163 'विदेह' ३४ म अंक १५ मई २००९ (वर्ष २ मास १७ अंक ३४) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. हास्यव्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा प्रेमशंकर सिंह २.२. कथा-सुभाषचन्द्र यादव-नदी २.३. प्रत्यावर्तन - चारिम खेप-कुसुम ठाकुर २.४ कामिनी कामायनी -कथा- चुट्टा लेमे की चुट्टी़ २.५ डा. कल्पना मिश्र-मातृभाषा २.६. कथा-मर्यादाक हनन- कुमार मनोज कश्यप २.७.भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक) , अन्तर्जालपर मैथिलीआ विश्वव्यापी अन्तर्जालपर लेखन आ ई-प्रकाशन- गजेन्द्र ठाकुर २.८.बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा - गजेन्द्र ठाकुर ३. पद्य ३.१. कामिनी कामायनी: आतंकी गाम ३.२. विवेकानंद झा-तीन टा पद्य ३.३. सतीश चन्द्र झा-सोनाक पिजरा ३.४. अओताह मन भावन- सुबोध ठाकुर ३.५.मणिकान्त मिश्र “मनिष”- मिथिला वन्दना ३.६. ज्योति-हम एक बालक मध्य वर्गके ४. गद्य-पद्य भारती -नागपंचमी मूल कोंकणी कथा : नागपंचम लेखक : श्री वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद : नागपंचमी अनुवादक : श्री सेबी फर्नानडीस ,मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह ५. बालानां कृते-१.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ२. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी ६. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list) THE COMET- English translation of Gajendra Thakur's Maithili NovelSahasrabadhani translated by Jyoti. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। १. संपादकीय आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील साहित्यमे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाज लेल। जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि। व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य”(मैथिल हित साधन, जयपुर,१९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त,श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि। विदेह:सदेह:1 (विदेह वर्ष 2: मास:13 :अंक:25) छपि कए आबि गेल मिथिलाक्षर आ देवनागरी दुनू वर्सनमे- विदेह ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग। विशेष जानकारी प्रिंट फॉर्मक स्पॉनसर प्रकाशक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर उपलब्ध अछि। संगहि आर्काइवमे विदेह:सदेह:1 केर दुनू वर्सन डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ब्रेल स्वरूप सेहो (पचीस अंकक आ बादक सभ अंकक सेहो) देवनागरी आ मिथिलाक्षर वर्सनक संग आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। विदेह:सदेह:2 जनबरी 2010 मे ई-पत्रिकाक 26-50 अंकक चुनल रचनाक संग प्रिंट फॉर्ममे छपत। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १३ मई २००९) ७९ देशक ७९६ ठामसँ २१,८१७ गोटे द्वारा विभिन्नआइ.एस.पी.सँ १,७४,१६६ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। अपनेक रचना आ प्रतिक्रियाक प्रतीक्षामे। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in 1 1 सुरेश चौपाल said... eke ta shabd achhi prashansa me, bah Reply05/15/2009 at 11:28 PM 2 Dr Palan Jha said... 34m ank bahut nik sankalanak sang, sadhuvad Reply05/15/2009 at 08:47 PM २. गद्य २.१. हास्यव्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा प्रेमशंकर सिंह २.२. कथा-सुभाषचन्द्र यादव-नदी २.३. प्रत्यावर्तन - चारिम खेप-कुसुम ठाकुर २.४ कामिनी कामायनी -कथा- चुट्टा लेमे की चुट्टी़ २.५ डा. कल्पना मिश्र-मातृभाषा २.६. कथा-मर्यादाक हनन- कुमार मनोज कश्यप २.७.भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक) , अन्तर्जालपर मैथिलीआ विश्वव्यापी अन्तर्जालपर लेखन आ ई-प्रकाशन- गजेन्द्र ठाकुर २.८.बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा - गजेन्द्र ठाकुर डॉ. प्रेमशंकर सिंह (१९४२- ) ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा। 24 ऋचायन, राधारानी सिन्हा रोड, भागलपुर-812001(बिहार)। मैथिलीक वरिष्ठ सृजनशील, मननशील आऽ अध्ययनशील प्रतिभाक धनी साहित्य-चिन्तक, दिशा-बोधक, समालोचक, नाटक ओ रंगमंचक निष्णात गवेषक,मैथिली गद्यकेँ नव-स्वरूप देनिहार, कुशल अनुवादक, प्रवीण सम्पादक, मैथिली, हिन्दी, संस्कृत साहित्यक प्रखर विद्वान् तथा बाङला एवं अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन-अन्वेषणमे निरत प्रोफेसर डॉ. प्रेमशंकर सिंह ( २० जनवरी १९४२ )क विलक्षण लेखनीसँ एकपर एक अक्षय कृति भेल अछि निःसृत। हिनक बहुमूल्य गवेषणात्मक, मौलिक, अनूदित आऽ सम्पादित कृति रहल अछि अविरल चर्चित-अर्चित। ओऽ अदम्य उत्साह, धैर्य, लगन आऽ संघर्ष कऽ तन्मयताक संग मैथिलीक बहुमूल्य धरोरादिक अन्वेषण कऽ देलनि पुस्तकाकार रूप। हिनक अन्वेषण पूर्ण ग्रन्थ आऽ प्रबन्धकार आलेखादि व्यापक, चिन्तन, मनन, मैथिल संस्कृतिक आऽ परम्पराक थिक धरोहर। हिनक सृजनशीलतासँ अनुप्राणित भऽ चेतना समिति, पटना मिथिला विभूति सम्मान (ताम्र-पत्र) एवं मिथिला-दर्पण,मुम्बई वरिष्ठ लेखक सम्मानसँ कयलक अछि अलंकृत। सम्प्रति चारि दशक धरि भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रोफेसर एवं मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली विभागाध्यक्षक गरिमापूर्ण पदसँ अवकाशोपरान्त अनवरत मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अभिवर्द्धित करबाक दिशामे संलग्न छथि,स्वतन्त्र सारस्वत-साधनामे। कृति- मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८ मौलिक हिन्दी: १.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, प्रथमखण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७१ २.विद्यापति अनुशीलन और मूल्यांकन, द्वितीय खण्ड, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, पटना १९७२, ३.हिन्दी नाटक कोश, नेशनल पब्लिकेशन हाउस, दिल्ली १९७६. अनुवाद: हिन्दी एवं मैथिली- १.श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली १९८८, २.अरण्य फसिल, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१ ३.पागल दुनिया, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००१, ४.गोविन्ददास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली २००७ ५.रक्तानल, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८. लिप्यान्तरण-१. अङ्कीयानाट, मनोज प्रकाशन, भागलपुर, १९६७। सम्पादन- गद्यवल्लरी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६६, २. नव एकांकी, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९६७, ३.पत्र-पुष्प, महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९७०, ४.पदलतिका,महेश प्रकाशन, भागलपुर, १९८७, ५. अनमिल आखर, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००० ६.मणिकण, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ७.हुनकासँ भेट भेल छल,कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००४, ८. मैथिली लोकगाथाक इतिहास, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ९. भारतीक बिलाड़ि, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, १०.चित्रा-विचित्रा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००३, ११. साहित्यकारक दिन, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, कोलकाता, २००७. १२. वुआड़िभक्तितरङ्गिणी, ऋचा प्रकाशन,भागलपुर २००८, १३.मैथिली लोकोक्ति कोश, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर, २००८, १४.रूपा सोना हीरा, कर्णगोष्ठी, कोलकाता, २००८। पत्रिका सम्पादन- भूमिजा २००२ हास्यव्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा आधुनिक जीवन निश्चये विभिन्न प्रकारक विसंगति एवं विषमता द्वारा खंडित भेल जा रहल अछि। एहन स्थितिमे अभिव्यक्तिमे तिक्तता आयब अस्वाभाविक नहि। गंभीर रूपेँ आहत भेल मनुष्य जखन बाजत तखन ओ व्यंग्ये बाजत, जखन ओ किछु करत तखन प्रहारे करत। इऐह कारण अछि जे जखन रचनाकार आन्तरिक एवं बाह्य रूपेँ अपनाकेँ आहत अनुभव करैत छथि तखनओ व्यंग्यकार बनि जाइत छथि। व्यंग्यकारक उत्तरदायित्व भ’ जाइत छनि जे समसामयिक युगक समस्त विसंगतिक आलोचना प्रस्तुत करथि। वस्तुत: व्यंग्य एक एहन साहित्यिक अभिव्यक्ति अछि जाहिमे व्यक्ति तथा समाजक दुर्बलता, करनी-कथनीक अन्तरक समीक्षा वा निन्दाकेँ वऋभगिमा दए वार्णत: स्पष्ट शब्दक माध्यमे प्रहार कयल जाइत अछि। व्यंग्य र्णत: अगंभीर रहितहुँ गंभीर भ’ सकैछ, निर्दय रहितहुँ दयालु भ’ सकैछ, प्रहारात्मक होइतहुँ तटस्थ लागि सकैछ, मखौल लगितहुँ वौद्विक भ’ सकैछ, अतिश-योक्ति एवं अतिरंजनाक आभास देवाक बदला पूर्णत: सत्य भ’ सकैछ। व्यंग्यमे आक्रमणक मुद्रा तँ अनिवार्य अछि। प्राय व्यग्यकेँ उपहास, उपालभ्म, परिहास, प्रहसन, वाकू-वैदग्ध्य एवं वऋवित आदिसँ पृथक क’ देखबाक प्रचलन नहि अछि, किन्तु हास्य एवं व्यंग्यम किछु विपनता अछि। हास्य निप्प्रयोजन मुक्त एवं बाह्य धरातलक वस्तु होइछ तेँ ओ विशिष्ट नहि भ’सकैछ, परन्तु व्यंग्म कहियो निप्प्रयोजन नहि होइछ। व्यंग्यक प्रयोजन वस्तुत: गुढ़ एवं मार्तिक अछि। हास्य मनकेँ सतेज एवं प्राणकेँ सजीव करैत अछि। प्राकृत-हास्य मानव स्वभावक उज्जवल गुण थीक। एहिमे घृणा वा विरक्तिक लेशो नहि रहैत छैक। सिद्वान्त, व्यवहार, धारणा एवं वस्तु स्वरूपक बीचक असंगति हमरा हँसवाक हेतु बाध्य करैछ। प्राकृत-हास्य कटुताक बोध नहि करबैत अछि, प्रत्सुत असीम सामान्यता एवं असंगति वा अन्तविरोध ‘हास्य-कर’ होइछ। गंभीर स्तर पर तँ ओ दु:ख, पीड़ा, वेदना उत्पन्न करैछ। प्राकृत-हास्यमे एहि हेतु एक प्रकारक वृहत् अनुभतिक आशा रहैत अछि आ सामान्य अनभिज्ञता वा उपलब्धि सेहो। उच्चतम हास्यसँ कोमलता एवं करूणाचाक अभद संबंध रहैत अछि। हास्यसँ हमर अभिप्राय ओहि प्रत्येक मन: स्थितिसँ अछि जकरा हास्य व्यंग्य, हँसी-ठट्टा कौतुक, विनोद-रसिकता आदि शब्दसेँ साहित्यमे व्यक्त कयल जाइत अछि। अंग्रैजीमे ह् युमर शब्दमे आअँरँनि, रौटाइअँ, फन, जोक्स, प्लेजन्ट्रि जेस्ट, विट, फारस, पैरडि, रिड्-इक्यूल, आदि द्वारा व्यक्त सम्पूर्ण मन: स्थिति कोनो ने कोनो रूपसँ मिश्रित अछि। अतएब अंग्रेजीकहू युमर धारणसँ अर्वाचीन साहित्य अत्यधिक प्रभावित अछि। रसमयी रचनाक सिद्वहस्त प्रर्ण हास्यरसावतार प्रोफेसर हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली कयलनि अपन अद्वितीय प्रतिभाक परिचय देलनि अछि। एकरे फलस्वरूप ओ एतेक लोकप्रियता अजित कयलनि। एहिसँ सिद्व भ’ गेल अछि जे मिथिलाक पावन भूमि एहि क्षेतमे विद्यापतिक जन्म द’ सकैछ। हिनक उपलब्ध रचनामे गद्यक प्रधानता अछि हिक प्रदृत्ति कथा-साहित्य दिस विशेष रहल। हिनक पूर्ववर्ती कथाकार कथामे गद्यक उत्पन्न क’ अन्तमे पातक हत्या क’ दैत छलाह। अवसाद एवं निराशाक वातावरणसँ संपूर्ण मैथिली कथा साहित्य तिमिराच्छन्न भ’ रहल छल। मैथिली साहित्यमे ई श्रेय प्रो. हरिमोहन झाकेँ छनि जे सर्वप्रथम एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्हलनिआ आ एहिसँ पृथक भ’हास्य-व्यंग्यक नव प्रवृत्तिक अवलम्बन कयलनि। मैथिलीक पाठककेँ अवसादमय वातावरणसँ फराक क’ हास्य व्यंग्यक एक नवीन मागेक रश्मि प्रदान कयलनि। मौथिलीमे हिनह हास्य-व्यंग्यसं युक्त रचनाम कन्यादान, द्विरागमत, प्रणम्य देवता, रंगशाला, खट्टर ककाक तरंग, चर्चरी, एवं एकादशी, पुस्तकाकार प्रकाशित अछि। एहिसँ अतिरिक्तो किछु कथा तथा स्फुट कविता समय-समय पर पतिकादिमे यत-तत प्रकाशित अछि जाहिमे हास्य-व्यंग्घक अजस्त्र धारा बहाओल गेल अछि। जीवनक प्रत्यक्ष देखल अनुभवगम्य रूपकेँ हास्य-व्यंग्यक माध्यमे चितित करब हिनक वैशिष्ट्य अछि। समकालीन मैथिल समाजक कुरूचिपूर्ण एवं सामाजिक विकृति पर कुठाराघात करैत-करैत ई अतिरजनाक आश्रय सेहो लेलनि अछि। जीबनमे अतविरोध, असंगति, क्षुद्र प्रव़त्ति, मूर्खतापूर्ण संघर्ष, बाबा वाक्य प्रमाणमूक हठधर्मिता, दम्भ, पाखण्ड, ढोंग, मिथ्या बड़प्पन, स्वार्थ-परता आदि हिनक हास्य-व्यंग्यक प्रमुख आलम्बन रहल अछि। हिनक रचनामे आचार, अनुष्ठान एवं धार्मिक वाह्याडम्बरक प्रति तीव्र आत्रोश भेटैत अछि। ई अपन रचनामे मानव मनक मोद, मोह, शोक, वेदनाकेँ एक मनोवैज्ञानिक जकाँ पर्यवेक्षण कयलनि अछि। वस्तुत: ग्राम्य परिवेशक यथार्थक अवतारणामे ई सिद्वहस्त छथि। ’कन्यादान’ एवं ‘द्विरागमन’ हिनक बहुचर्चित उपन्यास थीक। मैथिली उपन्यासमे‘कन्यादान’ क विशेष महत्व अछि। एहिमे अनमेल विवाहक समस्याकेँ उठाओल गेल अछि। पति-पत्नीक ई बेमेल ओकर अवस्था वा रूपक कारणे नहि, प्रत्युत शिक्षा दीक्षाकेँ ल’ कय अछि। एक एम.ए. पास युवकक विवाह ए.बी.सी. पर्यन्त नहि जननिहारि कनियाक संग होइत छैक। एहि प्रकारक विवाहकेँ उपन्यासकार नाटक काहेकद्ध भर्त्सना करैत छथि। अतएव स्त्री-शिक्षा ‘कन्यादान’ क प्रमुख स्वर थीक। एतय उपन्यासकार मैथिल समाजमे प्रचलित वैवाहिक विपमताकेँ अपन हास्य पृष्ठभूमि बनौलनि। एकर नायक सी.बी. मिश्र अत्याधुनिक पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक थिकाह जे ग्रामीण परिवेशसँ अनभिज रहलाक कारणेँ अपन आतृभाषा पर्यन्तसँ अपरिचित भ’ जाइत छथि। नायिका बुच्ची दाइ प्राचीन मैथिल संस्कृतिक प्रतीक थिकीह जनिका पर पाश्चात्य सभ्यताक कोनो छाप नहि छनि। नायक-नायिका संधर्षमय परिस्थितिक चिद्रण कय उपन्यासकार हास्य-ध्यंग्यसेँ ओत-प्रोत वातावरएणक निर्माण पाठकक हेतु कयलनि अछि। कन्यादानक अवसर पर जखन नायकस नाम पुछल जाइत छनि तखन ओ उत्तर दँत छथि—‘हमर नाम छय सी. सी. मिश्रा।‘1 एहन उत्तर सुनि मिथिलाक अशिक्षित महिलावृन्दक अट्टहाससँ सम्पूर्ण वातावरण गुंजित भ’ जाइत अछि। एहि पर एक तरूणी जे अपनाकेँ सबसेँ कुधियारि बुझैत छवि ओ छथि ओ टिप्पणी करैत छथिन—‘नखन तँ बोतल मिसर हिंनक बापे होइथिन।द्धद्ध वस्तुत: एहि प्रकारक कथोपकथन उपन्यासमे अनेक स्थल पर आयल अछि, जतय उपन्यासकार हास्य-रससँ युक्त वातावरणक निर्माण करबामे सफल भेलाह् भेलाह् अछि, ओतडि अशिक्षित मैथिलानी पर व्यंग्य सेहो कयलनि अछि। एकर किछु चरितकँ व्यग्यंकार एहि प्रकारेँ प्रस्तुत कयलनि अछि जे पाठक पर अपन अमिट छाप छोड़ैत छथि। ‘कन्यादान’ क घटकराज टुन्नी झाक स्वरूप, बजबाक शैली एवं उच्चारण प्रऋियासँ लोक चीन्हि जाइत अछि जे घटकैती करबामे पूर्ण अनुभवी भ’ गेला पर कथा तीन प्रकारेँ स्थिर करैत छथि ‘’एकटा खनखनौआ जाहिमे कन्यागत खनखनाके टाका हँसोथि लैत छथि। दोसर मानि लिय टनटनौआ जाहिमे बर पक्ष टनटनाक’ हजार पाँच शैक तोरा गनबैत छथि। तेसर मानि लिय ठनठनौआ जाहिमे वर कन्यागत दुह ठनठन गोपाल भए काज करैत छथि। हिनक खनखनौआ, टन-टनौआ, ठनठनौआ बलाघटकैतीक वृत्तान्त सुनितहि पाठक हँसैत-हँसैत लोट-पोट भ’ जाइत अछि। घटक-राज अपन वाक्-पटुतासे सेहो मनोरंजन करैत छथि। घटकराजकेँ घटकैतीक प्रति ई वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखाय उपन्यासकार हनका अपूर्व क्षमता प्रदान कयलनि अछि। जनैत एहिसै सफल चरिख कन्या-दानमे आर कोनो नहि अछि तकर कारण जे टुन्नी झा जकाँ अपन पक्षक प्रतिपादन बुते नहि भेलनि। ओ सामाजकि दोप तिलक-प्रथाक स्तम्भ स्वरूप थिकाह। एकरे फलस्वरूप मैथिल समाज दिन प्रतिदिन जजेरित भैल जा रहल अछि। ’कन्यादान’ एवं द्विरागमन अविस्मरणीय चरिख झारखण्डीनाथक क्रिया-कलाप, बाजब-भुकब, चलब-फिरब, खायब-पीयब सभमे हल्लुक हास्य भेटैत अछि। झारखण्डीकेँ वास्तवसे एतबा ज्ञान नहि छनि जे लाल काकीक तारक विपयमे ककरो आगूमे चर्चा नहि करबाक प्रतिज्ञा क’ एकर पालन करी। डाक्टरक संग हुनक कथोपकथनक एक अंश थवणीय अछि ‘’हमरा आङनमे कव्जियत बूझि पाता है। रामजीक परतापसँ कहियो-कहियो पेटो फूलि जाता है और लोक बेद नीके रहता है।‘’ जतेक बेर‘कन्यादान’ पाठक द्वारा बयम पुछला पर हुनक उत्तर तँ सुनू—‘’ सरकार ! हमरा लोक सभ दुलारसँ ‘खट्टर’ कहता है, लेकिन असल नाम झारखण्डी माय-बाप राखि दिया। और उमिरमे सरकार सब भाईसँ छोट है।‘’ ‘द्विरागमन’ मे झारखण्डीनाथ लाल ककाक ओतय बुच्ची दाइक शिक्षिका मेम साहेबक स्वागत करबाक हेतु प्रस्तुत होइत छथि। मेम साहेब हुनकासँ जिज्ञासा करैत छथिन—‘’ बाथ एहि ठामसँ बहुत दूर है। कोस छबेक-सातेकसँ कम नहि पड़ेगा। बाथ (गाम) मे आपका के रहता है ?‘6 बहवाँडि उत्तर तथा अपरिचित भाषाक नकलसँ एहिठाम हँसी लगैत अछि। उपन्यासकार हास्य उत्पन्न करबाक हेतु कतिपय चरित केँ अवलम्ब बनौलनि अछि। पुरोहित, जनिका लेल शुद्व उच्चारण करब गुण नहि, प्रत्युत आवश्यक छनि ; तोतराइत छथि। एहन पुरोहितक प्रसंगमे उपन्यासकार कहैत छथि—‘’ पंडित नवोनाथ झा तोताराइत-तोतराइत कंठरूपी बोरासँ उभड़-खाभड़ मंतक रोड़ा गड़गड़ा कए उझिलय लगलाह।‘’; मोहरिर जे लिखाइ-पढ़ाइ करैत-करैत बूढ़ भ’ गेल छथि, किन्तु तारक ‘क’ अक्षर पढ़बाक परिश्रममे परिश्रममे असफल भ’ जाइत छथि। बड़का गामवाली एवं बटुक जी प्राचीन परंपरागत रूढि़क झुंडमे रहितहुं शुद्व ओहि पक्षक पक्षपाती नहि छथि। हिनका सभक चरित्रमे साधारण बुद्वि उपन्यासक अन्य पात्रक अपेक्षेँ अधिक मात्रामे छनि। बटुक जी मूर्ख रहितहुँ अदूषित बुद्विक छथि। हिनक वार्तालय पाठकक मनोरंजन करैत अछि। एहि दृष्टिसँ सी. सी. मिश्रक प्रसंग हिनक कथ्य विलेक्षण अछि —‘’ हमरा लेखेँ त कुछ न छथ। ‘शंशकीरित’ मे हमरा साथ न बोल सकँ छथ। एगी कनी गो ‘जोतिश’के बाम पूछ देलिएन ताहीमे ढोकार हो गेलन। शीशूबोध के एगो इशलोक पूछलिऐन त चूड़ा अमौट दुन्नू खसे लगलैन। कुछ न छथ। मङनीमे महग छथ’’ ग्रामीण परिवेशमे रहितहुँ बड़का गामबाली पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक थिकीह जे सी. सी. मिश्रकेँ अपन हाथक कठपुतरी बना लैत छथि। हिनकेमे सी. सी. मिश्र अपन भावी पत्नीक मधुर कल्पना करय लगैत छथि जकर वास्तविकताक रहस्योदघाटन चतुर्थीक राति भ’जाइत अछि। उपर्युक्त नरित्र उपन्यासमे ‘कौमिक वातावरण उत्पन्न करबामे सहायक भेल अछि। भेल अछि। एहन-एहन पात्रक वृत्तान्त पढि़ क’ हँसी तँ लगबे करैछ, संगहि इही अनुभव होइछ जे समाजक प्रत्येक अंगमे सुधारक प्रयोजन अछि। ‘प्रणम्य-देवता काटाक्ष-पूर्ण रेखा-चित्र अछि जे प्रधानत: सामाजिक आलोचना प्रस्तुत करैत अछि। एहिमे ओ प्राचीन कथा-पद्वतिकेँ ग्रहण क’ गंभीर सँ-गंभीर विषयकेँ सरस-सुस्वादु बना क’ जनमन-रंजनक संग रूढि़-ग्रस्त जीर्ण-शीर्ण, विचारधारा परआधात कय नवीन प्रगतिक प्रेरणा दैत छथि। हिनका ने तँ प्राचीन अन्ध-विश्वासक प्रति निष्ठा छनि आने नवीनताक प्रति आसक्ति। एहिमे हास्य-व्यंग्यक सबसँ उपयुक्त स्थल तखन अवैत अछि जखन ओ भोजन अथवा धर्माचरणक प्रसंगकेँ ल’ कय कथाक पुष्ठिभूमि बनबैत छथि। जेना ‘विकट-पाहुन’ क चित्रणमे भोजन-प्रियता एवं अव्यवहार-कुशलताक कारणेँ हिनका सभकेँ दोसराक असौकर्यक कोनो ध्यान नहि रहैत छनि। पाहुनलोकनि अपन परिचय प्रोफेसर साहेवक लग कोना दैत छथि से देखू—‘’हें-हें-हें-हें अपने जे किने से हमरा चिन्हने हैब1 चीन्हब कोना ? कहियो देखने रही तखन ने ! हम अपनेक मसियौतक जे किने से-साढ़ू क पिसिऔत भाय होयबैन्ह।‘’ एहि प्रकारक परिचये वास्तवमे हास्यास्पद भ’ जाइत अछि। अध्रपक्क कटहर, एक हत्था पाकल केरा, एक बोतल धृत, माल्टेड मिल्क, एक पसेरी दालमोट एवं एक धरिका अमोटसँ गजेन्रद्र नाथ, ब्रजेन्द्र नाथ, भीमेन्द्र नाथ एवं दिसम्बर नाथक पनरिआइ होइत छनि। आब भोजनक सूची दिस दृकूपात करू— ‘’किन्तु हमर सरबेटा दिगम्बर नाथ—हें-हें-हें बिनु सोजने भात कोना खैताह ? हिनका लेल छनुआ सोहारी, अनोन तरकारी बना देबँन्ह। मधुरक संग खा लेताह। हमरालोकनि तँ- हेँ-हेँ-हेँ-हेँ धरे थिक। भोजनमे जे किने से भात, दालि, तरकारी, धृत, दही, चीनी, सब, आर की। हमरा संगमे एकटा जमीरी नेबो अछि से दूरि भेल जाइत अछि। तेँ थोड़ँ क मोछो मंगा लेब।‘’ मैथिलक भोजनप्रियताक एलबम एहिमे भेटि जाइत अछि जे हास्य उत्पन्न करबामे सहायक सिद्व होइछ। ’प्रणम्य-देवता’ मे धार्मिक आचरणक उल्लेख ‘धर्मशास्त्रचार्य’ एवं ‘ज्योतिषाचार्य मे विशेष रूपेँ भेल अछि। धर्मशास्त्रचार्य महामहोपाध्याय धुरन्धर शास्त्री अपन धार्मिक एवं आडम्बर ततेक ने पसारैत छथि जे पहिने ओ गामक लोक पर हँसैत छलाह; किन्तु बाह्याडम्बरक विरोध भेला पर आब हुनके पर संपूर्ण गाम हँसय लगैत अछि।‘ज्योतिपाचार्य ‘क अन्तर्गत ज्योतिप जनित आडम्बर पर व्यंग्य कयल गेल अछि। एहि दोपपूर्ण कारणेँ आदिस्यनाथ एवं मार्त्तण्डनाथक बीच टीका-टिकोअलि सेहो भ’ जाइत छनि। एहिमे सामाजिक समस्याक अतिरिक्त पारिवारिक समस्या पर सेहो व्यंग्य कयल गेल अछि। ‘साझी आश्रम’ मे जे चित्र प्रस्तुत कयल गेल अछि ओहि आधार पर परिवार सुख-साधनक बदला दु:खक अपार सागर बनि गेल अछि। वस्तुत: साझी आश्रयक जे दुर्दशा होइत छैक तकर एलबम भगीरथ झाक परिवारमे भेटैत अछि।11 व्यग्यकार अत्याधुनिक युगमे फैशनक बढ़ैत स्वरूप पर दृष्टिगम करैत छथि तँ हुनक लेखनी अत्यधिक प्रखर भ’ जाइत छनि। एहि, प्रकारक फैशनक अत्यधिक प्रभाव समकालीन नवयुवक समुदाय पर पड़ल अछि। अत्यधिक बनने दुर्घटना भ’ जैबाक संभावना रहैत छैक। आइ काल्हुक अप-टुडेट लेडी’ क प्रतीक थिकीहु ‘मंजुला देवी।‘’12‘नकली लेडी’ कोना सहजहि गमा जाइत छथि से ‘प्रणम्य देवता’ क ‘अंगरेजिया बाबू’क पत्नी ‘चमेली दाइ छथि।13 हुनक नकली स्वरूप तँ देखू—‘’ हे भगवान ! ई की !श्रीमती जी सबटा चौपट कैलैन्हि। नाक पर ‘स्नो’ लागल। कनपटद्यटी पर ‘पाउडर’पोतल ! गाल पर ‘लिपिस्टिक’ ढेउरल ! ठोर पर ‘नेल पालिश लेभरल ! हाय ! हाय !बहुरूपियाक वेश बना लेलन्हि ।‘’ जे ‘हिन्दुस्तानी साहेब’ अंग्रेजक ‘प्रियतम सम्बन्धी बनय चाहैत छथि तनिक झलक मधुकान्त चारत्रमे भेटैत अछि। ’रंगशाला’ क प्रत्येक कथा ओना तँ हास्य-व्यंग्सँ ओत-प्रोत अछि, किन्तु एकरा हिनक अन्यान्य रचना सदृश लोकप्रियता नहि भेटलैक। एहि प्रसंगमे ओ लिखैत छथि—‘’ई तेहन मनोनुकूल नहि भेल आ ततबा लोकप्रियो नहि भ’ सकल। तथापि एकरा द्वारा एक ढर्रा कायम भ’ गेलँक और गोटा नव-नव पर कथा-कहानी लिखय लगलाह।‘’15एकर प्रत्येक कथा एक वर्ग विशेषक प्रतिनिधित्व करैछ। हास्य-व्यंगक माध्यमे कथाकार सामाजिक दुर्नीतिसँ समाजकेँ पथक करबाक प्रयास कयलनि अछि। पात्रक चयनमे कथाकारकेँ बीआय नहि पड़लनि कथाकार स्वयं एहि तथ्यकेँ स्वीकार करैत छथि—‘’ हँसि, हँसि कऽ आनन्द कियेक ने लेल जाय ? क्षणिके विनोद सही, रसक छिटका तँ भेटत। कोन ठेकान, कदाचित एतबे मात्र सत्य होइक।‘’16 हास्य व्यंग्यक अत्यन्त सजीव ‘खट्टर तरंग’ मे उपलब्ध होइछ। एकर कधा नायक खट्टर कका पूर्णत विनोदी प्रकृतिक व्यक्ति छथि। हिनक प्रत्येक बात विनोदपूर्ण होइत छनि। ई अपन प्रत्युत्पन्नमतित्वक कारणेँ सदिखन काव्य-शास्त्र:विनोदक धारा प्रवाहित करैत् छथि। हिनक विनोदपूर्ण वार्तामे व्यंगयकार व्यक्ति, समाज धर्म, दर्शन आदिक कटू आलोचना करैत छथि। थैकरे जकरा ‘राउण्ड एबाउट पेपर्स’ कहलनि तकरा व्यंग्यकार खट्टर ककाक समक्ष परम्पर-के केन्द्र विन्दु बनबैत छथि। ओकर चारू भाग नवीन विचार-धारा प्रस्तुत करैत छथि। आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे प्राचीन मान्यता कोनो अर्थ नहि रखैत अछि। ‘खट्टर ककाक तरंग’ मे वणित विषय विचारात्मक, सरस एवं मनोरंजक अछि। हिनक वात लुती सन होइत छनि। ई देशक मूर्खताक श्रेय पंडितकेँ दैत छथि। एहि कमये ई असली एवं नकली पंडितक सम्पक् विश्लेषण कयलनि अछि—‘’ असली पंडित विद्याक अन्वेषणमे रहैत छथि, नकली पंडित विदाइक अन्वेषणमे। असली ज्ञानक विस्तार करैत छथि, नकली पंडित धोधिक विस्तार असली पंडित सूर्खताक संहार करैत छथि, नकली पंडित केवल मधुरक।‘’ हिनका अनुसारे वैह वासतवमे पाडित्य प्राप्त कयने छाथे जे अपन बुद्विक प्रयोग नित-नूतन आविष्कार हेतु करैत छथि। क वेद-पुराण, कमेकांड-धर्मशास्त्र गीता-वेदान्त, रामाण-महाभारत, ज्योतिष-आयुर्वेद, तंत्र-मंत्र, देवी-देवता स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म-मोक्ष, पाप-पण्य सभकेँ ई कोना लैत छथि से देखबाक एवं हँसबाक अवसर एहीमे भेटँत अछि। एकर मर्मस्पशी व्यंग्य अन्तस्तलमे पहुँचि सुरसुरी लगा दैत अछि। ओ अन्ध-विश्वास, धार्मिक पाखण्ड दोंग, रूढि़ आदिक प्रति व्यंग्यक माध्यमे भयानक विद्रोह करैत छथि। एहि प्रकारक मतक खण्डनमे हिनका ततवा रस भेटँत छनि जे सामाजिक रूढि़ वा अन्धविश्वास पर प्रहार करबाक हेतु ई संदिखन भंगघोटना लेने तत्पर रहैत छथि। जाधरि पाश्चात्य-प्राच्य सभ्यता एवं संस्कृतिक समन्वय नहि हैत ताधरि जीवनक कोनो मूल्य नहि। अतएव एहन समन्वय कोन प्रकारेँ होमक चाही ? युगक अनुसारेँ समन्वय अनिवार्य प्रतीत होइत अछि। एहि प्रसगमे खट्टरककाक दावा छनि जे ओ गोनू एवं गंगेश दुनूक वंशज थिकाह तखन पाश्चात्य सभ्यताक प्रतीक बूझब भ्रम थीक। हुनक कथन छनि जे ‘’ही इयैह बात तँ बुझबामे नहि अबैत अछि। कोन प्रकारेँ सम्न्वथ करै कहैत छह ? आबसँ शिवजीक माथ पर ‘सोडा वाटर’ ढारि दिऐन्ह ? भगवतीकेँ औचरक बदला ‘गाउन’ ओढ़ा दिऐन्ह? कुल देवताकेँ लिपिस्टिक लगा दिऐन्ह ? श्राद्वमे ‘केक’ ल’ कए पिंड दी? ब्राह्यण भोजन करा क’ ‘बिल’ द’ दिएन्ह ? जनउ धोबक हेतु ‘लोण्ड्री’ मे द’ दिऐक ? तारा काकीकेँ अंग्रेजीमे समदाउन गाबय कहिऐन्ह।‘18 एहि प्रकारेँ परम्परावादिताक जालमे ओझरयल समाज एवं व्यक्ति पर ओ जे व्यंस्य कयलनि अछि ताहिमे शाश्क्तक माधुर्य्य एवं कुनैनक तिक्तताक प्राचुर्य अछि। हुनक कथन छनि ‘’हमर बात् होइत अछि ओलक टोंटी कतेक गोटाकेँ भक द’ लगतँन्ह। कतेक गोटाकेँ अमाँशय उखडि़ जेतँन्ह।‘’19 हिनक विनोदपूर्ण विचार-पाठक विशेष रूपसेँ मनोरंजन करबे करैत अछि संगहि स्थल-स्थल पर व्यंग्य रूप तेहन झँसिगर भऽ गेल अछि जे औखि-नाकसँ पानि सेहो बहय लगैत । एहिसँ स्पष्ट जाइछ जे हिनक व्यंयक अत्एंत स्पष्ट रूप एहिमे उपलब्ध होइछ। चर्चरी हिनक विविध रूपक रचना संग्रह थीक। एहिमे कथा-पिहानी, एकांकी-प्रहसन, गप्प-सप्प किछु संगृहीत ओछ जाहिमे प्राचीनता एवं आधुनिकता पर समान रूपेँ व्यंग्य कयल गेल अछि। परम्परावा एवं अन्धविश्वासी मैथिल संस्कृतिक प्रतीक थिकाह भोल बाबा, जे अपन वाक् चातुर्य्यसँ हास्य एवं व्यंग्यक धारा बहौलनि अछि। ओ पुरातनताक पृष्ठभूमिमे अर्वाचीनताक जन्म मानैत छथि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्पमे हिनक‘दलान परक गप्प’, ‘चौपाडि़ परक’, ‘धूर तरक गप्प’ एवं ‘पोखरि परक गप्प’ विशेष उल्लेखनीय अछि। हिनक मान्यता छनि जे प्राचीन महापुरूष लोकनिक आदर्शमय जीवन छलनि। ओ स्वाभिमान, मर्यादा एवं मनस्विताक सुरक्षार्थ सतत तत्पर रहैत छलाह। भोल बाबाक अनुसारेँ आधुनिक सभ्यता प्राचीन पृष्ठभूमिमे कोनो अर्थ नहि रखैछ। ई प्राचीनकेँ आदर्श-मानि आधुनिकता पर व्यंग्य करैत कहैत छथि जे आधुनिक समयमे सब प्राचीन वस्तु समाप्त भेल जा रहल अछि—‘’हाथीकेँ मोटर खयलक, धोड़ाकेँ साइकिल खयलक, रामलीलाकेँ सिनेमा खयलक, भोज केँ पार्टी खयलक, भाँगकेँ चाह खयलक तथा संस्कृतिकेँ अंग्रजी खयलक।‘’20’’ हरिमोहन झा हास्य-व्यंग्यक माध्यमे नारी जागरणक शंखनाद कयलनि। चर्चरीक अनेक कथाक माध्यमे ओ मिथिलाक तारीमे दुर्गाक रूप प्रतिष्ठिन करय चाहैत छलाह। ग्रेजुएट पुतोहु’21 मेमे जाग्रत नारीक प्रति समाजमे उत्पन्न प्रतिकियासँ परिचय करबैत छथि। ‘ ग्राम सेविका’22 मे ओ जाग्रत नारीक मंजुल मंगलमयी मूर्तिकेँ प्रतिष्ठित करैत छथि। नारी जागरणक फलस्वरूप ओहो सब आब काटरक विरोधमे नारा लगबैत छथि। ‘एहि बाटे आबै छथि सुरसरि धार’23 मे मिथिलाक नारी अनमेल विवाह एवं तिलक दहेजक विरोधमे आवाज उठौलनि। ओ सब कहैत छथि जे ‘’ बिकी बला वर जाथु अपन घर। जे मँगताह हजार से रहताह कुमार। जे गनताह ओ कनताह। घटक पजियार होठ होशियार आब ने चलत ई रोजगार।‘24 किछुए दिनक पश्चात् नारीक एतेक बेशी जागरण भेल जे ओ सब आदर्श-विवाहक हेतु आन्दोलन प्रारंभ कयलनि। समाजक एहन कांति देखि व्यंग्यकार कहैत छथि ‘’ हरब तिलक ने तँ रहब कुमारि। जे नहि करताह द्रव्यक माँग, सैह भरता कन्याक माँग। तिलक करू दूर तखन दिअ सिन्दूर।‘’25 एहन परिवर्तित परिस्थितिमे नारी पुरूषक संग चलब प्रारंभ कयलनि तकरा देखि भोल बाबा चिन्तित भऽ जाइत छथि। ओ कहैत छथि जे नारी जागरणक फलस्वरूप ‘’पुरूषक संग बैसि क’ दौड़ैत अछि, कुदैत अछि, फनैत अछि, हेलैत अछि, नचैत अछि।‘’26 हिनक हास्य व्यंग्यक प्रतिभाक वास्ततिवक प्रस्फुटन हिनक काव्यमे भेल अछि। हिनक हास्य व्यंग्यक रूप अधिक स्पष्ट तखन होइत अछि जखन ओ समकालीन समाजमे प्रचलित अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाहक समस्या पर प्रहार करैत छथि। मिथिलाक सामाजिक जीवनमे ई मान्यता प्रचलित रहल अछि जे पुरूष कतबो विवाह किऐक ने करथु, किन्तुनारी एकहि विवाहक अधिकारिणी छथि। एकरे फलस्वरूप वृद्व व्यक्ति अपन कुलीनताक आधार पर अनेक विवाह करैत छथि। व्यंग्य-कवि एहि पृष्ठ भूमिक व्यंग्यात्मक शब्द चित्र अपन प्रसिद्व कविता ^ढालाझा’27 मे प्रसतुत कयलनि अछि। ढाला झाक स्वरूपक चित्रण करैत कहैत छथि जे हुनक माथ पर फाटल पुरान पाग तथा कान्ह पर गोबनौर सन अंगपोछा, माथ खल्वाट, त्रिपुण्डछक तीन ठोप तथा पैध रूद्राथ टीकमे बान्हल छनि। इऐह थिकाह ढाला झा, लुट्टी झाक प्रणैत्र, नरहा पौजि, ककड़ौड़क वासी एवं बेलौंचेक वंशज। हिनक यथार्थ स्वरूप कार्टून सदृश अछि जकरा देखतहि पाठकक हास्यक कोनो अन्त नहि रहैछ। औ बहुविवाहमे विश्वास रखनिहार ओहि प्राचीन परम्पराक अनुमोदक तथा कुलीन प्रथाक प्रतीक थिकाह जे सासुरकेँ आर्थिक आयक अजस्त्र स्त्रोत मानैत छथि। समय-समय पर ओ ओतय ओहिना प्रस्तुत होइत छथि जेना महाजन लहना-तगादाक हेतु खदुकाक ओतय जाइछ। ओ अपन श्वसुरक प्रसंगमे जिज्ञासा करैत छथि— कहाँ गेलाह फल्लाँ झा कन्यादानी श्वशुर हुमर हुनकासँ जरूरी खानगीमे गप्प करबाक अछि22 कुलीनताक कारणेँ ढाला झा अपन श्वसुरक प्रति एहन संबोधत दैत छथि। मैथिल समाज विभिन्न प्रकारक पाँजि एवं जातिक नाम पर विभाजित अछि। ओ श्वशुरसँ भरना छोड़ैबाक हेतु टाकाक मांग करैत छथि, किन्तु हुनक अस्वीकारात्मक उत्तर पाबि बमकि उठैत छथि— सासुरक अछि कोन कमी, जाइत छी दोसर ठाम जे नहि रूपेया देत, भोगत भरि जन्म फल बेटी हकन्न रहतइ कनैत ओकर जीवन भरि हमरा की ? जेम्हरे जैब, सार कोनो भेटिए जैत। ई कहि फराठी लैत, लग्गा सन डेग दैत मैल किट्ट फाटल पुरान पाग माथ पर लैत अङपोछा कान्ह, कुद्व कठकोंकाँडि़ जकाँ विदा भेलाह ढाला झा पित्ते थर-थर कपैत 29 एतय हास्यमे सन्निहित व्यग्य द्वारा ओ सामाजिक दोष दिस सर्वसाधारणक दृष्टिकेँ आकृष्ट करैत छथि। मिथिला मध्य एहि प्रकारक वैवाहिक प्रचलन मुख्यत: जाति-पाँति पर अवलंबित अछि। मैथिलके गर्व छनि जे ओ श्रीकान्त झा, महादेव झा, यजुआड़ै एवं बेलौचेक वंशज थिकाह। वस्तुत: मूल आर गोत्र पर समाज ततेक विश्वास करैत अछि जे ओहि वितण्डावादक फलस्वरूप ओकर अध: पतन शनै-शनै भेल जा रहल अछि। एहि प्रकारक परंपरावादीद वैवाहिक कुरीतिसँ जर्जरित समाजक पाँजि’ पाटि, सिद्वान्त पतड़ा, हरिसिंह देवी व्यवस्थाओ कर्मकाण्ड पर व्यंग्य कवि कहैत छथि जे आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे ओ सब ‘आगि’ मे धू-धू क’ जरि रहल अछि— रातिमे हम स्वप्न देखल, आगि लागल घर जरैये। चार सभ पुरना धधकि कय जोर सँ धू-धू करैये।।31 जहिना जहिना आधुनिकताक अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित भेल जा रहल अछि तहिना पुरातन-ताक धज्जी-धज्जी उडि़ रहल अछि। एतय ओ अन्धविश्वास, असमर्थता, आडम्बर, धर्म-नीति एवं संस्कृति पर निर्ममता र्वक व्यंग्य कयलनि अछि जतय फोंका पर्यन्त बहरा जाइत अछि। अर्थाभावक कारणेँ समकालीन मैथिल समाजमे कन्या-विकयक प्रथा सेहो प्रचलित अछि। कन्या-विकयक कारणेँ अनमेल विवाहकेँ प्रोत्साहन भेटल अछि। एकरे परिणाम थीक जे कोमल कलीकेँ कोकनल ढेंगक संग विर्वाह करय पडैत छनि। व्यंग्यकार‘कन्याक नीलामी डाक’32 मे अध: पतित कुलीन प्रथा एवं समाज पर कुठारधात करैत छथि। वर पक्ष एवं कन्या पक्षक घटक उपस्थित भ’ कोना परस्पर वर्तालाप करैत छथि, कथा स्थिर करैत छथि, तकर रूप तँ देखू— वर पक्षक घटक— सिंह लग्न मे जन्म भेल छन्हि, वयस तीनिये श्रीस। टीपनि अपने मिला लिय, संवत उनैस सै तीस। कलम चारि बीधा अपन छन्हि, हर बड़द दुइ जोड़। डेढ़ पाइ मासो किनलन्हि अछि, टका छैन्हि नहि थोड़। बेस किमतिगर छथि पनिगर हिनका सन भेटत ने आन। (कानमे कहैत छथि) तीस टका अपनहु के भेटत, खैब सुपारी पाम। दुनू पक्षक घटकक पारस्परिक वार्तालापक कममे विवाह स्थिर भ’ जाइछ, कारण कन्याक पिता कन्या बिकी हेतु उताहुल छथि। व्यंग्यकार एहन कन्याक पिता पर व्यंग्य करैत छथि— करब कथा पहिने जौँ हम्मर सभटा कर्ज सधावी चारि सौ जे गनि दिय’ व्यवस्था झट सिद्वान्त लिखाबी 31 एहि पर वरक उत्तर छनि— तावत तिन सै आनल, बाँकी देब सधाय 35 एहि पर कन्याक पिता उत्तर दैत छथि— ‘हैण्ड नोट लिखि देल जाय, अपनेकेँ कयल जमाय’ 36 जाहेना कोनो वस्तुक बिकीक हेतु बजारमे त्वंचाहंच होइछ तहिना वर एवं कन्यापक्षक घटक बीच सेहो होइछ। आश्चर्य तँ तखन होइछ जखन कन्याक पिता निर्ल ज्जतापूर्वक घोषणा करैत छथि जे जैह कर्ज सधा सकताह सैह कन्याक अधिकारी हेताह। समाजक आर्थिक दशा सुदृढ़ नहि रहलाक कारणेँ मिथिलामे एहि प्रकारक अनमेल विवाह प्रचलित अछि। एतय हास्य एवं व्यंग्य दुनूक रूप अत्यन्त तीव्र अछि। मैथिल लोकनिक भोजनप्रियता जगतसिद्व अछि। एहन भोजलन-विन्यास पर प्रो. झा निश्चित रूपेँ व्यंग्य कयलनि अछि। मिथिलामे जमायक स्वागतार्थ कतेक विन्यास कयल आइद तकर स्पष्ट चित्र ‘ढाला झा’ मे भेटैछ :— रातिमे सचार लागल ढाला झाक आर्गामे बाटी अठारह टा हुनका आगाँ लगाओल गेल बड़ बड़ी भटबड़ कदीमा तिलकोड़ और पापड़ तिलौरी ओ दनौरी आदौरी भाँटा एक बट्टा छल्हिगर दही एक बट्टा खोआ गाढ़ चीनी पर्याप्त, मालभोग केरा पाकल खूब डेढ़ सेर मेही भात, जाँति कऽ छलैन्हि परसल धृतसँ कँल चिक्कन तथा बाटीमे राहडि़ दालि आमिल देल, ऊपर खूब घृत छह छह करैत एहि प्रकारक भोजन-विन्यासक वर्णन सुनितहिँ निश्चये क्षुधाग्नि भऽ जाइछ। एतय व्यंग्यकार प्रचलित परंपरा पर प्रहार क’ हास्ये नहि, व्यंग्यक पर्याप्त सामग्री पाठककेँ देबाक प्रयास कयलनि अछि। समाजक अन्यान्य अपेक्षा ढोंगी-पोंगा-पथी पंडित लोकनि हिनक हास्य-व्यंग्यक सबसँ बेशी शिकार भेलाह। तन्त्र-मन्त्र, शास्त्र-पुराणक वितण्डवादक कारणेँ सामाजिक जीवन दिन-प्रति-दिन विषम भेल जा रहल अछि। एहना स्थितिमे व्यंग्यकार कोना चुप्प बैसि सकैत छथि ? धर्मक नाम पर विषम भेल जा रहल अछि। एहना अपनाकेँ अग्रदूत बुझनिहार पाखंडी ‘पंडित लोकनि’ पर व्यंग्य कय व्यंग्यकार हुनक भंडा फौड़लनि अछि। यथार्थत: ओ लोकनि अपन ज्ञानक दुरूउपयोग निष्प्रयोजन शास्त्रार्थक चकमे समाप्त क’ दैत छथि। आधुनिक संदर्भमे पंडितलोकनिक किया-कलाप ठप पडि़ गेल, किएक तँ युग परिचतित भ’ गेल अछि। परिवत्तित परिस्थितिकेँ देखि पंडितलोकनिमे आत्रोशक भावना स्वाभाविक अछि। एहना हुनका सभक विलापक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि रहि जाइछ1 ‘पंडित’ मे पाठकेँ प्रचूर सामग्री भेटँत छनि— जमाना बदलि गेलैक, उनउलै बात सब पुरना। उठै अछि पित्त तँ बहुतो करू की वृद्व अथबल छी जहाँ बट्टाक धृत पड़ै छल भोजमे आगाँ तहाँ आब डालडासँ दालि छौंकल देखि छी 35 ‘बुचकुन बाबा’ केँ आधुनिक नारीक पहिरब-ओढ़ब, चलब-फिरब, लिखन-पढ़ब एवं उन्मुक्त जीवन फुटलो नहि सोहाइत छनि। हुनका अनुसार नारी सतत दासताक बेड़ीमे जकड़ल रहथि, सँह उत्तम। हुनकर कथन छनि जे लोक केचुआकेँ फूँकि-फूँ कि साँपक सर्जन रहल छथि। एहन परिस्थितिमे ओ हफीम खा क’ अपन प्राणान्त करय चाहैत छथि। व्यंग्यकार वस्तुत: एहन पण्डितक अन्ते चाहैत छथि। पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृतिक रगमे सँगाक’ नारी ग्रामीण परिवेशमे अत्यन्त उपहासात्मक बनि जाइछ। एकर स्पष्ट चित्रण व्यंग्यकार 'अँङरेजिया लड़कीक समदाउन’ मेकयलनि अछि— आङनक बाहर घुमय नाह जयबैक भैसुर जैताह पड़ाय देब पितर किनको नहि हँसबैन्ह सभ जँताह तमसाय ओहिठाम जा अण्डा नहि मङबैक तकर ने छैक उपाय जो मन हो कहबैन्ह चुपचाताहे आनि देताह हमर जमाय 39 पाश्चात्य सभ्यतामे लालित-पालित कन्याकेँ चेतावनी दैत छथि; किन्तु हुनक व्यवहार पर व्यंग्यकारक आक्षेप एकदम स्पष्ट अछि। आधुनिक सभ्यातामे प्रो. झा केँ जे दोष परिलक्षित होइत छनि तकरी ई व्यंग्यक माध्यम बनबैत छथि। हिनक प्रसिद्व कविता ‘टी-पार्टी विशुद्वा हास्य-रसक रचना थीक। टी-पार्टी आधुनिक सभ्यता एवं संस्कृतिक प्रतीक थीक। एहि कवितामे कृत्रिमताक अभाव् अछि व्यंग्यकार कोनो अलंकरणक चेष्टा नहि कयलनि अछि। एकर भाषामे अद्भभुत प्रवाह अछि। हास्य-रसक पुष्टिक हेतु जेहन भाषा आवश्यक अछि ताहि रूपक भाषाक प्रयोग एहिमे कयल गेल अछि। ‘टी-पार्टी’ क बाह्यडम्बरक प्रति कवि उपहास करैत छथि— दूरे सँ देखँत छी जे अपूर्व अछि समारोह कुर्सी ओ टेबुल कतार सँ सजाओल अछि उज्जर दपादप श्वेत चादर ओछाओल और नाना प्रकारक फुलदान अछि शोभायमान40 पार्टीक साज-सज्जा तथा अल्प भोजनकेँ देखि कवि व्यंग्य करैत छथि— एकटा सिहारा और एक फक्का दालमोट एक रसगुल्ला और बुनिया एक चौठी मात्र तोला भरि सेबइ समतोला दुइ फाँक एक चुटकी किशमिश तथा सोहल केरा टा41 पार्टीक पश्चात् व्यंग्यकारक मनमे आधुनिक सभ्यताक प्रति जे भावना जागत भेल ओ निश्चये उपहासात्मक थीक। बस पार्टीक ने नाम लिय सोझे जाड भानसमे पजारू गऽ आँच शीघ्र खीचडि़ और साना बनाउ जतेक जल्दी हो आर ई कार्ड लऽ कऽ चूल्हिमे झोंकि दिअ42 प्रोफेसर हरिमोहन झाक उपर्युक्त रचना समूहक विश्लेषणसँ एतबा एतब। निश्चित रूपेँ कहल जा सकैछ जे ई मैथिली हास्य-व्यंग्य-साहित्यक उज्जवल भविष्यक सूचक भेलाह। हिनक हास्य-व्यंग्य रचनाक प्रभाव मैथिली समाज पर तीन रूपेँ पड़लँक। प्रथम तँ ई मैथिलीमे पाठक वर्गक निर्माण कयलनि। द्वितीय, मिथिलाक कन्यालोकनिक व्यक्तिगत जीवन प्रभावित भेल जकर फलस्वरूप हजारक हजार शिक्षित भ’ रहलि छथि। तेसर प्रभाव मैथिलीक परवर्ती साहित्यकारलोकनि पर पड़लनि ये एहि मे उन्मुख भेलाह जहिना सुस्वादु, चर्व्य चोष्य, लेह्य, पेय भोजनकेँ प्राप्त कयला पर हौइत छनि तहिना हास्य-व्यंग्यमे अभिरूचि रखनिहार पाठककेँ हिनक रचनाक पारायणोत्तर हिनक रचनाक लोकप्रियताक अनुमान तँ एही सँ लगाओल जा सकैछ जे उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति’ केँ पढ़बाक हेतु अनेक अहिन्दी भाषी पाठक प्रोफेसर हरिमोहन झाक चित्ताकर्षक हास्य-व्यंग्य-रचनाक रसास्वादनक लेल हिनक विभिन्न रचना समय-समय पर विभिन्न भारतीय एवं मासिक पित्रकादिमे अनूदित भ’ प्रकाशित होइत रहल अछि। श्रेय हिनके छनि सर्वाधिक रचना विभिन्न भाषामे सेहो अनूदित प्रसंग-निर्देश 1. कन्यादान, पृष्ठ 18 2. तत्रैव, पृष्ठ- 19 3. तत्रैव, पृष्ठ— 21 4. तत्रैव, पृष्ठ— 37 5. तत्रवै, पृष्ठ — 38 6. द्विरागमन, पृष्ठ— 158 7. कन्यादान, पृष्ठ— 104 8. तत्रैव, पृष्ठ — 59 9. प्रणम्य देवता, पृष्ठ—3 10. तत्रँव, पृ — 12 11. तर्त्रव, पृष्ठ— 53 12. तत्रैव, पृष्ठ —232-245 13. तत्रँव, पृष्ठ—270 14. तत्रँव, पृष्ठ—274 15. प्रथम अखिल भारतीय मैथिली लेखक सम्मेलन, कथा विभागीय सभापतिक भाषण, वैदेही समिति, लाल बाग, दरभंगा-1853पृष्ठ-3 16. रंगशाला एक-झलक, पृष्ठ—‘ख’ 17. खट्टर ककाक तरंग पृष्ठ- 293 18. तत्रँव भूमिका, पृष्ठ-छ 19. तत्रँव — पृष्ठ-ग 20. चर्चरी, पृष्ठ-220 21. तत्रैव, पृष्ठ-1 22. तत्रैब पृष्ठ -24 23. तत्रव, पृष्ठ-189 24. तत्रै व, पृष्ठ-189 25. तत्रै व, पृष्ठ-129 26. तत्रै व, पृष्ठ- 248 27. मासिक स्वदेश, वर्ष-1 अंक 4 विकास संवत् 2005 चैत्र, पृष्ठ- 28. तत्रैव, पृष्ठ-153 29. तत्रैव, पृष्ठ-153 30. वैदेही, अक्तूबर 1253, पृष्ठ-155 31. तत्रै व 32. मिथिला, वर्ष-1 अंक-4 जेठ, सन् 1336 पृष्ठ- 99. 33. तत्रै व 34. तत्रै व 35. तत्रै व 36. तत्रै व 37. मासिक स्वदेश, पृष्ठ-154. 38. मिथिला-दर्शन मार्च पृष्ठ- 1260, पृष्ठ-2 39. वैदेही विशेषांक-सन् पृष्ठ 1350 पृष्ठ 9. 40. मासिक स्वदेश, वर्ष-1 अंक 4, -वैशाख, विकम 2005र्सवत् पृष्ठ- 391 41. तत्रै व पृष्ठ- 220 42. तत्रै व, पृष्ठ- 222 (हरिमोहन झा अभिनन्दन ग्रन्थ 1983)। 1 Kundan Jha said... प्रेमशंकर सिंह जीक हरिमोहन झाजीपर लेख बहुत रास कथ्यकेँ देखार कएलक। Reply05/15/2009 at 08:35 PM 2 preeti said... premshankar singh jik aalek bad nik Reply05/05/2009 at 02:05 PM कथा-नदी सुभाषचन्द्र यादव- चित्र श्री सुभाषचन्द्र यादव छायाकार: श्री साकेतानन्द सुभाष चन्द्र यादव, कथाकार, समीक्षक एवं अनुवादक, जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। आरम्भिक शिक्षा दीवानगंज एवं सुपौलमे। पटना कॉलेज, पटनासँ बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्लीसँ हिन्दीमे एम.ए. तथा पी.एह.डी.। १९८२ सँ अध्यापन। सम्प्रति: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, पश्चिमी परिसर, सहरसा, बिहार। मैथिली, हिन्दी, बंगला, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, स्पेनिश एवं फ्रेंच भाषाक ज्ञान। प्रकाशन: घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। भूतपूर्व सदस्य: साहित्य अकादमी परामर्श मंडल, मैथिली अकादमी कार्य-समिति, बिहार सरकारक सांस्कृतिक नीति-निर्धारण समिति। नदी बिहारी परसू आयल रहय । एहि शहरमे गगनदेव केँ छोड़ि ओकर अओर क्यो परिचित नहि रहैक। तेँ ओ तत्काल गगनदेव लग टिक गेल छल । एहि शहरमे ओकरा एक साल रहय पड़तैक। एतेक दिन धरि गगनदेव लग टिकनाय व्यावहारिक दृष्टि सँ ठीक नहि रहै तेँ एतय अबिते बिहारी केँ किराया पर एकटा कोठली तकबाक चिन्ता लागि गेलै आ अगिले दिन ओ तलाशमे निकलि पड़ल । शहरसँ अपरिचित रहबाक कारणे ओ गगनदेवो केँ संग कऽ लेलक । दुनू काल्हिए सँ भटकि रहल छल आ अखनधरि कोनो ढँगगर कोठली नहि भेटल छलैक । पैदले एम्हर सँ ओम्हर भटकैत रहलाक कारणे ओ दुनू थाकि गेल छल आ मनमे निराशा पसरल रहैक । कनेक काल सुस्तयबाक लेल ओ दुनू चाहक दोकान दिस बढ़ि गेल । ओ इलाका ऊँच आ गाछ – बिरिछसँ भरल रहैक । एक घंटा पहिने भेल बरखामे हरेक चीज धोआ – पोछा कऽ साफ आ चमकदार भऽ गेल रहै आ पूरा प्रकृति आकर्षक आभामे दमकैत रहय। पीपरक विशाल गाछक नीचा सड़कक दुनू कात देहाती जनानी सभ ढकिया-पथियामे सामान लऽ कऽ बैसल छलै आ लोक सभ दैनिक वस्तुजात बेसाहयमे लागल छल । ओ दुनू दोकान पर बैसल चाह पीबि रहल छल । तखने नौ-दस सालक एकटा लड़की गगनदेवक बगलसँ गुजरलै । दुनूक आँखि मिललै आ सरल जिज्ञासा मे एक-दोसर पर स्थिर भऽ गेलै । फेर ओ लड़की आगू बढ़ि गेलै । गगनदेव चाह पिबैत-पिबैत ओहि लड़कीकेँ बिसरि गेल। बिहारी चिन्तित आ उदास बुझाइत रहय । चाह पीलाक बादो ओ दुनू कने काल धरि दोकान पर बैसल थकनी मेटबैत रहल । फेर उठि कऽ पानक दोकान पर चलि गेल । पानक दोकान पर आबि कऽ गगनदेवकेँ परम आश्चर्य भेलै । ओ लड़की ओत्तहि ठाढ़ छलै । लड़कियो गगनदेवकेँ देखलकै । दोकान पर भीड़ रहै । नहि जानि ओहि लड़की कें की लेबाक छलै । ओ दुब्बर-पातर छलै आ अन्तर्मुखी लागि रहल छलै । ओकर कोमल चेहरा पर बाल-सुलभ निश्छलता आ सहजता रहै । ओ गगनदेवकेँ एकटक तकैत चल जाइत रहै । गगनदेवक नजरि कतहु आओर छलैक लेकिन एहि बातक प्रति ओ सचेत छल जे लड़की ओकरा एकटक देखि रहल छैक । गगनदेव बूझि नहि पाबि रहल छल जे लड़की कियैक ओकरा देखि रहल छैक आ ओकरामे ऐहन की छैक जे ओ ताकि रहल छैक । ओकर तीक्ष्ण दृष्टिसँ गगनदेव आहत आ बेचैन छल । ओ बड़ी मुश्किल सँ लड़की दिस ताकलक । लड़की अखनो ओकरा पर नजरि टिकौने ठाढ़ रहैक । ओकर दृष्टिक रहस्य बूझब गगनदेवकेँ असंभव बुझा रहल छलै । भरिसक ओकर पूरा व्यक्तित्व लड़की लेल स्पृहणीय भऽ उठल होइ’। गगनदेव ओकर गाल छुलकै । लड़की विडुँसलै आ लाजेँ मूड़ी गोंति लेलकै । ओहिठाम सँ विदा होइते गगनदेव केँ बुझयलै आब ओकरा सँ फेर कहियो भेंट नहि हेतैक । लेकिन एहि बातक लेल ओकरा दुख नहि भेलै । ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूति सँ भरि गेल रहय । 1 Anand Priyadarshi said... ओहिठाम सँ विदा होइते गगनदेव केँ बुझयलै आब ओकरा सँ फेर कहियो भेंट नहि हेतैक । लेकिन एहि बातक लेल ओकरा दुख नहि भेलै । ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूति सँ भरि गेल रहय | bah ki kahal aa ki ham bujhal, muskurahat nikali gel Reply05/15/2009 at 08:55 PM 2 Dr Palan Jha said... chhota katha, lagal hamare varnan kathakar kay delanhi. Reply05/15/2009 at 08:48 PM उपन्यास -कुसुम ठाकुर प्रत्यावर्तन - (चारिम खेप) १० हम माँ के सँग आय अरुणाचल जा रहल छी। माँ आयल तs रहथि हमर द्विरागमन करबाक लेल मुदा हमर सास ससुर नहि मानलथि। काका के बदली राँची सs कहियो भs सकैत छलैन्ह। इ सोचि हिनकर इच्छा आ जोर छलैन्ह जे द्विरागमन भs जायत तs हमरो नाम मुजफ्फरपुर मे लिखवा दितथि आ हम ओहि ठाम पढितहुं। माँ सब के सेहो चिंता नहि रहितियैन्ह आ हिनको नीक रहितियैन्ह। बाबुजी के चिट्ठी लिखि कsएहि लेल इ मना लेने रहथि। जहिया सs हमर मोन ख़राब भेल छल तहिया सs इ लगभग सब मास एक बेर राँची आबि जायत छलाह। मुदा हमर सास एकही बेर कहि देलथिन "आय धरि हमरा सब ओहिठाम पहिल साल मे द्विरागमन नहि भेल अछि, आ नहि धारति अछि"। अंत मे जखैन्ह हमर सास ससुर तैयार नहि भेलथि तs माँ हमरा कहलथि "चलु अहाँ अरुणाचल गेलो नहि छी, घूमि कs चलि आयब। जओं एहि बीच मे काका के बदली भs गेलैन्ह तs फेर सोचल जायत जे की कायल जाय"। हमर कॉलेज गरमी के छुट्टी लेल बंद छलैक। दू दिन पहिनहि हमर विवाहक पहिल वर्षगाँठ छलs आ आय हम अरुणाचल जा रहल छी। हमर मोन इ सोचि कs उदास छलs कि ओतेक दूर जा रहल छी। फेर कतेक दिन पर हिनका सs भेंट होयत से नहि जानि। हमरा एको रत्ती माँ के सँग जयबाक खुशी नहि छलs। हमर चेहरा देखि कs कियो कहि सकैत छलथि जे हमर मोन बहुत दुखी अछि। हिनको मोन उदास छलैन्ह आ चुप चाप हमरे लग ठाढ़ छलथि। हम हिनक मोनक गप्प सेहो बुझि रहल छलियैन्ह मुदा की करी से नहि बुझय मे आबि रहल छलs। हम सब वेटिंग रूम मे ट्रेनक प्रतीक्षा मे छलहुँ जाहि केर अयबा मे अखैन्ह बहुत देरी छलैक। हम बेर बेर देखाबय चाहि रहल छलियैक जे हमर आंखि मे किछु परि गेल अछि आ हम अपन रुमाल सs निकालय के प्रयास कs रहल छी, मुदा सत्यता किछु आओर छलैक। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ माँ के कहलथि "अखैन्ह तs ट्रेन आबय मे देरी छैक हम सब चाह पीबि कs थोरेक काल मे अबैत छी"। इ कहि आ बौआ के बुझा हमरा चलय लेल कहलथि। जहिना हम सब बिदा भेलहुँ कि हिनकर मित्र धनेश जी, चलि आबैत छलाह। हुनका देखि हम सब रुकि गेलहुँ। जखैन्ह ओ माँ कs गोर लागि लेलथि तs हुनको सँग लs आगू बढ़ि गेलहुँ। माँ के लेल चाय इ वेटिंग रूम मे पठा देलथि। हम दुनु गोटे आ धनेश जी रेलवे केर जलपानगृह मे बैसि कs चाय पिबय लगलहुं। धनेश जी हिनकर अभिन्न मित्र छलथि आ दुनु गोटे एकहि कॉलेज मे सेहो पढैत छलाह। विवाहक बाद ओ पहिल बेर हमरा सs भेंट करय के लेल आयल छलाह। हम ओहिना बेसी नहि बजैत छलहुँ दोसर आय होयत छल जे बाजब तs पता नहि कना नहि जाय। इ हमर मोनक गप्प बुझि गेलाह आ हुनक बेसी प्रश्नक जवाब दs रहल छलथि। किछु किछु तs ओहि मे हमरा हंसेबाक लेल आ ध्यान दोसर दिस करबाक लेल सेहो छलैक। धनेश जी आ इ गप्प कs रहल छलथि, हम बीच बीच मे माथ तs डोला रहल छलहुँ मुदा हमर ध्यान कतहु आओर छल। हमर मोन एकदम बेचैन लागि रहल छल आ बेर बेर हम घड़ी देखि रहल छलहुँ। राँची मे रहैत छलहुँ तs कम सs कम मास मे एक बेर इ आबि जायत छलाह। चिट्ठी से सब दिन अबैत छलs । अरुणाचल जा तs रहल छलहुँ इ सोचि कs जे घूमि कs चलि आयब मुदा काका के बदली लs कs चिंता होयत छलs । राँची मे रही तs जखैन्ह मोन होयत छलैन्ह आबि जायत छलाह अरुणाचल एक तs दूर छलैक दोसर ओहि ठाम जेबाक लेल परमिट बनाबय परैत छैक। हमर की किस्मत अछि नहि जानि जहिया हमरा माँ सँग रहबाक मोन होयत छलs, हम माँ सs अलग रहलहुं। आब हिनका सँग रहबा मे नीक लागैत छलs आ रहबाक मोन होयत छलs तs आब हिनको सs एतेक दूर जा रहल छलहुँ, इ सोचि कs हमर मोन दुखी छलs । तथापि धनेश जी सोझा मे छलथि तs मुँह पर हँसी अनबाक प्रयास करैत छलहुँ। अचानक हिनकर बोली कान मे आयल "आब समय भs गेल छैक चलु माँ के चिंता होयत हेतैन्ह", इ सुनतहि हम सब उठि कs चलि देलहुं। हम सब जखैन्ह पहुँलहुं तs माँ के ठीके हमरा सब कs आबे मे देरी देखि चिंता होयत छलैन्ह। देखैत देरी बजलीह "अखैन्ह तक कुली सब नहि आयल अछि, आब ट्रेन आबय वाला छैक"। एतबा माँ कहिते छलिह की दुनु कुली आबि गेलैक। हम सब ट्रेन मे बैसि गेलहुँ, सामान सब जगह पर रखवेलाक बाद इहो हमरा सब लग बैसि गेलाह। सोनी बिन्नी दुनु गोटे एक एक टा खिड़की वाला सीट लs कs बैसि गेलीह, बेचारी अन्नू आ छोटू के कात मे बैसा देने रहथि। माँ आ बौआ अपना हिसाबे सामान सब ठीक करबा मे लागल छलथि। इ एक टक हमरे दिस देखैत छलाह। बुझि परैत छ्लैन्ह जेना आब कहताह अहाँ नहि जाऊ। हम अहाँक बिना नहि रहि सकैत छी। हम लाचार दृष्टि सs हुनका दिस देखि रहल छलहुँ आ मोने मोन भs रहल छलsकियो हमरा कहि दितैथ अहाँ के आब नहि जयबाक अछि। मुदा से नहि भेलैक आ अचानक धनेश जी खिड़की लग आबि कs कहलाह "यौ आब नीचा आबि जाऊ गाड़ी के सिग्नल भs गेल छैक"। एतबा सुनतहि इ हरबरा क उठि गेलाह आ कहलाह "पहुँचैत देरी चिट्ठी अवश्य लिखि देब।" इ कही माँ के गोर लागि उतरि गेलाह। हम घुसकि कs बिन्नी लग बैसि गेलहुँ आ फेर हिनका दिस लाचार भs देखय लागलियैन्ह। अचानक बुझायल जेना हमर किछु एहि ठाम छुटि रहल अछि । ट्रेन धीरे धीरे स्टेशन सs आगू बढ़ि रहल छलैक, मुदा हमर दुनु गोटे के नजरि एक दोसर पर छलs । हम सब एक दोसराके देखि रहल छलहुँ। धीरे धीरे दूरी बढ़ल जा रहल छलs, जखैन्ह आँखि सs ओझल भs गेलाह तs हम फेर अपन जगह पर आबि कs बैसि गेलहुँ। बौआ, सोनी बिन्नी अन्नू आ छोटू सब खुश छलथि। माँ अपन खाना वाला पेटार खोलि सब के ओहि मे सs निकालि कs खेबाक वस्तु सब के देबय लागलीह। गाड़ी सिलिगुरी पहुँचि गेल तs माँ हमरा आ बौआ के स्टेशन दिस देखा कs कहलिह "अहाँ सब के तs याद नहि होयत, एहि ठाम तक हम सब ट्रेन सs आबि, ओकर बाद गाड़ी सs सिक्किम जायत छलहुँ"। बाबुजी सिक्किम मे सेहो तीन बरख रहल छलथि। करीब चौबीस घंटा सs हमर सबहक ट्रेन न्यू बोगाई गाँव स्टेशन सs आगू आबि,एकटा छोट सन स्टेशन पर रुकि गेलैक। एतेक छोट स्टेशन की एहि ठाम किछु खेबा पिबाक सेहो नहि भेटैत छलैक। आगू कोनो ट्रेनक दुर्घटना भs गेल छलैक जाहि चलते सब ट्रेन एहि ठाम आबि कs रुकल रहैक। ओहि ठाम तेहेन स्थिति भs गेलैक जे बाद मे स्टेशन पर पानि सेहो खतम भs गेलैक। माँ के आदति छलैन्ह दूरक यात्रा करबाक आ ओ अपना सँग खेबा पिबाक ततेक नहि सामन रखने रहथि जे हमरा सब के ओहि मे कष्ट नहि भेल, मुदा सब गोटे परेशान भs गेलहुँ। एक तs एहिना अरुणाचल जेबा मे तीन दिन लागैत छलैक, ताहि पर चौबीस घंटा एक ठाम रुकलाक चलते आओर सब परेशान भs जाय गेलौन्ह। ट्रेन चारद्वार जहिना पहुचलैक हमरा सब केर जान मे जान आयल। बाबुजी स्टेशन पर ठाढ़ छलथि। करीब तीस घंटा देरी सs हमर सबहक ट्रेन पहुँचल छलैक। स्टेशन सsसीधा हम सब गेस्ट हाउस पहुँच गेलहुँ, ओहि ठाम हमरा सब के राति भरि रहबाक छल। हम सब तैयार भs आ जलखई करला कs बाद बोमडिला (अरुणाचल) के लेल सरकारी जीप सs बिदा भs गेलहुँ। बाबुजी हमरा बतेलाह अरुणाचल मे भारत केर १/३ सेना रहैत छैक। बॉर्डर पर परमिट देखाबय परलैक आ परमिट देखेलाक बाद बाबुजी कहलथि "अहाँ पहिल बेर आयल छी, बौआ तs एक बेर आयल छलथि। अहाँ जीप मे हमरा सँग आगू बैसि जाऊ, देखय मे बड नीक लागत। हम बाबुजी सँग आगू बैसि गेलहुँ। ओना तs आसाम सेहो नीक लागल, मुदा अरुणाचल मे प्रवेशक सँग बुझायल जेना प्रकृति एकरे कहैत छैक। कश्मीर तs हम नही देखने छलियैक जाहि केर तुलना लोग स्वर्ग सs करैत छैक।अरुणाचल मे प्रवेश करैत घाटिक घुमावदार सड़क आ चढाई आरम्भ भs गेलैक। सड़क सब नीक मुदा पातर देखय मे आयल। कहुना दू गाड़ी जएबाक जगह छलैक। बाबुजी बतेलाह जे सब सड़क सेना के छलैक। जीप जहिना जहिना आगू बढैत गेलैक,चढाई तहिना तहिना बढ़ल जा रहल छलैक। सोनी बिन्नी सब तs ओहि ठाम माँ बाबुजी लग रहैत छलथि आ कैयेक बेर आयल गेल रहैथ सब गोटे गप्प मे व्यस्त छलिह। हमर ध्यान मात्र प्राकृतिक सुन्दरता देखय मे छल। पहाडी नदी के विषय मे सुनने आ कविता मे पढ़ने रही। मुदा आय साक्षात देखि रहल छलहुँ।जतेक सुनने रही ताहू सs सुंदर छल इ पहाडी नदी। झरना देखय लेल दूर दूर जायत छलहुँ, आ अहि ठाम तs रास्ता मे कैयेक टा झरना भेट रहल छलs। बाबुजी हमरा सब ठामक नाम आ ओहि जगहक महत्व बताबैत जा रहल छलाह। बाबुजी कहलाह "आब इ जगह ठीक सs देखू, इ छैक तवांग वैली (Tawang Valley)। चीन सँग सन ६२ केर लड़ाई मे एकर बड महत्व छैक"। एहि ठाम सsबोमडिला बड लग छैक। ६२ मे सब सs बेसी लड़ाई बोमडिला मे भेल छलैक। बाम दिस जओं हमर नजरि गेल तs नीचा मे नदी बहैत छलैक, ओ देखा कs कहलाह " इ नदी देखैत छी, पहाडी नदी रहितो लड़ाई समय मे इ पूरा खून सs लाल भs जाइत छलैक। एहि ठामक लोग सब कहैत छैक जे लड़ाई केर बाद इ नदी सs कतेको लाश निकलल छलैक। बाबुजी जहिना कहने रहथि बोमडिला लग छैक तहिना किछुयैक दूरी गेलाक बाद घर सब नजरि आबय लागल। एकटा झरना आयल आ बाबुजी कहलाह लिय बोमडिला पहुँचि गेलहुँ। जीप झरना सs किछुए आगू आबि कs रूकि गेलैक। बोमडिला पहुँचलहुं त साँझ भs गेल छलैक। जीप सs उतरि कs माँ हमरा सब के लsआगू बढि गेलिह आ बाबुजी सामान सब उतरवाबय लगलाह। हम जहिना सीढी पर चढि ऊपर अयलहुं, लकडी के घर सब देखाई परय लागल। बाहर सs सब घर देखय मे एकहि जेना बुझि परैत छलैक। सब घरक छत हरियर, मुदा दू घर सs बेसी एक समतल जमीन पर नजरि नहि आयल। ऊपर आ नीचा सब ठाम जएबाक लेल सीढी बनल रहैक।ऊपर नीचा करैत हम सब अपन घर पहुँचि गेलहुँ। हम सब ततेक थाकल रही जे चाय आ जलखई केलाक बाद कखैन्ह नींद आबि गेल,हम नहि बुझलियैक। माँ के बोली पर हमर नींद खुजल। माँ कहि रहल छलथि " उठु नय भोजन केलाक बाद फेर सुति रहब"। उठलहुँ तs, मुदा जारक चलते हमरा भोजनो करबाक मोन नहि भs रहल छलs।माँ हमरा बिछोना सs उतरय लेल मना कs देलथि आ हमर भोजन बिछाओन लग मँगा देलिह। भोजनक बाद हम कोहुना उठि कs हाथ धोए लेल बिछाओन सs उतर कs गेलहुँ। हमर आँखि खुजल तs माँ बाबुजी आ एक आओर व्यक्ति के अपना सोझा मे देखि हम हरबरा कs उठय लगलहुँ। माँ कहलिह "किछु नहि भेल अछि परल रहू। असल मे अहाँ हाथ धोअय लेल गेलहुँ तs ओहि ठाम बेहोश भs खसि परल रही। की भेल छलs?डॉक्टर साहेब कहैत छथि ऊंचाई के चलते भेलैक अछि। एके बेर ओतेक नीचा सs ८ हजार फीट पर पहुँचि गेलहुँ ताहि केर असर छैक आओर किछु नहि"। तखैन्ह हमरा याद आयल जे हमरा चक्कर जेना बुझायल छलs आओर किछु याद नहि छलs। डॉक्टर इ कहि चलि गेलाह जे आराम करू भोर तक एकदम ठीक भs जायत। बेर बेर उठि मुदा बुझाइत छल एखैन्ह भोर नहि भेलैक आ फेर सुति जाइत छलहुँ। मोन मे आयल जे घड़ी देखि लेत छी। जओं घड़ी दिस नजरि गेल तs आठ बाजैत छलs, हरबरा कs उठलहुँ आ बाहर दिस निकलि गेलहुँ। राति मे एक तs ठंडा आ ताहि पर ततेक थाकल रही जे घर मे घुसलाक बाद बाहर निकलबाक हिम्मत नहि भेल। बाहर आबितहि बुझि गेलहुँ जे हमरा कियाक होयत छलs जे भोर नहि भेलैक अछि। धुंध तेहेन छलैक जे अपन घर छोरि कs सामने वाला घर सेहो नहि देखाइत छलs। किछुए कालक बाद बौआ सेहो बाहर पहुँचि गेलाह। धुंध बेसी काल नहि रहलैक आ हटैत के सँग प्राकृतिक रूप साफ साफ देखाई परय लगलैक।किछु काल तक ठाढ़ भs हम प्रकृतिक ओहि रूप के देखैत रहि गेलहुँ। जतय तक नजरि गेल, सब घरक सोंझा मे सुंदर सुंदर फूल नजरि आयल जे देखि मोन प्रसन्न भs गेल। हम ठाढ़ भsदेखैत छलहुँ कि अचानक एक झुंड लड़ाकू विमान (mig) बुझायल जेना हमर घरक ठीक पाछू सs निकलल अछि आ आसमान मे एम्हर सs ओम्हर करय लागल। ओ कखनहु बुझाइत छलs आब खसि परतैक मुदा फेर तुंरत ऊपर आबि जायत छलs। ओहि विमानक झुंड देखैत देरी हम दुनु भाई बहिन अपन बरामदा सs उतरि जओं पाछू गेलहुँ तs पहाड़ के सुन्दरता देखि किछु काल ओहि ठाम ठाढ़ रहि गेलहुँ। बुझाइत छल जेना पहाड़ घरक ठीक पाछू मे अछि। हम आ बौआ घरक चारू कात घुमि घुमि कsसब वस्तु देखय लगलहुँ। एक सs एक सुंदर फूल घरक सामने आ कात वाला फुलवारी मे लागल छलैक।फूलक रंग आ आकर देखि हम आश्चर्य चकित रही गेलहुँ। बाबुजी ऑफिस जएबाक लेल बाहर अयलाह त हम दुनु भाई बहिन बाहर छलहुँ। ओ बतेलाह जे बोमडिला मे बहुत सैनिक छैक, मुदा ओ सब नजरि नहि आयत कियाक तs सब बंकर(bunkar) मे रहैत छैक। अहि ठाम भारतीय सेनाक जेट,(jet)मिग(mig) आ सब तरहक लडाकू विमान देखय भेटत। सैनिक सब बराबरि अपन अभ्यास करैत रहैत छैक। भारत चीनक बोर्डर सेहो बोमडिला सs लग १४ हजार फीटक ऊंचाई पर एकटा जगह छैक सेलापास ताहि ठाम छैक। ओतय तs आओर बेसी ठंढा रहैत छैक। जुलाई, अगस्त मास मे एतेक जाड़ हम नहि देखने रहियैक। एक तs अहि ठाम हमरा आ बौआ दुनु गोटे के मोन नहि लागैत छलs ताहि पर जाड। हम आ बौआ सब दिन सोचैत छलहुँ घुमय लेल जायब मुदा जाड़क चलते नहि जायत छलहुँ। बाबुजिक ऑफिस घर सs बहुत नीचा रहैन्ह आ सीढी सs उतरय आ चढ़य परैत छलैन्ह जे १०० सs बेसी छलैक। एक दिन हम आ बौआ बिचारि कs स्वेटर पहिरि घुमैत घुमैत बाबुजी के ऑफिस देखय लेल गेलहुँ। जाइत काल मे उतरय के छलैक, ओ तs बड नीक लागल आ दुनु गोटे सीढ़ी पर कूदैत कूदैत उतरि गेलहुँ। चढ़ैत काल दुनु गोटे के हालत ख़राब भs गेल। आपस अयलाक बाद बौआ कहलाह "ठाकुर जी अओताह तs हम हुनका अवश्य बाबुजी के ऑफिस लs जयबैन्ह"। अन्नू आ छोटू तs बहुत छोट छलथि, सोनी आ बिन्नी दिन मे स्कूल चल जाइत छलिह, बौआ आ हम दुनु गोटे बेसी घर मे रहैत छलहुँ। साँझ मे बाबुजी अयलाह, हम सब बैसि कs बोखारी लग चाह पिबति रहि आ गप्प सप्प होयत छलैक। गप्प के बीच मे माँ बाबुजी सs कहलिह "मुन्नी बौआ के कतहु कतहु घुमा दियौक नञ। इ सब कतहु नहि जायत छथि भरि दिन घर मे रहैत छथि। दुनु गोटे के मोन नहि लागि रहल छैन्ह"। इ सुनतहि बाबुजी कहलाह"बुझाइत अछि आब हमर बदली जल्दिये भsजायत। आजु हम ठाकुर जी के लेल परमिट बनवा कs पठा देलियैन्ह आ जल्दिये आबय लेल लिखि देने छियैन्ह। हुनको आबि जाय दियौन्ह तs तीनू गोटे एकहि संग घूमि लेताह। बाद मे तs एहि ठाम आबय मे थोरेक झंझट छैक"। इ सुनी हमरा नीक लागल, सच मे हमरा मोन नहि लागि रहल छल। जहिया सs बाबुजी कहलाह ओ हिनका लेल परमिट पठा देने रहथि ताहि दिन सs हम आ बौआ सब दिन हिनक बाट देखैत छलियैन्ह। बौआ सब दिन बैसि कs हमरा सsगप्प करैथ जे हिनका अयला पर हम सब कतय कतय घुमय लेल जायब। ओ सब पता कs कs राखने रहथि जे कोन कोन ठाम घुमय वाला छैक। बोमडिला बड छोट जगह छलैक आ ओहि ठाम बाबुजी के ऑफिस(CPWD) केर लोक सब के छोरि किछु प्रशानक लोक आ केंद्रीय विद्यालय के किछु शिक्षक सब सेहो रहैत छलथि। माँ सब के किछु लोक के घर एनाई गेनाइ छलैन्ह हमरा अयला सs सांझ मे बराबरि कियो नहि कियो भेंट करय के लेल आबैत छलथि या नहि तs हमरा सब के लs कs माँ, बाबुजी भेंट कराबय लेल जायत छलथि। बोमडिलाक मोसमक एकटा विशेषता देखय के लेल भेंटल। ओहि ठाम जोर सs पानी नहि परैत छलs मुदा भरि दिन झिसी होइत रहैत छलैक आ बीच बीच मे थोरे थोरे समय के लेल रोउद निकलैत रहैत छलैक। बाबुजी के ऑफिस केर एक गोटे भेंट करय लेल आयल छलथि आ हुनका सब के पानि के चलते जेबा मे देरी भs गेल छलैन्ह। हुनका सब के गेलाक बाद माँ जल्दी जल्दी सतमन(नौकर) सs खेनाई के व्यवस्था करवाबय मे लागि गेलिह। पूरा बोमडिला के लोक के पनबिजली (hydroelectricity)द्वारा बिजली भेटति छलैक आ राति के १२ बजे के बाद सs बत्ती नहि रहैत रहैक। माँ के प्रयास रहैत छलैन्ह जे १० बजे तक रतुका भोजन भs जाय, मुदा आजु किछु देरी भs गेल छलैक। माँ भोजनक व्यवस्था मे लागल छलिह। हम आ बौआ बिछाओन मे घुसि कs अपन गप्प करैत छलहुँ, बाकी चारु भाई बहिन सब खेलाइत रहथि आ खूब हल्ला करैत छलथि। बाबुजी अपन ऑफिसक काज करैत छलाह। अचानक बुझायल जेना कियो केबार खट खटा रहल छथि। सोनी बिन्नी बाहर वाला घर मे खेलाइत छलिह केबारक आवाज सुनी दुनु गोटे केबार खोलय लेल दौड़ गेलिह। केबार खोलैत के सँग ओहि ठाम सs ठाकुर जी ठाकुर जी करैत भागि कs भीतर आबि गेलिह। हिनक नाम सुनैत देरी माँ बाबुजी सब बाहर वाला घर दिस आबि जाय गेलथि। हिनका अयला सs माँ आ सतमन के आओर काज बढि गेलैक। ओ सब जल्दी जल्दी आओर किछु किछु खेनाई मे बनाबय लगलथि। चाह पिलाक बाद माँ हिनका कहलथिन "इ जल्दी स तैयार भs जाओथ थाकल हेताह, भोजनक बाद गप्प करिहैथ"। कोहुना भोजन बिजली जाय सs पहिने भs गेलैक आ सब कियो सुतय लेल चलि गेलथि। बौआ हम आ इ बैसि कs गप्प करैत छलहुँ। इ अपन यात्राक वर्णन करैत कहलाह "आइ तs हम बचि गेलहुँ। चारद्वार पहुँचि पता केलहुँ तs लोक सब सs पता चलल आब बोमडिला के लेल एकहि टा बस छैक जे बेसी राति मे पहुँचायत। दिन वाला बस के लेल चाराद्वर मे राति भरि रहय परत इ सोचि चलि देलहुं। एहेन खतरनाक आ भयावह सड़क पर बस ड्राईवर तेनाक चला कs आनलक अछि जे हमर तs प्राण उपरे छल। बोमडिला आबि कs सेहो नीचा मे दुकान लग छोरि देलक। ओहि ठाम एकटा लोक नजरि नहि आबैत छल। संयोग सs एक गोटे भेंट गेलाह जे बाबुजी के ऑफिस के छलाह। ओ हमरा झरना लग पहुँचा कs गेलाह। झरना के बाद ऊपर चढि पहुँच तsगेलहुँ घर तक, मुदा होयत छल एहि राति मे ग़लत घरक केबार नहि खट खटा दियैक। पहिने घर लग आबि किछु काल ठाढ़ भs कs भीतरक गप्प सुनबाक प्रयास कयलहुँ। हल्ला सs बुझि गेलहुँ यैह घर हेबाक चाहीं मुदा मोन आगु पाछु होयत छल केबार खट खटाबी कि नहि कि अचानक मैथिलि मे बाजय के आबाज आयल आ तुंरत हम केबार खट खटा देलहुं"। हिनकर गप्प सुनि बौआ खूब हँसलाह आ कहलाह "बिना खबरि केने अहाँ बोमडिला आयब तs अहिना होयत नञ"। राति बड भs गेल छलैक हम सब उठि सुतय लेल आबि गेलहुँ। हम हिनका सs कहलियैन्ह अहाँ तs कालिदास भs गेलहुँ। इ हमरा दिस देखि हँसैत बजलाह "कि करितौंह अचानक अहाँ सs भेंट करबाक मोन भs गेल आ बिना किछु सोचनहि चलि देलहुं। राति मे मोन भेल आ भोरे तैयार भs हम निकलि गेलहुँ। हम स्टेशन के लेल निकलति रही ओहि समय मे हमरा बाबुजी के चिट्ठी भेंटल जाहि मे परमिट भेजने रहथि। परमिट के एतेक महत्व छैक हमरा से नहि बुझल छलs। ओ तs संजोगे सs हमरा परमिट भेंट गेल नहि तs बड दिक्कत होइत। टिकट से, स्टेशन पर आबि कs लेलहुँ ओहो संयोगे सs भेंटल"। (अगिला अंकमे) 1 Anand Priyadarshi said... charim khep khoob nik,हम हिनका सs कहलियैन्ह अहाँ तs कालिदास भs गेलहुँ। Reply05/15/2009 at 08:56 PM कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि। कथा-चुट्टा लेमे की चुट्टी़। गुडगाव क’ बड़का भव्यतम मालमे एक गोट बड़ सुन्नरि जेना कुम्हारक चाक पॅ बड़ प्रेम सॅ गढल कोनो भव्य प्रतिमा सन स्त्री केपरी पहिरने दू तीन गोटे संग खरीदारी करैत छल़ आ’ फर्राटेदार अंगरेजीक मध्य एक गोट एहेन आखर बाजल छल कि स्निग्धा चौंकिक’ ओकरा दिस तकलक ‘दिस टूहटूह रेड बकलेल कलऱ ।’ ‘अवस्से ई मैथिल अछ़ि।’ स्निग्धा अपन बेटी सॅ बाजल छल। ओकरा दिस तकैत़़ओकर गोर गोर हाथ पर कलाइ लग करीब एक इंच क’ कारी चेन्ह “हमर एक गोट संगी छल गुलाब़ तेकरो हाथ पर एहने चेन्ह छलै टैटू के ओहि जमानामे गोदना कहल जाइ छलै़। दूनू गोटे गुलाब लगा क’हाथ पर गोदना गोदबेने रहिए़ हमर त’ लिखा गेल मुदा ओ दर्द सॅ चिकरए लगलै़ आ’ अपन हाथ छोपि लेलकै़, एहेन लमगर चेन्ह भ गेल रहै़।’ओ अपन बेटी सॅ गप्प करैत छलीह़़ कि ओ हुनका घूरय लगलैन्हि। कनि अनसोहाति सन स्निग्धा दोसर स्टाल दिस बढय लगलीह़ कि ओ बड़ सुन्नरि स्त्री केपरी पहिरने पाछासॅ बड़ तेज चलैत एक हाथ सॅ पर्स पकड़ने आ’दोसर मे अपन धूपक चश्मा़ एकम्मे ल’ग आबि क’ कनि धखाति सऩ अनचिन्हार सन टोन मे अटकि अटकि हुनका टोकलकन्ह़ि- ‘गुलाब पुरनी पोखऱि के़ ।’ ‘हॅ हॅ’ आ’ स्निग्धा जेना चिहुकि क’ ओकर गरा लागि गेल रहथि ई केहेन चमत्त्कार भ’ गेलए़। ‘तू गुलाब।’ ‘हॅ गुलाब ।’ स्निग्धा के बेटी आ’ ओहि सुन्नरि स्त्री के संगी सब मूह बौने ठाढ़ । ई की तमासा़ जेना कुंभक मेला मे बिछुड़ल दू बहिनी भेंटल होय़। ‘तू कोना चिन्हलै’ प्रीति स्निग्धा सॅ पुछलक । ‘तोहरि हाथक करीया चेन्ह़ आ तू़’ अवाक स्निग्धा कनि विलमैत बाजल़-‘तोहर हाथ पर लिखल गुलाब आ’ आ’ परोड़क फाकि सनक आखि तोरा बिसरलै कहिया छलियौ आ’ कत्तो बैसि क’ बीतलाहा दिन मोन पाड़ैत छी ।’ आ’ सब गोटए चमचमाइत सीसा के दरवज्जा वला हल्दीराम मे एक टा कोन ताकि क’ आबि बैसली़। ओतए भीड़ सॅ ठसाठस भरल रेस्त्रामे कुरसी पर बैसल बैसल जेना करीब तीस बरखि पाछाक’ समय फेर सॅ पूरनी पोखरिक’ महाड़ पर धमाचौकड़ी मचबए लागल छल । ‘तोहर ददिहरै छलौ नै़’। ‘आ’ तोहर ममहरि ।’ आ’ दुनु भभा क’ हॅसलक जेना दुनु के हेरायल कोनो बड़ प्रिय खेलौना हाथ लागि गेल होय ।बड़ दिनक बाद एना बजनाए हृदय सॅ जेना प्रसन्नताक’फौव्वारा छुटए लगलै ।प्रेम सॅ ऊब डूब होइत दूनू के मूह एक गोट अजीब चमक सॅ भरि गेल छल । नेपाल तराई के एक गोट गाम टोल मे बड़ विवाह मूड़न आ’ उपनैन छल ताहि लेल दूर दूर सॅ लोक वेद सब ओतए आयल छल। अपन अपन सर संबंधी के ओतए । सबहक कुटुम सॅ सब दलान भरल। धिया पुत्ता सॅ खरिहान गाछी चारो दिस जेना खचबचिया सब उछलम कूद करि रहल होय ।स्त्रीगण सब अपन अदौड़ी दनौरी पाड़ैत| हॅस्सी ठठ्ठामे लागल चारो कात लाल पियर रंग सॅ रंगल नूआ़ धोती सब टांगल बांसक डाला चंगेरा पुड़हिल पातिल सब रंगल टीपल। गीत नाद होय। कत्तो बारहमासा कत्तो सोहरि। क़त्तो ‘शुभ के लगनमा शुभे हो शुभे’ कत्तो कत्तो सॅ समदौन आ डहकन सेहो सुनाय पड़ैत छल। आ गामक पूबारि टोलक पुरनि पोखरि क’ भीड़ पर जखन आठ बरखक दूनू संगी गुलाब लगौने छल तए पूबरिया महाड़ पर शिव मंदिरमे जाकए जल चढौने छल। ‘हे महादेव हमर दूनूक संग नहि छूटै ।’ ओत्तए पीपरक गाछ पर बैसल कार कौआ तखने काव काव करैत उड़ि गेल छलै| प्रीतिक दलान स्निग्धाक दलान सॅ कनि हटि कए पछाैति दिस छलै|बसबीट्टीक पाछा़ आ’ टोलक सब धिया पुत्ता प्रीतिए के खरिहान मे खेलय जुटै़। फागुनक मास़़। प्रीति नेने सॅ बड़ बियापक। आलथी पालथी मारि क’ नीचा मे गोबर सॅ नीपल खरिहान मे बैसि रहै आ’ सब धिया पुत्ता अपन अपन तरहत्त्थी ओकरा सोझामे रोपने बैसल। ओ पूंगबय लागै। मुदा जखने सुरू होय़ “अटकन मटकऩ दहिया चटकऩ”मूनमा जोर जोर सॅ हिलए लागै। पूनमी ठिठिया दैक आ’ सत्तो बिदकि क’ भागि जाए़। मोहनजी ओकरा पकड़ि क’ आनय आ फेर सॅ पुंगबए के क्रम मे प्रीति पीत्त सॅ माहुर होइत कानए लागै़ “आब तोरा सब संगे कहियो नहि खेलबौ।” तखन सब ओकरा मना तना क’ फेर सॅ खेला सुरू करै “केरा कूस़ महागऱ जागर पूरनी पत्ता हिलै डोलै माघ मास करेला फूलै। ओय करेला नाम की आमून गोटी जामुन गोटी तेतरी सोहाग गोटी़ बाँस काटे ठाँय ठाँय नदी गुंगुएल जाए कमलक फूल दूनू अलगल जाए बड़ी रानी छोटी रानी गेली नहाए” अहि बीच भोलबा कुन मुनाए किछु उकठ्ठी करै लेल कि शांति ओकरा आखि तरेर क’ दबाड़े त’ ओ संच मंच भ’ क’ बैसल रहि जाए़। प्रीति सबहक हाथ पर नजरि गड़ौने पूंगबैत रहै। “गहना गुरिया ल’ गेलन्हि चोर आब कि पहिरती कौआ के ठोर कौआ के ठोर त’ कारी आब की पहिरती साऽऽऽऽऽऽड़ी चूट्टा लेमे की चूट्टी।” स्निग्धा सदिखन चुट्टे कहै़ आ’ ओकरा ओ ततैक जोर सॅ मौसमे नैाह गड़ा क’बिठ्ठू काटै जे ओकर मूह लाल आ’ आखि सॅ भट भट नोर खसए लागै मुदा तैयो ओ हॅसैत़ एक मुठ्ठी काख तर आ’ एकटा माथ पर नेने खेलक’ नियमक’ मुताबिक शुद्व होमए लेल नहाए चलि जाए़ फुसिए़। “कत्त सॅ नहा क’ एलैं हैं ” कखनो डबरी क’ पानि सॅ कखनों खत्ता के पानि सॅ़ कखनों नाली के पानि सॅ आ’ जज क’ आसनि पर बैसल प्रीति खौझात़ि खौझात़ि ताबैत धरि सबके घुरबैत रहै जाबे धरि ओ सब गंगाजी के जल सॅ नहा क’ शुद्व भ’क’ नहि आबए । दूनू गुलाब गाछ पर चढै पोखरि मे कूदै इम्हर लताम तोङै़ उम्हर इमली तोड़ै इम्हर उम्हर बूलैत़ कखनो एक दोसर क’ आंगन मे जाकए भोजनोभात करि लैत छल ।गोटरस लुक्का छिपी डोला पाती़ दादी कहैथ ‘दुनु छौड़ी बड़ खुरलुच्ची लुक्खी जका फुदकैत रहैत अछि भरि दिन दूनू के एके गाम मे विवाह करबा देबए सासुरोमे उधम मचेतै ।’ “तू कोना लतामक गाछ पर सॅ खसल छलीह डोला पाती खेलबा काल़।’ “हॅ गै़ एखनो बथैत रहैत अछि ओ चोट़ ।” ओ केहेन दनि अपन मूह बनाक अपन बामा बाहि छुबए लागल जेना ओ चोट टटका होए । ‘ओकरा जे मारने छलही़।’ ‘केकरा गै ’ ‘ठेठरा के नाति थेथ्थर लछमनमा के़’। ‘हॅ हॅ बड़का बड़का आखि सॅ कोना गुरेर गुरेर क’ ताकए जखन हम सब एक्कट दूक्कट खेलाए़ । हम सब जतए खेलाए़ ओहि ठाम घुरियाबए लागै ‘हमरो खेलाउ न यै दाय सब़ ।’ कहियै जो कमल कक्का के बाड़ी सॅ लताम तोड़ने आ़ त’ कोना खी़ खी करि क’ हॅसय लागैत छल हेहरबा़।’ ‘मुदा ठेठरा के नाति आब एकदम्मे बदलि गेलए़ देख भी त’ आखि चोन्हरा जेतौ।’ ‘कि भ’ गेलै चारि टा हाथ आ’ चारि टा पएर भ’ गेलै की।’ ‘हॅ गै आब ओ पुलिसक बड़का औैफिसर बनि गेलए माए ओकर नैहरे मे रहैत छल़ ओहि गामक आधा सॅ बेसी जमीन आब लछमन परसाद खरीद क’ बैसल अछि बड़का बड़का लोक आब ओकरा सलाम करैत छै। एक टा पएर सॅ गाम नापै छै आ’ एक टा सॅ सहरि सौंसे गामक लोक आब डेराए छै ओकरा सॅ।’ ‘तोरा के कहलकौ।’ प्रीति अधीर भेल छल़ आखि मे अविश्वासक भाव सेहो़। ‘मौसी कहैत छलीह़। बड़का नेता के बेटी सॅ विवाह सेहो करि लेलक । ओकर माए सेहो महरानी बनि गेल अछ़ि गाड़िए पर घुमैत रहैत अछि आब़ ।’ ‘छोड़ लछमनमा के़ मुदा छौड़ा छलै बड़ पीत्तमरू़ आ’ तेजगर सेहो। कत्तेक थकुचने रहिए दुनु मिलक’ चाटे चाट गाल प मारने रहिए मुदा एकोबेर केकरो नहि कहलकै । हमरा त’ बड़ दिन धरि प्राण डरै सुखाएल छल़। कत्तहु बाबा के नहि ओकर नाना उपराग दै़ ।’ प्रीति स्निग्धा के घुरैत बाजल। ‘आ ओ भूत वला खिस्सा़ ।’ स्निग्धा मोन पाड़लकै प्रीति के एक गोट काकी के भूत लागि गेल रहै़ ‘तोहरि एक गोट काकी के जे भूत लागल रहै लोक सब बाजै़ जे झलफल सांझ मे बाड़ी मे जतए पीपरक गाछ छलैक़ चूल्हीक’ छौड़ फेंकए गेल छलथ़ि कि बड़का गाछक’ भूत धए लेलकन्ह़ि कि कहां नहि भेल रहै । कोन दन गाछ क’ टूस्सी मॅगाओल गेल बड़ लोक वेद सब जुटि गेल छल़। करीया कपड़ा पहिरने़ माथ पर सेहो करिया वस्त्र बन्हने । हाथ मे किदन किदन नेने़ लाल टरेस आखि वला कोनो ओझा आबि क’ भूत भगौने रहै़ ।’ ‘भूत की हाेइत छै कोना उनटा पएरे चलैत छै कोना नकिया क’ बजैत अछ़ि ई सब खिस्सा बड़ दिन धरि आंगन मे चलैत रहलै़ आ’ नेना भुटका सब बड़का टा के मूह बेने बड़ धियान सॅ ई सब गप्प सुनि अपन ज्ञान बढा क’ दाेसर दिऩ संहतिया सब के सेहाे बतबै ओहाे सब कतेक रास एहेन गाछ के चेन्ह लगोने छल जाहि पर लोक कहैक भूत रहै छै ।भूऽऽत कतेक ड’र लागै राति मे हम त’ कतेक बेर नींद मे चिकरए लगिए़ ‘भूत़ भूऊत़हमरा पकड़ि लेलक माेकने जाइत अछि घेंट़ ।’ ‘कत्तए छै भूत ’मा हमरा चुप्प कराबति कहैथ़ ‘ सगरे दिन नै जानि कत्त कत्त छिछियाबैत रहैत अछि कोन बाध कोन बोऩपएर धो क’ सूतल छलैं’ हम डराति डराति कहियै ‘हॅ’। ‘बजरंग बली के नाम ल’ क’ सूत़ भूत प्रेत किछु नै बिगाड़ै छै़ ।’आ’ हम जै हनूमान जी करैत फेर सॅ सूइत रहि ।’स्निग्धा भरि पेट छोले बटोरे खाइत बाजि रहल छल। ‘आ’ भूत प्रेतक पोटरी नेने मॅझली माैसी के बेटी जे राज विराज मे रहैत छल़ पहिने त’ खेल सुरू करै किछु आओऱ ‘डांग डूंग डांग डूंग ताले को आयाे हामी हरू ‘के ना़ राजा को छोरो को विवाह को फरसी लीनू । ’मुदा खेल छोड़ि क’ कहए लागै अपन इसकुलक बड़का गाछक खिस्सा़ जतए एक गोट नकियाति भूत ओकरा बरदान देदो छलैए ।ई सब खिस्सा तू कत्तेक धियान सॅ सुनही प्रीति जेना एको आखर छुटला कोनेा दोख नै लागि जाए़ वा’ परीच्छा मे पूछए वला उत्तर हाेक़ ।’ “गाम त’ बड़ पहिने छूटि गेल हमर सबहक पप्पा सहरि मे मकान बना लेलथ़ि आ’ धीरे धीरे सब भाय बहिनी के विवाह दान हाेइत माता पिता अपन आखिरी यात्रा पर न्किलि गेला़ तखन ओ सहरियाे छुटि गेल़ ़सब भाए बहिन एक दाेसरि सॅ हजाराे मील दूऱ ़ एकटा पृथ्वी के एक छोर पर त दाेसर दाेसर छोर प ।’प्रीति सुना रहल अछि । “आय काल्हि लोक सब बड़ ज्ञानी भ’ गेलए नै एक ठाम कोना रहतैक़ चरैवैती चरेवैती ’अपन आदि मानव जका फेर विश्व के कोना कोना छानि रहल अछि दुनिया देखय के उद्दाम लालसा़।’ आ’ जोर जोर सॅ ठहाका मारैत प्रीति अपन चश्मा के माथ पर स’ उतारि आंगुर सॅ कटलाहा केश सोझराबए लागल छल़ । समय जेना महानगर सॅ पड़ाऽऽ क’ ओहि गाम मे नूका गेल छल आ’ ओ दुनु बहिनपा ओकरा खिहारय निकलल छलीह। ओहिना गाछी सॅ बहैत बसात पुआरक बड़का बड़का टाल दलान पर बैसल पुरूष आ’ आंगनि मे स्त्रीगणक राज़ आ’ दुनु के आखि सॅ बचैत़ उत्त्पात मचबैत धिया पुत्ता । अहि बेर प्रीति उछलल़ ‘ओहि महफा लागल बैलगाड़ी के पाछा तू कोना भागल छलही़ ‘अनिया से मनिया दड़िभंगा वाली कनिया ’ कहैत गाड़ी के पीछा मे लटकल़ आ’ कोन एकटा फकड़ा पढै छलही़ देख नै़ एकदम बिसरि रहल छी़ कि छलै कि छलै ’अपन बिचला आंगुर सॅ माथ ठाेकैत बाजल़ ‘हॅ़ लाल भैया ल’क’ एला़ लाले लाले कनिया़ किछु एहने सन छलै नै़ ” प्रीति अपन विलक्षण स्मृति के परिचए दइत बाजल छल़ ओ बड़प्पन जे नेना मे छलै आ’ अपना के काबिल बूझए वला गप्प से एखनि धरि छइए छलैक़। अचानक अपन घड़ी पर तकैत बाजल़ ‘गुलाब आब चली छाै बाजि गेलए़ राैतुका फ्लाइट सॅ हमरा वाशिंगटन डी सी जेबा के अछ़ि बेटा अछि ओतए घरवला सेहाे ओहि ठाम पाेस्टेड छथि ’। हड़बड़ा क’ ओ अपन समान उठाैलक फेर समान टेबुल पर राखि पर्स खाेलि विजिटिंग कार्ड पर अपन व्यक्तिगत माेबाइल नंबर लिखिक स्निग्धा के देलकै “माेन त’ नै करैत अछि तोरा छोड़ए के मुदा जिनगी छै आए तीस बरखक बाद व्यतीत आॅखिक सोझा ठाढ भ’ गेल आब नै बिसरिहै ‘छोटी सी है दुनिया पहचाने रास्ते है तुम कभी तो मिलोगे़ कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल़’ गाबैत फेर कनि हड़बड़ा क बाजल़ ‘अतीते मे हम सब भ्रमण करैत रहि गेलौ नबका किछु नै पूछलै किछु नै कहलियौ मुदा आब फेर भेंट हाेयत त’ खाली नबके गप्प करब़ बेस़ ।’ दुनु लिफ्ट सॅ उतरि अपन अपन गाड़ी दिस चलि आएल छली़ ़ ़प्रीति के ड्राइवर गाड़ी लग आनि लेलकै ओ गला मिलैत बाए बाए करैत चलि गेल । स्निग्धा ड्राइविंग करए सॅ पहिने ओकर विजिटिंग कार्ड अपन पर्स सॅ निकालि कए नहि जानि की सोचि कए देखए लागलै़। “श्री शान्ति भूषण़ विदेश विभाग भारत सरकाऱ’ ।ओकर करेज जोर जोर सॅ लोहरबा के भाॅति जकां धड़कए लागल छल हाथ सेहो थर थर कांपय लगलै़ अपन पाप के छुपबए लेल़ ओकर पति पर बेबुनियाद आराेप लगा क’ सस्पैंड करबए बला व्यक्ति यएह छल सी़ बी आई जाचक मांग के ठुकरा बए वला यएह थीक अप्पन लोक जे ओकर घर उजाड़ए के भरिसक प्रयास केने छल । विदेशे विभाग मे उच्च पदस्थ ओकर पति यएह नाम कहने छलैन्ह़ मुदा सरनेम नहि लिखबा सॅ ई पता नहि छल केकराे की ओ कत्तए के छथि । प्रीति जेना कसि क’ ओकर हाथ पर नैाह गड़ाैने पुछि रहल छल ‘चुट्टा लेमे की चुट्टी़’ ओकर मुह लाल भ’ गेलै़ ।आखि सॅ पानियो बहि गेलय़ । मुदा अहि बेर ओ हॅसि नहि सकल । ओकरा भेलए जे फेर नहि जानि कत्तेक अवधि धरि डबरा़ नाला पोखरि तलाब खत्ता खुत्ती मे नहाति नहाति प्रीति के नजरि मे शुद्व होबए लेल गंगा के तलाश मे भटकैत रहत़ । मुदा गंगा नहेलोपरान्त आब ओकरा नजरि मे पवित्र भ’सकत वा’ नहि किएक त’ दुनु के दुनिया बदलि गेल छल । आखि सॅ बहैत धार देखि बेटी बुझलक संगी के याद मे मां विहृवल भ’ गेल छथि ।हुनका ड्राइविंग सीट सॅ हटा अपने गाड़ी चलबए लागल छल। कामिनी कामायनी 8।5।09 1 ज्योति वत्स said... gam ghar me bahina sabh aab katay karait hetih ena, aab te sabh hi-fi dekhbait chhathi. Reply05/15/2009 at 09:07 PM 2 Dr Palan Jha said... kamini jik bahinapa bala katha , puran phakra sabh khoob nik Reply05/15/2009 at 09:05 PM 3 vivekanand jha said... majedaar katha! khoob neek likhal Reply05/15/2009 at 06:15 PM डा. कल्पना मणिकान्त मिश्र,पिता डा शिव कुमार झा,गाम राटी,सासुर-गजहारा। विगत ३०-३२ बरस सँ मुम्बईवासी।मेडिकल शिक्षा जे.जे.होस्पीट्ल/ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज सँ सम्पन्न कए स्त्री-रोग विशेषज्ञ रुपमे कार्यरत। मातृभाषा मातृभाषाक प्रेम,बहुत किछ पढल आ सुनल अछि। अहूँ सब सुनने होयब कतेक बेर मुदा स्वयम अनुभव करबाक अवसर किछुयेक लोक के भेटैत छन्हि।हम सब बम्बई आएले रही। ओना तँ एहि गप्पक एक युग सँ बेसी भए गेल मुदा बिसरबाक हिम्मत नहि करि सकैत छी। आर कियैक बिसरु? महानगरीक चकाचौन्धमे हरायल रही,कतौउ भटकि नहि जाइ से चिन्ता रहए। १९८० दशक मे संजय गाँधीक एकटा योजना आएल छल, बेरोजगार ग्राजुएट लेल बैंकसँ किछु सुविधा २०,००० रुपया देबए लेल। हमहुँ बेरोजगार डाक्टर रही। आवेदन केलहुँ तँ लोन तुरते भेट गेल। मुदा आब ओहि पैसाक हम की करु? अपन रोजगार जेना दवाईखाना,कोनो छोटसन घर आदि भविष्यमे अपन क्लीनिक खोलि सकी, जे कि ओहि समयमे अति सुलभ आर सम्भव छल, आब तँ सपना रहि गेल। ओही पाइसँ निवेश करि हम अपन भविष्य सुरक्षित करि सकैत छ्लहुँ, गहना-गुड़िया बना अपन सोख-सेहनता पूरा करि सकैत छलहुँ वा भारत भ्रमण करि सकै छलहुँ। मुदा नहि ! हमर पतिक (डा. मणिकान्त मिश्र) इच्छा छ्लन्हि जे मैथिली भाषाक पत्रिका निकाली। हम दुनु गोटे मिली क ’विदेह’ नामक मैथिली पत्रिकाक शुरुआत केलहुँ। पत्रिका तँ छपए मुदा के कीनत आर के पढत ई बड पैघ समस्या छ्ल। कोनाहु करि कए अपन घरक पूँजी लगा कए २ बरख तँ पत्रिका चलेलहुँ। फ़ेर हमरा सभकेँ बन्द करए पडल किएक तँ दुनु गोटे डाक्टरी व्यवसाय मे लागल रही, घर-अस्पताल-पारिवारिक झन्झट सम्हारैत बड मुश्किल छ्ल। बम्बई मे नबे- नबे रही। तहूमे एतेक दुस्साहस कोनो साधारण आदमी नहि करि सकैत अछि सिर्फ आर सिर्फ डा मणिकान्त मिश्रा करि सकैत छ्लाह। किएक तँ मैथिलीक प्रति हुनका जुनूनी लगाव छ्लन्हि। बम्बईक आपाधापी भरल जीवन एवम स्वास्थ्यक उतार-चढाव किछु हुनकर मैथिली प्रेमक उत्साह केँ कम नहि कए सकलन्हि आर बीस-बाईस बरखक पश्चात ओ अपन सबटा पूँजी शरीर-समांग समेत मैथिलीक फिल्म "आउ पिया हमर नगरी"बनौलनि। फिल्म बड सुन्दर बनलै, अहाँ सभ देखने होएब। यदि नहि तँ एक बेर अवश्य देखी। फिल्म बनाबए मे जे कष्ट आर अनुभव भेल से हम एखन वर्णन नहि करि सकै छी। आर कखनो।।।।! मुदा एहिसब प्रकरण मे माँ मैथिली अपन लायक पुत्र सँ हरदम लेल बिछुडि गेली। अछि कोनो मात्रभाषा भक्त-पुत्र जे अपन माँ-मैथिलीक हृदयक पीडाक अनुभुति करि हुनका लेल अपन सब किछु समर्पित करि दिअए। 1 www.google.com/accounts/o8/id?id=AItOawnfdWWeKghW5vw2SndwaYt0nMuZlEe_-H0 said... Didi , Bahut neek lagal paedh ka ...ahaan neek Doctor aa didi chi se ta bujhal chalaik ......Ati Uttam likhal aich !!! Ahina likho !!! Binny Reply05/29/2009 at 06:24 AM 2 Dr. Dileep Kumar said... Respected Mam, I know you because, I am from 'Pilakhwar' and I met you in my villege when you were in pilakhwar for making your film "Aau piya hamar nagari". Very nice film, and more than that, I just inspired by you n your husband (Dr. Manikant mishra)affection & love with mithila culture n language. I am respecting you from my inner heart for doing all such thing to promote mithila culture, tradition, & language. With regard: Dr. Dileep Kumar ( Sree Chitra Inst., Trivandrum). dr.dileep08@gmail.com +91 9633463050. Reply05/25/2009 at 03:00 PM 3 सुशांत झा said... मिथिला और मैथिलीके उत्थान के लेल एखनों कतेको लोक लागल छथि। लेकिन दुर्भाग्य के गप्प जे नवका पीढ़ी अपन भाषा सं कटि रहल अछि। आ ई मैथिलिए संगे नहि..बल्कि सब भाषा संगे भ रहल अछि। हमसब अंग्रेजी आ हिंन्दी के भाषाई साम्राज्यवाद के शिकार भ रहल छी। एकर कोनो रास्ता नहि सूझि रहल अछि सिवाय अई बात के जे कम स कम अपन घर में त हमरालोकनि अप्पन भाषा बाजी। नहि त एकटा दिन एहन आयत जे जेना जेना शहरीकरण बढ़ल जायत, हमर भाषा खतम भेल जायत। अपन भाषा बजनाई हीनता नहि, स्वाभिमान के प्रतीक थिक। Reply05/22/2009 at 01:31 PM 4 vivekanand jha said... दाय हम तऽ एतबे कहब जे प्रेम छलन्हि आ ओ हम सब एखनॊ देखि सकैत छी एहिना बहुतॊ लॊक छथि जे मैथिली लेल मरैत-जीवैत छथि एहन लॊकक संख्या ओना हरदम कमे हॊइत छैक प्रेमक निर्वाह करऽ वला कम आ सतत श्रद्धेय हॊइत छथि Reply05/17/2009 at 04:12 PM 5 अंशुमाला सिंह said... विदेह अहाँ आ अहाँक पति शुरू कएने रहथि से देखि नीक लागल। एहि विदेहमे अहाँक संस्मरण आ ई जानि जे आउ पिया हमर नगरी अहाँक पति बनेने छलाह से सुखद, कारण ई फिल्म हम देखने छी। अपन पतिक फोटो सेहो एहि आलेखक संग दी आ हुनकर संग बिताओल अपन स्मरण राखी से आग्रह। Reply05/15/2009 at 09:22 PM 6 ज्योति वत्स said... videha 30 sal bad dekhi ahank prasannata ahak photo aa aalekh me dekhai paral, ahan se sabh ank me rachna aabay aa ham sabh dekhi tahi aasha sang. Reply05/15/2009 at 09:19 PM कथा-मर्यादाक हनन कुमार मनोज कश्यप जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प््रासारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प््राकाशित। सम्प््राति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। मर्यादाक हनन
मुख्य-आभयंता सन उच्च पद पर रहितो गंगाबाबूक सादगी, निश्छलता आ सेवा भावना उल्लेखनिय रहल आछ । हुनका लोक देवता बुझैत छनि। कोनो लोक एहि परोपट्टा मे नहिं भेटत जे कहि दिअय जे कोनो काज पड़ल होईक आ गंगाबाबू मना कऽ देने होथि । एहि परोपट्टाक जतेक जे लोक सिंचाई विभाग मे नोकरी करैत आछ से सभ गंगेबाबूक रखायल । ककरो नोकरी चाहियै तऽ सीधा सम्पर्क करय गंगाबाबू सँ । अपना ओहि ठाम रखबो करथिन आ नोकरियो रखा देथिन । गंगाबाबू पाई तऽ नहि कमैला मुदा यशक कोनो कमी नहिं । परोपट्टाक लोक हुनकर गुणगान करय, मुदा हुनकर अपने बेटा के छोड़ि कऽ।
कोन माय-बापक ई ईक्षा नहि रहैत छैक जे ओकर संतान सुसभ्य, सुशिक्षित, सुसंस्कृत बनय; उच्च पद पर जा माय-बाप, गाम-घर, देश-जयवारक पाग ऊँच करय। गंगोबाबू यैह आकांक्षा लय अपन एकमात्र पुत्र प्रभास कें सभ साधन उपलब्ध करबैत रहलखिन जे कहुना मनुक्ख बनि जाय । हमरा सँ आगू नहिं बढ़य, तऽ कम-स-कम सम्मानजनक स्तर धरि तऽ जरुरे पहुँचय । मुदा कुसंगति मे पड़ि बेटा नेन्हपने सँ पढ़ाईक जगह पान, सुसंसकारक जगह शराब-सिगरेट आ भलमानुषक जगह भांग अपना लेलकैन । कोना-कोना कऽ घिचैत-घिचैत ओकरा बी०ए० के डिग्री देयाओल गेलैक । एहना मे कोनो नीक नोकरीक तऽ आशा केनाई व्यर्थे छलैक । आ एतेक पैघ आधकारीक संतान कोनो छोट नोकरी करय तऽ प्रतिष्ठा कतऽ रहतै ! अंततोगत्वा बड़ सोचि-विचारि कऽ प्रभास के गंगाबाबू व्यवसाये मे लगायब उचित बुझलनि । मुदा भाग्य ओतहु पाछाँ काहाँ छोड़लकनि ओहो डुबि गेलनि ।
प्रभास के एक दिन ओहिना बौआईत देखि हम पुछि देलियै, 'आहाँ मे प्रतिभा के तऽ कोनो कमी नहि; एकर सदुपयोग कऽ आहाँ शिखर तक पहुँचि सकैत छी। मानल जे आब सरकारी नोकरीक उम्र नहिं बाँचल आछ ; मुदा आजुक युग मे तऽ प्राईवेटे सेक्टर सरकारी सँ आगू जा रहल आछ । आहाँ ओतऽ ट्राई कऽ सकैत छी । ' प्रभास मुँह मे भरल गुटकाक पीक कें पीच्च सँ फेकैत बाजल, 'कक्का ! आहाँ कोन दुनियाँ मे छी? प्राईवेट सेक्टर के चाहियैक यंग, इनरजेटिक, क्वालिफाईड, प्रोमीसिंग़़ हमरा सन भकलोल नहिं । ' गुटका के महीन कऽ चिबबैत ओ फेर बाजल, 'सत्य पुछू तऽ हमर नाकामीक जिम्मेवार हमर बापे छथि । जखन ओ जनैत छलाह जे हम भुसकौल छी, तखन सालक साल फार्म भरबाक पास करेबाक बदला मे जौं कतहु नोकरी रखा देने रहितैथ तऽ हमर आई ई दशा नहिं रहैत। मुदा एहि मे तऽ हुनकर झूठ मर्यादा आगू आबि गेलैन । आब आहं कहू जे मर्यादाक हनन कतऽ छै--पुत्र के छोट नोकरी करेबा मे वा दर-दर के ठोकर खाई लेल छोड़ि देबा मे?' हम निरुत्तर बगल दिस ताकऽ लगलहुँ। सोझाँक ख़िडकी सँ ताकि रहल गंगाबाबू अढ़ भऽ जेबाक कोशिश कऽ रहल छलाह। 1 মোহন said... lok bachcha par anavashyak davab banbai ye, okar pratibha ke tare jamin dekhi viksit karoo Reply05/15/2009 at 09:30 PM 2 अंशुमाला सिंह said... नीक समस्या उठेलहुँ मनोज जी। कथाक कसावट नीक। Reply05/15/2009 at 09:28 PM भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक) ,अन्तर्जालपर मैथिली आ विश्वव्यापी अन्तर्जालपर लेखन आ ई-प्रकाशन- गजेन्द्र ठाकुर गूगल आ वर्डप्रेस द्वारा जालवृत्त खोलबाक लेल बहुत रास बनल बनाएल परिकल्पित नमूना स्थल निर्माण लेल उपलब्ध अछि आ ओतए लेखन, संदेश आ टिप्पणीक लेल असीमित दत्तांशनिधि उपलब्ध अछि जतए जालोद्वहन मँगनीमे देल जा रहल अछि। ई सभ जालवृत्त निर्माण स्थल उपभोक्ता केन्द्रित अछि आ एतए सरल लेखन-पद्धतिक व्यवस्था सेहो कएल गेल अछि मुदा जे अहाँ संविहित पृच्छन भाषा (एस.क्यू.एल.) आधारित जालस्थलक निर्माण आ प्रबन्धन करए चाहैत छी तँ ओहि लेल ई निबन्ध अहाँक लेल उपयोगी रहत। पहिने मिथिलाक्षर आ देवनागरीक यूनीकोडमे लिखल जएबाक प्रक्रम दए रहल छी आ से अन्तर्जालपर पढ़ल जा सकबा योग्य कोना होएत तकरो चरचा होएत। तकर बाद जालस्थल निर्माण पद्धतिपर विस्तृत चरचा होएत। देवनागरी लिपिकेँ रोमन टाइपराइटरपर कोन टाइप करी- पहिने www.bhashaindia.com पर जा कए हिन्दी IME V.5 अवारोपित (डाउनलोड) करू । एहि विधि (प्रोग्राम) केँ अपना संगणक (कंप्युटर) पर प्रतिष्ठापित (इंस्टॉल) करू । फेर नियन्त्रण पटल (कंट्रोल पैनल) मे क्षेत्रीय आ भाषा (रेजनल आ लंग्वेज) पर जा कए लंग्वेज प्लावक (टैब) केँ दबाऊ । देखू जे कॉम्प्लेक्स स्क्रिप्ट/ राइट टू लेफ्ट लैंगुएज पर सही केर निशान लागल छैक आकि नहि । नहि छैक तँ करू आ संगणक ( कंप्युटर) ताहि लेल जे जे कहैत अछि से करू । एकरा बाद लंग्वेज प्लावक (टैबकेँ) आ डिटेल्स केँ दबाऊ । फेर ओतए ऐड क्लिक करू आ ओतए लंग्वेज मे हिन्दी आ कीबोर्ड मे HINDI INDIC IME 1[V.5.1] सेलेक्ट कए अप्लाइ दबाऊ । कंप्युटरकेँ रीस्टार्ट करू । आब वर्ड डोक्युमेंट खोलू । वाम Alt+Shift केँ सम्मिलित दबेला उत्तर H कुँजीपटल (कीबोर्ड) आओत नहि तँ नीचाँ लंग्वेजक़ेँ क्लिक करू आ हिन्दी चुनि लिअ । कुँजीपटलमे हिन्दी transliteration आ आन तरहक विकल्प जेना रेमिंगटन/ इन्सक्रिप्ट कुँजीपटल उपलब्ध अछि । चुनि कए टाइप शुरू करू । आब transliteration कुँजीपटलपर राम टाइप करबा लए raama टाइप करए पड़त । क् (हलन्त सहित) टाइप करबाक हेतु k दबाऊ आ माउसक लेफ्ट बटन क्लिक करू अन्यथा स्पेस पिञ्जक आकि एंटर पिञ्जक दबेला पर हलंत उड़ि जाएत । विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि भेटल छल । हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ ई सूचित करैत हर्षित छी जे २७.१०.२००८ केँ मैथिली भाषामे विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक । एतए संगणक शब्द सभक स्थानीयकरणमे बहुत रास अंग्रेजी शब्दक अनुवाद हम कएने रही आ ताहिसँ एह क्रयमे रुचि बढ़ल आ मदति सेहो भेटल । देवनागरीमे टाइप करबाक हेतु एकटा आर तन्त्रांश साधन (सॉफ्टवेअर टूल) उपलब्ध अछि टूल अछि जे http://www.baraha.com/BarahaIME.htm लिंक पर उपलब्ध अछि । एकर विशेषता अछि एकर संस्कृत कुञ्जी फलक जे आन कोनो तन्त्रांशमे उपलब्ध नहि अछि । एहिमे उदात्त,अनुदात्त स्वरित आ किछु आन संस्कृत अक्षर उपलब्ध अछि मुदा एतहु स्वास्तिक, ग्वाङ, अञ्जी इत्यादि उपलब्ध नहि अछि । स॑ , स॒ , स॓ , सऽ केँ स लिखलाक बाद सिफ्ट ३,२,४ आ ७ दबेलासँ लिखि सकैत छी । तिरहुता लिपि लिखबाक हेतु एहि लिंक पर जाऊ। http://www.tirhutalipi.4t.com/ मुदा एकरा हेतु एहि लिंक पर जे प्रीति फॉंन्ट छैक तकरा सेहो अवारोपित कए प्रतिकृति करू आ दुनू केँ ध्रुववृत्त चालक (हार्डडिस्क ड्राइव) C/windows/fonts मे लेपन करू । एहिमे जे फॉन्ट अछि से Ascii मे अछि । क्रुतदेव , शुशा ई सभ फॉण्ट सेहो एहि तरहक अछि, पहिने उपयोगी छल मुदा आब सर्च इंजिनमे यूनिकोड-यू.टी.एफ.8 केर सर्च होइत छैक आ Ascii मे लिखल देवनागरीक सर्च नहि भए पबैत अछि । विन्डोजमे मंगल वर्णमुख (फॉन्ट) अबैत छैक से यूनीकोडमे छैक आ एहिमे लिखल देवनागरी सर्च भए जाइत अछि । मिथिलाक्षरक यूनीकोड रूपक आवेदन (अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल) लंबित अछि जाहिमे बर्कले विश्वविद्यालयक प्रोफेसर डेबोराह एन्डरसन, Project Leader, Script Encoding Initiative, Dept. of Linguistics,UC Berkeley क आग्रहपर हमहुँ योगदान देने रही । आब किछु बात यूनीकोड आ जालस्थल (वेबसाइट) केर संबंधमे । कोनो फाइलकेँ पढ़बाक हेतु कंप्युटरमे आवश्यक फॉंट होएब जरूरी अछि, नहि तँ सभसँ सरल उपाय अछि, शब्द-संसाधकमे बनल लेख (वर्ड डोक्युमेंट) केँ पी.डी.एफ. फाइलमे परिवर्त्तित करू । एहिमे नफा नुकसान दुनू अछि । नफा जे बिना कोनो फांटक झंझटिक पी.डी.एफ.फाइल जाइ काँटा/ वर्णमुख/ लिपिमे लिखल गेल अछि, ताहिमे पढ़ल जा सकैत अछि । एकर नुकसान जे जखने फाइलमे जा कए सेव एज टेक्स्ट करब तँ अंग्रेजीतँ सेव भए जाएत मुदा देवनागरी तेहन सेव होएत जे पढ़ि नहि सकी । दोसर यूनीकोडक मंगलमे टाइप कएल लेखकेँ एडोब अक्रोबेटसँ पी.डी.एफ.मे परिवर्त्तित करबामे दिक्कत होए तँ संपूर्ण फाइलकेँ खोलि कए सभटा चयन करू, यूनीवर्सल यूनीकोड एम.एस.फांट ड्रॉप डाउन मेनूसँ सेलेक्ट करू फेर प्रिंटमे जा कए प्रिंटर (मुद्रक) एडोब एक्रोबेट सेलेक्ट करू । आब ई फाइल परिवर्त्तित भए जाएत पी. डी. एफ.मे । माइक्रोसॉफ्ट वर्डसँ pdf मे परिवर्त्तनक सोझ तरीका अछि, फाइल, प्रिंटमे जाऊ, आ फेर प्रिंटरमे एक्रोबेट डिस्टीलर सेलेक्ट कए प्रिंट कमांड दए दिअ । मुदा एहिमे कखनो काल pdf डॉक्युमेंट नहि बनैत छैक । तखन प्रिंटर एक्रोबेट डिस्टीलर सेलेक्ट कए प्रोपर्टीज मे जाऊ । ओतए अडोब pdfसेटिंग सेलेक्ट करू । ओतए ऑपशन डू नॉट सेंड फॉन्ट्स टू डिस्टिलर मे टिक लगाएल होएत । ओकरा अनचेक करू । आ से कए बाहर आऊ आ प्रिंट कमांड दिअ । आब pdf डॉक्युमेन्ट बनि जाएत । एहि फाइलमे कखनो काल घ हलन्त आ ज कखनो काल चतुर्भुज रूपमे नञि पढ़बा योग्य अबैत अछि । पी.डी.एफ. स्प्लिटर आ’ मर्जर सॉफ्टवेयर ( जेना फ्रीवेयर सॉफ्टवेयर ‘पी.डी.एफ. हेल्पर/ सैम) केर मदतिसँ आसानीसँ पी.डी.एफ. फाइल जोड़ि आ तोड़ि सकैत छी। आब वेबसाइट बनेबाक पूर्व किछु मुख्य बातकेँ देखि लिअ । पाँच तरहक अन्तरजाल गवेषक (इंटरनेट ब्राउजर) अछि, शेष सभटा एकरा सभकेँ आधार बना कए रचित अछि । तखन सभसँ पहिने ई चारू अपना कंप्युटरमे प्रतिष्ठापित (इंस्टॉल) करू- १.ओपेरा , २.मोजिल्ला , ३. माइक्रोसॉफ्टक इंटरनेट एक्सप्लोरर (ई तँ होएबे करत) , ४. गूगल क्रोम आ ५. एपलक,अखन धरि ई मेकिनटोसक लेल छल आब विन्डो लेल सेहो अछि, सफारी । आब जखन जाल पृष्ठ (वेब पेज) उपारोपित (अपलोड) करू वा पहिनहुँ तँ एहि सभपर खोलि कए अवश्य देखि लिअ । देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि । एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ किछु संगीतक स्वरलिपि लिखबाक सुविधा अछि । विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल । मंद्र सप्तक, तीव्र आ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि । ऋ,ॠ आ ऌ,ॡ आ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद जोड़क सुविधा एहिमे सुविधा छैक । अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि । ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि । आ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि । अ सँ ह तक वर्णमाला अछि । क्ष, त्र ,ज्ञ ओनातँ संयुक्त्त अक्षर अछि मुदा बच्चेसँ हमरा सभ अ सँ ज्ञ तक वर्णमालाक रूपमे पढ़ने छी । श्र सेहो क्ष, त्र, ज्ञ जेकाँ संयुक्त अक्षर अछि । ज्ञ केर उच्चारण ताहि द्वारे हमरा सभ ग आ य केर मिश्रण द्वारा करैत छी से धरि गलत अछि । ई अछि ज आ ञ केर संयुक्त । ऋ केर उच्चारण हमर सभ करैत छी, री । लृ केर उच्चारण करैत छी, ल, र आ ई केर संयुक्त्त । मुदा ऋ आ लृ स्वयं स्वर अछि, संयुक्ताक्षर नहि । विदेहक आर्काइवमे शुद्ध उच्चारणक आवश्यकताकेँ देखि कए अ सँ ज्ञ तक सभ वर्णक उच्चारण देल गेल अछि । भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूपक प्रयोगक देवनागरीमे चलन भऽ गेल अछि । भारतीय संविधानक अनुच्छेद 343(1) कहैत अछि जे संघक राजकीय प्रयोजनक हेतु प्रयुक्त होमए बला अंकक रूप, भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूप होएत। मुदा राष्ट्रपति अंकक देवनागरी रूपकेँ सेहो प्राधिकृत कऽ सकैत छथि । http://www.bhashaindia.com पर tbil converter सॉफ्टवेयर डाउनलोड करू । मंगल फॉंटमे आन फॉटसँ परिवर्त्तन करबाक अछि तँ डॉक्युमेन्ट .doc चयन करू इनपुट भाषामे हिन्दी आ ascii फॉन्टमे फॉन्ट चयन करू । आउटपुटमे भाषा हिन्दी आ फॉन्ट Unicode mangalचयन करू । आब ब्राउज कऽ कए फाइल सेलेक्ट करू । अहाँक कम्प्युटर मे ऑफिस २००७ अछि आ वर्ड डॉक्युमेन्ट .docx एक्सटेंशन अछि , तखन एक्सटेंशनकेँ रिनेम करू .docआब ब्राउजमे डॉक्युमेन्ट आबि जाएत । अहाँक कम्प्युटर मे ऑफिस २००७ नहि अछि तखन रिनेम केलासँ कोनो फाएदा नहि । आब कंवर्ट क्लिक करू । नूतन फाइल Unicode Mangalफॉन्टमे बनि जाएत । अहाँक शब्द संसाधक सञ्चिका )(वर्ड डॉक्युमेन्ट फाइल) मे यूनीलोड आascii वर्णमुख (फॉन्ट) मिलल अछि, तखन अंदाजीसँ ascii वा बेशी प्रयुक्त होएबला ascii केर चयन करू । कंवर्ट क्लिक करू कन्वर्ट भऽ जाएत यूनीकोड मंगल वर्णमुखमे। जालस्थल निर्माण पहिने कोनो ऑनलाइन प्रतिष्ठित संस्थासँ प्रदेश नाम (डोमेन नेम) कीनू । उदाहरणस्वरूप रिडिफ डॉट कॉम पर जाऊ आ रिडिफ होस्टिंगपर क्लिक करू । ओतए बुक यूअर डोमेन पर जा कए इच्छित नाम ट्कित कए देखू जे ओ उपलब्ध अछि आकि नहि । अहाँ अपन जालस्थलक हेतु उपयुक्त डोमेन नेम क्रेडिट कार्डसँ ऑनलाइन कीनि सकैत छी । ई सस्ता छैक दश डॉलर प्रतिवर्ष एकर अधिकतम मूल्य छैक । तकरा बाद जालोद्वहन सेवा (वेब होस्टिंग सर्विस) केर लिंकपर जाऊ । ५ वा दस साल लेल १०० एम.बी. स्थानक संग जालोद्वहन सेवा लिअ आ एकरा संग माय एस.क्यू.एल. सेवा मुप्त छैक मुदा ओहिमे लाइनक्सपर काज करए पड़त जे कनेक कठिनाह/ तकनीकी भए सकैत अछि से माइक्रोसॉफ्ट एस.क्यू.एल. सेवा किछु आर पाइ लगा कए अहाँ कीनि सकैत छी । आब अहाँ लग २० एम. बी. केर एस.क्यू.एल. दत्तनिधि (डाटाबेस) आ ८० एम.बी.केर साइट लेल जगह बाँचत (माने पूरा १०० एम.बी.) आ से पर्याप्त अछि। आर स्पेसक जोगार मँगनीमे भए जाएत, तकर चरचा आगाँ होएत। माइक्रोसॉफ्ट एस.क्यू.एल. सेवा लेबाक उपरान्त अहाँ अपन माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल सञ्चिका ओतए चढ़ा सकैत छी आ तकर उपयोग अपन जालस्थलपर एकटा मध्यस्थ (इन्टरफेस) बना कए अहाँ कए सकैत छी । आब जालस्थल (वेबसाइट) बनेबाक विधिपर विचार करी। माइक्रोसॉफ्ट फ्रन्टपेज ऑफिस एक्स.पी. क संग अबैत अछि । ऑफिस २००३ मे सेहो ई अलग सँ उपलब्ध अछि । प्रन्टपेजमे बनल-बनाओल वेबसाइट विजार्ड चलाऊ । मोटा-मोटी पाँच पृष्ठक जाल-स्थल बनि जाएत। एहिमे वाम कात राइट क्लिक कए पृष्ठक संख्या बढ़ा सकैत छी । ऊपरमे स्थित थीमसँ अपन इच्छा मोताबिक बनल-बनाओल डिजाइन सेहो लए सकैत छी । साइटक कोनो पृष्ठकेँ अहाँ फोटो एलीमेन्ट द्वारा फोटो गैलरीमे परिवर्तित कए सकैत छी आ ३-४-६ स्तम्भमे फोटो सभ सजा सकैत छी । ओहि पृष्ठपर डबल क्लिक कए अपन संगणकसँ फोटोकेँ आनू आ यूनीकोड टाइपराइटर द्वारा वर्णन टंकित करू । पृष्ठ सुरक्षित करबा काल चित्रक गुणवत्ता जे.पी.जी. फोटोमे १ सँ १०० धरि चुनबाक विकल्प छैक । जतेक पैघ फाइल चुनब ततेक बेशी जगह छेकत ।वाम आ नीचाँमे लिक लेल चिल्ड्रेन सेटिंग विकल्प चयन कएला उत्तर जालस्थलक सभ पृष्ठक सूचना ओतए आबि जाएत । बेशी पृष्ठ भेला उत्तर कोनो पृष्ठक भीतर पृष्ठ सभक श्रृंखला दए सकैत छी । आब अहाँक संगणकमे अहाँक जालस्थल माय डोक्युमेन्ट्स/ माय वेबमे सुरक्षित अछि । अपन वेबसाइटक वास्तविक स्वरूप प्रीव्यू विकल्प द्वारा ऊपर वर्णित ५ प्रकारक गवेषकमे देखू । किछु आवश्यक परिवर्तन प्रन्टपेजपर कएला उत्तर एहि साइटकेँ अपन सर्वरपर उपारोपित कए दियौक। एहि लेल फाइलजिला डॉट कॉम पर जाऊ जे मुफ्त तंत्रांश उपलब्ध करबैत अछि । एतए क्लाइन्ट आ सर्वर मे सँ क्लाइन्ट विकल्प चुनू आ तंत्रांश अपन कम्प्यूटरमे प्रतिष्ठापित करू । एकरा बाद यूजर नेम आ पासवर्ड दिअ आ एफ.टी.पी. डॉट डोमेन नेम पर पूर्ण जालस्थल वितरक (सर्वर) केर मूल फोल्डरमे पर उपारोपित कए दिअ। अहाँक जालस्थल अन्तरजालपर नियत जालस्थल पतापर देखाइ पड् लागत। अपन अपन दत्तसङ्ग्रह कोनो तन्त्रांश जेना ई.एम.एस. एस.क्यू.एल.मैनेजर केर माध्यमसँ अपन वितरकपर चढ़ाऊ आ एहि लेल अपन सेवा प्रदातासँ दूरभाषपर गप कए किछु विशेष ओर्टक जानकारी लिअ। सभटा सामग्री चढ़ि गेलाक बाद अपन जालस्थलक पृष्ठपर बनाओल मध्यस्थ पृष्ठपर कोडमे यूजर नेम आ पसवर्ड देनाइ नहि बिसरू। कोनो पृष्ठपर पृष्ठसँ संगीत अन्बाक लेल कम्प्यूटरसँ ओहि पृष्ठपर संगीतक सञ्चिका आयात करू मुदा आइ काल्हि मात्र ओपेरा आ इन्टरनेट एक्सप्लोररपर प्रन्टपेजसँ बनल जालस्थलमे संगीत बजैत अछि। आब किछु गप पृष्ठ शैली (स्टाइल शीट) पर। अहाँ सम्पूर्ण जालस्थलक डिजाइन जे एक्के रंगक राखए चाही तँ एहि लेल सभ पृष्ठमे एकर विधिलेख दए दियौक आ एकटा फोल्डरमे डिजाइन राखि दियौक। एहिमे पृष्ठभूमिमे बाजए बला संगीत सेहो रहि सकैत अछि । एहिसँ ई फायदा अछि जे सभ पृष्ठ खुजबा काल फेरसँ तागति नहि लगबए पड़त मात्र एक बेर डिजाइन आ संगीत खुजबामे जे समय लागत सएह टा। दोसर पृष्ठपर जे लिखित अंश वा फोटो आदि रहत ताहिमे जतेक देरी लागत सएह समय मात्र लागत। माने अहाँक जालस्थल हल्लुक भए जाएत आ जल्दीसँ खुजत। आब आर.एस.एस.फीडक विषयमे जानकारी ली। जालस्थल तँ बनि गेल आब एकर प्रचार प्रसार सेहो होएबाक चाही। आर.एस.एस. फीड अछि रिअल सिम्पल सिन्डिकेशन फीड केर संक्षिप्त रूप। एकटा वा कैक टा .xml फाइल बना कए अहाँ अपन वितरकपर चढ़ा दियौक। अहाँ .css डिजाइन तकर बाद ई एक तरहेँ जालस्थलक नक्शा बना दैत अछि आ जखने एहिमे कोनो परिवर्तन अबैत छैक तँ फीड-रीडर/ एग्रीगेटरकेँ जालस्थलपर नव सामग्री अएबाक सूचना भेटि जाइत छैक। एहिमेमे मुख्य घटनाक/ लेखक सारांश रहैत छैक जे लिंकसँ जुड़ल रहैत अछि। ओहि लिंककेँ क्लिक केला उत्तर अहाँ विस्तृत जानकारी प्राप्त कए सकैत छी। .xml युक्त पृष्ठकेँ जालवृत्त (ब्लॉग) पर ऐड गाडजेट/ फीड/ मे पताक रूपमे लिखि कए ५ सँ २० धरि नूतन सामग्रीक (क्रमशः गूगल आ वर्डप्रेस ब्लॉगमे) अद्यतन जानकारी लेल जालवृत्त (ब्लॉग) पर राखल जा सकैत अछि। एकर आर उपयोग छैक जेना फीडबर्नर केर माध्यमसँ ई-पत्र द्वारा सदस्यकेँ सूचना देब, हेडलाइन एनीमेटर जालस्थल/ जालवृत्तपर लगाएब/ ई-पत्र द्वारा इच्छित सामग्रीक लिंक संगीकेँ पठाएब आ गवेषक वा फीड/ न्यूज रीडरक माध्यमसँ पढ़ब। तकर बाद अपन जालस्थकेँ गूगल, याहूसर्च, लाइव सर्च आ आस्क डॉट कॉमपर सबमिट युअर साइट केर अन्तर्गत दए दियौक जाहिसँ ई सभ अन्वेषण यन्त्र अहाँक साइटकेँ ताकि सकए। .xmlफाइलबला विश्वव्यापी अन्तर्जाल पता/ संकेत तकबामे एहि यन्त्र सभकेँ आर सुविधा होएतैक से अहाँ साइटक मुफत प्रचार होएत। .xml फाइल .htm केर स्थान लेत से नहि छैक मुदा एहिसँ फीड एग्रीगेटर/ अन्वेषण यन्त्र सभकेँ जालस्थलपर नव सामग्री तकबामे सुविधा होइत छैक। जखन अहाँक जालस्थलमे परिवर्तन आबए तँ अपन मूल .xml फाइलकेँ परिवर्तित कए वितरकपर चढ़ाऊ, शेष कार्य फीड एग्रीगेटर/ अन्वेषण यन्त्र स्वयं कए लेत। अहाँक अन्तर्जाल गवेषक सेहो साइटमे फीड रहला उत्तर विकल्प चुनलाक बाद जालस्थलक पृष्ठकेँ रिफ्रेश कए लैत अछि, कारण कखनो काल कऽ टेम्परोरी फाइल संगणकमे रहने पुरनके सामग्री इन्टरनेटपर देखाएल जाइत रहैत अछि। मुदा एहि लेल सभ पृष्ठमे एकटा कूटसंकेत देमए पड़त। आब किछु चरचा ४०४ एरर पृष्ठक। अहाँक जालस्थपर कोनो फोटो/ लिंक जे पहिने छल मुदा आब नहि अछि केँ टाइप कएला उत्तर ४०४ एरर संकेत अन्तर्जाल गवेषक दैत अछि। अपन सेवा प्रदातासँ कन्फ्युगरेशन सम्बन्धी जानकारी लऽ कए अपन जालस्थलक स्टाइलसीटक हिसाबसँ एरर पृष्ठ बनाऊ जतए किछु व्यक्तिगत संदेश जेना- अहाँ द्वारा ताकल सामग्री आब उपलब्ध नहि अछि केर संग जालस्थलक दोसर लिंक सभ राखू। मुदा एकर ध्यान राखू जे एहि पृष्ठपर एहन कूटसंकेत रहए जाहिसँ अन्वेषण यन्त्र ओकरा सर्च नहि करए। अपन जालस्थलपर girgit.chitthajagat.in वा google translate गाडजेट राखि सकैत छी जाहिसँ मैथिलीक सामग्री दोसरलिपि सभमे एक क्लिकमे परिवर्तित भए जाए। साइटक प्रचार अपन ब्लॉग/ ग्रुप बना कए आ ऑनलाइन कमेन्ट सबमिशन लेल सेवा प्रदातासँ डॉट नेट सुविधा लए-जाहिसँ वितरक कमेन्ट अहाँक ई-पत्र संकेतपर पाठकक कमेन्ट प्रेषित कए सकए आ फीड एग्रीगेटरमे अपन फीड पंजीकृत कराए पाठकक संख्या बढ़ाओल जा सकैत अछि। कमेन्ट सबमिशन टाइपपैड डॉट कॉम (पेड ब्लॉगर सेवा प्रदाता) सँ सेहो प्राप्त कएल जा सकैत अछि, ई ब्लॉग लेल तँ पाइ लैत अछि मुदा प्रोफाइल बनबए लेल नहि आ ओहि संगे ब्लॉग आ साइट लेल कमेंट फॉर्मक कोड आ सुविधा दुनू उपलब्ध करबैत अछि, एहिमे अहाँ जालस्थलपर कमेंटक एक पृष्ठपर सँख्या, कमेंटपर आपसी वार्तालाप, आ कमेंट मॉडेरेशन विकल्प चुनि सकैत छी। अपन जालस्थलक आर्काइव लेल गूगल साइट आ वर्डप्रेस १० आ ३ जी.बी. क्रमशः स्थान मुफ्त दैत अछि। फाइल ओतए अपलोड करू मुदा अपन साइटपर ओकर लिंक दए दियौक। एहिसँ अहाँ अपन बजट ठीक कए सकैत छी। ब्लॉगक यू.आर.एल. यदि नीक नहि लागए तँ मोनमाफिक यू.आर.एल. सुविधा १० डॉलर सालानापर उपलब्ध अछि, मुदा ब्लॉगक सुविधाक अतिरिक्त कोनो आर सुविधा एहिसँ नहि भेटत। मुदा जे अहाँक बजट बहुत कम अछि तँ एकर उपयोग करू। अहाँ लग जे पूर्ण साइट अछि तँ ओकर एकटा पृष्ठ पर एफ.टी.पी. अपलोडसँ डिसकसन फोरम आदि अपन साइटक ऊपर राखि सकैत छी आ ब्लॉगकेँ अपन साइटमे सम्मिलित कए सकैत छी। ब्लॉगरक भीतर प्रकाशनक अन्तर्गत यू.आर.एल. सुविधा १० डॉलर सालानापर आ एफ.टी.पी. अपलोड ई दुनू सुविधा उपलब्ध छैक। आब चरचा फेव आइकनक। अपन लोगो ब्राउजरक पताक संग देबाक लेल .ico प्रारूपमे लोगोक चित्र बनाऊ आ अपलोड करू, संगमे स्टाइलसीटपर एकर विवरण दए दियौक। अपन ई-पत्रमे सिगनेचर, माय स्पेस, फेसबुक, ओरकुट, ट्विटर,यू ट्यूब, पिकासा, याहूग्रुप आ गूगलग्रुप केर माध्यमसँ, आर.एस.एस.फीड आ हेडलाइन एनीमेटर जे ई-पत्र सिगनेचरमे सेहो राखल जा सकैत अछि केर माध्यमसँ सेहो एकर प्रचार कए सकैत छी। गूगल एनेलेटिक्स आ वेबमास्टर टूलक सेहो उपयोग करू। एनेलेटिक्सक ट्रैकर कोड सभ पृष्ठपर दिअ जाहिसँ प्रतिदिन कतएसँ के आ कोना अहाँक जालस्थलपर अएलाह तकर जानकारी भेटि सकवे आ वेबमास्टर टूलसँ जालस्थल वेरीफाइ करू आ .xml फाइल सबमिट करू। यदि कोनो पृष्ठपर कोनो फोटो/ लिंककेँ दोसर टैब/ गवेषकमे खोलए चाही तँ टारगेट फ्रेम/ न्यू विन्डो-ब्लैंक चुनू। सी-डैक पुणेक अओजार आ फान्ट सेहो छैक मुदा ओहिसँ विशेष लाभ परिलक्षित नहि भए रहल अछि, उनटे बहुत रास दिक्कत जेना “द् ध” आ “ग् र” क्रमशः द्ध आ ग्र केर बदलामे देखबामे आओत। विदेह ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ पर ऑनलाइन यूनीकोड टाइपराइटर उपलब्ध अछि। विशेष दिक्कत भेलापर/ वा एकर ऑफलाइन रूप हमरासँ ggajendra@videha.comपर ई-मेल कए मँगबा सकैत छी/ पूछि सकैत छी। पी.डी.एफ.सँ सव एज टेक्स्ट केलापर देवनागरी रूप यूनीकोडमे आ कखनो काल आनोमे नहि सेव होइत छैक। यूनीनगरीमे पी.डी.एफ.सँ कॉपी कए पेस्ट केलासँ देवनागरी रूप आबि जाइत छैक। आस्की कन्वर्टरक सहायतासँ पी.डी.एफसँ यूनीकोडमे बदलैत छैक मुदा प्रारूपण खतम भए जाइत छैक। फन्ट कन्वर्टरमे SIL कन्वर्टर एहन टूल अछि जाहिमे प्रारोपण खतम नहि होइत अछि आ ई अछियो फ्रीतन्त्रांश। 1 जितेन्द्र नागबंशी said... bahuta raas jankari, aa seho maithili me, technical nahi simple aa practical aalekh Reply05/15/2009 at 09:36 PM 2 মোহন said... bahut ras nav jankari bhetal, hamro san avsikhua aab internet use kay sakait achhi Reply05/15/2009 at 09:34 PM बनैत-बिगड़ैत-सुभाषचन्द्र यादवक कथा संग्रहक समीक्षा - गजेन्द्र ठाकुर सुभाषचन्द्र यादवजीक “बनैत बिगड़ैत” कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लए आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करितहि अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओहि उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ ताहि अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कए चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक आ एहि सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ एहि संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नहि आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नहि करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत। किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना “जाइत रही” केँ “जाति रही” लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरामे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ “छै” लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ “छैक” लिखबाक अछि तँ “अन्तक ’क’ साइलेन्ट अछि” से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोकके “य” लिखल जाए वा “ए” एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छैक, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। “नहि” लेल “नञि” लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ(अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ। एहि पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि। कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि। कथामे असफलताक सम्भावना उपन्या-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि “सोप ओपेरा” जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप। कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे “देवी को बलि” सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थित आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि। वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित-विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित भए गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। तँ आइ-काल्हिक “डिसकसन” जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए। कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बैद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय(!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत। कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत। सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत: स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा “काठक बनल लोक” क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब “बनैत बिगड़ैत” कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी। कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका। ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे “मेड बाइ मी” केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत? असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छैक। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छैक। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि। एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि।मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि। ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन, एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छैक जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छैक जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छैक।ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ई कहि दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि। एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीकाक फोन अएलापर ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नवयुगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि। टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ ।गाम घरक जे सास-पुतोहुक गप छैक, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जाएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम! अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छैक। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छैक मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छैक, अपन आशा आ आकांक्षा छैक। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि। आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत। एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छैक तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि? कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोकलग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत। कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ सँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छैक। सिन्हा कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत तँ ओकर पति मरि जएतैक। आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि। कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि जे ओ से दाग नहि अछि वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा , हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि। कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- “साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक”। दीदी पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आस्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि। तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत। छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा “कैनरी आइलैण्डक लारेल” आ “तृष्णा”। दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छैक जे बाहरीकेँ नहि लैत छैक, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि। दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज , गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि। नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छैक। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छैक। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छैक। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल। परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छैक। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छैक आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छैक। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छैक से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छैक। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल। बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छैक। रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छैक। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छैक, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि। हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छैक से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि। स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि। यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छैक- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठीसभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि,कारण ई धारणा लोकमे छैक। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छैक। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि। ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जाएत? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जाएत? सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत। आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाज लेल। जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि। व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि। तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आ एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय यथार्थवादी होअए? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि। तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जाएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि। स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत। जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छैक। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह। कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्त्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत। लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या? होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत। पोस्टस्त्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि। आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म। कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि। किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी। रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य”(मैथिल हित साधन, जयपुर,१९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त,श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि। मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि। नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए प्रिंट फॉर्ममे आबि रहल अछि, कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। 1 राहुल मधेसी said... subhash ji ke estimate nik kelahu, gahir adhyayan ker parinam etek nik samiksha, chhichla knowledge se te panipat aa babar madhya yudh machat matra Reply05/15/2009 at 09:41 PM 2 जितेन्द्र नागबंशी said... bahut ras ideolism clear bhel, subhash jik samiksha lel dhanyavad Reply05/15/2009 at 09:39 PM ३. पद्य ३.१. कामिनी कामायनी: आतंकी गाम ३.२. विवेकानंद झा-तीन टा पद्य ३.३. सतीश चन्द्र झा-सोनाक पिजरा ३.४. अओताह मन भावन- सुबोध ठाकुर ३.५.मणिकान्त मिश्र “मनिष”- मिथिला वन्दना ३.६. ज्योति-हम एक बालक मध्य वर्गके कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि। आतंकी गाम । हाथ पएर मोङने ओ सूतल सूतल सन गाम़ जतए एखनो कियो कियो गाबैत छल पराती़ झूमऱि आ’ नचारी़ जतए एखनो रहैत छल विभेदक बावजुद संग संग बाघ आ’ बकरी । खरिहान में पसरल छल दूर दूर धान हसैत ठिठियाति लाेक क’ छलै भरि मुँह पाऩ नव नूकुत प्रेमक होइत छल चर्च़ आ’ नीक बेजाए में बुद्वि होए छल खर्च़ जतए अखनो बाँचल छल आंचरिक लाज़ जन्नी जाति जी जाति क’ करैत छलीह अप्पन काज । जतए एखनो भोर सॅ सांझ धरि बनैत छल किसिम किसिमके भानस भोजन सॅ तृप्त सुखासन पॅ बैसि ज्ञानी जन पढै छला मानस़ जतए एखनो सपना छलै भरत सन राजा के लछमन सन भाय आ’ रामक’ मर्यादा के़। ओहि सूतल सूतल ओंघाएल सन गाम मे पैसि गेल छल एक दिन अजगुत अन चिन्हार लोक रंग ढंग सॅ विचित्र हाथ मे कड़गर हरियर नोट़ आ’ बंदूक़ आयल छल खरीद शान्ति फैला क सब तरि भ्रान्त़ि । खेत खरिहान में उगाबए लेल बारूद आर डी एक्स ओ सब छिटैत रहल पाए़ आ’ देखैत देखैत गामक पोखरि भ’ गेलए विषाक्त बंद भ’ गेलए पराती आ’ डेरा गेलए समाज़ आेत्तए आब काबिज छै भयानक अट्टहास करैत मुॅह सॅ उगलैत आगि बला आतंक क’ घिनौन राज । कामिनी कामायनी 9।5।09 1 পঞ্জীকাব বিদ্যানন্দ ঝা said... kamayini ji, ahank kavyapath maithili bhojpuri akademi aa sahitya akademi ker tatvadhan me sunane rahi, etay padhi nik lagal जतए एखनो सपना छलै भरत सन राजा के लछमन सन भाय आ’ रामक’ मर्यादा के़। Reply05/15/2009 at 10:13 PM 2 कृष्ण यादव said... बंद भ’ गेलए पराती आ’ डेरा गेलए समाज़ आेत्तए आब काबिज छै भयानक अट्टहास करैत मुॅह सॅ उगलैत आगि बला आतंक क’ घिनौन राज । bah Reply05/15/2009 at 10:11 PM विवेकानंद झा,वरिष्ठ उप-संपादक छथि नई दुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेडमे। तीन टा पद्य १.राति स्वप्न मे प्रिय ! राति स्वप्न मे कविताक द्वि पाँतिक मध्य अहाँक टिकुली आबि हमरा आँखि मे गरि गेल आ गरिते चलि गेल भीतर धरि आ जे की हरदम भेलै अय हमहुं ओकर पछॊर धयने घसिटाइत चलि गेल छलहुँ बहुत गहीँर धरि एकटा अद्भुत लॊक देखलिअय हमर ई पहिल अनुभव नहि थिक एहन लॊक देख सकैत अछि एकटा बताहे आ एकटा बताहेक करेज मे सांस लऽ सकैत छै एहन लॊक एतय सबकिछु छलै महानगर छलै ओकर त्रास छलै नगर छलै ओकर घुटन छलै गामॊ छलै ओकर महक सेहॊ छलै ओ धार सेहॊ छलै जे अपन सम्पूर्ण वैभवक संग बहैत अछि हमरा स्मृति मे आ ताहि पर एकटा झलफल पर्दा छलै अहाँक ललका ओढ़नी सऽन आ जे की बाद मे बूझलिअय ओ अहीँ छलहुं हमर समस्त स्मृति केँ झँपने अपना ओढ़नी सँऽ हम आगू बढ़ि बहुत दूर निकलि आब अपना गाम आबि दलान पर छलहुं ठाढ़ कि बसात सिहकै छलै थलकमलक झमटगर गाछ पर आ ओहि पर लटकल रहै थॊकाक-थॊका फूल आ सॊझाँ पॊखरि मे कास छलै एम्हर बड़की टा बास छलै आ ओ सबकिछु छलै जे समयिक झॊल सँ अनवरत संघर्ष कऽ रहल छै आ ओहि पर पुनः एकटा लाल पर्दा छलै आ जे की बाद मे बुझलिअय ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । हम आगू आबि अपन पिता लग छलहुँ ठाढ़ जिनक माथा पर समयिक अद्भुत चित्रकारी छलै हम सॊचिते रही जे समय एकटा अद्भुत चित्रकार अछि आ की एकटा लाल पर्दा छलै जाहि तऽर सँ एक जॊड़ी पनिगर आस सँ भरल आँखि हमरा हेरैत छल आ ओहि दया पर ओहि करुणा पर एकटा लाल पर्दा छलै आ जे की बाद मे बुझलिअय ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । ई आँखि हमर माइक थिक जे हमर बाल्यकालहि सँऽ हमरा लेल एहने अछि कि हमर माइ संभवतः बूझैत छथिह्न जे एहि छौड़ाक आत्मा पर पछिला जन्मक बॊझ छै पापक आ हमरा अपन माइक एहि आँखि सँऽ डर लगैत अछि हम पसेना सँऽ भरि उठैत छी आ रातियॊ ओहिना भेल हम जागि उठलहुं पसेना-पसेना भऽ जे सबसे पहिने किछु मन पड़ल ओ लाल ओढ़नी छल आ जे की बाद मे बुझलिअय ओ अहीँ छलहुँ अहीँक ओढ़नी छलै । एम्हर एखन हम आगू बढ़ि आयल छी पाछू रहि गेल अछि भॊर कहिए कि हम दिल्ली मे छी जतऽ एकटा मॊहल्ला छै एकटा तिनमंजिला छै बुढ़िया मकान मलिकानिक झौहैर छै आ दॊसरे क्षण प्रेमक ओकर अभिनय छै पुनः एकटा विश्वविद्यालय छै ओकर सड़ल-गलल अंगांग छै भिनकैत माछी जॊकाँ हम सभ छिअय आ एकटा झलफल पर्दा छै आ जे हम बाद मे बूझैत छिअय ओकर रङ लाल छै उखड़ैत लॊग-बसैत लॊग पड़ाइत लॊग-हेराइत लॊग ठमकल-ठहिआयल लॊग मुदा फिराक ओकर आँखिक अतल मे की मौका भेटओ आ ओ छप दे ककरॊ गरदनि काटि लेअय एहि टहाटही दुपहरिया मे ओ सभटा वस्तु-जात छै जे साल दरि साल हमरा भाङि रहल अछि घृणित राजनीति छै आ छै हरेक दृष्टि सँऽ पहिने सुनिश्चित ई शब्द घृणा सर्वत्र छै आ सङहि एकटा नवका पीढ़ी छै जकरा पुरान पीढ़ी कॊन मे लऽ जा कऽ कान मे किछु बुझा रहल छै आ एकटा झलफल पर्दा छै आ जे की बाद मे बुझति छिअय ओकर रङ लाल छै । एम्हर विगत किछु वर्ष सँ हम अपन सभटा सरॊकार सामजिक भॊगि रहल छी एकटा फाँस मे जे कत्तहु हमरा हृदय मे एकटा फाँक बुनि रहल अछि एम्हरहि हमर आँखि कमजॊर भेल अछि कनैत-कनैत एना भऽ जाइत छै कहने छली हमर मैंयाँ हम नेनपनि मे बड़ कनैत रहिएय । आब सौँसे दुनिया आ दुनियाक सौँसे फरेब आ बाद मे जा कऽ ओकर सौँसे कष्ट हमरा लाल बुझना जाइत अछि निस्संदेह हमर आँखि कमजॊर भऽ गेल अछि आब हम दिनहुं मे सूति रहैत छी एहि द्वारे नहि जे काज नहि अछि हमरा लऽग आब हमरा राति मे बेसी सुझाइत अछि तेँ काल्हि राति स्वप्न मे पहिल बेर अहाँक टिकुली हमरा आँखि मे नहि गरल छल प्रिय ! पहिनहुँ बहुत दिन सँऽ हमरा सबकिछु लाल बुझाइत रहय मुदा राति जे प्रत्येक दृष्टि पर एकटा लाल पर्दा छलै पहिल बेर बुझलिअय ओ अहीँ छलहुं अहीँक ओढ़नी छलै००० २.अहाँ नहि जायब नारायणपट्टी गाम अहाँ केँ बड़ नीक लागल ने नारायणपट्टी गाम ? सबकेँ नीक लगैत छै नारायणपट्टी गाम ! बशर्ते जे देखऽ जयबाक हॊ गाम अहाँ कहियॊ भॊगने छी गाम ? पैंचक इजॊत मे इतराइत चान नहि थिक नारायणपट्टी गाम ! शहरक सौभाग्य लेल अपन ठेहुन पर जरैत टेमी मिझबैत-मिरबैत अहिबाती थिक गाम ! अहाँ आब कहियॊ नहि जायब नारायणपट्टी गाम किएक तऽ हम नहि हेराय चाहैत छी अपन एकटा आर अनमॊल वस्तु जेना हेरा गेल हमर अस्मिता जेना हेरा गेल हमर स्वप्न ओहि नारायणपट्टी गाम मे आ नहि बूझल कतेक लॊक कतेक नारायणपट्टी गाम मे हेरा लेने हॊयताह स्वयं कएँ हमरा जॊकाँ ३.देबै ने चिनगी ? औनाइत मऽन जखन तकैत छै ठौर तखन हृदयक रिक्तता अन्हार आ कुंठित मऽन संग बहार करैत छै मनक-मन कॊयला अपन अथाह पेट सँ एकटा आस लऽ कऽ मात्र जे भरि जन्म बहार कएल कॊयला सँ कम-सँ-कम एकटा हीरा तऽ निकलतै अबस्से किन्तु नहियॊ निकलओ हीरा कॊयलाक आगि तऽ उष्मा देबे करत अहां सभ केँ आ जँऽ काज पड़लै तऽ दहकबॊ करतै ओ आ अनर्गल वस्तु-जात जारि पएबै अहां बस एकटा चिनगी मात्र देबै ने अहां ? 1 सुरेश चौपाल said... ee site aa vivekanand jha doo ta khoj rahal interne par hamar Reply05/15/2009 at 11:29 PM 2 उमेश कुमार महतो said... bah bhaiya ghumaba le bhog ba lel nahi gamak ki hal bhel yauपैंचक इजॊत मे इतराइत चान नहि थिक नारायणपट्टी गाम !पुनः एकटा विश्वविद्यालय छै ओकर सड़ल-गलल अंगांग छै भिनकैत माछी जॊकाँ हम सभ छिअय आ एकटा झलफल पर्दा छै आ जे हम बाद मे बूझैत छिअय ओकर रङ लाल छै उखड़ैत लॊग-बसैत लॊग पड़ाइत लॊग-हेराइत लॊग ठमकल-ठहिआयल लॊग मुदा फिराक ओकर आँखिक अतल मे की मौका भेटओ आ ओ छप दे ककरॊ गरदनि काटि लेअय Reply05/15/2009 at 10:22 PM 3 পঞ্জীকাব বিদ্যানন্দ ঝা said... राति स्वप्न मे प्रिय !एहन लॊक देख सकैत अछि एकटा बताहे आ एकटा बताहेक करेज मे सांस लऽ सकैत छै एहन लॊक अहाँ नहि जायब नारायणपट्टी गाम-जरैत टेमी मिझबैत-मिरबैत अहिबाती थिक गाम ! देबै ने चिनगीजे भरि जन्म बहार कएल कॊयला सँ कम-सँ-कम एकटा हीरा तऽ bah bhai vivekanand ji. Reply05/15/2009 at 10:19 PM 4 Dr Palan Jha said... ee kavi te vilakshana chhathi, katay nukayal chhalah, sabh ank me hinkar rachna chahi Reply05/15/2009 at 09:04 PM सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। सोनाक पिजरा सोनाक पिजरा खौंइछा मे ल’ क’ दूभि धान। पेटी, पेटार, पौती, समान। जा रहल आइ छी सासुर हम अछि कोना अपन लेए बेकल प्राण। हमरा बिनु माय कोना रहतै। बाबू केर सेवा के करतै। नीपत चिनबार कोना भोरे जाड़क कनकन्नी सँ मरतैं। अछि केहन देवता के बिधान। ल’ कोना जाइत अछि संग आन। एखने उतरल छल साँझ पहिल भ’ कोना गेल एखने विहान। छल केहन अबोधक नीक खेल। कनियाँ पुतरा मे मग्न भेल। आमक टिकुला लय दौड़ि गेलहुँ अन्हर बिहारि मे सुन्न भेल। कखनो फूलक बनि रहल हार। ल’ एलहुँ बीछि क’ सिंगरहार। झूठक पूजा, माटिक प्रसाद भरि गाम टोल देलहुँ हकार। जे भेल मोन मे केलहुँ बात। के रोकत जखने भेल प्रात। भरि खौंछि तोड़ि क’ भागि एलहुँ ककरो खेतक किछु साग पात। ई समय कोना क’ बढ़ल गेल। रहलहुँ हम सूतल निन्न भेल। नहि भान भेल कहिया अपने जीवन ओरिया क’ ससरि गेल। बाबू सँ मा किछु केलक बात। निशब्द इशारा उठा हाथ। ल’ अनलथि जा क’ पिया हमर ललका सिन्दुर पड़ि गेल माथ। देखलहुँ पाहुन छथि अनचिन्हार। निशिभाग राति सगरो अन्हार। भेटल किछु नव श्पर्श पहिल मन बहकि गेल उतरल श्रृंगार। किछु सत्य भेल मोनक सपना। भेटल मुँह बजना मे गहना। हमहूँ देलियन्हि सर्वस्व दान ई मोन हृदय जे छल अपना। अछि केहन विवाहक ई बंधन। स्नेहक संबंध बनल प्रतिक्षण। अपरिचित दू टा चलल संग विश्वासक बान्हल डोर केहन। संगी साथी सभटा छूटल। की बिसरि सकब जीवन बीतल। ओ घर द्वारि आँगन दलान सभ सँ छल स्नेह कोना टूटल। कनिते कनिते औरियौन भेल। पाहुन संग हमर चुमौन भेल। भगबती घ’र सँ बिदा होइत दू टा कहुना समदौन भेल। दृग जल सँ गंगा उतरि गेल। ममता विधान सँ हारि गेल। बाबू दलान पर रहथि ठाढ़ मा ओलती मे निष्प्राण भेल। खोंता मे पक्षी सिहरि गेल। दाना अहार छल बिसरि गेल। स्तब्ध भेल छल गाछ पात पछबा बसात छल द्रवित भेल। भारक समान किछु छल राखल। भरि गाँव टोल सौसे कानल। गामक सीमान धरि बहिना सभ दौड़ल बताह भ’ छल कानल। हम प्रात पहुँचलहुँ हुनक गाम। जे अछि नारी केर स्वर्ग धाम। नहि रहल एतय पहिलुक परिचय भेटल हुनके सँ अपन नाम। कोबर मे बैसल छी अनाथ। राखथि जे बुझि क’ प्राण नाथ। क’ देलक बिदा जखने परिजन दुख केर कहबै किछु कोना बात। बान्हल चैकठि सँ आब रहब। दुख सुख कहुना अपने भोगब। नैहरि सासुर केर मान लेल कर्तव्यक सभ निर्वहन करब। अछि उजड़ि गेल ओ पहिल वास। भेटल अछि सोना कें निवास। टुटि गेल पांखि, अछि भरल आँखि पिजरा सँ की देखू अकाश। 1 satish said in reply to कृष्ण यादव... kavita lel apnek del comments hamesa dekhait chhi..dhanyabad. Reply05/21/2009 at 09:32 AM 2 satish said in reply to Anshumala Singh... bahut bahut dhanyabad je hamar kavita padhalahu Reply05/20/2009 at 11:45 AM 3 Subodh thakur said... Apnek kavita hridyay ke shparsh karait achi sangahi shabdak vinyas seho uttam Reply05/18/2009 at 03:25 PM 4 Rajni Pallavi said... Kavita padhlaun. Bahut nik lagal. Apan vivah yaad aabi gel. Lagal hamar har feelings ke aahan ehi kavita me kaid ka dene chhi. Reply05/16/2009 at 09:12 PM 5 Preeti said... कखनो फूलक बनि रहल हार। ल’ एलहुँ बीछि क’ सिंगरहार। झूठक पूजा, माटिक प्रसाद भरि गाम टोल देलहुँ हकार। muda pher अछि उजड़ि गेल ओ पहिल वास। भेटल अछि सोना कें निवास। टुटि गेल पांखि, अछि भरल आँखि पिजरा सँ की देखू अकाश। Reply05/15/2009 at 10:27 PM 6 उमेश कुमार महतो said... aah nari jivan, muda aab nahi Reply05/15/2009 at 10:26 PM 7 Praveen Kumar Jha said... Kavita Bahooooooooot Nik Lagal........ Katek din bad ekta hriday ke sparsh karay wala kavita padhlawn........... Reply05/14/2009 at 11:45 AM सुबोध ठाकुर, गाम-हैंठी बाली, जिला-मधुबनीक मूल निवासी छथि आ चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट प्रैक्टिशनर छथि। अओताह मन भावन
स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। सोचि-सोचि कए मन हर्षित छल आइ सँझमे अओताह हमर परदेशी मनभावन।
छल बरखक आस मोनमे दबल मोन कतेक पीड़ासँ छल गुजरल कानि कए काटल राति अन्हरिया आर रससँ भरल महिना साओन,
स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन।
ओ पछिला मिलन रातिक मोन भीजल रहए मिठगर-मिठगर बातसँ रोम-रोम पुलकित रहए, हुनक आलिंगन छल कतेक पावन, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन।
नबका साड़ी आइ पहिरबए नेचुरल रंग बला लिपिस्टिक लगेबए गजरासँ हम केश सजेबए देखिते सोचमे पड़ि जएता साजन, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन।
एतबामे फोनक घंटी बाजल धनी जेना निद्रासँ जागल, फोनपर आएल आबाज हम नहि आएब एहि महिना आब सुनि धनी झूर-झमान भए खसली जेना खसए रोगी दर्दक कारण, स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन।
कहए सुबोध धनी जुनि कानू बात कवि केर मानू, अगिला महिना निश्चय अओताह, अहांक सुन्दर मनभावन। स्वप्न सलोना आँखिमे लेने धनी बहारि रहल छलि आँगन। 1 subodh said in reply to Aum... mahan etihasik kavikokil ke sang hamra rakhi ahan apan varappan dekhelaun se dhanyabad, muda hunka anga te hamar swaroop bahut chot achi Reply05/18/2009 at 03:12 PM 2 subodhkumarthakur@rediffmail.com said in reply toPreeti... Dhanyabad apnek utsah vardhak protshahan ke lel Reply05/18/2009 at 03:09 PM 3 vivekanand jha said... wah khoob neek likhal. Reply05/18/2009 at 10:32 AM 4 Aum said... कहए सुबोध धनी जुनि कानू बात कवि केर मानू, vidyapati aajuk Reply05/15/2009 at 10:30 PM 5 Preeti said... nik pravasi geet Reply05/15/2009 at 10:29 PM मणिकान्त मिश्र “मनिष” गाम-बेलौचा, प्रखण्ड-लखनौर, जिला मधुबनी। मिथिला वन्दना देखू देखू हमर आंगनक भागए पच्छिम मे बाजैत कौआ आ ! पूरब मे एला सूरज भगवानए देखू देखू हमर आंगनक भाग !! दीदी गावि रहल छथि गीतए माँ बना रहल छथि तरूआ ! आई एता हमर मूंह लगूआए आबिते करबैन होम प्रणाम मनीष थिक हमर नाम !! दीदी ब्याह कऽ भऽ गेल सालए हमरा अंगना मे पसरल य कोजेगराक समान ! एता पाहूनक बाबू लऽ जेता ई दोकानए हमरा आंगन मे एला सूरज भगवान !! देखू देखू हमर मिथला कानए कोजेगरा मे बटैय पान आ मखान ओ मिथिला रहत सबखन महान ! मण्डन आ विद्यापतिक होईत रहै य जतै गुणगानए ओ जानकी धाम महान !! राम बनलथि पाहूनए लवकूश सन भगिनवान जाही ठाम गंगा देयथि पुण्यक ज्ञान ! ओई मिथिला क सत् सत् प्रणाम सत् सत् प्रणाम !! मणिकान्त थिका मिथिलाक संतान....। 1 মধূলিকা চৌধবী said... देखू देखू हमर मिथला कानए कोजेगरा मे बटैय पान आ मखान ओ मिथिला रहत सबखन महान ! मण्डन आ विद्यापतिक होईत रहै य जतै गुणगानए ओ जानकी धाम महान !! nik Reply05/15/2009 at 10:34 PM 2 Aum said... jay ma ज्योति हम एक बालक मध्य वर्गके हम एक बालक मध्य वर्गके स्वपन देखने छी बस उन्नतिके अपना संग खुश राखक सबके आस हमरापर पूरा परिवारके माय बापक उठाबक भार हम बनल छी श्रवण कुमार बाबू सम्हारता अपन खेत पथार हम तऽ करब कमाइर्क जोगार पढ़ाइर् पूरा करक बड्ड हरबड़ी चैन सऽ साँस लै लेल ठहरी जॅं भेटै एक बढ़िया नौकरी सुविधा पाबी सबटा शहरी सब कतेक ध्यान अछि रखने मुदा पढै़ लेल कण्ठ अछि धेने रोज पुस्तकक काँवर उठेने विदा होयछी एक पदयात्रामे भविष्य बढ़िया बनाबक इंतज़ाम नितदिन करै छी गुरूके प्रणाम हमरा लेल तीर्थ सन हम्मर गाम विद्यालय बनल हमर बाबाधाम 1 বশ্মি প্রিযা said... विदा होयछी एक पदयात्रामे भविष्य बढ़िया बनाबक इंतज़ाम नितदिन करै छी गुरूके प्रणाम हमरा लेल तीर्थ सन हम्मर गाम विद्यालय बनल हमर बाबाधाम sundar maithilik balsahitya lel jyotijik kaj bad nik Reply05/15/2009 at 10:39 PM 2 মধূলিকা চৌধবী said... हम एक बालक मध्य वर्गके स्वपन देखने छी बस उन्नतिके अपना संग खुश राखक सबके आस हमरापर पूरा परिवारके माय बापक उठाबक भार हम बनल छी श्रवण कुमार बाबू सम्हारता अपन खेत पथार हम तऽ करब कमाइर्क जोगार पढ़ाइर् पूरा करक बड्ड हरबड़ी चैन सऽ साँस लै लेल ठहरी जॅं भेटै एक बढ़िया नौकरी सुविधा पाबी सबटा शहरी सब कतेक ध्यान अछि रखने मुदा पढै़ लेल कण्ठ अछि धेने रोज पुस्तकक काँवर उठेने विदा होयछी एक पदयात्रामे भविष्य बढ़िया बनाबक इंतज़ाम नितदिन करै छी गुरूके प्रणाम हमरा लेल तीर्थ सन हम्मर गाम विद्यालय बनल हमर बाबाधाम bah bah Reply05/15/2009 at 10:37 PM नागपंचमी मूल कोंकणी कथा : नागपंचम लेखक : श्री वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद : नागपंचमी अनुवादक : श्री सेबी फर्नानडीस मैथिली अनुवाद : डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। नागपंचमी अश्लेशा नक्षत्रहि सँ बरखा झमाझम होमए लागलैक। गत सात दिनसँ बरखा होइत छलैक। साओन मे तँ बरखा बन्न भ’ जएबाक चाही, मुदा ओ तँ बन्न हेबाक नामहि नहि ल’ रहल छलैक। बोलकर्णें केर द्वीप पानिसँ दहाबोह भ’ गेलैक। गामक खेतक फाटक सहित दहोदिस पानि मे डूबि गेलैक। मल्लिकार्जून मंदिरक दूइ सीढ़ी धरि बरखाक पानि छूबि लेलकैक, मुदा ठेह पर रह बलाक लेल कोनो असौकर्य नहि रहैक। मजूरी आ रोजीमे व्यवधान हेबाक कारणेँ लोक सभ हकोबको भ’ गेल छल। साँच त’ ई थिक जे खेती-बारीक काज साओन धरि भ’ गेलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ताक धंधामे लागि जाइत छल। बहुतों जंगलक खाक छानलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ता जमा कए लगीच वला साकोड्डें नामक गाममे बेचि दैत छल। ओहुना ओ सभ ककड़ी ओ गैता फोंडाक बजारमे बेचैत छल। जँ पैघ-सन माछ हाथ आबि गेलनि तँ ओकरा देसाई परिवारमे बेचि 10-20 टका कमा लैत छल। मुदा एहि बेर बरखा बेसी हेबाक कारणेँ भरि साल रोजगार बाधित भ’ गेलैक। नाह चलाब’ वला मलाह सभ तँ कखने अपन-अपन नाहकेँ उपर आनि राखि देने छल। ओकरा नीक जकाँ लकड़ीक गुटखासँ अटका देल गेल छलैक। ओकरा उपर नारियरक पातक छतरी सेहो बनाओल गेल छलैक जकर सुरक्षाक लेल ओकरा नारियरक गाछसँ बान्हि देल गेल छलैक। हरि भगत अपन बरण्डामे एकटा सोंगरक सहारे अपन पीठ अटका कए बैसल छल, बेर-बेर नदीमे आयल बाढ़ि के देखैत छल। घनघोर बरखाक कारणेँ ओ नदीक दोसर दिसक गाम साकोर्डें केँ सेहो नहि देख सकैत छल। ओहि क्षण ओ सपनहिमे अपन भविष्यक सोच केँ मूर्त रूप देमए लागल। आड़िक बाटे जेबाक बजाए ओ बिसू भट्टजीक गाछी बाटे रस्तासँ निकलि गेल। वेगसँ बहैत नलीकेँ पार क’ कए पनशी पहुँच गेल आ गाड़ीक प्रतीक्षा करए लागल। बरखाक कारणेँ गाड़ीक आवाजाही बहुत कम भ’ गेल छलैक। मोलें सँ एकटा टेंपू आबैत रहैक। मोलें साकोर्डें सँ लोक ससत दाम पर गोबरछत्ता कीनए गेल छलैक आ आब ओकरा मडगांवक बजारमे बेचबाक लेल जाइत रहैक। हरि ओहि टेंपू सँ लिफ्ट ल’ कए तिस्क्यार आबि गेल। डॉक्टर सँ मिलिकए बेमार नेनाक लेल औषधि लेलक आ दूधक सोसोइटीमे सभ दिन दूध लेबाक लेल आबय वला टेंपू पर बैसि ओ सांकोर्डें आबि गेल। नदीक कछेर आबितहि ओकर पयर काँप’ लागलैक। नदी पानिसँ लबालब रहैक आ दुनू दिस बस पानिए पानि देख’मे आबि रहल छलैक। ओकर रूप वीरभद्र (रौद्र) जकाँ बुझाइत रहैक। ओहि काल ओकरा नजरिक समक्ष ओकर बेमार नेनाक सूरति आबि गेलैक। ने जानि ओकरा देहमे तखन कतए सँ उर्जा आबि गेलैक, ओ आव ने देखलक ताव झटसँ ओहि भयानक नदीमे कूदि गेल। ओकरा समक्ष केवल मृत्युये देखार दैत छलैक, मुदा ओ कोहुना हेलैत नदी पार क’ गेल। ओकर सौंसे देह पानिमे भीज गेल रहैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ टटोललक त’ देखलक जे ओकर सभटा पीब’ वला औषधि आ गोटी भीज गेल छलैक। * * * खाइक लगा दी.....खाएब ने? पत्नीक टोकलाक पश्चात् ओ होशमे आयल। सपनासँ जागल लोक जकाँ ओ एमहर-ओमहर देखलक। कन्हा पर राखल गमछासँ ओ अपन मुँह पोछलक आ किछु कालक लेल आँखि मुनि एकटा नमहर साँस लेलक। खाइक लगा दिऔक, हरि बाजल। पत्नी खाइक लगा देलकैक। स्नानघर जा कए ओ हाथ-पयर धोलक। चिलका कखन सुतल? एखनहि सुतल छैक.....पत्नी नहुएँ बाजलीह। बोखार उतरलैक? “........” ओकरा गोटी खोआ देलियैक? हँ जे बाँचल छलैक ओ द’ देलिऐक। आब कोन दबाइ दियैक किछु बुझनामे नहि आबि रहल अछि। बुझाइत अछि जेना ई अपन जन्महिसँ मुँहमे दबाइक चम्मच ल’ कए आएल अछि। देखियौक ने काल्हि नागपंचमी छियैक हम बूट फूलबा लेल द’ देने छिऐक, भगवती करैथ चिलकाक बोखार कने कम भ’ जाइक। हँ, साँचे काल्हि तँ नागपंचमी छैक। ई तेसर खेप छियैक...... ओ एकटा गहिरगर साँस लेलक। बुझाइत अछि एहु साल हमरा सभक लेल अपशकुने अछि, ओ बहुत आर्त स्वरमे बाजल। भगवतीक ईच्छा.......। ई कहि ओकर पत्नी ओकरा मुँह पर अपन हाथ राखि देलकैक आ ओकरा आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लागलैक। तकर बाद दुनूक मूँहमे एक्कोटा दाना नहि गेलैक। गामक सभटा नेना-बूढ़ राणू भगत (हरिक बाबूजी) केँ भ्रष्टाचारी भगत केर नामसँ चिढ़बैत छलैक। राणू भगत समूचा गाममे धार्मिक ओ आन अनुष्ठान करबैत छल। गामक गरीब लोककेँ भगवानक नाम पर फँसयबामे ओ ततेक माहिर छल जे तकर कोनो सीमा नहि। खेती-बारी सहित आन सभटा जिम्मेदारी ओ हरिक कान्ह पर लादि देने छल आ स्वयं आरामक बंसी बजबैत छल। हरिकेँ अपन बाबूजी एक्कोटा आदति पसिन्न नहि छलैक, मुदा राणू भगत कहियो हरिक बात नहि बुझलकैक। ओतहि राणू सदति हरि आ ओकर पत्नी केँ अधलाहे बात कहैत रहैक। हरिक बियाहक तीन मास भ’ गेल रहैक आ ओहि काल एकदिन राणू नेनपन जकाँ मजाक करबाक लेल नारियरक गाछ पर चढ़ि गेलैक आ ओतए सँ जे गिरलैक तँ अपन डाँड़ तोड़ि खाट पकड़ि लेलक। राणूक खाट पकड़ि लेलासँ हरिक जिम्मेदारी दुगूना भ’ गलैक। “एहि हराशंखिनीक कारणेँ हमरा घरक सभटा खुशी पानि भ’ गेल अछि” राणू सदैव हरिक पत्नीकेँ कहैत रहैक। एतेक सुनलाक पश्चातो हरिक पत्नी ओकर देखभालमे कोनो कसरि नहि छोड़ैक। दिन पर दिन बीतल गेलैक, राणू चढ़िते अखाढ़ परलोक सिधारि गेलाह आ एहि कारणेँ हरिक पत्नीकेँ तीन मासक लेल घर छोड़ए पड़लैक। बाबूजीक मृत्युक कारणेँ ओ ओहि बरख नागपंचमी नहि मना सकल। दोसरहि बरख हरिक पत्नी एकटा नेनाकेँ जन्म देलकैक आ सोइरी हेबाक कारणेँ ओ ओहू बरख नाग देवताक पूजा नहि क’ सकल। एहि बेर एक बरखक चिलका बोखारसँ जूझैत रहैक.....। जेना-जेना समय बीतैत छलैक, चिलकाक हालति आर बिगड़ले जाइत छलैक। आयुर्वेदिक औषधिक सेहो कोनो असरि नहि भ’ रहल छलैक। दोसर दिस नदीक पानि बढ़िते जाइत छलैक आ चिलकाकेँ ल’ कए नदी पार करब संभव नहि छलैक। हरि अपन गाछीक मोड़ पर ठाढ़ छल। जँ हमर चिलका नीक भ’ जाएत तँ हम एहि बेर भगवान, कुलदेवता, ग्रामदेवता आदिकेँ छागर बलि देबैक। ओकर मनौन सुनि कए ओकर पत्नी अबाके रहि गेलीह। जाधरि ओ ओकरा देखैत ताधरि ओ नदी पार क’कए हाथमे पूजाक समान ल’ कए मंदिर पहुँचि गेल। * * * अहाँ हिम्मति नहि हारब बाउ! बोखार उतरि जेतैक, एकटा पड़ोसनी ओकरा सांत्वना देलकैक। तखनहि मंदिरक घंटा बाजि उठलैक आ दुनू गोटे हाथ जोड़ि लेलक। ई हम एकदम साँच कहि रहल छी, ई कहि ओ चिलकाक माथ पर हाथ राखि देलक। देखियौक बोखार उतरि रहल छैक। पसेना चलि रहल छैक। हरि मंदिरसँ आनल भेभूत चिलकाक माथ पर लगा देलकैक। ओकर पत्नी बड़ भक्ति-भावसँ ओ भेभूत चिलकाक सौंसे देहमे मलि देलकैक। चिलकाक बोखार उतरैत देखि ओ दुनू परानी बेस खुश भेल। हरिक पत्नी भीजल बूटकेँ देखबाक लेल गेलैक आ हरि जंगल सँ आनल माटिसँ देबाल पर नागक आकृति बनब’ लागलैक। ओहि पर कुंकुम सँ ओकर रेखांकन कएलक आ कोयलासँ ओकरा पर “ओउम” बना देलकैक। हाथ धोलाक पश्चात् हरि फेर दरबज्जा पर आबि ठाढ़ भ’ गेलैक आ नदीक बहैत पानि दिस देख’ लागल। खेतमे एकनहुँ पानि भरले रहैक, मुदा बीच-बीचमे छोट-छोट गाछ सभ लखा दैत छलैक। हरि घुमबाक लेल नकलि गेल आ ताहि समय चिलकाक कानब-कुहरब सुरह भ’गेलैक। हरिक पत्नी ओकरा छातीसँ सटा दूध पियौलकैक। चिलका एक मिनटक लेल तँ चुप भेलैक मुदा चोट्टहिं जोर-जोरसँ कानए लागल। चिलका एकबेर ओछरलक आ सभटा दूध बाहर आबि गेलैक। चिलकाकेँ अचानक एकटा चक्कर लागलैक आ ओ काठ जकाँ कठोर भ’ गेलैक। हरि केँ ई समाद कोनो आन नेनाक माध्यमे भेटलैक। हरिक हाथमे दू टा नारियर छलैक, ओ ओकरा ओत्तहि फेकलक आ हकासल घर दिस भागल। घरमे पड़ोसियाक भीड़ लागल रहैक। ओकर पत्नी जोर-जोरसँ कानैत रहैक आ ओकरा दू टा पड़ोसिया सभ सम्हारबाक प्रयासमे लागल रहैक। चिलकाक आँखि बन्न क’ रहल छलैक। एकटा पड़ोसिन किछु औषधिय पातक चूर्ण बना क’ ओकरा नाक लग राखि देलकैक। चिलकाक केवल साँसे टा चलैत रहैक।हरिक लेल ओतए बिलमब मोसकिल भ’ गेलैक, ओ बाहर आबि बरण्डा पर अपन दुनू हाथेँ माथ पकड़ि बैसि रहल। करिया मेघमे छिपल सूरूज,पछिम दिस डूबहि बला छल। आब हरिक जिनगीमे एकटा आर आफत आबहि बला छल आ नागपंचमीक पाबनि ओहि आफतमे शरीक होम’ बला रहैक। सभटा मनौती आ प्रार्थना बाढ़िक पानिमे भासि गेलैक। चिलका एखन धरि आँखि नहि खोलने छलैक। लोहारक भट्ठी जकाँ हरिक छाती धड़कैत रहैक। चिलकाकेँ देखबाक लेल आएल लोक सभ अपन-अपन घर आपस जा रहल छल। पड़ोसी सभक शब्द हरिक हृदयमे तीर जकाँ लागैत रहैक ओ घवाह भ’ रहल छल। शाबा! चिलका आइ राति नहि काटि सकतैक, एकटा स्त्री बाजल। हमरा तँ बेचारा हरि पर दया आबि रहल अछि, दोसर बाजल। भगवाने जानथि ई कोन बेमारी चलल छैक, तेसर बाजल। एक-एक करि कए बहुत भयानक बेमारी पसरि गेलैक अछि। किछु दिन पहिलुके बात थिक, मालूक पोता, जे मात्र डेढ़ बरखक रहैक, ओकरो एहने चक्कर ऐलैक आ छओ घंटाक भीतरे मरि गेलैक। ई गाम ककरो लेल शुभ नहि अछि। चारू दिस पानिए पानि। एहनामे डॉक्टरो-बैद केँ कि क्यो आसानीसँ बजा आनि सकैत अछि? साँच पूछू तँ हम एकटा बात कही, हरिक भक्तिमे निश्चये कोनो-ने-कोनो खोट हेतैक यैह कारण छैक जे ओ आइ तेसर बेर नागपंचमी नहि मना सकत। हँ सत्ते ..... काल्हि तँ नागपंचमी छैक? माटिकेँ तँ हाथो नहि लगा सकैत छी, आ एहनामे जँ चिलका मरि गेलैक तँ ओकरा गाड़तैक कोना? हरिकेँ किछुओ नहि सुझैक। काल्हि नागपंचमी छैक आ माटिकेँ घवाह नहि करबाक चाही। जँ चिलका भोरहि मरि गेल तँ शव अंतिम संस्कारक बिना भरि दिन आर भरि राति घरहिमे पड़ल रहत.....आर...... ओ आर किछु नहि सोचि सकल...... उठल आ घरक कोनमे पड़ल कोदारि आ गैंता ल’क’ घरक बाहर निकलि गेल अन्हारेमे। ओ खाधि खुनब सुरह क’ देलक..... काल्हि मर’ वला चिलकाकेँ गाड़बाक लेल.......! 1 सुरेश चौपाल said... ehi site par aynai aab dincharya me shamil bhay gel achhi, वसंत भगवंत सावंत/ श्री सेबी फर्नानडीस/डॉ.शंभु कुमार सिंह teenoo gote keहरि भगत ker jivanak hriday vidarak ghatnak kathak prastuti lel shabdak abhav bhay gel achhi. Reply05/15/2009 at 11:26 PM 2 रघुबीर मंडल said... bah, badhi aa dabai ki nikgar katha, kosi mon pari gelih Reply05/15/2009 at 11:17 PM 3 केशव महतो said... hriday vidarak katha, dhanyavad savant ji Reply05/15/2009 at 11:11 PM 4 प्रियंका झा said... ee column sidha karait achhi je sause bharat ek achhi Reply05/15/2009 at 10:56 PM 5 Khattar said... 1. नदीमे आयल बाढ़ि के देखैत छल 2.हरि मंदिरसँ आनल भेभूत चिलकाक माथ पर लगा देलकैक। konkan pradesh me seho sabhta apane sabh dis jeka chhaik, bhabhoot te hamro sabh ke bokhar me lagaol jaait chhal Reply05/15/2009 at 10:51 PM 6 नीलिमा चौधरी said... हरिकेँ किछुओ नहि सुझैक। काल्हि नागपंचमी छैक आ माटिकेँ घवाह नहि करबाक चाही। जँ चिलका भोरहि मरि गेल तँ शव अंतिम संस्कारक बिना भरि दिन आर भरि राति घरहिमे पड़ल रहत.....आर...... ओ आर किछु नहि सोचि सकल...... उठल आ घरक कोनमे पड़ल कोदारि आ गैंता ल’ क’ घरक बाहर निकलि गेल अन्हारेमे। ओ खाधि खुनब सुरह क’ देलक..... काल्हि मर’ वला चिलकाकेँ गाड़बाक लेल.......! anuvad etek nik te original katek nik hoyat bah Reply05/15/2009 at 10:47 PM बालानां कृते- 1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); आ 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी 1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: मैथिलीक पहिल-चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) नीचाँक दुनू कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा पाँच नताशा छह 1 प्रियंका झा said... sause shor achhi natashak Reply05/15/2009 at 10:55 PM 2 Khattar said... natasha mohi lela, deviji seho. rojnamacha jyoti jik nik lagal Reply05/15/2009 at 10:55 PM 3 Jyoti said... Sabsa neek achi Natasha ke cartoon chitrakaari. Bad neek shuruaat achhi Reply05/07/2009 at 02:11 PM 4 মধূলিকা চৌধবী said... nataasha apan sthan banaot maithilik nena bhutka sahitya me Reply05/07/2009 at 02:06 PM 5 AUM said... natasha ati sundar Reply05/05/2009 at 06:03 PM 6 Umesh Mahto said... natasha mon mohi lelak, jyotijik devijik katha aa chitra dunu nik, madhdyapradesh yatra seho uttam Reply05/05/2009 at 02:12 PM 7 Umesh said... online dictionary bad nik, bahut ras science computer ker navin shabd. Reply05/05/2009 at 02:09 PM 8 Preeti said... Devanshu Vats Ker cartoon aa Jyotijik Madhyapradesh Yatra aa Deviji Dunu bad nik lagal. Reply05/05/2009 at 12:14 PM 9 Krishna Yadav said... Devanshu Vatsa Ker cartoon bad nik lagal. Reply05/05/2009 at 12:13 PM Sign in or sign up for a free account (optional). 2. मध्य प्रदेश यात्रा- ज्योति दशम दिन 1 जनवरी 1992 प्लेटफार्ममे नववर्ष मनाबैके हमर सबहक ई पहिल अवसर छल।हमसब ट्रेनक प्रतीक्षा करै छलहुँ।ट्रेन तऽ लेट छल लेकिन नव साल 1992 ठीक बीच राति बारह बजे आबि गेल। हम सब घड़ी पर नजरि रखने रही। 12 बजिते देरी सब जोर सऽ हल्ला केलहुँ ‘हैपी न्यू ईयर’।गाड़ी डेढ़ बजे मे स्टेशन पहुँचल।हमसब पूर्वारक्षिक बॉगीमे अपन राति कटलहुँ।भोरे भोजनके समय तक हमसब उज्जैन पहुँचि गेलहुँ।ओतय एक एहेन होटलमे रूकलहुँं जाहिमे प्रवेशक नज़दीक बीचोबीच श्रीराम़ श्री लक्ष्मण आर माता सीताक मूर्त्ती छल।अहि दुआरे ई एक धर्मशाला जकाँ लागैत छल।हमर सबहक अभिभावक सबके ई जानि बहुत खुशी हेतैन जे हमसब वर्षक पहिल दिन महाकवि कालिदासक जन्मस्थलीमे बितेलहुँ।अतक यात्रा हमरा सबके एक नया अनुभव देबै वला छल कारण हमसब तांगा पर भ्रमण करै वला छलहुँ। मुदा आहि नहि काल्हि।आहि हमरा सबके नववर्षक उपलक्ष्यमे किछु रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करैके छल।हमसब तैयारीमे जुटि गेलहुँ।होटलके मूर्त्तिमे रोज सांझकऽआरती होयत छल से हमरा सबके नहिं बुझल छल।ठीक आरती बेर मे हमर सबहक तैयारी चलै छल। पूजाबेरमे फिल्मीगाना बहुत गलत लगलै सबके आ ताहि द्वारे हमरा सबके कनिक उपेक्षाक भागी सेहो बनऽ पड़ल। बेस़ हमर सबहक सांस्कृतिक कार्यक्रम काल्हिलेल स्थगित भऽ गेल। देवीजी : ज्योति देवीजीः सौर्य ऊर्जा गर्मी सऽ सब परेशान छल।ताहि पर सऽ बिजली चली गेल।सब जगह सहित विद्यालय मे सेहो खलबली मचि गेल।आब तऽ सब लाह बाह छल। देवीजी अपन बच्चा सबहक परेशानी देख विचलित भऽ गेली।तुरन्त प्रधानाध्यापक लग जेनेरेटर लगाबैके निवेदन लऽ कऽ गेली। प्रधानाध्यापक कहलखिन जे तत्काल तऽ ओ जेनेरेटरक व्यवस्था कऽ देथिन मुदा ई बहुत खर्चीला छै तैं बेसी देर लेल नहिं कैल जा सकैत छै। बेस कम सऽ कम कनिक देर लेल तऽ सबके आराम भेटलै।फेर कनिये काल मे बिजली आबियो गेल। सबलेल तऽ ई बड्रड सहज घटना छल मुदा देवीजीके संताेष नहिं भेटलैन। अगिला दिन ओ सौर्य ऊर्जाक पूरा जानकारी लऽ कऽ एली।तकर बाद विशेष सम्मेलन भेल। प्रधानाचार्य के विद्यालय एवम् गाम मे सौर्य ऊर्जाक प्रयोगके उचित व्यवस्था करैके प्रस्ताव बहुत नीक लगलैन।विद्यालयमे किछु विशेष चहल पहल के भनक तऽ बच्चा सबके लागिये गेल छल।फेर गर्मी छुट्टीक शुभकामनाक संग बच्चा सबके ई काज देल गेल जे गाम भरिक लोक सबके जमा करू एक दिन जहिया हुनका सबके सौर्य ऊर्जाक जानकारी देल जायत आ फेर सऽ पिछला सालक रूकल साक्षरता अभियान शुरू कैल जायत। शिक्षकक आज्ञानुसार सब विद्यालयमे सांझकऽ जमा भेल।तखन देवीजी सबके जानकारी देलखिन जे सूर्यक गर्मी जाहि सऽ हम सब कतेक परेशान रहै छी ताहि सऽ बिजली बनायल जा सकैत छै।सौर्य उर्जा सऽ चलै वला काऱ बल्ब़ कूकर इत्यादि तऽ काफी प्रचलित भऽ चुकल छै।परन्तु हम सब गाममे पैघ पैमाना पर साैर्य ऊर्जाक सदुपयोग कर चाहै छी।हम सब सौर्य ऊर्जा सऽ बिजली बनाबक बात कऽ रहल अछि। एहेन उपकरण सब लगाओल जायत जाहि सऽ सूर्यक गर्मी सऽ बिजली उत्पादन होयत आर ओहि बिजलीक उपयोग विद्यालय मे़ सड़कक कात के बल्बमे तथा अन्य सार्वजनिक स्थान पर लोकके सुविधा प्रदान करैलेल कैल जायत। अहि विकासकार्य मे सफलताक बाद अगिला कार्य होयत लोकक घरमे सौर्य उर्जा सऽ निर्मित बिजलीक व्यवस्था केनाई। प्रधानाचार्य आश्वासन देलखिन जे हुन्का पूरा विश्वास छैन जे सरकार सऽ आर्थिक एवं तकनीकि सहायता भेटतैन आ ओ यथाशीघ्र अपन आवेदन लऽ कऽ क्षेत्र के विकास मंत्री लग जेता। सबके लेल ई खबरि चिलमिलाइत गर्मीमे एक शीतल अमृतवृष्टि सऽ कम नहिं छल।गामक विकासक एक आर डेग देवीजीक सहायता सऽ आगाँ बढल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। इंग्लिश-मैथिली कोष/ मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. केशव महतो said... shabd sabhak modern sankalan bejor Reply05/15/2009 at 11:10 PM 2 मनोज.सदाय said... online dictionary ati sundar Reply05/15/2009 at 11:08 PM भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली मैथिलीक मानक लेखन-शैली
1. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली आऽ 2.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन
१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।
२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।
३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।
४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।
५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।
६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।
७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।
८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।
९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।
१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि। पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।
कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर। पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.) योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ Reply05/15/2009 at 11:01 PM 2 English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed athttp://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title“KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. The Comet English Translation of Gajendra Thakur's Maithili Novel Sahasrabadhani translated into English by Smt. Jyoti Jha Chaudhary These unanswered questions restarted troubling him in his dreams. Sometimes he felt that he was in the open edge roof and started moving towards the edge without boundary. A mysterious gravity was pulling him until he was fallen down. Was that a direction life was moving in or a sign of future dangers. Aaruni couldn’t find the time when he went to sleep and later on he concluded that dream and sleep were two mysteries of human life which couldn’t be answered. Aaruni grew up. He entered into his student life by learning the shlok that was actually a prayer to the Goddess Saraswati – a Goddess of knowledge and learning following the second shlok which was a prayer to Shiva and Parvati. While reciting the second shlok Aaruni used to laugh loudly. Father thought that Aaruni would not take study as a punishment and would not get habbit of holding his head while sitting on the chair for studying if he would start studying at the young age. He learnt one to hundred in one sitting. He found it very easy to learn numbers from twenty one at it had some kind of rhyming. He was irritated with one habit of his mother. His mother used to neglect him when someone else was at home. His mother’s friend had come to his house one day. His mother was so much busy with her that she ignored him. Aaruni was holding a bunch of keys and he warned his mother that if he was not listened to then he would throw that bunch into the ditch in from of the house. His mother thought that if she would give value now then he could be more violent. So she ignored him. The result was same for either situation. The keys are still missing and still all almirahs have duplicate keys. These childhood memories brought a smile in Aaruni’s face. The father was often being troubled because of his principles so he was very eager to see Aaruni grown up. He got promotion from third class to fifth class. It was compulsory to go to village in every Holi and Durga Puja. Father returned by leaving everything. But his salary was stopped for a while so a letter came from village that they would have to stay in village. Mother started crying but Aaruni was very happy. (continued) 1 सुरेश चौपाल said... These unanswered questions restarted troubling him in his dreams. Sometimes he felt that he was in the open edge roof and started moving towards the edge without boundary. A mysterious gravity was pulling him until he was fallen down. Was that a direction life was moving in or a sign of future dangers. Aaruni couldn’t find the time when he went to sleep and later on he concluded that dream and sleep were two mysteries of human life which couldn’t be answered. best english translation of a maithili novel i have ever seen. Reply05/15/2009 at 11:22 PM 2 रघुबीर मंडल said... the translation is of top quality, aaruni's life curve is taking turn. Reply05/15/2009 at 11:17 PM महत्त्वपूर्ण सूचना (१):महत्त्वपूर्ण सूचना: श्रीमान् नचिकेताजीक नाटक "नो एंट्री: मा प्रविश" केर 'विदेह' मे ई-प्रकाशित रूप देखि कए एकर प्रिंट रूपमे प्रकाशनक लेल 'विदेह' केर समक्ष "श्रुति प्रकाशन" केर प्रस्ताव आयल छल। श्री नचिकेता जी एकर प्रिंट रूप करबाक स्वीकृति दए देलन्हि। प्रिंट संस्करणक विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे। महत्त्वपूर्ण सूचना (२): 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर १.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. प्रकाशित कएल जा रहल अछि: लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com website:http://www.shruti-publication.com महत्त्वपूर्ण सूचना:(३). पञ्जी-प्रबन्ध विदेह डाटाबेस मिथिलाक्षरसँ देवनागरी पाण्डुलिपि लिप्यान्तरण- श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। पुस्तक-प्राप्तिक विधिक आ पोथीक मूल्यक सूचना एहि पृष्ठ पर शीघ्र देल जायत। पञ्जी-प्रबन्ध (शोध-सम्पादन, डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- तीनू पोथीक शोध-संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा Combined ISBN No.978-81-907729-6-9 महत्त्वपूर्ण सूचना:(४) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 महत्त्वपूर्ण सूचना (५): "विदेह" केर २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे। महत्त्वपूर्ण सूचना (६):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर (1971- ) छिड़िआयल निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गिच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक (खण्ड 1 सँ 7 ) नामसँ। हिनकर कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे आ उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद संस्कृत आ अंग्रेजी(द कॉमेट नामसँ)मे कएल गेल अछि। मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली शब्दकोश आ पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन-आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण। अंतर्जाललेल तिरहुता यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा (1962- ), पिता श्री सुरेन्द्र प्रसाद सिन्हा, पति श्री दीपक कुमार। श्रीमति रश्मि रेखा सिन्हा इतिहास आ राजनीतिशास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधिक संग नालन्दा आ बौधधर्मपर पी.एच.डी.प्राप्त कएने छथि आ लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर आलेख-प्रबन्ध सेहो लिखने छथि।सम्प्रति “विदेह” ई-पत्रिका(http://www.videha.co.in/ ) क सहायक सम्पादक छथि। मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी ज्योति (1978- ) जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।ज्योतिकेँ www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) ज्योतिकेँ भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा। (विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक 26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।) Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- (add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.30/- per copy for outside Delhi) BOTH VERSIONS ARE AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) SOLE DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक सजिल्द
मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास
डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00 राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00
उपन्यास
मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
कहानी-संग्रह
रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
कविता-संग्रह
या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 मैथिली पोथी
विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/-से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10%की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन :0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/- चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन ” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पेपरबैक संस्करण
उपन्यास
मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
कहानी-संग्रह
रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 90.00
शीघ्र प्रकाश्य
आलोचना
इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन
सामाजिक चिंतन
किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र
उपन्यास
माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
कहानी-संग्रह
धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम
एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन
अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादव ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ आ २ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशर ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक (ISBN No.978-81-907729-1-4 मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) ९/१०/११ 'विदेह' द्वारा कएल गेल शोधक आधार पर१.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश २.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश श्रुति पब्लिकेशन द्वारा प्रिन्ट फॉर्ममे प्रकाशित करबाक आग्रह स्वीकार कए लेल गेल अछि। संप्रति मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश-खण्ड-I-XVI. लेखक-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा, दाम- रु.५००/- प्रति खण्ड । Combined ISBN No.978-81-907729-2-1 ३.पञ्जी-प्रबन्ध (डिजिटल इमेजिंग आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यांतरण)- संकलन-सम्पादन-लिप्यांतरण गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा । १२.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा" १३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1:तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु.100/- श्रुति प्रकाशन, DISTRIBUTORS: AJAI ARTS, 4393/4A, Ist Floor,AnsariRoad,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107.Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) VIDEHA GAJENDRA THAKUR said... मैथिली आ मिथिलासँ संबंधित कोनो सूचना एतए देबाक लेल ggajendra@videha.com किंवा ggajendra@yahoo.co.in केँ ई मेलसँ सूचित करी। Reply05/12/2009 at 01:37 AM संदेश १.श्री प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि। २.श्री डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह| ३.श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ४.श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी, साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बाधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ५.श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ६.श्री डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। ७.श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ८.श्री विजय ठाकुर, मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। ९. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका ’विदेह’ क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १०.श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका ’विदेह’ केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। ११.डॉ. श्री भीमनाथ झा- ’विदेह’ इन्टरनेट पर अछि तेँ ’विदेह’ नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १२.श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमर, जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत से विश्वास करी। १३. श्री राजनन्दन लालदास- ’विदेह’ ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल। १४. डॉ. श्री प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भ' गेल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ' संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका 'विदेह' ३४ म अंक १५ मई २००९ (वर्ष २ मास १७ अंक ३४) http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
ह i ee { 4 be / ही ze गन os a a) ps ms 4 | डर ट्रक sis a i ~ Ss के द fi शक ce ae \ 4 बी ods q ae: . LL " ’ a = ‘ _ आाक i i | कै. | zs it ~ Sf . i ’ अगर व ~ ah tf ha
शव ie oh ak Ss a ~ प्र Oy annie om » =a " 4 a 3 Bf : \ - i [Al a 3, ol # fe र os) || D> 3 i \ जा:
सका < कु = e eS ( y Yeh \ eae
an नताशा, अहां हद Se E GALES (> #* के की चाही ?/ न < जि पहिने हम रोशनाईक दाग. ( | \ / J sigma वला दवाई a “a Is EO | (EAE Ve are ~~ oe war शी की ही © देवांशु aca _ केमिस्ट| / ७ ख | | ली visit : www.devanshuvatsa.com Co E-mail - devanshuvatsa@gmail.com Yael की ? ए pe (पर दोसर Wag होइ त' / कर SS =; OF { | < i Vo eo = a SE + Sere 2 “= ra ey ol | Ale! | ae फए)
Oo हम आइयों ओतबहिं ~ | | sei इ बात कोना iN ताकतवर छी जेतना आय से तीस न / कहि सकैत Br? © देवांशु वत्स i) 4 a | au a __ visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com अहां ओ पत्थर wa ६ रहल श्ट ओकरा हम तीस ray a आइयो नहि उठा waa दर Me ? | पहिने नहि उठा a छी ll <i) > i A > 4 FG.
eae | SA = = a ay A me a S © — िट ि — TT — poe 2 3 | |S व व oy AV \ i & ee a a Whe था ी AG j See “LG Wi Uh rd 4 ZN y 4 j OR Fe < we ficnonece"e लि पड AA 9 कक bye! bas है. Gitta bos | tk || lg Se, (aay y @ © / < 2 i ys AS हा ey a हि hi oxo ae | eA AA ०.
I ही ही मल: ico / Dh. . . a i = कर 4 f = ३ जी . P on) ” ‘ } ete दब oy. | Re — श्र ¥ Wy ‘ee 7 ४ y M a! a4 . Ww | . ‘iv Re vi | 3 } » ae li fu 4 j \ et A ir a. a दम Goer | . ¥ 5 “sl | के के. ee | = प् - . La के on त मर कि i la ॥ ‘ a - ; j x! | a - है सन 7 4 L » ही _ Ys ve 4 ९ a poe जै | वर vi ~ A दि सर ड | s 5 हर | 7 Wee oa | is ४ | कि = ge if @ " ; om | — : " ie — हाथ ' = | जद द | ——— _ a j j rare i Jeera the) Pn rye . SSE EN ELS शक मे eft eb ei) “A af f Re Bihari ToS ong Se