुलाब मिसिर अपन बादशाही लहजा मे कहलनि�शास्त्राी को टिकट नहीं देना है। वह पाजी है। महामंत्राी झुंझला कबजलातककरा टिकट देबैककियो कटगर व्यक्ति अहि सीटक दाबेदार नहि अछि। कही तनांगटनाथ के टिकट ददिअनि। महामंत्राीक व्यंग्य नांगटक लेल वरदान बनि गेलै। गुलाब मिसिर महामंत्राी केँ जबाब देलनिठीक तो है। इसी साले को टिकट दे दो।नांगटनाथ सहजहि विधायक बनि गेल। नांगटनाथक गात मे ठाकुर त्रिलोकीनाथक सोनितभखरांइबालीक पालन-पोषणमुँह पर बटेर सिंहक नौटंकीक डायलॉगहाथ मे पटोरमणिक गठियाक अजमायल कलाक प्रवीणता आ ताहू पर विधायकक कुर्सी। सभ बात विलक्षण। ओ मात्रा किछुए वर्षक भीतर ट्रान्सफरपदोन्नतिठीका पर जान लेबठीका पर पुल बनबैकअर्थात् शासनक प्रत्येक दाव-पेंच मे माहिर भगेल। मुदा नांगटनाथ मंत्राी कहिओ ने बनि सकल। विधायक बनलोक बाद ओ गुलाब मिसिरक खबासी मे जीवन यापन करैत रहल। आब खिस्साक आदि मे आउ। ओहि दिन एकांत मे गुलाब मिसिर नांगटनाथ केँ कहलनिजरूरी भी है और मेरी मजबूरी भी है। इस काम के लिए इच्छा नहीं रहते हुए भी तुम्हारा चुनाव करना पड़ा। इस तारीख को भारदा से आकर तीन जन तुम्हें सूटकेश देगा। उन तीनों सूटकेसों को ट्रेन से तुम झंझारपुर लाओगे। वहाँ स्टेट प्लेन रहेगा। उसमें तुम तीनों सूटकेस लेकर पटना आओगे और सीध्ो मेरे पास पहुँचोगे। तुम दिन-रात पीते हो और लफन्दरी में भी तुम्हारा अच्छा नाम है। मैं तुम्हें सचेत करता हूँ कि काम के वक्त न शराब छुओगे और न ही लफंगा बाला काम करोगे। सुरक्षित तीनों सूटकेस मेरे पास आना हैबस। समझे या फिर से समझावें। नांगटनाथ नतमस्तक भगुलाब मिसिर केँ विश्वास दियौलक-हजूरकनिओ चिन्ता नहि। हम अहाँक आदेशक अनुसारे काज करब। हम तीनू सूटकेस संगे सुरक्षित अहाँक सेवा मे उपस्थित होयब से निश्चय बुझल जाए। मुदा नांगटनाथ केँ अपन नेताक आदेश बिसरा गेलनि। वैह विधायक नांगटनाथबर्थ पर चित पड़लगिलासक गिलास स्कॉच पिबैतमैनाक अद्भुत सौन्दर्यक पान करबा मे बेकल छलाह। तीनू सूटकेस ऊपरका बर्थ पर राखल छलै। नांगटनाथक बुढ़ायल शरीर मे सहस्त्राो पंचर छलै। मात्रा शिकोहाबादक झुम्मन मियांक सुरमाक प्रतापे ओकर आँखिक रोशनी ठीक छलै। संविधान साधारणतः विधायक केँ सम्पूर्ण प्रान्त आ खास कअपन क्षेत्रक सेवाक कार्यक हेतु आदेश देने छल। मुदा नांगटनाथक एक मात्रा लक्ष्य छलै जे कहुना मैना केँ अपन आलिंगन मे लजीवन सार्थक करी। नांगटनाथक इच्छा पूर्तिक सुअवसर तुरंते उपस्थित भेलै। काके उठि कडिब्बाक बाथ रूम मे प्रवेश केलक कि नांगटनाथ चिचिया उठलैरहमान। अपन नाम सुनिते रहमान केँ कर्तव्य बोध भगेलैक। ओ स्टेनगन नेने ठार भेल। बाथ रूमजाहि मे काके भीतर गेल छलैकेँ बाहर छिटकी लगा कबन्द कदेलक आ जोर सँ दोसर बडीगार्ड केँ सम्बोधन करैत बाजलबूढ़े महात्मा को कवर करो। अगिला जे घटना भेलै से मात्रा किछु सेकेण्ड मे सब किछु घटित भगेलै। नांगटनाथ जोश मे आबि मैना के अपन पाँज मे समेट लेलक। दोसर बडीगार्ड स्वामीजीक कनपटी मे स्टेनगनक मुंह सटा कनिशाना फिट केलक आ सतर्क भगेल। मुदा नांगटनाथक दुनू बाँहि सँ मैना छिहलैत नीचा खसलि आ फेर छिहलैत रहमानक दुनू पैरक बीच सँ बाथ रूमक फाटक तक पहुँचलि। मैना फाटकक छिटकिनी केँ खोलि देलनि। काके बिहारि जकाँ बाहर आयल तअपन दुनू हाथक गफ्फा सँ रहमानक गरदनि पकड़ि ऊपर मुंहे झटका देलकैक। काकेक झटका मे एतेक ने बल छलैक जे रहमानक माथ भराम दडिब्बाक छत सँ जा टकरायल। ओकर हाथक स्टेनगन नीचा खसि पड़लै। रहमानक माथक हड्डी चकनाचूर भगेलैक आ ओ बेहोश भकफर्श पर पसरि गेल। एम्हर मैनाक हाथक कराटेक चाप नांगटनाथक गरदनिक नीचा आ कालर बोनक ऊपर पड़लैक। एकटा शब्द भेलैक कड़ाक। बुझा गेलैक जे नांगटनाथक गरदनिक हड्डी दू फाँक मे टूटि गेलैक। अहि सभ क्रियाक बीचहि मे स्वामीजीक किताब सँ फायर भेलैक। ओहि मे सँ निकलल बुलेट दोसर बडीगार्डक दहिना हाथ केँ विदीर्ण कदेलक। सोनितक धार बहि गेल। स्टेनगन फेकैत ओ बफारि तोड़ैत नीचा बैसि गेल। स्वामीजी एतबे सँ निश्चिन्त नहि भेलाह। ओ उठि कओहि पुस्तक केँ अतिवेग सँ दोसर बडीगार्डक माथ पर प्रहार कदेलनि। ओकर चिचिएबाक प्रलाप बंद भगेलैक आ ओ मूर्छित भकफर्श पर चित भगेल। एक क्षणक लेल स्वामीजीकाके आ मैना ठहरि कतीनू बेहोश केँ निहारलनि। ट्रेन अपना गति सँ जा रहल छलै। फस्ट किलासक डिब्बा मे भेल घटना सँ ककरो कोनो मतलब नहि छलैक। आश्वस्त भकाके नांगटनाथक ऊपरका बर्थ सँ तीनू सूटकेस केँ अपन बर्थ पर अनलनि। स्वामीजी अपन झोड़ा सँ मूठ लागल एक इंचक फलबला ब्लेड केँ बाहर केलनि। ब्लेड एहन ने तेजगर छलै जे कनिकबे प्रयासे गोहिक चमरा सँ बनल तीनू सूटकेस दू फाँक भकओदरि गेल। सूटकेस मे सौ-सौ बला डॉलर केँ नोट बंडल मे पतियानि सँ सैंतल छलै। स्वामीजी अपन झोड़ा सँ दूटा मजगूत प्लास्टिकक बोड़ा निकालि तीनू सूटकेसक तमाम अमेरिकन डालर भरि लेलनि। सूटकेसक पेंदी सँ एगो कागज निकलल जाहि पर लिखल छलैटोटल टेन मिलियन। अर्थात् एक करोड़ डॉलर। स्वामीजी फेर अपन झोड़ा सँ फाटल पुरान ओ माटि मे लेटायल बोड़ा बाहर केलनि आ क्रमशः दुनू प्लास्टिकक बोड़ा केँ ठूसि मजबूत जौउर सँ बनहन दकबान्हि देलनि। आब तीनू अपन-अपन वस्त्रा परिवर्तन मे लागि गेलाह। मैना बाथरूम गेली। तीनूक नवीन ड्रेस देखल जाए। स्वामीजी केँ ठेहुन तक फाटल धोती माथ पर डालर बला एकटा बोड़ा आ बगल मे मझोला मैल झोड़ा। काकेक डांर मे धरियादेह मे हरियर गंजीगला मे तामक तगमा। मैनाक ड्रेस सबसँ लाजवाब। श्याम रंग मे रंगल हुनक सर्वादेहडांर मे ठेहुन सँ बित्ता भरि उठल घघरीउनटा मुंहे बान्हल केस और कन्हा पर एकटा छोट सन लग्गा जाहि मे घोंपल एकटा बिज्जी। ओ तीनू अपन-अपन असबाब संगे इत्मीनान सँ चलती ट्रेन सँ उतरि गेलाह। स्वामीजी अपन झोड़ा सँ अपन किताब निकालि एक विशेष पन्ना उनटौलनि। ओहि पन्ना मे कम्पास फिट छलैक। ओ पश्चिम-दक्षिण कोनक ठेकान करैत आंगुर सँ काके आ मैना केँ इशारा केलनि। तीनू सामनेक पगडंडी पकड़ि द्रुत गति सँ बिदा भेलाह। जेठक प्रखर आ प्रचंड रौउददुपहरियाक समय। रौउद मे चिलमिलिया चमकैत रहअए। मनुक्ख संगे चिड़ै-चुनमुनियोक दरस नहि। चारू कात जीवबिहीन सुन्नाहट। एतेक बिकराल रौदक सामना के करितयसभ छांह मे नुकायल। खेत-खरिहानगाछी मे चलबाक एकटा सरसराहटि। ओ तीनू बेग सँ चलैत रहल। आगू मे काकेबीच मे बिज्जी घोंपल लग्गा कन्हा पर लेने मैना आ सतर्क स्वामीजी सबसँ पाछाँ। करीब तीन-चारि घंटा चललाक ऊपरांतआमक गाछीक कात मे एक ठूठ गाछक नीचाएकटा औंघायल चापाकल केँ देखि तीनू ठहरि गेलाह। काके माथक बोरा केँ एक कात राखि हुमैच-हुमैच कचापाकलक हेण्डिल केँ चलोलनितखन भुभुआकपानि खसलगलै। तीनू चुरुके-चुरुके चापाकलक पानि पिलनि आ हाथ-पयर धोलनि। मैना अपन डाँरक बटुआ सँ बिस्कुट निकालि कस्वामीजी आ काके के देलनि आ अपनो खेलनि। तीनू बिस्कुट खा कफेर सँ पानि पिबैत गेला। फेर आबि कएक झमटगर गाछक छाया मे बसैत गेलाह। स्वामीजी अपन झोड़ा सँ मोटका किताब निकालि ओहि मे सँ विभिन्न तार केँ जोड़लनि। एक बहुत छोट सन हेडफोन कान मे फिट ककसांकेतिक भाषा मे रिपोट पढ़लगलाह। रिपोट केलाक बाद सांकेतिक भाषा मे हुनका चमेलीरानीक संदेश आ आदेश प्राप्त भेलन्हि। ओ ध्यान सँ सभ सुनिवायरलेस सेट केँ पूर्ववत किताब मे समेटि झोड़ा मे राखि लेलनि। संदेशक भावार्थ काके आ मैना केँ कहलथिन्ह जे जखन ओ सभ नट-नटिन बनि ट्रेन सँ उतरि बिदा भेलाह तखने बगलक कम्पाटमेन्ट सँ एक व्यक्ति उतरि पाछाँ करब शुरू केलक। ओ बराबर पाछाँ करैत आबि रहल अछि। ओ व्यक्ति उज्जर पेन्टकारी कोट आ नम्हर जुल्फी रखने अछि। अन्दाजन ओ व्यक्ति अपन काज मे माहिर आ होशियार बुझि पड़ैत अछि। ओकरा सम्बन्ध मे अधिक जानकारी नहि अछि। स्वामीजीक बाजब स्थिर आ शान्त छलनि। ओ फेर आगाँ कहलनिहमर सभहक एखुनका मंजिल मात्रा कोस भरि आगाँ अछि। रस्ताक डाइरेक्शन सेहो ठीक अछि। मुदा चमेली बिटिया केँ कहब छन्हि जे ओहि करिया कोटबला सँ फरिया ली। या तभौकी दओकरा भुतिया कआगाँ बढ़ी वा आवश्यकता भेला पर ओकरा समाप्त केलाक बादे अपन ठेकाना मे प्रवेश करी। भय आ चिन्ता नामक कोनो भाव ओहि तीनूक लेल नहि छलै। केवल कर्तव्यक पूर्ति आ चमेलीरानीक आदेशक पालन अभीष्ट छलै। ओ तीनू आगाँ अपन मार्ग पर बिदा भेलाह। कनिए आगाँ एकटा पैघ गाछी छलै। गाछीक आरम्भ मे एकटा विशालकरीब दू कट्ठा मे पसरल पुरान बड़क गाछ छलै। तीनू ओहि बड़क गाछतर आबि अपना मे मंत्राणा केलनि आ अपन-अपन मोटरी संगे ओहि बड़क गाछ पर चढ़ि गेलाह। गाछ वेश झोंझरिबला छलैक। ओ तीनू उपयुक्त स्थानक तजबीज कअदृश्य भगेलाह। पाछाँ करैबला आगाँ बढ़ि जाए तठीकअन्यथा अही गाछतर ओकरा खतम कदी सैह हुनक निर्णय भेल छलनि। किछुए मिनट बितल रहैक की उजरा पेन्टकरिया कोटबला ओहि विशाल बड़क गाछ तर पहुँचि गेल। गाछक नीचा पहुँच कओ अकबका गेल। नाकक थुथना सँ चारू कात सुंघलक आ फेर अचम्भित होइत ओ बड़ेक नीचा ठार भगेल। गाछक झोंझरि मे नुकायल तीनू गोटे दम सधने निचलका व्यक्ति केँ देखि रहल छल कि एकटा अजीब घटना घटित भगेलैक। बड़क एकटा मोटगर डारि पर स्वामीजी आ काके अपन-अपन बोड़ा केँ टेकने ठार छल। ओहि डारिक छीप पर लग्गा मे बिज्जी घोंपने मैना दोसर झोंझरि मे नुकायल छलीह। हुनक बिज्जीबला लग्गा ओहि सँ ऊपरका डारिक झोंझरि मे ठेकि गेल रहैक। ऊपरका झोंझरि मे एक जोड़ धामन साँप छलैक। दुनू साँप लग्गा आ लग्गा मे घोंपल बिज्जी केँ देखिते खोंखिया कझपटा मारलक। धामन साँप विशाल आकृतिक होइत अछि आ ओहि मे एक छोड़ि दूटा। मैनाक हाथक लग्गा साँपक वजनक कारणे छुटि गेलनि। हुनका अपन देहक बैलेन्स सेहो गड़बड़ा गेलनि। बड़क गाछक नीचा ठार व्यक्तिक दायां ओ बायां दुनू कात ओ साँप खसल। साँपक भयंकर आकृति देखि ओ बाप-बाप करितय कि तखने ओकर माथ पर मैना खसली। मैनाक घघरी हुनक सम्पूर्ण मूड़ी केँ झाँपि देलक। ओ मैना केँ नेने-देने मुँहे भरे आगाँ खसलाह। मैना फुर्ती सँ अपन घघरी केँ हुनक मूड़ी सँ अलग कउचकि कआगाँ कूदि गेलीह। मैनाक हालत देखिस्वामीजी आ काके अपन बोड़ा संगे धपाधप कूदि गेलाह। स्वामीजीक हाथ मे कतौ सँ पिस्तौल आबि गेल। अरेदादा रे दादा। ई कीया हो गया� बाजब आ उच्चरण सँ स्पष्ट भगेल जे पाछाँ केनिहार बंगाली छथि। स्वामीजीक हाथ मे पिस्तौल देखि ओ घिघिया उठलहमारा जान लेने से पहले साँप को मारो। स्वामीजी अनिश्चयक स्थिति मे छलाहपहिले बंगाली केँ मारी कि साँप केँमारी। ओहि काल मैना चिचिया उठलीहस्वामीजी साँप पर फायर करू। स्वामीजीक हाथक पिस्तौल दू बेर ठाँयठाँय केलक आओर ससरैतफुफकारैत दुनू धामनक मूड़ी चिथड़ा उड़ि गेलै। आब स्वामीजीक पेस्तौल ओहि करिया कोटबला दिस घुमल। ओ साँप मरलाक बाद थोड़ेक अपना केँ सुभ्यस्त अनुभव कयने छल। ओ पेस्तौल केँ अपना ऊपर तानल देखिबिना कोनो भय केँ बाजलहमारा पास सभ खबर है। थोड़ा देर पहले तुमको बायरलेस पर मुझे जान से मारने का अॉडर मिला है। तुम्हारा कोडेड मैसेज अनकोड होकर मुझको मिल चुका है। ठीकतुम हमको मारेगा और हम मरेगा। वैसे हम भी तैयार है। हमारा पास इतना ताकत है कि हजार आदमी भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। लेकिन नहींतुम मारेगा आउर हम मरेगा। मरने के पहले हम थोड़ा बात तुमको कहना चाहता है। उस बात को सुन लो। तुम्हारा पास टाइम जास्ती नहीं है। फिर भी हमारा बात सुन लो। हमारा बात तुमको लाभ देगा। हम तुम्हारा दोस्त हैनहीं तो तुम्हारा आखरी मेसेज के बाद हम तुम्हारा पिछु-पिछु नहीं आता। स्वामीजी पेस्तौल केँ हिलबैत बंगाली केँ अपन बात कहबाक इशारा केलनि। काके आ मैना अत्यधिक सावधान भकओहि बंगालीक बात सुनलगलाह। बंगाली जल्दी-जल्दी बाजब शुरू केलकमेरा नाम विश्वनाथ भट्टाचार्य है। हम बंगाली मानुष है। निर्मली मे मेरा रेडीमेड कपड़े की दूकान हैनिहारिका। कपड़ा का दूकान मेरा मुखौटा है। असल मे हम पक्का जासूस है। हम केजीबी के लिए काम करता है। बैंकॉक से सूटकेस चलाभरदा पहुँचाउसमें कैसा माल हैसभी कुछ का खबर हमको है। हमको इनटरफेयर करने का अॉडर नहीं है। फिर भीहमारा इलाका मे क्या कुछ होता है उसका खबर रखना हमरा काम है। तुम तीनों का हम निर्मली से फौलो करता है। तुम उस एमएलए आउर उसके दोनों बडीगार्ड को घायल कियाबेहोश कियामाल लियाट्रेन के नीचे आया तो हम भी ट्रेन का नीचा आया। फिर जब तुम तीनों जहाँ थोड़ी देर रुका था वहाँ पहुँचा आउर नाक से तुम सबका गन्ध सूंघा। हमको गन्ध सूंघने का स्पेशल ट्रेनिंग है। उसके बाद हम सारा मैसेज को ट्रान्समीट कर दियाफिर तुम्हारा छोड़ा गन्ध को सूंघते-सूंघते तुम्हारा पीछा किया। हमने जो मैसेज मास्को ट्रान्समीट किया उसमे तुम्हारा हुलियातुम्हारा ड्रेस सभी कुछ का कर दिया। हमारा मैसेज मास्कोरिसीभ किया आउर उसका कनफरमेशन आ गया। मास्को उस मैसेज को दिल्ली भेजा होगा आउर दिल्ली पटना को। पटना का इनटेलिजेन्स अॉपरेशन थोड़ा कमजोर है। फिर भी खतरा तो बढ़ गया है। तुम्हारा पास टाइम बहुत कम है। तुम्हारा पिछु-पिछु आया। दादा ओ दादाइस घाम में तुम लोग कितना तेज चलता है जिराफ का माफिक। हमको तो ट्रेनिंग है लेकिन तुम्हारा कैसा ट्रेनिंग हैसोचने की बात है। हम सोचाफिर कीया हुआ सो सुनो। हम काली माँ का पूजा करता है। काली माँ मेरा सब कुछ है। माँ ने दिमाग में झटका मारा। मेरा दिमाग ने सोचना छोड़ दियाफिर ठीक होकर सोचने लगा। दिमाग में माँ बोलता हैअरे! तुम किसको पिछु करता हैतुम किसका नुकसान करता हैये लोग अपना वतन का दिवाना है। देश को वास्तेअपना प्रान्त को वास्तेजान हथेली पर रखकर निकला है। मेरा माथा में सब बात साफ हो गया। फिर माथा बोलाभट्टाचार्य तुम इनका कितना बड़ा नुकसान कर दिया। अरे! अभी तक तो सभी पुलिसकुत्ता का माफिकइसको पकड़ने वास्ते निकल चुका होगा। ये हमने कीया किया भट्टाचार्य केँ निर्मलीक लोक भाटाजी कहैत छलैक। भाटाजी फूटि-फूटि ककानय लगलाह। हुनक आँखि सँ अश्रुधार बहय लगलनि। तकरा बाद भाटाजी जे कहलनि तकर भाव छलभाटाजीकलकत्ताक एकटा धाकर कम्यूनिस्ट नेताक पुत्रा छलाह। इलेक्ट्रॉनिक इन्जीनियरिंग पढ़ै लेल ओ रूस देश गेलाह। मेधावी छात्रा छलाह। हुनका रूस देश मे अनेको स्कॉलरसीप भेटलैन्ह। ओ संचारक क्षेत्रा मे अनेको किस्म आ उपयोगी यंत्राक आविष्कार केलनि। फेर ओ एकगोट रसियन कन्या सँ विवाह केलनि आ ओही देशक नागरिक बनि रूसहि मे रहए लगलाह। हुनक प्रतिभा सँ प्रभावित भकेजीबी हुनका अपना मे समेटि लेलक। अति कठिन ट्रेनिंग भेल आ ओ केजीबीक पैघ अॉफिसर बनि अनेको देश मे कार्यरत रहलाह। उमिर बढ़ला पर आ विशेष कबंगाली रहलाक कारणें हुनका अपन मूल देशक प्रेम जागृत भेलनि। केजीबीक प्रधान लग अपन आरजू पठौलनि तखन निर्मली मे हुनक पोस्टिंग भेलनि। निर्मली मे ओ बारह वर्ष सँ रहि रहलाह अछि एवं परिवार कलकत्ता मे रहै छथिन। मोटगर तनखाह भेटैत छनिआर्थिक दृष्टि सँ सम्पन्न छथि। भाटाजी अपना पर नियंत्राण करैत बजैत गेलाबाबातुम लोग कीया करता हैकिसके वास्ते करता हैहम अभी नहीं जानता है। लेकिन तुम्हारा संचार बहुतकमजोर है। आज के युग मे तुम्हारा काम बहुत अच्छाबहुत सफोस्टीकेटेड संचार सिस्टम का मांग करता है। संचार को इम्प्रूभ करने मे हम तुम्हारा मदद करेगा। काली माँ का भी अॉडर है आउर जीवन के अन्त मे कुछ अच्छा काम करने का इच्छा रखता है। इसी वास्ते तुमसे मिलने का हम रिस्क लिया। नहीं तो तुम्हारा आखिरी अनकोडेड मैसेज के बाद हम कभी भी अपना लाइफ को डेनजर मे नही डालते। माँ काली का शपथ खाकर बोलता हैमेरा फेथ करो। तुम्हारे वास्ते काम करेगायह मेरा अॉफर है। स्वामीजी पिस्तौल केँ काकेक हाथ मे पकड़ा वायरलेस सेट केँ ठीक केलनि। फेर चमेलीरानी केँ सभटा सविस्तार रिपोट दअपन मन्तव्य देलनिबिटिया रानीभाटाजी अपन जरूरत केँ पूर्ति करताह से हमर सोचब अछि। प्रायः चमेलीरानी स्वीकृति देलथिन। स्वामीजी भाटाजी दिस घुमैत बजलाहकन्टेक्ट फिरिक्वेन्सी फ. म. अस्सी हजार दसमलव फोर। ठीक। वेशअहाँ वापस जा सकैत छीभाटाजी। भाटाजीक मोन प्रफुल्लित भगेलनि। ओ मैना दिस तकलनि आ फेर गरदनि हँसोथि बजलाबाबायहाँ रास्ता में मुरही का भी दूकान नहीं है। पूरा एरिया बंडल है। मुस्की छोड़ैत मैना अपन बटुआ सँ छोट-छोट बिस्कुट निकालि भाटाजी केँ देलनि। भाटाजी प्रसन्न होइत वापस अपन रस्ता पकड़ि लेलनि। भाटाजीक कारणे बिलम्ब आ हुनकर सूचनाक कारणे अन्देसा। तें ओ तीनू बहुत तेज गति सँ अपन गंतव्य स्थानक हेतु बिदा भेलाह। एकटा छोटपुरान आ चहरदिवारी सँ घेरल महादेवक मंदिर। गाम सँ हटल आ आमक गाछ सँ घेरल। मंदिरक आगाँ पोखरि आ पाछाँ दूटा खोपड़ीनुमा घर। मंदिरक प्रांगण साफ-सुथराफूल पत्ती सँ सजल आ परम पवित्रा। नट-नटिन केँ अबिते पुजारी हड़बड़ा कठार भेलाह। आवश्यक निर्देश देलनि। निर्देश देबाक आतुरता अहि बातक संकेत दैत छल जे सतर्कता अनिवार्य बनि गेल अछि। किछुए कालक बादस्वामीजी पिअर धोतीउज्जर कुर्ता आ लाल गमछा संगे त्रिपुण्ड चानन आ पैघ सिनुरक ठोप केने मंदिरक अगिला हन्ना मे वैह मोटका किताब केँ अपना आगाँ राखि दूर्गा पाठ करहल छलाह। अन्दर खोपड़ीनुमा घरक एक कोठली मे काके बरक परिधान मे तथा मैना नव कनिआँक भेषभूषा मे एकटा खाट पर बैसल गप-सप करहल छलीह। डालरबला दुनू बोरा हुनक खाटक नीचा जाजीम सँ झांपल राखल छल। ओ सभ कियो कोनो अनहोनी घटनाक प्रतीक्षा मे पूर्ण तैयार ओ साकांच छलाह। सूर्यास्तक समयअतिशय गर्मी आ उमसक कारणें पुजारीजी गमछा सँ घाम पोछै मे व्यस्त छलाह। मंदिरक दक्षिण बरिया दुआरि पर पुजारी जाहि पटिया पर बैसल रहथि ओकर आगाँ दूटा थार राखल छलै। पहिल थार मे फूलफूलक माला आ घसल चानन तथा दोसर थार पेड़ा सँ भरल। ओहीकाल आशाक अनुरूप एकटा भीसण्ड मोट दरोगा तथा ओकरा संगे एकटा दुब्बरपांजरक हड्डी जागलसिपाही हहाइत ओतए पहुँचल। दरोगाक फूलल पेटक वामा कात पिस्तौल लटकल छलै। सिपाहीक हाथ मे ओकरे सन हकन कनैत बेंतचेहरा पर पसीना तथा आँखि मे एहन भाव जे ओ एक पन्द्रहिया सँ अन्नक दरस नहि केने होअय। दरोगा अबिते गरजि उठलहई पुजारी बाबा! रौआ बताँई जे इहाँ के सब आयल बा पुजारीजी दुनू हाथ जोड़ैत ठार भेलाह आ कलपैत स्वर मे बजलासरकारएतए तकियो नवीन लोक नहि एलाह अछि। हम पुजारीपाठ केनिहार महात्मा एतए महिनो सँ रहै छी। भीतर हमर खोपड़ी मे हमर बालक आ हुनक कनिआँ। बस आओर किओ नहि। दरोगा अपन आबाज केँ औरो कर्कश बनबैत बाजलका बोले तारहो पुजारी बाबा। हमरा घसबैनी सँ खबर मिलल बा जे दू जन नट आ एक जन नटिन एम्हरे आईल बा। उपरका अरजेन्ट हुकुम बानी। हमरा के ओ नट-नटिन के एरेस्ट करै के बा। पुजारी औरो नम्र होइत चुचकारीबला स्वर मे दरोगा केँ उत्तर देलनिसरकारहम अहाँ केँ चिन्हैत छी। अहाँ सन इमानदार हाकिम केँ के नहि चिन्हतजहिया सँ अहाँ थाना पर एलहूँ अछिचोर-उचक्का लापता भगेल। मुदा सरकारहमरा पर विश्वास करूहम अहाँक शपथ खा ककहैत छी जे कोनो नट-नटिन एम्हर पयर नहि देलक हेंए। ओहुना एतए नट-नटिनक कोन काजएततमात्रा एकटा काज भोलेनाथक पूजा। (अगिला अंकमे) सगर राति दीप जरय मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 1 सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा) आयोजक- तीन वा बेशी बेर प्रभास कुमार चौधरी कमलेश झा प्ा्रदीप बिहारी श्याम दरिहरे रमेश 1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.बहेरा 21.01.1995 1.बेगूसराय 13.01.1991 1.पटना 10.10.1998 1.महिषी (सह) 13.4.1997 2.वाराणसी 18.7.1992 2.सुपौल 08.04.1995 2.बेगूसराय 13.09.1997 2.धनबाद 21.10.2000 2.सहरसा 18.7.1998 3.कोलकाता 28.12.1996 3.अन्दौली 28.10.1999 3.खजौली 04.04.1998 3.देवघर 08.01.2005 3.पूर्णियाँ 24.6.2005 4.पटना 18.07.1997 4.बेनीपुर 20.09.2003 4.बेगूसराय 09.04.2005 5.बेगूसराय 10.02.2007 सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा )-अध्यक्षता/उदघाटन मे तीन वा बेशी बेर पण्डित गोविन्द झा राजमोहन झा रमानन्द रेणु डा.धीरेन्द्र डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 1.दरभंगा 07.07.1990 1.पटना 03.11.1990 1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.काठमाण्डू 23.09.1995 1.काठमाण्डू 25.06.2000 2.बिराटनगर 14.04.1992 2.घोघरडीहा 22.10.1994 2.खजौली 04.04.1998 2.राजविराज 24.01.1996 2.कोलकाता 22.01.2003 3.बोकारो 24.01.1993 3.पटना 10.10.1998 3.कोलकाता 22.01.2003 3.जनकपुरधाम 25.03.2000 3.राँची 02.01.2004 4.जनकपुरधाम 09.10.1993 4.मधुबनी 24.07.1999 4.सहरसा 21.07.2007 5.सुपौल 08.04.1995 5.धनबाद 21.10.2000 5.राँची 19.07.2008 6.कोलकाता 28.12.1996 7.दरभंगा 21.01.2004 8.पटना 03.11.2005 सगर राति दीप जरयक अवसर पर आलेख पाठ डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ डा.भीमनाथ झा डा.तारानन्द वियोगी 1.शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्रा 1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.मैथिली कथाक समस्या बिट्ठो 21.01.2001 मैथिली कथाक वर्तमान समस्या कोलकाता 22.01.2003 2.विभूति आनन्दक कथा यात्रा 2.कटिहार 22.04.1991 3.नेपालमे मैथिली कथा 3.विराटनगर 14.04.1992 सगर राति दीप जरयक अवसर पर पठित कथाक संग्रह जतय एक सँ बेशी बेर आयोजित भेल अछि नाम सम्पादक वर्ष 1.पटना 2.जनकपुरधाम 3.बोकारो 4.दरभंगा 5.राँची 1.श्वेत पत्र तारानन्द वियोगी/रमश 1993 1. 03.11.1990 09.10.1993 24.04.1993 07.07.1990 13.04.2002 2.कथा कुम्भ बुद्धिनाथझा/तुलानाथमिश्र 1994 2. 18.10.1992 25.03.2000 28.03.2001 21.02.2004 02.10.2004 3.कथादिशा महा विशेषांक प््रभासकुमार चौधरी/गंगेश गुंजन 1997 3. 18.07.1997 12.08.2006 19.07.2008 4.भरि राति भोर के..डी.झा/श्याम दरिहरे प्रदीप बिहारी 1998 .4. 10.10.1998 6.काठमाण्डू 7.कोलकाता 8.बेगूसराय 9.सहरसा 5एकैेसम शताब्दीक घोषणा पत्र रमेश/श्याम दहरहरे/मोहनयादव 2001 5. 01.12.2001 23.09.1995 28.12.1996 1.13.01.1991 18.7.1998 6.संधान-4 कथा विशेषांक अशोक 2000 6. 16.11.2002 25.06.2000 22.01.2003 2.13.08.1997 21.07.07 7.कथा सेतु प्ा्रशान्त 2002 7. 03.11.2005 3.09.04.2005 सुपौल 4.10.02.2007 09.01.1993 01.12.2007 एहि अवसरपर पठित कथाक कतेको व्यक्तिगत संग्रह छपल अछि तथा समस्त पठित कथाक संख्या 1500 सँ अधिक होएत । 2 विभिन्न नामे आयोजित सगर राति सगर राति दीप जरय- संचालक 1.कथा रैली डेओढ स्थान नाम स्थान नाम 2.क्था सम्वाद दरभंगा 1.मुजफफरपुर 1.प्रभास कुमार चौधरी 20.भागलपुर 20.अशोक 3.कथाचेतना रैली घोघरडीहा 2.प्ैाटघाट 2.अशोक 21.कोलकाता 21.रामलोचनठाकुर/नवीन चौधरी 4.सृजनकेरदीपपर्व सुपौल 3.इसहपुर 3.शैलेन्द्र आनन्द 22.बेनीपुर 22.अजित कुमार आजाद 5.गंगासँ हिमालय कठमाण्डू 4.सरहद 4.शिवशंकर श्रीनिवास 23.नवानी 23.मोहन भारद्वाज 6.कथा कुम्भ पर्व बोकारो 5.झंझारपुर 5.शिवशंकर श्रीनिवास 24.दरभंगा 24.डा.भीमनाथ झा 7.कथा कौमुदी बोकरो 6.घोघरडीहा 6.शिवशंकर श्रीनिवास 25.देवघर 25.प्रदीप बिहारी 8.कथा गंगा पटना 7.काठमाण्डू 7.रमेश रंजन 26.पूर्णियाँ 26.अजित कुमार आजाद 9.कथा कारिख खुटौना 8.राजविराज 8.रमेश 27.पटना 27.डा.देवशंकर नवीन 10.कथा पर्व राँची 9.राँची 9.अजित कुमार आजाद 28.जनकपुर 28.रमेश रंजन 11.भरि राति भोर पटना 10.मधुबनी 10.सरस 29.जयनगर 30.बेगूसराय 29.प्रदीप बिहारी 30. अजित कुमार आजाद 12.कथा लोरिक बेनीपुर 11.राँची 11.सरस 31.जमशेदपुर 31.डा.अशोक अविचल 13.कथा अमृत कोलकाता 12.महिषी 12.शिवशंकर श्रीनिवास 32.सहरसा 32.अजित कुमार आजाद 14.कथा सेतु भागलपुर 13..तरौनी 13.प्रदीप बिहारी 33.सुपौल 33.अजित कुमार आजाद 15.स्वर्ण दीप दरभंगा, 14.बलाइन 14.शिवशंकर श्रीनिवास 34.राँची 34. कु.मनीष अरविन्द/सरस 16.कथा कमला-कथा सलहेस जयनगर 15.काठमाण्डू 15.रमेश रंजन 17.कथा बहुरा बेगूसराय 16.धनबाद 16.अशोक 18.कथा संगम ज्मशेदपुर 17.बिट्ठो 17.अशोक 19. कथा वर्षा राँची 18.हटनी 18.डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘ 19.पटना 19. अजित कुमार आजाद सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी लोकार्पित पोथीक लेखक/सम्पादक 1.पण्डित श्री गोविन्द झा 2.रमेश 3.डा.तारानन्द वियोगी पोथीक नाम स्थान तिथि पोथीक नाम स्थान तिथि पोथीक नाम स्थान तिथि 1.सामाक पौती दरभंगा 07.07.1990 1.स्माड़ नवानी 21.07.1991 हमर युद्धक साक्ष्य बेगूसराय 13.01.1991 2.विद्यापतिक आत्म कथा प्ैाटघाट 10.07.1993 2.श्वेतपत्र (सहसम्पा) जनकपुरधाम 1993 2श्ष्वेतपत्र (सहसम्पा) जनकपुरधाम 1993 3.नखदर्पण काठमाण्डू 23.09.1995 3.समानान्तर पटना 18.07.1997 3.अतिक्रमण महिषी 13.04.1997 4.प्रलाप पटना 01.12.2001 4.प्रतिक्रिया सहरसा 18.07.1998 4.हस्ताक्षर महिषी 13.04.1997 5.आत्मालाप कोलकाता 22.01.2003 5.मण्डन मिश्र अद्वैत मीमांसा(सहसम्पा काठमाण्डू 25.06.2000 5.शिलालेख महिषी 13.04.1997 6.अतीतालाप पटना 6.एकैसम शताब्दीक घोषणा पत्र (सह सम्पा पटना 01.12.2001 7.पाथर पर दूभि दरभंगा 21.02.2004 8.कोशी घाटी सभ्यता दरभंगा 21.02.2004 4.डा.रमानन्द झा ‘रमण 5.श्याम दरिहरे 6.प्रदीप बिहारी 1.मिथिला दर्पण पुण्यानन्दझा-सबोकारो 25.08.2001 1.भरि राति भोर सहसम्पापटना 10.10.1998 1.भरि राति भोर सह.सम्पापटना 10.10.1998 2.बेसाहल दरभंगा 21.02.2004 2.एकैसम शताब्दीक घोषणा पत्र-सह सम्पा पटना 01.12.2001 2.मकड.ी काठमाण्डू 25.06.2000 3.यदुवर रचनावली दरभंगा 21.02.2004 3.सरिसब मे भूत दरभंगा 21.02.2004 3. सरोकार ब्ेागूसराय 09.04.2005 4.सगर राति दीप जरयक इतिहास दरभंगा 21.02.2004 4.कनुप्रिया-अनुवाद दरभंगा 21.02.2004 4. अक्षर आर्केस्ट्रा-अनुवाद बेगूसराय 21.07.2007 5.भजारल बेगूसराय 09.04.2005 3 सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी बेर लोकार्पणकर्ता 1.पण्डित श्री गोविन्द झा 2.प्रभास कुमार चौधरी पोथी ल्ेाखक स्थान तिथि पोथी ल्ेाखक स्थान तिथि 1.साहित्यालाप डा.भीमनाथ झा सकरी 22.10.1991 1.मोम जकाँ बर्फ जकाँ अमरनाथ दरभंगा 07.07.1990 2.गामनहिसुतैत अछि महेन्द्र मलंगिया जनकपुाधाम 09.10.1993 2.विद्यापतिकआत्मकथा गोविन्द झा पैटघाट 10.07.1993 3.कथा कुम्भ सं-बुद्धिनाथ झा घोघरडीहा 22.10.1994 3.कथाकल्प डा.देवकान्त झा कोलकाता 28.12.1996 4.निवेदिता स्ुाधांशुशेखर‘चौधरी कोलकाता 28.12.1996 4.समानान्तर श्रमेश पटना 18.07.1997 5.अतिक्रमण डा.तारानन्द वियोगी महिषी 13.04.1997 5.कुकूरू.कूआकसौटी चन्दे्रश ब्ेागूसराय 19.09.1997 6.प्रतिक्रिया श्रमेश सहरसा 18.07.1998 3.सोमदेव 7.युगान्तर विश्वनाथ पटना 01.12.2001 1.प्रलाप गोविन्द झा पटना 01.12.2001 8.एक फाँक रौद योगीराज पटना 16.12.2002 2.तीन रंग तेरह चित्र डा.सुधाकर चौधरी पटना 16.11.2002 9.यात्री समग्र स.ंषोभाकान्त पटना 16.12.2002 3.उदयास्त धूमकेतु पटना 16.11.2002 10.मैथिलीबालसाहित्य डा.दमन कुमार झा पटना 16.12.2002 4.अभियुक्त राजमोहन झा पटना 16.11.2002 11.दिदबल प्रभास कुमार चौधरी दरभंगा 21.02.2004 5.सर्वस्वान्त सकेतानन्द पटना 16.11.2002 12.गंगा प.ं यन्त्रनाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004 6.लाखप्रश्नअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर खुटौना 07.06.2003 13.गाछ झूल झूल जीवकान्त दरभंगा 21.02.2004 7.चितकावर हंसराज दरभंगा 21.02.2004 14.हम भेटब मार्कण्डेय प्रवासी दरभंगा 21.02.2004 5.डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ 15.यदुवर रचनावली डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004 1.अदहन डा.शिवशंकर श्रीनिवास कटिहार 22.04.1991 16.कनुप्रिया अनु.श्याम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004 2मिथिलांचलक लोक कथा डा.गंगाप्रसाद अकेला काठमाण्डू 25.06.2000 17लोरिक मनियार चन्द्रेश दरभंगा 21.02.2004 3.शिरीषक फूल अनु.डा अकेला काठमाण्डू 25.06.2000 4.राजमोहन झा 4.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा ‘सरस‘ दरभंगा 21.02.2004 1.मनकआडनमेठाढ़ डा.भीमनाथ झा धनबाद 21.10.2000 5.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्रमिश्र‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004 2..एकैसमशताब्दीक घोषणा पत्र रमेष/श्यामदरिहरे/मोहनयादव . पटना 01.12.2001 6.स्वास स्वासमे विश्वास विवेकानन्द ठाकुर राँची 02.10.2005 3 पृथा नीता झा भागलपुर 24.08.2002 7.अक्षर आर्केस्ट्रा अनुवाद- प्रदीपबिहारी बेगूसराय 21.07.2007 4.सरिसब मे भूत श्याम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004 5.हाथीचलय बजार डा.देवशंकर नवीन दरभंगा 21.02.2004 6.चिन्तन प्रवाह डा.धीरेन्द्रनाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004 7.सरोकार प्ा्रदीप बिहारी ब्ेागूसराय 09.04.2005 1.महेन्द्र कुमार मिश्र2. ज्योति नेपाल रल्वेक दुरावस्था आ सरकारक कानमे तेल -महेन्द्र कुमार मिश्र, पूर्व सांसद हमरा सब जकाँ भूपरिवेष्ठित मुलुकमे यातायातक चारि प्रणली मध्ये जल मार्गक विकाशकेँ कल्पना तत्काल केनाई सम्भव नहि । वायुमार्ग अति महग यातायातक साधन भेलाक कारणे आम नेपाली जनता, सर्वसाधारणकलेल सम्भव नहि अछि । सडक मार्ग आशा अनुरुप्नहियो होइत बहुतहद धरि निर्माणक पूर्वाधार तैयार करबाक चेष्टा अवश्य कऽलेलगेल अछि । अूदा विडम्वना केहन, विश्वक सबसँ सस्त, आरामदामयी, सुरक्षित एवं लोकप्रिय यातायात रेल्वेसेवा प्रणाली नेपालसँ विस्थापित होयबाक अवस्थामे अछि । इन्टरनेट एवं कम्प्युटरक युगमे जनसँख्याक वृद्धि भऽरहल अवस्थामे एकठामसँ दोसर ठाम शीघ्रातिशिघ्र पहुँचवाक आतुरता, ताहिक लेल रेलसेवा सनक आरामदायी आ सुरक्षित आधुनिक प्राविधिक सुसम्पन्न रेल मार्ग उपेक्षित एवं लावारीश अवस्थामे अछि । अखनो सँसारक दूर्लभ ईन्जन मार्टिनवर्नद्धारा निर्मित न्यारेगेज रेल्वे ईन्जन नेपालमे उपलब्ध अछि, मूदा संचालनमे नहि अछि । बेलायती शासनकालक रेल्वे ईन्जनसन १९३७, विक्रम संवत१९९४ साल सँ संचालित सेवा आई पूर्णरुपेण उपेक्षित बनल अछि । बहुतो नेपाली जनताकेँ जानकारी नहि हैतनि जे नेपालोमे रेल संचालनमे छैक ।१९९०मे सर्वप्रथम सर्भे कऽ १९९२ सँ निर्माण काज प्रारम्भभेल विदेशकलेल काठ ढुवानीमे प्रयोग कायलगेल, जखन नेपालक हरियोवन समाप्त होबऽलागल तत्पश्चात ई रेल सेवा मानव सेवामे प्रयोग होवऽलागल । आजुक परिवर्तित अवस्थामे आवागमनक साधनकेँ रुपमे स्थापित भेल आजुक परिवर्तित अवस्थामे आवागमनक साधनकेँरुपमे स्थापित भेल । वैज्ञानिक युगमे अन्य विकशित देश अचम्भित सवकाश कएलक, भारतमे आजुक दिन सबसँ पैघ रेले मन्त्रालय छैक । भारतक आर्थिक् रीढक रुपमे रेल्वे स्थापित अछि । जापान, फ्रान्स आदि देशक रेल सेवामें आश्चर्यजनक प्रगति कएलक अछि । एक घण्टामे ४०० किलो मिटरक दूरी तय करैत अछि । भारतमे वेलायति साम्राज्यद्धारा रेलसेवा प्ररम्भ आ विस्तार भेल । प्रय ओही समय वि.सं. १९९४मे युद्ध शम्शेरक शासनकालमे नेपाल सरकार रेल्वे( एन.जे.जे.आर.) नेपाल जनकपुर जयनगर रेलसेवा आ (एन.जी. आर.) भारतक रक्सौल होइत वीरगँज अमलेखगँज तक साचालित रहै, मूदा बहुत पहिने सँ सेवा बन्द अछि । आब मात्र ५१ कि.मि. मार्ग जयनगर विजलपुरा सँचालित सेवा जनकपुर सा विजलपुरा, २०५९ साल अषाढ २३ गते आएल भिषण बाढिक प्रकोप सँ बिग्धी नदी पुल क्षतिग्रस्त भेने यहो रेल सेवा पूर्णरुपेण बन्द भऽ २९ कि.मि.मे मात्र सिमीत अछि ई सेवा । सरकारक अकर्मन्यता, लापरवाही तथा उपेक्षाक कारणे लोहाक लीक माटि सँ भरल अछि, घासपात जनमिगेल अछि, ठाम ठाम निर्मित यात्री प्रतिक्षालय सेहो ध्वस्त भऽरहल अवस्था छैक । रेलक जमीन सब सेहो अतिक्रमण मात्र नहि लिकेपर तरकारी बजार छानल गेल अछि, मूदा सरकार आ सम्बन्धित निकाय रेल प्रशासनक ध्यान एम्हर नहि देखल जा रहल अछि । वेर वेर जानकारी आ तथादा कएलाक बादो कोनो सुनवाइ नहि भऽरहल जनताक सिकायत रहल अछि । देशक ऐतिहासिक धरोहर एवं तराई मात्र नहि नेपालक गौरव रेलसेवा जीर्ण अवस्थामे अछि । बुझना जाइत अछि जे यहि सेवाकलेल कोनो मायबाप नहि रहल । अखन धनुषा महोत्तरी धरि ई रेलसेवा सँचालित भेल अवस्थामे एहि मार्ग सँ जतेक यात्री आवत जावत करैत छल ताही अनुपातमे आन कोनो यातायात एवं सवारी साधन सा आवत जावत नहि होइत अछि जकर सत्य तथ्य यात्रीक सँख्या सँ पुष्टी होइत अछि । पर्यटनक युगमे रेलसेवा एनो उपेक्षित रहल ताहिसँ तराईवासीके जनमानसमे केहन भावना उत्पन्न हायत ? असमान भेदवाभ सँ ग्रसीत मानल जाए की नहि ? आई जौं एहन छोट समस्या पहाड मे रहितै तहन की एहीना उपेक्षित रहैत रेल सेवा ? जनकपुरधाम धार्मिक् स्थल तथा पर्यटनकलेल आवऽबला यात्री मध्ये सर्वाधिक भारतिीय नागरिक रहैत अछि, एकदिनमे कमसँ कम पाँच छौ हजारक सँख्यामे यात्री आवत जावत करैत अछि । दूर्भाग्यवस महोत्तरी जिल्लाक मध्य क्षेत्रमे एकमात्र यातायातक साधन रेले अछि, ओहो अखन बन्द अछि । अन्य यातायातक सुविधा नइ रहल क्षेत्रक ई सेवा वन्द भेने जनजीवन कतेक प्रभावित हेतै तकर अनुमान सहजहिँ कायल जा सकैया । अशक्त विमारी, उद्योगव्यापार, दैनिकजीवनक उपभोग सामग्रीक आभाव तथा क्रय विक्रयक समस्या सा एम्हरके जनमानस बहुत प्रभावित भेल अछि । प्राय प्रत्येकदिनक ई समस्याकेँ कारण रेलसेवा अभिषाप सिद्ध भऽरहल अछि । नयाँ नेपालक निर्मा०ँम्ै ज्ू६ल् द्यल् त्थ्ँ ज्न् प््रतिनिधि सबहक पूर्ण दायित्व होइत छन्हि, की त रेलसेवा फेर सा सञ्चालन कएल जाय या रेलसेवा बन्द कऽ वैकल्पिक मार्ग निर्माणमे ध्यान देथि । गणतन्त्रस्थापनाक महा अभियानमे एहि क्षेत्रक कम योगदान नहि रहल । राजनीति योगदान करऽबला बीर शहीदक पुण्यभूमि आई उपेक्षित अछि । आर्थिक योगदानमे सेहो रेलसेवा उल्लेखनिय काज बरबामे सहायक रहल अछि । दाता मित्र राष्ट्र्क सरकार तथा जनप्रतिनिधिद्धारा रेलसेवा विस्तार आ सुव्यवस्थित करबामे उत्साहजनक आश्वासन सेहो भेटल,मूदा अखन धरि ई काज कियाक नहि सफल भऽरहल अछि ? भारतीय जनता, राजनीीत्क् द्यल्? स्म्ँीज्क् क्ँईकर्ता वेरवेर ई सवाल सदन सँ लकऽ सडक धरि उठा रहल अछि, भाषण एवं सार्वजनिक अभिव्यक्ति सेहो सँचार माध्यमसँ जानकारी भेट रहल अछि । तात्कालिन रेल मन्त्रि रामविलास पासवान, वर्तमान रेल मन्त्रि लालू प्रसाद यादवजेक अभिव्यक्ति सेहो सार्वजनिक भेल अछि कि जयनगर, जनकपुर, विजलपुरा होइत वर्दिबास धरि ब्रोडगेज रेलसेवा विस्तार कायल जाएत । भारतीय राजदूतावास सँ सेहो प्रस्ताव आएल कि जनकपुर विजलपुरा रेल्वेसेवा विस्तार कऽ काठमाण्डौ धरि महुँचाएल जाय तकरालेल नेपाल सरकारद्धारा प्रस्ताप पेश करओ आ ताहिमे भारत सरकार पूर्ण सहयोग करत । किछु साल पूर्व नेपाल भारत बीच रेलसेवा विस्तारक सन्दर्भमे बिना विष्कर्ष वार्ता भाग भेल एहि वार्ता सा पूर्वो एकटा वार्ता दिल्लीमे भेल छल । पहिल आ दोसर चरणक वार्तामे सहभागी सरकारक प्रधिनिधिक कथन अनुसार ई वैसार उपलब्धी मूलक रहल कुटनीतिक माध्यम सँ निष्कर्षमे पहुँचवाक मे दुनु पक्ष सहमत भेल ,मूदा आश्चर्यक बात जे एतेक वर्ष बित रहल अछि अखनधरिक ब्रोडगेजक बात छारिदी, सँचालित नेरो गेज लिंक आ ३ कडोर लागतक पूल निर्माण क कियाक नहि भऽरहल अछि । पंचायतकालमे सेहो जापान सरकार नेपाल रेलसेवाक विस्तार निर्माण प्रस्ताव रखने छलाह, हुनकर शर्त रहनि जे जापाने सरकारक रेखदेखमे ई काज हायत, मुदा कमिशनक कारणे ओ म्रस्ताव पतन भेल । एमाले सरकारक सभय तत्कालिन निर्माण तथा यातायात मन्त्रि भरत मोहन अधिकारी जनकपुर रेल्वे आ नेपालक विकाश विषयक गोष्ठीमे हुनकर अभिव्यक्ति छलन्हि, जे जनकपुरधाम सनक पवित्र स्थलक पर्यटकिय विकाशक लेल राष्ट्रि्य सहमतिक आवश्यकता अछि । निकट भविष्यमे निर्माण तथा यातायात मन्त्रालयद्धारा जापान, भारत तथा फ्रान्स सरकार सपक्ष रेल्वेसेवाक आधुनिकीकरण एवं विस्तारकलेल लिखित प्रस्ताव पठायब जे प्रतिवद्धता जनौने छलाह । नेपाली काँग्रेसक मन्त्रिगणद्धारा वेरवेर निरीक्षण भेल ओ आशाजनक आश्वासन भेटैत रहल,मूदा समस्या अखनो यथावते अछि । अवस्था दयनिय अछि, पुरान भौतिक सँरचना, रेल्वे ट्र्याक,स्लीपर, इन्जनकोच तथा पूलसब जीर्ण अवस्थामे अछि । कर्मचारी व्यवस्थापन कमजोर रहलाक कारण रेल कम्पनीक आर्थिक अवस्था सेहो बहुत कमजोर अछि । हालहिमे नेपाल आ भारत सरकार बीच भेल सहमति अनुसार जयनगर सँ वर्दीबास धरि ७० किलोमिटर रेल्वेसेवा विस्तार करबालेल भारतक राइट्स नामक कम्पनि सन २००७ जुलाईमे सर्भे काज सम्पन्न कयलक अछि । तत्पश्चात भारतीय रेल सरकारक चीफ इन्जिनियर आ सहायक इिज्नियर सबहक टोली पुन सर्वे काज सम्पन्न कयलक जे काजक पूर्णता देवऽमे कम सँ कम पाँच वर्ष लागत, मूदा प्रश्न अछि जे पाँच वर्षक अवधि धरि एहि क्षेत्रक अवस्था कि हायत ? यहि अवस्थाके ध्यानमे रखैत नेपाल सरकार तत्काल सँचालित लीक आ पूल निर्माण क रेल सँचालन मे आवओ । बहुत प्रयासकबाद अर्थमन्त्रि ११ कडोर रुपैया देवाक निर्णय कयलथि । यहि प्रयासमे यातायात मन्त्रिक पूर्ण सहयोग रहलन्हि, मूदा ११ कडोर रुपैया भऽ की रहल छैक ? ११ कडोर मध्ये ५ कडोर जनकपुरसँ पूर्व आ ६ कडोर जनकपुर सँ पश्चिम बिजलपुरा धरिक मर्मत निर्माणकलेल छुटियाओल गेल छल तथापि अखन धरि काज प्ररम्भक गँधधरि नहि आबिरहल अछि । यातायतक प्रणलीमे रेलसेवा एकटा एहन प्रणली प्रमाणित भेल अछि । जे जतेक लम्बा खूरी धरि विस्तार करय ततवे वेसी आरामदायी हायत आ सँगहि ओतवे आमदानी होयवाक निश्चित अछि । सामान ढुवानी, यात्री आवत जावतमे राजश्ववृद्धिक सँगहि रोजगारीक अवसर सेहो प्राप्तक साथसाथ आहि क्षेत्रक सर्वाङ्गीन विकासक पूर्वाधार सुनिश्चित रहत । रेल्वेसेवा क्रमश रुपान्तरीत होइत संस्थानसँ कम्पनिमे परिणत भेल ई स्वायत्तता प्रप्त कम्पनिमे सात मन्त्रालयक शेयर अछि, मनोमानी ढँगसँ बिना मूल्याङ्कन कयल जायत त कैयक असबके सम्पति छैक । कम्पनि चाहे त अपने बलबूत्तापर रेलसेवा सँचालन कऽ सकैत अछि । एकटा सक्षम व्यवस्थापन, पारदर्शिताक आवश्यकता छैक । आशा राखी लोकतान्त्रिक सरकार एहि शुभकाजमे सहयोग करय, नहि त वोहि क्षेत्रक जनता आब हाथ पर हाथ धऽ बैसल नहि रहत आ देसर विकल्पक खोजीमे जुटत, जकर परिणाम सरकारमे सहभागी दल एवं सरकारके भोगहिटा परतैक । आतंकवाद महत्वाकांक्षाक खेतमे आकुरण होइत अछि महेन्द्र कुमार मिश्र पूर्व सांसद आतँक प्राणी जगतमे आदिम प्रत्युषा सँ चलैत आवि रहल अछि । प्राणीके अपन अकार, शक्ती आ कार्यक्षमताक कारणे आतँकक परिणम आ प्रकार सभमे विविधता देखल जा सकैत अछि । पुराणादीमे वर्णित देवासुर संग्रामसभ आतँकवादीक श्रृंखलाके महागाथा अछि । महिषासुरक क्रिया कलाप सँ आतँककीत देवतागण शक्तिक आराधनामे लागि नारी द्धारा छल प्रपञ्च रचना कऽ ओकरा समाप्त कयलगेल प्रसँग दुर्गा सप्तशीमे वर्णित अछि । रावणक आतँक समाप्त करवालैल राम अनेक जातिक सहयोग ल समाजके मुक्ति देवौलन्हि । तहिना कंशक उन्माद अती भेलाक पश्चात एकटा सामान्य गोपाल कृष्णक रुपमे अवतरीत भेलाह । कहवी छैक, बीनु बीज वृक्षक आकुरण नहि होइत छैक । अमेरिका के जन्मओल सद्दाम आ ओसामावीन लादेन अमेरिका विरुद्ध कियाक आततायी भ प्रगट भेल ? इन्दिरा गाँधीद्धारा पालीत सन्त जर्नेल सिंह भिण्डवाल इन्दिराकै प्राणे ल लेलक । ओसामावीन आ ओमार आजुक युगक विश्वके सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न अमैरिकाक निन्न आ भूख उडादेने अछि । आतँकवाद कहियो महत्वाकाँक्षाक खेतमे अंकुरण होइत अछि आ अन्याय अत्याचार, शोषण आ दमनक वर्षामै वढैत या त ताही श्रृंखलाके तोडैत अछि कि त अपने समाप्त भ जाइत अछि । संसारक आतंकके इतिहास व्याह परिणम देखवैत अछि । हिंसामे प्रतिहिंसा जकां आतंकवादी सभ मात्र अपने हत्या हिंसा, लुटपाट आ अगिलग्गी नहि करैत छैक दोसर पक्षके सेहो ओहने काज करवालेल वाध्य करवैत अछि । संसारक द्धन्दरत पक्षके गहींर सं अध्ययन, मनन कयला उपरान्त एकरा सभहक क्रिया कलापक परिनती याह प्रमाणित होइत अछि । आतंक शब्द सं कोनो हैजाक प्रकोप आ कठोर अत्याचार आदिसं उत्पन्न होव बला भयके वोध करवैत अछि । आतंकमे वाद जोडिदेलाक बाद एकर अर्थ मनुष्यकै डेरा क धमका क या त्रास श्रृजना क क हिंसात्मक विद्रोहक रुपमे अपन प्रभुत्व स्थापित क काज सिद्ध करवाक विचार आ सिद्धान्त बुझना जाइत अछि । दोसरके सम्पति लुटव, घरमे आगि लगाएव, पर स्त्रीसंग बलात्कार करब, समाजमे उत्पाद मचाएव एहन दुष्कर्मीकै दुराचारी कहल जाइत अछि । तानाशाही चाहे जेकर होउक, जर्जबुशक हौउक वा मुसर्रफकै एकरा कौनो दृष्टिए नीक नहि मानल जायत । कानो राष्टक तानाशाही आ दादागिरीके एक न एक दिन विनाश होयबेटा करैत अछि । आव ओ युग नहि रहिगेल जे लोक बुझौक परमेश्वरक अनुकम्पासं गर्भ धारण भैल, ई लौक मान लेल तैयार नहि रहिगेल । ककरोलेल तोपक सलामी आ केओ लाठी,बुट आ गरमे गोली खाई, आजुक मानव समाजक चैतना एकरा सह लेल तैयार नहि अछि । विश्वक कोनो ठाम जे विद्रोह भेलैक तकर समाधान करवाक काजक दायित्व वाहक अपना आपके विशिष्ट नहि समान्यस्तरक खण्डमे राखय तखने ई समस्याक समाधान भ सकैत अछि । २००७ साल सं पालीत, पोषित आ वढैत आएल समाजिक विद्रोहक स्तरके माओवादी लगायत तथाकथित प्रजातन्त्रवादी दलसब तराई समस्याकै जाइन बुझि क अखनो कार्यान्वयन पक्षकै कमजोर बनाविक रखने अछि । पिडीत पक्ष अखनो विश्वस्त भ नहि पाविरहल अछि । नेपालक सन्दर्भमै माओवादी १० वर्षधरि हथियार उठा जनविद्रौह कएलो उपरान्त सबपक्षके समेट नहि सकल । संगही आन पार्टी सैहो पिडीत,उत्पीडीत,राज्यक संरचना सं दर रह बला वर्गक प्रति इमान्दार नहि रहल त दौसर विद्रोहक सम्भावना अवश्सम्भावी अछि । विद्रोहक अनेक शैलीआ पद्यती मध्ये कम सं कम जनआतंक आ जनधनक क्षति होइक एहने शैली एवं आचरण मात्र विश्मे अनादिकालसं समाजिक मान्यता वपैत अछि । समाजिक रुपानतरण हथियार नहि विचार सं कायल जाइक तखने टिकाउ भ सकैत अछि । आसुरी ताल या वृति एकटा स्वभाविक कमजोरी अछि । सहिष्णुता संस्कारक उदात्तीकरण अछि । मनोविज्ञान याह तथ्यके मान्यता दैत छैक जकर प्रशस्त प्रमाणसब छैक । ३० वर्षे पञ्चायती शासन स्वैच्छाचारी, हुकुमी, निरंकुश सामन्ती प्रवृतिक छलेैक त २०४६ सालक जनआन्दोलन व्यावस्थामे परिवर्तन लौलक तथापि प्रवृतिमे कोनो परिवर्तन नहि दैखलगेल । पूर्व राजा ज्ञानेन्द्रद्धारा फैर सं व्याह शासन प्रणालीके पुनरावृति कर चाहलक मुदा सफल नहि भ सकल । ज्ञानेन्द्रक महत्वाकांक्षा बढैतगेल जकर फलस्वरुप देशक जनता गणतन्त्रोन्मुख होइत आई दैशमे गणतन्त्र स्थापना भ गेल अछि । आव जौ कोनो प्रकारक वाधा व्यवधान उत्पन्न करबाक कोशिश कायलगेल त विद्रोह बढवेटा करत । संविधानसभा मूद्दा नहि समाधाने मूद्दा अछि । संविधान सभाक विर्वाचन पश्चात मधैशक साथ कोनो दल धोखा देवाक धृष्टता करत त परिणाम अनिष्टकारी हायत । राष्ट दोसर दूगिर्तकै आमन्त्रण करत । मधेशक जनता अखनधरि उपेक्षित, उत्पीडित रहल, समान अधिकार आ समान पहिचानकलेल लालाइत रहल मधेशक मूद्दापर यदि राजनीति करबाक धृष्टता करत त स्वाभिमानी मधेशी जनता फेर विद्रोहमे उतरत, मधेशी जनता मधेशवादी अछि, मात्र मधेशवादी गणतन्त्रवादी नहि । गणतन्त्रवादी कहि जनता भोंट नहि देलक आइ किछु नेता कहैत छथि, “हामी गणतन्त्रवादी हौं” हुनका “हामी मधेशवादी” कह मे लाज किएक ? आबक संविधान जनआन्दोलन २०६२।०६३ तथा मधेश आन्दोलनद्धारा प्राप्त जनाधिकारक सन्दर्भमै एकटा एहन संविधानक आवश्यकता छैक जाहि संविधानक माध्यम सं नेपालक जनता सही अर्थमै समावेशी लोकतन्त्र, प्रतिस्पर्धात्मक बहूदलि, बहूभाषिक, बहूसांस्कृतिक स्वरुपक संगहि सम्बन्धित अधिकार सबहक उपभोग क सकय । एकरा संगही एहि दैशमे सयकडो वर्ष सं शोषित रहल मधेशी समुदाय, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी एवं जनजाती आव निर्माण हौव बला नयां संविधानद्धारा एकटा कण्ठारहित समुन्नत, समावेशी आ विकाशशील समाजक निर्माण भ सकै आ तकर यथार्थ अनुभूति अनुभव जनता क सकय । ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति भूमिका : एम पी टूर कहै छै जे एक बेर शेर जॅं मनुषक खूनक स्वाद चखि लैत अछि तऽ ओकरा मनुषक आदत भऽ जाएत छै। सैह हाल छल हमर सबहक।एक बेर जे टिस्कोक शैक्षणिक यात्रामे जाइत छल तकरा सबमे बेर-बेर जाइके अभिलाषा जागि जाइत छलै।अही कारण सऽ लगभग आधा सऽ लऽ कऽ दू तिहाई तक विद्यार्थी तेहेने रहैत छल जे पहिनेहो आयल रहैत छल। तकर बाद एहेनो बड होएत छल जे सब तरहक इण्टर स्कूल कॉम्पीटिशनमे एक दोसर के चिन्हार भेल रहैत छल।से बड कमे लोक एहेन होएत छल जे वस्तुत: नऽब होइत छल।पहिल बेर जॅं कनी अन्तर्मुखी रहितो छल तऽ अगिला बेर सऽ खूब खुलीकऽ मज़ा करैत छल।नब विद्यार्थी सबके सहायक सेहो बनैत छल। हमहुं आन विद्यार्थी जकॉं बहुत आह्लादित छलहुं।टूर लेल चयन भेल से तऽ पिछला सालक रिजल्ट निकलिते देरी पता चलि गेल छल।लेकिन कत जायब से अहिबेरका वार्षिक परीक्षाके समाप्ति दिन बतायल गेल।जहन पता चलल जे मध्यप््रादेश जायके अछि तऽ बहुत खुश भेलहुं।घरक परिवेशक ई असर छल जे उज्जैन आ अमरकंटक लेल बड उत्साहित छलहुं। ताहिपर सऽ कान्हा नैशनल पार्क के देखक लालसा सेहो कम नहिं छल।पहिल बेर ई अवसर छल। अहिबेरका टुरक लक्ष्य निम्नलिखित छल: (1) विलासपुर (2) अमरकंटक (3) जबलपुर (4) भेड़ाघाट (5) कान्हा नेशनल पार्क (6) पचमढ़ी (7) उज्जैन (8) इन्दौर तथा (9) भोपाल 1.अवैद्य नागरिकताः सिक्कमीकरणक प्रयास, 2.तराई/मधेशक आन्दोलनः लूटमे लटुवा नफ्फा,3.अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ,4.त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास मनोज कुमार मुक्ति- अवैद्य नागरिकताः सिक्कमीकरणक प्रयास मनोज मुक्ति नेपालमे नागरीकता वितरण बहुतो वर्ष पहिने सँ चर्चित विषय बनल अछि । खास कऽ पहिल मधेशवादी दलक रुपमें जानल जाइत नेपाल सदभावना पार्टी अपन स्थापने कालसँ नागरीकताके अपन प्रमुख मुद्दाक रुपमे रखैत आएल छल । प्रजातन्त्रक आगमनकबाद २०४८ सालमे बनल सरकारक समयमे सेहो नागरीकताक प्रश्न सदन गर्मओने छल ।सदभावना पार्टीक अडान रहैक बहुतो मधेशी जनता नागरीकतासँ बञ्चित अछि, सबके नागरीकता देल जाए । सदभावना पार्टीक एहि अडानपर जनमोर्चा लगाएतक दलसब एकरा भारतक विस्तारवादी नीति कहैत विरोध करैत छल । हूनकर सबहक कहब रहैनि जे मधेशीसबके नागरीकता दऽदेलासँ नेपाल सिक्कमीकरण भऽ जायत । जनआन्दोलन २०६२/०६३ सँ पहिने सेहो नागरीकता वितरणकलेल आयोग सब बनैत रहल, अपन प्रतिवेदन बुझवैत रहल । कोनो बेर जौं नागरीकता देलोगेल त “सबै भारतीयहरुलाई नागरीकता दियो, देशमा अब विखण्डन हुन्छ” कहैत, रिट दायर कऽ मधेशमे देल जाचुकल नागरीकताके बदर सेहो कराओल गेल । एकटा विदेशी नागरीकके नेपालक नागरीकता देनाई वास्तवमे बहुत बडका षडयन्त्र होइत छैक, देशक हीत विपरीत काज होइत छैक । देश हीतक विपरीत काज कयनिहार ककरो नईं छाडल जएबाक चाही । ताहुमे नागरीकता सन सँवेदनशील विषयमें त सबहक नजरि रहब ओतबे जरुरी होइत छैक । मुदा जोर जोरसँ गरजनिहार सबहक मानसिकता एहिबेरक नागरीकता वितरणक समयमे देखागेल । नागरीकता वितरणक तथ्याँक अनुसार लगभग २४ लाख नागरीकता समुच्चा देशमे वितरण कायलगेल । जाहिमे लगभग ११ लाख तराई मधेशमे आ १३ लाख पहाड हिमालमें । कि वास्तवमें नागरीकता प्रप्त केने चौबिसो लाख व्यक्ति नागरीकता लेबाक हकदार रहथि ? ई एकटा पैघ प्रश्न अछि । हँ सदनमे बहुत हँगामा कायलगेल, अपनाके देशक ठिकदार कहनिहार देखावटी देशभक्त पार्टीसबद्धारा । अहु हँगामा सबहक एकहिटा कहब छल जे तराई मधेशमे सबटा भारतीय सबके नेपाली नागरीकता द कऽ देशके सिक्कमीकरण करबाक तैयारी कायल जाऽरहल अछि । मुदा कि नागरीकता वितरण कयनिहार अधिकारीमे कएटा व्यक्ति तराई या मधेशी मूलक रहथि ? आँगुरपर गनल जा सकैया । अवैद्य रुपसँ वितरण कायलगेल नागरीकता मधेशक विरोधमें बहुत पैघ षडयन्त्र अछि । मधेशमें जाऽक गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा जे किछु मात्रामे विदेशी सबके मोटगर पाई ल कऽ नागरीकता वितरण कायलगेल अछि से मधेशीसबके अपने धर्तीमे गुलाम बनयबाक चालि अछि । एकर दू टा पक्ष अछि, जौ नागरीकता लेने विदेशी भुख्खे मरत त उदारवादी मधेशी अपनो हिस्साक भोजन देबऽमे पाछा नई रहत, आ मानसिक एवं शारीरिक यातनाक पीडा मेलैत रहत । जौ पाइके बलपर नागरीकता लेने कोनो धन्निक विदेशी गाममे रहत त गामक जिमदार बनिकऽ सबके फेरसँ कमैया बनालेत जेना पश्चिमी तराई मधेशमे थारु सबके पहाड सँ विस्थापित पहाडी सबद्धारा कमैया बनालेल गेल । ताएँ एहि बातपर मधेशीसब सचेत रहथि आ विदेशी सबके नागरीकता लेबऽसँ सकभर रोकलथि । मुदा तैयो पाइयक भुखल आ द्धेष भावनासँ कुटिकुटिकऽ भरल गैर मधेशी अधिकारीसबद्धारा मधेशोमे किछु नागरीकता अवैद्यरुपसँ वितरण कायलगेल । दोसर दिश पहाड आ हिमालमे जे जनसँख्यो सँ बेसी नागरिकता वितरण भेल ताइके विषयपर सदनमे ककरो बकार धरि नहि फुटल । कत चलिगेल ओई देशभक्त नेता सबहक देशभक्ति ? ई अहिने प्रष्ट कऽदैत अछि जे ओइ खोखला देशभक्तसबक नियति, ओसब कि चाहैत अछि, आ कत सँ सञ्चालित अछि ? वास्तवमे अवैद्य नागरीकता वितरण क कऽ नेपालके सिक्कमीकरण करबाक प्रयाश सोंचल समझलरुपमें शुरु भऽगेल अछि । नेपालमे लाखोके सँख्यामें तिब्बती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) नागरीकके नागरीकता द कऽ वैद्य नागरीक बनयबाक खेल शुरु भऽगेल अछि, आ तकरा सब मधेश विरोधी मानसिकताक लोक भितरिया मोन सँ स्वागत करैत गदगद भऽ रहल अछि । एकर कारण एक्कहिटा अछि जे नागरीकता लेनिहार तिब्बती, भुटानी आ भारतीय(दार्जिलिङ्ग) लोकके मुँहकान आ प्रायःके भाषा नेपालक ओइ बेतुक्का देशभक्त नेता सबसँ मिलैत जुलैत अछि । ई सिक्कमीकरण नईं त कि अछि ? देशक सम्पूर्ण सचेत नागरीकके सोंचबाक चाही । तराई/मधेशक आन्दोलनः लूटमे लटुवा नफ्फा मनोज झा मुक्ति सँयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चाक नामपर भेल तराई/मधेशक आन्दोलन अन्तोगत्वा सातदलक सरकारके फागुन १६ गते वाध्य कऽदेलक आ सातदलक सरकारके तरफसँ प्रधान मन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला, तात्कालीन नेकपा एमालेक मुखिया माधव नेपाल आ नेकपा माओवादीक अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल “प्रचण्डक” उपस्थितिमे आठबुँदे सम्मझौता पत्रपर हस्ताक्षर कएलक । सम्मझौता लागू कायल जाएत ताहि शर्तपर मधेशवादी दलसब तत्काल आन्दोलन स्थगित कएलक आ संविधान सभाक चुनाव संभव भऽसकल । तराई/ मधेशक आन्दोलनके विखण्डनकारीक आन्दोलन, संविधान सभा विरोधीक आन्दोलन एवं राजावादीक आन्दोलनके आरोप लगौनिहार, देखावटी कऽरहल आ अपनाके गणतन्त्रवादी कहऽबला एवं द्वेषक मानसिकतासँ कुटिकुटिकऽ भरल नेपालक सञ्चारकर्मीके मुँहपर पैघ झापड लागल जखन शान्तिपूर्णरुपसँ तराई मधेशमे संविधान सभाक चुनाव सम्पन्न भेल । संविधान सभाक चुनाव सम्पन्न भेलाकवादमें जहन संविधान सभाक पहिल बैसार भेल त तराई/मधेशक विरोधमे सबदिनसँ मेंहक काज करैत आएल राजतन्त्रक समाप्ति भेल जे तराई/मधेशक जनताके सबसँ पैघ विजय छल । जखन संविधान सभाक काज आगु बढल त मधेशी जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल मधेशी सभासदसब विगतके सम्मझौताके सुनिश्चित करबाकलेल अन्तरिम संविधानमे लिखएबाक माँग सहित सदन अवरुद्धक काज करऽलागल । अवरुद्धक काजके फेरसँ, नेपालके अपन बपौटी सम्पति बुझनिहार विभिन्न दलक नेतासब आ संकिर्णतासँ भरल प्रयः छोटसँ पैघ सँचारकर्मीसब( अपवादकरुपमे किछु छोडिकऽ) सदन अवरुद्धक काजके विदेशीक ईशारापर कराओल जाऽरहल, देशके विखण्डनकेलेल कायल जाऽरहल लगाएत नाना प्रकारक आरोप लगेबाक शुरु कऽदेलक । आरो त आरो तराई/मधेशक जनताक भोंटसँ जितिकऽ आएल आन–आन पार्टीक तराई/मधेशक ठिक्कालेने मधेशी नेतासबसँ विरोध करौनाई शुरु कऽ देलक । ओना विरोधक मोहराक रुपमें किछु नेता आगा आबिकऽ अपन मालिकके मन जितबामे सफल सेहो रहलाह आ मधेशीदलक नेता मात्र मधेशक हीत नई सोचत, हमहुँसब मधेशेकलेल लडव, कहिकऽ जितल मधेशवादी दल बाहेकके नेतासब सेहो अपन पद बँचेवाक डरसँ मौने रहऽमे भलमन्साहत बुझलथि । एम्हर, कहियो अञ्चलाधिश रहल राप्रपाक नेता नरेन्द्र चौधरी अध्यक्ष रहल थारु कल्याणकारिणी सभा थरुहट स्वायत्त प्रदेशक माँग करैत मधेशीदल आ सरकार सँगभेल सम्मझौताके लागु नई करबाकलेल दबाव स्वरुप जुलुश,बन्द आ चक्काजामके आयोजना करऽलागल । ओना जौ एहि आन्दोलनक नेता सबहक विगतके पृष्टभूमि देखि त किछु सोंचबाकलेल विवश भेल जाऽसकैया । अखन एहि आन्दोलनक अगुवाई कऽरहलछथि– राजकुमार लेखी, जे एमालेमे बहुत दिनसँ लगितो टिकट पएवामे असफल रहल अछि । आब राजनीतिक विश्लेषकके मानी त एमालेसँ राजकुमार लेखीक टिकट पक्का–पक्की अछि एहि विरोध प्रदर्शनक बाद । किशोर विश्वास, जे विशुद्धरुपसँ मधेशीके पार्टीक नामसँ जानल जाएबला नेपाल सदभावना पार्टीसँ अपन राजनीतिक जिवनक शुरुवात कएलक । माघ आन्दोलकबाद मधेशी जनाधिकार फोरममे सक्रिय भेल, फोरमद्धारा निष्कासित भऽ भाग्यनाथ गुप्ताके अध्यक्षतामे मधेशी जनाधिकार फोरमक दर्ता करौलक जकर उपाध्यक्ष किछुदिन रहल आ पुनः निष्कासित कऽदेलगेल । एहि थरुहटके आन्दोलनसँ हुनको एकटा प्लेटफार्म भेंटगेल अछि, आब देखबाक ई अछि जे एहि प्लेटफर्मपर हूनकर गाडी कतेक दिन धरि रुकत आरो जे हुए, थारुसब नेपालक आदिवासी अछि एहिमे कोनो शंका नहि । सबके अपन–अपन अधिकार भेंटवाक चाही । मूदा अपन अधिकारकलेल दोसरके अधिकारक हनन कायल जाए, कतेक ऊचीत गप्प अछि मधेश हुए, तराई हुए, थरुहट हुए या कोनो अन्ये नाम किया नई दऽदेल जाए ओहि प्रान्तके जनताकेँ समान अवसर, पहिचान, अधिकारक ग्यारेन्टी एवं स्वायत्तता भेंटवाक चाही । एकटा बात जे सबके आश्चर्य कएने अछि– मधेशी चोर देश छोड, एक मधेश एक प्रदेश नई थरुहट चाही ! ई कहिकऽ कायलगेल विरोध प्रदर्शनमें मगर सँघक व्यानरके, चुरे भावरक लोक सबके । मानिलेल जाए जे मधेश शब्दके बदलिकऽ तराई या थरुहट राखिदेल जाए त ताईमें मगरके आ चुरे भावरके कोन तरहक फायदा भेटतैक जौं मधेश स्वायत्त भऽ जएतैक त झलनाथ खनाल लगाएतके कोन श्रीसम्पति हरण कऽदेल जेतैक किया ओ सब एकर विरोध कऽरहल अछि ऊत्तर ताकब जरुरी अछि । सबदिन सँ तराई/मधेशके चरणकेरुपमे बुझने, महेन्द्रक फूटक नीति अनुरुप पहाडसँ तराईमें आबि सोझसाझ आदिवासी थारुके सम्पति हडपिकऽ ओकरा हरुवा आ कमैया बनेने एहि तरहक शोषक मानसिकताके पृष्टपोषक झलनाथसब किया चाहतैक जे ओतुक्का थारु लगाएत आन समुदाय सुखी आ सम्पन्न बनय आ जाधरि तराई/मधेशके स्वायत्तता नई भेटतैक ई सम्भव नहि से ओकरा सबके बुमल छैक । अन्तमे संघीयता या स्वायत्तता देलो जाए तराई/मधेशके त अपना अनुसारके बाँटिकऽ जे कहियो तराई/मधेशक जनता शक्ति सम्पन्न आ सामर्थवान नहिं भऽ सकय । ओकरा सबके नींक जकाँ बुमल छैक जे सम्पूण तराई/मधेश या थरुहट कोनो नामपर एक प्रदेश भऽगेल त हमरा सबहक कोनो चारा नई चलत ओतऽ । दोसरदिस अपनाके जनताके आवाज कहनिहार नेपालक सँचारकर्मी आ नागरिक समाज लगाएत बुद्धिजिबीपर पैघ प्रश्न उठाओल जाऽरहल अछि– सातदलक शिर्षस्थ नेताक सहमति/उपस्थितिमे,सातदलक सरकारक प्रमुख एवं राष्ट्राध्यक्ष रहल व्यक्तिद्धारा हस्ताक्षरित सम्मौताके लागु करबाकाल आयोग निर्माण आ विभिन्न बहाना कायल जाति छैक से हूनका सबके नई सुमाति छन्हि आ भेल सम्मौताके कार्यान्वयनके सुनिश्चितताक माँगमे हुनका सबके विदेशीक ईशारा आ विखण्डनके बात सुमाति छन्हि ।कि सम्मौताके सँग भऽरहल मजाकक बाद कोनो समूह सरकार या ककरो सँगे वार्ता करत ? माधव नेपालक सम्मौतामे रहल सहमति एमालेक सहमति छल की माधव नेपालक व्यक्तिगत,जे मलनाथ सम्मौताक पुनःविचारक बात करैत छथि ?जौं से बात छैक त हूनका पार्टीक नाम सेहो बदलि लेबाक चाही ।एहि बातपर किया नागरिक समाजके मूँह बन्द भऽगेल अछि, किया सँचारकर्मीक कलम ठमहि गेल अछि ? हूनका सबके ई नई बुमल छन्हि, जे देशक कोन पार्टी आ नेता कत–कतऽसँ सञ्चालित अछि ?निश्चित रुपसँ बुमल छन्हि, मूदा कोनो वर्ग विषेशके पकडमें रहल सँचारकर्मीसब अपना अनुसारे विश्लेषण करैत अपन मनमर्जी अनुसार नङ्गा नाँच कऽरहल अछि आ आम जनमानसमे मिडियाक छविकेँ तहसनहस कऽ रहल अछि । बजतैक केँ ? जौं एक ठाम कोनो अदना तराई/मधेशक लोक देशक विखन्डनक गप्प करैत छैक त सब मिडियाक प्रमुख समाचारकरुपमे ओकरा परसल जाइत छैक,मूदा सदनसन सर्वोच्चठाममे जहन एकटा प्रतिष्ठित मधेशी नेता सरकारमे सहभागि सबके दोष प्रमाणित करैत देशमे विखण्डनके बीजा रोपणक गप्प करैत छथि त ओ नाहियोंटा समाचार नई बनि सकैया ? अन्तोगत्वा जौं राष्ट्रप्रमुखद्धारा कायलगेल सम्मौता लागू नईभेल त देशमे केओ ककरो पर विश्वास नई करत आ एतेक पैघ सँकटके ई जन्मदेत से सबके बुमितो मौन अछि । आ दोसर बात तराई/मधेशक जनताके ई बात बुझनाई जरुरी अछि कि तराई/मधेशक जनताके अधिकार सम्पन्नता चाही आ स्वायत्तता चाही । तराई/मधेशक जनता अधिकार सम्पन्न नई भऽजाए आ सबदिन दास बनल रहय से मानसिकतासँ जे अपना घरमे फूट कराओल जाऽरहल अछि तकरा समयेमे बुझनाई जरुरी अछि । ओतुक्का जनताके एकैहिटा प्रदेश चाही या १०टा, तकर निर्णय ओतहिक जनता करत नई कि फूटाकऽ राज करबाक सोंचनिहारसब । जौं अपनाके मधेशवादी कहऽबला दलसब सेहो कोनो तरहक गलत निर्णय करैत छथि त हूनको सबहक विरोध होबहिक चाही । अन्तर्वार्ता-डा. राम दयाल राकेश/आभाष लाभ..... सरकारके ध्यान छठि पावनिपर देवाक चाही.....डा. राम दयाल राकेश ( सँस्कृति विद) छठि पावनि मधेसके संस्कृति कियाक मानल जाईत अछि ? –छठि पावनके अपने मौलिक विशेषता छइ,, ई पावनि शुरु होबऽ सँ एकमहिना पहिने सँ पावनि कयनिहार सब तैयारी मे लाईग जाईत छथि । एकर तैयारी आ पुजाके जौं देखल जाय त अईमे विशुद्ध मधेसी संस्कृति पाउल जाईत अछि । पावनि केनहार सँ लक ओईके तैयारीमे लागल हरेक व्यक्ति ओ संस्कृतिमे भिजल रहल पाओल जाइत अछि । ओकर प्रसाद सँ लऽक हरेक सामगी्रमे मधेसक संस्कृति देखल जाईत छक, ओ पावनिके अवसरमे गावै वाला विभिन्न धुन तथा गीत सब मैथिल संस्कृतिमे गाओल जाईत अछि । ई पावनि कियाक मनाओल जाईत अछि ? –एकर अपने पहिचान आ विशेषता छैक । सब पावनि सँ अई पावनिके अपने इतिहास छैक किया त कोनो पावनि एसगरे अपना घर परिवार मे रहिकऽ मनाओल जाइत अछि मुदा ई एकटा एहन पावनि अछि जे खुला जगहमे सामूहिक रुप सँ मनाओल जाइत अछि । अई पावन के मात्रे लोकतान्त्रीक पावनि कहल जा सकैय कियाक त अई पावनि मे कोनो भेदभाव उच्च नीच, जात भात नई देखल जाइत अछि । अई पावनिमे सूर्यके पुजा भेलाके कारण आओर एकर गरीमा के उच्च देखल जा सकैय । सूर्य जहिना ककरो पर भेदभाव नई क कऽ सम्पूर्ण जगतके रोशनी प्रदान करैत अछि, तहिना छठि पावनि सब के एक समान रुप सँ देखैत आईव रहल छैक । ई पावनि अपना परीवार के सुख समृद्धिके लेल तथा कोनेा रोग व्यधा नई लागै से मनोकामना सँ मनाओल जाइत अछि । भोर आ साँझक सूर्यके किरणमे एक प्रकारके गरीमा होईत अछि जकरा रोशनी सँ शरीरमे रहल विभिन्न विमारी फैलाब वाला किटाणु सबके नष्ट सेहो करैत चर्मरोग सँ बचाबैत अछि । चर्म रोगके अचुक दवाई मानल जाईत अछि छठि पावनि । छठि पर्व मे महिला सब अपना आचरा पर नटुवा कियाक नचवैत छैथ ? –एकरा एकटा श्रद्धाके रुपमे लेल जा सकैय, छठि माताके ध्यानमे राखि क कोनो किसीमके मनोकमना केला सँ जौं ओ पुरा भ जाईछै त ओई देवता पर आरो श्रद्धा बैढ जाईछै आ ओहि किसीमके कौबुला क क अपना आँचर पर नटुवा नचवैत छैथ । छठिक घाट पर चमार जाईत सब ढोल( डुगडुगीया) बजावैत छथि, ओकर कि विशेषता अछि ? –ओकरो जातिय तथा संस्कृति परिचयके रुपमे लेल जा सकैय, ओ जाईत सब अपन संस्कृति आ संस्कारके बचएबाक लेल ओ काज क रहल अछि । ओ ढोल बजला सँ घाट पर कतेक मधुरता आ रौनक महशुस होईत रहैत अछि, ओना त कते लोक सब अग्रेजी वाजा बाजा क पावैन मानावैत छैथ मुदा जतेक ढोल पीपही के आवाजमे संस्कृति के झलक भेटैत अछि ओते कोनो बाजामे नई । अई पावनि मे सूर्यके पुजा होईतो पर छठि माता या छईठ परमेश्वरीके नाम सँ कियाक जानल जाईत अछि ? –सूर्यके अर्थ उषा होईत अछि, उषा भगवतिके रुपमे पुजलाके कारण एकरा छठी माताके रुपमे सम्बोधन कायल जाइत छैक । ओना त स्पष्ट रुपमे कतौ ने अई विषयमे चर्चा भेल अछि लेकीन किछ शास्त्रमे महाभारत के कुन्ति शुरुमे छठि पावनि केनेे रहैथ ओही दिन सँ छठि पावनि शुरु भेल अछि से कतौ कतौ उल्लेख पाएल जाईत अछि । दिनकर के आ जलके कि सम्बन्ध अछि ? –जल के आ दिनानाथके बहुत गहिर सम्बन्ध अछि, बिना जलके दिनकरके पुजे नई भऽ सकैय हुनका खुश करबाक लेल जल चाहबेटा करी । छठिएके उदाहरणके रुपमे लऽ लिय, ओ पावनि बिना जल के नई भऽ सकैय कोनो जलासय नई भेला पर अपना घरमे खधिया खनि क ओइमे जल राईख क पावनि सम्पन्न करैत अछि, कियाक त दिनानाथे सूर्य छथि । एकटा एहो कहि सकै छि कि सूर्य मे बहूत गर्मी भेला के कारण जल के अर्घ देला सँ ओ किछ ठन्ढा होइत छैथ । लोकतान्त्रिक गणतन्त्रमे छठि पावनिके संस्कृतिके बारे मे अपने कि कहब अछि ? – हम गणतन्त्र नई कहिक लोकतन्त्रके चर्चा करैत ई कहव कि छठि एकटा विशुद्ध लोकतान्त्रिक पावन अछि, समानुपातिक ढगं सँ एकरा मनाओल जाइत अछि । सामूहिक रुपमे मनबाक सँगहि अई मे कोनो भेद भाव नई होइत अछि । गरीब सँ लक धनीक तक सब एकरा समान ढगं मनावैत अछि । जनता गणतन्त्रके रस्ता चलनाई शूरु कदेलक मुदा सरकार अखुनोे पाछा परल अछि । अखनोे मधेसी पहाडी बीच , दलित गैर दलित बीच, गरीब धनीकके बीच भेदभाव अछि, कि एकरे गणतन्त्र कहबै ? नवका नेपाल बनाबऽ लागल नेेतागण सबके छठि पावनि सँ किछ सिखवाक चाहि । अन्तर्वाता ...आभाष लाभ (२०२८ सालमें डा.राजेन्द्र विमल आ श्रीमति विणा विमलक सन्तानक रुपमें जनकपुरक देवीचौकक निवासमें जन्म लऽ २२ वर्ष पहिने सँ निरन्तर मैथिली गीत सँगितक आकाशमें ध्रुवतारा जकाँ चमकैत रहऽबला एकटा मिथिलाक बेटा छथि, गायक आभाष लाभ । बाल्येवस्था सँ विभिन्न मँच सबपर अपन आवाज सँ दर्शक श्रोता सबके हृदयमें वास कयनिहार आभाष लाभ, मैथिली आ मिथिला सँ सम्बन्ध रखनिहारकलेल चीरपरिचीत नाम अछि । प्रस्तुत अछि, गायक आभाष लाभ सँगक भेल बातचीतक प्रमुख आश ) १. आभाष जी गीत सँगीतमें कहिया सँ लगलहुँ? कहिया सँ लगलहुँ से त नईं बुझल अछि, मूदा बच्चे सँ जनकपुर आ लऽग परोसक गाँव सबहक एकौटा मञ्च हमरासँ नई छुटैत छल । २. पहिलबेर आहाँक रेकर्डेड गीत कोन अछि - पहिलबेर हम नेपाल सँ बहराएल अशोक चौधरीक मैथिली क्यासेट पानस में गीत गएने छलहुँ । ३. मैथिली गीत सँगीतक अवस्था केहन बुझा रहल अछि? जतेक होयबाक चाही ओतेक सँतोष जनक नहि अछि । नव नव प्रतिभा जाई तरहें एबाक चाही, नई आबि रहल छैक । दोसर बात अखन प्रविधि एतेक परफेक्ट भऽगेल छैक जे पाइ सेहो वड खर्च होइत छैक । ४. की बुझाइया, मैथिली गीत सँगीतमें लागिकऽ अखनुक युगमें बाँचल जा सकैया एकदम नीक जकाँ बाँचल जा सकैया एही क्षेत्रमें लागिकऽ । मैथिलीक क्षेत्र बहुत पैघ छियै । जौं मेहनतिसँ नीक काज कायल जाए त मैथिलीयो सँगीतक क्षेत्रमें बहुत पाई छै । उदाहरण लऽ सकैत छी, हमरे सबहक क्यसेट “रे छौंडा तोरा बज्जर खसतौ”के जे १५ लाख प्रति बिकाएल छल । तहिना “गीत घरघर के” जे जहिया सँ बहरायल तहिया सँ आइयोधरि बिकाइते अछि । हँ, काज नीक होयबाक चाही । ५. प्यारोडीके प्रभाव केहन पडि रहल छैक मैथिली गीत सँगीत पर? प्यारोडी मौलीकताके साफ साफ खतम कऽ दैत छैक । गीत सँगीतक क्षेत्रमें लागल श्रष्टा सबके मनोवलके तोडिकऽ राखिदेने छैक प्यारोडी गीतसब । ६. प्यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्ड छुटबाक उपाय की देखियौ, जखन अपन सँगीत या गीत नई हुए तखन प्यारोडीके किछु हद धरि पचाओल जाऽ सकैया,मूदा मैथिलीमे अपन मौलीक सँगीतक आभाव त कहियो नई रहलै । जहातक प्यारोडी गीत सँगीत सँ पिण्ड छुटेवाक बात छई त अइमे आम जे श्रोता सब छथि, जे वास्तविक रुपमें चाहैत छथि की अप्पन मौलीक सँगीतक विकास होइ, हूनका सबके प्यारोडी गीतके निरुत्साहीत करबाकलेल ताई प्रकारक क्यासेट किनऽसँ परहेज करऽ पडतन्हि आ सँचार माध्यम सबके सेहो ओहन गीत बजेवा सँ बचऽ पडतन्हि, तखने ई सँभव अछि । ७. नेपालीय आ भारतीय मिथिलाञ्चलमें मैथिलीक बहुत रास काज भऽ रहल छैक, की अन्तर बुझाऽ रहल अछि दूनु देशक मैथिलीक काजमे हम त मात्र एतबा बुझैत छियै जे एकटा हमर सहोदरा विदेशमे कमाऽरहल अछि आ हम नेपालमे । दूनु ठाम अपना अपना तरहें काज भऽरहल अछि एतबे बुझु । ८. अखन सऽभ भाषाक गीतमे रिमिक्सके बाढि आएल बुझाति छई, एकरा कोन रुप सँ आहाँ देखैत छियै? बहुत नीकबात छई रिमिक्स गीत औनाई । समय अनुसार आधुनिकीकरण होयबाके चाही । समाजकलेल आ बजारकलेल गीत गौनाई दूनु दूटा बात छियै, ताहिमें गीत सँगीतक व्यावसायीकरणमे रिमिक्स बहुत नीक सँकेत छई । रिमिक्स गीत बहरेवाक चाही बशर्ते अपन सँस्कार नई लुप्त भऽ जाई ताइके ध्यानमें रखैत । ९. अखनधरि कतेक गीत गएलहुँ जे रेकर्डेड अछि? अखनधरि लगभग साढे तीनसय गीत हम गाबि चुकल छी जे रेकर्डेड अछि । १०. क्यासेटके अलावा कोन फिल्ममें अपन स्वर देने छी आहाँ ? मैथिलीमे दहेज,ममता,प्रितम,आशिर्वाद फिल्ममे, तहिना भोजपुरी फिल्मसब सजना के आगना, ममता, तहार गलिया आदिमे । ११. स्टेज शो के सीलसीलामे कतऽ कतऽ गेलहुँ? अपन देश नेपालक लगभग सबठामके अलावा, कतार (४बेर),दूवई(२बेर),मलेशिया,पाकिस्तान,बंगलादेश, भारतक विभिन्न शहरमें अखन धरि जाऽचुकल छी । १२. नव की आबि रहल अछि मैथिल श्रोता सबहक लेल? बहुत जल्दिए निखिल राजेन्द्रक सँगीतमे भेनस क्यासेट सँ रिलिज भऽ रहल अछि.... त्रिभुवन विश्वविद्यालयद्धारा मिथिलाक्षर फन्टक विकास मैथिली लेखक एवं अन्य मैथिली भाषी लोकनिक भावनाकेँ सम्मान करैत त्रिभुवन विश्वविद्यालय भाषाविज्ञान केन्द्रिय विभाग तथा मदन पुरस्कार पुस्तकालय भाषा सञ्चार परियोजना अन्तर्गत यूनिकोड पर आधारित जानकी नामक मिथिलाक्षर(तिरहुता) फन्टक विकास कयलक अछि । एहि फन्टक मादे आब सँसार भरि इमेल मिथिलाक्षरमे पढल जा सकैत अछि । सँगहि, वेबसाइट पर मिथिलाक्षरमे पाठ्यसामग्री साखल जा सकैत अछि । मुद्रणक कठिनाई सँ मैथिली भाषा देवनागरी लिपिमे सामान्य रुपसँ लिखल जाइत अछि आ मिथिलाक्षरक प्रयोग बहुत सीमित क्षेत्रमे होइत जाऽ रहल अछि । यूनिकोडमे आधारित जानकी फन्टक आगमन सँ मिथिलाक्षरक प्रयोगक विस्तार होयबाक सँभावना बढल अछि । ओना दू वर्ष पहिनहिँ निजी स्तरपर श्रविण झा आ गँगेश गुञ्जन मिथिलाक्षर फन्टक निर्माण कयने रहथि । मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराँइत-/जितिया पावनि-मनोज झा "मुक्ति" मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराँइत-मनोज झा "मुक्ति" मकर सँक्रान्ति अर्थात तीला सकराइँत माघ महिनाक पहिल दिन, प्रायः माघ मासक १ गतेके मनाओल जाइत अछि । मकर सँक्रान्ति माघभरि लोक भोरमे स्नान करैत अछि । माघ मासक सँक्रान्तिक दिन लोक उडीदक दालि, चाउर,तिलबा, चुल्लौर आदि दान करैत अछि । धनवान लोकसब गोदान, उनीवस्त्र, कम्बल, सोन आदि सेहो दान कायल करैछथि । एहि दिनमे खिच्चरि खएबाक चलन चलि आएल अछि । आजुक दिन भगवान भगवतीके चुल्लौर, तिलबा चढाओल आइत अछि । बहुतो ठाम दिनमें चूडा,दही,चुल्लौर आ रातिमे भोजन काएल जाइत अछि । आ किछु ठाम चुल्लौर, तिलबा, चूडा,दही जलपान कऽ दूपहरक भोजन खिच्चरि सँ सँम्पन्न होइत अछि । मिथिलाञ्चलमे भेरे स्नान कऽ कऽ तीलक डाँठ अर्थात तीलाठीक आगि तापल करैत छथि । जौं तीलक डाँठ उपलब्ध नई होमय सकल त आगिमे तीलक किछु दाना धऽ आगि तापि परम्पराके निर्वाह कायल करैछथि । ताइकेबाद अपना सँ पैघ या कहु श्रेष्ठद्धारा चाउर, तील आ गुँड मिलाबिकऽ बनाओलगेल तील खुवाबिक अपना प्रतिके कर्तव्यबोध कराओल जाइत अछि, जकरा “तील बहव” कहल जाइत अछि । ई पावनि सँ आयु, आरोग्य, सम्पति, रुप, गुणक प्राप्ति होएबाक सँगहि सब तरहक पापसँ मुक्ति भेटबाक विश्वास कायल जाइत अछि । माघ स्नानके बृहत मन्त्र सेहो होइत अछि जे एहि प्रकारक अछि ॐ माघमासमिमं पुण्यं स्नाम्यहं देव माधव । तीर्थस्यास्थ जले नित्यं प्रदीदा भगवन हरे । दु ःख दरिद्रयनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणय च । प्रातः स्नानं करोम्यद्य माघे पाप प्रणाशनम् । मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत । स्नानेनानेन मे देव यथोक्त फदो भव । दिवाकर जगन्नथ प्रभाकर नमोऽस्तुते । परिपूर्ण कुरुष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम् । ओना वैज्ञानिक दृष्टिकोणे गुँड खएला सँ शरीरमे गर्मी अएबाक कारणे जाढ मासमे एही पर्वके अति उपयोगी मानल जाइत अछि । जितिया पावनि- मनोज झा "मुक्ति" मिथिलामे बहुतो पावनि बड श्रद्धापूर्वक मनाओल जाइत अछि । मिथिलाके साँस्कृतिक रुपसँ धन्निक कहऽजायबामे एहि पावनितिहार सबहक बहुत पैघ महत्व रहल अछि । ओना सब पावनि सबहक अपन हटले महत्व रहल करैत अछि, सब पावनिके अपन अपन प्रयोजन सेहो ओतबे विशेष भेल करैत छैक । मिथिलामे मनाओल जाएबला एकगोट महत्वपूर्ण पावनि सबमे सँ जितिया पर्वके अपने तरहक महत्व रहल अछि । मिथिलाञ्चलमे प्रचलित अछि जे केओ पुरुष कोनहुँ दूर्घटनासँ बाँचिगेल त कहल जाइत अछि,माय षडजितिया केने छलै ताहिसँ बाँचि गेलै । ई वाक्य स्पष्ट करैत अछि जे जितिया पावनि एकटा बेटाकेलेल हूनक मायद्धारा कायल जाइत अछि । भविष्य पुराणमे सेहो उल्लेख अछि जे पुत्रक दिर्घायुक कामनासँ ई व्रत कायल जाइत अछि । जितिया पावनि, कृष्ण अष्टमीक दुनू साँझ उपवास कऽ भोरमे तिथि बदललापर पारणा करबाक विधान रहल अछि । मिथिलाञ्चलमे जितिया व्रतसँ एक दिन पूर्व अहिवात स्त्रिसब माछ मरुआ अरबधिकऽ खाएल करैत छथि । तहिना पावनि केनिहार विधवा लाकनि अर्वा अर्वाइन खाइत छथि । भिनसरमे जौं अष्टमी नहि पडल रहैत छैक त चूडा दही ल ओंगठन करैत छथि । ताएँ बुझाइया ई कहबी बनल छई, जितिया पाबनि बड ध्यान रखैत छथि । एहि तिथिमे योग विशेष भेलापर षडजितिया मनाओल जाइत अछि, जकरा बहुत पैघ मानल जाइत अछि । जाहि दिनमे प्रदोष कालमे अष्टमी पडैत छैक ओह दिन व्रत होइत अछि, जौं दू दिन प्रदोष कालमे अष्टमी पडैत अछि त खोसर दिन जितिया पावनि व्रत करबाक लोकाचार व्याप्त अछि । जाहिबेर उदय कालमे अष्टमी पडैत अछि तहिया व्रत काएल जाइत अछि आ नवमीमे दोसर दिन पारणा कएल जाइत अछि । अष्टमी जाहि दिन पडैत अछि ताहिदिन व्रत कयनिहार जाहि ठाम स्नान करैत छथि( पोखरि,नदी या इनारपर ) ओकर प्राँगणमे पूवमुँहे ठाढ भऽ तामक अर्घामे मन्त्र पढिकऽ सूर्य भगवानके अर्घ दैत छथि, एवं व्रतक सँकल्प लइछथि । सँकल्प कऽ भरिदिन व्रत रहि साँझमे गायक गोबर सँ नीपि आँगनकेँ शुद्ध कऽ एकटा खधिया खुनि पोखरीक निर्माण कायल जाइत अछि । पोखरीक मोहारपर एकटा पाकडिक ठाढि आनि गारि देल जाइत अछि, गाछक डाढिपर गोबर माटिक चिल्ह राखिदेल जाइत अछि । गिदरनीक आकृति बनाबिकऽ डाढिक नीचामे राखि देल जाइत अछि । तकरा लगेमे जलसँ भरल कलश राखल जाइत अछि ।कलशमे कुशक जिमूतवाहनक मूर्तिक निर्माण कऽ राखल जाइत अछि । ताइकेवाद समय अनुसारक फलफूलके नैवेद्यक व्यवस्था ककऽ राखल जाइत अछि । नैवेद्यमे केरावक आकुरी आ खीराके राखब आवश्यक मानल जाइत अछि । सब सामग्रीक ओरियाओन केलाकबाद व्रति महिला सब पूजा करैत छथि । जितिया पावनिके बहुत कठीन पावनि मानलगेल अछि । ई पावनि केनिहार व्रति महिलासब पानि त नहिंए पिवैत छथि, एतऽधरि कि ओसब खढोधरि नई खोंटैत छथि । धीरेन्द्र प्रेमर्षि (१९६७- )मैथिली भाषा, साहित्य, कला, संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रक काजमे समान रूपेँ निरन्तर सक्रिय व्यक्तिक रूपमे चिन्हल जाइत छथि धीरेन्द्र प्रेमर्षि। वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि। सरल आ सुस्पष्ट भाषा-शैलीमे लिखनिहार प्रेमर्षि कथा, कविताक अतिरिक्त लेख, निबन्ध, अनुवाद आ पत्रकारिताक माध्यमसँ मैथिली आ नेपाली दुनू भाषाक क्षेत्रमे सुपरिचित छथि। नेपालक स्कूली कक्षा १,२,३,४,९ आ १०क ऐच्छिक मैथिली तथा १० कक्षाक ऐच्छिक हिन्दी विषयक पाठ्यपुस्तकक लेखन सेहो कएने छथि। साहित्यिक ग्रन्थमे हिनक एक सम्पादित आ एक अनूदित कृति प्रकाशित छनि। प्रेमर्षि लेखनक अतिरिक्त सङ्गीत, अभिनय आ समाचार-वाचन क्षेत्रसँ सेहो सम्बद्ध छथि। नेपालक पहिल मैथिली टेलिफिल्म मिथिलाक व्यथा आ ऐतिहासिक मैथिली टेलिश्रृङ्खला महाकवि विद्यापति सहित अनेको नाटकमे अभिनय आ निर्देशन कऽ चुकल प्रेमर्षिकेँ नेपालसँ पहिलबेर मैथिली गीतक कैसेट कलियुगी दुनिया निकालबाक श्रेय सेहो जाइत छनि। हिनक स्वर सङ्गीतमे आधा दर्जनसँ अधिक कैसेट एलबम बाहर भऽ चुकल अछि। कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन। नव भोर जोहैत मिथिला —धीरेन्द्र प्रेमर्षि राज्य पुनर्संरचनाक लेल भऽ रहल अभ्यासक असरि देशक समग्र क्षेत्रक सङहि मिथिलामे सेहो व्यापक देखल जा रहल अछि । जनता जागरुक आ उत्सुक अछि— नेपालक नव–निर्माणमे मिथिला क्षेत्रकेँ अपन पृथक आ विशेष पहिचानक सङ्ग देखबाक लेल । सौँसे देशमे गणतन्त्र आ सङ्घीय व्यवस्थाक माङ जोर पकड़िरहल अछि । एहनमे मिथिलावासीमे सेहो एहन भावना जागब आ तकराप्रति सक्रियता देखल जाएब जतबए स्वाभाविक अछि, ततबए उत्साहवर्द्धक सेहो । उत्साह देशक स्वत्व आ स्वतन्त्रताप्रेमी ओहन नागरिकक लेल जे अपन माटिपानिक प्रति इमान्दार छथि, अपन राष्ट्रिय स्वाभिमानपर गर्व करैत छथि, जे मिथिलाक स्वर्णिम इतिहासकेँ वर्तमान बनएबाक आकांक्षी छथि, आ जे यथार्थमे नेपाली जनताक सर्वतोमुखी विकास आ उन्नतिक पक्षपाती छथि । भूगोलसँ मिथिलाक अलोपित होएबाक पीड़ा हमसभ शताब्दियोसँ भोगैत आबिरहल छी । खास कऽ कर्णाटवंशीय मिथिला राज्यक पतनक बाद विभिन्न कालखण्डमे हमसभ यवन, अङरेज, गोर्खाली आदिक प्रहार निरन्तर सहैत आएल अछि । एतबा उत्पीड़नक बाद जँ कोनो आन सभ्यता वा संस्कृति रहितए आ कि कोनो आनठामक लोक रहितए तँ आइधरि छिन्नभिन्न होइत नेस्तनाबूद भऽ गेल रहितए । मुदा मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक अस्तित्व निरन्तर सात सए वर्षसँ चलैत आएल अनेको तरहक कुचक्रक मारि सहितो जीवन्त अछि । एकरा पाछाँ निश्चित रूपेँ मैथिल सभ्यता–संस्कृतिक सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि । साँस लेबामे पर्यन्त अशौकर्य भऽ रहल आइधरिक अवस्थामे सेहो अपनाकेँ जियाकऽ रखनिहार मैथिलीक एहि गौरवशाली आधारसभक प्रति नतमस्तक होइत हम किछु पाँति गढ़ने छी— मानैत छी जे आब रहल नइ दुनियाकेर भूगोलमे तैयो हमसभ बचाकऽ रखलौँ जकरा माइक बोलमे सोहर, लगनी, जटाजटिन कि झिझिया–साँझ–परातीमे एकहकटा मिथिला जीबैए एकहक मैथिल छातीमे उपर्युक्त काव्यांश भूगोलविहीनताक घाओमे मलहम लगएबाक आभास दऽ सकैत अछि, मुदा मात्र छातीमे जीवैत भूगोल हमरासभकेँ सम्पूर्णता नहि दिआ सकैत अछि । एहन–एहन कविता गढ़िकऽ असलमे कही तँ हमसभ अपनाकेँ परतारल करैत छी । एहि तरहेँ अपनाकेँ परतारिकऽ नहि राखल जाए वा जाहि बातपर हमसभ गौरव करैत छी तकरा युग–युगन्तधरिक लेल जँ चिरस्थायी करबाक हो तँ आवश्यक अछि जे खालि छातीमे सैँतल मिथिलाकेँ हमसभ जमीनपर उतारी आ मैथिल भूगोलकेँ पुनः नामकरण करैत उर्वर बनाबी । एकरा लेल देशक एखनुक राजनीतिक वातावरण हमरासभकेँ सर्वोत्तम अवसर प्रदान कएने अछि । मुदा देशमे जाहि तरहक क्रियाकलापसभ देखल जा रहल अछि ताहिसँ ई नहि बुझाइत अछि जे हमसभ एहि अवसरक सदुपयोग करबाक दिशामे पर्याप्त सचेत आ गम्भीर छी । सर्वप्रथम तँ ई बात अबैत अछि जे एखनधरिक सरकारसभ वास्तविक रूपमे सत्ताधारी वर्गसँ बाहरक लोकक लेल सेहो लोकतन्त्र आएल छैक से मानैत–सन अपन चरित्र देखबिते नहि अछि । ई कटुसत्य हमरासभक सोझाँ अछिए । वस्तुतः देशमे अखनो ओहने राजनीतिक दलक दबदबा अछि जे माघ १९ सँ पहिने संविधानसभाक नामे सुनैतदेरी कोनो बिगड़ैल साँढ़जकाँ भड़कि उठैत छल । वि.सं. २०४७ सालक संविधानमे कऽमा–फुलस्टाॅपधरिमे परिवर्तन करबाक आवश्यकता नहि देखनिहारसभ आइ नव संविधान बनएबाक बीड़ा उठौने छथि । एहनमे ओहि व्यक्तिसभक मानसिकता कतेक बदलल होएतैक से सहजहिँ अनुमान लगाओल जा सकैत अछि । जँ माओवादी जनयुद्ध नहि शुरू भेल रहितैक आ एखन जे मुद्दासभ उठल अछि से नहि उठाओल जइतैक तँ निश्चित अछि जे हमसभ आजुक ई स्वर्णिम वातावरण नहि पबितहुँ । मुदा जनयुद्धक मार्फत मैथिलीसभमे अधिकारक भूख तँ माओवादी जगा देलकैक, मुदा भुखाएलसभकेँ अन्न देखैतदेरी जाहि तरहक कछमछी भऽ सकैत छैक, तकरा व्यवस्थित करबा हेतु कोनो ठोस प्रयत्न कऽ सकबाक अवस्था माओवादीक सेहो नहि छैक । मिथिलामे भेल पहिचानक आन्दोलनक क्रममे आयोजित एकटा पत्रकार–सम्मेलनमे माओवादी नेता बाबुराम भट्टराई बाजल छलाह— ‘मधेशमे जे चेतना जागल छैक तकर वीजारोपण वा गर्भाधान के कएलक ? मधेश आन्दोलनक बाप के ?’ खास कऽकऽ २०४६ सालक परिवर्तनक बादक अवस्थाकेँ देखलापर हमरा जवाबक रूपमे ई कहबामे कनेको द्विविधा नहि होइत अछि जे माओवादी । मुदा एहिठाम ध्यान देबायोग्य बात ई अछि जे कोनो योग्य नागरिकक सम्पूर्ण निर्माणमे बापक वीर्यक भूमिका अत्यन्त न्यून होइत छैक । मुख्य भूमिका रहैत छैक— नओ मासधरि गर्भमे राखिकऽ जन्म देनिहारि आ लालन–पालन कएनिहारि माएक । मुदा दुर्भाग्य, मिथिलासहित देशक अनेको क्षेत्र, जाति, समुदायमे जागल चेतनाक बाप तँ माओवादी बनल, मुदा आब जखन माए बनबाक समय आएल अछि तँ देखा चाही जे ई भूमिका ओ कतेक कुशलतासँ निर्वाह करैत अछि । एहिसँ पहिने मधेशक पार्टी वा सङ्गठनसभ ओहोसभ खालि बाप बनबाक दम्भ मात्र देखा सकल । ई बात खास कऽ मिथिलाक भाषा–संस्कृतिजन्य भावनापर बेरबेर कुठाराघात करैत ओसभ देखा चुकल अछि । जँ मधेशी आन्दोलन/विद्रोह बाप बनबाक अहङ्कारमे मोँछक लड़ाइ नहि बनितए, एकरा समटिकऽ–सहेजिकऽ चलनिहार एकटा माए भेटितैक, तँ आइ अवस्था किछु भिन्न रहितैक । अवस्था तैयो बिगड़ल नहि छैक । सम्पूर्ण मिथिलावासीक मनोबल अखनो ओतबए उच्च छैक । एहि मनोबलकेँ सकारात्मक आ सार्थक परिणामपर अवतरण करएबाक लेल क्रियाशील होएबाक जिम्मेदारी हमरेसभपर अछि । संसद आ सड़कसँ जनआवाज बुलन्द कएनिहारसभ बेर–बेर ई बात दोहराओल करैत छथि जे संविधानसभा सभसँ बेसी मधेशी, दलित एवं जनजातिएक लेल आवश्यक अछि । ओहि आवश्यक संविधानसभा आ तकरा बाद बनल सरकारमे मैथिलसभक उल्लेख्य सहभागिता अछि । तेँ संविधानसभाकेँ अपन हकमे उपयोग करबाक दिशामे सभक क्रियाशीलता आवश्यक अछि । रहि गेल बात सशस्त्र आन्दोलन कएनिहार जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चासभक, हमर विचारमे ओहोसभ राज्यसत्ताकेँ समदर्शीए बनएबाक लेल ई मार्ग अपनौने छथि । जनभावसँ निरपेक्ष राजनीति हुनकोसभक नहि भऽ सकैत छनि । सुदीर्घ राजनीतिक इतिहास समटिकऽ बैसल व्यक्तिसभ एखन क्रियाशील मोर्चासभमे छथि । हुनकासभक आगाँ इहो चुनौती छनि जे हुनकेसभक देखासिखी कतेको अवाञ्छित तत्वसभ मिथिलामे पएर पसारिरहल अछि । ओ तत्वसभ हमरासभक मूल मुद्दाकेँ दरकिनार करबाक लेल जी–जानसँ लागल अछि । एहन अवस्थाकेँ विचारैत सेहो अपनाकेँ जनताप्रति उत्तरदायी बुझनिहारसभकेँ अपना–अपना दिससँ सेहो सहमतिक विन्दु तलाशैत रहबाक चाही । एम्हर अन्य पक्ष सेहो जँ व्यक्तिगत ईर्ष्या–द्वेषसँ उपर उठि जनताक प्रति इमान्दार भऽकऽ आगाँ आबए तँ निश्चित अछि जे सशस्त्र समूहसभ सेहो आमिल पीबिकऽ नहि बैसल रहत । एहि काजमे सरकार आ विशेष कऽ माओवादीक भूमिका विशेष महत्वपूर्ण भऽ सकैत अछि । किएक तँ जेसभ अलग बाट धएने छथि सेसभ अधिकांश माओवादीएसँ बहराएल छथि । जँ माओवादीसभ गम्भीरतासँ ई सोचथि जे जेसभ ओहन विकट–विकराल समयमे सङ्ग छल से आइ किएक अलग भऽ गेल तँ ई समस्या जल्दीए सलटि जाएत । ई विशुद्ध रूपसँ दियाद–वादमे होबऽ वला भावनात्मक प्रहारक कारणे उत्पन्न मतभिन्नता भऽ सकैत अछि । एहिमे अलग विचार रखनिहार दियादक बात सुनिकऽ ओकर सम्मान मात्र कऽ देल जाए तँ जतऽ कतौ ककरो अहंकेँ ठेस लागल होएतैक, से शान्त भऽ जएतैक । शान्तिक जोरक आगाँ केहनो कड़गर हथियारकेँ घमऽ पड़तैक आ घमि जएतैक से हमर दृढ विश्वास अछि । रहल मिथिलाकेँ साकार रूप देबाक बात, तँ एहिमे एतबए कहब— जखन जनजन ई मिथिलाक जागि जेतै भाइ हेतै सोन मढ़ल भोर, राति भागि जेतै भाइ । ३.पद्य ३.१. १.राम नारायण देव २.निमिष झा ३.२. १.अमरेन्द्र यादव २.मनोज मुक्ति ३.३.-१.ज्योति-२.गजेन्द्र ३.४. १. सच्चिदानन्द यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन ३.५. १.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप ३.६. कुमार मनोज कश्यप १.राम नारायण देव २.निमिष झा मिथिला राज्य- राम नारायण देव उठल मधेशी कयल हुँकार लऽके रहत, अप्पन अधिकार जन जनकेँ, एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्य अप्पन भाष, अप्पन सँस्कृति अप्पन अर्थनीति, अप्पन राजनीति मधेशी आन्दोलनक यैह सन्देश अप्पन बात, अप्पन परिवेश निरँकुश राजतन्त्रक भेल अवसान भेंटल लोकतन्त्रक बरदान मेची—महाकाली उमडिगेल अछि राज्यशक्ति मुकिगेल अछि उठू बन्धू, उठाउ तरवार भगाउ सामन्ती राजदरवार गठन करु गणतन्त्रक सरकार करु राज्यक पुर्नसँरचना समावेसी लोकतन्त्र आ समानुपातिक कल्पना अप्पन विकार, अप्पन विचार आव कियो नहि रहत, शिक्षित वेरोजगार छोडू आपसी मेल, करु विकासक मात्र खेल उखाडि फेकू, राजाक ताज तखन भेटत अप्पन स्वराज जन—जनके एके आवाज सबहक माँग, मिथिला राज्य । जीवन एकटा दुरुह कविता निमिष झा अर्थहीन शब्दक अर्थ खोजबाक अभिलिप्सामे अनायास थमि जाइत अछि आँखि फाड़ि दैति छियै पन्नाक पन्ना चेतनाक शब्दकोश आ भोगैत छी एकटा पराजयक थकान जतय नहि भेटैत छै जीवनक यर्थाथक अर्थ आ ताएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा दुरुह कविता छै । बजैत छै लयात्मक गीत जीवनक मधुर सङ्गीत आ छम...छम...कऽ नचैत सङ्गीतसँग असंख्य कलात्मक पायर आ प्रस्फुटित भऽ जाइत छै जीवन उपवनमे मुदा अनायास फेर बन्द भऽ जाइत छै सङ्गीतक धुन थाकि जाइत छै पायर मुरझा जाइत छै उपवनक फूल आ ताएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा सारहीन सङ्गीत छै । आन्नद छै माछ जकाँ जीवन सरोवरमे हेलब उल्लास छै एकटा गुड्डी जकाँ आकाशमे उड़ब मुदा उड़ि नहि सकैत अछि हमर आल्हादित मोन आ अनायास उल्लासक धरातलसँ दुर्गतिक चट्टान पर अनवरत खसैत छै मोन आ डुबि जाइत छै सरोवरमे आ ताएँ बुझाइत अछि गुड्डी जकाँ उड़ि नहि सकबाक आ माछ जकाँ हेलि नहि सकबाक नियतिक भोग छै जीवन । हाइकु निमिष झा १)गरम देह छिछैल गेल मोन अमृत–वर्षा । २)रामनवमी एलै एहू बेर मुदा राम नै । ३)नै छै उत्साह कुचाग्रक छुवन ई शरीरमेँ । ४)अपन पीडा आँचरिमे नुकबै हमर माय । ५)छाह खोजैछ ग्ााछ काटि काटिकऽ सभ्य मानव । ६)प्ाावस राति गवै उन्मुक्त मोन विरह गीत । ७)नकली हँसी कुटील व्यवहार आजुक छौडी । (१) पीयर पात पतझरक बाद तुत्छ होइछ । (२) लोचन नीर नहि बुझै जगत बहैछ स्फूर्त । (३) प्रेमक द्वारि बन्द भऽ जाइत छै स्वार्थक आगू । (४) खुलल वेणी पियाक प्रतीक्षामे खुल्ले रहलै । (५) हम भ्रमर नोचि देलियै फूल विजेता बनि । (६) पावस राति गवै उन्मुक्त मोन विरह गीत । (७) अन्तर नहि कागज आ हृदय जखन फटै । असमर्पित उन्माद-निमिष झा अहाँक वएह नयन, वएह मोन आ वएह तन हम देखिरहल छी, सुनिरहल छी आ भोगिरहल छी समयक लम्बा अन्तरालक बाद सेहो आँखि खोलैत आ मिचैत सेहो आ अहाँ हमर शरीरक अदृश्य सरित प्रवाहमे सर्वाङ्घ समाहित छी, सज्जित छी । ई अभीष्ट रूप अहीँक थिक जकर अनुपस्थितिमे हमर चित्त शुष्क सिकतातुल्य भङ्ग गेल अछि ई शीतल छाहरि अहीँक थिक जकर अभावमे हरेक निमिष हमरा लेल नीरस आ उदास वसन्त बनि गेल अछि । अहाँ पाइन छी हमर पियासक अहाँ वसन्त छी हमर बसातक तएँ एकटा अतृप्त उन्माद नाचि रहल अछि भैरव बनि हमर मानसमे । हमर स्नायुक रोबरोबमे एकटा विषाक्त तृष्णा बहिरहल अछि आ बहिरहल अछि हमर धमनीक कणकणमे एकटा उन्मुक्त तृषा । बहुत बेर उघारि दलियै, फाडि देलियै नृशंस बनि आवेशसँ लज्जाक पर्दासभ आ बन्द क' देलियै नैतिक मूल्यसँ पाशविक उन्मादसभ । हँ आईयो ओहिना स्मृतिमे लटपटायल अछि अहाँक गरम साँसमे गुञ्जित हमर जीवन संगीत अहाँक आँचरिमे ओझरायल हमर सर्टक बट्टम अनार जकाँ अहाँक दाँत पर पिछरैत हमर जीह अहाँक ब्लाउजक हुकसँ खेलैत हमर दसो आँगुर आ अहाँक सुन्दर छाल पर दौडैत हमर ठोर । तथापि किएक नहि मिझाइत अछि छातिक ई उन्मत्त मोमबत्ति किएक निष्काम नहि होइत अछि मोनक उत्तप्त बोखारसभ जेना अहाँ दारुक प्याला होई आ हम चुस्की ल' रहल छी मदहोस भ' रहल छी अहाँक स्वप्निल लज्जानत तनमे निमिष निमिषमे । मुदा उफ ई केहन विडम्बना नित्यशः एक्केटा विन्दू पर दुर्घटना होइत गेल हमर उच्छृङ्खल वासनासभ अहाँक दर्शन आ सिद्धान्तक शिखरसँ नितदिन एक्के रस्ता घुरि जाइत छल अभिशप्त अहाँक विचार हमर अभिशून्य मस्तिष्कके झकझोरैत छल । शायद कमजोरी हमरा मे छल कि, गिद्ध बनि हम युद्ध नहि क' सकलौं अहाँक तनसँ शायद महानता अहाँक छल माला बनि अहाँ समर्पित नहि भ' सकलौं हमर गलासँ । १.अमरेन्द्र यादव २.मनोज मुक्ति कल्पना आ यथार्थ- अमरेन्द्र यादव- दिघवा, सप्तरी । जिनगीक हड़हड़ खटखटसँ दूर मृत्युक तगेदासँ अन्जान बनल जिनगीक अति व्यस्त समयसँ किछ पलखति चोराकऽ अहाँक यादक उडनखटोलामे उडि जाइ छी हम प्रेमक अन्तरिक्षमे । नदीक ओहि पार दू गछिया तऽर हमर कोरामे औङ्गठल हमरासँग हँसैत बजैत खाइत छी अहाँ सप्पत खाइत छी हमहूँ सप्पत अहाँक तरहत्थीकेँ चुमिकऽ खोसि दैत छी हम एकटा गेनाक फूल अहाँक खोपामे । तखने हमर नाकमे अचानक ढकैत अछि जरल तरकारीक गन्ध आ अकचकाइत उठैत छी हम मिझबय लेल स्टोभ तखने हमर नजरि पडैत अछि टेबुलपर राखल चिठीपर जे काल्हिए एलै हमर गामसँ आ हमर आगा नाचय लगैत अछि भरना लागल खेत बाबुक फाटल बेमाय बहिनक कुमारि सिँथ भायक पढाइ खर्च आ मायक दम्मा बेमारी । हमर मैथिली-अमरेन्द्र यादव डाक्टर चन्देश्वरजी, अहाँक बाबुजी पियौने हेथिन्ह उठौना दूध अहाँकेँ पोसने हेथिन्ह भाड़ापरक माए लेकिन हमरा नओ महिनाधरि गर्भमे मैथिलीए केलखिन्ह सम्हार सोइरी घरमे सेहो मैथिलीए केलखिन्ह दुलार हम कनियाँक स्पर्श विना जीबि सकैत छी हस्थमैथुनक उत्कर्ष विना जीबि सकैत छी लेकिन मैथिलीक आकाश विना नहि मैथिलीक श्वासप्रश्वास विना नहि डाक्टर चन्देश्वरजी, हमर खाँडो, खुट्टी आ बलानमे बहै हइ मैथिली । हमर दिनाभदरी आ सलहेशक दलानमे रहै हइ मैथिली । स्मिताक लडाई- मनोज मुक्ति पशुपतिनाथक देशमे होइछ व्यभिचार सब भेषमे आन ठाम त बाते छोडू अबुह लगैया अपनो देशमे । प्रकृतिक देल ई आँखि,कान ओ बडका नाक आब दुष्मन प्रतित होइया सँसारमे अपन अलग छाप छोडने मिथिलावासी,डरपोकक हूलमे सरिक होइया । अपना समस्त अधिकार सऽभसँ बन्चित होइतो,बँचल छी काइल्हुक आशामे भ्रष्ट प्रशासन ओ नेताक लोभ सँ, जकडा रहल अछि देश, विदेशीक पाशामे । एतेक कठीन आ दूर्लभ मनुष्यक जीवन पाओल स्वर्ग समान एही मिथिलामे मूदा लगैछ जे जन्मजाते अभागल थिकहुँ जे दूर्दशा होइत देखैछी, मिथिलाके अपन आगामे । सम्पूर्ण श्रृँगार सँ सुशोभित जगतक माय ओ विलक्षणा सीता आई घरसँ निकालल जाऽरहल अछि मिथिलावासी एम्हर ओम्हरक वात सुनैत, घरक एकटा कोनामे बहादुरी देखाबि रहल अछि । भऽरहल अछि सस्ता रँग सँ शोणीत जाहिसँ सब छथि नहाएल कतेक दिन सऽब चुप्पे रहतै, बैसतइ एना नुकाएल? ताहि सँ, एहि स्मिताक लडाईमे बचने मात्र सँ काज नई चलत सम्पूर्ण मैथिलमे नव चेतना भरैत, सबके लडहिटा पडत । १.ज्योति२.गजेन्द्र जाड़ आयल-ज्योति जाड़ आयल अछि बदरीक संग धुन्धक कुहराम सऽसब अछि तंग दृष्टिक सीमा छोट़ धूमिल सब रंग शीतलहरी अपन धुनमे अछि मतंग सूर्यक निष्ठुरता देखि सब अछि दंग कियैक नहिं करैत अछि शीतक गर्व भंग बुच्ची सबके छैन माघ नहायक पारी गाँती बन्हने बच्चा करैत स्कूलक तैयारी संघर्षरत नवयुवक सबहक के करै पुछारी चायक चुस्की लैत छैन चौक पर बैसारी कनिके देर मे करता सायकिल के सवारी नहिं तऽ पकड़ता कॉलेज दिसका टायर गाडी दलानपर घूर लागल लोकक जुटान भेल कोन साल बेसी जाड़ छल से बखान भेल देश विदेशक समाचार शान्त भऽ सुनल गेल जखन गीतक कार्यक्रम रेडियो पर आरंभ भेल विचारक आदान प्रदान फेर सऽ प्रारंभ भेल भोजनक समय जानि सभाक समापन भेल पुरोहित- गजेन्द्र ठाकुर लघु उद्योगक पुरोहितक घर जेना राजा सभक, दारू पीबि मँतल, मुदा सरकारक छन्हि जिद्द, लघु उद्योगकेँ करताह समृद्ध, लघु उद्योगकेँ वा लघु उद्योगक पुरोहितकेँ, बना कय कम्पनी, लए सरकारी ऋण, बन्द करथि कम्पनी, कम्पनी मालिक नहि, निदेशक छी हम, कम्पनीकेँ होइछ घाटा तँ मजदूर छथि मरैत, नहि किछु होइछ निदेशकक, कम्पनी अछि मरैत। अर्थशास्त्र बनबैत अछि कम्पनीकेँ मनुक्ख, आऽ मनुक्ख बनैछ कनमुँह। वेश्यावृत्तिक संसार आब नर्तकीक घर नहि, गेल अछि पैसि राजनीति, धननीति आऽ पर्यटननीतिम्र्, आम्रपाली पहिरि चश्मा करैत छथि चालन वाहनक, नायक मृच्छकटिकक, होटल व्यवसायी, नव जाति व्यवस्थाक पुरोहित, आम्रपाली बनलि अनुलोम व्यवस्थाक शकुन्तला, मुदा गाम एखनो वैह, विधवा, दलित, गरीबीक खेरहा सैह। पीयर आऽ लाल होइत चौबटियाक बत्ती सभ, लुधकैत, गाड़ीक शीसा पोछैत, अखबार पत्रिका बेचैत, नव जाति-व्यवस्थाक दलित, बचिया-बच्चा सभक पाँती। कोरामे बच्चा लेने युवा भिखमंगनी, निरीह आँखि, पैर खञ्जित, खञ्जित पएरे बढ़ैत आगाँ। मुदा भने ओहि चौबटियापर शानसँ भीख मँगैत अछि बालगोविनक झुण्ड, भीख नहि आशिरवादी, पाइ देलहुँ तँ ठीक नहि तँ गारिक प्रसादी। औद्योगिक क्षेत्रमे सेहो कोयलाक भट्ठीक धुँआसँ कारी भूत भेल श्रमिक ईहो छथि नव जाति व्यवस्थाक दलित। घृणाक आस्वाद घृणामे आस्वाद संवादक अन्त मतवैभन्यक प्रारम्भ दिल्ली-मुम्बईक हाट, तरकारी माँछक बजार, होटलक बनथि भनसिया, पुत्र-पुत्रीक विवाह दानोमे जाति गौण, विधवा-विवाह क्षम्य, मुदा जखन यैह सभ घुरैत छथि गाम, नील-टीनोपाल दए नव व्यवस्थाक दलित, बनि जाइत छथि पुरातन व्यवस्थाक पथिक, तरकारी बेचनिहार जयबार, औद्योगिक क्षेत्रक कारी मुरुत, साबुनसँ रगड़ि चाम, भए जाथि गामक भलमानुष, होटलक भनसिया भऽ जाइत छथि सोइत, सरदारजीक मोहर्रिर कयस्थ, पासवानजी भऽ जाइत छथि दलित, घुरैत काल ट्रेनहिमे फेर सभ मिलि नव व्यवस्थाक आऽ पुरातनक करथि मेल। ट्रेन अछि साक्षी एहि मनसि द्वैधक अमूर्त व्यवस्थाक धँसल आँखिक, उजड़ा नूआक व्यथाक, युवा विधवाक, आम्रपालीक आऽ मृच्छकटिक नायक चारुदत्तक, आऽ बसन्तसेनाक। १. सच्चिदानन्द यादव २. विनीत उत्पल ३.जितमोहन आई हम ठाढ़ भेल छी- सच्चिदानन्द यादव,रायपुर– ६, सप्तरी आई हम ठाढ़ भेल छी चौबटियापर नइँ, बाट तऽ एक्केटा छै मुदा ओकरा रुकय पडतै जे हमरा एतय अनलकै हम ठाढ़ भेल छी ठीक ओहिना जेना कपड़ाक दोकानमे पुतरा सभदिन नव नव पहिरनमे ठाढ़ भेल रहै छै आ, किनयबला देखै छै उन्टापुन्टाकऽ । ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक। हम पुछैत छी इतिहास साक्षी अछि आय धरि हम अहां स कोनो सवाल नहि पुछलहुं कोनो गप नहि बुझलहुं मुदा, समय एतेक बदलि गेल जाहि सं हम पुछैत छी नहि त जे रहत तटस्थ समय लिखत हुनको इतिहास जन्म सं मृत्यु धरि संस्कार आ समाजिकताक बंधन स लोकवेद क जकड़हि छी किया, हम पुछैत छी हम पुछैत छी, सबकए अपन तरहै जिबाक छैक अधिकार तखन अपन कर्तव्य बिसरि कए दोसरक अधिकारक हनन किया हम पुछैत छी, अंगरेज चलि गेल मुदा, अंगरेजियत लबादा किया अछि किया अछि क्लासक पढ़ईक सिस्टम जिनका जे नीक लगिते ओ से विषय पढ़िते हम पुछैत छी, नेना स जीवनक लक्ष्य निर्धारित किया नहि होइत छैक समयक पाछु किया हम चलैत छी समयक आगू चलैक मे कोन तकलीफ़ हम पुछैत छी, सूर्य सेहो उगैक काल बदलैत रहैत अछि तखन हम अपन सुतबाक, उठबाक आ खाईके समय किय निर्धारित करैत छी किया निर्धारित होइत अछि आफ़िसक टाइम हम पुछैत छी, गाम-घरक लोक अपन गाम आ अपन जिलाक आगूक दुनिया किया नहि देखैत अछि जखन कि चिड़ैय-चुनमुन कतय नहि जाइत अछि हम पुछैत छी, अठारह साल मे जकरा देशक नेता चुनैक सूझ छैक ओ अपन करियर आ अपन भविष्यक सूझ किया नहि रखैत अछि हम पुछैत छी, रामायण आ महाभारत अहि ठाम लिखल गेल एकरा मे जतेक खिस्सा छैक ओकरा स बाहर किछु नहि भ रहल छैक तखन आश्चर्य किया होइत अछि हम पुछैत छी, ई देशक नेता चुनावक काल मे सेवा करैक शपथ खाइयै मुदा, समय बीतलाह पर देश कए खाइयै तखन हिनका लेल अहां तामस किया नहि फ़ूठैत अछि हम पुछैत छी, जति आ धर्म, गोरि आ कारि जखन भारत स ल कए अमेरिका तक झगड़ाक कारण छैक तखन एकरा खत्म करबा लेल अहांक खून ठंडा किया परि जाइत अछि हम पुछैत छी, दुनियाक शांति लेल पूरा दुनिया एक छैक मुदा, घरक शांति लेल हम किछु नहि करैत छी हम पुछैत छी, दुनिया मे बेरोजगारी महामारिक रूप धरि रहल अछि मुदा, अपन रोजगार खोलबाक लेल जर किया भो जाइत अछि हम पुछैत छी, बाढ़ि आ सूखाढ़ से छी त्रस्त दू सांझक रोटीक जुगाड़ लेल छी पस्त तखन ई शासन कए बदलबाक लेल अहां कए वोट देबा मे दिक्कत की होइत अछि हम पुछैत छी, चोरी-लूटपाट होइत अछि रोज पुलिस करि रहैत अछि अपराधिक खोज तखन अहि सब से सचेत हेबाक मे किया नहि रहैत अछि आहंक होश हम उत्पल जाति-धर्म-भेदभाव से उपर उठि कए पुछैत छी अहांक अपन व्यवहार अहांक अपन आचार अहांक अपन जति अहांक अपन धर्म अहांक अपन स्थान अहांक अपन कर्म अहांक अपन पेशा अहां कए जे लागैत अछि गलत ओकरा बदलहि मे की होइत अछि मुदा, अहि ठाम करैत छी घोषणा जखैन धरि अहां अपनै नहि बदलब ताहि धरि नहि बदलत समाज नहि बदलत राष्ट्र नहि बदलत दुनिया. जितमोहन झा घरक नाम "जितू" जन्मतिथि ०२/०३/१९८५ भेल, श्री बैद्यनाथ झा आ श्रीमति शांति देवी केँ सभ स छोट (द्वितीय) सुपूत्र। स्व.रामेश्वर झा पितामह आ स्व.शोभाकांत झा मातृमह। गाम-बनगाँव, सहरसा जिला। एखन मुम्बईमे एक लिमिटेड कंपनी में पद्स्थापित।रुचि : अध्ययन आ लेखन खास कs मैथिली ।पसंद : हर मिथिलावासी के पसंद पान, माखन, और माछ हमरो पसंद अछि। जखन जनता जागि जाइत अछि ! मुम्बईकेँ अपन कहै वला नज़र कियेक नञि आबैत छथि ! मुम्बईक दुश्मन सभ सँ ओ कियेक नञि टकराबैत छथि !! की ताज, ओबेराय, मरीन हाउस, मुम्बई मs नञि अछि ! या फेर मुम्बईक ठेकेदार अपन मौत सँ घबराबैत छथि !! दोसर प्रान्तक कहीकेँ अपने सभ लोग कs मारैत छथि ! दोसरे प्रान्तक लोग सभ मुम्बई पर जान लुटाबैत छथि !! अपने देशक लोग जखन रहैत छैथ तिनका केँ तरहे ! ओ कनियोटा वारसँ लकड़ीक तरह टुईट कs बीखैर जाइत छथि !! शर्मो नञि आबैत छैन अपन देशक निकम्मा नेता कs ! बजैत छला की पैघ-पैघ शहर मs छोट-मोट हादसा होयते रहैत अछि !! मुम्बईक जंगमे शहीद तँ बहुत जवान भेला मगर ! शहर मे खाली चंद शहीदक फोटो लगायल जैत अछि !! जे दुश्मन हमरा देश पर करैत अछि छुप - छुप कs वार ! हमर नेतागन ओकरा कs दावत पर इज्जत सँ बजाबैत छैथ !! सुइन लिय सभ नेतागन जखन जनता जैग जैत अछि ! तखन कुर्सी खुद - ब - खुद निचा भैग जैत अछि !! १.पंकज पराशर, २.भवनाथ दीपक ३.मयानन्द्र मिश्र ४.सूर्यनाथ गोप डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। इतिहास फिल्म निर्माणमे सहयोग कयनिहारक सूचीसँ जे गायब अछि- डमी के रूपमे मारि खाइत चक्कू आ गोलीसँ वास्तविक रूपेँ प्रहार सहैत अभिनेत्री संग-संग दर्जनो भरि छौंड़ी सब जे सुर आ अंगक समन्वित प्रदर्शनमे रहैत अछि अपस्याँत तकरा सबहक स्थान कतय अछि रजत पटक इतिहासमे? नायक केर नेनपनक संगी बनबाक निमित्त जे आयल छल नेना सबहक झुंड रजत पटपर आइ कतय छथि ओ लोकनि? भरि-भरि राति जागि कए जे बनौने छल अभिनेत्रीक परिधान एकसँ एक कर्णप्रिय गीतमे बाजा बजौनिहार वादक सब कतय अछि आइ सिनेमाक इतिहासमे? २. खबरि बनौनिहारसँ लिखनिहार धरिक नाम अछि अखबारमे मुदा कतहु नहि अछि ओकर सबहक नाम जे छापलक भरि राति जागि कए उघलक माथपर खबरिक बोझ आ पहुँचेलक जे घरे-घर, हाथे-हाथ दुनिया भरिक दार्शनिक सबहक सुदर्शन पोथीक लेल जे लोकनि कयलनि अपन हाथ आ स्वास्थ्यक नाश, जाकिर हुसैनक तबलाक लेल जे हाथ सानलक माटि आ गढ़लक अपन अँगुरीसँ तालजन्मा आकृति तकर कतय उल्लेख अछि संगीतक इतिहासमे? मकबूल फिदा हुसेनक लेल ले बनेलक कूँची-ब्रश बनेलक अनेक तरहक रंग ओकरा सबहक स्थान कतय अछि करोड़ो टाकामे नीलाम होइत पेंटिंक केर इतिहासमे? ई सब अनुल्लेखनीय व्यक्ति सब जीवित छथि जेना जन्म-जन्म के क्षुधित करौट लागल अपमानित होइत इतिहास नियन्ता द्वारा ...से कहैत छी भाइ तखन मुइल लोकक इतिहासक कथे कोन? विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (कन्याकुमारीमे महासागरक मिलन देखैत) एतय जमीन केर अन्त भऽ गेल अछि आ अनन्त जलराशिक फेनिल उर्मि-यात्रामे संग भऽ गेल छथि अस्ताचलगामी सूर्य हमरा मोनक आकाशमे झमारल कमलामे, कोशीमे, बागमती आ गंडकमे कोनो माघ कोनो कातिकक पूर्णिमा आ संक्रांतिमे स्नान-दान, कल्पवास कयनिहार स्वर्गाकांक्षी हमर पूर्वज सबहक देहगंधी जल आइ कतय, कोन अवस्थामे अछि समुद्र? हुनका लोकनिक अस्थिपुष्प अहाँक कोन कोषमे अछि ओ करुण प्रार्थना? आ ओ आकुल हाक कोन तरंगमे निबद्ध अछि हवा? युद्धमे हत मनुक्ख आ अश्व-गज केर प्राणांतक स्वर जे तलवारक टंकारमे मिज्झर होइत कालक प्रवाह बदलैत छल दलमलित गाम सबहक नोरक टघार जहिया नदीक धार बनल तँ कतेक बढ़ल छल अहाँक अश्रुगंधी नोनक भंडार आ हाहाकारी आवाज? अशेष जलराशिसँ पूरित पृथ्वीक आन-आन भागमे बसल लोकसँ परिचयक लेल कोलंबसी सफलतासँ पूर्व जे नाविक समा गेलाह अहाँक विशाल उदरमे तिनका सबहक असफल यात्राक कलपल स्वर आइ कोन अवस्थामे बाँचल अछि समुद्र? विश्व विजय केर निमित्त अश्वमेधक सरंजाम जुटबैत मनुक्खक निश्चित मृत्युक लेल हथियारी पुष्टिमार्गक निर्माता सिकंदरी आकांक्षाकेँ सभ्यताक संघर्षमे निबद्ध कऽ रहल अछि कहियो ईश्वर केर मृत्युक जे लोकनि कयनेँ छलाह घोषणा आइ इतिहासक अंत के कऽ रहल छथि पुष्टि पुष्टिमार्गक अंतवादी उत्तर-आधुनिक सिकंदर सबहक खरहू अश्वमेधी वांछाक लेल निट्ठाह नरमेधी अभियानकेँ नाम देलक अछि- ईश्वरीय आदेशक पालन प्रलय-कालक इतिहास-पुरुष समुद्र हमरा कहू कतेक वर्खसँ कतेक सभ्यता कतेक संस्कृति आ कतेक साम्राज्यक प्रत्यक्ष गवाह अहाँ कतेक रास सिकन्दर सबहक देखनेँ छी इतिहास! मनुक्खक प्राण लैत मनुक्ख सभ्य बनैत नगर बसबैत सिकन्दर बनैत बनबैत रहल अछि पृथ्वीपर इतिहासक अन्हार-घर जतय कलपैत स्त्रीगणक नोरक टघार अहाँकेँ घीचैत रहल कलिंगसँ तुगलक आ नादिरशाही धरि रक्त-रंजित सभ्यताक नोनछाह समुद्र हमरा इतिहासक कारागारसँ क्यो निरन्तर हाक दऽ रहल अछि इतिहासक कतेक रास हाक अहाँक हृदयमे हाहाकार बनल बेटाक लहासपर खसैत माय पतिक लहासपर खसैत सैनिक सबहक स्त्रीक वेदना समाहित कएनेँ अहाँक खसैत आबि रहल छी लहरि बनि कऽ कइक सदीसँ कटल गाछ जकाँ कइक शताब्दीसँ हमरा क्यो हाक दऽ रहल अछि अत्यंत आकुल स्वरमे बेर-बेर क्यो हमरा सोर कऽ रहल अछि कहबाक लेल मोनक व्यथा मुद्रा आ मोंछक कारणसँ मेटायल अनेक इतिहासक कथा हमरा कहबाक लेल कतेक दिनसँ कतेक रास हाक हमरा सोर कऽ रहल अछि साक्षी छथि आइ अस्ताचलगामी सूर्य आ स्वयं अहाँ समुद्र हम आइ सुनि रहल छी कइक सदीक सबटा हाक सभ्यताक सबटा मर्मांतक पुकार अभियान गीत-भवनाथ ‘दीपक’ उठह, उठह, उठह चलह, चलह, भलह बढह, बढह, बढह घरक भेदभाव बूझि शत्रु आबि गेल बुझा दियौक आन सँग एक बुद्धि भेल विश्व मंच मध्य हम उचित जगह लेल विशद विविध भेष हरित भरित देश जाति–पाँति वर्ण धर्म भेद–भाव हीन राज–पाट कर्म काज सब अपन अधीन श्रमिक कृषक बुद्धिजीव, उद्यमी उदार ग्रथित एक सूत्र मध्य व्यक्ति शत प्रकार भुक्ति मुक्ति हेतु वृत्त आइ एकताक सेतु जनैत हित मिलैत माँटि के सकत अनेर डाँटि ! सब प्रबुद्ध, सब सचेत पैर पाछु क्यो न देत देखाय देत शत्रुकेँ भैरवक स्वरुप के अलच्छ निन्दमे रहत भसैत चूप ? तिर्हुतिक माटिपर रहनिहार भाइ ! जन्म भूमि प्राण हेतु ठाढ हुअह आइ लाख–लाख कोटि–कोटि केर प्रयाण के कहैछ, मैंथिलीक पुत्र अल्पप्राण ? लक्ष्य चीन्हि–लेल आब निधि चीन्हि लेल शत्रु–मित्र केर भेद–विधि चीन्हि लेल उठह, उठह, उठह चलह, चलह, चलह बढह, बढह, बढह.....। अहाँ की छी—मयानन्द मिश्र अहाँ प्रलोभनक नाक काट’बला मर्यादा नञि छी नग्नताकेँ आवरण दैबला नञि छी सँतुलन राख’बला ट्रैफिक गाइड जकाँ चौबटियापर ठाढ दुनू हाथ उठौने अहिँसा नञि छी । अहाँ छी कोडोपैरीन खा–खा कऽ तत्काल अपन मथदुखी केँ दबबऽ बला क्षुब्ध हिमालय । अहाँ छी अपन खण्डित रसनाकेँ दाबि चुपचाप कान’बला सिन्धु । वस्तुतः अहाँ छी एकटा बिन्दु जाहिठामसँ अनेक रेखा तँ खीचल जा सकैछ किन्तु ओ सबटा दुर्जेय चट्टानक कोनो विराट अन्हार गुफाक अंतहीन घाटीमे जा क’ समाप्त भ’ जाइत अछि सरिपहुँ ई प्रश्न अछि जे अहाँ की छी? आत्मा–डाक्टर सुर्यनाथ गोप,दिघवा, सप्तरी मैथिलीकेँ बेचिकऽ पैन्ट सर्टपर टाईकोट कसिकऽ माथपर ढाका टोपी चढाकऽ बगलमे भारतीय दुतावासक झोरा लटकाकऽ एहि युगक सभसँ बडका विसंगति– डाक्टर सुर्यनाथ गोप एक हाथमे पासपोर्ट–भिसा मुठियबैत दोसर हाथमे हिन्दीक झण्डा फहरबैत हिनहिनाईत गिनगिनाईत जारहल छथि मौरिसस अन्तर्राष्ट्रिय हिन्दी सम्मेलनमे । कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। गजल धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि। अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि । आहत मोनक घायल तड़पन, पेᆬरो आई कनाबऽ आयल। जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह के ताकि रहल छि। दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये बनला । याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छि। बगबाहो अपनहिं हाथें, आई कलम-बाग सभ जारऽ आयल। तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि। बिसरि गेल जे याद छलै, से सपना कियैक याद दियौलक? नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि। निकलि गेलहुँ आछ सुन्न राह पर, अन्हारेक टा सम्बल केवल। अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि। अन्हार- अशोक हेगड़े कन्नड़मे तीन टा कथा संग्रह आ एकटा उपन्यास। प्रशिक्षणसँ अर्थशास्त्री आऽ व्यवसायसँ वित्त प्रबम्धक श्री हेगड़े अपन दोसर उपन्यासपर कार्य कऽ रहल छथि। अनुवाद कमलाकर भट्ट (कन्नड़सँ अग्रेजी)- श्री भट्टक अनुवादक अतिरिक्त मूल कन्नड़ कविता संग्रह सेहो प्रकाशित छन्हि जकरा २००६ ई.क पुटीणा कविता पुरस्कार भेटि चुकल अछि। आऽ गजेन्द्र ठाकुर (अग्रेजीसँ मैथिली)। कोनो दिन एना शुरू नहि हेबाक चाही, ओकरा सभदिन लगैत छैक। आऽ एकटा आर एहने दिनक प्रारम्भ भेल, प्ररम्भ होएबासँ पहिने हड़बड़-दड़बड़मे कार्य सभ। दूधबला दूध नहि दऽ गेल से ओ बगलमे धरफड़ीमे गेलाह पैकेट बला दूध अनबाक लेल। कमोडपर बैसल ओऽ भोरुका अखबारक सम्पूर्ण रिपोर्ट पढ़लन्हि निकृष्ट भ्रष्टाचारी आऽ हुनकर संगी सभक विषयमे। एकटा विज्ञापन छल जाहिमे एकटा फिल्म अभिनेताक हालमे जनमल बच्चाक नामक सुझाव दऽ कऽ पुरस्कार जितबाक प्रेरणा छल। एहि सभ जल्दीबाजीमे ओऽ अपन पुत्रकेँ नहेलक आऽ ब्लैकबेरीपर किछु कार्य सम्पन्न केलक, जलखै सोझाँ छल आऽ आब एतेक थाकि गेल जे बजबाक इच्छो धरि नहि रहलैक। ओकर पत्नी कहलकाइक जे माँक फोन आयल रहए गप कए लिअन्हु। माँ पुछि रहल छलीह जे ई सभ छुट्टीमे गाम अएताह की? ओकरा आब एतेक धैर्य नहि बचलैक जे ओ माँसँ गप करि सकितए। मनोहर कनियासँ झझकारि कए बाजल- “उत्तर हमरे द्वारा देब जरूरी अछि। फोनपर अहाँ गप नहि सम्हारि सकैत छलहुँ?” कनियाँ सिन्कमे अपन हाथ धो रहल छलीह, “आइ काल्हि अहाँक संग की भऽ रहल अछि? अहाँसँ अहाँक बिनु हमरापर गुम्हरेने गप नहि कऽ सकैत छी? अहाँ आऽ अहाँ माय..हम किएक बीचमे आऊ? मोन अछि तँ हुनका फोन करू नहि तँ नहि करू। हम काजपर जेबामे देरी भऽ रहल छी”। पत्नी ओकरा जलखै करैत छोड़ि ऑफिस बिदा भऽ गेलीह। जहिना ओऽ रोड धेलक तँ कनेक घुरमी अएलैक। एफ.एम.पर सुनयना रूट वन होस्ट कऽ रहल छलीह आऽ बड़बड़ा रहल छलीह। तरह-तरहक विज्ञापन, फोनक एनाइ, ई गीत हमरा भाए लेल बजाऊ, ओऽ गीत हमर प्रेमी लेल, ओतेक छुन्दर-मुन्दर माधुरीक तेसर बच्चाक नाम बताऊ, फोरम मालपर सलमान खानक संग आइसक्रीम खएबाक मौका जीतू.. ओकर घुरमी बढ़ि गेलैक। रेडियो बन्न कऽ ओ बाहर देखलक, ट्रैफिक जाम, धुँआ, गरदा, यातायात पुलिस सीटी बजबैत...पिरररर्र, भीतर घुसैत गाड़ी सभ द्वारा अवहेलना सहैत, सभ दस गजपर लाल-बत्ती, बी.टी.एस.बस सभ दौगैत भगवाने जानथि कतएसँ आऽ कोना कए, स्कूटर, रिक्शा, साइकिल, लॉरी, आऽ एहि सभक बीच बूढ़ बरद सभ पुरजोड़ लगा कए भरल कटही गाड़ीकेँ घीचैत, लोक सभ लहराइत पैसैत अबैत.. ओऽ ई सभ खौँझाहटि नहि बरदास्त कए सकल। डॉ वी.वी.बी.रामाराव (१९३८- ) हिनकर ३४ टा रचना प्रकाशित छन्हि जाहिमे मौलिक अंग्रेजी आऽ तेलुगु रचना सम्मिलित अछि। अनुवाद मूल लेखक द्वारा तेलुगुसँ अग्रेजी आऽ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अंग्रेजीसँ मैथिली। अभाग शीतलहरि सरसरा कए बहि रहल छल। घटाटोप बरखा धमगिज्जर मचेने छल। बिर्रोक बाद। ई बीच रातिक बादक पहरि छल। घुप्प अन्हरियामे हमर माथक ऊपरका करवस्त्र कोनो सुरक्षा नहि छल। कपड़ा बड्ड अबाज कए रहल रहए आऽ हम सुन्न सड़कपर संघर्ष कए आगाँ बढ़ि रहल छलहुँ। सड़कक स्ट्रीट लाइट काज नहि कए रहल छल। हम अपन कोठली कोनहुना पहुँचलहुँ मुदा ओतए ताला हथोड़िया देलासँ नहि भेटल। हमर थाकल हृदयसँ बान्हल मुट्ठी एड्रीनेलिनक प्रवाह केलक आऽ हम शीत घामसँ नहा गेलहुँ। हम केवाड़ीकेँ धक्का देलहुँ आऽ किएक तँ ई भीतरसँ बन्न नहि छल से कर्रसँ खुजल। हम भीतर गेलहुँ आऽ बत्ती जरेलहुँ। आश्चर्य, बत्ती प्रवासँ जरल। चलू कमसँ कम ई तँ बचल, हम निशास लेलहुँ। सरोजिनी साहूक ओड़िया कथा “दुःख अपरिमित” केर मैथिली अनुवाद गोपा नायक (ओड़ियासँ अंग्रेजी) आऽ गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली) द्वारा। सरोजिनी साहू (१९५६- ), ओड़िया साहित्यमे पी.एच.डी., बेलपहाड़, झारसुगुड़ा, उड़ीसामे अध्यापन। महिला साहित्यक अग्रणी लेखिका, पाँच टा उपन्यास आऽ सात टा कथा संग्रह प्रकाशित। १९९२ मे झंकार पुरस्कार आऽ १९९३ मे उड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार। गोपा नायकक जन्म भुवनेश्वरमे भेलन्हि आऽ ओतहि आरम्भिक जीवन बितलन्हि। सम्प्रति ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयसँ डी.फिल. कए रहल छथि। दुःख अपरिमित कथाक शीर्षक दुःख अपरिमित उड़ीसाक सन्त आऽ कवि भीमा भोइक ऋचासँ लेल गेल अछि। प्राणीर अरात दुःख अपरिमित जानु जानु केबा साहु ये जीवन पाछे नरके पदिथौ जगत उधार हेउ जीवनक दुख जीनाइ, काटनाइ, सहनाइ, किएक? हमरा जरए दिअ होमक ज्वालमे संसार जीबए दुःख अपरिमित पेन नहि खसितए यदि सोनाली एकरा हमरा हाथसँ नहि छिनितए। हमर माय बेर-बेर हमरा कहलन्हि जे पेन स्कूल नहि लऽ जाइ, मुदा पेन एतेक सुन्दर रहए जे हम एकरा अपन संगी सभकेँ देखबए चाहैत रही। सभ दिन हम पेनसँ किछु काल धरि खेलाइत रही आऽ फेर ओकरा आपस दराजमे ओद्इया कए राखि दैत छलहुँ। हमर एकटा काकी एकरा विदेशसँ अनने रहथि आऽ हमरा सनेसमे देने रहथि। हमर माय कहलक जे ई पेन सत्ते बड्ड महग रहए। पेन लिखैत काल चमकैत छल। पेनक एक कात एकटा छोट घड़ी रहए। हम पेन स्कूल अनने रही प्रेमलताकेँ देखबए लेल। ओकरा होइत रहए जे हम पेनक विषयमे झूठ बाजल रही। ओऽ कहने रहए जे एहन पेन एहि विश्वमे नहि उपलब्ध छैक। आऽ ताहि द्वारे ओकरा देखबए लेल हम एकरा स्कूल अनने रही। हम ओकरा स्कूलक क्रीडाक्षेत्रक एक कात लए गेलहुँ आऽ ओकरा ई पेन देखेने रही। हम बीचमे टिफिनमे बाहर खेलाइ लेल नहि गेलहुँ कारण ई अंदेशा रहए जे क्यो एकरा चोरा नहि लए। प्रेमलता कहलक जे ई रहस्य ओ ककरो नहि बताएत मुदा सोनालीकेँ ओऽ कहि देलक। स्कूलक छुट्टीक बाद सोनाली हमरा पेन देखबए लेल कहलक। शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। पसीझक काँट बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल केना ओऽ सभ पसरैतत अछि सोहड़ैत! चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान। भीड़-भाड़ सभठाम सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़ सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़ मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग आऽ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥ मुनैत, बहत नहि हवा एकताक तेनाकेँ ठुसैत सभक आश कोनहुना निकसी आकाश। मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य? कतए गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे? कतए गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत? सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतए गेल छोड़ि मात्र अशोक आऽ साखुक वृक्ष जे पसारि रहल आकाश मध्य अपन हाथ नीचाँ देखैत विश्वकेँ घासक पात सन तुच्छ? यदि हम मोड़ी आऽ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे वेधए बला मोथा नहि भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो। सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत परिवर्तित कएलक नगरकेँ सेहो बोनमे। पसारैत काँट सभ ठाम परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे साँसक फुलब पसरैत चारू दिश दोसराक संवेदना नहि आबए दैछ विचार जिनगी भेल उसनाइत खेत सन। इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ। आश्चर्य, मथि नहि सकैत छी, औँठा धरि। देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र। एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई.मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। ई सेहो अछि प्रवास अहाँ नहि छी मानैत मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास एकर गुण षडयन्त्र जेकाँ मूल जन्मकालेसँ “तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई? कोनो पुरुषक हाथमे तँ जएबाके छैक ने एक दिन प्रवास मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहिक नहि नारी सेहो अछि एकटा ई। अहाँ एकर अवहेलना कए सकैत छी सुविधासँ। तैयो कतेक कठिन छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान पाएब एकटा अनचिन्हारक आँगुर? अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल मुदा बनि मात्र पाहुन। जखने हम पएर राखब कतेक काल धरि अहाँ रहब पुछब हमर लोककेँ। “जाऽ धरि हम चाही” इच्छा अछि कहबाक मुदा श्रृंखला ससरल हमर इच्छापर बहुत पहिनहि। प्रवास नहि अछि हर्खक वस्तु। छोड़ि ई मात्र जे समय बितने बढ़ैत अछि ई बनैत अछि अभ्यास। मोहम्मद खदीर बाबू (१९७२- ) नेल्लूर जिलाक कवालीमे जन्म। तेलुगुमे तीन टा कथा संग्रह। भाषा सम्मान आऽ कथा पुरस्कारसँ सम्मानित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। हमरा सभक चित्रकला शिक्षक हमरा सभक भगवान छथि कोनो स्कूलमे सभसँ उत्साही आऽ सभसँ दुष्ट आर क्यो नहि वरन् सीनियर होइत छथि। की! सोचि रहल छी जे एक्के समयमे हम ककरो उत्साही आ दुष्ट कोना कहि रहल छी! थम्हू अहाँकेँ कहैत छी। जखन हम सभ अठमामे छलहुँ तँ दू टा क्रिश्चियन छौड़ा सेहो , एबनेजर आऽ डेविड दसमामे। ओ दुनू एतेक नमगर छल आऽ ओकर सभक जाँघ तेहेन रहैक मुदा तैयो दुनू टा हाफ पैंटमे अबैत रहए। शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा हमर मायक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। बालानां कृते देवीजी: ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी परीक्षाक परिणाम बच्चा सबहक मेहनत आहि परीक्षाफल के रूपमे घोषित हुअ वला छल।देवीजी आ अन्य शिक्षकगण परिणाम लऽ तैयार छलैथ।प्रधानाध्यापक बच्चा सबके अपन अभिभावक संगे बजेने छलैथ।अर्द्धवार्षिक तथा अन्य टेस्ट सब सऽ बेसी महत्वपूर्ण छल वार्षिक परीक्षाक परिणाम। देवीजी सबसऽ पहिने सर्वोच्च स्थान पाब वला छात्रक नाम घोषित केली आऽ ओकर प्रशंसा सहित ओकरामे कतऽ सुधारक आवश्यकता अछि ताहि सऽ अभिभावकके ज्ञात करौली।तकर बाद सामान्य विद्यार्थी सबहक परिणाम घोषित भेल।जे सब पहिने सऽ नीक केने रहैथ तिनका सबके आर नीक करैके प्रोत्साहन देल गेल आ जे सब पहिने सऽ खराप केने रहैथ तिनका सबके बहुत निंदित कैल गेलैन। अंत मे एहेन विद्यार्थीक पारी आयल जे अनुत्तीर्ण भेल छलैथ। देवीजी हुनक अभिभावकके सेहो निंदा केली जे ओ सब प्रोत्साहन आ सुविधा नहि दैत छथिन जाहि लेल हुनक बच्चा अनुत्तीर्ण भेलैन। कहल गेल छै- ''माता शत्रु पिता बैरी येन बाले पाठित:। मा शोभते सभा मध्ये हंसमध्ये वको यथा॥ अर्थात् एहेन माता-पिता शत्रु होएत अछि जे अपन बच्चा के नहिं पढ़ाबैत अछि। अनपढ़ बच्चा विद्वानक सभामे ओहिना लागैत अछि जेना हंसक बीच बगुला। देवीजी एहेन बच्चा सबके हतोत्साहित नहि हुअ कहलखिन।कहलखिन जे असफलता सफलताक सीढ़ी होइत छै तैं अपन असफलता सऽ शिक्षा लिय आ आगॉं मिहनत करू। तकर बाद विद्यालय बन्द रहक घोषणा भेल।अगिला साल २ जनवरी सऽ सबके आब लेल कहल गेल।बीचक अवकासमे सब बच्चा सबके प्रतिदिन दैनिकी लिखक कार्य देल गेल। तदोपरान्त अपन संगी साथी परिवार संगे सौहाद्रपूर्वक छुट्टी मनाबक शुभकामना दैत शिक्षक सब विदा लेला। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०.विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti The time spent in my village proved to be very precious memories for me. I was able to run so fast in wooden shoes. I never slipped while running in rain, in muddy ways. When slippers were introduced then many people were falling down and using hot water bags to sooth pain. I often recalled those incidents- fire, standing on queue for kerosene oil, sugar balls, rubber balls, fight between two villages during fishing, crowd to see the flood, gathering of people and discussion for small things, memories of mango groves; would those things change by time? “Uncle! I have not applied that irritating thing on his skin”. I started crying while giving clarification. Some boys had poured kabkabauch on Banai’s body when he was asleep. Every one was returning from the mango orchard when they saw this plant. Very soon boys started discussing about the affects of Kabkabauch – a plant whose leaves can create irritation if rubbed on skin. No one was ready to try this so when Banai was found sleeping boys tried that on him. All boys ran away and I was caught as I was coming behind them unaware of the fact. Uncle didn’t believe my clarification and he had given me punishment. He had also instructed me to stay with his group and walk around the fields instead of playing with those boys and learning mischief. It was time of flood. Viewing the sight of flood in a boat and hunting Silli was very adventurous. The Government banned the hunting of that animal later on. But I was missing my friends and I was lost in the imagination of fun my friends would be having by playing and running here and there. That was my first day with my uncle. Until afternoon, I was in the anticipation that I would have to go with my uncle on the second day too so I tried my best to hide my distress in front of my friends and narrated them the stories of my trip in last day very interestingly. But considering my fainted expression my uncle asked me if I was interested in going with them. I had not denied directly but said that I liked to stay at home. Then uncle showed pity and left me with my friends with the condition that I would not do any mischievous act. (continued) ९. मानक मैथिली इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। भारत आऽ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली। १.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ- ग्राह्य एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए। 2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह। 3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि। 4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि। 5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह। 6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)। 7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि। 8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह। 9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ। 10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि। 11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए। 12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय। 13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ। 14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक। 15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक। 16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय। 18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि। 19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय। 20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय। 21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय। ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत। कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य/अग्राह्य 1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु Videha ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १५ दिसम्बर २००८ (वर्ष १ मास १२ अंक २४) রিদেহ' পাক্ষিক পত্রিকা Videha Maithili Fortnightly e Magazine রিদেহ विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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