VIDEHA — Issue 30 / अंक ३०

Publication: VIDEHA · Issue: 30
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181 विदेह ३० म अंक १५ मार्च २००९ (वर्ष २ मास १५ अंक ३०) एहि अंकमे अछि:- संपादकीय २. गद्य २.१. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण २.२. मैथिली भाषाक साहित्‍य- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.३. भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी २.४. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन २.५. कथा- फानी-श्रीधरम २.६. होलीपर विशेष-. विद्या मिश्र २.७. 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन ३. पद्य ३.१. सतीश चन्द्र झा- शब्द ३.२. 1.बुद्ध चरित 2.महावीर ३.३.ज्योति-  एक हेरायल सखी ३.४.कामिनी कामायनी: चक्‍का ३.५. पंकज पराशर ३.६.सुबोध ठाकुर ५. गद्य-पद्य भारती -मूल अँग्रेजी कथा : अनदर संडे कथाकार : गैस्पर अल्मीडा मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह ६. बालानां कृते-मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी ७. भाषापाक रचना-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)- 8.1. ON ENGLISH_MAITHILI DICTIONARY BY GAJENDRA THAKUR- UDAYA NARAYANA SINGH 8.2. The Comet-English translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani by jyoti विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions संपादकीय मैथिली भाषासं सेहो कम्प्युटर अपरेट कएल जाए ताहिलेल प्रयास शुरु भेल अछि । परिष्कृत आ समृद्ध भाषा मैथिली एखनो आन भाषाक अपेक्षा कम्प्युटर प्रविधिमे पाछुए अछि । पटनामे फ़्युल प्रोजेक्ट अन्तर्गत मैथिली कम्प्युटरीकरण शब्दावलीक मानकीकरणलेल दु दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न भेल अछि । फ़्युल (फ़्रिक्वेन्टनली युज्ड एन्ट्रीज फ़र लोकलाईजेशन) एक ओपन सोर्स प्रोजेक्ट अछि । ई विभिन्न प्लेटफ़र्मके लेल प्रयोग कएल जाएबला कम्युटर शब्दावलीके मानकीकरणके काज विभिन्न भाषाक लेल कएल करैत अछि । एहि अवसरपर मैथिलीक विद्वान पण्डित गोविन्द झा कम्प्युटरलेल विशेष रुपे शब्द गढल जएबाक चाही मुदा एखन सामान्य शब्दसं काज चलि जाए त नीक । मैथिली एकेडमीक निर्देशक रघुवीर मोची जमीनी शब्द प्रयोग करबापर जोड दैत कहलनि जे मैथिलीके अपन क्षेत्र विस्तार करबाक चाही । कम्प्युटरमे मैथिलीक लेल कएल जारहल काजके दूरगामी प्रभाव रहल ओ कहलनि । प्रोजेक्ट संयोजक राजेश रंजन फ़्युलक कम्प्युटर मानकीकरणके कार्यविधिके विषयमा जनतब दैत कहलनि जे इ समुदाय आधारित प्रोजेक्ट अछि । कार्यक्रममे कम्प्युटरमे बेशी प्रयोग होब' बला 5 सय 78 शब्दपर गहन विचार क" मानक पर आम सहमति बनाओल गेल । मैथिली कम्प्युटक लेल शब्द गढबालेल ई पहिल प्रयास छल । कार्यक्रम एएन सिन्हा इन्स्टिच्युट अफ़ इन्स्टीच्युट अफ़ सोसल स्टडिजमे भेल छल जाहिमे रामानन्द झा रमण, मोहन भारद्वाज, सुधीर कुमार, जयप्रकाश, राकेश रोशन, संगीता सहितक विद्वान, अनुवादक आ कम्प्युटर उपभोक्ता सहभागी छल ।विकी फुएल, विकी मैथिली आदि प्रोजेक्ट इंटरनेटपर चलि रहल अछि। मैथिलीक भारतीय ओपेन ऑफिस, मल्टी प्रोटोकोल मेसेंजर,कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम, स्क्राइबस, सनबर्ड कैलेंडर, ई-मेल क्लाइंट, की-बोर्ड ड्राइवर, फॉंट, वेब ब्राउसर, आ द्विभाषीय डिक्शनरी आब आबि गेल अछि। ई सम्भव भेल अछि टेक्नोलोजी डेवेलपमेंट फॉर इंडियन लैंगवेजेज प्रोग्राम, सेंटर फॉर डेवेलोपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्युटिंग आ साहित्य अकादमीक सहयोगक परिणाम स्वरूप।  मैथिली साफ्टवेयर अओजार आ फान्ट नाम्ना एहि सी.डी.पर विद्यापतिक फोटो लागल अछि। मैथिली भाषाक कतेक डारिपर संस्मरण कृतिके एहिबेरके साहित्य एकेडमी पुरस्कार 2008 देल गेल अछि । भारतक राजधानी नयी दिल्ली स्थित साहित्य एकेडमीद्वारा आयोजित एक समारोहमे विभिन्न 23 भारतीय भाषाक कृतिके पुरस्कृत कएल गेल अछि । साहित्य एकेडमी पुरस्कार अन्तर्गत 50 हजार भारतीय नगद आ ताम्रपत्रसं सर्जकके सम्मान कएलक । मैथिली भाषाक संस्मरण कृति कतेक डारिपरके लेखक मन्त्रेश्वर झा के इ सम्मान देल गेलन्हि । एहि पोथीमे झा अपन प्रशासनिक जीवनक अनुभव सहेजने छैथ । झा मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक अभियानमे सक्रिय छथि । झा मैथिली साहित्य समृद्धिक लेल पाठक संख्या बढएबापर ध्यान देल जएबाक चाही कहलनि । मन्त्रे·ार झा पटनावि·ाविद्यालयसं स्वर्ण पदक आ राजनीतिमे स्नातकोत्तर कएने छैथ । हिनक अन्चिन्हार गाम, बहसल रातिक इजोत, कांटक जंगल आ पलाश, चाही एकटा नोकर जेहन कृति प्रकाशित छन्हि । हिनक जन्म सन् 1944 मे बिहारक मधुवनी जिलामे भेल छन्हि । सन 1972 में झाक प्रथम कृति खाधि कविता संग्रह प्रकाशित भेल रहनि । एखनधरि हिनक 25 टा कृति प्रकाशित भ चुकल छन्हि । पुरस्कृत पोथी मैथिलीमे नव आयामक पहिल आत्म कथा मानल गेल अछि । 18 फरबरीकेँ राजेन्द्र भवनमे एकल पाठक अवसरपर हुनकासँ भेँट भेल। गंगेश गुँजन, अनिल मिश्र आ सेक्रेटरी श्रीवास्तव जी सेहो रहथि। मिथिला मिहिरमे हुनक गंगापर कविता जकर कारण सुधँशु शेखर चौधरीकेँ क्षमा याचना करए पड़ल रहन्हि सँ ओ कविता पाठ शुरू कएलन्हि। स्व. अनिलचन्द्र ठाकुर जीक जन्म 13 सितम्बर 1954 ई.केँ कटिहार जिलाक समेली गाममे भेलन्हि। 1982 ई.मे हिन्दी साहित्यमे स्नातकोत्तर केलाक बाद नवम्बर '93 सँ नवम्बर '94 धरि "सुबह" हस्तलिखित पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन कएलन्हि आ कोशी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकमे अधिकारी रहथि। मैथिली, अंगिका, हिन्दी आ अंग्रेजीमे समानरूपेँ लेखन। मृत्युक पूर्व ब्रेन ट्यूमरसँ बीमार चलि रहल छलाह। प्रकाशित कृति: आब मानि जाउ(मैथिली उपन्यास)- पहिने भारती-मंडन पत्रिकामे प्रकाशित भेल, फेर मैलोरंग द्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित भेल। कच( अंगिकाक पहिल खण्ड काव्य,1975)। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ 13 फरबरी २००९) ७८ देशक ७८० ठामसँ १,६५,४५९ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर, नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in  ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण २.२. मैथिली भाषाक साहित्‍य- प्रेमशंकर सिंह (आगाँ) २.३. भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी २.४. बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास)-डॉ. देवशंकर नवीन २.५. कथा- फानी-श्रीधरम २.६. होलीपर विशेष-. विद्या मिश्र २.७. 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन कथा सुभाषचन्द्र यादव- कैनरी आइलैण्डक लॉरेल / कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल- मधुबनी। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। कैनरी आइलैण्डक लॉरेल तुलसियाही बहुत दूरस्त छैक। ई सोचिते ओकरा आलस आबऽ लगैत छैक । ओतऽ जयबाक निर्णय गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लगैत छैक । ताकति छीन भऽ गेलैक अछि । पयरेँ चलब पहाड़ बुझाइत रहैत छैक । ओकरा दू दिन धरि साइकिलक बाट देखऽ पड़लैक अछि । उपिया एखन दस बजे लऽ कऽ आयल छैक । बैसाखक रौद झट दऽ कपार पर चढ़ि गेलैक अछि । रौद दिस तकिते ओकर साहस निपत्ता भऽ जाइत छैक । चौकी पर ओठंगि जाइत अछि । उपिया कहैत छैक—'आइ नहि जा सुभाष बाबू ।’ ओ बाहर ताकऽ लगैत अछि — रौद...बाध ...मालजालक हेंज...। सात बरस भऽ गेल छैक तुलसियाही गेना । ओकरा छगुन्ता नहि होइत छैक जे एतेक समय कोना बीति गेलैक। खाली समयक एकटा दूरीक अनुभव होइत छैक । दीदी कतेको  बेर समाद पठौलकैक आबऽ लेल । दीदीक आग्रहमे ओकरा कहियो उत्कट गंभीरता नहि बुझयलैक । ओकर नहि जयबा मे तुलसियाहीक दूरस्त भेनाइ सेहो एकटा कारण रहल होयतैक ।    ओ एक मास सँ किछु टाकाक जोगाड़मे अछि , नहि भऽ रहल छैक । पाँच दिन पहिने निर्णय लेलक । दीदी धनीक छैक । मँगतैक तँ टाका सहजेँ दऽ देतैक । जँ नहि दैक तखन ? ई प्रश्न ओकर दिमागक सैकड़ो फेरी लगौलकैक अछि । आ सभ् बेर ओ सोचलक अछि जे टाका नहि देतैक तँ ओकर एतेक दूर गेनाइ व्यर्थ भऽ जयतैक । एहन सोचैत काल ओ उदास होइत रहल अछि । ‘ममियौतक आवाज ओकर तल्लीनता तोड़ैत छैक—'मर हो सुबहास ! जेबह तँ जाह ,रौद भेल जाइत छह । नै तँ आइ छोड़िये दहक । अन्हरगरे उठिहऽ आ चलि दिहऽ । ओ जयबा लेल तत्पर होइत अछि । उपिया हँसैत कहैत छैक—'जा ने, धारक ओइ कात बालु पर बुझियहक केहन होइत छैक मजा ।’ ओकर निर्णय एकबेर फेर कोसीक धसना जकाँ खसऽ चाहैत छैक। एकटा निष्‍प्राण मुस्‍की ओकरा चेहरा पर अबैत छैक। ओ फेर चौकी पर बैसि जाइत अछि आ बाहर देखऽ लगैत अछि...रौद...दूरस्त... धार.... बालु आ रुपैया । ओकरा मे एकाएक स्फूर्त्ति आबि जाइत छैक । ओ बिहाड़ि जकाँ साइकिल उठबैत अछि आ चलि दैत अछि । उपिया कहैत रहि जाइत छैक—'नहि जा सुभाष बाबू हे हौ... औ !’ घाटक ठीकेदारक खोपड़ी लग ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि । खोपड़ीमे चारि – पाँच गोटे छैक । ठीकेदार गामक कोनो गंभीर घटनाक व्याख्या कऽ रहल छैक । ओकर मोन होइत छैक, खोपडीमे जा कऽ बैसय । फेर ई सोचि रूकि जाइत अछि जे कानमे झड़ पड़तैक । ओ ठीकेदारक नामे ममियौतक लिखल चिट्ठी हाथा—हाथी बढ़ा दैत छैक । ठीकेदार 'जाउ ’ कहि भाषण चालू कऽ दैत छैक । ओ कटारि पर देने नाह दिस चलि दैत अछि । ओकरा कटारिक डर होइत छैक । कतहु खसि नहि पड़य । धारमे गेरूवा पानि आबि गेल छैक ।  नाह छीट पर उतारि दैत छैक । छीटक बाद बहुत दूर धरि भरि जाँघ पानि छैक । ओ साइकिल कनहा पर उठा लैत अछि । अधे लग्गा टपैत साइकिल जानसँ ऊपर भारी लागऽ लगैत छैक । ओ साइकिल हेला दैत अछि । बालु आगि जकाँ तबि गेल छैक । साइकिल ससरैत नहि छैक । डेग रखिते लगैत छैक , झरकि गेल । कपड़ाक जुत्ता हैंडिलमे बान्हल छैक । एहन धीपल बालु पर जुत्तो अगिया जाइत छैक । ओ जी-जान सँ साइकिलकेँ ठेलैत दौड़ऽ लगैत अछि । पाछाँ सँ एकटा मोसाफिर कहैत छैक—'साइकिल ससुरारि मे देलक-ए ? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक ।’ ओ बान्ह टपि कऽ निर्मली बजार अबैत अछि । कंठ सूखि गेल छैक । घामसँ गंजी –अंगा सभ भीजि गेल छैक । एकटा चाहक दोकानमे बैसि जिराय लगैत अछि । पीठपर फलिया बन्हने मोटिया सभ एहि गद्दी सँ ओहि गद्दी जाइत-अबैत छैक । 'रामेसर,चाह दहक दू टा ।’- धोती-गंजी पहिरने एकटा दुब्बर-पातर आदमी कहैत छैक । 'उधार नहि हेतह ।’ 'अरे, हीयाँ नकदी माल है बाबू-ह ।’ ओकर उत्तरसँ ओकरा प्रसन्नता होइत छैक । ओ अपनो लेल चाहक ऑर्डर दैत अछि । थोड़े-थोड़े धुक्कड़ शुरू भऽ जाइत छैक । गरदासँ आँखि बचयबाक लेल ओ आँखि मूनि लैत अछि आ डेस्क पर माथ टिका दैत अछि । आँखि लागि जाइत छैक । किछु हड़हड़ाइत छैक । ओ हड़बड़ा कऽ तकैत अछि । बोरा जकाँ लोककेँ लदने एकटा मोटर मनक मन गरदा उड़बैत कुनौली दिस जा रहल छैक । भरिसक चारि सँ पहिने चलऽ वला समय नहि होयतैक । ओ प्रतीक्षा करैत रहैत अछि । लोकपेरिया पर, लीखपर धुक्कड़क विरूद्ध ओकर साइकिलक पहिया फेर संघर्षरत होबऽ लगैत छैक । ओकरा कतेको बेर लगैत छैक , आब साइकिल नहि हाँकल जयतैक । जाँघ लोथ भऽ गेलैक अछि । ओ कतेको ठाम बिलमि कऽ पूछैत अछि—तुलसियाही कतेक दूर होयतैक । जेना ओ माउण्ट एवरेस्टक चढ़ाइ कऽ रहल होअय । ओकरा जाइत –जाइत अन्हार भऽ जाइत छैक  । ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि । ओकर पीसाक जेठका भाय पुछैत छैक— ' के छियह हौ ?’ ओ गोड़ लगैत कहैत छैक— 'हऽऽम सुभाष ।’ 'सुबहास?’- ओ मोन पाड़बाक प्रयास करैत छैक । फेर कहैत छैक – 'आब चीन्हि गेलियह । हे ओइ चौकी पर बैसह । ’ ओ ओकर पिसियौतकेँ हाक पाड़ऽ लगैत ऐक – ’रेऽऽ उगना ऽऽ... उगना रे ऽऽ।’  उगना आबऽ लगैत छैक तँ ओ कहैत छैक-'देखही के अयलौ । 'उगना' के छियै’ बुदबुदाइत ओकरा लग आबि जाइत छैक । आ ओकर मुँह निहारऽ लगैत छैक । सात बरस पहिने उगना बड़ छोट छलैक । ओ आत्मीय ढँग सँ परिचय देबाक प्रयत्न करैत अछि । उगनाक चेहरा निर्विकार बनल रहैत छैक । दीदी आ पीसा खाइत काल एतेक दिन नहि अयबा पर आश्चर्य व्‍यक्‍त करैत छैक । ओ कमजोर हँसी हँसैत रहैत अछि । बिआओन पर निन्न नहि अबैत छैक । लालटेम हेट कऽ एकटा किताब उनटाबऽ लगैत अछि । पीसाक जेठका भाय मसहरीक तरसँ बिगड़ैत ककरो सँ पुछैत छैक – ' लालटेम किएक जरैत छैक रे-ए?’ भोरमे ओ अबेर कऽ उठैत अछि । दीदी कहैत छैक – ' उगना चल गेलौ-ए इसकूल । कहने गेलौ-ए, कहि दिहैक भइयाकेँ हमरो आबऽ दै ले । बड़की पोखरि जयबैक । जँ बेसी अबेर भऽ जाइ तँ कहि दिहैक भैयाकेँ नहा लै ले ।’ उगनासँ लगाव अनुभव करैत ओकरा प्रसन्नता होइत छैक । मुदा ओ ओकरा संगे नहि नहा पबैत अछि । पीसा चाँरि लगा कऽ पठा दैत छैक । खाइते काल टा ओकरा दीदी आ पीसासँ गप्प करबाक अवसर भेटैत छैक । आन समय ओ सभ व्यस्त रहैत छैक । दीदी पछिला सालक अपन बेटीक बियाहक चर्च विस्तारसँ करैत छैक जे कोना कोटक खातिर दू दिन धरि बियाह रूकि गेल छलैक । फेर प्रसंग बदलैत कहैत छैक ' आब नोकरी कऽले । बेसी  पढ़ने आदमी बताह भऽ जाइत छैक । देखैत ने छीही मास्‍टरकेँ, बताह जकाँ करैत छैक ।’ ओ चुपचाप सुनैत रहैत अछि । दुआरि पर ओकर पीसाक जेठका भाय बैसल छैक । 'ओ ओकरासँ पितियौत देया पुछैत छैक – ’अनूपा गाम गेलौ, भेंट भेल छलौ की-ई ?’ अनूपाकेँ ओकर पित्ती दीदीये लग पठा देने छलैक जे एतऽ पढ़तैक । गाममे खरचहर होइत छलैक । सात-आठ दिन पहिने ओ मायसँ भेंट करऽ चल गेलैक । दीदी कहैत छलैक, अनूपा आ उगनामे कखनो ने पटैत छैक । पीसाक जेठका भाय फेर कहनाइ शुरू करैत छैक — 'छौंड़ा छलै तेज । मुदा तोहर दीदीये नहि पढ़ऽ दैत छैक। भैंसमे पठा देलक आ ताहूसँ नहि भेल तँ दुआरि परक ई टहल, ऊ टहल। तोहर पीसा कहबो करैत छैक जे 'पढ़ऽ दही, तँ ओ कहैत छैक, जे पढ़ऽ बेरमे पढ़तैक ।' ओ किछु नहि बजैत अछि । ओकरा अनूपाक प्रति दुख होइत छैक । ओ चौकी पर पड़ि रहैत अछि । ओकरा काकाक क्लान्त चेहरा मोन पड़ैत छैक । काकीक कनैत – कनैत फूलल लाल चेहरा, पितियौत बहिन सभक आँखिक असहाज दयनीयता । रातिमे ओ दीदीसँ कहैत अछि — 'हम भोरे चल जेबौ ।' दीदीकेँ भरिसक प्रसन्नता – अप्रसन्नता किछु नहि होइत छैक । टाका मँगबाक ओकर विचार नहि जानि कतऽ निपत्ता भऽ गेल छैक । दीदीक व्यवहार ओकरा धुंध जकाँ अस्पष्ट लगैत छैक । ओ चाहैत अछि बेसी सँ बेसी तटस्थ भऽ जाय । टाकाकेँ बीचमे ठाढ़ कऽ सम्बन्धक बारेमे नहि सोचय । भोरोमे दीदीक व्यवहार ओहिना रहैत छैक । जलखै खाइत काल दीदी गमछामे दू गो टाका बन्हैत कहैत छैक—'आइकाल्हि एक्को टा पैसा हाथपर नहि रहैत छैक ।’ फेर जेना दुलार करैत जीवित स्वरमे पूछैत छैक । - 'बौआ, रस्ता लेल कने चूड़ा बान्हि दियौक ?’ ओ मना कऽ दैत छैक । 'उगना ,जो भैयाकेँ एकपेरिया देने सड़क पकड़ा दिहैक । सुभीता हेतैक । आ तोँ घूरि अबिहें ।'- दीदी कहैत छैक । उगना अस्वीकार कऽ दैत छैक । ओ खाइ ले मँगैत कहैत छैक जे ओकरा स्कूल जेबाक छैक । उगनाक इच्छा छलैक जे ओ आइ रहि जाय । काल्हि एकबेर आग्रह कयने छलैक । ओ तुरन्त बात टारि देने छलैक । नहि टारितैक तँ बादमे असुविधा भऽ सकैत छलैक । ओ बड़ तीब्रतासँ अपना पर उगनाक स्थिर दृष्टिक अनुभव करैत अछि । दीदी की कहि रहलि छैक, ओकरा नहि बुझाइत छैक । ओकर सम्पूर्ण चेतना पर उगना पसरि गेल छैक । ओ पनिमरू चालिमे विदा भऽ जाइत अछि । गोहाली लग ओकरा अपना पाछाँ ककरो उपस्थितिक अनुभव होइत छैक । उगना थिकैक । 'जेबही सड़क धरि ?' ओ पुछैत छैक । किछु नहि पुछनाइ उगनाकेँ अप्रिय लागि सकैत छलैक । ओ कोनो उत्तर नहि दैत छैक । दुनू संग-संग चलैत रहैत अछि । दीदी नमहरगर डेग दैत एकाएक आबि जाइत छैक । एकटा रुपैया दैत कहैत छैक — 'ईहो  राखि ले । सकुन्ती धेने छलैक ।’ ओकरा सभ वस्तु कुरूप आ अधलाह बुझाय लगैत छैक । मात्र उगनाक एसकर होयबाक कल्पना ओकरा नीक लगैत छैक । दीदी उगनासँ पुछैत छैक — 'जेबही?’ ओ अपूर्ण आ अस्पष्ट शब्‍दमे प्रश्नक औपचारिकता पर खौंझाइत छैक । दीदी कहैत छैक —'जाह, रौद भऽ जेतह।’ ओकरा लगैत छैक जेना उगना जिंजीर भऽ गेल होइक । उगनाक समस्त मनोभाव चुप्पी मे बदलि गेल छैक । ओकर चेहरा शांत आ उद्वेगहीन लगैत छैक । मुदा सोचला पर ओकर स्थिरता बड़ उदास लगैत छैक। ओकर साइकिल एकपेरियापर ससरऽ लगैत छैक । रौद... धार... बालु... माउण्ट एवरेस्ट ...। कुमार मनोज कश्यप -दृष्टिकोण दृष्टिकोण राजपत्रित पदाधिकारी के पद पर चयनक जे खुशी रजत के भेल छलैक से व्रᆬमशहे एकटा अनजान भय मे परिणत होईत चलि गेलैक । मोन मे धुकधुकि पैसऽ लगलैक,  कारण --- सरकारी कार्यालयक कार्य-प््राणाली आ कार्य-संस्कृति दुहू सँ अनभिग़्यता । जखन सँ श्यामबाबू अपन आंखिक देखल घटना सुनेलखिन ओकरा जे कोना एकटा किरानी धोखा सँ आधकारी सँ फाईल पर दस्तखत करा लेलकै आ बेचारा निर्दोष आधकारी पँᆬसि गेलैक ; तखन सँ रजत आर बेसी विचलित भऽ गेल आछ। दोसरो घटना ओहने सुनेने छलखिन ओ जे एकटा कर्मचारी घूस खा कऽ कोर्ट-केसक फाईल दबा देलकै आ एकपक्षिय पैᆬसला सरकार के खिलाफ भऽ गेलैक आ कोना बेचारा आधकारी के परिणामस्वरुप सस्पेंड कऽ देल गेलैक। ई सभ सुनि रजत के लगलैक जे ओ कांटक ताज पहिरऽ जा रहल आछ़़़ अबूह लागऽ लगलै ओकरा। सोचैत-सोचैत डरे पसेना-पसेना भऽ गेल रजत़़़क़ंठ सुखाय लगलैक ओकर। आईये योगदान करबाक छैक ओकरा। जँ-जँ समय लगीच आयल जा रह्ल छैक, तँ-तँ ओकर बेचैनी बढले जा रहल छैक। भीतर सँ सद्यः  डेरायलो रहैत बाहर सँ वुᆬबा देखेलक ओ। कँपैत  डेगें    तैयार   भऽ  ओ  बाबूजीक  पायर  छुबि  आशिर्वाद  लेबऽ गेल। बाबूजीक  पारखी आँखि सँ रजतक मनोदशा नुकायल  नहि  रहि  सकलैक।        माय-बाप  आ  संतान  बीच  सत्ये  कोनो   टेलिपैथी   काज  करैत  छैक   जे   बिना   मुंह  खोलनहु  सम्वेदनाक   आदान- प््रादान   करैत   छैक। बगलक वुᆬर्सी पर बैसबाक ईशारा करैत रजत के बुझाबऽ लगलाह - ''बाऊ! घबराईत कियैक छी? ई  खुशी  आ   संगहि   गर्वक बात  आछ जे आहाँ भारत सरकारक एकटा उच्च पद पर आसीन होमय जा रहल छी। आहाँक योग्यताक पूर्ण परीक्षा कईयेकऽ आहाँ के ई जिम्मेदारीक पद सौंपल गेल आछ ।''  पेᆬर पानक खिल्ली पनबट्टी सँ निकालि मुंह मे लैत आगू बजलाह- ''के पहिने सँ ऑफिसक काज सँ भिग्य रहैत आछ? समय सभ कें सभ ग़्यान करा दैत छैक। अहाँ एतबा धरि करब जे आँखि आ कान दुहु खोलने रहब सदिखन। जतऽ कोनो प््राकारक परेशानी बुझाय तऽ सलाह लेबा मे कोनो टा  संकोच नहि   करब -  चाहे  ओ  अहाँक  मातहते  कियैक  ने  हो!'' बाबूजीक बात सँ रजत के जेना कोनो दिव्य दृष्टि भेट गेलैक। लगलैक जेना मृग जकाँ कस्तुरी ओकरा संगे मे छैक   आ  ओ  नाहक  लोकक  बात  सुनि-सुनि चिंता मे पड़ल छल। एकटा मुस्की पसरि गेलै ओकर ठोर पर। ऑफिस मे कार्य-भार सम्हारिते दर्शन भेलै फाईलक अम्बार सँ। उपर सँ एकटा फाईल उठा पढिकऽ बुझबाक प््रायास करऽ लागल; मुदा निष्फल। कतबो अपना भरि प््रायास केलक रजत मुदा नहि बुझबा मे एलई ओकर विषय-वस्तु आ ने आगूक प््राव्रिᆬया । ़पेᆬर खखसिकऽ उच्च स्वरे बाजल-''किनकर फाईल आछ ई? ई आँक़डा आहाँ कतऽ सँ लेलंहु?'' सुनितहि किरानी अपन वुᆬर्सी सँ उठि कऽ   दौड़ल आयल जेना ओकरा सँ कोनो गलती भऽ गेल हो। पेᆬर विस्तार सँ सभ बात बुझा देलकै। रजत ओकरा सभ के फाईल पर फरिछायल नोटिंग करबाक हिदायत दैत ओकरा अपन सीट पर जेबाक ईशारा केलक पेᆬर विजयी भावें आँखि उठा कऽ तकलक। विजयी एहि दुआरे जे आधनस्थ कर्मचारी पर धाख जमाकऽ ओकरा सभक   नजरि   मे  नवसिखुआक  आभास नहि होमय देलकै संगहि कार्यक  आरम्भ  सेहो शुभ रहलै।  शुरु  भला  तऽ  अंतो  भला। टेबुल पर राखल पानिक गिलास के एके छाक मे खाली क लेने छल रजत। ओम्हर आधनस्थ कर्मचारी सभक बीच मे यैह चर्चा होमऽ लगलै जे साहेब बड़ क़डा मिजाज के छथि। डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक, मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण, मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि, स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मैथिली भाषाक साहित्‍य विद्यापतिक परवर्ती मैथिलीक कवि लोकनिक रचनादि केँ प्रोत्‍साहित कयनिहार नरेश लोकनि मे कंसनारायणक नाम अग्रगण्‍य अछि जनिक दरबार मे जतेक कवि रहथि ओ सभ विद्यापति द्वारा चलाओल शैली केँ  सर्वाधिक प्रश्रय देलनि जाहि मे उल्‍लेखनीय छथि महाकवि गोविन्‍ददास (1663-4-1670-71)। हिनक एकमात्र रचना ‘श्रंृगारभजनावली’ (1938) प्रकाशित अछि। हिनक कवितादि सॅ श्रृंगारिकताक बोध होइछ, किन्‍तु ओ भक्ति विषयक रचना थिक। बंगालक वैष्‍णक भक्‍त कवि हिनका बंगाली बनयबाक प्रयास कयलनि, किन्‍तु ई मिथिलाक रहथि जनिक रचनाक अर्थक दुरूहताक कारणेँ प्रसिद्ध अछि। विद्यापतिक पश्‍चात् ई मैथिलीक दोसर प्रसिद्ध कवि छथि। महाराज कंसनारायणक संग हुनका ओही रूपक सम्‍बन्‍ध छलनि जे विद्यापति केँ महाराज शिवसिंहक संग छल। मैथिलीक हिनक पदावली साहित्‍य समस्‍त पूर्वान्‍चल मे एहि नवीन पद्धतिक पोषक सिद्ध भेल। विद्यापतिक उत्‍तराधिकारी कवि लोकनि मे महाकवि लोचन (1650-1725) क नाम अग्रगण्‍य अछि। यद्यपि मैथिली मे हिनक अधिकांश रचनादि नहि उपलब्‍ध भ’ रहल अछि तथापि जे उपलब्‍ध भ’ रहल अछि ओ कलाक दृष्टिसँ उच्‍च कोटिक थिक। किन्‍तु एकमात्र ‘रागतरङिनी;’ (1924) उपलब्‍ध भ’ रहल अछि। हिनक हाथक लिखल ‘नैषधीय चरित’ क एक प्रति ललित नारायण मिथिला विश्‍वविद्यालय पुस्‍तकालय मे सुरक्षित अछि। लोचन संस्‍कृत क निष्‍णात विद्वान, संगीतक मर्मज्ञ आ कवि रहथि। हिनक कवितावली ‘रागतरङिणी’ मे उपलब्‍ध अछि। ओइनवार वंशक पतनोपरान्‍त अनेक वर्ष धरि मिथिला मे अराजकता आ अस्थिरताक स्थिति प्रबल रहल। पुन: मिथिलाक विद्वान, कवि, संगीतज्ञ आश्रयक अन्‍वेषण मे अपन समीपवर्ती राष्‍ट्र नेपाल चल गेलाह। एम्‍हर दिल्‍लीक सिंहासन पर अकबर केँ बैसबाक पश्‍चात् उत्‍तर भारतक राजनीतिक स्थिति मे परिवर्तन भेल। एही समय मे मिथिलाक शासन-सूत्र खण्‍डवलाकुलक महेश ठाकुर (1556-1569) केँ भेटलनि आ दिल्‍ली केन्‍द्र सँ मिथिलाक निकट सम्‍पर्क स्‍थापित भेल। महेश ठाकुरक अधिकांश समय पश्चिम मे व्‍यतीत भेल छलनि, अत: पश्चिमक भाषा-साहित्‍यक एतय प्रचार-प्रसार नहि भेल, प्रत्‍युत स्‍थानीय साहित्‍य सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण भेल, प्रत्युत स्‍थानीय साहित्‍य सेहो प्रभावित भेल। इएह कारण थिक जे लोचन राग्तरङिणी मे राग-रागिनीक उदाहरण स्‍वरूप ब्रजभाषाक अनेक स्‍वनिर्मित पद उदृत कयलनि अछि। मैथिली साहित्‍यक मघ्‍यकालीन साहित्यिक रचनाक दृष्टिऍं स्‍वर्णकाल कहल जा सकैछ। यद्यपि एहि समयक राजनैतिक दृष्टिसँ उथल-पुथल भेल. किन्‍तु साहित्‍यपर एकर कोनो प्रभाव नहि पडल। एहि राजनैतिक उथल-पुथल क कारणेँ मैथिल विद्वत-वर्ग एतय सँ पडाक’ नेपाल चल गेलाह। ओ सभ ओहि ठामक राजदरबार मे संरक्षण आ प्रोत्‍साहनक हेतु गेलाह। नेपाल सुसंस्‍कृत शिक्षा-प्रेमी लोकनिक द्वारा मैथिलीकेँ नेपाल मे साहित्यिक भाषाक रूप मे स्‍वीकार कयल गेल। ओहि समय मे मल्‍लवंशक शासल छल। मल्‍ल शासक लोकनि काव्‍य आ नाटकक अत्‍याधिक प्रेमी रहथि। मल्‍ल राजवंश द्वारा मैथिल साहित्‍यकार लोकनि केँ प्रोत्साहित कयल गेल जकर फलस्‍वरूप मैथिलीक प्रारम्भिक नाट्य-साहित्‍यक रचना नेपाल मे प्रारम्‍भ भेल। विद्यापतिक परिपाटी पर रचना केनिहार स्‍वतंत्र पदक अतिरिक्‍त एहि कालावधिक अधिकांश पद नाटक मे गुम्फित अछि। मैथिली गीत सँ गुम्फित संस्‍कृत-प्राकृत नाटकक रचनाक श्रीगणेश ज्‍योतिशीश्‍वर कयने रहथि जकरा उमापति उपाघ्‍याय आगॉं बढौलनि जे एहि कालावधि मे विशेष प्रचलित भेल। क्रमश: संस्‍कृत प्राकृतक व्‍यवहार कम होअय लागल आ मैथिली मे सम्‍पूर्ण नाटक लिखल जाय लागल। पदावली-साहित्‍यक समान मघ्‍यकालीन नाटक नेपाल आ आसाम धरि व्‍यापक भ’ गेल। एहि एकारेँ मैथिली नाटकक विकास तीन केन्‍द्र मे भेल-मिथिला, नेपाल आ आसाम। नेपालक मैथिली नाटककार लोकनिक कार्य भूमि भातागॉव, काठमाण्‍डू आ ललितपुर पाटन मे रहल। नेपाल मे मैथिली नाटक संस्‍कृत नाटक परम्‍पराक स्‍थानपर मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल। ओहि समय मे मुसलमानक प्रभाव सँ नेपाल मुक्‍त छल जकर फलस्‍वरूप सांस्‍कृतिक आ साहित्यिक क्रिया-कलाप मे कोनो तरहक व्यवधान नहि भेल। एहि प्रकारेँ नेपाल मे मैथिली नाटकक सूत्रपात भेल जे एक भाग अपन नव-शिल्‍पक उत्‍थान मे लागल रहल आ दोसर भाग प्राचीन संस्‍कृत-प्राकृत-मैथिली मिश्रित त्रिभाषिक नाट्य स्‍वरूप केँ किछु दिन धरि अपन पूर्ववर्ती स्‍वरूप केँ सुरक्षित राखलक। नेपाल मे मैथिली नाटकक जे श्रृंखला स्‍थापित भेल ओकर सब श्रेय मल्‍ल राजवंश केँ छैक। भातगॉव मे प्रचुर परिमाण मे नाटक लिखल गेल आ उल्‍लेखनीय नाटककार मे जगज्‍योतिर्मल्‍ल (1613-1633), जगत्‍प्रकाश मल्‍ल (1637-1672), सुमतिजिता मित्रमल्‍ल (1672-1696), रणजीत मल्‍ल (1722-1772),भूपतीन्‍द्र मल्‍ल (1696-17क22) आ श्रीनिवास मल्‍ल (1658-1685) छथि। रणजीतमल्‍ल सबसँ बेसी नाटकक रचना कयलनि। काठमाण्‍डू आ पाटनक उल्‍लेखनीय नाटककार मे वंशमणि आ सिद्ध नरसिंह देव (1622-1657) क नाम लेल जाइत अछि। ई नाटककार लोकनि प्रचुर परिमाण मे नाटकक रचना कयलनि जाहि मे जगत्ज्योतिर्म्मलक ‘हरगौरी विवाह’ (1970). विश्‍वमल्‍लक ‘विद्याविलाप’ (1965) आ जगत्‍प्रकाश मल्‍लक ‘प्रभावती हरण’ नाट्क अद्यापि प्रकाशित भ’ पाओल अछि। शेष अन्‍य नाटककार लोकनिक नाटकक प्रकाशन अद्यापि नहि भ’ पाओल अछि जे नेपाल दरबार लाईब्रेरी मे संरक्षित अछि। शेष अन्‍य नाटकादिक प्रकाशनसँ मैथिली नाटकक उदय आ विकास पर नव प्रकाश पडि सकैछ। एहि नाटकादि मे गीतक प्रधानता अछि, कथानक पौराणिक अछि, नाटककार क्‍यो होथु, किन्‍तु ओहि मे प्रयुक्‍त गीतादि अन्‍य कवि लोकनिक उपललब्ध होइछ। सभ नाटक अभिनीयता सँ पूर्ण अछि आ ओकर भाषा मानक मैथिलीक प्रतिमान प्रस्‍तुत करैत अछि। महाराज पृथ्‍वीनारायण साह (1768-1775) क आक्रमणक फलस्‍वरूप मल्‍ल राजवंश द्वारा स्‍थापित परम्‍परा समाप्‍त भ’ गेल आ ओकरा स्‍थान पर गोरखा राजवंशक स्‍थापना भेल। एकर फलस्‍वरूप काठमाण्‍डू आ पाटन मे नाटकक परम्‍परा क समाप्ति भ’ गेल, किन्‍तु भातगॉव मे अद्यापि ई परम्‍परा सुरक्षित अछि। नेपालक उपर्युक्‍त परम्‍पराक क्षीण आलोक मिथिला मे सेहो भेटैत अछि। मिथिला मे जे नाटक लिखल गेल ओकर नाम केँ ल’ कए विद्वान लोकनि मे मतैक्‍यक अभाव अछि। डा. जयकान्‍त मिश्र (1922) एकरा ‘कीर्तीनयॉं नाटक’ रमानाथ झा (1906-1971) ‘कीर्तनियॉं नाच’ आ डा. प्रेमशंकर सिंह (1942) ‘लीला नाटक’ नामसँ अभिहित कयलनि अछि। एहि नाटककादिमे मूलरूप सँ शिव तथा विष्‍णु क लीला प्रस्‍तुत कयल गेल अछि। एहि नाटकादि केँ नाट्य मण्‍डली आदि कृष्‍ण आ शिवसम्‍बन्‍धी विविध कथादि केँ आधार बना क’ प्रदर्शन करैत छल. एहि कोटिक नाटक मे उपलब्ध सामग्री सभकेँ तीन काल खण्‍ड मे बाॅटल जा सकैछ: प्रथम उत्‍थान, द्वितीय उत्‍थान आ तृतीय उत्‍थान । प्रथम उत्‍थानक नाटक कार मे गोविन्‍दक ‘नलचरितनाटक’ रामदास (1644-1671) क ‘आनन्‍द विजय नाटक’, देवानन्‍दक ‘उषाहरण’ आ रमापतिक ‘रूकिमणीहरण’ इत्‍यादिक नामोलेख कयल जा सकैछ। द्वितीय उत्‍थानक उल्‍लेखनीय नाटककार लोकनि मे लाल कविक’गौरीस्‍वयंवर’ (1960), नन्‍दीपतिक ‘कृष्‍णकेलिमाला नाटक’ (1960), गोकुलानन्‍द क ‘मानचरित नाटक’, शिवदतक ‘पारिजात हरण’, कर्णजयानन्‍दक ‘रूकमागद नाटक’ श्रीकान्‍त गणक ‘श्रीकृष्‍ण जन्‍म रहस्‍य’, काल्‍हारामदासक’ गौरी स्‍वयंवर नाटक’, रत्‍नपाणिक ‘उषाहरण नाटिका’, भानुनायक ‘प्रभावती हरण’ आ हर्षनाथ झा (1897-1898) क ‘उषाहरण’, ‘माधवानन्‍द’ एवं ‘राधाकृष्‍ण मिलन लीला’ (1962) आदि साहित्यिक दृष्टिसँ उल्‍लेख अछि। तृतीय उत्‍थानक नाटककार मे विश्‍वनाथ झा क ‘रमेश्‍वरबन्द्रिक’ चन्‍दा झा क ‘अहल्‍या चरित नाटक’ महामहोपाघ्‍याय परमेश्‍वर झा क ‘महिषासुर मर्दनी’ आ राज पण्डित बलदेव मिश्र (1897-1975) क ‘राजराजेश्‍वरी’ एवं ‘रमेशोदय नाटक’ उल्‍लेखनीय थिक। एहि मे सँ किछु नाटक अनुसंधाता लोकनिक अथक प्रयास सँ प्रकाश मे आयल अछि, किन्‍तु अधिकांश अद्यपि अप्रकाशित अछि। ई नाटककार लोकनिक नाटकादि मे नाटकीयताक अभाव परिलक्षित होइत अछि तथापि एहि कालक नाटकक बुझैत दीपक क्षीण आलोकक अभास भरैत अछि। मैथिली नाटकक विकसित आ सुव्‍यवस्थित स्‍वरूप हमरा असम मे उपलब्‍ध होइत अछि। महाप्रभु चैतन्‍यक वैष्‍णव धर्मक समस्‍त पूर्वान्‍चल क भारतीय साहित्‍य पर यथेष्‍ट परिमाण पडल जकर परिणाम भेल जे साहित्‍य पूर्णत: भक्तिमय भ’ गेल। फलत: साहित्‍य मे रसक दृष्टिसँ विशेषत: कृष्‍णक अवतार लीला कथा केँ अधिक प्रश्रय देल गेल। वैष्‍णव कवि लोकनिक अभिव्‍यक्तिक भाषा अन्‍धकारमय छल। विद्यापतिक श्रृंगार रसक पदावली मे राधाकृष्णक उल्‍लेख रहलाक कारणेँ चैतन्‍यदेव ओकरा भक्तिरस क कविता बुझलनि। ओ वैष्‍णव धर्मक प्रचारार्थ विद्यापतिक कविता केँ माघ्‍यम बनौलनि। जखन विद्यापतिक भाषा आसाम पहुँचल तखत युगपुरूष शंकर देव (1449-1568) आ हुनक शिष्‍य माधवदेव (1489-1556) विद्यापतिक भाषाक अनुकरण क’ कए ओकरा संग असमिया केँ मिश्रित क’ कए एक नूतन भाषा ब्रजबुलिक जन्‍म देलनि। आसमाक ब्रजबुलि असमिया साहित्‍यक मेरूदण्‍ड थिक। एकरा माघ्‍यम सँ असमिया-साहित्‍य रस-समृद्ध भेल अछि। एक दूरूप थिक: वरगीत आ अङकीयानाट। युगपुरूष शंकरदेव वैष्‍णव धर्मक प्रचारार्थ नाटक केँ माघ्‍यम बनौलनि। अङकीयानाट मे गद्य आ पद्यक समविभाग थिक। सबसँ आश्‍चर्यक बात थिक जे महापुरूष शंकरदेव विशुद्ध आसमिया मे कयलनि, मुदा विद्यापतिक भाषासँ ओ एतेक अधिक प्रभावित भेलाह जे मैथिली-मिश्रित असमिया मे वरगीत आ नाटकक रचना कयलनि। असमी साहित्‍य मे एकर एहि विशिष्‍टता पर प्रकाश दैत अछि। डा. वाणीकान्‍त कातकी क कथन छनि, ‘जाहि प्रकारेँ प्रचण्‍ड वात्‍या वन मं लागल दत्‍वागिन केँ प्रज्‍वलित करबा मे सहायक होइत अछि ओही प्रकारेँ साहित्‍य जातीय एवं महाजातीय आन्‍दोलन केँ प्रेरित करैछ। नाटक, गीत एवं पद ई तीनू शंकर देवक वैष्‍णव-आन्‍दोलन केँ शाक्‍त प्रदेश मे एतेक व्‍यापक आ लोकप्रिय बनौलक जाहि प्रकारेँ मरूभूमिक ऊँट जलक गन्‍ध-सूत्र पकडि क’ जलाशयक खोल मे चलि पडैछ ओही प्रकारेँ तृषित जनता परगीतक सौरभसँ आकृष्‍ट भ’ कए शंकर माधवक शरणापन्‍न भेलाह ‘असमिया साहित्‍य, 510 वाणी कान्‍ता काकती)। युगपुरूष शंकरदेव अपन तीर्थ-यात्राक क्रम मे विद्यापति क वैष्‍णव-वंश्‍क गुरूमानि मिथिला अयलाह। ओहि समय मैथिली-काव्‍य आ नाट्य-साहित्‍य विकासक अपन चरमपर छल। उमापति उपाघ्‍याय रचित ‘पारिजातहरण’ क अभिनय अत्‍यधिक भ’ रहल छल। एकर विषय-वस्‍तु सेहो राधाकृष्‍ण छल। पारिजातहरण अभिनीत होइत देखिक’ प्रयोक्‍ता शंकरदेव अत्‍याधिक प्रभावित भेलाह। एस. के. भूइयॉंक मतानुसार, ‘आङ्कीयानाटक भाषा मैथिलीक तथा आसमियाक मिश्रणक विलक्षण उदाहरण प्रस्‍तुत करैत अछि। ‘ (Oh Anita NAT, She. BHUYAN, Page 288-289) (शंकरादेव अपन अद्वितीय प्रतिभा आ अप्रतिभ बैदुष्यक बल पर असमिया साहित्‍य मे अङ्कीयानाटक जनकक रूप मे प्रख्‍यात छथि। नाटककार लोकनि पुराणादि सँ उपादान क चयन कयलनि आ एहि सन्‍दर्भ मे भागवत पुराण, हरिवंश पुराण एवं रामायण हुनक प्रधान उपजीव्‍य रहल। शंकरदेवक निम्‍नांकित नाटक कालिदमन (1518), पत्‍नी प्रसाद (1521), केलिगोपाल (1540), रामविजय (1568), रूक्मिणी हरण (1568) संतपारिजात हरण (1568) आ माधवदेवक भोजजनविहार, भूमि लोखा, अर्जुन भंजन (1538), विम्‍परा-गुचोबा, रासझुमरा, चोरधरा, कटोरा-खेलोबा, भूषण हेरोवा एवं ब्रहमा-मोहन आदि प्रकाशित आछि। एकर अतिरिक्‍त गोपाल अता (1533-1688), द्विजराजभूषण (1507-1571), रामचरन ठाकुर (1521-1600) आ दैत्‍यारि ठाकुर (1564-1622) आदि नाटककार उल्‍लेखनीय छथि। यद्यपि एहि नाटक सभक कथा-वस्‍तु पौराणिक रहल, किन्‍तु संस्‍कृत और प्राकृतक स्‍थान पर मैथिली-असमिया-मिश्रित गद्यक प्रयोग भेल। गीतक स्थिति यथावता रहल, किन्‍तु संस्‍कृत-प्राकृतक प्रयोग नहि कयल गेल जतय ओ अनिवार्य छल। एहि नाटकादिक उद्देश्‍य मनोविनोद नहि, प्रत्‍युत वैष्‍णव धर्म प्रचार करब छल। एहि लेल अधिकांश नाटकादि मे कृष्‍णक वात्‍सल्‍यमय आ दासत्‍व भावक पूर्ण लीलाक रूप मे वर्णन कयल गेल। रंगमंचक दृष्टिसँ ई अधिक सुव्‍यवस्थित अछि। एहि नाटकादि विषय-वस्‍तु, रूप-रचना, भाषा आदि विशिष्‍टता केँ देखनासँ प्रतिभाषित होइत अछि जे युग पुरूष शंकरदेव असमक लोक मनोरंजनक विधा पर मैथिली आ ब्रज क्षेत्र मे प्रचलित रंग-शैलीक आरोपन ओहिना कयलनि जेना संस्‍कृत नाटकक शास्‍त्रोक्त परम्‍परा छल, कारण नाटकक माघ्‍यमसँ ओ वैष्‍णव धर्मक प्रचार-प्रसार करय चाहैत छलाह। मघ्‍यकालीन अन्‍य उल्‍लेखनीय सामग्री सभ मे मैथिली गद्यक प्राचीन परम्‍परा केँ जोडबाक निमित प्राचीन दस्‍तावेजादि मे एकरारनामा, गौरीवचरिका, बहिखत, अजातपत्र, एकररपत्र, निस्‍तार पत्र, दानपत्र, फैसलापत्र आ चिट्ठी-पत्री उपलब्‍ध होइत अछि। एहि अभिलेखादि मे कतहु साहित्यिक सौन्‍दर्य भेटैछ। मैथिली साहित्‍य मे एकर महत्‍व एहि बात केँ ल’ कए अछि जे ई सब मैथिली गद्यक विकास-क्रम विच्छिन्‍न परम्‍पराक पूर्ति करैत अछि। पद्य-काव्‍यक परम्‍परा तँ पूर्णवते रहल, किन्‍तु एहि युग मे महाकाव्‍य, चरित-काव्‍य, संस्‍मरण आदि लिखबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेल। नव राजनैतिक, सांस्‍कृतिक, सामाजिक आ साहित्यिक स्‍वरूपक जन्‍म भेल आ मैथिली मे नवयुगक प्रारम्‍भ भेल। एहि समय मे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा संकलित एवं सम्‍पादित रचनादि मे मैथिली क्रस्‍टोमैथी (1882) तथा ट्वेन्‍टी वन वैष्‍णव  (1884), भोल झा द्वारा सम्‍पादित मैथिली संस्‍कृत भक्ति गीतादिक संग्रह, मैथिल भक्‍त प्रकाश (1920) आ जितेन्‍द्र नारायण झा द्वारा संकलित आ कविशेखर बदरीनाथ झा (18931974) द्वारा सम्‍पादित मैथिली गीत रत्‍नावली उल्‍लेखनीय अछि। एहि कालखण्‍ड मे गीतिकाव्‍य क परम्‍पराक विकास भेल। विद्यापतिक परम्‍पराक अतिरिक्‍त गीति-काव्‍यक काव्‍यकार भेलाह ओहि मे भन्‍जन कवि, लालकवि, कर्णश्‍याम अछि प्रमुख छथि। परवर्ती मघ्‍यकाल मे एक नव-धारा चलल जकरा सन्‍त काव्‍यक नाम सँ सम्‍बोधित कयल जाइछ जकर आधार स्‍तम्‍भ मे साहेबराम दास (लगभग 1746), महात्‍मा रोहिणीदत गोंसाई, महात्‍मा तारादत गोंसाई, महात्‍मा रामरूपदास, महात्‍मा लक्ष्‍मीनाथ गोंसाई, तारादत गोंसाई, महात्‍मा रामरूपदास, महात्‍मा हकरू गोंसाई, महात्‍मा परमानन्‍द दास आ रघुवर गोंसाई प्रमुख छथि। लक्ष्‍मीनाथ गोंसाई क ‘गीतावली’ (1969) मे प्रकाश मे आयल अछि। विद्यापतिक श्रृंगार-प्रधान गीत परम्‍पराक विपरीत मनबोध (निधन 1788) कथा काव्‍यक माघ्‍य मे ‘कृष्‍णजन्‍म’ (1934) क रचना कयलनि। हिनक लोकप्रियताक प्रमुख कारण थिक जे ई ग्राम्‍य-शब्‍दादिक स्‍वच्‍छन्‍द भ’ कए प्रयोग कयलनि। इएह कारण अछि जे मैथिली साहित्‍य मे हिनक महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि। अनेक दृष्टिऍं मैथिली साहितयक आधुनिक काल मे अत्‍याधिक आधुनिकताक आभास भेटैत अछि। सन् 1857 ई. क सिपाही विद्रोह क पश्‍चात् भारत वर्षक राजनैतिक क्षेत्र मे बड पैघ परिवर्तन भेल जाहि सँ साहित्‍य सेहो अछूत नहि रहल। जतय अन्‍यान्‍य भारतीय भाषादि मे साहित्‍य मे गद्यक दिशा मे अत्‍याधिक प्रगति भेल ततय मैथिली उपेक्षित रहल। एकर प्रमुख तत्‍व छल फोर्ट विलियम कालेजक द्वारा उपेक्षा, मिशीनरी द्वारा उदासीनता, लिथो आ टाइप प्रेसक अभाव, समाज-सुधार सम्‍बन्‍धी आन्‍दोलनक अभाव, नव-शिक्षा योजना आ कचहरीक भाषा मे मैथिलीक उपेक्षा, मैथिल पण्डित लोकनिक संकीर्ण दृष्टिकोण तथा मैथिली भाषा-भाषी मे जनजागरणक अभाव। एहि दिशा मे उपर्युक्‍त उपेक्षा नीतिक फलस्‍वरूप मैथिली भाषा-भाषी जतय रहथि ततय एहि गेलाह। आधुनिक युग मे एहि साहित्‍यक जे प्रगति भेल अछि ओकर श्रेय कवीश्‍वर चन्‍दाझा, लालदास आ साहित्‍यरत्‍नाकर मुंशी रघुनन्‍दन दास केँ छनि से मौलिक, अनूदित रचनाक द्वारा मैथिली साहित्‍यक श्रृंगार कयलनि। मैथिली मे पत्र-पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्‍वरूप गद्य-साहित्‍यक विकास भेल जकरा माघ्‍यमे सुन्‍दर भाषाक निर्माण भेल, शब्‍द-भंडार मे श्रीवृद्धि भेल आ विश्‍वविद्यालय स्‍तर पर मैथिली केँ पाठ्य-विषयक रूप मे स्‍वीकार कयल गेल। बीसम शताब्‍दीक प्रारम्भिक दशक मे मैथिली मे पत्र-पत्रकादिक प्रकाशनक शुभारम्‍भ भेल जकर फलस्‍वरूप आधुनिक गद्य-साहित्यिक विकास मे तीव्रता आयल। मुद्रण कलाक नवीन वैज्ञाानिक प्रगतिक फलस्‍वरूप पत्रिकादिक प्रकाशन मे जोरदार प्रगति भेल। मैथिली पत्रकारिताक प्रारम्भिक अवस्‍था तप, उत्‍सर्ग आ पीडादायक रहल अछि। मैथिलीक सर्वप्रथम पत्रिका मिथिलेतर क्षेत्र जयपुर सँ प्रकाशित भेल मैथिल हित साधन (1905)। एकर प्रकाशनक दोसर वर्ष काशीसँ मिथिलामोद (1906) क प्रकाशन भेल। मिथिलामोद मातृभाषाक जागरणक जे शंखनाद कएलक ओकरा निरर्थक नहि कहल जा सकैछ, कारण मैथिलीक आङनमे बैह शंखनाद क्रान्तिक स्‍वर बनल। निर्भीकता, व्‍यंग्‍य, मैथिलीत्‍वक समर्थन,  मैथिली भाषाक ओजस्विता एहि पत्रिकाक प्रधान गुण छल। मिथिला सँ मिथिला मिहिर (1907) उदित भेल। प्रारम्‍भ मे एकर स्‍वरूप मासिक रहल आ पाछॉं जा क’ ई साप्‍ताहिक भ’ गेल। मैथिली मे ई पत्रिका दीर्घजीवी रहल। सन् 1960 ई सँ 1989 धरि ई प्रकाशित होइत रहल। जतय धरि मैथिली सेवाक प्रयत्न अछि एकर योगदान सराहणीय रहल। एकरा द्वारा गद्य केँ अभिवर्द्धित करबाक उदेद्श्‍य सँ उत्‍प्रेरित भ’ कए वर्तमान गद्य-गंगा विविध रूप सँ समलंकृत भेल अछि। स्‍वातन्‍त्रोत्‍तर काल मे मैथिली गद्य-साहित्‍यक विकास विभिन्‍न विधा यथा उपन्‍यास, कहानी, निबन्‍ध, आलोचना, यात्रा, संस्‍मरण, साक्षात्‍कार आदि गद्यक संभावित विधादिक विकास मे एकर बहुमूल्‍य योगदान रहल। प्रथम विश्‍वयुद्ध क पश्‍चात् मैथिली पत्रिकादिक प्रकाशन मे तीव्रताक संचार भेल। एहि कालावधि मे अनेक पत्रिकादि प्रकाशित भेल जे साहित्यिक जागरण मे सहयोग दैत रहल। ई पत्रिकादि मातृभाषाक प्रति जे शिक्षित जनमानसक घ्‍यान आकृष्‍ट होइत रहल जकर प्रतिफल तँ एकरा अवश्‍ये कहब। मैथिल प्रभा (1920-192, मैथिली प्रभाकर (1929-1930), श्री मैथिली (1925-1927), मिथिला (1929-1931), मिथिलामिश्र (1931-1932), मैथिल बन्‍धु (1935), मैथिलयुवक (1931-1941), जीवन-प्रभा (1940-1950), भारती (1937), विभूति (1936-1938), मैथिली साहित्‍यपत्र (1937-1938)  आदि अनेक पत्रिकादि साहित्‍यक जागरण मे सहयोग दैत रहल अछि। देशक स्‍वाधीनताक पश्‍चात् तँ मातृभाषादिक महत्‍व आर वेशी बढि गेल अछि। जनसाधारणक घ्‍यान मातृभाषाक दिस गेल आ सचेष्‍ट एवं जागरूक भ’ कए एकर विकास मे संलग्‍न भेलाह। स्‍वतंत्रताक प्रभात मे स्‍वदेश (1948) क अभ्‍युदय भेल। पटना सँ मिथिला ज्‍योति (1949) प्रकाशित भेल। सीतामढी सँ वैदेही (1950) प्रकट भेल। मातृभाषाक एहि नवोत्‍थाान मे मिथिला दर्शन (1952), पल्‍लव (1क948), मिथिला सेवक (1954), निर्माण (1955), इजोत (1960), मिथिला दूत (1954), बटुक (1949) घीयापूता (1957), कर्णामृत (1981), अन्तिका (1998), पूर्वातर मैथिल (2000) एवं घर बाहर (2001) इत्‍यादि सब पत्रिकादिक योगदान अछि। (अगिला अंकमे जारी) भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक)- (आगाँ) लेखिका - विभा रानी पात्र - परिचय मंगतू भिखारी बच्चा 1 भिखारी बच्चा 2 भिखारी बच्चा 3 पुलिस यात्री 1 यात्री 2 यात्री 3 छात्र 1 छात्र 2 छात्र 3 पत्रकार युवक पत्रकार युवती गणपत क्क्का राजू - गणपतक बेटा गणपतक बेटी गुंडा 1 गुंडा 2 गुंडा 3 हिज़ड़ा 1 हिज़ड़ा 2 किसुनदेव रामआसरे दर्शक 1 दर्शक 2 आदमी तांबे स्त्री - मंगतूक माय पुरुष - मंगतूक पिता भाग रौ (संपूर्ण मैथिली नाटक) अंक : 2 दृश्य : 3 सांझुक समय। तेज बरिसाति आ मेघ बिजली गर्जन-तर्जनक स्वर। पहिलुका तीनू भिखमंगा'  छौंड़ा मे स' सभस' छोटका आब रूमाल बेचैत अछि। ओ अपन समान सभ प्लास्टिक स' तोपबाक चेष्टा करैत बस स्टैंड दिस अबैत अछि। मंगतू अपना जगह बइसल पानि बरिसब देखि रहल अछि। ओकरा लग भीखक पाइ छितराएल छै। छौंड़ा दूरे स' मंगतू के देखैत अछि आ फेर अपना पेन्टक जेबी उन्टा क' देइत अछि। मंगतू लग पड़ल पाई दिस ओ चुंबक जकाँ आकर्षित होबैत बढ़ल चलैत अबैत अछि। मंगतू पानि छोड़ि ओकरा दिस देख' लगैत अछि। छौंड़ा दू-चार डेगक दूरी पर एकाएक थम्हि जाइत अछि। मंगतू :   की रौ झुनमा, की भेलौ। झुनमा :  किछु नञि । मंगतू :   त' रूकि कियैक गेलें? झुनमा :  अहिना। मुंगतू :   मुंह एना छाउर जकाँ कियैक केने छें? माल-ताल नञि बिकलऊ की? झुनमा :  ई बरखा-बैकाल मे लोक घर भागत की समान कीनत। मंगतू :   (कनेक काल चुप रहिक' जेना बात बदलिक) ई त' तों नीक केलें, जे भीख मांगब छोड़ि काज पकड़ि लेलें। अच्छा झुनमा, ई बता, तोरा पानि नीक लागै छौ? झुनमा :  पेट भरल रहला पर गदहियो करीना कपूर लगै छै। मंगतू :   (जेना अपनही प्रवाह मे) हमरा बड्ड नीक लगैत अछि ई बरिसाति! आ, सुनबै छियौ, किताब आओर मे केहेन-केहेन गप्प सभ लिखल छै, बरिसाति लेल - कारी-कारी मेघ, झमझम बरिसति पानिक धार - चांनी जकाँ, भीजल धरतीक सोंन्हिपन, जेना कुम्हारक आबा मे बासन आओर पाकि रहल हुअए। हवा मे सिहकी आ मोन मे कामनाक ज्वार! प्रिय स' मिलनक इच्छा..। (पार्श्र्व स' कजरीक मद्घम स्वर) सखी हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना झींगुर, मोर, पपीहा बोले दादुर दमके ना, सखि हे दादुर दमके ना, सखि हे आएल रात अंधियारी बदरा कारी-कारी ना। झुनमा :  रह' दे रौ, रह' दे। पोथीक गप्प रह' दे। पोथी लिख' बला पढुआ लोक छै। ओकरा सभ के भरिसकि नञि बूझल छै जे पानि एला स' बाढ़ि अबै छै, घर, जान-माल डूबि जाइ छै, सभटा जमा पूँजी स्वाहा.. मंगतू :   (फेर अपनही रौ मे) आ ओकरो स' त' नीक लागै छै बरिसातिक बादक रौद। एकदम नहाएल धोएल, स्वच्छ काया जकाँ। झुनमा :  (खौंझा क') रौ सार! एतेक साहरूख खान कियै बनल जाए छें रे। एहेन बरखा-बैकाल मे तोरा सनीमा सूझै छौ, हमरा राहत बाँट'बला देखाई पड़ैत अछि। हे.. ऊ देख.. हवाई जहाज स' पाकिट सभ खसि रहल छौ, हे एम्हर.. हे ओम्हर.. हौ, हौ जी, एकटा एम्हरो खसाबहक ने! यौ भाई जी, भाई जी यौ, एकटा एम्हरो खसबियौ ने यौ। बड्ड भूख लागलए.. एको छदामक माल नञि बिकाएल..। मंगतू :   रौ झुनमा। ओम्हर की चिकरि रहल छें। ले, ई पाइ ल' ले, आ ल' आन किछु.. गप-सप्प करैत खा-पी लेब। आ हे, सूत'क मोन करओ त' सुतियो जइहें। अही ठाँ स' धंधा पर निकलि जैहें। (झुनमा पाइ लेइत अछि आ चलि जाइत अछि। मंगतू फेर स' अपन दुनिया मे भुतिया जाइत अछि। ओ गबैत अछि..) 'बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम, बरसात मे।' (झुनमा अबैत छै आ एकटा ठोंगा ओकरा थमा देइत छै। झुनमा :  ले रौ हमर आमिर खान! खो। (दुनू खाइत अछि। मंगतू स्वाभाविक रूप स' आ झुनमा हबड़-हबड़ खाइत अछि।) मंगतू :   चौप खूब नीक बनल छै ने। झुनमा :  हूँ.. मंगतू :   काल्हि कोनो आओर चीज आनिहें। झुनमा :  हूं.. मंगतू :   किछु बाजै कियै ने छें? (झुनमा हाथ स' थम्ह' के इशारा करैत अछि। मंगतू ओकरा देखैत रहैत अछि। झुनमा पूरा खेलाक बाद ढेकरैत अछि आ बजैत अछि।) झुनमा :  हँ, आब बाज! पेट खाली रहला पर दुनिया बड़का अंडा देखाई छै। आब पेट भरि गेल अछि आ भरल पेट मे त' सुअरनिओ रबीना टंडन लागै छै। (गबैत अछि) तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त। (खाए पीबि क' दुनू ठोंगा ओही ठाँ एक कोना मे बीगि देइत अछि। दुनू पानि पिबै अछि आ ढेकरैत अछि। दुनू एक-दोसरा के देखैत ठठाक' हॅँसि' पड़ैत अछि।) झुनमा :  कतेक बाजल हेतै? मंगतू :   दस स' कम की भेल हेतै! पानि त' कहैय' जे आइ छोड़ि काल्हि हम बरसबे नञि करब। झुनमा :  (उदास होइा) एतेक पानि बरसतै त' रोड सभ टूटि जेतै। पटरी डूबि जेतै। बस ट्रेन चलल बन्न भ' जेतै। मंगतू :   त' अई लेल तों मलिन कियैक भ' गेलें? झुनमा :  रौ, बस-ट्रेन नञि चलतै त' पसिन्जर नञि ऐतै। ओ सभ नञि एतै त' हमर बिक्री-बट्टा.. बिक्री नञि त' पाइ नञि.. पाइ नञि त' दाना नञि। मंगतू :   रौ झुनमा, एक बात बता। तों बस-ट्रेन स' कतेक दूर धरि गेल छें? पटना स' मुजफ्फरपुर धरि.. किऊल धरि.. दानापुर.. पटना साहिब.. केहेन सोहनगर लागैत हेतौक ने देख' मे.. हजारो लोकक एके संग चढ़ब, एके संगे उतरब। फर्र-फर्र भागैत बस- ट्रेन। सर्र-स' छूटैत लोक, घर, खेत, खलिहान, गोरू बरद.. । हमरो हाथ-गोर रहतियैक त' जएतहुँ ने तोरे आओर जकाँ। झुनमा :  हँ, जेतें आ पुलिसक डंडा आ पब्लिक गारि-बात खेतें। बम फ़ुटनें जान गमबितें। एम्हर बम ओम्हर बम, एतेक मरलै, एतेक घायल.. याहि सभ त' आइ काल्हिक नूज छै। मंगतू :   (दीर्घ साँस लेइत) जानक की। ऊ त' अई ठाँ बइसलो बइसलो जा सकै छै। के जानए, एगो बम एम्हरो फाटय आ हम सभ' लत्ता बनि उड़ि जाइ.. बम, गोली, दंगा- ई सभ त' आइ काल्हिक रीत भ' गेलैये। एगो बम फूटै छै आ सैकड़ो लोक एक्के मिनट मे अपाहिज, लोथ भ' जाइ छै। किओ पूछय हमरा स' लोथ भेलाक दर्द। रौ.. हम त' रोजे मनबै छी जे हमरा मौगत आबि जाए। ई लोथ जिनगी स' की फेदा! झुनमा :  हमहँू सभ त' इएह बाजै छी।.. की सोचै छें? ऊपरवाला लग एतेक टेम छै हमरा आओरक गप्प-सुनबाक। नमगर लाइन हेतै रौ भाइ! (ओकासी मारैत अछि।) मंगतू :   नींद आबि रहल छौ। सूति रह अही ठाँ। (दुनू मिलिक' मंगतूक चीकट कथरी ओछा ओठँगि जाइत अछि। कनेक देरी मे दुनू फ़ोंफ़ि काट' लगैत अछि। मंचक प्रकाश शनै:-शनै: लाल होब' लगैत अछि। नीने में मंगतू बड़-बड़ाइत अछि-'हम जीय' नञि चाहै छी, 'हमरा मौगत द' दिय!' 'हमरा मौगत कियैक नञि अबैत अछि।' झुनमोक अस्फुट स्वर बहिराइ छै -'हं', जिय' नञि चाहै छी।' 'ई केहेन जिनगी अछि! मरने बेसी नीक' आदि। प्रकाशक लाली मंगतू पर केन्द्रित। मंगतू नींने मे उठि क' बैसि जाइत अछि आ अलसाएल नजरि स' अपना के देखैत अछि। जेना-जेना ओ अपना के देखैत अछि, तेना-तेना ओकर आँखि स' नींद गायब भेल जाइत अछि आ ओहि स्थान पर आश्चर्य भर' लागैत छै।) मंगतू :   अरे, ई की? हमर हाथ? आ पैर सेहो?.. जेना जमीन स' बीया फूटि रहल अछि - सुंदर, कोमल, नरम.. ई केहेन चमत्कार! भगवान, अहाँ सचमुच कृपालु छी.. (शनै: शनै: मंगतू मंच पर पूर्ण व्यक्तिक रूप मे ठाढ़ भ' जाइत अछि।) हम.. हम एक गोट पूरा-पूरा आदमी, दुनू हाथ, दुनू गोर.. पतियाऊ की नञि पतियाऊ। (अपने बांहि मे बिठुआ कटैत) नञि, पतियाएबला गप्प नञि छै। (फ़ेर अपने स') कियैक नञि छै? हमर हाथ गोर घुरि आएलए हमरा लग, त' अइ मे नञि पतियाएबला गप्प की भेलै?  आब हम अपन हैसियत बदलि सकै छी.. नीक समांग़ बनि सकै छी। भीख माँगब .... ई गर्हित कर्म स' हमरा मुक्ति भेंटि जाएत.. भेटत की.. भेटि गेल! हे.. ई लिय'.. छोड़लहुँ हम भीख माँगब.. (हँसैत अछि।) आई स', एखनि स'। आब हमरा अई जिनगी स' कोनो सिकाइत नञि । (किलकि उठैत अछि। झुनमा ओकर आवाज सुनि उठैत अछि। मंगतू के अई रूप मे पाबि क' हैरान रहि जाइत अछि। मंगतू कनखी मारि क' खुशी प्रकट करैत अछि।) झुनमा :  ई जादू छै। मंगतू :   ऊँहूँ! सच। झुनमा :  भइए नञि सकै छै। ई जरूर कोनो जादू छै अथवा नैना -जोगिन। मंगतू :   अहँ! एकदम सच। छूबि के देख। (झुनमा ओकरा छुबै छै। अपन आँखि मलैत छै, फेर छुबै छै।) झुनमा :  हँ, बुझा त' रहलए सचे सन! जौं ई सच छै, त' गुरू, कहू, आब की इरादा? मंगतू :   इरादा? अरे, आब त' हम खुजल आसमानक मुक्त पंछी छी। (गबैत अछि) 'पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में' झुनमा :  एतेक आजाद नञि छें, जतेक बूझै छें। मंगतू :   माने?.. जीवन एतेक सुंदर भ' सकै छै, हम त' ई सोचबो नञि केने छलहँु। देख, ई रोडक बत्ती.. बरिसातक पानि मे केहेन सतरंगी किरण छोड़ैत अछि। ई चाकर रोड, एखन शांत अछि - भिनसर होइत होइत कतेक जगजियार भ' जाइ छै.. (गबैत अछि) 'ई सहर बहुत हसीन है।' (आगाँ बढ़ैत अछि।) झुनमा :  कत' जा रहल छें। मंगतू :   पता नञि। हम त' खाली बूझ' चाहै छी, ई पूरा-पूरा देहक सुख उठाब' चाहै छी। भगवान, हम अहाँ के कएक बेर गारि पढलहुँ। आई अहाँ के धनबाद दइ छी। हमरा माफी द' दिय'.. (आओर तेजी स' चलैत अछि) की करब! लोक आओर जहन दुखी होइ छै, अहिना बाजै छै.. (खूब तेज-तेज चलैत अछि।) झुनमा :  रौ, हवाइ जहाज जकाँ कियैक उड़ल जा रहल छें? मंगतू :   चल, चल (गबैत अछि) 'दो दीवाने शहर में, रात मे या दोपहर में, आबो दाना ढँूढ़ते हैं, इस आशियाना ढँूढ़ते है।' झुनमा :  रौ, हम थाकि गेलहूँ। गमे - गमे चल। मंगतू :   हमर त' मोन भ' रहलए जे हम ई पूरा-पूरा धरती मापि ली, बामन भगवान जकाँ.. पूरा संसार के अपन अंकबारि मे भरि ली.. खूब चिकरि-चिकरि के गाबी - 'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। शरारत करने को ललचाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन।' झुनमा :  (डेराइत) मंगतू, एना सनकाह - बताह जकाँ नञि कर। हमरा डर होइए। मंगतू :   झुनमा, हमरा आइ केहेन लागि रहलए, बूझल छौ? झुनमा :  .. .. मंगतू :   आई हमरा मोन मे एकटा कामना, एक गोट इच्छाक मूर्ति बनि रहलए.. प्रेमक नरम अनुभूति.. आइए.. एखने.. लागि रहलए जे कोनो नरम, नाजुक अंचरा मे अपन मुंह तोपि ली.. ओकर प्रेम भरल स्पर्श हमर केश, देहक रग-रग मे पहुँचए आ अमृतक समुन्दर मे गहीर, खूब गहीर ल' जाए.. जत' प्रेम स' भरल संसार हएत..कियैक भ' रहल अछि एना? झुनमा :  भ' गेल ई आमिर खान.. आब गाओत 'आती क्या खंडाला!' मंगतू :   प्रेमक लालसा अई स' पहिने नञि भेल छल कहियो! झुनमा, सुन, तोहर भौजी.. (कनेक लजाइत अछि) झुनमा :  भेल आब ई सलमान खान (गाबैत अछि) तेरे बिना, तेरे बिना.. (मंगतू आगॉं बढ़ैत अछि.. पाछू-पाछू झुनमा सेहो..) मंगतू :   देख, ई श्रमक जीबैत रूप.. मेहनति स' लोक एतेक ने थाकि जाइत छै जे.. ओ कहबी छै ने जे 'नींन नञि जानै टूटल खाट।' हमहू.. एकरे आओर जकाँ खटब.. एतेक जे बस, खसिते फोंफ काटब शुरू। (फोंफ काटैत अछि।) झुनमा :  मुदा तों काज की करबें रे! के देतौ काज तोरा? लूल्हि-नांगड़ि. मंगतुआ के सभ किओ जनैत छै.. मुदा आजुक ई नमगर, सोहनगर रितिक रोसन के काज के देतौ? जास्ती स' जास्ती उपदेस देतौ, जाहि स' पेट चलतौ नञि। (फोंफ काटबाक नकल करैत मंगतू एकदम स' चेहाइत अछि। फोंफ बीचहि मे रूकि जाइत अछि। मुंहक चमक, खुशी बिला जाइत अछि।) मंगतू :   ऐं? की करब हम? (हँसैत अछि।) एकदम सही पकड़लें तों.. की करब हम?.. नञि, की क' सकै छी हम? ..रौ, तोंही बाज ने, की क' सकै छी हम? झुनमा :  खाली भीख माँगि सकै छें। सेहो लोथ-नांगर भ' क! एहेन मुस्टंडा भ' क' नञि । मंगतू :   एह! एना नञि बाज । एतेक दिन बाद हमरा ई सनेस भेटलए, ओकरा.. (हठात ओकर गर्दनि पकड़ि लेइत छै।) फेर जुनि बजिहें ई.. रौ तों त' चारि हाथ-गोर बाला आदमी भेलैं। तो की बूझबें लोथक पीर। झुनमा :  (गर्दनि छोड़बैत) त' कलक्टरी कर। डाक्टरी कर। हम तोहर चपरासी, कंपोडर बन' लेल तेयार छी। मंगतू :   तों हमर हौसला बढ़ेबाक बदले ओकरा खसा रहल छें। हमरा लग डिग्री अछि जे.. झुनमा :  त' कोनो धंधा क' ले.. किरानाक दोकान, कपड़ाक दोकान.. किछुओ.. हमरा अपना दोकान पर राखि लिहें। मंगतू :   कियैक मजाक क' रहल छें.. धंधा शुरू कर' लेल पूँजी चाही.. तों मदति की करबें, उन्टे.. चलि जो हमरा लग स'.. झुनमा :  जाइ छी, जाइ छी। काल्हि फेर एबौ। अई बेर सिंघाड़ा खुअबिहें.. (जाए लागै छै। बीच-बीच मे मुड़ि-मुड़ि क' देखै छै जे मंगतू ओकरा बजा लियए। मंगतू ओकरा दिस ध्यान नञि देइत अछि। ई देखि ओ अपने स' एक कोन्टा में ठाढ़ भ' जाइत अछि आ मंगतू के देखैत अछि..) मंगतू :   (जेना फेर अपना धुन मे) एह! एतेक सोहनगर समय। भोर भ' रहल छै..। हे, ई सुनू, पाखीक स्वर। भोरक मंद- मंद बेयार। हे देखियौ, ई सूतल अछि। एक उठल कि सभ किओ उठि जाएत.. बल्कि, देखियौ, जनीजात सभ त' उठियो गेलीह। ओ ओम्हर चूल्हि सुनगा रहल छै.. एम्हर ई अपना बच्चा के दूध पिया रहल छै.. आ ओकरा देखियौ, ऊ चाहक पानि सेहो चढ़ा देलकै.. ओम्हर एकटा बच्चा माय के देखि मुस्किया रहल अछि.. कतेक सोहनगर छै.. पाजेबक छुन-छुन जकाँ जिनगी छनकि रहल अछि.. मंगतू.. रौ.. हिम्मत जुनि हारि.. काज भेटतौ तोरा.. धैरज धर.. (ओ ई सभ बाजिए रहल अछि कि पाछू स' बम फ़ुटबाक भयंकर आवाज़ होइत छै। पलखतिए मे रोआ- कन्नटि, भागा दौड़ी मचि जाइत अछि। मंगतू किछु नञि बूझला सन्ते अकबकायल ओहि ठां ठाढेक ठाढ रहि जाइत अछि। दिग्भ्रमित भेल ऊ चारू दिस देखैत अछि, फेर माज़रा सभ बूझ' मे अबितही चिकर' लागैत अछि..) मंगतू :   अरे, ई की भेलै.. ऊ दूध पियबैत माय! .... बच्चा ओकरा हाथ स' .... एतेक दूर खसि ..... आ ओ अपने गेंद जकाँ.. माथ फाटि गेलै.. ओ, ओ चूल्हि सुनगबैत स्त्री.. ओकर त' हाथे-गोर उड़ि .. अरे, ई निचिन्त सूतल लोक सभ.. कागज-पत्तर, खढ -पात जकाँ उड़िया.. (चिकरैत अछि) रौ, .. रौ रछसबा सभ.. जल्लाद, कसाइया सभ.. रौ, जिनगीक एक गोट साँस त' द' नञि सकै छें, मुदा.. कियैक छीन रहल छें हमर जिनगी? कियैक लोथ बना रहल छें हमरा? हमर अपराध की? (पार्श्र्व स' ध्वनि.. जन्म लेबक अपराध केने छें तों सभ.. आब भोग।) (चीख-पुकार एखनो मचल छै। मंगतू असहाय सन ठाढ़ अछि.. हठात ओकर कान में जोरदार आवाज अबैत छै 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचो.. भाग रौ.. ' (भीड़क भागबाक ध्वनि। मंगतू, सेहो बिनु किछु बूझने बदहवास चिकरैत भाग' लागैत अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' रसे- रसे अई भगदडि. मे सभटा पात्र सम्मिलित भ' जाइत छथि.. सभ चिकरि. रहल छथि.. 'भागू, जान बचाऊ.. भाग रौ.. भाग.. ' रसे- रसे स्वर शांत होइत अछि.. सभटा चरित्र एक-दोसराक हाथ पकड़ने मंचक एकदम अग्रभाग मे ठाढ़ भ' जाइत छथि। समवेत स्वर मे सभ बाजैत छथि।) समवेत स्वर :       हुअए खाहे युद्घक विभीषिका वा खूनक बाजार गर्म मुदा नञि थाक' बला, हार' बला हम! ओ परम पिता, ओ काल.. अहीं सं', हँ, अहीं स' अछि टक्कर हमर.. हम खसब, लड़ब, मरब, मुदा फेर ठाढ़ भ' उठब साठि हजार सगर-पुत्रक भाँति ई संसार खल अछि, कामी अछि, दुष्ट अछि, पिशाच अछि, मुदा तइयो छै अई मे जीवनक आभा जे अछि सत्यो स' बढ़ि क' सत्य.. शिवो स' बढ़ि क' शिव अमरो स' अमर सुंदरतो स' सुंदर.. जीवन, नञि अछि एतेक सस्त जे बिछलि जाए मुट्ठी मे बंद बालु जकाँ हम जीयब, आ पारब रेघ कालोक सम्मुख ललकारब मौत के बढ़ब विजय पथ पर रचब नित नवीन अभियान नित नवीन विहान नित नवीन वितान (अंतिम पंक्ति बाजैत-बाजैत सभ किओ आधा-आधा हिस्सा मे बॅंटिक' मंचक दुनू ओर ठाढ़ भ' जाइत छथि। प्रकाश मंगतू पर.. ओ अपन पहिल स्थिति मे अछि.. आ निन्न मे बड़बड़ क' रहल अछि.. 'भाग रौ, बम.. भाग, जान बचेबाक छौ त' भाग.. भाग रौ.. ' । ओ नींने मे एम्हर स' ओम्हर भागबाक प्रयास क' रहल अछि। सभ पात्र वृत्ताकार मे ओकरा घेर लेइत अछि। फेर सभ एक दोसराक हाथ पकड़ि पाछू दिस झुकैत अछि, जाहि स' एकटा मानव-पुष्पक निर्माण होबैत अछि.. सभ कविताक अंतिम चार पंक्ति बाजि रहल छथि.. 'बढ़ब विजय- पथ पर, रचब नित नवीन अभियान.. ' बाजैत-बाजैत सभटा पात्र फ्रीज भ' जाइत छथि। परदा खसैत अछि।) (समाप्त) डॉ. देवशंकर नवीन (१९६२- ), ओ ना मा सी (गद्य-पद्य मिश्रित हिन्दी-मैथिलीक प्रारम्भिक सर्जना), चानन-काजर (मैथिली कविता संग्रह), आधुनिक (मैथिली) साहित्यक परिदृश्य, गीतिकाव्य के रूप मे विद्यापति पदावली, राजकमल चौधरी का रचनाकर्म (आलोचना), जमाना बदल गया, सोना बाबू का यार, पहचान (हिन्दी कहानी), अभिधा (हिन्दी कविता-संग्रह), हाथी चलए बजार (कथा-संग्रह)। सम्पादन: प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी, अग्निस्नान एवं अन्य उपन्यास (राजकमल चौधरी), पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ (राजकमल की कहानियाँ), विचित्रा (राजकमल चौधरी की अप्रकाशित कविताएँ), साँझक गाछ (राजकमल चौधरी की मैथिली कहानियाँ), राजकमल चौधरी की चुनी हुई कहानियाँ, बन्द कमरे मे कब्रगाह (राजकमल की कहानियाँ), शवयात्रा के बाद देहशुद्धि, ऑडिट रिपोर्ट (राजकमल चौधरी की कविताएँ), बर्फ और सफेद कब्र पर एक फूल, उत्तर आधुनिकता कुछ विचार, सद्भाव मिशन (पत्रिका)क किछि अंकक सम्पादन, उदाहरण (मैथिली कथा संग्रह संपादन)। बटुआमे बिहाड़ि आ बिर्ड़ो (राजकमल चौधरीक उपन्यास) सुशीलाजी जें कि आर्थिक रूपें समृद्ध आ निश्चिन्त छथि, आकर्षक परिधान पहिरबाक क्षमता आ उन्मादक देहक स्वामिनी छथि, आइ भुवनजी, काल्हि कमलजी, परसू केओ आओर... रंग-विरंगक स्वादमे मस्त रहै छथि। सभा-सोसाइटीमे, बुद्धिजीवी लोकनिक बीचमे अपन उपस्थिति बनौने राखए चाहै छथि, प्रतिष्ठित आ विद्वान लोकनिक नयनतारा बनल रहए चाहै छथि, तें ज्ञान नहिओ रहैत साहित्य, कला, संस्कृति आ मिथिला-मैथिलीक प्रगतिगामी आन्दोलनसँ जुड़ल रहए चाहै छथि; स्वस्थ आ सम्पूर्ण पुरुषक सान्निध्य हुनका लेल बड़ पैघ बात थिक। मदिरतम मुस्कान, भू्र-भंगिमा, रति-सुरतिक प्रभावें विद्वत जनक आँखिमे बसल रहब हुनकर नेत छनि (पृ. 39-40)। सुशीलाक राति आ निर्मलाक राितमे इएह अन्तर अछि आ इएह समानता।...वस्तुतः सुशीला आ निर्मला, दुनू दू वर्ग स्त्राी छथि। एक गोटे प्राण रक्षा लेल, नोन-रोटी लेल, अपन आ परिवारक क्षुधा मेटएबा लेल, स्वयं निष्काम बनि दोसरक कामोत्तेजना शान्त करबाक साधन बनै छथि; दोसरक यौन-पिपासाक शमन करै छथि; तँ दोसर यौन-पिपासासँ व्याकुल भेल दोसराकें पीबि जएबा लेल उताहुल रहै छथि; नित नव-नव माछ पर जाल फेकै छथि।--निर्मला जी छथि सभा-सोसाइटीक प्रेमिका। पुरुख-समाजमे गेला बिना नीक नहि लगै छनि। मैथिल समितिक द्वारा ई भुवनजीक सम्पर्कमे अएलीह, आ भुवनजीक द्वारा मैथिल समितिक सम्पर्कमे। आ भुवनजी हिनका अपनामे लपेट लेलथिन। निर्मलाजीकें ई गप्प अध् ालाह नहि लगलनि। आब त’ सौंसे समाजकें बूझल छै जो ओ भुवन जीक प्रेयसी छथि। हेम बाबूकें सेहो बूझल छनि। हेम बाबूक जमायकें सेहो खबरि छनि। ओ बेचारा तँ लाजें कलकत्ता अबितो नहिएँ...(आन्दोलन/पृ. 39)। विचारणीय विषय इहो थिक जे अर्थाभावे टा मानव जीवनक मूल समस्या नहि होइत अछि। यौन-तृप्ति लेल विवाहेटासँ निश्चिन्त नहि भेल जा सकैत अछि। निर्मलाजी तकरहि उदाहरण थिकीह, हुनका सन बिआहलि स्त्राी; विधुर पिता आ परदेशी पतिक संयुक्त कमाइ पर एकछत्रा अधिकार रखनिहारि स्त्राीक ई आचरण कथी लेल? नीलूक चरित्रा अपेक्षाकृत बेसी व्याख्येय आ विश्लेषणपरक अछि। ओ अनाथ छथि, मुदा भुवनजी सन निविष्ट व्यक्तिक छत्राछायामे लालन-पालन भेलनि। जन्महिसँ महानगरमे छथि, मुदा महानगरीय अपसंस्कृतिक असरि हुनकर आचरण पर नहि छनि। मैथिल संस्कार आ सभ्यतासँ परिपूर्ण छथि। वाक्चातुर्य, साहस, शालीनता, प्रगतिकामना, रूढ़ि द्रोहसँ सम्पन्न तेरह-चैदह बर्खक किशोरी छथि। अतिथि सत्कारमे पटु, काँचहि उम्रमे लोक-समाज आ देश-दुनियाँकें चिन्हबाक क्षमतासँ परिपूर्ण, कोनहुँ परिस्थितिमे कोनहुँ व्यक्तिक समक्ष अपन बात निडरतासँ रखबाक स्पष्टता छनि। विष्णुदेव ठाकुरकें ठाँय-पठाँय लोफर कहि देलनि (पृ. 16)। नीलू भावुक छथि, कमलजीकें कमल भैया एहि लेल नहि कहती जे हुनकर एकटा कमल भैया टी.बी. रोगसँ मरि गेलनि (पृ. 22-33)। कमलजीक जेबी आ मनीबेग टेबैत रहै छथि, छोट हेबाक अधिकार मँगै छथि (पृ. 32)। घरमे एकाकी जीवन व्यतीत करैत अकच्छ छथि आ कमलजीकें कहै छथि जे अहाँकें तँ हमरा दिश तकबाक पलखति नहि होइए (पृ. 47-48)। निर्मलासँ कमलजीक हेम-क्षेम नीलूकें नीक नइं लगै छनि (पृ. 48)। कमलजीसँ नीलूक हेम-क्षेम भुवनजीकें सन्देहास्पद लगै छनि (पृ. 49)। कमलजी नीलूक करतब पर संशकित रहै छथि (पृ. 48)। नीलूकें होइत रहै छनि जे ओ दिन राति कमलजी लग बैसल रहथि। राति कए अर्द्धनग्न अवस्थामे कमलजीक ओछाओन धरि पहुँच जाइ छथि (पृ. 50-51)। सम्पूर्ण कथामे नीलूक करतबकें एकटा ‘पाठ’ बूझि जँ एहि पर विचार-विमर्श हो, तँ सब किछु झलफल बुझाइत अछि। कमलजी आ भुवनजीक शंका, नीलूक ईष्र्या, बहिन-भाइक सम्बोधन, यौन-पिपासाक दैहिक आवश्यकता अथवा मनोवेग-उद्वेग अथवा काम-युद्ध लेल उन्मादित योद्धा, आन्हर राक्षस...सब किछु गड्ड मड्ड भ’ जाइत अछि। कखनहुँ त’ मानवीय मनोवेगक सहजात चरित्रा लगैत अछि कखनहुँ घनघोर रहस्यमय। सर्वगुण सम्पन्न किशोरी नीलूक यौनोन्माद हुनका समस्त नैतिकता, मर्यादा, वर्जना आ सम्बन्ध-सम्बोधनक सीमासँ मुक्त क’ दै छनि। मनौन लेल घिघियाइत कमलजीक समस्त प्रस्तावकें नकारैत साफे-साफ कहै छथि जे लोक किछु कहए, हमरा नइं रहल जाइए, अहाँ हमरासँ विवाह क’ लिअ’ (पृ. 51)। मनोवेग आ कामोत्तेजनाक खौंतकें एहि उपन्यासमे मानवीय प्रवृत्तिक रूपमे जतेक स्पष्टता आ वैविध्यसँ व्याख्यातित कएल गेल अछि, ताहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे सत्ते यौनोन्मादमे गाय धरि बाघिन भ’ जाइत अछि। स्थापित मर्यादाक अधीन तृप्तिक बाट साफ भेल तँ भेल, नहि भेल तँ उद्वेग लेल कोनहुँ सीमा, कोनहुँ मर्यादाक अनुपालन काम्य नहि थिक। समस्त नायक-नायिका एवं सहयोगी पात्राक जीवन-प्रक्रिया, रहन-सहन आदिक वर्णन एतए अत्यन्त स्वाभाविक ढंगें भेल अछि। एकटा गौण स्त्राी पात्रा छथि कमलजीक भौजी। कमलजी अपन प्रवासक श्रेय हिनके दै छथि। भौजी कहलकनि--गामक जीवन अहाँकें सहल नहि जाएत। सहलो जाएत तँ... गामक लोक निन्दा करत। कहत, घरमे विधवा भौजी छथिन, तें ई नौकरी छोड़ि गाममे बैसल अछि...(पृ. 13)। अइ वक्तव्यमे सेहो मानवीय वृत्तिक सहज आशंका अछि--समाजक मोनमे संशय हेबाक आशंका, अपने मोनक सम्भावना पर आशंका, कमलजीक धारणा पर आशंका...। आगि आ ख’ढ़ एक ठाँ रहत, जानि नहि कहिआ की भ’ जाएत! ‘भौजी’ मैथिल समाजक अथवा मैथिल नारीक विचित्रा उदाहरण थिकीह। जीवनक भार, सन्तानक भार, मर्यादाक भार, देहक भार, समाजवृन्दक मोनमे उठैत कल्पनाक भार... मिथिलाक कोनो विधवा स्त्राीक जीवन कोन तरहें, तरुआरिक धार पर चलबा लेल विवश रहैत अछि, तकरा उपन्यासकार मात्रा एक वक्तव्यमे स्पष्ट क’ देने छथि। सम्पूर्ण सृष्टिमे दू टा अभिकरण महत्वपूर्ण अछि -- एकटा समाज व्यवस्था, जाहिमे राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, मूल्यनीति आदिक मर्यादा, कानून-कायदा आ सीमा शर्त अबैत अछि; आ जकर प्रतिनिधित्व अइ उपन्यासमे मैथिल समिति द्वारा चलाओल आन्दोलन थिक। एहि आन्दोलनमे सब किओ अपन-अपन पैरुख-प्रतिभाक अनुकूल अपन-अपन महत्व साबित करए चाहै छथि, स’क भरि जे क’ पबै छथि, करै छथि, तृप्त अथवा कुण्ठित होइ छथि; निन्दा-शिकायत, च’र-चुगलखोरी, ईष्र्या-द्वेषमे लिप्त रहै छथि। अपन हैसियत लेल हरदम अत्यानुमान आ अदना लेल न्यूनानुमानक धारणासँ ग्रस्त रहै छथि। मैथिल समितिक क्रिया-कलापकें जँ प्रतीक अर्थमे ली तँ सम्पूर्ण भारतीय समाज व्यवस्थाक गुण-सूत्रा एहिमे भेटि सकैत अछि। दोसर अभिकरण थिक मानवीय मनोवेगक सन्धान व्यवस्था। सत्य तँ ई थिक जे एकर कोनो व्यवस्था नहि होइत अछि, कोनो स्थापित आ शाश्वत व्यवस्थासँ ई संचालित नहि होइत अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक क्षण विशेषक मनोवेग अलग-अलग व्यवस्था विधान निर्मित करैत अछि। रोटी, सेक्स, सुरक्षाक आवश्यकता पूर कर’ लेल कखन कोन व्यक्ति की करत, तकर पूर्वानुमान असम्भव अछि। कैक कोटिक स्त्राी पुरुषक मनोवेगक विश्लेषण आ चित्राणसँ एहि उपन्यासकें जाहि तरहें समृद्ध कएल गेल अछि; से विवेकशील रचना पाठ प्रक्रियाक माँग करैत अछि। ताहि आधार पर ई कहबामे कोनो संकोच नहि हेबाक चाही जे भारतीय नागरिकक जीवन-व्यवस्थाकें गम्भीरतासँ रेखांकित करबा लेल ई छोट सन वृतान्तक कथा, भारतीय साहित्यक अपूर्व निधि थिक, निदर्शिका थिक। तुलनात्मक रूपें देखी तँ आदिकथाक देवकान्त आ आन्दोलनक कमलजीमे विराट अन्तर अछि। देवकान्त मर्यादा आ मनोवेगमे सामंजस्य स्थापित नहि क’ पबै छथि। दुनू स्थितिक संघर्षक ज्वालामे स्वयंकें भस्म करैत रहै छथि। मुदा कमलजी बेसी सहज छथि। नैतिकता आ मर्यादाक रक्षा करबामे कतहु कोनो हूसल डेग नहि उठबै छथि; काम-तृप्ति हेतु समर्पित नीलूकें अपना कोठलीसँ आपस तँ क’ दै छथि, मुदा मनोवेगकें मारि कए अपनाकें प्रतारित नहि करै छथि। चल जाइ छथि राति बेच’बाली सुशीला नामधारी स्त्राीक खाट पर। ई दीगर बात थिक जे ओतएसँ दोसर मनोवेग बेसाहि अनै छथि।... दुनू नायकक दू परिदृश्य, दू जीवन, दू बाट, दू सीमा अछि। आन्दोलन, जीवन-संग्राममे तल्लीन मैथिल नागरिकक चारित्रिक विश्लेषण, सामाजिक-राजनीतिक पर्यवस्थितिक कोलाज थिक, वृत्तान्त थिक; तँ आदिकथा सामन्ती संस्कारक कोखिमे पुष्पित-विकसित विकृति आ मानवेतर भाषा, व्यवहार, व्यवस्थादिक कुत्सित स्वरूपक गाथा। आन्दोलनक नीलूक उन्माद वयसोचित आचरण थिक, अजोह वयसक एकटा कन्याक क्षणिक उद्वेग थिक; ओहिमे ने तँ दुतरफा प्रेमादर्शक कोनो रूपाकृति अछि, ने वासनात्मक भूखक कोनो नियोजित अवधारणा। ओहिमे कोनो स्वस्थ, सुविचारित सोच आ दूरगामी चिन्तनशीलताक कोनो आशा नहि कएल जा सकै अछि; सम्भवतः तें ओकरा बुझ-सुझा क’ बाट धराएब आसान छल। मुदा आदिकथाक सुशीला परिपक्व, प्रौढ़ आ प्रगल्भ स्त्राी छथि। कुलीन घरानाक एहि विवाहित आ अतृप्तकामा नायिकासँ हिनकर स्वस्थ मानसिकता, तीव्र मनोवेग आ ठोस निर्णयक उमेद कएल जा सकैत अछि। हिनकर प्रेम निवेदनकें नकारल जा सकै अछि, तिरस्कृत कएल जा सकै अछि, हिनका बुझाओल नहि जा सकै अछि। नीलूक उन्माद भेल लुत्ती, जकरा सुनगैसँ पूर्वहि मिझाओल गेल; मुदा सुशीलाक उन्माद भेल दावानल, ओकर मिझाएब असम्भव अछि, ओकर तृप्ति आवश्यक अछि, ओहिसँ धाह उठब उचित अछि। दोसर बात ई जे नीलूक उद्वेग एसगर उठल दोसर मिझौलक; मुदा सुशीलाक उद्वेग जखनहि उठल, देवकान्तक उद्वेगसँ घी-बसात पबैत गेल। दावानल बनि गेल...। दुनू उपन्यासक दू परिदृश्य अछि, दू पर्यवस्थिति अछि...। तथापि लेखकक जीवन-दृष्टिक अन्तर्धारा सब ठाँ व्याप्त अछि। दू उपन्यासक दू परिदृश्य आ दू पर्यवस्थितिक नायक छथि--कमलजी आ देवकान्त। मुदा सब किछु भिन्न रहलाक बादहु नायकक स्वभावमे एतबा साम्य छनि जे कमलजीक नजरिमे चाह-काॅफीमे दूध, चीनी मिलाएब ओकर कौमार्य नष्ट करब थिक (आन्दोलन/पृ. 43) दोसर दिश बिना दूध-चीनीक चाह पीब देवकान्तक प्रवृत्ति भ’ गेल छनि (आदिकथा/पृ. 37)। सामान्य अर्थमे त’ ई अत्यन्त सरलीकृत आ चलताउ वाक्य लगैत अछि, मुदा गम्भीरतापूर्वक विचार कएला पर, प्रतीक अर्थमे वस्तु आ विचारक मौलिकता बनौने रखबाक, ओकर दोषादोष संग ओकरा ग्रहण करबाक ईमानदारी थिक। विद्वान लोकनि तँ मानिते छथि, पाठकीय दृष्टिकोणसँ सेहो ई प्रमाणित भ’ चुकल अछि, जे कथोकथन आ वार्तालापसँ कोनहुँ कथाकृतिमे नाटकीयता आ जीवन्तता अबैत अछि। उपन्यासक स्थितिमे तँ ई सर्वाधिक प्रभावी होइत अछि। कथा विस्तार आ घटना विकासमे कथोकथन जते बेसी हो, उपन्यास ओतबे जीवन्त हएत। एतबा धरि अवश्य जे कथोपकथनक सम्वाद, भाषण नहि भ’ जाए, से भेलासँ उपन्यासक रोचकता आ प्रभाव आहत होइत अछि। हमरा जनैत ओ उपन्यास सर्वाधिक रोचक आ प्रभावकारी होइत अछि, जकर पात्रा आपसमे बेसी काल गप-शप करैत कथाकें गति दैत अछि। उपन्यासकारकें कथाभूमिमे जते कम जाए पड़नि, प्रभाव तते बेसी प्रबल हएत। मुदा ई गप-शप लद्धर नहि हो, से ध्यान राख’क थिक। सम्वादमे पात्राक मनोभाव आ आचरणक संकेत हो। अर्थात् नाटकीय शैलीक उपन्यास लिखब एकटा पैघ जोखिमक काज थिक, जे उपन्यासकें संक्षिप्त, दीप्त, रोचक आ प्रभावकारी बनबैत अछि। ओना एकटा विकराल जोखिम संग लागल रहैत अछि -- कौशलमे कनेको चूक भेल तँ सब गुर गोबर। एहि मामिलामे राजकमल चैधरीक दुनू उपन्यास--आन्दोलन, आदिकथा-- प्रभूत सफल उपन्यास थिक। दू भिन्न विषय, दू भिन्न मनोभावक उपन्यासमे कथानककें विस्तार दैत कथोपकथन, घटना विशेषक परिस्थिति आ वातावरण निर्माणमे अपूर्व सफलता प्राप्त केलक अछि। पात्राक आवेग, प्रेरणा, भावना, घटना विशेष पर ओकर प्रतिक्रिया आ पारस्परिक प्रभावक झाँकी दुनू उपन्यासक कथोपकथनमे हरदम देखाइत रहैत अछि। छोट-छोट वाक्य आ कथन खण्डक कारणें ई प्रभाव आओर रोचक भेल अछि आ उपन्यासमे निखार आएल अछि। आन्दोलनमे सुशीला सन वेश्यासँ कमलजीक वार्तालाप(पृ. 38-39), निर्मलाजीसँ भेंट-घाँटक मादे कमलजी आ नीलूक वार्तालाप(पृ. 48), भाषणक रूपमे देल गेल वक्तव्यक अछैत सुदर्शनजीक स्थिति-चित्रा विवरण(पृ. 51-53), अइ बातक प्रमाण थिक जे छोट-छोट वार्तालापसँ कोना एकटा वेश्याक दारुण कथा, अथवा कोनो पुरुष दिश अनुरक्त एकटा युवतीक दोसर स्त्राीसँ ईष्र्याभाव, अथवा कोनो अनैतिक-अवांछित घटनासँ कोनो युवकक आक्रोशक उद्वेग स्पष्ट होइत अछि; आ कोन वैशिष्ट्यक संग तकर प्रभाव पडै़त अछि। आदिकथा यद्यपि वर्णनात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यास थिक तथापि वार्तालाप द्वारा पात्राक मनोभाव आ चारित्रिक वैशिष्ट्य एतए अंकित अछि। राजकमल चैधरीक कथालेखनक ई खास विशिष्टता थिक, जकर समावेश अइ उपन्यासमे नीक जकाँ भेल अछि। वार्तालापक पश्चात एहि उपन्यासमे कतोक ठाम उपन्यासकार पात्राक क्रिया, आवेग, मनोदशा आदि पर अपन टिप्पणी दैत आगू बढ़ै छथि; मुदा से टिप्पणी अपन गसावक कारणें वार्तालापक संयोजक बिन्दु साबित होइत अछि। प्रथम भेंटक प्रारम्भिक सम्वादमे सुशीला, देवकान्तसँ पूछब शुरुह करै छथि जे--अहाँ जमीन्दार छी?... आ अन्त करै छथि जे -- अप्पन घर त’ अहाँ हमरा सबकें द’ देलऊँ, अपने कतए सूतब?...(पृ.34-35)। अइ वार्तालापमे दुनूक अनुरक्तिक सूक्ष्म विश्लेषण होइत नजरि अबैत अछि। कोनो स्त्राी-पुरुष एक दोसरा दिश कोना अनुरक्त होइ छथि, अनुरक्तिक उद्भव कोना होइत अछि, संकेत कोना होइत अछि, दू अपरिचित व्यक्तिक अपरिचित संकेतक जाँच परताल कोना होइत अछि, दुनू आपसमे कोना खुजैत जाइत अछि... आदिकथाक कथोपकथन एहि समस्त मनोभाव आ परिस्थितिक वार्तालापक विशिष्ट उदाहरण थिक। विश्लेषणात्मक शैलीमे लिखल गेल उपन्यासमे, पात्राक मनोविश्लेषणकंे रेखांकित करैबला कथोपकथन, अक्सर उपन्यासक प्रभावकें उत्कर्ष दैत अछि आ उपन्यासकारक विश्लेषणात्मकताकें गति आ आलन दैत अछि, से एतए भेल अछि। जखन देवकान्तक माम अनिरुद्ध बाबू देवकान्तकें मातृकमे किछु दिन आओर रहि जेबाक आग्रह करै छथि, तखन सुशीला आ देवकान्तक प्रेमाभिव्यक्ति स्पष्ट शब्दमे होइत रहैत अछि, प्रेमिकाक पतिकें सेहो अर्थ स्पष्ट लगैत रहै छनि, मुदा प्रेमक नहि, मामि-भागिनक मर्यादापूर्ण स्नेहक (पृ. 67-68)। बहुअर्थक कथोपकथनक ई कौशल चमत्कृत करैत अछि। दैनन्दिनक बोली-बानी, भाषा-संस्कारकें तरासि कए रोचक कथोपकथन बनाएब पैघ कौशलक बात थिक। राजकमल चैधरीकें भाषा संरचनामे एहि तरहक चमत्कार उत्पन्न करबाक महारत प्राप्त छनि। कोनहुँ उपन्यासक कथाक्रम, पात्राक आचरण आ करतब, क्रिया-कलापक परिणति तथा सामाजिक प्रतिक्रिया आदिक प्रभाव भावक पर तखनहि फलित होइत अछि, जखन ओकर विश्वसनीयता कायम भ’ सकए। विश्वसनीयता स्थापित नहि भेला पर कतोक बेर सत्यकथा, फूसि लगैत रहैत अछि, आ तखन पाठक ओकरा खिस्सा-पिहानी बूझि बहटारि दैत अछि। एहना स्थितिमे साहित्य-सृजनक मूल लक्ष्य --सामाजिक परिदृश्य संशोधन अथवा मानवीय व्यवस्थाक संस्थापनक पूर्ति नहि भ’ पबैत अछि, ओहेन साहित्य मात्रा मनोरंजन बनि कए रहि जाइत अछि। मनोरंजन कथा साहित्य लेल आवश्यक अवश्य अछि, मुदा ओ साधन थिक, साध्य नहि। कोनहुँ कथा साहित्य लेल मनोरंजन एतबे अर्थ रखैत अछि, जे पाठक ओकरा आश्रयमे रचनासँ आद्योपान्त जुड़ल रहए। कथा साहित्यक असल उद्देश्य समाप्तिक पश्चात शुरुह होइत अछि, जखन ओकर प्रभाव भावकक मोनमे चलैत रहैत अछि।. ..एहि स्थिति लेल कथाक्रमक विश्वसनीयता प्रमुख तत्व थिक। अविश्वसनीय कथासूत्रा कोनहुँ पाठकक चेतनाकें झकझोड़ि नहि सकैत अछि। तें हरेक घटनाक्रम लेल, चरित्रा चित्राण लेल, देश-काल-वातावरणक व्यवस्थित स्वरूपक निरूपण आवश्यक अछि। कोनहुँ पात्राक आचरण, करतब, मनोवेग, क्रिया-कलाप, कथोपकथन आदिक स्वाभाविकता सुनिश्चित करबा लेल वातावरण, देश, काल आदिक औचित्यक सूचना आवश्यक होइत अछि। निर्मलाजीक कामोन्माद, अनेक पुरुष संग घुमबा-फिरबाक प्रवृत्ति कलकत्ताक परिवेशमे मात्रा चर्चाक विषय थिक, मिथिलाक कोनो गाममे ई घटना होइत, तँ आगि लागि जइतए। मुदा इंगलैण्ड-अमेरिकामे एहेन किछु नहि होइतए। ठीक तहिना, नीलूक विवाह लेल हुनकर आश्रयदाता ब’र तकै छथि, कमलजी संगे हेम-क्षेम देखि चिन्तित होइ छथि; मुदा पाश्चात्य देशमे ई बात अप्रासंगिक होइतए। एम.ए. पास युवक कमलजी मिथिलाक कोनो गाम, कोनो टोलमे ट्यूशनकें अपन जीविका नहि बना सकितथि। कतबो पढ़ल-लिखल होथु, कोनो युवती ग्रामीण परिवेशमे सभा-सोसाइटीमे उठब-बैसब नहि क’ सकितए। पाश्चात्य संस्कृतिमे अनिरुद्ध बाबू कतबो उच्च कुलशीलक होइतथि, कतबो सम्पत्तिशाली होइतथि, सुशीला सन उद्दाम जवानीक स्त्राी बियाहि क’ घर नहि अनितथि; कदाचित अबियो जैतनि तँ ओ कुलानन्द सन समवस्की युवकक मातृत्व नहि स्वीकारितथि, अपन यौन तुष्टि लेल कखनहुँ कोनो देवकान्त, अथवा कुलानन्दक बाँहि ध’ लितथि। कुलानन्दक स्त्राी हुनकर अत्याचार नहि सहितनि; हरिनगरबालीक चैताली नहि चलितनि...। वातावरण निर्माण लेल सेहो आलोच्य समाजक सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, व्यवहार, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, सामाजिक परिवेश भौगोलिक आबोहवा, प्राकृतिक परिस्थिति...सब किछु उत्तरदायी होइत अछि। कोन परिवेश, कोन वातावरणसँ प्रभावित भ’ कए कोन कालमे आदिकथाक सोना मामी देवकान्त पर अनुरक्त होइ छथि, रुष्ट होइ छथि; कोन रीति रिवाजक कारणें कुलानन्द संगे रहबा लेल विवश होइ छथि, कोन कारणें हुनकासँ घृणा होइ छनि, कखन आ किऐ हफीम खा लै छथि, हरिनगरवाली पर किऐ तामस उठै छनि; आन्दोलनक नीलू कोन संस्कार आ सास्कृतिक अनदानक कारणें कोन समयमे कमलजीक स्वागत करै छथि, आदर करै छथि, प्रेम करए लगै छथि, सर्वस्व अर्पित करए चल जाइ छथि; कोन समयमे निर्मलाक शांतिगीतक प्रस्ताव अनर्गल साबित होइत अछि; कोन परिस्थितिमे आन्दोलनक सुशीला बनगाम बालीक शरणमे जाइ छथि; निर्मला भुवनजीक संग छोड़ि कमलजी दिश लपकै छथि... एहि समस्त प्रश्नक उत्तर देश-काल-वातावरणसँ देल जाइत अछि। कोनो घटना खास भौगोलिक परिवेशक खास परिस्थिति आ खास समयमे घटित भ’ कए अर्थवान अथवा अर्थहीन होइत अछि। कोनहुँ पात्राक मनोदशा अथवा क्रिया-कलाप स्थान-काल-पात्रा आ वातावरणक अनुसार स्थिर आ परिवत्र्तनशील होइत अछि। उपन्यासक कथाक्रममे एकर बड़ महत्व होइत अछि। से राजकमल चैधरीक एहि दुनू उपन्यासमे सहजतासँ रूपायित अछि। चित्राकलासँ राजकमल चैधरीकें बड़ बेसी अनुराग रहलनि अछि। कतोक बेर मित्रा लोकनिकें पत्रा लिखैत अपन किछु धारणा चित्रामे अभिव्यक्त केलनि अछि, किछु कविता, चित्राक संग लिखने छथि। इएह कारण थिक जे हुनकर कथा, कविता, उपन्यासमे कतोक ठाम पढ़बासँ बेसी कोनो मनोरम अथवा मार्मिक अथवा हृदय विदारक पेंटिंग देखबाक अनुभव होइत रहैत अछि, अर्थबहुल आ संकेतबहुल पेंटिंग देखबाक अनुभव -- शरदक पवित्रा आकाशमे श्वेत तनु चन्द्रमा उगल छल। कती राति बीतल होएत, किछु ज्ञात नहि। हमर मोन अपन गाम दिश भागि चलल। चरखा काटि कए गुजर करैबाली माइ, बदरिकाश्रम-केदारनाथ-अमरनाथ जएबाक मनोरथ जकर पूर नइं भ’ सकलइ... आ हम दू बेर सुमेरु पर्वत आ तिब्बतक अन्तिम सिमान धरि भ’ आएल छी। हमर अग्रज गामक हाई स्कूलमे गणितक अध्यापक छलाह... अपन पेट काटि कए हमरा एम.ए. पास करौलनि... गाममे महामारीक उत्पात भेल, टन्नसँ रहि गेलाह। आब विधवा भौजी छथि, सोन-सन हुनकर कन्या छनि आ चारू कात भूख, दरिद्रता, संक्रामक बीमारी सभक जाल पसरल अछि... भौजी हमरा संगें नइं रहै छथि, समाजक भयसँ... आ हम बिआह नइं करै छी... (आन्दोलन/पृ. 21)। एहि छोट सन स्थिति-चित्रामे उपन्यासकार कैक बर्खक समय, कैक मनोभाव आ स्वप्नखण्डक वितान, कैक मनोवृत्ति आ व्यवस्था-मर्यादा-दायित्वक बन्धन आ कैक विवशताक दारुण विडम्बनाकें जीवन्त क’ देने छथि। एतेक छोट चित्रामे विराट परिदृश्यक समावेश कोनो कलाकारक श्रेष्ठ कौशल आ गम्भीर जीवन-दृष्टिक परिचायक थिक। अहिना आदिकथा उपन्यासमे--अहाँ देवबाबूक संगें सुलतानगंजक जल-मन्दिर देख आउ। हम नइं जा सकब। कैकटा मोकदमाक कागज-पत्रा तैयार करबाक अछि...।...सुलतानगंजमे गंगाक बीच धारामे अछि प्रसिद्ध अजगैबीनाथ महादेवक प्राचीनतम मन्दिर।...भागिन आ मामी नाह किराया क’ कए मन्दिर पर अएलाह। भोरक आठ-नौ बजल हएत। सूर्यक किरण जाद्दवीक जल पर सतरंग चित्रा बना रहल छल।...अकारणे खिलखिलाइत, सुशीला पुछलथिन--महादेवसँ की वरदान मँगबैन?...की कहबैन? लाज किऐ होइ’ए...?...तावत तीन-चारि टा पण्डा हिनका सबकें धनीक कुलशीलक दम्पति बूझि कए संग भ’ गेलनि...(आदिकथा पृ. 44-46) ...स्थिति चित्राक एहि तरहक उत्कर्ष चमत्कृत करैत अछि। शब्द, कथन, आ वाक्यांशक अर्थ कैक परतमे कैक तरहक व्यंजना दैत रहैत अछि। सन्तुलित आ संयमित कौशलसँ देश-काल-वातावरणक चित्रांकन सर्वथा, सर्वदा कोनो रचनाकें विराट आ शाश्वत साबित करैत रहल अछि, से राजकमल चैधरीक हरेक रचनामे भेटैत अछि। वस्तुतः राजकमल चैधरी बहुविधावादी रचनाकार छथि। अंग्रेजी आ बांग्लामे त’ सब विधामे रचना नहि केलनि मुदा मैथिली आ हिन्दीमे ओ सब विध् ाामे रचना केलनि। विवेचक लोकनिमे बड़ बेसी विवाद अछि, किओ हुनका सफलतम कवि, किओ कथाकार, किओ उपन्यासकार, किओ निबन्धकार मानै छथि। हमरा जनैत, राजकमल चैधरीकें मूलतः कवि माननिहार लोकक धारणा ई रहैत हेतनि, जे हुनकर भाषा-शिल्प मूलतः कविताक शिल्प थिकनि। सम्पूर्ण गद्य, एते धरि जे डायरी आ पत्रा धरिमे कविताक लय भरल रहैत अछि। ई बात उल्लिखित समस्त उदाहरणहुँसँ प्रमाणित कएल जा सकैत अछि। छोट सन वाक्य खण्ड लिखि कए विराट व्यंजना दिश संकेत क’ दै छथि, आ तखनहिसँ पाठक/भावक दोहरी विचार-व्यवस्था संग वेगमयी जलधारामे बहैत चल जाइत अछि। जखनहि पाठक--भौजी (विधवा) हमरासंगें नहि रहै छथि, समाजक भयसँ...अथवा...महादेवसँ की...कहबैन?लाज किऐ होइए...? ... सन उद्धरण देखै छथि, एक टा कथा ओ पढ़ैत रहै छथि, आ एक टा कथा हुनका भीतर सेहो जनमैत जाइत अछि। दू कथाधाराक विकास एक संग होइत जाइत अछि, कखनहुँ समानान्तर, कखनहुँ ओझराइत, कखनहुँ स्पष्ट होइ...राजकमल चैधरीक गद्यक ई विशेष छटा थिक। मानव जीवनक पारस्परिक सम्बन्धक विचार, भावना, आवेग, प्रेरणा आदिकें अभिव्यक्ति दै वला महत्वपूर्ण विधा, आ महत्वपूर्ण रचनामे तकर उपयोग करैत गेल छथि। मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन: उदाहरण पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै’छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन् 2005) आ सन् 2007मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन् 2007) पाठकक बीच लोकप्रिय भ’ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क’ आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि। उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकत्र्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चैधरीक कथा ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह। पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ‘भए प्रकट कृपाला’ साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्रा पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ‘पेज थ्री’ जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकें बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीकें कथामे कलात्मक ढंगसँ एकेरल गेल अछि। काॅरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्राकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ’ जाउ। लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक छथि। हुनकर कथा ‘विधिक विधान’मे कामकाजी स्त्राीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ‘त्यागपत्रा’मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकें व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ’ सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा काॅलेजमे पढ़’ चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर’ चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकें ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ‘और भी ग़म हैं’ कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकंे विस्तृत आयाम नहि द’ पबैत अछि। मनमोहन झाक कया ‘फयदा’मे स्त्राी जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क’ स्त्राी जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्राी चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि। स्त्राी चेतनाक दृष्टिएं प्रदीप बिहारीक कथा ‘मकड़ी’ अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क’ ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल’ क’ अपन व्यक्तित्वकें विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क’ क’ भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ‘पेंपी’ पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकें करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्राी पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ’ सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ‘भोजन’ कथाक बहन्ने स्त्राीक बाहर काज करबाक विरोध क’ जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क’ ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि। राजकमल चैधरीक ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’, धूमकेतुक ‘भरदुतिया’, गंगेश गुंजनक ‘अपन समांग’(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ आ अशोकक ‘तानपूरा’ एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ‘भरदुतिया’ व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिक दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकंे नहि छोड़लक। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थित बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्राण देब छल। आओर नइं किछु त’ आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवासँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहुल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकें लक्षित केलनि अछि। ‘पन्द्रह अगस्त सन्तानबे’ कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त’ ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ’ गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त’ ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नइं कहिए जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...।’’ अशोकक कथा ‘तानपूरा’ मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकें तार-तार क’ देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकें हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद््रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त’ दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स’ख हुनक बेटाकें रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ’ पुत्राक एहि अव्यावहारिक स’ख’क केठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि। संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क’ रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ’ गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडै़छ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, त’ एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क’ रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमे पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ‘नागदेसमे अयनाक व्यवसाय’मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त’ केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकें राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकें पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकें तोड़ियो क’ यथार्थ बनल रहल अछि। मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ’ रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकें पढ़ि आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकें महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकें सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्रा-पत्रिकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्राीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ‘चितकबड़ी इजोरिया’ आ ‘रूपांतर’ कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ‘नेपथ्य अभिनेता’ आ ‘जहां पमन को गमन नहीं’ आदि लीकसँ हटि क’ लिखल गेल कथा थिक। ‘उदाहरण’मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकें पूरा करैत अछि हुनकर चैदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि। कमलानन्द झा हिन्दी विभाग सी.एम. काॅलेज दरभंगा फोन-09431857789 06272-256343 पुस्तकक नाम - उदाहरण सम्पादक - देवशंकर नवीन प्रकाशक - प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मन्त्रालय भारत सरकार पृष्ठ - 274 मूल्य - 200 टाका मात्रा देवशंकर नवीन ए-2/198, फेज-5, आयानगर एक्सटेंशन, नई दिल्ली 110047 अदद्दी पेनेनकें मजगुतुत करबाक आवश्यकता मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत तकैत दूर धरि नजरि जाइत अछि, सबसँ पहिने देखाइत अछि जे उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक, गम्भीर चिन्तन-मनन करबाक, छोट-सँ-छोट बात पर पर्याप्त विचार-विमर्श करैत निर्णय लेबाक प्रथा मिथिलामे पुरातन कालसँ अबैत रहैत रहल अछि। मुदा तकर अतिरिक्त ‘परसुख देबामे परमसुख’क आनन्द लेबाक आ जीवनक हरेक आचार एवं आचरणमे लयाश्रित रहबाक अभ्यास मैथिल जनकें निकेनाँ रहलनि अछि। स्वयं कष्ट सहिओ क’, अपन सब किछु गमाइओ क’, दोसरकें अधिकसँ अधिक प्रसन्नता देबाक आदति मिथिलामे बड़ पुरान अछि। प्रायः इएह कारण थिक जे अतिथि सत्कारमे मिथिलाक लोक अपना घरक थाड़ी-लोटा धरि बन्हकी राखि देलनि। दोसरकें सम्मान देबामे मैथिल नागरिक बढ़ि-चढ़ि कए आगू रहल अछि। भनसियाक काज कर’बला व्यक्तिकें महराज अथवा महराजिन, केस-नह-दाढ़ी-मोंछ साफ कर’बला व्यक्तिकें ठाकुर-ठकुराइन, घर-आँगनमे नौरी-बहिकिरनी आ सोइरी घ’रमे परसौतीक काज करबाब’वाली स्त्राीकें दाय कहि क’ सम्बोधित करबाक प्रथा मिथिलामे एहने धारणासँ रहल होएत। ध्यान देबाक थिक जे मिथिलामे दादीकें, जेठ बहिनकें आ घ’रक अत्यधिक दुलारि बेटीकें दाय कहबाक परम्परा अछि। अध्ययन, चिन्तन, मननक प्रथा मिथिलामे बड़ पुरान अछि। मुदा ई सत्य थिक जे अशिक्षेक कारणें मिथिला एतेक पछुआएलो रहल। गनल गूथल जे व्यक्ति अध्ययनशील भेलाह, से अत्यधिक पढ़लनि, जे नहि पढ़ि सकल, से अपन रोजी-रोटीमे लागल रहल। रोजी-रोटीक एक मात्रा आधार कृषि छल। विद्वान लोकनिक गम्भीर बहसमे बैसबाक अथवा ओहिमे हिस्सा लेबाक तर्कशक्ति, बोध-सामथ्र्य, आ पलखति रहै नहि छलनि, तें जे उपदेश देल जाइन, तकरा आर्ष वाक्य मानि अपन जीवन-यापनमे मैथिल लोकनि तल्लीन रहै छलाह। ईश भक्तिक प्रथा अहू कारणें मिथिलामे दृढ़ भेल। मानव सभ्यताक इतिहास कहै’ए जे प्रकृति-पूजन, नदी-पहाड़-भूमि-वृक्ष-पशु आदिक पूजन एहि करणें शुरुह भेल जे प्रारम्भिक कालमे जीवन-रक्षाक आधार इएह होइत छल। लोक अनुमान लगौलक जे सृष्टिक कारण, स्त्राी-पुरुषक जननांग थिक, तें ओ लिंग पूजा आ योनि-पूजा शुरुह केलक, जे बादमे शिवलिंग आ कामयोनि पूजाक रूपमे प्रचलित भेल। बादमे औजार पूजन होअए लागल।... तें पूजा पाठमे लीन हेबाक प्रथा पुरान अछि। मिथिलामे ओहि समस्त पूजन-पद्धतिक अनुपालन तँ होइते रहल; पितर पूजा, ग्रामदेव पूजा, ऋतु पूजा, फसल पूजा, कुलदेव-देवी पूजा आदिक प्रथा बढ़ल। हमरा जनैत विद्वान लोकनि द्वारा ईश भक्तिक उपदेश एहि लेल देल जाइत रहल हएत जे ईश भक्तिमे लागल लोक धर्म-भयसँ सदाचार अनुपालनमे लागल रहत, सद्वृत्तिमे लीन रहत, सामाजिक मर्यादाक ध्यान राखत, भुजबल-धनबलक मदमे निर्बल-निर्धन पर अत्याचार नहि करत।...लक्ष्यपूर्ति त’ नहिएँ भेल, उनटे लोक धर्मभीरु, पाखण्डी अन्धविश्वासी आ निरन्तर लोभी, स्वार्थी, अत्याचारी होइत गेल, परिणामस्वरूप आजुक मैथिल-प्रवृत्ति हमरा सभक सोझाँ अछि। कृषि जीवनसँ समाजक कौटुम्बिक बन्हन एते मजगुत छल, जे भूमिहीनो व्यक्ति सम्पूर्ण किसानक दर्जा पबै छल। हरेक गाममे सब वृत्तिक लोक रहै छल। डोम, चमार, नौआ, कुमार, गुआर, धोबि, कुम्हार, कोइरी, बाह्मण, क्षत्राी... आदि समस्त जातिक उपस्थितिसँ गाम पूरा होइ छल। जमीन्दार लोकनि समस्त भूमिहीनकें जागीर दै छलाह, बाह्मण पुरहिताइ करै छलाह, नौआ केश कटै छलाह; कुमार ह’र-फार, चैकी केबाड़ बनबै छलाह; धोबि कपड़ा-बस्तर धोइ छलाह...। सम्पूर्ण समाज एक परिवार जकाँ चलै छल। सब एक दोसरा लेल जीबै छलाह, सब गोटए किसान छलाह, कृषि-सभ्यतामे मस्त छलाह। सिरपंचमी दिनक ह’र-पूजा हो; दसमी, दीया-बाती, सामा-चकेबाक उत्सव हो; मूड़न-उपनयन-विवाह-श्राद्ध हो; छठि अथवा फगुआ हो... बिना सर्वजातीय, सर्ववृत्तीय लोकक सहभाग नेने कोनो काज पूर नहि होइ छल। एहिमेसँ बहुत बात तँ एखनहुँ बाँचल अछि, होइत अछि ओहिना, ओकर ध्येय कतहु लुप्त भ’ गेल अछि। मिथिलाक विवाहमे एखनहुँ जा धरि नौआ ब’रक कानमे हुनकर खानदान लेल गारि नहि देताह (परिहास लेल); धोबिन अपना केस संगें कनियाँक केस धो क’ सोहाग नहि देतीह, विवाह पूर्ण नहि मानल जाइत अछि। ध्यान देबाक थिक जे एहि तरहें ओहि नौआकें कन्याक पिता आ धोबिनकें कन्याक माइक ओहदा देल जाइत अछि। मिथिलाक छठि पाबनि तँ अद्भुत रूपें सम्पूर्ण विरासतक रक्षा क’ रहल अछि। नदीमे ठाढ़ भ’ कए सूर्यकें अर्घ देबाक ई प्रथा जाति-धर्म समभावक सुरक्षा एना केने अछि जे समाजक कोनहुँ वर्गक सहभागक बिना ई पाबनि पूर्ण नहि होएत। नेत अइ स’ब टामे एकता आ समानताक सूत्रा स्थापित रखबाक रहैत छल। ई कलंक स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिलाक स्वाधीन मानवक नाम अथवा वैज्ञानिक विकास, बौद्धिक उन्नति, औद्योगिक प्रगतिक माथ जाइत अछि, जे समस्त विकासक अछैत मानव-मनमे लोभ-द्रोह, अहंकार एहि तरहें भरलक छूआछूत, जाति-द्वेष, शोषण-उत्पीड़न बढ़ैत गेल; आ आइ मिथिला-समाज, जे त्याग, बलिदान, प्रेम, सौहार्द लेल ख्यात छल, सामाकि रूपें खण्ड-खण्ड भेल अछि। पैघसँ पैघ आपदा, विभीषिका ओकरा एक ठाँ आनि कए, एकमत नहि क’ पबै’ए। मिथलाक उदारता आ सामाजिकता ई छल जे ककरो बाड़ी-झारीमे अथवा लत्ती-फत्तीमे अथवा कलम-गाछीमे नव साग-पात, तर-तरकारी, फूल-फल होइ छल तँ सभसँ पहिने ग्रामदेवक थान पर आ पड़ोसियाक आँगनमे पहुँचाओल जाइ छल; कोनो फसिल तैयार भेलाक बाद आगों-राशि कोनो परगोत्राीकें देल जाइ छल; खेतमे फसिल कटबा काल खेतक हरेक टुकड़ीमे एक अंश रखबारकें देल जाइ छल...ई समस्त बात सामाजिक सम्बन्ध-बन्धक मजगूतीक उदाहरण छल। कोनो स’र-कुटुमक ओतएसँ कोनो वस्तु सनेसमे आबए, तँ ओ सौंसे टोलमे लोक बिलहै छल।...कहबा लेल कहि सकै छी जे ई मैथिलजनक जीवनक नाटकीयता आ प्रशंसा हेतु लोलुपता रहल होएत... मुदा तकर अछैत एहि पद्धति आ परम्पराक श्रेष्ठता आ सामाजिक मूल्य हेतु एकर आवश्यकतासँ मुँह नहि मोड़ल जा सकैत अछि। गाममे कोनो बेटीक दुरागसनक दिन तय होइ छल, तँ बेटीक सासुरसँ आएल मिठाइ भरि गाममे बिलहल जाइ छल। तात्पर्य ई होइ छल जे भरि गामक लोक बूझि जाए, जे ई बेटी आब अइ गामसँ चल जाएत। ओहि बेटीकें भरि गामक लोक धन-वित्त-जातिसँ परे, ओहि बेटीकें अपना घ’रमे एक साँझ भोजन करबै छल। सब किछुक लक्ष्यार्थ गुप्त रहै छल। एकर अर्थ ई छल, जे सम्पूर्ण गाम अपन-अपन थाड़ी-पीढ़ी देखा कए ओहि बेटीक विवेककंे उद्बुद्ध करै छल जे बेटी! आब तों ई गाम, ई कुल-वंश छोड़ि आन ठाम जा रहल छह, हमरा लोकनि अपन शील-संस्कृतिक ज्ञान तोरा देलियहु, सासुर जा कए, ओतुक्का शील-संस्कार देखि कए अपन विवेकसँ चलिह’, आ अपन गाम, अपन कुल-शीलक प्रतिष्ठा बढ़बिह’। इएह कारण थिक जे पहिने कोनो बेटीक दुरागमनक दिन पैघ अन्तराल द’ कए तय होइ छल। मुदा आब ई रिवाज एकटा औपचारिकता बनि कए रहि गेल अछि; गामक बेटीकें अपन बेटी मानिते के अछि? मिथिलामे कोनो स्त्राी संगें भैंसुर आ ममिया ससुरक वार्तालाप, भेंट-घाँट वर्जित रहल अछि, एते धरि जे दुनूमे छूआछूतक प्रथा अछि। आधुनिक सभ्यताक लोक एकरा पाखण्ड घोषित केलनि। परिस्थिति बदलै छै, त’ मान्यताक सन्दर्भ बदलि जाइ छै, से भिन्न बात; मुदा एहि प्रथाकें पाखण्ड कहनिहार लोककें ई बुझबाक थिक जे ई प्रथा एहि लेल छल, जे एहि दुनू सम्बन्धमे समवयस्की हेबाक सम्भावना बेसी काल रहै छल। संयुक्त परिवारक प्रथा छल, कखनहुँ कोनो अघट घटि सकै छल। ई वर्जना एकटा शिष्टाचार निर्वहरण हेतु पैघ आधार छल। प्रायः इएह कारण थिक जे विवाह कालमे घोघट देबा लेल प्राथमिक अधिकार अही दुनू सम्बन्धीय व्यक्तिकें देल जाइ छनि। जाहि स्त्राीकें केओ भैंसुर अथवा ममिया ससुर नहि छनि, हुनकहि टा ससुर स्थानीय कोनो आन व्यक्ति घोघट दै छनि। घोघट देबाक प्रक्रियामे कतेक नैतिक बन्हन रहैत अछि, से देखू, जे सकल समाजक समक्ष भैंसुर, नव विवाहित भावहुक उघार माथकें नव नूआसँ झाँपै छथि आ बगलमे ठाढ़ ब’र ओहि नूआकें घीचिकए माथ उघारि दैत अछि, ई प्रक्रिया तीन बेर होइत अछि, अन्तिम बेर माथ झाँपले राखल जाइत अछि। अर्थात्, सकल समाजक सम्मुख ओ व्यक्ति प्रतिज्ञा करैत अछि--हे शुभे! हम, तोहर भैंसुर (ससुर) प्रण लैत छी, जे जीवन पर्यन्त तोहर लाजक रक्षा करब! एते धरि जे अग्नि, आकाश, धरती, पवनकें साक्षी राखि जे व्यक्ति तोरा संग विवाह केलकहु अछि, सेहो जखन तोहर लाज पर आक्रमण करतहु, हम तोहर रक्षा लेल तैयार रहब! अही तरहें उपनयनमे आचार्य, बह्मा, केस नेनिहारि, भीख देनिहारि, डोम, चमार, नौआ, धोबि, कमार, कुम्हार आदिक भागीदारी; आ एहने कोनो आन उत्सव, संस्कारमे सामूहिक भागीदारी सामाजिक अनुबन्धक तार्किक आधार देखबैत अछि। कहबी अछि जे मैथिल भोजन भट्ट होइ छथि। अइ कहबीक त’हमे जाइ तँ ओतहु एकर सांस्कृतिक, पारम्परकि सूत्रा भेटल। मिथिलाक स्त्राी, खाहे ओ कोनहु जाति-वर्गक होथि, तीक्ष्ण प्रतिभाक स्वामिनी होइत रहल छथि। मुदा परदा प्रथाक कारणें हुनकर पैर भनसा घरसँ ल’ क’ अँगनाक डेरही धरि बान्हल रहै छलनि। अधिकांश समय भनसे घरमे बितब’ पड़नि। सृजनशील प्रतिभा निश्चिन्त बैस’ नहि दैन। की करितथि! भोजनक विन्यासमे अपन समय आ प्रतिभा लगब’ लगलथि। आइयो भोजनक जतेक विन्यास, तीमन-तरकारीक जतेक कोटि, चटनी आ अचारक जेतक विधान मिथिलामे अछि, हमरा जनैत देशक कोनहुँ आन भागमे नहि होएत। वनस्पतिजन्य औषधिकें सुस्वादु भोजन बनएबाक प्रथा सेहो मिथिलामे सर्वाधिक अछि।... आब जखन एते प्रकारक भोजन ओ बनौलनि, तँ उपयोग कतए हैत?... घरक पुरुष वर्गकें खोआओल जाएत। सर्वदा एहिना होइत रहल अछि, जे कोनो क्रियाक विकृति प्रचारित भ’ जाइत अछि, मूल तत्व गौण रहि जाइत अछि। मैथिल पेटू होइत अछि, से सब जनै’ए, मुदा मिथिलाक स्त्राीमे विलक्षण सृजनशीलता रहलैक अछि, से बात कम प्रचारित अछि। जे स्त्राी कामकाजी होइ छलीह, खेत-पथार जा कए शरीर श्रम करै छलीह, गामक बाबू बबुआनक घर-आँगन नीपै, लेबै छलीह, तिनकहु कलात्मक कौशल हुनका लोकनिक काजमे देखाइ छल। स्त्राी जातिक कला-कौशलक मनोविज्ञानक उत्कर्ष तँ एना देखाइ अछि जे हुनका लोकनिक उछाह-उल्लास धरिमे जीवन-यापनक आधार आ घर-परिवारक मंगलकामना गुम्फित रहै छल। जट-जटिन लोक नाटिका विशुद्ध रूपसँ कृषि कर्मक आयोजन थिक, जे अनावृष्टिक आशंकामे मेघक आवाहन लेल होइ छल, होइत अछि; सामा भसेबा काल गाओल जाइबला गीतमे सब स्त्राी अपन पारिवारिक पुरुष पात्राक स्वास्थ्यक कामना करै छथि; विवाह उपनयनमे अपरिहार्य रूपें वृक्ष पूजा (आम, महु), नदी पूजा, प्रकृति पूजा आदि करै छथि। विभिन्न वृत्तिक लोकक अधिकार क्षेत्रा पर नजरि दी, तँ नौआ, कमार, कुम्हार, डोम, धोबि... सबहक स्वामित्व निर्धारित रहैत आएल अछि। जाहि गाम अथवा टोल पर जिनकर स्वामित्व छनि, हुनकर अनुमतिक बिना केओ दोसर प्रवेश नहि क’ सकै छलाह। ई लोकनि आपसी समझौतासँ अथवा निलामीसँ गामक खरीद-बिक्री करै छलाह। एहि व्यवहारमे जजमानक कोनो भूमिका अथवा दखल नहि होइ छल। हस्तकलाक कुटीर उद्योग एतेक सम्पन्न छल, जे सामाजिक व्यवस्थामे सब एक दोसरा पर आश्रित छल। सूप, कोनियाँ, पथिया, बखाड़ी, घैल, छाँछी, सरबा, पुरहर, मौनी, पौती, जनौ, चरखा, लदहा, बरहा, गरदामी, मुखारी, उघैन, कराम, खाट, सीक, अरिपन... सब किछु लुप्तप्राय भ’ गेल। एते धरि जे ई शब्द आ क्रिया अपरिचित भेल जा रहल अछि। ढोनि केनाइ, भौरी केनाइ, केन केनाइ, पस’र चरेनाइ, झिल्हैर खेलेनाइ सन क्रिया, आ सुठौरा, हरीस, लागन, बरेन, जोती, कनेल, पालो, चास, समार, फेरा, पचोटा, ढोसि, करीन सन शब्द आब आधुनिक साहित्योमे कमे काल अबै’ए। मिथिलाक एहेन विलक्षण विरासत--कला, संस्कृति आ जीवन-यापन पद्धतिक उत्कृष्ट उदाहरण सम्भावनाविहीन भविष्यक कारणें आ सामाजिक कटुताक कारणें हेराएल जा रहल अछि। नवीन शिक्षा पद्धतिसँ सामाजिक जागृति बढ़ल, मुदा ओहि जागृतिक समक्ष ठढ़ भेल वैज्ञानिक विकास आ आर्थिक उदारीकरणक प्रभावमे अहंकारग्रस्त समृद्ध लोकक लोलुपता आ क्षुद्र वृत्ति। संघर्ष जायज छल। अपन पारम्परिक वृत्ति आ हस्तकलामे, पुश्तैनी पेशामे लोककें अपन भविष्य सुरक्षित नहि देखेलै। ‘रंग उड़ल मुरूत’ कथामे मायानन्द मिश्र आ ‘रमजानी’ कथामे ललित मिथिलाक परम्परा पर आघात देखा चुकल छथि।... ख’ढ़क घर आब होइत नहि अछि, घरामीक वृत्ति एहिना चल गेल। सीक’क प्रयोजन, खाटक प्रयोजन समाप्त भ’ गेल, बचल-खुचल माल-जाल लेल नाथ-गरदामी आब प्लास्टिकक बनल-बनाएल डोरिसँ होअए लागल, बच्चाक खेलौना प्लास्टिकक होअए लागल। नौआ, कमार, धोबि, डोमक जागीर आपस लेल जा लागल। ओ लोकनि अपन पुश्तैनी पेशा छोड़ि आन-आन नोकरी चाकरीमे जाए लगलाह। स्त्राी जाति आब भानस करबा लेल किताब पढ़ए लगलीह, फास्ट फूड खएबाक प्रथा विकसित भेल। मिथिला पेंटिंगकें आफसेट मशीन पर छपबा कए पूँजीपति लोकनि री-प्रोडक्शन बेच’ लगलाह। जट-जटिन आ सामा-चकेबाक खेलक विडियोग्राफी देखाओल जाए लागल। गोनू झा, राजा सलहेस, नैका बनिजारा, कारू खिरहरि, लोरिकाइनि आदिक कथा छपा कए बिक्री होअए लागल, टेप पर रेकाॅर्ड क’ कए, अथवा सी.डी.मे तैयार क’ कए, री-मिक्ससँ ओकर मौलिकतामे फेंट-फाँट क’ कए लाक सुन’ लागल, आ एकरा अपन बड़का उपलब्धि घोषित कर’ लागल। ... अर्थात् जे लोककला लोकजीवनक संग विकसित आ परिवर्द्धित होइ छल, तकर अभिलेखनसँ (डकुमेण्टेशन) ओकरा स्थिर कएल जा लागल। लोकजीवनक संग अविरल प्रवाहित रहैबाली सांस्कृतिक-धारा आब अभिलेखागारमे बन्द रहत, ओकर विकासक सम्भावना स्थगित रहत। अइ समस्त वृत्तिमे जुड़ल लोककें सम्मानित जीवन जीबै जोगर वृत्ति द’ कए एकर विकासमान प्रक्रियाकें आओर तीव्र करबाक आवश्यकता छलै, मुदा जखन मिथिलाक लोके ओ ‘लोक’ नहि रहि गेल अछि, तखन लोक-संस्कृति आ लोक-परम्पराक रक्षा के करत? (समाप्त) कथा- फानी-श्रीधरम पंच  सभ एकाएकी कारी मड़रक दुअरा पर जमा हुअ’ लागलछल । दलान पर चटाइ बिछा देल गेल रहै । देबालक खोधली मे राखल डिबिया धुआँ बोकरि रहल छल । मात्र रामअधीन नेताक अयबाक देरी रहै  बिना रामअधीन नेताक पंचैती कोना शुरु भ’ सकैए? डोमन पाँच दिन पहिनहि सँ पंच सभक घूर-धुआँ मे लागल छल । डोमन चाहैत रहए जे सभ जातिक पँच आबय, मुदा रामअधीन नेता मना क’ देने रहै, “बाभन-ताभन केँ बजेबेँ तँ हम नइँ पँचैती मे रहबौ जातिनामा पँचैती जातिए मे होना चाही ।“ डोमन केँ नेताजीक बात काटबाक साहस नइँ भेलै । रामअधीन आब कोनो एम्हर-ओम्हर वला नेता नइँ रहलै, दलित पाटीक प्रखंड अध्यक्ष छिऐ । थानाक बड़ाबाबू, सीओ, बीडीओ, इसडीओ सभ टा चिन्है छै । कुसी पर बैसाक’ कनफुसकी करै छै । मुसहरी टोलक बिरधापेंशनवला कागज-पत्तर सेहो आब नेतेजी पास करबै छै । कोन हाकिम कतेक घूस लै छै, से सभ टा रामअधीन नेता केँ बूझल छै । कारी मड़र तँ नामे टाक माइनजन, असली माइनजन तँ आब रामअधीने नेता किने? डोमन पँच सभ केँ चटाइ पर बैसा रहल छल आ सोमन माथा-हाथ देने खाम्ह मे ओङठल, जेना किछु हरा गेल होइ । टील भरिक मौगी सभ कारी मड़रक अँगना मे घोदिया गेल रहै—सोमन आ डोमनक भैयारी-बँटवारा देख’ लेल । ओना दुनू भाइक झगड़ा आब पुरना गेल रहै । मौगी सभक कुकुर-कटाउझ सँ टोल भरिक लोक आजिज भ’ ग्र्ल रहय तेँ रामअधीन नेता डोमन केँ तार द’क’ दिल्ली सँ बजबौलकै । सभ दिनक हर-हर खट-खट सँ नीक बाँट-बखरा भइए जाय । झगड़ाक जड़ि सीलिंग मे भेटलाहा वैह दसकठबा खेत छिऐ जे सोमनक बापे केँ भेटल रहै । रामअधीन नेताक खेतक आरिये लागल दसकठबा खेत । कैक बेर रामअधीन नेता, सोमनक बाप पँचू सदाय केँ कहने रहै जे हमरे हाथेँ खेत बेचि लैह, मुदा पँचू सदाय नठि गेल  रहै । रामअधीन नेता आशा लहौने रहए जे बेटीक बियाह मे खेत भरना राखहि पड़तनि, मुदा पँचू सदाय आशा पर पानि फेर देने छलै । एकहक टा पाइ जोगाक’ बेटीक बियाह सम्हारि लेलक तेँ खेत नइँ  भरना लगेलक । मरै सँ चारि दिन पहिनहि पँचू सदाय सोमन आ डोमन केँ खेतक पर्ची दैत कहने रहै,”ई पर्ची सरकारक देल छिऐ, जोगाक’ रखिहेँ बौआ, बोहबिहेँ । नइँ । दस कट्ठा केँ बिगहा बनबिहेँ, भरि पेट खाइत देखिक’ सभकेँ फट्टै छनि । बगुला जकाँ टकध्यान लगेने रहैए ।“ डोमन बापक मुइलाक बाद परदेश मे कमाय लागल रहय आ सोमन गामे मे अपन खेतीक संग-सग मजूरी । फसिलक अधहा डोमनक बहु रेवाड़ीवाली केँ बाँटि दैक । मुदा, जेठकीसियादिनी महरैलवाली केँ ईबड्ड अनसोहाँत लागै, “मर्र, ई कोन बात भेलै, पसेना चुवाबै हमर साँय, चास लगाब’ बेर मे सभ निपत्ता आ बखरा लेब’ बेर गिरथाइन बनि जायत । लोकक साँय बलू गमकौआ तेल-साबुन डिल्ली से भेजै हय त’ हम कि हमर धीया-पुत्ता आरु सुङहैयो ले’ जाइ हय् ।“ सभ दिन कने-मने टोना-टनी दुनू दियादिनी मे होइते रहै । मुदा, ओहि दिन जे भेलै... सोमन गहूँम दौन क’ क’ दू टा कूड़ी लगा देलक आ नहाय ले’ चलि गेल । गहूमक सऊँग देह मे गड़ैत रहै । रेवाड़ीवाली अपन हिस्सा गहूम पथिया मे उठाब’ लागल रहए कि देखते जेना महौलवाली केँ सौंसे देह मे फोँका दड़रि देलकै, “रोइयोँ नइँ सिहरै हय जेना अपने मरदबाक उपजायल होइ ।” रेवाड़ीवाली कोना चुप रहितय ? कोनो कि खेराअँत लै छै? झट द’ जवाब देलकै, “कोनो रंडियाक जिरात नइँ बाँटै हय कोइ अधहाक मालिक छिऐ छाती पर चढ़िक बाँटि लेबै।” ’रंडिया’ शब्दा महीरैलवालीक छाती मे दुकैम जकाँ धँसि गेलै-“बरबनाचो...के लाज होइ हय बजैत साँय मुट्ठा भेजै हय आइँठ-कुइठ धोइ क’ आ एत’ ई मौगी थिराएल महिंस जकाँ टोले-टोल डिरियायल फिरै हय, से बपचो...हमरा लग गाल बजाओत।“ सुनिते रेवाड़ीवालोक देह मे जेना जुरपित्ती उठि गेलै ओ हाथ चमकबैत महरैलवालीक मुँह लग । चलि गेल, “ऐ गै धोँछिया निरासी! तूँ बड़ सतबरती गै! हे गै उखैल क’ राखि देबौ गै । भरि-भरि राति सुरजा कम्पोटर पानि चढ़ा-चढ़ा क’ बेटीक ढीढ़ खसेलकौ से ककरा स’ नुकायल हौ गै? कोना बलू फटा-फटि बेटीक ’दीन क’ ससुरा भेज देलही।” बेटीक नाम सुनिते महरैलवालीक तामस जवाब द’ देलकै झोँ टा पकड़िक’ रेवाड़ीवाली केँ खसा देलक । दुनू एकदोसराक झोँ ट पकड़ने गुत्थम-गुत्थी भेल । ओम्हर सँ सोमनक बेटा गँगवा हहासल-फुहासल आयल आ  मुक्के-म्य्क्की रेवड़ीवाली केँ पेटे ताके मार’ लागल । रेवाड़ीवाली एसगर आ एमहर दू माइ-पूत । कतेक काल धरि ठठितया, ओ बपहारि काट’ लागल । टोल पड़ोसक लोक सभ जमा भ’ गेल रहै, दुनू केँ डाँटि-दबाड़ि क’ कात कयलक । दुनू दियादिनीक माथक अधहा केस हाथ मे आबि गेल रहै । ओहि राति रेवाड़ीवालीक पेट ने तेहन ने दरद उखड़लै जे सुरज कम्पोटर पानि चध्आ क’ थाकि गेलै, मुदा नइँ सम्हरेलै । चारिये मासक तँ भेल रहै, नोकसान भ’ गेलै । बेहोसियो मे रेवाड़वाली गरियबिते रहलै, “ईडनियाही हमरा बच्चा केँ खा गेल । सोचै हय कहुना निर्वश भ’ जाय जे सभ टा सम्पैत हड़पि ली । डनियाहीक बेटा मरतै । धतिंगबाक हाथ मे लुल्ही-करौआ धरतै । काटल गाछ जकाँ अर्रा जेतै...। ” दिसरे दिन रेवाड़ईवाली थाना दौगल जाइत रहे, रिपोट लिखाव’ । रस्ता सँ रामअधीन नेता घुरेने रहै, “समाजे मे पँचैती भ’ जैतौ” आ नेताजी सोमन केँ मार’-मास्क छूटल रहै, “रौ बहि सोमना । मौगी केँ पाँज मे राखबेँ से नै । आइए सरबे सब परानी जहल मे चक्की पिसैत रहित’ । मडर केस भ’ जइतौ । सरबे हाइकोट तक जमानति नहि होइत ।” सोमन बीतर धरि काँपि उठल रहय । नहि जानि पँचैती मे की सभ हेतै । एक मोन भेलै, जाय आ पटुआ जकाँमहरैलवाली केँ डंगा दैक । ’ई, छिनरी के हरदम फसादे वेसाहैत रहैए ।’ रामअधीन नेताक अबिते पँचैतीक करबाइ शुरु भ’ गेलै । फौदारक चीलम सँ निकलैत धुँआक टुकड़ी किछु दूर उपर उठि बिला जाइत रहे गंधक माध्यम सँ अपन उपस्थितिक आभास दैत एअहय । “हँ त’ डोमन किऐ बैसेलही हेँ पँचैती, से पँच केँ कहबिही किने” रामअधीन नेता बाजल । डोमन ठाढ़ होइत बाजल, “हम परदेस कामाइ छिऐ । रेवाड़ीवाले एत’ एसगर रहै हय । पँचू सदाय बलू भैयाक बाप रहै त’ हमरो बाप रहै । हमहुँ पँचूए सदायक बुन्न स’ जनमल छिऐ आ बोए केँ सरकार जमीन देने रहै महंथ स’ छीनिक । अइ जमीन पर जतने अधिकार एकर हइ ओतने हमरो हय । तहन जे स’ब मिलि क’ रेवाड़ीवालीक गँजन केलकै, तकर निसाफ पँच आरु क’ दइ जाउ । हमरा आर कुछो नइँ कहनाइ हय ।“ सब चुप...फेर नेतेजी सोमन केँ टोकलके, “की रौ । तोहर की कहनाम छौ?” “आब हम बलू की कहबै ? जे भ’ गेलै से त’ घुरिक नइँ एतै ग’ । समाज आरूक बीच मे छिऐ । जते जुत्ता मारै केँ हइ, मारि लौ । दुनू मौगी रोसाएल रहै, तहन त’ बलू ओकर नोकसान भ’ गेलै तेँ ओकर दिख त लोक नइँ देतै । तहन जे भ’ गेलै से भ’ गेलै । पंच आरू मिलिक’ बाँट-बखरा क’ दौ । खेतो केँ आ घरो केँ । झगड़े समापत भ’ हेतै ।” “रौ बहिं सिमना, बात केँ लसियबही नइँ । तहन त’ अहिना ककरो कियो खून क’ देतै आ समाज मुँह देखैत रहतै । कोना बभना आरू पुक्की मारै जाइ हइ से तूँ सभ की जान’ गेलही । परसू बेलौक पर सार मुखिया हमरा देखि-देखिक’ हँसैत रहय, चुटकी लैत रहय, “की हौ रामअधीन! जहन टोले नइँ सम्हरै छ’ त’ बिधायक बनलाक बाद पूरा एलाका कोना सम्हरतह? सुनै छिय’ एहि बेर टिकट तोरे भेटत’ । चल’ अइहबा मे पार लागिऐ जेत’।...” नेताजी गुम्हरल, “टिकटेक नाम सुनिक’ सार सब केँ झरकै छनि, आगू की सभ जरतनि?” रामअधीन नेता एक बेर मोँ छ केँ चुटकी सँ मीड़ि उपर उठेक फेर आक्रामक मुद्रा बनबैत बाजल, “सुनि ले बहिं, से सभ नइँहेतौ । गलती दुनू के छौ । पाँच-पाँच हजार दुनू केँ जुर्बाना देम’ पड़तौ, जातिनाम खाता मे।”  नेताजीस्वाभाविक गति सँ पुन: एक बेर मोंछक लोली केँ चुटकी पर चढ़बैत मड़र कका दिस देखलनि, “की हौ मरड़ कका बजैत किऐ ने छहक?” मड़र कका बदहा जकाँ मूड़ी डोला देलकै । डोमन भाइ सँ बदला लैक धुन मे एखन धरि गुम्हरि रहल छल, मुदा नेताजीक बात सुनिते झमान भ’ खसल । एक मोन भेलै, कहि दै—जे भेलै से भेलै भैयारी मे । नइँ करेबाक य’ पंचैती । ई किन बात भेलै ! हमरे बहु मारियो खेलक आ जुर्बान सेहो हमहीं दियौ, मुदा चुप रहल । डरें बाजल नइँ भेलै । डोमन केँ देखल छै जे रामअधीन नेता पंचैती नइँ माननिहार केँ कोना ताड़क गाछ मे बान्हिक’ पीटै छै । एखन धरि जुर्बाना वला पचासो हजार टाका जातिनाम खाता मे गेल हेतै, मुदा हिसाब? ककर बेटी बियेलैहेँ जे रामअधीन नेता सँ हिसाब माँगत! रामअधीन नेताक पी.ए. जकाँ हरदम संग रहनिहार मोहन सदाय बाजि उठल, “की रौ सोमना, हम दुनू भाइ स’ पुछै छियो; कहिया तक पाइ जमा क’ देमही ? एक सप्ताह स’ बेसीक टेम नइँ देल जेतौ । अहि पाइ स’ कोनो छिनरपन नइँ हतै, सारबजनिक काम हेतै । दीना-भदरीक गहबर बनतै ।” “कतौ स’ चोरी कए क’ त’ नइँ आनबै हमर हालति बलू ककरो स’ नुकाएल त’ नइँ हय ।“ सोमन कलपल । मोहन सदाय केँ रामअधीनक कृपा सँ जवाहर-रोजगार वला ठिकेदारी सभ भेट’ लागल छै । सीओ, बीडीओ केँ  चेम्बरे मे बंद क’ दैत अछि आ मनमाना दस्तखत करा लैत अछि तेँ ओकरा सभ टभजियायल छै जे घी किना निकालल जाइत छै । ओ सभक चुप्पी केँ तौलैत मड़रककाअक नाड़ी पकड़लक “की हौ मड़र कका! तोरा आरूक की बिचार छह? दीना भदरीक गहबर मे ओ पाइ  लागि जाए त’ नीके किने ?” मरड़ कका आइ दस साल सँ हरेक पंचैती मे अहिना दीना-भदरीक गहबर बनैत देखि रहलछै’ मुदा एखनो दीना-भदरीक पीड़ी पर ओहिना टाँग अलगा क’ कुकूर मुतिते छै । मड़रकका मने-मन कुकू केँ गरियेलक, “सार, कुकूरो केँ कतौ जगह नइँ भेटै हय, देबते-पितरक पीड़ी केँ घिनायत ।” खैनीक थूक कठ धरि ठेकि गेल रहै, पच्चा द’ फेकैत बाजल’ “जे तूँ सभ उचित बुझही !” पंचैती मे रामधीन नेता आ मोहन सदाय बजैत जा रहल छल । बाकी सभ पमरियाक तेसर जकाँ हँ मे हँ मिलबैत । सोमन पंच सभक मुँह ताकि रहल अछि, मुदा दिन भरिक हट्ठाक थाकल-ठेहियायल पंच सभक मुँह स्पष्ट कहै छै जे कतेक जल्दी रामअधीन नेता निर्णय दै आ ओ सभ निद्राक कोरा मे बैसि रहय । मड़र ककाक हुँहकारी सँ मोहन सदायक मनोबल एक इँच आरो उपर उठलै । ओ बाजल, “नगदी ई दुनू भाइ जमा क’ सकत से उपाय त’ नइँ छै तहन पाइ कोना एकरा सभ केँ हेतै, तकरो इन्तिजाम त’ आइए भ्’ जेबाक चाही । आब अहि ले’ दोसर दिन त’ बैसार नइँ हेतै । हम्र एक टा प्रस्ताब छै जे दुनू भाइक साझिया दसकठबा खेत ताबत केओ दस हजार मे भरना ल’ लौ । जहिया दुनू भाइ पाइ जमा क’ देतै तहिया खेत घुरि जेतै ।” बिना ककरो विचार लेनहि मोहन सदाय डाक शुरु क’ देलक, “बाज’के लेबहक! जमीन अपने टोला मे रहतै बभनटोली मे नइँ जेनाय छै खपटा ल’क” सभ चुप्प! फेर मोहन सहाय बाजल, “जँ नइँ कियो लेबहक त’ नेताजी सोचतै, टोलक इज्जति त’ बलू बचाब’ पड़तै ओकरे किने ।” अंतिम श्ब्द बजैत मोहन सदायक आँखि नेताजीक आँखि सँ टकरा गेलै । मड़रकका आँखि मुनने भरिसक कुकूरे केँ खिहारि रहल छलाह । खैनीक सेप मुँह मे एतेक भरि गेल रहनि जे कने घोँ टाइयो गेलनि । खूब जोर सँ खखसैत बजलाह, :सुनि ले’ बहिं पिछला बेर जकाँ एहू बेर नइँ पजेबा खसि क’ उठि जाइ ।“ मड़र ककाक शंका मे आरो एक-दू गोटा अपन हामी भरलक । मोहन सदाय पहिनहि सँ तैयार रहय, झट द’ बाजि उठल, “नइँ हौ। दसक हहास बलू अपना कपार पर के लेत? जुर्बानाक पाइ देबते-पितर मे जेतै । दीना-भदरी संगे जे सार फ़द्दारी करत, तकरा घर पर खढ़ो बचतै ? घटतै त’ एक-दू हजार नेताजी अपन जेबियो स’ लगा देतै । कोनो अंत’ जेतै? धरम-खाता मे जमा रहतै । बभना आरू जेहन डीहबारक गहबर बनेलकै, ओहू स’ निम्मन दीना-भदरीक गहबर बनतै।” महरैलवाली बड़ी काल सँ मुँह दबने रहय । आब ओकर धैर्य जबाव द’ देलक, “हइ के हमर जमीन लेतै? दीना-भदरीक गहबर बनै ले’ हमरे जमीन हइ । मोंछवला सभ बेहरी द’क’ बनेतै से नइँ।” रेवाड़ीवाक्लीक हृदय सेहो आब बर्फ भ’ गेल रहय । दियादनीक बात मे ओकरो मौन समर्थन रहै । रामअधीन नेता केँ कहियो-कहिओ दिन तका क’ तामस उठै छै जहन ओकरा मोनक विपरीत कोनो काज होइत छै। एहन परिस्थिति मे नेताजी टोल भरिक छौड़ी-मौगी सँ गारिक माध्यम सँ लैंगिक संबंध स्थापित क’ लैत छथि । “छिनरी केँ तूँ बीच मे बजनाहर के? हम सोमना नइँ छी, ततारि देब ।“ नेताजी मारैक लेल हाथ उठेलनि । महरसिलवली नेताजीक लग मे आरो सटैत बाजल, “माय दूध पियेने हइ त’ मारि क’ देख लौ ।”  नेताजीक हाथ थरथरा गेलनि मुदा मुँह चालू “मुँह सम्हारि क’ बाज मौगी नइँ त’ चरसा घीचि लेबौ । आगि-पानि बारि देबौ, देखै छी कोना गाम मे तूँ रहि जाइत छें।” “है केहन-केहन गेलै त’ मोछवला एलै । बहरा गाम मे रहि जेबै तें जमीन पर नइँ ककरो चड़ह’ देबै । ई नेताबा आरू गुरमिटी क’क जमीन हड़प चाहै हय । जमीन भरना लेनिहार केँ त’ खपड़ी स’ चानि फोड़ि देबै । दीना-भदरी गरीबेक जमीन लेतै । अइ नेताबा आरूक कपार पर हरहरी बज्जर खसतै । घुसहा पंच सभ केँ मुँह मे जाबी लागि गेल हय । निसाफ बात बजैत लकबा नारने हइ ।“ महरैवालीक ई हस्तक्षेप सोमनक पक्ष केँ आरो कमजोर क’ देलकै । पंच सभ सोमन केँ धुरछी-धुरछी कर’ लगलै । फौदार कहलकै, “त’ रौ बहिं सोमना, ई मौगी ठिके झँझटिक जड़ि छियौ । एकरा अँगना क’ बइलेबेँ से नइँ? गाइरे सुनबै ले’ पंच आरू केँ बजेलही हें ।”  सोमन केँ भरल सभा मे ई बेइज्जती बड़ अखड़लै “जहन मरदा-मरदी बात होइ हय त’ ई मौगी किऐ बीच मे टपकै हय ।” सोमन, महरैलवालीक ठौठ पकड़ि क’ अँगना मे जा क’ धकेलि देलक । महरैवाली आँगने सँ गरियाबैत रहल, “अइ मुनसा केँ त’ जे नइँ ठकि लइ । बोहा दौ सभ टा । नेतबा सभ त’ तौला मे कुश द’क’ रखनै हय।” आब नेताजीक तामस मगजो सँ उपर चढ़ि गेल, “ई सार सभ ओना नइँ सुधरत । एखने बभना आरू दस टा गारि दैतनि आ चारि डंटा पोन पर मारितन्हि त’ तुरते पंचैती मानितय । कोन सार पंचैती नइँ मानत से हमरा देखनाइ यए ।” नेताजीक ठोरक लय पर मोंछो थरथरा रहल छल ! “सरबे सभ केँ हाथ-पयर तोड़िक’ राखि देबनि । घर मे आगि लगा क’ भक्सी झोंकान झौकि देबनि । देखै छी कोन छिनरी भाइ दरोगा हमरा खिलाफ एन्ट्री लैयए ।” चारू भर श्मशानक नीरवता पसरि गेल छल । पंच सभ आगाँक बातव् केँ रोकबाक लेल डोमन आ सोमन दिस याचक दृष्टएँ ताकि रहल छल । मोहन सदाय कागत-कजरौटी  निकालैत सोमनक कान मे बाजल, “की विचार छौ, फसाद ठाढ़ करबें?” आ फेर सोमनक थरथराइत औंठा पकड़िक’ कजरौटी मे धँसा देलक । अही बीच महरैलवाली वसात जकाँ हहाइत आयल आ दुनू हाथ सँ कागत आ कजरौटी केँ पकड़ि क’ ओहि पर सूति रहल! ओ बाजय चाहैत रहय, मुदा मुँह सँ आवाज नहि निकलि रहल छलै । रामअधीन नेता कागत आ कजरौटी महरैलवालीक हाथ सँ छीन’ चाहैत छल, मुदा महरैलवाली पाथर भ’ गेल रहय । जेना ओ कागत नहि, ओ दसकठवा खेत हो जकरा ओ अपना छाती सँ अलग नहि कर’ चाहैत रहय । “छिनरी केँ तू एना नहि मानवें ।” महरैलवालीक मुँह पर घुस्सा मारैत ओकर मुट्ठी  केँ हल्लुक कर’ चाहलक । एम्हर रेवाड़ीवालीक चेहरा तामसे लाल भ’ गैल रहै । ओकर सभ टा चिद्रोह नेता सभक कूटनीति केँ बुझिते पिघलि गेल रहै । ओ डोमनक देह झकझौरैत बाजल, “बकर-बकर की ताकै छ’ । नार’ ने पूतखौका नेताबा आरू केँ । जब खेते नहि बचत’ त’ बाँटब’ की?” रेवाड़ीवालीक ई रूप देखि नेताजीक हाथ ढील हुअ’ लागल । पंच सभ हतप्रभ रेवाड़ीवाली दिस ताक’ लागल। होलीपर विशेष विद्या मिश्र मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) - विद्या मिश्र हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि। हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए। पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलैत छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा। मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि। एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल। 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन 1. सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना- डॊ. कैलाश कुमार मिश्र श्री सुभाषचन्‍द्र यादव केर कथा-संकलन आद्योपान्‍त पढ़लहुँ लेखक महोदय अपन भावनाक बेवाक प्रस्‍तुत करबाक नीक प्रयास केने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्‍न-‍मध्‍यम- वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्‍ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्‍वेदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि । परम्पराक नीक चिन्हसॅं लेखक अपना-आपकेँ जोड़ने छथि आ परम्पराक विद्रोह करबामे कखनो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्‍परा, परिवेश, खेत, खरिहान, गाम-घर, सौन्‍दर्य, यात्रा-वृतान्‍त आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रहपर हमरा जनैत दू दृष्टिकोणसँ विवेचित कएल जा सकैत अछि: (क) भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोणसँ: (ख) कथा-वस्‍तुक दृष्टिकोण सँ। आब उपर-लिखित दृष्टिकोण पर विचार करी: भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोणसँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कय एक नीक परम्‍पराक प्रारम्‍भ केलन्हि अछि। मैथिली भाषाक सबसँ पैघ समस्‍या एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्‍कृतनिष्ठ ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृत शब्‍दकेँ घुसा-धुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति एवं सर्वहाराक शब्‍द विन्‍यास, व्‍यवहार आदिकेँ नजरअंदाज कऽ परम्‍परा सँ कटि जाइत अछि। सर्वहारा वर्ग सँ कटि स्त्रीगण आदि अपना-आप केँ भाषाक ताग सँ बान्‍हल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब परम्‍परा सँ ई लोकनि अपन नाता समाप्‍त क लैत छथि । मैथिली भाषाक समस्‍या केवल जाति अथवा समुदाय मात्र सँ नहि अछि । विभिन्‍न सांस्‍कृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषा केँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक लोकक द्वारा प्रयुक्‍त मैथिली केँ सर्वाधिक नीक आ शेष लोक द्वारा प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ निम्‍न श्रेणीक मैथिली बुझल ज्ञाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल ज्ञाइत अछि तकरा पंचकोसीक लोक दछिनाहा, पूबमे व्यव‍हरित मैथिली केँ पुबहा एवं पच्छिम विशेषरूपसॅं  सीतामढ़ीमे प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ पच्छिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि । एहि सब कारणेँ मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोईटी, धानुख आदि मैथिली भाषा बाजय बला एहेन बुझाइ छन्हि जेना ओ लोकनि भाषाक मुख्‍यधारा सॅं अलग-थलग होथि । लोकविध अथवा फॉकलोर एतेक सम्‍पन्‍न होइतो स्‍थान बनाबएमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि। नामकरणक उ‍दाहरण अगर ली तँ बुझायत जेना  ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनि संस्‍कृत निष्‍ठ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जखन की पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्‍टा अछि। पंजाबी भाषा मे नाम निर्धारित होइत अछि। गुरू ग्रन्‍थसाहेब एखनहुँ धरि ‘गुरग्रन्‍थ साहेब’ कहल ज्ञाइत अछि। स्‍मरण सिमरन थीक। की स्‍त्री की पुरूष, की छोट की पैघ जातिक सभ अपना आपकेँ भाषा, संस्‍कार आ संस्‍कृति सँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि। अतेक सम्पन्‍न फॉकलोर रहितहुँ मिथिलाक फाकलोर पर विशेष कार्य नहि भऽ रहल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एकटा उल्‍लेखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाषजी पंचकोसिया नहि छथि; या दोसर ई ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्‍थ सेहो नहि छथि। लेकिन अपन परिवेशक प्रयुक्‍त शब्‍द, वाक्‍य फकरा, नाम आदिक वर्णन ताहि रूपमे कएने छथि । किताबक सभ पन्‍ना पढि लेलाक बाद अपन ढेठ गाम, गामक  परिवेश इत्‍यादि स्‍मरण होबए लागत। लोकमे प्रयुक्‍त खांटी देसी नाम जेना कि मुनियां, कुसेसर, उपिया, अखिलन, बिहारी, बौकू , सिबननन, समसरन रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजना‍थ, संकुन आदि पाठक केँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूप सॅं लऽ जाइत अछि भाषा सेहो एकदम देसी। कोनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि। एहि तरहक यथार्थवादी परम्‍पराक प्रारम्‍भ केला सँ मैथिली सम्पन्‍न हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक सख्या बढ़त। अनेरे संस्‍कृतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीमे पाठकक संख्या लगभग शून्‍य जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्‍वयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियो पढ़यवला नहि। वेबक विकासक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिला सँ बाहर रहनिहार मैथिल आइ काल्हि किछु सामग्री केँ सर्फ कए देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सभ सामग्री मैथिली मे पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन काज अंग्रेजीजीमे व्‍यक्‍त करैत छथि। सुभाषजी जकां अगर आरो लेखक, कवि इत्‍यादि आगु आबथि यथार्थवादी परम्पराक शुरुआत हैत। मैथिली मे नव-नव शब्‍दावली विकसित हैत, सब क्षेत्र सम्‍प्रदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक,  बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष लोकक हाथक खेलौनाना सँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत। आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्‍तु पर कनी विचार करी । कथा-वस्‍तुक दृष्टिएँ सेहो लेखक अपन परिवेश सँ बान्‍हल छथि। कथा सम मे लेखक केँ परम्पराक नीक तत्‍वक प्रति सिनेह, पाखण्‍डक प्रति विद्रोह एक निम्‍नमध्‍यम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर सुन्‍दर नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समूचा  यात्रा- वृतान्‍त, मोनक अन्तर्द्वन्द , सुन्‍दरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत। ’’ बनै‍त बिगड़तैत’’ कथा मे माय-बापक मनोदशा जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक जकाँ कैल गेल छैक। कथाक मुख्यपात्र माला टाहि-टाहि करैत कौवाक आवाज सँ डरैत अछि। ओकरा हरकाक दैत उड़बए चाहैत छैक। लेकिन ‘ ओ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — बज्‍जर खसौ, भागबो ने करै छै”। परदेस मे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु एना लिखैत छथि। कौवा कखनियों सॅं ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै, संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक । ने चिट्ठी-प‍तरी दै छै ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माप-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। ’’ हे भगवान, तूहीं रच्‍छा करिहऽ । हाहा हाहा’’— माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबऽ चाहै छै।‘’ आ माला के बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्‍यम सँ अपन विस्‍मय व्‍यक्‍त करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्‍न करैत छथि: माला सब बेर अहिना करै छै1 सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक । कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सन्‍तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्‍कार बनि गेल छै। सत्तो केँ छगुन्‍ता होइ छै। यैह माला कहियों अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्‍चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।‘’ अही तरहें लेखक अपन खिस्‍सा ‘कनियाँ पुतरा” मे लड़कीक निश्छल व्‍यवहार सँ आत्‍मविभोर भय, लड़की सँ एहेन सम्‍बन्‍ध बना लैत छथि जेना ओ लड़‍कीक माय अथवा पिता होथि। ट्रेनक भीर भरल बोगी मे ठाढि लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत बुझना जैत छैक जेना ‘ऊ ककरो आन संगे नै बाप— दादा या भाय-बहीन सॅं सटल हो।‘ लड़कीक भविष्य पर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्‍यम सँ सोचए लगैत छथि: ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्‍पना कऽ रहल छी । अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ। ‘’ ‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्‍न‍वर्गीय दब्‍बूपनीक मनो‍दशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक कप ओहि कथाक पात्र नवीन केँ थमा दैत छैक तँ सूत्रधार बाजि उठैत भछि : ‘’सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सॅं उतरि कऽ ओकर हाथ आ कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सॅं तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जाएत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै— ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक  खौंझ हुअए लगलै, ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहि कहि सकलै— हाउ यू डेयर ? तोहर ई मजाल। मुदा ओ कहि नहि सकलै। साइत निम्‍नवर्गीय दब्‍बूपनी आ संस्‍कार ओकरा रोकि लेलकै।‘’ (अगिला अ‍कमे जारी) 2.कविक आत्मोक्तिःकविताक अयना -विनीत उत्पलक कविता संग्रहपर डॉ. गंगेश गुंजन विश्व बजारी एहि समाज मे, भाषा-साहित्य सभक संसार मे सेहो बजारे जकां मंदी पसरल अछि। लगभग इएह परिस्थिति बेसी कला-विधाक बुझाइछ। साहित्यमे किछु आर विशेषे। ताहू मे कविताक विधा आओरो अनठिआएल अछि, किछु स्वयं कात करोट भेल आ किछु कएल जा रहल अछि। प्रकाशके टा द्वारा नहि, स्वयं संबंधित भाखा-भाखी अधिसंख्य लोक समाज द्वारा सेहो। जतए स्वयं कविक द्वारा, से अवश्य खेद करवाक विषय। कविता व्यक्ति कें अपन समाज मे एकटा आओर प्रतिष्ठा मात्र दिअयबाक मूल्य पर बेशी दिन जीवित नहि रहि सकैत अछि। अर्थात् कोनो सम्भ्रान्त व्यक्तिक भव्य ड्र्ाइंग रूम मे एक टा आओर इम्पोर्टेड दामी वस्तुक प्रदर्शनीय नमूनाक माल कविता नहि बनाओल जा सकैत अछि, जे कि दुर्भाग्य सं भ’ रहल अछि। भाषा वैह टा ओतबे जीवित अछि वा रह’वाली बुझा रहल अछि जे मात्र अपन भाषिक उपयोगिता बा कही अपन क्रय-विक्रय-मूल्यक बलें जीवित रहि सकय। ग्लोबल बजार मे भाषा अपन प्रवेश- जतेक दूर आओर गंहीर धरि करवाक क्षमता रखने अछि, ताही सामर्थ्यक उपयोगिते पर, ओतवे दुआरे जीवित राखल जा रहल अछि, कोनो अपन काव्य-सम्पत्ति, सांस्कृतिक अस्मिता आ भाषाक प्राचीनता बा महानताक जातीय स्वाभिमानक आधार पर नहि। तें दुर्भाग्यवश ई समय अपन-अपन भाषाक महानता ल’ क’ आत्म गौरव सं भरब तं फराक, जे मुग्ध पर्यन्त होयबाक समय नहि बांचि गेल अछि। हॅं, भाषाक ‘दाम’ ल’ क’ निश्चिन्त रहवाक बा कम बिकाएब ल’ क’ चिन्तित होयबाक समय अछि। मुदा कविता मे भाषाक आशय आ अस्तित्व कें एहन तात्क्षणिक बूझि लेब कोनो भाषा-साहित्यक मूल सं छूटि क’ आगां बढ़वाक बुद्धि कें अवसरवाद छोड़ि, दोसर किछु ने मानल जा सकैत अछि। समकालीन समस्त कवि कें, नवागन्तुक के तं अनिवार्यतः बजार आ कविता भाषाक बीचक एहि भेद कें नैतिक बुद्धियें बूझि’ए क’ एकर बाट चलवाक प्रयोजन । अन्यथा ई कविता सेहो एक टा नव पैकेटक नव उत्पाद बनि क’ दोकान मे रहत। पोथीक दोकान मे नहि। साज-शृंगारक कोनो मॉल मे, जत’ जनसाधारण लोकक पहुंचबो दुर्लभ! आब से बजार आ कविताक भाषाक एहि द्वन्द्व सं निकलैत भाषाक ई यात्रा कोन नीति-बुद्धि सं कएल जयवाक प्रयोजन ताहि विषय पर गंभीरता सं मंथन कर’ पड़त। स्वविवेक। ई त्वरित चाही। उत्पल जीक एहि कविता-पाण्डुलिपिक लाथें, ई चर्चा हमरा अभीष्ट भेल आ संभव, एकर श्रेय तें हम हिनके दैत छियनि। कारण बतौर काव्य-प्रवेशार्थी भाषा-व्यवहारक ई दायित्व हिनको वास्ते प्राथमिकताक डेग छनि। कविता भाषाहिक सवारी पर लोक धरिक अपन यात्रा करैत छैक। जेहन सवारी, जेहन सवार तेहन यात्रा। ताही मे गन्तव्य, काव्यबोध, युग आ जीवन-दर्शन समेत बहलमानी कही, कोचमानी कही, बा ड्र्ाइभरी-पॉयलटी तकर कर्म कुशलता, ई सभ तत्व अंतर्निहित छैक। बल्कि कएटा अन्यान्यहुं विषय जे कोनो कवि अपना साधनाक प्रक्रिया आ स्वविवेक सं निरन्तर अपने विकसित करैत जाइत अछि। मुदा तकरा यथावत “शब्द मे कहि सकब, प्रायः एखनो हमरा बुतें संभव नहि। कए दशक सं कविता लिखि रहल छी। हिन्दी सन व्यापक भाषाक स्थापित नीक-नीक स्वनामधन्य कवि पर्यन्त अपन कविता-पोथी अपने छपा रहल छथि। बिकाइ छनि तं बेचि रहल छथि। कोनो ब्रांड प्रकाशक सं खामखा छपवहि चाहैत छथि तं ओकरा पुष्ट मात्रा मे धन दैत छथिन। सरकारी पुस्तकालय सभ मे थोक मात्रा मे ‘खपबा’ देबाक वचन दैत छथिन, तखन अपन गुडविल दैत छनि। वा अपने अर्थ सक्षम कवि-लेखक अपना पुस्तकक संपूर्ण प्रकाशन-व्यय स्वयं करैत छथि। तें पाठक आइ धनिके कवि टा कें, ब्रांड प्रकाशन सभ मे पढ़ि सकवाक सौभाग्य पबैत अछि । मैथिलीक स्थान निरूपण तं सहजहिं कएल जा सकैए। मैथिली मे तं ओहिना प्रायः सभ टा साहित्ये लेखक-कवि कें अपना अपनी क’ अपने छपबाव’ पड़ैत छैक। महाकवि यात्रीजी पर्यन्त विशय आबहु जीवित अति पुरना किछु लोक आ यात्रीजीक स्नेही-श्रद्धालु पाठक समेत हमरा खाढ़ीक हुनक स्नेह-समीपी किछु रचनाकार कें बिसरल नहि हेतनि। पोथीक प्रसार आ विक्रय सं मैथिल लेखकक केहन उद्यम जुड़ल रहलैक अछि! प्रकाशक कत’? अर्थात् कविता आ साहित्य कवि आ साहित्यकारहिक संसार मे जीवित अन्यथा मृत नहियों तं अनुपस्थित तं अनुभव कएले जा रहल अछि। ई युग यथार्थ एकदम देखार अछि। एहना मे क्यो एक टा मैथिल युवक अपन समस्त ऊर्जा-उत्साहक संग दिल्ली मे कोनो संध्या बा प्रात अपन मैथिली कविताक पाण्डुलिपि दैत अपने कें ‘भूमिका’ लिखि देवाक आग्रह करथि तं केहन लागत ? मतलब जे प्रथम दृष्टया केहन अनुभव हएत? हमरा तं युवक दुस्साहसी आ किंचित गै़रजवाबदेह बुझयलाह। ओना जकरा साहस नहि हेतैक से कविताक बाट धइयो कोना सकैये ! अपन कुल अड़तालीस पृष्ठक अड़तीस कविताक पाण्डुलिपि दैत श्री उत्पल विनीत जखन से कहलनि तं किंचित असमंजस तं भेवे कएल। भूमिका-लेखन-काज सेहो एहि युग मे अपन धर्मान्तरण कए लेलक अछि। हमर प्राथमिकता सं तें बाहरे अछि। तथापि यदि कोनो मैथिली कविताक भविष्य एना सोझां उपस्थित हो तं स्वागत कोना नहि हो ! ताहू मे भागलपुरक नवतूर ! पाण्डुलिपि पढ़वाक क्रम मे हमरा कचकोही कविता ;मैथिली कवि विनोद जीक “शब्द मे कंचकूहद्धहोयवाक अनुभव भेलाक बादहु-कवि प्रतिभाक छिटकैत सूक्ष्म किरणक सेहो अनुभव, प्रिय आ आश्वस्तिकारक बुझाएल। स्वागत तें कहल अछि। उत्पलजीक प्रतियें उद्गार मे। कविक प्रस्तावना हिनक कविताक संसार कें बुझबा मे विशेष सहायक अछि जे ई बड़ स्पष्ट बुद्धियें आ पूर्ण मनोयोग सं लिखलनिहें। हिनकर रचनाक बुनियादी वर्तमान आ सरोकारक उद्घोश जकां छनि। से मात्र वयसोचित उच्छ्वास नहि, बल्कि अपन वचनबद्धताक स्वरूप मे कहल गेल छनि। सभ समयक नवीन पीढ़ी रचनाकारक सम्मुख अपन वर्तमाने प्रायः सब सं प्रखर चुनौती रहैत छैक। अतीत आ भविष्य तं अ’ढ़ मे रहैत छैक। रचनाकारक रूप मे अतीतक वास्ते ओकर नीक-बेजायक वास्ते ओकरा उत्तरदायी नहि बनाओल जा सकैए। यद्यपि ताही तर्क सं भविष्यक लेल ओकरा छोड़ि सेहो नहि देल जा सकैए। कारण समाजक भविष्य निर्माणक प्रक्रिया मे अन्य सभ सामाजिक कारण आ प्रेरक परिस्थिति सभ समेत, समकालीन रचनाकारहुक परोक्ष मुदा प्रमुख भूमिका रहबे करैत छैक। तें कविक दायित्व ल’ द’ क’ अपन समकालीनताक ज्ञान आओर अनुभव के विवेक सम्मत सम्वेदनाक रूप मे विकसित करैत अग्रसारितो कर’ पड़ैत छैक। जाहि सघनता आ व्यापकता सं कवि युगक “अतीत-ताप अर्थात् जीवनक दुःख-द्वन्द्व आ यथार्थ कें बूझि-पकड़ि पबैत अछि आ तकरा अपन रचना मे दूरगामी प्राणवत्ताक कलात्मक शिल्प द’ पबैत अछि, सैह ओकर प्रतिभाक सामर्थ्यक रूप मे दर्ज कएल जाइत छैक। कोनो रचनाकार अपना कृति मे बहुत युग धरि रहवाक सहज आकांक्षी होइतहिं अछि। तें हमरा जनैत मनुक्खक जिजीविशा आओर कविताक जिजीविशा मे तात्विक किछु भेद नहि। कवि जे अंततः मनुक्खे होइत अछि। तें दुनूक “आशक्ति अन्योनाश्रित होइछ। विनीतजीक कविता मोटामोटी हमरा तीन अर्थछाया सं वेष्ठित अनुभव भेल। कविता मे अपन कथनक कोटि, तकर पकड़ आ प्रयोगक विधि। कएटा रचना तें कंचकोह जे कहल, से छैक एखन। कएटा भावानुभूति मे संवेदनशील मुदा कथन मे अपेक्षाकृत बेजगह। “कविताक विषय कथात्मक सांच मे कहि देल गेलैक अछि, जे स्वाभाविके, ओ कविता विशेष अपन जाहि अनुभव-निष्पत्तिक योग्य सक्षम रहैक आ उपयुक्तो, से नहि भ’ सकलैक अछि। से आगां सकुशल सफलता पाबि जाइक तकर सामर्थ्य कविता मे अवश्ये झलकैत छैक। से साफ-साफ। तें ओतहु निराशा नहि, आस्वस्ति छैक। कवि आ कविता दुनू अपना प्रकृतियें बनिते-बनिते बनैत छैक। तेसर जे अति ज्वलंत अतः कविताक प्राणानुभूति वला अनुभव कें पर्यन्त कवि किछु तेहन अंदाज मे कहि जाइत छथि जे ओकर वांछित प्रभाव पाठकक मन पर ओएह नहि पड़ैत छैक जे स्वयं कविक अभीष्ट छनि। अगुताइ मे कहल गेल सन आभास होइत छैक। कारण जे कविता मात्र कन्टेंटे नहि, कहवाक छटा आ व्यंजनाक कलात्मक स्तर पर काज करवाक कविक समुचित भाषिक क्षमता सेहो थिक। बहुत सोचला उतर आधार भेटल जे, तकर यदि कोनो एकटा कारण देखल जाय, तं भाषाक अवरोध बुझाएल। कोनो भाषा स्वयं मे मात्र ओ भाषा टा नहि अपितु पूरा संस्कृति होइत छैक। भाषा मात्र ओकर बोध बा ज्ञाने नहि, ओकर संवेदना सेहो होइत अछि। अर्थात कोनो प्राचीन समृद्ध संस्कृतिक अभिव्यंजना लेल ओहि संस्कृतिक भाषाहुक प्रवाह मे प्रवेश चाही। से प्रवेश हमरा बुद्धियें भाषाक नाव टा सं संभव होइत छैक। नाव एकहि संग खेबैया सं ओकर स्वस्थ बल समेत कएटा अन्यान्य कुशलताक मांग करैत छैक। कवि सं कविता-विषय, तहिना। तें भाषाक साधना, कोनो कविक काव्य-यात्रा कें सुगम बनवैत छैक।सुचारु करैत छैक। दोसर जे, जेना जीवन आओर युग यथार्थ परिवर्तनशील होइत अछि , तहिना भाषाक भूमिका सेहो बदलैत छैक। अर्थात् भाषाक मिज़ाज। उत्पल विनीतजी कें भाषाक रूप मे एखन मैथिलीक संग बहुत बेशी आयन-गेन करवाक प्रयोजन। तखनहि मैथिलीक सहज स्वाभाविक “शक्ति सं आत्मीयता आ परिचय विकसित भ’ सकतनि। भाषा कें अपन काव्य प्रयोगी अभियान मे विश्वसनीय संगी बनब’ पड़तनि। सभ कें बनब’ पड़ैत छैक। मातृ भाषा हएब, कविक सामर्थ्य तं होइछ मुदा काव्य सामर्थ्यो सेहो भ‘ जाइक, से आवश्यक नहि। तें कोनो कविक वास्ते काव्यभाषाक सिद्धि अभीष्ट।अनुभव तं जीवनक निरंतर अंतरंगता आओर सरोकार सं अपना स्वभावें चेतनाक अंग बनैत चलैत छैक। सैह रचनाकार कें श्रेय तथा प्रेयक विवेक भरैत रहैत छैक। एहि टटका, उूर्जावान-संवेदनशील कविक पथ प्रशस्त हेतनि से विश्वास अछि। बहुत-बहुत स्नेह-“शुभाशंसाक संग, कालजयी कविताक आशा मे। ३. पद्य ३.१. सतीश चन्द्र झा- शब्द ३.२. 1.बुद्ध चरित 2.महावीर ३.३.ज्योति-  एक हेरायल सखी ३.४.कामिनी कामायनी: चक्‍का ३.५. पंकज पराशर ३.६.सुबोध ठाकुर सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। शब्द- चिकड़ि रहल अछि शब्द आबि क’ निन्न पड़ल निश्बद्द राति मे। अछि उदंड, उत्श्रृखल सबटा नहि बूझत किछु बात राति मे। केना करु हम बंद कान के उतरि जाइत अछि हृदय वेदना। बैसि जाइत छी तैं किछु लिखय छीटल शब्द हमर अछि सेना। कखनो कोरा मे घुसिया क’ बना लैत अछि कविता अपने जुड़ल जाइत अछि क्लांत हृदय मे शब्द शब्द के हाथ पकड़ने। कविता मे किछु हमर शब्द के नहि व्याकरणक ज्ञान बोध छै। सबटा नग्न, उघार रौद मे नेन्ना सन बैसल अबोध छै। कखनो शब्द आबि क’ अपने जड़ा दैत अछि प्रखर अग्नि मे। कखनो स्नेह,सुरभि,शीतलता जगा दैत अछि व्यग्र मोन मे। क्षमा करब जौ कष्ट हुए त’ पढ़ि क’ कविता शब्दक वाणी। शब्द ब्रह्म अछि नहि अछि दोषी छी हमही किछु कवि अज्ञानी। 1.बुद्ध चरित 2.महावीर बुद्ध चरित पूर्व बुद्धचरित ई पुरातन देश नाम भरत, राज करथि जतए इक्ष्वाकु वंशज। एहि वंशक शाक्य कुल राजा शुद्धोधन, पत्नी माया छलि, कपिलवस्तुमे राज करथि तखन। माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल, एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे, पैसि छल रहल हाथी मुदा, मायाकेँ भए रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट, वरन् लगलन्हि जे आएल अछि मध्य क्यो गर्भ। गर्भक बात मुदा छल सत्ते, भेल मोन वनगमनक, लुम्बिनी जाय रहब, कहल शुद्धोधनकेँ। दिन बीतल ओतहि लुम्बनीमे एक दिन, बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक, आकाशसँ शीतल आऽ गर्म पानिक दू टा धार, कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल, बरसि आकाशसँ। यक्षक राजा आऽ दिव्य लोकनिक भेल समागम, पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी। धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल, छोड़ि “मार” आनन्दित छल सकल विश्व, “मार” रुष्ट आगमसँ बुद्धत्वप्राप्ति करत ई? माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक, ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक, भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ, मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कए। महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म, चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त, वायु मार्गे अएलाह राज्य वन कपिलवस्तुक, बैसाएल सिंहासन शुद्धोधन तुरत, राजन् आएल छी देखए बुद्धत्व  प्राप्त करत जे बालक। बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पैरमे छल जकर, देखि असित कहल हाऽ मृत्यु समीप अछि हमर, बालकक शिक्षा प्राप्त करितहुँ मुदा वृद्ध हम अथबल, उपदेश सुनए लेल शाक्य मुनिक जीवित कहाँ रहब। वायुमार्गे घुरलाह असित कए दर्शन शाक्य मुनिक, भागिनकेँ बुझाओल पैघ भए बौद्धक अनुसरण करथि। दस दिन धरि कएलन्हि जात-संस्कार, फेर ढ़ेर रास होम जाप, करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि, घुरि नगर प्रवेश कएल माया, हाथी-दाँतक महफा चढ़ि। धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य, अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग, सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ। मुदा माया नहि सहि सकलीह प्रसन्नता, मृत्यु आएल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा। उपनयन संस्कार भेल बालकक शिक्षामे छल चतुर, अंतःपुरमे कए ढेर रास व्यवस्था विलासक, शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात बालक योगी बनबाक। सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह, समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म। उत्सवक संग बितैत रहल दिन किछु दिन, सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक, सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक, सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक, क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट। सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र, निकलि आयल पथपर दर्शनक सिद्धार्थक, चारू कात छल मनोरम दृश्य, मुदा तखने आएल पथ एक वृद्ध। हे सारथी सूतजी के अछि ई, आँखि झाँपल भौँहसँ श्वेत केश, हाथ लाठी झुकल की अछि भेल? कुमार अछि ई वृद्ध, भोगि बाल युवा अवस्था जाय अछि भेल वृद्ध आइ, की ई होएत सभक संग, हमहू भए जाएब वृद्ध एक दिन? सभ अछि बुझल ई खेल, फेर चहुदिस ई सभ करए किलोल, हर्षित मुदित बताह तँ नहि ई भीड़, घुरि चलू सूत जी आब, उद्यानमे मोन कतए लाग! महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न, पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र, मुदा एहि बेर भेटल एकटा लोक, पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास, रोगग्रस्त छल ओऽ पूछल सिद्धार्थ, सूत जी छथि ई के की भेल? रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल, कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन, सूत जी घुरू भयभीत भेलहुँ हम आइ, घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन, शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम। आमोद प्रमोदक कए आर प्रबन्ध, रथ सारथी दुनू नव कएल प्रबन्ध। फेर एक दिन पठाओल राजकुमार, युवक-युवती संग पठाओल करए विहार, मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक, हे सूतजी की अछि ई दृश्य, सजा-धजा कए चारि गोटे धए कान्ह, मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नहि जान। हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख, नहि बाजि सकत, अछि ई काठ समान। कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक, छोड़ए ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त। घुरू सारथी नहि होएत ई बर्दाश्त, भय नहि अछि एहि बेर, मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर, अज्ञानी सन कोना घुमब उद्यान। मुदा नव सारथी घुरल नहि द्वार, पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम। युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी पुरोहित पुत्र, करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन, मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति, पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की? हे मित्र क्षणिक ई आयु, बुझितो हम कोना गमाऊ, साँझ भेल घुरि युवतीसभ गेल, सूर्यक अस्तक संग सांसारक अनित्यताक बोध, पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न, शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन। किछु दिनक उपरान्त, माँगि आज्ञा बोन जएबाक, संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार, देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग, दुखित बैसि उतड़ल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ, बैसि जोमक गाछक नीचाँ धए ध्यान, पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु। छल ओऽ मोक्षक ताकिमे मग्न, सुनि ओकर गप देखल होइत अन्तर्धान। गृह त्यागक आएल मोनमे भाव, बोन जएबाक आब एखन नहि काज। घुरि सभ चलल गृहक लेल, रस्तामे भेटलि कन्या एक, कहल अहाँ छी जनिक पति, से छथि निश्चयेन निवृत्त। निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग, सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा, रहथि ओतए शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच। कहल - लए संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल, करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव। हे पुत्र कएल की गप, जाऊ पहिने पालन करू भए गृहस्थ, संन्यासक नहि अछि आएल बेर, तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक, तखन दूर करू चारि टा हमर भय, नहि मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय, धन सेहो क्षीण नहि होए संगहि। शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात, तखन हमर वियोगक करू नहि पश्चाताप। कहि सिद्धार्थ गेलाह महल बिच, चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकललि बाह्य, सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान, कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाऊ, सभ भेल निन्नमे भेर कंथक आएल, चढा सिद्धार्थकेँ लए गेल नगरसँ दूर, नमस्कार कपिलवस्तु, घुरब जखन पाएब जन्म-मृत्युक भेद। सोझाँ आएल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ, लेलन्हि रत्नजटित कृपाण काटल केश, मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ। अश्रुधार बहल छंदकक आँखि, जाऊ छंदक घुरु नगर जाऊ, नहि सिद्धार्थ हम नहि छी सुमन्त, छोड़ि राम घुरल अयोध्या नगर। घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर, तखने एक व्याध छल आयल, कषाय वस्त्र पहिरने रहए कहल सिद्धार्थ, हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र, अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहिर, छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि। सिद्धार्थ अएलाह आश्रम सभ भेल चकित, देखि नानाविध तपस्या कठोर, नहि संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग, अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि, निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि, स्वर्ग नहि मोक्षक अछि हमरा खोज, जाऊ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ, नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाऊ, सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचलाह आगु। एम्हर कंथकक संग छंदक खसैत-पड़ैत, एक दिनमे आएल मार्ग आठ दिनमे चलैत, घरमुँहा रस्ता आइ कम नहि अछि भेल अनन्त, घुरि सुनेलक खबरि कषाय वस्त्र पहिरबाक सिद्धार्थक, गौतमी मूर्छित, यशोधरा कानथि बाजि-बाहि, एहन कठोर हृदय सिद्धार्थक मुखेटा कोमल रहए, ओकरो सँ कठोर अछि हृदय हमर जे फाटए अछि नञि, शुद्धोधन कहथि दशरथक छल भाग्य, पुत्र वियोगमे प्राण हमर निकलए नञि अछि। पुरहित आऽ मंत्रीजी निकलि ताकू जाय, भार्गव मुनिक आश्रममे देखू पूछू ओतए। जाय जखन सभ ओतए पूछल भार्गव कहल, गेलथि अराड मुनिक आश्रम दिस मोक्षक लेल बेकल। दुनू गोटे बढ़ि आगाँ देखैत छथि की, कुमार गाछक नीचाँ बैसल ओतए। पुरोहित कहल हे कुमार पिताक ई गप सुनू, गृहस्थ राजा विदेह, बलि, राम आऽ बज्रबाहु, केलन्हि प्राप्त मोक्ष करू अहाँ सेहो। मुदा सिद्धार्थ बोनसँ घुरताह नहि, मोक्षक लेलन्हि अछि प्रण तोरताह नहि। हे सिद्धार्थ पहिनहु घुरल छथि बोनसँ, अयोध्याक राम, शाल्व देशक द्रुम आऽ राजा अंबरीष, हे पुरहित जी घुरू व्यर्थ समय नष्ट छी कए रहल, राम आऽ कि आन नहि उदाहरण समक्ष, नहि बिना तप कोनो क्यो बहटारि सकत, ज्ञान स्वयं पाएब नव रस्ता तकैत, घुरल दुहु गोटे गुप्त-दूत नियुक्त कए। सिद्धार्थ बढ़ि आगाँ कएल गंगाकेँ पार, राजगृह नगरी पहुँचि कए भिक्षा ग्रहण, पहुँचि पाण्डव-पर्वत जखन बैसलथि, राजा बिम्बसार आबि बुझाओल बहुत, सूर्यवंशी कुमार जाऊ घुरि, मुदा सिद्धार्थ कहल हर्यंक वंशज, मोहकेँ छोड़ल घुरि जाएब कतए, राजा सेहो होइछ कखनहुँ काल दुखित, दास वर्गकेँ सेहो कखनहुँ भेटए छै खुशी। करू रक्षाक प्रजाक संग अपन सेहो, सिद्धार्थ वैश्वंतर आश्रम दिश बढ़लाह, मगधराज चकित। अराडक आश्रममे ज्ञान लेल गेलाह शाक्य, कहल मुनि अविद्या अछि पाँचटा, अकर्मण्यता आलस्यक अछि अन्हार, अन्हारक अंग अछि क्रोध आऽ विषाद, मोह अछि ई वासना जीवनक आऽ संगक मृत्यु, कल्याणक मार्ग अछि मार्ग मोक्षक, मुदा सिद्धार्थ कहल हे मुनिवर! आत्माक मानब तँ अछि मानब अहंकारकेँ, अहाँ गप नहि रुचल बढ़ल आश्रम उद्रकक से। नगरी गेलाह राजर्षिक जे आश्रम छल, मुदा नहि उत्तर भेटलक ओतहु सिद्धार्थक। गेलाह तखन नैरंजना तट पाँचटा भिक्षुक भेटल, छह बरख तप कएल मुदा प्रश्न अनुत्तरित छल। स्वस्थ तनमे भेटत मनसक प्रश्नक उत्तर, प्रण कएल ई निरंजनामे कएल स्नान ओऽ, बाहर बहराए अएलाह तखने कन्या गोपराजक, श्वेत रंग नील वस्त्रमे नन्द बाला जकर नाम छल, आयलि पायस पात्र लेने तृप्त भए सिद्धार्थ भोजन कएल। पाँचू संगी देखि ई सिद्धार्थक संग छोड़ल, मुदा ओऽ भेलाह सबल बोधिसत्वक प्राप्तिक लेल, दृढ़ प्रण लए पीपरक तर ओऽ आसन देलन्हि, काल सर्प कहल देखू ई नीलकंठक झुण्डकेँ, घुमि रहल चारू दिस अहाँक, प्रमाण अछि जे बोधिसत्व प्राप्त करब अहाँ। सुनि ई तृण उठाए कएल प्रतिज्ञा तखन, सिद्धार्थ पाओत ज्ञान आऽ तखने उठत छोड़ि आसन। ब्रह्मांड छल प्रसन्न मुदा दुष्ट मार डरायल, कामदेव, चित्रायुध पुष्पसर नाम मारक, सिद्धार्थ प्राप्त कए ज्ञान जगकेँ बताओत, हमर साम्राज्यक होएत की तखन, पुत्र विभ्रम,हर्ष, दर्प छल ओकर, पुत्री अरति,प्रीति,तृषा के सेहो कए संग। चलू ई लेने ढाल प्रतिज्ञाक, सत् धनुषपर बुद्धिक वाण चढ़ाए, जीतत से की जीतए देबए हमरा सभ आइ। हे सिद्धार्थ यज्ञ कए पढ़ि कए शास्त्र, करू इन्द्रपद प्राप्त भोगू भोग। छोड़ू आसन देब वाण चलाए। नहि देलन्हि सिद्धार्थ एहिपर ध्यान, मार तखन देलक वाण चलाए, मुदा भेल कोनो नहि परिणाम। शिवपर सेहो चलल रहए ई वाण, विचलित भेल रहथि ओऽ सेहो, के अछि ई से नहि जान, हे सैनिक हमर विकराल-विचित्र, त्रिशूल घुमाए, गदा उठाए, साँढ़क सन दए हुंकार, आऊ करू विजित अछि शत्रु विकराल। राति घनघोर अन्हरियामे कतए छथि चन्द्र, तरेगणक सेहो कोनो नहि दर्श! मुदा सभ गेल व्यर्थ पदार्पण भेल अदृश्य, मार जाऊ होएत नहि ई विचलित। देखू एकर क्षमा प्रतीक जटाक, धैर्य अछि एकर जेना गाछक मूल, चरित्र पुष्प बुद्धि शाखा धर्म फलक प्रतीक। स्थान जतए अछि आसन पृथ्वीक थिक नाभि, प्राप्त करत ई ज्ञान सहजहि आइ, पराजित मार गेल ओतएसँ भागि। रातिक पहिल पहरिमे शाक्य मुनि, पाओल वर्णन स्मरण पूर्व जन्मक सहजहि, दोसर पहरमे दिव्य चक्षु पाबि, देखल कर्मक फल वेदनाक अनुभूति, गर्भ सरोवर नरक आऽ स्वर्ग दुहुक, पाओल अनुभव देखल खसैत स्वर्गहुसँ, अतृप्त भोगी जन्म, जरा, मृत्यु। बीतल तेसर पहरि चारिममे जाए, पाओल ज्ञान बुद्ध भए पाओल शान्ति। शान्त मन शान्त छल पूर्ण जगत, धर्म चारू दिस बिन मेघ अछार, सूचना देल दुन्दभि बाजि अकाश, सकल दिशा सिद्धगणसँ दीप्तमय छल, स्वर्गसँ वृष्टि पुष्पक इक्षवाकु वंश ई मुनि छल, बैसल एहि अवस्थामे सात दिन धरि मुनि शाक्य, विमान चढ़ि अएलाह तखन देवता दू टा, करू उद्धार जगतक दए मोक्षक शिक्षा। आऽ भिक्षुपात्र लए अएलाह फेर एक देव, कएल स्मरण अराड आऽ उद्रकक बुद्ध, मुदा दुहु छल छोड़ल जगत ई तुच्छ। आब जाएब वाराणसी भिक्षु पाँचो संगी जतए, कहल देखि बोधिक गाछ दिस स्नेहसँ। उत्तर बुद्धचरित बुद्ध चललाह असगरे रस्तामे भिक्षु एक भेटल तेजमय अहाँ गुरु के छथि अहाँक हे वत्स गुरु नहि क्यो हमर प्राप्त कएल निर्वाण हम, सभ किछु जानल जे अछि जनबा योग्य लोक कहए छथि हमरा बुद्ध जा रहल छी काशी दुखित कल्याण लेल दूर सँ देखल वरुणा आ गंगाक मिलन गेलाह बुद्ध लगहिमे मृगदाव वन। पाँचू संगि हुनक रहथि ओतहि देखैत अबैत विचारल क्यो नहि अभिवादन हुनक मुदा पहुँचिते ई की गप भेल सभ हुनक सत्कर छल लागि गेल आसन दए जखन बैसेलन्हि हुनका सभ क्यो उपदेश देब शुरु करितथि मुदा तखने बाजल कियो अहाँ तँ तत्वकेँ नहि छी बुझैत तप छोड़ि बीचहि उठल छलहुँ किएक बुद्ध कहल घोर तप आ आसक्ति दुनुक हम त्याग कएल मध्य मार्गकेँ पकड़ि बोधत्व प्राप्त कएल एकर सूर्य अछि सम्यक दृष्टि आ एकर सुन्दर रस्तापर चलैए सम्यक संकल्प ई करैए विहार सम्यक आचरणक उपवनमे सम्यक् आजीविका अछि भोजन एकर सेवक अछि सम्यक व्यायाम, शान्ति भेटैए एकरा सम्यक स्मृति रूपी नगरीमे आ सुतैए सम्यक समाधिक बिछाओनपर ई। एहि अष्टांग योगसँ अछि सम्भव ई जन्म, जरा, व्याधि आ मृत्युसँ मुक्ति। मध्य मार्ग चारिटा अछि ध्रुव सत्य दुख, अछि तकर कारण, दुखक निरोध, आ अछि उपाय निरोधक कौंडिन्य आ ओकर चारू संगी सुनल ई, प्राप्त कएल सभ दिव्यज्ञान । हे नरमे उत्तम पाँचू गोटे भेल ज्ञान अहाँ लोकनि के? कौंण्डिन्य कहलन्हि हँ, भेल भंते, कौंडिन्य भेलाह तखन प्रमुख धर्मवेत्ता तखनहि यक्षसभ पर्वतपरसँ कएलक सिंहनाद, शाक्यमुनि अछि कएलक धर्मचक्र प्रवर्तित, शील कील अछि क्षमा-विनय अछि धूरी, बुद्धि-स्मृतिक पहिया अछि सत्य अहिंसासँ युक्त, एहिमे बैसि भेटत शान्ति ई बाजल सभ यक्ष। मृगदावमे भेल धर्मचक्र प्रवर्तन। फेर अश्वजित आ ओकर चारि टा आन भिक्षुकेँ कएल निर्वाण धर्ममे बुद्ध दीक्षित, फेर कुलपुत्र यश प्राप्त कएल अर्हत पद यश आ चौवन गृहस्थकेँ कएल बुद्ध सद्धर्ममे दीक्षित घरमे रहि कऽ भऽ सकै छी अनाशक्त आ वनमे रहियो प्राप्त कऽ सकए छी आशक्ति एहिमेसँ आठ गोट अर्हत प्राप्त शिष्यकेँ बिदा कए आठो दिशामे चललाह बुद्ध पहुँचि गया जितबाक रहन्हि इच्छा सिद्धिसभसँ युक्त काश्यप मुनिकेँ। गयामे काश्यप मुनि कएलन्हि स्वागत बुद्धक, मुदा रहबाक लेल देल अग्निशाला रहए छल महासर्प जतए, रातिमे मुदा ओ सर्प प्रणाम कएल बुद्धकेँ भोरमे काश्यप देखल सर्पकेँ बुद्धक भिक्षापात्रमे कए प्रणाम ओ आ हुनकर पाँच सए शिष्य संग अएलाह काश्यक भाए गय आ नदी कएल स्वीकार धर्म बुद्धक प्राप्त कएल गय उत्तुंगपर निर्वाणधर्मक शिक्षा लए सभ काश्यपकेँ संग बुद्ध पहुँचल राजगृहक वेणुवण, बिम्बसार सुनि आएल ओतए देखल काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य बनल पूछल बुद्ध तखन काश्यपसँ छोड़ल अहाँ अग्निक उपासना किएक भंते काश्यप कहल मोह जन्म रहि जाइछ देने आहुति अग्निमे कएने पूजा पाठ ओकर, बुद्धक आज्ञा पाबि कएल काश्यप दिव्य शक्तिक प्रदर्शन आकाशमध्य उड़ि अग्निक समान जरि कए, तखन बिम्बसारकेँ देल बुद्ध अनात्मवादक शिक्षा विषय, बुद्धि आ इन्द्रिक संयोगसँ अबैछ चेतनता शरीर इन्द्रिय आ चेतना अछि भिन्न आ अभिन्न सेहो। बिम्बसार भऽ प्रसन्न दान बुद्धकेँ वेणुवन देल तथागतक शिष्य अश्वजित नगर गेल भिक्षाक लेल कपिल संप्रदायक लोक देखि तेज पूछल अहाँक गुरु के? कहल अश्वजित सुगत बुद्ध छथि जे इक्षवाकुवंशक सएह हमर गुरु कहए छथि बिन कारणक नहि होइछ किछुओ उपतिष्य ब्राह्मणकेँ प्राप्त भेल ज्ञान कहलक ओ मौद्गल्यायनकेँ मौद्गल्यायनकेँ सेहो प्राप्त भेलैक सम्यक दृष्टि सुनिकेँ सुनि वेणुवनमे उपदेश त्यागल जटा दंड पहिरि काषाय कएल साधना प्राप्त कएल परम पद काश्यप वंशक एकटा धनिक ब्राह्मण छोड़ल पत्नी परिजन प्रसिद्धि भेटल हिनका महाकाश्यप नामसँ। कोसलक श्रावस्तीक धनिक सुदत्त आएल वेणुवन गृहस्थ रहितो प्राप्त भेल तत्वज्ञान ओकरा उपतिष्य संगे सुदत्त गेल श्रावस्ती नगर जेत केर वनमे विहार बनएबाक कएल निश्चित् जेत रहए लोभी ढेर पाइ लेलक जेतवनक मुदा देखि दैत पाइ हृदय परिवर्तित भेल ओकर सभटा वन देलक ओ विहारक लेल विहार शीघ्रे बनि गेल उपतिष्यक संरक्षकत्वमे। बुद्ध फेर राजगृहसँ चलि देलन्हि कपिलवस्तु दिस ओतए पिता शुद्धोधनकेँ देल बौद्ध रूपी अमृत कोनो पुत्र पिताकेँ नहि देने रहए ई कर्म धरए अछि मृत्युक बादो पछोड़ कर्मक स्वभाव, कारण, फल, आश्रयक रहस्य बुझू, जन्म, मृत्यु, श्रम, दुखसँ फराक पथ ताकू आनन्द, नन्द,कृमिल, अनुरुद्ध, कुन्डधान्य, देवदत्त, उदायि कए ग्रहण दीक्षा छोड़ल गृह सभ अत्रिनन्दन उपालि सेहो कएल ग्रहण दीक्षा शुद्धोधन देल राजकाज भाए केँ रहए लगलाह राजर्षि जेकाँ ओ फेर बुद्ध कएल प्रवेश नगरमे न्यग्रोध वनमे बुद्ध पहुँचि चिन्तन कल्याणक जीवक करए लगलाह। फेर ओ ओतए सँ निकलि गेलाह प्रसेनजितक देस कोसल श्रावस्तीक जेतवन छल श्वेत भवन आ अशोकक गाछसँ सज्जित सुदत्त कएल स्वर्णमालासँ स्वागत बुद्धक कएल जेतवन बुद्धक चरणमे समर्पित। प्रसेनजित भेल धर्ममे दीक्षित तीर्थक साधु सभक कए शंकाक समाधान कएल बुद्ध हुनका सभकेँ दीक्षित। ओतएसँ अएलाह बुद्ध फेर राजगृह ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण,अंगदकेँ उपदेश दए, कएल सभकेँ संघमे दीक्षित। ओतएसँ गंधार जाए राजा पुष्करकेँ कएल दीक्षित विपुल पर्वतपर हेमवत आ साताग्र दुनू यक्षकेँ उपदेश दए अएलाह जीवकक आम्रवन। ओतए कए विश्राम घुमैत-फिरैत पहुँचल आपण नगर, ओतए अंगुलीमाल तस्करकेँ कएल दीक्षित प्रेमक धर्ममे। वाराणसीमे अस्तितक भागिन कात्यायनकेँ कएल दीक्षित देवदत्त मुदा भए ईर्ष्यालु संघमे चाहलक पसारए अरारि गृध्रकूट पर्वतपर खसाओल शिलाखंड बुद्धपर राजगृह मार्गमे छोड़ल हुनकापर बताह हाथी सभ भागल मुदा आनन्द संग रहल बुद्धक लग आबि गजराज भए गेल स्वस्थ कएल प्रणाम झुकि कए उपदेश देल गजराजकेँ बुद्ध देखल ई लीला राजमहलसँ अजातशत्रु भए गेल ओहो शिष्य तखन बुद्धक। राजगृहसँ बुद्ध अएलाह पाटलिपुत्र मगधक मंत्री वर्षाकार बनए छल दुर्ग बुद्ध कएल भविष्यवाणी होएत ई नगर प्रसिद्ध तखन तथागत गेलाह गौतम द्वारसँ गंगा दिस गंगापार कुटी गाममे देल उपदेश धर्मक फेर गेलाह नन्दिग्राम जतए भेल छल बहुत रास मृत्यु दए सान्त्वना गेलाह वैशाली नगरी निवास कएल आम्रपालीक उद्यानमे श्वेत वस्त्र धरि अएलीह ओ बुद्ध चेताओल शिष्य सभकेँ धरू संयम रहब स्थिरज्ञानमे लऽ बोधक ओखध प्रज्ञाक वाणसँ शक्तिक धनुषसँ करू अपन रक्षा। आम्रपाली आबि पओलक उपदेश भेलैक ओकरा घृणा अपन वृत्तिसँ माँगलक धर्मलाभक भिक्षा, बुद्ध कएलन्हि प्रार्थना ओकर स्वीकार, संगहि आएह भिक्षाक लेल अहाँक द्वार । सुनि ई गप जे आएल छथि बुद्ध आम्रपालीक उद्यान लिच्छवीगण अएलाह बुद्धक समीप बुद्ध देलन्हि शीलवान रहबाक सन्देश, लिच्छवीगण देलन्हि भिक्षाक लेल अपन-अपन घर अएबाक आमन्त्रण, पाबि आमन्त्रण कहलन्हि बुद्ध मुदा जाएब हम आम्रपालीक द्वार कारण हुनका हम देलियन्हि अछि वचन। लिच्छवीगणकेँ लगलन्हि ई कनेक अनसोहाँत, मुदा प्पबि उपदेश बुद्धक, घुरलाह अपन-अपन घर-द्वार। पराते आम्रपालीसँ ग्रहण कए भिक्षा बुद्ध गेलाह वेणुमती करए चारि मासक बस्सावास। चारि मास बितओला उत्तर, रहए लगलाह मर्कट सरोवरक तट। ओतहि आएल मार, कहलक हे बुद्ध नैरंजना तटपर अहाँक संकल्प जे निर्वाणसँ पूर्व करब उद्धार देखाएब रस्ता दोसरोकेँ, आब तँ कतेक छथि मुक्त, कतेक छथि मुक्ति पथक अनुगामी, आब कोनो टा नहि बाँचल अछि कारण करू निर्वाण प्राप्त। कहलन्हि बुद्ध, हे मार नहि करू चिन्ता, आइसँ तीन मासक बाद, प्राप्त करब हम निर्वाण, मार होइत प्रसन्न तृप्त गेल घुरि, बुद्ध धऽ आसन प्राणवायुकेँ लेलन्हि चित्तमे आ चित्तकेँ प्राणसँ जोड़ि योग द्वारा समाधि कएल प्राप्त। प्राणक जखने भेल निरोध, भूमि विचलित, विचलित भेल अकास, आनन्द पूछल करू अनुग्रह लिच्छवी सभपर, किएक ई धरा आ आकास, दलमलित मर्त्य आ दिव्यलोक। बुद्ध कहलन्हि आबि गेल छी हम बाहर, छोड़ि अपन प्रकोष्ठ, मात्र तीन मास अनन्तर छोड़ब ई देह, निर्वाण मे रहबा लेल सतत । आनन्द सुनि ई करए लागल हाक्रोस, सुनि विलाप लिच्छवी गण जुटि सेहो, विलापमे भऽ गेलाह संग जोड़ । बुद्ध सभकेँ बुझा-सुझा, चललाह वैशालीक उत्तर दिशा। पहुँचि भोगवती नगरी, देल शिक्षा जे विनय अछि हमर वचन, जे बोल अछि विनयविहीन, से अछि नहि धर्म। तखन मल्लक नगरी पापुर जाए, अपन भक्त चुंदक घरमे कएल भोजन बुद्ध, दए ओकरा उपदेश बिदा भेलाह कुशीनगरक दिस। संगे चुन्दक पार कएल इरावती धार सरोवर तटपर कए विश्राम, कए हिरण्यवती धारमे स्नान, कहल हे आनन्द, दुनू शालक गाछक बीच करब हम शयन। आजुक रातिक उत्तर पहर, करब प्राप्त निर्वाण। हाथक बनाए गेरुआ, दए टाँगपर टाँग, लऽ दहिना करोट कहल हे आनन्द, बजा आनू मल्ल लोकनिकेँ, भेँट करबा लेल निर्वाण पूर्व, शान्त दिशा, शान्त व्याघ्र-भालु, शान्त चिड़ई शान्त सभटा जन्तु। आबि मल्ल लोकनि कएल विलाप, मुदा बुद्ध दए सांत्वना घुरेलन्हि सभकेँ। आएल सुभद्र त्रिदंडी संन्यासी तकर बाद, पाबि अष्टांग मार्गक शिक्षा, कहल सुभद्र हे करुणावतार अहाँक मृत्युक दर्शनसँ पहिने हम करए चाहैत छी निर्वाण प्राप्त, बैसल ओ पर्वत जेकाँ आ जेना मिझा जाइत अछि दीया हवाक झोँकसँ, तहिना क्षणेमे कएलक निर्वाण प्राप्त। छल ई हमर अन्तिम शिष्य, सुभद्रक करू अन्तिम संस्कार । बीतल आध राति, बुद्ध बजाए सभ शिष्यकेँ, देल प्रातिमोक्षक उपदेश, कोनो शंका होए तँ पूछू आइ, अनिरुद्ध कहल नहि अछि शंका आर्य सत्यमे ककरो। बुद्ध तखन ध्यानक एकसँ चारिम  तहमे पहुँचि, प्राप्त कएल शान्ति। भेल ई महापरिनिर्वाण, मल्ल सभ आबिउठेल बुद्धकेँ स्वर्णक शव-शिविकामे, नागद्वारसँ बाहर भए कएलन्हि पार हिरण्यवती धार, मुदा शवकेँ चन्दनसँ सजाए, जखन लगाओल आगि, नहि उठल चिन्गारि, शिष्य काश्यप छल बिच मार्ग, ओकरा अबिते लागल चितामे आगि। मल्ल लोकनि बीछि अस्थि धऽ स्वर्णकलशमे, आनल नगर मध्य, बादमे कए भवन पूजाक निर्माण, कएल अस्थिकलश ओतए विराजमान। फेर सात देशक दूत, आबि मँगलक बुद्धक अस्थि, मुदा मल्लगण कएल अस्वीकार, तँ बजड़ल युद्धक युद्ध, सभ आबि घेरल कुशीनगर, मुदा द्रोण ब्राह्मण बुझाओल दुनू पक्ष। बाँटि अस्थिकेँ आठ भाग, द्रोण लेलक ओ घट आ पिसल गण छाउर बुद्धक, सभ घुरलाह अपन देश आब। अस्थि कलश छाउर पर बनाए स्तूप, करए गेलाह पूजा अर्चना जाए, दसटा स्तूप बनि भेल ठाढ़, जतए अखण्ड ज्योति आ घण्टाक होए निनाद। फेर राजगृहसँ आएल पाँच सए भिक्षु, आनन्दकेँ देल गेल ई काज, बुद्धक सभ शिक्षाकेँ कहि सुनाऊ, होएत ई सभ समग्र आब। हम ई छलहुँ सुनने एहि तरहेँ, कएल सम्पूर्ण वर्णन नीक तरहेँ। कालान्तरमे अशोक स्तूपसँ लए धातु कए कएक सए विभाग, बनाओल कएक सए स्तूप, श्रद्धाक प्रतीक। जहिया धरि अछि जन्म, अछि दुख, पुनर्जन्मसँ मुक्ति अछि मात्र सुख, तकर मार्ग देखाओल जे महामुनि, शाक्यमुनि सन दोसर के अछि शुद्ध। महावीर विदेहक राजधानी छल वैशाली, गण्डकी बहैत रहथि ओतए, लिच्छवीगणक गणराज्य, गण्डकीक तटपर दू टा टोल, ब्राह्मण आ क्षत्रियक कुण्डग्राम, क्षत्रिय कुण्डग्राममे जनम लेल ज्ञातृकुलक मुखिया सिद्धार्थ पिता, मुखिया चेतकक बहिन त्रिशला छलि माता, जाहि राति आएल गर्भ भेल माताकेँ स्वप्न, भोरमे पण्डितगण कहलन्हि एकर अर्थ, होएत प्रतापी पुत्र ज्योति एक हेरायल सखी भरल पूरल जीवन मे किछु हेरायके आभास एक विचित्र दु:ख सऽ सखी अछि उदास फुन्गी पर जेना फुलैल एक असगर पलास नोरके नुकाबैत ऑखि करैत हॅंसक प््रायास जीवन तऽ निरन्तर बढ़ल जा रहल छल लेकिन ओकर मोन घुरि-घरि जा अटकल जतऽ बितौने छल अल्हड़ता  सऽ भरल जीवनके अनुशासनहीन मुदा उन्मुक्त पल एक हमरे लग छल ओकर अन्तर्मन देखार सोचलहुॅं समयके फैसलाके करी स्वीकार परन्तु अहि सऽ नहिं दूर भेल मोनक विकार एना तऽ हम्मर संगी भेनाई भेल धिक्कार बीतल बात बिसरऽओकरो कहलियै जाहिदिन उपाय सुझेनाई जेना भऽ गेल आर कठिन अपन हठमे दृढ़ होयत गेल दिन प््रातिदिन की जानि ककर भरोसमे छल अभागिन नहिं कम कऽ सकलहुॅं ओकर आसक्ति कतेक क्रोध छल भरल ओकरा  प््राति बस सोचैत रहलहुॅं ओकरे दऽ दिन राति ओ व्यस्त भऽ लिख रहल छल प््रोमक पाती कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि। चक्‍का चक्‍का जे संस्कृति के शान छल ़ आब उन्नति के पहचान बनि गेल । अहि सभ्य समाज में जे जतेक नमहर तेकरा लग ततेक चक्‍का बङका दाैङल छाेटका दाैङल तेकरा पाॅछा नेंगङा दाेैङ रहल अछि आ दाेेैङि दाैङि क बैसाहय लागल नब नब पेेैघ पेेेेेेेेेैघ सुन्नर सुन्नर चक्‍का जेकर किछु पूछ नेेेेेै छले ैसेहाे गुङकि रहल अछि चारू कात चक्‍के चक्‍का आ ़ ‘ अहि चक्‍का सॅ जाम भ रहल अछि नगरक महानगरक सीमित सङक गारा गारी ठाेकम ठाेक थाना पुलिस काेट कचहरी जेळ सबहक पाछा लागि गेल अछि चक्‍का चक्‍का हटै तखन नेेै जाम हटतै डंडा बरसाबेेेेेेेेेैत पुलिसबाे थकले ेैकाेनाे राेक नै इर् ससरति ससरति टतेक ऊपर पहुॅच गेल अछि जत्त सॅ नीचा महाविनाशक ढलान छेेै चक्‍का के नियति आब की प्रगति आगाॅ बढते क़त्त ढलान प चढि आेहि ठाम विराम लेतए त काेना कि अहि प साेचलन्हि कहियाे आधुनिक विज्ञानी लाेक डॉ पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। रघुवीर सहायक साहित्यपर जे.एन.यू.सँ पी.एच.डी.। रावलपिंडी - पंकज पराशर (एक)

रावलपिंडी सँ आइयो बहुत दूर लगैत छैक लाहौर बहुत दूर... जतय स्वतंत्रता केर समवेत स्वर प्रचंड नरमेधक अनंत इतिहास मे बदलि गेल छल

दूर-दूर होइत समय मे अनघोल करैत अनंत स्वर-श्रृंखला ...जेहो सब छल निकट से दूर भेल जा रहल अछि दूर-दूर होइत बहुत किछु विलीन भेल जा रहल अछि

चारू दिशा मे टहलैत इंसाफी मरड़ आ छड़ीदार लोकनि इंसाफ करबाक लेल अपस्यांत वर्तमान सँ भविष्य धरि आश्वस्त होइत अगुताएल छथि इतिहासो मे घुरि कए इंसाफ करबाक लेल

(दू)

जखन हम फोन पर होइत छी खांटी मातृभाषी मायक लेल बजैत चिंताहरण बोल आ कि टैक्सी रोकैत ड्राइवर करीम खान अविश्वास आ आश्चर्य भरल स्वर मे पुछैत अछि --भाय तोंय हिंदुस्तानी छहो? हमरा अब्बा सँ तनी मिलभो -हुनि बोलइ छथिन इएह बोलीजे तोंय अखनी बोलइ रहो आ शनै: शनै: पसरि जाइत अछि हमरा टैक्सी मे आकुल-व्याकुल अविभाजित देशक भागलपुर आ मुंगेर लाहौरक बाट मे

(तीन)

हमरा डाकघरक मोहर मे आइयो कायम अछि मुंगेर आ एतय कतरनी धानक चूड़ा मोन पाड़ैत करीम खानक वृद्ध पिता दुनिया सँ जयबा सँ पूर्व एक बेर जाइ चाहैत छथि अपन देसकोस एकटा देश भेटबाक बादो ओ तकैत छथि अपन देसकोस

अपन देस स नगर-नगर बौआइत कइक कोस हम पहुंचल छी रावलपिंडी जतय आइयो पछोड़ धयनें अछि देसकोस

कोस-कोस पर परिवर्तित होति पानि एतेक कोस दूर ओहिना लगैत अछि जेहन अपन गाम केर इनारक आ दस कोस पर परिवर्तित होइत बोली साठि-एकसठ बरखक बादो ओहने लगैत अछि जेहन आजुक भागलपुरक

हम तकैत छी इतिहास दिस आ सामूहिक स्मृति सँ विलीन इतिहास हमरा दिस जे भेटैत अछि हमरा कइक कोस दूर रावलपिंडी मे

(चारि)

जतय एक्के संग घटि रहल अछि अनेक घटनाचक्र गहूमक चिक्कस लेल तनाइत ए.के-सैंतालिस सैंतालिस सँ सैंतालिसक चक्रवृद्धि देखैत ठाम-ठाम सँ आयल रावलपिंडीक किछु वृद्धजन उच्चरित करैत छथि मंत्र जकां -इस्लामाबाद इस्लाम-आबाद आ...बाद आबाद लोकक बीच सब बरबाद

(पांच)

बाघाक बाधा ब्रह्मांडक संपूर्ण बाधा सँ बेशी मोसकिल छैक नुनू तोंय अइलहो हमरा सँ मुलाकात करलहो ...मिललहो मिल विलीन होइत अस्सी बरखक जमकल नोर मे हमरा मात्र लहो...लहो...लहो...केर सृष्टिक सब सँ आदिम स्वर पंचम मे भागलपुरक सामूहिक स्मृति सँ विलीन इतिहासक जीवंत कथा वर्तमानक कैनवास पर पसरि रहल छल!

(2008) सुबोध ठाकुर 1 मनमे उठैये बेर-बेर विचार नहि सहबए आब अत्याचार शब्दक वाण चलेबए हम अपन सौम्य शक्ति बढ़ेबए सुन्दर मिथिला पेंटिंग ओ संस्कृति सँ खान-पान मिथिलाक वैभव सँ दुनियाँमे विदेहक माँटिक अलख जगेबए हम अपन सौम्य शक्ति बढ़ेबए मृदु भाषा अछि अपन धरोहर जाहिसँ बनब हम सभक ह्र्देश्वर से आब सभकेँ जनेबए विदेहक म्काटिक अलख जगेबए 2 पिया हमर परदेशिया होली खेलब ककरा संग पिया हमर परदेसिया यौ के बुझत हमर उदगार,के दोसर करत विचार पिया हमर परदेशिया औ। केश फुजल मन अछि सुतल हृदय के वेदना अछि मुदा जागल के दोसर करत एकर परितिकार, नाहि से बुझै हमर सनेहिया यौ होलि खेलब ककरा संग पिया हमर परदेशिया यौ। बैरि बानाल हमर मधुमास, जगबै रहि-रहि कामना और आश, कोयलिया के कुहुक मन के सतबै से नहि बुझै नीरमोहिया यौ होली खेलब ककरा संग पिया हमर परदेशिया यौ । कहै सुबोध धनि जुनि कानु जुरशितल मे करै ले शितल औताह अहां के मनबसिया यौ । मूल अँग्रेजी कथा : अनदर संडे कथाकार : गैस्पर अल्मीडा मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह एकटा आर रबि ओ अपन पड़ोसक पाथरसँ भरल फर्श वला हातामे जयबाक लेल जहिना दरबज्जा  खोललक, भोरक शीतल हवा ओकर स्वागत केलकैक। ओतए केवल पाँचे टा घर छलैक जाहिमे रह’ वलाक अपन पुश्तैनी नाम छलैक, ओकर वार्ड केर पुश्तैनी नाम छलैक, अल्मीडा वाडो। दरबज्जाक बाहर पुरनका कल, जकरा बहुत पहिनहि नबका कल केर कारणेँ छोड़ि देल गेल छलैक, ताहिसँ नमगर नोकगर बरफ लटकल रहैक। ओकरासँ सटले इनार देख-रेख केर अभावमे सूखि गेल छलैक। तैयहुँ एहिपर एखनधरि बालु नहि जमल छलैक। रोल्डाओ ब्रेगेन्जा झुकल, आँगुरसँ ओकरा पकड़लक आ ओहि जमलका बरफकेँ एखनहि पूरब दिससँ आबि रहल सुरूजक किरण केर समक्ष उठौलक। ओहि बरफ पर प्रकाश केर किरण पड़ितहि इन्द्रधनुषी रंग जगमगा उठलैक। छोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक, ई आवाज हाता केर जानवरकेँ सचेत क’ देलकैक। जे कि ओकर प्रतीक्षा क’ रहल छल, बुझनामे आयल जे ओ सभ कहि रहल हो, “चारा केर समय तँ कखनहि भ’ चुकल छैक? रोल्डाओ पाथरक बाट छोड़ि भूसासँ झाँपल धरती पर आएल आर पयरक नीचाँ नरम मौसममे बनल खुरसँ बनल उभर-खाभर बाट महसूस कएलक। पूबरिया देवालक इमारतकेँ  पार क’ कए जखन ओ दरबाजा खोललक तँ ओकर स्वागत बाछाक आवाज आर परिचित जानवर सभक महक कएलक। उठलका कूड़ादानक मुँह खुजल आर देवालसँ लागि कए टनटनाएल, आर एकटा भुरा केश (फर) फहराएल, जेना जलखै क’ रहल मूस उछलि पड़ल हो। ओकरा ठोरपर छोट-सन अपभाषा एलैक आ ओ  चारा नापै वला बरतनसँ मूसकेँ मारलक। आगूक एक घंटामे ओ बिना किछु बिसरने अपन दिनचर्या एक नियत गतिसँ पूर्ण कएलक। ओ अपन भोरक कएल गेल काजसँ आनन्द उठौलक आ परिचित दायित्व ओकरा आत्मसंतुष्टिक अनुभूति देलकैक। रोल्डाओ बहुत बेसी प्रेम व्यक्त कर’ वला व्यक्ति नहि छल, मुदा चारा देबा काल बाछा ओकर हाथ चाटैत रहैक आ बिलाइ ओकरा पयरसँ अपन पीठ नहु-नहु रगड़ैत छल, एहिसँ ओ बेसी आह्लादित भ’ रहल छल, जाहि भावकेँ ओ प्रायः  छिपौने रहैत छल, ताकि लोक भाँपि नहि सकए। ओकर सब काज पूर्ण होइत-होइत सुरूज बगैचा आ आन गाछ-विरीछ पर पड़ल ओसकेँ मेटाबैत-जराबैत अपन छाँही छत आर बगैचाक अधखुला स्थान पर पसारने जाइत छल। भानसघरमे घुसतहिँ ओकरा एकटा सुखद अनुभूति भेलैक किएत तँ मद्धिम आँच पर सूगरक माउस शनैःशनैः सीझैत रहैक, जकर तेज महक ओकरा आह्लादित कएलक। अपना जेबीमे हाथ डालि ओ सलाय निकाललक जकरा ओ प्रायः एकटा चामक बौगलीमे राखैत रहैक, आ एक दिन पहिलुका पाईपकेँ भर’ आ सुनगाब’ क लेल ओ बढ़ल।  ओकर ई काज ओकर स्थिर आ मन्द गति वला नियामकक अनुरूप छलैक। जेना-जेना प्रकाश अपन पयर पसारलक, मद्धिम लील रंगक मेघसँ हवा भरि गेलैक। स्टोवक लौ जहिना एकटा भभकारक संग कम-बेसी होइक तहिना ओकर ध्यान प्रतिदिनक चीज-बीत पर चलि जाइक। जाड़मे बाहर अएलाक बाद ओकरा भानसघरक गरमी दिवास्वप्न जकाँ बुझाइक। क्यो ओकरा आइ याद केने हेतैक, ओ सोचलक, मुदा नास्ता पर किछु बाजि नहि भेलैक.....कखनहुँ किछु बेसी नहि कहल गेलैक, कतेक समय बीत गेलैक एखन धरि?  ओ साठिक अछि वा एकसठि केर? ओ स्मरण नहि क’ सकल। ठीक! ओ धीरे सँ बाजल, “जँ हम नहि याद क’ सकैत छी तँ क्यो आन किएक?” ओ अपन पयर पसारलक आ ठाढ़ भ’ गेल। दरबज्जा लग खूँटीसँ टाँगल कोट केँ पार करैत ओ अपन जैकैट पहिरलक ओ कोनमे राखल छड़ीकेँ हाथमे एना पकड़लक जेना ओ ओकर पुरान मीत होइक। रोल्डाओ दरबज्जासँ  बाहर निकलि सड़क पार कएलक, चारू दिस गामक अवलोकन कएलक। कोना एहन एहि छोट-सन गाम ‘पारा’ मे सभ चीज बदैल गेलैक। वर्षक अवधिमे सभ किछु उसराह भ’ गेलैक, मुदा ओ जानैत छलैक जे धरतीक नीचाँ सूतल जीवन समयक जादूसँ फेर जागि उठतैक। ओ घुमल आ नापल-जोखल पयरेँ सड़कक नीचाँ दिस चलि पड़ल, एकटा छोटका बाट पर जतए एकटा करिया-झबड़ा कुकुर प्रतिदिन दौड़क प्रत्याशामे प्रतीक्षा करैत छल। कुकुर अपन उर्जाक पहिल स्फोटमे गाछ आ झुरमुट दिस दौड़ पड़ल, ओ विभिन्न प्रकारक गंधकेँ सूँघलक आ  निरीक्षणक बाद नव आनन्दमे डूबि गेल। कुकुर ‘ब्लैकी’ रूकल, अपन कानकेँ ठाढ़ कए बुझू जेना हवामे अपन परिचित जूताक चालिक ध्वनिकेँ पकड़’ चाहैत हो। उर्जाक दोसरहि स्फोटमे ओ सक्रिय भ’ गेल, अपन मालिकक चालिक अनुसरण करए लागल, सड़कक कात-कात रोचक चीज सभकेँ ओ जाँच’ लागल। पयर उठाकए ओ अपन जागीरकेँ कुकुरक मुद्रामे निश्चिन्तताक  संग चिह्नित कएलक। गलीक मोड़ पर रोल्डाओ अपन छड़ीकेँ एकटा प्लास्टिक बैग, जाहिपर—दुबई ड्यूटी फ्री—फ्लाई दुबई—स्पष्ट रूपसँ लिखल रहैक आ जकरा जारमे कोनो लापरवाह फेक देने छलैक, ताहिमे खोधबाक लेल रूकल। ओ सावधानीसँ एहि वस्तुकेँ उठाकए कूड़ेदानी दिस ल’ गेल, ई सोचैत जे ओ एना करबलाक बगैचामे फेकि देत। मोनमानी जेहन चीज ओकरा भीतर क्रोध उत्पन्न क’  दैत छलैक, ओ व्यवस्था ओ नियमक पक्षधर छल, सभ चीज-बीतक लेल एकटा नियत स्थान आ सब स्थानक चीज-बीत अपन स्थान पर। कोनो चीज खराब नहि होइत छलैक, तागक टुकड़ी सभ जमा कएल जाइत छलैक आ प्लास्टिक के पन्नी धरि तह लगा कए राखल जाइत छलैक। जकरा ओ व्यर्थ पदार्थ बुझैत छल ओकरा अपन पियरगर लाल रंगक टाइलसँ बनल घरक पिछुआड़मे उचित मौसम आ हवाकेँ देखिकए ओकरा जरा दैत छलैक। रोल्डाओ एक जागरूक व्यक्ति छल, भोरसँ ल’ कए साँझ धरि काज करबाक आदति ओ अपन उमिरक आरम्भिकहि अवस्थामे डालि नेने छल, माँटिसँ जीविका निकालबाक आ ओकरा संगहि अपन परिवारक जीवन-यापन चलएबाक लेल अपना-आपकेँ योग्य बनएबाक ओकरा गर्व छलैक। ओकरा अपना-आप पर गर्व हेबाक एकटा आर कारण छलैक ओ ई जे ओ ने तँ ककरहुँ सँ किछु माँगैत छल आ ने ओकरा पर ककरहुँ कोनो कर्ज छलैक। ओकरा भगवानसँ डर लागैत छलैक आ ओ ईश्वरीय तत्वकेर निर्भरतासँ अवगत छल, मुदा गामक चर्च-प्रशासन, संगहि पवित्र क्रॉस केर छोट पदाधिकृत छोट चैपल केर आलोचक सेहो छल। ओ ने केवल अपन विचार सबकेँ वा अपन कोनो जान’वलाकेँ सुनबैत छल, अपितु अपन भावनाकेँ अपन स्पष्ट मुखमुद्रासँ व्यक्त सेहो क’ दैत छल अथवा गप्पक काल विषयक उत्तर चुप्पीसँ द’ दैत छल। नमहर तंग सड़कसँ खेत धरि ओकर यात्रा आर एक छोट नदी पतझड़ केर पातसँ भारी भ’ गेल छल आ ओकरा पयर तर दबा गेल छलैक, कखनहुँ-कखनहुँ डारिकेँ टुटबाक आवाज केँ छोड़ि। कुकुर अपन नाँगरि आ मुँहक संग कखनहुँ-कखनहुँ कटनूर मूसक बिलक लग सूँघि लैत छल, जतय मूस भोरे-भोर अपन घरक विस्तार करबाक हेतु बहुत रास माटि बहार कएने छल, ओ ओकर ताजा गंध चिन्हैत छल। जहिना ओ गाछसँ बाहर आएल, रूकि गेल। कुकुर “ब्लैकी” फव्वारासँ जे कि सालो भरि बलबलाइत रहैत छलैक, पानि पी कए खद्धासँ बाहर आएल, माथ हिलाकए पानि झाड़लक आ एकटा चिपकल गुरचाकेँ निकालबाक लेल ओ अपन कान हिलबैत नीचाँ बैसि गेल। अपन प्रेक्षण स्थानसँ रोल्डाओ गाड़ीक बाट देख’ लागल, मानू गाम पर कोनो चोटकेर निसान छैक, शोरगुल करैत गाड़ी धुइयाँ निकालैत एना बुझाइक जेना  कंकरीटक फीता पर चुट्टी चलि रहल हो। गामक शांतिक भीतर आत्मघातक जल्दीबाजीमे ओ गाड़ी सभ चुपचाप देख’ जायसँ अन्जान बढ़ल जाइत छल। रोल्डाओ बनाओल जा रहल सड़ककेँ ध्यानसँ देखलक, अमोल जमीनसँ हाथ धो लेबाक कारणेँ ओकरा दुख छलैक, मुदा ओकरा बदलामे देल गेल हरजानासँ ओ खुश छल। ओ माँटि खोध’ वला उपकरणसँ चकित छल,  ओकर आकार आ काज करबाक क्षमतासँ ओ अभिभूत छल, अंततः परिणाम जे ओ आश्चर्यचकित छल किएकतँ जे किछु ओकरा देखा पड़ैत छल ओ ओकरा समझसँ दूर छलैक। अपना जवानीक दिनकेँ याद करैत ओ अपन साठि बरखक अवस्थासँ पाछू देखलक, जखन केवल खेत आ गाछ-बिरीछ, पड़ोसक गाम नगोआ, सेलिगाओ धरि देखल जा सकैत छल आर पहाड़क उपर मान्टे-डी-ग्यूरिम इसकूलक भवन..... जतय धरि ओकर दृष्टि जा सकैत छल। कैक तरहक परिवर्तन भेल छलैक मुदा रोल्डाओ स्पष्टतः एकरा स्वीकार नहि क’ सकल जे, जे किछु भेलैक से नीकेक लेल भेलैक। भिनसरबाक काजक लेल आवाज दैत चर्च केर घंटा हवामे स्पष्ट सुनबामे आएल, समय देखबाक लेल ओ दहिना हाथ सँ वास्कट वला जेबीसँ घड़ी निकाललक आ कैक बेर घुमा-फिरा कए  देखलाक बाद ओकरा आपिस राखि देलक। फेर ओ पाइप भरबाक लेल अपना हाथ पर तमाकुल रगड़लक, अपन अभ्यस्त हाथक आँगुरसँ विधिवत पाइप भरलक आ आगिक सुलगा सोंटलक। आगू बढ़बासँ पूर्व ओ कैक बेर सोंट मारि धुइयाँ निकालि अपनाकेँ आश्वस्त कएलक जे तमाकू बरोबरि जड़ैत रहए। घरक बाहर लटकल धातुक बुरूश सँ ओ अपन जूत्तामे लागल माटि झारलक आ फेर बुरूश सँ गंदगी साफ कएलक। ओ भानसघरमे गेल जूता उतारलक आ दरबज्जा लग पुर्तगाली कुर्सी पर बैसि गेल, अपन पछिला जनमदिन पर भेटल पनही (चप्पल) अपन पयरमे पहिर लेलक। दुपरहक भोजन (डिनर) बारह बजे मेज पर राखल जाइत छलैक। आन चीज जकाँ भोजन सेहो नियत समय पर खा लेल जाइत छलैक, लंच शब्दक प्रयोग नहि होइत छलैक. दूध दूह’ आर चारा देलाक पश्चात् नाश्ता आठ बजे देल जाइत छलैक। बारह बजे डिनर, चारि बजे चाह आर दस बजे सपर (रातिक भोजन) । एहि तरहेँ सभ दिनक दिनचर्या नियत छलैक, ई क्रम तखनहि बदलैक जखन क्यो भेंट कर’ आबैक वा कोनो समाचार देब’ आबैक। मेज पर बैसैत ओहि रबिक भोजन करबाक हेतु ओ काँटा आ चक्कू उठौलक.....बदामी रंगक भाफ निकलैत सालनसँ झाँपल पुडिंग केर सुनहरा रंग पैघ टुकड़ा। एकर बाद ओकरा समक्षहि बीफ (सुगरक माउस) राखल रहैक, जकरा ओ अपन समक्ष राखल चक्कूकेँ स्टील पर धार तेज करैत निकाललक। ककरहुँ आन प्रकारक भोजन पसिन्न हेबाक स्थितिमे ओहो सभ भोज्य पदार्थ ओतए राखल रहैक, सामान्यतः रबिक भोजन ककरहुँ लेल पर्याप्त होइत छल। चाहक समय चारि बजे भलैक। चाह पीलाक पश्चात् ओ खिड़कीसँ आबैत रोशनीक दिस पीठ क’ कए बैसबाक लेल सामने वला घरमे गेल। अपन चश्मा लगौलक आ शेष दुनियाँक समाचार जानबाक लेल ओ रबि दिनका समाचार-पत्र उठौलक। ओ शीघ्रहि अलसा गेल, जहिना ओकरा पर निन्न सवार होमए लागलैक, ओ माथकेँ आरामसँ कुरसीक कुशन पर राखि देलक। घर मे लोकक आवाजसँ रोल्डाओ जागि गेल—दौड़बाक कारणेँ पयरक खड़बड़ाहटि आ दूई बच्चा द्वारा एक दोसराकेँ धकेलैत दरबाजा खोलबाक आवाज, ओहि दुनूकेँ ओकरा लग पहुँचि पार्सल देबाक जल्दी। ओ कुरसी पर चढ़ल ओकरा चुमलकै आर जन्मदिन केर बधाई देलकैक, ओ बड़ कुशलतासँ एक दोसराकेँ अपन बाहुपाशमे जकड़लक। पहिने ककर पार्सल खोलल जाय? एहि समस्याक समाधान ‘लेडीज फर्स्ट’ कहि कए समाधान कएल गेल। बालक बाजल, “दादा नीक चीजकेँ बादक लेल राखैत छथि”। जहिना टकराव केर स्थिति उत्पन्न भेलैक, ओ ओहि दुनूकेँ कपड़ा बदलबाक आ बाहर जा कए खेलबाक लेल कहलकैक। जेना ओकरा दुनूकेँ मोनमे आनन्दक अनुभूति भेलैक, ओकरा कानमे हँसी केर आवाज आबि टकराएल। भानसघरमे नओ बजबाक आवाज सुनबा धरि, दुपहरसँ साँझ धरि ओकर मीत, संबंधी लोकनिक बधाई ओ उपहार ल’ कए अएबाक क्रम चलितहि रहलैक। ओ रातिकेँ पहिर’ जाएवला पयजामा पहिरलक, खूट्टीसँ स्कार्फ खींचलक गरदनिमे लपेटलक आ जाड़क अनुसारेँ ओकरा नीक जकाँ बान्हलक, सभ दिनक रात्रिकालीन नियमक अनुसार लकड़ीक नमगर ‘अदाम्बो’ सँ मुख्य द्वार धरि खिड़की ओ दरबज्जाक छिटकिनी जाँचलक। खिड़की लग राखल एक बहुत महत्वपूर्ण चीज—छओ सेलवला बड़का टार्च उठौलक, ओकर प्रकाशमे अपन सभ सामान केर निरीक्षण कएलक। ओकरासँ कनेक आगू सदा ओकरा संग रह’वला ओकर कुकुर ब्लैकी ओकरा संगहि-संग घूमल। अकाशमे जगमग करैत तरेगण केर  रातिमे जहिना ओ उपर देखलक, शीतल बसात ओकरा गाल पर थपेड़ा मारलकैक, एकटा मद्धिम प्रकाशक संग चान फार्म केर घरकेँ आलोकित करैत रहैक। आपस आबैत ओ सभ दरबाजाकेँ बंद कएलक आर ई सुनिश्चित कएलक जे सभ किछु सुरक्षित अछि कि नहि। तखन ओ उठिकए भानसघरमे राखल चमचम करैत कागदक टुकड़ा उठौलक। कागदक नीचाँ लिखल शब्द रहैक, “जन्मदिन मुबारक.....दिन मंगलमय हो ”। ओ लिखावट पर ध्यान देलक, शब्दकेँ धीरे-धीरे पढ़लक आर फेर मोनहि-मोन मुसकी देलक आ जोरसँ कहलक। “भगवानक सौगन्ध, हँ........ई एकटा नीक रबि रहल।” बालानां कृते- 1. मध्य-प्रदेश यात्रा आ 2. देवीजी- ज्योति झा चौधरी 1. मध्य प्रदेश यात्रा छठम दिन : २८ दिसम्बर १९९१ , शनिदिन : आई जबलपुरमे हमर सबहक यात्राक पहिल स्थान छल द्यमोतीलाल नेहरू पार्क'।अतक बगान विभिन्न प््राकारक पुष्प सऽ सुसज्जित छल।जगह जगह पर राखल हाथी, बाघ, चीता इत्यादिक मूर्त्ति सेहो आकर्षक छल।संध्याकालमे होए वला संगीतमय फब्बाराके हमसब नहिं देख सकलहुॅं।अतय एकटा छोट स्वीमिंग पुल छै।एक ठाम रानी दुर्गावतीक विशाल प््रातिमा छै जाहिके नीचा रानीक जीवनी संक्षेपमे लीखल अछि।अहि अनुसारे रानी दुर्गावतीक जन्म सन्‌ १५२४ ईसवी में तथा मृत्यु सन्‌ १५६४ ईसवीमे भेल छलैन।अकर बाद हमसब चिल्ड्रेन्स पार्क पहुॅंचलहुॅं जतय झूला, स्लाइड इत्यादि छल। आगॉं रानी दुर्गावतीक संग्रहालय छै जतय प््राागैतिहासिक कालक वस्तु सब राखल छै।किछु प््रातिमा तऽ बाहर बगान मे राखल छल।जेनाकि त्रिमुख कार्त्तिकेय (११म शताब्दी), सूर्य प््रातिमा (१०म शताब्दी),  राजलक्ष्मी (११म शताब्दी), देव एवम्‌ उपासक (१३म शताब्दी), साधु (१०म शताब्दी), चतुर्भुजी देवी (१०म शताब्दी), नाग दम्पति (१०म शताब्दी), युगल दम्पति (११म शताब्दी), लक्ष्मीनारायण (१०म शताब्दी), देवी (११म शताब्दी) इत्यादि।अहि संग्रहालयक शिलान्यास मुख्यमंत्री पंडित उारिका प््रासाद मिश्रक कर्मठ करसऽ नगर निगम जबलपुर उारा आयोजित कैल गेल छल।अहि संग्रहालय के अनेक दीर्घामे बॉंटल गेल छै। दीर्घा नंबर 1 मे शैव मत सऽ सम्बन्धित प््रातिमा सब छै।ई सब मूर्त्ति जबलपुर के दमाई जिलाक भिन्न भागसऽ प््रााप्त भेल छै।एहेन अनुमान छै जे अहि सबहक निर्माण १०म एवम्‌ १२म शताब्दीक बीच भेल छै।अहि दीर्घामे उमा, महेश्वर, पार्वती, शिवस्नातक, हरिहर, भैरव इत्यादि के प््रातिमा विराजमान छै।दीर्घा नम्बर २ मे भगवान विष्णुक विभिन्न रूपक प््रातिमा सुरक्षित राखल छै।ई सब उत्तर मध्यकालक निर्मित्त छै।दीर्घा नम्बर ३ मे जैन तीर्थकर और जैन शासक देवी सबहक प््रातिमा छै जे त्रिपुरीके कलचुरी राजाक राज्यकालमे निर्मित्त भेल छै। अहि सबहक अतिरिक्त अहिसंग्रहालयमे अनेको प््रााचीन शिलालेख सुरक्षित छै।अहिमे सऽ एक शिलालेख ब्राह्मी लिपि भटगॉंव सऽ प््रााप्त भेल छै।अहिमे मनुष आऽ पशुक चित्रक खुदाई कैल गेल छै।अतय लोहगा आऽ चन्देलकालक आयताकार शिलालेख सेहो छै। अहि ठाम सऽ बहरा हमसब भोजन केलहुॅं। भोजनोपरान्त हमसब भेड़ाघाट पहुॅंचलहुॅं।जबलपुर सऽ मात्र २३ किलोमीटरक दूरी पर स्थित संगमरमरक पहाड़क बीच विशाल जलप्रपातक भव्यताक वर्णन शब्दमे केनाई असम्भव लागैत अछि।अखन तक जतेक जलप््रापात देखने रही ई सबस सुन्दर आऽ विशाल छल।अमरकण्टकमे नर्मदाक बाल्यकाल अवलोकित होइत अछि आऽ अतय नर्मदाक युवावस्थाक उन्मत्त रूपक दर्शन होएत अछि।जल प््रावाहक ध्वनि सऽ पूरा वातावरण तरंगित छल तथा जलक छोट छोट कण पूरा वातावरण मे भरल छल। शान्त भऽ कऽ अतय घण्टों बिताबक मोन होइत छल।अतक स्थानीय गरीब निवासी सब जाहिमे १२ वर्ष तक के छोट बच्चा सब सेहो शामि छल पाई उारे लोक सबके झरना सबसऽ घिरल अतेक वेगवान धारमे डुबकी करतब देखा पर्यटक सबहक मनोरंजन करैत छल। भेड़ाघाटक मुख्य आकर्षण आर एकटा छै।से छै चौंसठ योगिनी मन्दिर।ई मंदिर एकटा पहाड़ी पर स्थित छै।अहिमे चारू दिस चौसठ टा मन्दिर योगिनी सबहक छै आर बीचमे महादेवक मन्दिर छै।अहि मंदिरक निर्माण ८म शताब्दीमे भेल छलै।तखन अहिपर छत नहिं छलै।मुदा १०म शताब्दीमे अहिपर छत बना देल गेलै।अकरा किछु लोक तांत्रिक के सिद्धिस्थल मानैत छथि।अकर बाद हमसब नर्मदा नद के एक आर स्वरूप मार्बल रॉक्स देखैलेल गेलहुॅं।अतय संगमरमर के पहाड़ीक बीच बहैत नर्मदा नद अत्यंत रमणीय लागैत छै।अतय पत्थड़के नक्काशी कैल समान सब कम दाम मे आ बहुत सुन्दर डिज़ाइन सब उपलब्ध छै।कोनो नाम वा वाक्य संगमरमरके पत्थर पर खुदवायल जा सकैत छै। मोल मोलाई खूब चलैत छै। हमरा एकटा सीनियर लड़का दू टा फूलदानी एकटाके दाम मे खरीदवा देलक।अहि ठाम नौका विहार सेहो खूब होइत छल। हमहु सब बहुत उत्सुक भेलहुॅं मुदा शिक्षक सब नहिं मानलैथ। अकर बाद हमसब जवाहरलाल नेहरू पर्यटक पार्क गेलहुॅं जतय विभिन्न जन्तुके पिंजरामे बन्द पौलहुॅं।ई पार्क कम आ चिड़ियाघर बेसी लागैत छल।अकर बाद हमसब अपन अस्थायी बसेरा द्यपॅंवार होटल' आबि गेलहुॅं। 2.देवीजी : देवीजी ः रामायण सप्‍ताहमे चित्रकला प्‍्रादर्शनी देवीजी सबलग रामायण सप्‍ताह पर चर्चा कऽ रहल छली।ताहि पर रामायणक विशेषता पर ज्ञानवर्द्धन हुअ लागल।आेना तऽ रामायणक नाम के नहिं सुनने अछि।हिन्दू धर्मावलम्बी सब अहि महाकाव्यके पूज्य मानै छैथ।वाल्मिकि रचित संस्कृत के रामायण के अनेकाें भाषामे अनुवाद भेल अछि।लेकिन भगवान रामक जीवनीके सर्वप्‍्राथम हिन्दीमे लिखिकऽ ‘राम चरित मानस’ के रूपमे  घर्र घर तक पहुॅंचाबै वला महामानव छलैथ महाकवि तुलसीदास जिनका अहि काव्यक रचनामे दू वर्ष सात महिना छब्बीस दिन  लगलैन।संवत्  1631 कऽ रामनवमी दिन वैह याेग रहै जेना कि त्रेतायुगमे  रामजन्म दिन रहै। तुलसीदासजी आेहि दिन रामचरित मानस लिखनाइर् प्‍्राारम्भ केला आर संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्‍लपक्षमे रामविवाहक दिन साताे काण्ड पूर्ण भेलैन।प्‍्राारम्भमे ज्ञानी पण्डित सब अहि महाकाव्यके हिन्दी रूप आऽ जर्नजन तक पहुॅंचैत देखि अप्‍्रासन्न छलैथ मुदा बादमे श्री मधुसूदन सरस्वतीजी अपन सम्मति अहि श्लाेक सऽ देलखिन ःर् “ आनन्द कानने ह्यस्मिनजंगमस्तुलसीतर ्उः। कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता।। ” अर्थात् अहि काशीरूपी आनन्दवनमे तुलसीदास चलैत फिरैत तुलसी के गाछ छैथ जिनकर कविता रूपी मंजरी बहुत सुन्दर छैन  आ ताहिपर राम रूपी भॅंवरा सदैव मंडराइत रहैत अछि। रामायणमे युगपुर ् उष रामके जीवनी छैन जाहिमे सबसऽ महत्‍वपूर्ण घटना अछि रावणक पराजय। अहिमे सतयुगक अलर्गअलग परिस्थिति के निमित्त अनेकाे आदर्श चरित्र प्‍्रास्तुत कैल गेल अछि। आ अहिके प्‍्रातिदिन पाठ घरमे सुख शान्ति आनैत अछि। तैं आे कहलखिन जे घरमे रामचरितमानस जरूर राखी आ पढ़ी। अकर हर प्‍्रासंग मनुष्यके किछु शिक्षा दैत छै आ मार्गदर्शन करैत छै। देवीजीक अहि वक्‍तव्य सऽ सब प्‍्राभावित छल। आगामी रामायण सप्‍ताहमे रामायणक चरित्र पर विचारविमर्श तथा रामायणक प्‍्रासंग पर समीक्षाक कार्यक्रम बनल। विद्यार्थी सब रामायणक विभिन्न प्‍्रासंगपर चित्रकलाक प्‍्रादर्शनी लगेलैथ। शिक्षक सब लेल नूतन पीढ़ी रामायणक प्‍्रासंगके काेनाकऽ प्‍्रास्तुत कऽ रहल छथि से बहुत महत्‍वपूर्ण छलैन। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। इंग्लिश-मैथिली कोष/ मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.पञ्जी डाटाबेस २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली १.पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग / मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण/ संकलन/ सम्पादन-पञ्जीकार विद्यानन्द झा, नागेन्द्र कुमार झा एवं  गजेन्द्र ठाकुरद्वारा) जय गणेशाय नम: उँ नमस्‍य शिवाय: उँ नमस्‍य शिवाय: (70) ''27'' (38/03) कुलपति सुतौ मांगुक: बहेराढ़ी सँ पांखू दौ।। (09/04) त्रिपुरे (40/07) पौखूक: परसंडा सं श्री दत्त दौ।। पॉखू सुता 48/0438/06 रतिमति बाबूचान्‍दा 31।।07 खौआनादू सुत चन्‍द्रक से अलयसॅ कारू द्दो. ‘’ एवं ठ. रघुपर्ति विवाह संकायं’’ ठ. धराधर सुता बेहर करमहा सॅ बाबू सुत कृष्‍णपति दौ।। 27/01/66/07 मानू सुता हरखू 168।।09 37105 जयदेवा: सरिसबसॅ महिपाणि दौ।। 20/04।। माने सुतौ गंगेश्‍वर: बलि बसाउन दौ।। 270।।09 सुतौ रतनपाणि महिपाणि माण्‍डर सँ प्रसाद सुभंकर: अलयसॅ गणेश दौ ।। ए सुतौ 38।।06 बुद्धकर: पानि नोने दौ ‘’18/05’’ नोने सुता हरि शिव नहियमीय: विस्‍फी संज्ञानक दौ महिपाणि सुता नयपति उँमापति रविपति शुभपति यथा क्रम यथा क्रम डीगरू निकट 53/10 निकरू 56/07 यौ होरिला: 52/05 मंगरौनी हरि दामु दौ’’ 25/07’’ केशव सुतौ समूक: परिवर्द्धमान दौ ‘’23/06’’ फनन्‍दह सॅ नरसिंह द्दौ।। 39।।05 दामू सुता माण्‍डर सॅ गिरीश्‍वर खैं 27/05’’ कुजौली सॅ मित द्दौ।। 49/01 हरखू सुतौ सदु. राघव: रैयाम सोदर माघूसुत गवेशदॉ ‘’22।।0/0’’ म. म. 30/07 रघुनाथ सुतौ धानू सिरू कौ बलियास सॅ श्री वश्‍ेवर सुत शिवादित्‍य सॅ टकबाल सँ लाखू द्दौ 50/07 सिर्फ प्र; श्री पति सुतौ माधव मनोरयौ पनि चोमसॅ पुलहारी दिनकर दौ।। 17:07 पुलाहारी दिनकर सुतो भवदत: दरिहरासॅ कीर्तिशर्म सुत केशव दौर यमुगामसॅ आडबनि द्दौ।। मिमांशक 42।।05 माधव सुता हरिकेश गणेश। नारायण अनन्‍त चतुर्भुजा: बुधबाल सॅ महेश्‍वर सुत शिरू दौ ।। 19।।06 शिरू सुतौ  66/02 रघु मैबधवास सरि. मोरि दौ ‘’27।।03’’ गंगेश्‍वर सुता गौरि 35।।05 मोरि (71) सोरि कुलपतिय: खैआलसॅ नोने दौ।। सोरि सुता माण्‍डर सॅ कान्‍ह दौ ।।09।।03’’ कान्‍ह सुतौ गोपीनाथ: बेलउँचसॅ र्ध्‍मादित्‍य दौ ‘’16/05 खैआलसँ उँमापति द्दौ गणेश सुता दरिहरा सॅ जीवे दौ ‘’25//06’’ शक्‍तू सुतो जीवेक: हरिअम सँ दिन दौ ‘’ ‘’16।।07’’ माण्‍डरसॅ नगाई द्धौ ‘’42।।88 जीवे सुतो 79।।05 रामदेव: महिषी पालीसॅ शिवधों 19/07’’ धरादित्‍यसुतौ देवे 40।।03 रतनू कौ बलि हरादित्‍य दौ 10/10’’ हरिदित्‍य सुतौ पनिधोध 36/04 सुधाकर मटिबोध शुभंरो फन नरसिहं द्दौ प्र. देवादित्‍य सुता शिव गागु 35/535।।02 बागे का: खनदजासँ दै दौ ‘’05/08’’ कामेश्‍वर सुतौ भवाई हराय कौ 33/07 बहे रति दौाा 07/05 निखूति सँजगद्दा द्धौ. ‘’ भवाई सुतौ दवेक: बमनि कुमर दौ ‘’14/06’’ सक. गिरीश्‍वर द्दौ देवे सुता खौआलसॅ रघुपति दौ.  07।।09’’  नरउनसॅ कोने द्दौ।। 30।।02 शिव सुतौ 56/07 नरपति: माण्‍डर सँ सुपन दो।। 09/06 ‘’ हरिकर 35/07 हरिकर सुता रतिकर 29।।05 मुधकर 36/09 खंतरा: टकबालसॅ बाटू दौ ‘’ 09/05 नरउनसॅयशु दौ खांतर सुता सुपन रूपन 56101 टलधरा: वेल धर्मादित्‍य दौ 16/05 खैआलसॅ उँमापति दौ।। सुपन सुता सुधे महाई राम नोने कोने नाउनसॅ खातू सुत सुचिदौ 27/06’’ बनियानस सॅ इश्‍वर द्दौ।। एवं राघव मात्रिकचदुं।। सदुपाध्‍याय राघव सुता बाबू बनाई 94।।05 53/37 विराई बाबा का सिमावाड़ सोपरपरुसॅ माधू दौ हलधर सुतो वास्‍त्रक कमेली व्‍यासकंठ दौ।। वास्‍तुओं राम 55/04 33/06 राम हरि कौ सक एजू दौ पा; नारायण द्दौ हरि सुता 35।।011 137/04 बसावन नाेने मतिश्‍वरा: सत चान्‍द पौ 26 9208 चान्‍द्र मुतौ दूबसे शिरू कटक ग्रहेश्‍वर दुमौ मतिश्‍वर सुता जनार्दन प्रा जाने अच्‍युत श्री निवास 46/05 नीना: खैआलसॅ गोन्‍दू दौ।। 21/0/0’’  30/04 बादू सुतो गोन्‍दूक: अलसयॅ रतनधरसुत हरदत हरदतदौ गंगोलीसॅ साधुकर द्दौ गोनू सुता जागे माधव गोपी मुरारी मुकुन्‍द केशवा: नाउनसॅ ऐंठो दो ‘’27/002 बागे सुतौ एंहोक: माण्‍डरसॅ दामसुत मांगु दौ पानीसँ रामदत्त दौ (72) ‘’28’’ ऐंठो सुतो हेलअन्‍दू कौ कर वाट सुत महिपति दौ गंगोली 28 रामद्दौ. माधव 80/109 माधू सुतौ माण्‍डरसॅ काशी दौ भवसुतौहलसर: नरउन खांतू दौ ।। 19।।02 माण्‍डरसॅ बागेद्दौ. 145/02 हलसर सुतौ काशीक: पालनीसॅ रूद दौ।। 23/11’’ देवे सुतौ रूद: दौ 23/11’’ देवे सुतौ रूद: नरउन सॅ उदयकर दौ तरूद सुता बलिनयास सॅ नारू दौ 21/;8 जीवेश्‍वर सुतौ 59/10 रतिकर: ए सुतौ नारूक: धुसौत सॅ रविकर दौ 19/011 माण्‍डरसॅ हरदन्‍त नारू 43//01 सुतौ चमरू क: 56/06 कामहा सॅ गौरीपति सुत बादूदौ एक साष्‍टदौ 58/07 काशीगता मरिअम सॅमहाई दौ ‘’25//08 चान्‍द सुतौ मितूक: मण्‍डरसँमिक गयन सुतवीर दौ कु सुधाकर द्दौ 191/011 माण्‍डरसॅ हरदन्‍त द्दौ नारू 43।।01 सुतौ चमरू 56/06 कामहा सॅ गौरीपति सुत बादूदों एक साष्‍ट द्दौ।। 58/07 काशीसुता हरिअम सॅमहाई दौ ‘’25।।08 चान्‍द सुतौ मितूक: माण्‍डरसॅमिक गयन सुत वीर दौ कु. सुधाकर द्दौ।। मितू सुतो 77/02 कोचे महाई सुखति पांखू का श्रीर विदॉं ‘’ 15/02 डाल सुते रविकार:सुतौ हरिनाथ: ए सुता गंगेश्‍वर हल्‍लेश्‍वर श्रावेश्‍वर बलियाससॅ गौरि दौ।। भवेश्‍वर सुता मिमायंक रूद धर्माध्किर वाट राजपंडित 43/04 गढ्कू 67/96 वर्णों का जालय से महिधर दौ।। मिश्र रूद्र सुता रविकर बुद्धिकर 262/08 गुणाकारा: अलयसॅ रतनधर दौ।। बुद्धिकर सुता उचति सॅ सुन्‍दर दौ।। 06/03 हलधर सुत सुन्‍दर सुतौ येध: खण्‍ड महादेव दौ एवम चक्र बाबू सुतो रतिधर हरिपति कृष्‍णपति कृष्‍णा 123/06: हारीसोदर जयदेव दौ।। 22/06 रति सुतौहौ रे नाने कौ कुजौली रविकर दौ 23/03’’ अलय सँ धर्माधिकार गंगाधर हारे सुता मणि शशि वाधे कृष्‍णा: जगति सँ रूद दौ ‘’27/08 भवै सुतौ रूद: जजि देव सुताधामदौ वलि सुफ द्दौ।। नम: (73) रूद सुतौ 35/06 नानक: उचतिसॅ कान्‍ह सुत पशुपति दौ गंगोली सॅ जोर द्दौ. मिश्र मणि सुता बासुदेव 88।।05 कामदेव जयदेवा: पनि. बुद्धिकर दौ ‘’26/06’’ धराई सुतौ विभाकर: दरिहरासँ श्रीपति सुत हरपल दौ टकबाल गांगु द्दौ  विभाकर सुता गुणाकर बुद्धिकर दिवाकर 93/03 प्रभाकर खौआलसॅ रघुनाथ दौ 21।।04 गंगोली केशव बु‍द्धिकर सुता माण्‍डरसॅ महाई दौ साधव सुत श्रीवेश्‍वर सुतौ कोने देवेक: सुरगनसँ लक्ष्‍मी कर दौ ए सुतौ महाइक: करमाहासॅ शुभे दौ।। महाई सुता पाली सैरूद सुत उगारूदौ दरिहरासँ महेश्‍वर दौ।। एवं जयदेव मातृक चक्रं मिश्र 76/06 जयदेव सुता नगवाडधोसोत सॅ महामहोपाध्धिपति दौ ‘’19।।011’’ रविकर सुतौ रूद बुद्धिकरौ दरिहरासँ गुणीश्‍वर दो बुद्धिकर सुतौ हलधर 5204  म. म. उ. पा. राम दौ।। पॉंखू सुतौा कोने केशवो माण्‍डरसँ विशोसुत प्रसाद शुभंदर दौ पनि नोने द्दौ. केशवसुता बलिमतिकर दज्ञै मएइस बमन दौर महामहोपाध्‍याद गोविन्‍द सुता महामहो लक्ष्‍मी नादो 209/05 परनामक ढकस म;प; उपा; 65।।05 विघापति म. प. पा. 102/03 दामोदर म.प.उ. पा. 178।।07 रामनाथ आगमचार्दक म. म.उ.प 96।।04 देवनाथ तर्क पच्‍चानन म. म. उ. प. गोपीनाथ कन्‍टको द्वाराकारक महामहोपाध्‍याय 39/04 मधुसूदन महमहो 105/09 जनदिना: माण्‍डरसँ दूखडि़ दौ।। 20/08 दुखडि सुता रघु राम रवि प्र नाने का: एकहरासँ एकहरासँ वगीश्‍वर दौ।। 28।।06’’ गंगेश्‍वर सुतौ बागीश्‍वर गणेश्‍वरौ 51/01 गणेश्‍वरौ कर श्रीनाथ दौ ‘’ वागीश्‍वर सुता सकराढ़ी सँ गिरीश्‍वर सुत महेश्‍वर दौ डरमहासँ सुपन द्दौ।। एवम् वर्ग विद्यापति माहक चक्रां।। (74) ‘’29’’ महोमहोपाध्‍याय विद्यापति सुता मुनिरूद्ध अनन्‍त अच्‍युता: एकहरासँ काशी दौ 29 ‘’25।।01’’ माधव सुतौ सन्‍यासी काशी या 09 ओने को पालीसँ गुणाकर दौ 24/04 गुणाकर सुता माण्‍डरसँ सुश्‍सर दौ 22।।02 कुजौली राजू दौ सन्‍यासी 134/04 काशीसुता सोदपासँ लाखन दौ 27/09 गोपीनाथ सुता हाऊ प्र. माण्‍डर महामहोपाध्‍याय पशुपति दौाा 18/08 अलय सँ म.म. उ. प. रामेश्‍वर दौ वाहाउँ प्र. 43।।05 रतनाक सुता राम लाखन भव 63।।03 जीवे का करमहासँ माधव दौ 02।।09 माधव सुतौ हदसर्वेश्‍वरौ माण्‍डरसँ रतिकरदौ 28/05 34।।05 रतिकसुता दूबे 32/10 गुणाकर 82।।09 प्रतिकए: बहेराढ़ीसॅ रवि दौ ।। 09।।04 माण्‍डर सँ विमू द्दौणा लाखन सुता बासुदेव 53/08 जनार्दन गोवी नरहरिय: खौभालसँ जीवे दौ ।। 25।।04 अपरा 55/02 हरिकर सुतौ जीवे जोरो तक 132।।08 तक प्रथमा परोक्षे भवदत्त स्‍यैव दौ सुरगनसँ भगव दौ  जीवे सुता करमहासँ शिरू सुत गंगाधर दौ जांजवाल सँ मीनू दौतिय दौ एवम कृष्‍ण पति मात्रक चक्रं।। कृष्‍णपति सुता खौआल सँ रतनपति सुत परशुराम दोषे 14।।05 बुद्धिकर 80।।05 बुद्धिकर सुतौ कृष्‍णपति गाउल करमहासँ साधुकर दौ 21/09 रूपन सुता साधुकर सुर्यकर 83।।07 पिरतू का: खौआल से रतन दौ 26/05 रतनू सुतौ डालूक गंगोरसँ सुधाकर दौ 19/06 44/15 चन्‍द्रकर: 40/06 माण्‍डरसँ डालू दौ साधुकर सुतौ भवनाथ रामनाथौ बेसडँल धरम् दौ 22।।09’’ कृष्‍णपति सुता भाषाकंठ श्री कंठ सबुकंठ प्र; धण्‍डुआसँ शुभंकर दौ पाण्‍डुग्रापासं बीजी म. म. उ. पाठक गोविन्‍द: ए सुतौवामन: सुता सदु. हरि सदुपाध्‍याय विष्‍णु सदुपाध्‍याय डालू सडपाजायछीतू चन्‍द्रकार:।। छीतू सुतौ पृथ्‍वीघर मनोधरौ महोमनोघर सुतौ हेमधर: ए सुतौ गुणाकर: ए सुतौ प्राणघर: (75) प्राणघर सुतौआनन्‍दकर: ए सुता कान्‍ह माधव केशव नारायणा: तकरतिपति दौ।। कान्‍ह सुता रामकर रतनाकर शुभंकर सुतौ सूर्यकर विभाकरौ नदाम सँ नरायण दौ।। धरमू सुता सक धनपति दौ।। 14/07 सदुसुपे सुतो दामोदर: एक सुतौ डालूक: पवौली सँ गोढिस 34/06 डालू सुतो विद्यापति 74/02 धनपति बुधपालसं वासुदेव दौ सुरगन सँ केशव दौ धनपति सुतों जोर 53/03 सकौना सँ रघु दौ अपरौ टचसूक: पालीसँ हरिकर सुत वाठन दज्ञै बलि कान्‍ह दज्ञै एवं कृष्‍णपति मत्रिक चक्रं।। कृष्‍ण पति सुतौ रतनपति: फरहरा बुधवाल सँ मानु सुत परखू दौ 19/06 मानू सुतौ पुरखू नारायणो मिद्धि खैआलसँ गिरूदौ 28/09 37।।01 बाटू सुतौ गिरू क: करमहासँ महिपति दौ गंगोलीसँ राम दौ ।। गिरू सुता हरखू 48/09 गणेश हमेशा: भख कुजौली शुभकर दौ 23/03 सुपन सुताश्रीकर शुभंकर हरिकरा: दरिहरा सँ सुपन दौ 22।।04 सुपन सुतौ गांगु विशोंको एकहर सँ हारू दौ शुभंकर सुता मेघू पागु दिन शुचि जागे का: खैआलसँ शुभे दौ 23/02 शुभे सुतौ माणेक: सोदापुरसँ महामहोपा रघुनाथ दौ 27।07 32/05 सुतौ जोरि बलि माचू दज्ञै 15/04 माधू सुतो 47/09 रूद शम्‍भू कौ आपससँ म. म. उ पा. रामेशवर दौ 02।।01 दरि. रति दौ पूरख सुतौ महामयो रामदेव: पबौलीसँ रघुदन्‍त दौ 34/01 शिवदत्त सुता 46/06 रूचिदनत रामदन्‍त 36।।07 रूचिदत्त शुभदत्ता मौआल माण्‍डरसँ सर्वाई दौ 22/07 सर्वाई सुतौ की 16/09 कर केउदू कौर सुपन दौ 26/08 गंगुआल स गोविन्‍द दौ रूचि दत्त सुता रघुदत्त जान 39/07 65/03 160/07 मुरारी (76) ‘’30’’ गादू का: पनिक लाखू दौ।। 17/10 56/09 लाखू सुतौ श्री निवास प्र. श्री राम: सकराढीसँ हरिश्‍वर दौ।। 05/05 हरिश्‍वर 12/02 सुतौरतीश्‍वर कर मांगु सुत प्रज्ञाक दौ।। 37/06 करमहासँ पशुपति दौ ‘‘03/07’’ म.म.उपा. रतिघर सुता महो 76/04 कुलपति सदु: पशुपति कृष्‍णपति विष्‍णुपति 43/06 विष्‍णुपुरी कात महो 306/03 रमापतिय: सोदरपुरम टेलू दौ 21/07 ग्रहेश्‍वरसुनौ हेलूक: उचति होरे दौ।। हेलू सुतौ 45/02 येध: नाउन सें ग्रहेश्‍वर सुत सुधाकर दौ दरि. गुणाकर दौ. 39।।01 पशुपति सुता सकराढी सँ राजू दौ 06/04 राजू सुतोहोरे शोरे कौ: बहेराढी सँ विरखू दौ 07/10’’ विरखू 77//05 सुतौ 44/011 वेणी वाछ कौ: नाउन स रतिकर दौ।। 19।।02 रतिकर सुता करमहा सँ बाद दौ ‘’21/08’’ तल्‍हनविर छॉंप एवम। रतनपति मात्रक चक्रं रतनपति सुतौ परशुराम: और खण्‍ड बलासँ महामहोपाध्‍याय ठ. गोपाल दौ 04/06 महामहोपाध्‍य (उदयपुर राजगुरू महेश सुता म. म. उ. रामचन्‍द्र महोपाध्‍याय गोपाल महामपोध्‍याय अच्‍युत र्ध्‍मकर्मावतार राजनैतिक म. प. परमानन्‍दा: महिषी पाली सँ शिव सुत दाम दौ 28/05 अपरा शिव सुता दाम 75/08 83/05 कान्‍ह जीवे का: बेलउँच सँ होरे दौ ।। 25/05’’ रूप्रादित्‍य सुतौ होरेक: 182/02 होरे सुतौ अमरूक: सोदरपुरसँ रामनाथ सुतकान्‍ह दौ 23//09 78/01 रामनाथ सुतौ कान्‍ह दरिहरासँ हरिहर दौ।। कान्‍ह सुतौ 1308/04 58/05 बांसू नोने को नरउनसँ चन्‍द्रकरसँ चन्‍द्रकर दों माण्‍डरसॅ विशो दौ 76/08 दामू सुता दरिहरा स गुणे दौ 22।। 05 75/09 शिव सुतौ गुणेक: द्वारम वेलउँच शिरू दौ।। 10।।03।। महो जयादित्‍य 139/07 सुता हरदत्त 33/04 सुधे शिरू 37/08 का: पण्‍डुआसँ प्राणघर सुत हल्‍लेश्‍वर दौ मन्‍दवालसँ शिरू दौ शिरू सुतौ 75/09 (77) गंगाधर लक्ष्‍मीधरौ पालीसँ दिनकर दौ ‘’12/05’’ हचलू सुतौ दिनकर: नरउन सॅ योगेश्‍वर दौ पालीसॅ हलधर दौ. ।। दिनकर सुता कटौना माण्‍डरसॅ सुरसरदौ ‘’22।।02 कु. रामू दौ।।  कु. रामू दौ।। गुणे सुतौ 70/09 गणेश: कटमा हरिअमसँ रामकर दौ।। 16।।08।। रामकर दौ।। 16।।08।। रामकर सुतौ 96।।05 हरिहर: पचही जजिमितू दौ ।। 17।।04।। गोपाल  सुता मितू दिन पिरतू पर्वत 58/06 हिरइ का: बलियास सँ सुधाकर दौ।। मितू सुतौ ओहरि: उचतिसँ थानू सुत होरे दौ खण्‍डबलासँ भीम दौ।। एवम् गोपाल मात्रिक चक्रं कर उपाध्‍याय ठ. 93/01 गोपाल सुतौ माधव: बलि. हरिआमसँ सुधाकर दौ ।।27/05  कुश सुतौ सुधाकर: महनौरा खौआससॅं डालू दौ ।।19/04।। 38/03 रामकर सुतौ डालूक: पालीसँ गोपालनदं माण्‍डरसँ वीर दौ.।। 83।।07 डालू सुतौ उधोरण: 84।।07 पचही जजिवालसँ शंकर दौ ।।17।।04।। 38/02 माधव सुतौ 77/02 शंकरौ सकराढ़ी सँ जगद्धर सुत आडनि दौ केउॅरामसँ मधुर द्दौ।। शंकर सुता हरिपति गणपति गुदे खांतरा: सकरादीसँ रतीश्‍वर सुत गौढि दौ ।।24।।03।।  गोढि सुता सोने गणपति मशे मुरारी शिरूका: बहेएढींस विशो सुत वागीश्‍वर दौ गंगोरसँ हरिहर दौ मिश्र सुधाकर सुतो 252/07 रघुनाथ: गौर सादोपुरसँ सुधाधर दौ ।।19।।0/।। बाटू सुता सुधाधर 57/09 मणिधर 54/02 रामधर रूपधरा: जगति सॅभवे दौ जजि. धाम द्दौ 44/08 सुधाधर सुता 36/2 बासुरे मिश्र सुधाकर सुतो 252/07 रघुनाथ: गौर सोदरपुरसँ सुधाधर दौ ।।19।।01।। बाटू सुता सुधाधर मणिधर 57/09 54/02 राम धर रूपधरा: जगति सँभवे दौ जजि धाम द्दौ।। 44/08 सुधाधर सुता 36/2 बासुरे 86/03 चक्रर्याण पद्मनाभा: माण्‍डरसँ नोने दौ ।। 18/03।। महामहो रतिपति सुता चान्‍द 35।।03 54।।08 दूबेकुशे का: मलिछाम परउन सँ डालू सुत मधुकर दौ ।।08।।03।। वलियासँ यशोधर द्दौ मोन शावर पुरूक।। कुचित पानि शौशे द्दौ।। कू. न. शाखा. लेखक: डोमाई मिश्रा।। चाण प्र. 39।।04 चन्‍द्रपति सुता बासू प्र. बसुपति सूर्यपति शम्‍भूपति गंगापति 45/06 मानू का: सिरखंडिया 3/4/03 लेखक लूटन झा (79) ‘‘31’’ जजि नारू दौ ।।20।।09।। खौआलसँ विश्‍वनाथ द्दौ।। बाटन सुतौ पदूम 96//01 छीतरौ माण्‍डरसँ हरिनाथ दौ ।।25/02 पदम सुतौ हरिनाथ: सरिसबसँ कुल पति दौ।। 28/01।। 87/01 कुलपति सुतौ विशोक: दरि गांगुदौ।। हरिनाथ सुतौ श्रीपति: बेहद कर. नरहरि दौ।। 26।।09।। हरसुतौ 76/04 गोविन्‍द नरहरि सि‍मरी बलिठाससँ जोर दौ ।।30/07।। माधव सुतौ नारायण: एकहरासँ सुधाकर दज्ञै ।। नारायण सुता जोर 44/10 महन् 36।।09 शिरू का: बेलउँचसँ धर्मादित्‍य दौ।। 16/05 खौआलसँ उँमापति दौ।। जोरसुतो रघुनाथ 40//05 बहेराढ़ी सँ विश्‍वरम्‍मर दौ।। 07।।06।। खौआलसँ रघुपति दौ।। नरहरि सुतौ गोन्‍दूक: हरिहरा सँथेध दौ ।।21//09।। बुद्धिकर सुतो थेध: सोदर रघुनाथ दौ 130/07।। रघुनाथ सुतौ 48।।05 महिपति गंगापति तिसूरीसँ ग्रहेश्‍वर दौ।। थेध सुतौ लक्ष्‍मी पति गौरीपति हारी पालीसँ कान्‍ह दौ ।।21//03।। कान्‍ह सुता 39/03 विष्‍णुपति 35//09 रघुपति नरपति 83/01 रमापति इन्‍द्रपति हरिपति 142/08  सुरपतिय: सकराढ़ीसँ गणेदौ।। एवम छीतर मात्रिक चक्र।। 81/07 छीतर प्र परशुराम सुतौ 106/03 भोरानाथ: रजौश्रा माणरसँ रघुनन्‍दनसँ ।।18//01 यग्‍यपति सुता 46/02 सुता अपुल 75/08 वेणी नरहरि 152/07 शशिधरा: आदया पालीसँ रूद दौ।। 28।।02 वलियारू सँ नारू दौ।। अन्‍यो पालसँ रविनाथ्‍त दौ 20/10 खौ रविनादह म.म.उ पा 56/03 हरिसुतौ धनेश: शोधोलि आलयसँ वेणी दौ ।।15/03।। हरि सुतौ रघुक: खौआलसँ शुचिकर दौ बुधवालसँ मानु दौ।। 66//08 रघु सुतो वेणीक खौआलह नारायण दौ ।।21/05।। नारायण सुता 61/02 खण्‍डकता सँ नरहरि दौ 22/02 नरउनसँ चन्‍द्रकर द्दौ वेणी सुतौ देवनाथ: 46/06 माण्‍डरसँ देहरि दौ 29/04 गुणाकर सुतौ देहरि: कुजौली सैश्री वर्द्धन सुत हरिहर दौ  वेणी सुतौ देवनाथ: 46/06 माण्‍डरसँ देहरि दौ 29//09 गुणाकर सुतौ देहरि: कुजौली सँश्री वर्द्धन सुत हरिहर दौ माण्‍डरसँ वागीश्‍वर द्दौ देहरि सुता जीवे बासू 131/03 यश का 131/03 सरिसबसँ भवादित्‍य सुत रवि दज्ञै सकराहीसँ नन्‍दीश्‍वर द्दौ।। (80) ।।32।। धनेश सुता रघुनन्‍दन गोविन्‍द 2/19//02 परमानन्‍दा: 92//05 पबौलीसँ रतन् दौ।। 30/08।। 32 शिवदत्त सुता भानुदत्त 43//08 कृष्‍णदत्त हरदत्त 62//07 रूपदत्ता: 63//08 टकबालसँ शिरू दौ।। 09/06।। माण्‍डरसँ सुधाकर दौ।। हरदत्त सुतौ रतनूक: खौआलसँ हरि दौ 22/01।। 169/01 हरिसुता सोदरपुरसँ हरि दौ 28/08 सत: चान्‍द दौ।। रतन 43/09 सुतो गोढ़ाई अफेलौ पनि हरि दौ ।। 17/011 82/07 बाध सुतौ हरि गोपाली 77/06 दरि कुसुमाकर दौ 24/09 फनन्‍दहरसँ गोविन्‍द द्दौ।। हरिसुता राजनपुरा दरिदरासँ जीवेदौ 16/01 दिवाकर सुतौबाटूक: सरिसबसँ माने दौ।। 27//03 वलि बसाउन द्दौ।। 32//07 बाटू सुतौ 78//03 पराउ जीवे कौ महिपासोदारपुरसँ हरिनाथ दौ ।।23/10।। कु वंशवर्द्धन द्दौ।। जीव सुतौ विष्‍णुपति गणपति रखवारी हरिअम सँ खूदी दौ ।।31//09।। 139/04 खूदी सुतौ 48/05 धरमूक: कटमा माण्‍डर सँ रविपति दौ ।। 24/05। म. म. उ. प. रविपति सुतौरतनू राम 178/01 36//105 लाखन बु‍द्धिकरा: उजान बुधवालसँ देवे ।। 22//08 बेलउँच सँ गयादित्‍य द्दौ।। रघुनन्‍दन सुता और खण्‍डबलासँ म.म. उ. प. विश्‍वभर दौ ।। 04//06 म.म.उ पा. दामोदर सुतौ अग्नि होत्रिक म.म.उ.पा. विश्‍वभार: हरिअमसँ गयन दौ । 19/03।। गयन सुता राजनपुरा दरिहरा सँ बसावन दौ 32/04 बाटू 34/08 सुतौ बसावन: बहेराढ़ीसँ जनार्दन दौ ।। 10/01 जनार्दन सुता नाउन सँ कोने दौ।। 14//05 सकराढ़ी सँ जीवेश्‍वर द्दौ।। 53//04 बसावन सता सोदरपुरसँ म.म.उ.पा. नासे दौ ।।23/01।। म.म. भासेसुता दामोदर पुरूपोषत्तम कृष्‍णा: सत शंकर द्दौ 24/07 89/06 शंका सुता रतिहर 41/07 लक्ष्‍मीकर बुद्धिकरा: फनन्‍दहसँ वासुदेव सुत महेश्‍वर दौ कुजौली सँ शशिकर अग्नि होमिक महामहोपाध्‍याय विश्‍वम्‍भर 95//08 सुतौ भवेश: 49/06 दरिहरासँ महेश दौ ।। 23//03 दाशेसुता 2777//03 247//03 शंकर महेश महादेव भीम (81) रामदेवा: 81//03 शक्रिरायपुरनाउनसँ नारू दौ।। 25/05 जगद्धर 318/08 प्र. मुशे सुतौ लाखू नारू शै बेलउँचसँ जयादित्‍य दौ।। 30//09 पण्‍डुआसँ हल्‍लेश्‍वर द्दौ।। नास सुतौ हल्‍लेश्‍वर 85//05 बेटर माण्‍डरसँ सोम दौ ।।20//011 सोम सुता 54/10 रतिकर बाटू चाणा 13/05 सरिसबसँ माने सुत गंगेश्‍वर दौ।। 27//09 खौआलसँ नाने दौ।। महेशा।। सुतौ भवानी 42/02 नाथ: कटमा हरिअमसँ भवपति दौ 25/09 विमू सुता 61/06 बसावन जसाइन विष्‍णपति भवपति गिरिपतिय: दिगउन्‍ध खौआल सँ तनू दौ 11/02 नाने सुतौ श्रीधर: धोसोतसँ रविकर दौ ।। श्रीधर सुतौ 56//03 रालूक: पनिचोभसँ धराई दौ 26/06 सबुणीय द्दौ।। शत सुता हलधर कानह शिव महिपतिक: कुजौली सँ दिवाकर सुत मधुकर दौ पनिचोभ मांगु दौ ।। 21/10 फनन्‍दहसँ मोरि द्दौ रूपे सुतौ 60/01 नाह प्र गया धर 2066/06 गाग प्र नारायण कौ उजान बुध्‍वालस दैवे दौ 22//08 बेलउँच सँ गयादित्‍य दौ।। एवं धराधर विवाह समांप्‍त ।। शुभ शाके 1778 सनद्य 1263 साल श्रावणा कृष्‍णतृतीययायं दिनकरौ पण्‍डुमासँ वां हर्कनसिवत मिदं ठ लक्ष्‍मीधर सुतो गणेश: पतनुका माण्‍डरसँ धनश्‍याम दौ 22/04 विध्‍ूपतिसुता प्राणपति जीउँतपति प्रभापति वेशी का राधवास सरिसबसँ गंगेशवर दौ 27/07 खैआलसँ नाने द्दौ।। प्राणपति सुता काशी 44/09 लड़ावन नरसिंहाि देउँरी खण्‍डबाला सँ सान्हि दौ 22/09 सकराढीसँ देवे दौ लड़ाउ सुतो रामदेव (82) ।। 33।। होराई कौकन्‍हौली एकहरा सँट्रनी दौ ।। 25//01।। ट्रनी सुतो हरिपति कुजौलीसॅ 33 गिरीश्‍वर सुत हरीश्‍वर दौ माण्‍डरसँ नोने द्दौ।। होराई सुता मधुसूदन गोपनीय लक्ष्‍मीदेवा: गढ़ खण्‍डबलासँ माधव दौ 28/04 हराई सुतौ माने सोना की दरिहरासँ ग्रहेश्‍वर दौ अल्‍यसँ साढूर्क्षेण माने सुता धारू 74/008 चाण 38/05 जीवे का: बुधवाल सँ गंगेश्‍वर दौ।। 11/06 माण्‍डर सँ जीवेश्‍वर द्दौ।। चान्‍द सुतौ माधव: नरउन सँ दिवाकर सुत दिनकर दौ 24/08दरिकुसुमाकर द्दौ माधव सुता बेलऊंच सं भवादित्‍य दौ 30//09 63//06 हरदत्त सुता पौखू रति भवादित्‍य सोमा शक्रिरायपुर नरउनसँ योगीश्‍वर सुत हरिश्‍वर दौ 25/05 विस्‍कीसँ होरई दौ 71/08 भवादित्‍य प्र भवाई सुता शंकर रघु गोढ़े का द्वारम खौआल सँ धारू दौ ।। 21//04 धारू 83/10 सुता शिरू पदम लखू गादूका: एकहरासँ श्री कर सुत चान्‍द दौ खौआल मूसेहर मधुसूदन सुता उमापति 84/01 विद्यापति 26/103 लक्ष्‍मीपति प्र भट्टा: अनलपुर कर महासू रघु सुत शिव दौ 02//10// भवेश्‍वर सुतौ धर्मादित्‍य: नाउनसँ गौरीश्‍वर दौ ।।03।।07 टकबाल सँ यद द्दौ धर्मादित्‍य सुतौ बासुदेव: ब्रहमपुर जजिबालसँ कान्‍ह सुत नारू दौ ।।25/08।। वरूमालीसँ रवि प्रसिद्ध रूचिकर दौटि भेदों 74//07 वासुदेव सुतौ रघु खूदे कौ मुराजपुर वलियास सँ शिवादित्‍य सुत सर्वादित्‍य दौ 12/09।। शिवादित्‍य सुतौ सर्वादित्‍य: हारीपालीसँ राम दत्त दौ।। 41//02।। पवौलिसँ बागे द्दौं।। साध्‍य सर्वादित्‍य 70/02 सुता बाढ़ सोढ़ू नोने गोढ़े का: फरहरा बुधवालसँ भानु सुत महेश्‍वर दौ ।।19/04 माण्‍डर से रविदत्त दौटित्र दौ रघुसुता शिव दामू मधुसूदन सोदापुरसँ सोदेन दौ ।। 21/07।। सोल्‍हन सुता श्री 82/02 पति दूबेमुरारि का: कन्‍हौली बेलऊँच हरि दौ।। 10/04 प्राणादित्‍य (83) सुतौहरि 70/09 गयनौ 14/03 गयनौ फनन्‍दहसँ बासुदेव सुत महेश्‍वर दौ कुजौली सँ शशिधर दौ।। हरि सुतौ विश्‍वासनाथ प्र. रविनाथ देवनाथौ गढ़धोतोसँ रविपतिसुत कुलपति दौ ।। 25/10 वलियास सँ मधुकर द्दौ।। शिव सुता महनौरा खैभाल सँ जीवे दौ 20//09 मित्रकर 48/02 सुतौ हरखू 55//06 हरखू जीवेकौ काको बेलउँच सँ केशव दौ 21/07 के शव सुतोगोन बागे कौ पालीसँ लक्ष्‍मीधर प्र. माधव सुत गोपाल प्र. गोप दौ जजिवाल सँभव द्दौ जीवे सुतो पीताम्‍बर: दिगउन्‍ध्‍ सोदाउरसँ शक्‍तू सुत उद्योरण मधुकरपन्‍ने दरिहरासँ शंकर दौ 11//08 गुणाकर सुता शंकर चन्‍द्रकर सूर्यकरा: विठुआल सँ नोने दौ।। 36//02 शंकर सुता विरपर सोदपुरसँ रूद्रंश्‍वर सुत हरिहर दौ बेलउँच से रूद्रादित्‍य दौ।। उद्योग 57/07 सुतौ गंगाधर: कड़राइन बन नियामसँ ग्रहेश्‍वरसुत होरें दौ।। 22/10 होरे सुतौ विष्‍णुपति: सकराढ़ीसँ गुणपति दौ।।30 या डालू सुतौ रघुपति कुलपति से दौ ।। रघुपति सुतौ गुणपति शिवपति कुजौलीसँ रूपन दौ गुणपति सुता जजिवालसँ हरिहर सुत पुराई दौ सरौसँ पुराई द्दौ एवम् भट्ट मात्रिाक चन्‍द्राभट्ट सुता घनश्‍याम राम श्री कृष्‍णा बेहर खण्‍डवलासँ जनार्दन दौ 01//07।। महिपति सुतौ कान्‍ह: राजनपुरा दरिहरासँ दिवाकर सुतकर दौ बाटू, सुता अलयसँ नारायण सुत श्रीकरसॅ खैआल सँ शुचिक द्दौ.।। ठ. 72//02 कान्‍ह सुतौ विष्‍णुपति: कुरैलसकरीढ़ीसँ रूचिकर दौ।। 24/03 लाख सुता रूचिकर।। (84) ।।34।। शुचिकर मतिकर 59/07 रासकर 46/03 कृष्‍ण 52/06 करा: पाली सँ गंगाधर सुत नरसिहं दौ 34 वलियाससँ रति द्दौ।। रूचिकरसुतौ 46/09 सुतौ अफेल पइमो 36/03 पालीसँ सुधाकर सुतमुशे दौ 24/03 सुधाकर सुतौ मित्रकर प्र मुसेक: बलियास सँ रूचिकर दौ।। मुझे सुता खौआलसँ डालूसुत विद्यापति दौ भण्‍डारिसम सँ शुभे द्दौ।। ठ.। ठ. 91/10 विष्‍णुपति सुतौ जनार्दन बुआ तिसउँतसॅ जीवेश्‍वर सुत नन्‍दन दौ।। 14/05 गणपति सुतौ नन्‍दीश्‍वर रघुरामों बरेबा सें देवे दौ।। नन्‍दीश्‍वर सुता गौरी मौदि खण्‍डेश्‍वर रबी का: पचाउँहसँ  कीर्ति शर्म्‍म दौ।। चण्‍डेश्‍वर सुतौ श्रीवेश्‍वर: दिशोसँ बासुदेव सुत रति सर्म्‍म दौ कूचित पण्‍डोलसँयन दौ मून शा पनि व्‍ध्‍नपतिदा। जीवेश्‍वर सुता रघुपाणि हरिपाणि रंजन 51/06 राम नन्‍दन 36/02 माधूका: सुदै बेसउँचसँ होरे दौ 30/07 सोदरकान्‍ह दौ।। 147/05 नन्‍दन सुतौ गोपीनाथ विजहरा माण्‍डर सँ शिरू दौ 29/03 रतिकर सुतौ हेलूक: पबौली सँ श्रीदत्त सुता माण्‍डर सँ बागेश्‍वर दौ 17/01 कुजौली सँ राजू राजू द्दौ।। हेलू सुता विद शिरू लाख परमू जाना: कुजौलीसँ सुपन दौ 30/05 हरिहरासँ सुपन दौ शिरू सुता साधुकर 37/04 मानुकर भस्‍करा: सकुरी गंगोली सँ आलू सुत सुरेदौ ।।05।।04 विश्‍वरूप बड़गाम सुतौवहुरूप ए सुतौ मधुकर: ए सुतौ सर्वदन्‍त: ए सुतौ लक्ष्‍मीदत्त: ए सुतौ भवदत्त: सुतो सोमदत्त: ए सुतौ डालूक: ए सुता रघुपति 44/07 कान्‍ह सुरेश्‍वरा: बरेबासँ साउले दौ।। सुरेश्‍वर सुतों होरे शोरेकौ भन्‍दवालसँ विध सुत फूलहर दौ माण्‍डरसँ सागर द्दौ।। एवम् जनार्दन मात्रिक चक्रम।। (85) ठ. जनार्दन सुता बाबू प्र 95//04 रघुदेव जयकृष्‍ण जयराम 111/02 जय शिव श्‍याम गोविन्‍दा:गंगौरा बुधवाससॅ रामदेव दौ ।।/03।। रूचिकर 37/03 सुतौ रविकर बुद्धिकररौ एक थानू दौ 22/08।। दरि प्रतिशर्म्‍म दौ।। रविकर सुता माधव साधुकर अमरू 85/01 लोटना: 137/04 ओमोसिबेलउँच सॅ धरादित्‍य सुत बाढ़ दौ 10/05।। बाढ सुता जाने माने महेश्‍वर गौरीश्‍वर 45/07 चान्‍दा: भरेहासँ गणपति सुत केशव दौ सुगनसँ देवनाथ द्दौ।। माधव 47/02 सुतौ परमके: महिया सोदारपुरसँ रूचिनाथ 23/01 पालीसँ गांगु द्दौ।। परमसुता बासुदेव रामदेव गोविन्‍दा: खढ़ीक खौआल सँ गौरीनाथ दौ।। 24/03 गौरीनाथ 62/09 सुतौ अमरू उद्धवो पालीसॅ देवादित्‍य सुत गांगु दौ ।। 28/03 गांगु सुता विदू कुलपति श्री पति 332/09 जागे का: केउँरगामा सोदरपुरसँ बादू दौ।। 19/0 माण्‍डरसॅ होरे द्दौ।। रामदेव सुतौ नारायण: जगति सँकाशी दौ 29/01 नाने सुता मि‍मांशक 87/05 मिसरू होरे 15/08 वेणी 43/03 काशीका: करमा हरिअमसँ मितू दौ।। 28//04 दरिहरासँ रविदौ।। काशीसुतौ भवानीनाथ विठौली सोदरपुरसँ नोने दौ 30/07 48/05 जोर सुतौ नोने हचलू कौ माण्‍डरसँ विशोसुत हरिकर दौ 28/05 हरिकर सुतौ वेणी बुद्धिकरो 173/04 गंगरौना हरिअमसँ केशव दौ।। 27/05 हरिहरा सँवर्द्धमान द्दौ।। नोने सुता परान विष्‍णुपति एकमा बलियासँ रघु दौ।। 16//03।। विभाकर सुता गुणाकर मतिकर दिवाकरा: गंगोरसँ देवनाथ दौ मतिकर सुतौ रघु पुनन्‍दहसँ माधवदौ ।। रघु सुतौ महाईक: गाउल करमहासँ बाटू सुत हरिदौं सकराढ़ीसँ लनिद्दौ।। एवम् घनश्‍याम मातुबुचक्रम।। घनश्‍याम 109/04 सुतौ कुनाईक: 116/03 कन्‍हौली (86) ।। 35।। सोदरपुरसँ छोटाई दौ।। 28/081 बसाउन सुता पशुपति विद्यापति 35 73/02 महिपति 49/07 उँमापतिका: खौआन सँ गोविन्‍द सँ गोविन्‍द दौ 22/01।। खण्‍डवाससँ नरहरि द्दौ।। पशुपति सुता 78/05 नरहरि श्री हरिय: 44/02 महिषी पालीसँ महिषी पालीसँ बागे दौ 28/03 बागे सुता येध ठालू रघुपतिय: भौआन दरिहरा सँ कारू दौ 23//09 कारू 40/04 कारू सुतौ रति महाईकौ झंझारपुर करमहा सॅ राम दौ।। 02/09 राम सुतौहरिहर दिवाकरौ जगौर माण्‍डर सँ पघुपति दौ।। 23/06 सोदर खांतू द्दौ।। नरहरिसुता 11/05 रामदेव कामदेव लोटाई छोटाई का: 120/07 हारीपाली सँ जसाई दौ।। 32/05 रघुपति 42/05 सुतौ जसाई वाचस्‍पतिडीह दरिस्‍रासँ भवे दौ 28/05 रवि सुतौ भवेक: हरिअम सँ नोने दौ।। 16/03।। वलियास सँ नितिकर द्दौ भवेसूत्रों में पाकर प्र. मेध रतनाकर: बघवास सरिसवसँ गौरि दौ।। 27//09 गौर सुतौ जोर: टकवालसँ शिरू दौ।। 09/06 माण्‍डरसँ सुधाकर द्दौ।। जसाई सुता लाखू 51/07 शंकर 89/03 गणेशा: हसौली सोदरपरसँ शिव दौ।। 23/02 दूबे 48/06 सुतौ चौबेक: 53/01 पवौलिसँ देवदत्त दौ ।।24/0/।। देवदत्त सुता वलियासँ दूबेसुत शक्रि दौ गंगोलीसँ सोमदत्त दौ।। शिवसुताध्‍य शोभाज्ञानोंकें वमनियामसँ कुलपति दौ ।।27/07।। कुलपति दौ ।।27/07 ।। कुलपति 81/06 सुतों जादू बाटू कौ माण्‍डरसँ किरतू दौ।। 22/02 किरतू 230//01 सुतो दूबेक: सुपरानी गंगोलीसँ शोनूसुत शिवदो पनिचोभ से के उदू द्दौ एवम् छोटाई मात्रिक चक्रं।। 103/01 छोटाई सुतौ अनिरूद्ध: मलंगियह कुजौलीसँ हरिनाथ दौ।। 18/02 जीवे सुतो महाई गारी कौ माण्‍डरसँ सुधाकर सुत चाण दौ उध दामू द्दौ।। 37/08 महाई सुतोगोपीनाथ: पालीसँ कुलपति दौ।। 26/04 गुरू सुतो कुलपति महिपति के उँटू का: (87) कुजौलीसँ लक्ष्‍मीश्‍वर दौ गंगोलीसँ हरिश्‍वर द्दौ.।। कुलपति सुतो मुथेक: खौआलसँ हरपति दौ।। 25/04।। हरपति सुता चान्‍द माने सोनेका: 43/09 38//07 77//05 पाली सँ गोपाल दौ 31//06।। खैआल सँ शुचिकर सँ शुचिकर दौ.।। गोपीनाथ सुतौ प्रितिनाथ हरिनाथों बुआ तिसउँतसँ माधू दौ।। 34/05 माधू सुतौ रूचिदत्त लोकयं सकराढ़ी सॅ गिरीश्‍वर दौ ।।27/05।। कुजौली सँ मितू दौ।। दूबे सुतौ गोविन्‍द: बलियान सँ मितू दौ 28/03 महिधोध सुधाकर सुतौभितूक: टकबालसँ सोम दौ।। मितू सुता गुणेशंकर महाई गहाईका: सोदर माधवदत्त दौ सत रतनाकर द्दौ.।। हरिनाथ मातृक चक्रं।। हरिनाथ सुता सोम आनन्‍द मांझी डुमरा बुधवाल सँ गुणपति दौ।। 19/04 विश्‍वश्‍वर 44/10 सुता कुशे प्रश्‍न देवानन्‍द 151/08 बसाउन 67/07 राज 173/09 परानमणिका: 52/05 का: बेल. रूद्रादित्‍य दौ नरहरिश्‍वर दौ।। क्‍वचित वलि जोर दौ ।। 32/03।। वहे ठ. विश्‍वभर दौ ।। कू: न शाएबा ।। सदु. मणि सुता 82/10 गणपति विष्‍णुपति उँमापति सुरपतिय: 40/03 जैरामाण्‍डसँ यग्‍यपतियो ।।32/0;7 पालीसँ रूद द्दौ।।गुणपति सुतौ गोविन्‍द: सोदर वासुदेव दौ 31/07। वासुदेव 40/03 सुता पालीसँ होराइ होरिल दौ।। सुतथ सुतोनाथू पॉंथू 169/09 मणिधर माण्‍डरसँ मधुकर दौ।। 28/05 मधुकर सुता जोर जान बलभद्रा: करमहासँ प्रजाकर दौ ।। नाथू सुतौ होराई क: पबौलिसँ देवदत्त सुत शिवदत्त दौ ।30/08।। माण्‍डरसँ सर्वाई दौ।।. (88) ।। 36।। होराई सुता कुजौली सें बैजू सुत औहरि दौ।। 23/03।। यशोधर सुतौ 36 वैजू कौ विशो कौ सोदरपुरसँ वर्द्धन दौ 21/02।। माणरसँ भवदत्त दौ।। बैजू सुतो नोने ओहरि असयसँ बुद्धिपर प्र. बुधेदो।। 18/02 हरि गौरी दौ मो.न.था गंगोली शिरू द्दौ।। झू.न. ओहरि सुतो गणपति पशुपति दरिहरासं शंकर दौ 34/05 शंकर 41/08 सुता वमनियामसॅ रूचिकर दौ 15/04 रूचिकर सुता खौआल सँ श्रीधर दौ 33/04 पनि. धरादित्‍य द्दौ.।। (म.न.श.वैजू द्दौ।।) एवम् ठ. लक्ष्‍मीधर प्रथम विवाह समाप्‍त।। ठ. गणेश सुतो बैदेयनाथ दुर्गदत्तौ पुड़े नाउन सँ रमाकान्‍त दौ ।। 24/08।। विर 76/07 सुतौ ज्‍यो रामनाद: माण्‍डर सँ रतिपति सुत सारवन दौ।। 32/06।। लाखन सुते मेध 247/06 धरम कौ कुजौलीसँ श्रीकर दौ।। 30/06 श्रीकर सुतों ज्ञान 131/06 मधुकरपट्टो दरिरासँ चाण दौ।। ।। 19/07 पवौलीस देव धर दौ।। कल्‍याण सुता करमहास विद्यापति दौ ।।26/09।। शम्‍म 58/05 सुता विद्यापति धनपति महिपतिय: माण्‍डरसँ मनोरथ दौ ।। 09/03।। मनोरथ सुता जीवे शीरू 71/01 चणों: जालयसँ रामेश्‍वरसुत महिघर दौ यमुगामसँ गेणाई द्दौ।। विद्यापति सुतो भगीरथ: बलियास सँ शीरू दौ 32/03 शीरू सुता 57/03 बसाउन 85/02 भवनाथ नाने सोने का 90/10 (89) बहेराढ़ी सँ नरहरि सुत विश्‍वम्‍मर दौ ।।07।।06।। खैआलसँ रघुपति दौ।। श्रीधर सुता गणेश्‍वरोत्तम धरनीधए: सोदरपुरसँ वेणीसुत रतिनाथ दौ ।। 35।।06।। वासुदेवस वेणी काशी कौ माण्‍डर सँ नगाई सुत विश्‍वम्‍भर दौ फनन्‍दहसँ जगन्‍नाथ द्दौ।। वेणी सुतो रतिनाथ: पालीसँ देवादित्‍य सुत बागे दौ।।35/02 दरिहरासँ कारू द्दौ।। रतिनाथ सुतो श्री 165/08 अच्‍युतौ पालीसँ विष्‍णोदेवसुत कामदेव दौ ।। 32/05।। विष्‍णुपति सुता बासुदेव कामदेव 03/10 सोमदेवा माण्‍डरसँ बसाउन सुत दशरथ दौ सरिस:हलधर दौहित्र दौ।। कामदेव सुता माण्‍डरसँ शिरू सुत साधुकर दौ।। 34/07।। साधुकर सुतो नरपति रवि: हरिअमसँ विमूसुत जसाउन दौ।। 33/03 जसाउन सुता माण्‍डर सँ सुबे सुत गिरू दौ पालीसँ वद दौ।। धरनीधर सुतौ रमाकान्‍त कमलाकान्‍तोबेहर 91/07 करमहासँ रामचन्‍द्र दौ 27/02 जयदे सुतौ बासुदेव शिवदेवों 98/06 पवौलीसँ रूचिदत्त सुत रघुदन्‍त दौ ।। 30//01 रघुदत्त सुता बलियाससँ होरे सुत सोंढू दौ ।। 15/04।। दूबे सुता शक्ति श्रीधर गणतिका पालीसं नरसिंह दौ।। गणपति सुता हेलू 47/01 सुरे होरेका आदया गंगोलीसँ सोखदत्त दौ।। अन्‍त्‍यो टकबालसँ माधव दौ।। 09/07।। दरिहरा सँ सोढू द्वौणा होरे सुतौ बादू सौठ कौ बेलऊँचसँ दिनकर दौ।। सौ 128/24 सोठ सुता कुजौलीसँ जीवे सुत महाई दौ 135/01।। महाई सुतौ रतन पूरखू कौ सोदरपुरसँ 34/04 देवनाथ दौ देवनापरूतोनाथ 70/10 ।।73।।03 पाथू कौ पालीसँ नादू सुत यशु दौ सरिसबसँ खांतू द्दौ।। बासुदेव सुतौ रामचन्‍द्र भगीरथौ 78/06 सोदरपुरसँ निकार दौ।। 23/02 म.म. गोविन्‍द 49/03 सुता रघुनन्‍दन 39/08 (90) ।। 37।। गोन्‍टू 66/04 निकारा: खौआल सँ वीर दौ ।। 30/05।। बाटू 44/03 सुतौ वीर: बेलउँच सँ धरादित्‍य सुत महादित्‍य दौ एक. दूनम द्दौ वीर 47/07 सुतौ रंजन 73/05 परानौ हरिअमसँ लाख दौ ।। 25/08 लाख 65/06 सुतौ खखनू धारू कौ दरिहरासँ नारू सुत लाखू दौ बुधवलसँ गंगादित्‍य द्दौ। निकार सुता महिपति 77/04 272/04 चूड़ामणि विष्‍णु 103/04 कृष्‍ण हरिनन्‍दन 75/01 लक्ष्‍मन अच्‍युता: 63/08 बुधवालसँ चाण सुत धारू दौ।। 35/01।। रूचिकर सुता चाण 46/03 दिनकर नोनेका: 49/02 माण्‍डरसँ कौने सुत जीवेश्‍वर दौ बुधवासँ उत द्दौ।। चाण सुता मानू 48/06 73/06 नीति रतिपति 52/08 श्री पति 77/07 धरापति प्र धारू का: वेलउँच सँ गयादित्‍य सुत कृष्‍णपति दौ।। 29/08 पणडुआसँ शुभंकर द्दौ।। 77/01 चारू सुतौ रघुनाथजी 89/09 जी वनाथों 78/10 एकहरा संकृराणपति सुत श्री पति दौ।। 22/08 दिन 42/03 सुता गुणपति 304/04 कृष्‍णपति सुधापति नरपतिय: अलयसँ हरि दौ।। कृष्‍णपतिसुता 45/01 कुलपति 50/07 श्रीपति रमापतिय: जजिवालसँ लाखू दौ।। 17//03 गौरीश्‍वर सुत रतनपाणि सुतौ जीवे लाखू कौ फनन्‍दहसँ विदू दौ।। लाखू सुतौ रथुपाणि 72/05 हरिपाणि 189/04 करनहासँ गंगेश्‍वरसुत राम ।।35/03।। माण्‍डरसँ रघुपति द्दौ।। श्रीपति सुता सोदरपुरसँ भद्रेश्‍वर सुत सोम्‍हल दौ।। 33/01।। बेलउँचसॅ हरि द्दौ।। रामचन्‍द्र सुता रामकृष्‍णा हष्‍ण लक्ष्‍मीकांता दरिहरा सँ रामचन्‍द्र दौ।। 22//05।। हरि 47/03  सुता मति गोविन्‍द दामू 75/02 मधुसूदन श्री हरि का: 114/03 बेलउँच सँ जयादित्‍य सुत सुधे दौ।। 30।।09 सुधेसुता 43/07 माधू मित्रकर 60/09 यशु 51/09 गुणोका: पालीसँ हचससुत दिनकर दो 135/01।। माण्‍डरसँ सुरसर द्दौ।। माण्‍डरसँ सुरसर द्दौ।। गोविन्‍द सुताकेशव अर्जून प्रदभूभना: करमहासँ रवि सुतमांगु दौ।। 20/08।। रवि सुतो गांगुक: तल्‍हन पुरसं गोविन्‍द सुत गोपाल दौ (91) 25/10/0।। पालीसँ नन्‍दीश्‍वर द्दौ।। मांगू सुतामहाई 179/0668/05 नरिहरि विशोका दरिहरा सँ हरिकर सुत पदमकर दौ ।।10/09।। पद्यकर सुतो 58/01 रघु कान्‍हु कौ जजिबाल सँ सोमसुत माधव दौ।। 31/माधव सुतौ देध: उचति सँ हटवय सुत माधव दौ खौआल सँ भवे द्दौ।। प्रदयूम्‍म सुता रामचन्‍द्र रामभद्र वलभद्रा: 160/01।। बलभद्रा: 106 बुधवालसँ मणि सुत विष्‍णुपति दौ।। 36/07।। विष्‍णुपतिक शिवनाथ: खौआन सँ यशोधर दौ ।। 31/04।। रामकर सुता हरि 39/03 गणपति कुशा: हरिअम्‍बसँ हारू सुत शिरू दौ।। 19/01 वलियास सँ रूचि द्दौ।। गणपति सुतौ यशौपार सीरसद  केशव दौ।। 29/06।। वलियाससँ नितिकर द्दौ।। यशोधर सुत जजिवालसँ रघु दौ।। 12/08।। शंकर सुता भैरवपुर होरे शोरे का दरिहरासँ धराधर सुत लाख दो करमहस धार रघुसुतौ देवदत्त भवे कौ माण्‍डरसॅ रतनू सुत बागे दौ रउन सँ शशि दौ रामचन्‍द्र सुतौ रघुनन्‍दन 102/04 हरिनन्‍दनौ 83/06 खण्‍डबलासँ रतिनाथ दौ।। 33/10।। की सुता रामनाथ पॉथू हरिहरा बेल. बाढ सुत मानू दौ नरउन सँ शशि दौ।। रामचन्‍द्र सुतौ रघुनन्‍दन 102/04 हरिन्‍न्‍दनौ 83/06 खण्‍डबलासँ रतिनाथ दौ।। 33/03।। की सुता रामनाथ मॉथू हरिहरा बेल बादू सुत मानू दौ पालीसँ शुभंकर द्दौ।। 64/08 पाथू सुतौ रतिनाथ बहेशंकर दौ।। 27/10।। मतिश्‍वर सुताजोर महनबुशे जीवे शंका सकण्‍नितिकर दौ।। शंकर सुताहोरिल रनतपाणि राघव 236//01 शूलपाणि का सरिसबसँ इन दौ ।। 20/04।। ग्रहेश्‍वर 69/01 सुतारद चाण 44/03 इन महेन्‍द्र 147/08 रषिका: 60/02 करमहासँ लक्ष्‍मीपतियां इनसुतों केध सुधाकरौ पनि महि सुत रतनू दो माण्‍डरसँ नगाई दौ।। रतिनाथ सुता महिषी बुधवालसं डालूसुत श्री दत्त दौ ।। 10/01।। सूर्यकर सुतौ राम लखन खण्‍डबलासँ बलभद्र दौ लाखन प्र. लक्षमन सुन्‍त ग्रहेश्‍वर 57/09 भोगीश्‍वर मतिश्‍वर नन्‍दीश्‍वरा: तत्राद्यो तिसूरीसँ गुणेश्‍वर दौ अन्‍रयो पण्‍डुचासँ हरेश्‍वर दौ भोगीश्‍वरसुतो धारधाने कौ उपरसँ दोसर पंक्रिकदीप: अपरप्रदमन सुत्‍ग गौरीपति 97/03  रघुनाथ 78/04 लक्ष्‍मीनाथ खण्‍ड मेघ दौ खौजार: (92) ।। 38।। माण्‍डरसँ सागर दौ।। धारू सुता श्रीपति गिरपति ठालू प्र. रतिपति मणिपति गणपतिकां वलियाससँ विभाकर सुत मित्र मित्रकर दौ गंगोली सादू द्दौ।। रतिपतिय प्र. डालूसुता जतज अमांई दौ।। 12/05।। ग्रेहश्‍वर प्र. अमांइ सुता दरिहरासँ पॉंथू दौ ।। 23/08 कोने सुतो पॉंथूक: फन व्‍हीरिनाथदौ ।। पॉंथू सुता सोदव देवनाथ दौ श्री दत्त सुता कृष्‍णदाश पुरूषोत्तम वलभद्रा: माण्‍डरसँ विशो सुत बासुदेव दौ।।27/01।। कुलपति सुतौ विशांक: करमहा सँ जागू दौ ।। 53/06 विशो सुतो वासुदेव: बुधवालसँ देखे सुत रवि दौ तिसुरीसँ खाजो द्दौ।। वासुदेव सुतो रूपधर: पानी सॅ सुरपति दौ।। 25/10/0।। बागू सुता गोविन्‍द 62/02 दामोदर माधवहरिहरा: 89/08 81/04 माण्‍डरसँ बुद्धिकर दौ।। 27 बुद्धिकर सुताभवनाथ रवि 64/02 गोरीका ।। गोविन्‍द सुतो सुरपति मनमानी ऋषिकेशा: दरि.रवि सुत भवे दौ सरि.गोगी द्दौ।। सुरपतिसुता खौआलसँ माने दौ।। 36/01।। माने सुता वेद गर्व90/09 नोन गोविन्‍दधाने अमरूशंकरा: बहेराढ़ी सँ गदाघर दौ।। 25/04।। गदघर सुतो विष्‍णुपति 49/03 सकराढ़ी सँ गोविन्‍द सुत चाणो दौ ।।05/08 प्रबन्‍ध मेंध दौ एवम् रमाकान्‍त मातृचक्रं ।। रमाकान्‍त सुता सिहानि माण्‍डरसँ महिपति सुत वलदेव दौ।। 31/08।। दूबे 54/02 सुतौ विभाकर भागीरथ सोदापुर से वर्द्धनसुत हरिनाथ दौ ।।21/03 दरिहरासँ राम द्दौ। विभाकर सुतौ वैदिक विश्‍वम्‍भर हीरे वौ बुधवालसँ लाखूसुत गोपी ।। 19।।09।। लाख सुता (93) सुता गोपी 85/07 गौरी रूदा: खौआल सँ बुद्धिकर दौ ।।14//05।। बभनि. रूचिकर द्दौ।। गोपी सुतो दामोदर: खौआलसँ सोजू दौ।। 19/09।।  किशोटू सुता विशोरघुशोभीक टक. प्रतिकर दौ।। रघु सुतो साजू 85/07 जगन्‍नाथौ करमहासँ गणपति दौ जजि. सोम द्दौ.।।  सोजू सुतो रंजन: पानिलाख दौ 30/01।। सकराढ़ी सँ हरिश्‍वर द्दौ।। वैदिक: विश्‍वमभर 86/01 सुतो हरिपति 92/01 महिपति खण्‍डबलासँ म.म. ढ़ दामोदर दौ।। 32/107।। हरिअमसँ गयात द्दौ।। महिपति 77//03 सुता बलदेव जयदेव भागीरथ: घुसौतसँ जगतगुह. सदानन्‍द दौ।। 29/0 कंटकाद्वारकरक म.म. मधुसूदन 182/02 सुतो कृष्‍णानन्‍द 82/05 जगतग्रह म.म. सदानन्‍दो दरिहरासँ शक्‍तसुत इन दौ ।।25/06।। शक्‍तू सुता होरे चाण इन शोरे 49/01 महिन्‍द्रा: 66/02 बेलउँच सुधे दौ।।37।।08।। पालीसँ दिनकर दौ।। इन सुतो श्रीराम: 128/02 हरिअमसँ पीताम्‍बर दौ ।।31/08।। मांगु सुतो पीताम्‍बर गुदीकौ माण्‍डरसँ रमायति दौ।। 22/04 पक्षघर सुतो महिपति अपरा लाखू सुतो सुधाकर: कर बाराह दौ ।।20/8।। खण्‍ड. ज्ञानपति रमापति तिसुरी संग्रहेश्‍वर दौ ।। रमापति सुता नरउनसँ खांतू दौ ।। 19/03।। माण्‍डर सें वागीश्‍वर द्दौ।। पीताम्‍बर सुता सकराढ़ी सं सुधकर दौ 34/09।। पालीस हरियाणि सुधाकर दुतो परमूक: पालीसँ दौ ।।31/06 २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली

1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

आब 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली  आऽ  2. मैथिली अकादमी, पटनाक मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू। ग्राह्य / अग्राह्य 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/ होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे 71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि 181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो ON ENGLISH_MAITHILI DICTIONARY BY GAJENDRA THAKUR- PROFESSOR UDAYA NARAYANA SINGH Only when Samuel Johnson's A Dictionary of the English Language (1755) was published, the English scholars and students could get an actually reliable lexicon of their language with a great degree of sophistication. Most early efforts in English lacked maturity. The 1604 dictionary called A Table Alphabeticall by Robert Cawdrey, or other works by many imitators who followed it were no match vis-a-vis the tradition of dictionary-making in the rest of Europe. But the early bilingual dictionaries that involved French, Italian or Latin words along with definitions of the foreign words in English were much better, and the 1592-glossary of Richard Mulcaster could be given as one instance. These were still not comparable with Arabic dictionaries were compiled between the 8th and 14th centuries, especially the general purpose dictionaries like the Lisan al-`Arab (13th c.). English as we know her now has been a relatively recent phenomenon in the world history of languages, perhaps a little older than Maithili. This is because when the oldest available treatise in Maithili by Jyotirishwara was being written, that was the time of Chaucer in English. The oldest known western dictionaries were created in the erstwhile Akkadian empire with bilingual Sumerian-Akkadian wordlist (found in Ebla, Modern Syria) and dating roughly 2300 BC. But the oldest Greek lexicon by Apollonius the Sophist (fl. 1st century CE), which lists Homeric vocabulary and meanings set an example. The 2nd millennium BC Urra=hubullu glossary with such bilingual Sumerian wordlists is another example of old lexicographical accounts, comparable only with the Chinese tradition of the 3rd century B.C. The early Japanese attempt of 682 CE Niina glossary of Chinese characters, or the oldest existing Japanese dictionary, Tenrei Banshō Meigi (835 CE) were also important steps. In India, preservation of the Vedic literature was the biggest motivation for grammatical and lexicographical works. In Panini as well as other grammatical traditions in Sanskrit, it was a common and very basic task to segment Vedic sentences into words, and words into root-suffix components. In the process, morphological, phonological as well as morpho-phonological theories were also developed. Nighantu (700BC) on which Yaska is believed to have written a commentary called Nirukta is the oldest known treatise, and this tradition continued to Pali tradition as well. They arranged lexical material from the point of view of Synonymy as well as Homonymy. The first and the foremost popular name of lexicon work in Classical Sanskrit is Amarasimha’s Amarakosa (6h century AD). The Catalogous Catalogorum lists at least 40 commentaries on Amarakosa alone, which shows how important and popular this synonyms dictionary was in Ancient India. There were many other léxica created more or less in the style of Amarakosa, which included the following (cf. Malhar Kulkarni, in TDIL site): 1. Naamamaalikaa of Bhoja (11 C) 2. SiddhashabdaarNava of Sahajakirti- (17th C) 3. Shaaradiiyaakhyaanaamamaalaa of Harsakirti- (17th C) 4. Paryaayashabdaratna of Dhananjaya-Bhatta 5. Koshakalpataru 6. Naanaartharatnamaalaa of Irugapa Dandadhinatha (14th C) 7. Naanaarthamañjarii of Raghav a 8. DharaNiikosha of Dharanidas a (12th C) 9. Shivakosa of Sivadatta-Misra 10. Ekaarthanaamamaalaa-dvyaksharanamamaalaa of Saubhari. 11. Paramaanandiiyanaamamaalaa of Makrandadasa The first modern-day dictionary of Sanskrit made using the western principles was the Sanskrit-English Dictionary compiled by Professor H.H. Wilson and published in 1813. Two Indian dictionaries came out soon after, namely, the Sabdakalpadruma of Pt Sir Raja Radhakanta Dev and the Vacasptya compiled by Pt Taranatha Tarkavacaspati. To my mind, Practical lexicography, or the science and art of compiling, writing and editing lexicons meant for different purposes is as important as Theoretical lexicography. Lexicography as an expression occurs only in 1680 A.D., although the term Dictionary makes its appearance in English in 1526 A.D., as the Merriam-Webster’s tells us. We are told that a dictionary must be the following: 1 : A reference source in print or electronic form containing words usually alphabetically arranged along with information about their forms, pronunciations, functions, etymologies, meanings, and syntactical and idiomatic uses 2 : A reference book listing alphabetically terms or names important to a particular subject or activity along with discussion of their meanings and applications 3 : A reference book giving for words of one language equivalents in another 4 : A computerized list (as of items of data or words) used for reference (as for information retrieval or word processing) The activities associated with the practice of this rare and time-intensive art involves at least the following: Identification of the end-users and their requirements Decision on a limited set of defining words based on common people’s vocabulary Decision on how to organize definitions and explications Identifying what the communicative and cognitive functions of the lexicon might be Identification of the different components of the dictionary Choice of appropriate structures for data storage and display (i.e. frames, categorization, classification, distribution, and cross-references) Selecting head words and affixes for lemmatization Highlighting the collocations and combinations Adding IPA or Bloch & Tragger symbols marking pronunciation of words Adding stylistic and dialectal variations Choice of equivalents in the target languages in case of multilingual dictionaries User access keys and facilities in both print and e-dictionaries The Gangetic plain in Bihar and the Terai region at the foothills of the Himalayas in Nepal that together define the cultural space of Maithili and Mithila was talked about by George Abraham Grierson (1908) long ago, although he was mainly concerned with what is traditionally known as Mithila within India. There had been many changes and redrawing of borders in this region. Grierson had considered the speech area of Maithili to be the entire districts of Darbhanga and Bhagalpur of Bihar in the early 20th century. In addition, he had enlisted Maithili as a language spoken by the majority of people living in the districts of Muzaffarpur, Mongyr, Purnea and Santhal Parganas. But as we know, some of these have now been a part of Jharkhand state. It should also be mentioned that in between, during the recognization of the state, only 5 out of 17 districts (viz. Bhagalpur, Purnea, Saharsa, Darbhanga and Muzaffarpur) were generally taken as Mithila-speaking districts of Bihar. Paul Brass(1974) in his detailed study of the Maithili movement in his "Language religion and politics in North India" had taken this as broadly defining the geographical space of Mithila. After Bihar was split up into 31 districts in early 1980s, in a project report (entitled "The Maithili language movement in North Bihar: a sociolinguistic investigation") prepared by me jointly with N. Rajaram and Pradip Kumar Bose, we had taken the position that 10 out of 31 districts should be considered as Maithili speech area: Bhagalpur, Katihar, Purnea, Saharsa, Madhubani, Darbhanga, Samastipur, Sitamarhi, Muzaffarpur and Vaishali. In conclusion, the geographical boundaries have changed both because of natural changes (as the river Koshi has changed its course seven times in the last 200 years) as well as because of reorganization of districts. It is obviously a great challenge for anyone who wishes to attempt a gigantic dictionary of Maithili as Gajendra Thakur has attempted. The situation is more complex because Maithili lexis is likely to be affected partly or greatly by the 12 other languages spoken in the same cultural area. There are about 12 other languages worth mentioning. The major languages spoken around Maithili are Bhojpuri and Magahi with Hindi being a super-imposed language spoken by all the three speech communities. But Bihar being a multi-lingual state, one can also find Nepali and Bengali speakers in good number. In addition, since Maithili speakers are found in good numbers in the Jharkhand region too, one has to take it that Oraon, Mundari, Ho, Bihar, Dhangar, Santali and a number of the smaller Austric language speakers too co-exist with them. Although a lot of Muslims in Mithila region return their mother tongue as Maithili, a number of them also claim to be speakers of Urdu. Of these, only four have constitutional recognition: Hindi, Urdu, Bengali and Nepali. To my mind, Maithili has had influences at the syntactic levels from many, including from the Austric languages but at the lexical level, the additions and adaptations have been limited to limited sources such as Urdu, Hindi, Bhojpuri and Magahi. The dictionary captures native lexis as much as the nativized ones. This is also because I think not more than 25% to 30% speakers are monolingual speakers of Maithili, as most are quite proficient in other tongues. Those Maithili speakers living near western Bihar also speak in Bhojpuri and those in the Patna-Ranchi-Gaya-Monghyr region know Magahi, too, in addition to Hindi. But only a tiny percentage, say - less than 3% to 5% of Maithils, can also speak effectively in English. But borrowing from English into Maithili at the word level is as rampant as in case of other New Indian Languages (NIA). Many might raise this doubt as to what would be the number of people who would be benefitted by an attempt such as Gajendra-ji’s? Although the Official figures of speakers of Maithili have not remained stable. But this obviously needs some elaboration. The Census figures are not realistic as 2001 figures are: 1,21,79,122. The skepticism is confirmed, when we see that there have been tremendous fluctuations in the decennial estimates of Maithili speakers as can be shown from a comparison of decennial increase or decrease of all Census figures since 1891 base: 1901 - 11: + 3.12% 1911 - 21: - 0.77% 1921 - 31: + 7.68% 1931 - 41: + 9.13% 1941 - 51: Not conducted 1951 - 61: + 22.35% 1961 - 71: + 20.89% 1971 - 81: + 24.19% In actuality, the number of Maithili speakers have reasonably steadily increased. Some indications could be given only from my guess-work, which is estimated to be 40 million. In 1891, Grierson (1908) had estimated the number of speakers of Maithili as 9,289,376. As against this, the Census 1961 figures showed 4,982,615. Obviously, the Census 1961 figures were not realistic. Although Grierson’s (1909) population estimates based on his survey done in 1891 were not agreed upon by all, at the turn of the present century Maithili was spoken in the following regions: i. all Darbhanga and Bhagalpur, ii. 6/7th of Muzaffarpur iii. 1/2 of Monghyr iv. 2/3rd of Purnea, and v. 4/5 of the so-called "Hindi" speakers (enumerated in the Census) under the Santhal Parganas. During 1816, a part of the northern speech area was permanently annexed by the Kingdom of Nepal. Therefore, to the total number of speakers, about 14% population of Nepal will have to be added. Paul Brass (1974: 64-6) uses Gait's computation (cf. Census 1901) based on various documents available through 1885, and arrives at the figure of 16,565,477. The calculation here is based on Grierson's estimates plus the growth of overall population for Bihar over these 8 decades. On the basis of 1981 figures, and considering the figures of scattered Maithilis outside the Mithila area, and considering the population in the 10 districts (out of 31), I and my colleagues had, in mid-1980s, arrived at the figure of 22,972,807 (cf. Singh, Rajaram & Bose 1985). This figure, considering the decennial increase of population, has gone up to 40 million, to my mind, and that many people stand to gain by a gigantic effort such as this dictionary. It is generally presumed that Maithili is spoken only by the Brahmins in the Mithila region. This seems to be a disinformation spread earlier to somehow fit it as a dialect of Hindi, mainly in order to increase the official figure of speakers of Hindi. But a look at the caste composition in North Bihar and the actual census returns for Maithili would tell the true story. The relatively high returns for Maithili in some census reports could be explained only by the fact that although 46.84% people living in the Mithila-speaking districts are Muslims, as against 31.06% Hindus in Mithila, there could not have been an overwhelming support for Maithili unless a good number of them returned Maithili as their mother tongue. A survey of language use in Mithila could show that although the language had been shrinking in use in the formal domains. But it is also true that literary productivity and achievements are better noticed on all-India scale now more than they were 20 years ago. Madhubani painting or Mithila Art have become famous all over India, and has reached the world market, too. Only if the new generation of Maithili speakers decides to shift their cultural-linguistic identity, there could be a threat. In my perception, denial of constitutional rights has been a boon in disguise for Maithili, because that has added vigor to its literary-cultural activity. It has already overtaken several constitutionally recognized languages such as Manipuri, Konkani, Nepali and even Sindhi. And now that it is in the 8th Schedule, it should get the official and other kind of patronage it deserves. It should also get the support of its users who would now look for the modern tools such as on-line e-zines, e-dictionaries, hand-held mobile glossaries, and the automated Q-A systems etc. To that extent, this dictionary of Maithili which will be available in both web and printed version will be a significant contribution by the compiler. Gajendra Thakur and the publishers deserve all commendation from the Maithili speech community in particular, and from the scholars in translation in general. It is true that Maithili lexicography bloomed very late, much after M.M. Dinabandhu Jha’s efforts and only now we have some significant works like KalyaaNii-kosha by Pt. Govind Jha, or the Brihat Maithilii Shabdakosha by Jayakant Mishra, Mithila Shabda-Prakasha by Pt. Matinath Mishra ‘Matanga’, or Basic Colloquial Maithili: A Maithili-Nepali-English Vocabulary by Alice Davis. The Sankshipta Maithili Shabdakosha and the Bilingual Maithili Dictionary, planned by the Maithili Academy, Patna are yet to see the light. The plan of the National Translation Mission (see www.ntm.org.in) to come out with a Longman-CIIL Basic English-English-Maithili based on corpora will also be an interesting product. But all said and done, the significance of this work will be understood more and more as time will pass by. 28.2.2009. Mysore Prof. Udaya Narayana Singh Director CENTRAL INSTITUTE OF INDIAN LANGUAGES (CIIL) Born in 1951 at Calcutta, Dr Udaya Narayana Singh writes in both Maithili (in which he has 3 collections of poems, 11 plays, and a few books in translation) with a pen-name �Nachiketa� and also in Bengali (with two collections of poems, 3 books of translation, 7 edited books of essays and scores of literary essays). He has also translated from and into Bengali, Hindi, Gujarati, Maithili, Sanskrit and English, and has edited the first poetry journal in Maithili called Maithili Kavita for a number of years. His research publications in Linguistics and Translation Studies are over 150, and they are in varied fields. Dr Singh earned Linguistics honours at Sanskrit College, Calcutta, and later at the Univ of Delhi (Ph.D., 1979). He taught at several Indian universities, including MSU-Baroda (1979-81), SGU-Surat (1981-85), Univ of Delhi (1985-87), and later at the University of Hyderabad (1987-2000). Currently, he is the Director of the Central Institute of Indian Languages, Mysore � the apex institution dealing with Indian languages. Dr Singh has been an Eshan Scholar of the University of Calcutta (1972), UGC Fellow (1994-99), a recipient of LSA fellowship at Urbana (1978), CIPL-grant for visiting Berlin (GDR) (1987), a member of the Indo-Italian Cultural Exchange Programme for Creative writers, and a member of the Official delegation of scholars to Trinidad & Tobago (2002). He has been Chief Editor of Indian Linguistics, 1988-1990, and a Visiting Professor of IIAS (1989), and delivered many prestigious lectures in India, Bangladesh, Nepal, Pakistan, Thailand, Singapore, Russia, Sweden, Germany (including erstwhile East Germany), and USA.         He has been a Life Member of numerous academic bodies and societies, including LSI, DLA, ASRC, Canadian Studies, and Comparative Literature Association, and has completed several major projects in Sociolinguistics, NLP, and Translation Studies, besides supervising a large number of doctoral and M.Phil. students in Linguistics, Translation and Comparative Literature. English Translation of Gajendra Thakur's (Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in )Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti  received editor's choice award from www.poetry.com and her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India).  Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. SahasraBarhani:The Comet translated by Jyoti His body was stretched and senseless. The fear of death of Nand turned the environment very sad. Aaruni was shocked. The doctor from the upper floor came and declared death of Nand. Aaruni’s friend called his friends without delay. Everyone got their job- one at the entrance to guide people, one in the drawing room and so on. His friends rolled the required things in the bedding and brought to Aaruni. “You will have to prepare for funeral; you will need to go arrange bamboo bed to lift the body to the bamboo ghat. I am going to arrange the vehicle,” said Aaruni’s friend. “My father was very attached to the village. He used to say that he would not come to the city for next seven births. Ba’s funeral was done in Patna. The bridge of Patna was not made during those days. But now it is possible to take the body of my father to the village by any vehicle so funeral can be done in the early morning,”said Aaruni. “I am arranging that”, replied his friend. That friend of Aaruni was like Hanuman there arranging everything so quickly including the vehicle. “You must have the identity card of your uniform”, said his friend. “Yes I do have,” said Aaruni. “However there is less chance to be any destruction in the way to home but keep it with you for the safer side,” advised his friend. House was vacant. That was locked. Both brothers along with their mother started towards the village in that night of Shukla Paksha. (continued) महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर  'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आऽ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) मे श्रुति प्रकाशन, १/७, द्वितीय तल, पटेल नगर (प.) नई दिल्ली-११०००८ द्वारा छापल गेल अछि। 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-15 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(२). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आऽ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । महत्त्वपूर्ण सूचना:(३) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  'सहस्रबाढ़नि'(उपन्यास), 'गल्प-गुच्छ'(कथा संग्रह) , 'भालसरि' (पद्य संग्रह), 'बालानां कृते', 'एकाङ्की संग्रह', 'महाभारत' 'बुद्ध चरित' (महाकाव्य)आ 'यात्रा वृत्तांत' विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। - कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर महत्त्वपूर्ण सूचना (४): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, ई-प्रकाशित तँ होएबे करत, संगमे एकर प्रिंट संस्करण सेहो निकलत जाहिमे पुरान २४ अंकक चुनल रचना सम्मिलित कएल जाएत। महत्त्वपूर्ण सूचना (५):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकें सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष 2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00

शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आऽ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता” ९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी  शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-15 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आऽ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । श्रुति प्रकाशन, रजिस्टर्ड ऑफिस: एच.१/३१, द्वितीय तल, सेक्टर-६३, नोएडा (यू.पी.), कॉरपोरेट सह संपर्क कार्यालय- १/७, द्वितीय तल, पूर्वी पटेल नगर, दिल्ली-११०००८. दूरभाष-(०११) २५८८९६५६-५७ फैक्स- (०११)२५८८९६५८ Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी,  एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ’ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आऽ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ’ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आऽ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ 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