VIDEHA — Issue 25 / अंक २५

Publication: VIDEHA · Issue: 25
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235 विदेह ०१ जनवरी २००९ वर्ष २ मास १३ अंक २५ 'विदेह' ०१ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) एहि अंकमे अछि:- एहि अंकमे अछि:- चित्र: ज्योति झा चौधरी १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१.१. सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता (कथा) २.२.उपन्यास- केदारनाथ चौधरी २.३.१. श्‍यामसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि २.४.१. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्‍द्र लाल ३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत’ आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा (कथा) २.६. आलेख-रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा-जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी २.७.  डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा २.८. मिथिला मंथन- सुशान्त झा २.९. भानस भात-नीलिमा ३.पद्य ३.१. १.आशीष अनचिन्हार २.मधुप ३.२. १.महेश मिश्र "विभूति" ३.३.-१.ज्योति-२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा ३.४. विनीत उत्पल ३.५. पंकज पराशर ३.६. १.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्‍द्र यादव ४. मिथिला कला-संगीत-छवि झा/ कुमुद सिंह ५. गद्य-पद्य भारती (तेलुगु कथा, गुजराती पद्य) ६. बालानां कृते-१.उमेश कुमार-२.ज्योति झा चौधरी ७. भाषापाक रचना लेखन- १.कृषि-मत्स्य शब्दावली २.बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण।मानक-मैथिली 8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti १.संपादकीय चित्र: प्रीति ठाकुर प्रिय पाठकगण, विदेहक नव अंक  ई पब्लिश भऽ गेल अछि। एहि हेतु लॉग ऑन करू http://www.videha.co.in | एहि अ‍ंकसँ डॉ शम्भु कुमार सिंहक आलेख प्रतियोगी परेक्षार्थीक लेल शुरु कएल गेल अछि। रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति एहि महत्वपूर्ण नाट्यवृत्तिक संचालनक भार  मैलोरंग केँ देल गेल । प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट,घोंघौर आ ओकर प्रबंध न्यासी श्री श्रीनारायण झा द्वारा । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाट्य निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीला जी जीवन पर्यंत भंगिमा, पटना संग जूड़ि बाल रंगकर्म के बढ़ावा दैत रहलीह । प्रमीलाजीक स्मृति मे स्थापित प्रमीला झा मेमोरियल ट्रस्ट, घोंघौर हुनकर बाल रंगमंच मे अविस्मरणीय योगदानक लेल एहि नाट्यवृत्तिक स्थापना केलक अछि । एकर मूल मे मैथिली रंगमंच पर महिला रंगकर्मीक प्रोत्साहन संग हुनकर सामाजिक सम्मान अछि । एहि नाट्यवृत्तिक संचालनक भार ट्रस्ट द्वारा लोक कलाक लेल समर्पित संस्था मैलोरंग के प्रदान कयल गेल अछि । वर्ष 2006 सँ नियमित रूप सँ ई नाट्यवृत्ति  ज्योति वत्स (दिल्ली), रंजू झा (जनकपुर), स्वाति सिंह (पटना), प्रियंका झा (पटना), वंदना डे (सहरसा) के प्रदान कयल गेल छनि । वर्ष 2008क लेल समूचा मिथिला (भारत+नेपाल) मे चालीस गणमान्य रंगकर्मी/संस्कृतिकर्मी केँ नामक अनुशंसाक लेल पत्र पठाओल गेल छलनि । ओही अनुशंसाक आधार पर प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव (मधुबनी), द्वितीय : वंदना ठाकुर (कोलकाता), तृतीय : नेहा वर्मा (दिल्ली), आ चतूर्थ : विजया लक्ष्मी शिवानी (पटना) अयलीह । किछु पारिवारिक कारण सँ वंदना जी एहि बेर वितरण समारोह मे अयबा सँ असमर्थ भ’ गेलीह  तेँ  ई क्रम बदलि गेल आ वंदना जीक  स्थान अगिला बेरक लेल सुरक्षित राखल गेल अछि । रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति-2008 तृतीय :विजया लक्ष्मी शिवानी : पटना शिवानीक जन्म दरभंगाक रसियड़ी गाम मे भेलनि । ई पिछला तीन साल सँ लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल छथि । शिवानी अरिपन, भंगिमा सन चिर-परिचित रंग संस्था सँ जुड़ल छथि । एहि बीच अहाँ नदी गोंगियायल जाय, मिनाक्षी, घुघ्घू, आगि धधकि रहल अछि, से कोना हेतै ?, अलख निरंजन आदि महत्वपूर्ण नाटक मे अभिनय करैत अपन नीक छवि बनेलहु अछि । मनोज मनुज, कौशल किशोर दास आ अरविन्द अक्कू जीक निर्देशन मे काज करैत शिवानीक इच्छा छनि जे  वरिष्ठ रंग निर्देशक कुणाल जीक निर्देशन मे सेहो नाटक करी । वरिष्ठ रंगकर्मी प्रेमलता मिश्र जी सन रंगकर्मी बनबाक हिनक मोन छनि । विजया लक्ष्मी शिवानीजीक कहब छनि जे - समकालीन समस्या मैथिली नाटक मे एयबाक चाही जकर अखन तक कमी अछि । पारिजात हरण हिनकर प्रिय नाटक छनि आ शिवानी नबका तुरिया के कह’ चाहैत छथि जे इमानदारी सँ रंगकर्म करबाक चाही । द्वितीय :नेहा वर्मा :  नई दिल्ली नेहाक जन्म बेगूसरायक न्यू चाणक्य नगर मे भेलैन । ई बच्चे सँ रंगमंच सँ जूड़ल रहलीह अछि । नवतरंग, इप्टा, यात्रीक संग कार्य करैत एखन मैलोरंग दिल्ली सँ रंगकर्म क’ रहल छथि । नेहा अनिल पतंग, परवेज़ यूशुफ, संतोष राणा, विजय सिंह पाल, अभिषेक, मनोज मधुकर आ प्रकाश झाक निर्देशन मे नाटक केलीह अछि । हिनका द्वारा कयल गेल प्रमुख नाटक अछि सामा-चकेवा, जट-जटिन, डोम कछ, गोरखधंधा, काठक लोक, कमल मुखी कनिया, एक छल राजा आदि । आगू लगातार मैथिली रंगमंच सँ जुड़ल रहबाक हिनकर इच्छा छनि । हिनकर प्रिय नाटककार आ निर्देशक महेन्द्र मलंगिया छथिन आ रंजू झा (जनकपुर) क अभिनय हिनका प्रभावित करैत छनि । काठक लोक प्रिय नाटक आ प्रगतिशील सोचक संग बेसी युवा के होबाक कारण मैलोरंग नेहाक मनपसंद रंग संस्था छनि । अपन आत्मसमर्पण आ संस्कारक संग रंगकर्म सँ जुड़बाक हिनकर आग्रह छनि नबका कलाकारक लेल । नेहा सी. सी. आर. टी. द्वारा जूनियर स्कॉलर्शिप प्राप्त कयने छथि । अखन राष्ट्रीय कथक केन्द्र सँ कथक मे पोस्ट डिप्लोमाक संग खैरागढ़ विश्वविद्यालय सँ एम. ए. क’ रहल  छथि । प्रथम : मधुमिता श्रीवास्तव :  मधुबनी मधुमिताक जन्म मधुबनीक सूरत गंज मुहल्लामे भेलनि । बचपने सँ हिनका नृत्य आकर्षित करैत छलनि । विगत दस साल सँ ई मैथिली रंगमंच पर सक्रिय छथि । मधुबनीक इप्टा संग रंगकर्म करैत अहाँ इप्टाक राज्य आ राष्ट्रीय स्तरक महोत्सव मे सेहो शिरकत केने छी संगहि अहाँ सॉंग आ ड्रामा डिभीजन संग सेहो संबद्ध छी । मुकाभिनयक लेल अहाँ इंटर कॉलेज यूथ फेस्टीवल-03 मे तेसर आ वर्ष 06 मे लोक नृत्यक लेल पहील स्थान प्राप्त केने छी । अहाँ ओकरा आङनक बारहमासा, ओरिजनल काम, टूटल तागक एकटा ओर, छुतहा घैल, गोनूक गबाह, दुलहा पागल भ’ गेलै, बिजलिया भौजी, बिरजू-बिलटू संग कतेको हिन्दीक नाटक केने छी । मंचीय नाटक संग नुक्कड़ नाटक मे सेहो मधुमिता बढ़ि चढ़ि क’ भाग लैत रहलीह अछि । झिझिया, झड़नी, जट जटिन डोम कछ एहन कतेको लोक नृत्य, एकल अभिनय, फिल्म सिरियल आदि मे अभिनय क’चुकल मधुमिता  नेहरू युवा केन्द्र, एस.एस.बी संग कतेको संस्था सँ सम्मानित कयल गेल छथि । संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००८) ७० देशक ६७३ ठामसँ १,३६,८७४ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आऽ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आऽ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आऽ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। २.गद्य २.१.१. सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता (कथा) २.२.उपन्यास- केदारनाथ चौधरी २.३.१. श्‍यामसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि २.४.१. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्‍द्र लाल ३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत’ आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा (कथा) २.६. आलेख-रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा-जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी २.७.  डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा २.८. मिथिला मंथन- सुशान्त झा २.९. भानस भात-नीलिमा कथा १. एकटा प्रेम कथा-सुभाषचन्द्र यादव २. तृष्णा- राजेन्द्र विमल,३.अमित कुमार झा, बुढ़ी माता चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। एकटा प्रेम कथा कहियो-कहियो ओहि लड़कीक फोन अबै । रिसीभर उठा  कऽ 'हलो’ कहिते ओम्हरसँ आवाज अबै- 'कने, प्रेमी केँ बजा देबै ?’ ई सुनिते खौंझ आ तामस सँ जी जरि जाय ।खौंझ आ तामस खाली ओही लड़कीक फोनसँ  होइत हो, से बात नहि। तामस सब पर होइ जे ककरो बजा देबा लेल फोन करै । ओ तऽ कहुना लड़किए रहय । फोन जँ लड़की आ जनीजातिक हो तऽ मरद-पुरुखक रवैया ओहुना कने लरम आ मोलायम होइत छै । जहिया पहिल बेर ओकर फोन आयल रहै तऽ हम पुछने रहिअइ- 'अहाँ के छी ?’ हमर मतलब ओकर नामसँ रहय । लेकिन ओ अपन नाम नहि बतेलक । बाजल- 'हम नया बजारसँ बाजि रहल छी । खाली एतबे कहला सँ ओ बूझि जेतै ।’ 'फोने पर रहब आकि फेर करब ?'-हम अनमनायल जकाँ पुछलिऐ । 'पाँच मिनटमे फेर करै छी ।' –कहि कऽ ओ फोन राखि देलक । हम मन मारि कऽ ओहि कोठली गेलहुँ, जकर खिड़की सँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै । ओकर मकान हमर मकानक पंजरामे रहै । 'प्रेमी ! रे, प्रेमी !' हम दू-तीन बेर जोर सँ हाक देलिऐ । ओ कोठलीसँ बाहर निकलल तऽ कहलिऐ- 'नया बजारसँ फोन छौ ।’ ओ हमर घर दिस आबय लागल । आब या तऽ ओ छहरदेवाली फानि कऽ चोट्टे चल आयत या कने आगाँ बढ़ि कऽ बिना फानने भीतर चल आयत किऐ तऽ ओहिठाम छहरदेवालीक ऊँचाइ भरिए ठेंगहुन छै । ओ घर ढुकिते रहय कि फोनक घंटी बजऽ लगलै । फोन सुनऽ लेल बाहर सँ क्यो अबै तऽ हम ओहि कोठलीसँ निकलि जाइ । आन लोकक फोन सूनब या ओकरा पर पहरेदारी करब हमरा शिष्ट आचरण नहि बुझाइत रहय । कोठलीसँ बाहर निकलैत आ घरक भीतर एम्हर सँ ओम्हर जाइत-अबैत जे सुनबा मे आयल ताहि सँ ई बुझायल जे प्रेमी साँझ खन ओहि लड़कीसँ भेंट करतै । ओ लड़की के छलै आ प्रेमी सँ ओकरा कोन काज छलै, से जनबाक इच्छा तऽ बड्ड रहय, मगर प्रेमी सँ ई सब पूछब मोसकिल छलै । ओ अठारह-बीस सालक  जवान रहय आ हम ओकर बापक उमेर के । ओहुना ओ घुन्ना स्वभावक लड़का रहै । ओ इंटरक विद्यार्थी छलै, लेकिन पढ़ाइमे ओकर मन नहि लगै । ओ टी.भी. देखय, गाना सुनय, क्रिकेट खेलय आ दोस-महिम सँ गप्प लड़ाबय । नहि जानि ओहि दिन साँझकेँ प्रेमी ओहि लड़की सँ भेंट केलकै कि नहि; लेकिन दुइए-चारि दिनक बाद लड़की फेर फोन केलकै । वएह पुरान आग्रह । बाजक ओहने ढंग । कने संकोच, कने घबराहट आ कने डर । बेर-बेर पुछलो पर ने तऽ ओ अपन नाम बतेलकैआ ने काम । तखन एतबा जरूर कहलकै जे ओ प्रेमीक मामा कत’ सँ बाजि रहल अछि । तऽ की ओ प्रेमीक ममिऔत बहीन छिऐ ? जँ ममिऔत बहीन छिऐ तऽ बेर-बेर वएह टा किऐ फोन करै छै ? क्यो दोसर किऐ नहि करै छै ? मामा, मामी, ममिऔत भाइ -एहि मे सँ क्यो तऽ कहियो करितइ । हमर मन मे कतेको सवाल आबय, मगर जवाब कोनो नहि । संदेह आ असमंजस उपलाइत रहय । आइ-काल्हि लड़कीक घरक लोक दिलफेक किसिमक लड़का सभक फोनसँ चिंतित आ फिरीशान रहैत अछि । मगर एतय मामला उन्टे छलै। कहियो काल हमरा बुझाय जेना प्रेमीक रुचि लड़कीमे नहि छै। फेर सोची जे से रहितइ तऽ प्रेमीक उदासीनता लड़कीसँ बहुत दिन धरि छिपल नहि रहितइ । जँ प्रेमी ओकरा नहि चाहितिऐ तऽ लड़की बेर-बेर फोन किऐ करितइ ? तकर बाद  फोन आयब बन्न भऽ गेलै । किछु दिनक बाद पता लागल जे प्रेमी मोबाइल कीन लेलक अछि । आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सब तरहक गप्प करैत हैत । भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो । हमरा लेल आब ई मामला सभ दिनक लेल अज्ञात आ रहस्यमय भऽ गेल रहय । लेकिन नहि, जीवनमे कोनो चीज अंतिम नहि होइत छै। भरिसक एक साल बीतल हेतै । एक दिन सांझुक पाँच बजे फोनक घंटी बजऽ लगलै । हेतै ककरो । हम अन्यमनस्क भाव सँ सोचलहुँ । कैकटा भटकल फोन अबैत रहैत छै । मगर नहि, ओम्हरसँ कोनो लड़कीक आवाज एलइ, पातर-मधुर आवाज आ फोन कटि गेलै। हम सोचमे पड़ल रही कि फोनक घंटी फेर बज्ऽ लगलइ । हलो !'-हम रिसीभर उठा कऽ कहलिऐ । ' कने, प्रेमीकेँ बजा देबै ?' अरे ! ई तऽ वएह लड़की छिऐ । अपन नाम आ काम बतेने बिना प्रेमीकेँ  बजा देबाक अनुरोध करयवाली । ओ बहुत दिनक बाद फोन केनेछल, तैं खौंझ तऽ नहि भेल, लेकिन मनमे थोड़े उदासीनता पसरि गेल । 'देखइ छिअइ।'-हम कहलिऐ । 'पाँच मिनट मे हम फेर करै छी ।' 'ठीक छै ।'—हम विरक्त सन कहलिऐ। देखिऐ या नइँ देखिऐ, एहि दुविधामे पड़ल-पड़ल हम ओहि कोठलीमे पहुँच गेल रही, जाहि कोटलीक खिड़कीसँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै । लेकिन पहिने जकाँ हम प्रेमीकेँ हाक नहि देलिऐ । आइ-काल्हि प्रेमीक माय-बाप एतहि छै । खिड़की सँ ओहि पार तकिते ओ दुनू अभरल । मकानक मरम्मत होइत रहै । प्रेमीक  कतहु अता-पता नहि छलै । भरिसक कोठलीक भीतर हो । हम ठाढ़ भेल देखैत रहलिऐ । भऽ सकैत अछि प्रेमी कोठलीसँ बाहर निकलि आबय । आयल तऽ फोन दिआ कहबै ।एक बेर भेल जन सँ पुछिऐ प्रेमी छै कि नहि, फेर छोड़ि देलिऐ । सोचलहुँ फोन उठेबे ने करबै । लेकिन एहन भऽ नहि सकल । ओ पांच मिनटक अंदरे फोन केलकै आ हम उठाइयो लेलिऐ । 'प्रेमी नहि छै । कतहु निकलल छै । ओकर माय-बाप आयल छै । घरक काज चलि रहल छै ।’—अपन निष्ठामे खोटक अनुभव करैत हम एक साँसमे ई सब कहि गेलिऐ । ओ निराशा आ सोचमे डूबल बाजल—'अच्छाऽ !’ हम पुछलिऐ-'अहाँ के बाजि रहल छी ?’एकर ओ सोझ जवाब नहि देलक । बातकेँ ओ जहिना घुमेनाइ-फिरेनाइ शुरू केलकै, हमरा बुझा गेल ओ पहिनहि जकाँ सवालकेँ टारि देत । लेकिन आब ओ बेसी अनुभवी, पटु आ सियान भऽ गेल छल । ओकरामे साहस आ निर्भीकता आबि गेल छलै । 'अकल, हम नया बजारसँ बाजि रहल छी ।'-ओ आवाज सँ हमर उमेर ठेकना लेलक, तैं अंकल कहि रहल अछि;हम सोचलहुँ । ओकर अंकल कहनाइ कने खटकल, फेर लगले सामान्य भऽ गेलहुँ । 'ठीक छै, नया बजारसँ बाजि रहल छी, मगर छी के, से न बताउ ?’-अपन स्वरमे बहुत नरमी अनैत हम धीरे-धीरे कहलिऐ । 'हम प्रेमीक ममिऔत बहीनक सखी भेलिऐ ।’-आब ओ सहज भेल जाइत रहय । तइयो अपन नाम तऽ ओ नहिएँ बतेने रहय । हमरा लागल ओ जरूर नाज-नखरावाली, शोख आ चंचल होयत। ओकर गप करबाक ढंग मोहक रहै। 'अहाँ अपन नाम नहि कहब ?’-हम जेना गोहारि केलिऐ । 'रितु ।हमर नाम रितु अछि ।’-हमर अभ्यर्थना सँ जेना ओ पघिल गेल रहय । आब ओकरा कोनो हड़बड़ी नहि छलै आ ओ निचेन सँ गप्प कऽ रहल छल । 'किछु कहबाक हो तऽ कहू, हम ओकरा कहि देबै ।’-हम प्रेरित केलिऐ । ओ सोचमे पड़ि गेल फेर पुछलक- 'अहाँकेँ ओकर नवका मोबाइल नम्बर बूझल अछि ?’ हम कहलिऐ- 'न्न, मगर हम पूछि कऽ राखब । ' 'ओकरा कहि देबै काल्हि एगारह बजे फोन करबै ।’ मन पड़ल काल्हि तऽ हमरा दस बजे कतहु निकलबाक अछि, तैं कहलिऐ-'एगारह बजे नहि, दस बजे करब।’ 'ठीक छै ।’-ओ कहि तऽ देलकै, लेकिन हमरा लागल जेना ओकरा अपन बात पर संदेह होइ । ओ फोन राखि देलक । फोन पर रहल ओकर संग आब छूटि गेल छल ।आइ ओ बड़ी काल धरि आत्मीय जकाँ गप्प केने रहय । फोन राखि देलाक बादो हम ओत्तहि ठाढ़ रहि गेल रही, जेना किछु और कहबाक हो, किछु और सुनबाक हो । हमरा छगुन्ता भेल, ओहि लड़की लेल हम किऐ उदास भऽ रहल छी ? दस बजे । काल्हि दस बजे। कोनो मंत्र जकॉं इ हमर भीतर बजैत रहल आब प्रेमी केँ ताकय पड़त । काल्हि दस बजे सँ पहिने बतबय पड़त जे ओकर फोन आबऽ वला छै । साँझे मे कहि देनाइ ठीक हेतै । भोरमे छुट्टी नहि रहत ।जँ ओ खिड़कीसँ देखा गेल, तखन तऽ कोनो बाते नहि, नहि तऽ ओकर खोजमे चक्कर काटय पड़त । साँझ केँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि । पहिने ओत्तहि देखबै ।नहि भेटल तऽ ओकर घर जाय पड़त । लेकिन घर पर तऽ ओकर माय-बाप छै ! माय-बापकेँ लड़कीक फोन दिआ कहब ठीक नहि हेतै । खैर, देखल जेतै । अखन तऽ बहुत समय छै । भऽ सकैत छै ओ खिड़कीसँ देखाइए जाय । हम बेर-बेर खिड़की लग जाय लगलहुँ । ओतय जाइ, कनी काल ठाढ़ रही आ थाकि कऽ घूरि जाइ । अपन छाहे जकाँ ओ लड़की हमर संग-संग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत । रितु आ प्रेमीक चुम्बकत्व हमरा आविष्ट कऽ लेने छल । ओहि दिन प्रेमी नहि भेटल । राति मे हम सपना देखैत छी जे ओ दुनू आयल अछि । घरमे हम असकर छी । दुनू केँ कोठलीमे बैसा कऽ हम बाहरमे टहलि रहल छी । कोनो चीजक खसला सँ निन्न टूटि जाइत अछि। रौद भऽ गेल छै । मन पड़ैत अछि आइ दस बजे रितुक फोन एतै । प्रेमीकेँ कहबाक अछि । हम बिछान छोड़ि उठि जाइत छी। तृष्णा- राजेन्द्र विमल आइ फेर बहु-बदला भेलैए कहाँ दन!...गे दाइ, गे दाए! रजदेबाके बहु सिकिलिया आ देबलरैनाके बहु सोनावती। सिकिलिया ओना छै मोसकिलसँ अढ़ाइ हाथक मौगी मुदा सउँसे गोर देहमे गजगज मासु करै छै। देखिते होएत जे काँचे चिबा जाइ। टोङि देबै, बन्न दऽ सोनित फेकि देतै। देहपर जेना इस्त्री कएल होइ; छिहलैत आऽ गतानल अंगअंग। देबलरैनके मुँहसँ तँ कहिया सऽ ने लेर चूबैत रहै-लसलस। देबलरैना-बहु सोनाबती, रोलल-छोलल, पोरगर करची सन लचलच करैत देह। रजदेबाके ततराटक लागि जाइक- देखैक तँ देखिते। एक्के टोलमे दसे घरक तऽ फरक हएतै दुनूक घरमे। छिनरझप्पबाली सोनावतियो केहन मन सरभसी जे जखने रजदेबासँ नयन मिलै कि छट्ट दऽ बिहुँसि उठै अंग-अंग- जेना लौका लौकि गेल होइ भीतरे भीतर। उपर सऽ सतबरती जे बनैय। रजदेबा माने राजदेव मंडल, अंचल अस्पतालमे चपरासी अछि। बाप ओकरा जनमऽ सँ पहिनहि सरग सिधारि गेल रहथिन्ह। पोसल केऽ तऽ माए। एकटा बहीन रहै चंचलिया। सभ कहै कुमरठेल्ली। सउँसे गाम अनघोलकएने रहै छौंड़ी। कहियो खेसारीक झारमे पकड़ल जाइक, कहियो राहरि खेतमे केयो देखि लैक। कहिने कते आगि भगवान देहमे देने रहथिन्ह। चंचलियाक माय कहै जे ई देहक आगि थोड़बे रहैक, पेटक आगि रहै, पेटक। आब जे रहौक, मुदा ओ मारलि गेलि। ओकरा लऽ कऽ दू टा मनसामे झगड़ा भऽ गेलैक। जगदिसबा कहै जे हमर धरबी अछि, मनमोहना रिक्साबला कहै जे हम्मर माल अछि। चंचलिया दुन्नूकेँ दूहै छलि। से बरदास्स नहि भेलै मनमोहना रिक्साबलाकेँ। ताड़ीक झोंकमे रिक्साक पुरना चेनसँ तेना ने ततारऽ लगलै जे होशे ने रहलै। सउँसे देहसँ सोनित बहि रहल छलै आ ओ मुँह बाबि देने छलि। परिवारमे विधवा माय छलै, स्वयं छल, सिकिलिया छलै आऽ पाँच बरखक बेटा रहै। बेटा बड्ड सुन्नर आ बड़ ठोला! चंचलिया तऽ संसारसँ उठिए गेलै। आब परिवारक सुखाएल आँतक घघरा मिझएबाक लेल सोनित सुखएबाक जिम्मेबारी रजबेक छलै। जूआमे चुपचाप कान्ह लगा देलक आ बहए लागल। बहु रहै चमचिकनी, फरदेबाल आ फसलीटीबाली। रोज गमकौआ तेल चाही, स्नो-पाउडर चाही। रङसँ ठोर नइँ रङब, लिपेस्सी चाही। सिनेमामे चसकलि। जी-मुँह चलिते रहइ। पनपियाइमे घुघनी-मुरही, कचरी भरि पोख। दुसंझी। रोज-रोज माछु-मासु गमकैत रहउ आङनभरि- ने किछु तऽ डोका-ककरि। आकि कछुएक झोर। कतेक दिनसँ एक जोर परबा पोसक लेल रगड़ा कए रहलि छलि साँयसँ। छमकि कए एमहर, छमकि कए ओमहर। राति-राति भरि झूलन देखए, सलहेसक नाचमे खतबैया टोलक झुलफिया या नटुआक नाच आ सतरोहनाक बिपटइ देखि-देखि कऽ लहालोट भऽ जाए। रजबाकेँ ई सभ सतखेल्ली मौगिक लच्छन बुझाइक, तेँ रोज बतकुटौअलि होइ। रिक्साबला देबलरैनासँ यारी रहै रजदेबाकेँ। देबलरैना सिकलियाके बड़ पसिन्न। कारण रहै जे देबलरैना सेहो सलहेसक नाचमे ढोलकिया रहै। ईह ढोलक बजबैकाल ओकर कनहा जे उपर-नीचाँ होइ छल- गुम-गुमुक-गुमुक...गुम गुमुक गुमुक! .. बेर-बेर झुलफी मुँहपर खसि पड़ै जकरा ओ ओहिना छोड़ि दैक। मुँहपर बुनकिआएल ओसक बूँद सन पसेना! ओ मोनहि मोन अपन साँय रजदेबासँ देबलरैनाक मिलान करै। ... कहाँ देबलरैना, कहाँ रजदेबा। रजदेबाक मुँहपर चौबीस घंटा जेना विपत्तिके झपसी लधने रहै। घोघनमुँहा एक रत्ती ने सोहाइ सिकिलियाकेँ। मगर करओ तऽ की करओ? सिङार-पटार कए एकान्तमे एसगर बिछाओनपर पड़ि रहय आ कल्पना करए-साँय जे बदलतै! देबलरैना फुलपेन्ट पेन्हि कऽ, चसमा पेन्हि कऽ बाबू-भैया नाहित जे रिक्शापर बैठिकऽ रिक्सा चलबइ हइ तऽ सिनेमाके गोबिना माउत कऽर हइ। .. मानली जे ताड़ी-दारू पीबै हइ, त की भेलइ। सुनइ छिऐ जे कहाँदुन ताड़ी-दारु पीलै हइ मनसासुन तऽ ओकरा देहपर राछच्छी सबार भऽ जाइ छै, मौगीके छोड़ने ने छोड़ै छै।..धौर, केनाकऽ सकैत होतै देबलरैना बहु।..रजदेबा ला धन्न-सन! बिछाओनोपर जाएत त खाली घरेके समेस्सा। ..रङ आ लस!! .. देहो हाथ छूबैतऽ खौंझा कऽ छूटत!.. देबलरैनाके बँसुरीके आवाज सुनएलै। ..दारू पीकऽ अबै छै तऽ आङनमे बैसिकऽ बँसुरी टेरऽ लगै छै।..अहाहाहा..की राग, की तान।..सोनाबतीके तऽ लीरीबीरी कऽ दै छै। फेर दुनू परानीमे मुँहाठुट्ठी होइत-होइत पिटापिटौअल शुरू भऽ जाइत छै।..सोनाबतीके कहब छै जे मरदाबा जे कमाइ हए से तऽ दारू पानीमे उड़ा दै हए, सिनेमामे गमा दै हए आ सूतऽ लागी हरान रहै हए।..पेटमे अन्न नैआ.. “मनसा तऽ रजदेबो हइ”- सोचैए सिकिलिया- “ओकरा सूतऽ के मन नै होइ हइ?..केरबा आमसन मुँह लटकओने रहैए!” सिकिलियाके अपने हँसी लागि जाइ छै। “दोसजी कहाँ गेलखिन”?- अरे, ई बारह बजे रातिमे सोनाबती!!.. “की हइ, हे”?- बाँसक फट्टक खोलिकऽ सिकिलिया बाहर अबैत अछि।..छौंड़ाक बाप तऽ नै एलैगऽ अस्पताल सऽ।..लैटडिपटी (नाइट ड्यूटी) हइ।..” “बहीन की कहियो दुखके बात। आइ फेनू मनसा मारलकगऽ।“ “कइला?” “धुर। की जान गेलिऐ कोन बढ़मकिटास हइ देहपर।..हमर तऽ जान लऽ लेलक।..अन्न-पानी जरि गेलै, जी-जाँघमे खौंत फुकने रहै छै चौबीस घंटा।– बलू, चल नऽ सूतऽ।..सुतना बेमारी धऽ लेलकैगऽ।“..सोनाबती घौलेघौले बजैत रहल। जोर-जोरसँ घोल-चाउर भेलै तँ बुढ़िया रजदेबामाइ टुघरि कऽ अङनामे आएल- गे, की भेलउ गऽ? चुप, लबरी। साँइयो बहुके बातके कहूँ एते घोलफचक्का भेलै गऽ?” सोनाबती घेओना पसारलकि। रित्ती रित्ती कऽ फाटल, सतरह ठामसँ गिरह बान्हल अपन नूआ आ अङिया देखओलकि। घरबाली अन्न बेत्रेक मरै छै आ ओ दारु-ताड़ी पीबिकए बेमत्त भेल रहै छै। घरमे लाल बुद्दी नं दै छै। दारू पी कऽ सेजपर ओकर गत्रगत्रमे दाँत गड़ा दै छै! “इस्स!” रजदेबाबहुके मुँहसँ अनायासे बहार भऽ गेलै। भीतर चीनीक गरम पाक जेना टघरि रहल छलै। ओ गत्रगत्र देबलरैनाक हबकबाक कल्पनामे हेरा गेलि। “हे बहीन!..मनसा नै भोगतओ तँ ई देह लऽ कऽ की करबा।..एक दिन अँचियापर तऽ सबहक देह जरै छै!”- रजदेबा-बहु समझओलकै। रजदेबामाइ दुरदुरओलकै। ताबत डिप्टीसऽ रजदेबो घूरि अएलै। आङनमे ठहाठहि इजोरियामे चमकैत सोनाबतीक मुँह चमकैत देखलक। नयन मिललै, सोनावती विहुँसि देलकि, जेना रजनीगंधा फूल झरझरा गेलै। मोनप्राण गमैक उठलै। रजदेबा बाजल किच्छु नैं। बस पुछलकै- “की भेलौ गऽ भौजी?” सोनावती फेर सउँसे खेरहा दोहरओलकि।... सिकिलिया चौल कएलकै- “साँय बदलबे?” “सहे तऽ ने उपाइ हइ।..तोहर डागदरसनके साँय हउ गजै छे।..अस्पतालमे काम करै हउ। ने दारू, ने पानी। घरगिरहस्थी डेबने हउ। भरिमुँह कोनो छौंड़ी मौगी जरे बोलबो ने करइ हउ। अपन काम से काम। एहन महाभारथ पुरुख हमर भागमे कहाँ?..” सिकिलियाकें देह जरि गेलै- हइ गोबरके चोत महाभारत कहाँदुन! मनसरभसी। अपना साँय महकै छनि आ छौंड़ाक बाप जरे केना रसिया-रसिया, सिलिया बतिआइ हए। “बहीन, तौँ घर जा।..तोहर साँयके दोसरकेँ सम्हारि देत ओ? जे अपन साइँयो के कसमे ने रखलक, से मौगी कथिके?” आ सिकिलिया रजदेबाक बाँहि पकड़ि घरदिशि घीचय लागलि। रजदेबामाइके पित्त लहरि गेलै। सोनाबत्ती कनिकाल थरभसाएलि, फेर बाजलि-“दोस जी!..हम आइ घरे नैं जबे..फेन “निम्मन सऽ कूटत।..” ओकर आकृति कातर छलै। “अहाँ जाउ। लोक फरेब जोड़त”। रजदेबा समझओलकै। ओ घूरि गेलि। सभ अप्पन-अप्पन फट्टक लगा लेलक। मुदा, भोरे उठल रजदेबा जँगलझार लेऽ तँ देखलक जे देबलरैनाके बहु दरबज्जापर एकटा फेकल तरकुन्नीपर ओंघराएलि छै, घर नैं गेलउ।..कनिकाल ओ टुकुर-टुकुर ओकर मुँह तकैत रहल। केना निभेर भऽकऽ सूतलि छै, दुधपीबा पिहुआजेकाँ। नूआँ-बस्तर अस्त-व्यस्त। बिन तेलकूँड़क जट्टा पड़ल, भुल्ल भऽ गेल पैघ पैघ केश, भुँइयापर एमहर-ओमहर जौंड़ जेकाँ लेटाएल। ओकरा देवलरैनापर बड्ड तामस भेलै। सोन-सनक सोनावती अन्न-वस्त्र बेत्रेक झाम भऽ गेलै- बीझ लागल ताम-सन। एखनो जँ नहा धो देल जाइक आ सिङार कऽ दै तऽ झकाझक भऽ जएतै। मुदा दोस तऽ दारू पीकऽ मस्त रहै छै। सलहेसक नाचमे ओकर ढोलकक गुमकीपर खतबैया टोलक कतेको छौंड़ी-मौगी ओकरापर जान दओ छै। दोसजी, खत्ता-पैन, चर-चाँचर, राहरि-कुसियारक खेत, भुसुल्ला घर, पोखरिक भीर जत्तहि पओलक, तत्तहि छौंड़ी-मौगी लऽकऽ...। राम-राम।..एहन गुनमन्तीके एना काहि कटबै हइ, दोसजी निम्मन नहि करै हइ! बड़ समझओलकै रजबा सोनाबतीके। सोनाबती नैं गेलै। देबलरैनाके धन्न-सन। खोजैत-खोजैत एक्के बेर सुरुज जखन नीचाँ अएलै तऽ बँसुरी टेरैत आएल। सोनाबतीके भरिपाँज पकड़ि कए चुम्माचाटी लेबए लागल।– सबहक सामने! दरूपिबाके कोन लाज आ बीज। रजबामाइके हँस्सी लागि गेलै। सोनाबत्ती मनसाकेँ धकेलि देलकै, मनसा धाँय दऽ चारूनाल चित्त खसल। बिच्चे आङनमे।..चटाक!...मनसा उठिकए एक चाट देलकै। मौगी घेओना पसारलकि। मनसाकेँ धन्न-सन।..दोसजी अस्पतालमे रहै। सिकिलियाक बेटाके “मैंगोफ्रूटी”क खाली डिब्बा कतहु सड़कपर फेकल भेटि गेल रहै। ओ ओहिमे पानि धऽधऽ पीबै छल। सिकिलियाक नजरि पड़लै-“केहन लगइ हउ?” छौंड़ा हँसि देलकै- आमके रस नहिंता!..पीबे?” सिकिलियाक मोन भेलै- एक बेर ओहो पीबि कए देखैत। ओ बड़का-बड़का बाबू-भैया सबके पीबैत देखने रहै।..मुदा, ओइमे तऽ पतरसुट्टी फोंफी लागल रहै, एइमे कहाँ हइ?.. ओ बड़ा ललचाएल दृष्टिसँ फ्रूटीक डिब्बाकेँ देखि रहलि छलि। “दोस्तिनी, पीयब?”-देवलरैना टुभ दऽ पूछि बैसल। दोस्तिनीक आँखिमे फ्रूटीक लालच, पतिसँ उलहन, अभावजन्य वेदना लक्काबाज देवलरैनाकेँ झक् दऽ लौकि गेलै। “चलू दोस्तिनी, फ्रूटियो पीयब, सिनेमो देखब आ होडरोमे खाएब। घूमैत-घूमैत राति तओले च्हलि आएब”।– देवलरैना बजलै आ फेर कोन जादूके बान लगलै कहिने, सिकिलिया चट दऽ ओकर रिक्सापर बैसि गेलि। सभ मुँहे तकैत रहि गेलै। ओ जे गेलै सिकिलिया से फेर ६ महीना नैं घुरलै। सोनाबती रजबाके घरसऽ टकसऽ के नाम नैं लै। पऽर भेल, पंचैती भेल। दुनू मौगीमे सँ कोनो अपन-अपन साँय लग घुरबाक लेल तैयार नहि भेलि। छओ मासक बाद दुनू अपन-अपन मनसा लग कनैत-कनैत घूरलि-ढाकीक ढाकी सिकाइत नेने। सिकिलिया आ सोनाबती एक दोसरक गरदनि पकड़ि झहरा देमए लागलि। सिकिलियाक घेओनाक आशय छल- देबलरैनाके मुँह महकै छै, ओ बदमास अछि, गुन्डा अछि, निसेबाज अछि, लापरवाह अछि; स्वार्थी अछि आदि-आदि। सोनावती छाती पीटिपीटि बेयान करै छलि- रजबा गुम्मा अछि, बहुसँ बेसी मायकें मानै अछि, दिनराति पाइ लेऽ खटै अछि आ सभ पाइसँ घरे चलबै अछि, बहु ले कहियो कचरी- मुरही नै अनने अछि। कहियो सिनेमा नैं जाइ अछि, बहुकें चुम्मा नैं लैत अछि..आदि...आदि... दुनू अपन-अपन ओरिजिनल साँय लग घूरि गेलि। मनोविज्ञानक प्रोफेसर सत्यनारायण यादव कहलैन्हि- यार, जे भेटैत छै, तकर मोल नै बुझाइ छै। जकर पति गंभीर छै ओकरा चंचल पतिक लेल मोन पनिआइ छै, जकर चंचल छै से गंभीर पतिक लेल सिहाइए..इएह क्रम छै...नो वन इज परफेक्ट.. एक दिन सिकिलिया आ सोनावती सुनू एक-एकटा कोनो मनसा संगे उरहरि गेलै- ओहो एक्के दिन। रजदेबामाइ भोरेसँ आसमान माथपर उठा लेलकि- “जुआनी कक्कर ने उमताइ हइ..फेनू बान्ह हइकि नै।..समाज आ पलिवारके बन्हन टूटि जतइ तऽ मनसा-मौगी जिनगी भरि अहिना भँड़छि-भँड़छि कए मरि जतइ... प्रो. सत्यनारायणक व्याख्या छैन्हि- म्यान इज पोलिग्यामस बाइ नेचर..इट इज सोसाइटी ह्विच च्यानलाइजेज सेक्स एनर्जी..सओ मुँह, सओ बात!..सबसँ बड़का सत्य जे सोनाबती, सिनकिलिया दुनू उरहरि गेल! अमित कुमार झा, चैनपुर, सहरसा बुढ़ी माता अपन परिवार- माँ, बाबूजी, भाइ, बहिन) संग पटनाक शेखपुरामे रहैत रही, बाबूजी पी.डब्लू. डी. मे एस.डी.ओ. एकटा प्रसिद्ध ईमानदार अधिकारी रहथि, सभसँ पैघ भैया पी.एच.ई.डी.दुमकामे पोस्टेड रहथि। हम सेंट जेवियर्स स्कूल, गाँधी मैदानसँ बारहमा करैत रही, पढ़ाइ-लिखाइमे बहुत नीक रही, पढ़ाइ-लिखाइक अलावा कोनो काज नहि रहए, ओइ पढ़ाइ-लिखाइक कारण हम बहुत कम उम्रमे नीक पद- मैनेजर बिरला ग्रुप- पर छी, हमर किछु दोस्त रहए जे ओहि समयक पैघ राजनीतिक परिवारसँ संबंधित छलाह- एहि विषयमे बादमे कहब- आइक तिथिमे सेहो बहुत पैध स्थानपर छथि। बारहमाक संगहि राम मनोहर राय, एस.पी.वर्मा रोड, पटनासँ मेडिकल एन्ट्रेंसक तैयारी सेहो करैत रही। मुख्य घटना मोन पड़ैत अछि जनवरी १९९५ क – कोचिंग क्लास ५.३० बजे भोरे सँ होइत रहए, हम घरसँ अन्हारे- ४.३०-४.४५ निकलैत रही। पटनामे जनवरी मासमे बहुत ठण्डी पड़ैत छैक, ओहि समयमे आर बेशी ठंडी पड़ैत रहए। ठंडा, ऊपरसँ अन्हार सुनसान रस्ता, बहुत डर सेहो लगैत रहए, लेकिन एक नया जोशमे सभ किछु बिसरि जाइत रही। ११ जनवरी १९९५ केँ कोचिंगमे ’मोड्युल टेस्ट’ रहए, ई कारण हम ४ बजे घरसँ कोचिंग निकलि पड़लहुँ- कारण ठंढाक कारण लेट नहि होए। हम जहिना पुनाइचक-हड़ताली मोड़क बीच मेन रेलवे लाइन लग पहुँचलहुँ, अचानक एक टा घोघ तनने, करिया कम्बल ओढ़ने बुढ़ी माता सामना आबि गेलि, हम तँ डरसँ साइकिलसँ खसि पड़लहुँ, देखलहुँ तँ ओ बहुत बुढ़ आरो कमर लगसँ झुकल लागल। हम उठि कऽ ठाढ़ भेलहुँ, गरदा सभ झाड़ि कऽ जहिना चलय लऽ चाहलहुँ तँ ओऽ आवाज देलक,..सुन..अ..बौवा... डरसँ हालत खराब भऽ गेल..चारू दिससँ सनसन जेकाँ अवाज महसूस हुअ लागल। डरल-डरल ओकरा लग गेलहुँ..। पुछलक...कतए जाऽ रहल छी!!! ताऽ तक ओऽ अपन घोघ नहि हटेने रहए। डरसँ अबाज तँ जल्दी नहि निकलल...;लेकिन हिम्मत कऽ कए जवाब देलहुँ, कोचिंग जाइ छी। फेर पुछलक..कथी के पढ़ाइ करैत छी..!! बातसँ अपनापन लागल। हम कहलहुँ-डॉक्टरीक तैयारी करैत छी.. अच्छा बैस..दोसर पढ़ाइमे मोन नहि लागए छौ- निर्देश दैत-..कनी देर रुकि जो तखन जहिये। ताऽ तक समय लगभग ४.४५ भऽ गेल रहए..एक दू टा आदमी सभ सड़कपर सेहो नजरि आबए लागल। लेट होइत रहए एहि कारण हिम्मत कए कऽ कहलहुँ...हमरा लेट भऽ रहल यऽ..हमर आइ परीक्षा अछि। कोनो बात नहि..जवाब भेटल बड़ असमंजसमे पड़ि गेलहुँ..की करी..नञि .करी..एक मोन होय रहए, चलैत लोककेँ अवाज दी, मुदा सड़क फेर सुनसान भऽ गेल। तखने ओऽ अपन घोघ हटेलक..हुनकर...चेहराकेँ देखिते लगभग बेहोश भऽ गेलहुँ..बुढ़—झुर्रीदार चेहरा...ओहिपर मर्द जेकाँ...दाढ़ी...मोँछ...हे भगवान आइ-धरि एहन नञि देखने रही...हमर हाव-भावकेँ देखि ओऽ बजली...हमरा देखि कए डर लागए छौ..नञि डर। हम दोसर किओ नञि छियौ...पता नञि किए ओऽ किछु अपन जेकाँ लागए लागल...ताऽ तक लगभग ५ से ऊपर टाइम भऽ गेल...रोडपर दूध/ न्यूजपेपर बला हॉकर सभ नजरि आबए लागल... किछु कालक बाद अवाज भेटल- आब तू जो..घुरैत काल अबिहेँ...हम हवाक भाँति/ तीर सँ बेशी तेजीसँ निकललहुँ...बहुत लेट भऽ गेल रही...साइकिलकेँ अपन क्षमतासँ बेशी तेजीसँ चलबए शुरू कए देलहुँ, जहिना गाँधी मैदान/ सब्जी बागक मुँहपर पहुँचलहुँ...देखलहुँ जे जबरदस्त एक्सीडेन्ट भेल रहए, पूरा रस्ता पुलिस ब्लॉक कऽ देने रहए- एक्सीडेंट लगभग २० मिनट पहिने भेल रहए, जाहिमे चारि टा लोक आऽ एकटा चाहक दोकानदार मारल गेल...ओऽ चारू टा हमरे इंस्टीट्यूटक छात्र रहए जे नीक चाह पीबए खातिर रुकल रहए लेकिन...!! हमहुँ ओहि चाहबलाक दोकानपर रोज रुकैत रही- अगर बुढ़ीमाता नञि भेटितए तँ हमहुँ ओहि समयमे चाहक दोकानेपर रहितहुँ ...फेर पता नञि...)- चाह पिबैक तँ आदति नहि रहए मुदा ठंढ़ाक चलते पीबि लैत रही। कहुना इंस्टीट्यूट पहुँचलहुँ..ओहिठाम घटनाक सूचना पहुँचि गेल रहए...इंस्टीट्यूट दू दिनुका लेल बन्द कऽ देल गेल। छात्रक घरबलाकेँ सेहो सूचित कए देल गेल, हमहुँ बुझल मोनसँ घर घुरए लगलहुँ, घर घुरैत काल वैह बुढ़िया ओहीठाम भेटल...ओहिना घोघ तनने...लग जाऽ कए सभ घटना सुनेलाक बादो ओऽ कोनो जवाब नहि देलक...किछु कालक बाद कहलक... बौआ हमरा भूख लागल यऽ!! की खेबए!!! हम पुछलियए। चूड़ा आऽ शक्कर..जवाब भेटल। संयोग एहन रहए जे ताऽ तक हम सभ तरहक समान किनबाक वास्ते कोनो दोकानपर नहि गेल रही, कारण घरमे काज करए लेल बहुत आदमी रहए दोसर घरक सभसँ छोट रही। तैयो दोकानपर गेलहुँ आरो बुढ़ी-माता लऽ चूड़ा-शक्कर कीनि कए अनलहुँ। किछु देरक बाद हम पुछलहुँ..कतए जेबही, हम पहुँचा देबौ। “कतहु नञि”, जवाब भेटल। “रहबीहीं कतए”, हम पुछलहुँ। “यैह जगह” सीधा जवाब भेटल। “खाना कतए खेबहीं”...पुछलापर जवाब भेटल- “ तूँ खुआ, बेशी बक-बक नञि कर, खाइ लेल दे फेर तू पुछिहेँ जे पूछए के छौ”- बिल्कुल रुखल जवाब सेहो भेटल। संगहि स्नेहसँ कहलक- “तूँहो खो”। हम तँ अजीब मुश्किलमे पड़ि गेलहुँ..ओकरा अकेले छोड़ि कए जाइ के मोन सेहो नञि करैत रहए...आखिर की करी...बहुत सोचलाक बाद निर्णय लेलहुँ..जे हुअए एकरा अपना संग लऽ जाइ...रिक्शापर बुढ़िया आरो साइकिलपर हम, घर पहुँचि ओकरा गेटपर ठाढ़ कऽ बाहर ठाढ़ कऽ हम घर गेलहुँ, सभ कहानी अपन माताजीकेँ बतेलहुँ, बुढ़िया बाहरमे ठाढ़ छै, सेहो कहि देलहुँ। सभसँ पैघ समस्या जे बुढ़ियाकेँ आखिर कतए राखी...माताजी कहलखिन- नीचाँमे एकटा रूम खाली छै- ओहिमे जगह देल जाए, सभ बेबस्था-बिछोना, कम्बल, साफ साड़ी-कऽ कए ओकरा घरमे बैसेलहुँ। साँझमे बाबूजी ऑफिससँ अएलाह तँ हुनका सभ कहानी बतेलहुँ। बाबूजी कहलन्हि-“बुढ़िया कहिया तक रहतहु”। “नञि पता”- हम कहलहुँ। फेर माताजी सभ सम्हारि लेलन्हि ..आरो बाबूजीकेँ समझा देलखिन। बुढ़ी-माताक सेवा करब हमर रोजक ड्यूटी भऽ गेल। कोचिंग जाइसँ पहिने आधा घण्टा, आबए के बाद १ सँ डेढ़ घण्टा हमर समय बुढ़ी माता लग बीतए लागल। खानाक अलग-अलग फरमाइश होइत, सभ किछु पूरा करैत एक सप्ताह बीतल, एक दिन अपना लग बैसा हमर बारेमे पूछए लागल- जेना अपन दादी-दादा-अग्रज- बुढ़ी माता दिससँ कहल गेल- तूँ दोसर पढ़ाइ- मेडिकल छोड़ि कऽ– कर। बहुत नाम हेतौ, खूब पैसा कमेबे, माँ-बाप तोरापर नाज करतौ, १० वा दिन रातिमे बिना किछु बतेने पता नञि कतए चलि गेलय- आइ तक नहि भेटलीह...एखन तक हम इन्तजार करए छी जे बुढ़ी माता एकदिन जरूर भेटतीह। बुढ़ी माताक बात बिल्कुल सही भेल जखन १४-१५ घण्टा पढ़ाइ करबाक बावजूद सी.बी.एस.ई. मेडिकलमे वेटिंग आबि गेल। बी.सी.ई.ई.मे डेयरी ब्रान्च भेटल, एम.डी.ए.टी.मे १००% चान्स रहए- ९०% एक्यूरेट प्रश्न सही कएने रही- मुदा परीक्षा-केन्द्र मिल्लत कॉलेज, दरभंगा केन्सिल भऽ गेल..एहि कारणसँ हम फ्रस्ट्रेशनमे रहए लगलहुँ। पढाइ-लिखाइ बन्द कए देलहुँ...जे एतेक पढ़ाइ करए के बाद जखन सफलता नहि भेटल तँ आब कहियो नहि हएत। फेर हमरा बुढ़ी-माताक बात याद भेल, संगहि बाबूजी सेहो कहलन्हि- अपन ट्रैक चेन्ज करू, लगभग ओही समय यू.जी.सी.सँ ३ टा नया कोर्स पटना आऽ मगध विश्वविद्यालयकेँ भेटल- बायो-टेक्नोलोजी, जल आऽ पर्यावरण प्रबंधन आऽ बी.सी.ए.। एन्ट्रेन्स परीक्षापर नामांकन प्रक्रिया शुरू भऽ गेल। बी.सी.ए. हमरा किछ ढंगक कोर्स बुझाएल, एन्ट्रेन्स देलहुँ आऽ पास कऽ गेलहुँ। यू.जी.सी. बी.सी.ए.क प्रथम बैचक पहिल छात्र हम रही जे अन्तिम परीक्षा ८९% सँ पास केलहुँ। बाबूजी कहलन्हि- आब यू.पी.एस.सी.क तैयारी करू, ढंगक सरकारी नोकरी लिअ, लेकिन हमर सोच किछु आरे रहए। “अगर अपन प्रतिभा/ क्षमताक उपयोग करबाक यऽ तऽ सरकारी नोकरी नञि करू”। फेर एम.सी.ए. केलहुँ, मोन भेल जे एम.बी.ए. कएल जाय- बहुत कठिन रहए आइ.टी.सँ एम.बी.ए. करब। मुदा बुढ़ी माताक कृपासँ एम.बी.ए. सेहो कऽ लेलहुँ। कैम्प्स सेलेक्शनमे रिलायन्सक ऑफर भेटल। जोइन केलहुँ, फेर एच.डी.एफ.सी. बैंकसँ ऑफर भेटल तँ बैंक जोइन कऽ लेलहुँ। हृदयमे इच्छा रहए जे टाटा-बिड़लामे नोकरी करबाक चाही। बुढ़ी माताक कृपासँ इच्छा पूरा भऽ गेल आऽ बिड़ला ग्रुपसँ नीक स्थानक ऑफर आबि गेल। जोइन सेहो कऽ लेलहुँ आऽ एखन तक एतहि छी..आब इच्छा यऽ दिल्ली/ मुम्बइक बहुत सेवा केलहुँ...आब अपन बिहार/ मिथिलाक सेवा कएल जाय..बुढ़ी माताक कृपासँ ओहो भऽ जेतए...लेकिन सभसँ पैघ इच्छा अछि बुढ़ी-माताक दर्शनक..पता नञि होएत कि नञि... जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। माहुर ..1.. दृ”आह! भैया आबि गेला। हाथ मे पोटरी छनि। अबस्से ओहि मे ‘मीट’, अरे! नहि माता दुर्गाक परसाद हेतनि!“ रंजना बाजलि छलीह। ओ दौड़ैत आंगन सँ बाहर एलीह। हुनका भाइजीक हाथ मे ठीके पोटरी छलनि जाहि मे ‘मीट’ रहैक। भाइजी अपन हाथक पोटरी रंजनाक हाथ मे देब’ चाहलनि। फेर, ने जानि हुनका की मोन पड़लनि जे अपन पोटरी बला हाथ क¢ँ पाछाँ घीचि लेलनि। ओ बूत बनि ठार भ’ गेला। भाइजीक ठोर मे कंपन होब’ लगलनि, आँखि सँ ढबढब नोर बह’ लगलनि आ हुनक समग्र शरीर थर-थर काँपए लगलनि। भाइजी अर्थात आकाश सँ हुनक एकमात्रा छोट बहिन रंजना हुनका सँ बारह बर्खक छोट छलथिन जे आब पन्द्रहम मे पयर रखने छलीह। ओ सलवार-कुर्ती पहिरने छलीह। हाथ मे चूड़ीक स्थान पर घड़ी बान्हल छलनि। पुछू किएक? रंजना विधवा छलीह। पछिला आषाढ़ मे रंजनाक विवाह कमीशन प्राप्त सेकेण्ड लेफ्टिनेन्ट भास्कर चैधरी सँ भेल रहनि। एक महिनाक अवकाश समाप्त भेला पर भास्कर चैधरी अपन ड्यूटी पर कश्मीर पहुँचल छला। ओतहि आतंकवादीक संग मुठभेर मे शहीद भ’ गेलाह। रंजना विधवा भ’ गेलीह। आकाश लगक शहर दरिभंगाक एक बैंक मे कार्यरत रहथि। ओ गामहि सँ स्कूटर पर बैंक जाथि आ आबथि। अष्टमी रहैक आ बैंक दशहराक छुट्टी मे बन्द छलै। गामेक दुर्गा स्थान मे बलिप्रदान कएल छागरक भड़ाक माँउस पुजेगरीक आदेश सँ बिकाइत छलै। ओही ठाम सँ आकाश एक किलो ‘मीट’ आ की परसाद जे कहियौ कीनि क’ अनने रहथि। सम्प्रति जे दृश्य उपस्थित भेल छलै ओहि मे आकाश हाथ मे मीटक पोटरी टंगने थरथराइत ठार रहथि। हुनका आँखि सँ दहो-बहो नोर बहि रहल छलनि। हुनक पत्नी, पांच बर्खक बेटी सुजाता, माता-पिता सभ कियो ढलानक एक कात ठार डबडबाएल आँखिए देखैत चुपचाप आकाश दिस ताकि रहल छलथिन। रंजना ठीक आकाशक सामने छलीह। हुनक बाल सुलभ सदृश मुख-मंडल पर बड़ी टा प्रश्न चिन्ह बनि गेल छल। काजर पोतल आँखि मे रंजनाक समग्र भविष्य धह-धह धधकि रहल छल। त¢ँ नोरक एकोटा बून्न देखाइ नहि पड़ि रहल छल। परिवारक क्रंदन बीच रंजना एक अजीबे दृष्टि सँ अपन भ्राता, आकाश क¢ँ निहारि रहल छलीह। बड़ी काल सँ अंटकल आकाशक कंठ सँ कुहरैत शब्द बाहर भेलदृ”हे भगवान! हम ई की कएल? कियक हम ‘मीट’ कीनल?“ एतबा बाजि आकाश मीट’क पोटरी क¢ँ नाला मे फेकि, दुनू हाथे माथ पकड़ि, नीचा जमीन पर बैसि हबोढेकार कान’ लगलाह। आब रंजना क¢ँ छोड़ि परिवारक सामूहिक क्रंदन सँ स्थान पीड़ादायक बनि गेल। मात्रा रंजना अविचल ठार रहलीह आ शून्य नजरि सँ सभ किछु देखैत रहलीह। हम कोन तरहक खिस्सा सुनाब लगलहुँ। इहो कोनो खिस्सा भेलै? रंजनाक विवाह लड़ाइक सिपाही संग भेल छलनि। ताहू मे एहन सिपाही सँ जनिक नियुक्ति कश्मीर मे आतंकवादी सँ भिड़न्त मे भेल होअय। तखन त’ प्राण जायब करीब-करीब निश्चिते छलै। त¢ँ रंजना विधवा बनलीह। अहि मे अजगुत बला कोनो बात नहि भेलै। दुखक बात जँ रहै त’ एतबेटा जे जाहि जाति मे रंजनाक जन्म भेल रहनि ओहि जाति मे पुनर्विवाहक नियम नहि रहैक। ओहि जातिमे आ सनातन सँ आयल परम्परा मे विधवाक निदान हेतु कोनो टा व्यवस्था नहि रहैक। रंजना विधवा भेलीह त’ भेलीह। पूर्वजन्मक पाप ओ नहि भोगती त’ के भोगत? त¢ँ ई मात्रा ओहने आ ओतबेटा बात भेल जेना मनता मानल कोनो पाठीक बलि पड़ल होअय। आब अहाँ कहबै जे ई कोन तरहक मिलान भैलै? नहि अरघै अछि, त’ सुनू। मनता मानल पाठी-छागरक बलि पड़ै काल बलि देनिहार, कबुला केनिहार एवं बाँकी सभटा तमाशा देखनिहार एतबे ने सोचैत छथि यौ जे हरदि, मिरचाइ आ मसल्ला मे भूजल एकर माँउस मे कतेक सुआद हेतै? तहिना विधवा भेलि रंजना द’ सभ सोच’ लागल छथि जे ई आब सासुर त’ जेतीह नहि, गामहि मे रहतीह। गाम मे सभहक टहल-टिकोरा करतीह, अदौरी-कुम्हरौरी खोंटतीह, अँगने मे भानस-भात करतीह, एकरा-ओकरा संग तीर्थाटन जेबा काल भनसिया बनि क’ जेतीह आ छौंड़ा सँ लगाति बूढ़बा तकक करेजक तपन मेटौती। त¢ँ बरसामबाली काकी कहने रहथिन यौ, भगवान सभहक सभटा इन्तजाम बैसले-बैसल ‘क’ दैत छथिन। दूर जो, मनसा सभहक लप-लप करैत जिह्वा आ आँखिक खोराकक पूर्ति सदिकाल सँ बाल-विधवे सँ पूर्ति होइत रहलै अछि। ई कोनो नुकायल गप्प छैक? आब अहीं कहू जे मनता मानल पाठी आ विधवा भेलि रंजना मे की फर्क? कोनो तरहक शिकायत करब सेहो युक्ति संगत नहि होयत। त¢ँ आब नीक होयत जे अहि खिस्सा क¢ँ अही ठाम विराम द’ क’ ओही गाम मे ओही दिन घटल दोसर घटनाक जानकारी प्राप्त करी। गामक नाम भेल पानापुर। पानापुर मे सभ जाति, समुदाय एवं सम्प्रदायक लोकक निवास। गाम आर्थिक रूपे सम्पन्न। ओहि गाम मे छल एकटा दुर्गा मंदिर, जे दस-बीस कोस दूर तक प्रसिद्ध छल। पैघ पोखरिक पूबरिया भीड़ पर तीन-चारि बीघा मे पसरल मंदिर आ मंदिरक परिसर। मंदिर मे दुर्गाक भव्य प्रतिमा। तकरबाद मंडप, पुजारीजीक आवास आ सदिकाल खल-खल हँसैत, स्वच्छ, विशाल समतल भूमि। दशहराक समय मे अही स्थान पर मेला, नौटंकी, नाच-गान आदि आयोजित होइत छल। दुर्गा मंदिरक पुजारी छलाह काली कान्त ओझा। दुब्बर-पातर, साँची धोती, खोंसल ढेका, छाती पर उगल पंक्तिबद्ध हड्डीक उपर दू भत्ता फहराइत जनउ, गौ-खूँर बरोबरि टीक, पयर मे खराम आ ललाट पर सेनुरक ठोप। पुजारीजी सज्जन आ मृदुभाषी छलाह। वैष्णव त’ओ छलाहे आ सप्ताह मे अधिक दिन उपासे मे रहैत छलाह। मुदा हुनक पत्नी अढ़ाइ मोनक पट्टा छलथिन। थुलथुल देह, खुजल कारी केश, नाक सँ मांग तक पतिव्रताक निशानी स्वरूप सेनुरक डरीर, पान-जर्दा दुआरे कारी भेल दाँत आ बीड़ी त’ ओ नैहरे सँ पिबैत आयल रहथि। जँ जुमनि त’ नित्य माँउस-माँछ चाहबे करी। दू अगहनी जोड़ दू रब्बी गुण दू बरोबरि मंदिरक बर्ख भरिक अन्न-टाकाक आमदनी पर हुनक पूर्ण एकाधिकार छलनि। पुजारीजी पत्नीक सोझा मे आब’ मे कँपैत छलाह। शारीरिक दुर्बलता अथवा धार्मिक अजीर्णता, कारण जे हौउ, पुजारी जी सदिकाल पत्नी सँ डेरायल रहैत छलाह। तखन पुजारीजी के संतान स्वरूप पुत्राक प्राप्ति भेलनि कोना? ई रहस्यक विषय अवस्से छल। मुदा अहि रहस्यक छेदन नीति शास्त्रा ज्ञाता कइएक बेर क’ चुकल छथि। हुनका लोकनिक अनुसारे पति-पत्नीक ग्रह-नक्षत्रा कतबो उल्टा-पुल्टा किएक ने हौउक, प्रचुरता एवं परिपक्कता बेला मे कखनहुँ काल अर्द्ध-विराम पूर्ण विराम भैए जाइत छैक। पुजारीजीक पुत्राक नाम रहनि यदुनाथ ओझा। पैघ भेला पर यदुनाथक उपनयन भेलनि आ बर्ख भरिक भीतरे विवाह सेहो भ’गेलनि। यदुनाथक पत्नी अर्थात पुजारीजीक पुतहु जखन दुरागमन भेला पर सासुर अयलीह त’ हुनक अनुपम सौन्दर्यक दुआरे सम्पूर्ण पानापुर गाम महमही सँ गमकि उठल। यदुनाथ त’ अपन बापक कार्बन काॅपी छलाह। मुदा हुनक पत्नी जनिक नाम छल कामिनी, तनिका जे देखलक सैह विभोर होइत बाजल छलदृ”माइ गे माइ! एतेक रूप पुजारी जीक सन्दुक-पेटार मे झाँपल कोना रहतैक? कोनो अनहोनी ने भ’ जाइक?“ अष्टमीक निस्तब्ध राति। पानापुर गामक सभटा मनुक्ख भरि दिन नाच तमासा देखलक, इच्छा भरि नशा केलक आ भरि पेट माँउस-भात खाए थाकि क’ झुरझमान भ’ सुति रहल। मुदा चोर-उचक्का, अत्याचारी एवं व्यभिचारी किस्मक लोक क¢ँ राति मे निन्न होइते ने छैक। ओहन लोक रातिए मे अपन इच्छा-पूर्तिक जोगार करैत अछि। ओहने राक्षस प्रवृतिक श्रेणी मे छल बिदेसरा कुएक। गाम मे एकटा अस्पताल अवस्से छलै। मुदा डाक्टर महिना, दू महिना मे कहिओ काल अबैत छलाह। गामक स्वास्थ्य विभाग कुएकक जिम्मा छल। ओना सड़क-छाप बहुतो कुएक छल। मुदा बिदेसरा कुएक सभ सँ तेज-तर्रार मानल जाइत छल। ज्वर-धाह राति-विराति कखनो-ककरो भ’ सकैत छलै। ताहि कालक भगवान छल बिदेसरा कुएक। ककरा मे एतेक साहस रहै जे बिदेसरा कुएक सँ तकरार करितय। नाड़ी देखै लेल अथवा सूइया भोंकै लेल बिदेसरा कुएक ककरहु आंगन मे कखनहुँ प्रवेश क’ जाइत छल। ओकरा कोनो रोक-टोक नहि रहैक। जहिया सँ यदुनाथ दुरागमन करा क’ अयलाह आ सुन्दर कनिआँक कारणें गाम भरिक छौंड़ा सभहक बीच इर्खाक मूर्ति बनलाह तहिया सँ बिदेसरा कुएक हुनका मे अधिक काल सटले रहैत छल। चाह-नास्ताक संग चोटगर-मिठगर गप-सप कहि बिदेसरा कुएक यदुनाथक मोन क¢ँ मोहैत रहल आ अन्ततः हुनकर अभिन्न मित्रा बनि गेल। एहना मे जिगरी यार बिदेसरा कुएकक फर्माइस यदुनाथ पूर्ति कोना नहि करितथि? ओही अष्टमीक राति बुझू निशा पूजा निमित्ते, दुनू यार बैसल रहथि। स्थान छल यदुनाथक शयन-कक्ष। पुजारीजीक आवास मे पहिने छल कनेटा खुजल दरबज्जा। तकरबादक कोठली मे पुजारीजी पत्नीक संग रात्रि विश्राम करैत छलाह। तकर सटले भंडार आ भनसाघर। सभ सँ अन्त मे जे कोठली छल सैह भेल यदुनाथक शयन-कक्ष। दुरगमनिआँ पलंगक एक कात टेबुल आ कुर्सी। देवाल पर सिनेमाक अभिनेत्राीक नयनाभिराम फोटोक बीच भगवतीक फोटो। खिड़की-केबाड़ पर्दा सँ झाँपल। दू गोट कुर्सी पर यदुनाथ आ बिदेसरा कुएक आमने-सामने बैसल छल। बीचक टेबुल पर एकटा फूलदार विदेशी शराबक खुजल बोतल, पानि सँ भरल जग आ दू गोट शीशाक गिलास राखल रहैक। ताही काल यदुनाथक कनिआँ कामिनी छिपली मे भुजल माँउस टेबुल पर रखलनि आ पतिक अगिला आदेशक प्रतीक्षा मे एक कात ठार भ’ गेलीह। हुनक गोरकी बाँहि मे सटल करिका ब्लाॅउज ककरो एक बेर आरो देखीक’ लोभ मे पटकि सकैत छल। बिदेसरा कुएक अपन नजरिक नोक क¢ँ कामिनीक उठल ब्लाॅउज मे भोंकैत बाजलदृ”यार, एतय सभ ठर्रा पिबैत अछि। मुदा अहाँ लेल हम दरिभंगा सँ सय टाका मे असली अस्सी प्रतिशत प्रूफ अल्कोहलबला ‘जीन’ मंगौलहुँ अछि। आब बिलम्ब नहि क’ एकरा टेस्ट करियौ।“ दू टा गिलास मे शराब ढारल गेल, पानि मिलाओल गेल, गिलास टकराओल गेल आ तखन दुनू यार पिअब शुरू केलनि। माँउस निघंटि गेल। कोनो बात ने, कामिनी छिपली भरी भूजल माँउस फेर सँ अनलनि। यदुनाथ पहिले पैग मे डोलि गेल छलाह। शराब पचेबाक ने हुनका काया रहनि आ ने प्राइटिस। दोसर पैग समाप्त करैत-करैत यदुनाथक आँखिक डिम्हा सँ टर्चक फोक्सिंग बाहर होब’ लगलनि। तेसर पेगक आरम्भे मे कामिनी फेर सँ भूजल माँउस आन’ चलि गेल रहथि। जाबे ओ घूमि क’ एलीह ताबे हुनक नाथ पलंग पर चित बेहोश पड़ल रहथिन आ हुनकर थुथून सँ सा¢ँ-सौंक अबाज प्रसारित भ’ रहल छल। कामिनीक हाथ मे तेसर खेपबला भूजल माँउसक छिपली छलनि। ओ थकमकाइत ठार भ’ गेलीह आ पलंग पर पड़ल अपन स्वामी क¢ँ टकटक देख’ लगलीह। किछु समय लेल कामिनीक मस्तिष्कक सोचक यंत्रा मे ब्रेक लागि गेलनि। बेगूसराय सँ खगड़िया जेबाक ‘हाइ वे’क दक्षिण गंगाक तटपर बसल छल पिहुआ नामक गाँव। ओही गामक मंदिरक पुजारीक कन्या छलीह कामिनी। गंगाजल सँ घोअल मंदिरक पवित्रा परिसर मे कामिनीक जन्म आ पालन-पोषण भेल रहनि। सासु-ससुरक सेवा एवं पतिक आदेशक पालन करबाक बीज मंत्रा ल’क’ कामिनी सासुर आयल रहथि। मुदा सासुरक वातावरण किछु अलगे तरहक रहैक। सासुक बीड़ी पिअल मुँहक गंध सँ कामिनी क¢ँ मितली होब’ लागनि, असरधा होनि। मुदा ओ अपना क¢ँ रोकथि आ बुझबथिदृकोनो बात नहि। नव स्थान मे एना प्रायः होइते छै। सभटा अपने आप ठीक भ’ जेतै! केवल धैर्यक निर्वाह चाही। यद्यपि ई बात हुनका कियो सिखौने नहि छलनि। मुदा आन-आन नव विआहलि कन्या जकाँ एकर विश्वास हुनकर संस्कार मे पहिने सँ छलनि जे पति हुनकर रक्षक छथि, परमेश्वर छथि। तखन चिंता कथिक? मुदा एखन त’ हुनकर रक्षक, परमेश्वर बेसुध भेल पड़ल छथि। एखुनका बयस तक कामिनी क¢ँ नीक-बेजायक कोनो टा ज्ञान नहि भेल छलनि। त¢ँ कामिनीक लेल एखुनका परिस्थिति अप्रत्याशित आ ओझरायल सन छल। ओ काठ बनलि ठार रहि गेलीह। १. श्‍यामसुन्दर शशि-विचार २.अंकुर काशीनाथ झा, नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि श्‍यामसुन्दर शशि विचार मिथिलाक तवाही,सरकारी षडयन्‍त्र त ने अछि ?? संविधानसभाक निर्वाचन पश्‍च्‍यात् मधेस चैनक स्‍ाांस लेत ,मिथिला आरामसँ अपन विकास आ कला—संस्‍कृतिक संरक्षण सम्‍बर्द्धनमे जूटि जाएत,तेहन विश्‍वास राजनितिक वृत्तमे ब्‍याप्‍त छल । राजनितिक विश्‍लेषकसभके कहब छलनि जे अधिकार वास्‍ते मधेसभरि उठल पसाही निर्वाचन पश्‍च्‍यात् संसदमे धुधुआएत आ सडक शान्‍त भ जाएत । सशस्‍त्र समूहक बन्‍दुक सेहो सहज निकास पाओत । मुदा से धरि भेल नहि । मधेसक अन्‍यान्‍य भाग थोर बहुत शान्‍तो भेल मुदा मिथिलाक अवस्‍था बद्सँ बद्त्तर होईत गेल । खासकऽ मिथिलाक सीमामे पडएवला धनुषा,महोत्तरी,सर्लाही,सिरहा आ सप्‍तरीक अवस्‍था त बेहाल भ गेल । तथ्‍यांक दिस दृष्‍टिगत करी त विगत तीन महिनामे एहि क्षेत्रमे लगभग एक सय सर्वसाधारणकेँ हत्‍या भेल अछि । अपहरण,लूट,चोरी,डकैती आ मारि पिटक त लेखा जोखा करब मुस्‍कील । सडकसँ संसदधरि पहुचिनिहार मधेसी जनअधिकार फोरमकेँ नेतालोकनि उपराष्‍ट्रपति, उपप्रधानमन्‍त्री,मन्‍त्री आ कि—कहाँदनके पाछाँ पडि, सडककेँ भावना बिसरि गेलाह अछि । किछुकेँ पाछाँ नहि पडवाक नाटक कएनिहार तराई मधेस लोकतान्‍त्रिक पार्टी, काँग्रेसकेँ नव संस्‍करण जकाँ प्रतीत भ रहल अछि । जेकरा अशान्‍त होएवाक चाहैत छल से अर्थात संसद, शान्‍त अछि । सडककेँ शान्‍तिपूर्ण आन्‍दोलनकारीसभ एखनो संसददिसि आशाक नजरिसँ ताहि रहलाह अछि जे कखन हमरालोकनिकेँ अधिकार भेंटत ? अपन सहनशीलताके उत्‍कर्षधरि आम मधेसी आ मैथिल अपन नेता आ संविधान सभासदसभक शुभसंकेतक प्रतिक्षा करबाक प्रण जकाँ कएने अछि । सम्‍भवत ः तें सडक शान्‍त अछि । मुदा ई खामोसी विहायडिक संकेत सेहो भ सकैत अछि । तेँ मधेसी दल,सशस्‍त्र समूह आ सरकार विहाडिक संकेत समयमे अकानथि त वेस । अन्‍यथा आब उठएवला पसाहि जूटक नहि फूटक हएत । साढे तीन करोड जनताक ६सय सभासद्, साढे छ महिनाधरि राजकोषक दानापानी चैनसँ हजम करैत रहलाह,मन्‍त्री—जन्‍त्री आ कि—कहाँदन बनवाक जोगाडमे लागल रहलाह । आब हुनकासभकेँ आँखि खुजलनि अछि जे—बापऱ़़ेसंविधान कहिया लिखब ? हमरालोकनि त संविधान लिखवा वास्‍ते पठाओल गेल छलहुँ । आ आब बनल अछि विभिन्‍न समितीसभ । जे से, पुजारीके जेना देरीसँ मोन पडलनि जे हम पुरुष छी तहिना हमरासभक सभासद्लोकनिकेँ देरिएसँ सहि मोन त पडलनि जे हमरालोकनि संविधान सभासद् छी,सांसद नहि । हमरालोकनि बात कऽ रहल छलौं ,मिथिलामे व्‍याप्‍त अशान्‍तिक विषयमे । जेनाकि पूर्वमे अनुमान लगाओल जा रहल छल जे संविधानसभाक निर्वाचन पश्‍च्‍यात् मधेस शान्‍त भऽजाएत आ संसद अशान्‍त होएत । से भेल नहि । राजनितिक शास्‍त्रक सिद्धान्‍तकेँ औठा देखबैत मधेसक सशस्‍त्र समूहसभक सकृयता आओर बढि गेल । मिथिला भरि हत्‍या,हिंसा,लूट,अपहरण,चन्‍दा असुलीलगायतके घटनामे अपेक्षाकृत बृद्धिए भेल । सरकारद्वारा वार्ताक आह्वानक बाबजुदो  हत्‍या हिंसाक घटनामे कमि नहि आवि रहल अछि । आम नागरिक मात्र नहि राजनितीक विष्‍लेशक लोकनि सेहो खोजी क रहलाह अछि जे आखिर एकर पाछाँ की कारण भ सकैछ ? राजनितिज्ञलोकनि सेहो छगुन्‍ता मे छथि । दोसर दिस आम नागरिककेँ मोनमे एक गोट प्रश्‍न उठि रहल छैक जे निर्वाचनकेँ क्रममे चुपचाप बैसल मधेसक सशस्‍त्र समूहसभ,फेरसँ किया आ कोना सकृय भ उठल ?  संगहि किछु शंका उपशंकाक जन्‍म सेहो भेल अछि । एक गोट सहज सवाल जे सभकेँ झकझोडि रहल अछि ओ ई जे—कि माओवादी नेतृत्‍वक वर्तमान सरकार नितिगत रुपसँ मधेसकेँ अशान्‍त राखए चाहैत अछि, मधेसक अशान्‍तिक फायदा उठा पुनः औपनिवेसिक शासन त ने करए चाहैत अछि ??यदि से नहि त मधेसमे व्‍याप्‍त हिंसाके किए नहि रोकल जा रहल अछि । मधेस आन्‍दोलनकेँ क्रममे कएल गेल समझौताक कार्यान्‍वयन किए नहि कएल गेल ? फेरसँ मधेसी जनताकेँ ठकबालेल ? एक दिस सशस्‍त्र समूहसंग वार्ताक नाटक करब आ दोसर दिस कार्यकर्ताकेँ हत्‍या करब ,कराएव । एहना स्‍थितीमे वार्ताक वातावरण केाना बनत ? दोसर दिस मधेसक सशस्‍त्र समूहक ताजा गतिविधी सेहो प्रश्‍नक घेरामे अछि । की मधेसमे उत्‍पात मचा रहल दू दर्जनसँ अधिक समूह मधेसेक वास्‍ते काज क रहल अछि ? यदि ई समूहसभ मधेसक वास्‍ते काज क रहल अछि तँ संविधानसभाक निर्वाचनकेँ बेरमे कत्त छल ?ओ समूहसभक मांग की अछि ?सैन्‍य संरचना केहन छैक ?आ ओ समूहसभ कोन ठाम सरकारसंग लडाई कएलक अछि ? आ सभसँ महत्‍वपूर्ण जे मधेसक वास्‍ते संघर्षरत्त ओ समूहसभ मधेसमे चोरी,डकैती,हत्‍या,हिंसा,अपहरण क रहल आपराधिक समूहसंग केहन  व्‍यावहार क रहल अछि । मधेसक मसिहा कहएवला एहि समूहसभक काज मधेसके सुरक्षा देब सेहो होएवाक चाही ने ? एहि तरहे देखल जाय तँ मधेसप्रति वर्तमान सरकार आ मधेसक नामपर सशस्‍त्र संघर्ष करएवला समूह, दुनूक दृष्‍टिकोण नकारात्‍मक छैक । दुनू मिलीक मधेस आ मधेसीकेँ शोषण,दोहन आ तवाह करवाक काज क रहल अछि । मधेसक नामपर सशस्‍त्र संघर्ष करएवला किछु समूह सर्वसाधारण व्‍यक्‍तिकेँ अपहरण करैत अछि,फिरौती लैत अछि आ पुलिससंगे आधा आधा भाग बण्‍डा लगवैत अछि । सशस्‍त्र समूहसभ पहिने हथियार खरीद करबाक नामपर चन्‍दा असुली अभियान चलबैत छल । आब त ईहो कहल जाईत छैक जे —हमरा कार्यकर्ताके पुलिस पकडने अछि ,ओकरा छोडएवाक वास्‍ते चन्‍दा चाही । धनुषाक महेन्‍द्रनगरमे एक गोट घटना हालहि घटल अछि—अपहरणकारीके पकडल जएवाक मांग सहित उमाप्रेमपुर आ किसाननगरके ग्रामीणसभ महेन्‍द्रनगर ईलाका प्रहरी कार्यालय घेराउ कएने छल । स्‍थिती बेसम्‍हार भेलाक बाद पुलिसके गोली चलावए पडलैक आ एहि क्रममे संजय कुमार साहनामक एक युवक घायल सेहो भेल । एहि तरहे यदि पुलिस अपहरणकारीके संरक्षण दैत छैक त अपराध कोना नियन्‍त्रण हेाएत ? जनकपुरमे एक सरकारी कर्मचारीके हत्‍याक बाद सरकार मिथिलाक एहि पाच जिल्‍लामे विशेष सुरक्षा रणनिती बनौलक अछि । एहि सरकारी रणनितिससँ अपराध घटओ वा नहि मुदा मिथिलाक जनता आओर तवाह हएत से धरि पक्‍का अछि । सन्‍दर्भ ःराम—जानकी विवाह महोत्‍सव दुलहा बनल श्रीराम हे ऽऽऽ़़़़ अगहन शुक्‍ल पञ्‍चमी । दुनिया भरिक हिन्‍दुसभक वास्‍ते प्रतिक्षाक दिन । कारण एहि शुभ तिथीमे मार्यादापुरुषेात्तम श्रीराम आ आदर्श नारी सीताक विवाह भेल रहनि । जाहि तिथीक एतेक बिकलतासू प्रतिक्षा कएल जाईत हो,ओ स्‍थान कतेक पवित्र होएत ?कल्‍पना कएल जा सकैत अछि । स्‍वाभावत ः राम—जानकीक विवाह भेल धरतीकेू स्‍पर्श कऽ लोक धन्‍य धन्‍य होवए चाहैत छथि । सोचियौं  जे जनकपुरवासी कतेक भाग्‍यमानी छथि,जनिकर जन्‍म एहि पावन धरतीपर भेल छनि । ओ पावन धरती आ एहि धरतीक प्रतिपालकसभ एहि सप्‍ताह अपन प्रिय सीता आ पूज्‍य श्रीरामक विवाह धूमधामसू कएलनि अछि । एक सप्‍ताह धरि चलल एहि विवाह महोत्‍सवमे ने मात्र जनकपुर आ मिथिलावासी अपितु भूगोलक कोना कोनाक हिन्‍दुसभ अपन अराध्‍य देवक विवाहमे सहभागी भेलाह । मिथिलामे सीताके बेटी आ बहिनक रुपमे मान—सम्‍मान कएल जाईत छनि । स्‍वाभावत ःदुलहा रामके जयाय आ बहिनोक रुपमे । ईतर मिथिलावासीके आश्‍चर्य लागि सकैत छनि जे जहन श्रीरामके डोला(प्रतिमा) विवाह वास्‍ते जानकी मन्‍दिर प्रवेश करैत अछि त मैथिलानी गितिगाईनसभ हुनका गाडी पढैत छनि आ पुछैत छनि— रामजीसू पुछय मिथिलाक नारी बतावऽ बबुवा एक गोर ,एक कारी बतावऽ बबुवाऽऽऽ़़़़़ अर्थात हे राम । जवाफ दिय,एक भाय गोर(लक्ष्‍मण)आ एक भाय कारी(राम) कोना भेलौं । यदि एके गोट पिताक दुनू पुत्र छी त एके रंगक होएवाक चाही ने ??? मैथिलानीसभक पुछवाक तात्‍पर्य छनि जे अहाूक दूगोट पिता त ने छथि ?राम सीताक विवाह एहन विलक्षण आ मनोरम वातावरणमे होईत अछि । राम जानकी विवाह महोत्‍सवके प्रशंगमे जानकी मन्‍दिरके महन्‍थ रामतपेश्‍वर दास वैष्‍णव सीताक पिता अर्थात जनकके रुपमे प्रस्‍तूत भेल करैत छथि आ राम मन्‍दिरके महन्‍थ राम गिरी रामक पिता अर्थात दशरथके रुपमे । सात दिवसीय एहि विवाह महोत्‍सवमे धनुष यज्ञ,तिलक,मटकोर,सेनुरदान आ मर्यादी भोज(राम कलेवा)सेहो होईत अछि । दुलहा पक्षीय श्रीराम युवा कमिटीक युवा—युवती एवं सरकारी कार्यालयके प्रमुखलोकनि बरियातीक रुपमे सहभागी भऽ ढोल पिपही एवं अंग्रेजी वाजाक धूनपर डिस्‍को सेहो कएलनि । जनकपुर नगर पालिकाक पदाधिकारी आ नागरिक समाजक अगुवालोकनि सरियातिक रुपमे बरियातिसभके स्‍वागत कएलनि । हूसी मजाक आ रंग अविरक मर्दन त मिथिलाक वैवाहिक विधिक अभिन्‍न अंङ्गे अछि । सेहो भेल । माने सीता दाईके  विवाहमे ओ सभ किछु भेल जे हम अहाू अपन बेटी,बहिन वा भतिजीक विवाहमे करैत छी । मिथिलाक वैवाहिक रितिरिवाजके सभसू आह्लादक पक्ष अछि, एहिमे गाओल जाएवला गीत । साूच कही त मैथिलके विवाहमे पोती पतरा लऽ उपस्‍थित पुरोहितोसू बेसी महत्‍वपूर्ण होईत छथि,गितगाईन दाई—माईलोकनि । आ जहन राम सीताक विवाह भऽ रहल होईत अछि त मैथिलानीलोकनि बड आवेशसू गाओल करैत छथि— मिथिलाक धिया सिया जगत जननि भेलि दुलहा बनल श्रीराम हेऽऽऽ अंकुर काशीनाथ झा, गाम -- कोइलख, मिथिलांचल नेताजी पर तामश कियैक उठैत अछि॥ विगत किछु दिन सऽ नेता के प्रति लोकक सोच बदैल गेल अछि। नेता सबहक जे छवि सामने ऐल अछि ओ लोक के प्रभावित कम केलक। एहि मे नकारात्मक संदेश बेसी अछि। जिनका लोक सब एक दिन समाज के मार्गदर्शित करबाक लेल आगू आनई छैथ। एकटा पहचानक संग ठाढ़ करई छैथ। आई हुनका वैह लोकसब गरिया रहल छथिन। आब प्रश्न उठैत अछि जे एकटा जिम्मेवार आ पथ प्रदर्शक व्यक्ति के प्रति लोकक मोन में नकारात्मक सोच कियैक घूसि गेलैन अछि ? दरअसल एकाएक ऐना नहि भेल अछि। बल्कि पछिला किछु साल में नेता सबहक हावभाव, विचार, स्वभाव आ काज करबाक नीति में ऐल परिवर्तनक ई दुष्परिणाम अछि। एकरा लेल नेता स्वयं हद तक जिम्मेवार छथि। ओ सब नेता शब्दक परिभाषा के बदैल कऽ राखि देलैन अछि। ओ सब राजनीति के मात्र एटा व्यवसाय बुझऽ लगला अछि। ओ सब चुनाव के एकटा व्यवसायिक परीक्षा जंका प्रयोग करैत छैथ। समय के संग परीक्षा में भीड़ बढ़ि गेल अछि। तांहि भीड़ सऽ आगू निकलबाक लेल आ खबरि मे रहबाक लेल मजबूर भऽ कऽ नेता जी सब विकासक काज छोड़ि फालतू आ तर्कविहीन बयान दैत रहैत छैथ। हुनका सब के एहि गप सऽ कोनो मतलब नहि छैन जे हुनकर वक्तव्यक असरि कते दूरगामी आ घातक भऽ सकैत अछि। ई घटना ककरो सऽ नुकैल नहि अछि, जे राज ठाकरे एकटा चुनावी परीक्षा में फेल भेला के बाद अपन मुखारबिन्दू सऽ एहेन शिगुफा छोड़लैन जे महारष्ट्र के हालात बदैल गेल। गैर जिम्मवारपूर्ण बयानवाजी केला पर कोनो तरहक सख्त सजै नहि भेटबाक कारण नेताजी सबहक हौसला आरो बढ़ि जैत छैन। यैह कारण अछि जे देशक केन्द्रीय मंत्रीजी सब आतंकी घटना में लिप्त संगठन सिमी पर सअ प्रतिबंध हटेबाक वकालत करैत छैथ। हुनकर सबहक निर्लज्जता तऽ तखन आर हद फानि जैत अछि जखन अमर सिंह आ अंतुले साहब एक टा शहीदक शहादत पर प्रश्नचिह्न लगा दैत छैथ। एहिना एक बेर तऽ एहेन लागल जे केरल के मुख्यमंत्री जी सठिया गेला अछि। मुख्यमंत्री जी एकटा शहीदक परिवार के गारि दई सऽ परहेज नहि केलनि। एकर सबहक ऐके टा कारण छै। वोट इकट्ठा कऽ चुनावी परीक्षा में पास भेनाई। ई सब कऽ कऽ जखन नेताजी सब चुनावी परीक्षा पास करैत छैथ तऽ ओकर बाद हुनकर सबहक एक टा मात्र लक्ष्य रहैत छैन। कोनो तरहे बेसी सअ बेसी रूपया कमेनाई। जखन गप पैसा के आगू पाछू घूमअ लागैत अछि तखने एहि तरहक खेला होयत अछि। ऐना में सार्वजनिक तौर पर एकटा सवाल उठैत अछि जे एहि स्थिति में आम लोक की करैथ। जे सब किछु देखई आ सहै लेल मजबूर छैथ। मुंबई में भेल आतंकी हमला के बाद अचानक हुनकर सबह ओ तामस जे सालो सअ मोन में दबल छलैन, बारह निकैल गेलैन। किछु गोटे मीडिया के सामने आबि कऽ अपन तामस निकालला तऽ किछु गोटे एकबद्ध भऽ किछु कालक लेल सड़क पर उतरला। एहि सअ बेसी कओ की सकैत छलाह। लोक लाचार छैथ। विवस छैथ। कियैकि विकल्पहीन छथि। हुनका ककरो नै ककरो तऽ नेता बनेबाक छैन्हे। लोकतांत्रिक ढ़ांचा एहेन छैक, जई में नेता जरूरी छई। आ ओ नेता आम जनता द्वारा चुनेवाक छई। बेसी सऽ बेसी आम जनता एक के बदैल कऽ दोसर के चुनि सकैत छथि। मुदा रहता ओहो नेता। मात्र शरीर बदलैत छैक। शरीर बदलला सऽ कृत्य मे कोनो बेसी बदलाव नहि होयत छैक। किछु बदलाव के जॉ उम्मीद कैल जैत अछि तऽ जरूरी नहि अछि जे ओ बदलाव सकारात्मके हुवै। नेता केनो विशेष व्यक्ति नहि होयत छैक। बल्कि ई नाम अछि ओ विशेष वर्ग के, जकर अलग धर्म होयत छैक। अलग इमान होयत छैक। आ अलग पहचान होयत छैक। एकरा लेल एकटा गप अकाटय अछि, आ ओ अछि जे एहि विशेष वर्ग के भ्रष्टता आ विवेकहिनता के हद तक पहुंचाबई में हमर, अहां के आ हमरा सब के कनी कनी योग्दान अछि। कियैकि जान अनजान मे जॉ कियौ एहि सऽ कनी अलग हटि कऽ काज करैयो चाहैत छैथ तऽ हुनका सहजतापूर्वक स्वीकार नहि कैल जैत छैन। ओहि समय लोकक मोन में परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आ पार्टीवाद एहेन किटाणु घोसिंया जैत छैन जे तत्काल हुनका पथ विचलित कऽ दैत छैन। आ एकरे परिणाम दूरगामी आ घातक होएत अछि। फलस्वरूप बाद मे हम सब पछतैत रहैत छी। जे आई सबहक समने अछि। १. अयोध्यानाथ चौधरी-दू पत्र २.एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार-बृषेश चन्‍द्र लाल ३.कुमार मनोज कश्यप- नव वर्ष ४.एत' आ ओत’- अनलकान्त ५.प्रेमचन्द्र मिश्र- अनाम कथा दू पत्र _________अयोध्यानाथ चौधरी अन्तत; आइ हम दिनेशकेँ पत्र लिखवाक लेल उद्यत भेलहुँ अछि । कागत-कलम सब दुरुस्त १९६९, माने ठीक ३६ वर्षक बाद । एतेक नम्हर अन्तराल ! की बूझत ओ ? खीझ होइत अछि हमरा जे जीवनमे एंकटा उत्साही पत्र लेखक किएक नहि वनि सकलहुँ हम ? एकटा सफल दायित्व किएक नहि निभा सकलहुँ हम ? जकरा हम पत्र लिखाक हेतु उद्यत भेलहुँ ओ हो त कहियो लिखवाक वात सेचि सकैत छल । खैर शरुआत हमरेसँ रहओ । ओकरा हेतु हमर पत्र एकटा अप्रत्याशित घटना सावित हेतैक – ’अ सरप्राइज’ आ, जौं ओ जीवित नहि हो ............ ? बहुत नम्हर अत्नराल भेलैक ने ! पत्र फिर्ता आबि सकैत अछि .............ओहि पर “डेड’ जा मृत कानो संकेत रहि सकैत छैक । एतेक निराशाजनक वात नहि सोचवाक चाही । ओहना स्थितिमे पोस्टमैन पत्र फारि-फेकिकऽ अपन मथ-दुक्खी सँ मृक्त भऽगेल रहत । ई समय पत्र लिखवाक अनुकूल +{बहुत अनुकूल वुझा रहल अछि । दशमीमे सब गाम अबैए- ओकरो जरुर गाम आवक चाही । तावत ओकर पत्नी, बेटा वा वेटी केओ ने के ओ पत्र सहेजिकऽराखि देने रहतैक । जाइ जमानामे हम सव – ’ग्रैजुएशन’ केने रही, ओइ हिसाव सँ ओ जरुर कोनो नोकरी मे हैत किएक त’ नीक विद्यार्थी रहय । पता नहि – पटना वोकारो, टाटा, दिल्ली कतऽ अइ..... आकि सुदुर दक्षिण केरला, मद्रास-नहि जानि कतऽ ?/ चारि वर्ष संगे अभिन्न रहवाक कारणे ओकरा पत्र लिखवामे एकटा ’पेन फ्रेन्ड’ क मजा आओत । सबसँ पहिने तँ’ ओकरा परिवाक हुलिया लेवऽ पडत । ओकरा परिवारमे के सब छैक ? के कतऽ की करैत छैक ? पत्रक सिलसिला जौ चालु भऽ जायत त कालान्तरमे इ हो बूझऽ मे आवि जायत जे ओकरा एकटा मनोनुकूल पत्नी भेटलैक की नहि..... आकी कोनो ना शेष जीवन वितावऽक क्रममे अइ । याददाश्त वा फेहरिस्त रहत । तहिया सी. एम. कलेजक आलीशान आर्ट्स व्लक नव हेवाक कारणे विल्कुल कोनो सुन्दर कागज पर पारल रंगीन नक्शा वुझाइक – पार्क जकाँ । जतऽ जाउ जेना पक्षीक झुण्ड आ कलरव पसरल । विशाल पुस्तकालय । वागमतीक मनोरम आ खतरनाक किछेर । रहस्यमयं गर्ल्स-कामन-रुम । विभिन्न विषयक अलग ’डिपार्टमेन्ट’ आ ओ रहस्यमय कोठली, उपर हेवाक कारणे, छात्रसब कौखन कार्यवश, कौखन अनेरो, कोनो ’सरसँ भेटवाक वहानामे उपर भीड कऽदैक । परन्तु’ जखन ’हुसैन’ साहव माने वाइस प्रिन्सपल अपन ’चैम्बर सँ ’ बहार भऽ केवल तर्जनी उठवैत छलाह तखन सब सिड़हीसँ नीचा भगैत छल – कान – कपार फुटवाक – टांग टुटवाक कोनोटा डर नहि । हमरा सभक ग्रूपमे एकटा रीनिता नामक लड़की छलि ’जकरा मात्रे’ कार प्रतिदिन कालेज पहुँचा जाइक । लक्ष्मी आ सरस्वतीक अपूर्व संयोग ! मांजल अंग्रेजी वजैत आ लिख्यैत छलि । फस्ट इयरमे ’विदेह’मे जे ओकर लेख छपैलक से लाजबाव रहैक – शीर्षक छल “Exclusively ours “| लेख मार्फत ओ ओकरा सभक कोठलीक पर्दा हटा भीतरक बहुत रास रहस्योदघाटन कएने छलि । मुदा ओ एक बर्षक बाद नहि जानि कतऽ चल गेलि ? धनीक बापक वेटी रहए । प्राय: ओ कलेज झुझाअन लागल हेतैक ।“ Exclusively ours”  एखनो कहियो काल पढि लैतछी मुदा शीर्षकक तात्पर्य वुझवामे एखनो माथमे बल देवऽ पडैत अछि । एकटा और घटना जकर हम सब कहियो नहि विसरि सकब । हम सव विश्वस्त छी जे जौ पत्र लेखनक शुरुआत मित्र दिनेश राय दिससँ होइत त ओहो ओइ घटनाक चर्च जरुर करैत । हम सव भाग्यवान रही जे ओहो कोनो ’नन्दी’ टाइटलवाली हमरे सभक ग्रुपक छलि आ वंगालिने छलि । ओकरा आँखिमे वास्तवमे एहन एकटा चमक छलैक जे आई ३६ वर्षसँ कतौ अन्तऽ नहिं अभरल, पता नहि ओ आँखि कतऽ अइ  ? ओइ बड़का – बड़का आँखिमे ओ चमक विद्यमाने छैक वा मलीन भेलैक अछि ? जे किछु । मुदा सारा काजेज ओ जादुई आँखि देखने छल – देखैत छल । अनहोनी भाऽ गेलै । एकटा हमरे सवहक सहपाठी लड़का ओकरा नाम पर – ओकर नाम लैत जहर खा लेलक मुदा समये पर अस्पताल पहुचाओल गेल आ जान वचि गेलैक । जंगली आगि जकाँ वात सौसे पसरि गेल । मुदा ओकरा लेल धन-सन । कोनो प्रतिक्रिया ने कोनो हलचल ने – सव किछु विल्कुल सामान्य । असलमे एक तरफा प्रेम छलैक । वात ओकरो तक जरुर गेल हेतै –लेकिन ओ वेहद गम्भीर जे छलि । Eng. Hons. Group मे टॉप कैलक । मुदा ओ जमाना वड़ वेजाए छलैक । लड़का – लड़कीमे बार्ताक संचार नहि होइत छलैक । लाख कोशिशक वाद हमरा आ दिनेशक मुँहसँ कंग्राच्युलेसन शब्द नहि फुटल – नहिए फुटल । कालेज आ संवेदनशील घटना – संवेदनशील घटना आ कालेज – जेना एक दोसरक पर्याय रहैक । कतेक वात भेल । कतेक घटना घटल । मुदा पहिने पत्राचारक क्रम त शुरु होवऽ । दिनेश वहुत वातक जानकारी करा सकैए – ओहि पानि क’ जे अइ । जन्मभूमि आ कर्मभूमि नेपाल भेलाक कारने बहुत रास अपन लोक छुटि गेल । ओना सीमा नहि बुझाइत छैक मुदा सम्पर्क जे टुटिगेल अछि । मुदा एकटा वात । एहि सन्धि-स्थल पर जीवाक अपन मजा छैक । कौखन उत्तराभिमुख, कौखन दक्षिणाभिमुख । दूटा संस्कृति मिश्रित जीवनक उत्फुल्लता – जुनि पुछू । पहाड़क गीत खोलामे झहरिकऽ समुद्रक लहरिमे विलन भऽ जाइत अछि । भास दू-मुदा भाव एके –ऐन-मेन । “जहाँ जहाँ वान्छौ तिमी, म पाइला वनि पच्छयाई रहन्छु “ तु जहाँ-जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा” । पहाड़क गीतक सन्दर्भमे १९७१ ई. क एकटा सांझ मोन पडैत अछि । काठमान्डौ सँ दूर उत्तर वालाजुउद्यानसँ उपर पहाडीपर English Language Trainning Institute द्वारा आयोजित वनभोज समारोह । नाच करैए ओ सव । कोन लड़का-कोन लड़की-नाचमे फर्क नहि वुझायत । निर्विकार । निर्विकार भऽ नाचत आ गाओत । मुदा एम्हर, अपना समाजमे लज्ज कलाके प्रस्फुटिता नहि होवऽ दैत छैक । गीत गओलक राममणि । सम्पूर्ण मण्डली अभिभूत आ मंत्रमुग्ध भऽ गेल । पहाडमे केवल निर्जीव पाथरे नहि होइत छैक । एकटा प्रशिक्षार्थी – एकटा शिक्षिकाक आँखिसँ नोर झहडऽ लागल आ समस्त वातावरण जेना जड़ भऽ गेल ।, ओ गीत एखनो कहियो काल हंमरा मन-प्राणके जेना आन्दोलित कऽ जाइत अछि – “कोई जव तुम्हारा हृदय तोड़ दे .......... “ दुर्गम पहाडी गाममे एहनो गीत गाओल जाइत अछि- आ ओतुक्को लोक ओकर तात्पर्य बूझि विभोर भऽ जाइत अछि – हमरा आश्चर्य लागि गेल । ओइ दिन हम पहाडक आँखि नोरायल देखने रही । स्पस्ट । निस्सन्देह । हमरा जनैत सैकड़ौ-हजारो वर्ष पहिने, कोनो युगमे ओइ गीत सँ बहुत बेसी, कैएक गुना वेसी दर्द-भरल गीत सुनि पहाड जे करुण क्रन्दन केने हैत तकरे फलस्वरुप एतेकं नदी नालाक जन्म भेल हैत । बहुत सम्भव गायक स्वंय Adam छल हैत आ सुननिहार ओकर प्रेयसी Eve । राममणि शर्मा ओहि दिन सँ हमर अभिन्न भऽ गेल । ओकर आ और कतेक साथी सभक पता हमरा डायरीमे ओहिना पड़ल अछि । आव त डायरीक पन्न जीर्ण-शीर्ण भऽ पीयर भऽगेल अछि । आइए ३४ वर्षक वाद एकटा पत्र हम और लिखव, एखने लिखव .........। १ जनवरी ,’०५ जनकपुरधाम दिनेश भाइ, नव वर्षक हार्दिक मंगलमय शुभकामना । आशा अछि लिफाफ पर हमरनाम पढलाक बाद हमरा चिन्हऽ मे एको क्षण देरी नहि लागल हैत । ओना किछु चौकल जरुर हैव । से त स्वभाविके ..........। कोनो अपराध वोध नहि भऽ रहल अछि । एकटा प्रश्न पुछै छियऽ । जीवन एना जटिल किएक भेल जा रहल छैक ? कतेक वेर विचार करैत छलहुँ ............ आई लिखैछी, काल्हि पक्के लिखव .......... मुदा आई ....... जावत दुनूपत्र हम लिखि नहिलेव, तावत हमराअ चैन नहि ........... चैन नहि .............। शान्ति सदन, ढुहवी-१ (धनुषा) बृषेश चन्‍द्र लाल- एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार कछमछी छुटिते नहि छैक । जखनसँ मकवानपुरक सेनगढ़ी दरबार देखिकए फिरलि अछि ओकर मस्‍तिष्‍कपर इन्‍द्रकुमारी छाएलि छैकि । १४ बर्षक इन्‍द्रकुमारी बाल राजकुमारी । लगैत छैक जेना ओ सभकिछु प्रत्‍यक्ष देखि रहलि हुअय । सोन।चानीक महीन कढ़ाईसँ युक्त चमकैत नीच्‍चातक सोहराइत घघरा, नितम्‍बतक लटकल कारी केशमे कलात्‍मक गुहल चोटीसँ सज्‍जित माथपर हीरा जड़ित मुकुट, डरकशसँ नापल गोल गिरहसनक डाँड़, बाँहिपर चमकैत बाजुबन्‍द, हीरा। मोती आ रंगबिरंगी रत्‍न जड़ित हारसँ सुशोभित कनेक्‍के उठल वक्ष, कानमे झुमैत झुमका आ कर्णफूल आदि।आदि । राजकुमारीक जाज्‍वल्‍य सौन्‍दर्यक काल्‍पनिक प्रतिमूर्त्ति ओकर मानसपटलपर निरन्‍तर बिम्‍बित भ। रहल छैक । ओहि राजकुमारीक दैवी सौन्‍दर्यक चर्च कोना गोरखा पहुँचल हएतैक ? सभकिछुमे राजकीय सत्ता तथा शस्‍त्र।शक्तिक बढ़ोत्तरीक योग।ह्रास देखि निर्णय लेबएबला धूर्त्त गोरखा युवराज पृथ्‍वीनारायण शाह आ ओकर सशस्‍त्र मण्‍डली एहि मादेँ कोना अपन प्रतिक्रिया देखओने होेएतैक ? कोना पहिने राजाक खोपीसभारुरुआ फेर तकरबाद भारदारीसभामेरुे मकवानपुरक राजा हेमकर्ण सेनक सुता राजकुमारी इन्‍द्रकुमारीसँ पृथ्‍वीनारायणक विवाहक प्रस्‍तावक योजना बनल हएतैक ? । आदि।इत्‍यादि प्रकरणसभक दृश्‍यसभ ओकरा आगाँ जेना सजीव भए एक।एक कए आबए लागल छैक ओ फेर करोट बदलैति अछि । ओही कोठरीमे लगले मायसंगहिं दोसर चौकीपर सुतलि आ कनेक्‍के काल पहिनेतक फुसुर।फुसुर बतिआइत बड़की भौजी ओकर कछमछी पकड़ि लैति छथिन्‍ह, । “मणिदाइ, निन्‍न नहि होइअ ? किछु होइअ की ?” “नहि, किछु नहि उ” । भाउजक प्रश्‍नसँ ओ अकचका जाइति अछि । “ तँ ओना किआ अहुरिया कटैति छी ?”। बड़की भौजी जेना कछमछी ठेकानि नेने रहथिन्‍ह । “नहि, किछु नहि होइअ । खाली वहए मकवानपुरगढ़ीक दृश्‍य आगाँ चलि अबैत अछि । ़़़ हेमकर्ण, इन्‍द्रकुमारी आ दिगबन्‍धन सेनक खिस्‍सा मोन पड़ि जाइत अछि उ” । ओ अपनाप्रति भाउजक चिन्‍ताकेँ हटाबक कोशिश करैति अछि । मुदा बड़की भौजी अपन स्‍वाभाविक व्‍युत्‍पन्‍नता छोड़यबाली नहि छथिन्‍ह । चट् दागि दैति छथिन्‍ह, ।“ आ की केओ ओतय मोनमे उतरि गेल अछि ? माय, देखथुन्‍ह , मणिदाइक मोनमे केओ चढ़ि गेल छन्‍हि बेटासभकेँ शिघ्र वर खोजय कहथुन्‍ह । देखै छथिन्‍ह, कोना करोट पर करोट फेरै छथिन्‍ह उ” माय बुझाइअ औंघा गेलि छथिन्‍ह । ननदि।भाउजक गप्‍पमे ओ कोनो उत्तर नहि देलखिन्‍ह । मणिकेँ भौजीक एखुनका परिहास नीक नहि लगलैक । चुप्‍पे आंखि मुनि लेलकि । सोचय लागलि, ।“खाली बिआहेटा कोनो जीवन छैक ? बिआह तँ मुदा प्रारम्‍भ अछि । बिआहक बादक सहयात्रा ने थिक जीवन उ की नारी सभदिन अनचिन्‍हारे सहयात्रीक प्रतीक्षा करैति रहति ? आ कतेको इन्‍द्रकुमारी अहिना जीवनक यात्राक पहिलुके पड़ाओपर अपन सहयात्रीक प्रतिक्षा करैति त्रासदीक खाढ़िमे ढ़केलि देलि जाएति ।आ ओकर सहयात्रीसभ ओकरा अनभुआर जंगलमे एसगर ठाढ़कए भगैत रहत । संग नहि देबकलेल अनर्गल आ अनसोहाँत असम्‍भव शर्तसभ आगाँ बढबैत रहत ? बेटीसभ अहिना चीज।वस्‍तु जकाँ निर्जीव नारी बनि तील।तील क। जड़ैति रहति ?” आक्रोश जेना मणिकेँ भीतरसँ आओर छटपटा दैछ । ओ एकबेर फेरो करोट फेरैति अछि । बड़की भौजी प्रायः सुति रहलि छथिन्‍ह । राति बेशी चढ़ि गेल छैक । ओहो अपनाकेँ शून्‍य करक यत्‍न करैति अछि । निन्‍नहेतु मनसँ बल करैति आँखि मुनि लैति अछि । राजकुमारी इन्‍द्रकुमारीक कक्ष । पलंगपर बैसलि राजकुमारी । उदास मुदा आंखि आक्रोशित लालतेस उ मुहँ लड़कओने ४/५ सखीसभ चारुकात घेरने । ककरो पदचापक ध्‍वनि अबैछ । सभ साकांक्ष भ। जाइछ । राजकुमार दिगबन्‍धन सेन प्रवेश करैत अछि । फिकिरसँ गलल मोनपर उदासी स्‍पष्‍ट छैक । सखीसभ् स्‍थिरसँ बहरा जाइछ । दिगबन्‍धन । बहिन उदास नहि होअअ उ निर्णय भ। गेलैक । हमरासभ अपन बहिनकहेतु सभ किछु न्‍योछावर क। देब । बहिनक भविष्‍य आ एहि क्षेत्रक मर्यादाक आगाँ एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार मूल्‍यहीन आ तुच्‍छ अछि । इन्‍द्रकुमारी । ( दौड़िकए अपन भायक छातीमे माथ सटाए कनैति ) नहि, भाई नहि । आब सेन राज्‍य आओर मानमर्दित नहि हएत ।बहुत भ। गेलैक । एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार हमरा।आहाँक नहि एहि राज्‍यक सम्‍पत्ति छैक । जनताक सम्‍पत्ति एकगोट राजाक बेटीकेँ दहेजमे नहि दिआ सकैत अछि । ओ सभक धरोहर छैक । एकदन्‍त हाथी केओ कमाएल नहि अछि , एहि क्षेत्र विशेषक हेतु प्रकृतिक विशेष आ अनुपम उपहार थिकैक । एहन गल्‍ती जुनि करब । दिगबन्‍धन । अपन जमायकेँ संतुष्‍ट नहि करय सकब एहि महाभारतक आगोसक सम्‍पूर्ण मध्‍यक्षेत्रक मर्यादाक विपरित हएत । इतिहासमे हमरासभकेँ कोसल जाएत बहिन जे सेन राजा अपन बेटीक बिरागमन दहेजक आभावमे ८ राजा, रानी, युवराजक व्‍यक्तिगत कोठरीके पहिने नेपाली दरबारी भाषामे खोपी कहल जाइक । ट्ट दरबारक सल्‍लाहकारसभके भारदार कहल जाइक । नहि क। सकल । जीवनधरि बेटी विवाहोपरान्‍त नैहरेमे रहि गेल ।  नहि बहिन नहि आब समय नहि छैक तैयारी मे लागलजाय । इन्‍द्रकुमारी । आ ई नहि जे सेन राजा अपन अबुझ जमायक अनर्गल माँगक आगाँ झुकि गेल जे सम्‍पूर्ण राज्‍यक सम्‍पत्ति सेनवंश एकगोट बुनल षड़यन्‍त्रक कारणेँ गोरखाक राजाकेँ विवश भ। चढ़ा। देलकैक ।हम नहि जाएब । हमहुँ अपन सम्‍पूर्ण जीवन न्‍योछावर क। देब दुनियाँकेँ देखा देबैक जे एहि क्षेत्रक नारी चीज नहि सृष्‍टिक बीज अछि । मानक माथ आ त्‍यागक शिर्ष अछि । दिगबन्‍धन । आह, बहिन उ एहन जीद्द जुनि करु । भ। सकैछ , एहिसँ एहि राज्‍यक सुरक्षापर सेहो असर पड़य । इन्‍द्रकुमारी । तँ करु युद्ध राज्‍यक अस्‍मिताक लेल युद्ध करब, आवश्‍यक पड़लापर शहीद हएब आहाँक धर्म थिक । राज्‍यक सुरक्षापर कोनो असर पड़ैत अछि तँ उठाउ तरुवारि हम नारी छी । नारीक अस्‍मिताहेतु , अपन पवित्रताहेतु अपनाकेँ न्‍योछावर करब हमर धर्म थिक ।नारी सभ किछुसँ दबि जाएत मुदा ओकर पवित्रता ओकर स्‍वाभिमान आ नारीत्त्‍व ओकर प्राणेासँ बढ़िकए थिकैक । हमरा उपहारक वस्‍तु नहि बनाउ, भाई उ दिगबन्‍धन कक्षक चारुकात आहत बाघ जकाँ धुमय लगैत अछि ।धम्‍म द। बहिनक पलंगपर बैस जाइत अछि आ ओकर माथ झुकि जाइत छैक । इन्‍द्रकुमारी । आहाँ तँ अँड़ल रहिऐक भाई कोना झुकि गेलिऐक ? कर्त्तव्‍यपर बहिनक ममताक छार पड़ि गेल अछि । सेन राज्‍यक राजकुमारकेँ राज्‍यक गौरव रक्षा करब पहिल काज छैक । बहिनक ममता नहि ।हम तहिये कहने रही । गोरखाक रितिरिवाज, राज्‍य प्राप्‍तिकहेतु किछु करक चलन, ठगी संस्‍कारक बारेमे सोचि लिअ । लिगलिगक चौरीमे चोरी क। बनल राजाक प्रस्‍तावमे जरुर किछु षड़यन्‍त्र हएत । मुदा हम तँ १४हे बर्षमे आहाँसभक बोझ बनि गेल रही । शायद कोनो त्रुटि भेल रहय तैँ एहन खानदानमे हमरा फेकक निर्णय कएल गेल । दिगबन्‍धन । नहि , बहिन उ अनजानमे भेल गल्‍तीक कारणेँ हृदयमे आओरो प्रहार नहि करु । अपन गल्‍तीक आगिसँ ई अपने दग्‍ध आ तप्‍त अछि । आहाँ हमरासभक गौरव छी । हमसभ तँ उत्तरक सभसँ शक्तिशाली राज्‍यक रानीक रुपमे आहाँकेँ देखय चाहलहुँ । इन्‍द्रकुमारी । शक्तिये प्राप्‍त कएलाक कारणेँ केओ नीक नहि भ। जाइछ, भाई । गुम्‍बजपर बैसल कौआ सभसँ नम्‍हर नहि भ। जाइत अछि । दिगबन्‍धन । इन्‍द्रकुमारी , हमर सोनसन बहिन उ (स्‍वरमे किंकर्त्तव्‍य विमूढ़ता स्‍पष्‍ट अछि ।) इन्‍द्रकुमारी । एकदन्‍त हाथी आ नौलखा हार दैये देलापर आहाँक बहिन खुश रहत ? निर्बाध सासुर भोगत तकर कोनो निश्‍चित ठेकान छैक ? काल्‍हि कतहुँ आओर किछु नहि माँगि लेअय ? सबसँ पहिने ओसभ विवाह होइते चतुर्थीयोसँ पहिने बरिआतीये संग बिदागरीक माँग कएने रहए । हमरासभक रितिरिवाजपर अपन चलन लादक कोशिश कएने रहए । एकरा संस्‍कृति आ परम्‍परापरक आक्रमण बुझू । आब दहेज मँगैत अछि । अड़ाकए । काल्‍हि फेरो कोनो नया बहन्‍ना खोजि लेत । भाई, हमरा तँ बुझाइत अछि ओ एहि औपचारिक वैवाहिक सम्‍बन्‍धक लाभ उठाए राज्‍यपर चढ़ाई क। देत ।एखन झुकक नहि तनक समय थिकैक, भावनामे नहि कर्त्तव्‍यमे बहक बेर छैक ई । बहिनसँ पहिने मातृभूमिक रक्षाक चिन्‍ता करु दिगबन्‍धन उठि जाइत अछि । ओकर गाल लाल भ। गेल छैक । बान्‍हल मुठि उपर उठि जाइत छैक । दिगबन्‍धन । एकदम ठीक कहलहुँ बहिन उ आहाँक साहससँ हम गौरवान्‍वित आ प्रेरित छी । बाबूसँ एखने निवेदन करैत छिअन्‍हि । ( तिब्र डेगेँ बहरा जाइत अछि । ) इन्‍द्रकुमारीक आँखि क्रोध आ आक्रोशसँ लाल भ। गेल छैक । बुझाइत छैक जेना बाहर निकलयलेल आरत होइक । ओ अपन कसल मुठिसँ घघरा उठाकए दाँत कटकटअबैति झारि दैति अछि । ङ्ग ङ्ग ङ्ग ङ्ग मणि धड़फड़ाकए उठलि । मुठि ओकरो कसल रहैक । बड़की भौजी तखने प्रवेश करैति रहथिन्‍ह । अपना हिसाबेँ अर्थ लगाइये लेलखिन्‍ह, । “मणिदाई, सपनाइत छलहुँ ? सुतलमे कसैत देह देखिते हमरा बुझा गेल छल ।देह दुःखाइत हएत ” । फेर हँसैत कहलखिन्‍ह, । “बादक इन्‍तजाम तँ भायसभ करताह । छोटकी चाय बना नेने अछि । नेने अबैत छी ।” मणि किछु नहि बाजलि । बड़की भौजी बाहर निकलि गेलि रहथिन्‍ह । ओ पलंगसँ चुपचाप उतरि ब्रसमे पेष्‍ट लगाबए लागलि । कुमार मनोज कश्यप।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। नव-वर्ष शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल कें स्वागत करय मे बेहाल़़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ। धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ़ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल आछ़़ नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ। मुदा सब केयो थोड़बे? शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा  पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' ''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प््रायास केलक सुकना। चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लागि गेलै- ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छि? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक??'' सुकना एहि अबोध कें कोना समझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जँका होईत छैक। बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक। एत’ आ ओत’- अनलकान्त

आइ-काल्हि कनाट प्लेस मे चलैत-चलैत हमरा लगैत अछि, अपना गामक दशहरा·मेला मे घूमि रहल छी। नइँ, ओत’ मेला मे रंग-बिरही चीज कीनि पबैत रही, नइँ एत’ शो-रूम मे ढुकि पयबक साहस क’ पबै छी। किलोक किलो रसगुल्ला-जिलेबी तौलबैत आकि मारते रास खिलौना ल’क’ जाइत लोककेँ  डराइत-ललचाइत देखैत रही ओत’ आ एत’ विशाल-भव्य मॉल आ नेरुलाज-मैकडोनाल्ड सँ चहकैत फुदकैत बहराइत अर्द्धनग्न अप्सरा केँ इन्द्र-बेर संग रभसैत, डेटिंग फिक्स करैत ईर्ष्या आ क्रोध सँ देखै छी।

राष्ट्रपति भवनक पिछुआडक जंगल मे एक दिन एक टा बेल गाछ लग कनेकाल ठमकल रही। ओकरा जडि़ मे किछु माटिक महादेव फेकल छल, किछु निर्माल्य आ कातक झोंझि मे कोनो साँपक छोड़ल केंचुआ पुरबाक सिहकीमे डोलि रहल छल। हमर आँखि क्षणभरिक लेल मुना गेल। ओत’ एहने सन एकटा बेल गाछ तर हमर बालपनक प्रियाक गर्दनि भूत मचोडऩे छलै। ओकरा मौनी मे कामधक चूड़ा ओहिना नजरि पड़ै अछि!... मुदा हम कतहुँ हेरायल-भोतिआयल नइँ रही।हम राष्ट्रपति भवनक पिछुआडि़क जंगल मे ओही बेल गाछ लग ठाढ़ रही। हमराओही आसपास मे एक टा अस्तबलक रिपोर्टिंग करबाक छल जत’ सँ करिया घोड़ाक नालक स्मगलिंग होइत छलै। से ओहि बेरहट-बेरा मे भुखायल सन हम अपन रिपोर्ट पूरा करबाक ओरिआओन क’ रहल छलहुँ कि अचानक एक टा गमक हमरा विचलित क’ देलक। गाम मे नवका धान-चूड़ा कुटैकाल जे गमक बहराइत छल, एकदम वैह गमक छल! आसिनक बसात अगहनी भ' गेल छलै।... मुदा हमर मन बताह हेबाक सीमा धरि अवसादग्रस्त भ' गेल।

ओहिना एक साँझ कुतुब मीनार लग सँ गुजरि रहल छलहुँ। एक टा छौंड़ी अपन संगी छौंड़ा केँ जोर-जोर सँ बता रहल छलै जे ओकर सपना मीनारक एकदम ऊपर सँ दिल्ली देखैत रहबाक छै। हम सर्दिआयल भुइँ पर लगाओल पुआरक सेजौट परक सपना मन पाडय़ लगलहुँ कि तखने हमरा मोबाइल पर बीड़ी साँग बाजल। छोटकी मामक फोन छल। ओ कनैत-कनैत बाजलि, ''देखियौ यौ भागिन बाबू, आब हम की करबै!... बैमनमा सब हुनका सी.बी.आई. सँ पकड़ा देलकनि। फुसियेपाइ लेबाक नाटक मे ओझराक'...।" हमर मामा इनकम टैकस कमीशनर। हम एक-दू बेर गेल छी हुनका 'रेजीडेंस' पर, मुदा हमरा डेरा मोबाइल पर हुनका लोकनिक सर्दिआयल स्वर आ किछु एसएमएस टा आयल अछि। तखन अपना भीतरक भाव नुकबैत हम की आ कोना बाजल, से मन नइँ अछि। हमर अदना-सन पत्रकार काज नइँ अयलनि, अपने पाइ वा जे कथुक एकबाल!... से बात जे-से। मोबाइल स्वीच-ऑफ क' हम जेब मे रखनहि रही कि हमर मन-प्राण एक टा टटका गमक सँ सराबोर भ' गेल। धनिया, सरिसो सभ देलाक बाद झोर मे टभकैत माछक तीमन सँ घर-आँगन मे जे गमक पसरि जाइत छै, सैह गमक हमरा मतौने जा रहल छल। हम अगल-बगल हियासल जे कतहु ककरो घर वा झुग्गी मे रन्हा रहल होयतै, मुदा ओहि झोलअन्हारी मे हमरा चारूभर जंगल-झाड़ आ करकटक अम्बार छाडि़, किछु तेहन नइँ देखा पड़ल जत' ओहि गमकक स्रोत ठेकानि सकितहुँ। अंतत: हम अपन जेब मे हथोडिय़ा देब' लगलहुँ जे माछक इंतजाम भ' सकै छै वा नहि!...

हाले मे हम अपन सेठक कृपा सँ महीनबारी गुलामी सँ मुक्त कयल गेल छलहुँ। आब हम तथाकथित 'स्वतंत्र' दिहाड़ी मजदूर छी। आ दिहाड़ी पर खट'वलक कपार मे जे बौअयनी लिखल रहै छै, से हमरो संग छल। आ तेँ ओत' सँ एत' आयल मैथिल लोकनि सँ भेंटघाट सेहो किछु बेसी भ' रहल छल। से एक टा एहने भेंट मे हमर एक ग्रामीण कहलनि, ''बाउ, ई नगर तेजाबक नदी थिक जाहि मे अपन मैथिले टा नहि, कोनो मनुक्ख बाढि़ मे भसिआइत माल-जाल, घर-द्वार आ लोकवेद जकाँ निरुपाय अछि।"

कि मधेपुरा-सिंहेश्वर दिस सँ आयल एक टा युवक बाजल, ''हौ भैया!,बाजार, मशीन आ सीमेंट तर दबैत-मरैत लोकक नगर छियह ई।"

''हँ, भाइ, ठीक कहलह! मुदा ओत' दलदलो मे जकरा जगह नइँ भेटलै, ओ एत', बारूदक ढेरी पर सही, एक टा नव मिथिला तँ बसबै छै!..." बजैत-बजैत हम हकम' लागल रही आ भीतर पसेना-पसेना भ' गेल रहय।

से लगातार एहने सन मन:स्थिति सँ गुजरि रहल छलहुँ हम। आ, यैह पछिला पखक गप्प थिक। एक साँझ विद्यापति बाबाक बरखीक हकार पूर' हम नोएडा गेलहुँ। ओत' बहुत दिन पर भेटलाह, बतौर कलाकार दरभंगा सँ आयल मिथिला नरेशक अंतिम पुरोहितक परपौत्र महानंद झा। आयोजक सँ पूरापूरी विदाइ असूलि अटैची डोलबैत फराक भेले छलाह कि हम नमस्का कयलियनि। बहुत बरखक भेंटक बादो चिन्हलनि आ एक कात ल' जाक' हाल-चाल पूछ' लगलाह। गप्पक क्रम मे ओ बेर-बेर एम्हर-ओम्हर ताकथि। कि हम पुछलियनि, ''किनको तकै छी की?"

''हँ यौ! दरभंगक कमीशनर साहेबक बेटा एत' प्रोफेसर छथि। ओ हमरा अपना ओत' ल' जाइवला छलाह। देखियौ ने, हुनकर आग्रह देखि हम अपन सभ प्रशंसककेँ निराश क' देलियनि। सांसद जी धरि सँ लाथ क' लेलहुँ। असल मे होटल मे हमरा जहिना जेल बुझाइ अछि, तहिना नेता सभक ठाम मेला बुझाइछ। तेँ हम कतहु जाइ छी तँ अपने कोनो समाँगक घर रहै छी।" चेहराक बेचैनीक बादहु महानंद जीक स्वर समधानल छलनि।

''से तँ नीके करै छी!" हुनक बेचैनी कम करबाक लेल हम आश्वस्त कयलियनि, ''कहने छथि, तँ अबिते हेताह!" ''से आब नइँ लगै अछि। चारिए बजेक टाइम देने रहथि। कोनो मीटिंग मे फँसि गेल हेताह। ...देखियौ ने, हम ने पते लेने छी, ने फोन नंबर। आब तँ अवग्रहमे पडि़ गेलहुँ।" हुनक परेशानी आब सभ तरहेँ प्रकट भ' रहल छल।"

हमरा साफ लागि रहल छल जे ओ होटलक खर्च बचब' लेल ठहार ताकि रहल छथि। एम्हर हमरा ई डर किछु बजबा सँ रोकै छल जे नइँ जानि कते दिन धरि मेहमानी डटाओताह। अंतत: पुछलियनि, ''कहियाक वापसी अछि?"

''परसू साँझ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस पकड़बाक अछि। टिकटो आर.ए.सी. 27 सँ कन्फर्म भेल वा नइँ, मालूम करबाक अछि।" आ हमरा हाथ मे मोबाइल देखि झट जेब सँ टिकट बहार कयलनि, ''देखियौ तँ मोबाइल सँ, टिकटक स्टेटस की छै?

दुइए दिनक बात निश्चित जानि हम हिम्मत कयलहुँ, ''ई कोना देखै छै, से हमरा नइँ पता! हमर कनियाँ देखि सकै छथि। आ से तखने हैत जँ अहाँ हमरो अपने समाँग बुझी आ हमरे घर दू दिन लेल चली।"

''आ से की कहै छिये! अहाँ तँ अपनो सँ अपन समाँग छी। हम तँ घरेक लोक बुझै छी अहाँ केँ। ठीक छै, अहींक घर जायब। ओ प्रोफेसर आब आबियो जयताह तँ हम नइँ जायब हुनका ओतय। ओ तँ कमीशनर साहेब अपनहि फोन क' कहलनि चलै काल तेँ सोचल!!... धौर, छोड़ू आब ओहि गप्प केँ। आ ओ हमरा संग चलबा लेल अगुआयले सन छलाह।

हम नइँ चाहैतो अपना परतारि रहल छलहुँ जे एतक पैघ कलाकार दू दिन हमरा घर रहताह। से बसक भीड़ो मे ठाढ़ हम हुनके स्वागत-सत्कार मादे सोचि रहल रही।

किछु काल बाद हम सब यमुना विहारक स्टैण्ड पर बस सँ उतरलहुँ। मेन रोड छोडि़ अपना गली मे ढुकले रही कि गलक ओहि छोर परक चाह दोकानवला छौंड़ा गणेश पाछाँ सँ चिकरिक' सोर पाड़लक। ओकरा दोकान मे हमर अबरजात किछु बेसी छल। अपन भाषा भाषीवला लगाव सेहो रहय। आ ओ छौंड़ा एक तरहेँ हमर मुँहलगुआ जकाँ भ' गेल रहय। हम ओकरा गाम-घर सँ भले परिचित रही, मुदा हमरा मादे ओ नइँ जानि सकल रहय। मुदा तखन हमरा पाछाँ घुरिते ओ पुछलक, ''अहाँक घर सहरसा लग, बिहरा छी ने!"

''से के कहलकौ?" हम अकचकाइत पुछलिऐ।

''अहीं गामक भोला कामति। ओ हमर मामा छिये।" गणेश बिहुँसि रहल छल, जेना ओ कोनो बडका जानकारी हासिल क' लेने छल।

''कत' छौ भोला?"

''भोर मे आयल रहै। दुपहरिया मे चलि गेलै। भोरे अहाँ केँ बस पकड़ैत अचानके देखलकै ने तँ बाजल, ''ई तँ धीरू भैया लागै छौ रे गणेसबा!"  हम कहलिऐ, ''हँ, धीरजी...बड़का पत्रकार छिये! तों कोना चिन्है छक?... " आ तखन ओ मारते सब टा कहलक।... आगाँक बात ओ छौंड़ा हमरा संग मे अपरिचित देखि नइँ बाजल।

''गेलौ कत' भोला?"  हम बात केँ भोला दिस मोड़लहुँ।

''ओ बदरपुर मे रहै छै। काल्हि-परसू धरि फेर अयतै। एत्तै दोकान शुरू करैवला छै! "

एते काल मे हम ओकरा दोकानक भीतर राखल बेंच पर बैसि चुकल रही।महानंद जी सेहो। गणेस चाह बनब' लागल छल।

सहसा महानंद जी बजलाह, ''एत' तँ डेग-डेग पर अपन मैथिल भेटि रहलाह अछि आ से मैथिली मे बजैतो छथि। अपना दरभंगा-मधुबनी मे चाह-पानवलाक कोन कथा, रिक्सावला धरि केओ मैथिली मे जवाब नइँ देत।

हमरा किछु बाजब जरूरी नइँ बुझायल। चाहक पानि एखन खदकिए रहल छलै कि गणेश पुछलक, ''किछु खयबो करबै, सर? "

''हँ! कहि हम महानंद जी दिस तकलहुँ, ''अंडा लैत छी की?... लैत होइ तँ आमलेट-टोस्ट बनबा ली!"

''हँ, लिय!"  क्षणभरि बिलमक' ओ बजलाह, ''यौ धीरजी, आब दूध-दही लोक केँ भेटै नइँ छै। सागो-पातक दाम नइँ पुछू, आगि लागि गेल छै।तिलकोड़क तरुआ कते साल भ' गेल, जीह पर नइँ गेल। तखन ईहो सब नइँ खाइ तँ जीबी कोना? फेर विज्ञानो कहै छै जे ई पोष्टिक चीज छिये।"

हमरा हँसी जकाँ लागि गेल। तत्काल किछु बाजल नइँ। चलै काल गणेश केँ लग बजा किछु तिलकोड़क पात पार्ककक कात सँ आनि देब' कहलहुँ। महानंद जी उछलि गेलाह, ''अयँ! एत तिलकोड़क पात! आब तँ दरभंगो मे नइँ देखाइ छै!"

आ तहिना हमरा कनियाँ हाथक दर्जन सँ बेसी तरुआ चट क' बजलाह, ''असली मिथिला तँ आब दिल्ली आबि गेल। दरभंगा मे आब कहाँ छै ओ बात, कहाँ छै ओत' ई मैथिलानीवला हाथ!..."

हम सभ दू दिन हुनक खूब स्वागत-सत्कार कयल। ओ ओहि अंतराल मे अनेक बेर, अनेक तरहेँ, एहन-एहन अनेक बात बजलाह। हमसभ कृत-कृत! जयबा काल हमर कनिया हुनक आर.ए.सी. वला आधा बर्थक नंबर सेहो पता क' देलकनि आ बाट मे खयबा लेल पराठा-भुजियक एक टा पैकेट पकड़ौलकनि। ओ खूब-खूब आशीष दैत बहार भेलाह।

हुनका अरियातैत हम गली सँ गुजरि रहल छलहुँ। गणेशक दोकान लग एखन पहुँचले रही कि भोला पर हमर नजरि गेल। तखने ओहो हमरा देखलक आ बाढि़क सोझाँ आयल। हम दुनू गोटे एक-दोसरा सँ लिपटि गेलहुँ।

कि तखने ओकरा पाछाँ लागलि एक स्त्री सेहो मुस्किआइत लग आयलि।अबिते ओ हमर पयर छूबि लेलक। हम तुरत चिन्हि नइँ सकलहुँ। हमरा अकचकायल देखि वैह बाजलि, ''हमरा नइँ चिन्हलहक कका!... हम मीरा!"

''ओ!... सैह तँ हम अँखियासै रही।.. " हमरा सोझाँ ओकर अठारहक बयस वला विधवा-जीवन नाचि गेल छल।

आगाँ भोला बाजल, ''हमरा दुनू आब संगे छियह। कयाह तँ सिंहेसरे मे केलिऐ, लेकिन गाम जाइ के हिम्मत नइँ भेलह।"

हमरा अतिशय प्रसन्नता भेल। मुदा तकरा व्यक्त करबा लेल शब्द नइँ भेटि रहल छल, ''बड़ बढिय़ाँ! चलह दुनू गोटे पहिने डेरा। बगले मे छै।... हम झट हिनका बस मे बैसा केँ अबै छियह।"

कि भोला पनबट्टी खोलि अपना हाथक लगाओल पान देलक। महानंद जी सेहो खयलनि। फेर महानंद जीक संग मेन रोड दिस बढ़लहुँ।

बस· प्रतीक्षा मे ठाढ़ महानंद जी सँ हम कहलहुँ, ''ई मीरा हमर पितिऔतक बेटी छी। बचपने मे विधवा भ' गेल छलि।... आइ तकरा सोहागिनि देखि मन पुलकित भ' गेल।"

सहसा महानंद झा पुछलनि, ''ई भोला कोन जातक थिक?"

हमरा कनपट्टी पर जेना चटाक द' बजरल! ''कीयट"...

''अयँ यौ, ओत'क सब टा गौरव-गाथा बिसरा गेल? बाप-दादक नाँ-गाँ...पाग-पाँजि-जनेउ सब? ...ब्राह्मणक विधवा बेटी कीयट संग! ...दुर्र छी!" आ महानंद झा भोलक देल पान बगलक नाली मे थुकडि़ देलनि।

हमर मन घिना गेल। हम नहुँए, मुदा कठोर स्वर मे बजलहुँ, ''अहाँ केँ पता अछि हमर कनियाँ कोन जातक थिकी? ...जकरा अहाँ सभ मलेछ कहै छिऐ!..."

महानंद झाक मुँह लाल भ' गेलनि, मुदा बकार नइँ फुटलनि। तखने बगल मे आबिक' रुकल एक टा ऑटो मे झट द' बैसैत 'स्टेशन' शब्दक उच्चारण करैक संग मुँह घुमा लेलनि। ऑटो आगाँ बढि़ गेल।

हमर मन कहलक, ''ओ तत्काल एत' सँ भागबकक· लेल हवाइ जहाज पकडि़ लेथि, मुदा हमर कनियाँ देलहा पराठा-भुजिया नइँ फेकि सकताह।

सहसा दुर्गंधक तेज भभक्का लागल। जेना ओत'क कोनो सड़ल पानिवला पोखरि गन्हा रहल हो!... प्रेमचन्द्र मिश्र-(१९८२- ) अनाम कथा भरत झा बजलाह जे चलु कुल मिलाकय बात बरियातीक ६५ टा आ आब दिनक निर्णय कएल जाएत। तखनहि प्रेमचन्द्र बजलाह जे ई निर्णय गामपर बाबूजी करताह कारण जे हमरा बहुर सर-कुटुम छथि आ सभकेँ सूचना (नोत-हकार) सेहो देनाय छैक। भरत झा बजलाह- ई सत्य अछि, कोनो बात नहि, हम दिन ताकैत छी आ फोन कय देबनि वा भेट कऽ लेल जाएत। बस किछु समय पश्चात् पतराक अनुसार दिन भेल- २०, २१ अप्रील आ २,३ मई। ई सूचना देल गेल, फेर बड़हरा (गाम)सँ किछु दिन बाद सूचित भेल जे २१ अप्रील क ठीक रहत, तदुपरान्त प्रेमचन्दकेँ पिताजी गामसँ कहलथिन जे कपड़ाक खरीदारी दिल्लीमे कऽ लिअ आ जेवर सभ एहिठाम (गाममे) खरीदब। कपड़ा खरीदल गेल, विवाहक, कनियाक लेल, कनिया बहीन लेल, भौजीक लेल, मायक लेल आ विधकरीक लेल आ घरक प्रत्येक सदस्यक लेल। २१ अप्रील कय दिनक विवाह छल। कन्या पक्ष आ वर पक्षक बीच सहमति छलनि जे दिनक विवाह छैक ताहि हेतु हाथ धरएके लेल समयसँ पहुँचब आ बात भेल जे दू आदमी हाथ धरैक लेल अएताह। एम्हर वर पक्षक ओहिठाम सबेरेसँ चहल-पहल छल। गाम-गामक बच्चा वा स्त्रीगण दू दिन पहिनेसँ आयल छल। पुरुष लोकनि सेहो सबेरे पहुँचलाह कारण जे दिनक विवाह छै ताहि हेतु बरियाती सेहो जल्दी जयबाक विचार छल आ दूरी वा सड़कसँ सभ अवगत छलाह। गामक धाय-माय सेहो एक अँगनासँ दोसर अँगना कय रहल छली। ताबत धरि लगभग २ बाजि गेल घड़ीक अनुसार लेकिन कन्या पक्षक कोनो पता नहि देखि बच्चा सबक भीतरक उत्साह कम भऽ रहल छल! करीब चारि बजेक लगभग एकटा आदमी राजू, दिलीप झाक जेठ सार, संवाद लऽ कय अयलाह जे किछु विलम्ब भय गेल ताहि लेल क्षमा करब। लगभग ५ बजेक करीब एकटा मार्शल (गाड़ी) दरबाजापर लागल। ओहि गाड़ीसँ चारि टा सज्जन उतरलाह आ एकटा चारि सालक बच्चा सेहो, कुल मिला कय पाँच! ई देखितहि दाइ-माइ कनफुसकी करए लगलीह जे कहने छलथिन दू आदमी आ पहुँचलाह पाँच! पुरुष वर्ग आगन्तुकक सेवामे जुटलाह। विश्वनथवा सभकेँ पानिसँ पएर धोबि कय अपन काज सम्पन्न कयलक। तावत कियो ठंढ़ा पानि अनलक आ ई काज सभ पूरा भेलाक बाद पुरुष वर्ग बजलाह जे अँगनामे दाय-माय सब कने अहाँ सभ अपन काज जल्दी करू, कारण जे पहिलेसँ विलम्ब भऽ गेल अछि। अँगनामे गोसाउनिक आ ब्राह्मणक गीत शुरू भेल। सभ दाय-माय अँगनाक माँझमे मरबापर गीत गावैत छलीह तावत एकटा बच्चा एकटा लोकल ब्रिफकेश लऽ कय पहुँचल। प्रेमचन्द पश्चिम दिशाक घरमे पलंगपर बैसल भौजी आ बहिनसँ वाच कय रहल छलाह। ब्रिफकेशकेँ देखि विभा (बहीन) भौजीसँ कहलथिन अहाँ सभ बात करू, हम कनी ब्रिफकेशक समान देखैत छी आ ओऽ मरबा दिश निकलि पड़लीह! तावत धरि एकटा बुजुर्ग महिला ब्रिफकेश खोललन्हि। प्रेमचन्द्रक नजरि पड़ि गेल तौलियापर जे पीयर रंगक दु-सूतीक छल। ई देखते दाय-माय एक दोसरकेँ मुँह दिश देखऽ लगलीह जे ई केहेन आदमी अछि, आयल अछि मार्शलसँ आ कपड़ा देखियौ। तौलियाकेँ देखिते प्रेमचन्दक क्रोध आसमानकेँ छूबि लेलक। ओऽ दू डेगमे बरन्डा फानि कय मरबापर पहुँचलाह आ कपड़ा साड़ी आ ब्रिफकेश देखैत बजलाह जे दाय-माय ई बन्द करू आ गीत-नाद सेहो। हम विवाह नहि करब। ई सुनिते बिभा हुनका सम्हारैत बजलीह, बौआ की भेल अहाँकेँ? अपन क्रोधकेँ शान्त करू, दलानपर लोक सभ की कहताह। दू मिनटमे अँगनामे गीतक बदलामे सन्नाटा भय गेल। आब दाय-माय गीत की कहती, सभ कहलथिन जे अहाँ चुप रहू, की हेतै। अहाँ एतेक खर्च कएलहुँ, तिलक नहि लेलहुँ आ कपड़ा वा समानक लेल की हल्ला करैत छी। प्रेमचन्दक जवाब छलनि, जे हम विवाह नहि करब। ई बात भय रहल छल की गीतक अवाज बन्द सूनि ४-५ टा बुजुर्ग पुरुष  वर्ग दरवाजासँ अँगना पहुँचलाह आ ई दृश्य देखि सभ हुनका बुझाबय लगलाह आ कहलथिन दाय-माय अहाँ सभ आगू काज करू! आ ओ लोकनि प्रेमचन्दकेँ पुनः पछबरिया घरमे लय गेलाह। किछु पुरुष वर्ग आगन्तुक देख-भाल कय रहल छलाह। पुरुष-वर्ग मे सँ एकटा काका पुछलथिन जे बौआ की भेल, शान्तिसँ बाजू। बिभा एकटा गिलासमे पानि दैत कहलन्हि जे कपड़ा सभ नीक नहि छैक काका। काका बजलाह जे ई तँ छोट बात अछि। ई तुक्षताक प्रतीक छी! अहाँ शान्त रहू, अहाँकेँ केहेन चाही हम मँगवा दैत छी। एक घंटामे बजारसँ उपलब्ध भय जायत! प्रेमचन्द जवाब देलखिन जे काका, बात कपड़ाक नहि अछि, कारण जे हम स्पष्ट कहने छलियनि जे हमरा किछु नहि चाही। लेकिन जँ अपने किछु अनबए तँ समान नीक कम्पनीक चाही। ई तँ हमरा बेवकूफ बनओलथि! हमरा बातक दुःख अछि! जँ अपनेकेँ हमरा बातपर विश्वास नहि अछि तँ भौजी (महारानी) केँ पुछल जाय! आ अबाज देलखिन यै भौजी, अहाँ एम्हर आऊ! भौजी शब्द सुनिते महारानी उपस्थित भेलीह आ बजलीह जे बौआक बात १००% सही छनि। कन्यागत गलत काज कयने छथि, एहिमे कोनो सन्देह नहि! ई बात पूरा होमयसँ पहिने बिच्चेमे प्रेमचन्द बजलाह जे हम विवाह नहि करब कारण जे कि पता ? ओ हमरा लड़कीमे सेहो ठकताह। लेकिन बात आब इज्जत आ मान-मर्यादाक अछि, जँ विवाह नहि होएत तँ दुनू पक्षक इज्जत बर्बाद भय जायत! एक-दिश इज्जत, मान-मर्यादा आ दोसर दिशसँ दू-टा जिनगीक प्रश्न। समस्या जटिल अछि, कोनो सन्देह नहि! लेकिन छी तँ मैथिल आऽ मान-मर्यादासँ पैघ जिनगी नहि अछि। जे मान-मर्यादा ककरो लेल अभिशाप बनि जाइत अछि! हम सभ मैथिल जे किछु छी, बाप-दादाक पाग छी, जिनगीक कोनो मोल नहि! मोनमे एक हजार प्रश्न अबैत अछि जे हम मैथिलगण विश्वमे सभसँ बेशी चतुर छी आ तखनो सभसँ पाछू छी, तेकर की कारण अछि? हमरा नजरिमे जे हम सभ भूतकेँ बेशी महत्व दैत छी आ भविष्यकेँ गला दबा दैत छी, सेहो बहुत आसानीसँ हमरा लोकनिकेँ कनियो हिचकिचाहटि नहि होइत अछि! प्रेमचन्दक एकेटा उत्तर छलनि जे किछु बीति जाएत, हम विवाह नहि करब। कारण जे हमरा आब हुनका सभ (कन्यापक्ष) पर विश्वास नहि अछि। दाय-माय गीत तँ गबैत छलीह लेकिन श्वरमे उदासी गीत छल। गोसाउनिक (हे जगदम्बा जगत माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे), लेकिन श्वर सुनयमे लागैत छल जेना उदासी गाबैत छथि। अँगनाक माहौल खराब भय गेल छल। लगभग एक घंटा बीति गेलाक उपरान्त जखन कोनो तरहसँ मानैत नहि देखि भीम मिश्र (प्रेमचन्दक पिताजी) बजलाह- आब हमरोसँ बर्दाश्त नहि भय रहल अछि आ हमरो निर्णय अछि से अहाँ सुनू- जँ अहाँ विवाह नहि करब तँ हम आत्म हत्या कय लेब। आब अहाँक हाथमे गेंद अछि! निर्णय अहाँकेँ लेबाक अछि जे की करब। पहिल निर्णय विवाह ओहि लड़कीसँ करब आकि दोसर निर्णय हमर दाह-संस्कार करब? कारण हम अपन जिबैत अपन पुरुखाक इज्जत नहि गवाँ सकैत छी। ई कहि ओ ओहिठामसँ उठि चलि पड़लाह। हुनका उठिते सभ पुरुषवर्ग ठाढ़ भय गेलाह आ एकक बाद एक दरबज्जा दिस बिदा भेलाह। हुनका (भीम मिश्र) केँ बुझबैत जे अहूँ एना नहि करू, ओ बात मानताह अहाँक आ अहाँसँ पैघ हुनकर अपन भविष्य नहि छनि। सभ मड़वापर ठाढ़ गप्प करैत छलाह। एतबेमे प्रेमचन्द घरसँ निकललाह आ आँखिमे दहो-बहो नोरक मुद्रामे पिताक पएर पर खसैत बजलाह जे हमरा माफ करू आ करुण स्वरमे बजलाह, जखन श्रवण कुमार मातृ-पितृक लेल अपन प्राण न्योछावर कय देलन्हि तँ हम अपन पिताक लेल अपन भविष्यक बलिदान दैत छी। लेकिन किछु शर्त अछि, भीम मिश्र बजलाह- मंजूर अछि। पहिल शर्त हम कन्यागतक समान नहि लेब दोसर हुनकर गाड़ीपर नहि जाएब तेसर देल गोरलगाइक रुपैया नहि लेब। ई शब्द सुनैत सभ दाय-माय समेत उपस्थित पुरुषवर्ग आ नेना-भुटकाक हृदय सेहो करुण भय गेल! प्रेमचन्दकेँ उठबैत भीम मिश्र करुण स्वरमे बजलाह- हे दाय-माय। जल्दी-जल्दी अपन काज करू। हजामकेँ अबाज दैत कहलथिन- अहाँ जल्दीसँ स्नानी चौकी धो कऽ आनू। फेर अबाज देलखिन- भोगी पाहुनकेँ जल्दीसँ खानाक व्यवस्था करू! ई शब्द सुनितहि सभ बिहारि जेना काज करए लगलाह आ लगभग २०-२५ मिनटमे सभटा काज भऽ गेल। एतबामे जयदेव मिश्र बसकेँ दरबज्जापर लगबैत सभ बरियातीकेँ बसमे बैसबैत बजलाह- भीम भैया हम बसमे सभकेँ बैसा लेलहुँ। अहाँ- मार्शल दिश इशारा करैत- बैसू। प्रेमचन्दक आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार जकाँ नोर बन्द होइके नाम नहि लैत छलनि। बड़की भौजी एक आँखिमे काजर कऽ आबथि जा दोसर आँखिमे करतीह ताधरि ओ काजर नोरक रूपमे परिवर्तित भय नीचाँ चलि आबनि। हुनकर बुझु अधा आँचर नोरमे भीजि कय गुलाबी साउथ शिल्कक साड़ी काजरमय भय गेलनि आ हुनका किछु खबरि तक नहि! एहि तरहेँ ओहिठाम हाथधरीक विध पूरा भेल आ बर आ बरियाती प्रस्थान कयलक! ड्राइवर गाड़ीकेँ तेज चलाबयके प्रयास करैत लेकिन गामसँ तीन कि.मी. क बाद रस्ता सेहो नीक नहि। गाड़ी आगू जायके नाम नहि लैत छल जेना सभटा केँ मुहक्षी मारि देने हो। कोनो तरहेँ वर आ बरियाती गन्तव्य तक पहुँचल। ओहिठामक दृश्य तँ बहुत रमणीय छल। नीक पंडाल जे बहुत नीक सुसज्जित नीक-नीक मधुर स्वरमे मैथिली कैसेट सँ स्टीरियोक अवाज मोन मोहित कय रहल छल। ई दृश्य देखि बरियाती लोकनिकेँ विश्वास नहि भेलनि जे एहिठाम हमर बैसबाक व्यवस्था अछि! ओ सभ तुलना करए लगलाह ब्रिफकेश आ कपड़ाक जे वरक लेल गेल छल आ ओहि सजावटक। हुनका लोकनिकेँ विश्वास नहि होइत छलनि जे समान एहिठामसँ गेल अछि। तावत अवाज आबए लागल जे अपने सभ बैसल जाऊ, सरकार ठाढ़ कियैक छी? ओम्हर सँ दिलीप झाकेँ कियो अवाज देलखिन जे हजमा कतऽ गेलाह। बरियातीकेँ पएर धो कय शुद्धिकरणक विध पूरा करबाऊ! पंडालमे सभटा आधुनिक सुविधा उपलब्ध छल! किछु नवतुरिआ लोकनि पेपसी आ पेयजल तँ कियो बिगजीक समान बन्द डिब्बामे ल कय उपस्थित भेलाह! बरियाती लोकनि शहरी मजा लऽ रहल छलाह। लेकिन प्रेमचन्दक आँखिसँ नोर बन्द हो से नामे नहि लऽ रहल छल। ओ मोने-मोन अतेक दु:खी छलाह जेना शमसान घाटमे कोनो मुर्दाक अन्तिम संस्कार हो। करीब बीस मिनटक बाद गामक नवतुरिआ लड़की आ नेना भुटका पंडालक पाछूसँ अबाज देलथिन जे वरकेँ कहियन्हु कनि पागक लटकैत भागकेँ आगूसँ उठा देथिन ताकि ओ लोकनि वरकेँ देखि सकथि। किछु नवतुरिआ लड़का सभ मजाक करैत छल वरक प्रति- एतवामे आज्ञा-डाला आयल आ ई विध सेहो पूरा भेल। ओम्हर परिछनक लेल आय-माय अयलीह आ परिछनक लेल प्रेमचन्द बिदा भेलाह मुदा हुनकर डेग आगू नहि होइन। चलथि जेना महुअकक चालि हो, किछु जवान लड़की मजाकमे बाजथि जे बड़ शान्त आ सुशील छथि वर, तँ कियो किछु जे खाना खाऽ कय नहि आयल छथि। प्रेमचन्द कोनो जवाब नहि देथि जेना गामपर सभटा क्रोध छोड़ि आयल होथि। कारण छल पिताक देल वचन जे जाधरि अपने लोकनि रहबए हम किछु नहि बाजब आ तकर बाद जँ आगू ओ गलती करताह तँ हम नहि छोड़बनि हुनका सभकेँ। परिछन भेल आ विवाहक शुरुआत भेल। ओम्हर बरियाती लोकनिक स्वागतमे कोनो कमी नहि। सभ समान पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध छल। विवाहक अन्तिम विध छल सोहाग देब। सभ बरियातीगण प्रस्थान करत। एहि बीचमे दुनू पक्ष वार्ता कयलनि जे द्विरागमन संगे होय कारण भीम मिश्रकेँ कनी डर भऽ रहल छलनि, लोककेँ चिन्हबामे देरी नहि लगलनि, जे एकरा सभकेँ लड़काकेँ एकटा नीक कुरता देबाक उपाय नहि छैक आ पंडाल लगैत अछि जेना पैघ घरक काज हो। विवाह तँ भेल मुदा दू सालक बाद अगर द्विरागमन हो तँ ई किछु देत तँ अपमान वा कलहक कारण। द्विरागमनक दिन पक्का भऽ गेल एगारहम दिन। सोहागक उपरान्त श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ बजाकय एकान्तमे ५-७ टा गणमान्यक संग बुझेलखिन जे संगे द्विरागमनक हम बात कय लेलहुँ आ अहाँकेँ इच्छा अछि जे किछु नहि लेबाक अछि तँ आब ओ लड़की हमर आदमी भेलीह, पुतोहु भेलीह। हम अपन आदमीकेँ एहनठाम नहि छोड़ब कारण जे ओ हिनके रूपमे रंगि जेतीह। ई सभ बुझबैत श्री भीम मिश्र प्रेमचन्दकेँ भरोसा दैत कहलथिन जे हम अपन पुतोहुकेँ अपना रंगमे रंगि लेब। अहाँ चिन्ता नहि करब आ चतुर्थी दिन गाम जरूर आयब तखन बात करब। ई शब्द कहैत ओ विदा भय गेलाह। प्रेमचन्द आब कोबरघरमे छथि। विधकरी आ किछु घरक सदस्यगण सेहो छथि। ओ उदासीक कारण पुछलथिन। ओ किछु नहि बजलाह। करीब ५-७ बेर अलग-अलग दाय-मायक शब्द सुनिकय उत्तर देलखिन जे एखन नीन्द आबि रहल अछि, भोर भेलापर बात करब। ई बात सुनैत सभ एका-एकी घरसँ बाहर भेलीह। कोबरमे नीचाँमे बिस्तर लगाओल गेल। प्रेमचन्द सुतबाक प्रयास जरूर केलन्हि, मुदा आँखिसँ नोर पुनः आबय लगलनि। करीब २०-२५ मिनटक बाद एकटा जनानी कोबरमे प्रवेश कएलक लेकिन हुनका ऊपर कोनो प्रभाव नहि पड़लनि, आँखिसँ अश्रु पूर्ववत निकलैत रहलनि। ओ जनानी किछु काल धरि ठाढ़ रहल आ तावत पाछूसँ अवाज भेल जे प्रणाम करू, ठाढ़ भय की कय रहल छी। मुदा प्रेमचन्दक ऊपर कोनो असर नहि कारण ओ पहिने कहने छलाह जे हम भोर भेलापर किनकोसँ बात करब। तखने हुनका बुझना गेलनि जे हमर पएरकेँ कियो स्पर्श कय रहल अछि आ लहठीक खन-खनाहटि सेहो आयल। ई अवाज सुनैत आ पएरक स्पर्श अनुभव करैत ओ पहिनेसँ बेशी अनभिज्ञताक परिचय देलखिन आ जहिना छलाह ओहिना रहि गेलाह जेना हुनका कोनो खबरि नहि। बस पएर स्पर्शक दू-मिनट बाद ओ जनानी वापस भेल। ओ मोनमे सोचैत छल जे ई जरूर नव विवाहिता छलीह। लेकिन ई बात गुप्र राखएमे नीक जे हम सुतल छलहुँ, हमरा कोनो बातक खबरि नहि। किछु समय पश्चात् भोर भेल। भोरमे निन्न आबए लगलनि। ओ घर बन्न कए सूतय लेल चलि गेलाह। कोबरमे दू पहर बितलाक बाद गामक दाय-मायक झुण्ड तँ कखनो दू-चारि गोटेक आवाजाही छल। आब सभकेँ पएर छूबि प्रणामक सेहो प्रावधान अछि कारण जे हम मैथिल छी। साँझमे मौहकक विध पूर्ण भेल। पुनः रात्रिमे बिस्तरपर विश्रामक लेल गेलाह। लगभग दस-पन्द्रह मिनट बाद अनुभव भेलनि जे पुनः  कोनो जनानी प्रवेश कए रहल अछि। ओ पुनः पएरक स्पर्श कय रहल अछि आ ओ अहिठाम बैसल अछि। प्रेमचन्दकेँ निन्न तँ नहि लागल छलन्हि मुदा निन्नक बहन्ना जरूर भेटलन्हि कारण विवाहक रात्रिमे ओ नहि सूतल छलाह। ओ दिनमे दुपहरिया बादसँ जागल छलाह। करीब दू घण्टा बैसि ओ जनानी पुनः वापस भेलीह। पुनः तेसर राति ओ जनानी पुनः अएलीह आ पूर्ववत अपन कर्ममे लिप्त भय गेलीह, यानी चरण-स्पर्श कए बैसि रहलीह। लगभग चारि-पाँच घंटा धरि ओ बैसलि रहलीह आ पएर धय निकलबाक कोनो चेष्टा नहि कय रहलि छलीह, जेना हुनकर प्रतिज्ञा हो जे आशीर्वाद कानमे जरूर सुनी। एतबेमे प्रेमचन्दकेँ एकटा शरारत सुझलनि आ ओ बहन्ना केलन्हि जेना पूरा निन्नमे होथि। ओ करोट बदलि कय पएरकेँ स्थानान्तर कय देलथिन। एकरा बाद ओ जनानी पुनः ओहिठामसँ हिलय के कोशिश नहि केलक। प्रेमचन्द तँ करोट लेलन्हि मुदा ओ जनानी पूर्ववत छलि जेना माटिक मूर्ति हो जेकरा कियो ओहिठाम बैसल अवस्थामे राखि बिसरि गेल हो। चारिम राति पुनः ओहि जनानीक प्रवेश भेल आ ओ अपन कर्तव्यमे पूर्ववत छल। प्रेमचन्द बजलाह- हमरा कोन कारणसँ परेशान कय रहल छी? अहाँ के छी? हम की कपट देने छी जे अहाँ प्रति रात्रिमे आबि हमर पएरकेँ स्पर्श करैत छी? हमर निन्नकेँ कोन कारणसँ खराब कय रहल छी? ई बात सुनिते ओ जनानी लाजसँ शरीरकेँ सकुचा लेलक। जेना लजबिज्जीक पातमे किछु स्पर्श भेलापर ओ सिकुरि जाइत अछि ठीक ओहि प्रकारसँ ओ बाला सिकुरि गेलीह। कोनो उत्तर नहि भेटलापर प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना बना कए फोंफ काटए लगलाह। किछु समय उपरान्त ओ बाला कोबरसँ निकलि गेलीह। करीब दू-तीन घंटा पश्चात् विधकरी कोबरमे प्रवेश कय अवाज देलन्हि जे मिसरजी उठथु, नहा लथु। नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ स्नान भेल। हरक पालोपर बैसाकए नवविवाहिता संग पुनः विवाह शुरू भेल- चतुर्थीक विध सभ। आजुक दिन नुनगर-चहटगर भोजन भेटलन्हि आ प्रेमचन्द घरक लेल प्रस्थान करबाक तैयारीमे छलाह तँ रिश्तामे ज्येष्ठ साढ़ू कहलन्हि जे साढ़ू भाइ, हमरो जेबाक अछि। संगे चलब। हम हुनके दू-पहियापर बैसि गाम अयलहुँ। किछु काल पश्चात् पुनः गाममे भोजन कय प्रेमचन्द एम्हर-ओम्हर निकलय के प्रयास जरूर केलन्हि, लेकिन ओ ओहिठाम सँ निकलि नहि सकलाह। पुनः साँझमे पिताजी आ ज्येष्ठ भ्रातृगणक दवाबमे सासुर घुरि कए अएलाह। रात्रि-भोजनक पश्चात् विश्रामक लेल कोबर गेलाह। करीब मध्यरात्रिमे पुनः ओहि बालाक प्रवेश भेल। ओ अपन काजमे व्यस्त छलीह। प्रेमचन्द पुनः निन्नक बहन्ना कयलनि। फेर मोन पड़लनि जे गामसँ जखन आबय लगलाह तँ बड़की भौजी किछु ज्वेलरी देने छलथिन जे ई कनियाँकेँ मुँहबजना छी, दऽ देबय, तखन सुतब।  जेबीसँ निकालि कय ओ बालाकेँ कहलथन, ई अहाँक समान अछि, लऽ लेब। हमरा निन्न आबि रहल अछि, सूति रहल छी। निन्न की होयतनि, शरीर तँ लगभग चारि-पाँच दिनमे आधा भय गेल रहनि। दिमागमे सोच जे पैसि गेलनि! ने खेनाइ-पिनाइ नीक जेकाँ ने निन्न। एकदम चिरचिरा स्वाभावक भय गेल छलाह। मध्यरात्रिमे प्यास लगलन्हि तँ पानिक लोटा ताकि रहल छलाह। ओ बाला हुनका एकटा गिलासमे लगभग ठंढा भऽ गेल दूध बढ़ेलखिन। प्रेमचन्द कहलथिन जे ई दूध छी, हमरा प्यास लागल अछि, ई राखि देल जाओ। मुदा ओ नहि रखलन्हि। हुनका संग समस्या छल जे ओ घोघमे छलीह, भरि रातिक जागलि छलीह आ कहियो बाजल नहि छलीह। ई सभ कारणेँ ओ हाथमे दूधक ग्लास लऽ तपस्याक मुद्रामे ठाढ़ रहलीह। प्रेमचन्दकेँ लगेमे लोटामे राखल पानि भेटलन्हि आ ओ पानि पीबि कए पुनः सुतबाक प्रयासमे छलाह। हुनका की जिज्ञासा भेलनि जे देखियै ई बाला कतेक काल धरि ठाढ़ भय गिलाससँ भरल दूध रखैत अछि। लगभग एक घण्टा बीति गेल मुदा ओ तपस्यामे लीन छथि ई देखि प्रेमचन्दकेँ दया आबि गेलनि आ दूधक गिलास हाथसँ लय दू-चारि घोंट पीबि गिलास राखि देलन्हि। पुनः परिचय भेल। प्रेमचन्दक प्रश्नक उत्तरक समय ओ बाला थर-थर काँपि रहल छलीह, जेना कसाइकेँ देखि छागरक आँखिमे डर। प्रेमचन्द- नाम? -सोनी। -कतेक पढ़ल छी? -दसम बोर्ड फेल छी। -सत्य या झूठ? -ई ध्रुव सत्य अछि। ई बात सुनिते प्रेमचन्दक आँखिमे पुनः गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित भय गेलन्हि तँ सोनी रुदन अवस्थामे बजलीह- हम अपनेसँ झूठ नहि बाजि सकैत छी। हमरा क्षमा करू। हमरा जे सजा देब से कम अछि। आ हुनको आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलन्हि। -अपने शरीरसँ विकलांग तँ नहि छी? -नहि। -अपने कोनो बीमारीसँ ग्रसित तँ नहि छी? -नहि। -अपने जिबैत किनका लेल छी? -अहाँ हमर गरदनि दबा दिअ तँ हमरासँ बेशी भाग्यशाली कियो दोसर नहि होएत। -अपनेक सभसँ पैघ लक्ष्य? -अहाँक खुशी। -अपने कानि रहल छी, कारण? -अहाँक कष्ट देखि बर्दाश्त नहि भऽ रहल अछि। -अहाँ जुनि कानू सोनी। एहिमे अहाँक कोनो दोष नहि अछि। -आइ हम मरि गेल रहितहुँ तँ अहाँकेँ कष्ट नहि भेल रहैत।ई तँ ईश्वरक बनायल विधिक विधान छी! एकरा कोनो शक्ति नहि काटि सकैत छैक। -देखू, एहि दुनियाँमे दू तरहक लोक होइत अछि- आशावादी आ पुरुषार्थवादी। हम आशावादी पुरुष नहि छी, पुरुषार्थवादी छी आ आशावादीसँ घृणा करैत छी। कारण आशावादी पुरुष या औरत मेहनती नहि होइत अछि। अपने कोन तरहक छी? -हम धार्मिक प्रवृत्तिक छी आर धर्ममे बहुत विश्वास अछि, ताहि हेतु आशावादी छी! ई सुनि प्रेमचन्दक मोनमे आर बेशी तकलीफ बढ़ि गेलन्हि। एहि तरहेँ चतुर्थीक राति दुनू नव-विवाहित जोड़ी कटलन्हि। प्रेमचन्द फेर अपन गाम घुरि गेलाह। साँझ भेल, भौजीसभकेँ भेलन्हि जे प्रेमचन्द पुनः गाम जएताह। मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखि पुछल गेलन्हि तँ उत्तर आएल जे आब द्विरागमनक लेल हम उपस्थित होएब  सासुरमे, नहि तँ आब दिल्ली घुरि जाएब। अन्यथा हमर पीड़ाकेँ बढ़ाओल नहि गेल जाऊ। हमरा आब जीवित रहय के कोनो इच्छा नहि अछि। कोनो मनोरथ नहि अछि। हमर कोनो भविष्य नहि अछि! द्विरागमन भेल, कनियाँ सासुर अयलीह। भड़फोरीक पश्चात् प्रेमचन्द दिल्ली उपस्थित भेलाह। अपन कम्पनीक काम-काज सम्हारलथि। काजपर तँ जाथि मुदा अन्तरात्मामे कतेक प्रश्न अबन्हि। कारण जे जीबाक आशाक किरण लगभग अन्तिम चरणमे पहुँचि गेल छलन्हि। आब कोनो मनोरथ नहि, नहिए जिनगीक कोनो लक्ष्य बाँचि गेल छलन्हि। आ एकर कारण मैथिल समाजक किछु महानुभावक विचार आ कृत्य अछि, संगहि मैथिल समाजक किछु प्रावधान सेहो जिम्मेदार अछि। एहि प्रकारेँ नहि जानि कतेक मैथिल नव-युवक-युवतीकेँ अपन करुण जिनगी जीबाक लेल मजबूर होमए पड़ैत अछि। आलेख- रिपोर्ताज- १.डॉ.बलभद्र मिश्र, २.नरेश मोहन झा ३.नागेन्द्र झा,४.डॉ. रत्नेश्वर मिश्र ५.ज्योति ६.जितेन्द्र झा, जनकपुर ७.उमेश कुमार ८.नवेन्दु कुमार झा ९.मुखीलाल चौधरी डॉ.बलभद्र मिश्र, सेवा निवृत्त आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी, पूर्णियाँ लब्ध धौत प्रतिष्ठ पंजीकार- स्व. पं मोदानन्द झाजी- एक संस्मरण स्व. पंजीकार जी विलक्षण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति छलाह। हिनक संपर्क भेलासँ पूर्वहि सुनैत आएल छलहुँ कि शिवनगर (पूर्णियाँ, संप्रति अररिया जिला) निवासी पं. मोदानन्द झा जी पुबारिपारक एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पंजीकार तऽ छथिए, संगहि संपूर्ण मिथिलाक मूर्धन्य पंजीकारक श्रेणीमे हिनकहु नाम लेल जाइत छलन्हि। पंजीकारजी प्रतिवर्ष सौराठ सभा गाछी जाइत पुबारि-पछबारि पारक भेल विवाहक सिद्धान्तक लिपिबद्ध आदान-प्रदान करैत छलाह, जाहिसँ हिनक पंजी-पुस्तिका वृहदाकार होइत वंश परिचयक विशाल भंडारसँ सुशोभित अछि। पंजीकारजी महाराज दरिभंगाक अध्यक्षतामे आयोजित “पंजीकार धौत परीक्षा” मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कऽ “लब्ध धौत प्रतिष्ठ” भेल छलाह, जकर निर्णायक मण्डलमे महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झाजी सम प्रभृति विद्वान लोकनि छलाह। पंजीकारजी कतेको ठाम सम्मानित भेलाह, जाहिमे “अखिल भारतीय मैथिल महासभा”क विद्वत् मंडलीसँ आदृत होइत विशिष्ट स्थान पौने छलाह। हिनक कृति एवं विलक्षण प्रतिभाक आलोकमे हिनक जीवनहि कालमे “चेतना समिति” स्वयम् आमंत्रित कऽ पंजीकारजीकेँ सादर सम्मानित करैत भेल। जखन हमर विवाह १९५५ ई.मे पोर्णियाँ भेल तहियासँ पंजीकारजीक मृत्युसँ तीनमास पूर्व तक संपर्क बनल रहल। एहि तरहेँ पंजीकारजीक प्रति जे सुनैत आयल छलहुँ तकर यथार्थ अनुभूति हमरा पंजीकारजीक संगतिमे भेटल। कतेको विवाह सिद्धान्त लिखबाक अवसर हमरा बुझना गेल कि- भलमानुष (जाति-पाँजि) व्यक्तिक वंश परिचय पंजीकारजी केँ जिह्वाग्र छन्हि। यद्यपि वर कन्याक अधिकार देखबाक क्रममे पंजीकारजी केँ “पंजी पोथा” उलटबाक आवश्यकता नहि छलन्हि, तथापि कतहु गलती नहि भऽ जाय ई बुझि पोथा उलटबाक उपरान्ते अपन लिखित निर्णय दैत छलाह। पंजीकारजी सदाचार सम्पन्न होइत सभ दिन अहं भावसँ निर्मुक्त रहलाह। हिनक रहन-सहन वेश-भूषा एवं टपकैत ओजस्विताकेँ देखि केओ अपरिचित व्यक्ति हिनक गुणसँ परिचित भऽ जाइत छल। हम स्वयं पंजीकार जीक सद्विचार, सद्व्यवहार, सदाशयितासँ विशेष प्रभावित भेलहुँ। पंजीशास्त्रक गहन अध्ययन रहले सन्ताँ पूबारि-पछबारिक समन्वय करबाक स्तुत्य प्रयास जीवन भरि करैत रहलाह। खुशीक गप्प जे पंजीकारजीक बालक श्री विद्यानन्द झा (मोहनजी) पंजीकारिताकक्षेत्रमे निष्ठापूर्वक अपन मनोयोग रखने छथि, जाहिसँ स्व. पं.मोदानन्द झा जीक आत्मामे अवश्ये शान्ति भेटैत होयतन्हि। अन्ततः हम यैह कहब जे स्व. पंजीकारजीक प्रत्युत्पन्न मतित्वक आगाँ हम जे किछु कहि गेलहुँ से सूर्यकेँ दीप देखेबाक समान बुझल जाय। एहन स्वनामधन्य पंजीकार स्व. पं. मोदानन्द झा जीकेँ मरणोपरान्त एक संस्मरणक रूपमे अपन श्रद्धा-सुमन अर्पित करैत हमर शतशः प्रणाम। नरेश मोहन झा, तुलसिया, किशनगंज विद्वद्वरेण्य पञ्जीकार मोदानन्द झा वर्ष १९५४-५५क वार्ता थीक। गृष्मावकाश छल। गामहिं छलहुँ। एक दिन वेरू प्रहर मे दरवज्जहिपर छलहुँ। एक व्यक्ति, अत्यन्त गौरवर्ण, मध्यम ऊँचाई, देदीप्यमान ललाट, प्रशस्त काया, धूपमे चलबाक कारणेँ ललौंछ मुखमण्डल, पैघ-पैघ आँखि, उपस्थित भेलाह। देखितहिं बुझबामे आएल जे कोनो महापुरुष अएलाह अछि। हमर पिता पं. लीलमोहन झा सेहो दलानेपर छलाह। ओऽ परम आह्लादित भए उठि कऽ ठाढ़ भेलाह। झटकि कऽ अरियाति अनलखिन्ह। हमरा सभ जतेक नवयुवक रही- सभकेँ कहलन्हि- प्रणाम करहुन्ह। हमरो लोकनि उल्लसित एवं अनुशासित भए प्रणाम कएलियन्हि। बाल्टीमे जल, जलचौकी ओऽ अढ़िया आनल गेल। हुनकासँ पए धोएबाक आग्रह कएल गेलन्हि। हमर पिता जे परोपट्टाक श्रेष्ठ समादृत व्यक्ति छलाह- स्वयं लोटामे जल लए हुनकर पएर धोअय लगलखिन्ह। पुनः अंगपोछासँ पएर पोछि पलंगपर बिछाओल साफ सुन्दर विछाओनपर बैसेलखिन्ह। आऽ हुनक पएर धोयल जलसँ समस्त घर-आङनमे छिड़काव भेल। एहि बीच सरवत आएल- पान आएल। घरक सभ सदस्यमे एक अद्भुत उल्लास-जेना कोनो इष्टदेव आबि गेल होथि। ओहि बैसारमे तँ बहुत काल धरि कुशलादिक वार्ता होइत रहल। संध्याकाल धरि तँ हमर दरवज्जापर गाम भरिक ब्राह्मणक समूहक समूह उपस्थित होमऽ लागल। ओहि मध्य हमर पिता परिचय करौलन्हि। कहलन्हि- ई थिकाह पंजीकार प्रवर श्री मोदानन्द झा जी लब्ध धौत, शिवनगर, पूर्णियाँ निवासी। हमरा लोकनिक वंश रक्षक। हिनकहिं प्रतापे हमरा लोकनि अपन कुल ओऽ जातिक रक्षा कऽ पबैत छी। हिनक पिता पञ्जीशास्त्र मूर्धन्य पञ्जीकार भिखिया झा बड़ पैघ विद्वान् ओऽ सदाचार पालक। ओहि योग्य पिताक यशस्वी पुत्र छथि पञ्जीकार प्रवर मोदानन्द बाबू। नाम सुनितहिं अकचकयलहुँ। हम पूर्णियाँ कॉलेजक जखन छात्र रही तँ समस्त कुटुम्ब वर्ग बिष्णुपुर गामक मित्रवर्ग जे नवरतन पूर्णियाँमे रहैत छलाह तनिकासँ हिनक नाम बड़ श्रद्धापूर्वक उच्चरित होएत सुनने छलहुँ। अहि साक्षात्कार भेल सन्ता बुझि पड़ल जे जे किछु हिनकर मादे सुनने छलहुँ से बड़ कम छल। निश्चय ई व्यक्ति परम आदरणीय छथि। सांध्यकालीन बैसारमे गामक सभ श्रेष्ठ व्यक्ति अपन-अपन वंशक नवजन्मोत्पत्तिक विवरण लिखबैत गेलखिन्ह। पञ्जीकारजी तत्परतापूर्वक सभक परिचय बड़ मनोयोगसँ लिखैत रहलाह। तखन हमरा बुझाएल जे कोना कऽ हमरा लोकनिक वंश परिचय पछिला हजार वर्षसँ साङ्गो-पाङ्ग उपलब्ध रहल अछि। हमर गाम पञ्जीकार गामसँ १०० कि.मी.सँ अधिके पूर्वमे अवस्थित अछि। यातायातक कोनो सम्यक व्यवस्था पूर्वमे नहि रहल होएतैक। नाना प्रकारक असुविधाक सामना करैत एतैक भू-भागमे पसरल मैथिल ब्राह्मणक यावतो परिचय संग्रहित करब, सुरक्षित राखब आ बेर पड़लापर उपस्थित करब अत्यन्त दुःसाध्य कार्य। यात्रा ओ परिस्थिति जन्य कष्टक थोड़ेको अनुभव नहिं कऽ केँ अपन कर्तव्येक प्रधानता दैत निःस्वार्थ भावसँ धर्मशास्त्रक रक्षामे तत्पर एहि इतिहासक संरक्षण सन पुनीत कार्य करैत रहब हिनकहि सन व्यक्तिसँ संभव। प्रातः काल पूज्य पितासँ एकान्तमे पुछलियन्हि जे एतेक कष्ट उठा कऽ परिचय संग्रह करबाक प्रयोजन की? बुझौलन्हि जे अपना लोकनि जे सनातन धर्मावलम्बी से सभटा कार्य मनु, याज्ञवल्क्य, शतपथ, शंख इत्यादि महान् ऋषि लोकनिक देल व्यवस्थापर चलैत छी। मनु विवाहक सन्दर्भमे कहने छथि जे कोनो कन्या ओ वरक विवाह स्वजन, सगोत्र, सपिण्ड ओ समान प्रवरमे नहि हो। एहि हेतु आवश्यक अछि जे सपिण्ड्य निवृत्तिक ज्ञान हो। ताहि हेतु पुरुषाक विवाहादिक विवरण सम्पूर्णतः उपलब्ध हो। एहि धर्मक रक्षा तँ विन पञ्जीकारहिं सम्भव नहि। अन्यथा वर्णशंकरक प्रधानता होएत ओ जातिय रक्षा नहिं होएत। पञ्जीकारक नहिं रहने वंशक इतिहासक ज्ञान नष्ट भए जाएत। विश्वास जमि गेल। हुनका प्रति मनमे जे आस्था छल से चतुर्गुण भऽ गेल। तकर बाद जखन कखनो ओऽ अएलाह हम ओहि देवत्व भावेँ हुनक सम्मान कएल। ओहो पितृवत स्नेह देलन्हि। ओऽ अपन व्यक्तित्वक धनी छलाह। सदाचार पालनमे तत्पर। जखन कखनो हुनकर गामपर जएबाक अवसर भेटल- गमौलहुँ नहि। कतेको बेर हुनकर गाम शिवनगर गेल छी। हुनक ओऽ साफ परिछिन्न दलान। रमनगर फुलवाड़ी। पञ्जीकारजीक दैनिक चर्या कलम ओऽ खुरपीक संग सम्पन्न होइत छलन्हि। कर्मिष्ठ पुरुषः। नागेन्द्र झा, नवरत्न हाता, पूर्णियाँ स्व. पञ्जीकार मोदानन्द झासँ सुनल परुए महेन्द्रो मूलक पूर्णियाँ जिलाक शिवनगर ग्रामवासी छलाह। ई पञ्जी प्रबन्धक नीक ज्ञाता छलाह। महाराज दरभङ्गाक चलाओल धौत परीक्षोत्तीर्ण छलाह। ई लेख पञ्जीकारक विषयक थिक। अतः पञ्जी शब्दक अर्थ की से बूझब आवश्यक। पञ्ज शब्द आएल अछि संस्कृतमे तथा भाषोमे पञ्च शब्दक प्रयोग ५ संख्याक अर्थमे भेटैछ। तैं पञ्ज शब्द ५ संख्यासँ सम्बद्ध अछि। भाषामे हाथक पाँचो आङ्गुर तथा ताशक ५ कैं पञ्जा कहल जाइछ। पञ्जीमे ५ संख्याक कि प्रयोजन? उत्तर- हमरा लोकनि अर्थात् मैथिल ब्राह्मण “पञ्चदेवोपासक” छी। कोनो तरहक शुभ कार्यमे पूजा पञ्चदेवतैक पूजासँ आरम्भ होइछ। तहिना धर्मशास्त्रक अनुसारे कहल गेल अछि जे “मातृतः पञ्चमीं त्यक्त्वा पितृतः सप्तमीं भजेत्”। अर्थात् प्रकृति (माय)सँ पाँचम स्थान स्थिति कन्याक सङ्ग विवाह नहि करी। ई निषेध कयल गेल। विवाह सृष्टि प्रयोजनार्थे होइछ आ सृष्टिमे प्रकृतिक प्रयोजन तैं मायसँ पाँचम स्थान स्थित कन्यासँ विवाह निषिद्ध भेल तथा एहि निषेधक कारणसँ सम्भव थिक जे एकर नाम “पञ्जी” राखल गेल हो अथवा कन्यादानमे वरक दू पक्ष, कन्याक दू पक्षक अर्थात् दुनू मिलाकेँ चारि पक्षक निःश्शेष व्याख्या जाहि पुस्तकमे लिखल जाय आओर पञ्जीकार ओकरा स्वीकार करथि अर्थात् हस्ताक्षर करथि ओऽ भेल पञ्जी। संस्कृतमे पञ्जी (पञ्जिका) शब्दक अर्थ थिक जे पूर्णतः पदक व्याख्या जाहिमे लिखल गेल हो। अर्थात् ओऽ रजिस्टरो भऽ सकैछ, पुस्तकोक रूपमे भऽ सकैछ, हैन्डनोटोक रूपमे भऽ सकैछ। सरकारी रजिस्ट्री ऑफिसमे रजिस्टर रहैछ। हाटपर मवेशीक बिक्री भेलापर विक्रीनामा लिखल जाइछ। एकर निदान “याज्ञवल्क्य” साक्ष्य प्रकरणमे स्पष्ट कयने छथि जे बेचनिहार, खरीददार आऽ साक्षी सभक पूर्ण पता रहै जैसँ भविष्यमे कोनो तरहक विवाद नहि उठै। ई अभिलेख (रेकर्ड) वस्तु विक्रयोमे तथा दानमे सेहो राखल जाय। ई तँ कन्यादान प्रकरणमे वर-कन्या दुनूक वंशक पूर्ण सपिण्डक अभिलेख जाहिमे लिखल जाय से भेल पञ्जी आऽ ओहि पञ्जीमे जे वर-कन्या सपिण्डक अभ्यनाट नहि छथि से लिखनिहार पञ्जीकार कहवैत छथि। एहि स्थितिमे ईहो ज्ञात होबक चाही जे पञ्जी प्रथा कहियासँ चलल, कियैक चलल? ई प्रथा हरिसिंह देवक समयसँ प्रचलित भेल अछि। कियैक आरम्भ भेल से कथा स्व. पञ्जीकारे मुहसँ सुनल अछि, जे निम्न थिक। पञ्जी प्रबन्धक आरम्भक बीज- एक ब्राह्मणी रहथि। ओऽ जाहि गाममे रहथि ओऽ ब्राह्मण बहुल गाम छल। लोक कि पुरुष वा कि स्त्री बिनु पूजा-पाठ केने भोजन नहि करथि। ओहि गामक एक पोखरिपर एक शिवमन्दिर छल। उक्त ब्राह्मणीक नियम छल जे जाऽ धरि उक्त शिव-मन्दिरक महादेवक पूजा नहि करी ताऽ धरि जलग्रहण नहि करी। ई शिव पूजार्थ मन्दिर गेली ओहि समय एक चाण्डाल सेहो पूजार्थ गेल रहए। हिनका देखि हिनकासँ दुराचरणक आग्रह कएलक। ई परम पतिव्रता छलीह। ओकरा दुत्कारैत कहलनि जे ई मन्दिर थिकैक तू केहेन पापी छैं, जो भाग नहि तँ तोहर भला नहि हेतौ। ई कहिते छलीह की शिवलिङ्गसँ एक सर्प फुफकार करैत अवैत ई चाण्डाल भागल। संयोगवश बाहरसँ एक ब्राह्मणी, ओहि दुनूक वार्तालाप सुनिते छलीह। गामपर आवि मिथ्या प्रचार ओहि चाण्डालक संग कऽ देलनि। गामक लोक हिनका बजाय कहलनि जे अहाँकेँ प्रायश्चित करए पड़त। एहि लेल कि अहाँ चण्डालक सङ्गम कएल। ई कहि उठलीह जे के ई कहलक, हमरा तँ ओकरासँ स्पर्शो नहि भेल अछि। मुदा लोककेँ विश्वास नहि भेल। प्रायश्चित लिखल गेल (यदीयं चाण्डालगामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु) ई लिखि हुनक दहिन हाथपर एक पिपरक पात राखि आऽ तैपर लह-लहानि आगि राखल गेल। ई पाकि गेलीह। तखन हिनका ग्राम निष्कासनक दण्ड देल गेल। कनैत-खिजैत लखिमा ठकुराइन नामक पण्डिताकेँ सब बात कहलनि। श्रीमती ठकुराइन प्रायश्चित्त लिखनिहार पण्डितकेँ बजाय कहल जे प्रायश्चित्त गलत लिखल गेल। हम प्रायश्चित्त लिखब। तखन ठकुराइन लिखल जे “यदीयं पतिभिन्न चाण्डाल गामिनी तदा अग्निस्तापं करोतु”। ई वाक्य पूर्ववत् दहिन हाथक पिपरक पातपर राखल गेल तँ ई नहि पकलीह। तखन ई वार्ता महाराज हरिसिंहदेवक ओतय गेल। तखन उक्त महाराज पण्डित मण्डलीकेँ आमन्त्रित कऽ पुछलनि जे उक्त स्त्रीक पति चण्डाल कोना? तखन विद्वतमण्डली उक्त स्त्रीक पतिक विवाहक शास्त्रानुकूल विचारि देखलनि तँ हुनक विवाह अनधिकृत कन्यासँ भेल तैँ हिनकर पति चण्डाल भेलाह। एकर बाद महाराजक आदेशसँ मैथिल ब्राह्मण लोकनिक विवाह पञ्जी बनल। मैथिल ब्राह्मणमे १६ गोत्रक ब्राह्मण छथि। एकर बाद गाँव-गाँवमे उक्त गोत्रान्तर्गत जे जे लोक छलाह तनिका-तनिका गामक नाम देल गेल एवं मूल कहौलक। पञ्जी मूलक अनुसार बनल, गोत्रक अनुसार नहि। एक गोत्रमे अनेक मूल अछि। गोत्रक नामपर पञ्जी बनैत तँ गामक पता नहि लगैत। हमर मतसँ पञ्जी-प्रबंध धर्मशास्त्रक अंग थिक। तैं एकर लिखनिहार, अभिलेख (रेकर्ड) रखनिहार एवं एक पढ़निहार व्यक्ति पञ्जीकार (रजिस्ट्रार वा धर्मशास्त्री) थिकाह। कलियुगानुकूल पूर्व समय जेकाँ पञ्जीकारक परामर्श बिनु लेनहुँ विवाहक निर्णय कऽ कन्यादान कऽ लैत छथि जे परम अनुचित थिक। जे पञ्जीकार हमरा लोकनिक लोकान्तर प्राप्त पूर्व पुरुषक अभिलेख (रेकर्ड) राखि आ वैह विद्या पढ़ि अपन जीवनयापन करैत छथि हुनक आर्थिक स्रोत एक मात्र ईएह जे हमरा लोकनिक सन्तान (वर वा कन्याक) जखन समय आओत तखन हुनक परामर्श शुल्क दऽ ग्रहण करी। से वर्षमे कतेक होइछ। यदि ईएह रास्ता रहत तँ ई विद्या लुप्त भऽ जायत। एहि पञ्जीक मूल्य सरकारोक न्यायालयमे कम नहि छैक जेकर निम्नांकित एक उदाहरण देखू- उदाहरण- एक राजपरिवार वंशविहीन भऽ लुप्त भऽ गेल। हुनक सब सम्पत्तिमे सँ किछु सम्पत्ति महाराज दरभंगाकेँ भेल आऽ किछु सम्पत्ति बनैलीक राजामृत राजपरिवारक उत्तराधिकारीसँ कीनि लेल। एकर बाद महाराज दरभंगा न्यायालय जाय बनैली राज्यपर ई कहि जे ओऽ (वनैली राज्य) अनधिकृत किनने छथि। मोकदमा बहुतो दिन चलल। दुनू पक्षसँ दिग्गज वकील लोकनि छलाह। उत्तराधिकारक हेतु दुनू पक्षकेँ ई पञ्जी-प्रबन्ध मान्य भेल। जाहिमे बनैली राज्यक पञ्जीकारक रूपमे उक्त पञ्जीकार जनिक विषयमे ई लेख लिखल जाऽ रहल अछि, हिनक पूज्य स्व.पिता तथा ई, दुनू गोटें मोकदमाक बहसक लेल नियुक्त भऽ पञ्जी-प्रबन्ध पुस्तकक अभिलेख न्यायालयक जजकेँ देखओलनि। एकर बाद बनैली राज्य “डिग्री” पओलक त्तथा ई दुनू पिता-पुत्रक मान्य सम्मान कयलक। एहिसँ सिद्ध भेल जे उक्त पञ्जीकारक पञ्जी सुरक्षित रहि पञ्जीकारक योग्यतोकेँ सिद्ध कएलक। हिनक निर्लोभताक वर्णन सेहो देखू:- एक राजदरबारमे कन्यादान उपस्थित छल। ताहिमे परामर्श (सिद्धान्त)क हेतु अनेको पञ्जीकार बजाओल गेल रहथि ताहिमे ईहो रहथि। राजदरबारक बात रहैक। राजाकेँ अपन कन्याक हेतु ई वर पसिन्द रहथिन। ई पञ्जीकार अन्य पञ्जीकारसँ वार्तालापमे कहलथिन जे औ पञ्जीकारजी! ऐ वरक अधिकार तँ नहि होइत छैक। ओऽ उत्तर देलथिन जे अहाँ बताह भेलहुँ हेँ। राजाक बात थिकैक। राजाकेँ काज पसिन्द छनि। एहिमे अरङ्गा नहि लगबियौक। नीक पारश्रमिक भेटत। ई मोने-मोन विचारलन्हि जे ऐ पापक भागी (रुपैय्याक लोभमे पड़ि) हम कियैक होउ। किछु कालक बाद बाह्यभूमि (पैखाना) जेबाक बहाना बनाय ओतयसँ भागि अयलाह। हिनक नैष्ठिकता सेहो तेहने छल। सब दिन स्नानोत्तर सन्ध्या, तर्पण, गायत्री जप, शालिग्रामक पूजा बिनु कएने विष्णु भगवानक चरणोदक तथा तुलसीपात बिनु खएने! अन्न-जल नहि करैत छलाह। एकर अतिरिक्त कार्तिक मास जखन अबैक तखन भरि मास धात्रीयैक गाछतर हविष्यान्न भोजन करथि। ऐ सँ हुनक पूर्ण नैष्ठिकताक पता चलैत अछि। डॉ. रत्नेश्वर मिश्र- मिथिला विभूति पं मोदानन्द झा दस वर्षक अल्पायुमे हुनका वर्तमान मधुबनी जिलान्तर्गत सौराठ गाम विद्याध्ययन लेल पठाओल गेलनि। ओतय हुनक गुरु आ आश्रयदाता रहथिन ख्यातनाम पंजीकार पं.विश्वनाथ प्रसिद्ध निरसू झा, जनिकर पिता लूटन झा मोदानन्द झाक मौसा रहथिन। पंजीशास्त्रक अध्ययन लेल सामान्यतः पन्द्रह वर्षक कालावधि समुचित मानल गेल छैक मुदा मोदानन्द झा दसे-एगारह वर्षमे गुरु-कृपासँ निष्णात भेलाह। ओना ओऽ पन्द्रह-बीस वर्ष धरि लगातार गुरु सान्निध्यमे सौराठ रहलाह आऽ बादोमे आजीवन, विशेष रूपसँ वार्षिक वैवाहिक सभाक अवसरपर सौराठ अबैत-जाइत रहलाह आऽ ताहि क्रममे बाटमे दरभंगा स्थित हमर नरगौना निवासपर ओऽ कनियो देर लेल अवश्य आबथि। हमर पिता डॉ. मदनेश्वर मिश्र लेल हुनका विशेष स्नेह आऽ सम्मान रहनि आऽ हमर एक पितृव्य पं. नागेश्वर मिश्रक ओऽ सम्बन्धमे साढ़ू रहथिन। हमर एकटा पीसा स्व. दिगम्बर झा हुनकर पितियौत रहथिन। जे हो, विध्याधयन समाप्त समाप्त भेलापर राज-दरभंगा द्वारा आयोजित धौत परीक्षामे १९४० मे ओऽ सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयलनि। हुनका संग उत्तीर्णता प्राप्त केनिहार अन्य दू महत्वपूर्ण पंजीकार छलाह ककरौरक हरिनन्दन झा आऽ सौराठक शिवदत्त मिश्र। एहि सफलता लेल महाराज सर कामेश्वर सिंहक हाथे तीनू गोटाकेँ धोती देल गेलनि, मुदा सर्वोच्च घोषित भेलाक कारणेँ मोदानन्द झाकेँ दोशाला सेहो देल गेलनि। पारम्परिक मिथिलामे धौत परीक्षामे उत्तीर्ण भेनाय बड़का सम्मान होइत छल मुदा ताहूमे सर्वोच्चता पायब तँ अनुपमे छल। तहियासँ अनवरत ओऽ अपन जीवन-पर्यन्त मिथिलाक प्रायः सर्वाधिक समादृत पंजीकार रहलाह। मोदानन्द झाकेँ पाबि पंजीकारक व्यवसाय धन्य भेल। १९६२ मे निरसू झाक दिवंगत भेलापर ओऽ सौराठ प्रतिवर्ष नियमपूर्वक वैवाहिक सभामे मात्र अपन नाम बढ़यबा लेल नहि बल्कि अपन गुरुक ऋण अदाय करबाक विचारसँ सेहो जाथि। ताधरि निरसू बाबूक दुनू बालक छोट रहथिन आऽ पंजीकारी नहि करथि। हुनकर जेठ बालक प्रोफेसर (डॉ.) कालिकादत्त झा, जे सम्प्रति ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक संस्कृत विभागक अध्यक्ष रहथि आऽ विगत लगभग दस-पन्द्रह वर्षसँ दरभंगामे रहि रहल छथि (पहिने मगध विश्वविद्यालय, गयामे रहथि) आब सक्रिय रूपेँ अधिकार जँचबा आ सिद्धान्त लिखबाक काज करय लागल छथि। ताहिसँ पहिने मोदानन्दे बाबू अपन गुरुक ओहिठाम अयनिहार लोकनि लेल सिद्धान्तादि लिखथिन। ततबे नहि ओऽ निरसू बाबूक पुत्र लोकनिकेँ पंजी-ज्ञान सेह् देलथिन आ आइयो कालिकादत्त बाबू गुरु रूपहि हुनका प्रति श्रद्धा रखैत छथि। मोदानन्द बाबू पंजीकारीक व्यवसायसँ जे धनार्जन करथि ताहिसँ सन्तुष्ट छलाह। सिद्धान्त लिखबासँ तथा विदाइसँ हुनका पर्याप्त कमाइ होइन आओर खेत-पथारसँ सेहो नीक आय होइत छलनि। कमाइसँ बेसी हुनकर अभिरुचि ज्ञानक विस्तारमे आ पंजीसँ सम्बन्धित विषयपर शोध करबामे छलनि। मैथिलीक महान् विद्वान, आलोचक आ समीक्षक डॉ. रमानाथ झाक संग ओऽ पृथक-पृथक विभिन्न मूलक विख्यात छवि, विद्वान् आ राजा-जमीन्दार सबहक वंश-परिचय तैयार करबा दिस प्रवृत्त भेलाह आ तकरहि परिणाम छल पूर्णियाँक प्रसिद्ध बनेली राजवंशक परिचयात्मक पुस्तक अलयीकुल प्रकाशक प्रकाशन। आन एहन प्रकारक कृत्य नहि तैयार कयल जा सकल तकर हुनका क्षोभ छलनि। हुनकर शोधपरक सोचक अंग छल एक अन्य परियोजना जाहिक अन्तर्गत विशिष्ट गाममे बसनिहार मैथिल ब्राह्मण सभक बीजी पुरुष धरिक परिचयात्मक विवरण तैयार करब अभीष्ट छल। ओऽ सर्वप्रथम कोइलख गामक सम्बन्धमे एहन रचना लिखलनि। ओऽ हमरा तकर कतिपय अंश सुनेबो कयलनि। हुनकर इच्छा रहनि जे उक्त रचनाक प्रकाशन हो मुदा से आइ धरि नहि भऽ सकल अछि। उपर्युक्त दुनू प्रकारक शोध परियोजनाक पंजीकार समाजमे सामान्यतः आलोचना भेलैक कियैक तँ ओऽ अपन रचनामे एहनो विवरणक सन्निवेश करय चाहैत रहथि जे पंजीकारीक व्यवसायमे प्रकाशित करब वर्जित कहल जाइत छैक- वस्तुतः ओऽ विवरण सभ दूषण पञ्जीक अंग होइत छैक जाहिमे व्यक्ति आऽ परिवार विशेषक सम्बन्धमे ज्ञात अशोभनीय आ अप्रकाश्य बात उल्लिखित रहैत छैक। एहि क्रममे एक तेसर परियोजना, जाहिपर ओऽ उन्नैस सय पचासहिक दशकमे कार्य आरम्भ कयलनि छल, ओहन पञ्जीकार परिवार लग उपलब्ध पाण्डुलिपिक संग्रह करब जाहि परिवारमे आब क्यो पंजीकारीक व्यवसायमे नहि रहि गेल रहथि आ हुनकर पंजी-पोथी सभ नष्ट भऽ रहल छलनि। पिताक मृत्यु भऽ गेलासँ हुनकर दरभंगा सम्पर्क घटि गेलनि आ पूर्णियाँमे पारिवारिक सम्पत्तिक प्रबन्धनमे अपेक्षाकृत बेसी समय लगबय पड़नि। तथापि हुनकर शोध-दृष्टि बनल रहलनि आऽ ओऽ अपेक्षा करथि जे सामाजिक विज्ञानमे आधुनिक शोध तकनीकसँ परिचित क्यो व्यक्ति हुनका संग रहि उपर्युक्त परियोजना सभ तँ पूर्ण करबे करथि पंजीसँ सम्बन्धित आनोआन विषयपर काज करथि। हुनकर ई अभिलाषा नहि पूर्ण भेलनि मुदा हुनक पुत्र  मोहनजी, जे पञ्जीकारीक पैत्रिक व्यवसायमे लागि क्रमिक रूपेँ कौलिक प्रतिष्ठाक विस्तार कय रहल छथि। आ अनुकरणीय रूपसँ पितृभक्त सेहो छथि, एहि दिशामे भविष्यमे क्रियाशील भऽ सकैत छथि। स्वयं शोधपरक दृष्टि आ रुचि रखनिहार मोदानन्द बाबू जिज्ञासु लोकनिक मदति करबालेल सदति तत्पर रहैत रहथि। हमरा कमसँ कम दू अवसरपर एकर लाभ भेटल। हम १९८७-८८मे बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटनाक अनुरोधपर बिहारक एक पूर्व मुख्यमंत्री पं. विनोदानन्द झाक जीवनी लिखि रहल छलहुँ मुदा हुनकर वंश-परिचय कतहु प्राप्य नहि छल। आधा-छिधा भेटबो कयल तँ प्रामाणिक नहि। हम कैकटा पंजीकारसँ एहि सम्बन्धमे जिज्ञासा कयलहुँ मुदा व्यर्थ। मात्र मोदानन्द बाबू सूचना देलनि जे हुनकर एक परिजन स्व. गिरिजानन्द झा गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण आ पंडा सभक वंशावली तैयार करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि आ अपना संग शिवनगर स्थित हुनकर घरमे जाऽ ओहि संग्रहमे विनोदानन्द झाक वंश परिचय तकबाक चेष्टो कयलनि, मुदा हुनकर पंजी-पोथी सभ व्यवस्थित आ संगठित नहि भेलाक कारणेँ से संभव नहि भेल। जे हो, हमरा ई अवश्य ज्ञात भऽ गेल जे यदि स्व. गिरिजानन्द झाक पोथी-पंजी व्यवस्थित नहि कयल गेलनि तऽ गंगाक दक्षिण बसल मैथिल ब्राह्मण लोकनिक पूर्वजसँ सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचना सभ लुप्त भऽ जेतैक कियैक तँ गिरिजानन्द बाबूक परिवारमे आन किनकहु पंजीकारीक व्यवसायमे रुचि नहि छनि। दोसर अवसर छल जखन भारतीय इतिहास शोध परिषदक अनुरोधपर हमरा पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा ग्राममे उत्पन्न सुविज्ञात इतिहासकार प्रोफेसर जगदीश चन्द्र झाक अंग्रेजीमे लिखल विलक्षण पोथी “माइग्रेशन ऐन्ड एचीवमेन्ट्स ऑफ मैथिल पंडित्स: दि माइग्रैन्ट स्कौलर्स ऑफ मिथिला (८००-१९४७)क १९९० मे समीक्षा लिखबाक छल। ओहि पोथीक परिशिष्टमे कम-सँ-कम तीन पंडित (१) महामहोपाध्याय नेनन प्रसिद्ध दीनबन्धु झा, (२) म.म.भवनाथ झा आ(३)म.म.गुणाकर झा केर वंश परिचय देल छल किन्तु लेखककेँ हुनका लोकनिक मूल ज्ञात नहि भऽ सकलनि। मोदनन्द बाबू क्षण भरि ध्यानस्थ भेलाह आ कहलनि जे ई लोकनि क्रमशः खौवालय सुखेत, नरौने पूरे आ खौवालय नाहस मूलक छलाह।  एतय ई कहब आवश्यक जे मूल आ एक-दू खाढ़िक व्यक्तिक नाम देल रहलापर आन सम्बन्धित सूचना देव संभव छैक मुदा उपर्युक्त उदाहरणमे तँ उनटा बात छैक आ तैयो मोदानन्दे बाबू सन पंजीकार छलाह जे वांछित सूचना तत्काल देबामे समर्थ भेलाह। ओ ओहि पुस्तकमे उल्लिखित पन्द्रह खनाम मूलक प्रसिद्ध विद्वान् गोकुलनाथ, हुनक पिता पीताम्बर आ पुत्र रघुनाथक विषयमे बतौलनि जे ओ तीनू मिथिलाक बारह सडयन्त्री अथवा सर्वज्ञाता विद्वान् मे सँ छलाह। गोकुलनाथक पितामहक नाम रामभद्र छलनि, रामचन्द्र नहि। एतबहि नहि ओ इहो बतौलनि जे मिथिलाक एक घुमक्कड़ विद्वान् ककरौर वासी पड़वे महेन्द्रपुर मूलक गुणाकर झाक एक वंशज धीरेन्द्र झा सेहो छलाह जे आइसँ लगभग चारि सय वर्ष पूर्व बंगाल जाय ओतुक्का ब्राह्मण सभक पंजी-सूचनाक संशोधन-संवर्द्धनक क्रममे अनेक ब्राह्मणेतर व्यक्ति सभकेँ ब्राह्मणक रूपमे पंजीमे परिगणित कय देलथिन। अपन पंजी-पोथीमे उक्त धीरेन्द्र झा अपनाकेँ आ अपन पिताकेँ पंजी पंचानन कहि सम्बोधित कयलनि अछि। एहन कतेको सूचना मोदानन्द बाबू जिज्ञासु व्यक्ति सभकेँ दैत रहैत छलथिन। ओ अपन समाजमे अपन विद्वता, उदारता आ सहज सम्प्रेषणीयताक कारणेँ सर्वत्र समादृत रहथि। हम जखन छट छलहुँ, आइसँ प्रायः पचास वर्ष पूर्व, ओ हमर गाम विष्णुपुर अथवा पूर्णियाँ शहर स्थित हमर डेरा आबथि तऽ सम्पूर्ण परिवार हुनकर सम्मानमे सन्नद्ध रहैत छल। ओ सभक छुइल भोजन कहियो नहि कयलनि। बेसी काल सभ सामग्री दऽ देल जाइन तऽ ओ अपन पाक अपनहि करथि। हमरा बूझल अछि जे कैक बेर हमर सभसँ जेठ पित्ती, पूर्णियाँक अत्यन्त समादृत ओकील आ भरि बिहारमे सभसँ बेसी अवधि धरि सरकारी ओकील रहनिहार स्व. कपिलेश्वर मिश्र अपन हाथें हुनका लेल पाक करथिन। हमरा परिवारमे तऽ हुनका सदैव सम्मान भेटबे करैत रहनि मुदा अन्यत्रो कम नहि। एक बेरक घटना सुनबैत ओ कहने छलाह जे ओ वर्तमान बांग्ला देशक एक मैथिल ब्राह्मण बहुल गाम बोधगाम गेल छलाह जतय हुनका प्रचुर विदाइ तऽ भेटबे कयलनि ओतुका लोक सभ हुनकर पएर पखारि चरणोदक सेहो लेने रहनि। मोदानन्द बाबू अपन चिन्तनमे एक तरहेँ प्रगतिशील आ सुधारक सेहो रहथि। हुनकर चेष्टा रहनि जे पंजीकार लोकनि मात्र अधिक सँ अधिक धनार्जन मे लागि अपन वृत्तिक प्रतिष्ठार्थ सेहो सोचथि। हुनका ई नीक नहि लगनि जे पंजीकार सभ एक दोसराक प्रति द्वेष भावसँ कार्य करथि। हुनकर इच्छा रहनि जे सभ मिलि पंजी आओर पंजीकारक संस्थाकेँ जीवन्त बनाबथि तथा समाजमे हुनका सभकेँ जे आदर प्राप्त रहनि तकर लाभ लए समाजकेँ दिशा निर्देश देथिन। ओ राजदरभंगाक निर्देशमे चलि रहल पंजी व्यवस्थाक प्रजातंत्रीकरणक पक्षमे रहथि जाहिसँ ब्राह्मण समाजक सभ वर्गक प्रतिनिधि मिलि ओहिना परमानगी दय जातीय स्तरीकरणमे समय-समयपर वांछित परिवर्तन करथि जेना राज दरभंगाक तत्वावधानमे अतीतमे कैक बेर कयल गेल छलैक। जे कोनो ब्राह्मण परिवार पंजी-व्यवस्था विहित रीतिसँ नीक वैवाहिक सम्बन्ध करथि तनिकर स्तरोन्नयन करबाक ओ पक्षमे रहथि। १९६६ मे हमर पित्ती डॉ. रामेश्वर मिश्रक विवाह जखन सोनपुर (उजान) वासी प्रसिद्ध श्रोत्रिय ब्राह्मण स्व. दुर्गेश्वर ठाकुरक कन्यासँ स्थिर भेलनि तँ मोदानन्द बाबू राजसँ परमानगी प्राप्त करबामे तऽ सहयोगी भेबे केलथिन, सौराठमे अधिकांश पंजीकारक बैसक बजाय सभक सहमतिसँ हमर प्रपितामह लाल मिश्रक सभ सन्तति लेल कन्हौली पाँजिक स्थापना सेहो करबौलनि। ओ प्रायः खभगड़ा (अररिया जिला) वासी स्व. बालकृष्ण झाक परिवार आ कतिपय आनो परिवार लेल एहने स्तरोन्नयनक पक्षमे रहथि। हुनकर मन्तव्य रहनि जे जमीन्दारी प्रथाक उन्मूलनसँ आन अनेक संस्थाक संग पंजी व्यवस्थाक सेहो बड़ क्षति भेलैक। जमीन्दार लोकनि परम्परा आ संस्कृतिक सम्पोषक रहथि मुदा आब हुनकर स्थान लेनिहार सरकार अथवा कोनो आन संस्था से काज ताहि रूपेँ नहि कऽ पाबि रहल अछि। पंजीकार लोकनिक दुर्दशाक एक कारण जमीन्दारक समाप्ति सेहो भेल। हुनका सन्तोष रहनि जे पटनाक मैथिली अकादमी सन संस्था हुनक जीवन पर्यन्तक सेवाक मान्यता दय हुनका सम्मानित कयने छलनि, मुदा से संभव भेल छल अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. मदनेश्वर मिश्रक व्यक्तिगत प्रयाससँ, अन्यथा आन किछु श्रोत्रिय, योग्य आ कुलीन परिवारकेँ छोड़ि अनेकशः मैथिल ब्राह्मण परिवारेकेँ जखन पंजीकार अथवा हुनका द्वारा कयल सिद्धान्तक प्रयोजन नहि रहलनि तऽ ब्राह्मणेतर समाज आ प्रायशः तकरहि प्रतिनिधि सरकार पंजीकारक स्थितिमे सुधारक कोनो यत्न कियैक करत। मिथिला विभूति स्व. मोदानन्द झाक स्मृतिक संरक्षणार्थ ई सर्वतोभावेन वांछनीय अछि जे पूर्णियाँमे हुनका द्वारा सुविचारित शोध परियोजना सभपर काज करबाओल जाय, स्व. गिरिजानन्द झा सन मिथिला भरिमे पसरल पञ्जीकार लोकनिक ओतय उपलब्ध ओ पंजी-पांडुलिपि सभक संग्रह कयल जाय जे आब कतिपय कारणसँ उपयोगमे नहि रहि गेल अछि, मैथिल मूल ग्राम सभक अभिज्ञान प्राप्त कयल जाय तथा ज्ञात अथवा अज्ञात मैथिल ब्राह्मण परिवारक विशिष्टताक प्रचारार्थ परिचयात्मक विवरणिका तैयार करबाओल जाय। पंजी व्यवस्था निश्चयतः पतनोन्मुख अछि मुदा मोदानन्द बाबूक बताओल मार्गपर जौं शोध कार्य कयल गेल तऽ मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासक अभूतपूर्व सेवा होयत। ज्योति ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ''मैथिली लिखबाक अभ्यास हम अपन दादी नानी भाई बहिन सभकेँ पत्र  लिखबामे कएने छी। बच्चेसँ मैथिलीसँ लगाव रहल अछि। -ज्योति एम पी टूर पहिल दिन 23 दिसम्बर 1991 सोम दिन : हमसब अपन शिक्षक द्वारा निर्देशित पूर्व सूचित कार्यक्रमानुसार 2ः30 बजे दोपहरमे स्टेशन पहुंचलहॅं। ओतऽ अपन सहयात्री साथी सबसऽ भेंट करक उत्‍सुकता तऽ स्वभाविक छल। संगहि अपन अभिभावक द्वारा शिक्षक सबलग चिन्ता व्यक्‍त केनाइर् सेहाे आश्चर्यजनक नहिं छल। अगर किछु नब छल तऽ शिक्षकगण़ किछु विद्यार्थी एवम् भ्रमण करैलेल चुनल गेल स्थान।हमर सबहक जिज्ञासा तहन कनिक धैर्य पौलक जखन गाड़ी प्‍लेटफाॅर्म पर आयल आ हम सब रिजर्व बॉगीमे अपन सामान रखलहुं।गाड़ी ठीक साढ़े तीन बजे विदा भेल। हमहु सब अपन अभिभावक सबके टाटा करैत अपन नब टोलीमे जुटि गेलहुं।दू तीन घंटाक भीतर चक्रधरपुर आबैत आबैत हमर सबहक बढ़िया चिन्हा परिचय भऽ गेल।एक स बढ़ि कऽ एक नब प्‍्रातिभा उभरैत गेल।कियाे नृत्‍य सऽ सबके मनाेरंजन केलक तऽ कियाे माउथ आॅरगन सऽ सुन्दर धुन सुनेलक। चुटकुला किस्सा आ गीतके तऽ अन्ते नहिं।बीच बीच मे बाहरक दृष्यक अवलाेकन सेहो करी लेकिन ओ अतेक मनोरंजक नहिं छल जेहेन बॉगीक माहौल छल। तैयो जखन स्टेशन पर गाड़ी रूकै तऽ अपन हल्ला हुच्चड़ हम सब कम कऽ दएत छलहुं। इ शिक्षक सबहक आदेश छल।अहि तरहे आहि के दिन चिन्हा परिचय आ यात्रा मे बीतल।स्टेशन पर सऽ खरीदल नास्ता आ रेलवेक भोजन सऽ काज चलल। राइतमे सुतै काल हमरा सबके बहुत हंगामा होएत छल। सब एक दोसरक एअर पिल्लो के नाब निकाइल दैत छल। जॅं नाब भीतर दिस राखू त पिन भोइक कऽ हवा निकाइल दैत छल। कोनो  तरहे बिना तकिये के सूतक छल तखन कियै पिन भाेकवाकऽ तकियाके आगाेंलेल खराब करितहु तैं नाब निकालक मौका देनाइ बेसी ठीक लागल।काल्हि जल्दी उतरक छल तैं कम सऽ कम समान निकालने रही जे हरबरी मे किछु छुटै नहिं। जितेन्द्र झा- जनकपुर अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद अपन बिभिन्न माग सहित भारतक राजधानी नयां दिल्लीस्थित जन्तर मन्तरमे धर्ना देलक अछि । सोमदिन देल गेल एहि धर्नामे भारतक विभिन्न स्थानसं आएल मैथिल आ संघ संस्थाक प्रतिनिधि सहभागी रहथि । जन्तर मन्तरमे भेल एहि धर्नामे मिथिला क्षेत्रक विकासक लेल अलग मिथिला राज्य बनाओल जाए से माग कएल गेल । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद एहि अवसरपर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलके ज्ञापन पत्र सेहो बुझौलक । ज्ञापन पत्र बुझेनिहार प्रतिनिधि मण्डलमे डा भुवने·ार प्रसाद गुरमैता, डा रबिन्द्र झा, डा धनाकर ठाकुर,डा कमलाकान्त झा, चुनचुन मिश्र, भवेश नन्दनसहितके सहभागिता छल । परिषदक धर्नामे दिल्लीमे रहल विभिन्न राजनीतिक दलसं सम्बद्ध नेतालोकनि सेहो सहभागी रहथि। परिषदक नेपालक पदाधिकारी आ कार्यकर्ता सेहो धर्नामे सामेल रहथि ।  धर्नामे भीख़ नंहि अधिकार चाही हमरा मिथिला राज्य चाही से नारा लगाओल गेल रहए । परिषद मैथिली भाषाक आधारपर राज्य बनएबाक माग करैत आएल अछि । कोना बचाएब संस्कृतिक विरासत ? मिथिलाक परम्परा आ धरोहरिके मौलिक विशिष्टता गुमिरहल कहैत विज्ञसभ चिन्ता ब्यक्त कएलनि अछि । संस्कृतिक अपन अलग स्थान बांचल रहए से डा गंगेश गुन्जक कहब छन्हि । मैथिली संस्कृतिक विभिन्न पक्षपर नयां दिल्लीमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न गोष्ठीमे बजैत गुन्जन मैथिली संस्कृतिक संरक्षणपर जोड देने रहथि । नाटककार महेन्द्र मलंगिया मिथिलाक लोकसंस्कृतिमे रहल टाना टापर, घरेलु उपचार, शकुन सहितके विषयके फ़रिछियाक' प्रस्तुत कएने रहथि । मैथिली संस्कृतिक संरक्षणलेल एहिमे समाहित गुणके उजागर करब आवश्यक रहल मलंगिया कहलनि । मिथिलामे सातो दिन सात तरहक वस्तु खाक' यात्रा गेलासं शुभ यात्रा हएबाक चलन आ एहने चलनमे रहल वैज्ञानिकता दिश ध्यान जाएब आवश्यक रहल ओ कहलनि । साहित्यकार देव शंकर नविन मैथिली भाषा संस्कृतिके मुल भावना विपरित होबए बला काजके अपमानित कएल जाए से कहलनि । मैथिलीक मौलिकताके लतियाक' कएल जाए बला कोनो काजके बहिष्कार कएल जाए नविनक विचार छन्हि । गायक, साहित्यकार सहित सभके मैथिली गीत संगीत, भाषा संस्कृतिके प्रतिकुल असर होब बला काज नई करबालेल ओ आग्रह कएलनि । नक्कल आ स्तरहीन प्रस्तुतिके अपमानित करबालेल नविन आग्रह कएलनि । मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष अनिल मिश्र मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके विकासक सम्भावना बढाओल जाए से कहलनि । साहित्य, लोक संस्कृतिके समॄद्ध कएल जाए से कहैत ओ मैथिली भोजपुरी एकेडमी एहिदिशसं एहिलेल काज हएबाक प्रतिबद्धता ब्यक्त कएलनि । मिथिला संस्कृति लेल कएल जाएबला काज आपसमे बांटि लेल जाए से मिश्रक सुझाव छन्हि । संस्कृतिक विरासतके रेखाङकित करैत रोड मैप बनएबापर ओ जोड देलनि । संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान भेटए ताहिलेल प्रयास कएल जएबाक ओ जनतब देलनि । दिल्ली प्रसारित सरकार दुरदर्शनमें मैथिलीक स्थानलेल दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षितके ज्ञापन पेश कएल जएबाक आश्र्वासन देलनि । सुभाषचन्द्र यादव एकमात्र वक्ता रहथि जे अपन विचार पहिनहिये सँ लिखि क' देने रहथि से एतए प्रस्तुत अछि।- मैथिली लोक-कथा सुभष चंद्र यादव मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक , जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब आनक भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि । मैथिली मे लोक-गीत, लोक – गाथा आ लोक – देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक – कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक युश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक – साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संश्क्षण जरूरी अछि । लोक – साहित्यक संश्क्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक , भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी । तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि । लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि । ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि । जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उअपस्थित कयल गेल अछि । लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोक – कथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक , से कम आयल अछि । रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि । लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि — ‘एकटा बुढ़िया रहय ‘ आ ‘ एकटा चिनता खेलिऐ रओ भैया ‘। एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि । दुनू क विमर्श , आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि । दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि । पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा , रानी , आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक । कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि – हाथी – हाथी – हाथी ! समुद्र सोखू समुद्र । समुद्र ने अगिन मिझाबय , अगिन । अगिन ने रानी डेराबय , रानी । रानी ने राजा बुझाबथि , राजा । राजा ने बरही डाँड़थि , बरही । बरही ने खुट्टी चीड़य , खुट्टी। खुट्टी ने दालि डिअय , दालि । की खाउ , की पीबू , की लऽ परदेस जाउ। जाइत अछि । चुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक । फेर तऽ चुट्टीक डरँ हाथी , हाथीक डरँ समुद्र , समुद्रक डरँ आगि , आगिक डरँ रानी , रानीक डरँ राजा , राजाक डरँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक । ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनन छलाह । ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक । लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि । हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू चुट्टी धरि जाइत अछि । बुढ़िया केँ चुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक । लेकिन लोक – कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि ? एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि , सएह एहि कथाक आत्म – वाचन थिक । एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि । राजा- रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा – मोतीक दान नहि लैत अछि । दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि । तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही । भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही । दान लेब नीक नहि । स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही । कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक । ’एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया ’ न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि । मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक  रूपमे चलैत छैक , जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक । बरदवला भाइ ! परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता भुखै मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइलएपकड़ने जाइए । फेर घोड़ावला अबै छै , हाथीवला अबै छै , खुद्दी-वला अबै छै । मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि ।ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक;=छोड़बाक बदला मे बरद , घोड़ा , हाथी देबऽ लेल तैयार छैक ,लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि । जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक , तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि । मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि । मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक ; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल । इएह कथाक आत्मवाचन थिक । कथा ई प्रतिमान उप़स्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक । एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही। श्याम भद्र मैथिली भाषाक अपन संचारमाध्यम हुअए से माग कएलनि । एहिलेल संगठित प्रयास करबालेल ओ कार्यक्रममे आग्रह कएलनि । बिहारमे अतिरिक्त भाषाके श्रेणीमे मैथिलीके राखल गेल कहैत भद्र रोष प्रकट कएलनि । मातृभाषाक श्रेणीमे मैथिली नई भेलासं विद्यार्थी मैथिली नई पढि रहल हुनक दाबी छन्हि । रंगकर्मी प्रमिला झा मेमोरियल ट्रष्ट घोंघौरक ट्रष्टी श्रीनारायण झा मैथिलमे प्रतिबद्धताक कमी हएबाक विचार व्यक्त कएलनि । हिन्दीमे लिखनिहार मैथिल स्रष्टा अपन मैथिली भाषामे किया नईं लिखैया नारायणक प्रतिप्रश्न रहनि । मैथिलीके समांग आ समान दुनु रहैत स्थिति सन्तोषजनक नइ रहल ओ कहलनि । अष्ट्‌म अनुसूचिमे मैथिली आबि गेलाक बाद आब सहज रुपे भाषा संस्कृतिक काज आगु बढए नारायण कहलनि । गोष्ठीमे मैथिलीलेल काज कएनिहार संस्थाक वर्तमान भूत भविष्यपर सेहो वक्तासभ बाजल रहथि । मैथिलीमे रंगकर्मक विकासके बात होइतो एहिमे काज कएनिहारके प्रोत्साहनलेल कोनो पक्षसं ध्यान नई देल गेल कहल गेल । प्रमिला झा नाटयवृति शुरु भेलाक बादो एक्कोटा नव पुरस्कार/वृत्तिक शुरुवात नई भ' सकल मैलोरंगक प्रकाश झा कहलनि । तहिना झा एकगोट  मैथिल दोसर मैथिल पर विश्र्वास करए त सभ तरहक समस्या समाधान हएत कहलनि । मैथिलबीचके आपसी विश्र्वासके ओ विकासक मूलमन्त्रके संज्ञा देलनि । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषदक कृपानन्द झा सरकारी स्तरपर मैथिलीके संरक्षण नई भेट रहल कहैत रोष प्रकट कएलनि । मैथिलीक संरक्षण लेल मिथिला राज्य स्थापना हुअए - झा कहलनि । मैथिली भाषा संस्कृतिदिश लागल संस्था आर्थिक संकटसं ग्रस्त रहल कहैत ओ गोष्ठीमे सहभागीके ध्यानाकर्षण करौने रहथि । विद्यापति संगीत संरक्षणलेल योजनाबद्ध काज हएब आवश्यक रहल गायिका अंशुमालाक विचार छन्हि । दिल्ली युनिवर्सिटीमे संगीतसं एम फ़िल क' रहल अंशुमाला विद्यापति संगीतले स्थापित करबालेल व्याकरणक आवश्यकता पर जोड देलनि । मैथिलीमे लोकसंगीत आ युवाबीचके दुरी बढब चिन्ताक विषय रहल ओ कहलनि । 'लोकसंगीत नई बुझनिहार लडकीसं वियाह नई करब एहन चलन हएबाक चाही' मैथिली संस्कृति संरक्षणलेल अंशुमाला सुझाव दैत बजलिह । गोष्ठीमे सहभागी रंगकर्मी अपन कथा ब्यथा सेहो सुनौने रहथि । दिल्लीमे रहिक' रंगकर्म क' संघर्षरत कलाकार बाध्यताबश गुणस्तरहीन काज क' रहल मैलोरंगक दीपक झा कहलनि । एहिद्वारे कलाकारके अपमानित करबाक काज कियो नई करए दिपकके आग्रह छन्हि । संस्कृति बचएबाक अभियान मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके संरक्षण सम्बर्द्धनक लेल योजनाबद्ध काज करबा पर जोड देल गेल अछि । मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत : संरक्षण आ विकासक सम्भावना विषयपर बजैत वक्तासभ एहन विचार रखलनि अछि । मैथिली लोक रंग दिल्लीक आयोजनमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न मैथिलोत्सवमे बजैत वक्तासभ मैथिली संस्कृति रक्षाक लेल ठोस कार्ययोजना बनाओल जाए से कहलनि । मैथिलोत्वसमे भेल संगोष्ठीमे लोक नाटय, खानपान, हस्तशिल्प, लोक नॄत्य, लोक विश्र्वास, पुरातात्विक संरक्षण, चित्रकला, पाण्डूलिपि, पावनि तिहार, देवी देवता, रीति रिवाज, मठ-मन्दिर, पहिरन-ओढन, लोकसाहित्य, लोकवाद्य, शिष्टाचार,मेला सहितक विषयपर वक्तासभ बाजल रहथि । गोष्ठीमे कथाकार अशोक, कमलमोहन चुन्नु, नाटककार महेन्द्र मलंगिया, मोहन भारद्वाज, सीयाराम झा सरस, सुभाष चन्द्र यादव, गंगेश गुन्जन, मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष प्रो अनिल मिश्र, डा अनिल चौधरी, देवशंकर नविन सहित वक्तासभ मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक विभिन्न विषयपर बाजल रहथि । भारतीय भाषा संस्थान मैसुरक सहयोगमे मैलोरंग नयां दिल्लीक राष्ट्रिय नाटय विद्यालयमे कार्यक्रम आयोजन कएने छल। मैथिलोत्वसमे मैलोरंग रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्ति सेहो वितरण कएलक । एहिबेरक नाटयवृत्तिक पओनिहारिमे पहिल मधुबनीक मधुमिता श्रीवास्तव, द्वितीय कोलकाताक वन्दना ठाकुर आ तृतीय दिल्लीक नेहा वर्मा छथि। रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाटय निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीलाक स्मृतिमे स्थापित प्रमीला मेमोरियल ट्रष्ट,घोंघौर एहि नाटयवृतिक स्थापना कएने अछि । मैथिलोत्वसमे संगोष्ठी, वृति वितरणक बाद सांगीतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल छल  । सांगीतिक कार्यक्रममे सुन्दरम, घनश्याम, दिवाकर, प्रभाकर, गुन्जन, अंशुमाला, कल्पना मिश्रा, राखी दास,रीतेस सहितक कलाकार दर्शकके मनोरन्जन करौने रहथि । उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज बहादुरगंज स’ रिपोर्ट- बाढक स्थिति बडे खतरनाक रहल, आब कोना के ओ बीत गेल। हमर सभक गाममे कोनो राहत कर्मी नै अएला, नेता सभ चुनाव मे अबै छथ, मुदा रौदी दाही मे नै। गाममे सरकारी स्कूल अछि, सप्ताहमे दू दिन खुजल रहै ये, कशीबारी मे। चारि दिन बन्दे रहै ये, अहा पत्रकार छी हितेन्द्र भैया ई मुद्दा तैं भेजी रहल छी। गामक लोक खेती बारी करै ये , धान,गेहूँ परवल खीरा, करैला, कद्दू ,तारबूज ,गोभी, बैगन आ मछली मारै ये। विराटनगर नेपाल मे सेहो लोक सभ सम्बन्धी सभ छथि, 20 किमी दूर बहादुरगंजमे हास्पीटल अछि, गाममे झोलाछाप हास्पीटल अछि जे झोलाछाप डाक्टरक झोरामे रहै ये। पिछला साल एक गोटे के बहादुर गँज हास्पीटल् ले गेलौ, डाक्टर सभ पानी चढा देलकै , तीन दिन तक पानी चढैते रहलै, कियो खेनाइ नै देलकै, ओ पेट फूलि क मरि गेल। घर सभ फूसक आ घासक, धानक पुआरक बनल छै, अगिलग्गेमे से सभ जरैत रहैत छै। एक-एक्अ आदमी के 5-6 टा बच्चा जिबैत रहैत छै, 9-10 बच्चामे। विराटनगर लग गाम मे मौसाक घर गेलौ, ओतए सरकार मैथिली या नेपाली बाजय लेल कहने अछि, सभ गोटे ओत मैथिली बाजै छथि, भारतमे स्थिति खराप। नेपालमे मैथिली के नीक स्थितिक कारन अछि ओतुक्का मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मन आ कर्न कायस्थ मे सीमित नै अछि, ओतय महतो यादव सभ मैथिली के अपन बुझैत छथि. भारतमे कतेको ठाम मात्र दू जातिमे सीमित अछि, तेसर के अशुद्ध कहल जै छै से ओ अपनाके मैथिली से दूर केने छथि,जाति-पाति से अपन उन्नति जे हुए मुदा समाजक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मैथिलीक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मिथिला के उन्नति नै हैत

जाति-पाति से कुंठाग्रस्त लोक नीक रचना नै लिखि सकताह आ घृनामे जरैत रह ताह। नेपालमे घर फूसोके छै मुदा बेसी लकडी आ टीना के छै। ओत खेती बारी भारते जेका छै। ओतहुओ हास्पीटल दूरे छै। ओते रिक्शा टेम्पू नै चलै छै, खाली बस चलै छै। ओत गाम्मे सेहो बिज्ली छै, गाममे मुदा रोड नै छै, ऊबर खाबर छै, बरसातमे कीचड्क्ष भे जाइ छै। शहरमे रोड ठीक छै। विराटनगर से 20 किलोमीटर दूर नया बजार हटियामे आधा बजार मे बजार आ आधामे दारू बिकाइत छै, जतए छोट से पैघ बच्चा सभी दारू पीबै छै। आर समाचार बाद मे। अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व -नवेन्दु कुमार झा मिथिलांचलक सांस्कृतिक धरोहर महाकवि विद्यापतिक जयन्तीक प्रतीक्षा मिथिलावासी वर्ष भरि करैत छथि। कार्तिक धवल त्रयोदशीकेँ प्रति वर्ष मनाओल जाएवला एहि वार्षिक उत्सवमे पूरा मनोयोगक संग मिथिलावासी शामिल होइत छथि। एहि क्रममे राजधानी पटनामे आयोजित होमएवाला विद्यापति स्मृति पर्वक प्रतीक्षा सेहो राजधानीक मिथिलावासीकेँ रहैत अछि। मुदा एहि वर्ष एहि आयोजनपर जेना ग्रहण लागि गेल अछि। बढ़ैत संसाधनक बावजूद आयोजक एहि सांस्कृतिक उत्सवक स्वरूप वर्ष-दर-वर्ष छोट कएने जा रहल छथि। ई आयोजन आब इतिहास बनबाक द्वारपर ठाढ़ अछि। पछिला चौबन वर्षसँ प्रति वर्ष आयोजित होमएवाला त्रिदिवसीय कार्यक्रम एहि वर्ष एक दिवसीय होएबाक संवाद अछि। पटनाक हार्डिंग पार्कसँ सचिवालय मैदान आ मिलर हाई स्कूल मैदान होइत ई आयोजन जखन भारत स्काउट मैदान धरि आएल ता धरि ई उम्मीद छल जे ई समारोह अपन पुरान गौरवकेँ फेरसँ प्राप्त करत मुदा जखन एहि समारोहक स्थान परिवर्तित कऽ कापरेटिव फेडरेशन परिसर आबि गेल तऽ स्पष्ट भऽ गेल जे आब आयोजक मात्र खानापूर्ति करबाक लेल एकर आयोजन करैत छथि। आ एहि बेरक सूचनापर गौर करी तऽ स्पष्ट होइत अछि जे आब एहि समारोहक आयोजन मात्र औपचारिकता रहि गेल अछि। कोसी क्षेत्रमे आएल बाढ़ि आयोजक सभकेँ एकटा बहाना बनि गेल अछि आ एहि बहाने एहि समारोहक गौरवपूर्ण इतिहासकेँ समाप्त करबापर लागल छथि। बाढ़ि मिथिलांचलक नियति अछि। शायदे कोनो वर्ष होएत जखन कि एहि प्राकृतिक आपदाक सामना नहि होइत अछि मुदा एहि बेर कोसीमे आएल बाढ़िसँ आयोजक संस्था चेतना समितिक कर्ता धर्ताकेँ अपन गाम-घर दहाएल तँ हुनक दर्द जागि उठल आ कार्यक्रमक समय-सीमा घटा देलनि। दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आदि मिथिलांचलक कतेको क्षेत्र सभ साल बाढ़िक मारि झेलैत अछि मुदा बिना रुकावट सभ साल तीन दिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजन होइत रहल अछि। ओहि क्षेत्र सभक चिन्ता समितिकेँ शायद नहि रहैत छल। ज्यो बाढ़िक समस्याक प्रति एतेक गंभीर छलाह तँ पूर्वमे कतेको बेर आएल बाढ़िक बाद एहि आयोजनकेँ छोट कएल जा सकैत छल से आइ धरि नहि भेल। ज्यो अहू बेर आयोजक एहि समस्याक प्रति गंभीर रहितथि तँ एहि समारोहक माध्यमसँ राजधानीक मिथिलावासीक सहयोग बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल लऽ सकैत छलाह। एहन रचनात्मक डेग संस्था उठाएत से संस्थाक कर्ता-धर्ताक आदति नहि रहलनि अछि। एहिसँ समितिकेँ सामूहिक श्रेय भेटैत से तऽ संस्थाक महानुभाव लोकनिकेँ कतहु मंजूर नहि छलनि। ओ तँ व्यक्तिगत श्रेय लेबापर विश्वास करैत छथि। दरअसल चेतना समितिक जुझारू पदाधिकारी सभमे आब काज करबाक चेतना नहि बचल अछि। नहि तँ ओ एहिपर जरूर चिन्तन करितथि जे एहि समारोहमे प्रतिवर्ष दर्शकक संख्या किए कम भऽ रहल अछि। जखन संस्थाक स्तरसँ दर्शककेँ जोड़बाक कोनो प्रयास नहि भऽ रहल अछि तँ एहिमे दर्शक दिससँ प्रयास होएबाक बात सोचब निरर्थक अछि। ओना आयोजक कतेको वर्षसँ एहि समारोहकेँ विराम देबाक प्रयासमे छथि। कखनो चुनावक बहाना बना तँ कखनो कानून व्यवस्थाक बहाने एहि कार्यक्रमक स्वरूपकेँ छोट क देलनि। एहि वर्ष तँ कोसीक विभीषिका तँ मानू हुनक सभक मनोनुकूल वातावरण दऽ देलक। प्रारम्भमे त्रिदिवसीय आयोजनक तैयारीक बाद एकाएक एकरा एक दिवसीय करब मात्र औपचारिकता लागि रहल अछि जाहिसँ कि जे किछु मैथिली प्रेमी छथि अगिला वर्शसँ अपनहि एहि कार्यक्रमसँ कटि जाथि आ दर्शकक अनुपस्थितिक बहाना बना कार्यक्रमकेँ बंद कऽ देल जाए। ई विडम्बना कहल जा सकैत अछि जे पटनामे शुरू भेल विद्यापति स्मृति पर्वक देखा-देखी प्रदेश आ देशक आन क्षेत्रमे वर्ष दर वर्ष पूरा उत्साहक संग आयोजित भऽ रहल अछि आ एहि ठामक आयोजनक अस्तित्वपर संकट आबि गेल अछि। वास्तवमे चेतना समिति आब किछु फोटोजेनिक चेहरा सभक अखाड़ा बनि गेल अछि जे एकर कार्यालय विद्यापति भवनकेँ अपन दलान बुझि अपनहिमे कुश्ती करैत रहैत छथि। कोसीक विभीषिकाक दर्द मठाधीश लोकनिक संग-संग सभ मिथिलावासीकेँ अछि। कोसीक बाढ़ि पीड़ितक दर्द एहि आयोजन माध्यमसँ सभ मिथिलावासीकेँ जोड़ि सामूहिक रूपेँ बाटल जा सकैत छल। ज्यो से नहि तऽ बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल प्रदेश आ देशक कतेको क्षेत्रमे सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक कएल गेल आयोजन व्यर्थ छल। मिथिलाक कतेको महान विभूति सभक प्रयासँ शुरू भेल राजधानीक ई सांस्कृतिक उत्सव पूरा देशमे एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। एहि आयोजनकेँ इतिहास बनेबाक प्रयास करब चिन्ताक विषय अछि। पहिने कार्यक्रमक स्थान छोट करब आ आब एकर समय सीमा घटएलासँ राजधानीक मिथिलावासी मर्माहत छथि। एकरे परिणाम अछि जे छोटे स्तरपर सही राजधानीसँ सटल दानापुर आ राजीवनगरमे किछु वर्षसँ आयोजित भऽ रहल विद्यापति पर्व आब लोकप्रिय भऽ रहल अछि। आब राजधानीक मिथिलावासी चेतना समितिक बदला एहि दुनू स्थानपर होमएवाला आयोजनक प्रतीक्षा करैत छथि। शायद अहूसँ चेतना समिति सचेत होएत आ विद्यापति स्मृति पर्वक अपन पुरान गौरवकेँ पुनर्स्थापित करबाक प्रयास करत। मुखीलाल चौधरी सुखीपुर – १, सिरहा हाल ः बुटवल बहुमुखी क्‍यापस बुटवल दिनाड्ढ २०६५ जेष्‍ठ २९ गते बुधदिन । धीरेन्‍द्र बाबु, नमस्‍कार बहुत दिनक बाद अपनेक कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” चिठ्ठी पठारहल छी । आशेटा नहि वरण विश्‍वास अछि, प्रकाशित होएत । दिनाड्ढ २०६५ जेठ १४ गते मंगलदिन जनकपुरधाममें लोकार्पण भेल “समझौता नेपाल”क दोसर प्रस्‍तुति गीति एल्‍वम “भोर” क गीतके संगही समझौता नेपालक निर्देशक नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीक साक्षात्‍कार दिनाड्ढ २०६५ जेठ १८ गते शनिदिन कान्‍तिपुर एफ़एम़के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” सुनबाक मौका भेटल । संघीय गणतान्‍त्रिक नेपालक भोरमे समझौता नेपालद्वारा प्रस्‍तुत केल गेल गीति एल्‍बम भोरके लेल समझौता नेपालक निर्देशन नरेन्‍द्रकुमार मिश्रजीके हार्दिक बधाई एवं शुभकामना । आगामी दिनमें समझौता नेपाल मार्फत गीति यात्राके निरन्‍तरततासँ गीत या संगीतके माध्‍यमसँ मिथिलावासी आ मधेशी संगही सम्‍पूर्ण आदिबासी थारु में जागणर लावय में सफल होवय आओर मिथिलावासी, मधेशी, आदिवासी थारु संगही सम्‍पूर्ण देशवासीमें सदाशयता, सदभावना, सहिस्‍णुता आ स्‍नेहमें प्रगाढता बढावमें सफलता प्राप्‍त होवय, एकर लेल साधुवाद । गीतकार सभहक गीत उत्‍कृष्‍ट अछि, कोनो गीत वीस नहि सभटा एकाईस । एकसँ बढी कय एक । गीतकार सभहक गीतके सम्‍वन्‍धमें छोटमें अलग अलग किछु कहय चाहैत अछि रुपा झाजीक गीत शिक्षा प्रति जागरुकता आ चेतानक सन्‍देश द�रहल अछि । ज्ञान प्रकाश अछि आओर अज्ञान अन्‍धकार । अन्‍धकारसँ वचवाक लेल ज्ञान प्राप्‍त केनाइ आवश्‍यक अछि । “केहनो भारी आफत आवौ, ज्ञानेसँ खदेड” पाति कोनो समस्‍या किएक नहि विकराल होय ज्ञान आ वुद्धि सँ समाधान करल जा सकैत अछि । पुनम ठाकुरजीक गीत सब सन्‍तान समान होइछ, बेटा—बेटीमे भेदभाव नहि होयबाक आ करबाह चाहि सन्‍देश द�रहल अछि । “मुदा हो केहनो अबण्‍ड बेटा, कहता कुलक लाल छी ” सिर्फ एक पातिस आजुक समाजमें बेटा—बेटी प्रति केहन अवधारणा अछि, बतारहल छथि । मिथिलाके माटि बड पावन छै । संस्‍कार आ अचार–विचार महान छै । आओर वएह माटिक सपुत साहिल अनवरजी छथि । जई माटिमें साहिल अनवरजी जकाँ मनुक्‍ख छथि ओही माटिमे सम्‍प्रदायिकताक काँट उगिए नहि सकैछ । उगत त मात्र सदभावना, सदाशयता, माया—ममता, स्‍नेहक गाछ । जेकर गमकसँ सभकेओ आनन्‍दित रहत आ होएत । “जतय हिन्‍नुओ राखि ताजिया, मान दिअए इसलामके छठि परमेसरीक कवुलाकय मुल्‍लोजी मानथि रामके” सँ इ नहि लागि रहल अछि ? कि मिथिलाके पावन माटिमें सहिश्‍णुताक सरिता आ बसन्‍तक शीतल बसात बहिरहल अछि । धन्‍य छी हम जे हमर जनम मिथिलाक माटिमें भेल अछि । धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक गीत सकारात्‍मकतासँ भरल अछि । समस्‍या किएक नहि बडका होबय आ कोनो तरहके होय निरास नहि होयवाक चाहि आओर सदिखन धैर्य—धारणकय सकारात्‍मक सोच राखिकय आगाँ बढवाक चाहि । संगहि जाहि तरहसँ माँ–बाप अपन सन्‍तानक लेल सदिखन सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण राखैत छथि, वएह तरहसँ संतानक कर्तव्‍य होइछ जे ओ सभ अपन वुढ माँ–बाप प्रति वहिनाइते दृष्‍टिकोण अपनावैत । गीतके शुरुके जे चार पाति “संझुका सुरजक लाल किरिनिया, नहि रातिक इ निशानी छै छिटने छल जे भोर पिरितिया, तकरे मधुर कहानी छै” । सकारात्‍मकताक द्योतक अछि । एकर संगहि “सोना गढीके इएह फल पौलक, अपने बनि गेल तामसन वाह बुढवा तैओ वाजैए, हमर बेटा रामसन” इ पातिसँ मा–बापके अपन सन्‍तानक प्रति प्रगाढ माया ममताक बोध करारहल अछि । नरेन्‍द्रकुमार मिश्राजीक गीत इ बतारहल अछि कि संसारमे प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता अछि तएँ संसार एतेक सुन्‍दर अछि । यदि प्रेम, स्‍नेह, माया–ममता हटा देल जाय त संसार निरस भ�जाएत आ निरस लाग लागत । तएँ हेतु एक दोसरक प्रति प्रेम, स्‍नेहक आदन–प्रादान होनाइ आवश्‍यक अछि । “आखि देखय त सदिखन सुन्‍दर सृजन ठोर अलगय त निकलय मधुरगर बचन” पाती सँ प्रेम आ स्‍नेह वर्षा भ�रहल अछि, लागि रहल अछि । वरिष्‍ट साहित्‍यकार, कवि, गीतकार द्वय डा़ राजेन्‍द्र ॅविमल� जी आ चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीके गीत अपने अपनमे उत्‍कृष्‍ट आ विशिष्‍ट अछि । हिनका सभक गीत सम्‍बन्‍धमे विशेष किछु नहि कहिके हिनका सभक गीतक किछु पाति उधृत कयरहल छी, सबटा बखान कैय देत । डा़ राजेन्‍द्री विमल जीक पातिक “जगमग ई सृष्‍टि करए, तखने दिवाली छि प्रेम चेतना जागि पडए, तखने दिवाली छि रामशक्ति आगुमे, रावण ने टीकि सकत रावण जखने डरए, तखने दिवाली छि” अपने अपनमे विशिष्‍टता समाहित केने अछि । ओही तरहे चन्‍द्रशेखर ॅशेखर� जीक गीतक निम्‍न पाति अपने अपनमे विशिष्‍ट अछि “साँस हरेक आश भर, फतहक विश्‍वासकर बिहुँसाले रे अधर, मुक्त हो नैराश्‍य–डर रोक सब विनाशके, ठोक इतिहासके दग्‍धल निशाँसके, लागल देसाँसके” हमर यानी मुखीलाल चौधरीक गीतके सम्‍बन्‍धमे चर्चा नहि करब त कृतघ्‍नता होएत । हमरद्वारा रचित गीत भोरक संगीतकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिद्वारा परिमार्जित आ सम्‍पादित केल गेल अछि । तएँ एतेक निक रुपमे अपने सभहक आगाँ प्रस्‍तुत भेल अछि । हमर गीतके इएह रुपमे लाबएमे धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीक उदार या गहन भुमिका छैन्‍ह । एकर लेल प्रेमर्षिजीके हम मुखीलाल चौधरी हार्दिक धन्‍यवाद ज्ञापन करए चाहैत छी । सभटा गीतके संगीत कर्णप्रिय लगैत अछि । सुनैत छी त मोन होइत अछि फेर–फेर सुनी । कतबो सुनलाक वादो मोन नहि अगहाइत अछि । एतेक निक संगीतक लेल धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिजीके हार्दिक बधाई आओर अगामी दिन सभमे एहोसँ निक संगीत दय सकैत, एकर लेल शुभकामना आ साधुबाद । सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका इत्‍यादिक संयोजन कय बड सुन्‍दर आ हृदयस्‍पर्शी गीति एल्‍बम “भोर ” जाहि तरहसँ हमरा सभहक आगाँ परोसने छथि, एकर लेल भोरक संयोजक रुपा झा जीके हार्दिक बधाई । अन्‍तमे सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका, संयोजक आ समझौता नेपालक  निर्देशकके हादिक वधाई । डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। आलेख: मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तन पर लिखल गेल अछि। एहि नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्ग मे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा एहि विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कयलनि जाहिसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ एहि कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब  हैब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। एहि काल प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कयल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कए सोझाँ आयल अछि। एहि कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नहि भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जयबाक संभावना ओ पराश्रित भ’ कए पतित होयबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक  शिकार हैबाक आशंका , वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कयलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि। भारतीय समाजमे नारीक स्थान समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जाहि प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नहि चलि सकैत अछि ओकरा चल’ क लेल  दुनू पहियाक ठीक होयब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ी केँ चलयबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनू मे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नहि भ’ सकैत अछि। एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलैक। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलैक। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओहि समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नहि होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नहि करैत छलाह। नारी सहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता, आ सावित्री सन देवी  घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलैक। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषी सँ गौरवान्वित छल। ओहि युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओहि समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। एहि लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः”  अर्थात जतय नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतय देवता विचरण करैत छथि। एहि प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि। समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनतिक क्रांति भेल एहि सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नहि रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कए रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे  सेहो महान परिवर्तन भ’ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़’ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नहि छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लाग’ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह। जखन मुसलमानी शासन एहि देशमे दृढ़ भ’ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भ’ क’ शासन करय लगलाह, तखन दरबारमे जतय महफिल जमय लागल, सुरा क दौर चल’ लागल ततय पायलक झनकार सेहो होम’ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कय ओकर नख- शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह। हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त एहि कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नहि रहि गेल। आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतय सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आयल ओतय नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलैक। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य त’ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नहि हैत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माण मे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समय आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कयल जाय। विधवा-विवाह हो वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हो, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हो वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओहि सभ कुप्रथाकेँ समाप्त कर’ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार क’ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओहि गौरवकेँ प्राप्त क’ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। एहि दिशामे जतय धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ एहि भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छथि। नारीक कारुणिक स्वरुप नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। एहि हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा होएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ ल’ क’  आइ धरि परिवार मे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतय धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि भारतमे अन्य  सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्रचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कयल जाइत छल। एतय धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होयबक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नहि छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नहि उठैत छल। स्पार्टा मे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”1 भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था विशेष कए मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनहुँ, घर-घर मे कयल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनहुँ कर्तव्यक पूर्ति नहि क’ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होम’ लागल तत्पश्चात् नारी मे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ क’ देलक। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओहि सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजिकरण। व्यावहारिक रुपमे एहि सभटा क्रिया पर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्ध मे हस्तक्षेप करब ने केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानैत छथि। एकैसम शताब्दीक तथाकथित  समतावादी समाजहुँमे नारी पर होम’ वला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नहि भेल अछि, जखन की एहि अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भ’ गेल अछि। नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। एहि कारण सँ पारिवारिक स्वरुप मे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भ’ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास क’ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कयलक आ क’ रहल अछि एहि संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन- अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कयने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कयल जा सकैत अछि। शारीरिक प्रताड़ना शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नहि अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”2 एकटा नवविवाहिता  जाहि संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना ल’ क’  नव घरमे अबैत अछि ओतय पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेला पर ओकरा कतके असह्य वेदना होइत हैतेक तकर अनुमान हम आसानीसँ नहि लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि। मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कय आयल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये  समाज ओ परिवारक  विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि--- सुगियाः  “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला,जलखै                       ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ क’ के एलाह जे जलखै    दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”3 विडम्बना ई थिक जे इ समस्या केवल ग्रामीण , गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नहि अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारहुँ मे नारीक कमोबेश यैह स्थिति अछि। यौन उत्पीड़न मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होम’ वाला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण  सँ महिमामंडित क’ जाहि सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कयने अछि ओहिमे स्त्रीकेँ सेहो पता नहि चलि सकल जे ओ शोषित भ’ रहल अछि। उत्सर्गक नाम पर पुरुष ओकरासँ सभ किछु माँगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कतहुँ महानतासँ विभूषित होयबाक गर्वक मोहसँ ओकरा पर अपनाकेँ निछावर करैत रहल त’ कतहु परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतय ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतहि दोसर दिस ओकर यैह गुण , ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल। नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक यातनाहुँ सँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओहि टकामेसँ बिजली अपन कमीशन माँगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कय बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भ’ जाइत छथि आ कहैत छथि कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध त’ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भ’ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे----“धुर औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?4 वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार करल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कयने छथि। एहि एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कयल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नहि क’ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क क’ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोग पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ। सूर्यः       हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ....... कुन्तीः   (उत्तेजित स्वरमें) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह        नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ? सूर्यः     (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा क’ देवताक   पूजा करैत अछि-- मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना क’ स्वर्ग ल’ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक ? कुन्तीः    (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक  करैत छी ? सूर्यः      (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना क’ राखैक      लेल। कुन्तीः     (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भ’ जाइत होइत त’ ओ मनुक्खे  भ’ क’ रहैत होयत। सूर्यः       हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? 5 अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (1992) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। एहि घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार कहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक----- किसुनः    “तोहर तँ गप्पे अनटटेल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फकेल रहतैक?”6 तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जाहि करणेँ ओ समाजमे मुँह देखयबाक योग्य नहि रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। महेन्द्र मंगगियाक ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’ मे सेहो एहि विषय पर दृष्टिपात कयल गेल अछि---- मनोजः     “हँ, एना सकपकेलेँ किएक ?  दरोगा साहिब इएह ओ शैतान छी जे कतेको बेटी-पुतोहुक इस्त्रीकेँ लोभ आ बलात्कारसँ भ्रष्ट करैत आयल अछि। गाममे हरदम एकटा ने एकटा उधवा मचबैते रहैत अछि जाहिसँ लोक अशांत अछि।”7 एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भ’ रहल छथि एहि विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कयने छथि। बाल विवाह बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओहि प्रथासँ अछि जाहिमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कइल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालहिसँ जाहि विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होम’ सँ पूर्व जँ विवाह नहि कयल गेल तँ एहि सँ माता-पिताकेँ महापाप होइत छैक। एहन विवाह कतके हास्यास्पद अछि से एहि बातसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे हमरा कोनहुँ मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनहुँ निर्देश नहि देल गेल अछि । तथापि ई व्यवस्था आइयहुँ मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जाहि परिस्थितिसँ भेल हो मुदा एहि कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भ’ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भ’ जाइत छैक। एहि समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भ’ गेल छैक किएक तँ बाल- विवाहक कारणेँ ने त’ ओ शिक्षा प्राप्त क’ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। एहि प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कए रहि गेल अछि। एहिमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भ’ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन  नारकीय भ’ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या ल’ क’ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कयने छथि, एहिमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ क’ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह  हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे क’ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भ’ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखनहि बाल्यावस्थाकेँ पार कए युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाब’ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नहि छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कए आगिमे स्वाहा क’ देल  जाइत छैक। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ-- मधुकला—    “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’8 मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनहु समाजमे बाल विवाह भ’ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नहि फुजैत छैक। दहेज मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सबसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आयल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देब’ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नहि आनि सकैत छथि  तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुन’ पड़ैत छैक। बात-बात मे ओकरा अपमानित कयल जाइत अछि। ओ भाँति-भाँतिक लाँछन सेहो लगाओल जाइत छैक। एतबे नहि ई प्रक्रिया ता धरि चलैत रहैत छैक जाधरि ओ सासुर वलाक इच्छाक पूर्ति नहि क’ दैछ। दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइत छैक तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कार मे भेटैत अछि--- ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै    देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” 9 पर्याप्त दहेज नहि देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था      भ’ जाइत छैक से स्वतः अनुमान कयल जा सकैछ। एतबे नहि एहि पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइत छैक जे ओ दोसरहुकेँ एहि परिणामक भविष्य भोक्ता  रूपमे देखि सिहरि जाइत छैक— ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ            अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?......अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”10 जाहि परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छैक ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन- देन उचिक बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोग’ पड़ैत छैक जे “कनियाँ – पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भ’ जाइत अछि, जाहिसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नहि भेटैत छैक। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भ’ कनियाँ- पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर इ वेदना आ अतृप्त लालसा--- निर्मला--- “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि.....? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक...कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”11 पर्याप्त दहेज नहि लयबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कयल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि क’ लैत अछि। एतबे नहि कखनहु-कखनहु तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नी केँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो क’  दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जाहिमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह क’ देलक। एतय दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि---- षोडसीः  “हम जीबय चाहै छी राजा,  जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा     दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी। वृद्धाः     चुप पपिनियाँ। षोडसीः   हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”12 एहि कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भ’ नाटककार स्वयं कहैत छथि— “आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ   सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।”13 भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ एहि चौंकाब’ वला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आँकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतय प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जाहिमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भ’ रहल छैक। वेश्यावृत्ति वेश्यावृत्ति भारतीय  समाजक कैंसर थिक। एहि ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि। जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छैक आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छैक। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कयल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नहि बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ एहि धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आयल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छैक  आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भ’ समाजमे जीवित रहबाक हेतु एहि धन्धाकेँ स्वीकार क’ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नहि छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक  कुत्सित  मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नहि देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करय पड़ैत छैक। आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नहि बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करय लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार कर’ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा  एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नहि रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः- सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत) अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी, अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”14 नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कयने छथि। नवलः     “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब        रातिक पहरमे  जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’15 चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भ’ जाइत अछि-- रघुनन्दनः  “तुम्हारी और तुम्हारी खुबसुरती के अलावा मेरे लिए  सोचने    का मसाला ही कौन सा है ? मोतीः      (सलाम करैत) मैं निहाल हुई मेरे राजा। रघुनन्दनः  निहाल यों हुआ जाता है ? मेरे पहलू मे बैठो, मेरे जलते हुए जिगर पर मरहम डालो। तर होने दो मेरे प्यासे लबों को, अपने लवों और शरबते अनार से।”16 एहि तरहँ हम देखैत छी आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कयल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार एहि रोगक पर्दाफाश कयलनि ओ संगहि चेतावनी द’ रहल छथि एहि कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु। स्त्री - पुरूष संबंधक नव आयाम वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भ’ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कयल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जाहिसँ स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कयलक । हमरा समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। एहि तरहेँ ओकरा आपसी संबंधमे आयल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाज पर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलैक आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कयल जाइत छलैक। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलैक एहि कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाब’ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग क’ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयहु ओकरामे ओतेक साहस नहि छलैक जो अपन संग भ’ रहल अन्यायक प्रतिकार क’ सकय। जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलैक आ नारी शिक्षित होमय लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सोहो प्रभावित होमय लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनैलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लैक तखन ओकरा लेल आवश्यक भ’ गेलैक जो ओ अधिकारक रक्षा करय आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकय। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हो, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होम लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा एहि दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। एहि नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरी सँ हुनक विवाह कर’ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होयबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी एहि अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घर सँ बाहर भ’ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि----- बमबाबा--- “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’  रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ नहि काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौक—एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”17 एहि तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा ,पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँ मे हस्तक्षेप बढ़’ लागल एहि तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक। पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्रविकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भ’ रहल अछि। ओ परिवारर ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नहि द’ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भ’ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। एहि हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नहि देल जा सकैछ प्रत्युत ओहि समाज व्यवस्थाक अछि जाहिमे हमर परंपरा बनल अछि जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भ’ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कयलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल  छथि।  पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि--- रजनीः--- “हुँह....मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान-  मर्यादाक तकर दशांशो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि दँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”18 व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि ल’ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन- वासनाक पूर्तिक समस्या एहिसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिक पूर्ण भ’ सकैछ , किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हैत। एहन नारी व्यवहार शून्य भ’ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जाहिसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भ’ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सब सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि--- ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि.... लाल भैयाक  लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी....जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”19 समाजक नींव परिवार छैक आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगहिसँ परिवार सुखी भ’ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एकहुँ पंगु भ’ जायत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। ताहि हेतु आब पुरुषहुँ केँ सोच’ पड़तैन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भ’ गेल अछि। शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नहि बुझल जायत जाधरि ओहि देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नहि हेतैक। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदय, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार। वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्राहिक भाँति शिक्षित कयल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजर’ पड़ैत छलैक। अथर्व वेदमे लिखल छैक जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त कर’  मे तखने सफल भ’ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भ’ चुकल हो। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त  कयने छलीह। एतय धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कयने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि एहि प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि। वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओहिमे नारीक सहयोग कोनो कम नहि छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। एहि तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि। उत्तर वैदिक कालमे समयक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होम’ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेज’ मे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलैक, ई विचार प्रबल भ’ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होम लागल। कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भ’ गेल। मैथिल समाजमे एखनहुँ नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नहि रहि जाइत अछि। एहि संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ- “जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पयर नहि बढ़ा सकय एको कौड़ी अरजि नहि सकय, एतेक तक जे ककरहुँसँ भरि मुँह बाजि नहि सकय तकरा जँ नाँगड़ि कही बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही त’ कोनो अनुचित नहि।”20 स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नहि रह’ चाहैत छथि कालीनाथ झा ‘सुधीर’ क  नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका एहि लेल तिरस्कृत करैत छथि— कमला-  “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि  पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी - पत्री लिखब । तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”21 ‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कयल जाइत अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नहि क’ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी  कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कय समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त क’ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट  कयने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कयल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! --- बेटी तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”22 एहि तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जाहि नारी शिक्षाकेँ आरंभ कयल गेल ओहिमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ एहि विषय के प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे  परिवर्तन आनबाक प्रयास कयने छथि। एहि प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत  छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओहि कुड़हड़िक धारकेँ तेज क’ देने अछि जाहिसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाय संभव भ’ गेल अछि।23 निष्कर्ष मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष क’ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जाहिमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनहुँ मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कयल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। एहि उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाय तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ ल’ क’ ।  यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध – विवाह, बिकौआ प्रथा  एखनहुँ समाजसँ उठि नहि गेल अछि तथापि एहि दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भ’ कए कतोक नाटक मध्य एहि समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कयने छथि जाहिसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। मुदा एतय एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि ? एहि कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नहि कयलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कए नष्ट भ’ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भ’ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भ’ रहल अछि। एहि कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीकेँ जतेक आदर्शवादी ढ़ंगसँ चित्रण कयल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नहि। संदर्भ 1.           डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—172 2.           स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर 2001, अंक—1 3.           बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—43 4.           एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, 1977,पृष्ठ—133 5.           वएह, पृष्ठ—26 6.           रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, 1992,पृष्ठ—20 7.           लक्ष्मण रेखा खण्डित, महेन्द्र झा, उपेन्द्र झा, ग्राम- मलंगिया, दरभंगा, पृष्ठ—68 8.           त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, 1950,पृष्ठ—41 9.           लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—25 10.      वएह, पृष्ठ—63 11.      कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—21 12.      सप्तपर्णा, सं. डॉ. देवेन्द्र झा, पृष्ठ--21 13.      तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ---16 14.      नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—20-21 15.      नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, 9/1  खेलात घोष लेन, कलकत्ता, 1971,पृष्ठ—9 16.      दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—46 17.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 18.      एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,1985, पृष्ठ—16 19.      लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—63 20.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—18 21.      कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—3 22.      बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 23.      के. एम. पन्निकर, मिथिला मंथन- सुशान्त झा १. मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो स पैघ कारण एहि इलाका के मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी के लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक के बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासक मिथिला के सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई और पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि। मिथिलांचलक  ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकट पैघ हमरा हिसाब सं आधा से बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या के निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सं नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार के नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। पिछला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आंखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सं मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत। बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रलेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि। किछु गोटाके कहब छन्हे जे बिहार मे उद्योग धंधा के जाल बिछाक एकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे पिछला अविकासके चक्रक फलस्वरुप आबादीके बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण  सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै खोजल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सं ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोग के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गांव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि।  कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुं,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकर इलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि,  ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40  प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च हुए। तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक। किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी -अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि। मिथिला के विकास के माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनतौ किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प। मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकर महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहे ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घर के पास कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना हुए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव केल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा  क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सं ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी। २. प्रवीण आई अमेरिका चलि गेल। ओकरा एल एंड टी के प्रोजेक्ट पर शिकागो पठा देल गेलै। लेकिन ओकरा संग पढ़ैवाली पूनम के भाग्य ओहन नहि छलैक। ओ दू बच्चा के मां  बनि अपन स्वामी के सेवा में अपन जिंदगी बिता रहल अछि। बितला समय याद करैत छी त लगैत अछि जे पूनम के संग बड़्ड अन्याय भेलैक। बात सन् 95 के हतैक, हमर बोर्ड के रिजल्ट आबि गेल छल। ओहि समय पूनम आ प्रवीण छट्ठा में पढैत छल।  जाहि स्कूल में पढ़ैत छल ओहि में चारि टा मास्टर छलैक जे बेसीकाल खेतिए बारी में लागल रहैत छलैक। पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल आ प्रवीण सेकेंड...लेकिन छट्ठा के बाद प्रवीण के बाबू जी ओकरा ल क कटक चलि गेलखिन्ह जतय  ओ एकटा दुकान में काज करैत छलखिन्ह। पूनम के घरक हालत अपेक्षाकृत ठीक छलैक, ओकर बाबूजी सरकारी सेवा में छलखिन्ह, लेकिन पूनम दसवीं से आगू नहि पढि सकल। ओकरा इंटर में मधुबनी के झुमकलाल महिला कालेज में नामो लिखा देल गेलैक लेकिन बाद में ओ आगू नै पढ़ि सकल। लेकिन प्रवीण राउरकेला सं इंजीनरिंग केलाक बाद एल एंड टी में प्लेस्ड भ गेल आ कंपनी ओकरा शिकागो पठा देलकै। एक दिन हमर दीदी पूनम के पूछवो केलकैक जे ओ कियेक ने बीए में नाम लिखेलक, त पूनम के जवाब छलैक जे ओकर मां-पप्पा के बीच ओकर पढ़ाई के ल क नित दिन घोंघाउज होइक। ओकर बेसी पढ़नाई पूनम के विवाह में बाधा बनि रहल छलैक। तीन बहिन में सबस पैघ पूनम के दहेज एकटा बड्ड पैघ समस्या छलैक। दू साल के बाद पूनम के विवाह भ गैलैक आ जे  पूनम क्लास में फर्स्ट अबैत छल ओ जीवन के दौड़ में सदा के लेल सेकेंड भ गेल। पूनम के तमाम टैलेंट आब सिलाई-कढ़ाई आ स्वेटर के नब डिजाइन सीख में खप लगलैक। आई हमरा गाम में प्रवीण के टैलेंट के धूम मचल छैक। मिथिला के तमाम दहेजदाता ओकर दरवाजा पर आबि चुकल छथि, लेकिन सवाल ई जे कि पूनम के आगू नै पढ़ि पबै में कि सिर्फ दहेज टा एकटा कारण छलैक या किछू आउर...?  मानि लिय जे दहेज नहियों रहितैक त की पूनम के अपन घर लग नीक कालेज भटि जयतैक ? हम सोचैत छी जे यदि पूनम के जन्म कर्नाटक या केरल में भेल रहितैक  त भ सकैछ ओ इंजिनीयर बनि जाईत आ एल एंड टी ओकरो शिकागो भेजि दैतैक। लेकिन ई सवाल एखनो नीतीश कुमार अतबा अर्जुन सिंह के एजेंडा में नहि छन्हि। नै जानि कतेको लाख पूनम आई चिचिया-चिचिया क ई सवाल अहि व्यवस्था सं पूछि रहल अछि। हमर ई पोस्ट हिंदी के हमर ब्लाग आम्रपाली(amrapaali.blogspot.com)...ओहि पर एकटा टिप्पणी अछि जे सब साधन सबके नहि देल जा सकैत छैक, आगू बढ़य बला के खुदे के जिजीविषा हुअके चाही। लेकिन हमर कथन ई अछि जे प्रवीण के संग कोनो जीजिविषा नहि छलैक-ई पुरुष प्रधान समाज के एकटा दुखद अध्याय छैक जे हजारो प्रवीण के त कोटा स ल क बंगलोर तक डोनेशन पर भेज देल जाइत छैक लेकिन लाखों पूनम एखनों आशाके बाट जोहि रहल अछि। की ई सरकार के कर्तव्य नहि छैक जे ओ पूनम सब के उचित पढ़ाई के व्यवस्था करैक..?. ई कतेक दुर्भाग्य केर बात अछि जे बिहार में एखन हाईस्कूल खोलै पर प्रतिबंध लागल छैक। एखन 5 किलोमीटर के दायरा में बिहार में एकटा हाईस्कूल छैक। कोनो लड़की के लेल ई कोना संभव छैक जे ओ पांच किलोमीटर पढ़य लेल हाईस्कूल जाय। आब बिहार सरकार हाईस्कूल में लड़की सबके साइकिल द रहल छैक लेकिन की सिर्फ हाईस्कूल तक के पढ़ाई उपयुक्त छैक..? दोसर बात ई जे बिहार सनहक राज्य में जतेक सामान्य ग्रेजुएशन के सीट नै छैक, कर्नाटक आ महाराष्ट्र में ओहि स बेसी इंजिनीयरिंग के सीट छैक। एखन तक राज्य में एकोटा महिला विश्वविद्यालय आ तकनीकी विश्वविद्यालय नै छैक। हुअके ती ई चाही छल जे बिहारल में 20-25 साल पहिनहि हर जिला- आ ब्लाक में एकटा कालेज खोलि देबाक चाही छलैक। आब के जमाना त इंजिनीयरिंग आ एमबीए कालेज खोलक छैक। एहन हालत में ओहि खाई के के भरत जे बिहार आ दोसर राज्य के बीच में बनि गेलैक अछि। फेर वेह सवाल सामने अछि- की अबैयो बला समय में पूनम इंजिनीयरिंग कालेज में जेती....? भानस भात - नीलिमा मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। जखन खौलय लागय तँ ओहिमे चिन्नी, काजू, किशमिश सभ दऽ कय अन्तिममे इलाइची पाउडर खसाऽ कऽ मिलाऽ कऽ उताड़ि लिअ। मखानक खीर तैयार अछि। नोट:- मखानकेँ सुखलो भुजि कऽ कुटि सकैत छी वा घीमे सेहो भूजि कए कूटि कऽ पाउडर बना सकैत छी। मेथीक परोठा सामग्री:-आटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, रिफाइन-२५० ग्राम, मेंथी साग-५०० ग्राम, हरिअर मेरचाइ-४टा, आदी- १ इन्चक टुकड़ा, धनी-पात आऽ नोन-अंदाजसँ। विधि- मेंथीकेँ साफ कऽ कए धोऽ लिअ। मेंहीसँ काटि कए लोहियामे कनी तेल दऽ कय मेंथी पात खसा दियौक। कनी भाप लागि जाय तँ ओहिमे काटल हरियर मेरचाइ, आदी घसल, धनी-पात काटि कय आऽ नून मिला कय एहि मिश्रणकेँ बेसन फेँटल आँटामे मिला दियौक। आँटाकेँ कनेक कड़ा कऽ सानि लिअ। पराठा बेल कए तवापर कम आँचपर रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। खास्ता मेथीक पराठा तैयार भऽ गेल। नोट:- अहाँ काँच मेंथी पात कऽ मेंही काटि कऽ, पियाजु सभ मिला कऽ सेहो आँटा सानि सकैत छी। मुगलई कोबी सामग्री:-कोबीक टुकड़ा-१/२ किलो, पियाजु महीन काटल-१कप टमाटर, कद्दूकस कएल-१ कप, हरियर मेरचाइ-आदीक पेस्ट-१ चम्मच, नून स्वादानुसार, लाल मिरचाइक पाउडर-१/२ चम्मच, धनियाँ पाउडर-१ चम्मच, हरदि- १ चम्मच, गर्म मसल्ला-१/२ चम्मच, अमचूर-१/२ चम्मच, जीर-१/२ चम्मच, मलाई-१/२ चम्मच, टोमेटो सॉस- १ चम्मच, रिफाइन तेल-२ चम्मच। विधि:- कोबीक टुकड़ा धोऽ कऽ चालनिमे आधा घंटाक लेल राखि दियौक, जाहिसँ एकर पानि निकलि जाय। फेर लोहियामे तेल गर्म कऽ कोबीकेँ हल्का गुलाबी फ्राइ कऽ लिअ आर एकटा पेपरपर निकालि लिअ, जाहिसँ तेल निकलि जाय। एक पैनमे तेल ढारू। ओहिमे जीर दऽ कए पियाज आऽ आदीक पेस्ट दऽ कय भुजि दियौक। आब सभ टा मसल्ला दऽ कय कनी देरमे आर भुजियौक। मलाएकेँ मैश कऽ दऽ दियौक, सॉसकेँ सेहो दऽ दियौक आर नीकसँ मिला दियौक। आब एहिमे कोबीक टुकड़ा दऽ कय चम्मचसँ मिला दियौक। फेर एक बाउलमे ओकरा निकालि कऽ ऊपरसँ गरम मसल्ला आर धनियाँ (धनी) पात सजा दियौक आर पड़सि लिअ। केसर पुलाव सामग्री:- २ कप बासमती चावल, १ कप मटरक दाना, १ टुकड़ा दालचीनी, १ बड़ी इलायची, ४ टा लौंग, ४ कप पानि, २ टेबुल स्पून घी, १/२ केसर, २ टीस्पून गरम पानि, एकटा पियाजु लम्बा-लम्बा काटल, १ टी स्पून जीर, २ टी स्पून नून। विधि:-केसरक गरम पानिमे फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कए फुलइ लेल दऽ दियौक। चाउरकेँ नीकसँ धोऽ कऽ फुलय लेल दऽ दियौक। कुकरमे घी गरम कऽ कए ओहिमे प्याज दऽ कए ब्राउन होय धरि फ्राइ कऽ कए प्लेटमे निकालि लिअ। आब एहि गरम घीमे दालचीनी, जीर, इलाइची, लौंग आर नून दऽ दियौक। मटरकेँ दऽ कए कनी चलाऊ आर चाउरकेँ पानिसँ निकालि अहीमे दऽ दियौक। ऊपरसँ पियाजु आ केसर सेहो दऽ दियौक। ४ कप पानि दऽ कय एक सीटी आबए तक पकाऊ। गरम-गरम केसर पुलाव, रायता वा कोनो रसगर तरकारी संग खाऊ। मूरक परोठा सामग्री:- आँटा-२५० ग्राम, बेसन-१०० ग्राम, मूर-२५० ग्राम, रिफाइन तेल-१०० ग्राम, जमाइन-मंगरैल-अंदाजसँ। आदी-१ इन्च टुकड़ा, धनी-पात-दू डाँट, हरियर मेरचाइ ४ टा, नून- अंदाजसँ। विधि:- मूरकेँ धोऽ कऽ कद्दूकस कऽ लिअ। लोहियामे कनी तेल दऽ दियौक। गर्म भेलापर ओहिमे मूर आ सभ मसल्ला खसा दियौक आ ढ़क्कनसँ झाँपि दियौक। कनी भाप आबि जाएत, ओकरा निकालि कऽ ठंढ़ा हेबय दियौक। आब एहि मिश्रणमे नून मिला कय बेसन मिलल आँटामे मिला कऽ सानि लिअ। गोल-गोल पातर-पातर बेल कऽ ताबापर दुनू दिस रिफाइन लगा कए सेकि लिअ। मूली पराठा तैयार भऽ गेल। मूरक परोठा बनेबाक एकटा आर विधि अछि, अहाँ मूलीक कद्दूकस कऽ कए ओहिमे सभ मसल्ला मिला लिअ। आब ओकड़ा गाड़ि कए एक दिस राखि लिअ। आब आँटाक गोलीमे थोड़े मूलीक मिश्रण लऽ कऽ नून मिला कऽ भरि लिअ आ बेल कऽ ताबापर रिफाइन दऽ कऽ सेकि लिअ। नोट:-एहि तरहेँ काँच अनरनेबा आ बन्धा कोबीक परोठा सेहो बना सकैत छी। ३.पद्य ३.१. १.आशीष अनचिन्हार २.मधुप ३.२. १.महेश मिश्र "विभूति" ३.३.-१.ज्योति-२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा ३.४. विनीत उत्पल ३.५. पंकज पराशर ३.६. १.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्‍द्र यादव १.आशीष अनचिन्हार२.मधुप आशीष अनचिन्हार- १.        मनुख मनुख काज करैत जान अरोपि कए आफिसमे, रोडपर वा कतौ भरि लैए टका जेबीमे निकलि जाइए मार्केटिंग करबाक लेल कीनि लबैए रेडीमेड खुशी वस्तु-जातक रूपमे की मनुख रेडीमेड भेल जा रहल अछि? २.गजल जीवनमे दर्दक सनेश शेष कुशल अछि नहि कहब विशेष शेष कुशल अछि अन्हरा सरकार चला रहल राजकाज छैक बौकक ई देश शेष कुशल अछि देह बदलैए आत्मा नहि सूनि लिअ एहने छैक सरकारक भेष शेष कुशल अछि मुक्का आ थापड़क उपयोग के करत खाली आँखिए लाल टरेस शेष कुशल अछि गजल कहब असान नहि एतेक आशीष आब चलैत छी बेश शेष कुशल अछि मधुप जीक कवितामय चिट्ठी (अप्रकाशित पद्य-डॉ.पालन झाक सौजन्यसँ) चि. श्री चन्द्रकान्त मिश्र शुभाशीर्वाद पाबि अहाँकेँ कुशल थिकहुँ सह्लाद गामहुमे परिवार अपन आनन्द अहींक हेतु छल चिन्तित चित्त अनन्त। घेंट-पेट ओ तैठ पेटसँ हीन उदय रहए अछि मनहि मन किछु खिन्न। मंगलमय श्री मंगल झा सूरधाम काशीवासी ’तजि वनता’ आराम। अहूँ हुनक सेवामे मेवा छी चखैत छी तहिठाम जतए केओ नहि अछि झखैत। (चन्द्रकान्त मिश्र-मधुप जीक छोट भाइ उदय- चन्द्रकान्त मिश्रक बालक चन्द्रकान्त मिश्रक विवाह मंगलदत्त झा, गाम हरौलीक कन्यासँ। मंगल झाक काशी प्रवासमे लिखल पत्र, सूर्यक उत्तरायणमे गेलापर मृत्युक वरण, संगमे उदय आऽ मंगल झाक पौत्र श्री प्रद्युम्न कुमार झा सेहो संगमे रहथि।) १.महेश मिश्र "विभूति" महेश मिश्र "विभूति" सन्तोष (०६.०२.६५) सन्तोष सरितमे नित नहाय, बल्कल पहिरी तँ लाज न हो। बेदाग होय कर्तव्य करी, हाथी नवीश सँ काज न हो॥ कहू! व्यर्थ झगड़िके धन अरजी, सत् कर्म बिना सब काज हो। एक दिन बिन कैंचाके जगसँ, प्रस्थान करू, तँ लाज न हो॥ भऽ जाय फकीरी वोहि सँकी? मस्तक ऊँचा सदिकाल रहे। कहू? भला वो अमीरी की, लानत जेहि पर कङ्गाल कहे॥ भऽ जाय अमीरी वोहिसँ की? सत् कीर्ति समुज्ज्वल कर्म करू, निशि दिन सद्भाव निबाहू जँ। भगवान् भला करता निश्चय, कहियौन हुनकहि, नहिं काहूसँ॥ हुनकर लीला अनदेखल अछि, फल प्राप्त करै छथि विश्वासी। सुनितहुँ छथि सबहक परमप्रभु, कारण; वो छथि घट-घट वासी॥ उद् बोधन : ढाढ़स (३१.०७.६३) मत होउ निराश एक झटका पर, नित कर्मक ध्यान धरू मनमे। दुनियाँमे एहिना होइतैं छै, ई सोचि पुनः उतरू रनमे॥ बहुतोंके एहिना मेल एतऽ, किन्तु; की साहस छोड़ि देलक।?। साहस थीक सम्बल आशाके, जगमे हारल पुनि लाहु लेलक॥ नभमे देखू वो चन्दाके, जे पूर्ण विकासक क्रमपर अछि। एक दिन पूनम परिपूरित भऽ, पुनि ग्रास ह्रास भऽ जाइत अछि॥ नयन निहारि निरखू जगके, के रहल समान निशि दिन जगमे।?। उत्थान-पतन क्रम कर्मक अछि, निर्भीक बनूँ, बिचरू महमे॥ जी तोड़ि परिश्रम करथि कोय, फल नीक नाहिं, तँ दोष कोन। विधना के एहिना लीला छन्हि, तँ, एकरामे किनको दोष कोन॥?॥ बड़ आश केलहुँ शुभ आशाके, सम्भव केलहुँ नहिं काज कोन। फलदाता दरजल नाहिं यदि, तँ, एकरामे किनको लाज कोन॥?॥ भेटत वोतबहि, जे लिखल अछि, पाथर परके रेखा बुझियौ। कर्तव्य करू नित निकक हित, भेटत निश्चय, भागक लेखा बुझियौ॥ श्रम-साध्य मजूरी भेटतैं छै, ई शास्त्र-पुराण, सुधि जन कहि गेल। औकतेलासँ भट्टा पाकयऽ? ई कथ्य युगाब्दक रहि गेल॥ वोपदेव इतिहास-पुरुष, अमर लेख्य पाणिनी तिनकर। धीर धैर्य धारण करियौ, यथा भाग भावी जिनकर॥ पाण्डव के राज भेटल छीनल, नल दमयन्तीके याद करू। सिंहासनारुढ़ सियावर भेला, वसुदेव कोना आजाद करू॥ मधुर स्वप्न (०७.११.६२, रवि श्री विजयादशमी) मधुर स्वप्न की देख रहल छी, दत्यतासँ सँदूर भऽ के। चिरनिशा के गर्भमे, तल्लीनतासँ निकट भऽ के॥ दुक्खसँ जँ दूर छी तँ, कहू कोन उपचार हो। मूक मुद्रा एना कऽ के, अति दुःखक नेँ विस्तार हो॥ या कहू अन्तर्निहित, दुःखसँ दुःखी छी मनहि-मन, से कहू सङ्कोच तजि के, की स्वप्न देखब छनहि-छन॥ मौन रहला पर कोना के, बुझि सकत पर वेदना। वेदना के व्यक्त कऽ के, छाड़ि दी निज कल्पना॥ मधुर स्वप्नक की महत्ता, कहि दियऽ दू शब्दमे। हम भ्रमित छी दशा लखिके, किछु कहू, किछु शब्दमे॥?॥ या कहू किछु विसरि गेने छी, अहाँ निज ख्यालसँ। मधुर स्वप्नक ज्वलित ज्वाला, त्यागि दी अन्तरालसँ॥ सजनि! पता दी अपन क्लेशक, विषम वेदना मानस के। वा बहु भाँति व्यथित छी अपने, हृदयान्तर्गत तामस से॥ कोना वेदना उमड़ल अछि जे, अगम-अथाह, पता नहिं आय। अतिशय क्लेशक दुःसह भारसँ, दबयित छी दयनीय भऽ हाय॥ कहू-कहू! मानस के ओझरी, मधुर स्वप्न के त्यागू आय। मधुर यदि दुःखदाई हो, तुरत त्यागी, कथमपि नहिं खाय॥ अहाँ बेसुधि, हम ससुधि भऽ कोना जीवन-रथ चलत। सामंजस्यानन्दक प्रयोजन, जीवनक रथ अथ चलत॥ सिन्दूर-दानक गीत: “अनुरोध” (१४.०५.६३, सोम) “प्रिय पाहुन सिन्दूर-दान करू” सुन्दर सरस समय शुभ सरसल, सिन्दूर हाथ धरू। उषा निहारथि कमल हस्तके, अविलम कर्म करू॥...॥ नव निर्मित नगरीमे सिञ्चित किञ्चित ख्याल करू। विलम छाड़ि, सिन्दुर लऽ करमे, हिय प्रभुनाम धरू॥...॥ दर्शक सब व्याकुल होय निरखय, स्वातीक जल बरसू। नवजीवनके सृजन करथि प्रभु कर्मक ध्यान धरू॥...॥ कबलौं प्रभु अनुरोध करायब शुभ-शुभ कर्म करू। मनःपूत मनसाके कऽ के, भवनदमे विहरू॥...॥ शुभ शङ्कर-गौरी मैयाके शुभाशीष हिय मध्य धरू। विनय “विभूति”क एतवहि प्रभुसँ, युगल जगत् विचरू॥...॥ बादरीक आगमन (२६.०५.६३) “नभमण्डलमे पवनक रथपर, कारी-कारी बादरि आयल”। बिजुरि छटकै, ठनका ठनकै, देखि-सुनि जनमन खूब डेरायल॥ चहु दिशि उमड़ल कारी बादरी, बादरि आबिके जल बरसायल। प्रलयनाद मेघक सुनि-सुनि, वृद्ध जनी सब नेनहिं नुकायल॥ हकरै बालक वृद्ध जनी सब, लोक कहै सब माल हेरायल। बाँस-आम गीरल अनगिनती, क्यो कहै हमरो महिंस हेरायल॥ लोक कहै बहु भाँति मनोदुःख, प्रिया कहै मोर प्रिय नहिं आयल। कामिनी कलपथि, प्रिय नहिं गृह छथि, विजुरिक धुनि-सुनि जियरा डेरायल॥ रोर मचल अछि चहु दिशि जन-जन, एतबहिमे अति जल झहरायल। त्रिषित भूमि “विभूति”मय भेली, तरु-तृण वो जन-मन हरसायल॥ जगक प्रमान (०९.०६.६३) डोली उठल बिन खोलीके दुवारसँ, घुरि नहिं आओत, प्रमान हे। काँच कचम्बा काटि कुढ़ावोल, उघल सबटा सामान हे॥ श्वेत वस्त्रसँ मृतक सजाओल, नित प्रति होत जहान हे। अचरज के नेँ बात बुझि ई, ई थिक ध्रुवक समान हे॥ चारि जने मिलि कान्ह लगाओल गमन करत शमशान हे। पुत्र-प्रणय के परिचय देता, करता अग्निक दान हे॥ सच् होय अछि “पुत्रार्थे भार्या” होय छथि पुत्र महान् हे। कहथि “विभूति” बनब विभूति, एहि थिक जगक प्रमान हे॥ “अपटुडेट बलिष्ठ युवकसँ” (१५.१२.१९६२) करू किछु काज बाबू औ, रतन धन आय पौने छी। धरा पर अवतरित भऽ के, एना की मन गमौने छी॥?॥ करू उत्साह किछु मनमे, चलू सन्मार्गपर निशि-दिन। चुकाऊ कर्ज माताके- जे भेटल अछि अहाँके रिन॥ बढ़ाऊ डेगके आगू, समय तँ कटि रहल अछि औ। पुनः ऋण बढ़ि रहल अछि जे, सधाउ आय, नेँ राखू शेष तनिको औ॥ पड़ल माता कराहति छथि, दया के बेच देने छी। तनिक तँ लाज राखू जे, एना की मन गमौने छी॥?॥ सुयश पायब समाजीसँ, धवल यश देश व्यापी औ। पिता-माता सुकीरति लहि, अभय वरदान देता औ॥ “अनुरोध” (२८.०९.१९६२) की कहू? कहलो नेँ जाय अछि, हिय व्यथित, वाणी सबल नहिं, बुद्धि व्याकुल, व्याल चहु दिश ज्वाल ऊरमे बढ़ि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ दशा पातर, हाल दयनीय, आननक सुकुमारताके। मौन शब्दातीत मुद्रा;- से हृदयमे चुभि रहल अछि। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ प्राण आकुल, विकल की छी, व्यथा-ज्वालमे जरि रहल छी, शूल बज्रक पतित नगसँ बमरि-झहरिके खसि रहल अछि! की कहू कहलो नेँ जाय अछि॥ हृदय दारुण दुःख सहिके, मात्र प्राणे शेष बाँचल। एना विह्वल हाल कऽ के, व्यथा द्विगुणित दऽ रहल छी॥ की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ चन्द्रमुख-मण्डल सुलोचन, कच-विकच बेहाल की अछि। वेदनासँ व्यथित भऽ के, व्यथित अनका कऽ रहल छी।। की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥ बस आश एक, अनुरोध केवल, मधु-मधुर मुस्कान के। हेरि चानक स्वच्छ आभा, करु मुकुल, विकसित प्राण के॥ पुनः मञ्जुल मृदुलाअ के, हेतु अनुरोधी बनल छी। मानिनी भऽ मान राखू, दशा लखि के अति विकल छी॥ १.ज्योति२.सन्तोष मिश्र३.नवीननाथ झा ज्योति बाबा अमरनाथ ठोप ठोप पानि जमा भऽ धीरे  धीरे परतमे जमिकऽ पहाड़क उपर गुफाक अन्हारमे अमरनाथ बाबा भौतिक रूप मे होइत छथि प्रतिवर्ष उद्भवित भक्‍तक आह्‍वान सऽ उत्प्रेरित जेना एक शीतल अलौकिक प्रकाश समेटने सम्पूर्ण सागर आ आकाश जटामे लागैत निहित आकाशगंगा हिमानी शिवलिंग दूधिया श्वेतरंगा देवी पावर्तीके जीवन रहस्यक ज्ञान अहि पावन ठाममे  शिव केलखिन प्रदान हिमक आरो प्रतिमा होएत अछि उपस्थित स्वयम् गणपति देव शिव  पार्वती  सहित नुकायल छल हिन्दुक ई महातीर्थस्थान ताकैवला चरवाहा छल एक मुसलमान १. एना किए ?- सन्तोष मिश्र एकटा स्‍त्री , हमर घरकें सबहे काज कऽ दैअ समय–समय पर आबिकऽ हमर जरुरत पुरा क दैअ एहिके बाध ओ परतरि दैअ मुदा एना किए ? जहिया हम असगरे रहैछी तहिया ओ हमरा संग राति बितऽबैय कखनो तिर त कखनो तार कहियो राईके बनादै पहाड़ कखनो हमरा लेल आाखिमे नोर आ कखनो हमरासँ दूर मुदा एना किए ? कि ईहे त प्रेम नहि ? कि ईहो प्रेम छै ? हमरा कोनो बेगरता होए ओ सेहो पुरा कऽ दैअ गलती जौ भऽगेल हमरासँ त डटबो करैए मुदा एना किए ? ओकर आँखिमे, एकटा भावना रहैछैक ओकरा विश्‍वास रहैछैक हमरे पर तैयो ओ हमरा डटैत रहैए मुदा एना किए ? किछु जौं कहि दिऐ त भऽजाइए टोका–चाली बन्‍द ओकर मूँह बन्‍द भइयोक ओकर आँखि, अपन प्रेमक गीत कहैए मुदा एना किए ? किछु समय बाद जेना किछु भेले नहि हुए जेना ओ हमरासँ चिन्‍तीते नहि हुए तहिना ब्‍यवहार करैए मुदा एना किए ? नवीननाथ झा २ नारीये सतयुग आनत यौ अपन पीयुष अनुदानसँ, जन-जनकेँ पान करायत औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ। उषाकालक उद्भव भऽ रहल अछि, अरुणोदयक पावन मुहुर्त अछि, कल्याणक वेदी सजल कतो, नर समूहक मेला अछि कतो, एहेन सुन्दर उपवनमे, युग-परिवर्तनक बिगुल बजाओत औ। आएल वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखन नहि नारीये सतयुग आनत औ॥१॥ करलक जीव सृष्टिक संरचना, चेतनाक संचार लाएत औ, प्रसव-वेदनाकेँ सहलक, माँ बनिकेँ प्यार देलक औ, श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा बनि, ई अनुकम्पाक परम्परा निभौलक औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥२॥ देव युग्मोमे प्रथम नारी, तत्पश्चात् नरक नाम आएल औ यथा-उमा-महेश, शची-पुरन्दर, राधा-कृष्ण, किया नै हुएवो सीता-राम मानुषी रूपमे देवी थीकि, ई तथ्यकेँ ज्ञात कराएत औ। आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥३॥ नारी-हृदय अछि निर्मल-कोमल, प्रेमक भंडार छुपल अछि सभटा, मानवताक सिंचन करवा लेल, निकलल अहिसँ अमृत-धारा, मुर्छित बसुन्धरा पर पुनः जागृति अवश्मेष आएत औ, आबि रहल अछि वो पवित्र ब्रह्म मुहुर्त, जखनहि नारीये सतयुग आनत औ॥४॥ ३ युगनिर्माणी संकल्प आइ कमर कसिकेँ आएल अछि, दुनियाक युगनिर्माणी, बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए मनमानी। धनक लेल वासना भड़काबैवला, सुनू औ! दुराचार-अपराधकेँ, उकसावैवाला सुनू औ, केविल, टी.वी. आओर सिनेमामे सुधार आब होएत, ई विनाशकारी शैली आब हमरा सभकेँ अपनावैक नहि अछि, बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमे देबए हम मनमानी॥१॥ जे किशोरक मनकेँ भड़कावै,ई कोन मनोरंजन भेल? जे अपराधकेँ उकसावै, ई कोन मनोरंजन थीक? लूट-पाट, हिंसा, हत्या, अहिलेल होएत अछि, दुराचारक घृणित क्रिया, अहि लेल होइत अछि, ईएह महामारी समाजक लेल, जड़िसँ मिटेबाक दृढ़प्रतिज्ञ छी, बहुत भऽ चुकल, आब नञि हुअए देबए हम मनमानी॥२॥ घर-घर जे अश्लील चित्र अछि, तकरा जरा कए हम दम लेब, बच्चा सभकेँ भड़कदार वस्त्र नञि पहिराएब हम, बुक स्टॉलपर जहरीला साहित्य नञि बिकाय लए देबए, मानवीय मूल्यक आगू नञि गलत भावकेँ टिकए लेल देबए, कतो नञि रहए लेल देबए कोनो कुत्सित कथा-कहानी। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥३॥ आन्तरिक कविक भाव पत्र-पत्रिकामे पुनः होएत प्रेरक गाथाएँ अपराधक लेल प्रमुखताक नञि होएत प्रथाएँ सहज विधेयात्मक होएत पुनः दृष्टि कलाकारक हुनका नञि होएत चिन्ता, मात्र धन वा बजारक। माँक बिसरल प्रतिष्ठा पुनः बढ़त ई अवश्य जानू। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥४॥ फिल्म नैतिक मूल्यकेँ उकसाबएवाली होएत, कविता नारीक मान-प्रतिष्ठा बढ़ावैवाली होएत। कतहु नहि होएत मादक-धुनपर नृत्य सिहराबएवाली, मानव-चिन्तनक विष भरए लेल नञि होएत संचार कनेको, पुनः प्रतिष्ठापित करबाक अछि, पुरान गरिमामयी कहानी, बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥५॥ व्यक्तित्व पाठक आओर दर्शकक सत्चिन्तनकेँ उभारए लेल पड़त आवश्यक छी, शुभ समाजक लेल समर्पित जँ व्यक्तित्व नञि होएत, ओऽ कवि कलाकारक नवयुगमे अस्तित्व नञि होएत, आए ईएह संकल्प लऽ केँ बढ़ि चलू सृजन-सेनानी। बहुत भऽ चुकल आओर नञि होमए देबए हम मनमानी॥६॥ ४ जीव की छी? अहम् प्रश्न उत्तर जीवन एक जोखिम छी, जीवन एक समर छी। जीवनकेँ एहि रूपमे स्वीकार करब, तकर अलावे कोनो चारो तेँ नहि अछि। सत्ये कहैत छी, जीवन एक तथ्यपूर्ण रहस्यमयी भाव छी। जीवन एक तिलस्मी छी, जीवन एक भूल-भुलैया छी। एक तरहेँ ई एक गोरख धंधा सेहो छी। जिनकर जिम्मा गंभीर पर्यवेक्षण करबाक दृष्टि छैक (अछि) ओ जन जोहि भावनाक तहतक पहुँच सकैत अछि, जीवनसँ जुड़ल भ्रान्ति, कुहासा सेहो, मिटाएल जाऽ सकैत अछि, अनेकानेक खतरासँ सेहो बाँचल जाऽ सकैत अछि जेना ९यथा)- हँसैत, हँसाबैत, हलका, फुलका रंगमंच, मानिकेँ, विनोदपूर्वक मंचन करैत, आनन्दपूर्वक समय व्यतीत करबाक दृढ़ निश्चयी-भाव, लऽ केँ चली तँ- जे कि पूर्णानन्दक सर्व इच्छा छी॥ जीवन एक जोखिम छी॥ जीवन एक गीत छी, जे गीतकेँ हम पंचम स्वरमे गाबि सकैत छी, कल्प विशेषज्ञ बनल जाऽ सकैत अछि॥ जीवन एक जोखिम छी॥ जीवन एक अवसर छी! एहि अवसरकेँ हाथसँ गँवा नहि देबाक अछि, कारण ई शुभ अवसर जीवनमे ईश्वरक अनुकम्पासँ, कमसँ कम एक बेर अवश्यमेव भेटबेटा करत ई निःसंदेह अछि॥ जीवन एक शुभावसर सेहो छी॥ ५ गायत्री महामंत्र प्रार्थना करैत छी हुनकासँ (परमात्मासँ) ओऽ प्राणस्वरूप, दुखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्माकेँ हम अपन अन्तरात्मामे धारण करी। ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्गमे प्रेरित करताह, जे अवश्यंभावी अछि। ओऽ परमात्मा हमर बुद्धिकेँ सन्मार्ग, सत्मार्गपर चलबालेल सुबुद्धि देथि॥ गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहाएल अछि॥१॥ गायत्री भारतीय धर्मशास्त्रक ओऽ समस्त दिव्यज्ञानक प्रकाश अछि, गायत्रीकेँ बीजाक्षरक विस्तार मानल गेल अछि। गायत्री माँकेँ आँचर पकड़एबला साधक, कखनो निराश भऽ नहि सकैत अछि। ई मंत्रक चौबीस अक्षर , चौबीस शक्तिक एवं सिद्धिक मार्ग अछि, गायत्री मंत्रक उपासना करएबला साधकक-मनोकामना, अवश्यमेव सफलीभूत होइत अछि।। गायत्रीकेँ भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥२।। गायत्री वेदमाता कहल जाइत अछि, गायत्री मानव-मात्रक पाप-नाशनी थिकी, अक्षर चौबीस परम पुनीत अछि, एहिमे बसल शास्त्र, श्रुति, गीता- महामंत्रक जतेक जगमाहि, एकोटा गायत्री सम नञि अछि। गायत्री भारतीय संस्कृतिक जननी कहल गेल अछि॥३॥ ॐ अव्ययवाचक शब्द छी। अतः ई शब्द परमात्माक अतिरिक्त कोनो, प्राणीकेँ प्रयोजित नहि होइत अछि, ॐ शब्दकेँ ब्रह्म सेहो कहल जाइत अछि। भू: भुवः स्वः- ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशक द्योतक अछि॥४।। तत्- परमात्माकेँ भाव ध्यानक दिस आकर्षित करैत अछि॥ सवितुः – सविता वै प्रसवनामीशे निश्चयेव समस्त सृष्टिक ईश्वररे सविता अछि थीक। ६ प्रेम आनन्दक अभिव्यक्ति छी प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि। प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी। प्रेम जीवनक सत्यरूपमे नियामक छी। जीवन आओर जगक विकासक सोपान छी। हर क्षेत्रमे प्रेमक विशिष्टताकेँ नकारल नहि जाऽ सकैत अछि प्रेम, धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र तकमे- समाओल गेल अछि, पिराओल गेल अछि। प्रेम मानव जीवनक अनिवार्य एवं अपरिहार्य अंग मानल गेल अछि, से सत्ये जानू॥ प्रेम सत्ये अर्थमे जीवन छी॥ प्रेम एक सार तत्व अछि, जे अणुसँ अणुमे, परमाणुकेँ परमाणु मिलाबैत अछि। पैघ-पैघ ग्रहकेँ एक दोसरसँ आकृष्ट कराबैत अछि, पुरुषकेँ स्त्रीक ओर, स्त्रीकेँ पुरुषक ओर, मनुष्यकेँ मनुष्यक ओर, पशुकेँ पशुक ओर, मानू तँ समस्त संसारकेँ एक केन्द्रक ओर खिचैत अछि प्रेम सर्वोपरि सुख आओर आनन्द छी। प्रेम जीवनक सार वस्तु छी॥ प्रेम यथार्थमे निःस्वार्थक भावनाक प्रतीक छी, प्रेमकेँ दैवी भावनाक संज्ञा सेहो दऽ सकैत छी, प्रेममे सदैव आदर्शक चरमोत्कर्ष अछि॥ प्रेम जीवनक महानतम धरोहर छी॥ प्रेम पुरस्कार नञि चाहैत अछि, प्रेम सदैव प्रेमक वास्ते होइत अछि, प्रेम प्रश्नकर्ता नञि अछि, प्रेम भिखमंग नञि, प्रेमक प्रथम सिद्धान्त जे याचना नञि करैत अछि प्रेम सत्ये अर्थमे आत्माक पुकार छी, प्रेम जगतमे सार वस्तु होइत अछि प्रेम सत्ये अर्थमे जीवनक सार छी॥ विनीत उत्पल ३.विनीत उत्पल (१९७८- )। आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ  इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्लीमे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडामे वरिष्ट उपसंपादक। बच्चा नीक छै ई बच्चा नीक छै कतेक नीक एकर पैमाना नहि छै सुसंस्कृत-संस्कारवान छै कतेक एकरो पैमाना नहि छै बेसी बजै नहि छै दुनियादारीक नव वस्तुक बूझाबक इच्छा नहि छै ताहि लेल ई बच्चा नीक छै माय कए दूध पिबाक लेल तंग नहि करैत छै नहि भेटैत छैक तखनो चुप छै ताहि लेल ई बच्चा नेक छै दुनियाक गम देखक अपन दुखक सोचिकऐ ई बच्चा कानब  बिसरि गेल ताहि लेल ई बच्चा नीक छै माय-बापक झगड़ा देखि कए घर में अशांति सं घबराइल ई बच्चा केकरो किछु नहि कहैत छै ताहि लेल ई बच्चा नीक छै जे राटायल से रटत अपन दिमाग सं किछु नहि पूछत किताबी कीडा छै ई बच्चा ताहि लेल ई बच्चा नीक छै सोचैक क्षमता  नहि छै माय-बाप स पूइछ कए करैत अछि सब काज ताहि लेल ई बच्चा नीक छै दुधमुंहा बच्चाक जना नहि किछु बाजैत छै नहि किछु काज करैत छै ताहि लेल ई बच्चा नीक छै। जिनगी एकटा तमाशा जिनगी एकटा तमाशा छै कखनो उतार कखनो चढ़ाव कहियो खुशी कहियो गम एकरे नाम जिनगी छै जिनगी एकता तमाशा छै केकरो जीत पर केकरो दुःख केकरो हारि पर ककरो सुख सुख-दुखक सार जिनगी छै जिनगी एकता तमाशा छै एक ठाम फेल तए दोसर ठाम पास पास-फेलक झमेला जिनगी छै जिनगी एक तमाशा छै केकरो कानला से हँसब केकरो हंसबा स कानब हंसबाक-कनबाक खेल जिनगी छै। स्त्रीगण स्त्रीगण कए दोयम दर्जा मानले स पुरूष समाज कए की मिलैत छैक किछु संतुष्टि किछु घमंड सोचैत छि हमही सर्वश्रेष्ठ मुदा, ई फुइसियोका गैप स नहि किछु भेटत केकरो दुःख दैके अहां कए सुख भेटैत छैक त सुन लियअ एकटा गप अहां कहियो सुखी नहि रहबै स्त्रिगन स सीखू सामंजस्य बनाबैक लेल प्रबंधनक गप आउर धैर्यक क्षमता कहबाक में ई सभ छोट गप लागैत छै मुदा अहांक क्षमता नहि छैक जे नौ महीना एक जीवनक भारि साधि भोरहि स साँझ धरि भनसाघर में रंग-बिरंगा तीमन बनबै सकब कतबैयो दियो तर्क कलेजा पर हाथ धरि कए एक बेर सोचब अहां आउर एक स्त्रिगनक क्षमता में अन्तर दिल ओ दिमाग खुइल जाइत अहांक घमंड चुइर-चुइर भ जाइत अहां कए मानहि परत तुच्छ छी अहां दोयम दर्जा त अहां छी अपन खामी छिपा बैक लेल धौंस जम्बैत छी . सभ्य समाज तथाकथित सभ्य समाज में प्रेम करैक अधिकार नहि छैक लोक कए अहां प्रेम करबै  ते घर सं बारल भए जाइब समाज में प्रतिष्ठा खत्म भए जाइत अहां होयब घृणाक पात्र अहां माय सं प्रेम कए सकैत छी अहां पिता सं प्रेम कए सकैत छी अहां बहिन सं प्रेम कए सकैत छी अहां भाई सं प्रेम कए सकैत छी अहां घर सं प्रेम कए सकैत छी अहां पढाई सं प्रेम कए सकैत छी अहां करियर सं प्रेम कए सकैत छी अहां कुत्ता  सं प्रेम कए सकैत छी मुदा, नहि कए सकैत छी प्रेम स्वर्णिम भविष्यक लेल आन जातिक युवक आ युवती सं ई 'सभ्य' समाजक परिभाषा छैक माय-बापक पसिन सं ब्याह करू माय-बापक पसिन से प्रेम करू माय-बापक पसिन से बच्चा जनमाऊ. पंकज पराशर, डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। पुरइनि जन्म कालेसँ छुटैत रहल अछि हमर जीवन केर एक-एकटा खोंइचा अपने देहक एक-एक अंग छोड़ैत रहल अछि हमर संग साँपक केचुआ जकाँ हमर जीवनदाता नाभिसँ नालबद्ध पुरइनि समा गेल मायक कोइखिसँ धरतीक कोइखमे कारी-कारी हमर जन्मौटी केश लाल मोलायम हाथक नह छुटि गेल हमरा देहसँ रोज-रोज छुटैत जा रहल दुनिया जकाँ उज्जर दुधहा दाँत हमर पृथ्वीक कोन काज आयल हेतनि? मासे-मास कटैत केश आ अठवारे कटैत नह भरिसक काज अओतनि कोनो इतिहासवेत्ता केर हमर केश, हमर नह आ दुधहा दाँत दुनियामे अबिते देरी अलग भ गेल हमरासँ संग-संग संसारमे आयल पुरइनि जखन संग नहि देलक तँ ककरोसँ कोन याचना कोन अपेक्षा! लाहौर (सुन्दर दास रोड, लक्ष्मी चौक आ लाला छतरमल रोडपर टहलैत) कोनो ध्वनि तरंगकेँ अनुमति नहि छैक एहिठाम भारतसँ अयबाक पासपोर्टपर लागल वीजाक मोहर चुपचाप अभयदानक मुद्रामे हाथ पकड़ैत कहैत अछि- कहियो साठि-पैंसठि बरख पूर्वक रहल वर्तमान आब इतिहास बनल अछि जतयसँ बाहर भेल बहुत रास ध्वनि तरंग आइयो इतिहासपर आंगुर उठबैत अछि जिस लाहौर नहि वेख्या ओ जम्या ही नइ- के कहैत छल? के लाहौरसँ जन्म लेबाक सार्थकताकेँ जोड़ैत छल? मोनमे तरंगित प्रश्न असंख्य हिन्दुस्तानीक जनम अकारथ केर कथामे ओझराइत अनारकलीसँ निकसैत ग्वाल मंडीमे भुतिया जाइत छल जखन-जखन इस्लामाबादसँ उठल बिहाड़ि बिड़रो बनि पसरैत अछि तरेगन भरल आकाशमे लहोर-लहोर कहि आर्तनाद क उठैत अछि बिलटल हृदयक हाहाकार दरबार-दरबार सबमे गिरफ्तार इतिहासक स्वर-पहाड़- पंजाबीमे, पश्तोमे, उर्दूमे अभिव्यक्तिक अवलंब अनुगूंजित होइत अछि बुल्लेशाहक स्वर...लहोर-लहोरक उच्च स्वरमे कतेक नपना सबसँ नापल गेल पानि पानि-पानि भेल धरतीक सीनापर फांक-फांकक बखरामे बटखरा सबसँ जोखल जाइत रहल पूर्वज सिंचित नोर खूनम-खून भेल आत्माक कछेरपर देखैत गिद्धक झुंड लोल भरि-भरि कए भरैत रहल घोघ नरमुंडसँ मतिर्भिन्ना लकीर रेड क्लिफक गवाहीमे लाहौरक बताह सबकेँ “टोबा टेक सिंह” मे रूपांतरित करैत वधस्थलपर चीत्कारोल्लसित टैंक केर मुंहपर अमृतसरक अमृतविहीन हेबाक गवाही दैत आइ धरि हमरा जेबीमे कोनो रेडियोधर्मी तत्व जकां पासपोर्ट-वीजा बनल छल बसरा नष्ट कऽ देल गेल ओहि नगर सबटा खेसरा कतहु नहि बाँचल आब ओ बसरा विश्व चौधरीक जुत्तामे लागल धूरामे स्वचालित हथियारक मोनबरहू नलीमे तकैत अछि अपनाकेँ बसरा कंधारी कान्हपर स्थायी कठिहारी बनौनिहार जुत्ता सबहक नोंकसँ उड़ल धूरा नष्ट कऽ दैत अछि नोरो केर स्वच्छता नोरक विशाल नदी बहि रहल अछि बसरामे बगदादमे काबुलमे कंधारमे ईरानमे सीरियामे क्यूबामे लीबिया आ फिलिस्तीनमे जाहिमे हेलडूब करैत कोन भविष्यक आसमे जीबि रहल छी? पुछैत अछि बसरा केर कोइख-माथ सुन्न स्त्रीगणक समूह कतेको नेना मानव-कंकालसँ भयभीत हेबाक वयसमे बेचि रहल अछि व्यापारीकेँ बीछ-बीछ कए मानव अस्थि ई कोन युद्ध छल जाहिमे बेर-बेर अश्वत्थामा हाथीक मृत्युकेँ द्रोणपुत्रक मृत्यु कहि कए प्रचारित कयल गेल ई कोन युद्ध छल जाहिमे कतहु अस्तित्वे नहि छल द्रोणपुत्र अश्वत्थामा कतहु? एक दिन जखन साँझमे घर घुरैत छल फौजिया अल सईद तँ देखलनि कइक हजार सालक कइक लाख हुनक पुरखाक आँखिसँ खसैत अविरल नोर-प्रपात आ कखन बिला गेल ओहिमे ओ से नहि देखि सकल दजला-फुरात! १.बिनीत ठाकुर २.निमिष झा ३.अमरेन्‍द्र यादव १. बिनीत ठाकुर बाँहिके गोदना कविता रैहगेल निशानी आब बाँहीके गोदना अनाहकमे मारल गेलै बुधनीके बुधना उमेरोनै बेसी भेलरहै मात्र बिस मरैतकाल ए १ राम बजलैनै ईश फटलैजे बम त शरीर भेलै चिथरा दैवोनै गवाही त कहबै की ककरा लागल छै गाराभुकुर बुधनिके चिन्‍ता के करतै आब पुरा ओकर बच्‍चाके सिहन्‍ता ऐ देशेके लागलछै शतिके श्रात एत सिधा सोझा जनताके केउ नै माई बाप भरल नोर मे केहन  सपना  हम मीता देखलौँ भोर मे माय  मिथिला  जगाबथि  भरल नोर मे कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल कनिको  बातपर  हमरा  तूं करै  विचार की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ कर हिम्मत तूं पुत्र छियौ हम तोहर साथ अछि तोरापर बाँकी हमर  दूधक कर्ज करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज लौटादे  हमर  आब अपन स्वाभिमान पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छौ महान २. निमिष झा चिर्रीचिर्री भेल मोन अहाँके सफलताक शिखर पर देखऽ चाहैत छलौं भीडसँ पृथक अहाँक परिचय खोजैत छलौं ई हमर सपना नहि प्रेमक भावना नहि जीवनक आदर्श छल एहि बाट पर संगे चलबाक नियार छल मुदा आब तऽ ठिके ओ नियार सपने भङ्ग गेल खुलल आँखिसँ देखलौं सबटा भ्रमसन लागल क्षणभंगुरमें विलीन भेल एकटा अतीतसन लागल । जोरसँ कानि नहि सकैत छी मोन निचोरी कऽ निकलल नोर कें रोकि नहि सकैत छी क्षतविक्षत छातीक ई व्‍यथा ककरो कहि नहि सकैत छी व्‍यथासँ भरल मन, जीवन लऽ बनाबटी हँसी हँसैत छी वेदना नुकाऽ खुशीक भ्रममें जिबाक असफल प्रयास करैत छी । चुल्‍हा आ चौका आब अहाँक संसार बनल सिन्‍दूर आ चुरी अहाँक परिचय ई नेल आ हतकडीसँ दूर हम अहाँके सम्‍पूर्णता दैत छलौंह मुदा अहाँ तऽ सीतक सिन्‍दूरसँ दबल छी नुपूरक जञ्‍जिरमें बन्‍हयाल छी किया चारि किलाक बन्‍दी बनि गेलौंह अहाँ ? हमर सपनासँ आब अहाँ विभोर नहि हैब चाहियो कऽ हमर आकाँक्षां अहाँक तन्‍द्रा भङ्घ नहि करत हम स्‍वीकार कऽ चुकल छी ई सब हमर असफलता अछि हमर सपनाक चिता अछि अहीँक लेल देखल सपना सब अहाँक जीवन लक्ष्‍यमें सम्‍पूर्ण सपनाके रुपान्‍तरण नहि कऽ सकबाक प्रमाण अछि ई । जीवनक लक्ष्‍य आ उद्देश्‍य अहाँक तरबासँ पिचाइत गेल अहाँ उज्‍ज्‍वल प्राप्‍तिक लेल दूर भऽ गेलौंह मुदा हम आ हमर मोन इजोरियोमें अन्‍धकारमय अछि सदाक लेल ई मोन फाटि गेल अछि चिर्रीचिर्री भऽ गेल अछि । ३.  अमरेन्‍द्र यादव- टमटमियाँ घोडा अमेरिका जे इराक पर अपन खैमस्‍ती झाडलक अछि ताहिसँ हमरा कोन काज । म्‍ााओवादी जे बन्‍दुक उठौने अछि आ गणतन्‍त्रक लेल लडि रहल अछि तकर हमरा कोन मतलब । सौंसे मुसहरी जे भुखक सुली चढि रहल अछि आ घर—घरक बेटी पुतौह जे चुल्‍हाक आँच बनि रहल अछि तकर हमरा कोन चिन्‍ता । हम तऽ अहाँक टमटमियाँ घोडा छी बाबुजी । अहाँक वीर्यसँ लऽ कऽ खुन पसिना धरिक लगानी अछि हमरा पर । हम कोना बिसरि सकैत छी अहाँक ओ आदेश अहाँक ओ महत्‍वाकाँंक्षा हँ बाबुजी हमरा चढबाक अछि अहाँक सपनाक पहाड पर । कला आ संगीत शिक्षा छवि झा/ कुमुद सिंह लेखिका छवि झा पिछला तीस वर्ष स मिथिला चित्रकला कए अर्थ पर काज कए रहल छथि। संप्रति ओ 'स्नेह छवि मिथिला स्कूल ऑफ आर्टÓ, दरभंगा क निदेशक छथि आ एकरा परिभाषित करबा मे लागल छथि। लेखिका कुमुद सिंह मैथिलीक पहिल इ-पेपर समादक संपादक छथि।

मिथिला चित्रकला : अर्थक अधिकता आ सार्थकता

1960 क दशक मे मिथिला चित्रकला कए दीवार स कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भ गेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक।

सब कलाकृतिक एकटा अर्थ होइत छैक। जेकर कलाकृति स घनिष्टï संबंध होइत अछि। कलाकृति आ ओकर अर्थ ओ कृतिक सार्थकता कए सिद्घ करैत अछि। मिथिला चित्रकलाक संबंध मे जखन विचार करैत छी त कर्ठटा गप सामने अबैत अछि, मुदा एकटा गप स्पस्ट होइत अछि जे मिथिला आ भारतक विद्घान एहि कलाक प्रति आइ धरि अपन नजरिया नहि बना सकलथि अछि। पिछला पांच दशक मे विदेशी विद्वान जे एहि कलाक प्रति नजरिया स्थापित केलथि अछि, देशक विद्वान ओकरे आधार मानि कए आगू बढैत रहलथि अछि। च पूछु त देशी विद्वान कहियो अपन नजरिया प्रस्तुत करबाक प्रयास तक नहि केलथि। मिथिला चित्रकलाक एहि गुप्त आ जटिल वास्तविकता कए धुंध स निकालबाक पहिल प्रयास सेहो अमरीका मे कैल गेल। 1984 मे अमरीका स प्रकाशित मानव शास्त्र पर आधारित पत्रिका मे पहिल बेर एहि गप कए रोचक आ गंभीरतापूर्वक उठाउल गेल जे अर्थक अधिकता स केना एहि कलाक सार्थकता खत्म भ रहल अछि। उत्तर बिहार आ नेपालक तराई मे पसरल मिथिला क महिला द्वारा अपन घरक दीवार आ आंगना मे बनाउल जाइवाला एहि चित्रक संबंध मे एखन धरि कई बेर लिखन जा चुकल अछि आ कई ठाम कहल जा चुकल अछि। एतबे नहि कई टा अंतरराष्टï्र्रीय मंच पर एकर प्रस्तुति सेहो भ चुकल अछि। मुदा एकर संबंध मे लिखल साक्ष्य बेसी पुरान नहि अछि। 1949 मे पहिल बेर एहि पुरातन कलाक संबंध मे कागज पर किछु लिखल गेल। डब्ल्यू जी आरचर अपन किताब मे एहि चित्रकला कए अद्भुत आ आश्र्चयजनक कहने छथि। मुदा 1962 मे प्रकाशित लक्ष्मीनााि झाक पुस्तक मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला सही मायने मे एहि चित्रकला पर पहिल आधिकारिक दस्तावेज अछि। देसी नजरियाक संग-संग एकर भाषा मे सेहो हिंदी आ मैथिलीक मिश्रण अछि, जाहि स अर्थक भाव अंगरेजी स बेसी साफ बुझबा मे अबैत अछि। देशी नजरियावाला एहन पुस्तक कए पाठक तक नहि पहुंचब एहि कलाक अर्थक अधिकताक मूल कारण कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकलाक अर्थक संबंध मे समय-समय पुस्तक क प्रकाशन होइत रहल अछि। 1952 मे ब्राउन आ लेन्यूइस, 1966 मे माथुर, 1977 मे इब्स विको (वैक्यूवाद) आ 1990 मे जयकर एहि कलाक अर्थक संबंध मे बहुत किछु लिखलथि। अविश्वसनीय मुदा सत्य अछि जे एहि किताब सब मे जे किछु लिखल गेल अछि ओ मिथिला मे प्रचलित अर्थक स सर्वथा भिन्न अछि। एहि संबंध मे अमरीकाक चीको विश्वविद्यालयक कैरोलिन ब्राउन लिखैत छथि जे मिथिला चित्रकलाक अर्थ कए हरदम गलत आ भ्रमक तरीका स विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। एकर मुख्य कारण इ रहल जे एहि पर देशी खास कए मिथिलाक विद्वान गंभीर काज नहि केलथि, जे काज भेल ओ विदेशी विद्वानक शोध स भेल। मिथिलाक अंगना मे बनाउल गेल एहि चित्रक संबंध मे पुख्ता जानकारी लेब कोनो विदेशी लेल हरदम एकटा चुनौती रहल अछि। लोककला कए बुझलाक बाद ओकर सही अर्थ बुझब आ फेर ओकरा सही रूप मे परिभाषित करि अभिव्यक्त करब कोनो विदेशी शोधकर्ता लेल राई क पहाड़ सन काज अछि। 1986 मे एसैड, वैल, मारकस आ फिसर, 1988 मे क्लिवाड आ 1992 मे वूल्फ क आलेख स बुझबा मे अबैत अछि जे ओ किछु एहने सच्चाई स सामना केने हेताह। कैरोलिन ब्राउन एहि संबंध मे साफ तौर पर लिखैत छथि- हम पश्चिम कए लोक एहि चित्रकला कए परिभाषित नहि करि सकैत छी, ताहि कारण हम सब एहि अद्भुत विषय कए तोडि़-मरोड़ी कए पेश करैत रहलहुं अछि। हालांकि एहि मे कोनो संदेह नहि अछि जे एकटा समाज मे भिन्न-भिन्न लोकक अगल-अलग नजरिया भ सकैत अछि, ओ एकटा चित्रक भिन्न-भिन्न अर्थ कहि सकैत छथि, मुदा विभिन्न अर्थक बीच मे एकटा समानता होइत अछि, जे अर्थ कए कतहु ने कतहु जोड़ैत अछि। उदहारण लेल मिथिला मे पुरुख कर्मकांड, न्यायशास्त्र सन शास्त्रीय विधा मे नीक पकड़ रहैत छथि आ ओहि स जुड़ल पावैन-तिहार क व्याख्या नीक जेका करि लैत छथि, ओतहि मौगी घरेलू पावैन-तिहार पर नीक पकड़ी रखैत छथि आ ओकर अपन अनुसारे व्याख्या सेहो करैत छथि। एहि लेल कुलदेवीक पूजा या गौरी पूजा मे पुरुखक योगदान कम देखबा मे अबैत अछि। एकर पाछु कारण इ अछि जे अत्यंत गूढ़ संसार आ अत्यधिक विकसित समाजक सबटा गपक ज्ञान राखब असंभव अछि। ओना मिथिला समाज कए अत्यंत विकसित समाज बहुत कम विद्वान मानने छथि। जेना कि 1991 मे दरिदा आ 1994 मे वाल साफ तौर पर लिखने छथि जे एहि चित्रकलाक सही अर्थ मिथिला मे आब गिनल-चुनल लोक बता सकैत अछि। वेल क कहब अछि जे मिथिला मे जे चित्रक अर्थ कहि सकैत छथि ओ चुप रहय चाहैत छथि, जखन कि अर्थ नहि जननिहार लोक कए चुप राखब एकटा कठिन काज अछि। ओना एहि संबंध मे ब्राउनक मत किछु अलग अछि। ब्राउन कहैत छथि, 'इ सच अछि जे आम मैथिल एहि कलाक संबंध में कम जानकारी रखैत छथि, मुदा बहुत विद्वान लेल इ कोनो महत्व नहि रखैत अछि जे मैथिल एहि संबंध में कतेक बुझैत अछि आ की कहैत अछि। अधिकतर विद्वान मैथिलक भावना कए अपन शोध मे तोडि़-मरोडि़ कए प्रस्तुत करबा स पाछु नहि हटला अछि। दुर्भाग्य अछि जे एखन तक कोनो देशी विद्वान एहि तथ्य कए रेखांकित नहि केलाह अछि, मुदा ब्राउन अपन मिथिला प्रवासक दौरान किछु एहने महसूस केलीह। असल मे सबस पैघ गप इ अछि जे पाश्चात्य संस्कृति, व्यवहार आ शिक्षा हमरा लोकनि क सोच कए दबा देलक अछि या इ कहू जे सीमित करि देलक अछि। एकर अलावा हमरा लोकनि मे अनुवाद करबाक क्षमता सेहो कम भ चुकल अछि। आब सवाल उठैत अछि जे एतेक जटिल आ गुप्त तथ्यक कोनो एक व्यक्ति द्वारा कैल अनुवाद कए सर्वोच्च मानल जा सकैत अछि? एहि ठाम इ कहब जरूरी अछि जे एकटा चित्रक कई टा अर्थ भ सकैत अछि, मुदा ओकर सूत्र दूटा नहि भ सकैत अछि। वैह एकटा सूत्र ओकरा आन स भिन्न करैत अछि। एहि सूत्रक चारुआत ओकर अर्थ घुमैत रहैत छैक। एहन सूत्र मिथिला मे एखनो किछु महिला कए बुझल छैन, मुदा ओ निश्चित रूप स व्यावसायिक नहि छथि। ताहि लेल हुनका स ओ सूत्र बुझब कोनो देशी विद्वान लेल कठिन काज अछि, एहन मे विदेशी विद्वानक गप करब बेकार अछि। दरअसल मिथिलाक मौगी एहि सूत्र कए अपन शरीरआ आत्मा मे बसा रखने छथि आ नव पीड़ी कए थोड़े-थोड़े करि कए बुझाउल जाइत रहल अछि। एहन मे अल्प ज्ञानी स जानकारी लेलाक बाद विदेशी विद्वान मिथिलाक सूत्र जनिनिहार महिला कए नजरअंदाज करि दैत छथि। मिथिला चित्रकला क सबस प्रचलित चित्र कोहबरक पुरैन कए ल कए सबस बेसी भ्रमक स्थिति अछि। अधिकतर विद्वान एकरा कोहबर नाम स परिभाषित केलन्हि अछि, जखन कि पुरैन कोहबरक अनेक चित्रगुच्छक एकटा सदस्य मात्र अछि। आइ जे पुरैनक स्वरूप देखबा मे आबि रहल अछि, ओ जानकार महिला मे भ्रम पैदा करि रहल अछि। हालांकि एतबा अवश्य अछि जे एकटा गोलाकार आकृतिक चारुआत छह टा मौगिक मुंह बनाउल गेल अछि, जेकर बीच मे सातम मुंह सेहो अछि जे छह टा मुंह स कनि पैघ आकारक अछि। एहि चित्र कए रेखाचित्रक रूप मे बनाउल गेल अछि। पुरैनक सूत्र पर बनाउल गेल एहि रेखाचित्र स भ्रण हेबाक कईटा कारण अछि। मिथिला मे पुरैन रेखाचित्र नहि, बल्कि भित्तिचित्र अछि आ पांचटा रंग स बनाउल जाइत अछि। हालांकि आइ अधिकतर कागज पर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, लेकिन एहि चित्रक विशेष मे साफ तौर पर कहल गेल अछि जे एकरा दीवार पर बनाउल जाइत अछि। मिथिला मे रेखाचित्र कए अरिपन कहल जाइत छैक आ ओ जमीन पर बनाउल जाइत अछि। ओनाओ मिथिला मे पुरैनक दू टा सूत्र अछि। एकटा ब्राह्मïण आ दोसर कर्णकायस्त लोकनिक पुरैन। दूनू मे सूत्रक अंतर अछि। मुदा एहि चित्र मे एकर प्रारूपक कोनो चर्च नहि अछि। सातटा मौगिक मुंहक संग सांप, कछुआ, माछ आदिक चित्रक औचित्य जखन मिथिलाक लोक लेल बुझब कठिन अछि तखन विदेशी की बुझत? विदेशी विद्वान लेल इ मात्र एकटा भीड़वाला चित्र अछि, जाहि मे संदेशक कोनो स्थान नहि अछि। बहुत रास विदेशी विद्वान त एकरा जादू-टोना आ भूत-प्रेत लेल बनाउल गेल चित्र कहलथि अछि। मुदा ब्राउनक कहब अछि जे इ पुरैनक नव रूप अछि आ कायस्त प्रारूप स मिलैत-जुलैत अछि। मिथिला मे पुरैन कमलक लत्ती कए कहल जाइत अछि। ब्राह्मïण प्रारूप मे नौ आ कायस्थ प्रारूप मे सातटा कमलक पात दर्शाउल जाइत अछि। चूंकि कमलक लत्ती पाइन मे होइत अछि, ताहि लेल एकर संग-संग पाइन मे रहैवाला वस्तु आ जीवक चित्र बनाउल जाइत अछि। लक्ष्मीनाथ झा एहि संबंध मे लिखैत छथि जे पुरैन मुख्य रूप स वंश वृद्घिक लेल नव दंपति स सांकेतिक अनुरोध अछि। जेना कमलक एकटा लत्ती पोखरि कए कहियो कमल विहीन नहि हुए दैत अछि, तहिना नव दंपति कए घर कए कहियो वंश विहीन नहि हुए देबाक कर्तव्य निभेबाक चाही। एतबा त जरूर अछि जे 20वीं शताब्दी मे पश्चिम मे पलल-बढ़ल कोनो व्यक्ति एहि स्त्रीत्व कए(स्त्री कए हृदय मे वास करैयवाला भावना) घेरा नहि बुझि पाउत। आइ जखन बियाह एकटा अलग अर्थ ल चुकल अछि, एहन मे पुरैनक औचित्य जरूर प्रासंगिक भ गेल अछि। 1960 क दशक मे एहि चित्र कए कागज पर उतारबाक प्रयास शुरू भेल छल आ तहिए स शुरू भेल एहि चित्र मे नव-नव प्रयोग। तहिये स शुरू भेल एकर अर्थक नव संसार जे मिथिलाक सोच आ संस्कृति स पूरा भिन्न अछि। नव प्रयोग आ पुरान अर्थक एहन मिश्रण भेल जे कलाक पूरा स्वरूप आ अर्थ क औचित्य पर सवाल उठा देलक। सच कहल जाए त मिथिलाक महिलाक एहि विलक्षण प्रतिभा कए परिभाषित करबा मे एखन धरि कोनो विद्वान सफलता नहि पाबि सकलथि अछि। समस्त मिथिला मे बनाउल जाइवाला एहि चित्र कए किछु चारि-पांच टा गाम मे समेट देबाक अलावा इ विद्वान लोकनि एहि चित्र कए कएटा अनपढ़-गवांर मौकी द्वारा बनाउल गेल चित्र स बेसी किछु नहि साबित कए सकलथि अछि। मिथिला मे एखनो कई टा महिला अपन फाटल पुरान कॉपी निकालि देखबैत छथि, जाहि मे कईटा विदेशी विद्वानक लिखल वाक्य अछि। दुख आ तामस तखन होइत अछि जखन कॉपी पर लिखल वाक्य पढ़ैत छी, जाहि मे लिखल रहैत छैक जे इ चित्र एकटा पिछड़ल समाजक गवांर, अनपढ़ आ मूर्ख महिला द्वारा बनाउल गेल अछि। विदेशी विद्वान मे इ सोच अचानक नहि आबि गेल अछि। हुनका कई प्रकार स इ बतेबाक बेर-बेर प्रयास भेल अछि। दुनिया मे इ धारण कए स्थापित करबाक श्रेय इब्स विको कए अछि। विको स बेसी शायद कोनो विद्वान एहि चित्रकला पर काज नहि केलथि अछि, मुदा ओ जतेक एहि चित्रक करीब अबैक कोशिश केलाह, एकर अर्थ स ओ ओतेक दूर होइत गेलाह। विको राय औवेन्स क संग एकटा फिल्म सेहो बनौलथि, जेकर नाम 'मुन्नीÓ अछि। ओ एकटा फ्रंच फिल्म सेहो बनउलथि, मुदा चित्रक अर्थ बुझबा आ बुझेबा मे सब बेर असफल भेलथि। विको तखनो हार नहि मानलथि, ओ 1994 मे एकटा विडियो फिल्म 'मिथिला पेंटरस...Ó बनौलथि, मुदा नव किछु नहि कहि पैउलथि। आइ स्थिति एहन भ चुकल अछि जे समाजक सब लोक इ बुझबा मे लागल अछि जे आखिर इ परंपराक कौन वस्तु बारे मे थिक। एहि चित्रकलाक संबंध मे सबसे लोकप्रिय स्रोत विकोक 1977 मे छपल किताब' द वीमेंस पेंटर ऑफ मिथिला...Ó अछि। जखन कियो एहि पुस्तकक एक-एक टा चित्र कए गौर स देखैत अछि आ ओकर रूपरेखा कए पढ़ैत अछि त ओकर सामना एकटा आश्र्चजनक, अद्भुत आओर लगभग असंभव सन प्रतीत होइवाला संसार स होइत अछि। विको लिखैत छथि जे मिथिला समाज मे मुख्यपात्र महिला छथि आ एहि ठाम पुरुषक भरमार अछि। एहि ठाम युवती हमउम्र युवक स विवाह करबा लेल तरह-तरह स प्रयास करैत छथि।(1977, पृष्ठ- 17)। विको एहि गप कए बाजारू आओर रोचक बनबैत आगू लिखने अछि जे मिथिला मे एकटा युवती अपना लेल सुयोग्य युवक कए चुनैत अछि आ विवाहक प्रस्ताव स्वरूप ओकर सामने कोहबर रखैत अछि ।(1977, पृष्ठ- 17)। ओ लोक जे मिथिला कए नीक जेका नहि चिन्हाल अछि, हुनको इ वाक्य पढ़लाक बाद आश्र्चय हेतेन जे विको केना मिथिला समाज कए अतेक चरित्रहीन बना देलथि। इ अद्भुत मुदा सत्य सन आलेख कए पढ़लाक बाद एहन प्रतीत होइत अछि जे विको कए एहन अनुवादक भेटलन्हि जेकरा मिथिला समाज, संस्कृति आ सभ्यता स कोनो वास्ता नहि रहैन, संगहि हुनका मिथिलाक रिति-रिवाज आ लोकाचार तक कए ज्ञान नहि रहैन। सच पूछु त अनुवादकलेल विको मात्र टका देनिहार विदेशी छलाह। ओना देखल जाए त विको क इ किताब एहि विषय पर लिखल गेल पहिल अथवा आखिरी किताब नहि थिक। इ पुस्तक एहि लेल महत्वपूर्ण भ गेल अछि, किया कि मिथिला चित्रकला पर शोध केनिहार अधिकतर विद्वान एहि पुस्तक स प्रभावित छथि। एतबा धरि कि भारतीय विद्वान उपेंद्र ठाकुर तक अपन किताब मे विको क नजरिया कए नजरअंदाज नहि केलथि अछि। विको क एहि किताब क महत्व पर ब्राउनक कहब अछि जे पश्चिमक विद्वान जखन कोनो विषय पर काज शुरू करैत छथि तखन ओहि विषय पर लिखल गेल पूर्वक किताब स काफी प्रभावित होइत छथि। मिथिला चित्रकलाक संग सेहो किछु एहने भेल। अधिकतर विद्वान विकोक रूप-रेखा स प्रेरणा लेलथि, किछु त हुनकर नकल तक कैलथि। ताहि लेल इ अन्य पुस्तक बेसी महत्वपूर्ण भ जाइत अछि। दोसर इ जे विको बहुत दिन धरि एहि विषय पर काज केलथि अछि आ कई प्रकार स एकरा दुनियाक समक्ष अनलथि अछि, एहन मे विदेशी विद्वान लेल हुनका नजरअंदाज करब कठिन रहल अछि। एहि प्रकारे विको भ्रमक आओर सर्वथा गलत तरीका स अनुवाद करि झूठ कए एकटा सत्य स बेसी सत्य रूप मे स्थापित केलथि अछि। ओना अधिकतर विदेशी विद्वानक कहब अछि जे मिथिला समाज विश्वक सबस चरित्रवान समाज मे स एक अछि। एकर संस्कृतिक संबंध मे प्राख्यात चिकित्सक डॉ कैमेल क कहब अछि जे आइ 'जीनÓ(अणु)क संबंध मे दुनिया भरि मे शोध भ रहल अछि, जखनकि मिथिला मे पंजी व्यवस्था ओकरे एकटा रूप अछि। मिथिलाक ब्राह्मïण आ कर्णकायस्थ लग एखनो बीस-बीस पीढिक़ जानकारी उपलब्ध अछि। विको कए शायद इ नहि बताउल गेल कि मिथिला मे युवतिक विवाह पंजीकारक राय स तय कैल जाइत अछि। युवतिक इच्छा एहि ठाम कोनो मायने नहि रखैत अछि। एहि तथ्य कए ब्राउन बहुत साफ तौर पर रखने छथि। ब्राउन कहैत छथि जे ओ मिथिला प्रवासक दौरान पंजीक विधिवत शिक्षा ल चुकल छथि। ओ एहि गप कए सेहो साफ करबाक प्रयास केलथि अछि जे मिथिला मे कहियो युवति कए पति चुनबाक अधिकार नहि रहल अछि। सीताक संबंध मे सेहो ब्राउनक मत स्पष्टï अछि। ओ कहैत छथि जे सीताक स्वयंवर नहि छल ओ एकटा सशर्त विवाह छल। इ सच अछि जे ओहि विवाह मे पंजीक कोनो व्यवस्था नहि छल, मुदा धणुष रामक बदला मे रावण उठा लैत त कि सीताक इच्छा रहितो राम स विवाह संभव छल? सीताक इच्छा हुनक विवाह मे कोनो मायने नहि रखैत छल। ब्राउल इ तर्क देलाक बाद आखिरी फैसला मिथिलाक लोक पर छोड़ैत कहैत छथि जे मेरे एहि मत स शायद मिथिलाक लोक सहमत नहि हेताह। वैकसेनेलक शब्द मे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला चित्रकला एकटा आंखिक भांति अछि जे समयक संग-संग अपना कए बदलैत रहल अछि, मुदा अपन मूल सिद्घांत स कखनो समझौता नहि केलक अछि। इ कला जगतक एकटा अद्भुत औजार अछि जेकरा स कलाकार अपन समाजक संग-संग पूरा विश्वक गुढ़ गप आ रिति-रिवाज कए चित्रक माध्यम स प्रस्तुत करैत आइल अछि। (1972,पृष्ठ-38) जे किछु हुए एतबा त अवश्य भेल अछि जे मिथिलाक संस्कृति कए दुनियाक सामने सर्वथा गलत तरीका स परिभाषित केल गेल अछि। आइ मिथिला चित्रकला अधिकतर एहन चित्र बनाउल जा रहल अछि, जेकर एतुका संस्कृति स कोनो लेनादेना नहि अछि। आवश्यकता अछि एहि चित्र क गंभीरता स शोध करबाक आ एकर अर्थक अधिकता कए समाप्त करबाक, नहि त इ चित्र हरदम लेल हमरा लोकनिक अज्ञानताक द्योतक बनल रहत। शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफक जन्म आन्ध्र प्रदेशक कडापा जिलामे भेल छल। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंदल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमर विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहए-ए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। हम काजमे व्यस्त छलहुँ जखन फोन बाजल। फोन उठेलहुँ तँ दोसर दिस अम्मी छलीह..हुनकर फोन ओहि समय नीक आ सहज लागल। एहिसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितहुँ ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि। “की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि। “हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल..अहाँ सतर्क रहब! ...लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नहि गेल रही हमर बाउ।” हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलहुँ। जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नहि जएबासँ ओ प्रसन्न भेल छलीह। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छलीह? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे एहि तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचरक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहए लागल। १ हमर अम्मीकेँ जुम्माक नवाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नहि, से ओ हमरा सभकेँ ओहि दिन घरमे नहि रहए दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नहि बचि पाबथि जे ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लए मस्जिद चुपचाप जाए पड़न्हि। हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागए बला, आलसी बच्चा, शिकारी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नहि जएबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहैत छलहुँ। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहैत छलाह जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जएबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहए हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लहुँ...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नहि बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नहि पठा सकैत छलीह...हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ कोना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आँगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अँगनामे कपड़ा जकाँ टँगैत। से हम ई चोट खएबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकाशमे उड़ि जाइत रहए। एक बेर ओतए पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभ संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदानक लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जान्हि, हमर पढ़ाईमे मोन लागए आ की की। हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान प्राप्त करबाक लेल नहि जएबाक चाही, हमर बाउ..हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही...अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वैह छथि जे हमर सभ कल्याण देखैत छथि”। जखन दोसर हुनका हमर उपराग देन्हि जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थनाक काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू...कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ अएबासँ रोकू। बगलमे बम किएक ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...”। हुनका ओहि दिन एहि गपक अन्देशा नहि रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नहि जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छलीह। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भावह ई भऽ सकैत अछि। हम हुनकर वेदनाकेँ नहि देखि पाबि रहल छी। ओ डरायलि छलीह। ओ नमाजसँ डरायल छलीह। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छलीह। “अम्मी...”। हम उद्यत भऽ कहलहुँ। “हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजलीह।  “अहाँ आइ मस्जिद नहि गेलहुँ, नहि ने, हमर बाउ”? ओ फेरसँ कहलीह। हमर हृदय डूमि रहल रहए। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहए। हमर कंठ सूखि रहल रहए। हम घुटनक अनुभव कएलहुँ। विचार ज्वारि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कए सोखिं कए भूतमे लऽ जाऽ रहल अछि। २ जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करैत छलहुँ। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करैत छलहुँ। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगन मे लऽ चुम्मा लैत छलीह, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करताह, हमर बाउ...”। ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय कएलहुँ जे जहुँ हमरा कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नहि छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जएबापर जोड़ देथि। आन चीजक अतिरिक्त ओ एहि गपक विषयमे बाजथि जे कुरान अही दिन बनाओल गेल रहए, कि मनुक्ख अपन कर्मक लेल अही दिन उत्तर दैत अछि आ जे विश्व जीवन रहित जे कहियो होएत तँ सेहो अही दिन होएत। हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किएक मुसलमान लेल पवित्र अछि। सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहैत छलाह, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दैत छलहुँ, मस्जिद जएबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलहुँ। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कए केने छलीह। दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छलाह। ओ हमरा भाग्यशाली बुझैत छलाह आ अपनो मुस्लिम होएबाक मनोरथ करैत छलाह। हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी कएने होइ। हमर अम्मी ओहि महत्वपूर्ण उपस्थितिक लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कए राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहैत छलहुँ मुदा ओहि दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलहुँ। दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा चक लए अबिते ने छी”!! अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगा केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे हेलैत; अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत; आ नारिकेलक दाम दोकानक खिड़कीपर बढ़ैत। दरगा केर फ्रेम कएल चित्र पर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतए अहाँ नहि छोड़ि सकैत छियैक। किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नहि छलन्हि से ओ हजरतकेँ छओटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखबाक लेल हुनकर पछोर धेने अबैत रहथि। “अहाँकेँ ई अन्तरो नहि बुझल अछि कलमा..आकि गुसुल...हमरा अहाँसँ निकाह करेबाक लेल अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबए पड़त...कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नहि भेटलन्हि, अहाँसँ हमर बियाह करेलथि। आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़लथि हँ...” ओ हुनकासँ एहि तरहेँ विवादपर उतरि जाथि। “अहाँ ..घरक...ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..”। पजरैत, ओ मस्जिद जाइत रहथि लाल-पीयर होइत हजरतकेँ घर अनबा लए। हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। एहि बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कए ओहिमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन एहि मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि। हम शिकाइत करियन्हि, “यैह हमरा लेल बचल अछि”? “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु नहि खएबाक चाही, हमर बेटा..हम दोसरामे एकरा बाँटी तैयो जहुँ हमरा सभ लेल किछु नहि बचए”। ओ हमरा शान्त करथि। हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नहि भेटबाक निराशाकेँ खतम कए दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम, अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही। ई सभ सोचि हमर आँखिमे नोरक इनार बनि गेल... “हमर पुत्र, अहाँ किएक नहि बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...” हमर अम्मी पुछैत रहलीह। ओना तँ हैदराबाद एनाइ तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नहि पढ़लहुँ। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलहुँ जे नमाज पढ़नाइ की छियैक। “अम्मी..” हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलहुँ। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एतेक चिन्तित भऽ रहल छी”? हम पुछलहुँ। हम मोन पाड़लहुँ ओहि दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आएल रहथि कारण हम कहन्र् रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कतहु जाए नहि चाहैत छी...हमरापर किएक पाइ खर्च कऽ रहल छी”? हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नहि बनए चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नहि देलहुँ। हमर जोर देलापर ओ एक बेर अएलीह। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि। “अहाँ कतए जन्म लेलहुँ...कतए अहाँ बढ़लहुँ...अहाँ कतेक टा भऽ गेलहुँ? अहाँ एहि पैघ नगरमे कोना रहए छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलहुँ...” ओ बड़ाई करैत कानए लगलीह। “अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही कि अहाँ कतहु हेराऽ ने जाइ। आब अहाँ एतेक पैघ भऽ गेलहुँ जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी”। ई कहैत ओ नोरक द्वारे ठहरि गेलीह। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि। ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छलीह हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि। “अम्मी...हम एतए जीबाक इच्छासँ अएलहुँ। हम साहस केलहुँ आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन कएलहुँ। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लए ले जाइ आ संगमे तखनो प्रत्यन करी।, ई सभ अम्मी...ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नहि? एहि नगरमे अपना कहि कऽ संबोधित करए बला हमर क्यो नहि अछि, तखनो हम एतए बिना असगर रहबाक अनुभूतिक रहैत छी”। अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र”। समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल। “सभ जुम्मा..जुम्मा...अहाँ नमाज पड़ए छी हमर बाउ”? ओ पुछलन्हि। “नहि माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि”? “अहाँकेँ कहियो समय नहि भेटत, मुदा अहाँकेँ करए पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुन्जाइश नहि अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ, कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालए पड़त”, ओ कहलन्हि। आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिलाए नमाज पढ़ैत छथि। ओहि दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर हरेलापर अहाँ ओ आशीष कहियि घुरा नहि सकैत छी। ताहि द्वारे धनिक आ एहनो जो लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका एहिसँ हेतन्हि। संगहि ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नहि कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि”। हमरा डर छल जे हमर माँ वैह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नहि शुरू कऽ देतीह। विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतए निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...”? “एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतए नहि लऽ चलब”? ओ उत्साहसँ बजलीह। “जखन अहाँ ओतए पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बा ले अहाँ नहि ने कहब”। हम विनयपूर्वक प्रार्थना कएलियन्हि। “हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी...हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दैत छी”। “ठीक छैक..चलू चली”! हम सभ ओतएसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलहुँ। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहए। “अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतए चली..आकि मस्जिद”? हम पुछलियन्हि। “ओतए चारमीनारमे की अछि हमर बाउ”? “ओतए किछु नहि अछि...कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकैत छी। ओतएसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी...आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी...अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी”। ओ स्वीकृति देलन्हि। मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहए। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, सुखकारी आ विस्तृत रहए। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहए। अम्मी भीतर जएबामे संकोच कऽ रहल छलीह कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नहि प्रवेश करैत छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतए देखि ओम्हर बढ़ि गेलीह। अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजलीह, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने”? घरसँ चलैत काल ओ एहि लेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका एकरा पहिरएसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नहि छलन्हि मुदा हम एहि नव स्थानपर हुनका एहि झंझटसँ मुक्ति देमए चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदयक स्त्रीगण बीचमे बिना बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छलीह। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथराइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नहि पहिरए देबाक लेल लज्जित अनुभव कएलहुँ। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितहुँ अम्मी जे हमर सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत”। ओ किछु नहि बजलीह। “एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत अछि...आऊ”। हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलहुँ। ओ हमर संग अएलीह। हम सभ अपन चप्पल कातमे रखलहुँ जाहिसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी होए। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कए बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कए उतरल। किचु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनकाँ आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ अएलीह जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलहुँ। प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कए बजलीह, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतए बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकैत छथि”? “हमरा नहि बुझल अछि अम्मी...कैक हजार हमरा लागए-ए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ैत छथि”। हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि” अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम अपनामे सोचलहुँ। चारू कात देखाऽ कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलहुँ। पाथारक फलक चिड़ैक मलसँ मैल भेल रहए। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहए। ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेलीह। “एतए नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ”, ओ कहलन्हि। हम एहि बेर कोनो अति सम्वेदना नहि भेल। “हँ। ठीके, हम एतए कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब”। हम अपनाकेँ कहलहुँ। हम जतए रहैत छी मक्का मस्जिद ओतएसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतए अएनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो, अगिला बेर हम एतहि नमाज पढ़बाक प्रण कएलहुँ। “हम अगिला सप्ताह् एतए  आबि नमाज पढ़ब अम्मी”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव कएलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि। “एहि सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही”, ओ कहलन्हि। “अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहैत छथि, ओ की नमाज पढ़बाक लेल एतए आबि सकैत छथि? अहाँ अही नगरमे छी..एतए नमाज पढ़ू”, ओ कहलन्हि। “नहि मात्र एतए, जतए कतहु पुरान मस्जिद होए ततए नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एतए नमाज पढ़ने होएताह। एहि सभ ठाम नमाज पढ़लाक बाद कोनो घुरए केर गप नहि अबैछ। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखताह”। हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होए। हम हुनकर गप सुनलहुँ, कान पाथि कऽ। बदमे, बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ। अपन मस्जिद जएबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलहुँ। ओही संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लहुँ। तकर बादा दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नहि छल। आब बम विस्फोटक एहि समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी। “अम्मी...अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल”? हम फोनपर पुछलियन्हि। “कोनमे हमर बाउ”? ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि। “अहाँ एक बेर हैदराबाद आएल रही, मोन पाड़ू? हम नञि अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे लऽ गेल रही...मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओतहि, ओही मस्जिदमे...खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी...खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही जे कियो जे ओतए नमाज पढ़त, धन्य होएत...ओही मस्जिदमे अम्मी”। हम कहलियन्हि।  “छोट बच्चा सभ...ओकर सभक देह खोनमे लेपटाएल...परबा सभ सेहो मरल...”। नोर अनियन्त्रित दुखमे बहए लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलहुँ। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटए लगलन्हि। ओ सेहो कानए लगलीह। हम आगाँ कहलहुँ, “अम्मी, नहि कानू...अब्बाकेँ होएतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि...हुनका कहियन्हि जे हम नीकेना छी”। कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नहि राखब हमर बाउ”। “जल्दी अम्मी, कहू”। “अहाँ चलि आउ...गाम चलि आउ...हमर गप सुनू”। “हमरा किछु नहि भेल अछि अम्मी”। “बाहर नहि जाएब..हमर बाउ”। “ठीक छैक अम्मी”। “ओहि मस्जिदमे नहि जाएब, हमर बाउ”। हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओहि मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नहि जाएब, फोन रखलहुँ। मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक विभिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई बाजि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नहि जाऊ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नहि हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...! (ओहि सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमए पड़लन्हि...लेखक) अजय सरवैया, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अहाँक तामस हमर स्वागतपथ “अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा चक्रधर आ पीयुषक लेल १. “कहि धरि हम खिचैत रहब एना”? ओ पूछत आद्र मुखसँ हेराएल आँखिसँ हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखतीह नियमावली हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र हम आनब प्रश्न, ओ पलायन हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक कहिया धरि? हम बुझलहुँ नीक जकाँ हमर भाग्य रहए फराक हमरा सभक दिन राति सेहो ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ समय काल हमरा सभक अन्तर हमरा सभक विभिन्नता रहए विभिन्न हमरा सभ प्रेम करैत रही कतेक दिन धरि? राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। १ हम किएक कऽ रहल छी अनुभव धरा बिन शाखक बिना एहि हाथक? पसारैत दूर आ विस्तृत जीवित साँपक ताकिमे ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझराएल आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे। बाबाक छड़ीक पकड़िसँ बसक ठाढ़ होएबला लटकल चक्र मुट्ठी अनैत अछि वैह अविचल शून्याकाश। ओकर कए अनुभूति ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ घुमि जाएत आकाश दिस सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित पृथ्वीक गत्र-गत्रक पाँजर खेतमे औंगठल बाँहि जकाँ। सभटा हरक फारक चेन्ह भाग्य रेखा हाथक। पंक्ति जोखि सकैए मात्र हाथक लम्बाई नहि एकर जड़ि पहिने हम कए सकी एकर निदान हाथक आक्रमण जड़िपर श्वेत धरापर रोशनाईसँ पसरल अपन नव अंकुरित आँखिए उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए ओहि धूसरित गगनक पार आब सभटा मस्तिष्क कोशिकामे हाथ रहैछ अहर्निश प्रवेश कए रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। सांध्य बेला साँझ होइते शिशिर आह पर्वतक आच्छादित कएल अकाश अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण आकाश फाँसमे एहि पर्वतक छाहक पर्वतकेँ भेटत अकाश प्रकाशकेँ छाह शरीर सुतत हृदय दुखित ओहिना जेना ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। आमद हे विदेशी! देखाऊ हमरा एहन दृश्य यदि अछि कोनो एहन बिनु प्रकाश बिनु गद्दक ओछाओन बिनु छाह जतए नहिए अछि चुप्पीक अंश व्यथित हृदयक ध्वनि नहिए ध्वनिक आँगुरक नोकक स्पर्श देखाऊ हमरा ओ दृश्य यदि अछि कोनो एहन हौ विदेशी! जतए क्यो नहि करैछ एकत्रित स्वासक मालगुजारि। बाबू सुथार, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। गृहमोह १. गंध पहिल बुन्नीक आ हम बैसि आ पसारी एक-दोसराक दिस भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द बलुआही माटि भेल यथार्थ छननी अएल प्रखर रौदक फोका पाथरक चामपर अविलम्ब झझायत छातक खपराक भूर धारक संग उगडुम करत नवतुरिआ बरद कछेरपर नाचत। सभटा गलीमे बरद सभ आनत पानि सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे सभ घरमे धरनि सभ नहाएत जी भरि देबालपर गाछक छातीपर स्मृतिक शिलालेखपर हदसैत पानि खोलत हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक। बराखक संगे चमकैत आकाश माएक कोमल तरहत्थी। सूर्य करत आच्छादित वृक्षक शाखक पातक पँखुडिक। टाँगल पक्षिक आवास सभ गृहक बाहर मयूर सभ करत नृत्य। जेना प्रिय नव वधु मयूरीक माथपरक जलक घट गामक दोगहीसँ निकलत अनबा लए पानि छिटैत नहक आकारक झील वैतरणी डुमाएत रीढ़युक्त नागफनीक पात। संग जीव आ शिव करत अष्टमी आ एकादशी चन्द्रमा उगत चुट्टीक कटगर पीठपर आ चाली सभ बहराएत आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने सत्ये किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे आइ आइ गंध पहिल अछारक आ हम बैसि आ पसरैत एक दोसरामे। वासुदेव सुनानी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अनुमति हमरा अनुमति अछि श्रीमान! हम कए ली विश्राम कनेक काल? अहाँक आदेशानुसार छाह केँ देने अछि बहारि, बत्तू केँ देने छी खोआए, अहाँक नालाकेँ कए देने छी साफ, नहि रहत कोनो दुर्गन्ध आब। हमर अछि ढोल बजबए बला मधुमाछी युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ आ हमर आँगुर स्थिरताक राखए आश हम करी विश्राम थोड़बे काल? हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद हमर देव, हमर मृतात्मा। ताहि लेल प्रिय श्रीमान् घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ किएक तँ हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक। हम करए छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समय तृप्तिक संगहि अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक। प्रतीक्षा सेहि भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर विशेषकए लाख बरखक जहुँ ई होए। से हम करए छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्? कारण हमरो सन् तुच्छकेँ बुझल छैक छोट-मोट विद्रोहक कला। भरत माँझी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर घुरलाक बाद हमर घुरलाक बादो ओहि स्थानके नहि छोडू रिक्त पकड़ने रहू ओकरा। फूल सभकेँ नहि फेकू की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका फुलाएल अछि आकि अछि मौलाएल? खोलू हमर सभटा नुकाएल भोथियाएल स्वप्न, ओकरा अलंकृत कए। उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ, आ रोकि दिअ अन्हारक प्रति घृणा बिना घबरेने देखू समुद्र आ तखनो नहि करू घृणा अकाससँ। नेहोरा अछि!!! पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतए। कृपया बाट ताकू अपन आ से करए काल, रहू जागल! मोन राखू, हम घुरब एहि पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि राखू मोन कि हम घुरब हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ, मोन राखू ओ पथ बालानां कृते १.उमेश कुमार-२.ज्योति झा चौधरी उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज एकटा राजा रहए। ओकरा एकटा बेटा रहए। ओकर राजपाट खूब शांति सँ चलैत रहए। राजा जखन बीमार भेलए तँ बेटाकेँ कहलकए। १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले। राजकुमार एकर अर्थ नहि बुझि पेलक। राजा मरि गेलैक। राजकुमार राजा बनि गेल। पिताजीक गपपर ओ अमल करए लागल। १.फी कोरमे सीरा खेबाक मतलब ओ बुझलकै जे सभ दिन खस्सी कटबा कए सीरा खेनाइ आ बचल मासु नोकर सभ के देनाइ आ ओ सैह करए लागल। २.द्वारपर ओ एकटा हाथी कीन कऽ रखबा देलक आ चारि टा नोकर ओकर देखभाल लेल राखि देलक। ३.ओ सभटा बैरक गाछ काटि कऽ हटा देलक। ४.ओ दू टा नोकर राखलक जे गाछ काटि कऽ जतऽ जतऽ राजा जाइत रहए ओतए-ओतए लऽ जाइत रहए। एना किछु दिन ओ राजपाट चलेलक। एना करिते-करिते राजपाट खतम भऽ रहल छलैक , कारण खर्चा बेसी भऽ गेलै आ आमदनी कम, सभ गाछ कटि गेलैक। गामक एक बुजुर्ग सँ ओ पुछलक जे हमर राजपाट किएक खतम भऽ रहल अछि। तँ ओ बुजुर्ग ओकरा बुझेलक जे जाऊ आ तीन मूरी बला आदमी सँ पुछू। चारू तरफ राजा खोजलक मुदा तीन मूरी बला आदमी ओकरा नहि भेटलैक। फेर ओही बुजुर्ग आदमी सँ पुछलक जे हमरा तँ तीन मूरी बला आदमी नहि भेटल। बुजुर्ग कहलकै जे ७० बरख सँ ८० बरखक आदमी केँ तीन मूरी बला कहल जाइत छैक कारण जे जखन ओ बैसैत अछि तँ ओकर मूरी झुकि जाइ छैक आ ठेहुन ऊपर उठि जाइत छैक आ से ओ तीन मूरी जकाँ भऽ जाइत छैक। राजा एहेने एकटा मनुक्खकेँ ताकि क' पुछलक। “पिताजी मरए से पहिने की की बतेने रहथि”। ओ तीन मूरी बला मनुख पुछलक। राजा कहलक। “ओ बतेलथि- १.फी कोरमे सीरा खाइले। २.द्वारपर हाथी बन्हबा कऽ राखय ले। ३.वैर भाव नहीं राखए ले। ४.बाहर निकलैपर छाँवमे रहबा ले”। “पहिलाक मतलब छी- एक पाव डेढ़का मांछ लऽ कऽ बनबा क' खाउ ओकर सभ कौरमे सीरा भेटत। दोसराक मतलब घरक आगाँ घूर लगा देबा लऽ जाहिसँ द्वारपर हरदम १० गोटे बैसल रहत। तेसरक मतलब झगड़ा-झाँटि सँ दूर रहि दोस्ती मिलान सँ रहू। चारिमक मतलब दू रुपैयाक छाता लऽ छाहमे चलू”। तीन मूरी बला मनुक्ख बतेलक। एकरापर अमल केलापर राजाक राजपाट वापस आबए लगलैक। देवीजी:  ज्योति झा चौधरी देवीजी : देवीजी  कंप्‍यूटर शिक्षा विद्यालयमे नव वर्षक पहिल दिन छल। एना लागैत छल जे विद्यालयके इमारतमे किछु नवीनीकरण कैल गेल छल।सब प्रार्थना लेल एकत्रित भेल। नववर्षक संग नया कक्षामे जायके शुभकामना देलाक बाद शिक्षकगण रहस्यमय मुस्कान देबऽ लगला। विद्यार्थी सबहक उत्‍सुकता चरम पर छल।तखन देवीजी समय व्यर्थ बिताैनाइ छाेड़ि सबके सूचित केलखिन जे पाठशालामे कंप्‍यूटर शिक्षाक व्यवस्था कैल गेल अछि। वर्त्तमान वैज्ञानिक विकासक परिपेक्ष्यमे कंप्‍यूटर के ज्ञान अत्‍यंत आवश्यक छल।आहिकाल्हि सब जगह कंप्‍यूटरक उपयाेग भऽ रहल छै। सब विषयमे कंप्‍यूटरक समावेश छै।चाहे आे विज्ञान हाेए वा कला। चित्रकला तकमे कम्प्‍यूटरक उपयाेगिता छै। डिगिटल आर्ट़ लाेगाे डिज़ाइऩ फैशन डिज़ाएऩ एनिमेशऩ अतऽ तक जे फिल्म निर्माता सब एक्‍शन सीन के  कंप्‍यूटर पर एनीमेशन कऽ स्टण्ट मास्टर के देखाबैत छथि जाहि सऽ बात बुझमे सहायता हाेएत छै। ताहि द्वारे प्‍्राधानाध्यापक अहिलेल विशेष प्‍्रायास केने छलैथ।बड पहिने सऽ लागल छलैथ तखन अहि वर्ष इर्च्छा पूर्ण भेलैन। विद्यार्थी सब सेहाे अहि समाचार सऽ बहुत आह्‍लादित भेलैथ।हुनका सबलेल तऽ मानू स्वप्‍न साकार भऽ गेलैन।तकर बाद प्‍्राधानाध्यापक इहाे कहलखिन जे अगिला साल तक इंटरनेट के इंतज़ाम सेहाे हाेयत। सबके बेर्राबेरी कम्प्‍यूटर रूमक दर्शन कराआेल गेलैन। कंप्‍यूटर के बाह्‍य बनावट माॅनीटऱ सेन्ट्रल प्‍्रााेसेसिंग यूनिट ह्य सी पी यू़हृ़ तथा की बाेर्ड के संक्षिप्‍त विवरण देल गेल। इंटरनेट के प्‍्रायाेग सऽ सम्पर्क स्थापना कतेक सरल आ सस्ता भऽ गेल अछि तकर जानकारी सेहाे देल गेल। तकर बाद विद्यार्थी सब अपन कक्षा दिस नव उत्‍साह संग विदा भेल।सबहक उत्‍साह देख प्‍्राधानाध्यापक के अपन प्‍्रायास सफल बुझेलैन। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०.विश्वक प्रथम देशभक्त्ति गीत (शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। ७. मानक मैथिली इंग्लिश-मैथिली कोष मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आऽ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@yahoo.co.in वा ggajendra@videha.co.in पर पठाऊ। १.कृषि-मत्स्य शब्दावली २.बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण। कृषि-मत्स्य शब्दावली- गजेन्द्र ठाकुर माँछ वंशीसँ सेहो मारल जाइत अछि। छोट माँछक लेल जाल- भौरी जालक प्रयोग होइत अछि। भिरखा- हाथसँ उठा कए फेंकल जाइत अछि। एहिमे सूत आ लोहाक गोली प्रयोग होइत अछि, २५-२५ ग्रामक लोहाक गोली लगभग २-१/२ सँ ५ किलो धरि प्रयोगमे आनल जाइत अछि।  अन्ता जाल छोट होइत अछि आ कछारमे रातिमे लगाओल जाइत अछि। कोठी जाल पैघ होइत अछि आ एहिमे बाँसक प्रयोग होइत अछि। बिसारी जाल- दिनमे माँछ हरकि जएतैक से रातिमे खुट्टी लगा कऽ रातिमे माँछ मारल जाइत छैक। चट्टी जाल- प्लास्टिकक, पैघ-छोट दुनू, दिनमे आषाढ़-साओन दुनू मे। ५-१० मिनटमे उठाओल जाइत छैक। सूतक मोट पैराशूट जाल, सूत आ नाइलनक मिश्रणक करेन्ट जाल, सूतक बड़का हाटा जाल होइत छैक। पैराशूटसँ छोटकी माँछ उड़ि जएतैक। पैघ मछली बड़का वंशीसँ, बड़का चट्टी जालसँ, सूताक महाजालसँ मारल जाइत अछि। पैघ छोट दुनू माँछ बाँसक जंघासँ मारल जाइत छैक। एकरा ४ हाथ खड़ा नारियल आ नाइलोनक डोरीसँ बान्हल जाइत छैक। बाँसक करचीक छीपसँ सेहो माँछ मारल जाइत छैक। पटुआक सण्ठीक १००-२०० पुल्ली एकसाथ लगा कए सेहो माँछ मारल जाइत छैक। हाटा जाल किमी धरि पैघ होइत अछि आ सूताक बनैत अछि। चाँच कहड़ा बाँसक होइत अछि।धार/बदहाल घेरकेँ मारल जाइत अछि। पानिकेँ फुलाऽ कए डगरी लगाओल जाइत छैक, चाँच फहड़ामे चाँच फहड़ासँ घेरल जाइत अछि। माँछक प्रकार डाँरा मछली (डेरका मछली), मूँहा मछली, पोठी, लत्ता (पिआ माँछ), गड़इ, पलवा, टेंगड़ा, सिंघी, माँगुड़, चपड़ा, पैना, रेवा, गड़ही, उड़न्था, मोहुल, बुआरी, बामी, बगहार, चेलवा, कौअल, गोर्रा, सौल,भौरा, कजाल, कलबौस, चित्तल, भोइ, कत्ती, भौकुड़ी, सिलोन, रेहू, मिरका, बिलासकप, सिल्वरकप, चाइना माँगुर, कबइ, चाइना कबइ। दरबा- छोट, पातर- २-३ इन्चक, पीठपर कारी, बगल सफेद गड़ई- कारी चोपड़ा- चाकर, कारी, मलिन पलबा- दुनू दिस काँट, पीठपर सेहो काँट, रंग- पीयर-उज्जर, मोंछ सेहो होइत छैक। टेंगड़ा- पैघ माँछ, एकरो तीन टा काँट, मुँहपर मोँछ। सिंघी- पातर, दू टा काँट दुनू दिस, लाल रंगक आ लाल आ हल्का कारी मँगुरी- मोट आ महग सेहो।एकरो दू टा काँट, लाल आ हल्का कारी पैना- सफेद रंगक, पीठपर काँटा रेवा- सफेद, पौआ-आधा किलोक डढ़ी- पीठपर काँटा, सफेद उरन्था- पीठपर काँट, नीचाँ गामे झुकल, सफेद भालु- लम्बाइ मुँह, सफेद- खड़ा(पीयर), ऊपरमे काँटा, नाभिक लग काँट(सभ माँछमे) बोआली- पैघ मुँह- २० किलो तक, सफेद, पीठपर काँट, पखना दुनू दिस (सभ माँछमे) बामी- लम्बा, बिलमे रहैत अछि, मुँह आगू, गोल मुँह, सूआ जकाँ लम्बा, पीठपर काँट, नाभिपर दू टा काँट सौंस- माँछकेँ खाइत अछि। बघार- छोट, १ पौआसँ क्विंटल भरिक, कारी-खैरा (पीयर), काँट- पीठपर एकटा, बगलमे दू टा, पुच्छी-चाकर, मुँह चापट, चकड़ाई- बेसी। चेलबा- उज्जर, काँट नहि होइत छैक। चलैक लेल दुनू दिस पखना, माँछमे तेजगर। कौअल- सफेद, मुँह नमगर। गोर्रा- मोँछ, दाढ़ी, काँटा, आगाँमे टेढ़ साउल- लाल आ पीयर, नमगर, २-३-५ किलोक भौरा-(गजाल), साउल, चितफुटरा, पैघ २०-२५०४० किलो तक, गोल-गोल उज्जर, हरियर आ कारी कलबौस- रंग हल्का कारी अंदाजी माँछ चित्तल- चकरगर बेसी, २०-२५ किलोक, २-३ फीट चकरगर सिलोन- पालतू,३-४ किलोक,पोखरिमे पोसल जाइत अछि। रोहु-पीयर, हल्का उज्जर, पीठपर काँट मिरका- हल्का लाल सफेद सिल्वरकप- पालतू चैना माँगुर- चलानी (पालतू), दुनू दिस काँट चैना कबइ- पालतू (चलानी), पीठपर जहाँ-तहाँ काँट कबई- कनफर आ पीठ दुनू ठाम काँट चेंगा माँछ- सुखायलोमे दूर धरि चलि जाइत अछि, कबई जकाँ सौंस- पानिमे माँछ खाइत अछि, आदमीकेँ नोकसान नहि, आदमी संगे खेलाइत अछि, सीटीक अवाज (डोलफिन) घड़ियाल- कुर्सेला लग गंगामे, मुँह लम्बा, एक-डेढ़ हाथ,दाँत- आँगुरक जेकाँ, रंग लाल, पुछरी नमगर, ३ हाथ बोँछ- आदमीक रंग रूप, कारी, माथपर चूल- केश पकड़िकेँ डुमा दैत छैक कृषि- जोड़ा बैल/ हर ईश- हरमे जोड़ि कऽ पालोमे बान्हल जाइत छैक। लगना पालो- कन्हापर पालोमे दू टा कनैल दुनू बगल बरदकेँ एने- उने (एम्हर-ओम्हर) नञि होमए दैत छैक। कनैलसँ हटि कऽ एक सवा फीटक डोरी बान्हल जाइत छैक। समैल (पौन फीटक लकड़ीक/ बाँसक) मे डोरी बान्हल जाइत छैक। ईशक नीचाँमे पेटार ईशकेँ खुजए नहि दैत छैक, ऊँच-नीच करए दैत छैक। हलमे पुट्ठी, नीचाँमे दू-फीटक अगल फल्ली पुट्ठीमे सेट कएल जाइत छैक, माटि उखाड़ैत छैक। परहत (लगना)- हरवाह एहिपर हाथ धरैत अछि। तीन फीटक/ ६ इन्चक मुट्ठी पकड़ैबला लगनामे ठोकल जाइत छैक (मुठिया)। नाधा- पालो-ईशमे बान्हिकेँ जोड़ल जाइत छैक, डोरी होइत छैक ४-५ फीटक। दू टा मैडोर (डोरी)- १०-११ फीटक दू टा- एकरा चौकीमे बान्हि कऽ बरदमे बान्हि कऽ हरवाहा चौकी दैत अछि। चौकी- (बाँस/ लकड़ीक) ६-७ फीटक एहिपर हरवाह छढ़ि कऽ चौकी दैत अछि। हरवाहाक हाथमे एक टा झूर/ ज्वोली/ लाठी बरद हाँकए लेल रहैत अछि। गेहूँक जोताई ३ इन्च गहरा कऽ ४-५ टा चास दऽ होइत अछि। मक्कइ लेल ४-५ इन्च गहराइ करए पड़ैत अछि। बीया- एक एकड़ (१०० डिस्मिल) मे २ मन गहूमक बीया, १० किलो मक्कइक बीया। खाद- एकड़मे २० कि. डी.ए.पी., ५ किलो पोटाश, ५ किलो यूरिया, ५ किलो जिंक गहूम बाउग करबा काल देल जाइत अछि। मकइमे डेढ़ सँ दू फीटक भेलाक बाद माटि चढ़ाओल जाइत अछि। २ कतार २ फीट चौड़ाइसँ। एकड़मे २ क्विंटल खाद देल जाइत अछि। १०० किलो डी.ए.पी., ५० किलो यूरिया, २० किलो साल्फिक, १२० किलो पोटाश, १० किलो जिंक। पानि पटवन समयमे खाद दऽ कऽ माटि चढ़बैत छियैक, फेर पानि पटबैत छियैक। पानि पटेलाक बाद यूरिया एक एकड़मे एक क्विंटल देल जाइत अछि। तर-तरकारीक प्रकार सिंघिया करैला- बड़ा- हाइ ब्रेक/ प्लेन छोटकी करैला- हजरिया/ जुल्मी सफेद करैला- पटनिआ (नजली- मध्यम खुटक) तारबूज- नामधारी-स्वादिष्ट- भीतरमे लाल, ऊपरमे सफेदी/ चितफुटरा (हरियर-उज्जर) माइको- हल्का कारी पहुजा- माइकोसँ बेशी कारी राजधानी- कारी रंगमे महाराजा- पैघ छोट कारी रंगमे सैनी आ सुगरदीबी- कारी रंगक नाथ- हल्का चितफुटरा (उज्जर/ हरियर) गंगासागर- कुम्हर जेकाँ उज्जर साफ सोरैय्या-  चितफुटरा खीरा जुल्मी- छोट हाइब्रीड माइको- नमगर/ हरियर/ पीअर महाराजा- खीरा खेतीबारी- हरियर रंगक , नमगर कम, पाछाँमे मोट बेशी आगाँ कम। बसैटी (अररिया) बिहार, शिव मन्दिरक मिथिलाक्षर शिलालेखक देवनागरी रूपान्तरण। वंशे सभा समाने सुरगन बिदिते भू सूरस्यावतिर्ना। राजाभूतकृष्णदेवोनृपति समरसिंहा मिधस्यात्मजातः॥ यस्मिन् राज्याभिषेकं फलयितु मिवतद्भक्तितुष्टोमहेशः। कैलाशाद् भूगतेद्योप्यधिन सतितरा वैद्यनाथेन नाम्नाः॥ तस्य तनुजः सुकृतिनृपवरौ विश्वनाथ राजा भूत। विरनारायण राजस्तस्याप्यासीद् सुतस्य॥ नरनारायण राजो नरपति कुल मौलि भूषणम् पुनः। अर्थिनकल्पद्रूमदूव सुरगन वंसावतंसोत्भूत॥२॥ तस्मादि वैरिकुल सूदन रामचन्द्र नारायणो नरपतिस्तनयो वभूक। संमोदिता दश दिशो निज कीर्ति चन्द्र ज्योतिस्नेहाभिरार्थ निवहः सुरिवतश्चयेण॥३।। यद्दानवारि परिवर्द्धित वारि राशि सक्तान्त कीर्ति विमलेन्दु मरिचिकाभिः। प्रोद्योतिता दशदिशः सतनुज इन्द्रनारायणोस्य कुलभूषण राजराजः॥४॥ तेनच सत्कुल जाता तनया मनबोध शझणिः कृतिनः। परिणीता बन्धु यत्नैस्त्रिलोचननाद्रि पुत्रीव॥५॥ यस्या प्रतापतरणावुदितेऽपिचिते चिन्तारजविन्द वनमालभते विकासम सौहृदय हृदय मकरन्द च उद्येन तत्रैव यद् गुणगणा मधुपन्ति योगात्॥६॥ यज्ञेवर्देव गणो द्विजाति निवहः सस्तायनत्यादरैः। दर्दानैपूर्णः मनोरथोऽर्थपरन सन्तितिनिः सज्जना॥७॥ गर्ज्जद वैरि मदान्धवारण चपश्चञ्चःपेतापांकुरौ। र्वस्याः सर्वदृशेकृतागुण चमेर्मस्याश्च भूमीतने॥८॥ श्री श्री इन्दुमति सतीमतिमती देवी महाराज्ञिका जाता मैथिल माण्डराऽमिछकुलात् मोधोसरी जानयाः। दानै कल्पलता मधः कृतवती श्री विष्णु सेवा परा पातिव्रत्य परायणाच सततं गंगेर सम्पारणी॥९॥ शाकेन्दु नवचन्द्र शैलधरणी संलक्षित फाल्गुने मासि श्रेष्ठतरे सिताहनि शितेपक्षे द्वितीयायां तिथौ। भूदेवैर्वर वैदिकेर्म्मठमयं निर्भारय सच्चिनिमिः तत्रे सेन्दुमति सुरस्य विधित्र प्राण प्रतिष्ठाव्यधात्॥१०॥ सोदरपुर सम्भव राजानुकम्पापजिवनिकृतिनः। श्री शुभनायस्य कृतिर्मिदं विज्ञेक्षं सन्रन्तताम्॥११॥ मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली आऽ 2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य / अग्राह्य 1. होयबला/होबयबला/होमयबला/ हेब’बला, हेम’बलाहोयबाक/होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो 8. English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti  received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India).  Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti We stayed in the village for 18 months and when my father got transferred to Patna then I came to Patna via Pahlejaghat and Mahendrughat. There was a rule of entrance test for admission in the school. Dad made my brother to give test for admission in class seven and he made me to give test for admission in class six and seven. Now I came to know why my father had inspired me to learn maths of class six when I was in class five. Well, my brother passed the test for class seven and I passed the test for both class six and class seven in District school. There was rule of wearing uniform for students even in the Government school in urban area. We, both brothers went to shop with my father and our school uniforms were prepared –one shirt and one pair of half pants for each of us. On the very first day of school a fight was just to happen as one boy tried to tease us. First he called us ‘dehati’ (people from rural area, not stylist) but that didn’t made us angry because at that age we were considering that word good but now I realise that he had said that with wrong sense. Anyway when he found us unaffected then he started calling us ‘Bengali guys’. That was intolerable. We both were looking like very gentle and quiet so he dared to call us so. I couldn’t bare this insult and ran to fight with him but my brother stopped the fight. Now that boy started crying and ran to call some senior student. When he came back he was not crying and he told me that I was lucky as the boy he went to call had not come to school that day. I remained scared for two three days thinking about what would happen if that boy would come with his hero senior. After a few days the boy quarrelled with someone else and his hero friend was present that day. He came to our class and hit my classmate on his stomach. Nobody saved that boy at that time but after those boys left we had decided that nobody will talk to that querulous boy and we would make a complaint against that boy to our class teacher so that he could forward that complaint to the class teacher of that boy. That quarrelsome boy became worried and again showed his crooked attitude. He went to his senior friend and said that everyone was conspiring against him. Then the senior boy came and told every one to stand up but nobody stood up. Then he told me to stand up. I followed his instruction and stood up. He repeated that with three or four more boys and all of them stood up one by one. Then he instructed the entire class to stand up. All followed him. Then that senior boy started threatening us. But our class monitor acted courageously that time. He told him about the naughty behaviour of his friend. He gave my reference and asked him whether I looked like a quarrelsome boy but his friend had teased me too. Then that senior boy was convinced and he warned his little friend not to repeat such mischievous acts. The school days were passing by so on. Once, a boy whistled to tease the teacher. That boy had escaped to Bombay to be a child actor but returned from there. Some one once asked him why did he returned from Bombay then he replied that people working there were B.A., M.A. so he decided to complete at least matriculation. Now the teacher had left teaching and started investigating about who the culprit was. According to the majority of opinions one side was separated then one bench was pointed now it was to be found out that who was that boy among those six boys sitting on that bench. Then a question was raised that where the sound was came from- right side or left side. At last the teacher’s investigation ended on two boys. Out of those two boys one was that Bombay returned hero whose story of trial to be an artist was favourite time pass in our leisure classes. It couldn’t be confirmed who that culprit was among those two. The diary was blank after that. Nand had returned that diary to his son and there was nothing to be ashamed of in that diary but Aaruni’s siblings used to tease him for that incident. Therefore Aaruni torn his diary one day out of anger and this autobiography couldn’t be turned as a novel. The mission of Nand to fix disorganisation was at its leisure. Kids had stayed in the village for 18 months. His salary was stopped for that period. His elder brother helped him to quit the job of field work and find the job of drawing project in an office by influence of a politician. He also instructed Nand to visit office, take care of his children and establish harmony with people around him. Nand was very obedient to his brother when he came to Patna. He sought one house nearby the Women’s college in which his daughter got admission. For admission of two sons he submitted the required forms for entrance examination with correct information. He invited everyone to Patna. He instructed his nephew to come with all. He also told him to catch the steamer of the Bihar Government at Pahlejaghat. He didn’t like the private steamer of Bachcha Babu because it used to be over crowded and not very scheduled. On the other hand the Government’s steamers were very punctual and they were not accepting excess passengers. That was the reason why there was a crisis of tickets. One more advantage in Government’s steamers over private steamer was that in the Government’s stearmers life of each passenger was to be insured by a Bima company. His wife and children reached with his nephew. Nand was living isolated life in the Ganga Bridge Colony. He had also prevented his family to associate with neighbours. But every thing was reversed in Patna. There were three neighbours - one retired soldier, one policeman of Bihar Government and one worker of Bihar Legislative Council. Nand had visited three of them with his both sons and introduced himself and his sons. Nand’s children had started going to school. Nand was travelling 5 kilometres on his feet to go to the office and while returning to home he used to do domestic works too like buying green vegetables and other groceries items from the weekly fair on each Thursdays. The fair was held on Sundays too and he used to buy all household things by himself. The only job children had to do was to study. Milkman used to drop packed milk at door. Getting fresh milk was disturbing children’s study as they were supposed to bring it from the house of the milkman. His elder son, who used to destroy neighbours’ garden by snipping flowers or throwing grabbles to other’s windows in the Ganga Bridge colony, was turned much disciplined after staying in the village for 18 months. Nand remembered that he had to go to a neighbour’s house with his elder son and his elder son asked for his apologise to the lady at whom he had thrown grabbles when she was looking out through her window. When Nand returned from office then he came to know about that incident and he immediately made his elder son to say sorry. The younger son had hit a stone to an elder boy while he was riding the bike. Actually that boy had promised to stop after completing one circle but he didn’t stop and continued by saying that he was stopping after completing. He couldn’t convince the younger one to say sorry as in his opinion he had not done anything wrong. Well those incidents happened in the Ganga Bridge Colony. When Nand visited to his neighbours this time his elder son was totally changed but his younger son was like stubborn. Both sons of Nand were securing first positions in their classes. Life was going quite smoothly at that time. All worries of past days were seemed to be gone. A couple of people from the village were also living in Patna. They used to go for outing on one Sunday each month - either to their villagers or to a zoo. Once they were visiting zoo then Aaruni asked Nand “We have come to the zoo, it is written ‘Botanical Garden’ on the board outside and at the gate it is printed as ‘Biological Garden’. “In early days, immigrated birds were exhibited in the Sonepur Mela so people starting calling it as a Zoo. The acres of this land have treasured many trees and each tree has its name and botanical description written on it so this garden is also a botanical garden. Later on, it was realised that there are mainly two parts of biology – one is botany and other is zoology. And in this garden apart from trees, birds and animals like lions, tigers etc. are also kept. So people found ‘Biological Garden’ as the most suited name for this place. Old name boards were not removed”, Nand replied. Once they were in villagers’ house then the topic of discussion was inauguration of the new Bridge on the Ganges. The inauguration had been postponed for last two three years. They asked Nand, “In your opinion when will this be inaugurated? The Chief Minister had said that the bridge would be inaugurated this year only”. “It will never be inaugurated. I have been hearing this for two three years. When one pillar is completed, because of excess of sand, it stars cracking after some period. Again the pillar is broken and new construction begins” When that discussion started Nand started thinking of those labourers who fell down from the breaking pillar. Nand was crossed with his colleagues and the contractor of the project. Nand had expressed his disagreement during constructing one pillar and after some time that pillar was cracked. The pillar was tried to be broken during night time and when it was not done then a big tent was hung to cover the crack mark so that no one could see that. That incident was remained as a big issue for a long time. The workers working in that project started respecting Nand a lot after that incident but at the same time Nand had become a villain for contractors and his colleague engineers. Everything was good in those days. Nand’s sons used to finish learning all maths and science of the new class from January to March. But since Nand was doing all works by himself his children were totally unaware of the world outside. They only knew the path between home and the school. Where ever they were going out they were going with their father so their personalities were developed in different way. Nand was leading a normal life but any discussion about the Ganges Bridge project was enough reason to disturb him. Therefore he started avoiding his friends by and by and at last he neither was visiting any one’s house nor does he has any friend. There was a Japan made transistor of medium wave available in the market in those days. That was the only source of entertainment in Nand’s house. His children used to call it radio then Nand used to clarify that radio was very bigger machine in respect of transistor. When nand had started earning he bought a transistor of the Bush company and took that to the village. The villagers had crowded to hear that. That Japanese radio was consuming battery too fast. The batteries used to be finished till 10th day of a month and those were bought once in a month with the grocery. So that source of entertainment was not working for rest of twenty days of a month. During those days Nand’s sons used to play vivid games. Both boys used to make two goal posts at two ends of the bed. The goal posts were made by joining two plastic toys. Those toys were gifted to them by someone in the Ganga Bridge Colony. They were using combs to kick the balls and the plastic made letters used to be balls. The challenge was to make goal by hitting the ball from opposite goal post in one stroke. The rules of the game were also different. In that way Nand’s sons were creating many new games. The days were passing by in that way. The outing was minimal. Two incidents happened after that. The first was inauguration of the Ganges Bridge and the other was that Nand’s both sons couldn’t secure first positions in their classes for the first time. After that Nand was somehow upset. However, those two incidents were not inter-related. Since Nand was not justified by the system of the Government and his sons were not got the first positions, Nand was disappointed. Nand’s blind faith in the almighty and omnipresent God was again strengthened. Every incident has its reason and when the reason is not visible then people’s attraction for the invisible God becomes stronger. And Nand used to be very theist from his childhood. “Is Nand at home?” an elderly man having black teeth because of chewing paan too much, dark complexion and thin body asked after knocking the grill of Nand’s house. “No, he has not yet returned from the office. He must be coming very soon. Come in please”, Nand’s son told. “I am coming after some time”, that man replied. After some time Nand returned in his usual manner of without noticing his surrounding just hopping towards the home. That man came following him. As soon as Nand saw him he greeted- “Oh! Shobha Babu! You’re seen after a long time.” “You recognised me”, said that man. In return Nand sat down and started crying, “You crazy man, you are still a mad.” Shobha Babu was pleased at heart to get such respect. Shobha Babu was from the Kachabi village. He was younger brother of husband of Nand’s eldest sister. Nand’s sister was dead. Daugher of his sister was living with them but she also died after suffering from the deadly pain in stomach. His brother-in-law was used to ride horse to collect taxes. But after death of the daughter of Nand’s sister his relation with his brother-in-law was also weakened without any intention. And suddenly Shobha Babu met him in Patna after 25 years. “How is my brother-in-law? We told him a lot for re-marriage but he was not convinced.” “Those old royal days are gone now. With the end of jamindari the status of the family had also diminished. But the habit of leading luxurious life was still existed. How long can one survive by selling lands and properties? People started moving towards towns to earn. We told him that you are the eldest one. You are habituated to live in luxury so you cannot labour. We won’t feet it dignified.” Shobha Babu stopped speaking by making an excuse of chewing paan. But the fact was that his eyes and throat were unable to hide his grief. After taking a break he restarted, “After telling this to my brother I left home with some chura and jiggery without asking for his permission. I went to Simariya Ghat and had a bath in the holy river Ganges then crossed the river by a boat and finally reached Patna. I worked in a tea stall for some days. People from our region were not in such a large number in those days and I was also young. I continued my work there for many years. Meanwhile many rumours about me were spread in my village like I was dead or I became a priest etc. Then I started my own tea stall after what I sent a postcard to my family. I have been running my own tea stall near B.N. Collegiate School for last five years. I have also started a paan stall near that”, narrated Shobha Babu. “Shobha babu! All your teeth are broken.” “I got addiction of tea while working in tea stall. But that was not a problem. When I started a paan shop then I started chewing cold paan after having a cup of hot tea. This sequence of hot and cold damaged my teeth.” Both of them started laughing at that. Again they started chatting. Sister-in-law of Shobha babu died otherwise the relationship between Mehath and Kachabi villages would be warm now. All misfortunes came together. Nand recalled that his niece (daughter of his sister) was playing so nicely. Suddenly his mother told that someone of some family had touched his niece’s stomach and she started feeling strange pain in her stomach just after that. Even if many remedies were tried but that strange pain lead to her mysterious death. “If your niece was live then relation would be alive too”, said Shobha Babu. But Nand was lost in some other world. He was thinking about the life of his choice. That family life he was leading at that time, buying groceries, worrying about children’s results, all those things were just a way to obey his elder brother. The new bridge on the Ganges was inaugurated and his sons had not got first ranks in their classes. His daughter had opted for Science i.e. Biology in Graduation. There was no connection between the inauguration of bridge and degradation of his sons in study but in Nand’s opinion children’s progress or retardation is reflection of their parents’ good or bad deeds respectively. He considered his failure in stopping the corruption in the construction of the bridge and earning to take care of his family to follow his elder brother’s instruction in stead of fighting against the corruption as reasons behind his sons’ degradation. Meanwhile, children’s uncle and Nand’s elder brother arrived Patna. Nand asked him whether he came through the new bridge or crossed the river by a steamer. “I came by streamer because I was unaware of the fact that the bridge was opened for public use. I will go through that while returning home as I came to know that many deluxe coaches are available to cross the bridge”, replied Nand’s brother. “No, don’t go through that bridge. There are many corruptions done to make that bridge. Any time it may collapse.” The elder brother couldn’t understand what happened to Nand. “Are you ok? How is your health? Is your problem of asthma in control?” asked the elder brother as both brothers were suffering from asthma. “No, that is fine. I tried my level best to forget the past, whatever happened during construction of that bridge, according to your order. I have seen many workers falling from the collapsing pillars. Hundreds of workers died. The engineers earned a lot by corruption. Now when the bridge was inaugurated then list of only 17 workers’ names are sculptured on the stone and kept near bridge and the engineers were rewarded. This bridge can fall down anytime. When I tried struggling against the corruption then they retained my salary. Every time I got transferred my salary is retained and I have to leave my family. Following your instruction I accepted this transfer. I tried to forget everything, the falling bodies of workers into water, crying families of those workers. I was having nightmares of such incidents. And now degradation in the results of my three children; they used to get the first positions but now condition is changed. This is result of my own deed. I shouldn’t have left my struggle without completion”, said Nand. “Are you mad? People who had done corruption they will have to pay one day. You did your duty at your utmost. Who doesn’t take care of his family? Neglecting own children because of other’s fault is not wise. What is fault of your children?” said Nand’s brother. Again both started talking about the village. Nand used to be lost in some other thoughts while conversation. The elder brother understood that the storm in Nand’s brain was not going to stop. He kept on consoling Nand. But he had known Nand from his childhood. He knew that Nand is very stubborn. So he was scared. He was not talking to Nand’s wife directly but he told her that everything was dependent on her. Nand went to drop his elder brother to the steamer at Mahendrughat because he couldn’t trust his brother. He suspected that his brother could go through the bridge without telling him and the bridge might collapse anytime. After that Nand started learing astrology. He and his children started wearing variety of stones in rings. One day, he bouth Hanumaan chalisa for every one at home. He kept five to ten books extra in stock and started giving to visitors. During that time Nand met a fake tantrik. He caught Nand’s psychology so nicely that Nand accepted him as a prophet. That priest had all solutions to Nand’s problems- like how to punish the corrupted people, how to improve children’s result and many more. The basis of solution was mantra and tantra on which Nand never had disbelief. That priest started asking for money for doing all needful rituals. That priest told Nand that the goddess told him in his dreams that everything would be fine in next month. He taught him some yoga postures and Nand started following his instructions like a student followed his teacher’s instructions. Nand tried that for the entire month but nothing happened. In that way a year passed. Meanwhile that priest had some financial problem and Nand had to bear his personal expenses too. That priest’s children also started tantra. Once a child said, ‘the Goddess is under the bed’ and Nand started looking underneath the bed to find the Goddess. Again the priest gave proposal of marriages of his son and his daughter with Nand’s nephew and Nand’s son. Nand was fed up of his diverted behaviour till then. Nand was happy to be associated with him but he never liked his children to be associated in that circumstances. At the same time when Nand’s villagers came to know about that then Nand’s nephew and Nand’s elder brother quarrelled with the priest and the priest had accepted the fact that he was not a real tantric. He promised to return the money he took from Nand but he never returned that. That incident was a bid shock for Nand. He was passing by the priest’s house but he was not talking to him and the priest was also not taking any initiative. Nand’s daughter got married and again Nand started leading a lonely aimless life. (continued) महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२) 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आऽ ३.मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण-पञ्जी-प्रबन्ध डाटाबेश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत।१.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आऽ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे - कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ १.मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश, २.अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोश आऽ ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण) (तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन (c)२००८. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ०१ जनवरी २००९ (वर्ष २ मास १३ अंक २५) http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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