133 'विदेह' ३३ म अंक ०१ मई २००९ (वर्ष २ मास १७ अंक ३३) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१ रामभरोस कापडि भमर-संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा २.२. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- दृष्टि २.३. प्रत्यावर्तन - तेसर खेप- -कुसुम ठाकुर २.४. बलचन्दा (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (अन्तिम खेप) २.५ १. कामिनी कामायनी - सूटक कपङा आ २.कुमार मनोज काश्यप-प्रतिरोध २.६. मणिपद्म क संस्मरण-संसार- प्रेमशंकर सिंह २.७. कथा-विधिक विधान- लिली रे ३. पद्य ३.१. अन्हारक विरुद्ध- भ्रमर ३.२. कामिनी कामायनी: लिखत के प्रेम गीत ३.३. विवेकानंद झा-कविता आ की सुजाता/ चान आ चान्नी ३.४. सतीश चन्द्र झा- मध्य वर्गक सपना ३.५ मनक तरंग- सुबोध ठाकुर ३.६. ज्योति-महावतक हाथी ४. गद्य-पद्य भारती -सोंगर,मूल कोंकणी कथाः खपच्ची,लेखकः श्री. सेबी फर्नानडीस, हिन्दी अनुवादकः डॉ. चन्द्रलेखा डिसूजा,मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह ५. बालानां कृते-1देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी ६. भाषापाक रचना-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] ७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list) ७.THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili NovelSahasrabadhani translated by Jyoti. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। १. संपादकीय मैथिली पत्रिका “मिथिला दर्शन". नव रूप-रंग मे संपूर्ण पारिवारिक पत्र जाहिमे आर्थिक लेखक संग नेना-भुटका लेल कथा-कविता, महिला स्तम्भक अन्तर्गत भानस-भात आ साज-श्रृंगार, समीक्षा-लेख, पोथी-परिचय, सुश्रुषामे डॊक्टरी सलाह आ नियमित कथा-कविता सम्मिलित अछि। एहि पत्रिकाक स्थापना १९५३ ई.मे भेल रहए आ प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह रहथि । आब एकर प्रधान सम्पादक- नचिकेता आ कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर छथि। कला सम्पादक छथि डॉ. रमानन्द झा’रमण’। श्री शम्भु कुमार सिंह आ श्री अजित मिश्र एहिमे सम्पादकीय सहयोग दए रहल छथि। आ सम्पादकीय उपदेष्टा छथि पन्ना झा, रामचन्द्र खान, भीमनाथ झा, सुभाष चन्द्र यादव आ कुणाल। चित्रकार छथि चन्दन विश्वास। डॉ. अणिमा सिंह द्वारा ई प्रकाशित आ मुद्रित कएल जा रहल अछि। ई पत्रिका अपन वेबसाइट http://www.mithiladarshan.com/ शीघ्र शुरु करत। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ०७ अप्रैल २००९) ७८ देशक ७८१ ठामसँ २०,९५१ गोटे द्वारा विभिना आइ.एस.पी.सँ १,६८,७०८ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in 1 aum said... excellent magazine Reply05/04/2009 at 07:03 PM २. गद्य २.१ रामभरोस कापडि भमर-संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा २.२. कथा-सुभाषचन्द्र यादव- दृष्टि २.३. प्रत्यावर्तन - तेसर खेप- -कुसुम ठाकुर २.४. बलचन्दा (संपूर्ण मैथिली नाटक)-लेखिका - विभा रानी (अन्तिम खेप) २.५ १. कामिनी कामायनी - सूटक कपङा आ २.कुमार मनोज काश्यप-प्रतिरोध २.६. मणिपद्म क संस्मरण-संसार- प्रेमशंकर सिंह २.७. कथा-विधिक विधान- लिली रे संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा – रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, अध्यक्ष ः साझाप्रकाशन, ललितपुर संचार एवं साहित्य क्षेत्रमे समावेशी स्वरुपक अपेक्षा वि.स. १९५८ मे प्रारंभ भेल गोरखापत्र समाचारपत्रक प्रकाशनसं नेपाली पत्रकारिताक विधिवत शुरुआत मानल जएबाक चाही । मुदा इहो समाचारपत्र मात्र नेपाली भाषा आ नेपाली भाषी सभक हेतु पृष्टपोषणक काज करैत आएल अछि । ई एक सय आठ वर्षक नेपाली पत्रकारिताक इतिहासेमे नुकाएल अछि समस्त नेपालक पत्रकारिताक व्यथा कथा । राजनीतिकर्मी लोकनि भले दू सय चालिस वर्षक गोरखासं ल’ नेपालक शाह वंशीय राजघराना धरिक समय कालमे मधेशवासीक शोषणक बात करैत हो, सत्य तं ई अछि एहि समस्त अवधिसं ल’ एखन धरिक गणतंत्र नेपालमे समेत अवस्था उएह छैक आ ओ चाहे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक हुअए अथवा साहित्य एवं संस्कृति क्षेत्र हुअए । मधेश आन्दोलनक बाद जे किछु आंगुर पर गन’ बला परिवर्तनक संकेत आएल अछि से धन सन । हम पहिने संचार क्षेत्रक बात करी । गोरखापत्रक सय वर्षसं उपरक इतिहासमे पहिल बेर कोनो मधेशी किंवा मैथिल नि.प्रधान सम्पादकक जवावदेह पद पर जा सकलाह अछि । एहिस पूर्व सम्पादक आ काका अध्यक्षक वाते नहि आने महाप्रबन्धक । नीति निर्माणक तहमे मैथिल किंवा मधेशीक पहुंच शून्य रहल अछि । गणतन्त्रो नेपालक संचार कर्मी सभक हेंजमे जवावदेह पदपर मधेशी आबि पओताह–तकर आशा कम्मे अछि । नेपाल टेलिभिजनक महाप्रबन्धक भले नोकरीक वरिष्ठताक कारणें कोनो मधेशी तपानाथ शुक्ला भ’ जाथु । एखनो सरकारक मनोनयनमे सरकारी संचार क्षेत्र मधेशी विहिन अछि । कहियो काल देखएबालेल सचिवक अध्यक्षता बला संचालक समितिक सदस्यक रुपमे रेडियो नेपालमे कोनो मंगल झा किंवा रोशन जनकपुरी भले नियुक्त क’ देल जाइत हो । ने अवधि पूर्ण ने नितिनिर्माणमे कोनो अहमियत । नेपाल टेलिभिजनक हालति सएह छैक । संचालक धरिमे कोनो मधेशी नहि । बड कठिनसं आ प्रायः घनघोर प्रसव वेदनाक संग राससक उचिते प्राप्तकर्ता महाप्रबन्धक पद पर महतोजी वैसाओल गेलाह अछि, मुदा का.मु.क संग । राससक अध्यक्षक कुर्सि सदैब मधेशी सभक हेतु आकासक तरेगन भ’क’ रहि गेल अछि । प्रेस काउन्सिलक अध्यक्ष धरि मधेशीक पहुंच एखन धरि भ’ नहि सकल अछि । ४१ वर्ष पूर्व गठन भेल प्रेस काउन्सिल तहियासं आइधरि उएह नेपाली भाषी सभक हाथमे राखल गेल आ वात कएल गेल काठमाण्डू आ तराईक पत्र–पत्रिका विकासक । परिणाम भेलै एखनो धरि प्रेस काउन्सिल मधेशक पत्र–पत्रिकाकें पक्षपातपूर्ण आ द्वैध चरित्र देखा दबबैत रहलैक अछि, सतबैत रहलैक अछि । प्रत्येक नियुक्तिमे एक–आध गोटे मधेशी सदस्य बना देल जाइत छथि, जनिका सम्भवतः चलितो किछु नहि छन्हि । सरकारी संचार क्षेत्र जाहिने नेपालक आनोक्षेत्र खास क’ मधेशीक कर आ मालपोतक रकम लागल छैकमे कोनो समावेशी स्वरुपक अवधारणा शासक लोकनि किएक ने राखि सकलाह । गणतन्त्र नेपालक संचार मंत्री द्वारा गठित प्रेस काउन्सिल लगायत आन संचार क्षेत्र मधेशी पदाधिकारीसं किए शून्य भ’ गेल अछि । नहि लगैए ? – समावेशी मात्र नारा आ सहमति–समझौताक विषय भ’क’ रहि गेल अछि । तकरा कार्यरुपमे परिणत करबाक कोनो प्रयोजन सत्तापक्ष नहि वुझैत अछि । सरकार सूचना आयोग बनौलक, एक्कोटा मघेशी किएक राखत । सरकारी संचार माध्यम जाहिपर सभक अधिकार मानल जाइत अछि, तकर ई हालति अछि तं निजी क्षेत्रक वाते करब की । एत्त तं आर दुर्गति छैक । मधेश, मधेशी, मैथिल, मिथिला आ मैथिलीक चर्च एहि निजी पत्र–पत्रिका आ संचार माध्यमक हेतु कुनैनक गोली जकां गलामे अरघैत नहि छैक । तखन व्यवसायिक बाध्यतावश किछु मधेशी, मैथिल लोकनि किछु संचार माध्यमक महत्वपूर्ण पद पर आसीन राखल गेलाह अछि । नेपाली भाषी सभक नियंत्रणक ओहि प्रतिष्ठान सभमे हिनका सभकें की चलैत हयतनि–अनुमान कएल जा सकैछ । आब आबी साहित्य दिश । नेपालमे तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशमशेर ज.व.रा. (१९०१–१९२९, प्रधानमंत्रीत्व काल) जखन नेपालमे राणाशासन विरुद्ध सुगबुगाहट देखलनि आ चोरानुकी राणा विरोधी साहित्य प्रकाशनक बात महशूस कएलनि तं १९१३ ई. मे ‘गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति’ नामक संस्थाक गठन कएलनि । फरमान जारी कएलनि–कोनो साहित्य वा रचना एहि समितिक स्वीकृति विना प्रकाशित नहि हयत । एहि तरहें राणा प्रधानमंत्री जे अपन गद्यी बचएबालेल समिति बना नियम चलौलनि ओ आइधरि परिवर्तित रुपमे अर्थात् पहिने गद्यी बचएबा लेल आब मात्र नेपाली भाषा बचएबा लेल तेहने जालसभ विनल गेल अछि । ओ चाहे तत्कालीन राजा महेन्द्रक कृपासं गठन भेल नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान होए आ अथवा २०२१ सालमे गठन भेल साझा प्रकाशन होअए । नेपालक जनसंख्या अनुसार मैथिली भाषीक संख्या १३ प्रतिशत अछि २०५८ सालक तथ्यांक अनुसार । दोसर भाषा अछि नेपालीक बाद । मुदा सरकारी संरक्षण विहिन अवस्था छैक । तहिना भोजपुरी, अबधी, थारु आदि भाषा छैक, जकरा प्रारंभ सं उपेक्षाक शिकार होब’ पडल छैक । साहित्यक रक्षामे लागल प्रतिष्ठान सभ मे समेत ई अवस्था शाहीकाल सं एखन धरि छैक जे दुखद मानल जएबाक चाही । मधेशी सेहो संचारमंत्री भेल छथि, मुदा की कएलनि ! शुरुमे हम संचारक्षेत्रक बात कएल अछि । सरकारी संचार क्षेत्रक गोरखापात्र, रेडियो नेपाल, नेपाल टेलिभिजन आदिमे नियमित साहित्यिक प्काशन व प्रसारण होइत अछि । कतेक स्थान नेपाली इतर भाषा, साहित्यक छैक । गोरखापत्र एम्हर ‘नयां नेपाल’ परिशिष्टमे देशक विभिन्न भाषाक पृस्ट देब’ लागल अछि । नीक प्रयास थिक । मुदा दू पृस्ट सं एक क’ देल भाषाक ओ पृस्ट भाषाक विशिष्टताक आधार पर नहि समावेशीक नामपर हक अधिकारकें कटौती क’क’ देल जा रहलैक अछि । आनो पृस्टपर छापबला रचना सभमे नेपाली भाषाक लेखकक अतिरिक्त आन भाषा–भाषी लेखक किंवा उक्त भाषाक साहित्य सम्वन्धी आलेख छापबामे परहेज कएल जाइत रहल अछि । गोरखापत्रक शनिवारीय परिशिस्टांक आ मधुपर्क साहित्यिक रचनाक प्रकाशन अछि । जं नियमित पाठक छी तं महिनौंक वाद किछु मैथिल किंवा मधेशी लेखकक रचना अति उपेक्षित रुपें कोनो कोनमे अभरत । वस, तकरा बाद उएह देखले–पढले नाम आ भाषा–रचना सभ । कतबो समावेशीक बात केओ क’ लिअए–मजाल अछि एहि पत्रिका सभमे मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु भाषा साहित्यक रचना व विकास यात्रा सम्वन्धी आलेख छापालेब । कहियो काल ‘भनसुन’ कएला पर भले अपवादमे देखि पडए । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक गप त आर निराला अछि । नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे काज नहि करबाक जेना सप्पत खएने होए एकर पदाधिकारी लोकनि । एकतं एहिमे पहिने तीसटामे एक मधेशी सदस्य आ उएह कार्यसमिति अर्थात् परिषद्मे राखल जाइत छलाह । से भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि विधाक अन्तरगत । ताही महक किछु पाइ कबारि एक आधटा पुस्तक मैथिलीयोमे बहार भ’ गेल अछि तं ई महान कृपा भेल छैक मैथिली पर । एकरालेल कोना विभाग छुटिआओल नहि गेल अछि । हालेमे गठित आ भंगठित प्रज्ञा–प्रतिष्ठानसं पूर्वक गठनमे एकमात्र मधेशी मैथिली साहित्यकार अवसर पबितो परिषद्मे राखल नहि गेलाह । तथापि प्रज्ञाप्रतिष्ठानक इतिहासमे पहिल बेर ‘आंगन’ गतगर पत्रिका मैथिलीमे निकलल । किछु काज आगां बढल रहय, परिषद् भंग आ दीर्घअन्तरालक बाद जं गठनो भेल तं एहन जे शपथग्रहण लेवासं पूर्वे तहस–नहस भ’ गेल । अदालत आ जनता दुनू द्वारा वहिष्कृत भ’ क’ रहि गेल अछि । तए“ एकरा सं ने पहिने आशा छल, आ ने आब करी से तकर वातावरण बनैत देखल जा रहल अछि । कोना डा. योगेन्द्र प्र. यादव जहिया एकर सदस्य रहथि तहियासं ‘सयपत्री’ पत्रिकाक प्रकाशन शुरु भेल रहय जे वास्तविक रुपमे समावेशी स्वरुप रहैक । आब साझा प्रकाशनक गप करी । पहिने चर्च भ’ आएल अछि राणा प्रधान मंत्री अपना विरुद्धक साहित्यकें प्रकाशनसं रोकबाक हेतु १९१३ ई. मे जे गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति (नेपालके समीक्षात्मक इतिहास–डा. श्री रामप्रसाद उपाध्याय, (२०५५), पृ–३१७ साझा प्रकाशन)क गठन भेल उएह समिति तत्कालीन राणा प्रधानमंत्री जुद्धशमशेर द्वारा नेपाली भाषा प्रकाशन समिति (वि.स. १९९०)क रुपमे परिणत क’ देल गेल तकरे उत्तराधिकारीक रुपमे २०२१ साल अगहन १७ गते साझा प्रकाशनक स्थापना भेल । एकरो संचालक लोकनि नेपाली वाहेक आन भाषामे प्रकाशन करब सोचने ने छलाह आ साझा प्रकाशन विगत ४५ वर्षसं नेपाली साहित्यक भण्डारकें विना कोनो सरकारी अनुदान, अपनेसं कमा क’ अथवा घाटा सहि क भरैत रहल अछि । जं कि एहि संस्थामे सरकारक लगानी ६० प्रतिशत अछि तए“ एकर अध्यक्ष लगायत तीन संचालक सरकार दिशसं मनोनित होइत रहलाह अछि । मुदा केओ एकरा नेपाली भाषा सं आगां लाबि नेपाली जनताक करक अंशसं चलैत एहि संस्थाकें समावेशी नहि बना सकल । सहकारीक कारणें ई कृषि मंत्रालय अन्तरगत अछि आ एहिसं पूर्वो वहुतो मधेशी कृषि मंत्री होइत रहलाक अछि । मुदा आय, लाभ शून्य साझा अध्यक्षक पद पर धरि कोनो मधेशीकें लएबाक जरुरति महशूस नहि कएल गेल । ४५ वर्षक बाद एहिबेर पहिल मधेशी एकर अध्यक्ष पदपर आएल अछि । साझाक नेपाली भाषा मुखी सम्पूर्ण क्रियाकलापकें समावेशी बनएबाक प्रयास जारी अछि । किछु प्रकाशनक तैयारी चलि रहल अछि । मैथिली व्याकरण, मैथिली वालकथा, मैथिली कथा संग्रह आदिक प्रकाशन प्रगति पर अछि तं महाकवि विद्यापतिक चित्र प्रकाशित भ’ चुकल अछि । भोजपुरी, अवधी, थारु, नेपाल भाषा, तमाङ आदि भाषामे काज करबाक गृहकार्य चलि रहल अछि । मुदा ई सभ काज नगण्य स्तपरपर अछि – नेपाली भाषाक काजक आगां ओत्त नेपाली मानसिकतासं उबरि सकबामे जे कठिनाइ लगबाक चाही, लागि रहल अछि । तथापि किछु साहित्यिक संचालक लोकनि समावेशीक वर्तमान रुपान्तरण मे साझाकें मात्र नेपालीक घेरामे राखब उचित नहि, कहि उदारता देखा रहलाह अछि । परिणाम दूर तं अछि मुदा पहुंचसं ततेक दुरो नहि । साझाक पत्रिका ‘गरिमा’ एखन नेपालसं, प्रकाशित साहित्यक पत्रिकामे अग्रणी रखैत अछि । ओकरो समावेशी स्वरुपमे लाओल जा रहल अछि । लेखकीय घेराकें तोडैत मधेशक लेखक लोकनि द्वारा मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारु आदि साहित्य सम्वन्धी आलेख प्रकाशन प्रारंभ भ’ चुकल अछि, आहवान कएल जा रहल अछि । एकर अतिरिक्त निजी क्षेत्रक पत्र–पत्रिकामे समावेशी रचना सभक उपस्थापन कमजोर अछि । रचना’, ‘अभिव्यक्ति’, शारदा’ ‘मिर्मिरे,’ ‘नेपाल’ लगायतक पत्र–पत्रिका सभमे नियमित रुपमे भाषान्तरक रचना, साहित्यक समीक्षा समालोचना, अनुवाद, मौलिक आदि प्रकाशित होइत रहबाक चाही । एहि सम्वन्धमे उक्त पत्र–पत्रिका द्वारा प्रयास कएल गेल हो से हमरा ज्ञात नहि अछि । एहि तरहें देखलापर स्पष्ट रुपें देखि पडैछ जे राजनीतिए जकां भाषा, साहित्य किंवा संचारक क्षेत्रमे मधेशी उपेक्षित रहल अछि । ओ राज्य द्वारा तं सभसं बेसी अछिए, निजी क्षेत्र द्वारा सेहो कम अबडेरल नहि गेल अछि । परिणाम छैक मैथिलीभाषा, साहित्यमे विभिन्न विधा आ धाराक गतिविधि चरम पर होइतो नेपाली संसार ताहिसं अनभिज्ञ अछि आ समकालीन साहित्य यात्राक उपलव्धि अपने धरि सिमित भ’ क’ रहि गेल अछि । तहिना संचारक्षेत्र एतेक आगां बढि गेल अछि, मुदा एहि क्षेत्रमे अपन योग्यता, क्षमता प्रदर्शित क’ सकबाक अवसर कोनो ‘ज्ञानी’ मधेशी पाबि नहि रहलाह अछि । ई व्यक्तिक मात्रे नहि राष्ट्रकें क्षति सेहो भ’ रहलैक अछि । आ तए“ राष्ट्रियताक सूत्र कहियोकाल ढील पडैत वूझि पडैत छैक । आबो समावेशी नहि त फेर कहिया !!! 1 Neelima Chaudhary said... bhramar jik article bad nik, madhesh ker janatak, mithilanchalak uttaree bhagak lokak samasya aa samadhan par tathya parak lekh Reply05/04/2009 at 10:30 PM कथा सुभाषचन्द्र यादव-दृष्टि चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। दृष्टि रातिक दस बजल अछि । अन्दाज लगबैत छी डेरा पहुँचय मे कम सँ कम एक घंटा अबस्से लागि जायत। पाइ केँ जेबीये गनय लगैत छी । बड़ कम अछि । डेरा लग एकटा टुटपुजिया होटल छैक, जे सस्ते मे खुआबैत छैक । लेकिन ओतऽ जाइत-जाइत एगारह बाजि जेतैक । ताधरि ओ होटल बंद नहि भऽ जाय, ई सोचि एकटा होटलमे घोसिया जाइत छी । एकटा टिनहा बोर्ड टांगल छैक, जाहि पर सभ वस्तुक दर लिखल छैक । हम मनेमन पैसाक मोताबिक हिसाब बैसा लैत छी आ आधा प्लेटक आर्डर दऽ दैत छी । किछु पाइ बचि जाइत अछि । मोन सिगरेट पीबा लेल नुड़िआय लगैत अछि आ बचलाहा पाइक सिगरेट लऽ लैत छी । मोन हल्लुक जकाँ बुझाइत अछि आ चालि किछु स्थिर भऽ जाइत अछि । रस्ता मे बहुत बात मोन पड़ैत रहैत अछि – 'ई हाले मे एम. ए. कयने छथि, बेचारा बड्ड गरीब छथि । कतहु कोनो नोकरी दिया दियौक ।’ आब बड्ड घृणा भऽ गेल अछि एहि सभसँ । भरि दिन एम. एल. ए., एम. पी. सभक खुशामद, अपन हीनता-बोध आ सर्विस होल्डरक मौन व्यंग्यसँ मन कुंठित भऽ जाइत अछि । दिन भरि नोकरीक चक्करमे बौआइत छी आ राति केँ झमान भेल डेरा घुरैत छी। जीवनक यैह क्रम बनि गेल अछि । कहिया निस्तार होयत, तकर ठेकान नहि । कोठलीमे एकटा चिठ्टी फेकल अछि । चिठ्टी उठबैत छी । गामसँ आयल अछि । नोकरी भेटल कि नहि, से पूछल गेल अछि । मोन घोर भऽ जाइत अछि । बहुत उदास भऽ जाइत छी । चिठ्टी मे गाम अयबाक आग्रह सेहो अछि । गाम अयबाक बात मनकेँ सान्त्वना दैत अछि । मन होइत रहैत अछि गाम भागि जाय । एहिठामक भूख-प्यास, अपमान, दुख, निराशा कखनो काल बताह बना दैत अछि । ई शहर काटय दौड़ैत अछि । बुझाय लगैत अछि जे नोकरी एकटा मृगतृष्णा थिक । ओकरा पाछू बौआइत-बौआइत जीवन अकारथ चल जायत । गाम जेबाक निर्णय करैत छी । निर्णय पर दृढ़ रहय चाहैत छी लेकिन से होइत नहि अछि । गौंआ—घरूआक व्यंग्य आ उपहासक कल्पना कलेजामे भूर करैत रहैत अछि । 'देखही रौ, फलनाक बेटा बुड़िआय गेलै । एतेक पढ़ियो—लिखि कऽ नोकरी नहि भेलै । आब गाम मे झाम गुड़ैत छै ।' 'धौ, पढ़तै कि सुथनी । पढ़ितिऐक तँ यैह हाल रहितैक ।' 'अरे अबरपनी कयने घुरैत हेतै ।' एहन-एहन बिक्ख सन बोल सुनि केँ मन होइत अछि लोकक मुँह नोचि ली । लेकिन मरमसि कऽ रहि जाइत छी । नोकरी । पढ़बाक—लिखबाक उद्देश्य लोक एक्केटा बुझैत अछि-नोकरी । जे नोकरी नहि करैत अछि, गाममे रहय चाहैत अछि, तकरा लोक उछन्नर लगा दैत छैक । कियैक ? मन मे बेर-बेर ई सवाल उठैत अछि । लोकक व्यवहारक प्रति मनमे क्रोधकं धधरा उठैत अछि । आइ भोर ओहि दक्षिण भारतीय पत्रकार सँ भेंट भेलाक बाद मन उद्वेगहीन आ शांत भऽ गेल अछि । सोचि लेने छी आब गामे मे रहब । खेती करब । पत्रकारक बात रहि-रहि कऽ मोन पड़ैत अछि- 'जँ आइ सभ पढ़ल-लिखल लोक नोकरिये करत तँ फेर खेतीक काज के करत । हमरा आश्चर्य होइत अछि जे आइ—काल्हिक शिक्षित वर्ग केँ खेती करबामे लाजक अनुभव होयत छैक । जीवनक कोनो क्षेत्र होअय-कृषि, उद्योग अथवा व्यापार, एकटा महान आदर्श उपस्थित करबाक चाही । जीवन प्राप्तिक उद्देश्य केवल पेटे टा भरब नहि, किछु आरो अछि । आ ई की जे बी. ए. वा एम. ए. पास करू आ तुरन्त पेट पोसबा लेल कोनो नोकरी पकड़ि लिअऽ । भूख पर विजय प्राप्त करू, तखनहि कोनो महत् आदर्श स्थापित कऽ सकैत छी नहि तँ भूखे मे ओझरा कऽ रहि जायब ।' लेकिन भूख पर कतेक दिन धरि विजय प्राप्त कयल जा सकैछ?' हम शंका राखलियैक । ओ बहुत गर्वित होइत बाजल – 'डू यू नो, डेथ केन नॉट कम ट्वाइस । आ जखन मृत्यु एक्के बेर भऽ सकैछ तँ हम सभ भूख सँ कहियो मरि सकैत छी?’ हमरा तखन बुझायल जेना इजोतक एकटा कपाट अचानक खुजि गेल हो । हम किछु आओर नहि सोचलहुँ आ गाम चल आयल छी। गाम आबिते एकटा निराशा घेरि लेलक अछि । ओहि पत्रकारक प्रेरणा फीका आ बदरंग भेल जा रहल अछि। गामक जीवन, बहुत कठिन आ दुर्वह बुझाइत अछि । एहिठामक गरीबी, अशिक्षा, दंगा-फसादमे हम ठठि सकब ? हमरा सन सफेदपोश एहिठाम नहि रहि सकैछ । हमर निर्णय गलत रहय । हमर फैसला सुनिकेँ ककरो खुशी नहि भेलै । पत्नी पर तँ जेना वज्रपात भेलै । ओकर सभटा सपना चकनाचूर भऽ गेलैक । कतेक आस लगेने छल सब । पढ़त-लिखत, नोकरी करत, परिवार केँ सुख देत । लेकिन सब व्यर्थ । अपन अस्तित्व आब निरर्थक आ अप्रासंगिक बुझाय लागल अछि । की करी ? शहर घुरि जाय ? लेकिन ओतय करब की ? बस एत्तहि आबि कऽ अटकि जाइत छी । बुझाइत अछि शहर आ गाम हमरा लेल कतहु जगह नहि अछि । गाम अबैत छी तँ भागि कऽ शहर चल जयबाक मन होइत अछि आ शहरमे रहैत छी तँ भागि कऽ गाम चल अयबाक इच्छा होइत अछि । भरिसक हम चाहैत छी जे बैसले-बैसल सभ किछु भेटि जाय । लेकिन से कतहु भेलै—ए । उद्यम तँ करय पड़त । हमरा मे चारित्रिक दृढ़ता सेहो नहि अछि । छोट-छोट बात पर उखड़ि जाइत छी आ निर्णय बदलय लगैत छी । क्यो कहिये देलक जे 'पढ़ि-लिखि' कऽ गोबर भऽ गेलै, तँ की हेतैक । कहैत छैक तँ कहओ । एहि सँ दुखी भऽ कऽ शहर पड़ा जायब कोन बुद्धिमानी हेतैक । आइए एक गोटे 'हरबाह' कहलक तँ कुटकुटा कए लागल । मन भेल कतहु पड़ा जाय । एहि तरहक क्षणिक आवेश आ भावुकतामे गलब ठीक नहि अछि । मनकेँ अनेक तरहेँ शांत आ स्थिर करबाक प्रयास करैत छी । लेकिन फेर कोनो एहन बात भऽ जाइत अछि जाहिसँ अन्हार आ निराशा पसरय लगैत अछि । क्यो कहैत अछि – 'खेती मे कोनो लस छैक । कहियो रौदी, कहियो दाही....’ आ हमर मन डूबय लगैत अछि । भविष्यक चिन्ता आ डर खेहारय लगैत अछि । ई नहि सोचय लगैत छी जे सब जँ एहि डरेँ खेती छोड़ि दैक तँ अन्न एतै कतयसँ आ लोक खायत की ? आखिर एतेक आदमी तँ खेतीये सँ जिबैत अछि । पता नहि कियैक, मनमे खाली निराशाजनक भावना आ विचार अबैत रहैत अछि । साइत सुविधाभोगी हेबाक कारणे । हम श्रम सँ भागय चाहैत छी, सुविधाकामी छी तेँ भविष्य असुरक्षित आ अंधकारमय बुझाइत अछि । हरबाह-चरबाह आ जन-बोनिहार भविष्य सँ डेराइत नहि अछि । श्रमे ओकर भविष्य होइत छैक । श्रम, जे ओकर अपन हाथमे छैक । फेर कथीक चिन्ता आ कोन असुरक्षा । हम अचानक एकटा विचित्र तरहक आशा आ प्रसन्नताक अनुभव करय लगैत छी। 1 Krishna Yadav said... Subhash Chandra Yadav Jik Katha me kichhu gap rahait chhaik. Reply05/05/2009 at 11:50 AM उपन्यास -कुसुम ठाकुर प्रत्यावर्तन - (तेसर खेप) ९ आय भोरे बाबुजी असगर चलि गेलाह। माँ कs मोन नहि मानलन्हि जे ओ हमरा कानैत छोरि कsजैतथि। बाबुजी कs गेलाक बाद हमरा बड अफसोस होयत छलs जे माँ के हमरा चलते रहय परि गेलैन्ह, आ आब बच्चा सब के लs असगर जाय परतैन्ह। कॉलेज जयबाक खुशी एतबे दिन मे समाप्त भs गेल, कियाक से नहि जानि। कॉलेज जाइ अवश्य मुदा जेना कतो आओर हेरायल रहैत छलहुँ।घर आबि तs घर मे सेहो एकदम चुप चाप जा अपन कोठरी मे परि रहैत रही। माँ सब सोचथि हम थाकि जायत होयब आ सुतल छी, मुदा हम घंटो ओहिना परल रहैत रही। हमरा अपनहु आश्चर्य होयत छलs। स्कूल गेनाई तs हम मोन ख़राब मे सेहो नहि छोरैत रही , फेर हमरा एहि तरहे कियाक भेल जा रहल छलs। काल्हि बाबुजी चलि गेलाह से आओर घर सुन लागैत छलैक ताहि पर कॉलेज जयबाक से मोन नहि होयत छलs। कहुना कॉलेज तs गेलहुँ मुदा ओहियो ठाम नीक नहि लागल।कॉलेज सs आपस अयलाक कs बाद नहि जानि मोन जेना बेचैन लागैत छलs। हमरा बुझय मे नहि अबैत छल जे एहि तरहे कियाक भsरहल अछि। जहिना हाथ पैर धो कs अयलहुं मौसी (जे की हमर काकी सेहो छथि) जलखई लsकs ठाढ़ रहथि आ हमरा आगूक जलखई दैत बजलीह जल्दी सs पहिने जलखई कs लिय। अहाँ सब दिन बहाना कs दैत छियैक जे भूख नहि अछि एतबहि दिन मे केहेन दुब्बर भs गेल छी। नीक सs खाऊ पिबू नहि तs ठाकुर जी अओताह तs कहताह एतबहि दिन मे सब हमर कनियाँ के दुब्बर कs देलैथ। ठाकुर जी नाम सुनतहि नहि जानि कतय सs हमरा मुँह पर मुस्की आबि गेल। बुझि परल जेना फूर्ति आबि गेल हो। मौसी के एकटा नीक मौका भेंट गेलैंह आ ओ तुंरत माँ के बजा कहय लागलिह "हे बहिन, अहाँ तs किछु नय बुझैत छियैक, कुसुम थाकय ताकय किछु नय छथि रोज तीन चारि बेर ठाकुर जी कs नाम लs नय लेल करू, सब ठीक रहतैक"। आब हमरा कोनो दोसर उपाय नहि बुझाइत छल, हम बिना किछु बजने चुप चाप मौसी के हाथ सs जलखई लsलेलियैन्ह। सब राति हम आ काका विविध भारतिक हवा महल अवश्य सुनैत रही। हमरा दुनु गोटे कs इ कार्यक्रम बड़ पसीन छलs। सब सुति रहथि मुदा हम दुनु गोटे हवा महल के बाद सुतय लेल जाइत रही। हमरा कतबो पढ़ाई कियाक नहि हो सब दिन काका हमरा हवा महल काल अवश्य बजा लेत छलाह। आइयो हवा महल जहिना शुरू भेलैक मधु के भेजि कs हमरा बजा पठेलथि। हवा महल सुनलाक बाद हम अपन कोठरी मे सुतय लेल चलि गेलहुँ आ काका अपन कोठरी मे। जहिना इ कहने रहथि, तहिना सब दिन हिनकर चिट्ठी आबैन्ह आ ओकर जवाब सब दिन राति मे सुतय काल लिखय चाहि मुदा हिनका हम की सम्बोधन कs चिट्ठी लिखियैन्ह इ हमरा बुझय मे नहि आबति छलs आ हम पुछबो किनका सs करितहुँ । हम अपन पहिल चिट्ठी जे हिनका बौआ सँग मुजफ्फरपुर पठौने रहियैन्ह ताहू दिन सोचैत- सोचैत जखैन्ह किछु नय फुरायल छलs तs हम हिनका "ठाकुर जी" सम्बोधन कs चिट्ठी लिखि पठा देने रहियैन्ह। ओ चिट्ठी पता नहि कोना , हिनकर कोनो दोस्त देख लेने रहथि आ हिनका कहि देने रहथिन्ह जे अहाँक सारि चिट्ठी बड़ सुन्दर लिखति छथि।इ ओकर चर्च हमरा लग हँसैत हँसैत कयने रहथि। हमरा ओहि दिन अपना पर तामस अवश्य भेल छलs मुदा हमरा बुझले नय छलs जे लोग की संबोधन कs घरवाला के चिट्ठी लिखैत छैक। आब तs "ठाकुर जी "सम्बोधन कs सेहो नहि लिखि सकैत छलहुँ । जखैन्ह हम सुतय लेल अयलहुं तs इ सोचिये कs आयल छलहुँ जे, किछु भs जाय आइ हम चिट्ठी लिखबे करबैन्ह।हमरा अपने बहुत खराप लागैत छलs जे हम एकोटा चिट्ठिक जवाब नहि देने रहियैन्ह। बहुत सोचलाक बाद जखैन्ह हमरा सम्बोधनक कोनो शब्द नहि फुरायल तs हम ओहि भाग कs छोरि चिठ्ठी लिखय लगलहुँ । चिट्ठी मे कैयाक ठाम हम लिखिये जे हमरा मोन नहि लागति अछि जल्दी चलि आऊ मुदा ओ फेर हम काटि दियय । खैर बिना सम्बोधन वाला चिट्ठी लिखि कs हम एकटा किताब मे इ सोचि कs राखि देलियैक जे भोर तक किछु नय किछु फुरा जयबे करत। तखैन्ह ओ लिखि कsकॉलेज जाय काल खसा देबैक। पोस्ट ऑफिस हमर घरक बगल मे छलैक। चिट्ठी लिखलाक बाद हम सोचलहुँ सुति रही मुदा कथि लेल नींद होयत। बड़ी काल तक बिछौना पर परल परल जखैन्ह नींद नहि आयल तs उठि कs पानि पीबि लेलहुँ आ फेर बिछौना पर परि कs हिनकर देल किताब "साहब बीबी और गुलाम पढ़य" लगलहुँ । दू चारि पन्ना पढ़लाक बाद किताबो सs मोन उचटि गेल आ जओं घड़ी दिस नजरि गेल तs देखलियैक भोर के चारि बाजति छलs। सोचलहुँ आब की सुतब, जाइत छी चिट्ठी पूरा कs तैयार भs जायब। इ सोचि जहिना उठि कs कलम हाथ मे लेलहुँ कि बुझायल जे कियो केबार खट खटा रहल छथि। हमरा मोन मे जेना एक बेर आयल कहीं इ तs नहि अयलाह। हम जल्दी सs आगू बढ़ि कs जहिना केबार खोलति छी तs ठीके इ एकटा बैग लेने ठाढ़ छलथि। हम किछु क्षण ओहिना ठाढ़ भs हिनकर मुँह ताकैत रही गेलहुँ अचानक मोन परल आ हिनका सs बिना किछु पूछने वा कहने ओहि ठाम स तुरन्त भागि गेलहुँ । ता धरि काका के छी करैत ओहि ठाम पहुँच गेलाह आ हमरा भागैत देखि पुछलथि" के छथि"?हम बिना किछु कहने ओहि ठाम सs भागि अपन कोठरी मे जा बैसि गेलहुँ। काका हिनका देखैत देरी अ हा हा ... ठाकुर जी आयल जाओ बैसल जाओ कहैत हिनका घर मे बैसा तुरंत ओहि ठाम सsजोर जोर सs भौजी भौजी करैत भीतर आबि सब के उठा देलथि। थोरबहि काल मे भरि घरक लोग उठि गेलथि। तुरंत मे चाह पानि सबहक ओरिओन होमय लागल। राँची मे तs हमर पितिऔत चारि भाई बहिन सेहो रहथि। जाहि महक तीन गोटे हिनका देखनेहो नहि रहथि, मधु टा विवाह मे छलिह। सब हिनका देखय लेल जमा भs जाय गेलथि। मौसी सs सेहो हिनका पहिल बेर भेंट भेल छलैन्ह। विवाह मे मौसी नहि रहथि नीलू दीदी कs विवाह के बाद सोनूक (छोटका बेटा) मोन खराप भs गेल छलैन्ह आ काका मौसी, सोनू, निक्की आ पप्पू के राँची छोरि आयल छलथि। हुनका एतबो समय नहि भेंटलैन्ह जे मौसी के फेर अनतथि। हम अपन कोठरी मे चुप चाप बैसल रही, रतुका बेचैनी आब नहि छलs मुदा हमरा किछु नहि बुझाइत छलs जे हम की करी। इ सोचैत रही जे कॉलेज जाइ या नहि, जयबाक मोन तs नहि होयत छलs, ताबैत मौसी हमरा कोठरी मे कुसुम कुसुम करैत हाथ मे चाह लेने घुसलीह। हमरा देखैत कहय लगलीह "अहाँ अहिना बैसल छी, जल्दी सs चाह पीबि लिय आ तैयार भs जाऊ। हमरा इ सुनतहि बड़ तामस भेल, हमरा मोन मे भेल कहू तs इ अखैन्हे अयलाह अछि आ मौसी हमरा कॉलेज जाय लेल कहैत छथि हम धीरे सs कहलियैन्ह हमर माथ बड़ जोर सs दुखायत अछि। इ सुनतहि मौसी के मुँह पर मुस्की आबि गेलैन्ह आ कहलथि तैयार भs जाऊ मोन अपनहि ठीक भs जायत, आ आय कॉलेज नहि जयबाक अछि। इ सुनतहि हमरा भीतर सs खुशी भेल,बुझायल जेना हम यैह तs चाहैत रही, जे कियो हमरा कहथि अहाँ कॉलेज नहि जाऊ। हम जल्दी सs चाह पीबि तैयार होमय लेल चलि गेलहुँ। ओना तs हमरा तैयार हेबा मे बड़ समय लागैत छलs मुदा ओहि दिन जल्दी जल्दी तैयार भsगेलहुँ। अपन कोठरी मे पहुँचलहुं तs मौसी हमरे कोठरी मे रहथि आ किछु ठीक करैत छलिह। हमरा देखैत बाजि उठलिह "बाह आय तs अहाँ बड़ फुर्ती सs तैयार भs गेलहुँ, आब माथक दर्द कम भेल"? हम हुनका दिस देखबो नही केलियैन्ह आ दोसर दिस मुँह घुमेनहि हाँ कही देलियैन्ह। काका के विवाहे बेर सs हिनका सँग खूब गप्प होयत छलैन्ह। हमर काका बड़ निक आ हंसमुख व्यक्ति, ओ हिनका सs कखनहु कखनहु कs हँसी सेहो कs लेत छलाह। हिनको काका सs गप्प करय मे बड़ नीक लागैत छलैन्ह। हम तैयार भs कs पहुँचलहुं ता धरि ओ सब गप्प करिते छलाह। मौसी हमरे कोठरी सs काका के सोर पारि हुनका सs कहलथि" ठाकुर जी कs तैयार होमय लेल कहियोक नहि, थाकल होयताह "।किछुए कालक बाद इ हमर वाला कोठरी मे अयलाह,हम चुप चाप ओहि ठाम बैसल रही। हिनका देखैत देरी हमरा की फुरायल नहि जानि झट दय गोर लागि लेलियैन्ह।गोर लगलाक बाद हम चुप चाप फेर आबि कs बैसि रहलियैक। मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छल।इहो आबि कs हमरा लग बैसि रहलाह आ पुछ्लाह अहाँ कानैत कियाक रही, आ हमरा देखि कs आजु भागि कियाक गेलहुँ। अहाँक बाबुजी जखैन्ह सs इ कहलाह जे अहाँ कs कनबाक चलते माँ रही गेलीह, आ आब एक मास बाद जयतीह, तखैन्ह सs हमरो मोन बेचैन छलs। अहाँ के बाबुजी के गाड़ी मे बैसा सीधे हॉस्टल गेलहुँ आ ओहिठाम मात्र कपडा लs जे पहिल बस भेंटल ओहि सs सीधा आबि रहल छी। हिनकर इ गप्प सुनतहि हमर आँखि डबडबा गेल। हमरा अपनहु इ नहि बुझल छलs जे हम कियाक भागल रही आ नहि इ, जे हमरा कियाक कना जायत छल। साँझ मे हम चाह लs कs जखैन्ह घर मे घुसलहुं तs इ आराम करैत छलाह मुदा हमरा देखैत देरी उठि कs केबार बंद कs लेलथि आ हमरा लग आबि बैसैत कहलाह "अहाँ सs हमरा किछु आवश्यक गप्प करबाक अछि"। हम किछु बजलियैन्ह नहि मुदा मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छलs। चाह पीबि कप राखैत कहलाह "अहाँ सच मे बड़ सुध छी, अहाँ हमर बुची दाई छी"। हम तखनहु किछु नहि बुझलियैन्ह आ नय किछु बजलियैन्ह, मोने मोन सोचलहुं इ बुची दाई के छथि। हम सोचिते रही जे हिनका सs पुछैत छियैन्ह, इ बुची दाई के छथि ताबैत धरि इ उठि कs एकटा कागज लs हमरा लग बैसि रहलाह। हमरा सs पुछलाह हरिमोहन झा कs नाम सुनने छी? हम सीधे मुडी हिला कs नहि कहि देलियैन्ह, ठीके हमरा नहि बुझल छलs। ठीक छैक हम अहाँ के बुची दाई आ हरी मोहन झाक विषय मे दोसर दिन बतायब। पहिने इ कहू, अहाँ के तs हमरा देखि कs खुशी आ आशचर्य दूनू भेल होयत। हिनका देखि कs हमरा खुशी आ आश्चर्य तs ठीके भेल छलs मुदा हिनका कोना कहितियैन्ह हमरा कहय मे लाज होयत छलs, तथापि पुछि देलथि तs मुडी हिला कs हाँ कहि देलियैन्ह। इ अपन हाथ महक कागज़ हमरा दिस आगू करैत कहलाह, इ अहाँ के लेल हम किछु सम्बोधानक शब्द लिखने छी, अहाँ के अहि मे सs जे नीक लागय वा अहाँ जे संबोधन करय चाहि लिखी सकैत छी, मुदा आब चिट्ठी अवश्य लिखब। कोनो तरहक लाज, संकोच करबाक आवश्यकता नहि अछि। बादक गप्प के कहय हम तs इ सुनतहि लाज सs गरि गेलहुँ। हम सोचय लगलहुं हिनका हमर मोनक सबटा गप्प कोना बुझल भs जायत छैन्ह। थोरबे काल बाद इ हमरा अपनहि कहय लगलाह हम अहाँक किताब देखैत छलहुँ तs ओहि मे सs हमरा ओ चिट्ठी भेटल जे अहाँ हमरा लिखने छलहुँ। ओहि मे अहाँ हमरा संबोधन तs नहि कयने छी मुदा ओ हमरे लेल लिखल गेल अछि से हम बुझि गेलहुँ। कोनो कारण वश अहाँ नहि पठा सकल होयब इ सोचि हम पढि लेलहुँ। पढ़ला पर दू टा बात बुझय मे आयल, पहिल इ जे अहाँक मोन एकदम सुध आ निश्छल अछि, आ दोसर इ जे अहाँ मोन सs चाहैत छलहुँ जे हम आबि, आ देखू हम पहुँची गेलहुँ। अहाँ हमरा चिट्ठी एहि द्वारे नहि लिखी पाबैत छी नय जे अहाँ के सम्बोधनक शब्द नहि बुझल अछि,कोनो बात नहि।एहि मे लाजक कोनो बात नहि छैक, अहाँ के जे किछु बुझय मे नहि आबय आजु सs ओ अहाँ हमरा सs बिना संकोच कयने पुछि सकैत छी। ओहि दिन नहि जानि कियाक, हमरा बुझायल जे बेकारे लोक के घर वाला सs डर होयत छैक। पहिल बेर हुनक जीवन मे हमर महत्व आ स्थान केर आभास भेल आ हमरा मोन मे संकोचक जे देबार छलs से ओहि दिन पूर्ण रूपेण हटि गेल। नहि जानि कियाक, बुझायल जेना एहि दुनिया मे हमरा सब सs बेसी बुझय वाला व्यक्ति भेंट गेलैथ। जाहि दिन हमर विवाह भेल छलs ओहि समय हमर बडकी दियादिन केर सेहो द्विरागमन नहि भेल छलैन्ह। आ ओ राँची अपन नैहर मे छलिह। दोसर दिन साँझ मे इ कहलाह जे काल्हि भौजी सsभेंट करय लेल जयबाक अछि आ ओकर बाद परसु मुजफ्फरपुर चलि जायब। आजु चलु राँची(राँची केर मुख्य बाज़ार मेन रोड के लोग राँची कहैत छैक) दुनु गोटे घूमि कs अबैत छी। बरसातक मास आ बादल सेहो लागल छलैक तथापि हम सब निकलि गेलहुँ। रिक्शा किछुएक दूर आगू गेला पर भेंट गेल। घर सs मेन रोड जयबा मे करीब आधा घंटा लागैत छलैक। हम सब आगू बढ़लहुं ओकर १५ मिनट केर बाद सs पानि भेनाइ आरम्भ भs गेलैक। विष्णु सिनेमा हॉल सs किछु पहिनहि हम दूनू गोटे पूरा भीजि गेलहुँ। सिनेमा हॉल लग पहुँची इ कहलाह, भीजि गयबे केलहुं,चलू सिनेमा देखि लैत छी तs आपस घर जायब, कपड़ा सिनेमा हॉल मे सुखा जायत। राति मे अचानक माथक दर्द आ प्यास सs नींद खुजि गेल, बुझायल जेना हमर देह सेहो गरम अछि। उठि कs पानि पीबि फेर सुति गेलहुँ। भोर मे मोन ठीक नहि लागैत छलs मुदा हम किनको सs किछु कहलियैन्ह नहि, भेल कहबैक तs बेकार मे सब के चिंता भs जयतैन्ह। मोन बेसी खराब लागल तs जा कs सुति रहलहुं। जखैन्ह आँखि खुजल तs देखैत छी डॉक्टर हमरा सोंझा मे अपन आला लेने ठाढ़ छलथि। हमरा ततेक बुखार छल जे चादरि ओढ़ने रही तथापि कांपति छलहुँ।डॉक्टर की कहलैथ से हम किछु नहि बुझलियैक। हमरा थोर बहुत बुझय मे आयल जे कियो हमर तरवा सहराबति छलथि, आ कियो गोटे पानिक पट्टी दs रहल छलथि , मुदा हम बुखारक चलते आँखि नहि खोलि पाबति छलहुँ, हम बुखार मे करीब करीब बेहोश रही। जखैन्ह हमरा होश आयल आ आँखि खुजल तs प्यास सs हमर ओठ सुखायत छल, मुदा साहस नहि छलs जे उठि कs पानी पिबतहुं। जहिना करवट बदललहुं तs हिनका पर नजरि गेल। हिनका हाथ मे एकटा रुमाल छलैन्ह आ बिना तकिया सुतल छलथि। हमरा इ बुझैत देरी नहि भेल जे इ हमरा रुमाल सs पट्टी दैत दैत सुति रहल रहथि। हमरा हिम्मत तs नहि छल तथापि हम चुप चाप उठि जहिना हिनकर माथ तर तकिया देबय चाहलियय इ उठि गेलाह। हमरा बैसल देखि तुंरत कहि उठलाह अहाँ कियाक उठलहुं अहाँ परल रहु। इ सुनतहि हम फेर तुंरत परि रहलहुं। भोर मे उठलहुं त कमजोरी तs छलs मुदा बुखार बेसी नहि छल। मौसी सs पता चलल जे चाय पिबय के लेल जखैन्ह मधु उठाबय गेलीह तs हम बुखार सs बेहोश रही। इ देखि तुंरत डॉक्टर के बजायल गेलैक। डॉक्टर के गेलाक बाद बड राति तक माँ आ इ दूनू गोटे बैसल रहथि आ ठंढा पानी सs पट्टी दs बुखार उतारबाक प्रयास मे लागल रहथि। माँ के बाद मे इ सुतय लेल पठा देलथि आ अपने भरि राति जागल रहथि कियाक तs बुखार कम भेलाक बादो हम नींद मे बड़ बड़ करैत छलियैक। दोसर दिन सs हमर बुखार कम होमय लागल मुदा हमरा पूर्ण रूप सs ठीक होयबा मे एक सप्ताह लागि गेल। हिनका कतबो कहलियैन अहाँ चलि जाऊ, क्लास छूटैत अछि मुदा इ कहलाह, अहाँ ठीक भs जाऊ तखैन्ह हम जायब। एक सप्ताह इ कतहु नहि गेलाह हमरे कोठरी मे बैसि कs अपन पढ़ाई करथि। साँझ मे काका लग बैसि कs खूब गप्प होयत छलैन्ह। ओहि एक सप्ताह मे काका सेहो हिनका सs बहुत प्रभावित भsगेलथि आ इहो काका के स्वभाव सs परिचित भेलाह। साँझ मे परिचित सब हिनका सs भेंट करय लेल आबथि। एहि तरहे पूरा सप्ताह बीमार रहितहुँ हमरा खूब मोन लागल। आइ भोर सs हमरा एको बेर बुखार नहि भेल। काल्हि भोर मे हिनका मुजफ्फरपुर जयबाक छैन्ह भरि दिन इ हमरा सँग गप्प करैत रहलाह। साँझ मे काका ऑफिस सs अयलाह तs इ हुनका लग बैसि हुनका सs गप्प करय लगलाह आ हम अपन कोठरी मे छलहुँ। माँ मौसी जलखई के ओरिआओन करैत छलिह बाकी भाई बहिन सब बाहर खेलाइत छलैथ। हमरा इ सोचि कs एको रति नीक नहि लागैत छलs जे काल्हि इ चलि जेताह आ ओकर किछु दिनक बाद माँ सेहो चलि जयतीह। राति मे सुतय काल इ कहलाह भोरे तs हम जा रहल छी मुदा हमर ध्यान अहीं पर ता धरि रहत,जा धरि अहाँक चिट्ठी नही भेंटत जे अहाँ पूरा ठीक भs गेलहुँ अछि। एहि बेर माँ के जाय काल नहि कानब, ओ बड दूर रहति छथि हुनको अहिं पर ध्यान लागल रह्तैन्ह। अहि बेर रोज एकटा कs चिट्ठी अवश्य लिखब, आ हमरा दिस देखैत आ मुस्की दैत कहलाह आब तs अहाँ के चिट्ठी लिखय मे सेहो कोनो तरहक दिक्कत नहि हेबाक चाहि। हमहु हिनकर मुस्कीक जवाब मुस्की सs दsदेलियैन्ह। आजु साँझ मे माँ के अरुणाचल जेबाक छैन्ह। हमरा खराप तs लागि रहल अछि मुदा एहि बेर हम कानैत नहि छी। माँ बड उदास छैथ। एक तs हमरे छोरय मे हुनका नीक नहि लागैत छलैन्ह, आ आब तs बिन्नी के सेहो छोरय परि रहल छैन्ह।माँ बिन्नी के हमरा आ काका के कहला पर छोरि कs जा रहल छथि। पन्द्रह दिन सs बिन्नी के बुखार छलैन्ह ठीक तs भs गेलैन्ह मुदा ओ बहुत कमजोर भs गेल छथि। डॉक्टर हुनका लs कs ओतेक दूर जएबाक लेल मना कs देने छथिन्ह । बाबुजी के चिट्ठी आयल छलैन्ह हुनक मोन ख़राब छैन्ह। माँ के किछु नहि फ़ुराइत छलैन्ह जे ओ की करथि। जखैन्ह हम कहलियैन्ह जे अहाँ जाऊ बिन्नी के रहय दियौन्ह तs ओ अरुणाचल जयबाक लेल तैयार भs गेलीह। निक्की बड ताली छथि हुनका कोनो काज काका स वा दोसर किनको सs करेबाक होयत छैन्ह तsततेक नय नाटक करय छथि जे लोग के ओ सच बुझा जायत छैक आ हुनका ओ काज करय लेल भेट जाइत छैन्ह। जखैन्ह सs माँ के जेबाक चर्च शुरू भेलैक निक्की माँ सँग जेबाक लेल हल्ला करय लगलीह।काका कतबहु निक्की के बुझेबाक प्रयास केलैथ मुदा ओ नहि मानलिह आ हुनकर नाटक के आगू सब के हुनकर बात मानय परलैन्ह। माँ निक्की के अपना सँग अरुणाचल लsजएबाक लेल तैयार भs गेलीह। साँझ मे माँ सोनी, अन्नू, छोटू आ निक्की के लs मुजफ्फरपुर चलि गेलीह। इ कहने रहथिन्ह जे मुजफ्फरपुर बस अड्डा आबि जेताह आ ओहि ठाम सs माँ सब के अपन कॉलेज लs जयताह माँ सब भरि दिन कॉलेजक गेस्ट हाउस मे रहि साँझ के अवध आसाम मेल पकरि कs चलि जेतीह। माँ के गेलाक बाद सs घर एकदम सुन भs गेल छलैक। एहि बेर बहुत दिन माँ सँग रहल रहि से आओर खराप लागैत छल। राति मे काका बहुत उदास छलैथ, हुनका निक्की के बिना नीक नहि लागैत छलैन्ह। आय रबि छैक हमरा कॉलेज नहि जएबाक छलs। भरि दिन प्रयास मे रहि जे बिन्नी के असगर नहि छोरियैन्ह। बेर बेर हुनका दिस देखियैन्ह जे ओ उदास तs नहि छथि। एक तs हमही छोट बिन्नी तs हमरो सs करीब नौ साल छोट छथि मुदा ओ हमरा पकरि मे नहि आबय दैथ जे हुनका माँ के याद अबैत छैन्ह। दिन भरि काका सेहो बिन्नी लग बैसल रहथि आ हुनका हंसेबाक प्रयास करैत रहलाह। राति मे काका कहलाह काल्हि तs अहाँक कॉलेज अछि अहाँ अपन समय पर चलि जायब। सोम दिन हमर दू टा क्लास होयत छलs आ दुनु भोरे मे छल। हम कॉलेज जाय लगलहुं तs बिन्नी के समझा बुझा देलियैन्ह आ मौसी रहबे करथि। हमर क्लास १० बजे तक छलs, क्लासक बाद हम घर जल्दी जल्दी पहुँच सीधा अपन कोठरी मे गेलहुँ कियाक तs माँ के गेलाक बाद बिन्नी हमरे कोठरी मे हमरे सँग रहैत छलिह। जओं अपन कोठरी मे पहुँचति छी तs बिन्नी आ इ दूनू गोटे बिछाओन पर बैसि कs गप्प करैत आ हँसैत छलाह। हमरा देखैत देरी बिन्नी तुंरत कहय लगलीह, "दीदी निक्की बोमडिला(बोमडिला, अरुणाचल मे छैक) नहि गेलीह। ततेक नय नाटक केलिह जे ठाकुर जी कs पहुँचाबय लेल आबय परलैन्ह"। साँझ मे काका बड खुश छलथि, निक्की आपस जे आबि गेल रहथि। दोसर दिन इ फेर मुजफ्फरपुर आपस चलि गेलाह। (अगिला अंकमे) 1 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said in reply to Technogati... by devanagari you mean Hindi perhaps, but this site is in Maithili Reply05/10/2009 at 01:12 PM 2 Technogati said... Thanks.I hope Hindi will alive till next world. Reply05/10/2009 at 12:54 PM 3 Kusum Thakur said in reply to sanjai Mishra... Sanjai ji, please specify what do you mean by the "complicated language" here in this Novel. Reply05/10/2009 at 12:12 PM 4 कृष्ण यादव said in reply to Jyoti Kumari Vats... hamhu ehi se sahmat chhi Reply05/06/2009 at 11:26 PM 5 sanjai Mishra said... Went through the part of Novel.Really very nice way of presantation of fact.But I will request you not to use complicated language n facts in Novel if you want to draw the attaintion of mass through yr creation. Sanjai Kumar Mishra@yahoo.co.in Reply05/06/2009 at 04:53 PM 6 Subodh thakur said... Apnek rachna padhla ke bad bujhayal jena madhyam vargak jingi ke parikrama kailaunh saripahun anant sapna puda karvake lel madhyam varg puda jingi ashavan rahait khepai chati Reply05/06/2009 at 04:41 PM 7 Subodh thakur said... Apnek rachna padhla ke bad bujhayal jena madhyam vargak jigi ke parikrama kailaunh saripahun anant sapna puda karvake lel madhyam varg puda jingi ashavan rahait khepai chati Reply05/06/2009 at 04:39 PM 8 Kusum Thakur said... Dhanyavaad. koshis karab ahaan sab ke niraash nahi kari. Reply05/05/2009 at 02:23 PM 9 Vidyanand Jha said in reply to Jyoti Kumari Vats... ehi pothik print form avashya ayebak chahi Reply05/04/2009 at 09:09 PM 10 Jyoti Kumari Vats said... एहि उपन्यासक जतेक बड़ाई भए रहल अछि से ठीके भए रहल अछि। ई प्रिंट रूपमे सेहो अएबाक चाही। Reply05/04/2009 at 09:01 PM 11 Anshumala Singh said... uttama, kono khep madhyam nahi Reply05/04/2009 at 08:59 PM 12 Mohan Mishra said... bad nik rachna sabh, ahank lekhni me flow achhi Reply05/04/2009 at 08:58 PM 13 Manoj Sada said... ई उपन्यास अपन स्थान राखत मैथिली उपन्यासक मध्य। Reply05/04/2009 at 08:57 PM 14 preeti said... ee bhag seho pachhila dunu bhag jeka, nik Reply05/04/2009 at 08:55 PM 15 aum said... upanyasa bad nik lagal, agila beruka pratiksha rahat Reply05/04/2009 at 08:51 PM बलचन्दा (मैथिली नाटक)-अन्तिम खेप विभा रानी (वर्तमान। स्त्री मंच पर अबैत अछि।.... पार्श्र्व स' समदाओन चलैत अछि। स्त्रीक विवाहक बाद विदा लेबाक अभिनय। एकरा ओ अपन लाल ओढनी से प्रतिध्वनित करैत अछि। समदाओन सुनाइ पड़ैत अछि) बड़ा रे जतन स' सिया धिया पोसल सेहो सिया राम नेने जाए आगू आगू रामचन्दर, पाछू पाछू डोलिया तही पाछू लछुमन जे भाई लाल रंगे डोलिया, सबुज रंग ओहरिया लागि गेलै बत्तीसो कहार । (समदाओन धरि स्त्री मंचक एक ओर से दोसर दिसि जाइत अछि, जेना नइहर से सासुर पहुंचि गेल हुअए। स्त्री सासुर पहुंचलाक बाद 'कनिया एलै', 'कनिया परीछू'क सोर भेलै। गाड़िये मे हमरा परीछि- तरीछि के सभ किओ हमरा आगं बढेलक। चंगेरी मे पएर दइत हम आगां बढलहुं। आइ-माइ-दाइ सभ फ़ेर गीत शुरु केलीह। गीत, धुन, बदलइत अछि। स्त्री जेना चंगेरी मे पएर राखैत आगां बढि रहल हुअए। गीतक स्वर) दुल्हीन धीरे-धीरे चलियऊ ससुर गलिया ससुर गलिया ओ भैंसुर गलिया तोरे घँूघटा मे लागल अनार कलिया स्त्री चंगेरी-यात्रा के बाद हम पाओल जे हम सभ एक गोट दूरा पर ठाढ छी- दूर छेकाइ लेल। रोहित सभ के यथायोग्य नेग-तेग देइत आगां बढलाह, आ पाछू-पाछू हम। कोहबरक बिध-बेबहारक बीच फ़ेर गीत उठलै- (कोहबरक गीत। स्त्री द्वारा कोहबरक बिध, खीर खुअएबाक आदिक अभिनय ) आज फूलों से कोहबर भरा जाएगा आज दूल्हा ओ दुल्हन सजा जाएगा जरा सा तो टीका पहन मेरी लाड़ो तेरे बचवे पर सबका नजर जाएगा। (प्रेमक प्रसंग.. स्त्री द्वारा प्रेमक नाना अभिव्यक्तिक आ चरम संतुष्टिक बाद गहीर नींद मे सुतबाक अभिनय... नीने मे जेना नवजातक परिकल्पना।.. स्त्री ओकरा गसिया लइत अछि.. चुम्मा लइत अछि.. अपन पेट के सोहरबइत अछि.. सोहरबइत-सोहरबइत चेहाइत अछि.. हमरा स' नञि भ' सकत, एहेन अभिनय.. कल्पने मे बच्ची के बेर-बेर पँजियबैत अछि.... ओ कनेक नर्वस अछि.. स्त्रीक पतिक पएर पड़बाक, रूसबाक, मनेबाक अभिनय.. प्रताड़ित हेबाक अभिनय.. स्त्री डेकरैत अछि.. ) स्त्री : बाउजी! हमरा बचा लिय'..। हमर बेटी के बचा लिय'। आइ धरि अहां हमरा अपना पुतरी मे सन्हियाक' राखलहुँ.. मुदा हम.. हम अपन बच्ची के.. (पति स') रोहित, रोहित,प्लीज.. अरे, कोना अहाँ एतेक निष्ठुर भ' सकै छी..? की फेदा अई जिनगी स'? एहेन जिनगी? हमर पढ़ाई बिच्चहि मे छोड़बा देलहुँ.. गामक पहिल लड़की के इंजीनियर बनबाक स्वप्न.. अधरस्ते मे दम तोड़ि देल.. संगे छलहुं ने हम दुनू, एके क्लास मे। अहाँ स' कम त' किन्नहुं नञि छलहुँ.. कखनो अहाँ फर्स्ट आबी, कखनो हम.. विवाह स'पहिने एतेक रास चर्चा, डिस्कशन्स, ज्वाइंट स्टडी.. आ विवाहक बाद सभटा सुड्डाह.. पूछला पर एक्कहि टा वाक्य- मायक इच्छा.. हुनका नोकरीबला पुतौहु पसिन्न नञि.. अंग्रेजी बाज-भूक'बला लड़की हुनका नञि चाहीं । त' जहन इयैह सभ छल, तहन विवाह स' पहिने कियैक ने कहल? .. गामक पहिल लड़की हम, जे प्रेम कएल.. भौजी सभ की-की सभ नञि सुनौलन्हि। भौजी सभ माय के सुना सुना के कहितथिन्ह- 'हम सभ जौं एना कएने रहितहुं, त' हमर बाउजी त' हमरा सभ के जीबिते खाल खींचि के भुसि भरबा देने रहितियन्हि।' ..फ़ेर ओ सभ हमरा खोंचारैथि- 'अयं ये प्रेमा दाय, कॉलेज इंजीनियएरीक पढाइ पढ' जाय छलहुं कि प्रेमक इंजीनियरी पढ' लेल..? हं ये, राधा कृष्णक रास कत' नञि होइत छैक.. अयं ये प्रेमा दाइ, रास मे सभ किछु द' देलियन्हि कि किछु बचाइयो के राखलियन्हिए कि नञि.. नीके छै, विवाहक पहिनही विवाहक सभटा मज़ा लूटि लिय'। बाद मे फ़ेर ई कन्हैया नयिं त' कोनो आन कन्हैया, रास रचैया त'भेटबे करताह.. हुनका ट्रेनिंग अहीं द' देबैन्हि, कहबन्हि जे इंजीनियरीक ई खास कोर्स छलै... (कनैत) ई सभटा अपमान हम चुपचाप सहि गेलहुं।.. मात्र एक्कहि टा उमेद पर,जे एक बेर बस, एक बेर अहां लग आबि जाइ, तहन त' फ़ेर सुखे सुख.. धन्य हमर बाउजी। वएह हमर सखा, वएह हमर सहायक.. सभटा विरोध सहितहुं हमर अन्तर्जातीय विवाह लेल पूर्ण सहमति देलन्हि.. अहाँक मायक सभटा सौख सरधा हमर बाउजी तिगुना चौगुना क' क' पूर्ण कएलन्हि। मुदा.. हुनका लेल हम एखनो धरि आनि जातिएक छौंड़ी छी..। घर परिवारक मर्जाद आ बाउजीक मुंह देखि चुप छी..। भरि दिन कोल्हूक बरद जकाँ खटैत छी.. मुदा चुप छी..। अहाँ स' दूटा गप्प कर' लेल तरसि जाइ छी.. मुदा चुप छी..। कतेक अरमान छल.. स'ख सिहंता छल.. अहाँ स' दुनिया जहान पर चर्च करब.. डिस्कशन्स करब, मुदा..(स्त्री के लागैत छै जे कोनो छोट बालिका ओकरा ल'ग आबि कनफुसकियाइत अछि -माँ! हम आबि रहल छी! स्त्री : (स्त्री चेहाइत एम्हर-ओम्हर ताकैत अछि) के? के छी? कत' स' बाजि रहल छी? बालिका : हम! अहींक बेटी! अहींक पेट स'.. स्त्री : (पेट पकड़ि के) नञि बाजू! चुप भ' जाऊ! आ सूति जाऊ! ई कोनो गप्प करबाक बेर छै?ई त' सुतबाक बेर छै। सूति रहू। देखिऐ, हमरो नींन आबि रहलए। हम्हूं सूति रहलहुं। ई देखियौ। (फोंफ कटबाक अभिनय। स्त्रीक बच्ची रूप मे हंसि आ कथन..) बालिका : झूठ! बहन्ना! निन्नी नयिं। माँ! हम आएब, हमरा आब' दिय'। स्त्री : (पति स') रोहित, सुनू ने! प्लीज! ई अप्पन संतान अछि.. हमर-अहाँक प्रेमक प्रथम निशानी! ..बाउजी कहै छथि.. बेटा-बेटी में कोन फरक?.. मुदा नञि! बाउजी, फरक छै..। फ़रक नयिं रहितियन्हि त' हम एना अपने बच्चा लेल एतेक अंहुरिया कटितहुं? ओकरा अई धरती पर आन' में अपना के एतेक असहाय अनुभव करितहुँ..। हम सभ त' गुलाम छी । कहलो गेल छै- पराधीन सपनहुं सुख नाही। .. अम्मा जी.. मानि जाथु ने.. गोर पड़ै छी अम्मा जी, गोर पड़ै छी। अरे, आब अई मे हमर कोन दोख, यदि हमर कोखि मे बेटीए आएल त'? साइंस पढबइत काले टीचर हमरा सभ के बुझेलखिन्ह जे प्रजनन प्रक्रिया मे दू टा फ़ैक्टर होइत छै- एक्स आ वाई। स्त्री मे मात्र XXएटा होइत छै, आ पुरुख लग X आ Y दुनू। पुरुख X देलन्हि त' बेटी आ Y देलन्हि त' बेटा। अम्माजी,छोट मुंह, जेठ गप्प.. जदि हिनको पहिल बेर बेटीए भेल रहितियैक तहन.. सासु : (सासुक स्वर मे) तहन? तहन मारि देने रहितियैक। आ मारि देने रहितियैक नञि, मारि देलियई.. ओहो एकटा के नञि, तीन तीन टाके.. आ, ले, देख हमर हाथ.. देख, भगै कत' छें? ले देख, देख। (दुनू हाथ भयानक तरीका स' सोझा देखबइत अछि। स्त्री चेहाक' आ डेरा क' दूर भगैत अछि.... स्त्री विक्षिप्त जकाँ करैत अछि..) स्त्री हा.. हा.. स्त्री.. अभागल..। शास्त्र मे कहल गेल छै, 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवा:!' फूसि, अनर्गल.. हम सभ त' मात्र दासी छी.. सेविका.. भूमिका मे बन्हल..'भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा:।' हम सभ मनुक्ख नञि, मात्र भूमिका छी.. भूमिका नीक.. हम नीक.. नीक-अधलाहक फ्ऱेम हुनकर.... त' जहन भूमिके छी, त' जीब' दिय'हमरा आओर के अपन भूमिका संग.. माँ.. माता.. जननी.. मुदा नयिं, हम सभ त'कठपुतरी भरि छी। डोरी आनक हाथ में आ नचै छी हुनका ताले। .... (स्त्री उन्मत जकाँ चिकरइत अछि) ले, ले, भोगि ले.. भोग्या छी हम.. आऊ, आऊ, आ मर्दन करू हमर इच्छा के, हमर मान के, हमर सम्मान के.. हे.. हे समस्त स्त्रीगण.. हे समस्त स्त्रीगण,आऊ, आऊ आ प्रस्तुत करू अपना के.., प्रस्तुत करू अपना के, प्रस्तुत करू अपना के,प्रस्तुत करू अपना के। (एक-एक वस्त्र उतारबाक अभिनय। अंतिम वस्त्र उतारैत मुंह नुका लइत अछि..) मात्र रम्भा, मात्र उर्वशी, मात्र मेनका.. अहिल्या, द्रौपदी, कुन्ती, तारा,मंदोदरी - ई प्रात: स्मरणीया पंचकन्या नञि.. रंभा, उर्वशी, मेनका-भोग्या।..सीता..त्याज्या। ..नञि, द्रौपदी नञि। पति आ समाज स' प्रश्न पूछ'बाली द्रौपदी नञि चाही हमरा समाज के.. मात्र सीता चाही हमरा.. सीताक भूमि पर सीते-सीता.. प्रश्न नञि.. मात्र सहू.. आ नञि सहि सकी त' सन्हिया जाऊ.. । बच्ची मां, मां, आब' द दिय' हमरा। हम आएब। मां, मां, हमरा बचा लिय', बचा लिय' हमरा।(बालिकाक चिकरनाइ) (स्त्री के होइत छै जे किओ ओकरा बचिया के ओकर कोखि से बाहर घींचि रहलए। स्त्री द्वारा बालिका के बचब' लेल ओकरा दिस दौगनाई कि बिच्चहि मे ठमकि जाइत अछि आ बेहोश भ' जेबाक अभिनय करैत अछि, जेना ईथर सुंघाएल गेल हुअए..। फ़ेर कने चैतन्य भ' क' एम्हर-ओम्हर करोट फ़ेरैत अछि।.. हठात ओ चिकरैत अछि, जेना किओ ओकरा घिसिया रहल हुअए.. ओ दौग-दौग क' चारू कात स' भागबाक प्रयास करैत अछि, मुदा सभ ओर स' ओकर रास्ता बन्न अछि.. चारू कात स' निराश ओ पाछा मंचक देवाल/पर्दा दिस भागैत अछि आ ओत' टकराक' खसैत अछि.. ओ एक पएर पकड़ि क' चिकरैत अछि,जेना किओ ओकर एक टाँग काटि देने हुअए.. 'माँ...' स्त्री एके पएर से अपना के घिसियबइत भागबाक प्रयास करैत अछि कि फेर दोसर पएर पर प्रहार.. ओकर पुन: चीख..। तेज संगीत.. स्त्री दुनू पएर स'अशक्त फेर दोसर दिस भगैत अछि.. आब एक हाथ कटबाक अभिनय.. ओकर कननाइ- 'ई की क' रहल छी? हमर बेटी के कत' ल' जा रहल छी? .. अरे, हमर बेटी अहांके की बिगाड़ने अछि?' स्त्रीक पुन: बच'लेल एम्हर-ओम्हर दौगनाई - एक हाथ आ दुनू पएर स' अशक्त.. कि दोसर हाथ कटबाक अभिनय आ ओकर चिकरनाइ.. 'एना जुनि करियउ हमर बेटी संगे। एना त' ओकर अंग-भंग क' क' नयिं मारियऊ हमर बेटी के। छोडि दियऊ हमर बेटी के।' .. (स्त्रीक बेचैनी बढ़ैत अछि.. ओ एम्हर स' ओम्हर दौगि रहल अछि.. लोथ-हाथ-गोर कटबाक अभिनय संगे.. अचानक जेना माथ पर प्रहारक अभिनय.. अभिनय स' पहिने जेना हथौड़ा माथ पर बरजैत देखने हुअए.. तदनुसार मां.. शब्दक चीख, छटपट आ भागबाक अभिनय..'माँ, मां, मां मां,.. देखब ई दुनिया.. हमरा आब' दे'.. कि माथ पर प्रहार आ ओ एकदम स' शांत.. स्त्री चक्कति खा के' खसि पड़ैत अछि। कनेक काल बाद ओकर शरीर मे हरकति होइत छै.. अशक्त भावे उठैत अछि आ विद्यापतिक गीत गबैत अछि।) 'कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ दुखहि जनम लेल दुखहि गमाओल नयन न तिरपित भेल', हे भोलानाथ.. (स्त्री लस्त पस्त अवस्था मे उठैत अछि.. ओ एखनो विभ्रम केर अवस्था मे अछि। अही अवस्था मे ओ अपना के निरेखइत अछि, पेट सोहरबइत अछि। पहिने लागै छै जे पेट मे किछु नयिं छै, मुदा फ़ेर पेट के सोहरबइत अछि। अई बेर ओकरा प्रतीत होइत छै जे ओकर गर्भ नष्ट नयिं भेलैये। ओ रसे- रसे अपना के सम्हारैत अछि ..कपड़ा, केश, विन्यास आदि सभटा ठीक करैत अछि.. मोन मे बेचैनी छै, जकरा एकटा दीर्घ श्र्वासक संगे बाहर करबाक प्रयास करैत अछि.. गमे- गमे चलि क' फ़ेर ओ ओहि स्थान पर पहुंचइत अछि, जत' ओ छलीह। ओकरा चेहरा पर फ़ेर विभ्रमक स्थिति अछि। ओ अपन शरीरक एक एक अंग देखैत अछि, फ़ेर अपन पेट के। वास्तविकताक भान भेला पर ओ अपन पेट के प्यार स' सोहरबैत अछि। एक गोट निश्चयक भाव ओकर चेहरा पर अबैत छै, जे भेलै बहुत, आब नञि। स्त्री रसे- रसे उठैत अछि,अपन संपूर्ण शरीर के निरखैत अछि, जेना ओकर संपूर्ण शरीरक एक एक टा अंग नव-नव हुअए। ....अपन स्वर के निश्चित बनबैत अछि। मुख पर दृढ़ निश्चयक भाव। ) स्त्री नञि संभव अछि हमरा स' ई .. अपने हाथे अपन संतानक हत्या.. धरती पर जनमल संतानक हत्या करितहँु त' जेल जइतहुं, राक्षसी कहबितहुं, मुदा ई अजनमल संतानक.. सेहो हिनका आओरक प्रसन्नता लेल?.. हिनक तथाकथित.. परम्पराक रक्ष लेल?े.. हमरा स' विवाह कएला सन्ते जे मर्जाद टूटल छल, तकर अभिशाप दूर कर' लेल?'.. (दर्शक स') ई हमर इंजीनियर पति..कहबाक लेल आधुनिक, मुदा आधुनिकता स' कोसो दूर.. अरे, आधुनिक त' हमर पिता छथि- ग्रामीण, कमे पढल-लिखल, मुदा विचार स'कतेक आधुनिक.. परन्तु ई हमर अजुका जुगक पढुआ पति? प्रेमी रूप मे कतेक नीक,कतेक समर्पित- आ प्रेमी स' पति बनितहि सभटा सुड्डाह? हिनका लेल हम मात्र पत्नी,मात्र भोग्या..। .. अपने त' मातृभक्त कहाब मे ई बड्ड गौरव बुझै छथि, ..मुदा..हमरा मातृत्व सुख स' वंचित कर' लेल आएल छथि.. (जेना संपूर्ण सृष्टि के ललकारैत) त'सुनू, हे सृष्टि, हे बिधाता, हे अई धरतीक समस्त नर- नारी! सुनू, हम तैयार छी.. अपन बेटीक उत्तरदायित्व वहन कर लेल.. हे, सुनने छलहुँ.. ओकर धड़कन.. डाक्टर सुनौने छल..कतेक मीठ, कतेक सोहनगर.. धक-धक, धक-धक, छुक छुक, छुक- छुक..जेना रेलगाड़ी चलैत हुअए। एहेन मीठ आ सोहनगर धड़कन के हम अपने हाथे.. बन्न क' दी?..आ जौं दोसरो बेर बेटिए एलीह, तहन फेर डाक्टर.. फेर हत्या। फ़ेर इय्ह सभ नाटक?..न.., बहुत भेल।..प्रेमी स' पति रूप मे परिवर्तित तथाकथित मातृभक्त हमर परम प्रिय प्राणपति परमेश्र्वर.. हँ, हम.. अई धरतीक कोमल, अबला, कमजोर, असहाय स्त्री, आई समाजक देल ई परिभाषा स' अपना के मुक्त करै छी। मुक्त करै छी अपना के अई सभ बंधन स'.. आ धारण करै छी अपन स्त्रीत्व के.. स्त्रीत्वक मान के, ओकर मर्याद के आ शप्पथि लइत छी अई धरती माता के छूबि के जे आब नञि.. आब नञि त' हम मरब,नञि हमर बेटी.. (स्त्री उत्तेजना स थर थर कंपैत अछि। स्त्री के लागै छै जे ओकरा कान मे ओकर बेटी कुहुकि रहल अछि। ओकरा चेहरा पर प्रसन्नताक भाव अबै छै। ओ प्रथम दृश्य मे मंचक पाछां रखल गुड़िया के उठा क' ल' अबाय्त अछि। ओकरा कोरा मे नेने-नेने ओ मंचक बीच में बैसि जाइत अछि.. ओक्का-बोक्का खेल स्त्री आरंभ करैत अछि..) 'ओक्का बोक्का तीन तरोक्का लउआ लाठी चंदन काठी चंदना के नाम की? रघुआ खइल' कथी? दूध भात सुतल' कहाँ? बोन मे ओढ़ल' कथी? पुरइन के पत्ता ढोढ़िया पचक! ढोढ़िया पचक पर स्त्री अपन तर्जनी प्यार स' गुडिया दिस आ फ़ेर अपने नाभि पर खोपैत अछि.. दुनू खिलखिलाइत अछि.. पार्श्र्व स' मृदुल, मद्घम सितारक अथवा जलतरंगक धुन.. स्त्रीक नाना बाल-कौतुक /मातृ सुलभ गतिविधिक संगे प्रकाश शनै: शनै: फेडआउट होबैत अछि.... । (समाप्त) 1 Preeti said... बलचन्दाक धारावाहिक प्रस्तुतिक लेल धन्यवाद। अहाँक दोसर रचनाक आश रहत। Reply05/06/2009 at 03:48 PM 2 Rahul Madhesi said... Vibha Rani Jik Natak Bad Nik Lagal. Reply05/05/2009 at 11:51 AM १. कामिनी कामायनी - सूटक कपङा आ २.कुमार मनोज काश्यप-प्रतिरोध कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि। सूटक कपङा वेदान्तक माय बेर बेर कहलखिन्ह ‘रै बाैआ ़ ़ ़ कनि अपन सूटक कपङा देखानै ़ ़ ़ ।गनगुआरि वाला पीसा आयल छथि ़़ ़हुनका विदाय में द’ दैतियैन्ह त एखन कीन नै पैङतै ़ ़़ ़हाथ मे पाइर् नहि अछि एखन ।’ आहि रे बा़ ़़ देखै के काेन काज ़़ ़ हम त’ देखने छी नै ़ ़ ़आ आेतेक दामक सूट गनगुआरि वाला पीसा सपनाे मे देखने हेता ़ ़़जे पहिरय देबहुन ़ ़ ़ ।हुनका त’ कपङा देखिते मातर दाॅति लागि जेतैन्ह ़़ ़ ़सिलाइर्याे के पाए हेतैन्ह ़ ़ ़ धाेती द’ दहुन बिदाइर् ़ ़ ़आे आे हि जाेगर छथि ।’ माय चुप भ’ गेलीह । छाेटकी बहिन पुछलखिन्ह ़ ़ ़ ‘के देलक अछि सूटक कपङा ़़ ़ ़ कनि हमराे सब के देखय दियाै नै ।’ ‘आफिस मे एक गाेटे देलकै ़ ़ ़।आेकर कत्तेक काज नै हम कराैने छी ़़ ़।गिफ्ट त’ बङ लाेक देलकै़ ़ ़ कियाे तमधैल ़़ ़ कियाे गिलासक सेट ़ ़ ़़ ़ ़कियाे सेन्टक सीसी ़ ़ ़ ़आर किदन किदन ़ ़ ़ ़आे सब त’ हम आन लाेक में बाॅटि देलियै़ ़ ़ मुदा इर् ़़़ ़सूटक कपङा हमरा बङ पसिन्न ़ ़ ़ एकर हम अपने सीएब भायजी के विवाह में ़़ ़ ़ ़।’ ‘मुदा कनि खाेलि क’ देखैबतीए नै ़़ ़ ़।’ छाेटकी बहिन कनि अङए लगलीह ़़ ़त कनि खाैंझैत बजलाह ़़ ़ ‘गै छाैङी ़ ़ ़ एक बेर आेकर पैकिंग खुलि जेतैए त’ फेर सॅ चपेत मे आेकर तह टुटि जाइर्त छै ़़ ़ आ’ कपङा दुइर्र भ’ जाय छै ़़ ़ टेलर बदमासी करय लागै छै तखन ़ ़ ़ बुझली दाय ़़ ।’़ ़ ़ ़ ‘मुदा जखन अहाॅ एकर पैकेट खाेलबे नहि केलियै त’ बुझलियै काेना ़ ़ ़जे सूटे के कपङा छै ़ ़ ़।’़ ़ ‘ गै ़़ ़ ताेरा जकाॅ मूरूख छी ़ ़ ़ ़।उङैत चिङि के पाॅखि चिन्ह वला हम ़ ़ ़ ।पन्नी के नीचा सॅ ऊज्जर देखाय छल ़़ ़ बूझि गेलियै़ ़ ़।’ ‘ंंंंंमुदा इर् काेना बुझलिए जे सुटे के कपङा छैक ।धाेतियाे भ सकैत छै आे कहलक की़़़़़ ़ ़।’ बहिनाे कम नै छलीह। ‘गै भकलाेल ़़ ़ आे की कहत हमरा़ ़ ़ हम अपने नहि बूझबै़ ़ ़ धाेती के कपङा आ’ सुटक कपङा में भेद छै से हम नै जनबै ़़ ़ ़।अहिना लाेक वेद हमरा आगाॅ पाॅछा बूलैत टहलैत रहैत छै ़़ ़ ।’ भायजी के विवाह तय भ’ गेलन्हि ।बाबूजी माॅ सब धिया पुत्ता के ल’ क’ बाजार गेलाह ़़़़़़ ़़ ़पसिन्नक कपङा खरीदबाबै लै ़़ ़ ्र बनराघाटवाला आेझा आ’ वेदान्त पहिने निकलि काेनेा काेनाे आआेर काज सॅ किराे मिराे सावक दाेकान गेल छलथि ।जखन हजमा चाैराहा लग गामक रिक्सा वाला पहूचलै ़़़त’ बाबूजी माॅ के कहलथि “वेदान्त के सेहाे बजा लैतियै ़ ़ ़ ़आेहाे अपन पसिन्नक कपङा खरीद लैतै़़़़ ़़ ़दस दिन बाॅचल छै ़़ ़ अहि बेर त धमगज्जरि लगन छै ़़ ़दरजीबा देबाे करतै की नै कपङा सब ़़। ‘” माॅ कहलखिन्ह ‘वेदान्त लग बङ दीव सूटक कपङा छै ़ ़़ आेकरा कियेा गिफ्ट देने छलैक ़ ़ ़ ़आे त वएह रखने अछि भायजी के विवाह मे पहिरय लेल ़़।’ ताबैत धरि पाछाॅ वाला रिक्सा दुनु सेहाे लग आबि गेलय ़़ आ’ सुनील बबलू दुनु भाय सेहाे उतरिक बाबूजीक ल’ग आबि गेलाह ‘हजमा चाैराहा त’ आबि गेलय आब किम्हऱ’ । ़ ‘बनारसी के दाेकान चलए।’ ‘बेस’ ।आ आे दूनू अपन रिक्सा प बैस थाेलबा के कहलथि ‘आगाॅ वाला रिक्सा के पाछाॅ बढ’। सब गाेटे अपन पसिन्नक वस्त्र कीनि दरजीबा के नाप दइर्त गाम अयलाह ़ता धरि वेदान्त आ बनरा घाट वाला आेझा गाम नै पहुॅचल छलाह ।बाबूजी के चिन्ता भेलनि ़ ़ ़ त’माॅबजलीह ‘बेदुआ के बाट घाट नै बूझल छै की ़़ ़आए नै त काल्हि जा क’ दरजीबा के कपङा के नाप द देतैक ़़ ़ राेज राेज त बजार अखन जाइर्ए पङै छैक।’ तखने वेदान्त आ आेझा अपन सायकिल घरक दू मुहाॅ मे ठाढ केलन्हि ़ ़ ़। “बाैआ ़़ ़बाबूजी कहै छलखुन्ह दरजीबा के कपङा कहिया देबहक़ ़ ़ ़’। ंमाॅ अपन मुॅह फाेलबे केलथि कि बजला ‘गै हमर भक्त अछि दरजीबा ़़ ़ ़एक दिन मे नहि एक घ्ंाटा मे सीब क’हमरा द’ देत ।तू आन काजक आेरियान कर ़़ ़ ।हॅ़़़़ ़ किछु खेनाय दे बङ भूख लागल अछि ़़ ़इर् बज्र देहाती बनराघाट बला संगे कि गेलहुॅ ‘काेल्ड ड्रींक’ सेहाे धरि नहि पीबए देलाह ़ ़ ़ ‘अहि मे की दन हाेइर्त छैक ़ ़ ़ महींसमाङ ़़ ़ ़ ़ ़ ़आ’ आेझा के खाैझाबैत़ ़ ़ ़हॅस्सी ठठा करैत ़़़़़़़़़ ़़ ़ दूनू खाय लेल बैसला़ ़ ़ ़ ़ ़।आेहि समय मलाहिन माछक छीटा नेने आॅगन मे पैुसल छल ।वेदान्त के देखि आेकर मुॅह प’ प्रसन्नताक’ लहरि दाैङि गेलए ़ ‘कहिया अलखिन बैाआ ़ ़ ़ ़ बाैआ माछक बङ साैकीऩ ़नेने सॅ ़ ़ ़माछक टाेकरीए नेने पङा गेल छलखीन कएक बेर नेना मे ।लाेक वेद खिहारि क’ हुनका सॅ टाेकरी छीने हल्ले ।’आे अनेरे बाजय लागल छल । ‘गै ताेहरि माछ सब नीके छाै नै ़ ़ ़’ ।माछक मतलब मलाहिनक धीया पुत्ता़ ़ ़ ़।’आ’ मलाहिन नूआ सॅ मूॅह छॅापि हॅसैत बाजल ‘बाैआ एखनाे ठठ्ठा करैत हथीन ़़ ़ ़बदललखिन नै कनियाे ।डिल्ली में नाैकरी करैत छथिन्ह तैयाे नहि ़ ़ ़।’ इम्हर माछ तराइत रहल ़़़़़़। वेदान्त अपन बकलेलहा हरकति सॅ आेझा ़़़पीऊसा ़़़़़़भाउज ़ ़ ़ ़बहिन सबहक मनाेरंजन करैत करैत तरल माछ खाइत रहला ़ ़ ़।कनिए बेरक बाद सब पुरूषपात उठि क’ दलान प चलि गेलाह ़़ ़ ़ । घर मे हुनक अनेकाे खिस्सा के दाेहराबैत तैहराबैत स्त्रीगण सब लाेट पाेट हाेइत रहली़। बङकी भाैजी बजली ‘हम एक बेर नैहर मे रही त माॅजी मटकूङीमें बङ विशेख दही पाैरि क’ हिनका हाथे पठाैलन्ह़ि ़ ़।इर् सायकीलक पाॅछा में मटकूङी राखि हमर घरक दरवज्जा लग आबि ततेक जाेर सॅ सायकिल के स्टैंड प’ ठाढ केलखिन्ह ़ ़ कि सायकील दही के मटकूङी के उपर खसलै ़़ ़ आ दही समेत मटकूङी के टूकङी टूकङी उङि गेलय ़ ़ ़बाॅचल दही आेहि ठाम जमीन प पसैर गेलय ़़ ़ ़ ़ ।’ दाेसर भाैजी बजली ‘ंमुनु जखन छाै मास के छलै ़़ ़हमसब दरभंगा डेरा प छलाैं ़ ़़ ़ ़ बङ जाेर सॅ आेकरा कान मे दरदि उठलै ़़ ़ ़ भरि राति आे कनैत रहलै़ ़ ़ ़ भिनसरे हिनका ल’ क” हम डाक्टर लग गेलहुॅ ़ ़ ़ ़कम्पाउंडर नाम पूछलकन्हि त अपन नाम लिखैलकिन्ह ़ ़़ ़आ” जखन उमरि पुछलकैन्ह त’ मुनु के लिखा चुपचाप हमरा बगलि में आबि बैसला ़़ ़ ़ ़कनिए काल में कंपाउंडर बजाैलकैन्ह ़ ़ ‘वेदान्त ़ ़ ़ उमरि छाै मास ़़ ़ ।’जखन हम पूछलियैन्ह ़ ़ त’ कहलैन्ह ‘हमरा भेल हमर नाम पूछैत अछि ़़ ़ आ’ जखन उमरि पुछलकैन्ह त लागल जे बच्चा के पूछि रहल अछि ़।’हम कहलियै जे तखनाे अहाॅ अपन नाम काटि क’ बच्चा के नाम किएक नहि लिखबा देलियै ।’त कहैथ छथि ‘नाम सॅ कि कानक दर्द बदलि जेतैक ।’ बङकी बहिन बजली ‘एक बेर इर् घर सॅ सेहाे भागल छथ़ि ़ ़ ़पढाइर् लिखाइर् में माेन नहि लागैन्ह ़़ ़ ़ ़ बाबूजी डाॅटलखिन्ह त’ चुपचाप भाेरे भाेर पङा गेला ़़ । दुपहरिया मे मुजफ्फरपुर सॅ फाेन करैत छथि ‘बाबूजी हम घर सॅ पङा गेल छी ।’ बाबूजी पुछलन्हि ‘पङा क’ जेबए कत्तए़ ़ ़ ़।’त कहलन्हि ‘जत्तय भाेला बाबा ल’ जाइर्थ ।’ ‘बेस़ ़ ़ ़ अखन कत्तय छ ़़ ।’ ‘एखन हम मुजफरपुर मे छी ़़़ ़ ़ ।’ ‘अच्छा काेनाे गप नै ़़ ़ ़ ़अखन भाेलेबाबा कहैत छथुन जे घर आबि जा ़ ़़ ़तेकरा बाद देखल जेतै ।’ आ” आे सांझ धरि घर आबि गेल छलाह ।’ अहि गप्प सप्प क सूत्रधार मॅझिली बहिन बङ वियापक भ बजलीह ‘दीदी़ ़ ़ ़चारि पाॅच बरक पहिने जे आेझाजी अपन दुरगमनियाॅ माेटर सायकिल छाेङि देने छलखिन अहिठाम ़ ़ ़ आेकरा इर् खूब चलेलथि ़ ़ ।एक बेर काेनाे काज रहै ़़ ़ भरिसक शंभू के मूङन रहै़ ़ ़ इर् तीन चारि बच्चा के माेटरसायकिल प’ बैसा गाम में घूमए निकलला ़ ़ ़ ततेक तेजी सॅ माेटरसायकिल चलैलखिन्ह जे एकटा बच्चा अहि खेत में दाेसर आेय खेत में ़ ़़ तेसर हिनकर पीठ पकङने चिकरए लागल़ ़ ़ ़रस्ता पेङा जाइर्त लाेक बच्चा दुनु के उठाक घर पहुॅचेलकै ़़ ़ ़ आे त’ जाेतलाहा खेत छलै ़़ ़ ़ ़नै ़़त़ ़ ़ पूछू नह़ि ़ ़ ़ ़ ़।’ ताबैत वेदान्त खाय लेल आबि गेल छलाह ़ ़ ़ आेझाजी सॅ बाजि लगबैत बजलाह ‘पाॅच साै के बाजी राखू़ ़ ़ ़ हम सब टा माछभात खा जायब ।’ आेझाजी हॅसला ‘ आै ंमहाराज़ ़ ़ ़ ़ सबटा माछभात जे खा जेबए त हमसब की खेबै़ ़ ़ ़ । आ’ ऊपरि सॅ पाॅच साै टाका सेहाे दिय ़़ ़ ़ हमरा कंगाल बनाव के विचार अछि की़ ।’ “बाैआ ़़ ़काल्हि भायजी के सेहाे नाप दिया दहुन ़़ ़ ।आे आय रतुका गाङी सॅ आबि रहल छथुन्ह ़ ़ ़ ़सिल्कक कुरता के एक टा कपङा छै राखल घर में ़़ ़ ।’माॅ अपन दुनियाभरि के चिन्ता परगट करैत रहलीह । भिनसरे खा पीबि क़ ़ ़वेदान्त ़आेझाजी ़़़आ’ भायजी बजार दिस निकलए लगलाह ़ ़ ़त आेसारा मे राखल चाैकी प’ बैसल माॅ कनिया के सब गहना देखैत बजलीह ‘जा ़़ ़ कनिया के पाजेब त’ एबे नहि केलए बाैआ राै ़़ ़ ।’ त वेदान्त हुनका आश्वासन दैत बजलाह ‘जे सब बचलाहा काज छाै हमरा माेन पाङैत रहियै ़़ ़हम आनि देबाै ़ ़ ।’ छाेटकी बहिन के अपन माेबाइर्ल नंबर लिखाक कहलखिन्ह ़ ़ ‘जाै आर किछू मॅगबावके हेताै त फाेन करि दिहै ़ ़ ़ ।’ भायजी के मूॅह प’ जेना सूरूजक लाली आबि गेल छलैन ़ ़लाल टरेस़ ़ ़ सदिखन मुुूस्कैत़़ ़ ़़ ़ जेना अहि ब्रम्हांड मे आे प्रथम पुरूष थिकाह ़ ़ जिनकर विवाह हाेमए जा रहल अछि ।दूनू हाथ आगाॅ मे एक दाेसर सॅ सटाैने ़़ ़ ़ मुस्कैत दरजी लग ठाढ ़़़़़ ़़ ़ ़कुरता के नाप ़़ ़ ।वेदान्त आ’ आेझाजी कनि फराक सॅ भायजी के प्रसन्नता के आनंद उठबैत ठाढ़ ़ ़ ।भायजी मुस्कैत दरजी के कहलखिन्ह ‘हमर विवाह कलक्टर साहेबक कन्या सॅ भ’ रहल अछि ।कुरता कनि नीक सॅ सीबियह़।’ गाम प आबिते मातर आेझाजी अहि बात क बिराेर् उङा देलन्ह़ि ़। ‘ भायजी दरजीबा के काेना मुस्का मुस्का क’कहैत छलखिन्ह।’ घरे मे लाेक ठट्टा करए लगलैन्ह ‘कहै छलैथि जे विवाहे नहि करब संत रहब आ’ देसक समाजक सेबा करब ़ ़़ आ” विवाह भेबाे नहि केलन्हि ससुरक पदवी बङ साेहाेन लागए लगलैन्ह।’ मुदा भायजी के काेनेा गत्तरि मे जेना आब लाज धाक नहि बाॅचल छल ़ ़ ़ आे पलथा खसाैने आेहिना मुस्कैत बैसल छलाह ़़़। सब काजक आेरियाैन भ’ गेल ।कनिया के नूआ फट्टा लहठी सिंनुर सब डाला में राखि भगवति आगाॅ पङि गेल ।काल्हि हथधरी वला सब आबि रहल छथि ़ ़मुदा ़ एखन धरि वेदान्त अपन कपङा दरजी के नहि देलाह । जखन सब एक दिस सॅ ठाढ भ’ गेलए कि ‘पुरने कपङा पहिर क’ बरियाती में जायब’।तखन आेझा के ल’ क’ आे अपन सूट सियाबए दरजी लग पहुॅचलाह ़ ़ । “भाय ़़ ़ जल्दी सॅ सूट तैयार करि के राखह ़़ ़ ़ आय सांझ क’ द दिह ़़ ़ काल्हि बराती जेबाक अछि ़ ।” दरजीबा ‘हॅ सर ़ ़ ़ एकदम ़़ ़ किएक नै” कहैत हुनकर पूरा शरीरक नाप लेला के बाद वस्त्र क’ पैकेट खाेललक । “इर् की सर ़ ़ ़ ़एक टा डबल बेडक चादरि आ’ दू टा गेरूआ के खाेल ।” आेझाजी के हॅसी तेहेन अनार ़़़़़़ ़़़छुरछुरी़ ़ ़ ़ जकाॅ फुटलै ़़ ़ ़ जे बंद हेबाक नामे नहि लइत छल ।दरजीबा सेहाे हॅसय लगलै ़ ़ ़ ़आ’ वेदान्त क’ मूॅह देखबा जाेगर छल ़़ ़ ़ ़ । कामिनी कामायनी 23।4।09 1 vidhu kanta mishra said... satishjee, manoram rachana lel badhai. - Vidhukanta Mishra Prayag Reply05/11/2009 at 12:49 PM 2 Vidhu Kanta Mishra said... kaninijee katha adbhut aich. ahina likhait rahoo - Vidhukanta mishra , Prayag Reply05/11/2009 at 12:42 PM 3 Preeti said... Kamini Jik katha bad nik lagal Reply05/05/2009 at 06:02 PM 4 Neelima Chaudhary said... kamini jik sootak kapra te bad nik rahal, muda manoj jik pratirodh dekhan me chhotan aa ghav gambhir bala achhi Reply05/04/2009 at 10:33 PM 5 aum said... kamini aa manoj ji dunu gotek katha bad nik lagal Reply05/04/2009 at 08:34 PM डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक,मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण,मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि,स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका,महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल,कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन,भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ मणिपद्म क संस्मरण-संसार विगत अनेक शताब्दीदसँ मैथिली भाषा ओ साहित्यणक सुदीर्घ एवं समृद्वशाली साहित्यिक परम्पअरा अवि छिन्नथ-अक्षुण्णय रूपेँ चलि आबि अछि; किन्तुw बीसम शताब्दी केँ जँ एकर साहित्यिक विकास-यात्राकेँ स्वार्णयुगक संज्ञासँ अभिहित कयल जाय तँ एहिमे कोनो अत्यु्क्ति नहि हैत, कारण विगत शताब्दीञमे एकर सर्वांगीण विकास-यात्रामे एक नव मोड़ आयल जे पत्र-पत्रिकाक उदय भेलैक तथा ओकर प्रकाशनक शुभारम्भद भेलैक जकर फलरूप गद्यक विभिन्नप रूप-विधानक प्रादुर्भाव पत्र-पत्रिकाक प्रकाशनसँ आ ओकर प्रयोग रूप-विधानक रूपमे पाठकक समक्ष प्रस्तुदत भेल। संघर्षमय युगक जीवनमे गद्यक मर्यादा एहि रूपेँ रूपायित कऽ देलक जे ओ अभिव्यपक्तिक असाधारण साधन बनि गेल। आधुनिक मैथिली गद्य-गंगाकेँ सम्पोजषित करबाक उद्देश्यस सँ साहित्य -पुरोध लोकनिक सत्प्र यासँ ओकर परिष्काूर परिमार्जन भेलैक। गत शताब्दीउमे आत्म कथा, आलोचना, उपन्याास, कथा, गाआ जीवनी, डायरी, निबन्धा, संस्मआरण, साक्षात्कारर आदि अनेक साहित्यिक विधा-जन्म) देलाआ साहित्य मे एक नव-स्पनन्द,न-स्पहन्दसन भरबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलका। ई श्रेय वस्तु त: पत्रिकादिकेँ छैक जे आधुनिक गद्यक आविर्भाव एवं विकास-यात्राकेँ करबाका तथा साहित्यरक श्रीवृद्विक सहयोगमे अपेक्षित ध्यािन देलक। एहि निमति साहित्यत-सृजानिहार लोकनि नव-नव प्रवृत्तिक रचनाक दायित्वहक भार वहन कयलनि आ सम्पा्दक लोकनि ओकरा यत्नर पुरस्स-र प्रकाशति कयलनि जकर फलस्विरूप मैथिली गद्यक भेलैक आ ओकरा विविध रूप-विधानमे विन्या स्तय कयल जाय लागल। पत्रिकादिक माध्य मे सेहो नव-नव रचानाकारकेँ प्रोत्सा्हन भेटलनि तथा हुनका सभक ध्यायन ओहि विधा दिस आकर्षित भेलनि जकर एहि साहित्याान्तरर्गत सर्वथा अभाव छलैक। एहिसँ अतिरिक्त विगत साहित्यिक विकास-यात्रामे अनेक उल्लेअख योग्य काज भेल जकर ऐतिहासिक महत्त्व छैक। रचनाकारक भाव-प्रवणता, हार्दिकता, कल्पनाशीलता एवं स्वहछन्दछ प्रवृत्तिक परिणाम स्ववरूप मैथिली गद्य अपनाकेँ नव पल्लवसँ पल्लववित कयलक। विगत शताब्दीैमे एकर सर्वतोमुखी विकास विकास भेलैक जाहि आधार पर एकरा गद्य-युग कहब समीचीन होयत, कारण मैथिली गद्य-गंगा शत-शत धारा मे प्रवाहित होइत एकर साहित्यम सागरकेँ भरलक आ पूर्ण कयलक। उपर्युक्त पृष्ठकभमिक परिप्रेक्ष्यभमे मैथिलीमे एक अद्वितीय प्रतिभासमपत्रा तप : सपूत रचानाकारक प्रादुर्भाव भेल आ अपन अप्रतिम प्रतिभाक बल पर साहित्यक अनेक विधाकेँ संस्कादरित कयलनि आ ओकरा मिथिलांचल अभिज्ञानद’ कए भारतीय साहित्यपक समकक्ष स्था्पित कयलनि जे रचनाक प्रत्येाक क्षेत्रमे, सर्जनाक यावतो प्रस्थाकनमे ओ अपन कृतिमे ने केवल परवर्ती पीढ़ीक हेतु, प्रत्युमत् अपन समकालीनक हेतु सेहो शिखर पुरूष आ प्रेरक स्तपम्भर बनि गेलाह ओ रहथि डॉ. व्रजकिशोर वर्मा मणिपदूम (1927-1986) हुनक प्रकाशित साहित्य वैविध्यिपूर्ण अछि, कारण साहित्यिक अभिक्तिक कोनोक विधा नहि बाचल रहल जकर सहज प्रयोगमे ओ उल्लेगख योग्य् सफलता नहि प्राप्त कयलानि। हुनका द्वारा रचित साहित्यगक प्रचुरता आ विचित्रता अछि, किन्तु ओहिमे सर्वाधिक महत्विपूर्ण तथ्यच थिक जे एहि परिमाण-प्राचुर्यमे हुनक अधिकांश साहित्यिक कृतियि कोटिक थिक। जहिना हिनक रचनाक विशदता पाठककेँ चकित आ विस्मित क’ रहल अछि तहिना हुनक व्याक्तित्वाक आध्याँत्मिक रहस्युमयता सेहो अधिक जोड़ पकड़लक। हुनक आभ्य न्तारिक शक्ति हुनका निरन्त र चिर-नूतन रचनाक हेतु उत्प्रे्रित करैत रहलनि तथा विश्राम करबाक लेल पलखति नहि देलकनि। ओ जीवनक विविध पथक पथिक रहथि तथा विषाद आ करूणाक बीच सौन्द र्यक अन्वेवषण करब हुनक लक्ष्या छलनि। हुनक मन आ मस्तिष्कआ क्षितिज जाग्रत छलयनि। ओ जीवन आ प्रकृतिक पक्षधर रहथि। ओ एक दूरदर्शी साहित्यर-मनीषी रहथि जे मैथिली मे जाहि विधाक अभाव हुनका परिलक्षित भेलनि तकर पूत्य्र्थ मनसा-वाचा- कर्मणा ओहि मे लागि गेलाह। हिनका द्वारा प्रयुक्त विधा साहित्यूक विधे नहि रहल, प्रत्युीत आकर्षक विधाक रूपमे ख्या ति अर्जित कयलक। चिरनूतनताक अन्वेहषी मणिण्द्य मैथिली साहित्यतमे संस्मररण साहितयान्तुर्गत चारि नव विधाक प्रवर्त्तन कयलनि जकर सम्बवन्धद अतीतसँ अछि, यद्ययपि संस्मेरणक संसार विषयक दृष्टिऍं व्यालपक नहि, तथापि संवेदनाक गाम्भीहर्य आ आत्मींय-स्पवर्शक दृष्टिऍं अत्यकन्त् श्रेष्ठण कोटिक साहित्यन-विधाक अन्त्र्गत अबैछ1 भारतीय भाषा आ साहित्य्मे एहि विधाक जन्म पाश्चात्या साहित्यहक संग-सम्पतर्कक फलस्वकरूप प्रारंम्भय भेल जे अधुनातम सन्दयर्भमे एक वेश चर्चित विधाक रूपमे प्रचलित भेल अछि। ओ एहि विधामे के विपुल परिमाणमे सहित्यम-सृजन कयलनि, किन्तुि दुर्योगक विषय थिक जे मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनिक ध्या न एहि दिस नहि गेलनि आ ओकर चर्चा पर्यन्ति नहि कयलनि। भारतीय साहित्यध निर्माता सिरीज अन्तओर्गत साहित्यु अकादेमीसँ मणिपद्य (1969) पर एक मनोग्राफ प्रकाशित भेल अछि। ओकर लेखक एहि सिरीजक रचनाकेँ बिनु पढ़न।हि उपेन्द्र महारथीक बदला मे रामलोचन शरणक उल्ले्ख कयलनि। इएह तँ मनोग्राफ लेखकक स्थिति अछि। भारतक स्वलतन्त्रछता-संग्रामक इतिहासमेक सन् उन्नैलस सै वियालिसक ऐतिहासिक दृष्टिएँ अत्यकन्तव महत्वतपूर्ण स्थािन अछि। सन् वियालिसक महाक्रान्तिमे बूढ़-बूढ़ानुस नेतासँ अधिक जुआन-जहानक रक्तर विशेष गर्म छलैक आ अंग्रजी शासनक विरूद्व ओकरा लोकनिक स्व-र वेश मुखर भेल छलैक। उत्तर बिहार वा मिथिलांचलक नवयुवक लोकनि एहि यज्ञमे अपन प्राणक आहुति देलनि आ रक्तसँ तर्पण कयलनि। मणिपद्य स्वुयं सजग, सचेष्ट् आ निर्भीक स्व तन्त्रपता सेनामी रहथथि तहि परिप्रेक्ष्यकमे ओ मै थिली संस्मतरणक सर्वप्रथम डायरी शैलीक प्रवर्त्तन कयलनि अवश्य्, किन्तुा एकरा अन्त्र्गत ओ प्रचुर परिमाणमे रचना कयने रहितथि तँ ओ निश्चनये मैथिली साहित्यमक एक अभूतपूर्व कृति होइत । एकरा अन्तनर्गत हुनक ‘विलायसीक फारारीक सात दिन (1153) तथा ‘फरारीक पाँच दिन’ (1171) प्रकाशित अछि जाजिमे स्वीतन्त्रूता आन्दोयलनक क्रम मे ओ जे डायरी लिखलनि तकर दारूण पीड़ादायक वर्णन कयलनि। एहिमे रचनाकार सद्यय : स्फुतटितभाव वा विचारकेँ अभिव्यीक्ति देलनि वा अपन अनुभवक रेखांकन वा विगत अनुभवक पुनर्मूल्यांीकन कयलनि। एहिमे वियालिसमे फेरार भेल अपन स्थितिक चित्रण कयलनि संगहि नेपाल तराइक जन-जीवन पर सेहो प्रकाश देलनि। अपन दीर्घ सार्वजनिक जीवनमे ओ देशक राजनैतिक,सामाजिक, साहित्यरक आ सरकारी उपक्रमे काज कयनिहार व्यनक्तिक सम्परर्कमे अयलाह, ओहि स्मृतिकण केँ जोडि़क’ हुनका सँ भेट भेल छल सन् 1153ई सँ लिखब प्रारम्भल कयलनि जकर समापन 1183 ई. धरि अनवरत चलैत रहलनि जकरा एहिमे अभिव्यसक्तिक मूर्त्तरूप प्रदान कयलनि। हिनक उपर्युक्त संस्मिरण मात्र लेखकीय मनीषा पर नहि आधृत अछि; प्रत्युकत्त-प्रेम, ईश्वार-प्रेम, स्व्देश-प्रेम, महतक प्रति श्रद्वा विनोद-प्रियता आदिक समस्तत वैशिष्ट्रमयक झलक एहिमे भेटैछ। ओ अपन दीर्घ साहित्यिक जीवनान्तीर्गत जाहि-जाहि मातृभाषा आ साहित्या नुरागी साधक लोकनिक सम्पमर्कमे अयलाह ओकरा संगाहि अन्याआन्यस भाषानुरागी विद्वत् वर्गसँ अभिभूत भेलाह, जाहि रूपेँ हुनका हृदयंगम कयलनि, जाहि रूपेँ प्रभावित भेलाह तनिके ओ एहि श्रृंखलाक कड़ीक आधार बनौलनि। हिनक संस्मकरणात्मनक आलेख यद्यति विवरणात्मिक अछि तथापित ओ सत्यि घटना पर आध़त संगहि वर्णित व्यआक्तिक मातृभाषाक अनुराग आ साहित्यिक आन्दोपलनक परिचायक सेहो अछि। एहि सिरीजक अन्तभर्गत प्रकाशित संस्मदरण जीवनक एक पक्षकेँ उदूघाटित करैत अछि जे व्येक्ति अपन क्रिया-कलापसँ आकर्षित कयलनि तनिके पर ओ लिखलनि। एकरा अन्तार्गत वर्णित व्यिक्तिक व्य क्तित्व आ कृतित्व क ओही अंशकेँ ओ स्पतर्श कयलनि जे अपन उपस्थितिसँ अमृत वर्षा कयलनि आ सहज होथि आ ने केवल स्मृकति विषयक व्य क्तित्व केँ सेहो दीपित करैत हो, प्रत्यु त स्वकयं लेखकारक व्यषक्तित्वि कँ सेहो दीपित कयलक। एहिमे ओ वर्णित व्यतक्तिकक व्यतक्तित्वे ओही वैशिष्य् तथा स्थितिकेँ जनसामान्यसक समक्ष प्रस्तुओत-कयलनि जाहिसँ हिनक संस्मकरण वास्तकविक घटित घटनाक सन्निकट आ सम्भथवभ’ सकल। ओ स्पिष्टम रूपेँ पाठकक-समक्ष अपन यथार्थ प्रतिक्रिया वर्णित व्य क्ति पर व्य क्तप कयलमनि जकर वर्त्तमान परिपेक्ष्यटमे ऐतिहासिक महत्वअभ’ गेल अछि। एहि सिरीजक अन्तरर्गत मैथिली भाषा आ साहित्यपक निम्न स्थव व्यकक्तित्वक संग हुनका साक्षात्का र भेलनि तथा अपन अमिट छाप छोड़लनि यथा सीताराम झा, (1811-1175), बैद्यनाथ मिश्र यात्री (1111-1118) काञ्चीनाथ झा किरण (1103-1181) , चन्द्रटनाथ मिश्र अमर (1125), कुलानन्द- नन्द न (1108-1180) सुधांशु शेखर चौधरी (1120-1110) सामदेव (1134), सुरेन्द्र1 झा सुमन (1110-2002), नरेन्द्र नाथ दास विद्यालंकार (1104-1113) मायानन्द) मिश्र (1134) भोलालाल दास (1814-1199), लक्ष्मरण झा (1113-2002), गिरिन्द्र मोहन मिश्र (1810-1183), जगदीश्वकरी प्रसाद ओझा (?) महामहोपाध्या य उमेश मिश्र (1825-1139), अमरनाथ झा (1819-1144), राजकमल चौधरी (1129-1139), रामकृष्णर झा किसुन (1123-1190), रामनाथ झा (1103-1191) कविशेखर बदरीनाथ झा (1813-1198) ज्यो1तिषाचार्य बलदेव मिश्र (1180-1194), राजेश्व र झा (1122-1199), बाबू लक्ष्मी3पति सिंह (1109-1192), उपेन्द्र ठाकुर मोहन (1113-1180) एवं श्रीमती सुभद्रा झा (1111-1182), राधाकृष्ण1 चौधरी (1124-1184) इत्या1दि पर ओ हुनकासँ भेंट भेल छल क अन्त1र्गत लिखलनि1 कविवर सीताराम झा बाबू भोलालाल दास आ राधाकृष्ण1 चौधरी पर हुनक दुइ संस्म्रण हमरा उपलब्ध9 भेल जकरा यथावत् एहिमे समाहित कयल अछि। उपर्युक्तस महानुभावक संस्म्रण एक जीवितावस्थाह थिक आ दोसर मृत्यूपपरान्त1क। उपर्युक्त संस्मुणान्तमर्गत ओ हुनक जीवनवृतिक इतिहासे नहि प्रस्तुवत कयलनि; प्रत्युहत हुनक साहित्यिक अभिरूचि एवं अवदानक संगहि संग संगठनात्मतक प्रवृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तु्त कयलनि जे मातृभाषाक विकासमे उल्लेहख योग्यि अवदानक रूपमे चर्चित अछि। हनुका सँ भटँृ भेल छलक परिधि मात्र मैथिली साहित्य मनीषी लोकनि धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युभत ओकर फलक विस्तृित छल तकर प्रारूप भेटेछ, जे विश्व्क प्रख्याात भाषा-शास्त्री विद्वतवरेण्यु डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी (1810-1199), हिन्दीि साहित्येक प्रख्याभत साहित्यँ मनीषी आचाय्र डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (1109-1191), महान राजनेता जयप्रकाश नारायण (1102-1191), मिथिलाक प्रख्या त चित्रकार उपेन्द्रय महारथी (मृत्युि 1181), मिथिलाक यशस्वीर राजनेता ललित नरायण मिश्र (1122-1195), एवं दरभंगाक राजा बहादुर विश्वेलश्व1र सिंह (1108-1193) इत्या्दि व्यएक्तित्वमक प्रसंगमे अपन निजी धारणाकेँ रूपायित कयलनि। एहिसँ अतिरिक्त ओ अपन पूज्यक पिताश्री आ पूज्या माता पर सेहो संस्म1रणक रचना कयलनि1 एहि सिरीजक अन्त्र्गत समाजक उपेक्षित आ तिरस्कृोत वर्गक प्रति हुनकर हृदयमे असीम श्रद्वा, अगाध प्रेम आ अपार सहानुभूति छलसनि तकर यथार्थताक प्रतिरूप भेटैछ सोमन सदाइ, गोदपाडि़नी नट्टिन एवं नंगटू साँढ़ मे जाहिमे ओ ओकर वास्त्विक पृष्ठ भूमिक रेखांकन कयलनि। सरकारी तन्त्रवक परिवेशमे भ्रष्ट चारी थानेदारक संग कोन स्थितिमे साक्षात्कारर भेलनि तकर यथार्थ क्रिया-कलाप दिस हुनक ध्याान केन्द्रित भेलनि तकरो एहि सिरीजक अन्तर्गत अनलनि। व्ययवसायसँ ओ होमियोपैथ रहथि। ओ एक पहाड़ी रोगिणीक प्रसंगमे सेहो लिखलनि जे हुनकासँ इलाज कराबय आयल छलीह। हनुकाँ सँ भटँ भेल छल क अन्तोर्गत ओ स्मृलति-सूत्र आ साहित्यिक रिक्त ताक जीवन-परिचय विचार-धारा, साहित्यिक प्रवृत्ति आ सामाजिक गतिविधिक परिचय प्रस्तुकत कयलनि। एहि संस्म-रणात्मखक निबन्धवमे ओ ने केवल प्राचीन परिपाटीक परित्यानग कयलनि, प्रत्युात नव जीवन दष्टि आ नव पद्वतिक श्रीगणेश कयलनि। एहन अनुभति परक कृति सभमे ओ अपन अतीतक ओहि प्रसंगक उद्भभावना कयलनि जे हुनक साहित्यिक व्य क्तित्विक नियामक सिद्व भेल। एहि सिरीजमे जतबे संस्मअरण उपलब्धत अछि दवबे ओ तदयुगीन साहित्यिक गतिविधिक दस्तानवेज थिक जे मैथिली साहित्योेतिहासमे अत्य न्ता अहं भूमिकाक निर्वाह करैछ। भावनात्मिकता आ वैयक्तिकताक संगहि संग वैचारिकताक अद् भुत समन्वूय एहिमे भेल अछि। सैद्वान्तिक दृष्टिएँ, हुनक संस्म रण साहित्यम साहित्यिक संस्मकरणक विशिष्टच गुणसँ अलंकत आ महत्त्वपूर्ण अछि। एहिमे कथात्महकताक दृष्टिएँ कथा, वैचारिकताक दृष्टिएँ निबंध आ भावनात्मवकताक दृष्टिएँ कविता एहि तीनू विधाक त्रिवेणीक अभूतपूर्व संगम भेल अछि। हिनक संस्मूरणमे अनुभूति, वर्णन, विवरण, विचार, भाव, यथार्थ, आ कल्पिनाक अद् भुत समन्वसय भेल अछि। हिनक संस्मनरणात्मीक निबन्ध क मूलाधार भावना जे काव्यांत्मलकताक सहज गुणसँ अलंकृत अछि। एहि सिरीजक संस्ममरणक अनुशीलनसँ अवबोध होइछ जे मणिपद्यकेँ भारतीय साहित्यआक संगहि-संग पाश्चा।त्यी साहित्य क सेहो गहन अध्यधयन छलरनि जकर वास्तकविकताक परिचय हुनक उपर्युक्त संस्मणरणान्तअर्गत डेग-डेग पर उपलब्धल होइछ। ओ अपन एहि रचनान्तुर्गत एहन वातावरणक निर्माण कयलनि पाहिसँ पाश्चाोत्यल साहित्यछ चिन्तचक लोकनिक विश्वर प्रसिद्व रचना सभक सेहो विवरण प्रस्तुोत करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह जे ओहि अवसरक हेतु उपयुक्त हेतु उपयुक्त छल। एहिमे गांधीवादक संगहि-संग मार्क्सेवादक छौंक स्थतल-स्थिल पर भेटैछ। हुनका सँ भँट भेल छल मे तीव्र मानवीय संवेदना, व्याथपक सहानुभूति, सजल करूणा ममता आ आत्मी यता अछि जे अन्यंत्र दुर्लभ अछि। एहिमे नोर आ तीव्र आवेगक गम्भीआर चित्र तथा सामाजिक, राजनीतिक विचारक स्पिष्ट् फराकहिसँ चिन्हनल जा सकैछ। एहिमे साहित्यीकार, शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ मातृभाषाक उन्नाफयक, समाजसेवी, कलाकार आ विद्वत् वर्गसँ सम्बकन्धित व्यिक्तिक संग साक्षात्कातर अछि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्येमे अतिशय ज्ञानवर्द्वक थिक। मणिपद्य एक पैघ यायावर रहथि। साहित्यिक यायावरकेँ एक अद् भुत आकर्षण अपना दिस आकर्षित दिस आकर्षित करैछ, ओ मन्त्र मुग्धतभ’ कए ओहि दिस आकर्षित भ’ जाइछ। एहन साहित्यक सर्जनमे ओ संवेदनशील भ’ कए निरपेक्ष रहथि1 यायावरीक क्रममे हुनकर रस्तारमे पड़निहार मंदिर, मसजिद, मीनार, विजय स्त म्भ , स्मा रक, खण्डमहर, किला, कब्रीस्ता्न आ प्राचीन महलक संस्कृहतिक, कला आ इतिहासकँ एकत्रितक’ कए अपन यात्राक प़ष्ठ,भूमि तैयार कयलनि। हिनक उपलब्धज यात्रा-साहित्यि संस्मनरणात्मठक थिक जाहिमे ओ एक सामान्यल यात्री जकाँ अपन प्रभाव, प्रतिक्रिया आ सम्वेनदनाकेँ महत्वम देलनि। एहि सिरीजकेँ ओ ओहीठाम गेल छलहुँ नामे यात्रा-वृतान्तत प्रस्तुयत कयलनि जकरा अन्तथर्गत कोर हाँस गढ़क सौझ (1162), ई आषाढ़क प्रथम दिन (1163) पुण्याभूमि सरिसव पाही (1168), कुलदेवी विश्वेजश्वपरी (1168), त्रिशुला तट प्रवास (1161), एकटा पावन प्रतिष्ठा न (1191), प्रसंग एकटा स्मारक का (1195), महिषी साधना/साधना/संकेत (1195) एवं विसफीसँ वनगाम धरि (1183) आदि उल्लेाखनीय अछि। ओहिठाम गेल छलहुँ मे ओ साहित्य क समग्र जीवनक अभिव्यसक्ति रूपमे ग्रहण कयलनि। हिनका लेल प्रकृति सजीव अछि यात्रामे जे पात्र भेटलनि ओ हुनक आत्मीय आ स्व्जन बनि गेलथिन। हिनक यात्रा-साहित्यपमे महाकाव्यत आ उपन्याससक विराटत्तत्वस कथाक आकर्षण, गीति काव्य्क मोहक भावशीलता, संस्म रणक आत्मीसयता, निबन्ध क युक्ति सभ किछु अनायासहि भेटि जाइत अछि। ओ जे देखलनि, अनुभव कयलनि तकर यथार्थ चित्र एहिमे प्रस्तु त कयलनि। एकर सर्वोपरि वैशिष्ट्यत थिक-औत्सुलक्यन जे पाठक एकबेर पढ़ब प्रारम्भत करैछ तँ ओकर समाप्ति जा धरि नहिभ’ जाइछ ताधरि हुनका चैन नहि होइत छनि। हुनका भूगोलक विशद ज्ञान छलनि तेँ कोनो स्था्नक भौगोलिक वर्णन करबामे ओ निपुणता देखौलनि जकर यथार्थक परिचय एहिमे उपलब्धय एहिमे करौलनि1 एहि श्रृंखलान्त र्गत जे रचनादि उपलब्धा अछि ओकर चिन्तबन चिन्तकन-मननसँ स्पखष्ट प्रतिभाषितभ’ भ रहल अछि जे ओ वर्णित वस्तुधक फिल्मां कणक’ देलनि जे पाठकक समक्ष वर्णित वस्तुपक समग्र चित्र सोझाँ आबि जाइछ। हिनक यात्रा-वृतान्त् शौली पर औपन्या सिक शैलीक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि जे ओहिमे स्थाान विशेषक विस्तृात चित्रण कयलनि जहिना ओ देखलनि तहिना तकर यथार्थ चित्रण पाठकक समक्ष प्रस्तु त कयलनि। पाठककेँ सहसा आभास होमय लगैत छनि जेना ओहो ओहीप यात्राक सहयात्री होथि। हिनक वर्णन-कौशल चित्रात्मगक होइत छलनि। एहन चित्रात्मठक वर्णण निश्चीये अप्रतिम प्रतिभाक परिचायक थिक जे सामान्यह रचनाकार द्वारा सम्भरव नहि। ओ जाहि वस्तुक वर्णन कयलनि तकर रनिंग कमेन्ट्रीा ओहिना प्रस्तुदत कयलनि जेना आइ काल्हि क्रिकेट खेलक मैटानसँ मैदानसँ रेडियो वा टेलिभीजन पर देल जाइछ। यात्रा-विवरणमे रोचकता अपरिहार्य गुण मानल जाइछ तकर सम्यिक निर्वाह हिनक ओहि ठाम गेल छलहुँ मे भेल अछि। ओ अत्यपन्त भावुक हृदयक व्यनक्ति रहथि तेँ बिनु कोनो राग-द्वेषक ओकर यथार्थ वर्णन कयलनि। अपनाकेँ सत्य आ ज्ञानक भण्डाथर बुझिक’ नहि तथा पाठककेँ शिक्षित करबाक मनसा हुनकर कदापि नहि छलनि, जेना ओ पञ्चभूत सँ भिन्ना-भिन्न चरितक सहायतासँ भिन्न -भिन्न् दृष्टिकोण उपस्थित कयलनि जाहि प्रकारेँ ओहि ठाम गेल छलहुँ मे जेना ओ अपनहि संग तर्क करैत यात्राक समापन कयलनि। एहि श्रृंखलान्तुर्गतक रचनामे ओ जे किछु मैथिली पाठक केँ द’ पौलनि ओ सभ हुनक आत्मश-परीक्षणक स्वचगत कथन थिक। मैथिलीक प्राचीन पत्रिकाक अनुशीलनसँ ज्ञात होइछ जे मणिपद्यक प्रबल इच्छान छलननि जे ओ अपन व्य्क्तिगत एवं साहित्यिक जीवनक आधार पर आत्मककथाक एक विस्तृ त पुस्त कक रचनाक रकथि तकर प्रतिमान उपलब्धा होइछ सांस्कृ तिक समिति, मधेपुर, मधुबनी द्वारा प्रकाशित स्मृतति नामक स्माारिकामे तथा मैथिली प्रकाश मे प्रकाशति बाटे-घाटे (1183) एवं अनजान क्षितिज (1183) मेा बाटे-घाटे पहिने प्रकाशित भेल स्मृमति मे जे पश्चा(त् जाक’ मैथिली प्रकाशमे पुन: प्रकाशित भेल1 एहि भेल। एहि दुनू आलेखसँ विषय स्प(ष्ट होइछ। वस्तुीत: ओ आत्मरकथा लिखलनि वा नहि से अनुसन्धेुय थिक। मणिपद्यकेँ भाषा पर जबरदस्तृ अधिकार छलनि। हुनक भाषाक चमक कहियो फिक्काि नहि पड़लनि। अपन विलक्षण भाषाक कारणेँ ओ मैथिलीमे अनुपम उदाहरण रहथि। मैथिलीमे ओ अपन भाषा आ वर्णन-कौशलक कारणेँ प्रख्या त रहथि। चाहे प्रकृतिक दृश्यि हो वा महानगरक कोलाहल पूर्ण वातावरण हो ओकर अत्येन्त मनोहारी वर्णन अपन भाषाक बल पर कयलनि। हुनक डायरी, हुनका सँ भेल भेल छल, ओहिठाम गेल छल हुँ एवं आत्मककथा सभक भाषा-शैली अलंकृत अछि जाहिमे कतहु अस्वाहभाविकताक आभास नहि भेटैछ। विम्ब-धार्मिता हुनक भाषाक सर्वाधिक वैशिष्ट्य् थिक1 एहन भाषामे संगीतात्म।कताक लय आ धाराक प्रवाह अछि। भाषाक धनी मणिपद्य अपन विचार-वल्लअरीक प्रत्या ख्यािनमे शब्द क एहन अनुपम विन्या स कयलनि जे हिनक गद्यमे सेहो पद्यक सौष्ठव परिलक्षित होइत अछि। हुनक भाषामे रूप, छन्दि आ सुस्वावदुता अछि जे पाठकक संग हुनक व्य्वहार, सौजन्य , आसक्ति आ हास्यआ-व्यंिग्युक बोध होइछ आ जगक संग ओकर व्युवहार मे राग ओ दूरदर्शी काल्पयनिकताक पुट भेटैछ। ओ तथ्युपूर्ण भाषाक प्रयोग कयलनि। प्रस्तुओत संकलनक भाषा काव्यामयी अछि जे स्थ ल-स्थहल पर ओ अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेभक्षा आ रूपक का झड़ी लगा देलनि जे हिनक एहि साहित्यथक अनुपम उपलब्धि थिक। हिनक भाषा मिथिलांचलक लोकक माटिक भाषा थिक। हिनक भाषा पर हिनक व्यकक्तित्व क एतेक गम्भी र छाप छलयनि जे ओ सुगमतापूर्वक चिन्ह ल जा सकैछ। हिनक भाषा मे एहन अद् भुत शक्ति आ वैभव पूर्ण अछि कारणेँ हिनक रचना सभकेँ बारम्बाेर पढ़बाक उत्सुअकता पाठकक मोनमे सतत जागृत होइत रहैछ चाहे ओ उपन्याबस हो, कथा हो, नाटक हो, एकांकी, कविता हो वा संस्मेरण हो। एहि मे ओ साधुभाषाक संगहि संग घरौआ ठेंठ चलन्त भाषाक स्त्रोातस्विनी प्रवाहित कयलनि। लोक शब्दारवलीकेँ मने मन स्वी कारक’ लेने रहथि जकर यथार्थ प्रतिरूप हुनक साहित्या न्तोर्गत प्रतिध्ववनित होइत अछि। शास्त्री य भाषाक संगहि ओ आंचलिक भाषाक अनुच्छिष्टू उपमानक प्रयोग प्रचुर परिमाणमे कयलनि। जनिका मिथिलांचलक ग्राम्यष-शब्दाकवलीक उपमानक रसास्वारदन करबाक होइन ओ मणिद्य-साहित्यलक अवगाहन करथु हुनका एहन-एहन शब्दा वलीक संग साक्षात्का र होयत-नि तकर यथार्थ अर्थ-बोधमे अवश्ये- कठिता होयतनि। अन्यािय भारतीय भाषामे हिनक रचनादिक अनुवाद करबामे कतिपय समस्यान उत्पवन्नय होइछ जे ओकर समानर्थी शब्दच सुगमता पूर्वक नहि उपलब्धस होइ जाहि सन्दवर्भमे ओ प्रयोग कयलनि। विषयगत विविधताक अनुरूप हिनक भाषा-शैली सेहो विविध रूपा थिक। संस्कृ्त गर्भिता मिश्रित भाषा, काव्याषत्मैक आ भाव बहुत भाषा, सामान्य लोकक भाषाक संगहि संग ओ आलंकारिक भाषाक प्रयोग सेहो कयलनि। प्रस्तुैत रचना समूहमे मिथिलांचक माटि-पानिक अपूर्व सौष्ठयव अछि1 ई अत्यतन्तह छोट-छोट सरल वाक्यतक प्रयोग कयलनि जाहिसँ भाषामे चमत्कासर आबि गेल अछि। एहि रचना समूहमे ओ संलाप शैलीक प्रयोग कयलनि। काव्याक समानहि हिनक गद्य-भाषा सेहो अत्यैन्तग सरल, प्रवाह पूण्र आ माधुर्य युक्त अछि। भाव, भाषा आ संगीतक त्रिवेणीक संगम बनाक’ ओ गद्यक निर्माण कयलनि1 हिनक शब्द।-चयन अत्य न्तर शिष्टा, भावानुकूल तथा सरल वाक्यप-विन्यारस अत्य,न्ती सुदृढ़ अछि। हिनक गद्य-भाषामे सर्वत्र कविताक सरलता, तल्लीननता, तन्महयता आ तीव्रता अछि। फलत: पाठक कखनो कोनो पर अरूचिक अनुभव नहि करैछ; प्रत्यु त कलाकारक भावक संग बहैत चल जाइत अछि। ओ भाव-प्रवण रचनाकार। रहथि। अतएव जाहि स्थकल पर मार्मिक अनुभूति आ सुन्द्नर काल्पथनिकताक समन्वयय अछि ओतय भाषाक सौन्दसर्य प्रेक्षणीय अछि। अपन भावक अभिव्याक्तिमे ओ अत्यनन्तव आलंकारिक एवं व्य्ञ्जना पूर्ण शैलीक प्रयोग कयलनि। हुनक शैलीमे कल्पकना, भावुता, सजीवता आ भाषाक चमत्कायर दर्शनीय अछि। हुनक भाषा-शैलीमे स्पेन्द,न अछि, हृदयकेँ मथबाक शक्ति अछि, सुकुमारता आ तरलता अछि जे मैथिली मे अन्य त्र दुर्लभ अछि। मणिपद्यक गद्यक उदात्त रूप उपलब्धछ होइछ हुनक डायरी, हुनका सँ भँट भेल छल, ओहिठाम गेल छलहुँ आ आत्मद-कथा मे। ओ गद्य रचना कयलनि कविक समान, हिनक गद्यक गुण कविताक गुण थिक। प्रस्तुउत संग्रहक गद्यक तकर प्रतिमान प्रस्तुनत करैछ जे ओहिमे शब्दावलंकारक संगहि अर्थालंकारक अपूर्व चमत्कापर भेटैछ। हुनक गद्य-साहित्यए हो वा पद्य-साहित्यक हुनक व्यतक्तित्वचक अखण्डभता केँ प्रमाणित करैछ। जहिना स्मितफान मलार्भेक पालेरिक गद्यक समानहि सांकेतिक होइत छलनि मणिपद्यक गद्य-साहित्यह विषयोविशुद्वा आ आर रहित अछि। ओ अपन डायरी संस्मनरण, यात्रा वृतान्तँ आ आत्मोकथामे एकरे आधार बनौलनि आ अपन भावनाक, अपन कल्पयनाक, अपन बोध आ मत पक्षक विस्ताार कयलनि। प्रतिपाद्य संकलनक गद्य रचना एक रम्य् रचनाक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। 1 preeti said... premshankar singh jik aalek bad nik Reply05/05/2009 at 02:05 PM 2 Anand Priyadarshi said... Premshankar Jik Manipadmak pothi par aalekh bad nik, pandityapoorna. Reply05/05/2009 at 11:54 AM विधिक विधान- लिली रे लिली रे 1933- जन्म:२६ जनवरी, १९३३,पिता:भीमनाथ मिश्र,पति:डॉ. एच.एन्.रे, दुर्गागंज, मैथिलीक विशिष्ट कथाकार एवं उपन्यासकार । मरीचिका उपन्यासपर साहित्य अकादेमीक १९८२ ई. मे पुरस्कार । मैथिलीमे लगभग दू सय कथा आ पाँच टा उपन्यास प्रकाशित । विपुल बाल साहित्यक सृजन। अनेक भारतीय भाषामे कथाक अनुवाद-प्रकाशित। पहिल प्रबोधसम्मान 2004 सँ सम्मानित। विधिक विधान-कथा- लिली रे पानमती खटनारि माउगि छल। सब ठाम ओकर माँग छलै। चाहे कतबो राति कऽ सुतए, पाँच बजे भोरे ओकर नीन टूटि जाइ। छ’ बजे ओ काज पर बहरा जाए। तीन घरमे बासन मँजैत छल, घर बहाड़ैत-पोछैत छल,कपड़ा धोइत छल। साढ़े एगारह बजे अपन झुग्गीमे घुरैत छल। झुग्गीमे सबसँ पहिने चटनी पीसैत छल। तकरा बाद स्टोव पर गेंट क गेंट रोटी पकबैत छल। ओकर बेटी तकरा बिल्डिंग साइट पर बेचैत छल। कुली-मजदूर टटका रोटी कीनए। चटनी मुफ्त भेटइ। हिसाब-किताब पूनम राखए। ओ पाँच क्लास तक पढ़लि छल। स्कूलमे पाँचहि क्लास तक छलै। से भऽ गेलइ त’ पानमती पूनमकेँ काज लगा देलकै। बासन माँजब घर पोछब नइं। पूनम करैत छल कपड़ामे‘इस्त्राी’। फाटल कपड़ाक सिलाइ, बटन टाँकब। इसकूलिया बच्चाक माइ लोकनि पूनमकेँ मासिक दरमाहा पर रखने छलीह। सस्त पड़नि। चोरी, मुँहजोरी, दुश्चरित्राता-तीनूमे कोनो दोष पानमतीमे नइं छलै। झुग्गी कालोनीक लोककेँ ओकरासँ ईष्र्या होइ। नियोजक लोकनि लग पानमती सम्मानक पात्रा छल। पूनम आठ वर्षक छल जखन पानमती ओहि इलाकामे आएल। पचास टाका मास पर झुग्गी किराया पर नेने छल। आब ओकरा चारि टा अपन झुग्गी छलै। एकमे रहै छल। तीनटा किराया लगौने छल। सौ रुपैया मास प्रति झुग्गी। आब इच्छा छलै एकटा सब्जीक दोकान करबाक। दखली-बेदखलीवला नइं, रजिस्ट्रीवला दोकान। जकरा केओ उपटा नइं सकए। दुनू माइ-बेटी रुपैया जमा कऽ रहल छल। बेटी समर्थ भऽ गेल रहै। तकर बियाह करब’ चाहैत छल। नीक घर-वर। विश्वासपात्रा। पूनम पानि भरबा लेल लाइनमे ठाढ़ि छल। बुझि पड़लै जेना केओ ओकरा दिस ताकि रहल होइ। मुँह चीन्हार बुझि पड़लै। अधवयसू व्यक्ति। उज्जर-कारी केश। थाकल बगए। ताबत लाइन आगू घसकि गेलइ। पूनम सेहो बढ़ि गेल। आगू पाछू लोकक बीच अ’ढ़ कऽ लेलक। ओ लोक सेहो दोसर दिस मूड़ी घुरा लेलक। पूनम सेहो तीन घरमे काज करैत छल। मुदा ओकरा देरीसँ जाइए पड़ै। तहिना देरीसँ अबैत छल। तीनू ठाम चाह-जलखइ भेटै। माइ-बेटी तीन ठाम नइं खा सकए। एक ठाम खाए, बाकी ठाम चाह पीबए। जलखइ’क पन्नी घर आनए। बेरहट रातिमे चलि जाइ। कहियो काल भानस करए। पूनम जलखइ ल’ कऽ बहराए त’ माइ ठाढ़ि भेटइ। पूनमसँ दुनू पन्नी ल’माइ घर घूरि जाइ। माइ जाबत अदृश्य नइं भऽ जाइ, पूनम देखैत रहए। तखन पुनः काज पर जाए। फेर ओएह व्यक्ति सुझलइ। ओ पूनमकेँ नइं, पानमतीकेँ अँखियासि कऽ देखि रहल छल। दूरहि दूरसँ। पानमती निर्विकार भावसँ जा रहल छल। तकरा बाद ओ व्यक्ति नइं सुझलइ। पूनम सेहो बिसरि गेल। पानमती स्टोव पर रोटी पकबैत छल। गरमीमे पसीनासँ सराबोर भऽ जाइत छल। काज परसँ घूरए त’ सबसँ पहिने अपन झुग्गीक पाछू पाॅलिथिनक पर्दा टाँगए। पानिक कनस्तर आ मग राखए। तकरा बाद माइ’क बनाओल रोटी-चटनीक चंगेरी उठा साइट पर बेच’ जाए। पानमती स्टोव मिझा,स्थान पर राखि, नहाइ लेल जाए। ओहि दिन रोटी कीननिहारक जमातमे ओहो व्यक्ति छल। सभक पछाति आएल। रोटी कीनबाक सती अपन गामक भाषामे बाजल-माइ कि एखनहुँ सुकरिया कहइ छउ? पूनम अकचकाइत पुछलकइ-अहाँ के छी? -तोंही कह जे हम के छियौ तोहर?-फेर ओएह भाषा। -बा... बू... !-पूनम कान’ लागल। -विधिक विधान! जहिया तकैत रहियौ, नइं भेटलें। आशा छुटि गेल त’ भेट गेलें। अकस्मातहि। -तों चुपहि किऐ पड़ा गेलह? हमरा लोकनिकेँ कतेक तरद्दुत उठाब’पड़ल-पूनम कनैत बाजल। -विधिक विधान। हमर दुर्भाग्य। भेल जे आब एहि ठाम किछु हुअ’ वाला नइं। आन ठाम अजमाबी। गम्हड़ियावाली काज करैत छल। तइं भेल जे तोरा लोकनि भूखल नइं रहबें। कहि कऽ जएबाक साहस नइं भेल। घूरि कऽ अएलहुँ त’ ने ओ नगरी, ने ओ ठाम। गउआँ सभक ओतए खोज लेब’गेलहुँ त’ सुनलहुँ जे ओ बाट बहकि गेल। गाम नइं जा मजूरक संग चल गेल। कोनो पता नइं छलइक ओकरा सबकेँ। धत्! हमर माइ ओहेन नइं अछि।-पूनमकेँ हँसी लागि गेलइ। छलछल आँखिसँ हँसैत बाजल, गामक लोक कंठ ठेका देने रहइ गाम घूरि जाइ लेल। जबर्दस्ती ल’ जाइत। तइं माइ नुका कऽ मंजूर मामाक मोहल्लामे आबि गेल। -मंजूर कत’ अछि? -पता नइं। मामा बड़ जोर दुखित पड़ि गेलै। दवाइ दारूमे सब पाइ खर्च भऽ गेलै। रिकशा सेहो बेच’ पड़लै। पाछू नोएडामे ओकरे गामक कोनो साहेब रहथिन। सएह क्वार्टर देलखिन। रिकशा कीनै लेल पैंच देलखिन। शर्त रहनि जे मेमसाहेबकेँ स्कूल पहुँचाएब, आ घर आनब। तकर बीचमे अपना लेल चलाएब। मेमसाहेब डी. पी. एस.मे टीचर छली। पहिने भेंट कर’ अबैत रहै। एक दूू बेर मामी, बच्चा सबकेँ सेहो अनने छल। आब त’ कत्ता वर्ष भऽ गेलइ। कोनो पता नइं। मंजूर मामाक झुग्गी हमरा लोकनि कीनि लेलहुँ। -वाह। -तीन टा झुग्गी आर अछि। किराया पर लगौने छी। सबटा माइक बुद्धिसँ। तों की सब कएलह? -से सब सुनाबी त’ महाभारत छोट भऽ जेतइ। हम अभागल, दुर्बल लोक। -चल’ घर चल’। माइ बाट तकैत होएत। पानमती नहा कऽ भीतर आबि चुकल छल, जखन पूनम आएल। -माइ, देख त’ हम ककरा अनलिऔ? चीन्हइ छही? पानमती चीन्हि गेलै। मुदा किछु बाजल नइं। -कोना छें?-ओ पुछलकइ। -एतेक दिनसँ जासूसी चलैत रहइ, बूझल नइं भेलइ जे कोना छी।-पानमती अपन पैरक औंठा दिस तकैत नहुँ-नहुँ बाजल। -तकर माने जे तोंहू चीन्हि गेलें।-ओ हँसबाक प्रयास कएलक। पानमती किछु उत्तर नइं देलकै। ओहिना अपन पैरक औंठा दिस तकैत रहल। पूनमक ध्यान ओहि दिस नइं गेलै। ओ अपनहि झोंकमे छल-आब लोकक सोझामे माइ पूनम कहैत अछि। मुदा जखन दुःखित पड़ैत छी त’ कह’ लगैत अछि-हमर सुकरिया, नीके भऽ जो।-माथो दुखाइत त’ एकर हाथ पैर हेरा जाइत छै। कौखन नीको रहै छी त’दुलार कर’ लगैत अछि। मारि मलार-हमर अप्पन सुकरिया। सुकरी! की-कहाँ नाम दैत अछि। पूनम नाम त’ तोरे राखल थिक ने? स्कूलमे। नइं? के रखलक हमर नाम सुकरिया? -गाममे। तोहर जन्म शुक्र कऽ भेलौ, तें सब सुकरिया कह’ लगलौ। हमरा केहेन दन लागए। मुदा ओतेक लोकसँ के रार करए। एत’ अएलहुँ त’ नाम बदलि देलियौ। तोहर नाम पूनम। तोहर माइक नाम पानमती। आ अपन नाम जागेश्वर मंडल।-पूनम ठठा कऽ हँस’ लागल। जागेश्वरकेँ सेहो हँसी लागि गेलै। पूनम बाजल-कतेक सुखी रही हमरा लोकनि तहिया। जागेश्वर लए सबसँ सुखक समय रहै ओ। मालिक सीमेण्ट, ईटाक खुचरा व्यापारी छल। अपन साइकिल ठेला छलै, जाहि पर समान एक ठामसँ दोसर ठाम पठबै। कइएक ठाम छोट छोट कच्चा गोदाम बनौने छल। तहीमे एक गोदाम लग एकटा झुग्गी जागेश्वर लेल सेहो बना देलकै। जागेश्वर अपन परिवार ल’ अनलक। सामनेक कोठीमे पानमतीकेँ बासन मँजबाक काज भेटि गेलै। म्यूनिसिपल स्कूलमे पूनम पढ़’ लागल। मालिक रहै छल दक्षिण दिल्लीमे। अपन कोठी छलनि। तहीमे एक राति हुनकर परिवार सहित हत्या भऽ गेलनि। पुलिस आ वारिस लोकनिक गहमागहमी हुअ’ लागल। गोदामक जमीन मालिक केर नइं छलनि। जागेश्वरकेँ झुग्गी छोड़’ पड़लै। जाहि घरमे पानमती काज करैत छल,तत’ जगह खाली नइं छलै। दोसर एक कोठीमे टाट घेरि, टिनक छत द’, जगह देबा लेल राजी छलै, यदि पानमती ओहि कोठीक काज करब गछए। पानमती दुनू कोठीमे काज कर’ लागल। जागेश्वरकेँ काज नइं भेटि रहल छलै। नब मालिक पुलिसक झमेला समाप्त होएबा तक प्रतीक्षा कर’ कहलखिन। झमेला अनन्त भऽ गेल छल। ओ मंजूरकेँ पकड़लक। मंजूर बाजल, हमर इलाकामे मजूरी बड़ कम छै। ओहि ठाम अधिकांश लोक नोकरिया। स्त्राीगण सब सेहो आॅफिस जाइत छथि। तैं ओहि ठाम घरक काज कएनिहारक मांग छै। पाइयो तहिना भेटै छै ओहि सब घरमे। छह बजे भोर जाउ, नौ बजेसँ पहिने काज खतम करू। घरवाली अपस्याँत भऽ जाइत अछि जाड़मे। नागा भेल, त’ पाइ कटि गेल। हमरा पोसाइत त’ किऐ अबितहुँ एतेक दूर काज ताकऽ? मंजूर प्रीतमपुरामे रहै छल। भिनसर बससँ उत्तर दिल्ली अबैत छल। जगदीशक संग मालिक केर साइकिल ठेला पर माल उघैत छल। साँझ कऽ फेर बससँ घर घुरैत छल। ओहि ठाम मालिककेँ कोनो गोदाम नइं छलनि। मंजूर तीस टका मास किरायाक झुग्गीमे रहै छल। ओकर योजना छलै एकटा अपन रिक्शा किनबाक। तकर बाद अपन स्त्राीक काज छोड़ा देबाक। मंजूरक योजना सुनि जागेश्वर सेहो योजना बनबैत छल। पानमती सेहो। जागेश्वरकेँ झुग्गीक किराया नइं लगैत छलै। तैं ओ अपनाकेँ मंजूरसँ अधिक भाग्यवान बुझैत छल। बुद्विमान सेहो। भविष्यमे ओ झुग्गी बनएबाक सोचैत छल। -पहिने जगह सुतारब। ठाम ठाम झुग्गी बना किराया पर लगा देबै। तखन तोरा काज कर’ नइं पड़तौ। -नइं, हम काज नइं छोड़ब। झुग्गी किरायासँ साइकिल ठेला कीनब। एकटा नइं कइएक टा। माल उघै लेल किराया पर देबै। -मालिककेँ?-जागेश्वर कौतुकसँ पूछै। पानमतीकेँ हँसी लागि जाइ। पूनम सेहो हँस’ लागए। किछु नइं भेलै। फरीदाबाद तक बउआएल। ढंगगर काज नइं भेटलै। शुभचिन्तक सब दिल्लीसँ बाहर भाग्य अजमएबाक सलाह देलकै। अपनहुँ सएह ठीक बुझि पड़लै। पानमती कन्नारोहट करत, ताहि डरसँ चुप्पहि चल गेल। पूनम नेना छल। तैयो ओ दिन मोन पड़ि गेलै। स्कूलसँ बहराएल त’ बाप फाटक लग ठाढ़ भेटलै। -नोकरी भेटलह?-पूनम पुछलकै। -भेटि जायत। -कत’? -बड़ी दूर। तों नीक जकाँ रहिहें। माइक सब बात मानिहें। जाइ छी। -कत? -काज ताकऽ-जागेश्वरक आँखि छलछला गेलै। -नइं जाह। -फेर आबि जएबौ। जागेश्वर चल गेल। तीन मास जखन कोनो खबरि नइं भेटलै, त’पानमती पूनमक संग रघुनाथ रिक्शवाला लग गेल। ओकरहि गामक रहै। रघुनाथ बाकी गौंआं सबकेँ खबरि देलकै। सब पहुँचलै। घर घुरि जएबाक सलाह देलकै। पानमतीकेँ नइं रुचलै। सब जोर देब’ लगलै। पानमतीकेँ मान’ पड़लै। तय भेल जे अगिला मासक आठ तारीख कऽ जे जमात गाम जाएत, ताहि संग पानमती आ पूनम सेहो रहत। सात तारीख कऽ लोक आबि कऽ ल’ जेतै अड्डा पर। ताबत पानमती दुनू घरसँ अपन दरमाहा उठा लिअय। दुनू मलिकाइन दिल्ली छोड़बाक सलाह नइं देलखिन। कहलखिन, काज ताकए गेल छौ, घुरि अएतौ। चाहत त’ आब एत्तहु काज भेटि जेतै। हमरा लोकनि देखबै। -अपन लोकवेदक से विचार नइं छै। ओ आबि जाए त’ कहबै जे हमरा जल्दी गामसँ ल’ आबए।-पानमती बाजल। मंजूर भेंट करए अएलैक। पानमती ओकर पैर पकड़ि लेलकै। कान’लागल। बाजल-हमरा अपन इलाकामे ल’ चलू। ओहि ठाम काजक लोकक माँग छै। माइकेँ कनैत देखि, पूनम सेहो माइक बगलमे लोटि गेल। माइ बात दोहराब’ लागल। मंजूर अकचका गेल। बाजल-ओहि ठाम रहब कत’? -झुग्गीक किराया द’ कऽ। जेना अहाँ रहै छी। -झुग्गीक किराया आब बढ़ि गेलै अछि। पचास टाका मास। आ पचास टाका सलामी भिन्न। -देबै। जे नुआ फट्टा अछि, बेचि कऽ द’ देबै। मंजूरक बहु किछु दिनसँ काज पर जाइ काल नाकर नुकर कऽ रहल छलै। हाथ-पैर झुनझुनाइत रहै। बदलामे पानमती सम्हारि देतै त’ दरमाहा नइं कटतै। सएह सोचि कऽ मंजूर राजी भऽ गेल। पानमती तखनहि बिदा हेबा लेल वस्तु जात बान्ह’ लागल। रघुनाथकेँ खबरि दइ लए पूनमकेँ दौड़ा देलकै। -रघुनाथ काका! हमरा लोकनि गाम नइं जाएब। -किऐ? -मंजूर मामा लग रहब। रघुनाथकेँ तखन सवारी रहै। ओ अधिक खोध वेध नइं केलकै। जागेश्वर प्रीतमपुरामे कत्ता बेर छानि मारलक। ने मंजूर भेटलै, ने पानमती, ने पूनम। अपने लोकबेद जएबासँ रोकै। बेर बेर बुझबै-केओ ककरो संग भागत, त’ पुरान डीह पर थोड़े बसत। ओ त’ तेहेन ठाम जाएत, जत’ओकरा केओ नइं चीन्हइ। केहेन मूर्ख छें तों। -महामूर्ख छी हम-जागेश्वर घाड़ नेरबैत बाजल। पूनम सेहो घाड़ नेरबैत बाजल-नइं। तों कदापि मूर्ख नइं छह। झुग्गी बना कऽ किराया लगएबाक विचार तोंही कएने छलह। हमरा लोकनि जे ठेला किनलहुँ, से जकरा चलब’ देलिऐ, सएह ल’ कऽ भागि गेल। माइ त’ निश्चय कऽ लेलक अछि,बिना रजिस्ट्रीक सब्जी दोकान नइं करत। आब तों आबि गेलह। तोंही दोकान चलएब’। आदना लोककेँ नइं देबै। पूनम अपन माइ दिस तकलक। माइ अपन पैरक औंठा दिस दृष्टि गड़ौने ओहिना ठाढ़ि रहए। पूनमकेँ आश्चर्य भेलै। पूछलकै-माइ! तों किछु बजै नइं छें? एक क्षण आर चुप रहि, पानमती बाजल-सब्जी दोकानमे देरी छै। रुपैया जमा हैत, जगह भेटत, रजिस्ट्री हैत-एखन त’ नाम पर लगैत बट्टा बचएबाक अछि। -बट्टा? -नौ वर्षसँ एहि इलाकामे छी। सब जनैत अछि जे हमरा एक बेटी छोड़ि, आगू पाछू केओ नइं अछि। तखन एकटा पुरुष क्यो। -केओ एकटा पुरुष नइं। तोहर वर, आ हमर बाप थिक। -केओ नइं मानत। सब आंगुर उठाओत। -के आंगुर उठाओत? प्रति तेसर लोक जोड़ी बदलैत रहै अछि एतए। -तइं त’ ककरो विश्वास नइं हेतै सत्य पर!-पानमती अइ बेर जागेश्वर दिस ताकि बाजल, बेटी लेल नीक घर वर चाहैत छी। एहने समयमे... -माइ! एहेन कठोर जुनि बन। बाबू हारल थाकल अछि। कहियो त’ भरि गामक लोकसँ लड़ाइ कऽ कऽ हमरा लोकनिकेँ एत’ अनलक। बेटी-पुतोहुकेँ बाहर पठएबा ले ने तोहर लोकवेद राजी रहौ, ने बाबूके। बाबू नइं अनैत त’ गाममे गोबर गोइठा करैत सड़ैत रहितहुँ आइ। -तोरा जनैत नीक दशा बनबै वाला तोहर बाप छौ। माइ जहन्नुममे देलकौ! -नइं माइ, नइं। हमर तात्पर्य से नइं छल। हमरा सन माइ ककरो नइं छै। -गामसँ अनलक ठीके। बैसा कऽ नइं खुऔलक। तहू दिनमे बासन मँजैत रही। आइयो सएह करैत छी। तहिया दू घर काज करैत रही, आइ तीन घर करैत छी। पूनमकेँ उत्तर नइं फुरलै। ओ दहो-बहो कान’ लागल। पानमती फेर अपन पैरक औंठा दिस ताकऽ लागल। जागेश्वर नइं सहि सकल। हाथसँ बेटीक मुँह पोछैत बाजल-चुप भऽ जो। माइसँ बढ़ि कऽ तोहर हित-चिन्तक आन नइं हेतौ। ओकर बातसँ बाहर नइं होइ। ओकरा खूब मानी। चलै छियौ। -नइं।-पूनम केर कोंढ़ फाट’ लगलै। जागेश्वर बिदा भऽ गेल। पानमती ठाढ़िए रहल। पूनम अपन माइकेँ बड्ड मानैत छल। कहियो कोनो विरोध नइं कएने छल। दरमाहा बख्शीस जे किछु भेटै, माइक हाथ पर राखि देअए। माइ प्रति बेर ओहिसँ किछु पूनमकेँ दैत कहै-ले अपन सौख-मनोरथ लेल राख। पूनम एकटा बटुआमे सौख मनोरथक रुपैया रखैत छल। पूनम फुर्तीसँ ओ बटुआ आ जलखैक एकटा पन्नी उठा बाहर दौड़ल। जागेश्वर मंथर गतिसँ जा रहल छल। पूनम हाक देलकै-बाबू... कनेक बिलमि जा।-जागेश्वर थमि गेल। पूनम बटुआ ओकर हाथमे दैत कहलकै-ई एकदम हमर अपन पाइ थिक। तोरा लेल। जतबा दिन चल’, भूखल नइं रहिह’। -नइं, नइं। ई राख तों, हमरा काज भेटल अछि। -तैयो राखि लैह। तोहर बेटीकेँ संतोष हेतह। आ इहो लैह। जे घड़ी ने कऽलमे पानि अएलहि अछि। हाथ मुँह धो कऽ पेटमे ध’ लैह। -एतेक मानै छें हमरा?-जागेश्वर आर्द्र कंठसँ बाजल। -तों कोनो कम मानै छ’, हमरा राति कऽ खिस्सा कहैत रह’। गीत सुनबैत रह’। कतेक दुलार-मलार करैत रह’। कहियो नइं बिसरल। ने कहियो बिसरत।-पूनम फेर कान’ लागल। जागेश्वर हाथसँ नोर पोछि देलकै। बाजल किछु नइं। पूनम अवरुद्ध कंठसँ कहलकै, दू सौ सत्तासी नम्बर वैशाली नगरमे हम काज करैत छी। फाटक पर घरवैयाक नाम पता लिखल छै। ओहि ठाम चिट्ठी दिह’। नीक आ अधलाह सब हाल लिखिह’। आर एकटा बात... -की? -माइकेँ माफ कऽ दिहक। कठोर मेहनति करैत-करैत ओकर मोन कठोर भऽ गेलै अछि। मुदा हमरा विश्वास अछि जे एक दिन ओ पिघलत। आहमरा लोकनि पहिने जकाँ संग रह’ लागब, प्रेमसँ। 1 Jyoti Vats said... Lili Ray ker katha Vidhik Vidhan Bar nik lagal. Reply05/05/2009 at 11:55 AM ३. पद्य ३.१. अन्हारक विरुद्ध- भ्रमर ३.२. कामिनी कामायनी: लिखत के प्रेम गीत ३.३. विवेकानंद झा-कविता आ की सुजाता/ चान आ चान्नी ३.४. सतीश चन्द्र झा- मध्य वर्गक सपना ३.५ मनक तरंग- सुबोध ठाकुर ३.६. ज्योति-महावतक हाथी रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ अन्हारक विरुद्ध
उपर अन्हार निचां अन्हार वाम अन्हार दहिन अन्हार विगत अन्हार आगत अन्हार चारुभर अन्हार अन्हारे–अन्हारक विचमे बन्न भेल जकां कोनो कृष्णक प्रतिक्षामे संक्रमणक नामपर एहि आन्हर वर्तमानकें सहि रहलहुं अछि ! ई सहब हमर नामर्दी किन्नहु नहि अछि, एहि अन्हारक विरुद्ध विगतक कएकटा आन्दोलन हमर पुरुषार्थकें दुनियांक आगां स्थापित क’ चुकल अछि । हम अपन ताही पुरुषार्थकें रक्षार्थ एहि अन्हारक संतापकें सहेजबाक उपक्रम क’ रहल छी, संक्रमण वितबाक प्रतिक्षा क’ रहल छी, रैतीसं शासक बनबाक सुखद अनुभूति किछु कालक हेतु चकबन्न कोनो कोठरीमे पडबासं वेजाय नहि हयत, तएं गणतन्त्र आ नयां नेपाल नयां गणतन्त्र आ नयां नेपाल नयां सम्विधान आ जनताक सत्ता चकबन्न कोठरीक कोनो खिडकीक दोग द’ इजोत बनि अवस्से आओत– नहि हएतै विफल संघर्षक प्रतिफल एहि कारी गुजगुज कोठरीमे हाथपैर मारि–मारि क’ तेहने नव इजोतक हेतु हमरा सभक ई संघर्ष कहियो उफांटि नहि हयत विराट कारी रातिकें चिरबा लेल दिऔरीक लुकझुक टेमीक प्रकाश हमर आदर्श रहल अछि, अन्हारक विरुद्ध हमर ई संघर्ष नव क्षितिजक अन्वेषण करत जत्त सरिपहुं इजोतक टा साम्राज्य हयतै !! 1 Manoj Sada said... bhramar ji sada anharak virudh rahait chhathi aa te manniya chhathi. Reply05/05/2009 at 11:58 AM कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि। लिखत के प्रेम गीत कदंबक गाछ तऽ कटि चुकल छऽल आब कृशकाय एकसरि ठाढ राधा हेरए छलीह एखनाे कृष्णक बाट सखी सब पहिने संग छाेङलन्हि आब मुरारी सेहाे लापता केहेन घाेर कलिकाल प्रेमक शाश्वत कलि काेना मुरझा गेलय नहिं बाॅचल हृदयक उद्वेग नहि रहल आब आे राग अनुराग पाेखरी क’ घाट ़़ ़ ़ गाछी ़ ़इर्नार सब जेना विरान भ’ गेलए चिङै चुनमुन चुप्प चारहु कात ़ ़जेना अन्हार घुप्प प्रेम कत्तय उङि गेल कपूर सन कत्त ताकू ़़ ़ काेन बाध़ ़ ़काेन बाेन साेचैत छथि राधा भरल आॅखि सॅ कि जखन प्रेमी नहि त लिखत के प्रेम गीत के लिखत जाैवन के मधुर मधुर प्रीत ताकै छथि व्याकुल भ’ धरती आकास के गाछ बिरीछ ़़ ़लता कुॅज ़ ़ ़़दूर आ’ पास के लिखत के प्रेम गीत लिखत के प्रेम गीत विद्यापति जबाब दाैथ ़ ़ ़ ़ ़ ़ ़ । कामिनी कामायनी 24।4।9 1 Jitendra Nagabansi said... कदंबक गाछ तऽ कटि चुकल छऽल आब बड्ड नीक कविता कामिनी कामायिनी जीक। Reply05/05/2009 at 11:59 AM विवेकानंद झा,वरिष्ठ उप-संपादक छथि नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेडमे। 1.कविता आ की सुजाता/ 2.चान आ चान्नी कविता आ की सुजाता बूझल नहि कखन कत्त आ कॊना हमरा आंखि मे बहऽ लागल कविता नदी बनि कऽ भऽ गेल ठाढ़ पहाड़ करेज मे जनक बनि कऽ देखलिए चिड़ै चुनमुन नहि डेराइत अछि आब खेलाइत अछि हमरा संग गाछीक बसात अल्हड़ अछि मज्जर विहीन भूखले पेट नचैत अछि झूमैत अछि कारी मेघ माथ पर अकस्मात कानि उठैछ सुजाता सुन्नरि नॊर संऽ चटचट गाल चान पर कारी जेना चान आ चान्नी अहां कें नहि लगैछ जे चान आ चानक शुभ्र धवल इजॊत आ ओहू सऽ नीक हेतै इ कहब जे चान आ ओकर चाननी आकी इजॊरिया दू टा नितांत भिन्न आ फराक चीज थिकै ईश्वर जखन बनौलकै चान तऽ सुरुज संऽ मंगलकै कनेक टा इजॊत आ ओहि इजॊत कें चान कॊनॊ जादूगर जेकां इजॊरिया बना देलकै जेना प्रेम जाधरि रहैत छै करेज में कॊनॊ जॊड़ा कें लैला मजनू बना दैत छै चंद्रमॊहन के चांद आ अनुराधा कें फिजां बना दैत छै आ फेर तऽ वएह अन्हरिया व्यापि जाइत छैक चहुंदिश मुदा हम तऽ कहैत रही जे जहिया सुरुज संऽ पैंच लेल इजॊत के चान कॊनॊ कविराज जेकां अपन सिलबट्टा पर खूब जतन संऽ पीस पीस कऽ चंदनक शीतल लेप सऽन इजॊरिया बना देलकै तहिया संऽ रखने छै अपना करेज मे साटि कऽ मुदा बेर बेखत बांटितॊ छै तें खतम हॊइत हॊइत एकदिन अमावश्याक नौबति सेहॊ आबिए जाइत छैक आ फेर सुरुज संऽ ओकरा मांगऽ पड़ैत छैक कॊनॊ स्वयंसेवी संगठन जेकां पैंचक इजॊत लॊक कें सीधे सरकार रायबहादुर सुरुज लग जयबाक सेहंता तऽ छै मुदा साहस कतऽ संऽ अनतै ओ एतेक अमला फैला छै सुरुजक चहुंदिश जे करेजा मुंह में अबैत छै हुनका लग कॊना जाऊ सर्व साधारण ओ तऽ धधकै छथिह्न आधिक्यक ताप संऽ खैर हम जहि चानक गप्प कऽ रहल छी ओकरा संऽ डाह करैत छै मेघ सदिखन संऽ ओ ईर्षाक आगि मे जरैत आयल अछि भगवान मङने रहथिह्न वृष्टि मेघ संऽ चान लेल मुदा ओ नहि देने छल एक्कहु बुन्न पानि झांपि देने छल चान कें हमरा बूझल अछि ओ बनऔने हॊयत धर्मनिरपेक्षता आ सांप्रदायिकताक बहाना लॊक हित में काज नहि अबैत ह्वैतेक ओकरा मुद्दा ओकर ह्वैतेक किछु आउर मुदा हऽम तऽ एम्हर मात्र एतबे कहऽ चाहैत रही जे हमरा केओ चान आ अहांके चान्नी जुनि कहय की जखन मेघ झांपैत छै चान कें तऽ पहिने मरैत छै इजॊत आ बाद में मरैत छै चान आ हम नहि चाहैत छी जे हमर इजॊत हमरा संऽ पहिने खतम हॊ हमरा संऽ पहिने मरय कखनहुं नहि किन्नहुं नहि सत्ते 1 মধূলিকা চৌধবী said... 1.कविता आ की सुजाता/ 2.चान आ चान्नी dunu kavita mon ke praphullit karae bala, ee kavi bes badhi dahar, bunni achhar dekhne chhathi, anubhavak prachurtak bina ehan uchcha kotik kavita likhab sambhav nahi Reply05/07/2009 at 02:09 PM 2 বশ্মি প্রিযা said... विचारक प्रस्फुटन अछि ई दुनू कविता, आ तेँ विशिष्ट बनबैत अछि एकरा। Reply05/07/2009 at 02:04 PM 3 कृष्ण यादव said... देखलिए चिड़ै चुनमुन नहि डेराइत अछि आब bad nik vivekanand ji Reply05/06/2009 at 11:30 PM 4 Keshab Mahto said... Vivekanand ji dhanyavad etek nik kavitak lel. Reply05/05/2009 at 12:02 PM 5 विद्यानन्द् झा said... विवेकानन्द जी नव कवि लोकनि मे विशिष्ट स्थान बनओताह से एहि दुनू कवितासँ पता चलि रहल अछि। शुभकामना। Reply05/05/2009 at 12:01 PM सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। मध्य वर्गक सपना भीजि क’ आयल छलहुँ हम आँखि मे किछु स्वप्न धेने। मोन के पौती मे भरि क’ स्नेह के संदेश रखने।
किछु कहब हम बात अप्पन किछु अहाँ सँ आइ पूछब। फेर हम निष्प्राण भ’ क’ बाँहि मे विश्राम खोजब।
पी लितहुँ हम नोर आँखिक ठोर पर उतरल अहाँ के। नेह सँ परितृप्त करितहुँ साटि छाती मे अहाँ के।
ल’ लितहुँ चुम्बन हृदय सँ गाढ़ रक्तिम ठोर पर हम। की करै छी ? लोक देखत, अहाँ कहितहुँ , हँसि दितहुँ हम।
भागि चलितहँु फेर सँ हम संग ल’ सुन्दर विगत मे। कल्पना के पाँखि ल’ क’ उड़ि जयतहुँ उन्मुक्त नभ मे।
होइत जौं ई सत्य सपना देवता के जल चढ़बितहुँ। हे प्रिये ! होइतै केहन जौं किछु समय के रोकि सकितहुँ।
भेंट होइते सभ बिसरलहुँ हम केना क’ बात मोनक। छै कहाँ रहि गेल वश मे स्वप्न देखब मध्यवर्गक।
अछि जतेक सामथ्र्य अप्पन क’ रहल छी कर्म सभटा। मोन मे अछि सोच कहुना किछु रहय बाँचल प्रतिष्ठा।
अर्थ दुर्लभ वस्तु जग केँ अछि एकर भरि मास खगता। खर्च बढ़िते जा रहल अछि बढ़ि रहल दानव बेगरता।
कात मे मुनियाँ कनै अछि किछु नया परिधान कीनत। नीक ब्राँडक जींस, जैकेट पुत्रा बड़का आइ आनत।
माँग छल पायल अहूँ के मोन मे अछि दू बरख सँ। नीक कुर्ता लेब हमहूँ जीब की हम आब सुख सँ।
साग - सब्जीक दाम पुछि क’ होइत अछि परिपूर्ण इच्छा। जा रहल छी पाँव पैदल, भाग्य अछि रेलक प्रतिक्षा।
देत के सहयोग अपनो क’ रहल अछि लोक शोषण। चीज शौखक अछि सेहन्ता क’ रहल छी मात्रा भोजन।
नाम सँ के आब चिन्हत अर्थ केँ सम्मान होइ छै। झूठ के सम्बन्ध सगरो के कतय किछु प्राण दै छै।
कामना भगवान सँ अछि जन्म दोसरो, संग भेटय। उच्च नहि त’ दीन .. निर्धन वंश कुल मे जन्म भेटय।
माँटि पर बैसल अहाँ संग खेल करितहुँ, स्नेह सदिखन। काल्हि के नहि आइ चिन्ता छुच्छ जीवन, तुष्ट जीवन। 1 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... सतीश जी । मध्य वर्गक सपनाकेँ नीक जेकाँ रेखांकित केलहुँ। Reply05/09/2009 at 10:28 AM 2 कृष्ण यादव said... खर्च बढ़िते जा रहल अछि बढ़ि रहल दानव बेगरता। satish ji bad nik santulit aa prerak, muda hilkor utha delahu Reply05/06/2009 at 11:32 PM 3 Arvinda kummar said... Manak ego nirakar bhawna ke pradarshit karai vala ati vilakshan Reply05/06/2009 at 05:35 PM 4 Subodh thakur said... Apnek rachna Madhyam vargak jingi k parkram kay rahal achi a sarpahaun madhyam varg apan pur jeevan sapna pura karaike lel ashavan rahait jingi kati lait chati Reply05/06/2009 at 05:13 PM 5 Anshumala Singh said... Satish Jik Kavita bad nik lagal, hridaysparshi. Reply05/05/2009 at 12:03 PM सुबोध ठाकुर, गाम-हैंठी बाली, जिला-मधुबनीक मूल निवासी छथि आ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट प्रैक्टिशनर छथि। मनक तरंग सनन-सनन सन बहए छल पवन शब्दक हिल्कोरक संग डोलि रहल छल मन सोचल किए नहि शब्दकेँ छन्दक रूप देल जाए, कविता एक अनमोल बनाओल जाए, लिखए बैसलहुँ हम तखन सनन-सनन सन बहए छल पवन विरहक वेदना मोनमे जतेक छल मानस-पटलपर तखने सभटा उभरल, शब्दक रूपी बूँद से बुझबए लेल अगन लिखए बैसलहुँ हम तखन सनन-सनन सन बहए छल पवन नहि हम अति विद्वान छी परञ्च लग-पास परिलक्षित दृश्यसँ अनजान छी, करए लगलहुँ सभकेँ बुझबए लेल तँए जतन, सनन-सनन सन बहए छल पवन हृदयक आह्लादसँ, विनती कएलहुँ सन्ध्या कालक प्रह्लादसँ जुनि बनाऊ आर ककरो परदेशी कठोर साजन सनन-सनन सन बहए छल पवन नहि जानि की हम लिखलहुँ लिखए काल हम किछु नहि बुझलहुँ जुनि बुझब एकरा झूठ वचन ई अछि शब्द रूपी मनक तरंग सनन-सनन सन... 1 Arvind said... Subodh ji ke kavita me manak ek nirakar bhawna achi Reply05/06/2009 at 05:37 PM 2 Kundan Jha said... flow chhal kavita me. Reply05/05/2009 at 12:04 PM ज्योति महावतक हाथी महावत आयल हाथी लऽ कऽ भीख माॅंगैत दलान पर ठाढ़ भऽ बच्चा सब मे मचल हलचल लऽग जायमे डेरायताे छल मुदा सबमे चाह छल सवारी के भीड़मे अपन र् अपन पारी के कियाे कानल जॅं जायमे भेल देरी कियाे कानऽ लागल चढ़ैत देरी अहि सबमे महावत सम्हारैत अपन हाथी के रहल पुचकारैत अतेक भयावह विशालकाय प््रााणी काेना अनुशासित छल की जानी जेना आे बुझैत रहै भाषा मनुषक वा भऽ गेल छल आेकरा हिस्सक अपन वास्तविक वातावरण स वंचित पराधीनता स नहिं हाेइत विचलित जीविका हेतु करैत कतेक प््रायत्न जानवराे भऽ पाैलक मनुषक जीवन मालिकक अत्याचार के पीबैत विष एक यात्रा पशुत्व सऽ मानवत्व दिस 1 Suresh Kumar Chaupal said... Mahavtak hathi padhi bachchak bad kichhu gap mon pari gel. Reply05/05/2009 at 12:07 PM ४. गद्य-पद्य भारती -सोंगर,मूल कोंकणी कथाः खपच्ची,लेखकः श्री. सेबी फर्नानडीस, हिन्दी अनुवादकः डॉ. चन्द्रलेखा डिसूजा,मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह सोंगर मूल कोंकणी कथाः खपच्ची लेखकः श्री. सेबी फर्नानडीस हिन्दी अनुवादकः डॉ. चन्द्रलेखा डिसूजा. मैथिली अनुवाद : डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। सोंगर 13 सितम्बर, दिन मंगल। भोरे-भोर मोबाइल खनकल। हमरा ओछाओनक लगहिमे मोबाइलक प्रकाश एना झिलमिलाइत छल जेना भिनसरे कोनो अस्पतालक‘वैन’ रोगी केँ ल’ क’ निकलल हो। हम अपन आँखि मलैत मोबाइल उठौलहुँ...देखलहुँ तँ नम्बर चिर-परिचित छल। शैली केर। शैली माने हमर मिता, जे हमरे ऑफिस मे काज करैत अछि। बहुत नीक आ जिम्मेवारीक पद पर ओकर नियुक्ति भेल छैक। ओना देखल जाय तँ अपन स्वभाव सँ ओ एकदम सरल आ अपन काजसँ मतलब राखय वाली। नरम-नरम घोंघा-सन। जँ क्यो किछु कहि देलक तँ चुपचाप सुनि लए वाली। साँच पुछू तँ ओ हमरो बड़ नीक लागैत अछि। हमरा बुझने सभ कन्याकेँ शैलीए-सन हेबाक चाही। हम अपन मोनक बात कैक बेर ओकरा बतएनहुँ छी मुदा ओ ओकरा अनसुना करि दैत अछि। हम सभ एक दोसराकेँ लगधक सात बरखसँ जानैत छी। हमरा सभक दोस्ती विश्वविद्यालयमे पढ़बाकाल भेल छल। शैलीक हँसबाक अंदाज आ ओकर सरल स्वाभाव दुनू हमरा अतीव पसिन्न अछि। संभवतः यैह कारण रहल हेतैक जे हम ओकरा दिस झुकल चलि गेलहुँ। आइ तँ जेना ओ हमर मिता नहि अपितु हमर छाँह हो तहिना बुझाइत अछि। आइ ओ हमरा लेल हमर सभसँ करीबी बनि गेल अछि। हेलो..... हम मोबाइल उठबैत कहलहुँ। “शागू हम शैली बाजि रहल छी.... हम एखनहि अहाँसँ भेंट कर’ चाहै छी।” शैलीक ई जबाब तँ जेना हमरा आँखिक निन्ने उड़ा देलक। “मुदा बाद की थिक? से तँ साफ-साफ बताउ.......” “बताएब, सभ किछु बताएब। मुदा अहाँ भेंट त’ दिअ।” ठीक छैक भेंट क’ रहल छी... ऑफिस मे... 9:30 बजे। “नहि, नहि एखनहि मिलबाक अछि।” शैली बाजलि। “मुदा एखन...” “नहि, नहि हम किछु नहि सुन’ चाहैत छी।” कहितहि ओकर बोली जेना काँप’लागलैक। “देखू शैली कानू नहि प्लीज.....” “हम की करी शागू! हमरा समझमे किछु नहि आबि रहल अछि।” ओ बाजलि। हमरा शैली पर दया आबि गेल। “ठीक छैक, हम एखनहि अहाँक ओतए आबि रहल छी। साढ़े आठ बजे धरि हम आबि जाएब, अहाँ घबराउ जुनि।” ओकर साहस बढ़बैत हम कहलिऐक। “ठीक छैक, हम अहाँक बाट देखि रहल छी।” कहैत शैली मोबाइल बन्न क’देलक। हे भगवान ! की भेल हेतैक ? ई सोचैत-सोचैत हम हाँइ-हाँइ केँ मुँह धोलहुँ, कल्हुके पहिरलाहा अंगा-पेंट पहिर निकलि गेलहुँ। घरसँ निकलतहि हमरा मोनमे कैक प्रकारक शंका-कुशंका केर चक्र चल’ लागल। आखिर की भेल हेतैक शैलीकेँ? की ओकर मोन खराब भ’ गेलैक? वा अचानक टकाक कोनो बेगरता पड़ि गेलैक? हम आर झटकि कए चल’ लागलहुँ। पौने आठहिं बजे हम शैलीक घर पहुँच गेलहुँ। पछिला बेर जे शैली अपन घर गेल छलीह तँ ओ “वाल” (एक प्रकारक तरकारी) क लत्ती आनने छलीह। आब ओ लत्ती नरम-मोलायम पातक संग सोंगरक सहारे उपर दिस बढ़ि रहल छल, संगहि ओ अपन जड़ि जमएबाक जतन क’ रहल छल। दरबज्जा खटखटएलासँ पूर्वहिं शैली दरबज्जा खोललक। ओ शायत हमर पयरक आहटि सुनि नेने छल। जहिना हम घरमे प्रवेश कएलहुँ, शैली दरबज्जा बन्न क’हमरासँ लिपटि गेल। शैलीक ई व्यवहार हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल। “शैलीक व्यवहार एहन किएक भ’ गेलैक?” हम मोने-मोन सोचलहुँ। जरूर किछु विशेष भेल छैक, तखनहि तँ ओ हमरा अपन हितचिंतक बुझि एना क’ रहल अछि? हम नहुँए-नहुँए ओकर पीठ सहलाबैत रहिलऐक। “की भेल शैली? ऐना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छी? किछु बाजबो तँ करू?” ओ शनैः-शनैः अपनाकेँ हमरासँ अलग कएलक आ हमरा मुँह दिस निहार’लागलीह। हमरा बुझा रहल छल जे जरूर शैलीक संगे किछु अनिष्ट भेल छैक? ओकरा आँखिसँ नोर तेना बहैत रहैक जेना भदवारिक इनारसँ पानि बहराबैत छैक। हमरा मोन पड़ल अपन गामक “सेजांव” उत्सव जाहिमे लोक इनारमे कूदि जाइत छैक आ छपाक होइतहि पानिक छींटा एमहर-ओमहर पसरि जाइत छैक। शैलीक आँखिक पानि फेर उफन’ लागलैक। ओ फेर हमरासँ लिपटि गेल। एहिबेर ततेक नोर बहलैक जे हमर अँगा भीज गेल। ओकर शीतलता मानू हमरा हृदयकेँ सेहो भीजा देलक। हमहूँ बरफ जकाँ पिघल’ लागलहुँ। हमरा जीवनमे सदैव एकटा दृढ़ गाछक सदृश ठाढ़ रहएवाली शैली आइ सिगरेटक पुत्ती जकाँ ढ़हि रहल छलीह। “शैली आखिर किछु बताउ त’! आब तँ हम अहाँक समक्ष छी।” ई सुनतहि शैली आर फफकि-फफकि कए कानए लागलीह। “देखू शैली, एना कानने कलपने सँ काज नहि चलत, जाधरि अहाँ किछु बताएब नहि हम कोना बुझू?” “हम लूटि गेलहुँ शागू.... हम तबाह भ’ गेलहुँ.....फँसि गेलहुँ....हमर इज्जति पानि भ’ गेल.... हमरा लूटि लेल गेल.....।” “अरे.....अरे.....शैली, ई अहाँ की बाजि रहल छी? बाज’ सँ पहिने अपन शब्दकेँ नापि-जोखि लेल करू।” हमरा लेल ओकर ई बात बहुत दुखदायी छल। आइ शैली एना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छलीह? एहिसँ पहिने तँ ओ हमरा संगे शब्दक एहन खेल नहि खेलने छलीह? “बाजू शैली, की भेल...” “हमर कपारे मे आगि लागि गेल अछि....। हमर महीनवारीक दिन बीत गेल अछि, आ....। काल्हि हम डॉक्टरसँ चेकअप करौलहुँ त’...।” ओ ई बात! तँ शैलीक परेशानीक ई कारण छैक। हम मोने-मोन सोचलहुँ। “पछिला महीनवारीक कोन तारीख छल? हम पुछलिऐक।” “दुइ अगस्त।” ओ बाजलि। हम मोनहि-मोन गिनती लगएलहुँ....कैक दिन निकलि चुकल छलैक। हमरा किछु बाज’ सँ पूर्वहि शैली बाजल—सात दिन धरि हम बाट देखैत रहलहुँ काल्हिए डॉक्टरसँ देखएलहुँ, रिपोर्ट + + आएल छैक। + + केर माने भेलैक जे शैलीक कोखिमे नव ‘जीव’ अस्तित्वमे आबि गेल छैक। हमरा मिताकेँ बियाहसँ पहिनहि कल्याणक योग भ’ गेलैक। हम ई की सुनि रहल छी? कोना भ’ गेलैक ई सभ? हमरा माथ घूम’ लागल... कैक प्रकारक सवालसँ हमर माथ फाटल जा रहल छल। ओमहर शैली अनवरत रूपेँ कानि रहल छलीह। हे भगवान! शैलीक घरक लोककेँ जखन एहि बातक आभास हेतैक तखन की हेतैक? एखन शायत शैलीकेँ सान्त्वनाक आवश्यकता छलैक। शैलीक कपार पर विपतिक पहाड़ टूटल रहैक आ हम पत्ता जकाँ काँपि रहल छलहुँ। जेना जाड़क दिनमे शीशीक तेल जमि जाइत छैक तहिना हमहुँ जड़वत भेल जा रहल छलहुँ। के छी जे शैलीकेँ एहि दशामे आनि देलक? ई जानब हमरा लेल आवश्यक भ’ गेल छल मुदा ताहिसँ पहिने ई जानब जे, जे किछु शैली कहि रहल छलीह से साँचे थिक वा...। “शैली भ’ सकैछ अहाँक अंदाज गलत भ’ गेल हो..। भ’ सकैछ डॉक्टरक रिपोर्ट गलत हो....। अहाँ घबराउ जुनि। हम हरदम अहाँक संग छी, दुखमे, सुखमे सभमे।”हमरा बातसँ शैलीक मोन कने हल्लुक भेलैक। आइ धरि जे बात हम शैलीकेँ नहि कहबाक साहस केने रही से आइ एतेक आसानी सँ कहा गेल। शैली एकर माने की निकालने हेतैक से भगवाने जानथि। ओना शैली एखन जाहि मानसिक स्थितिसँ गुजरि रहल छलीह एहनमे हुनकासँ एहन सभ बात पर उमेदो करब उचित नहि छलैक। “शैली अहाँ जे कहि रहल छी से गलतो तँ भ’ सकैछ? पहिने डॉक्टरसँ नीक जकाँ पूछि त’ लिअ।” “आ जँ डॉक्टर फेर वैह बात कहलक तखन?” शैली बाजलि। “ओ बादमे देखल जेतैक।” हम कहलिऐक। “हम अपन जान द’ देब। मरि जाएब। हम आब जीब’ नहि चाहैत छी।”कानैत-कानैत ओ बाजलि। “हमसभ आइए डॉक्टर लग जाएब।” हम कहलिऐक। “कखन?” शैली तपाकसँ बाजलि। “ऑफिसक बाद, छओ बजेक लगधक। आइ हमहुँ अपन ऑफिसक काज जल्दीए जल्दी निपटा लेब।” ई कहैत हम ओकरा सांत्वना देबाक प्रयास कएलहुँ। शैली हमरा मुँह दिस देखैत रहलीह। हम ऑफिससँ जल्दी निकल’ वला नहि छी से शैली नीक जकाँ जानैत छलीह। ओ सोचि रहल हेतीह जे “शायत हम हुनका समय द’ कए मुकरि जाएब।” “अरे हम अहाँसँ प्रॉमिस क’ रहल छी हम अवश्य आएब। चाहे कतेको काज किएक नहि हो।” शैली किछु पल केर लेल अपन आँखि बन्न क’ लेलक। जेना ओ सोचि रहल हो जे जँ हम नहि आएब तखन की हैत? “शैली अहाँ जल्दी-जल्दी तैयार भ’ जाउ। हम बाहर अहाँक बाट जोहि रहल छी। कहैत हम ओकरा गाल पर हाथ फेरलहुँ आ ओकर आँखिक नोर पोछलहुँ।” “अहाँ डरब नहि चलू देखैत छी जे आइ साँझ केँ डॉक्टर की कहैत छथि”—कहैत हम ओकर देहरी पार कएलहुँ। शैली शीघ्रहि अपन कपड़ा बदललक आ हम दुनू बाहर निकलि गेलहुँ। अहाँ नाश्ता कएलहुँ की नहि? ई पूछब हम उचित नहि बुझलहुँ, तथापि पुछलहुँ--- “ऑफिसेक कैंटीन मे क’ लेब” ओ बाजलि। ओहि दिन भरि रस्ता शैलीक पयर नहुँए-नहुँए आगू बढैत रहल। ओकर मोन जे टूटि गेल रहैक! हम ओकर ओहि मोनक टुटलका तागकेँ जोड़बाक प्रयास क’ रहल छलहुँ। हमरा मोनमे एक पल केर लेल भेल जे हम शैलीक हाथ अपन हाथमे थामि ली, मुदा बाट चलति एहि तरहक व्यवहार हमरा शोभा नहि देत, ई जानि हम अपन विचार दमित क’ देलहुँ। गुमसुम शैली अपनहि विषयमे किछु सोचि रहल छलीह ई जानि हम ओकरा टोकलिऐक---- हाँ.....25। शैली उत्तर छल। “की भेल?” हम पुछलिऐक। शैली मौन रहलीह। हम फेर पुछलहुँ। शैली मौन। हमरा मोनमे भेल जे शायत शैली सीढ़ी चढ़ैत काल अपन उमिरक संबंधमे सोचि रहल छलीह। हम पाछू मूड़ि कए सीढ़ीक गिनती कएलहुँ ओ ठीक पच्चीसे छल। पच्चीस सीढ़ी आ पच्चीस साल, मेल बड़ नीक छलैक। पच्चीस सीढ़ी चढ़लाक पश्चात् ऑफिसमे प्रवेश आ पच्चीस सालक पश्चात् माय बनब......कुमारि माय? शायत एहि लेल ई क्षण ओकरा लेल सुखदायी नहि छलैक। कैंटीनमे हमरा दुनूक नास्ता-पानि भेल आ साँझमे मिलबाक बात क’ हम दुनू अपन-अपन ऑफिस चलि गेलहुँ। पूरा दिन काज करैत हम शैलीएक संबधमे सोचैत रहलहुँ। बीचहिमे हम एकबेर ओकरा इंटरकॉम नम्बर सँ फोन केलिऐक। शैली, केनह छी अहाँ? देखू धैर्य राखब, हम अवश्य आएब....कहैत हम फोन राखि देलहुँ। दूपहरमे एकबेर फेर हमसभ लंचक समय मे मिललहुँ। ओ भोजन करबासँ मना करैत छलीह। हमहुँ उपासे करब। ऐहने नाजुक समयमे तँ मितकेँ मितक आवश्यकता होइत छैक। हम ओकरा सहारा द’ रहल छलिऐक ई सोचि हमरा खुशी भ’ रहल छल। एखन घड़ीमे पाँच बजैत रहैक। ठीक ओहि काल शैली हमरा मोबाइल पर‘मिसकॉल’ द’ क’ समयक संबंधमे आगाह कएलक। साढ़े पाँच बज’ सँ पूर्वहि हम ऑफिससँ बाहर आबि गेलहुँ। शैलीओ केँ झटकि कए आबैत देखलिऐक। “चली?” हमर प्रश्न सुन’ सँ पहिनहि शैलीक पयर बढ़ि चुकल छलैक। हमसभ अस्पताल पहुँचलहुँ। हमरा आभासो नहि भ’ सकल जे कखन शैली हमर हाथ कसि कए पकड़ि नेने छलीह। ओ डरि रहल छलीह। ओकर हाथ काँपैत छलैक। “डॉक्टर छथि?” हम स्वागत कक्षमे पुछलिऐक। “हँ, हँ छथि” कहैत ओ स्वागत अधिकारी हमरा बगल कुर्सी पर बैसबाक इशारा कएलथि। हम दुनू जा कए कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। हम डॉक्टरक कक्षमे हुलकी मारलहुँ, आ सामने नामपट्ट पर सेहो, लिखल रहैक—डॉ. गीता। हम बुझि गेलहुँ जे यैह डॉ. थिकीह। देख’ मे एकदम सुन्नरि, सौम्य। हम मोने मोन सोचलहुँ जे शायत डॉ. गीता कहतीह—“शैली अहाँ एकदम नार्मल छी” आ हुनक ई वाक्य शायद हमरा सभक मोनक भ्रम तोड़ि देत। एतबहिमे नर्स आवाज देलक—“अहाँ सभ अन्दर जाउ।” डॉ. गीता एकदम मधुर आवाजमे पुछलथि—“कहू की तकलीफ अछि।” डॉक्टरक पश्न सुनि हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। डॉ. केर प्रश्न एखन चलिए रहल छलैक। हम हुनका दिस देखलिएनि की ओ हमरा कहलथि—“कनेक कालक लेल अहाँ बाहर जाउ”हम ओतए सँ उठि बाहर ओहि कुर्सी पर जा बैसलहुँ जतय पहिने बैसल रही। नर्स दरबज्जा बन्न क’ दैलकैक। हमरा मोनमे तखन कतेको प्रकारक प्रश्न सभ उठि रहल छल। थोड़बे कालक बाद डॉ. दरबज्जा खोललक। हमरा फेर बजाओल गेल। हमरा ओत’पहुँच’ सँ पहिने शैली डॉ. केँ किछु बता रहल छलीह। डॉ. हमर नाम पुछलथि--- “शागू गांवकर।” हम जवाब देलियनि। डॉ. हमर नाम पुरजा पर लिख लेलथि। हम देखतहि रहि गेलहुँ। हमरा अपनहि आँखि पर विश्वास नहि भ’ रहल छल। हम अपन आँखि आर कने बिदोड़ि कए देखलहुँ—हँ! ई शालीए रहैक। शैली, शाली कहिया भ’ गेलैक? “हँ तँ अहाँ सभकेँ बच्चा एखन नहि चाही, यैह ने?” डॉ. हमरा दुनूसँ पूछलक। “जी नहि। हमरा सभक आर्थिक परिस्थिति एखन बच्चा जन्म देबाक इजाजत नहि द’ रहल अछि।” शैली उर्फ शाली चोट्टहि बाजलि। हम ओकरा दिस साश्चर्य देखतहि रहि गेलहुँ। “तँ ई निर्णय अहाँ दुनूक छी ने?” “जी हँ, डॉक्टर! हमरा दुनूक यैह सम्मति अछि।” शैली बाजलि। शैलीक जवाब मानू हमरा अंतर्मनकेँ झकझोरि कए राखि देलक। बच्चा ककरहुँ हो मुदा ओकरा प्रति कने ममता तँ हेबाक चाही? डॉ. ओहि पुरजा पर आर किछु लिखलक आ हमरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबा लेलक। शैली, शाली गांवकर नामसँ हस्ताक्षर केने छल जे पूर्ण रूपसँ जाली छलैक। अपन हस्ताक्षर केलाक पश्चात् ओ कलम हमरा हाथमे थमा देलक। हम की करी, की नहि एहि अंदर्द्वन्द्वमे रही। शैली एकबेर हमरा दिस देखलक---हम बात बुझि गेलिऐक, हमहुँ हस्ताक्षर क’ देलिऐक। डॉ. अपन अलमारीसँ किछु दबाइक गोली आ एकटा करिया-सन शीशीमे दबाइ शैलीकेँ थमा देलकैक। शैली अपना पर्ससँ आठ सय टका निकाललक आ तीन सय हमरासँ माँगलक। हम ततेक ने नर्वस भ’ गेल रही जे शैलीए हमरा जेबीसँ ओ टका निकालि डॉ. केँ देलकैक। शैलीक ई व्यवहार देख डॉ. केँ हँसी लागि गेलैक। “साँचे अहाँ दुनूक प्रेम बेजोड़ अछि।” हमरा दुनूक बीच पति-पत्नीक संबंध अछि, ई विश्वास डॉ. केँ दिएबाक लेल शैलीक ई नाटक एकदम ‘परफेक्ट’ साबित भेलैक। “मि. शागू! अपन पत्नीक ध्यान राखब, हिनका एहि समय अहाँक सख्त आवश्यकता छैक।” ई कहैत डॉ. गीता हमरा सभकेँ बिदा कएलथि। हम आ शैली बाहर एलहुँ। पेशेंट सभकेँ स्ट्रेचर पर ल’ जएबाक जे पथ होइत अछि ओहि बाटे हम सभ अबैत रही हमरा बुझाएल जे जेना हमर अपन संतुलन बिगड़ि रहल अछि। हम शायत अपनहि सँ उलझि गेल छलहुँ। किछु आगू चललाक पश्चात् शैली दबाइक दोकान पर पुरजा दैत किछु आर दबाइ किनलक। हमरा मोनमे एकटा जबरदस्त जद्दोजहद भ’रहल छल। “हम पापी छी, हत्यारा छी, हमरहि कारणेँ आइ एकटा ओहन शिशुक हत्या भ’ रहल छैक जे एखन धरि दुनियाँ मे आएलो नहि छैक” कोनहुँ बच्चाक लेल संसारक सभसँ सुरक्षित स्थान होइत अछि ओकर माइक कोखि, हम ओहि कोखिक लेल मृत्युक सौदागर बनि गेल रही। दबाइ सभ गर्भनाड़ीकेँ बन्न क’ नेना भ्रूणकेँ समाप्त करबाक प्रक्रिया भ’ रहल छलैक। हमरा लागल आइ हम एहन अपराध केने छी जकरा लेल भगवान हमरा कहियो माफ नहि करताह। मुदा जँ हम एहन नहि करितहुँ तँ शैलीओ तँ आत्महत्या क’ लेतिऐक? यैह सभ सोचैत हम बहुत कालक लेल एकदम गुम्म भ’गेल रही। जखन हम कॉलेजमे पढ़ैत रही आ परीक्षामे कम अंक आबए तखन मैडम पापा केँ बजा कए आनए कहैत छलीह। तखन हम गलीक नुक्कुड़ पर जा कए “साइकिल पायलट”केँ दस-बीस टका द’ कए किछु कालक लेल भाड़ाक पप्पा बना कए ल’ जाइत छलहुँ। परीक्षाक अपन गलती छुपएबाक लेल भाड़ाक पप्पासँ नाटक करबैत छलहुँ....। आइ हम अपनहि नाटक करैत रही। शैली केँ बचएबाक नाटक। बातो तँ साँचे रहैक, घौर बला केलाक गाछमे जेना संतुलन बनएबाक लेल ‘सोंगर’ लगाओल जाइत अछि, तहिना आइ हम शैलीक संतुलन ठीक रखबाक लेल सोंगरक काज क’ रहल छलहुँ। “चलू चलैत छी।” दबाइ ल’ कए घूरि आएल शैली बाजलि आ हम अपन विचारसँ बाहर निकलबाक प्रयास कएलहुँ। ओहि दबाइमे ओहि छोटका “जीब”क लेल“जहर” छलैक। हम शैलीकेँ ओकरा घर धरि पहुँचा देलिऐक। शैली हमरा बैसबाक लेल कहलक। शायत ओ बुझैत छलीह जे आइ जे किछु भेल छैक तकर परिणामस्वरूप हमरा मोनमे की भ’ रहल हैत। आइ भोरसँ जे किछु भ’ रहल छैक तकर जड़ि केर संबंधमे हम ओकरासँ पुछबैक। मुदा काल्हि भेंट करब, ई कहि हम ओकर मोन हल्लुक क’ देलिऐक। “गुड नाइट” कहि हम चलि देलहुँ। राति शनैः-शनैः भीजल जाइत छलैक आ ओकरा संगहि हमर चिंतन सेहो गंभीर भेल जा रहल छल। हमर एकटा मोन हमरा लांछित करैत छल आ दोसर मोन मजगूत क’ रहल छल। एहि अनजान शहरमे हमरा सिवाय शैलीक क्यो नहि छलैक। जँ हम आइ ओकरा सहारा नहि देतिऐक तँ ओ अपन इहलीला समाप्त क’ लेतिहैक। हे भगवान!हमरा माफ करब! जाहि भ्रूणकेँ अहाँ जनम देब’ चाहैत छलहुँ हम ओकरहि विनाश करबाक लेल शैलीक संग देलहुँ। कतेक पैघ गद्दार छी हम! दोसर दिन शैली ऑफिस नहि अएलीह। हमहुँ ओकरा सँ मिलबाक साहस नहि जुटा पएलहुँ। एहिना कैक दिन बीति गेल। एक दिन अकस्मातहि हमरा शैली सँ ऑफिस मे भेंट भ’ गेल। “शागू हम घर जा रहल छी।” शैलीक बात सुनि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। “मुदा एना अचानक?” “काल्हि भेंट करब” ई कहैत ओ ऑफिस चलि गेलीह। काल्हि शनि रहैक, से हम शैलीक घर जयबाक सोचलहुँ। आइ शुक्र दिन देर धरि ऑफिसक काज करैत रहलहुँ। दोसर दिन हम शैलीक घर पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकरा घरमे ताला लागल छल। तालाक भूरमे एकटा पर्ची खोंसल रहैक। ओ संभवतः हमरे लेल हैत से जानि हम ओकरा खोललहुँ। हमरे चिट्ठी छल। प्रिय शागू, हम घर जा रहल छी। घरक लोक सभ हमर बियाह तय क’ देने छथि। अहाँक कएल गेल उपकारकेँ हम जिनगी भरि नहि बिसरब। हमरा जीवनक लेल अहाँ बहुत महत्वपूर्ण छी। हम बुझैत छी जे हमरा बिसरि जाएब अहाँक लेल एकदम असंभव हैत। मुदा हम आइसँ अहाँकेँ बिसरैत छी, संभव भ’ सकय तँ अहूँ हमरा बिसरि जाउ। शैली चिट्ठी पढ़ि हमरा लागल जेना एकटा जोरगर समुद्रक लहरि आएल आ हमरा पयरक निचलका सभटा बालु बहा कए ल’ गेल। हमरा आँखिसँ नोरक दूइटा बुन्न कखन ओहि चिट्ठी पर पड़ि पसरि गेल के हम नहि बुझि सकलहुँ। “काल्हि भेंट करब”कहएवाली शैलीकेँ काल्हि आ आजुक बीचक अंतर किएक नहि बुझि मे एलैक? शैली हमरा एहि तरहेँ किएक फँसौलक? शायत ओ सोचने हेतीह जे हम ओकरा बियाह करबा सँ मना क’ देबैक। जखन हम ओकरा गर्भपात करबैत काल नहि रोकलिऐक तँ एखन किएक रोकि देतिऐक? शैली आब पहिनुक शैली नहि रहल। ओ आब बहुत समझदार भ’ गेल छलीह। आब समाजक सामना करबाक साहस ओकरामे भ’ गेल छलैक। शैली शुक्र दिनक रातिएमे रेल सँ चलि गेलीह आ छोड़ि गेलीह हमरा लेल कैकटा अनुत्तरित प्रश्न सभ। ओहि दरबज्जाक आगू हमर ध्यान गेल जतय शैली कहियो “वाल” केर लत्ती लगौने छलीह। ओ लत्ती आब खूब पैघ भ’ गेल रहैक। ओकर जड़ि चतरि गेल छलैक आ ओहि लत्ती पर आब कैकटा फूल-फल लागि गेल छलैक। एहि “आल” केर फूल-फल आ ओकर पातक तरकारी खएबाक लेल शैली एतए नहि छलीह। शैली बियाहक लग्न मंडपमे छलीह। ई सभ सोचैत हम देबालक कोनसँ सटि गेलहुँ एकदम “सोंगर” जकाँ। 1 KUNDAN JHA said... konkani kathak prastuti lel shabd nahi achhi shambhu ji, sebi fernandez aa chitralekha d'souza ke hamra taraph se dhanyavad ahank madhyam se day rahal chhyanhi Reply05/05/2009 at 06:15 PM 2 Dr Palan Jha said... Sebi Fernandes ker katha aadyopant padhlahu, bhavnatmak katha. Shambhu ji aa chandralekha jik aabhar je konknik ee katha maithili me padhi saklahu. Reply05/05/2009 at 12:12 PM 3 प्रीति said... नव तूरक लेखकक नूतन रचना, अनुवाद सेहो ओहने उत्तम। Reply05/04/2009 at 09:47 PM बालानां कृते- 1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी 1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: मैथिलीक पहिल-चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) नीचाँक दुनू कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा तीन नताशा चारि 1 Jyoti said... Sabsa neek achi Natasha ke cartoon chitrakaari. Bad neek shuruaat achhi Reply05/07/2009 at 02:11 PM 2 মধূলিকা চৌধবী said... nataasha apan sthan banaot maithilik nena bhutka sahitya me Reply05/07/2009 at 02:06 PM 3 AUM said... natasha ati sundar Reply05/05/2009 at 06:03 PM 4 Umesh Mahto said... natasha mon mohi lelak, jyotijik devijik katha aa chitra dunu nik, madhdyapradesh yatra seho uttam Reply05/05/2009 at 02:12 PM 5 Umesh said... online dictionary bad nik, bahut ras science computer ker navin shabd. Reply05/05/2009 at 02:09 PM 6 Preeti said... Devanshu Vats Ker cartoon aa Jyotijik Madhyapradesh Yatra aa Deviji Dunu bad nik lagal. Reply05/05/2009 at 12:14 PM 7 Krishna Yadav said... Devanshu Vatsa Ker cartoon bad nik lagal. Reply05/05/2009 at 12:13 PM 2. मध्य प्रदेश यात्रा- ज्योति नवम दिन ः 31 दिसम्बर 1991 ़ मंगलदिन ः कॅंपकपाइत जाड़मे काेनाे हिलस्टेशन दिस भाेरक यात्रा बहुत कष्टप्रद हाेएत छै।परन्तु समयाभावमे हमरा सबके 5ः30 बजे भाेरे बस सऽ पचमढ़ी दिस विदा हुअ पड़ल।धीरे धीरे राइतक सन्नाटा पक्षी सबहक चुहचुही सऽ टूटल।पर्वतक बीच सुयाेर्दय देखक इ पहिल अवसर छल।अपन लक्ष्य दिस पहुॅंचैमे करीब दू घण्टा लागल।पिपरिया सऽ 53 किलाेमीटरक सफर तय करैत हमसब7ः45 बजे पचमढ़ी पहुॅंचलहुॅं। समुद्र तलसऽ करीब 3़555 फीट अर्थात् 1़067 मीटरक ऊॅंचाइ पर स्थित पचमढी मध्यप्रदेशक ग्रीष्मकालीन राजधानी छै।अहिठामक मन्दिऱ गुफा़ झरना़ घाटी सब बड रमणीय छै।पर्वतश्रेणी सबहक बीच बसल इ पर्वतीय स्थल अपन अद्भुत दृश्यावलीके कारण ‘मध्यप्रदेशक स्वर्ग’के उपाधि पाैने अछि।अंग्रेज शिकारी कर्नल हांडी अकरा तकने छल।सन् 1869मे अंग्रेज अकरा बसेने छल। अतक पाण्डव गुफा अपन एतिहासिक महत्व के लेल प्रसिद्ध अछि।एहेन मान्यता छै जे अहि गुफा सबहक निर्माण पाण्डव अपन बनवासक समयमे केने रहैथ।अकर शिखर सऽ पूरा मध्यप्रदेश अवलाेकित हाेइत छै।पुरातत्ववेत्ताक अनुसारे इ बाैद्धकालीन छै आर अकर निर्माण 9म आर 10म शताब्दीक बीच भेल छै। अतऽ के विभिन्न खाइ सबमे एकटाक हांडी खाेह सेहाे छल जे करीब 300 फीट गहींर छल।अतऽ अंग्रेज मेजर हांडी खसिकऽ मरि गेल रहैथ तकरा बाद सऽ हुन्के नामसऽ सब अकरा हाण्डी खाेह कहऽ लागल। ‘प्रियदर्शिनी’ एक छाेट पहाड़ी छै जतय सऽ पचमढ़ीक साैन्दर्य सुषमाक दर्शन अत्यन्त मनाेहारी लागैत छै।इ स्थल पहिने फाेरसीयक नाम पर छल जे अहि शहरके बसेनाइ प्रारम्भ केने रहथि।हमर सबहक टाेली विभिन्न जीपमे सवार भऽ टेढ़ मेढ़ पथरीला भूमि पर विचरण कऽ रहल छल।आब हमसब बड़ा महादेव मन्दिर पहुॅंचलहुॅं। इ मन्दिर एक पहाड़क खाेहमे छै आ बड छाेट नहिं छै।अहिमे एक जलकुण्ड छै। अहि गुफामे वर्ष भरि बूॅंद बूॅंद वर्षा हाेइत रहै छै।अकर कारण गुफाक छतवला चट्टानक बीच जमल पानि छै।हमरा सबके ड्राइवर बतेलक जे अहिके आस पास रघुवीर यादव द्वारा अभिनय कैल फिल्म ‘मैसी साहब’ के शूटिंग भेल छै। अकर बाद हमसब पुनः एक धार्मिक स्थल पहुॅंचलहुॅं।आस्तिक सब लेल इ जन्म सिद्ध करैवला स्थल छै।मुदा अपन अनभिज्ञता कहू या किछु आर हमरा सबके अकर धार्मिक महत्व अकर भाैगाेलिक बनावट के सामने धूमिल लागल।एक पाथरक लम्बा सुरंगक अन्दरए क पण्डित एक जीवित नाग व आरतीक थारी लऽकऽ बैसल अन्दरके शिवलिंगक रक्षा करैत बैसल छलैथ।कहलगेल छै जे शिवजी भष्मासुर सऽ बचैलेल आेतय नुकायल रहैथ।अहि सुरंगमे एक बेरमे एक व्यक्ति सेहाे तिरछा भऽ कऽ पैस सकैत छल।हमसब एक के बाद एक क्रमसऽ पाॅंच टा छात्र छात्रा घुसलहुॅं तऽ कनिये दूर बाद दम घुॅंटऽ लागल।अन्दर आरती लेने बिना घुरनाइ ठीक नहिं लागि रहल छल।खैर हमसब तऽ बाहर आबि गेलहुॅं मुदा एक टा शिक्षक अपन बढ़ल पेटक कारण अन्दर नहिं जा सकला।आेतय सऽ हमसब अपन हाेटल एलहुॅं जे मचान कम्पलेक्स सऽ मिलैत जुलैत छल आ अकर सामने बहुत सुन्दर लाॅन आ फूलक क्यारी छलै।आेतय स समान पाती लऽ हमसब पिपरिया स्टेशन पहुॅंचलहुॅं। देवीजी : ज्योति देवीजी ः चित्रपट्ट देवीजी आहि किछु भिन्न छलैथ। बच्चा सब सऽ पुछलखिन जे अहाॅं सब फिल्म देखै छी।बच्चा सब आश्चर्य चकित छलैथ कारण हुन्कर सबके फिल्म देखनाइर् नहिं नीक बतायल गेल छलैन । हुन्का सबके तऽ फिल्म देखके विचाराे राखला पर घर मे डपट परै छलैन।एहेन मे विद्यालयमे फिल्म देखबाक बात बहुत विस्मयकारी छल।मुदा देवीजी कहलखिन जे सब तरहक फिल्म खराब नहिं हाेयत छै। बल्कि मनाेरंजन बहुत आवश्यक छै।देवीजी कहलखिन जे 1 मइर् कऽ जे लेबर डे मनायल जाइत छै तकर शुरूआत अहि सिद्धान्त सऽ भेल छै जे 8 घण्टा काज करू 8 घण्टा आराम करू आऽ 8 घण्टा मनाेरंजन व्यायाम तथा अन्य काज करू।फिल्म देखनाइर् सबसऽ प्रसिद्ध मनाेरंजन के साधन अछि। देवीजी कहलखिन जे आगामी सप्ताहमे देश के दू टा विश्वप्रसिद्ध दिग्गज सबहक जन्मदिन अछि। महान् फिल्म निर्माता एवम् आॅस्कर विजेता स्वर्गीय सत्यजीत रायके जन्मदिन 2 मइर् कऽ छैन।देशके प्रथम नाेबेल पुरस्कार विजेता स्वर्गीय रविन्द्रनाथ ठाकुरके जन्म दिवस 7 मइर् क छैन। रविन्द्रनाथ ठाकुरक उपन्यास पर आधारित फिल्म आऽ दूरदर्शन धारावाहिक सेहाे बनि चुकल अछि।इर् दुनु बहुमुखी प्रतिभाक स्वामी छलैथ। अहि दृष्टिकाेण सऽ बंगाल के भूमि मे देशके सम्मान बढ़ाबै वला अनेकाे शिराेमणि सबहक जन्म भेल अछि।तकर बाद फिल्म के द्वारा भारतमे बहुत विदेशी मुद्र सेहाे आबैत अछि। तैं फिल्म इंडस्ट्री भारत सरकार के लेल आय के महत्वपूर्ण स्राेत छै। देवीजी अनुसार फिल्म इंडस्ट्रीमे बहुत फिल्म बच्चा सबलेल बनै छै। जाहि सऽ बच्चा के मनाेरंजन सहित शिक्षा सेहाे भेटैत छै।कतेक फिल्म जानवर सबके प्रति दया भावना के प्रेरित करैलेल बनाआेल गेल छै। कतेक फिल्म धार्मिक मान्यताक सम्मान मे बनाआेल गेल छै। ताहि द्वारे बच्चा सब अगर अपन उम्रके लायक फिल्म देखैथ तऽ बहुत फायदा भऽ सकैत छैन।देवीजीके अहि विचार सऽ प्रेरित भऽ आबैवला रवि जहिया भारत सहित अन्य देश मदर्स डे के रूपमे मना रहल छल गाम भरिक लाेक के फिल्म देखाबक कार्यक्रम बनल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। इंग्लिश-मैथिली कोष/ मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. 1 KUNDAN JHA said... online dictionary ke shuruaat nik, ee aar aaga aar nik hoyat se aasha achhi Reply05/05/2009 at 06:13 PM 2 Umesh said... computer internet ke bahut ras english shabdak maithili roop dekhi aanandit bhelahu Reply05/05/2009 at 02:10 PM 3 Khattar said... bad nik prayog. Reply05/05/2009 at 12:20 PM 4 Jitender Nagabansi said... Online dictionary lel badhai. Reply05/05/2009 at 12:20 PM 5 Ajay Karna said... dictionary sql aadharit bad nik prayog Reply05/05/2009 at 12:19 PM 6 Rahul Madhesi said... Maithili to English aa English to Maithili Dictionary online dekhi harshi bhay gel mon. Reply05/05/2009 at 12:18 PM 7 Anshumala Singh said... online Dictionary lel dhanyavad. Reply05/05/2009 at 12:17 PM 8 Neelima Chaudhary said... डिक्शनरी ओना तँ बड्ड नीक मुदा प्रूफक कनेक आवश्यकता। Reply05/04/2009 at 11:01 PM भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली
1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन
१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।
२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।
३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।
४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।
५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।
६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।
७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।
८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।
९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।
१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।
कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
1 Krishna Yadav said... manak shaili aa panji dunu nik Reply05/05/2009 at 06:07 PM 2 preeti said... manak maithili lel prayas stutya Reply05/05/2009 at 02:04 PM 3 Anshumala Singh said... Bhasha pak rachna lekhnak sabh samagri research based. Reply05/05/2009 at 12:16 PM 4 aum said... the dictionary, manak maithili, mithilakshar se devnagari pandulipik anuvad sabh nik lagal Reply05/04/2009 at 08:33 PM English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed athttp://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title“KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. The Comet English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary “The funeral should be held near the place where his father funeral was done in the mango orchard”, elder brother ordered so the pyre was made according to his will. “Look at his face! How pleasant! Does he look like dead?” Nand’s elder brother said. When Aaruni’s elder brother came forward to give flame to the pyre he became sentimental. His uncle consoled him. The body started diminishing in fire abolishing hope of return. All arrangement was held as if it was some festive occasion. Everything was done according to the instructions of the priest known as Mahapatra or Kantaha Brahmin. Gadura Puran was described in every evening. In this was the rituals of funeral were completed. Either tranquil or extreme agitation! Aaruni Thakur was not well and was staying alone in the apartment adjacent to the woodland nursing home where he often used to think about those days of his student life when apart of studying he was habituated to analyse the past events. The unpleasant moments were disturbing him every now and then. He used to share his grieves with his well-wishers to reduce them. But that trick also stopped working then he started hiding his facts and started staying cut out from the society. His friends presumed that his problems were solved. Aaruni had been dreaming about horrible things from his childhood. He still remembered how he used to start sweating in midnight and his worried parents used to fan him. Father is born by grandfather then who has given birth to the grandfather? If God is creator of everyone then who has created him? People used to laugh at such curiosity of Aaruni but when he read books of philosophy then he came to know that many saints had dedicated their entire life in searching answers of such querries but they never got answered. (continued) 1 Anshumala Singh said... We are amazed to see english translation of Sahasrabadhani-novel by Gajendra Thakur. The English translator has done enough justification in translating the novel in its true spirit. The translation is a lesson for linguists, it has grace of Indian English, it never compromises with the original theme. Reply05/05/2009 at 12:28 PM महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट संस्करणक विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे। महत्त्वपूर्ण सूचना (२): 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. प्रकाशित कएल जा रहल अछि: लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website:http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(३). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (शोध-सम्पादन, डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक शोध-संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा Combined ISBN No.978-81-907729-6-9 महत्त्वपूर्ण सूचना:(४) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 महत्त्वपूर्ण सूचना (५): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे। महत्त्वपूर्ण सूचना (६):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर (1971- ) छिड़िआयल निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक (खण्ड 1 सँ 7 ) नामसँ। हिनकर कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे आ उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद संस्कृत आ अंग्रेजी(द कॉमेट नामसँ)मे कएल गेल अछि। मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली शब्दकोश आ पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन-आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण। अंतर्जाललेल तिरहुता यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा (1962- ), पिता श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, पति श्री दीपक कुमार। श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा इतिहास आ राजनीतिशास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधिक संग नालन्दा आ बौधधर्मपर पी.एच.डी.प्राप्त कएने छथि आ लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर आलेख-प्रबन्ध सेहो लिखने छथि।सम्प्रति “विदेह” ई-पत्रिका(http://www.videha.co.in/ ) क सहायक सम्पादक छथि। मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी ज्योति (1978- ) जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।ज्योतिकेँ www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा। (विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक 26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।) Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- (add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.30/- per copy for outside Delhi) BOTH VERSIONS ARE AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) SOLE DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक सजिल्द
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कविता-संग्रह
या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी
विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/-से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10%की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन :0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण
उपन्यास
मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
कहानी-संग्रह
रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 90.00
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आलोचना
इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन
सामाजिक चिंतन
किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र
उपन्यास
माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
कहानी-संग्रह
धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम
एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन
अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) ९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर१.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । १२.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा" १३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1:तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु.100/- श्रुति प्रकाशन, DISTRIBUTORS: AJAI ARTS, 4393/4A, Ist Floor,AnsariRoad,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107.Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... मैथिली आ मिथिलासँ संबंधित कोनो सूचना एतए देबाक लेल ggajendra@videha.com किंवा ggajendra@yahoo.co.in केँ ई मेलसँ सूचित करी। Reply05/12/2009 at 01:37 AM संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ३३ म अंक ०१ मई २००९ (वर्ष २ मास १७ अंक ३३ ) http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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