VIDEHA — Issue 41 / अंक ४१

Publication: VIDEHA · Issue: 41
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119 'विदेह' ४१ म अंक ०१ सितम्बर २००९ (वर्ष २ मास २१ अंक ४१) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी-कथा-अभिशप्त २.२. मिथिलेश कुमार झा-रिपोर्ताज २.३. अनमोल झा- लघुकथा- कोर बैंकिंग २.४ कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१६ २.५  मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा २.६. कथा-चौबटियापर-कुमार मनोज कश्यप २.७.मनोज झा मुक्ति २.८.प्रकाश झा - रंगदृष्टि; दिल्ली ३. पद्य ३.१. गुंजन जीक राधा- दसम खेप ३.२.सतीश चन्द्र झा-पंखहीन कल्पना ३.३.दयाकान्त-माँ मिथिला ताकय संतान ३.४.पंकज पराशर--ननकाना साहिब ३.५.कामिनी कामायनी-आजुक विद्यार्थी ३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां ३.७.अजित-ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि ३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३ ३.९.सुमित आनन्द जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! ४.. गद्य-पद्य भारती -पाखलो -४ (धारावाहिक)- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह ५. १.बालानां कृते-देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स).२.कल्पना शरण: देवीजी ६. भाषापाक रचना-लेखन - पञ्जी डाटाबेस (आगाँ), [मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] ७. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list) ७.१..Original poem in Maithili  by Gajendra Thakur Translated into English by  Lucy Gracy from New York. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।  http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'। मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"। विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय आइ काल्हि पञ्जी-प्रबंध मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थक मध्य विद्यमान अछि। मुदा प्रारम्भमे ई क्षत्रिय( गंधवरिया राजपूत) केर मध्य सेहो छल। वर्णरत्नाकरमे ७२ राजपूत कुलक मध्य ६४ केर वर्णन अछि, जाहिमे बएस आ पमार दोहराओल अछि। दोसर ठाम ३६ राजपूत कुलक वर्णन अछि। २० टा नामक पूर्वहुमे चर्च अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे, जे प्रायः हुनकर नेपाल प्रवासक क्रममे लिखल गेल छल, चन्देल आ चौहानक वर्णन अछि। गाहनवार वा मिथिलाक गंधवरिया राजपूतक दू टा शखा मिथिलामे छल, भीठ भगवानपुर आ पंचमहला(सहर्सा, पूर्णियाँ)। गंधवरिया,पमार,विशेवार,कंचिवाल, चौहान आदि मिथिलाक महत्त्वपूर्ण राजपूत छथि।मुदा गंधवरिया मिथिलामे महत्त्वपूर्ण छथि आ एखनहु मधुबनीसँ सहरसा-पूर्णियाँ धरि छथि। वर्णरत्नाकरक राजपूत कुलवर्णनक निम्न लगभग ६२ टा कुल अछि। सोमवंश,सूर्यवंश,डोडा, चौसी, चोला, सेन, पाल, यादव, पामार, नन्द, निकुम्भ, पुष्पभूति, श्रिंगार,अरहान, गुपझरझार, सुरुकि, शिखर, बायेकवार, गान्हवार,सुरवार, मेदा, महार, वात,कूल, कछवाह, वायेश, करम्बा, हेयाना, छेवारक, छुरियिज, भोन्ड, भीम, विन्हा,पुन्डीरयन, चौहान, छिन्द, छिकोर, चन्देल, चनुकी, कंचिवाल, रान्चकान्ट, मुंडौट,बिकौत, गुलहौत, चांगल, छहेला, भाटी, मनदत्ता, सिंहवीरभाह्मा, खाती,रघुवंश, पनिहार,सुरभांच, गुमात, गांधार, वर्धन, वह्होम, विशिश्ठ, गुटिया, भाद्र, खुरसाम, वहत्तरी आदि। एखनो गंगा दियारामे राजपूत आ यादव दुनूक मध्य ‘बनौत’ होइत छथि, आ दुनूमे बहुत घनिष्ठता अछि। पर्वतमे रहनिहार आ वनमे रहनिहारक वर्णन सेहो अछि वर्ण रत्नाकरमे। जनक राजाक विरुद ज(कबीला) सँ बनल प्रतीत होइत अछि। महाराजाधिराज ५ मान् मिथिलेशक आज्ञानुसार पछबारिपारक लौकिक आ श्रेणिक व्यवस्था पञ्जीकार लोकनि जे स्थिर कएलन्हि से प्रकाशित भेल छल आ ईहो प्रार्थना छल जे ताहि मध्य जनिका किछु वक्त्तव्य होइन्ह से प्रार्थना पत्र द्वारा श्री ५ मान् मध्य निवेदन करथि, ततः निदान विशिष्ट सभा मध्य एकर परामर्श कए पुनः प्रकाशित कएल जायत। एतएसँ १ सँ १५ धरि श्रेणी बना देल गेल। ढेर विवाद उठल जे पाइ लए कए उच्च श्रेणी देल गेल। पछबारिपारक लौकिक नाममे कतहु लौकिक तँ कतहु असल नाम छल। किछु उदाहरण अछि- १.     सिंहवाड़-मथुरेश ठाकुर २.    मनियारी- मधुपति मिश्र ३.    अमौन-बालकराम पाठक ४.    भराम- धीतरी ५.    बसन्तपुर- माधव मिश्र ६.    कोकडीही- रामेश्वर मिश्र ७.    नित्यानन्द चौधरी- पिण्डारुछ ८.    एडु- भैय्यो मिश्र ९.    खुटौनियाँ- भवानीदत्त झा १०.    लक्षमीपति मिश्र- धगजरी ११.    कन्त झा- चानपुरा १२.   टङ्कवाल महिधर झा-पेकपाड़ १३.   विष्णुदत्तपुरचिकनौट (मुजफ्फरपुर) १४.   चान पाठक- गजहरा १५.   काकठाकुर- धमदाहा १६.    खाशी ध्यामी- रंगपुरा(पूर्णियाँ) मात्र रसाढ़-अररियाक पञ्जीमे महिलाक पञ्जी भेटैत अछि। राजाक निहुछल लड़कीसँ बियाह केलापर राजा द्वारा पञ्जीकारकेँ बजाए हुनकर नाममे तस्कर उपाधि जोड़ब, नैय्यायिक गंगेश उपाध्यायक जन्म पिताक मृत्युक ५ सालक बाद होएब, महेशठाकुरक बहिनक विवाह कूच-बिहारक राजकुमारसँ होएब, कविशेखर ज्योतिरीश्वरक उपाधिक संग उल्लेख (हुनकर पाण्डुलिपि नेपालक पुस्तकालयसँ प्राप्त होएबासँ पूर्व), ओकर अतिरिक्त ढेर रास कवि एकटा ढाका कवि , संधिविग्राहिक आदि पद आ कवि शेखर लोकनिक विवरण, मुस्लिम आ चर्मकारसँ विवाहक विवरण आ समाजमे ओहिसँ भेल सन्ततिक प्रति कोनो दुराग्रहक अभाव, ई सभ पञ्जीमे वर्णित अछि। एहि पोथीक मिथिलाक्षर अंकन जाहि दस हजारसँ ऊपर तालपत्र/ बसहा पत्र/ आधुनिक कागजपर लिखल मिथिलाक्षर पञ्जीक ४०० वर्षसँ ऊपर पुरान पाण्डुलिपि मध्य वर्णित साढ़े पन्द्रह सए वर्षक (४५०-२००९ ए.डी.)क जीन मैपिंग वर्णित अछि। गंगेश उपाध्याय-छादन छादन, उदयनाचार्य-ननौतीवार ननौती (करियन, समस्तीपुर),महेश ठाकुरक मातृक काश्यप गोत्री सकराढ़ी मूलमे रुद झा। रमापति उपाध्याय प्रसिद्ध विष्णुपुरी, परमानन्दपुरी वत्सगोत्री करमहा मूलक तरौनी गामक चैतन्यक गुरु ई वर्णन सेहो अछि। पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग /अंकन/ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण/ संकलन/ सम्पादन- गजेन्द्र ठाकुर,नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा प्रणीत एहि पुस्तकक कारण आवरण देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा पञ्जीकारजीक हस्ताक्षर जे १७६६ केर अछि, केर सेहो प्रयोग भेल अछि आ हुनक पितामह पज्ञीकार रघुदेव झाक लिखल माण्डर मूलक पोथीक प्राचीनतम डिजिटल इमेजिंग सेहो अछि। आर्यभट्टक विवरण- (27) (34/08) महिपतिय: मंगरौनी माण्डैर सै पीताम्ब र सुत दामू दौ माण्ड्र सै वीजी त्रिनयनभट्ट: ए सुतो आदिभट्ट: ए सुतो उदयभट्ट: ए सुतो विजयभट्ट ए सुतो सुलोचनभट (सुनयनभट्ट) ए सुतो भट्ट ए सुतो धर्मजटीमिश्र ए सुतो धाराजटी मिश्र ए सुतोब्रह्मजरी मिश्र ए सुतो त्रिपुरजटी मिश्र ए सुत विघुजटी मिश्र ए सुतो अजयसिंह: ए सुतो विजयसिंह: ए सुतो ए सुतो आदिवराह: ए सुतो महोवराह: ए सुतो दुर्योधन सिंह: ए सुतो सोढ़र जयसिंहर्काचार्यास्त्रस महास्त्र विद्या पारङगत महामहोपाध्या य: नरसिंह:।। 584(A) मिथिला पञ्जी-विज्ञान प्रोन्नयन संस्थान, पचही हाउस, मिर्जापुर रोड, दरभंगा द्वारा मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक अतिरिक्त आन जाति मध्य सेहो पञ्जी व्यवस्था लागू कएल जएबाक गप छल (आचार्य भोलानाथ झा, १८.१०.१९८२), मुदा ई संस्थान स्वयं विलीन भऽ गेल। पञ्जीक उद्देश्य जे छल, तकर विपरीत ई ब्राह्मण आ कायस्थ समुदायक मध्य आन्तरिक स्तरीकरण आनलक, मिथिलाक लोकतांत्रिक मूल्यमे कमी आनलक, पञ्जीकारक निःस्वार्थ सेवा, सत्यनिष्ठा, आ विश्वासी होएबामे कमी आएल,बिकौआ वर्गक उत्पत्ति भेल आ बाल-विवाहक प्रथा आएल, विधवाक संख्यामे अभूतपूर्व वृद्धि भेल आ आइ धरि समाज एहिसँ देखार भऽ रहल अछि कारण विधवा-विवाहक पक्षमे आ बाल-विवाहक विपक्षमे कोनो समाज-सुधार आन्दोलन मिथिलामे नहि दृष्टिगोचर भेल आ मैत्रेयी सन विदुषीक मिथिलामे उत्पत्ति पुरान गप भऽ गेल। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० अगस्त २००९)८४ देशक ८९६ ठामसँ २८,५३३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ १,९४,७९४ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078  ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.कामिनी कामायनी-कथा-अभिशप्त २.२. मिथिलेश कुमार झा-रिपोर्ताज २.३. अनमोल झा- लघुकथा- कोर बैंकिंग २.४ कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन -१६ २.५  मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा २.६. कथा-चौबटियापर-कुमार मनोज कश्यप २.७.मनोज झा मुक्ति २.८.प्रकाश झा - रंगदृष्टि; दिल्ली कामिनी कामायनी अभिशप्त ग्राउंड फ्लोरक ओ भव्यतम   चूँह चूँह करैत फ्लैट  बेली चमेली  बोगनबेलिया के लता पुष्प सॅ कनि झाँपल सन  कंपाउंडक  बङका देवार प’ ठाठ सॅ ठाढ रॉक गार्डनक किछु विशेष नमूना़   झरोखेदार लाल बङका लौह फाटकक कात में चमकैत ग्रेनाइट पाथर एखनो पति के ऊपर ओकर नाम सुनहरा आखर सॅ अपन  छाती प’  खोदबेने शान सॅ ठाढ ओ देवाऱ   ओ नेम प्लेपट    ओ लता कुंज    ओ घर   बङ किछु कहय चाहैत छलै   ओकर सबहक जीभ तालुॅ सॅ सटि गेल होय जेना़   मुदा ओकर सबहक वियाकुलता  ओकरा सब के अवस्से बुझाय पङि जाय    जे इर् घर के जनैत छल लग सॅ  । ‘शांति’ के नाम एखनो अपन करेज सॅ सटाैने ओ कतेक अशांत छल से वर्णनातीत बूझू ।कतेक बेर सांझ  भोऱ  वा दुपहरिया में ओ नामें नै  दरो देवार संगे ओ घर सेहो वियाकुल भ’ ताकए लागै  अपन गृहस्वामिनी के ओ वात्स ल्यपूर्ण  मधुर मधुर स्नेह सिक्तए स्पर्श़  ओ परम निश्छल हास्य ओ ममत्व्  मुदा  हश्र की कतेक बरख पहिने   अपन  किराया के फ्लै ट में रहैत रहैत  ओकर  नजरि अहि ग्राउंड फ्लोर प’ पङल रहैक   बिकाउ  छल   मुदा बङ मॅहग  अपन म्युजिक के स्कूल चला चला क’ जे पाय जमा केने छल   आ’ इकॉनोमिस्ट घरवला के जमा पूँजी सॅ  त’ अहि इलाका में इर् फ्लैेट  खरीदनाए    अहि जन्म में त’ असंभवे छल़  मुदा जखन इच्छा प्रबल भ’ जाइत छै  त’ विधाता कोनो नै कोनो विध आगाँ आबिए जाइर्त छथि   । शांति के एक गोट दोस्त   म्यूजिकक अनन्य प्रेमी   गायक सहकर्मी़   कुबेर क’ परम कृपा पात्र    के मददि सॅ ओ अहि एच आइर् जी डी डी ए फ्लैकटक अधिकारिणी बनि हर्षित भ’ आगाँ के सपना के महल सजेबा में लागि गेल छल   करीब बरख दिनक’ समय आ’ ऊपर सॅ दस लाख आओर अहि फ्लैगट के भीतरि बाहरि सॅ सुरूचिपूर्ण कोठी में परिवर्तित करि देने छलै़   ओ दप दप करैत संगमरमरिक देवार   ओ हल्का हरियर टाइल्स ।कत्त कत्त सॅ नहि आशियाना के सजावटक चीज बोस्त खरीदल गेल   चाॅदनी चाैक़   चावङी बजार  दिल्ली हाट़  लाइर्फ स्टाइल़  जयपुर   जम्मू़  चैन्ने  ।ड्राइंग रूमक पछवरिया देवार त एम एफ हुसैनक बङका कैनवासे बूझू़  कि लैंप शेड  शैडिलियर्स़  साेरोस्की कटग्लास   बाथरूमक सुन्दर टाइल्स़  बाथटब  फिटिंग्स  पर्दा   सब किछु एकदम स्वर्ण मय जेना मिडास टच तीन बेडरूमक के बङका फ्लैुट में आगाँ दिश कंपाउंड में एक गोट कमरा संगीत कक्ष के रूप में प्रतिष्ठित कराओल गेल   जतय सॅ  पंचम स्वर में कखनो राग मल्हार छेङल जाए त’ तानपूरा आ’ सितार क संग कखनो राग भैरवी घरक पाछाॅ बङका पार्क     पार्क में बेसी दूर धरि बङका बङका फूलक पाैधा लगवा क’ ओतय दाना पानी राखि दै   त’ चिङैचुनमुनक बहार  कलरव  सेहो ओहि घर के आत्मेमुग्ध करि दैक  । देखला सॅ लागै़  जेना साैदर्य  आ’ कला  दूनू के संजाेग कत्ताै छै त’ ओ शांति में वस्त्रे पहिरै त’ पएर क’ सैडिल सॅ ल क़ माथक किलिप धरि एके रंग जेना पुरान फिल्मक कोनो हिरोइन  गीत संगीत   त ओकर शरीरक सम्पूर्ण सेल में व्याप्ति  एक क्षण नै चुप   सदिखन  चाहे किचन में हो वा बाथरूम में  भाैंरा जकॉ गुनगुनाइर्त  सुंदरि जखन कालेानी के सङक प’ ठाढ भ’ अपन  जन्नत के निहारै   त’ अङाेसिन पङाेसिन सबहक करेज में हूक उठै़ जेना ओकर सबहक छाति प’कियाे मूॅग दङङि रहल होय   हूॅह’ । घरक लता कुॅज   एक एक टा़ पजेबा   पाथरि   प्ला स्टर के ़   लाेकवेदक इर्रखा के भान होइर्त रहैत छलै मुदा ओ सब त’ अपन मलकानिक’उदारता प’   रइर्सी प’   कलात्मनक पहलूॅ प’ गीत संगीत प’ अपने में ‘महो महो’भेल प्रसन्नतापूर्वक ओकरा आसीरबाद दइर्त छलै़   ओकरा प्रसन्न देखि ओ सब मिली क’ झिझिर कोना झिझिर कोना’ खेलाय लागैत छल । ‘नजरि लागे राज ताेरे बंगले पर’    जखन शांति गबै  त’ इर्ंट इर्ंट सिहरि जाए  ‘अइर् बंगला प’ कोनो दुष्टा़  कोनो कुटनी के नै लागै नजरि  भगवत़ि ।’मुदा तैयाे केकर नजरि एतेक तेज धारदार  जरैत गोइठ ासन छलै जे़  । उम्हर ओ करिया आ’ ऊजरा झाझी कूकूर   केहेन दन भेल  अलसाएल पङल एक कोन में ।पहिने त’ भरि भरि दिन नै खाए  शांति के बेडरूम में बनल दूनु आलमीरा लग   जाहि में ओकर वस्त्र आ’ सैंडिल सब छलै  सिूॅघ सूॅघि क’ बेहाल भ’ भूकए लागै़  कखनो अहि बहिनी के दुलार  कखनो ओहि बहिनी के सिनेहि  के अनठबैत कूॅ  कूॅ  करैत पङल ।मालिक अपने सॅ कोरा म्ेंा बैसा क दूध में डूबा डुबा क’ बिस्कुट खुआबैथ  त’ कनि मनि खाए । गृहस्वामी के माय बाबू   दूनू परानी जे अहि शहरि में कत्ताे अनतए रहैत छलाह  दाैङल आबि गेलखिन्ह  दूनु बेटी   एक त’ बारहवी करि क’ फैशन टैक्ना ेलौजी करए छल  दोसर बारहवीं में   ।माय बाबू अपन पुत्रक मुॅह देखिक बेकल भ’जायथ मुदा विधि क’ विधान  । भुट्ट खाॅट पुरूख   पहिनो चुप्पर   आब त’ आओर चुप्पे भ’  गेला ।कनि फरिच्छ भेला प’ फैब इंडिया के घुठ्ठी सॅ कनिए ऊपर रंगीन कुरता पहिर   छाति तनने   दूनू कुकुर के सिकङि पकङि टहलए लेल कालाेनी में निकलए छलाह़    आब बङका भोरे कहु त’ जे अंधारे में   घरक पाछाॅ कूकूर के टहला क’ घर में पइस जाइत़  आत्मक निर्वासित सन  । घर की छल  एकदम सुन मसाऩ    संगीत मुरूझा गेलए   कन्या द्वुय अपने में  भरि भरिदिन दोस्त महिम संग    घर में चूँ शब्द नै   शनै  शनै   बङकी पढए लेल अमेरिका चलि गेलए   छाेटकी सेहो बारहवी करैत कोनो कोर्स करए लेल होस्टल चलि गेलए  माए बाबू के अपनो घर दुआरि छलैन्ह  कत्तेक दिन छाेङने रहितथि     आखिर में गृहस्वामी  नाैकरानी  आ’ दूनु कूकुर  ।घरक रंग रूप एकदमे बदलि गेलए़  गाछ   बिरीछ  सुखैत़  पार्क सॅ सॅटल सबटा पाैधा सूखा गेलए  अन्न पानिक अभाव में चिङै चुनमुन धरि तियागि देलक ओहि बास के । ंमहल्ला के दू चारि जनानि जे शांति के जनैत छल   ओहि बाटे आबैत जायत   एक गोट अर्थपूर्ण दृष्टि ओहि फ्लैनट प’ अवस्से द’ दै आब ककरो नजरि में ओहि घर वा घरनी लेल कोनो इरखा नहि बाॅचल छल़   ओ कलंकित भ’ गेल छलै नै  अपराध बोध सॅ ग्रस््रत़   आ’ कहु नै अभिशप्तल   । कएक बेर सुतलाहा राति में लाेकवेदक वक्राेक्ति’ सुनि घरक नीन उखङि जाए़  ओकरा होय  इर् पढल लिखल मूढमति  निशाचरि  सब आधुनिकता के चकचुक में इर् हो बिसरि गेलए   जे देवारो के कान होइत छै  ।अपन माथ अपने सॅ नहि पीट सकैत छल   माेन होय़  जाेर सॅ हाका्रेश करि  मुदा शहरक मर्जादानुसारे  कानब रोकै  त’ जाेर सॅ सिसकारि ओहि सुनसान राति में दूर दूर धरि अवस्से सुना जाइत छलै अहि में त’ किम्हराें सॅ दू मत नहि छलै जै दूनू परानी   पृथ्वी के दू ध्रूव    ।एकटा  इर्र घाट़  त’ एकटा बीर घाट   एकटा सदिखन  हाय पाय कि हाय पाय़  बाप  म्या  भाय़ बहिन  पत्नी    संतान  सब किछु पाय  ।दोसरि नख सॅ शिख धरि कला आ’ साैंदर्यक पुजैगरी  भावना क’ उन्मत्त लहरि सॅ सराबोर  जखन अपन सुकुमारि  कंठ सॅ ‘छुप गया कोइर् रे  दूर से पुकार के़  दरद अनोखी हाय़”  गबै त’केकर करेज में नै दरेग उठि जाए    चिङै चुनमन धरि कुहुकए लागै़ ।जखन ओ दूनू संगी मिल क’ डुएट गाबैथ  “तेरे मेरे सपने अब एक रंग है तू जहाॅ भी ले जाए राही़ ।’वा ‘ नैन साे नैन नाही मिलाव देखत सूरत आवत लाज गुइर्याॅ  ”  तखन त’ पूछू नहि    इर्ट पाथरि प्लामस्टर फूल पाैधा  जेना सब मिलि क’ ं  ंमगन  भ’झूमरि गाबए लागै कतेक प्राेग्राम अपन संगीत स्कूलक तत्वामवधान में श्रीराम सेंटर  कमानी आॅडीटाेरियम़  इंडिया हैबिटेट सेंटर  वगैरह वगैरह में देने रहै  अपन छात्र संगे स्वयं अपनो स्टेज प’ कएकटा   गीत  ओ  आ ‘ओकर दोस्त मिलि क’ प्रस्तुत करैत  आ’ प्रबुद्व    गणमान्य श्राेता सबहक गगन भेदी ताली के गङगङाहटि सॅ माथ सॅ पएर धरि सराबोर भ’ जायथ  । गृहस्वामी तखनो डाेनेशऩ  फंड   अहि  फिराक में रहि जायथ  ।हुनका तनिको भान नहि कि मुठ्ठी सॅ बालू जकॉ की ससरि रहल अछि  । आ’ ओहि दिन     सावनक सुहाैन  गरजैत मेघ   आकास में बिजुरि लता संग संगत द रहल छल़  नीचा धरतीके ओहि फ्लैरट में   हारमाेनियम आ’सितारक जुगलबंदी  आ ओहि जुगलबंदी सॅ जे समाॅ बंधलै़   बंधैत जाइत रहलै   पानि बूनी के डरै   कोनो विद्दार्थी नहि आयल छलै  आ’ नै तबलची वा गिटारिस्ट सएह़  बच्चा सब स्कूल़  घरवला  आफिस़   एकसरि दूनू दोस्त़  आकासक कारी कारी मेघ शांति के ह्दूयक शांति भंग करय लेल व्यग्र  मन मजुर अहि मेघ में नृत्य रत होय लेल  पाखि फङफङेबे कएने छलै कि     अप्रत्याुशित रूपेण पति के आगमन   पित्तै आन्हर होइत कमंडलु सॅ अपन चुरू में जल निकासि  गाैतम श्राप देबए लेल हाथ ऊपर उठाैने ही रहैथ क़ि   ‘जाे कुलच्छिनी़  आय सॅ तू प्रस्तर मूरत में परिवर्तित भ जाे  ।’  माेन में इर् वाक आैनाइर्ते रहैन्ह   कि अहिल्या  अपन स्वभावक प्रतिकूल ज्वालामुखी जकॉ फुइट गेल़  हवा में उठल हाथ पकङैत एकदम कठाेर स्वर में बाजल ‘बस्स़    बङ भेल   अहाॅ हमरा की सराप देब    आय हम अहाॅ के द’ रहल छी़    ’गाैतम हकबक सन ठाढे़  हाथ में कमंडल आ’ जल कत्तय    जरूरी फाइलक पुलिन्दा  नेने अनचिन्हार सन ताकितै रहि गेला़    ‘इर् कोन रूप एकर   अजगुत    इर् वएह थिक जे अठारह बरख पहिने   लाल जाेङा में मल्लिका ए तरन्नुम बनल ओकरा साेझाँ माथ झूकाैने बैसल़    साैस ससूरक आज्ञाकारिणी  पति के अनुगामिनी   बच्चा द्वय केर स्नेहिल माय    लगक साप्ता़हिक हाट सॅ   दूनू हाथ में सब्जी सॅ भरल भरल भारी झाेरा   उठा क’ अननिहारि मध्यम वर्गीय सुगृहणी  अपन परिवारक धूरि प’ नचैत स्त्री ’ तेहेन ठनका खसलै जे ओहि हरियर वटवृक्ष के सम्पूर्ण सूडऽऽह करि देलकै  ।तेकरा बाद बाहर आकास में उधियाति सबटा मेघ तीव्र बसातक झाेंका सॅ उङि गेलुा  मुदा ओ अनतए नि ह जाकऽ् गाैतमक मानस पटल प’ स्थायी रूपे बास ल’ लेलकै   । कतेक घंटा    दिऩ  सप्ताीह़   मास़  बीतैत रहलै  ‘बिन घरनी घर भूतक डेरा’ भ’ गेलै  ।सम्पूर्ण घर अस्त व्यस्त़   सुन्नर चिक्क़न कजरिया टाइल्स क’ छटा मलिन होबए लगलै़  एत्तए बाल्टी फेंकल   ओत्त’ झाङू़  ओह की दुर्गति  । आ’ एक दिन   छुट्टी के दिऩ   भरिसक कोनो परब छलै   फ्लै टक कागद सॅ अप्पनन नाम हॅटा क’ दूनू बेटी के नाम करि   शांति आबि क’ ओ कागद गाैतम के पकङा देलकैन्ह  अहि चेतावनी के संग  ‘हम इर् घर अप्परन बेटी द्वय के दान द’रहल छी़   मुदा एकरा देखबा लेल हम अवस्से आबैत रहब   जखन जखन हमर माेन करत़  इर् हमर स्वप्नए    हमर शाेणित  हमर प्राण अछि।’ सदिखन सलवार सूट़  साङी पहिरए वाली शांति    जीन्स टाॅप में सजल   एक गोट गाैरवान्वित जुबती सन गरदनि धरि काटल केस झूलबैत़ बिन कोनो लाेच लाच के चलि जायत रहल । गाैतम के त’ नहि कहि मुदा बाहरि ग्रेनाइर्ट प’ सुनहरा आखर में लिखल ओ नाम़   ओ घर  ओ बाॅचल खूचल पााद पष्प बिलखि बिलखि क’ कानय बाजए लागल छल  ‘सरिपहुॅ  हम ‘अभिशप्तह’  भ’ गेलहॅू।’ कामिनी कामायनी 20।8।09 _________  मिथिलेश कुमार झापरिचय-पात

नाम ________ मिथिलेश कुमार झा पिता ________ श्री विश्वनाथ झा जन्म ________ 12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक ________ ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 डाक-संपर्क _____ द्वारा- श्री विश्वनाथ झा, 15, हाजरा रोड, कोलकाता-- 700026 शिक्षा :  प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि। प्रकाशित पहिल रचना: हिन्दी मे– मुखपृष्ठ अखबार का- जनसत्ता(कलकत्ता संस्करण) मे 19-10-94 केँ(कविता) मैथिली मे- विधवा(कविता)-प्रवासक भेंट(मैथिली मासिक कोलकाता)-रिकार्ड तिथि उपलब्ध नहि, आरक्षण सिर्फ सत्ताक हेतु- आलेख(प्रवासक भेंट-कोलकाता)- नवम्बर 1994 कें। प्रकाशित रचना: मैथिली:- प्रायः 15 गोट कविता, 17 गोट बाल कविता, 18 गोट लघुकथा, 3 गोट कथा, 1 टा बालकथा, 44 गोट आलेख आ 6 गोट अन्य विविध विषयक रचना प्रकाशित। प्रकाशित रचना:- हिन्दी:- प्रायः 10 गोट कविता/गजल, 18 गोट आलेख, 1 गोट कथा ओ 3 गोट विविध विषय प्रकाशित। मिथिलेश कुमार झा “हम मैथिल” (मैथिली त्रैमासिक) पत्रिकाक लोकार्पण दिनांक २६.०७.०९ (रवि दिन) केँ हावड़ाक मेडिज्कल क्लबक सभागारमे साँझू पहर आयोजित एकटा कार्यक्रममे मैथिली त्रैमासिक “हम मैथिल”क लोकार्पण भेल। एहि कार्यक्रमक अध्यक्षता कएलनि श्री किशोरीकान्त मिश्र। कार्यक्रमक उद्घाटन कएलनि श्री युगल किशोर झा, अतिथि छलाह श्री गंगा झा ओ श्री रामलोचन ठाकुर। पत्रिकाक विमोचन श्री नवीन चौधरीक हाथेँ भेल। संचालन कएलनि श्री प्रमोद ठाकुर। एहि अवसरपर विभिन्न वक्ता लोकनि पत्रिकाक हेतु हर्ष जनबैत संपादक-प्रकाशककेँ शुभकामना देलनि। दोसर सत्रमे श्री रामलोचन ठाकुरक अध्यक्षतामे एकटा कवि सम्मेलन भेल। एहिमे कविता पाठ कएलनि श्री अजय कुमार झा “तिरहुतिया”, श्री अमरनाथ झा “भारती”, श्री अनमोल झा, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री विनय भूषण आ श्री रामलोचन ठाकुर। कार्यक्रमक अन्तमे श्री मनमोहन चंचल धन्यवाद ज्ञापन कएलनि। लोकार्पित पत्रिका: हम मैथिल (प्रवेशांक जुलाइ-सितम्बर २००९) प्रधान सम्पादक-श्री रामलोचन ठाकुर संपादक-श्री मनमोहन मिश्र “चंचल” संपादकीय पता-१४८ सी.रोड, बामनगाछी, सलकिया, हावड़ा-६, फोन-९९०३२०१०५० पृष्ठ-४०, दाम-१६ टाका “संपर्क”क मासिक बैसार १२ जुलाइ २००९ (कोलकाता)-संपर्कक जुलाइ मासक बैसार नियमानुसार मासक दोसर रवि (१२ जुलाइ)केँ संध्या पाँच बजेसँ नवीन प्रकाशनक कार्यालय-कक्षमे भेल। एहि बैसारक अध्यक्षता श्री नवीन चौधरी कएलनि। आरम्भिक कुशल-क्षेम ओ विविध चर्चाक उपरान्त उपस्थित रचनाकार लोकनि अपन-अपन रचनाक पाठ कएलनि। संपर्कक परम्परानुसार संपर्कमे प्रस्तुत रचना टटका, अप्रकाशित ओ अपठित होइछ। प्रस्तुत रचना सभपर उपस्थित श्रोतागण अपन-अपन प्रतिक्रिया जनौलनि। रचनाक पाठ कएनिहार रचनाकार छलाह-मिथिलेश कुमार झा (समय-संकेत, उपकार-लघुकथा), अनमोल झा (नीक लगैत अछि हमरा-कविता), सुरेन्द्र ठाकुर (देखब कहीं छिलकि नञि जाए-कविता, मुइल राष्ट्र-कथा), नवीन चौधरी (दू गोट कथा)। पठित रचना पर उक्त रचनाकार सभक संगहि श्री किशोरीकान्त मिश्र, श्री नवोनारायण मिश्र, श्री देवशंकर मिश्र, श्री रोहित मिश्र, श्री विमलकान्त मिश्र, श्री शंकर मिश्र आदि अपन प्रतिक्रिया जनौलनि। अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, साठिसँ बेशी लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। कोर बैंकिंग -डाक बाबू, हमर एकटा मनीआडर अबै बला छै। देखियौ ने एलै हे की नै? -के फेकना पठेतौ। -हँ, एलैहे की? -नै गै, फार्म तऽ एलौ हे, पाइ तऽ एखन नै एलैहे, एतै तऽ काहा पठेबौ। -आर कनी दिन ठकि लिअ गिरहत! कहै छलै फेकनाक बाउ जे किदैन बैंकिंग भऽ जाइ छै झंझारपुरक बैंक तऽ ओतऽ पाइ जमा करत नेना, एतऽ संगे संग आबि जेतै खाता मे...!! कुसुम ठाकुर प्रत्यावर्तन १६ हमर एकटा स्वभाव अछि, जे आई धरि हम नहि बदलि सकलियैक अछि, आ आब शायद बदलि नहि सकैत छियैक। हमरा मोन मे खराप बात बहुत जल्दी आबि जायत अछि। पचास तरहक आशंका तुंरत आबि जायत अछि। हम कतबो कोशिस करैत छियैक जे मोन सs निकालि दियैक मुदा कियैक ओ निकलत। चाहे कियो घर सs बाहर गेल होयथ आ समय पर नञ लौटल होयथ किंवा कोनो तरहक मोन खराप होय। हम बहुत जल्दी घबरा जायत छी। आ तखैन्ह नञ हमरा खएबा मे नीक लागैत अछि आ नञ दोसर कोनो काज मे। इ हमर सबस पैघ कमजोरी अछि एहि लेल हमरा हमर शुभ चिन्तक बेटा हमर पति आ हमर सब सs नीक संगी जे आई धरि एकहि टा छथि सेहो कैयैक बेर समझौलैथ आ समझाबैत छथि मुदा ओहि स्वभाव के हम नहि बदलि सकलहुँ। हम सोचि के अस्पताल गेल छलहुँ जे हम श्री ठाकुर जी के लs कs घर अयबैन्ह आ अनबो कयलहुँ मुदा हमरा पता चलल आ डॉक्टर बी.एन.झा कहलैथ जे bone marrowकराबय परतैन्ह आ ओहो वेल्लोर जाय कs , इ सुनतहि हमरा जेना खराब दिनक आशंका भs गेल। ओना तs डॉक्टर साहब बुझेलथि जे जमशेदपुर मे सेहो bone marrow भs सकैत छलैन्ह, चूँकि ओ चाहए छलथिन्ह एक बेर वेल्लोर मे सबटा जाँच भs जाय ताहि लेल ओ जमशेदपुर मे आगू जाँच नञ कराय वेल्लोर पठा रहल छलथिन्ह। ओहि दिन, राति भरि हमरा कियैक नींद होयत। भरि राति सोचितहि प्रात भs गेल। दोसर दिन सs वेल्लोर जेबाक आ अगुलका जाँच करेबाक विषय मे सोचय के छल, आ हम सब सब सँ पहिने अपन बहिन जमाय, यानि छोट बहिनक पति जे नीक डॉक्टर छथि आ धनबाद मे छलाह हुनका सs गप्प कयलहुँ। ओहि समय हमर बाबूजी सेहो धनबाद मे छलाह। सब सs बात बिचारक बाद भेलैक जे बाबुजी हमरा सब सँग वेल्लोर जयताह आ माँ बच्चा सब संग जमशेदपुर मे रहतिह। बाबुजी श्री ठाकुर जी आ हम तीनू गोटे साँझ मे वेल्लोर पहुँचलहुँ। होटल पहुँचि आ तैयार भs एक बेर अस्पताल गेलहुँ आ अस्पताल देखि आबि गेलहुँ। राति भरि हमरा कियैक नींद होयत भोर मे हम सब समय पर तैयार भs अस्पताल पहुँचि गेलहुँ। अस्पताल मे तs किछु दिक्कत नहि छलैक मुदा जाहि डॉक्टर के ओहि ठाम डॉक्टर बी. एन. झा पठेने रहथि हुनक विषय मे हम सब पता करय के लेल घुमि रहल छलहुँ। हमरा सब केर घुमैत देखि एक सज्जन रुकि कs पुछलाह " अहाँ सब केर कोनो दिक्कत अछि वा किनको खोजि रहल छि"? हम तुंरत कहलियैन्ह "असल मे हमरा सब केर डॉक्टर कुरियन सs देखेबाक अछि, हुनके खोजि रहल छियैन्ह" । सुनतहि ओ पुछलाह "अहाँ सब रजिस्ट्रेशन करवा लेने छी "? जहिना हम सब कहलियैन्ह नय करवाबय के अछि, ओ तुरंत अपना संग लs जा रजिस्ट्रेशन करवा संग चलय लेल कहलाह आ ओकर बाद कुर्सी सब लागल हॉल छलैक ओहि ठाम बैसय लेल कहि कतहु चलि गेलाह। श्री ठाकुर जी केर नाम लs बजेलकैन्ह हम तीनु गोटे भीतर गेलहुँ । भीतर पहुँचि हम जे देखलहुं तs हमर आश्चर्यक ठेकान नहिं रहल। डॉक्टर कुरियन आओर कियो नहि, ओ तs ओ व्यक्ति छलाह जे हमरा सब केर सब काज करवा अपना सँग ओहि ठाम तक अनने छलाह । हम बाबुजी आ श्री लल्लन जी तीनु गोटे एक दोसराक मुँह तकैत रहि गेलहुँ । विश्वास नहिं भेल जे एतेक नामी आ पैघ डॉक्टर के इहो रूप होइत छैक । हम सब तs कहियो कल्पना मे सेहो नहि सोचने आ देखने रहियैक डॉक्टर के इ रूप । डॉक्टर कुरियन पहिने जमशेदपुरक पूरा रिपोर्ट देखि आ विस्तार सs सब किछु पुछलाह आ ताहि केर बाद इ कहि अस्पताल मे भर्ती होयबाक लेल कहलाह जे दू तीन दिन मे सबटा जाँच भs जायत ताहि केर बाद हम अहाँ सब केर किछु कहि सकैत छी। अस्पताल मे भर्ती करेलाक बाद दू तीन दिन तक हम सब दिन, राति मे हिनकर भोजनक बाद करीब १० बजे आपस होटल बाबुजी केर सँग आबि जायत छलियैन्ह । मोन तs अयबाक नहिं होयत चल मुदा बाबुजी आ हिनकर जिद्द रहैत छलैन्ह तsआबि जाइ ।राति भरि हम किछु किछु समय पर बाथरूम जाइ आ समय देखि । भोर ६ बजे सs पहिनहि अस्पताल पहुँचि जायत छलहुँ बाबुजी अपन बाद मे आबथि। एक सप्ताह धरि जाँच आ रेपोर्टक सिलसिला चलैत रहलैक आ एक सप्ताह बाद एक दिन डॉक्टर कुरियन अपने अपन पूरा डाक्टरक दल सँग अयलाह । एक टा चीज हम वेल्लोर अस्पताल मे देखलहुँ जे कोनो ठाम देखय के लेल नहिं भेटल। ओहि ठामक डाक्टर सब पूर्ण रूपेण मरीज के लेल समर्पित रहैत छथि आ ताहू मे डाक्टर कुरियन के हम महान कहि सकैत छियैन्ह । सब दिन ओ आबि पहिने मरीज वाला बिछावन केर बगल मे एकटा आओर बिछावन रहैत छलैक ओहि पर बैसि जाइत छलाह आ पहिने हाल चाल पुछैथ । ओहियो दिन आबि बैसी गेलाह आ हाल चाल पुछलाह, ताहि केर बाद कहलाह "आब सबटा रिपोर्ट तs आबि गेल अछि, मुदा हम सब bone marrow करबैन्ह जाहि मे बहुत कष्ट होइत छैक। ठाकुर जी केर खून बहुत कम छैन्ह जाहि लेल हमरा सब केर खुनक आवश्यकता परत आ अहाँ सब मे सs एक गोटे के खून देबय पडत। हम तुंरत खून देबाक लेल तैयार भs गेलहुँ। हमरा घर मे हमर चारू गोटे के एकहि ग्रुप केर खून छैक। डाक्टर कुरियन हिनका देखि जखैन्ह बाहर गेलाह तs हुनक एकगोट सहायक डाक्टर हमरा बाहर बजेलाह आ हमरा एकटा फार्म दs blood bank जा खून देबाक लेल कहलथि । हम फार्म लेलाक बाद हिनकर केबिन मे नहिं गेलहुँ आ सोझे blood bank चलि गेलहुँ। नर्स के जहिना फार्म देखेलहुँ ओ तुंरत एक टा कुर्सी पर बैसेलथि आ किछु समय बाद हमरा एकटा खूब पैघ हॉल मे लs गेलिह । जहिना हॉल मे हम पैसलहुँ पूरा हॉल मे सब ठाम सब बिछावन पर लोक सुतल खून दैत छल । इ देखतहि हमर डर सs हालत ख़राब भs गेल । हमरा सूई सs बड डर होइत छलs आ सुनने रहियैक जेblood donation मे बहुत समय लागैत छैक।मोन मे एक सँग कैयैक टा प्रश्न उठैत छल जाहि मे पहिल ई: जँ हम बेहोश भs गेलहुँ तs की होयत ?हमरा सँग आओर कियो नहि छलs । बाबुजी के हम खून देबय लेल नहि कहितियैन्ह । सूई घुसाबय सs पहिने तक हम बहुत डरल छलहुँ मुदा एक बेर सुई घुसा देलक ताहि केर बाद साहस बढि गेल आ दर्द से नहि होइत छल। जखैन्ह हमरा बुझय मे आबि गेल, हम बेहोश नहि होयब तs हम नर्स सs पुछलियैक "इ खून हमर पति के देल जयतैन्ह नय" ? ओ कहलक " नहि अहाँक पति के दोसर खून हुनक ग्रुप के देल जायत जे bank सs उपलब्ध होयत "। हम सुनने छलियैक जे bank मे HIV केर जाँच नहि होइत छैक जाहि चलते मात्र सम्बन्धी व जे मरीजक संग आयल रहैत छथि हुनके खून लेल जाइत छलैक , इ सुनतहि हमरा और मोन बेचैन होमय लागल तथापि हम ओहि blood bank केर विभागाध्यक्ष छलैथ हुनका बजवोलियैन्ह आ कहलियैन्ह हमर आ हमर पति केर खुनक एकहि ग्रुप छैन्ह । ओहो हमरा कहलथि ई संभव नहि छलैक । हमरा किछु नय फ़ुराइत छल, तथापि हम हुनका आग्रह केलियैन्ह जे "हमर खून पर हमर नाम आ मरीजक नाम लिखि राखि दियोक आ किछु घंटा रुकि कsकोनो दोसर ठाम खून पठाबियौक , ताबैत हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट कयने आबैत छि "। डॉक्टर कुरियन केर नाम सुनतहि डॉक्टर हमरा कहलैथ "ओना तs हम सब,सब खून पर खून देबय वाला केर नाम,मरीजक नाम आ तारीख लिखि दैत छियैक । डॉक्टर कुरियन कहि देताह तs हम अहींक खून अहाँक पति लेल पठा देबैन्ह "। नर्स आबि हमर सुई निकालि देलैथ आ हमरा हिदायत देलैथ जे कम स कम १५ मिनट रुकय लेल मुदा हम सुई निकालैत के संग अपन चप्पल पहिरलहुं आ तुंरत ओहि ठाम सs बिदा भs गेलहुं । हम देखलियैक नर्स चाय लय आबि रहल छलैथ मुदा हमरा ओहि समय इहो होश नय छल जे हम खून देने छलियैक तुंरत नय जयबाक चाही । हम आठ नौ दिन सs वेल्लोर मे छलहुँ आ ओतबा दिन मे ततेक बेर डॉक्टर कुरियन सs काज पड़ल छलs जे कोन समय मे डॉक्टर कुरियन कतय रहैत छथि से हमरा बुझल भs गेल छल । हम जल्दी जल्दी ओहि वार्ड पहुँचलहुँ मुदा पता चलल डॉक्टर कुरियन ओहि ठाम नहि छलाह ओहि वार्ड केर डॉक्टर हमरा दोसर वार्ड केर नाम बता कहलथि अखैन्ह ओहि ठाम भेटताह , हम लगभग दौरति ओहि वार्ड तक पहुँचलहुँ । वार्ड मे पहुँचलहुँ ताबैत धरि पसीना सs लथपथ भs गेल छलहुँ हमरा देखि केयो कहि सकैत छलs जे हम थाकल आ परेशान छी । वार्ड मे पहुँचति देरी हम डॉक्टर कुरियन केर सहायक डॉक्टर सs हुनका विषय मे पुछलियैन्ह मुदा ओ हमारा जवाब देबय सsपहिने पुछलाह "आखिर की बात अछि अहाँ एतेक घबरायल कियैक छि? पहिने अहाँ बैसू आ हमरा कहू की बात छैक "? आ तुंरत एक ग्लास पानि मँगा कs पिबय लेल देलाह , मुदा हम पानि पिबय सs पहिनहि एक साँस मे हुनका सब बात बता देलियैन्ह आ कहलियैन्ह" हमारा डॉक्टर कुरियन केर मदद चाही" । ओ तुंरत कहलाह अहाँ के हम कतहु नय जाय देब हम तुंरत डॉक्टर कुरियन के एहि ठाम बजा दैत छियैन्ह । तुंरत अपन पेजर निकालि खबर पठा देलथि हुनक समाद अखैन्ह खतमो नहि भेल छलैन्ह कि हम डॉक्टर कुरियन के आबैत देखलियैन्ह । हम दौरि क डॉक्टर कुरियन लग पहुँचलहुँ आ सबटा बात बता देलियैन्ह । हमर गप्प सुनैत देरी डॉक्टर कुरियन हमरा कहलाह "अहाँ घबराऊ जुनि, अहीं केर खून अहाँक पति के देल जयतैन्ह" आ फ़ोन उठा ओहि ठाम सs blood bank केर विभागध्यक्ष के फ़ोन करि कहि देलथिन्ह जे "श्री ठाकुर जी केर केबिन मे हुनक पत्नी जे खून देने छथिन्ह सैह पठायल जाय "। एतवा वाक्य सुनि हमरा जे ख़ुशी भेटल ताहि केर हम वर्णन नहि कs सकैत छियैक । एहि देश मे एहेनो डॉक्टर छैथ ताहि केर हमरा अंदाज नहि छल । हम हुनका धन्यवाद कि देतियैन्ह हम एक टक हुनका देखैत रहि गेलियैन्ह। ओ हमरा दिस देखि कहलाह अहाँ केबिन मे जाऊ साँझ मे श्री ठाकुर जी केर अहीं वाला खून चढ़तैन्ह। हम डॉक्टर कुरियन सs भेंट करि केबिन दिस जाइत छलहुँ रास्ता मे हमरा चक्कर आबि गेल आ हम एक ठाम कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। पॉँच दस मिनट केर बाद हम केबिन पहुँचलहुँ, बाबुजी आ इ हमरा लेल चिंतित छलैथ जे हम कतs चलि गेल छलहुँ, देखैत देरी पुछलाह "कतs गेल छलहुँ "। हम कहलियैन्ह "खून देबय लेल, दsदेलियैक आ आब साँझ मे अहाँके खून चढत "। साँझ मे हिनका जल्दी भोजन करवा देलियैन्ह खून चढ़ेनाइ शुरू भेलैक ओकर किछु समय बाद बाबुजी के होटल पठा देलियैन्ह आ हम हिनका बगल मे बैसि गेलहुँ। कतबहु कहैथ सुति रहु हमरा कियैक नींद होयत एक तs चिंता दोसर हम जमशेदपुर मे देखने रहियैन्ह जहाँ हमर ध्यान दोसर दिस देखैथ तs झट द tube के पकरि ओकर speed बढ़ा दैत छलाह जे कहुना खून चढेनाइ जल्दी खतम भs जाय। राति मे इ सुति रहलाह आ हम हिनकर हाथ पकरने बैसल रहि गेलहुँ आ जखैन्ह पूरा खून चढि गेलैन्ह तs नर्स के बजा ओकर पाइप सब निकलवा ताहि केर बाद बगल वाला बिछावन पर परि रहलहुँ। दोसर दिन भोर मे डॉक्टर के आबय सs पहिने नर्स आबि जाँचक लेल हिनकर खून लs गेलैन्ह आ ओकर दोसर दिन भोर मे bone marrow होमय के छलैक । डॉक्टर कुरियन अपन पूरा डॉक्टरक दल सँग अयलाह हुनका देखैत नहि जानि कियैक हमरा आशंका आ डर दुनु होमय लागल। हमरा मात्र एतबा बुझल छल जे रीढ़ केर हड्डी सs खून लेल जयतैन्ह जे कष्टप्रद होइत छैक। डॉक्टर सब जहिना हिनकर केबिन मे घुसलथि हमरा आ बाबुजी के बाहर जेबाक लेल कहि देलैथ। हम तs एक सँग ओतेक डॉक्टर के देखि घबरायल छलहुँ। बाहर मे ठाढ़ पचास तरहक मोन मे आबैत छल। अचानक हिनकर कानय केर आवाज बुझायल, ओ सुनतहि हमरा कना गेल आ हमर आँखि के आगु जेना अन्हार भs गेल। हम बाबुजी के बिना किछु कहनहि जा एकटा कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । बाबुजी के कोना अपन स्थिति केर विषय मे बुझय देतियैन्ह । डॉक्टर जखैन्ह बाहर निकलाह तs हमरा कहलैथ अहाँ सब आब भीतर जाऊ । भीतर गेलहुँ तs इ कानैत छलाह आ हमरा देखैत देरी कहि उठलाह "मारि देलक "। हम वर्णन नहि करि सकैत छी जे हमरा ओहि समय मे असगर केहेन बुझायल, बाबुजी छलाह मुदा हुनका सोंझा हम अपन वेदना के कोना प्रकट होमय दितियैन्ह , ओ नहि रहितथि तs हम अवश्य कानय लगितौन्ह। दोसर दिन डॉक्टर कुरियन अपन डॉक्टरक दल सँग सबटा रिपोर्ट लs कs अयलाह ,आ आबि श्री ठाकुर जी केर बगल मे बैसि गेलाह। पहिने हुनक हाल चाल जे कि सब दिन पुछैत छलाह पुछलाह आ ताहि केर बाद अपन असली मुद्दा पर अयलाह। सब सsपहिल ओ हमरा सब केर कहलाह हम सबटा रिपोर्ट देखि लेने छी आ इ निष्कर्ष निकलल अछि जे अहाँक "cell malignant" अछि। ओहि समय मे हम इ तs नहि बुझैत छलहुँ जे "malignancy" की होइत छैक मुदा इ बुझा गेल जे किछु ख़राब बीमारी छैक, किछु गरबर छैक। डॉक्टर कुरियन सबटा बात बताबैत कहलाह आब चूँकि इ "oncology department" केर case छैक ताहि लेल हम अहाँ के "oncology department" पठा रहल छी। oncology शब्द सुनैत केर सँग हमरा जेना सब बुझय मे आबि गेल आ ओकर बाद हमरा मुँह स एक शब्द किछु नहि निकलल जे हम डॉक्टर सँ किछु पुछितियैन्ह । डॉक्टर कुरियन अपन सहायक डॉक्टर सब केर कहि कs चलि गेलाह जे अस्पताल सँ छुट्टी देबाक लेल आ "oncology" विभागक डॉक्टर सs देखबाक लेल सबटा कागज तैयार करि देबाक लेल। हम सब आपस होटल आबि गेलहुँ। दोसर दिन हम सब होटल सs सीधा oncology department डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचलहुँ । ओहि दिन हम आ श्री ठाकुर जी गेल छलहुँ। बाबुजी के आँखि देखेबाक छलैन्ह ओ आँखि वाला अस्पताल चलि गेल छलाह, जे एक तरह सँ नीके छलैक । डॉक्टर प्रसाद जे हमरा सोंझा मे कहलथि से भगवान कोनो पत्नी के ओ दिन नहि देखाबथि जे हुनका ओ सुनय परैन्ह । डॉक्टर प्रसाद विस्तार सs बिमारी के विषय मे बतेलाक बाद कहलथि जे इ बिमारी मे लोक बेसी सs बेसी पन्द्रह साल जीबैत छैक। किछु आओर जाँच से कराबय लेल कहलाह मुदा ओ बाहर रहि सेहो करायल जा सकैत छलैक । हम सब आपस होटल अयलहुँ, इ त बहुत राति तक जागल रहलाह आ ओकर बाद सुति गेलाह मुदा हम तs भरि राति जागले रहि गेलहुँ। दुनु गोटे एक दोसरक स्थिति बुझैत छलियैक मुदा कथि लेल राति भरि मे एको शब्द बाजि होयत । भोर मे तैयार भs समय पर डॉक्टर प्रसाद लग पहुँचि गेलहुँ । डॉक्टर प्रसाद किछु जाँच केलाक बाद कहलैथ जरूरत परतैक तS "WBC" बदलय परतैक आ ओहि लेल एक गोट अपन आदमी के तैयार रहय पड़त जिनकर " WBC "लेल जा सकैत अछि । ओ "WBC" बदलय केर सबटा प्रक्रिया बता देलाह । हमरा एकटा फॉर्म द ब्लड बैंक जेबाक लेल कहलाह आ हिनका फेर सs भरती हेबाक लेल । हम हिनका केबिन मे पहुँचा ओहि ठाम सs फेर ब्लड बैंक पहुँचि गेलहुँ । ब्लड बैंक केर डॉक्टर हमरा हाथ सँ फॉर्म लs एकटा कुर्सी पर बैसय कहलाह। किछु समय बाद आबि खून निकालि लेलैथ। हम जहिना कुर्सी पर सs उठय चाहलहुँ हमर माथ घुमि गेल आ हम धम्म सs फेर कुर्सी पर बैसि गेलहुँ । इ देखि हमर बगल मे नर्स छलैथ से पकरि हमरा तुंरत बेड पर सुता देलिह । हम उठलहुँ तs डॉक्टर हमरा कहय लगलाह, "हम अहाँक खून नहि लs सकैत छी कियैक तs अहाँ जाँच समय मे बेहोश भs गेलहुँ अछि। इ सुनतहि हमरा कनाइ छुटि गेल मुदा हम अपना आप के रोकि लेलहुँ आ ओहि ठाम सँ निकलि चलि देलहुं। हमरा किछु नहि फ़ुराइत छल हम की करी हमरा संग आओर कियो नहि छलाह । हम मोन दुखी कयने चलल जाइत छलहुँ आ सोचैत छलहुँ आब की होयत। अचानक सामने मे डॉक्टर कुरियन पर नजरि गेल ओ हमरा देखि हमरे तरफ आबैत छलाह। ओ हमरा पुछलाह " डॉक्टर प्रसाद की कहलाह", हम हुनका सबटा परिस्थिति बता देलियैन्ह आ इहो जे हमरा लग दोसर कियो नहि छैथ हम आब की करी। ओ तुरन्त कहलाह अहाँ घबराऊ जुनि जरूरत परतैक तs हम अपन WBC अहाँक पति के देबैन्ह । इ सुनैत देरी हम अपना आप के नहि रोकि पयलहुँ आ कानय लगलहुँ । मोन मे भेल कि एहनो डॉक्टर होइत छैक? ओ वाक्य आय धरि डॉक्टर कुरियन केर क़र्ज़ हमरा लग अछि। आय धरि हम डॉक्टर कुरियन के कहल वाक्य नहि बिसरि सकलहुँ। मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा मिथिलाक लोक एतेक सरस, मैथिली भाषा एते मृदुल, एहि ठामक भूमि एते उर्वर, उपवन एते सघन आ हरियर कंचन अछि- तकर कारण की? की ई नहि जे एतऽ जलाशयक आगार अछि, नदी पोखरि डबरा अपार अछि? मिथिलामे समुद्र नहि छै, तेँ एहि भूमिक वासीक स्वभाव नोनछराइन नहि लागत, लोक “अथाह” नहि भेटत। मिथिलामे गंगा बहै छथि,तेँ समाज पवित्र अछि; मधुर जलक प्रवाह चलै छै, तेँ लोकोमे मधुरताक तरंग उछलैत देखब। पानिक एतऽ कमी नहि, लोकक आँखियोमे “पानि” भेटि जायत। कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाकेँ नदी-मातृक देश ओहिना नहि कहने छथि- नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौं सम्पन्न समय सिर पर होय वर्षा बहुत संचित अन्न दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार सकल विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार नदिए नहि, पोखरियोक प्रधानता अछि एतऽ। एहन कोनो गाम नहि, जतऽ दू-चारि दस-बीस छोट-पैघ पोखरि नहि हो। सैकड़ो वर्ष पुरान एहन-एहन सयक धक पोखरि एखनो एतऽ अछि जकरा “दैता पोखरि” कहल जाइछ, माने कोनो दैत्य आबिकऽ ओकरा खुनने छल! मनुक्ख बुते कतहु ओते टा पोखरि खूनल होइ! तहिना, बड़का पोखरिमे “महराजी पोखरि” सभ अछि। छोट-मोट तँ कैयन हजार होयत। तेँ, मिथिलामे जलकरक चलनि बेसी। जलक सर्वप्रधान फसिल थिक- मखान। मखान- ई शब्द ध्यानमे अबितहिँ मिथिलाक अनुपम व्यक्तित्व साकार भऽ उठैछ। एहन व्यक्तित्व जकर जोड़ नहि- अद्वितीय। मखान, कहल जाइछ, स्वर्गोमे नहि भेटैछ। देवतासभकेँ मखानक तस्मै लेऽ, पाग कयल मखानक फोँका लेऽ मन जखन ललचाय लगै छनि तँ मिथिलामे जन्म लै छथि आ जीहकेँ जुड़बै छथि। मिथिलाक एक खास पाबनि थिक कोजगरा- उल्लासक पाबनि, उमंगक पाबनि, लक्ष्मीक आराधनाक पाबनि। ओहि दिन मखान परसबाक प्रथा अछि। से मिथिलेमे अछि। मखान मिथिलाक खास वैशिष्ट्य बनि गेल अछि। तेँ, एहि ठामक साहित्योमे मखान प्रवेश कऽ गेल अछि। अनेक साहित्यकार कोनो-ने-कोनो प्रसंगमे एकर नाम लेने छथि। जाहि रचनामे मखान शब्द आबि गेल अछि, ओ रचना ओहने ललितगर-देखनगर, ओहने कोमल-निर्मल, ओहने हुलसगर-सुअदगर भऽ गेल अछि। कविवर सीतारामझाकेँ भगवानस रामक सुयशक निर्मलता आ महिमाक व्यापकता देखयबाक भेलनि तँ कहि उठला- आश्विनीक चान जकाँ दही ओ मखान जकाँ राम-यश प्रान जकाँ विश्वमे पसरि गेल। कविवर सीतारामझा एक आनो प्रसंगमे, लक्ष्मी-पूजाक नैवेद्यक अंग-रूपमे, मखानक नाम लेने छथि- पूजथि लक्ष्मी-पद नबेद दय मधुर मखानक। अपनहुँ खाथि प्रसाद भाग धनि ताहि किसानक॥ मखानक उल्लेख कयनिहार मैथिली साहित्यकारक कमी नहि अछि, किन्तु एतऽ तीन कविक मात्र चर्चा करऽ चाहब। पहिल छथि कविचूड़ामणि मधुप, जनिक अविस्मरणीय कविता “कोजगराक मखान” अछि। दोसर छथि मंत्रेश्वर झा, जनिक गीतपोथीक नाम थिकनि- “पान एतैए मखान एलैए”। तेसर थिका गोपालजी झा “गोपेश” जे अपन पोथी “मखानक पात” सँ कतेको गोटेक मुहँ पोछऽ चाहलनि। मधुपक “कोजगराक मखान”क विषयवस्तु उच्च वर्ग द्वारा दलितपर कयल गेल अत्याचारपर आधृत अछि। ई कविता वर्ग-वैषम्यकेँ उघारिकऽ राखि देने अछि। मधुप करुणरसक महान कवि थिका। एतऽ एक फोँका मखानसँ कवि करुणाक निर्झरिणी बहा देने छथि। किन्तु, ताहिसँ पहिने उत्सवक जीवन्तता देखल जाय- आबालवृद्ध जुटि रहल- आसमर्दे विदीर्ण जनु युग्म कान मिलि हमहुँ ताहि मानव-निधिमे बहि गेलहुँ न गुनि अपमान-मान, कहुँ दू फोँका, कहुँ एक कतहु नहि सेहो तेहन महगिक विधान, किछु हो, आजुक निशिमे कहुना निश्चय थिक खाइ मखान पान। ता कि ओही भीड़मे एक अवांछित छौँड़ा सन्हिया गेलै। चीन्हि गेलापर छ्रपिटा देल गेलै। कविक नजरि पड़लनि- जाकऽ समीप देखल निगाहि, देखितहिँ हिय कहलक आहि! आहि! गोविन्द त्राहि! ई आबि मखानक हेतु, गेल, नहि पाबि सकल एको फोँका, सौँसे शरीरमे छैक किन्तु ककरो कुकृत्य-निर्मित फोँका! एहि करुण प्रसंगक बाद उल्लासक चर्चा उचित थिक। सर्वाधिक मखानक बखान गीतकाव्यमे भेल अछि। मंत्रेश्वरझाक मखान-प्रेम तँ हुनक गीतपोथीक नामेसँ झलकैत अछि- “पान एलैए मखान एलैए”। कोनो करतेबताक अवसरपर ग्रामवासिनी मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारमे रहरहाँ देखब ई हूलिमालि- बड़की पिसिया कुम्हरौड़ी अँचार बनाबथि बैसल बुढ़बा काका दरबज्जापर पान चिबाबथि ओङठल लछमन एलैए कि राम एलैए टोल-पड़ोसक घर-घर के समाङ एलैए पान एलैए मखान एलैए धीया के बियाहके सामान एलैए। मखान जहिना स्वच्छ कोमल चिक्कन होइछ, मखानक पात तहिना कँटाह खड़खड़ आ मैलमुँह। एहिपर कहबियो प्रसिद्ध भऽ गेल- मखानक पातसँ मुँह पोछब। एकक आकांक्षा जखन दोसराकेँ सोहाइ नहि छै तँ अपन खौँझ एहू तरहेँ व्यक्त करैछ। अर्थात, बड़ नीक-निकुत चाहै छथि तँ बुझथु, तेहन उपाय करबनि जे नोचैत रहिहथि अपन मुँह! एहि कहबीक प्रयोग व्यंग्योमे होइ अछि। शीर्षक- कवितामे कवि तिलक-दहेज लेनिहार बाप, समाजक चरित्रहीन मुँहपुरुष, स्वार्थी नेता, छद्मवेशी भद्रजन एवं समाजकेँ गर्तमे ठेलनिहार जते तत्व अछि, सभकेँ मखानक पातसँ मुँह पोछि देबऽ चाहै छथि। आइ प्रयोजन अछि- जे ओहन-ओहन शिखण्डीक मुँह मखानक पातसँ पोछि दी जे बेटाकेँ विक्रीक वस्तु बूझि कए तिलक-दहेजकेँ बढ़बइत अछि कन्यागत करेज खखोरि कए अपन इष्टदेवताक अर्घ्य चढ़बइत अछि। ................... बन्धु! तेँ आइ प्रयोजन अछि जे समग्र परिवर्तन आनब सर्जन लेल कोनो अवरोधक तत्त्वक मुख मखानक पातसँ पोछि दी जे कार्यपालिका, न्यायपालिका आ विधायिकाक गरिमाकेँ भंग करैछ आ विधि-व्यवस्थामे आस्था रखनिहार शान्तिप्रिय लोककेँ अकारणहुँ तंग करैछ। मखान जे जलतलमे, पंकक परिसरमे जन्म लै अछि, से अपन गुणसँ भगवानपर माला बनि चढ़ै अछि, भोग बनि अर्पित होइ अछि, श्रेष्ठ पदार्थक मापदण्ड बूझल जाइ अछि, ततबे नहि, मुहाबिरा बनिकऽ दुर्जनकेँ चेतौनियो दै अछि, अपन “पात”सँ कुत्सित तत्त्वक मुहोँ पोछै अछि। संसारक एहन दुर्लभ पदार्थ, जे मिथिलामे सुलभ अछि, तकर “मान” कतौ मैथिल साहित्यकार लोकनि नहि देथि! डॉ. बी.झाक धुनपर गुनगुनयबाक हेतु ककर मन नहि मचलि उठैत होयत?— चन्द्रमा उतरल गगनसँ चांदनीसँ नहाउ औ! धान-पान-मखान-पूजित मैथिलीकेँ जगाउ औ! कुमार मनोज कश्यप जन्म  मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। चौबटिया पर ' भैया ! हम कहैत छी आब अवस्था भेल, आबो तऽ चैनक साँस लिय । कहिया धरि कोंढ़ तोरैत रहब? आब तऽ बौआ वयस्क भऽ गेल छथि ; आबो तऽ किछु करथु  कि सभ दिन पढ़ाई के नाम पर बापे के कमाई पर पुᆬटानी करैत रहताह । सभ के कोनो सरकारीये नोकरी भेटैत छैक? अपने गाम  कि टोले मे देखियौ ने जे हुनका सँ कतेक छोट सभ जकरा नाक पोछबाक लुरि नहिं छलैक सेहो सभ दिल्ली-बम्बई जा कऽ हजारक-हजार  रूपैया घर पठबैत आछ । साँच पुछि तऽ मैथिलक पछुएबाक कारण सरकारी नोकरी के पाछु भागब आछ । से जँ नहिं भेटल तऽ कतहु के नहिं रहि गेलहुँधोबिक गदहा बला परि़। हम तऽ कहैत छी कलियुग मे तपस्या केला सँ भगवान भने भेट जाथि ; मुदा सरकारी किन्नहुँ नहिं एकरा तऽ मरीचिका बुझु़ एतेक भाई-भतीजावाद आ घुसखोरीक जुग मे ओना कतऽ नोकरी राखल छै़ ओ तऽ जमाना रहई जे आहाँ सभ के सरकारी नोकरी भेट गेल़़आब ककरो नाम गनाउ गाम मे ?।' कक्का आरो बहुत किछु बजैत चलि गेलाह। मुदा दलानक कोनटा मे ठ़ाढ हमरा मे आर बेसी  सुनबाक सामर्थ्य नहि रहि गेल छल हम झमा कऽ खसल छलहुँ  मोश्किल सँ सम्हारि पओलहुँ अपना कें । बाबूक प्रतिव्रिᆬया हम बुझि नहि पओने छलहुँ ओ मुँह सँ साईत किछु बाजल नहि छलाह  बाजलो हेताह तऽ सम्भव जे मनोद्वेगक कारणे हमहीं सुनि नहि पओने होईयैक। कक्काक शब्द हमरा जमीन पर पटकि देने छल़़हमर सिविल सेवाक बुनल सभ टा सपना जेना एके चोट मे टुटि कऽ हमरे सोझँा मे खंड-खंड पसरि गेल आ हम ओहि पर ओंघरा कऽ अपन सर्वांग शरीर शोणिते-शोणित कऽ लेने छी । हमर बाबू परम शुद्ध़़बेसी बाजऽ वला नहिं । ओहि दिन कक्का के स्पष्ट जवाब नहि देबाक पाछु हुनका मोनक कोनो कोन मे नुकायल कोनो अनजान भय छलनि से हमरा ओहि दिन मायक बात सँ बुझायल - 'सरकारी नोकरी नहि भेल तऽ कतहु प्राईवेटो मे तऽ देखतियैक । बाबूये पर कतेक भार देबैऩ़पँाच-छौ महिना मे ओहो तऽ रिटायरे कऽ रहल छथि। वेतनक समुचा पाई मे तऽ घर चलिये नहि रहल छैक़़पेंसनक अधोर पाई मे कोना पार लगतैक ? मुनमुन तऽ अखन बी०ए० मे गेबे केलैयै, ओकर पढ़ाई तऽ कहुना पूरा करबैये पड़तैक़़। ' मायक स्वर मे जे एकटा चेतावनी छलैक से हम नहि बुझितियैक, एतबो अबोध हम नहि। हम ओहि राति कतेक कानल रहि से हमहीं जनैत छियैक। जाहि सपना के हम एक-एक विंदु सँ उकेरने रहि, जकर पँाखि पर बैसि कऽ हम कल्पना लोक मे निच्छंद विचरण करैत रहि, तकर जेना पँाखि कतरि कऽ भू-लुंठित कऽ देल गेल छलैक । हमरा अपन भविष्यक चिंता सँ बेसी दुख एहि बातक आछ जे कक्का अपन वुᆬटिल सिद्धांत - 'दुभि, दालि आ देयाद जतेक गलय ततेक नीक ' - हमरो परिवार पर अजमेबा मे सफल भऽ गेल छलाह। नहि तऽ जे बाबू एकटा सपना देखने रहथि अपन संतान के प्रशासनिक सेवा के उच्चत्तर स्तर पर पहुँचेबाक  सदा प्रोत्साहित कयने रहथि एहि लेल, जे गर्व सँ कहथि जे साधनक अभाव मे हम स्वयं नहिं बनि सकलहुँ तऽ की ; अपन बेटा के  आई०ए०एस० बना कऽ देखायब से एकाएक यू-टर्न लऽ लेताह से हम सपनो मे नहि सोचने रही । पहिल चाँस मे हम पी०टी० तऽ निकालिये लेने रही़एहि बेर दोसर चाँस एपियर होयब़़एतबे मे बाबू अगुता जेताह; ई हुनकर स्वभाव तऽ किन्नहुँ नहिं! हम अपन पित्त के पीबि गेलहुँ। अपन सफाई मे किछु बाजब उचित नहिं बुझना गेल । सुतली राति मे अपन दु-चारि टा कपड़ा बैग मे राखि घर सँ चुपचाप निकसि गेलहुँ बिना ककरो जनेने । मोन मे रंग-विरंगक भवना आयल़़आत्म-हत्या तक के । अंत मे मोन स्वीकारलक़़चंडीगढ़ चल जाई दिनेश लग़़क़तेक जीद्द करैत छल ओ चंडीगढ़ एबाक लेल़़क़हैत छल बड नीक शहर छै । ट्रेन एबा मे एखन देरी छैक़़ फरीछ सेहो भऽ रहल छैक़़ हम दिनेश के फोन करैत छी - 'परसू हम चण्डीगढ़ पहुँच रहल छियौ भोर मे़ स्टेशन पर आबि कऽ अपना ओतऽ लऽ जैहैं । ' आर किछु हम नहि कहि सकलियै़ओ पुछिते रहि गेल़़ फोन काटि देलियै । स्टेशन पर ओ आयल छल हमरा आरयाति कऽ अपन घर लऽ जेबाक हेतु। दिनेश हमर लंगोटिया याऱ़पढ़लक-लिखलक कम्मे़ज़ल्दिये कोनो प्राईवेट मे नोकरी पकड़ि लेलक । सुनैत छियैक नीक कमाईत आछ । भरि रस्ता ओ हमर अकस्मात एबाक प्रयोजन पुछैत रहल  हम बात के घुमबैत रहलियै । बस एतबे कहलियै जे हमरा कोनो नोकरी धरा दे़ज़े होई हम करै लेल तैयार छी। ओ हमरा अपना भरि बुझेबाक प्रयास करैत रहल य़ार ! तोरा मे प्रतिभा छौ़तों आई०ए०एस कऽ सकैत छैंतोरा पर गाम समाज के आँखि लागल छैक़़तों प्राईवेट नोकरी-चाकरी के झंझट छोड़़़तैयारी करैत रह़़ माँ भगवती के कृपा सँ सफलता अवस्से भेटतौ़। मुदा हमहुँ जिदियायल रही। ओ हारि मानि लेलक  हमरा एकटा केबल-ऑपरेटर ओहिठाम नोकरी रखा देलक तीन हजार रूपैया महिना पर । गाम-घर, माय-बाप, भाय-बहिन सभ कें बिसरि जेबाक प्रयास कऽ रहल छी हम । कतऽ कहाँ सँ पता करैत-करैत एक दिन मायक फोन आयल़़बड़ कनैत छल़़हमरो बकोर लागि गेल़़ हम किछु बाजि नहिं सकल रहि फ़ोन काटि देलियै । बितैत समयक संगे एक दिन नरेंद्रजी सँ भेंट भेल़़ नरेंद्रजी अपने ओम्हर के समवयस्के जकाँ । दोस्ती बढ़ल़़पता चलल हुनकर पिता बैंक-मैनेजर छथिन समस्तीपुर मे । बैंक सँ लोन लऽ कऽ स्वयं के केबल शुरू करबाक विचार जागल । बात आगू बढ़ल़़क़ाज करबाक अनुभव आई दू साल मे भैये गेल । योजना पर काज करय लगलहुँएक-एक मुद्दा पर गहन सोच-विचार   प्रोजेक्ट-रिपोर्ट तैयार भेल  कतऽ सँ मशीन सभ कीनब क़ेहन आदमी सभ के काज पर राखब़़क़ोना प्रचार -प्रसार करब सभ किछुक योजना राति भरि जागि कऽ बना लेलहुँ । लोन  भेटि गेल़़मशीन,आवश्यक वस्तु-जात सभ खरीद भऽ गेल। काल्हि धूम-धाम सँ उद्घाटन करबाक दिन छल । सोचलहुँ बाबू-कक्का सहित गामक सभ लोक के बजायब उद्घाटन-समारोह मे । अचानक सँ एहन पैघ योजना देखि कऽ घरक लोक गर्व सँ गद्-गद भऽ उठत़़क़क्का के जलन तऽ हेबे करतैन जे देयाद गलि नहिं, उठि रहल आछ  मुदा ताहि सँ हमरा कि ? हुनकर मोने एहने छनि तऽ दोसर की करतैन ?। बुधना आबि कऽ समाद देलक - 'आहँ करैत रहू उद्घाटन, ओम्हर पायल-केबल सभ कें मुपत्त मे केबल देखेबाक घोषणा कऽ देलकैयै । जेहो एक-दू गोटे तैयार छल अपन केबल लेबाक लेल, सेहो पायले दिस चलि गेल । फ्री ककरा नहिं रूचतै ?' पायल केबल के मालिक भवेश तऽ हमरा संगे गामक स्वूᆬल मे पढ़ने आछ , ओकरा एना नहि करक चाहियैक । हम दौड़लहुँ भवेशक घर दिस। रस्ते मे भेटा गेल ओ। हम कहलियै - ' यार ! तोरा एना नहि करक चाहियौ । तों तऽ पुरान छैं ; कमा चुकल छैं, कनेक दिन फ्रीयो मे केबल देखा सकैत छैं । मुदा हम बैंक सँ लोन लऽ कऽ शुरूये करऽ जा  रहल छी । हमरा पेट पर तऽ लात नहि मार । ' भवेश चौआनयँ मुस्कियायल छल। ओकर एहि मुस्की मे वुᆬटिलता हमरा साफ बुझा रहल छल।  'देखही दोस ! दोस्ती अपना जगह पर छैक आ बिजनेस अपना जगह पर । ने दोस्ती मे बिजनेस एबाक चाही ; ने बिजनेस मे दोस्ती । ' से बिजनेस मे दोस्ती नहिये एलै । हमर सभ मशीन, सामान ओ आधया दाम में खरीद लेलक । हमर सपना एक बेर पेᆬर सँ चकनाचूर भऽ कऽ हमरा आगँ छिड़िया गेल आछ । हम अपन मोन के बुझबैत छी---सपना टुटबे खातिर बुनल जाईत छैक़़आर कोनो बात नहिं। मनोज झा मुक्ति देशक अवस्‍था आ जनताक प्रवृति                     — मनोज झा मुक्‍ति    अखुनक परिवेशमे ककरोसँ पुछियौक देशक अवस्‍था केहन अछि ? त, कहता कि कहू सभ ठाम भ्रष्‍टाचारे भ्रष्‍टाचार व्‍याप्‍त अछि । देशक नेता भ्रष्‍ट, कर्मचारी तन्‍त्र भ्रष्‍ट, पत्रकारिता जगत भ्रष्‍ट, व्‍यापारी भ्रष्‍ट...आर किदन किदन...सभचीज भ्रष्‍टे भ्रष्‍ट, तहन देशक स्‍थितिके कि कहबैक...।    देशक स्‍थिति निश्‍चितरुपेण नीक त नहिंए अछि, मुदा एकर दोषी के ? सभ जौं भ्रष्‍टाचारिए अछि त नीक व्‍यक्‍ति केओ नहिं ? आ देशक जनता कि दूधक धोएल अछि ? सबकेँ एकवेर अपना छातीपर हाथ राखिकऽ सोंचहिटा पड़त । आखिर किया देशक हालति एहि तरहें दिनानुदिन खसकैत जाऽरहल अछि ?     देशमें सब तरहक लोक हाएव कोनो आश्‍चर्यक गप्‍प नहिं । सबहक कहब ई छन्‍हि जे सभक्षेत्रमे भ्रष्‍टाचारीए लोकक चलाचल्‍ती छैक । अईसँ असहमत बहुत कम्‍मेगोटे हएता । मुदा यहो सत्‍ये छैक जे सत्‍यक बाटपर धिरे—धिरे आगा ससरैत लोक सेहो अई देशमे अछि । हँ, सत्‍यवादी धारमे लागल खाँटी राष्‍ट्रवादी सभक सँख्‍या बहुत कम अछि आ दिनानुदिन ओहि सँख्‍यामे ह्रास होइत जाऽरहल अछि । तकर कारण कि ?     जौं स्‍पष्‍टरुपसँ कहल जाए त दशक एहि परिस्‍थितिक जिम्‍मेवार आन केओ नहिं, हमहि आँहाँ छी । हमही आँहाँ देशक नेताके, व्‍यापारी आ कर्मचारीकेँ भ्रष्‍टाचारी बनावि रहल छियैक ।      हम आँहाँ एकटा नेताके भ्रष्‍टाचार करबालेल विवश कऽ दैत छियैक । जौं गाममे एकटा कोनो नेता साइकलपर चढिकऽ अवैत अछि या पैदल अवैत अछि त ओकरा देखबाकले कोना जनता नहिं जाइत छियैक । एतवे नहिं ओई नेताके अपना दरबज्‍जापर बैसऽदेवमें सेहो हमसब अपनाआपके हीन महशुस करैत छी । आ हमरे आँहाँक गाममे जौं एकटा नेता महँग गाड़ीमे चढिकऽ अवैत अछि त ओकरा पाछा या कहु स्‍वागत करबाकलेल माइए पुते दौड़ैत छियैक, ओकरा अपना दरबज्‍जापर बैसबऽमे हमसब अपनाके गर्वान्‍वित भेल अनुभूति करैत छी । चुनावक समयमे कतबो सकारात्‍मक सोंंचवला नेता किएक नहिं हुअए ओकरा भोंट देवाक बदलामें हमसब मतपत्रमे अपन जातिक उम्‍मेदवारके चिन्‍हमे मोहर लगवैत छी । ओतवे नहिं अपन मतक महत्‍वके बुझितो हमसब अपना मतके पाई लऽ कऽ बेचि दैत छियैक जकर कारणसँ जकरालग अपन जातिक जनसँख्‍या वेसी अछि आ वेसी पाई अछि वएह नेता चुनाव जितैत छथि । कि हमर आँहाँक एहि तरहक व्‍यवहार एकटा नेताकेँ भ्रष्‍ट बनवाकलेल विवश नहिं करैत छैक । जौं जातिक नामपर केओ जितैत अछि त ओ अपना जातिक वाहेक आन जनताके वारेमे किया सोंचत ? आ अपना जातिकलेल सेहो किछु नहिं कऽसकैया, कियाक त ओ ई नीक जकाँ बुझने रर्हैत अछि जे अपना जातिकलेल हम काज नहिंयो करब तखनो हमर जाति हमरा भोंट देबेटा करत । आ ओ जे पजेरोबला नेता आ पाईबला नेताक तुलनामें अपनाके निरीह बुझैत अछि, ओहो हमरा आँहाँक सामिप्‍यता पएवाकलेल आ चुनाव जीतवाकलेल पाईएके अपना जीवनक सभसँ पैघ लक्ष्‍य बुझि ‘एनि हाउ, पाई कमाऊ’ के नीति अवलम्‍वन कऽलैत अछि । आ जखन ओ पाइएक बलपर हमरआँहाँक भोट लेत त किया हमरा आँहाँक विकासकलेल ओ सोंचताह ?      तहिना देशक कर्मचारिके हमही आँहाँसब अपन काज जल्‍दीसँ जल्‍दी करेबाकलेल या कानूनन नहिंयो होबऽवला काज गैरकानूनन रुपसँ करेबाकलेल घुस देल करैत छियैक आ एहिं तरहें एकटा कर्मचारीकेँ जवरदस्‍ती हमसब भ्रष्‍टारी बना दैत छियैक । ओनो कर्मचारीयो खासकऽ एकटा पुलिसमे जेबाकलेल हाकिम एकलाख टका लेल करैत छैक, हाकिमके डाइरेक्‍टर बनेवाकलेल मन्‍त्रीद्वारा लाखो रुपैया घूस लेल जाइत छैक । जहन ओ कर्ज पैंच  लऽ कऽ बहाल भेल रहैत छैक त कोनो बहन्‍ने कमेबेटा करतैक ।     एकटा व्‍यापारीकेँ काला बाज़ारी करबामे सेहो हमसब अपने बहुत बेसी दोषी छी । हमसब बुझितो रहैत छि तइयो ओकर विरोधमे बजबाक हिम्‍मत नई करैत छियैक ? हमरा आँहाँलेल के बाजि देत ? ककरो लग ओतेक फुरसति नहिं छैक ।     हमसब सबके भ्रष्‍टाचारी त कहैत छियैक, मुदा अपन टेटर नहिं देखैत छी । सरकार अपन गाम अपने बनाबु कहिकऽ प्रत्‍येक गाममे १५ सँ ३० लाखधरि रुपैया प्रतिवर्ष देल करैत अछि । गामक विकास कतेक भेल छैक, विशेषकऽ मधेशमे से ककरोसँ छुपल नहिं अछि । सभ पार्टीक प्रतिनिधिसब अपन बपौटी(पैत्रृक) सम्‍पति बुझि खुलेआम लुटैत अछि आ हम आँहाँ मौन भऽ सबकिछु देखैत रहैछी । जौं कियो व्‍यक्‍ति ओइ काजक विरोध करैत छैक त हमहि आँहा केओ पार्टीक नामपर, केओ जातिक नामपर ओहन भ्रष्‍टाचारीकेा दूधक धोएल बनाऽदैत छियैक । ओहन भ्रष्‍टाचारीकलेल पार्टीयोसब अपन प्रतिष्‍ठाधरि दाओपर लगा दैत अछि ओकरा बँचवऽमें । एकरा अरिक्‍त जे किछु कोनो गामठाममे जौं छोटछीन विकासक काज होइत अछि त ओकरा विनाश करबामें हमसब बहादुरी बुझैत छी । अपना घरक अगााक सडकपर राखलगेल ग्राभेलक पाथर अपना घरमे घुसियाबऽमे त हमरा सबके जोरा सम्‍भवतः कतौ नहिं भेटत ।     एतेक धरि कि सरकार विद्यालयसबके व्‍यवस्‍थित करबाकलेल अपनेगामक स्‍थानिय व्‍यक्‍तिक अनुसारे चलेवाकलेल विद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीतिके निर्माण योजना लाबि प्रायः सभ विद्यालयके समुदायमे हस्‍तान्‍तरण केलक, मुदा विद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीति अखन मात्र   पाई कमेबाक एकटा स्‍थलक रुपमें परिणत भऽगेल अछि । चाहे विद्यालयमे शिक्षकक रखबामे होय या शिक्षककेँ सरुवामें हुए, विशेष कऽ मधेशक प्रत्‍येक विद्यालय व्‍यवस्‍थापन समीतिसभ एहि तरहक व्‍यापारमें लागिगेल अछि । विद्यालयक पढाई केहन छैक, शिक्षक विद्यालयमें अवैत अछि कि नहिं, विधार्थी अवैत अछि कि नहिं ताहिसँ व्‍यवस्‍थापन समीतिके कोनो मतलव नई रहल देखल जाऽरहल अछि ।     एहि तरहें देशक विकास कोना हायत ? जाधरि हमसब अपने नहिं सुधरब त आन के सुधारत ? जौं हमसभ एकटा सत्‍य बाटपर चलनिहार, देशभकत आ जनताक समस्‍याके अपन बुझऽबला नेताक बदलामे तामझामबला पँजेरो एनिहार नेताके निरुत्‍साही नहिं करब त दिनानुदिन भ्रष्‍टाचारक दलदलमें हमसब धँसैत जाएब । सत्‍यक पक्षधरके मनोबल बढेनाई जरुरी आ सभक कर्तव्‍य भऽगेल अछि । आन कियो किया हमरा आँहाँक सम्‍बन्‍धमे सोंचि देत ? ताएँ आनके दोष देबासँ पहिने एकवेर हमसभ अपने टेटर देखब कि ? टेष्‍ट परीक्षा आबऽलागल, मैथिलीक विद्यार्थी पुस्‍तक बिहीन शैक्षिक वर्षक अन्‍त होमऽ लागल अछि, किछु दिनकवाद दशम कक्षाक टेष्‍ट परीक्षा सेहो हएत । आन आन विषयक विद्यार्थीक कोर्स अन्‍तो होमऽलागल अछि, मुदा हिलसि कऽ अथवा ककरो दबावसँ मैथिली विषय लेनिहार विद्यार्थी अखनो धरि पुस्‍तक केन्‍द्रक दुवारिपर हाजरी दैत बरोबरि भेटत । कारण जे दशम कक्षाक विधार्थी अखनो धरि नहि देखने अछि— दश किलासक मैथिली पोथी । धनुषा जिल्‍लाक लगभग एक दर्जन आ महोत्तरी जिल्‍लाक पर्सा पतैली लगायतक स्‍कूलमे मैथिली विषयक पढाई होइत अछि, मुदा विधार्थी आ शिक्षक दुनुगोटे मैथिलीक पुस्‍तक अखनधरि नई भेटलाकवाद फिरसान अछि । साझा प्रकाशनद्वारा प्रकाशित पुस्‍तक, जनक शिक्षा सामग्री केन्‍द्रद्वारा विधार्थीकलेल उपलब्‍ध कराओल जाइत  अछि । जनकपुरधाम स्‍थित विद्यापति चौकपर रहल ‘विद्या पुस्‍तक केन्‍द्र’क विक्रेता कलानन्‍द झा कहलनि, ‘साझा प्रकाशनकेँ वेरवेर तगेदा कएलाकवादो मैथिलीक पुस्‍तक उपलब्‍ध नहि कराओल गेल’ । दुखक गप्‍प त ई अछि जे ताहिकालमे मैथिली विषयक पाठ्य पुस्‍तकक आभाव देखल गेल अछि, जाहिकालमे साझा प्रकाशनक अध्‍यक्ष छथि— मैथिलीक पैघ साहित्‍यकार/पत्रकार/कवि/फोरमक नेता/बहुतरास मैथिली संघ—संस्‍थाक अगुवा व्‍यक्‍तित्‍व श्री राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ । अपनाके मैथिलीक योद्धा आ साझा प्रकाशनक पहिल मैथिल/मधेशी चेयरमैन कहबामे गर्व कएनिहार कापड़िके पदपर पहुँचलाक वादो मैथिली पोथी नहि भेटव सर्वत्र आलोचनाक विषय बनल अछि । मैथिली विषयक पुस्‍तकक अभाव हएव, मैथिली भाषा आन्‍दोलनक व्‍यापकतामें सऽभसँ पैघ रोकावटकरुपमें देखाऽरहल अछि । मैथिलीक पाठ्य पुस्‍तकक सहज उपलब्‍धता जाधरि नई हएत ताधरि विद्यालयक शिक्षामें मैथिलीक पढाई मात्र भाषण धरि सीमित रहत । गणतन्‍त्र प्राप्‍तिकबाद मैथिलीकेा भजा कऽ भलेहिं कतेको मैथिल वरिष्‍ठ पदपर चलिगेल होथि, मुदा धरातलिय यथार्थ इएह अछि जे मैथिली काल्‍हियो पाछा छल आ एखनो सिसैकते अछि । -प्रकाश रंगदृष्टि; दिल्ली बांग्ला नाटक लेल कोलकाता आ मराठीक लेल मुम्बई, तहिना पहिने मात्र हिन्दीक लेल दिल्ली जानल जाइत छल । मुदा आब सम्पूर्ण भारतवर्षमे विविधतापूर्ण नाटक मंचनक लेल दिल्ली केन्द्रमे आबि चुकल अछि, ताहिमे कोनो शंखा नहि । दिल्लीक मंडी हाउस स्थित विभिन्न प्रेक्षागृहमे नित्य कोनो-ने-कोनो भाषाक नाटक मंचित होइते रहैत अछि । एहि ठाम हिन्दी, मराठी, बंगाली मात्र नहि बल्कि मणि पुरी, असमिया, उर्दू, पंजाबी,मैथिली, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाक नाटक देखबाक मौक़ा प्राय: भेटैत रहैत छैक । एहि बीच दिल्लीक प्रेक्षक केँ एकटा अत्यंत सुखद अनुभव भेलनि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयक प्रांगणमे । मराठी नाटककार विजय तेंडुलकर लिखित प्रसिद्ध नाटक जात ही पूछो साधु की आ बांग्ला लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित अचलायतन; दुनूक मंचन हिन्दीमे, जेना तीनू रंगमंचक संगम भ’ रहल हो । जात ही पूछो साधु की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडलक कलाकारक संग प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक राजिन्दर नाथ आ अचलायतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वितीय वर्ष छात्रक संग युवा निर्देशक शांतनु बोस कयने छलाह । नाटक जात जी पूछो साधु की एकटा स्वस्थ हास्य-व्यंग नाटक अछि ।  एहिमे महीपत नामक व्यक्ति कहुना क’ एम.ए. पास करैत अछि  - थर्ड डिविजन सँ । बहुत दिन बेरोज़गार रहला बाद सिफारिशिज़्मक टेकनिक सीख कोनो कॉलेजमे लेक्चरार बनैत अछि आ नाटकक अंतमे कतेको उथल-पुथलक बाद एक बेर फेर बेरोजगार भ’जाइत अछि । एहि सोझा-सोझी कथ्यक लेल नाटकक संवादमे नाटककार ततेक ने द्वन्द ओ उत्सुकता भरि देने छथि, जे प्रेक्षक एकाग्र भ’ महीपतक सोलो लौगीमे हेरायल रहैत छथि । ई नाटककारक विशेषते ने जे आई सँ 40 वर्ष पहिने लिखल कथ्य आजुक संदर्भ सेहो समकालीने बुझना जाइछ । संवाद सेहो तेहेन ने चोटगर आ तीक्ष्ण छैक जे प्रेक्षागृहमे बैसल दर्शक केँ बेधैत अछि । हास्यक पुट द’ नाटककार अपन सभ गप्प कहि दैत छथि आ दर्शक ओकरा सहर्ष ग्रहण करैत छथि । एकत’ सबस’ बेसी तेण्डुलकरजीक नाटकक मंचन सम्पूर्ण भारतमे भेलन्हि अछि  ताहुमे जात ही पूछो साधु की नाटकक मंचन सबस’ बेसी भेल अछि । निर्देशकक रूपमे राजिन्दर नाथ जीक नाम हिन्दी रंगमंचक सुपरिचित नाम अछि । विजय तेण्डुलकरक प्राय: सभ नाटकक  हिन्दीमे मंचन राजेन्दरजी कतेको बेर कयलथि अछि । एहि नाटक लेल मंच पर नाटकक संप्रेषणक जे विधि राजिन्दर नाथ अपनेने छथि ओ अति सरल अछि । मुदा, अभिनेताक अभिव्यक्ति पर अत्यंत बारीकी सँ कार्य कयल गेल अछि । मंच पर तीनू कात तीनटा दरवाज़ा, आधा मंच पर मात्र एक फूट ऊँच प्लेटफॉर्म आ सात-आठ टा ब्लॉक मात्र सँ एतेक जीवंत प्रस्तुति निर्देशकक दूर दृष्टिक परिणाम थिक । प्रस्तुतिमे प्रकाश परिकल्पना गोविन्द यादवक छनि । गोविन्दजी सेहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स’ प्रशिक्षित छथि । महीपत बनल अम्बरीश मात्र दू कदम चलि जखने दोसर प्रकाश बिम्बमे प्रवेश करैत छथि कि समुच्चा परिदृश्ये बदलि जाइत छैक । मात्र प्रकाशक प्रभाव सँ मंच कखनो समाचार पत्रिकाक दफ्तर,  कखनो निछछ देहात त’कखनो गामक कॉलेज वाकि पिकनिक स्थलमे परिवर्तित होइत रहैत अछि । एहिना वस्त्राभूषण सभ सेहो तर्क संगत अछि । जेँ सभ किछु संतुलित अछि तेँ नाटक देख सभ दर्शक भरपूर पूर्णताक संग प्रेक्षागृह सँ बहराइत छथि । आब दोसर प्रस्तुति : अचलायतन । ई प्रस्तुति छात्रक प्रशिक्षणक हिस्सा अछि तेँ प्रस्तुतिमे तकनीकी पक्ष पर बेसी ध्यान गेल । भ’ सकैत अछि बहुतो दर्शक केँ ई प्रस्तुति बहुत बेसी आकर्षित नै केने होइन, मुदा ई प्रस्तुति तकनीकी दृष्टिए उत्कृष्ठ त’अछिए । नाटक देखबाकाल अभिनेता-अभिनेत्रीक शारीरिक शक्तिक क्षमता, देह गति,आवाज़ संतुलन आ पात्रक मानसिक अभिव्यक्ति रोमांचित करैत छल । रवीन्द्रनाथ जीक लिखल एतेक पुराण कथा केँ आजुक संदर्भमे प्रस्तुत केनाइ अति कठिन कार्य छल, जकरा निर्देशक अपन दृष्टि सँ समकलीन बनेबाक भरपूर कोशिश केलनि अछि । अचलायतन के कथा सार ई जे एहि नामक एकटा शिक्षा संस्था अछि जत’  शिक्षाक रूपमे सालों-साल पुरान रुढ़िकेँ जीवित रखनाए मात्र अछि । मुदा किछु नव सोचक विद्यार्थी आ गुरुक प्रयास स’ एहि परम्पराकेँ तोड़ि देल जाइत छै आ एकबेर फेर स’अचलायतन के पुन: स्थापित करैत अछि । नाटक जे प्राय: कंभेंशनल फॉर्ममे कयल जाइत अछि तकरा तोड़बाक पूरा-पूरा कोशिश केलनि अछि शांतनु बोस । शांतनु बोस लगातार एहि विधामे कार्य क’ रहल छथि । मुदा एखन एहि फॉर्म केँ सामान्य दर्शक स्वीकारबाक लेल तैयार नै छथि । नाटक जात ही पूछो साधु की अत्यधिक यथार्थवादी अछि जाहिमे समाजक जे रूप आइ जै स्थितिमे अछि ओकरा ओही रूपमे लेखक रखलन्हि अछि आ ओकरा हम सभ सहर्ष स्वीकरलहुँ अछि जाहिमे समजाक सभरूप एक्केठाम देखबामे अबैत अछि । तथाकथित सभ्य समाज आ निरक्षर समाज दुनूक वार्तालापमे आकाश-पतालक अंतर । नाटककार आ समीक्षक आ दर्शक; सभकेँ यथार्थवादक रूपमे एकरा स्वीकार करबाक चाही । हँ ! मिथिलाक लोक जीवन एकरा कहिया ने स्वीकारि चुकल अछि । एहि फॉर्ममे मैथिलीमे सेहो कतेको रचना भेल जेँ उत्कृष्ठ अछि मुदा एखनो तक मैथिल तथाकथित सभ्य साहित्यकार ओकरा स्वीकारबाक लेल तैयार नहि भेलखिन्ह । एहना स्थिति के की कहल जा सकैत अछि ? एहिना दोसर रूप ई जे अपन रचनाकेँ कोनो काल मात्र केँ लक्ष्मण रेखा सँ मुक्त करबाक चाही । तखने ओ कालजयी भ’ पाओत । आ रचनाकेँ सेहो समकालीन परिप्रेक्ष्यमे देखबाक चाही । ओकरामे जँ कनी फेर-बदल कयला सँ आजुक’ पीढ़ीक लेल सार्थक बनि जायत त’ ई कोन बेजाय बात हेतैक ? • प्रकाश झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भगवान दास रोड, नई दिल्ली-01. 011-23389138, 09811774106.                    । ३. पद्य ३.१. गुंजन जीक राधा- दसम खेप ३.२.सतीश चन्द्र झा-पंखहीन कल्पना ३.३.दयाकान्त-माँ मिथिला ताकय संतान ३.४.पंकज पराशर--ननकाना साहिब ३.५.कामिनी कामायनी-आजुक विद्यार्थी ३.६.निशाप्रभा झा (संकलन)-आगां ३.७.अजित-ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि ३.८.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३ ३.९.सुमित आनन्द जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! गंगेश गुंजन गुंजन जीक राधा- दसम खेप (नवम खेपक बाद किछु कालक विराम आएल छल राधाक प्रस्तुतिमे। प्रस्तुत अछि राधाक दसम खेप। आशा अछि, गुंजन जीक एहि मैग्नम ओपसक प्रस्तुति अपन लोकप्रियताक शिखरपर विराजमान रहत-सम्पादक।) कहानी बेश बढ़िया कथानक बेश चिक्कन मुदा सौँसे कथा मे हमर ने मन ने हम! कहल जे नेत की से बुझत जे लोक की से एही बीचहि मे तँ सभ फाँक टा रहि जाइछ बुझब बंद केवाड़ बुद्धि विवेक वा एकर किछु आओर अभिप्राय अपनहि सँ पुछैत-पुछैत अपनहि प्रश्न भऽ गेल मनक सेहो एकटा फराके दशा होइत छैक। राधाक सएह छनि। दुःखित छथि, दुखिते बनलि रहऽ चाहैत छथि, दुःख सँ निकलऽ चाहैत छथि। दुनू चाहबाक- इच्छाक अपन-अपन बेर होइत छनि। ईहो अनुभव विचित्रे कहबाक चाही। भोर मे मन कहैत रहैत छनि जे बात; दुपहर मे नहि रहि जाइत छनि से मनोदशा. साँझ होइत-होइत परिस्थिति किछु आर भऽ जाइछ आ अन्त मे एकटा चारिमे स्वभावक भऽ जाइत छनि राति अबैत-अबैत...मनक बात। स्वयं अपनहि हाथ सँ छहलि कऽ  छुटि गेल डोलक डोरी जेकाँ गंहीर इनार। किछुओ टा कहाँ रहि जाइत छनि बुझवा योग्य, अपन सुभीता वला समाचार. सबटा जेना  अनचिन्हार भऽ जाइनि, किछु टाने चिन्हार।  कि तं मने बनि जाइत छनि समस्त ब्रजभूमि संसार । बा पड़लि-पड़लि रचि लैत छथि संसारे केँ अपन मन । एहना  मे निश्चिते जल नहि, अन्न नहि आ स्वर नहि संगी साथी नहिँ तेँ नहि कोनो तरहक वाणी-बोलीक व्यवहार ।  सबहक कउखन बलात् -स्वयं राधा कृत अनुपस्थित आ                कउखन स्वतः भऽ जाइत से ! अर्थात् ओना तँ अनुमान होइछ सब किछु चलिए रहल अछि लोकक दिनचर्या आ आ जरूरी समाचार । सबटा अपना गतियेँ अपन हिसाबेँ अछि व्यस्त ! आँगन निपनाइ, जाड़निक ओरिआओन सँ लऽ  फूल-दूभि तुलसीक ब्योँत आ ठाँव-बाट धरिक प्रक्रिया, अथक अनवरत चलि रहल अछि। आ हम! राधाक प्रश्न राधाकेँ ! हम कतऽ छी? कतबा आ कियेक ?  हम एहि दिन-राति आ चलैत बीतैत समय मे छी वा नहि छी?  जँ छी तँ कोन अंश मे आ नहि तँ, तँ कियेक नहि छी? बाटक कात निस्सहाय ठाढ़ लोक जकाँ कियेक भऽ गेल छी हम ! सोझाँ सँ एक एक कऽ जा रहल गाड़ी, बटोही सँ लऽ कऽ वस्तु जात लादल बड़दक घंटी टुनटुनबैत गाड़ी, घोघ मे कनैत कनियाँ, आ कउखन घरहटक बाँस वा काठक सिल्ल लादल। सबटा तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सृजनेक व्योंत। कनियाक विदागरी सँ लऽ बटोहीक चलब अपना-अपना गन्तव्य धरि आ बाँस-काठ सँ लदल गाड़ी घवाहो कान्ह पर ऊघैत बड़दक बेबस जोड़ा- किछु रचने मे अछि लागल! मन सँ बा कर्तव्य सँ , बा कोनो दबल आवश्यकता- विवशता सँ । कऽ तऽ रहल अछि रचने। श्रम-फल निर्भर  परिवार-बालबच्चाक परोक्ष प्रतिपादन आ निर्माणक काज। प्रतिपल रचना होइत अछि। से बात तँ बूझल अछि। मुदा एहि रचना सँ भऽ वा कऽ देल जाइत अछि कोनो-कोनो मनुक्ख  वंचित, तिरस्कृत तेकर तँ नहि अछि ज्ञान! ध्यानो कहाँ गेल पहिने कहियो... जे सोचितिऐक एकर मर्म, रचना क्रमक यात्रा सँ वंचित होयवाक अभाव आ तकर मनोभाव ! कहाँ गेल ध्यान। वंचित परन्तु करैत रहलैक  अछि सतत् कोनो ने कोनो सत्ता। सत्ता माने प्रभुता। प्रभुता माने राजा, राजा माने राजा । कए टा राजाक राजा- महाराज! सत्ता माने महाराज। श्रीकृष्ण छथि की? हमरा कऽ देलनि सृजन सँ विरत, एक कात असकर ! की छथि ओ ? आ स्वयं हम केहन मूर्ति आ अकर्मण्य, चुपचाप . हुनकर देल समय केँ सहजहि स्वीकारि कऽ  पड़लि छी दुखित। अपनो तँ नहि  रमैये मन कदाचित् एही मे ? पड़ल-पड़ल अपन आ मात्र अपनहि मनोनुकूल संसार रचै मे, ताहि मे एते असकरे बSसै मे?  कतहु चाहैत तँ नहि अछि मन - रही अहाँ एहिना रुसल किछु आर दिन, मास.. रुसले रही हमहूँ , नहि करी किछु टा काज नहि आबी, नहिये टा आबी अहाँक लग पास। रहू रुसले बरु  किछु आर दिन... चीन्हि सकी हमहूँ अपना केँ आ भऽ सकय अहुँक चरित्र आ हृदयक परिचय किछु आर एहि बेर मन तैयार अछि, आब सह्य करबा लेल नहि बुझाइत अछि प्रस्तुत कऽ लेबऽ चाहैत अछि- एहि पार कि ओहि पार! आत्मीय चिन्हार हँसीक स्वर, बुझलनि, आकुल प्रश्न कहलखिन कृष्णकेँ  मनकथाक एहि निर्णय-बिन्दु पर राधाक कान मे पड़ल कोनो आत्मीय चिन्हारक हंसी-स्वर!  -अहाँ एना कियेक हँसलौँ एतेक जोर ठहक्का दऽ? -’बेकूफ, एहन विषयक की हेतैक एहि पार कि ओहि पार? ई की कोनो यमुना छै...  यमुना तँ बड़ दयालु माय अछि राधा ! ओ तँ प्रस्तुत केने छैक सब लेल अपन सब किछु। ई परिस्थिति नहि यमुना। एकर कोनो नहि छैक ई कात ओ कात। ई धार निरन्तर आ निर्बंध छौक । चाहला सँ सेहो नहि छौक इच्छित परिणाम! कालधाराक आरम्भ आ अंत, स्वयं कालेधारा सखि! की करओ क्यो, तोहूँ की करबेँ आब यैह छौक तोरो गाम ! एहि सभ मनोभाव केँ गाम जकाँ मान आ बिनु तमसयने, कुंठित मोने सोच किछु-किछु काज, किछु लोकगर उपाय, नव बाटक संज्ञान! निकल  घर-आंगन सँ, चुपचाप नहि रहै,  आब बाज, राधा बाज... नहि  कर चिन्ता निकल अपना मन सँ  आत्मा  केँ करऽ दे विचरण भरि वज्रभूमि, सौँसे संसार! जुनि हो एना जीवितहि मृत । जीवन मनुक्खक सामर्थ्य छैक ।  एही लेल होइत अछि मनुक्ख, तोँ बूझ ई बात । सृष्टि स्वयं मनुष्येs पर तँ जीबैत अछि। कात मे भरलो लोटा जल रहैत छौक राखल लागल रहैत छौक उत्कट पियास नहि पीयैत छेँ जल, करैत रहैत छेँ  छट पट अपना केँ प्रताड़ित करैत, बुझाइत रहैत छौक उत्कीरना करैत छेँ ? नहि राधे!  ई छैक एक प्रकारेँ आत्मदाह। स्वयंकेँ डाहैत मारैत रहैत छेँ! एहि मात्र अपनहिँ आत्मलिप्ततामे  बूझल छौक जे अपने ओतेक  नहि मरैत छेँ तोँ जतेक मृत्यु होइत रहैत छैक कतहु अन्तऽ आन आनक । आन-आन ठाम... एक बेर हमरा दिस ताकि ले । देख हमरा एक बेर.. खोल आँखि-आँखि खोल। बंद आँखि मे वास्तविक जीवन आ संसार  अँटियेनहि सकैत छैक। बुझवाक चाही मनुक्ख केँ। बंद आँखिक सेहो मर्यादा छैक, मुदा कोनो मर्यादा सृष्टिक वास्तविक उत्तरदायित्व-मनुक्ख जीवनक उत्कर्ष सँ बेसी नहि । (अगिला अंकमे...) सतीश चन्द्र झा पंखहीन कल्पना सुखा गेल अछि मोसि कलम केँ कोना आइ कविता हम लीखू। रुग्ण भेल अछि मोन भावना राति अन्हार चान की देखू। दीन हीन व्याकुल अनाथ भ’ भटकि गेल अछि भाव मोन केँ। पंखहीन विक्षिप्त कल्पना बदलि गेल अछि अर्थ शब्द केँ। कानि रहल अछि वर्णक मात्रा छंद आब उन्मुक्त भेल अछि। सुन्दर देह आगि सँ सगरो अलंकार केर झरकि गेल अछि। अछि आयल दुर्दिन साहित्यक आँखि खोलि क’ की हम देखू। सुखा ...............................लीखू। अहित सुखी भ’ जीवि रहल अछि हित दुर्लभ अछि वस्तु जगत केँ। स्वार्थ धर्म ज्ञानक परिभाषा भोग विलास अर्थ जीवन केँ। झूठ पहिरने वस्त्रा रेशमी सत्य ठाढ़ निर्वस्त्रा कात मे। अछि निर्मल नहि जल गंगा केर अध्र्य देब हम कोना प्रात मे। दिशाहीन जा रहल दूर छी केना ठहरि क’ किछु क्षण बैसू। सुखा ...............................लीखू। बिलटि गेल अछि अपन घ’र मे संस्कार, शिक्षा, अनुशासन। खंड - खंड मे बाँटि रहल अछि जाति धर्म केँ अंध कुशासन। ज्ञानी छथि बैसल अन्हार मे भ्रष्ट लोक केर नित अभिनंदन। सत्य आचरण लज्जित जग मे अत्याचारक रूप विलक्षण। चिंता छोरि करू हम चिंतन अछि मृगतृष्णा की की देखू। सुखा ...............................लीखू। पहुँचि गेल अछि यान चान पर अछि पसरल ओहिना निर्धनता। वक्षस्थल केर वसन बेचि क’ दूध पियाबथि शिशु कँे माता। लोक बनल अछि वस्तु बजारक बिका रहल जीवन नेनमन मे। भेल कतेक उन्नति एहि देशक चमकि रहल अछि विज्ञापन मे। बिलखि रहल अछि भूखल बच्चा केना द्वारि पर जा क’ बैसू। सुखा ...............................लीखू। दयाकान्त माँ मिथिला ताकय संतान ससरी गेल कतेको टाट खसि परल कतेको ठाठ नहि अछि कतहु पर्दा टाट नहि राखल दलान पर खाट कतेको घर साँझ-प्रात सं बंचित कतेको घर ताला सं संचित जतय रहै छल जमाल दलान आई बाबा बिन सुन्न दलान माँ मिथिला ताकय संतान सगर देश मे भय रहल पलायन मिथिला सन नहि दोसर ठाम बी०ए०, एम०ए० घर बैसी के कहिया धरि देता इम्तिहान जीबाक नहि बचल कोनो साधन नहि रोजगारक कोनो ठेकान गाम बैसी करता की बैउया कोना बचेता घरक प्राण माँ मिथिला ताकय संतान पढ़ल लिखल बौक बनल अछि धुरफंदी सब मौज करैत अछि एक आध जे पोस्ट निकलैत अछि भाई-भतीजा छापि लैत अछि सबतरि बन्दर बाँट मचल अछि कोनो विभाग नहि आई बांचल अछि बिना पाई कियो बात नहि करताह कतेक सहत सज्जन अपमान माँ मिथिला ताकय संतान हमर बुद्धि-विवेकक लोहा देशे नहि विदेशो मानैया हमर मेहनत-लग्नक वल पर आई कियो बाबु कह्बैया हमर उन्नति देखि के आई सब प्रांत हमरा सं जरैया करितहु प्रतिभाक सदुपयोग रहिता जँ मिथिलामे ओरियान माँ मिथिला ताकय संतान दयाकान्त ! पंकज पराशर ननकाना साहिब चिड़ै डेराइत अछि डेराइत-डेराइत चेहाइत अछि आ उड़ि जाइत अछि निस्सीम गगन मे एहि भूगोल मे इतिहासक ऑक्टोपसी गछाड़ आ सेहो नहि तँ कोन बात जे तोप केर आवाज सहज लगैए आ चिड़ै केर स्‍वर भयाक्रांत ? लाउडस्‍पीकर सँ गुरू ग्रंथ साहिब केर लयात्मक स्‍वर पसरैत अछि अंतरिक्ष मे आ सड़क पर ओहिना विद्यमान रहैत अछि निस्‍तब्‍धताक साम्राज्‍य बैग उठबैत बढ़बैत छी डेग कोनो आन नगरक लेल तकैत छी चारू दिस तकैत जाइत छी आकुलता सँ मुदा देखार नहि पड़ैत अछि चिड़ै-चुनमुनीक किलोल करैत झुंड! कामिनी कामायनी आजुक विद्यार्थी लोदी के लोढी बूझू सिस्टम सील समान थिंकर के कुतरूम बूझू पीसू एक समान बनत चहटगर चटनी । क्राम्ट  क्राम्पटन फैन भेल हॉब्स हासुआ छाप अकबर आब होटल बनल फैराडे   फेराडॉल बनल बढिया विज्ञापन  । भू के नक्शा  ताड़ि क’ अपन बनाउ प्ला न जतए मोन तत्त राखू एशिया यूरोप आनि रहत वसुधैव कुटुंबकम हरिश्चन्द्र औ प्रेमचंद दूनू बेमातर भाय एकके काज पोथी लिखब दोसरक गप्पे केनाय देखु इ नब नमूना । औरंजेब भागल कब्र  सॅ दुख सॅ ढहि गेल ताज मुँह नूकॉने हिम छलाह देखि विद्यार्थी आज एना की उचित लगै छै । सरस्वती के राज में कानि रहल इसकुल ओहो केहेन दिन छलै बिहॅसति छल  गुरूकुल केहेन बयार चलल छै  । कामिनी कामायनी ् 20।8।09 निशाप्रभा झा (संकलन) भगवती गीत कओने मुँह सँ अयलीह काली, कओने मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी। कओने मुँह भए गेली ठाढ हे कलजोरी-जोरी। पूब मुँह सँ अयलीह काली, पश्चिम मुँह गेलीह हे कलजोरी-जोरी, उत्तर मुँह भए गेलीह ठाढ्हे कलजोरी-जोरी। कओने फूल ओढब काली कओने फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी, कओने फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी। बेली फूल ओढन काली, चमेली फूल पहिरन हे कलजोरी-जोरी, ओडहुल फूल सोलहो सिंगार हे कलजोरी-जोरी। पहिरि औढिय काली गहबर मे ठाढि हे कलजोरी-कलजोरी, करय लगलीह सेवक के गोहारि हे कलजोरी-कलजोरी। अजित ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि रिक्शापर माइक लगा जोर जोरसँ छोटगर-छोटगर भाषणे तँ देलथि नेताजी किछु कऽकऽ देखाबथि! कहथि जा घर-घरमे बिजली लगाएब आब अन्हारमे जीबि नहि पाएब हर रातिकेँ हम दीवाली बनबाएब एको जे खम्हा गारिकऽ लबैथ नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!! घर-घरक बच्चा स्कूल जाएत पढ़ए-लिखऽ सँ नञि कियो वंचित हएत शिक्षाक स्तर बहुत बढ़ाएब चारियोटा शैक्षिक सामग्री बटबैतथि नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!! गाम-गाममे फोनेटा नहि ई-मेल आ इन्टरनेट लगाएब मोबाइलक तँ बाढ़ि बहायब एक्को दू टा पी.सी.ओ. तँ खोलाबथि नेताजी किछु कऽकऽ देखाबथि!!! कारखाना खुलत, काज बढ़त रोजगारीक अवसर प्रसस्त बनबाएब बेरोजगारीक नामोनिशान मेटाएब एकोटाकेँ ढंगगर नोकरी दियाबथि नेताजी किछु कऽ कऽ देखाबथि!! ओ तँ मुहेँक बड़जोड़ छथि पार्टी आ अप्पन मात्र काज करौलथि जितलाक बाद चेहरो नहि देखओलथि ओ तँ आब राज करै छथि अनेरे किए किछु कऽकऽ देखओबथि!!! । कल्पना शरण प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-३ अपन संहारकक नाश करै लेल प्रकोप बरसल देवी माया पर स्तब्ध रहि गेल ई- जानि कऽ कोना कृष्ण पौलैथ सुरक्षित घर पहिने मथुरामे बाल संहार भेल फेर बात बढ़ल गोकुल तक पूतना सऽ जे प्रारम्भ भेल छल भयभीत कंसक नुकायल प्रहार एक पर एक आघात होयत रहल वकासुऱ अगासुर सन कतेक आर मुदा अहि सब मे हारैत दुश्मन अचूक छल हरि के पलट वार इम्हर कखनो ब्रह्माक नटखट खेल कखनो कालिनाग सऽ सामना भेल बाल्य काल स माखन चोरेनहारक हाथे कतेको के मोक्ष प्राप्ति  भेल कृष्णावतारक उद्देश्य सऽ अज्ञात गोकुलवासी वृन्दावन दिस विदा भेल सुमित आनन्द जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! ट्रेनमे लाइन, बसमे लाइन सिनेमाक हॉलमे लाइन गैसक गोदाममे लाइन राशनक दोकानमे लाइन सबसँ बड़का सैलूनमे लाइन! जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! स्कूलमे लाइन कॉलेजमे लाइन डॉक्टरमे लाइन आ वकीलमे लाइन अस्पताल आ कोर्टमे लाइन सबसँ बड़का सर्कसमे लाइन! जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! चाहमे लाइन, पानमे लाइन पैखानामे लाइन आ पेशाबमे लाइन होटलमे लाइन, बोतलमे लाइन सबसँ बड़का पाइनमे लाइन! जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! मन्दिरमे लाइन, मस्जिदमे लाइन योगीमे लाइन आ भोगीमे लाइन जोतखीमे लाइन, पंडितमे लाइन सबसँ बड़का शमसानमे लाइन! जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! नेतामे लाइन, अभिनेतामे लाइन खेलमे लाइन आ जेलमे लाइन ऑफिस आ आवासमे लाइन सबसँ बड़का सर्विसमे लाइन! जेम्हरे देखू तेम्हरे लाइन!! गद्य-पद्य भारती पाखलो मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह पाखलो- भाग-३ पाखलो- भाग-४ दादी अपन बेटा गोविन्दक संग हमरहुँ स्कूल पठा देलक। ओहि दिनसँ हम आ गोविन्द दुनू गोटे खास मीत बनि गेलहुँ। विद्यालयक प्रवेश-पंजीमे शिक्षक हमर नाम पाखलो लिख देलनि। अही नाम सँ हम ओहि विद्यालयमे मराठीक माध्यमसँ चारिम कक्षा धरि पढ़ाइ केलहुँ। हाजरी दैत काल हमर एहि नाम पर हमरा कक्षाक आन-आन छात्र लोकनि हमर खूब मजाक उड़ाबए जे हमरा बहुत खराप लागैत छल। प्रवेश-पंजीमे हमर नाम पाखलो लिख देल गेल रहए इहो लेल हमरा बहुत खराप लागैत छल। गोविन्द हमरा सँ एक कक्षा आगू छल तकर पश्चातो हमरा ओकरासँ दोसती भ’गेल छल। हम ओकरा संगहि माल-जाल ल’ क’ जंगल धरि जाइत रही। जंगल जाइत काल हमरा काँट-कुशक कोनो डर नहि होइत छल। ओतए हम सभ कणेरा-काण्णां, चारां-चुन्नां1  खाइत छलहुँ। घूस-गे बाये घूस2  ई शब्द बोलिकए एक दोसरा पर  ‘भा’  अएबा धरि आ  कोयण्या-बाल, गड्ड्यांनी3  आदि प्रकारक खेल खेलाइत छलहुँ। चरवाहा सभक संग रहि हमहुँ चरवाहा बनि गेल छलहुँ। गोवा केँ स्वतंत्र हेबासँ पहिनुके बात थिक। तखन हमर उमिर नओ-दस बरखक रहल होएत। गामक बन्न पड़ल पुलिस-स्टेशन एकबेर फेर चालू भ’ गेल रहैक। ओतए तेशेरा नाम केर एकटा नव पुलिस प्रधानक नियुक्ति भेल छलैक। ओ 1.    कोंकण प्रदेशक एकटा जंगली फल जे लोक खाइत अछि। 2.    कोंकण प्रदेशमे खेलल जाएबला एक प्रकारक खेलमे प्रयुक्त शब्द जाहिमे एहन मान्यता अछि जे ई शब्द बाजलासँ कोनो खास व्यक्तिक देहमे कोनो आत्माक प्रवेश भ’ जाइत अछि। 3.    कोंकण प्रदेशमे नेना सभक द्वारा खेलल जाएबला एक प्रकारक खेल। कहियो काल सैह पणजीसँ गामक पुलिस स्टेशन अबैत-जाइत छल। ओ अपना लेल ओतए एकटा धौरबी राखि नेने छल। ओकरा ओ अपना संगहि गाड़ी-घोड़ा पर घुमबैत रहैत छल। गामक बगल वला जमीनक लेल दत्ता जल्मी आ सदा ब्राह्मणक बीच बहुत दिनसँ विवाद छलैक। ओकरा सभक बीच मोकदमा चलि रहल छलैक। दू-तीन साल बीत गेलाक पश्चातो एखन धरि ककरहुँ पक्षमे फैसला नहि भेल छलैक। एकबेर ओ नव पुलिस प्रधान (तेशेराकेँ) अपना घर बजाकए खूब मासु- दारू खुऔलक-पिऔलक। ओहि दिन ओ प्रधान ओकरा स्त्रीकेँ देखलकैक। ओहि काल ओ ओकरा प्रति आसक्त भ’ गेल आ ओ जाहि कक्षमे रहथि ताहि दिस देखैतहि रहि गेल। सदा प्रधानसँ विनती केलक जे ओ मोकदमा ओकरहिं पक्षमे करा दैक। कने काल चुप रहलाक पश्चात् प्रधान ओकरा हँ कहि देलकैक। शर्तक रूपमे ओ सदासँ ओकर स्त्री माँगि लेलकैक। सदाकेँ जल्मीक जमीनक संगहि-संग गामक सभसँ पैघ जमीन (केगदी4चास-बास) भेटए बला रहैक। चारिए-पाँच दिनक बाद पुर्तगालीक विरोधमे काज करबाक अभियोगमे दत्ता जल्मीकेँ भीतर क’ देल गेलैक। तकर बाद ओकर की भेलैक ताहि संबंधमे ककरहुँ कोनो पता नहि चलि सकल। केओ कहैक जे दत्ता फेरार भ’ गेलैक तँ केओ कहैक जे प्रधान ओकरा मारि देलकैक। ओहि दिनक बादहिं सँ सदाक घर लग सभ दिन एकटा गाड़ी लागए लागलैक। सदाक स्त्री सभ साँझकेँ नव-नव साड़ी पहिरए, नीक जकाँ अपन केश-विन्यास करए, काजर, बिंदी पौडर आदि लगा अपन श्रृंगार करए आ तेशेराक गाड़ी मे बैसि जाए। तेशेराक गाड़ी सदाक बंगला पर धूरा उड़बैत फुर्र भ’ जाइक। 4.    क्षेत्र विषेशक बाध-बोनक नाम। दोसर भोर ओ गाड़ी हुनका एतए पहुँचा दैक। ओ गाड़ीक पछिला सीट पर लेटल रहैत छलीह। हुनकर केश आ चोटी सभ उजरल-उभरल रहैक, आँखिक काजर नाक आ गाल पर  लेभराएल रहैत छलैक। मोकदमाक फैसला सदा जमींदारक पक्षमे भ’ गेल छलैक एहि लेल ओ सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक लेल सोचलक। पूजामे अएबाक लेल ओ भरि गामक लोककेँ हकार देलकैक। सदा ओ ओकर स्त्री पूजा पर बैसि चुकल छलीह। तखनहि प्रधान तेरेश अपन गाड़ी ल’ कए ओतए आबि गेल। ओ पूजा पर बैसलि सदाक स्त्रीकेँ उठा लेलक। पूजामे आएल सभ लोककेँ एहि घटनासँ बड्ड आश्चर्य भेलैक। केगदी चास-बास केर कागद-पत्तर सदाकेँ थम्हबैत ओ ओकरा स्त्रीकेँ ल’ कए आगू बढ़ल, तखनहि सदाक छोट भाय ओकरा सभकेँ रोकबाक प्रयास केलकैक। तेशेर ओकरा पर बन्दूकसँ निसान साधि लेलकैक आ आब गोली दागहि वला रहैक की सदा ओकरा रोकि दैलकैक। तेशेर अपन बन्दूक नीचाँ क’ लेलक। तकरा पश्चात् ओ सदाक भायकेँ एक दिस धकेलि ओकरा स्त्रीक हाथ पकड़ि आगू बढ़ल। एहि पर सदा अपना स्त्रीसँ कहलकैक—“ओकरा संग एना जा कए अहाँ हमर नाक कटबाएब की?” ई सुनि सदाक स्त्री अपन मुँह चमकबैत बजलीह—“अहाँकेँ नाको अछि की? जँ अहाँकेँ नाके चाही तँ हे ई लिअ...” एतबा कहि ओ अपन नाकक नथिया निकालि सदाक पयर लग धरती पर फेकि देलकैक आ प्रधान तेरेश केर संग चलि देलक। तेसरे दिन प्रधान ओकरा ल’ कए पुर्तगाल चलि गेलैक। प्रधान तेशेरकेँ पुर्तगाल जेबासँ ठीक एकदिन पहिनुके गप्प थिक।  रातिक लगभग दू वा तीन बजैत हेतैक। केओ हमरा घरक फटकी खोलि हमरा घर घूसि गेल। हमर माय कम कएल लालटेमक इजोतकेँ कने तेज केलक। देखलहुँ तँ एकटा अनजान लोक! ओ बाजल—“बहिन हमरा कतहुँ नुका दिअ, हमरा पाछू फिरंगी पुलिस लागल अछि। एकबेर जँ हम ओहि पुलिस प्रधान तेशेराक हाथ आबि गेलहुँ तँ ओ हमर जान ल’ लेत। हम जीवित नहि बाँचि सकब।” एतबहिमे दूरसँ अबैत जूता ध्वनिसँ बुझाइक जे केओ आबि रहल छैक। हमर माय ओकरा ओढ़बाक लेल अपन साड़ी देलकैक आ ओ साड़ी ओढ़ाकए ओकरा हमरहिं लग सुता देलकैक। किछुए क्षण केर पश्चात् घरमे इजोत देखि प्रधान तेशेर  हमरा घरमे घुसि गेल। हमर माय बहुत डरि गेलीह। तेशेरा सौंसे घर केर तलाशी ल’लेलकैक आ ओतए के सूतल छैक? ओकरा संबंधमे पूछय लागल—हमर माय डरैत-डरैत बजलीह—“ओ हमर बहिन थिकीह.....साहेब।” क्रमशः श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद,संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि। डॉ शंभु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ,आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता,कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। सेबी फर्नांडीस क्रमशः बालानां कृते- 1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) आ 2.कल्पना शरण: देवीजी देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग”प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा बीस नताशा एक्कैस नताशा बाइस 2.कल्पना शरण: देवीजी देवीजी  शिक्षक दिवस ‘2009’ प्रधानाध्यापक के विद्यालय के लऽग गेला सऽ किछु हलचल बुझेलैन।कनिक आश्यर्च आऽ कनिक भय के संगे प्रवेश केला तऽ अन्दर के आयोजनक भनक लागि गेलैन।एहेने हाल देवीजी आ आन कर्मचारी सबहक सेहाे छल।अहिबेर सबटा पासा पलटल छल। शिक्षक दिवसके सुअवसर पर अहि बेर देवीजीके पिछला साल जकाँ किछु कहैके आवश्यकता नहिं पड़लैन। देवीजी कनिक अंठा देने छलखिन मुदा सब बच्चा सब अपने सऽ तैयारी कऽ रखने छलैथ। बल्कि अहिबेर बच्चा सब दिस सऽ शिक्षक सब के उपहार के रूपमे एक रंगारंग कार्यक्रमक आयोजन कैल गेल छल।दरबान सऽ अपन अभिभावक के बात करा कऽ बच्चा सब विद्यालय के पहिने खुलबा लेलैथ आ शिक्षक सबके पहुॅंचै सऽ पहिने अपन प्रस्तुति लेल तैयार छलैथ। कार्यक्रममे शिक्षक दिवसके आरम्भक पाछु कारण के बखान सऽ जे मनाेरंजन शुरू भेल से शिक्षक सबहक प्रति आदर अभिव्यक्‍ति सऽ लऽ कऽ विभिन्न प्रकार सऽ शिक्षक सबके हॅंसाबैके प्रयास तक सराहनीय रहल। सब भावाविभाेर भऽ गेल छलैथ। प्रधानाध्यापक के  व्यंगात्‍मक कार्यक्रम बेसी नीक लगलैन कारण हुन्का अपन विद्यार्थी सबहक आकांक्षा आऽ विद्यालयक प्रयास मे विद्यार्थीक दृष्टिकोण सऽ कतऽ कमी रहि गेल छल से ज्ञात भेलैन। एवम अहि सऽ विद्यार्थी सबहक मानसिक विकासक परिपक्‍वता सेहाे अवलाेकित भऽ रहल छल। पूरा तैयारी बच्चा सब अपने केने छल। रंगमंचके सजावट  सऽ लऽ कऽ कार्यक्रमक उद्घाेषणा तथा कार्यक्रमक श्रृंखला सब बच्चे सबहक मत आ आपसी सामंजस्य सऽ भेल छल।देवीजी आ अन्य कर्मचारी लेल यैह सबसऽ पैघ खुशी छल।परन्तु विद्यार्थी सबहक स्नेहाभिव्यक्‍ति अखने खत्‍म नहिं भेल छल। शिक्षक दिवस के आहिके यादगार प्रस्तुति जे आगाँ कतेको दिन तक सबके मोनमे सुरक्षित रहतैन तकरा निहारैलेल सब बच्चा सब अपन हाथे प्रत्‍येक कर्मचारी लेल ग्रीटिंग कार्ड बनेने छलैथ।अहि तरहे आहि गुरू गुड़ आ चेला चीन्नी भऽ गेल छल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवाफोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara orPhonetic-Roman.) Language: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली कोष/ मैथिली-इंग्लिश कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वाराggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. १.पञ्जी डाटाबेस आ २.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली १.पञ्जी डाटाबेस-(डिजिटल इमेजिंग /अंकन/ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण/ संकलन/ सम्पादन- गजेन्द्र ठाकुर,नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा द्वारा) (101) रघु बनमाली (136/0) (266/0) कुनें सभापतिय: सोदरपुरसै जीवनाथ दौ (22/0) महो जीवनाथ सुतो (32/06) थेघ: दरिहरा सै मुनि दौ (16/0) बभनियामसै गोनन दौहित्र दौ।। कुने प्रo कुलपति सुतो जागेक: बेलउँच सै मधुदौ।। जागे सुतो लक्ष्‍मीनाथ: वलियास सै सुपे दौ।। लक्ष्‍मीनाथ सुतो (266/0) बावू भिखूकौ एकहरासै परान सुत काशी दौ पनिचोभसै रमापति द्दौणा भिखू (135/04) प्रo भिरवारी सुता माण्‍डर सै नरहरि दौ सोन्‍हू सुत परान सुतो नरहरि: पालीसै भवनाथ दौ।। नरहरि सुता पालीसै गणपति सुत पाठक बैजू दौ सरिसब सै गोपाल द्दौणा एहे ठ. लक्ष्‍मीघर द्वितीय विवाह समाप्‍त 16.06.2003 Monday ठ. बैद्यानाथ सुता तरौनी कामहासै बासुदेव सुत दाउँ दौ (30/02) विष्‍णुपति सुता मुकुन्‍द मुरारि महेशा: परहर सकराढ़ी सै भोजू दौ (06/04) अपरा वीर सुतो भोजू धीरू को (45/09) को बभनियाम सै रूचिकर दौ (36/03) खौआल सै श्रीधर द्दौणा भोजू सुतो रघु सुपनो (88/08) नरउनसै बासू दौ (23/06) श्रीकर सुतो बासुक: पालीसै धरादित्‍य दौ (28/02) बलियास सै हरादित्‍य द्दौणा बासू सुता गंगोली सै सुरेश्‍वर दौ (43/09) भन्‍दवालसै फूलहत द्दौणा मुकुन्‍द सुतो शंकर बढि़याम पबौली सै रतनू दौ (32/02) अपरा रतनू सुता खौआल सै माधव दौ (36/0) चान्‍द सुता माधव कान्‍ह राम (68/06) देवे (60/09) हरखू पराना: वहेराढीसै गदाधर दौ (38/07) सकराढ़ीसै चांडो द्दौणा (102) ।।43।। माधव सुता बभनियामसै मतिकर सुत गहाई दौ दरिहरासै राजू द्दौणा शंकर सुतो बासुदेव: वलियाससै रामचन्‍द्र दौ (28/03) अपरा नारू सुता ऐठो दूबे (76/0) बाग का गंगोली सै होरे सुत भवदत्त दौ भवदत्त सुतो जीवेश्‍वर: पालीसै हिताई दौ (12/02) हिताई सुतो दिवाकर: तिलईसै ज्ञानधर दौ।। इबे सुतो वंशमणि सोदरपुर सै महादेव दौ (23/0) महामहो महादेव सुता सोने (134/06) (86/03) (138/08) (36/04) रूचि रतन् दाका कवि मo मo (55/09) गणपतिय: कुजौलीसै रविकर दौ (23/03) अलयसै मo मo गदाधर द्दौणा वंशमणि सुता (130/28) सुता रामचन्‍द्रराघव मुकुन्‍दा बुधवाल सै दिवाकर दौ (11/03) रतिकर सुतो मतिवर (43/09) मासैकों आद्या बेलउँचसै गयादित्‍य दौ (22/09) भरेहासै केशव द्दौणा अन्‍त्‍यो माण्‍डर सै रतिकर दौ (29/03) बहेराढ़ीसै रवि द्दौणा मासे (80/09) सुतो शंकर दिवाकरौ सोदरपुरसै कमलू दौ (29/03) अपरा हाउँ प्रoरत्नाकर सुता कमलू गोढि (53/02) शुभे अन्‍दू विरू (31/06) (47/05) धीरू का (62/04) वलियाससै इबे सुत गणपति दौ गंगोली सै सोम द्दौणा अन्‍त्‍यो टकबालसै हरदत्त दौ (25/04) हरदत्त सुता सुरगनसै धीरू सुत माधव दौ तिसुरी सै मुरारी दौ कमलू सुता खौआलसै इबे दौ नरउन सै वागे द्दौणा दिवाकर सुता बेलउँच सै माधू दौ (37/08) माधू सुता रूचि वेणी वासू रामू जीवेका वलियाससै विभाकर सुत गुणाकर दौ पालीसै कवि द्दौणा कवि रामचन्‍द्र सुता पबौली सै नरायण दौ (32/0) भानुदतसुता (79/08) प्राणपति घनपति श्रीपतिय: बुधवालसै मति दौ (43/04) मति सुतो नरपति (94/05) सुरपति सोदरपुरसै हौउँ दौ (29/03) करमहासै माधव द्दौणा प्राणपति सुता (168/08) (103) उँमापति भवानीनाथ नारायण हरिश र्म्‍मणा: खौआल सै रघुसूत गोंढि दौ पालीसै राम द्दौणा नरायण सुतो श्रीनाथ लोकनाथो दरिहरासै गिरी पौत्र बागे सुत हरिहर दौ पनिया रघुपति द्दौणा बासुदेव सुतो दाउँक: कन्‍हौली सोदरपुरसै मोरा द्दौणा (35/02) श्री हरि सुता हरीनाथ (61/07) रामनाथ शिवनाथा: खौआलसै हरिकेश दौ (37/0) (132/02) बाइ सुता आङनि इबन माथना (56/05) हरिअम सै परमू दौ (42/09) सोदरपुरसै महो जीवनाथ द्दौणा आङनि सुतो गोविन्‍द हरिकेशों बुधवालसै लाखू दौ (38/09) खौआल सै बुद्धिकर द्दौणा हरिकेश (98/04) सुतो रतिदेव रामदेवों (164/0) पनिचोभसै अन्‍इ दौ (20/04) अन्‍इ सुतो जसाई क: गंगोर सै पौखू दौ (29/07) अपरा सुधाकर सुता प्रभाकर दिवाकर दिनकरा: (80/05) सकराढ़ी सै चोड़ो दौ (38/08) खण्‍डबलासै मेघ द्दौणा (63/05) प्रभाकर सुतो पौखूक बलिरूचि (10/09) अपरा रूचि सुतो शुचिकर जजिवालसै सोम सुत राम दौ वुधवालसै शिवादित्‍य द्दौणा पौखूक सुतो डालू मण्‍डनो माण्‍डरसै सोने सुत रूद्रपाणि दौ बेलउँचसै विशो द्दौणा रामनाथ सुता रघुदेव (95/03) विष्‍णुदेव भोराका: हरिo मधुसूदन दौ (27/06) भवे सुता मुरारि (83/0) मधुसूदन मुकुन्‍द यथाक्रम बाघ सिंह शादिला: नरउनसै प्रथमापररोसेo गौरीपति दौ (27/08) गौरीपति ब. (81/05) पति सुता तलहनपुरसै केशवसुत गणपति दौ एकहरासै बामू द्दौणा मधुसूदन सुता और सोदरपुरसै जागू दौ (31/07) अपरा सुधाकर (02/09) सुतो जागूक: नरउन सै दिनकर दौ (24/08) दरिहरा सै कुसुमाकर द्दौणा जागु सुता (130/08) माण्‍डर सै काशी दौ (33/09) काशीसुता रूचि छितू मीना: (93/0) सोदरपुरसै कितिनाथ दौ खौआल सै गहाई द्दौणा भोरा सुता वलियास  सै गोढ़ाई दौ (32/03) महनू (71/05) सुतो वेणी काशी को (334/0) बुधवालसै विश्‍वेश्‍वर दौ (36/06) अपरा विश्‍वेश्‍वर सुता माण्‍डरसै रतिदौ अपरा महनू सुता बहेराढ़ीसै ढोढे दौ।। (104) ।। 44।। (29/03) बहेराढ़ी सै रवि द्दौणा वेणी सुता श्रोत्र पल्‍लव धीरू (147/02) गोपीनाथ प्रo गोपाल नाथू पौथू (55/07) (49/06) मिश्र कृष्‍णा: बहेराढ़ीसै वेणी दौ वेणी दौ वेणीसुतो शंकर रतनूकौ माण्‍डरसै गांगुदौ (02/07) दामू सुत मांगु सुतो गांगूक पाली सै रामदत्त दौ (14/02) पबौली सै बागे द्दौणा गांगु सुतो आदित्‍य: बड़गाम गंगोलीसै रघु दौ (34/08) रघुसुता दरिहरासै सोनू सुत जगन्‍नाथ दौ टकबालसै वंशीधर द्दौणा नाथू सुतो गोढ़ाई सोनाईकौ सरिसबसै बावू दौ (38/07) चान्‍द सुता रतनू राम होरिल शौरे मुरारी नइहरिय: माण्‍डरसै मनोधर दौ (36/0) जाल्‍यसै महिधर द्दौणा मुरारि सुता बावू श्रीधर कान्‍हा करo जोर सुत धीरू दौ दरिहरासै मेघ द्दौणा बावू सुता खौआल सै जागू सुत परान दौ सुरगनसै शंकर द्दौणा गोढ़ाई सुतो मथुरेर (157/0) एकहरासै दशरथ दौ (26/07) मुरारि सुता श्री पति विष्‍णु पति गदाधर पीताम्‍बर नारायणा: (228/08) पबौलिसै रामदत्त दौ (36/07) बेलo जोर द्दौणा श्रीपति सुतो दशरथ: नरउन जाने दौ (25/05) जाने सुतो भगीरथ महिपति माण्‍डरसै शीरू पौत्र रूद्रकान्‍त सुत सर्वाई दौ नरउनसै रतीश्‍वर द्दौणा मिश्र दशरथ (91/06) सुतो रमापति: (94/05) माण्‍डरसै श्री हरिद (26/03) जाने सुतो सोने धाने कौ कनन्‍दह सै जीवधर दौ।। सोने सुतो शिव अनाथौ पचही जजिवालसै जीवे दौ।। अनाथ सुता श्री हरि हरिकेश महादेवा: पालीसै रति दौ रति सुतोटेकीक: खौआल सै अमाई दौ फनदहसै चान्‍द द्दौणा श्री हरि सुतो यदुनाथ: खण्‍डबालासै नोने दौ (20/0) अपरा राजू सुता लान्हि शूज रूचि लवे (50/0) वरेवासै भोम दौ।। शूज सुतो मित्रकर सोमो खौआल सै गोढि दौ।। सोम सुतो नोनेक: करमहासै दिवाकर दौ।। नोने सुता वभनियाम सै सुधाकर सुत विभाकर दौ जजिवालसै पशुपति द्दौणा दाउँ सुता सरिसव सोदरपुर सै रामचन्‍द्र सुत अच्‍युत दौ (39/08) बावू प्रo र‍त्नपति सुतो रामचन्‍द्र मधुसूदनो करमहासै लक्ष्‍मीघर दौ (105/108) (105) दुबन  (42/06) (52/03) दुबन सुतो लक्ष्‍मीघर मनोधरौ (107/09) एकहरा सै कृष्‍णपति दौ (37/05) (49/0) कृष्‍णपति सुतो रविपति इन्‍द्रपति (53/07) (132/06) पालीसै गोढ़े दौ (21/03) खौआल सै रघुनाथ द्दौणा लक्ष्‍मीधर सुतो नारायण: (51/0) नरउनसै गीरू दौ (25/0/) माण्‍डरसै बसाउन द्दौणा रामचन्‍द्र (77/0) सुतो अच्‍युत वनमाली कौ हरिअमसै हिंगु दौ (27/05) मधुकर सुता मितू (85/09) छीतू प्रo जीवे चान्‍दा कुजौलीसै मधुकर सुत मतिकर दौ सोदरपुरसै बासुदेव द्दौणा मितू सुतो रतिदेव हरिदेवौ एकहरासै राम दौ (40/05) अपरा महाई सुता (80/0) रतनू राम वेणी चान्‍दा: सोदरपुरसै मo मo देवनाथ दौ (37/08) पालीसै यशु द्दौणा (90/02) राम सुतो रघुपति माण्‍डरसै शंकर दौ (223/06) बेलउँच नोने द्दौणा हरिदेव सुतो चिन्‍तामणि हिंगु कौ सरिसब सै जानू दौ (41/07) अपरा जुड़ाउन सुता माधव (230/03) गोविन्‍द जानूका बहेराढ़ी सै रूचिकर दौ (39/07) माण्‍डर सै जोर द्दौणा जानू (63/02) जानू सुता माण्‍डर सै शिव सुत शंकर दौ पबौली सै माधू द्दौणा हिंगु सुतो विश्‍वनाथ: माण्‍डर सै यदुनाथ दौ (31/09) गंगापति सुतो (156/06) जीवे यशोधर मुरारि गणपतिय: सोदरपुर सै देवे सुत अन्‍दू दौ घुसौतसै गुणाकर द्दौणा यशोधर सुतो दामोदर: बेलनउँच सै आदित्‍य दौ (35/03) गौरीश्‍वर सुता आदित्‍य कमल भमरू का: पण्‍डुआ सै रामकर दौ (29/0/0) रामकर सुतौ लड़ावन नोने कौ गंगोर सै शिवनाथ दौ (17/0) टकबाल सै सोनमनि द्दौणा आदित्‍य प्रo अदितू सुता मण्‍डन रघुपति विष्‍णुपति शिरू का करमहासै हरि दौ सकराढ़ीसै लान्हि द्दौणा दामोदरसुता यदुनाथ चतुर्भुज (61/09) प्रितिनाथ (109/0) गोप मुशायका हरिअमसै देवनाथ दौ।। (106) ।।45।। (42/0) सोनी सुतो देवनाथ रूपनाथौ गंगोर सै जोर दौ।। देवनाथ सुता माण्‍डरसै नन्‍दन सुत रघु दौ करo जागे द्दौणा यदुनाथ (85/02) सुता घनश्‍याम बालानाथ मधुसूद मo उपाo पद्यापतिय: करमहासै हरपति दौ (42/07) माधव सुता हरपति मुरारि (82/0) जाना सोदरपुरसै थेघ दौ (30/03) थेघ सुता सकराढ़ीसै मतीश्‍वर दौ (39/0/0) अलयस हेलू द्दौणा हरपति सुतो रामकृष्‍ण (60/05) सकराढ़ी सै श्री नाथ दौ (05/08) गुणे सुता बसावन बुद्धिकर अन्‍दूका बहेराढ़ीसै वाराह दौ (25/02) माण्‍डरसै रघुपति द्दौणा बसाउन सुता (80/07) भवनाथ रूचिनाथश्रीनाथ जीवनाथा: पालीसै वेणी नाथ दौ (42/02) अपरा परमगुरू पदांकित वाचस्‍पति (65/09) सुता महो वेणीनाथ रघुनाथ महामहो (58/07) पाध्‍याय नरहरिय (62/0) पबौली सै हरदत्त सुत रूद दौ दोस्‍ती सै जीवे द्दौणा महो वेणीनाथ सुता हरखू सिद्धि गाइ लाखू गौरी श्रीदत्ता दरिहरा सै महादेव सुत देहरि दौ नरउनसै बागू द्दौणा श्रीनाथ सुता बुधवाल सै कृष्‍ण दौ (11/03) गणेश्‍वर सुता मिश्र भरथी सोने नरहरिय: बेलउँच सै महादित्‍य दौ (10/05) माण्‍डर सै गोपाल द्दौणा सोने सुता रघुपति पाँ श्रीपति विदूका तल्‍हनपुर सै गढ़लयसुत भानुकर दौ दरिहरा सै गाइ द्दौणा रघु सुता कृष्‍ण वेणी माधव गोपीका खौआलसै श्रीधर सुत हिरदू दौ जजिवाल सै पशुपति द्दौणा कृष्‍ण सुतो मधुसूदन: सरिसब सै भोगेसुत धनपति दौ पनिचोभसै अदितू द्दौणा अच्‍चुत सुतो रत्‍नाकर: परहरस शदीसै पुरूषोत्तम दौ (43/07) धीरू सुतो रूपधर: नरउनसै रतिपति दौ (09/0/0) बहेराढ़ी सै ठ. गणपति द्दौणा रूपधर सुतो रामभद्र: बहेराढ़ी सै (107) सै सोने सुत महाई दौ (25/03) महाई सुता खौआल सै धारू सुत गाइ दौ पालीसै गाइ द्दौणा मo मo उo रामभद्र सुता महो (111/06) भवदेव मo मo ज्‍योतिर्विद यदुनाथ (78/07) कविन्‍द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहासै विद्यापति दौ (42/06) अपरा (53/07) राम सुतो विद्यापति माण्‍डरसै यग्‍यपति दौ (32/07) अपरा यग्‍यपति (73/06) सुता बुधवाल चान्‍द दौ (37/03) अपरा चान्‍द (86/04) सुता दरिहरा सै पद्मकर दौ (11/09) तल्‍हनपुर सै गढ़वय द्दौणा विद्यापति सुता (109/06) सुता दरिo माधव दौ (25/07) (48/04) माधव सुतागुण (138/05) नन्‍दार हरिहरा: (84/03) हरिo मधुकर दौ (16/03) गुणे सुतो मधुकर माधवो दरिहरासै यटाधर सुत सुपन दौ फनन्‍दह सै गयन द्दौणा मधुकर सुता फविकर ठकरू अन्‍इ गणेश बासुदेवा सोदरपुर सै भासे दौ (32/09) सतलखासै यटाघर सुत सुपन दौ फनन्‍दह सै गयन द्दौणा मधुकर सुता फविकर ठकरू अन्‍इ गणेश बासुदेवा सोदरपुर सै भासे दौ (32/09) सतलखासै शंकर द्दौणा कविन्‍द्र पदां. मo मo रघुनाथ (75/06) सुतो पुरूषोत्तम सोदरo यदुनाथ दौ (28/09) भीम सु यदुनाथ श्री नाथ (86/09) (74/06) कुनाई का गोधुलि अलयसै देवनाथ दौ।। (32/09) देवनाथ सुतो बलभद्र (88/03) पवौलिसै बासुदेव दौ (30/08) रविदत्त सुतो (56/08) रविदत्त सुतो महो (61/08) महनूकौ दरिoगाढि़ वेणी सुतो बासुदेव: खौआल सै दिनकर दौ पालीसै गोढि द्दौणा बासुदेव सुता टकबालसै कोने दौ (23/04) अपरा रतिकर सुतो चाण (87/05) इन्‍द्रो वलियास हरिपाणि सुत विशो दौ सरिo सोने द्दौणा इन्‍द्र सुता नोने कोने दूबे (132/02) चौबे अन्‍दूका माण्‍डर सै होरे दौ (19/02) नरउन सै खांतू द्दौणा  (62/08) कोने सुता विष्‍णुपति कृष्‍णपति रतिपति शंकरा कसराढ़ी सै रूचिकर दौ (34/0) अपरा रूचिकर सुता बेलउँचसै होरे दौ (30/07) सोदरपुर सै कान्‍ह दौहित्र दौ (93/03) २.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य 

एखन  ठाम  जकर,तकर  तनिकर  अछि 

अग्राह्य  अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original poem in Maithili  by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 JulOriginal poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The Invisible Fence Of The Colours Of My Heart The invisible fence of the colours of my heart The collapsing walls of emotions Pillars of rigidity standing firm The granary of archived desires is full Symbolising The Himalayan wooden temple at home Or the Tulasi tree at the passage Only depicts good virtues The borders of wells and high bank of ponds The blue walls of the swimming pool Making colour of water azure The invisible fence of the colours of heart Crumbling The pillar of the rigidity stands Flowing १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल जा' रहल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे।कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)-लेखक गजेन्द्र ठाकुर Combined ISBN No.978-81-907729-7-6विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:  Language:Maithili  ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)  (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) 

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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com  website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:1) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा मुख्य पृष्ठ डिजाइन: विदेह:सदेह:1 ज्योति झा चौधरी विदेह ई-पत्रिकाक साइटक डिजाइन मधूलिका चौधरी (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस), रश्मि प्रिया (बी.टेक, कम्प्यूटर साइंस) आ प्रीति झा ठाकुर द्वारा। (विदेह ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ http://www.videha.co.in/ पर ई-प्रकाशित होइत अछि आ एकर सभटा पुरान अंक मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल वर्सनमे साइटक आर्काइवमे डाउनलोड लेल उपलब्ध रहैत अछि। विदेह ई-पत्रिका सदेह:1 अंक ई-पत्रिकाक पहिल 25 अंकक चुनल रचनाक संग पुस्तकाकार प्रकाशित कएल जा रहल अछि। विदेह:सदेह:2 जनवरी 2010 मे आएत ई-पत्रिकाक26 सँ 50म अंकक चुनल रचनाक संग।) Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size) विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- (add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.30/- per copy for outside Delhi) BOTH VERSIONS ARE AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ http://videha123.wordpress.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ. Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website:http://www.shruti-publication.com e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह।  Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तक सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक,सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी छमाही पत्रिका,सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन २.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ३.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ४.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- ५.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुरमूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ$४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ६.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रो.१००/- ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (ISBN NO.978-81-907729-0-7 मूल्य रु.१२५/- यू.एस. डॉलर ४०) आ पेपरबैक(ISBN No.978-81-907729-1-4मूल्य रु. ७५/- यूएस.डॉलर २५/-) १२.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा" १३. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: :देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- १४. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु)ISBN978-81-907729-9-0 COMING SOON: 1.मिथिलाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल 2.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरनमैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल।पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। 3.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) 4.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी Details of postage charges availaible onhttp://www.shruti-publication.com/  (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.)

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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक एहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रि‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना। २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। ४९.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili 692 pages : Price INR Rs.100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) 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