VIDEHA — Issue 27 / अंक २७

Publication: VIDEHA · Issue: 27
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147 विदेह २७ म अंक ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७) एहि अंकमे विशेष:- रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॉ. गंगेश गुंजन मृत्युपूर्व हुनकासँ साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे। एहि अंकमे अछि:- १.संपादकीय संदेश २.गद्य २.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा) २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ) २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ) २.४. मैथिली भाषाक साहित्‍य- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3 २.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.७.  डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या २.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार २.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार ३.पद्य ३.१.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (नवम खेप) ३.२. गजेन्द्र ठाकुर- 15 टा पद्य ३.३. सतीश चन्द्र झा- दू टा कविता ३.४.ज्योति- पनभरनी ३.५. पंकज पराशर - सत्तनजीब ३.६. मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण ४. मिथिला कला-संगीत- हृदयनारायण झा ५-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी ६-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] ७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( तिरहुता आ देवनागरी दुनू लिपिमे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Tirhuta and Devanagari versions both ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक तिरहुता आ देवनागरी दुनू रूपमे Videha e journal's all old issues in Tirhuta and Devanagari versions १.संपादकीय मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली  द्वारा गणतंत्र दिवसक अवसरपर कविता महोत्सवक आयोजन कएल गेल। मैथिलीमे रमण कुमार सिंह, सारंग कुमार, रवीन्द्र लाल दास, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कामिनी कामायनी आ गंगेश गुंजन जीक काव्य-पाठ भेल। मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा मैथिलीमे विद्यापति सम्मान आ भोजपुरीमे भिखारी ठाकुर सम्मान एक-एकटा, जे प्रत्येक 51-51 हजार टाकाक सम्मान राशिक होएत, साहित्यकार/ कलाकार/ संस्कृतिकर्मीकेँ देल जाएत। अकादमी द्वारा मैथिली आ भोजपुरीमे अलग-अलग पत्रिकाक सेहो प्रकाशन होएत जाहिमे कथा, कविता, लेख, निबन्ध, समीक्षा आ सर्जनात्मक टिप्पणी प्रकाशित कएल जाएत। मैलोरंग सेमीनारमे सुभाषचन्द्र यादवजी फील्डवर्कक आधारपर लोककथा लिखबाक आग्रह कएने छलाह कारण अपन दादी-मैयाँसँ सुनल कथा क्षेत्रमे पसरल कथाक विभिन्न स्वरूपकेँ ग्रहण करबामे सक्षम नहि होइत अछि। विदेह द्वारा एहि सम्बन्धमे काज शुरू भ' गेल अछि आ शीघ्र एकर परिणाम ई-पत्रिकामे देखबामे आएत। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनवरी २००८) ७३ देशक ७११ ठामसँ १,४६,१६१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in २.संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आऽ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। २.गद्य २.१. १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप (कथा) २.२.बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल (आगाँ) २.३.उपन्यास- चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी (आगाँ) २.४. मैथिली भाषाक साहित्‍य- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.५.भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (आगाँ)अंक 1 दृश्य : 3 २.६. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन (आगाँ) २.७.  डॉ.शंभु कुमार सिंह-प्रतियोगी परीक्षा -आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या २.८. रामाश्रय झा "रामरंग" सँ डॉ. गंगेश गुंजन द्वारा लेल गेल साक्षात्कार २.९. विवेचना: आशीष अनचिन्हार १. कबाछु-सुभाषचन्द्र यादव २. विवसता - कुमार मनोज कश्यप चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। कबाछु ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय । 'शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक । बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक । आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक । चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर  एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक । एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै । ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै । ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल । पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत । लेकिन नहि । ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै--- 'शी-इ-इ ! आब अनठेनाइ असंभव छलै । ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै । चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक । बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्‍यक्ति सभ बैसल रहैक । एहन अवस्‍था में चम्‍पीवलाक धृष्‍टता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक । 'की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै । चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै । देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक । 'बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै । ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—'एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?' चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल । ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार । चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्‍ली बुझेलै । 'देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक । 'हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक ।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै । चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक । ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय । लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक । ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो । ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक । लघुकथा- कुमार मनोज कश्यप ।जन्म-१९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाम मे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखन मे अभिरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। विवसता अपन जन्मभूमि के प््राति मोह ककरा नहिं होईत छैक? जाहि धरा पर पहिल बेर पायर राखल, जकर धूरा-माटि मे खेल-खेल कऽ समर्थ भेलंहु, तकरा प््राति लगाव तऽ स्वभाविके आछ। अपन राज्यक सीमा मे प््रावेश कईयो कऽ गाम नहिं जाई से ने हमर मोन मानत आ ने गाम-परिवारक लोक। अहु बेर सरकारी यात्रा सँ मुस्किल सँ पलखति पाबि रातियो भरि लेल गाम जेबाक विचार कय बिदा भऽ गेलंहु बस धरबाक लेल। भोरे आपसे एबाक छल, तैं कोनो समान लऽ जेबाक दरकारे नहिं। सभ गामक चौक पर अहाँ के ओहन रिक्सावला भेट जायत जे चौक सँ बस लग-पासक गामक सवारी उठबैत आछ - आर कतहुँ नहिं जायत ओ - कतबो बेगरता होऊक लोक कें। चौक पर बस रुकिते ओ सभ रिक्सा लऽ कऽ तेना दौड़ैत आछ सवारी लेवाक हेतु जेना कोनो तिर्थ-स्थानक पण्डा। जकरा सवरी भेटि गेलैक से विजयी आ आन सभ हारल - मुदा पेᆬर सँ आगला प््रातियोगिता लेल डाँड़ बन्हने। कैकटा रिक्सावला हमरो पाछु दौड़ल, मुदा आई हमरा पायरे जेबाक मोन भऽ रहल छल, तैं मना कऽ देलियई। समान कोनो छलैहे नहिं आ साँझक सोहाओन मौसम, कियैक नहिं आनंद लेल जाय एकर। सभ सँ पैघ बात जे गामक एहि चिर-परिचित धुरियायल रस्ता पर चलि कऽ एक बेर पेᆬर हम अपन बितल दिन मोन पाड़ऽ चाहि रहल छलंहु। आततक स्मरण बड़ मनभावन भेल करैत छैक। सड़क पार कय हम चलऽ लगलंहु गामक ओहि रस्ता पर जे कहियो बड़ आत्मीय छल हमर। किछु आभास भेला पर पाछाँ तकलंहु - एकटा रिक्सवला निरीह भावें रिक्सा लऽ कऽ चल अबैत हमरा पाछाँ। लऽग आबि बाजल -'' हाकीम! तऽ नहिंये करबै रिक्सा? जे मोन हुअय से दऽ देब खुशी सँ, मुदा बैस जाऊ हमर रिक्सा पर।'' हम कहलियै - ''बेकार मे हमरा पाछाँ नहिं पड़, आई हमरा पायरे जेबाक ईच्छा भऽ रहल आछ । घुरि जो तों।'' रिक्सावला के आँखि मरल माँछ जेना थिर भऽ गेलै हमरा उपर। कल्पैत स्वर मे बाजल- ''ऐं यौ हाकिम! अंहु सन हाकिम-हुक्काम जँ पयरे चलऽ लगतै, तऽ हमरा सभ गरीब-गुरबा अपन   परिवारक पेट कोना पोसतै?'' हमर पैर एकाएक थमकि गेल। बिना किछु बजने हम बैसि गेलंहु ओकर रिक्सा पर। वृषेश चन्द्र लाल-जन्म 29 मार्च 1955 ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देव।  हिनकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि। मूलतः राजनीतिककर्मी । नेपालमे लोकतन्त्रलेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार । लगभग ८ वर्ष जेल ।सम्प्रति तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्टीय उपाध्यक्ष । मैथिलीमे किछु कथा विभिन्न पत्रपत्रिकामे प्रकाशित । आन्दोलन कविता संग्रह आ बी.पीं कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित । ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि। नेपाली राजनीतिपर बरोबरि लिखैत रहैत छथि। बी. पीं कोइराला कृत मोदिआइन मैथिली रुपान्तरण बृषेश चन्द्र लाल “ की होइतैक ? ओतयसँ तान्त्रिक धड़फड़ाइत सोझेँ राजदरबार गेलाह, राजाकेँ सम्‍पूर्ण वृतान्त सुनोलन्हि । आ’ फेर तखन तान्त्रिकेक सलाहपर एहि खधियाक उत्खननक निर्णय भेल रहैक । ओहिमे महाभारत कालक योद्धासभक शरीरक कोनो हाड़ भेटतैक की से सोचि उ पाँच हजार जन छौ महीनातक एकरा खनिते रहि गेलैक । बहुतो हाड़खोर भेटलैक । सभकेँ गङ्गाजीमे अनुष्ठानपूर्वक प्रवाहित कयल गेल — जेना फुलाक बिर्सजन होइत छैक । तहियासँ ई खधिया उत्खननक कारणेँ एहन बड़का पोखरिक रुपमे परिणत भऽ गेल । किएक तऽ एहिमे बहुतो हाड़खोर भेटल रहैक तैं एकर नाम बादमे हड़ाहा पोखरि भऽ गलैक । ” अत्यन्त उत्‍कण्ठासँ हमर स्वर सुखा गेल छल — “ तखन ? ” मोदिआइन बाजलि — “ इहए छैक अहि पोखरिक कथा । आब अहाँ खा पी कऽ सुतू । थाकल छी । ” थाकल तऽ हम ठीके रही । भरि दिनक शहर प्रदक्षिणाक कारणेँ शरीर गलिकय क्लान्त भऽ गेल छल । थकानक कारणेँ बीच–बीचमे आँखि सेहो निन्नसँ मुना जाइत छल, मुदा मलाहिनक कथे एहन छलैक जे बेर–बेर उताहुल आ’ उत्तेजित कऽ दैत छल । ततबेमे सन्‍ध्‍या समाप्‍त कऽ मिसरजी दोकानमे प्रवेश कयलन्हि आ’ मोदिआइनकेँ कहलखिन्ह — “ मोदिआइन, बौआकेँ बढ़ियाँसँ खुआ–पिआकय सुता देबन्हि । हम ओम्‍हरे खा लेब । राति अबेर कऽ फिरब । दू स्‍टेशन आगाँधरि जएबाक अछि । गाड़ी सेहो आबक समय भऽ गेल छैक । तैं हम आब जाइत छी । ” हम दौड़िकय हुनका लग पहुँच गेलहुँ आ’ जीद्द करय लगलहुँ — “ हमहुँ जायब । ” मिसरजी एहिबेर कहुना तैयार नहि भेलाह । मोदिआइन सेहो समझओलकि — “ कहाँ जायब थाकल–ठेहिआयल शरीर लऽ कऽ रातिमे । चारि–पाँच घण्‍टामे मिसरजी चलिये अओताह । चलू, खा कऽ सुतू । भाँटाक तरुआ बना दैत छी, दूध आ’ भात खा लियऽ । ” मिसरजी स्‍टेशनदिसि बिदा भऽ गेलाह । मोदिआइन चुल्हिमे बैसिकय भाँटा तड़य लागलि । भितरका कोठरीमे मोदी बैसल खोंखि रहल छल । हम कनेक काल एकसरे चौकीपर बैसल अन्‍हारमे डूबल दड़िभङ्गा शहरकेँ देखैत रहलहुँ । बीच–बीचमे सोझे मलाहिन ठाढ़ भऽ जाइत छलि । हम सोचय लगलहुँ अखन रातुक एहि निस्तब्ध अन्‍हारमे जे पोखरि हेरायल विलीन अछि तकरे एक कातमे ओ बैसति छलि हएत अही दोकानक घराड़ी लग कतहु उ हम चौकीपर बहुत कालधरि नहि बैसि सकलहुँ । ससरिकय चुल्हिदिसि मोदिआइनलग पहुँचि गेलहुँ । मोदिआइन बाजलि — “ बौआ, भूख लागि गेल ? बैसू उ आब लगचिया गेलैक, कनेक्के देरी अछि । तुरत्ते सभ किछु तैयार भऽ जायत । ” हम कहलिऐक — “ मोदिआइन, महाभारत कालक लोक कहुँ एतेक दिन तक जिअत ? साँचे रहैक ओ मलाहिन ?” ओ बाजलि — “ किया नहि जीअत ? प्रेतात्‍माक रुपमे जुगजुगान्तरतक जिबैत अछि लोक । अपन प्रियजनसभक लगमे रहय चाहैत अछि । कोनो ने कोनो पिआस, कोनो ने कोनो पूरा होमयसँ बाँकी कामना भीतरी आकांक्षा ओकरासभकेँ अमर जकाँ मृत्‍युलोकमे दृश्य–अदृश्य राखि घुमा रहल रहैत छैक । ” हम धड़फड़ाकय पुछि बैसलिऐक — “ तऽ अखनो होयतैक ओ मौगी ?” मोदिआइन तरकारी नीचा उतारैत बाजलि — “ होयतैक उ लिय, अहाँ खाऊ” ओ उठिकय पीढ़ी अनलकि आ’ हमरा बैसयलेल देलकि । एकदम नया स्थान आ’ परिवेशमे अपरिचितसनक महिलाद्वारा देल गेल दूध, भात, गुड़ आ’ भाँटाक तरुआ खाइत हमरा किछु कोनादन आ’ असहज जकाँ लागल । असगरपन अनुभव भेल । घर मोन पड़ि गेल । माय–बाबु, भाय–बहिन सभ केओ याद आबि गेलथि । अखनतक तऽ सभ केओ खा कऽ सुति रहल होयताह । नहि जानि, मिसरजी कखन घुरताह ? आ’ कत्तहु नहि अयलाह तखन ? हमर मोन घबड़ाय लागल । हमरा सुतय लेल एकगोट कम्‍मलपर नील रङ्गक चद्दरि मोदिआइन ओछा देने छलि । एकटा मैल तकिया ओहिपर रखैति ओ चौकीये परसँ हमरादिसि तकलकि आ’ बाजलि — “ बौआ, खाउ ने उ किया ने खाइ छी ? जल्दी–जल्दी खाउ । भरिपेट खायब । याऽ देखू, ओछाओन ओछा देलहुँ अछि । अहाँक सुतयलेल ।” हम जल्दीये खा कऽ उठि गेलहुँ आ’ हाथ धो कऽ ओछाओनपर पड़ि रहलहुँ । मोदिआइन भाडा़–वर्त्तन माँजि आङ्गनमे गोलियाकय राखि देलकि । तकराबाद ओ एकगोट डिबिया लेसिकय चुल्हि लग राखि देलकि आ’ लालटेनकेँ मिझा देलकि । आब ओहिठाम चुल्हि लगक एकगोट धुआँ उगलैत लाल धधड़ाबला डिबियाक क्षीण प्रकाश मात्रहिं रहैक । बाहर निर्जन निस्तब्ध रात्रि आ’ असंख्‍य कीरासभक तीख महींन आवाज व्‍याप्‍त छलैक । मोेदिआइन एकबेर कोठरीमे चारुभर घुमिकय देखलकि । शायद सभ किछु ओकरा ठीकेठाक लगलैक । ओ बाजलि — “ हँ, तऽ आब सुतू । डर तऽ नहि लागत ने, बौआ ?” हम भीतरसँ साहस बटोरिकय कहुना मुड़ी हिलबैत कहलिऐक — “ नहि, हमरा डर नहि लागत “ जाइत–जाइत ओ फेर बाजलि — “ हम सटले भीतुरका कोठरीमे छी । जरुरी बुझायत तऽ मोदिआइन कहि कऽ सोर करब । ठीक छ़ै ?” ओकरा जाइते जेना राति आओर निस्तब्ध भऽ गेल होइक । डिबियाक लाल शिखा कखनो–कखनो हिलि जाइक तऽ कोठरीमे सभ किछु — सम्‍पूर्ण छाँहसभ सेहो हिलय लगैक । भीतपरक छाँहसभ, ढ़कियाक, मोटरीक, लाठीक, बोराक छाँहसभ कखनो–कखनो दहिन–बाम करैक, हिलोरि मारिकय झुलैक तऽ कखनो एक्के ठाम थर्‌थराय लगैक । डिबियाक बाती कखनो चट–चट कऽ कऽ चरचराइक तथा बातीक मुँहपर कारी गिरह बनि जाइक । खाली धुआँक मोटगर रासि चारुदिसि चढ़ैत उठैत रहैक । धीरे–धीरे हमरा मोनमे डरक सञ्‍चार होमय लागल । एना एकसर हम कहियो नहि सुतल रही । मलाहिनक खिस्सा ओहिना स्‍पष्‍ट देखाय लागल । हमर हृदय डरसँ काँपय लागल । देहक सभ रोइयाँ काँट जकाँ ठाढ़ भऽ गेल । तखने लागल जेना बाहरक निस्तब्धता भङ्ग भऽ गेलैक आ’ पानिमे केओ छपाकसँ कुदलैक । हमरा बड्ड डर भऽ गेल आ’ हम जोड़सँ चिचिअयलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ उ” मोदिआइन भीतरेसँ पुछलकि — “ की भेल, बौआऽऽऽ ़ “ हम कहलिऐक — “ हड़ाहा पोखरिमे केओ छपाकसँ कुदलैक अछि । ” ओ हमरा अन्‍ठाकय सुतक लेल कहैति बाजलि — “ सुतू, सुतू । पानिमे माछ कुदलैक अछि “ मोदी एकभरसँ खोंखि रहल छल । बुझाइत छलैक जेना ओ अखने मरिये जयतैक । मोदिआइन नहि जानि कथी बाजलि आ’ मोदीक छातीपर मालिस करय लागलि । मोदी घेघिआइत बजलैक — “ ओह उ बाप रे उ एहिसँ तऽ मरियो जइतहुँ ऽऽऽ । ” मोदिआइन कनेक पिताइत कहलकैकि — “ मोदी उ रातिमे ई की अमङ्गल बात बजैत छह । मालिससँ तोरा दम फुुलनाई कम भऽ जयतह । कहुना सुति रहह । ” कनेक कालक बाद भीतर कोठरीक हलचल शान्त भऽ गेलैक । अन्ततः ओसभ शायद सुति रहल छल । मोदीक साँस भारी आ’ घेघिआइत चलि रहल छलैक । रातुक भयावह निस्तब्धता, डिबियाक प्रकाशक छोट घेराक बाहर चारुतरफकेर अन्‍हार गुजगुज परिवेश, निशाचरी कीरासभक तीख आ’ महींन ध्‍वनिक गुञ्‍जन तथा एम्‍हर–ओम्‍हर हिलैत, डोलैत आ’ थर–थर करैत छाँहसभ । हम फेर भयभीत होमय लगलहुँ । मस्तिष्कमे बेरि–बेरि उत्पन्न होइत मलाहिनक प्रेतात्‍माक कल्‍पनाक चित्रसँ हमर दम फुलय लागल । दिनभरिक बौअइनीक कारणेँ शरीर ओहिना थाकल आ’ मलीन छल, आँखि भारी छल, झपलाइत छलहुँ मुदा डरसँ निन्न भऽ नहि रहल छल । आँखि लगिते कनेक सपना जकाँ देखाइत छल आ’ फेर डरसँ िन्‍ान्न टुटि जाइत छल । जागलोमे आ’ सपनोमे एकहि रङ्गक डराओन आकारसभ आगाँ ठाढ भऽ जाइत छल । हम फेर एकबेर जोड़सँ डेराकऽ चिचियाऽ उठलहुँ — “ मिसरजी ऽऽऽ “ मोदिआइन ‘ की भेल ? की भेल ? ’ कहैत दौड़लि आयलि । मोदी खोंखिते रहय । मोदिआइन बाजलि — “ बौआकेँ डर लागि गेलन्हि । बेचारा उ अच्‍छा कोनो बात नहि, हम अहीं लग बैसैति छी । ” मोदिआइनक हमरालग अबिते हमर डर आब पूरे हेरा गेल छल । निन्न धीरे–धीरे जाँतय लागल छल कि मोदिआइन पुछलकि — “ बौआ, खिस्सा सुनक मोन करैत अछि ? सुनब तऽ सुनाऊ” हम हुलसिकऽ कहलिऐक — “ सुनाउ ने, मोदिआइन “ मोदिआइन कथा सुनाबय लागलि । जेना कि ओकर आदत रहैक ओ एक्के सुरमे बजैति चलि जाइति छलि । हमरा बुझाय लागल जेना दूरसँ ककरो स्वर लगातार हमर कानमे पड़ि रहल होय । डर हेराऽ गेल छल तैं आब घरक भीतपरक हिलैत–डोलैत छाँहसभ खेल आ’ कौतुक जकाँ लागय लागल छल । दिनभरिक परिश्रम रग–रगमे निन्नक सञ्‍चार कऽ रहल छल । हडा़हामे बीच–बीचमे छप–छप सेहोे होइत रहलैक जे हमरा दूरसँ अबैत पृष्‍ठभूमिक आवाज जकाँ लगैत रहल । स्‍टेशनपरक भिनसुरका कोलाहल, हुलिमालिक दृश्य, लालदरबार, हथिसार, आ’ शहरक अन्यान्य दृश्यसभ हमर थाकल मस्तिष्कसँ रङ्ग जकाँ धोआइत मलीन्‍ा होबय लागल । बीच–बीचमे हम औंघाइयो जाइत छलहुँ । सपनामे चित्रसभ एकटापर दोसर–तेसर अबैत पड़ैत देखाय लगैत छल । आ’ अही बीचमे मोदिआइन निरन्तर अपन सुरमे हमरा खिस्सा सुना रहलि छलि । ओकर स्वरमे सम्‍मोहन छलैक । बिहारिक पश्चात् जेना बर्षाक बुन्नसभ खसैत रमणगर लगैत रहैत छैक ठीक तहिना हमर कानमे ओकर कोमल महीन आवाज टप्टप् कऽ पड़ि रहल छलैक । ओ कहैति गेलि — “ बहुत पहिनेक गप्‍प थिक । बहुतो पहिनेक ऽऽ भारतबर्षमे हस्तिनापुर नामक एकगोट बड़ीटा राज्यक राजधानी रहैक । ओतक राजा रहथि धृतराष्‍ट्र — बूढ आ’ आन्हर उ आन्हर रहथि तैं गद्दीपर नहि बैसि सकलाह । परिणामस्वरुप राजा बनक प्र्रश्‍नपर हुनक बेटा आ’ भातिजसभमे कलह मचि गेलन्हि । धृतराष्‍ट्रक रानी गान्‍धारी अत्यन्त पतिव्रता रहथिन्ह । जहिना हुनक पति अपन आँखिसँ विश्‍वक सुन्‍दर रचना देखयमे असमर्थ रहथिन्ह तहिना ओहो अपन आँखिक उपयोग नहिये करब उचित बुझलन्हि आ’ तैं सदैवक हेतु अपनोेेे आँखिमे पट्टी बान्हि लेलन्हि । हुनका एक सय बेटा भेलन्हि जे बादमे धृतराष्‍ट्रक पट्टी कौरव कहायल । जेठकाक नाम रहन्हि दुर्योधन । धृतराष्‍ट्रक पाँचटा भातिज । सभसँ जेठ रहथिन्ह युधिष्‍ठिर । ई पाँचो भाईँ पाण्‍डव कहयलाह । बेटा आ’ भतिजामे राजक लेल कलह बहुत बढ़ि गेलाक कारणेँ धृतराष्‍ट्र बूढ़–पुरानसभसँ सरसलाह कऽ भतिजासभक हेतु अलगे राज छुटियाकऽ दोसर राजधानीक बना देलखिन्ह, इन्द्रप्रस्‍थ “ “ हस्तिनापुरसँ उत्तर–पूूर्व खाण्‍डवप्रस्‍थ जङ्गलकेँ फाँड़िकऽ इन्द्रप्रस्‍थक स्थापना कयल गेल छल । ओहिसँ पहिने खाण्‍डवप्रस्‍थक जङ्गलमे विभिन्न जातिसभ अपन–अपन वस्‍तीमे निवास करैत छल । ओहीमे बहुतो ठाम आर्य परिवारसभक वस्‍तीसभ सेहो रहैक । इन्द्रप्रस्‍थक स्थापनामे ई सभ वस्‍तीसभ उजड़ि गेल । जङ्गलक आदिवासीसभ तऽ उत्तरभर भीतर आओर घनगर जङ्गलमे चलि गेल मुदा नया नगरक स्थापनासँ खेती–पाती कऽ कऽ बसल परिवारसभ बहुत कठिन परिस्थितिमे फँसि गेल । घरदुआर उजड़ि गेलैक । उजड़ल बेघर परिवारसभमे एकगोट क्षत्रिय परिवार सेहो रहैक । ओहि परिवारमे एकगोट बालिका छलि जकर नाम जकर नाम जकर नाम अच्‍छा, राखि लियऽ रहैक नारी उ नारी माने बुझैत छिऐक , बौआ ?” “ हम किया ने बुझबैक, नारीक अर्थ छिऐक — मौगी “ मोदिआइन बाजलि — “ हँऽऽ , नारी माने हमरे सनक मौगी उ बौआ, अहाँ तऽ बहुतो बुझैत जनैत छिऐक “ बड्ड संतोष भेल । मोदिआइनक प्रशंसा हमरा प्रफुल्‍लित कऽ देलक । आँखि निन्नसँ भारी भऽ गेल छल । घरोमे मायसभ सुतय कालमे एहने खिस्सासभ कहैत रहय आ’ सुनिते–सुनिते हम निन्न पड़ि जाइत रही । अखनो हमरा घरे जकाँ नीक लागि रहल छल । जेना हम घरेमे खिस्सा सुनि रहल होइ । साँचे कही तऽ हमरा लागल जेना इएह कथा हमर माय हमरा कहियो सुनोने रहय । हमरामे आऽलादक निसा चढ़ैत चलि गेल, एकगोट अवर्णनीय आनन्‍दमे सन्हियाइत चलि गेलहुँ । हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ, खाली मोदिआइनक कोमल कण्‍ठेटाक आवाज आ’ ओहि आवाजद्वारा चित्रित भऽ रहल कथाक दृश्यसभ मात्रहिं हमर चेतनामे बाँकी रहि गेल । “ नारी तहिया एकगोट छोटि नग्‍निका बालिका छलि । इन्द्रप्रस्‍थकेँ राजधानी बनाबयलेल असंख्‍य लोकसभ ओतय आबय लगलैक । भीड़ बढ़य लगलैक । रातिदिन एक कऽ काज आगाँ बढ़ैत गेलैक । धीरे–धीरे नम्‍हर–नम्‍हर विशाल भवनसभ ठाढ़ होमय लागल । फुलवारी–वाटिकासभ लगाओल सजाओल गेल । मूर्त्तिकारसभ सुन्‍दर आ’ नीक–नीक आकर्षक मूर्त्तिसभ गढ़ि–गढ़ि कऽ विभिन्न स्थानसभपर ठाढ़ कयलन्हि । इन्द्रप्रस्‍थक शोभा आ’ सुन्‍दरता इन्द्रपुरीकेँ सेहो मात करय लागल । नव निर्मित नगरमे नव–नव वस्‍त्राभूषणधारीसभ आबिकय रहय लगलाह । गान–बाजानसँ नगर बजार रमणीय भऽ गेल । बहुतो हाथी, घोड़ा, सजल–बजल बड़का–बड़का रथसभ आयल । अस्‍त्र–शस्‍त्रसँ सुसज्जित वीर रक्षकीसभ सेहो आयलि । बालिका नारी विस्‍मित भए आँखि फारि–फारिकय एहि सभ विराट परिवर्त्तनकेँ निहारति रहलि । सड़कपर नाङ्गटि कुदैति, अपनेसनक अन्य बाल–बालिकासभक हुलिमे एतएसँ ओतय दौड़ैति नयाँ–नयाँ चमत्‍कारिक दृश्यसभक ओ अवलोकन करैति गिेल । मुदा ओकर माय–बापक स्थिति किछु भिन्न रहैक । ओसभ अत्यन्त दुखित रहथि । घर–घराड़ी सभ किछुक हरण भऽ गेल छलन्हि । नगर स्थापनाक क्रममे बहुतो लोक जन–मजूरीमे लागि गेल रहय आ’ कतेक दोसर पेशाकेँ अङ्गीकार कऽ नेने रहय । बहुतो महिलासभ गणिका वृतिमे चलि गेलि छलि ़ पेट तऽ कहुना येनकेन प्रकारेण पोसा जाइत रहैक मुदा अपन स्वतन्‍त्र खेती–पातीमे लागि आयल ओतक पूर्वनिवासी खेतिहर वृतिबलासभ अत्यन्त दुखित आ’ क्षुब्ध छल । तथापि नियतिकेँ स्‍वीकारब छोड़ि दोसर कोनो उपाय बाँकी नहि रहैक । एक दिन अभूतपूर्व शोभा–सिन्‍दूरक आयोजन भेलैक आ’ पाण्‍डवसभ नगरमे प्रवेश कयलथि । ओही दिन ओसभ गृहप्रवेश सेहो कयलन्हि उ बड्ड हुलि, बड्ड लोक — बड्ड विशाल आयोजन रहैक उ अनेकन् यज्ञ भेल, ब्राऽमण आ’ पुरोहितसभ उच्‍च कण्‍ठसँ वेदक पाठ कयलन्हि ़ अस्‍त्र–शस्‍त्रक प्रदर्शन भेलैक । उपस्थित सैनिक आ’ नागरिकलोकनि पाडण्‍वसभक जयजयकार कयलखिन्ह । यज्ञ–धूमसँ आच्‍छादित आकाश बड़ी कालधरि जयध्‍वनिसँ प्रकम्‍पित होइत रहल । बालिका नारी अत्यन्त कौतुकमय भऽ उत्‍सुकतासँ एहि सम्‍पूर्ण आयोजन आ’ प्रदर्शनक अवलोकन कएलकि । ओ देखलकि जे पाण्‍डवसभ अत्यन्त सुन्‍दर रहथि आ’ द्रौपदीक रुपक वर्णन तऽ सम्‍भवे नहि छल । ओहुना हरेक घरमे पहिनहिंसँ एकर चर्चा रहैक । बालिका नारी छलि तऽ बड्ड छोटि मुदा तैयो ओ भाँपि गेलि जे पाँच प्रतापी युद्ध–कुशल पुरुष–रत्‍नसभक सिम्‍म्‍ालित प्रेमपात्री हएबाक कारणेँ द्रौेपदीक नाक, भृकुटि आ’ ग्रीवा गर्वसँ चढ़लि छलैक । पाण्‍डवसभ इन्द्रप्रस्‍थसँ दिनानुदिन अपन विस्‍तार होइत बढ़ैत राज्यपर शासन करय लगलाह । इन्द्रप्रस्‍थ धीरे–धीरे एकगोट राजधानीक अपेक्षित गति धऽ लेलक । ओतक नागरिकसभ अपन–अपन वृति आ’ काजमे लागि गेल । नहुँए–नहुँए नगरक नूतनता समाप्‍त होमय लगलैक । विस्थापित भऽ गेल परिवारसभ सेहो एक–एक कऽ अपनाकेँ स्थापित करैत स्थायी नागरिकक रुपमे परिणत होइत गेल । ओहोसभ क्रमशः पूर्ण रुपेण नागरिकताक नव स्वरुपकेँ ग्रहण करय लागल छल । नारी बालिकासँ नम्‍हर होइत गेलि । डाँड़मे डराडोरि लऽ कऽ वस्‍त्रखण्‍ड बान्हय लागलि । एम्‍हर हस्तिनापुरक दुयोर्धनक दरबार आ’ इन्द्रप्र्रस्‍थक युधिष्‍ठिरक दरबारमे भीतरे–भीतर नित्यप्रति प्रतिस्‍पर्धा बढ़िते चलि गेलैक । दुयोर्धनकेँ पाण्‍डवक उन्नति असह्य होमय लगलन्हि ़ ओम्‍हर पाण्‍डव सेहो प्रतिरक्षाक तैयारीमे जुटि गेलाह । दुनूूमे युद्धे तऽ शुरु नहि भऽ गेलैक मुदा सामरिक तैयारीसभ होमय लागल ़ हस्तिनापुर आ’ इन्द्रप्रस्‍थक बीचमे एकप्रकारसँ शीतयुद्धक वातावरण बनि गेलैक । देखाबयलेल उपरसँ दुनू औपचारिकतामे नीके सम्‍बन्‍ध रखने रहथि । दुनू परिवार सामाजिक एवम् धार्मिक अनुष्ठानसभ पारिवारिक रुपमे सम्‍मिलित भऽ कऽ सम्‍पन्न करथि मुदा तरेतर दिनानुदिन बैर–भाव बढ़िते गेलन्हि । दुनू दिसक बूढ़–पुरानसभ एकरा शान्त करक अनेकन् प्रयत्‍न कयलथि मुदा सफल केओ नहि भऽ सकलाह । (अगिला अंकमे) उपन्यास- चमेली रानी जन्म 3 जनवरी 1936 ई नेहरा, जिला दरभंगामे। 1958 ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, 1959 ई.मे लॉ। 1969 ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, 1971 ई.मे सानफ्रांसिस्को वि.वि.सँ एम.बी.ए., 1978मे भारत आगमन। 1981-86क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई पुने होइत 2000सँ लहेरियासरायमे निवास। मैथिली फिल्म ममता गाबय गीतक मदनमोहन दास आ उदयभानु सिंहक संग सह निर्माता।तीन टा उपन्यास 2004मे चमेली रानी, 2006मे करार, 2008 मे माहुर। चमेली रानी- केदारनाथ चौधरी पुजारीजीक जबाब सुनि दरोगा अइँठल मोछ केँ औरो अइँठलक, फेर अपनासंग आयल सिपाही केँ ताकीत केलक–”कृपलबा! तुम सावधानी से इन दो लोगन पर नजर रख। हम अंदर चेकीन करता हूँ।” दरोगा मंदिरक पाछाँ बनल खोपरी दिस बिदा भेल। कृपलबा नामक सिपाही ससरि क’ पुजारीजी लग आयल। पुजारीजीक आगाँ थार मे राखल पेड़ा पर ओकर आँखि जेना गरि गेलैक। ओ ओहीठाम बैसि रहल, बाजल–”ई सरौं, अपनो मरिहें औरो हमरो जान खतम करिहें। पुजारी बाबा, थार मे की बा? बड़ा गम गम करेला।” पुजारीजी स्वामी दिस ताकैत छलाह। दुनू केँ आँखिक भाषा मे गप भ’ रहल छल। सिपाहीक प्रश्न सुनि पुजारीजी हड़बड़ाइत पटिया पर बैसि गेलाह आ कहलनि–”परसाद थिकै सिपाहीजी। भोग लगाउ।” पुजारी जी दूटा पेड़ा कृपलबा नामक सिपाहीक हाथ मे राखि देलथिन आ कान केँ दरोगाक गतिविधि पर पथने चुप भ’ रहलाह। हुनक माथ पर चिन्ताक सिकुरन स्पष्ट झलकै छल। दरोगा पहिले दुनू खोपड़ी केँ बाहर घुमि जाँच-पड़ताल केलक। मूड़ि नमरा क’ चारू कातक हाव-भाव के निहारलक। फेर आयल ओहि कोठलीक दरबजा लग जाहि मे काके आ मैना छलीह। दरोगा सटायल केबाड़ केँ भराम दए खोलि भीतर ढुकि गेल। अन्दर काके आ मैना कोन अवस्था मे छलीह, दरोगा की देखलक से दरोगा जानए। मुदा, दरोगा चिचियाति आ बफारि कटैत बाहर आयल आओर पलटनिया दैत पुजारीजी लग पहुँच गेल। हँफैत बाजल–”हे पुजारी बाबा, ई मंदिर बानु? ई भगवान का फ्लेट बानु? अन्दर कोन खेल होत बा। हम जे देखली, राम राम, आब अहाँ से का कहीं। हमार त’ नजरिए झौआ गेल बा।” गर्मी आ उमस पराकाष्ठा पर छलै। दरोगाक शरीर मोट आ भारी-भरकम। ओ काके आ मैनाबला कोठली सँ भगैत आयल छल। ओकर सम्पूर्ण देह पसीना सँ लथपथ छलै। पुजारीजी फेर हाथ जोड़ैत बजला–”सरकार, कोठली मे हमर बालक आ हुनकर कनिआँ। हमर बालक बिआहो ने करैत छल। कतेक परतारने त’ अहि बेर शुद्धक समय मे दिल्ली सँ एलाह। हुनकर बिआहक त’ दसो दिन ने भेलनि। कहू त’ अहाँ की कर’ भीतर गेलौं? छिया, छिया।” –”अरे, हमनी का करब? हमनी के ड~यूटी बड़ा बेढंगा बा।” कहैत दरोगाबैसक उपक्रम कर’ लागल। ओ पहिने एक हाथ रोपलनि, फेर दोसर हाथ रोपि, देहक बैलेन्स ठीक केलनि। तखन लूद द’ बैसि गेलाह। पुजारीजी अन्दाज केलनि जे दरोगाक वजन तीन, साढ़े तीन मन सँ कम नहि हेतैक। कृपलबा दुनू पेड़ा केँ मुँह मे ठुसि नेने छल। पेड़ाक साइज बेस पैघ छलै। ओ कहुना क’ पेड़ा घोंटबाक प्रयास क’ रहल छल। दरोगा पटिया पर बसैत देरी पेड़ाबला थार केँ दुनू आँंखिये निहार’ लागल। ओ बाजल–”पेड़ा बानु?” –”हँ सरकार! अहीं सभहक लेल बाबाक परसाद थिक। भोग लगबियौ।” कहैत पुजारीजी पेड़ाक थार घुसका क’ दरोगाक आगाँ मे क’ देलथिन। –”सुगन्धी त’ बड़ा नीमन बा। गाय का दूध मे बनल ह’ तो?” –”हँ सरकार! सामने देखिऔक मुसहर टोली। सदाय भाइ सभ महादेवक भक्त। सभहक दूरा पर मुलतानी गाय। तखन दूधक कौन कमी। खाक’ देखल जाए।” दरोगा एकटा पेड़ा मुँह मे देलक–”वाह! वाह!! पुजारीबाबा। सबाद बड़ा अच्छा बा। बहुत दिनन के बाद अइसन पेड़ा खाई के मौका मिललबा।” दरोगा थारक सभटा पेड़ा उदरस्त क’ लेलक। पेड़ा मे पुष्ट सँ नवका भांग मिलाओल रहैक। पुजारीक देल पानि सेहो दरोगा पीब गेल। तखने पुजारीजी पुछलथिन–”हाकिम, ई नट-नटिन बला की मजरा थिकै?” दरोगा पहिने पूरा मुँह बाबि ढेकार केलक। फेर बाजल–”आब रौआ से का छिपायब। वायरलेस पर अरजेन्ट खबरि आयल बा। ओ नट-नटिन बड़का डकैत। कोनो मारवाड़ी के लाखो टाका का जेबर गहना लेके भागल बा। सोंचली, सरौं के पकड़ब त’ आधा माल डकार जायब, आधा माल जमा करब। के सार बुझिहेंए? बहुत दिन हो गेइल, कोनो बड़का माल हाथ नहिखे आईलबा।” पुजारीजी मोने-मोन बजला–‘बस एक घड़ी आओर। भांग जखन भिजतौक तखन नट-नटिन केँ तकिहेंए रे सार।’ दरोगाक माथ सुन्द होबए लगलै। ओ डपोरशंख जकाँ चुपे एककात देख’ लागल। किछु काल पहिले काके आ मैनाबला दृश्य ओकर मानस पटल पर थिड़क’ लागल। ओकरा अपन बियाहक गप मोन पड़’ लगलै। जखन ओ पहिल बेर अपन कनिआँक मुँह देखलक–कारी, उठल आ मोटका थूथून। Åपरका दाँत निचला ठोरकेँ छपने, डिग्गासन पितरिया आँखि। ओकरा जिनगी सँ विरक्त भ’ गेलैक। ओ संन्यास लेबा लेल तैयार भ’ गेल। मुदा, एखन जे दृश्य देखलक। वाह! छौकड़ी राधा रानी त’ छौकड़ा किसन-कन्हैया। मन केँ हर्षित क’ देलक। रंग त’ अनलक नवका भांग। किछुए कालक बाद भिसिण्ड तोंदबला दरोगा पटिया पर चित पड़ल नाक सँ डिगडिगिया बजा रहल छल। थोड़बे हटल कृपलबा बीड़ी मुँह मे दबने बेहोश पड़ल, मोंछ के चिबा रहल छल। ई सब कार्य पूर्ण अनुशासित आ पटुताक संग होशियार व्यक्तिक देख-रेख मे भ’ रहल छल। कनेक आओर सांझ जकाँ भेलै त’ कतहु सँ पाँच युवक आ पाँच युवती, कुल दस, कमरियाबला पिअरका वस्त्रा पहिरने कामर केँ कन्हा पर उठौने आयल। आगन्तुक युवक-युवतीक उमेर काके आ मैनाबला छलै। सब तहिना चुस्त-दुरुस्त आ शांत। तुरंते पुजारीजी, स्वामीजी, काके एवं मैना कमरियाबला ड्रेस मे आ कामर केँ उठौने तैयार होइत गेलाह। डालरबला दुनू बोरा केँ छोट-छोट मोटरी बना क’ सब कमरियाक कामौर मे लटका देल गेलै। सब वस्तु ल’ क’ कमरिया टोली मे जोर सँ हुंकार देलक पाछाँ कमरियाक टोली ओहि मंदिर सँ प्रस्थान केलक। मंदिर मे रहि गेला फोंफ कटैत दरोगा आ टिटहीबसंत सिपाही कृपलबा। कमरियाक टोली भरि राति चलैत रहल। टोलीक नेतृत्व केनिहार आ पुजारी बनल अमृतलाल। अमृतलाल जाहि जाति या संप्रदायक प्रतिनिधित्व करै छल ओ पुस्त दर पुस्त सँ चोरि विद्या मे पारगंत होइ छल। अमृतलाल भुखन सिंहक खास पियादा रहए। ओ चतुर आ भुखन सिंहक विश्वासी मातहत छल। कठिन अवसर पर भुखन सिंह अमृतलाल केँ खास किस्मक काज करक लेल नियुक्त करै छलाह। प्रस्तुत अभियान मे अमृतलाल अपन निपुणताक सहज परिचय द’ रहल छल। अमृतलाल केँ ओहि इलाकाक पूर्ण ज्ञान छलैक। ताहि कारणे कमरियाक टोली कोनो गाँव वा शहर मे प्रवेश नहि केलक। बाघ-बोन, गाछी-बिरछी, मरचरही, धारक कछेर होइत भोरहवा मे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचल। ओतए सभ तरहक इन्तजाम छलैक। भरि दिनक विश्रामक बाद कमरियाक टोली फेर दोसर राति अमृतलालक नेतृत्व मे चलैत रहल आ भोर होइत चमेलीरानीक अड्डा पर पहँुचि गेल। स्वामीजी सभटा डालर सुरक्षित अर्जुन केँ सुपुर्द क’ चमेलीरानी सँ भेंटकरबाक उद्देश्य सँ बिदा भेलाह। रस्ते मे हुनका चमेलीरानी सँ भेंट भ’ गेलनि। चमेलीरानी झुकिक’ दुनू हाथ जोड़ि स्वामीजी केँ प्रणाम केलनि आ कहलनि–”बज्जर काका, ददू अहाँ के अबिलम्ब बजौलनि अछि।” ददू अर्थात~ भुखन सिंह, चमेलीरानीक धर्म-पिता। स्वामीजी अर्थात~ बज्जर कका भुखन सिंहक दाहिना हाथ। चमेलीरानीक आग्रह पर भुखन सिंह ठाकुर नांगटनाथ सिंह नामक अभियान मे बजz नाथ केँ पठौने छलाह। चमेलीरानी बज्जर कका केँ बड़ आदर करैत छलि। सदिखन हिन्दी आ अँग्रेजी बाजैवाली चमेलीरानी भुखन सिंह, बज्जर कका एवं औरो पैघ हस्ती लग मैथिलीए टा बजैत छलीह। चमेलीरानीक व्यवहार मे नम्रता आ कोमलता बज्जर कका केँ बड़ सोहाइत छलनि। बज्जर कका चमेलीरानीक प्रणामक प्रतिउत्तर मे हाथ उठा क’ आशीर्वाद देलनि आ कहलनि–”काके आ मैनाक संग काज करबा मे नीक लागल। फेर कहिओ हुनका संगे कोनो अभियान मे जेबा मे हमरा प्रसन्दता होयत। सब ठीक बिटिया, हम अबिलम्ब बिदा भ’ रहल छी।” बज्जर ककाक प्रस्थानक बाद चमेलीरानी ओतए पहुँचली जतए काके आ मैना कमरियाबला ड्रेस मे चुपचाप मूड़ी गारने बैसल छलीह। किछु दिन पूर्व हुनका दुनू संगे बड़ पैघ अत्याचार भेल छलनि तकर वृत्तांत सेहो सुनि ली। ठाकुर नांगटनाथ सिंहक अभियानक पहिने चमेलीरानीक संसार मे बहुत किछु परिवर्तन भेल छलै। पछिला ट्रेन डकैतीक बाद हुनक जे अर्जुन संगे वार्तालाप भेल छलै से हमरा ज्ञात अछि। तकर बादे चमेलीरानी खास किस्मक निर्णय लेलनि। ओ अर्जुन सँ विवाह केलनि। बिआहक अवसर पर कीर्तमुखक पाँचो बेटा उपस्थित छल। ओहि पाँचोंक समक्ष चमेलीरानी अपन योजनाक स्पष्टीकरण केलनि। सभहक विचार मे मेल-मिलाप भेलै। सब मिलि क’ सभहक सहयोगे कार्य करबाक हेतु तत्पर होइत गेलाह। कलकत्ता आ मदzास सँ दूटा स्पेशल जपानी ट्रेनर केँ आनल गेल। अहि ट्रेनर केँ पैघ तनखाह आ सब तरहक सुविधा उपलब्ध कराओल गेल। आधुनिक युगक सब आधुनिक उपकरण आनल गेलै। खास स्थान पर ओइ दुनू जपानी ट्रेनरक देख-रेख मे अत्यधिक कठिन आ परिश्रमबला ट्रेनिंग आरंभ भेलै। ट्रेनिंग लेनिहार छल कीर्तमुखक पाँचो बेटा आ चमेलीरानी। ट्रेनिंग छह मास तक चलल। पाँचो भाइ अर्थात~ युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुलवा आ सहदेवा संगे चमेलीरानी अपनशरीर एवं मनक पूर्ण तैयारी केलनि जे अगिला योजना केँ क्रियान्वित करबा लेल जरूरी छलै। अही छह मासक भीतरे पाँच सुरक्षित स्थानक चयन भेल। प्रत्येक स्थान मे दू बीघा जमीन कीनल गेल। फेर ओकर तैयारी कएल गेलै। करीब एक सय छात्रा-छात्राा केँ रहबाक लेल अलग-अलग हाWस्टल, व्यायामशाला, सुन्दर मैदान इत्यादिक संगे भवन पाँचों ट्रेनिंग कैम्प केँ लेल बनाओल गेल। पाँचो ट्रेनिंग कैम्प केँ नवीनतम उपकरणक संगे कम्प्यूटरीकरण कयल गेल। सम्पूर्ण प्रान्त मे चोरि, डकैती, रंगबाजी, अपहरण, गुटबाजी आदिक गृह-उद्योग पसरल छल। अत: पाँचो ट्रेनिंग सेन्टरक हेतु पाँच सय युवक-युवती केँ ताकए मे कोनो अरचन नहि भेलै। युवक-युवतीक चयन मे अति सावधानी राखल गेलै। सबहक उमेर चौदह सँ बीस वर्षक अन्दरे रहै तकर ध्यान राखल गेल। आब ओहि पाँचो कैम्पक उद्देश्य, कार्यक्रम आ अपन प्रान्तक लेल समर्पण इत्यादिक बखान आगाँ कयल जायत। सम्प्रति काके अर्थात~ सहदेवा एवं मैनाक संग भेल अत्याचार केँ स्पष्ट करी। सहदेवा जाहि कैम्पक इनचार्ज छल ओहि मे मैना ट्रेनिंग ल’ रहल छलीह। ओही ठाम दुनू केँ नैन-मटक्का भेलै। एकर सूचना तत्काल चमेलीरानी केँ देल गेल। चमेलीरानी अबिलम्ब दुनूक बियाहक तिथि निश्चित केलनि। फलाँ तारीख क’ सहदेव वल्द कीर्तमुख निवासी मिरचैयाक मैना वल्द बेनाम निवासी अनामकक बियाह होयत। सभ केँ हकार, सभ केँ स्वागत। पैघ मंडप बनल। सजाबट, खेबा-पिबाक नीक इन्तजाम, पाँच सयक लगभग गेस्ट। बियाह भेल। सहदेव आ मैना सभकेँ प्रणाम करैत आ आशीर्वादक मोटरी उठबैत कोहबर दिस प्रस्थान केनहिए छल कि नांगटनाथ बला योजनाक सूचना आयल–”सूटकेस बैंकाक से चलने वाला है।” योजना मास पूर्वे बनि चुकल छलै। ओहि मे सहदेव केँ काके बनि क’ तथा मैना केँ भाग लेबाक छलैक। अस्तु, कोहबर मे जेबा लेल तैयार ओ दुनू बज्जरकका संग निर्मली पहुँच गेल। भेलै ने अत्याचार? चमेलीरानीक इशारा पाबि सहदेव आ मैना हुनक सोझा मे आबि ठार भ’ गेल। हे भगवान! अब कोन हुकुमनामा चमेलीरानी सुनौती से नहि जानि। चमेलीरानीक ठोर पर मृदुल हँसी। ओ हुकुम देलखिन–”अहाँ दुनू हमर कोठली मे जाउ। ओतए सब किछुक इन्तजाम छै। एक मास धरि अहाँ दुनू ओहिकोठली मे निवास करी से हमर आदेश।” सहदेव चुपे रहला। मुदा, मैना दबले मगर देखार, खिखिया उठली। ओ दुनू चमेलीक स्पेशल कक्ष मे प्रवेश केलनि। (अगिला अंकमे) डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- १. गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मैथिली भाषाक साहित्‍य मैथिली भाषाक अधिकांश साहितय मानक मैथिली मे उपलब्‍ध अछि जकरा ‘साहित्यिक भाषा’, ‘साधुभाषा अथवा शिष्‍ट भाषा’ सेहो कहल जाइत अछि। अधिकांश समयधरि ई एकमात्र साहित्यिक अभिव्‍यक्ति क भाषा छन जाहि आधार पर एकरा ‘मानक मैथिली’ कहल जाइत अछि। ई दरभंगा आमघुबनी जिला मे बाजल जाइत अछि। ‘दक्षिणी मानक मैथिली’ समस्‍तीपुर, बेगूसराय, खगडिया, सहरसा, मेधपुरा आ सुपौल जिला आदि मे बाजल जाइत अछि। एहि मे मानक मैथिली सँ किछु अन्‍तर अछि। पूर्वी मैथिली पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, करिहार आदि जिला क केन्‍द्रीय आर पश्चिमी भाग मे अशिक्षित वर्ग सभ मे चलैत अछि तथा महानन्‍दा सँ पूव सेहो हिन्‍दू लोकति बजैत छथि जतय मुसलमान मुख्‍यत: बाडव्‍ला बजैत अछि। छिकाछिकी बोली गंगाक दक्षिण भाग मे बाजल जाइत अछि। एहि मे खगडिया आ बेगूसराय जिला क पूर्वी भाग, बॉंका जिलाक पश्चिम भाग केँ छोडि क’ संथाल परगनाक उत्‍तरी आ पश्चिमी भाग मे बाजल जाइत अछि। पश्चिमी मैथिली मुजफफरपुर, पूर्वी चम्‍पारण आ पश्चिमी चाचारण जिलाक पूर्वी भाग मे बाजल जाइछ। चम्‍पारण आ उत्‍तर मुजफफरपुर क बोली भोजपुरी सँ प्रभावित अछि। जोलही बोली दरभंगा जिलाक अधिकांश इस्‍लाम धर्मविलम्‍बी अपन पडोसी हिन्‍दू क भाषा मैथिली बजैत अछि, मुदा ओकर बोली थोडे क विकृत आर अरबी-फारसी शब्‍दऍं ूिज्ञित रहैत अछि। वर्तमान समय मे मैथिलीक दू उपभाषाक नव नामकरण आ नवजागरण भेल अछि जाहि मे प्रथम थिक अंगिका अद्वितीय थिक बज्जिका। अंगिका भाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पूर्वी मैथिली कहल अछि आ डा. सरजार्ज अब्राहम ग्रियर्सन छिकाछीकी गॅवारी कहलनि।एकर क्षेत्र भागलपुर, गोडा आ देवधर तथा संथाल परगना मानल जाइत अछि। बज्जिका ओहि उपभाषाक नाम पडल अछि जकरा हम पश्चिमी मैथिली कहलहुँ अछि। ई नामकरण बज्‍जी आलिच्छिवी क इतिहास क आधार पर कयल गेल अछि, किन्‍तु आधुनिक परिप्रेक्ष्‍य मे एहि जातिक नामनिशान नहि भेटैत अछि। मैथिली व्‍याकरणक अपन निजी विशेषता अछि। एकर विशिष्‍टताक प्रसंग मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ‘लिग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया (खण्‍ड-5, भाग-2) (1902), ‘एन इण्‍ट्रोडक्‍शन टू द मैथिली लैंग्‍वेज ऑफ नौश विहार (1800) तथा ‘सेभन ग्रामर्स ऑफ द डायलेक्‍ट्स एण्‍ड सब डायलेक्‍ट ऑफ द विहारी लैंग्‍वेज (1883) मे विस्‍तारपूर्वक विचार क’ ई प्रमाणित क’ देलनि अछि जे ई विश्ष्टिता अन्‍य भारतीय भाषादि मे नहि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि। मैथिली व्‍याकरण मे सर्वनामक तीन रूप प्रयुक्‍म होइत अछि-‘अपने’, ‘अहॉं’ आ ‘तों’ वा मोरा, मुदा बाडव्‍ला मे दू ‘आपनी’ आ ‘भूमि’ वा ‘तुइ’ आ हिन्‍दी मे सेहो दूइए रूप प्रयुक्‍त होइत अछि ‘आप’ आ ‘तुम’। मात्र भषा-शास्‍त्रक दृष्टिऍं सँ नहि, प्रत्‍युत व्‍याकरण आ शब्‍दावलीक विभन्‍नताहि आ विशेषतादि कारणेँ नहि, अन्‍य भाषा-भाषी लोकतिक द्वारा सरलता सँ बुझबाक कारणेँ नहि, प्रतयुत अपन एक स्‍वतन्‍त्र साहित्यिक आ सांस्‍कृतिक परम्‍परा हैबाक कारणेँ मैथिली भाषाक स्‍वतन्‍त्र अस्तित्‍व अछि। मैथिली भाषा आ व्‍याकरणक सम्‍बन्‍ध मे अनेक कार्य भेल अछि। ओहुना संस्‍कृत आ अंग्रेजी व्‍याकरणक आधार मानिक’ मैथिली मे छोट-पैध अनेक व्‍याकरण लिखल गेल अछि, मुदा महावैयाकरण दीनबन्‍धु झा (1878-1955) क ‘मिथिला भाषा विद्योतन’ (1945) क ऐतिहासिक महत्‍व अछि जकरा सूत्र-शैली मे ओ लिख लनि जे संस्‍कृत-प्राकृतक श्रेष्‍ठ व्‍याकरणादि सँ तुलना कयल जा सकैछ। एहि व्‍याकरण केँ आधार मानिक’ गोविन्‍द झा (1923) ‘लघुविद्योतन’ (1963) आ ‘उच्‍चतर मैथिली व्‍याकरण’ (1979) क रचना कयलनि। हिनक अन्‍य कृति मे ‘मैथिलीक उद्गम ओ विकास’ (1968) आ ‘मैथिली भाषा’ (1909-2000) ‘द फारमेशन ऑफ मैथिली लैग्‍वेज (1960) सर्वाधिक उल्‍लेखनीय कार्य कयलनि अदछ। अन्‍य स्‍वतन्‍त्र साहित्यिक भाषाक समान मैथिली भाषाक अपन स्‍वतन्‍त्र प्राचीन लिपि थिक जकरा ‘तिरहुता’ वा ‘मिथिलाक्षर’ वा मैथिलाक्षर’ वा ‘मैथिली लिपि’ कहल जाइत अछि। तिरहुता नाससँ ज्ञात होडत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक अछि जकर विकास ‘तीरमुक्‍त’ वा ‘तिर्हुत’ नामक व्‍यवहार हैबाक बाद पूर्णत: प्राप्‍त कयल गेल अछि। बौद्ध ग्रन्‍थ ‘ललित-विस्‍तर’ मे एहि लिपि केँ ‘वैदेही लिपि’ क नाम पर अभिहिस कयल गेल अछि। घुमा क’ लिखनिहार पूर्वी वर्णमाला साक्षात बाडव्‍ली असमिया, मैथिली आ ओडिया लिपिक स्रोत थिक। वस्‍तुत: मिथिलांचल मे उपलब्‍ध प्राचीन संस्‍कृत ग्रन्‍थ एही लिपि मे उपलब्‍ध अछि जकरा बाडव्‍ला, असमिया आ ओडियाक पण्डित लोकति केँ पढबा मे सुविधा होइत छवि। पटना सँ प्रकाशित ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’ (1960-61) मे अनेक किस्‍म मे एहि लिपिक तात्विक अघ्‍ययन प्रस्‍तुत कयलनि, किन्‍तु दुर्योग रहल जे पुज्ञतकाकार प्रकाशित नहि भ’ सकल। एहि दिशा मे राजेश्‍वर झा (1923-1977) ‘मिथिरलाक्षरक उद्भव आ विकास (1971) लिखिक’ एकर ऐतिहाकिसकता, प्राचीनता, शास्‍त्रीयता प्रमाणित कयलनि अछि जे भाषा-पैश्राानिक दृष्टिसँ एकर सर्वातिशायी महत्‍व थिक। उनैसम शमाब्‍दीक मल्‍यचरि ई लिपि जीवित छल, मुदा वर्तमान सन्‍दर्भ मे एकरा लोक बिसरि गेल अछि आ ओकरा स्‍थन पर देवनागरी लिपि व्‍यवहार कयल जाय लागल अछि। मैथिली साहित्‍य क इतिहासकार लोकति एकरा सामान्‍यत: तीन काल आदिकाल, मघ्‍यकाल आ आधुनिककाल मे विभक्‍त क’ अघ्‍ययन कयलनि अछि। किन्‍तु ओंकर समय सीमाक निर्धारण से इतिहासकार लोकति मे मनैक्‍यक सर्वथा अभाव अछि। इतिहास-लेखनक आधार-भूत प्रक्रियाकेँ घ्‍यान मे रासिक’ एकरा निम्‍नस्‍थ काल खण्‍ड मे विभाजित करब श्रेयस्‍कर प्रतीत होइत अछि: i. आदिकाल 800 ई. सँ 1350 ई. धरि। ii. मघ्‍यकाल 1351 ई. सँ 1857 ई. धरि। iii. आधुनिक काल i. ब्रिटिशकाल 1857 ई. सँ 1947 ई. धरि। ii. स्‍वातन्‍त्रयोत्‍तर काल 1947 सँ अर्द्यपर्यन्‍त। सन् 1857 ई. का सिपाही विद्रोहक पश्‍चात् मैथिली साहितय मे आधुनिक कालक सूत्रपात मानल जा सकैछ। ई विशाल मुगल साम्राज्‍यक अन्तिम वर्ष थिक। मुगल शासनक अवसानोपरान्‍त ब्रिटिश शासन काल मे जाहि सामाजिक चेतनाक उदय भेल ओहि मे सन् 1857 ई. पश्‍चात् क्षिप्रताअबैत अछि। एहि सामाजिक चेतनाक प्रतिनिधित्‍व नवीन शिक्षित बुद्धि जीवी वर्ग कयलक ले एक भाग अपन प्राचीन संस्‍कृति क सुरक्षाक प्रति उत्‍सुकतिा देखौलक आ दोसर भाग युग क आलोकक स्‍वागत कयलक। एहि सांस्‍कृतिक अनुष्‍ठान मे भारतीय भाषादिक विकास भेल आ ओकर साहित्‍य सम्‍पन्‍न आ समृद्ध होइत अछि। पश्चिमी शिक्षक प्रचार, रेल-तारक व्‍यवहार, रचायत शासनक व्‍यवस्‍था मुद्रण कलाक आविष्‍कार आ सामाजिक चेतनाक प्रभाव साहित्‍य पर पडल आ ओ स्‍ढ परम्‍परादिकेॅा तोडि क’ नव दिशाक दिस चलि पडल। मैथिली साहित्‍यक इतिहास मे नव-युगक निर्माण मे कमीश्‍पर चन्‍दा झा (1831-1907) आ पण्डित लालदास (1856-19) अवदान सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण अछि। हुनक राजनीतिक.सामाजिक रचनादिक आधार पर अनुमान कयल जा सकैछ जे सन् 1857 ई. क पश्‍चात् परिवर्तित परिस्थितिक सहल प्रक्रिया छल। वस्‍तुत: चन्‍दा झा आ लालदास मैथिली साहितय मे नवयुग अनबा मे समर्थ भेलहि। अपन गद् रचनादि द्वारा ओ लोकति आधुनिकता क द्वार खोललनि। फेर जहिना-जहिना मिथिलान्‍चल से नव आलोक पसरल साहितय सेहो नव-नूतन किसलयक संग पल्‍लवित भेल। सर्वप्रथम तँ ओ रहस्‍यवादी गीत एवं कवितादिक थिक जकर अन्‍वेषण नेपाल मे तथा प्रकाशन बंगाल मे भेल। एकर रचयिता सिद्ध लोकति छथि। एहि सिद्ध लोकतिक सम्‍बन्‍ध बौद्ध लोकतिक महायान शाखाऍं छलनि। एहि रचना-संग्रहक नाम ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ देल गेल अछि। सन् 1323 बंगाब्‍द अर्थात् सन् 1916 ई. मे महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री (1853-1931) सर्वप्रथम एकर प्रकाशन करौने छलाह। एहि मे संग्रहीत कविता सभक भाषा अति प्राचीन अछि मथा एहि मे ओ विशेषता दि अछि जे बाडव्‍ला. मैथिली, मगाही आदि पूर्वीय भषादि मे अछि। एहि कारणसँ एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे रारबल जाइत अछि। एहि कारण सॅा एहि भाषादिक प्रारम्भिक रूपक उदाहरण मे राखल जाइत अछि। वस्‍तुत: ई कवितादि तहिया लिखल गेल जखन आधुनिक पूर्वीय भाषादि अपन प्रारम्भिक अवस्‍था मे छल। भाषा वैज्ञानिक लोकति एहि विषय मे एकमत छथि। अत: एहि कवितादिक भाषा पूर्वीय अथवा मागधी अपभं्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्‍त अछि। तथापि ई स्‍वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्‍व उपलबध अछि जे मागधी अपभ्रशक पूर्वीय रूप थिक। यद्यपि एहि पर शौरसेनी अपभ्रशक सेहो प्रभाव संक्षिप्‍त अछि। तथापि ई स्‍वाभाविक अछि जे एहि मे ओ सभ तत्‍व उपलब्‍ध अछि जे मागधी अपभ्रंश सँ विकसित वर्तमान भाषादि मे सेहो पाओल जाइत अछि। एकरा संगहि ई मानबाक लेल प्रचुर साधन अछि। ई संग्रह प्राचीन मैथिलीक रूप थिक। एकर रचयिता अधिकांश मिथिलाक निवासी रहल हैताह। बौद्ध गान ओ दोहा मे तीन न्रकारक साहित्‍य उपलब्‍ध भ’ ीहल आछि, जकरा मैथिलीक प्रारम्भिक रूप कहल जा सर्कैछ। ओ अछि: दोहा कोश, चर्चाचर्च विनिश्‍चय आ डाकार्णव। एकर स्‍वचिता बौद्ध सिद्ध आ तान्त्रिक रहथि। हिनक भाषा मिभिलाक पूर्वी भागक प्राचीन रूप थिक। एहि सामग्री आदिक आधार पर एकर रचयिता लोकतिक समय आठम शताब्‍दी सँ तेरहस शताब्‍दी धरि निश्‍चय कयल जाइत अछि। विषयक दृष्टि सँ एहि रचनादिक ओतेक महत्‍व नहि जतेक की भाषाक दृष्टिऍं अछि। एकर भाषा एहन अछि जकरा आधार पर एकरा मैथिली, बाडव्‍ला, असमिया, हिन्‍दी, मगही आ भोजपुरी आदि प्रत्‍येक भाषा-भाषी अपन सम्‍पत्ति घोषित करैत छथि। एहि समय भारतीय आर्य भाषा निर्माणक स्थिति मे छल। इएह कारण अछि जे भाषा-वैज्ञानिक लोकति एहि रचना-समूह मे भारतीय पूर्वान्‍चलक सभ भाषादिक रूप भेटैत अछि। संगहि-संग ई मानबाक लेल सेहो प्रचुर साधन अछि जे एहि संग्रह केँ प्रधानत: मैथिलीक रूप थिक। ज्‍योतिरीश्‍वर (1280-1340) वर्णरत्‍नाकर (1940) मे एकर सम्‍पूर्ण नामावली द’ देलनि अछि। पूर्वीय भाषादि मे सर्वप्रथम मैथिलीक प्रयोग गम्‍भीर साहित्‍यक रूप मे कयल गेल छल। बाडव्‍ला आ आसमी मे तँ साहित्‍य-रचनाक प्रयास एक शताब्‍दी पाछॉं जा क’ प्रारम्‍भ भेल तथा एकरा लेल मैथिलीक महान कवि विद्यापति प्रेरक सिद्ध भेलहि। एकर अतिरिक्‍त प्राचीन अप्रपभं्रश मे कविता लिखबाक परम्‍परा मात्र मिथिला मे छल आ ई परम्‍परा चौदह म शताब्‍दी धरि चलैत रहस। विद्यापति अपन दू पुस्‍तक-‘कीर्तिलता’ (1924) आ ‘कीर्तिपताका (1960) तथा अनेक छोट कवितादिक रचना मे कयलनि जे देश्‍य-मिश्रित अपभ्रंश शिला ‘प्राकृत पैडालम’ टीकाकर वंशीधर एहि मे संगृहीत अपभ्रंश कवितादिक भाषाकेँ अवहट् कहलनि। डा. सुभद्र झा एकरा आदिकालीन मैथिली कहलनि। ओ लिखैत छथि. ‘प्राकृत पैड;लम मे उदाहरण स्‍वरूप अनेक शब्‍द एवं पद देल गेल अछि जकरा विषय मे कहल जा ाकैछ जे ओ प्राक् मैथिली मे रचित थिक ओहि मे एहन किछु नहि अछि जकरा आदिकालीन मैथिली कहबासँ वंचित क’ सकी।‘ राधाकृष्‍ण चौधरी (1924-1984) ‘मिथिलाक सांस्‍कृतिक इतिहास’(1961) क परिशिष्‍ट-ग मे प्राकृत पैडलम मे व्‍यवहृत 115 शब्‍दादिक सूची देलनि अछि तथा एहरा आदिकालीन मैथिलीक ग्रन्‍थ मानलनि अछि। तथापि एहि प्राचीन भाषाक विषय मे सुनिश्चित एवं अन्तिम रूपसँ विचार करब आवश्‍यक अछि। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य मे एकरा प्राक् मैथिली मानव तर्क संगत अछि। दोसर प्रकारक साहित्‍य जे उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओ थिक ‘डाकवचनाबली’। एहि वचनाबली मे स्‍थानीय लोक प्रसिद्ध विज्ञाता, ज्‍योतिष एवं कृषि सम्‍बन्‍धी वचन, जीवन आ विविध विषयक समालोचना भेरैत अछि। ई जनसामान्‍य मे प्रचलित अछि तथा एकर विस्‍तार आसामसॅ ल’ कए राजस्‍थान धरि सम्‍पूर्ण आर्यवर्त मे विस्‍तृत अछि। एकर रचयिताक सम्‍बन्‍ध मे विद्वान लोकति मे मतैक्‍य नहि अछि तथा अनेक जनश्रुति आदि प्रचलित अछि। देशक भिन्‍न भिन्‍न भाग सब मे एकर रचयिता लोकतिक भिन्‍न-भिन्‍न नाम अछि। मिथिला मे डाक, घाघ, भण्‍डरी एवं डंक आदि प्रचलित आदि। एम्‍हर आबिक’ देशक विभिन्‍न भागसॅ एहि वचनावलीक कतिपय संग्रह प्रकाया मे आयल अछि, परन्‍तु एहि मे सँ कोनो, कोनो प्राचीन हस्‍तलिखित प्रति पर आधारित नहि भ’ कए ओहि भू-भाग मे प्रचलित अनेक मौखिक रूप पर अछि। एकर फलस्‍वरूप प्रत्‍येक संस्‍करणक भाषा आधुनिक भ’ गेल अछि। मैथिलीक हेतु ई सौभाग्‍यक बात थिक जे डाकक नाम पर प्रचलित अनेक वचन मैथिल विद्वान द्वारा रचित ज्‍योतिषक प्राचीन ग्रन्‍थादि मे उद्घृत अछि। जाहि मे किछु तँ चौदहम-पन्‍द्रहम शताब्‍दीक थिक। एहि उद्धरणादिक भाषा अत्‍यन्‍त प्राचीन अछि तथा ‘बौद्ध गान ओ दोहा’ क भाषासँ साम्‍य रखैत अछि। ओना तँ मिथिला सँ जे वचनाबली प्रकाशित भेल अछि ओकर भाषा आधुनिकताक छाप नेने अछि। मात्रमिथिला आचार्यगण कोनो महान आचार्यक वचन सदृश प्रमाणक हेतु डाक वचनादि केँ जे उद्घृत कयलनि अछि ओहिसँ ओकर मैथिल उद्भव आ प्राचीनता सिद्ध होइत अछि। अत: ई कहब पूर्णत: संगत सिद्ध होइत अछि जे डाक मैथिल रहथि आ हुनक लोक प्रसिद्ध सारबी आदिक भाषा प्राचीन मैथिलीथिक। कालान्‍तर मे ई सम्‍पूर्ण भारत मे प्रचलित भ’ गेल तथा अपन मौखिक परम्‍परा मे नूतन रूप धारण क लेलक अछि। मात्र डाके एहन व्‍यक्ति नहि रहथि जे एहि प्रकारक लोक प्रसिद्ध वर्णनक रचना प्राचीन मैथिली मे कयलनि। एतबा तँ निश्चित अछि जे सबसँ विख्‍यात इएह छथि। सप्‍तरत्‍नाकरकर्ता महामहोपाहसाय चण्‍डेश्‍वर अपन ‘कृतचिन्‍तामणि’ नामक ज्‍योतिष निबन्‍धक प्रशानग्रन्‍थ मे अवहद्ध भाषाक अनेक पद म्रमाण रूप मे उदृत कयलनि अछि, जकरा क्षपणक जातक भृगुसंहिंता तथा कापलिक जातक प्रभृत ग्रन्‍थसँ उदृत कहलनि अछि। यद्यपि ई ग्रन्‍थ आब अनुपलब्‍ध अछि, अतएंव ई नियिचत रूप सँ नहि कहल जा सकैछ जे उक्‍त ग्रन्‍थ ओही भाषा मे लिखल गेल अथवा ओहि मे कतहु सँ अदृत कयल गेल अंछि। परन्‍तु डाकवचनावली क रचनाक समानहि ई सब सेहो जनसाधारण केँ प्रभावित करबाक लेल विद्वान लोकति हुनके भाषाक आश्रय लैत रहथि आ चाण्‍डेश्‍वर सदृश विद्वान् सेहो प्रमाण स्‍वरूप ओंकरा उदृत करबा मे कनेको कुण्ठित नहि भेलाह। तेसर प्रकारक जे साहित्‍य उपलब्‍ध अछि ओ लोक प्रसिद्ध आख्‍यान आ गीतक थिक। एहि मे किछु तँ साहित्यिक थिक। गोपीचन्‍दक गीत एही श्रेणी मे अबैत अछि। ई गीत ओही समयक थिक जाहि समयक डाकक वचन थिक। ई गीत भीखमॉंगनिहारक एक वर्ग द्वारा गाओल जाइत अछि जकरा गुदरिया गोसांईक नाम देल गेल अछि। एहि गीतक अतिरिक्‍त लोरिक, सलइेस. बिहुला, मरािया आदिक गीत कथादि एही वर्गक थिक। ई सभ रचनादि प्राचीन कालक थिक। एहि कथादिक विशेषता ईहो अछि जे एकर कथानायक कोनो अवतारी देवता वा अंशी पुरूष नहि छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन एकर संकलनक प्रयास कयने रहथि। युग-युगसँ ई जनकण्‍ठ मे पीढी-दर-पीढी गुंजित होइत आवि रहल अछि। एकर भाषाक परिशुद्धता क विषय मे कयों दावा नहि क’ सकैछ। अपन मौखिक परम्‍परा सँ एकर भाषा मे निश्चित रूपेण परिवर्तन भेल हैत। एहि रचनाहि केँ देखि क’ ई स्‍पष्‍ट प्रमाण भेटैत अछि जे मैथिली अपभ्रंश भाषाकेँ लोकप्रिय रचनाक लेल प्रयोग करबाक परम्‍परा मात्र उपयोगी साहित्‍यक लेल नहि, प्रत्‍युत मनोरंजनक लेल सेशे-मिथिला मे पूर्व भारतीय अपभ्रंश भाषाक आरम्भिक स्थिति मे जकर समय भाषा वैज्ञाानिक एक हजार ई. निधारित करैत छथि। डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन सर्व प्रथम एहन गीतादि केँ ‘इण्डियन एण्‍टीक्‍वेटी’ खण्‍ड-10 मे प्रकाशित करौलनि। एकर अतिरिक्‍त ‘समबिहारी फोक सॉंग्‍स’ (1884), ‘टू भरसन्‍स ऑफ द सांग्‍स आफ गोपी चन्‍द’ (जे. ए. एस. बी. खण्‍ड 54, भाग-1 अर ‘द वर्थ आफ लोरिक’ (कैम्ब्रिज 1929) आदि मे प्रकाशित अछिणे उल्‍लेखनीय अछि। एम्‍हर आबि क’ लोकगीतक कतिपय संग्रह प्रकाश मे आयल अछि जाहिसॅा एकर विकास मे गति आयल अछि। मिथिलान्‍चलक विभिन्‍न जनपद मे मैथिलीक करीब तीस लोक नाट्यक प्रस्‍तुति इस देखल अछि जाहि मे लोक जीवनक स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्‍यक त्रिवेणी प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक जीवनक स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति भेल अछि। एहि लोक-नाट्यादि मे गीत, संगीत आ नृत्‍यक त्रिवेणी  प्रवाहित भेज अछि जाहि मे लोक-जीवनक सार-गर्वित भावसँ सम्‍पन्‍न, तत्‍कालीन युग क प्रवृतिक मनोरंजकता प्रदान करबाक हेतु नव-नव आयामक व्‍यवस्‍था कयलक। कालन्‍तर मे इएह साहित्यिक विधादिक रूप मे विकसित भेल। विविध मांगलिक अवसर जेना व्रत-त्‍यौहार, धार्मिक, सांस्‍कृतिक लोकोतसव इत्‍यादिक विशेष परिस्थिति मे विभिन्‍न प्रक्रियादि सँ उद्भूत सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक आ साहित्यिक चेतनाक परिणाम थिक मैथिली लाक-नाट्य। मिथिला और मैथिली साहित्‍यक ऐतिहासिक ग्रन्‍थों के अवगाहन सँ ज्ञान होइछ जे मिथिला पर अनेक राजवंश शासन कयलक जाहि मे तीन राजवंश क शासक लोकति मे कर्णाट राजवंश (1097-1324), ओइनवार राजवंश (1353-1526) आ खण्‍ड वला राजवंश (1556-1947) प्रमुख छथि। कर्णाटवंशीय राजा लोकतिक छत्र-छाया मे मैथिली साहित्यिक साहित्‍यकार लोकति केँ प्रोत्‍साहन भेटबाक प्रक्रिया प्रारम्‍भ भेल। ज्‍योतिरीश्‍वर ठाकुर एही राजवंशक छठम राजा महाराज हरिसिंह देवर (1443-1444) क सभासद रहथि। ओइनवार वंशक शासनकाल मे मैथिली साहित्‍यक विकास अत्‍यन्‍त दुतगतिऍं भेल, कारण एहि राजवंशक राजा लोकति केँ साहित्‍यक प्रति अधिक अभिरूचि छलनि जकर फलस्‍वरूप साहित्‍य मनीषी लोकतिकेँ कतेक राजा लोकति प्रोत्‍साहित कयलनि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि कवीश्‍वर चन्‍दा झा आ महाकविलास दास आ साहित्‍य रत्‍नाकर मुंशी रघुनन्‍दनदास (1860-1945)। ई साहित्‍य मनीषी लोकतिक रचनादि मे सर्वथा आधुनिकताक शुभारम्‍भ होइत अछि। सर्व प्रथम प्रामाणिम पुस्‍तक जे खॉटी मैथिली मे अछि आ थिक ज्‍योतिरीश्‍वर ठाकुरक ‘वर्णरत्‍नाकर’ आ ‘धूर्तसमागम’  (1960)। ई दुनू पुस्‍तक चौदहम शताब्‍दीक आरम्‍भ मे लिखल गेल छल। वर्णरत्‍नाकरक विषय मे सन् 1901 ई. मे बंगाल ए‍शियारिक सोसायटीक सचिव केँ महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री सूचना देने रहथि। प्रथमे प्रथम एकर प्रकाशन डा. सुनीतिकुमार चटर्जी (1890-1977) आ पण्डित बबुआजी मिश्र क संयुक्‍त सम्‍पादक ख मे एकर प्रकाशन भेल छल। अपन रिपोर्ट मे महामहोपाघ्‍याय डा. हरप्रसाद शास्‍त्री कहने रहथि, ‘ई ग्रन्‍थ काव्‍य नहि, काव्‍योपयोगी ग्रन्‍थ कहि सकैत छी। यदि ज्‍योतिरीश्‍वर वास्‍तव मे इच्‍छापूर्वक काव्‍य ग्रन्‍थ लिखितथि तँ एकर स्‍वरूप आन रूपक रहैत, मुदा वर्णनक अवसर पाबि ग्रन्‍थकारक सहज कवित्‍व प्राय: नहि मानलक आ लाख रोकनहु पर सेहो कस्‍तुरी मोदक समान प्रकटभ’ गेल। स्‍थल-स्‍थलक वर्णनकेँ देखिक’ कादम्‍बरी प्रभृति संस्‍कृत गद्य-काव्‍यक स्‍मरण भ’ जाइत अछि। एहि प्रकाश्क उन्‍नत गद्य-साहित्‍य केँ देखिक’ अनुमान होइत अछि जे एहि सँ चारि-पॉंच शताब्‍दी पूर्व मिथिला भाषा मे नियचये साहित्‍य रचना प्रारम्‍भ भ’ गेल छल। अनेक अनुच्छिट उपमादिक संग्रह. भाषा-उपभाषाक उल्‍लेख द्वारा भाषा-विज्ञान सम्‍बन्‍धी अनेक सामग्री, ओहि समयक सामाजिक तथा साहित्यिक विचारक भण्‍डार, ओहि समयक वर्णन-शैली इतयादि विशेषताक विशद रूप एहि ग्रन्‍थ मे उपलब्‍ध अछि। प्रतिपाद्य गद्य ग्रन्‍थ भावी कवि आ कत्‍थक लोकतिक क हेतु एकपथ प्रदर्शक ग्रन्‍थ बनायब छल जेना जँ नायकक वर्णन करबाक होतॅ कोन-कोन विषयक उल्‍लेख करब उचित, जँ नायिका वर्णन करबाक होतँ कोन-कोन विषयक निरूपण करब आवश्‍यक अछि। ई ग्रन्‍थ सातकल्‍लोल मे विभाजित अछि जेना नगस्‍वर्णन, नायिका वर्णन, आस्‍थान वर्णन, ऋतु-वर्णन, प्रयानक वर्णन, भट्टादि वर्णन आ श्‍मशान वर्णन। सबसँ महम्‍वक बातईथिक जे ई पुस्‍तक गद्य मे अछि तथा उत्‍तर भारतक कोनो भाषा साहित्‍य मे एतेक प्राचीन ग्रन्‍थ नहि भेहैत अछि। जखन दोसर-दोसर प्रान्‍त अपन भाव प्रकाशनक लेल कोनो साहित्यिक माघ्‍यमक अभाव मे अन्‍धकार मे टापर-टोइया द’ रहल छल, तखन मैथिली एक पूर्ण भाषा क रूप मे विकसित भ’ गेल छल जाहि सँ समाजक स्‍वरूप केँ प्रकट कयल जाय सकय। ई कोनो लोकप्रिय भाषाक प्रधान विशेषता है। वर्णरतनाकर एकर सटीक उदाहरण थिक। ज्‍योतिरीश्‍वरक दोसर रचना संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाटक थिक ‘धूर्त समागम’ । ई नाटक जतय मैथिली कविता आ नाटकीय परम्‍पराक द्योतक थिक, ओतहितत्‍कालीन समाजक चित्र अंकित कयलनि अछि जनिक चातु:शालक चारू भाग कतहु महींस बान्‍हल अछि, कतहु बाछा-बाछीक संगपुष्‍ट थन्‍त्‍वाली गाच एम्‍हर-ओम्‍हर जा रहल अछि, कतहु दासी सुन्‍दर भवनक प्रागंण मे मन्‍द-मन्‍द गति सँ अवगार्हन क’ रहल अछि। वर्णरत्‍नाकर आ धूर्तसमागम क रचना नोकभाषाक आलोकमय भविष्‍यक सूचक छल। भाषा-साहितयक एहि अभ्‍युदय आ विकासक कोनो साहित्यिक प्रेरणाक परिणाम नहि कहल जा सकैछ, प्रत्‍युत ई तँ साहित्यिक जडवाद सँ असन्‍तुष्‍ट जनताक स्‍वाभाविक प्रवृतिक प्रकाशन छल। भाषा मे फूटैत कवि-प्रतिभा जरमन राजा लोकति केॅा चमत्‍कृत कयलक तखन हुनक संरक्षण एवं प्रोत्‍साहनक फलस्‍वरूप भाषा-काव्‍यक विकास भेल। ई विकास एहि बातकद्योतक जे लोक भाषा केँ साहित्यिक गौरव सॅ विशेष अवधि धरि वंचित नहि कयल जा सकैछ। जे सामान्‍य जनमानसक व्‍यापक भाषा बनिगेल ओहि मे व्‍यवहारोपसोगी एवं ललित दुनू प्रकारक साहित्यिक सृष्टि अवश्‍य हैत। मैथिली साहित्‍यक इतिहासक इतिहासक अवलोकन कयला सँ एकर स्‍पष्‍ट बोध होइछ। वस्‍तुत: ज्‍योतिरीश्‍परक रचनादि मैथिली गंगाक ‘हरद्वार’ थिक जतय ओ लोक भाषाक सामान्‍य धरातल पर उतरि क’ पूर्ण वेग सँ प्रवाहित होमच लागल एकर पश्‍चात् उमापति उपाघ्‍याय सर्वाधिक लोकप्रिय नाटककार भेलाह जनिक ‘पारिजातहरण’नाटकऍं असमक शंकरदेव (1499-1568) आत्‍यधिक प्रभावित भेलाह। मैथिली साहित्‍य केँ ई सौभाग्‍य अछि जे ओइनवार वंशक शासनकाल मे एक एहन प्रतिभासम्‍पन्‍न व्‍यक्तित्‍वक प्रादुर्भाव भेल जनिक काव्‍यप्रतिभा अमर भ’ गेल आ ओ मात्र मिथिला धरि सीमित नहि रहल ; प्रत्‍युत पूर्वान्‍चल मे बंगाल, आसाम आ ओडिसा धरि ख्‍याति अर्जित कयलक आ समस्‍त भारतवर्ष मे लोकप्रियता अर्जित कयलनि ओ रहथि विद्यापति। हिनक ग्र्न्‍थक विषय-वैविघ्‍यकेँ देखला सँ ज्ञात होइत अछि जे ओ केवल कविए नहि, प्रत्‍युत सर्वतोमुखी प्रतिभासँ समलंकृत सच्चिन्‍तक रहथि। ओ एकहि संग शास्‍त्रकार, राजनीति-विशारद, इतिहासकार, भूवृतान्‍त लेखक, अर्थशास्‍त्राविद्, नीतिशास्‍त्र विचक्षण, धर्म-व्‍यवस्‍थापक, निबन्‍धकार, शिक्षक, कथाकार, संगीतज्ञ आपुरूषार्थ पुजारी रहथि। ई निम्‍नस्‍थ संस्‍कृत ग्रन्‍थादिक रचना कयलनि यथा- भूपरिक्रमण (1976), शैवसर्वस्‍वसार (1815), लिखनावली (1969), दुर्भाभक्तिरडि;णी (1902), शैवसर्वस्‍वसार (1980), शैव सर्वस्‍वसार पुराण-भूतसंग्रह (1981), गंगावाक्‍यावली (अप्रकाशित), संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित रचनादि मे त्रिभाषिक नाटक गोरक्षविजय (1960) आ मणिमन्‍जरी (1966) आ अवहटट् रचनादि मे कीर्तिलता (1924) एवं कीर्तिपताका (1960) थिक । विशुद्ध मैथिली मे ई पदावलीक रचना कयलनि जकर उपलब्‍धताक स्रोत थिक नेपाल, मिथिलाम्‍पलक अन्‍तर्गत रामभद्रपुर, तरौनी एवं राग तरडि;णी आ बंगालक अन्‍तर्गत क्षणदा गीत चिन्‍तामणि, पदामृतसमुद्र, पदकल्‍पतरू, कीर्तनालल्‍द आ संकीर्तनामृत तथा लोककण्‍ठक पद। एहि पदक संख्‍या एक हजार पॉंच सयक लगधक अछि। यद्यपि हिलक अधिरकांश रचनादि प्रकाश मे आबि गेल अछि तथापि गंगावाक्‍यावली, गयापतलक आ वर्षकृत्‍य पुस्‍तकाकार प्रकाशन नहि भ’ पाओल अछि। ई पीडा दायक स्थिति अछि जे हिनक रचनादि एतेक लोकप्रिस मेल तथापि हिलक समग्र रचनादिक प्रकाशन ग्रन्‍थावली वा रचनावलीक रूप मे अद्यापि प्रकाशित नहि भ’ पाओल अछि। वस्‍तुत: एहन प्रतिभासम्‍पन्‍न महाकविक कृतिकेँ घ्‍यान मे राखि अद्यापि साहित्‍य चिन्‍तक लोकति जतेक अपुसन्‍धान आ आलोचना प्रज्ञतुत कयलनि अछि ओकरा एकांगी कहल जा सर्केछ ले ओ पुरूषार्थ कवि रहथि जे अपन कृति आदि मे कोनो-ने-कोना रूप सॅ ‘पुरूषार्थचतुष्‍टय’क प्रतिपादण कयलनि अछि। हिनक सम्‍पूर्ण कृतिक मुख्‍य उद्देश्‍य अछि पौरूष। विद्यापति अपन कृति सभ मे मानवक उदारता, वीरता, धीरता, साहसिकता, निर्भीकता, स्‍पष्‍टता, कर्तव्‍यपरायणता, बुद्धि आ ज्ञानवर्द्धक सभ साधन पर बल देलनि अछि जे सामाजिक आ सांस्‍कृतिक वातावरणक निर्माण मे समान रूपसँ सहयोग प्रदान क’ समय। जाहि मानव मे पर्युक्‍त गुणक अभाव अछि जे हुनका दृष्टि मे अयलनि तकर ओ अपहास कयलनि। पुरूषार्थ चतुष्‍टय क दृष्टिएँ हिनक समग्र कृति हिनक नवोन्‍सेषशालिनी प्रतिभाक विपुल-वैठुण्‍यक परिचय दैत अछि। लोक मे स्‍व-धर्म आ राष्‍ट्र-धर्म क सुरक्षा क भावना ओ संचारित आ ओकरा पल्‍लवित पुष्पित करय चाहैत रहथि। अपन समग्र पदावली मे ओ अतीव मृदुलता, जनजीवन मे सुसुप्‍त मधुर-भाव केँ जगयबाक क्षमता मिथिलाक जनमानस मे अभिहिंत हैबाक कारणेँ ई सर्वाधिक लोकप्रिय भेल। विद्यापति अपन साहित्‍य-साधनाक माघ्‍य मे मैथिली-साहित्‍य भंडार केॅा भरबाक लेल अनेक विधा करचनाकयलनि। हिनक एक-एक रचना मैथिलीक अमूल्‍य-निधि थिक जाहि मे एक भाग श्रंृखगारिकताक आभास भेटैछ तँ दोसर भाग भक्तिक, मुदाविद्यापतिक समग्र कृति पर जखन प्रत्‍यक्ष रूप सॅ विचार करैत छी तखन स्‍पष्‍ट भ’ जाइठ जे भारतीय-चिन्‍तन-धारासँ प्रभावित भ’ कए ओ पुरूषार्थ-चतुष्‍टयक उदेदश्‍यसँ समग्र रचनादि कयते रहथि। एहि प्रकारेँ विद्यापति मैथिली-साहित्‍य मे जे परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलनि ओकरा परवर्ती कवि लोकति अपनाक’ रचना कयलनि। विद्यापतिक समसायिक उवं यपरवर्ती कविलो‍कति एहि साहित्‍यक बहुमूल्‍य सेवा कयलनि। हिनक समसामयिक कवि लोकति मे भवानीनाथ (1375-1450), अमृतकर (1450-1500), चन्‍द्रकला (1400-1475), कंसनारायण (1475-1528), गोविन्‍द कवि (1450-1530), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), नवकवि यशोधर (1500-1550), जीवनाथ (1500), दस-अवधान (1500), सदानन्‍द 1550), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्‍याम सुन्‍दर (1500), भीषम (1600), चतुर्भुज (1575-1640), श्‍याम सुन्‍दर (1500), हरिदास (1609-1950), गंगाधर (1600) श्रीनिवास मल्‍ल (1640) इत्‍यादि उल्‍लेखनीय छथि। (अगिला अंकमे जारी) भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)- (आगाँ) अंक 1 दृश्य : 3 लेखिका - विभा रानी पात्र - परिचय मंगतू भिखारी बच्चा 1 भिखारी बच्चा 2 भिखारी बच्चा 3 पुलिस यात्री 1 यात्री 2 यात्री 3 छात्र 1 छात्र 2 छात्र 3 पत्रकार युवक पत्रकार युवती गणपत क्क्का राजू - गणपतक बेटा गणपतक बेटी गुंडा 1 गुंडा 2 गुंडा 3 हिज़ड़ा 1 हिज़ड़ा 2 किसुनदेव रामआसरे दर्शक 1 दर्शक 2 आदमी तांबे स्त्री - मंगतूक माय पुरुष - मंगतूक पिता भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) अंक 1 दृश्य : 3 (प्रकाश मंगतू पर। ओ अखबार पढ़ि रहल अछि। पढ़ैत-पढ़ैत पसेने पसेने भ' जाइत अछि। ओ मुंह पोछैत, एम्हर-ओम्हर देखै छै.. फेर अटकि-अटकि क' पढ़ैत अछि..) मंगतू :   नवयुवती के साथ बलात्‌.. चार युवक.. नशे में.. भाई भी.. दो गिफ्तार.. दो अभी भी फरार.. (पसेना पोछैत अछि। हकला क' घबड़ाहटि मे बजैत अछि) माने.. काल्हि.. कविता.. गणपत कक्का.. राजू.. (माथ पकड़ि लेइत अछि) बहीनक रखवार अपने स' ओकरा परोसि देलकै गिद्घक सोझा.. (चिकरैत अछि) .. कक्का, गणपत कक्का.. (आवाज सुनि किछु छात्र, किछु यात्री ओम्हर अबैत अछि सभ पूछैत अछि -- की भेलौ रौ? सपना देखै छही की? दिने मे सपना.. हँ, एकरा करैये के की छै? चौबीसो घंटा, आठो पहर सूतल रहौ,.. हमरा आओर जकाँ नञि छै ने.. छिछियाइत फिरू।) (मंगतू कानि रहलए। कखनो अखबार स' माथ पीटैत अछि, कखनो बेबसी मे अपन केस नोचैत अछि।) मरियो नञि जाइ छी हम। एहेन देह, एहेन जिनगी, एहेन समाज.. मरि कियै नञि जाइ छी हम। रे दैब.. आह रे दैब! कक्का यौ, गणपत कक्का..? (भीड़ के काटैत गणपत बहिराइत अछि। मंगतू ओकरा देखतही भरि पांज ध' लेइत अछि आ कनैत अछि। कक्का पीठ-माथ सोहरबैत ओकरा भरोस दियबैत अछि।) मंगतू :   कक्का.. काल्हि.. काल्हि.. गणपत :  की भेलौ बेटा? मंगतू :   कक्का.. कविता.. काल्हि.. गणपत :  कत्त' घुरलौ बाऊ। दुनू मे स' किओ नञि। आँखिए मे राति कटलए। मंगतू :   कविता आब नञि आओत कक्का.. (गणपत प्रश्नवाची दृष्टि स' ओकरा देखैत अछि.. मंगतू अखबार ओकरा दिस बढ़ा देइत छै। गणपत अनपढ़क मुद्रा मे अखबार उनटैत-पुनटैत अछि.. एकटा यात्री अखबार ल' क' पढ़ैत अछि.. खबरि सुनि गणपत थहराक' खसैत अछि.. मंगतू फेर भरि पाँजि ओकरा ध' लइत अछि।) गणपत :  (विक्षिप्त जकाँ) रौ दैब रौ दैब.. मौगत द' दे रो दैब.. आब हम जीबि क' की करब.. (मंगतू के झोरि क') कहै छले ने तों जे हम सभ घर-दुआर, बाल-बच्चेदार, परिवारबला आदमी सभ छी। देख लेले नें? ईहे अछि घर आ ईहे अछि धिया-पुता। गै कविता गै.. हमर सोन सन बेटी गै.. रौ रजुआ.. रौ तोरा नरको मे ठौर नञि भेटतौ रौ.. (पुलिसक सायरन बजै छै.. सभ यात्री ओत' स' हटि क' बस स्टैंड लग ठाढ़ भ' जाइत अछि। किओ घड़ी देखैत अछि, किओ मोबाइल करैत अछि, किओ चोर नजरि स' मंगतू-गणपत दिस देखैत अछि, किओ अखबार स' पंखा करैत अछि.. छात्रक एक गोट टोली मे खुसर-फुसर करैत अछि।) (पहिला दृश्यबला पुलिस अबैत अछि.. डंडा डोलबैत..) पुलिस :  रौ, गणपत तोंही छें? गणपत :  जी हुजूर। पुलिस :  चल थाना.. गणपत :  हमर कसूर हुज़ूर। पुलिस    सार नहिंतन! बेटी स' धंधा आ बेटा स' भड़ुआगिरी, आ पूछै छें.. चल थाना.. पता चलतौ जे की छौ तोहर कसूर.. (पकड़ि क' ठेलैत- ठालैत ल' जाइत अछि।) मंगतू :   साब! साब, हिनका छोड़ि देल जाओ। ई निर्दोख छथि। पुलिस :  (मंगतू के लात लगबैत) त' तोंही चल। रौ डाँड़ मे छौ बूता छौंड़ी सभ लेल! हट सार! (मंगतू फेर बीच-बचावक प्रयास करैत अछि। पुलिस डंडा बरसाबइत ओकरा ठेलि देइत अछि। मंगतू मुंहक भरे खसल रहि जाइत अछि। पुलिस गणपत काका के पकड़ि क' ल' जाइत अछि। यात्री, जाहि मे किछु छात्र सभ सेहो छथि, बिटर-बिटर तकैत रहैत छथि। पुलिस के गेलाक बाद) यात्री 1 :  बाप रौ बाप! एहेन कलजुग! बापे बेटीबेच्चा। यात्री 2 : अहूँ त'! जे पुलिसबाला कहि देलकै, पतिया लेलहुँ ने! यात्री 3 : पुलिसक बात आ चूल्हिक पाद एक सन! छात्र 1 :  एतेक घमर्थन क' रहल छी। जहन पुलिस बुढ़बा के पकड़ि क' ल' गेलै, एकरा (मंगतू दिस) एतेक मारलकै, तहन त' नञि फ़ूटल बकार॥ पुलिस के जाइते देरी कि सभक लोल एक-एक हाथ नमगर भ' गेलै। यात्री 1 :  रौ, पुलिसक सोझा बाजक कोनो मतलब छै। छात्र 2 : त' एखनि बाजबाक कोन अर्थ? यात्री 2 : हे रौ, बूझल जे हम सभ किछु नञि बाजल। तों सभ त' छलें, युवा शक्ति, छात्र शक्ति! तोहें सभ कियैक ने बाजलें रे! यात्री 1 :  (मंगतू दिस) हम सभ त' बाउ रौ, जिनगीक दोग मे फँसल बूँट छी। सेठ साहूकार कैंचीक मध्य फँसल कापड़ि। पुलिस-दारोगा करबाक समय कत'? छात्र 2 : जहन अपना पर आओत तहन? यात्री 3 : तहन देखल जेतै। छात्र 3 : माने अपना पर पड़ल मोसीबत पहाड़, आ आनक फूसि-फासि? यात्री 1 :  तैं ने कहलियौ रौ भाय जे तों आओर त' छें छुट्टा बरदि। ने घर गिरस्थीक चक्करि ने नौकरी पातीक झंझटि, ने बाल-बच्चाक पिरसानी। ऊपर स' नेता बनबाक मोका फ्री-फंड मे। (बस देखैत.. हे हमर बस आबि गेल' कहैत चढ़बाक अभिनय करैत अछि। चढ़ि गेलाक बाद सोर पारिक' छात्र के कहैत अछि -) रौ, मोन राखिहें हमर गप्प। की ठेकान, छात्र नेता स' मुख्य मंत्री आ फेर केंद्रीय मंत्री भ' जेबें। घरोवालीक निस्तार भ' जेतौ। हे ले (पाइ फेंकैत अछि..) ऊ भिखमंगाक दबाई करबा दिहें। (छात्र सभ तमतमाएल ठाढ रहैत छथि, अन्य यात्री सभी हंसैत अछि। किओ ठहाका पारि क', किओ मुंह तोपिक! किओ मुसिकियाइत पेपर पढ़बाक त' किओ समय देखबाक अभिनय करैत अछि। सभक बस एकाएकी अबैत छै, सभ ओहि मे सवार भ' भ' चलि जाइत अछि। जाए स' पहिले सभ किओ चवन्नी, अठन्नी, सिक्का मंगतू दिस फेंकैत अछि आ छात्र आओर के इलाज क तगेदा करैत अछि।) छात्र 1 :  ओह! रहब मोश्किल भ' रहल छै! मोन उजबुजाइय ई सभ देखि क'। छात्र 2 : सपना देखै छी, देखैत रहै छी। कहियो किओ सपना देखल त' आइ देश आजाद भेल। आजाद देश लेल सपना देखल जे सभके जीबाक, रहबाक, काज करबाक समान अधिकार अछि। किओ भूखल-पियासल, बेरोजगार नञि रहत। पढ़ाई रोटीए जकाँ अनिवार्य रहतै। मुदा भेटलै की? आजादीक एतेक बरखक बादो वएह भूख, गरीबी, बेरोजगारी.. छात्रा 1 : भ्रष्टाचार, बेईमानी, सत्ताक अपराधीकरण। जिनगी जीबाक विवश्ता.. मंगतू :   (कने जोरगर आवाज मे, जाहि स' छात्र सभ सुन सकथि।) रौ हाथ-गोर रहितहु कियैक एना बाजि रहल छें। (छात्रक ध्यान ओकरा दिस जाइत छै। ओ सभ ओकरा ल'ग अबैत अछि) छात्र 1 :  भाई, हाथे-गोर रहला स' समस्याक समाधान नञि भ' जाइ छै। छात्र 2 : सभ ठाँ पाई चाही, पैरवी चाही। देख भाई, लोक आओर हमरा सभ के कहै छथि जे हम सभ युवा शक्ति छी, देशक भविष्य छी। छात्र 3 : रौ, वास्तविकता त' अछि जे हमरा आओर के अपने नञि बूझल अछि अपन भविष्य। छात्र 1 :  माय-बाप सपना काढ़ै छथि जे बेटा सभ पढ़ि-लिख क' हमर दुख दूर करत। छात्र 2 : हम सभ त' हुनकर दुखक भीजल चिपरी मे चिनगी लगाक' आबि जाई छी, रसे-रसे सुनगैइत रहू। छात्र 3 : करैत रहै छी - अपन अरमानक खून, माय-बापक सपनाक हत्या। रौ, तों त' खाली देहे स' अपाहिज छें। ई व्यवस्थाक हाथे हम सभ त' तन-मन दुनू स' अपाहिज छी। मंगतू :   मुदा भाई, ई व्यवस्था की छै। ककर छै, के बदलत? छात्र 1 :  (रोब स') हे, नेता जुनि बन। दू अच्छर अखबार पढ़िक' अपना के प्रधानमंत्री नञि बूझ। (पहिलुका पत्रकार युवक-युवतीक प्रवेश) युवक :   अरे वाह, आई त' एकरा लग छात्र सभ सेहो अछि। गुड। चलू, एकरो आओर के कवर क' लेइत छी। युवती :   हम त' आइ काल्हि रोजे देखै छी, किओ न किओ एकरा लग बनले रहैत छै। युवक :   ई छैहे तेहेन कमालक चीज। हाथ नञि, पएर नञि, घर-परिवार नञि, शिक्षा-संस्कार नञि । तइयो पढुआ छै, अखबार पढ़ै छै। चिट्टी-पत्री लिखै-पढ़ै छै। (दुनू सटि क' ओकरा आओरक गप्प सुनैत छथि। छात्र सभ मंगतू लग स' हटि क' बस स्टॉप दिस बढ़ैत छथि।) छात्र 1 :  कह' लेल जे कही। भने ओकरा झलकारि दही। हमर गप्प मे सेहो तों सभ दर्शन ताक' लाग। मुदा, कखनो लगैत अछि जे एकरे जकाँ हम आओर सेहो भेल जाइ छी। लोक आओर भेल जाइत अछि, देश-दुनिया बनल जाइत अछि। छात्र 2 : रौ बाप, हे, पहिनहीं परीक्षा खराब भ' गेल अछि। आब ई दर्शन-तरसन छाँटि क' माथ नञि खराब कर। छात्र 1 :  सुन त'! एकरा देखिक' तोरा नञि बुझाइ छौ जे एकर देह-देह नञि, ई समाज आ ओकर व्यवस्था छै। ई समाज, ई व्यवस्थाक माथ छै, माथ मे दिमागो छै, जे सोचैत त' छै, मुदा किुछ करै नञि छै। करबाक लेल सक्रियताक हाथ-गोर चाही, जे एकरे जकाँ ओकरो नञि छै। तैं एकरे जकाँ पड़ल रहै छै - लोथ भेल। छात्र 3 : (छात्र 2 आ 3 माथ ठोकैत छथि।) गेलौ रौ गेलौ। पूरमपूर गलौ। आब ई हमरा आओर के त' पकेबे करतौ, तोरो आओर के नञि छोड़तौ। (युवक-युवती के देख) नीक भेल। आबि गेलहुँ। सुनू आब अरस्तूक गप्प। (दुनू तेजी स' निकलि जाइत अछि। छात्र 1 ओही ठाँ अछि।) युवक :   देखू! पत्रकार छी हम आओर आ पत्रकार जकाँ बतियाइत छथि ई आओर। युवती :   हमरा आओर त' छात्र सभक संगे ओकरा कवर कर' चाहै छलहुँ। युवक :   से त' रहिए गेल। युवती :   ई एकटा अछि ने! एकरे कवर क' लेइत छी। युवक :       (चिढ़िक') त' निकालू साड़ी आ क' लिय' कवर। युवती :   शटअप! फालतू गप्प नञि करी। हमर संग साथ नञि नीक लगैत अछि त' अहाँ जा सकै छी। हम अपन काज क' लेब। युवक :   ककरा संगे? ऊ लोथक संगे की ई देशक भविष्यक संगे। युवती :   (चिकरैत) बंद करू ई बकवास। अहाँ जर्नलिस्ट छी। बूझै छी जर्नलिस्टक माने? (ओही उत्तेजना मे) जर्नलिस्ट माने उन्नत विचारक स्वामी, खुलल दिल आ दिमागवाला व्यक्ति, जनताक विचार वहन कर' बला, व्यवस्थाक छेद मे आंगुर द' क' देखाब' बाला। मुदा अहाँ त' ईर्ष्या आ द्वेष स' जरैत संठी छी मात्र। दुर्गंध स' भरल तौला। दुनियाक चौथा आवाजक नाम पर भड़ुआगिरी कर' बला। छि:। (युवक नाराज भ' क' यवती दिस घूरैत अछि। युवतीक चिकरब सुनि बाहर गेल दुनू छात्र घूरि अबैत अछि। छात्र 1 पहिनही स' अकबकाएल बेरी-बेरी स' दुनू युवक-युवती के देखैत अछि। युवक-युवतीक हाथ घीचि क' मंच क दहिना भाग मे ल' जाइत अछि। छात्र सभ मंचक बाम दिस छथि आ मंगतू बीच मे। मंच पर अत्यन्त मद्घम प्रकाश। अचानक युवक-युवती पर हाथ उठबैत छै। सभ चौंकि उठैत अछि। युवती खसल अछि। मंगतू हड़बड़ाक' ओम्हर बढ़बाक प्रयास करैत अछि, मुदा खसि पड़ैत अछि। छात्र सभ युवकक चेहरा देखि ओहि ठाँ थकमकाएल रहि जाइत छथि। पार्श्र्व स' समवेत स्वर में ईको साउन्ड इफेक्ट मे ई पंक्ति चलैत अछि।) किओ किछु नञि क' सकैत अछि। किओ किछु नञि कहि सकैत अछि। बिकाएल बजार मे मानवताक मूल्य बंधक अछि माथ हाथ गोर भांगल, धड़ शिथिल जागू, जागू, तखने होएत विहान नव सूरज रचत इतिहासक नव काल खंड। (प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होइत अछि।) (मध्यांतर) (अगिला अंकमे जारी) डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप में विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे में कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) वस्तुतः अपन रचनामे कोनो पात्राक सृजन केलाक बाद जँ रचनाकार ओकर स्वामी बनि जाइ छथि, चरित्राक सहज विकास नहि होअए दै छथि, तँ ओ रचना सामान्यतया असफल भ' जाइत अछि, अपना समयक यथार्थसँ पृथक रहि जाइत अछि, रचनाक सत्य आ नायकक आचरण समाज सापेक्ष नहि भ' पबैत अछि। मुदा राजकमल चौधरीक रचनाक नायक-नायिका आ तकर सहयोगी पूर्ण रूपें स्वतन्त्रा रहैत अछि, स्वेच्छाचारी नहि। ओकर चारित्रिाक विकासमे राजकमल चौधरीक नियन्त्राण ओतबे रहैत अछि, जतबा घूमैत चाक पर राखल माटि पर कुम्हार नियन्त्राण रखैत अछि। अपन ब्रह्माक मात्रा एतबहि टा नियन्त्राण पाबि ओ पात्रा आ रचना महान भ' जाइत अछि। जेना आदिकथा आ आन्दोलन महान भेल अछि; आदिकथाक देवकान्त आ सोना मामी; आन्दोलनक कमलजी, भुवनजी, नीलू, निर्मला, सुशीला महान भेल छथि। आन्दोलनक प्रमुख पुरुष पात्रा छथि--विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी, नरेन्द्र झा, चन्द्रशेखर बाबू, हेम बाबू, सुदर्शन जी, भुवनजी, कमलजी आदि। किछु अनाम-सुनाम सामूहिक पात्रा सेहो छथि, जे अवसर-बेअवसर अपन वक्तव्यसँ, आ अपन क्रिया-कलापसँ अपन चरित्रा आ मानसिक स्तरक परिचय दै छथि। विष्णुदेव ठाकुर, मोदनारायण जी आ चन्द्रशेखर बाबूक उपस्थिति कथा विस्तारमे ठाम-ठीम होइ छनि, मैथिलोचित प्रवृत्ति आ दुष्टतासँ परिपूर्ण छथि, एकर अलावा कोनो विशेष उल्लेखनीय योगदान हिनका लोकनिक नहि छनि। हेम बाबू सेहो तेहने प्रासंगिक पात्रा छथि, मुदा निर्मला सन उद्धत यौवना बेटीक पिता छथि, विधुर छथि। आत्म-प्रशंसासँ ग्रस्त छथि, अपन बौद्विकता पर अपनहि गर्वित रहै छथि, बेटीक उग्र-आधुनिकाक छवि कोनो बेजाए नहि लगै छनि, दोसरक नीको काल अधलाह लगै छनि, सुझाव आ उपदेश देबामे अपनाकें दक्ष बुझै छथि, छिद्रान्वेषी छथि। मैथिल समितिक आयोजनमे पचीस टाका चन्दा द' कए एना मोन बनबै छथि, जेना भुवनजीकें कीनि लेलनि (पृष्ठ-३४)। नरेन्द्र झा मैथिल समितिक सक्रिय कार्यकर्त्ता छथि, भुवनजीक संग रहै छथि, मुदा परोक्षमे निन्दा करब स्वभाव छनि। निर्मलाक बासा पर जएबामे मोन लगै छनि, मुदा हुनका दुष्चरित्रा कहबामे रस लगै छनि (पृ. ३९-४०)। मैथिल जातिक आम वृत्ति--चुगलखोरी आ दुष्टाचरण पर एहि उपन्यासमे पर्याप्त दृष्टि देल गेल अछि (पृ.१७)। पात्राक वक्तव्य आ आचरणसँ चरित्राक सम्पूर्ण छवि अंकित करबाक महारत राजकमल चौधरीक लेखनमे सगरो देखाइत रहैत अछि। सुदर्शनजी सन मातृभाषानुरागीक अवतारणा उपन्यासमे थोड़बे काल लेल भेल, मुदा ओतबहि कालमे उपन्यासकार हुनकर विराट छवि ठाढ़ क' देलनि। परम उत्साही, क्रियाशील आ विद्रोही व्यक्तित्वक एहि युवक द्वारा स्कूलमे भाषा सम्बन्धी रीति पर वक्तव्य जारी करब, प्रतिक्रिया देखाएब, एकटा विराट परिदृश्य दिश इशारा करब थिक। स्कूली शिक्षाक भाषा माध्यम आ शिक्षक-शिक्षार्थीक वार्तालापक भाषा माध्यम बड़ पैघ महत्व रखैत अछि। स्कूलमे शिक्षक लोकनि जखन मैथिलीमे गप करनि, तँ हुनका ओ अपन पिता, पितृव्य, भाइ सन लगैत रहनि। मुदा जखनहि आन बोली-बानीक लोक अध्यापक बनि स्कूल अएलनि आ ओ हिन्दीमे गप करए लगलनि, हठात्‌ ओ अदना बुझाए लगलनि, मातृभाषा विरोधी लागए लगलनि (पृ. ५४-५५)।  मातृभाषा लेल बुनियादी क्रान्तिक संकेत एहि अंशमे देल गेल अछि। सुदर्शनजीक हृदयमे क्रान्तिक आगिएना धधकै छनि जे बीचहि सभामे निर्मलाजीसँ बहस क' लेलनि--नइं निरमल दीदी!...शान्तिक कविता नइं, मात्रा क्रान्ति हमरा सभकें चाही, आन्दोलन चाही(पृ. ५३)।... एहि छोट सन उपन्यासमे ततेक बातक संकेत देल गेल अछि, जे सूइक नोक बराबरि फाँक कतहु नहि देखाइत अछि। वस्तुतः सन्‌ १९४७सँ १९६७ धरिक समय मिथिला लेल विचित्रा सन छल। स्वातन्त्रयोत्तर कालक भारतीय परिदृश्यमे मैथिल, मैथिली आ मिथिला ठकमूड़ी लगा क' बैसल छल। मिथिलाक जे सेनानी, सब किछु छोड़ि संग्रामक सिपाही बनल छल, तकरा पमरियाक तेसर बूझल जाए लागल, ओकर कोनो मानि-मोजर नहि देल जाइ छल। मिथिलाक जे व्यक्ति शासनमे गेल, से नंगरडोलाओन धन भ' गेल। ओकरा लेल मातृभाषा मैथिलीक उपेक्षा कोनो अर्थें उद्वेलनक विषय नहि छल। भाषाक महत्वसँ ओ परिचित नहि छल। ओहेन आत्मकेन्द्रित जन प्रतिनिधि मातृभाषा आ जनपदीय संस्कृति लेल कोन संघर्ष करितए?... स्वातन्त्रयोत्तर कालीन तीन दशकक मैथिली रचनाकारकें ई सब किछु भारी बोझ जकाँ निमाहए आ सँवारए पड़लनि। स्थानीय रूढ़ि निपटानक जटिल दायित्वसँ संघर्ष करैत भाषाई जागरूकता उत्पन्न करबामे, आ आन्दोलनक छद्मसँ सर्वसाधारणकें सावधान करबामे...तल्लीन रहब बड़ दुर्वह काज छल। आन्दोलन उपन्यास ताहि क्रममे महत्वपूर्ण भूमिका निमाहने अछि। भुवनजी एहि उपन्यासक अत्यन्त उदार, निविष्ट आ सहज चरित्राक पात्रा छथि। उपन्यासक मुखर पक्ष थिक आन्दोलन, तकर नायक इएह छथि। मुदा, जें कि आत्मकथात्मक शैलीमे ई उपन्यास लिखल गेल आ कथावाचक कमलजी भ' गेलाह, भुवनजी गौण पड़ि गेल छथि। बहुत रोचक ढंगें उपन्यासकार भुवनजीक चरित्रा ठाढ़ केने छथि--धीर, गम्भीर, शान्त, उदार।... कलकत्ताक पैघ कम्पनीमे कानूनी सहायक आ व्यापार संचालक छथि। मुदा मातृभाषाक प्रति प्रबल अनुराग छनि। मैथिल समिति आ मैथिली पत्रिाका लेल समर्पित व्यक्ति छथि, परोपकारी छथि, मैथिल लोकनि लेल बेस सहायक लोक छथि। ट्राम, बस, फैक्ट्रीमे सय-दू सय मैथिलकें नौकरी दिऔने छथि (पृ. ३४)। नीलू सन अनाथ बालिकाकें बेटी जकाँ रखने छथि (पृ. १४)। बेस बुझनुक, चिन्तनशील, युगीन परिस्थितिसँ आ परिस्थितिजन्य क्रिया-कलापसँ नीक जकाँ परिचित छथि। कमलजी जखन कोनो बात पर प्रतिवाद करै छथिन, तँ भुवन जी कहै छथि -- ई राजनीति थिकै कमलजी, एहिमे उचित-अनुचितक कोनो गप नहि कएल जा सकइए। मिथिला-आन्दोलनक लेल एखन एकटा नेता हमरा सबकें चाही, नामक नेता। जे सभामे गरजि सकए, शासक वर्गक आगाँ धुरझाड़ अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, फारसी चिकरि सकए। लोककें आतंकित क' सकए, एकटा बिहाड़ि सौंसे देशमे उठा सकए।... असली काज त' हम सब करबइ।... बिहाड़िमे उड़ैत ख'ढ़मे चिनगी त' हम सब लगेबइ (पृ. १५)। मातृभाषा आ जन्मभूमिक प्रति एहि तरहें समर्पित लोक, आन्दोलनकें सफल करबा लेल सफल मार्गक ज्ञाता, नीति-कुशल लोक, भुवनजीक नजरिमे कोनो पैघ काज लेल योजनापूर्वक काज करबाक परिदृश्य एना रचल जाइत अछि। एहेन निविष्ट आ नीतिज्ञ पुरुषक पत्नी महान कुरूपा, नितान्त अव्यवहारिक छथिन। समस्त भव्य छविक अछैत जीवन-परिदृश्यक एक खण्ड बेरंग छनि, मलीन छनि, श्रीहीन छनि। एहेन पत्नी संग कोनो सभा सोसाइटीमे नहि जा सकै छथि। कोनो सभ्य व्यक्तिक चौपालमे नहि बैसि सकै छथि...। भुवनजी सन विशिष्ट आ विराट व्यक्तित्व संग उठबा-बैसबाक लिलसा निर्मला सन सुशिक्षित, सुदर्शन, उद्धत यौवना स्त्रीकें होइ छनि। एहेन उदार देह आ उदार मोनक जवान स्त्रीक प्रति जँ भुवनजी सन परिस्थितिक लोक अनुरक्त होइ छथि, तँ से सहज सम्भाव्य थिक। मुदा अही बीच निर्मलाजीक परिचय कमलजीसँ होइ छनि आ निर्मला आब पुरान गाछक डारिसँ उड़ि कए नव डारि पर बैसए चाहै छथि, कमलजी दिश हुनकर अनुरक्ति बढ़ि जाइ छनि। भुवनजीकें ई बात पसिन नहि छनि, मुदा से व्यक्त नहि करए चाहै छथि। नहि चाहै छथि, मुदा व्यक्त भ' जाइ छनि (पृ. ४५)। वार्तालापक ई चमत्कार रोचक अछि।... वस्तुतः प्रेम, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्यक मार्गमे प्रतिद्वन्द्वी ठाढ़ हैब बड़ दुखदायी होइत अछि। एहि दृश्यक विकट-जटिल मनोविज्ञानक ओझराहटिकें जाहि सहजतासँ राजकमल चौधरी टिपने छथि, से रोमांचक अछि। सकल मैथिल समाजमे चर्चा अछि, जे निर्मलाजी भुवनजीक प्रेयसी छथिन, ताही आकर्षणमे भुवनजी हुनकर बासा पर जाएब आएब करै छथि। मुदा भुवनजी ई व्यक्त नहि होअए देताह, प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। लोकक मुँह बन्द करबा लेल भुवनजी निर्मलासँ दूरी बढ़ा लेताह, से नहि हेतनि। स्त्री देहक उदार छाहरिक प्रश्न अछि। कोनो आन पुरुखक संगति निर्मलाकें भेटनि, से भुवनजीकें पसिन नहि, मुदा कोना रोकथिन, ओ हुनकर पत्नी नहि छथिन, घोषित प्रेमिको नहि। कमलजीक सोझाँ, जे हुनकर बड़ सम्मान करै छथिन, नांगट कोना हेताह? अइ उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल व्यवस्था हिनकहि चरित्रा-चित्राणमे अछि। विवाद, तनाव, दाम्पत्य, प्रतिष्ठा, प्रभुत्व, भय, उदारता, वैराट्य... सब किछु मिला कए विचित्रा सन स्थिति बनैत अछि। एक दिशा पकड़ि कए जाइत रहू, हुनका नीक आ कि बेजाए साबित करैत रहू, जाइत-जाइत ओहिमे दोसर दृश्य आबि कए पहिलुक सूत्रा ओकरा देत। आन पात्राक संग से स्थिति नहि होइत अछि। कने-मने नीलूक चरित्रा-चित्राणमे सेहो इएह बात अछि। कमलजी अइ उपन्यासक नस-नसमे समाएल छथि। कथावाचक हेबाक कारणें आन पात्रा लोकनिक चरित्रा पर टिप्पणियो करैत गेलाह अछि, मुदा हिनका सम्बन्धमे हिनकर टिप्पणी, उद्घोषणा, वक्तव्य, वार्तालाप आ आचरणे टा विश्लेषण आ मूल्यांकनक आधार बनि सकैत अछि। बेस पढ़ल-लिखल, आधुनिक विचारधारा, स्वच्छन्द चिन्तन पद्धति, प्रचुर प्रतिभा सम्पन्न बेरोजगार मैथिल युवक छथि। साहित्यिक संस्कारक सृजनशील आ सांसारिक युग चक्रक सूक्ष्मतासँ परिचित व्यक्ति छथि। छद्म, पाखण्ड, द्वेष-दुविधासँ परहेज छनि। क्षुधा, यौन-पिपासा आ आत्मसुरक्षाकें मनुष्यक मूल प्रवृत्ति मानै छथि। बुझनुक, वाक्‌चतुर आ जिम्मेदार लोक छथि। ट्यूशन क' कए भाउज, भतीजीक जीवन-यापन, लालन-पालनक चिन्ता रखै छथि। सामाजिक रीति-कुरीति, द्वेष-दुविधा, लोभ-ईर्ष्या, जीह-जाँघ-पेटक कामनासँ परिचित छथि। प्रतिभा आ वाक्‌चातुर्यक बलें महानगरमे अधिकांश लोकक नजरिमे सम्मानपूर्वक बसल छथि। निर्मला सन कामातुरा युवती हुनका पर लहालोट होइ छथि, नीलू सन किशोरी समर्पित हेबा लेल तत्पर छनि, मुदा उचितानुचितक ज्ञानसँ परिपूर्ण कमलजी नीलूक कौमार्य भंग नहि करै छथि। स्त्री-पुरुषक अतिरिक्त निकटता कखनहुँ कोनो परिस्थितिमे परिणत भ' जा सकैत अछि--ताहि अन्देशासँ कमलजी परिचित छथि, तें नीलू आ अपना बीच भाइ-बहिनक लक्ष्मण रेखा घीचि दै छथि। नारी शोषणक प्रति रोष छनि, स्त्री दमनक प्रति आक्रोश छनि, देह व्यापार क' कए गुजर-बसर करै वाली सुशीला सन स्त्रीक अन्तर्कथा सुनि कए मोन घोर भ' जाइ छनि। कामेच्छा तृप्त करबा लेल अनेक पुरुख कोरमे नांगट होइत अर्थ-सम्पन्न स्त्री निर्मला, आ पारिवारिक भरण-पोषण हेतु असंख्य कामुक राक्षसक उत्तेजना शान्त करैवाली विपन्न स्त्री सुशीलाक तुलनात्मक विश्लेषण करए लगै छथि (पृ. ३७-३९)। छोट वयसमे, जखन विवाहक अर्थो नहि बूझै छलाह, स्त्री पुरुष सम्बन्धक ज्ञानो नहि छलनि, तखनहि अपन भाउजक बहिन गुलाबसँ विवाह करबाक इच्छा व्यक्त केलनि (पृ २८); सम्पूर्ण उपन्यासक जीवनमे भुवनजी सन निविष्ट, प्रतिष्ठित आ गम्भीर लोकक प्रति कोनहु आक्षेप अथवा आधार नहिओ रहैत, निर्मलाजी सन पथभ्रमित स्त्रीक प्रति हुनकर अनुरक्ति (पृ. ४५); स्वकीया होइतहु अनेक परिस्थितिवश निर्मलाजी परकीया बनि जएबाक घटना (पृ. ३८-४०), नीलू पर विष्णुदेव ठाकुरक वासनात्मक दृष्टि (पृ. १६)...अइ तरहक कतोक प्रकरणसँ उपन्यासमे कथावाचक स्पष्ट करै छथि जे भूख, वासना आ सुरक्षाभाव मानव जीवनक अपरिहार्य आवश्यकता थिक, अइ अपरिहार्यताक अपवाद कमलजी स्वयं सेहो नहि छथि, जकर संकेत अपन वक्तव्य आ आचरणसँ दैत रहलाह। ई परिदृश्य एक दिश उपन्यासक आधार कथ्यकें मजगुत करैत अछि तँ दोसर दिश कमलजीक वैचारिक दुनियाँ आ दृढ़ मान्यताक प्रमाण दैत अछि। आन्दोलनक स्त्री पात्राक कैक कोटि अछि-- समय-चक्र आ समाज व्यवस्थाक चाँगुरमे विवश; कामोन्मादमे मातल, मदोन्मत्त; किशोरकालीन उद्वेगमे बहकल, मुदा किछु-किछु सावधान। एहिमे एक वर्गक स्त्री छथि बनगाम वाली आ सुशीला। बनगामवाली जीवन संग्रामसँ लड़बा लेल स्त्री देहक सौदा करै छथि, सौदाक प्रबन्धन, दलाली; दस पाँच स्त्री रखै छथि, अपना घरमे जगह, सुविधा, सुरक्षा दै छथिन, व्यापार चलै छनि, तकर कमीशनसँ हुनकर जीवन-यापन होइ छनि; दुनियाँक आन कोनहुँ परिस्थिति, परिवेश, आर्थिक-सामजिक-राजनीतिक-नैतिक घटना-कुघटनासँ हुनका कोनहुँ सरोकार नहि छनि। गँहिकी अबैत रहए, पाइ लेल परपुरुष गमन हेतु सहर्ष तैयार स्त्रीक संख्या हुनका ओतए बढ़ैत रहए, एहिसँ पैघ बात, प्रसन्नताक बात हुनका लेल किछु नहि थिक। सुशीला रोजगारक अनुसन्धानमे बौआइत पिताक सन्तान थिकीह, जिनका अपन माइए अइ काज लेल प्रेरित केलकनि आ माइ संगे ओ विभिन्न वेश्यालयमे जाए लगलीह। जीवन-यापन हेतु आओर कोनो आधार बचल नहि छलनि (पृ. ३६-३९)। दोसर वर्गक प्रतिनिधित्व करै छथि-- निर्मलाजी। जेना कि कहल भेल जे कोनहु व्यक्तिक आचारण, ओकर मनोवेगसँ संचालित होइत अछि, आ मनोवेगक मानसिक अवस्थिति व्यक्तिकें प्रदत्त सर्वांगीण वातावरणमे निर्मित आ निर्देशित होइत अछि। निर्मला, हेम बाबूक पुत्री छथि, हेम बाबू कमाऊ लोक छथि, महिनबारी दरमाहा अबै छनि, ओहि दरमाहाक लार-चार, संचय-निस्तार करबाक दायित्व अथवा अधिकार निर्मलाजीकें छनि--कोनो तरहक सामाजिक आँकुश अथवा आर्थिक दबावमे नहि रहै छथि। अन्न-वस्त्रा आ सामाजिक सुरक्षाक कोनो समस्या नहि छनि। मुदा दैहिक उत्ताप छनि, जगजियार बनल रहबाक आकांक्षा छनि, सबहक आँखिमे बसल रहबाक लिप्सा छनि। विधुर पिताक दरमाहा, आ परदेशी पति द्वारा पठाओल मनीयाडरक महाबलसँ निर्मलाजी मैथिल समिति द्वारा आयोजित जनसभामे अपनाकें शो-केसक मूर्त्ति जकाँ सजा क' प्रस्तुत करै छथि। अपन भाषण, भू्र-विलास, अधरक लाली, कुटिल कटाक्ष, रति-सुरति, अंग-संचालनसँ लोकक मोन मोहैत रहै छथि आ लोकक प्रशंसाक पात्रा बनल रहै छथि। हिनका सुशीला जकाँ बनगाम बालीक खोलीमे खाट नहि ओछब' पडै छनि, नित्य प्रति आ अनेक बेर अनेक कामुक पुरुष संग व्याभिचार नहि करए पड़ै छनि। काज दुनू एके रंग करै छथि, मुदा, जें कि सुशीला लेल देह पूँजी छनि, तें हुनकर करतब व्यभिचार कहल गेल आ जें कि निर्मला लेल देह प्रसाद छनि, तें हुनकर करतब आचार भेल। सुशीला जकाँ जँ निर्मलोजी बेरोजगार पिताक बेटी रहितथि, दायित्वक बोझ तर दाबल रहितथि, दू साँझक नोन रोटी जुटएबा लेल, दू बीत वस्त्राखण्ड अनबा लेल देहक अलावा आन कोनो बाट नहि रहितनि, तँ निर्मला जीक चटक-मटक कतए जइतनि?... ओना आजुक स्त्री विमर्शमे छान-पगहा तोड़निहार वक्तव्यवीर लोकनि एहि चरित्राक प्रति, आ तकर एहि तरहक मूल्यांकनक प्रति अनघोल अवश्य करताह, जे स्त्री, देहसँ बाहरो बहुत किछु होइत अछि।...अवश्य होइत अछि, मुदा कोनो मादक संगीत सुनि पोन पर तबला बजाएब, आ तबला पर तबला बजाएब, दुनू दू बात होइत अछि। निर्मलाजी आ सुशीला जीक चारित्रिाक विश्लेषणमे एहि उपन्यासमे कामुकताक इएह विरोधी स्वरूप, वासनाक इएह विरोधाभास, नारी समुदायक इएह रूप वैविध्य आन्दोलन उपन्यासमे भावककें आन्दोलित करैत अछि। (अगिला अंकमे जारी) डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। आलेख: आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता एखनहुँ गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्य पर निर्भर छथि आ बरखा पर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यैह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमयबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओतहु हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि। निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयारपर जीब’ क लेल बाध्य भ’ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जाहि मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नहि, पहिर’ क लेल शरीर पर वस्त्र नहि, रहक लेल घर नहि, बीमार भेलापर दवाय-दारूक पाय नहि, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत त’ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नहि भ’ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भ’ सकैत अछि ? ओ कोनहुँ बड़का काज कोना क’ सकैत अछि ? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट क’ सकैत अछि ? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन ईच्छाक मार’वला बनि जाइत अछि। मैथिली नाट्य साहित्य मध्य एहि समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (1956) भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (1966) बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (1967) गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (1967) महेन्द्र मलंगियाक ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ (1980) नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (1971) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (1981) गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (1982) गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (1982) आदि। मनोरथ मे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि---- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि कए करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। एहि परिप्रेस्थमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि--- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न  समस्याक सामना करय पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन एहि नाटकमे होइत अछि।”1 गरीबीक ई पराकाष्ठा छैक जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतय समुचित व्यवस्थाक आभाव अछि। एतय अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे एहि समस्याकेँ उजागर कयल गेल अछि---- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सबने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगायल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”2 निम्नवर्गक यर्थाथ चित्रणक दृष्टिसँ ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ मैथिली नाट्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान राखैत अछि। एहि नाटकक केन्द्रबिन्दु थिक सर्वहारा वर्गक यातनापूर्ण जीवन, वासन्ती पवन, ग्रीष्मीय निदाध, बर्षाक रिमझिम हेमन्तक शीत आ शिशिरक सिहकी समटा गरीबक हेतु, फुसि थिक। एहिमे एकटा गरीब एरिवारक बारहो मासक दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण कयल गेल अछि, जाहिमे कातिक मासक एकटा बानगी प्रस्तुत अछि----- “कातिक हे सखि बोनियो ने लागै छै, अन्नक नहि कोनो बाट यौ। पेटक ज्वाला राम सहलो ने जाइ छै, घर-घर हुलकय राड़ यौ।”3 वस्तुत: कातिक मास खेतिहर मजदूरक लेल दुखक मास होइत अछि। एहि समयमे अन्नाभाव भ’ जाइत छैक एहन स्थितिमे निम्नवर्ग स्थिति दयनीय भ’ जाइत छैक – “दू गोट कोकड़ा पकबिति पियास लागल हय।”4गरीब लोकक लेल खयबाक हेतु भरिपेट अन्न वस्त्र आ आवासक एकटा जटिल समस्या  भ’ गेल अछि एहि समस्या दिस नाटकारक ध्यान जाति छनि--- “अन्न बिना पेट जरिते हय, बस्तर बिना ठिठुरबे केली आ घर त’ दखते छी”5 प्रो. प्रेमशंकर सिंह एहि नाटककेँ “मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजक अलबम कहने छथि।”6 “जाहि आँगनक बारहमासा एहिमे टेरल गेल अदि तकर ध्वनि खाली ओहि आँगनसँ नहि आबि रहल अछि, प्रत्युत मिथिलाक लाख-लाख आँगनसँ उठैत ओकर रोस, हाहाकार करैत सोझे मर्मकेँ बेधि देमयवला अछि।”7 आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छैक जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नहि रहैत छैक। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके त’ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनि पर दस गोटय मिलि जाय तँ की ने क’ सकैत छी।”8 ‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देश मे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नहि जाइत छैक। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कयलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नहि पहुँचि सकैत अछि--- “एकरा देह पर एक बीत वस्त्र नहि, एकर अंग-2 उघार अछि।”9 समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीन टा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी----घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी---अहू सँ बेसी किछु अशुभ भ’ सकैत अछि।”10 वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर एहि प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भए गेल अछि। संदर्भ 1.                             मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—96 2.                             नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—54 3.                             ओकरा आँगनक बारहमासा, महेन्द्र मलंगिया,पृष्ठ--1 4.                             वएह, पृष्ठ—2 5.                             वएह, पृष्ठ--46 6.                             मैथिली नवीन साहित्य, सं. डॉ. बासुकीनाथ झा, पृष्ठ--28 7.                             वएह, पृष्ठ—28 8.                             अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, 9.                             बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन 10.                        अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, Top of Form रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॊ. ग‍गेश गु‍जन मृत्यु पूर्व हुनकासं साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे। पं0 रामाश्रय झाक इन्टरव्यू ।

प्रश्ननः1. अपनेक दृष्टि सं विद्यापति गीत-संगीत परंपरा कें कोन रूप मे देखल-बूझल जयवाक चाही? विद्यापति-संगीत परिभाषित कोना कएल जयवाक चाही? एतत्संबंधी कोनो स्वर-लिपि उपलब्ध अछि ? उत्तर ः हमरा विचार सँ विद्यापतिक अधिकांश गीत पद; भजनबद्धगायन शैली एवं किछु गीत ग्रामीण गीत शैलीक अंतर्गत् बूझल जयवाक चाही। उदाहरण स्वरूप पद-गायन शैली मे- 1. नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर धिरे धिरे मुरली बजाव । 2. जय जय भैरवि असुर भयाउनि। एवं अन्य श्रृंगार रस सँ सम्बन्धित पद। जेना- क. कामिनी करय असनाने ख. सुतलि छलौं हम घरवा रे ग. अम्बर बदन झपाबह गोरी घ. ससन परस खसु अम्बर रे, इत्यादि । टइ तरहक पद व गीत मिथिला प्रदेश मे लगभग 60 व 70 वर्ष सं जे गाओल जाइत अछि एकर धुन अर्धांशस्त्रीय संगीतक अंतर्गत् एवाक चाही। परन्तु अइ पदक जे मिथिला मे गायन शैली छैक ओकर एक अलग स्वरूप छैक। जेकरा प्रादेशिक संगीत कहवाक चाही। जहांतक लोक संगीत तथा ग्रामीण संगीत सं संबंधित विद्यापतिक गीत अछि, जेना- क. आगे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जो। बुढ़ होयता जमाय, ख. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर, ग. उगना रे मोर कतय गेलाह, घ. आज नाथ एक व्रत मोहि सुख लागत हे, इत्यादि । ई गीत सब लोक संगीतक धुनक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। यद्यपि अहू लोकधुन मे रागक दर्शन छैक मगर राग शास्त्र केर अभाव छैक। तें हेतु ई सब गीत लोक संगीत शैली मे अयवाक चाही। उत्तर-1-ए. विद्यापति संगीतक कोनो भिन्न स्वरूप नहि अछि, केवल विद्यापति गीत मिथिला प्रादेशिक संगीत शैलीक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। राग आओर ई अर्धांशस्त्रीय एवं धुन प्रधान लोक संगीत राग गारा,राग पीलू, राग काफी, राग देस, राग तिलक कामोद इत्यादि राग सं सम्बन्धित अछि। अभिप्राय ई जे जेना सूर, तुलसी, कबीर इत्यादि संत कविक पद भिन्न-भिन्न तरह सं गाओल जाइत अछि अइसंत कवि सबहक कोनो खास अपन संगीत नहि छैन्हि जे कहल जाय जे ई सूर व तुलसी तथा कबीरक संगीत थीक, एही रूप सं विद्यापति संगीतक रूप मे बुझवाक चाही।

प्रश्नन-2. विद्यापति संगीत-परंपराक विषय मे आइध्रिक स्थिति पर अपनेक की विचार-विश्लेषण अछि ?

उत्तर-2. विद्यापति पदक सम्बन्ध मे हमर ई विचार अछि जे विद्यापतिक पद मैथिली भाषा मे अछि तें हेतु केवल मिथिला प्रदेश मे अइ पदक गायन प्रादेशिक संगीतक माध्यम सं होइत अछि। हॅं, यदा कदा बंगाल प्रदेश मे बंगला कीर्तन मे अवश्य प्रयोग हाइत अछि। कहवाक अभिप्राय ई जे कोनो प्रादेशिक भाषा मे लिखल काव्य केर गुणवत्ताक आकलन ओइ काव्यक श्रृंब्द व साहित्य तथा भाव पर निर्भर करैत छैक। संगीत आकइ काव्य के रसमय एवं सौंदर्यवर्धन करइक हेतु परम आवश्यक तत्व अवश्य थिक परन्तु प्राथमिकता पदक थिकइ। मैथिली भाषा अत्यन्त सुकोमल भाषा अछि एवं अइ मे लालित्य अछि ।आर संगीत सुकोमल भाषा मे अधिक आनन्द दायक होइत छैक।अही हेतु विद्यापति पद संगीतक माध्यम सं मिथिलाक संस्कृति मे विद्वान जन सं ल’ क’ जनसाधारण तकक मानस के प्रभावित क’ क’ अपन एक सुदृढ़ परम्परा बनौने अछि एवं मिथिलावासीक हेतु परिचय पत्र समान अछि। तें हेतु समस्त मैथिल समाजक ई परम कर्तव्य थीक जे अइ अमूल्य धन कें धरोहर जकां जोगा क’ राखी।

प्रश्न-3. विद्यापति-संगीत आओर विद्यापति-गीत कें एकहि संग बूझल जयवाक चाही बा फराक क’? यदि हं तं किएक आ कोना ?

उत्तर : एहि प्रश्नक उत्तर उपरोक्त पहिल तथा दोसर क्रमांक मे लिखल गेल अछि।कृपया देखल जाय।

प्रश्नन-4. विद्यापति-संगीतक प्रतिनिधि गायक रूप मे अपने कें कोन-कोन कलाकार स्मरण छथि आ किएक ? उत्तर : विद्यापति पदक गायक आइ सं किछु वर्ष पूर्व बहुत नीक नीक छलाह, जेना पंचोभक पं0 रामचन्द्र झा,पंचगछियाक श्री मांगन, तीरथनाथ झा, बलियाक पं0गणेश झा, लगमाक पं0 अवध पाठक, श्री दरबारी ; नटुआ द्ध श्री अनुठिया ; नटुआद्ध पं0 गंगा झा बलवा, श्री बटुक जी, आर पं0 चन्द्रशेखर खांॅ, अमताक पं0 रामचतुर मलिक, पं0 विदुर मलिक, लहटाक पं0 रामस्वरूप झा, खजुराक पं0 मधुसूदन झा एवं नागेश्वर चैधरी, बड़ा गांवक पं0 बालगोविन्द झा, लखनौरक पं0बैद्यनाथ झा इत्यादि। वर्तमान मे जे गायक छथि हुनका सबहक नाम अइ प्रकार छनि-पं0 दिनेश झा पंचोभ, श्री उपेन्द्र यादव, अमताक पं0 अभयनारायण मलिक, पं0 प्रेमकुमार मलिक इत्यादि। उपरोक्त जतेक गायकक हम नाम लिखल अछि ई सब गायक अधिकारपूर्वक विद्यापतिक पद कें गबै वला छलाह एवं वर्तमान मे छथि। कियेक तं ई सब मिथिलावासी छथि। विद्यापति पदक अर्थ भाव पूर्ण रूप सं बूझि क’ तहन प्रश्नकरैत छलाह व वर्तमान मे करैत छथि। तें हेतु ई सब गायक स्मरण करवा योग छथि।

प्रश्नन-5. पं0 रामचतुर मल्लिक, प्रो0 आनन्द मिश्र प्रभृत्ति तं इतिहास उल्लेखनीय छथिहे । किछु अन्यो गायकक नाम अपने कह’ चाहब ?ओना मल्लिकजी तथा आनन्द बाबूक विद्यापति-गीत गायकी मे की किछु विशेष लगैत अछि जे अन्य गायक मे नहि ?

उत्तर ः हम जतेक गायक क नाम लिखल अछि सब अपना-अपना स्तर सं नीक छलाह एवं नीक छथि। विद्यापतिक पद गायन मे राग गायकीक जेना बड़का बड़का आलाप व तान तें गाओल नहि जाइत छैक। विद्यापति पद गायन मे पदक अर्थ भाव ध्यान मे राखि सरसतापूर्वक गाओल जाइत छैक। अइ सम्इन्ध मे एक सं दोसर गायकक तुलना करइक आवश्यकता नहि। तथापि पं0रामचन्द्र झा व श्री मांगनजी तथा पं0 रामचतुर मलिकजी,श्री बटुक जी,पं0 रामस्वरूप् झा,श्री दरबारी इत्यादि गायक बहुत प्रसिद्ध छलाह। चूंकि प्रोफेसर आनन्द मिश्रजीकें हम कहियो गायन नहि सुनल तथा मिथिलाक गायक पंक्ति मे हुनक नाम हम नहि सुनल तें हेतु हुनका संबंध मे किछु लिखइ सं असमर्थ छी।

प्रश्न-6. विद्यापति-गीत मैथिली लोकगीत ध्रि कोना पहुंचल हेतैक ?एहि विषय मे अपनेक विश्लेषण की अछि? उत्तर ः विद्यापति गीत मैथिलीक दू तरहक भाषा मे रचल गेल अछि।एकटा मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे रचल गेल अछि जेना- 1.नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर 2.अम्बर बदन झंपावह गोरी 3. उधसल केस कुसुम छिड़िआयल खण्डित अधरे । इत्यादि। अइ तरहक मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे जे गीत छैक से लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि बहुत कम पहुँचलै। जे गीत ग्रामीण भाषाक माध्यम सं रचल गेल छैक।जेना- 1. आ गे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जं बुढ़ होयता जमाय.... 2. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर 3. जोगिया भंगिया खाइत भेल रंगिया हो भोला बउड़हवा. 4. उगना रे मोर मोरा कतय गेलाह. इत्यादि। अइ तरहक जे गीत छैक से लोकगीत;ग्रामीण अंचलद्धधरि अधिक सं अधिक पहुँचलए।एक बात आर ई जे लोकभषाक अधिक समकक्ष छैक तकरा जनाना सब अधिक गबैत छथि। हमरा बुझने विद्यापति गीत कें लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि पहुँचइके यैह कारण थीक। दोसर बात ई जे अपन मातृभाषा स्वभावतः बहुत प्रिय होइत छैक आर अपना मातृभाषाक माध्यम सं जे काव्य रचल जाइत छैक आर ओइ मे लालित्य आ आकर्षण छैक तं ओ अपनहि आप विद्वान जन सं ल’ क’जनसाधारण तक प्रचारित भ’ जाइत छैक। आर विद्यापति पद तं लौकिक व पारलौकिक दुनू ृदृष्टिसं अत्यन्त उच्च कोटिक रचल गेल अछि, तथा सब तरहक गीत रचल गेल अछि जेना-भक्ति, भक्ति श्रृंगार, लौकिक श्रृंगार, श्री राधाकृष्णकें विलासक अत्यन्त मधुर गीत, भगवान श्रृंंकरक विवाह सं सम्बंधित जनसाधारण भाषाकके गीत एवं नचारी, समदाउनि, बटगवनी,तिरहुत इत्यादि तरहक गीतक रचना केने छथि जे लोकरंजनके हेतु उच्चकोटिक एवं गायन के वास्ते बनल छैक। ई तंे बिना प्रयासहिं लोक मानस एवं लोकगीत धरि पहुँचि गेल गेल हेतैक।

प्रश्न-7.विद्यापति पदक मैथिली व्यवहार-गीत मे विलय होयवाक प्रक्रिया अपनेक दृष्टियें कोना आ की रहल हेतैक ? उत्तर ः हमरा बुझने इहो प्रश्न 6ठमे प्रश्न सं संबंधित अछि। तें ओही पर विचार कएल जाय।

प्रश्न-8. विद्यापतिक पद यदि मिथिलाक सर्वजातीय माने-सभ वर्ग आ समाजक लोक मे स्वीकृत छैक ? तं तकर कारण विद्यापति-पदक साहित्यिक गुण बा ओकर सांगीतिकता छैक आकि एकरा मे निहित कोनो आन तत्व आ विशेषता छैक ? उत्तर ः विद्यापति पद जे मिथिला समाजक सब वर्ग मे स्वीकृत छैक तकर मुख्य कारण विद्यापति पदक साहित्यिक गुण एवं सांगीतिक गुण दुनू छैक।मिथिला मे कवि विद्यापतिक पहिनहुं तथा बादहु मे बहुत कवि भेलाह मगर जनसाधारण मे तं हुनकर क्यो नाम तक नहि जनैत अछि। परंतु विद्यापति एवं विद्यापति गीत के तं एहेन क्यो अभागल मिथिलावासी हेताह जे नहि जनइत हेताह। विद्यापति पदक प्रचार-प्रसार मे साहित्यिक व संगीतक गुण के अतिरिक्त आन कोनो तत्व व कारणक जे अपने चर्चा कएल अछि, अइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे कवि विद्यापति भगवान के परम भक्त छलाहं हुनका भक्ति सं प्रभावित भ’ क’ भगवान शंकर जिनका घर मे नौकर के काज करैत रहथिन एहेन भक्त कविक कावय मे तं प्रचार-प्रसार हेबाक सब सं महत्वपुर्ण तत्व एवं कारण हुनका आराध्यदेवक कृपा बुझवाक चाही। भगवानक भक्ति सं हुनकर हृदय ओतप्रोत छलन्हि तें ओ अपन काव्य मे लिखैत छथि- क. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे , ख. हे भोलानाथ ;बाबाद्धकखन हरब दुख मोर , इत्यादि । ग. खास क’ भगवान राधाकृष्णक भक्ति व भक्ति-श्ाृंगार रस जे ओ अपना काव्य मे दरसओ -लन्हि अछि ओ अत्यन्त हृदयस्पशर््ाी तथा संगीतमय अछि। प्रश्न-9.लोकगीत एवं व्यवहार-गीत मे तत्वतः की-की भेद मानल जयवाक चाही ?

उत्तर ः लोकभाषा एवं लोकधुन मे जे गीत गाओल जाइत छैक तकरा लोकगीत कहल जाइत छैक। आर व्यवहार गीत क जे अपने चर्चा कएल अछि इउ सम्बन्ध मे हमर कहब ई जे एकरा अंतर्गत संगीतक सब शैली आबि जाइत छैक।परंतु हमरा बुझना जाइत अछि जे व्यवहा गीत सं अपनेक अभिप्राय संस्कार गीत सं अछि। हमरा विचार सं लोकगीत एवं व्यवहार गीत दुनू के लोकसंगीत कहल जाइत छैक, अइ मे कोनो विशेष अंतर नइ छैक।

प्रश्न- 10.विद्यापति-संगीतक वर्तमान जे निश्चिते निराश कयनिहार अतः खेदजनक अछि। अपने कें तकर कारण की सब लगैत अछि ? जखन कि बंगालक रवीन्द्र-संगीत-कला मे विद्यापति संगीत जकां कोनो प्रकारक पतनोन्मु -खता आइ पर्यन्त देखवा मे नहि अबैत अछि । तकरो कारण की आजुक उपभोक्तावाद, ब्जारवाद भू-मण्डलीकरण मात्रकें मानल जयवाक चाही बा आनो आन ऐतिहासिक, समाजा -आर्थिक परिस्थि ति आ सामाजिक कारण आ परिवर्तन कें ?

उत्तर ःअइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे संपूर्ण भारत मे अपना संस्कृति के छोड़ै मे जतेक मैथिल अगुआयल छथि तेना अन्य कोनो प्रदेश नहि। जे मैथिल मिथिला सं बाहर अन्य प्रदेश मे आबि गेलाहय सब सं पहिने ओ अपन मातृभाषाक प्रति उदासीन भ’ जाइत छथि आ अत्यंत हर्षपूर्वक ई कहैत छथि जे हमरा बच्चा के तं मैथिली बाजहि नहि अबैत छैक। अपना घर मे मैथिली नहि बजैत छथि। जखन अपना मातृभाषाक प्रति एहेन उदासीन छथि तहन अपना संस्कृति सं अपनहि आप दूर भ’ जेताह। अपना मॉं-बा पके डैडी व मम्मी अन्य के अन्टी व अंकल कहैक रेवाज भ’ गेलै अछि तं हिनका सब सं की आश कयल जाय जे ई अपना संस्कृतिक रक्षा करताह। बंगाली,मद्रासी,पंजाबी,मराठी इत्यादि प्रदेशक लोक सब अपना संस्कृति के एखनहुं धरि संजोय क’ रखने अछि। मगर पश्चिमी सभ्यताक प्रभाव सब सं अधिक मैथिल पर छन्हि ते हेतु मिथिला संस्कृति मे एहेन हानिकारक परिवर्तन देखाय पड़ैत अछि।

प्रश्न-11.अपनेक स्मृति मे कोनो गायकक गायन बा अन्य कोनो संदर्भ हो जेकर वर्णन अपने कर’ चाही? हुनक विषय मे किछु सुनयवाक इच्छा हो।वर्तमान समेत आगां पीढ़ीक लाभ हेतैक। संगहि अपनेक किछु विशेष अभिमत जे देब’-कह’ चाही।

उत्तर ःहम शास्त्रीय संगीतक उपासक छी आर अत्यंत उदासीन भ‘ कहि रहल छी जे अपन मिथिला वर्तमान समय मे शास्त्रीय संगीत सं शून्य भ’ रहल अछि। वर्तमान समय सं पहिने पं0रामचतुर मलिक, पं0 बिदुर मलिक, पं0सियाराम तिवारी,;चूंकि पं0 सियाराम तिवारीक शिक्षा अमता गाम मे भेलन्हि तें हेतु हुनका मैथिल मानइ छियनि। पं0 चन्द्र शेखर खां,पं0 रघू झा, ई सब बहुत उच्च स्तरक गायक छलाह। खास क’क’ पं0 रामचतुर मलिक, व पं0 सियाराम तिवारी तं इतिहासिक गायक छलाह ध्रुवपद शैलीक गायन मे। भावी पीढ़ीक शिक्षार्थी एवं जिज्ञासु के अइ गायक सबके जानइ के प्रयास व हिनका गायन व कार्यक सम्बंघ मे श्रृंोध करवाक चाही ताकि भावी पीढ़ी लाभान्वित एव धु्रुवपद शैली गायनक विशेषता सं परिचित होथि।

जय मिथिला जय मैथिली, जय जय जानकी अम्ब । जेहि रज मे मन्डन भेला, हरलन्हि शिव के दम्भ ।। Bottom of Form Top of Form आशीष अनचिन्हार- अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि  (आलोचना) शीर्षक पढैते देरी पाठक लोकनि एकर रचियता के निराशावादी घोषित कए देताह आ फतवा देताह जे समाज के एहन -एहन वकतव्य सँ दूर रहबाक चाही।मुदा हमरा बुझने पाठक लोकनि अगुता गेल छथि,आ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि। मुदा इहो एकटा सुपरिचित तथ्य थिक जे लोक के जतेक उपदेश दिऔक ओ ओतबे तागति सँ ओकर उन्टा काज करत।मुदा तैओ हम कहबनि जे अगुताथि जुनि आ ता धरि नहि अगुताथि जा धरि शीर्षक पूर्ण वाक्य नहि भए जाए।आब अहाँ सभ टाँग अड़ाएब जे शीर्षक त अपना आप मे पूर्ण छैहे तखन अहाँ एकरा अपूर्ण कोना कहैत छिऐक ? मुदा नहि, कोनो वस्तु बाहर सँ पूर्ण होइतो भीतर सँ अपूर्ण होइत छैक। इहए गप्प एहि शीर्षकक संग छैक। अच्छा आब हम अपन विद्वताक दाबी छोड़ी आ आ अहाँ सभ के पूर्ण वाक्य के दर्शन कराबी - "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि, सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। मैथिली साहित्य मे बहुत रास बिडंबना छैक, प्रवंचना छैक, वंदना छैक अर्थात सभ किछु छैक मुदा तीन गोट वस्तु के छोड़ि-- १) मैथिली मे व्यंग प्रचुर मात्रा (गुण एवं परिमाण) मे नहि लिखाइत अछि, २) जँ झोंक- झाँक मे लिखाइतो छैक त स्तरीय आलोचना नहि होइत छैक , ३) आ जँ भगवान भरोसे स्तरीय आलोचना अबितो छैक त हरिमोहन झा के शिखर मानि सभ के भुट्टा बना देल जाइत छैक । एहि तीन टा के छोड़ि एकटा आर महान बिडंबना छैक जे आलोचक आलोचना करताह फल्लाँ बाबूक अथवा हुनक कृति के मुदा समुच्चा  मैथिली अलोचना मे हरिमोहन बाबू तेना ने घोसिआएल रहता जे पाठक एहन आलोचना के हरिमोहने बाबूक आलोचना बूझैत छथि। आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि  2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "ली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि--1) मोमक नाक (कथा संग्रह) 2) धूकल केरा (कथा संग्रह) 3) लगाम (नाटक) 4) वचन वैष्णव (नाटक) 5)  नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक। आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । इ शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मतलब जे भविष्यक संकेत कए गेल छथि। आब किछु गप्प करी मैथली व्यंग मे राजनीतिक व्यंग पर। कोन चिड़ियाक नाम छैक  राजनीतिक व्यंगइ हमरा जनैत मैथिली व्यंगकार नहि जनैत छथि। ओना व्यंग केकरा कहल जाइत छैक सेहो बूझब कठिन। हमरा जनैत मैथिली मे 93% व्यंग लिखल जाइत छैक मुदा 93% आलोचक ओकरा हास्य मानि आलोचना करैत छथि। सभ व्यंगकार ओहीक मारल छथि, चाहे शिखर-पुरुष हरिमोहन बाबू होथि वा रुपकांत ठाकुर। सुच्चा व्यंग लिखला पछातिओ हरिमोहन बाबू कहेलाह हास्य-व्यंग सम्राट। अर्थात हास्यकार पहिने आ व्यंगकार बाद मे। बाद बाँकी 7% हास्य लिखाइत अछि जकर प्रतिनिधि छथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" । हँ त फेर आबी हम राजनीतिक व्यंग पर। हमरा जनैत जाहि व्यंग मे अपन समकालीन अथवा पूर्वकालिक राजनीति, शासन-व्यवस्था, ओकर संचालक आदि पर निशाना साधल गेल हो ओकरा राजनीतिक व्यंग कहाल जाइए। ओना इ अकादमिक परिभाषा नहि अछि। त फेर हम अहाँ सभ के रुपकांत ठाकुर लग लए चली, आ हुनक एक गोट पोथीक परिचय करा  हुनक राजनीतिक चेतना के देखाबी। जाहि पोथी सँ हम अहाँ के परिचय कराएब ओकर नाम छैक "मोमक नाक"। एहि व्यंग-संग्रह मे नौ गोट कथा थिक। परिचय शुरु करेबा सँ पहिनहि कहि दी जे इ कोनो जरुरी नहि छैक जे हम अहाँ के नओ कथा कहब आ ने जरूरी छैक जे संग्रहक पहिल कथा सँ हम शुरू करी। इ निर्णय हमर व्यत्तिगत अछि आ अहाँ एहि सँ सहमत भइओ सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। हँ त हम शुरू करी संग्रहक अंतिम कथा "मर्द माने की" सँ। जेना की शीर्षके सँ बुझाइत छैक लेखक अवस्स एहि मे मर्दक परिभाषा देने हेथिन्ह। से सत्ते, लेखक जखन शुरुए मे कहैत छथिन्ह जे " लोटा ल' क' घरवालीक लहटगर देह पर गदागद ढोल बजौनिहार एहन सुपुरुष कत' भेटत?"। त सभ अर्थ स्पष्ट भए जाइत छैक। मुदा लेखक एतबे सँ संतुष्ट नहि भए आगू कहैत छथि " मर्द माने कमौआ, आ कमौआ माने वियाहल,आ वियाहल माने बुड़िबक आ बुड़िबक माने बड़द"। सुच्चा मैथिल अभिव्यत्ति। एखनो अर्थात 2009 धरि मैथिल समाजक इ धारणा छैक जे कमौए मर्द होइत अछि, आ जहाँ कहीं कोनो मर्द देखाइ पड़ल लोक ओकर विआह करबाइए कए छोरैए। आ जहाँ धरि गप्प रहल बियाहल माने बुड़िबक से त हम नहि कहब मुदा बुड़िबक माने बड़द अवश्य होइत छैक। खाली खटनाइ सँ मतलब। अधिकारक प्रति निरपेक्ष। आब हम एहि सँ बेसी नहि कहब एहि कथाक प्रसंग। बस एतबे सँ लेखकक चेतनाक अनुमान कए लिअ। "ठोकल ठक्क" मे लेखक ओहन भातिज आ जमाएक दर्शन कराबैत छथि जनिकर काजे छन्हि कमीशन खाएब आ एहि लेल ओ अपन पित्ती एवं ससुरो के नहि छोड़ैत छथिन्ह। आ जँ एही कथाक माध्यमे अहाँ तात्कालीन रजनीतिक देखए चाहब त रुपकांत एना देखेताह-"सरकार पर जनताक कोनो धाख नहि"। अर्थात बेशर्म, निर्लज्ज, हेहर,थेथर सरकार। भारतक समकालीन विकास जँ अहाँ देखबाक इच्छा होइत हो त रुपकांत ओहो देखेताह। कनेक पढ़ू "जय गंगा जी" जतए रेलगाड़ी के बढैत देखि लेखक टिप्पणी करैत छथि-"कांग्रेसी नेता जकाँ लोक के अपन पेट मे राखि क' ओकर सुख-दुख अथवा उन्नति-अवनति के बिसरि गाड़ी मात्र आगू बढब जनैत छल। अपना बले नहि कोइला आ पानिक बलें। परन्तु पवदान पर चढ़ल यात्री कतऽ छलाह?" ई सवाल जतेक भयावह लेखकक समय मे छल ततबे भयावह एखनो अछि। लेखक सरकारक डपोरशंखी योजनाक लतखुर्दन एही कथा मे करैत छथि-" कोन टीसन केखन बितलैक से मोन राखब पंचवर्षीय योजना सभ मे उन्नतिक कागजी आकड़ा मोन राखब थिक"। बेसी प्रशंसात्मक उद्धरण देब हमरा अभीष्ट नहि मुदा तैओ एकटा उद्धरण देबा सँ हम अपना के रोकि नहि पाबि रहल छी। एही संग्रहक दोसर कथा थिक "फूजल ऊक"।बेसी अपन वक्तव्य नहि कहि उद्धरण सुनाबी-"मात्र सुधारवादी दृष्टि रखला मात्र सँ सुधार कथमपि नहि भए सकैछ"। जँ लेखकक भावना के बचबैत हम लिखी जे "प्रगतिशील विचार लिखला मात्र सँ प्रगतिशीलता कथमपि नहि आबि सकैछ" त इ स्पष्ट भए जाएत जे रुपकांत कतए व्यंग कए रहल छथिन्ह आ केकरा पर कए रहल छथिन्ह। ठाकुर जी एकपक्षीय व्यंगकार नहि छथि। ओ दूनू पक्ष के हूट सँ मानसिक आ बूट सँ शारिरिक प्रताड़ाना दैत छथिन्ह। तकर प्रमाण ओ एहि संग्रहक पहिल कथा जे पोथीक नामो छैक अर्थात " मोमक नाक" मे देखेलैन्ह अछि। हुनकहिं शब्द मे " आजुक युग मे भला आदमीक परिभाषा उनटि गेल छैक। जनता जनता अछि जे से सभ मोमक नाक जकाँ लुजबुज। जखन जाहि दिस नफगर रहै छैक तिम्हरे लोक घूमि जाइछ" स्वतंत्रे भारत नहि हमरा विचारे जम्बूदीपक जनता सँ लए कए एखुनका भारतीय जनताक चारित्रिक विशेषता ई उद्धरण देखबैत अछि। आ एतेक देखेलाक पछातिओ आलोचक रुपकांतक नाम बिसरि गेल छथि। भने आलोचक नाम बिसरि गेलखिन्ह मुदा पाठकक मोन मे एखनो धरि रुपकांत ठाकुरक रचना खचित छैन्ह। हमरा जनैत कोनो प्रथम आ अंतिम सफलता इएह छैक। आ रुपकांत इ सफलता अपन रचनाक माध्यमें प्राप्त केलन्हि ताहि मे संदेह नहि। Bottom of Form ३.पद्य ३.१.श्री गंगेश गुंजनक- राधा (नवम खेप) ३.२. गजेन्द्र ठाकुर- 15 टा पद्य ३.३. सतीश चन्द्र झा- दू टा कविता ३.४.ज्योति- पनभरनी ३.५. पंकज पराशर - सत्तनजीब ३.६. मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण डॉ. गंगेश गुंजन(१९४२- )। जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी। एम.ए. (हिन्दी), रेडियो नाटक पर पी.एच.डी.। कवि, कथाकार, नाटककार आ' उपन्यासकार।१९६४-६५ मे पाँच गोटे कवि-लेखक “काल पुरुष”(कालपुरुष अर्थात् आब स्वर्गीय प्रभास कुमार चौधरी, श्री गंगेश गुन्जन, श्री साकेतानन्द, आब स्वर्गीय श्री बालेश्वर तथा गौरीकान्त चौधरीकान्त, आब स्वर्गीय) नामसँ सम्पादित करैत मैथिलीक प्रथम  नवलेखनक अनियमितकालीन पत्रिका  “अनामा”-जकर ई नाम साकेतानन्दजी द्वारा देल गेल छल आऽ बाकी चारू गोटे द्वारा अभिहित भेल छल- छपल छल। ओहि समयमे ई प्रयास ताहि समयक यथास्थितिवादी मैथिलीमे पैघ दुस्साहस मानल गेलैक। फणीश्वरनाथ “रेणु” जी अनामाक लोकार्पण करैत काल कहलन्हि, “ किछु छिनार छौरा सभक ई साहित्यिक प्रयास अनामा भावी मैथिली लेखनमे युगचेतनाक जरूरी अनुभवक बाट खोलत आऽ आधुनिक बनाओत”। “किछु छिनार छौरा सभक” रेणुजीक अपन अन्दाज छलन्हि बजबाक, जे हुनकर सन्सर्गमे रहल आऽ सुनने अछि, तकरा एकर व्यञ्जना आऽ रस बूझल हेतैक। ओना “अनामा”क कालपुरुष लोकनि कोनो रूपमे साहित्यिक मान्य मर्यादाक प्रति अवहेलना वा तिरस्कार नहि कएने रहथि। एकाध टिप्पणीमे मैथिलीक पुरानपंथी काव्यरुचिक प्रति कतिपय मुखर आविष्कारक स्वर अवश्य रहैक, जे सभ युगमे नव-पीढ़ीक स्वाभाविक व्यवहार होइछ। आओर जे पुरान पीढ़ीक लेखककेँ प्रिय नहि लगैत छनि आऽ सेहो स्वभाविके। मुदा अनामा केर तीन अंक मात्र निकलि सकलैक। सैह अनाम्मा बादमे “कथादिशा”क नामसँ स्व.श्री प्रभास कुमार चौधरी आऽ श्री गंगेश गुंजन दू गोटेक सम्पादनमे -तकनीकी-व्यवहारिक कारणसँ-छपैत रहल। कथा-दिशाक ऐतिहासिक कथा विशेषांक लोकक मानसमे एखनो ओहिना छन्हि।  श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ,  मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)। प्रस्तुत अछि गुञ्जनजीक मैगनम ओपस  "राधा" जे मैथिली साहित्यकेँ आबए बला दिनमे प्रेरणा तँ देबे करत सँगहि ई गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित सभ दुःख सहए बाली- राधा शंकरदेवक परम्परामे एकटा नव-परम्पराक प्रारम्भ करत, से आशा अछि। पढ़ू पहिल बेर "विदेह"मे गुञ्जनजीक "राधा"। -सम्पादक. गुंजन जी लिखित रचना सभ डाउनलोड करबाक लेल नीचाँक लिंककेँ क्लिक करू - मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download गुंजनजीक राधा (नवम खेप) विचार आ संवेदनाक एहि विदाइ युग भू- मंडलीकरणक बिहाड़िमे राधा-भावपर किछु-किछु मनोद्वेग, बड़ बेचैन कएने रहल। अनवरत किछु कहबा लेल बाध्य करैत रहल। करहि पड़ल। आब तँ तकरो कतेक दिन भऽ गेलैक। बंद अछि। माने से मन एखन छोड़ि देने अछि। जे ओकर मर्जी। मुदा स्वतंत्र नहि कए देने अछि। मनुखदेवा सवारे अछि। करीब सए-सवा सए पात कहि चुकल छियैक। माने लिखाएल छैक । आइ-काल्हि मैथिलीक महांगन (महा+आंगन) घटना-दुर्घटना सभसँ डगमगाएल- जगमगाएल अछि। सुस्वागतम! लोक मानसकें अभिजन-बुद्धि फेर बेदखल कऽ रहल अछि। मजा केर बात ई जे से सब भऽ रहल अछि- मैथिलीयेक नाम पर शहीद बनवाक उपक्रम प्रदर्शन-विन्याससँ। मिथिला राज्यक मान्यताक आंदोलनसँ लऽ कतोक अन्यान्य लक्ष्याभासक एन.जी.ओ.यी उद्योग मार्गे सेहो। एखन हमरा एतवे कहवाक छल । से एहन कालमे हम ई विहन्नास लिखवा लेल विवश छी आऽ अहाँकेँ लोक धरि पठयवा लेल राधा कहि रहल छी। विचारी। राधा  (नवम खेप) किछु ने उत्तर कतहुसँ सब किछु पड़ल अछि शान्त सब दिश रातुक अतल अन्हार आ निश्चिन्त निद्रालीन गामक लोक । सभ टा माल जाल, पंछी पखेरु चुप्प दबकल । अपन-अपन ठौर आ अपन ठेकान समय स्वयं बनि गेल हो जेना सबहक कान एक मात्र, एकमात्र, नाक आ एकहि मात्र आँखि सौंसे आबादीक भऽ गेल हो- जेना एकीकरण, एकहि एक चेतना करण, एकहि बोध एकमात्र अस्तित्वक भास सौंसे सब किछु भऽ गेल हो जेना आकाश से बूझि मनुषकेँ अब्बल-दुब्बल चुपचाप आकि सूति गेल हो स्वयं बनि पताल ! माने सब तारागण समेतक चन्द्रमा आ रंग, रसक बसात लऽ कऽ आ सूतल आकाश अतल तल मे जा कऽ ओहि पताल विलक्षण मनक ई प्रवाह आ बुद्धिक दिशा राधा, एहुक नहि कोनो टा अछि उत्तर, भला सोचू जे ई आकाश जाऽ कऽ कोना भऽ जायत पताल यदि सेहो तँ कतऽ जायत पताल, कोन बाटे उतरत ? वा चलि कऽ गेल होयत ? जँ भरि जायत एही अनन्त आकाशसँ ? दोसर जे, कोना आँटत एतेक टा आकाश ओतनी टाक पताल मे ? के अंटाओत आ फल की तकर ! हँ, से तं अछि ठीक मुदा हमरा लेल एकदम साफ कहाँ कत्तहु देखाइए  एकहु टुकड़ी मेघ एक्कहु टा, एतय धरि जे कनियों लुकझुको तारा, कत्तहु कोनो कात ? कोनो कोन मे ? कहाँ सब टा तँ अछि भेल अदृश्य - अंतर्धान, सोझाँ जे विशाल विस्तारसँ पसरल महा अन्हार राति कहाँ किछु अछि शेष कोनो ध्वनि कोनो ज्योति कोनो स्पर्श कोनो बोध जे स्वाधीन, कहि आ बुझा सकय अहाँक होयबाक अर्थ सेहो सदेह आ जीवन्त प्राणक ? कहाँ किछु कतहु ? सब टा अछि बनि गेल समुद्र कि योजन योजनक अन्हार पताल । ककरो किछु ने सूझय, किछु ने भेटय, तथापि किछु ने किछु तकबे करी से मनुक्खक लुतुक आ अभ्यास तेँ, लागल अनेरे एहि अन्हारक सिन्धु सँ खसयबा मे मनक जाल – बझवै लेल जानि ने माछ केहन ? समस्त अस्तित्व फाटल पुर्जी सन उधिया रहल कृष्णक प्रथम पत्रक पुर्जी, सौंसे भेल, भरि पृथ्वी, अनन्त पताल धरि, चलि गेल, छूटि गेल अपना हाथ सँ, उधिया रहल ई मन स्वयं हुनकर प्रथम पत्रक फटल पुर्जी  भेल, यद्यपि शब्द अछि कंठस्थ सभ टा किन्तु हुनक स्पन्दित उपस्थिति, हुनक होयवाक निरन्तर अनुभूति आभास केर स्वरूप तँ टूटि गेल ई की भेल ? हमरा संगे ई की भेल ? बड़ रही उदास एक दिन अहाँ माधव, कोनो टा ने करैत रही गप्प शप्प , खोंटैत मात्र दूभि हरियर, ताहू पर करैत जेना स्वयं के मने मन गंजन आ पश्चात्तापी आघात, -‘दूवि भेल तँ दूरि गेल ? अनेरे कियेक ओकर हो एना दुर्दशा आ सेहो अहाँ सदृशक हाथ सँ ? ई तँ थिक हिंसा एक प्रकारेँ हिंसा, अन्याय ! नहि ?’ भंगठल खेलौना ठीक भऽ गेलापर कोनो नेनाक आकृति पर जेहन, अबैत छैक स्वर्गसँ चलल काल हर्षक आभा  मृदुल नान्हि टा ठोढ़ पर  आ आँखि मे चमक आनन्दक, सएह अनमन सएह  भऽ गेल रहय अहूंक समाचार ,मन अछि? केहन दुर्लभ विहुंसी छल ओ ? सौंसे भुवनक सुखक सूत्र बिहुंसी ! अहाँक, अछि मन ? ताहि दिव्य विहुंसी के देखिते हम ताकऽ लगलौँ  अपन नूआक खूट बड़े व्यग्र बड़ उताहुल । -“की भेलौ राधा?” अहाँक एहि प्रश्न मे रही बाजल जेना । - खूटमे सरिया कऽ एकरा बान्हि कऽ धऽ लैत छी, अहाँक ई मुस्की, माधव  ! अनन्त कालक चुप्पीक उपरान्त ; सौंसे सृष्टि जेना हम सत्ये लैत अहाँक ठोर सँ विहुंसी अपन आंजुर अभागल सब सँ बान्हि लेने रही खूट मे विहुँसीक गीरह ! बन्हितहिं रही कि अहाँ अनचोकहि हमर जुट्टी के घीचैत जोर सँ  कहने बिना किछु- कष्ट देबा धरि- जोरे हमर मूड़ी पाछाँ देलौं झुका आ कृत्रिम क्रोध सँ कय गेलौं हमरे आँखि बाटे हमरे अभ्यंतर मे बलात् प्रवेश, स्वागत ! कहाँ बाँचल रहल हमरा  बोध । नहि बाँचल । अहाँक हाथें  घीचल जाइत अपन दुखाइत केशक । मात्र एतबे तँ रही कहने आधा तामस आ पूरा स्नेह सँ -‘करबें सैतानी फेर, हमरा संगे? बाज...बाज मोटकी?’ से पूछब बोल नहि छल - स्वयं छल अनंत प्रतिध्वनि – निनादित ब्रह्माण्ड अपने आप अहाँक ओहि बोल सँ गुंजित अनुगुंजित प्रतिगुंजित अनवरत एहि प्रक्रियामे बनि गेल छल महानादक एक टा त्रिलोक व्यापी आवर्त ! प्रत्यावर्त’ गनगनाय लागल छल हमर सृष्टि ! बहुत किछु तँ अहिना अनेरे होइत अछि जीवन मे, अनेरेक ओही आवृत्त पुनरावृत्त पड़ल पथार मे स सस्नेह आ श्रमपूर्वक ताकय पड़ैत छैक मनुक्ख केँ । मनुक्ख, ताही प्रकृति प्रक्रिया स मात्र तकबा लेल, जीवन-प्राण लेल उपयोगी, तत्व तकबा लेल आयल पृथ्वी पर । सएह कऽ रहल । तहिया सँ आइ धरि सएह क रहल । तहिया- तकर बादो बहुत युग धरि कहियो नहि भेल विरत- विरक्त ने एकहु रती उदासीन अपन एहि जीवन-गति सँ । लैत अपन एहि नियति केँ कौखन प्रेम, कौखन आदर्श, नैतिकता कौखन धर्म धर्मादेश कौखन आओर नहि तँ बेशी काल लोक लज्जा-मर्यादा । एतेक विस्तृत आ जटिल भेल चल जाइत मनुक्ख जीवनक अनादि अनन्त पथार मे सँ एतेक रास अकटा मिसिया बीछ कऽ करब फराक आ अपना योग्य अन्न कऽ लेब अपना दिस अपन पथिया- ढाकी- अर्थात् अपन वासन मे- केहन मोश्किल आ कए काल अकच्छाह सेहो तँ ! मनुक्ख भरि जन्म कि  अन्नक पथारमे सँ इच्छित अकटा मिसिया बिछबाक  लेल ! भेटल छैक लोककेँ एतबे लेल आयु ? -एतबे लेल नहि अवश्ये, मुदा इहो छैक आवश्यक राधिका ! एहनो नहि बुझियौ एहि बातकेँ व्यर्थ । कए बेर सुनि गेलाक आ चुप रहलाक बाद, कृष्ण अहाँ स्वभाव सँ एकदम अप्रत्याशित धीर-गम्भीर स्वरमे एतवा कहि कऽ आँगुर सँ सरिया देने रही हमर तेल बिन भऽ गेल जट्टा जट्टा केशक । एकटा कपार पर लटकल लट। -जेना ईहो तँ ! सौंसे ब्रजमे कतेक रास छैक लोक, कतेक रास गोपी सब । लोक गोपीक कतेक रास केश सुन्दर  आ सुन्दर, बहुत रास.... तहिना बात, घटना आ धान-पान-मखान संगहि जनमल अनेरेक दूभि निफल लत्ती-कर्मीक महाजाल ! आदि तकरा  बीचहि सं त अपना लेल’ उपयुक्त आनऽ पड़ैत छैक मनुक्ख कें ।  एहि मे  एकहु रत्ती नहि छैक उदास आ विरक्त होयबाक बात । बल्कि उन्टे  एकरा  जीवन कें आगाँ  लऽ जयबा लेल, सुख कें आगाँ बढ़यवा वास्ते आ दुःख सबकें बीछि-बीछि कऽ फराक करैत अपना सुभीताक बाट करवाक वास्ते सृष्टिक देल  एकटा अवसर होयवाक चाही, से एकर उपयोग । एकरे तं राखऽ पड़ैत छैक ध्यान । ध्यान बड़ मूल्यवान छैक मनुक्ख-देहक रक्त-प्रवाह मे राधा ! मुदा आश्चर्य जे सेहो नहि छैक अंतिम अनिवार्य । ओकरो छैक अपन आयु आ अपनहि अर्थ, सीमा । मनुक्ख-मनुक्खक मोताविक छैक तहिना उपयोगिता सेहो   ओकर । छूटय नहि बुद्धिक ई सूत्र । सैह चेतवैत रहैत अछि हमरा विवेक । सुख तं सुख, जे आनन्द पर्यन्त नहि होइत अछि तेहन पोखरि-धार जाहि मे सतत निर्मल जले टा छल-छल करैत रहय । प्रवाहित होइत रहय । थम्हलो रहय तं नहि भऽ सकैत अछि ओ  एकदम्मे  सेमार-करमी बा अन्य दृय-अदृश्य वनस्पति सभ सं सर्वथा मुक्त, मात्र जल  शीतल सर्वथा मनुष्येक उपयोग आवश्यकता भरि । तें आनन्द सन आनन्द ! तकरो मुदा  एकटा काल सीमा पर, यथा समय झाड़ऽ–पोछऽ पड़ैत छैक । ओकरा आनन्द बनल रखवाक वास्ते समय पर ध्यान सं स्नान करबऽ पड़ैत छैक, नव धोआ वस्त्र पहिराबऽ पड़ैत छैक । यमुना पर्यंत सतत् यमुना नहि रहि पबैत छैक राधा । ओकरो नहाबऽ पड़ैत छैक । एकरो वस्त्र बदलऽ पड़ैत छैक-नव धोअल वस्त्र ! सब लोक तें अपने-अपने आनन्दक माय होइत अछि । आनन्द ओकर शिशु-संतान ! तकरो लेल करऽ  पड़ैत छैक भरि प्राण ताकुत राधा ! पोसऽ पड़ैत छैक... से सत्य । मुदा  नहि बना दी आनन्द कें जुआन, परिपक्व ! कथमपि नहि। जनैत छें अपन आनन्दकें कदापि जुआन नहि होमऽ दी । रखने रही ओकरा कोरा-करेज आ बांहि धरि मे समेटि इच्छानुसार दुलार करबा लेल मोहक शिशु  ! आनन्द बच्चे आनन्द ! जवान आनन्द, भऽ जाइत अछि किछु आन बात : बुझबा लेल कहैत छी ई जे हमर मित्र अभिन्न छथि अप्पन । महान । हिनकर आनन्द भऽ गेलनिहेँ जवान ! तकरे टा आब ई सब उपद्रव छनि भरि जीवन जगत, निर्गुण-सगुणक ज्ञान-ध्यान । सएह बनल छनि हिनक सामर्थ्य तेँ सैह बनौने छनि निरानन्द । यद्यपि सभक अपन-अपन बाट होइत छैक ! अपन डेग, अपन-अपन गति ! हम तँ भऽ गेल रही हतप्रभ ! वाह रे कृष्ण ! वाह रे अहांक ज्ञान !  ई केहन गप्प आ सुझाव ? आनन्द कें नेने रखने रही... जवान नहि होअ दी ...उद्धवक  भऽ गेल छनि आनन्द जवान ! (२१.०४.०५) (अगिला अंकमे जारी) गजेन्द्र ठाकुर 15 टा पद्य १. देखैत दुन्दभीक तान *शामिल बाजाक सुनैत शून्यक दृश्य प्रकृतिक कैनवासक हहाइत समुद्रक चित्र अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द क्यो देखत नहि हमर चित्र एहि अन्हारमे तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर सागरक हिलकोरमे जाइत नाहक खेबाह हिलकोर सुनबाक नहि अवकाश देखैत अछि स्वरक आरोह अवरोह हहाइत लहरिक नहि ओर-छोर आकाशक असीमताक मुदा नहि कोनो अन्त सागर तँ एक दोसरासँ मिलि करैत अछि असीमताक मात्र छद्म। घुमैत गोल पृथ्वीपर, चक्रपर घुमैत अनन्तक छद्म। मुदा मनुक्ख ताकि अछि लेने एहि अनन्तक परिधि परिधिकेँ नापि अछि लेने मनुक्ख। ई आकाश छद्मक तँ नहि अछि विस्तार, एहि अनन्तक सेहो तँ नहि अछि कोनो अन्त? तावत एकर असीमतापर तँ करहि पड़त विश्वास! स्वरकेँ देखबाक चित्रकेँ सुनबाक सागरकेँ नाँघबाक। समय-काल-देशक गणनाक। सोहमे छोड़ि देल देखब अन्हार खोहक चित्र सोहमे छोड़ल सुनब हहाइत सागरक ध्वनि। देखैत छी स्वर, सुनैत छी चित्र केहन ई साधक बनि गेल छथि शामिल बाजाक दुन्दभी वादक। *राजस्थानमे गाजा-बाजावलाक संग किछु तँ एहेन रहैत छथि जे लए-तालमे बजबैत छथि मुदा बेशी एहन रहैत छथि जे बाजा मुँह लग आनि मात्र बजेबाक अभिनय करैत छथि। हुनका ई निर्देश रहैत छन्हि जे गलतीयोसँ बाजामे फूक नहि मारथि। यैह छथि शामिल बाजा। २. ढहैत भावनाक देबाल खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ बालकोनीमे राखल गमलामे तुलसीक गाछ प्रतीक मात्र सहृदयताक आकांक्षाक बखाड़ी अछि भरल घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक छोट मन्दिर प्रतीक बनि ठाढ़। मोन पाड़ैत अछि इनार-पोखरिक महार, स्विमिंगपूलक नील देबाल बनबैत पानिकेँ नील रंगक मोनक रंगक अदृश्य देबाल ढहैत खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ बहैत। ३ बद्री विशाल केदारनाथ अलकनन्दा मन्दाकिनीक मेल हड़हराइत धार दुनू मिलैत मेघसँ छाड़ल ई ककर निवास। बदरी गेलाह मीत भाइ नहि घुरलन्हि ओदरी हुनक ताहि, आइ सड़क धरि एतए आओल शीतल पवनक झोंक, खसि रहल भूमि, स्खलन भेल जन्तु सबहिक, हिम छाड़ल ई ककर वास। हृदय स्तंभित देखि धार पर्वत श्रेणीक नहि अन्त एतए कटि एकर तीव्र, नीचाँ अछि धार खसत जे क्यो की होएत तात दुहू कात छाड़ल पर्वतसँ ई, अलकनन्दे ई सौन्दर्य अहींक मन्दाकिनी जे आकाश मध्य देखल आइ पृथ्वीक ऊपर हरहड़ाइत ई केहन फेनिल स्वच्छ निर्मल मनुक्ख निवसित, शीतल पवनक छाड़ल ई सृष्टि नव दृष्टि देलक देखबाक आइ। ४ पक्काक जाठि तबैत दुपहरियाक भीत पोखरिक महार, पस्त गाछ-बृच्छ-केचली सुषुम पानि शिक्त, जाठि लकड़ीक तँ सभ दैछ पक्काक जाठि ई पहिल, कजरी जे लागल से पुरातनताक प्रतीक। दोसर टोलक पोखरि नहि अछि डबरा वैह, बिन जाठिक ओकर यज्ञोपवीत नहि भेल कारण सएह, सुनैत छिऐक मालिक ओकर अद्विज छल, पोखरिक यज्ञोपवीतसँ पूर्वहि प्रयाण कएल। पाइ-भेने सख भेलन्हि पोखरि खुनाबी, डबरा चभच्चा खुनेने कतए यश पाबी। देखू अपन टोलक पक्काक जाठि ई, कंक्रीट तँ सुनैत छी, पानियेमे रहने होइछ कठोर, लकड़ीक जाठि नहि जकर जीवन होइछ थोड़। ५ निन्नक जीवन विचित्र डैनियाही दुपहरियाक घामक बीच, सपनाइत, सहस्रबाढ़निक दानवाकार आकृति, प्रेयसीपर झपटैत ओकर कंठ मचोड़ैत, प्रेमी पकड़ैत अछि सहस्रबाढ़निक झोंट, पोखरिमे अछि खसैत प्रेमीक पएर बान्हि लेलक झोंटासँ, डैनियाही दुपहरियामे पोखरिक झोंटाबला पनिडुब्बी। तांत्रिक-सहस्रबाढ़निक झोँझसँ निकलि, अपन प्राणान्त करैत प्रेयसीकेँ बचबैत, प्रेमीक निन्न अछि खुजैत रौदसँ घमैत घामसँ नहाएल। घोर निद्राक तृप्ति रहैछ मुदा हेराएल। देखैत ओलम्पिक्समे देशवासीकेँ पछड़ैत, मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल गुनधुनी बला स्वप्न, बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक, अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान, दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त। कारिख चित्रित रातिक निन्न, टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य, बनि राजनेता करैत देशक समस्याक अन्त, बड्ड थोपड़ी अछि बजैत न्यायक डंका गुंजैत, धर्म-जाति-आतंकवाद, समस्या-समझौता करैत, प्राणघातक प्रहारकेँ छातीपर सहैत- जितइत, निन्न अछि टुटैत, मुदा तकर अछैत, घोर-निद्रा तृप्तिक अनुभूति अछि छुटैत। निन्नकेँ आस्ते-आस्ते देलक माहुर् मित्र, कएलक निन्नक जीवन विचित्र। ६ बंशी पाथि पकड़बाक प्रयास, आकांक्षाक पंखयुक्त अश्वकेँ, बोर देने सफलताक सूत्रक, अनन्त प्रतीक्षा निस्बद्ध चुप्पीक। पानिक तल स्थिर नियन्ताक रूप, छोट कीड़ीक गमन उठबैत अछि सूक्ष्म हिलकोर, आशाक विश्वासक प्रतिरूप। बंशी पथने ठाढ़, पाथि पकड़बाक प्रयास, अंधविश्वासक छोड़, विज्ञानक ओर, बोर देने ज्ञानक पिण्ड, प्रतीक्षाक अन्त! प्रशान्त शान्ति, सोंस, काछु, हरकाछुसँ रिक्त पानि, निर्माताक निर्मितिक अंत कएल व्याधि। बीया-जीरा माछक रोपि, बंशी पाथि पकड़बाक लेल हियाउ, आकांक्षाक अश्व, सफलताक सूत्र, ज्ञानक पिण्ड निर्माताक निर्मितिक साधांश, ठाढ्च बिच अनन्त अकास, यंत्रवत बिच अनन्त विस्तार, शान्त-प्रशान्त-वाकहीन मनुक्ख। सूक्ष्मतर भावनाक जखन आबए हिलकोर, विह्वल करैत मनुक्खकेँ छल जे छुच्छ-रुक्ख। ७ सुरसराइत ग्वालक झुण्ड कमलाक धारमे पिछड़ि हेलबाक द्वंद, धारक विरुद्ध चलबाक क्रम, ढेकरैत माल-जालक अबैए शब्द, घुरि जाइछ गाम दिस झुण्डक-झुण्ड। घरक वातावरण गारि-मारिक, बकरीक नेरीक बीच जीवन साइत, पलायन नगर दिस भेल आब ई दैव, घृणा, विरक्ति, प्रदूषण आ ई एड्स। कैक संगी मृत एड्सक भेँट, नगरक चमक मोन पाड़ैछ गामक द्वैध। अगिलही पहिने आब सुन्न अछि घर-द्वार, कोठा-कोठामे भेल मुदा की सुखहाल? गामक गाम सुड्डाह पलायनक अगिलहीमे, नहि जानि की षडयंत्र ई अछि महीमे? गाममे बेचने तरकारी लोक की कहत, नगरमे के ई जाए देखत? आह भेल नजरिक भेद लोकक एतहु, चारू कात ताकी अपन जे भेटत कतहु। अपन लोक सेहो अछि दैत अहम्, अहमक मारि मरैत पुस्तक-पुस्त आगाँक। आह ई खून-खुनाहनि असामक, ई हाल की निचुलका पीढ़ीक होएत भरि भारत। तखन कोन भयेँ छोड़ल अपन देस, केकर षडयन्त्र किए नहि बुझि पाओल कियो? छोड़ल धरती जड़ि नहि ताकि पाओल किएक। तहिया मोन खराप भेने नहि डॉक्टर छल, बाढ़ि अकालमे के ककर आसरा बनत, जाति-पाति-धर्मक देबाल बिच, पिचाएल जाइत मनुक्खक पलायन बाट छल। मुदा जे आएल नहि रहल ओतहि सएह, अछि समृद्ध, डॉक्टर वैद्य अछि, जाति टूटल पाँति टूटल, टूटल धर्म-सम्प्रदाय की? लोक समृद्ध भेल जनसंख्याक कम भेने आर बाट की? मुदा दिअ हमरो अहाँ यश एहि समृद्धिक लेल, सभ बहराएल ताहिं बोझ धरतीक कम भेल, देस-कोस घर-द्वार आब हमर ईएह, वेदना हमरामे अछि अगुलका पीढ़ीक, तँ ई सम्बलो ने हएत। ८. अभिनव भातखण्डे ( शास्त्रीय संगीतक शास्त्रकार आ गायक श्री रामाश्रय झा “रामरंग” जीक मृत्यु १ जनवरी २००९ केँ भऽ गेलन्हि। हमर रचित “मिथिलाक ध्वज गीत”क संगीत हुनके देल छन्हि। हुनकर स्नेहमे अनायासे किछु पाँती पद्य रूपमे बहराएल अछि।) भातखण्डेक अमरत्वक, पाश्चात्य संगीतक जे रहए षडयन्त्र, भारतीयताक, भारतक संगीतक स्वाधीनताक अपहरण, दृष्टिदोषक कारण जतए, राजनैतिक नेतृत्व भेल पराजित, स्वाधीनता भेल अपहृत, मुदा भातखण्डेक चरित्र, रोकि देलक संगीतक पराधीनता, हे रामरंग, अहाँक अभिनव गीताञ्जलि, पढ़लहुँ हम सम्पूर्ण आ ठीके छी अहाँ अभिनव भातखण्डे, मिथिलाक धरतीक रत्न, कोनो मातवर, नामवरक नहि अधीन, अहाँक पचासो बरखक साधना, कंठसँ शास्त्रसँ स्वाधीनताक परिभाषा, हनुमान-भक्त रामरंग अहाँक सम्पूर्ण संगीत-रामायणक आस्वाद लेने, मोन पड़लथि तुलसीदास, हुनक स्त्री-शूद्रक प्रति दुर्भावपर, अहाँक संगीत रामायणक विजय, स्वाधीनतक नव-नव अर्थ दैत, ठीके छी अहाँ अभिनव भातखण्डे, राग वैदेही भैरव, राग तीर भुक्ति राग विद्यापति कल्याण मिथिलाकेँ देल, राग भूपाली आ राग बिलावलमे मैथिली भाषाक रचना कएल, राग विद्यापति कल्याणक द्रुत आ विलम्बित खयाल, अहाँक देल संगीत मिथिला ध्वज गीतकेँ देलक नव अर्थ, नव अनुभूति, ध्वजक फहरएबाक अर्थ अछि स्वाधीनता, स्वाधीनता मनसिक, नाम खसि कए ठाढ़ होएबाक, आ बैशाखी छोड़ि दौगबाक। घृणाक आस्वाद कएनिहारक मस्तिष्कक, प्रक्षालन करैत संगीत लहरीसँ, हे सुखदेव झाक पुत्र खजुरा गामक लोक भेटताह तँ कहबन्हि, रामरंगक मूर्ति गाममे लगबाए, नहि होमए जाएब उऋण हे बहिन-भाए, स्वाधीनताक शाखाक करए जाऊ विस्तार। रामरंग रहि वाराणसी-प्रयागक गंगा तटपर, कएल स्वाधीन संगीतकेँ ओ ऋषि, स्व अधीन विचार-बात होएत, तखने होएत श्रद्धांजलि रामरंगक हे खजुरावासी। युगक अन्त भेल आइ, माँगनक स्वरमे गाबए छी, माँगनक-रामरंगक नाम लिअ नहि लिअ, मुदा मोन राखू स्वाधीनताकेँ, विश्वाससँ निकलैत आत्मविश्वासकेँ, नहि बान्हि राखू मस्तिष्ककेँ सिक्कड़िमे, पएर भने बैशाखीपर रहए, माथ रहए मुदा स्वाधीन। ९ शिल्पी शिल्पी बलिराजगढ़क हड़ाही पोखरिक, पस्टनक अकौरक आ नाहर-भगवतीपुरक बौद्ध खोह, अवलोकितेश्वर ताराक प्रतिरूप उच्चैठक मूर्ति, स्त्रीगणक गीत सहस्राब्दि भरि सुनि-सुनि बनलीह काली-भगवती, वैजयन्तीपुर-जनकपुर आ मिथिलानगरीक उत्थान, अरि मर्दनक भूमि मथल जाइत अछि जतए शत्रुकेँ, जन आ विश केर साम्राज्ञ जनक केर भूमि, दलित शिल्पीक सभटा ई कृति, मुदा आब के देत ओकर महत्व, चरण रज धोबि पीबू हिनक पएर, एतेक भेलोपर निष्कपट कएलन्हि मातुक सेवा, कमलाक भगता बनि जनकपुरक प्रदिक्षणा, मिथिलाक वृहत परिक्रमा गहबर सभकेँ गोहारिकेँ, मुदा बनलाह अछूत, गामसँ बाहर के पठेलकन्हि हुजूर, तैयो संस्कृतिक ई शिल्पी, नहि कएलन्हि पलायन, अहांक बुद्ध अहींक शिव राम कृष्ण, मन्दिरमे प्रवेश निषेधक अछैत, नहि कएलन्हि पलायन, धर्म-जातिक बोझ माथपर लेने रहलाह, पूजन करू पएर रज पखारि कऽ, बौद्ध मूर्तिक शिल्पी, ब्रह्मा विष्णुक मूर्तिक आधार, कलाकृति भाँसि गेल, हेराएल केलहुँ सभ मिलि ठाढ़ हिनका, गामक बाहर, तखन विनती दीन भदरी, छेछन महाराज, गरीबन बाबा, लालमइन बाबा, अमर बाबा, मोती दाइ, गांगो देवी, कृष्णाराम,सलहेसक मूर्ति बनाऊ, चरण रज पूजि मुदा १० अहाँक आँखिक मिलन भेने, दूर होइत अछि चिन्ता ओहिना, सागर तटपर जेना लहरि लऽ जाइत अछि, सभटा पात-खाद्य वस्तु करैछ साफ, सभटा फिकिर, शान्त स्वच्छ तट मोनक। अहाँक हँसीमे भऽ जाइत छी, फेकैत अपन सभटा दुःख, दुःखक संगे अपन सभटा महत्वाकांक्षा, अहाँक प्रेरणा दैत अछि सम्भावना, आत्मविश्वास अबैत अछि फुर्तिक संग, अभिलाषाक पूर्तिक बढ़बैत आकांक्षा, बिसरैत अपनाकेँ अहाँक आँखिमे, अहाँक स्नेहसँ गप करब, मात्र एतबे अनैत अछि कतेक सम्भावना आ परिणाम, मुदा एकर विपरीत... ११ आर्यभट्टक पाटलिपुत्रमे उद्घोष आन विद्याक तँ होइत अछि भेद-विभेद, मुदा विज्ञानक तँ अछि ई सूर्य-चन्द्र गबाह चन्द्रायणक स्वप्न पूर्ण केलन्हि वाह, लीलावती पढ़ि सूर्य-चन्द्र-तरेगणक दूरी नापलन्हि, आइ पूर्ण सफल भेल परिश्रम जाए। अग्नि-ब्रह्मोस पूर्ण कएल ई अर्थ, ब्रह्मास्त्र-पाशुपतास्त्र केर अर्थ बुझलनि जाए आइ। १२. यौ शतानन्द पुरहित अगहन शुक्ल विवाह पंचमी, विवाहक सभसँ नीक दिन, पुरहित शतानन्द, राम सीताक विवाह कएल सम्पन्न, खररख वाली काकीक विवाह, सेहो विवाह पंचमीएकेँ भेल, पुरहित सेहो कोनो पैघे पण्डित रहथि, सीता दाइ कतेक कष्ट कटलन्हि, मरबापर चित्रकला लिखल रहए मिथिलाक, परिछन, नैना-जोगिन सभटा भेल, ओहिना जेना भेल रहए सीता दाइक विवाहमे । बाल-विवाह तँ भेले रहन्हि खररख वाली काकीक, विवाहोक दिन सभसँ नीक, नैना जोगिन, जोगक गीत, किछुओ कहाँ बचा सकल, भऽ गेलीह विधवा। कहैत छथि हमर संगी, जहिया लऽ जाइत छथि ओ भौजीकेँ, पेंशनक लेल दानापुर कैण्ट, विधवा भौजीकेँ देखि, भीतरे-भीतरे कनैत रहैत छथि, बाबूकेँ कहलन्हि जे विधवा विवाह हेबाक चाही, तँ मारि-मारिकेँ ओ उठलथि, नेऊराक राजपूत बाबूसाहेबक ई खानदान, बड़ काबिल भेलाह ई, मुदा अछि बुझल हमरो, कुहरैत रहैत छथि बापो, मुदा बोझ उठेने छथि समाजक कुरीतिक, उपाय नहि छनि कोनो दोसरो। १३.मिथिला रत्न जनक याज्ञवलक्य विदथ माथव, मल्ल जगत्प्रकाश-जगतज्योतिर्र माँगन खबास रामरंग यात्री हरिमोहन, सुन्दर झा शास्त्रीक पएरमे सिकड़ि बान्हल जेलक चित्र, सीरध्वज वेदवती मैथिली मैत्रेयी जयमंगला-असुर-अलौली-कीचक-वरिजन-बेनू नौला गढ़ सभ बलिराजपुरक बुद्ध-महावीरक वस्सावसक भूमि, शिल्पी कृषकक क्षेत्र, खिखीर शाही नीलगाएक भ्रमण, आँखि लागल सभटामे। हजारक-हजार साल जे भूमि कएलक निर्वहण, से अछि पलाएनक भूमि आब, पचास सालमे की भेल जे हजार सालमे नहि छल प्राप्त लोचनक रागतरंगिणीक चर्च भातखण्डेमे भातखण्डेक चर्च रामरंगमे, गंगेश वाचस्पतिक तर्कक बीच कुतर्की कहियासँ भेलहुँ जाए। याज्ञवल्क्य द्वारा गुरुक शिक्षाक त्याग शुक्ल यजुर्वेदक निर्माणक नव अध्याय, मुदा पछातिक जाति-मंडित शास्त्र, इतिहाससँ तैयो क्षमाक करैत आश! तँ शुरु किएक नहि करैत छी इतिहासक नव अध्याय। १४. पिताक स्वप्न पिताक छल आश झूठ बजनाइ पाप, गलत काजक सर्वदा त्याग, सभ होए समृद्ध, साधारण जीवन उत्तम विचारक बीच। करैत पालन देखल जे, बुरबक बुझैत अछि लोक तँ की बदली? अपन शिक्षाक अर्थ त्यागि रस्ता नुदा वैह लक्ष्य जिदियाहवला। मुदा बजने की बस करैत रहू सोझाँवलाकेँ बुझए दोयौक, जे छी हम बुरबक। जावत बुझत तावत भऽ जएतैक हारि, पिताक सत्यकेँ झुकैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे तहिये बुझने रही जे त्याग नहि कएल होएत रस्ता जिदियाहवला। १५ सरोजिनी नगर मार्केटक बम विस्फोट डस्टबिनमे राखल बमक विस्फोट उड़ैत लोक कार वस्तु-जात खूनक धार, टटका निकलल लाल, पुरनाएल गप, खून खरकटि गेल, कारी स्याह बनल आ एम्हर दिल्ली नगर फेर आबि गेल पटरीपर! दिलवलाक छी ई नगर तेँ! मुदा जिनका घरमे रोटी कमाएवलाक मृत्यु अछि भेल हुनक जीवनक रेल एक दू दिन की भरि जिनगीयो की आबि सकत पटरीपर। सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। 1. ई जीवन 2.‘‘ अप्पन भाषा ’’ 1. ई जीवन भेल व्यर्थ ई जीवन ले के जन्म जगत मे । नहिं केलहु किछु काज व्यथा ई रहल ह्रदय मे । बीतल बचपन उड़ल संग तितली के धेने। कखनो मस्त मलंग खेल मे जोर लगेने। आवि गेल चुप चाप उतरि के यौवन कहिया। चैंक उठल मन भेल भविष्यक आहट जहिया। लगा लेलहुं संपूर्ण जोर ताकत छल जतवा । अछि की कम संघर्ष करब परिवारक सेवा । अन्न, वस्त्र, भोजन के करिते उचित व्यवस्था । बीत गेल जीवन के सबटा नीक अवस्था । छै कर्मक ई खेल भाग्य के कोना मेटेबै । भाग्य प्रवल छै कहि के ककरा केना बुझेबै । किछु जीवन के दोष देवता छथि किछु दोषी। करिते रहलहुं कर्म सतत् किछु कम आ बेसी। भेटल किछु सम्मान, मान लय के अछि भूखल । होई छै एखनो सुनू, अर्थ सँ सबटा प्रतिफल । कहाँ शक्ति छनि सरोस्वती के असगर अपना। सबसँ उपर ठाढ़ लक्ष्मी सबके सपना । जिनका जतवा अर्थ पैघ छथि जग मे नामी। बिना अर्थ सब व्यर्थ, दुखक जीवन अनुगामी। आब सोचि की करब उम्र उतरल अगुता के। वाणप्रस्थ मे जायब किछु संताप उठा के। हम रहलहुं अभिलाषी भव मे मोक्ष मार्ग के। चलिते रहलहुं हम धिसियाक पथ सुमार्ग के। की भेटल अभिमान करब जकरा ले के हम। पेट पोसि के मात्र बीतेलहुं ई जीवन हम। 2.‘‘ अप्पन भाषा ’’ बनल मंच पर शब्द जोड़ि क’ जगा रहल छी झूठक आशा। बिसरि मैथिली मृदुल कंठ सँ चिकड़ि रहल छी आनक भाषा। करब याद माईक कोरा मे निकलल शब्द पहिल जे मुख सँ। कतेक सुकोमल,मिठगर,रसगर, ई भाषा अछि बाजू सुख सँ। छी मैथिल संतान कथी लय बाजि मैथिली शर्म करै छी । छोड़ि पियरगर शब्द अपन ई अंग्रेजी के ओट धरै छी। नहिं जीवन के नव प्रवाह मे अछि भाषा कखनो अवरोधक। नहिं बाजै छी तैं अछि लज्या बना लेने छी दृष्टि अबोधक। बाजब हम सब अप्पन भाषा लिअ’ आई संकल्प हृद्य सँ। पसरल जायत अपने दिन. दिन भ’ जायत समृद्ध अभय सँ। पनभरनी -ज्योति झा चौधरी पनभरनी आयल भोरहरबामे छल कनकनी सऽ भरल बसात केवाड़क खटखटीसऽ नींद खुजल मेघक आवरणमे प्रकाशहीन प्रात बरतन बासन रखलक बाहर भन्सा घरके निपलाक पश्चात डोल सबके लटकेने विदा भेल पानि भरै लेल इनारक कात पानि उपछैत नहिं अघायल काज लग सोहेलै नहिं कोनो बात रोजी रोटीक प्रयोजन छल फुर्ती सऽ जाड़के धांगैत लात आवश्यकता उर्जा श्रम आभूषण अपर्याप्‍त वस्त्र सहैत ऋतुक आघात मृदुलता आऽ कोमलताक प्रतीक स्त्री कर्त्तव्यपथ पर देलक प्रकृति के मात पंकज पराशर, डॉ पंकज पराशरश्री डॉ. पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। सत्तनजीब एहि अकादारुण कंक्रीटक बोनमे बौआइत तकैत छी एकटा कोर एकटा स्नेहिल गाछ सन चतरल तरहत्थ जतय बिसरि सकी जा कए भविष्यहीन समय केर सबटा संताप एकटा अदद चाकरीकेँ सुरक्षित बचौनेँ रहबाक लेल अव्यक्त आक्रोशकेँ चाँपैत-चाँपैत रक्तक भयंकर चापसँ चापित एहि नव साम्राज्यवादी लोकतांत्रिक अभिशापित एक नागरिक कथी लेल जीबैत छी ककरा लेल जीबैत छी जीबि कए की करैत छी? डॉक्टरक बताओल पथ्य आ दवाइक सोंगरपर टिकल एहि जीवनक कोन उपयोगिता, कोन सार्थकता मैञा, किएक उकासियो लेल कहैत छलेँ सत्तनजीब हमरा सन-सन सहस्रो लोकक मोनमे निरन्तर बढ़ल जाइत व्यर्थता-बोध एक अदद चाकरीक लेल जीबैत लोकक मोनमे अपने प्रति घृणा आ विरोध जे लोकनि अपस्याँत छथि जीवनोत्सवक समारोहमे लहालोट छथि रागात्मक काव्यक उत्पादनमे हुनकर आँखिक रेटिनापर खचित नहि भऽ सकैत छनि आयकरदाताक सूचीसँ बाहर विशाल जनसमूह केर पिरौंछ मुंह एहि समय केर विभिन्न तंत्र सबसँ बारंबार पुछैत अछि लोक भिन्न-भिन्न परिभाषाक कोन व्याख्यामे निपत्ता भऽ जाइत अछि हमर मैञाक सत्तनजीब हमर पिताक देल दीर्घायु हेबाक आशीष? लोक पुछैत अछि भिन्न-भिन्न तंत्र केर व्याख्याकार सबसँ ई प्रश्न आ मारल जाइत अछि अचक्के राष्ट्रद्रोहक नामपर जे किछु नहि पुछैत अछि किछु नहि बजैत अछि ओ एक अदद चाकरीक रक्षामे तिल-तिल कए मरैत मृत्युक आवाहन करैत अछि। मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल- बी.के कर्ण मुऱझाऽल अछि अपन व्यक्तित्व पर सेनहता लगले रहल अपन काबिलियत पर सफल खिलाड़ीक क्षेत्रक शान आ मान देखि कऽए मोन होइया हमरो क्षेत्रक शान आ मान पर भेटल रहिताऽ एकोटा मेडल मिथिलाक लेल ढुढि रहल छी मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल अथक प्रयास करबे करब ककरा जकां क्रिकेटमे गावस्कर आ तेंदुलकऱ शतरंजमे आनन्द विश्वनाथन जकां शुटिंगमे अभिनव बिन्द्रा आ टेनिसमे सानिया मिर्जा जकां कते कहु ककरा ककरा जका़ चाहि एकटा मेडल ढुढि रहल छी मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल के नैऽ जनैऽयैऽ मिथिलामे बाढि अभिशाप बनलयैऽ माहिर भेल नेना भुटका सभ खुब हेलैयऽ बाढिक वरदान तखने बुझब जखनैऽ अगला ओलम्पिकमे मेडलिस्ट स्वीमर फेल्पस पर कड़त प्रहार बाढि प्रताड़ित एक मैथिल ढुढि रहल छी मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल बिहारक प्रहार मिथिला पर हिन्दीक प्रहार मैथिली पऱ ताहु स पैघ मैथिलक प्रहार मैथिली पर बिहार आ हिन्दी सॅं लगाव कोनो कम नहि पर मिथिला वा मैथिलीक उपेक्षा अगज सॅं मगज तक प्रहारो झेलब उपेक्षित रहब जखन क्यो मैथिल़ जीत कयऽ लयताह मिथिलाक लेल़ एक ओलम्पिक मेडल कोशीक देल कष्टसॅं की की नैऽ गवेलहुँ राहत काेष सॅं आहत भए अथाह टुअरक नाम कमेलहुँ इतिहासमे बिलाऽल मिथिला महिमाके़ पुनरनिर्वाणक क्रान्ति सुनगि रहल कहिया हैऽत से नहि जानि पर एकटा भरोसा अछि बनल मैथिल जनसॅं मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल भरोसा दऽय रहल नवतुरिया मैथिल सब कहि रहल अछि अथक प्रयास करबे करब मिथिलाक लेल एक ओलम्पिक मेडल लेबे करब़ कला आ संगीत शिक्षा हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त। मिथिलाक लुप्तप्राय गीत

गर्भ सॅ छठिहार धरि सोहर आ खेलउना पर आधारित संस्कार गीतक बानगी

मिथिलाक गौरवमयी श्रेष्ठ संस्कृति एवं परम्परा केॅ सुरक्षित रखबाक श्रेय मैथिली लोकगीत कें अछि। परम्पराक सूत्रधार पूर्वजलोकनि मैथिल समाजक जन सामान्य कें अपन मूल संस्कृति ओ परंपराक प्रति उदार बनाबए लेल तदनुकूल लोकगीतक परंपरा विकसित कएलनि । कालान्तर में अनेकों विद्वान गीतकार ने अपन कृति मे मैथिली लोकगीतक भण्डार के अत्यन्त समृ( बनओलनि । देश ,काल और परिस्थिति में परिवर्तनक संग संग लोकगीतक रचना में सेहो विविधता आएल । मुदा आदर्श आचार पर आधारित लोकगीतक परंपरा लोककण्ठ में स्थान पबइत रहल जे आइयो मिथिलाक आचार आदर्श सॅ परिचय करबइत अछि । सर्वविदित अछि जेे लोकगीतों में कृत्रिमतानहि होइत अछि । समाज मे प्रचलित सामान्य बेवहारक अभिव्यक्ति होइत अछि । मैथिली लोकगीतक अवलोकन सॅ मिथिलाक सभ्यता ,संस्कृति , रीति रिवाज ,पर्वत्योहार ,कला ,साहित्य सामाजिक उन्नति आ मानवीय आकांक्षाक यथार्थ रूप आइयो अनुभव करबा योग्य अछि । मिथिला में जन्म सॅ लऽ कऽ विवाह धरि सब बिध बेवहार गीतक संग सम्पन्न होइत अछि । बारहो मास मे प्रचलित पर्व त्योहार व्रत पूजन आदि परंपराक लेल अलग अलग गीत अछि । )तुक अनुसार मैथिली लोकगीतक अपन विशेषता रहल अछि मिथिला में । विवाह ओ उपनयन आदि संस्कारक गीत में खास प्रकार के रागक प्रयोग भेल अछि जे अन्य़त्र नहि देखल जाइछ । धर्म प्रधान क्षेत्र हेबाक कारणें मिथिला में प्रातः जागरण सेहो पराती लोकगीत सॅ होइत रहल अछि । जहॉ तक मैथिली लोकगीतक प्रकारक प्रश्न अछि अनेकों प्रकारक लोकगीत आइयो लोककंठ में रचल बसलन अछि। पुत्रकामना ,जन्म सॅ संबंधित सामान्य व्यवहार एवं लोकाचारक सहज अभिव्यक्ति सोहर , खेलउना , छठिहार , पीपर पिलाई , आॅख अॅजाई , बधैया , आदि नाम सॅ प्रचलित लोकगीत सभ मे अछि । एहि मे लौकिक एवं भक्ति प्रधान विषय पर आधारित गीतक समावेश अछि । एक भक्त हृदय स्त्रीक पुत्रकामना व्यक्त करइत सोहर अछि - पॉच गाछ रोपल आप पॉचे गाछे इमली रे । ललना तइयो ने सोभय बगीचबा एकहि चनन बिनु रे ।। नहिरा में छथि पॉच भइया आओर पॉच भातिज रे । ललना तइयो ने भावए नइहरबा एकहि अमा बिनु रे ।। ससुरा में छथि पॉच जाउत आओर पॉच जइधी रे । ललना एक नहि भाबए सासुरबा अपन होरिला बिनु रे ।। गंगा पइसी नहइतहुॅ हरिवंश सुनितहुॅ रे । ललना सूति उठि लगितहुॅ गोर कि दैव सहाय हएत रे ।। ललना एकहि पुत्र दैव दीतथि जिउरा जुड़बितहुॅ रे ।। बच्चा जन्मक समय प्रसव पीड़ा सॅ विह्वल स्त्रीक मनोदशाक वर्णन सेहो स्वाभाविक लगइत अछि । एहि प्रसंगक सोहर अछि है इस प्रसंग के सोहर गीत में । प्रसव पीड़ाक वेदना मे स्त्री अपन सासु ,जेठानी आ ननदियो कें स्वार्थी आ कठोर बूझऽ लगैत अछि आओर पुत्र प्राप्तिक बाद सभ कष्ट कंे बिसरि जाइत अछि । पुत्र जन्मक खुशी मे ओकरा सभक बेवहार नीक लगइत अछि । एहि भाव कें व्यक्त करइत सोहर अछि - अपन माए मोरा रहितइ , मुुंहवां निहारितइ ,दरद बॉटि लीतइ हो । ललना पिया जी के माए निरमोहिया होरिला होरिला करइ हो ।। अपन भाउज मोरा रहितथि डॉड़ लागि बइसतथि हो । ललना पिया जी के भाउज निरमोहिया भानस भानस करइ हो ।। आधा राति बीतल पहर राति आरो भिनसर राति हो । ललना होइते भिनसर पह फाटल होरिला जनम लेल रे ।। ललना पुत्र फल पाओल से देखि सब दुःख बिसरल रे ।। मिथिला मे जन्मक प्रथम उत्सव छठिहार होइत अछि । एहि उत्सव मे ननदि आ भाउजक बीच हास परिहासक जे स्वाभाविक रूप मिथिला मे अछि तकर अभिव्यक्ति खेलउना और बधइया गीत मे अछि । ननदि आ भाउजक बीच मधुर संबंध कें व्यक्त करइत एक खेलउना मे छठिहारक अवसर पर ननदि कंे बजाबऽ लेल पति सॅ आग्रह करइत भावव्यक्त होइत अछि - पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे । जब रे ननदिया नगर बीच आएल । पूरी मिठाई बड्र्र्र्ऱा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया दुअरे बीच आएल । बिछिया बाजे बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया आॅगन बीच आएल । ननदी के बोली बड़ा मीठ लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ जब रे ननदिया सोइरी बीच आएल । बेसरि मॉगे बड़ा तीत लागे ।। पिया तोर गोर लागूॅ ननदी मॅगा दे ।। आओर भाउज आ ननदिक बीच हास परिहास एहनो होइत अछि जाहि मे ननदि इनामक मांग करइत अछि आ भाउज ओहि मांग के अपना तर्क सॅ टारबाक कोशिश करइत अछि । ननदि- सब गहना में नथिया बड़ा महराजा हो राज ।। भाउज- नथिया ने लेइ ननदिया हो महराजा हो राज ।। ;ननदि बच्चा कंे उठाकऽ चलि दैत अछि । तखन भाउज कहइत अछि द्ध लय गेलइ बबुआ उठाय हो महराजा हो राज । दए जाहु ननदी बउआ हमार महराजा हो राज ।। लए जाहु भइया उठाय हो महाराजा हो राज । ननदि- हम लेबइ भइया के राज हो महाराजा हो राज ।। भाउज- जौं तोहें लेब ननदी भइया के राज महाराजा हो राज । की लेतइ बउआ हमार हो महाराजा हो राज ।। भाउजक तर्कक समक्ष ननदि हारि जाइत अछि तखन ननदि बधैया गबइत अधिकार पूर्वक भाउज सॅ कहैत अछि - बधइया हम लेबउ भउजी हे ।। अॅउठी आ मुनरी हम नहि लेबइ। जड़ाउदार कंगना भउजी हे ।। बधइया बाली आ कनफूल हम नहि लेबइ । मीनादार नथिया भउजी हे ।। बधइया बाजू बिजउठा हम नहि लेबइ । घॅुघरूदार पायल भउजी हे ।। बधइया रेसम के सरिया हम नहि लेबइ । लहरदार चुनरी भउजी हे ।। बधइया हम लेबइ भउजी हे ।।

मुदा आब एहि सब तरहक गीतक परंपरा लुप्त प्राय अछि तें इ गीत सभ सेहो लुप्त भऽ रहल अछि । एहि सभ गीतक परंपरा लुप्त भेला सॅ लौकिक परंपरागत संबंधक मधुरता कोन रूप मे प्रभावित भऽ रहल अछि विचारणीय अछि संगहि इहो विचारणीय अछि जे ओहि आदर्श कें बचाबऽ के विकल्प कोना खोजल जाय । बालानां कृते- 1. मध्य-प्रदेश यात्रा आ 2. देवीजी- ज्योति झा चौधरी 1. मध्य प्रदेश यात्रा तेसर दिन : 25 दिसम्बर 1991 : आहिके हमर सबहक यात्रा प्रातः साढ़े नौ बजे प्रारम्भ भेल जखन हमसब नर्मदा एक्सप्रेस सऽ पेण्ड्रारोड दिस विदा भेलहुं।अहिबेर हमसब अपन गतिविधि कम कऽ गाड़ीक गतिविधि पर विशेष ध्यान देने रही।हमर सबहक गाड़ी उस्लापुर (10:05 a.m.) घुटकू (10:15 a.m.) कलमीटर(10:30 a.m.) करगीरोड(10:40 a.m). बेलगहना(11:00 a.m). टेमनमाड़ा(11:15 a.m). बेलगहना(10:40 a.m.) होंगसा (11:35 a.m. सऽ होइत पेण्ड्रारोड पहुंचल। ओत सऽ हमसब तुरन्त अमरकण्टक लेल रवाना भऽ गेलहुं।लगभग सवा दू बजे हमसब अमरकण्टक पहुंचलहुं।ओतय हमसब पर्यटक अतिथिशालामे रूकलहुं।भोजनोपरान्त हमर सबहक पहिल पड़ाव छल ‘माइ की बगिया’। ई जगह नर्मदा नद तथा सोनभद्रा नदीक उद्गम स्थान अछि। माई की बगिया के भ्रमण मे सबसऽ पहिने विवेकानन्द सेवाश्रम देखलहुं।अकर स्थापना 1983 इर्सवीमे भेल छल।अत साधुसब गेरूआ वस्त्र धारण केने विराजमान छलैथ।ओतऽ सऽ कनिके आगू बढ़लापर नर्मदामूड़ा पहुंचलहुं जतय एकटा छोट सन जलकुण्ड छल। यैह कुण्ड नर्मदा नदके मूल उद्गम स्थान छल। अत नर्मदा अवतरित भऽ पुनश्च भूमिगत भऽ जाइत छैथ। ई कुण्डके नर्मदाक बाल्यकाल मानल गेल अछि।अहिठाम ‘गुलवकावली’ नामक बूटी भेटैत छै जे की आयुर्वेद विज्ञानमे अमूल्य छै आर मेकार पर्वतके अतिरिक्‍त मात्र अतै भेटै छै।तकर बाद श्री महातीर्थ सोन उद्गम कुण्ड महन्तजी श्री 108 बालकेश्वर गिरि के तपोभूमि अवस्थित छै।तकर बाद सोन आऽ भद्रा नदीक संगम कुण्ड छै जे भूमिगत भेलाक बाद कनिके दूर पर विशाल झरनाक रूप लऽ लैत छै्र। अहि विशाल जलप्रपातक सुन्दरताक वर्णन केनाई असम्भव लागि रहल अछि।मानव निर्मित वाटर फाउण्टेन अकर सामने बहुत तुच्छ अछि। शहर मे अतेक वास्तविक एवम् मनोरम प्राकृतिक दृष्य कहां देखऽ भेटैत छै। ऊंच ऊंच वृक्ष श्रृंखलाक बीच कच्चा सड़क के पार करैत हमर सबहक टाेली आब करीब तीन फीट ऊंच घासक मैदान मे घुसल।फेर सऽ गाछक झुण्ड आयल।गाछ पर चढ़ि कऽ सब फोटो सेहो खिंचेलक लेकिन हमरा लग कैमरा नहिं छल से हमेशा पछतावा रहत।एक वृताकार पथ स होएत हमसब ‘जय मां नर्मदे हर’ पहुंचलहुं।अहि ठाम एकटा नर्मदा कुण्ड छै जे एक टा छोट पोखरि के आकारक छै। कहल गेल छै जे नर्मदा अपन बाल्यकालके बाद अहिठाम पुनः अवतरित होएत छथि।अत अनेको देवी देवताक मन्दिर छैन जेनाकि गोरखनाथ मन्दिर श्री रोहिणी देवी मन्दिर श्री दशावतार मंदिर नर्मदेश्वर महादेव मन्दिर श्री गाैरीशंकर मंदिर श्री सूर्यनारायण मंदिर श्री ग्यारह रुद्र मंदिर सिद्धेश्वर मंदिर इत्‍यादि।अहि सबहक बाद हम सब घुरि एलहुं अपन स्थान पर।पता चलल जे आहि हम सब करीब 7 किलाेमीटर पैरे चललहुं। ई ज्ञात भेलासऽ हमर सबहक थकान आर बढ़ि गेल।तकर बाद फेर वैह संग मे खेलनाइ़ अंताक्षरी़ चुटकुला़ गीत  नाद आ सबसऽ नीक छल माउथआर्गन सुननाई।हमरा सबके खुजल मैदान भेटल छल ताहिमे कैम्प फायर के मजा सेहो उठेलहुं। 2.देवीजी : सरस्वती पूजा वसंत पंचमी के शुभ दिन आबि रहल छल।सब विद्यार्थी गौँवा सबसऽ चंदा जमा कऽ पूजाक तैयारी केलैथ। अहि पूजा लेल विद्यालयके प्रांगण सऽ उत्तम आर कोन स्थान भऽ सकैत छल।सब प्राधानाध्यापक सऽ अनुमति लऽ कऽ सरस्वती जीक प्रातिमा अनलक। पूजाक तैयारी मे देवीजी विद्यार्थी सबहक संगे सतत् उपस्थित एवम् कार्यरत रहैथ।पुरोहित के बजाओल गेल। पूर्ण विर्धिविधान सऽ देवी सरस्वतीजीक पूजा अर्चना भेल। अहि सबमे पुरोहित सबके सरस्वतीजीक महिमा बतेलखिन। ओ कहलखिनजे माता सरस्वती विद्याके देवी छथि।ई श्वेतवस्त्र धारण करैत छथि जे सात्‍विकताक प्रातीक अछि।हिनकर हाथमे वीणा रहैत छनि तथा हंस पक्षी हिनकर सवारी छैन।हिनकर चारिटा हाथ चारि वेदक प्रातीक मानल गेल अछि आर ई चारिटा वेद मे साहित्‍यके तीनू विधा पद्य़ गद्य  तथा संगीत निहित अछि।एक हाथमे पुस्तक गद्यक प्रातीक़ दोसर हाथमे स्फटिक माला पद्यक प्रातीक़ तेसर हाथमे वीणा संगीतक द्याेतक तथा चारिम हाथमे पवित्र जल सऽ भरल कलश साहित्‍यक तीनू विधाके शुद्धताक प्रातीक मानल गेल अछि।सरस्वती देवीके सेब फल सबसऽ प्रिय छैन से मानल गेल अछि तथा हिनका मधुक नैवेद्य चढ़ायल जायत छैन। मधुके ज्ञानक सम्पूर्णताक प्रातीक मानल गेल अछि। फेर मूर्त्तिके विसर्जन सेहो कैल गेल। अहि प्राकारे सब अपन बौद्धिक विकास के लेल विद्याक देवीके पूजा केलैथ।आबै वला समयमे विविध प्राकारक प्रातियोगिता आबैवला छल से सब देवी सरस्वती सऽ आशीर्वाद लऽ आगामी कार्यक्रमक तैयारी मे लागि गेलैथ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Top of Form Input:(कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Roman or Mithilakshara) Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Roman, Mithilakshara and Phonetic Roman.) English to Maithili Maithili to English Bottom of Form विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.पञ्जी डाटाबेस २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली १.पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-पञ्जीकार विद्यानन्द झा, नागेन्द्र कुमार झा एवं  गजेन्द्र ठाकुरद्वारा) जय गणेशाय नम: 18 पुरूषोत्तम सुतो ज्ञानपति: मांडबेस्‍ट स हरिकर सुत बाटू दो।। ज्ञान पति सुतो उँमापति सुरपति एकमा बलियास सँ आडनिसुत बाढ़ दौ।। एकमा बब्यिास सँ बीजी वरणीधर। एक सुता पदमनाम श्री निधि श्री (1115/0411) नाया:।। पदमनाम सुतो शुक्‍त (1108/0711) हरिवंश हरि शर्मणो बरेबा स पुरूषोत्तम दौ वरूआली मराढ़ में बीजी दिवाकर: ए सुतोवाध श्रीहर्ष:।। श्री हर्ष सन्‍तति  मराढ़वासी बाछ सन्‍‍तति बरूथली वासी।। बाछ सुतो।। आवस्थिक चन्‍द्रकर रतनाकर मधुकर साधुकर विरेश्‍वर धीरेश्‍वर गिरीश्‍वरा: धनौजसँ जनार्दन दौ।। साधुकर सुतो धाम: पनिहारी दरिहरा सँ गंगेश्‍वर दौ अपरो देहरि: पनिचोभ सँ विघ्‍नेश्‍वर दौ।। देहरि सुता गंगेश्‍वर दौ।। ठ सुरपति सुता दूबे 1127/ दरिहरा सँ गंगेश्‍वर दौ अपरौ देहरि: पनिचोभ सँ विघ्‍नेश्‍वर दौ।। देहरि सुता दरिहरा सँ गंगेश्‍वर दौ।। ठ सुरपति सुता दूबे 1127/ लाक्ष महिपतिय: मंगरौनी माण्‍डर सँ पीताम्‍बर सुत दाम दौ माण्‍डर सँ बीजी त्रिनयनभट्ट : ए सुतो आदिभट्ट: ए सुतो उदय भट्ट ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचन भट (सुनयन यह) ए सुतो यह ए सुतो धर्मजटी मिश्र ए सुतो धाराजही निम्‍न ए सुतोब्रहमजरी मिश्र एसुतो त्रिपुर जरी मिश्र ए सुतं विघुजरी मिश्र ए सुतो अजय सिह: ए सुतो विजय सिंह ए सुतो ए सुतो आदि बइह: एसुतो महोवराह: ए सुतो सोढ़र जय सिहं तर्काचार्यरस्‍त्र महास्‍व विद्या पारड़त महामहो पाध्‍याथ: नरसिंह:।। 19 तर्काचार्यस्‍त्र महास्‍त्र विद्याा पारड़त महामहोपाध्‍याय नरसिहं (111011061) सुता महामसे 1107110/11 निधि शिलपाणि (1116110/11) कुलधरा:।। महामहो निधि सुतो श्री कुमार पाठक वासी कुलधंर कोड़रावासी शिलपाणि मड़रौनीवासी ए सुतो महाविभाकर: जजिबाल मातृक:।। ए सुता नारायण चन्‍द्रकर विश्‍वेश्‍वरा: करिअन सँ धर्माधिकरणीक महामहोपाध्‍याय भरथ दौ।। महामहोपाध्‍याय नारायण सुता महामहोपाधा देवशर्म्‍म हेलन जगतपुर नरदेवा: आदय: परली पालीसँ जयशर्म्‍म दो अन्‍यो केउँटी राडढ़ सै धराई दौ।। महामहोउपा देवशर्म्‍म सुता महामहो  जगन्‍नाथ महामहोड़ देवनाथ मिश्र (1116/0811) नन्‍दी मिश्र (1118110911 गुणे मिश्र स्थितकरा:आदयो पोखरौनी टंकवास स्‍ नरसिंह दौ अपरौ छादन सरिसब सॅ देवादित्‍य दौ अन्‍यौ भण्‍डारिसमसँ रूचिकर दौ।। महामहोउ  जगन्‍नाथ सुता सदुपाध्‍याय (191105) अमतू सदुपाध्‍याय (1909/0611) विशो महामहोपाध्‍याय वतेशा (1118/02।।) वतेशा गढ़निरदूतिसँ महामहन्‍तक विद्याधरदौ मेरन्‍दीसँ श्रीधर दौ।। अपरौ पीताम्‍बर: चक्रहद पनिचोभ सँ चन्‍द्रकर दौ।। पीताम्‍बर सुतोदाम प्र दामोदर: बेलउँचसँ तीर्थड़र दौ भरेससँ विश्‍वनाथ दौं।। (1144110211) दामू सुता बाए़ प्रलय सँ महामहोपाध्‍यायरामेश्‍वर दौ: बाढ़  प्रलयसँ बीजी पंडित गंगा ए सुतोभरत: ए सुता सीते पदूम वर्द्धमान हाडका:।। पदूम सुतोकमलपाणि। ए सुता रतनेश्‍वर वस्‍त्रश्‍वर यवेश्‍वर देवेश्‍वरा: खौआल सै नयपाणि दौ एकहरी सँ सोने दौ वत्‍सेवर सुतो (1157/10811) वीरेश्‍वर महापहोपाध्‍याय रामेश्‍वरी आदय: भाण्‍डरसँ श्‍यामकंठ दौ अन्‍योततैल पण्‍डआसँ महामहो दिवाकर दौ सोनकरियाम करमह गसॅ हरिकेश।। (20) महोपाध्‍याय (11600211) रामेश्‍वर सुता महो (181101) ग्रहेश्‍वर महो लक्ष्‍मीघर (531107) महो गंगाधरा: (1631103) मताउन दरिहरा सँ एति दोते।।: मताओन दरिहरा सँ बीजी श्रीकर: ए सुतो गंगेश्‍वर विश्‍वेश्‍वरों।। गंगेश्‍वर सुता विन्‍दयेश्‍वर ग्रहेश्‍वर यवेश्‍वर परनाम सर्वेश्‍वर पशुपति धर्मेश्‍वर गिरीश्‍वर गौरीश्‍वरा टकबालमाद्रक गिरीश्‍वर सुतो देवादित्‍य दुर्गा दित्‍यों अलय सँ रति दौ।। देवादित्‍य सुतो रति बिजूको: सरिसब सँभवदेव दौ महोरति सुता ठकुराइनि लरिका देयीका:।। कोइयारसँ भवशम्‍मर्स दौ।। ठक्‍कुर दुबे प्र श्रीपतिसुता ठ (151109) हरपति ठ (84/04) नरपति ठ. चन्‍द्रपति प्र. चन्‍द्रपति प्र. चाण: सोन करयांम करमहा सँ श्रीधर दौ सोन रियाम करमाहासँ ब्रीजी महामहोपाध्‍याय वंशधर: ए सुता महामहोहरिब्रहम महामहोहरिकेश म. म. धूर्तराज गोनूका: सकुरीसँ महामहो देयी दौ।। महामहो हरिकेश सुतो (121104) गोविन्‍द नोने को खण्‍डबला सँ नित्‍यानन्‍द दौ।। अपरौ (11102) लक्ष्‍मीपति लक्ष्‍मीकंठो कुजौली सँ बाछे दौ।। अपरै लान्हि रूचिकर हरिवंशा: लखनौर सकराढ़ी सँ पनिहथ ढोढं दौ।। रूचिकर सुतो हरदत्त नितिकरौ खण्‍डबलासँ विश्‍वनाथ दौ।। अपरो गिरीश्‍वर: मनकी सजातनाम सीत दौ।। गिरीश्‍वर सुतागंगेश्‍वर भवेश्‍वर देवेश्‍वरा: लखनौर सकराढ़ीसँ सर्वेश्‍वर दौ।। (603106) गंगेश्‍वर सुता (211108) नरसिंह श्री कर्स केशवा: बेलासक जीवेश्‍वर दौ अपरै (20/08 ) वाराह श्री धर माधव (291103 351103) रामा: पतौना खौआल सँ आदू दौ।। पतऔना खौआलसँ बीजी महामहोपाध्‍याय प्रजापति सुतो महो वाचस्‍पति महो उँमापति।। (127/05) वाचस्‍यति सुतो गणपति (21) धनौज सँ त्रिपुरारि दौ।। गणपति सुता शशिधर (211/04) लक्ष्‍मीघर सुरानन्‍द धर्मधिकरणिक महामहोपाध्‍याय (1103110511) हरिशर्म्‍मणा:।। शशिधरसुतो गदाधर: मड़ारसँ (विदौ ।। अपरौ महिघर पृथ्‍वीघरौ गंगोली सँ देवरूप दौ।। अपरै जयकर शिरू गोनू गंगाधरा: सँ प्रियकर दौ।। गदाधर सुतो महामहो न्‍यपाणि महो हरिपाणि महुआएं भीखम दौ।। महो हरिपाणि सुतो लक्ष्‍मीपाणि रतनपाणि उदनपुर जजिवाल सँ शान्तिकर दौ।। अपरौ महिपाणि जयपाणि गंगोली सँ माद्रक:।। महामहो रतनपाणि सुता महो हरादिस महामहो (131010) भवादित्‍य महामहो न्‍यादित्‍य महामहो धरादित्‍या गंगोलीसँ वंशधर दौ।। अपेरे जयादित्‍य महामहो (191109) दैवदित्‍य महो गंगादित्‍या मिगुआल सँ चन्‍द्रकर दौ।। महामहो जयादित्‍य सुता लक्ष्‍मीकर शुचिकर आचार्य उदयकरा: बनाइनि पाली सँ भोगीश्‍वर दौ (20101) शुचिकर सुता छीतू (71106) बीकू आडू का भुतहरी निरबूतिसॅ सुत दौ दियोयसँ पति गौण।। आड़ सुता महपौर प्रलयसँ गयशमर्स दौ: महथोरे प्रलयपर बीजी बाढ़न ए सुतो विश्‍वनाथ: ए सुतौ गयशर्म्‍म गुणाकरौ मिगुआलसँ विरेश्‍वर दौ।। गयशर्म्‍मा सुतोकारू वेदूकौ सकराढ़ी मात्रकौ।। श्रीधत्‍सुतो (30110) रतिध (531106) महिधेरो नाउन में मुरारि दौ: शक्रिरायपुर नरउनसँ बीजी मनोधर: ए सुतोबलमद्र: ए सुतो बलमद्र: ए सुतो पनाईत भद्रेश्‍वर: केउँटी सउढ़सँ हरिहर दौ।। ए सुतो (10101) रामेश्‍वर नन्‍दीश्‍वरौ अलयसँ देवपति दौ।। नन्‍दीश्‍वर सुतो गौरीश्‍वर गोविन्‍दो करूआनी सकराढ़ीसँ रतिकर दौ: करूआनी सकराढ़ी सँ बीजी हरदन्‍त: ए सुतो श्रीकरदशा: (13104) मनोरथा: (22) दशरथ सुता बलिदेव (81105) राम नरसिहं।। पचहीवासी नरसिहं सुतो शूलपाणि: सिंहाश्रम सँजाई दौ।। ए सुतो पदमपाणि महामहोपाध्‍याय कारूकौ आदय: सुरगण सँ गोवर्द्धन दौ।। अन्‍यो कोइगर सँदल्‍हन दौ।। महामहोपाध्‍यायकारू सुतो महो गोविन्‍दमहो प्रतिकर महो जगद्धरमहो (14107) हरिहरा: करही सँ हरिवंश दौ।। महोप्रतिकर सुतो लक्ष्‍मीकर मधुकरौ सरिसब सँमहो हरादित्‍रू दौ।। सरिसबसँ बीजी रतनपाणि ए सुतो चक्रपाणि दीधीसँ भीम दौ।। ए गुत श्री वस टल्‍लेश्‍वर वसुन्‍धर रामदेवकाम देवा: चक्रहदपनिचोभसँ छितिशर्मा दौ।। श्री वत्‍स सुतामहो (11102) देवादित्‍य महो (14107) जयादित्‍य महो हरादित्‍या मन्‍दवाल जल्‍लकीसँ उद्योतकर दौ।। अपरौ शिवादित्‍य: जलकौर पालीसँ श्री वत्‍स दौ महो हरादित्‍य सुता नान्‍यपुर सौआल सँ  बाछ दौ 1103 101।। म. म. धर्म विधर्यणक हरिशर्मा सुत राजे बढ़े (11102 4101) नाने गडूर जयशम्‍मणि: नान्‍यपुर का सिनय: तत्रादयो गढ़ एकहरी सँ धनमुय दौ। अपरौ मड़ार सँ पीथो मगिनेय: 14101 बाछे सुता जयदेव कापनि मधवा गंगोलीसँ भीम सुत शाकलय दौ धोसियाम सँ धाम दौण अपरौ धाम: अहपूर करमहा सँ सँ नारायण सुत हिंगू दौ।। गौरीश्‍वर सुतो दामोदा मुराारि: तक बाल सैरूद दौ: टंकबालसँ बीजी हरिपाणि: ए सुतो शंरपयाणि: कीर्तिपाणि: पिहवालसँ मालोदो ।। गंखपाणि: नीमावासी।। कीर्तिपाणि सुतो गोविन्‍द शूलपाणि: गोविन्‍द पोरखरौनीकासी।। ए सुतो नरसिंह: पइसरासँ उँमापति दौ।। ए सुतो बरसेश्‍वर: बेला सकरादी सँराउल मासो दौ।। अपरौशुक्‍ल (17106) भिखारी:।। गंगोलीसँ रतिदेव दौ ।। अपरै रतिदेव दौ।। अपरै हरिहर मुरारि अनन्‍नत दामोदर श्रीनापा: (23) तेरहोत सकराढ़ीसँ रामेश्‍वर दौ 110311090 वत्‍सेश्‍वर सुतो रूद: नान्‍यपुर खौआलसँ होरिल दौ 11103511 गड़र सुतो धर्माधिकरणीक म.म. विठुआलसँ रैधर सुत मनोधर दौ।। ए सुतो धीरेश्‍वर: सुइरीसँ धर्माध्‍यक्षक देवे दौ ।। अपरौ विन्‍ध्‍येश्‍वर: ।। रूदसुता 2 प्रोझोली बेलउँच सँ कीर्तिशर्मा दौ।। अथ ठोम टेकारी ग्राम तत्र चतुर्वेदाध्‍यायी कामदोवो बीजे।। ए सतापात्रिक परशुराम दिक्षीत सोमत्रिपाठी कृष्‍ण।। कलिगामौ पार्यक परशुराम सुतोश्रीधर बलभद्रो त्रिपाटीसँ कुमर दौ बलभद्र सुता शारड़ बनमाली उद्योतकरा: महुआसँ अग्निहोत्रक धनमय दौ।। शारड़ सुतो राम वामनौ।। वामन कांचगाम वासी।। महामहोपाध्‍यायराम विल्‍वपंचक (बेलउँच) वासी। ए सुतो संतोष परितोषौ।। सन्‍तोष सन्‍तति दक्षिण पाटक वासी चाकग्राम सन्ति।। परितोष सुतो हरिहर नारायणो दुखनौरीसकराढ़ीसँ बनमाली सुत हरानन्‍द दौ।। अन्‍त्‍यौ दरिहरसँ मातृक:।। नारायण सुतो देवे (1130111) भवे को एकहरा वासिन्‍यो।।। हरिहर सुतो कुश लवौ सकर निन्‍यानन्‍द दौ लमस्‍त बड़यि नाम्‍ना प्रसिद्ध गढ़ वासी।। कुश सुतो शिवदाश कीर्तिशम्‍मणों सकराढ़ी सँ लक्ष्‍मीपाणि दौ कीर्तिशर्म्‍म सुता बलाइनि पालीसँ भोगीश्‍वर दौ मुरारी (116220) सुता बागे गोगे मांगुका तेरहोत सकराढ़ीसँ जाई दौ।। तेरहोत सकराढ़ीसँ बीजी गंगाराढ़ीसँ बीजी गंगादित्‍य एसुतो भवादित्‍य एसुतो जाई माने कौ गंगोली सं पणिडत केशव दौ।। (24) ''4'' जाई सुतो हारू गोगू कौ कुजौली सँ राजू दौ।। कुजौलीसँ बीजी दान्तिय पुत्र पौत्रदय इन्‍द्र चन्‍द्र रूद्र तारापति दिनकर मटकरा।। दिनकर सुता कर्ण वासुदेव गंगाधर नरदेव मूल देव।। कर्ण सुता हरिहर हरिब्रहन शान्रिबह्म शूलपाणि नरसिहं शिवब्रह्माणा:।। शिव ब्रहन सुता (1117110811) शुभंकर जयकर लक्ष्‍मीकर नोने मेधाकर गुणाकरा: मोखरि सँ मधुमन दौ सकुरीसँ महमहो देवीदौ।। मेधाकर सुतो जनक: वनगांव वासी बलाइनि वासी पासीसँ देल्‍टन दौ।। ए सुतो भीम नन्‍दीश्‍वरौ पकलिया सँ कान्‍ह दौ।। नन्‍दीश्‍वर सुतो (1126090) रूप पचटन पण्‍डुआ सँ मुरारी दौ अपरौ शिव: क‍पसिआ मातृक: शिव सुतो राजूक: कुरिसमा सकराढ़ी सँ श्‍यामकंठ दौ।। राजू सुता सुधाकर अमृतकर (12310711) सोमकर विधुकर चन्‍द्रकर शशिकरा: तत्रादयोरेकौरा गंगोलीसँ पण्डित केशव दौ।। सोइनिसँ शंकरदाश द्धौ।। ठ. (1173110511) चन्‍द्रपति सुता महामहो महादेवा परनामक येध महामएं भगीरथा: परनामक मेध महामहो दामोदर म.प. महेशा: रेकौरा सकराढ़ीसँ वीर सुत रूद हौ: रेकौरा अकराढ़ीसँ बीजी कपिलानन्‍द ए सुतो नयपाणि ए सुतो ब्रहमश्‍वर: बरैवा सँ त्रिलोचन दौ।। ए सुतो गोवर्द्धन नान्‍यपुर अलय सँ हरिपाणि दी ।। ए सुतोबन्‍धु वर्द्धन: टूनी नाम्‍नारख्‍यात: नरधोध टकबालसँ बनमाली दौ।। ए सुता बाटू गोविन्‍द माधना चन्‍दौत पालीसँ गंगाधर दौ।। अथ पल्‍ली ग्राम बीजी कपिदेव: ए सुतो सोमदेव ए सुतो वासुदेव: सुतोआदिदेव ए सुतोराउल भुगुक: एतस्‍यपली।। त्रयम एकस्‍य सुतो अभिमन्‍यु (06110711 112110411) पुरूषोन्‍तमौं (25) अपरा सुतो ब्रहमेश्‍वर महेश्‍वरौ।। अपरा सुता शंकरदेव बलदेव वरदेव वासुदेवा: मछैटा ग्रामोपार्यका:।। महेश्‍वरसुता किर्तू गुणाकर दिवाकर गर्वेश्‍वरा।। किर्त सुता नाटू साटू शिव छीतर नोनेका: सकराढ़ी सँ नरसिंह दौ।। नादू सुतो चन्‍द्रकर:चन्‍द्रोत गामे पार्थक:।। ए सुता महो (19166) प्रतिकर महामहो शुचिकर आचार्य लक्ष्‍मीकर महो गुणाकरा: तत्रादयास्‍त्रय डीह ढरिहरासँ अभिमन्‍यु दौ।। अन्‍त्‍यौ खौआलसँ हरिपाणि दौ।। महामन्‍ने गुचिकर सुतो महोगंगोधर गणपति: आदमो गंगोर सँ रजदेव दौ अन्‍यो नहरासँ गांगू दौ।। महो गंगाधर सुतो मही (10104) हलधर धर्मधिकरिणि म.म. (2311010) नरिसिंह।। महामहो (20/01) ब्‍ज्ञदै क्‍ज्ञ: तत्रादयो मताओन दरिहरासँ शूलपाणि दौ अन्‍यो गोरा जजिवालसँ शिवदन्‍त दौ।। गोविन्‍द सुता (1351109) होरे चांड़ो सोम (301101) हरिश्‍वर गोमा: गढ़ खण्‍डबला सँ कामेश्‍वर दौ 01/0511 बैकुण्‍ठ सुतो गंगेश्‍वर (0609) भोगीश्‍वरौगढ़ वासियों।। गंगेश्‍वर सुता सिद्धेश्‍वर सोमेश्‍वर रतनेश्‍वर नोन देवके तत्रा दयाश्‍चत्‍वारों नरवाल मात्रक: अन्‍यो हरिअम मात्रक: ।। सिद्धेश्‍वर सुता गढ़वय भगव शिवशर्म्‍म विष्‍णुसर्म्‍णा: नीमातक (तनपाणिदौ।।भगव सुतो कामेश्‍वर गढ़अलयसँ देवशर्म्‍म दौ।। (28104) कामेश्‍वर सुता फनदहसँ गंगेश्‍वर दौ: अवहिरखण्‍ड भण्‍डारिसम स बीजी कुसुमादित्‍य: ए सुतो श्रीधर कलपाणि:।। श्रीधर सुता।। (26) ''5'' एकादश: तत्रेक: मैनी वासी।। अपरौ वशिष्‍ठ: सुरगन ऍं सर्वाज आउ दौ।। अपरौ ओहरी करही अपरौ रैधर: ए युतो गंगाधर: फनन्‍दह वासी।। ए सुतो लरवाई शशिधरौ।। महो लखाई सुता रतनेश्‍वर (181106) भवेश्‍वर: ज्ञानेश्‍वरा: बुजौलीसँ मेधाकर दवै।। अपरौ हल्‍लेश्‍वर बिरेश्‍वरौ में रन्‍दीसँ हषिकेश दौ हल्‍लेश्‍वर सुता ंगेश्‍वर घनेश्‍वर रामेश्‍वरा: तेरहोत सकराही सँ कुलेश्‍वर सुत भवनेश्‍वर दो सकुरीसँ महो नयपाणि दौ।। (20/05) गंगेश्‍वर सुता सुपरानी बंगोनी सँ सुपट दौ (1101/0411) वी सुता देवधर मासो मुरारि गांगु शिवदेव:।। देवधरसुता आदिदेव (1134110711) विश्‍वरूप पुरूषोत्तम आदिदेव सुतो (1107/02) विकर्ण वसुन्‍धरौ।। तत्र वसुन्‍धर सुतो देवपाणि:दरिहरा सें मांगु दौ।। ए सुता शारड़पाणि श्रीपाणि शूलपाणि वंशीधर धराधर हलधरा: तत्रादयास्‍त्रय बलहि।। टंगवालसँ बृहस्‍पति दौ।। मित्रवंश भागिनेभयो।। धराधर सुतो देवादित्‍य: देवहार सरौनीसँ देवनाम दो।। लोहरा ग्रामोपथिक ए सुतो शुज महामहोपाध्‍याय सुपरौ रवौआलसँ हरिपाणि दौ महामहोपाध्‍याय सुपर सुतो तत्र (109/0211) सोम गोमों वननियामसँ भीखम दौ अपरै साबै वीर (1120/0211) धीर परम चांड़ौका बलहिटसँ रतिकर दौ ।। अपरौ गौरीश्‍वर: बलहिटसँ (आनयादि सात्र) चांडो सुता वीर ( 40/0611 451103) नन्‍दी गुणेका: उचति सँ अन्‍दू सुत दृष्‍टव्‍य दौ (27) उचित भण्‍डारिसमसँ बीजी महिपाणि ए सुतो धर्मपाणि लखाई कौ।। लरवाईक: सोहरा वासी धर्मपाणि उचति वासी।। ए सुतो पदमपाणि नरउनसँ प्रियंकरदौ।। ए सुतो पुरूषोतम सरिसबसँ कामदेव दौ।। ए सुतोअन्‍टू नोने कौ मालिछसँ लक्ष्‍मीकंठ सुत देवकंठ दौ।। अन्‍द्र सुतो (112310411) धानू तटवय कौ।। आदयो: गोरा जीजवाल सँ रीपति दौ।। अन्‍त्‍यो गुलदी खण्‍डवसासँ रतनाकर दौ।। हटवय सुत (1125102111) माधव दामोदर श्रीधर (1128110711) हलधर केशव: कुजौलीसँ शशिकर शंकर सुत रधु दौ यहिमतसँ हरिहर दौ।। (1143/0611) वीर सुता रूद्र (1130/110311) राजू सोने का: वमनियामसँ गोनन सुत किहो दौ: वभनियामसँ बीजी हरिशर्म्‍म ए सुतो झालोक: महजाली मात्रिक: एक सुता शुभंकर जयकर प्रियंकर चोथेका।। (117510411) शुभंकर सुतो बाहते क: जगतिसँ महानिधि दौ।। ए सुतो रामब्रहम कृष्‍ण ब्रहजौ।। रामब्रहम सुता भीम जाई जवे कांगू का: सुइरीसँ कान्‍ह दौ।। जायी सुता गोर जयपति (1122/10) गणपतिय:।। गोर सुतो वीर (111411) गोननो कोड़रा माण्‍डरसँ रतनेश्‍वर दौ अन्‍यो यमुगाम सँ हरिकृर दौ।। गोनन सुता (''27/07'' ''92/09'') महिपति किठो ऐंठोका: महवालसँ दिवाकर दौ: महबालम बीजी माहवमपत्‍या: परना ए सुतो प्रभाकर ए सुतो बनमालीक: ए सुता ओहरि ढेहरि चक्रधरा:।। ओहरिप्र रत्नाकर सुतो दिवाकर जीवाकौ हथियन सकुसँ देवपति दौ।। किहो। सुता खण्‍डवलासँ रविकर दौ (''22/01'') दिवाकर भवशर्म्‍म गढ़धरा: नीमाटंक सउँथ पाणि दौल रतनाकर सुतो पक्षधर: कुर्रसमासक राजूदौ।। (28) ''6'' पक्षधर सुतो हलधर गशोधरौ दरिहरासँ रतनाकर दौ।। यशोधर सुतो रविकर पानियोगसँ कोनदौ ।। रविकर सुलारूद्र श्री करौ गढ़ विस्‍क्रीसँ शंकर दौ बाढ़ विस्‍क्री सँ बीजी विष्‍णु शर्म्‍मा: ए सुतो हरादित्‍य ए सुतो कर्मादित्‍य:।। ए सुतो कर्मदित्‍य।। ए सुतोशान्ति विग्राहिक देवादित्‍य राजवल्‍लम भवादिलो।। यदि विग्रहदेवादित्‍य सुता  पाएधारिक वीरेश्‍वर व्‍यक्तिव नैवाधिक (64/05) धीरेश्‍वर प्रक्रय महासमन्‍धिपति महामहनतक गणेश्‍वर मण्‍डमागीक यटेश्‍वर स्‍थान्‍तरि: हरदयन्‍ सु्रदहानक लक्ष्‍मीछत शुभ न्‍ता: तत्र वीरेश्‍वर स्‍टपक्रप गणेश्‍वर शुभदन्‍ता: नान्‍यपुर त्रिपालीसँ कामेश्‍वर दौ।। अपरौवर्तित धीरेश्‍वर अनुक्रमांक जनेश्‍वरों महपौर वासी माध्‍दमभागिनयो हरदन्‍त लक्ष्‍मीदन्‍त: मह पौर वासी यमुगाम करिर्य माने दौ।। हरदन्‍त सुतो मुरारीदन्‍त: बहेरापीसँ लठावन दौ।। अपरौ उँमापति दत वरूआली मातृक ।। अपरौ शंकरदत्त अलयसँ देवे दौ।। अपरौ महबाक होराइक: गढ़ बेल्‍उँचसँ शंकरदत्त दो।। शंकरदात्‍त सुता नरवाल सँ दिवाकर दौ।। रूद सुतो वेणीक: देल्‍हण सोल्‍हण तिमे मुरारिय: देहलों (09/07) देल्‍हनी वलाइनि वसी सोल्‍हनों मछाँटा वासी तिमे जलकर मुरारी बहराढ़ीवादी ए सुतो देवपाणि चन्‍द्रपति।। देवपाणिसुतो हारिल देहरि: आदय: सुरगनसँ गोबर्द्धन दौ।। (29) अन्‍यो भिन्‍न मातृक:।। होरिल सुता लक्ष्‍मीकंठ जयकंठ शितिकंठ सोखे (09/04) लड़ावन श्‍यामकंठ हेलना: तत्रादयो सरिसबसँ कामदेव सुत कानह दौ अन्‍यो खैआलसँ बाछे दौ।। जयकंठ सुतोस्‍थानान्ररिक रति: पवौलीसँ वीर दौ (05/04) विकर्ण सुतो गणपति वाचस्‍पति।। वाचस्‍पति पबौली गामोपार्थक: ए सुतौ हरदन्‍त।। बापरौ आदय सुरगन सँ गोबर्द्धन दौ अन्‍य जेहोरी सकरदीसँ ऐलौदो।। हरदन्‍त सुता वीर देवे श्रीदन्‍ता: वीर सुतो मसे (14/03) गंगारभन्‍द हरिदाशदै।। जलवंशा राजवासी दामोदरो बीजी ए सुतो माधव बान्‍ध्‍वौ।। माधव सन्‍तति भन्‍दवाल वासी ए सुतो जानु श्रुतिपरम त्रिलोचन:।। जानू सुता भुमिनन्‍द दाजू अच्‍युत मधरा:।। दाजू सुतो हरिदाश:।। हरिदाश सुता सँ दौ।। स्‍थान्रीक ठरनि सुतो ठ. वासुकी: गढ़ निखूतिसँ भगपर दौ।। निश्‍निसँ बीजी त्रिपाठी रूद्र: ए सुता महामहवक सुरेश्‍वर रतनेश्‍वर नोने देवे का: सरौनी मातृक: सरौनी मातृक:।। महामहत्तक सुरेश्‍वरसुता शान्ति विग्रहिक हरिहर विद्याधर देवधरा: डीह राउढ़सँ छीतर दौ।। महामहतक विधाधर सुता जगद्धर नाने प्र रतनधर देवधरा बुधौरा सकराढ़ी में गणपति दौ।। छतौनीसँ माधव छौ।। महामहतक जगद्धर सुती लक्ष्‍मी शर्मा कीर्तिशर्म्‍मणों सिंहाश्रम रतनेश्‍वर दौ दुवादए पार पुर मकएढ़ीसँ अनन्‍त दौ।। ठ. वासुकी सुता गोविन्‍द नरहरि (10/01) जनार्दना: तल्‍हनपुरसँ रत्नाकर दौ : तल्‍हनपुरसँ बीजी विष्‍णु शर्म्‍मा: ए सुता शुक्‍ल जान रतनेश्‍वर क्षमोदरा: तत्र दामोदर सुतोलोरिक: बेलासकएढ़ीसँ  मासोदौ।। ए सुतो चन्‍द्रकर धमकी।। कुजौलीसँ विकर्ण दौ।। चन्‍द्रकर सुतो लग शर्म्‍म (तनाकरौ डीह दरिरासँ लक्ष्‍मेश्‍वर दौ।। रतनाकर सुता पोखराम बसहासँ राम सुत देवे दौ।। सुइरीसँ कीर्तिदाश दौ।। ठ. (25/02) नरहरि सुता विश्‍वम्‍मर (30/04) विरपू (25/04) गदाधरा: गढ़माण्‍डर सँ नागे दौ (30) ''7'' (02/01) महामहो निधिसुतो श्री कुमार पाठक वासी गंभीरसँ चन्‍द्रकर दौ।। ए सुतो दूबे (26/02) चौबेकौ टकबालसँ रतनपाणि दिशि मित्रानन्‍द दौ।। (09/05) दूबे सुतो घृतिकर: केउँटराम पण्‍डोसी सँ रूद दौ।। ए सुतो रविकर: अलयसँ गोविनद दौ।। एक सुतो गुणीश्‍वर (11/06) कोने वाणेकौ तिसउँन सँ जगद्धर सुत नारायण दौ निमऍ दुर्भाग्‍य दौहित्र दौ।। बागे सुतोशतूक: गढ़ यमुगामसँ जीवेश्‍वर दौ गढ़यमुगाम बीजी श्रीकर: ए सुतो हरिकर: ए सुतो जीवेश्‍वर: सकराढ़ीसँ पदमपाणि दौ।। जीवेश्‍वर सुतो आउनि माउनि: अथरी दरिहरा सँ नरसिंह दो: दरिहरासँ बीजी कमल पाणि: ए सुता देवधर धरणीधर माहव (कनिष्‍ठा) अपरौ (14/07) चिन्‍तामणि: (15/07) देवधर सुतो कुसुम (11/03) रेचन्‍द्रो कुसुमे सुता सागर पुराई सीध का: ।। सागर सुतो पाई दामोदरा।। दामोदर सुतो बसाईक: ए सुतो राम: ए सुतो नरसिहं।। नरसिहं।। सुता दिधो से कर्मादित्‍य दौ।। ठ. विश्‍वम्‍मर सुतो नाथू (70/02) बाटू कौ (52/01) खौआलसँ बिकू सुत रघुपति दौ (03/06) बिकू सुतो रघुपति: गंगोरसँ भोरे दौ: गंगोर सँ बीजी शाश्‍वत: ए सुतो दामोदर: ए सुता रघु माधव चन्‍द्रपारा: छतौनी सँ श्रृंगार दौ।। चन्‍द्रघर सुतो बिनू विनू कौ पण्‍डुआ स राम दौ।। (19/04) विदू सुता विश्‍वनाथ (16/09) श्री नाथ जगन्‍नाथ देवनाथा: सतलखासँ महिधर दौ।। श्री नाथ सुतो गुणीनाथ: राढ़ी कोइगार सें शान्ति दौ ए सुतो भोरेक: शीशे पालीसँ ऐलौदौ।। भोरे सुता (17/01) शिवनाथ भवनाथ देवनाथा: छतौनी वासी सठवालसँ देवशर्म्‍म दिशि कुसुमाकर दौ छतौनीसँ परमेश्‍वर द्वौणा (23/01) रघुपति सुतोहरिपति: (25/04) नरउनसें कोने दो नरउनसँ बीजी महामहोपाध्‍याय महिधर: ए सुता श्री धर मनोबर लक्ष्‍मीधरा:।। श्रीधर सुतो उदयकर प्रियंकर प्रियंकरें।। कुमुदी मातृको।। अपरो त्रिलोचन:।। उदयकर सुतारतनाकर पुण्‍याकर रूचिकरा: लखनौर सक मातृ: रतनाकर सुता पदमाकर मक्रिकर। (31) शुचिकर कीर्तिकरा: मक्रिकर सुतो जयशर्म्‍म हरिशम्‍मीणौ।। वत्‍सवाल वासिन्‍यो।। बुधौरा सकराढ़ी प्रितिकर दौ।। (11/06) हरिशर्म्‍म सुतो प्रितिशर्म्‍म: पचही जजिवालसँ लक्ष्‍मीश्‍वर दौ जानिवालसँ बीजी दण्‍डपाणि: ए सुतो रतनपाणि हर्षपाणि:।। रतनपाणि सुता शूलपाणि गोवर्द्धन महेवश्‍वर शीरू शारड़ा।। शूलपाणि सन्‍तति पतखौरि वासी।। (09/01) गोवर्द्धनो गोरा वासी।। महेश्‍वरसुतो उग्रेश्‍वर: पचही वासी।।। ए सुता (17/03) गौरीश्‍वर शुक्‍ल कान्‍ह सुस्‍रेवर सोमेश्‍वपरा:।। कान्‍ह सुतो लक्ष्‍मीश्‍वर हरिश्‍वरौ: सरौनी सँ सर्वानन्‍द दौ।। लक्ष्‍मीश्‍वर सुतो पदमपाणि: पचही सकराढ़ीसंकारूदौ।। तिसउँत सँ छौ।। प्रितिशर्म्‍म सुतो डालू (08/02) कोने कौ करमहा सँ नोने दौ।। (02/06) नोने सुता कीर्तिशर्म्‍म (143/06) रामशर्म्‍म मांगू का: आदय: मेरन्‍दी सँ कुसुमाकर दौ।। अन्‍यो सुरगन सँ विरेश्‍वर दौ।। मेरन्‍दीमँ बीजी जनार्दन: सुतौ बैकुण्‍ठ ऋषिकेश सुता भानू पुण्‍याकर दिवाकर गुणाकर: परस्‍पर भिन्‍न मातृका:।। पुण्‍याकर सुता दृष्टिगत सँ कान्‍ह दौ (14/05) कोन सुतो उदयकर (23/06) श्री करौ बलियाससँ भीख दौ।। (01/02) शुक्‍ल हरिवंश सुता (09/03) सुता रतिकर सोमकर लक्ष्‍मीकर (10/65) साधुकर दिवाकर शुंभकरा: आदय सिधौलीसँ सुरेश्‍वर दौ।। अपरैत्रय हड़री खण्‍उवाससँ चक्रेश्‍वर दौ।। अन्‍त्‍यो गढ़ बेलउँच सँ चणाई दौ।। दिवाकर सुतो भिखेक: तिसउँत सँग्रहेश्‍वर दौ तिसउँतसँ बीजी विश्‍वम्‍मर: ए सुता हरिहर हल्‍लेश्‍वर (14/05) नारायण (10/05) पदमनाम गोधन जीवन दिवाकरा: आदय सरिसब सँ रामदौ।। अन्‍यौ करनैठा सकराढ़ीसँ रतनपाणि दौ।। हरिहर सुतो डालूक: विस्‍की से मधुकर दौ।। डालू ग्रहेश्‍वर: माण्‍डर सँ चन्‍द्रकर दौ।। ग्रहेश्‍वर सुतो मोती क (32) ''8'' माण्‍डर से नारायण दौ।। (11/03) भिखे सुता रूद्रपुर सरिसब सँ वीर सुत महादेव दौ वरूआलीसँ रामेश्‍वर दौ।। एवम ठ. महोदेवादि मातृक चक्रम।। महामहोपाध्‍याय ठ. भगीरथा परनामक मेध सुतोमहामहोपाध्‍याय ठ. रामभद्र: नाउन से उतिपति शुत शोरे दौ (08/04) डालू सुता मधुकर (27/02) चन्‍द्रकर (24/07) दिवाकरा: मड़ार सँ सोम सुत यरेश्‍वर दौ।। पचदही सिंहश्रम सँ धाम दौ।। मधुका सुतो रूचिकर विश्‍वेश्‍वरौ (5/07) करहिया पनिचोभ सँ सोंसे दौ।। करतिया पनिचोभसँ बीजी चण्‍डेश्‍वर: ए सुतो भिखेक: ए सुतो गोंढि: केउँटराम पण्‍डौलीसँ पण्‍डौलीसँ ग्रहेश्‍वर दौ तल्‍हनपुर सँ महादेव दों।। गोंढि सुतो सोंसेक: सुइरी सँ गुणकर सुत मधुकर दो।। सोंसे सुतो प्रितिकर हारू कौ बेला सक जीवेश्‍वर दौ।। 03/011 रामौ बलहि टंकबाल मातृक: ए सुतौ मधुकर चाड़ौ।। मधुकासुतौ राउल मासौकौ बेलावासी पचही जजिवालसँ महेश्‍वर दौ राहुल मासौ सुता त्रिलोचन कृष्‍ण नारायणा: कोइयार सँ हरश्‍वर दो।। त्रिलोचन सुवा हरदत्त पुरोहित गोपाल साधुकरा: बुधौरासँ बुधौरासँ भोनू दौ।। हरदन्‍त सुतो चाण गोननो पनिचोभ सँ सहसदेव दौ।। पनिचोभसँ बीजी मधुमन: ए सुताधूज्‍जटि वाचस्‍पति वृहस्‍पति भोजदेव्‍य:।। तत्र धूर्ज्‍जटि सन्‍नतति तल्लिस्‍मा ग्रामोपार्यक:।। (16/02) वाचस्‍पति सन्‍तित वीरपुर ग्रामौं पार्यक:।। ए सुतो रवि शर्म्‍म: ए सुतो महादेव ए सुता सहदेव श्रीदेव आदिदेवा:।। सहदेवसुता सान्हि देहरि आडूका: से  सँ दौ गोनन सुतो जीवेश्‍वर धरेश्‍वरी बरूआलीसँ चान्‍द दौ।। जीवेश्‍वसुतो गिरीश्‍वर: (33) खण्‍डबलासँ जाई दौ (07/05) दामोदार सुतो महोदधि: पाली मातृक:। ए सुतौ विश्‍वनाथ गोननौ।। दौ अपरौ होरेक: दरिहरासँ विश्‍वरूप दौ।। होरे सुतो जाई भवनाथो।। गम्‍भीर होरा वासियों ।। जाई सुता मातिध सँ देहरि दौ।। मालिछ सँ बीजी वत्‍सेश्‍वर ए सुतौ हलैश्‍वर दण्डिका: सुरगन मातृक:।। ए सुतो पुरूषोत्तम प्र देहरि: खण्‍डबसासँ कापनि माधव दौ।। देहरि सुतो करूणाकर: थुरी जालय सँ धाम दौ।। (55/04) रूचिकर सुतो रतिपति: तकवाल सँ शिरू दौ टकबाल से बीजी हरिकंठ: ए सुतौ लक्ष्‍मीकंठ: पण्‍डुआ सँ शंकर दौ।। ए सुतो बाढ़क: देउरीसँ श्री नाथ दौ।। ए सुतौ माधव (25/01) केशवौ नरवालसँ यशुदौ भन्‍दवाल परिसरासँ कृष्‍ण शर्म्‍म दौ।। बृहद ब्रहनपुरासँ विश्‍णुकर कस्‍तत: माधव सुतो शिरू मांगु कौ जलकौर दरिहरासँ अन्‍इ सुत सोंढ दौ गाउल फरमहा सॅ पागु छौ।। शिरू सुता (24/08) रूद रति विश्‍वेश्‍वरा: माण्‍डर सँ सुधाकर दौ (02/05) सदुपाध्‍याय (27/02) विशोसुतौ (28/05) हरिका सुधाकरो पालीसँ हलधर दौ (06/08) देल्‍हन सुतो गंगादत्त हल्‍लेश्‍वरौ विलय सँ हरि दौ गंगादत्त सुता धारेश्‍वर शंकर भोगीश्‍वर यवेश्‍वर (12/01) मोतीश्‍वरा: सिंहाश्रमसँ महोदधि पौत्र देहरि सुत गदाधर दौ।। धारेश्‍वर सुतो धीरेश्‍वर: दरिहरासँ देव सन्‍तति देवेश्‍वर दौ।। ए सुता हलधर देवधर लक्ष्‍मीधर (14/02) श्री धरा: जगतिसँ धारेश्‍वर दौ: जगतिसँ बीजी जयकर ए सुतो सगर: ए सुता जलसेन त्रिलोचन अरविन्‍दा।। जलसेन सुता मधुकर गोधब श्रीकर देल्‍हन जीव धरा:।। गोधन सुनो सिद्धेश्‍वर गंगेश्‍वरौ।। सिद्धेश्‍वर सुता कृष्‍ण धारेश्‍वर रूद्रेश्‍वरा: जगति वासन्‍य:।। धारेश्‍वर सुतो बोधी कोने को केउँटी एडढ़ सँ हरिहर दौ (34) ''9'' केउँटी राउढ़ बीजी मसबास बासूक: ए सुतो सिंगारूक: ए सुतोवाराह:।। ए सुता श्री वत्‍स जगद्धद श्री धरा: श्रीधर सुता विश्‍वापर लक्ष्‍मीधर शशिधर महिधर हरिहरा: सिंहाश्रम सैगंगादित्‍य दौ।। हरिहर सुता धोसियामसँ तिनन्‍दन दौ। हलधर सुतो (42/01) सोसेक: सुपटानी गंगोलीसँ गोम देगो। (05/07) गोम सुतो जीवेक: एकमा वलियास सँ रतिकर दौ।। (08/07) रतिकार सुता दिखोसँ सान्‍हू दौ।। (19/02) सुधाकर सुता मनोरथ (36/06) हरि कान्‍ह सोमा बहेराढ़ी सँ रवि दों (07/01)।। लड़ावन सुतो राम सुपनो रूद्रपुर सरिसबसँ वीर दौ।। राम सुतो (27/01)  रवि: डीह दरिहरा स विश्‍वम्‍भर दौ पिहवालसँ लक्ष्‍मीपति दौहित्र दे (19/08) रवि सुतो पुरेक: माण्‍डसँ विभू दौ (07/01) अपरा दूबे सुता गुणाकर शान्तिकरणीक (22/07) पौखू मित्रकरा: मछेटा पालीसँ श्री कंठ दौ।। अपरौ सुपेक घुसौनसँ राम सुपे सुतो विभूक: दिप्‍योयसॅ जगन्‍नाथपुर वासी सुरेश्‍वर दौ (10/10) विभू सुतो गोरा जजिवाल सँ भवदन्‍त दौ 1108/03) गोबर्द्धन सुतो कापनि प्र ब्राह्णण: भण्‍डासिकस कंठ दौ कोधुआसँ गोविन्‍द द्धौ।। कापनि सुता भवदत्त गंगादत्त जयदता: सकराढ़ीसँ शारड़ दो।। मांडल प्र भवदत्त सुता दूबा सकश लभशर्म्‍म दौ।। श्री कर सुता जनक बैकुण्‍ठ धारेश्‍वरा:।। जनक सुतो ऐलो बीठू को बरैबासँ कान्‍ह दौ ऐलो सुता आदिदेव जीवधर व केश्‍वरा: जी सुताअनन्‍त रवि सुपेका इबावासिन्‍या: चण्‍डी बेहद दष्टिमसँ विद्यानिधि महि निधि दौ।। रवि सुता शुचिकर गुणाकर शुंभकर लभशर्म्‍मणा: बलहिसि शिवादित लभशर्म्‍म सुतो रामशर्म्‍म: गढ़ बेल लक्ष्‍मीपाणि सुत पांचू दौ।। एवम रतिपति मातृक चंक्र।। ।।रतिपति (48/05) सुता गोरे होरे बासू शशुका: बहेराढ़ी सँ जनर्दन (35) सुत गणपति दौ (07/08) (32/08) जनार्दन सुतो गणपति: शक्रिरायपुर न उनसँ हरिश्‍वर दौ (03/08) रामेश्‍वर सुतो योगीश्‍वर चक्रश्‍वरों (65/03) विरपुर पनिचोभ सँ रतनेश्‍वर दो (08/08) वाचस्‍पति सुतो हरिशर्म्‍म ए सुतो (18/03) देवशर्म्‍म ए सुतो थानूक: ए सुतौ गौरीश्‍वर ए सुतौ महेश्‍वर वीरपुर वासी ए सुतोकामेश्‍वर: ए सुवौरतने ततैल पण्‍डुआ में गुणाका दौ।। ए सुतौ विश्‍वनाथ (17/04) विकू कौ तत्रदयो रेकौरा गंगोली स जाटू दौ अल्‍यौ तल्‍हनपुरसँ लौरिक दौर अपरा सुता करूआनी सकराठी सँ जगद्धदर दौ सरिसबसँ राम द्धौ (08/07) (2/108) साधुकर सुतो मित्रकर (16/03) चण्‍डेश्‍वरौ तिसउँतसँ पण्डित सुपाई दौ।। 08/09।। नारायण सुतो पण्डित सुपाईक: पतऔना खौआ गदाघर दौ।। ए सुता भड़ारसँ श्रीनिवास दौ।। हरिश्‍वर (25/05) सुता चान्‍दोवलियास सँ शिवादित्‍य दौ।। चान्‍दो बलियास सँ बीजी पुरूषोत्तम ए सुतामहादेव जयदे महेश्‍वरा:।। जयदेव सुतो सुध्‍निधि एसुतौ महानिधि ए सुतो जयनिधि रतनपुर तिलयसँ हरिहर दौ।। जयनिधि सुवा अभयनिधि राजनिधि सु लक्ष्‍मी करा: तत्रदयो बभनिपाम सँ राम दौ।। सुपर कोयलीसँ रवि भागिनेयो।। अन्‍यौ महुआ मातृकी।। अभयनिधि सुता रतनेश्‍वर रामेश्‍वर परमेश्‍वर: गंगो देवरूप दौ।। रतनेश्‍वर सुता सूर्यकर देवत्त गौरीश्‍वर शंकर गदाधरा: तत्रादयो दिनारी सरीसन सँ  राम दो।। अपरै बनिनियामसँ नितिश दौ।। सूर्यकर सुता (44/06) रूचिकर शिव (13/02) गंगादित्‍य महो (28/03) हरादित्‍य कान्‍ह प्र कामेश्‍वरा: मछैटा पाली से गणेश्‍वर दौ शोधवाल गंगोलीसँ गंगेश्‍वर दौ।। शिवादित्‍य सुता होरे पुराई धारू भवाई दुर्गादिल्‍य (36) ''10'' धोसियामसॅ जगन्‍नाथ सेतु श्री रंग दौ लाहीसँ श्री धर दौ।। (49/07) गणपति सुता रविकर अमरू कमलू का: बेलकुँच महादित्‍रू दौ (04/07) शिवदाश सुतोदुर्गादित्‍य (14/05) तीर्यकरौ डीह दरिहरासँ विकर्ण सुतनन्‍दन दौ सुरगन सँ राय दृष्टिकेश द्धौ।। दुर्गादित्‍य सुतो धरादित्‍य कपिलेश्‍वरौ कुजौली सँ रूचिकर दौ सरिसबसँ बीर दौ।। धरादित्‍य सुता एकादश महो (16/05) धर्मादित्‍य महो (30/09) जयदित्‍य महो (22/06)  गयादित्‍य महो महादित्‍य महो जीवादित्‍य (19/06) महो (25/05) महो रूद्रादित्‍य (25/05) पझपुर मकलियसॉं सीधू सुत बाछे दौ चिलकौ दरि भव द्धौ अपरे सुता (तना दित्‍य नहो मित्रादित्‍य महो (20/02) महो प्राणादित्‍या: (33/16) भरेहासँ गणपति दौ सोहन जल्‍लकीसँ समशर्म्‍म छौठा अपरौ रूक्‍मादित्‍य परनामक बाट (35/02) बाटु प लाला लहरा गंगोली में बारू दौ।। महो महादित्‍य सुवा विश्‍वनाथ (50/02) दूबे (66/02 दूबे मोखे चौबे का: माण्‍डर सँ गोपाल दौ।। 02/10) अपरा नरिसिंह सुतो चोथू  मोथू कौ ।।चौथू  सुतो देहरि: जजिबालयाक: ए सुतो देवदाश रामपति:।। देवदाश सुतो रतनेश्‍वर ए सुतो सुधन सथवई कौ नान्‍यपुर अलय सँ पौखू भागिनेयो ।। सुपन सुतो गणेश्‍वर नर देवौ सँ दौ।। नरदेव सुतो सज्‍जन गोपालौ अलयसँ शूल पाणिदौ।। गोपाल सुतोहरिरि नरसिहों सरपरब खण्‍डबला सँ होरे सुत परमेश्‍वर दौ बलहा बलियाससँ महादेव दौ।। नरदेव सुतो सज्‍जन गोपालौ अलय सँ शत पाणि दौ।। गोपाल सुतोहरिहर नरसिंहो सरपाब खण्‍डबलासँ होरे सुत परमेश्‍वर दौ बलहा बलियाससँ महादेव दो।। एवम शोरे मातृक चक्र शोरे सुताबुधवाल सँ कान्‍ह दौ बुधवालसँ बीजी वायुदेव: ए सुतो विभाकर प्रभाकरौ।। प्रभाकर सुतोधारेश्‍वर हरिपुर वासी ए सुताधर्मेश्‍वर बागन होगा गंगोली गणपति दो बामनसुता पुराश कौशलदूबे हिरू का सुइरीसँ प्रतिहस्‍त प्रज्ञाकर दौ।। पुराश सुल मधुक (38/08) सूर्यकर उदयकरा: खौआल सँ रतनपाणि दौ (37) मधुकर सुतो सटुपाध्‍याय मानूक: एकमा खण्‍डबला सँ सुये दौ।। (09/01)  अपरा विश्‍वनाथ सुतो सुपे गांगुकोदक्षिण खण्‍ड कटाईसँ भीम दौ।। सुपे जादू मतिसर (20/07) शत्रु लाखू का:  करमहासँ  लक्ष्‍मीपति दौ।। (02/06) लक्षमीपति सुता सरिसवसँ देवादित्‍य दौ (03/02)  देवादित्‍य सुता (12/07) सुता रर्वेआत्‍य सँ नोन दौ (003/105) (33/04) नोने सुत: (16/05) कान्‍ह: गंगोर सँ शकल्‍प दौ।। सदुपाध्‍याय (191/03) भानू सुता (45/06) गणेश्‍वर (22/07) गुणीश्‍वर महो गंगेश्‍वर (35/01) रूचिकर (43/04) रतिकरा: एकमा वलियास सँ भीखे दौ (08/01) उपरा भीखे सुता चिन्‍तामणि दिनमणि (19/09) हिरमणि धरार्माणय: त्रिलाठी धुसौत सँ त्रिलोचन दौ।। त्रिलाठी धुसौत से बीजी नरसिंह ए सुतो केश्‍व: ए सुता लक्ष्‍मीकंठ श्‍याम कंठ सुपटा: छत्तौनी सँ विभू दौ।। लक्ष्‍मी कंठ सुता चन्‍द्रकर भवेश्‍नर वस्‍न्‍ता आदयो गोधोली सॅ श्रीधर भागिनेयो।। अन्‍योछहिमतसँ राम दौ।। भवेश्‍वर सुतो त्रिलोचन: दरि गौढि दौ त्रिलाचन सुता नाउन सँ हरिशर्म्‍म दौ (08/08) जजि लक्ष्‍मीश्‍व छो ।। महो गंगेश्‍वर सुतो हेलूक गढ़ माण्‍डरसँ जीवेश्‍वर दौड़ (07/02)  कोने प्र गुणीश्‍वर सुतो जीनेश्‍वर पवौली सँ पुराश दै (07/03) वापट सुता यशोधर जगद्धर (17/05) हलधरा: कुसमाल सँ मणिधर दौ।। अपेरे उदयकर गुणाकर पदमकरा: फनन्‍दहसँ लखाईभ्रातृ शशिघर दौ।। यशोधरा सुतो प्रितिकर पुराशो: नीमातक बलासँ जगन्‍नाथ सुत भवनाथ दौ कुजौलीसँ पहका दौ वसुआलसँ भवदाशस्‍तुत: पुराश सुतो देवशर्म्‍म तिसउत खुशे दौ।। अपरौ मोहन दामकौ एकमा पलियासँ आनन्‍द कर दौ मरेहासँ लड़ावन छौणा अपरौं वीठू पुण्‍याकरौ एकराढ़ीसँ हरपति दौ।। जीवेश्‍वर सुता टकबालसँ गोपाल दौ।। अपरा जीवेश्‍वर सुतो सोंसेक : बुधवाल (59/07) सँ मानू दौ।। जसानन्‍द टकबाल सँ बीजी: (38) पॉंखूक: ए सुतो श्री निवास: ए सुतो हरिहर: उदनपुर त्रजिवास आवस्थिक माने दौ।। ए सुतो बाछेक: गढ़ यमुगामसँ हरिकर दौ।। सुतो गोपाल: मिगुआससँ जाटू सुत मितूदौ सोइनिसँ शंकरदाश छौणाएकान्त्रिक गोपाल सुता (46/04) नारायण हरि बासुदेवा: नरवालसँ दिवाकर पौत्र मणिकर सुत होरे दौ भिखौनी कलिगामासँ कमलपाणि दौ।। अपरौ सुपेक: हड़री खण्‍डबलासँ गोनन्‍द द्वौ।। तेलू सुतो कान्‍ह: दरिहरा सँ पदमकर दौ (07/04) रेचन्‍द्र सुतो योगु मन्‍डनौ ।। योग सुता आनिधर मनोधर चतुर्भूजा चतुर्भुज सुता पुराक मसवास देवधरा: पाली सँ श्रीपाणि  दौ।। पराक श्री पत्‍या: परनामा सुतो यशस्‍पति सिंहासनसँ मनोधर दौ ए सुतो महामहो रतिपति नहीं रामति महो (12/10) जानपतिय: ।। गोधूलि अलयसँ शंरपाणि दौ।। ब्रहमपुरादिधोय सोम छौठ।। महामहो  रतियति सुता महामहो सुरपति महामहो इन्‍द्रपति महामहो महो धृतिपतिय: जाती मराड़ से लोचन प्र चन्‍द्रकर दौ पिहवासँ सीधू दौहिन दौ।। महामरी सुरपति सुता महो कितिर्श्‍मा महो प्रतिशर्म्‍म नहीं हरिशर्म्‍ममिश्र मित्रशर्म्‍मणा: आद्यो महुआसँ धीतू दौ दरिहरासँ गंगेश्‍वरदौ।। अन्‍योकरही भण्‍डारिसमसँ देववंश सुतनयवंश दौ महामहो प्रितिशर्मा ता रविकर  गांगु दिवाकरा: तत्रादयो यमुगाम सँ जीवेश्‍वर दौ।। अन्‍यो वति गाम सँ इशर वाट सुत जादू दौ।। दविकर सुता शुभकर (34/05) गुणाकर प्रजाकर (24/09) कुसुमाकर पदमासर नदामसँ महादेव सुत सुधाकर दौ दूबा सक मतिदेव दौ।। (38/01) पद्मकर सुतो बाटू (73/07) प्र हरीक: तल्‍हनपुर सँ गढवय दौ (07/08) शुक्‍ल जान सुतो महादेव: चाण्‍डीटक वालसँ सोम दौ।। महादेव सुता सोमदेव नरदेव गंगदेवा: कुजौली मनोरथ दौ।। सोमदेव सुतो चन्‍द्रश्‍वर बर्द्धमानौ।। चन्‍द्रश्‍वर सुतो यवेश्‍वर (39) (21/09) वीरेश्‍वरी: जालयसँ श्रीपति दौ।। यवेश्‍वर सुतो गढ़वयक: महियानीसँ तारापति दौ।। गढ़वय सुता हरि रवि रतना: पालीसँ छिताई दौ।। (09/07) मोतीश्‍वर सुतो रतनाकर: दरिण्‍कान्‍ह दौ।। ए सुतो छिताई कौ (43/02) हिताई को सिम्‍भुनाम वरमहासँ शंकर दौ।। छिताई सुतो प्रभावकर: पदमपुर पकलियासँ बाछ दौ।। पदम पुर पकलियासँ बीजी बासुदेव:ए सुता महादेव गंगदेव रामदेव कामदेवा: रामदेव सुतो शितिकंठ श्‍याम कंठौ।। शितिकंठौ ।। शितिकंठ सुतो सिधूक ग्रामुगाम मात्रक: ए सुतो गणपति बाहरे कौ अपेरो गिरीश्‍वर पाली सुइरीसँ अभिन्‍नद दो।। बाछे सुवा भाइ मासे चन्‍द्रकरा: चितकौर सँ भव दौ।। माडबेहर सँ कान्‍ह छौ।। कान्‍ह सुता हरि शिव शंकर: उदनपुर जजिपाल सँगुणु दौ।। उदनपुर जजिवालसँ बीजी आवस्मथ्‍क मानेक: ए सुता शिनिकंठ रति कंठ मुयर कंइ होर कंठ अनन्‍त कंठ मणि कंठा तत्रादयो सझौरा सकाढ़ीसँ दौ।। अपरै बरेबासँ शंकर दौ।। शितिकंठ सुता धीर वीर भासे गोपाल हरिहरा: तेर होता सँ नारायण दौ।। देयाम सँ प्रजाकर पौड़ श्री कर सुत हरिकर दौ अनयौ के धौनी टकबालसँ गुणकर भा‍गिनेयो: गोपाल सुो कान्‍ह: बनाइनि पाली सँ धीरेश्‍वर दौ ए सुता गोविन्‍द (20/09) नारू पुराई रामा: तत्रदयो जगतिसँ गणपति दौ अन्‍लो करूआनी सकराहीसूं नाइदो ।। बेलमोहरन नाउन सू तपक सुत कार्प्यि गंगादाश दौ. पुराई सुतो बैजू शंकरों ( 38/04) उचित हखय दौ।। अपरौ डालूक झोंट पाली दरिहरासँ रविदन्‍त दै। (11/05) जानपति झोंटवाली वासी ए सुता महो शिवपति कृष्‍णपति वासुदेवा: सरिश्रम छीतू दौ हरिअम्‍ब दो बीजी दीक्षित झॉंड़क: ए सुतौयान्त्रिक त्रिलोचन: एअतौ विद्यानिधि देवनिधि।। देवनिधि सुतोविद्याधर छीतू प्रसिद्ध नामा: वन्‍डवलासँ नीलढंठ दौ।। सुता हरिहर (16/08) माधव गोविन्‍दा सुइरीसँ बहलचनुद्रा।। (40) ''12'' सुइरीसँ बीजी शेखर ए सुता रतनपाणि वासुदेव लखपतिय:।। वासुदेव सुतोशंकर:।। ए सुता आमेध  कुमार शार उपाणिय: ।। शारड़ पाणि सुतौ और बहन चन्‍द्रो बहलचन्‍द्रसुता सँ दौ।। शिवपति सुता डालू विशो होरे हरपन्‍त जादू का: आदया छादन सरिसब सँ गयन दौ।। अपरौगंगौर सँ बराहनाथ दौहित्र हो होरे सुतो रविदन्‍त: गाउल करमाहासँ श्रीदेव दौ।। रविदन्‍त सुता गांगु कान्‍ह गोपाला: कोइयार संहारू ।। अपरा सुता करमहासँ आउन्‍ि दौ (02/06) गौरी सुतो अमॉं इक: नान्‍यपुर (बौआल सँ जगदेव दौ।। ए सुतो आउनि बलहिरसँ देवकंठ दौ।। ए सुतो डारू क: धोसिवाम सँ पराशर दौ।। कलिमासँ दिवाकर छौंप (38/02) डालू सुता गोरी गुणेग्रहेश्‍वर परनामक आमांउका बरूआली से रूचिकर दौ (01/0511) चन्‍द्रकर सुतो विश्‍वनाथ: कन्‍जुग्राम सकराढ़ीसँ जगन्‍नाथ दो गोविन्‍द वनपानि चोमसँ नन्‍दन सुत गंंगेश्‍वर छौ। विश्‍वनाथ सुतो (25/08) मेरी सिंहसन संभव दौ।। ए सुतो रूचिकर दहिमतसँ राम सुत इबे दौ भण्‍डारिसमसँ हरिहर रूचिकर सुता सरिसब सँ नाने दौ अपरौ देवादित्‍य सुतोकरूणाकर : करूआनी एक राढिसँ म. म. उ कारू दौ।। करूणाकर सुतो रतनाकर प्रजाकररौं  दहुलासँ श्रीहर्ष दौ।। रतनाकर सुतो हरिकर: कटाई संमीम दौ।। हरिकर सुतो नाने क: सरौनी संलीक दौ।। नारे सुतो भ्‍वदित्‍य पुरादित्‍यौ जालयसँ राम दौ।। जल्‍लकी (जालप) सँ बीजी बान्‍धन: एसुता खड़गपर चØघर शंखघर जीवघरा: एतै मातृक कृष्‍ण: खड़घर सुता विद्याघर कीर्तिघर गंगाधरा मेरन्‍दी मादक विधाधर सुतो द़ष्टि रूचिकरौ विजनपुर दरिण्‍सँ वेद दो।। हरिहर सुतो चक्रघर शंख धरा जीवधरा: एते मात्रक कृष्‍ण।। खडगपर सुता विधार कीर्तिघर गंगा धरा मेरन्‍दी मादक विधाधर सुतो हरिहर रूचिकरो विजनपुर परि सं वेद दो।। हरिहर सुतो श्रीपति: ए सुतो विश्‍वेश्‍वर: मटियानीसँ तारापति दौ।। ए सुतोभवेश्‍वर रामेश्‍वरौ वरूआली माण्‍डर सँ म म उ शंकर दौ म म उ रामेश्‍वर सुता महमहतक गणति महामतक रतिधर सदुण (24/02) महिधरा: आदया पबौली सँ महिपाणि सुत यूबेदै अन्‍त्‍यो एक धृतिका दौ।। गुणेसुता अफेल (224/05) लाखन रविय 391/07) पालसँ हलधरदौ।। (10/04) अपरौमहो टपबर सुतो। (41) मुरारी एकहरासँ दिवाकर दौ (04/06) देवे सुतो रतनेश्‍वर : मझौरा सकराढ़ीसँ श्रीकंठ सुत नीलकंठ दौ पवौती संवाचस्‍पति  अपरेसुस्‍त सोम धर्ममित्रश्‍वर यश्यिसँ त्रिलोचन दौ महुआसँ बर्द्धमान दौ।। रतनेश्‍वर युवा दिवाकर रूचिकर (227/07) शुचिकर मतिकर मिश्र हरिकरा: मड़ार सँ श्री हर्ष दौ।। दिवाकर सुतोस्‍थानान्‍तरिक  सुधाकर रतिकरौ विलयसँ बराह सुत देवशर्म्‍म दौ भण्‍डारिसमसँ धरिश्‍वर द्वौणा। अपरा सुता तेरहोत सकराढ़ी सँ कुलेश्‍वर सुत भवेश्‍वर दौ सकुरीसँ लक्ष्‍मी हैंा मुरारी सुतो पौखूक: तेरहोत सकराढ़ीसँ गाजो दौ (03/09) मनोरथ सुता वनमाली वशिष्‍ट गोविन्‍द शुभकरा: अपरौ शकर्षण शुभंकर सुता भागीरथ दिवाकर तनपति नाई का: तोहोत वासिन्‍य।। सिंहाश्रम सैविद्यापति छौ. भागीरथ सुतो कुलेश्‍वर: ए सुता रामेश्‍वर योगीश्‍वर भवेश्‍वर परमेश्‍रा: रामेश्‍वर सुनी जीवधर पितधरौ महुआ सँ महादेव दौ।। जीवधर सुतों गाजांक केउँटी विषय सँ लक्ष्‍मीकर दौ।। ढेढवाल 2 वलय सँ नयदेव दौ।। गाजो सुतो गणपति: अलय सँ यशाकरदौ अलय सँ बीजी धरनी धर धाउन प्रसिद्धनामा।। ए सुता मनोरथकम्रकअमारका:।। मनोरथ सुता प्रितिकर श्रीधर वावन रामा: वावन सुतो शंख पुरूषोन्ति।। गोधूलि वासियों पुरूषोत्तम सुते भोगीश्‍वर: पदमपुर पकलियासँ राम दौ।। ए सुतो यशोधर देव धरौ करूआनी एकराढ़ीसँ म.म. उ कारू दौ करहीसँ नमवंश दौ।। यशोधरा सुतोसरूक नाउन सँ महिधर दौ अपरा सुता खौआतसँ रूद्रिपाणि सुतखांजो  दौ खण्‍डबला सँ होरे क्षै।।  पौखू सुता गणेश्‍वर नन्‍दीश्‍वर वीर गोविन्‍द हरिश्‍वर पतऔना (वौआल सँ नरसिंह दो (03/04) भवादित्‍य सुतो रति: वमनियामसँ यवे दौ।। रति सुतो डालूक: सरौनीसँ हाउँ दौ।। डालू शशिधर नरसिंहों तम्‍तदयो नगवाड़ धोसोतसँ रति दौ (42) ''13'' अन्‍तयोभण्‍डारिसमसँ सिरटि दौ।। नरसिहं सुतो नारायण दामोदरौ मुगेनी दिथोयसँ कुमर सुत साठू दौ मूलहरीसँ बल्‍लभदाश दौ।। गोविन्‍द सुता होरि नाने भरैवा चान्‍दो बलियाससँ धारू दौ (10/10) गंगादित्‍य सुता भबाई मंगलधरा परनामा।। भवाईं मिश्र, शिवादिस दन्‍तकपुत्र: यमुगामसँ दिनकर दौ अन्‍तयो धोसियामसँ श्रीरंकदौ मंगलधर सुतो धारूक: कनन्‍दहसँ परान सुत हद दौ यमुगाम सँ चतुर्भुत धारू सुतो चाको रतनपाणि: कुरहरि करमहासँ धनेश्‍वर दौ।। गाउल करमहासँ बीजी मुरारी।। रासुता जगद्धर ऐमधर मनोधरा:।। हेमधर सुतो महिपार ए सुतो हरिहर ए सुतो रतिदेव जगदेव श्री देव वासुदेवा: तत्रादयो पनिहारी दरिहरासँ बविराज मिसर दौ।। अत शक्रिरायपुर नाउनसँ बलभद्र दौ।। श्री देव सुतो चण्‍डेश्‍वर विश्‍ववरै।। चण्‍डीश्‍वर सुता प्राणेश्‍वर नन्‍दीश्‍वर महेश्‍वर मश्‍वरा: कुरहरिवासियों योग बेहद कुसखान गोविन्‍दौ।। रामेश्‍वर सुता। गिरीश्‍वर धनेश्‍वर मतिश्‍वर देवेश्‍वरा: यमुगामसँ बासुदेव दौ धनेश्‍वर सुतो गुणीश्‍वर: बेलमोहन नाउनसँ नारायण दौ।। कीर्तिकर सुतो भीखर धाने कौ।। भीखन प्र रतनेश्‍वर सुता प्रान्‍ध्‍ान डगरू दर्ब्‍बेश्‍वरा नान्‍यपुर विस्‍फीसँ गुणे दौ।। दर्ब्‍बेश्‍वर सुतो पीताम्‍बर गोविन्‍दवन पनिचोम लखन सुत लक्ष्‍मीरकर दौ।। ए सुतो भिरखेक: मालिछ मात्रक: ।। ए सुतो नारायण गोविन्‍दो उपमान्‍य गोत्रे गढ़ एकहरी सँ हरिहर दौ। क्‍वचित गुरू भद्रेश्‍वर दौ।। नारायण सुतो लक्ष्‍मीपति: मन्‍वाल परिसरासँ नयशर्म्‍म दौ।। एवम रामभद्र मातृक चक्र।। २.इंग्लिश-मैथिली कोष / मैथिली-इंग्लिश कोष इंग्लिश-मैथिली कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। मैथिली-इंग्लिश कोष  प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा  ggajendra@yahoo.co.in  वा  ggajendra@videha.co.in  पर पठाऊ। भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली  आऽ  2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य / अग्राह्य 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/ होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti  received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India).  Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti Walking to the office, always thinking about something etc. had become routine of Nand. Earlier he used to read some books but he left that habit too. He was not spending time in reading books with his children as well. Visiting village twice in a year in Holi and in Durga Puja was also changed in visiting village only once on the occasion of the Durga Puja. But Nand never missed to celebrate Holi in village although apart from his family.  While going to village Nand started visiting one uncle somehow related to his family. (continued) महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-15 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। - कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्त्वपूर्ण सूचना (५):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-15 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ’ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।(c) 2008 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ' आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ' पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ' रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ०१ फरबरी २००९ (वर्ष २ मास १४ अंक २७) http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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