VIDEHA — Issue 44 / अंक ४४

Publication: VIDEHA · Issue: 44
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169 'विदेह' ४४ म अंक १५ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४४) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल-मिथिलाक बेटी-(नाटक) २.२. अनमोल झा- लघुकथा-युगान्त २.३.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-जिनगीक जीत २.४.कथा-पहिल चिट्ठीकुमार मनोज कश्यप २.५.हेमचन्द्र झा-कुंठा २.६.पंचानन मिश्र-मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा २.७.पंचानन मिश्र-विद्यापति जयन्‍ती (31 अक्‍टूबर 09) क अवसर पर-मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ २.८. सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा- गोपाल प्रसाद ३. पद्य ३.१. गुंजन जीक राधा-तेरहम खेप ३.२.पंकज पराशर-वसीयत ३.३.सुबोध कुमार ठाकुर-सुन्न लागए गाम ३.४.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)-आगाँ ३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-६ ३.६.सतीश चन्द्र झा-मैथिल ३.७.रूपेश कुमार झा ’त्योंथ'-खेली सप्पत जा भुइयाँ थान ३.८.विनीत  उत्पलक दू टा टटका कविता ४. मिथिला कला-संगीत-कल्पनाक चित्रकला ५. गद्य-पद्य भारती -पाखलो (धारावाहिक)-भाग-७- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह ६. बालानां कृते-देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)२.कल्पना शरण:देवीजी. ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original poem in Maithili  by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York 8.2. Original Maithili Poem by Sh.Ramlochan Thakur, translated by Gajendra Thakur 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।  http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal athttp://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'। मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"। विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय श्री उदय नारायण सिंह नचिकेताकेँ कीर्ति नारायण मिश्र सम्मान 2009 सँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। चयन प्रक्रियाक तेसर चरणमे तीन सदस्यक निर्णायक मंडल हुनकर नाटक नो एण्ट्री:मा प्रविश लेल हुनका ई सम्मान देबाक निर्णय कएलक अछि। एहि सम्मानमे 11,000 टाका, प्रतीक चेन्ह, अंगवस्त्रम आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि। हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कार रुमानियामे जनमल जर्मन लेखिका हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेल अछि। १९५३ ई.मे जनमल मुलर निकोल चौसेस्कूक शासनक अप्रिय परिस्थिक निरूपणक लेल बेस चर्चित छलीह। स्टॊकहोमक स्वेडिश एकेडमी कहलक अछि जे हुनकर गद्य आ पद्य दुनू प्रशंसनीय अछि। एकेडमी कहलक अछि जे लेखिका गरीब-गुरबाक परिस्थितिक वर्णनमे पारंगत छथि। रुमानियाक जर्मन अल्पसंख्यक समुदायमे जनमल मुलर १९८७ ई. मे जर्मनी आबि गेलीह। १९८२ ई. मे हुनकर पहिल जर्मन भाषाक लघु-कथा संग्रह नादिर्स रुमानियाक जर्मन भाषी गामकेँ केन्द्रित कऽ कथा कहैत अछि, ई पोथी रुमानियामे प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। तकर बाद ओप्रेसिव टैंगो प्रकाशित भेल। मुलर मात्र अपन मातृभाषा जर्मनमे लिखैत छथि। हुनकर द एप्वाइन्टमेन्ट उपन्यास फ्लैशबैकमे भूतकालक वर्णन करैत अछि जखन ओ ट्रामसँ रोमानियन पुलिसक इन्टेरोगेशन लेल जाइत छथि। हुनकर स्विन्गिंग ब्रेथ उपन्यास हुनकर नव्यतम रचना अछि। हुनकर पिता द्वितीय विश्वयुद्धमे भाग लेने छथि आ हुनकर माता पाँच बर्ख धरि सोवियत वर्क कैम्पमे कटने छथि। हुनकर आन पोथी सभमे द पासपोर्ट, द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स आ ट्रैवलिंग ऑन वन लेग अछि। आत्म-केंद्रित आ आइ-माइमे लागल अमेरिकी साहित्य लेल साहित्यक नोबल पुरस्कारक लगातार तेसर बर्ख यूरोपकेँ जाएब एकटा चेतौनीक रूपमे देखल जा रहल अछि। नोबल पुरस्कार 2009-वेंकटरमन रामकृष्णन भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक वेंकटरमन रामकृष्णनकेँ 2009 ई.क रसायनशास्त्रक नोबल पुरस्कारसँ संयुक्त रूपसँ सम्मानित कएल गेल अछि। हुनका ई पुरस्कार हुनकर एहि रिसर्च लेल जे सभ सेलमे जीनक ब्लूप्रिंट होइत अछि जकरा राइबोजोम जीवित पदार्थमे बदलैत अछि जे प्रोटीन बनबैत अछि। एहिसँ एंटीबायोटिक रिसर्चमे प्रगति होएत। अल्मोड़ा, उत्तराखण्डमे जनमल रोनाल्ड रॉसकेँ हुनकर मलेरियापर खोज लेल 1902ई.मे मेडिसीनक नोबल भेटल। बम्बैमे जनमल ब्रिटिश रुडयार्ड किपलिंगकेँ 1907 ई.क साहित्यक नोबल भेटल। 1913 ई. मे रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ गीतांजली- (बांग्ला पद्य-संग्रह) लेल जकरा संवेदनशील, नव आ सुन्दर पद्य कहल गेल रहए-साहित्यक नोबल भेटल रहए। 1930 ई. मे चन्द्रशेखर वेंकटरमन केँ भौतिकीक नोबल- "प्रकाश किरणक बिन नमरएबला पसार"पर देल गेल। 1968 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक डॉ. हरगोविन्द खुरानाकेँ मेडिसीनक नोबल हुनकर गेनेटिक कोडक विश्लेषण आ ओकर प्रोटीन- संश्लेषण संबंधी कार्यपर देल गेल। 1979 ई. मे अल्बानिया मूलक भारतीय नागरिक मदर टेरेसाकेँ शांतिक नोबल हुनकर गरीबी आ दुखसँ संघर्ष लेल- जे शांतिक लेल खतरा अछि, देल गेल। अविभाजित भारतमे जनमल अबदुस सलामकेँ इलेक्ट्रोवीक यूनीफिकेशन पर 1979 ई. मे भौतिकी नोबल भेटल। 1983 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक सुब्रह्मण्य़म चन्द्रशेखरकेँ भौतिकी नोबल तरेगणक सैद्धांतिक स्वरूप आ निर्माण-विसाकपर देल गेल। 1998 ई.क अर्थशास्त्रक नोबल भारतीय अमर्त्य सेनकेँ कल्याणकारी अर्थशास्त्र लेल देल गेल। 2001 ई. मे साहित्यक नोबल भारतीय मूलक त्रिनिदादमे जन्मल ब्रिटिश वी.एस.नैपॉलकेँ भेटल। 2007 ई. मे संयुक्त राष्ट्र संघक मौसम परिवर्तनक पैनेलकेँ शांतिक नोबल भेटल जकर अध्यक्ष आर.के.पचौरी छलाह। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ अक्टूबर २००९) ८६ देशक ९३१ ठामसँ ३१,२२० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,०२,८२२ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078  ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल-मिथिलाक बेटी-(नाटक) २.२. अनमोल झा- लघुकथा-युगान्त २.३.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-जिनगीक जीत २.४.कथा-पहिल चिट्ठीकुमार मनोज कश्यप २.५.हेमचन्द्र झा-कुंठा २.६.पंचानन मिश्र-मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा २.७.पंचानन मिश्र-विद्यापति जयन्‍ती (31 अक्‍टूबर 09) क अवसर पर-मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ २.८. सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा- गोपाल प्रसाद जगदीश प्रसाद मंडल नाटक 

मिथिलाक बेटी

- जगदीश प्रसाद मण्डल मिथिलाक बेटी नाटक

ःः पात्र परिचय:ः

पुरुष पात्र

1. कर्मनाथ प्रशासनिक अफसर 45 बर्ख 2. सोमनाथ कर्मनाथक पिता 65 बर्ख 3. रामविलास सेवा निवृत्ति मिस्त्री 61 बर्ख 4. विकास सेवा निवृत्ति शिक्षक 70 वर्ख 5. नूनू कर्मनाथक भाइ 30 बर्ख 6. लालबाबू कर्मनाथक भाइ 25 बर्ख 7. श्रीचन किसान 45 बर्ख 8. फुलेसर कर्मनाथक बेटा 17 बर्ख 9. राधेश्याम बोनिहार 35 बर्ख

नारी पात्र

1. चमेली कर्मनाथक पत्नी 41 बर्ख 2. आशा कर्मनाथक माए 63 बर्ख 3. माधुरी रामविलासक पत्नी 58 बर्ख 4. चम्पा कर्मनाथक बेटी 19 बर्ख 5. जुही कर्मनाथक बेटी 14 बर्ख 

पहिल अंक  (कर्मनाथक डेरा। बहराक कोठरी मे कर्मनाथ) कर्मनाथ : (घड़ी देखि) पौने पाँच बजि रहल अछि, किऐक ने अखन धरि बच्चा सब पढ़ि कऽ आयल। भऽ सकैत अछि जे बाट मे किछु देखए लगल हुअए। ओना हमहँू आन दिन पाँच बजेक बादे आॅफिस स अबैत छलहुँ, मुदा आइ किछु पहिनहि आबि गेलहुँ। कोना नै अबितहुँ, आन दिन तते काज रहैत छल जे ओकरे निपटबै मे अबेर भ जाइत छल, मुदा आइ त महगीक बिरोध मे, कर्मचारी सबहक हड़ताल, आॅफिसे बन्न कऽ देलक। खैर जे होय, किछु काल मे ते सब आबिये जायत। (कहि कुरसी पर बैसि अखबार पढ़ै लगैत) (चम्पा आ चमेलीक आगमन। दुनू केँ हाथ मे झोरा। एकटा झोरा मे चाउर, दाइल, तरकारी आ देासर मे दूधक डिब्बा, चाय पत्तीक डिब्बा, छोट-छोट पुड़िया मे मसाला, एकटा नोनक पौकेट, आ शीशी मे करुतेल) चमेली : बजार मे आगि लगि गेल अछि। बाप रे बाप, ऐना कतौ महगी आबए। (दूधक डिब्बा निकालि) जे बौस कीनै ले जाउ, अग्गह से बिग्गह दाम। कोना लोक कोनो चीज खायत। जे दूधक डिब्बा बीस रुपैया मे कीनै छलौ, आइ अट्ठाइस रुपैया मे देलक। जे चाहक डिब्बा (डिब्बा देखबैत) दस रुपैया मे दइत छल ओकर दाम बारह रुपैया लेलक। कोनो की एक्के-दुइये टा चीजक दाम बढ़ल, सब चीजक दाम अकास ठेकल जाइ अए। तोहूँ मे नोकरियाक जिनगी ! सब चीज पाइये हाथे हैत। साल मे एक्को दिन ऐहेन अबन्च नइ रहए अए जइ दिन ककरो नै ककरो तकेदा नइ सुनै छी।

कर्मनाथ : कते अनघोल केने छी। बजैत-बजैत होइ अए जे बताहि भ जाय। जत देखू तते महगीक चर्च। बजैत त सब अछि जे देशव्यापी महगी भ गेल। मुदा एकटा बात कहू जे महगी कतऽ स आयल। ओकरा अबैत कियो ने देखलक। अगर जँ अकासक रास्ता स हवाइ जहाज पर आयल ते ओकरा हवाइये फिल्ड पर किऐक ने रोकल गेल। जँ से नहि पाइनिक रास्ता स आयल ते पनिया जहाज के बन्दरगाह मे ढ़ूकै किऐक देल गेल। जँ सेहो नहि, माटिएक रास्ता स आयल ते ओकरा सीमाने पर ने किअए रोकल गेल। मुदा से त किछु नहि भेल, तखन कोन दोग देने, चोर जेँका, महगी चलि आयल। जे एत्ते नमहर देश मे, एत्ते लोक के एक्के बेरि चद्दैर जेँका, ओढ़ा देलक। 

चमेली : अहाँ अहिना नोन- तेल मिला, बात के बतंगर बना बजै छी। एतबो नइ बुझै छियै जे बड़का-बड़का लोकक कहब छै जे अधिक उपजाबाड़ी भेला स चीजक दाम कम होइ छै आ कम भेने दाम बेसी होइ छै। जइ स दामक घटती-बढ़ती होइ छै। सदिखन रेडिओओ मे कहै छै। आ अखबारो मे लिखै छै जे खेतो आ करखन्नो मे बेसी पैदाबार भेल हेँ। तखन इ महगी किअए भेल?

(माएक बाँहि पकड़ि, डेालबैत) चम्पा : गे माए, तू जे कहलीही उ सोझका बात कहलीही, जे हमहू हाइये स्कूल से पढ़ैत एलहुँ। मुदा अइ के तर मे असल बात अछि। बड़का-बड़का पाइबला व्यापारी सब जे अछि ओ खेतोक उपजा आ करखन्नोक बौस के कीनि लइ अए आ ओकरा नमहर-नमहर गोदाम (जे माइटिक उपरो, आ माइटिक तरो मे बनौने अछि) मे डिक दइ अए। जइ से बौस घेरा जाइ अए। घेरेला से बौस निग्हटि जाइ अए। तखन जा कऽ ओ सब (व्यपारी) कनी-कनी क कऽ बौस के निकालि-निकालि महग क कऽ बेचइ अए।

चमेली : (मुह चमकबैत) गोदाम मे जे बौस नुकबै अए, ओकरा लोक (जनता आ सरकार) नै देखै छै।

चमपा : ऊँह, गे तेहेन ठीमन के रख्ैा छै जे लोकक कोन बात जे कानूनो ने देखै छै। ओ सब करैत कि अछि जे बड़का-बड़का पनिया जहाज मे समान लादि के समुद्र मे ठाढ़ क दइत अछि। ततबे नहि, जे बौस माइटिक उपरको गोदाम मे रहै छै, ओकरा तेहेन कानूनी पेंच लगा दइत अछि जे ओ देशक छी की विदेशक, से बुझबे ने करबीही।

चमेली : (पति स) अहाँ हाकिम छियै कि माइटिक मुरुत। मोटका-मेाटका जे कानूनक किताव सब रखने छियै, ओ झींगुर खाइ ले। जखैन कानून हाथ मे अछि, पुलिस अछि, जहल अछि तखन ओकरा सब के छुट्टा खेलाइले छोड़ि देने छियै। पैछला खेप (सात दिन पहिने) अढ़ाय सौ मे जते समान भेलि रहए ओतबे समान कीनै मे आइ तीनि सौ लागल हेँ अहाँ नोकरिया छी अहूँक दरमाहा एहिना बढ़ैत अछि।

कर्मनाथ: कते, खापड़िक मकई जेँका, भरभराइ छी। होइ अए जे हम खूब बजनता छी।

चमेली : उलटे चोर कोतबाल के डाॅटे। अहीं हमरा पर आखि लाल-पीअर करै छी। एतबो आखि उठा कऽ नइ देखै छियै जे अहाँ के एते दरमाहा अछि, तखन इ रामा-कठोला अछि, जे बेटी विआह करै जोकर भेलि जाइ अए मुदा हाथ मे एकोटा फुटल कौड़ी नै अछि। (कर्मनाथ नमहर साँस छोड़ैत) अहींक आॅफिस मे जे कम महीना पबैवला संगी सब छथि, हुनका सब के की दशा होइत हेतनि। तहू मे कम महीना पौनिहार के धियो-पूतो बेसी होइ अए। जइ से परिवारो नमहर रहैत अछि।

(चमेलीक बातक गंभीरता कऽ अकैत कर्मनाथ तीनि बेरि चमेली कऽ उपर स निच्चा धरि देखि) कर्मनाथ: बड़ सुन्दर बात अहाँ बजलहुँ, मुदा हम ते पढ़बे केलहुँ नोकरिये करै ले। जे आइ बुझै छी भूल भेल। जना हम मीनबाला परिवार क छी तना हमरा खेतीक संबंध मे पढ़ैक चाहै छल। जते धन माइटिक तर मे साले-साल बिला जाइत अछि ओकर चैथाइयो नोकरी मे नइ कमाइ छी। ततबे नहि, जाधरि सब अप्पन-अप्पन गामक सम्पत्ति के नहि जगाओत ताधरि आन ठाम से जे सम्पत्ति आओत, ओ या त भीख बनि क आओत वा कर्ज बनि क। खैर जे होय! हँ, ते कहैत छलहुँ जे लगले त हम्मर दरमाहा बढ़त नहि। तखन ते दुइये टा उपाय, दिवस गुजारैक अछि। पहिल अछि जे जेहन चीज-बौस कीनै छलौ, तइ स कनी झुस (दब) कीनू चाहे जेहेन कीनै छलौ तेहने कनी कम क कऽ कीनू। जँ से नइ करब ते पाओल जायब। करजा तर मे पड़ब। अइ ले एते आमील किअए पीबै छी। महगी कि कोनो हमरे-अहाँ टा ले भेलि हेँ, जे एते आफन तोड़ै छी। आ कि सब ले भेलइ अए। जहाँ धरि हाकिमक बात अछि, हाकिमक मतलब इ नहि ने अछि जे, जे मन फुरत से क देबइ। महगी रोकब हमरा सबहक बुताक बात छी, जे रोइक देबइ। जेकर हम नोकरी करै छियै ओकरे काज छियै महगी आनब।

चमेली : तखन झुठे एते लाम-काफ किअए देखवै छियै?

कर्मनाथ: (मुस्की दैत) दरमाहा तरे देखबै छियै। जे होइ छै ओ देखियौ। जखन अकासे फाटल अछि ते कते सीबै। तखन ते मेघ तरकै छै ते कियो अपना माथ पर हाथ दऽ ‘साहोर-साहोर’ करैत अछि। (चम्पा से) बुच्ची, चीज-बौस घर मे रक्खू। (दुनू झोरा उठा चम्पा जाइत अछि) अच्छा एकटा बात कहू जे आन दिन बाजार से सबेरे अवैत छलहुँ, आइ किऐक एत्ते अबेर भेलि

चमेली : (अकचका कऽ) से नइ बुझलियै। 

कर्मनाथ: कहबै तब ने बुझबै। हम कि कोनो भगवान छी जे बिनु सुननहुँ, सुनि जायब। चमेली : परसुका गप छियै। बजार मे एकगोटेक बेटीक विआह छलै। बनारस से बरिआती आयल छलै। बरिआतियो लाजबाब छलै। मौगी-मरद सब छलै। खूब निम्मन बैंड पाटी सेहो छलै। बैंड-पाटी मे छौड़हरे कौरनेटिया छलै। कहाँ दन ओकरा मेाछक पम्ह अबिते छलै। 

कर्मनाथ: कोन खेरहा पसारि देलियै?

चमेली : ऐँह, एतबे मे अगुताइ छी । अस्सल बात त आब अछि। खाली सुनैत रहियौ। बड़ी बजनतिरी ओ छैाँड़ा छलै। बैंड-पारटीक संग बरिआतियो (मौगी-मरद) आ बजारोक छैाँड़ा-छैाँड़ी सब खूब नाचल। ओहि कौरनेटियाक संग, बजार मे रस्ताक पछबारि भग जे बड़का गद्दी छै, ओकर बेटी चलि गेलइ।

कर्मनाथ: तब ते अेाकरा बाप के, बेटीक विआह मे एक्को-पाइ खरचो ने भेल हेतइ। चमेली : अहाँ ते अहिना आगुऐ से लोइक लइ छियै। सुनियौ, कहाँ दन ओ छैाँड़ा (कौरनेटिया) नोकरी करै अए। ओइ छैाँड़ी के माए-बाप कतबो रोकलकै, ओ किन्नहु नहि मानलकै। ओकरे संगे चलि गेलइ।

कर्मनाथ: ओ लड़की केहेन छलै?

चमेली : ओइह सब बजै छलै जे ओ (लड़की) कओलेजो मे पढ़ैत छलै आ नाचो सिखै छलै। (अफसोस करैत) से देखियो जे ओइ छैाँड़ीक गुजर ओहि कौरनेटियाक संग कोना चलतै। कहाँ अेा धनी-मनीकक बेटी आ कहाँ ओ गरीब घरक कौरनेटिया।

कर्मनाथ: (मुस्की दइत) गुजर किअए ने चलतै। एकटा बजनत्री अछि दोसर नचनिया। दुनू मिलि कऽ एकटा पार्टी ठाढ़ क लेत आ गामे-गाम नाचत। (तहि बीच फुलेसर आ जुहीक आगमन। दुनूक हाथ मे किताब) (बेटा स) बौआ आइ बीस तारीक भ गेल। एक तारीक के गाम चलब। तइ बीच तू दुनू भाय-बहीनि (स्कूल कओलेज मे) दरखास्त द कऽ दू मासक छुट्टी ल लिहह।

फुलेसर : बावू, अगिला मास से एक घंटाक स्पेशल क्लास चलतै। ओ ते छुटि जायत। तेँ, मन होइ अए जे हम एतै रहि जइतौ। 

कर्मनाथ: विचार त बड़ सुन्दर छह, मुदा असकर रहब नीक हेतह(बिचहि मे चमेली पति स)

चमेली : अहाँ ते दोसर गप करै लगलहुँ। एकटा गप सठवे ने कयल आ दोसर लाधि देलियै।

कर्मनाथ: अहाँ अपना बात के थेाड़े पछुआइ देवइ। हमही अपना बात के पाछु क लइ छी। बाजू... ..। चमेली : हँ, ते वरिआतीक गप्प कहै छलौ ने। उ ते कौरनेटियाक कहलौ। अहू से चोखगर गप आरो अछि।

कर्मनाथ: (मुस्कुराइत) ओइ मे कने तेतरीक रस मिला देबइ।

चमेली : अहूँ ते हद छी। स्त्रीगणक बात के कोनो मोजरे ने दइ छियै। कर्मनाथ: छुछे मोजर देने की हैत। ओ फड़बो करै तब ने। 

चमेली : बुझै मे अहूँ बिहाड़िये छी। नट्ठा होइ अए पुरुख आ कहिऔ मौगी के। अनरनेवा गाछ देखलियै हेँ। मरदनमा गाछ खाली फुलेबे करैत अछि फड़ैत नहि अछि। मुदा मौगियाही गाछ जते फुलाइत अछि तते फड़बेा करैत अछि। हँ, ते सुनू बरिआतीक दोसर गप। बरिआती आबि दुआर लगलै। दुआर लगि, जखन बैठकी मे बरिआती वैसल ते बरक बाप कहलकै जे पहिने दारु पीबि, डान्स करब तकर बाद विआहक कोनो विधि-वेबहार हैत। मुदा घरवारी ओ बात मानै ले तैयारे ने भेल। दुनूक (बरिआती आ घरवारिक) बीच रक्का-टोकी शुरु भ्ेाल। दुनू मे से कियो पाछु हटै ले तैयारे नहि। ओमहर बैंड बाजा गड़गड़ाइते रहै। दुनूक बीच कहा-कही होइत-होइत पकड़ा-पकड़ी भ गेल। पकड़ा-पकड़ी होइतहि पटको-पटकी आ मुक्को-मुक्की शुरु भेल।

कर्मनाथ: (हॅसैत) बाह-बाह, तखन ते कुरथी दउन (दौन) हुअए लगल हैत।

चमेली : अहाँ ते बाजै ने दइ छी, विचहि मे लोइक लइ छियै। पटका-पटकी करितहि टेन्टक बाँस घीचि-घीचि एक-दोसर के मारै लगल। कते के कपार फुटलै। तहि बीच हड़हड़ा कऽ टेन्ट खसल। सब ओइ तरे मे झँपा गेल। ककरो निकलियेे ने होय। जहिना महजाल मे माछ फँसैत अछि, तहिना।

कर्मनाथ : मरदे-मरदी सब रहै कि मौेगियो सब रहै।

चमेली : सब रहै की। कतऽ के ओंघराइल रहे से कोइ देखइ। बड़ी कालक बाद गौँआ सब समेना हटौलक। समेना तर मे जते गोटे रहै सब गरदा स नहा कऽ गरदे रंग मे रंगि गेल। पी के सब बुत्त रहबे करै। टगैत-टुगैत सब (बरिआती) निफाहे मे जा-जा बैसल। थोड़े खान जब हवा लगलै तब बारह गेाटे (बरिआती) अप्पन-अप्पन बैंग-एटेंची ल-ल जाइ ले तैयार भ गेल। घरवारी सब गुहरिअबै लगल। मुदा कियो मानै ले तैयारे ने।

कर्मनाथ : तब ते बेचारे बरिआती सब के नइ सुतरलै।

चमेली ः ऐँह, एतबे भ्ेालइ। जते बजरुआ पौकेटमार सब रहे सब सबहक (बरिआतीक) रुपैइयो, मोबाइलेा आ आनो-आनो चीज छीनि के निकलि गेल। रौतुका मसीम रहबै करै।

कर्मनाथ: बरिआतीक सोखड़ि ओराइल कि आरो अछि।

चमेली ः एतबे मे अगुता गेलहुँ। अच्छा, एकटा आरो कहि दइ छी। बरिआती सब तते छुुड़छुड़ी आ फटाका अनने रहे जे दुआर पर पहुँचते, गदमिशान उठा देलक। लड़कीक नन्ना, ओहि काल, पैखाना गेल रहथि। एकटा बड़का फटाका ओहि पैखाना कोठरीक देवाल मे, एकटा बरिआती मारलक। से कहाँ दन ओ फटाका (बम) गुंगुंआ के तते जोर से अवाज केलकै जे ओ बेचारे धड़फड़ा कऽ भगै लगल। केबाड़ बन्न रहै। वेचारेक होश त उड़ि गेल रहनि, देवाले मे टकरा गेलाह। कपारो फुटि गेलनि आ चोट स चोन्ह आबि गेलनि। चोन्ह अबिते तिलमिना के खसलाह कि दहिना पाएर पैखानाक नाली मे फॅसि गेलनि बड़ी कालक बाद जखन दोसर गोरे पैखना जाय लगलाह कि केबाड़ बन्न देखलखिन। थोडे़ काल ओतइ ठाढ़ रहथि, मुदा कोनो सुनिगुनि नहि बुझि हल्ला केलखिन। तखन केबाडक छिटकिल्ली अलगाओल गेल। केबाड़क छिटकिल्ली अलगबिते, बुढ़ा के अचेत-भेल पड़ल देखलखिन।

कर्मनाथ : (हँसैत) तब ते बिआहक संग सराधेाक जोगार लगि गेलनि। चमेली ः अहाँ ते अहिना अनका दुख के दुखे ने बुझै छियै।  कर्मनाथ: हम की अहाँ जेँका अनकर सुख देखि कऽ थेाड़े नचै छी। सुख-दुखक बीच जिनगीक रास्ता छैक। तेँ, जिनगी जीवैक लेल सुख-दुख अंगेज कऽ चलए पड़ैत छैक। जे यात्री (जातरी) सुख मे मगन भ जायत आ दुख मे विचलित, ओ जिनगीक यात्रा कोना सफर कऽ सकैत अछि। छोड़ू दुनियादारीक गप। अप्पन जिनगीक गप करु। (चम्पाक आगमन) भने चम्पो आबिये गेलि। फुलेसर ः दू मासक छुट्टी ल कऽ की करबै, बावूजी?  कर्मनाथ : चम्पाक विआह करैक विचार से गाम जायब। मुदा तू जे कहने छेलह जे स्पेशल क्लास चलत, तेँ रहि जाइक विचार होइ अए। बड़ सुन्दर विचार छह, मुदा इ बात बुझै पड़तह जे हर मनुष्य केँ पहिल कर्तव्य होइत जिनगीक रक्षा। जीबैत रहबह, तखने बुझि पड़तह जे दुनिया छैक, नहि त किछु नहि। पढ़ैक खियाल से तोहर विचार नीक छह। मुदा एकटा बात कहि दइ छिअ। हम अफसर छी तेँ विशेष अनुभव अछि। अखन अप्पन परिवारक बीच छी, तेँ बजैत एक्को पाइ असोकर्ज नै भ रहल अछि। जँ अखन सरकारक कुरसी पर रहितहुँ वा लोकक बीच, त नहि बजितहुँ। जुही ः बावूजी, कते काल सरकारी आदमी रहै छियै? कर्मनाथ: बाउ, जे सवाल पुछलह, ओकर उत्तर साधारण नइ अछि। अखन परिवारक काजक विचार करैक अछि, तेँ तोरा सवालक उत्तर नीक नहाँति नइ द सकवह। निचेन मे दोसर दिन बुझा देबह। अखन थेाड़े इशारा मे कहि दइत छिअह। अखन जे अपना देशक स्थिति अछि, एहि मे क्यो सुरक्षित नहि अछि। जना सब दिन अपहरणक घटना सुनै छहक। घटना मे की सुनै छहक जे पाइक दुआरे अपहरण (फिरौती) होइ छै। इहो होइ छै। मुदा एतबे टा नइ होइ छै। आखि उठा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे बिनु पाइओवलाक अपहरण होइ छै। ततबे नहि, पाइबला त पाइ द कऽ जानो बचा लइ अए मुदा बिनु पाइवलाक जानक अपहरण होइ छैक। जुही ः इ बात लोक कहाँ बजै अए। कर्मनाथ: लोक के अखवार आ रेडिओ पढ़वै छैक। तेँ, जे अखबार मे पढ़ैत अछि से दोसर के पढ़बैत अछि। मुदा अस्सल बात एहि स आगू अछि। जे थेाड़-थाड़ कहियो रेडिओओ आ अखवारो कहियो दइत अछि आ बेसी नहिये कहैत अछि। हँ, ते कहै छेलियह जे अपहरण भेला पर बिनु पाइवलाक जान नहिये बँचैत अछि। तेँ, इ बात बुझै पड़तह जे के केकर जान लइ ले, खून पीबै ले तैयार अछि से कहब कठिन। (बेटा से) तू कहबह जे अहाँ त गलत काज कहियो ने केलहुँ आ ने करैत छी, तखन हमरा किऐक किछु होयत। मुदा एहि सवालक जबाब बुझै ले एहि बात पर नजरि देमए पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि। धनिकक गरीब आ सुखक विपरीत दुख होइत अछि। मुदा एकरे उलटा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि तहिना राइतियोक विपरीत दिन होइत अछि। तहिना धनिको आ सुखेाक होइत अछि। जुही ः बावूजी, हम इ बात नइ बुझि सकलहुँ जे विपरीतक माने की?  कर्मनाथ : बाउ, अखन हम दोसर काजक गप करै चाहैत छी, तेँ, अखन तोरा प्रश्नक जबाव नीक जेँका नहि द सकबह। मुदा तोरा जे शंका भ रहल छह, अेा हमहुँ बुझि रहल छी। अखन एतबे बुझह जे दिन-राति प्रकृति स जुड़ल अछि, तेँ अेा हेबे करत। एक-दोसरक विपरीत रहबे करत। मुदा धनी-गरीब आ सुख-दुख से नहि अछि।  जुही ः बावूजी, अहाँ जे कहलियै तइ से हमर मन नै मानलक।  (जुहीक बात सुनि कर्मनाथ मने-मन सोचै लगलथि जे जखन हाइ स्कूलक बच्चा के हम संतुष्ट नहि कऽ सकलहुँ, तखन परिवार आ समाज त बड़ नमहर होइत अछि। सोचि-बिचारि)  कर्मनाथ: बाउ, एकठाम भेाज भेलइ। भेाज नै भेलइ, पाँच गोटे आन मुलुक से एक गोटे एहिठाम ऐलखिन। आन मुलुकक रहने नमहर पाहुन भ्ेालखिन। ओ घरवारी (जिनका ऐठाम आयल रहनि) खाइ-पीबैक नीक ओरियान केलनि। आन मुलुकक पाहुन बुझि अपनो दस सवांग केँ खाइक नोत देलखिन। खाइक सब बरतन (थारी,लोटा, गिलास,बाटी,चम्मछ) सोनाक रहैक। खेला-पीलाक बाद अप्पन (घरवारीक) एकटा सवांग एकटा चम्मछ चोरा क जेबी मे रखि लेलक। घरवारी देखि लेलखिन। देखला बाद घरवारीक मन मे दुअए लगलनि जे जँ कहीं पाहुनो सब देखि नेने होथि। मुदा दोसर दिशि अप्पन मुलुक आ सवांगक प्रश्न छलनि। असमंजस मे वेचारे पड़ि गेलाह। तत्-मत् करैत ओ (घरवारी) एकटा मैजिक केलनि। जुही ः खाइये काल मे मैजिक केलनि।

कर्मनाथ : हँ। आगू सुनह। मैजिक ओ इ केलनि जे कहलखिन- जनिका जेबी मे जे वस्तु अछि से हम देखै छी। सभकेँ आश्चर्य भेलनि। अप्पन सवांग दिशि इशारा करैत कहलखिन जे हुनका जेबी मे एकटा चम्मछ अछि। जइ सवांगक नाम कहलखिन, ओ भड़कि उठलनि। दोसर गोरे, जेबी मे हाथ द चम्मछ निकालि टेबुल पर रखि देलखिन। तेँ बाउ, तू जे प्रश्न केलह ओ अहू से नमहर मैजिक अछि। आब तू चुप रहह। आगूक गप बढ़वै दाय। जुही ः भैयाक सवालक जबाव अधखड़ुऐ रहि गेल छनि।

कर्मनाथ : बौआ, समय ऐहन परिस्थिति पैदा क देलक हेँ जे कियो अपना कऽ सुरक्षित नहि बुझैत अछि। सचमुच अछियो नहि। अखन एकटा अपहरणक चरचा केलियह। ऐहन-ऐहन अनेको अछि। एक राज्यक लोक दोसर राजवला के दुसमन बुझैत अछि। दुसमनक संग जेहेन बेबहार होइ छै, से करबो करैत अछि। ततबे नहि, एक सम्प्रदायवला दोसर के दुसमन बुझैत अछि। तहिना एक जाइतिक लोक दोसर के बुझैत अछि। जुही ः तना ओझड़ा-पोझड़ा के कहलियै जे हम किछु बुझबे ने केलहुँ। कर्मनाथ : अप्पन देश विभिन्न राज्य, विभिन्न सम्प्रदाय, आ सैकड़ो जाइत मे बँटल अछि। उपर से सब कहैत अछि जेे हम सब एक देशक बासी छी। तै, मिलि-जुलि के रहैक अछि। मुदा से थोड़े अछि। एक राजवला दोसर राजवला केँ मारि-पीटि, बहू-बेटीक इज्जत लुटि, कमाइल पाइ लुटैक पाछु लागल अछि। तहिना आरो सब अछि। जुही: तइयो अहाँ ओझराइले बात कहलियै।

(एक टक स जुही पर नजरि राखि कर्मनाथ कने काल गुम्म रहि ) कर्मनाथ: बाउ, अखन धरि तू सब शहर-बजार मे रहलह, तेँ नहि देखै छहक। हमरा ते गमैया लोक सब से गप-सप होइ अए किने। सुनह, गाम सब मे की होइ छै; एक जाइतिक लोक (जे बुतगर अछि) दोसर जाइतिक लोकक (जे अब्बल अछि) बहू-बेटी केँ दिन-देखार इज्जत लुटै अए। तहिना एक सम्प्रदाय वला दोसर सम्प्रदायवला केँ। फुलेसर ः (नमहर साँस छोड़ैत) बाबूजी, जे बात अहाँ आइ बिकछा के कहलियै, ओइ बात दिशि हम्मर नजरि आइ घरि नहि गेल छल।  कर्मनाथ: अगर जँ अखन धरि तोहर नजरि एहि बात दिशि नहिये गेल छेलह ते ओहो कोनो बड़ भारी गलती नहिये भेल छेलह। किऐक त अखन धरि तू किताबक बीच रहलह, दुनिया दारीक बात थोड़े बुझै छहक। मुदा एकटा बात पर सदिखन आखि, कान ठाढ़ क कऽ राखै पड़तह जे सिर्फ किताबेक ज्ञान स जिनगी नहि चलैत अछि। जिनगीक लेल दुनू (किताबो आ बाहरियो) ज्ञानक जरुरत होइत अछि। फुलेसर ः बाबूजी, अखन देखै छियै जे छोटका स्कूलक विद्यार्थी स ल कऽ कओलेज धरिक विद्यार्थी, सिनेमा आ खेल-कूदक सब बात जनैत अछि मुदा अप्पन परिवार, समाज आ वंशक विषय मे किछु नहि जनैत अछि। बहुत दिन सऽ मन मे अवैत अछि जे अप्पन परिवारक संबंध मे अहाँ से पूछी। मुदा समयक ऐहेन उटपटँग रुटिंग बनि गेल अछि जे पूछैक गरे ने लगै अए। कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) अपनो इ इच्छा दस वर्ख पहिने से मन मे अछि, किऐक त एहि शरीरक कोनो ठेकान नहि अछि। कुम्हारक बनाओल माइटिक काँच वरतन जेँका मनुक्खेा अछि।  (बिचहि मे) चमेली ः बेटा फुल, एकटा बात आरो जोड़ि दहक जे दू परिवार, दू समाज आ दू वंशक योग स नव परिवारक उदय होइत अछि। तेँ, दुनू के जानव जरुरी अछि। कर्मनाथ ः (हँसैत) हँ ते पहिने अहीं परिवारक खेरहा कहै छी। पुरुष-नारीक संयोग स नव मनुखक जन्म होइत अछि। एकर अतिरिक्त जे सब अछि ओ बाहरी उपरी छियै। तेँ, अखन एतबे कहब। मुदा हमरा संग जे अहाँक विआह भेल, ओ बच्चा सब के जरुर कहि देबइ। जुही ः (थोपड़ी बजवैत) पहिने यैह कहियौ बावूजी। तखन आन बात कहबै। कर्मनाथ ः (मुस्की दइत पत्नी स) हम अहाँ छोड़ि बच्चा सब के कहै छियै। तेँ, बीच मे रग्गड़ नहि ठाढ़ कऽ देवइ।  चमेली ः (मुह चमकवैत) हम बड़ रगड़ी छी, की ने। कर्मनाथ: अपना की बुझि पड़ै अए। अहीं सन लोकक संबंध मे कहल गेल अछि जे नाक नै रहैत ते की सब खेइतहुँ, तेकर कोनो ठीक नहि। चमेली ः छुछुनरि होइ अए पुरुख आ दुसिऔ मौगी के।  कर्मनाथ: पुरुष की छुछुनरि होइ अए? चमेली ः बजार जाइ छी ते देखै छियै जे जहाँ पुरुख कोनो स्त्रीगण के देखत कि अनेरे ओकर जाँघक दिनाइ चुल-चुला लगै छै। कर्मनाथ ः अहाँ कोनो डाॅक्टर छी जे दिनाइ देखि दवाई सोचै लगै छी। अहाँ दिनाइ देखै छियै कोना? चमेली ः अँाखिये छियै। ओकरा पकड़ि कऽ रखबै, से हैत।  कर्मनाथ : अच्छा बुझि गेलहुँ। अहूँ के अप्पन विआहक बात सुनैक मन अछि, ते सुनू। जखन हम बी.ए.पास केलहुँ, तखन बावूजी विआह करैक चर्च चला देलनि। सब दिन दू-चारि कन्यागत अबै लगलथि। हम दरभंगे मे रहैत रही। इमहर बावूजी एकठाम विआहक बात पक्का क लेलनि। जे हम पछाति बुझलियै। कहाँ दन ओ कन्यागत भरिपोख द्रव्य आ कन्याक खेांछि मे बीस बीघा जमीन देवा ले तैयार रहथि। मुदा अंतिम बात हमरे पर अँटकल रहै। जेठ मास। गेाटे-गोटे गाछ मे गोटि पंगरा आम फड़ल रहै नइ त नहिये जेँका फड़ल रहै। दस बजेक बाद बाध मे लू नचै लगै। जना बुझि पड़ै जे खेत सब स आगिक ताव जेँका नाचि रहल छै। हम खा के दरवज्जेक ओसारक कोठरी मे रही। ओसारक दुनू भाग (उत्तरो आ दछिनो) दू टा कोठरी बनल रहै आ बीच मे खाली रहै। ओहि खाली ओसार मे एकटा मोथीक सोफ (नमहर बिछान) विछाओल रहैत छलै। सतासीक बाढ़ि मे ओ दरबज्जा खसि पड़ल। करीब बारह बजे तोहर (बेटा-बेटी) नन्ना आबि के, ओहि सोफ पर चारु नाल चीत भ के ओंघरा गेलाह। ओंघरेला पर जे बिछान (सोफ) खड़बड़ेलइ ते हमहू कोठरी से बहरेलहुँ, ते देखलियै जे एक गोटे दुनू बाँहि के मोड़ि माथ तर मे नेने, आखि मूनि कऽ पड़ल छथि। आ कनी हटा कऽ मत्थे सोझे एकटा बटुआ रखने छथि।  जुही ः बटूआ केहेन होइ छै, बावूजी? कर्मनाथ: (मुस्कुराइत) बटुआ कपड़ाक बनै छै। दरजी सब सीवै अए। कोठरीनुमा ओहि मे हन्ना सब बनल रहै छै। जेकरा लोक डाॅरक डोराडोरि मे बान्हि कऽ रखैत अछि। ओहि मे अमलोक वस्तु आ पाइयो-कौड़ी रखैत अछि। हमरो हड़ल ने फुड़ल, ओतइ वैसि कऽ बटुआ उठा देखै लगलियै। ऐँह, की कहवह अजीव खजाना बटुओ होइ अए। जहिना लोक पीढ़ी, केबाड़ आ सन्दूक सब मे रंग-बिरंगक चित्र बनबवै अए तहिना ओहि बटुआक उपर मे एकटा इनार बनौल रहै। ओहि इनार पर पाँच टा जनिजातिक चित्र बनाओल रहै। एक गोटे इनार मे डोल खसबैत। दोसर उगहनि पकड़ि डोल उपर करैत। तेसर काँखतर मे घैल रखने। आ बाकी दुनू इनारक दुनू भाग ठाढ़ भ कऽ बाँहि फड़का-फड़का झगड़ा करैत अछि।  फुलेसर : इनारो-पोखरि मे लोक झगड़ा करैत अछि। कर्मनाथ : (ठहाका मारि) हौ, इनार-पोखरि त स्त्रीगणक लड़ैक अखडे़हे छी (पत्नी दिशि देखि, मूड़ी डोला हँसि) उठा-पटक त स्त्रीगण कम करैत अछि मुदा गरिखर बेसी होइ अए। सात पुरखाक नाम आ सातो पुरखा के कोन गारि ककरा लगतै, से सबके बुझल रहैत अछि। चमेली ः (मुह चमकवैत) इनार-पोखरि ढ़ाठै अए पुरुख आ झगड़ाउ होइत अछि मौगी। (मूड़ी डोलबैत) निरलज के ने लाज, पेट भरला से काज। पुरुख नीक रहतै ते मौगी अधला भ जेतइ, की? फुलेसर: बटुआ जे उठौलियै से ओ नइ वुझलनि।  कर्मनाथ: (उदास होइत) ओ कोना बुझितथि। ओ कोनो रौदक जरल रहथि, ओ त जिनगीक ठोकर स घायल बटोही रहथि। चिन्ता आ दुखक अथाह समुद्र मे डूवल रहथि। जहि स निकलैक कोनो रस्ते ने देखथि।  जुही ः बटुआ मे की सब रहनि? कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) जखन बटुआक डोरा दुनू हाथे पकडि खेललियै कि भक दे एक्के बेरि नअ टा मुह बाबि देलक। नवो हन्ना मे नअ रंगक बौस। पहिल हन्ना मे नोइसिक डिब्बा। नोइसिक डिब्बा के उठाबितहि गमकि उठल। गमक देखि हमरो मन भेल जे कनी निकालि कऽ नाक मे लगा ली मुदा फेरि मन मे आयल जे नाक मे नोइस लगाएव ते छीक हेबे करत। जँ कही जोर से छिक्का भेल आ ओ आखि खोललनि, ते देखिये जेताह। तेँ नोइस नइ लगेलहुँ।  फुलेसर ः नोइस नइ लगेलियै? कर्मनाथ : हँ, लगौलियै। पाछु काल । दोसर हन्ना मे छलिया सुपारी। शुद्ध कालापानी, चारि टा। खूब नमहर-नमहर। तेसर हन्ना मे पानक पनबट्टी। चारिम मे दू टा जरदाक डिब्बा। एकटा हरिशंकर काली पत्ती आ दोसर पान सौ नम्बर, पीली पत्ती। पाँचम मे चानीक रुपैया। ओ नीक जेँका नइ देखलियै। मुदा कम्मे बुझि पड़ल। छठम मे लंग, इलायची। सातम मे बिलेती तमाकुल पात। आठम मे एकटा चुनौटी मे चून आ दोसर शीशी मे बुकल खैर। नवम् मे रामपट्टीक बनाओल सरोता। नवो हना कऽ देखि नोइसिक डिब्बा से कने नोइस निकालि, चुटकी मे रखलौ। बटुआ बन्न क कऽ रखि नाक मे नोइस लगेलहुँ। नोइस लगविते खूब जोर से छिक्का भेल। जहाँ छिकलौ कि ओ फुर-फुरा कऽ उठि, बैसि रहलाह। हमरा नाक मे सुरसुरी लागल तेँ नाक मलैत रही।  फुलेसर: नाना किछु बजलाह नहि? कर्मनाथ : ने ओ किछु बाजथि आ ने हम किछु पुछिएनि। हुनक बगए आ शरीरक रुप देखि हम्मर बोली बन्न रहै। मन मे ढ़ेरो रंगक सवाल सब उठैत रहै। जहिना कोनो राही बटोही बिनु खेने-पीने रास्ता-बाट चलैत रहैत अछि, मुदा रुकैक नाम नहि लइत, तहिना बुझि पड़ल। बड़ी कालक बाद, मन के असथिर करैत पुछलिएनि, अपने कतऽ रहै छियै? नीक जेँकँा नहि चीन्हि रहल छी। आखिक नोर पोछैत ओ कहलनि, बौआ, अहाँ अखन बच्चा छी, तेँ हम अप्पन सब बात त नहिये कहब, मुदा एते जरुर कहब जे जइ धनुष कऽ तोड़ि राम वीर भेलाह, ओहि धनुष कऽ मिथिलाक बेटी (सीता) बामा हाथे उठा बाहरै-नीपै छलीह। ओहि मिथिलाक आइ एते पतन भ गेल अछि जे बेटीक हाथ पकड़िनिहार, बिना रुपैया नेने, कियो नहि अछि। फुलेसर: (चैंक कऽ) बड़ भारी बात कहलनि, बावूजी।  (चमेली, चम्पा आ जुहीक आखि मे नोर आबि गेल) कर्मनाथ: हमर करेज दहलि गेल। आखि भारी भ गेल। मुहक बकार बन्न भ गेल। हम्मर आखि कखनो हुनक मुह देखैत त कखनो बगए। तहि काल पितो जी अएलाह। पिताजी केँ देखितहि ओ (तोहर नन्ना) कहलखिन, जे एकटा कुल-शील कन्याक भार उताड़ि देल जाय। जइ पर पिताजी तुरुछ भ कऽ जवाब देलखिन जे कुल-शील ल कऽ हम धो-धो चाटब। द्रव्यक युग छी। टका धर्म टका कर्म छी। अहाँ अप्पन बेटीक प्रति कते खर्च करै चाहैत छी। जहिना पाइन (तरल) बरफ बनैत, तहिना हम्मर कोमल ह्दय कठोर बनै लगल। मन मे अन्हर-बिहाड़ि उठै लगल। मुदा चुप रही। ओ (तोहर नन्ना) कहलखिन, हम्मर हालत पाइ-कौड़ी खर्च करै जोकर नहि अछि। अपनेक पाएर पकड़ि कहै छी जे एकटा मुइल बापक बेटीक भार उताड़ि देल जाय। द्रव्य से त अपनेक इच्छा पूर्ति हम नहिये कऽ सकब, तखन एकटा नोकरनी परिवार मे जरुर देब। हुनकर बात सुनि पिताजी उठि कऽ बाड़ी दिशि विदा भ गेलखिन। हमरा हुअए जे बोम फाड़ि कऽ कानी। मन मे विचित्र स्थिति पैदा ल लेलक। एक दिशि पिता दोसर दिशि निरीह कन्या।  फुलेसर ः नाना बैसिले रहलथि कि उठि के चलि गेलाह।  कर्मनाथ: बैसिले रहलथि। उठैक साहसे ने होइन। मुह करिछौन भेलि जाइत रहनि। लगले-लागल हाफी करथि। मिरमि-राइते हम पुछलिएनि, अपने कते खर्च करए चाहैत छिअए। ओ कहलनि, बौआ, जखन अहाँ पुछलहुँ ते हम अप्पन दुख कहै छी। हम दू भाइ छी। हमरा से जेठ भाइ छथि। ओ पढ़लहुँ-लिखलहुँ त बेसी नहि मुदा अखड़ाहा पर जरुर जाइ छलौ। दुनू भाइक बीच जखन बँटवारा हुअए लगल तखन ओ खेत-पथार त बाँटि देलनि, मुदा घरक बरतन-वासन, गहना-जेबड़ आ नगद-नारायण किछु नहि देलनि। एक दिन हम खिसिया के कहलिएनि। हुनको दाँव-पेंचक दाबी। ओहो ओहिना जोर से कहलनि जे जे बँटैवला छेलह से बाँटि देलियह आब किछु ने देबह। हमरो अखड़ाहा परहक ताव रहबे करए। दरवज्जे पर उठा कऽ पटकि पान-सात थापर मुह मे लगा देलिएनि। कहि दुनू हाथ माथ पर ल चुप भ गेलाह। फुलेसर: किअए चुप भऽ गेलाह? कर्मनाथ : थोडे खानक बाद फेरि कहै लगलाह। हौ बाउ, पेंच-पाँच त हम जिनगी मे कहियो सीखिलहुँ नहि। कोट मे केसो क देलक आ गौउओ सब के मिला लेलक। दुनू दिशि हम फँसि गेलहुँ। बलजोरी लोक सब जजातो काटि लिअए, बाँसो-गाछ काटि लिअए आ आमो तोड़ि लिअए। तारीक पर जाइ ते एक के तीनि ओकिलो-मुन्सी ठकि लिअए। केस हारि गेलहुँ। जहि के चलैत छह मास जहलो मे रहलौ। कोनो कर्म बाकी नइ रहल। सब सम्पत्ति नष्ट भ गेल। हारि के बेटा पड़ा कऽ दिल्ली चलि गेल। एहना स्थिति मे बेटी विआह करै जोगर भ गेल अछि।  चमेली ः (नोर पोछैत) हे भगवान, ऐहेन दिन ककरो नइ दिहक।  (चम्पा आ चमेली माइयक मुह तकैत आ फुलेसर बापक मुह) फुलेसर ः बाबा घुरि कऽ एलखिन आ कि नहि? कर्मनाथ ः ने घुरि कऽ एलखिन आ ने कतौ गेलखिन। अंगनाक पछुआरक रस्ता देने आबि कऽ अढ़ मे बैसि गेलखिन। फुलेसर ः सोझा मे किअए ने एलखिन? कर्मनाथ: से त ओ जानथि। मुदा हम्मर मन हुनका (पिता) स हटै लगल आ हिनका (ससुर) दिशि झुकै लगल। मने-मन सोचै लगलहुँ जे अखन जँ हम बलजोरी (पिताक बिना विचारे) विआह क लइ छी ते परिवार मे जबरदस विबाद ठाढ़ हैत। जँ विआह करै स इनकार करै छी ते दरबज्जाक इज्जत चैपट हैत।  जुही ः दरबज्जाक इज्जत की छियै? कर्मनाथ : बाउ, दरवज्जा अंगनाक नाक होइत। आंगन व्यक्ति-विशेषक वुझल जाइत, जबकि दरवज्जा दसगरदा मे बदलि जायत। आंगन आंगनवालीक (पत्नीक) बुझल जाइत जबकि दरवज्जा द्वार (दुआर) होइत। ककरो आंगन मे पुरुख क आगमन आंगनवालीक आदेश स होइत जबकि दरवज्जाक लेल आदेशक जरुरत नहि। सबहक लेल सदिखन रहैत। पुरुखक परीछाक (परीक्षाक) केन्द्र दरवज्जा छी। परिवार मे जेहेन पुरुख रहत दरवज्जाक इज्जत ओहि रुपक होइत। हमर-अहाँक पुरुखा एहि इज्जत केँ वुझै छेलखिन, तेँ, बहुतो गोटे एहि प्रतिष्ठा के उच्च सीढ़ी धरि मर्यादित बना कऽ रखलनि। ऐहन-ऐहन हजारो पुरुख भेल छथि जे कनैत आइल मनुक्ख केँ दरवज्जा पर स हँसा कऽ विदा केलनि। अइह बात (विचार) हमरो मन मे आयल। जुही ः इ विचार बावा मे किऐक ने एलनि? कर्मनाथ : इ त ओ जानथि। मुदा हमरा मन मे जरुर भेल जे जहिना तोहर नन्ना कनैत अएलाह तहिना हम हँसा कऽ विदा करबनि। चाहे परिवार मे जे होय। फेरि मन मे आयल जे जाधरि परिवार स नीच विचार हटत नहि ताधरि उच्च विचार आबि कोना सकैत अछि। इ त कोनो जादू-टोना नहि छियै। बेवहार छियै। जे सोझे कर्म (काज) स जोड़ल अछि। 

फुलेसर ः तकर बाद की केलियै? कर्मनाथ: (गंभीर होइत) थेाड़े काल मने-मन विचार केलहुँ जे अखन त हमरो स्थिति काटल गाछक छाहरिये जेँका अछि। तेँ विआह करै स पहिने अप्पन आस्तित्व कायम करी। अगर जँ से नहि कऽ पहिने विआहे क जे कनियाँ घर ल आनब त ओहने दशा कनियाँक संग हेतनि जहिना अनभुआर चिड़ैक दशा चिड़ैक जेर मे होइत। तेँ जरुरी अछि जे पहिने अप्पन जिनगी कऽ अपना हाथ मे ल कऽ चली। मुदा इ होएत कोना? सोचैत-विचारैत तय केलहुँ जे आब एहि घर कऽ छोड़ि कतौ नोकरी करी। नोकरी करैक विचार मन मे अबितहिं हम कहलिएनि जे एहिठाम अपनेक जे नोर खसल ओ अपनेक उद्धार करत।  जुही: (हॅसैत) तब ते नानाक मन खूब खुशी भेलि हेतनि? कर्मनाथ: ओ बड़ पारखी रहथि। किछु बाजथि नहि मुदा हमरे मुहक बात सुनै चाहथि। जबकि हमरा मन मे भीतर स समुद्रक लहरि जेँका उठाय। हुअए जे की कहिएनि,कत्ते कहिएनि जे अेा ठहाका मारि हँसथि। हम कहलिएनि जे अपने भोजन क-ए लेल जाउ। ओ कहलनि, बौआ अहाँ अखन बच्चा छी तेँ अपना ऐठामक विधि- बेबहार नइ बुझै छियै। अखन हम कन्यागत छी, कोना भोजन करब। मन मे भ्ेाल जे कहि दिअनि, जौर जरि गेल मुदा ऐँठन नहि गेल। हम भुखल बुझि के कहलिएनि आ ओ शास्त्र पढ़वै लगलथि। मुदा हम चुप्पे रहलहुँ। फेरि कहलिएनि जे कम से कम एक गिलास पाइन पीवि लेल जाउ। पाइनिक नाम सुनि धड़फड़ा के कहलनि, हॅ, इ भऽ सकै अए। जुही ः चाह-ताह पीबै ले नइ कहलिएनि? कर्मनाथ: अपना ऐठाम (इलाका) ते चाहक चलनि (1935 ई0 क बाद भेल) आब भेलि हेँ। जखन पाइन पीबैक लेल राजी भ गेलाह, तखन सोचलहुँ जे भरि मन सरबत पीआ देबनि। मुदा बाउ, अपना ऐठाम गिलास मे पाइन बच्चा पीबैत छल चेतन लोटा मे पीबैत छल। एकटा बड़का लोटा अपना घर मे अछि, जइ मे तीनि किलो से बेसिये पाइन अँटैत अछि। ओही मे भरि लोटा सरबत बना कऽ अनलौ आ आगू मे रखि देलिएनि। लोटा देखि ओ हँसि देलनि।

जुही ः सरबत देखि कऽ हँसलथि आ कि मने खुशी भऽ गेल रहनि।  कर्मनाथ: से ते ओ जानथि। मुदा तखन से हँसी मेटेलनि नहि। लोटो भरि सरबत पीबि लेलनि। सरबत पीबि, बटुआ खोलि पान निकालि मस्तगर खिल्ली लगा, मुह मे दइत कहलनि, आब मन हल्लुक भ गेल। जते हुनकर मन हल्लुक होइत जाइन तते हमरो मन मे शान्ति अबैत गेल। मुदा करेज सक्कत हुअए लगल। हम कहलिएनि, किछु दिन अपने केँ प्रतीक्षा करै पड़त। मुदा एते अखन जरुर कहि दइत छी जे जहि काजक लेल अपने परेशान छी ओ परेशानी जरुर मेटा जायत। एते सुनितहि ओ बजै लगलथि जे हम सब मिथिलाक बासी छी तेँ मैथिल छी। हमरा सबहक पूर्वज नारीक जिबठ (साहस) के जनैत छेलखिन। किऐक त जिनगी-जिनगी भरि नारी परपुरुषक मुह नहि देखलनि, भले ही ओ बाल-विधवे किऐक ने भऽ गेल होथि। जे हमर धरोहर सम्पत्ति छी। हँ, आइ भले ही समाजक विकृतताक चलैत किछु अनुचित जेँका जरुर भऽ गेल अछि। मुदा अस्सल तथ्य सभकेँ बुझैक चाही। हम दुनू गोटे गप-सप करिते रही कि ओमहर (कोठरी मे) पिताजी गरजि अन्ट-सन्ट बजै लगलथि। फुलेसर ः अढ़े से बावा बजथि, सोझा मे किअए ने ऐलाह। कर्मनाथ : से त ओ जानथि। ओ (तोहर नाना) उठि के विदा हुअए लगलाह कि हम गोड़ लगलिएनि। गोड़ लगितहि ओ बटुआ खोलि पाँच टा रुपैया हमरा हाथ मे दइत कहलनि बाउ, मिथिला अखने पुरुष-विहीन नइ भेलि अछि, आ ने हैत। आब अहीं सबहक (नव युवक) हाथ मे सब कुछ अछि, तेँ, जना कऽ आगू ल चली। कहि चलि गेलाह।  फुलेसर : अहाँ की केलियै? कर्मनाथ: बी0 ए0 धरि हम कहियो, कोनो क्लास मे फेल नहि केने छलहुँ, तेँ मन मे पढ़ैक उत्साह एक्को पाइ कमल नहि छल। सोचलहुँ जे जखन नोकरी करैक अछि तखन एक बेरि प्रशासनिक परीक्षा मे बइस कऽ देखियै। नइ पास करब ते नइ करब। दू वर्ख मेहनत कऽ परीक्षा मे बैसलहु। पास केलहुँ। पास केलाक बाद विआह केलहुँ। आब पैछला खिस्सा-पिहानी छोड़ह। अखन परिवारक सब कियो छी, तेँ एकटा विचार कइये ली। 

फुलेसर ः (साकांच होइत) हम सब त बच्चा छी, की विचार दऽ सकै छी। मुदा बुझि त सकै छी।  कर्मनाथ: बौआ, कोनो परिवारक बच्चा, न एक्के बेरि सियान होइत अछि आ ने एक्के रंग रहैत अछि। किऐक त सब परिवारक वातावरण एक्के रंग नहि होइत अछि।ं पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चा आ बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चा मे बहुत अंतर होइ छै। तहिना अगुआइल परिवारक (सम्पन्न) बच्चा आ पछुआइल परिवारक (गरीब) बच्चा मे सेहो बहुत अंतर होइत अछि। ऐहेन- ऐहेन अनेको कारण अछि जहि स दू परिवारक बच्चा के दू रंगक वातावरण भेटैत छैक। तेँ दू रंगक होइत अछि। चमेली ः जेकर माए-बाप खूँटा सन-सन ठाढ़ रहत, अनेरे ओहि बच्चा कऽ परिवारक काज किअए पूछबै। कर्मनाथ: बिनु वुझनहि अहाँ किअए सब वात मे टाँग अड़ा दइत छियै। (भाव बदलैत) ओना अहूँक दोख बड़ बेसी नहिये अछि किऐक ते अहुँक विचार एक रस्तेक अछि। जे रास्ता व्यवस्था स जुड़ल अछि। अइ दुनियाक अजीव बुनाबटि अछि। कने नीक जेँका बुझियौ। विषुवत रेखा बीच दुनिया मे अछि। रेखा से उतरो आ दछिनो, समान दूरी पर, एक्के रंग मौसम होइत अछि। मुदा विपरीत समय मे। तहिना विचारो आ जिनगियोक अछि। अखन चम्पाक विआहक संबंध मे विचारेैक अछि तेँ बेसी नहि कहब। कोनो परिवार, परिवारक सव सदस्यक होइत, नहि कि परिवारक गारजने टाक। हँ, इ बात जरुर अछि जे परिवारक सब काजक भार गारजने पर रहैत अछि एकर माने इ नई जे बच्चा सब बुझवे ने करए। फुलेसर : बहीनिक विआहक चरचा करै छेलियै?  कर्मनाथ: जे बात बौआ तू पुछलह, सैह हमहू कहै चाहै छिअह। तीनू भाइ-बहीनि मे चम्पा जेठ छह। बी0एक रिजल्टो निकलिये गेलइ। अपना मन मे जे छल ओ भइये गेल। उमेरोक हिसाब से अठारहम पुरि उनैसम चढ़ल, तेँ आब बिआह क लेब, उचितो हैत। कथा-कुटुमैतीक सवाल अछि, तेँ किछु समय लगबे करत। फुलेसर ः किछु दिनक बाद चलितहुँ कर्मनाथ : देखहक, ओना त हमहू नीक-नाहँाति नहिये बुझै छी किअए त सब दिन बाहरे रहलौ। मुदा देखै छियै जे किछु मास छोड़ि लोक बेटा-बेटीक बिआह सब मास करैत अछि। तखन ते सब मासक अप्पन-अप्पन गुण छै। तइ मे हमरा बुझैत फागुनक काज बढ़ियाँ होइत अछि। जाड़क मास मे बेसी जाड़ आ गरमी मास मे हबा-बिहाड़िक संग रौउदो तीख होइ छै। तेँ फागुनक दिन सबसँ नीक। (चम्पा बिआहक चर्च सुनि सबहक मनमे सब रंगक विचार उपकै लगल। चमेलीक मन मे बेटी जमाइ आ परिवार नचै लगल। जबकि चम्पाक मन मे बदलैत जिनगी। जुहीक मन मे बहीनिक विआहक आनन्द त फुलेसरक मन मे माए-बापक परेशानी। खुशी स जुही गीत गबै लगली।) चमेली ः बेटी विआहक चर्च, बेटीक सोझा मे करैत लाज-धाक नइ होइ अए। कर्मनाथ : से की? चमेली ः आइ धरि ऐहेन कतौ देखने-सुनने छेलियै। आ कि मन मे सनकी सवार भऽ गेल अछि। जे मन मे अबै अए बकै छी।  कर्मनाथ: (मुस्की दइत) जकरा अहाँ नीक परम्परा बुझै छियै, भऽ सकैत अछि। जखन समाज मेदहेज(खरीद-बिकरीक) चलनि नहि रहल छल हेतइ। पढ़लो-लिखल नहिये जेँका छलै। मुदा आइक बेटी पढ़लक-लिखलक हेँ। ओ अपन जिनगी क बात बुझै लगल हेँ। तेँँ माए-बापक ओकाइत आ अपना प्रति माए-बापक सेवा ओकरा सोझा मे अछि। ते,ँ ओ खुद अपन विआहक विचार कऽ सकैत अछि। ऐहेन त नहि जे वेटीक चलैत माए-बाप डूबि जाय वा माइये-बाप बेटी के डुबा दइ। जहाँ धरि अनमेल विआहक बात अछि ओ लेन-देनक चलैत रहल अछि। तेँ बेटी के अपना पर भरोस कऽ अगिला जिनगीक लेल डेग बढ़वै पड़तै। जइ समाज मे नारी शिक्षा कऽ अधला मानल गेल ओहि समाज मे लड़का-लड़की समान कोना भऽ सकैत अछि। तखन रहल रंग-रुपक समानता,रंग-रुपक समानता परिवारक रंगरुप समाप्त कऽ दइत अछि। तहू स जुआइल गहूमन, बिनु केंचुआ छोड़ला जेँका, कात मे बैसल अछि। ओ छी जाइतिक भीतर जाइतिक कुल-मूल। फुलेसर ः बाप रे बाप, जइ समाज मे एते रंगक विषमता अछि ओ समाज एक रास्ता स चलि कोना सकैत अछि। समाजक बात त कात रहअ जे परिवारो कोना चलि सकैत अछि। मर्द औरत (पति पत्नी) परिवारक मुख्य अंग होइत, जहिना गाड़ीक पहिया। मुदा गाड़ीक एक पहिया मजगूत होय आ दोसर कमजोर त समुचित भार ल गाड़ी कोना चलि सकत। तहिना त परिवारो अछि। कर्मनाथ: बौआ, समाज आ परिवार एहि रुपे, पुरान कपड़ा जेँका, चिड़ी-चोंट भऽ कऽ फटि गेल अछि जेकरा सीला से काज नहि चलि सकैत अछि। जाधरि ओहि मे पीओन-चेफड़ी लगा-लगा काज चलाओल जाइत अछि, जाइत अछि। मुदा एहि स काज कते दिन चलत। अखन हम एहि स बेसी नहि कहबह। किऐक त अखन अपने सिर पर काज अछि, जहि लेल सोचैक अछि।  चमेली ः जखन चम्पाक विआह करैक विचार करै छी ते गहना जेबरक ओरियान कहिया करब? कर्मनाथ: (चम्पा दिशि देखि) कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा रुपैआ नइ रहतै ओ की करत? चमेली ः छुछ देहे बेटी सासुर जायत, से अपना नीक लागत।  कर्मनाथ: कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा अहाँ मान-मरजादा वुझै छियै ओ सिर्फ गहने-जेबर छी। गरीब लोक जे गहना-जेबरक सिहिन्ता करै अए अेा ओकर मुरुखपना छियै। कने आखि उठा के देखियौ जे कोन परिवारक माए-बाप अपना बेटी के किछु नहि किछु गहना नइ देलक, मुदा ककरा घर मे एकटा कनौसियो छै। तेँ गरीब लोक के एकर (गहनाक) सिहनते नइ करैक चाहियै।  फुलेसर ः बावूजी, जखन ऐहेन ओझराओठ काज अछि आ अखन धरि किछु केलहुँ नहि, तखन लगले कोना काज निपटाएब? कर्मनाथ : हम संकल्प क कऽ गाम जा रहल छी, तेँ विआह हेबे करतै। काज कोना हैत से हमरा मन मे अछि। हम्मरबेटी सुगक अनुकूल अछि, ते ँ विआह नइ होइक कोनो कारणे नहि अछि। (चम्पा से) बाउ, हमर जेठ बेटी छिअह। पढ़ल-लिखल सेहो छह। ते ँ तोरा किछु बात कहि दिअए चाहै छिअह। दुनिया दिशि नइ देखह अपना आ अप्पन माए-बाप के देखह। हम पढ़ि कऽ प्रशासनिक अफसर बनलौ मुदा तोहर माए कते पढ़ल छथुन। फेरि परिवार कोना चलैत अछि। तोरा हम बी. ए. पास करा देलियह। तोरा मे ओतेे क्षमता आबि गेल छह जे स्कूल, आॅफिस, बैंक वा आन कोनो काज कऽ सकैत छह, तखन तेाहर जिनगी भारी किअए हेतह। मन से इ हटा लाय जे हम उपारजन नइ कऽ सकै छी। जहिना पुरुख उपारजन करैत अछि तहिना तोहूँ क सकै छह। हम तोहर बाप छिअह, तेाहर अधला हुअ, इ हमरा मन मे कोना आओत?  चमेली ः गाम मे जे खेत-पथार अछि, जइ से एक्को सेरक आशा कहियो ने होइ अए, भाय सब बेचि-बेचि खाइ अए, ओ बेचि कऽ बेटीक बिआह क लिअ। कर्मनाथ : कहलौ ते ठीके मुदा जाधरि पिताजी जीवैत छथि ताधरि हम्मर बेचब उचित होएत। एक त ओहिना पिताजी (दहेज हाथ नइ लगला स) कड़ुआइल छथि, तइ पर स ज ऐहन काज करब त परिबार मे विस्फोट होइ मे बाँकी रहत। हम बेटीक विआह करै ले गाम जायब कि घर मे आगि लगवै ले।  फुलेसर ः (चिन्तित भऽ) बड़ भारी काज उपस्थिति-भऽ गेल अछि, बावूजी।  कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) बौआ, अखन तू बच्चा छह; तेँ नीक जेँका परिवार आ समाज के नहि जनैत छहक। जहिना फुलवारी मे सैकड़ो रंगक फूल रहै छै, मुदा कात से देखिनिहार त कातेक फूल देखैत अछि। बीच मे कोन फूल केहेन छै, से थेाड़े देखैत अछि।  फूलेसर: अहाँक बात हम नहि बुझि सकलहुँ, बावूजी। कर्मनाथ : फुलवारीक त उदाहरण देलियह। असल बात समाजक अछि। फुलबारिये जेँका समाजो मे अछि। हजारो रंगक मनुष्य समाज मे रहैक अछि। हर मनुष्य केँ अप्पन-अप्पन जिनगी, अप्पन-अप्पन विचार होइत अछि। जहि स अप्पन-अप्पन संकल्प आ उदेस (उद्देश्य) सेहो होइत अछि। नीक स नीक आ अधला स अधला मनुष्य समाजक पेट मे नुकाइल रहैत अछि। जेकरा सिर्फ देखिनिहारे देखि पबैत अछि। सब नहि। मुदा एकटा बात कहि दइत छिअह जे जखन कोनो काज करै ले डेग उठाबी ते देहक सब अंग के चैकन्ना क कऽ राखी। जेकर सब अंग क्रियाशील रहत ओ माइटिक रास्ताक कोन बात जे पाइनियो आ हवोक रास्ता स चलि सकैत अछि। तेँ सदिखन आशावान भ कऽ डेग बढ़ेवाक चाही।

दोसर अंक (सोमनाथक दरवज्जा। सेामनाथ मसलन पर ओंगठल, आशा आ नूनू दुनू भाग बैसल।) सोमनाथ ः बाउ नूनू , आइ जे भाँग पिऔने छेलह से कतऽ से अनने छेलह? अप्पन घरक पत्ती त नहि छेलह। बहुत दिन बाद ऐहेन मस्तगर भँाग पीलहुँ। आब कने चाह पीआवह। तखन, परसु जे कर्मनाथक पत्र आयल छेलह, ओ पढ़ि कऽ सुनविहह। (नूनू चाह अनै जाइत) (पत्नी स) एकटा बात कहू। आशा ः की? सोमनाथ ः कने विआह दिनक बात मन पाड़ियौ ते। ओइ दिन इ बात कल्पनो केने रही जे एक दिन हमहू सब अथबल हैब। आशा ः (खौंझा कऽ) मन बौआइ अए। जते बूढ़ भेल जाइ छी तते बुद्धियो टूटि-टूटि खसै अए। एतबो नै बुझै छियै जे अइ दुनियाक नियमे छै जे जन्म लेब, जुआन हैब आ बू़ढ़ भ कऽ मरि जायब। अगर जँ से नहि होइत आ पहिलुको लोक सब जीबिते रहितथि ते अहाँ के कि हमरा के पूछैत? (चाह ल कऽ नूनू अवैत। एकटा कप सोमनाथक हाथ मे आ एकटा आशाक हाथ मे दइत) सोमनाथ ः (चाहक चिस्की लइत) सात घर मुद्दइयो किअए ने हुअए मुदा भगवान जँ ओकरो बेटा देथुन ते नूनू सनक देथुन। जे बेटा बाप-माएक सेवा नै केलक ओहो कोनो बेटे छी। कखनो काल मन मे अबै अए जे दूटा समाजोक लोक कऽ आ अपनो दियाद-बाद केँ बैइसा कहि दिअए जे हमरा मुइला पर नूनूए आगि दिअए। आशा ः ऐना किअए बजै छी। लोक सुनत ते की कहत। जखन भगवान तीनि टा बेटा देने छथि ते हमरा लिये सब बरावरि। जेकरा हाथे आगि लिखल होएत, ओ देत। कोनो कि देखै ले एबइ। माए-बापक अप्पन करतब छै, बेटा-बेटीक अपन होइ छै। तइ ले अनेरे माथ किअए धुनै छी। सोमनाथ ः (बिगड़ि कऽ) जे बेटा जीबैत मे कटहर लगा कऽ मोजर नइ दइ अए ओ मुइला पर सोनाक मंदिर बना देत। अहाँ सैह बुझै छियै। आशा ः (झपटैत) जना अहाँ अपना माए-बावू केँ सोनाक मंदिर बना देने होइएनि, तहिना बजै छी। जेहने किरिया-करम क कऽ मरब तेहने ने फलो हैत। जँ अशुद्ध (अधलाह) किरिया क कऽ मरब ते भूत-परेत (प्रेत) बनि गाछी-बिरछी मे बौआइब, नइ जे शुद्ध (नीक) किरिया क कऽ मरब ते स्वर्ग मे जायब। देखै नै छियै जे पपियाहा सब जे मरै अए ते ओहिना बौआइत रहै अए। पियास लगै छै ते इनार पर जा-जा लोकक धैला फोड़ै अए आ भुख लगै छै ते बाट-बटोही के पटकि-पटकि सनेस छीनि-छीनि खाइ अए। हमरा की अहाँ के विधाता छठियारे दिन लिखि देने छथि, से त हेबे करत। सोमनाथ ः (पिनकि कऽ) मौगीक बातक कोनो ठीक नै। लगले कहै छी जे जेहेन किरिया करब तेहेन फल हैत आ लगले कहै छी जे छठियारे दिन विधाता लिखि देलनि। अच्छा, एकटा बात कहू ते, जाबे जीबै छी ताबे ने लिखलाहा हैत आ कि मुइलाक बादो। आशा ः अहाँ के की होइयै जे मुइलाक वाद फेरि से लिखायत। आ कि छठियारे दिनक लिखल मुइलाक वादो हैत।  (पनबट्टी स पान निकालि मुह मे दइत सोमनाथ) सोमनाथ ः (मुहक पान गाल तर दवैत) बेटा नूनू , अगर ज भगवान गाहीक-गाही बेटा नहियो दथि आ तोरा सन एकोटा रहए त ओइ गाहीक-गाही स नीक। अपना सबहक जे बाप-दादा कहने छथिन जे माए-बापक सेवा करब बेटाक सबसँ पैध धर्म थिक। से कोनो अधलाह कहने छथिन। अखनो जे इ दुनिया चलैत अछि से तोरे सन-सन बेटाक धर्म पर। नइ ते इ दुनिया कहिया ने अलोपित भऽ गेल रहैत। किऐक ते तते ने चोर-उचक्का, बइमान-शैतान सब फड़ि गेल हेन जे एक्को दिन इ धरती असथिर रहैत। अच्छा, एकटा बात कहह जे औझुका भाँग कतऽ स अनने छेलह। नूनू ः औझुका कोन भाँग छेलए से नइ बुझलियै। दछिनवारि टोल मे जे दिनेश अछि ओइह दरभंगा से अनने अछि। सोमनाथ ः के दिनेश? नूनू ः हीरा कक्काक बेटा। दरभंगा कओलेज मे पढ़ै अए।  सोमनाथ ः (किछु मन पाड़ैत) हीरालाल। ओकरा ते कहियो भाँग मुह मे लइत नै देखलियै। तेकर बेटा ऐहेन ओसताज भऽ गेल। नूनू ः ऐँह, जेहने मजगर भाँग पीवए अए तेहने टिपगर तमाकुलो खाइ अए। गाम मे ओहन माल के देखत। अपना सब ते ओ भाँग पीबै छी जे बाड़ी-झाड़ी मे अनेरुआ जनमै अए। ओ शुद्ध कलमी भाँग पीबए अए। सोमनाथ ः भाँगो कलमी होइ छै, हौ। नूनू ःअहाँ ते पुरना गीत गबै छी। विज्ञान कते आगू बढ़ि गेल अछि से नइ बुझै छियै। आ कि सोझे हवाइये जहाज आ रौकेटे टा बुझै छियै। विज्ञान बढ़ला से खाइओ-पीवैक वस्तु बढ़ल की। अहाँ ने सदिखन कहै छियै जे बासमती धानक चूड़ाक जोड़ा दोसर नइ अछि। मुदा आब जे चूड़ा बजार मे विकाइत अछि ओकर जोड़ा बासमतीक चूड़ा करतै।  सोमनाथ ः चूड़ाक गप छोड़ह। देखते छहक जे छह मास से तेहेन रोग ने तरे-तर देह मे धेसिया गेल अछि जे सब खेलहा-पीलहा बिसरि गेलहुँ। जे ने करै बीमारी। ने ते जइ जौ के कहियो अन्न मे नइ गनलौ, से भ गेल अछि अहार। थाकल पाँव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी। खाइक बात छोड़ह। कलमी भाँग कोना होइ छै, से कनी बुझा दाय। नूनू ः एकटा बड़ भारी कम्पनी अछि। जेकर अरबो-खरबेाक कारोवार छै। वैह भाँगोक कारोवार करैत अछि। भाँगेक जूस, मोदक इत्यादि विन्यास बना-बना देश-विदेश सगतरि बेचै अए। ओइह कम्मनी भाँगक खेतीक लेल किसान के अगुरबारे खरचो आ संकर किस्मक बीओ दइत अछि। किसानो सब के, आन फसिल से बेसी रुपैइयेा होइ छै आ मेहनतो कम होइ छै। बाधक-बाध किसान सब कात-कात मे मकै रोपने अछि आ बीच मे बीधाक बीधै भाँग लगौने अछि। ओही भाँग मे मसल्ला सब मिला के जूसो, मोदको आ आनो-आनो विन्यास सब बनबैत अछि।  सोमनाथ ः अच्छा, आब दुनियादारीक बात छेाड़ह, पत्र निकालि के सुनावह।  (जेबी से चिट्ठी निकालि नूनू मने-मन पढ़ै लगैत) नूनू ः (चिट्ठी पढ़ि) सबतुर भैया नीके छथि। चम्पा बी.ए.पास केलक। ओकरे विआहक ले लड़का भजिअवै ले लिखलनि अछि।  सोमनाथ ः (उत्तेजित होइत) तोरा दुनू भाइ के लिखने छौ कि हमरा।  नूनू ः अहीं के लिखने छथि।  सोमनाथ ः (आरो उत्तेजित होइत) पढ़ल-लिखल लोक कते बेसरमी होइ अए से देखही। तोरा मन हेतउ कि नहि, जखैन उ (ओ) बी.ए. पास केने रहए, तखैन विआहक चरचा उठौलियै। (अफसोस करैत) ओ-हो-हो, हुसि गेल। गरदनि कटि गेल। सम्पत्ति दोवरा जइतौ। बीस बीघा खेत ते बेटीक खोंइछ मे दइ ले तैयार रहै। नगद आ जेबरक कोन ठेकान। (आदर्शवादी बनैत) कहू जे कते भारी नोकसान परिवार मे भेल। आशा ः अहाँ ते तेना बताह जेँका बजै छी जना करमू अइ घरक कियो छीहे नहि। ने अहाँ कियो छियै आ ने ओ कियो छी। बाल-बच्चा जे कनी-मनी किछु कइये गेल ते की हेतइ। तइ ले अहाँ किअए एते आमील पीने छी। सोमनाथ ः हूँह। एते दिन बेटा सिखौलक आ आब अहाँ सिखाउ। गीदरक नंागरि किमहर होइ छै से अहीं बुझवै। दिन-राति कमाई छी, घर चलबै छी तेँ बुझि पड़ै अए जे एहिना दिन-दुनिया चलै छै। (चिन्तित होइत) आब ते सहजहि अथबले भेलहुँ , अपनो जिनगी पहाड़ बुझि पड़ै अए। मान-अपमान, इज्जत-आबरु सब बिसरि गेलहुँ। जावे जीबै छी ताबे कौआ जेकाँ टाँहि-टाँहि करै छी। (अफसोस करैत) घरक की मान-परतिसठा (प्रतिष्ठा) छल, की रुआब छल, सब चलि गेल। भगवानो रच्छ रखलनि जे सब सुख-भोग छोड़ा देलनि। जौ के फँाटी पर आनि के रखि देलनि। नइ ते हम्मर की दशा होइत से ते उगलेहे देखितथि। (गंभीर होइत) अच्छा अहीं कहू जे बेटा मनसम्फे कमाइ अए की नै? मुदा माए-बाप के की दइ अए। आशा ः (मुह बिजकबैत) अहाँ के कोनो गत्तर (गत्र) मे लाजे ने होइ अए। जखैन ओ (कर्मनाथ) नोकरी शुरु केलक आ महीने-महीने पान सौ रुपैया पठबै लगल, ते तीनिये मासक बाद लिखि पठौलियै जे पान सौ रुपैया ल कऽ चुट्टीक बिल गहब। आ आब निरलज भट्टा जेँका कहै छियै जे रुपैइये ने दइ अए। अगर पान सैा रुपैया झुझुआन बुझि पड़ल ते कहितियै जे बौआ मासे-मास नहि, छह मास पर एक्के ठीन पठबिहह। जहि से कोनो काज चलत। सोमनाथ ः बड़ बुद्दिआरि छी अहाँ। एकटा बात कहू ते, जे बेटा-बेटीक विआह-दुरागमन करब माए-बापक मर्यादा छी की नहि? आ कि अपने मने विआह कऽ लिअए। आशा ः अगर जँ करमू (कर्मनाथ) अपने मने विआह कइये लेलक ते कोन बड़ भारी जुलुम क लेलक। कोनो कि जाइत गमा लेलक। दहेज नै लेलक, सैह ने केलक। ते की हेतइ। वैह कन्यागत अहाँक तिजोड़ी भरि दइते ते बड़वढ़िया, नइ भरलक ते बड़ अधला। सोमनाथ ः की हौ बौआ नूनू। माइयक बात के तू नीक बुझै छहक कि अधला। नूनू ः बाबू, माए पुरना विचारक लोक छथि तेँ हिनको विचार बेजाय नहिये छनि।ं मुदा आब ते युग बदलि चुकल अछि। अर्थयुग आबि गेल। जेकरे पाइ छै अेाकरे लोक मनुक्खो बुझै छै आ समाज मे मानो-प्रतिष्ठा दइत छैक। तेँ एते घाटा त परिवार मे जरुर भेल जे मोट रकम हाथ स ससरि गेल। मुदा माए, आब परिकछो (परीक्षो) बेरि आबिये गेल अछि। करमू भैया दहेज नइ लेलनि, बड़बढ़िया। मुदा आब त अपनो बेटीक विआह करैक छनि की ने? सोमनाथ ः (फड़कि कऽ) हँ-हँ, बेस कहलहक बौआ। जनिहें मियाँ धुनै बेरिया। भने त आविये रहल हेँ। भगवाना नीक केलनि जे अथबल बना देलनि। ने किछु करब आ ने दोखी हैब। आशा ः बौआ नूनू , तू ने कहै छहक जे अर्थयुग आवि गेल, तेँ सब काज पाइयेक हाथे हैत। मुदा एकटा बात वुझै छहक जे मनुक्ख मनुक्खे रहत। युग कोनो अबै आ कि जाय, मुदा नीक काज करैवला नीके काज करत आ अधला काज करैवला अधले करत। जइ बेटाक दोख तू दुनू बापूत लगवै छहक ओइ बेटाक गुणो बुझै छहक। अप्पन परिवारक कोन बात जे गामे मे अप्पन कर्मनाथक जोड़ा कैक टा अछि। मनुक्ख ते सौँसे गामे भरल अछि।  सोमनाथ ः अहाँ हाकिम बेटा ल कऽ नाचू, मुदा हम ते सोमनाथे छलो आ रहबो करब। हमरा नूनू सन बेटा रहक चाही। जखैन जे कहै छियै, दासो-दास रहै अए।  आशा ः अही सन हमहुँ नै ने छी जे कर्मनाथ सन बेटा पर ओंगरी उठाएब। अपनो ते दू टा बेटी आ (कर्मनाथ छोड़ि) दू टा बेटो अछिये, किअए ने एकोटा हाइयेा स्कूल धरि देखलक। बेटेक चलैत पोती बी.ए. पास केलक। तेकरा अहाँ मनुखे ने बुझै छियै। जेकरा अहाँ नै मनुख वुझवै ओ अहाँ के मनुख बुझत? सोमनाथ ः (शान्त होइत) आब हमरा कोन मनुख बनैक काज अछि। मृत्युक रास्ता मे अटकल छी, जखन रसीद कटि जायत, राम-राम क कऽ विदा भ जायब। (लालबावूक आगमन) सोमनाथ ः भरि दिन तू कतऽ निमत्ता रहै छह, लालबावू? लालबाबू ः ऐँह, की कहब बाबू! ककर मुह देखि कऽ आइ उठलौ जे समय पर अनजलो ने भेल। सबेरे चैक दिशि गेलहुँ ते देखलियै जे मारे-लोक घेाल-फचक्का कऽ रहल अछि। अनगैाँओ आ गैाँओ थाहा-थहि कऽ रहल अछि। ससरि कऽ हमहूँ गेलहुँ, ते देखलियै जे अनगौँआ सब सन-सन कऽ रहल अछि। गौँआ सबमूड़िआरी दऽ दऽ खाली सुनैत अछि। मन असथिर भेल। एक गोटे के पुछलियै जे भाइ की बात छियै जे अहाँ सब ऐना सन-सन करै छी? कत्तऽ हेँड़ बान्हि कऽ जा रहल छी, ओ कहलक, हमरा गामक (खैरबोनीक) एकटा विद्यार्थी दरभंगा मे पढ़ैत अछि। लौज मे रहै अए। ओही लौज मे पीपराघाटक सेहो पान-सात गोटे रहैत अछि। एक ठाम रहने सबके-सबसे चिन्हारय छै। पीपराघाटक विद्यार्थी सब हमरा गामक विद्यार्थी के फुसला कऽ अपना गाम ल गेल, आ एकटा लड़कीक संग बलजोरी वियाह करा देलक। सोमनाथ ः लड़काक बाप के बिना पुछिनहि? लालबाबू ः हँ, तेँ ने लड़काक सवांग सब जुटि के पीपराघाट जाइ अए। लड़काक पितिऔत भाइ कहलक जे दस लाख रुपैआ पर लड़काक विआह सतगछिया ठीक भेल छै। जइ मे एक लाख रुपैया अगुरवारे देनहुँ अछि। बाकी रुपैया विआह स चारि दिन पहिने देवाक बात पक्का भ गेल छै। सोमनाथ ः जखन लड़का-लड़कीक विआह भ गेलइ, तखन लड़कावला सब जा कऽ की करतै? लालबाबू ः ऐँह, की करतै? तेहन गरमाइल लोक सब के देखलियै जे बुझि पड़ल जना बेटी वलाक घरक कोरो खींचि लेतइ। आ अहाँ कहै छियै की करतै? सोमनाथ ः कते गोरे खैरबोनीवला सब छेलइ? लालबाबू ः कोनो की गनलियै, मुदा चालीस-पचासक धत-पत छलै।  नूनू ः आइये खैरबोनीवला सबहक दालक छुटतै। तेहेन शैतानक चरखी पीपराधाटबला सब अछि जे आइये बुझि पड़तै। तहु मे एकटा तेहेन खूँखाड़ नेताक धसना पाटी अछि जे काजे यैह करै अए।  सोमनाथ ः (दुनू हाथ माथ पर लऽ) कोन जुग-जमाना चलि आयल से नहि जाइन। नूनू ः बाबू, भगवान के कहिअनु जे दस बर्ख आरो औरदा दथि। तखन देखबै जे की सब होइ छै।  सोमनाथ ः तकर बाद की भेलइ? लालबाबू ः सब कियो चाह-पान खा उत्तर मुहे सनकल विदा भेल। जखन ओ सब कनी चैक से आगू बढ़ल कि हमहू ससरि कऽ रतनाक चाहक दोकान पर आवि गेलहुँ। चाहक देकान पर नीक-नहाँति बैसलो ने रही कि सुरजा आयल। तामसे ओकर मुह तुरुछ जेँका भेल, मुदा किछु बजै नहि। पूछलियै जे सुरुज मन बड़ खिसिआइल छह। ओ कहलक, लालबाबू की कहब! दुनिया मे सब बेइमान भ गेल। ककरा के अप्पन बुझत। से की? हमरा सार के बेटीक विआह मे करजा भ गेलइ। ने रुपैआ होइ छलै आ ने महाजन के दइ छलै। खिसिया कऽ महाजन लालीस क देलकैेेेेेेेे। हमर सारो चलाकी केलक। ओ अप्पन सब जमीन ममिऔत भाइक नाम से फरजी कऽ देलक। ओहो साला तेहेत नेतघटू जे सब जमीन वेइमानी क दफानि लेलक। सैह, ओतइ से समाद आयल हेँ जे कनी आबि के फड़िया दिअ। नूनू ः के केकरा पर बिसवास करत। एक त ओ वेचारा अप्पन बुझि जमीन फरजी केलक आ ओ साला केहेन गइखोक भ गेल जे सबटा बेइमानी करै छै। लालबाबू ः अखन ते अनकर बात सुनलियै। आब अपन बात सुनू ; चाह पीबि के जहाँ घर दिशि विदा भेलहुुुुँ कि आगूऐ से गंगाइ घेरि कऽ कहै लगल। सोमनाथ ः (उत्सुक भऽ) की, की गंगाइ कहै लगलह? लालबाबू ः कहै लगल जे अहाँक मोहन (लालभाइ) हमर गरदनि काटि लेलनि। गरदनि कटैक नाम सुनि हम चैंकलहुँ। मन मे रंग-विरंगक बात अबै लगल। पूछलियै जे कने सरिया कऽ कहह। ओ कनैत कहै लगल जे पनरह कट्ठा खेत हुनका से नेने छलहुँ। दस हजार रुपैइये कट्ठा देने रहथि। जेकरा तीनि-चारि मास भेल हएत। खेत जोइत कऽ मकै केने छी। परसु खन मुनेसरा आबि कऽ कहलक जे गंगा भाइ मकई हमरा बाँटि दिहह। हम चैंकि गेलहुँ कहलियै जे जखन हम खेत कीनने छी ते तोरा किअए बाँटि दिअ। एते सुनिते ओ जेबी से दस्तावेज निकालि कऽ देखा देलक। ओकर रजिष्ट्री हमरा से दू मास पहिलुके छै।  सोमनाथ ः (अकचकाइत) मोहनक त चाइल-प्रकृति ऐहेन नै छै।  नूनू ः लोकक किरदानी मुह-कान देखने वुझबै। बेटीक विआह जे ओते लाम-झाम से केने छलाह से कतऽ स। एक लाख रुपिया मे पटना से खाली टेन्टे अनने छलाह। कहाँदन पच्चीस हजार भनसिया नेने छलै, तइ पर स चारि सय बरिआतीक खेनइ-पीनाइ। तहू मे जते बरिआती खेलक, तइ से बेसी समान उगरिये गेलनि। लालबाबू ः सात लाख रुपियो गनने छलाह। सोमनाथ ः जे सात लाख रुपिया गनत, ओ ओहने लड़का आनत? नूनू ः लड़का अनलनि कि धन। डेढ़ सय बीघा जमीन लड़काक माथ पर पड़ै छै। सोमनाथ ः अच्छा, छोड़ह दुनियादारीक गप। लालबावू के कर्मनाथक पत्र देखए देलहक।  नूनू ः कहाँ। नहि! (नूनू लालबावूक हाथ मे चिट्ठी दइत। लालबावू चिट्ठी पढ़ै लगैत)  लालबावू ः दिन पनरहम छियै। हम चैके पर गुलटेनक पानक दोकान पर रही। वैह (गुलटेन) कहैत रहए जे मालिक आइ से पानक खिल्ली मे एक रुपैआ बढ़ा देलियै। किऐक ते पानक सब मसल्ला महग भ गेल। तहि बीच एक गोटे साइकिल से आयल। साइकिल दोकानेक आगू मे ठाढ़ कऽ गुलटेन के पुछलकै, पोलीथीन अछि। गुलटेन मुसकिया देलकै। ओ कम्पनीक नाम पुछलकै। पानोबला मूड़ी डोला देलकै। किलो भरिक एकटा पोलीथिन बढ़ा देलकै। ओहो बटोही एकटा पचसटकही निकालि दोकानवला के द देलकै। ठाढ़े-ठाढ़ ओ बटोही गट दे पोलीथिन पीबि गेल। पीलाक बाद ओ बटोही दोकानदार के पुछलकै, कर्मनाथ बावूक घर ऐठाम से किमहर छनि। हमरेा कान ठाढ़ भेल। सोमनाथ ः ओकरा किछु पुछबो केलहक? लालबाबू ः नहि। अपने मने बजै लगल जे कर्मनाथ बावू आ हम्मर भाइ सहाएव (जेठ भाइ) एक्के ठीन रहै छथि। कमा कऽ हम्मर भाइ सहाएव अमार लगा देलखिन। हमरा गाम मे एक्केा गोटे नहि अछि जे बेटीक विआह मे एते खर्च केने हैत। नूनू ः अप्पन कर्मनाथ भइया कि रुपैइया नइ रखने छथि। तखन ते हम सब दियाद छिअनि तेँ छिपौने छथि। पाइ रखैक लूरि सबके होइ छै। कियो ढ़ोल जेँका ढ़नढ़नाइत रहत आ कियो चुपचाप दबने रहत। सोमनाथ ः पत्रक बात त सब बुझवे केलहक। आब चारु गोटे (बाप-माए, दुनू भाइ) विचारि लाय जे की करवह? नूनू ः जखन अहाँ दुनू गोरे (बाप-माए) छीहे तखन हम सब की कहब। सोमनाथ ः हमरा ते साप-छुछुनरिक पड़ि भ गेल अछि। ने, हँ कहैत बनै अए आ ने नै कहैत। हँ, कहैत अइ दुआरे नइ बनैत अछि, जे सत पूछह ते हमर मन कर्मनाथ पर स ओही दिन हटि गेल जइ दिन ओ अपना मने बिआह क लेलक। देखल लक्ष्मी घुरि गेलीह। खैर, विआहो केलक ते केलक जे कमाइयो के ते एक्को पाइ कहियो नहिये देलक। मुदा छी ते बेटे। तहू मे बेटीक विआह करत। बेटी त सिर्फ माइये-बापक नहि होइत, ओ ते सबहक होइत। आशा ः अहाँक अपने मन कखनो थीर नै रहै अए। कखनो किछु बजै छी त कखनो किछु। अहीं कहू जे जखैन करमू पान सौ रुपैया मनिआडर करैत रहै तखैन चिट्ठी मे लिखि कऽ पठौलियै जे पान सौ रुपैया से चुट्टीक बोहरि मूनब, आ आइ कहै छियै जे एक्केा पाइ नै कहियो देलक। वेचारा नोकरी करै अए, जेैह दरमाहा रहतै तेही मे ने काज चलौत। अनका देखि के करमूओ के वहिना बुझवै से ओहिना ओहो घूस-पेंच लइत हुअए तखन ने। दुनिया मे सबहक चाइल एक्के रंग होइ छै।  सोमनाथ ः औझुका लोकक भँाज अहीं पेबइ। ककरा रुपैआ बकछुहुल (अधला) लगै छै। एक बर लोक के दरमाहा रहै छै आ सात बर बाइली होइ छै। लालबाबू ः माए गे, भइयेक एकटा संगी कमा के अमार लगा देलक हेँ। एक्के काज दुनू गोटे केँ छनि।  आशा ः बौआ, एकटा बात तूही सब कहह जे जइ सम्पतिक सुख तू सब करै छहक ओइ मे ओकर हिस्सा नै छै? ओकर हिस्सा ते अपने सब खाइ छियै। ओ कहियो किछो पूछबो केलकह हेँ। एतबो आखि मे पाइन नै छह। अगर जँ ओकरा बेटीक बिआह मे खरच नै जुमतै ते की ओ अइ सम्पत्ति मे से नइ लेत। लालबाबू ः हमरो रहत तब ने देवइ। तू नै देखै छीही जे साले-साल खेत बेचै छी तखन कहुना के काज चलै अए। ने एकोटा पुरना गाछ गाछी मे रहल आ ने बाध मे खेत। ल द कऽ घरारी आ घरक आगू मे जे अछि ततबे रहल हेँ, सेहो अपना बुते खेती कएल होइते ने अछि। बटेदारो सब तेहेन अछि जे दूध महक डारही बाँटि के दइ अए। मुदा ओहू वेचारा सब के की कहबै, कोनो साल रौदी होइ छै ते कोनो साल दाही। लगतौ बूड़ि जाइत छै। आशा ः से ते हमहूँ देखै छियै, मुदा रौदी-दाही दुआरे ककरो उचित कल्याण रुइक जेतइ। बेटा-बेटीक वियाह सबके हेबे करतै। घर-दुआर बनबै पड़तै। धिया-पूताक पढ़ौनी, बर- बेमारी मे खरच हेवे करतै। तहू मे हम दस कुटूम परिवार वला छी। एकरा सबके छोरबहक से बनतह। परिवार किअए कहौल कै।  सोमनाथ ः एते राँउ-झाँउ करैक कोन काज छह बौआ। अन्हार घर सापे-साप। जखन कर्मनाथ आओत, विआहक चरचा करत, तखन ने पुछबै जे बौआ कोना काज करबह? ऐठाम ते देखते छहक जे जेकरो ने किछु रहै छै, बोइन-बुत्ता करै अए, ओहो एक-आध (एकाध) लाख रुपैआ बेटीक विआह मे खरच करै अए। जबकि अप्पन परिवार त से नहि छह। कतबो काटि-छाँटि के विआह करवह, तइओ दस लाख खरच हेबे करतह। तहू मे अपना सबहक समाज तेहेन गड़िबहू अछि जे एतवो नै बुझै अए जे जे माए-बाप बेटी के पढ़बै मे ओते खर्च करै अए ओकरा से रुपैआ कोना मंगबै। से लाज थेाड़े ककरो होइ छै। नमहर-नमहर भाषण क लेत, मुदा करै काल छुतहरो से छुतहर भ जाय अए। ऐहेन छुतहर समाज मे लोक कोना जीबत। भीतर स ः दादी, दादी, कर्मनाथ कक्का ऐलखिन। (आशा उठि कऽ भीतर जाइत। कर्मनाथक परिवार अवैक गल्ल-गुल) नूनू ः बावू, हम दुनू भाइ ते छोट छी, तहू मे अहाँ जीबिते छी। तखन ते जे भैया कहता से क देबनि। सोमनाथ ः (मूड़ी डोलबैत) एकटा बात हमरा मन मे उपकै अए। नूनू ः से की? सोमनाथ ः कहीं ऐहन ने हुअए जे कर्मनाथ अप्पन रुपैआ दाबि लिअए आ खेत बेचै ले कहथुन। जँ से हेतह ते हाथो तरक जेतह आ पाएरो तरक। लालबावू ः तखन की करबै? सोमनाथ ः की करवहक सें हमहीं कहबह। आब तोहूँ दुनू भाय धीगर-पुतगर भेलह, आबो जे नइ सोचबहक ते कहिया सोचबहक। हम त सहजहि अथवल भेलियह, चलन-पियारा छियह हम्मर आशा कते दिन करबह। जाधरि दाना-पानी लिखल अछि ताधरि मुह देखै छह। जहिया उठि जायत तहिया चलि जायब। (कर्मनाथक प्रवेश। पिता कऽ प्रणाम करैत। लालबावू आ नूनू कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत) सोमनाथ ः (असिरवाद दइत) कल्याण हुअ। वौआ, आब त हम्मर हालत एत्ते रद्दी भ गेल जे मुइले बुझह। छह मास से डाॅक्टर सब कुछ बड़ा देलक। जौ केर फाँटो खाइ छी, तेँ अखनो ठाढ़ छी। नै ते कहिया ने चलि गेल रहितौ। सैांसे देह जाँचि के डाॅक्टर कहलक जे रोग जड़ि से नै मेटाइत, तखन त पथ-पाइन करैत रहूँ। मन भेल जे सवा लाख महादेबक पूजा करा कऽ सेहो देखियै। मुदा आइ-काल्हि करै छी, ओहो अखैन धरि नहिये केलहुँ हेँ। सब परिवार आनन्द से छह की ने? कर्मनाथ ः हँ । सब आनन्द सऽ छी। दू मास पहिने हमरो परमोशन भेल। चम्पो बी.ए. कऽ लेलक। बड़वढ़िया नम्बर एलै। फुलेसर बी.ए. मे, आ जुही मैट्रिक मे पढ़ै अए। सोमनाथ ः (हँसैत) परमोशन भेलह ते दरमहो बढ़ल हेतह की ने? कर्मनाथ ः हँ। अढ़ाई सय टाका महीना बढ़ल। मुदा तइ से की जिनगी मे कोनो बदलाव आओत। सोमनाथ ः (अकचकाइत) से की? कर्मनाथ ः दरमाहा जे बनल छै अेा परिवार आ पदक स्तरक हिसाब स बनल छै। तहू मे इनकम-टेक्स ओकरा (दरमाहा) नियंत्रित केने रहै छै। जहिना दरमाहा बढ़ै छै। तहिना इनकम-टैक्स सेहो बढ़ि जाइ छै। ततबे नहि, मकान भाड़ा, पाइन बिजलीक खर्च सब बढ़ि जाइ छै। घुमा-फिरा क कहुना परिवार चलवैत जीवि लइ छी। तीनि-तीनि टा विद्यार्थीक खर्च, शुरुहे से अपनो पढ़ै-लिखैक अभ्यास बनि गेल अछि, तोहू मे खर्च होइते अछि। तइ पर स जइ समाज मे रहै छी ओहू मे खर्च होइते अछि। इ सब खर्च त दरमहे मे से होइ अए। महीना लगैत-लगैत हाथ साफ भ जाइ अए। साल कहियौ कि मास, एक्को दिन ओहन नइ बँचै अए जइ दिन ककरो नै ककरो, किछु ने किछु बाकी नइ रहैत अछि। तखन ते कहुना जीबि लइ छी। सोमनाथ ः तोरो से छोट-छोट नोकरी करैवला सब के देखै छियै जे कमा कऽ बुर्ज क लइत अछि। से कोना कऽ लइत अछि? कर्मनाथ ः (मुस्की दैत) जहिना शरीर मे रोग होइत अछि तहिना मनो मे रोग होइत अछि। जे बात अहाँ कहलौ ओ मनक रोग छी। मुदा सबहक शरीर वा मन रोगाइले होइत अछि, एहनो बात त नहि अछि। लालबाबू ः भैया, पछवारि गामक एक गोटे छथि, भरिसक अहाँ चिन्हतो हेबनि, जे कमा कऽ अमार लगा लेलनि अछि। कर्मनाथ ः हुनका हमहुँ चिन्हैत छिअनि। हमरा से एक बैच पाछु छथि। पहिने बेसीकाल डेरा पर अबैत छलाह आ हमहूँ हुनका ऐठाम जाइ छलौ, मुदा धीरे-धीरे संबंध कमैत गेल। आब ने हम हुनका ऐठाम जाइ छी आ ने ओ हमरा ऐठाम अबैत छथि। रस्ते-पेरे जँ कतौ भेटि भऽ गेलाह ते भेटि गेलाह। लालबाबू ः भैया, अहाँ जे चम्पा विआहक संबंध मे चिट्ठी लिखने छलौ से त आब अपनहुँ आबिये गेलहुँ। जहिना चम्पा अहाँक बेटी छी तहिना त हमरो भतीजिये छी। जना जे करब तइ मे हम सब कोनो अड़ंगा करब। कर्मनाथ ः अखन ते हमहूँ विआहेक उदेस से एलहुँ, तेँ दोसर तेसर गप करब नीक नइ हैत। मुदा एकटा बात जरुर कहबह जे समय बहुत तेजी स बदलि रहल अछि, तेँ समयक संग अपनो केँ बदलै पड़तह। जँ से नइ बदलवह ते पाओल जेबह। बाबू बूढ़ भेलखुन, कते दिन छथुन तेकर कोनो ठीक नहि। मुदा तू दुनू भाइ त जवान छह। परिवार बढ़बे करतह, घटतह त नहि। तेँ खरचो बढ़बे करतह। इ त तोरा अपने पुरबै पड़तह। अखन छोट परिवार छह तखन त खेत बिकाइत छह, आ जखन खरचा बढ़तह तखन कोना पुरेबहक। लालबाबू ः हँ, इ त ठीके कहलहुँ। मुदा नोकरियो त अपना हाथ मे नहि अछि। तखन की करबै? कर्मनाथ ः नोकरिये के सीमा-नांगरि छै जे जे करत ओकर गुजर चलतै आ जे नै करत ओकर गुजर नै चलतै। बहुत रास काज सव अछि, जेकरा केला से धनक उपारजन होइत अछि। जे करैवला अछि ओ त नोकरियो छोड़ि अपन काज ठाढ़ कऽ करैत अछि।  लालबावू ः (मूड़ी डोलवैत) ठीके कहै छी भैया, पाछु घुरि क तकै छी ते बुझि पड़ै अए जे अखन धरिक समय फुर्र-फाँइ मे बीति गेल। आब बुझि पड़ै अए जे जीवैक लेल सबके मेहनत करै पड़तैक।  कर्मनाथ ः निचेन मे कोनो दिन नीक जेँका बुझा देबह। अखन हमहूँ काजे मे पड़ल छी तेँ पहिने एहि काज के निपटबैक अछि।  नूनू ः भैया, बेटीक विआह परिवारक सबसँ भारी काज भऽ गेल अछि। तोहू मे जेकरा पाइ-कौड़ीक अभाव छै ओकर त इज्जत-आवरु बँचब कठिन भ गेल अछि। सबसँ लाजिमी बात समाज मे इ अछि जे बेटी केहनो पढ़ल-लिखल हुअए, शील,गुण,सौन्दर्य स पूर्ण किऐक ने हुअए, मुदा ओकर कोनो मोल नहि अछि। कर्मनाथ ः (दृढ़ता स) बौआ, चम्पाक विवाह हेबे करतै। इ हमरा अपन ब्रह्म कहि रहल अछि। जहाँ धरि दहेजक सवाल अछि, ओ हम एक्को पाइ नइ देवइ। हँ, जे बेबहारिक चलनि दछि ओ त पुरबै पड़त। नूनू ः दहेज नइ देबइ ते काज (विवाह) हैब कटिन अछि। कर्मनाथ ः जइ समाज मे तू दहेजक चलनि देखै छहक, ओ चुतिया समाज अछि। अेाहि समाज पर हम थूक फेकइ छी। मुदा वैह टा समाज नहि अछि। अेाहि स (समाज) हटि दोसरो समाज अछि, जे मनुक्खक समाज छी। जइ समाज मे कियो ककरो अधलाह नहि करैत अछि, आ ने ककरो अधलाह मन मे अनैत अछि। चम्पाक विआह ओहि समाज मे हेतइ। तेँ, हमरा दहेजक चिन्ता नइ अछि। तखन ते सब दिन समाज स हटि कऽ रहलहुँ , जहि स अनभुआर थेाड़े जरुर छी। 

तेसर अंक (विकास क दरवज्जा। प्लास्टिकक डोरी स कुरसी बुनैत)  श्रीचन ः (भीतरे स) विकास भाइ। यौ, विकास भाइ। (कुरसी बीनब छोड़ि। चकोना होइत, चारु भाग विकास तकै लगैत) विकास ः के छियह हौ। (फेरि चारु भर तकै लगैत) श्रीचन ः (प्रवेश करैत। कान्ह पर कोदरि, हाथ मे खुरपी) बिकास भाइ। यौ विकास भाइ। विकास ः श्रीचन। किअए ऐना अपसियाँत होइ छह, की भ्ेालह हेँ?  श्रीचन ः नाश भ गेल। गरदनि कटि गेल। विकास ः (अकचकाइत) की नाश भेलह? मन असथिर क कऽ बाजह। श्रीचन ः अइ से एकटा बेटा मरि जाइत, से नीक। मुदा भरल-पुरल चास नाश भेने त दू मासक मेहनत बुइर गेल। विकास ः ऐना किअए मुह से अधला बात निकालै छह।  (कोदरि, खुरपी रखि। दुनू हाथ माथ पर लइत, कनैक मुद्रा मे श्रीचन) श्रीचन ः भाइ की कहब। भगवानो बड़ धड़कट-बेईमान छथि। किअए लोक अपना कऽ हुनकर सनतान वुझैत अछि। जखैन ओ भगवान छथि ते सबपर एक रंग नजरि राखथि। से कहाँ रखै छथि। हुनको मे दूजा-भाव छनि। ककरो पर खुशी भऽ कऽ खूब दइ छथिन आ ककरो भेातहा कचिया (हाँसू) से गरदनि हलालि दइ छथिन। विकास ः तेना ने तू बजै छह जे हम किछु बुझवे ने करै छिअह। कने खोलि कऽ साफ-साफ बाजह। श्रीचन ः की खोइल कऽ कहब भाइ! अहाँ त सबटा बुझबे करै छियै, तइयो अनठा कऽ पूछै छी।  विकास ः अनठा के कहाँ पुछै छिअह। तेना ने तू कहै छह जे हम अखनो धरि बौआइते छी। उनटे तोंहि कहै छह जे सबटा अहाँ बुझिते छियै। कनी फरिछा के कहह। श्रीचन ः अहाँ ते जनिते छी जे हम ने गिरहत छी आ ने बोनिहर। चैदह-पनरह कट्ठा खेत अछि, तेही मे खेतियो करै छी आ अपना काज नै रहै अए ते बोइनो करै जाइ छी। पान-सात कट्ठा तरकारीक खेती करै छी जइ से अपनो खाइ छी आ दू-चारि पाइ के बेचिओ लइ छी। चारि कट्ठा टमाटरक खेती केने छलौ, से सबटा गलि गेल। जना कियो चोरा कऽ नोन छीटि देने हुअए, तहिना। विकास ः टमाटर गलि गेलह ते हमरा की कहै छह? श्रीचन ः चलु , कनी मधमन्नी चलु। विकास: किअए? श्रीचन ः ओइ बीआवला कम्पनी पर लालीस करबै। अपने ते कोट-कचहरीक पेंच-पाँच बुझै नै छियै, तेँ अहाँ के संगे ल जायब। ओइ बीआवला के सिखा देवइ जे मरदक पल्ला केहेन होइ छै। जाबे ओकरा जहल मे नइ ढ़ुकाएव ताबे हम्मर मन असथिर नै हैत। जेँ चारि कट्ठा टमाटर गेल तेँ दू हजार रुपैआ आरो जा। विकास ः कनी सरिया के सब बात कहह। श्रीचन ः दू मास पहिलुका गप छी। जतराक (यात्राक) परात झंझारपुर हाट बीआ कीनै ले गेलौ। ओना अप्पन चिन्हरबो दोकान अछि। मुदा केान दुरमतिया कपार पर चढ़ि गेल जे ओइ दोकान नइ जा हाटे दिशि बढ़ि गेलौ।  विकास ः अप्पन चिन्हरबा दोकान किअए ने गेलह? 

श्रीचन ः की कहब भाइ, हाट से कनी पछुऐ रही कि बड़का भेामहा (होरन) से बीआ-बाइलिक परचार होइत सुनलियै। खूब जोर-जोर से अमेरिकन कम्पनीक परचार करैत रहै। हमरो जना डोरी लगि गेल। जहिना अजगर सापक आखि पर आखि पड़ला से होइत, तहिना भोमहाक अवाज हमरा मन के पकड़ि लेलक। आन कोनो चीज देखबे ने करियै। जाइत-जाइत हमहूँ ओतए पहूँच गेलहुँ। एकटा खूब नमहर मोटर गाड़ीक उपर मे दू टा भेामहा, दुनू भाग घुमा के लगौने रहै। गाड़ीक बगल मे बीआ-बाइलिक खूब नमहर दोकान सेहो लगौने रहै। ओहि दोकानक चारु भर लोक सब वैसि के बीआक पौकेट सब देखैत रहै। दू गोटे दुनू भाग बैसि कऽ बीआ बेचैत रहै। पाँच गराम से ल कऽ किलो भरि-भरिक पौकेट सब रहै। पौकेट सब पर, जइ चीजक बीआ रहै, खूब रंगर फोटो सब बनल रहै।  विकास ः अमेरिकन कम्पनी रहै, से तू कन्ना बुझलहक? श्रीचन ः भेामहो से परचार करैत रहै आ दोकानदारो कहैत रहै। विकास ः देखै मे दोकानदार केहेन रहए?  श्रीचन ः ऐँह, की कहब भाइ; तीनू गोटे एक्के रंग देखै मे लगे। घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैइया केश तीनूक रहै। विकास ः (छुव्द होइत) घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैया केश......। श्रीचन ः अहाँ नै वुझलियै भाइ। तीनू एक्के रंग घोर जेँका (छालही मोहि कऽ घोर बनैत) उज्जर दप-दप। तेँ कहलौ घोरहा रंग। अपना सबहक आखि, केहेन सुन्दर कारी अछि आ ओहि तीनूक आखि पित्तरि जेँका देखै मे लगइ। तेँ कहलौ पितरिया आखि। आ जहिना मकै बाइलिक उपर मे जे रुँइयाँ जेँका रहै छै तहिना तीनूक केश देखै मे लगई। अपना सबहक केश केहेन सुन्दर कारी अछि से ओकरा सवहक नइ रहै। विकास ः (हँसैत) तीनू मौगी रहै कि पुरुख? श्रीचन ः यौ भाइ, इ हम ठीक-ठीक नइ कहब। किऐक ते तीनूक मुहो-कान आ उमेरो एक्के रंग बुझि पड़इ। मोछ-दारही रहितइ तखैन ने बुझितियै। से तीनू मे ककरो ने रहै। रहबे ने करै आ कि कटौने रहे, से नहि कहि। विकास ःमोछ-दारही ने रहै, मुदा माथोक केश से नइ वुझलहक? श्रीचन ः की कहब भाइ, अपना सबहक केश केहेन मरदनमा अछि। स्त्रीगणक केश नमहर होइ छै, से ओकरा सबहक नइ रहै।  विकास ः तब केहेन रहै? श्रीचन ः ने मौगियाही केश रहै आ ने मरदनमा। ने बाबरी सीटे जेागर रहै आ जुट्टी गुहै जोकर। खोपाक त कोनो बाते नहि। ओहिना सोझे पाछु मुहे उनटौने रहै। जे लटकि के गरदनिये धरि रहै।  विकास ः सिनुरो लगौने रहै कि नहि? श्रीचन ः ओह। एक्को गोटे सिनुर नइ लगौने रहै। विकास ः आखि केहेन रहै?  श्रीचन ः कहलौ ते पित्तरि जेँका बुझि पड़ै। मुदा एक गोरेक आखि बिलाइ जेँका चकोना होइत रहै। विकास ः (मुस्की दइत) आँइ हौ श्रीचन, तोँहू जीवनी (पारखी) भ कऽ अनाड़ी भ गेलह, जे मौगी रहै कि पुरुख से नइ वुझि सकलह।  श्रीचन ः यौ भाइ की कहब। एक्के रंगक पेन्टो आ अंगो पहिरने रहै। खाली बोलीक अवाज मे कनी फड़क बुझि पड़ै। दू गोरेक अबाज कनी मोट (भारी) बुझि पड़े आ एक गोरेक मेही। विकास ः जेकर अबाज मेही रहए ओ केहेन रहए? श्रीचन ः अरे बाप रे, बिलाइक आखि जेँका ओकर आखि चमकबो करै आ नचबो करै। मुदा तते हाँइ-हाँइ बजइ जे बुझैक कोन बात, सरिया के सुनबो ने करियै। हम ते खाली ओकरे मुहे दिशि देखियै। विकास ः (हँसि) उ तोरा दिस देखह कि अनका दिस। श्रीचन ः अइ भाग से ओइ भाग जे आखि नचबै, तखैन हमरो देखए मुदा बेसी ओ पाइयेवला सब दिशि देखए। हम ते तीनिये सइअ रुपैआ ल कऽ गेल रही। सेहो ढ़ट्ठा मे रखने रही। सोचने रही जे एक सइ मे बीआ कीनि लेब आ दू सइ के घरक चीज-बौस कीनि लेब। किअए ते लोक थेाड़े सब दिन हाट-बजार जाइ अए।  विकास ः बीआ जे कीनलहक तेकर रसीदो देलकह। श्रीचन ः हँ। (जेबी से रसीद आ बीआक खाली डिब्वा निकालि विकास दिशि बढ़बैत) हे, यैह दुनू छी। विकास ः (रसीदो आ पौकेटो मे लिखल मिलबैत) ऐँह, ओ त सोलहन्नी ठकि लेलकह। रसीद मे किछु लिखल छह आ पैकेट मे किछु। तहू मे तू कहै छह जे अमेरिकन कम्पनीक परचार करैत छलैक। तीनू तीन रंगक भ जाइ छह।  श्रीचन ः (निराश होइत) तब ते लालीस नइ हेतइ? विकास ः नै। अगर अइ सबूत पर केस करबहक ते अपने फँसि जेबह। उनटे जहल जाइ पड़तह। श्रीचन ः हमरे तीन सय रुपैइयौ ठकि लेलक आ हमही जहलो जायब। विकास ः कानून के अपन रास्ता छै। जना कहै छह तना जे तीनूक मिलान रहितह ते केशो होइतह। से त नहि छह। श्रीचन ः तब की करब?  विकास ः नीक हेतह जे भरमे-सरम चुपे रहि जाह। नहि ते अनेरे खरचो हेतह, खेतियो बुड़लह आ जहलो जेबह।  श्रीचन ः (गुम्म भ मूड़ी डोलवैत) भाइ अहाँक बात ते हम सब दिन मानैत एलहुँ। तेँ मानि लइ छी। मुदा हमर मन जरल अछि, जाबे ओकरा या त दस टा गारि नहि पढ़बै, वा दस थापर नै मारबै वा जहल नै ढ़ुकेबै, ताबे हमर मन शान्त नै हैत। विकास ः अपना गलती से सब कुछ भेलह। कान पकड़ि लाय जे ककरो लल्लो-चप्पो मे नइ पड़ब। एक पर एक ठक दुनिया मे अछि। अच्छा, एकटा बात कहह ते ऐना अल्लग-बल्लग मे ठका कोना गेलह? श्रीचन ः (कनै-कनै सन) भाइ, वेगरताक मारल मन बौआ गेल। ओना ते दू टा बेटी अछि, मुदा जेठकी बेटीक विआह तेसरे साल से करैक विचार अछि। तेसराँ बाढ़ि मे सब दहा गेल, तेँ नइ कए भेल। पौरुका रौदिये भ गेल, तेँ ने भेल। अइ बेर सोचने छेलौ जे जना-तना वेटीक विआह कइये लेब, मुदा सेहो आशा टुटि गेल। देखते छियै जे हमरा सब के बैंक से करजो ने भेटइ अए। गामक महाजनो सब हाथ-पाएर समेटि लेलक। तेँ सोचने छलौ जे जना-तना खेते मे खूब मेहनत कऽ बेटीक विआह कऽ लेब। सेहो ने भेल। आब किछु फुड़वे ने करै अए जे की करब। विकास ः श्रीचन, आशा नइ तोड़ह। जखने गरीब भेलह तखने चारु दिस से बेगरता खिहारबे करतह। मुदा की करबहक। नइ अइ साल बेटीक विआह हेतइ त अगिला साल करिहह।  श्रीचन ः भाइ, हैत त सैह। मुदा गामक स्त्रीगण सब कुट्टी-चाल करै अए। विकास ः ओहिना स्त्रीगण सब बजै अए। ककरो बजै मे किछु लगै छै। साहस करह। श्रीचन ः भाइ, अपन मन त, समय-साल देखि कऽ, मानि जाइत अछि, मुदा घरवाली सदिखन कनिते रहै अए। ओकरा जे कनैत देखै छियै ते अपनो छाती दहलि जाइ अए। विकास ः से ते होइते हेतह। एक बेरि तमाकू खाह। श्रीचन ः (जेबी से तमाकुल-चून निकालि, तमाकुल चुनबै लगैत) एकटा बात ते पुछबे ने केलहुँ। आब मन पड़ल। ओ सब (अमेरिकन) जे ओहन उज्जर दप-दप लगै छले से ओकरा सबहक रंगे ओहिना होइ छै कि चरक फुटल छलै। किऐक ते अपनो गाम मे एक गोरे ओहने अछि। जेकरा सब चरकाहा कहै छै। विकास ः जइ मुलुक मे ओ सब रहै अए, ओइठाम बारहो मास ठंढ़े रहै छै। अपना सब जेँका गरमी नै होइ छै, तेँ ओकरा सबहक रंगे ओहन भ जाइ छै। (तमाकु खा श्रीचन विदा हुअए लगैत) विकास ः एकटा बात सुनि लाय श्रीचन। जाबे तक अपना ऐठामक किसान नीक बीआ, नीक खाद, नीक दवाई (कीटनाशक) बनवैक लूरि अपने नइ सीखि लेत, ताबे तक एहिना ठक सब आबि-आबि ठकैत रहतै। बजैत दुख होइ अए जे अपन देश किसानक देश छी। मुदा किसानक जिनगी मुरदो स बत्तर अछि। ने खेती करैक लूरि किसान के छैक आ ने खेतीक उपकरण छै। ने पटवैक कोनो जोगार छै। धार-धुरक अप्पन इलाका रहने खेत चैरसो ने अछि। एहना स्थिति मे लोक कोना जीवित रहत? (श्रीचन जाइत अछि। कर्मनाथ प्रवेश। विकास के प्रणाम करैत) विकास ः आ-हा-हा, बाउ कर्मनाथ। बहुत दिनक बाद तोरा स भेटि भेल। कहिया गाम ऐलह। सपरिवार आनन्द स रहै छह की ने। बच्चा सबहक कुशल कहह? कर्मनाथ: सब आनन्द सऽ छी। जेठकी बच्चिया बी.ए. पास केलक। बच्चा कओलेज मे आ छोटकी बच्चिया हाइ स्कूल मे पढ़ैत अछि। परसु गाम एलहुँ विकास ः बेटी त विआहै जोकर भ गेल हेतह? कर्मनाथ: हँ। ओइह सेाचि दू मासक छुट्टी ल कऽ एलहुँ। मुदा ऐठाम जे हवा-बिहाड़ि देखै छी तइ से मने घबड़ाइत अछि। आन नोकरिया जेँका ते हम्मर जिनगी नहि अछि। विकास ः बाउ कर्मनाथ, अखन धरि तोरा बच्चे जेँका वुझैत एलियह आ आगुओ बुझैत रहबह। भने कहलह जे दहेजक बिहाड़ि समाज मे उठि गेल अछि। अखन धरि त कहियो कोनो काज केलह नहि, तेँ मन घबड़ाएव उचिते छह। मुदा एकटा बात वुझए पड़तह जे हवा-बिहाड़िक जन्म जहिना समाज मे उठैत अछि तहिना समाजे ओकरा रोकबो करैत अछि। अज्ञानी, लोभी आ समाज विरोधी लोक ओकरा बढ़वैत अछि। मुदा एहि स समझदार लोक थेाड़े धवड़ाई अए। जहिना एक्के खेत मे बगुरोक गाछ रहैत अछि आ नीक-नीक फलोक गाछ रहैत अछि, तहिना समाजो मे होइत अछि। नीक स नीक लोक आ अधलाह स अधलाह लोक एक्के समाज मे रहैत अछि। हँ, इ बात जरुर अछि जे कखनो अधलाह लोक नीक लोक केँ पछाड़ैत अछि त कखनो नीक लोक अधलाह लोक के पछाड़ैत अछि। कर्मनाथ: जँ एहिना होइत रहत ते समाज नीक कोना बनत?  विकास ः अखन धरिक जे इतिहास अछि, ओहि आधार पर नीक लोक पछड़ैत रहल अछि। किऐक त जहि शक्तिक हाथ मे समाज सत्ता रहल ओ धूत्र्त, बेइमान आ शेाषकक हाथ मे रहल। तेँ ओहि शक्तिक संग इमानदार, मेहनती आ भलमानुस लोक केँ संगठित भ मुकावला करै पड़तैक। जहि स उठा-पटक हेबे करतै मुदा अंतिम विजय इमानदारेक होएत। किऐक त ऐहेन लोकक संख्यो बेसी अछि आ काजो नीक अछि। कर्मनाथ: तखन फेरि ऐना किअए होइ छै? विकास ः (मुस्की दइत) कम संख्या मे धूर्त, वेइमान के रहितहुँ , बुद्धि आ सम्पति ओकरे हाथ मे छै। जे दुनू हथियारक रुप मे काज करै छै। कमजोर, मुर्ख अधिक रहितहुँ अखन धरि पछड़ैत रहल अछि। कर्मनाथ: एहि बात के अखन छोड़़ूँ। हम जहि काज से अहाँ लग एलहुँ तहि पर कने विचार कएल जाय। अपने सिर्फ गुरुऐ (शिक्षक) नहि समाज निर्माता सेहो छी। हम्मर बेटी आइक मनुक्ख छी, नहि कि घसल-पिटल परम्पराक। तेँ, हमरा मन मे अटूट बिसबास अछि जे हमरा बेटीक विआह हँसी-खुशी स हेबे करत। मुदा हम त समाज स सब दिन अलग रहलहुँ तेँ, कने चिन्ता मन मे जरुर अछि।  विकास ः बौआ, तोरा पिता स हमरा मतभेद किऐक अछि? से पहिने सुनि लाय। तोहर परबाबा जे रहथुन अेा नामी-गामी लोक रहथि। समाजो अनुकूले रहनि आ समयो तेहने रहै। जहिना हुनका धन-सम्पति रहनि तहिना मानो-प्रतिष्ठा। जखन ओ मुइलाह ते मास दिन धरि सराधक भोज होइते रहलै। हमहूँ ताबे ढ़रवे रही, मुदा सब कुछ मन अछि। तीस गाम नति के खुऔल गेल रहै। एक-एक गाम के एक-एक दिन। गामक (सब जाइतिक) ओहि काज मे जुटल रहै। किऐक त काजो भारी रहै। खेबाक सब वस्तुक ओरियान स ल कऽ नेात पठौनइ आ खुऔनाइ धरिक काज रहै। कर्मनाथ : (मुस्की दइत) इ बात हमरा नइ बुझल छल। भने अहाँ कहि देलहुँ। विकास ः करीब पचास-पचपन बर्ख पहिलुका बात छी। ताधरि गाम मे दोसर तरहक विचार चलैत छलैक। अखुनका जेँका लोक मे दूजा-भाब नै छलैक। ओहि समय लोकक जिनगियो छोट छलैक। तेकर बाद, करीब पेंइतीस-चालीस बर्ख पहिने, तोहर बाबा मरलखुन। हमहुँ शिक्षक भऽ गेल रही। समाज मे विचारो बदलै लगल छलै। तोहर पिताजी (सोमनाथ) भोजक लेल समाज के बैसौलनि। हमहूँ छलौ। ओ (सोमनाथ) कहलखिन जे नअ गामक जे सौजनिया अछि, तते ल कऽ भोज करब। किछु गोटे समर्थनो केलकनि। मुदा किछु गोटे विरोधो केलकनि, जइ मे हमहूँ छलौ। कर्मनाथ ः विरोध किअए केलिएनि? विकास ः (हँसैत) हमरा सबहक (विरोध केनिहरक) विचार छल जे कोनो भोज मे समाजक लोक के छोड़ि (आन जाइतिक) अनगोंआ के न्योत द खुआएव उचित नहि। जते खर्च कऽ भोज करै चाहै छी ओ गौंउये केँ न्योत द कऽ खुआउ। गामक कोनो जाइत किऐक ने हुअए, मुदा छी त ओ समाज। समाजक काज सदिखन लोक (समाज) के होइत छैक। कोनो बेर बेगरता मे समाजे ठाढ़ होइत अछि। अनगौंआ ते सिर्फ भोजे खाइत अछि आ खुआबैत अछि। तेँ इ काज अधलाह छी। कर्मनाथ : (मुड़ी डोलबैत) इ त वैचारिक मतभेद भेल। विकास ः सिर्फ वैचारिके मतभेद नहि, एकरा पाछू वास्तविकतो छैक। बेटा-बेटीक विआह लोक आन गाम मे करैत अछि। जहि स ओ समाज नहि, कुटुम्ब होइत अछि। जनिका संग नोत-पिहान चलिते अछि। मुदा आन गामक जाइत क समाज मानि खाइ-पीवैक वेवहार बनाएव, उचित नहि। हँ, उचित तखन जखन समाजक सब जाइत कऽ खुआ, आनो गामक लोक के खुआबी। मुदा समाज त जीबैत स ल कऽ मृत्यु धरि संग रहैवला होइत। तेँ, आन गामक जाइत स पैध अप्पन समाज होइत अछि। जना कतौ आगि लगै छै ते समाजेक लोक (चाहे कोनो जाइतिक किऐक ने हुअए) आबि कऽ आगि मिझबैत अछि। तहिना कियो बीमार पड़ैत अछि, वा कोनो आफत-असमानी होइत छैक त समाजे आगू अबैत अछि। अही ल कऽ दुनू गोटेक बीच मतभेद अछि। मतभेदे नहि अछि, एक जाइत रहनहुँ खेनाइयो-पीनाइ बन्न अछि। हमरो समाज अलग अछि आ हुनकेा अलग छनि। सिर्फ एक गाम मे छी तेँ गौँआ छिआह। कर्मनाथ : तखन त गाम दू समाज मे बँटि गेल अछि। विकास ः (दृढ़ता स) निश्चित। निश्चित दू भाग मे बँटल अछि। एक-समाजक लोक गौँआ स जुड़ल अछि आ समाजक लोक अनगैाँवा जाइत सब स जुड़ल अछि। तेँ अहाँ ऐठाम जे कोनेा भोज होइ अए ते हम खाइ ले नइ जाइ छी। आ ने अहाँक परिवार हमरा ऐठाम अबैत छथि।  कर्मनाथ: इ त जवर्दस्त कारण अछि। विकास ः हमरा संग ऐहेन समस्या अछि जे ज अहाँ ऐठाम खाइ ले जायब त अप्पन वैचारिक समाज टुटि जायत। जँ बैचारिक समाज टुटि जाइत त फेरि ओहिना विना जड़ि-पालोक समाज मे मिझ्र भ जायब। जहि समाज मे बलात्कार के धिया-पूताक खेल बुझल जाइत अछि। गारि क मजाक बुझल जाइत अछि आ आथर््िाक शोषण (धनक बेइमानी) के परम्पराक चलनि वुझल जाइत अछि। कर्मनाथ: (मूड़ी डोलबैत) हँ, इ त होइत अछि। विकास ः आइ धरिक जिनगी मे हम दुइये टा काजक संकल्प कऽ करैत एलहुँ। आ अखनो करैत छी। पहिल, समाजक भेाज आ दोसर, बेटा-बेटीक विआह मे दहेज, ने लेब आ न देब। जे सिर्फ हमही टा नहि, अप्पन जे समाजक लोक अछि, ओ सब करैत अछि। अही दुनू काजे तोरा परिवार स हमरा मनमुटाव बुझहक वा पार्टी बुझहक वा दू समाज वुझहक। अच्छा, आब अपना काज पर आबह। तू ते अफसर छह, तखन किअए अफसरक समाज छोड़ि गामक समाज मे कुटुमैती करए चाहै छह? कर्मनाथ : अफसरक समाज कहियौ वा नोकरियाक समाज, ओ अअस्थायी (अस्थायी) होइत अछि। जहिना रबड़क बैलून मे जाधरि हवा रहैत ताधरि अकास मे उड़ैत, मुदा फुटितहि कतौ जा कऽ खसि पड़ैत। तहिना नोकरियोक जिनगी होइत। जाधरि नोकरी रहैत, पावर मे रहैत आ नोकरी समाप्त होइतहि जिनगी कत्तऽ स कत्तऽ चलि जाइत। मुदा सामाजिक जिनगी से नहि होइत। स्थायी होइत। सामाजिक जिनगी बहुआयामी होइत। जहिना गनगुआरि कऽ सैकड़ो पैर होइत, जहि मे से एकाध टुटनहुँ कोनो अन्तर नहि होइत, तहिना। एकर अतिरिक्तो कारण सब अछि। विकास ः आरो की कारण अछि? कर्मनाथ ः नोकरी करैवला सिर्फ एक्के इलाकाक नहि हेाइत। जहि स जिनगीक ऐहन अनेको काज अछि जहि मे एकरुपता नहि हेाइत। मुदा सामाजिक जिनगी ओही स विपरीत होइत। जाधरि हमरो नोकरी अछि ताधरि हमहुँ घर स बाहर छी, मुदा नोकरी समाप्त होइतहि गाम चलि आयब।  विकास ः बहुत बढ़ियाँ विचार छह। आइ जे देखै छहक जे गाम घरक दशा दिनो-दिन पछुआइल जा रहल अछि, एकर की कारण अछि? एकर कारण अछि गामक पढ़ल-लिखल लोक केँ गाम छोड़ि कऽ चलि जायब। जाधरि गामक सम्पत्ति मे बुइधिक उपयोग नै हैत, ताधरि गामक सम्पत्ति नीचे मुहे ससरैत जायत। ओकरा (गामक सम्पत्ति क) आगू मुहे बढ़वैक लेल नव ज्ञानक जरुरत अछि। जखने नव ज्ञान क उपयोग गाम मे हुअए लगत तखने नव तकनीक, नव ढ़ंग (लूरि) आबि जायत। नव तकनीक आ नव ढ़ंग नव मनुष्य पैदा करत। नव मनुष्य पैदा होइतहि नव समाज बनि कऽ ठाढ़ भ जायत। जे समयक अनुकूल चलै लगत। कर्मनाथ:(मूड़ी डोलबैत) हूँ-उ-उ। विकास ः एतबे नहि, अपना इलाकाक (मिथिलांचलक) जे अमूल्य व्यवहार, अमूल्य क्रिया-कलाप अछि, ओ धीरे-धीरे घटि रहल अछि। आ ऐहेन बुझि पड़ि रहल अछि जे घटैत-घटैत मेटा जायत। लोकक जीवन शैली बदलि रहल अछि, जहि स सामाजिक संबंध, कला संस्कृति सब कुछ प्रभावित भ रहल अछि। नान्हि-नान्हि टा काज, नान्हि-नान्हि टा बात मे, लोक तेना ने दिन-राति ओझराइल रहैत अछि जे आगू मुहे ससरैक कोन बात जे पाछुऐ मुहे ढ़रैक रहल अछि। जहि स सदिखन बातावरण दूषित भेल रहैत अछि। अनेरो लोक सदिखन चिन्ता आ तनाव मे पड़ल रहैत अछि।  कर्मनाथ : एहि दिशा मे समाजक बुद्धिजीवी लोकनि केँ आगू अबै पड़तनि। विकास ः निश्चित। कोनो समाज के आगू बढ़वैक लेल वा गलत दिशा स सही दिशा दिशि ल जाइक लेल वुद्धिजीविये अगुआइ कऽ सकैत छथि। जेकरा अपने दिशाक बोध नहि छैक अेा आगू मुहे कोना बढ़ि सकैत अछि। ओना पढ़लो-लिखल सभकेँ दिशाक बोध होइते अछि, सेहो बात नहि। जना कहल गेल अछि जे जहि पोथी कऽ पढ़ि लोक ज्ञान अर्जित करैत अछि वैह पोथी लोक केँ अज्ञानोक दिशा मे बढ़वैत अछि। कर्मनाथ ः (गंभीर होइत) अपने जे बात कहि रहल छी, ओहि दिशि हमरो धियान अखन धरि नहि गेल छल। विकास ः (मुस्कुराइत) अखन धरि तोहर धियान, एक वेवस्थाक बीच रहलह तेँ नीक-अधला बेरबैक (फुटबैक) ज्ञान नहि भेलह। किऐक त व्यवस्था वेवहारक माघ्यम स चलैत अछि। कर्मनाथ : (मूड़ी डोलवैत) तखन ते नीक-अधला वुझैक लेल मन स नहि विवेक स कयल जा सकैत अछि। विकास ः निश्चित। एहि मे एक्को पाइ संदेह नहि। मन निर्णय करैत बुइधिक हिसाव स। बुद्धि बनैत व्यवस्थाक हिसाव स। तेँ लोकक जे सोचैक आ बुझैक प्रक्रिया अछि ओ वेवसथाक अनुकूल होइत अछि। मुदा वेवसथा केहेन अछि, ओ एहि स आगूक प्रक्रिया छी। हमरा नीक हुअए, इ सब चाहैत अछि। मुदा एहिक भीतर प्रश्न उठैत जे अप्पन नीकक संग जँ दोसर के अधला होय, तखन? नीक त तखन ने नीक जे अपना संग-संग दोसरोक नीक होय। जँ दोसर के नीक नइ हेाय त अधलो नहि होय। हँ, इ बात जरुर जे किछु काज व्यक्तिगतो होइत अछि, जहि स दोसर के मतलब नइ होइत।  कर्मनाथ : (नमहर साँस छोड़ैत) तब ते विवाह मे जे दहेजक चलनि अछि, सेहो ओहने अछि। विकास ः (मुस्की दइत) निश्चित। दहेज लेनिहार तीनि रंगक अछि। पहिल अछि जे जते दहेज लइत अछि ओहि स दोबरा-तेवरा कऽ बजैत अछि। दोसर तरहक अछि जे बेटाक विआह मे जते दहेज लइत ओहि स कम बेटीक विआह मे दइत अछि वा नहियो दइक विचार मे रहैत अछि। तेसर तरहक अछि जे दहेज लेलाक बादो छिपबै चाहैत अछि। आब तोंही कहह जे ऐना किऐक अछि।  कर्मनाथ ः ऐहन ओझराइल सवालक हल कोना होएत? विकास ः (हँसैत) यैह काज त हम अपना समाज मे कऽ रहल छी। उपर से नहि बुझि पड़तह, मुदा समाजक भीतर समाज बनि चलि रहल अछि। जहिना बेटा तहिना पढ़ौल शिष्य। तू हमर पढ़ाओल शिष्य छियह, तेँ तोरा हम विसबास दइ छियह, हम्मार जे जरुरत तोरा हुअअ, तेही लेल हम तैयार छिअह। तोहर बेटी हम्मरो त पोतियो छी। तोरा हम शुरुहे से जनैत छिअ जे आन नोकरिया जेँका तू लेन-देन स परहेज केने छह। तोरा एक्को पाइ दहेज कहि खर्च नहि हेतह। तखन त बेटा-बेटीक विआह छी। जे वेवहार अदौ स आबि रहल अछि ओ त पुरवै पड़तह। कर्मनाथ : आइ धरि जे समस्या माथ के भरिऔने छल ओ निकलि गेल। मन हल्लुक भ गेल। मुदा एकटा बात कहि दइत छी कक्का, हम त नोकरिया छी। गनल दिनक छुट्टी अछि तेँ दोहरा कऽ छुट्टी नहि लिअए पड़ए। तहि पर नजरि रखबैत। विकास ः (मुड़ी डेालबैत) हमहुँ नोकरी कऽ चुकल छी तेँ छुट्टीक महत्व बुझै छियै। काल्हिये से हम तोरा काजक पाछु पड़ि जायब।ं परसु फेरि भेटि होएव बेटी किछु विशेष पढ़ल छह तेँ काज थेाड़े भरिगर जरुर अछि। किऐक त गाम-घर मे लड़कीक कोन बात जे लड़को कम पढ़ल-लिखल अछि। बी.ए. पास लड़कीक लेल कम स कम एम.ए. पास लड़का चाहिऐक। नहि त इंजीनियर, डाॅक्टर, वकील त चाहबे करिऐक। कर्मनाथ : आब हम कने हटि कऽ एकटा सवाल पूछै छी। अखनो आ पहिनहुँ स देखैत एलहुँ जे नीक स नीक (बेसी स बेसी) पढ़ल लिखल लड़काक संग अनपढ़ लड़कीक विआह होइत अछि वा होइत आयल अछि। ओ उचित बुझल जाइत। मुदा अधिक पढ़ल-लिखल वा पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कम पढ़ल वा अनपढ़ लड़काक संग विआह करब, उचित वा अनुचित। विकास ः एहि प्रश्नक उत्तर दोसर दिन देबह। अखन हमर मन तोरा काज मे ओझरा गेल अछि। चारिम अंक (रामविलासक घर) रामविलास: जिनगीक साइठम बर्ख मे, आइ वुझि पड़ैत अछि जे निचेन भेलहुँ सेहो सोलहन्नी नहि, पाँच पाइ चिन्ता अखनो बाकिये अछि। मुदा तइओ आइ अपना कऽ निचेन मानै छी, किऐक त जहिना एक दिन बीतने पूर्वज सौंसे माध बीतब मान लेलनि, तइ हिसाबे त पाँच पाइ भार बड़ थेाड़ भेल। जिनगीक साठि बर्खक संघर्षक (रग्गरघस) उपरान्त जे फल भेटल ओ त सुअदगर आ मीठ हेबे करत,तेँ मन मे खुशी सेहो अछि। माधुरी : मन मे खुशी आछि त नाचू। रामविलास: नचै त शरीरक भीतर मन अछि। हम कोनो नचनिया छी जे मंच पर नाचब। तखन हँ, एकटा बात मन मे जरुर उपकैत अछि जे अहाँ स भरि मन गप करी। माधुरी : ठीके लोक कहैत अछि जे पुरुखक बात आ गाड़ीक पहिया दुनू बरोबरि। जहिना गाड़ीक पहिया घुमैत रहैत अछि तहिना पुरुखोक बात। कहू जे केहेन अकड़हर बात बजै छी जे एते दिन दुनू गोरे संग-संग रहलौ, मुदा भरि मन गप कहियो ने केलहुँ। रामविलास: (मुह बिजकबैत) अहाँ कऽ की होइये जे हम फुसिये कहलहुँ।  माधुरी : अपना की बुझि पड़ै आए जे साँचे कहलहुँ। रामविलास: सुआइत लोक कहैत अछि जे पुरुख आगू बढ़ैत-बढ़ैत चोर-डकैत, लुच्चा, लम्पट सब बनि गेल, मुदा मौगी गोबरक चोत जेँका ठामक-ठामहि रहि गेलि। अहीं से पुछै छी जे कहू काल्हि धरि हम कहिया निचेन भेल छलहुँ आ अहाँ से भरि मन हँसी-खुशीक बात केलहुँ।  माधुरी : कोन बड़का पहाड़ उलटबै छलौ, जेकरा उलटबै मे साठि बर्ख लागि गेल। रामविलास: (गंभीर होइत) बड़ सुन्दर बात कहलौ। सबसे पहिने इ बात बुझि लिअ जे जहिया से हम अहाँ एकठाम भेलहुँ आ जाधरि नहि भेल छलहुँ। तेँ पहिने, दुनू गोटेक विआह स पहिलुका बात कहि दइत छी। तकर बाद विआहक उपरान्तक बात कहब। जहिया अहूँ अपना गाम मे रहैत छलौ आ हमहुँ अपना गाम मे। माधुरी : अहाँक अप्पन कोन गाम छल? हम त अप्पन गाम अप्पन नैहर कऽ बुझै छी। रामविलास: एतवेा नइ बुझै छियै जे अप्पन गाम होइत अछि अपना रहने। से ज नइ रहलौ त अप्पन गाम कोना भेल? बड़बढ़ियाँ अहाँ अप्पन नइहर के अप्पन गाम कहलियै। मुदा हमरा त अपना गाम से भगा देलक। माधुरी : के भगा देलक? रामविलास: गरीबी भगा देलक। जखन हम दसे-बारह वर्खक छलौ तखन बवू दुखित पड़लाह। तीनिये गोरेक परिवार छल, माए-बावू आ हम। हम ताबे खेलाइते-धुपाइते छलौ आ धरिये पहिरैत छलौ। दुख से बाबूक हालत दिनो-दिन बिगड़िते जाइत रहनि। असकरे माए बोइनो क कऽ आनए आ बावूओक सेवा टहल करैत रहए। दिन-राति तंग-तंग रहैत छलि। बेबस भ एक दिन कहलक जे बौआ गाम मे सब अन्न बेतरे मरि जेवह। गाम मे ने कियो काज करौनिहार अछि आ ने अपना कोनो-आए-उपाए छह। तेँ कतौ जा कऽ कमा आनह। माधुरी : गाम से माइये जाइ ले कहलनि। रामविलास: हँ। मुदा ओहो बेचारी की करैत।  माधुरी : गाम से असकरे कत्तऽ गेलियै? रामविलास: असकरे कहाँ गेलियै। अपनो गामक आ लग-पासक आनो-आनो गामक लोक, सब साल पटुआ कटै ले, धनरोपनी करै ले पूभर जाइ छल। ओकरे सबहक संगे हमहूँ गेलौ। तीन दिने मोरंग पहुँचलौ। ताबे कोसी धार मे पुलो ने भेल रहए। नावे पर पार भेलहुँ। भीमनगर से जगबोनी बस चलैत रहए। कोसी पार भ कऽ बथनाहा मे बस पकड़लौ। जे नेने-नेने जगबोनी पहुँचा देलक। जगबोनी से पाएरे मोरंग गेलौ। तेसर दिन किरिण डूबैत-डूबैत मोरंग बजार पहुँलौ। ओही दिन हाटो रहए। हम सब हाटे पर रही कि एकटा थारु, दुनू परानी, आइल रहए। ओ जे हमरा सब के देखलक ते बुझि गेल जे पछबड़िया सब छी। लग मे आबि के कहलक जे अइ देसवाली भइया हमरा संगे चलह। सव कियो ओकरे संगे विदा भेलहुँ। जहाँ हाट से निकलै लगलौ कि कहलक जे भैया तोरा सब के भुख लागल हेतह तेँ किछु खा लाय। दू छिट्टा मुरही आ कचड़ी कीनि के द देलक। सब कियो गमछाक खोंचड़ि बना मुरही ल लेलहुँ आ खाइते विदा भेलहुँ। साँझ मे ओकरा अइठिन पहुँचलौ। देखै मे ते ओ अलबटाहे जेँका बुझि पड़ै, मुदा रहए पूजीगर। आठ जोड़ा बड़द खूँटा पर रहए।  माधुरी : कते दिन ओकरा ऐठाम रहलियै? रामविलास: दू मास रहलियै। एक मास पटुआक काज चललै आ एक मास धनरोपनी। माधुरी : काजक लूरि कोना भेल? रामविलास: सबकेँ जना-जना करैत देखियै, तहिना-तहिना हमहुँ करियै। माधुरी : दू मास मे कत्ते कमेलियै?  रामविलास: डेढ़-डेढ़ सौ रुपैआक फँाट सबके भेलइ। ओइ मे से हम सबा सौ रुपैआ गाम पठा देलियै आ पच्चीस रुपैआ लऽ कलकत्ता चलि गेलियै। कलकत्ता त गेलियै मुदा कियो चिन्हरए रहबे ने करए। बस स्टैण्ड मे उतड़ि एकटा दोकान मे खाइ ले गेलहुँ। खाइते रही कि तीनि-चारि टा मटिया चाह पीबै आयल। ओ सब अपने बोली बजै। हम खेबो करैत रही आ ओकरे सब दिस तकबो करैत रही। हमहूँ हाँई-हाँई के खा हाथ धोय, दोकानदार के पाइ द, एक गोरे के कहलियै, भाइ हमहूँ काजे करै ले एलौ, कतौ जोगार लगा दाय। ओ सब अपने संगे हमरो नेने गेल। माधुरी : मटिया सब काज की करए? रामविलास: बोरो उधै आ आनो-आनो सामान सब उधै। ओकरे लाट मे हमहूँ काज करै लगलहुँ। बर्ख दिन ओकरे सबहक संगे रहलौ। बर्ख दिनक बाद ओहो सब गाम आयल आ हमहूँ एलौ। बरखे दिन मे कते गोरे से चिन्हारय भ गेल। गाम आवि एकटा भीतघर बन्हलौ। बावूओक मन नीक भ गेलनि। अपन मासुल ले रुपैआ रखि अन्न-पानि कीनि के घर मे द देलियै आ डेढ़ मासक बाद फेरि चलि गेलहुँ। माधुरी : फेरि मटिये काज करै लगलहुँ? रामविलास: हाँ। पाँच बर्ख धरि मटिया काज करैत रहलहुँ। तेकर बाद अहाँक संग विआह भेल। विआहक बाद जे कलकत्ता जाइत रही कि दरभंगा मे एक गोरे परिवारक संगे हमरे लग मे आबि कऽ बैसिलथि। ओहो कलकत्ते जाइत रहथि। समस्तीपुर तक हमहूँ चुप्पे-चाप बैसल रही, मुदा ओ सब अपना मे गप सप करैत। समस्तीपुर तक छोटकिये गाड़ी चलै। समस्तीपुर से बड़की गाड़ी कलकत्ता जाइ। जखन समस्तीपुर टीशन लगिचाइत कि ओ हमरा कहलनि, वौआ कतऽ जेबह। हम कहलिएनि, कलकत्ता। ओ कहलनि जे हमहू कलकत्ते जायब। हमरा समानो सब अछि आ दू टा बच्चो अछि, तेँ कने समस्तीपुर टीशन मे बच्चा सब के सम्हारि दिहह। हमहूँ सैह केलहुँ। माधुरी : समस्तीपुर टीशन मे जे गाड़ी पकड़लियै अेा सेाझे कलकत्ता ल गेल कि बीच मे कतौ फेरि बदलै पड़ल। रामविलास: नहि। बीच मे कतौ नै बदलै पड़ल। समस्तीपुर टीशन मे जे गाड़ी पर बैसलहुँ , तखन से ओइह चाहो पिअबथि आ गपो-सप करै लगलहु। ओ अपने इलाकाक रहथि। हिन्द मोटर कारखाना मे नोकरी करैत रहथि । इंजीनियर रहथि। देखै मे ते साधारणे बुझि पड़थि, मुदा ओ राक्षात् देबता रहथि। ओ कहलनि जे बौआ तू हमरे संगे चलह। हमरे ऐठाम रहिहह आ तोरा हम करखन्ने मे काज धरा देवह। तहिया से हम हुनके ऐठाम रहै लगलहुँ। माधुरी : (मुस्की दइत) अखन धरि विआह से पहिलुके जिनगीक बात कहलियै। रामविलास: हँ। विआहक बाद ते अहूँ आबिये गेलहुँ आ देखवे करैत एलियै जे साल मे एक बेर, महीना दिनक छुट्टी मे अवैत छेलहुँ। तहि एक मास मे जे-जना घरक काज रहैत छल ओकरे सम्हरै मे महीना बीति जाइत छल। तखन आब अही कहू जे हम कहिया निचेन भेलहुँ। माधुरी : अच्छा, आब अपन खिस्सा-पिहानी छोड़ू। काल्हि त बौआक (मदनक) रिजल्ट निकलिये गेल। पढ़ाइयो ओकर समापते (समाप्ते) भ गेलै। आब ओकर विआह क लिअ। रामविलास: अपनो मन मे सैह अछि। मुदा अखन धरि त घरक गारजन अहाँ रहलौ हम ते सब दिन बाहर खटलौ। घरक तीत-मीठ त बुझलियै नहि। आब रिटायर क कऽ एलहुँ हेँ। आब जे घरक भार उठबै चाहब से हमरा बुते सम्हरत। माधुरी : कोनो काज केने लोक काज सीखैत अछि। अहाँ कतबो अनाड़ी छी तइयो त पुरुखे छी। हम कतबो जीवनी छी तइयो त स्त्रीगणे छी। घरक काज सम्हारि सकै छी, मुदा घर स बाहरक काज कोना सम्हारल हैत। रामविलास: अहूँक बात एकतरहक जरुर अछि। मुदा आब त तीनि गोटे भेलहुँ। मदनोक पढ़ाइ समापते भ गेलै। तेँ सबसे पहिने ओकर विआह क लेब अछि।  (विकासक आगमन) रामविलास: (हँसैत) आउ, आउ मास्टर सहाएव। अहोभाग्य हम्मर आ हमरा परिवारक। बहुत दिनक बाद अपने स भेटि भेल। शरीर स स्वस्थ रहै छियै की ने? विकास : हँ। रामविलास: परिवारक सब आनन्द स छथि की ने? विकास : हँ। बच्चा (बेटा) हाइ स्कूल मे मास्टरी करैत अछि। अपने त आठ साल पहिने रिटायर भ गेलहुँ। रामविलास: (मुस्कुराइत) वाह,वाह। हमरो मदन एम.कम. केलक। काल्हिये ओकर रिजल्ट निकललै। फस्ट डिवीजनभेलइ। (पत्नि स) अनासुरती मास्टर सहाएव पहुँच गेलथि, भाग्य हम्मर। किऐक त मास्टरे सैहबक पढ़ौल मदन छिअनि, तेँ सबसे पहिने मास्टर सहाएव के मिठाइ खुअविअनु। (माधुरी जाइत अछि) विकास : मदन कहाँ अछि। बिना असिरवाद देने मिठाइ कोना खायब। रामविलास: ओ त आइये भोरुका गाड़ी से दरभंगा गेल। अप्पन संगियो-साथी आ प्रोफेसरो सब से भेटि करए गेल। भऽ सकैत अछि सौझुका गाड़ी से घुमत। नइ ज संगी सबहक संगे सिनेमा देखै लगत ते काल्हि कखनो आओत। हमहुँ पैछला मास रिटायर कऽ गेलहुँ। मदनेक दुआरे घरक सब काज जक-थक पड़ल अछि। किऐक त जाधरि ओ पढ़ैत छल ताधरि घरक काज मे कोना लगबितियै। मुदा सोचै छी जे सबसे पहिने ओकर विआह कऽ ली। ओना अखन धरि घरो बनौनाइ पछुआइले अछि।  विकास : हँ, हँ, बड़बढ़ियाँ विचार अछि। रामविलास: एकटा भार मास्टर सहाएव अहूँ कऽ दइ छी, किऐक त गाम-घरक (समाजक) बात अपने बुझै नइ छी। घन्यवाद घरेवाली के दी जे वेचारी स्त्रीगण रहितहुँ अखन धरि घर सम्हारि कऽ चलौलनि। हम त जिनगी भरि सिर्फ कमेलहुँ, एहि स बेसी त किछु केलहुँ नहि। अपने केँ यैह भार दइ छी जे मदनक विआह कतौ करा दिऔ। विकास : भार त बड़बढ़िया देलहुँ, मुदा.......। रामविलास: मुदा की? विकास : बेटा-बेटीक विआह आब विजनेस भ गेल अछि। जइ से हमरा सख्त घृणा अछि। सत्तरि वर्खक जिनगी मे, सैकड़ो विआहक अगुआइ केलहुँ मुदा एकोटा मे लेन-देन नहि केलहुँ। तखन आब अहीं कहू जे इ भार हमरा उठत। (प्लेट मे मिठाइ नेने माधुरीक प्रवेश) रामविलास: मास्सैब, ल द कऽ एकटा बेटा अछि, अगर जँ ओकरो बेचियै लेब तखन मुइलाक बाद एक चुरुक पाइनियो के देत। बेचलाहा बेटा ज देवे करत ते ओहि से थोड़े सबुर हैत। विकास : (मुस्कुराइत) कहलियै ते बड़बढ़िया, मुदा आब लोक थेड़े इ बात बुझैत अछि। आब त लोक के रुपैआक आगि मन मे लागि गेल छैक। रुपैइये के धरम-करम सब वुझैत अछि। समाजोक ऐहेन रुखि भ गेल छैक जे जेकरा रुपैया छैक ओकरे पूछै अए आ जकरा नइ छै ओकरा कियो ने पूछै अए। रामविलास: (मुस्कुराइत) मास्सैब, हम अपन बात कहै छी, जाधरि हमहूँ नइ बुझै छेलिएक ताधरि मन मे सदिखन रुपैऐक बात रहैत छल। संतोष के एकटा शब्द मात्र बुझै छेलियै। मुदा धन्यबाद ओहि इंजीनियर सहाएव केँ दिअनि जे आखिक परदा हटा देलनि। आब रुपैया के एकटा साधन मात्र बुझै छी। जिनगी नहि। विकास : ओ इंजीनियर के छलाह? रामविलास: हुनकर घर अपने इलाका छनि मुदा बच्चे स ओ कलकत्ते मे रहलाह। ओतइ पढ़वो केलनि आ हिन्द मोटर मे नोकरियो केलनि। बहुत दिनक बात छियै, हमहूँ कलकत्ता जाइत रही आ ओहो दरभंगा मे गाड़ी पकड़ि जाइत रहथि। गाड़िये मे भेटि भेलाह। अपने संगे हमरो ल जा पहिने त, उठे काज मे घरौलनि मुदा किछुए दिनक बाद हमरो परमानेंट नोकरी भ गेल। सदिखन ओ यैह कहथि जे राविलास गरीबक पूँजी मेहनत छियै। तेँ मेहनत के अपन दोस्त बना कऽ चली। हुनके परसादे हम हेड मिसतिरी भ के रिटायर केलहुँ। मुरुख रहितहुँ हम कमा कऽ बुर्ज लगा देलियै। विकास : की बुर्ज लगा देलियै? रामविलास: जना-जना आमदनी बढ़ैत गेल तना-तना अपन कारोबार बढ़बैत गेलहुँ। जाबे मशीनक ज्ञान नहि भेल छल ताबे एकटा सेकेण्ड हेंड टैक्सी कीनिलहु। एकटा ड्राइवर के पचास रुपैया रोज पर चलवै ले द देलियै। अपन जे दरमाहा हुअए ओहि मे अधा गाम पठाबी आ आधा जमा करी। किछुए दिनक बाद पुरना टेक्सी के बेचि नवका कीनि लेलहुँ। तख भड़ो वेसी हुअए लगल। अपनो मिसतिरीक हेल्पर से मिसतिरी बनि गेलहुँ।  विकास : बाह-बाह। तखन ? रामविलास: जखन मिसतिरी बनि गेलहुँ तखन दरमहो दोवरा गेल। आ गाड़ी के बनौनाइ सीखि लेलहुँ। आठ घंटा करखन्ना मे डयूटी करी बाकी समय मे बजारक गाड़ी सबके ठीक करै लगलहुँ। फेरि दोसर टेक्सी लेलहु। ओहो भाड़ा पर लगा देलियै। मन पड़ै अए ते हँसी लगै अए। जहिना रुपैयाक लेल मन जरल रहैत छल तहिना रुपैयाक बरखा हुअए लगल। विकास : बाह-वाह। तखन? रामविलास: आमदनी देखि मन हुअए लगल जे कलकत्ते मे जमीन कीनि मकान बना ली। मुदा जखन हुनका (इंजीनियर के) पुछिलिएनि ते ओ कहलनि जे विचार त बड़बढ़िया छह, मुदा मुरुखपाना हेतह। अपना इलाका सन दुनिया मे कोनो इलाका नहि अछि। सिर्फ पाइये सब कुछ नहि ने छियै। ऐठाम ने खेत कीनह आ ने मकान बनावह। हॅ जाबे नोकरी करै छह ताबे किछु अस्थायी (टेमप्रोरी) कारोबार करै छह ते करह। मुदा रिटायर भेला पर गाम चलि जइहह। विकास : किअए गाम अबै ले कहलनि? रामविलास: हमहूँ इ बात पुछलिएनि ते बुझवैत कहलनि जे देखहक अपन इलाका, बजारक हिसाबे, बड़ पछुआइल अछि। पछुआइल इलाका मे लोकक आमदनियो आ जिनगिओ पछुआइले रहै छै। मुदा अइ स ककरो घवड़ेबाक नहि चहियै। कोनो इलाका अगुआइल अछि ओहिठामक लोकक मेहनत स। जँ लोक मेहनत नहि कऽ कऽ भागतते ओ इलाका अगुऐतै कोना? विकास : (गंभीर होइत) बड़ पैघ बात कहलनि। रामविलास: तहि बीच मदन चिट्ठी लिखलक जे बाबू अपने गाम होइत ‘राष्ट्रीय राज पथ’ (एन.एच.डव्लू) बनि रहल अछि। अपने ते चिट्ठियो ने पढ़ल होइत अछि, हुनके पढ़ै ले देलिएनि। चिट्ठी पढ़ि ओ मने-मन खूब हँसलाह। कहलनि जे रामविलास अहाँ मिसतिरी छीहे, आब अहाँक कलकत्ता गामे भ जायत। हमरा कोनो अरथे ने लागल। तखन ओ वुझा के कहलनि जे नोकरियो लगिचाइले अछि आ बड़का सड़को बनिये रहल अछि। ठाठ से ऐठामक सब गाड़ी बेचि एकटा नमहरका बस कीनि लेब। ताबे वेटेाक पढ़ाई समापते भ जायत। बेटा के वस द देबइ आ अपने एकटा लेथ मशीन कीनि के रोडे साइड मे बैसा देबइ। हमहूँ खेत-पथार नइ कीनिलहु। सिर्फ घर लग तीनि कट्ठा कीनि लेलहुँ। विकास : बड़ सुन्दर विचार अछि। रामविलास: ओना अखन सब काज पछुआइले अछि। ने घर बनेलहुँ हेँ आ ने वस कीनिलहु हेँ। मुदा तीस लाख रुपैआ हाथ मे रखने छी। तेहि से सब काज भ जाइत। अपनो नोकरिये करैत छलहुँ आ बेटो पढ़िते छल, तेँ कोना करितहुँ। आब पाइक भुख मेटा गेल। दुनिया देखैक ढ़ंगो बदलि गेल। विकास : दुनियाँ देखैक की ढ़ंग बदलि गेल? रामविलास: जाबे मिसतिरी नइ बनल छलौ आ कम आमदनी छल, तावे जे लोकक हाइ-फाॅइ देखियै ते हुअए जे कोन दरिदरा भगवान हमरा सब के जन्म देने छथि जे सब दिन सब चीजक अभावे रहै अए। मुदा जखन मिसतिरी बनलौ आ आमदनी बढ़ल, तहिया से वुझि पड़ै लगल जे हमरा सन-सन दरिद्र ते सौंसे दुनिये भरल अछि। जहि से मन मे संतोषक अंकुर जनमै लगल। आब ओ अंकुर विशाल गाछक रुप मे भ गेल अछि। जहि स आखिक इजोत सुन्दर होइत गेल। आब वुझि पड़ै अए जे दुनिया बड़ सुन्दर अछि। विकास : की सुन्दर? रामविलास: आब देखै छी जे दुनिया, स्वर्गो स सुन्दर आ हजारो तीर्थ स्थान मिलौला से जेहेन होइत, तहू से पवित्र आ पैध अछि। कोनो देवस्थान मे गनल-गूथल देवताक वास होइत मुदा दुनियारुपी तीर्थ स्थान मे अरबो-अरब देवता वास करैत अछि। किऐक लोक एहि देवस्थान स हटै चाहत। मन मे संकल्प शक्तिक जन्म भेल। जे संकल्पशक्ति विचारक रास्ता बदलि देलक। जहि स जिनगी फूलो स हल्लुक बनि गेल अछि। विकास : इ त दुनिया देखैक नजरि भेल, मुदा अपना जिनगी मे की सब आयल? रामविलास: जाधरि जिनगी नहि बदलल छल ताधरि कमेनाइ-खेनाइ मात्र बुझैत छलहुँ। मुदा आब दोसर केँ मदति करब बुझै लगलहुँ। अनका हाथे जे अपन मेहनत बेेचै छलौ ओ मेहनत आब अपना काज मे लगबै लगलहुँ। जहि स मनक गुलामी मेटा गेल। विकास : आव अपना काज दिशि आउ। जहिना अहाँक लड़का पढ़ल-लिखल छथि तेहने एकटा लड़की हमरो नजरि मे अछि। बी.ए.पास ओ लड़की अछि। शील, स्वभाव, आ गुणक भंडार अछि। शुद्ध लछमीपात्र। ओहन लड़की भगमन्ते घर मे जन्म लैत अछि। रामविलास: मास्सैब, हम मदनक पिता जरुर छिअनि मुदा ज्ञान दइवला गुरु त अहीं छिअनि। तेँ, मदन के अहाँ अपन बेटा वुझि जतए विआह करा देवनि, हमरा दिस स एको-पाइ आपत्ति नहि। पाइ-कौड़ीक हमरा एको-पाइ लोभ नहि अछि।  विकास : (मने-मन खुश होइत) देखिऔ ओ लड़की एकटा पैध अफसरक छिअनि। ओ अपनो साक्षात् देवता छथि। ओना ओहो (अफसर) हमरे पढ़ाओल छथि, तेँ हमरा पर अटूट विसवास छनि। जे कहबनि से ओ जरुर करताह। मुदा आइ-काल्हि देखै छियै जे झूठ-फुस ल कऽ शादी-विआह मे झगड़ा-झंझट भ जाइत छैक। खास कऽ स्त्रीगणक चलैत। जँ से सब नइ हुअए ते हम एहि काज मे पड़ब। रामविलास: मदन त अखन नहि अछि, नइ ते अहाँ के संग लगा दइतौ। ओना हम कन्यागत नहि बरपक्ष छी, तेँ पहिने पाएर कोना उठाएब। मुदा अहाँ ऐठाम जेबा मे ते कोनो असोकर्ज नहि अछि। चलू हम अहींक संग चलै छी। आ कन्यागत से गप-सप करा दिअ। माधुरी : माहटर बावू, बेटा त हमरो छी आ पुतोहुओ हेती, तेँ, एकटा बात हमहूँ कहै छी। लोक सब बजैत अछि जे दुनिया बड़ आगू बढ़ि गेलई, इ त नीक बात। जते आगू दुनिया बढ़तै तते आगू सब बढ़त। मुदा हम सब त मिथिलाक गाम मे रहै छी, जइ ठाम अखनो लोक पाएरे नैहर-सासुर करैत अछि। कोनो सोखे त नहि करैत अछि। अभाव मे करैत अछि। शहर-बजारक लोक हवाई-जहाज पर उड़ैत अछि आ हमरा सबहक सवारी अखनो नाव अछि। तेँ, एहि सब केँ नजरि मे राखब जरुरी अछि। विकास : (ठहाका दइत) इ सब कहैक जरुरत नहि अछि। पहिनहि कहि देलहुँ जे कन्या लछमीपात्र छथि। साक्षात् लछमीक आगमन परिवार मे होएत।  रामविलास: मास्सैब, शुभ काज मे बिलंब नहि करक चाही। हमरो कपार परक, अंतिम भार उतडि ़जायत, जे पाँच पाइ चिन्ता अछि ओहो मेटा जायत। तेँ, हम्मर विचार अछि जे हमहूँ अपनेक संग चलि, सब बात आइये फरिच्छा लेब। 

पाँचम अंक  (विकासक दरवज्जा। विकास, रामविलास आ तीनि चारि गोटे बैसल) विकास ः राधेश्याम, कने कर्मनाथबावू केँ बजौने आवह? (राधेश्याम जाइत) रामविलास ः कते दूर पर हुनकर घर छनि?  विकास ः थोड़वे दूर पर छनि। लगले चलि औताह। रामविलास ः मास्सैब, जखन ऐठाम धरि आबिये गेलहुँ तखन कहुना काज कऽ सलिटिआइये देवैक।  विकास ः देखियौ, हम त अपना भरि परियास करबे करब तखन ते.........। (राधेश्यामक संग कर्मनाथ अबैत) विकास ः आउ, आऊ कर्मनाथ बावू। हमरा त होइत छल जे अहाँ गाम मे छी की नहि। मुदा संयोग नीक अछि। कर्मनाथ ः अखने हमहूँ मामा गाम (मात्रिक) से एलहुँ। ममो संगे अएलाह हेँ। विकास ः हुनको किअए ने संगे नेने ऐलिएनि?  कर्मनाथ ः कोना नेने अवितिएनि। राधेश्याम सोझे कहलक जे विकास कक्का बजौलनि अछि। विकास ः (रामविलास के देखवैत) हिनका त अहाँ नहि चिन्हैत हेबनि। हिनकर घर सुन्दरपुर छिअनि। हिनका एकटा लड़का छनि जे एहिवेर एम.कम. केलनि अछि। काल्हिये रिजल्ट निकललनि हेँ। ओना ओ लड़का हमरे पढ़ौल छी मुदा किछु दिन पहिलुका देखल अछि। मुदा लड़का दिव हेबे करत। (कर्मनाथ मुस्कुराइत) रामविलास ः रिजल्ट सुनि बौआ पराते भिनसुरका गाड़ी पकड़ि, संगी-साथी सब स भेटि करै चलि गेला हेँ। भए सकैत अछि जे रौतुका गाड़ी स आबि जाय, नहि जँ संगी साथीक संग सिनेमा देखै लगए त काल्हि आओत। विकास ः रामविलास जी, हिनका (कर्मनाथ बावू केँ ) ते अहूँ नहिये चिन्हैत हेबनि। इहो हमरे पढ़ौल छथि। मुदा हमरा गामक रत्न छथि। गामक पहिल फुल। बड़का अफसर छथि। भगवान ऐहेन बेटा सबकेँ देथुन। जेहेने पैघ अफस तेहने इमानदार। सज्जनक त चरचे नहि। ओना जिनगी भरि हमहूँ गुरुआइये केलहुँ। मुदा औझुका शिक्षक सब जेँका नहि, जे अपनो पढ़ौल विद्यार्थी, सोझा मे सिगरेट, बीड़ी पीवैत रहत आ शिक्षक मुड़ी निच्चा कऽ जाइत रहताह। आजुक जे छौड़ा-माड़रि सब भ गेल अछि ओ ने माए-बाप केँ आदर करैत अछि आ ने शिक्षक केँ। रामविलास ः (हड़वड़ा कऽ कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत, मने-मन सोचैत जे कहुना कुटुमैती भ जाय।) मास्सैब अहाँ के ते हम कहि देलहुँ जे भलेही मदन हम्मर बेटा छी मुदा शिष्य त अहींक छी। तेँ, मदन पर जते अधि हमर अछि ओहि स मिसिओ भरि कम अधिकार अहूँक नहि अछि। माए-बाप जन्म दैत अछि मुदा जिनगीक रास्ता त गुरुऐ बतबैत अछि। विकास ः (मुस्की दैत) अहाँ दुनू गोटे सोझा मे छी, तेँ हमरा किछु बजैत असोकर्ज नहिये भ रहल अछि। कर्मनाथ बावू, अपने त बड़ ज्ञानी लोक छी, तेँ हम किछु बाजी से हमरा उचित नइ वुझि पड़ै अए। मुदा दू परिवारक बीचक संबंध अछि तेँ चुप्पो रहब उचित नहि।  (कर्मनाथो आ रामविलासो ठहाका मारि हँसैत) हम दुनू गोटे केँ परिचय करा देलहुँ। आब एकटा बात अॅाझुका समयक संबंध मे कहि दइत छी। रामविलास ः अबस, अवश्य अपनेक कहि देल जाओ।  विकास ः अखुनका समयक संबंध मे कहि रहल छी। अहाँ (कर्मनाथ) जेठरैयति परिवारक छी जे आब निच्चा मुहे भऽ रहल अछि। उपर स निच्चा उतड़ैत आ निच्चा स उपर जाइत, एक सीमा पर दुनू गोटे (सामाजिक, आर्थिक आ शैक्षणकित) पहुँच गेल छी। तेँ, दुनूक बीच मे संबंध बनब समयानुकूल अछि। रहल बात लड़का-लड़कीक। अपना ऐठामक जे सामाजिक ढ़र्रा बनि गेल अछि, ओकरा हम झुस (घटी) बुझै छी। किऐक त मुरुख लड़कीक संग पढ़ल-लिखल लड़काक विआहक चलनि अछि। जेकरा सबकियो नीक बुझि अंगीकारो कऽ नेने छी। मुदा एहिठाम एकटा प्रश्न उठैत अछि जे मुरुख लड़काक संग पढ़ल-लिखल लड़कीक विवाह के नीक मानल जाय वा अधलाह। मुदा अहाँ दुनूक संबंध मे त से बात नहिये अछि। तेँ, एहि संबंण मे किछु कहैक जरुरते ने अछि। हृदय स असिरवाद बुझी वा धन्यवाद देव बुझि हम दुनू गोटे केँ (मदन आ चम्पा) दइत छिअनि।  रामविलास ः (हँसैत) से की?  विकास ः जहिना अहाँक मदन रत्न भेलाह (बोनिहार परिवारक दुआरे) तहिना हम चम्पो के (नारी शिक्षाक) बुझैत छिअनि। तेँ, चाहे रत्नक हार होय वा फुलक, एकोटाक माला बनैत आ सओक। मुदा दुनू गरदनिये मे पहिरल जाइत। भलेही एकक डोरा सबहक नजरि पर पड़ै आ दोसराक झँपाइल होय। रामविलास ः (हँसैत) मास्सैब, हम त मुरुख छी तेँ अहाँक सब बात बुझियो ने रहल छी, मुदा एते बिसवास मन मे जरुर अछि जे अहाँ हमर अधला कखनो नहि सोचब।  विकास ः देखियौ, दुनू गोटेक विचार एक रास्ताक अछि, तेँ एहि संबंध मे किछु अटकलबाजी करब उचित नहि। आब काजक गप कऽ आगु बढ़ाउ। कर्मनाथ ः हमरा मन मे एक्को पाइ इ शंका नहि अछि जे हम लड़का के नहि देखलहुँ। मुदा जखन ऐठाम (हमरा गाम) पहुँच गेल छी त कने हम अप्पन दुनू भाइयो केँ बजा लइ छिअनि। एहि दुआरे नहि कि हुनका से पूछब जरुरी अछि, बलकि एहि दुआरे जे हुनको सबहक मन मे इ नइ होइन जे भैया हमरा सब के कहबो ने केलनि। ततवे नहि, हम त चाहब जे अपना बेटिओ के देखा दी। रामविलास ः आइ अहाँक बेटी तेँ सब भार अहाँ उपर मे अछि। मुदा विआहक उपरान्त त हमरो पुतोहूऐ हेतीह। तेँ, जखन ऐठाम धरि आबिये गेल छी ते असिरवादो देनहि जेवनि।  विकास ः (हँसैत) बड़बढ़िया। राधेश्याम, तू कने फेरि दोहरा के कर्मनाथ बावू एहिठाम जा आ दुनू भाइयो (लालबावू आ नूनू) आ चम्पो केँ बजौने आबह। (राधेश्याम बजवै ले जाइत) कर्मनाथ ः कक्का, हम्मर बेटी आइक मनुक्ख छी। सिर्फ पढ़ले-लिखल अछि, ततबे नहि। कमप्युटरक ज्ञान सेहो छैक। परिवार चलवैक सब लूरि छैक। आ सबसँ पैघ गुण इ छैक जे मिथिलाक सब व्यवहार क (जे नारी लेल अछि) ज्ञाने नहि व्यवहार मे सेहो छैक। ओ सिर्फ कुशल गृहणिये नहि अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवन-यापन करैक लूरि स सेहो सम्पन्न अछि। रामविलास ः कर्मनाथबावू, हम मुरुख रहितहुँ ओहन विचारवान आदमी लग रहि जिनगी बितेलहुँ, जिनका हम देवता बुझैत छिअनि। ओ हमरा अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवैक लूरि (ज्ञान) सिखा देलनि। सदिखन ओ कहथि जे श्रमिक अपन श्रम पूँजीपतिक हाथ बेचि लइत अछि, जे उचित नहि। तेँ, हम अप्पन श्रम केँ अपना काज मे लगेबाक सतत प्रयास करैक चेष्टा करी। ओना हमहूँ जिनगी भरि नोकरिये केलहुँ किऐक त ऐहेन मजबूर परिवार मे जन्म भेल छल जे दोसर चारा नहि छल। मुदा आब हम एते कमा लेलहुँ जे हमरा परिवार के कहियो नोकरी क लेल मुहताज नहि होअए पड़त। (लालबावू,नूनू आ चम्पाक प्रवेश) विकास ः रामविलास जी यैह बच्चिया थिक। (एकटक स रामविलास चम्पा कऽ देखि) रामविलास ः मास्सैब, हमरा पाइक भुख नहि, मनुक्खक भुख अछि। (हँसैत) हम अपन बेटे टा नहि, विआहोक खर्च हमही करब।  कर्मनाथ ः (मुस्की दइत) बौआ तोरा दुनू भाइ (लालबावू आ नूनू) के हम एहि दुआरे बजौलियह जे जहिना बेटी तहिना भतीजी, तेँ तोहूँ दुनू भाइ अप्पन विचार दाय। दुनू भाइ : (लालबावू आ नूनू) भैया, जहिठाम अहाँ आ विकास कक्का छी, तहिठाम हम सब की बाजब। अहाँ लोकनिक पसन्द हमरो पसन्द। कर्मनाथ ः (चम्पा से) बाउ, गोड़ लगहुन। (सबसँ पहिने चम्पा विकास केँ, तेकर बाद अप्पन पिता कर्मनाथ केँ तेकर बाद रामविलास केँ गोड़ लगलक) रामविलास ः (हजारी नोट दइत) भगवान जिनगी दथि। मास्सैब, भलेही हम बेटावला छी मुदा कर्मनाथ बावूक आगू मे किछु नहि छी। धन्यवाद हम अहाँ कऽ (विकास बावू) दइत छी जे हमरा कीचड़ स निकालि सिंहासन पर पहुँचा देलहुँ। विकास ः रामविलास जी, हम दुनू गोटे स आग्रह करब जे शुरुहेक लगन मे काज (विवाह) निपटा लेब। रामविलास ः हमरा दिशि स कोनो आपत्ति नहि। विकास ः एकटा बात आरो। अखन जे लोकक रुखि भऽ गेलै अए जे खूब लाम-झाम से विआह करै अए से नहि हेवाक चाही। जेते खर्च (चाहे कन्यागतक होय वा बड़क पिताक) झुठ-फुस मे करब, ओ बेकार। ओ पइसा जँ बँचा कऽ कोनो काज क लेव त ओ जिनगीक लेल होएत। हम अप्पन बात कहै छी, हम्मर जे विवाह भेल छल अहि मे सिर्फ पितेजी टा बरिआती गेल रहथि। तइयो काज भेलइ। तेँ, कौआ स खइर लुटायब, कोनो नीक बात नहि। रामविलास ः अपनेक विचार स हमहूँ सहमत छी। जना कर्मनाथ बावू कहताह, तहिना करब। कर्मनाथ ः हम्मर कोनो विचार नहि, जना विकास कक्का कहताह, तहिना हम करब। विकास ः विआहक बात त समपन्ने जेँका भऽ गेल। आब जँ किनको मन मे किछु बात बाकी हुअए से अखने बाजि चलू।  कर्मनाथ ः हम जहि समाज मे अखन धरि छी ओहि समाजक बीच त बेटीक विआह नहिये कऽ रहल छी, मुदा ओहि समाज मे त बहुत अधिक संबंध (लेन-देन) बनि चुकल अछि। तेँ, हम आग्रह करब जे एक बेरि, विआहक बाद, बेटी के अपना संगे ल जाएव। ओकरो सखी-विहीनिया छैक तेकरो सब स भेटि-घाँट क लेत। तकर बाद त अहाँक ऐठाम रहत आ ओइह अपन घर हेतैक। विकास ः हम नीक जेँका अहाँक बात बुझि नहि सकलहुँ, कर्मनाथ बावू। कर्मनाथ ः काकाजी, जहि समाज (अफसर समाज) मे रहैत छी ओहिक बीच पच्चीसो-पच्चास काज (विआह,मूड़न इत्यादि) सब साल होइत छैक। जहि मे हमहूँ आमंत्रित होइत छी। ओहि मे हम त सिर्फ भोजने करैत छी, मुदा प्रति काज पाँच सय स दू हजार धरि खर्च होइत अछि। मुदा हम त अेाहि समाज स अलग भ कऽ अप्पन काज कऽ रहल छी। तेँ, ओहि समाज मे रहैक लेल हमरो किछु करै पड़त। विकास ः ओ-ो. ो. ो, ो। हँ इ त उचिते छी। की यौ रामविलास जी अहूँक किछु समस्या अछि? रामविलास ः हँ। समस्या त हमरो अछि। मुदा हम्मर समस्या दोसर तरहक अछि। विकास ः की? रामविलास ः अपने केँ कहिये देने छी जे किछुए दिन पहिने नेाकरी स निवृत भेलहुँ आ मदनो पढ़िते छल। मरदा-मरदी कियो घर मे छेलहुँ नहि, जहि स घरक सब काज पछुआइल अछि। जना, घर बनौनाइ, काज सब ठाढ़ केनाइ, जहि कऽ पुरबै मे कम स कम छह मास जरुर लगत। अखन घरो ने अछि, जहि मे रहब। तेँ हमरो किछु समय चाही। ओना विआह अखन कइये लेब, मुदा जहाँ धरि बिदागरीक सवाल अछि ओ अगिला साल करब। विकास ः की सब काज करैक अछि? रामविलास ः (हँसैत) मास्सैब, मुरुख रहितहुँ हम बहुत (बड़) कमेलहुँ। जाधरि कमाइत छलहुँ ताधरि अपनो अनके घर मे रहैत छलहुँ। वेटो होस्टले मे रहैत छल। सिर्फ पत्निये टा घर मे रहैत छलहुँ , तेँ ने बेसी घरक जरुरत छल आ ने बनवैक समय भेटल। आब दुनू बापूत निचेनो भेलहुँ आ दुनू काजो (नोकरी आ पढ़नाई) सम्पन्न भ गेल। तेँ, दुनू ठाम (रहबोक लेल आ कारोबार करैक लेल) घरो बनवैक अछि आ कारोवार शुरुह करैक अछि।  विकास ः की सब कारोबार करैक विचार अछि?  रामविलास ः सबसँ पहिने रहैक लेल चैघारा घर बनाएव। तीन अलंग अंागन मे रहत आ एक अलंग दरवज्जा रहत। तेकर बाद चैकपर (एन.एच.क बगल मे) तीनि टा कोठरी बनवैक अछि। जहि मे एकटा कोठरी मे लेथ मशीन बइसायब। दोसर मे अप्पन कारोवारक (मिसतिरिआइक) रहत आ तेसर मे बच्चा कऽ आॅफिसनुमा बना देवइ, जहि मे ओ अप्पन कारोवारक हिसाव-किताब राखत। विकास ः वाह, बड़सुन्दर योजना अछि। तेकर बाद की करब? रामविलास ः घर बनौलाक बाद दुनू बापूत कलकत्ता जायब। ओतुक्के बैंक मे रुपैइयो अछि। रुपैइया उठा इंजीनियर सहाएव केँ संग कऽ एकटा वस बेटा लेल कीनब। अपना लेल मशीन आ जखन पुतोहू कमप्युटर सीखन छथि ते हिनका लेल एकटा कमप्युटर कीनब। तेकर बाद जे रुपैया उगरत ओहो आ सब सामानो बसे मे लादि कऽ ल आनब। एहि सब काज करै मे छह मास स बेसिये लाइग जायत। विकास ः काज त बहुत अछि। बड़वढ़िया नहि छह मास त साल भरि मे सब काज भइये जायत। रामविलास ः हँ, से किअए ने हैत। विकास ः भने दुनू गोटे, एहि साल भरि मे, अप्पन-अप्पन काज साल भरिक भीतर पूर्ति कऽ लेब। बिबाह त अखन कइये लिअ, विदागरी अगिला साल करब। मुदा दुरागमनोक विधि समपने कऽ लेब। अखन कनियाँ केँ अप्पन सीमा पार कऽ घुमा लेब। विवाहक काज त समपन्ने बुझू।

ःः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः  समाप्त अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सय लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। लघुकथा युगान्त -हे सुनै छी की? -हँ माँ कहथु ने, की कहै छथि। -आइ रीता दाइ अबै छै। -से की? -से घर आँगन नीप लिअ। तिलकोड़, पापर, राहड़िक दालि, बड़ी सब सकाले कके राखि लिअ। -बेस! एतऽ हम हिनका दुनु बेकतीक सेवाक लेल छियैनि। हिनका बेटी जमाय लेल नै। अबैत छथिन एहि बेर अपने गाम, चल जेबनि संगे। लऽ लिहथि तखन धधकल..कहलकै जे..!! जगदीश मंडल उपन्यास: जिनगीक जीत  ःः  1 छोट-छीन गाम कल्‍याणपुर। गाम क' देखनहि बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुक्‍ख स ल' क' आइ धरिक मनुक्‍ख हँसी-खुशी स रहैत अछि। मनुखे टा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्‍ची दूधवाली गाय स ल' क' बीस लीटर दूधवाली गाय धरि। बकरीओक सैह नस्‍ल। ऐहनो बकरी अछि जकरा तीनि-चारि बच्‍चा भेने, एक-दू टा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जकरा चारि लीटर दूध होइत। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जहि मे एकछाहा शीशोए टा अछि त दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वैह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि त कोनो एकछाहा कलमीक। ततबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छपने अछि त ओहनो गाछी अछि जहि मे पनरह-पनरह टा आमक गाछ एक कट्ठा मे फइल स रहि मनसम्‍फे फड़बो करैत अछि। ओझुका जेँका कल्‍याणपुर, चालीस बर्ख पहिने नहि छल। ने एकोटा चापाकल छलै आ ने बोरिंग। जेहने हर त्रेता युग मे राजा जनक जोतने रहथि तेहने हर स अखनो कल्‍याण पुरक खेत जोतल जाइत अछि। ने अखुनका जेँका उपजा-बाड़ी होइत छल आ ने बर-बीमारीक उचित उपचार। सवारीक रुप मे सभकेँ दू-दू टा पाएर वा गोट-पङरा बड़द जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैआ जिनगी मे मिसिओ भरि सुधार नहि भेल। जहिना जाँत मे दू चक्‍की होइत- तरौटा आ उपरौटा। तरौटा कील मे गाड़ल रहैत। तहिना शरही आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी त आगू मुहे घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्‍की जेँका ओहिना गड़ाइल रहि गेल अछि। बान्‍ह-सड़क, घर-दुआर सब ओहिना अछि जहिना चालीस बर्ख पहिने छल। तेँ की कल्‍याणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ै मे, भाग नहि लेलक? जरुर लेलक। दिल खोलि साहस स लेलक। सगरे गाम क' गोरा-पल्‍टन आगि लगा-लगा तीनि बेरि जरौलक। कत्त्ो गोटे बन्‍दूकक कुन्‍दा से, त कत्त्ो गोटे मोटका चमड़ाक जूत्ता स थकुचल गेलाह। जहल जाइवलाक धरोहि लागि गेल रहय। कत्त्ो गोटे डरे जे गाम छोड़ि पड़ायल ओ अखनो धरि घुरि क' नहि आबि सकल। कत्त्ो गोटेक परिवार बिलटलै, तकर कोनो ठेकान, अखनो धरि नहि अछि। कल्‍याणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे राति मे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहय। पहिलुके साँझ मे स्‍त्री मखनी केँ पेट मे दर्द उपकलै। प्रशबक अंतिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रशवक पीड़ा छी। अछेलालो केँ सैह बुझि पड़लै। ओसरे पर चटकुन्‍नी बिछा मखनी पड़ि रहलि। चटकुन्‍नीक बगले पे अछेलालो बैसि गेल। दरद असान होइतहि मखनी बाजलि- ‘‘दरद असान भेल जाइ अए।'' मुह पर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असकरुआ छी कोना पलहनिक ओहिठाम जायब? कोना अगियाशी जोड़ब? जाड़क समय छियै। परसौतीक लेल जाड़ ओहने दुश्‍मन होइत अछि जेहने बकरीक लेल फौती। दर्द छुटितहि मखनी फुड़-फुड़ा क'उठि भानसक जोगार मे जुटि गेलि। पानि भरैक घैल लए जखने घैलची दिशि बढ़ै लागलि कि अछेलाल(पति) बाँहि पकड़ि रोकि, कहलक- ‘‘अहाँ उपर-निच्‍चा नइ करु। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घर से बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धो क' आनि देब।'' मखनी चुल्‍हि पजारै लागलि आ अछेलाल लुरु-खुरु करै लगल। बरतन-बासन धोय ओहो चुल्‍हिऐक पाछु मे बैसि, आगियो तपै आ गप्‍पो-सप्‍प शुरु केलक। मुस्‍कीदैत अछेलाल बाजल- ‘‘एहिबेर भगवान बेटा देताह।'' बेटाक नाम सुनि मखनी सुखक समुद्र मे हेलए लागलि। मने-मन सुखक अनुभव करैत विचारै लागलि जे बच्‍चा केँ दूध पियाइब। तेल-उबटन सँ जाँतव। आखि मे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्‍मा लेब। कोरा मे लए अनको आंगन घूमै जाएब। इस्‍कूल मे नाओ लिखा पढ़बैक विचार एलै, कि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालि मे सानल कौर मुह मे दइते, ओहन आँकर पड़ि जाइत जहि स जी(जीभ) कटि जाइत, तहिना भेलि। मनक सुख मनहि मे मखनी क' अटकि गेलि। पत्‍नीक मलिन होइत मुह देखि पति बाजल- ‘‘गरीबक मनोरथर आ बरखाक बुलबुला एक्‍के रंग होइ छै। जहिना पाइनिक बुलबुला सुन्‍दर आकार आ रंग ल' बढ़ैत अछि कि फुॅटिये जाइत, तहिना।'' मखनीक मन मे दोसर विचार उठलै जे धन त बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार,गाय-महीसि, रुपैआ-पैसा मुदा एहि सब धन स पैघ बेटा धन होइत छैक। जे बूढ़ मे माय-बापक सवारी बनि सेवा करैत अछि। ततबे नहि, परिवारो खनदानो क' आगू बढ़बैत अछि। तोहूँ मे जँ कमासुत बेटा होइत त जीवितहि माय-बाप केँ स्‍वर्गक सुख दैत अछि । भानस भेलै। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआर पर चटकुन्‍नी विछाओल, तहि पर जा मखनी सुति रहलीह। थारी-लोटा अखारि, चुल्‍हि-चिनमारक सभ सम्‍हारि अछेलाल चुल्‍हिये लग बैसि आगि तपै लगल। तमाकुल चूना मुह मे लेलक। चुल्‍हिये लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ै ले उठि क' अंगना मे टहलै लगल। भक्‍क टुटिते फेर चुल्‍हि लग आबि अछेलाल आगि तपै लागल। मखनी निन्‍न पड़ि गेलि। मखनीक नाकक आबाज सुनि अछेलाल सोचै लगल जे जँ राति-बिराति दर्द उपकतै त महा-मोसकिल मे पड़ि जायब। अपने त किछु बुझैत नहि छी। दशमीक डगरक सिदहा द' नहि सकलिऐक तेँ पलहनियो आओत की नहि? चुल्‍हिक आगि मिझाइत देखि अछेलाल जारन आनै डेढ़िया पर गेल। ओस स जारनो सिमसल। लतामक गाछ पर स टप-टप ओसक बुन्‍न खसैत। अन्‍हारक तृतीया रहने, चान त भरि राति उगल रहत, मन मे अबितहि अछेलाल मेघ दिशि तकलक। चान त उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीन पर इजोत अबितहि नहि। पाँज मे जारन नेने अंगना आयल। ओसार पर चुल्‍हि रहने सोचलक जे घरे मे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हैत किऐक त घरो गरमाइल रहत। अछेलालक पाएरक दमसि स मखनीक निन्‍न टुटि गेलै। धधकैत घूर देखि मखनियो केँ आगि तपैक मन भेलै। ओछाइन पर स उठि ओ घूर लग आबि बैसलि। बीच मे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुख स मखनी तहिना मोनक दुख स अछेलाल। बेबसीक स्‍वर मे अछेलाल बाजल- ‘‘अदहा राति त बीतिए गेल, अदहे बाकी अछि। जहिना अदहा बीतल तहिना बाँकियो बीतबे करत।'' अछेलालक बात सुनि मखनी पूछलक- ‘‘अखन धरि अहाँ जगले छी?'' ‘हँ, की करब। जँ सुति रहितौ आ तइ बीच मे अहाँ केँ दरद उठैत त फटोफन मे पड़ि जइतहुँ। सैाँसे गामक लोक सुतल अछि। ककरा सोरो पारवैक। एक्‍के रातिक त बात अछि। कहुना-कहुना क' काटिये लेब। मन मे होइत छल जे बहिन केँ बिदागरी करा केँ ल' अनितहुँ मुदा ओहो त पेटबोनिये अछि। तहू मे चारि-पाँच टा लिधुरिया बच्‍चो छै। जँ विदागरी करा क' आनव त पाँच गोटेक खरचो बढ़ि जाइत। घर मे त किछु अछि नहि। कमाई छी खाई छी।'' ‘‘कहलिएै त ठीके। अपना घर मे लोक भुखलो-दुखलो रहि जाइत अछि। मुदा जकरा माथ चढ़ा क' अनितियै ओकरा कोना भूखल रखितियै?'' दिन-राति चिन्‍ता पैसल रहै अए जे पार-घाट कोना लागत। भगवानो सबटा दुख हमरे दुनू परानी केँ देने छथि। एक पसेरी चाउर घैल मे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत। तकर बाद बुझल जेतैक।'' पसेरी भरि चाउर सुनि अछेलालक मोन मे आशा जगल। मुह स हँसी निकलल। हँसैत बाजल- ‘‘जँ हमर बनि बच्‍चा जनम लेत त कतबो दुख हेतइ तइओ जीवे करत। नहि जँ कोनो जनमक करजा खेने हेबै त असुल क' चलि जायत।'' पतिक बात सुनितहि मखनी केँ पहिलुका दुनू बच्‍चा मन पड़ल। मने-मन सोचै लागलि जे ओहो बच्‍चा नहि मरिते। जँ नीक-नहाँति सेवा होइतइ ते। मुदा मनुखे की करत? जकरा भगवाने बेपाट भ' गेल छथिन। पैछला बात मन स हटबैत मखनी बाजलि- ‘‘समाज मे ओहनो बहुत लोक होइत जे बेर-बेगरता मे भगवान बनि ठाढ़ होइत।'' ‘‘समाज दू रंगक होइछै। एकटा समाज ओहन होइ छैक जइ मे दोसराक मदति केँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छैक जहि मे सब सभक अधले करैत अछि। अपने गाम मे देखै छियै। अपन टोल तीस-पेंइतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसर स' भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीनि घरक दियादी अछि। तीनू घर मे सुकनाकेँ दु सेर दू टाका छैक। ओकरा देखै छियै। सदिखन झगड़े-झंझटक पाछू रहैअए। टोल मे सबसे बाड़ल अछि। ओकरा चलैत हमरो से सब मुह फुलौने रहै अए। ने ककरो से टोका-चाली अछि आ ने खेनाई-पीनाई, आ ने लेन-देन। भगवान रच्‍छ रखने छथि जे सब दिन बोइन करै छी मौज स खाई छी नइ त एक्‍को दिन अइ गाम मे बास होइत।'' अछेलालक बात सुनि मूड़ि डोलबैत मखनी बाजलि- ‘‘कहलौ त ठीके, मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन ओइह ने पारो-घाट लगबै छथिन।'' मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- ‘‘सगरे गाम मे नजरि उठा क' देखै छी त खाली बचेलालेक परिवार स थोड़-बहुत, मिलान अछि। साल मे दश-बीस दिन खेतिओ सम्‍हारि दइ छियै आ घरो-घरहट। पेंइच-उधार त नहिये करै छी। हमर ब्रह्‌म कहै अए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबनि त ओ बेचारी जरुर सम्‍हारि देती। कहुना राति बीतै भोर होय, तखन ने कहबनि। दुखक रातियो नमहर भ जाइ छै। एक्‍के निन्‍न मे भेर भ जाइ छले, से बितबे ने करै अए।'' हाफी करैत मखनी बाजलि- ‘‘देहो गरमा गेलि आ डॉड़ो दुखा गेल। ओछाइने पर जाइ छी।'' मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भ' मखनीक बाँहि पकड़ि ओछाइन पर ल' गेल। मखनी पइर रहलि। पड़ले-पड़ल बाजलि- ‘‘मन हल्‍लुक लगै अए। अहूँ सुति रहू।'' अछेलालक मन मे चैन आयल। मुदा तइयो सोचैत जे एहि देह आ समयक कोन ठेकान। कखन की भ' जयतैक। गुनधुन करैत बाहर निकलि चारु भर तकलक। झल-अन्‍हारक दुआरे साफ-साफ किछु देखवे ने करैत। मूड़ी उठा मेघ दिशि तकलक। मेघो मे छोटका तरेगण बुझिये ने पड़ै। गोटे-गोटे बड़का देखि पड़ै। अयना जेँका चानो बुझि पड़ै। डंडी-तराजू केँ ठेकना ताकै लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्‍हुआइल देखलक। डंडी-तराजू देखि अछेलाल क' संतोष भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि क' आबि घूर लग बैसल। आलस अबै लगलै। तमाकुल चुना मुह मे लेलक। बाहर निकलि तमाकुल थूकड़ि क' फेकि पुनः घुरे लग आबि बोरा पसारि घोंकड़ी लगा,बाँहिएक सिरमा बना सुति रहल। निन्‍न पड़ि गेल। निन्‍न पड़ितहि सपनाइ लगल। सपना मे देखै लगल जे घरवाली दरद स कुहरैत अछि। चहा क' उठि पत्‍नीकेँ पूछलक-‘‘बेसी दर्द होइ अए?'' मखनी निन्‍न छलि। किछु नहि उत्तर नहि देलि। घूर क' फूँकि अछेलाल धधड़ाक इजोत मे मखनी लग जा निङहारि क' देखै लगल। मन मे भेलै जे कहीं बेहोश त ने भ' गेलि अछि, मुदा नाकक साँस असथिर रहै। कौआ क' डकितहि अछेलाल उठि क' बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोटेक घर थोड़बे हटल, मुदा बीच मे डबरा रहने घुमाओन रास्‍ता। बचेलालक माए क' अछेलाल भौजी कहैत। दियादी संबंध त दुनू परिवार मे नहि मुदा सामाजिक संबंधे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्‍दन छोटे गिरहस्‍त, मुदा सामाजिक हृदय रहने सभ सँ समाज मे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़िया पर ठाढ़ भ' बचेलालक माय सुमित्राकेँ सोर पाड़लक। आंगन बहारैत सुमित्रा बाढ़नि हाथ मे नेनहि घरक कोनचर लग स देखि, मुस्‍कुराइत बाजलि- ‘‘अनठिया जेँका दुआर पर किऐक छी?आउ-आउ, अंगने आउ।'' अछेलालक मन्‍हुआयल मुह देखि सुमित्रा पूछलक-‘‘राति मे किछु भेलि की? मन बड़ खसल देखै छी।'' कपैत हृदय स अछेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘नइ राति मे त किछु ने भेल मुदा भारी विपत्ति मे पड़ल छी। तेँ एलौ।'' ‘‘केहन विपत्ति मे पड़ल छी?'' ‘‘भनसियाकेँ संतान होनिहार अछि। पूर मास छियै। घर मे त दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला ते अपने बुझै नइ छी। तेँ अहाँ क' कहै ले एलौ जे चलि क सम्‍हारि दिओ।'' कनेकाल गुम्‍म भ' सुमित्रा बजलीह- ‘‘अखन त दरद नहि ने उपकलै हेन?'' ‘‘नै, अखन चैन अछि। साझू पहर दरद उपकल छलै मुदा कनिये कालक बाद असान भ' गेलै।'' ‘लोकेक काज लोक क' होइ छै। समाज मे सभक काज सभकेँ होइ छै। अगर हमरा गेला स अहाँक नीक हैत त किअए ने जायब।' कहि सुमित्रा फुसफुसा क पूछल-‘‘परसौती खाइले चाउर अछि, की ने?'' अछेलालक मोन मे एलै जे झूठ नहि कहबनि। कने गुम्‍म भ बाजल- ‘‘एक पसेरी चाउर घर मे अछि, भौजी।'' एक पसेरी चाउर सुनितहि सुमित्राकेँ हँसी लगलनि। मुदा हँसी क' दाबि, सोचलनि जे कम स कम एक मासक बुतात चाही। मास दिन सँ पहिने परसौतिक देह मे कोनो लज्‍जति थोड़े रहै छै। तेँ एक मासक बुतातक जोगार सेहो क देबै। बेर पड़ला पर गरीब लोकक मन बौआ जाइ छै तेँ अछेलाल ऐना कहलक। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैत अछि। जखन हमरा बजबै ले आइल तखन बच्‍चा क' एहि धरती पर ठाढ़ करब हमर धर्म भ जाइत अछि। सिर्फ बच्‍चा जनमि गेला से त नहि होइत। दुनू गोटे गप-सप करिते छल कि बचेलाल सुति क उठल। केबाड़ बन्‍ने छल कि दुनू गोटेक गप-सपक आवाज सुनलक। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी देलक कि दुनू गोटे केँ गप-सप करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोटे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भ गेल। पुतोहूक दुआरे सुमित्राा बाजलि- ‘‘दरबज्‍जे पर चलू।'' तीनू गोटे दरवज्‍जा पर आबि गप-सप करै लगल। अपन भार हटबैत सुमित्राा बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बच्‍चा!  अछेलालक कनिञाँ क' सन्‍तान होनिहारि छै। बेचारा,जेहने सवांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगाा क अपना ऐठाम आयल। गाम मे त बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किऐक ने गेल। जेँ हमरा पर बिसवास भेलै तेँ ने आयल।'' मूड़ी निच्‍चा केने बचेलाल चुपचाप सुनैत। माएक बात सुनि कहलक- ‘‘जखन तोरा बजबै ले एलखुन ते हम मनाही करबौ।'' ‘‘सोझे गेला से त नइ हेतै। कम स कम एक मासक बुतातो चाही की ने?'' ‘‘जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरा से पूछैक कोन जरुरी? जे जरुरी बुझै छीही,से कर।'' अछेलालक हृदय मे आशा जगै लगल। मने-मन सोचै लगल जे अखन धरि बुझै छलौ जे गाम मे क्‍यो मदतिगार नहि अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलनि जे ऐठाम एलौ। कुस्‍कुराइत अछेलाल सुमित्रा केँ कहलक- ‘‘बड़ी काल भ गेल भैजी, अंगना मे की भेल हेतै, सेहो देखैक अछि तेँ आव नइ अँटकब। चलू, अहूँ चलू।'' सुमित्राा- ‘‘बौआ! अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठे पर अबै छी।'' अछेलाल आंगन बिदा भेल। सुमित्राा बचेलाल केँ कहै लागलि- ‘‘बच्‍चा! मनुखेक काज मनुख क' होइ छै। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घर मे जमा रहत। महीना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबै। भगवान हमरा बहुत देने छथि। कोन चीजक कमी अछि।'' बचेलाल- ‘‘माए! तोरा जे नीक सोहाओ, से कर। जा क' देखही।'' दरबज्‍जा स उठि सुमित्रा अंगनाक काज सम्‍हारै लागलि। सब काज सम्‍हारि सुमित्रा अछेलाल ऐठाम विदा भेलि। मखनी ओसार पर, विछान बिछा, पड़लि। पहुँचते सुमित्रा मखनी केँ पूछलि- ‘‘कनिञाँ, दरदो होइ अए?'' कर घूमि मखनी बाजलि- ‘‘दीदी, अखन त दरद नइ उपकल हेन, मुदा आगम बुझि पडै़ अए।'' मखनी क' दू टा संतान भ चुकल छल तेँ आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलाल केँ कहलक-‘‘ऐठाम हम छी हे। अहाँ पलहनिक ऐठाम जा बजौने आउ?'' अछेलाल पलहनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पलहनि ऐठाम जेबा ले डेगे ने उठैत। मन मे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै द' सकलिऐक, तेँ ओ आओत की नहि?मुदा तइयो जी-जाँति क' विदा भेल। भरि रास्‍ता विचित्र मे अछेलाल। एक दिशि सोचैत जे जँ पलहनि नहि आओत त बेकार गेनाइ हैत। दोसर दिशि होय जे जाबे हम इमहर एलौ ताबे घर पर की हैत की नहि। पलहनिक ऐठाम पहुँचते अछेेलाल देखलक जे पलहनि मालक थैरिक गोबर उठा, पथिया मे ल खेत विदा भेलि अछि। जहिना न्‍यायालय मे अपराधी केँ होइत तहिना अछेलालो केँ बुझि पड़ैत। मुदा तइयो साहस क'पलहनि सँ कहलक- ‘‘कने हमरा ऐठाम चलू। भनसिया क' दरद होइ छै।'' ‘‘माथ पर गोबरक छिट्टा नेने पलहनि उत्तर देलक- ‘‘हम नइ जेबनि। डगरक सिदहा हमर बाँकिये अछि। पेट-बान्‍हि कतेक दिन काज करबनि।'' पलहनिक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्‍य क' कोसैत। भगवान केहेन बनौने छथि जे जकरा-तकरा स दू टा बात सुनै छी। मुह सिकुड़िअबति अछेलाल पुनः कहलक-‘‘कनिञाँ, अइ साल सिदहा नइ द सकलिएनि, तेँ कि नहि देबनि। समय-साल नीक हैत त अगिला साल दोबर देबनि। समाज मे सभक उपकार सभकेँ होइत छैक। चलू,चलू....। खिसिया क पलहनि डेग बढ़बति बाजलि- ‘‘किन्‍नहु नहि जेवनि।'' एक टक स अछेलाल पलहनि क' देखैत रहल। देह मे जना एको मिसिया तागते ने बुझि पड़ै। हताश भ, दुनू हाथ माथ पर ल अछेलाल बैसि सोचै लगल जे आब की करब? आशा तोड़ि घर दिशि विदा भेल। आगू मुहे डेगे ने उठै, पाएर पताइत। जना बुझि पड़ै जे आखि स लुत्ती उड़ै अए। कहुना-कहुना क' अछेलाल घर पर आयल। तेसर सन्‍तान भेने मखनी क' दरदो कम भेलै आ असानी स बच्‍चाक जन्‍म भेलै। अपना जनैत सुमित्रा सेवो मे कोनो कसरि बाकी नहि रखलखिन। डेढ़िया पर अबितहि अछेलाल केँ बुकौर लगि गेलै। दुनू आँखि स दहो-बहो नोर  खसै लगल। अंगना आवि मुस्‍कुराइत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, ककरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हैत। भगवान बेटा देलनि। गोल-मोल मुह, मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पाएर छैक।'' आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगै-डूबै लगल। हँसी होइत सुख निकलै चाहैत जबकि आखिक नोर होइत दुख। बेटा जनमितहि सुमित्राक अंगनाक टाट पर बैसल कौवा दू बेरि मधुर स्‍वर मे बाजल कौवाक बोली सुनि बचेलालक मुह स अनायास निकलल- ‘‘अछेलाल काका क'बेटा भेल।'' मुह स निकलितहि बचेलारल आखि उठा-उठा चारु कात देखै लगल जे क्‍यो कहलक नहिये तखन मुह स किऐक निकलल? आंगन स निकलि बचेलाल टहलैत डबराक कोन लग आयल। कोन पर ठाढ़ भ' हियासै लगल जे बच्‍चाक जन्‍म भेलि आ कि दरदे होइत छै। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत। अगियासी जोड़ै ले अछेलाल डेढ़िया पर जारन आनै गेल कि बचेलाल पर नजरि पड़ल। नजरि पड़ितहि अछेलाल, थोडे़ आगू बढ़ि,बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बौआ, छैाँड़ा जनमल।'' लड़काक नाम सुनितहि बचेलालक मोन मे आयल जे जा क' देखिऐेक। मुदा सोचलक जे अखन जा क' देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आंगन आवि पत्‍नी क' कहलक-‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।'' बेटाक नाम सुनितहि मने-मन असिरवाद दैत रुमा बाजलि- ‘‘भगवान जिनगी देथुन।'' बच्‍चाक छठियार भ' गेल। सुमित्रा अपन अंगनाक काज सम्‍हारि अछेलालक आंगन पहुँचली। गोसाई लुक-झुक करैत। पतिआनी लगा बगुला पछिम स पूब मुहे उड़ैत अपना मे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सब धिया-पूता हाथक रोटी छीनै ले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया उपर मे नचैत। सुरुज अराम करैक ओरिआन मे लगल। अछेेलालक बीच आंगन मे बोरा बिछा सुमित्रा बच्‍चा क' दुनू जाँघ पर सुता जतबो करति आ घुनघुना क गेबो करथि- गरजह हे मेघ गरजि सुनाबह रे ऊसर खेत पटाबह, सारि उपजावह रे जनमह आरे बाबू जनमह, जनमि जुड़ाबह रे बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश रे हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे मैलहि बसन सुतायत, छैाँड़ा कहि बजायत रे जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे पीयर बसन सुताबह बाबू कहि बजावह रे झुमि-झमि सुमित्रा गबितो आ बच्‍चा क' जँतबो करति। आखि स आखि मिला स्‍नेहक बरखा बरिसबैत। बच्‍चा क' कोनो तरहक तकलीफ नहि होइ तेइ ले मुह दिशि देखैत। टाटक अढ़ मे बैसि अछेलाल सुमित्रा क' स्‍नेह देखि, दुनिया क' बिसरि आनन्‍द लोक मे बिचरैत। घ्‍ 2 रवि दिन रहने बचेलाल अबेर क' उठल। मन मे यैह सोचि विछान पर पड़ल,जे आइ स्‍कूल नहिये जाएब। घर पर कोनो अधिक काजो नहिये अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजिये टा खिंचैक अछि। दुपहर तक त काजो एतवे अछि। बेरु पहर हाट जा घरक झूठ-फूस समान कीनि आनब। हाटो दूर नहि,गामक सटले अछि। सुति उठि बचेलाल नित्‍य-कर्म स निवृत भ' दलानक चौकी पर आबि बैसल। रुमा चाह द' गेलनि। दू घोंट चाह पीबितहि बचेलाल केँ पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़ितहि बचेलाल अपन तुलना हुनका(पिता) स करै लगला। मने-मने सोेचै लगल जे पिता साधारण किसान छलाह। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा क' लिखि लथि। काजो ओतबे रहनि जे कहियो-काल रजिष्‍ट्री अॉफिस जा सनाक बनथि। भरि दिन खेती स ल क' माल-जालक सेबा मे व्‍यस्‍त रहैत छलाह। मुदा एत्त्ो गुण अवश्‍य छलनि जे गाम मे कतौ पनचैती होइत वा कतौ भोज-भात होइत वा समाजिक कोनो(दशनामा) काज होइत त हुनका जरुर बजौल जाइन। ततबे नहि, बूढ़-पुरान छोड़ि केयो नाम ल क' सोरो नहि पाड़ैत छलनि। अपन संगतुरिया भाय कहनि आ धिया-पूता स चेतन धरि गिरहत बाबा, गिरहत काका कहनि। परिवारे जेँका समाजो क' बुझैत छलथिन। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिना छुट्टिये एक्‍को दिन ने स्‍कूल मे अनुपस्‍थिति होइ छी आ ने एको क्षण बिलम्‍ब स पहुँचै छी। जते काल स्‍कूल मे रहै छी, बच्‍चा सभकेँ पढ़विते छी। जना आन-आन स्‍कूल मे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छथि, कखनो जाइ छथि आ स्‍कूलो मे ताशो भँजैत छथि। ओना हमहू ककरो उपकार त नहिये करै छी किऐक त दरमाहा ल काज करैत छी। आन शिझकक अपेक्षा इमानदारी स जीवितहुँ अपना पैघ कमी बुझि पड़ैत अछि। ओ कमी अछि समाज मे रहि समाज स कात रहब। स्‍कूलक समय छोड़ि दिन-राति त गामे मे रहै छी मुदा ने क्‍यो टोक-चाल करै अए आ ने क्‍यो दरवज्‍जा पर अबै अए। मन मे सदिखन रहे अए जे कमाई छी त दू-चारि गोटे केँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा क्‍यो कनडेरियो आखिये नहि तकैत अछि। हमहू त ककरो ऐठाम नहिये जाइ छी। चेतन सभक कहब छनि जे दुआर-दरबज्‍जाक इज्‍जत छी चारिगोटेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइ अए। गाम त शहर-बजार नइ छी जे एक्‍के मकान मे रहितहुँ, आन-आन क्षेत्रक रहने, लोक आन-आन भाषा बजैत, आन-आन चलि-ढ़ालि मे अपन जिनगी वितवैत, ककरो क्‍यो सुख-दुख मे संग नहि होइत! मुदा समाज त से नहि छी? बाप-दादाक बनाओल छी। एक ठाम सइयो-हजारो बर्ख स मिलि-जुलि क' रहैत अयलाह। रंग-विरंगक जातियो प्रेम स रहैत अछि। सभ सभकेँ सुख-दुख मे संग रहैत अछि। बच्‍चाक जन्‍म स ल क' मरण धरि संग पूरैत। ऐहन समाज मे, हमर दशा ऐहन किऐक अछि? जहिना पोखरिक पानिक हिलकोर मे खढ़-पात दहाइत-भसिआइत किनछरि लगि जाइत तहिना त हमरो भ' गेल अछि। की पाइनिऐक हिलकोर जेँका समाजो मे होइत छैक? जँ पाइनियेक हिलकोर जेँका होइत छैक त हम ओहि हिलकोर क' बुझैत किऐक ने छी? हमहू त पढ़ल-लिखल छी। जत्त्ो समाजक संबंध मे बचेलाल सोचैत तत्त्ो मन मलिन होइत जाइत। मुदा बुझि नहि पबैत। अधा चाह पीलाक बाद जे गिलास मे रहल ओ सरा क' पानि भ' गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि, बचेलाल क'। जना बुझि पड़ैत जे हम ओहन बन मे बौआ गेलहुँ जत्त' एक्‍को टा रस्‍ते ने देखैत छी। गंभीर भ' बचेलाल बड़बड़ेबो करैत आ अपने-आपमे गप्‍पो करैत। आंगन स सुमित्रा आबि बचेलाल केँ देखि पूछलखिन- ‘‘बच्‍चा, कथीक सोग मे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?'' बचेलालक मुह सँ निकलल- ‘‘नहि माए! भेल त किछु नहि। मुदा गामक किछु बात मोन मे घुरिआइत अछि। जकर जबाब बुझिते ने छी।'' तारतम्‍य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘गाम मे त बहुत लोक रहैत अछि मुदा सभ थोड़े गामक सब बात बुझैै छै। गाम मे तीनि तरहक रास्‍ता छैक। पहिल ओ जहि स समाज चलैत अछि। दोसर स परिवार चलैत आ तेसर स मनुक्‍ख चलैत अछि। मनुक्‍ख अपन चलि परिवारक चालि मे मिला क' चलैत अछि। तहिना परिवार समाजक चालि स मिला क' चलैत अछि तेँ, तीनूक अलग-अलग चालि रहनहुँ ऐहन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझवो मे नहि अबैत।' मुह वाबि बचेलाल माएक बात सुनि, कहलकनि- ‘‘माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलहुँ। मन मे यैह होइ अए जे किछु बुझिते ने छी। अन्‍हार मे जना लोक किछु ने देखैत, तहिना भ रहल अछि।' मूड़ी डोलबैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘अपने घर मे देखहक- दू टा बच्‍चा अछि, ओकर त कोनो मोजरे नहि। तीनि गोटे चेतन छी। तोँ भरि दिन इस्‍कूलेक चिन्‍ता मे रहै छह। भोरे सुति उठि क' नओ बजे तक, अपन सब क्रिया-कर्म स निचेन भ खा के इस्‍कूल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पाएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घर पर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखाना स अबैत-अबैत दोसर साँझ भ' जाइ छह। दरबज्‍जा पर बैसि, कोनो दिन ‘रमायण' त कोनो दिन ‘महाभारत' पढै़ छह। भानस होइ छै खा क सुतै छह। फेरि दोसर दिन ओहिना करै छह। एहिना दिन बीतैत जाइत छह। दिने स मास आ मासे स साल बनैत छैक। कोल्‍हुक बड़द जेँका घर स इस्‍कूल आ इस्‍कूल स घर अबै-जाइत जिनगी बीति जेतह। मुदा जिनगी त से नहि थिक? जिनगी त ओ थिक- जना बसन्‍त ऋृतु अबिते गाछ-विरीछ नव कलश ल बढै़त अछि, तहिना। मनुक्‍खोक गति अछि। जिनगीक गतिये मनुक्‍ख केँ ब्रह्‌माण्‍डक गति से मिला क' ल चलैत। अज्ञानक चलैत मनुक्‍ख, एहि गति क' नहि बुझि, छुटि जाइत अछि। छुटैक कारण होइत व्‍यक्‍तिगत, परिवारिक आ सामाजिक जिनगी। जे सदिखन आगूक गतिक पाछु महे धकेलति अछि। जहि स मनुख समयक संग नहि चलि पबैत। मुदा तइ स की? बाधा कतबो पैघ किऐक ने हुअए मुदा मनुखो केँ साहस कम नहि करक चाही। सदिखन सब अंग क' चौकन्‍ना क चलला से सब बाधा टपि सकैत अछि। पुतोहूए जनि केँ देखुन। भरि दिन भनसा आ धिये-पूतेक आय-पाय मे लगल रहैत छथुन। हमरो जे शक लगै अए से करिते छी। घर त कहुना चलिये जाइ छह। मुदा परिवार त समाजक एक अंग छी। परिवारेक समूह ने समाज छी। तेँ समाजक संग चलैक लेल परिवार क' समाजक रास्‍ता धड़ै पड़त। से नहि भ' रहल छह। जना देखैत छहक जे रेलगाड़ी मे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै। जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छै। मुदा चलै काल सब संगे चलै छै। तहिना मनुक्‍खो छै।'' सुमित्राक बात सुनि बचेलाल जिज्ञासा स पूछल- ‘‘अपन परिवारक की गति अछि?'' मुस्‍कुराइत सुमित्रा कहै लागलि- ‘‘अपन परिवार ठमकल अछि। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू मुहे जा रहल छी, मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिझक छी, नीक नोकरी करै छी। नीक दरमहो पबै छी। हँ, ई बात जरुर अछि। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुद्धियार छी। तखन हमरा बुद्धिक काज कैक गोटे क' होइ छै। जे क्‍यो नहिये पढ़ल अछि ओहो त अपन काज, अपन परिवार चलबिते अछि। कने नीक कि कने अधला सब त जीवे करैत अछि। आइ तोरा नोकरी भ गेलह, तेँ ने, जँ नोकरी नइ होइतह तखन त तोहू वहिना जीवितह जहिना बिन पढ़ल-लिखल जीवैत अछि। एहिना पुतोहू जनि केँ देखुन, जना घर स कोनो मतलबे नहि अछि। हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल। हमहूँ कनियाँ छलौ मुदा आइ जे घर मे देखै छिअह तना त नहि छल। जखन हम नैहर स ऐठाम एलहुँ तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीविते रहथि। जखन चारि दिनक बाद चुल्‍हि छूलौ, तहिया स सासु कहियो चुल्‍हि दिशि नहि तकलनि। ने कोठी से चाउर निकालि क' देथि आ ने किछु कहथि। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्‍को छल। जे सब काज नैहर मे करै छलौ सैह सब काज अहूठाम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्‍न आ कि कोनो वस्‍तु दुइर नहि हुअए दैत छलिऐक। अखन देखै छिअह जे पाँचे गोटेक परिवार रहनहु सभ सब स सटल नहि,हटल चलि रहलह हेन। सटि क' चलैक अर्थ होइत सभ सब काज मे जुटल रही। इ त नहि कि क्‍यो काजक पाछू तबाह छी आ क्‍यो बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सीमा बुझ चलक चाही, से नहि छह। हम खेलहुँ कि नहि, तोँ खेलह कि नहि। भनसिया लेल धन्‍य सन। की खायव, कोन वस्‍तु शरीरक लेल हितकर हैत कोन अहितकर, से सब बुझैक कोनो मतलवे नहि। जे खाई मे चसगर लागत, भले ही ओ अहितकरेे किऐक ने हुअए, वैह खायब। जहि स घर मे बीमारी लधले रहै छह। जहिना सुरुजक किरिण मे देखै छहक जे अनेको दिशा मे चलैत तहिना परिवारोक काज सब दिशा क' जोड़ैत अछि, से नहि भ' रहल छह।'' बिचहि मे बचेलाल माएकेँ पूछलक- ‘‘माए! नीक-नाहाँति तोहर बात नइ बुझि रहलौ हेन?'' बचेलालक बात क' तारतम्‍य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्‍चा, देखहक जहिना गाम मे किछु परिवार आगू मुहे ससरि रहल अछि त किछु परिवार पाछू मुहे। किछु परिवार ठमकल अछि। जहि स गाम आगूू मुहे नहि बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारो मे होइत। परिवारो मे किछु गोटे आगू बढ़ैक चेष्‍टा करैत त किछु(आलस अज्ञान आदि क चलैत) पाछू मुहे ससरैत। किछु गोटे अदहा-छिदहा मे रहैत। तेँ परिवार केँ जहि गति मे चलक चाही, से नहि भ' रहल अछि। ततवे नहि इ रोग मनुक्‍खक भीतरो मे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समय स जोड़ि क' चलै चाहैत त किछु समयक गति नहि बुझि, पाछूऐ मुहे चलैत। इ बात जाबे नीक जेँका नहि बुझबहक ताबे ने मन मे चैन हेतह आ ने आगू मुहे परिवार बढ़तह।'' माइक बात स बचेलालक मन घोर-मट्ठा भ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरिअबैत बचेलाल माए केँ कहलक- ‘‘माए! जखन मन असथिर हैत तखन बुझा-बुझा कहिऐं। एक बेरे नइ बुझब, दू बेरे बुझैक कोशिश करब। दू बेरे नइ बुझब तीन बेरे कोशिश करब। मुदा बिना बुझने त काज नहि चलत।'' बचेलालक बात सुनि मुस्‍कुराइत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्‍चा जखन तोहर पिता जीविते रहथुन तखन घर मे पाथरक  बटिखारा छल। ओहि स जोखै-तौलै छलहुँ। एक दिन अपने(पति) आबि कहलनि जे आब लोहाक पक्‍की सेर, अढ़ैया पसेरी सब आइल। हम पूछलिएनि जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तकरा फेकि देबै? ओ(पति) कहलनि-फेकबै किऐक? लोहा सेर क' पथरक सेर स भजारि लेब। बटिखारा कम-बेसी हैत, सैह ने हैत, ओकरा अपन बटिखारा हिसाब स मानि लेबै। अओर की हेतै। बौआ अखन तोरो मन खनहन नइ छह, जा तोहू अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप्‍प करब।'' अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खींचै विदा भेल। आंगन जा बाल्‍टी-लोटा,कपड़ा आ साबुन नेने कल पर पहुँचल। कपड़ा साबुन के कात मे रखि पहिने कलक चबूतरा साफ केलक। बाल्‍टी मे पानि भरि सब कपड़ा क' बोइर देलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगल मे रखैत। जखन सब कपड़ा मे साबुन लगाओल भे गेलै तखन पहिलुका सावुन लगौलहा कपड़ा निकालि खींचै लगल। सुमित्रा खन्‍ती ल बाड़ी ओल उखाडै़ विदा भेलि। बाड़ी मे पतिआनी लगा ओल रोपने रहथि। तीन सलिया ओल। केंकटा गाछ फुला गेल। बाड़ी मे सुमित्रा हियासै लागलि जे कोन गाछ खुनब। सब गाछ डग-डग करैत। पतिआनीक बीच मे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भ गेल। पात क' पीअर देखि सुमित्रा ओइह गाछ खुनैक विचार केलनि। ओल कटि नहि जाय तेँ फइल से खुनव शुरु केलनि। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी  एकोटा नहि। टोंटी नहि देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे टोंटी रहैत त रोपियो दैतिऐक मुदा से नहि भेल। ओलक माटि झाड़ि गाछ के टुकड़ी-टुकड़ी काटि खधिये मे द उपर स माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहथि जे ओलो आ खन्‍तिओ ऐके बेर नेने जायब मुदा से गरे ने लगनि। दुनू हाथ स' ओल उठा एक हाथ के ल दोसर हाथ से खन्‍ती लिअए लगथि कि ओल गुड़कि क' निच्‍चा मे गिर पड़नि। कैक बेर कोशिश केलनि मुदा नहिये भेलनि। तखन हारि क' पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग राखि, खन्‍ती आनै गेली। खन्‍तिओ मे माटि लगल आ ओलो मे। तेँ दुनू क' नीक-नाहाँति घुअए पड़त। माए क' ठाढ़ देखि बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ै लगल। कपड़ा ल बचेलाल चार पर पसरै गेल। सुमित्रा ओल के कलक निच्‍चा मे रखि कल चलबै लगली। गर उनटा-उनटा दश-पनरह बेर कल चलौलनि। मुदा तइयो सिरक दोग-दाग मे माटि रहबे केलै। तखन ओल क घुसुका बाल्‍टी मे पानि भरि लोटा स ओलो, खन्‍तिओ आ अपनो हाथ-पाएर धोलनि। आंगन आबि सुमित्रा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘आइ रवियो छी, बच्‍चो गामे पर रहता तेँ ओलक बड़ी बनाउ। बड़ निम्‍मन ओल अछि तेँ दू चक्‍का तड़ियो लेब।'' सुमित्राक बात सुनि मुह-हाथ चमकबैत पुुतोहू उत्तर देलखिन- ‘‘हिनका हाथ मे सरर पड़ल छनि तेँ कब-कब नइ लगै छनि। हमरा त ओल देखिये के देह-हाथ चुलचुला लगै अए। अपने जे मन फुड़ैन से बनबथु। हम चुल्‍हि पजारि ताबे भात रन्‍है छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छनि।'' पुतोहूक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे जाबाव दिअनि आ कि नहि?समय पर जँ जबाव नहि देब त दबब हैत। मगर जबाव देनहु त झगड़े हैत। अपना जे इच्‍छा अछि वैह करब मुदा बाता-बाती से त काजे रुकत। जत्त्ो बनबै मे देरी हैत तते भानसो मे अबेर हैत। मुदा सुमित्राक मन जबाव देइ ले तन-फन करैत। ओल क'बीचो-बीच काटि, चारि फाँक करै लगली ओलक सुगंध आ रंग देखि सुमित्रा जबाव देलखिन- ‘‘कनियाँ, जे चीज सब दिन नीक लागल ओ आइ अधला कोना भ' जायत?जाबे जीबै छी ताबे त खेबे करब। तेाँ जकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नहि छी। दुनू गोटेक नजरि मे अन्‍तर छह। जे अन्‍तर नी-अधला मे बदलि गेल छह। दुनू गोटेक नजरि, एहि दुआरे दू रंग भ गेल छह जे दुनू गोटेक जिनगी दू रंग बीतल। तेाँ नोकरिहाराक परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाई छथुन जहि स हाट-बजार से समान कीनि आनि खइ छेलह। हम त सामान उपजवै वला परिवार मे रहलहुँ। कोन वस्‍तु कोना रोपल जाइ छै, कोना ओकर सेवा करै पड़ैत छै, से सब वुझै छियै। तेँ हमर नीक आ तोहर नीक मे यैह अन्‍तर छह।'' दुनू सासु-पुतोहूक गप-सप बचेलालो दरवज्‍जा पर स सुनैत। बीच आंगन मे बैसि सुमित्रा ओल बनवति रहथि। घर मे पुतोहू भन-भना क' बजैत रहति, जे सुमित्रा नीक जेँका सुनवो ने करैत। बच्‍चा नेने मखनी सेहो आइलि। मखनी के कोरा मे बच्‍चा देखि सुमित्रा दबारैत कहलखिन- ‘‘मासे दिनक बच्‍चा के अंगना से किऐक निकाललह? जँ रस्‍ता-पेड़ा मे हबा-बसात लागि जइतै तब?'' हँसैत मखनी उत्तर देलकनि- ‘‘दीदी! अइ आंगन के अनकर आंगैन कहै छथिन। हमर नइ छी? अपनो अंगना अवै मे संकोच हैत।'' मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत कहलखिन- ‘‘अनकर अंगना बुझि नइ करलियह। अखन बच्‍चा छोट छह तेँ बचा केँ राखै पड़तह। बेटा धन छी। घर से त निकलबे करत। पुतोहू केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘पहिले-पहिल दिन बच्‍चा अंगना आयल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घर मे नइ हुअअ ते तेले टा नेने आवह। ताबे चुल्‍हि मिझा दहक। पहिने बच्‍चा के जाँति-पीचि दहक।'' घर स रुमा तेल आ विछान नेने आबि अंगने मे विछौलक। तेलक माली लग मे रखि बच्‍चा केँ कोरा मे लेलक। दुनू पाएर पसारि बच्‍चा केँ जाँध पर सुतौलक। बच्‍चाक मुह देखि रुमा मने-मन बाजलि- ‘‘मखनी केहेन भाग्‍यशाली अछि जे भगवान ऐहन सुन्‍नर बच्‍चा देलखिन।'' उनटा-पुनटा क' बच्‍चा देखलक। रुमाक मन मे ऐलै जे कोना लोक बजै अए जे फल्‍लाँक कपार खराब छैक आ फल्‍लांक नीक? जँ कपार अधला रहितैक त बेटी होइतै। जकर कपार नीक रहै छै, ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजरि मे सब बराबरि अछि। सभ त हुनके सनतान छी। कोन पापी बाप ऐहेन हैत जे अपना सन्‍तान केँ दूजा-भाव करत? अनेरे लोक, कपार गढ़ि, भगवान केँ दोख लगबै छनि। सुमित्रा हाथ स ओलो आ कत्तो ल मखनी ओल बनबै लगलीह। ओल देखि मखनी सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘ओल अंडाइल रोहू(माछ) जेँका बुझि पड़ैत अछि। दीदी‘हाथ धो लथु, हम बना लै छी।'' सुमित्रा हाथ धोय दुनू हाथ मे करु तेल लगा अपना पाएर मे हसोथि लेलनि। हाथक कबकबी मेटा गेलनि।ं विछान पर जा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘कनि०ााँ, बच्‍चा लाउ। हम जाँति दइ छियै। अहाँ चुल्‍हि लग जाउ।' सुमित्रा कोरा मे बच्‍चा के द' रुमा चुल्‍हि पजारै गेलि। सुमित्रा बच्‍च केँ जाँध पर सुतवैत मखनी केँ कहलक- ‘‘कनियाँ,बीचला चक्‍का ओरिया क' काटब। ओ तड़ब। कतका सब उसनि क' बरी बनाएब।'' मुस्‍की दैत मखनी कहलकनि- ‘‘तेहेन सुन्‍नर ओल छनि दीदी जे चुल्‍हि पर चढ़िते गल-बला जेतनि। खेबो मे तेहने सुअदगर लगतनि। अइ आगू मे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।'' सुमित्रा बच्‍चा केँ जतबो करैत आ घुनघुना क' गेबो करैत- ‘कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे। कौने बाबी पीसल कसाय ओ जे बच्‍चा केँ उङारब हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल ओ जे सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौलीह बच्‍चा केँ उङारथि हे। जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्‍चा क' जाँति-पीचि चानि मे काजरक टिक्‍का लगा निचेन भेलीह। मखनीक कोरा मे बच्‍चा द सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल द देलखिन। (अगिला अंकमे) कुमार मनोज कश्यप जन्म  मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित। पहिल चिट्‌ठी परमादरणीय बाबूजी, ओना तऽ बहुत दिन सँ बात मोन मे घुरियाईत छल ; मुदा  हिम्मत नहिं जुटा पाबि रहल छलहुँ जे कोना आहाँक सोझाँ मुँहा-मुँहीं कहि सकी । आई नहिं जानि एतेक हिम्मत हमरा मे कतऽ सँ आबि गेल जे अपन भावना व्यत्तᆬ करबा लेल कागज-कलम लऽ कऽ बैसी गेलहुँ । सोझा-सोझी अपन भावना व्यत्तᆬ कऽ सकी ई हिम्मत तऽ हमरा मे एखनो नहिं आछ । तैं गामो-घर मे सभ हमरा मुँहदुब्बरि बुझैत छल । हमर ई कायरता हमरा आहाँ सभ सँ भेटल संस्कंारक थिक वा हमर अपने भीतरक कमजोरी से तऽ नहिं कहि ; मुदा हम एतबा धरि जनैत छी नारी जातिये के लोक सर्वसहा, अवला, भोग्या ऩहिं जानि की की सर्वनाम आ विशेषण दऽ कऽ मुँहदुब्बरि बनल रहबा लेल विवश कऽ दैत छैक । हम मानैत छी जे डिबिया लऽ कऽ तकला पर बहुत एहन मैथिलानिये भेटि जेतीह जे अपन आधकार छिनि कऽ पाबि लैत छथि़ मुदा एहन तऽ किंछु मुट्‌ठीये भरि छथि ने । हम तऽ अनुभव केलहुँ आछ जे नारी के सर्वसहा भऽ कऽ जीबाक लेल जिम्मेदार तऽ नारिये थिकदादी, पिसी, नानी,माय, काकी रूप मे । हमरा एखनो बड़ नीक जकाँ मोन आछ जे जखन माय के चारिमो बेटिये भेलैक तऽ आँगन मे जनि-जाति कोना कन्ना-रोहट पसारि देने रहय ; जेना कोनो बज्रपात वा अपशवुᆬन भऽ गेल हो। एहन सुन्नरि़साक्षात भगवती सन बच्चा के नाम राखल गेलैक - 'मनतोड़िया' । बाबूजी साईत आहाँ एहि पर विचार नहिं केने होयबैक जे पैघ भेला पर बेचारी के अपन नाम लऽ कऽ कतेक ग्लानि के सामना करऽ पड़लैकसंकोचे ओ अपन नाम ककरो नहिं कहैक । मनतोड़िया नाम  जे सुनैक से कोनादन मुँह बना लैक । संकोचे ओ संक्षेप मे अपन नाम बतबैत छैक मिस एम0 चौधरी । आहाँ अंदाज लगा सकैत छी कतेक सिद्दति भोगऽ पड़ल हेतैक बेचारी के ! आहाँ तऽ पढ़ल-लिखल बाप छलियैकआहाँ तऽ कोनो सुन्नर, आधुनिक नाम राखि दितियैक। विक्वूᆬ के जनम के बाद पूरा परिवार के ध्यान कोना ओकरे दिस चलि गेलैक से तऽ अहुँ जनिते छी़ओकर एक-एक जरूरत के सभ ख्याल राखय मुदा हमरा सभ बहीन जेना टुअर सन भऽ गेलहुँअपडेरल । मानलहुँ जे विक्वूᆬ नेना  छल आ नेना के सभ प्यार-दुलाड़ करैत छैक ; मुदा हमहुँ चारू बहीन तऽ कोनो सयान नहिये भऽ गेल छलहुँ। हमरो सभ के वात्स्ल्य आ स्नेह के भुख छल़़से तऽ केयो नहिं बुझलक । ई देखि कऽ हमर सभक मोन किं नहिं कचोटैत छल जे माय संदूक मे गुड़, चीनी, मेवा आ आनो नीक-निवुᆬत वस्तु सभ बंद कऽ कऽ रखैत छलीह आ चोरा कऽ विक्वूᆬ के खुअबैत छलीह । बाल मोने हम सभ बहीन मँगियै तऽ झझकारि लिअय़़क़ंखनो- कखनो बेसी लटारहम केला पर धेले चटकन सेहो पड़य। विक्वूᆬ कतबो बदमाशी करय तऽ कोनो बात नहिं; हमरा सभ बिनु गलतियो के मारि खाई़़मायक चटकन तेहन सक्कंत जे ओनाहों केयो किंछु करबाक सोचितो नहिं छल । आहाँ के तऽ बाबूजी साईत मोन होयत जे जखन विक्वूᆬ खेल-खेल मे हथौड़ी उठा कऽ हमर कपाड़ फोड़ि देने  रहय तऽ माय उनटे हमरे ठुनकिंयबैत कहने रहय--'ईह ! लोथबी नहिंतन ! देखलही जे हथौड़ी उठेने मारऽ अबैत छौ तऽ पड़ायलो नहिं भेलौ '। ओ तऽ आहाँ ओहि काल मे रहि जे हमरा कोरा मे उठा कऽ शोणित पोछने रही आ माय पर तमसायल रही -' एक तऽ विक्वूᆬ बेचारी के कपाड़ फोड़ि देलकै आ उनटे आहाँ एकरे डँटैत छियै? ' बाबूजी हमरा सभ बहीनक एकेटा सम्बल अहीं टा रहि। मुदा धिरे-धिरे हमरा बुझाय लागल जे अहुँ के झुकाव विक्वूᆬये दिस बेसी आछ । नहिं तऽ विक्वूᆬ के सिनेमा-सर्कस, दोस्त-महीम पर उड़बै लेल एक्के बेर मे पाई निकालि कऽ दऽ दियै आ हमरा सभ के किंताबो-कॉपी लेल खेखनय पड़य । हम मात्र दू टा सलवार-सूट सँ काज चलाबी आ विक्वूᆬ लग नव-नव पैᆬशन के कपड़ाक अम्बार । सत्य पुछु तऽ बाबूजी एहि सभ कारणें हम  अपन सहोदर छोट भाय  के  अपन  प््रातिद्वंद्वी बुझऽ लगलहुँ हमरा एक-एक टा छोट-छीन गप्प तक कचोटऽ लागल  मोन मे विद्रोहक भावना आबय लागल । मोनक पीड़ा मोने मे घुमरैत रहल  व्यत्तᆬ करबाक तऽ हिम्मते नहिं छल । आहाँ कतेक प््रासन्न होईत छलहुँ बाबूजी आ कतेक गर्व होईत छल जखन हम स्वूᆬल मे गणित  आ भौतिकी  मे  क्लासक  हाईयेस्ट  स्कंोरर  होईत  छलहुँ जे  भेटैत  छल  सभ  के  आहाँ  ई  खुशखबरी  सुना  अबैत  छलहुँ । हमरा कोरा मे उठा कऽ चुम्मा लैत कहैत छलहुँ जे हमर बेटी एक दिन हमर नाम करत । हमहुँ आगू जा कऽ ईंजिनियर बनबाक सपना बुनि लेने रही़उठैत-बैसैत अपना के ईंजिनियर के रूप मे देखि । एहि लेल जी-जान सँ परीक्षा के तैयारी मे जुटि गेल रही। मुदा बाबूजी नहिं जानि कोना अहाँ के मति फीरि गेल जे आहाँ हमर इंट्रेंसक फार्म भरबा मे ई कहि कऽ मना कऽ देने रही --- 'लड़की सभ लेल ई सभ ठीक नहिं होईत छैक । बी0एससी0 कऽ ले ओतबे बहुत छौ । ' पेᆬर आहाँ बड़की काकी दिस देखि कऽ बजने रही--' जतेक आगू जायत ओतेक पैघ ओहदावला लड़को तऽ भेटक चाही ! आ पेᆬर ओहन वर-घर लेल डाँड़ो तऽ सक्कंत रहक चाही ! ' बड़की काकीक संगे ओसारा पर बैसल सभ केयो स्वीकृति सूचक मुड़ी डोलओने छल । हमरा तऽ लागल छल जेना केयो हमरा गाछ पर चढ़ा कऽ छौ मारि देने हो़ केयो हमरा कल्पना-वुᆬसुम के पैर सँ मीड़ि कऽ  नेस्त-नाबूत कऽ देने हो। बाबूजी साईत आहाँ के ई नहिं बुझल होयत जे आहाँक ओहि निर्णय सँ हमरा करेजा पर तखन की बीतल होयत ? आहाँ के मोने होयत जे एक बेर जखन अपन लहलहाईत गहुँमक सभ टा खेत साँढ़ भरिये राति मे निट्‌ठाह कऽ चरि गेल छल तऽ आहाँ कतेक दिन तक शोके व्यावुᆬल रहलहुँ । मुदा हमर ई शोक साँढ़ चरल जजाति सँ बेसी पैघ छल बाबूजी । फसील तऽ आगला बेर पेᆬर भऽ जेतैक मुदा हमर एतेक दिन सँ देखल सपना के महल जे एके झोंक मे बालूक देवाल जकाँ ढ़हि गेलैक तकर क्षतिपूर्ति की कहियो सम्भव छलैक? हम एसगर मे भरि-भरि राति कनैत रहैत छलहुँ । बाद मे कहुना-कहुना मोन के दिलासा  दियेलहुँ -- ईंजिनियरिंग  के  पढ़ाई  मे  बड़  खर्चा  अबैत  छै ।  भऽ  सकय  जे  आहाँ  एहि  डरे  पाछु  हटि  गेल होई । आहाँ खेत बेचि कऽ डोनेशन दऽ कऽ विक्वूᆬ के प््रााईवेट डेंटल कॉलेज मे एडमीशन करेलहुँ । साईत एहि द्वारे जे विक्वूᆬ बेटा आछ़़माय -बाप के बुढ़ारी मे परवरिश करत । बेटी तऽ आनक घर चलि जायत़़ यैह ने ? आहाँक हाथें एहन दुराव सत्य पुछी तऽ बाबूजी हमरा भीतर सँ तोड़ि कऽ राखि देलकहमरा सोचय लेल विवश कऽ देलक जे एके माय-बापक संतान बेटी-बेटा के लेल भिन्न दृष्टिकोण किंयैक? किंयैक माय-बाप एखनहुँ सोचैत छथि जे बेटी लेल हुनकर दायित्व ओकर विवाह करा देब बंद तक सीमित छनि ; मुदा बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ योग्य बनायब । की बेटी बेटा जकाँ माय-बापक देखभाल नहिं कऽ सकैछ वा करैछ ? तखन बेटा आ बेटी मे भावनाक एतेक पैघ अंतर किंयैक? खास कऽ आहाँक हाथें तऽ बाबूजी हम कहियो कल्पनो ने केने रही । हम आहाँ के प््रागतिवादी बुझैत रही से किं सत्ये पुᆬसि छल ? एतेक पढ़ियो-लिख कऽ बाबूजी साईत आहाँ सोचबाक प््रायास नहिं केलियै जे आजुक एहन पड़ाईत जिनगी मे एकटा गृहणी मात्र बनि कऽ जीवन काटब कतेक दुष्कंर छैकपति भोरे ऑफीस जेता तऽ मुन्हारि साँझ सँ पहिने नहिं घुमताह़़धिया-पुता स्वूᆬल, कॉलेज,संगी-साथी मे बाझल रहत । एसकर घर के भीतर बंद एक एक पल कोना बितैत छै से हम कोना वर्णन करू ? हमरा क्षमा करब बाबूजी यदि भावनावश हमरा सँ किंछु अनर्गल लिखा गेल हो । आई जखन भावनाक बान्ह टूटल तऽ अपना संगे सभ दमित भड़ास के बहओने चल गेल । हमर ई आशय कथमपि नहिं जे हम अपना उपर बीतल के उकेरि । मा भगवती सँ हम एतबे मँगैत छियैन जे हमर समाज के सद्‌बुद्धि देथुन जे सभ संतान के एके नजरि सँ ताकय । एहि चिट्‌ठी के लिखबाक हिम्मत तऽ हम आई कऽ लेलहुँ ; मुदा नहिं जानि एकरा डाक सँ पठेबाक हिम्मत कऽ सकब किं नहिं ? आहंक। हेमचन्द्र झा कथा कुंठा हेमचन्‍द्र झा नौ बजे राति मे ड्‌यूटी सँ वापस भेले छल सुरेश कि पत्‍नी ओकरा समक्ष गाम सँ आयल चिट्‌ठी राखि देलखिन। यद्यपि सुरेश जिज्ञासा कयलक जे एहि मे की प्रमुख बात लिखल छैक से कहू, परन्‍तु पत्‍नी स्‍वयं पढ़ि लेबाक लेल कहैत किचेन मे चलि गेलीह। सुरेश गाम सँ आयल चिट्‌ठी के आद्योपांत पढ़लक आ एकटा गंभीर श्‍वास लैत ओकरा टेबुल पर राखि देलक। तखनहि पत्‍नी एक गिलास पानि आ चाह ल' क'पहॅुंचि गेलीह। सुरेशक गंभीर मुखाकृति पर अबैत-जाईत विभिन्‍न रेखाक अध्‍ययन करैत पत्‍नी गप्‍प शुरू केलीह - ‘‘की सोचलियै एहि पर'' ‘‘एहि मे सोचबा जोग किछु नै छैक, वरन्‌ ई तँ एक तरहक आदेश छैक, जेकर पालन करबाक लेल हमरा कहल गेल अछि'' - सुरेश बाजल। ‘‘कतय सँ अनबैक एतेक टाका?'' पत्‍नी जिज्ञासा केलनि। पत्‍नीक एहि प्रश्‍नक तत्‍काल कोनो जबाव नहि द' सकल सुरेश । समस्‍या गंभीर छलैक। एकमात्र बेटाक उपनयन सामने छलैक। दिल्‍ली सन महानगर मे मात्र4-5 हजार टाकाक नोकरी करैत अपन परिवार के संगे रखैत सुरेश हरदम ‘‘हैंड टू माउथ' रहैत छल। 4-5 हजार टाका मे कोना बचतैक आ ताहि पर सँ उपनयनक वास्‍ते खर्चाक एकटा पैघ आदेश गाम सँ। सेहो छोट-मोट नहि 50-60 हजार टाकाक। चिट्‌ठी लिखने छलाह सुरेशक जेठ भाय दिनेश । दिनेश गामे मे रहथिन। हुनको दू बेटाक उपनयन रहनि। ओ झंझारपुर मे वोकालति करेैत रहथि आ गाम पर किछु ट्‌यूशन। खेती-पथारीक जिम्‍मा सेहो हुनके पर। माता-पिता वृद्ध रहथिन तें एहि काज मे ओ सभ कोनो आर्थिक मददि करबा में असमर्थ रहथिन। छोट भाय महेश, जिनका एकटा बरूआ रहनि, ग्‍वालियर मे रहथि। ओ फुट्‌टे अपने समस्‍या सँ ग्रस्‍त। गामक सर-समाज देखैत, अपन परिवारक हाड़ी-बिमारी देखैत आ गाम-गामक नोत पुराई करैत दिनेशक अनुसार हुनका एको पाई नहि बचैत छनि आ उपनयनक सभ छाड़-भार सुरेश पर रहतैक, सएह पत्र आयल छल गाम सँ। तथापि पत्र मे ईहो लिखल छल जे माधव भाय कोन रूपें पछिला साल अपन बेटाक उपनयन कयलनि अछि आ एहने उपनयन होमक चाही। घंटा-डेढ़ घंटा एहि विकट समास्‍या पर विचार करैत रहल सुरेश अपन पत्‍नी मीनाक संग, तथापि किछु निष्‍कर्ष नहि निकालि सकल। अंततः पुनः फोन पर जेठ आ छोट भाय सँ काल्‍हि गप्‍प करबाक नियार करैत दुनू प्राणी सूति रहल। परन्‍तु निन्‍न कहाँ एतैक? दुनू प्राणी करौट फेरैत परात केलक। भिनसरे टेलीफोन बूथ पर पहॅुंचल। गाम आ ग्‍वालियर फोन मिलेलक। परन्‍तु सभटा व्‍यर्थ। दुनू भाय हाथ उठा देलखिन। कियो ई सोचय नहि चाहलखिन जे एतेक पाई ई अनतैक कतय सॅ? जे से समय पर अपन ड्‌यूटी पर पहॅुंचल सुरेश। ड्‌यूटी की छलेैक। एकटा थोक विक्रेताक ओतय काज करय। ‘‘ए टू जेड'' सभटा काज करय पड़ैक। ओना कहबाक लेल रहय तँ काउन्‍टर पर, परन्‍तु आवश्‍यकता पड़ला पर लोहा सेहो उठबय पड़ैक आ आनो कयकटा काज करय पड़ैक। काज करैत चिंताक रेखा स्‍पष्‍ट देखाय पड़ैक ओकरा माथ पर। ओकरा किछु अनमनस्‍क सन देखि मालिक जिज्ञासा केलकैक। ओ टारय चाहल। तथापि मालिक नीक लोक रहैक। खोधि-खोधि क' पूछय लगलैक आ सुरेश के सभटा राम कहानी कहय पड़लैक। तथापि पाईवला गप्‍प ओ नहि कहि पओलक। मालिक खर्चाक संबंध मे जिज्ञासा केलकैक तँ बाजल 50-60 हजार। एकबेर मालिको अचंभित भ' गेलैक आ एहि प्रस्‍ताव पर पुनः विचार करक अनुरोध केलकैक। तथापि सुरेश बाजल - ‘‘सर हमलोंगों को पूरी जिंदगी मे सिर्फ तीन काम करना है - बेटे का जनेऊ, लड़की की शादी और माँ-पिता का श्राद्ध। इससे ऊपर न हम कुछ कर सकते हैं और न ही सोच सकते हैं।'' सुरेशक उक्‍त बात सूनि कें मालिक थोड़े पसीझल। मालिक सुरेश के आश्‍वासन देलकैक जे तोरा जते रूपया चाही से ल' जो आ तों बाद मे धीरे-धीरे दरमाहा मे सँ हमरा कटा दिहें। सुरेश कें जेना कतहु सँ प्राण भेटलैक। तुरंत ओ हामी भरलक। साँझ मे हँसी-खुशी घर आयल आ अगिला दिन पुनः गाम आ ग्‍वालियर फोन कयलक जे समय पर उपनयन हेतैक आ अहाँ सभ अपन तैयारी मे लागि जाऊ। उदोग सँ तीन-चारि दिन पहिने गाम पहॅुंचल सुरेश सभ के ल' क'। सभटा काज शुभ मुहुर्त मे सम्‍पन्‍न होईत गेलैक आ रातिमक प्रात जेना निःश्‍वास छोड़लक ओ। जे किछु ल' क' आयल छल लगभग सभटा खर्च भ' गेलैक। महेश 5000 पकड़ा के फराक भ' गेल। दिनेश गाम मे रहथि, सभटा कारबार अपना हाथ मे रखलनि। सुरेश खर्च करैत गेल, परन्‍तु खर्चक कोनो हिसाब नहि भेलैक। भार-दोर वाला आमदनी सेहो दिनेश रखलथि अपना पॉकेट मे आ निश्‍चिंत भ' गेलाह। काज सम्‍पन्‍न भेलाक बाद सुरेश वापस दिल्‍ली आयल। आब समस्‍या रहैक कर्जा सधेबाक। प्रथमतः कमरा-किचेन वाला घर छोड़ि सिर्फ एकटा कमरा वला घर लेलक ताकि मकान किराया मद मे बचैक। बच्‍चा सभ ठीक-ठाक स्‍कूल पढ़ैत रहैक,ओकरा सभक नाम एकटा साधारण स्‍कूल मे लिखेलक आ 5000 टाका दरमाहा मे सँ1000 कटेनाय शुरू केलक। कुला मिला कें दुर्दिनक शुरूआत भ' गेलैक आ सभ तरहें सुरेश कुंठित भ' गेल। एहि तरहक कुंठा सिर्फ सुरेशे के नहि छैक, वरन्‌ मिथिलांचलक एकटा सम्‍पूर्ण युवा पीढ़ी एहि सँ ग्रस्‍त अछि। ई एहन पीढ़ी अछि जे गाम मे पढ़लक-लिखलक,ओतय पलल-बढ़ल आ रोजगारक वास्‍ते दिल्‍ली वा कोनो शहर आबि गेल। संघर्षक पथ पर अग्रसर होईत अपना लेल  शहर मे रोजगार ताकि कनेक स्‍थिर होईत अछि ई वर्ग कि सामने अबैत छैक गामक समस्‍या। आई उपनयन, काल्‍हि बियाह, परसू मूड़न,चारिम दिन दुरागमन आदि। हर काज मे गाम गेनाई एकर विवशता छैक आ नोकरी करेैत अछि तँ खर्चो-पानि करय पड़ैत छैक। गामक लोकक सामान्‍य सोच छैक - शहर मे टाकीक कोन कमी। ताहू मे जँ कियो सरकारी नोकरी मे अछि तँ ओकर शामते छैक। सरकारी नोकरीक मतलब एम्‍हर-ओम्‍हरक आमदनी। शहर मे अहाँ की छी? कतय छी? कोना गुजर करैत छी? एहि सभ सँ कोनो लेना-देना नहि छैक गाम लोक कें। शहर मे छी, नोकरी करेैत छी, तँ पाईक कोन समस्‍या। गाम वा सर-कुटुमक सभ काज में दियौक, माने स्‍वयं बिका जाऊ। एहि नववर्गक सभ सँ पैघ समस्‍या अछि जे ई वर्ग अधखिज्‍जू अछि। आधा गामक अछि आधा शहरक। आ तें बेसी कुंठित अछि। कोनो काज वा संस्‍कार ई गाम मे करताह। कारण ओतहि रहल छथि, नेनपन बितेने छथि। एकेबेर सभटा कें तोड़बाक सामर्थ्‍य नहि छनि हिनका मे। परंतु एना कते दिन चलत? कते दिन धरि कुंठित रहत ई वर्ग। आई ने काल्‍हि एहि सँ उबरबाक रस्‍ता निकालहि पड़तैक एहि वर्ग कें। आवश्‍यकता छैक सोच मे परिवर्तत करबाक। गामक समाज सहित एतय एकटा अलग समाजक निर्माण करबाक आ सभ तरहक संस्‍कारक शुरूआत एही ठाम करबाक आ तखनहि मुक्‍त होयत ई वर्ग कुंठा सँ। वरन्‌ जिनगी भर पिसाईत तरह ई वर्ग एहिना। पंचानन मिश्र मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा मऊ वाजितपुर गाम समस्‍तीपुर जिलाक अन्‍तर्गत सुदूर दच्छिन भाग मे बसल अछि। एकर लगीचहि दक्खिनवरिया कोन पर कहियो गंगाक अविरल धार बहैत रहल होएत। आजुक तिथि मे नदीक छारनिटाए बाँचि गेल अछि। गंगाक इएह दियारा क्षेत्र मे इतिहास प्रसिद्ध गाम थिक चौथम। सामाजिक संरचनाक दृष्टिऐ सम्‍प्रति राजपूत ओ यादव बहुल जाति चौथमक ‘माइनजन’ थिकाह मुदा अत्‍यन्‍त पिछड़ल समुदाय मे परिगणित 261 अत्‍यन्‍त पिछड़ल समुदाय मे कैक जातिक अवस्थिति सेहो अछिये। अनुसूचित जाति क सदस्‍यहुँ सँ गाम निमुन्‍न नहिये अछि। तैयो चोथमक प्रसिद्धि आ ऐतिहासिक महत्त्व रहल अछि महाकवि विद्या-पतिके लऽ कए। किंवदन्‍ती अछि जे महाकवि अपन निम्‍न रचनाक उपरान्‍ते गंगालाभक सद्इच्‍छा व्‍यक्‍त कयने रहथि- सपन देखल हम शिव सिंह भूप बतीस बरख पर सामर रूप। बहुत देखल हम गुरूजन प्राचीन आब भेलहुँ हम आयु विहीन। आओर लोकमान्‍यताक जनतब कहैछ जे बिस्‍फी सँ जीवनक महाप्रयाणक चलल महफा एही चौथमे गाम मे महाकविक आदेश सँ राखल गेल छल जतए गंगा अपन मुख्‍य धार सँ बहराए हिनक नश्‍वर शरीर के जल स्‍पर्शक अवसर प्रदान करैत लगले अपन मुख्‍य धार मे घुरि गेल छलीह। चमथाक निकटस्‍थ मऊ वाजिदपुर गाम आजुहुँ ओही स्‍थान पर स्थित अछि। पूर्व मध्‍य रेलवेक सोनपुर मण्‍डलक हाजीपुर-बछवाड़ा स्‍टेशनक पतियानी मे विद्यापतिनगर स्‍टेशन सँ चौथम बड़ लगीचहि अछि। एहि स्‍थान के पथ निर्माण विभाग चारि दिस सँ पक्‍की सड़क सँ जोड़ने अछि। एक सड़क बछवाड़ा मे जा कए राष्‍ट्रीय उच्‍च पथ सँ जा मिलैत अछि। दोसर मोहिउद्दीननगर होइत महनार-विदुपुर सँ हाजीपुर धरि गेल अछि। तेसर दलसिंहसराय-नरहन रोसड़ा-बहैड़ी क मार्ग सँ लहेरियासराय के जोड़ैत अछि आ चारिम सड़क सरायरंजन-समस्‍तीपुर दुनू स्‍थान केँ छूबैत अछि। मऊ वाजिदपुर गामक एक पैघ भू-खण्‍ड आब विद्यापतिनगर नाम सँ बूझल जाइछ। तैयो बूढ़-पुरान लोक द्वारा विद्यापतिनगर के ‘वाजिदपुर बाबाधाम’ कहि सम्‍बोधन कएनिहारक संख्‍या तऽ अछिये। महाकविक समाधि भूमि होएबाक करणे बरोबर लोकक आबाजाही लागल रहैत अछि तँ विद्यापतिनगर केँ प्रखण्‍डक स्‍तर प्रदान कएल गेल अछि जे समस्‍तीपुर जिलान्‍तर्गत थिक। एतय ‘विद्यापति भवन’ नामक सामुदाथिक भवन निर्मित अछि। बिहार सरकारक पर्यटन विभाग स्‍थानक ऐतिहासिकता मे देखैत‘पर्यटन सूचना’ केन्‍द्र तऽ वनौने अछि मुदा सँ मात्र औपचारिकतावश। राजस्‍व ग्राम मऊ वाजिदपुर इएह विद्यापतिनगर क्षेत्र मे महाकविक समाधि भूमि अछि। एहि स्‍थानक विडम्‍बना रहल अछि जे एकर इतिहासपरक अनुसंधान अन्‍वेषण आ विवेचन करबाक प्रयोजन कहियो-कोनहुँ स्‍तर पर नहि भऽ पाओल अछि। हम सभ बिस्‍फी आ एखनुक विद्यापतिनगरक महा‍कविक कालजयी व्‍यक्तित्‍वक संदर्भ मे स्‍थानीयताक दृष्टि सँ भौगोलिक परिवेशक संदर्भ मे तखनुक सामाजिक-सांस्‍कृतिक परिदृश्‍य मे अध्‍ययन करब आवश्‍यक नहि बूझि सकलहुँ अछि। ते विद्यापति सँ जुड़ल स्‍थान ‘स्‍ट्रेफोर्ड ओवेन आन’ नहि बनि सकल अछि। वर्ड्सवर्थ सँ सम्‍बद्ध स्‍थान पर कैक तथ्‍यात्‍मक आलेख अभाव हम सभ आइ धरि किंवदन्‍ती लोककथन आ परम्‍परागत आस्‍था के स्‍वीकार करैत रहलहुँ अछि जे तथ्यक निष्पक्षता पर प्रश्‍न ठाढ़ करैत रहल अछि, लोकमान्‍यताक  विसंगाति के देखार करैत रहल अछि इतिहासक मापदण्‍ड के आघार भूमि नहि प्रदान कऽ सकल अछि। ते आइ चौथम आ विद्यापतिनगर प्रसंग मे जतेक मुंह ततेक वाणी। विद्यापतिनगर मे महाकविक समाधि भूमि अछि। तकर समीपहिं पीपरक एवं अजोध गाछ एखनहुँ अछि। कहल जाइछ जे चमथा अएला उत्तर ओ एही गाछक नीचां विश्राम कएने रहथि। क्‍यो ईहो कहैछ जे इएह बुढ़वा पीपर हुनक समाधिस्‍थक साक्ष्‍य अछि। जे-सँ। आजहुँ एहि गाछ के महाकवि सँ जुड़ल रहबाक आस्‍था अछि। ते लोक अपन संतान के संस्‍कार वृद्धि लेल ताविज एहि मे बन्‍हैत अछि। जतय महाकवि समाधि‍स्‍थ भेल छलाह आ मां गंगा अपन अमोध सलिला मे हुनका जलमग्‍न कऽ देने रहथिन ततय आइ एक विशाल प्रस्‍तर मन्दिर अछि। लाल रंगक मंदिर एहि मंदिरक गर्भ गृह मे महाकवि विद्यापति ओ महादेवक प्रस्‍तर प्रतिमा छेन्हि । दुनू प्रतिमा कारी पाथरक अछि। कहल जाइछ जे ई दुनू प्रतिमा स्‍वत: स्‍फुट अछि। एकरा महाकविक महाप्रयाणक दोसर दिन देखल गेल छल। महाकविक एहि विशाल मंदिरक पूर्व भाग मे उत्तर सँ दच्छिन भाग मे चारि छोट-छोट मंदिर अछि। मुख्‍य मंदिरक वहिर्गमन द्वार सँ बहरएला उत्तर पार्वती मं‍दिर अछि। श्‍वेत प्रतिमा मे पार्वती ठाढ़ मुद्रा मे छथि। एकर वाम भाग मे श्‍वेत पाथरक महावीरजीक विशाल मूर्त्ति अछि। तकर बाद बसहा आ अंतिम काल भैरव क मूर्ति जे कारी पाथरक विचित्र ओ भयावह लगैछ। कला सौष्‍ठव ओ धार्मिक अनुष्‍ठानक दृष्टि सँ ई मंदिर एवं एतूका प्रतिमा सभ मूर्तिकला ओ वास्‍तुकलाक अनुपम उदाहरण अछि। सामने एक नौलखा प्रवेश अछि जे गाम मलकलीपुरक सम्‍पन्‍न लोक द्वारा बनाओल गेल अछि। वर्त्तमान विद्यापति मंदिरक संग कैक सत्‍य कथा संलग्‍न अछि। कहल जाइछ जे महाकविक महाप्रयाणक बाद पाथरक दू प्रतिमा विद्यापति ओ शिवलिंग स्‍वत: स्‍फुट भैल छल। एकर सटले पीपरक नव अंकुर कोपरि सेहो निकलि आयल छल। पछाति एतय धार्मिक कृत्‍य होमय लागल। तखन दुलारपुर महन्थक तखनुक मैनेजर दिस सँ टीनक छोट-छीन मंदिर बनबौलनि। बाद मे बछवाड़ाक कोनो व्‍यक्ति ई मंदिर क निर्माण करौलनि। एहि समय दलसिंहसराय थानाक केवटा गामक भेषधारी चौधरी केँ पचहत्तरि वर्षक अवस्‍था मे मंदिरक कृपा सँ पुत्र भेल छलन्हि। एक बेर तखनुक नोर्थ बंगाल रेलवे एहि मंदिर ओ पीपर गाछ के ध्‍वस्‍त करबाक प्रयास कएने छल मुदा ओहि अंग्रेज अफसर के काल कवलित होमय पड़ल छल। मंदिरक निकट एक ब्रजगिरा टीला अछि। कहल जाइछ कोनो मुगलकालीन बादशाह महाकविक समाधिक पशास्ति सुनि क्रोधित भऽ गेल छलाह। मंदिरक प्रशस्ति गाथा सुनि कए एकरा ध्‍वंस करवाक नीयत सँ ओ हजारक संख्या मे सैनिक पठौलनि। सैनिक सभ पड़ाव दए रहल छल कि भयंकर वर्षाक संग ठनका खसल आ सौनिक विजय नहि भऽ सकल। एहि मन्दिरक परिसरमे शिवराति ओ वसन्‍त पंचमी क अवसर पर पैघ मेलाक आयोजन होइछ। हमर जनैत विद्यापति सँ जुड़ल स्‍थान के पर्यटन क दृष्टिऐ विकसित करबाक योजना आइ धरि राज्‍य सरकार किंवा मैथिली सेवी संस्‍थाक स्‍तर पर नहि बनाओल गेल अछि। आइ ‘बुद्धिष्‍ट सर्किट’ क माध्‍यम सँ राज्‍य मे भगवान बुद्ध सँ जुड़ल प्रमुख स्‍थान के चिन्हित कएल गेल अछि। ‘विद्यापति सर्किट’ मे बिस्‍फी उगना स्‍थान आ विद्यापति नगर के जोडि़ पर्यटनक संभावना ताकल जा सकैछ। पंचानन मिश्र विद्यापति जयन्‍ती (31 अक्‍टूबर 09) क अवसर पर मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ आसिनक शारदीय नवरात्र मिथिलाक सामाजिक, सांस्‍कृतिक, ऐतिहासिक अस्मिताक विशिष्टता के जोगाए रखने रहल अछि। अदौ मे ई प्रधानत: घरैया-पूजाक स्‍वरूप ग्रहण कएने छल तहुखनहो एकरा मे एकात्‍मकता, संस्‍कारात्‍मकता ओ अंश धरि सामाजिकता विद्यमान छल। आब त’ डेगे-डेग ई सार्वजनिक स्‍थापन भऽ दुर्गा मूर्त्ति पूजाक प्रवर्त्तक मिथिला भूपति राजा कंसनारायणक स्‍मृति के जग जियार कए रहल अछि। अभिप्राय जे सम्‍पूर्ण मिथिलांचल मे मूर्त्ति स्‍थापित कए किंवा प्रस्‍तर प्रतिमाक पूजाक माघ्‍यम सँ जीवन के क्रियाशील रखवाक परम्‍परा रहल अछि। राजेश्‍वरी (दोखर मधुबनी), गिरिजास्‍थान (फुलहट मधुबनी), भुवनेश्‍वरी (भगवतीपुर मधुबनी), भद्र कालिका (कोइलख मधुबनी), चामुण्‍डा स्‍थान (पचही मधुबनी), सोनामाइ (जनकपुर नेपाल), योगमित्रा (जनकपुर नेपाल), कालिका देवी (जनकपुर नेपाल), राजेश्‍वरी देवी (जनकपुर नेपाल), छिन्‍नमस्तिका (उजान आ मिर्जापुर दरभंगा), वनदुर्गा (खरड़क मधुबनी), सिंधेश्‍वरी देवी (सरिसव मधुबनी), देवी स्‍थान (अंधराठाती मधुबनी), कंकाली देवी (रामबागपैलेस दरभंगा), उग्रतारा (महिषी सहरसा), दुर्गास्‍थान (उच्चैठ मधुबनी), जयमंगला स्‍थान (मुँगेर), पूरन देवी (पूर्णियाँ), काली स्‍थान (हाजमा चौराहा दरभंगा), कात्‍यायणी स्‍थान (वदलाघाट सहरसा), बासठि योगिनी (सहरसा) आदि (स्‍त्रोत कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक: गजेन्‍द्र ठाकुर) स्‍थान पर आसिन आ अन्‍यहुँ समयावधि मे भेल आयोजन भनहि प्रसिद्धि पओने रहल अछि मुदा अन्‍यहुँ कैक स्‍थान जतय शताब्‍दीयों सँ पूजाक आयोजन सेहो इतिहासक अंशहि बूझल जएबाक चाही। एहि संक्षिप्‍त आलेख मे मेन स्‍ट्रीम सँ विलग किछु स्‍थानहिंक चर्च भेल अछि जकर स्‍थापत्‍यक महत्ता अछि, लोक परम्‍परा अलग छवि बनौने रहल अछि, सांस्‍कृतिक प्रतिमानक गढ़नि कैक रूप मे गढ़ल जाइत रहल अछि। मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमंडलक न्‍योर गाम सँ डेढ़ किलोमीटर उत्तर सखड़ा मे सखड़ेश्‍वरी भगवतीक भव्‍य मन्दिर अछि। ई मन्दिर धार्मिक, सांस्‍कृतिक ओ सामाजिक एकताक जाग्रत प्रतीक थिक। एकर प्राचीनताक प्रसंग कहल जाइछ जे मिथिलाक कर्णाटवंशीय राजा नान्‍यदेव जखन शासनाच्‍युत भऽ गेलाह तऽ अपन कुलदेवी कुर्जा भवानी सँ रक्षार्थ प्रार्थना कयलनि। मां कुर्जा स्वप्न मे हुनका आदेश देलीह जे प्रात: स्‍नान करैत काल नदी मे जे कोनहुँ वस्‍तु भेटय ओ उठा कए चोट्टे पड़ा जायब आओर जाहि स्‍थान पर ई वस्‍तु खसि पड़य ततहि अपन शासन स्‍थापित करी। ताहि अनुसारेँ जनकपुर सँ सोलह माइल पश्चिम सिमरौनगढ़ मे कर्णाट वंशक राज्‍य पुन: स्‍थापित भेल जे पांच खाढ़ी धरि शासक रहैत गेलाह अन्तिम शासक सक्रदेव सिंह एहि भगवती के यंत्रक सिंहासन पर मन्दिर बनाए स्‍थापित कएलनि। 1934 ई. क भूकम्‍प मे मूल मन्दिर त’ खसि पड़ल मुदा अलौकिक शक्तियुक्‍त सिंहासन आजहुँ विद्यमान अछि। सखड़ेश्‍वरी वा सक्रेश्‍वरी भगवती राजा सक्रदेव सिंहक स्‍मृति मे नामित अछि। मुजफ्फरपुर जिलाक मीनापुर प्रखण्‍डक पश्चिम छोर पर गण्‍डकी नदीक कतबइमे पानापुर गाम मे विख्‍यात भष्मी देवीक मन्दिर अछि। भगवती भष्मीक मूर्त्ति एकहि पाथर सँ तराशि बनाओल गेल अछि जकर दिप्‍ती आइयो मंद नहि भेल अछि। साइत मिथिलांचल मे इएह एक भगवती थिकीह जनिक सोझाँ पड़वा के पूजोपरान्‍त मुक्‍ताकाश मे विचरण करबाक लेल छोडि देल जाइछ। एतूका हवन कुंड् सँ प्राप्त भभूत मे चर्म रोग सँ मुक्तिक विश्‍वास पाओल जाइछ। पुरातात्विक दृष्टि सँ पूर्णत: उपेक्षित ऐतिहासिक - सांस्‍कृतिक धरोहर के सुरक्षित रखने दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखंडक मकरन्‍दा-भंडारिसम गाम स्थित मां वाणेश्‍वरी एखनहुँ आस्‍था एवं विश्‍वासक केन्‍द्र थिकीह। मनीगाछी प्रखण्‍ड मुख्‍यालय सँ 5 किलोमीटर दक्खिन-पश्चिम कोन मे डीह पर स्थित ई तांत्रिक साधना स्‍थल सामान्‍य धरातल सँ अनुमानत: 10 फीट ऊँच अछि। किछु अन्‍वेषक एहि डीह के कर्णाटवंशीय शासकक प्रशासकीय स्‍थल मानैत छथि तँ किछु राजा शिव सिंहक गढ़। जे-से। मां वाणेश्‍वरीक प्रार्दुभावक सम्‍बन्‍ध मे कैक मान्‍यता थिक। कहल जाइछ जे वाण नामक भगवतीक एक उपासकक घर पुत्रीक जन्‍म भेल। जनिक रूप-गुणक प्रशंसा सुनि तखनुक यवन राजा बलजोडि वाणक पुत्री के अंगीकार करबाक लेल दूत पठौलनि जकर प्रतिक्रिया स्‍वरूप वाण-पुत्री स्‍वयं के प्रस्‍तर मे परिवर्त्तित कए जल समाधि लए लेने छलीह। आजहुँ एहि परिसर मे ओ ‘परसाइन पोखरि’ अवस्थित अछि जाहि मे सँ पाथरक मूर्ति निकालि पूजा-अर्चना आरम्‍भ भेल छल। एखनुक मंदिर निर्माणक सम्‍बन्‍ध मे कहल जाइछ जे महाराज लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह पत्‍नी रानी लक्ष्‍मीवती द्वारा एहि भगवतीक पूजोपरान्‍त अपन भाए श्रीनाथ मिश्रक घर पुत्र होएबाक याचना कयने छलीह जे फलीभूत भेल छल आ 1916 ईo मे मन्दिर बनवाओल गेल। पश्चिम चम्‍पारण जिलाक रामनगर प्रखंडान्‍तर्गत सोमेश्‍वर मे मां कालिका देवीक प्राचीन मंदिर अछि। हेवनि मे मंदिरक ऊपर नेपाली झंडा आ मंदिरक प्रवेश द्वार पर नेपाली भाषामे ‘हाम्रो अमर’ शिलापट्ट देखि विवाद उत्‍पन्‍न भऽ गेल छल। दरभंगाक बेनीपुर अनुमण्‍डल मुख्‍यालय सँ पांच किलोमीटर उत्तर-पश्चिम अवस्थित नवादा गाम मे हयहट्ट देवी दुर्गाधाम सिद्धपीठ मानल जाइछ। एहि पीठक उत्‍पत्ति शिव प्रिया सती सँ जुड़ल थिक। तंत्र चूडामणि मे सतीक अंग सँ संबंधित कुल 52 शक्तिपीठक चर्च अछि। जाहि मे ईहो परिगणित अछि। देवी भागवत पुराण एवं मत्‍स्‍य पुराणक अनुसार सती केर वाम स्‍कन्‍ध ए‍तहि खसल छल। कहल जाइछ जे लगभग 600 वर्ष पूर्व राजा हयहट्ट द्वारा एतय जगदम्‍बाक मूर्ति स्थापित भेल। बहेड़ी प्रखंडक हावीडीह गामक एक साधक प्रतिदिन देवीक साधना-आराधना लेल अबैत छलाह। पछाति वृद्धावस्‍था मे दुर्बल कायाक कारण भगवतीक प्रेरणा सँ सिंहासन सँ मूर्त्ति उठाकए हावीडीह चलि गेलाह जतय आइयो ओहि मूर्तिक पूजा कएल जाइछ। पछाति हावीडीह सँ नवादा मूर्ति अनबाक लेल संघर्षक स्थिति बनि गेल। अन्‍तत: नवादाक सिद्धपीठ मे अगवे सिंहासन शेष रहल जकरहि पूजा होइत रहल अछि। दरभंगाक घनश्‍यामपुर प्रखंड मुख्‍यालय सँ 8 किलोमीटर पर मां ज्‍वालामुखीक भव्‍य मंदिर एहि क्षेत्र मे भगवती डीहक नाम सँ प्रसिद्ध थिक। एतय मांक पिंडीक पूजा कएल जाइछ। कसरौर गामक पनचोभ मूलक ब्राह्मण परिवारक घर केर कुल देवी एकहि ठाम भगवती डीह मे विराजमान थिकीह। कहल जाइछ जे 600 वर्ष पूर्व उफरौल गाम वासी स्‍वo लखनराज पाण्‍डेय के हिमाचल प्रदेशक भिंडी जिलाक नगरकोट सँ दैवीय दर्शन भेल छलन्हि। काल क्रमें कसरौर मे पिण्‍ड बना पूजा होमय लागल । जकरा स्‍वoपाण्‍डेयक स्‍थापना मानल जाहछ। मां ज्‍वालामुखीक दर्शन सँ रोग निवारणक आस्‍था व्‍य‍क्‍त कएल जाइछ। मधुबनी जिलाक जयनगर अनुमण्‍डल मुख्‍यालय मे प्रान्‍तक सभ सँ ऊँच दुर्गा मन्दिर अछि। एतय दुर्गा पूजाक अवसर पर जमीनक भीतर रहि कए साधना करबाक परिपाटी अछि। सुपौल बजारक रामनगर दुर्गास्‍थान मे आब बलि नहि, छागरक परीक्षा लेल जाइछ। जौं छागर परीक्षाक क्रम मे दुर्गा कबूला स्‍वीकार करैत छथि तखनहि बलि प्रदान होइछ। स्‍नानोपरान्‍त छागर के कान पकडि उपर दिस उठा कए पुन: जमीन पर राखि देल जाइछ । छागर सिरा के हिला दैछ तखनहि बलि देल जाइछ अन्‍यथा नहि। बेगूसराय जिलाक मंझौल अनुमण्‍डलक विक्रमपुर गाम मे पछिला 400 वर्ष सँ फूल, वेलपात ओ कलशक सहायता सँ माता जयमंगला देवीक प्रतिकृति बना कए दुर्गा पूजा करैत जाइत छथि । लगभग छ:(ह) हजारक आबादीवला एहि गाम मे रोस्‍टर सिस्‍टम सँ फूल एवं वेलपात जमा कएल जाइछ। कहल जाइछ जे एतूका लोक जयमंगलागढ़ मे दवीक रूप मे दुर्गाक समक्ष बलि प्रदान करैत छलाह। पहसाराक ग्रामीण मे सर्वप्रथम बलि प्रदान देबाक प्रश्‍न पर विवाद भऽ गेल। राति मे माता जयमंगलाक स्वप्न भेल। विक्रमपुरहिमे वेलपात-फूल सँ हमर आकृति बना कए पूजा करैत जाइ। चम्‍पारण जिलाक सेमरा रेलवे स्‍टेशन सँ 2 किलोमीटर पश्चिमोत्तर एक विशेष देवी शक्तिपीठ, जकरा वनसती देवी स्‍थान कहल जाइछ। सहरसाक सोनबरसा प्रखण्‍ड मे वराँटपुर मे चण्‍डीमाताक मंदिर थिक। मंदिर पर सर्वसिंहदेवक नाम अंकित अछि। चण्‍डीपूजा सँ पूर्व लोक ‘बुधाँई’क पूजा करैछ। ओ दुसाध जातिक देवांशी पुरुष छल। एहि स्‍थल के राजा विराटक स्‍थान मानल जाइछ। मानसी-सहरसा रेलवे खण्‍डक बीच धमहारा घाट स्‍टेशनक निकट हरौ कतानेथान शक्तिपीठ अछि जकरा कात्यायनी थान सेहो कहल जाइछ। कहल जाइछ जे महादेवक भार्या सती जखन राजा दक्षक यज्ञ मे जरि गेल छलीह त’ हुनक अधजरुआ लाश अधि महादेव हरिद्वार सँ कामाख्‍या जाइत काल सती (कात्‍यायनी) क ‘कत्ता’ एत‍हिये खसि पड़ल छल जाहि कारणेँ एकर नामकरण ‘कतानेथान’ पड़ल। मधुबनी जिला मुख्‍यालय सँ 14 कि.मी. पर स्थित कोइलख गाम मे भद्रकाली कोकिलाक्षीक मन्दिर अछि जे हिनक मंदिर सँ पश्चिम प्रवाहित कमला नदी सँ बहराएल छलीह। हिनकहिं नाम सँ गामक नामकरण भेल अछि। मिथिलाक संथाली लोकनि दशहरा मे इरा केर पूजा करैत जाइत छथि। इरा संथालक देवी थिकीह। प्रतिदिन एक-एक इराक अलग-अलग स्‍वरूप क आराधना दस दिन कएल जाइछ। विष्‍णु पुराणक अनुसार सँ महर्षि कश्‍यपक एक पत्‍नी इरा छलीह जनिका संथाली देवीक रूप मे अदौ सँ पूजैत रहलाह अछि। सम्‍पूर्ण मिथिलांचल मे भगवती वाराही देवीक मूर्त्ति मात्र बहेड़ामे अछि। जतय आसिन मासमे बेस जमघट रहैछ । दुर्गा पूजाक अवसर पर अन्‍य उद्देश्‍यक संगहि ओकर स्‍थानीय माहात्‍म्‍य परम्‍परागत स्‍वरूप  स्‍थापत्‍य विवेचन आदि जौं हमर एजेंडा मे होइ त’ एक सकारात्‍मक प्रयास मानल जाएत। सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा                                                         - गोपाल प्रसाद साहित्यिक काज समाजक यथार्थ चित्रण होयत अछि । हमरा बुझवामे मैथिली साहित्य एकरासँ वंचित अछि । मैथिली साहित्यमे सामाजिक परिवर्तनक स्वर किछु आलेखमे भेटैत अछि मुदा एहि तरहेँ साहित्यिक चित्रण पुरातनवादी रचाकार लोकनिकेँ नहि पचैत अछि । वैश्‍वीकरणक प्रभाव मैथिली साहित्य पर सेहो पड़ैत अछि । मैथिली पत्रकारिताक सिद्धान्तक निर्वहनकेँ फूसि दंभ भरयवला जे कहबालेल सबहक बात करैत अछि एहि सिद्धान्त पर चलबाक साहक किनकोमे नहि छैन्ह । पटना सँ प्रकाशित समय-साल नामक मैथिली द्वैमासिक पत्रिकाक अस्तित्व दीर्घजीविताक लेल मसाला पर टिकल अछि । एहि तरहक साहित्य सृजन दुकानदाररिएटा मात्र अछि । दलविशेषसँ प्रभावित रचनाकार ओ संपादकक लेखनी एखनहुँ ओकर चक्रव्यूहकें तोड़वामे समर्थ नहि अछि ।   हिन्दीमे दलित साहित्यिक सॄजन नीक जकाँ भऽ रहल अछि मुदा मैथिली साहित्य एखनहुँ एकरासँ परिपूर्ण नहि भऽ सकल अछि जखन एहि वर्गकचर्चा मैथिलीमे नहि हेतैक तखन एहि उपेक्षिक वर्गक समर्थक भाषायी समृद्धिक लेल कोना जुड़त ? गामघरमे सर्वहारा मजदूर लोकनि ओ कथित छोटका जातिक प्राणिये एहि भाषाके वास्तवमे जियाकऽ रखने अछि । मैथिली अकादमीसँ प्रकाशित ओ डॉ. मंत्रेश्‍वर झा द्वारा रचित कविता संग्रह अनचिन्हार गाम मे एकर झलक दृष्टिगोचर भेल मुदा एकर बादक रचनामे एहि दृष्टिकोणक सर्वथा अभाव भऽ गेल अछि ।   समाजमे आइ मैथिलीक संदर्भमे प्रचलित अछि जे इ ब्राह्मणक भाषा थिक मुद्दा ओ गप्प दुष्प्रचारटा मात्र अछि । एकटा गंभीर पाठकक रूपमे हम जनैत छी जे जियाउर रहमान जाफरी कैसर रजा, मंजर सुलैमान, मेघन प्रसाद, महेन्द्रनारायण राम, देवनारायण साह,अच्छेलाल महतो, सुभाषचन्द्र यादव, महाकांत मंडल, अभय कुमार यादव, बुचरू पासवान,हीरामंडल, सुरेन्द्र यादव शिवकुमार यादव, बिलट पासवान विहंगम आदि अपन साहित्य सृजनतासँ मैथिली साहित्यके समृद्धि प्रदान करबा लेल सक्रिय छथि ।    पटनामे मैथिलीक समर्पित संस्था चेतनासमितिकेँ दलित महिला अमेरिका देवी ओ तिलिया देवीक सम्मानक माने की अछि ? वास्तवमे मैथिली भाषायी क्षेत्रक दलित महिलाक सम्मानसँ दलित दर्गक भाषा-भाषी लोकनिक समर्थन अवश्‍ये भेटत । एहि प्रयासकें अन्य संस्थाकें अपनैबाक आवश्यकता अछि । कतेक आश्‍चर्यक गप थिक जे नोबेल पुरस्कारक चयन समितिकें एहि वर्गक कृतित्व ओ व्यक्‍तित्व पर खुजल नजर अछि मुदा मिथिलाओ मैथिलीक संस्था एहि विषय पर आँखि मुनने अछि । बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषदक अध्यक्ष डॉ. किशोर कुणाल एहि विंदु पर केन्द्रित भक दलित देवो भव पुस्तकक रचना कयलनि जकर मैथिली अनुवाद होयबाक चाही ।    मैथिली साहित्यक बहुआयामी प्रतिभाक उपन्यासकार, कवि, नाटककार आ एहि साहित्यकेँ अपन अपरिमित साहित्यिक रचनाएँ उर्वर बनौनिहर डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म अपन विविध रचना ओ स्वभावगत विशिष्टताक कारणे अत्यंत लोकप्रिय भेलाह । हुनक लोकगाथात्मक उपन्यास मिथिलाक लोकसंस्कृतिकेँ समेटने अछि । लोरिक विजय, नैका बनिजारा, रायराणपाल, राजा सलहेस, लवहरि-कुशहरि, दुलरा दयालक रचना कय मैथिलीक सर्वाणीण विकास, भाषायी समृद्धता ओ लोकप्रियताके बढ़यबामे अपन अविस्मरणीय योगदान देलनि । हुनक उपन्यासक वातावरण किंवा विषयवस्तुमे ओ एहन पात्रक जीवन परिचायक प्रदर्शन कएलन्हि जे अपन-अपन वर्ग समुदाय ओ वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत जीवनयापन करबामे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । नैका बनिजारामे वर्णिक समाजक व्यापकतातँ अछिए संगहि धोबी, हजाम, ब्रह्मण, क्षत्रिय आदिक उल्लेख सेहो भेल अछि । राजा सलहेसमे दुसाघक शौर्यगाथाक वर्णन कएने छथि । लवहरि-कुशहरिमे ब्राह्मण द्वारा पूजा-पाठक विधा ओ मील-मलाह आदिक चर्चा सेहो भेल अछि । वीर क्षत्रिय राय रणपालक कथासँ सम परिचिते छी । समाजमे धनी ओ गरीबमे की अंतर अछि, तकर सूक्ष्म परण मणिपद्मजीकेँ छलन्हि । ग्रामीण जीवनयापनकेँ कारणे हुनक लेखनीमे ग्राम्यसमाजक मर्मज्ञता दृष्टिगत होयत अछि । अट्टालिकामे रहनिहार झुग्गी-झोपड़ीमे रहि कए जे चित्रण झोपड़ीक करताह ताहिमे अंतर निश्‍चित होयत मणिपद्मक रचनाक पात्र यादव, दुसाघ, मलाह, चमार, धोबी,वाणिक आदि चुनलैन्हि तकर कारण सामन्ती शोषणक धोर विरोधी हुनक मानसिकता ओ स्वातंत्र्य प्रेम छल । सामाजिक संरचनाकेँ दृष्टिमे राखि मैथिलीक अपूर्ण भंडारकेँ पूर्ण करबाक सफल प्रयास कयनिहार मणिपद्मक बाद के छथि ? वर्त्तमानमे मैथिलीमे हुनक विलक्षण लेखनशैली, कथामे पात्रक सार्थक निर्वहन ओ भाषाक व्यवस्थित रूप किंचित नहि भेटैत अछि । आइ हुनक शैलीकेँ प्रेरणाश्रोत मानि लेखनी उठयबाक पहलक आवश्यकता अछि । वर्त्तमानमे मणिपद्मक नुकायल, बिसरायल कृतिक पुर्नप्रकाशनक लेल कर्मगोष्ठी, कोलकाताकेँ योगदान प्रशंसनीय अछि । मैथिली प्रकाशकक जिम्मेवारी छनि जे एहि विषयवस्तुकेँ ध्यान राखि ओहन विधाक प्रकाशन करय जकर अभाव थिक । आजुक मैथिलीप्रेमी लोकनिक ध्यान सरगर गीत, नाटक, व्यंग्य ओ शोधपूर्ण आलोचना विधाकेँ प्रति बेसी आकृष्ट भऽ रहल अछि ।   मैथिलीके लोकप्रिय बनयबाक अभियानमे किछु रचनाकार लागि गेल छथि । आजुक युवावर्गक नब्जकेँ चिन्हबाक उपरान्त हालहिमे मधुकान्त झाक लटलीला बहराएल अछि । निश्‍चित रूपे एहि कदमसँ मैथिलीक पाठकमे वृद्धि हेतैक । वास्तवमे आइ दूएटा वस्तुक बिक्री बेसी अछि- धर्म ओ काम । धर्मपर मैथिलीमे बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा काम पर एखन धरि दुःसाहस कियो रचनाकार नहि कयलनि । आजुक सन्दर्भमे समाजक सही चित्रण वार्त्तालापकें रुपमे लटलीलामे कयल गेल अछि । हालाँकि एकर सभ रचना पटनासँ प्रकाशित समय साल पत्रिकामे लतिकाक छद्‌म नामसँ पूर्वहिमे छवि चुकल अछि । एहि आलेखक प्रसंगमे पं. चन्द्रनाथमिश्र अमरक कहब उल्लेखनीय अछि- एहि माध्यमसँ बहुतोक सड़ल अंतरीक दुर्गन्ध बाहर आबि गेल अछि । यथार्थ नामपर नग्नताकें हम पचा नहि पबैत छी ।    रूढ़िवादिता, अंधविश्‍वास, छूआछूत ओ संकीर्ण मानसिकताकें विरूद्ध ध्यानमे रखैत आइ मैथिलीमे लेखन होयबाक चाही । स्व. राजकमल चौधरी ओ स्व. प्रभास चौधरीक कृतिकें प्रतिबिम्ब नहि भेटैत अछि । व्यवस्थाक प्रति विद्रोहक स्वर जाहि लेखनमे होयत ओकर स्वागत होयबे करत । आजुक पाठकक मानसिकता बदलैत समयकेँ अनुसारे बदलि रहल अछि । एकर मूल कारण सामाजिक परिवर्तन अछि । एहि परिवतनकेँ दृष्टिमे रखैत जे लेखन नहि होयत ओकरा आजुक पाठक नकारि देत । स्व. हरिमोहनझाक कृति एकर सबसँ पैघ उदाहरण अछि । रसगर, चहटगर, हास्य-व्यंग्य ओ उपेक्षित वर्गक स्वर मैथिली साहित्यमे अनुगूंजित होयत त ओकर लोकप्रियता आ माँग दुनू उत्तरोत्तर बढत.   पुरान भाषायी शैलीक स्थान पर नवतुरिया रचनाकारक आलोचनात्मक लेखनकेँ प्रोत्साहन भेटबाक आवश्यकता थिक । गौरीनाथ, अविनाश, पंकज पराशर, श्रीधरम, विमूति आनंद,अमरनाथ, देवशंकर नवीन, मंत्रेश्‍वर झा, प्रदीप बिहारी आदिक रचना एहि वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि ।   संक्षेपमे कहल जायतँ मैथिलीक सर्वागीण विकास तखने होयत जखन एकर सभविद्या पर रचना होयत । एखन धरि किछु विद्या पर बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा दोसर विधा पर अत्यंत उल्प । एहि तरहे मैथिलेक व्यापकता ओ लोकप्रियता स्वप्नहि बुझना जाइत अछि । मैथिलीमे स्वादक अनुसारे रचनाक ढ़ालय पड़तनि तखने ओकरा सही दिशा भेटत ओ दशा सुघरत । वर्त्तमानमे एहि लेल सबसँ बेसी सक्रिय संस्था भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर ओ साहित्य अकादमी दिली तथा स्वाति फाउंडेशन (प्रबोध-साहित्य सम्मान) आदिक मैथिलीक संवर्धन हेतु प्रयास सराहनीय अछि । ३. पद्य ३.१. गुंजन जीक राधा-तेरहम खेप ३.२.पंकज पराशर-वसीयत ३.३.सुबोध कुमार ठाकुर-सुन्न लागए गाम ३.४.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)-आगाँ ३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-६ ३.६.सतीश चन्द्र झा-मैथिल ३.७.रूपेश कुमार झा ’त्योंथ'-खेली सप्पत जा भुइयाँ थान ३.८.विनीत  उत्पलक दू टा टटका कविता गंगेश गुंजन गुंजन जीक राधा- तेरहम खेप केहन रंगक रमकनियां भौजीक दुःख, केहन रंगक बूझल से अभावक एहि सं पहिने कहां छल बूझल हम स्त्री, ओ आ  ओ कतेको आन, कहां छल बूझल ई अनुभव जs चलि रहल देह मे सब देह मे, छैक जकर संबंध मात्र देहे सं पहिने । तकरा बाद मिलि जाइत अछि ओहि देह-गमन मे मन! घर सं असकर विदा भेलाक बाद जेना बाट पर आगां रस्ता चलैत कोनो एक ठां भेटि जाय अपनहि कोनो मित्र अनन्य आत्मीय। मुदा प्रथम तं ई देह ! एकर गीतक, भास होइत अछि बड़य मनोहर बड्ड मार्मिक, दुर्लभ स्वादक तेसरे स्वर्ग ! यद्यपि प्रतिदिन होइत अछि घर मे तथापि नव आ नव रसक भोजनक विन्यास जकां बदलल स्वादक एकटा अलगे स्वर्ग जकां। करैत अछि सृष्टि स्वयं सभ बेर यैह देह, एकर गाना ! मुदा तों एखन ओते नहि बुझि सकबें एक रती आओर फुलयतौ ई सुन्दर काया- बनबा लेल फल, देबा जोग गाछ ! सुगंधि उठतौक तं तकbत रहबें अपने पहरक पहर बौआइत ! कतहु ने कतहु अपनहि भीतर, कतेको ठाम मुदा भेटतौ कहाँ¡। से त फेर क्यो अपने कहतौ अनचोखे लग आबि- ‘ एना किए रहलेहें बौआइत रधिया !’ बिहुँ¡सतौ। जादू करतौ। मोहि लेतौ। मादक बना जेतौ। सुखक छटपटी लगा देतौ। आकुलताक टटका कबाछु मलि देतौ- अंग-अंग, कुरिआइयो ने सकबें लोक सभक बीच। तेहन सुख उत्सुक लाचारी! भेल नहि छौक अनुभव।’ ई सब की भ रहलए ? हमर मोन आ देह एना किएक क रहलए ? पुछबहीक आकंठ विकलतें। ओ फेर बिहुंसतौ। गाढ़ क देखतौ आंखि, तकर भाषा बेचैन बड़ बुधियार रंग मे कहतौ-‘ प्रेम !’ यैह छियै एकर आवेग , देहक आओर फुलाएब, बनैत जाएब अंग सभक अत्तर-गुलाब! बनबा वास्ते फलदार झमटगर गाछ। एखन तं छौ तोहर कदम्बक दू टा टिकुला। फूट’ दहीक होब’ पूरा-पुष्ट, प्रबल, पैघ ! सबटा वैह  देतौ बुझा...अपने एकर रंग आ रस !’ चिहुंकि उठलि ओ, खोललक आंखि। तं कि सुतलि छल निसभेर ? मात्र मुनने आंखि नहि छल पड़लि एतबा काल ? रमकनियां भौजी कोना जगा गेलि। एतेक बरखक बाद, कोना क’ एहन दशा मे ? उढ़ड़ि गेलि जे, लोकक बोली मे-लोकक की, पुरुखक समाजक भाखा मे, कए बर्ख ने बीति गेलै…। आन पुरुखक संग बहुत दूर देस जाक’ ओ फेर बसौलक अपन घर! समाजक एहि गामक उढ़ड़ी रमकनियां भौजी ! कियेक देखलियै एना ई स्वप्न ओकर ?  बा आएलए वैह स्वयं क’ क’ हमरा पर स्नेह, दया ? हो जे मुदा, हम तं कहियो नहि सोचलियौ तोरा द’ एहन बात, एत’ धरि जे बजैत जाइत गेलौ तोहर ब’र, सासु-ससुर-भाउज। कहां माफ कएलकौ तोहर नैहरोक लोक- माए-बाप-भाय ? तों तं ने सासुर ने नैहरे बसलें। कहां क्यो तोरा वास्ते भेलौ ठाढ़, होइतौ सहाय, भरितौ तागति तोहर डेग मे। कहां ? जे कएलें से अपने कएलें। मुदा नीक कएलें! अपन खराप अनसोहांत संसार कें त्यागि मनक अप्पन प्रिय गाम बसौलें, खूब नीक कएलें भौजी! तहियो कहैत छलए हमर मन यैह। आइ एते बरखक बादो मानैये मन यैह सत्य! मुदा बड़ कचोट होइए मन पाड़ि क’ ओ दुपहरिया! एकान्त मे बैसि तोरा संग गपसपक प्रसंग, भरिसक वैह भेल अपना दुनू गोटेक अंतिम भेंट रमकनियां भौजी! कहां देखने छलियौ आइ सं पहिने तोरा ओना ओहन विकल गै भौजी! -‘ आब त नहि होइत अछि सहल...’ बाजलि रहयं करैत निष्करुण करुणाक अन्त। -‘हम छोड़ि देबै ओकरा। रहय तोहर भाय अपन जेना रहय।’ -‘ कथी? हम तं चिकरिये जकां उठल रही की बजै छें भौजी ?’ -‘सत्ते कहि रहल छियौ-हिरदेक बात!’ -‘ एं से कोना छै संभव, कहतौ की लोक समाज ?’ -‘ ओकरो कहतै । कहौ। मुदा तें ई नहि बूझ जे हम छोड़बै ओकरा- -छुच्छी देह लेल। अपन अइ देह वास्ते-नइं- निर्लज्ज देखबैत दबैत अपन पुष्ट सुन्दर पुष्ट दलकैत दुनू छाती, अपनहि दुनू हाथ! से नइं। तोहर सप्पत।’ कहैत, भेलि जेना बताहि। हम त निर्वाक। बौक। घामे-पसेने त’र लेने अपन मन बेचैन। तकरा बादहु ओ आंगुर सं देखबैत डाँ¡ड़क नीचां अपन सर्वाधिक लाज-अंग बाजलि-‘‘ एकरो दुआरे नइं।’ छोड़बै जे, मनसा मुरुख आ निर्लज्ज है। पुरुख के आर किछुओ हो मुदा ई दुर्गुन नहि होना चाही, राधा! हम त अचंभित लाजे कठौत भ’ गेलौं। ओ कहैत रहलि आगां-‘ ई हमरा अपना काज मे नहि होअ’ दैये संग। नै बनबैए बनिहारिक संगी जे लोक की कहत! आ हम चाहने रही-एकर हर हमहूं जोती। हमहू । तामि दियै खेत, बीया बरु अपने छीटओ वैह, पटfबयै बाड़ी , से एकरा नइ पसिन्न। हमरा अछि बूझल बस अही बाटे- मिलि जुलि क’ काज करबै तही रस्ते भेटतै हमरा ओकर देह, पुरुखक सरीर ! हमरा बेसी काल चाही राधा, से सत्ये। एखन तों नहि बुझबहीक। कहियो हेतौ एकर ज्ञान। से, हमर देह -प्रान धधकैत रहय आ ई मनसा फोंफ काट’ लागय। बड़ी-बडी़ काल देहक जातना सं छोड़बैत मन बताह जेना कर’ लागए। तही बतहपनी मे एक राति… बड्ड जोर सं ओकरा झकझोरि क’  जगबैत  उठौलियै तं चिहुंकि क’ उठल तं अबस्स, मुदा हमर ओहनो देह-मनक दशा मे रहल अनोन-बिसनोन। ईZ नहि जे छै ओ अपरुख। नै-नै खाली देहक श्रम झमारल हालति सेहे रहै कारन।-ओंघाएल पंजिया तं लेलक खूब  गाढ़ क’क’ सक्कत सं हमरा मुदा जेना कल जोड़ैत कह’ लागल-‘‘ अखनी सूति र’ह...’ आ फेरो काट’ लागल फोंफ। माया आबि गेल। बड़ यतने अपने देह-छाती सं करैत अपने हाथे खेला बदलैत रहलौं करौट तहिना भेल भोर ! हमर सोचनाइ छल जे काज मे संग देबै तं ओकरो थकनी रहतै आधा, दोसर हमरो थाकत आधा देह। ओना जे टटका-टटका फुलाएल गेना- देह लेने दिन खेपैत रहि जाइ छी बिन मेहनति भरि दिन, से नहि रहब, तं भ’ सकत देह मनक झिलहरि सेहो एक रती दूर। मिलजुलि क’ चला सकब नाह मे करुआरि! तैयो हम सप्पत खा कहै छियौ-छुच्छे देह नहि, ओकरा लेल मास्चर्य आ अपना इज्जतिक रच्छा लेल। आ अइ लेल जे पुरुखो बूझौ जे ओकर स्त्री खाली ओछान पर सुतबे काल धरि नै, बाध-बोन खेत ख्रिहान माने भरि दिन छैक ओकर संग। से हमर दाबी हय। अधिकार। सास्त्र-पqरान की कहै है, हमरा नै पता। हम ई मानै छियै। हम तै दुआरे छोड़बै। बहरीयो जा काज करबा के अधिकार लेल आ बांकी स्त्रीगन-गामक बेटी-पुतहु सबके ई बात बुझाब’क लेल जे –तों भानस  करब , आंगने नीप’ लेल नहि छें। तों ओहिना ओतबे छें पुरुख। ह’र जोतबा लेल, कुरहड़ि सं जाड़नि चीरबाक जोग... तोहूं छें। तै लेल छोड़बै। हमर हक नै मिलतै त छोड़ि नै देबै ? ई बात एत’ छै-सेहो पुरुखक छुच्छ ईड़ द्वारे जे बिन बुझनहि बजैत रहैये, तें। (अगिला अंकमे…) पंकज पराशर वसीयत कविता हमर हुनका देबनि जे अपन माटि-पानिक गंध सँ परिपूरित होथि कवितामय ओ जँ बुझि सकताह हमरा आ हमर अनुराग-विराग तँ हुनका कहबनि मोन राखथि मात्र रचना केँ जे रहत तहियो जखन हम रहब दुनिया मे अनुपस्थित! 2009 सुबोध कुमार ठाकुर सुन्न लागए गाम बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, काल्हि दिबाली छियैक दीप जरतए सगरे हमरो अँगना आएत फेरसँ उल्लास, बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, बैसले-बैसल मन सोचि रहल छल पिछला दिनमे मन घुमि रहल छल सगर टोल आओर गाम सुखमय लगैत छल जखन सभ गामहि रहैत छल मुदा आब ओ समए नहि रहल नहि रहल आब ओ बात बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, सोचिते मन परिजरित भय उठल जेना हृदयमे सहजहिं प्रश्न उठल किएक बनल सभ परदेशी, आ गाम बनल सुनसान सोचिते कऽ रहल छल मोन विलाप बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल, थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट, केहन भेलइ ई मजबूरी रोटी खातिर बनलय दूरी, सभकेँ चाही खूब पाइ रुपैय्या आओर चाही खूब भोग विलाश बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल... एक बेर जेना कहलकहि, कहि पठाबी ई समाद पुत्र सभकेँ, तूँ पाय आब बड कमेलह इहे पाइ तँ देश छोड़ेलकह नहि चाही खूब पाइ रुपैय्या घुरि आबह तूँ अपन देश बटोहिया माँ मिथिले दोहराबए सेहो इहे बात बुढ़िया माय कोनटा पर बैसल.. थाकल आँखिसँ निहारि रहल छलीह बाट। उमेष मंडल (1) गरजह हे मेध गरजह गरजि सुनावह रे। ललना रेश् ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुष रे। हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे। ललना रेश् भैलहि वसन सुतायत छौड़ा कहि बजायत रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् पीयर वसन सुताबह बाबू कहि बजायब रे। (2) पलंगा सुतल तोहेँ पिया कि तोहें मोर साहेब रे। ललना रेश् बगिया जँ एक लगबितहुँ टिकुला हम चखितहुँ रे। भल नहि बोललिह धनी कि बोलहुँ न जानह रे। ललना रेश् बेटबा जँ एक तोरा होइत सोहर हम सुनितहुँ रे। भानस करैत तोहें गोतनी कि तोहें मोर हित बंधु रे। ललना रेश् अपन बालक दिअ पैंच पिया सुनु सोहर रे। नोन तेल पैंच उधार भेटय आर सभ किछु रे। ललना रेश् कोखिआक जनमल पुत्र सेहो नहि भेटय रे। मचिया बैसल तोरे सासु कि सासु सँ अरजि करु रे। ललना रेश् कओनश्कओन तप केलहुँ पुत्र फल पेलहुँ रे। गंगहि पैसि नहेलहुँ हरिवंष सुनलहुँ रे। ललना रेश् देवलोक भेला सहाय कि पुत्र फल पयलहुँ रे। आदित लगैत बिलम्ब भेल होरिला जनम लेल रे। ललना रेश् लाल के पलंगा सुता देल पिया सुनु सोहर रे। दषमासी सोहर (3) प्रथम मास जब आयल चित फरिआयल रे। जानि गेल सासु हमार चढ़ल मास दोसर रे। सासु मोर बसु नैहर ननदी बसु सासुर रे। घर छथि देबर नदान चढ़ल मास तेसर रे। बाट रे बटोहिया कि तोहि मोर भैया कि हित बंधु रे। हमरो समाद लेने जाउ चढ़ल मास चारिम रे। अन्न पानि किछु नहि भावय खटरस भावय रे। कहब हम कओन उपय चढ़ल मास पाँचम रे। रचिश्रचि पतिया लिखाओल नैहर पठाओल रे। बिनु आमा नैहर विरान चढ़ल मास छट्ठम रे। आगुश्आगु आवय दोलिया पाछु भैया आवय रे। घुरिश्घुरि घर भैया जाउ चढ़ल मास सातम रे। तन भेल सरिसब फूल देह भेल पीयर रे। अब न बाँचत जीव मोर चढ़ल मास आठम रे। घरश्घर बाजत बधावा कि भेल बड़ आन्नद रे। अयोध्या मे जनमल राम चढ़ल मास नवम रे। तुलसीदास सोहर गाओल गाबि सुनाओल रे। भक्तवत्सल भगवान कि आजु प्रकट रे। (4) एक दिन छल बन झंझर आब बन हरियर रे। बड़ रे सीता दाई तपसी कि गरम सँ रे। के मोरा गरुअनि काटत खिनहरि बूनत रे। ललना रे मन होय पियरी पहिरतहुँ गोद भरबितहुँ रे। ललना रे राम दहिन भए बैसतथि कौषल्या चुमबितथि रे। (5) प्रथम समय नियराओल शुभ दिन पाओल रे। ललना रे देवकी दरदे वयाकुल दगरिन आयल रे। दोसरो वेदन जब आयल कृष्ण जन्म लेल रे। ललना रे तेसर हरिक प्रवेष कलेष मेटायल रे। दगरिन आबि जगाओल केओ नहि जागल रे। ललना रे हरि देखि सभ मन अचरज सभ हित साधल रे। सूरदास प्रभु हितकर कृष्ण जनम लेल रे। बाजन बाजय सभ ठाम देव लोक हरखित रे। (6) उतरि सावन चढ़े भादव चहुँ दिस कादब रे। ललना रे मेधवा झरी लगाबय दामिनि दमकय रे। जनम लेल यदुनन्दन कंस निकन्दन रे। ललना रे फुजि गेल वज्र केवाड़ पहरु सब सूतल रे। शंख चक्र युक्त हरि जब देवकी देखल रे। ललना रे आइ सुदिन दिन भेल कृष्ण अवतार लेल रे। कोर लेल वसुदेव कि यमुना उछलि बहू रे। ललना रे हरि देल पैर छुआय नन्द घर पहुँचल रे। नन्द भवन आन्नद भेल यषुमति जागल रे। ललना रे सूरदास बलि जाय कि सोहर गाओल रे। (7) घर से बहार भेली सुन्दरि, देहरि धय ठाढ़ भेली रे। ललना रे ओलती धय धनि ठाढ़ि कि, दरदे व्याकुल रे। कथि लय बाबा बिआहलनि, बलमु घर देलनि रे। ललना रे रहितहुँ बारि कुमारी, दर्द नहि जनितहुँ रे। अगाध राति बिराल पहर रति, बबुआ जनम लेल रे। ललना रे बाजय लागल बधाबा, कि गाओल सोहर रे। (8) पहिल परन सिया ठानल सेहो विधि पूड़ाओल रे। ललना रे भेटल अयोध्या राज ससुर राजा दषरथ रे। दोसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे भेटल कौषल्या सासु लखन सन देओर रे। तेसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे माँगल पति श्रीराम सेहो विधि पूरल रे। (9) गाँव के पछिम एक कुइयाँ सुन्दरि एक पानि भरु रे। ललना रे घोड़बा चढ़ल एक कुमर पानि के पियासल रे। पानि पीबू पानि पीबू कुमर सुरति नहि भुलह रे। तोरो सँ सुन्दर हमर स्वामी जे तजि विदेष गेल रे। कोन मास तोहरो वियाह भेल कोने गवन भेल रे। कोने मास जोड़ल सिनेह कि तजि परदेष गेल रे। फागुन हमरो विआह भेल कि चैत गवन भेल रे। बैसाख जोड़ल सिनेह कि तेजि विदेष गेल रे। (10) जीर सन धनि पातरि फूल सन सुन्दरि रे। ललना रे सुतल प्रेम पलंग पर दरदे व्याकुल रे। सासु जे हुनका अलारनि बहिन दुलारनि रे। ललना रे तिल एक दरद अंगेजह, होरिला जनम लेत रे। जाहक हे ननदी जाहक, भइया के बजाबह हे। ललना रे भइया ठाढ़ देहरि बीच कहु बात मनके रे। (अगिला अंकमे) कल्पना शरण प्रतीक्षा सऽ परिणाम तक – 6 पितामहके मृत्युक बाद सऽ छल प्रारम्भ श्रृंखला पाण्डवक एक पर एक जीतक छल आ बल सॅ बढ़ि रहल छल युद्ध कुरूक्षेत्रमे भाई भाई मे धर्म आ अधर्मक भीष्म प्रणक रक्षामे प्राण त्यागला कृष्ण तोड़ला प्रण नहिं शस्त्र उठाबक अभिमन्युक मृत्यु पर अर्जुन लेला प्रतिज्ञा अगिले दिन करब जयद्रथक अन्त लेल प्रहार सुर्यास्तक भ्रम बनाबैलेल कृष्ण केला अपन सुदर्शन सऽ सूर्यग्रहण सन अन्हार जयद्रथक गर्दनि वृद्धकक्षत्र क कोरामे अर्जुनक एकहि वारमे पिर्तापुत्रक संहार राजसूय  यज्ञके बाद छल ई दोसर अभिमन्यु पुत्रक रक्षामे अश्वमेध यज्ञ पहिलमे पिता भाग्यदत्तके अहिमे पुत्र विध्नकर्ता वज्रदत्तके अर्जुन केला वध दुनु छल नरकासुरक वंशज जकरा मुरारि मारिकऽ केने छलैथ शुरू दिवालीक पर्व सतीश चन्द्र झा मैथिल एहि देश प्रांत मे कोना हैत सम्मान मैथिली भाषा के । दोषी छी हमहूँ सब अपने छी दर्शक बनल तमाशा के।

किछु कतौ बरख दिन पर कहियो विद्यापति पर्व मना रहलौं। हम पाग माथ पर राखि कतौ किछु कथा पिहानी बाँचि एलौं।

की हैत करै छी झूठ- मुठ चढ़ि कतौ मंच सँ व्यथा पाठ। दू चारि लोक के छोड़ि दिअ बाँकी सभटा छी बनल काठ। सभ मुँह नुकौने जड़ बैसल छी कतय अपन भाषा भाषी। पथ उतरि करत के शंखनाद हम छी विद्रोहक अभिलाशी। अछि अपन पत्रिका गिनल- चुनल निष्प्राण भेल पाठक विहीन। के कीनत सोचि रहल अछि ओ टीशन पर टाँगल दीन हीन। हम कोना बचायब एकर प्राण ल’ जायब एकरा गाम- गाम। देखत बच्चा उपहास करत अंग्रेजी बाजब बढ़त नाम। चुट्टी पिपरी सभ जीव जन्तु अपना सँ राखत कतेक स्नेह। छथि मुदा केहन मैथिल समाज सभ समाघिस्थ, निश्चल, विदेह। माइक कोरा मे पहिल बेर जहि भाषा के छल भेल ज्ञान। ओ पहिल चेतना भाव बोध छल जीवन के आधार प्राण। सभ बिसरि गेल छी तैं देखू ! अछि सुखा रहल गंगाक धार। कहिया धरि रहब उपेक्षित हम सभ करू फेर सँ किछु बिचार। संकल्प लिअ उठि चलू आइ आँजुर मे गंगा जल राखू। दिनकर के साक्षी राखि फेर नहि आइ कियो पाछाँ ताकू। हरिमोहन झा जयकांत मिश्र सभकंे साहित्यिक मान लेल। छी कतय नीन्न मे एखनो धरि जागू मैथिल सम्मान लेल। ..................... रूपेश कुमार झा ’त्योंथ' -पिता-श्री नवकान्त झा, ग्राम+पत्रालय-त्योंथा, भाया-खिरहर,थाना-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक (अन्तिम वर्ष) मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सक्रिय, अनेक रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकादि मे प्रकाशित। खेली सप्पत जा भुइयाँ थान बड रे जतन सँ हम पोसली पुता केँ, भूखे सुतली अपने मर ओकरा सुतौली खुआ केँ। अपने हम मूरुख मुदा बौआ केँ पढौली, काटि कष्ट पोथी लेल ढौआ जुटौली। देखिते हमर पूत भेल फूटि जुआन, मोने बीतल हमर कष्ट मुख पसरल मुस्कान। ओहि बेरा जिद कयलक गेल ओ असाम, महिनो ने लगलै पठौलक ढौआ कऽ काम। तंग छली पहिने आब उबार भेल जान, तकलीफ भेल छू-मंतर भेल दिन हमर असान। आयल एक दिन बेरा मे बौआ कयने लाल कान, देखली ओकर कान आ कि उडल हमर प्राण। कमाइ हइ लोक ढौआ ढेरी परदेश जा, मुदा भागि आयल बौआ हमर मारि खा। किछु दिनक बाद भेल ढौआ केर टान, भऽ गेल हमर समैया फेरो पहिने समान। फेर गेल बेटा बम्बई अपन पित्तीक संग, छली हम ने हरखित मुदा ओकरा छलै नव उमंग। एहि बेर कमायल बौआ हमर ढौआ ढेर, आब ने गरीब रहली देलक दिन फेर। देखल नहि गेलनि भगवान केँ हमर दिन, लेला हमर मुखक मुसकी ओ छीन। आयल फेर बौआ हमर मारि खा बम्बई सँ, उपर सँ तऽ ठीके छल मुदा टूटि गेल मोन सँ। ककरा ने लगै हइ नीक अपन गाम-घर, पेटक खातिर परदेश जाय पडै हइ मर। भुखले रहब मुदा देबै ने जाय ओकरा देश आन, अखनिये हम खेली सप्पत जा भुइयाँ थान। विनीत उत्पलक दू टा टटका कविता सुतल अछि अनंतकाल स ओ सुतल अछि अनंतकाल स एहन नहि जे ओ बेसी थाकल अछि एहनो नहि जे ओ राति भर जागल अछि ओकरा घर वा दफ्तर में कलह नहि भेल अछि ओ सुतल अछि अनंतकाल स राति भर करट बदललाक बाद राक्षसी खानपान केलाक बाद देह में शिथिलता ए लाक बाद दू टकाक लेल झूइठ-फूइस करलाक बाद आधी दुनिया पर कुचेष्टा करलाक बाद ओ सुतल अछि अनंतकाल स कियाकि ओकर मामलाक सभटा गप फूइस अछि सच कऽ फूइस वा फूइस कऽ सच बना कऽ पेश करब छैक आसान कियाकि ओकरा नींद नहि आबैत अछि सच कऽ सामना करैत काल ओकरा नींद नहि आबैक छैक कटु सच सुनला पर ओ सुतल अछि अनंतकाल स कियाकि ओ पढ़ि नहि सकल कियाकि ओ एहन भक्त अछि जे बस ‘जी हां, जी हां’ करैक अलावा आआ॓र तरबा चटबा से आगू नहि करि सकैत अछि कोनो काज कियाकि सुनि नहि सकैत ओ  जे ओ अछि आस्था पर विश्वास कऽ सकत मुदा नहि कऽ सकत बहस तऽ आबि गेल अछि ओ समय कुंभकर्णी नींद मे सुतल लोक कऽ जगैबाक तथ्य आ तर्कक कसौटी पर कसबाक अनपढ़ कऽ पढ़बाक कियाकि बेवकूफ ज्ञानी कखनो ककरो किछु नहि सुनि सकैत अछि। मुर्दाघर आब हड़ताल नहि होइत अछि कार्यालय मे, फैक्ट्री मे अपन मांग कऽ लऽ कऽ कोनो शहर मे आब धरना-प्रदर्शन नहि होइत अछि मंत्रालय वा विभागक आगू कोनो मुआवजा कऽ लऽ कऽ कोनो भीड़भाड़ बाला सड़क पर आब झगड़ा-फसाद नहि होइत अछि चौक-चौराहा वा चौबटिया पर अपन अधिकार कऽ लऽ कऽ कोनो मोहल्ला में जखन कि एखनो मांग अछि यथावत नहि भेटल एखन धरि केकरो मुआवजा अपन अधिकार स बेदखल केल जा रहल छथि लोक सब दिश नजरि आबि रहल अछि मुद्दा-ए -मुद्दा स्त्रीक मांग भऽ रहल अछि सून समाजक तथाकथित सफेदपोश ठेकेदार निकाल रहल छथि जनाजा घुटि रहल छथि स्त्रीगण, घुटि रहल छथि पुरूष बहरहाल, ओ देश,देश नहि जतय मांग कऽ लऽ कऽ मुआवजा कऽ लऽ कऽ अधिकार कऽ लऽ कऽ मुद्दा कऽ लऽ कऽ आवाज नहि उठति अछि छायल रहैत अछि खामोशी ई लगैत अछि मुर्दाघर। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती पाखलो मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह पाखलो- भाग-७ (भाग-5) शंभुक होटलमे रातिक भोजन कएलाक पश्चात् हम दीनाक घर दिस चलि देलहुँ। आइ बहुत काज केने रही तहि लेल सौंसे देहमे दरद छल। भूइयाँ पर पड़ितहि हमरा निन्न आबि जाइत, एहन बुझाइत छल। बान्ह पर पहुँचबाक देरी नहुँ-नहुँ बसात सिहक’ लागल। आहा........ कतेक शीतल बसात छैक! बसात लगितहिं देहमे हरियरी आबि गेल। बगलमे एक दिस खेत-पथार आ दोसर दिस मांडवी नदी बहैत छलैक। बगलक नारियरक गाछसँ आवाज आबि रहल छलैक। चारू दिस अन्हारे-अन्हार छलैक। एहि अन्हारमे उपर भगजोगनी भुकभुक करैत छलैक। नदीक कारी पानिमे माछ सभ उछलैत छलैक आ ओकर लहरि भगजोगिनिएँ  जकाँ दीप्यमान भ’ रहल छलैक। बान्हक बीचहि मे ब्रह्मबाबाक मंदिर नुकाएल रहैक। ओ मंदिर एकदम टूटि गेल रहैक। मंदिरक उपर चार नहि छलैक। मंदिरक चारू कातक देवाल सभमेसँ आगूक देवाल तँ एकदम्मे टूटि गेल रहैक। बाँकी तीनू देबाल पर सिम्मर, बर, अश्टीचे (गोवा प्रदेशक एकटा गाछ जाहिसँ लकड़ी प्राप्त होइत अछि) सन पैघ-पैघ गाछ सभ जनमि गेल छलैक। गोविन्दक विचारसँ ब्रह्मबाबाकेँ खुब पैघ खुलल मंदिर भेटल छनि। ओ कहैत छल – एहि चारू गाछ पर आकास केर छत छैक आ एहि मंदिरमे ब्रह्मबाबा रहैत छथि। चलैत – चलैत हम ब्रह्मबाबाक मंदिर लग पहुँच गेलहुँ आ एहि मंदिरमे हमरा एकबेर साँप नजरि आएल रहय, ओ स्मरण अबितहिं हमर सौंसे देह सिहरि गेल। नेनपनमे एकबेर हम आ गोविन्द माछ मारबाक लेल नदी पर गेल छलहुँ। बहुत कालक बाद हमरा बंसीमे एकटा खर्चाणी (माछ) फंसल छल। ओकरा हम एकटा नारियरक सिक्कीमे गूथि लेलहुँ। बाटमे ब्रह्मबाबाक मंदिर भेटल। बंसी नीचाँ राखि हम दुनू ब्रह्मबाबाकेँ गोर लागबाक लेल गेलहुँ। ब्रह्मबाबाक कारी मूर्ति, मंदिरक टूटलका भागमे पाथरक ढेरक बीचमे छलनि। हम अपन हाथक माछ मंदिरक सीढी पर राखि देलहुँ। हम दुनू गोटे मूर्ति लग माथ टेकलहुँ। ने जानि कतएसँ ओहि मूर्ति लगक पाथर पर एकटा साँप आबि कए ठाढ़ भ’ गेलैक। हम दुनू गोटे बहुत डरि गेलहुँ आ पाछू हटि गेलहुँ। पछाति जा कए ओ साँप ओहि पाथरक ढेरमे ढूकि गेल। गोविन्द तँ डरक कारणेँ बुझू जे पाथरे बनि गेलाह। हम सभ भगवानक सीढी पर माछ रखने छलहुँ,एहिलेल हुनका खराप लागलनि की? हमरा मोनमे एहन भेल। हम आपस सीढी लग गेलहुँ आ ओतए राखल माछ उठाकए नदीमे फेकि देलहुँ। हमसभ पुनः ब्रह्मबाबाक पयर पर गिर कए हुनकासँ माफी माँगलियनि। हम गोविन्दसँ पूछलियनि – माछ राखने छलहुँ एहिलेल ब्रह्मबाबाकेँ गोस्सा आबि गेलनि की? मंदिर भ्रष्ट भ’ गलैक की? नहि यौ, एहन कतहुँ होइक? गामक लोकतँ हुनका माछो चढबैत छनि। गोविन्द जवाब देलक। तखन साँप किएक देख’ मे आएल? हम..............। चुप रहू, पाखलो भेलहुँ तँ की भेल? पछिला बेर तँ हम इमली आ आँवला रखने छलहुँ,तखनहुँ मंदिर भ्रष्ट भेल छलैक की? नहि ने, अहाँ चुप रहू आ ककरो किछु नहि बतेबैक। हम ब्रह्मबाबाक मंदिर लग पहुँचि गेलहुँ। मंदिरक चारू कात पहाड़ छलैक आ बीचमे मंदिर। रातुक अन्हारमे मंदिर कारी देखाइत रहैक। उपर तरेगणसँ भरल देहबला अकाश। घरक बीचला देबाल आ मठौत एहि दुनूक बीच दए इजोत अबैत रहैक। ओहने इजोत अकाश आ पहाड़क बीच पसरि रहल छलैक। हम अपन जूता खोललहुँ आ ब्रह्मबाबाकेँ गोर लागलहुँ। रातिक अन्हारमे ब्रह्मबाबाक मूर्ति नहि देखा पड़ैत रहैक। हमरा भेल जे जेना ब्रह्मबाबा एतए अन्हारक एकटा बड़का टा रूप ल’ कए पूरा संसार पर पसरि गेल छथि। ब्रह्मबाबा केर मंदिर बहुत सिद्ध छैक। मांडवी नदीक कछेर पर एहि गाम केँ बसौनिहार आदिपुरूख वैह छथि। पहिने ई गाम बाढ़िमे डूबि जाइत छलैक मुदा मांडवी नदी पर बान्ह बान्हि ओ एहि गामक सृष्टि केने रहथि। हुनका मरलाक उपरान्त एहि गामक लोक सभ हुनकर स्मरणमे ई मंदिर बनौने छल। एहि तरहेँ ई मंदिर आ ब्रह्मबाबाक द्वारा बनाओल गेल ई बान्ह दुनू बहुत पुरान अछि। हम ब्रह्मबाबा द्वारा बनाओल गेल ओहि बान्ह दए चलि रहल छलहुँ। आ एहि बान्हक कारणेँ बसल गाममे हम, माने पाखलो रहैत रही। दिनाक  बैसकी घरमें सभ दिन जकाँ हम चटाय बिछा कए बैसि गेलहुँ। दिनाक बेटा एकटा चिट्ठी आनि हमरा हाथमे थमा देलक। ओ चिट्ठी गोविन्देक छलैक। बहुत दिनक बाद ओ हमरा चिट्ठी लिखने रहय। हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल। गोविन्दक संग घूमब-फिरब, केगदी मैदानक पोखरिमे नहाएब, हेलब ई सभ सोचैत-सोचैत हम चटाय पर सूति गेलहुँ। हम माथ धरि कंबल ओढ़ि लेलहुँ। बहुत राति बीति गेलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हमरा मोनमे केगदी मैदानक पोखरिक चित्र बेरि-बेरि आबि जाइत छल। लील रंगक आकाश केर प्रतिबिंब पानिमे चमकैत छलैक। आकासक रंगीन मेघक पोखरिक लहरि पर हेलब।  आकाश अपन रूप पोखरिक पानिमे देखि मोनहि-मोन खूब प्रसन्न होइत छल। ‘ई रूप नीक नहि अछि’ ई सोचि ओ अपन रूपकेँ नव रूपमे रंगैत छल आ मेघक वस्त्र पहिरैत छल। पोखरिक लग केबड़ा झाड़ ओ केबड़ाक गाछ सभक बड़का टा जंगल रहैक, ओ पोखरिक महार केबड़ाक झाड़ीसँ भरल रहैक। केबड़ाक झाड़ पर फूल फूलाइत अछि।  ओहि दिन हमसभ नहएबाक लेल गेल छलहुँ। केबड़ा फूला गेल छलैक। पीयर-पीयर केबड़ा हरियर-हरियर पातसँ बाहर आबि, अपन जी देखा-देखा कए कबदा रहल छलैक। पूरा वातावरण केबड़ाक सुगन्धसँ भरल रहैक। हम आ गोविन्द पोखरिमे कूदि गेलहुँ। दुनूगोटे हेलैत-हेलैत केबड़ाक द्वीप लग पहुँचलहुँ।  द्वीप पर केबड़ाक बहुत घनगर जंगल रहैक। दुनू गोटे केबड़ाक झाड़क अंदर घूसि केबड़ाक फूल तोड़ए लागलहुँ। फूल तोड़ि पोखरि पार केलहुँ। ओ सभटा पोखरिक कछेर पर राखि देलियैक। बादमे बेंग जकाँ हमसभ पोखरिमे डुबकी लगौलहुँ। भरि दम साँस घीचि ओहिना पानिमे डूबि गेलहुँ, तँ ओहि साँसक संगे बाहर भेलहुँ। सौंसे देह डूबल छल, मुदा माथक केश हेलैत नारियर सदृश बुझाइत छल। हमरा गाम क्षेत्रफल आन गामक अपेक्षा कने पैघ छैक। गाममे खेतक मैदान, जंगल ओ पहाड़ हमरा सभकेँ घूमबाक लेल कम्महि भेटैत छल। नाह ल’ कए नदीमे घूमैत-फिरैत रही। नदीमे नहएलाक पश्चात् हेलिकए नदी पार करैत रही। अज्ञातवासक कालमे पांडव लोकनि द्वारा बनाओल गेल पोखरिमे हमसभ नहएबाक लेल जाइत रही। ओ पोखरि बहुत सुन्नर रहैक। पैघ-पैघ पाथर पर पोखरिक चारू दिस नीक चित्रकारी कएल गेल रहैक। चारू दिससँ सीढी होइत लोक पोखरिमे ढूकैक छल। पोखरिक चारू दिस खोदल गेल मेहराब परक कलाकृति सभ। सभ मेहराबक भीतर दू-तीनटा कक्ष इजोतसँ भरल। एहि कक्ष सभक देबालक खाम्ह पर लेपटाएल लत्ती, चिड़ै-चुनमुनी द्वारा कएल गेल बीट (बिष्टा), विभिन्न प्रकारक आकृति बना नेने रहैक। एहन बुझाइत रहैक जेना मेहराबक सुन्नर कक्षक बीच पाषाण केर पोखरिमे शिलाखण्ड पर भगवान अमृत-कलश राखि देने होथि आर ओहि निर्मल पानिकेँ देखिकए जेना कौआक आँखि चंचल भ’ रहल हो, ओहिना ओकरा देखि ककरहुँ प्राण प्रसन्नतासँ भरि जाइक। एहने पानिमे हमसभ नहाइत छलहुँ। नहएलाक बाद गोविन्द मेहराबक कक्षमे जा कए कोनो ऋषि-मुनि जकाँ ध्यानस्थ भ’ बैसैत रहथि। तखन ओहि पाषाणकेँ देखि बुझा पड़ैक जे बुझू महाभारतक काल घुरि एलैक। पछिला किछु सालक स्मृतिसँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। ओह......हमर माय! हमर साँस केओ बन्न क’ देलक, हमरा गरमे फंदा बान्हि देलक, हमरा एहने लागल। हम आ गोविन्द जखन एहि पोखरिमे नहा रहल छलहुँ तखनहिं भट बाबू ओहि बाटे जा रहल छलाह। हमरा पोखरिमे नहाइत देखि – पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक, पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक...... चिकर’ लागलाह। हुनकर चिकरब सुनि ओतए पाँच – छओ लोक जमा भ’ गेलाह। भट बाबू हुनका लोकनिकेँ आदेश देलथिन, जे ओ सभ हमर कान घीचि बाहर आनथि। ओ लोकनि हमर कान घीचैत हमरा बाहर आनलथि। बादमे भट बाबू अपन छड़ीसँ हमरा खूब मारलथि। ओ सभ हमरा मारैत-मारैत सांतेरी मंदिर धरि ल’गेलाह। भरि गामक लोक हमरा देखबाक लेल ओतए जमा भ’ गेलाह। ओ लोकनि हमरा सांतेरी मंदिरक सीढ़ी पर नाक रगड़बाक लेल बाध्य केलथि। हम अपन नाक रगड़लहुँ। माँफी माँगलहुँ। बादमे ओ हमरा पोखरिक लग बला स्तंभ (खाम्ह)सँ बान्हि देलनि। काल्हिए हम पीयर नारियर तोड़ने छलहुँ। सभक संग ढोल आ ताशा बजाकए शिगमो खेलने छलहुँ आर आइ हम स्वयं गामबलाक लेल एकटा तमाशा बनल रही। क्रमशः श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि। डॉ शंभु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा,गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। सेबी फर्नांडीस बालानां कृते- १.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) २.कल्पना शरण: देवीजी देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग”प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा सत्ताइस नताशा अट्ठाइस कल्पना शरण:देवीजी: देवीजी : परमाणु उर्जा देवीजी पदार्थक संरचना पढ़ा रहल छलैथ। ताहि पर ओ बतेलखिन जे परमाणु मे बहुत उर्जा होयत छै।परमाणु बम अकर नकारात्मक आऽ विभत्स रूप छै।एक परमाणु बम विशाल शहर के समाप्त कऽ सकैत छै आ अकर असर आगॉं आबैवला पीढ़ी तक सेहो होयत छै।जापानके हिरोशिमा आ नागाशाकी शहर के जे दुर्दशा द्वितीय विश्वयुद्धमे भेल रहै तकर दर्दनाक यादक तस्वीर अखनो दुःखी कऽ दैत छै।परमाणु बम स सुरक्षा लेल परमाणु बम के जवाबी बम ह्यसेकेण्ड स्ट्राइक स्टेटसहृ राखनाई अनुचित नहिं मानल गेल छै परन्तु आब जँ कोनो देश हिरोशिमा आ नागाशाकीक इतिहास दुहरेता तऽ विश्वमे ओहि देशक मौलिक अस्तित्व तऽ निश्चित रूपे हमेशा के लेल समाप्त भऽ जेतैन। युनाएटेड नेशन्स डे आबि रहल छल।देवीजी अपन शिक्षण मे आहि बतेलखिन जे अहि साल परमाणु हथियार के निष्काषण पर जोर देल गेल छै।परमाणु उर्जाके बहुत सकारात्मक प्रयोग कैल जा सकैत अछि।कहल जा रहल छै जे परमाणु शक्तिके सदुपयोगक के क्रान्ति युग आबऽ वला छै। परमाणु उर्जाक असामरिक आ मानविक प्रयोग सऽ पर्यावरण के तापमानक असंतुलन पर नियंत्रण पाबैके रस्ता भेटि रहल छै।तकर अतिरिक्त अकर उपयोग कृषि जगत एवम् अन्य उद्योग सबमे कैल जा सकै छै जाहिमे धातु विकिरण सऽ हुअ वला हानि. जल प्रदूषण.  कोयला आ गैस के अत्याधिक उपयोग सऽ समाप्ति के आशंका आदि के कम कैल जाऽ सकैत छै।आधुनिक युगमे अकर सबसऽ बढ़िया उपयोग भऽ रहल छै कैंसर के ईलाज़ रेडियोथेरेपीे मे। देवीजी कहलखिनजे कम सऽ कम मनुष्यके आपसमे एक दोसर के कष्ट पहुँचाबक प्रयास नहिं करबाक चाही।प्रकृति पर तऽ पूरा जोड़ नहिं छै। अक्टूबर के दोसर बुद्ध के इण्टरनेश्नल डे फॉर नैचुरल डिसेस्टर रिडक्सन के रूपमे मनाओल जा रहल छल। देवीजी कहलखिन जे युनाइटेड नेशन्स के दिस सऽ अहि क्षेत्रमे सेहो अनेकानेक कार्यक्रम चलैत रहै छै।जेनाकि इण्डोनेशिया मे भूकम्प पीड़ित के सहायता. भारत मे बाढ़ पीड़ित के मददि . केत्साना समुद्ी तूफान सऽ क्षतिग्रस्त जनजीवन के मददि इत्यादि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य 

एखन  ठाम  जकर,तकर  तनिकर  अछि 

अग्राह्य  अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original poem in Maithili  by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York 8.2. Original Maithili Poem by Sh.Ramlochan Thakur, translated by Gajendra Thakur DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in A Trial To Follow The Movements Of The Fishing Rod The diving along the fishing rod was tried With wings of reels of aspiration The support by tackle to succeed A pin drop silence of indefinite wait The bottom of the still water so bleak The insects passing bring movements A light of faith and hope in creek Stands holding the fishing rod to catch in the path From an end of superstitions towards the science indeed Hook attached with the food of knowledge The waiting ended and a divine peace The turtle are not present Couldn’t see the hurdles He had made The two forms of baby life Could hold the rod only when fish increased The reels of desire and tackle of success The food of knowledge In the middle of endless sky The mechanics of life proceed The peaceful speechless human The waves of feelings touched Filled his heart with sensitive feelings Used to lack emotions always In these Thirty Seven Years (Original Maithili Poem by Sh.Ramlochan Thakur, translated by Gajendra Thakur) And He Sumbles The tring-tring machine in his hand is speechless Beside coming from shop sound of Radio President's speech addressed to Nation accounting of progress of independence on 37th anniversary "thirty seven years!" he exhales From today exactly 37 years He came to Kolkata He remembers exactly like tape of Cinema all events in front of eye dancing one day in darkness of night when all the village was silent came jostling around forty policemen surrounded his house broke wooden house gate and took his father away. This talk although he knew later on that his father was in Swarajya Party and the landlord of his village Satlaren Babu had hand in his catch who was with police and that he saw with his eye then after around six months one day he listened 'country has become independent Swarajya Party has won' and that day he felt ecstatic People said that his father would be freed from jail he too would come to village but day after day month after month passed his father did not return. and Satlarem Babu on that occasion went to Delhi people say became minister and in that very year during Agham month his maternal uncle visited village brought along him "Sister-fucker, you have made this a Ricksaw-stand.." and instantly his leg is beaten with a stick he becomes uneasy sees his leg how thin it has become in these thirty seven years- in these thirty seven years-his bone has become naked in these thirty seven years- in these thirty seven years-his waist has leaned so much, in these thirty seven years- in these thirty seven years stick of policeman has become so particular in these thirty seven years- in these thirty seven years-his abuses has become so crude and his leg moves subconsciously tring- tring "where? come here" and police pushes he almost fells in front is policestation that day when he came to Kolkata this policestation was not there he was the only one from his village now around forty some with cart pulling some with Ricksaw and som like Coolie this time he visited his village all the tola of Dusadh emptyno one male member there likewise as happened that time when his father was taken away whole of Dusadhtoli fled although this time people did not fear did not fled village due to hunger of belly fled to Delhi Punjab he thinks in these thirty seven years so many Tolas so many villages became sort of people in these thirty seven years so many young and bold left their own their village-home in these thirty seven years in these thirty seven years bread has become dearer in these thirty seven years in these thirty seven years labour has become cheaper in these thirty seven years now in these thirty seven years policestations are in plenty in these thirty seven years... "sister-fucker, vomit five rupees" "from where sir from morning only two rupees i have earned, I do have license.." "License bastard.." and a powerful slap on his temple he feels drowsy fells darkness in front of his eyes his purse around his waist swings in policeman's hand his hard-earned money two rupees swings in policeman's hand Policeman laughs beside sound of Radio from shop presidential address addressed to nation account of progress of independence on thirtysevent anniversary Ricksawpuller still senseless fallen around him is darkness complete darkness. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर। महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:  Language:Maithili  ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)  (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) 

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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com  website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह।  Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

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या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुरमूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ$४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रु.१००/- ४. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ५/६. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: :देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ७. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ८/९/१०.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. COMING SOON: १.मिथिलाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल २.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरनमैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल।पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। ३.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन ४.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह ५.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन ६.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ"बलचन्दा" ७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल ८.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) ९.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी Details of postage charges availaible onhttp://www.shruti-publication.com/  (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. Address your delivery-address to श्रुति प्रकाशन,:DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107Website: http://www.shruti-publication.com e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल,तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथीकुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- दास जी द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। मैथिलीमे उपरझपकी पढ़ि लिखबाक जे परम्परा रहल अछि तकर ई एकटा उदाहरण अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोगक हम भर्त्सना करैत छी-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जेअपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि..(स्पष्टीकरण-क्यो नाटक लिखथि आ ओहि नाटकक खलनायकसँ क्यो अपनाकेँ चिन्हित कए नाटककारकेँ गारि पढ़थि तँ तकरा की कहब। जे क्यो मराठीमे चितपावन ब्राह्मण समितिक पत्रिकामे-जकर भाषा अवश्ये मराठी रहत- ई लिखए जे ओ एहि पत्रिकाक माध्यमसँ मराठी भाषाक सेवा कए रहल छथि तँ ओ अपनाकेँ मराठीभाषी पाठक मध्य अपनाकेँ हास्यास्पदे बना लेत- कारण सभकेँ बुझल छैक जे ओ मुखपत्र एकटा वर्गक सेवाक लेल अछि। ओना मैथिलीमे एहि तरहक मैथिली सेवक लोकनिक अभाव नहि ओ लोकनि २१म शताब्दीमे रहितो एहि तरहक विचारधारासँ ग्रस्त छथि आ उनटे दोसराक मादेँ अपशब्दक प्रयोग करैत छथि-सम्पादक)...ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।( स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ- विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए। ओना अहाँक  मंत्रपुत्र हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित भेल, जे जीवकांत जी अपन आलेखमे कहै छथि। एहि अनूदित मंत्रपुत्रकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, सेहो अनुवाद पुरस्कार नहि मूल पुरस्कार, जे साहित्य अकादमीक निअमक विरुद्ध रहए। ओना मैथिली लेल ई एकमात्र उदाहरण नहि अछि। एकर अहाँ कोन रूपमे विरोध करब?) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्याससहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनकसेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका'विदेह' ४४ म अंक १५ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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