301 'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्यास-जिनगीक जीत २.३.सुजीतकुमार झा-६अम शताब्दीक लोक नायक वृतचित्रमे २.४.बिपिन झा-॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥ २.५.अनमोल झा--रिलेशन-१ २.६.जितेन्द्र झा-जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी २.७.मैथिलीक युगद्रष्टा-निमिष झा २.८.१.कुमार मनोज कश्यप २. राजदेव मंडल-कथा ३. पद्य ३.१.गुंजनजीक राधा- १६म खेप ३.२. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ ३.४.१.रघुनाथ मुखिया २.कल्पना शरण-क्षितिजक साक्षात दर्शन ३.५.१.सतीश २.रूपेश ३.सुबोध ३.६.शेफालिका- तीनटा पद्य ३.७.१.महाकान्त ठाकुर २.शिव कुमार झा-दू टा गीत ३.८.१.निमिष २.धर्मेन्द्र ४. बालानां कृते-१.जगदीश प्रसाद मंडल-लघुकथा२.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)३.कल्पना शरण:देवीजी. 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 5.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English byAnulina mallik. 5.2. Short Story by Ilarani Singh विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय श्री उमानाथ झाक (1923-2009)निधन 07-12-2009 केँ भऽ गेलन्हि। जन्म:-01-01-1923, मृत्यु07-12-2009 महरैल, भधुबनी ।भूतपूर्व अङरेजी विभागाध्यक्ष एवं प्रति-कुलपति मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा । रचना:-रेखाचित्न, अतीत (कथा संग्रह); मैथिली नवीन साहित्य, इन्द्र धनुष, विद्यापति गीतशती (सम्पादन)। 28 दिसम्बर, 2009 केँ नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली क सम्मुख प्रेक्षागृह मे मैलोरंग आयोजित कऽ रहल अछि :मैथिलोत्सव - 09 समय : 10 बजे दिन सँ सेमिनार : सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अनुवाद साहित्य की भूमिका प्रस्तुति : पाँच पत्र ( नाटक ) ; समय साँझक 6.00 बजे सँ।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति - 09क वितरण । मैथिली समीक्षा: शिक्षित मध्यवर्गमे मैथिली भाषा नवम वर्गसँ स्नातक-स्नातकोत्तर धरि मैथिलीकेँ भाषा वा मातृभाषाक रूपमे लेनिहार एहिसँ स्नेह करै छथि। अन्तर्जालपर मैथिलीक आगमनसँ सेहो मातृभाषासँ स्नेह फेरसँ जागल। मैथिलीक पोथीक सुगमतासँ नहि भेटब जाहिमे सरकारी संस्थाक मैथिली पाठ्यपुस्तक सम्मिलित अछि। एहिमे अन्तर्जाल द्वारा सीमित रूपमे हस्तक्षेप भेल अछि। आ एहि सभक परिणामक रूपमे मैथिली लेखकक भीतर हीन भावना (सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स सेहो हीन भावनाक रूप अछि) पैसि गेल आ साहित्य सोंगरपर ठाढ़ कएल जाए लागल। वाद-विवाद उत्पन्न कऽ आरोप-प्रत्यारोप आधारित साहित्यक चर्चा प्रारम्भ भेल। पति-पत्नी, जिला-जबार आ पिता-पुत्रक अपन पक्षमे वातावरण तैयार करब आरम्भ भेल। माने ब्लैकमेलिंग आ ब्लैक-मार्केटिंग द्वारा कथा-कविताक पुरस्कार लेल लिखल जाएब। मुदा बुकर आ नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त साहित्य सेहो कालातीत नहि रहि पबैत अछि, बहुत रासकेँ तँ लोक मोन रखैत अछि मुदा ढेर रास विस्मृत भऽ जाइत छथि आ पाठक ओकर मूल्यांकन कऽ दैत छथि। मुदा मैथिलीमे खाढ़ीक-खाढ़ी बीति जाइत अछि मुदा पाठकक अभावमे पति-पत्नी, पिता-पुत्र, जिला-जबार आ आब कथाकार-कविक बनल गोल सभ एकर ब्लैकमेलिंगक आधारपर मूल्यांकन करैत अछि। अन्तर्जालक हस्तक्षेप सीमित रहलाक कारण नीक साहित्य, सृजनात्मक साहित्य आ कल्याणकारी साहित्य सोझाँ नहि आबि पाबि रहल अछि, नहि सृजित कएल जा रहल अछि। विवाद कऽ समाचारमे रहएबला कवि-कथाकारकेँ अहाँ प्रश्रय देब कारण ओ ब्लैकमेलिंग कऽ रहल छथि वा धूरा-गर्दामे रहनिहार मानवतावादी कवि-कथाकारकेँ। आ जखन से करब तखने निरर्थक देखाएबला मैथिली साहित्यमे प्राणवायु भरि पाएब। एहि लेल मैथिली कथा-कविताक समीक्षाक आवश्यक तत्वपर विचार करए पड़त। १. नव वातावरणमे अवस्थित नव समस्याकेँ चिन्हित करब, २. व्यक्तिगत अनुभवकेँ सार्वजनिक जीवनसँ जोड़बाक प्रयासकेँ चिन्हित करब, ३. सूत्रबद्धता अछि वा नहि, कारण विवादित वस्तुकेँ घोसिआएब, वादक प्रतीक-चिन्हकेँ ठूसि कऽ साहित्यमे देबाक प्रवृत्तिक आधारपर ब्लैकमेलर साहित्यकेँ चिन्हित करब, ४. अपन व्यक्तिगत प्रशंसा आ दोसराक प्रति आक्षेपक कथा-कवितामे ब्लैकमेलर साहित्यकार द्वारा प्रयोग करबाक गुंजाइश रहैत अछि। मुदा तथ्यपूर्ण मूल्यांकन एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करत। ५. हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? ६. बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन ७. कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइत छैक। आ एहने साहित्य बेर-बेर अपनाकेँ परिमार्जित-परिवर्धित करितो मूल दोषसँ दूर नहि भऽ पबैत अछि। जातिवाद-सांप्रदायिकतावाद आबिये जाइत छैक, तकरा चिन्हित करब। ८. गपाष्टक आ समीक्षाक अंतरकेँ चिन्हित करब। एकर मुख्य लक्षण – “कियो हुनका कहियो पुछलकन्हि, सुनैत छिऐ जे ओ ई करए चाहैत रहथि ..” आ एहि तरहक आर गप सभ। संगहि हिनकर रचनाकेँ पाठक नहि बूझि पबैए- समीक्षक सेहो नहि बूझि पबैए- मुदा हिनकामे असली गप ई छन्हि। ई फलनाक बेटा छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि, ई एहि पदपर छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि। ई पाइबला छथि, होटल छन्हि तेँ साहित्यकार नहि छथि आ ई पर्चा फेकै छथि, पत्रकार छथि तेँ महान साहित्यकार छथि। ई सहरसा-सुपौलक छथि तेँ नीक आकि अधलाह आ ई दरभंगाक सोति आकि ब्राह्मण-कायस्थ तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि। ९. एक पाँतिक वक्तव्य- एहि रचनाक हम विरोध आकि समर्थन करै छी। ई हमरा लेल नीक लोक छथि तेँ नीक लिखै छथि। ई हमर जातिक छथि वा हमरा भविष्यमे फाएदा पहुँचेताह तेँ अद्भुत लिखै छथि। हिनकर हम प्रशंसा करबन्हि तँ ईहो हमर प्रशंसा करताह। एहि सभ प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करब। १०. मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा राखब। ओकर सम्पूर्ण गप बुझबासँ पूर्वे निर्णय सुनाएब। एहिकेँ चिन्हित करब। ११. मैथिली साहित्य, जतए पाठकक संख्या शून्य छैक, एक साहित्यकार दोसराक समीक्षा करैत अछि आ एतए व्यक्तिगत अहम् आ ब्लैकमेलिंगक पूर्ण गुंजाइश छैक। अहाँ दू-चारिटा कवि-कथाकार सम्मेलनमे चलि जाऊ, उद्घोषकक उद्घोषणा आ थोपड़ी उद्घोषकक आ साहित्यकारक पूर्वाग्रहकेँ चिन्हित कऽ देत। जेना गौरीनाथ लिखै छथि जे हिन्दीयोमे -प्रेमचन्द, मोहन राकेश आ उत्तराखण्डी- एना कऽ कए संग्रह अबैत अछि जेना उत्तराखण्डी प्रेमचन्द आ मोहन राकेशक कोटिक हिथि। तहिना मैथिलीमे कुलानन्द मिश्र-हरेकृष्ण झा आ ई; वा यात्री-राजकमल आ ओ, वा राजकमल-ललित आ ई , मात्र यैह कवि कथाकार छथि एहन सन वक्तव्य अबैत अछि आ एहि मे ई आ ओ क प्रति देखाओल पूर्वाग्रहकयुक्त दुटप्पी चिन्हित भए जाएत। खूब साहित्य पढ़ू- भारतक अ नेपालक दुनू दिसुका मैथिली साहित्य। आ एहि क्रममे जे रचना आ जे रचनाकार नीक लागथि आ जे तथाकथित स्थापित रचनाकार वा रचना अधलाह लागए तकरा चिन्हित करू, विसंगतिकेकेँ सेहो। आ से बिना भएक, कारण ब्लैकमेलर आ गोल बना कऽ कविता-कथा रचनिहारक दिन खतम करबाक लेल साहस जरूरी अछि। बिना पाठकक ई लोकनि मैथिली साहित्यकेँ सोंगरपर रखने छथि, एकटा छद्म वातावरण बना कऽ। (क्रमशः) संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ दिसम्बर २००९) ९० देशक १,००९ ठामसँ ३४,८१८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,१४,०४२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्यास-जिनगीक जीत २.३.सुजीतकुमार झा-६अम शताब्दीक लोक नायक वृतचित्रमे २.४.बिपिन झा-॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥ २.५.अनमोल झा--रिलेशन-१ २.६.जितेन्द्र झा-जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी २.७.मैथिलीक युगद्रष्टा-निमिष झा २.८.१.कुमार मनोज कश्यप २. राजदेव मंडल-कथा प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक मिथिलाक इतिहास तिब्बत आर नेपाल सँ सेना आनि दूतमण्डलक दोसर प्रमुख पदाधिकारी, सियांग-चेन-जेनक नेतृत्व मे तीन धरि युद्ध भेल आर अंत मे अरूणाश्व पराजित भेलाह। वाँग जखन बन्दीक रूप मे अरूणाश्व केँ लकए चीन पहुँचलाह तखन वाँग केँ प्रोन्नत कओल गेलन्हि। उपरोक्त विवरण ताँग वंशक पुरना इतिहास मे भेटैत अछि। ताँग वंशक नवका इतिहास मे सेहो अहि घटनाक विवरण एवं प्रकारे भेटैत अछि। ६४८ मे वाँग केँ जखन भारत दूतमण्डलक नेता बनाके पढ़ाओल गेलन्हि तखन हर्षक अवसान भ चुकल छल आर अरूणाश्व राज्यक अधिकारी भ चुकल छलाह। वो तीरभुक्तिक शासक छलाह। तिब्बत आर नेपाल सँ साहायता लए वाँग अपन वेइज्जतीक बदला लेबाक हेतु तिरहुत पर आक्रमण केलन्हि। वो अपन सेना केँ कैक भाग मे विभक्त कए अपन तेसर दिन चा-पुओ-हो-लो नामक स्थान पर पहुँचलाह आर ओहि पर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि। अहिक्रम मे ३००० व्यक्तिक हत्या भेल आर १०००० व्यक्ति केँ नदी मे डुबाओल गेल। अर्जुन भागि केँ पुनः अपन शक्ति संचय केलन्हि आर फेर वाँगक संग युद्ध शुरू केलन्हि मुदा हुनका कोनो सफलता नहि भेटलन्हि। राजाक जनानखानाक प्रधान दुश्मनक बाट रोकबाक हेतु किएन-तो-वाइनामक नदीक मार्ग अवरूद्ध कए देलन्हि तथापि चीनी दूतमण्डल हिनका लोकनि केँ पराजित केलन्हि आर अरूणाश्वक पत्नी समूह एवं पुत्रादि केँ गिरफ्त कए माल असवविसब लूटि लेलन्हि। चीनी सेना नायक उपरोक्त चेन-जेनक समक्ष ५८०टा नगर आत्म समर्पण केलक। पूर्वी भारतक राजा ची-कीउ-मो (श्री कुमार) अथवा भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक बड्ड साहायता केलथिन्ह आर हुनका लोकनि केँ घोड़ा, बड़द, अस्त्र, शस्त्र, तीर धनुष आदि बहुत रास सामान उपहार मे देलथिन्ह। चीनी सम्राटक हेतु वो एकटा भारतक मानचित्र सेहो उपहार मे देलथिन्ह। दूतमण्डल सँ वो आग्रह केलथिन्ह जे ओतए सँ वो लाओ- जेक एकटा चित्र पठा दैथ। अरूणाश्व वन्दीक रूप चीन मे रहलाह आर ओतहि हुनक मृत्यु भेलैन्ह। मात्वालिन सेहो अहि घटनाक विवरण उपस्थित कएने छथि आर हुनक विवरण उपस्थित कएने छथि आर हुनक विवरण ताँग वंशक नवका इतिहास सँ मिलैत–जुलैत अछि। मात्वालिन क अनुसार चीनी सम्राट ६४६ ई. मे मगध सम्राटक ओतए एकटा दूतमण्डल पठौने छलाह। अर्जुन अथवा अरूणाश्व केँ चीनी श्रोत मे तिरहुतक शासक मानल गेल छैक आर दुनुक बीच जे युद्ध भेलैक से कतहु अहि क्षेत्र मे भेल हेतैक। वाँग कन्नौज धरि गेल होएताह ओहि मे संदेह बुझना जाइत अछि। तिरहुतक राज्यपाल अरूणाश्व हर्षक परोक्ष भेला पर तिरहुतहिं सँ अपना केँ साम्राज्यक अधिकारी घोषित कएने होथि से संभव। चीन मे जाहिठाम अर्जुनक शव अछि ताहिठाम एकटा जे स्मारक पर लेख छैक ताहि मे लिखल छैक “तीरभुक्तिक हिन्दूराजा अरूणाश्व”। अहुँ सँ ई स्पष्ट होइछ जे अर्जुन अथवा अरूणाश्व तीरभुक्तिक शासक छलाह आर वाँगक युद्ध तीरभुक्तिक सीमे धरि सीमित रहल होएत। अहि घटनाक विवरण चीनक करीब २५ टा सँ वेसी ग्रंथ मे भेटैत आर आधुनिक शोध एवं अहि २५ सो ग्रंथक उपयुक्त अंशक अनुवादक अध्ययन सँ एतवा धरि स्पष्ट होइत अछि जे हर्षक परोक्ष भेला पर अर्जुन तीरभुक्तिक शासक छलाह। चीनी दूतमण्डल आर हुनका बीच संघर्ष भेल छल जाहि मे वो पराजित भेल छलाह आर अहि युद्धक कार्यस्थल छल गण्डकी, वाग्मती, बलान आर गंगाक बीचक भूमि। युद्धक वास्तविक स्थान कोन छल से निर्णय करब अद्यतन कठिन समस्या बनल अछि। वृज्जि क्षेत्र सँ अंगुतराय क्षेत्रक वीच ई लड़ाई भेल छल से धरि निश्चित आर वाँगक शक्तिशाली सैनिकक समक्ष जँ तत्काल छोट-पैघ सहर सब आत्मसमर्पणक देने हुए तँ अहि मे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। किछु दृष्टिदोष अथवा विचार दोष सँ ई आक्रमण भेल हुए सेहो संभव। वाँग केँ अर्जुन दुश्मन बुझि विरोध केने हेथिन्ह आर वो अखन साहायतार्थ तिब्बत पहुँचलाह तखन ओहिठामक शासक श्रोंग सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी व्यक्ति रहैथ आर विचार सँ साम्राज्यवादी सेहो। वो एहि अवसर केँ अपन साम्राज्य विस्तारक अवसरक रूप मे देखने होथि तँ कोनो आश्चर्य नहि कारण ताहि दिन मे हुनक प्रभुत्वक धाख चीन आर नेपाल धरि पसरल छलैन्ह। वाँगक माध्यम सँ वो तिब्बती प्रभाव भारत पर बढ़वे चाहैत छलाह परञ्च से संभव नहि भ सकलन्हि कारण ई युद्ध तिरहुत धरि सीमित रहि गेल आर ४०–५० वर्षक बाद ओहि विदेशीसत्ता उखारि केँ फेक देल गेल। एकर कोनो स्थायी प्रभाव भारतक इतिहास पर नहि पड़ल। अहु मे संदेह अछि जे श्रोंग स्वयं भारत पर आक्रमण केने होथि कारण श्रोंगक विजयक विवरण जाहि तिब्बती परम्परा मे सुरक्षित अछि ताहि मे कतहु भारतक नाम नहि अछि। केवल मात्वालिन अहि बातक उल्लेख केने छथि। दोसर बात जे महत्व रखैत अछि से भेल ई जे नेपाली परम्परा मे अहि घटनाक विधिवत उल्लेख कतहु नहि अवइयै। पूर्वी भारत पर हर्षक शासन ६४१ मे भेल छल। चीनी परम्परा मे अर्जुन केँ पूर्वी भारतक शासक (तीरभुक्तिक) कहल गेल छैक आर तैं संभव जे हर्षक परोक्ष भेला पर वो (पूर्वी भारत) पुनः अपना केँ कन्नौजक नियंत्रण सँ मुक्त कलेने हो आर अर्जुन गवर्नरक हिसाबे ओहि पर अपन अधिकार कलेने होथि। अहि घटनाक एत्तेक विस्तार सँ चीनी परम्परा मे वर्णन कैल गेल हो से संभव। एतवा धरि तँ निश्चित रूपे माने पड़त जे अर्जुन आर चीनी दूत वाँगक वीच खटपट अवश्य भेलैक आर अहि क्रम मे तीरभुक्ति पर आक्रमण सेहो। एकर स्थान एवं अन्यान्य बातक विश्लेषण अखन आर शोधक अपेक्षा रखइयै। हम पहिने कहि चुकल छी जे कामरूपक भास्करवर्मनक पूर्वजक समय मे बहुत रास मैथिल साम्प्रदायिक ब्राह्मण कामरूप गेल रहैथ आर ओतुका शासकक अनुग्रह प्राप्त केने रहैथ। हर्षक पूर्वहिं निर्धनपुर ताम्रलेख सँ ई ज्ञात होइछ जे वर्मन वंशक सीमा पुरैनियाक कोशी धरि छलैन्ह आर तकर पश्चिम मे तिरहुतक राज्य छल जाहि पर हर्षक अधिकार छल। जाधरि हर्ष जीवित रहलाह ताधरि कामरूपक शासक हुनक मित्र बनल रहलथिन्ह मुदा हर्षक परोक्ष भेला उत्तर भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक साहायता केने छलथिन्ह से उपरोक्त विवरण सँ स्पष्ट अछि– एकर कि कारण से नहि कहि। संभवतः अर्जुनक प्रभुत्व देखि आर तीरभुक्ति राज्यक विस्तार सँ वो घबड़ा कए चीनी दूतमण्डलक समर्थन केने होथि से संभव। दोसर बात इहो भ सकइयै जे चीनक डर सँ वो एना केने होथि। ऐहेनो बुझि पड़इयै जे जखन वाँगक आक्रमणक समय मे मौरवरी, उत्तर गुप्त आर नेपालक लिच्छवी शासकक वीच संभवतः कोनो प्रकारक समझौता भेल छल आर वो लोकनि तिब्बती साम्राज्यवादी प्रसारक विरोध मे संगठित छलाह। अदु शक्तिशाली संगठन सँ भयभीत भए भास्करवर्मन वाँगक साहायता केने होथि तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। भास्करवर्मन सेहो महत्वाकाँक्षी छलाह आर तैं हुबक आंतरिक इच्छा ई अवश्य रहल हेतैन्ह जो कामरूप राज्यक प्रसार हो। कामरूप आर मिथिलाक सीमा सेहो मिलैत जुलैत छल। हर्षक मृत्युक उपरांत वो कन्नौज सँ अपन सम्बन्ध विच्छेद कए कर्ण सुवर्ण केँ अपना राज्य मे मिला लेने छलाह आर अपन चारूकातक छोट छीन क्षेत्र सब केँ सेहो। निर्धनपुर ताम्रलेखक आधार ई कहल जा सकइयै जे वो मिथिलाक पूर्वी भागक किछु हिस्सा पर अपन अधिकार जमा लेने छलाह आर ओतहि सँ संभवतः वो वाँगक साहायता केने छलाह। ६४८ सँ ७०३ ई. धरि मिथिला पर तिब्बती आधिपत्य बनल रहल। अहि वीचक इतिहास अंधकारमय अछि। मिथिला पर बहुत दिन धरि तिब्बती प्रभाव नहि रहि सकलैक आर उत्तरगुप्त शासक लोकनि अपन परिश्रम सँ पुनः सम्पूर्ण बिहार केँ जीति अपना अधीन केलन्हि आर मिथिला केँ तिब्बती आक्रमण सँ मुक्त सेहो। कटरा (मुजफ्फरपुर) सँ प्राप्त अभिलेख (ताम्रलेख) सँ ज्ञात होइछ जे जीवगुप्त नामक कोनो व्यक्ति ओहिक्षेत्र पर शासन करैत छलाह। तिथिक अभाव मे किछु असंभव अछि मुदा अंदाजन इएह कहल जा सकइयै जे ई संभवतः उत्तरगुप्त वंशक केयो रहल हेताह आर तिब्बती आक्रमण सँ मुक्त भेला पर अहि क्षेत्रक शासनाधिकारी भेल होयताह। गुप्तवंशक परम्पराक पुनर्स्थापना मे व्यस्त जे सर्व प्रसिद्ध व्यक्ति भेलाह अहि वंशमे हुनक नाम छलैन्ह आदित्य सेन। महासेन गुप्तक शासन कालहि सँ मिथिला पर हिनका लोकनिक प्रभुत्व छलन्हि आर आदित्यसेनक समय धरि तँ उत्तरगुप्त लोकनि पूर्वी भारतक एकटा प्रसिद्ध राजवंश घोषित भचुकल छलाह। अफशड़, मंदार आर शाहपुअर सँ प्राप्त अभिलेखक आधार ई निश्चित रूपें कहल जा सकइत अछि जे आदित्यसेन समस्त विहार पर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि आर वृहत्तर मगध राज्यक संस्थापकक नाम सँ बहु चर्चित भेलाह। हुनका परममहारक-महाराजाधिराजक पदवी छलैन्ह आर वो गंगा सागर धरि अपन राज्य बढ़ा अश्वमेघ यज्ञ सेहो केने छलाह। ताँग वंशक इतिहासे सँ हमरा ई ज्ञात होइत अछि जे मिथिला आर नेपाल ७०३ धरि विदेशी नियंत्रण सँ मुक्त भगेल छल। सिल्वोलेदीक अनुसार ७०२ मे मिथिला मे उत्तर गुप्तक शासनक स्थापना एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। नेपाली अभिलेख मे सेहो आदित्य सेन केँ मगधक महत्वपूर्ण शासकक रूप मे वर्णन कैल गेल छैक। नेपालक शिवदेव मौरवरी भोगवर्मनक जमाय छलाह आर भोगवर्मन आदित्य सेनक बेटी सँ विवाह केने छलाह। एवं प्रकार तीनू राज्य एक दोसरा सँ सम्बन्धित छल। आदित्य सेनक वादो हुनका लोकनिक केँ प्रभाव बनल रहल आर जीवित गुप्त द्वितीय धरि वो लोकनिउतरापथनाथ कहबैत रहलाह। मिथिलाक इतिहास मे बुझु जे वारी-वारीक कए उत्तर भारतक सब छोट-छीन राज्य कोनो ने कोनो रूपे राज्य केलन्हि आर मिथिला मे कोनो स्थायी राज्यक स्थापना १०९४ क पूर्व नहि भसकल। उत्तर गुप्तक बाद मिथिलाक इतिहासक कि स्थिति छल से ठीक सँ हमरा लोकनि केँ ज्ञातव्य नहि अछि। उत्तरगुप्तक राज्यक अंत केलन्हि कन्नौजक यशोवर्मनक। गौड़वहीक कवि वाक्पतिक अनुसार यशोवर्मन गुप्त लोकनि केँ पराजित केलन्हि आर हिमालय प्रदेश केँ जीति अपना राज्य मे मिलौलन्हि। आर अहि क्रम मे जँ वो तिरहुत केँ जीतने होथि तँ कोनो असंभव बात नहि। कश्मीर सेहो अपन प्रभाव बढ़ा रहल छल आर पूर्व मे सेहो पूण्ड्रवर्द्धन मुक्तिक दिसि कश्मीरक प्रभाव क वृद्धि देखबा मे आवे लगैत अछि। ललितादित्य मुक्तपीड़ अहि क्षेत्र मे यशोवर्मन केँ पराजित कए अपन प्रभाव क्षेत्र बढा लेने छलाह। लामा तारनाथक अनुसार मिथिला मे चन्द्रवंशक शासन छल जकर सम्बन्ध पश्चिम मे राजा भतृहरि सँ छलैक। चन्द्रवंशक राज्य वर्मा आर पूर्वी बंगाल मे सेहो छलैक। वर्माक चन्द्रवंशक शासक लोकनि‘वेथाली’ (वैशाली) नामक एक गोट शहर बसौने छलाह। चन्द्रवंशक पछाति मिथिला मे पालवंशक स्थापना भेल छल। उत्तरपूर्वी भारतक विभिन्न प्रदेशक कोनो श्रृंखलाबद्ध एवं साधनयुक्त इतिहास नहि अछि। आर मिथिलाक अहोधरि प्रश्न अछि से तँ सर्वथा अपूर्णे अछि। लामा तारनाथ जकर वर्णन कएने छथि तकर समर्थन कोनो आन साधन सँ नहि भऽ रहल अछि तैं एकरा अखन संदिग्धे मानल जाएत। चन्द्रवंशक प्रश्न विवादास्पद अछि। जँ अहि वंशक राज्य रहलो हैत तँ पूर्वी मिथिले पर रहल होएत कारण उएह स्थान वंगक समीप अछि। किछु गोटए अहुमतक छथि जे यशोवर्मनक आक्रमणक उपरांते तिब्बती प्रभाव तीरभुक्ति क्षेत्र पर सँ घटल होएत। यशोवर्मन मालदह राजशाही आर पुर्णियाँ धरि बढ़ल छलाह आर तत्पश्चात कश्मीरक शासक सेहो “पंच गौड़” (मिथिला जकर एकटा प्रमुख अंश छल) पर अपन विजय प्राप्त केने छलाह। हियुएन-संग द्वारा वर्णित “पाँच भारत” वाद मे “पंच गौड़” क नाम सँ प्रसिद्ध भेल आर पाल काल मे अहि ‘पंच गौड़’ केँ विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त भेलैक। तारनाथक अनुसार अहि ‘पंच गौड़’ मे चन्द्रवंशक पछाति अराजकता पसरि गेल छल आर ओहि क्षेत्र मे कोनो प्रकारक राज्य नहि रहि गेल छल। चारूकात मत्सन्याय क प्रधानता छल आर कोनो व्यवस्था नहि रहि गेल छल। चन्द्रवंश (सिंह चन्द्रक पुत्र)क बलिचन्द्र केँ भंगल सँ भगा देल गेल छलैन्ह। लिच्छवीपंचभासिंह (जनिक राज्य ताहि दिन मे तिब्बत सँ त्रिलिङु आर बनारस सँ समुद्र धरि रहैन्ह) बाल चन्द्र केँ पराजित केने रहथिन्ह आर वो भंगल सँ भागि केँ तिरहुत मे आवि केँ राज्य शुरू केने छलाह। बलिचन्द्रक पुत्र विमल चन्द्र अपन पिताक पराज्यक बदला लेलन्हि आर अपन राज्यक विस्तार बंगाल आर असम धरि केलन्हि। हुनक पुत्र छलाह गोविन्द्र चन्द्र आर गोविन्द्र चन्द्रक पुत्र भेलाह ललित चन्द्र। ई दुनु गोटए सिद्धि प्राप्त कए राज्य सँ विमुख भ गेलाह आर तत्पश्चात् राज्य मे अराजका पसरि गेल आरमत्सत्यायक स्थिति उत्पन्न भेल। पाल वंश:- अहि मत्सत्यायक स्थिति सँ उबारबाक हेतु ओहिठामक लोग गोपाल नामक एक व्यक्ति केँ अपन शासक चुनलक आर उएह पाल वंशक संस्थापक भेलाह। मत्सत्याय आर अराजकताक स्थिति समाप्त कए गोपाल चन्द्रवंशक समस्त राज्य क्षेत्र व्यवस्थाक स्थापना केलन्हि आर तखन लकए (७५०–१०००) लगभग २५० वर्ष धरि समस्त पूर्वी भारत मे एक प्रकारक शांति बनल रहल। पाल युगक इतिहास भारतीय इतिहास मे महत्वपूर्ण स्थान रखइयै आर मिथिलाक इतिहासक हेतु सेहो ई काल महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। गोपाल चूंकि चन्द्रवंशक उत्तराधिकारीक रूप मे शासक भेल छलाह तैं ई अनुमान लगाएव स्वाभाविक जे वो तीरभुक्तिक शासक सेहो अवश्य रहल होयताह कारण तीरभुक्तियो पर चन्द्रवंशक शासन रहल छल। गोपालक बाद हुनक पुत्र धर्मपाल शासक भेलाह। पाल साम्राज्यक वास्तविक संस्थापक धर्मपाले छलाह अहि मे संदेह नहि। उत्तर भारत पर आर खास ककए कन्नौज पर आधिपत्य प्राप्त करबाक हेतु हुनका राष्ट्रकूट आर प्रतिहार वंश सँ युद्ध मोल लेवए पड़लन्हि जे हुनका बादो चलैत रहलैन्ह। खलीमपुर अभिलेख एवं तारनाथक विवरण सँ ज्ञात होइछ जे तिरहुत हुनक राज्यक अंतर्गत छल आर पूव मे कामरूप धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ौने छलाह। मूंगेरक समीप वो प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय केँ हरौने छलाह। राज्यक प्रसारक क्रम मे वो हिमालय धरि गेल छलाह आर वागमती नदी पर अवस्थित गोकर्ण धरि अपन राज्य केँ बढ़ौने छलाह। गोकर्ण एकटा प्रसिद्ध धार्मिक स्थल छल तैं संभव जे ओतए धरि वो धर्म करबाक हेतु गेल होथि मुदा वास्तविक कारण ई छल जे ओहि क्षेत्र मे किरातक राज्य छल आर तैं हिनका डर छलैन्ह जे किरात लोकनि तिरहुतक क्षेत्र मे किछु उत्पात मचा सकैत छथि तैं हेतु किरात लोकनि केँ पराजित करब आवश्यक छल। पशुपतिनाथ मंदित केँ उत्तर पूब मे गोकर्णक जंगल मे किरात लोकनिक केँ राजधानी छलैन्ह आर तैं वो ओतए दूर धरि जाकए किरात लोकनि केँ पराजित केलन्हि। स्वयंभु पुराण मे कहल गेल अछि जे धर्मपाल नेपालक राजगद्दी पर अधिकार प्राप्त केलन्हि। ई गप्प संभवतः गोकर्ण पर धर्मपालक आक्रमण केँ प्रमाणित करैत अछि। नेपाल पर हुनक अधिकार भेल हो अथवा नहि परञ्च किरात केँ आवश्यक छल आर धर्मपाल अहिबात केँ साम्राज्यवादी हिसाबें नीक जकाँ बुझैत छलाह। मूंगेर ताम्रलेख मे ‘गंगा समेतं बुद्धि’क जे उल्लेख अछि से गोकर्ण सँ सर्वथा भिन्न स्थान भेल आर तैं दुनु केँ मिलाएब अचित नहि बुझना जाइत अछि। मूगेर ताम्रलेखो सँ ई ज्ञात होइत अछि जे धर्मपाल हिमालयक तराई मे आक्रमण कएने छलाह। मूंगेर जे लड़ाई भेल छल ताहु मे तीरभुक्तिक योगदान रहल होएत सँ निश्चिते। धर्मपाल समस्त उत्तरी भारत मे अपन ढाख जमौने छलाह एकर प्रमाण हमरा कैकटा श्रोत सँ भेटैत अछि:- केशव प्रशस्ति, खालिमपुर अभिलेख एवं भागलपुर ताम्रलेख। गुजराती कवि सोढ़्ढ़ल अपन उदय सुन्दरी कथा मे देवपाल केँ उत्तरा पथ स्वामी कहने छथि। ‘पंच गौड़’ हुनक साम्राज्य सीमाक बोध दैत अछि। ‘पंच गौड़’शब्द केँ प्रसिद्ध केँ निहार भेलाह कल्हण जे अपन राज तरंगिणी मे एकर विवरण देने छथि मुदा एकर राजनैतिक स्वरूपक वास्तविक जन्मदाता धर्मपाले रहब हेताह जनिक साम्राज्य पंजाब सँ बंगाल आर हिमालय सँ मध्य भारत धरि पसरल छल। मिथिला नेपाल पर सेहो हुनक प्रभुत्व छल। धर्मपालक पछाति हुनक पुत्र देवपाल राजा भेलाह आर हुनक साम्राज्य हिमालय सँ विन्ध्य पर्वत धरि पसरल छल। उहो प्रतिहार राजा मिहिर भेज केँ हरौलन्हि। हुनकहि समय मे पाल साम्राज्य अपन चरमोत्कर्ष पर पहुँचल। वाचस्पति आर राजा नृग:- अहिठाम एक प्रश्न पर विचार कलेब आवश्यक बुझना जाइत अछि। स्वर्गीय महामहोपाध्याय उमेश मिश्र राजा नृगक चर्च कए एकटा समस्या उपस्थित क देने छथि जाहि लकए इतिहासकार मे विवाद हैव स्वाभाविके। ओकर नृग नामक एक राजाक नामक उल्लेख पुराण मे अछि मुदा ओहि सँ वाचस्पति कालीन नृगक तुलना नहि भसकइयै। वाचस्पति (९ म शताब्दी) अपन भामती मे नृग नामक महत्वपूर्ण राजाक उल्लेख कएने छथि। उमेश्र मिश्रक अनुसार नृग किरात लोकनिक राजाक ओतए बैसि कए लोखने छलाह। नृग वाचस्पति केँ सम्मानित केने छथिन्ह।‘नव्व-न्यायक इतिहास’क रचयिता अहि नृग केँ बंगालक आदिसूर सँ मिलबैत छथि। अहिठाम स्मरणीय जे वाचस्पति अपन न्याय कणिका मे सेहो आदिसूरक फरा केँ वर्णन कएने छथि। नृगक सम्बन्ध मे वाचस्पति अपन भामती क अंत मे लिखैत छथि– “ नृपांतराणां मनसाप्यगम्यां भूक्षेपमात्रेण चकार कीर्तिम् , कार्त्तस्वरासारसुपूरितार्थ सार्थः स्वयं शास्त्रविचक्षणश्च, नरेश्वरा यच्चरितानुकारमिच्छंति कर्त्तुं नच पारयंति तस्मिन्महीये महनीय कीर्तौ श्रीमन्नृगेडकारि मया निबन्धः॥ दोसर स्थान पर एवं प्रकारे वर्णन अछि– “नचायापि न दृश्यंते लीलामात्र विनिर्मितानि महाप्रसाद प्रमदवनानि श्रीमन्नृगनरेन्द्राणाम न्येशां मनसापि दुष्करानि नरेश्वराणाम्”॥ ‘नृग’क ‘महीप’ एवं नरेन्द्र कहल गेल छन्हि आर अहि सँ ई अनुमान लगाओल जाइत अछि जे वो मिथिलाक कोन भाग मे ताहि दिन मे राज्य करैत हेताह। ‘नृग’आर “आदिसूर” दुनु दु व्यक्ति छलाह अहि मे सेहो कोनो सन्देह नहि। ‘नृग’ किरात लोकनिक शासक होथि से संभव कारण ताहि दिन मे किरात आर पाल लोकनिक वीच बरोबरि खटपट होइत रहैन्ह आर एकर उल्लेख हम धर्मपालक समय मे क आएल छी। आदिसूर पूर्वी मिथिलाक शासक छलाह जकर सीमा बंगाल सँ मिलैत छल आर वाचस्पति सन विद्वान केँ दुनु राजाक दरबार सँ सम्बन्ध हैव कोनो आश्चर्यक विषय नहि। नृग सँ ‘नरवाहन’क बोध सेहो होइयै आर किरात लोकनिक बीच ई वेश प्रचलित छल– अहु किरात लोकनि क्षेत्र मिथिलाक उत्तरी पूर्वी भाग मे छल। ’नृग’ एकटा समस्या मूलक नाम भगेल अछि अहिठाम अमलानंद सरस्वती अपन भामतीक हीरा वेदांत कल्पतरू मे लिखने छथि– “तथाविधःसार्थोयस्यप्रक्रतत्वेनवर्त्ततेस नृगस्तथेत्यपरः। नृग इति राज्ञ आख्या. . .” ‘नृग’ एकटा परम्पराक द्धोतक सेहो मानल गेल छथि आर वो परम्परा भेल दयालु हैव। दानी हेव आर सब तरहें परोपकारी हैव। अहि परम्पराक एकटा उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखो मे अछि– ___ “ भूमि प्रदानान्न परं प्रदानं दानाद्विशिष्टं परिपालनञ्च। सर्वेडतिसृष्टा परिपाल्य भूमिं नृपा नृगाधास्त्रिदियं प्रपन्नाः॥ अहि अभिलेख मे महाराज्य संक्षोभ्यक तुलना परम्परागत दानी नृग सँ कैल गेल अछि। अमलानंद सरस्वती सेहो अपन टीका मे ताहिकालक शासकक तुलना राजा नृग सँ करबाक चेष्टा कएने छथि। जेना कि हम उपर कहि चुकल छी राजा नृग पौराणिक राजा नृगक संकेत मात्र छथि आर वो दान शीलता आर जनप्रियताक हेतु प्रसिद्ध छथि। १४ शताब्दीक सारंग धरक रचना मे सेहो नृगक उल्लेख भेटइयै। अहुठाम परम्परागत रूपे मे। उपेन्द्र ठाकुर सब तथ्यक परीक्षण केला उत्तर ई निर्णय दैत छथि जे ‘नृग’ शब्द सँ अहिठाम पाल राजा देवपालक तुलना कैल गेल अछि आर वाचस्पति अपन भामती मे देवपाल केँ नृग कहलन्हि अछि। तिथि सम्बन्धी जे झंझटि अछि ताहि संदर्भ मे अखन अहुमत केँ संदिग्धे कहल जाएत। उमेश मिश्रक अनुसार नृग कर्नाट सँ आदि मिथिला मे राज्य स्थापित केने छलाह परञ्च ई मत तर्कपूर्ण नहि अछि कियैक नान्यदेव सँ पूर्व एकर कोनो प्रमाण नहि भेटइयै। हमरा बुझने ‘नृग’ आर आदिसूर दुनु दुव्यक्ति छलाह आर मिथिला प्रांतक उत्तरी पूर्वी एव पूर्वी भागक क्रमशः शासक छलाह। वाकह्स्पतिक समय धरि मिथिला आर उत्तर भारत मे सामंतवादी प्रथाक विकास भचुकल छल आर अभिलेख,साहित्य एवं विदेशी यात्रीक विवरण अहिबात केँ पुष्ट करैत अछि। पालवंशक स्थापना संगहि उत्तर पूर्वी भारत मे एकटा स्थायित्व एलैक आर पाल साम्राज्यक विस्तार सँ नेपाल धरिक क्षेत्र तक एकटा सुव्यवस्थित राज्यक स्थापना भेलैक। ताहि दिन मे आवागमन एवं यातायातक सुविधाक अभाव रहलाक कारणे ई शासक लोकनि विभिन्न क्षेत्र केँ जीति केँ ओहिठाम अधिकारी केँ सुपुर्द करैत छलाह आर हुनका सामंतक स्थिति मे राखि अपन शासन सुव्यवस्था केँ चलबैत छलाह। जँ वाचस्पति मिश्र देवपालक ओतए अपनभामती ग्रंथ लिखतैथ तँ वो देवपालक नामक स्थान पर ‘नृग’क नाम कियैक लिखतैथ? देवपाल अपने बड्ड पैघ लोक छलाह आर वाचस्पति सन विद्वानक हाथे अपन नाम उल्लिखित करेबा मे अपना केँ गौरवांवित बुझितैथ। वाचस्पतियो के अहि मे कोनो आपत्ति नहि होइतैन्ह कारण देवपालक शासन धरि एकटा व्यवस्थित व्यवस्थाक स्थापना भचुकल छल। दोसर बात ईहो जे वाचस्पति जहिना आदिसूरक नामक उल्लेख केने छथि ठीक तहिना नृगक नाम। तैं ई माने पड़त जे ई दुनु व्यक्ति अलग अलग राजा छलाह आर दुनुक दरबार मे रहि केँ वो दुनु ग्रंथक निर्माण केने छलाह। प्रथम किरात सामंत छलाह आर दोसर पूर्वी मिथिलाक सामंत– जे दुनु पालेक अंतर्गत हेताह। जाधरि आर साधन उपलब्ध नहि होइयै ताधरि नृगक समस्या अहिना बनल रहत। नृग राजा सहरसा जिलांतर्गत बड़गामक रहनिहार छलाह। एहनो एकटा मत अछि। देवपालक बाद पाल साम्राज्यक स्थिति मे डावाँडोल शुरू भेल आर चारूकात सँ पुनः आक्रमण–प्रत्याक्रमण होमए लागल। नारायण–पालक भागलपुर अभिलेख सँ ई ज्ञात होइत अछि जे तीरभुक्तिक कक्ष विषय (जकर तुलना कौशिकी कक्ष सँ कैल जा सकइयै) मे पाल शासक पशुपताचार्य परिषद एवं शिवभद्दारक लोकनिक हेतु किछु दान देने छलाह। ८६६ ई. क आसपास राष्ट्रकूट शासक अमोधवर्ष अंग, वंग आर मगध धरि अपन अधिकार बढ़ा लेने छलाह। कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूटक समक्ष सैह स्थिति छल। ओम्हर सँ प्रतिहार भोज आर महेन्द्रपाल सेहो पाल साम्राज्यक सीमा मे अपन अधिकार बढ़ा चुकल छलाह। प्रतिहार लोकनि तिरहुत धरि अपन अधिकार बढ़ौने छलाह। महेन्द्रपाल प्रतिहार तँ बंगाल मे पहाड़पुर धरि पहुँचि गेल छलाह। पाल साम्राज्य बिहारक किछु भाग धरि सीमित रहि गेल छल। मिथिला पाल–प्रतिहार साम्राज्यक वीच मे बत्तीस दाँतक वीच मे जीभक स्थिति मे छल कखनो प्रतिहार लोकनि बढ़ैथ आर कखनो पाल लोकनि। अहि काल मिथिलाक कोनो प्रामाणिक इतिहास भेटतो नहि अछि आर हम देखैत इएह छी जे पश्चिम आर पूब दुनु दिसि सँ जे आक्रमण होइत छल, मिथिला ओकर शिकार भजाइत छल। पाल लोकनि कोनो रूपें अपन अस्तित्व केँ ढ़ौने जाइत छलाह अहि मे संदेह नहि यद्धपि हुनक प्रभुत्व बहुत घटि गेल छलैन्ह। ९५३–५४ ई. मे जेजामुक्तिक चन्देल लोकनि मिथिला पर आक्रमण केलन्हि। यशोवर्मन आर हुनक पुत्र धंग मिथिला पर आक्रमण केलन्हि आर गुर्जर प्रतिहारक निमंत्रण सँ ओकरा मुक्त कए अपना अधीन मे केलन्हि मुदा वो लोकनि बहुत दिन धरि अहि क्षेत्र पर राज्य नहि क सकलाह। चन्देल आक्रमण सँ समस्त उत्तरी भारत पराजित भेल आर आक्रान्त सेहो आर पाल साम्राज्य केँ अहि सँ वेस धक्का लगलैक। अहि सँ पूर्वहिं प्रतिहार आर राष्ट्रकूट लोकनिक आक्रमण सँ पाल साम्राज्य शिथिल भइयै चुकल छल आर चन्देल आक्रमण ओकरा आर तहस नहस क देलकै। नवम–दशम शताब्दी मे गण्डक आर शोण नदी सब प्रतिहार आर पाल राज्यक सीमा छलैक। चन्देलक प्रभाव पूर्णियाँ धरि पसरल छल आर ओहि काल मे चारूकात अस्तव्यस्तता बढ़ि गेल छल। महिपाल प्रथम एक वेर पुनः पाल साम्राज्य केँ श्रृंखलाबद्ध करबाक प्रयास केलन्हि आर पाल साम्राज्य फेर संगठित भए अपना पैर पर ठाढ़ भेल। महिपाल प्रथमक अभिलेख मुजफ्फरपुर जिलाक इमादपुर गाम मे भेटल अछि आर अहि सँ ई सिद्ध होइत अछि जे महिपाल उत्तर आर दक्षिण दुनु बिहारक शासक छलाह। हुनक राज्यक सीमा बनारस धरि छलैन्ह। परञ्च हुनको शासन काल सुखद एवं शांतिपूर्ण नहि रहलाह। विभिन्न साधन ई ज्ञात होइछ जेचेदि–कलचुरी लोकनि सेहो मिथिला पर अपन जाल फेरने छलाह आर हाथ पैर पसारने छलाह। महिपाल आर कलव्हुरी मे संघर्ष भेल छलैन्ह अथवा नहि से ज्ञातव्य नहि अछि तखन एतवा जरूर अछि ११ म शताब्दी मे चोल लोकनिक संग दक्षिण सँ बहुत रास कर्णाट लोकनि एम्हर आवि केँ बैसि गेल छलाह।प्राकृतपैगलमु सँ सेहो ज्ञात होइत अछि जे ताहि दिन मे चम्पारण बाटे सेहो ओम्हर गोरखपुर दिसि किछु आक्रमन भेल छल। मिथिलाक इतिहासक कोनो स्पष्ट तस्वीर हमरा लोकनिक केँ अहि युगक उपलब्ध नहि होइत अछि। पाल लोकनि येन केन प्रकारेण अपन अस्तित्व बनौने रखलन्हि आर विहार–बंगालक विभिन्न भाग पर छिटपुट ढ़ंगे शासन करैत रहलाह। नौलागढ़ आर वनगाँव सँ जे विग्रटपाल तृतीयक अभिलेख भेटत अछि ताहि सँ ई स्पष्ट होइछ जे पाल लोकनि अपन अंतिम काल मे तीरभुक्ति मे अपना केँ बचौलन्हि कारण ताहि दिन मे कलचुरी कर्णक आक्रमण सँ बंगाल अक्रांत छल और विग्राटपाल तृतीय आर कलचुरीक वीच जे मनमुटाव चल अवैत छल तकरा अतीश दीपंकरक प्रयासे मेटाओल गेल आर दुनुक वीच एकटा वैवाहिक संधि भेल। विग्रटपाल तृतीय यौवनश्री सँ विवाह केलन्हि आर हुनका दुनुक वीच जे संधि भेलन्हि तकरा दुनुक वीच जे संधि भेलन्हि तकरा कपाल संधि कहल गेल अछि। नौलागढ़ आर वनगामक अभिलेख केँ देखला सँ ई प्रतीत होइछ जे मिथिला कलचुरीक आक्रमण सँ वचल छल आर मिथिला पर पास लोकनिक शासन चल अवैत छल। अपन ह्रासकाल मे पाल लोकनि तीरभुक्ति केँ अपन ओहिठाम सँ शासन केनाई प्रारंभ केलन्हि। विग्रटपाल तृतीयक समय मे पालवंशक सूर्यास्त भरहल छलैक। प्राकृत पैगलम् आर अन्य साधन सब सँ ई ज्ञात होइछ जे गण्डक क्षेत्र धरि कलचुरी वंशक लोक अपन प्रभुत्व ब बढ़ा लेने छलाह। पाल लोकनि सँ हुनक संघर्ष बढ़ि रहल छलैन्ह। संध्या कर नन्दीक ‘राम चरित’ मे ताहि दिनक राजनैतिक स्थितिक बढ़िया विवरण अछि। नेपालक हस्तलिखित पोथी मे रामायणक एक गोट पोथी उपलब्ध भेल अछि जकरा अनुसार संवत १०७६ मे तीरभुक्ति मे एकटा सोमवंशोद्भव महाराजाधिराज गाँगेयदेवक शासन छल। ओहि रामायणक किष्किन्धा काण्ड केँ अंत मे लिखल अछि–“सम्वत् १०७६ आषाढ़ वदी४ महाराजाधिराज पुण्यावलोक सोमवंशोद्भव गौड़ध्वज श्रीमद् गांगेयदेव भुज्यमान तीरभुक्तौ कल्याण विजयराज्ये नेपाल देशीय श्री भंक्षुशालिक श्री आनन्दास्य पाटकावस्थित (कायस्थ) पंडित श्रीकुरस्यात्मज गोपतिमा लेखिदम्”–१९४० मे एकर दोसर प्रति भेटलैक जाहि मे “गौड़ध्वज”क स्थान पर “गरूड़ध्वज” छैक। अहि पुष्पिकाक अध्ययन असँ मिथिलाक इतिहासक वस्तुस्थिति पर विद्वानक वीच पूर्ण मतभेद छन्हि। किछु गोटए एकरा कलचुरी गांगेयदेव मनैत छथि आर किछु गोटए कर्णाट गांगेयदेव। हमरा बुझने ई कर्णाट गांगेयदेव छलाह। एकर कारण ई अछि जे मिथिला मे अद्यावधि कलचुरी शासनक प्रमाण उपलब्ध नहि दोसर बात ई जे कलचुरी शासकक संग विग्रटपाल तृतीय कपाल संधि आर वैवाहिक संधि कए अपन अस्तित्व केँ सुरक्षित रखने छलाह। तेसर बात ई जे कोनो उल्लेख नहि पाओल जाइत अछि आर ने अप्रत्यक्षे रूप सँ एकर कोनो विवरण कलचुरी साधन मे भेटइयै। चारिमबात ई जे महिपालक ४८म वर्ष धरि तिरहुत हुनका अधीन मे छलैन्ह तखन ओहिठाम गांगेयदेव कलचुरीक राज्य कोना भसकइयै। महिपालक बादो रामपाल धरि मिथिला मे पालवंशक राज्य बनल रहल आर पालवंशक अंत भेला पर कर्णाट लोकनिक शासन प्रारंभ भगेल। मिथिलाक समस्त क्षेत्र मे पालकालीन अवशेष भेटैत अछि जखन कि एम्हर कलचुरीक कोनोटा अवशेष मिथिला मे नहि भेटैछ। अहि प्रश्न पर विस्तृत रूपें विचार हमरा लोकनि कर्णाट कालक अध्ययन क्रम मे करब। जखन पालवंशक सूर्यास्त भरहल छल तखन दक्षिणक षष्ठम विक्रमादित्य उत्तर मे अपन भाग्य अजमेबाक हेतु आगाँ बढ़ि रहल छलाह। अध्याय–7 कर्णाटवंशक इतिहास (१६४ सँ २०८) ग्यारम शताब्दीक अंतिम चरण मे मिथिलाक अबस्था अत्यंत दयनीय आर सोचनीय भगेल छल कारण अहिठाम कोनो प्रकारक केन्द्रीय सत्ता नहि रहि गेल छल आर चारूकात सँ महत्वाकाँक्षी शासक लोकनि अहि पर अपन गिद्ध-दृष्टि लगौने छलाह। पाल लोकनिक शासन डगमगा गेल छल। कलचुरी लोकनि पश्चिम सँ हिनका सबके ठेलैत–ठेलैत मिथिलाक एक कोन मे पहुँचा देने छल। १०७७ एवं १०७९ क वीच कलचुरी शोढ़देव गण्डकी मे स्नान कए दान कएने छलाह तकर प्रमाण एकटा शिलालेख सँ भेटैत अछि। अहि सँ ई नहि बुझबाक अछि जे कलचुरी लोकनिक शासन स्थायी रूपे मिथिला पर छ्ल। अहि सँ तात्पर्य एतवे बहराइत अछि जे मिथिलाक दुर्मल राजनैतिक स्थिति सँ लाभ उठाकए विभिन्न राज्य अहि पर अपन सत्ता स्थापित करए चाहैत छलाह। सन्ध्या कर नन्दीक रामचरित मे तत्कालीन राजनीतिक विशद विश्लेषण अछि आर ओहि सँ इहो ज्ञात होइछ जे विग्रटपाल तृतीय कर्न केँ हरौने छलाह। हुनक नौलागढ़ आर बनगामक शिलालेखक उल्लेख हम पूर्वहि कचुकल छी। पाल लोकनि सेहो अहिकाल मे सबठाम सँ सिकुरि केँ मिथिले मे आवि गेल छलाह। कुब्जिकामतम्क एकटा तालपत्र पोथी मे ई लिखल अछि जे रामपालदेव नेपालक शासक जाहि सँ स्पष्ट होइछ जे विग्रटपाल तृतीय सँ रामपाल धरि मिथिला आर नेपाल पाल साम्राज्यक मुख्य केन्द्र छल। एहि अनिश्चित स्थिति सँ जखन सब दिशक महत्वाकाँक्षी शासक लाभांवित होइत छलाह तखन दक्षिणक महत्वाकाँक्षी लोकनि कियैक मुँह तकैत रहितैथ? हमरा लोकनि केँ विल्हणक विक्रमाँकदेव चरित सँ ज्ञात होइछ जे चालुक्य सोमेश्वर (१०४०–१०६९) मालवाक परमारक राजधानी धार केँ जीतलैन्ह आर भोजक भोज केँ ओतए सँ पगार पड़लन्हि आर डाहलक राजा कलचुरि कर्णक शक्ति केँ सेहो नष्ट केलन्हि। हुनक पुत्र विक्रमादित्य षष्ठम अपन बापो सँ एक डेग आगाँ बढ़लाह आर गौड़ कामरूप पर दूवेर विजय प्राप्त केलन्हि। बाप–बेटाक लगातार उत्तर भारतीय विजयक फलस्वरूप उत्तर विहार, बंगाल आर कन्नौजक राजनीति मे क्रांतिकारी परिवर्तन भेल। वो लोकनि नेपाल धरि आक्रमण केने छलाह। विक्रमादित्य षष्ठमक पुत्र सोमेश्वर तृतीय अपन एक शिलालेख मे कहने छथि जे आन्ध्र, दर्विङ, मगध आर नेपालक शासक लोकनि हुनका पैर पर अपन माथ टेकने छलाह। ___ चालुक्य आक्रमण अहि बात केँ सिद्ध करइयै जे उत्तर भारत मे ताधरि परमार आर कलचुरि वंशक पतन प्रारंभ भगेल होएत। जँ से नहि होएत तँ एहि वेर चालुक्य लोकनि आन्हर विहाड़ि जँका समस्त उत्तर भारत एवं नेपाल केँ कोनो आक्रांत केने रहितैथ? विरोधक संभावना नहि रहला संता वो लोकनि प्रोत्साहित भए अहि सब क्षेत्र पर अपन प्रभुत्व जमौने हेताह। हिनकहि सब संग दक्षिण सँ बहुत रास कर्णाट सेनापति लोकनि उत्तर भारत मे मिथिला नेपाल मे कर्णाट नान्यदेवक, बंगाल विजय सेनक आर कन्नौज मे चन्द्रदेव गढ़वालक उत्थान संभव भेल। गढ़वाल लोकनि बढ़ैत–बढ़ैत गंगाक दक्षिण मे मूंगेर धरि पहुँच चुकल छलाह। कर्णाट लोकनिक उत्पत्ति:- जनक वंशक परोक्ष भेला पर मिथिलाक अपन कोनो राजवंशक राज्य मिथिला मे नहि भेल छलैक। १०९७ मे मिथिला मे कर्णाट वंशक स्थापना ताहि हिसाबे एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल जा जासकइयै। मुदा ई कर्णाट लोकनि केँ छलाह आर कोना मिथिला मे आवि केँ बसलाह आर शासक भेलाह से पूर्ण रूपेण अखनो धरि ज्ञात नहि अछि आर हमरा लोकनि निश्चित रूपे ई नहि कहि सकैछी जे कर्णाट लोकनि अमूक वा अमूक छलाह। जेना कि हम पहिने देखि चुकल छी कि ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरण मे मिथिला, कन्नौज आर बंगाल मे करीब करीब एक्के समय तीनटा स्वतंत्र राज्यक स्थापना भेल छल आर वो तीनू राज्य तत्कालीन राजनीति मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा केने छल। मिथिलाक व्यक्तित्वक पूर्ण विकास अहिवंशक शासन काल मे भेल आर ताहिये सँ मिथिलाक प्रसिद्धि बढ़लैक। कर्णाट लोकनि अपना केँ कर्णाट क्षत्रिय कहित छलाह। सेनवंश शासक सेहो अपना के कर्णाट क्षत्रिय कहैत छलाह। हिनका लोकनिक सम्बन्ध मे विद्वानक वीच मे पूर्न मतभेद अछि। ई लोकनि कर्णाट छलाह एतवा धरि निश्चित अछि कारण नान्यदेव अपना केँ कर्णाट कुल भूषण कहने छथि आर सामंत सेन अपना केँ कर्नाट क्षत्रियक कुल शिरोमणि। हेमचन्द्र राय चौधरीक मत छन्हि जे देवपालक मूंगेर ताम्रलेख मे जाहि कर्णाट लोकनिक उल्लेख अछि सम्भवतः उएह कर्णाट लोकनि बाद मे चलिके अलग–अलग राज्यक स्थापना केलन्हि। अहिमतक समर्थन केनिहार एक गोटएक कथन ई अछि जे जखन मगध – मिथिला मे पालवंशक ह्रास प्रारंभ भेल तखन उएह कर्णाट लोकनि (जे अखन धरि अहि क्षेत्र मे चुप्पी साधने छलाह) ओहि स्थिति सँ लाभ उठाके विस्तार केलन्हि आर कर्णाट सत्ताक स्थापना सेहो। एकमत इहो अछि जे राजेन्द्र चोलक आक्रमणक समय मे बहुत रास कर्णाट सैनिक एम्हर आएल छलाह आर राजेन्द्र चोलक घुरि जेबाक वाद अहिठाम रहि गेलाह आर एम्हुरका राजनीति मे सक्रिय भाग लेवए लगलाह। राजेन्द्र चोल अपना गंगाईकोण्ड सेहो कहने छथि जाहि सँ प्रमाणित होइछ जे विजयामियानक क्रम मे ई गंगा धरि आएल छलाह। परंतु सब साधनक सामान्य अध्ययन केला उत्तर ई प्रतीत होइछ जे राजेन्द्र चोलक अभियानक विशेष प्रभाव तत्कालीन उत्तर भारतक राजनीति पर नहि पड़ल छल। तैं ई कहब जे हुनका संगे आएल कर्णाट लोकनि एतए वसलाह से वैज्ञानिक केँ नहि बुझि पड़इयै। देवपाल सँ मदनपाल धरि जतवा जे पाल अभिलेख अछि ताहि सब मे गौड़, मालव, खस, हूण, कुलिक, कर्णाट, लाड़, चाट, भाट, आदि शब्दक मात्र औपचारिक व्यवहार अछि आर अहि शब्द सँ मिथिला अथवा बंगालक कर्णाट केँ जोड़ब समीचीन नहि बुझइत अछि। कर्णाट शासक लोकनि कर्णाट सँ आवि मिथिला मे बसल छलाह ई सर्व सम्मति सँ स्वीकृत अछि–विवाद एतवे अछि जे वो लोकनि कखन, कहिआ आर कोना एतए आवि के रहलाह आर कोन रूपे सत्ता हथिऔलन्हि। नेपाली परम्परा आर वंशावलि मे सेहो मिथिलाक नान्यदेवक वंश केँ कर्णाट क्षत्रिय कहल गेल छैक। तान्यदेव भरतक नाट्यशास्त्र पर एकटा टीका लिखने छलाह जे सर्व प्रसिद्ध अछि आर ओहिक्रम मे वो अपना सम्बन्ध मे निम्नलिखित पदवी सबहिक प्रयोग कएने छथि–नान्यपति, नान्य, महासामंताधिपति धर्मावलोक, धर्माधारभूपतिस, मिथिलेश, एवं कर्णाटकुल भूषण। नान्य शब्दक व्यवहार हमरा लोकनि अन्हराठाढ़ी अभिलेख मे सेहो भेटैत अछि। नान्य शब्दक उत्पत्ति द्रविड़ शब्द ‘नन्नीय’ सँ भेल अछि। नान्यदेव अपन टीका मे जतवा देशी रागक उल्लेख केने छथि से सब कर्णाट शैलीक राग थिक आर ओहु सँ ई सिद्ध होइत अछि जे नान्यदेव कर्णाटक सँ हुनक सम्बन्ध कोनो ने कोनो रूपे अवश्य रहल हेतन्हि। चाहे कारण जे भी रहल हो, एतवा धरि निश्चित अछि जे ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरण मे कर्णाट लोकनि उत्तर भारतक राजनीति मे सक्रिय रूप सँ भाग लेमए लागल छलाह। एक मत इहो अछि जे कलचुरि गांगेयदेवक संग जे कर्णाट लोकनि सैनिकक रूप मे एतए आएल छलाह उएह एक बाद मे चलि केँ शासक भगेलाह परञ्च इहो मत नेऽ सर्वमान्य भसकइयै। अहिठाम केवल एतवे स्मरण राखब आवश्यक अछि जे जँ गांगेय देवक आक्रमण मिथिला पर भेवे कैल होन्हि तँ से नान्यदेवक प्रादूर्भाव सँ ६०–७० वर्ष पूर्वे भेल हेतैन्ह आर ओहना स्थिति हुनक (गांगेयदेव) सैनिक मिथिला पर अधिपत्य स्थापित केने हेथिन्ह से संभव नहि बुझाइत अछि। तैं अहि तर्क केँ मानब असंभव। रामकृष्ण कविक अनुसार राष्ट्रकूट लोकनि सेहो कर्नाट कहबैत छलाह आर जखन दक्षिण मे हुनक अवसान समीप एलन्हि तखन वो लोकनि ओहिठाम सँ हँटि उत्तर दिसि बढ़लाह आर कन्नौज, मिथिला आर बंगाल मे अपन शासन स्थापित केलन्हि। अहि कथनक कोनो शुद्ध ऐतिहासिक अथवा परम्परागत आधार नहि अछि। राष्ट्रकूट इतिहासक मर्मज्ञ स्वर्गीय सदाशिव अनंत अल्तेकर सँ हम अहि सम्बन्ध जखन विचार विमर्श कैल तखन वो कहने छलाह जे मिथिला मे कहियो कोनो रूपे राष्ट्रकूट लोकनिक शासन नेऽ छल आर नेऽ ओकर कोनो प्रमाणे अछि। तैं राष्ट्रकूट केँ अहिठाम कर्णाट सँ मिलाएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। सुप्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान सिल्वाँलेवीक अनुसार मिथिला मे कर्णाट वंशक उत्पत्तिक सम्बन्ध सोमेश्वर चालुक्य एवं ओकर वंशजक उत्तर भारत पर आक्रमण सँ छैक आर इएह सब सँ समीचीन तर्क बुझियो पड़ैत अछि। विल्हणक विक्रमाँक देव चरित मे अहि आक्रमणक विवरण भेटइयै आर पिता–पुत्र–पौत्रक अभियानक समय सेहो एहन अछि जे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक स्थिति सँ मिलैत–जुलैत अछि।अहि आक्रमणक फलस्वरूपे बहुत रास कर्णाट वीर, सैनिक एवं सामान्य लोक सब एम्हर आवि केँ मिथिला, मगध, वंग, कन्नौज आदि स्थान मे वसि गेल छलाह अहि आक्रमणक फले उत्तर भारतक परमार आर कलचुरि राजवंशक पराभव सेहो भेल छल। सोमेश्वरकचण्डकौशिक मे एकटा कथा अछि जाहि सँ भान (ज्ञात) होइछ जे पालवंश महिपाल कोनो कर्णाटराज केँ हरौने छलाह– ____ “ य संश्रित्य प्रकृति गहनामार्य्या चाणक्यनीति हत्वानंदान् कुसुमनगरं चन्द्रगुप्तो जिणाय कर्णाटत्वं धुवमुपगतानत्व तानेव हंतुं दादैपोघः स पुनरभवत् श्री महीपाल देवः ”॥ आव ई कर्णाट राज के छलाह से अखुनका स्थिति मे कहब कठिन। संभवतः कर्णाट केन्दु विक्रमादित्य षष्ठम गौड़ पर आक्रमण केने होथि। विक्रमादित्यक नागपुर प्रशस्ति सँ त एतवा स्पष्ट अछि जे कर्णाट लोकनिक सम्पर्क चेदिराज कर्ण सँ सेहो छलैन्ह आर वो हिनके लोकनिक मदति सँ मालवा केँ पराजित केने छलाह। मुदा ई कहब अहि सहयोगक फले मिथिला मे कर्णाट नान्यदेव केँ राज्य स्थापित करबा मे सुविधा भेलैन्ह से तर्क संगत नहि बुझि पड़इयै कारण अहि दुनु घटना मे तिथिक जे अंतर अछि से ततेक व्यापक जे दुनु केँ जोड़ब असंभव। सोमेश्वर एवं विक्रमादित्य षष्ठमक आक्रमणक फले जे कर्णाट सैनिक एवं सेनापति लोकनि एमहर एलहि सैह राज्यक स्थापना मे समर्थ भेल छलाह कारण एम्हर आएल सेनापति लोकनि एमुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाएब अचित बुझलैन्ह कारण एम्हर रहबा मे दुनु हाथ मे लड्डुये–लड्डु छल। सेन वंशक संस्थापक अपना केँ कर्णाट कुल लक्ष्मीक संरक्षक कहने छथि। विक्रमादित्य षष्ठम आर सोमेश्वर तृतीय अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह। एकर बाद सँ विभिन्न भारतीय राजा लोकनि नेपाल पर अपन प्रभाव बढ़ेबाक प्रयास केलन्हि। पाल लोकनि जखन कलचुरिक संग लटपटाएल छलाह तखने चालुक्य लोकनिक आक्रमण केँ फले उत्तर भारतक कैक स्थान पर कर्णाट लोकनि पसरि चुकल छलाह आर ओहिठामक राजनीति मे हस्तक्षेप करब शुरू कदेने छलाह। अहि तथ्यक प्रमाण हमरा विक्रमाँकदेव चरित सँ भेटित अछि। १०५३ ई. क आसपास सँ चालुक्य लोकनि एम्हर सक्रिय रूपें हुलकी–बुलकी देमए लागल छलाह। १०५३ क केलावाड़ी अभिलेख सँ ई ज्ञात होइछ जे सेनानायक भोगरस वंग केँ जीति लेने छलाह। ई सोमेश्वर प्रथमक सेनानायक छलाह। चालुक्यक एकटा सामंत, जकर नाम आच छलैक, सेहो विक्रमादित्य षष्ठमक समय मे वंग धरि आक्रमण केने छलाह। अहि दुनु घटना सँ ई स्पष्ट भजाइत अछि जे हिनके लोकनिक संग आएल सेनापति, सेनानायक, सामन्त, सिपाही आदि व्यक्ति एम्हुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाइजाएत गेलाह। नान्य अथवा हुनक पूर्वज एहने एकटा सामंत–सेनापति रहल हेताह जे नेपालक तलहट्टी मिथिला केँ उपयुक्त बुझि ओहिठाम वसि गेल हेताह आर चालुक्य वंश क वापस भेलाह अपन स्वतंत्र सत्ता घोषित कए मिथिला आर नेपालक शासक बनि गेल हेताह। शासक भेला उत्तरो वो अपना केँ महा सामंताधिपति कहिते रहलाह से अहिबातक द्धोतक थिक जे राजा हेवाक पूर्व हुनक कि स्थिति छल। नान्यदेव (१०९७–११४७):- हम उपर देखि चुकल छी जे चालुक्य आक्रमणक समय सँ चालुक्य सेनाक विशेष भाग मिथिला आर बंगाल मे वसि गेल छल। नान्यदेव मिथिला मे कर्णाट वंशक संस्थापक भेलाह। अहिठाम ई स्मरण राखब आवश्यक जे अहि वंशक तत्वावधान मे समस्त पूर्वी भारत मिथिले एक गोट एहेन राज्य छल जाहिठाम २२७ वर्ष धरि (१०९७–११४७) मुसलमान लोकनिक कोनो राजनीतिक एवं साँस्कृतिक दृष्टिकोण सँ नान्यदेवक शासन काल तँ महत्वपूर्ण अछिये परञ्च कर्णाटवंशक शासन केँ स्वर्णयुग कहल गेल छैक कियैक तँ अहि युग मे मिथिला मे लगभग १४००–१५०० वर्षक वाद स्वतंत्र संगठित राज्य एवं शासन प्रणालीक स्थापना भेलैक आर कला, साहित्यक संगहि संग मैथिली भाषाक विकास सेहो भेलैक। नान्यदेव अपन दीर्घ राजकाल मे पाल, कलचुरि, सेन आर गढ़वालक पारस्परिक संघर्षक मध्य अपन दूरदर्शिता, नीतिकुशलता, एवं वीरता सँ अपन राज्यक स्थापना केलन्हि आर उत्तरोत्तर ओकरा शक्तिशाली बनौलन्हि। वो अपना वंशक संस्थापक संगहि संग एकटा सर्वश्रेष्ठ शासक सेहो छलाह जनिक स्थान तत्कालीन भारतीय राजा सबहिक मध्य महत्वपूर्ण छल। नान्यदेव १०९७ ई. मे सिमरौनगढ़ मे राजगद्दी पर वैसलाह आर कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि। निम्नलिखित श्लोक सँ उपरोक्त तिथिक मान होइयै आर कहल गेल अछि जे ई लेख सिमरौनगढ़ (जे सम्प्रति नेपाल मे अछि) सँ प्राप्त भेल अछि। “ नन्देन्दु विन्दु विधु समितशाकवर्षे सच्छ्रविणे सितदले मुनिसिद्धितिथ्याम्। स्वा(ती) तौ शनैश्चर दिन करिवैर लग्ने श्री नान्यदेव नृपतिर्व्यदधीत वास्तुम्” शक् १०९७ (=१०९७ ई.)क स्वाती नक्षत्र मे शनि दिन(श्रावण सप्तमी) केँ नान्यदेव राजा भेला–याने मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि। १६२७ ई. भतगाँवक राजा जगज्योतिमल्ल रचित मुदितकुवलयाश्व सँ सेहो ज्ञात होइछ जे नान्यदेवक १७ जुलाई १०९७ केँ मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि। मिथिला राज्यक स्थापनाक क्रम मे नान्यदेवक स्थान सर्वप्रथम छन्हि आर तकर प्रमाण हमरा नेपालक परम्परा एवं वंशावली आर शिलालेख सँ भेटैत अछि। प्रतापमल्लक शिलालेख मे सेहो अहि क्रमे नाम अछि। नान्यदेव मिथिला राज्यक स्थापना मिथिला–नेपालक सिमान पर सिमरौनगढ़ मे केने छलाह आर ओहिठाम सँ चारूकात पसरल छलाह। मैथिल परम्परा मे एकटा कथा सुरक्षित अछि जे एवं प्रकारे अछि। कहल गेल अछि जे प्रारंभ मे नान्यदेव निलगिरी प्रांत (दक्षिण भारत) मे राज्य करैत छलाह आर ओतहि सँ वो मिथिला प्रांत आएल छलाह। घुमैत–फिरैत वो सीतामढ़ी जिलांतर्गत नान्यपुर परगंतास्य पुपरी ग्रामक समीप कोइली ग्राम मे विश्राम केलन्हि। एकदिन वो अपन खेमाक कात सँ एकटा विषधर सर्प केँ जाइत देखलन्हि जाहि पर निम्नलिखित श्लोक लिखल छल– “ रामोवेत्ति नलोकेत्ति वेत्ति राजा पुरूखाः अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यो राजाभविष्यति ”। ___ परम्परा केकटा जँ देखल जाईक तँ अहि सँ इएह सिद्ध होइछ जे अलक्षित धनक प्राप्ति कए नान्यदेव मिथिलाक राजा हेताह। कहल जाइत अछि जेहुनका राज्यशक्ति अर्जन करबा मे साहायता भेटल छलैन्ह। वो दक्षिण मे नीलगिरी मे राजा छलाह अथवा नहि से कहब तँ कठिन अछि मुदा एतवा धरि ज्ञातव्य जे मिथिला पहुँचलाह पर हुनका किछु अलक्षित धनक ज्ञात अवश्य भेलन्हि आर वो ओहि सँ लाभांवित भए मिथिला राज्य प्राप्त करबा मे अग्रसर भेलाह। तखन मिथिला मे कोनो प्रकारक विरोधक संभावना नहि रहि गेल छल। नान्यदेव केँ कामरूपक धर्मपालक समकालीन कहल छन्हि। धर्मपालक शासनकाल मेकालिका पुराणक संकलन भेल छल आर ओहि कालिका पुराण मे सब सँ प्राचीन उल्लेख भरत भाष्यक अछि जकर लेखक नान्यदेव छलाह। ओहि काल मे मिथिला सँ बासतरिया ब्राह्म लोकनिक परिवार असम गेल छल। मिथिला ताहि दिन धरि तंत्रक प्रमुख केन्द्र बनि चुकल छल आर कालिका पुराणक संकलनक मूल उद्धेश्य छल मिथिला आर असमक वीच एक प्रकारक साँस्कृतिक सम्पर्क स्थापित करब। नान्यदेव जे कि अभिनव गुप्तक नामे सेहो प्रसिद्ध छलाह, क प्रसंग के.सी.पाण्डेयक विचार छन्हि जे वो १०१४–१५ ई.मे भेल होयताह मुदा से कोनो रूपे मान्य नहि भसकइयै आर अहि प्रसंगक तर्क हम आनठाम उपस्थितक चुकल छी (द्रष्टव्य–काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान द्वारा प्रकाशित बिहारक बृहत् इतिहास–अंग्रेजी मे)। सिमरौनगढ़ शिलालेख मे नान्यदेवक तिथि स्पष्ट अछि जकर संकेत हम पूर्वहिं द चुकल छी। नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दासक एकटा बिनु तिथिक शिलालेख, जे अन्हराठाढ़ी गाम मे अछि, क पाठ निम्नलिखित अछि– ___ “ ॐ श्रीमन्नान्य पतिर्जेता गुणरत्न महार्णवः यत्कीर्त्यां जनितम् विश्वे द्वितीय क्षीर सागर। मंत्रिणा तस्यन्नान्यस्य क्षत्र वंशाब्ज भावुना दवोयकारित श्रीधरः श्रीधरेणच यस्यास्य बाल्मीकेर विजयो प्रबन्ध गलधौ व्यासस्य चात्यद् भुत्ते वाधैरण वद्ध गद्ध चतुरैन्यैश्च विस्तारिते अस्माकम् क्वर्पुन ग्गिरामवसरः कोवाकारोत्यादर यद्वालबचोप्य ”। १६४८क प्रताप मल्लक शिलालेख मे नान्यदेवक वंशक क्रम एवं प्रकारे अछि– “ आसीत् श्री सूर्यवंशे रघुकुल न्रपजो रामचन्द्रो नृपेशः तदूंशो नान्यदेवोऽवनि पतिरभवत सुतः गंगदेवः। तत्पुत्रोऽभून्नृसिंहो नरपतिरतुलस्तत्सुतो रामसिंहः तज्जः श्री शक्तिसिंहो धरनिपतिरभत् भूप भूपालसिंह तस्मात्कर्णाट चूड़ामनि विहरियुत्सिंह देवास्यवंशे ”। ओहिकाल राजनीतिक परिस्थितिक अध्ययन सँ हमरा लोकनि नान्यदेवक उचित मूल्याँकन क सकैत छी। बंगाल मे सेन वंशक स्थापना भचुकल छल आर कन्नौज मे गहढ़वाल राज्य सेहो जमि रहल छल। मूंगेरक क्षेत्र पाल लोकनि सिमैटि केँ आवि गेल छलाह। जखन पाल, सेन आर गहढ़वाल अपने–अपने मे बाँझल छलाह तखन नान्यदेव मिथिला सँ नेपाल पर आक्रमण केलन्हि आर ओकरा अपन राज्य मे मिला लेलन्हि। सेन सब केँ हरेबाक हेतु नान्यदेव गहढ़वाल सँ बढ़िया सम्बन्ध रखैत छलाह आर एकर प्रमाण हमरा विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ सेहो भेटैत अछि जाहि मे लिखल अछि नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव राजा जयचन्द्रक ओतए सम्मानित भावें रहैत छलाह। विजयसेनक देवपाड़ा शिलालेख सँ ई ज्ञात होइछ जे नान्य केँ पराजित कए विजयसेन गिरफ्तार क लेने छलन्हि। सेन आर कर्णाट वंशक वीच बरोबरि खटपट होइते रहैत छल आर पूर्वी मिथिला (सहरसा–पूर्णियाँ)क क्षेत्र मे दुनु केँ कोनो ने कोनो रूपें झंझटि चलते रहैन्ह। एहि हेतु नान्यदेव गहढवाल लोकनिक संग नीक सम्बन्ध रखैत छलाह। नान्यदेव मिथिला मे मात्र कर्णाटवंशक स्थापनेटा धरि नहि केलन्हि अपितु एकरा दृढ़ सेहो केलन्हि आर समस्त मिथिला पर अपन एकक्षत्र शासन काएम केलन्हि। गण्डकी सँ कौशिकी धरि आर हिमालय सँ गंगाधरि अपन राज्यक विस्तार करबा मे वो सक्षम भेला। मिथिलाक इतिहासक संदर्भ मे नान्यदेव केँ उएह स्थान प्राप्त छैन्ह जे समस्त भारतक इतिहासकसंदर्भ मे चन्द्रगुप्त मौर्य केँ जनक वंशक पश्चात् एहन प्रशस्त राज्य मिथिला मे आर कहिओ नहि बनल। ओहि समय मे मिथिलाक जे राजनैतिक स्थिति छलैक ताहि मे नान्यदेव अहि सँ वेसी किछु कइयो नहि सकैत छलाह। राज्यक स्थापनाक संगहि संग ओकरा सुदृढ़ बनेबाक हेतु वो संगठित शासन विधानक जन्म सेहो देलन्हि। नान्य अपना केँ श्रीमहासामंताधिपति, श्रीमन्नान्यपति, कर्णाटकुलभूषण, धर्माधर भूपति, राजनारायण, नृपमल्ल मोहन मुरारी, प्रत्ययग्रवानिपति, मिथिलेश्वर, सामंतधिपति आदि–कहने छथि। अन्हराठाढ़ी अभिलेख मे हुनका ‘श्रीमान’ कहल गेल छन्हि। अहि सब सँ हुनक पूर्वक स्थितिक भान होइयै आर बुझि पड़इयै वो पूर्व मे सामंत रहल होएताह आर बाद मे शासक भेल होएताह आर बाद मे शासक भेल होएताह। ताहि दिनक अनिश्चित राजनैतिक स्थिति मे वो मिथिलाक व्यक्तित्व विकास केलन्हि आर मिथिलाकेँ एकटा रूप देलन्हि। मिथिलाक चौहद्दीक परिभाषा जे हमरा लोकनि देखैत छी तकरा राज्यक रूप मे चरितार्थ उएह केलन्हि आर तै वो प्रशंसनीय छथि। वो स्वयं एक पैघ कूटनीतिज्ञ एवं सफल योद्धा छलाह। चम्पारण मे राजधानीक स्थापना करब (सिमरौनगढ़) हुनक कूटनीतिज्ञताक परिचय देने छथि। ताहि दिन मेदरद–गण्डकी क्षेत्र धरि पश्चिमक राज्य छल आर मिथिलाक सीमा ओहि राज्य सँ मिलैत छल आर ओम्हर यशः कर्णक नजरि सेहो अहि दिसि लगले छल तैं नान्यदेव ओहि खतरा सँ अपन राज्यक रक्षार्थ ओम्हरे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहि सँ पश्चिम आर उत्तर दुनुक सुरक्षा हो। अहि विचार सँ वो अपन राज्यक राजनीति केँ सेहो संचालित करैत छलाह। नान्य जे टीका लिखने छथि ताहि मे वो अपना केँ सौवीर आर मालवक विजेता घोषित कएने छथि– ____ “जित सौवीर वीरेण सौवीरक उदहृतः” ____ “लुप्तमालव भूपाल कीर्तिर्मालव पञ्चमीम्” ____ “बाँगालि केति कथिता मिथिलेश्वरेण”। ____ “श्री रागस्यैक भूमिर्ललित मधुर वाग्भिंत बंगाल–गौड़, प्रोढ़ प्राग्मारसारः कुकुभमुभ यथा साधय न्विश्रमुच्चैः। संग्रामे भैरवोयः प्रबिल सति मुहु र्धूर्जरीयस्य कण्ठे, सौवीरो ध्यायमोनं व्यधित कृतमतिर्भूपति नान्यदेवः”॥ सौवीर, मालव, बंगाल आर गौड़ केँ पराजित करबाक श्रेय वो अपना पर लैत छथि–सौवीर मालवा पर संभवतः वो मिथिलेश्वर होयबाक पूर्वहिं विजय प्राप्त केने होयताह। बंगालक प्रश्न लकए हुनका सेन वंश सँ झंझटि भेलन्हि तकर वर्णन उपर क चुकल छी आर संभव जे अंततोगत्वा हुनका बंगाल–गौड़ पर विजय प्राप्त भेलहोति। बंगाल आर गौड़क प्रश्न पर नान्यदेव आर विजयसेनक वीच मनोमालिन्य भेलहोति अथवा रहैत होति से संभव। दिनेश चन्द्र सरकार सेनवंश आर कर्णाटवंशक सब तथ्यक अध्ययन केलाक पछाति अहि निर्णय पर पहुँचल छथि जे विजयसेन केँ नान्यदेवक विरूद्ध कोनो खास सफलता नहि भेटल छलैन्ह। गिरीन्द्र मोहन सरकार सेहो अहिबात सँ हमरा लोकनि केँ अवगत करौने छथि जे सेनक मिथिला मे शासन अथवा राज्य हेबाक कोनो ठोस प्रमाण नहि अछि। देवपाड़ा शिलालेखक अध्ययन सँ एतवे प्रमाणित होइछ जे विजयसेन नान्यदेव आर राघवक घमण्ड केँ चूर केलन्हि। मिथिला मे अपन अस्तित्व केँ सुदृढ़ कए आर अपन चारूकात विस्तारक कोनो आशा नहि देखि नान्यदेव नेपाल दिसि अपन ध्यान लगौलन्हि। ताहि दिन मे नेपालो मे कैक गोट राज्य छल आर ओहि मे आपस मे आधिपत्यक हेतु संघर्ष होइत रहैत छल। नान्यदेव अहि संघर्ष होइत रहैत छल। नान्यदेव अहि स्थिति सँ लाभ उठौलन्हि आर नेपालक राजनीति मे हस्तक्षेप करब प्रारंभ केलन्हि। नेपाल परम्पराक अनुसार वो समस्त नेपाल केँ अपना अधीन मे केलन्हि आर नेपालक स्थानीय शासक, पाटन आर काठमाण्डुक जयदेव मल्ल आर भात गाँवक आनंद मल्ल केँ गद्दी सँ उतार लन्हि। नेपाली परंपराक अनुसार नेपालक राजवंश केँ नान्यदेव समाप्त नहि केलन्हि–बुझि पड़इयै जे जखन वो लोकनि नान्यदेवक सत्ता केँ स्वीकार क लेलथिन्ह तखन नान्यदेव हुनका लोकनि केँ अपन अधीनस्थ शासक बना केँ छोड़ि देलथिन्ह। सामंतवादी व्यवस्थाक ई एकटा प्रमुख बात छल। नेपालक इतिहास दिल्ली रमण रेगरीक अनुसार नान्यदेव सम्पूर्ण नेपाल केँ नहि जीतने छलाह आर हुनका ११४१ मे फेर दोसर वेर नेपाल पर आक्रमण करए पड़ल छलैन्ह। नान्यक परोक्ष भेला पर पुनः ठाकुरी वंशक लोग अपन आधिपत्य बना लेने छलाह। नेपाल पर नान्यदेव जे कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि तकरा हुनक वंशज हरिसिंह देव बाद मे दृढ़ केलथिन्ह। विजेता, राज्यनिर्माता, कुशल प्रशासक एवं संगठन कर्ताक अतिरिक्त नान्यदेव स्वयं एक बहुत पैघ विद्वान छलाह आर भरतक नाट्यशास्त्र पर एक गोट टीका सेहो लोखने छलाह। श्रीधर दास एवं रत्नदेव नान्यदेवक प्रधान मंत्री छलथिन्ह। श्रीधर दासक पिता बटुदास सेनक महा सामंत छलाह आर श्रीधर दास सेहो महामाण्डलिक छलाह। हिनक मूल राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल) मे छलैन्ह आर दोसर राजधानी नान्यपुर मे। नान्यदेव ५० वर्ष धरि राज्य केलन्हि आर सब किछु सफलतापूर्वक उपलब्ध कए मिथिला राज्य केँ एकटा स्वरूप प्रदान केलथि। मिथिला तहिया सँ आई धरि संस्कृतिक एकटा प्रधान केन्द्र बनल अछि। राजनैतिक इतिहासक महत्वक लोप भेलो उत्तर सांस्कृतिक दृष्टिकोण सँ नान्यदेवक शासन अपन अलग महत्व अछि। मल्ल देव:- विद्यापति अपन पुरूष परीक्षा मे मल्लदेव केँ युवराज कहने छथि परञ्च मिथिला मे कर्णाट वंशक शासन श्रृंखला मे नान्यदेवक बाद गंगदेवक नाम अवइयै तैं मल्लदेवक युवराजक संज्ञा एकटा समस्या बनिगेल अछि। सभ साधनक अध्ययन केला पर ई प्रतीत होइछ जे नान्यदेवक बाद मिथिला राज्य संभवतः दुनु भाई मे बहि गेल छल आर दुनु गोटए अपन–अपन क्षेत्र पर शासन करैत हेताह। पुरूष परीक्षाक अनुसार नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव बड्ड साहसी आर स्वाभिमानी छलाह। वो किछु दिन धरि कन्नौजक जयचन्द्रक ओतए छलाह आर फेर ओहिठाम सँ चिक्कौर राजाक ओतए आवि के रहला। मैथिली अनुश्रति ई कहल जाइत अछि जे दुनु भाई मे पटैत नहि छलैन्ह आर तैं जखन मल्लदेव हुनक मदैति नहि केने छलथिन्ह। जयचन्द्र मल्लदेवक वीरता सँ बड्ड प्रभावित छलाह। सहरसा जिला मे मलडीहा आर मल्हनी गोपाल मल्लदेवक नाम पर बसल अछि। भीठ भगवानपुर मे मंदिर मे एकटा अभिलेख अछि जाहि मे लिखल अछि– “ॐ श्री मल्लदेवस्य”। कि वदंती अछि जे भीठ भगवानपुर मल्लदेवक राजधानी छल। भीठ भगवानपुर गंधवरिया राजपूतक केन्द्र सेहो मानल गेल अछि आर गंधवरिया परम्परा मे सेहो एकटा मल्लदेवक नाम अवइयै। तैं ई कोन मल्लदेवक शिलालेख थिक से कहब असंभव। विभिन्न तथ्यक परीक्षणक बाद हम अहि निर्णय पर पहुँचल छी जे नान्य देवक पछाति मिथिला राज्यक विभाजन भेलैक आर ओकर पूर्वी भाग पर मल्लदेवक आधिपत्य रहलैक। पश्चात मल्लदेवक वंशज सेहो अहि क्षेत्र पर शासन केलन्हि जकर अप्रत्यक्ष रूपें कनेको प्रमाण भेटैत अछि। राज्यक बटबारा भगेल सँ कर्णाट वंशक प्रभाव किछु घटि अवश्य गेल होयतैक आर तैं नान्यदेवक पछाति हमरा लोकनि केँ कर्णाट राज्यक विशेष विस्तार देखबा मे नहि अवइयै। स्वर्गीय कालिकारज्जन कानूनगोय एकठाम लिखने छथि जे १२१३–१२२७क वीच मिथिला मे कोनो कर्णाट अरिमल्लदेवक शासन छल मुदा अहिठाम स्मरणीय जे अहिनामक कोनो शासक मिथिला मे नहि भेल छथि। नेपाल मे अहिनामक शासक भेलहि अवश्य परञ्च वो कर्णाटवंशक नहि छलाह आर ने ताहि दिन मे नेपालक कोनो प्रभाव मिथिलाक कोनो भाग पर छल। इहो संभव अछि जे कानूनगोय महोदय मल्लदेव केँ अरिमल्लदेव बुझि लेने होथि। एकर कारण हमरा बुझने ई अछि जे मिथिला परम्परा मे कहल गेल छैक जे नान्यक एकटा पुत्र नेपाल मे शासन करैत रहथिन्ह आर चूंकि नान्यक एकटा पुत्रक नाम मल्लदेव छलैन्ह तैं कानूनगोय साहेब ओहि नाम केँ अरिमल्लदेवक संगे मिझ्झारक देने होथि। तैं हम अपन एक लेख मे (जे आनठाम प्रकाशित अछि) मल्लदेव केँ मिथिलाक एकटा विसरल राजाक संज्ञा देने छी। मल्लदेव पूर्वी मिथिला पर तँ राज्य करिते छलाहे आर संगहि नेपालक किछु भाग पर सेहो भीठ भगवानपुर एकटा केन्द्रीय स्थल छल तैं ओकरा वो अपन राजधानी बनौलन्हि कारण ओहिठाम सँ वो अपन शासन बढ़िया जकाँ दुनुठाम चला सकैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हुनके दरबार मे स्मृतिकार वर्द्धमान उपाध्याय सेहो रहैत छलाह जनिक एकटा शिलालेख आसी (मटिआरी) (हाटी परगन्ना) सँ उपलब्ध अछि। वो मल्लदेवक समय मे धर्माधिकरणक पद पर नियुक्त छलाह। शिलालेख एवं प्रकारे अछि– ___ “ जातो वंशे बिल्व पंचाभिधाने धमाध्यक्षो वर्द्धमानो भवेशात्। देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा रूढ़ कृत्वाऽस्थापद्वैन तेयम् ” ॥ भीठ भगवानपुरक मंदिर आर पोखरि सँ बहराएल बहुत रास बस्तुजात अहि बात केँ प्रमाणित करैत अछि जे प्राचीन काल मे ई एकटा महत्वपूर्ण स्थान रहल होएत। कलात्मक वस्तुजात जे कर्णाटकालीन बुझि पड़ैत अछि से ओतए प्रचुर मात्रा मे बहराएल अछि आर किछु वस्तु तँ एहनो अछि जकरा अपूर्व कहल जा सकइयै। एकर विस्तृत विवरण कतेक ठाम हम कैल अछि। कर्णाट कालीन पुरातात्विक महत्वक बहुत रास वस्तु बहेड़ा सँ सेहो बाहर भेल अछि। भगवानपुरक डीह, डाबर, पोखरि आर मंदिर विस्तार देखला आर सामरिक दृष्टिकोण सँ ओहिगामक चौहद्दीक अध्ययन केला सँ ई बुझना जाइत अछि जे मल्लदेव ओहि स्थान केँ अपन राजधानी बनौने हेतहि आर ओतहि सँ वो नेपाल आर सहरसा–पूर्णियाँ क्षेत्र धरि अपन राज्यक नियंत्रण करैत हेताह। प्राचीन काल मे सहरसा–पूर्णियाँ जेवाक रास्ता, बाट–घाट, सबटा अहि दके छल आर नेपालो जेबा मे हुनका अहिठाम सँ सुभीता होइत हेतैन्ह। ओहि स्थानक उत्खनन भेला सँ ओहि पर आर प्रकाश पड़बाक संभावना अछि। जा धरि आर कोनो नवीम तथ्य हमरा लोकनिक समक्ष नहि अवइयै ताधरि मल्लदेवक ऐतिहासिकता संदिग्धे मानल जाएत। मल्लदेवक सम्बन्ध अखन आर शोधक अपेक्षा अछि। गंगदेव:- ११४६ ई. मे नान्यदेवक मृत्युक अरांत आर पारिवारिक कलह एवं उपरोक्तक पछाति गंगदेव मिथिलाक राजगद्दी पर आसीन भेलाह। वो बंगालक वल्लालसेनक समकालीन छलाह आर स्वयं एक महत्वाकाँक्षी शासक सेहो। विजय सेनक हाथे अपन पिता नान्यदेवक वेइज्जतीक बात वो विसरल नहि छलाह आर वो अवसरक खोज मे छलाह जाहि सँ एकर बदला ल सकैथ। गंगदेव आर गाँगेयदेवक प्रश्न पर इतिहासकारक मध्य जे एकटा विवाद चलि रहल अछि ताहि दिस हम पाठकक ध्यान पूर्वहिं आकृष्ट कए चुकल छी। रामायणक पुष्पिका मे जे एकटा गाँगेय देवक विश्लेषण भेल अछि ताहि प्रसंग मे मिथिलाक इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुरक विचार छन्हि जे वो गाँगेयदेव कलचुरि वंशक छलाह आर हुनका महिपाल सँ संघर्ष भेल छलैन्ह। परञ्च हमरा अहिठाम अहि प्रश्न पर विचार करबाक हेतु निम्नलिखित बात केँ ध्यान मे राखए पड़त। ___रामायणक एक पोथी मे छैक–‘गौड़ध्वज’ श्रीमद गांगेयदेव–अहि मे पुण्याव लोक शवक व्यवहार अछि आर विनु कोनो संकेत संवत् १०७६क–दोसर पाठ मे ‘गौड़ध्वज’क स्थान पर “गरूड़ध्वज” छैक। उपेन्द्र ठाकुर महामहोपाध्याय मिराशीक मत सँ सहमति प्रगट कएने छथि। मुदा अहिठाम विचारणीय विषय ई. अछि जे १०७६–शक छलअथवा विक्रम आर दोसर बात ई जे महिपाल प्रथमक समय मे पाल वंशक पुनरूद्धार भेल छल आर तैं ओहि काल मे कलचुरि लोकनि केँ ‘गौड़ध्वज’क उपाधि सँ विभूषित हेवाक कोनो संभावना नहि बुझाइत अछि। महिपाल प्रथम अपन साम्राज्यक सीमा बनारस धरि बढ़ौने रहैथ आर जँ कलचुरि गांगेयदेव केँ से शक्ति रहितैन्ह तँ वो अवश्ये बंगालक महिपालक प्रगति केँ रोकितैथ परञ्च से कहाँ हमरा लोकनिक देखबा मे अवइयै। दोसर बात इहो जे मिथिला सँ महिपालक काल अभिलेखो भेटल अछि। संवतक संकेत नहि रहब सेहो एकटा दिग्भ्रमक जन्म दैत अछि। पोथीक लोखनिहार श्रीकरक आत्मज कायस्थ मिथिलाक नरंगवाली मूलक एकटा प्रमुख व्यक्ति छलाह आर अहुँ ई प्रमाणित होइछ जे अपन तीरभुक्तिक महाराजाधिराज पुण्यावलोक श्री गंगदेवक प्रसंगहि मे लिखने हेताह। तत्कालीन राजनैतिक अवस्था केँ ध्यान मे राखि जखन हम अहि साधनक अधययन करैत छी तखन ई स्पष्ट भ जाइत अछि जे बारहम शताबदी उतरार्द्ध मे बंगाल मे पालवंशक ह्रास भरहल छल आर बंगालक सेनवंश आर मिथिलाक कर्णाट लोकनि ओहि पाल साम्राज्य पर अपन गिद्ध दृष्टि लगौने छलाह। एहेन बुझि पड़इयै जे प्रारंभ मे मिथिलाक कर्णाट आर बंगालक सेन संगहि मिलि पाल केँ परास्त कए ओतए सँ भगौलन्हि आर जखन आपसी बटबाराक प्रश्न उठल तखन दुनु मे संभवतः विवाद भेलन्हि आर सेन आर कर्णाट वंश मे झगड़ा भेल। पाल लोकनि केँ पराजित करबाक श्रेयक कारणें मिथिला का गाँगेय देव “गौड़ध्वज”क उपाधि सँ विभूषित भेलाह। तैं रामायणक पुष्पिका मे उल्लिखित ‘गांगेय देव’ मिथिलाक गंगदेव थिकाह जे मिथिला सँ बंगाल धरि अपन शासनक प्रचार केने छलाह आर बल्लालसेन मिथिलाक बढ़ैत शक्ति सँ सशंकित भए भागलपुर धरि गंगाक दक्षिण मे अपन सत्ता बढ़ा लेने छलाह। बल्लालसेनक एकटा अभिलेख धातु सनोखर (भागलपुर) सँ प्राप्त भेल अछि जे अहिबात के सिद्ध करइयै। बल्लाल चरित मे कहल गेल अछि जे बल्लालसेन पंचगौड़ (वंग, वागड़ी, वरेन्द्र, राढ़ आर मिथिला)क शासक छलाह परञ्च हमरा बुझने पहिल चारि पर हुनक शासन छलैन्ह आर पाँचम के वो अपन बापक अमलक प्रतिष्ठाक रूप मे जोड़ने छलाह। पूर्वहिं ई देखाओल जा चुकल अछि कि मिथिला पर सेन राज्यक कोनो स्पष्ट प्रमाण नहि छल तैं आव ई निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे गंगदेवक शासन काल मे मिथिला पूर्ण रूपेण स्वतंत्र छल आर कर्णाट लोकनि अक्षुण्ण भावें अहिठाम राज्य करैत छलाह। दुनु राज्यक सीमा मिलैत जुलैत छल तैं यदा कदा टंटा भजाएब स्वाभाविके छल। लक्षमण संवत प्रचलनक साक्ष्य दकेऽ ई कहब जे मिथिला मे सेन वंशक राज्य छल से समीचीन प्रतीत नहि होइछ आर नेऽ एकरा सिद्ध करबाक हेतु कोनो ठोस प्रमाणे अछि। गंगदेव अपन मंत्री श्रीधर दासक साहायता सँ उत्तमोतम रीति सँ अपन राज काज चलबैत रहलाह। हुनका समय मे कर्णाट शासन प्रणाली केँ दृढ़ बनाओल गेलैक। राज्य केँ परगन्ना मे विभाजित केलन्हि आर प्रत्येक परगन्ना मे मुखिया अथवा प्रधान नियुक्त भेलाह जे ‘चौधरी’ कहबैत गेलाह। न्याय प्रशासनक हेतु पंचायती व्यवस्थाक स्थापना भेल। जन कल्याण आर कृषिक उन्नतिक हेतु वो अपना राज्य मे अनेका नेक पोखरि एवं जलाशयक व्यवस्था केलन्हि। अपन राज्य केँ वो अपना शासन काल मे सुरक्षित रखबा मे समर्थ भेलाह। पश्चिम मे गहढ़वाल, पूर्व मे सेन आर दक्षिण मे पाल लोकनि सँ अपन साम्राज्यक सुरक्षा रखैत वो नेपालो पर अपन अधिकारक दावी देनहि रहलाह आर एवं प्रकारे नान्यदेव द्वारा स्थापित राज्य केँ गंगदेव आर दृढ़ बनौलन्हि जाहि सँ मिथिलाक प्रतिष्ठा चारूकात बढ़ल। गंगदेवक समय मे मिथिला मे शांति आर सुव्यवस्था बनल रहल आर कोम्हरो सँ कोनो आक्रमण नहि भेल। इएह कारण छल जे वो शासन संगठन आर प्रशासनिक सुधार दिसि अपन ध्यान देबा मे समर्थ भेलाह। नान्यदेव तँ विजय प्राप्त कैक राज्यक जन्म देलन्हि आर शांति प्रदान केलन्हि। ई एकटा अजीव संयोग थिक जे पिता पुत्र दुनु एक्के रंग कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शी आर कुशल विजेता आर प्रशासक बहरेलाह। बारहम शताबदीक श्रीवल्लभाचार्य (न्याय–लीलावतीक लेखक) निम्नलिखित वाक्य एकटा तत्कालीन कर्णाट शासक उल्लेख करैत छथि– ____ “ यदि च गगन मात्मा वान्य धर्मणान्यम वच्छिन्धात् काश्मीर वर्त्तिना कुङ्कुम रागेण कर्णाट चक्रवर्त्ति (ललना) करकमवच्छिन्धात्–” आब ई कर्णाटचक्रवर्त्ति (ललना) के छलाह से कहब असंभव। नान्यदेव, मल्लदेव आर गंगदेव–सब भसकैत छथि। ‘ललना’ शब्द मैथिली मे छोट वच्चाक हेतु प्रयोग होइत छैक तैं हमरा बुझने अहि सँ नान्यदेवक कोनो पुत्रक संकेत होइयै, आव वो मल्लदेव हेताह अथवा गाँगदेव से कहब कठिन। श्री वलवभाचार्य–एकटा शासन करैत राजाक नाम सेहो लिखैत छथि–“श्री शालि वाहनो नृपति”– अहु राजाक पहचान असंभव अछि=मिथिला सँ प्राप्त मैथिलीक पाण्डुलिपि सब से एहेन बहुत रास राजा सबहक नाम भेटैत अछि जकरा कोनो राजवंश सँ मिलाएब अथवा जोड़ब असंभव भजाइत अछि। मिथिलाक इतिहासक साधनो अखन धरि इएह सब रहल अछि तैं एकरा तिरस्कारो करब असंभव। नरसिंह देव–(११८७–१२२७)– गंगदेवक परोक्ष भेला पर मिथिलाक राजगद्दी पर नरसिंह देव वैसलाह। हुनका समय मे मिथिला आर नेपालक मध्य किछु खट पट भेल छल आर एकर नतीजा ई भेल जे नेपाल मिथिला सँ फराक भगेल। रामदत्त अपन दान पद्धति मे नरसिंह देव केँ कर्णाटात्वय भूषणः- कहने छथि। रामदत्त हुनक मंत्री छलाह आर रामदत्तक अनुसार नरसिंह देव मिथिलाक अक्षुण्ण शासक छलाह। विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ ज्ञात होइछ जे नरसिंह देव अपन पिती मल्लदेवक संग कन्नौज गेल छलैथ। ओतए सँ वो दिल्ली सेहो गेल छलाह आर शहाबुद्दीन गौरीक सेना मे सेनानायक काज कएने छलाह जाहि सँ गोरी हिनका सँ प्रसन्न भए हिनका मिथिला मे अक्षुण्ण करबाक हेतु छोड़ि देवाक आश्वासन देने रहथिन्ह। ई चाचिक देव चौहानक परम मित्र छलाह। कहल जाइत जे इहो एक कुशल शासक छलाह मुदा राजनैतिक दृष्टिकोण सँ हम देखैत छी जे हिनका राज्य मे नेपाल हिनका हाथ सँ बाहर भगेल आर ताधरि बाहर रहल जाधरि हरिसिंह देव पुनः ओकरा नहि जीतलैन्ह। दोसर बात इहो जे मुसल मान लोकनि पश्चिम आर पूब सँ मिथिला राज्य केँ दबबे लागल छलाह आर आक्रमण श्री गणेश सेहो हिनके समय मे प्रारंभ भगेल छल। मिथिला राज्य केँ मुसलमान लोकनि अपन आँखि मे काँट जकाँ बुझैत छलाह आर तैं वो लोकनि एम्हर–ओम्हर सँ हुलकी–बुलकी दने आरंभ कदेने छलाह। नरसिंह देव अपना भरि मिथिला राज्य केँ चारूकात सँ सुरक्षित रखबाक यथेष्ट प्रयास केलन्हि आर अहि क्रम मे हुनका बहुत किछु सफलता भेटलन्हि। रामसिंह देव–(१२२७–१२८५)– रामसिंह देव कर्णाट वंशक एक सफल आर कुशल शासक छलाह जनिक महिमाक गुनगान तिब्बती यात्री धर्मस्वामी सेहो कएने छथि। कर्मादित्य ठाकुर रामसिंह देवक मंत्री छलथिन्ह आर कर्मादित्यक एकटा अभिलेख ल.सं.२१२क सेहो उपलब्ध अछि। हिनका समय मे समस्त उत्तर भारत मे मुसलमानी सत्ताक प्रसार भचुकल छल आर मिथिलाक चारूकात मुसलमानी आक्रमणक संभावना बढ़ि गेल छल। वैशाली मे मुसलमानी आक्रमणक स्वरूपक विवरण धर्मस्वामी उपस्थित कएने छथि। लखनौतीक हिसामुद्दिनइवाज मिथिलो सँ कर प्राप्त केने छल आर तिरहुत मे पूर्व–पश्चिम दुनु दिसि सँ आक्रमण होइत रहैत छल। रामसिंह देवक पदवी मे‘भुजबलभीम’ आर ‘भीमपराक्रम’क विशेष महत्व रखइयै। हिनक सान्धि विग्रहिक छलाह देवादित्य ठाकुर जिनका वंश मे बड्ड पैघ–पैघ विद्वान आर पराक्रमी लोक सब भेल छलाह। धनवान होयबाक कारणे वो लोकनि महलक (महथा) सेहो कहबैत छलाह। रामसिंह देव विद्या आर धर्मक समर्थक आर प्रवर्त्तक छलाह। हुनके समय मे मिथिला मे वैदिक टीका लिखल गेलैक। ओहिकाल मे सामाजिक एवं धार्मिक नियमक प्रतिपादन भेल आर शासन विधान मे सेहो वेस सुधार भेलैक। प्रत्येक गामक हेतु कोतवालक नियुक्ति भेल। गामक प्रत्येक समाचार चौधरी कोतवाल केँ दैत छलैक आर ओहि ठाम सँ वो समाचार राजा धरि पहुँचैत छ्ल। ओहि समय मे पटवारी प्रथाक विकास भेल। रामसिंह देव पैघ विद्या प्रेमी छलाह आर हुनके समय मे श्रीधर आचार्य अमरकोश पर अपन टीका लिखलैन्ह। रामसिंह देवक समय मे प्रसिद्ध तिब्बती यात्री धर्मस्वामी एम्हर आएल छलाह आर रामसिंह देवक संग हुनक सम्बन्ध मधुर छलैन्ह। वो आती–जाती दुनु वेर रामसिंह देवक संगे रहलो छलाह। फि समय मे मिथिला मे मुसलमान लोकनिक प्रकोप बढ़ल जाइत छल। रामसिंह राजधानी ‘प’ट’ (सिमरौनगढ़)क सुन्दर विश्लेषण धर्मस्वामी कएने छथि। ‘प’ट’ बड्ड पैघ आर उन्नत नगर छल आर चारूकात सँ दुर्ग आर खाधि सँ घेरल–वेढ़ल छल। सब तरहे एकर सुरक्षाक प्रबंध कैल गेल छल। ई नगर उत्तर मे छल। अहिठाम वो ज्वर सँ पीड़ित सेहो भेल छलाह। नेपाल सँ अहिठाम एवा मे हुनका तीन मास लागल छलैन्ह। रोग सँ मुक्त भेला पर जखन वो अपन देश जेबाक हेतुतैयार भेला पर तखन रामसिंह हुनका किछु दिन आर रहबाक हेतु आग्रह केलथिन्ह। एतवे नहि रामसिंह हुनका किछु दिन आर रहबाक हेतु आग्रह केलथिन्ह। एतबे नहि रामसिंह हुनका अपन प्रधान पुरोहितक पद पर नियुक्त करबाक आश्वासन सेहो देलथिन्ह मुदा तइयो वो एतए रहबा लेल तैयार नहि भेलाह आर घुरबाक हेतु तत्पर भगेलाह। रामसिंह हुनका बहुत रास वस्तुजात उपहार मे देलथिन्ह। धर्मस्वामीक विवरण ई स्पष्ट होइछ जे मुसलमान लोकनिक प्रभाव बड्ड बढ़ि गेल छल आर रामसिंह किलाबंदी पर विशेष बल देने छलाह। रामसिंह किलाबंदी पर विशेष बल देने छलाह। रामसिंहक अपन राजभवन सात गोट भीत आर २१ गोट खाधि सँ घेरल छल। वैशालीक निवासी लोकनि मुसलमानी आक्रमण सँ हड़कम्पित छलाह। वैशाली मे एकटा प्रसिद्ध ताराक मूर्त्ति छल। धर्मस्वामीक मुसलमानी आक्रमण सम्बन्धी मतक समर्थन परम्परागत साहित्य एवं साधन सँ सेहो होइत अछि जाहि मे ई कहल गेल अछि जे रामसिंह केँ मुसलमान सँ लड़ए पड़ल छलैन्ह। मुसलमान लोकनि गंगाक दक्षिण मे मूंगेर, भागलपुर, पटना, आदि स्थान मे पसरि चुकल छलाह आर ओम्हर बंगालक शासक सेहो पश्चिम दिसि अपन शक्ति केँ बढ़ेबा मे लागल छलाह। ओहि दुनु मे बरोबरि संघर्ष चलैत रहैन्ह आर मिथिलाक शासक अपन ‘वेतसिवृति’क पालन कए अपन स्वतंत्रता केँ सुरक्षित रखबा मे व्यस्त छलाह। रामसिंह देव अहि हेतु कत्तेक प्रयत्नशील छलाह तकर प्रमाण तँ एतवे अछि जे वो जँ अपन राज्यक विस्तार नहि केलन्हि तँ हुनका समय मे हुनक राज्य एक्को इंच घटल नहि आर साँस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि बनौलन्हि तकरे आधार पर बाद मे हरिसिंह देवी पंजी प्रथा ठाढ़ भेल। शक्ति सिंह:-(शक्र सिंह)–(1285–95)– रामसिंहक पछाति शक्तिसिंह अथवा शक्रसिंह मिथिलाक राजा भेलाह। वो महा पडिंत, प्रतापी एवं पराक्रमी शासक छलाह आर दिल्लीक शासकक संग हुनक सम्बन्ध बरोबरि बनल रहलैन्ह–ई सम्बन्ध विरोध आर मित्रता दुनुक छलैन्ह। हम्मीरक विरूद्धक अभियान शक्तिसिंह अलाउद्दीन खलजीक संग रहैथ आर हुनका संग हुनक मंत्री देवादित्य आर हुनक आत्मज वीरेश्वर सेहो रहथिन्ह। अपन मंत्रीक स्वामी द्रोहक कारणे (रायमल्ल आर रामपाल) हमीर पराजित भेलाह। अलाउद्दीन देवादित्य केँ ‘मंत्रिरत्नाकर’ पदवी सँ विभूषित केलथिन्ह। शक्तिसिंहक संग खलजी सम्राटक मित्रता बनल रहल आर मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो वचल रहल। शक्तिसिंह अत्याचारी शासक छलाह। हुनक निरंकुश शासन केँ रोकबाक हेतु वृद्ध केँ चुनि केँ एकटा ‘वृद्ध–परिषद’क निर्माण कएने छलाह। हुनक अत्याचारी शासन सँ हुनक दरबारी आर मंत्री लोकनि कूपित भए गेल छलाह। राजाक निरंकुशताक विरोध मे सर्व प्रथम अवाज उठौलनि चण्डेश्वर ठाकुर जे अपना युगक एकटा प्रसिद्ध विद्वान आर राजनीतिज्ञ छलाह। हुनके प्रयासे राजाक निरंकुशता पर रोक लागि सकल। दरभंगाक अनंदवागक पश्चिम ‘सुखीदिग्घी’ पोखरि हिनके खुनाओल थिक आर आधुनिक सकुरीक बसौनिहार शक्तिसिंहें थिकाह। शक्तिसिंहक बाद एकटा भूपाल सिंहक नाम भेटइयै मुदा वो शासक भेलाह अथवा नहि से कहब असंभव। हरिसिंह देव:-(१२९५–१३२४-?)– नान्य देवक पश्चात् कर्णाटवंशक सब सँ प्रसिद्ध एवं महान शासक हरिसिंह देव भेलाह जे मिथिला आर नेपालक इतिहास मे कैक दृष्टिये विख्यात छथि आर जनिक शासन काल पूर्वी भारतक इतिहास मे महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। हिनक जन्म, राज्यारोहण, मृत्यु इत्यादिक वास्तविकताक सम्बन्ध मे हमरा लोकनिक ज्ञान अपूर्ण अछि अथवा इहो कहि सकैत छी जे हिनका सम्बन्ध सबटा एतिहासिक तथ्य अद्यावधि अनिश्चितता एवं सन्दिग्धक गर्भे मे अछि। एकर मूल कारण ई अछि जे मिथिलाक अहिकालक इतिहासक अध्ययनक हेतु जे प्रामाणिक साधन चाही तकर सर्वथा अभाव अछि। तथापि जतवे जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधार पर हमरा लोकनि हरिसिंह देवक शासन एकटा वस्तुनिष्ठ अध्ययन प्रस्तुत करबाक प्रयास करबा नेऽ राजनीतिक इतिहासक हिसाबे आर साँस्कृतिक इतिहासक हिसाबे हरिसिंह देव केँ विसरल जा सकइयै। जँ नान्यदेव अहिवंशक संस्थापकक हिसाबे स्मरणीय छथि तँ हरिसिंह अपन नेपाल विजय एवं पंजी–प्रथाक संस्थापकक रूपें मिथिलाक इतिहासक महत्व दिसि पौवात्य–पाश्चात्य विद्वानक ध्यान आकृष्ट भेल छन्हि आर एकर प्रमाण भेल लुसिआनो पेतेकक ‘मिडिभल हिस्ट्री आफ नेपाल’ तथा भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित “दिल्ली सल्तनत” (खण्ड 6) मे विवेचित मिथिलाक इतिहासक अंश। आव मिथिलाक इतिहासक अहिकाल केँ उपेक्षित करब कठिन अछि कारण अहि सम्बन्ध मे जे अद्यावधि एकटा भ्रांति पसरल छल से दूर भगेल अछि आर सामाजिक इतिहासक अध्ययनार्थ हरिसिंह देवक पंजी प्रथा एकटा प्रमुख विषय बनल अछि। कहिआ, कोना आर कोन रूपें वो मिथिलाक शासन भार ग्रहण केलन्हि तकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लग नहि अछि मुदा हुनका सम्बन्ध मे प्रचलित किंवा व्यवहृत शब्दावली अहि बातक प्रमाण अछि जे वो शक्तिशाली शासक छलाह अपना काल धरि वो कहियो ककरो समक्ष ने अपन माथ झुकौने छलाह आर नेऽ टेकने छलाह। अपना केँ स्वाभिमानी स्वतंत्र आर निर्भीक बुझैत छलाह आर अहिबातक प्रमाण हमरावसातिनुलउन्स सँ भेटैत अछि। पुरूष परीक्षा मे विद्यापति हुनका‘कर्णाट–कुल–सम्भव’ कहने छथिन्ह; चण्डेश्वरक कृत्यरत्नाकर मे हुनका ‘कर्णाट वंशोद्भव’ कहल गेल छैन्ह। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त समागम मे कर्णाट चूड़ामणिक संज्ञा हिनका देल गेल छन्हि। कर्णाटवंशोद्भव शत्रुजेता हरिसिंह देव मिथिला मे अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केने छलाह। हुनक सान्धिविग्रहिक मंत्री देवादित्य ठाकुर छलथिन्ह। देवादित्य यशस्वी, बुद्धिमान एवं दानी छलाह। हुनक पश्चात् हुनक पुत्र वीरेश्वर ठाकुर मंत्री भेलाह। उहो महा दानी छलाह आर समुद्र सन गहिर पोखरि दहिभत गाम मे खुनौने छलाह। वो श्रौतकर्मानुष्ठाता ब्राह्मण लोकनि केँ उदारता पूर्वक दान देने छलाह आर गामक गाम दान मे सेहो हुनका लोकनि के देने छलाह। उहो एकटा पोखरि खुनौने छलाह जकर नाम छल ‘वीरसायर’ पड़ल। वीरेश्वर ठाकुर केँ ‘महावर्तिक नैबन्धिक’ सेहो कहल जाइत छलन्हि। वीरेश्वर ठाकुरक बाद हुनक पुत्र चण्डेश्वर ठाकुर महामत्तक सांधि विग्रहिक भेलाह। उहो प्रतापी, साहसी, उदार एवं दानी छलाह आर हरिसिंह देवक मित्र, सलाहकार एवं दार्शनिक सेहो छलाह। हरिसिंह देव हिनक समय मे व्यस्क भचुकल छलाह आर राज काज सम्हारि लेने छलाह। इहो हावी परगन्नाक सिमराम ग्राम मे एकटा पोखरि खुनौने छलाह जे “सुरवय” कहबैत अछि। नाबालिक अवस्था मे राजगद्दी पर बैसलाक कारणे हरिसिंहक देखरेख सुयोग्य मंत्रिगणक हाथ मे छल आर राजाक दिसि इएह मंत्री लोकनि सब काज करैत छलाह। हरिसिंह देव जखन जवान भेलाह तखन चण्डेश्वर ठाकुर हुनक मंत्री छलथिन्ह। ब्राह्मणक एकवंश सँ कर्णाट राजदरबार मे तीन पीढ़ी धरि बरोबरि मंत्री होइत रहलाह–ताहि सँ ई सिद्ध होइत जे अहि काल मे सामंतवादी व्यवस्थाक विकासक कारणे मंत्रीपद वंशानुगत भए चुकल छल आर राजा पर हुनका लोकनिक विशेष नियंत्रण रहैत छलैन्ह। हम उपर देखि चुकल छी जे शक्ति सिंह जखन निरकुंश बनबाक चेष्टा केलन्हि तखन इएह सामंत लोकनि हुनक ओहि चेष्टा केँ विफल कैल आर हरिसिंह देवक नावालिग रहबाक कारणे हुनका लोकनिक अधिकार मे अत्यधिक बृद्धि भेल। विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ इहो ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देव यादव राजा देवगिरिक रामदेवक समकालीन छलाह आर गोरखपुरक राज दरबार मे हुनक कला–प्रेमी होयबाक चर्च बरोबरि होइत छलैन्ह। हरिसिंह देवक नाम सँ समकालीन राजा लोकनि नीक जकाँ परिचित छलाह। हरिसिंह देवक मंत्री चण्डेश्वर अपना कालक प्रसिद्ध विद्वान छलाह आर तैं हिनक नाम सँ मिथिला राज्योक नामक प्रसार होइत छल। हरिसिंह देवक समय मे चण्डेश्वर ठाकुर नेपाल अभियानक नेतृत्व केलन्हि। ओतए ई किरात राजा सन केँ एवं सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा गण केँ पराजित कए सम्पूर्ण नेपाल राज्य पर मिथिलाक आधिपत्य जमौलन्हि। अहि सँ ई तँ स्पष्ट भजाइछ जे नरसिंह देवक समय मे नेपाल सँ खट–पट भेलाक बाद नेपाल अपना केँ मिथिलाक नियंत्रण सँ मुक्त क लेने छल कारण जँ से बात नहि रहैत तँ चण्डेश्वर ठाकुर केँ हरिसिंह देवक शासन काल मे पुनः नेपाल पर आक्रमण करबाक आवश्यकता कियैक भेलैन्ह। दोसर बात इहो जे हरिसिंह देवक प्रभाव जखन नेपाल पुनः स्थापित भेल तँ मिथिलाक प्रतिष्ठा सेहो बढ़ल आर अहि हिसाबे हरिसिंह देव तुगलक सँ पराजित भेलाक बाद भागि केँ नेपाले गेल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर वाग्मतीक नदीक तट पर स्वर्ण तुलापुरूषमहादान कयने छलाह आर उएह प्रथम व्यक्ति छला जे पशुपति नाथ धरि पहुँचल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर अधीन हरिब्रह्म नामक एक सामंतक चर्च प्राकृत–पैंगलम् मे भेल अछि। हरिसिंह देवक समय मे मिथिलाक राज्य सुरक्षित रहल यद्धपि ताहि समय तक पश्चमी आर पूर्वी राज्य सँ मिथिला पर बरोबरि प्रहार भरहल छल। नेपाल धरि अपन राज्यक सीमा केँ पुनः बढ़ेबाक श्रेय हरिसिंह देव केँ छन्हि। नेहरा मे हरिसिंह देव सेहो अपन एकटा मुख्यालय रखने छलाह आर ओहिठाम एकटा गढ़ सेहो छल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘धूर्त समागम नाटक’ सँ ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव केँ कोनो सुरत्राण सँ झगड़ा भेल छलैन्ह जकर परिणाम अनिर्णीत बुझना जाइत अछि। हरिसिंह देवक पादपद्म पर कतेको प्रतापी राजा अपन–अपन माथ नमवैत छलाह। ____ “ नानायोध निरूद्ध निर्जित सुरत्राणात्र सद्धाहिनी नृत्यद्भीमकबन्ध मेलक दलद् भुमि भ्रमद् मुधरः॥ अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिः कर्णाट् चूड़ामणिः दृप्यत्पार्थिव सार्थ मौलिमुकुटन्यस्ताङघ्र पंकेरूहः”॥ उमापतिक परिजात हरण सँ सेहो ई स्पष्ट होइछ जे हरिसिंह द्व आर कोनो मुसलमान शासकक बीच संघर्ष भेल छल मुदा ज्योतिरीश्वर आर उमापतिक विवरण मे कोनो मुसलमान शासकक नाम नहि रहला सँ कठिनताक अनुभव हैव स्वाभाविके। ओहि सब सँ केवल एतवे ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देव कें बरोबरि मुसलमान शासक लोकनि सँ टंटा होइत रहैन्ह आर ओहि सभहिक वावजूदो वो मिथिला केँ राज्य सुरक्षित रखैत अपन प्रजाक कल्याण मे लागल रहैथ। हमरा बुझि पड़इयै जे मिथिलाक राज्यक भविष्यक सम्बन्ध हुनका पूर्वाभास भगेल छलैन्ह आर तैं वो नेपाल पर पुनः अपन आधिपत्य कायम करबाक प्रयास मे लागल छलाह। मिथिला मे चारूकात सँ तंगी देखि वो अपना हेतु नेपाल राज्य केँ सुरक्षित राखए जाहि सँ किवो मुसलमानी आक्रमण सँ आक्रांत भेला पर ओतए जाए केँ रहि सकैथ। इएह कारण थिक जे हुनक मंत्री नेपाल पर पूर्ण आधिपत्य कायम केने छलाह। तुगलक आक्रमणक बाद वो भागि केँ ओम्हरे गेवो केलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिला छोड़बाक पूर्व वो नेहरा पोखरि पर विश्वचक्र महादान यज्ञ कयने छलाह। १३२३–२४ ई. मे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। कहल जाइत अछि जे बंगाल आर मिथिलाक शासकक संग एक प्रकार गुप्त समझौता छल आर दुनु अपन–अपन स्वतंत्रता केँ सुरक्षित रखबाक लेल प्रयत्नशील छलाह। गयासुद्दीन तुगलक अहि दुनु राज्य केँ अपना आँखिक काँट बुझैत छल आर तैं बंगाल पर आक्रमण केलाक बाद वो मिथिले बाटे घुरल आर अहिठाम शासक केँ अपना अधीन करबाक प्रयास केलक। फरिस्ताक अनुसार तिरहुतक राजा संघर्षक हेतु आगाँ बढ़लाह परञ्च हुनका खेहारि केँ जंगल मे ठेल देल गेलैन्ह। तुगलक राजा जंगल केँ अपने हाथ सँ कटलन्हि आर जखन जंगल साफ भेल तखन वो देखलन्हि जे तिरहुत राजाक एकटा बड़का किला अछि जे चारूकात बड़का–बड़का खाधि सँ घेरल अछि। उच्च उच्च भीति आर सातटा खाधि सँ घेरल किला देखि तुगलक शासक थोड़ेक कालक हेतु धतमतेलाह आर तत्पश्चात् सातोटा खाधि केँ भरि वो किलाक भीत आर देवाल केँ नष्ट केलन्हि। अहि सब काज मे हुनका तीन हफ्ता लगलन्हि। राजा सपरिवार गिरफ्त भेलाह आर तिरहुतक शासन भार मलिक तबलिगाक पुत्र अहमद खाँक हाथ मे देल गेल। तकर बाद तुगलक राजा दिल्ली दिसि प्रस्थान केलन्हि। वरनीक अनुसार जखन गयासुद्दीन तुगलक तिरहुत पहुँचलाह तखन सब राजा लोकनि आत्म समर्पण केँ देलन्हि।वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा पड़ा केँ नेपाल चल गेलाह आर तिरहुत पर तुगलक शासन स्थापित भगेल। (विशद् विश्लेषणक हेतु देखु हमर लिखल पोथी –“हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत”) चण्डेश्वर ठाकुरक दान रत्नाकर आर ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्तसमागम नाटक तथा उमापतिक परिजात हरण नाटक सँ एतवा धरि स्पष्ट होइयै जे i) हरिसिंह देव म्लेच्छ सँ आप्लावित पृथ्वी केँ मुक्त कएने छलाह आर, ii) वो कोनो सुरत्राण केँ पराजित कएने छलाह आर iii) पृथ्वी पर जे म्लेच्छ लोकनि भार स्वरूप छथि तकरा सँ वो पृथ्वी केँ हलुक केने छलाह। फरिस्ताक कथन जे हरिसिंह देव सपरिवार गिरफ्त भेलाह से मान्य नहि अछि कारण आँखिक देखल हाल लिखनिहार वसातिनुलउंस मे एकर समर्थन नहि केने छथि। ओहि मे ई स्पष्ट लिखल अछि जे राजा भागि केँ नेपाल चल गेलाह आर ओतहि बसि गेलाह। परिस्थिति सँ वाध्य भए भागि जेबाक कथा आर पहाड़ मे घुसिया जेवाक बात मैथिली परम्परा मे निम्नलिखित श्लोक मे सुरक्षित अछि। “वाणाब्धि बाहु सम्मित शाकवर्षे पौषस्य शुक्ल दशमी क्षितिसूनुवारे यकत्वा स्व–पट्टन पुरी हरिसिंह देवो दुर्दैव दिशित पथे गिरिमाविवेश”– मिथिला सँ निराश्रित भेला पर हरिसिंह देव पड़ा केँ नेपाल गेला जतए १० वर्ष पूर्व चण्डेश्वर ठाकुर किरात आर क्षत्रिय शासक लोकनि केँ हराके मिथिलाक प्रभुत्व स्थापित कएने छलाह। हरिसिंह देव नेपाल पहुँचि सूर्यवंशी राज्यक स्थापना केलन्हि से कहल जाइत अछि। वो भात गाँव मे अपन केन्द्र बनौलन्हि। नेपाल पर मिथिलाक आक्रमणक तिथि लकए इतिहासकार मे मतभेद छन्हि। दिलीरमण रेग्मी १३१४ (चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक तिथि) केँ नेपाल पर आक्रमणक तिथि मनैत छथि परञ्च भगवान लाल इन्द्र जी आर राइट महोदय १३२४ ई. केँ (जखन हरिसिंह देव मिथिला सँ पड़ाय ओतए पहुँचलाह)। अहि दुनु तिथि मे कोनो संघर्षक गुंजाइश नहि अछि यदि हमरा लोकनि एकरा अहि ढ़ँगे देखी–चण्डेश्वर मिथिला राज्यक मंत्री हिसाबे नेपाल केँ जीतने छलाह आर तहिया सँ पुनः नेपाल मिथिलाक अधीन भगेल छल। हरिसिंह देव जखन ओतए पहुँचलाह तखन वो विधिवत अपना केँ ओतुका शासक घोषित केलन्हि आर भातगाँव मे अपन प्रधान कार्यालयक स्थापना केलन्हि। अहि दुनु मे विशेष साम्य अछि। १३१४ सँ १३२४ धरि वो मिथिला सँ नेपाल पर राज्य करैत छलाह मुदा १३२४ क पछाति मुख्यरूपेण नेपालक एकमात्र शासक भगेलाह। १३१४ क बादहि सँ नेपाल मे मैथिल लोकनिक आवागमन शुरू भगेलन्हि। मिथिला मे मुसलमानक प्रकोप बढ़ल आर नेपाल मे मल्ल लोकनिक मुदा हरिसिंह देव बड्ड चतुर व्यक्ति छलाह आर वो ओतुक्का मल्ल लोकनिक संग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित क लेलन्हि। नेपालक वंशावली आर शिलालेख अहिबातक सबूत अति जे हरिसिंह देव नेपाल मे जाकए नीक जकाँ जमि गेल छलाह आर हुनक प्रभुत्व ओहिठाम नीक जकाँ स्वीकृत भगेल छलैन्ह। काठमाण्डुक एकटा शिलालेख मे हरिसिंह देव केँ कर्णाट वंशोद्भव आरकर्णाट चूड़ामणि कहल गेल छन्हि।- __ “जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः प्रोढ़ प्रतापोदयः तद्वंशे विमले महारिपुहरे गाम्भीर्य रत्नाकरः कर्त्तायः सरसामूपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षप्रियो नेपाले पुनराधाइभव युते स्थैर्यः चिरम्विद्यते”। हरिसिंह देवक उत्तराधिकारी केँ चीनी सम्राट नेपालक कानूनी शासक मानैत रहथिन्ह। कर्णाट वंशक पतन:- हरिसिंह देवक बाद मिथिला मे कर्णाट वंशक पतन भगेल। बहुत रास साहित्यिक साधनक अध्ययन केला संता एवं पाण्डुलिपिक पुष्पिका सब केँ देखला सँ ई प्रतीत होइछ जे हरिसिंह देवक नेपाल पड़ैला उत्तरो मिथिला मे वचल कर्णाट लोकनि मिथिलाक स्वतंत्रताक हेतु संघर्ष करैत रहलाह आर मुसलमान लोकनिक पैर केँ नहि जमे देल गेल। कर्णाट वंशक अंतो भेला पर मिथिलाक किछु क्षेत्र सब मे कर्णाट शासन विद्यमान छल आर एकर प्रमाण भेटैत अछि। श्रीवल्लभाचार्य कर्णाट राजवंशक उल्लेख कएने छथि। वो अपन सम्बन्ध मे सब सँ महत्वपूर्ण अछि। मधुसूदन ठाकुरक ‘कण्टकोद्धार’ पुस्तकक पुष्पिका। मधुसुदन ठाकुर कर्णाट चक्रवती महाराजाधिराज रामराजक अधीन रहि केँ लिखने छलाह। पुष्पिका मे लिखल अछि–“इति महाराजाधिराज कर्णाट चक्रवति भुजबल भीम समस्त दिग्विजयार्जित समस्त संतोष निखिल भूमण्डल श्री रामराज कारितायां महामहो पाध्याय समृपकुर श्री मधुसुदन कृता वनुमान लोक कण्टकोद्धारः सम्पूर्ण मिति। लं.सं.५२९ फाल्गुन शुक्लाष्टम्याँ मध्ययन शालिना श्री भवदेव शर्मणा भौरग्रामेऽपूरीय मिति”। अहि सँ स्पष्ट होइछ जे कर्णाटवंशक किछु लोकनि हरिसिंह देवक वादो मिथिला मे शासन करैत रहलाह भनेऽ हुनक क्षेत्र सीमित आर छोट रहल हो। ओइनवार वंशक बादो वो लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र मे शासन करिते रहि गेला। ओइनवार वंशक समाप्त भेलो पर जे अराजकताक स्थिति उत्पन्न भेल छल ताहु सँ लाभ उठाकय कर्णाट रामराज अपन प्रभाव क्षेत्रक विस्तार केने होथि से संभव। सकरपुरा ड्योढ़ी (राजपुतक जमीन्दारी) सेहो नान्यदेवक वंशजक अंग छथि आर मिथिलाक राजपुत लोकनि सेहो नान्यदेवक वंशजक अंग छथि आर मिथिलाक राजपुत लोकनि सेहो कर्णाट कुल सँ अपन सम्बन्ध जोड़बा मे गौरवांवित बुझैत छथि। मुसलमानी आक्रमणक चलते मिथिला मे कर्णाट वंशक अंत भेल। हरिसिंह देवक बाद केओ योग्य शासक नहि रहि गेलाह जे अहिठाम कर्णाटवंश केँ दृढ़ करितैथ आर ओम्हर तुगलक लोकनि जखन अहिठामक शासन भार अपना हाथ मे लेलन्हि आर देखलन्हि जे चलाएब असंभव अछि तखन वो लोकनि एहेन व्यक्तिक खोज करए लगलाह जिनका पर हुनका विश्वास हटि चुकल छलैन्ह तैं वो लोकनि सुगौनाक राजपंडित कामेश्वरक वंशज केँ अपन प्रतिनिधि चुनलैन्ह आर मिथिलाक शासन वागडोर हुनके लोकनिक हाथ मे देलन्हि। फिरोजशाह शाह तुगलक भोगीश्वर केँ प्रियसरवा कहि केँ संबोधित कयने छथि। १०९७ सँ १३२५ धति कर्णाट लोकनि मिथिला पर शासन कए एकटा अमिट छाप छोड़ने छथि जाहि सँ मिथिलाक निजी व्यक्तित्व विकास भेल आर मैथिली संस्कृतिक पृष्ट पोषण सेहो। परञ्च ऐतिहासिक नियमक अनुसार सामंतवादी व्यवस्थाक गुण–दोषक चलते जेना सब राज्यक पराभव भेल छैक तहिना मिथिलाक कर्णाट राज्य अपन अवधिक पूर्ण कए लुप्तप्राय भेल आर मिथिला मे मुसलमानी शक्तिक प्रादुर्भावक संगहि ओइनवारक स्थापना कर्णाट वंशक अवशेष पर भेल। परिशिष्ट चण्डेशवर ठाकुरक कृत्य रत्नाकरक किछु आवश्यक श्लोक– _ अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिर्निः शेष विद्वोषिणां निर्माथी मिथिलां प्रशासदखिलाँ कर्णाटवंशोद्भवः। आशाः सिञ्चति यो यशोभिरमलैः पीयूष धारा द्रवैर्देवः सारद शर्वरी पति रिवाशेष प्रिवंभावुकः॥ आस्मिन्दिग्विज योद्यते बलभरा त्कुब्जी भवद्भिः फणै रन्योन्यं निविङं मिलद्भिरभितः शेषः सहस्रेणसः गच्छत्यम्बुजबान्धवे दिन पतौ प्रत्यक् पयोधेरधः सधः सङ्कुचदब्जकोरक वपुः सादृश्यमालम्बते॥ मा माखेदं भजध्वं जलधिमुपगतेबान्ध्वे पंकजाना मंतः पञ्चेपुरोष व्यसन भयजुषाश्चक्र वाकावराकाः। श्रीमत्कर्णाट भूमीपति मुकुट मणिः प्रीणयन्नध लोका– नेष प्रौढ़ प्रतापद्युमणिरूदयिनी संपदं संतनोति॥ एतस्याद्भुत संधि विग्रह धुरां वोढ़ा पाविवीकृत– क्ष्मालोका शरदिन्दु सुन्दर यशः संदोदृगंगाम्बुभिः॥ आसीन्मंत्र मयधुति प्रतिहता मित्रान्धकारोदयो देवादित्य इतिप्रसन्नहृदयो देवद्रुमोजङ्गुमः॥ - यः संधि विग्रह विधौ विवि धातुभावः शौर्योदयेन मिथिलाधिपराज्यभारम्। निर्मत्सरं सुनयसाञ्चित कोषजातम् सप्तांग रूंघटन सम्मृत मेव चक्रे॥ प्रज्ञावताँ सदसि संसरि वाक्पटूनां राज्ञांसभासु परिषत्स्वपि मंत्र भाजाम्। चितऽर्विनाञ्च कविताश्व पिसत्कवीनां वीरेश्वरः स्फुरति विश्व विलासि कीर्तिः श्रीमान मुष्यतनयो नवचन्द्र चारू राचारवन्धविग्रह धुरौण पदालम्ब– श्चण्डेश्वरो विजयते सचितावतंसः। उन्मूल्याद्रि नितम्बमम्बर मणिं कृत्वापताकाऽऽवृतं, सेनोद्धू तरजोभरेरेनिनभृतं भित्वा महाकर्डमम्। दुर्गसत्पथ मातनोद् दृढ़मथो निर्मायदुर्गसमंतादयम्– र्नेपाल क्षितिपालवर्गमनयद् दुर्ग समंतादयम्। आलीनं गिरिकन्दरासु विपनेलंतर्हितं निर्झरे, गंभीरे चिरंमग्नमद्रि शिखर प्राग् भारमाप्य स्थितम्॥ नेपाले विजिते बलेन सुतरां भीता त्मेभिर्भमियै–, र्विस्मृत्यधुमणेः कुले भगवतः स्वंजन्मतत्ततकृतम्॥ एषमैथिल मही भुजा भुज द्वन्द वारित समस्त वैरिणा श्री विद्याविनि कुलक्रमागते संधिविग्रह पदेनियोजितेः॥ गणेश्वर ठाकुरक सुगति सोपानक आरंभक श्लोक– __अभू द्देवादित्यः सचिव तिलको मैथिल पते– र्निज प्रज्ञा ज्योतिर्द्धलित रिपु चक्रान्ध तमसः।, समंताद श्रांतोल्लसित सुहृद केपिल ममौ समुद भुते यास्मिन द्विज कुल सरोजैर्विकसितम्। अस्मान्महादान तड़ागयाग भूदान देवा लय पूत विश्वः। वीरेश्वरोऽजायत मंत्रिराजः क्ष्मापालचूड़ामणि चुम्बितांङ्घ्रः। लसन्मही पाल किरीट रत्न रोचि छ्रय राज्जतपाद पद्मः। अस्यानुजन्मा गुणगौरवेण गणेश्वरो मंत्रिमणिश्चकास्ति। संशोष यन्ननिश मौर्व (मैर्ष) निभ प्रतापै– र्गौड़ावनी परिवृढ़ं सुरतान सिन्धुम् धर्मा वलम्बनकरः करूणार्दचेता– यस्तीर भुक्ति मतुलामतुलः प्रशास्ति॥ श्रीमानेषु महामत्तक महाराजा धिराजोमहा– सामंतधि पतिर्विक स्वर यशः पुष्पस्यकल्पद्रुमः। चक्रे मैथिलनाथ भूमि पतिभिः सप्तांग राज्यास्थिति– प्रौढ़ानेक वंशव्वेदैहक हृदयो दोः स्तम्भ सम्भावितः॥ वेदस्मृति पुराणादि दृष्ट्वा लोकहितैषिणा कृतं सुगति सोपानं श्रीगणेश्वर मंत्रिणा॥ गणेश्वरक पुत्र रामदत्त– _संधि विग्रह मंत्रीन्द्र देवादित्य ननुद्भवः। भूमिपाल शिरिरत्न रज्जिताङघ्रस रोरूह। सान्धि विग्रहिकः श्रीमद्वीरेश्वर सहोदरः महामत्तकः श्रीमान विराजति गणेश्वरः। श्रीमता रामदत्तेन मंत्रिणा तस्य सुनुना। पद्दतिः क्रयते रम्या धर्म्या वाज सेनयियाम्॥ उपर्युक्त श्लोक सब सँ कर्णाट कालीन मिथिलाक इतिहासक विविधयक्ष पर यथेष्ट प्रकाश पड़इयै तैं अहिठाम ओहिसब केँ परिशिष्टक रूप मे जोड़ि देल अछि। तिथि आर तथ्यक सम्बन्ध अद्यपर्यंत विवाद बनले अछि तैं ओहि सम्बन्ध मे कोनो निर्नय देव असंभव। (विशेष विवरणक हेतु हमर निबन्ध– ‘द कर्णाट्ज आफ मिथिला’) . अध्याय–८ ओइनवार वंशक इतिहास (२०९–२४३) कर्णाट वंशक परोक्ष भेला पर मिथिला मे ओइनवार वंशक राज्य प्रारंभ भेल। ओइनवार वंश केँ ‘कामेश्वर वंश’ तथा ‘सुगौना वंश’ सेहो कहल गेल छैक। ‘कामेश्वर वंश’अहि कारणे कि राज पंडित कामेश्वर अहि वंशक संस्थापक छलाह और ‘सुगौना वंश’अहि कारणे कि सुगौना मे अहि वंशक राजधानी छल। ओइनवार लोकनि ‘खौआड़े जगत्पुर’ मूलक काश्यप गोत्र मैथिल ब्राह्मण रहैथ। हिनक पूर्वज मे जयपति, हुनक पुत्र हिङ्गु आर हुनक पुत्र ओएन ठाकुर छलाह। वो अत्यंत विद्वान आर परम तपस्वी छलाह आअ हुनके कोनो कर्णाट राजा सँ ‘ओइनि’ गाम दान मे भेटल छलैन्ह। अहि कारणे अहि वंशक नाम ओइनवार वंश पड़ल। ओएन ठाकुरक पुत्र भेला अतिरूप, अतिरूपक पुत्र विश्वरूप, हुनक पुत्र गोविन्द, हुनक पुत्र लक्ष्मण आर लक्ष्मण ठाकुरक छटा पुत्र छलथिन्ह–यथा i) राज पण्डित कामेश्वर, ठाम–ठाम एकटा सातम पुत्रक उल्लेख अवइयै जकर नाम रामेश्वर छल। अहि छः मे सँ एक गोटएक वंश अहुखन मालदह जिला मे विराजमान छथि। ii) हर्षण, iii) त्रिपुरे, iv) तेवाड़ी, v) सलखन, vi) गौड़ एहेन बुझनाजाइत अछि जे कर्णाट शासक हरिसिंह देवक पड़ैलाक बाद मिथिला मे कर्णाट लोकनिक सत्ताक ह्रास भेल आर शासनक उलट–फेर बरोबरि होइत रहल। गयासुद्दीन तुगलक शासनक हेतु अपन प्रबन्ध केलन्हि आर हुनक पुत्र मुहम्मद तुगलकक समय मे मिथिला तुगलक साम्राज्यक एकटा प्रांत बनि चुकल आर एकरा तुगलक पुर अथवा तिरहूत सेहो कहल जाइत छलैक। १३२३–२४ सँ करीब ३० वर्ष धरि एक प्रकारक अव्यवस्था बनल रहलैक। कर्णाट लोकनि अपन सत्ता केँ पुनः स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील एवं संघर्षशील बनल रहलाह मुदा हुनका लोकनि केँ कोनो सफलता हाथ नहि लगलन्हि आर छिट–पुट भए एम्हर–ओम्हर मे विखैर गेलाह आर यत्र तत्र अपन क्षेत्र बना केँ रहए लगलाह। ओम्हर दिल्ली सँ तिरहूतक शासन करब कोनो आसान काज नहि छल कारण पूव सँ बंगालक गिद्ध दृष्टि सेहो मिथिला पर लगले रहैत छलैक आर जहाँ दिल्लीक दिसि सँ कनिओ ढ़िलाई भेलैक कि बंगाल बाला सब घर मिथिला पर चढ़ि वैसैत छल। ई एकटा एहेन कटु सत्य छल जकरा दिल्ली नकारि नहि सकैत छल। दिल्लीक हक मे मिथिलाक दिल्लीक अंग बनल रहब सामरिक दृष्टियें महत्वपूर्ण छलैक कारण तखन दिल्ली मिथिला केँ अड्डा बनाए बंगालक हक मे मिथिला केँ बंगालक पक्ष मे रहब उचित बुझना जाइत छलैक आर तैं बंगाल आर दिल्ली तथा पश्चिमक आन राज्य अहि दृष्टियें मिथिला केँ देखैत छल। मिथिलाक शासक लोकनि अहि अवसर सँ लाभ उठाय अपन स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ ताक मे रहैथ छलाह परञ्च ओइनवार वंश मे कर्णाट शासक नान्यदेव अथवा हरिसिंह देव सन केओ योग्य आर कुशल शासक नहि भेला तैं अहि मौकाक लाभ उठेबा मे असमर्थ रहलाह। शिवसिंह सब सँ योग्य, कर्मठ, एवं स्वतंत्र प्रेमी व्यक्ति छलाह आर तँ मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ अपन प्राणक बाजी लगौलन्हि। ओइनवार वंश मे शिवसिंह आर भैरवसिंहक नाम चिर स्मरणीय रहल कारण वो दुनु गोटए अपना–अपना ढ़ँगे मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ किछु उठानहि रखने छलाह। १३२४ आर १३५५क मध्य मिथिलाक श्रृंखलावद्ध इतिहासक अभाव अछि। तुगलक काल मे मिथिला दिल्लीक प्रांत छल आर एकर उल्लेख हम पूर्वहिं कचुकल छी। बंगाल केँ ई बात पसिन्न नहि छलैक आर बंगालक शासक हाजी इलियास शाह सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी शासक छल। तिरहूत पर आक्रमण करबाक ओकर मूल उद्देश्य ई छलैक जे ओहि बाटे वो नेपाल पर आक्रमण कए हाजीपुर धरि पहुँचि गेल आर हाजीपुरक स्थापना अपना नाम पर केलक जकर प्रमाण नेपाल सँ प्राप्त एकटा शिलालेख अछि। तुगलक लोकनि केँ ई बात सहाय्य नहि भेलैन्ह आर फिरोज तुगलक तुरंत एकर बदला लेबाक हेतु मिथिला बाटे बंगाल पर आक्रमणक योजना बनौलन्हि। बरनीक विवरण सँ स्पष्ट अछि जे फिरोज गोरखपुर, खरोसा आर तिरहूतक बाटे बंगाल दिसि गेल छलाह आर संभवतः राजविराज लग कोशी नदी केँ टपने छलाह। मधुबनी जिला मे अखनो एकटा पिरूजगढ़ नामक स्थान अछि जे फिरोज तुगलकक बाटक संकेत दइयै। १३५५क आसपास ई घटना घटल छल। फिरोज शाह सब स्थिति केँ देखि अहि निर्णय पर पहुँचल हेताह जे मिथिलाक आंतिरिक स्वतंत्रता केँ सुरक्षित राखिये केँ वो मिथिला केँ दिल्लीक मित्र बना केँ राखि सकैत छथि। अहि तथ्य केँ स्वीकार कए वो एकटा दूरदर्शिता आर कूटनीतिज्ञाताक परिचय देलन्हि। मिथिलाक स्वतंत्रताक स्वीकृति दए वो ओइनवार लोकनिक अधीन मिथिलाक शासन भार छोड़लन्हि आर ओहि क्रम वो ओइनवार वंशीय ‘भोगिसराय’ केँ अपन प्रियसखा कहि केँ संबोधित केलन्हि। मिथिला पुनः स्वतंत्र रूपें अपन शासन प्रारंभ केलक परञ्च ताहि दिनक समय एहेन छल कि चारूकात दिन राति खट–पट होइते रहैत छल। मैथिली परम्पराक अनुसार फिरोज तुगलक राज पण्डित कामेश्वर केँ मिथिलाक राज्य देने छलाह आर हुनक पुत्र भोगीश्वर केँ ‘प्रियसखा’ कहि सम्मान केलन्हि। राजपण्डित कामेश्वर ‘ठाकुर’ ठाकुर कहबैत छलाह तैं किछु गोटए अहिवंश केँ ‘ठाकुर वंश’ सेहो कहैत छथि। वर्धमानक गंगकृत्य विवेक मे कहल गेल अछि “कामेशो मिथिला मासत”।कामेश्वर स्वयं सिद्धपुरूष एवं योगी होयबाक कारणे मिथिलाक राज्य गछवा लेल तैयार नहि छलाह तथापि भोगीश्वरक आग्रह वो गछलन्हि आर किछु दिन शासन केलन्हि। कामेश्वर केँ ‘राय आर ‘राजपण्डित’ दुनु कहल गेल छन्हि। कामेश्वरक बाद भोगीश्वर राजा भेलाह। हुनको ‘राय’ कहल जाइत छलैन्ह आर कीर्तिलता सँ ज्ञात होइछ जे वो फिरोज शाहक परम मित्र छलाह। भोगीश्वरक बाद गणेश्वर शासक भेलाह। हुनक समय मे ओइनवार वंश मे बटवारा हेतु संघर्ष भेल जाहि मे लोग दू दल मे बटि गेलाह–एक दल भोगीश्वरक छोट भाई भवासिंहक समर्थक छल आर दोसर दल गणेश्वर। जे भेल हो मुदा हम देखैत छी जे गणेश्वर राजा भेलाह। भवेशक पुत्र द्वय कुमर हरसिंह आर कुमर त्रिपुर सिंह केँ ई बात अप्रिय बुझि पड़लैन्ह आर वो लोकनि अरजुन राय आर कुमार रत्नाकरक मदति सँ गणेश्वरक वध केलन्हि। तत्पश्चात भवेश राजा भेलाह। भवेशक दरबारे मे चण्डेश्वर ठाकुर अपन ‘रत्नाकर’– विशेष कए राजनीति रत्नाकरक रचना केने छलाह। विद्यापतिक कीर्तिलता मे अहि घटनाक विवरण दोसरा ढ़ंगे अछि। विद्यापतिक अनुसार गणेश्वरक हत्या अर्सलान नामक एक मुसलमानक हाथें भेल छल जे मिथिलाक तत्कालीन अराजक स्थिति सँ लाभ उठा केँ मिथिलाक राज्य केँ हथिया लेने छल। मैथिली परम्परा मे सेहो अहि प्रश्न पर मतैक्य नहि अछि मुदा सब साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केला संता ई स्पष्ट होइछ जे मिथिला मे ताहि दिन मे गद्दीक हेतु गृहयुद्धक स्थिति विराजमान छल। गणेश्वरक दुनु पुत्र कीर्तिसिंह आर वीरसिंह बालिग भेला पर अपन पितामह भ्राता भवसिंह सँ राज्यक हेतु प्रार्थना केलन्हि परञ्च से नहि भेटलन्हि। अपन पिताक हत्याक प्रतिशोध लेबाक हेतु ई दुनु भाई जौनपुर राजा इब्राहिम शाहक ओतए साहाय्यक हेतु पहुँचलाह। महामहोपाध्याय परमेश्वर झा लिखैत छथि जे कीर्तिसिंह वीरसिंह फिरोज शाहक ओतए नालिस कएल आर फिरोज शाह मिथिला पर चढ़ाइ कए हरसिंह त्रिपुर सिंह केँ मारि राज्य कीर्तिसिंह केँ फिरौलन्हि। मुदा विद्यापतिक कीर्तिलता सँ अहि बातक समर्थन नहि होइछ। बायक वैरि केँ कीर्तिसिंह सधौलन्हि से बात ठीक अछि मुदा अहि हेतु फिरोजशाह मिथिला पर आक्रमण केने छलाह तकर कोनो प्रमाण नहि आछि। अहि गृहयुद्धक क्रम मे दुनु पक्ष तत्कालीन मुसलमानी प्रतिनिधि सँ साहाय्यक अपेक्षा रखने होथि तँ कोनो आश्चर्यक बात नहि आर अहिक्रम मे गणेश्वर केँ अपने सँ नहि मारि कोनो मुसलमानक हाथे मरबौने होथि सेहो संभव कारण जखन लोक ज्ञान आर तर्क केँ स्वार्थ वश तिलांजलि दैत अछि तखन वो कोनो प्रकारक काज (नैतिक–अनैतिक)क वैसइयै। भैय्यारी मे जखन अहि प्रकारक झगड़ा होइत तखन तँ दुश्मन लाभ उठवे करइयै। विद्यापति ओइनवार वंश सँ एत्तेक घनिष्ट छलाह कि वो अहि घिनौना बात केँ दावि देलैन्ह आर एकर कतहु चर्चौ धरि नहि केलन्हि आर गणेश्वरक हत्याक उत्तरदायित्व अर्सलान पर देलन्हि। मुदा विद्यापतिक विवरण सँ एतवा धरि नहि केलन्हि आर गणेश्वरक हत्याक उत्तरदायित्व अर्सलान पर देलन्हि। मुदा विद्यापतिक विवरण सँ एतवा धरि तैं स्पष्ट अछिये जेनाहि दिन मे मिथिला मे चारूकात अराजकता पसरल छल आर केओ ककरो कहब मे नहि छल। ‘अर्सलान’ अर्थ होइछ ‘वीर’ ‘बहादुर’, ‘जमामर्द’ इत्यादि। वीर अफगान नामक पदाधिकारी ताहि दिन तिरहूत मे छल आर इहो संभव अछि जे गृहयुद्धक स्थिति केँ देखि वो एक पक्षक भगेल हुए आर स्वयं मिथिलाक राज्य हथिया लेने हुए। गणेश्वरक मृत्युक कारण अखनो धरि मिथिलाक इतिहास मे एकटा समस्या मूलक प्रश्न बनल अछि आर विद्यापति ओकरा झँपबाक हेतु सब प्रयास कएने छथि कारण गणेश्वरक पुत्रक प्रति विद्यापति सहानुभूति रखैत छलाह आर हुनक अधिकारक स्थापनाक हेतु हुनका लकए जौनपुर सेहो गेल छलाह। वो कीर्तिसिंह केँ ‘पुरूष श्रेष्ठ’ क कोटि मे रखने छथि आर मैथिल कवि दामोदर मिश्र अपन छन्द ग्रंथ “वाणी भूषण” मे सेहो कीर्ति सिंहक सम्बन्ध मे निम्नालिखित उद्गम प्रगट केने छथि। ___ “कीर्ति सिंह नृपजीव यावद मृत धुति–तरणी” ___ “त्वयि चलति चलति वसुधा वसुधा धिप कीर्तिसिंह धरणी रमणे”। कीर्तिलता मध्यक विवरण एतवा धरि अवश्य स्पष्ट कदैत अछि जे तत्कालीन स्थिति गंभीर छल आर जौनपुरक शासक मिथिलाक राजकुमारक सहायता केने छ्लथिन्ह। उपेन्द्र ठाकुरक मत छैन्ह जे गणेश्वरक समय मे मिथिलाक बटबारा भगेल छल आर ओइनवार वंश दू भाग मे बटि केँ शासन करैत छल। भवसिंहक शासक हैव तैं चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर सँ प्रमानित अछि। परञ्च गणेश्वरक पुत्र स्थिति कि छल से कहब असंभव। उपेन्द्र ठाकुर मिथिला केँ जौनपुरक सामंत राज्य हौयबाक बात कहने छथि मुदा एकर कोनो प्रमाण वो नहि देने छथि आर कीर्ति सिंहक सम्बन्ध मे जे तिथि देल गेल अछि सेहो गलती अछि। भवेशक दुर्दशा केँ समस्त मिथिला केँ एक रखबाक यथेष्ट प्रयास केने छलाह। कन्दाहा अभिलेख मे हुनका ‘पृथ्वी पति द्विजवरो’ भवसिंह कहल गेल छन्हि आर विद्यापति अपन शैव सर्वस्वसार मे हुनक वैभवक वर्णन करैत लिखैत छथि– ___ “गंगोहुंग तरंगिता मललसत् कीर्तिच्छटाक्षालित क्षोणिक्ष्मातल सर्वपर्वत वरो वीरट्रतालंकृत. . .“ भवसिंह एतेक प्रतापी शासक छलाह जे छोट–छोट सामंत शासक हुनका डरे थर–थर कंपैत छल। वो सब सतत अपन माथ हिनका पैर टेकने रहैत छल। भवसिंह प्रतापी राजा छलाह आर दानी सेहो। वाग्मतीक तट पर वो अपन पार्थिव शरीर केँ त्यागलन्हि आर ओहिठाम हुनक दुनु पत्नी सेहो सती भेलथिन्ह। भवसिंहक बाद देवसिंह राजा भेलाह। परमेश्वर झाक अनुसार ओइनि मे कीर्ति सिंहक राज्य भेने राति दिन खट पट होइतैन्ह तैं महाराज भवसिंह अपन अंतिम समय मे ओहि स्थान केँ त्यागि दरभंगा सँ दक्षिन वाग्मती तट पर अपन स्कन्धावार बनौने छलाह। देवसिंह जखन राजा भेलाह देकुली मे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहिठाम अखनो स्मार्त निबन्धकर्ता धर्माधिकारी अभिनव वर्धमान उपाध्यायक स्थापित“वर्धमानेश्वर” नामक महादेवक मंदिर अछि। देवसिंहक विरूद्ध ‘गरूड़नारायण‘छलैन्ह। हुनक पत्नीक नाम छलिन्ह हासिनी देवी। पुरूष परीक्षा आर शैवसर्व स्वासारक अनुसार देवसिंह एक कुशल प्रशासक आर सफल विजेता छलाह। मिथिलाक एक उदारशासकक रूप मे वो सेहो प्रसिद्ध छथि कारण वो ‘तुला पुरूषदान’ सेहो करौने छलाह। कृषि आर जनकल्याणक हेतु वो अपना राज्य मे बड्ड पैघ–पैघ पोखरि सेहो खुनौने छलाह। एक पोखरिक नाम देवसागर छल आर ओहि सँ सटल वस्तीक नाम सगरपुर छल। वो विद्या आर संस्कृतिक समर्थक सेहो छलाह आर विद्यापतिक अनुसार वो “वीरेषु मान्याः सुधियाँ वरेण्योः” छलाह। हुनके कहला पर विद्यापति “भूपरिक्रमा” लिखने छलाह जाहि मे नैमिष्य जंगल सँ मिथिला धरिक बलदेवक यात्रा विवरणक उल्लेख अछि। संगहि अहि मे नीतिपरक कथा सेहो कहल गेल अछि। देवसिंहक अनुअमति सँ श्रीदत्त एकाग्निदान पद्धतिक रचना केलन्हि। हुनके समय मे मुरारिक पितामह हरिहर प्रधान न्यायाधीश छलाह। हिनके दरबार मे स्मृति तत्वामृतक रचयिता अभिनव वर्द्धमान रहैत छलाह आर वो धर्माधिकारी सेहो छलाह। देवसिंहक समय मे आवि केँ मिथिलाक दुर्व्यवस्था मे थोड़–बहुत सुधार भेल आर आव वो लोकनि अहि बात केँ बुझए लगलाह जे जाधरि ओइनवार वंश पुनः एकजूट भए प्रयत्नशील नहि रहत ताधरि मिथिलाक दुर्व्यवस्था बनले रहतैक। देवसिंह अहि दिशा मे विशेष प्रयास केने छलाह आर अपना चारूकातक क्षेत्र पर अपन प्रभाव केँ दृढ़ करबा मे किछु उठा नहि रखने छलाह। कीर्तिसिंहक ओहिठाम सँ देवसिंहक दरबार मे विद्यापतिक आएब एकटा विचारणीय विषय अछि। विद्यापति ओइनवार कुलक सब किछु छलाह आर ओइनवारक नेतृत्व मे मिथिलाक स्वतंत्रता केँ सुरक्षित देखए चाहैत छलाह। तैं जखन देवसिंहक प्रयास सँ विद्यापति केँ ई विश्वास भेलैन्ह जे ई समस्त मिथिलाक एकता एवं स्वतंत्रताक हेतु प्रयत्नशील छथि तखन वो कीर्तिसिंहक संग छोड़ि देवसिंहक ओतए एतए आर तहिया सँ यावज्जीवन हुनके वंशजक संग रहलाह। जे विद्यापति गणेश्वरक हत्याक वाद कीर्तिसिंहक हकक हेतु सब किछु केने रहैथ सैह विद्यापति जखन देखलन्हि जे कीर्तिसिंहक नेतृत्व मे मिथिलाक एकता संभव नहि वांचत तखन वो अपन निर्णय बदलि देलन्हि आर देवसिंहक प्रयास मे सहयोग देलन्हि आर देवसिंहक प्रयास मे सहयोग देलन्हि। ‘घर फुटे गँवार लूटे’क कहावत मिथिला मे चरितार्थ भचुकल छल आर एकर कि परिणाम होइछ से विद्यापति देखि चुकल छलाह तैं वो देवसिंहक वंशजक संग अपन मृत्यु धरि वो मिथिलाक एकता एवं स्वतंत्रताक हेतु तल्लीन रहलाह आर स्वयं युद्ध एवं शांति मे एक रंग बहादुर जकाँ ठाढ़ रहलाह। देवसिंहक ज्येष्ठ पुत्र शिवसिंह विद्यापतिक अभिन्न छलथिन्ह आर शिवसिंह मिथिलाक इतिहास पर जे अमिट छाप छोड़ने छथि तकरा विद्यापति अपन लेखनी आर अमर बना देने छलथिन्ह। शिवसिंह:- ओइनवार वंशक सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रसिद्ध आर एतिहासिक दृष्टिकोण सँ सब सँ महत्वपूर्ण शासक छलाह शिवसिंह। हिनक विरूद्ध छलन्हि रूपनारायण। ई दुनु भाई छलाह अपने आर पदमसिंह। बाल्य कालहि सँ ई राजदरबार मे रहैत छलाह आर बालिग भेला पर अपन पिताक सबटा राज्यक कार्य करैत छलाह। ई बड्ड तीक्ष्ण बुद्धिक लोक छलाह आर राजनीति मे सर्वथा निपुण सेहो। योग्य राजकुमार बनेबाक विचारे हिनक पिता देवसिंह हिनका विद्यापतिक संग लगौने रहथिन्ह आर नीति मे निपुणता प्राप्त करेबाक हेतु विद्यापति शिवसिंहक आदेशानुसार ‘पुरूष परीक्षा’क रचना केने छलाह। विद्यापतिक गीत मे १२९ पद मे (११२+१७) शिवसिंहक नाम अछि। १५ वर्षक अवस्थहिं सँ ई राज्यक प्रशासन मे हाथ बटबैत छलाह। जखन वो राजा भेलाह तखन वो देकुली (देवकुली) सँ अपन राजधानी हटा केँ गजरथपुर अनलन्हि। ओकरा शिवसिंहपुर सेहो कहल जाइत छैक। अहिठाम गजरथपुर सँ शिवसिंह विद्यापति केँ दान देने छ्लथिन्ह। राज्य प्रशासन मे हाथ बटेबा काल हुनका अपन परम मित्र एवं अभिन्न विद्यापति सँ सेहो सहयोग भेटैत रहैन्ह। शिवसिंह परम विद्वान, उदार, सुन्दर, तथा प्रतापी छलाह। हुनक खुनाओल पोखरि वारि भड़ौरा मे रजोखरि नाम सँ प्रसिद्ध अछि आर हुनक बनाओल सड़क सब रजबान्ह (राजबन्ध) शिवसिंहपुर सँ राजवाड़ा घोड़ दौड़ धरि हुनक गजरथक सड़क अत्यंत सुदृढ़ आर चाकर अछि। पोखरि आर सड़क वो प्रजाक कल्याणार्थ बनौने छलाह। एहि प्रसंग मे हुनका सम्बन्ध मे एकटा लोकोक्ति निम्नांकित अछि– ___ “पोखरि रजोखरि आर सब पोखरा, राजा शिवसिंह आर सब छोकड़ा। तालते भूपाल ताल आरो सब तलैया, राजा ते शिवसिंह आरो सब रजैया”॥ शिवसिंहक समय मे तिरहूतक राज्य शक्तिशाली भगेल छल। अपना चारूकातक परिस्थिति केँ ध्यान मे राखि वो अपन राजधानी गजरथपुर मे अनने छलाह आर राज्यक विभिन्न भाग सँ सड़क द्वारा ओकरा जोड़ने छलाह। गौड़ आर गज्जनक विरूद्ध वो संघर्ष केने छलाह जकर प्रमाण हमरा पुरूष परीक्षा सँ भेटइयै। देवसिंहक समय मे सेहो मिथिला मे मुसलमानी प्रकोप छल। परम्पराक अनुसार अपन पिताक शासनकाल मे मुसलमानी सेना सँ लड़बाक हेतु वो पठाओल गेल छलाह आर ओहि मे पराजित भेलाक कारणे गिरफ्त भेल छलाह। हुनके छोड़ेबाक हेतु विद्यापति गेल छलथिन्ह आर मुसलमानी शासक विद्यापतिक काव्य प्रतिभा सँ प्रभावित भए शिवसिंह केँ छोड़ि देने रहैन्ह आर विद्यापतिक बहुत सम्मान केने रहैन्ह। राजा भेलाह शिवसिंह अहि अपमान केँ बिसरल नहि छलाह आर तैं अपन स्वाभिमान आर मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ हुनका कतेको मुसलमान शासक सँ संघर्ष करए पड़लन्हि। जेना कि हम पूर्वहिं कहि चुकल छी जे मध्य युग मे मिथिला पर पश्चिम आर पूव दुनु दिसि सँ दबाब पड़ैत छल आर मिथिला ‘वेत्तसिवृत्ति’क नियम पालन करैत छल। दिल्ली, जौनपुर, बंगाल, सभहिक नजरि मिथिला पर छलैक। शिवसिंहक पूर्ण इच्छा छलैन्ह जे मिथिला केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र राज्यक रूप मे राखल जाए आर ताहि प्रयास मे वो कोनो कसैरि उठा नहि रखलन्हि। अपन कम दिनक शासन मे वो जाहि निपुणताक परिचय देने छथि से कोनो देशक राजाक हेतु एकटा गौरवक विषय। शिवसिंह केँ पँचगौड़ेश्वर सेहो कहल गेल छन्हि। बंगालो मे मिथिला जकाँ अराजक स्थिति छल आर ओतहु शिवसिंह जकाँ राजा गणेश ओहि स्थिति सँ लाभ उठा केँ ओतए अपन शासन स्थापित क लेने छलाह। हुनक पुत्र जदुसेन मुसलमान भगेलाह आर जलालुद्दीनक नामे ओतुका राजा बनलाह। वो शिवसिंहक समकालीन छलाह। शिवसिंह हिनका विरूद्ध अभियान शुरू केलन्हि आर हिनका पराजित केलन्हि आर हिनक राज्यक किछु अंश केँ अपना राज्य मे मिलौलन्हि। बंगाल पर विजय प्राप्त करबाक हेतु ई पंचगौड़ेश्वर कहाओल गेल हेताह से संभव ताहि काल मे पश्चिम मे जौनपुर इब्राहिम शर्कीक बड्ड प्रभाव छलैक आर बंगाल मे जखन मुसलमानी शासनक पराभव भेल तखन ओतए गणेशक उत्थान भेल। मिथिला मे शिवसिंह आर बंगाल मे गणेशक प्रादुर्भाव सँ पश्चिमक मुसलमान शासनक कान ठाढ़ भेल आर बंगालक मुसलमान संत लोकनि इब्राहिम शर्की केँ अहि बातक हेतु चेतौलन्हि। बंगालक निमंत्रण पर इब्राहिम शर्की बढ़लाह जहि सँ ओहिठाम पुनः मुसलमानी शासनक पुनर्स्थापित भसकए। एहिक्रम मे मिथिला मे हुनका शिवसिंह अंझट हैव स्वाभाविक कैयैक तँ शिवसिंह बंगालक जलालुद्दीन केँ पराजित कए ओतए धरि अपन राज्यक विस्तार क लेने छलाह आर संगहि मिथिला केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र सेहो। इब्राहिम केँ अहि दू मे सँ कोनो बात पसिन्न नहिये पड़ल होएतैन्ह आर तैं मिथिला पर आक्रमण करब हुनक बंगाल नीतिक एकटा प्रमुख अंग रहल होएत। शर्की कालीन अभिलेख तिरहूत मे मुल्ला तकिया देखने छलाह आर ताहि सँ ई बुझना जाइत अछि जे शिवसिंह के परास्त करबाक हेतु अथवा बदला लेबाक हेतु इब्राहिम शाह तिरहूत पर आक्रमण केने हेताह। हुनक समर्थक कीर्तिसिंहक प्रताप आव मिथिला मे नहि छलैक आर स्वाभिमानी एवं स्वतंत्रता प्रेमी शिवसिंहक शासन पूव–पश्चिम दुनु केँ चैलेंज करहल छलैक। एहना स्थिति मे इब्राहिम शर्की चुप्प वैसनिहार नहि छलाह। दुनुक बीच संघर्ष भेल जकर परिणाम हमरा लोकनि केँ ज्ञात नहि अछि आर एकर बादे वो वंगाल दिसि बढ़ल होएताह। एहो संभव जे बंगाल सँ घुरबो काल (जतए वो शिवसिंहक महत्वाकाँक्षाक विषय मे सुनने होथि) वो मिथिला पर आक्रमण कए गेल होथि। मुदा तत्कालीन साधनक आधार पर अहि सम्बन्ध मे कोनो ठोस निर्णय देव असंभव अछि। शिवसिंह स्वतंत्र रूपें लगभग ३–४ वर्ष धरि शासन केलन्हि परञ्च कहियो वो निश्चिंत भए सुति नहि सकलाह कारण सब दिन हुनका कोनो समस्या लगले रहैन्ह। दिल्ली आर जौनपुर हुनका बरोबरि तंग करैत् रहैन्ह जो वो पसिन्न नहि करैत छलाह। मुसलमान शासक केँ जे तिरहूत सँ कर भेटैत रहैक से देव वो वंद क देलैन्ह आर वो अपना केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र घोषित क देलैन्ह। ई शासक के छलाह से सम्प्रति कहब असंभव मुदा कर बन्द केलाक बाद वो खिसिया गेलाह आर शिवसिंहक संगहि युद्ध बजरब स्वाभाविक भगेल। एतवे नहि अपन स्वतंत्रता केँ व्यापक बनेबाक हेतु शिवसिंह अपना नामे सोनाक सिक्का बहार केलन्हि आर अहिक्रम मे वो ई सिद्ध क देलैन्ह जे मिथिलाक कोनो दोसर महाप्रभु शिवसिंह छोड़ि के आर केओ नहि छल। एहि सँ मिथिलाक गौरव मे वृद्धि भेल आर शिवसिंह नान्यदेवक परम्परा मे आवि गेला। शिवसिंहक अहि काज सँ तत्कालीन छोट–छोट राजा केँ प्रेरणा भेटलैक आर शिवसिंहक शासन काल धरि मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो अक्षुण्ण रहलैक। ई मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा गौरवक विषय मानल जाइत अछि। मुसलमानं सुल्तान शिवसिंहक एहेन विद्रोही रूप देखि आश्चर्य चकित भए गेलाह। शिवसिंह सेहो अपन गिरफ्त होएबाक अनुमान केँ विसरने नहि छलाह। दुनु अपन–अपन जिद्द पर छलाह जकर नतीजा ई भेल जे दुनुक वीच युद्ध अवश्यम्भावी भगेल। अहि युद्धक परिणाम तँ बुझल नहि अछि परञ्च एकर बाद शिवसिंह हारि गेला, अथवा मारल गेलाह या लापता भगेलाह से बुझल नहि अछि। मारलो गेल होथि से असंभव बात नहि। किछु गोटएक मत छैन्ह जे शिवसिंह नेपालक जंगल मे भागि गेलाह अथवा ओम्हरे लापता भगेलाह। एकर अर्थ किछु लेल जा सकइयै। अहि पराजयक बाद लखिमा देवी विद्यापतिक संगे द्रोणवार राजा पुरादित्यक ओतए सप्तरी परगन्ना मे चल गेला। नेपाल मे सेहो एकटा शिवराजगढ़ अछि जकरा लोक शिवसिंह सँ जोड़ैत अछि आर किछु गोटएक विचार छैन्ह जे रानी लखिमा अपन पतिक स्मारक स्वरूप अहि गढ़क निर्माण करौने छलाह। विद्यापति अहि युद्धक वर्णन जाहि रूपें केने छथि ताहि सँ बुझना जाइत अछि ई भयंकर युद्ध छल। विद्यापति सेहो शिवसिंहक संगे युद्ध मे शरीक भेल छलाह। युद्धक स्वरूप विद्यापतिक निम्नलिखित कविता सँ स्पष्ट होएतः– “दूर दुग्गमदमसि भज्जे, ओगाढ़ गड़ गूठीअ गण्ज़ेओ। पातिसाह ससीम सीमा समदरसे ओरे। ढोलतरल निसान सद्दहि भेरि काटल संखनद्दहि। तीन भूअन निकेत केतकि सनभरि ओरे॥ कोहे नीरे पयान चलियो वायुमध्य सयगरूओ। तराणि तेअ तुलाधार परताप गहि ओरे॥ मेरू कनक सुभेरू कम्पिय धरणि पूरिय गगन झम्पिय। हाति तुरय पदाति पयभर कमन सहि ओरे॥ तरल तर तखारि रङ्ग़े विज्जुदाम छटा तरंगे, घोरघन संघातवारिस काल दरस ओरे॥ तुरय कोटी चाप चूरिय चारदिस चौविदिशपूरिय। विषम सार असारधारा घोरनी भरि ओरे॥ अन्धकुअ कबन्ध लाइअ फेखी फफफरिस गाइअ। रूहिरमत्त परेत भूत वेताल विछलि ओरे॥ पारभए परिपत्य गज्जिय भूमि मण्डल मुण्डे मण्डिअ। चारू चन्द्रकलेब कीर्तिसुकेत की तुलि ओरे। रामरूपे स्वधरम राखिअ दान दप्पे दधीचि खीखिअ। सुकवि नव जयदेव भनि ओरे॥ देवसिंह नरेन्द्र नन्दन शत्रु नखइ कुल निकन्दन, सिंह समशिवसिंह मया सकल गुणक निधान गणि ओरे”॥ शिवसिंह मात्र एक विजेतेटा नहि अपितु कला, संस्कृति आर साहित्यक संरक्षक सेहो छलाह। हुनक दरबार विद्वान, पण्डित, कवि, दार्शनिक एवं चिंतक लोकनि सँ भरल रहैत छल आर अहि माने मे वो राजा विक्रमादित्य आर भोज सँ एक्को परिक्रम नहि छलाह। विद्यापति, वाचस्पति, अमृतकर, जयंत, लखिमा आदिक नाम सँ सब केओ परिचित छथिओ। विद्यापति तँ हुनक सब किछु छलथिन्ह आरपदावलीक रचना शिवसिंहक्ल दरबार मे भेल। शिवसिंहक मंत्रीगण छलाह अच्युत, महेश (महेश्वर) आर रतिधर। शंकर नामक एकटा प्रमुख अधिकारी सेहो हुनका दरबार मे रहैत छलाह। तरौनीक एक पोखरिक अंगनाई मे शिवसिंह कालीन एतिहासिक अवशेष सब सुरक्षित अछि। ओहि समयक एकटा पोखरि ‘भटोखरि’क नाम सँ प्रसिद्ध अछि। मिथिला मे वो प्रथम राजा छलाह जे स्वर्ण मुद्राक प्रचलन चलौने छलाह आर जकर दूटा अवशेष अखनो प्राप्य अछि। शिवसिंहक सम्बन्ध मे कहल गेल अछि जे वो अपना समयक समकालीन राजा सभहिक मध्य एकटा अद्वितीय प्रतिभाक व्यक्ति छलाह जे एतवे कम दिन मे समस्त उत्तरी भारत मे अपन धाक जमा लेने छलाह। परञ्च सबहिक दिन सबखन एक्के रंग नहि रहैत अछि तैं शिवसिंह एकर अपवाद कोना होइतैथ। शिवसिंहक परोक्ष भेलाह पर पद्मसिंह मिथिलाक शासक भेला आर मैथिल परम्पराक अनुसार वो दिल्ली सुल्तान केँ कर देव स्वीकार केलन्हि। हुनका काल मे विद्यापति ठाकुर केँ मंत्री सेहो कहल गेल छन्हि। वो पद्मा, पद्मौलि आदिक स्थापना केलन्हि आर चम्पारण मे पद्मकेलि नामक स्थानक सेहो। विद्यापति हिनका नृपति पद्मसिंह भीम जकाँ बहादुर छलाह आर दानीक हिसाबे कल्पवृक्षे बुझल जाइछ। शैव सर्वस्व सार मे विद्यापति लिखने छथि– “संग्रामांगन सीम भीम सदृश .... दाने स्वल्पित कल्पवृक्ष”। पद्मसिंह केँ कोनो पुत्र नहि छलन्हि। पद्मसिंहक बाद महारानी लखिमा मिथिला राज्यक भार अपना हाथ मे लेलन्हि। उपेन्द्र ठाकुर लिखने छथि जे शिवसिंहक पछाति लखिमा उत्तराधिकारिणी भेलीह मुदा से बात विश्वास करबा योग्य नहि अछि कारण हम देखि चुकल छी जे विद्यापतिक संग लखिमा द्रोणवार पुरादित्यक दरबार मे चल गेल छलीहे आर मिथिला मे बसि गेल छलाह पद्मसिंह जे मुसलमानी महाप्रभु केँ कर देबाक वचन दए मिथिला राज्यक आंतरिक स्वतंत्रता सुरक्षित रखबा मे समर्थ भेल छलाह। मैथिली परम्परा मे एकटा कथा सुरक्षित अछि जाहि सँ अहि बात पर प्रकाश पड़इयै। शिवसिंहक लापता भेला पर कायस्थ चन्द्रकरक पुत्र एवं शिवसिंहक मंत्री अमृतकर पटना गेला आर ओतए जाए सुल्तानक प्रतिनिधि सँ भेट कए मिथिलाक स्वतंत्रताक भीख मंगलन्हि। तखन जे समझौता भेल तदनुसार पद्मसिंह राजगद्दी पर बैसलाह। पद्मसिंह बछौड़ परगन्ना मे पदुमा नामक स्थान पर अपन राजधानी बनौलन्हि। अहि परम्परा केँ ध्यान मे राखिक स्पष्ट होइछ जे शिवसिंहक बाद मिथिलाक गद्दी पर पद्मसिंह बैसलाह आर तत्पश्चात लखिमा रानी। लखिमा रानी केँ गद्दी पर बैसबाक मूल कारण ई छल जे पद्मसिंह सेहो अपुत्रे मरल छलाह। बारह वर्ष धरि वो शिवसिंहक प्रतीक्षा नियमानुसार केलन्हि आर तदुपरांत शिवसिंहक श्राद्धादि कए विद्यापतिक विचार सँ वो राजगद्दी पर बैसलीह। लखिमा देवी नीति, धर्मनिष्ठा, उदारता, एवं विद्वता आदि मे निपुण छलीहे आर विद्यापतिक सहयोग सँ नीक जकाँ करीब नौ वर्ष धरि राज्य केलन्हि। एकर बाद पद्मसिंहक पत्नी विश्वास देवीक शासन भेलैन्ह। वो विसौली गाम मे अपन राजधानी बनौलनि आर बहुत रास धार्मिक कृत्य केलन्हि। विद्यापति हिनका समय मे बहुत रास पोथी लिखलैन्ह। देवसिंहक वंशज अंत अहिठाम भगेल आर तत्पश्चात हुनक वैमात्रैय भाय कुमर हरसिंहक शाखाक शासन पुनः प्रारंभ भेल। ई बहुत कम दिन धरि शासन केलन्हि आर हिनका समय मे कोनो खास घटनो नहि घटल। विभागसार (विद्यापति), कृत महार्णव एवं महादान निर्णय (वाचस्पति), विवाद चन्द्र (मिसारमिश्र) तथागंगकृत्य विवेक (वर्द्धमान) आदि पोथी सब मे हिनक नामक उल्लेख भेटइयै। कन्दाहा अभिलेख मे सेहो हिनक उल्लेख अछि। वो विद्वान उदार एवं योद्धा छलाह। हिनक वाद हिनक पुत्र रत्न सिंह प्रसिद्ध नरसिंह अत्यंत प्रतापी राजा छलाह आर तैं हिनका दर्पनारायणक विरूद्ध मंत्री लोकनि देने रहथिन्ह। कहल जाइत अछि जे वो अपने मंत्री विद्यापति ठाकुर सँ विभागसागर नामक कानूनी ग्रंथक निर्माण करौने छलाह आर तदनुसार न्यायालय मे कार्य करबाक आरया देने छलाह। कन्दाहा (सहरसा)क सूर्य मन्दिर पर एखनो लिखाओल उपलब्ध अछि आर ओकर तिथि देल अछि शक १३७५ (–१४५३–४ ई.) ओहि शिलालेखक पाठ एवं प्रकारे अछि– __ “पृथ्वीपति द्विजवरो भव (सिंह) आसी दाशी विषेन्द्र वपुरूज्जवल कीर्तिराशिः। तस्यात्मजः सकल कृत्य विचार धीरो वीरो वभूव वि (हरसिंह देवः)॥ (दोः ?) स्तंभद्वय निर्जि नाहिततप श्रेणी किरीटोपल ज्योत्सना वर्द्धित पाद पल्लव नख श्रेणी मयुखा वलिः॥ दाता ततनयो मयोक्त विधिना भूमण्डलं पालयत् धीरः श्री नरसिंह भूपतिलकः कांतोधुना राजते। विदेशतो स्यायतनं खेरिदम चीकरत्। विल्व पंचकुलोद भुतः श्रमद वंशधरे कृती ....“॥ अहिलेख मे नरसिंहक पूर्वज उल्लेख अछि आर इहो कहल गेल जे वो अपन दुनु शक्तिशाली भुजा सँ अपन दुश्मन केँ दवौने छलाह आर सब हुनके पर पर लोट पोट करैत छल। कामन्द कीय नीर्तिसारक अनुसार वो अपन राज्य केँ रक्षा करैत छलाह। अहि मे हुनका ‘भूपति तिलक’ सेहो कहल गेल छन्हि। दुर्गा भक्ति तरंगिनी मे विद्यापति हिनका योद्धा कहने छथिन्ह। ई अपने आर हिनक पत्नी धीरमति एक्के रंग उदार छलाह। कहल जाइत अछि जे धीरमतिक आदेशानुसार काशी मे एकटा वापी खुनाओल गेल छल आर धर्मात्माक हेतु एकटा धर्मशालाक निर्माण सेहो कैल गेल छल। हिनके आदेश पर विद्यापति दानवाम्यावली ग्रंथक निर्माण कएने छलाह। अहि मे नरसिंह देवक हेतु निम्नलिखित वाक्यक प्रयोग भेल अछि। _ “श्री कामेश्वर राज पण्डित कुलालंकार सारः श्रिया मावासो नरसिंह देव मिथिला भूमण्डला खण्डलः। दृव्यद दुर्ध खौरिदर्पदलनोऽ भूद्दर्प नारायणो। विख्यातः शरदिन्दु कुन्द धवल भ्राम्यधशो मण्डलः। तस्योदार गुणाश्रस्य मिथिला क्ष्मापाल चूड़ामणेः॥ हिनके समय मे विद्यापति व्याढ़िभक्तितरंगिणी सेहो बनौने छलाह।व्याढ़िभक्तितरंगणी आर विभागसारक मूल अपन पोथी ‘मिथिला इन द एज ऑफ विद्यापति’क परिशिष्ट मे छपने छी। हिनका समय मे बहुत रास विभिन्नविषयक ग्रंथक रचना सेहो भेल। नरसिंहक बाद धीरसिंह राजा भेलाह। नरसिंह केँ चारिटा पुत्र छलथिन्ह– i) धीरसिंह हृदय नारायण (प्रथम पत्नी सँ) ii) भैरवसिंह रूपनारायण iii) चन्द्र सिंह (द्वितीय पत्नी सँ) iv) दुर्लभ सिंह (रण सिंह) धीरसिंह अपने पिता जकाँ एकटा योग्य शासक छलाह। ई, १४६० क आसपास गद्दी पर बैसलाह आर विद्यापति हिनको हेतु प्रशंसाक पुल बान्हने छथि। मर्यादा, पराक्रम आर प्रज्ञा तीनु मे ई अपूर्व छलाह। हिनको दरबार मे बहुत रास विद्वान रहैथ छलथिन्ह। हिनके छोट भाई चन्द्रसिंह चनौर (चन्द्रपुर)क निर्माता छलाह। चन्द्र सिंहक आदेश पर क्रष्ण मिश्रक प्रवोध चन्द्रोदय नाटक पर रूचिशर्मा अपन टीका लिखने छलाह। धीरसिंहक कंसनारायण सेहो कहल जाइत छलैन्ह। भैरवसिंह देव:- मिथिला मे शिवसिंहक बाद ओइनवार वंश मे सब सँ प्रसिद्ध शासक भेलाह भैरव सिंह देव जे पुनः एकवेर शिवसिंह जका समस्त मिथिलाक एकीकरण केलन्हि आर मिथिला केँ पूर्ण स्वतंत्र घोषित केलन्हि। उहो शिवसिंह जकाँ अपन चानीक सिक्का चलौने छलाह आर ओहि सिक्काक आधार पर ई निर्विवाद रूपें कहल जाइत अछि जे वो १४७५ ई. मिथिलाक गद्दी पर वैसलाह। हुनक स्त्री जयाक अनुरोध पर वास्तपति मिश्र द्वैत निर्णयक रचना कएने छलाह। शिवसिंह जकाँ इहो पंचगौड़ेश्वरक उपाधि सँ विभूषित छलाह। हिनका सम्बन्ध मे निम्नलिखित शब्दावली ध्यान देवाक योग्य अछि। विद्यापति:- शौयावर्जित पंचगौड़घरणी नाथोप नम्रीकृता– नेको तुङ्ग तुरंग संग सहित च्छत्रायि रामोदयः श्रीमद भैरव सिंह देव नृपतिर्यस्यानुजन्मा जय त्याचन्द्रा केमरण्ड कीर्ति सहितः श्री रूपनारायणः। रूचिशर्मा (प्रबोधचन्दोदय कटीका मे):- न्याये नावति तीरभुक्ति वसुधां श्री धीरसिंह नृपे श्री मद भैरव सिंह भूमि पतिना भ्रात्रानु जेनांविते। वर्द्धमान (दण्डाविवेक):- गौड़ेश्वर प्रति सरीर मति प्रतापः केदार राय मवगच्छति दार तुत्यम्॥ संभवतः शिवसिंह जकाँ भैरवसिंह सेहो अपन पिताक समय सँ शासन मे हाथ बटबैत छलाह। हिनका समयक सब सँ मुख्य घटना ई अछि जे ई बंगाल सुल्तान द्वारा कैल गेल मिथिलाक अप्राकृतिक बटवारा कँ तोड़लन्हि आर पुनः समस्त मिथिला केँ एक कए ओहि पर अपन एक क्षत्र राज्यक स्थापना केलन्हि। बछौड़ परगन्नाक बरूआर ग्राम मे वो अपन राजधानी बनौलन्हि कारण इएह सब सँ सुरक्षित स्थान हिनका बुझि पड़लन्हि। एतए ई स्मरण रखबाक अछि जे हाजी इलियास १३४६ ई. मे मिथिला पर आक्रमणक क्रम मे हाजीपुर तक बढ़ल छल आर मिथिलाक ओइनवार राजा केँ बाँटि देने छल। गंडकक दक्षिणी भाग समस्तीपुर, बेगुसराय, बछवाड़ा, महनार, हाजीपुर आदि क्षेत्र केँ वो अपना अधीन रखलक। गण्डक पर अपना दिसि वो समस्तीपुर (शमसुद्दीन पुर) नामक नगरक स्थापना केलक। तिरहूतक ओइनवार शासक के ई सब दिन खटकैत रहैन्ह। अहि आप्राकृतिक बटबारा केँ किछु दिनक हेतु शिवसिंहक परोक्ष भेला पर पुनः यथास्थितिक स्थापना भेल आर केओ मैथिल शासक अहि दिसि ध्यान नहि देलन्हि। भैरव सिंह एक महत्वाकाँक्षी व्यक्ति छलाह आर मिथिलाक अप्राकृतिक बटवारा हुनका बरोबरि खटकैत रहैन्ह तैं वो राजगद्दी पर एला उत्तर सब सँ पहिने अहि दिसि ध्यान देलन्हि आर अहि मे सफल सेहो भेला। धीरसिंहक समय सँ बंगाल सँ खटपट होइत छल आर ई बात भैरवसिंह देखैत छलाह। वेर–कुवेर मे हुनके बंगालक विरूद्ध अभियान मे जाइयो पड़ैत छलैन्ह तैं जखन वो शासक भेलाह तखन वो अहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। हुनका समय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि केदार राय हाजीपुर मे रहैत छल। भैरव सिंह केदार राय केँ पराजित कए ओहि क्षेत्र पर अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आर समस्त मिथिलाक एकीकरण करबा मे समर्थ भेला। वो सौ सँ उपर पोखरि खुनौलन्हि। अहि मे जरहटिया गामक पोखरि सब सँ पैघ छल। हिनका दरबार मे चौहान केसरी सिंह आर संग्राम सिंह प्रसिद्ध सिपाही छलथिन्ह आर परम्परा कथाक अनुसार वो एहि दुनु सिपाही लंका पठौने छलाह। जरहटिया पोखरिक यज्ञोत्सव बड्ड पैघ भेल छल आर ओहि क्रम मे उपरोक्त दुनु दूत केँ लंको पठाओल गेल छलैन्ह। ताहि दिन मे बंगाली विद्वान रघुनाथ शिरोमणि सेहो अहिठाम पढ़ि रहल छलाह आर अहि यज्ञ मे गलती मंत्र पढ़ल जा रहल छल आर से हुनका नहि रहल गेलन्हि तो वो बाजि उठलाह–“साखती” कथिता कवितापण्डित राज (रत्न) शिरो मणिना–अहि सँ लोग हुनका चिन्ह लेलक। पोखरिक अतिरिक्त भैरवसिंहक समय मे बहुत रास नगर पट्टनक स्थापना सेहो भेल छल। ‘तुला पुरूष दान’क चर्च सेहो भेटैत अछि। संस्कृत साहित्य मे बहुत रास ग्रंथक रचना अहि काल मे भेल। विद्यापति, वाचस्पति, पक्षधर आदि सन पुरन्धर विद्वान हुनका दरबार मे छलथिन्ह आर राजा स्वयं संस्कृत साहित्यक बड्ड पैघ पृष्टपोषक छलाह। हुनका दरबार मे वाचस्पति ‘परिषद’ रहथिन्ह, आर वर्द्धमानधर्माधिकरणीक रहथिन्ह। हिनक विरूद्ध छलन्हि ‘रूपनारायण’ भैरवसिंहक वाद रामभद्र शासक भेला आर हिनको विरूद्ध रूपनारायणे छलैन्ह। इहो अपन राजधानी रामभद्रपुर नामक गाम मे बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे हिनका पटना मे सिकन्दर लोदी संगे भेट भेल छलैन्ह आर दुनु मे वेस दोस्ती सेहो छलैन्ह। ई हुनका संग सतरंज इत्यादि सेहो खेलाइत छलाह। सुल्तान रहस्य नृत्य देखबाकाल हुनकहुँ अपना समीप मे स्थान देथिन्ह। गौड़, बंगाल, मालदह, मुर्शीदाबाद आदि स्थान केँ वो जीतने छलाह। सिकन्दर लोदी बंगाल केँ ध्यान मे राखि मिथिलाक शासक केँ अपना दिसि पटिया केँ रखने होथि से संभव। विभाकरद्वैतविवेक नामक ग्रंथ सँ निम्न लिखित वाक्य स्पष्ट अछि। __ “सिकन्दर पुअरन्दरो गुरूदुरोदाक्रीड़या दिनं गमयति ध्रुवं विविध नागरी विभ्रम्ऐः। पचण्ड रिपुमण्डली मुकुट कोटि प्रभा। समाजित पदाम्बुजं यमिह मित्र भावंनयन्॥ येना खानि समुद्र खात सदृशं वापीगतं तिजेले। येना दायिचतानि तान्यथ महादानानि पुण्यत्मना। जागेत्येद्भुत विक्रमः सजगती कन्याकर ग्राहको। गौड़ो वीकलयेन्द्रदविदहनः श्री रामभद्रो नृपः ॥ रामभद्र अत्यंत विद्याप्रिय छलाह। वाचस्पति हिनको समय मे जीवित छलाह। सिकन्दर लोदी केँ रामभद्र पर बड्ड विश्वास छलैन्ह आर तैं आवश्यकता पड़ला पर हिनक व्रजाहरि होइत रहैन्ह। रामभद्र उदार, दानी आर विद्याप्रेमी छलाह आर ओइनवार परम्पराक अनुसार इहो बहुत रास पोखरि इत्यादि खुनौने छलाह। हिनका समय मे भट्ट श्री राम नामक एक यात्री गया सँ तीरभुक्ति तीर्थ करबाक हेतु आयल छलाह आर वो रामभद्रक दानप्रियता एवं उदारता सँ बड्ड प्रभावित भेल छलाह। मिथिला होइत वो प्रयाग घुरल छलाह। वो तीरभुक्तिक विद्वत समाज सँ एत्तेक प्रभावित भेल छलाह जे अहि बातक उल्लेख वो अपन पोथी ‘विद्वत प्रवोधिनी’ मे सेहो केने छथि– __ “गयाया निर्गता रामस्तीर्भूक्यारण्य देशपम्। रूपनारायणं विप्रं संतुष्टं स्वागिराक रोत्॥ रूपनारायणाद् भूपा दाज्ञां प्राप्य सुतात्वितः। तीरभूकत्याख्य देशाश्च प्रयागं समुपागतः”॥ अहिवंशक सब सँ अंतिम शासक छलाह लक्ष्मी नाथ देव कंशनारायण जनिका समयक अभिलेख भगीरथपुर सँ प्राप्त भेल अछि। १५१३ ई. मे मिथिला मे शासन करैत छलाह। १५१० ई मे गद्दी पर वैसल होथि से संभव कारण ओहि वर्ष मे हिनके शासन काल मे देवी माहात्म्यक एकटा पाण्डुलिपि तैयार भेल छल। भगीरथपुर अभिलेख मे हिनका ‘राजाधिराज’ कहल गेल छैन्ह– “यवन पति भया–धायक स्तीरभुक्तौ राजा राजाधिराजः समर–सः कंसनारायणो सौ”। हिनका डरे यवन चरित्र संदेहास्पद छल आर ई अपन कोनो मंत्री श्री धरक पत्नी सँ सम्बन्ध रखैत छलाह। हिनका समय मे मिथिला पर मुसलमानी आक्रमण भेल। १५२६ ई. मे हिनक मृत्यु भेल जेना कि निम्नलिखित श्लोक सँ स्पष्ट अछि–“अंकाब्धिवेद शशि (१४४९) सम्मित शाकवर्षे, भाद्रेसिते, प्रतिपदिं, क्षिति सुनुवारं हा हा निहाय इव कंसनारायणौऽसौ, त्याज्य देवसरसीनिकहे शरीरम्”– १४४९ शाक अथवा १५२६ ई. मे अपन पार्थिव शरीर त्यागलन्हि। संभवतः बंगालक नशरत शाहक हाथें ई पराजित भेल छलाह कियैक तँ नशरत शाहक एकटा अभिलेख बेगुसरायक मटिहानी अंचल सँ प्राप्त भेल अछि। नशरत दिल्लीक सुल्तान संग भेल संधि केँ नहि मानि मिथिला पर आक्रमण केलन्हि आर लक्ष्मीनाथ कंसनारायण केँ पराजित कए अपन जमाए अलाउद्दीन केँ अहिठामक राज्यपाल नियुक्त केलन्हि। एकर बादक इतिहास पूर्णरूपेण ज्ञाति नहि अछि। ओइनवारक शक्तिक ह्रास भगेलैक। तथापि ओइनवार वंशक लोग यत्र तत्र मिथिला मे राज्य करैत रहलाह आर एम्हर अराजकता सेहो बढ़े लागल। केन्द्रीय सत्ता टुटि गेला सँ चारूकातक राजा–सामंत अपन स्वतंत्रता घोषित क लेलन्हि आर मुसलमान लोकनि सेहो अहिक्षेत्र मे अपन अधिकार बढ़ेबा मे प्रयत्नशील भगेलाह। ओइनवार वंशक एकटा इन्द्रसेन शालिहोत्रसार संग्रहक लेखकक नाम भेटइत अछि जकरा सम्बन्ध मे हमरा लोकनि केँ कोनो विशेष ज्ञान नहि अछि। १४३४–३५ मे चम्पारण मे राजा पृथ्वीनारायण सिंह देवक राज्य छल (महाराज पृथ्वीनारायण सिंह देव भुज्यमान राज्ये चम्पकारण्यनगरे)। हिनक उत्तराधिकारी छलथिन्ह शक्तिसिंह आर तकर बाद हुनक पुत्र मदन सिंह। मदन सिंह मदन–रत्न–प्रदीपक लेखक छलाह। ई सब राजा अपन सिक्का सेहो चलौने रहैथ जाहि पर लिखल अछि– “गोविन्द चरण प्रणत–चम्पकाररण्ये” हिनक मुद्रा हिमालय तराई सँ दिल्ली धरि भेटैत अछि। मदन सिंहक राज्य गोरखपुर धरि छलैन्ह। नरसिंह पुराणक पाण्डुलिपिक पुष्पिका मे एकर प्रमाण अछि– “.... महाराजाधिराज श्री मन्मदन सिंह देवानम् विजयिनाम् शासति गोरक्षपुरे .....” चम्पारणक लौरिया नंदनगढ़ मे अशोकक स्तंभ पर एकटा लेख अछि– “नृपनारायण सुत नृप अमरसिंह”। ई के छलाह आर कतुका राजा छलाह से कहब असंभव। महाराज लक्ष्मीनाथ अपुत्र छलाह तैं हुनक बाद हुनक कायस्थ मंत्री केशव मजुमदार राजक भार सम्हारलैन्ह आर उएह राजा भेला। ओइनवारक परंपराक निर्वाह करैत उहो जन–कल्याणक हेतु पोखरि खुनौलन्हि आर दानादिक नीक व्यवस्था केलन्हि। मजलिश खाँ नामक व्यक्ति सेहो अहि स्थिति सँ लाभ उठाए किछु दिन मिथिला पर शासन केलन्हि। केशव मजुमदार कुशल व्यक्ति छलाह आर ओइनवार शासन सब बात सँ अवगत रहबाक कारणे वो मिथिला केँ अपना शासन काल मे यथासाध्य स्वतंत्र रखलन्हि आर मैथिल परम्परा निर्वाह करैत जन कल्याणार्थ बहुत किछु केलन्हि। ओइनवार वंश आपसी कलह आर भय सँ खण्डित भए चुकल छल। राजकुलक सम्बन्ध सँ ओइनवार मूलक ब्राह्मण लोकनि “कुमार” पदवी धारण करए लगलाह आर ‘कुमार’ पदवी धारी ओइनवार ब्राह्मण लोकनिक एक शाखा अहुखन मालदह जिलाक अराइदंगा गाम मे छथिन्ह। ओइनवार वंशक अनेक शिलालेख आर किछु मुद्रा सेहो अछि जाहि पर हमरा सब ई कहि सकैत छी जे ओइनवार लोकनि कर्णाट वंश जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु किछु उठा नहि रखलन्हि आर हुनका शासन काल मैथिलक प्रसार चारूकात भेल। एहि वंशक तत्वाधान मे साहित्य, कला, व्याकरण, स्मृति, निबंध, दर्शन, इत्यादिक विकास भेल। महाकवि विद्यापति देवसिंहक समय सँ भैरव सिंहक शासन काल धरि ओइनवार राजनीतिक एकटा प्रमुख स्तंभ छलाह। राजकाज मे एतवा व्यस्त रहितो वो अपन लिखब–पढ़ब नहि छोड़लन्हि आर मातृभाषा केँ सेहो नहि विसरलाह। एहिवंशक समय मे गोनु झा सेहो भेल छलाह। एहिवंशक परोक्ष भेला पर मिथिला मे मुसलमानी प्रभावक वृद्धि भेल। (अहि प्रसंग मे हमर “हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत” देखल जा सकइयै आर देखु हमर निबन्ध–“द ओइनवारज ऑफ मिथिला”) अध्याय–९ खण्डवला वंशक इतिहास (२४४ सँ २६५) ओइनवार वंशक अंत भेला पर मिथिला मे केशव मजुमदार आर मजलिश खाँक शासन रहल। केन्द्रीय सत्ताक समाप्त भगेला प्र आर मुसलमान लोकनिक केँ लगातार आक्रमण सँ मिथिला छिन्न भिन्न भगेल छल आर चारूकात अराजकता पसैरि गेल छल। जे जेम्हरे पेलक से तेम्हरे अपन आधिपत्य कायम कैलेलक आर अहियुग मे मिथिला वेसी बावू बवुआन लोकनि बढ़ती भेलैन्ह। किछु राजपूत लोकनि सेहो अहि सँ लाभ उठौलन्हि आर कैक ठाम अपन स्वतंत्र राज्य कायम करबा मे सफल भेलाह। समस्त मिथिला मे हाजीपुर सँ बंगालक सीमा धरि मुसलमानी प्रभाव बढ़ि चुकल छल आर मुगल साम्राज्यक स्थापना करीब–करीब इएह स्थिति बनल रहल। अहिठाम मुगल साम्राज्यक स्थापना हम बाबरक समय सँ नहि लकए १५५६ यानि अकबरक समय सँ लैत छी कारण बाबर द्वारा स्थापित राज्य तँ राज्ये मात्र रहल आर हुनक पुत्र ओहि राज्य केँ जोगा नहि सकलाह। नतीजा भेल जे बिहारेक शेरशाह मुगल साम्राज्य केँ नस्त नाबूद केलन्हि आर अपन सत्ता स्थापित करबा मे समर्थ भेलाह। शेरशाहक एकटा उत्तराधिकारी सिक्का तिरहूत भेटल अछि आर एकटा मैथिली लिपिक अभिलेख सूर्यगढ़ा (मूंगेर) सँ। अकबरक शासन भेलाक बाद जे परिवर्त्तन भेल तकर मिथिला पर स्वाभाविक रूपें पड़ल। खण्डवला वंशक सम्बन्ध मे कहल जाइत अछि जे हिनका लोकनि केँ मुगल सम्राट अकबर सँ समस्त मिथिलाक राज्य भेटल छलैन्ह। दरभंगा राजक इतिहास विस्तृत रूपे डा. जटाशंकर झा शोध कएने छथि आर अहि दृष्टिकोणें हुनक “हिस्ट्री ऑफ दरभंगा राज” आर “महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह” पठनीय ग्रंथ अछि। खण्डवला वंशक संस्थापक छलाह महामहो पाध्याय महेश ठाकुर। हिनक पूर्वज मिथिलेक रहथिन्ह आर ओहि मे एक गोटए शंकर्रान उपाध्याय केँ किछु दान खण्डवा मे भेटबाक ओम्हरे जाके वसि गेल छलाह। महेश ठाकुर हुनके वंशज छलाह (दशम पीढ़ी) आर जमीन जायदाद वाला रहबाक कारणे ई लोकनि उपाध्याय सँ ठाकुर (सामंती पदवी) कहबे लागल छलाह। १६म शताब्दी मे इ लोकनि मण्डला (गढ़ मण्डल–वस्तर) सँ पुनः एलाह। हिनक पितामह श्री पति ठाकुर भर राजपुत केँ किछु दान दकए भौर गाम बसौने छलथिन्ह। अहिठाम स्मरणीय जे ओइनवार वंशक पतनक बाद जे अराजक स्थिति शुरू भेल छल ताहि सँ लाभ उठा केँ भर राजपूत लोकनि सेहो अपन स्वतंत्र राज्य स्थापित क लेने छलाह। भौर मे आवि केँ वसला कारणे खण्डवला लोकनि ‘खरौरे भौर’ कहौलथि। अहिवंशमे विद्वानक जे एकटा परम्परा चलि आवि रहल छल तकरा अनुरूपें ई लोकनि भौर मे एकटा संस्कृत विद्या केन्द्रक स्थापना केने छलाह जत्तेऽ देशक विभिन्न भाग सँ विद्यार्थी लोकनि पढ़बालेल अवैत छलाह। महेश ठाकुरक ज्येष्ठ भाई भगीरथक कारणे भौरक प्रतिष्ठा बड्ड बढ़ि गेल छल– __ “पद्म पत्र मपि यत्र दुर्लभम्, रन्धनं भवति नेन्धनं बिना। श्री भगीरथ गुणेन केवलम्, भौर गौरव कथा गरीयेसी”॥ गढ़ेश–नृप–वर्णन–संग्रह श्लोकक पाण्डुलिपिक अध्ययन सँ मैथिल विद्वानक जे विवरण भेटैत अछि ताहि मे महेश ठाकुरक प्रशंसनीय उल्लेख अछि। रूपनाथ मैथिलक पाण्डुलिपि गढ़ेश–नृप–वर्णनम् क उपरोक्त पाण्डुलिपि पूरक थीक आर ओहि पाण्डुलिपि मे गढ़मण्डल राज्यक विवरण भेटैत अछि। रूपनाथक अनुसार महेश ठाकुर भौर ठक्कुर लोकनिक वंशजक रूप मे वर्णित छथि आर संगहि यादोरायक धार्मिक गुरूक रूप मे सेहो। महेश दलपत शाह आर रानी दुर्गावतीक समकालीन छलाह। खण्डवा, मण्डला, रतनपुर आर वासर मे हिनक वेस इज्जति रहैन्ह। महेश ठाकुर दुर्गावती केँ पुराण सुनवैत छलाह। एक दिन कोनो कारणे वो ओतए अपन प्रिय शिष्य रघुनंदन केँ पढ़ौलन्हि परञ्च रघुनन्दन केँ ओतए किछु खटपट भ गेलैन्ह आर ओतहि सँ गुरू शिष्य दुनु गोटए दिल्ली दिस विदा भेलाह। ओहिठाम मुगल दरबार मे ई लोकनि अपन विद्वता सँ सम्राट केँ प्रभावित केलन्हि आर रघुनन्दन जे फरमान प्राप्त केलन्हि से दक्षिणा स्वरूप अपन गुरूदेव महेश ठाकुर केँ ददेलन्हि। महेश ठाकुरक आर तीनू भाई दिल्ली सँ घुरि केँ वस्तर, रतनपुर आर मण्डला दिसि चल गेला कियैक तँ ओहिठाम हुनका लोकनि केँ जागीर छलैन्ह आर महेश ठाकुर असगरे फरमानक संग घुरला। मण्डला अखनो धरिमहेशपुर आर तिरहूतिया टोल अछि। मैथिल परम्परा मे सेहो महेश ठाकुरक राज्य प्राप्तिक उल्लेख भेटैत अछि– “नवग्रह वेद वसुन्धरा शक मे अकबर शाह पंडित सुबुध महेश को किन्हो मिथिलानाह”॥ _ “आसीत पण्डित मण्डलाग्र गणिता भूमण्डला खण्डला। जाता खण्डवाल कुले गिरि सुता भक्तो महेशः कृति। शाकेरण्ध्र तुरंग श्रुतिमही (१४४८)=??) लक्षिते हविनेवाग्देवी कृप्या सुयेन मिथिला देशंसमस्तोऽर्जितः”॥ “अति पवित्र मंगल करण राम जनम केदिय। अक्सर तुषित महेश को तिरहुति राजा करन॥ जेना कि पूर्वहिं कहल जा चुकल अछि जे महेश ठाकुर जखन फरमान लकए मिथिला मे राज्य करबाक हेतु पहुँचलाह तखन हुनका विरोधक सामना करए पड़लन्हि कारण अहिठामक स्वतंत्र राजपूत राजा लोकनि ताधरि स्वतंत्रताक स्वाद ललेने छलाह। ओइनवारक वाद जे स्थिति उत्पन्न भेलैक तकर विवरण हम प्रस्तुत क चुकल छी इहो कहि चुकल छी जे राजपूत लोकनि अपन प्रभाव बढ़ा लेने छलाह। तथा सरौंजा आर पररी मे पहिने हिन्दु राजा चुनचुनक राज्य छल परञ्च चुनचुनक परोक्ष भेला पर लक्ष्मी सिंह नामक एकटा राजपुत राजा ओहि क्षेत्र पर शासन करए लगलाह। ओइनवारक ववुआन लोकनि सेहो ठाम–ठाम अपन अधिकार जमौने छलाह आर १७ म शताब्दी मे औरंगजेबक शासन काल धरि मिथिला मे एकटा ओइनवार शासकक विवरण (तलवार–अभिलेख–जे मिथिला मण्डल मे प्रकाशित भेल अछि) भेटल अछि। अहि सँ तँ सामान्यतः इएह स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुर केँ प्रारंभ मे काफी मुश्किल भेल होएतन्हि। ताहि दिन मे मिथिला छोट–छोट खण्ड मे बटल छल। भौर प्रधान प्रशासनिक केन्द्र छल। महेश ठाकुरक समय मिथिलाक स्थिति वर्णन निम्नाकिंत अछि– __ “रहै भौर क्षत्री प्रबल, वसत भौर निज ठौर सूर समर विजयी वड़े, सब क्षत्री सिरमौर॥ अच्युत मेघ गोपाल मिलि, मारौ क्षत्री राज निज सुत लैभागी तबै रानी नैहर राज बहुत दिवस केँ वाद सौ सजि आये पम्मार युद्ध करण मिथिलेश सँ सेना अपरेपार”॥ महेश ठाकुर सब प्रकारक विरोध केँ दबेबा मे सफल भेला। अहिठाम प्रश्न ई उठइयै जे राज्य गुरू दक्षिणा मे भेटल छलैन्ह अथवा वो स्वयं ओकरा प्राप्त केने छलाह। अहि पर विद्वानक बीच मतभेद अछि आर एक सिद्धांत इहो अछि जे वो अपन विद्वता सँ मानसिंह केँ प्रभावित कए राज्य प्राप्त केने छलाह। अकबर सेहो अहि पक्ष मे छल जे कहुना चारूकात शांति बनल रहए जाहि सँ वो अपन राज्य विस्तार कसके आर तैं मिथिलाक भार महेश ठाकुर केँ सुपुर्द कए वो निश्चिंत होभए चाहैत छल। तिरहूतक कलक्टरक १७८९ क एक पत्र सँ ई ज्ञात होइछ जे महेश ठाकुर ओइनवार वंशक पुरोहित छलाह आर ओइनवार वंशक अंत भेला पर वो स्वयं दिल्ली जाए ओतुक्का शासक केँ सब स्थिति सँ अवगत कराए अपना हेतु राज्य प्राप्त कके अनलन्हि। एक आर दिवदंती बुकानन पुर्णियाँ रिपोर्ट मे सुरक्षित अछि। प्रिंसेपक अनुसार खण्डवला वंश मुगल साम्राज्यक अंतर्गत एक स्वतंत्र राज्य छल आर ओहि राज्यक अधीन कतैको सामंत लोकनि रहैत छलाह। गोपाल ठाकुरक देन अकबरक फरमान सँ ई स्पष्ट अछि जे आंतरिक मामला मिथिला पूर्णरूपेण स्वतंत्र छल–चौधराई आर कानून गोई समस्त तिरहूतक हिनका लोकनि केँ प्राप्त छलन्हि। १६५२ ई. क मजहरनामा सँ सेहो स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुर अहिवंशक संस्थापक छलाह। औरंगजेबक समय मे अहिवंश बिहार आर बंगालक ११० परगन्ना दानस्वरूप भेटल रहैक आर संगहि खिलत आर महिमरेतिव (माँछक चेन्ह–जे दरभंगा राज्यक राजकीय चेन्ह छल)। अहि सँ स्पष्ट भजाइछ जे समस्त तिरहूत पर अहिवंशक प्रभाव महेश ठाकुरक समय सँ चलल अवैत छल। महेश थाकुर मिथिला मे खण्डवला कुलक संस्थापक छलाह अहि मे आव सन्देह नहि रहि गेल अछि। अपन राजा हेवाक अवसर केँ चिरस्मरणीय बनेबाक हेतु वोधौत परीक्षाक प्रथा चलौलन्हि। महेश ठाकुर मात्र एक शासकेय नहि अपितु एकपैघ विद्वानो छलाह आर बहुत रास पोथी सेहो लिखने छलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिला मे राज्य प्राप्त भेलाक बाद वो गढ़ मण्डला सँ अपन देवी (कंकाली देवी) केँ सेहो ओतए सँ अनलन्हि। वो अकबरनामाक एकटा संक्षिप्त संस्कृत संस्करण बाहर केलन्हि जे सर्वदेश वृतांत संग्रहक नाम सँ प्रसिद्ध अछि। कहल जाइत अछि जे महेश ठाकुर अकबरक शासनक ३४म वर्ष अहि ग्रंथक अनुवाद कएने छलाह। बीरबलक आदेश पर ई अनुवाद भेल छल। किनको–किनको इहो मत छैन्ह जे अहि अनुवादक बाद महेश ठाकुर केँ मिथिलाक राज भेटलन्हि। सुभद्र झाक संपादकत्व मे ई पोथी प्रकाशित अछि। अहि ग्रंथ सँ ई ज्ञात होइत अछि जे हिमायुँ नरहन आएल छलाह आर तिरहूत आर पूर्णियाँ मे वोजागीर सेहो देने छलथिन्ह। ई दुनु स्थानक जागीर वो अपन भाई हिन्दाल केँ देने छलाह आर हुनका अपन जागीर ठीक ककए बंगाल दिसि बढ़बाक आदेश देने छलाह। मैथिली शब्दक सेहो अहि संस्कृत पोथी मे वेस व्यवहार अछि। उदाहरणार्थ– __ i) सभ्यक्तया ii) गल्ली iii) असुस्थ iv) तखारि v) सुस्थ vi) ढ़व्य=ढ़ौआ vii) विचीय–विचीय (बीछि–बीछि) viii) वस्तु जातानि– ix) हत्था जोरी– आर एहेन बहुत शब्द ओहि संकलन मे अछि। महेश ठाकुरक बाद हुनका द्वितीय पुत्र गोपाल ठाकुर गद्दी पर बैसलाह। कहल जाइत अछि जे वो विद्रोही राजपूत प्रधान लोकनि केँ दबौलन्हि। हिनके समय मे टोडरमलक राजस्व व्यवस्था लागू भेल छल। हिनका समय मे भेटल फरमानक उल्लेख हम पूर्वहिं कचुकल छी। मिथिलाक आंतरिक झंझट मे ई ततेक वाझल छलाह जे जखन दिल्ली सँ हिनका बजाहटि एलन्हि तँ अपने नहि जाकए वो अपन पुत्र हेमांगद ठाकुर केँ पठौलन्हि जे ओतए कोनो कारण वश गिरफ्त भए गेलाह आर ओहि गिरफ्तावस्था मे अपन सुप्रसिद्ध एवं अद्वितीय ज्योतिष शास्त्रक पोथी लिखलन्हि। कागज कलमक अभाव मे ओतए वो माँटि पर लिखैत छलाह आर जखन राजा केँ एकर सूचना भेटलन्हि तँ राजाक पूछला पर वो कहल थिन्ह जे एक हजार वर्ष धरि कहिया–कहिया ग्रहण लागत तकरे हिसाब वो लिखि रहल छथि। ‘राहू पराग पंजी’ नामे ई ग्रंथ प्रचलित अछि– _ “खण्डवला कुल तरणे गोपाला दापयं गौरी हेमाङ्गद सतनुते पंजी (!) राहू परागस्थ”। राजा हिनका सँ प्रसन्न भए हिनका मुक्त कए देल आर तिरहूत राज्यक जे बकिऔता छल सेहो माफ कदेलक। हेमाङ्गद तकर बाद सँ पढ़वे–लिखबे मे अपन समय व्यतीत करेऽ लगलाह। गोपालक बाद शुभंकर ठाकुर शासक भेलाह। शुभंकर ठाकुरक नाम पर दरभंगा लग अखनो शुभकंर पुर अछि। ई एक पैघ विद्वान आर लेखक सेहो छलाह। ओ भौर मे अपन राजधानी स्थापित केलन्हि कियैक तँ अहिठाम पहिने भर राजपूत लोकनिक प्रधानता छल। हुनका बाद हुनक पुत्र पुरूषोत्तम ठाकुर शासक भेला। हिनक बजाहटि मुगल राजस्व पदाधिकारी दरभंगाक किला घाट मे ठहरल छलाह। ओहि पदाधिकारी केँ मुगलशासकक हाथे सजा भेटलैकि। हिनकहि शासनकाल मे तिरहूतक दूटा ब्राह्मण केँ मुगल दरबार मे पुरष्कार भेटल छलैक। पुरूषोत्तमक बाद हुनक सतभाय नारायण ठाकुर राजा भेलाह। नारायण ठाकुरक समय मे दू फरमान भेटल छ्लैक जाहि सँ दूटा गामक न ननकार प्राप्त भेल छ्लैन्ह–सरसो (परगन्ना भौर) आर बिजिलपुर (परगन्ना वेराय)। भखारा परगन्नाक स्थिति केँ सुधारबा मे हिनक विशेष हाथ छलैन्ह आर १६४५ तक वो राज्य करैत रहलाह। तकर बाद सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। राज्यक बटबाराक संकेत भेटैत अछि। अहिकाल मे शाहजहाँक शासन छल आर हकीकत अली नामक एक व्यक्ति दरभंगाक नवाब छलाह। __ “ल सं ५०९ श्रावणवदि १४ खौ पुनः परमभद्दारकाश्व पति गजपति नरपति राज्य त्रया धिपति सुरत्राण शासत शाहजहाँ सम्मानित नओवाव हकीकत खाण संभुज्यमान तीर भुक्त्यंतरित, स्स् तीसाठतया संलग्न झोरिया ग्रामे . . . .। हिनके शासन काल मे मैथिल रघुदेव शाहजहाँक विरूदावली बनौने छलाह। सुन्दर ठाकुरक बाद महिनाथ ठाकुर राजा भेलाह। वो पलामू आर मोरंग मे मुगल सम्राटक सहायता केने छलथिन्ह जकर सबूत उपलब्ध अछि। सुन्दर ठाकुर सुन्दर पुर मोहल्ला बसौलन्हि आर भाल पट्टी मे सुन्दर सागर पोखरि खुनौलन्हि। अहि पोखरिक नाम रामकविक आनन्द विजय नाटिका मे भेटैत अछि। सुन्दर ठाकुर देखबा मे बड्ड सुन्दर छलाह– __ “अरविन्द विनान्दित सुन्दर लोचन सुन्दर ठक्कुर सुन्दरता। मदनेन समं विधिना तुलिता कलिता मिथिलैक पुरन्दरता। तव खण्डवला कुल मण्डन भूप। सदा मति रस्तु मुकुन्द रता नैने नगरे निले कमला पर वारिधि मंथन मन्दरता”– महिनाथ ठाकुरक समयक एकटा औरंगजेबक फरमान सेहो उपलब्ध अछि। महिनाथ ठाकुरक काज सँ प्रसन्न भए मुगल सम्राट हिनका आर राज्य देलथिन्ह– __ सदर जमीन्दारी सरकार तिरहूत (तराईक संग १०२ परगन्ना) __ परगन्ना धरमपुरक जमीन्दारी __ सरकार मूंगेर–एक परगन्ना– बंगाल सँ सेहो निम्नलिखित इलाम भेटलन्हि– माछक निसानी सेहो– __ सरकार पूर्णियाँ–५ परगन्ना– __ सरकार ताजपुर–२ परगन्ना– महिनाथ ठाकुर केँ बेतियाक राजा गजसिंह सँ सेहो झंझटि भेलन्हि। मिरजा, फिदाई आर जीवन हिनका समय मे तिरहूत मे मुगल फौजदार छल। महिनाथ ठाकुरक शासन काल मे खण्डवला कुल अपन चरमोत्कर्ष पर पहुँचल छल। महिनाथ ठाकुर बेतिया (सिमरॉन)क राजा गजसिंह केँ पछाड़लन्हि जे सुगौना पहुँचि केँ सुगौना किला मे आराम करैत छलाह। __ “धाय मिथिला केँ महिनाथ सिंह महाराज बाज केँ झपटते सुगाओ पर चढ़ि गयौ। घेराकरि दौड़ि दरवाजे मे दरेरा लगेगी धरव, लागै मुचित्यौ आगे आग सी लहरि गयो। दौड़–दौड़ पैदल कंगुरन मे चढ़ि लागै। लेहुकी लहरि सो सोति ताल भरि गयौ। कहु ढ़ाल कहु तरकस तलवार डारि तौलौ। गज सिंह खोलि खिड़की दै निकल गयो। महिनाथ ठाकुर मैथिली साहित्यक सेहो संरक्षक छलाह। हिनके समय मे लोचनक राजतंरगिणी आर नैषध काव्यक रचना भेल छल। हिनकहि समय मे इहो निर्णय भेल जे दरभंगा राज्य भविष्य मे बटत नहि आर ओहि हिसाबे उत्तराधिकारक नियम सेहो बना देल गेल। एकर बाद नरपति ठाकुर शासक भेलाह। दुनु भाई (महिनाथ आर नरपति)क सम्बन्ध केहेन छल से निम्नलिखित काव्य सँ स्पष्ट होएत। कालीक पूजक छलाह– __ “वदन भयान कानशब कुण्डल विकट दशन धन पाँती। फूजल केश वेश तुअ केँ कहजनि नवजलधर काँती॥ काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खङ्गकर लाई। भय निर्भय वर दहिन हाथ कए रहिअ दिगम्बर भाई॥ पीन पर्याधर उपर राजित रूधिर स्त्रवित मुण्ड हारा। कटि किङ्किणि शब कर करू मंडित सृक बहु शोणित धारा॥ वसिअ मशान ध्यान शब उपर योगिनि गणरहु साथे। नरपति पति राखिअ जग ईश्वरि करू महिनाथ सतार्थ॥ नरपति ठाकुर कुशल योद्धा छलाह आर तलवार भजबा मे वेस कुशल। पलामू आर मोरंग मेजे महिनाथ ठाकुर मुगलक सहाय्यक हेतु सेना पठौने छलाह ताहि मे वो ओहि सेनाक नेतृत्व नरपति ठाकुरक हाथ मे देने छलथिन्ह। हुनक बहादुरी सँ सम्राट सेहो बड्ड प्रसन्न छलाह। एकर विवरण कतेको ठाम भेटैत अछि। उपरला पद सँ सेहो एकर मान होइयै। नेपाल तराई सँ एकटा मकवान पुर राज्य छल। ओइनवार वंशक अंत भेला ई राजा लोकनि तिरहूत राज्यक किछु हिस्सा केँ हड़पि लेने छलाह। नरपति ठाकुर हिनका विरूद्ध पटनाक सूबेदारक आश्वासन भेटला पर वो आन जमीन्दार लोकनि केँ संग लए शिकार खेलबाक बहाना सँ मकवान पुर राज्य पर आक्रमण केलन्हि आर ओतुका राजा केँ गिरफ्तार कलेलन्हि। ओहि राजा केँ पकड़ि केँ दरभंगाक फौजदारक ओतए आनल गेल। वो मिथिलाक राजा केँ सलाना 1200 टाका आर हाथी नजराना देव स्वीकार कैलक। मुगल सम्राटक संग हिनक सम्बन्ध बढ़िया छलैन्ह आर तैं हिनका समय मे खण्डवला कुलक प्रतिष्ठा बढ़ल। नरपति ठाकुरक बाद हुनक पुत्र राघव सिंह राजा भेला। ‘ठाकुर’क स्थान वो‘सिंह’ पदवी लेलन्हि। उहो अपन पिता जकाँ एकटा प्रतापी शासक छलाह आर हुनका मिथिला पति सेहो कहल गेल छन्हि। बेतियाक राजा ध्रुवसिंह सँ हुनका खटपट भेलैन्ह आर संघर्ष सेहो– “नगहु खङ्ग ध्रुवसिंह तोहि उपर यम चढ़ौ। मिथिला पति सौवेर दिन–दिन तोहि बढ़ौ॥ तेकयत कुलवधिक एतो राघव नृप राजा। अहि दल दलन सम्मथ भीम भारत जिमि गाजा॥ कवि कहत रामरे मूढ़ सुनु जेहि दल प्रचण्ड भैरो रहत। ठहरे बनाया फौजजाथ इति कोजब सरदार खाँ तेगा गहत”॥ प्रसिद्ध अफगान लड़ाकू सरदार खाँ हिनका दरबार मे छल। बिहारी लाल अपन‘आयनी तिरहूत’ मे लिखने छथि जे औरंगजेब हिनको राजाक उपाधि देने छलैंन्ह। किछु गोटएक मत छैन्ह जे ई पदवी हुनका अलीवर्दी सँ भेटल छलैन्ह। एक लाख टाका जमाक हिसाब ई तिरहूत राज्यक मुकर्ररी लेने छलाह। नवावक दिवान धरणिधर के सेहो ५०,००० टाका नजराना दैत छलथिन्ह। मकवानीक राजा जखन वार्षिक नजराना देव बन्द क देलन्हि तखन हुनका मकवान पुरक खिलाफ सेहो आक्रमण करए पड़लैन्ह। युद्धक घोषणा होइतहुँ मकवानीक राजा हिनका सँ मेल मिलाप कलेलथिन्ह आर वेसी नजराना देवाक प्रतिज्ञा केलथिन्ह। हिनका समय मे एक आर प्रसिद्ध घटना भेल। बीरू कुरमी जे पहिन का ओतए रहैन्ह तकरा वो राजस्व पदाधिकारी बना केँ धर्मपुर परगन्ना पठौलन्हि। बीरू ओतए अपन एकटा किला बना लेलक आर ओहि सँ राज केँ राजस्व पठाएब बन्द क देलक। ओकरा विरूद्ध सेना पठाओल गेल आर ओहि मे वीरूक बेटा मारल गेल आर वीरू पराजित भेल। ओकरा सम्बन्ध मे निम्नलिखित कहावत अछि– __ “वीरनगर वीर साह का बसे कौशिका तीर का पति राखे कौशिका का राखे रघुवीर”। बुकाननक पुर्णियाँ रिपोर्ट मे लिखल अछि जे वीरूक हाल सुनि सरमस्त अली खाँक नेतृत्व मे दिल्ली सँ सेना पठाओल गेल। पहिलवेर तँ वो सेना पराजित भ गेल मुदा दोसर वेर राघव सिंहक मदति सँ वीरू पराजित भेल। राघव सिंहक अधिकार पुनः समस्त परगन्ना पर भेलैन्ह परञ्च नाथपुर आर गोराड़ी हुनका सँ लकए पुर्णियाँक राजा के ददेल गेलैन्ह। राघव सिंह दानी आर उदार व्यक्ति छलाह आर बहुत रास मन्दिर इत्यादिक निर्माण सेहो करौने छलाह। हुनक दूटा शिलालेख उपलब्ध अछि– मधुरवाणी श्वर (परगन्ना हाटी)क शिलालेख– __ ॐ नमः शिवाय। आसीन्नासीर दासी भवदरि निवह(:) क्ष्मा भृताँकोऽपि धन्यः पुण्य(:) श्री शालिखण्डोरय (मल) कव रसमाहुति वंशाग्र गण्यः॥ समस्तो यावदात स्फुरदम लयशोरा सिरस्वती कृतान्य– स्त्रीकः श्री कण्ठ भक्तिस्फुट घटितमति स्तीरभुक्तिश्वरोयः॥ तस्य श्रीमन्नरातिसिंह स्यासन् सुताः फलतपसः श्रीमद् राघव सिंहो येषां ज्यायान्महाराजः॥ श्रीनन्द नन्दन इति प्रथितः पृथिव्यां। सवस्वदोऽस्य नृप तेरभवतक नीयन्। श्री भानु दग्र गुण ठाकुर सिंह नामा। कामारिसक्त हृदयोऽवरजस्तदीयः॥ एतेषांतु विशेषज्ञा प्रज्ञा वज्ञात धीरधीः। स्वसामधुरवाणीति नाम तोऽप्यर्थ तोऽप्यभूतः॥ नखन वंशकवीर श्रीमद्धरि जीव शर्मणः कृतिनः। कल्पमहीरूहदान प्रभृति महादान यायिनी दयिता॥ शाके लोचन वाण (१६५२) भूपति मते मास शुभे माघवे। पक्षे स्वच्छ तरेऽधि पंचभि तिथौवा चस्पतेवसिरे॥ उन्मीलन्मदगण्ड मण्ड लवल द्वेतण्ड वृन्दे श्वरे। श्रीमद् राघव सिंह नाम्नि मिथिला नाथे महीशासति॥ हुनकर दोसर शिलालेख लोहना गाम सँ भेटल अछि– ॐ स्वस्ति। श्रीमद् राघव सिंह वाहु विलंस ज्जेत्रास्त विक्षोयित– प्रोधद्धरै महीप संभव यशः शुभ्रीभवद् भुतले। प्राज्ञ श्री बलभद्र वलितो यत्नेन शम्योरिदं गर्भागारम कारयद् दृढ़तरं निर्वाण सं प्राप्तये॥ शाके वारण वेदराज कमिते राकेश्वरे भास्वरे पौषे मासि विलासि मोद रच्ते कामात्वितायांति थौ। शाके १६४८ राघव सिंहक वाद विष्णु सिंह शासक भेलाह। आर चार वर्ष धरि शासन कए वो मरि गेलाह। हुनका बाद राजा नरेन्द्र सिंह राजा भेलाह। नरेन्द्र सिंहक शासन काल मे मिथिला मे बड्ड महत्व पूर्ण मानल गेल अछि। वो बड्ड वीर छलाह। हुनका सम्बन्ध मे चन्दा झा लिखने छथि– “नृपति नरेन्द्र सिंह भेल जखन। अरिधर कानन पसरल तखन॥ ताकि ताकि शत्रुक संघार। कैलन्हि बहुत छात्र व्यवहार॥ कतहु जुद्धि नहि एला हारि। अतिशय तेज तनिक तरू आरि”॥ मुसलमान सँ जखन हिनका संघर्ष भेल छलन्हि तखन नरहनक बबुआन हिनका मदति केने छलथिन्ह। नरेन्द्र सिंह आर नरहनक बबुआनक बहादुरी देखि नवाव आश्चर्यचकित रहि गेल छलाह जकर स्पष्टीकरण निम्नलिखित पद्ध सँ होइछ– “ऐसो महाथोर जोर जंग सुल्तानी बीच झुकत बबरजंग संगर करीन्द्र हैं। औलिया नवाव नामदार पूछै बार–बार। ये दोनो कौन लड़त अरिवारण परीन्द्र हैं। साहेब सुजान जैनुद्दिन अहमद खाँ सामनेयय अजैकरत कहत कवि चन्द्र हैं। ये तो द्रोणवार केशो साह केँ अजीत साह आगे राघो सिंह जी केँ नवल नरेन्द्र हैं। हुनका समय मे बछौर परगन्ना लकए पुनः झंझट ठाढ़ भेल। बछौरक रूपनारायण ई झंझट केने छलाह। नरेन्द्र सिंह नवाव महावत जंगक ओतए जाय मुर्शिदावाद मे अपन दावी रखलन्हि परञ्च नवाव हुनका सँ अनुरोध केलथिन्ह जे वो बछौर परगन्ना रूपनारायण केँ ददेथुन्ह। राजमहल धरि सब गोटए संगहि अवैत गेलाह आर ओतए पुनः बवाव हुनका सँ आगेअह केलथिन्ह तखन नरेन्द्र सिंह अहि शर्त्त पर देवा लेल तैयार भेलाह जे वो हुनका (नरेन्द्र सिंहक) प्रति राजभक्त रहताह आर करहिया, चिचरी आर जयनगर पर वो कोनो प्रकारक दावा नहि करताह कारण ई सब तिरहूत राजाक सम्पत्ति छल। राजा आर नवाव मे बढ़िया सम्बन्ध छलैन्ह। नरेन्द्र सिंह केँ जे सुविधा सरकार द्वारा भेटलैक तकर विवरण कम्पनीक कागज सब मे सेहो भेटैत अछि। कन्दर्यी घाटक लड़ाईक विवरण जे लाल कवि कएने छथि ताहि सँ ताहि दिनक मिथिला दरबारक ज्ञान होइछ। नरेन्द्र सिंह अपन पिताक स्मारक केँ चिरस्थायी बनेबाक कारणे सहरसा जिला मे राघवपुर (राघोपुर) नामक स्थानक स्थापना केलन्हि। मठक स्थापनाक हेतु कैक व्यक्ति केँ दान देलन्हि। हुनक एकटा पत्नी महिषिक छलथिन्ह आर तिनके आग्रह पर वो महिषि मे उग्रताराक मन्दिरक जीर्णोद्धार केलन्हि। हुनक दरवार विद्वानक हेतु एकटा बड़का आश्रय छल। नरेन्द्र सिंहक पछाति प्रताप सिंह राजा भेलाह। वो भनवारा सँ राजधानी हटाके झंझारपुर अनलन्हि आर फेर ओतए सँ दरभंगा। स्थानीय परम्परा मे हुनका“मिथिलेश” कहल गेल छन्हि। ताहि काल मे तिरहूत सँ बंगाल धरि चोर–डकैतक प्रभाव बढ़ि गेल छल आर कम्पनीक रेकार्ड मे कहल गेल अछि जे प्रताप सिंह हिनका सजा देबाक बात पर सेहो विचार कैल गेल छल। दान देवा मे इहो बड्ड उदार आर हिनक दानक कैकटा कागज सेहो भेटल अछि। हिनका समय मे फ्रान्सिस ग्रांड दरभंगा (तिरहूत)क कलक्टर छलाह। १७७४ मे तिरहूत केँ पटना प्रोविनासि. . . . कौंसिलक अंतर्गतक देल गेल। १७७१ मे नेपालक पृथ्वीसिंह जे भारत सरकार सँ समझौता कए कर देवाक प्रतिज्ञा केलन्हि से कर भारत सरकार केँ राजा प्रताप सिंहक माध्यमे पठाओल जाइत छलन्हि। १७७० मे राजा प्रताप सिंह केँ वंसीटटि आर राजा सितावराय सँ तिरहूतक राज्य मुकर्ररी पद्धा पर भेटल छलैन्ह। ओहि वर्ष तिरहूतक हेतु इस्ट इण्डिया कम्पनी एकटा सुपर भाइजर सेहो बहाल केने छल। कर देवा मे विलंभ भेलाक कारण हिनका झंझटक सामना करए पड़लैन्ह। खेआली राम आर हिम्मत अली केँ तिरहूतक आर्थिक हालात जाँच करबाक हेतु पठाओल गेलन्हि। दरभंगाक राजधानी अनबाक सम्बन्ध मे निम्नलिखित आक्य उल्लेखनीय अछि– दोहा– “नृत्यत फणिन फणानं पर खंजन पाँखि पसारि सोलाखि सब पूछत भये अदभूत बात निहारि॥ पूछत भये नेरश तब सुनु सोति सब लोग खंजन फणि पर शोभहि थाको कौन संयोग”॥ कवित– कहत लगे है तब मंत्री प्रबल लोग सुनियं मिथिलेश जे ज्योतिष मे प्रमाण है। सरस है भूमि याको जीतिनसकत कोउवास करिबे केँ यह विधि केँ निशानि है॥ सुनि केँ आनन्द आर उमंगे छलाह बढ़ि बोले महाराज ने सरस भरिवाषी है। हुकुम हमारी यह जाहिर जहान करो भौरा को छाड़ि यहाँ दरभंगा राजधानी है। दोहा– राजधानी दरभंगा भय सकल गुणान खानि भौरा छड़ि भूप तब सम्मत सबके जानि”॥ विद्या प्रेमी हेवाक कारणे महाराज प्रताप सिंह आलापुर परगन्नाक जगत पुर ग्राम वो पंडित भवानी नाथ शर्मा केँ दान मे ददेलैन्ह जाहि सँ वो आन आर विद्यार्थीक खर्च चला सकैथ। _ “महाराजाधिराज श्रीमत प्रताप बहादुरः– वंग देशाय्नांत राभेक भूपाले दत्तानेक वृत्तितरा स्वीकारक स्मार्ता धर्मज्ञ तर्क मीमाँसा वेदांता लंकार कानन पञ्चानन धर्मधीर श्री भवानीनाथ शर्मषु वृत्तिपत्रम ददाति सकल छात्राध्ययन निर्वाहाय सूर्य विहार सरकार पटनाभ्यांतर्गत तीरभुक्त देशांतर्गत परगन्ना आलापुर अंतर्गत जगतपुर सारैण्यक ससीमक सकाननक ग्रामस्य श्री विष्णु प्रीति सम्पादनायच यवनायवन साधारण स्वसपथपूर्वक वृत्ति रक्ष णामेव करिष्यति ...” हुनका वाद राजा माधव सिंह गद्दी पर बैसलाह। वो स्थायी रूपेण दरभंगा केँ अपन राजधानी बनौलन्हि। १७८५ सँ अद्यावधि हिनका लोकनिक राजधानी दरभंगा रहल अछि। खण्डवला कुलक इतिहास मे माधव सिंहक शासन केँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। वो अपन प्राचीन परम्पराक अनुसार समस्त तिरहूत पर प्रभुत्वक माँग अंग्रेजक समक्ष रखने छलाह आर चिरस्थायी बन्दोबस्त केँ मनबा लेल तैयार नहि छलाह। अहि हेतु वो सम्राट शाह आलम द्वितीयक दरबार मे सेहो दरखास्त देने छलाह आर शाह आलम सँ १८०० ई. मे एकर स्वीकृति सेहो भेट गेल छलन्हि। परञ्च कम्पनीक अधिकारी लोकनि हिनक बात नहि सुनल कैन्ह आर शाह आलमक स्वीकृतिये केँ मानल कैन्ह आर हिनका लोकनि केँ जमीन्दारक दर्जा ददेल कैन्ह आर तहिये ई राजा दरभंगाक जमीन्दारी कहबे लागल जे १९४७ तक रहल। १७८१ खेआली राम राजा कल्याण सिंहक डिप्टी बहाल भेलाह। राजा कल्याण सिंह सँ राजा माधव सिंह केँ सेहो मतभेद भेल छ्लैन्ह। एम्हर जखन कल्याण सिंह से झंझटि चलिते छ्लैन्ह कि तामे हुनका दरभंगा सदर दिवानीक अदालतक हाकिम सँ सेहो मतभेद शुरू भगेलन्हि। हुनक आदमी सब केँ गिरफ्तार कलेल गेलन्हि। राय मोहन लाल आर माधव सिंहक बीच तँ झंझट आर हुनका शासन काल मे उत्पन्न भेल। सरदार खान अफगानक बेटाक राम अली अपन मृत्यु सँ पूर्व अपन सब सम्पत्ति राजा माधव सिंह केँ दान मे लिखि देने छ्लथिन्ह। १७९५ मे दरभंगाक कलक्टर, दरभंगाक तहसिलदार केँ आदेश देलथिन्ह जे वो करीम अलीक सम्पत्ति केँ जप्त कलौथ। राजा माधव सिंह एकर विरोध केलन्हि आर ओम्हर कराम अलीक भगिना सेहो एकटा दरखास्त देलक जे कराम अलीक दानपत्र जाली थिक। अंत मे माधव सिंहक जीत भेल आर वो सम्पत्ति हुनका भेटलन्हि। माधव सिंह उदार आर दानी छ्लाहे आर बहुत रास मन्दिरक निर्माता सेहो। १८म शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे समस्त पूर्वी भारतक स्थिति चिंतनीय भगेल छल आर समस्त क्षेत्र मे सन्यासी फकीरक वगे बना केँ चौर–डकैत चारूकात उपद्रव करैत छलाह। हिनका सब केँ संरक्षण आर प्रोत्साहन मोरंगक राजा सँ भेटैत छलैन्ह। मोरंग आर तिरहूतक सीमा मिलैत–जुलैत छल। सन्यासी–फकीरक नेता छलाह खुर्रम शाह आर वो ताहि दिन नेपाल सँ मुक्त भए मोरंगक एकटा गाम मटिहानी मे रहैत छलाह। तिरहूतक सीमा पर ई लोकनि आतंक मचौने छलाह। १८०४ मे परगन्ना छै आर फरकीयाक तिरहूत सँ अलग ककए भागलपुर मे मिला देल गेलैक। माधव सिंहक समय धरि तिरहूत एक स्वायत्त हिन्दू राज्य छल जकर अपन न्यायालय छलैक आर अपन न्यायाधीश होइत छलैक। एकर सब सँ पैघ प्रमाण ई अछि १७९४ ई. क एकटा न्यायाधीशक निर्णय संस्कृति मे भेटल अछि जाहि मे गुलामकन्याक उपर स्वत्वाधिकारक प्रश्न पर निर्णय अछि। अहि निर्णय केँ बड़ा महत्वपूर्ण मानल गेल आर अठारहम शताब्दीक अन्तिम चरण धरि न्यायालयक निर्णय संस्कृत मे लिखल जाइत छल तकर ई प्रमाण थिक आर गुलामक स्थिति पर सेहो प्रकाश पड़ैत अछि। माधव सिंहक समय सँ दरभंगा राजक स्थिति पूर्ण रूपेण जमीन्दारक स्थिति मे परिवर्तित भगेल। माधव सिंहक पछाति छत्रसिंह महाराज भेलाह। १८१२क बाद जखन अंग्रेज केँ नेपाल संग झंझटि भेलन्हि तखन वो लोकनि बेतिया, पुर्णियाँ आर दरभंगाक राजा लोकनि केँ आदेश देलन्हि जे अपन–अपन सीमाक सुरक्षार्थ वो लोकनि प्रयत्नशील रहौथ। अहि अवसर पर छत्रसिंह अंग्रेज लोकनि केँ साहाय्य देने छलथिन्ह। एकर कारण ई छल जे नेपाली सब तिरहूत क्षेत्र मे सेहो हुलकी–बुलकी दैत छल आर एम्हर–आम्हर सँ लूट पाट सेहो करैत छल १८१५ मे हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। छत्रसिंहक समय मे बेतिया राज आर तिरहूत राजक बीचक सम्बन्ध बढ़िया भगेल छल। दुनु गोटे केँ पटनाक पाटन देवीक मन्दिर मे भेट भेला पर स्थिति मे सुधार भेलैक। सौराठक मन्दिर केँ छत्र सिंह पूरा करौलन्हि आर ओहि मे माध्वेश्वर महादेवक स्थापना सेहो। सौराठ मे वो एकटा धर्मशाला सेहो वो बनबौलन्हि। हुनका बाद महाराज रूद्र सिंह गद्दी पर बैसलाह। हुनका बाद राजा महेश्वर सिंह गद्दी पर बैसलाह। हुनके समय मे सिपाही विद्रोह भेल छल। अंग्रेजक निगरानी हिनका पर शक बनल रहैत छलैन्ह। अंग्रेजक निगरानी हिनका पर रहैत रहैन्ह। नाथपुर आर पुर्णियाँक बीच डाकक व्यवस्थाक हेतु ई अंग्रेजी सरकार केँ १६टा घोड़ सवार सेहो देने रहैथ। संताल विद्रोह केँ दवेवा मे सेहो ई अंग्रेजक मदति केने रहैथ मुदा तैइयो अंग्रेज केँ हिनका पर विश्वास नहि होइत छलैन्ह। १८६० मे हिनका मरलाक बाद दरभंगा १८७८ धरि कोर्ट आफ वार्डसक अधीन रहल। ओकर बाद महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह राजगद्दी पर बैसलाह। वो एक सफल शासक, कुशल प्रशासक, विद्या प्रेमी, विधायक आर राजनीतिज्ञ छलाह। हुनका समय मे दरभंगा राज्यक उत्तरोत्तर विकास भेला। दरभंगा मे लेडीऽफरिन अस्पतालक स्थापना आर खड़गपुर (मूंगेर) मे सेहो एकटा अस्पतालक स्थापना केलन्हि। काँग्रेस केँ बरोबरि चन्दा दैत रहलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालय केँ वो हृदय खोलि केँ दान देलन्हि आर दरभंगा मे राज स्कूलक स्थापना केलन्हि। ताहि दिन मे ऐहेन कोनो शिक्षण संस्था नहि छल जहि मे मंगला पर अथवा बिनु मंगनो ई सहायता नहि देने होथि। १८८८ मे काँग्रेस केँ अधिवेशन करबा लेल ई ‘लाउ पर कास्ल’ प्रयाग मे कीनि केँ देने छलथिन्ह आर सालाना १०,००० टाका चंदा तँ दैते रहथिन्ह। महात्मा गाँधी सँ सेहो हिनका पत्राचार छलैन्ह। जगदीश मंडल जगदीश प्रसाद मंडल (1947- )
गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(उत्थान-पतन- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। मौलाइल गाछक फूल उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डल १ दू साल रौदीक उपरान्तक अखाढ़। गरमीसँ जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौंकि-हौंकि लोक सभ बितबैत। सुतली रातिमे उठि-उठि पाइन पीबै पड़ैत। भोर होइते घाम अपन उग्र रुप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारैले लग पहुँचि जाइत, तहिना सुरुजो लग आबि गेलाह। रस्ता-पेराक माटि सिमेंट जेकाँ सक्कत भऽ गेल अछि। चलबा काल पएर पिछड़ैत अछि। इनार-पोखरिक पानि अपन अस्मिता बचबैक लेल पातालक रस्ता पकड़ि लेलक अछि। दू सालसँ एक्को बुन्न पानि धरतीपर नहि पड़ने धरतीक सुन्दरता धीरे-धीरे नष्ट हुअए लगल अछि । पियाससँ दूबि सभ पाण्डुरोगी जेकाँ पीअर भऽ-भऽ परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भऽ गेल अछि। लताम, दारिम, नारिकेल इत्यादि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि गेल। आम, जामुन, गमहाइर, शीशोक गाछक निच्चा पातक पथार लगि गेल अछि। दसे बजेसँ बाधमे लू चलै लगैत अछि। नम्हर-नम्हर दरारि फाटि धरतीक रुपे बिगाड़ि देने अछि। की खाएब? कोना जीब ? अपनामे सभ एक-दोसरासँ बतिआइत अछि। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखि कऽ संठी जेकाँ भऽ गेल अछि। अनधुन मरबो कएल। अनुकूल समए पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भऽ गेल। माल-जालसँ लऽ कऽ लोको सबहक जान अबग्रहमे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चौपट्ट होइत देखि थारी-लोटा बन्हकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भगै लगल। जैह दशा किसानक, ओएह दशा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतनि, एहि आशामे अनधुन कबुला-पाती लोक करै लगल। तीनि दिनसँ अनुपक घरमे चुल्हि नहि पजड़ल। नल-दमयन्ती जेकाँ दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तरमे पड़ल-पड़ल एक-दोसराक मूह देखैत। ककरो किछु बजैक साहस नहि होइत। बारह बरखक बेटा बौएलाल बोरापर पड़ल माएकेँ कहलक- ‘‘माए, भूखे परान निकलल जाइ अए। पेटमे बगहा लगै अए। आब नइ जीबौ !’’ बौएलालक बात सुनि दुनू परानी अनुपक आँखिमे नोर आबि गेलै। मूहक बोल बुताए लगलैक। लगमे बैसल रधिया उठि कऽ डोल-लोटा लऽ इनार दिशि बिदा भेलि। इनारोक पानि निच्चा ससरि गेलैक अछि, जहिसँ डोलक उगहनियो छोट भऽ गेल। कतबो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पबै चाहैत, तैयो डोल पानिसँ उपरे रहैत। रधियाक मनमे एलै, जखन अधला होइबला होइ छै, तहन एहिना कुसंयोग होइ छैक। बौएलाल नइ बँचत। एक तँ पाँचटा संतानमे एकटा पिहुआ बँचल, सेहो आइ जाइए। हे भगवान, कोन जनमक पापक बदला लइ छह। इनारसँ डोल निकालि लहरेपर डोल-लोटा छोड़ि रधिया उगहनि जोड़ैले डोरी अनै आंगन आइलि। रधियाक निराश मन देखि अनुप पुछलक- ‘‘की भेल?’’ टूटल मने रधिया उत्तर देलक- ‘‘की हैत, जखन दैवेक डाँग लागल अछि, तखन की हएत। उगहनि छोट भऽ गेल तेँ जोड़ैबला डोरी लेल एलौं।’’ रधियाक बात सुनि अनुप घरेक ओसारेक बनहन खोलि देलक। खड़ौआ जौर लऽ रधिया इनारपर जा उगहनि जोड़लक। उगहनि जोड़ि पानि भरलक। पाइन भरि लोटामे लऽ रधिया आंगन आबि बौएलालकेँ पीबैले कहलक। पड़ल बौएलालकेँ उठिये ने होए। ओसारपर लोटा रखि रधिया बौएलालक बाँहि पकड़ि उठा कऽ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटासँ चुरुकमे पानि लऽ बौएलालक आँखि-मुँह पोछलक। बौएलालक देह थर-थर कपैत। थरथरी देखि रधियोकेँ थरथरी पैसि गेलनि। लोटा उठा रधिया बौएलालक मूहमे लगबै लागलि आकि थरथराइत हाथसँ लोटा छुटि गेलनि, जहिसँ पानि बोरापर पसरि गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोरसँ बजै लागलि- ‘‘आब बौएलाल नै जीत, जे घड़ी जे पहर अछि।’’ रधियाक बोल सुनि अनुप जोरसँ कनै लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पूतो आ जनिजातियो एक्के-दुइये अबै लगल। सबहक मूह सुखाइले। के ककरा बोल-भरोस देत। सबहक एक्के गति। अनुपक कानब सुनि रुपनी अंगनेसँ कनैत अबैत। रुपनी अनुपक ममिओत बहिन। अनुपक आङन आबि रुपनी बौएलालकेँ देखि बाजलि- ‘‘भैया, बौआक परान छेबे करह। अखन मुइलहहेँ नहि। किअए अनेरे दुनू परानी कनै छह। जाबे शरीरमे साँस रहतै, ताबे जीबैक आशा। चुप हुअ।’’ कहि रुपनी बौएलालकेँ समेटि कोरामे बैसौलक। तरहत्थीसॅं चाइन रगड़ै लागलि। बौएलाल आँखि खोलि बाजल- ‘‘दीदी, भूखसँ पेटमे बगहा लगै अए।’’ बौएलालक बात सुनि रुपनी बाजलि- ‘‘रोटी खेमे।’’ ‘‘हँ।’’ बौएलालक बात सुनि रधिया घरमे धएल फुलक लोटा, जे रधियाकेॅं दुरागमनमे बाप देने रहनि, निकालि अनुपकेँ देलक। लोटा नेने अनुप दोकान दिश दौगल। लोटा बेचि गहूम किनने आएल। अंगना अबिते रधिया हबड़-हबड़केँ चुल्हि पजारि गहूम उलौलक। दुनू परानी रधिया जाँतमे गहूम पीसऽ लगल। एक रोटीक चिक्कस होइतहि रधिया समेटि कऽ रोटी पकबै आबि गेलीह। अनुप गहूम पीसै लगल। रोटी पका रधिया बौएलाल लग लऽ गेल। अपनेसँ रोटी तोड़ि खेबाक साहस बौएलालकेँ नहि होइत। छाती दाबि- दाबि रधिया बौएलालकेँ रोटी खुआबै लगली। सैाँसे रोटी बौएलाल खा लेलक। रोटी खाइत-खाइत बौएलालोकेँ हूबा एलैक। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीबितहि हाफी हाेअए लगलैक। भुइँयेमे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्कस समेटि रधिया चुल्हि लग आनि सूपमे सानै लगलीह। जांघपर पड़ल चिक्कस अनुप तौनीसॅं झाड़ि, लोटा-डोल लेने इनार दिशि बढ़ल। हाथ-पएर धोय, लोटामे पानि लए आंगन आबि खाइले बैसल। छिपलीमे रोटी आ नोन-मेरचाइ नेेने रधिया अनुपक आगूमे देलक। भुखे अनुपकेँ होए जे साैॅंसे रोटी मोड़ि-सोड़ि कऽ एक्के बेरि मूहमे लऽ ली, मुदा से नहि कए तोड़ि-तोड़ि खाए लगल। छिपलीक रोटी सठितहि अनुप रधिया दिशि देखै लगल, मुदा तीनिये टा रोटी पका रधिया चिक्कसक पथिया कोठीपर रखि देने। रधियाकेँ देखि अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीबि उठि गेल। दिन अछैते नथुआ दौड़ल आबि, हँसैत अनुपकेँ कहलक- ‘‘गिरहत कक्का बड़की पोखरि उड़ाहथिन। काल्हिसँ हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करै चलिहह।’’ नथुआक बात सुनितहि रधियाकेँ, जेना अशर्फीॅं भेटि गेल होए, तहिना भेलै। अनुपोक मूहसँ हँसी निकलल। अनुपक खुशी देखि नथुआ बाजल- ‘‘अपने मुसना कक्का मेटगिरी करत। ओएह जन सबहक हाजरी बनौत।’’ नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप होइतहि छल आकि मुसनो धड़फड़ाएल आएल। मुसना दिशि देखि नथुआ बाजल- ‘‘मुसनो कक्का तँ आबिये गेला। आब सभ गप फरिछाकेँ बुझबहक।’’ मेटगिरी भेटलासँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होइत। ओना कहियो मुसना मेटगिरी केने नहि, मुदा गामक बान्ह-सड़कमे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तेँ खुशी। मने-मन सोचैत जे जकरा मन हैत तकरा जनमे राखब आ जकरा मन हैत तकरा नै राखब। ई तँ हमरे जुइतिक काज रहत की ने। जकरा मन हैत ओकरा बेसिये कऽ हाजिरी बना देबैक। पावर तँ पावर होइत अछि। जँ पावर भेटै आ ओकर उपयोग फाजिल कऽ के नहि करी तँ ओहन पावरे लऽ कऽ की हेतै ? जँ से नहि करब तँ मुसना आ मेटमे अनतरे की हैत। लोक की बुझत। मुस्की दैत मुसना अनुपकेँ कहलक- ‘‘भैया, काल्हिसँ बड़की पोखरिमे काज चलतै, तोहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मड़ुआ, भरि दिनक बोइन हेतह। तत्तेटा पोखरि अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिये जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबैले अछि, मुदा ओकरा सभकेँ माटि नहि काटै देबै।’’ मुसना बात सुनि बौएलाल फुड़फुड़ा कऽ उठि कहलक- ‘‘कक्का हमरो गिनती कऽ लिहऽ। हमहूँ माटि काटै जेबह।’’ -‘‘बेस बौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहरमे भानस करैले भौजीकेँ पहिने छुट्टी दऽ देबइ।’’ कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल। दोसर दिन भोरे, पोखरिमे हाथ लगैसँ पहिनहि चौगामाक जन कोदारि-टाला वा पथिया-कोदारि लऽ पोखरिक मोहारपर पहुँचि थहाथहि करै लगल। मेला जेकाँ लोकक करमान लागि गेल। जते गामक जन तहिसँ कैक गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देखि मुसनाक मनमे अहलदिल्ली पैसि गेलै। तामसो आ डरोसँ देह थर-थर कपै लगलैक। मुसनाक मनमे एलै, हमर बात के सुनत। माथपर दुनू हाथ लऽ मुसना बैसि गेल। किछु फुरबे ने करैत। ठकमूरी लगि गेलैक। सौँसे पोखरि, गौआँसँ अनगौँँआ धरि, जगह छेकि-छेकि कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मनमे एलै जे गिरहत कक्का रमाकान्त-बाबूकेँ जा कऽ सब बात कहिअनि। सैह केलक। उठि कऽ रमाकान्त ऐठाम बिदा भेल। तहि बीच गौआँ-अनगौआँ जनमे रक्का-टोकी शुरु भेल। अनगौआँ सभ जोर-जोरसँ बजैत जे कोनो भीख मंगैले एलहुँ। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब। गौआँ जन सभ कहै जे हमरा गामक काज छी तेँ हम सभ अपने करब। सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्के ठाम पोखरि माटि दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौबलि हुअए लगलै। सभ हल्ला करैत तेँ ककरो बात कियो सुनबे नहि करैत। सभ अपने बजैमे बेहाल। गारि-गरौबलि करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिशि बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिशि। दुनूक बीच मूहसँ गारियो-गरौबलि होइत आ हाथसँ पकड़ो-पकड़ा भऽ गेल। एक-दोसरकेँ पटकि छाती पर बैइसै चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने तँ भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किएक तँ सिंहेसराक पएर घुच्चीमे पड़ि गेलै, जहिसँ ओ धड़फड़ा कऽ खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नहि मानलक। हिम्मत कऽ के उठि भुटकुमराकेँ छिड़की लगा खसौलक। दरबज्जापर बैसि रमाकान्त बाबू बखारीक धान, मड़ूआक हिसाब मिलबैत। हलचलाइत मुसनाकेँ देखि रमाकान्त पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे नहि करैत। मुदा तैयो मुसना कहै लगलनि- ‘‘काका, तत्ते अनगौआँ जन सब आबि गेल अछि जे गौआँकेँ जगहे ने हैत। कतबो मनाही केलियै कोइ मानैले तैयारे ने भेल। अपनेसँ चलि कऽ देखियौक।’’ कागज-कलम घरमे रखि रमाकान्त बिदा भेलाह। आगू-आगू रमाकान्त आ पाछू-पाछू मुुसना। पोखरिसँ फड़िक्के रमाकान्त रहथि आकि पोखरिमे हल्ला होइत सुनलखिन। मन चौंकि गेलनि। मनमे हुअए लगलनि जे अनगौआँ सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्न कऽ देब तँ गौँओ कामइ हैत। जँ काज बन्न नहि करब तँ अनगौँओ मानबे नहि करत। विचित्र स्थितिमे रमाकान्त। निअरलाहा सभ गड़बड़ भऽ जाएत। पोखरिक महारपर रमाकान्तकेँ अबितहि चारु भरसँ जन सभ घेरि लेलकनि। सभ हल्ला करैत जे जँ काज चलत तँ हमहूँ सभ खटब। ततमतमे पड़ि रमाकान्त अनगौआँ सभकेँ कहलखिन- ‘‘देखू रौदियाह समए अछि। सभ गाममे काजो अछि आ करौनिहारो छथि। चलै चलू, अहाँ सबहक संगे हमहूँ चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबनि जे अपना-अपना गामक बोनिहारकेँ अपना-अपना गाममे काज दियौ।’’ आन सभ गामक लोक कोदारि, छिट्टा, टल्ला नेने बिदा भेल। रमाकान्तो संगे बिदा भेलाह। किछु दूर गेलापर रमाकान्त मुसनाकेँ इशारामे कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकलि जाएत तखन गौआँ जनकेँ काजमे लगा दिहक। तहि बीच क्यो जा कऽ सिंहेसरा घरवालीकेँ कहि देलक जे पोखरिमे तोरा घरबलाकेँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरबलाक मारिक नाम सुनितहि सिंहेसराक घरोवाली आ धियो-पूतो गामे परसँ गरिअबैत पोखरि लग आबि गेल। मुदा तइसँ पहिने अनगौआँ सभ चलि गेल छल। पोखरिक काज शुरु भेल। तीनू गोटे अनुप एक्के ठाम खता चेन्ह देलक। कोदारिसँ माटि काटि-काटि अनुप पथिया भरैत, रधिया आ बौएलाल माथपर लऽ लऽ महारपर फेकए लगल। बारहक अमल भऽ गेल। रमाकान्त घुरिकेँ आबि पोखरिक पछबरिया महारपर ठाढ़ भऽ देखै लगलथि। मुसना नजरि पड़ितहि दौड़ि कऽ रमाकान्त लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचतहि रमाकान्त आंगुरक इशारासँ बौएलालकेँ देखबैत पुछलखिन- ‘‘ओ के छी। ओकरा साँझमे कहिहक भेटि करै लेल।’’ कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ता पकड़लनि। बारह बर्खक बौएलालक माटि उघब देखि सभकेँ छगुन्ता लगैत। जाबे दोसरो कियो एक बेरि माटि फेकैत ताबे बौएलाल तीनि बेरि फेकि दैत। बौएलालक काज देखि अनुप मने-मन सोचै लगल जे बोनिआतीसँ नीक ठिक्का होइत। मुदा हमरे सोचलासँ की हेतैक। ताबे मुसनो रमाकान्तकेँ अरिआति घुरि कऽ अनुप लग आबि कहलक- ‘‘भैया, मालिक दुनू बापुतकेँ साँझमे भेंट करैले कहलखुनहेँ।’’ मालिकक भेट करैक सुनि अनुपक हृदयमे खुशीक हिलकोर उठै लगल। मुदा अपना कऽ सम्हारि अनुप मुसनाकेँ कहलक- ‘‘जखन मालिक भेंट करैले कहलनि तँ जरुर जाएब।’’ सुरुज पछिम दिस एकोशिया भऽ गेलाह। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधियाकेँ कहलक- ‘‘भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनहि जाएत।’’ रधिया आंगन बिदा भेलि। अनुप आ बौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ गोटे काज छोड़ि देलक। गामपर आबि अनुप दुनू बापुत नहा कऽ खेलक। कौल्हुक गहूमक चिक्कसक रोटी आ अरिकंचन पातक पतौरा बना पकौने छलि, ओकर चटनी बनौने छलि। खा कऽ तीनू गोटे अनुप, बौएलाल आ रधिया ओसारपर बैसि गप-सप करै लगल। अनुप रधियाकेँ कहलक- ‘‘भगवान बड़ी गो छथिन। सभपर हुनकर नजरि रहै छनि। देखियौ एहेन कहात समएमे कोन चक्कर लगा देलखिन।’’ गप-सप करितहि गोसाइ डूबि गेल। झलफल होइतहि अनुप दुनू बापुत रमाकान्त ऐठाम बिदा भेल। रस्तामे दुनू बापुतकेँ ढेरो तरहक विचार मनमे उठैत आ समाप्त होइत। ओना दुनू बापुतक मन गदगद। दरबज्जापर बैसि रमाकान्त मुसनासँ जनक हिसाब करैत रहथि। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाम छुटल तेँ हिसाव मिलबे नहि करैत। अही घो-घाँ मे दुनू गोटे। तहि बीच दुनू बापुत अनुप पहुँचल। फरिक्केसँ अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्तकेँ गोर लागि बिछानपर बैसल। बौएलालो गोर लगलकनि। बौएलालकेँ देखि रमाकान्त बिहुँसैत अनुपकेँ कहलखिन- ‘‘अनुप, तोँ अपन ई बेटा हमरा दऽ दए।’’ मने-मन अनुप सोचै लगल जे ई की कहलनि ? कने काल गुम्म भऽ अनुप उत्तर देलकनि- ‘‘मालिक, बौएलाल की हमरेटा बेटा छी, समाजक छिऐ। जखन अपनेकेँ जरुरत हैत तखन लऽ लेब।’’ अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्तामेँ पड़ि गेलाह। मास्टर साहेब अनुपकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगलथि। एकटा युवक, जे दू दिन पहिने भाग्यक मारल आएल छल, ओहो आशा-निराशामे डूबल। ओहि युवककेँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाइ पूरा भेल छलैक, खाली एक बर्ख बाकी छलैक। अपन सभ खेत बेचि पिताक बीमारीक इलाज करौलक, मुदा ओ ठीक नहि भऽ मरि गेलखिन। कर्जा लऽ पिताक श्राद्ध-कर्म केलकनि। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलैक आ जीबैक कोनो उपायो ने रहलनि। जिनगीक कठिन मोड़पर आबि युवक निराश भऽ गेल छलाह। साल भरि पहिने बिआहो भऽ गेल छलनि। एक दिस बूढ़ि माए आ स्त्रीक भार दोसर दिस जीबैक कोनो रस्ता नहि। सोगसँ माइयोक देह दिने-दिन निच्चे मुहे हहड़ल जाइत। रमाकान्क उदार विचार सुनि ओ युवक आएल छल। सभ दिन रमाकान्त चारि बजे पिसुआ भांग पीबैत छथि। दोसरि-तेसरि साँझ होइत-होइत रमाकान्तकेँ भांग क नशा चढ़ि जाइत छनि। भांग क आदति रमाकान्तकेँ पितासँ लागल छलनि। रमाकान्तक पिता न्याय शास्त्रक विद्वान्। ओना गाममे कम्मे-काल रहैत छलाह, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तक ऊपर। तेँ रमाकान्त जेहने इमानदार तेहने उदार विचारक सेहो। पोखरिक चर्चा करैत रमाकान्त मुसनाकेँ कहलखिन- ‘‘काल्हिसँ बौएलालकेँ दोबर बोइन दिहक।’’ दोबर बोइन सुनि, कने काल गुम्म भऽ मुसना कहलकनि- ‘‘मालिक, एक गोरेकेँ बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। एहिसँ झंझट शुरु भऽ जाएत। झंझट भेने काजो बन्न भऽ जाएत।’’ काज बन्न होइक सुनि रमाकान्त उत्तेजित भऽ कहलकखिन- ‘‘काज किए बन्न हैत। जे जतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबैक।’’ रमाकान्तक विचारकेँ सभ मूड़ी डोला समर्थन कऽ देलकनि। समर्थन देखि गदगद होइत रमाकान्त कहै लगलखिन- ‘‘अखन बौएलालकेँ बोइन बढ़ेलहुँ, बादमे दू बीघा खेतो देबैक। मास्टर सहाएब, अहाँ रातिकेँ बौएलालकेँ पढ़ा दियौ। सिलेट-किताबक खरच हम देबै।’’ खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘विपन्न तँ बौएलालेटा नहि, गाममे बहुतो अछि।’’ मुसनाक प्रश्न सुनि रमाकान्तक हृदयमे सतयुगक हरिश्चन्द्र पैसि गेलनि। उदार विचार, इमानमे गंभीरता, मनुक्खक प्रति सिनेह हुनक विवेककेँ घेरि लेलकनि। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि आ ने धन जमा करैबला जेकाँ अमानवीय व्यवहार प्रवेश केने छलनि। नीक समाजमे जहिना धनकेँ जिनगी नहि बुझि, जिनगीक साधन बुझि उपयोग होइछ, तहिना रमाकान्तोक परिवारमे रहलनि। जखन रमाकान्तक पिता गाममे रहैत छलथिन आ कियो किछु मंगै अबैत तँ खाली हाथ घुरए नहि दैत छलथिन। जे रमाकान्तो देखथिन। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक आबनि आ ओ किछु मांगै आबथि तँ हुनका जरुर देबनि। किएक तँ ओ गामक प्रतिष्ठा बचाएब होएत। गामक प्रतिष्ठा व्यक्तिगत नहि सामूहिक होइछ। तहिठाम जँ क्यो सोचैत जे गाम सबहक छिऐक, हमरा ओहिसँ कोन मतलब? गलती हेतैक। गाममे अधिकतर लोक गरीब आ मुर्ख अछि, ओ एहि प्रतिष्ठाकेँ नहि बुझैत अछि। तेँ जे बुझनिहार छथि हुनकर ई खास दायित्व बनि जाइत छनि। एहि धरतीपर जतेक जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ मनुख धरि अछि, सभकेँ जीबैक अधिकार छैक। तेँ जे मनुख ककरो हक छिनै चाहै छैक ओ एहि भूमिपर सभसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक कएल रस्ताकेँ पकड़ि कऽ चलक चाही। जहिसँ ओ प्रतिष्ठा सभदिन बरकरार रहतैक। २ सुखी-सम्पन्न रमाकान्त जेहने उदार तेहने इमानदार, एहि लेल समाजमे बुझल जाइत छथि। मरौसी जमीन तँ बेशी नहि मुदा पिताक अमलदारीमे जत्था बहुत भेलन्हि। पितो किनने तँ नहिये रहथिन्ह मुदा पुरस्कार स्वरुप पैघ-पैघ दरबार सभसँ भेटल छलनि। रमाकान्तक पिता मधुकान्त अध्यात्म, वैयाकरण आ न्यायशास्त्रक विद्वान छलथि। बच्चेसँ मधुकान्तक झुकाव अध्ययन दिशि देखि पिता बनारस पढ़ैले पठौलखिन। बनारसमे अध्ययन कऽ मधुकान्त तीन बर्ख काशीक एकटा न्यायशस्त्रक पंडित एहिठाम अध्ययन केने रहथि। अध्ययनक उपरान्त मधुकान्त पूर्ण रुपेण बदलि गेल रहथि। अध्ययन-अध्यापनक असुविधा दुआरे गाममे मोन नहि लगनि। ने अपन मनोनुकूल लोक भेटनि आ ने क्रिया-कला मे सामंजस्य होइन। तेँ जिनगीक अधिक समए अनतै बितबैत रहथि। जेहने प्रतिष्ठा मधुकान्तकेँ अपना राजमे, तेहने आनो-आनो राजमे रहनि। भारतीय चिन्तनक बुनियादी ढंगसँ व्याख्या करब मधुकान्तक खास विशेषता रहनि। सामाजिक व्यवस्थाक गुण-अवगुनक चर्च अनेको लेखमे लिखने रहथि, जे असुविधाक चलैत अप्रकाशिते रहलनि। तगमा, प्रशस्ति पत्र टांगि दरबज्जाक शोभा बढ़ौने छलाह। जखन गाममे रहैत छलाह, तखन सबहक एहिठाम जा-जा सामाजिक व्यवस्थाक कुरीति बुझबथिन। खास कऽ कर्मकाण्डक। तेँ समाजमे सभ चाहनि। अपनो जिनगीक बात दोसरकेँ कहथिन आ दोसरोक जिनगीक अध्ययन करैत रहैत छलाह। छल-प्रपंचक मिसिओ भरि गंध जिनगीकेँ नहि छुलकनि। समाजमे मनुक्ख कोना मनुक्खक बाधा बनि ठाढ़ अछि आ ओहिसँ कोना छुटकारा भेटतै, नीक-नहाँति मधुकान्त बुझथिन। सत्तरि जाड़ एहि धरतीपर कटलनि। सभ दिन चारि बजे रमाकान्त भांग पीबि, पान खा टहलैले निकलि दोसर साँझ धरि घुरि कऽ घरपर अबैत छलाह। घरपर अबिते हाथ-पएर धोय दरबज्जापर बैसि दुनियादारीक गप-सप करैत छलाह। टोल-पड़ोसक लोक एका-एकी आबि-आबि बैसए। रंग-बिरंगक गप-सपक संग चाहो-पान आ हँसिओ-मजाक चलैत रहैत छलैक। मास्टर सहाएब हीरानन्द आ युवक शशिशेखर सेहो टहलि-बूलि कऽ अएलाह। चाह पीबि रमाकान्त शशिशेखरकेँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, अहाँ की चाहै छी ?’’ मजबूरीक स्वरमे शशिशेखर कहए लगलनि- ‘‘एहन दल-दलमे हम फँसि गेल छी जे एकटा पएर निकालै छी तँ दोसर धँसि जाइत अछि। एहिसँ कोना निकलब?’’ कृषि कओलेज मे प्रवेशक प्रतियोगितामे सफल होइतहि शशिशेखरकेँ सुखद भविष्यक ज्योति भेटलन्हि। बेटाक सफलता सुनि पिताक उत्साह हजार गुना बढ़ि गेलनि, जते जिनगीमे कहिओ नहि भेल छलनि। जहिना काँटक गाछमे अमरफल बेल फड़ैत, काँटक गाछमे गुलाबक फूल फुलाइत अछि, तहिना पछुआएल परिवारमे शशिशेखर भेलाह। शशिशेखरक पिता मनमे अरोपि लेलनि जे बीत-बीत कऽ खेत किए ने बीकि जाए मुदा बेटाकेँ कृषि वैज्ञानिक बना कऽ छोड़ब। शशिशेखरोक मनमे पैघ-पैघ अरमान अबै लगलनि। कृषि वैज्ञानिक होएब, नीक नोकरी भेटत, माए-बापक सेहन्ता कमा कऽ पूरा करब। सिर्फ परिवारेक नहि, जहाँ धरि समाजोक भऽ सकत सेवा करब। मुदा बिचहिमे समए एहन मोड़पर आनि देलकनि जे सभ अरमान हवामे उड़ि गेलनि। जहिना बीच धारमे नाओ चलौनिहारक हाथसँ करुआरि छुटि गेलापर नाओमे यात्रा केनिहार आ चलौनिहारकेँ होइत, तहिना शशिशखरोकेँ भेलनि। चारि सालक कोर्समे तीन साल पुरलाक बाद पिता दुखित पड़लखिन। चारिम सालक पढ़ाइ छोड़ि शशिशेखर पिताक सेवामे जुटि गेलाह। एक दिशि पिताक इलाज तँ दोसर दिशि परिवारक बोझ पड़ि गेलनि। आमदनीक कोनो स्रोत नहि, मात्र खेते टा। खेतो बहुत अधिक नहि। तहूमे अदहासँ बेसी बिकिये गेल छलनि। शशिक बचपनाक बुद्धि। जिनगी आ दुनिआसँ भेट नहि। छोट बुद्धिसँ पैघ समस्याक समाधाने नहि होइत छलनि। अंतमे निराश भऽ खेत बेचि-बेचि परिवारो आ पितोक इलाज करबै लगलाह। बीति-खेत बिक गेलनि। जहन कि दुनू समस्या परिवार आ इलाज बरकरारे रहलनि। बेबश भेल छलाह शशि। पितो मरि गेलखिन। कर्ज कऽ केँ पिताक श्राद्ध-कर्म केलनि। दुनियाँमे कतौ इजोत देखबे नहि करथि। सौँँसे दुनिया अन्हारे-अन्हार लगै लगलनि। बेबस भेल शशि मने-मन सोचै लगलाह जे जँ हम ट्यूशनो पढ़ा कऽ अपनो पढ़व तहन परिवारक की दशा होएत ! ओतेक तँ ट्यूशनोसँ नहि कमा सकैत छी, जहिसँ अपनो काज चलाएब आ परिवारो चला लेब। अधिक कमाइक लेल अधिक समयो लगबै पड़त। जे संभव नहि अछि। अगर जँ सभ समए ट्यूशनेमे लगा देब तँ अपने कखन पढ़ब आ क्लास कोना करब। जहियासँ पिता मुइलाह तहियासँ माइयोक देह सोगसँ हहड़ले जा रहल छनि। एक तँ बूढ़ि छथि दोसर सोगसँ सोगाइल। मनुक्खमे जन्म लेलापर क्यो माए-बापक सेवा नहि करै तँ ओ मनुक्खे की ? मनुक्खक मात्र नकल छी। हम से नहि करब। चाहे दुनियाक लोक नीक कहै वा अधला, तेकर हमरा गम नहि अछि। डिग्री लऽ कऽ हम नीक नोकरी करब। नीक दरमाहा भेटत। जहिसँ खाइ-पीबै, ओढ़ै-पहिरै आ रहैक सुविधा भेटत, मुदा जिनगी तँ ओतबे टा नहि अछि। जिनगीक लेल ज्ञान, कर्म आ व्यवहारक जरुरत सेहो होइत अछि। जिनगी पाबि जँ मनुक्ख प्रतिष्ठित नहि बनि सकल तँ ओ जिनगिये की ? आइ जँ हम माएकेँ छोड़ि दिअनि आ हुनका कष्ट होइन, ओहि कष्टक भागी के बनत ? दिन-राति हुनका सेवाक जरुरत छनि, उठौनाइ-बैसोनाइ सँ लऽ कऽ खुऔनाइ-पिऔनाइ धरि। हम सभ ओहि धरतीक सन्तान छी जहि ठाम श्रवणकुमार सन बेटा जन्म लए चुकल छथि। यैह विचार शशिशेखरक पढ़ाइ छोड़ौलकनि। दुनियामे कोनो सहारा नहि देखि शशि रमाकान्त ऐठाम अएलाह। अपन जीवनक सभ बात शशि हीरानन्दकेँ कहलखिन। शशिक बातसँ हीरानन्दक हृदय पघलि गेल छलनि। हीरानन्द मने-मन सोचैत रहथि जे, जे नवयुवक देश सेवामे एकटा खूँटाक काज करत ओ अपनहि नष्ट भऽ रहल अछि, तेँ ओहन युवककेँ सोंगर लगा ठाढ़ करैक जरुरति अछि। सोझमतिया रमाकान्त दोहरबैत शशिकेँ पुछलखिन- ‘‘नीक जेकाँ अहाँक बात हम नहि बुझि सकलौं?’’ बिचहिमे मास्टर साहेब रमाकान्तकेँ बुझबैत कहलखिन- ‘‘शशि महा संकटमे फँसि गेल छथि। हुनका अहींक मदतिक जरुरत छनि। तखने ओ उठि कऽ ठाढ़ हेताह।’’ मास्टर साहेबक बात सुनि धाँए दऽ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘अगर हमर मदतिसँ शशिकेँ कल्याण हेतनि तँ जरुर करबनि।’’ रमाकान्तक आश्वासनसँ शशिक हृदयमे भोरक सूर्य देखि दिनक आशा जगलनि। शशिक मूहसँ हँसी निकललनि। जिनगीक अमावश्या पूर्णिमामे बदलै लगलनि। गंभीर भऽ हीरानन्द शशिकेँ कहै लगलखिन- ‘‘चिन्ता छोड़ू। नव जिनगीक दिश डेग उठाउ। ई कर्मभूमि थिकैक। एहिठाम कर्मनिष्टे लोक मनुष्यक जिनगी पाबि सकैत अछि।’’ हीरानन्दक विचार सुनि शशि उठि कऽ ठाढ़ भऽ हुनक हाथ पकड़ि जिनगी भरिक मित्रताक व्रत लैत कहलखिन- ‘‘जहिना कोनो रोगाइल गाछकेँ माली तामि-कोड़ि, पानि दऽ पुनः नव जिनगी दैत अछि तहिना अहाँ दुनू गोटे हमरा देलहुँ। तहि लेल हम ऋणी छी। जहाँ धरि भऽ सकत सेवा करैत रहब।’’ शशिक विचार सुनितहि रमाकान्तक हृदयमे कर्णक रुप सन्निहा गेलनि। खुशीसँ गद्-गद् होइत कहलखिन- ‘‘बौआ, हम तँ पढ़ल-लिखल नहि छी। पिताजी गाममे नहि रहैत छलाह तेँ परिवार सम्हारै पड़ैत छल। ओना कोनो वस्तुक अभाव जिनगीमे ने पहिने भेल आ ने अखन अछि। जहिया पिताजी गाम अबैत छलाह तहिया बुझा-बुझा कऽ कहैत छलाह। अखनो मनमे ओएह विचार अछि।’’ रमाकान्तकेँ दू गोट बेटा। दुनू डाॅक्टरी पढ़ि मद्रासमे नोकरी करैत छन्हि। कहियो काल दू-एक दिनक लेल गाम अबैत छन्हि। दुनू भाइ मद्रासेमे बिआहो कऽ नेने छथि। दुनू कनिओ डाॅक्टरे छथिन। एक परिवारमे चारि डाॅक्टर, तेँ आमदनियो नीक छनि। दस बर्खक नोकरीमे कमा कऽ ढेर लगा लेने छथि। अपन तीन मंजिला मकान मद्रासेमे बनौने छथि। चारिटा गाड़ी सेहो रखने छथि। अपन क्लीनिक सेहो बनौने छथि। बेटा लग जेबाक विचार रमाकान्त बहुत दिनसँ करैत छलाह मुदा दुरस्तक दुआरे नियारियेकेँ रहि जाइत छलाह। पुनः रमाकान्त बजलाह- ‘‘पोखरियोक काज सूढ़िआइये गेल अछि ओकरा सम्पन्न कए मद्रास जाएब। मद्राससँ अएलाक बाद अहाँक सभ जोगार कए देब। ताधरि अहाँ पत्नियो आ माइयोकेँ एहिठाम लए अबिअनु। एतै रहू।’’ बेरु पहर हीरानन्द आ शशिशेखर टहलै निकललाह। दरबज्जाक सोझे पोखरिक महारक निच्चामे, उत्तर पूब कोनमे एकटा भरिगर सरही आमक गाछ। दुनू गोटे ओहि गाछक निच्चा दुभिपर बैसि गप-सप करै लगलाह। हीरानन्द अपन खेरहा कहै लगलखिन। मैट्रिक पास केलाक उपरान्त मास्टरीक लेल इन्टरभ्यू देइले गेलौं। जखन ओहि ठाम गेलहुँ आ देखलिऐक तँ बुझि पड़ल जे इन्टरभ्यू मात्र दिखावा अछि। मोल-जोल तेजीसँ चलैत छल। मुदा सोझे घुमिओ जाएब उचित नहि बुझि रुकि गेलहुँ। मनमे आएल जे मोल-जोलक विरोध करी। संगी भजिअबै लगलौं। मुदा मोल-जोलक पाछू सभ लागल। एकोटा संग देमएबला नहि देखि मनकेँ असथिर केलहुँ। फेर भेल जे विरोध कऽ हंगामा ठाढ़ कए दियैक। मुदा दुनू पक्ष एक दिशहे, सिर्फ हमहीं टा कातमे। तामसे देह थर-थर कपैत छल। लाभ-हानिक हिसाब जोड़ी तँ हानिये बेसी बुझि पड़ैत छल। मुदा मन तैयो मानै लेल तैयार नहि हुअए। हुअए जे, जे बहालीक उपरका सीढ़ीपर अछि ओकरा चारि धौल लगा दिऐ। दस दिन जहलेमे रहब। फेर हुअए जे जखन डिग्री आ योग्यता अछि, तखन एहेन-एहेन नोकरी कतेको औत आ जाएत। फेर हुअए जे हजारो नवयुवक देशक आजादीक लेल खून बहौलक। हमरा बुते एतबो ने हैत। समुद्रक लहरि जेकाँ मनमे संकल्प-विकल्प उठैत आ शान्त होइत रहल। सभ केयो चलि गेल। हम असकरे रहि गेलहुँ। अचता-पचताकेँ बिदा भेलौं। डेगे ने उठैत छल मुदा तैयो घरपर एलहुँ। घरपर अबितहि पत्नी बुझि गेली। मुदा आशा जगबै दुआरे लोटामे पानि नेेने आगू आबि कहलनि- ‘‘थाकि गेल होएब। हाथ-पएर धोय लिअ, थाकनि कमि जाएत। जलखै नेने अबै छी।’’ जाबे हम पएर-हाथ धोलहुँ ताबे थारी नेने ऐलीह। पहिनहि जलखैएक ओरियान कए कऽ रखने रहथि। जलखै खा, दरबज्जेक चौकीपर कुरता खोलि कऽ रखि देलिऐ आ बाँहिक सिरमा बना पड़ि रहलौं। मुदा मनमे ढेरो रंगक विचार सभ उठै लगल। मुदा दू तरहक विचार सोझमे आबि गेल। पहिल विचार जे शिक्षकेक बहाली टामे घुसखोरी छैक आकि सभ विभागमे छैक? आँखि उठा-उठा सभ दिशि देखै लगलहुँ तँ बुझि पड़ल जे अहूसँ बेसी आन-आनमे अछि। जखन सभ विभागमे घुसखोरी अछि, तखन देश आगू मुहे कोना ससरत ? निच्चासँ ऊपर धरि एक्के रोग सगतरि पकड़ने अछि। मन औना गेल। मन औनाइते छल आकि दोसर विचार मनमे उपकल। मनकेँ असथिर कए सोचए लगलहुँ। अनायास मनमे आएल जे जहिना पुरबा-पछबा हवा धरतीसँ अकास धरि बहैत अछि, तहिना ई व्यवस्थाक हवा छिऐक। तेँ एकरा बदलैक एक्केटा रस्ता अछि व्यवस्था बदलब। मुदा व्यवस्था बदलब छौड़ा-छाैड़ीक खेल नहि छी। कठिन काज छी। व्यवस्था सिर्फ लोकक चालिये-ढालि धरि सीमित नहि अछि। ओ अछि मनुक्खक चालि-ढालिसँ लऽ कऽ ओकर बुद्धि-विचार विवेक धरि। मनुष्यकेँ जेहेन बुद्धि रहै छै, ओहने विचार मनमे अबै छै। जेहेन विचार मनमे अबैत छैक, तेहने ओ काज करैत अछि। तेँ जाधरि मनुक्खक बुद्धि नहि बदलत ताधरि ओकर क्रिया-कलाप नहि बदलि सकैत अछि। जाधरि-क्रिया-कलाप नहि बदलत, ताधरि व्यवस्था बदलब मात्र बौद्धिक व्यायाम हैत। तेँ जरुरत अछि मनुक्खमे नव बुद्धिक सृजन कए नव क्रिया-कलाप पैदा करब। नब क्रिया-कलाप अएलापर नव रस्ता बनत। नब रस्ता बनला पर कियो नव स्थानपर पहुँचत। नव जगह पहुँचलापर मनुक्ख मनुक्खक बराबरीमे आओत। आ छोट-पैघ, धनीक-गरीब, ऊँच-नीचक खाधि समतल हएत। तखन भक्क खुजल। भक्क खुजितहि हाइ स्कूलक शिक्षक देवेन्द्र बाबू मन पड़लनि। देवेन्द्र बाबू, सदिखन छात्र सभ केँ कहथिन- ‘‘मनुखकेँ कखनो निराश नहि हेबाक चाहिऐक। जखने मनुक्खमे निराशा अबैत छैक, तखने मृत्यु लग चलि अबै छैक। तेँ सदिखन आशावान भए जिनगी बितेबाक चाहिऐक। कठिनसँ कठिन समए किएक ने आबए मुदा विवेकक सहारा लए आगू डेग उठेबाक चाहिऐक।’’ देवेन्द्र बाबूक विचार मन पड़ितहि ओ संकल्प लेलनि, जहन शिक्षक बनैक लेल डेग उठेलहुँ तँ शिक्षक बनि कऽ रहब। चाहे जत्ते विघ्न-बाधा आगूमे उपस्थिति होअए।’’ जखन देवेन्द्र बाबू कओलेजमे पढ़ैत रहथि तखन आजादीक आन्दोलन देशमे उग्र रुप धेने छल। देवेन्द्रबाबू पाँच-सात संगीक संग पोस्ट आॅफिसमे आगि लगा देलखिन। पोस्ट-आॅफिस जरि गेलै। तीन दिनक बाद हुनका पुलिस पकड़ि लेलकनि। मारबो केलकनि आ जहलो लए गेलनि। जहल जाइसँ पहिने कने डरो होइत छलनि। लोकक मुहे सुनने रहथिन जे जहलमे खाइले नहि दैत छैक। ऊपरसँ साँझ-भिनसर दुनू साँझ मारबो करै छै। मुदा जहलक भीतर गेलापर देखलखिन जे हजारो देशप्रेमी क्रान्तिकारी जहलमे छथि। हुनका सबहक लेल जेहने घर तेहने जहल। एक बर्ख ओहो जहलमे रहलाह। ओहि बर्ख दिनमे ओ बहुत सिखलनि। जिनगीये बदलि गेलनि। आब देबेन्द्र बाबू सिर्फ अपने आ अपना परिवारे टा लेल नहि सोचथि। बल्कि ओ बुझि गेलखिन जे देशक अंग समाज आ समाजक अंग व्यक्ति वा परिवार होइत अछि। तेँ, सभकेँ अपनासँ लऽ कऽ देश धरिक सेवा करैक चाहिऐक। जहल सँ निकलि बी.ए.क फार्म भरलनि। बी.ए. पास केलापर हाइ स्कूलक शिक्षक बनलाह। हाइ स्कूलमे बहूतो शिक्षक छलथि मुदा हुनकर जिनगी भिन्न छलनि। ट्यूशन माने खानगी पढ़ौनीकेँ पाप बुझि क्लासमे तेना पढ़बैत छलाह जे विद्यार्थीकेँ टयूशन पढ़ैक जरुरते ने रहैत छलैक। स्कूलक पजरेमे टटघर बना असकरे रहैत छलाह। महिनामे एक दिन गाम जा बालो-बच्चाकेँ देखथिन आ दरमहो परिवारमे दऽ अबथिन। चौकीपर हीरानन्द पड़ले रहथि आकि एकटा अनठीया आदमी पहुँचलनि। ओ नहि चिन्हलखिन। मुदा दरबज्जाक लाज रखैक लेल आंगनसँ एक लोटा पानि आनि पएर धोय बैसैले कहलखिन। पुनः आंगन जा पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘एकटा अतिथि अएला हेन, तेँ झब दे चाह बनाउ।’’ कहि दरबज्जापर आबि ओहि आदमीक नाम-गाम पूछै लगलखिन। नाम गाम पूछि काजक गप उठबितहि रहथि आकि आंगनसँ पत्नी हाथक इशारा सँ चाह लए जाइले कहलखिन। इशारा देखिते गप्पकेँ विराम दैत आंगन चाह अनैले गेलाह। आंगन जा दुनू हाथमे दुनू चाहक गिलास लए दरबज्जापर आबि दहिना हाथक गिलास अतिथिकेँ देलखिन आ बामा हाथक गिलास दहिना हाथमे लऽ अपने पीबै लगलाह। गप्पो चलैत आ चाहो पीबैत रहथि तेँ पीबैमे देरी लगलनि। चाह सठलो नहि छलनि आकि आंगनसँ पत्नी जलखइक इशारा देलखिन। पत्नीक इशारा देखि हाथेक इशारा सँ थोड़े काल बिलमि जाइले कहलखिन। चाह पीबि लगले जलखै करब नीक नहि होइत अछि। हँ, चाह पीबैसँ पहिने जलखै नीक होइत छैक। चाह पीबि पान खा दुनू गोटे गप-सप करै लगलाह। अतिथिकेँ पुछलखिन- ‘‘किमहर-किमहर अहाँ एलहुँ?’’ अतिथि- ‘‘एकटा बूढ़ि हमरा गाममे छथि। सामाजिक संबंधमे दादी हेतीह। बिधवा छथि। बेटो नहि छनि। हुनका विचार भेलनि जे बच्चा सभकेँ पढ़ैले एकटा इस्कूल बनाबी। चारि बीघा खेत छनि। समाजोक सभ आग्रह केलकनि जे सम्पति तँ राइ-छित्ती भइये जाएत, तहिसँ नीक जे इस्कूल बना दियौक। अखन ओ दू बीघा खेत इस्कूलमे देथिन आ दू बीघा अपना लेल रखतीह। जखन दादी मरि जेतीह तखन चारू बीघा इस्कूलेक हेतै।’’ ध्यानसँ अतिथिक बात सुनि मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘बडड् नीक विचार छनि।’’ ‘‘ओहि इस्कूलकेँ चलबैले अहाँसँ कहै अएलहुँ।’’ “जरुर जाएब। राति एतै बीता लिअ। भोरे चलब।’ ‘‘कोसे भरि अछि, दोसर साँझ धरि पहुँच जाएब।’’ ‘एते अगुताइ किएक छी ? हमहूँ थाकल छी। भोरे चाह पीबि दुनू गोटे चलब।’’ हीरानन्दक आग्रह अतिथि मानि गेलाह। अंगनाक टाट लगसँ पत्नी दुनू गोटेक सभ बात सुनैत रहथिन। दुनू गोटे तमाकू खा लोटा लऽ मैदान दिस बिदा भेलाह। घुमैत-फिरैत दुनू गोटे तेसरि साँझमे घरपर अएलाह। घरपर आबि दुनू गोटे, दरबज्जापर बैसि, गप-सप करै लगलाह। भानस भेल, दुनू गोटे खा कऽ सुति रहलाह। चारि बजितहि दुनू गोटेक निन्न टूटि गेलनि। जाबे दुनू गोटे पैखानासँ आबि दतमनि केलनि ताबे पत्नी आरती चाह बनौलनि। चाह पीबितहि रहथि आकि सूर्यक उदय भेल। आजुक सुरुजमे एक विशष रंगक आकर्षण बुझि पड़ैत छलनि। सूर्यक रोशनीमे विशष आकर्षण छल आकि सबहक हृदयमे छलनि। आरतीक मनमे होइत छलनि जे पति नोकरी करै जा रहल छथि तेँ, विशेष आकर्षण। हीरानन्दक हृदयमे जिनगीक एक सीढ़ी बढ़ैक आकर्षण रहनि आ अतिथि मटकनक हृदयमे अपन बेटाक पढ़ैक आकर्षण छलनि। चाह पीबि हीरानन्द झोरामे धोती-तौनी लए, दुनू गोटे गप-सप करैत बिदा भेलाह। गप-सपक क्रम मे बुझि पड़लनि जे स्कूल बनबैमे रमाकान्तक विशेष हाथ छन्हि। तेँ गाम पहुँचतहि मटकनकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने रमाकान्तसँ भेट कऽ लेबनि तखन दादी ऐठाम जाएब।’’ दुनू गोटे रमाकान्त ऐठाम पहुँचलाह। साठि वर्षीय रमाकान्त गाएक नादिमे कुट्टी-सानी लगबैत रहथि। दलानपर दुनू गोटेकेँ देखि रमाकान्त हाँइ-हाँइ हाथ धोय, लग आबि बैसैले कहलखिन। हीरानन्द चौकीपर बैसलाह मुदा मटकन ठाढ़े रहल। मटकनकेँ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘तूँ आगू बढ़ि जाह। हम दुनू गोटे पाछूसँ अबैत छी। जहन मास्टर सहाएब दुआरपर ऐला तँ बिना जलखइ करौने कोना जाए देबनि।’’ मटकन आगू बढ़ि दादीकेँ सभ समाचार सुना देलकनि। समाचार सुनि दादीक मन खुशीसँ नाचि उठलनि। दादीक मनमे हुअए लगलनि जे आब गामक बच्चा अन्हारसँ इजोत मुहे बढ़त। जलखै कए आ चाह पीबि दुनू गोटे दादी ऐठाम चललथि। दादीक घर थोड़बे हटल। रस्तामे रमाकान्तक मनमे अबै लगलनि जे स्कूल तँ व्यक्तिगत संस्था नहि छी। सामाजिक छी। सामाजिक संस्थामे सबहक सहयोग हेबाक चाहिऐक। धन्यवाद भौजीकेँ दैत छिअनि जे अपन सभ सम्पति समाजकेँ दऽ रहल छथि। मुदा हमरो सबहक तँ किछु दायित्व होइत अछि। तेँ एहि लेल किछु करब जिम्मा भऽ जाइत अछि। मास्टर साहेबक भोजन आ रहैक जोगार हम कए देबनि। दरमाहा रुपमे खेतक उपजा हेतनि आ समाजक सभ मिलि कऽ जँ स्कूलक घर बना दै तँ सर्वोत्तम होएत। एते बात मनमे नचितहि छलनि आकि दादी ऐठाम पहुँचि गेलाह। दादीकेँ रमाकान्त भौजी कहथिन। किएक तँ समाजिक संबंधमे दादीक पतिसँ भैयारी रहनि। दादीयो मास्टर सहेबक रस्ता देखैत छलीह। भौजी ऐठाम पहुँचतहि रमाकान्त मटकनकेँ कहलखिन- ‘‘मटकन, स्कूल गामक एकटा पैघ संस्था छी। तेँ समाजो लोककेँ खबरि दहुन आ सभ मिलिकेँ बिचारि आगूक डेग उठाएब। ओना भौजीक तियागक प्रशंसा जते कएल जाए कम हएत। जहि सम्पतिक लेल लोक नीचसँ नीच काज करैले उतरि जाइत अछि, ओहि सम्पतिक तियाग भौजी कए रहल छथि। जखन मास्टर साहेब आबिये गेल छथि तखन हड़बड़ करैक जरुरति नहि। अखन सौंसे गाममे सभकेँ कहि दहुन आ बेरमे सभ एकठाम बैसि विचारि लेब।’’ बेर टगि गेल। समाजक सभ एका-एकी अबै लगलाह। सभक मनमे जिज्ञासा रहनि। तेँ सभ विशेष उत्सुक रहथि। सबहक बीचमे रमाकान्त कहलखिन- ‘‘समाजक सभ जनिते छी जे भौजी अपन सभ सम्पति बच्चा सबहक लेल दए रहल छथि। जाहिसँ हमरे अहाँक कल्याण होएत। मुदा हमरो अहाँक दायित्व होइत अछि जे हमहूँ सभ किछु भागीदार बनी। जाधरि हम जीबैत रहब ताधरि शिक्षकक रहैक आ भोजनक प्रबंध करैत रहबनि। अहाँ सभ स्कूलक घर बना दियौक।’’ रमाकान्तक विचारक सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘घर बनैमे किछु समए लगत, तहि बीच अहाँ सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पठाउ। हम पढ़ाइ शुरु कए देब।’’ मास्टरो साहेबक विचारकेँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। थोपड़ी बन्न होइतहि दुखिया ठाढ़ भए अपन विचार रखैत बजै लगल- ‘‘खेती करै ले कत्तऽसँ हर-जन अनताह। जते बोनिहार छी सभ मिलि कऽ खेती कए देबनि। किएक तँ जहिना मास्टर साहेब हमरा सबहक सेवा करताह तहिना तँ हमहूँ सभ मिलिकेँ हुनकर सेवा करबनि।’’ ३ छह माससँ सोनेलालक स्त्री सुगिया अस्सक छथि। परोपट्टाक डाॅक्टर, वैद्य, हकीम ओझा-गुनी थाकि गेल मुदा सुगियाक रोग एक्कैसे होइत गेलै, जे उन्नैस नहि भेलैक। फेदरति-फेदरतिमे सोनेलाल पड़ल। दिन-राति एक्को क्षण मन चैन नहि। कखनो डाॅक्टर एहिठाम जाइत, तँ कखनो दवाइ आनै बजार जाइत छलाह। कखनो बच्चाले दूध अनै जाइत, तँ कखनो माल-जालकेँ खाइ-पीबैले दैत छलाह। अपना खाइयो-पीबैक सुधि नहि रहैत छलनि। कखनो मनतरियाकेँ बजा अनैत, तँ कखनो साँढ़-पाराकेँ रोमएले खेत जाइत छलाह। स्त्री मरैक ओते चिन्ता नहि जते तीन बेटीपर सँ भेल चारिम बेटाक। कोरैलै बेटा जनमै काल सुगियाकेँ दुख पकड़ि लेलकनि। बच्चा जनमै काल तेहेन समए भऽ गेल छलैक जे सोनेलाल डाॅक्टर एहिठाम नहि जा सकलाह। एक तँ जाड़क मास, दोसर अनहरिया राति। कनिये-कनिये पछबा सिहकी दैत आ बरखा बुन्न जेकाँ टप-टप गाछ सभपर सँ पालाक बुन्न खसैत छलैक। समए देखि सोनेलाल बेवस भऽ गेलाह। पलहनिक घर लगमे रहितहुँ बजबै गेल नहि भेलनि। डरो होइन जे हम ओमहर जाएब आ एम्हर किछु भऽ जाइन। गुप-गुप अन्हार। हाथ-हाथ नहि सुझैत छलैक। विचित्र संकटमे सोनेलाल पड़ि गेलाह। जहियासँ बच्चाक जन्म भेलै आ स्त्री बीमार पड़लनि, तहियासँ सोनेलालक कोनो दशा बाकी नहि रहलनि। मुदा सोनेलालो हिम्मत नहि हारलनि। जे क्यो जे दवाइ वा प्रतिकारक कोनो वस्तुक नाम कहनि ओ आनि सोनेलाल स्त्रीकेँ देथिन। अंतमे पाँच कट्ठा खेत पाँच हजारमे भरना लगा सोनेलाल लहेरियासराय जाइक विचार कऽ लेलक। बच्चो सभ छोट-छोट, तेँ घरो आ बाहरो सम्हारैक लेल आदमीक जरुरत भेलनि। घर सम्हारैले सारि आ लहेरियासराय जाइक लेल बहीनकेँ बजौलनि। स्त्रीक दूध सुखि गेलनि। तेँ बच्चाकेँ बकरीक दूध उठौना केने रहथि। बहीनोक छोटका बच्चा नमहर भऽ गेल छलैक। तेँ ओकरो दूध सुखि गेल छलैक। मुदा बच्चाक दशा देखि बहीन मसुरी दालिक झोरो खाए लगली आ बच्चोकेँ छाती चटबै लगलीह, जहिसँ कनी-कनी दूध पोनगै लगलनि। लहेरियासराय जाइक तैयारीमे सोनेलाल लगि गेल। मालक घरमे टांगल खाटकेँ उतारि झोल-झार झाड़ै लगला। खाटक झोलो साफ केलक आ कतौ-कतौ जे जौर टूटल रहै, ओकरो जोड़ि-जोड़ि बन्हलक। बहीनकेँ सोनेलाल कहलक- ‘‘दाइ, नुआ बिस्तर आइये खीचि लए, भोरके गाड़ी पकड़ि कऽ चलैक छह। दस दिन जोकर चाउरो-दालि लइये लेब। चाउर तँ कोठियेमे छह, दालि दड़रै पड़तह। सब ओरियान आइये कऽ के राखि लाए।’’ बहीन- ‘‘भैया, तोहर कोन-कोन कपड़ा साफ कए देबह ?’’ “दाइ, एक जोड़ धोती, अंगा आ चद्दरि हम्मर आ तूँ अपनो कपड़ा खीचि लीहह। अखन तँ एकटा धोती पहिरनहि छी। अलगन्नीपर धोती छह, ओकरा अखने खीचि दहक जहिसँ नहाइ बेर तकमे सुखि जाएत। नहा कऽ ओकरा पहीर लेब आ पहिरलाहा धोतीकेँ खीचि लेब।’’ सोनेलालक सारि सेहो लगेमे ठाढ़। सारिकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ दुआर-दरबज्जासँ कतौ बाहर नै जाएब। अंगने-दुआरमे बच्चो सभकेँ राखब आ मालो-जालकेँ खाइ-पीबैले देबइ। समए साल खराप अछि, तोहूमे अइ गाममे देखते छिऐ जे नव कबरिया छौँड़ा सभ भांग -गाँजा पीबि लेत आ अनेरो लोककेँ गरिअबैत रहत। जँ कियो उकट्ठे कऽ दिअए।’’ बहीन कोठीसँ मसुरी आ चाउर निकालि, अंगनेमे बिछानपर सुखै देलक। नवकुट्टिये चाउर, तेँ सुरा-फड़ा नहिये लागल छलैक। बहीन कपड़ा खिचै गेलि आ सारि मसुरी दड़रै लगली। सोनेलाल खाट ठीक कए दू टा बरहा दुनू भागक पाइसमे बन्हलनि। कपड़ा खीचि बहिन सोनेलालकेँ पुछलक- ‘‘भैया, कत्ते चाउर-दालि लऽ जेबहक?’’ सोनेलाल- ‘‘दाइ, दुइये गोरे खेनिहार रहब ने, तै हिसाबसँ चाउरो आ दालियो लऽ लेब। तीमन-तरकारी ओतै कीनब।’’ बहीन- ‘‘भैया, नून तँ ओतौ कीनि लेब मुदा मिरचाइ, हरदि आ कड़ू तेल एतै गामेसँ नेने जाएब। एकटा थारी एकटा लोटा आ दुनू छोटकी डेकची सेहो लइये लेब। डेकचियेमे सभ समान लऽ लेब, किएक तँ फुट-फुट कऽ लेलासँ अनेरे नमहर मोटरी भऽ जाएत। खाइयोक चीज-बौस रहत आ लत्तो-कपड़ा रहत, मुदा तैयो मोटरी नम्हरे भऽ जाएत।’’ सोनेलाल बाजल - ‘‘मोटरी नम्हरे हैत तेँ की करबै। जखैन गारामे ढोल पड़ल अछि तखन की करबै।’’ लहेरियासराय जाइक बहीन तैयारियो करै आ मने-मन सोचबो करै जे भगवान भारी बिपतिमे भैयाकेँ फँसा देलखिन। जँ कहीं भौजी मरि जेतै तँ भैया फटो-फन्नमे पड़ि जाएत। असकरे की करत ? बच्चो सभ लेधुरिये छै। कना खेती सम्हारत, धिया-पूताकेँ देखत आ माल-जालकेँ देखत। हे भगवान एहेन बिपति सात घर मुद्दइयो रहै ओकरो नइ दिहक। हमही की करबै? हमहूँ तँ असकरुए छी। हमरो चारिटा धिया-पूता, माल-जाल अछि। छी अइठीन आ मन टांगल अछि गामपर। मुदा एहेन बेरमे जँ भैयोकेँ नै देखबै तँ लोक की कहत। लोके की कहत? अपने मनमे केहेन लागत।’’ साँझ परितहि सोनेलाल टीशन जाइले दूटा जन तकै गेल। ओना तँ अपनो दियाद-बाद अछि मुदा बेरपर ककर के होइ छै। अचताइत-पचताइत सोनेलाल फुदिया ऐठाम पहुँचल। फुदियाक जेहने नाम तेहने काज। सोनेलालकेँ देखितहि फुदिया पुछलक- ‘‘किमहर-किमहर ऐलह, भाए?’’ “तोरेसँ काज अछि।’’ “की ?’’ “काल्हि, भोरका गाड़ी पकड़ब। रेखिया माएकेँ लहेरियासराय लए जेबै। अपनेसँ तँ चलै-फिरै वाली नइ अछि। खाटपर लऽ जाए पड़त। तेँ दू गोटेक काज अछि।’’ ‘‘तोरा जँ हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह। तोहर उपकार हम जिनगी भरि नइ बिसरब। हमरा ओहिना मन अछि जे बेटी बिदागरी करैले तीन दिनसँ जमाए बैसल रहथि आ कपड़ा दुआरे बिदागरी नइ करियैक। मगर जहिना आबि कऽ तोरा कहलियह तहिना तोहीं रुपैआ निकालि कऽ देने रहह। एहेन उपकार हम बिसरि जाएब।’’ ‘‘समाजमे एहिना सबहक काज सभकेँ होइ छै आ होइत रहतै। जेँ ई तोरापर भरोस छल तेँ ने एलौं। भोरेमे गाड़ी छै। तेँ गाड़ी अबैसँ एक घंटा पहिने घरपर सँ बिदा हैब।’’ “बड़-बढ़िया! चारिये बजेमे हमरा सभ दिन निन्न टुटि जाइ अए। समएपर हम दुनू भाइ चलि अएबह। तोहूँ अपन तैयारीमे रहिहऽ। भऽ सकै अए जे कहीं समएपर निन्न नहि टूटए तेँ एक लपकन चलि अबिहह।’’ फुद्दी एहिठामसँ आबि सोनेलाल बहीनकेँ पुछलक- ‘‘दाइ, सभ चीज एक ठीन सरिया कऽ रखि लाए, नै तँ जाइ काल हरबड़मे छुटि जेतह।’’ सोनेलालक बात सुनि बहिन मने-मन सोचै लगल जे कोनो चीज छुटि तँ ने गेल। बहीन भाइकेँ पुछलक- ‘‘भैया, एक बेर फेरसँ सभ चीजक नाम कहि दाए। अखने मिला कऽ सरिया लेब।’’ दुनू भाइ-बहीन एक-एक कऽ कऽ सभ वस्तुक नाम लेलक। सभ वस्तु देखि सोनेलाल बहीनकेँ कहलक- ‘‘दाइ, चारि बजे उठैक अछि, जँ भानस भऽ गेलह तँ अखने खाइ लेल दऽ दाए।’’ हाथ-पएर धोए सोनेलाल खाइले बैसल। चिन्तित मन, तेँ खाएले ने होए, मुदा तैयो जी जाँति कऽ कहुना-कहुना चारि कौर खेलक। खा कऽ मालऽ घर गेल। माल-जालकेँ खाइले दऽ, आबि कऽ सुति रहल। बहीन खा कऽ बच्चाकेँ छाती लगा सुति रहल। सुतले-सुतल बहीन भौजाइकेँ पुछलक- ‘‘भौजी, मन नीक अछि की ने?’’ ‘’हँ ऽऽ।’’ ओछाइनपर पड़ल सोनेलालकेँ निने ने होए। बिचित्र द्वन्द्वमे पड़ल रहए। एक दिशि भोरे उठै दुआरे सुतै चाहैत, तँ दोसर दिस पत्नीक चिन्ता नीन आबै ने दैत। कछ-मछ करैत। कनिये कालक उपरान्त हाँफी भेलनि। निन एलनि। निन्न अबितहि चहा कऽ उठि बहीनकेँ पुछलखिन- ‘‘दाइ, भोर भऽ गेलै?’’ बहीनो जगले छलि, बाजलि- ‘‘भैया, अखने तँ खा कऽ कर देलहुँहेँ। लगले भोर कना भऽ जएतैक।’’ फेर दुनू गोटे सुति रहल। तीनि बजे दुनू भाइ फुदिया आबि डेढ़िया परसँ सोर पाड़लक- ‘‘सोनेलाल भाइ, हाँ सोनेलाल भाए, अखैन तक सुतले छह। उठह-उठह, भुरुकुवा उगि गेलै।’’ फुदियाक आवाज सुनि दुनू भाइ-बहीन धड़फड़ा कऽ उठल। आँॅखि मिरितहि सोनेलाल बाहर निकलि फुद्दीकेँ कहलक- ‘‘की कहिह, बड़ी रातिमे नीन भेल। भने तू आबि कऽ जगा देलह। हम चीज-बौस निकालै छी आ तू खाटकेँ सुढ़िआबह।’’ अन्हारक दुआरे बहीन दूटा डिबिया नेसलक। एकटा डिबिया ओसारक खुटा लग रखलक आ एकटा घरमे। खाट निकालि फुद्दी पाइसमे बान्हल बरहाकेँ अजमा कऽ देखलक जे सक्कत अछि आकि नहि। दुनू कात पाइसमे बान्हल बरहाकेँ देखि फुद्दी सोनेलालकेँ कहलक- ‘‘भाइ, बरहा तँ ठीक अछि। बाँसक टोन कहाँ छह ?’’ बाँसक टोन घरक पँजरेमे राखल। टोनकेँ ओंगरीसँ देखबैत सोनेलाल कहलक- ‘‘होइबएह छह।’’ टोन आनि फुद्दी डिबियाक इजोतमे देखै लगल जे गिरह सब छीलल छै आकि नहि। छीलल छलै। खाटपर बिछबैले सोनेलाल एक पाँज पुआर आनि फुद्दीकेँ कहलक- ‘‘तोरा अटिअबैक लूरि छह, कनी पुआर सरिया कऽ चौरस कऽ कऽ बिछा दहक।’’ पुआरकेँ सरिया फुद्दी कहलक- ‘‘भाइ, अइपर बिछेबहक की?’’ सोनेलाल घरसँ शतरंजी आ सिरमा आनि फुद्दीकेँ देलक। बिछान सरिया फुद्दी बाजल- ‘‘भाइ, रस्तामे कान्ह बदलै काल, कहीं भौजी गिरि-तिरि नहि पड़थि। तेँ पँजरोमे दुनू भागसँ डोरी बान्हि देबहऽ ?’’ फुद्दीक विचार सोनेलालकेँ जँचल। कने गुम्म भऽ बाजल- ‘‘की कहिह फुद्दी, दुख पड़लापर मनो बौआ जाइ छै। तोहूँ की अनारी छह जे नइ बुझबहक। जे नीक बुझि पड़ह, से करह।’’ खाटपर रोगीकेँ चढ़ा, दुनू भाइ फुद्दी कान्हपर उठौलक। कान्हपर उठबितहि सोनेलालकेँ मन पड़ल, कहलक- ‘‘फुद्दी, घरमे तँ धिये-पुते रहत, कियो चेतन नहिये अछि। साइरियो आइलि अछि, ओहो अनठिये अछि। तेँ, तूँ रातिकेँ एतै खैइहह आ सुतिहह।’’ ‘बड़-बढ़िया’ कहि फुद्दी आगू बढ़ल। चाउर-दालि आ बरतन-बासनक मोटरी माथपर लऽ सोनेलाल निकलल। बच्चाकेँ छाती लगौने बहीनो निकललीह। डेढ़ियापर अबितहि सुगिया खाटेपर सँ बाजलि- ‘‘कनी अँटकि जाउ।’’ फुद्दी ठाढ़ भऽ पुछलक- ‘‘किअए रोकलहुँ?’’ खाटे परसँ सुगिया बजलीह- ‘‘हे सौध-गुरु, अगर निकेना घुरिकेँ आएब तँ पचास मुरतेक भनडारा करब।’’ फुद्दी खाट उठा बिदा भेल। रस्तामे केयो किछु नहि बजैत रहथि। मने-मन सभ रंगक बात सोचैत रहथि। फुद्दी सोचैत जे भगवानो केहेन बेइमान अछि जे सोनेलाल भाइ सन सुधा आदमीकेँ एहेन बिपति देलखिन। सोनालाल सोचैत जे तीन बेटीपर बेटा भेल, जँ घरवाली मरि जाएत तँ बेटो मरि जाएत। चुमौन करब तहिसँ बेटाक कोन गारंटी हएत। जँ कहीं बेटिये भेल तँ खानदानोक अंत होएत आ जिनगी भरि अपनो विआहे दानक बनर-फाँसमे सोहो पड़ल रहब। बहीन सोचैत जे जँ कहीं भौजी मरि जेतीह तँ जिनगी भरि भैयाकेँ दुखे-दुख होइत रहतै। स्टेशन पहुँचि सोनेलाल मोटरी रखि गाड़ीक भाँज लगबै गेल। टिकट कटैत देखि बुझलक जे गाड़ी अबैमे लगिचा गेल अछि। हमहूँ टिकट कटाइये लइ छी। टिकट कटौलक। कनिये कालक बाद गाड़ी आएल। दु गोटे फुद्दी आ सोनेलाल -तीनू गोटे सुगियाकेँ गाड़ीमे चढ़ौलनि। सोनेलाल गाड़ीमे उपरेमे रहलाह। मोटरी उठा कऽ फुद्दी देलकनि। मोटरी रखि सोनेलाल बहीनक कोरासँ बच्चाकेँ लेलनि। बहिनो चढ़लीह। गाड़ी खुजितहि दुनू गोटे फुद्दी खाट उठा घर दिशि बिदा भेल। गाड़ी दरभंगा पहुँचल। छोटी लाइन दरभंगे तक चलैत। तेँ गाड़ी दू घंटा उपरान्त फेर घुरि कऽ निरमलिये जाएत। गाड़ीसँ यात्री सभ उतरै लगलाह। मगर सोनेलाल सबतुर बैसले रहलथि। मनमे कोनो हड़बड़ी नहिये रहनि, जखन सभ उतरि गेलाह तखन सोनेलाल सीट परसँ उठि बहीनकेँ कहलनि- ‘‘दाइ, तू एतै रहह, हम कोनो सबारी भजिऔने अबै छी।’’ कहि सोनेलाल गाड़ीसँ उतरि, प्लेटफार्मसँ निकलि बाहर एकटा टेम्पू लग पहुँचलाह। ड्राइवर निच्चामे ठाढ़ भऽ पसिन्जर सभकेँ देखैत रहैत। सिरसिराइत सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- ‘‘भाइ, हमरा डाकडर ऐठाम जेबाक अछि, चलबह?’’ सोनेलालक बोलीसँ ड्राइवर बुझि गेल जे देहाती आदमी छी, तेँ एना बजैत अछि। मुदा सोनेलालक प्रति ड्राइवरक आकर्षण बढ़ि गेलनि असथिरसँ ड्राइवर पुछलखिन- “रोगी कहाँ छथि।’’ ‘‘गाड़ियेमे।’’ ‘‘बजौने अबिअनु।’’ ‘‘अपने पाएरे अबैवाली नइ छथि। पकड़िकेँ आनै पड़त।’’ गाड़ीकेँ सोझ कऽ ड्राइवर सोनेलालक संग प्लेटफार्मपर आएल। गाड़ी लग पहुँचि ड्राइवर रोगी आ समान देखि मने-मन विचारलनि जे एक आदमीक काज आरो पड़त। प्लेटफार्म दिशि नजरि उठा कऽ हियाबै लगल। गाड़ी साफ करै लेल दू गोटेकेँ नेने अबैत देखि जोर सँ ड्राइवर बाजल- “भैया”। भैया सुनि झाड़ूबला आखि उठौलक तँ ड्राइवरकेँ देखलक। ड्राइवरकेँ देखितहि लफड़ि कए ड्राइवर लग आएल। ड्राइवर कहलकै- ‘‘भाए, एकटा दुखित महिला अइ कोठलीमे छथि, हुनका उतारि कऽ टेम्पूमे बैसाए दिअनु।’’ झाड़ू राखि दुनू झाड़ूओबला आ ड्राइवरो सुगियाकेँ उतारि टेम्पू दिशि बढ़लाह। सोनेलाल मोटरी लेलनि। आ बहीन बच्चाकेँ कन्हा लगा चललीह। सुगियाकेँ चढ़ा कऽ झाड़ूबला गाड़ी साफ करैले घुरै लगल। दुनू झाड़ूबलाकेँ रोकि सोनेलाल दसटा रुपैआ निकालि दिअए लगलखिन। रुपैआ देखि, अधबएस झाड़ूबला बाजल- ‘‘भाइ हमहूँ रेलवेमे सरकारी नोकरी करै छी। दरमाहा पबै छी। अहाँक मदति केलहुँ। अखन जै मुसीबतमे अहाँ छी, ओहिमे हमरा देहो आ रुपैयोसँ मदति करक चाही। मुदा गरीब छी, कहुना-कहुना कमा कऽ गुजर कए लैत छी। किएक तँ अहूँ बुझिते हेबै जे सभ दुख गरीबेकेँ होइ छै। धनीक लोक सोनाक मंदिर-मुरुतकेँ खोआ-मलाइ चढ़ा धरम करैत अछि। हमर भगवान यैह मरल-टूटल लोक छथि। हम सेवा केलहुँ। भगवान करथि जे हँसी-खुशीसँ अहाँ घर जाइ।’’ झाड़ूबलाक बात सुनि सोनेलाल अचंभित भऽ गेलाह जे जकरासँ लोक छुति मानैत अछि, ओकर आत्मा कतेक पवित्र छै। टेम्पू आगू बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- ‘‘डरेबर सहाएब, हम अनभुआर छी। कहियो ऐठाम नइ आएल छी। अहाँ अइठीन रहै छी। सभटा बुझल-गमल अछि। तेहेन डाकडर लग चलू जे हमरा रोगीकेँ छुटि जाए।’’ ‘‘बड़-बढ़िया।’’- ड्राइवर बाजल। मने-मन ड्राइवर सोचै लगल जे अस्पतालमे भरती करौनाइ नीक नहि हेतनि। एक तँ अस्पतालमे बेवस्थो बढ़िया नहि छैक, दोसर जेकरे लागि-भागि छै तेकरे सभकेँ सभ सुविधो भेटैत छैक। तेँ सभसँ बढ़िया डाॅक्टर बनर्जी लग लए चलिअनि। डाॅक्टर बनर्जी रिटायर भए अपन घरो आ क्लीनिको बनौने। बारह बजि गेल। डाॅ. बनर्जीक पहिल पाली आठ बजे भिनसरसँ बारह बजे होइत आ दोसर पाली चारि बजेसँ आठ बजे साँझ धरि होइत छलनि। सभ रोगीकेँ देखि डाॅ. बनर्जी डेरा जेबाक तैयारी करिते रहथि, टेम्पूकेँ ड्राइवर सोझे फाटकसँ भीतर ओसार लग लए गेल। टेम्पू देखि डाॅ. बनर्जी फेर बैसि रहलाह। टेम्पू रोकि ड्राइवर उतरि कऽ सोझे डाॅ. बनर्जी लग जा कहलकनि- ‘‘डाॅक्टर साहेब, रोगी अपनेसँ चलै-फिरैवाली नइ छथि, तेँ पहिने एकटा डेरा दिअनु।’’ आखिक इशारासँ डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ कहलखिन। बगलेमे अपन डेरा रहनि। कम्पाउण्डर जा कऽ एकटा कोठरी खोलि कुन्जी सोनेलालकेँ दऽ देलकनि। कम्पाउण्डर घुरि कऽ आबि, नोकरकेँ संग कऽ स्ट्रेचरपर सुगियाकेँ लऽ जा सीट माने दुजनिया चौकीपर सुता देलकनि। स्ट्रेचर राखि कम्पाउण्डर डाॅ. बनर्जीकेँ कहलकनि- ‘‘सब व्यवस्था कए देलिअनि।’’ डाॅ. बनर्जी आगू-आगू आ कम्पाउण्डर, ड्राइबर आ सोनेलाल पाछू-पाछू। सुगियाकेँ देखितहि डाॅक्टरकेँ रोग चिन्हा गेलनि। मुदा आरो मजबूतीक लेल सुगियाकेँ पूछए लगलखिन। हताश मन सोनेलालक। मूह सुखाएल। आखि नोराएल। बहीनक आखिसँ नोरक ठोप खसैत। डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ सूइ लगबैले कहलखिन। कम्पाउण्डर सूइ अनै गेल। सोनेलाल डाॅ. बनर्जीकेँ पुछलखिन- ‘‘डागडर सहाएब, रोगीक दुख छुटतै की नै?’’ सोनेलालक प्रश्न सुनि डाॅ. बनर्जीक हृदय पघलि गेलनि। उत्साह दैत सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘चौबीस घंटाक भीतर रोगी टहलै-बुलै लगतीह। अखन एकटा सुइया दैत छियनि। पाँच बजे तक सुतल रहती। उठेबनि नहि। अपने निन्न टुटतनि। निन्न टुटलापर कुड़रा-आचमन करा चाह बिस्कुट देबनि।’’ ताबे कम्पाउण्डर आबि सुगियाकेँ सूइ लगौलक। सूइ पड़ितहि सुगियाकेँ निन्न आबि गेलनि। डाॅ. बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘आब अहाँ सभ खाउ-पीबू।’’ डाॅक्टर चलि गेलाह। ड्राइवर सोनेलालकेँ बुझबै लगलखिन- ‘‘पानिक कल बगलेमे अछि। भानस करैले चुल्हियो अछिये। अपने भानस करब। बाहर चलू, दोकान देखा दै छी। अाइसँ बाहर नइ जाएब। लुच्चा लम्पट बेसी अछि। जेबीसँ पाइ निकालि लेत। तेँ जतबे काज हुअए ततबे पाइ मुट्ठीमे नेने जाएब आ सामान कीनि लेब। आब हम जाइ छी। ऐठाम कोनो चीजक डर नइ करब। सभ भार डाॅक्टर साहेबकेँ छनि।’’ पाँच बजितहि सुगिया आखि खोललक। सुगियाक लगेमे सोनेलालो आ बच्चोकेँ कोरामे नेने बहीनो बैसलि। आखि खोलितहि सुगिया सुतले सुतल बाजलि- ‘‘किछु खाइक मन होइ अए।’’ सुगियाक बात सुनितहि सोनेलालकेँ मन पड़ल जे डाॅक्टरो सहाएब कहने रहथि। उठि कऽ चाह-बिस्कुट आनि सुगिया लग रखलक। कलपर सँ लोटामे पानि आनि कऽ कुड़रा करै ले देलखिन। बैसले-बैसल सुगिया कुड़रा कए चाहेमे डुबा-डुबा बिस्कुट खेलनि। चाह-बिस्कुट खा सुगिया मूह पोछलक। सुगियाक मूह पोछितहि सोनेलाल पुछलक- ‘‘मन केहेन लगै अए।’’ - ‘‘कनी हल्लुक लगै अए।’’ सोनेलालो आ बहिनोक मनमे खुशी आएल। मने-मन बहीन भगवानकेँ कहै लगलनि जे हे भगवान कहुना भौजीकेँ नीक कए दिअनु।’’ सुगियाकेँ सुधार हुअए लगल। तेसर दिनसँ सुगिया बुलै-टहलै लगलीह। दू बेर दिनमे डाॅक्टरो साहेब आबि-आबि देखथि। सभ तरहक तरदुत सोनेलाल करैले हरदम तैयार। दसम दिन सुगियाकेँ डाॅक्टर साहेब छुट्टी दए देलखिन। सोनेलाल कम्पाउण्डरसँ सभ हिसाब केलनि। जते हिसाब सोनेलालकेँ भेलनि तेहिसँ पाँच सए रुपैआ अधिक लऽ सोनेलाल डाॅक्टर साहेबक आगूमे रखि देलकनि। रुपैया गनि डाॅक्टर साहेब फजिलाहा रुपैया घुमबैत कहलखिन- ‘‘जोड़ैमे पाँच सौ बेसी आबि गेल। ई पाँचो सए रखि लिअ।’’ डाॅक्टर साहेबक बात सुनि सोनेलाल कहलकनि- ‘‘गनैमे गलती नइ भेल। पाँच सए अहाँकेँ खुशनामा दै छी।’’ खुशनामा सुनि डाॅ. बनर्जी गुम्म भऽ गेलाह। मनमे एलनि जे बेचाराक बगए-बानि कहैत अछि जे पैंच-उधार कए आएल होएत, तखन देखू उद्गार। हमरा कोन चीजक कमी अछि जे एहि बेचाराक फाजिल पाइ हम छूबै। मन पड़लनि, जमीनदारीक समएक पुनाह। जमीनदार सभ सालमे एक बेर पुनाह करैत छलाह। जमीनदारक कचहरीमे पुनाह होइत छलैक। पुनाह होइसँ पनरह दिन पहिने रैयत सभकेँ जानकारी दए देल जाइत छलैक। जमीनदार दिशिसँ मोतीचूरक लड्डू बनाओल जाइत छलैक। एक रुपैआमे एक लड्डू हिसाबसँ देल जाइत छलैक। रैयतोमे दू विचारक रैयत रहैत छल। एक तरहक ओ छल जकरा खाली अन्नेक आमदनी छलैक। ओहि तरहक रैयतक हालत कमजोर छलैक। मगर दोसर तरहक जे रैयत होइत छल ओकरा अन्नक संग-संग नगदो आमदनी छलैक। जेना कोना-कोनो जातिकेँ दूध-दहीक, तँ कोनो-कोनो जातिकेँ तीमन-तरकारीक। कोनो जातिकेँ पानक तँ कोनो-जातिकेँ छोट-छोट कोल्हु इत्यादि। पुनाह धर्मसँ जोड़ल शब्द अछि। धार्मिक भावना सबहक मनमे रहैत छलैक। तेँ, एक-दोसरकेँ निच्चा देखबैक लेल मने-मन प्रतियोगिता करैत छल। एकटा लड्डूक दाम मुश्किलसँ दू पाइ होइत छल होएतैक। किएक तँ आठ अने चिन्नी आ रुपैआमे चारि सेर खेरही वा आन कोनो अन्न, जेकर लड्डू बनैत छलैक। प्रतियोगिता दू तरहक होइत छलैक। पहिल-व्यक्ति विशषमे आ दोसर जाति-विशेषमे। लोक खुब खुशी रहैत छलै। गामे-गाम मलगुजारीसँ बेसी, पुनाहमे जमीनदार रुपैआ असुल कए लैत छलाह। जहि समाजमे मलगुजारीक चलैत लोकक खेत निलाम होइत छलैक, ओहि समाजमे पुनाहक नामपर लूट सेहो चलैत छलैक। वैह बात डाॅ. बनर्जीकेँ मन पड़लनि। हँसैत डाॅ. बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ, खुशी भए एहिठामसँ जा रहल छी, यैह हमर खुशनामा भेल। भगवान करथि परिवार फड़ै-फुलाए।’’ तीनू गोटे गामक रस्ता धेलनि। बच्चाकेँ सुगिया कोरामे लेने आ बहीन बरतनक मोटरी माथपर लेने। खालिये देहे सोनेलाल दरभंगा स्टेशन आबि गाड़ी पकड़लनि। अपना स्टेशनमे उतरि तीनू हँसी-खुशीसँ गाम दिसक रस्ता धेलक। रेलवे कम्पाउण्डसँ निकलि सुगिया सोनेलालकेँ कहलनि- ‘‘जाइ काल पचास मुरते सौधक भनडारा कबुला केने रही। कबुला-पाती उधार नइ राखक चाही। काल्हि खन ओहो कबुला पुराइये लेब।’’ सोनेलालोक मन खुशी रहनि। चाउर-दालि घरेमे रहनि। रुपैयो किछु उगड़ले रहनि। मुस्कुराइत सुगियाकेँ कहलखिन- ‘‘काल्हि तँ भनडारा नहि सम्हरत। दही पौरैक अछि, हाटसँ तीमन-तरकारी, नोन-तेल आनै पड़त। चारि-पाँच दिनमे भनडारा कए लेब। अखन दाइयो आएले अछि।’’ दाइक नाम सुनि बहीन बाजलि- ‘‘भैया, तेहने गड़ूमे पड़ि गेल छेलह तेँ अपन सभ कुछ छोड़िकेँ छिअह। तूँ नै बुझै छहक जे हमरो कियो दोसर करताइत नै अछि । काल्हि हम चलि जेबह।’’ सोनेलालक मन गद्-गद्। जहिना चुल्हिपर चढ़ाओल पानि देल बरतनमे निच्चासँ आगिक ताव लगितहि निचला पानि गर्म भऽ उपर मुहे उठैत, तहिना सोनेलालक मन खुशीसँ नचैत रहनि। स्टेशनसँ थोड़ेके दूर एलापर सोनेलाल कहलक- ‘‘अहाँ दुनू गोरे अइठाम बैसू। लगले हम चीज-बौस किनने अबै छी।’’ सुगियो आ बहिनो, रस्ते कातमे आमक गाछक निच्चामे बैसलीह। सोनेलाल स्टेशन दिशि बिदा भेल। स्टेशने कातमे आठ-दसटा दोकान छलैक। एकटा दोकान माछक, दोसर मुरगी आ अण्डाक, एकटा सुधा दूधक, एकटा चाहक, एकटा पानक आ पान-छौ टा तरकारीक। सोनेलालक मनमे एलै जे पान-सात रंगक तरकारियो, दूधो आ राहड़िक दालियो कीनिये लेब। किएक तँ छह माससँ ने भरि पेट अन्न खेलहुँ आ ने कहियो मन असथिर रहल। तेँ आइ राति अपनो सभ परिवार आ फुद्दियो दुनू भाँइकेँ न्योत दए खुआ देबनि। रेलवेक कम्पाउण्डमे जे तरकारी, दूध, माछ इत्यादिक दोकान छलैक ओ स्थायी नहि। साधारण छपड़ी टाँगि-टाँगि दोकान चलबैत अछि। क्यो दोकानदार रेलवेसँ दोकानक पट्टो नहि बनौने। स्टेशनेक स्टाफ, दोकानदारकेँ दोकान लगबै देने अछि, जहिसँ बट्टीक बदला सभकेँ परिवार जोकर तरकारी सभ दिन भए जाइत छलैक। जहिया कहियो रेलवेक अफसरक आगमन होइत छलैक, तहिसँ पहिनहि स्टाफ दोकानदार सभकेँ कहि दैत छलैक। अपन-अपन छपड़ी सभ हटा लैत छल। दोकान आ रेलवेक बीच मोड़पर ठाढ़ भए सोनेलाल सोचै लगल जे दोकानमे जे राहड़िक दालि बिकाइत ओ अरबा रहैत अछि। तेँ दालिकेँ उलबै पड़त। घरमे तँ लोक पहिनहि राहड़ि उला लैत अछि। बिनु उलौल राहड़िक दालि तँ खेसारिये जेकाँ होइत अछि। मुदा उलौलाक बाद आमील देल राहड़िक दालि तँ दालिये होइत। सभसँ नीक। लटखेना दोकान पहुँचि सोनेलाल एक किलो राहड़िक दालि, आधा किलो चिन्नी किनलक। दुनूक दाम दए तरकारीबला लग आबि सात-आठ रंगक तरकारी किनलक। तरै जोकर गोलका भाँटा-भाँटिन गंगाकातक बड़का परोड़, हैदराबादी ओल टेबि कऽ कीनलक। दू किलो सुधा दूध सेहो लेलक। सभ समानकेँ गमछामे बान्हि, हाथमे लटकौने घुरि कऽ सुगिया लग आएल। गमछामे बान्हल समान देखि बहीन पुछलक- ‘‘भैया, की सभ कीनि लेलहक?’’ बहीनक मनमे भेलनि जे धिया-पूता लेल भरिसक लाइ-मुरही कीनि लेलनि। मुदा मोटरी नमहर, तेँ पुछलकनि। बहीनक बात सुनि सोनेलाल हँसैत बाजल- ‘‘दाइ, खाइ-पीबैक समान सभ किनलहुँ। आइ सभ परानी मिलि नीक-निकुत खाएब। बेचारा फुदियो, नोकर जेकाँ राति कऽ घरक ओगरबाही करैत हएत। तेँ ओकरो दुनू भाइकेँ नोत दए खुआ देबइ। तेँ तीमन-तरकारी, दूध आ दालि कीनि लेलहुँ। भानस करै लेल तोहूँ तीनि गोटे- बहीन, स्त्री आ सारि- छेबे करह। एक्कोदिन तँ तोरो सभक मेजमानी होअए। दाइ, जते अनका भाइयोसँ सुख नहि होइत छै, तहिसँ बेसी तोरासँ भेल। तोहर उपकार जिनगीमे नहि बिसरब। भगवान तोरा सन बहीन सभकेँ देथुन।’’ सोनेलालक बात सुनि गद्-गद् होइत बहीन उत्तर देलकनि- ‘‘भैया, हम अपन काज केलहुँ। तोहर उपकार की केलियह। एहेन बेरपर जे तोरा नै देखितियह तँ हमरा सन बहीन ककरो रहिये कऽ की हेतै।’’ बहीनक बात सुनि सुगिया पतिकेँ कहलनि- ‘‘दाइ तँ औगुताइ छथि। कहै छथि जे काल्हि भोरे चलि जाएब। एकोटा धराउ घरमे साड़ियो ने अछि जे देबनि। बिना साड़ी देने कोना जाए देबनि। केहेन हएत ?’’ भौजाइक बात सुनि मुस्की दैत ननदि बाजलि- ‘‘भौजी, चारु बेटा-बेटीक विअाहमे तँ हमरा चारि जोड़ साड़ी रखले अछि। मुदा एहेन बेरिमे साड़ीक कोन काज छै। अपने तँ भैया पैंच-उधार लऽ कऽ काज चलौलक अछि। तइपर सँ हमरोले करजा करत। हमरा जँ दियौ चाहत तँ हम नै लेबै।’’ घरपर अबितहि परिवारसँ गाम धरि खुशीक बर्खा बरिसए लगल। तीनू बेटी सुगियाक गरदनिमे लटपटा गेल। बहिन -सुगिया- क बच्चाकेँ कोरामे लए मूह चुमै लगल। जहिना जाड़क मासमे गाछ-बिरीछ पालाक मारिसँ ठिठुर जाइत, मुदा गरमीक धबितहि नव रुप धारण करैत अछि, तहिना सभकेँ भेल। छह मासक तबाही, सोग, निराश सोनेलालकेँ छोड़ि पड़ा गेल। पास-परोसक जनिजाति सभ आबि-आबि सुगियाकेँ देखबो करैत आ बीमारीक समएक खिस्सो सुनैत छलीह। एक्के-दुइये सौसेँ अंगना धियो पूतोक आ जनिजातियोसँ लोकक भीड़ हटल। तीनू गोटे भानसक जोगारमे लागि गेलीह। कते दिनसँ सोनेलाल भरि इच्छा नहाएल नहि छल। साबुन लए कऽ नहाएले गेल। भानस भेलैक। सभ कियो भरि मन खेलनि। खाइते सभकँे ओंघी अबै लगलनि। सभ जा-जा कऽ सुति रहलाह। पत्नीक संग सोनेलालकेँ लहेरियासराय जैतहि गाममे चर्च चलै लगल छल। एक दिशि जनिजाति सभ सोनेलालक बाहवाही करैत छलीह तँ दोसर दिशि मर्दा-मर्दीक बीच इलाजक खर्चक चर्च चलै लगल। सौसेँ गाम दुनू परानी सोनेलालेक चर्च चलैत रहए। सबेरे स्कूलमे छुट्टी दए खसल मने हीरानन्द चलि ऐलाह। सबेरे हीरानन्दकेँ आएल देखि रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘सबेरे स्कूल बन्न कए देलिऐक?’’ ओना रमाकान्तोकेँ सोनेलालक संबंधमे बुझल छलनि मुदा जहि गंभीरतासँ हीरानन्द सोचैत रहथि, ओहि गंभीरतासँ ओ नहि सोचैत छलाह। तेँ मनमे कोनो तेहेन विचार नहि छलनि। हीरानन्द उत्तर देलखिन- ‘‘बच्चा सभकेँ पढ़बैमे मोन नहि लगैत छल, तेँ छुट्टी दए देलिऐक।’’ “किअए नहि पढ़बैमे मन लगैत छल।’’ चिन्तित भए हीरानन्द कहलखिन- ‘‘एक तँ बाढ़िक मारल बेचारा सोनेलाल ताहिपर सँ बीमारीक। तेहेन चपेटमे पड़ि गेला जे कोनो कर्म बाकी नहि छन्हि। यैह बात मनमे घुरिआए लगल। पढ़बैमे एक्को रत्ती नीके नहि लगैत छलै।’’ सोनेलालक बात सुनितहि रमाकान्तक मन मौलाए लगलनि। मौलाइत-मौलाइत जहिना हीरानन्दक मन रहनि तहिना भए गेलनि। पएरमे ठेस लगलापर जहिना केयो मूह भरे खसैत आ छातीमे चोट लगैत अछि, तहिना रमाकान्तक हृदयमे मनक चोट लगलासँ भेलनि। मुदा जोरसँ नहि कुहरि चुप्पेचाप कुहरै लगलथि। मनमे एलनि, जहि गाम मे चारि-चारिटा डाॅक्टर छथि ओहि गामक लोक रोगसँ कुहरै, कते दुखक बात छी। ऐहने डाॅक्टरकेँ लोक भगवान बुझि पुजनि कहाँ धरि उचित छी। जाहि पढ़ल-लिखल लोककेँ अपना गामसँ स्नेह नहि, अपन कुटुम्ब परिवार सर-समाजसँ स्नेह नहि छन्हि, अपने सुख भोगक पाछू बेहाल छथि। हुनका अनेरे दाइ-माए किअए छठियार दिन छातीमे लगा जीबैक असीरवाद देलकनि। फेर मोनमे एलनि, जहिना माल-जालकेँ डकहा बीमारी होइ छै, तहिना तँ मनुक्खोकेँ चटपटिया बीमारी होइ छैक। जे छनमे छनाँक कए दैत छैक। चारिटा बेटा-पुतोहू डाॅक्टर हमरे छथि जँ कहीं अपने आकि महेन्द्रक माइयेकेँ ओएह चटपटिया बीमारी भए जाइन तँ की करताह ओ सभ हमरा। मन घोर-घोर, बाके बन्न भए गेलनि। तीन दिनक बाद सोनेलाल भनडाराक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीबैक सभ ओरियान दिल खोलि कऽ केलनि। तुलसीफुलक अरबा चाउर, राहड़िक दालि, एगारहटा तरकारी, दही-चिन्नीक नीक व्यवस्था केलनि। गाममे दू पंथक साधू। पहिल पंथक महंथ रमापति दास आ दोसर पंथक गंगा दास। राम-जानकीक मंदिर रमापति दास बनौने छथि। दुनू साँझ पूजा करैत छथि। मुदा गंगादासकेँ किछु नहि। सँवकान दुनू गोटेकेँ छन्हि। आन-आन गाममे सेहो दुनू गोटेकेँ सँवक छन्हि। सोनेलालक मनमे, छल-प्रपंचक मिसिओ भरि लसि नहि, तेँ पच्चीस मुरते साधुक दल रमापति दासकेँ देलकनि आ पच्चीस मुरतेक दल गंगादासकेँ। दल देलाक बाद सोनेलाल दुआर-दरबज्जा चिक्कन-चुनमुन करै लगलाह। भानस करैक बरतन सभ माँजि-मूजि तैयार केलनि। खाइक लेल केराक पात काटि-धो कऽ सेहो रखलनि। एक गाममे रहितहुँ दुनू पंथक बीच अकास-पतालक अंतर छलनि। पहिल पंथमे ऊँच जातिक बोलबाला जखनिकि दोसर पंथमे ऊँच जाति कम मुदा निम्न जाति बेसी। छूत-अछूतक कोनो भेद नहि। दिनुके भनडारा। दोसर पंथक साधु सभ सबेरे आबि, चरण पखारि भजन शुरु केलनि। भजन शुरु होइतहि टोल-परोसक जनिजातियो आ धियो-पूता आबि कऽ सौँसे खरिहान भरि देलकनि। खरिहानेमे बैसारो केने रहथि। तीनटा भजन समाप्त भेलाक बाद रमापति दास चेलाक संग पहुँचलथि। संगमे सभ साधु रहथि। फरिक्केसँ दोसर पंथक साधु देखि रमापतिदास मने-मन जरै लगलथि। मुदा क्रोधकेँ दाबि दरबज्जापर पहुँचलथि। दरबज्जापर अबितहि रमापतिदास सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘हमरा सबहक बैसार फुटमे करु।’’ रमापतिदासकेँ प्रणाम कऽ सोनेलाल दलान दिशि इशारा दैत कहलकनि- ‘‘अपने सभ दरबज्जेपर बैसियौक।’’ सोनेलालक विचार सुनि रमापति दास मने-मन सोचै लगलथि जे जँ अखन दोसर ठाम बैसार बनबैले कहबैक तँ धड़फरमे संभव नहि होएत। जँ झगड़ा करै छी तँ ककरा सँ करु। बेचारा घरबारी की करत? घरवारीक लेल तँ जहिना हम दल देलाक बाद एलहुँ तहिना तँ ओहो सभ छथि। तेँ जेहने हम सभ तेहने ओहो सभ। अगर ओही साधु सभसँ कहा-कही करैत छी तँ दू धार्मिक पंथक बीच विवाद होएत। मुदा एहिठाम तँ भनडारा छी, पंथक नीक-अधलाक विवेचनक मंच नहि ! इहो करब उचित नहि। जँ अपनाकेँ उन्नैस मानि लैत छी तँ कायरता होएत। विचित्र स्थितिमे रमापतिदास पड़ि गेलाह। गुम्म-सुम्म भेल रमाापतिदास दरबज्जा आ खरिहानक बीच खुट्टा-ठाढ़। ने डेग आगू बढ़ैन आ ने पाछु होइन। जत्ते गोटे हमरा संग आएल छथि जँ हुनका सभसँ विचार पुछबनि आ ओ लोकनि हमरा मनक विपरीत विचार दैथि तखन की करब? आइ धरि तँ सेहो नहि केलहुँ। करब उचितो नहि। गुरु-चेलाक अन्तर समाप्त भऽ जाएत। रमापतिदासक मन औनाए लगलनि। चाइनपर पसीनाक रुप चमकलनि। ताबे कानपर रखनिहार हारमुनियमबलाक कान्ह अंगिया गेलैक, ओ आगू बढ़ि ओसारक चौकी पर हारमुनियम रखि देलक। हारमुनियम रखैत देखि ढोलकियो ढोलक रखि देलक। एहिना एका-एकी सभ अपन-अपन लोटा-गिलास धरि रखि देलक। मुदा बैसल कियो नहि। तकर कारण बिना चरण पखरबौने बैसब कोना? आ जाबे गुरु महाराज नहि बैसताह ताबे हम सभ कोना बैसब। सभकेँ अपन-अपन सामान -बाजा, लोटा, गिलास- रखैत देखि आ अपन गिलास-कमंडलकेँ सेहो राखल देखलथि। रमापतिदासकेँ गर भेटिलनि। रमापतिदास विक्षिप्त मने कहलखिन- ‘‘जखन सबहक मन अछि तखन किएक ने दरबज्जेपर बैसल जाए। घरवारियो तँ आदर करिते छथि।’’ एक दिशि रमापतिदासकेँ मन जड़ैत, दोसर ईहो खुशी जे स्वागत चरण पखरबा संग घरबारी हमरे बेसी महत्व देलनि। सभ कियो चरण पखारि बैसए लगलाह। बिढ़नी जेकाँ सुगिया नचैत छलीह। कखनो घर जा दही देखि अबैत, जे कहीं बिलाइ ने आबि कऽ खा लिअए। तँ लगले ओसारपर राखल सामान आङन -चाउर-दालि, तरकारी- केँ देखैत जे कौआ ने आबि कऽ छुता दिअए। फेर लगले अंगनामे राखल टकुना, कराह, बालटीनकेँ देखैत जे धिया-पूता ने गंदा कए दिअए। तँ लगले आबि दलानक पाछूमे ठाढ़ भऽ टाटक भुरकी देने देखैत, जे लोकसँ भरल दरबज्जा-खरिहान अछि, कहीं मारिये ने शुरुह भए जाए। सुगियाक मनमे अहलदिल्ली पैसि गेलनि। मगज परक पसीना केशक तर देने गरदनिपर होइत गंजी तर देने सोनेलालक धोती भिजबैत रहैक। भजन सुननिहारमे धिया-पूतासँ लऽ कऽ स्त्री-पुरुष धरि। मोतियाक माए पचास बर्खक बूढ़ि। भजन बन्न भेल देखि बुचाइदासकेँ कहलखिन- ‘‘हे यौ बुचाइ दास, बिना भजन गौने जे पंगहति करबै तँ पाप नै लिखत?’’ मोतिया माइयक कड़ूआएल बात सुनि बुचाइ दास उत्तर देलखिन- ‘‘बड़ी काल गाजा पीना भऽ गेल अछि, तेँ कने पीबि लै छी। तखन नाचो देखा देब आ कबीर सहाएब की कहलखिन सेहो सुना देब। कनिये काल छुट्टी दिअ। होअए हौ रघूदास, जलदी गुल दहक।’’ बिना साज बजनहि घुन-घुना कऽ कहै लगलखिन- ‘‘हटल रहियौ सन्तो बिलइया मारे मटकी।’’ बुचाइ दासक पाँती आ मूहक चमकी देखि धियो-पूतो आ जनिजातियो, खापरिमे देल जनेरक लाबा जहिना भर-भराकेँ फुटैत अछि, तहिना सभ हँसै लगलाह। दलानोमे आ खरियानोमे भजन शुरु भेल। दोसर पंथक बैसारमे ढोलक, झालि, खजुरीक संग थोपड़ियो बजै लगल। मुदा पहिल पंथ दिशि पखाउज, झालर, हारमुनियाक संग सितार सेहो बजै लगल। एक सूर एक लय आ एक तालमे भजन शुरु भेल- ‘‘केशव! कही न जाए का कहिये!’’ मुदा दोसर पंथ दिशि भजन तते जोरसँ होइत जे पहिल पंथक भजन सुनाइये ने पड़ैत छल। महंथ रमापतिदास बाहर निकलि घुमबो करैत आ भजनो सुनैत रहथि। रमाओत भजनक अवाज दलानक घरसँ बाहर निकलबे नहि करैत छल। रमापति दास तामसँ माहुर होइत रहथि। मने-मन भनभनेबो करैत रहथि। सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘ई कोन बखेरा ठाढ़ कए देलिऐक?’’ थरथराइत दुनू हाथ जोड़ि सोनेलाल उत्तर देलखिन- ‘‘सरकार, हम अनाड़ी छी। नहि बुझलिऐक जे एना होइ छै। जे भऽ गेलैक से तँ भइये गेलैक। अपने तमसाइयौ नहि। जँ कनी गलतिये भऽ गेलै तँ माफ कऽ दियौक। अपने समुद्र छिऐक। नीक-अधला पचबैक सामर्थ्य अछि। अखन धरि भोजन बनबैक अहरियो नहि खुनल गेल अछि, आदेश दियौक।’’ तरंगि कऽ रमापतिदास कहलखिन- ‘‘हमर जते साधु छथि ओ फुटेमे अहरियो खुनता आ भोजनो बनौताह। तेँ बरतनसँ ल कऽ चाउर-दालि, तरकारी धरि सभ किछु हमरा फुटा दिअ।’’ ‘बड़बढ़िया’ कहि सोनेलाल सभ किछु दू भाग कऽ देलकनि। चारि-चारि गोटे भानसक जोगारमे लगि गेलाह। दूटा अहरी, हटि-हटि कऽ खुनल गेल। सोनेलाल सभ बरतनो आ चाउरो-दालि आनि दुनू अहरी लग रखि देलकनि। दलानक भजन बन्न भऽ गेल। मुदा खरिहानक भजन चलिते रहल। बुचाइ दास अगुआ मुरते। भजनिया सभ गोल-मोल भेल बैसल, तेँ बीचमे जगह खाली रहए। ओहि खाली जगहमे बुचाइ दास ठाढ़ भऽ आगू-आगू भजनक पाँतिओ गबैत आ नचबो करैत। बीच-बीचमे पाँतीक अरथो कहैत रहथि। रमापतिदास सोनेलालकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘बड्ड अनघोल होइत अछि। भजन बन्न करबा दियौ।’’ बुचाइ दास लग आबि सोनेलाल बाजल- ‘‘गोसाइ सहाएब, भजन बन्न कऽ दियौ। महंथजीकेँ तकलीफ होइ छनि।’’ सोनेलालक आग्रह सुनितहि, के छोट के पैघ सभ एक्के बात कहै लगलनि जे हम सभ बिना भजन गौने पंगहति नहि करब। सोनेलाल अबाक भऽ गेलाह। सौँँसे देह सोनेलालक कपैत। मुदा की करैत ? क्यो तँ बिन दले नहि आएल छलाह। तेँ सभ साधुक महत्व बराबरि बुझथि। अंगनाक टाट लग ठाढ़ सुगिया मने-मन सोचैत जे जँ कहीं सौध सभ अपनामे झगड़ा कए बिना भोजन केनहि चलि जेताह, तखन तँ हमर कबुला पूरा नइ हएत। कबुला नइ भेने दुखो घुरि कऽ आबि सकैत अछि। आब जँ दुखित पड़ब तँ जीब की मरब, तेकर कोन ठेकान। हे भगवान सौध सभकेँ मति बदलि दियौन जे असथिर भए जेताह। मने-मन सौध-सौध जपै लगलीह। दू बजैत-बजैत निर्गुण पंथ दिशि भोजन बनि कऽ तैयार भए गेल। भोजन तैयार होइतहि गंगादास सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘भोजन बनि गेल तँ आब भोजनक जगह तैयार करु।’’ गंगादासक आदति सुनि सोनेलालक करेज आरो थरथर कपै लगल। ई केहेन हएत। एक दिशि साधु सभ भोजन करताह आ दोसर दिशि बनितहि अछि। एक तँ जखनेसँ सौध सभ दरबज्जापर ऐला तखनेसँ झंझट होइ अए। कहुना-कहुना अखैन धरि पार लगल, मगर आब आखरी बेरमे ने कहीं झगड़ा फँसि जाइन। बाढ़नि आनै लाथे सोनेलाल आंगन गेल। आंगनमे जा बाढ़नि ताकै लाथे बैसि रहल। बइसैक कारण रहैक समए लगाएब। कनिये कालक बाद सुनलक जे हिनको सबहक भोजन तैयार भऽ गेलनि। बाढ़नि नेनहि सोनेलाल अंगनासँ निकलि खरिहान आबि बाहरै लगल। खरिहान बहारि सोनेलाल पानिक छिच्चा देलक। छिच्चा दऽ खरही बिछौलक। खरही बिछबितहि साधु सभ हरे-हरे कऽ उठि खरहीपर बैसलाह। खरहीपर बैसितहि पात उठल। पत्ताक बँटवारा शुरु होइतहि रमापति दास अपन सत्तरिमे घुमि-घुमि जए-जएकार करै लगलाह। दोसर दिशि भजन मंगल शुरु भेल। सभ साधु भोजन केलनि। भोजन कए सभ उठलाह। दोसर पंथ दिसक सत्तरिमे एक्कोटा अन्न वा कोनो वस्तु पातपर छुतल नहि। जखनिकि दोसर सत्तरिमे बरिआतीक भोजन जेकाँ छुतल। सभक उठितहि चारुभरसँ कौआ-कुकुड़ आबि-आबि खाए लगल। भोजन कए दोसर पंथवला सभ ढोलक-झालि लए बिदा हुअए लगल। मुदा रमौत दिशि सँ दछिनाक तगेदा भेल। अनाड़ी सोनेलाल सिक्कीक चंगेरीमे पान-सुपारी लए बीचमे ठाढ़ रहथि। हाथक इशारासँ रमापति दास सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘आब हम सभ चलब तेँ झब दे दछिना लाउ।’’ सोनेलाल- ‘‘कोना की दछिना.....।’’ रमापतिदास- ‘‘एक सए एकाओन, स्थानक चढ़ौआ एक सए एक, हमर साधु सभकेँ एकाओन-एकाओन आ भोजन बनौनिहारकेँ एकासी-एकासी दऽ दियौन।’’ भोजन बनौनिहारक आ महंथजीक दछिना तँ सोनेलालकेँ जँचल, मुदा.....। गंगादास आ बुचाइ दास सेहो सभ देखैत आ सुनैत। आँखिक इशारासँ गंगादासकेँ बुचाइ दास कहलखिन- ‘‘अधिकार अधिकार छी। जत्ते दछिना रमापति दासकेँ हेतनि तहिसँ एक्को पाइ कम हमहूँ सभ नहि लेब।’’ हिसाब जोड़ि सोनेलाल अंगनासँ रुपैआ आनि आनि रमापति दासक हाथमे दऽ देलकनि। रुपैआ ठीकसँ गनि रमापति दास सोेनेलालकेँ असिरबाद दैत उठि कऽ बिदा भेलाह। रमापति दासक पाछू-पाछू सोनेलालो अरिआतने किछु दूर धरि गेल। फेर घुरि कऽ आबि गंगादास लग ठाढ़ भऽ पुछलकनि- ‘‘गोसाइ सहाएब, अहाँकेँ दछिना कत्ते हएत?’’ सोनेलालक तड़पैत मोनकेँ गंगादास आँकि लेलखिन। दयासँ हृदय बरफसँ पानि बनै लगलनि। मूहसँ बोली नहि फुटनि। सोनेलालकेँ की कहथिन से फुरबे नहि करनि। बुचाइ दास दिशि देखि पुछलखिन- ‘‘की यौ बुचाइ दास, अहूँ तँ अगुआ मुरते छी, बिना अहाँ सबहक विचार लेने हम कोना जबाब देबनि। किएक तँ ऐठाम तीनटा प्रश्न अछि। पहिल दू पंथक अधिकारक सवाल अछि से दोसर पंथकेँ निच्चा मुहे जाएब हएत। आ तेसर, सोनेलाल कबुला पुरबैक लेल भनडारा केलनि। एक तँ बीमारीक फेरीमे पड़ि पस्त भेल छथि, तइपर सँ हमहूँ सभ भार दिअनि, ई हमरा नीक नहि बुझि पड़ैत अछि।’’ गंगादासक प्रश्न सुनि दोसर पंथक सभ साधु गुम्म भऽ मने-मन सोचै लगलाह जे की कएल जाए ? मुदा सोचबोक रस्ता अलग-अलग होइत अछि। एक्के प्रश्नक उत्तर पेबाक लेल वैरागीक रस्ता अलग होइत अछि। जबनिकि रागीक विचार अलग। भलेही दुनू गोटे एक्के रंग विद्वान किएक ने होथि। ततबे नहि ई आध्यात्मिक चिन्तक आ भौतिकवादी चिन्तकक बीच सेहो होइत अछि। जबनिकि निष्पक्ष चिन्तकक अलग होइत अछि। पंथक बीच बँटल समाजमे निष्पक्ष चिन्तक होएब कठिन अछि। किएक तँ पंथ खाली वैचारिकते टा नहि होइत, व्यवहारिक सेहो होइत अछि। जे परिवार आ समाजसँ सेहो जोड़ल रहैत अछि। जहिसँ जिनगीक गाड़ी चलैत अछि। कोनो विषय पर गंभीर चिन्तन करैक लेल एकटा आरो भारी उलझन अछि। ओ अछि भुखल आ पेट भरल शरीरक मन। मनकेँ बहुत अधिक प्रभाबित करैत अछि शरीरक इन्द्रिय। इन्द्रियकेँ संचालित करैत अछि शरीरक उर्जा। उर्जाक निर्माण करैत अछि उर्जा पैदा करैक वस्तु। ओ वस्तु अबैत भोजनसँ। मुदा सिर्फ भोजने टासँ उर्जा पैदा नहि होइत? उर्जा पैदा करैक दोसरो वस्तु अछि, जेकर भोजन शरीरक भोजनसँ अलगो होइत अछि। बीच-बचाव करैत बुचाइ दास गंगादासकेँ विचार देलखिन- ‘‘गोसाइ सहाएब, हमहूँ सभ अपना धरमक सिपाही छी, तेँ मरैत दम तक पाछु हटब धोखाबाजी हएत मुदा पवित्र धरमक रक्षा करब सेहो हमरे सभपर अछि। तेँ सोनेलाल जते रुपैआ रमापति दासकेँ देलखिन, तते हमरो सभकेँ दऽ दौथु। छ मासक दुख-तकलीफ हम सभ सोनेलालक सुनबे केलहुँ तेँ हुनकर दुखमे हमहूँ सभ शामिल भऽ रुपैआ घुमा दिअनि।’’ सैह भेल। सभ कियो हँसी-खुशीसँ भनडारा सम्पन्न कए जए-जएकार करैत बिदा भेलाह। ४ मद्रास स्टेशन गाड़ी पहुँचतहि रमाकान्त नमहर साँस छोड़लनि। दू राति तीनि दिनसँ गाड़ीमे बैसल-बैसल रमाकान्त, पत्नी श्यामा आ नोकर जुगेसर तीनू गोटेक देह अकड़ि गेल छलनि। गाड़ीक रुकितहि रमाकान्त हुलकी मारि प्लेटफार्म दिस तकलनि तँ दोसरि-तेसरि लाइनपर गाड़िये सभकेँ ठाढ़ भेल देखलखिन। अपना सबहक स्टेशन जेकाँ नहि जे कखनो काल कऽ गाड़िओ अबैत आ भीड़-भाड़ नहि रहने पुलोक जरुरत नहि पड़ैत। सगतरि रस्ते। जेमहर मन हुअए तेमहर बिदा भऽ जाउ। गाड़ीयो छोट आ लाइनो तहिना। गाड़ीमे रमाकान्तकेँ अनभुआर जेकाँ नहि बुझि पड़लनि किएक तँ बिहारेक गाड़ी आ बिहारेक पसिन्जरो रहए। गाड़ीसँ यात्री सभ उतड़ै लगलाह। तीनू गोटे रमाकान्तो अपन झोरा-मोटरीक संग उतरि, थोड़े आगू पुलपर चढ़ै लगलाह। पुलपर लोकक करमान लागल मुदा अपना सभ स्टेशन जेकाँ ऐंड़ी-दौड़ी नहि लगैत। जकरा हियासिकेँ रमाकान्त अपनो चेत गेला आ श्यामो-जुगेसरकेँ कहि देलखिन। अखन धरि स्टेशनमे दुनू कात गाड़िये देखथिन मुदा पुलपर जना-जना उपर चढ़ैत जाइत छलाह, तेना-तेना आनो-आनो चीज सभ देखै लगलखिन। पुलक सीढ़ीपर चलैत-चलैत श्यामो आ रमाकान्तोक जांघ चढ़ि गेलनि। पुलक ऊपर पहुँचतहि रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, मोटरी कतबाहिमे राखि दहक आ कने तमाकू लगबह। ताबे हमहूँ कनी बैसि लइ छी। चलैत-चलैत जांघ चढ़ि गेल।’’ जुगेसर मोटरी भुइयेँमे रखि तमाकुल चुनबै लगल। गाड़ीक जते चिन्हार पसिन्जर रहनि, सभ हरा गेलनि। नव-नव लोक पुलोपर आ निच्चोमे देखए लगलखिन। खाली लोकेटा नव नहि, ओकर पहिरेबो आ बोलियो। तमाकुल खा झोरा-मोटरी उठा तीनू गोटे पुल परसँ उतरि हियाबै लगलथि जे ककरोसँ पूछि लियनि। मुदा ककरो बाजब बुझबे नहि करथि। रमाकान्तो लोक सभकेँ देखैत आ लोको सभ रमाकान्तकेँ देखनि। तमाश दुनू बनल रहथि। रमाकान्त आ जुगेसरक धोती पहिरब देखि ओहिठामक लोक निङहारि-निङहारि देखैत रहथि आ रमाकान्तो तीनू गोटे ओहिठामक मरदो आ मौगियोक कपड़ा पहिरब देखि मने-मन हँसबो करथि। अनुभवी लोक सभ तँ बुझि जाइत छलाह जे बिहारी छथि। मुदा जकरा नहि बुझल छलैक ओ सभ ठाढ़ भऽ भऽ तजबीज करनि। एक जेर मौगी रस्ता धेने गप-सप करैत जाइत छलीह, ओ सभ अपने सभक मर्द जेकाँ ढेका खोंसने। मौगी सभक ढेका देखि श्यामा मुस्की दैत रमाकान्तकेँ कहलखिन- ‘‘देखियौ एहिठामक मौगी सभकेँ ढेका खोसने।’’ श्यामाक बात सुनि रमाकान्त हँसलनि मुदा किछु बजलथि नहि। रमाकान्त आँखि उठा-उठा चारु दिशि ताकि मने-मन सोचैत जे वाह रे एहिठामक सरकार। कते सुन्दर आ चिक्कन-चुनमुन बनौने अछि। कतौ बैसि जाउ। कतौ सुति रहू। सरकार बनौने अछि अपना सभ दिस, कोनो स्टेशन एहेन नहि अछि जाहि ठाम भरि ठेहुन गंदगी नहि रहैत होअए। प्लेटफारमेपर केराक खोंइचा, पानक पीक, चिनिया बदामक खोंइचा, कागजक टुकड़ी, रंग-बिरंगक गुटखा सभक पन्नी छिड़ियाएल रहैत अछि। ततबे नहि ! जेरक-जेर भिखमंगा, पौकेटमार, उचक्का रेलवे स्टेशनसँ लऽ कऽ बस स्टेण्ड धरि पसरल रहैत अछि। मुदा एहिठाम तँ एक्कोटा नजरिये नहि पड़ैत अछि। गाड़ीक झमारसँ तीनू गोटेक देह भसिआइत छलनि। मुदा की करितथि। जुगेसर तमाकुल चुनबै लगल। मने-मन रमाकान्त सोचथि जे बड़का फेरामे पड़ि गेल छी। की करब? मुदा किछु फुरबे नहि करैत छलनि। बड़ी काल धरि उगैत-डूबैत रहलाह। जहि गाड़ीसँ गेल रहथि ओहि गाड़ीक भीड़ छँटल। लोक पतराएल। तहि बीच एक गोटे मोटर साइकिलसँ आबि रमाकान्तेक आगूमे गाड़ी लगौलक। रमाकान्त ओहि आदमी दिशि तकै लगलथि आ ओहो आदमी रमाकान्त दिस तकै लगलनि। जेना नजरियेसँ दुनू गोटेक बीच चिन्हा-परिचय भऽ गेल होनि। रमाकान्त उठि कऽ ओहि आदमी लग जा, जेबीसँ पुरजी निकालि देखै देलखिन। पुरजीमे पता लिखल छलनि। पुरजी देखि ओ आदमी एकटा टेम्पूबलाकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़लनि। टेम्पूबलाक अबिते पता बता लए जाएले कहलखिन। तीनू गोटे टेम्पूमे बैसि बिदा भेलाह। मुदा ड्राइवर ने हिन्दी जनैत आ ने मैथिली। तेँ ड्राइवर संग कोनो गप-सप रस्तामे नहि होइत छलनि। स्टेशनक हातासँ निकलितहि रमाकान्त आखि उठा-उठा बजारो दिशि देखैत आ लोको सभकेँ देखैत छलाह। बाजारमे ओते अन्तर नहि बुझि पड़नि, जते लोक आ बोलीमे। मने-मन रमाकान्त अप्पन इलाकासँ इलाका मिलबै लगलाह। अपना ऐठाम पिण्डश्यामा आ गौर वर्ण एकरंगाह अछि, मुदा एहिठाम पिण्डश्याम वर्णक लोक अधिक अछि। लोकक बाजबो दोसरे रंगक। जना मधुमाछी भनभनाइत अछि तहिना। मुदा अपना ऐठामक लोक जेकाँ ठक ओहिठाम नहि। बजारक रस्तासँ जाइत रहैत तँ गरीबी-अमीरीमे अन्तर बुझिये नहि पड़नि। मुदा अपना इलाकाक बजारसँ ओहिठामक बजार बेसी चिक्कन चुनमुन आ सुन्दर। गंदगीक कतौ दरस नहि बुझि पड़नि। मुख्य मार्गसँ निकलि पूब मुहे एकटा रस्ता गेल छलैक। ओहि रस्तामे डाॅक्टर महेन्द्रक घरो आ क्लीनिको। मुदा जहि अस्पतालमे महेन्द्र नोकरी करैत रहथि ओ मुख्य मार्गमे छलैक। ओहि गलीक मोड़पर टेप्पू ड्राइवर तीनू गोटेकेँ उतारि भाड़ा लऽ आगू बढ़ि गेल। सड़कक दुनू भाग बड़का-बड़का मकान सभ अछि। ओहि मोड़पर तीनू गोटे मोटरी रखि बैसि रहलथि। गाड़ीक झमारसँ तीनूक देह-हाथ बथैत छलनि। ठाढ़ रहले नहि होइत छलनि। जहिना अमावस्याक रातिमे बादल पसरि आरो अन्हार कए दैत अछि तहिना रमाकान्तोकेँ होइत छलनि। एक तँ अनभुआर जगह दोसर बोलिक भिन्नता। बोली मनुष्य मनुष्यक बीच कत्ते दूरी बनबैत अछि ई बात रमाकान्त आइये बुझलनि। श्यामा मने-मन सोचैत जे हे भगवान केहेन जगह अछि जे अछैते मनुक्खे हम सभ हराएल छी। तीनू गोटे निराशाक समुद्रमे डूबल। मने-मन रमाकान्त सोचैत जे आब की करब? आइ धरि जिनगीमे एहेन फेरा नहि पड़ल छल। अपन सभ बुद्धि-अकील हरा गेल अछि। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, मन घोर-घोर भऽ गेल अछि। कनी तमाकू लगाबह।’’ जुगेसर तमाकुल चुनबै लगल। सभ सबहक मूह देखि पुनः नजरि निच्चा कऽ लैत छलाह। तहि बीच रमाकान्तक जेठ बेटा डाॅक्टर महेन्द्र फियेट कारसँ अस्पतालसँ घर अबैत रहथि आकि सड़कक कातमे तीनू गोटेकेँ बैसल देखलनि। पहिने तँ थोड़े धखएलाह, मुदा चिन्हल चेहरा तेँ मेन रोडसँ गाड़ी बढ़ा अपन रस्तापर लगौलथि। गाड़ी ठाढ़ कए महेन्द्र उतरि रमाकान्तकेँ गोर लगलनि। रमाकान्तकेँ गोर लागि महेन्द्र माएकेँ गोर लगलनि। गोर लागि महेन्द्र पिताक झोरा लए गाड़ीमे रखलनि। तीनू गोटे उठि गाड़ी दिस बढ़लाह। जुगेसर मोटरी गाड़ीमे रखलक। चारु गोटे गाड़ीमे बैसि आगू बढ़लाह। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैत रहथि। महेन्द्रकेँ गाड़ी चलबैत देखि माए पुछलकनि- ‘‘बच्चा, मोटर अपने हँकै छह?’’ “हँ”। “डरेबर नइ छह?” माएक प्रश्न सुनि महेन्द्र मुस्कुराइत कहलकनि- ‘‘जखन गाड़ीमे रहैत छी तखन दोसर काजे कोन रहैत अछि जे डरेबर राखब। अनेरे खरचा बढ़त।’’ घरक आगू गाड़ी पहुँचतहि महेन्द्र हार्न देलनि। गाड़ीक आवाज सुनि भीतरसँ नोकर आबि गेटक ताला खोलि देलकनि। महेन्द्र गाड़ी भीतर लए गेलाह। गाड़ी ठाढ़ कऽ महेन्द्र उतरि गाड़ीक तीनू फाटक खोलि तीनू गोटेकेँ उतारलनि। गाड़ीसँ उतरितहि रमाकान्त मकान दिशि तकलनि। तीनि तल्ला बड़का मकान। आगूक फुलवाड़ी देखि रमाकान्त मने-मन सोचै लगलथि जे सम्पति तँ गामोमे बहुत अछि मुदा एहेन घर....। अप्पन कोन जे परोपट्टामे एहेन मकान ककरो नहि छैक। मनमे उठलनि जे अपन कमाइसँ महेन्द्र एहन घर बनौलक आकि बैंक-तैंकसँ करजा लऽ कऽ बनौलक आकि भाड़ामे नेने अछि। ओना कहने रहथि जे जमीन कीनिकेँ मकान बनेलहुँ। मुदा एहेन घर बनबैमे पचासी लाखसँ उपरे खर्च भेल हेतैक। एतबे दिनमे कत्ते कमा लेलक। आगू-आगू महेन्द्र आ तहि पाछू तीनू गोटे मकानमे प्रवेश केलनि। मकानक सिमेंट एहन जमाओल जे पएर पिछड़ैत। सभसँ उपरका तल्लामे लए जाए एकटा कोठरी रमाकान्त आ जुगेसरकेँ दोसर माएकेँ सुमझा देलनि। ताबे नोकर जलखइ आ पानि नेने पहुँचि गेलनि। हाथो-पएर नहि धोए रमाकान्त पलंगपर पड़ि रहलाह। पंखा चलैत रहए। दूटा पलंग कोठरीमे लगाओल रहए। दूटा टेबूल, एकटा नमहर अएना, रंग-बिरंगक देवी-देवताक फोटो देवालमे सेहो छलैक। नील रंगसँ कोठरी रंगल। दूटा अलङा अल्गा सेहो देवाल दिस राखल। खूब मोटगर गद्दीदार ओछाइन पलंगपर बिछौल। मसलन सेहो दुनू पलंगपर। पानिक टंकी सेहो कोठरीक मुहेपर केबारक बगलमे छलैक। पलंगसँ उठि रमाकान्त कुरड़ा कऽ जलखै करै लगलाह। दू कौर खा पानि पीबि रमाकान्त चाह पीबै लगलथि। जुगेसरो जलखै खा चाह पीबै लगल। महेन्द्र ठाढ़े-ठाढ़ चाह पीबै लगलाह। चाहक चुस्की लैत रमाकान्त महेन्द्रकेँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, मकान अपने छी?’’ “हँ।“ “बनवै मे कते खर्च भेल?” खर्चक नाम सुनि मुस्की दैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बाबू, खर्च तँ डाएरीमे लिखल अछि तेँ बिना देखने नीक-नाहाँति नहि कहि सकै छी मुदा तीन लाखमे जमीन कीनलहुँ से मन अछि। जखन जमीन भऽ गेल तखन चारु गोटे कमेबो करी आ घरो बनबी। तेँ ठीकसँ बिना डायरी देखने नहि कहि सकैत छी।’’ चाह पीबि टेबुलपर कप रखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘चारि दिन नहेला भऽ गेल। देहमे एक्को रत्ती लज्जति नहि बुझि पड़ै अए। तेँ पहिने नहाएब, खाएब आ भरि मन सुतब।’’ “बड़बढ़िया” कहि महेन्द्र कोठरीसँ निकलि नोकरकेँ कहलखिन- ‘‘भाइ, स्त्री आ भावो तीनू गोटेकेँ फोनसँ कहि दहक जे बुरहा-बुरही अएलाह अछि।’’ नोकरकेँ कहि रमाकान्त लग आबि महेन्द्र कहलखिन- ‘‘चलू। नहाइक घर देखा दै छी।’’ आगू-आगू महेन्द्र आ पाछू-पाछू रमाकान्त, जुगेसर चललाह। स्नान घरक केवाड़ खोलि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘दूटा जोड़ले कोठरी अछि, दुनू गोटे नहाउ।’’ - कहि दुनू कोठरीक बौल जरा देलखिन। कोठरीकेँ निङहारि-निङहारि दुनू गोटे देखै लगलथि। पानिक झरना, टंकी, साबुन रखैक ताक, कपड़ा रखैक अलगनी इत्यादि। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, चाह पीलौं आ तमाकू खेबे ने केलहुँ। मन लुलुआइल अछि। जाह पहिने तमाकुल नेने आबह।’’ जुगेसर स्नान घरसँ निकलि कोठरी आबि, तमाकुल-चून लए आबि तमाकुल चुनबै लगल। तमाकुल चुना जुगेसर रमाकान्तोकेँ देलकनि आ अपनो ठोरमे लेलक। थूक फेकैत रमाकान्त बजलाह- ‘‘जुगे गाममे हमहूँ सम्पतिबला लोक छी मुदा आइ धरि एहेन पैखाना कोठरी आ नहाइक घर नै देखने छेलिऐक। सभ दिन खुल्ला मैदानमे पैखाना जाइ छी आ पोखरिमे नहाइ छी।’’ “कक्का, अपना सभ गाममे रहै छी ने। ई सभ शहर-बजारक छिऐक। जँ शहर-बजारक लोक गाम जेकाँ चाहबो करत से थोड़े हेतै। ऐठाम लोक बेसी अछि आ जगह कम छै, तेँ लोककेँ एना बनबै पड़ै छै। मुदा पोखरिमे लोक पानिमे पैसिकेँ नहाइत अछि आ ऐठाम पानि ढारिकेँ नहाइत अछि। जहिना अपना सभ कहियो काल लोटासँ पानि ढारि कऽ नहाइत छी। मुदा पानिमे पैसिकेँ नहेलासँ संतोख होइ छै, जे अइमे नइ हेतै।’’ ‘‘एहेन जिनगी जीनिहारकेँ गाममे रहब पार लगतै?’’ “से कोना लगतै।’ ‘‘बाबू हमरा बेसी काल कहै छलाह जे मनुखक शरीर देखैमे एक रंग लगनहुँ, जीबैक जे ढंग छैक ओ दू रंग बना दै छैक।’’ “अहाँक गप हम नइ बुझलौं काका।’’ ‘‘देखहक, जे आदमी भरिगर काज सभ दिन करै अए ओकरा जहि दिन भरिगर काज नहि हेतै तँ देहो-हाथ दुखैतै आ अन्नो रुचिगर नहि लगतैक। तहिना जे आदमी हल्लुक काज करै अए आ जँ ओकरा कोनो दिन भरिगर काज करै पड़तै तँ ओकरो देह-हाथ ओते दुखेतै जे अन्नो ने खा हेतै।’’ “हँ, से तँ होइ छै। हमरो कए दिन भेल अछि।’ ‘‘तहिना गामक लोक जे शहर-बजारमे आबि जिनगी बदलि लैत अछि ओ फेर गाम अही दुआरे नहि जाए चाहैत अछि।’’ “गामक लोक गरीब अछि काका ! खाए-पीबैसँ लऽ कऽ ओढ़े-पीनहै, रहै, दवाइ-दारु, पढ़ै-लिखैक सभ चीजक अभाव छैक, तेँ लोक नहि रहै चाहैत अछि।’’ महेन्द्र पिताकेँ स्नानघर पहुँचा घुमि कऽ अपना कोठरी आबि भाए डाॅक्टर रविन्द्र, पत्नी डाॅ. जमुना, भाबो डाॅक्टर सुजाताकेँ फोनसँ कहि देलखिन जे गामसँ माए-बाबू आ जुगेसर अएलाहहेँ। तीनू गोटेकेँ जानकारी दऽ अपने भंसा घर जाए मने-मन सोचै लगलथि, जे एहिठामक जे खान-पान अछि ओ हुनका सभकेँ पसिन्न हेतनि की नहि? तेँ गामक जे खान-पान अछि, सैह बनाएब नीक हएत। मुदा भनसिया तँ ऐठामक छी, तेँ बना सकत की नहि? तेँ अपनेसँ बनाएब नीक रहत। ओना भात-दालि आ रसगर तरकारी तँ भनसियो बना सकैत अछि। खाली तेतेरिक परहेज करैक अछि। तेतेरिक अलगसँ खटमिट्ठी बना लेब। जँ तरुआ तरकारी नहि बनाएब तँ पिता अपमान बुझताह। ओना दूधो-दही जरुरी अछि। मुदा एक्कोटा चीजसँ काज चलि सकैत अछि। दहियो तँ घरमे नहिये अछि। लगक दोकान सबहक दही दब रहै छै तेँ रविन्द्रकेँ कहि दियनि जे दरभंगाबलाक होटलसँ दही किनने आबथि। ई बात मनमे अबितहि महेन्द्र मोबाइलसँ रविन्द्रकेँ कहलखिन। रविन्द्र अस्पतालसँ सोझे दरभंगाबला होटल बिदा भेलाह। महेन्द्र अपनेसँ तिलकोरक पात, परोड़, झिंगुनी, भाँटा आ आलू तड़ै लगलाह। गैस चुल्हि, तेँ लगले सब कुछ बनि गेलनि। पैखाना जाइसँ पहिनहि रमाकान्त हाथ मटिअबैले माटि तकै लगलाह। मुदा माटिक कतौ पता नहि। नहाइसँ लऽ कऽ हाथ धोए धरि साबुने। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, बिना माटिये हाथ कोना मटिआएब?’’ रमाकान्तक बात सुनि मुस्कुराइत जुगेसर कहलकनि- ‘‘कक्का, जेहन देश ओहन भेस बनबै पड़ैत छैक। गाममे तरभरि दिन माटिये पर रहै छी, मुदा ऐठाम तँ माटिसँ भेंटो मश्किल अछि। किएक तँ देखते छिऐ जे माटि तरमे पड़ि गेल अछि। ने माटिक घर अछि आ ने रस्ता पेरा। साबुनो तँ गमकौए छी। की हेतै साबुनेसँ हाथ धो लेब।’’ कहलह तँ ठीके जुगेसर मुदा हाथ धोअब आ मनकेँ मानब दुनू दू बात अछि। हाथ धोइये लेब मुदा मन नहि मानत तँ ओ हाथ धोअब कना भेल?’’ “हँ कक्का, ई बात तँ हमहूँ मानै छी, मुदा गंदगी साफ करैक सवाल छै की ने से तँ हएत। मनकेँ बुद्धि ने चलबै छै, तेँ मनकेँ बुद्धि मना लेत।’’ ‘‘तोहूँ तँ आब बच्चा नइ छह जे नहि बुझबहक। एकटा बात कहह जे लोक पेटमे खाइ अए। पेट भरै छैक, तखन लोक किअए कहै छै जे भरि मन खेलहुँ वा पेट भरलाक बादो कहै छै जे मन नहि भरल।’’ “अपना सब कक्का मिथिलामे रहै छिऐ ने। मिथिलाक माटियो पवित्र छैक। मुदा ई तँ मद्रास छी ने तेँ ऐठामक लोक जे करैत हुअए, सैह करब उचित।’’ ‘‘बड़बढ़िया।’’ कहि दुनू गोटे अपन क्रिया-कलाप मे लगि गेलाह। रमाकान्त आ जुगेसर स्नाने घरमे रहथि, तहि बीच रविन्द्र, जमुना आ सुजाता तीनू गोटे अपन-अपन गाड़ीसँ आबि गेलथि। सभक मनमे अपन-अपन ढंगक जिज्ञासा रहनि। तेँ गाड़ीसँ उतरितहि सभ, पिता रमाकान्त, ससुर रमाकान्तकेँ देखैक लेल उताहुल। मुदा कोठरी अबितहि पता चललनि जे ओ नहाइ छथि। नहाएब सुनि सभ अपन-अपन कपड़ा बदलै अपन-अपन कोठरी गेलथि। पेन्ट-शर्ट खोलि रविन्द्र लुंगी पहिरतहि माएक कोठरी दिस बढ़लाह। कोठरीमे पहुँचतहि रविन्द्र माएकेँ गोर लागि आगूमे ठाढ़ भऽ गेला। रविन्द्रकेँ माए चिन्हलकनि नहि, मुदा गोरक जवाब बिना चिन्हनहि दऽ देलखिन। रविन्द्र मुस्कुराइत रहथि। मुदा अनचिन्हार जेकाँ माए बेटाक मूह दिशि बकर-बकर देखैत रहैत। तहि बीच जमुना आ सुजाता आबि माए केँ गोर लगलनि। दुनू पुतोहूओकेँ माए असिरवाद देलखिन। रविन्द्र बुझि गेलखिन जे माए नहि चिन्हलनि। मुस्कुराइत रविन्द्र माएकेँ कहलखिन- ‘‘माए, हम रविन्द्र छी।’’ रविन्द्र नाम सुनितहि माए हक्का-बक्का भऽ गेलीह। अनायास मूहसँ निकललनि- ‘‘रविन्द्र।’’ चारि सालसँ रविन्द्र गाम नहि आएल छलाह। पहिने रविन्द्रक देह एकहारा छलनि। खिरकिट्टी जेकाँ। जे अखन मस्त-मौला भऽ गेलाह। पुष्ट देह भेने रविन्द्रक रुपे बदलि गेलनि। कोरैला बेटा होइक नाते माएक ममता बाइढ़िक पानि जेकाँ उमड़ि गेलनि। मूहक बोली पड़ा गेलनि। खाली आखिये टा क्रियाशील रहलनि। जे अश्रुधारासँ सिमसि गेलनि। आँचरसँ नोर पोछितहि ओ दिन मनमे नचै लगलनि, जहि दिन रविन्द्र एहि आँचरमे नुकाएल रहैत छल। सौझुका तरेगण जेकाँ श्यामाक हृदयमे सुखद जिनगीक मनोरथ सभ चमकै लगलनि। हाथक इशारासँ माए दुनू पुतोहूकेँ बैसै कहलखिन। दुनू पुतोहू माइक दुनू भाग बैसिलीह। दुनू कान्हपर दुनू हाथ दऽ सासु ओहि दुनियाँमे बौआइ लगली, जाहि दुनियाँमे दुखक कोनो जगह नहि होइत छैक। मुदा सुखोक तँ दूटा दुनिया अछि। एक दुनिया श्यामाक आ दोसर रविन्द्रक। जे दुनियाँ श्यामा दुनू परानीक भेल जाइत छलनि, ओ तियाग, करुणा, दयाक सवारीसँ वैरागक मंजिल दिशि बढ़ैत जाइत छलनि। जखनिकि दुनू भाए रविन्द्रक जिनगी अधिकसँ अधिक धन उर्पाजन कऽ दैहिक सुख दिशि बढ़ल जाइत छलनि। रमाकान्त आ जुगेसर नहा कऽ कोठरी अएलाह। नहेलाक उपरान्त दुनू गोटेक देहक थकान मेटा गेलनि। नव-नव स्फूर्ति आ ताजगी आबि गेलनि। नव ताजगी अबितहि भूखो जगलनि। रविन्द्र कोठरीसँ निकलि पिताक कोठरी दिशि बढ़लाह। ताबे महेन्द्र सेहो पिता लग आबि भोजन करैक आग्रह केलकनि। एम्हर सासु लग दुनू पुतोहू बैसि एक-दोसराक खानदान, परिवार आ मानवीय संबंध बनबैक लेल वस्तु-जात एकत्रित करै लगलीह। गामक देहाती जिनगी बितौनिहारि पचपन बर्खक माए आ बजारु जिनगी जीनिहारि दुनू दियादनी पुतोहू, तीनूक मन अपन-अपन जिनगीक रस्तासँ भ्रमण करैत रहनि। मुदा सासु-पुतोहूक रस्तामे कतौ संबंध नहि रहनहुँ मानवीय संवेदना आ जिनगीक व्यवहारिक प्रक्रिया तीनूकेँ लग आनि सटबैत रहनि। बीतल जिनगी तँ स्मृति आ इतिहास बनि जाइत अछि मुदा अबैबला जिनगीक रुप-रेखा तँ अखने निर्धारित होएत। एक सासु जिनगीक पचपन बर्खक अनुभव, तँ दोसरि-तेसरि आधुनिक शिक्षासँ लैस। सोचमे दूरी रहनहुँ, सभ एक्के परिवारक छी, ई विचार सभकेँ बलजोरी खींचि कऽ एकठाम सटबैत रहनि। सासुक मनमे प्रश्न उठैत छलनि जे हम हजारो कोस हटि कऽ बेटा-पुतोहूसँ दूर रहैत छी, हमरा पुतोहूक सुख कत्ते हएत ? समाजमे देखै छी जे अस्सी बर्खक बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ पेटक बच्चा धरि एक-ठाम रहि हँसी-खुशीसँ जिनगी बितबैत अछि। खाएब-पीब कोनो वस्तु नहि थिक। किएक तँ जकरा हम नीक वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्य-पदार्थ छी आ जेकरा दब वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्ये-पदार्थ छी। हँ, ई विषमता समाजमे जरुर छैक जे केयो नीक वस्तु थारीमे छुता कऽ उठैत अछि जे कुकूड़ खाएत आ कियो भुखल सुतैत अछि। मुदा हम देखै छी हजारो किस्मक भोज्य-वस्तु घरतीपर पसरल अछि जेकरा ने सभ चिन्हैत अछि आ ने उद्यम कऽ आनै चाहैत अछि। जखनिकि जमुना आ सुजाता सोचैत जे परिवारकेँ आगू बढ़बैक लेल सन्तान जरुरी अछि। नोकर-दाइक सहारासँ छोट बच्चाक पालन हएत सेवा नहि किएक तँ माए अपन बच्चाकेँ दूधो नहि पीआबै चाहैत। बच्चा जखन स्कूल जाए जोकर हएत तखन आवासीय विद्यालयमे भरती करा शिक्षा-दीक्षा होइत। शिक्षा प्राप्त केलाक बाद कमाइक जिनगीमे प्रवेश करत। जिनगीक एक चक्र इहो थिक। जे जमुना आ सुजाताक मनमे चकभौर लैत छलनि। श्यामाक मन अपन पारिवारिक खानदानी फुलवाड़ीमे औनाइत छलनि। ने आगूक रस्ता देखैत छलीह आ ने पाछूक। आगूक रस्ता कठिन अछि आकि सघन आकि संवेदन रहित वा सहित अछि। एक-दोसर मनुष्यक संबंध हेबाक चाहिऐ, ओ जरुरिये नहि अनिवार्य आ आवश्यक सेहो अछि। जे मनुष्य एहि धरतीपर जन्म लेलक, ओकरे ओतेक जीबैक अधिकार छैक जते दोसरकेँ छैक। जँ से नहि अछि तँ लड़ाइ-दंगाकेँ कोन शक्ति रोकि सकैत अछि? मुदा प्रश्न जटिल अछि, आइ धरिक जे दुनियाक मनुक्खक जिनगी बनि गेल अछि ओ एतेक विषम बनि गेल अछि, जे सामूहिक मनुक्खक कोन बात जे दू सहोदया-सहोदर भाइक बीच समता रहब कठिन भऽ गेल अछि। तेँ की ? भोजनालय। नमगर-चौड़गर कोठरी। देबालपर बहुरंगी फूलक चित्र बनाओल अछि। सुन्दर हल्का गुलाबी रंगसँ कोठरी ढओरल, एयरकंडीशन। गोलनुमा नमगर-चौड़गर खाइक टेबुल। जकरा चारु कात खेनिहारक लेल कुरसी लागल। पनरहोसँ बेसिये। देवालक खोलियामे साउण्ड बक्स। जहिसँ मधुर स्वरमे गीत होइत अछि। भोजन करैक बाजारु व्यवस्थाकेँ महेन्द्र अपनौने। मुदा माता-पिताक अएलासँ आइ महेन्द्र धर्मसंकटमे पड़ि गेलाह। मने-मन सोचै लगलाह जे हम दुनू भाय आ दुनू दियादनी चारु गोटे तँ एक्के टेबुलपर खाइ छी मुदा माए तँ बाबूक सोझमे नहि खेतीह। ततबे नहि हमरा दुनू भाइक संगे तँ ओ खेताह मुदा दुनू पुतोहूक संग तँ नहि खेताह। अगर जँ जोर करबनि तँ कहीं बिगड़ि नहि जाथि। जँ बिगड़ि जेताह तँ आरो विचित्र भऽ जाएत। तखन की करब नीक होएत ? गुनधुनमे महेन्द्र। अनायास मनमे एलनि जे माए सँ विचार पूछि लिअनि। माए लग जा पुछलखिन- “माए, हमसब तँ एक्के टेबुल पर खाइ छी मुदा....?’’ महेन्द्रक बात सुनि माए बुझबैत कहलखिन- ‘‘बौआ, हमरो उमेर पचास-साठि बर्खक भेल हएत। आइ धरि जहि काजकेँ अधलाह बुझलिऐक, आब कोना करब? कते दिन आब जीबे करब! तइले किअए अपन बाप-दादाक बताओल रस्ता तोड़ब। एहन व्यवहार सिर्फ अपनेटा परिवारमे तँ नहि अछि, समाजोमे छैक। जाधरि ऐठाम छी ताधरि, मुदा गाम गेलापर तँ फेर ओएह व्यवहार रहत। तइले एहेन काज करब उचित नहि। गामक जिनगीक अनुकूल चलनि अछि। कोनो चलनि समाज आ जिनगीक अनुकूल होइत अछि। जे जिनगीक लेल नीक होइत अछि। भले ही दोसर तरहक जिनगी जीनिहारकेँ ओ अधलाह लगै।’’ माइक विचार सुनि महेन्द्र दू तोर कऽ खाएब नीक बुझलक। पहिल तोर मे अपने, जुगेसर आ पिता तथा दोसर तोरमे बाकी सभ कियो। भोजन करितहि रमाकान्त हफुआय लगलाह। जुगेसर सेहो हफुआय लगल। हाथ-मूह धोए दुनू गोटे सुति रहलाह। तीन रातिक जगड़ना। ताहिपर अन्नक निसां सेहो लागल रहनि। एक्के बेर चारि बजे रमाकान्तकेँ निन्न टुटलनि। नीन टुटितहि, सुतले-सुतल रमाकान्त देवालक घड़ीपर आखि देलनि। चारि बजैत। भांग पीबैक बेर भऽ गेल रहनि। भांग क आदति रमाकान्तकेँ पहिनहिसँ लागल रहनि। तेँ मद्रास अबैये काल झोरामे भांग क पत्ती लऽ लेने रहथि। श्यामा सेहो बुझि गेलीह जे हुनका भांग पीबैक बेर भऽ गेलनि। भांग क सभ समान- मरीच, सोंफ अननहि छी। सिर्फ पीसक जरुरत अछि। पलंग परसँ उठि झोरा खोलि भांग क सभ समान निकालै लगलीह। तहि बीच सुजाता ब्राण्डीक किलोबला बोतल आ गिलास नेने सासु लग आबि ठाढ़ भऽ गेलीह। खाइये बेरमे सासु पुतोहकेँ कहि देने रहथिन जे बुढ़ा सभ दिन चारि बजे पीसुआ भांग पीबैत छथि। भांगक संबंधमे सुजाता अनाड़ी रहथि। किछु नहि बुझल रहनि। मुदा ब्राण्डीक संबंधमे तँ बुझल रहनि। तेँ सुजाता, श्यामा आ रमाकान्त सभ अपन-अपन ढंगसँ से साकांछ रहथि। पलंगपर सँ उठि रमाकान्त जुगेसरकेँ जगा टंकीपर मूह-हाथ धोएले गेलाह। खट-खुट अवाज सुनि श्यामा बुझि गेलीह। बोतल लऽ सुजाता तैयारे रहथि। मुदा सुजाताक मनकेँ मिथिलाक संस्कृति झकझोड़ैत रहनि। किएक तँ मिथिलाक संस्कृतिक व्यवहारिक पक्ष जनैत नहि छलीह, तेँ जहिना अनभुआर जंगलमे कोनो जानवर औनाइत रहैत, तहिना सुजातो। मने-मन सोचैत जे एहिठाम जहिना पुतोहू ससुरक बीच व्यवहार होइत अछि, तहिना मिथिलोमे होइत आकि नहि। दोसर प्रश्न उठनि जे पढ़ल-लिखल समाजमे तँ पुरान व्यवहारो बदलि नव रुप लऽ लैत अछि। तेँ सुजाता हाथमे ब्राण्डीक बोतल आ गिलास रखने विचारक दुनियामे बौआइत छलीह। रमाकान्तकेँ भांग पीबैक समए भऽ गेल छलनि, तेँ विचारमे मधुरता आबि गेल छलनि। श्यामा आबि रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘अखन भांग नइ पिसलहुँहेँ। पुतोहू जनी एकटा बोतल रखने छथि, से की कहै छियनि?’’ भांग नहि पीसब सुनि रमाकान्तक मनमे कने क्रोध अबै लगलनि, मुदा बोतलक नाम सुनि दबि गेलनि। मुस्कुराइत रमाकान्त पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी आ पुतोहूमे की अन्तर छैक। जहिना बेटी तहिना पुतोहू। ताहूमे छोटकी पुतोहू, ओ तँ कोरैला बेटीक सदृश्य होइत। एक तँ दुनियामे कोनो संबंध अधलाह नहि छैक मुदा जखन ओ सीमामे रहैत अछि तखन। जखन सीमाक उल्लंघन लोक करै लगैत, तखन लाज आ परदाक जरुरी भऽ जाइत अछि। जे परम्परा बनि आगूमे ठाढ़ भऽ गेल अछि। मुदा ओहने पछिला व्यवहार निपुआंग मरि नहिये गेल अछि। तेँ नीक व्यवहार जिनगीमे धारण करब अधलाह तँ नहि।’’ रमाकान्तक बात सुजातो सुनैत छलीह। मने-मन खुशियो होइत छलीह जे ज्ञानवान ससुर छथि। मुदा बिना सासुक कहनहुँ तँ आगू बढ़ब उचित नहि। तेँ बोतल-गिलास नेने अढ़मे ठाढ़ छलीह। रमाकान्तक विचार सुनि श्यामा सुजाताकेँ कहै आगू बढ़लीह। पर्दाक अढ़मे ओ ठाढ़। कहलखिन- ‘‘जाउ! भगवान अहाँकेँ भोलेनाथ ससुर देने छथि। मुदा ससुर जेकाँ नहि पिता जेकाँ व्यवहार करबनि।’’ बामा हाथमे बोतल आ दहिना हाथमे गिलास नेने सुजाता ससुर लग आबि मुन्ना खोललनि आकि सौँँसे कोठरी महक पसरि गेल। गमकसँ हवोमे मस्ती आबि गेल। एक गिलास पीबि रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, तोहू एक गिलास पीबह।’’ जुगेसर- ‘‘कक्का, अहाँ लग बैसि कोना पीब?’’ “अखन, ने तूँ छोट छह आ ने हम पैघ छी। सभ मनुक्ख छी। मनुक्ख तँ मनुक्खे लगमे रहि ने जिनगी बितौत।’’ तहि बीच सुजाता गिलास जुगेसरो दिशि बढ़ौलनि। जुगेसर एक्के सूढ़िमे सौंसे गिलास पीबि गेल। पेटमे ब्राण्डी पहुँचतहि गुदगुदबै लगलै। दोसर गिलास पीबितहि रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी, किछु निमकी खाइ ले लाउ?’’ रमाकान्तक आढ़ति सुनि सुजाता गिलास-बोतलकेँ टेबुलपर रखि कीचेनसँ मद्रासी भुजिया दूटा प्लेटमे नेने अएलीह। एकटा पलेट रमाकान्तक आगूमे आ दोसर जुगेसरक आगूमे देलनि। दू-चारि फक्का भुज्जा फाँकि रमाकान्त फेर दू गिलास ब्राण्डी चढ़ा लेलनि। ओना भांगक निसां रमाकान्तकेँ बुझल, जे पीलाक उपरान्त घंटा-दू घंटाक बाद निसां अबैत अछि, मुदा ब्राण्डीक निसां तँ पीबितहि आबि गेलनि। ओना जुगेसर दुइये गिलास पीलक मुदा तेहीमे मन उनटि गेलै। सौँसे बोतल पीबि रमाकान्त ढकार केलनि। सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी, इलाइची देल पान खुआउ?’’ सुजाताकेँ बुझल। सासु पतिक खान-पानक संबंधमे सभ बात कहि देने छलखिन। दू खिल्ली पान, सुअदगर तेज जरदा डिब्बा, इलाइची, सेकल सुपारीक कतरा पलेटमे नेने सुजाता आबि रमाकान्तक आगूमे रखि देलनि। शराबक रंगमे जहिना रमाकान्त तहिना जुगेसर रंगि गेलाह। बजैक लेल दुनूक मन लुसफुसाइत। पान मूहमे लैत हि रमाकान्त सुजाताकेँ पुछलखिन- ‘‘बेटी, अहाँ डाक्टरी कोना पढ़लहुँ?’’ ससुरक सबाल सुनि सुजाता बगलक कुरसी पर बैसि, संकुचित भऽ कहै लगलनि- ‘‘बाबू जी, हमर पिता आ माए अपन महल्लाक कपड़ा साफ करैत छलथि। सभ दिना काज छलनि। एहिसँ जेना-तेना गुजर चलैत छलनि। एक्केटा घर छलनि। अनके कलपर नहेबो करै छलौं आ पानियो पीबै छलहुँ। पिता ताड़ी पीबथि। एक दिन साझू पहरकेँ ताड़ी पीबि अबैत रहथि। बहुत बेसी निसां लागि गेल रहनि। रस्तापर एकटा खाधि-गढ़ा रहए। ओहि खाधिमे ओ खसि पड़लाह। ओहि समए एकटा ट्रक, बिना इजोतेक, पास करैत रहए। ट्रक हुनका उपरे देने टपि गेलै कुड़कुट-कुड़कुट सौंसे शरीरक हड्डी भऽ गेलनि। हम सभ बुझबो ने केलिऐक। दोसर दिन भिनसरमे हल्ला भेलै। हमहूँ माए,भाए तीनू गोटे देखै गेलहुँ। देहक दशा देखि चिन्हबो ने केलिऐनि। मुदा कपड़ा आ चप्पल देखि मन खुट-खुट करै लगल। तीनू गोटे दुनू वस्तुकेँ चिन्हि गेलिऐक। तखन हुनका उठा कऽ आनि जरौलिऐनि। बिचहिमे जुगेसर बाजि उठल- ‘‘अरे बाप रे।’’ जुगेसरक ‘अरे बाप’ सुनि सुजातक आखिमे नोर आबि गेलन्हि। सुजाताक बात रमाकान्त आखि मूनि कऽ सुनैत रहथि। जुगेसरक बात सुनितहि आखि खोललनि। हृदय पसीज गेल रहनि। ताड़ी पीआकक बात सुनि रमाकान्त मने-मन विचारैत रहथि जे नशापान तँ हमहूँ करै छी मुदा ऐठामक जिनगी आ गामक जिनगीमे बहुत अन्तर छैक। ततबे नहि पेटबोनिया आदमीक सवाल सेहो अछि। हमरा सबहक ग्रामीण जिनगी शान्तिपूर्ण अछि। धनक अभाव तँ जहिना एतौ छैक तहिना गामोमे छैक। एहिठाम किछु गनल-गूथल उद्योग आ व्यापार कारोबारी अछि जे समृद्धशाली अछि। मुदा पेटबोनियो ओकरे देखौस करै चाहैत अछि, जहिसँ ओकर जिनगी अशान्त भऽ जाइत छैक। ओहि अशन्तिकेँ शान्ति करै दुआरे लोक सड़ल-गलल निसां पान करैत अछि। जहिसँ जिनगी बाटेमे टूटि जाइत छैक। एत्ते बात मनमे अबितहि रमाकान्त पलंगसँ उठि पीक फेकै निकललाह। बाहरक नालीमे पान थूकड़ि कऽ फेकि, टंकीमे कुरड़ा कऽ कोठरी आबि सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटा, चाह पिआउ?’’ आँचरसँ आखि पोछैत सुजाता चाह आनै निकललीह। रमाकान्तक हृदयमे सुजाताक प्रति विशेष आकर्षण बढ़ि गेलनि। जना हनुमानक हृदयमे राम-लक्ष्मण बैसल, तहिना सुजातो रमाकान्तक हृदयमे एकटा छोट-छीन घर बना लेलनि। रमाकान्तक प्रति सुजातोक हृदयमे तस्वीर बनै लगलनि। आइ धरि जे बात सुजातासँ क्यो ने पूछने छलनि से बात सुनि ससुरक हृदय पघलि गेलनि। जरुर रमाकान्तक हृदयमे सुजाता अपन जगह बना लेलनि। चाह आनि सुजाता रमाकान्तोकेँ आ जुगेसरोकेँ देलनि। हाथमे चाह लैतहि रमाकान्त अपन अस्तित्व बिसरि गेलाह। सुजाताक आखिमे अपन आखि दए एक-टकसँ देखै लगलाह। आद्र भऽ रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘ओहि समएक जिनगी ओहिना मन अछि आकि बिसरबो केलहुँहेँ ?’’ “बिसरब कोना ! ओ समए आ घटना तँ हमर जिनगीक इतिहासक एक महत्वपूर्ण कालखंड छी।’’ ‘‘तकर बाद की भेल?’’ “हम, दू भाइ-बहीन छी। एगारह बरखक हम रही आ आठ बर्खक भाए। दुनू गोरे इस्कूल जाइत रही। महल्लेमे स्कूल। भाइ तँ छोट रहै तेँ कोनो काज नै करै मुदा हम माइक संग कपड़ो खीची, परतीपर सुखेबो करी, लोहो दिऐ आ माइयेक संग महल्लासँ कपड़ा आनबो करी आ दाइयो अबिऐ। ओहिसँ जे कमाइ हुअए तहिसँ गुजरो करी। पढ़ल-लिखल परिवारसँ लऽ कऽ बनिया-बेकाल धरिक परिवारमे आबा-जाही रहए। पढ़ल-लिखल परिवारमे जखन जाइ तँ फाटल-पुरान किताब मांगि ली। ओहिसँ पढ़ैले किताब भऽ जाए। खाइक जोगार कमाइयेसँ भऽ जाए। एहि तरहेँ मैट्रिक फस्ट डिबीजनसँ पास केलहुँ। जखन मैट्रिकक रिजल्ट निकलल रहै, तखन महल्ला भरिक लोक बाहबाही केलक। हमरो उत्साह बढ़ल। मनमे अरोपि लेलौं जे बी.एस.सी. करब। ओहि समए हमरा मनमे डाॅक्टरक विचार रहबे ने करए। कोना रहैत ? जतबेटा बुद्धि ततबे ने सोचितहुँ। कओलेजमे एडमीशन शुरु भेल। महेन्द्र भैयाक कपड़ा दैले हम माए-भाइ आ हम तीनू गोरे भिनसुरके पहरकेँ एलहुँ। भैया ताबे अस्पतालेक क्वाटरमे रहैत रहथि। ओसारपर बैसि दाढ़ी बनबैत रहथि। माए कपड़ाक मोटरी रखि जमुना दीदीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘मलिकाइन, कपड़ा लिअ।’’ हम-दुनू भाइ-बहीन ठाढ़े रही। कोठरीसँ निकलितहि दीदीक नजरि हमरापर पड़लनि। जमुना माएकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी पास केलक, मिठाइ खुआउ।’’ जमुना दीदीक बात सुनि महेन्द्र भैया दाढ़ी बनाएब छोड़ि हमरा दिशि मूड़ी उठा कऽ तकलनि। बिना किछु बजनहि थोड़े काल देखि, फेर हाँइ-हाँइ दाढ़ी कटै लगलाह। दाढ़ी काटि, दाढ़ी कटैक सभ समान सैंतिकेँ राखि, हमरा सोर पाड़लनि। हमरा मनमे कोनो तरहक विचार उठबे ने कएल। किएक तँ तेसरा-चारिम दिनपर बरोबरि अबैत छलहुँ। दीदीकेँ भैया कहलखिन- ‘‘कने चाह बनाउ।’’ भैयाक बोली हम नइ बुझलिऐनि मुदा दीदी बुझि गेलखिन। ओ पाँच कप चाह बनौलनि। दू कप अपने दुनू परानी आ तीन कप हमरा तीनू गोरेकेँ देलनि। पहिल दिन हम भैयाक डेरामे चाह पीने रही। भैया, हमर नाम पुछलनि, हम कहलिऐन। मैट्रिक रिजल्ट संबंधमे पुछलनि। सेहो कहलिऐन। भैया नाम लिखबैसँ लऽ कऽ किताब-कापी धरिक भार उठबैत माएकेँ कहलखिन- ‘‘स्कूल-काओलेज तँ लगे महल्लेमे अछि तेँ बाहर जा पढ़ैक समस्ये नहि अछि। घरेपर रहि पढ़ि सकैत अछि। तखन स्कूल-कओलेजक खर्चसँ लऽ कऽ पढै़क सामग्री धरिक खर्च दुनू भाए-बहीनक हम देब।’’ भैयाक बात सुनि खुशीसँ हमर मन नाचि उठल। हम बड़ी काल धरि बकर-बकर भैयाक मूह देखिते रहि गेलहुँ। जाधरि डाॅक्टर बनलहुँ ताधरि भैया सभ खर्च दैते रहलाह।’’ सुजाताक बात सुनि रमाकान्तक मनमे एलनि जे जँ कनियो मदति गरीबकेँ कएल जाए तँ जिनगीक उद्धार भऽ सकैत अछि। पितो बहुत केलन्हि। बेटो केलक। बीचमे हम तँ किछु नहि केलहुँ। ओना दोसराक लेल रमाकान्तो बहुत किछु केनहुँ रहथि आ करबो करथि। मुदा सभ केलहा बिसरि गेलाह। रातिक आठ बजि गेल। एका-एकी तीनिटा गाड़ी आएल। महेन्द्र अपन गाड़ी कोठरीमे रखि, कपड़ा बदलि, सोझे पिता लग अएलाह। महेन्द्रकेँ देखितहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, हम बेसी दिन नहि अँटकब। हम तँ दस गोटेमे समए बितबैबला छी। एहिठाम असकरमे नीक नहि लागत।’’ महेन्द्र- ‘‘गाड़ीक झमारल छी तेँ पहिने चारि दिन अराम करु। तकर बाद देखि-सुनिकेँ जाइक विचार करब।’’ ५ मद्रास अएला रमाकान्तकेँ दस दिन भऽ गेलनि। दस दिन कोना बीतिलनि से बुझबे नहि केलनि। एहि दस दिनक बीच महेन्द्र अपने गाड़ीसँ तीनू गोटेकेँ उदकमंडलम्, कोडाइकनाल आ एकडि हिलस्टेशन सहित शुचीन्द्रम, रामेश्वरम्, तिरुचेंदूर, मदुराइ, पलनी, तिरुचिरापल्ली, श्रीरंगम, तंजोर, कुम्बकोणम, नागोर, वेलांकण्णि, वैत्तीश्वरन कोइल, चिदम्बरम्, तिरुवण्णामलै, कांचीपुरम, तिरुत्तणि आओर कन्याकुमारी घुमा देलकनि। मुदा अपना सभसँ भिन्न रीति रेवाज, बेवहार आ जीबैक ढंग ओहिठामक लोकक बुझि पड़लनि। एकटा बात जरुर देखल जे अपना सभसँ ओ सभ अधिक मेहनतियो आ इमानदारो अछि। भारतक आजादीक उपरान्त राज्य पुनर्गठन अधिनियमक अन्तर्गत चौदह जनवरी उन्नैस सौ उनहत्तरिमे मद्रास राज्यक नाम तमिलनाडु राखल गेलैक। पुरना केरलक किछु हिस्सा आ आंध्रप्रदेशक किछु हिस्सा जोड़ि कऽ एहि राज्यक निर्माण भेलैक। तमिलनाडु द्रविड़ सभ्यताक केन्द्र अदौसँ रहल अछि। ई. पू. चारिम शताब्दीमे चोल, पाण्ड्य आ चेर राजवंशक समएमे द्रविड़ सभ्यता अपन चरम सीमापर फुलाएल-फड़ल। तेरहमी शताब्दीक आरंभमे एहिठाम काकतीयेक शासन रहल। तेरह सौ तेइस ईस्वीमे दिल्लीक तुगलक सुल्तान काकतीय शासककेँ भगौलक। गोलकुंडाक कुतुबशही सुल्तान अखनुका हैदराबादक न्यो लेलक। सम्राट औरंगजेब सुल्तानकेँ हरा आसफ जा केँ गवर्नर बना देलक। मुगल शासनक आखिरी समएमे आसफ जा अपनाकेँ, निजामक उपाधि धारण कए, स्वतंत्र शासक घोषित कए लेलक। सोलह सौ उनचालीस ईस्वीमे, ईस्ट इंडिया कम्पनीक पएर मद्रासमे जमि गेल ताधरि देशक अधिकांश भागमे अंग्रेजक अधिकार भए गेल छलैक। तमिलनाडुक पूबमे बंगालक खाड़ी, दछिनमे हिन्द महासागर, पछिममे केरल आ उत्तरमे कर्नाटक आ आन्ध्रप्रदेश अछि। पैछला राति गप-सप करैत सभकेँ डेढ़ बजि गेलनि। गप्पक विषयो नमहर, सात दिनक देखल मद्रास छलनि। अढाइ बजे भोरमे एकठाम गाड़ी दुर्धटना भए गेलैक। चारु गोट डाॅक्टरकेँ फोन एलनि जे जलदी दुर्घटनाक जगहपर अबियौक। फोन सुनि महेन्द्र तीनू गोटे रविन्द्र, जमुना आ सुजाताकेँ जानकारी दैत कहलखिन- ‘‘जल्दी तैयार भए चलै चलू।’’ एकहि गाड़ीसँ चारु गोटे बिदा भेलाह। दुर्घटनाक जगह पहुँचि महेन्द्र देखलखिन जे गाड़ी एकटा सड़कपर राखल रौलरसँ टकरा गेल अछि। जााहिसँ थौआ-थाकर भेल अछि। गाड़ीमे एक्के परिवारक आठ गोटे सवार रहथि। उद्योगपति परिवार। एकटा जवान आ एकटा बच्चाक मृत्यु भए गेल छलैक। एकटा बूढ़क माथ फटि गेल रहनि, जहिसँ अड़-दर्र बजैत रहथि। दोसर महिलाक छाती टुटि गेल रहनि। मुदा वायुपर ओहो बजैत छलीह। एकटा जुआन महिलाक दुनू जांघ टूटि गेल रहनि। दूटा ढेरबा बचियाक एक-एक आखि फुटि गेल रहनि आ एक-एक डेन टूटि गेल रहनि। अबोध बच्चाकेँ किछु नहि भेल छलैक। महेन्द्रक पहुँचतहि धाँइ-धाँइ अस्पतालक आनो-आनो डाॅक्टर, नर्स आ स्टाफो सभ आएल छलाह। थाना पुलिससँ लऽ कऽ जिला पुलिस धरि पहुँच गेलैक। डाॅक्टर आएल छलाह, सभ रोगी सभकेँ देखि विचार केलनि जे अस्पताले लए जाएब नीक होएत। डाॅक्टर सभक संगमे सिर्फ अल्लेटा। ने कोनो दवाइ आ ने कोनो औजार रहनि। आठो गोटेकेँ, थानोक पुलिस आ अस्पतालोक कर्मचारी, उठा-पुठा कऽ अस्पताल अनलकनि। अस्पतालमे जाँच-पड़ताल होइतहि समए दू गोटेक मृत्यु भऽ गेलैक। बाकीक उपचार चलै लगलैक। साँढ़े पाँच बजे चारु गोटे महेन्द्र डेरा पहुँचलाह। गाड़ीक हड़हरेनाइ सुनि रमाकान्तोक निन्न टुटि गेलनि। सुतैक समए नहि देखि चारु गोटे गाड़ीसँ उतरि अपन-अपन नित्य-कर्ममे लगि गेलाह। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल रमाकान्त सोचै लगलथि जे आइ एगारहम दिन छी मुदा एक्को-टा पोता-पोतीक मुँह नहि देखि सकलहुँ। जाहि परिवारमे पाँच-पाँचटा पोता-पोती रहत ओहि परिवारक बच्चासँ भेटि नहि होअए, कते दुखक बात छी ? माए-बाप, दादा-दादीक स्नेह बच्चाक प्रति की होइत छैक, तेकर कोनो नामो-निशान नहि देखैत। जहि बच्चाकेँ माए-बापक सिनेह नहि भेटितैक, ओहि बच्चाकेँ माता-पिताक प्रति केेहेन धारणा बनतैक? हँ, ई बात जरुर जे दुनियाँक सभ मनुष्य-मनुष्य छी, तेँ सबहक प्रति सभकेँ स्नेह हेबाक चाहिऐक। मुदा जाहि परिवेशमे हम सभ जीबि रहल छी, जाहि ठाम व्यक्तिगत सम्पत्ति आ जबाबदेहिक बीच मनुष्य चलि रहल अछि, ताहि ठाम स्नेहो तँ खंडित होइत अछि। मनुष्यक जिनगी स्थायी नहि, अस्थाइ होइत अछि। उम्रक हिसाबसँ शरीर क्रियाशील रहैत अछि। जहिना बच्चाक उत्तरदायित्व माए-बापपर रहैत छैक तहिना रोगसँ ग्रसित वा अधिक बएस भेलापर जखन शरीरक अंग शथिल होअए लगैत छैक, तखन तँ दोसरेक सहाराक जरुरत होइत छैक। जँ से नहि होए तँ जिनगी कष्टमय हेबे करत। लोक एक राज्यसँ दोसर राज्य, एक देश सँ दोसर देश कमाइले जाइत अछि। किएक? एहि लेल ने जे अपनो आ परिवारोक जिनगी चैनसँ चलत। महेन्द्रकेँ तीन आ रविन्द्रकेँ दू सन्तान। दुनू मिला कऽ पाँच भाइ-बहीन। महेन्द्रक जेठ बेटा हाइ स्कूलमे पढ़ैत, बाकी चारु नर्सरीमे। महेन्द्रक जेठ बेटा रमेश हाइ स्कूलक होस्टलमे रहैत अछि आ बाकी चारू आवासीय स्कूलमे रहैत अछि। महिना दू महिनापर महेन्द्र जाएकेँ खरचा पहुँचबैत छथि। बाबा-दादीक जोर कएलापर बच्चा सभकेँ भेट करैक कार्यक्रम महेन्द्र बनौलनि। रवि दिन स्कूलो बन्न रहतैक, तेँ भेट-घाँट करैमे सुविधा सेहो होएतनि। सात बजे डेरासँ चलबाक कार्यक्रम बनलनि। रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर समएसँ पहिनहि तैयार भऽ गेल छलाह, मुदा भरि रातिक जगरना दुआरे महेन्द्र पछुआएल रहथि। ओंघीसँ देह भसिआइत रहनि। मुदा निन्न तोड़ैक दवाइ खाए रमाकान्त लग आबि कहलखिन- ‘‘बाबू, हम तँ भरि राति जगले रहि गेलहुँ। जखन ओछाइनपर गेलहुँ, निन्न पड़लो नहि रही आकि फोन आबि गेल जे एकटा गाड़ीक दुर्घटना भऽ गेलैक, जहिमे सबार एक्के परिवारक आठ गोटे छलाह, ओ पैघ उद्योगपतिक परिवारक छलाह। हुनके सभकेँ देखैत-सुनैत भोरमे एलहुँ।’’ बिचहि मे जुगेसर बाजल- ‘‘मरबो केलइ?’’ “हँ। जे दुनू मुख्य कारोबारी छलाह ओ मरि गेलाह। एक गोटेकेँ ब्रेन हेम्रेज भए गेलनि। ओ सभ दिन पगलाएले रहती। एक गोटेकें छातीक हड्डी थकुचा-थकुचा भए गेल छनि, ओ दू-चारि मासक मेहमान छथि। तीनटा अधमरु भएकेँ जीताह। एकटा चारि सालक बच्चा टा सुरक्षित अछि।’’ रमाकान्त महेन्द्रक बातो सुनैत आ मने-मन सोचबो करैत जे ईएह थिक जिनगी। अहीक लेल लोक एते नीचसँ नीच काजपर उतरि मनुखकेँ मनुख नहि बुझैत अछि। अनका बुझबैले धरमक नाटक रचि पूजा-पाठ, कीरतन-भजन करैत अछि। हजारो-लाखो रुपैआ खर्च कए पाथरक मूर्ति स्थापित करैत अछि। नीक-नीक प्रसाद चढ़बैत अछि। मुदा जाहि मनुष्यकेँ पेटमे अन्न नहि, देहपर वस्त्र नहि, रहैक घर नहि आ जीबैक कोनो ठेकान नहि, ओकरा तँ देखिनिहारो क्यो नहि। यैह थिक कर्मकाण्डक आडम्बर आ चक्रव्यूह। रमाकान्तकेँ गंभीर देखि मुस्की दैत महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बाबू, नोकरीक जिनगिये एहन होइत छैक। एक रातिक कोन बात जे एकलखाइत पाँचो राति जागल रहब तैयो किछु नहि बुझबैक। एहन-एहन दवाइ सब अछि जे खाइत देरी निन्न निपत्ता भऽ जाएत अछि। जाबत अहाँ सभ चाह-पान करब ताबत हमहूँ तैयार भऽ जाइत छी।’’ कहि महेन्द्र उठि कऽ तैयार होइ लगलाह। चारु गोटे कारमे बैसि बिदा भेलाह। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैत रहथि। दुनू स्कूल एक्केठाम। एक दोसरसँ थोड़बे हटल रहै। चारु गोटे पहिने रमेशक होस्टल पहुँचलाह। छहरदेबालीक बीचमे होस्टल अछि। अबै-जाइक एक्केटा दरबज्जा, जहि दरबज्जामे लोहाक फाटक लागल। एकटा चौकीदार बैसल। दरमान महेन्द्रकेँ चिन्हैत रहनि। किएक तँ मासे-मास ओ अबैत छथि। चारु गोटे भीतर गेलाह। भीतरमे गारजन सभक लेल एकटा खुला घर बनल अछि, जाहिमे चारु कात कुरसी सजल। चारु गोटे ओहि घरमे बैसलाह। महेन्द्र रमेशकेँ समाद देलखिन। रमेश आबि पिताकेँ गोर लगलकनि। पिताकेँ गोर लागि रमेश ठकुआ कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। ने रमेश बाबा दादीकेँ चिन्हैत आ ने बाबा-दादी रमेशकेँ चिन्हैत रहनि। ठकुआ कऽ ठाढ़ देखि रमेशकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादीकेँ गोर लगिअनु।’’ महेन्द्रक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोर लगलकनि। शिष्टाचार निमाहैत तेँ तीनू गोटे असिरवाद दए देलखिन। मुदा रमाकान्तक मनमे तूफान उठि गेलनि। सोचै लगलाह जे, जे पोता चिन्हबो ने करै अए ओ सेवा की करत ? पढ़नाइ-लिखनाइ, सभ मनुष्यक लेल जरुरी अछि। एहिसँ ज्ञान होइत छैक, जे जिनगी जीबैक ढंग सिखबैत छैक। मुदा जँ बच्चाकेँ परिवारसँ अलग जिनगी बना पढ़ाओल-लिखाओल जाए तँ ओ परिवारकेँ कोना चिन्हत आ परिवारक दायित्वकेँ कोना बुझत? परिवारोक तँ सीमा छैक। एक परिवार पैछला पीढ़ीकेँ जोड़ि बनैत, जे संयुक्त परिवार कहबैत। जे मिथिलाक धरोहर छी। आ दोसर अपने लगसँ आगू बढ़ि बनैत अछि, जे एकल परिवार कहबैत अछि। जहिमे लोक बापो-माएकेँ बीरान बुझि कुभेला करैत अछि। जँ एहि तरहक परिवारक संरचना होअए लगत तँ बापो-माएकेँ धिया-पूतासँ कोन मतलब रहतैक। तखन समाजक की दुर्दशा होएतैक ? जँ से नहि होएतैक तँ मनुष्य आ जानवरमे अन्तरे की रहतैक ? अखने देखि रहल छी जे अपन खून रहितहुँ बुझि पड़ैत अछि जे, जहिना हाट-बजार वा मेला-ठेलामे हजारो मनुक्खकेँ देखलोपर अनचिन्हारे-अनचिन्हार बुझि पड़ैत, तहिना तँ अखनो भए रहल अछि। एहिसँ नीक जे जहिना मनुष्यक समूहसँ परिवार बनैत आ परिवारक समूहसँ समाज बनैत तँ समाजेक सदस्यकेँ किएक ने अंगीकार कएल जाए, जहिसँ जिनगी हँसैत-खेलैत बीतैत रहत। पिताकेँ गुम्म देखि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बाबू, एहिठामसँ चलू। एहिठाम सभ बच्चाक रुटिंग बनल छैक। अगर अपना सभ बेसी समए अँटकबै तँ बच्चाक रुटिंग गड़बड़ा जएतैक। ममता भरल मनकेँ मारि रमाकान्त उठिकेँ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘हँ, हँ, चलू। ओहू बच्चा सभकेँ देखैक अछि।’’ रमेश चलि गेल आ इहो चारु गोटे गाड़ीमे बैसि बढ़लाह नर्सरी विद्यालय लगेमे रहै। महेन्द्रकेँ दरमान चिन्हिते रहनि तेँ, कोनो रोक-राक नहिये भेलनि। चारु बच्चाकेँ दरमान बजा अनलक। चारु बच्चा आबि महेन्द्रकेँ गोर लगलकनि। गोर लागि चारु बच्चा ठमकि गेल। हाथक इशारा सँ रमाकान्त आ श्यामाकेँ देखबैत बच्चा सभकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादी छथुन। गोर लगहुन।’’ महेन्द्रक कहलापर चारु बच्चा तीनू गोटेकेँ गोर लगलकनि। रमाकान्तो आ श्यामोक मन तरे-तर टूटै लगलनि। मुदा की करितथि? सोचै लगलथि जे की सोचि एहिठाम एलहुँ आ की देखि रहल छी। आब एक्को दिन एहिठाम रहब उचित नहि, मुदा जखन आबि गेलहुँ तखन तँ बेटे-पुतोहूक विचारसँ ने गाम जाएब। किछु देखैक लेल सेहो बाकी अछि। टूटल मने रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘बच्चा सभकेँ देखिये लेलहुँ, आब ऐठाम सँ चलू। गामक सुरता खीचि रहल अछि। जल्दीये चलि जाएब।’’ पिताक बात महेन्द्र नहि बुझि सकलाह। जाधरि महेन्द्र गाममे रहलाह विद्यार्थिये छलाह। डाॅक्टर बनला बाद मद्रासे चलि अएलाह। जाहिसँ मद्रासेक परिवेशमे ढलि गेलाह। बेर टगितहि चारु गोटे ब्रह्मचारी आश्रम बिदा भेलाह। बह्मचारी आश्रममे मंदिर नहि। मात्र दूटा घर। एकटा घर धर्मशाला जेकाँ सार्वजनिक आ दोसर घरमे ब्रह्मचारी जी अपने रहैत छलाह। ओहिमे एक भाग सुतबो आ भानसो करैत छथि। बरतन-बासन सभ एक भागमे सेहो ओहि घरमे रखने छथि। ब्रह्मचारी जी मिथिलेक। अद्वैत दर्शनक प्रकाण्ड पंडित छथि। नस-नसमे अद्वैत दर्शन समाएल छनि। ब्रह्मचारी आश्रम लगमे रहितहुँ महेन्द्र नहि जनैत छलाह। मुदा जखन रामेश्वरम् गेल रहथि तँ ओतै एकटा पुजेगरी कहलकनि। मुख्य मार्गसँ ब्रह्मचारी आश्रम दस लग्गी पछिम। एकपेड़िया रस्ता तेँ महेन्द्र मुख्य मार्गक कतबाहिमे गाड़ी लगा, चारु गोटे आश्रम दिशि बढ़लाह। आश्रमक सीमापर पहुँचतहि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा-उठा तजबीज करै लगलथि। ने कोनो तरहक तड़क-भरक आ ने लोकक भीड़ आश्रममे देखथि। घर तँ ईंटाक बनल छैक मुदा धर्मस्थान जेकाँ नहि बुझि पड़ैत छैक। साधारण गृहस्तक घर जेकाँ आश्रम। मुदा नव चीज दुनू गोटेकेँ बुझि पड़लनि। जे हम सभ मद्रासक जमीन छोड़ि मिथिला चल एलहुँ। ब्रह्मचारी जी करजानमे कच्चिया हाँसूसँ केरा गाछक सुखल डपौर सभ कटैत रहथि। केरा गाछक अढ़मे रहथि। तेँ ने ब्रह्मचारी जी रमाकान्त सभकेँ देखलखिन, आ ने रमाकान्त सभ ब्रह्मचारी जीकेँ। मुदा गाड़ीक आवाज ब्रह्मचारी जी सुनने रहथि। ओना गाड़ी तँ सदिखन चलिते रहैत अछि, तेँ गाड़ीक आवाजपर ब्रह्मचारी जी धियाने नहि देलनि। अपन काजमे मस्त रहथि। एक बीघा जमीन आश्रममे। ओहिमे सभ किछु बनल रहैक। दू कट्ठामे दुनू घर, आंगन आ गाइक थैर रहनि। चारि कट्ठाक एकटा छोटबेटा पोखरि। पाँच कट्ठामे गाछी-कलम। दू कट्ठामे गाइयक लेल घासक खेती आ सात कट्ठामे अन्न उपजैत अछि। सभसँ पहिने चारु गोटे पोखरिक घाटपर पहुँचलथि। पोखरिक घाट पजेबा-सिमटीक बनल। घाटपर ठाढ़ भए चारु गोटे पोखरिकेँ हियासि-हियासि देखै लगलथि। पोखरिक किनछरि मे पान-सातटा मिथिलेक बगुला चरौर करैत रहए। एक टकसँ रमाकान्त बगुलाकेँ देखि सोचै लगलथि जे जहियासँ ऐठाम एलहुँ, आइये अपन इलाकाक बगुला देखलहुँ। ओना बगुला तँ एतहुँ अछि मुदा मिथिलाक बगुला तँ दोसरे चालि-ढालिक होइत अछि। बगुला परसँ नजरि हटा पोखरि दिशि देलनि। पोखरिमेँ दस-बारहटा कुमहीक छोट-छोट समूह फूल जेकाँ छिड़ियाइल रहए। जे हवाक सिहकीमे नचैत रहए। तहि बीच दूटा पनिडूबी भुक दे जागल, जकरा अपना सभ पिहुओ कहै छिऐक। पिहुआकेँ तजबीज करितहि रहथि आकि एक जेर सिल्ली उड़ैत आबि पोखरिमे बैसल। तहि बीच जुगेसर रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘कक्का, ई तँ अपने इलाकाक पुरैनिक गाछ छी। फूलो ओहने बुझि पड़ै अए।’’ जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी उठा पुरनि कऽ देखि कहलखिन- ‘‘हँ, हौ जुगेसर। छी तँ कमले।’’ हाथ-पएर धोए चारु गोटे घाटक उपरका सीढ़ीपर आबि ब्रह्मचारी जीकेँ हियाबै लगलथि। ब्रह्मचारी जीकेँ नहि देखि रमाकान्त सोचै लगलथि जे भरिसक ब्रह्मचारी जी कतौ गेल छथि। तहि बीच जुगेसरक नजरि करजान दिशि गेल। करजानमे ब्रह्मचारी जीकेँ देखि जुगेसर रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘काका, एक गोटे करजानमे काज कए रहल अछि। हम जा कऽ पूछि लइ छिअनि।’’ जुगेसरक बात सुनि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा कऽ देखलनि। मुदा ब्रह्मचारी जीक छुछुन चेहरा देखि रमाकान्तकेँ भेलनि जे कियो जौन मजदूर काज करैत अछि। तहि बीच ब्रह्मचारिये जीक कानमे रमाकान्तक आवाज पहुँचलनि, कानमे आवाज पहुँचतहि ब्रह्मचारी जी हाथक हँसुआ नेनहि पहुँचलथि। ब्रह्मचारी जी अनेको भाषा आ बोलीक जानकार छथि। चारु गोटेकेँ देखि ब्रह्मचारी जी बुझि गेलथि। ई लोकनि मिथिलेक छथि किएक तँ जुगेसर आ रमाकान्तकेँ मिथिलेक ढंगसँ धोती पहिरने देखलनि। मुदा महेन्द्रकेँ देखि तत-मतमे पड़ल रहथि। श्यामाक साड़ी पहिरब देखि ब्रह्मचारी जीक मन मानि गेलनि जे ई सभ मिथिलेक छथि। मुदा रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ नहि चीन्हि पुछलखिन- ‘‘ब्रह्मचारी जी कते छथि?’’ ब्रह्मचारी जी साधारण धोती पहिरने रहथि। सेहो फाँड़ बन्हने। देहपर गमछा रहनि। ने बाबरी छटौने आ ने दाढ़ी रखने रहथि। ने गरदनिमे कंठी-माला आ ने देहमे जनेउ। मुस्कुराइत ब्रह्मचारीजी उत्तर देलखिन- ‘‘अहाँ सभ मिथिलासँ एलहुँ अछि। एना-ठाढ़ किएक छी। चलू बैसि कऽ गप-सप करब। ब्रह्मचारी जी अपने आबि जएताह।’’ कहि ब्रह्मचारी जी पोखरिक घाटपर हाँसू रखि हाथ-पएर धोए अंगनेमे मोथीक बिछान बिछौलनि। चारु गोटेकेँ बैसाए ब्रह्मचारी जी घरसँ एक घौर केरा निकालि अनलनि। केराक रंग-रुप देखि रमाकान्त बुझि गेलखिन जे ई तँ मिथिलेक गौरिया-मालभोग छी, अंठियाहा नहि छी। घौउरो नमहर। गछपक्कू, आँठी-आँठी जुआइल छलैक। सुआदो नीक हेतै, अपनेसँ पूर्ण जुआ कऽ पाकल अछि। धुकलाहा नहि छी। केराक घौड़ बीचमे राखल आ सभ किओ हाथ बगने। जुगेसर सोचैत जे खेने छी, पेटमे जगहे नहि अछि, नइ तँ सौँँसे घौड़ खा जइतियनि। रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ कहलकनि- ‘‘अखने, एक घंटा पहिने, भोजन केलहुँ, तेँ खाइक क्षुधा नहि अछि। मुदा ब्रह्मचारी आश्रमक परसाद छी, तेँ दू छीमी जरुर खाएब।’’ कहि दू छीमी उपरका हत्थासँ तोड़ि खेलनि। रमाकान्तकेँ देखि महेन्द्रो आ जुगेसरो दू-दू छीमी तोड़ि खेलनि। श्यामा हाथ बगने रहथि। चुपचाप बैसल छलीह। श्यामाकेँ हाथ बागब देखि ब्रह्मचारी जी कहलखिन- ‘‘बहीन, अहाँ जाहि दुआरे हाथ बगने छी ओ हमहूँ बुझै छी। मुदा अपन मिथिलामे दुनू चलैन अछि। पतिक आगूमे पत्नीक नहि खाएब आ विवाहक प्रकरणमे समाजक माए-बहीन मिलि मौहक करैत छथि। जाहिमे पति-पत्नीकेँ संगे खुआओल जाइत अछि। तेँ अहूँकेँ लजेबाक नहि चाही। ई तँ सहजहि आश्रम छी। दोसर धर्मस्थानो छी।’’ ब्रह्मचारी जीक विचार सुनि श्यामाक मन डोललनि मगर व्यवहार मनकेँ रोकैत छलनि। असमंजसमे श्यामाकेँ देखि जुगेसर फनकिकेँ बाजल- ‘‘काकी, जब हमर घरनीक हाथ ढेकीमे कटि गेल रहनि, तखन हम अपने हाथे खुआबिअनि। अहाँ तँ सहजहि बृद्ध भेलहुँ।’’ जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी झुका लेलनि। दू छीमी केरा श्यामो खेलनि। चारु गोटे केरा खा, पानि पीबि मूह पोछलनि। ब्रह्मचारी जी रमाकान्तकेँ पुछलखिन- ‘‘एहिठाम अपने कोना-कोना ऐलिऐक?’’ महेन्द्र केँ देखबैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘ई जेठ बेटा छथि। डाॅक्टरी पढ़ि, नोकरी करै एहिठाम चलि अएलाह। सालमे एक बेर अपनो गाम जाइत छथि। बाल-बच्चा आ स्त्री आइ धरि गाम नहि गेलखिन अछि। तेँ दुनू परानीक मनमे आएल जे देशे-कोस आ बच्चो सभकेँ देखि आबी। तेँ एलहुँ?’’ महेन्द्र दिशि देखि ब्रह्मचारी जी पुछलखिन- ‘‘कते दिनसँ एहिठाम छी?’’ कनेक गुम्म भए समए मन पाड़ि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘ई बाइसम बर्ख छी।’’ “एते दिनसँ एहिठाम रहै छी, मुदा कहियो भेट-घाँट नहि भेल।’’ अपन विबसता देखबैत महेन्द्र उत्तर देलखिन- ‘‘एक तँ नोकरी करै छी तहिपर डाॅक्टरी एहन पेशा छी जे भरि मन कहियो अरामो नहि कऽ पबैत छी। घुमनाइ-फीरिनाइक कोन बात। मुदा तैयो कहुना ने कहुना समए निकालि ऐबो करितहुँ से बुझले नहि छल।’’ “आइ कोना भाँज लागल? ’’ ‘‘चारिम दिन रामेश्वरम् गेल रही, ओहिठाम एकटा पुजेगरी अपनेक संबंधमे कहलनि।’’ महेन्द्रक बात सुनि ब्रह्मचारी जी मुस्कुराइत कहए लगलखिन- ‘‘मासमे एक बेर हमहूँ रामेश्वरम् जाइ छी। समाजरुपी समुद्रक कातमे स्थापित रामेश्वर लग जाए समुद्रमे उठैत लहरिकेँ धियानसँ देखबो करैत छी आ बिचारबो करैत छी। दुनू तरहक लहरि समुद्रमे उठैत अछि- नीको आ अधलो। नीक लहरि देखि मन प्रसन्न होइत अछि आ अधला देखि मन जरै लगैत अछि। मुदा तैयो सोचैत रहै छी जे अधला लहरि बेसी उग्र नहि हुअए। आ नीक लहरि सदिखन उठैत रहए।’’ ब्रह्मचारी जीक विचार जना महेन्द्रक सुतल बुद्धिकेँ जगा देलकनि। अनायास महेन्द्रकेँ बुझि पड़ै लगलनि जे अन्हारसँ इजोतमे आबि गेलहुँ, आकि इजोतेसँ अन्हारमे चलि गेलहुँ। विचित्र स्थितिमे महेन्द्र पड़ि गेलाह। जाहि रुपमे माए-बाप आ जुगेसरकेँ अखन धरि देखैत छलाह ओ अनायास बदलै लगलनि। बीचसँ उठि महेन्द्र गाछी दिशि टहलै बिदा भऽ गेलाह। ब्रह्मचारी जी बुझि गेलखिन। रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ पुछलखिन- ‘‘अपने मिथिला छोड़ि एहिठाम किएक आबि गेलहुँ ? जखनिकि ई इलाका दोसर धर्म, संस्कृति आ जातिक छी?’’ मुस्कुराइत ब्रह्मचारी जी कहै लगलखिन- ‘‘कोनो जाति पंथ आ संस्कृतिक आधार होइत छै जिनगी। जिनगीक आधार होइत छै मुनुक्खक बुद्धि, विचार आ कर्म। जखने मनुक्ख अपन सुपत कर्मसँ जिनगी ठाढ़ करैत अछि तखने धर्म, संस्कृति, विचार आ आचार सभ किछु बदलि, सही मनुक्खक निर्माण करैत अछि। जकरा हम महामानव धर्मात्मा आ उच्च कोटिक मनुष्य बुझैत छी, जे मिथिलांचलमे क्षीण भऽ रहल अछि। सोलहन्नी मरल नहि अछि मुदा दबाइत-दबाइत दुब्बर भऽ गेल अछि। मिथिलाक जे मूल बासी छथि हुनका अभिजात वर्ण वा कही तँ परजीवी वर्ण वा बाहरी लोक आबि सभ किछुकेँ बदलि, एहेन सामाजिक ढाँचामे ढालि देलकनि, जहि सँ अदौसँ अबैत संस्कृति दाबि अभिजात संस्कृतिकेँ बढ़ा देने अछि। जिनगीक सच्चाइकेँ दाबि बनौआ जिनगीमे बदलि देने अछि, जाहिसँ लोकक जिनगी वास्तविकतासँ हटि बौआ गेल अछि। ओना निर्मूल नष्ट नहि भेल अछि मुदा एतेक क्षीण जरुर भए गेल अछि जे नीक-अधलाहकेँ बेराएब कठिन भए गेल अछि। हम तँ सभ मनुष्यकेँ मनुष्य बुझैत छी। ने कियो कारी अछि आ ने कियो गोर। मुदा जिनगीक ढाँचा एहन बनि गेल अछि जे स्पष्ट रुपमे एक-दोसरसँ पैघ आ छोट बनि गेल अछि। ओना देखबै तँ बुझि पड़त जे सभ, एक दोसरसँ पैघ आ एक-दोसरसँ छोट अछि। मगर मकड़ा जेकाँ अपने पेटसँ सूत निकालि, जाल बुनि, ओहिमे सभ ओझरा गेल अछि।’’ ब्रह्मचारी जी आखि बन्न कए बजितहि रहथि आकि बिचहिमे रमाकान्त पूछि देलखिन- ‘‘अपने तँ प्रकाण्ड पंडित छी तखन मिथिलाकेँ किएक छोड़ि एहिठाम चलि एलहुँ ?’’ रमाकान्तक प्रश्न सुनि ब्रह्माचारीजी गंभीर होइत कहै लगलखिन- ‘‘अहाँक बात हम मानैत छी मुदा पढ़ल-लिखलसँ मुरुख धरिक विचार एहेन बनि गेल अछि जहिमे नीक विचारकेँ सन्हिआइये नहि देल जाइत अछि। कहलो गेल छैक जे ‘असकर वृहस्पतिओ फूसि।’ ततबे नहि जेकरा कल्याणक जरुरत अछि ओहो नीक रस्ता धरैक लेल तैयारे नहि अछि! ‘जकरा लेल चोरि करी सएह कहै चोरा।’ की करबैक? जँ सिर्फ वैचारिके स्तरपर संघर्ष होए तँ संघर्ष कएल जा सकैत अछि, मुदा ततबे नहि अछि ? जिनगीक क्रियामे उपद्रव जे करैत अछि से तँ करबे करैत अछि जे जानोसँ खेलबार करैमे नहि चुकैत अछि ! अभिजात वर्ग एते सशक्त बनि गेल अछि जे जहिना कोनो साँढ़-पारा पाँकमे चलैत काल फँसि जाइत अछि आ परोपट्टाक नढ़िया, कुकुड़क संग गीध, कौआ आबि-आबि जीबितेमे आखि फोड़ि-फोड़ि खाए लगैत अछि, तहिना इमानदार मनुखोक संग होइत अछि। मुदा हारि मानैले नै हम तैयार छी आ ने मानब? जहिना नव सुरजक संग नव दिन शुरु होइत, तहिना नव मनुक्ख नव जिनगी बनबैक दिशमे बढ़ैत अछि, तेँ संतोष अछि।’’ रमाकान्त- ‘‘अपनेक परिवारमे के सभ छथि?’’ ब्रह्मचारी- ‘‘पिता गिरहस्त छलाह। पनरह बीघा खेत छलनि। ओहि खेतकेँ माता-पिता दुनू परानी उपजबै छलाह, जाहिसँ परिवार नीक जेकाँ चलैत छलनि। ओना रौदी-दाही होइते छलैक मुदा तैयो सहि-मरि कऽ ओहिसँ गुजर करैत छलाह। हम दू भाइ छी। घरे लग नवानी विद्यालयमे हम पढ़लहुँ किछु दिन लोहना पाठशालामे सेहो पढ़लहुँ। हमर छोट भाइ बच्चेसँ पिताजीक संग खेती करैत छलाह। नहि पढ़लनि। माइयो आ बाबूओ मरि गेलाह। हम विआह नहि केलहुँ। भाइकेँ विआह करा सभ किछु छोड़ि अपने घरसँ निकलि गेलहुँ। मनमे छल जे मिथिलामे जे कुरीति, कुव्यवस्था आ कुचालिमे समाज फँसल अछि ओकरा सुधारि सुरीति, सुव्यवस्था आ सुचालि दिशि लए चली। ताहि पाछू लगि गेलहुँ। मुदा वेबस भऽ छोड़ि चलि एलहुँ। कारण एहिठामक नियामक आ नियामकक पाछु पढ़ल-लिखल-जे अपनाकेँ पंडित बुझै छथि- लोकसँ लऽ कऽ अभिजात लोकनि, सभ मनुक्खक साँचकेँ ओहन बना देने छथि, जहिसँ कुपात्र छोड़ि सुपात्रक निर्माणे ने होइत। जकरा चलैत छीना-झपटी, बलात्कार चोरि, छिनरपन, जातीय उन्माद, धार्मिक उन्माद वा ई कहियौ जे मनुक्ख बनैक जते रस्ता अछि सभ नष्ट भऽ गेल अछि। सबहक जड़िमे सम्पति घुरिकऽ काज कए रहल अछि। जहि पाछू पड़ि सभ बताह भऽ गेल अछि। सभसँ दुखद बात तँ ई अछि, जे नीक सँ नीक, पैघसँ पैघ आ विद्वानसँ विद्वान धरि, बजताह किछु आ करताह किछु। जहिसँ समाजक बीच सत्य बजनाइ मेटा गेल अछि। एहेन समाजमे नीक लोकक रहब कोना संभव हएत। तेँ छोड़ि कऽ पड़ा गेलहुँ। देहक सुखक पाछू सभ आन्हर भऽ गेल अछि।’’ ब्रह्मचारी जीक बात सुनि रमाकान्तकेँ धनक प्रति मोह भंग हुअए लगलनि। सोचै लगलाह जे हमरो दुइ सए बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि। जँ ओहि जमीनकेँ निर्भूमिक गरीबक बीच बाँटि दिऐक तँ कते परिवार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जिनगी जीबै लगत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि जे ढेरिऔने छथि। अदौसँ मिथिला तियागी महापुरुषक राज रहल, किएक ने हमहूँ ओहि परम्पराकेँ अपना, परम्पराकेँ पुनर्जीवित कए दिऐक। एते बात रमाकान्तकेँ मनमे अबितहि, ब्रह्मचारी जीकेँ पुछलखिन- ‘‘अपने एहि जिनगीसँ संतुष्ठ छी?’’ रमाकान्तक प्रश्न सुनि हँसैत ब्रह्मचारी जी उत्तर देलखिन- ‘‘हँ, बिल्कुल संतुष्ट छी। एहिसँ नीक जिनगी की भए सकैत छैक। दुनियाक जते भाषा अछि, ओहि भाषाक उद्भव, विकास आ साहित्यक सभ पोथी पुस्तकालयमे रखने छी। ततबे नहि, दुनियामे जते धार्मिक सम्प्रदाए अछि ओकरो पुस्तक रुपमे रखने छी आ अध्ययन करैत छी। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, संहिता, ज्योतिष, पुराण, रमाएणक संग बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रन्थ सेहो रखने छी। सभ दर्शनक पोथी सेहो अछि। शरीर निरोग रखैक दुआरे किछु समए शारीरिक श्रम करैत छी, बाकी समए अध्ययन, चिन्तन-मननमे रमल रहै छी। मासमे एक दिन सभ धार्मिक सम्प्रदायिक पंडित सभकेँ बजा, अपन-अपन सम्प्रदाएपर व्याख्यान करबैत छी। एक दिन राजनीतिक व्याख्यान, एक दिन साहित्यिक व्याख्यान मासमे करबैत छी। एहि सबहक अतिरिक्त एक दिन किसान गोष्ठी, एक दिन चिकित्सा गोष्ठी, एक दिन विज्ञान गोष्ठीक संग आइक वैश्वीकरणक, दुनियामे विज्ञानसँ नीक-अधलापर विचार-विमर्श करबैत छी। समए कोना बीति जाइत अछि से बुझबे ने करै छी।’’ ब्रह्मचारी जी बजितहि रहथि आकि महेन्द्र सेहो आबि गेला। उन्मत्त पागले जेकाँ महेन्द्रक चेहरा बुझि पड़ैत छलनि। रमाकान्तो बाहरी दुनियासँ निकलि भीतरी दुनियाँक बाट पकड़ि लेलनि। चारु गोटे ब्रह्मचारी जीक पएर छुबि गोर लागि चलैक विचार केलनि। चारु गोटेकेँ अरिआति ब्रह्मचारी जी गाड़ीमे बैसाए अपने घुरि गेलाह। गाड़ीमे कियो ककरोसँ गप-सप नहि करै चाहैत। सभ अपने-आपमे डूबि गेलाह। डेरा अबितहि रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ, आब हम एक्को दिन नहि अँटकब। गामक सुरता खीचि लेलकहेँ, तेँ जते जल्दी भए सकै बिदा कए दिअ?’’ “बड़बढ़िया।’’ आइये टिकट बनबा लइ छी। एहिठामसँ दरभंगाक गाड़ी साप्ताहिक अछि तेँ अपना धड़फड़ेने तँ नहि ने होएत। अगर टिकटो बनि जाइत तैयो पाँच दिन रहए पड़त।’’ आठ बजे रातिमे सभ कियो एकठाम बैसि अपन गामक संबंधमे गप-सप करै लगलाह। गाममे अप्पन बीतल दिनक चर्चा करैत महेन्द्र बजलाह- ‘‘की जिनगी छल आ अखन की अछि, एहि विषयपर अखन धरि विचारैक अवसरे नहि भेटल। जहिना आकासमे चिड़ै-चुनमुनी उन्मुक्त भए उड़ैत अछि तहिना बच्चामे छल। ने कोनो चिन्ता आ ने फीकिर। जहिना मध्यम गतिसँ गाड़ी-सवारी चलैत अछि, तहिना छल। ने कोनो प्रतियोगिता परीक्षाक लेल चिन्ता आ नोकरीक जिज्ञासा छल। साधारण गतिसँ आई.एस.सी. पास केलहुँ आ मेकिल कओलेजमे नाम लिखा डाॅक्टर बनलौं। डाॅक्टर बनलाक बाद नोकरी आ पाइक भूख जगै लगल। जाहिसँ अपन गाम, अपन इलाका छोड़ि हजारो कोस दूर आबि गेल छी। एहिठाम आबि बजारु समाज आ संस्कृतिमे फँसि अपन परिवार, समाज सभ छुटि गेल। जते पाइ कमा सुख-भोगक कल्पना करै छी, ओते काजक बोझ बढ़ल जाइत अछि। फेर सुख-भोगक लेल समए कहाँ बचैत अछि। समएक एत्ते अभाव रहैत अछि जे कताक दिन अखबारो नहि पढ़ि पबैत छी। अखन धरिक जे विचार जिनगीक संबंधमे छल, आइ बुझै छी जे भ्रमक छल। एते दिन अपने सुख टाकेँ सुख बुझैत छलहुँ मुदा आब बुझि पड़ैत अछि जे अपने सुख टा सुख नहि छी। हर मनुष्यकेँ जिनगी चलैक जे आवश्यक वस्तु अछि ओ पूर्ति हेबाक चाहिऐक तखने ओ चैनसँ जिनगी बिता सकैत अछि। मनुष्यसँ परिवार बनैत छैक आ परिवारसँ समाज। मनुष्योक कर्तव्य बनैत छैक जे सभसँ पहिने ओ अपना पएरपर ठाढ़ भए परिवारकेँ ठाढ़ करए। परिवार ठाढ़ भए जाएत तँ समाज स्वतः ठाढ़ भए आगू बढ़ै लगत। ओना सुख की थिक? सभसँ पहिने एहि बातक विचार कऽ लेबाक चाही। पंचभौतिक शरीर आ आत्माक संयोगसँ मनुष्य बनैत अछि। सुख-दुख, नीक-अधला आत्माक अनुभूति थिक, नहि कि शरीरक। ओना दुनियाँक जते मनुक्ख अछि सभकेँ एक स्तरसँ चलैक चाहिऐक, मुदा से तँ नहि अछि! दुनिया देशमे बँटल अछि आ देशक शासन व्यवस्था आ समाज खण्ड-पखण्ड भए भिन्न-भिन्न भाषा, भिन्न-भिन्न संस्कृति आ भिन्न-भिन्न जातिमे बँटल अछि, जाहिसँ खान-पान, रीति-रेबाज, चालि-ढालिमे भिन्नता छैक। कहैले तँ हमहूँ मनुक्खेक सेवा करैत छी, मुदा पाइक दुआरे हम पाइबलाक सेवा करैत छी। बिनु पाइबलाक सेवा कहाँ भए पबैत अछि, जकरा सभसँ बेसी जरुरत छैक। अभावमे ओ खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ घर-दुआर, कपड़ा-लत्ता, दवाइ-दारु, सभसँ बंचित रहि जाइत अछि। जेकर चलैत गरीब लोकक जिनगी जानवरोसँ बदतर बनि गेल छैक। ओ सभ मनुक्खक शक्लमे जानवर बनि जीबैत अछि। जहि मनुष्यक जरुरत ओकरा सभकेँ छैक ओ अपने पाछू तबाह अछि।’’ डाॅक्टर महेन्द्रक बात, सभ केयो धियानसँ सुनलनि। रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, जइ गाममे तोहर जन्म भेलह आ जहि माटि-पानिमे रहि डाॅक्टर बनलह, ओहि गामक लोक उचित इलाजक दुआरे मरि जाए, कते दुखक बात थिक?’’ रमाकान्तक प्रश्न सुनि सभ केयो गुम्म भए गेलाह। केयो किछु नहि बाजि पबैत रहथि। सभ सबहक मूह देखैत छलाह। हजारो कोसपर गाम अछि। कोना एहिठामसँ ओहिठाम इलाज भए सकैत छैक? सभक मनमे सवाल नचैत छलनि। बड़ी कालक बाद महेन्द्र मूह खोललनि- ‘‘बाबू, सवाल तँ एहन भारी अछि जे जबावे नहि फुरैत अछि। मुदा एकटा उपाए मनमे अबैत अछि।’’ “की?” ‘‘अहाँ गाम जाएब तँ दू गोटे एकटा लड़का, एकटा लड़की जे कम्मो पढ़ल लिखल हुअए, केँ एहिठाम पठा दिअ। ओहि दुनू गोटेकेँ ऐठाम राखि छह मास पढ़ा पठा देब। जे तत्काल इलाज करब शुरु कए देत। संगहि हम सभ चारि गोटे सालमे एक-एक मासक लेल जाइत रहब आ जहाँ धरि भए सकत तहाँ धरि इलाज करैत रहब। तहि बीच जँ कोनो जरुरी रोग उपकि जाए तँ फोनसँ कहि सेहो बजा लेब। नहि तँ लहेरियासराय अछिये।” महेन्द्रक विचार रमाकान्तकेँ जँचलनि। मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘बौआ, गामक लोक तँ गरीब अछि, ओ कोना इलाज करा सकत?’’ गरीबक नाम सुनि धाँए दऽ रबिन्द्र उत्तर देलकनि- ‘‘बाबू, हम सभ बहुत कमाइ छी। जते इलाजमे खर्च हेतैक से देबै। ततबे नहि! अखन अहाँ जाउ, पहिने दू गोरेकेँ पठा दिअ। अगिला मासमे आएब, एकटा स्वास्थ्य केन्द्र बनाएब। जहिमे सबहक इलाज हेतैक।’’ रविन्द्रक विचारसँ सभक ठोरपर हँसी अएलनि। रमाकान्तक मनमे उठलनि- ‘‘हमरे दू सए बीघा जमीन अछि, मुदा छी कैक गोटे? जँ इमनदारीसँ देखल जाए तँ की हमहीं चोर नहि। महाभारतो मे कहल गेल छैक जे, जे जरुरतसँ बेसी सम्पत्ति रखने अछि, ओ चोर अछि। जे पिता जी बरोवरि कहैत रहैत छलाह। ओना अनका जेकाँ हम बेइमानी कएकेँ खेत नहि अरजने छी मुदा ढेरिया कऽ तँ रखनहि छी। गप-सप करैत साढ़े दस बजि गेल। भानसो भए गेलैक। सभ केयो गप-सप छोड़ि खाइले गेलाह। दोसर दिनसँ चारु गोटे बिदाइक जोगारमे लगि गेलथि। कतेक गोटेसँ दोस्ती चारु गोटेकेँ, जकरा सभक काज उद्यममे इहो सभ नोत पुरने। तेँ सभकेँ जानकारी देब उचित बुझि चारु गोटे अपन-अपन अपेक्षितकेँ जानकारी देमए लगलखिन। अपनो सभ फुट-फुट माता-पिताक बिदाइमे जुटि गेल। एहि चारि दिनक बीच रमाकान्त टहलब-बुलब छोड़ि, दिन-राति आत्मनिष्ट भए, सोचमे डूबल रहै लगलाह। चाह पीबै बेरि चाह पीबि पान खा, भोजन बेरि भोजन कए, भरि दिन पलंगपर पड़ल-पड़ल जिनगीक संबंधमे सोचै लगलथि। अखन धरि एक्केटा दुनिया बुझै छेलिऐ जे आब दोसरो दुनिया देखै छिऐक। एक दुनिया बाहरी, जकरा उपरका आखिसँ देखैत छी, दोसर दुनिया शरीरक भीतर अछि, जहि दुनियाकेँ अखन धरि नहि देखैत छलहुँ। बाहरी दुनियासँ भीतरी दुनिया फुलवाड़ी जेकाँ सुन्दर अछि। जहिमे आशाक जंगल पसरल अछि। पाँच बजे साँझमे मद्रास स्टेशनसँ दरभंगाक गाड़ी खुजैत अछि। आरक्षित टिकट, मनमे बेसी हलचलो नहिये छलनि। गाड़ी पकड़ैक हलचल तँ ओहि यात्रीकेँ होएत जे साधारण बोगीमे टटका टिकट कटा सफर करैत अछि। मुदा आरक्षित बोगीमे तँ गनल सीट आ गनल टिकट होइत अछि। बाइली यात्रीकेँ तँ चढ़ै नहि देल जाइत अछि। दुइये बजेसँ सभ समान अटैची कार्टूनमे सैंति तैयार केलनि। रस्ताक लेल फुटसँ एकटा झोरामे खाइक सभ सामान सेहो दए देलकनि। दस लिटरा गैलनमे पानि। थर्मसमे चाह। पनबट्टीमे पान। एक कार्टून विदेश शराब जे डाॅक्टर सुजाता रमाकान्तकेँ आखिक इशारासँ कहि देने रहनि। चारि बजे, परोठा-भुजिया खाए रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर तीनू गोटे नव वस्त्र पहीरि तैयार भए गेलाह। स्टेशनो लगे, तेँ बिदा हेबाक हड़बड़ियो नहिये। मुदा सामान बेसी तेँ गाड़ी खुजैसँ पहिनहि स्टेशन पहुँचब जरुरी छनि। ओना गाड़ी मद्रासेसँ बनि कऽ चलैत तेँ सामानो रखैमे परेशनियो नहिये रहनि। सबा चारि बजे सभ डेरासँ बिदा भए गाड़ी पकड़ै चललाह। ६ छुट्टी दिन रहितहुँ हीरानन्द गाम नहि गेलाह। ओना लगमे गाम रहने शनिकेँ गाम आ सोमकेँ स्कूल खुजबासँ पहिने चलि अबैत छलाह। मुदा रमाकान्त नहि रहने, परिवारक सभ भार देने गेल रहथिन। गोसाइक धाही दैते ओ नहा, चाह पीबि बौएलाल ऐठाम चललाह। मने-मन यैह होनि जे रमाकान्त कहने रहथि जे मद्रास जाइ छी, धिया-पूताकेँ देखि-सुनि लगले घुमि जाएब। मुदा आइ पनरहम दिन भऽ रहल छनि अखन धरि किएक ने अएलाह। ओना दुरसो छैक आ परिवारोक सभ तँ ओतै छनि ते जँ बिलंबो भेलनि तँ स्वभाविके छैक। रस्तामे जे धिया-पूता देखनि हाथ जोड़ि-जोड़ि प्रणाम करनि। हीरोनन्द सभकेँ असिरवाद दैत आगू बढै़त जाइत रहथि। बौएलालक घरसँ थोड़े पाछुए रहथि आकि बौएलाल देखलकनि। देखितहि आगू बढ़ि, प्रणाम कऽ, संगे-संग अपना ऐठाम लऽ गेलनि। हीरानन्दकेँ पाबि बौएलाल बहुत किछु सिखबो केलक आ सुधरबो कएल। अपन एकचारी बैसारमे बैसबैत पानि अनै आंगन गेल। आंगनसँ लोटामे पानि नेने आबि पएर धोए लेल कहलकनि। लोटामे पानि देखि हीरानन्दक मनमे मिथिलाक वेबहार नाचि उठलनि। सोचै लगलथि जे पूर्वज कते विचारवान छलाह जे एते चलौलनि। पएर धोए हीरानन्द चौकीपर बैसलाह। बौएलाल चाह बनबै आंगन गेल। माएकेँ चाह बनबै नहि होइत छलैक। तहि बीच अनुपो बाड़ियेमे खुरपी छोड़ि, मटिआयले हाथे आबि मास्टर साहबकेँ प्रणाम कए चौकीक निच्चामे एकचारीक खुँटा लगा बैसल। मटिआएल हाथ देखि मास्टर साहेब पुछलखिन- ‘‘कोन काज करै छलौं ?’’ मटिआएल हाथ रहितहुँ अनुपकेँ संकोच नहि होइत छलैक। निःसंकोच भऽ उत्तर देलकनि- ‘‘बाड़ीमे गेनहारी साग बाउग केने छी, ओइमे तते मोथा जनमि गेल अछि जे सागकेँ झाँपि देने अछि, ओकरे कमठौन करै छलौं।’’ सागक कमठौन सुनि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘चलू, जाबे बौएलाल अबै अए, ताबे कनी हमहूँ देखि ली।’’ कहि उठि बिदा भेला। मास्टर सहैबकेँ ठाढ़ होइत देखि अनुपो ठाढ़ भऽ आगू-आगू बिदा भेल। धुर दुइऐकमे साग बाओग छलैक। साग देखि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘जिनगीमे आइये हम एहन गेनहारी देखलौं। ई तँ अद्भुत अछि। किएक तँ एक रंग पत्ताबला गेनहारी तँ अपनो उपजबै छी, मुदा ई तँ फूल जेकाँ लगै अए। अधा पात लाल आ अधा पात हरियर छैक। कत्तेसँ ई बीआ अनलौं ?’’ मास्टर साहेबक जिज्ञासा देखि अनुप कहै लगलनि- ‘‘हम सढ़ूआड़य नोत पुरै गेल रही। ओतए देखलिऐ। देखि कऽ मन हलसि गेल। ओतैसँ अनलौं। करीब दस बर्खसँ सब साल करै छी। खाइत-खाइत जखन डाँट जुआ जाइ छै, तखन छोड़ि दैत छिऐ। ओहिमे तत्ते बीआ भऽ जाइ अए जे अपनो बाउग करै छी आ जे मंगलक तेकरो दै छिऐ।’’ “अइ बेर हमरो थोड़े देब।’’ “बड़बढ़िया।’’ दुनू गोटे घुरि कऽ आबि पुनः एकचारीमे बैसलाह। तहि बीच बौएलालो चाह बनौने आएल। दुनू गोटेकेँ चाह दए आंगन जा, अपनो लेलक आ माइयोकेँ देलक। चाह पीबि, माए –रधिया- घोघ तनने दुआरपर आबि मास्टर सहेबकेँ गोर लगलकनि। सूखल शरीर, केश पाकल, आखि धसल रधियाक। रधियाक देह देखि मास्टर सहेबक मन तरे तर बाजि उठलनि- ‘‘हाए, हाए रे गरीबी, आगियोसँ तेज धधड़ा गरीबीक होइत छैक। पैंतीस-चालिस बर्खक शरीरक ई दशा बना दैत छैक। मुस्की दैत एकटा आँखि उघारि रधिया बाजलि- ‘‘आइ हमर भाग जगि गेल जे मास्टर-सहाएब ऐलाह। बिनु खेने-पीने नइ जाए देबनि। जे कन-सागक उपाए अछि से बिनु खुऔने नइ जाए देबनि।’’ रधियाक स्नेह भरल शब्द सुनि हीरानन्दक आखि सिमसि गेलनि। दुनू तरहथीसँ दुनू आखि पोछैत बजलाह- ‘‘ओना तँ घुमैक विचारसँ आएल छलहुँ, मुदा अहाँ सभक स्नेह बिना खेने जाइ नहि दिअए चाहैत अछि। जरुर खाएब।’’ घरमे सुपारी नहि रहने बौएलाल सुपारी आनै दोकान गेल। तहि बीच मास्टर साहेब अनुपके पुछलखिन- ‘‘अहाँक पुरखा कते दिनसँ एहि गाममे रहैत आएल छथि?’’ हीरानन्दक प्रश्न सुनि अनुप छगुन्तामे पड़ि गेल। मने-मन सोचै लगल जे एहन बात तँ आइ घरि क्यो ने पूछने छलाह। मास्टर साहेब किएक पुछलनि। मुदा मास्टर-साहेबक उपकार अनुपक हृदयमे एहि रुपे बैसल छलनि जे आत्माक दोसर रुप बुझैत छला। हुनके पाबि बेटा दू आखर पढ़बो केलक आ मनुक्खोक रस्ता सिखै अए। हँसैत अनुप कहै लगलनि- ‘‘मास्टर सहाएब, हमरा बाउकेँ अपना घरारियो ने रहै। अनके जमीनमे घरो बन्हने रहै आ अनके हरो-फाड़ जोतए। अनके खेतमे रोपनि-कमठौन सेहो करै। हम धानोक सीस आ रब्बी मासमे खेसारियो-मौसरी लोढ़ी। अनके गाइयो पोसिया नेने रहै। सालमे जते पाबनि-तिहार होए आ अनदिनो जे करजा बरजा लिअए ओ ओही गाइएक दूधो बेचि कऽ आ लेरु जे होए, ओहो बेचि कऽ करजा सठाबै। एक दिन बाउक मन खराप रहै। गिरहत आबि कऽ भार बेटी ऐठाम दए अबै ले कहलकै। बाउक मन बेसी खराब रहै तेँ जाइसँ नासकार गेल। तइपर ओ बेटाकेँ सोर पड़लकै। बेटा एलै। दुनू बापुत हमरा बाउकेँ गरिऐबो केलकै आ अंगनाक टाट-फड़क उजाड़ि कऽ कहलकै जे हमर घरारी छोड़ि दे। हमर बाउ कतेक गोरेकेँ कहबो केलकै मुदा सभ ओकरे दिस भऽ गेलै। तखन हमर बाउ की करैत, तेँ माटिक तौला-कराही छोड़ि, थारी-लोटा, नुआ-बिस्तर, हाँसु-खुरपीक मोटरी बान्हि बाउ, माए आ हम तीनू गोरे ओइ गामसँ भागि गेलौं। गामसँ निकलि, बाधमे एकटा आमक गाछ रस्ते पर रहै, ओइठिन आबि कऽ बैसलौं। बाउकेँ बुकौर लगै। दुनू आखिसँ दहो-बहो लोर खसै। माइयो कानए। थोड़े खान ओइठिन बैसलौं। तखन फेर बिदा भेलौं।’’ बजैत-बजैत अनुपक दुनू आखिमे नोर आबि गेलै। अनुपक नोर देखि हीरोनन्दक आखिमे नोर आबि गेलनि। रुमालसँ नोर पोछि पुनः पुछलखिन- ‘‘तब की भेल?’’ अनुपक हाथ मटिआएल रहै तेँ हाथसँ नोर नहि पोछि गट्टासँ नोर पोछि पुनः बाजै लगल- ‘‘ई मात्रिक छी। नाना जीबिते रहए। हुनका एक्केटा बेटी रहनि। हमरे माए टा। जखन तीनू गोरे ऐठाम एलौं तँ ननो आ नानियो अंगनेमे रहए। नानी आ माए दुनू, बाँहिसँ दुनू गरदनिमे जोड़ि कानै लगल। बाउओ कनै लगल। नाना हमरा कोरामे उठा नोर पोछैत अंगनासँ निकलि, डेढ़ियापर बुलबै लगल। थोड़े खान नानी कानि, मोटरीकेँ घरमे राखि हाँइ-हाँइ चुल्हि पजारै लागलि। मुदा माए कनिते रहल।’’ बिचहि मे हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘नाना गुजर कोना करैत छलाह?’’ “अहाँसँ लाथ कोन मासटर सैब। महिनामे आठ-दस साँझ भानसो ने होए। हम बच्चा रही तेँ नानी बाटीमे बसिया भात-रोटी राखि दिअए। सैह खाए छलौं।’’ अनुपक बात सुनि हीरानन्दक हृदय पघिलए लगलनि। अनुपकेँ कहलखिन- ‘‘जाऊ, काजो देखिऔ। बौएलाल तँ आबिये गेल।’’ मास्टर साहेबक आदेशसँ अनुप फेरो साग कमाइ ले चलि गेल। बौएलाल आ हीरानन्द रमाकान्तक चर्चा करै लगलाह। बौएलाल बाजल- ‘‘करीब पनरह दिनक धक लगि गेल हएत, अखन धरि बाबा किएक नहि अएलाह। बाजि कऽ गेल रहथि जे आठ दिनक भीतरे चलि आएब। किछु भऽ नै तँ गेलनि।’’ हीरानन्द- ‘‘अखन धरि कोनो खबरियो नहि पठौलनि, जे बुझितिऐ।’’ दुनू गोटे उठि कऽ बाड़ी दिशि टहलै बिदा भेला। अनरनेबाक गाछ देखि हीरानन्द हिया-हिया कऽ देखै लगलाह। पहिल खेपक फड़, तेँ नमहर-नमहर रहैक। गोर-दसेक फड़ नमहर आ जेना-जेना फड़ उपर होइत जाइत तेना-तेना छोटो खिच्चो। पान-सातटा फड़ छिटकल। जहिमे एकटा कऽ लाली पकड़ि नेने रहए। हीरानन्द बौएलालकेँ ओंगरीसँ देखबैत बजलाह- ‘‘बौएलाल, ओ फड़ तोड़ि लाए। खूब तँ पाकल नहि अछि मुदा खाइ जोकर भऽ गेल आछि। हम सभ तँ दँतगर छी की ने।’’ गाछ बेसी नमहर नहि। हाथेसँ बौएलाल ओहि फड़केँ तोड़ि, डंटीसँ बहैत दूधकेँ माटिपर रगड़ि देलक। दुनू गोटे घुरि कऽ आबि गेलाह। हीरानन्द चौकीपर बैसलथि आ बौएलाल अनरनेबा रखि आंगन गेल। आंगनसँ कत्ता आ एकटा छिपली नेने आएल। कत्तासँ अनरनेबाकेँ सोहि टुकड़ी-टुकड़ी कटलक। छिपली भरि गेल। भरलो छिपली बौएलाल हीरानन्दक आगूमे देलकनि। भरल छिपली देखि हीरानन्द बजलाह- ‘‘एत्ते हमरे बुते खाएल हएत। पान-सातटा खंडी खाएब। बाकी आंगन लऽ जाह।’’ बौएलाल सैह केलक। अनरनेबा खा पानि पीबि हीराननद बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘चलू, थोड़े टहलि आबी?’’ दुनू गोटे रस्ते-रस्ते टहलै लगलथि। जाधरि दुनू गोटे टहलि-बूलिकेँ अएलाह ताधरि रधिया अरबा चाउरक भात, माछक तीमन आ माछक तरुआ बनौलनि। भानस कए रधिया चिक्कनि माटिसँ ओसार नीपि, हाथ धोए कम्मल चौपेत कऽ बिछौलक। थारी-बाटी, लोटा आ गिलासकेँ छाउरसँ माँजि धोलक। लोटा-गिलासमे पानि भरि कम्मलक आगूमे रखि बौएलालकेँ बजौने आबैले कहलक। आंगन आबि हीरानन्द कम्मलपर बैसि मने-मन सोचै लगलाह। भोजनसँ तँ पेट भरैत अछि मुदा मन तँ सिनेहेसँ भरैत अछि, जे भेटि रहल अछि। तहि बीच बौएलाल घरसँ थारी निकालि आगूमे देलकनि। गम-गम करैत भात तहिपर माछक नमहर-नमहर तरल कुटिया। जम्बीरी नेबोक खंड। बाटीमे तीमन। भोजन देखि, मुस्की दैत हीरानन्द रधियाकेँ कहलखिन- ‘‘अलबत्त ढंगसँ भोजनक व्यवस्था केने छी। देखिये कऽ पेट भरि गेल।’’ मास्टर साहेबक बात सुनि खुशीसँ रधियाकेँ नहि रहल गेलै, बाजलि- ‘‘माहटर बाबू, अहाँ पैघ छी। देबता छी। हमर भाग जे हमरा सन गरीब लोकक ऐठाम भात खाइ छी।’’ रधियाक बात सुनि ओ बुझि गेलखिन जे ओ भातकेँ कऽ अशुद्ध बुझि कहलनि। मुदा ओहि विचारकेँ झपैत कहलखिन- ‘‘बौएलाककेँ छोट भाइ बुझै छिऐ आ परिवारकेँ अपन परिवार बुझैत छी। तखन भात रोटी खाइमे कोन संकोच।’’ हीरानन्दक विचार सुनि रधियाक हृदय साओनक मेघ जेकाँ उमड़ि पड़लनि। मनमे हुअए लगलनि जे अपन जिनगीक सभ बात कहि सुनबिअनि। उत्साहित भऽ बजै लगलीह- ‘‘माहटर बाबू, एहनो दुख कटने छी जे एक दिन ममिओत भाए आएल रहै। घरमे एक्को तम्मा चाउर नइ रहै। चिन्ता भऽ गेल जे भाइकेँ खाइले की देबैक। तीन-चारि अंगना चाउर पैंचले गेबो केलौं मुदा सबहक हालति खराबे रहै। अपने ने रहै तँ हमरा की दैत। हारि कऽ मड़ुआ रोटी आ सीम-भाँटाक तीमन रान्हि कऽ भाइयोकेँ खाइ ले देलिऐ आ अपनो सब खेलौं। मुदा अखन तँ रमाकान्त कक्का परसादे सब कुछ अछि।’’ थारीमे बाटीसँ झोर ढारैत हीरानन्द पुछलक- ‘‘पहिलुका आ अखुनकामे कते फर्क बुझि पड़ै अए?’’ “माहटर बाबू, अहाँसँ लाथ कोन ! ओइ हिसाबे अखन राजा भऽ गेलौं। पहिने कल्लर छलौं। हरदम पेटेक चिन्ता धेने रहै छल।’’ मूहक भात आ माछ चिबबैत रहथि आकि दाँतक गहमे एकटा काँट गड़ि गेलनि। भात घोंटि आंगुरसँ काँट निकालि थारीक बगलमे रखि हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘पहिने जत्ते खटै छलौं तइसँ अखन बेसी खटै छी आकि कम ?’’ “पहिने बेसी खटै छलौं। बोइन कऽ के आबी तखन अंगनाक काजमे लगि जाए। अंगनाक काज सम्हारि भानस करी। भानस करैत-करैत बेर झुकि जाए। तखन खाइ।’’ ओसारपर बैसल अनुप रधियाकेँ चोहटैत बाजल- ‘‘मास्टर सहाएबकेँ भोजन करै देबहुन आकि नहि?’’ अनुपक बात सुनि हीरानन्द बजलाह- ‘‘अहाँ तमसाइ किएक छिअनि। भोजनो करै छी आ गप्पो सुनै छी। जे बात काकी कहै छथि ओ बड्ड नीक लगै अए।’’ मास्टर साहेबक समर्थन पाबि रधियाक मनमे आरो उत्साह जगि गेलैक। होइ जे जते बात पेटमे अछि, सभ बात मास्टर साहेबकेँ सुना दिअनि। बाजलि- ‘‘माहटर बाबू बरखमे अधासँ बेसी दिन सागेक तीमन खाइ छलौं। माघ-फागुनमे, जखन खेसारी-मसुरी उखड़ै आ बोइन जे हुअए, दस-पाँच दिन दालि खाइ। नइ तँ बाड़ी-झाड़ीमे जे तीमन-तरकारी हुअए, से खाइ। बेसी काल सागे खाइ। खेसारी मासमे महीना दिन दुनू साँझ चाहे खेसारी साग खाइ नइ तँ बथुआ।’’ खेसारी सागक नाम सुनि हीरानन्द पुछलक- ‘‘खेसारी साग कोना बनबैत छी?’’ मास्टर साहेबक प्रश्न सुनि अनुपोकेँ पछिला बात मन पड़ितहि खुशी एलैक। मुस्की दैत बाजल- ‘‘राड़िन बुते कतौ खेसारी साग रान्हल हुअए।’’ अनुपक बातकेँ धोपैत हीरानन्द बजलाह- ‘‘खेसारी सागमे कँचका मिरचाइ आ लसुनक फोरन दऽ हमरो कनियाँ बनबैत छथि। हमरा बड़ सुन्दर खाएमे लगै अए।’’ व्यंग्यक टोनमे अनुप बाजल- ‘‘अहाँ सबहक कनियाँक पड़तर राड़िनकेँ हेतै। हमही छी जे एहेन लोकक गुजर चलै छै। नइ तँ......?’’ व्यंग्यक भाव बुझि हीरानन्द चुप्पे रहलाह। मुदा फनकि कऽ रधिया एक लाड़नि चलबैत बाजलि- ‘‘नै तँ सासुरमे बास नइ होइतै?’’ अनुप- ‘‘मन पाड़ू जे जइ दिन अइठिम आएल रहए तइ दिन कोन-कोन लुरि रहए। जँ सासु नहि सिखबैत तँ कोनो लुरियो होइत?’’ पासा बदलैत रधिया बाजलि- ‘‘माए आ सासुमे की अन्तर होइ छै। जहिना अपन माए तहिना घरबलाक माए। सिखलौं तँ।’’ रधिया अनुप दिशि तकैत, अनुप रधिया दिस। मुदा दुनूक मनमे क्रोध नहि स्नेह रहैक। तेँ वातावरण मधुर रहैक। हीरानन्द सागक संबंधमे कहै लगलखिन- ‘‘अपना सबहक पूर्वज बहुत गरीब छलाह। अखुनका जेकाँ समयो नहि छल। बेसी काल ओ सभ सागे खाइत छलाह।’’ जेहने भोजन बनल, तेहने पवित्र बरतन छलनि। आ ताहूसँ नीक बैइसैक जगहक संग ऐतिहासिक गप-सप। जते वस्तु हीरानन्दक आगूमे आएल छलनि रसे-रसे सभ खा लेलनि। पानि नहि पीलनि, किएक तँ ने गारा लगलनि आ ने बेसी कड़ू रहैक। भोजन कए बाटियेमे हाथ धोए उठलाह। उठि कऽ बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘एते कसि कऽ आइ धरि भोजन नहि केने छलहुँ।’’ आंगनसँ निकलि एकचारीमे आबि सोझे पड़ि रहलाह। पड़ले-पड़ल अनुपो आ बौएलालोकेँ कहलखिन- ‘‘आब अहूँ सभ भोजन करै जाउ। हमरा सुतैक मन होइ अए।’’ हीरानन्द अस-बिस करैत रहथि। लगले-लगले करौट बदलैत रहथि। मने-मन सोचै लगलाह जे एतबे दिनमे अनुप कते उन्नति कए गेल। उन्नतिक कारण भेलै सही ढंगसँ परिवारकेँ बढ़ाएब। जे परिवार जते सही दिशामे चलत ओ परिवार ओते तेजीसँ आगू बढ़त। मुदा जिनगीक रस्ता तँ बाँस जेकाँ सोझ नहि अछि। टेढ़-टूढ़ अछि, जहिसँ बौआ जाइत अछि। जिनगीक रस्तामे डेग-डेगपर तिनबट्टी-चौबट्टी अछि। जहिसँ लोक भटकि जाइत अछि। तहूमे जकरा रस्ताक आदि-अंतक ठेकान नहि छैक ओ तँ आरो ओझरा जाइत अछि। एहन-एहन ओझरी सभ जिनगीक रस्तामे अछि जहिमे ओझरेलापर कियो बताह भए जाइत अछि तँ कियो घर-दुआरि छोड़ि चलि जाइत अछि। क्षणिक सुखक खातिर स्थायी सुखक रस्ता छुटि जाइत छैक। क्षुद्र सुख पैघ सुखक रस्तासँ धकेलि एहन पहाड़ जेकाँ ठाढ़ भए जाइत छैक जे पार करब मुश्किल भए जाइत छैक। जिनगीक रस्ता एक नहि अनेक अछि मुदा पहुँचैक स्थान एक अछि। जते मनुख तते रस्ता अछि। एक मनुक्खक जिनगी दोसरसँ भिन्न होइत अछि। अनभुआरो आ बुझिनिहारो, अज्ञानियो आ ज्ञानियो लगले जिनगीक शुरुहेमे, नहि बुझि पबैत छथि जे कोन रस्ता पकड़लासँ सही जगहपर पहुँचब आ नहि पकड़ने छुटि जाएब। मनुक्खक उद्धारक बात तँ सभ सम्प्रदाइ, किस्सा-पिहानी सभ कहैत अछि, मुदा रस्तामे घुच्ची कते छैक जहिठाम जा लोक खसैत अछि, से बुझिये ने अबैत छैक! मुदा इहो तँ सत्य छैक जे निस्सकलंक जिनगी बना ढेरो लोक ओहि स्थानपर पहुँचि चुकल छथि आ ढेरो जा रहल छथि, जे जरुर पहुँचताह। भलेही हुनका भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र नहि भेटैत होनि। सुखल गाछ रुपी समाजकेँ जाधरि गंगाजल सन पवित्र पानिसँ नहि पटाओल जाएत ताधरि ओहिमे कोना कलश आ फूल फुलाएत ? अगर जँ समए पाबि कलशवो करत तँ किछुए दिनमे मौला जाएत। दुखो थोड़ दिनक नहि, जड़िआएल रहैत अछि। अनेको महान् व्यक्ति एहि दिशाकेँ देखबैक रस्ता अदम्य साहस आ शक्ति लगा केलनि, मुदा जड़िसँ दुख कहाँ मेटाएल? हमहूँ-अहाँ एहि मातृभूमिक सन्तान छी, तेँ हमरो अहाँक दायित्व बनैत अछि जे माएक सेबा करी। छठिआरे राति समाजक माए-बहीन कोरामे लए छाती लगौलनि, मुदा ओकरा बिसरि कोना जाइ छी? की सभ बिराने छथि? अपन क्यो नहि?’’ बेर खसैत हीरानन्द चलैक विचार करै लगलाह। बौएलाल चाह पीबैक आग्रह केलकनि। मुदा भरिआएल पेट बुझि हीरानन्द चाहक इनकार करैत कहलखिन- ‘‘खाइ बेरिमे पानि नहि पीने छलहुँ, एक लोटा पानि पिआबह।’’ आंगनसँ लोटामे पानि आनि बौएलाल देलकनि। लोटो भरि पानि पीबि हीरानन्द बाजलाह- ‘‘बुझि पड़ै अए जे अखने खा कऽ उठलौंहेँ। चाह नहि पीबह, सिर्फ एक जूम तमाकू खुआ दाए।’’ अनुप तमाकुल चुनबै लगल। तहि बीच हीरानन्द बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘तू तँ आब धुरझार किताब पढ़ै लगलह। आब तोहूँ पड़ोसिक बच्चा सभकेँ, जखन समए खाली भेटह, पढ़ाबह। एहिसँ ई हेतह जे कखनो बेकारी सेहो नहि बुझि पड़तह आ थोड़-थाड़ बच्चो सभ पढ़ै दिस झुकत।’’ पढ़बैक नाम सुनि अनुप बाजल- ‘‘मासटर सहाएब, ककरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ाओत !” ओंगरीसँ देखबैत बाजल- “देखै छिऐ, ओ तीन घर कुरमी छी। ओकरासँ खनदानी दुश्मनी अछि। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने हकार-तिहार।” फेर ओंगरी सँ देखबैत बाजल- “तहिना ओ घर मल्लाहक छी, भरि दिन जाल लऽ कऽ चर-चाँचरसँ लऽ कऽ पोखरि-झाखड़िमे मछबारि करै अए। जकरा बेचि कऽ गुजरो करै अए आ ताड़ी-दारु पीबिकेँ औत आ झगड़ा-झाटी शुरु कए देत।” ओंगरीसँ देखबैत-“तहिना ओ कुजरटोली छी। अछि तँ सभटा गरीबे, मुदा व्यवसायी अछि। स्त्रीगण सभ तरकारी बेचै छै आ पुरुख सभ पुरना लोहा-लक्करक कारोबार करै अए। जातिक नामपर सदिखन अराड़िये करैत रहै अए। तहिना हम दस घर धानुक छी। हमहीं टा गरीब रही, बोनि करै छलौं। आब तँ अपनो रमाकान्त देल दू बीघा खेत भऽ गेल, तेँ खेती करै लगलहुँ, नहि तँ सभ खबासी करै अए। जुआन-जहान बेटी सभकेँ माथपर चंगेरा दए आन-आन गाम पठबै अए। तेँ ओकरा सबहक एकटा पाटी छै आ हम असकरे छी। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने कोनो लेन-देन। आब अहीं कहू जे ककरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ाओत?’’ अनुपक बात सुनि हीरानन्द गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन सोचै लगलथि जे समाजक विचित्र स्थिति छैक। एहेन समाजमे घुसब महा-मोसकिल अछि। कने काल गुम्म रहि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा ई सभ बीमारी पहिलुका समाजमे बेसी छलैक। ओना अखनो थोड़-थाड़ छैहे, मुदा बदलि रहल छैक। आब लोक गाम छोड़ि शहर-बजार जा-जा कल-कारखानामे काज करै लगल अछि। संगे गाममे चाह-पानक दोकान खोलि-खोलि जिनगी बदलि रहल अछि। खेती-बाड़ी तँ मरले अछि तेँ एहिमे ने काज छैक आ ने लोक करै चाहैत अछि। करबो कोना करत ? गोटे साल रौदी तँ गोटे साल बाढ़ि आबि सभटा नष्ट कए दैत अछि। जहिना गरीब लोक मर-मर करैत अछि, तहिना खेतोबला सभ। खेतोबला सभकेँ देखते छिऐक बेटीक विआह, बीमारी आ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ बिना खेत बेचने नहि कए पबैत अछि। ओना सबहक जड़िमे मुरुखपना छैक, जे बिना पढ़ने-लिखने नहि मेटाएत। धिया-पूताकेँ पढ़बैक इच्छा सभकेँ छैक मुदा ओ मने भरि छैक। बेवहारमे एको पाइ नहि छैक। इहो बात छैक जे जकरा पेटमे अन्न नहि, देहपर वस्त्र नहि रहतै, ओ कोना पढ़त?’’ हीरानन्द आ अनुपक सभ गप, बाड़ीमे टाटक पुरना करची उजाड़ैत सुमित्रा सुनैत छलि। बारह-तेरह बरखक सुमित्रा। अनुपक घरक बगलेमे ओकरो घर। तमाकुल खा हीरानन्द बिदा भेलाह। हीरानन्दकेँ अरिआतने पाछू-पाछू बौएलालो बढ़ैत छल। थोड़े दूर आगू बढ़लापर हीरानन्दकेँ छोड़ि बौएलाल घुमि गेल। जाबे बौएलाल घुमि कऽ घरपर आएल ताबे सुमित्रो जरनाक कड़ची आंगनमे रखि बौएलाल लग आइलि। ओना परिवारक झगड़ासँ धिया-पूताकेँ कोन मतलब। धिया-पूताक दुनियाँ अलग होइत अछि। सुमित्रा बौएलालकेँ कहलक- ‘‘हमरा पढ़ा दे।’’ बौएलाल किछु कहैसँ पहिने मने-मन सोचै लगल जे हमर बाबू आ सुमित्राक बाबू राम परसादक बीच कते दिनसँ झगड़ा अछि, दुनूक बीच कताक दिन गरि-गरौबलि होइत देखै छी, तखन कोना पढ़ा देबइ। मुदा हीरानन्दक विचार मन रहै, तेँ गुनधुन करऽ लगल। कनी काल गुनधुन करैत सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘पहिने ई माएसँ पूछि आ।’’ सुमित्रा दौड़ि कऽ आंगन जा माएकेँ पुछलक- ‘‘माए, हम पढ़ब।’’ माए- ‘‘कतए पढ़मे?’’ ‘‘बौएलाल लग।’’ बौएलालक नाम सुनि माए मने-मन बिचारै लगली जे हमरासँ तँ कम्मो-सम्म, मुदा ओकरा (पति) सँ तँ बौएलालक बापकेँ झगड़ा छै। कने काल गुनधुन कए माए कहलकै- ‘‘जँ बौएलाल पढ़ा देतौ तँ पढ़।’’ खानदानी घरक बेटी सुमित्राक माए। आन-आन घरक बेटियो आ पुतोहुओ चंगेरा उघैत अछि, मुदा सुमित्राक माए कतौ नहि जाइत। अपने राम परसाद भार उघैत अछि। मुदा स्त्री नहि। जहिना कहियो अनुप आ रामपरसादक बीच भार उघैक सवालपर झगड़ा होइत, तँ सुमित्रा माएक विचार अनुप िदसि रहैत छल। मुदा मरदक झगड़ामे कोना विरोध करैत। तेँ चुपचाप आंगनमे बैसि मने-मन अपने पतिकेँ गरिअबैत छलि, जे कोन कुल-खनदानमे चलि एलौं। घुमि कऽ सुमित्रा आबि बौएलालकेँ कहलकै- ‘‘माइयो कहलक।’’ “ठीक छै। मुदा पढ़मे कखन कऽ। भरि दिन हमहूँ काजे उद्यममे लगल रहै छी आ साझू पहरकेँ अपने पढ़ैले जाइ छी।’’ दुनू गोटे गर लगबैत तए केलक जे काजक बेर सँ पहिने भोरमे पढ़ब। ७ तीन बजे भोरमे हीरानन्दक निन्न टुटलनि। निन्न टुटितहि बाहर निकललथि तँ झल-अन्हार देखि पुनः ओछाइनपर आबि गेलाह। अनुपक बात हीरानन्दक मनकेँ झकझोड़ैत छलनि। जे समाजमे एहि रुपे कटुता, विषमता पसरि गेल अछि जे घर-घर, जाति-जाति, टोल-टोलमे भैंसा-भैंसीक कनारि पकड़ि नेने अछि। एहना स्थितिमे कोना समाज आगू बढ़त? समाजकेँ आगू बढ़ैक लेल एक-दोसरक बीच आत्मीय प्रेम हेबाक चाहिऐक। से कोना होएत? एहि प्रश्नकेँ जते सोझरबै चाहै छलाह तते ओझराइत छल। विचित्र स्थितिमे पड़ल हीरानन्द। अपने मनमे प्रश्न उठा, तर्क-वितर्क करैत आ अंत होइत-होइत प्रश्न पुनः ओझरा कऽ रहि जाइत। विबेक काजे नहि करैत छलनि। तहि बीच भाग चिड़ैक चहचहेनाइ सुनलनि। चिड़ैक चहचहेनाइ सुनि फेर कोठरीसँ निकलि पूब दिस तकलनि। मेघ ललिआएल बुझि पड़लनि। घड़ीपर नजरि देलनि तँ पाँच बजैत छलैक। पुनः कोठरी आबि लोटा लए मैदान दिशि बिदा भेलाह। मुदा मनकेँ एहेन गछाड़ि कऽ सवाल पकड़ने रहनि जे चलैक सुधिये नहि रहलनि। जाइत-जाइत बहुत दूर चलि गेलाह। खुला मैदान देखि, लोटा राखि टहलबो करैत आ प्रश्नो सोझरबैक कोशिश करैत रहथि। मुदा तैयो निष्कर्षपर नहि पहुँचि सकलाह। पुनः घुरि कए घरपर आबि, दतमनि कए मूह हाथ धोए चाह बनबै लगलाह। ओना चाहक सभ समान चुल्हिएक उपर चक्कापर राखल रहैत अछि। मातर केतली पखारब, गिलास धोअब आ ठहुरी जारन डेढ़ियापर सँ आनै पड़लनि। सब कुछ सरिया हीरानन्द चाह बनबै बैसलाह, मुदा मन बौआइत छलनि। असथिरे नहि होइत छलनि। असकरे चाह पीनिहार, मुदा भरि केतली पानि दए चुल्हिपर चढ़ा देलनि। जखन चाह खौलए लगलनि तखन मनमे एलनि जे अनेेरे एते चाह किअए बनबै छी। फेर केतली चुल्हि परसँ उतारि दू गिलास दूध मिलाओल पानि कातमे राखल गिलासमे रखि, बाकी दूध मिलाओल पानि दू गिलास केतलीमे दए देलनि। मन बौआइते छलनि। आँच लगबैत गेला मुदा चाह पत्ती केतलीमे देबे नहि केलनि। आगिक तावपर दुनू गिलास पानि जरि गेलापर मन पड़लनि जे चाह पत्ती केतलीमे देबे ने केलिऐक। हाँइ-हाँइ कऽ डिब्बामे सँ हाथपर चाह पत्ती लए केतलीक झप्पा उठौलनि आकि नजरि केतलीक भीतर गेलनि तँ पानिये नहि छलैक। सभटा पानि जरि गेल छलैक। तरहत्थी परक चाह पत्ती डिब्बामे रखि पुनः केतलीमे पानि देलनि। चाह बनल। भिनसुरका समए दू गिलास पीलनि। एक तँ ओहिना मन समाजक समस्यामे ओझड़ाएल छलनि, तहि परसँ चाह आरो ओझरी लगा देलकनि। चाह पीबि दरबज्जापर बैसि बिचारै लगलाह। मुदा चाहक गर्मी पाबि मन आरो बेसी बौआइ लगलनि। जहिना ककरो कोनो वस्तु हरा जाइत छैक आ ओ खोजए लगैत अछि, तहिना हीरानन्द समाजक ओहि समस्याक समाघान खोजै लगलाह, जे समस्या समाजकेँ टुकडा़-टुकड़ा कए देने अछि। दोसर कियो नहि छलनि, जनिकासँ तर्क-वितर्क करितथि। असकरे ओझराएल रहथि। अपने मनमे सवालो उठनि जवाबो खोजथि। अध्ययनो बहुत अधिक नहिये छलनि। सिर्फ मैट्रिके पास छलाह। मुदा तैयो समस्याक समाधान तकितहि रहलाह, छोड़लनि नहि। जहिना पथिककेँ बिनु देखलो पथ हराइत-भोथिआइत भेटिये जाइत छैक तहिना हीरानन्दोकेँ भेटलनि। अनायास मनमे मिथिलाक चिन्तनधारा आ मिथिला समाजक बुनाबटिक ढाँचापर गेलनि। चिन्तनोधारा आ सामाजिक ढ़ाँचो दुनूपर नजरि पड़ितहि मनमे एकटा नव ज्योतिक उदय भेलनि। बिजलोका इजोत जेकाँ मनमे चमकलनि। बिछानसँ उठि ओसारेपर टहलै लगलथि। अनायास मूहसँ निकललनि- ‘‘वाह रे मिथिलाक चिन्तक! दुनियाँक गुरु। जे ज्ञान हजारो बर्ख पहिनहि मिथिलाक धरतीपर आबि गेल छल, ओएह ज्ञान उन्नैसम शताब्दीमे मार्क्स कठिन संधर्ष कए कऽ अनलनि, जहिसँ दुनियाँक चिन्तनधारा बदलल। मुदा मिथिलाक दुर्भाग्य भेलै जे समाजक नियामक धूर्तइ केलक। जे चिन्तक मनुष्यकेँ सभ मनुक्ख मनुक्ख छी, एक रुपमे देखलनि, ओहि रुपकेँ नियामक, शासनकर्ता टुकड़ी-टुकड़ी कए काटि देलनि। आइ जरुरत अछि ओहि सभ टुकड़ीकेँ जोड़ि कए एक रुप बनबैक। जे नान्हिटा समस्या नहि अछि। ततबे नहि! अखनो टुकड़ी बनौनिहारक कमी नहि अछि। जहनकि भेल टुकड़ीकेँ स्वयं ओ चेतना नहि छैक। जे टुकड़ी भेल कातमे पड़ल छी आ कौआ-कुकुड़ खाइत अछि। ई एहन विचार हीरानन्दकेँ उपकितहि मन असथिर भेलनि। मनमे नव स्फूर्ति, नव चेतना आ नव उत्साह जगलनि। नव ढंगसँ सभ वस्तुकेँ देखै लगलथि। तहि बीच शशिशेखर सेहो टहलि-बूलि कऽ अएलाह। हीरानन्दपर नजरि पड़ितहि शशिशेखरकेँ बुझि पड़लनि जे जना क्यो नहा कऽ पोखरिसँ उपर भेल होअए, तहिना। मुदा हीरानन्दक मन विचारमे डूबले रहलनि। मने-मन सोचैत जे जहिना पटुआ सोन, सनईक सोन वा रुइक रेश महीन होइत, मुदा कारीगर ओहि रेश केँ टेरुआ वा टौकरीक सहारासँ समेटि कऽ सूत वा सुतरी बना कपड़ा वा बोरा वा मोटगर रस्सा बनबैत अछि। तहिना समाजोक टुटल मनुक्खकेँ जोड़ि समाज बनबै पड़त। तखने नव समाजक निर्माण होएत। जे अद्दी-गुद्दी काज नहि कठिन काज छी। कठिन काजक लेल कठिन मेहनतक जरुरत पड़ैत अछि। सिर्फ कठिन मेहनते कएलासँ सभ कठिन काज नहि भए सकैत अछि। कठिन मेहनतक संग, सही समझ आ सही रस्ताक बोध सेहो जरुरी अछि। तेँ कठिन मेहनत, गंभीर चिन्तन आ आगू बढ़ैक, काज करैक अदम्य साहस सेहो सभमे हेबाक चाहिऐक। एहि कऽ संग मजबूत संकल्प सेहो होएब जरुरी अछि। विचारक संग-संग हीरानन्दक मनमे कठिन कार्यक संकल्प सेहो अपन जगह बनबै लगलनि। भिनसुरका समए, तेँ लाल सूर्यमे ठंढ़ापन सेहो देखए लगलथि। एक टकसँ सूर्य दिशि देखैत अपन विचारकेँ संकल्प लग लऽ जाए दुनूकेँ हाथ पकड़ि दोस्ती करौलनि। दुनूक बीच दोस्ती होइतहि मनक नव उत्साह शरीरमे तेजी अनै लगलनि। दरबज्जाक आगुऐ देने उत्तरे-दछिने रस्ता। हीरानन्द शशिशेखरकेँ कहलखिन- ‘‘चलू, कने बुलियो-टहलि लेब आ एकटा गप्पो कए लेब।’’ दुनू गोटे दरबज्जापर सँ उठि आगू बढ़लाह आकि उत्तरसँ दछिन मुहे तीनटा ढेरबा बच्चाकेँ जाइत देखलनि। तीनूक देह कारी खटखट। केश उड़िआइत। डोरीबला फाटल-कारी झामर पेन्ट तीनू पहिरने रहए। देहमे ककरो कोनो दोसर वस्त्र नहि। तीनूक हाथमे पुरना साड़ीक टुकड़ा कऽ चारु कोण बान्हल झोरा। तीनू गप-सप करैत उत्तरसँ दछिन मुहे जाइत रहए। तीनूकेँ एक टकसँ हीरानन्द देखि, तीनूक गप-सप सुनैक लेल कान पाथि देलनि। मुस्की दैत बेङबा बाजल- ‘‘रौतुका बसिया रोटी आ डोका तीमन तते ने खेलियौ जे चललो ने होइ अए। पेट ढब-ढ़ब करै अए।’’ दहिना हाथ बढ़बैत फेर बाजल- “हे सुंगही हमर हाथ केहेन गमकै छै। जना बुझि पड़तौ जे कटुक-मसल्ला लागल छै।’’ हाथ समेटि बाजल- “तूँ की खेलै गै रोगही?’’ सिरसिराएल रोगही बाजलि- ‘‘हमरा माए कहलक जे जो डोका बीछि कऽ ला गे। ताबे हमहूँ मड़ूआ उला- पीसि कऽ रोटी पका कऽ रखबौ। डोका चटनी-साना- आ रोटी खइहें।’’ रोगहीक बात सुनि बेङबा कबूतरीकेँ पुछलक- ‘‘तूँ गै कबूतरी?’’ “काल्हि जे माए डोका बेचै गेल रहै, ओम्हरेसँ मुरही किनने आएल। सैह खेलौं।’’ कबूतरीक बात सुनि बेङबा पनचैती केलक जे तोहर जतरा सभसँ नीक छौ। आइ तोरा सभसँ बेसी डोका हेतौ। सभसँ बेसी तोरा, तइसँ कम हमरा आ सभसँ कम रोगहीकेँ हेतै।’’ बेङबाक पनचैतीक विरोध करैत रोगही बाजलि- ‘‘बड़ तूँ पंडित बनै छें। तोरे कहने हमरा कम हैत आ तोरा सभकेँ बेसी। हमरा जेकाँ तोरा दुनू गोरेकेँ डोका बिछैक लूरि छौ ? घौदिआएल डोका कतऽ रहै छै से बुझै छीही?’’ मूह सकुचबैत बेङबा पुछलक- ‘‘कतऽ रहै छै से तूही कह?’’ “किअए कहबौ। तू खेलएँ से हमरा बाँटि देलैं।’’ बेङबा- ‘‘बाँटि दितियौ से हम अगरजानी जननिहार भगवान छी। तू कहलेहेँ अखनी आ बाँटि दैतियौ अंगनेमे।’’ बेङबाक बात सुनि रोगही निरुत्तर भऽ गेलि। हीरानन्द आ शशिशेखर तीनूक बात चुपचाप ठाढ़ भऽ सुनलनि। ताधरि तीनू गोटे हीरानन्दक लग पहुँचि गेल। हाथक इशारासँ तीनू गोटेकेँ हीरानन्द सोर पाड़ि पुछलखिन- ‘‘बौआ, तू सभ कतए जाइ छह?’’ हीरानन्दक प्रश्न सुनि बेङबा धाँए दए उत्तर देलकनि- ‘‘डोका बिछैले।’’ “डोका बीछि कऽ की करै छहक?’’ “अपनो सभ तुर खाइ छी आ माए बेचबो करै अए। बाउ कहने अछि जे डोका बेचि कऽ पाइ हेतौ, तइसँ अंगा-पेन्ट कीनि देबौ। घुरना विआहमे पीहीन कऽ बरिआती जइहें।’’ बेङबाक बात सुनि हीरानन्द रोगहीकेँ पुछलखिन- ‘‘बच्चा तूँ?’’ रोगही उत्तर दैत कहलकनि- ‘‘हमहूँ डोके बीछैले जाइ छी। माए कहलक जे डोकासँ जे पाइ हेतौ, तइसँ शिवरातिक मेलामे महकौआ तेल, महकौआ साबुन, केश बन्हैले फीता आ किलीप कीनि देबौ।’’ मुस्कुराइत हीरानन्द बातक समर्थनमे मूड़िओ डोलबैत आ मने-मन विचारबो करैत जे कत्ते आशासँ गरीबोक बच्चा जीबैत अछि। शशिशेखर दिशि देखि आखिक इशारासँ कहलखिन, जे एकरा सबहक बगए देखियौ आ आशा देखियौक। तेसर बचिया कबूतरीकेँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, तूँ?’’ हीरानन्दक आखिमे आखि गड़ा कबूतरी कहै लगलनि- ‘‘हमरा माए कहने अछि जे डोका पाइसँ सल्बार-फराक कीनि देबौ।’’ काजक समए नष्ट होइत देखि हीरानन्द तीनूकेँ कहलखिन- ‘‘जाइ जाह।’’ हीरानन्द आ शशिशेखर घुरि कऽ दरबज्जापर अएलाह। ओ तीनू बच्चा गप-सप करैत आगू बढ़ल। थोड़े आगू बढ़लापर कबूतरी बेङबाकेँ पुछलक- ‘‘बेङबा, तू विआह कहिया करमे?’’ विआह सुनि बेङबाक मनमे खुशी भेलैक। ओ हँसैत उत्तर देलक- ‘‘अखनी विआह नइ करबै। मामा गाम गेल रहियै तँ भैया कहलक- ‘‘जे कनी आउर बढ़मे तँ तोरा भेबन्डी –भिबन्डी- नेने जेबउ। ओतै नोकरी करबै। जखैन बहुत रुपैआ हेतै तब ईंटाक घरो बनेबै आ बिआहो करबै।’’ बिचहिमे रोगही कहलकै- ‘‘तोरा सनक ढहलेल बुते बौह सम्हारल हेतउ?’’ बौहुक नाम सुनि बेङबाक हृदय खुशीसँ गदगद भए गेलैक। हँसैत कहलक- ‘‘आँए गै रोगही, तूँ हमरा पुरुख नइ बुझैछेँ। हम तँ ओहन पुरुख छी जे एगो कऽ के कहै जे तीन गो बौहकेँ सम्हारि लेब।’’ कबुतरी- ‘‘खाइले बौहकेँ की देबही?’’ बेङबा- ‘‘भेबन्डीमे जब नोकरी करबै तब बुझै छीही जे कते कमेबै। दू हजार रुपैआ एक्के महीनामे हेतै।’’ हँसैत रोगही बिचहिमे टिपकल- ‘‘दू हजार रुपैआ गनलो हेतउ?’’ बेङबा बाजल- ‘‘बीस-बीस कऽ गनबै। रुपैआ हेतै तँ फुलपेन्ट सियेबै, खूब चिक्कन अंगा किनबै, घड़ी किनबै, रेडी किनबै, मोबाइल किनबै, डोरी बला जुत्ता किनबै । तब देखिअहै जे बेङबा केहेन लगै छै।’’ कबूतरी- ‘‘तोरा नोकरी के रखतौ?’’ बेङबा- ‘‘गामबला भैया नोकरी रखा देतै। उ कहलक जे जेही मालिक अइठीन हम रहै छिऐ तेही मालिक अइठीन तोरो रखा देबउ। बड़ धनीक मालिक छै। मारिते नोकर छै। हम जे मामा गाम गेल रहाइ तँ भइयो गाम आइल रहै। ओ कहै जे हम मालिकक कोठीमे रहै छिऐ। दरमाहा छोड़ि कऽ बाइलियो खूब कमाइ छै। मालिककेँ एकटा बेटी छै। उ बड़का इस्कूल-कओलेजमे पढ़ै छै। अपनेसँ हवागाड़ी चलबै छै। सभ दिन हमर भैया ओकरा इस्कूल संगे जाइ छै। उ पढ़ै छै आ हमर भैया गाड़ी ओगरै छै। जखनी छुट्टी भऽ जाइ छै तखनी दुनू गोरे संगे अबै छै। उ मलिकाइन हमरा भैयाकेँ मानबो खूम करै छै। संगे-संग सिलेमा देखैले जाइ छै। बजार घुमैले जाइ छै। बड़का दोकान-होटलमे दुनू गोरे खूम लड़ू खाइ अए। अन्ना तँ बड़का मालिक सभ नोकरकेँ दीयाबत्ती-दिवाली-मे चिक्कनका नुआ देइ छै, हमरो भैयाकेँ दै छै। छोटकी मलिकाइन अपने दिसनसँ निकहा-निकहा फुलपेन्ट, निकहा-निकहा अंगा कीनि-कीनि दै छै। रुपैयो खूम देइ छै।’’ तीनू गोटे बाध पहुँचि गेल। बाध पहुँचितहि तीनू गोटे तीन दिशि भए गेल। तीन दिस भए तीनू गोटे डोका बीछै लगल। उपरे सबमे डोका चराओर करैले निकलल रहए। डोका बीछि तीनू गोटे घुरि गेल। दरबज्जापर आबि हीरान्द शशिशेखरकेँ पूछल- ‘‘शशि, की सभ ओहि बच्चा सभमे देखलिऐक?’’ मूह बिजकबैत शशि उत्तर देलनि- ‘‘भाय, ओहि बच्चा सभकेँ देखि छुब्द छलहुँ। ओकरा सबहक बगए देखए छलिऐक आ मनक खुशी देखै छलिऐक। जना दुनियादारीसँ कोनो मतलब नहि। निर्विकार। अपने-आपमे मग्न छल।’’ हीरानन्द- ‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा एकटा बात तर्कक छल। अपना सबहक समाज तते नमहर अछि जाहिमे भिखमंगासँ राजा धरि बसैत अछि। एक दिस बड़का-बड़का कोठा अछि तँ दोसर दिस खोपड़ी। एक दिस आजुक विकसित मनुक्ख अछि तँ दोसर दिस आदिम युगक मनुुक्ख सेहो अछि। एते पैघ इतिहास समाज अपना पेटमे रखने अछि, ने ओहि इतिहासकेँ कियो पढ़निहार अछि आ ने बुझनिहार।’’ “ठीके कहलहुँ भाए।’’ ‘‘आइ धरि, हम सभ समाजक जाहि रुपकेँ देखैत छी ओ उपरे-झापरे देखै छी। मुदा देखैक जरुरत अछि ओकर भीतरी ढाँचाकेँ। जहिना समुद्रक उपरका पानि आ लहरि तँ सभ देखैत अछि, मुदा ओहिक भीतर की सभ अछि से देखनिहार कैक गोटे अछि।’’ भोरकेँ बौएलाल अपनो पढ़ैत आ सुमित्रोकेँ पढ़ा दैत। जाधरि टोल-पड़ोसक लोक सुति कऽ उठै ताधरि बौएलाल आ सुमित्रा एक-डेढ़ घंटा पढ़ि लिअए। एक तँ चफलगर दोसर पढ़ैक जिज्ञासा सुमित्रामे, तेँ एक्के दिनमे अ, आसँ य, र, ल, व तक सीखि गेल। कब्बीरकाने सीखि सुमित्रा बाल-पोथी आ खाँत सिखब शुरु केलक। सुमित्राकेँ पढ़ैत देखि माए-बापकेँ खुशी होइ। ओना माइयोकेँ आ बापोक मनमे शुरुहेसँ रहए जे बच्चा सभकेँ पढ़ाएब, मुदा समएक फेर आ परिवारक विपन्नताक चलैत, मनक सभ मनोरथ मनेमे गलि कऽ विलीन भए गेलैक। मुदा जहियासँ सुमित्रा पढ़ै लागलि तहियासँ पुनः ओ मनोरथ अंकुरित होअए लगलैक। मनुक्खक जिनगीक गति मनुक्खक विचार आ व्यवहारकेँ सेहो बदलैत अछि। अनुपक प्रति जे कटुता आ दुर्विचार रामप्रसादक मनकेँ गहिया कऽ धेने छलैक ओ नहुँए-नहुँए पघिलए लगलैक। सुमित्राक माए -रामप्रसादक स्त्री- अनुपक आंगन अबैत जाइत छलीह। तीमन-तरकारीक लेन-देन पतिसँ चोरा कऽ सेहो करैत छलीह। मुदा तैयो रामप्रसादक मनमे पछिला दुश्मनी नीक-नहाँति नहि मेटाएल छलैक। जहिना बरसातमे सुखाएल धारमे पानि अबितहि जीवित धारक रुप-रेखा पकड़ि लैत, तहिना विद्याक प्रवेशसँ रामप्रसादोक परिवारक रुप-रेखा बदलै लगलैक। भैंसा-भैसीक दुश्मनी भाय-भैयारीमे बदलैै लगलैक। मिरचाइ, तरकारी आ चून कीनैले अनुप हाट गेल रहए। कोसे भरि पर कछुआ हाट अछि। तहि बीच रामप्रसाद कताक बेरि अनुपक डेढ़ियापर आबि-आबि अनुपक खोज केलक। रामप्रसादक अधला विचारकेँ धिक्कारि कऽ भगा, नीक-विचार अपन जगह बना लेलक। दोसरि साँझमे अनुप हाटसँ घुरि कऽ रस्तेमे अबैत छल आकि रामप्रसाद फेर तकैले पहुँचल। अनुपपर नजरि पड़ितहि रामप्रसाद कठहँसी हँसि कहलक- ‘‘बहुत दिन जीबह भैया। बेरुए पहरसँ कत्ते हरा गेल छेलह?’’ रामप्रसादक बदलल चेहरा आ विचार सुनि अनुप मने-मन तारतम्य करै लगल। जे आइ सुर्ज किमहर उगलाह। जिनगी भरिक दुश्मनी एकाएक एना बदलि कोना गेलैक? पछिला गप अनुपकेँ मन पड़लै। अखन धरि रमपसदबा संग हमरा दुश्मनी ओकर अधले-खवासी- काजक दुआरे ने छल। मुदा ताराकान्तकेँ धन्यवाद दिऐ जे बेचारा मारिओ खा, जहलो जा गाममे खबासी प्रथा मेटौलक। जाबे रमपरसदबा अधलाह काज करै छल ताबे जँ दुश्मनी छल तँ ओहो नीके छल। किएक तँ हमहूँ अपना डारिपर छलौं। आब जँ ओ ओहि काजकेँ छोड़ि देलक तँ हमरो मिलान करैमे हरज की ? कालोक गति तँ प्रबल होइत छैक। समयो बदलि रहल अछि। एक तँ पहिलुका जेकाँ भारो-दौर लोक नहि दैत अछि, दोसर पहिने लोक कान्हपर भार उघैत छल आब गाड़ी-सवारीमे लए जाइत अछि। ततबे नहि, आब सबहक समांग परदेश सेहो खटै लगल अछि। गामक मालिको-मलिकानाक पहिलुका रुतबा कमले जाइत छैक। रामप्रसादक बात सुनि अनुप कहलक- ‘‘हाट जाएब जरुरी छल। घरमे ने मिरचाइ छल आ ने चून। जे चूनवाली चून बेचए अबै छलि ओकर सासु मरि गेलै। अइ साल एक्को दिन कटहरक आँठी देल खेरही दालि सेहो नै खेने छलौं, तेँ मन लगल छले।’’ कहि अनुप सोझे आंगन जाए ओसारपर आँठी आ मेरिचाइक मोटरी रखि, कोहीमे चून रखलक। एकचारीमे बैसि रामप्रसाद तमाकुल चुनबैत। चूनक कोही खोलियापर रखि अनुप बाहर आबि रामप्रसादकेँ कहलक- ‘‘ताबे तमाकुल लगबह, कने हाथ-पएर धोए लै छी। एक तँ कच्ची रस्ता तहूमे तते टेक्टर सभ चलै छै जे भरि ठेहुन कऽ गरदा रस्तामे भऽ गेल अछि। जहिना लोकक पएर थाल-पानिमे धँसै छै तहिना गरदोमे धसै अए।’’ कहि अनुप इनारपर जा हाथ-पएर धोए कऽ आबि, रामप्रसाद लग बैसल। अनुपकेँ तमाकुल दैत रामप्रसाद कहलकै- ‘‘भैया, दुपहरेसँ मनमे आएल जे तोरो बड़दक भजैती आन टोलमे छह आ हमरो अछि। दुनू गोरे ओकरा छोड़ा कऽ अपनेमे लगा लाए। जइसँ दुनू गोरेकेँ सुविधा हेतऽ।’’ थूक फेकि अनुप उत्तर देलकै- ‘‘ई बात तँ कत्ते दिनसँ बौएलाल कहै छलए जे जते काल बड़द अनैमे लगै छह ओते कालमे एकटा काज भऽ जेतह।’’ मूड़ी डोलबैत रामप्रसाद बाजल- ‘‘काल्हि जा कऽ तोहूँ अपन भजैतकेँ कहि दहक आ हमहूँ कहि देबै। परसूसँ दुनू गोरे एक्के ठीन जोतब।’’ आंगन बहरनाइ छोड़ि रधिया सेहो आबि कऽ टाटक कातमे ठाढ़ भऽ गेलि। किएक तँ बहुतो दिनक उपरान्त दुनू गोटेकेँ मुहा-मुही गप करैत देखलनि। बड़दक भजैतीक गप कए अनुप रामप्रसादकेँ कहलक- ‘‘अबेर भऽ गेल। अखन तोहूँ जाह, हमहूँ पर-पाखाना दिस जाएब।’’ जहिना सड़लसँ सड़ल पानिमे कमल फुलेलासँ भगवान माथपर चढ़ैक अधिकारी भए जाएत अछि तहिना बौएलालक सेवा सबहक लेल होअए लगल। जहिसँ गाममे बौएलाल चर्चक विषय बनि गेल। हीरानन्दक आसरा पाबि बौएलाल रामाएण, महाभारत, कहानी कविता पढ़ब सीखि लेलक। जहि गाममे लोक भरि-भरि दिन ताश खेलैत, जुआ खेलैत तहि गाममे बौएलालक दिनचर्या सभसँ अलग बीतए लगलैक। जहिसँ बौएलालक जिनगीक रस्ता बदलि गेल। अधिककाल हीरानन्द बौएलालकेँ कहथिन- ‘‘बौएलाल, गरीबक सभसँ पैघ दोस्त मेहनत छी। जे कियो मेहनतकेँ दोस्त बना चलत ओएह गरीबी रुपी दुष्टकेँ पछाड़ि सकैत अछि। तेँ सदिखन समएकेँ पकड़ि सही रस्तासँ मेहनत केनिहार जे अछि, ओएह एहि धरती आ दुनियाँक सुख भोगि सकैत छथि।’’ ८ रौतुके गाड़ीसँ रमाकान्त तीनू गोटे अपना टीशनमे उतरलाह। अन्हार राति। भकोभन स्टेशन। खाली दुइये गोटे, स्टेशन मास्टर आ पैटमेन, स्टेशनक घरमे केबाड़ बन्न कए जगल रहए। लेम्प जरैत। ने एक्कोटा इजोत प्लेटफार्मपर आ ने मुसाफिरखनामे। अन्हारेमे तीनू गोटे अपन सभ समान मुसाफिरखानामे रखि, जाजीम बिछा बैसि रहलाह। गाड़ी झमारक संग दू रातिक जगरनासँ तीनू गोटेक देह ओंघीसँ भसिआइत रहनि। प्लेटफार्मक बगलमे ने एक्कोटा चाहक दोकान खुजल आ ने एक्कोटा दोकनदार जगल रहए। ने कोनो दोकानमे इजोत होइत छलैक आ ने गाड़ीसँ एक्कोटा दोसर पसिंजर उतड़ल। निन्न तोड़ै दुआरे रमाकान्त चाह पीबै चाहथि मुदा कोनो जोगार नहि देखि कखनो समान लग बैसथि तँ कखनो उठि कऽ टहलै लगथि। जुगेसर आ श्यामा सुति रहल। मुदा रमाकान्तक मनमे होनि जे जँ कहीं सुति रहब आ सभ समान चोरि भए जाए तखन तँ भारी जुलुम हएत। निन्न तोड़ैक एकटा नीक उपाए छलनि जे ढाकीक-ढ़ाकी मच्छर रहए। जुगेसरो आ श्यामो चद्दरि ओढ़ि, मूह झाँपि सुतल रहथि। प्लेटफार्मपर पनरह-बीसटा अनेरुआ कुकुड़ एम्हरसँ ओमहर करैत रहए। प्लेटफार्मक पछबारि भाग माल-जालक हड्डीक ढेरीसँ गंध अबैत । सकरीक एकटा व्यापारी हड्डीक कारोबार करैत अछि। गाम-घरमे जे माल-जाल मरैत ओकर हड्डी गामे-घरक छोटका व्यापारी, भारपर उघि-उघि अनैत अछि, ओहि व्यापारी ऐठाम बेचि-बेचि गुजर करैत अछि। जखन बेसी हड्डी जमा भए जाइत छैक, तखन ओ मालगाड़ीक डिब्बामे लादि बाहर पठबैत अछि। जाधरि हड्डी प्लेटफार्मक बगलमे रहैत अछि ताधरि अनेरुआ कुत्ता सभ ओहि हड्डीकेँ चिबबैक पाछू तबाह रहैत अछि। दिन रहौ आकि राति, जते टीशनक कातक कुकुड़ अछि, सभ ओहिक इर्द-गिर्द मड़राइत रहैत अछि। ओना आनो-आनो गामक कुकुड़ गाम छोड़ि ओतए रहैत अछि। एकटा पिल्ला एकटा पिल्लीक संग, प्लेटफार्मक पुबारि भागसँ अबिते छल आकि एकटा दोसर कुत्ताक नजरि पड़लैक। बिना बोली देनहि ओ कुकुड़ दौड़ि कऽ ओहि पिल्ला-पिल्लीक जोड़ि लग पहुँचि गेल।आगू-आगू पिल्ली आ पाछू-पाछू पिल्ला नाङरि डोलबैत। ओ दोसर कुकुड़ पिल्लीक मूह सूँघलक। मूह सुँघितहि पिल्ली मूह चियारि कऽ ओहि कुत्तापर टूटलि। पिल्लीक टूटितहि पछिला पिल्ला जोरसँ भुकल। कुत्ताक अवाज सुनितहि, जते अनेरुआ कुकुड़ प्लेटफार्म पर रहए, सभ भुकैत दौड़ि कऽ ओहि पिल्लीकेँ घेरि लेलक। सभ सभपर भूकै लगल। मुदा पिल्ली डराएल नहि। रानी बनि हस्तिनीक चालिमे पछिम मुहे चललि। अबैत-अबैत टिकट घरक सोझेँ बैसि रहलि। पिल्लीक बैसितहि सभ पिल्ला पटका-पटकी करै लगल। प्लेटफार्मक पछवारि भाग, कदमक गाछक निच्चामे मघैया डोम सभ डेरा खसौने रहए। ओहि काल एकटा छाँैड़ा एकटा छैाँड़ीक संग, डेरासँ थोड़े पछिम जाए लट्टा-पट्टी करैत रहए। कुत्ताक अवाज सुनि एक गोटेकेँ निन्न टुटलै। निन्न टुटितहि आखि तकलक आकि पछवारि भाग दुनू गोटेकेँ लट्टा-पट्टी करैत देखलक। ओ ककरो उठौलक नहि ! असकरे उठि कऽ ओहि दुनू लग पहुँचल। ओहो दुनू देखलकै। छौँड़ा ससरिकेँ झाड़ा फीड़ैले कातमे बैसि गेल। मुदा छौड़ी चलाक। फरिक्केसँ ओहि आदमीकेँ छौड़ी कहलकै- ‘‘कक्का।’’ कक्का सुनि ओ किछु बाजल नहि मुदा घुरबो नहि कएल। आगुए मुहे ससरैत बढ़ल। छौँड़ियो ओकरे दिस ससरलि। लगमे पहुँचतहि छौड़ी कन्हापर दहिना हाथ दैत फुसफुसा कऽ कहलकै- ‘‘कक्का....।’’ कान्हपर हाथ पड़ितहि कक्काक मन बदलै लगलनि। जहिना शिकारीकेँ दोसराक शिकार हाथ लगलापर खुशी होइत, तहिना कक्कोकेँ भेलनि। ओहो अपन दहिना हाथकेँ छौैड़ीक देहपर देलखिन। देहपर हाथ पड़ितहि छौड़ी हल्ला केलक। छौड़ो देखैत। उठि कऽ ओहो हल्ला करै लगल। हल्ला सुनि सभ मघैया उठि-उठि दौड़ल। स्टेशनक टिकटघरमे टिकट मास्टर पैटमेनकेँ कहलक- ‘‘रघू, प्लेटफार्मपर बड़ हल्ला होइ छैक। जा कऽ देखहक तँ।’’ पैटमेन जवाब देलकनि- ‘‘टीशन छिऐ। सभ रंगक लोक ऐठाम अबै-जाइ अए। जँ हम ओमहर देखैले जाइ आ एम्हर स्टेशन घरमे चोर चलि आबए तँ असकरे अहाँ बुते सम्हारल हएत। भने केबाड़ बन्न छै। दुनू गोटे जागलटा रहू। नहि तँ सरकारी समान चोरि भेने दुनू गोरेक नोकरी जाएत। कोनो कि सुरक्षा गार्ड अछि जे चोरिक दोख ओकरा लगतै।’’ पैटमेनक बात स्टेशन मास्टरकेँ नीक बुझि पड़लनि, पैटमेनकेँ कहलखिन- ‘‘ठीके कहलह।’’ दुनू गोटे गप-सप करै लगला। लेम्प जरिते रहै। केवाड़क दोग देने पैटमेन प्लेटफार्म दिस तकलक तँ देखलक जे कुत्ता सभ पटका-पटकी करै अए। अन्हार दुआरे मघैया सभकेँ देखबे नहि केलक। एक दिस कुत्ता सबहक झौहड़ि आ पटका-पटकी, दोसर दिस मघैया सबहक गारि-गरौबलिसँ प्लेटफार्म गदमिशन हुअए। मने-मन रमाकान्त सोचैत जे भने भए रहल अछि। लोकक हल्लासँ हमर समान तँ सुरक्षित अछि। जुगेसरकेँ उठबैत कहलखिन- ‘‘कने आगू बढ़ि कऽ जा कऽ देखहक तँ कथीक हल्ला होइ छै?’’ जुगेसर उठि कऽ कहलकनि- ‘‘कक्का, कोन फेरामे पड़ै छी बस-स्टेण्ड आ रेलवे स्टेशनमे एहिना सदिखन झूठ-फूसि लए हल्ला होइते रहै छै। अपन जान बचाउ। अनेरे कतऽ जाएब।’’ भोर होइतहि टमटमबला सभ अबै लगल। थोड़े हटि कऽ उत्तरवारि भाग ठकुरबाड़ीमे घड़ीघंट बजै लगल। घड़ीघंटक आबाज सुनि रमाकान्त नमहर साँस छोड़लनि। जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘ओंघीसँ मन भकुआएल अछि। चाहो दोकानपर लोक सभकेँ गल-गुल करैत सुनै छिऐ। कने चाह पीने अबै छी। ताबे तूँ समान सभ देखैत रहह।’’ कहि रमाकान्त उठि कऽ कल पर जाए कुड़ुड़ केलनि। पानि पीलनि। पानि पीबि चाहक दोकानपर जाए चाह पीलनि। चाह पीबि पान खाए घुरि कऽ आबि जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘आब तोहू जाह। चाह पीबि दूटा टमटम सेहो केने अबिहह।’’ जुगेसर उठि कऽ कलपर जाए कुरड़ा केलक। कुरड़ा केलाक बाद सोचलक जे अखैन भिनसुरका पहर छै। तोहूमे तीनिये-चारिटा टमटमबला आएल अछि। जँ कहीं चाह पीबैले चलि जाइ आ इम्हर टमटमबला दोसर गोरेकेँ गछि लै, तखन तँ पहपटि भऽ जाएत। तइसँ नीक जे पहिने टमटमेबलाकेँ कहि दियै। सैह केलक। टमटमबला लग पहुँचि कऽ पुछलकै- ‘‘भाइ, टमटम खाली छह।’’ “हँ।’’ “चलबह।’’ “हँ, चलब।’’ पहिल टमटमबला जे छल, ओकर घरबाली दुखित छलैक। दस बजेमे डाॅक्टर ऐठाम जेबाक छलैक। एक्को टा पाइ नहि रहने भोरे स्टेशन पहुँच गेल, जे एक्को-दूटा भाड़ा कमा लेब तँ औझुका जोगार भऽ जाएत। किएक तँ कमसँ कम पचास रुपैआ दवाइ-दारु, तकर बाद घरक बुतात, घोड़ाक खरचा आ दस रुपैआ बैंकबलाकेँ सेहो देबाक अछि। जुगेसरक पुछितहि टमटमबला मने-मन सोचै लगल जे भिनसुरका बोहनि छी तेँ एकरा छोड़ैक नहि अछि। साला टमटमबला सभ जे अछि ओ उपरौज करैत रहैत अछि। कहैले अपनामे युनियन बनौने अछि मुदा बान्ह कोनो छैहे नहि। लगले बैसार कऽ केँ विचारि लेत आ जहाँ दस रुपैआ जेबीमे एलै आ ताड़ी पीलक अकि मनमाना करै लगैत अछि। अपनामे सभ विचारने अछि जे बर-बीमारीमे सभ चंदा देबै मुदा हमरे कए टा पैसा चंदा देलक। पनरह दिनसँ घरवाली दुखित अछि, जहि पाछु रेजानिस-रेजानिस भऽ गेल छी। ने एक्को मुट्ठी घोड़ाकेँ बदाम दै छिऐ आ ने अपने भरि पेट खाइ छी। धिया-पूता सभ अन्न बेतरे टउआइत रहै अए। तखन तँ धन्यवाद ओही बच्चा सभकेँ दिअए, जे भुखलो माएक सेवा-टहल करै अए। अपनो घोड़ाक संग-संग टमटम घिचै छी। जँ से नइ करब आ सोलहो अन्ना घोड़े भरोसे रहब तँ ओहो मरि जाएत। ओएह तँ हमर लछमी छी। ओकरे परसादे दू पाइ देखै छी। ओकरा कन्ना छोड़ि देबै। जिनगी भरि तँ ओकरे संग सुखो केलौं, छोट-छोट बच्चोकेँ तँ ओएह थतमारिकेँ रखलक। हम तँ भरि दिन बोनाइले रहै छी। घर तँ ओहि बेचारीक परसादे चलै अए। तहि बीच जुगेसर पुछलकै- ‘‘कते भाड़ा लेबहक?’’ भाड़ाक नाम सुनि टमटमबला सोचै लगल- एक तँ भिनसुरका बोहनि छी, दोसर डाकडरो अइठीन जाइ के अछि। जँ भाड़ा कहबै आ ओते नइ दिअए तखन तँ बक-झक हएत। जँ कहीं दोसर टमटम पकड़ि लिअए, तखन तँ ओहिना मूह तकैत रहि जाएब। तइसँ नीक हैत जे पहिने समानो आ पसिनजरो चढ़ा ली। एते बात मनमे अबितहि टमटमबला कहलकै- ‘‘जे उचित भाड़ा हएत सैह ने लेब। हम तोरा एक हजार कहि देबह तँ कि तूँ दैये देबह।’’ टमटमबलाक बात सुनि जुगेसर कहलकै- ‘‘अच्छा ठीक छै। पहिने चाह पीबि लाए।’’ दुनू, टमटमोबला आ जुगेसरो चाहक दोकानपर जाए चाह पीलक। चाह पीबि तीनू गोटे तमाकुल खेलक। चाहबलाकेँ जुगेसरे पाइ देलकै। तीनू गोटे रमाकान्त लग आबि समान सभ उठा-उठा टमटमपर लदलक। एकटा टमटमपर श्यामा, जुगेसर चढ़ल आ दोसरपर असकरे रमाकान्त समानक संग चढ़ल। किछु दूर आगू बढ़लापर रमाकान्त टमटमबलाकेँ कहलखिन- ‘‘घोड़ा एते लटल छह, खाइले नइ दै छहक?’’ रमाकान्तक बात सुनि टमटमबला बेवशक आखि उठा रमाकान्त दिशि देखि उत्तर देमए चाहैत, मुदा कनैत हृदय मूहसँ बकारे नहि निकलै दैत। टमटमबलाक आखिपर आखि दए रमाकान्त पढ़ै लगलथि। तहि बीच टमटमबलाक आखिमे नोर ढ़बढबा गेलै। कान्ह परक तौनीसँ आखि पोछि टमटमबला कहै लगलनि- ‘‘सरकार यैह टमटम आ घोड़ा हमर जिनगी छी। अहीपर परिवार चलै अए। जइ दिनसँ भनसिया दुखित पड़ल तइ दिनसँ जे कमाइ छी से दबाइये-दारुमे खरचा भऽ जाइ अए। अपनो बाल-बच्चाकेँ आ घोड़ोकेँ खाइक तकलीफ भऽ गेलै अए। की करबै ! कहुना परान बचेने छिऐ। परान बँचतै तँ माउस हेबे करतै।’’ टमटमबलाक धैर्य आ बेवश देखि रमाकान्तक हृदय पघिल कऽ इनहोर पानि जेकाँ पातर भऽ गेलनि। बिना किछु बजनहि मने-मन सोचै लगलथि जे एक तरहक मजबुर ओ अछि जे किछु करबे कमेबे नहि करैत अछि आ दोसर तरहक ओ अछि जे दिन-राति खटैत अछि मुदा ओकरा प्राकृतिसँ लऽ कऽ मनुक्ख धरि एहि रुपे संकट पैदा करैत अछि, जहिसँ ओ मजबूर होइत अछि। ई टमटमबला दोसर श्रेणीक मजबूर अछि, तेँ एहेन लोकक मदति करब धरमक श्रेणीमे अबैत अछि। जरुर एहेन लोकक मदति करैक चाहिऐक। मुदा मेहनतकश आदमीक मोन एत्ते सक्कत होइत अछि जे दोसरसँ हथउठाइ नहि लेमए चाहैत अछि। जँ हम किछु मदति करै चाहिऐक आ ओ लइसँ नासकार जाए, तखन तँ मनमे कचोट हएत। एहि असमंजसमे रमाकान्त पड़ि गेला। फेर सोचै लगलथि जे कोन रुपेँ एकरा मदति कएल जाए ? सोचैत-सोचैत सोचलनि जे हम नहि किछु कहि एकरेसँ पूछिऐक, जे अखन तूँ जहि संकटमे पड़ल छह ओहिमे कते सहयोग भए गेलासँ तोरा पार लगि जेतह। ई विचार मनमे अबितहि पुछलखिन- ‘‘अखन तोरा कते मदति भए गेलासँ पार लगि जेतह।’’ रमाकान्तक बात सुनि टमटमबलाक मनमे संतोषक छोट-छीन लकीर खिंचा गेल। मने-मन सभ हिसाब बैसबैत बाजल- ‘‘सरकार, अगर अखन पाँच दिनक परिवारोक आ घोड़ोक बुतात आ एक सए रुपैआ भए जाए तँ हम अपन जिनगीकेँ पटरीपर आनि लेब। जखने जिनगी पटरीपर आबि जाएत तखने जिनगीक सरपट चालि पकड़ि लेब। स्त्रीक इलाज, परिवार आ कारोबार तीनू काज एहेन अछि जे एक्कोटा छोड़ैबला नहि अछि।’’ टमटमबलाक बोलीमे रमाकान्तकेँ मदतिक आशा बुझि पड़लनि। आशा देखि खुशी भेलनि। खुशी अबितहि बिचारलथि जे अगर पाँच दिनक बदला दस दिनक बुतात आ सए रुपैआक बदला दू सए रुपैया जँ मदति कए देबै तँ विरोध नहि करत। संगे जखने समस्यासँ निकलैक आशा जगि जेतै तँ काजो करैक साहस बढ़ि जेतै। मुदा असकरे तँ नहि अछि, दूटा टमटमबला दू गोटे अछि। की दुनू गोटेकेँ मदति करबैक आकि एकरे टा ?’’ पुनः एहि सवालपर सोचै लगलथि। मनमे एलनि जे मुसीबत तँ एहि बेचारे टाकेँ छैक। दोसर टमटमबालासँ तँ गप नहि भेल जे बुझितिऐक। मुदा एकर तँ बुझलिऐक। तेँ एकरे टा मदति करबैक। दोसर टमटमबलासँ पुछि लेबै जे तोहर भाड़ा कते भेलह ? जेते कहत तते दए देबै। मुदा सोझामे एक ठाम कम-बेसी देबो उचित नहि। तेँ पहिने ओकरा भाड़ा दए बिदा कए देबै आ एकरा रोकि पाछू कऽ सभ किछु दए बिदा कए देबै। गरीबक हृदयकेँ जुराएब बड़ पैघ काज होएत। एते सोचैत-सोचैत रमाकान्त घरपर पहुँचि गेलाह। घरमे ताला लगा हीरानन्द पैखाना गेल रहथि। दुनू टमटम पहुँचि दलानक आगूमे ठाढ़ भेल। टमटम ठाढ़ होइतहि सभ कियो उतड़लाह। टमटमोबला आ जुगेसरो सभ समानकेँ उतारि दरबज्जाक ओसारपर रखलक। ताबे हीरानन्दो बाध दिशिसँ आबि पोखरिक पुबरिया महार लग पहुँचलाह। महार लग अबितहि दरबज्जापर टमटम लगल देखलनि। टमटम देखि हीरानन्द बुझि गेल जे रमाकान्त आबि गेलाह। हाँइ-हाँइ कऽ दतमनि, कुरुड़ कए लफरल दरबज्जापर आबि घरक ताला खोलि देलखिन। हाथे-पाथे तीनू गोटे सभ सामानकेँ कोठरीमे रखि देलकनि। दोसर टमटमबलाकेँ भाड़ा पूछि रमाकान्त दए देलखिन। पहिल टमटमबलाकेँ आँखिक इशारासँ रुकैले कहलखिन। दोसर टमटमबला चलि गेल। पहिल टमटमबलाकेँ दू सए रुपैया आ दस दिनक बुतात -दू पसेरी बदाम आ तीन पसेरी चाउर- दए बिदा केलनि। टमटमपर चढ़ि मने-मन गद-गद होइत टमटमबला गीत ‘सभक सुधि अहाँ लइ छी यौ बाबा हमरा किअए बिसरल छी यौ..’ गुनगुनाइत बिदा भेल। पसीनासँ गंध करैत कुरता-गंजी निकालि रमाकान्त चौकीपर रखलनि। भकुआइल मन रहनि। मुदा निकेना घर पहुँचलासँ मन खुशी होइत रहनि। हीरानन्दक पूछैसँ पहिनहि रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘गाम-घरक हाल-चाल बढ़िया अछि की ने ?’’ “हँ’’- कहि हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘यात्रा बढ़ियाँ रहल की ने? ’’ ‘‘येह, यात्राक संबंधमे की कहू ! अखन तँ मनो भकुआएल अछि आ तीन दिनसँ नहेबो ने केलहुँहेँ। तेँ पहिने नहा लिअए दिअ। तखन निचेनसँ यात्राक संबंधमे कहब।’’ जुगेसरकेँ जे बिदाइ मद्रासमे भेटल रहै ओ चारिटा कार्टूनमे रहै । चारु कार्टून जुगेसर फुटा कऽ ओसारेपर रखने रहए। जुगेसरक घरवाली आ धिया-पूता सेहो आबि गेलैक। चारु कार्टून जुगेसर अपना घरवालीकेँ देखबैत कहलक- ‘‘ई अप्पन छी। अंगना नेने चलू।’’ अप्पन सुनि घरोवाली आ धियो-पूतो चपचपा गेल। चारु कार्टून लए आंगन बिदा भेल। रमाकान्तक अबैक समाचार गाममे बिहाड़ि जेकाँ पसरि गेल। धिया-पूतासँ लऽ कऽ चेतन धरि देखैले अबै लगलनि। दरबज्जापर लोकक भीड़ बढै़ लागल। रमाकान्त नहाएब छोड़ि जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, सनेसबला कार्टून एतै नेने आबह।’’ सनेसमे डाॅ. महेन्द्र टुकड़ी बनाओल दू कार्टून नारियल देने रहनि। जुगेसर कोठरी जा एकटा कार्टून उठौने आएल। जहियासँ रमाकान्त ब्रह्मचारी जीक आश्रम गेलथि, तहियासँ विचारे बदलि गेलनि। अपन सुख-दुखकेँ ओते महत्व नहि दिअए लगलथि, जते दोसराक। दरबज्जापर लोक थहा-थही करै लगल। जना लोकक हृदय रमाकान्तक हृदयमे मिझराए लगलनि आ रमाकान्तक हृदय लोकमे। अपन नहाएब, दतमनि करब आ आँखिपर लटकल ओंघी सभ बिसरि जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘चेतनकेँ दूटा टुकड़ी आ बाल-बोधकेँ एक-एकटा टुकड़ी बाँटि दहक। दरबज्जापर आएल एक्को गोटे ई नहि कहए जे हमरा नहि भेल।’’ कार्टून खोलि जुगेसर नारियलक टुकड़ी बिलहै लगल। हाथमे पड़ितहि, की चेतन की धिया-पूता, नारियल खाए लगल। एक कार्टून सठि गेल मुदा देखिनिहार, जिज्ञासा केनिहार नहि सठल। दोसरो कार्टून जुगेसर अनलक। दोसर कार्टून सठैत-सठैत लोको पतरा गेल। लोकक भीड़ हटल देखि रमाकान्त नमहर साँस छोड़ैत जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘आब तोहूँ जा कऽ खा-पीअह गे। हमहूँ जाइ छी।’’ आंगन आबि जुगेसर अपन चारु कार्टून खोललक। मद्रासमे कार्टूनक भितरका समान नहि देखने छल तेँ देखैक उत्सुकता रहै। एक-एकटा कार्टून चारु गोटे- महेन्द्र, रविन्द्र, जमुना आ सुजाता- देने रहै। पहिल कार्टून, महेन्द्रबलामे एक जोड़ धोती, एक जोड़ साड़ी, एकटा कुरता कपड़ाक पीस, एकटा आङीक पीस, एकटा चद्दरि, एकटा गमछा, जुगेसर ले एक जोड़ जुत्ता आ घरवलीले एक जोड़ चप्पल, दुनू बच्चाले पेन्ट-शर्टक संग तीन सए रुपैआ रहैक। एहिना तीनू कार्टूनमे सेहो रहैक। चारु कार्टूनक समान देखि जुगेसरक परिवारक मनमे खुसीक बिहाड़ि उठि गेलैक। दुनू बच्चा अपन कपड़ा देखि खुशीसँ एक-एकटा पहीरि आंगनमे नचै लगल। किएक तँ कपड़ाक एहन सुख जिनगीमे पहिल दिन भेटल छलैक। दुनू परानी जुगेसरकेँ सेहो खुशीसँ मन गद-गद भए गेलैक। जुगेसर हिसाब जोड़ै लगल जे जँ ओरिया कऽ पहिरब तँ दुनू गोरेक जिनगी पार लगि जाएत। एहन चिक्कन कपड़ा आइ धरि नसीब नहि भेल छल। एक आखि जुगेसर समानपर देने आ दोसर आखि घरवालीक आखिपर देलक। दुनू गोटेक आखिमे जिनगीक बसन्त अबै लगलैक। अपन बिआह मन पड़लै। जुगेसरकेँ होए जे घरवालीकेँ दुनू बाँहिसँ पजिया कऽ छातीमे लगा ली आ घरवालीकेँ होए जे घरबलाक कोरामे बैसि एकाकार भए जाए। मुदा तीन दिनक गाड़ीक झमारसँ जुगेसरक देहो भसिआइ आ ओंघियो आखिक पिपनीकेँ झलफलबैत रहए। जुगेसर घरवालीकेँ कहलक- ‘‘पहिरैले एक-एक जोड़ कपड़ो आ जुत्तो बहार रखू आ बाकीकेँ खूब सरिया कऽ रखि लिअ, जे दुरि नहि हुअए।’’ बेर टगि गेल। जुगेसर नवका धोती, गंजी पहीरि कान्हपर गमछा नेने रमाकान्त ऐठाम पहुँचल। रमाकान्त सुतले रहथि। आंगन जाए श्यामाकेँ देखलक तँ ओहो सुति उठि कऽ मूह-हाथ धोइत छलीह। जुगेसरकेँ देखि, श्यामा एक टकसँ निङहारि, मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘आइ तँ अहाँ दुरगमनिया वर जेकाँ लगै छी जुगेसर।’’ हँसैत जुगेसर उत्तर देलकनि- ‘‘काकी, महिन्दर भाए देलहा छी।’’ महिन्दरक नाम सुनि श्यामा कहलखिन- ‘‘भगवान भोग देथि। की सभ बच्चा देलनि?’’ जुगेसर- ‘‘अहाँसँ लाथ कोन काकी, तते कपड़ा-लत्ता आ जुत्ता-चप्पल चारु गोरेकेँ देलनि जे जिनगी भरि कतबो धाँगि कऽ पहिरब तैयो ने सठत।’’ बेटा-पुतोहूक बड़ाइ सुनि श्यामाक हृदय उमड़ि पड़लनि। आह्लादित भए पुछलखिन- ‘‘पाइयो-कौड़ी देलनि आकि कपड़े-लत्ताटा?’’ “रुपैआ तँ गनलिऐ नहि, मुदा बुझि पड़ल जे दस-पनरहटा नमरी अछि।’’ “बाह। मालिक देखलनि की नहि? ’’ “ओ तँ सुतले छथि। हुनके देखबैले पहीर कऽ एलौं।’’ “हम ताबे चाह बनबै छी। दरबज्जापर जा कऽ हुनको उठा दियौन।’’ ‘बड़बढ़िया’ कहि जुगेसर दरबज्जापर आबि रमाकान्तकेँ उठबै लगलनि। आखि खोलि रमाकान्त देबालक घड़ीपर नजरि देलनि। चारि बजैत। पड़ले-पड़ल सुतैक हिसाब जोड़लनि। हिसाब जोड़ि घुनघुना कऽ बजलाह- ‘‘एहेन निन्न तँ जुआनियोमे नहि अबैत छल।’’ ओछाइनपर सँ उठि जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘कने चाह बनौने आबह। अखनो बुझि पड़ै अए जे निन्न आँखियेपर लटकल अछि। ताबे हमहूँ कुरुड़ कए लैत छी।’’ कहि रमाकान्त पहिने लघी करै गेलाह। लघी करै काल बुझि पड़नि जे चाहोसँ धीपल लघी होइ अए। ततबे नहि जते लघी चारि बेरिमे करैत छी, तोहूसँ बेसी भए रहल अछि। लघी कए कलपर आबि आखि-कान पोछि, कुरुड़ कए दमसा कऽ भरि पेट पानि पीलनि। पानि पीबितहि बुझि पड़लनि जे अधा निन्न पड़ा गेल। जुगेसर चाह अनलक। रमाकान्त चाह पीबितहि रहथि आकि हीरानन्दो स्कूलसँ आबि गेला। शशिशेखर आबि गेल। हीरानन्द जुगेसरकेँ पुछलखिन- ‘‘जात्रा बढ़िया रहल की ने ?’’ हँसैत जुगेसर बाजल- ‘‘जाइ काल टेनमे बड़ भीड़ भेल। जाबे गाड़ीमे रही ताबे ने एक्को बेर झाड़ा भेल आ ने सुतलौं। किएक तँ रिजफ सीट रहबे ने करै। जइ डिब्बामे बैसल रही ओहिमे लोकक करमान लागल रहै। तइपर सँ जइ स्टेशन मे गाड़ी रुकै सभ टीशनमे एगो-दूगो लोक उतड़ै आ दस-बीस गोरे चढ़ि जाए। मुदा भगवानक दयासँ कहुना-कहुना पहुँच गेलौं। जखन मद्रास टीशनपर उतड़लौं तँ दोसरे रंगक लोक दखिऐ। अपना सभ दिस अछि किने जे सभ रंगक लोक मिलल-जुलल अछि। से नइ देखिऐ। बेसी लोक कारिये रहै। गोटे-गोटे लोक उज्जर बुझि पड़ै। जखन डेरापर पहुँचलौं तँ मकान देखि बिसबासे ने हुअए जे अपन छिअनि। बड़का भारी मकान। तइमे कोठलीक कमी नहि।’’ “भरि मोन देखलौं की ने? ’’ ‘‘ऐह, की कहू मासटर सैब, महिन्दर भाए अपने मोटरसँ भरि-भरि दिन बुलबैत रहथि। मोटरो तेहेन जे जहाँ बैसी आ खुगै आकि ओंघी लगि जाए। कतए की देखलौं से मनो ने अछि।’’ रमाकान्तक मद्राससँ अएबाक समाचार सुनि महेन्द्रक स्कूलक संगी सुबुध सेहो अएलाह। ओ हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। महेन्द्र आ सुबुध, हाइ स्कूल धरि, संगे-संग पढ़ने रहथि। महेन्द्र साइंसक विद्यार्थी आ सुबुध आर्टक। बी.ए. पास केलापर सुबुध शिक्षक भेलाह आ महेन्द्र डाॅक्टरी पढ़ि डाॅक्टर बनलाह। महेन्द्रक कुश्ल-क्षेम पूछि सुबुध रमाकान्तकेँ पुछलखिन- ‘‘अपना एहिठामक लोक आ मद्रासक लोकमे की अंतर देखलिऐक?’’ दुनू ठामक लोकक तुलना करैत रमाकान्त कहै लगलखिन- ‘‘ओत्तुका आ अपना ऐठामक लोकमे अकास-पतालक अन्तर अछि। ओहिठामक लोक अपना एहिठामक लोकसँ अधिक मेहनती आ इमानदार अछि।’’ बिचहिमे शािशशेखर प्रश्न केलकनि- “की मेहनती?” “मनुक्खक तुलना करैसँ पहिने अपन इलाका आ मद्रासक माटि-पानिक तुलना सुनि लिअ। जेहेन सुन्नर माटि अपना सभक अछि, देखते छिऐ जे कते मुलाएम आ उपजाऊ माटि अछि। पानियो कते बढ़ियाँ अछि, एहन मद्रासमे नहि अछि। अपना सभसँ बेसी गरमियो पड़ैत छैक। जहाँ धरि लोकक सवाल अछि, अपना ऐठामक लोक अधिक आलसी अछि। समएकेँ कोनो महत्व नहि दैत अछि। वा ई कहियौक जे एहिठामक लोक समएक महत्व बुझबे नहि करैत अछि। कियो बुझबो करैत अछि तँ ओ परजीवी बनि जिनगी बितबै चाहैत अछि। हँ, किछु गोटे एहेन जरुर छथि जे मर्यादित मनुष्य बनि जिनगी जीबि रहल छथि। जे पूजनीय छथि, मुदा सामाजिक व्यवस्था सदिखन हुनको झकझोड़ितहि रहैत छन्हि। ओहिठामक लोक समएक संग चलैत छथि, जहिसँ कमजोर इलाका रहितहुँ नीक-नहाँति जिनगी बितबैत अछि। ओहिठामक लोक भीखकेँ अधला बुझि नहि मंगैत अछि, मुदा अपना ऐठाम लोक उपार्जनक स्रोत बुझैत अछि।’’ बिचहिमे सुबुध पुछलकनि- “पढ़ाई-लिखाई केहेन छैक ?” “स्कूल, कओलेज, युनिवर्सिटी सभ देखलहुँ। लड़का-लड़कीक स्कूल शुरुहेसे अलग-अलग अछि। मुदा तैयो दुनूकेँ संगे-संग पढ़ैत सेहो देखलहुँ। अपना ऐठामसँ बेसी लड़की ओहिठाम पढ़ैत अछि। अपना ऐठाम लड़के पछुआएल अछि तँ लड़कीक कोन हिसाब। गाड़ी, ट्रेन, बसमे सेहो अलग-अलग व्यवस्था छैक। जहनकि अपना ऐठाम सभ संगे-संग चलैत अछि।’’ सुबुध- ‘‘खाइ-पीबैक केहेन व्यवस्था छैक?’’ “गरीब लोकक खान-पान दब होइतहि छैक। मुदा एक हिसाबसँ देखल जाए तँ अपना सभक नीक अछि। कपड़ो-लत्ता पहिरब अपना ऐठाम नीक अछि।’’ रमाकान्तक छोटकी पुतोहू सुजाता एक कार्टूनक फलक बनल शराबक पेटी सेहो देने रहनि। आँखिक इशारासँ रमाकान्त जुगेसरकेँ एक बोतल ब्राण्डी अनैले कहलखिन। जुगेसर उठि कऽ भीतर गेल आ एकटा बोतल ब्राण्डी नेने आएल। दरबज्जापर आबि चाहेक गिलासकेँ धोए, सभमे शराब दए सबहक आगूमे देलकनि। आगूमे पड़ितहि रमाकान्त घट दए पीबि गेलाह। मुदा हीरानन्दो, शशिशेखरो आ सुबुधोकेँ डर होइत छलनि। कहियो पीने नहि। दोहरी गिलास पीबैत रमाकान्त सभकेँ कहलखिन- ‘‘पीबै जाइ जाउ, फलक रस छिऐक। कोनो अपकार नहि करत।’’ मुदा तैयो सभ-सबहक मूह तकैत रहथि। दोहराकेँ फेर रमाकान्त सभकेँ कहलखिन- ‘‘मने-मन सुबुध सोचलनि जे कोनो जहर-माहूर थोड़े छिऐक जे मरि जाएब। अगर मरबो करब तँ पहिने कक्के ने मरताह। बुझल जएतैक। आगूमे राखल गिलास उठा आस्तेसँ दू घोट पीबि, गिलास रखि, हीरानन्दकेँ कहलखिन- ‘‘पीबू, पीबू मास्टर सहाएब। सुआद तँ कोनो अधला नहिये बुझि पड़ैत अछि।’’ सुबुधक बात सुनि हीरानन्दो आ शशिशेखरो गिलास उठा कऽ पीलनि।ताबे तेसरो गिलास रमाकान्त चढ़ा देलखिन। तेसर गिलास पीबितहि आखिमे लाली अबै लगलनि। मन हल्लुक सेहो हुअए लगलनि। बजैक ताब सेहो चढ़ै लगलनि। जहिना आगिपर चढ़ल पानिक बरतनमे ताव लगलापर निच्चाँक पानि गर्म भए उपर आबै चाहैत अछि, तहिना रमाकान्तोकेँ हुअए लगलनि। धीरे-धीरे रंग चढ़ैत नीक जेकाँ चढ़ि गेलनि। अहू तीनू गोटे- हीरानन्द, सुबुध आ शशिशेखरक आँखि तेज हुअए लगलनि। तेज होइत नजरिसँ सुबुध पुछलखिन- ‘‘कक्का, महेन्द्र भाए मस्तीमे रहै छथि की ने?’’ बजैक वेग रमाकान्तकेँ रहबे करनि, तहि परसँ महेन्द्रक मस्ती सुनि कहै लगलखिन- ‘‘महेनद्रक मेहनति आ कमाइ देखि क्षुब्द भऽ गेलहुँ। अप्पन बड़का मकान, चारिटा गाड़ी, बजारमे अइल-फइलिक बास तहि परसँ बैंकोमे ढेरी रुपैआ जमा केने अछि। अइठामक सम्पत्तिक ओकरा कोनो जरुरी नहि छैक। किएक रहतैक? जेकरा अपने कमाइ अम्बोह छै।’’ बिचहिमे सुबुध टोकि देलकनि- ‘‘तखन ऐठामक खेत-पथार गरीब-गुरबाकेँ दए दियौक?’’ बिना किछु आगू-पाछू सोचनहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर बात अहाँ कहलहुँ। अनेेरे हम एत्ते खेत-पथार रखने छी। यैह खेत जे गरीबक हाथमे जेतै तँ उपजबो बेसी करतै आ ओकर जिनगीयो सुधरि जेतै।’’ जहिना धधकल आगिमे हवा सहायक होइत, तहिना रमाकान्तोकेँ भेलनि। एक तँ ब्राण्डीक नशा, दोसर परिवारमे चारि-चारिटा डाॅक्टरक कमाइ, तहि परसँ अपार सम्पत्ति देखि मन उधिआइत छलनि। समाजक स्नेह सेहो बढ़ि गेल छलनि। ततबे नहि, अद्वेत दर्शन हृदयकेँ पैघ बना देलकनि। हँसैत रमाकान्त सबहक बीच, कहलखिन- ‘‘अखन धरि हम गुलरिक कीड़ा बनल छलहुँ, मुदा आब दुनियाँकेँ देखलिऐक। दू सए बीधा जमीन अछि। किएक हम एत्ते रखने छी। एकटा जमीनदारक खेतसँ सैकड़ो गरीब परिवार हँसी-खुशीसँ गुजर कए सकैत अछि। जखनिकि ओतेक सम्पत्तिक सुख एकटा परिवार करैत अछि। ई कते भारी अनुचित थिक। सभ मनुक्ख मनुख छी। सभकेँ सुख-दुखक अनुभव होइत छैक। केयो अन्न बेतरे काहि कटैत अछि तँ ककरो अन्न सड़ैत छैक। घोर अन्याय मनुक्ख-मनुक्खक संग करैत अछि।’’ कहि जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, चाह बनौने आबह?’’ जुगेसर चाह बनबै गेल। तहि बीच बौएलाल सेहो आएल। रमाकान्तकेँ गोर लागि कातमे बैसल। बौएलालकेँ बैसितहि रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- ‘‘मास्टर सहाएब, महेन्द्र कहने छल जे एकटा लड़का आ एकटा लड़की दू गोरेकेँ एहिठाम मद्रास पठा दिअ। ओहि दुनू गोटेकेँ अपना संग रखि छोट-छोट बीमारीक इलाज केनाइ सिखा देबैक। गाममे इलाजक बड़ असुविधा अछि। ततबे नहि, गरीबीक चलैत लोक रोग-व्याधिसँ मरि जाइत अछि, मुदा इलाज नहि करा पबैत अछि। तेँ एकटा छोट-छीन अस्पताल सेहो बना देब, जहिमे लोकक मुफ्त इलाज हेतैक। तहि लेल जते दवाइ-दारुमे खर्च हएत से हम देब। हम सभ चारि गोटे छी। बेरा-बेरी चारु गोटे, सालमे एक-एक मास गाममे रहब आ लोकक इलाज करब। तहि बीच छोट-छोट बीमारीक लेल सेहो दू आदमीकेँ तैयार कऽ देबाक अछि। जँ कहीं बीचमे नमहर बीमारी ककरो हेतैक तँ ओकर इलाजक खर्च सेहो देबै। तेँ दू आदमीकेँ मद्रास पठा दियौ, ओकर जेबाक खर्च देबै।’’ रमाकान्तक बात सुनि, सभ कियो बौएलाल आ सुमित्राकेँ मद्रास पठबैक विचार केलनि। बौएलालकेँ हीरानन्द कहलखिन- ‘‘बौएलाल सबहक विचार तँ तू सुनिये लेलह। काल्हि दुनू गोरे मद्रास चलि जाह।’’ ९ कछ-मछ करैत हीरानन्द भरि राति जगले रहि गेलाह। मनमे कखनो होनि जे रमाकान्तक देल जमीन समाजक बीच कोना बाँटल जाए, तँ कखनो हुनक उदार विचार नचैत रहनि। कखनो होनि जे निसाँक झोकमे बजलाह मुदा निसाँ टुटलापर जँ कहीं नठि जाथि। विचित्र स्थितिमे हीरानन्द रहथि। बात बदलब धनीक लोकक जन्मजात आदत छी। मुदा हम तँ शिक्षक छी, शिक्षकक प्रति आदर आ निष्ठा, सभ दिनसँ, समाजमे रहलैक आ रहतैक। एहि विचारक बीच जते गोटे छलहुँ ओहिमे हम आ सुबुध शिक्षक छी। तँ आन क्यो तँ कम्मो मुदा हम दुनू गोटेतँ बेसी घिनाएब। कोन मूह लए समाजक बीच रहब। फेर अपनेपर शंका भेलनि जे हमहूँ तँ शराबेक निशामे ने तँ बौआइ छी। ई बात मनमे उठितहि, उठि कए बाहर निकलि चारु भर तकलनि। अन्हार गुप-गुप रहए। सन-सन करैत राति छलैक। हाथ-हाथ नहि सुझैत छलैक। मुदा मेघ साफ। सिंगहारक फूल जेकाँ तरेगण चकचक करैत रहए। हवा तँ कोनो नहिये बहैत रहै मुदा राति ठंढ़ाइल रहए। पुनः बाहरसँ कोठरी आबि बिछानपर पड़ि रहला। मुदा निन्नक कतौ पता नहि ! मनसँ जमीन हटबे नहि करैत रहनि। पुनः उठि कऽ कोठरीसँ निकलि लघी लघुशंका करैले कातमे बैसलाह। भरिपोख पेशाब भेलनि। पेशाब होइतहि मन हल्लुक भेलनि। मन हल्लुक होइतहि ओछाइनपर आबि पड़ि रहलाह। ओछाइनपर पड़ितहि निन्न आबि गेलनि। सुबुध सेहो भरि राति जगले बितौलनि। मुदा हीरानन्द जेकाँ ओ ओझरीमे नहि ओझराइल रहथि। समाज शास्त्रक शिक्षक होइक नाते स्पष्ट सोच आ समाज चलैक स्पष्ट दिशा छलनि, तेँ मन दृढ़ संकल्प आ सक्कत विचारसँ भरल छलनि। सभसँ पहिने मनमे उठलनि जे जहिना आर्थिक दृष्टिसँ टूटल समाजकेँ रमाकान्त कक्काक सहयोगसँ मजबूत बल भेटतैक, तहिना तँ ओहि बलकेँ चलबैक सेहो मजगूत रस्ता भेटैक चाही ! जे रमाकान्त कक्का बुते नहि हेतनि। इमानदारी आ उदार स्वभावक चलैत तँ ओ सम्पत्तिक त्याग केलनि। मुदा ओ सम्पत्ति आगू मुहे कोना बढ़तैक? जहिना मनुक्खक परिवार दोबर, तेबर, चारिबरक रफ्तारसँ आगू मुहे बढ़ैत अछि, तहिना तँ सम्पतियोक गति हेबाक चाहिऐक। मुदा सम्पत्तिमे ओ गति तखने आओत जखन कि ओहिमे श्रमक इंजिन लगाओल जाएत। ओना श्रमक इंजन लगौनिहार श्रमिक सेहो पर्याप्त अछि मुदा ओकरा श्रमकेँ कोन रुपमे बढ़ाओल जाए। एक रुपक ई होइत जे सोझे-सोझी ओकरा नव कार्यक ढाँचामे ढालल जाए, नव काज देल जाए, जे संभव नहि अछि ! किएक तँ नव औजार, नव तरीका बिना नव ज्ञाने संभव नहि अछि, जे नहि अछि। दोसर जे लूरि आ औजार अछि, ओकरे धारदार बना आगू बढ़ाओल जाए। जे संभवो अछि आ उपयुक्तो होएत। मुदा ओहू लेल पथ-प्रदर्शकक जरुर होएत। जेकर अभाव अछि। हमहूँ तँ नोकरीये करै छी। सात दिनमे एक दिन रविकेँ गाममे रहै छी, बाकी छह दिन अनतै रहै छी। तहिसँ काज कोना चलि सकै अए ? किएक तँ समाजो नमहर अछि आ समस्यो ढेर अछि। हर समस्याक समाधानक रस्तो फराक-फराक होएत। जना बुद्धदेव कहने छथि जे दुश्मनकेँ सूइयाक नोक भरि जँ सुराक भेटि जाएत तँ ओहि होइत हाथी सन विकराल जानवर प्रवेश कए जाएत। समाजक समस्यो तँ ओहने अछि। अनायास मनमे उपकलनि जे जहिना रमाकान्त कक्का अपन सभ सम्पत्ति समाजकेँ दैले तैयार छथि तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि अपन ज्ञान समाजकेँ दए देबैक। सभ किछु बुझितहुँ सड़ल-गलल रस्ता, अपन अरामक दुआरे, धेने चलि रहल छी। सात बीघा जमीन, एकटा पोखरि, दस कट्ठा गाछी-कलम आ खढ़होरि अछि। जाहिसँ पिताजी नीक-नाहाँति गुजरो करैत छलाह आ हमरो पढ़ौलनि। मुदा हम नोकरीयो करैत छी, खेतो-पथार ओहिना अछि मुदा कते आगू मुहे बढ़लहुँ। हँ, एते जरुर भेल अछि जे घरोवालीकेँ आ बेदरो-बुदरीकें, धनिकक मंदिरक मुरती जेकाँ, नीक-नीक परसाद, नीक-नीक सजावटसँ सजा काहिल बनौने छी। की हम ई नहि देखैत छी जे झक-झक करैत छातीक हाड़बला रिक्सा खिंचैत अछि, साठि बरखक महिला चिमनीमे पजेबा उघैत अछि, मरैबला पुरुख बड़दक संग हर खिंचैत अछि। अन्नक बोझ उघैत अछि। की ओकर देह लोहाक बनल छैक आ हमरा सबहक कोढ़िलाक बनल अछि। ई सभ धन आ बुद्धिक करामात छी। आइ धरिक समाज आ समाजक नियामक एकरे पोसक रहलाह जे सुधारबाक अछि। नहि तँ मनुक्ख आ जानवरमे की अन्तर रहतैक? जहि समाजमे मनुक्ख जानवरक जिनगी जीबए ओहि समाजक प्रबुद्ध लोककेँ चुरुक भरि पानिमे डूबिकेँ नहि मरि जेबाक चाहियनि। एते बात मनमे अबितहि सुबुध तए केलनि जे सभसँ पहिने काल्हि स्कूलमे त्यागपत्र दए देब। आइ धरि जे जिनगी जीलहुँ, मुदा काल्हिसँ नव जिनगीक सूत्रपात करब। एहि संकल्प-विकल्पक बीच मन घुरिआइत रहनि। भोर होइतहि सुबुध ओछाइन परसँ उठि मैदान दिशि बिदा भेला। हाथमे लोटा, मुदा मन ओहि विचारमे डूबल छलनि। थोड़े दूर गेलापर गाममे गल्ल-गुल होइत सुनलनि। रस्तेपर ठाढ़ भए अकानै लगलाह। जे कथीक गल्ल-गुल भए रहल अछि। सोझामे ककरो नहि देखैत, जे पुछियो लैतथि। मने-मन अनुमान करै लगलाह जे भरिसक रातिमे कतौ कोनो घटना घटि गेलैक। या तँ ककरो साँप-ताँॅप काटि लेलकै वा कतौ चोरि भए गेलैक। मुदा से सभ नहि छलैक। साँझमे जे विचार रमाकान्त व्यक्त केने रहथि ओ राता-राती बिहाड़ि जेकाँ सगरे गाम पसरि गेलैक। रस्तेसँ घूरि सुबुध कड़चीक दतमनि तोड़ि, दतमनि करैत घरपर अएला। घरपर अबितहि देखलनि जे सुकना बैसल अछि। मुदा सुकनाक नजरि सुबुधपर नहि पड़लैक, किएक तँ ओ अंगनाक दुआरि दिशि तकैत रहए। सुबुध सुकनाकेँ पुछलखिन- ‘‘भोरे-भोर किमहर सुकन।’’ सुबुधक बात सुनि अकचकाइत सुकन चौकीपर सँ उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाजल- ‘‘मालिक, अहाँ तँ जनिते छी जे कोनो काज-उद्यममे सभ तूर मिलि सम्हारि दै छी। गरीबोपर नजरि रखबै। सुबुधकेँ सुकनक बातक कोनो अर्थे ने लगलनि। पुछलखिन- ‘‘सुकन भाए, तोहर बात हम नहि बुझलिअह।’’ “लोक सभ कहलकहेँ जे रमाकान्त कक्का अपन सभ खेत गरीब-गुरबाकेँ दए देथिन, जे अहीं बँटबै।’’ सुकनक बात सुनि सुबुध मने-मन सोचै लगलथि जे जमीन-जएदादक सवाल अछि। धड़फड़ा कऽ कोना हेतैक। जँ आम लोकक बीच विचार कएल जाएत तँ हो-हल्ला हेतै। हो-हल्ला भेने काजो बिगड़ि जएतैक। तेँ असथिरसँ विचार करैक जरुरत अछि। मुदा अखन जँ सुकनकेँ ई बात कहबै तँ दुख हेतैक। तेँ आशाक बात कहब अछि। कहलखिन- ‘‘सुकन भाए, जखन गरीबक बीच खेतक बँटवारा हैत तँ तोहूँ गरीबे छह। तखन तोरा किएक ने हेतह। अखन जाह।’’ सुकन बिदा भेल। कलक आगूमे ठाढ़ भए सुबुध सोचै लगलाह। अजीब स्थिति भए गेल। एक दिशि गरीबक सबाल अछि। जँ कनियो चूक हैत तँ जिनगी भरि बदनामीक मोटरी माथपर चढ़ि जाएत। तेँ इमानदारीक जरुरत अछि। मुदा इमानदारी दिशि तकै छी तँ अपनोमे बेइमानी घुसल अछि। परिवारोमे तहिना देखै छी आ समाजोमे तँ अछिये। गरीबोमे देखै छी जे, जे मेहनती अछि ओ बहुत किछु कमा कऽ बनाइयो नेने अछि। जना रहैक घर, पानि पीबैक कल, जीबैक लेल बटाइ खेतीक संग पोसिया मालो-जाल खूँटापर रखने अछि। जहनकि जे आलसी अछि ओकरा सब कथूक अभावे छैक। ततबे नहि जँ हम इमनदारियोसँ विचार रखै चाहब तैयो उलझन होएत, हमही टा तँ नहि छी। आरो गोटे रहताह। सभक नेत सभक प्रति एक्के रंग हेतनि, सेहो बात नहि अछि। जँ कियो मूह देखि मंूगबा बँटताह, सेहो भए सकै अछि। ओहि ठाम जँ हुनका कहबनि तँ हमरे बात मानि लेता, सेहो संभव नहि अछि। जँ रमाकान्त कक्का ककरो बेसी दिअए चाहथिन तँ की कहबनि, सम्पत्ति तँ हुनके छिअनि। एहि सभ विचारक जंगलमे सुबुध बौआए लगलथि। दतमनिक घुस्सा कखनो चलैत आ कखनो बन्न भए जाइत छलनि। एक तँ भरि रातिक जगरना तहि परसँ अमरलत्ती जेकाँ ओझरी केँ सोझराएब असान नहि बुझि पड़नि, कनियो किम्हरो जोर पड़त तँ टन दऽ टुटि जाएत। तेँ समाजक मूल रोगकेँ जड़िसँ नहि पकड़ल जाएत तँ सभ गूड़ गोबर भए जाएत। तहि बीच मुनमा डाबामे दूध नेने सुबुधक आंगन जाए डाबा रखि, सुबुध लग आबि दुनू हाथ जोड़ि कहलकनि- ‘‘भाए, अबलोपर दया करबै?’’ एक तँ सुबुधक मन अपने घोर-घोर भेल, तहि परसँ लोकक पैरबी। मन मसोसिकेँ सुबुध कहलखिन- ‘‘अखन जाह। जखन जमीनक बँटवारा हुअए लगतै तँ तोरो बजा लेबह।’’ दतमनि कए सुबुध आंगन जाए पत्नीकेँ पुछलखिन- ‘‘डाबामे मुनमा की नेने आएल छल?’’ “दूध।’’ “दाम देलिऐ।’’ “नहि।’’ “किएक? ’’ “हमरा भेल जे अहीं पठेलौं, तेँ।’’ पत्नीक जबाव सुनि सुबुधक मनमे आगि लगि गेलनि। खिसिया कऽ पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘झब दे चाह बनाउ। स्कूल जाएब।’’ पत्नी- ‘‘अखने किअए जाएब? आन दिन खा कऽ जाइ छलौं आ आइ भोरे किअए जाएब? ’’ “रौतुका खेलहा ओहिना कंठ लग अछि। तेँ नहि खाएब।’’ कहि सुबुध लुंगी बदलि धोति पहिरए लगला आकि पत्नी चाह नेने एलखिन। कुरता पहीरि चाह पीबि सुबुध बिदा भेलाह। जिनगी भरिमे रमाकान्तकेँ एहन निन्न कहियो नहि भेल छलनि जेहन राति भेलनि। समएक अन्दाजसँ जुगेसर आबि खिड़की देने हुलकी देलक तँ देखलक जे रमाकान्त ठर्र पाड़ैत छथि। रमाकान्तकेँ सुतल देखि जुगेसर जोरसँ केबार ढ़कढकौलक। केवारक अबाज सुनि रमाकान्त आखि मलैत उठलाह। जुगेसर रमाकान्तकेँ उठा चाह अनै आंगन गेल। रमाकान्तो उठि कऽ कलपर जा कुरुड़ केलनि। ताबे जुगेसरो चाह नेने आबि गेलनि। रमाकान्त चाह पीबितहि रहथि आकि मनमे एलनि जे बाबा चाणक्य ठीके कहने छथि जे धन ककराले रक्खी। हमरो तँ पितेजीक अरजल छी। जाधरि ओ जीबैत छलाह, हमरा कोनो मतलब नहि छल। मुदा हुनका मुइने तँ सभटा हमरे भेल। दुनू बेटा तते कमाइत अछि जे अइ धनक ओकरा जरुरते नहि छैक। हम कते दिन जीबे करब। तहन तँ सभ धन ओहिना नष्ट भए जाएत। कौआ-कुकुड़ लूझि-लूझि खाएत। तहिसँ नीक जे समाजक गरीब-गुरबाकेँ दए दिअए। जहिना तिब्बतक ८म-९अम शताब्दीक राजकुमार चेन पो अपन सभ सम्पति लोकक बीच बाँटि देलखिन, तहिना हमहूँ बाँटि देबइ। तहिसँ समाजमे भाइ-भैयारीक संबंध सेहो मजगूत बनतैक। आइ जँ व्यास बाबा जीबैत रहितथि तँ ओ जरुर बिना कहनहुँ आबि कऽ असिरवाद दैतथि। अगर स्वर्ग जेबाक रस्ता तियागो होए तँ हमहूँ किएक ने जाएब। धन्यवाद सुबुध आ मास्टर सहाएबकेँ दिअनि जे हमर अज्ञानताक केबार खोललनि। सभ जखन सुनत तँ मने-मन खूब खुशी हएत। की हमर कएल धरम ओकरा नहि हेतैक? चाह पीबि, पान खा लोटा लए रमाकान्त गाछी दिशि चललाह। किसुनभोग आमक गाछ तर लोटा रखि, टहलि-टहलि गाछ सभकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगलाह। गाछक जे रुप आइ रमाकान्त देखथि ओ आइ धरि कहियो नहि देखने रहथि। गाछ देखि बुझि पड़नि जे सभ हँसि रहल अछि। धरतीक शक्ति पाबि ऐश्वर्यवान बनल अछि। दोसराक सेवा लेल उत्साहित अछि। एक टकसँ गाछक रुप देखि रमाकान्तक हृदय सेहो गद-गद भऽ गेलनि। गाछ सभकेँ देखि लोटा उठा पाखाना दिशि बढ़लाह। तहि बीच जए-जएकारक आवाज सुनलखिन। आवाज दूरमे रहै तेँ स्पष्ट नहि बुझैत, मुदा सुनथिहिन। रसे-रसे आवाज लग अबैत गेलनि। पैखानासँ उठि ओ आवाजकेँ अकानए लगलथि। जए-जएकारक संग अपनो नाम सुनथिहिन। अपन नाम सुनि आरो चौकन्ना भए कानक पाछूमे हाथक तरहत्थी रखि अवाज अकानै लगलथि। लोकक समूह जते लग अबैत जाइत, तते अवाज स्पष्ट होइत जाइत छलैक। हाँइ-हाँइ कऽ लोटा नेने पोखरिक घाटपर आबि, कुरुड़ कए घर दिशि बिदा भेलाह। अपन नामक संग जए-जएकार सुनि सोचै लगलाह जे की बात छिऐक? किएक लोक जए-जएकार कए रहल अछि। दिलक धड़कन सेहो तेज हुअए लगलनि। मनमे गुदगुदी सेहो लगनि। उत्साहसँ छाती सेहो फुलैत जाइनि। जाबे लोकक जुलूस घर लग पहुँचल, तहिसँ पहिनहि दरबज्जापर आबि, देखै लगलथि। हीरानन्द आ शशिशेखर सेहो दलानक आगूमे ठाढ़ भए देखैत छलाह। की बूढ़, की जुआन, की बच्चा सभ एक्के सुरमे। सभ मस्त। सभ उत्साहित। सभ नचैत। सबहक मूहमे हँसी छिटकैत छलैक। दरबज्जाक आगूमे जुलूस आबि कऽ रुकल। आगू-आगू घोड़ाक नाच। पाँच गोरे, बाँसक बत्तीकेँ ललका कपड़ासँ सजा, घोड़ा बनौने। पाँचो घोड़े जेकाँ दौगैत। कखनो हीं-हीं करैत तँ कखनो पाछूसँ चौतार फेकैत। तहि पाछू डफरा-बाँसुरीक धुन। वसन्तक बहार छिड़िअबैत रहए। तहि पाछू लोक नचबो करैत आ जय-जयकाराे करैत रहए। रमाकान्त अपन उत्साहकेँ रोकि नहि सकलाह। दलानक ओसारसँ उतड़ि सोझे जुलूसमे सन्हिया नचै लगलाह। के छोट, के पैघ, के बूढ़, के जवान, सभ बाढ़िक पानि जेकाँ उधिआइत रहए। घर-घरसँ स्त्रीगण सेहो आबि चारु कात पसरि गेलीह। आंगनसँ श्यामा आबि दरबज्जाक आगूमे ठाढ़ भए नाचो देखैत आ रमाकान्तोपर आखि गरौने छलीह। रमाकान्तोकेँ नचैत देखि ओ मने-मन सोचै लगलीह जे एना किएक भए रहल अछि। लोक सभकेँ कोनो चीजक खुशी हेतै तेँ नचैत अछि। मुदा िहनका की भेटलनि जे एना बुढ़ारीमे कुदैत छथि। छोट बुद्धि श्यामाक, तेँ बुझबे नहि करैत जे धार जखन समुद्रमे मिलै लगैत अछि, तखन दुनूक पानि एहिना नचैत अछि। एक दिशि नदीक पानि गतिशील होइत, तँ दोसर दिशि समुद्रक असथिर होइत अछि। ओहिमे सिर्फ लहरि उठैत अछि। अखन धरिक जुलूस आ नाच गामक उत्तरबारि टोलसँ आएल छलैक। दछिनबारि टोलसँ दोसर जुलूस, मोर-मोरनीक नाचक संग सेहो पहुँचल। दुनू नाचक बीच सौंसे गामक लोक हृदय खोलिकेँ नचैत। कातमे ठाढ़ भेल हीरानन्द, शशिशेखरकेँ कहलखिन- ‘‘अखन जे आनन्द अछि ओ समाजमे सभ दिन कोना बनल रहत?’’ हीरानन्दक प्रश्नक उत्तर शशिशेखरकेँ नहि फुरलनि। मुदा प्रश्नक पाछू मन जरुर दौड़लनि। गंभीर प्रश्न। तेँ धाँए दऽ उत्तरो देब शशिशेखर उचित नहि बुझि चुप्पे रहलाह। मुदा एते बात जरुर मनमे अबैत रहनि जे जँ सुकर्मक रस्तासँ मनुष्य उत्साहित भए चलैत रहत, तँ जरुर एहने आनन्द जिनगी भरि चलैत रहतैक। जुलूसक बीच रमाकान्त नचैत-नचैत घामे-पसीने तर-बत्तर भए गेल रहथि। मुदा तैयो मन नचैले उधकैत रहनि। एकटा छौंड़ा, जे अखरहो देखने, नचैत-नचैत रमाकान्त लग आबि दुनू हाथे पजिया कऽ रमाकान्तकेँ उठा कन्हापर लए नचै लगल। सभ कियो दुनू हाथे थोपड़ी बजबैत जए-जएकार करै लगल। कातमे ठाढ़ भेल हीरानन्दकेँ भेलनि, जे कहीं ओ खसि-तसि नहि पड़थि, तेँ लफड़िकेँ बीचमे जाए रमाकान्तकेँ डाँड़ पकड़ि निच्चा केलकनि। निच्चा उतड़ितहि रमाकान्त दुनू हाथे थोपड़ी बजबैत फेर नचै लगलथि। दुनू हाथ उठा कऽ हीरानन्द सभकेँ शान्त होइ लेल कहलखिन। हाथक इशारा देखि सभ शान्त भए गेल। धोतीक खूँटसँ रमाकान्त पसीना पोछि कहै लगलखिन- ‘‘अहाँ सभक बीच कहै छी जे, जे खेत-पथार आइ धरि हम्मर छल, अखनसँ ओ अहाँ सबहक भए गेल।’’ रमाकान्तक बात सुनि सबहक मूहसँ धानक लावा जेकाँ हँसी भरभरा गेल। जे समाज आर्थिक विपण्णताक चलैत अखन धरि मौलाइल छल ओहिमे खुशीक नव फुल फुलाए लगल। सभ केयो हँसी-चौल करैत अपन-अपन घर दिस बिदा भेल। घरसँ निकलि सुबुध सोझे अपन डेरा गेलाह, डेरामे पहुँचि त्याग-पत्र लिखलनि। मेसबलाकेँ सभ हिसाब फड़िछा स्कूल जाए प्रध्यानाध्यापककेँ त्याग पत्र दैत कहलखिन- ‘‘मास्टर साहेब, आइसँ सेवामे सहयोग नहि कए सकब।’’ कहि आॅफिससँ निकलै लगलाह। आॅफिससँ निकलैत देखि कुरसीसँ उठि प्रध्यानाध्यापक कहलखिन- ‘‘सुबुध बाबू, कने सुनि लिअ।’’ हेडमास्टरक आग्रह सुनि सुबुध रुकि गेलाह। मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘की कहलौं मास्साहेब?’’ हेडमास्टरक छातीक धड़कन तेज होइत जाइत छलनि। तेँ बोलीक गति तेज हुअए लगलनि। कहलखिन- ‘‘सुबुध बाबू, अहाँ जल्दीबाजीमे निर्णय कए लेलहुँ। अखनो कहब जे अपन कागज वापस लए लिअ।’’ निशंक आ गंभीर स्वरमे सुबुध कहलकनि- ‘‘मास्सैब, आइ धरि अहाँ सबहक संग रहलहुँ, मुदा आब हम बैरागीक संग जाए रहल छी। तेँ एक्को क्षण एतए अटकैक इच्छा नहि अछि। एक्को पाइ हमरा दुख नहि भए रहल अछि। व्यक्तिगत जिनगी बना अखन धरि जीलहुँ, मुदा आब सामाजिक जिनगी जीबैक लेल जा रहल छी। तेँ अपनहुँसँ आग्रह करब, जे असिरबाद दिअ।’’ एक दिशि सुबुधक मुखमंडल नवज्योतिसँ प्रखर होइत जाइत, तँ दोसर दिस हेडमास्टरक मुखमंडल मलिन होइत जाइत छलनि। सुबुधक त्यागपत्रक समाचार शिक्षकक बीच सेहो पहुँचल। सभ शिक्षक अपना कोठरीसँ उठि हेडमास्टरक चेम्बरमे पहुँचि गेलाह। दुनू हाथ जोड़ि सुबुध सभकेँ कहलखिन- ‘‘भाए लोकनि, आइ धरिक जिनगी, संगे-संग बितेलहुँ, तहि बीच जँ किछु अधला भेल हुअए, ओ बिसरि जाएब। आइ धरि किताबी ज्ञानक बीच ओझराएल छलहुँ, मुदा आब ओहि ज्ञानकेँ व्यवहारिक धरतीपर उताड़ै जाए रहल छी।’’ जहिना सूर्योदयसँ पूर्व थलकमल उज्जर रहैत, मुदा सूर्यक रोशनी पाबि धीरे-धीरे लाल हुअए लगैत अछि तहिना सुबुधक हृदय समाजक प्रखर रोशनीक प्रवेशसँ हृदय बदलि गेलनि। कहि सुबुध तेज गतिसँ स्कूलक ओसारसँ निच्चा उतरि गेलाह। सुबुधक तेज चालि देखि विवेक बाबू सेहो नमहर-नमहर डेग बढ़बैत सुबुध लग आबि कहलखिन- ‘‘सुबुध भाए, अहाँ जे किछु केलहुँ, अपन विचारक अनुकूल केलहुँ। तेँ ओहि संबंधमे हमरा किछु कहैक नहि अछि। किएक तँ जहिया स्कूलमे नोकरी शुरुह केलहुँ आ जते बुझै छेलिऐक, ओहिसँ बेसी आइ जरुर बुझै छिऐक, तेँ ओहि दिनक विचारक अनुरुप केलहुँ आ आइ औझुका विचारक अनुकूल कए रहल छी। मुदा हमर अहाँक संबंध सिर्फ शिक्षकेक नहि अछि, बल्कि विद्यार्थियोक अछि।’’ सुबुध आ विवेक हाइये स्कूलसँ संगी। हाइ स्कूलसँ कओलेज धरि दुनू गोटे संगे-संग पढ़ने रहथि। मुदा विवेकसँ सुबुध तीन दिन जेठ रहथि। जे बात सुबुधोकेँ आ विवेकोकेँ बुझल छलनि। स्कूलोमे आ कओलेजोमे सुबुध विवेकसँ नीक विद्यार्थी रहथि। तेँ विवेकसँ अधिक नम्बर परीक्षामे सुबुधकेँ अबैत रहनि। ओना दुनू एक्के डिवीजनसँ पास करैत छलाह, मुदा अंकमे किछु तरपट रहैत छलनि। विवेक सुबुधकेँ सीनियर बुझैत छथि। जेकर उदाहरण अछि, जे जहि दिन दुनू गोटेक बहाली स्कूलमे भेल छलनि, ओहि दिन सभ कागजात विवेकक अगुआएल रहितहुँ स्वेच्छासँ विवेक सुबुधकेँ तीन नम्बर शिक्षक आ अपनाकेँ चारि नम्बर शिक्षकक लेल हेडमास्टरकेँ कहने रहथिन। जकरा चलैत सुबुधक बहालीक चिट्ठीक समए बदलि हेडमास्टर रजिस्टर मेनटेन केने रहथि। विवेकक प्रति सुबुधक हृदयमे ओएह स्नेह रहनि। दुनू गोटे विवेकक डेरा अएलाह। डेरामे अबितहि विवेकक पत्नी चाह बना, दुनू गोटेक आगूमे दए बैठकखानासँ निकलि खिड़की लग ठाढ़ भए गेलीह। एक जिनगीक टूटैत संबंधसँ कपैत हृदय विवेक बाबूक। थरथराइत स्वरमे पुछलखिन- ‘‘एक्को दिन पहिने तँ ई बात नहि बाजल छलहुँ ! अनायास एहेन निर्णय कोना कए लेलिऐक?’’ मुस्कुराइत सुबुध उत्तर देलखिन- ‘‘पहिनेसँ नियार नहि छल। एहि बेरि जे गाम गेल छलहुँ तखन भेल। जहिना देव-असुर मिलि समुद्र मंथन केने रहथि, तहिना समाजक मंथनक परिस्थिति बनि गेल अछि। जहि लेल हमरो जरुरत समाजकेँ छैक। समाजक पढ़ल-लिखल लोक तँ हमहुँ छी, तेँ अपन दायित्व पूरा करैक लेल नोकरी छोड़लहुँ। महान् जिनगीक लेल सेवा जरुरी होइत अछि। जँ नोकरीकेँ सेवा कहल जाए तँ खेतमे काज करैबला बोनिहारकेँ की कहबैक? किएक तँ बोनि-मजूरी लेल ओहो काज करैत अछि आ नोकरीयो केनिहार। मुदा पेटक, जिनगीक लेल तँ कमेबो जरुरी अछि। जँ से नहि करब तँ खाएब की आ दोसरकेँ खुएबै कोना ? भूखलकेँ भोजन चाही। चाहे ओ अन्नक भूखल हुअए वा ज्ञानक। तेँ चाहे नोकरी होए वा आन उपारजनक काज, ओहिकेँ इमानदारीसँ निमाहैत, आगू बढ़ि किछु करब, चाहे ज्ञानक क्षेत्र होए वा जीवनक, भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, शिक्षा, ओ सेवा होइत। ज्ञानक सेवा ताधरि अपन महत्वक स्थान नहि पबैत, जाधरि ओ जीवनसँ जुड़ि कर्मक रुप नहि लैत अछि। सिर्फ वैचारिके धरातलसँ होइत तँ मिथिलामे महान्-महान् पैघ-पैघ विचारक, मनुष्यक उद्धार लेल रस्ता बतौलनि। मुदा अखनो समाजमे ओहन मनुक्ख अछिये जे हजारो बर्ख पूर्वमे छलैक। हँ, किछु आगुओ बढ़ल, इहो बात सत्य अछि। मुदा जे कियो बौद्धिक, आर्थिक- क्षेत्रमे आगू बढलथि ओ पछुआएलकेँ डेन पकड़ि आगू मुहे खिंचलनि वा पाछू मुहे धकेललनि। जँ बाँहि पकड़ि आगू मुहे खिंचै चाहितथि तँ एतेक जाति, सम्पद्राय, कर्मकांड पैदा करैक की प्रयोजन ? राजसत्ता आ समाजसत्ता- दुनू पछुआएल लोककेँ आरो पाछुए मुहे धकेललक।’’ एते कहि सुबुध उठि कऽ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘आब एक्को क्षण एहिठाम नहि रुकब। हमर बाट रमाकान्त कक्का तकैत होएताह। सुबुधकेँ दुनू बाँहि पकड़ि बैसबैत विवेक पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘झब दऽ थारी साठू। सुबुध भाए जेवा लेल धड़फड़ाइ छथि।’’ भोजन कए सुबुध विवेकक डेरासँ बिदा भए गेलाह। दुनू हाथ जोड़ि विवेक कहलकनि- ‘‘हमरोपर ध्यान राखब।’’ गामक सीमामे प्रवेश करितहि सुबुध घरक सुधि बिसरि गेलाह। साैँसे गाम परिवारे जेकाँ बुझि पड़ै लगलनि। एक टकसँ खेत, पोखरि, गाछी-कलम, खढ़होरि देखि मने-मन सोचै लगलथि, जँ एहि सम्पत्तिकेँ ढंगसँ आगू बढ़ाओल जाए, विकसित ढंगसँ कएल जाए तँ निसचित गामक लोकमे खुशहाली ऐबे करत। अखन धरि जहिना खेत मरनासन्न भए गेल अछि, तहिना पोखरि-झाखड़ि सेहो अछि। सभसँ पैघ बात तँ ई अछि जे लोको दबैत-दबैत एते दबि गेल अछि, जे सिर्फ मनुक्खक ढाँचा मात्र रहि गेल अछि। तेँ सभमे नव चेतना, नव ढंग -करैक क्रिया- नव तकनीकक नव औजारक उपयोग आवश्यक अछि। तखने शिशिरक सिकुड़ल रुप बसन्तक विकसित रुपमे बदलि सकैत अछि। सोचैत सुबुध राजिनदरक घर लग पहुँचलाह। राजिनदरक घर देखि सुबुध रस्ता छोड़ि ओकरा ओहिठाम गेलाह। राजिनदरकेँ तीनटा घर। अंगनाक एकभागमे टाट लगौने रहए। दछिनबरिया घरमे मालो बन्हैत छल आ अपनो बैसार बनौने। बैसारमे दूटा चौकी देने रहए। एकटापर अपने सुतैत आ दोसरकेँ पाहुन-परकक लेल रखने रहए। सुबुधकेँ देखि राजिनदर चौकी परसँ उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाँहि पकड़ि चौकीपर बैसौलकनि। सुबुधकेँ चौकीपर बैसाए घरवालीकेँ दरबज्जे परसँ कहलक- ‘‘मास्टर सहाएब ऐला हेन, झब दे एक लोटा पानि नेेने आउ?’’ राजिनदरक बात सुनि गुलबिया लोटामे पानि नेने आबि ओलती लग ठाढ़ भए गेलि। मूह झँपने। स्त्रीकेँ ठाढ़ देखि राजिनदर कहलक- ‘‘हिनका नइ चिन्है छिअनि, सुबुध भाइ छथि। मूह किअए झँपने छी।’’ राजिनदरक बात सुनि सुबुध मुस्की दैत बजलाह- ‘‘हम तँ गाममे रहितहुँ अनगौआँ भए गेल छी। जहियासँ नोकरी शुरु केलहुँ, गाम छुटि गेल। सप्ताहमे एक दिन अबै छी जहिसँ गाममे घुरियो-फीरि नहि पबैत छी। तेँ नहि चिन्है छथि। मुदा आब गाममे रहै दुआरे नोकरी छोड़ि देलहुँ। आब चिन्हतीह।’’ सुबुधक बात सुनि राजिनदर स्त्रीकेँ कहलक- ‘‘सुबुध भाए पैघ लोक छथि। जखन दुआरपर पएर रखलनि, तखन बिना किछु खुऔने-पीऔने कना जाए देबनि। जाउ बाड़ीसँ ओरहाबला चारिटा मकैक बालि तोड़ि, ओड़ाहि कऽ नेने आउ।’’ राजिनदरक बात सुनि गुलबिया मुस्की दैत बिदा भेलि। राजिनदर सुबुधकेँ पूछल- ‘‘भाए नोकरी किअए छोड़ि देलिऐ?’’ राजिनदरक प्रश्नक सही उत्तर देब सुबुध उचित नहि बुझि कहलखिन- ‘‘नइ मन लागल। अपनो खेत-पथार अछि, आब खेतिये करब।’’ चारू ओड़ाहल बालि, नोन-मेरिचाइ थारीमे नेने गुलबिया आबि सुबुधक आगूमे रखि, अपने निच्चामे बैसि गेलीह। मकैक ओड़हा देखि सुबुध तिरपित भए एकटा बालि हाथमे लए गौरसँ दाना देखै लगलथि। सुभ्भर बालि, एक्कोटा दाना भौर नहि। बालिकेँ देखि कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर मकइ अछि। अपना ऐठामक गिरहत तँ उपजबितहि नहि अछि, जँ उपजौल जाएत, खूब हेतै। बेगूसराय, सहरसा आ मुजफ्फरपुर इलाकामे देखै छिऐ जे मकैयेक उपजासँ गिरहस्त धनिक भए गेल अछि। सालो भरि मकैक खेती होइत छैक। जहिना खेती तहिना उपजा। पाँच मन छह मन कट्ठा मकइ उपजैत अछि। खाइयोमे नीक। रोटी, सतुआ, भुज्जा, ओरहा सब कुछ मकैक बनैत अछि। बदाम आ मकैक सतुआ तँ बुझू जे बिनु दाँतबला बूढ़क अमृते छी।’’ वामा हाथमे बालि दहिना हाथक ओंगरीसँ दाना छोड़ा मूहमे लैत पुछलखिन- ‘‘राजिनदर भैया, बाल-बच्चा कैक टा अछि?’’ सुबुधक प्रश्न सुनि राजिनदर चुप्पे रहल मुदा गुलबिया बाजलि- ‘‘तीनि भाइ-बहीन अछि। जेठकी सासुर बसै अए। बड़बढ़िया जेकाँ गुजर चलै छै। दोसरोक बिआह केलहुँ। मुदा जमाए बौर गेल। दिल्लीमे नोकरी करैत रहै, ओतैसँ बौर गेल, ने एक्कोटा चिट्ठी-पुरजी पठबैए आ ने रुपैआ-टाका। छह मास बेटीकेँ सासुरमे रहै देलिऐ, तकर बाद अपने ऐठाम लए अनलिऐ। दिल्लीसँ जे कोए आबै आ पुछिऐ तँ कोए कहे दोसर बिआह कए लेलक, तँ कोए कहै अरब चलि गेल। कोए कहै मलेटरीमे भरती भए गेल तँ कोए कहै उग्रवादी भए गेल। कोनो भाँजे ने लागल। आखिरमे चारि बरिस अपना अइठिन बेटीकेँ रखलहुँ। मुदा गामोमे तेहेन लुच्चा-लम्पट सभ अछि जे अनका इज्जतकेँ कोनो इज्जति ने बुझै छै।’’ हाथक इशारा सँ देखबैत- “उ घर देखै छिऐ, ओहि अंगनाक एकटा छौँँड़ा कहियो माछ कीनिकेँ नेने आबए तँ कहियो फोटो खिचबैले संगे लऽ लए जाए। हम दुनू परानी बाध-बोनमे भरि-भरि दिन रहै छलौं। गामपरक खेल-बेल बुझबे ने करै छेलिऐ। जखन गामक लोक कुट्टी-चौल करै लगल तखन बुझलिऐ। जेठकी बेटी आएल रहए। ओकरा कहलिऐ। ओ अपने संगे नेने गेलै। दोसर विआह अइ दुआरे नै करिऐ जे जँ कहीं जमाए जीविते हुअए। फेर जेठके जमाएसँ बिआह कए लेलक। दुनू बहीन एक्के घरमे रहै अए। दुनूकेँ सखा-पात छौ। छोट बेटा अछि। ओकरो विआह-दुरागमन कए देलिऐ।’’ मुस्कुराइत सुबुध पुछलखिन- ‘‘दान-दहेजमे की सभ देलक?’’ दान-दहेजक नाम सुनि गुलबिया हँसैत कहै लगलनि- ‘‘समैध अपने ऐला। संगमे सार -लड़कीक माम- रहनि। दुआरपर अबिते भोला बापक पुछाड़ि केलनि। हम चिपड़ी पथैत रही। नुआक फाँड़ बन्हने रही। माथ परक साड़ी पसरिकऽ गरदनिपर रहए। दुनू हाथमे गोबर लागल रहै। कना गोबराएल हाथे साड़ी सम्हारितौं। तेँ ओहिना चिपड़ी पथैत रहि गेलहुँ। कोनो की चिन्हैत रहिऐ। ओहो तँ हमरा नहिये चिन्हैत रहथि। अनठिया ओहो आ अनठिया हमहूँ रही। ओहो मनुक्खे छथि आ हमहूँ मनुक्खे छी, तखन बीचमे कथीक लाज ?’’ गुलबियाक बात सुनि दाँत पिसैत राजिनदर कहलक- ‘‘आबो एक उमेरक भेलि, तैयो समरथाइक ताव कम्म नै भेलै अए। जेे मनमे अबै छै, बकने जाइ अए।’’ राजिनदरक बातकेँ दबैत बाजल- ‘‘कोनो की झूठ बात बजै छी, जे लाज हएत। मास्टर बौआ की कोनो अनगौआँ छथि। जे रस्ते-रस्ते ढोल पीटताह।’’ बिच-बचाव करैत सुबुध कहलखिन- ‘‘तकर बाद की भेल?’’ ‘‘ताबे इहो –पति- आएल। दुनू गोरेकेँ चौकीपर बैसाए गप-सप करै लगलथि। हमरो गोबर सठि गेल। चलि गेलहुँ। हाथ-पएर धोए पछबरिया टाट लग ठाढ़ भए, गप-सप सुनै लगलौं। लड़कीक माम उचक्का जेकाँ बुझि पड़ै। मुदा बाप असथिर बुझि पड़ल। बेचारा बड़ सुन्नर गप्प बाजलथि। ओ कहलकनि जे देखू अहाँक बेटा छी आ हम्मर बेटी। दुनियामे जते लोक अछि ओ अपने बेटा-बेटी लेल सबकुछ करै अए। जहिना अहाँ छी तहिना तँ हमहूँ छी। जहिना अपन नून-रोटीमे अहूँ गुजर करै छी तहिना हमहूँ करै छी। कौआसँ खैर लुटाएब मुरुखपना छी। हमरे एकटा पितिऔत सार अपन बेटाक विआह केलक। एक लाख रुपैआ नगद नेने रहए। तते लाम-झामसँ काज केलक जे अपनो जे बैंकमे साठि हजार रुपैआ रहै, सेहो सठि गेलै। हम ओहन काज नइ करब। बेटी-जमाइकेँ एकटा चापाकल गड़ा देबै। दू कोठरीक मकान बना देबै। एक जोड़ा गाए ली वा महीस से देब। दुनू गोटेकेँ लत्ता-कपड़ा, बरतन-बासन, लकड़ीक सभ आवश्यक सामानक संग बिआहक खर्च करब। अहाँकेँ एहि दुआरे नहि खर्च कराएब जे, जे खर्च भए जेतै ओ तँ ओही दुनूक जेतै की ने। हमरा पसिन्न भए गेल। मन कछ-मछ करै लगल जे सूहकारि ली। मुदा पुरुखक बीच गप चलैत रहै। मनमे इहो हुअए जे जँ कहीं कोनो बाते दुनू गोरेमे रक्का-टोकी भऽ गेल तखन तँ कुटुमैतियो नइ हएत। मन कछ-मछ करै लगल। एक बेर खोंखी केलहुँ जे ओ –पति- आबए, मुदा से नइ भेल। तखन दुनू हाथे थोपड़ी बजेलहुँ। तैयो सैह। आब की करितहुँ ? काज पसिन्नगर अछि, मुदा जँ कही कोनो बाधा उपस्थित भए गेल तखन तँ सभ नाश भऽ जाएत, मूह उघारनहि हम दुआरपर गेलहुँ। आगूमे ठाढ़ भए हिनका कहलिऐनि- ‘‘भैया, बड़ सुन्नर बात समैध कहै छथुन, भोलाक बिआह कए लाए।’’ कहि चोट्टे घुमिकेँ आंगन आबि शरबत बनेलहुँ। अपने सँ जा कऽ तीनू गोटेकेँ पिऐलहुँ। कुटमैती पक्का भए गेल। बिआह भए गेलै।’’ तहि बीच चारु बाइलो सुबुध खा लेलनि। पानि पीबि घर दिसक रस्ता पकड़लनि। थोड़े दूर आगू बढ़लापर मनमे अबै लगलनि, घर पर जाइ आकि रमाकान्त काका ऐठाम। दुबट्टी लग ठाढ़ भए गुनधुन करै लगलथि। एक मन होनि जे भरि दिनक थाकल छी, कने आराम करब जरुरी अछि। तेँ घरपर जाएब जरुरी अछि। दोसर मन होनि जे एहि जुआनीमे जँ आराम करब तँ जिनगी छुटत। फेर मनमे भेलनि जे नोकरी छोड़ैक समाचार घर पहुँचाएब जरुरी अछि। तत्-मत् करैत रमाकान्त घर दिसक रस्ता छोड़ि मलहटोलीबला एकपेड़िया पकड़ि घर दिस बढ़लाह। घर लग अबितहि सभ किछु बदलल-बदलल बुझि पड़लनि। जना सभ किछु खुशीसँ मस्त हुअए। दरबज्जाक चुहचुही सेहो नीक बुझि पड़ै लगलनि। दुआरपर आबि कुरता खोलि चौकीपर रखि पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘कने एक लोटा पानि नेने आउ। बड़ पियास लगल अछि।’’ पतिक आवाज सुनि लोटामे पानि नेने आएलि किशोरीक हाथसँ लोटा लए लोटो भरि पानि पीबि, पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘आइसँ नोकरी छोड़ि देलहुँ विद्यालयमे त्यागपत्र दए देलहुँ।’’ पतिक बात सुनि किशोरी चौंकि गेली। मुदा पति-पत्नीक बीच मजाको होइत छलनि। किशोरीकेँ सोलहन्नी बिसबास नहि भेलनि मुस्की दैत बजलीह- ‘‘नीक केलहुँ। आठ दिनपर जे भेंट होइ छलौं से दिन-राति भेंट होइते रहब। हमरो नीके।’’ किशोरीक बात सुनि सुबुधक मनमे भेलनि जे भरिसक ओ समाचारकेँ मजाक बुझलनि। दोहरबैत कहलखिन- ‘‘अहाँ मजाक बुझै छी। सत्य बात कहलौं।’’ जेबीसँ त्यागपत्रक नकल निकालि- “हे देखियौ कागज।’’ तहि बीच मंगल सेहो आएल। मंगलकेँ देखि किशोरी ससरि गेलीह। मुस्कुराइत सुबुध मंगलकेँ कहलखिन- ‘‘काका, नौकरी छोड़ि देलहुँ। आब गामे रहि खेतियो-पथारी करब आ जहाँ धरि भए सकत समाजक सेवा करब।’’ सुबुधक बात सुनि मंगल कहलकनि- ‘‘बौआ, हम तँ उमेरेमे ने अहाँसँ जेठ छी, मुदा अहाँ पढ़लो-लिखल छी, मास्टरियो करै छी, तेँ नीके जानि कऽ ने नोकरी छोड़ने हैब।’’ मंगलक बात सुनि सुबुधक मनमे सवुर भेलनि। मुस्की दैत बजलाह- ‘‘कक्का जाधरि पढ़ल-लिखल लोक समाजमे रहि समाजक क्रिया-कलापकेँ आगू मुहे नहि धकेलत ताधरि समाज आगू कोना बढ़त।’’ सुबुध आ मंगल गप-सप करतहि रहथि आकि किशोरी आंगनमे अड़राहट मारि कानै लगलीह। सुबुध बुझि गेलाह तेँ असथिरसँ बैसले रहलाह। मुदा अकलबेराक कानब सुनि टोलक जनिजाति दौड़ि-दौड़ि आबए लगलीह। सौँसे आंगन जनि-जातिसँ भरि गेलनि। नवानीवाली किशोरीकेँ पुछलखिन- ‘‘कनियाँ की भेल हेन जे एना अकलबेरामे कनै छी?’’ मुदा किछु उत्तर नहि दए किशोरी आरो जोर-जोरसँ कनै छलीह। टोलक जते बहिना, फुल, पान, गुलाब, कदम, चान, पार्टनर किशोरीक छलनि सभ केयो एक्केटा प्रश्न पूछैत छलनि जे- ‘की भेल?’ जते संगी-साथी सभ किशोरीसँ पूछै छलनि तते किशोरी जोर-जोरसँ कनैत छलीह। ककरो कोनो अर्थे नहि लगैक। मुदा अनुमानक बजार तेज होइत जाइत छल। कियो किछु बुझैत तँ कियो किछु। दरबज्जापर बैसल-बैसल सुबुध मने-मन खुशी होइत रहथि। सोचैत रहथि जे जाधरि पुरना चालि-ढालिक लोकक -चाहे मरद हुअए वा स्त्रीगण- चालि नहि बदलत ताधरि नव समाज कोना बनि सकैत अछि ? ई प्रश्न तँ सिर्फ समाजेक लेल नहि परिवारोक लेल छैक। आ परिवारे किअए मनुक्खोक लेल छैक। तँे सुबुध किछु बजबे नहि करथि। अकलबेराक समए रहबे करए। बाध दिशिसँ गाय, महीस, बकरी चरि-चरि अबैत रहए। घसबहिनी घासक पथिया नेने अबैत छलि। गोबर बीछनिहारि गोबरक छितनी माथपर नेने अबैत छलि। बुधनी आ सोमनी, घासक छिट्टा माथपर नेने अबैत छलीह आकि सुबुधक अंगनामे कानब सुनलनि। दुनू गोटे अकानिकेँ बुझलनि जे सुबुधक कनियाँ कनै छथिन। सोमनी बुधनीकेँ कहलखिन- ‘‘बहीन, छिट्टा रखिकेँ चल देखैले।’’ बुधनी कहलक- ‘‘गै बहीन, अइ चमचिकनी सबहक भभटपन सुनि कऽ की करबीही। भरि दिन चाह-पान घोटैत रहै अए, बुझै अए जे एहने दुनिया छै। मरदकेँ किछु हुअए, मौगी सभ रानी छी। जाबे एतए बरदेमे ताबे गामेपर चलि जेमे। घास-भूसा झाड़ब, जरना-काठी ओरिआएब। थैर खरड़ब। बासन-कुसन धुअब आकि अइ भभटपनवालीक भभटपन सुनब।’’ सोमनी मुड़ी ड़ौलबैत बाजलि - ‘‘बेस कहले बहीन। जकरा जते सुख होइ छै ओ ओते कनै अए। अपने सभ नीक छी, जे कमाइ छी खाइ छी। चैनसँ रहै छी। अइ ललमुही सबहक किरदानी सुनबीही तँ हेतउ जे मुहेपर थुक दए दीऐ।’’ १० भरि दिन सुबुधक मनमे ईएह खुट-खुटी धेने रहलनि जे जाहि गामक लोकमे एते उत्साह बढ़ल अछि, ओहि गाममे जँ बिहाड़िक पूर्व हवा खसै तँ लोकक मनमे अनदेशे बढ़ि सकैत अछि। समाज छिऐ, के की बाजत की नहि बाजत, तकर कोन ठेकान। कियो कहि सकैत अछि जे, जते विचारक सभ अछि ओ पाइ-कौड़ीक भाँजमे कहीं टौहकी ने लगबैत हुअए। मुदा लोकक धाराकेँ रोकलासँ खतरो उपस्थित भए सकैत अछि। जहिना अधिक रफ्तार चलैत गाड़ीमे एकाएक ब्रेक लगौलासँ दुर्घटनो भए सकैत अछि, तहिना काजमे ढील-ढाल भेलापर भए सकैत अछि। ओना भरि दिन तँ अपने चक्करमे फँसल रहलौं, से के बुझत ? गामक लोक तँ गामक काजे भेलासँ बुझताह अचताइत-पचताइत सुबुध रमाकान्त ऐठाम बिदा भेला। मुन्हारि साँझ भए गेल छलैक। थोड़े दूर आगू बढ़लापर रस्ताक पछबारि भाग रतिया घरक आगूमे, पान-सात गोटे बैसि गप-सप करैत रहथि। एक गोटे अनुभवी जेकाँ बाजल जे - ‘‘खेतक बँटवाराक ढोल तँ रमाकान्त कक्का पीटि देलखिन, मुदा बँटै कहाँ छथिन। धनक लोभ ककरा नइ छै। ओ थोड़े खेत बँटथिन्ह। ई सभ सभ टा धनिक लोकक चालबाजी छिऐ। लोक थोड़े नीक-अधलाक विचार करै अए, जे सुनलक ओ कौआ जेकाँ काँए-काँए कए सगरे गाम बिलहि दैत अछि। मुदा तइसँ की, अगर जँ ओ खेत नहिये बँटथिन्ह तँ की लोक मरि जाएत ?’’ रस्तापर ठाढ़ भए सुबुध सुनलनि। दोसर बाजल - “जे अपने ठकि-फुसिया कऽ एते धन जमा केलक ओ सुहरदे मुहे थोड़े लोककेँ जमीन दए देतै। तखन तँ गरीबक कपारेमे दुख लिखल छै, से तँ भोगै पड़तै। केहेन निरलज्ज जेकाँ रमाकान्त नाचि-नाचि लोककेँ कहलकै।’’ एते सुनैत सुबुधक मनमे आगि लागि गेलनि। सोचै लगलाह जे भरि दिन तँ हमहूँ अनतै छलहुँ, गाममे ने तँ किछु भए गेलैक। मुदा बिना किछु बजनहि सुबुध आगू बढ़ि गेलाह। रमाकान्त एहिठाम पहुँचतहि हीरानन्द बाजि उठलाह- ‘‘जिनके चरचा करै छलौं से आबिये गेलाह।’’ रमाकान्त सुबुधकेँ कहलखिन- ‘‘कैक बेर तोरासँ गप करैक मन भेल, मुदा तोँ तँ भरि दिन निपत्ते रहलह। कतौ गेल छेलह की?’’ रमाकान्तक बात सुनि सुबुध कहलखिन- ‘‘भरि दिन एते व्यस्त रहलौं जे अखन फुरसति भेल। घरसँ बहार धरि परेशान-परेशान दिन भरि होइते रहलौं।’’ रमाकान्त- ‘‘की परेशान?’’ ‘‘काल्हि रातिमे जखन ओछाइनपर गेलहुँ तँ अहाँक कहलाहा बात मन पड़ल। मन पड़ितहि पेटमे घुरिआए लगल। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत रहलौं। नीनो ने हुअए। अंतमे यैह मनमे आएल जे जहिना अहाँ अप्पन सभ सम्पति समाजकेँ दए देलिऐ, तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि, देहसँ समाजक सेवा करब। जहिना गाड़ी इंजिनक बले चलैत अछि, तहिना तँ समाजोमे इंजिनक जरुरति छैक। तहि बीच एकटा इतिहासक घटना मन पड़ल।’’ इतिहासक घटना सुनितहि उत्सुकतासँ हीरानन्द पूछि देल- ‘‘की बात मन पड़ल?’’ सुबुध बाजए लगलाह - ‘‘तिब्बतमे एकटा राजकुमार चेन-पो नामक भेलाह। ओ अपना राजमे धनी-गरीबक बीच खाधि देखलनि। ओहि खाधिकेँ पाटैक लेल अपन सब सम्पति प्रजाक बीच बाँटि देलखिन। मुदा किछुए दिनक उपरान्त फेर ओहिनाक ओहिना भए गेलै। धनिक धनिक बनि गेल आ गरीब गरीब बनि गेल। राजकुमार क्षुब्ध भए गेलाह, जे एना किएक भए गेलैक?’’ खिस्सा सुनि बिचहिमे शशिशेेखर पूछि देलकनि- ‘‘एना किएक भेलै?’’ ‘‘हम समाजशस्त्रक विद्यार्थी छी तेँ एहि बातकेँ जनैत छी। जाधरि व्यवस्था नहि बदलत ताधरि मनुक्खक जिनगी नहि सुधरत। तेँ हम अपन दायित्व बुझि नोकरी छोड़लहुँ। गामक गरीबसँ लऽ कऽ अमीर धरि आ बच्चासँ लऽ कऽ बूढ़ धरि गाम सबहक छिऐक। तेँ हम तिब्बत जेकाँ हूसल काज नहि करब।’’ रमाकान्तक मन पहिलुके प्रशंसा सुनि, कान नेने उड़ि गेलनि, राजकुमारक खिस्सा सुनबे नहि केलनि। मुदा हीरानन्दोक आ शशिशेखरोक धियान ओहि खिस्सामे घुमै लगलनि। तहि बीच जुगेसर चाह अनलक। सभ कियो चाह पीबै लगलाह। चाह पीबि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘देखू, हम अप्पन सभ खेत समाजकेँ दए देलिऐक। आब हमरा कोनो मतलब ओहि खेतसँ नहि अछि। मुदा एकटा बात जरुर कहब जे कोनो तरहक गड़बड़ी समाजमे नहि हुअए। सभकेँ खेत होए।’’ रमाकान्तक बात सुनि शशिशेखर अप्पन विचार रखलक- ‘‘गामक गरीब-लोकक परिवार जते अछि ओकरा जोड़ि लिअ आ खेतकेँ जोड़ि एक रंग कऽ बाँटि दियौ।’’ शशिक विचार सुनि हीरानन्द नाक मारैत कहलखिन- ‘‘ऊँ- हूँ।’’ मूहपर हाथ नेने सुबुध मने मन सोचैत जे कियो एहनो अछि जकरा घरारियो ने छैक। आ कियो एहनो अछि जकरा घरारीक संग दू कट्ठा धनखेतियो ने छैक। ककरो पाँचो कट्ठा छैक। जँ जमा सम्पतिमे एक रंगकेँ देल जाए तँ सभकेँ एक रंग कोना हेतै। एहि ओझरीमे सुबुध पड़ल रहथि। हीरानन्द सोचैत जे गरीबो तँ सभ एक रंग नहि अछि। कियो मेहनती अछि तँ कियो नमरी कोइढ़। कियो नशाखोर अछि तँ कियो सात्विक। गरीबोक स्थिति तँ विचित्र अछि। लेकिन मूल प्रश्न अछि समाजकेँ उपर उठबैक। सभकेँ गुम्म देखि रमाकान्त मूहमे पान लए जरदा फँकैत कहलखिन- ‘‘एना सभ गुम्म किअए छी? हम समाजक दाँव-पेंच तँ नहि बुझै छिऐ मुदा अहाँ सभ तँ पढ़ल-लिखल होशगर छी। तखन कियो किछु किअए ने बजै छी।’’ अपन बुद्धिक कमजोरी व्यक्त करैत हीरानन्द सुबुधकेँ कहलखिन- ‘‘भाए, जे सोचै छी ओ ओझरा जाइत अछि। तेँ अहीं सोझरबैत कहियौ।’’ गंभीर भए सुबुध कहै लगलखिन- ‘‘अप्पन समाज बहुत पछुआएल अछि। पछुआएल समाजमे घनेरो समस्या, समाढ़ जेकाँ, पकड़ने रहैत अछि। जे बिना समाधान केने आगू नहि ससरै दैत। मुदा समाधानो तँ कागजपर नक्शा बनौने नहि होएत। समस्या लोकक जिनगीकेँ चुड़ीन जेकाँ पकड़ने अछि। जहिना चुड़ीन लोकेक देहमे घोसिया अपन करामात करैत अछि तहिना समस्यो अछि। तेँ अखन मात्र दूटा सवालकेँ पकड़ू। पहिल, सभकेँ एक रंग खेत होए। आ दोसर खेतक संग-संग आरो जे पूँजी अछि ओकरो उपयोग ढंगसँ कएल जाए।’’ सुबुध बजितहि रहथि आकि बिचहिमे जुगेसर टभकि गेल- ‘‘मास्सैब, कनी बिकछाकेँ कहियौ। एना जे पौतीमे राखल वस्तु जेकाँ झाँपि कऽ कहबै, तँ हम सभ कना बुझबै।’’ जुगेसरक बातसँ सुबुधकेँ तकलीफ नहि भेलनि। मुस्कुराकेँ कहै लगलखिन- ‘‘ठीके अहाँ नहि बुझने होएब जुगे। नीक जेकाँ बिकछा कऽ कहै छी। देखियौ, सिर्फ खेते रहने उपजा नहि भए जाइ छैक। ओकरा उपजबै पड़ैत छैक। तामि-कोड़ि कए तैयार करै पड़ैत छैक। बरखा होए वा पटा कऽ बीआ पाड़ै पड़ैत छैक। बीआ जखन रोपाउ होइत छैक तखन उखाड़ि कऽ रोपल, कमठौन कएल जाइत छैक। तखन ने उपजा हएत। खेतक संग-संग मेहनत जे होएत से ने पूँजी भेलैक। मेहनत करैले ओजारोक जरुरत होइत अछि। ओजारोक नमहर इतिहास रहल अछि। शुरुमे लोक साधारण औजारसँ काज करैत छल। जेना-जेना औजारो उन्नति करैत गेल तेना-तेना लोकक हालत सुधरैत गेल। मुदा अप्पन गाम बहुत पछुआएल अछि। तेँ नव औजारसँ काज करब संभव नहि अछि। नव औजारक लेल अधिक पैसोक जरुरत होइत, जे नहि अछि। अखन साधारणे औजारसँ काज चलबै पड़त। जेना-जेना हालत सुधरैत जाएत, तेना-तेना औजारो सुधरैत जाएत।’’ सुबुधक बात सुनि जुगेसर भक दऽ निसाँस छोड़ि बाजल- “हँ, आब बुझलौं। सुआइत लोक कहै छै जे पढ़ि-लिखकेँ जँ हरो जोतब तँ सिराउर सोझ हएत।’’ हीरानन्द बजलाह- ‘‘बड़ सुन्दर बात कहलिऐक सुबुध भाइ। आब खेतक बँटवाराक संबंधमे कहियौक।’’ कनडेरिये आखिये हीरानन्दकेँ देखि सुबुध कहै लगलखिन- ‘‘हीरा बाबू, गाममे जते एक बीघा खेतसँ निच्चा बला गरीब लोक छथि हुनका सभकेँ एक-एक बीघा खेत भए जेतनि। सिर्फ रमाकान्ते कक्काबला जमीन टा नहि, हुनकर अपनो जमीन ओहिमे जोड़ा जेतनि। जना देखियौ जे किनको घरारियो नहि छन्हि, हुनका बीघा भरि खेत दिअए पड़त। मुदा जिनका पाँच कट्ठा छन्हि हुनका तँ पनरहे कट्ठा दिअए पड़त। ततबे नहि जिनका ओहूसँ बेसी छन्हि, हुनका आरो कम दिअए पड़त।’’ सुबुधक बात सुनि रमाकान्त ठहाका मारि बजलाह- ‘‘बड़ सुन्नर, बड़ सुन्नर। बड़ सुन्नर विचार सुबुधक छनि। आब रातियो बेसी भए गेल। खाइओ-पीबैक बेरि उनहि जाएत। रोटी गरमे-गरम खाइमे नीक होइ छै। तेँ आब गप-सप छोड़ू। काल्हि भोरे ढोलहो दए सभकेँ बजा लेबनि आ सबहक बीचमे अपन निर्णय सुना देबन्हि। खेत बटैक भार हुनके सभपर छोड़ि देबनि। नहि तँ अनेरे हो-हल्ला करताह।’’ भोरे ढोलहो पड़ल। एक तँ ओहिना सबहक कान ठाढ़ रहनि, तहि परसँ ढोलहो पड़ल घरा-घरी सभ पहुँचलाह। जहिना केस लड़निहार फैसला सुनैले उत्सुक रहैत अछि, तहिना बैसारमे सभ रहथि। अस्सी बरखक सोने बाबा सेहो आएल रहथि। ओना सोनेलाल बाबाकेँ अपने अढ़ाइ बीघा खेत छन्हि मुदा गाममे नब उत्सवक उत्साहसँ आएल छलाह। बैसले-बैसल ओ मूड़ी उठा कऽ देखि बजलाह- ‘‘कोनो टोलक कियो छुटलो छथि। सभ अपन-अपन टोलक लोककेँ गनि लिअ।’’ सोनेबाबाक गप सुनि सभ अपन-अपन टोलक लोक मिलबै लगल। सिर्फ दू आदमी बैसारमे नहि आएल छलाह। दुनू टोलक दू आदमीकेँ पठा दुनूकेँ बजौल गेलनि। दुनू आदमीकेँ देखितहि सोनेबाबा पूछि देलखिन- ‘‘तोरा दुनू गोटेकेँ ढोलकक अबाज कानमे नहि पहुँचल छलौ ?’’ बौका बाजल- ‘‘ढोलहो तँ बुझलिऐ। मगर नोकरी करै छी ने, ने माए-बाप अछि आ ने बहु, तखन खेत लऽ कऽ की करब? बिआहो होइते ने अछि। लोक ढहलेल बुझै अए। तखन अनेरे किअए अबितौं।’’ बौकाक बात सुनि सोनेबाबा मूड़ी डोला स्वीकार केलनि। आब दोसर गोसैमा बाजल- ‘‘हम दुनू परानी तँ बूढ़े भेलहुँ की ने। बेटा अछिये नहि। लऽ दऽ कऽ एकटा ढेरबा बेटी अछि। ओकरो बिआह अइ बेर कइये देबै। विआह हेतै, अपन घर जाएत। भोगिनिहार के रहत जे अनेरे हम खेत लेब।’’ गोसैमोक विचार सुनि सोनेबाबा मूड़ी डोला स्वीकार केलनि। बौका आ गोसाइ दुनू गोटेक बात सुनि सोनेबाबा सोचै लगलथि जे समाजमे दूटा परिवार कमि जाएत। तेँ दुनू परिवारकेँ तँ नहि बचाओल जाए सकैत अछि, मुदा दुनूकेँ जोड़ि कए एकटा परिवार तँ बनाओल जाए सकैत अछि। कहलखिन- ‘‘बौका तँ सिर्फ नामक अछि। केहेन बढ़ियाँ बजै अए। गोसाइओक बेटी आन गाम चलि जेतै। जहिसँ बाप-माए दुनू गोटेकेँ बुढ़ारीमे दुख हेतै। तेँ बौकाक विआह गोसाइक बेटीसँ करा देने एक परिवार भए जाएत।’’ सोनेबाबाक विचार सुनि अधासँ बेसी गोटे समर्थन कए देलक। मुदा किछु गोटे विरोध करैत बजलाह- ‘‘एक गाममे लड़का-लड़कीक विआहक चलनि तँ नहि अछि। जँ हएत तँ अनुचित हएत।’’ धड़फड़ा कऽ लखना उठि जोरसँ बाजल- ‘‘कोन गाम आ कोन समाज एहेन अछि जहिमे छौड़ा-छौड़ी छह-पाँच नहि करैत अछि। चोरा कऽ छह-पाँच केलासँ बड़बढ़िया, मुदा देखाकेँ करत से बड़ अधला हेतैक।’’ लखनाक विचारकेँ सभ सहमति दए देलनि। दुनूक विआहक बात पक्का भए गेल। सुबुधक मनमे फेर एकटा प्रश्न उठि गेलनि जे बौका आ गोसाइक दुनू परिवारकेँ एक मानि जमीन देल जाए वा दू मानि। तर्क-वितर्क करैत, मिला कऽ एक परिवार मानि हिस्सा दैक सहमति बनल। फेर प्रश्न उठल जे जमीनक नाप-जोख के करत ? रमाकान्त कहि देलखिन जे अपनेमे अहाँ सभ बाँटि लिअ।’’ सुबुधोक मनमे भेलनि जे रमाकान्त कक्का ठीके कहलनि। काजकेँ बाँटि कए नहि करब तँ गल्ती हएत। सभ काज जँ अपनहि करै चाहब तँ एते गोटे जे समाजमे छथि ओ की करताह। जँ कहीं कोनो गलतियो हेतै तँ सुधरि जेतै। कहलखिन- ‘‘खेत नपैक लूरि कते गोटेकेँ अछि? किएक तँ जँ अमीन लएकेँ बँटवारा करब तँ बहुत खर्च होएत। जे खर्च बँटैमे करब ओहि पैसासँ दोसरे काज किअए नहि कए लेब। पैसाक काज तँ बहुत अछि, तेँ अन्ट सन्ट खर्च नहि कए सुपत-सुपत खर्च करब नीक होएत। देखते छिऐ जे जहिना देशक संविधान ओकीलकेँ सालो भरि हरियरी देने रहैत अछि, तहिना तँ सर्वेओ अमीनकेँ अछि। कौआसँ खैर लुटाएब नीक नहि। जहिना अहाँ सभकेँ मंगनीमे खेत भेटि रहल अछि तहिना सही-सलामत हाथमे खेत चलि जाए। जँ अमीन सबहक भाँजमे पड़ब तँ ओहिना हैत जहिना लोक कहै छै ‘जतेमे बहु नहि ततेमे लहठी कीनब’।’’ सुबुधक बात सुनि, जोशमे बिलटा उठि कऽ ठाढ़ भए बाजल- ‘‘माघ माससँ लऽ कऽ जेठ धरि हम सभ खेत तमिया करै छी। कोनो एक्के साल नहि, सभ साल करै छी। सेहो कोनो आइयेसँ नहि जहियासँ ज्ञान परान भेल तहियेसँ। कोन अमीन आ कमिश्नर नपैले अबै अए। अपन गामक कोन बात जे चरिकोसीमे तमनी करै छी। ततबे नहि, नेपालो जा-जा तमै छी। ततबे नहि साले-साल नपैत-नपैत तँ सौँसे गामक खेत जनै छी, जे कोन खेत कतए अछि, तेँ नपैक जरुरतो ने अछि। मूहजबानिये कहि देब जे कोन कोला कते अछि। एक गोरे कागजपर लिखि लिअ जे ककरा कते खेत देबै। हमरा कहैत जाएब, हम कोला फुटबैत जाएब। एकटा पंडीजी, बड़बढ़िया नाम कहने रहथिन, मुदा मन नइ अछि, जे ओ तीनिये डेगमे दुनियाँकेँ नापि लेने रहथि। तहिना हमहूँ तीन डेगक लग्गी बना, एक गामक कोन बात जे परोपट्टाक जमीन नापि देब।’’ बिलटाक बात सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़बढ़ियाँ, बड़बढ़ियाँ।’’ सभ केयो उठि-उठि बिदा भेलाह। बेर झुकतहि सौँसे गामक स्त्रीगण, ढेरबा बचिया छोटका-छोटका ढेन-बकेन चिकनी माटिक खोभार दिशि बिदा भेल। सबहक हाथमे खुरपी-पथिया। सभकेँ हाथमे खुरपी पथिया नेने जाइत देखि श्रीचन मने-मन सोचै लगल जे एना किअए लोक कए रहल अछि। दसमिओ तँ अखन नहि एलै। कोनो पावनियो-तिहार नहिये छिऐक। तहन स्त्रीगणमे एना उजैहिया किअए उठि गेलै। कोन बुढ़िया जादू तरे-तर गाममे पसरि गेल जे मरद बुझबे ने केलक आ मौगी सभ बुझि गेल। अनकर कोन अपनो घरवाली रमकल जाइत अछि। जते श्रीचन सोचै ओते ओझरिये लगल जाए। तत्-मत् करैत रुदल ऐठाम बिदा भेल। रुदलक घर लगेमे। श्रीचने जेकाँ रुदलो छगुन्तामे पड़ल रहए श्रीचनकेँ देखितहि रुदल पूछि देलकै- ‘‘आँइ हौ श्रीचन भाइ, मौगी सभकेँ कथीक रमकी चढ़लै जे एते रौदमे माटि आनैले जाइये।’’ रुदलक बात सुनि श्रीचन आरो छगुन्तामे पड़ि गेल। मनमे एलै जे हम गामपर नइ छलौं तेँ नइ बुझलिऐक। मगर ई तँ गामेपर रहए। किअए ने बुझलकै ? फेर सोचलक जे जखन घरवाली माटि लऽ कऽ आओत तँ पूछि लेबै। मन असथिर भेलै। मुदा रुदलक मूहक रंगसँ बुझि पड़ै जे कत्ते भारी काज स्त्री बिना पुछिनहि कए लेलकै। भीतरसँ खुश मुदा उपरसँ गंभीर होइत श्रीचन रुदलकेँ पुछलक- ‘‘आँइ हौ रुदल भाइ, तोरा भनसियासँ मिलान नइ रहै छह, जे बिन पुछनहि चलि गेलखुन।’’ श्रीचनक मनक बात नहि बुझि खिसिया कऽ रुदल बाजल- ‘‘की कहिहऽ भाइ, मौगीपर विसबास नै करी। जखैन अपन काज रहतै तँ हँसि-हँसि बजतह, मुदा जखैन तोरा कोनो काज हेतह तँ कहतह जे माथ दुखाइ अए।’’ मूह दाबि श्रीचन मने-मन खूब हँसैत मुदा रुदल तामसे भेर होइत जाइत। बिदा होइत श्रीचन कहलकै- ‘‘जाइ छिअ भाइ। मौगी सबहक किरदानी देखि हमरा किछु फुरबे ने करै अए।’’ सह पाबि रुदल गरजि उठल- ‘‘बड़बुधियार मौगी सभ भए गेल हौ, चलै चलह तँ हमरा संगे कोदारि पाड़ए।’’ थोड़े दूर आगू बढ़ि श्रीचन रुकिकेँ कहलकै- ‘‘भाए की करबहक, आब मौगिये सबहक राज भेलै।’’ ‘‘हमरा कोन राज-पाटसँ मतलब अछि, हर जोतै छी, कोदारि पाड़ै छी, तीन सेर कमा कऽ अनै छी, खाइ छी। एते दिन पुरुखे चोर होइ छलै, आब मौगियो चोरनी हएत। भने जहल जाएत आ पुलिसबासँ यारी लगौत। श्रीचन बढ़ि गेल। रुदल, दुनू हाथ माथपर लए सोचै लगल। सभ केयो माटि आनि-आनि अपन-अपन अंगनाक माटिक ढेरीपर रखलनि। घामे-पसीने सभ तर-बत्तर रहथि। कने काल सुसतेलाक उपरान्त दिआरी बनबै लेल मुंगरी, लोढ़ीसँ माटि फोड़ै लगलीह। मेहीसँ माटि फोड़ि, इनार-कलसँ अछिनजल पानि भरि-भरि अनलनि। माटिमे पानि दए सानै लगलीह, सुखल माटिमे पानि पड़ितहि सोन्हगर सुगंध सौँँसे गाममे पसरि गेल। गामक हबे बदलि गेल। जहिना साझू पहर कऽ सिंगहार फूल, रातिरानीसँ वातावरण महमहा जाएत, तहिना माटि-पानिसँ जनमल सुगंध गामकेँ महमहा देलक। माटि सानि, छोट-छोट दिआरी सभ बनबै लागलि। दिआरी बना, पुरान साफ सूती वस्त्रकेँ फाड़ि-फाड़ि दहिना हाथक तरहत्थीसँ जाँघपर रगड़ि-रगड़ि टेमी बनौलनि। टेमी बना दिआरीमे कड़ू तेल दए टेमी सजौलनि। दिआरी सजा केयो फुलडालीमे तँ कियो चंगेरीमे तँ कियो छिपलीमे तँ कियो केराक पातपर रखलनि। दिआरी रखि सभ नहेलीह, अजीब दृश्य। नव उत्सव। नव जिज्ञासा। नव आशा सबहक मनमे छलनि। सुरुज डूबबो नेहि कएल, मुदा निच्चा जरुर उतरि गेल रहथि, गाछो सभपरक रौद बिला गेल छलैक, सभ अपन-अपन गोसाउनिक घर जा सिरा आगूमे दिआरी लेसिलनि, दिआरी लेसि एकटंगा दऽ आराधना करै लगलीह, जे आइल लछमी पुनः पड़ाइत नहि। गोसाइकेँ गोर लागि सभ गामक देव स्थान दिशि चललीह। अपन-अपन आंगनमे तँ सभ असकरे-असकर छलीह, मुदा आंगनसँ निकलितहि देवस्थान दिशि बिदा होइतहि संगबे सभ भेटै लगलनि। संगबे मिलितहि सभ, जहि स्थान दिशि जाइत रहथि ओहि देवताक, गीत गबै लगलीह। सौँसे गाम, सभ रस्तामे, एक नहि अनेक समूह गीत गबैत मगनसँ देवस्थान पहुँचै लगलीह। सबहक मनमे जमीनक खुशी तँ सभ देवतोकेँ मुस्कुराइत सभ देखैत। सबहक मनमे नचैत जे एकसँ एक्कैस हुअए। दिआरीक इजोत जेकाँ गामक सभ गरीब-गुरबाकेँ आशाक दीप खेत पाबि जरै लगलनि। हजारो बर्खसँ पछुआबैत गरीबीमे एकाएक आड़ि पड़ि गेल। सभ कियो नव-नव योजना मनमे बनबै लगलाह। जहिसँ जिनगी दुखक बेड़ीकेँ टपि सुखक सीमामे पएर रखलक। नव जिनगी जीबैक उत्कंठा सबहक मनमे जगलनि। ११ खेत भेटलासँ भजुआक सभ समांगक विचारो बदललनि। नवो बापुत बैसि विचार करै लगल जे जहिना रमाकान्त काका हमरा सभकेँ रखि लेलनि, तहिना हमहूँ सभ समाजक एक अंग बनि कऽ रहब। सभसँ पहिने रमाकान्त, सुबुध शशिशेखर आ मास्टर सहाएबकेँ अपना ऐठाम भोजन करैबनि। मुदा अखन धरिक जे हमरा सबहक चालि-ढालि रहल अछि, ओकरा तँ अपनहि बदलै पड़त। अंगना-घर आ दुआर-दरबज्जाक जे छिछा-बिछा अछि, ओ नीक लोकक बैइसै जोकर नहि अछि। सभ दिन अपना एहनेमे रहलौं, तेँ रहै छी, मुदा नीक लोक एहेन जगहमे कोना औताह। देखिये कऽ मन भटकि जेतनि। तेँ पहिने सभ समांग भोरेसँ दुआर-दरबज्जा, अंगना-घरकेँ चिक्कन-चुनमुन बनाबह। मरदो आ मौगियो जे भदौस जेकाँ नुआ-बसतर बनौने रहै छी, ओकरो बदलह। जखन अपन काज करै छी तखन जे फटलो-पुरान आ मैलो-कुचैल कपड़ा पहिरै छी तँ बड़बढ़िया। मुदा जखन किनको नोत दए कऽ खाएलेे बजेबनि, तखन एहेन बगए-बानिसँ काज नइ चलत। भजुआक जेठ बेटाक सासुर दरभंगा बेला मोड़पर अछि। जखन ओ सासुर जाइत आ ओहिठामक रहल-सहन, बात-विचार देखैत तँ मन जरुर आगू मुहे बढ़ैक कोशिश करैत अछि। मुदा गामक जे गरीबीक अवस्था छैक ओ सभ विचारकेँ दाबि दैत छैक। मुदा तैयो दरभंगाक देखल परिवार नजरिमे तँ रहबे करैक। भजुआक जेठ बेटा झोलिया सातो भाइक भैयारीमे सभसँ जेठ। तेँ सभ भाए झोलियाक बात मानैत अछि। झोलिया कहलक- ‘‘सातो भाएक बीच रमाकान्त बाबा सात बीघा जमीन देलखुन। पाइ तँ एक्कोटा नै लेलखुन। दुनियाँमे ककरा के एना दै छै। जेँ हुनका मनमे हमरो सबहक प्रति दया एलनि तेँ ने। तहिना हमहूँ सभ हुनका ओते पैघ बुझि आदर करबनि। गामेमे भाड़ापर कुरसी, समेना, शतरंजी, जाजीम, सिरमा सभ भेटै अए। जहिना बरिआतीक लेल लोक भोजनसँ लऽ कऽ रहै तक सभ व्यवस्था करै अए, तहिना हमहूँ सभ करब।’’ झोलियाक विचार सुनि छवो भाइयो आ बापो-पित्ती सभ कियो मूड़ी डोला समर्थन कऽ देलक। झोलिया फेर बाजल- ‘‘बाउ, तूँ रमाकान्त बाबा ऐठाम चलि जैहह। हुनका चारु गोटेकेँ नोतो दए दिहनु आ संगे-संग बजेनहु अबिहनु। दू भाए रहैक, भाड़ापर सभ समान आनि जोगार करिहह। दू सवांग बजारसँ खाइक सभ समान कीनि आनह। सभ सब काजमे भोरेसँ लगि जैहह।’’ दलानपर बैसि रमाकान्त आ हीरानन्द चाहो पीबैत रहथि आ गामेक गप-सप करैत रहथि। गामक गप-सप करैत रमाकान्तक नजरि बौएलाल आ सुमित्रापर गेलनि। गिलास रखि रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहल- “महेन्द्र बौआ कहने रहथि जे छअ मास सिखा-पढ़ा दुनू गोटेकेँ पठा देब मुदा अखन धरि किएक ने आएल?’’ हीरानन्द बजलाह- ‘‘कोनो कारण भेल हेतै तेँ ने अखन धरि नहि आएल अछि। ओना चिकित्सा कठिन विद्या थिक। सुढ़िआइमे तँ किछु समए लगबे करतैक।’’ दुनू गोटे गप-सप करिते रहथि आकि भजुआ आबि रमाकान्तकेँ गोर लगलकनि, रमाकान्तकेँ गोर लागि हीरानन्दोकेँ लगलकनि। हीरानन्दकेँ गोर लगितहि ओ असिरवाद दैत पुछलखिन- ‘‘भजू भाइ, नीके रहै छह कीने ?’’ “हँ मास्टर बौआ। हमरा तँ गामसँ भगैक नौवत आबि गेल छलए।’’ रमाकान्त दिशि देखि- “मुदा कक्का नै भागै देलनि।’’ ‘‘से की, से की”- हलचल शब्दमे रमाकान्त पुछलखिन। गाममे बसैक खिस्सा भजुआ कहै लगलनि- ‘‘एहि गाममे पहिने हम्मर जाति डोम नै छल रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गाममे जनमसँ मरन धरि रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहै। पूभरसँ कोसी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि आएल। अखार चढ़िते कोसी फुलेलै। पहिलुके उझूममे तेहेन बाढ़ि चलि आएल जे बाधक कोन गप जे घरो सभमे पानि ढूकि गेल। तीन दिन तक ने माल-जाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बितौलक। मगर पहिलुका बाढ़ि रहै, तेसरे दिन सटकि गेल। हम्मर बाबा दुइये परानी। ताबे हम्मर बाउ नै जनमल रहै। बाढ़िक पानि सटैकिते दुनू गोरे दसोटा सुगर आ घरक समान लए गामसँ बिदा भऽ गेल। जखैन गामसँ बिदा भेल तँ दादी बाबाकेँ कहलकै- ‘‘अनतै कतऽ जाएब। हमरो माए-बाप जीविते अछि, तेँ ओतै चलू। बबो मानि गेल। दुनू परानी अही गाम देने जाइत रहै। गाममे अबिते सुगरकेँ चरैले छोड़ि देलकै आ अपने दुनू परानी सुसताए लगल। अइ गाममे डोम नहि तेँ गामक बेदरा-बुदरी सभ सुगर देखैले जमा भऽ गेल। गामोमे हल्ला भए गेलै। गामक बाबू-भैया सभ आबि हमरा बाबाकेँ कहलकै जे अही गाममे रहि जा। हमर बाबा रहि गेल। गामक कातमे एकटा परती रहै। ओही परतीपर एकटा घर सभ बाबू-भैया बना देलकै। ओइ दिनमे परती नमहर रहै। मगर चारु भाग जोता खेत रहै। चारु भागक खेतबला सभ परतीकेँ छाँटि-छाँटि खेतमे पीअबैत गेल। परती छोट होइते गेलै। रहैत-रहैत घर-अंगना आ खोबहारे भरि रहलै। मगर तैयो दिक्कत नै होए। हमर बाउओ भैयारीमे असकरे। मुदा हम दू भाइ भेलौं। जखैन दुनू भाए भिन्न भेलौं तँ घरारियो बँटा गेल आ गिरहतो। मुदा तैयो गुजरमे दिक्कत नै हुअए। अखैन दुनू भाएक बीच सातटा बेटा अछि। चारिटा हमरा आ तीनटा भाएक। गुजर तँ कमा कऽ सभ कऽ लैत अछि, मुदा घरक दुख तँ सभकेँ होइते छै।’’ भजुआक खिस्सा सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘आब तँ बहुत खेत भेलह?’’ ‘‘हँ कक्का! कते पीढ़ी आनन्दसँ रहब। अखैन घर तँ नै बन्हलौं मुदा खेती केनाइ शुरु कऽ देलिऐ।’’ बिचहिमे हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘सबेरे-सबेरे केम्हर चललह, भज्जु भाइ?’’ भजुआ- ‘‘रातिमे सभ सवांग विचारलक जे जहिना रमाकान्त कक्का सभकेँ समाजक अंग बना खेत देलनि तहिना हमहूँ सभ हुनका नोत दए खुऐबो करबनि आ धोती पहिरा बिदाइयो करबनि। तेँ नोत दैले एलौंहेँ।’’ न्योतक नाम सुनितहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘कहियाक नोत दै छह?’’ ईहो तीनू गोटे- सुबुध, शशि आ हीरानन्द- जेथुन। हिनको सभकेँ कहि दहुन।’’ ‘‘हँ कक्का, अहीं टाकेँ थोड़े लए जाएब। हिनको सभकेँ लए जेबनि। ऐठाम तँ अहीं दू गोरे छी। शशिभाइ आ सुबुध भाइ नइ छथि। ताबे अहाँ दुनू गोरे नहाउ-सोनाउ, हम ओहू दुनू गोरेकेँ बजौने अबै छिअनि।’’ हीरानन्द- ‘‘औझुके नोत दै छह?’’ ‘‘हँ, मासटर सहाएब!’’ रमाकान्त- ‘‘बड़बढ़िया! शशि तँ पोखरि दिस गेलखुन, अबिते हेथुन। ताबे सुबुधकेँ कहि अबहुन।’’ भजुआ सुबुध ऐठाम बिदा भेल। चाह पीबि सुबुध दुनू बच्चाकेँ पढ़बैत रहथि। भजुआकेँ देखितहि सुबुध पूछि देलखिन- ‘‘भज्जु भाइ, केम्हर-केम्हर?’’ प्रणाम कए भजुआ कहलकनि- ‘‘भाइ, अहीं ऐठाम ऐलौंहेँ। रमाकान्तो कक्काकेँ कहि देलियनि आ अहूँकेँ कहैले एलौंहेँ।’’ “की कहैले ऐलह? ’’ ‘‘नत दैले एलौं।’’ “कोन काज छिअह?” ‘‘काज-ताज नै कोनो छी। ओहिना अहाँ चारु गोरेकेँ खुअबैक विचार भेल।’’ भजुआक बात सुनि सुबुधक मनमे द्वन्द्व उत्पन्न भए गेलनि। मनमे प्रश्न उठलनि जे भजुओ तँ अही समाजक अंग छी। जहिना शशीरमे नीकसँ नीक आ अधलाहसँ अधलाह अंग अछि, जहिसँ शरीरक क्रिया चलैत अछि तहिना तँ समाजोमे अछि। मुदा शरीर आ समाजकेँ तँ एक नहि मानल जाएत। समाजमे जाति आ सम्प्रदाइ एहि रुपे पकड़ि नेने अछि जे सभसँ उपरो अछि आ निच्चो अछि। एक दिस धर्मक नामपर सभ हिन्दू छी, मुदा जाति रंग-बिरंगक भीतरमे अछि। एक जाति दोसर जातिक ने छुवल खाइत अछि आ ने कथा-कुटमैती करैत अछि। ततबे नहि, हिन्दूक जे देवी-देवता छथि ओहो बटाएल छथि। जे देवी-देवताकेँ एक जाति मानैत अछि, दोसर नहि मानैत अछि। जँ मानितो अछि तँ ने हुनकर पूजा करैत अछि आ ने परसाद खाइत अछि। भरिसक हृदयसँ प्रणामो नहि करै जाइ छथि। देवतो मने-मन अछोप, शूद्र इत्यादि बुझैत छथि। जँ ई प्रश्न हल्लुक-फल्लुक रहैत तँ कोनो बात नहि! मुदा प्रश्न तँ जड़िआएल छैक। एहेन ने हुअए जे नान्हिटा प्रश्नक चलैत समाजमे विस्फोट भए जाए। समाजक लोक एहि दुनू प्रश्नक बीच तेना ने बन्हाएल अछि, जे जिनगीक सभसँ पैघ वस्तु एकरे बुझैत छथि। जहन की छी नहि। मुस्कुराइत सुबुध भजुआकेँ कहलखिन- ‘‘ताबे तूँ रमाकान्त कक्का ऐठाम बढ़ह। हम नहेने अबै छी।’’ भजुआ बिदा भेल। मुदा सुबुध मने-मन सोचिते रहलाह जे की कएल जाए। तर्क-वितर्क करैत सुबुधक मन धीरे-धीरे सक्कत हुअए लगलनि। अंतमे एहि निष्कर्षपर पहुँचि गेलाह जे जाधरि एहि सभ छोट-छीन बातकेँ कड़ाइसँ पालन नहि कएल जाएत, ताधरि समाज आगू मुहे नहि ससरत। समाजकेँ पछुअबैक इहो मुख्य करण थिक। तेँ एकरा जते जल्दी हुअए तोड़ि देब उचित हएत। ई बात मनमे अबितहि सुबुध नहाइ लेल बिदा भेला। नहा कऽ कपड़ा पहीरि रमाकान्त ऐठाम बिदा भेला। जाबे सुबुध रमाकान्त एहिठाम पहुँचथि ताबे रमाकान्त शशिशेखर आ हीरानन्द नहाकऽ कपड़ा पहीरि तैयार रहथि। सुबुधक पहुँचतहि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘सुबुधो भाइ आबिये गेलाह। आब अनेेरे बिलम्ब करब उचित नहि।’’ सुबुध बैसबो नहि कएला। सभ क्यो बिदा भए गेलाह। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू सभ। थोड़े दूर आगू बढ़लापर हीरानन्द भज्जुकेँ पुछलखिन- ‘‘कथी सबहक खेती केलहहेँ भज्जु?’’ मजबूरीक स्वरमे भज्जु कहै लगलनि- ‘‘भाइ, अपना बड़द नै अछि। कोदारियो ने छलए मुदा छौरा सभ जोर केलक आ दस गो कोदारि कीनि अनलक। सभ बापुत भोरे सुतिकेँ उठै छलौं आ खेत तामै चलि जाइ छलौं। पनरह दिनमे सभ खेत तामि लेलहुँ। बड़बढ़िया जजात सभ अछि। अइ बेर हएत तँ बड़दो कीनि लेब।’’ “जखन खेत भेलह तँ बड़द किअए ने कीनि लेलह?’’ “एक्केटा दिक्कत नइ ने अछि। बड़द कीनितौं तँ बान्हितौं कतए। खाइले की दैतिऐ। जे सभ काज -बड़द कीनिनाइ, घर बनौनाइ, खाइक जोगार केनाइ- एक्के बेर शुरु करितौं तँ ओते काज पार कना लगैत। तेँ एका-एकी सभ काज करब।’’ ‘‘बड़ सुन्दर विचार केलह?’’ गप-सप करैत सभ भजुआ एहिठाम पहुँचलाह। घरक आगूमे दू कट्ठा जमीन। ओहिमे समियाना टँगने। एक भाग कुरसी लगौने। दोसर भाग शतरंजी, जाजीम, तकिया लगौने। भजुआक सभ सवांग- मरदसँ मौगी धरि- नहाकऽ नवका वस्त्र पहिरने। जहिना कतौ बरिआतीक व्यवस्था होइत छैक, तहिना व्यवस्था केने अछि। व्यवस्था देखि चारु गोटे क्षुब्ध भए गेलाह। किनको बुझिये नहि पड़ैत, जे डोमक घर छिऐ। चारु गोटे चारु कुरसीपर बैसलाह। कुरसीपर बैसितहि भजुआक एकटा बेटा शरबत अनलक। सभसँ पहिने रमाकान्त दू गिलास सरबत पीबि, ढकार करैत कहलखिन- ‘‘आब पान खुआबह।’’ जते काल सरबत पीबथि, तहि बीच भजुआक पोती चाह नेने आबि गेली। हाँइ-हाँइ कऽ शशिशेखर सरबत पीलनि। स्टीलबला कपमे चाह। शुद्ध दूधक बनल। ने अधिक मीठ आ ने फिक्का। चाहक रंगो तेहने। तइपर काॅफी चक-चक करैत। चाह पीबैत-पीबैत रमाकान्तक पेट भरि गेल। भरिआइल पेट बुझि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘ई तीनू गोटे- कुरसीपर बैसताह, हम ओछाइनेपर पड़ब।’’ कहि उठि कऽ ओछाइनपर जाए पड़ि रहलाह। पान आएल। सभ क्यो पान खेलनि। मूहमे पान सठबो नहि कएल छलनि आकि जलखै करैक आग्रह भजुआ केलकनि। भजुआक आग्रह सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘हम ओछाइनेपर खाएब। हुनका सभकेँ टेबुलपर दहुन।’’ भजुआक सभ सवांग दासो-दास रहए। जखनसँ चारु गोटे अएलाह तखनसँ भजुआक परिवारमे नव उत्साहक लहरि उमरि पड़लैक। की मरद की स्त्रीगण। जे स्त्रीगण सदिखन झगड़ेमे ओझराएल रहैत छलि, सभक मूहमे हँसी छिटकैत। मनुक्खे एहि दुनियाक सभसँ पैघ कर्ता-धर्ता छी, ई विचार सभक मनमे नचै लगलनि। भजुआक पोती, जेकर मात्रिक दरभंगा छिऐ आ ओतै बेसी काल रहबो करैत अछि, हाइ स्कूलमे पढ़बो करैत अछि, ओकर संस्कार आ काज करैक ढंग देखि सुबुध आ हीरानन्द आखियेक इशारामे गप करै लगलथि। आँखिएक इशारामे सुबुध कहलखिन- ‘‘जँ मनुखकेँ नीक वातावरण भेटै तँ ओ किछु सँ किछु कए सकैत अछि, चाहे ओकर जनम केहनो गिरल परिवारमे किएक ने भेल होए।’’ सुबुधक बात सुनि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘ई सभ ढोंग छी जे लोक कहैत अछि जे पूर्व जनमक कर्मक फल लोक एहि जनममे पबैत अछि। हँ, जँ एकरा एहि रुपे मानल जाए जे एहि जनमक पूर्व पक्षपर पछातिक जिनगी निर्भर करैत अछि, तँ एक तरहक विचार होए। देखियौ जे यैह बचिया - भजुआक पोती कुशसरी- अछि, कते व्यवहारिक अछि। अही परिवारमे तँ एकरो जनम भेल छैक मुदा अगुआएल इलाका आ अगुआएल परिवारमे रहने कते अगुआइल अछि। की पैघ घरक बेटीसँ कम अछि।’’ चूड़ा, दही, चिन्नी, केरा, अचार, डलना तरकारीक संग पाँचटा मिठाइ सेहो जलखैमे छल। चारु गोटे भरि मन खेलनि। खेलाक बाद अस-बीस करै लगलथि। हाथ धोए रमाकान्त बिछानेपर ओंघरा गेलाह। मुदा गप-सप करै दुआरे सुबुधो आ हीरानन्दो कुरसियेपर बैसल रहलाह। सभ सवांग भज्जु जलखै कए सरिआती जेकाँ बैसल रहए। सुबुध पुछलखिन- ‘‘जखन एते समांग छह तखन माल-जाल किअए ने पोसने छह?’’ नवो समांगमे झोलिया सभसँ होशगर। अपनो सभ समांग झोलियाकेँ गारजन बुझैत। सुबुधक सवालक उत्तर झोलिया देमए लगलनि- ‘‘मास्सैब, अखन धरि हमरा सबहक परिवारमे सुगर पोसल जाइत रहल अछि। मुदा सुग्गर सिर्फ खाइक जानवर छी। आन काज तँ ओकरासँ होइ नहि छैक। ने हर जोतल जाइ छैक। आ ने दूध होइ छै। छोट जानवरक दुआरे गाड़ियो नहिये जोतल जेतैक। जकरा नूनो-रोटी नहि भेटै छै ओ माउस कत्तऽ सँ खाएत। तैयो हम सभ पोसै छी। अप्पन पोसल रहै अए तेँ पावनि-तिहारमे कहियो-काल खाइयो लै छी। खेनिहारक कमी दुआरे नेपाल जा-जा बेचै छलौं। नेपालमे अपना ऐठामसँ बेसी लोक खाइत अछि। किएक तँ सुगरक माउस खस्सी बकरीसँ बेसी गरम होइ छै। अपना ऐठामक जलवायु सेहो गरम अछि। तेँ सुग्गर मुख्यतः ठंढ़ इलाकाक खाद्य थिक। मुदा तैयो सुग्गरो पोसै छलौं, किएक तँ गाए-महीस जँ पोसबो करितहुँ तँ हमरा सबहक दूध के कीनैत?’’ झोलियाक बात सुनि सुबुध पुछलखिन- ‘‘सेहो तँ नै देखै छिअह?’’ झोलिया- ‘‘पहिने जेरक-जेर सुग्गर रहै छलै। पोसइयो मे असान होइत छलए। एक्के गोटेकेँ बरदेलासँ सए-पचास सुग्गर पला जाइत छल। भोरे किछु खा कऽ सुग्गरकेँ खोबहारिसँ निकालि चरबैले चलि जाइत छल। घरपर खुअबै-पिअबैक कोनो जरुरत नहि। साल भरि पोसै छलौं आ सालमे एक बेर नेपाल लए जाए बेचि लै छलौं। परुँका साल डेढ़ सए सुग्गर लए कऽ बाउओ आ कक्को नेपाल गेल। ओइठिन एकटा मंगलक हाट लगै छै। जहि हाटमे सभसँ बेसी सुग्गर बिकै छै। बड़का-बड़का पैकार सभ ओहि हाटमे रहैत अछि। हाटक एक भागमे हमरो सुग्गर छल। एक भाग बाउ वैसल आ दोसर भाग कक्का। एकटा पैकार पान-सात गोरेक संग आएल। दाम-दीगर हुअए लगलै। दाम पटि गेलै। सभ सुग्गरक गिनती कए, एकटा पैकार रहल आ बाकी गोरे सुग्गर हाँकि कऽ बिदा भेल। ओ पैकार हमरा बाउओ आ कक्कोकेँ कहलक जे चलू पहिने किछु खा-पी लिअ। हमरो बड़ भुख लागल अछि। एकटा दोकानमे तीनू गोटे गेल। जलखै करै लगल। जलखैमे किछु मिला देने छेलै। खाइते-खाइते दुनू गोरेकेँ निसाँ लगि गेलै। लटुआ कऽ दुनू गोरे दोकानेमे खसि पड़ल। तहि बीच की भेलै से बुझबे ने केलक। दोसर दिन निन्न टुटलै तँ ने ओ पैकार आ ने दोकान। किएक तँ दोकान हाटे-हाटे लगैत रहए। दुनू भाए कनैत-खिजैत बिदा भेल। ने संगमे एकोटा पाइ आ ने खाइक कोनो वस्तु। भूखे लहालोट होइत, कहुना-कहुना कऽ डगमारा आएल। डगमारा अबैत-अबैत दुनू भाए बेहोश भए गेल। डगमारामे हम्मर एकटा कुटुम अछि। दुनू भाएक दशा देखि ओ कुटुम गुम्म भए गेलाह। किछु फुरबे नहि करनि। बड़ी कालक बाद दुनू भाएकेँ होश भेलै। होश अबितहि दुनू भाए पानि पीबि, जखन कने मन नीक भेलै तँ नहाएल। नहा कऽ खेलक। खा कऽ सुतल। सुति कऽ उठला बाद आरो मन नीक भेलै। दू दिन औतै रहल। तेसर दिन गाम आएल। ओहि दिनसँ सुगर उपटि गेल।’’ सुबुध- ‘‘अपना घरमे रुपैआ-पैसा नहि अछि?’’ झोलिया- ‘‘थोड़बे रुपैआ अछि जे बाबा वाउकेँ देने रहै आ कहने रहै जे जब हम मरब तँ अइ रुपैआ सँ भोज करिहेँ। रुपैआ गनल नै अछि। बाँसक चोंगामे, सुगरक खोबहारीमे राखल अछि।’’ हलचला कऽ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘नेने आबह तँ। देखियैक कते रुपैआ छह?’’ सातो चोंगा रुपैआ भजुआ सुगरक खोबहारीसँ निकालि रमाकान्तक आगूमे रखि देलकनि। फोंकगरहा बाँसक पोरक चोंगा, एक भाग गिरहेसँ बन्न आ दोसर भागमे कसिकऽ लत्ता कोंचने। सातो चोंगाक लत्ता निकालि रमाकान्त आगूमे रुपैआ निकालि-निकालि रखलक। एकटा रुपैआ उठा रमाकान्त निङहारि कऽ देखलनि तँ चानीक रुपैआ रहै। रुपैआक ढेरीपर सबहक आखि रहनि। जे जत्ते रहै सँ तत्तैसँ रुपैआपर आखि गड़ौने रहए। रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- ‘‘मास्सैब, एहि रुपैआकेँ गनियौ तँ।’’ कुरसी परसँ उठि हीरानन्द रुपैआ लग आबि गनै लगलाह। सातो चोंगामे सात सौ चानीक रुपैआ। सात सौ चानीक रुपैआ सुनि सुबुध मने-मन हिसाब जोड़ै लगलाह जे एक रुपैआक कीमत पचहत्तरि रुपैआ होइत अछि। एक सए सँ पचहत्तरि सए होएत। सात सौ सँ बाबन हजार पाँच सए हएत। अगर एक जोड़ बड़द कीनत तँ पाँच हजार लगतै। एकटा बोरिंग-दमकल लेत तँ पनरह हजारमे भए जेतै। जँ तीन नम्बर ईंटा लऽ ओकरा गिलेबापर जोड़ि, उपरमे एसबेसटस दए सात कोठरीक घर बनाओत तँ पच्चीस-तीस हजारमे भए जेतै। अपनो सभ सवांग कमाइते अछि आ सात बीघा खेतोक उपजा हेतै। साले भरिमे बढ़िया किसान परिवार बनि जाएत। जे अछैते पूँजीये लल्ल अछि। सभ कथूक दिक्कत छैक। विचित्र स्थिति सुबुधक मनमे उठि गेलनि। एक नजरिसँ देखथि तँ खुशहाल परिवार बुझि आ दोसर दिस देखथि तँ ने रहैले घर, ने खाइ-पीबैक समुचित उपाए। मुदा एकटा गुण भजुआक परिवारमे सुबुध जरुर देखलनि, जे आन गामक डोम जेकाँ ताड़ी-दारुक चलनि परिवारमे नहि छैक। सिर्फ बुझैक आ बुझबैक जरुरति परिवारमे छैक। नमहर साँस छोड़ैत सुबुध भजुओ आ भजुआक सभ सवांगोकेँ कहै लगलखिन- ‘‘भजु भाइ, हम सभ समाजकेँ हँसैत देखै चाहै छी, कनैत नहि। तेँ ककरो अधला होए से नहि सोचै छी। सभक नीक होए, सबहक परिवार हँसी-खुशीसँ चलैत रहए। सबहक बेटा-बेटी पढ़ै-लिखै, रहैक नीक घर होए, दबाइ-दारु दुआरे कियो मरै नहि, तेँ हम कहब जे एहि रुपैआकेँ रस्तासँ खर्च करु। ओना बाबू श्राद्धक भोजले कहने छथि, सेहो थोड़थार कए लेब, जँ एत्ते दिन नहि केलहुँ तँ किछु दिन आरो टारु। पहिने घर, बड़द आ बोरिंग गरा लिअ, तखन जे उपजा बाड़ी हएत तँ भोजो कए लेब।’’ सुबुधक विचारक समर्थन करैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्दर विचार सुबुध देलखुन भज्जु। जिनगीकेँ बुझह जे जिनगी ककरा कहै छै आ कोना बनतैक। से जाधरि नहि सिखबह ताधरि एहिना बौआइत रहि जेबह।’’ भजुआ तँ चुप्पे रहल मुदा झोलिया टपाक दे बाजल- ‘‘बाबा जे कहलनि ओ गिरह बान्हि लेलौं। अहाँ सभ हमरो छोट भाए बुझू। जाबे हम्मर परिवार रहत आ हम सभ रहब, ताबे अहाँ सबहक संगे-संग चलैत रहब।’’ झोलियाक विचार सुनि हीरानन्द खुशीसँ झूमि उठलाह। हँसैत कहलखिन- ‘‘भज्जुभाइ, अहाँ तँ आब बुढ़ भेलहु तेँ नवका काज दिस नजरि नहि ढुकत, मुदा बेटा-भातीज सभ जुआन अछि, नव काज दिस बढ़ै दियौक। जाधरि लोक समएक हिसाबसँ नब काज दिशि नहि बढ़त ताधरि समएक संग नहि चलि पाओत। बाढ़िक पानि जेकाँ समए आगू बढ़ैत जाएत आ खढ़-पात जेकाँ मनुक्ख अरड़ा लगल रहत। तेँ समएकेँ पकड़ि कऽ चलैक कोशिश करह। आब अपनो सभ भाए मिला कऽ सात बीघा खेत भेलह। सात बीघा खेतबला बढ़ियाँ गिरहस्त तखने बनि सकैत अछि जखन कि खेती करैक सभ जोगार कए लिअए। पानिक बिना जजात नहि उपजि सकै अए। तहिना बड़दोक जरुरी अछि। खेतक महत्व तँ तखने हएत जखन कि ओकरा उपजबैक सभ जोगार कए लेब। बहुत रास रुपैआ अछि, ओहि रुपैआक उपयोग जिनगीक लेल करु।’’ गप-सप चलिते छल कि हहाइल-फुहाइल डाॅक्टर महेन्द्र आ बौएलाल पहुँचि गेलाह। महंथ जेकाँ रमाकान्त ओछाइनपर पँजरा तरमे सिरमा देने पड़ल छलाह। महेन्द्रकेँ देखितहि सभ अचंभित भए गेलाह। महेन्द्र आ बौएलाल सोझे रमाकान्त लग पहुँच गोर लगलकनि। महेन्द्रकेँ असिरबाद दैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘एहिठाम किएक ऐलह। कनिये कालक बाद तँ हमहूँ सभ ऐबे करितहुँ। गाड़ीक झमारल छह, पहिने नहैतह, खैतह अराम करितह। हम कि कतौ पड़ाएल जाइ छलौं जे भेट नहि होइतिहह।’’ महेन्द्र डाॅक्टरक नजरिसँ चुपचाप पिताकेँ देखैत छलाह। पिताकेँ देखि मने-मन अपसोच करैत रहथि जे गलती समाचार पहुँचल। मुदा किछु बजैत नहि छलाह। तहि बीच भजुआ झोलियाकेँ कहलक- ‘‘बौआ, पहिने दुनू गोरेकेँ खुआबह।’’ महेन्द्रो आ बौएलालोकेँ खुअबैक ओरियान झोलिया करै लगल। ओरिआन तँ रहबे करै। लगले परसि दुनू गोटेकेँ खुऔलनि। दुनू गोटे खा कऽ घर दिस बिदा भेला। पाछूसँ कुशसरी महेन्द्रकेँ सोर पाड़ि कहलकनि- ‘‘चाचाजी, पान-सुपारी लए लिअ।’’ कुशसरीक आवाज सुनि दुनू गोटे रस्तेपर ठाढ़ भए गेला। झटकि कऽ कुशसरी, तस्तरीमे पान-सुपारी नेने, लगमे पहुँचलि। लगमे पहुँचि अपने हाथे पान सुपारी नहि दए तस्तरिये महेन्द्रक आगूमे बढ़ौलकनि। पान सुपारी देखि महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बुच्ची, हम तँ पान नहि खाइ छी। अगर घरमे इलायची आ सिगरेट हुअ तँ नेने आबह।’’ कुशसरी चोट्टे घुरि कऽ आंगन आइलि। आंगन आबि सिगरेटक पौकेट, सलाइ आ इलायची नेने पहुँचली। उत्तरमुहे घुरि महेन्द्र ओरिया कऽ सिगरेट लगौलनि जे कहीं पिताजी ने देखि लेथि। दुनू गोटे गप-सप करैत बिदा भेला। कुशसरीकेँ देखि महेन्द्र अचंभित नहि भेलाह किएक तँ मिथिलाक गामक लेल कुशसरी अचंभित लड़की भए सकैत छलीह। मुदा मद्रासक लेल नहि। पछुआइल जाति मे कुशसरी सन-सन ढेरो लड़की अछि। महेन्द्रकेँ गामसँ एकटा गुमनाम पत्र गेल रहनि। ओहिमे लिखल छलैक जे पिताजी बताह भऽ गेल छथि। अन्ट-सन्ट काज गाममे कए रहल छथि। तेँ समए रहैत हुनका इलाज नहि करेबनि तँ निच्छछ पागल भए जेताह। पत्र देखितहि महेन्द्र घर अबैक विचार केलनि। भाए रबिन्द्रसँ बिचारि लेब जरुरी बुझि महेन्द्र एक दिन रुकि गेलाह। दोसर दिन महेन्द्रक भावो सुजाता, महेन्द्र, बौएलाल आ सुमित्रा, चारु गोटे गाड़ी पकड़ि गाम बिदा भेलाह। गाम अबितहि महेन्द्र पिताकेँ नहि देखि मने-मन आरो सशंकित भए गेलाह। माएकेँ पिताक संबंधमे पुछलनि। माएकेँ मात्र एतबे पूछलनि जे ‘बाबू कतए छथि?’। माए कहलखिन। एटैची रखि महेन्द्र बौएलालक संग सोझे भजुआ ऐठाम चललाह। डाॅ. सुजाता घरेपर रहि गेलीह। सासु ऐहिठामक परम्पराकेँ बुझबैत मनाही कए देलखिन। चारि बजि गेल। खेबाक इच्छा ने रमाकान्तकेँ आ ने आरो किनको रहनि। भानस भऽ गेलै। जते विलम्ब होएत, ओते वस्तु सुआदहीन बनत। तेँ भजुआ चाहैत छल जे गरम-गरम भोजन सभ कियो करथि। मुदा भूख नहि रहने चारु गोटे टाल-मटोल करैत रहथि। असमंजस करैत भजुआ रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘कक्का, भानस भए गेल अछि। जैह मन माने सएह......।’’ ढकार करैत रमाकान्त उत्तर देलखिन- ‘‘जखन भोजन बना लेलह तँ नहि खाएब तँ मुहो छुताइये लेब। मुदा सच पूछह तँ एक्को रत्ती खाइक मन नहि होइत अछि।’’ ‘‘सैह करबै’’ -भजुआ कहलकनि। चारु गोटे उठि कऽ आंगन गेलाह। सौंसे आंगन चिक्कनि माटिसँ टटके नीपल, तेँ माटिक सुगंधसँ अंगना महमह करैत। आंगन तँ छोटे, मुदा बेसी लोकक दुआरे पैघ बुझि पड़ैत रहए। कम्मल चौपेत कऽ बिछाओल। जना आइये कीनिकेँ अनने हुअए तेहने थारी, लोटा, गिलास, बाटी चकचक करैत। भोजनक बिन्यास देखि रमाकान्त क्षुब्ध भए गेलाह। की पवित्रता, की सुआद। मने-मन रमाकान्त सोचथि जे अगर खूब भूख लागल रहैत तँ खूब खइतहुँ। मुदा भूखे ने अछि तँ की खाएब।’’ भोजन कऽ चारु गोटे बिदा हुअए लगलाह। बिदा होइसँ पहिनहि झोलिया रंगल चंगेरामे चारि जोड़ धोती आनि चारु गोटेक आगूमे रखि देलकनि। धोती देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘झोली, तूँ सभ गरीब छह। अपनेले घोती रखि लाए। तूँ पहिरौलह हम पहीरलहुँ। भए गेलैक।’’ १२ मद्रासमे महेन्द्र चारि बजे उठि अपन जिनगी लीलामे लगि जाइत छथि। मुदा गाममे चारि बजे भोरमे महेन्द्रकेँ कड़गर निन्न पकड़ने रहनि। एना किअए भेल? उठलाक उपरान्त महेन्द्र सोचै लगलथि। की मिथिलाक माटि, पानि, हवाक गुण छैक वा काजक कम रहने एना भेल। रमाकान्त सुति-उठि कऽ महेन्द्रक कोठरीमे जा देखलनि तँ देखलखिन जे ओ ठर्र पाड़ैत घोर नीनमे सुतल अछि। नहि उठौलखिन। मनमे एलनि जे बापक राजमे बेटा एहिना निश्चिन्त भए रहैत अछि। अपने लोटा लए कलम दिशि बिदा भेलाह। टहलि-बूलि, दिशा-मैदानसँ होइत अपन घरक रस्ता छोड़ि टोलक रस्ता पकड़ि घुमलाह। टोलमे प्रवेश करितहि, रस्ता कातेक चापाकलपर मूह-हाथ धुअए लगलथि। कलक बगलेमे मंगलक घर। रमाकान्तकेँ मंगल देखि चुपचाप अंगनासँ बेंतबला कुरसी आ टेबुल आनि डेढ़ियापर लगौलक। मूह-हाथ धोए रमाकान्त अपना घर दिस चललाह। रस्ता कटैत देखि मंगल कहलकनि- ‘‘काका, कने एक रत्ती अहूठाम बैसियौ।’’ मंगलक बातकेँ कटलनि नहि, मुस्कुराइत आबि कुरसीपर बैसि गेलाह। कुरसीपर बैसि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर कुरसी छह। कहिया बनौलह?’’ ‘‘आठम दिन छौड़ा दिल्लीसँ आएल। वैह अनलक।’’ मंगलक बेटा रविया, अंगनामे चाह बनबैत रहए। चाह बना, तस्तरीमे बिस्कुट नमकीन भुजिया आ चाहक गिलास नेने अबि रमाकान्तक आगूमे टेबुलपर रखि, गोर लागि कहलकनि- ‘‘बाबा, कने चाह पीबि लियौ।’’ रवियाक बात सुनि रमाकान्त सोचै लगलाह जे यैह मंगला छी जे बिहाड़िमे जखन घर उधिया गेल रहै तँ सात दिन अपनो सबतुरकेँ आ मालो-जालकेँ अपना मालक घरमे रहैले देने रहिऐ। आइ वैह मंगला छी जे केहेन सुन्दर घरो बना लेलक आ कुरसियो टेबुल कीनि लेलकहेँ। मुस्की दैत पुछलखिन- ‘‘बेटा, कत्तऽ नोकरी करै छह मंगल?’’ ‘‘दिल्लीमे, कक्का। बड़बढ़िया अए।’’ रमाकान्त भुजिया, बिस्कुट खाए पानि पीबि चाह पीबैत रहथि आकि तहि बीच रविया आंगन जाए एकटा पौकेट जर्मनीक बनल रेडियो नेने आबि रमाकान्तक आगूमे रखैत कहलकनि- ‘‘बाबा, ई अहींले अनलहुँहेँ।’’ रेडियो देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘अइ सबहक सख आब एहि बुढ़ारीमे की करब। रखि ले। तूँ सभ अखन जुआन-जहान छैँ, छजतौ। हम लए कऽ की करब। दहिना हाथसँ रेडियो आ बामा हाथे रमाकान्तक गट्टा पकड़ि हाथमे दैत रविया कहलकनि- ‘‘बाबा, अहींले किनने आएल छी।’’ चाह पीबि, कुरसीपर सँ उठि रमाकान्त घर दिसक रस्ता पकड़लनि। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू मंगल हाथमे रेडियो नेने। एक बाँस सुरुज उपर उठि गेल। महेन्द्र ओसारपर बैसि, दतमनि-ब्रस करैत रहथि। पान-सातटा बचिया माथपर पथिया आ हाथमे लोटा नेने पहुँचल। महेन्द्र ब्रश करैत रहथि आ चुपचाप ओकरा सभकेँ देखबो करैत रहथि। लोटा पथिया ओसारपर रखि एकटा बचिया महेन्द्रकेँ पुछलकनि- ‘‘बाबा कहाँ छथिन?’’ बचियाक प्रश्नक उत्तर महेन्द्र नहि देलखिन, किएक तँ नहि बुझल रहनि। सभक पथिया आ लोटाकेँ निङहारि-निङहारि महेन्द्र देखै लगलथि। कोनो पथियामे कोबी, कोनोमे टमाटर, कोनोमे करैला तँ कोनोमे भट्टा रहैक। लोटामे दूध रहै। दूध आ तरकारी देखि महेन्द्र सोचै लगलाह जे ई की देखि रहल छी। किअए ई सभ ऐठाम अनलकहेँ। गुन-धुन करै लगलाह। मुदा कोनो अर्थे ने लगैत छलनि। मन घुरिआइत छलनि। कनी कालक बाद पुछलखिन- ‘‘बौआ, ई सब किअए अनलह?’’ एकटा ढेरबा बचिया जे बजैमे चड़फड़, कहलकनि- ‘‘बाबा अप्पन सभ खेत हमरे सभकेँ दए देलखिन। अपनाले किछु ने रखलखिन, तेँ खेथिन की?’’ बचियाक बात सुनि महेन्द्र गुम्म भए गेलाह। सोचै लगलथि जे हम बेटा छिअनि। हुनकर चिन्ता हमरा हेबाक चाही। सुआइत कहल गेल अछि जे ‘जेहेन करब तेहेन पाएब।’ मूहपर हाथ नेने महेन्द्र सोचैत जे अनेरे लोक अप्पन आ दोसर बुझैत अछि। जकराले करबै, ओ अहूँले करत। चाहे अपन हुअए वा आन। सोचितहि रहथि आकि पिताजीकेँ अबैत देखलनि। पिताकेँ देखितहि उठि कऽ कुरुड़ करै गेलाह। रमाकान्तपर नजरि पड़ितहि सभ बचिया ओसारपरसँ उठि गोर लगै लगलनि। आगू बढ़ि रमाकान्त लोटामे दूध आ पथियामे तरकारी देखलखिन। तरकारी देखि कहलखिन- ‘‘बच्चा, एत्ते किअए अनलह? अच्छा जे आनिये लेलह, तँ आंगनमे रखि आबह।’’ सभ बचिया अपन-अपन पथिया-लोटा लऽ जा कऽ अांगनमे रखि आएल। महेन्द्रक अबैक जानकारी गाममे सभकेँ भए गेलनि। एका-एकी लोक आबि-आबि अपन-अपन रोगक इलाज करबै चाहलक। मुदा महेन्द्र तँ नियारि कऽ नहि आएल छलाह, से ने जाँच करैक कोनो यंत्र अनने रहथि आ ने दवाइ। मुदा तैयो बौएलाल आ सुमित्राकेँ बजा अनैले जुगेसरकेँ कहलखिन। जुगेसर बौएलालकेँ बजबै गेल। जते जाँच-पड़ताल करैक यंत्र, चीड़-फाड़ करैक औजार बौएलाल आ सुमित्राकेँ कीनि देने रहथिन ओ सभ सामान नेने दुनू गोटे पहुँचल। बौएलाल महेन्द्र लग बैसल आ सुमित्रा सुजाताक संग दरबज्जाक पाछूक ओसारपर बैसलि। जनिजाति सुजाता लग जाँच करबै जाए लगलीह आ पुरुख महेन्द्र लग। चारिये-पाँच गोटेकेँ महेन्द्र जाँच केलनि आकि चारि-पाँचटा रोगी खाटपर टांगल अबैत देखलखिन। ओ सभ दोसर गामक छलैक। खाट देखि महेन्द्रकेँ भेलनि जे भरिसक हैजा-तैजा भए गेलैक। ओसारपर सँ उठि महेन्द्रो आ बौएलालो निच्चामे ठाढ़ भए गेलाह। खाटोबला आबि गेल। सभ कुहरैत रहए। ककरो कपार फुटल तँ ककरो डेन टूटल। ककरो मारिक चोटसँ देह फुलल। अपना लग कोनो दवाइ महेन्द्रकेँ नहि रहनि। हाँइ-हाँइ कऽ बौएलालकेँ बैनडेजक सभ समान आ दबाइक पुरजी बना, बजारसँ जल्दी अनैले कहलखिन। साइकिलसँ बौएलाल खूब रेसमे बिदा भेल। रमाकान्त रोगी लग आबि, एकटा खाट उठौनिहारकेँ पुछलखिन- ‘‘कोना कपार फुटलै?’’ डरसँ कपैत ओ कहलकनि- ‘‘मारिसँ कपार फुटलै।’’ सुनितहि रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ, सबहक इलाज नीक जेकाँ कए दहुन।’’ कहि ओसारपर बिछाओल बिछानपर बैसि, खाट उठौनिहार सभकेँ सोर पाड़लखिन। सभ केयो लगमे आबि बैसल। पुछलखिन- ‘‘मारि कखैन भेलह?’’ ‘‘खाइ-पीब रातिमे।’’ “तब तँ खेनहुँ-पीनहुँ नहि हेबह?’’ ‘‘नै।’’ जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने सभकेँ खुआबह।’’ पनरह-बीस गोटेक जलखै तँ घरमे छलनि नहि। जुगेसर सुमित्राकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘बुच्ची, काकी तँ बूढ़े छथि, डाॅ. साहेब –सुजाता- अनभुआरे छथि। झब दे बड़का बरतन चढ़ा कऽ खिचड़ी बना। बेचारा सभ रौतुके भुखल अछि। हम सब समान जोड़िया दै छियौ। तोरो सब कुछ बुझल नइ छौ।’’ जहिना जुगेसर सुमित्राकेँ कहलक, तहिना सुमित्रो भानसमे जुटि गेलि। सुजाता सेहो लगि गेलीह। जहिना बौएलाल निछोह साइकिल हाँकि बजार गेल तहिना लगले सभ समान कीनि आबियो गेल। बौएलालकेँ अबितहि महेन्द्रो आ बौएलालो सभ रोगीकेँ दरदक सुइया देलखिन। सूइ पड़ितहि, कनिये कालक उपरान्त, सभ कुहड़ब बन्न केलक। खिचैड़-तरकारी बना सुजातो आ सुमित्रो रोगी लग अएलीह। मन शान्त होइतहि, सबहक खून लगलाहा कपड़ा बदलि, खिचैड़ खुआ इलाज शुरु भेल। तीन गोटेक कपार फुटल रहै आ दू गोटेक डेन टूटल रहैक। सुजाता आ सुमित्रा दुनू गोटेक पलास्टर करै लगली। महेन्द्र कपारमे स्टीच करैत रहथि। बौएलाल दौड़-बड़हामे लागल रहै। कखनो किछु अनैत तँ कखनो किछु। दू घंटाक बाद सभ चैन भेल। रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘मारि किअए भेलह?’’ नोर पोछैत जोखन कहै लगलनि- ‘‘मकशूदनक बेटी सितिया भाँटा बेचै हाट गेल रहै। सत्तरह-अठारह बर्खक उमेर हेतै। नमगर कद। दोहरा देह। चाकर मूह। गोल आखि ओकर छैक। परुँके साल दुरागमन भेल छलै। ओना हाट ओकर माए करै छै, मुदा पान-सात दिनसँ ओ दुखित अछि। डेढ़ कट्ठा खेतमे भाँटा केने अछि। खूब सहजोर फड़लो छै। भाँटाकेँ जुआइ दुआरे सितिया छाँटि-छाँटि कऽ नमहरका भाँटा तोड़ि लेलक। एक छिट्टा भेलै। भट्टोकेँ बेचनाइ आ माएले दवाइयो कीनिनाइ जरुरी छलै। दवाइक पुरजी साड़ीक खूँटमे बान्हि लेलक जे घुमै कालमे दवाइ किनने आएब। हाटमे भट्टा बेचि, दोकानमे दवाइ कीनि असकरे बिदा भेलि। गोसाइ डूबि गेलै। खूब अन्हार तँ नै, मुदा झलफल भऽ गेल छलै। धीरे-धीरे रस्तो चलनिहार पतराए लगल छलै। हाट गेनिहार तँ साफे बन्न भए गेल छलै। मगर हाट सँ घुरनिहार गोटे-गोटे रहबे करए। पाँतरमे जखन सितिया आइलि तँ पाछूसँ ललबा आ गुलेतिया सेहो साइकिलसँ अबैत छल। गुलेतिया ललबाक नोकर। ललबा बापक असकर बेटा। बीस-पच्चीस बीघा खेत छै। बच्चेसँ ललबा बहसल। दुनू गोरे दारु पीने रहै। अन्ट-सन्ट बजैत घर दिस अबैत रहै। जखन दुनू गोटे सितियाक लगमे आएल तँ ललबा बाजल- ‘‘गुलेती, शिकार फँसलौ।’’ ललबाक बात सुनियोकेँ सितिया किछु नहि बाजलि। मुदा मनमे आगि सुनगै लगलैक। आरो डेग नमहर केलक। आगू बढ़ि ललबा साइकिलसँ उतरि, रस्ताकेँ घेरि साइकिल ठाढ़ कए देलकै। साइकिल ठाढ़ कऽ जेबीसँ सिगरेट आ सलाइ निकालि, लगा पीबै लगल। सितियाक मनमे शंका भेलै मुदा डराएल नहि। साइकिल लग आबि रस्ताक बगल देने आगू टपि गेलि। आगूमे ललबो आ गुलेतियो ठाढ़ भए सिगरेटो पीबैत आ चढ़ा-उतरीक गप्पो-सप करैत। मूहमे सिगरेट रखि ललबा सए रुपैआ नोट उपरका जेबीसँ निकालि सितिया दिशि बढ़ौलक। रुपैआ देखि सितियाक देह आगिसँ लह-लह करै लागल। मुदा ने किछु बाजल आ ने रुकल। लफड़ल आगू बढ़ैत रहलि। सितियाकेँ आगू बढ़ैत देखि ललबो पाछूसँ हाथमे रुपैआ नेने बढ़ल। दुनू गोटेकेँ पछुआबैत देखि सितिया ठाढ़ भए गेलि। माथ परक छिट्टाकेँ दहिना हाथे आरो कसिया कऽ पकड़ि सोचलक जे छिट्टेसँ दुनूकेँ चानिपर मारब। तामसे भीतरे-भीतरे जरितहि छलि। ललबा दहिना हाथे नोट सितिया दिस बढ़ौलक। लगमे ललबाकेँ देखि, मौका पाबि सितिया तना कऽ रुपैआपर थूक फेकलक जे रुपैआपर कम्मे मुदा ललबाक मूहपर बेसी पड़लै। मूहपर थूक पड़ितहि ललबा सितियाक बाँहि पकड़ि खिंचै चाहलक। पहिनहिसँ सितिया छिट्टाकेँ पकड़ि अजमौनहि रहै। धाँइ-धाँइ दू छिट्टा ललबाकेँ दए देलक। दुनू गोटे दुनू बाँहि पकड़ि सितियाकेँ खिचलक। छिट्टा नेनहि सितिया रस्ताक निच्चा खेतमे खसि पड़लि। खेतमे खसितहि जोश कऽ केँ उठि दहिना तरहत्थीक मुक्का बान्हि, मुक्को आ दहिना पएरो अनधुन चलबै लागलि। मारिक डरसँ गुलेतिया कात भए गेल। मुदा ललबा नहि मानलक। ओहो अनधुन मुक्का चलबै लगल। गुलेतियाकेँ कातमे देखि सितियोक जोश बढ़लै। ललबा दारु पीनहि रहै, तिलमिला कऽ खसल। जहाँ ललबा खसल आकि सितिया ऐँड़े-ऐँड़ मारै लागलि। तहि-बीच हाटसँ तरकारी बेचिनिहारिक जेर अबैत रहै। तरकारी बेचिनिहारिक चाल-चुल पाबि सितियाक जोश आरो बढ़ि गेलै। एक तँ समरथाइक शक्ति सितियाक देहमे, दोसर इज्जत बँचबैक प्रश्न, बाघ जेकाँ सितिया मारि कऽ ललबाकेँ बेहोश कए देलक। तरकारियो बेचिनिहारि लगमे आबि गेलीह। सितियाक काली रुप देखि हसीना पुछलकै- ‘‘बहीन, की भेलौ?’’ सितिया बाजलि- ‘‘अखैन किछु ने पूछ। अइ छुतहरकेँ खून पीबि लेबै।’’ बजबो करैत आ अनधुन ऐँड़ो देहपर बरिसबैत छलि। चारि गोरे सितियाकेँ पकड़ि कात करै चाहलनि। मुदा चारुकेँ झमारि सितिया पुनः आबि कऽ दस लात ललबाकेँ फेर मारलक। फेर चारु गोरे हसीना, जलेखा, रेहना आ खातून घेरि सितियाकेँ पँजिया कऽ पकड़ि घिचने-तिरने बिदा भेलि। अबैत-अबैत जखन गामक कात आएल कि सितिया फेर चारु गोरेकेँ झमारि, अपन डेन छोड़ा फेर ललबाकेँ मारै दौड़लि। मुदा रेहना आ खातून दौड़ि सितियाकेँ आगूसँ घेरलक। हसीना आ जलेखा सेहो दौड़ि कऽ आबि पकड़लक। सितियाक मन क्रोधसँ बमकैत रहै। मनमे होए जे ललबाक खून पीने बिना नहि छोड़बै। चाहे फाँसीपर किअए ने चढ़ऽ पड़ए। चारु गोटे सितियाकेँ पकड़ने घरपर पहुँचल। सौँसे गाम घटनाक समाचार बिहाड़ि जेकाँ पसरि गेल। गाम डोल-माल करै लगल। तनावक वातावरण बनै लगलैक। राति भारी हुअए लगलैक। गामक बुढ़बा चोट्टासँ लऽ कऽ नवका चोट्टा धरिक चलती बढ़ि गेल। तहि बीच चारि गोटे ललवाकेँ खाटपर टाँगि सेहो अनलक। ललबाक बेहोशी तँ टूटि गेलै मुदा कुहरनी धेनहि रहलैक। ललबाक पितिऔत भाए डाॅक्टर बजा ललबाक इलाज करबै लगल। स्लाइन लगा डाॅक्टर बगलमे बैसि पानिक गति देखैत रहए। ललबाक पितिऔत भाए गाममे लाठी संगोर करै लगल। जते गामक मुहगर-कन्हगर लोक सभ छल, ललबाक पक्ष लेलक। ललबाक बाप बाजल- ‘‘जखैन इज्जत चलिये गेल तँ समपैते रखि कऽ की करब।’’ ‘दुर्गा-महरानी की जए’ कहि पनरह-बीसटा गामक हुड़दंगहा लाठी लए सितिया ऐठाम बिदा भेल। रस्तोमे सभ जए-जएकार करैत रहए। मकलदनक टोल मात्र बारह परिवारक। गरीब घरक टोल तेँ समांगो सभ मरदुआरे। मुदा तैयो जते पुरुख रहै, लाठी लए-लए गोलिया कऽ बैसि विचारलक जे इज्जतक खातिर मरि जाएब धरम छी। तेँ जे हेतै से हेतै, मुदा पाछू नै हटब। दोसर दिस टोलक सभ जनिजाति सेहो तैयार होइत निर्णय केलनि, जे जाधरि पुरुख ठाढ़ रहत ताधरि अपना सभ कातमे रहब। मगर पुरुखकेँ खसिते अपना सभ लाठी उठाएब। एक तँ सितियाक देहमे आगि लगले रहै आरो धधकि गेलै। बाजलि- ‘‘जत्ते जुआन बेटी छेँ आ जुआन पुतोहू छेँ, सभ अपन-अपन साड़ीकेँ कसि कऽ बान्हि ले। माथमे साड़िएक नमहर मुरेठा कसि कऽ बान्हि ले, जहिसँ कपार नै फुटौ। बुढ़िया सभकेँ छोड़ि देही। मड़ुआ बीआ पटबैबला जे पटै घरमे छौ से निकालि कऽ एक ठाम कए कऽ राख। आ देखैत रही जे की सब होइ छै। जहिना सभ बहीन मिलि मरब, तहिना संगे संगे सभ बहीन जनमो लेब।’’ टोलक जते छोट बच्चा रहै, सभकेँ घरक बूढ़ि-पुरान लए-लए टोलसँ हटि गाछीमे चलि गेल। दोसर हँसेरी टोलक लग आबि जए-जएकार केलक। जए-जएकार सुनि सितियाकेँ होए जे असकरे सभसँ आगू जा हँसेरीकेँ रोकी। मुदा लड़ाइमे अनुशासन आ निर्णयक महत्व बढ़ि जाइत अछि। तेँ सितिया आगू नहि बढ़ि ठाढ़े रहलि। टोलक लोक, ताकत भरि हँसेरीकेँ रोकलक। अनधुन लाठी दुनू दिससँ चललै। मुदा पछड़ि गेल। पाँच गोटे घाएल भेल। हँसेरी घुमल नहि धन आ इज्जत लुटैक खियालसँ आगू बढ़ल। अपन समांगकेँ खसल आ हँसेरीकेँ आगू बढ़ैत देखि मुरेठा बन्हने आगू-आगू सितिया, तहि पाछू-पाछू टोलक सभ स्त्रीगण, पटै लए हँसेरीकेँ रोकलनि। की बिजलोका चमकै छैक तहिना गामक बेटी अपन चमकी देखौलनि। वार रे मिथिलाक धी। मिथिला सिर्फ कर्मभूमे आ धर्मभूमे नहि, वीरभूमि सेहो थिक। चारि आदमीक कपार असकरे सितिया ढाहलक। चारु खसलै। खूनक रेत चललै। हँसेरी मे हुड़ भेलै। सभ पाछू मुहे पड़ाएल। इहो सभ भागल हँसेरीकेँ रबाड़लनि। मुदा किछु दूर रबाड़ि घुमि गेलीह। अप्पन सभ समांगकेँ उठा-उठा सभ अनलक। मुदा दोसर दिसक लोककेँ अप्पन समांग अनैक साहसे नहि होइत छलैक। होए जे कहीं हमहूँ सभ अनैले जाइ आ हमरो सभकेँ ओहिना हुअए। तखन की हएत। बड़ी कालक बाद चोरा कऽ अपना समांग सभकेँ ओहो सभ लए गेल। गाममे दुइयेटा डाॅक्टर। सेहो डिग्रीधारी नहि, गमैया प्रेक्टिश्नर। दुनू ललबे ऐठाम रहए। रातिमे कतए जाएब, कोन डाॅक्टर भेटताह आकि नहि भेटताह, संगे संग दोहरा कए आक्रमणक डर सेहो रहै। सभ तत्-मत् मे पड़ल रहए। मुदा जेहो सभ घाएल छल ओकरो मूह मलिन नहि छलैक। मनमे खुशी होइत रहए। तेँ दर्दकेँ अंगेजने सभ रहए। इनहोर पानि कए कऽ सभकेँ स्त्रीगण सभ ससारै लगलीह, कपारक फाटल जगहमे सिन्नुर दए-दए खून बन्न केलक। भरि राति कियो सुतल नहि। रमाकान्तक नाम इलाकामे पसरल छलनि। जहाँ-तहाँ हुनके चरचा बेसीकाल चलैत रहैत। डाॅ. महेन्द्रकेँ गाम अबैक जानकारी सेहो सबहक जानकारीमे छलनिहेँ। जोखनक बात सुनि रमाकान्त बमकि उठलाह। ठाढ़ भए जोर-जोरसँ कहै लगलखिन- ‘‘जदि कियो अप्पन इज्जत-आबरु बँचाबैले हमरा कहत तँ हम अप्पन सभ सम्पति ओहि पाछू फुकि देब। मुदा छोड़बैक नहि। बौआ, जते तोरा हुन्नर छह तहिमे कोताही नहि करिहक। खेनाइ-पीनाइ, दवाइ-दारु सभ कथुक मदति कए दहक। फेर एहि धरतीपर जनम लेब। ई कर्मभूमि छिऐक। मनुष्य किछु करैक लेल एहिठाम अबैत अछि। सिर्फ अपनहि टा नहि आनो जे कर्मनिष्ट अछि, ओकरो जहाँ धरि भए सकत मदति करबैक। जे भए गेल से भए गेल जोखन, मुदा सुनि लाए जे जहिया-कहियो कोनो भीड़ पड़ए, हमरो एक बेरि खोज करिहह। जाधरि घटमे परान अछि ताधरि जरुर मदति करबह।’’ बेर टगैत चारिटा बचिया खाइक लए कऽ पहुँचलीह। एक कठौत भात बड़का डोलमे दालि आ छोटका डोलमे तरकारी नेने आइलि छलि। खाइले केराक पात आ दूटा लोटा सेहो अनने छलि। चारु बचियाकेँ देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बुच्ची, खाइक किअए अनलह?’’ रमाकान्तक बात सुनि सितिया कहलकनि- ‘‘बाबा, हमरा सभकेँ नै बुझल छलै, तेँ अनलौं।’’ ‘‘अच्छा, अनलह तँ सभकेँ पूछि लहुन जे खाएब आकि घुरौने जाएब।’’ सितियाक संग रमाकान्त गप-सप करितहि रहथि आकि जोखन बाजल- ‘‘कक्का, यैह सभ बचिया मारि कऽ ओहि पाटीकेँ भगौलक।’’ अकचकाइत रमाकान्त बजलाह- ‘‘आँ-आँइ, यैह सभ छी। वाह-वाह। तोरे सभ सन-सन बेटी एहि धरतीक मान रखि सकैत अछि।’’ बिहाड़ि जेकाँ जोखनक बात, रमाकान्तक दरबज्जा आंगनसँ लए कऽ गाम धरि पसरि गेल। जे सभ मरदक हँसेरीकेँ अनधुन मारबो केलक, कपारो फोड़लक आ गामक सीमा धरि खेहारबो केलक। ई समाचार सुनि गामक स्त्रीगण मर्द सभ उनटि कऽ ओहि बचिया सभकेँ देखैले अबै लगल। अजीब दृश्य बनि गेल। श्यामा आंगनसँ सुमित्रा दिया समाद पठौलनि जे कने ओहि बचिया सभकेँ अंगना पठा दियौ जे हमहूँ सभ देखब। दरबज्जापर आबि सुमित्रा रमाकान्तकेँ कहलकनि। अंगनाक समाद सुनि रमाकान्त चारु बचियाकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी, कने आंगन जाह।’’ चारु बचियाकेँ संग केने सुमित्रा आंगन गेलि। ओसारपर ओछाइन ओछा श्यामो आ सुजातो बैसलि छलीह। आगू-आगू सुमित्रा आ पाछू-पाछू चारु बचियो छलि। आंगन जाए चारु बचिया श्यामा आ डाॅ. सुजाता दुनू गोटेकेँ गोर लगलकनि। एकाएकी गामक स्त्रीगण, गामक बेटी अंगने जाए-जाए सितिया सभकेँ देखै लगलीह। अपने लगमे चारु बचियाकेँ श्यामा बैसौने रहथि। सुजाता निङहारि-निङहारि चारुकेँ उपर माथसँ लए कऽ निच्चा पएर धरि देखैत छलीह, अजीब शक्ति चारुक चेहरामे बुझि पड़लनि। चारु बचियो आखि उठा-उठा कखनो श्यामापर तँ कखनो गामक स्त्रीगण सभपर दैत छलीह। सबहक मनमे खुशी रहितहुँ, हँसी मूहसँ नहि निकलैत छलनि। जना खुशीक पाछू अदम्य उत्साह अदम्य साहस आ जोश सबहक चेहरापर नचैत रहनि। चारुक विशष आकर्षण सभकेँ अपना दिशि खिंचैत छल। जेहो स्त्रीगण कने हटि कऽ ठाढ़ भए देखैत छलि, ओहो सहटि-सहटि सितियाक लगमे अबै चाहैत छलि। श्यामा सुमित्राकेँ कहलखिन- ‘‘सुमित्रा, एहेन लोककेँ आंगनमे कहिआ देखबिही। तेँ बिना किछु खेने-पीने कोना जाए देबैक।’’ श्यामाक बात सुनि सुजाता उठि कऽ अपन आनल मद्रासी भुजियाक डिब्बे घरसँ उठैने अएलीह। भुजियाक डिब्बा देखि सितिया बाजलि- ‘‘बाबी, लगले खा कऽ बिदा भेल छलौं। एको-रत्ती खाइक छुधा नै अछि।’’ तहि बीच रमाकान्त चारु गोटेकेँ बजबैले जुगेसरकेँ अंगना पठौलखिन। जुगेसर अंगना आबि सभकेँ कहलक। उठि कऽ चारु गोटे श्यामाकेँ गोर लगलनि। असिरवाद दैत श्यामा कहलखिन- ‘‘भगवान हमरो औरदा तोरे सभकेँ देथुन, जे हँसैत-खेलैत जिनगी एहिना बिताबह।’’ चारु गोटेकेँ अंगनासँ निकलितहि सभ बिदा भेलि। चारिक समए। रौदो गरमियो कमै लगल। महेन्द्र जोखनकेँ कहलखिन- ‘‘ऐठाम रोगी सभकेँ रखैक जरुरत नहि अछि। घरेपर साँझ-भिनसर सभ दिन बौएलाल जाए जाए कऽ सूइया दए दए आओत। गोटी सेहो लगातार चलबैत रहब। पनरह-बीस दिनमे पूरा ठीक भए जाएत।’’ पाएरे सभ बिदा भेल। साँझू पहर, रमाकान्त आ जुगेसर दरबज्जापर बैसि मद्रासेक गप-सप शुरु केलनि। मुस्की दैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘कक्का, एक बेर आरो मद्रास चलू।’’ नाक मारैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘धुः बूड़िबक। गाड़ीमे लोक मरि जाइ अए। ऐठाम केहेन निचेनसे रहै छी। ने गाड़ी बसक हर-हूड़ अबाज आ ने रस्ता-पेराक ठेकान। सड़क धए कए चलू। तहूमे सदिखन लोकेक धक्का लगैत रहत। केहेन सुन्दर अपना सबहक गाम अछि जे रस्ताक कोन बात जे आड़िये धुरे खेते पथारे जत्तै मन हुअए तत्तै जाउ। ने गाड़ी बसक धक्काक डर आ ने पएरमे काँटी शीशा गरैक। जकरासँ मन हुअए तकरासँ गप करु। कुशल-समाचार पूछि लियौ। ओइठाँ तँ जना मूहमे बकारे नहि रहै तहिना बौक भेल रहैत छलौं।’’ व्यंग्य करैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘केहेन ठंढ़ा घरमे रहै छलौं। ने नहाएले कतौ जाइ पड़ै छलए आ ने पर-पैखानाले।’’ रमाकान्त- ‘‘धुत् बूड़ि। ओइठाँ जँ दुइयो मास रहितहुँ तँ कोढ़ि भए जइतहुँ। उठइयो-बैठइयोमे आसकतिये लगैत। सच पूछैँ तँ एते दिन रहलौं, ने कहियो भरि मन पानि पीलहुँ आ ने पैखाना भेल। सभ दिन जना कब्जियते बुझि पड़ैत। जखने पानि मूह लग लए जाइ आकि मन भटकि जाए।’’ फेर मुस्की दैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘अंगूरक रस पीबैमे केहेन लगैत रहए?’’ अंगूरक रस सुनि थोड़े असथिर होइत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘लोक कहै छै जे अंगूरमे बड़ तागति छै, मुदा अपना सबहक जे केरा, आम, बेल लताम अछि, ओते तागति अंगूरमे कतऽ सँ आओत। अंगूरेक शराब बनैत अछि मुदा अपना ऐठामक भांगक पड़तर करतैक ? अंगेरिजा शराब सनसना कऽ मगजपर चढ़ियो जाइत अछि आ लगले उतरियो जाइत अछि। मुदा अप्पन जे भांग अछि ओ रइसी नशा छी। ने अपराध करैले सनकी चढ़ौत आ ने एको मिसिया चिन्ता अबै दैत अछि।’’ रमाकान्त आ जुगेसरक गप-सप सुजातो अढ़सँ सुनैत रहथि। दुनू गोटेक गप्पो सुनैत आ मने-मन विचारबो करैत छलि। तहि बीच हीरानन्द आ शशिशेखर सेहो टहलि-बूलिकेँ अएलाह। दुनू गोटेक बैसितहि रमाकान्त हीरानन्दकेँ कहलखिन- ‘‘मास्सैब, खेतक झंझट तँ सम्पन्न भेल। बड़बढ़ियाँ भेल। एकटा बात कहू जे जते लोक गाममे अछि, सभ अप्पन गाम कहैत अछि की ने?’’ हीरानन्द- ‘‘हँ। ई तँ कोनो नब नहि अछि। अदौसँ कहैत आएल अछि आ आगूओ कहैत रहत।’’ ‘‘जखन गाम सभक छिऐक तँ गामक सभ किछु ने सभक भेलैक?’’ ‘‘तहिमे थोड़े गड़बड़ अछि। गड़बड़ ई अछि जे अखन धरि जे बनैत-बनैत समाज आ गाम अछि ओ टूटैत टूटैत खण्ड-पखण्ड भए गेल अछि। तेँ एक-एक केँ जोड़ि कए समाज बनबै पड़त जे लगले नहि भए सकैत अछि।’’ हीरानन्द बजितहि रहथि आकि उत्तर दिशिसँ सुबुध आ दक्षिण दिशिसँ महेन्द्र आ बौएलाल सेहो आबि गेलाह। रमाकान्त बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘बौएलाल, आब तँ तूँ डाक्टर बनि गेलैं, मुदा तैयो ऐठाम सभसँ बच्चा तोँही छैँ। जो, चाह बनौने आ।’’ डाॅक्टरक नाम सुनि महेन्द्रो आ हीरानन्दो मने-मन खुश भेलाह। किएक तँ दुनू गोटेक पढ़ौल बौएलाल अछि। मुस्कुराइत बौएलाल चाह बनबै बिदा भेल। रमाकान्त सुबुधकेँ कहलखिन- ‘‘सुबुध, जमीनक ठौर तँ लगि गेल पोखरि बाँचल अछि। शशि नौजवानो छथि। पढ़लो-लिखल छथि आ लूरियो छन्हि। पोखरिमे माँछ पोसैत।’’ सुबुध- ‘‘बड़ सुन्दर विचार अपनेक अछि काका। हमहूँ यैह सोचै छलौं जे गाममे तँ दुइयेटा चीज माटि आ पानि अछि। तेँ दुनूकेँ एहेन ढंगसँ उपयोग कएल जाए जे जहिना एक गोटेकेँ पाँचटा बेटा भेने पाँच गुना परिवार बढ़ि जाइत छैक तहिना खेतो आ पाइनोक होए। ढ़ंगसँ मेहनति आ नव तरीका अपनाओल जाए। जहिसँ मनुक्खे जेकाँ ओहो पाँचो गुनाक रफ्तारसँ किएक ने आगू बढ़त। जँ एहन रफ्तार पकड़ि लै तँ गामकेँ बढ़ैमे कते देरी लागत। बीस बीघासँ उपरे गाममे पानि अछि जे बैशाखो-जेठमे नहि सुखैत अछि। अगर जँ महा-अकालो पड़ि जाएत तैयो बोरिंगक सहारासँ उपजि सकैत अछि। अखन धरि सभ पोखरि ओहिना पड़ल अछि। सौँसे पोखरि केचली, घास छाड़ने अछि। ने नहाए जोकर अछि आ ने माछ-मखान करै जोकर। जे इलाका माछ-मखानक छी, ओहि इलाकाक लोककेँ माछ-मखान नहि भेटै, कते लाजक बात छी। एहि लाजक कारण की हम सभ नहि छिऐक? जरुर छिऐक। भलेहि हरसी-दीरघी कए अपनाकेँ निर्दोष साबित कए ली, मुदा....। अखन देखै छी जे किछु सुभ्यस्त परिवारकेँ तँ माछे-मखानक कोन बात जे अहूसँ नीक-नीक वस्तु भेटैत अछि। मुदा विशाल समूहक गति की छैक ? जितिया पावनिमे माछसँ भेंट होइ छैक आ कोजगरामे दूटा मखान देखैत अछि। तेँ मनुष्यकेँ खुशहाल कऽ बनैक लेल वस्तुक परियाप्तता जरुरी अछि। जँ वस्तुक कमी रहत तँ खुशहाली आओत कोना?’’ सुबुध बजितहि रहथि आकि बौएलाल चाह नेने आएल। चाह देखितहि केयो कुरुड़ करै उठलाह तँ कियो तमाकू थुकरै। जुगेसर चाह बँटै लगल। एक घोंट चाह पीबि हीरानन्द महेन्द्रकेँ पुछलखिन- ‘‘डाॅक्टर साहेब, कते दिनक छुट्टीमे आएल छी?’’ हीरानन्दक प्रश्न सुनि महेन्द्र असमंजसमे पड़ि गेलाह। मने-मन सोचै लगलाह जे कोना चिट्ठीक चरचा करब। चिट्ठीक बात तँ सोलहन्नी झूठ निकलल। जँ बेसी दिनक छुट्टीक चरचा करब तँ सेहो झूठ हएत। धड़फड़ीमे आएल छी। की कहिअनि की नहि कहिअनि। विचित्र स्थितिमे महेन्द्र पड़ि गेलाह। मुदा बिचहिमे जुगेसर टभकल- ‘‘येह मास्सैब, डाकडर सहाएब तँ आला भए गेलाह। कोनाे चीजक कमी नहि छन्हि। जखन अपना गाड़ीमे चढ़ा कऽ बुलबैत छलाह तँ बुझि पड़ैत छल जे इन्द्रासनमे छी।’’ हीरानन्दक बात तर पड़ि गेलनि। मने-मन सोचलनि जे भरिसक पिता दुआरे गुमकी लधने छथि। सभ कियो चाह पीबि-पीबि गिलास बौएलालकेँ देलखिन। सभ गिलास लए बौएलाल अखारैले कलपर गेल। तहि बीच सुबुध महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘महेन्द्र भाए, गामक लोककेँ जे देह देखै छिऐ तहिसँ की बुझि पड़ैत अछि, जे किछु नहि किछु रोग सभकेँ पछारनहि छैक। तेँ सभकेँ जाँचि इलाज कए दियौक।’’ सुबुधक प्रश्न महेन्द्रकेँ जँचलनि। कहलखिन- ‘‘अपनो विचार अछि। चारि-पाँच दिन जँचैमे लगत। सभकेँ जाँचि, जहाँ धरि भए सकत तहाँ धरि इलाजो कइये दितिऐक। आइ तँ भरि दिन दोसरे ओझरीमे ओझरा गेलहुँ, मुदा काल्हिसँ एहिमे लगि जाएब।’’ शशि पुछलकनि- ‘‘डाॅक्टर साहेब, बुढ़ा –पिताजी- जे अप्पन सभ खेत बाँटि देलनि तहि लेल अपनेक..?” शशिशेखरक बात सुनि मुस्कुराइत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘दू भाइ छी दुनू भाएकेँ डाॅक्टर बना देलनि। एहिसँ बेसी एक पिताक पुत्रक प्रति की बाकी रहि जाइत अछि जे किछु कहबनि। खेतक बात अछि, हम थोड़े खेती करए आएब। तखन तँ जे खेती करैबला छथि जँ हुनका हाथमे गेलनि तँ एहिसँ बेसी उचित की होएत। बाबाक अरजल खेत छिअनि, जकर हकदार तँ वैह छथि। जँ अप्पन सम्पति लुटाइये देलनि तहिसँ हमरा की। वैरागी पुरुषकेँ रागी बनाएब पाप छी।’’ पुनः शशिशेखर पुछलखिन- ‘‘मद्रासमे केहेन लगैत अछि?’’ किछु मन पाड़ैत कने रुकि महेन्द्र कहै लगलखिन- ‘‘जहिया डाॅक्टरीक शिक्षा पेलहुँ तहिया नीक बुझि मद्रास गेलहुँ। मुदा अखन एहिठामक सिनेह हृदयकेँ तेना पकड़ि लेलकहेँ जेना छातीमे लगल तीरसँ पक्षी छटपटाइत अछि। होइत अछि जे मद्रासक सभ किछु छोड़ि-छाड़ि एहिठाम रही। कतएसँ जिनगीक लीला शुरु कएल जाए, ई गंभीर प्रश्न अछि। एहि प्रश्नक बीच मन ओझरा गेल अछि। स्पष्ट उत्तर नहि भेटि रहल अछि। किएक तँ एहि प्रश्नक उत्तर दृष्टिकोणक मुताबिक भिन्न-भिन्न भए जाइत अछि।’’ १३ गामक दुखताहक दुख जाँचि दवाइ देबाक समाचार गाममे पसरि गेल। काल्हि भिनसरसँ सभ टोलक दुखताहकेँ बेरा-बेरी जाँचो होएत आ दवाइयो देल जाएत। भिनसर होइतहि ओहि टोलक लोक अबै लगलाह जहि टोलक पार छलनि। मर्दक जाँच महेन्द्र करै लगलथि आ स्त्रीगणक डाॅ. सुजाता करै लगलीह। डाॅ. महेन्द्रक मदतिक लेल बौएलाल आ सुजाताक लेल सुमित्रा रहथि। तीन दिनमे सौँसे गामक रोगीक जाँच भेलनि। दवाइयो भेटलनि। लोकक बीच एहन खुशी दौड़ि आएल जना गामसँ बीमारीये पड़ा गेल होए। सभक मनक खुशी एक्के रंगक रुप बना नचैत छलीह। मनमे एहन खुशी जे आब ने हमरा देहमे कोनो रोग अछि आ ने मरब। खुशीक नाच एहन छल जेना रोग देखियेकेँ भगि गेल होए। मुदा जिनगीमे तँ यैहटा रोग तँ नहि अछि, आरो बहुत तरहक अछि। मुदा ई तँ मनक बात छल। ई मनक बात छी मुदा वास्तविक बात की छल ? से तँ लोकेमे देखै पड़त। सभ दिन भलेसराकेँ देखै छेलिऐ जे दुखताहे अछि जहिसँ काज काज-उद्यम छोड़ि देने छल, मुदा आइ भोरे बड़का छिट्टामे छाउर गोबर नेने खेत फेकै जाइत अछि। रस्तामे सोनमा पुछलकै तँ कहलकै जे आब देहमे कोनो दुख नहि अछि। जाइ छी छाउरो फेकि लेब आ गरमा धानो काटि कऽ नेने आएब। तहिना तेतरो पटैमे गाँथि, दूटा धानक बोझ कन्हापर उठैने अबैत रहए। सोनमाक मनमे नचै लगलै जे एना किअए भेलै? देखै छिऐ जे लहेरियासराय असपतालमे छअ-छअ मास रोगीकेँ लोहाबला खाटपर रखि, सूइयो पड़ै छै आ गोलियो खाइले देल जाइ छै, तैयो मरि जाइ अए। मुदा एहि गामक दुखताहक दुख कोना एते असानीसँ पड़ा गेलै। अजीब भेलै। ओह, भरिसक दुख ककरा कहै छै से बुझबे ने करै छी। जब अपने बुझबे नै करै छी तब बुझबै कना ? जँ अपने सोचि बुझै चाहबै आ गलतिये सोचा जाए तखन तँ गलतिये बुझबै। गलती बुझब आ नहि बुझब, दुनू एक्के रंग। बिनु बुझलो काज लोक करै लगैत अछि आ गलतियो काज करैत अछि। भलेही दुनूक फल अधले होए मुदा करै तँ अछि। तब की करब? जकरा बुझै छिऐ जे फल्लाँ बुझनिहार अछि जँ ओकरो नइ वुझल होए आ झुठे अन्ट-सन्ट कहि दिअए। ततबे नहि जे बुझिनिहारो अछि आ ओकरा पूछिऐ जँ ओ गलतिये कहि दियए, तैयो तँ ओहिना रहि जाएब। मुदा तोहूमे एकटा बात अछि जे, जे ओ कहै आ हम करी आ तेकर फल गल्ती होए तँ दोखी के हएत ? तब की करब? आब उमेरो ने अछि जे इस्कूलोमे जा कऽ पढ़ब। धिया-पूता सभ इस्कूलमे पढ़ैत अछि। मुदा जखैन इस्कूल जाइबला रही, तखन किअए ने पढ़लौं। पढ़लौं कोना नै, इस्कूलमे नाओ लिखौनहि रही। पाँच किलास तक पढ़बो केलौं। तँ छोड़ि किअए देलिऐ ? छोड़लिऐ की मास्टर मारिकेँ छोड़ा देलक। मास्टर मारिकेँ किअए छोड़ा देलक ? जखैन छअ किलासमे गेलौं आ अंग्रेजी मास्टर आबिकेँ पढ़बए जे बी.यू.टी.- बट। पी.यू.टी.- पुट। तेहिपर ने कहने रहिऐ जे अहाँ गलती पढ़बै छिऐ। कोनो गलती कहने रहिऐ। जब गलती नै कहने रहिऐ तब ओ मारलक किअए। नै पढ़बैक मन रहै तँ ओहिना कहितए जे तोरा नइ पढ़ेबौ। इस्कूलसँ चलि जो। मारलक किअए। जँ मारबो केलक तँ हमरा मनकेँ तँ बुझा दइतै। हमर मन मानि लैत । मन मानि लैत, भए गेलैक। से तँ नै केलक। तेँ ने हम मुरुख रहि गेलौं। नइ तँ हमर की हाथ-पएर कोनो पातर-छितर अछि जे दरोगा नइ बनलौं। हमर जे दरोगाक नोकरी गेल सँ उ मास्टर हमरा देत। जे मारि कऽ इस्कूल छोड़ा देलक। धिया-पूतामे सैह भेल, चेतनमे तहिना देखै छी। आब कना जीब ? भरिसक हमरो तँ ने बतहा दुख पकड़ि लेलकहेँ। ककरासँ पुछबै, के कहत, सभकेँ तँ सैह देखै छिऐ। की हम भरि जिनगी हरे जोतैत रहब, घोड़ापर चढ़ि कऽ शिकार खेलैले कहिया जाएब? दुनू हाथ माथपर लए सोनमा गाछक निच्चामे बैसि सोचै लगल, जहिना आमोक गाछ रोपल जाइ छै, तहिना तँ खाइरो-बगुरक रोपल जाइ छै। मुदा आममे मीठहा फल फड़ै छै, खैर-बगुरमे काँट होइत छैक। रोपैक इलम तँ एक्के होइ छै। ओना अनेरुआे होइ छै। आमोक गाछ अनेरुओ होइ छै आ खाइरो-बगुरक। साते दिनक छुट्टीमे महेन्द्र गाम आएल छलाह। आठ दिन पहिनहि छुट्टी बीति गेलनि। अबै जाइक रस्ता सेहो मद्रासक पाँच दिनक अछि। छुट्टी बढ़बै पड़तनि। काल्हि भोरका गाड़ीसँ चलि जएताह, ई बात सुबुधोकेँ बुझल छलनि। तेँ सुबुधक मनमे अएलनि जे महेन्द्र बच्चेक संगी छी, मुदा भरि मन गप एक्को दिन नहि कएलहुँ। काल्हि भोरमे चलिये जाएत। तेँ आइये भरि समए अछि। ई सोचि सुबुध अपन सभ काज छोड़ि महेन्द्रसँ गप्प करैक लेल अएलाह। दरबज्जापर बैसि महेन्द्र पिताकेँ कहैत रहथि- ‘‘बाबू, गामक जत्ते रोगीकेँ जँचलहुँ ओहिमे एक्को गोटे पैघ रोग, जना टी. वी., कैंसर, एड्स इत्यादिसँ ग्रसित नहि अछि। तेँ आश्चर्य लगैत अछि जे बीमारी शहर-बजारमे धड़ल्लेसँ होइत अछि। ओहि रोगक नामे-निशान गाममे नहि अछि। जे खुशीक बात छी।’’ महेन्द्रक रिपोर्ट सुबुधो सुनलनि। खुशीक बात सुनि रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘तखन जे एते लोक बीमार अछि, ओकरा कोन रोग छै?’’ मुस्की दैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘साधारण रोग। जे बिना दवाइओ-दारुसँ ठीक भए सकैत छैक। अगर ओकर खान-पान सुधरि जाए तँ ई सभ रोग लोककेँ नहि हेतैक। अदहासँ बेसी रोगी ओहन अछि जकरा कोनो रोग नहि सिर्फ शंका छैक। मुदा जँ ओकरा दुइयो-चारिटा गोली नहि दितिऐक तँ मन नहि मानितैक। तेँ पुरजो बना देलिऐक, अल्लासँ देहो हाथ देखि लेलिऐक आ दू-चारिटा गोलियो दए देलिऐक। महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्तो आ सुबुधो मने-मन हँसै लगलाह। हँसी रोकि सुबुध महेन्द्रकेँ पूछल- ‘‘महेन्द्र भाए, काल्हि तँ तूँ चलि जेबह, फेर कहिया भेंट हेबह कहिया नहि। तेँ तोरेसँ गप-सप करैले अप्पन सभ काज छोड़ि एलहुँ। जिनगीक तँ ढेरो गप्प होइत, मुदा तोँ डाॅक्टर छिअह आ हम शिक्षक छलौं, जे आब नहि छी। मुदा रोगक कारण बुझैक जिज्ञासा तँ जरुर अछि। तेँ अखन रोगेक संबंधमे किछु बुझै चाहै छी।’’ “की? ’’ ‘‘पहिल सवाल बताहेक लाए। जखन बताह दिस तकै छी तँ बुझि पड़ै अए जे जते मनुख अछि सभ बताह अछि।’’ धड़फड़ा कऽ रमाकान्त पूछि देलखिन- ‘‘से कोना?’’ ‘‘कक्का, जे एक नम्बर प्रशसक छथि, जे एक इलाकासँ लए कऽ देश भरिक शासनमे दक्ष रहैत छथि ओ घरक परिवारक शासनमे लटपटा जाइत छथि। तहिना देखै छी जे, जे बड़का-बड़का हिसाबी गणितज्ञ छथि ओ जिनगीक हिसाबमे फेल कए जाइत अछि। तहिना देखै छी जे, जे बड़का-बड़का इंजीनियर छथि ओ परिवारक नक्शा बनबैमे चूकि जाइ छथि। नेताक तँ कोना बाते नहि। किएक तँ जहिना गोटे साल मानसुन अगते उतरि खूब बरिसैत अछि जहिसँ बेंगक वृद्धि अधिक भए जाइत छैक, तहिना ओकरो छैक। मुस्की दैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘हँ, ठीके कहै छहक।’’ “ततबे नहि कक्का, कियो ताड़ी-दारु पीबै पाछू बताह अछि, तँ कियो धनक पाछू। कियो पढै़क पाछू बताह रहैत, तँ केयो ऐश-मौजक पाछू। कियो खाइ पाछू बताह तँ कियो ओढ़ै-पहिरै पाछू बताह। कियो काजेक पाछू बताह रहैत, तँ कियो अरामेक पाछू। कियो खेले-कुदक पाछू बताह रहैत, तँ कियो नाचे-तमाशाक पाछू। एते बताहक इलाज कतए हैत। ततबे नहि, एक रंगक बताह दोसरकेँ बताह कहैत आ दोसर तेसरकेँ। तहिना कियो शरीरक रोगसँ दुखित वा रोगी कहबैत तँ कियो अन्नक अभावसँ, तँ कियो वस्त्रक अभाव वा घरक अभावसँ दुखी होइत। तहिना कियो कोनो उकड़ू बात सुनलासँ होइत। एहि दृष्टिये जँ देखल जाए तँ कते लोक निरोग अछि। ततबे नहि जँ एक-एक गोटेमे देखल जाए तँ कए-कएटा रोग धेने अछि। मुदा ई सभ उपरी बात भेल। मूल प्रश्न अछि जे बसन्त ऋृतुक गुलाब जेकाँ जिनगी सबदिन फुलाइत रहै।’’ गुलाबक फूल जेकाँ फुलाइत जिनगी सुनि महेन्द्र नमहर साँस छोड़लनि। आखि उठा सुबुधक आखिपर देलनि। सुबुधक नजरिसँ नजरि मिलितहि जना महेन्द्रकेँ बुझि पड़लनि जे अथाह समुद्रमे सुबुध हेलि रहल छथि। आ हम छोट-छीन पोखरिमे उग-डूब कए रहल छी। ई बात मनमे अबितहि महेन्द्र अप्पन माए-बापसँ लए कऽ अपन भैयारी होइत, धिया-पूता दिशि नजरि दौड़ौलनि। जे कते आशासँ पिता जी हमरा दुनू भाएकेँ पढ़ौलनि, मुदा हम हुनकासँ कत्ते दूर हटि कए रहै छी। एते दूर हटल रहलापर कोना हुनका सेवा कए सकबनि। आब हुनका सेवाक जरुरति दिनोदिन बेसिये होइत जेतनि। उमेरो अधिक भेलनि आ दिनानुदिन बढ़िते सेहो जेतनि। जते उमेर बढ़तनि तते शरीरक अंग कमजोर हेतनि। जते अंग कमजोर हेतनि तते शरीरक क्रियामे रुकावट हेतनि। जहिसँ कते नव-नव रोग शरीरमे प्रवेश करतनि। जते रोग शरीरमे प्रवेश करतनि तते कष्ट हेतनि। की ओहि कष्टक जिम्मेवार हम नहि हेबै। ताहि लेल करैत की छिऐक ? किछु नहि। अखन हम सभ दुनू भाइ आ दुनू पत्नी जवान छी, मुदा किछु दिनक उपरान्त तँ हमहूँ सभ हुनके जेकाँ बूढ़ होएब। कोनो जरुरी नहि अछि जे हमरो सबहक बेटा हमरे सभ लग रहत। अखन तँ हम देशेमे छी। अंतर ऐतबे अछि जे देशक एक छोर पर ई सभ छथि आ दोसर छोरपर हम सभ छी। मुदा आइक जे हवा बहि रहल अछि जे आन-आन देशमे जाए लोक नोकरी करैत अछि आ जीवन-यापन करैत अछि। जँ कहीं हमरो संगे सैह हुअए तखन की होएत ? एते बात मनमे अबैत-अबैत महेन्द्रक चेहरा उदास हुअए लगलनि। मन बौआए लगलनि। देहसँ पसीना निकलै लगलनि। बुझि पड़ै लगलनि जे देह शक्ति विहीन भए रहल अछि। एक्को पाइ लज्जति देहमे अछिये नहि। पसीनासँ तर-बत्तर होइत महेन्द्र सुबुधकेँ कहलखिन- ‘‘सुबुध भाए, जिनगीक अजीब रस्ता अछि। जते मनुक्ख एहि धरतीपर जन्म लेने अछि, ओकरा तँ जिनगी बीतबै पड़तैक। मुदा जिनगीक रस्ता एहेन पेंचगर अछि जे विरले क्यो-क्यो बुझि पबैत अछि, बाकी सभ औनाइते रहि जाइत अछि।’’ मुस्कुराइत सुबुध महेन्द्रकेँ कहलखिन-‘‘महेन्द्र भाए, अहाँ तँ डाॅक्टर छी। पढ़ल-लिखल लोकक बीच सदिखन रहबो करैत छी। अहाँ किअए एहेन बात कहि रहल छी। हम तँ जाबे मास्टरी केलहुँ ताबे धिया-पूताकेँ पढ़ेलहुँ आ जखन नोकरी छोड़ि गाममे रहै छी, तखन जेहन समाजमे रहै छी से देखबे करैत छी।’’ महेन्द्र- ‘‘भाए, अहाँ जे बात कहलहुँ ओ तँ आँखिक सोझामे जरुर अछि मुदा अहाँमे मनुक्ख चिन्हैक आ ओकरा चलैक रस्ताक लूरि जरुर अछि। अहाँ अपनाकेँ छिपा रहल छी।’’ महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्तकेँ भेलनि, जे आदमी घरसँ हजारो कोस दूर हटि, कमा कऽ एत्ते बनौलक ओ अपनाकेँ एते कमजोर किअए बुझि रहल अछि। मुदा दुनू संगीक बीच नहि आबि गुम्मे रहलाह। बैसले-बैसल एक बेर महेन्द्रकेँ देखथि आ एक बेर सुबुधकेँ। अपनाकेँ छिपाएब सुनि सुबुध बजलाह- ‘‘महेन्द्र भाए, जाहि प्रश्नक बीच अहाँ ओझरा रहल छी ओ प्रश्न एतेक ओझड़ाओठ नहि अछि। मुदा असानो नहि अछि। सिर्फ आखिमे ज्योति आनि देखिकेँ चलैक अछि।’’ दलानक आंगना दिसक भितुरका कोठरीमे बैसि सुजाता खिड़की देने सभकेँ देखबो करैत आ गप्पो-सप सुनैत रहथि। कखनो मनमे खुशियो अबैत छलनि तँ कखनो मन कड़ुऐबो करनि। मुदा किछु बाजथि नहि। बाजब उचितो नहि बुझैत। ओना पढ़ल-लिखल रहने, कखनो कऽ बजैक मन जरुर होइ छलनि। मुदा किछुए दिनमे सासु मिथिलाक रीति-रेवाज आ व्यवहारक संबंधमे तेनाकेँ बुझा देलकनि जे मद्रासक सुजाता मिथिलाक सुजाता बनि गेलीह। मूहपर नुआ राखब तँ उचित नहि बुझथि मुदा बाजब-भूकबपर नजरि जरुर रखै लगलीह। किनकासँ कोन ढंगे बाजी, कते आबाजमे बाजी, कोन शब्दक प्रयोग करी, एहि सभपर नजरि अवश्य रखै लगलीह। तेँ बोली संयमित भए गेलनि। ओना एहिठामक चालि-ढालि पूर्ण रुपेण नहि अंगीकार कए सकल रहथि, मुदा अंगीकार करैक पूर्ण चेष्टा करए लगलीह। सुबुधक ऊट-पटांगो बातसँ महेन्द्रकेँ दुख नहि होइत छलनि। हल्लुको बातमे ओ गंभीर रहस्यक अनुमान करै लगलथि। भलेही ओ गंभीर नहि हल्लुके किएक ने होए। महेन्द्रक गंभीर मुद्रा देखि सुबुध सोचलनि जे आब ओ गंभीर बात बुझैक चेष्टामे उताहुल भए रहल छथि। तेँ जिनगीक गंभीर बातकेँ खोलि देब उचित होएत। कहलखिन- ‘‘महेन्द्र भाए, अपना गाममे सभसँ अगुआएल परिवार अहाँक अछि। चाहे धन-सम्पतिक हुअए वा पढ़बा-लिखबाक। मुदा कने गौर कए केँ देखियौ जे एत्ते धन-सम्पत्तिक उपरान्तो धनेक पाछू हजारो कोस घरसँ हटि कऽ रहै छी। अहीं कहू जे कत्ते धन भेलापर मनमे संतोष होएत। मुदा एहि प्रश्नक दोसरो पक्ष अछि, आ ओ ई अछि, ‘विश्व-बंधुत्व’क विचार। अपनो एहिठामक महान्-महान् चिन्तक एहि विचारकेँ सिर्फ मानबे नहि केलनि बल्कि बनबैक प्रयासो केलनि। ओना सैद्धान्तिक रुपमे विश्व-बंधुत्वक विचार महान् अछि मुदा जते महान् अछि ओहिसँ कनियो कम व्यवहारिक बनबैमे असान नहि अछि। लोक गामक वा आन गामक देवस्थानमे दीप जरबै, साँझ दैसँ पहिने अपना घरक गोसाइक आगूमे दीप जरबैत अछि, जे उचिते नहि गंभीर विचारक दिग्-दर्शन सेहो थिक। तहिना सभकेँ अपना लगसँ जिनगीक लीला शुरु करक चाहिऐक। अपनासँ आगू बढ़ि समाज, समाजसँ आगू बढ़ि इलाका, इलाकासँ आगू बढ़ि देश-दुनियाँ दिस बढ़ैक चाहिऐक। जँ से नहि कए कियो परिवार-समाज छोड़ि आगू बढ़ि करैत अछि, तँ जरुर कतहुँ नहि कतहुँ गड़बड़ जरुर हेतैक। जहिना दुनियामे समस्याग्रस्त मनुष्य असंख्य अछि, तहिना तँ ओहि समस्यासँ मुकबलो करैबला मनुष्य असंख्य अछि। एक्के आदमीक कएलासँ तँ दुनियाक समस्या नहि मेटा सकत। तेँ जे जेतए जन्म नेने छी ओ ओतए इमानदारी आ मेहनतसँ कर्ममे लगि जाउ।’’ सुबुधक प्रश्नकेँ स्वीकार करैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘हँ, ई दायित्व तँ मनुष्यमात्रक थिक।’’ सुबुध- ‘‘जखन ई दायित्व सभ मनुष्यक छी तँ अपने गाममे देखियौ ! एहि सालसँ, जखन सभकेँ खेत भेलै, थोड़-बहुत खुशहाली गाममे एलै। मुदा एहिसँ पहिने तँ देखै छेलिऐक जे ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छलै आ ने भरि देह वस्त्र। ने रहैक लेल सुरक्षित घर छलै, ओना अखनो नहि छैक, आ ने रोग-व्याधिसँ बचैक कोनो उपाए। बाजू, छलै की नइ छलै?’’ ‘‘हँ, छलैक।’’ ‘‘आब अहीं कहू जे हमर-अहाँक जन्म तँ अही समाजमे भेल अछि। की हम ओते कमजोर छी जे गाम छोड़ि पड़ा जाएब, पड़ाइक मतलब, जतए पेट भरत। जँ कियो पड़ाइत अछि तँ ओकरा कायर, कामचोर छोड़ि की कहबैक ? मुदा तैयो लोक जाइत किएक अछि? एकरो कारण छैक। एकर कारण छैक अधिक पाइ कमाएब वा कम मेहनतसँ जिनगी जीब। मुदा कम मेहनतसँ जिनगी असानीसँ जीब ताधरि संभव नहि अछि, जाधरि मेहनतसँ देशकेँ समृद्धिशाली नहि बना लेब। अगर जँ किछु गोटेकेँ समृद्धशाली भेने देशकेँ समृद्धशाली बुझब तँ ओ नेने-नेेने गुलामीक जंजीरमे बान्हि देत। कोनो देश गुलाम नहि होइत, गुलाम होइत अछि ओहि देशक मनुक्ख आ गुलामी होइत ओकर जिनगीक क्रिया। पाइबला सबहक जादू समाजमे ओहि रुपे चलि रहल अछि जहिना हम-अहाँ पोखरिमे कनेक बोर दए बनसी पाथि दै छिऐक आ नमहर-नमहर माछ भोजनक लोभे फँसि जाइत अछि, तहिना मनुक्खोक बीच चलि रहल अछि। ओहिकेँ नजरि गड़ाकेँ देखै पड़त।’’ सुबुधक विचारकेँ महेन्द्र मूड़ी डोला मानि लेलनि। मुदा मुड़ी डोलौलाक उपरान्तो मनमे किछु शंका रहबे कएल छलनि। जे सुबुध मूहक हाव-भावसँ बुझि गेलखिन। पुनः अपन विचारकेँ आगू बढ़बैत कहै लगलखिन- ‘‘अपना एहिठामक दशा देखियौ। जकरा अपना सभ क्रीम ब्रेन कहै छिऐ, ओ थिक वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाॅक्टर इत्यादि। ओ सभ आन-आन देश जाए अपन बुद्धिकेँ पाइबलाक हाथे बेचि लैत छथि। भलेही किछु अधिक पाइ कमा लैत होथि, मुदा ओ ओहि धनिककेँ आरो धन बढ़बैत छथि। नव-नव मशीन, नव-नव हथियारक अनुसंधान कएकेँ पछुएलहा देशपर आक्रमण कए वा व्यापारिक माल बेचि आरो पछुअबैत अछि। एकटा सवाल आरो मनमे अबैत होएत। ओ ई जे अपना देशमे ओतेक साधन नहि अछि जे ओ अपन बुद्धिक सदुपयोग कए सकताह। तेँ अपन बुद्धिक सदुपयोग करैक लेल आन देश जाइत छथि। मुदा हमरा बुझने एहि तर्कमे कोनो दम्म नहि छैक। आइ धरिक जे दुनियाँक इतिहास रहल ओ यैह रहल जे सम्पन्न देश सदिखन कमजोर पछुआएल देशकेँ लुटैत रहलैक। चाहे लड़ाइक माध्यमसँ होए वा व्यापारक माध्यमसँ। जहिसँ जेहो सम्पत्ति-साधन ओहि देशकेँ रहैत, ओहो लुटा जाइत अछि। जखन ओ लुटा जाएत तखन आगू मुहे कोना ससरत?’’ माथ कुड़िअबैत महेन्द्र पुछलखिन- ‘‘तखन की करक चाही?’’ सुबुध- ‘‘आखि उठा कए देखिऔ जे दुनियाँमे क्यो बिना अ,आ पढ़ने विद्वान् बनि सकल अछि वा बनि सकैत अछि ? जँ से नहि बनि सकैत अछि तँ पछुआएल देश वा लोक, बिना कठिन मेहनत केने आगू बढ़ि सकैत अछि। तेँ पछुआएल देश वा लोककेँ एहि बातकेँ बुझै पड़तनि। जँ से नहि बुझि अगुएलहाक अनुकरण करताह, तँ पुनः गुलामीक बाटपर चलि अओताह। कते लाजिमी बात छी जे हम अपने बनाओल हथियारसँ अपने घाएल होइ। आब दोसर दिशि चलू!’’ “अपना ऐठाम जे परिवारक ढाँचा, अदौसँ रहल, ओ दुनियामे सभसँ नीक रहल अछि। आइक चिन्तनमे दुनियाँ परिवारवाद दिशि बढ़ल अछि। जे हमरा सबहक संयुक्त परिवारक रुपमे धरोहर अछि। मनुक्खक जिनगी कतेटा होइ छै, एहिपर नजरि दियौ। तीन अवस्था तँ सभक होइ छैक। बच्चाक, जवानीक आ बुढ़ारीक। एहिमे दू अवस्था बच्चा आ बुढ़ारीमे दोसराक मदतिक जरुरत पड़ैत छैक। जे एकांगी परिवारमे नहि भए पाबि रहल छैक। आइक जे एकांगी परिवार बनि गेल अछि, ओ कुम्हारक घरारी जेकाँ बनि गेल अछि। जहिना कुम्हारक घरारी बेसी दिन धरि असथिर नहि रहैत, तहिना भए रहल अछि। बाप-माए कतौ, बेटा-पुतोहू कतौ आ धिया-पूता कतौ रहै लगल अछि। मानवीय स्नेह नष्ट भए रहल अछि। सभ जनै छी जे काँच बरतन जेकाँ मनुष्य होइत अछि। कखन की एहि शरीरमे भए जाएत, तकर कोनो गारंटी नहि छैक। स्वस्थ अवस्थामे तँ मनुष्य कतौ रहि जीबि सकैत अछि मुदा असवस्थक अवस्थामे तँ से नहि भए सकैत छैक। तखन केहेन कष्टकर जिनगी मनुष्यक सामने उपस्थित भए जाइत छैक तोहूपर तँ नजरि देमए पड़त।’’ सुबुधक विचार महेन्द्रकेँ झकझोड़ि देलकनि। देहमे कम्पन आबि गेलनि। बोली थरथराए लगलनि। कने काल असथिर भए मनकेँ असथिर केलनि। मन असथिर होइतहि सुबुधकेँ कहलखिन- ‘‘सुबुध भाए, भलेही हाइ स्कूल धरि संगे-संग पढ़लहुँ, मुदा जिनगीकेँ जहि गहराइसँ अहाँ चिन्हलहुँ, हम नहि चीन्हि सकलहुँ। सच पूछी तँ आइ धरि अहाँकेँ साधारण हाइ स्कूलक शिक्षक बुझैत छलहुँ मुदा ओ भ्रम छल। संगी रहितहुँ अहाँ गुरु छी। कखनो काल, जखन एकांत होइ छी, अपनो सोचै छी जे एते कमाइ छी, मुदा दिन-राति खटैत-खटैत चैन नहि भए पबैत छी। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बुझिये ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि, मुदा देखैक समए नहि भेटैत अछि। खाइले बइसै छी तँ चिड़ै जेकाँ दू-चारि कौर खाइत-खाइत मन उड़ि जाइत अछि, जे फल्लाँकेँ समए देने छिऐ, नहि जाएब तँ आमदनी कमि जाएत। तहिना सुतइयोमे होइत अछि। मुदा एते फ्रीसानीक लाभ की भेटैत अछि? सिर्फ पाइ। की पाइये जिनगी छिऐक?’’ महेन्द्रक बदलल विचार सुनि, मुस्की दैत सुबुध कहलखिन- ‘‘भाए, पाइ जिनगी चलैक साधन छी, नहि कि जिनगी। पाइक भीतर एते पैघ दुर्विचार छिपल अछि, जे मनुष्यकेँ कुकर्मी बना दैत अछि। कुकर्मी बनलापर मनुष्यत्व समाप्त भए जाइत छैक। जाहि सँ चीन्ह-पहचीन्हि समाप्त भए जाइत छैक। आपराधिक वृत्ति पनपै लगैत छैक। आपराधिक वृत्ति, मनुष्यमे अएलापर पैघसँ पैघ अपराधमे मनुष्यकेँ धकेलि दैत छैक। तेँ अपन जिनगीकेँ देखैत परिवार, समाजक जिनगी देखब जिनगी छी। ओना मनुष्यमात्रक सेवाक लेल सेहो सदिखन तत्पर रहक चाही। जहाँ धरि भए सकै, करबो करी। मुदा कर्मक दुनियाँ बड़ कठिन अछि। एत्ते कठिन अछि जे कर्मठसँ कर्मठ लोक रस्तेमे थाकि जाइत छथि। मुदा ओ थाकब हारब नहि जीतब छी। जे समाज रुपी गाछ मौला गेल अछि, ओहिमे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देबाक अछि। जाहिसँ ओहिमे फूल लागत आ अनबरत फुलाइत रहत। एहि काजमे अपनाकेँ समर्पित कए देबाक अछि।’’ सुबुधक संकल्पित विचारसँ महेन्द्रक विचार सेहो सक्कत बनै लगलनि। आँखिमे प्रखर ज्योति अबै लगलनि। दृढ़ स्वरमे पितो आ सुबिधोकेँ कहलखिन- ‘‘दुनू गोटेक बीच बजै छी जे सालमे एक्को दिन ओहन नहि बँचत जहि दिन हमरा चारु -दुनू भाइ आ दुनू स्त्रीगण- गोटेमे सँ कियो नहि क्यो एहिठाम नहि रहब। ओना मद्रासोमे अज-गज बहुत भए गेल अछि, ओकरो छोड़ब नीक नहि होएत, मुदा परिवारो आ समाजोकेँ नहि छोड़ब। मद्रासक कमाइ परिवारो आ समाजोमे लगाएब। अखन तँ ओते अनुभव नहि अछि, मुदा चाहब जे समाजमे बीमारीक लेल जे खर्च होइत ओ पूरा करब। जहिना पिताजी समाजक खाइक ओरियान कए देलखिन तहिना स्वास्थक ओरियान जरुर कए देब। समाजकेँ कहि दिअनु जे जकरा ककरो कोनो रोग बीमारी होए ओ आखि मूनिकेँ एहिठाम चलि आबथि। ओकर इलाज जरुर हेतै। बिना नियारे गाम आएल छलहुँ तेँ किछु लएकेँ नहि एलहुँ। मुदा कहै छी जे जहाँ धरि रोग जँचैक औजारक जोगार भए सकत ओ मद्रास जाइते पठा देब। तत्काल अखन भावो रहतीह। बौएलाल आ सुमित्रा रहबे करत। आब जे आएब ओ बेसी दिनक लेल आएब। आ एहिठाम आबि अधिकसँ अधिक गोटेकेँ चिकित्साक ज्ञान करा गामसँ रोगकेँ भगा देब। समाज हम्मर छी, हम समाजक छिऐक। (२००४ ई.) सुजित सुजीतकुमार झा जनकपुरधाम, । ६अम शताब्दीक लोक नायक वृतचित्रमे ६अम शताब्दीमे मिथिलामे विशेष कऽ तिब्बती आ भुटानी आक्रमण बढल छल । उत्तर क्षेत्र सँ तिब्बतीक आक्रमण बढल छल । ओहि समयमे सिरहाक महिसौथा (बर्तमानमे नेपालक सिरहा जिल्ला) मे जन्म लेनिहार सलहेश किराँती सभ संग समन्वय कऽ संयुक्त शैन्य दस्ता बनौलन्हि आ कुशलता पूर्वक लडाइ लडि अपन देशक सीमा बचौने रहैत । सीमा केँ रक्षा कऽ मिथिलामे राज्य करयबला दुसाध (पासवान ) जातिक ओहे लोक नायकक रुपमे चिन्हल जायबला सलहेशक विषयमे रंगकर्मी रमेश रञ्जन झा वृत्तचित्र बनौलन्हि अछि । जनकपुरक लोक सञ्चार नामक संस्थाक प्रस्तुति रहल सलहेश वृत्तचित्रमे हुनक जिवन,योगदान आ ओहि समयमे बाहिरी आक्रमण सँ मिथिलाकेँ बचौने इतिहास समेटल गेल अछि । २४ मिनेटक ओ वृत्तचित्र फेर सँ सलहेशक सम्पूर्ण व्यक्तित्वकेँ आम जनता लग स्मरण करा देलक मिथिलाञ्चलक वरिष्ठ रंगकर्मी मदन ठाकुर कहैत छथि । वृत्तचित्रक लेखक एवं निर्देशक रमेश रञ्जन झाक अनुसार सलहेशक मिथिलाञ्चलभरि मात्र नहि जतय कतौ मैथिल सभ रहैत छथि ओतयकेँ लोक हुनक योगदान आ कतेको शताब्दीपूर्व बिकेन्द्रीकरण निति लागु कऽ जनताकेँ न्याय देने स्मरण करैत पुजैत आबि रहल अछि । ओहन व्यक्ति सँ अखनकेँ देश चलाबयबला नेता सभ सिखै बहुत आवश्यक रहल हुनक कथन अछि । सलहेशक इतिहास ६अम–७अम शताब्दीमे मिथिलाक महिसौथा स्थानमे सलहेशक जन्म भेल छल । सलहेशक जन्मक समयमे मिथिलामे सामाजिक आ राजनीतिक आरजकता व्याप्त छल । छोट छोट ग्राम पिता बिचक अन्तरद्वन्दमे आम जनता पिचायल छल । सलहेश तात्कालिन सामन्त विरुद्ध सुसंगठित शक्तिक निर्माण कऽ सभकेँ परास्त करैत राज्य स्थापनाक कएलन्हि । पूर्वमे कोशी आ पश्चिममे गण्डकी उत्तरमे चुरे पर्वत शृंखला आ दक्षिणमे गंगा तक मैदानी भागमे सलहेशक शासन सत्ता स्थापना भेल । बाहरी आक्रमणकारी सँ अहि क्षेत्रकेँ सुरक्षित बनाबय सलहेश अत्यन्त कुशल आ युद्धकलामे निपुण शैन्य शक्तिक स्थापना कएलन्हि । आम जनताक जिविकाक माध्यम कृषि आ पशु पालन तथा प्राकृतिक स्रोत साधनमे आम जनताक पहुँच सुनिश्चित कएलन्हि । किराँत सँगक सम्बन्ध मिथिलामे सलहेशक राज्य स्थापना भेलाक बाद सभ सँ बडका चुनौती जनताकेँ एकजुट बनाएब आ इहे बलमे सीमाके सुरक्षित पारब रहल छल । मिथिलाकेँ गण्डक , गंगा आ कोशी सँ एक प्रकारक सुरक्षा चक्र प्रदान छल । उत्तर दिस सँ मात्र मिथिलाके आक्रमण होएबाक बेसी खतरा छल । तिब्बत आ भुटानक नरेश सँग संलग्नता आ मिथिलाक खुँखार डाकु चुहर मलक सहयोगमे बेर बेर आक्रमण भऽ रहल छल । मिथिलाक मैदानी भूमि अन्न आ पशुधनक दृष्टि सँ अत्यन्त समृद्ध भेलाक कारण आक्रमणकारी सभक अहि क्षेत्र उपर दृष्टि छल । आक्रमण कऽ फिर्ता होबयबला तिब्बती सैनिक सभ महाभारत पर्वत श्रृंखला में रहल किराती सभकेँ सेहो लुटपाट करैत छल । अर्थात मिथिला आ किराँत दूनु समान्य रुपमे आक्रमणक पीडा सँ ग्रस्त छल । ओहि समयमे मैथिल आ किराँत संयुक्त सैन्य निर्माण करब आ सामुहिक प्रतिबाद करब सलहेसक प्रस्ताब किराँती सैन्यपति केवला किराँत स्वीकार कएलन्हि । किछ दिनक वाद पकरियागढ आ तरेगना गढ लडाइमे तिब्बत भुटान आ चोहरमलक संयुक्त सैन्य शक्तिके परास्त कऽ भुटानी नरेश सुंगके सलहेस बन्दी बनाबय सफल भेल रहथि । अर्थात किराँत सँगक संयुक्त सैन्य निर्माणक वाद बाहरी आक्रमणकारी पराजित होबय लागल छल । सलहेसक उपासक सभ हुनका देवताक रुपमे पूजा करय लागल छल । तकर निरन्तरता अखनो जारी अछि । सलहेसक समाजमे प्रभाव तत्कालिन समाजमे सलहेस अत्यन्त न्याय प्रेमी शासक मानल जाइत छलाह । जातिय द्वन्द्व बढल समयमे सलहेस सभ गोटेके संगठित कएलन्हि । सभ जाति के लोक सलहेसक नेतृत्वके स्वीकार कएलन्हि । मिथिला समाजमे सलहेस आ हुनक सहयोगी पात्रके सयौ वर्ष वितलाक बादो कियो नहि विसरि सकल । सलहेसके न्यायक प्रतिमूर्ति मानल जाइत अछि । कोनो इच्छा विमारी, भुख, ऋण , पीडा सँ मुक्तीक लेल अखनो सलहेसक कोवला कएल जाइत अछि । सलहेसक भाई मोतीरामके पहलमान सभ स्मरण कऽ मात्र अखाडामें उत्तरैत अछि । जंगलमे लकरी आ अन्य उत्पादित समान लाबय जायबला सभ हिंसक जानवर सँ बचय सलहेसक भगिना कारिकन्हा आ वहिन वनसप्तीके पूजा करैत अछि । अर्थात मिथिलाक समाजिक जिवनमे सलहेसक प्रभाव एखनो अत्यधिक अछि । बिपिन बिपिन झा ॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥ (विशिष्टभाषाक रूप मे संस्कृत:- एक विमर्श) संसारक प्राचीनतम उल्लिखित भाषाक रूप मे संस्कृत प्रथित अछि। संस्कृत शब्द दू शब्द “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, कयल गेल) (सम्+कृ+क्त) सऽ मिलकें बनल अछि| एहि शब्द कअर्थ होइत अछि- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| अन्यान्य भाषाक नामकरण क्षेत्रादिक नाम पर कयल गेल अछिमुदा संस्कृतक नामकरणक हेतु एकर संस्कारयुक्त होयब छैक। एतय संस्कारयुक्त होयबाक तात्पर्य एकरपरिष्कृत व्याकरण, सरलता एवं वैज्ञानिकता छैक। संस्कृत कें विशिष्ट स्थान प्रदान करय बला किछुअन्यान्य कारक सेहो छैक जेकरा अधोलिखित बिन्दुक माध्यम सऽ निर्दिष्ट कयल जा सकैत अछि- भाषावैज्ञानिक अध्ययन मे एकर प्रभूत योगदान (सन्दर्भ हेतु ऋग्वेद १/१६४/४५, ४/५८/३,१०/७१/१-२-३, १०/११४/८, यजुर्वेद १९/७७, अथर्ववेद९/१०/२-२१ द्रष्टव्य)। प्रमुख प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, कला, पुराण, काव्य, नाटक आदिपरक ग्रन्थक संस्कृत मे निबद्धता। हिन्दू धर्मक लगभग सबटा धर्मग्रन्थ संस्कृते मे निबद्ध अछि। एकताकऽ शिक्षा देनाई। संस्कृत भाषा क व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक अछि। संस्कृत हेतु प्रथितव्याकरण अछि पाणिनि अष्टाध्यायी जे एकरा कम्प्यूटर फ्रेण्डली भाषा होयबा मे योगदानदेलकैक। संस्कृत भाषा कऽ वैशिष्ट्य- अक्षर कऽ उच्चारण- संस्कृत मे प्रत्येकव्यंजनक उच्चारण हेतु स्वरक योग सर्वथा अपेक्षित रहैत छैक। संगहि उच्चारणकवैशिष्ट्य ई अछि जे कतहु व्यतिक्रम नहि होइत अछि। उदाहरण हेतु ’अ’ कऽ १८ भेद होइत अछि।व्यतिक्रम नहिं भेलाक कारणे उच्चारण वैषम्य नहिं दृष्टिगत होइत अछि। एहि भाषाक विपरीत आंग्लआदि मे ई व्यतिक्रम स्पष्टतः दष्टिगत होइत अछि। उदाहरणतः come (कम) और coma(कोमा) मे‘co’ क दू टा भिन्न भिन्न उच्चारण भेटैत अछि| संस्कृत शब्दक निर्माण- संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग, और सन्धि आदिक सहायता सँऽ नवीन शब्द कनिर्माण सरल अछि| संस्कृत मे शब्दो क निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक ढंग सँऽ कयल जाइत अछि|। व्याकरण- एकर व्याकरण आओर वर्णमाला कऽ वैज्ञानिकता क कारण सर्वश्रेष्ठता स्वयंसिद्ध अछि। प्राचीनकाल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहलअछि| प्राचीनता वैदिक ग्रन्थक प्राचीनता निर्विवाद रूप सँ स्वीकृत अछि। अस्तु संस्कृत हजारो वर्ष पहिने सविद्यमान अछि। संस्कारित भाषा- संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं थीक, अपितु संस्कारित भाषा अछिएहि कारण एकर नामसंस्कृत अछि। संस्कृत कऽ संस्कारित करय बला छथि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योगशास्त्र क प्रणेता महर्षि पतंजलि । सरल भाषा- सामान्य रूप सँऽ संस्कृत वाक्य मे शब्द कें कोनो क्रम मे रखल जा सकैत छैक। जाहि सँऽ अर्थकअनर्थ नहिं होइत छैक। ई एहि कारण संभव छैक जे एतय प्रत्येक पद वैज्ञानिक तरीका (समुचितविभक्ति आदिक संग) सँ राखल गेल होइत छैक।उदाहरणतः – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहंअहम् दुनू ठीक छैक। त्रुटिहीन भाषा- ई भाषा संगणक आओर कृत्रिम बुद्धि क लेल सबसँऽ उपयुक्त भाषा मानल जाइत अछि। संस्कृतव्याकरण तर्कशास्त्रीय दृष्टि सँऽ उपयुक्त अछि अस्तु मशीनक भाषाक लेल पूर्णतः उपयुक्त अछि| Forbes magazine, (July, 1987) केर अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm] मष्तिष्क विकास आधुनिक शोध सँऽ ई स्पष्ट अछि जे संस्कृतक अध्ययन स मानसिक दृढता और स्मरणशक्तिकविकास होइत अछि। [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html] एकताक निर्वाहक- संस्कृते एहेन भाषा अछि जे भाषाविवाद कें प्रश्रय नहिं दैत अछि। ई एकता केर गीत सुनवैत अछि। अस्तु उक्त विविध बिदुक माध्यम सँऽ एतेक निर्विवाद अछि जे संस्कृत विशिष्ट भाषाक रूप मे विद्यमान अछि। एकटा प्रवाद सतत सुनवा मे अबैत अछि जे संस्कृत आब मृतप्राय अछि; एहि सन्दर्भ मे विभिन्न सन्दर्भक संग भ्रान्ति दूर करबाक प्रयास करब हम आगामी लेख मे। ता धरि विभिन्न राजनेता द्वारा संस्कृत मे शपथग्रहण करब, संस्कृत लेल जनमानस द्वारा समस्त वसुधाक अखण्ड मानैत कयल जारहल प्रयास आदि अपनें लोकनि कें उक्त प्रवादक जाल मे फँसवा सऽ वारित करत संगहिhttp://sanskritam.ning.com/ ई अन्तर्जाल श्रोत संस्कृतक जीवन्तताक झांकी प्रस्तुत करत। बिपिनझाhttp://sites.google.com/site/bipinsnjha/home अनमोल अनमोल झा रिलेशन-१ -गोर लगै छी। हम निखिल बजै छी। -नीके रहू। कहू की समाचार छै गामक। -ठीके छै चचाजी। कहलहुँ जे हप्ता दिनक एकटा काज अछि लखनऊमे। से अपनेक डेरापर रहबै। कोनो दिक्कत तँ नै ने हएत। - दिक्कत। दिक्कत कोना नै हएत। एकटा घर, बरण्डापर खेनाइक समान। कोना रहै छी से हमहीं सभ बुझै छी। भातिज छी, दिक्कत थोड़े होमए देब अहाँकेँ। आऊ, एकटा होटल बुक कऽ देब। कोनो दिक्कत नै हएत..। जितेन्द्र जितेन्द्र झा जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी जनकपुरधामक साहित्यकार आ रंगकर्मी शुक्र दिन ११ दिसम्बरकऽ सडकपर कवितावाचन करैत मिथिला राज्यक माग कएल अछि । नेपालमे चक्काजाम हएब कोनो नव बात नहि , मुदा जनकपुरधामक साहित्यकार रंगकर्मी रचनात्मक चक्काजाम कएलक अछि । जनकपुरक प्रवेशद्वार रहल पिडारी चौकपर यातायात अबरुद्ध करैत कविगोष्ठी कएल गेल । चक्काजाम कवि गोष्ठीमे कविसभ नेपालक नव संविधानमे मिथिलाराज्यक ब्यबस्था हएबाक माग कएने छल । नेपालमे एखन नव संविधान लिखबाक प्रक्रिया चलि रहल अछि । आ एहि क्रममे विभिन्न समुदाय, वर्ग अपन अधिकारक लेल आवाज उठारहल अछि । नयां संविधानमे मिथिला राज्य आ मधेशीक हक अधिकार सुनिश्चित हएबाक चाही रंगकर्मी रन्जु झा कहलनि । गोष्ठीमे साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल, मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, सुनिल मिश्र,काशीकान्त झा, प्रमिला मिश्र, रमेश रंजन, रंजु झा, मदन ठाकुर सहितक सहभागिता छल । मिथिला राज्य संघर्ष समिति जनकपुर मिनापक सहभागितामा गोष्ठी कएने छल । चक्काजामक कारण जनकपुर महेन्द्रनगर सडक खण्डकमे सवारी साधन नहि चलि सकल छल । संविधान सभामे मिथिला राज्यक माग कमजोर पडि रहल समयमे एहि तरहक गोष्ठीसँ मिथिला राज्यक माग थोडबहुत चर्चा बटोरलक अछि । निमिष निमिष झा
मैथिलीक युगद्रष्टा
कोनो साहित्यमे किछ साहित्यकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्म कोनो घटनाक रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बन्धित सम्पूर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत अछि । ओहन साहित्यकारक साहित्यिक व्यक्तित्व ओहि साहित्यक सर्वाङ्गीण विकासमे वरदानसिद्ध होइत अछि । ओहन साहित्यिक महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यिक परम्परा आदिक सम्यक अनुशीलन पश्चात अपन मान्यता एवम साहित्यिक योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन कार्यसभक माध्यमसँ युगान्तकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्व प्राप्त करैत छथि ।
मैथिली साहित्यक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि । सम्पूर्ण मैथिली साहित्य हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण करबाक साहित्यिक क्षमता भेल व्यक्ति मैथिली साहित्यक इतिहासमे अखन धरि किओ नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ कवि छथि । हुनकेमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण गौरव आधारित अछि ।
इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्दमे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम कवि छथि । ओ संस्कृत साहित्यक अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे काव्य रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव, चण्डीदास, रामानन्द राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान स्रष्टासभ अपन भक्ति भावनाक माध्यमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि ।
मैथिली साहित्यमे विद्यापति युग ओतबे महत्वपूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी साहित्यमे शेक्सपियर युग, नेपाली साहित्यमे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्र युग तथा हिन्दीमे भारतेन्दु युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टय भक्तिभावना, शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुटित भेल आभाष कयलक अछि । ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ व्याप्त असमानताक अन्त करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वरक रूप ग्रहण कऽ सकल ।
वास्तवमे विद्यापति युगद्रष्टा रहथि । ओ मैथिली साहित्यक श्रीवृद्धिक लेल अथक प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कालीन समयमे पतनोन्मुख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि । विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपक प्रायः हरेक भागक सभ्यता आ संस्कृति सङकटपूर्ण अवस्थामे छल । मुसलमानी शासकसभक आतङक चरमोत्कर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृतिक रक्षा आवश्यक भऽ गेल छल । ओहन अवस्थामे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल महत्वपूर्ण वरदान सिद्ध भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यक मनस्थितिसँ आक्रान्त मैथिल सभ्यता आ संस्कृति अपन उन्नयनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्त कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे सक्षम भेल ।
विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्यमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक उपज अछि शृङ्गगारिक रचना सभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्कालीन मिथिलाक युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तित्व रक्षा करबाक लेल विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल ।
तत्कालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे देखल जा सकैया ।
समाजमे व्याप्त असमानाता, कुरीति, अन्धविश्वास सहित विभिन्न विसङगतिसकेँ मानव प्रेम एवम भाषा उत्थानक भरमे विद्यापति अन्त करबाक काजमे सफल छथि ।
विद्यापतिक सम्पूर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि । कतेको विद्वानसभ विश्व साहित्यमे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि रहल कहैत छथि ।
महाकवि विद्यापति तत्कालीन समाजमे प्रचलित संस्कृत, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्त रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि ।
यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युक सम्बन्धमे विभिन्न विद्वानसभक विभिन्न मत अछि । तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठ रहथि । अहि तथ्यक आधार पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दा झा विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू वर्ष पैघ रहथि उल्लेख कयने छथि । जँ ई तथ्यकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे राज्यारोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्म सन् १३५० मे भेल निश्चित अछि ।
डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ स्वीकार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्त मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि ।
अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि अछि । अपन मृत्युक सम्बन्धमे मृत्यु पूर्व विद्यापति स्वयंद्वारा रचित पद विद्यापतिक आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मक रूपमे अन्य मत सभसँ अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल अछि ।
विद्यापतिक जन्म हाल भारतक बिहार राज्यक मधुवनि जिल्ला अन्तर्गत बिसफी गाममे भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वे लाइनक कमतौल स्टेसन लग अवस्थित अछि । हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक वंशजसभ सौराठमे रहति छथि ।
विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान पिताक सम्पर्कमे ओ प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्ड विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि । तहिना प्रकाण्ड विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली साहित्यक धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृतक सेहो प्रकाण्ड विद्वान रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृतमे सेहो अनेको रचना कयने रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि ।
क) संस्कृत ग्रन्थ ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वसार, शैवसर्वस्वसार प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्यावली, विभागरि, दान वाक्यावली, गया पत्तलक, दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जरी, वर्ष, व्रत्य, व्यादिभक्ति तरङ्गिणी ।
ख) अवहठ्ठ ग्रन्थ ः कृतिलता, कृतिपताका
ग) मैथिली ग्रन्थ ः गोरक्ष विजय १.मनोज २.राजदेव १.कुमार मनोज कश्यप घुरि आऊ निशा आओर निशा अहाँ घुरि कंऽ नहि एलहुँ । व्याकुल, विदग्ध मोन संगे पथड़ायल आँखि पथ हेरैत रहि गेल । मुदा अहाँ के नहि एबाकं छल;से अहाँ नहि एलहुँ । दिमाग कंान मरोड़ैत आछ---'बुड़िबकं कंहाँ के! ओ भला किंयैकं एतहु! किंयैकं पागल बनि रहल छै ओकंरा पाछाँ ? तोहरा सँ ओकंरा कंोन रिस्ता; कंोन संबंध? दु पल के लेल भेंट किं भेलहु; अपन आधकंार जमाबऽ लगलै ओकंरा पर?' मोन कंहैत आछ---'कंोन रिस्ता से तऽ नहि जानि; मुदा ओ घुरि कंऽ एकं दिन आओत अवश्ये़।' निशा अहाँ अपना मुँह सँ भने कंोनो आश्वासन नहि देलहुँ; मुदा अहीं कंहु निशा हमर आँखि अहाँकं आँखि के मूकं निमंत्रण नहि देने छल? किं अहाँ झुकंल पलकं सँ मौन स्वीकृति नहि देने छल हुँ? तखन पेᆬर अहाँ घुरि कंऽ किंयैकं नहि एलहुँ निशा? हमर आँखि सदिखन स्टेशन, बस-स्टैंडकं भीड़ मे आहं के तकैत रहैत आछ जे कंखनो,कंतहु-ने-कंतहु भेटाईये जैब आ बिहुँसैत कंहब, 'हम आबि गेलहु रजत!'जखन-जखन हम श्रमजीवि ट्रेन पक़ंडबाकं लेल घर सँ निकंलैत छि तऽ लगैत आछ अहाँ स्टेशन पर पेᆬर भेटायब आ हँसि कंऽ बाजब--''हाय रजत! कंोना छि अहाँ? केहन संयोग जे हम सभ दोबारा स्टेशने पर सेहो गामे जाईत कंाल भेटलहुँ ।'' हम कंहितह ुँ- '' हम तऽ निके छी। आहाँ अपन वुᆬशल बताऊ? एतेकं दिन बाद भेंट भेल। हम तऽ कंहिया सँ आहाँकं बाट जोहि रहल छि।'' आहाँ चट्ट दऽ उत्तर दितहुँ --''अरे वाह! ने अपन पता बतेलहुँ; ने हमर पता लेलहुँ, पेᆬर भेंट हेबो कंरैत तऽ कंोना?'' पेᆬर हम सभ ट्रेन मे चढ़ि जयतहुँ। मुदा निशा अहाँ नहिये एलहुँ। हमरा सभकं मिलन केहन संयोग छल! आहाँ आ आहाँकं पिताजी निचुलकंा बर्थ पर बैसल रही। ओ बर्थ हमर छल। तै हम अपन बर्थ लग आबि पुछने रहि तऽ आहाँकं पिताजी बाजल रहथि, 'ई बर्थ आह के होयत। हमर दुनू उपरकंा बर्थ आछ। आहाँ के कंष्ट नहि हुअय तऽ हम दुनू एहि पर बैसल रहि।' उत्तर मे स्वीकृति सूचकं मुड़ी डोलेबाकं आतरित्तᆬ हम किंछु नहि बाजि सकंल रहि। आहाँ कं अलौकिंकं सुंदरता हमरा मुग्ध केलकं रुप-माधुरी़ज़ेना आहाँ कंोनो दोसर लोकं सँ पृथ्वी पर उतरल होई ! कंाश! किं हम शृंगार रसकं कंवि रहितहुँ तऽ कंाव्य-घट कें अहाँकं सौंदर्य-माधुरी सँ बूंद-बूंद भरि दितहुँ। कंाश! किं हम कंोनो चितेरा होईतहुँ तऽ एहि प््रोरणा-प््रातिमूर्ती कें फलकं पर साकंार उकेरि दितहुँ। हम कंवि-चित्रकंार भने नहि; भावुकं-हृदयकं स्वामी तऽ अवश्ये छी।हमर निरीह आँखि जे कंविता हृदय पर कंविता अंकिंत केलकं; मस्तिष्कं मे जे चित्र उकेरलकं ओकंर बरोबरि कंोनो कंवि-चित्रकंार किं कंहियो कंऽ सकैत आछ? आहाँ के शाईत मोन हेबे कंरत निशा, जे जखन बातकं सिलसिला चलि परलै तऽ हम अहाँकं नाम पुछने रहि। अहाँके किंछु बजबा सँ पहिने अहाँकं पिताजी उत्तर देलनि--''श्वेत निशा'' । ''सुंदर! अतीब सुंदर! श्वेत निशा यानि पुर्णिमाकं धवल ईजोरिया''-- हमरा मुँह सँ बहरायल रहय । ओहि पर आहाँ बाजल रहि--''ईजोरियाकं संगहि अन्हरियाकं शुरुआत सेहो़ ।'' एहि सँ पहिने किं हम एकंर दार्शनिकं व्याख्या सुनि पबितहुँ, आहाँकं पिताजी टोकंने रहथि, -''निशा! चायकं थरमश निकंाल। एकं-एकं कंप घरकं गर्मागर्म चाय भऽ जाय''। आहाँ एकं कंप चाय हमरो दिस बढ़ेने रहि। जखन हम मुड़ी डोला कंऽ लेबा सँ मना केलहुँ तऽ आहाँ कंटाक्ष कंयने रहि --''किंयैकं, हमरा हाथकं चाय नहि पियब कंी?'' मुदा, निशा आहाँ चाय अपना हाथ सँ कंहाँ देने रहि हमरा। चाय के कंप हमरा दिस आहाँकं पिताजी बढ़ेने रहथि। हम चायकं कंप बिना कंोनो प््रातिवाद के लऽ कंऽ पिबऽ लागल रहि; मुदा बेमजा ।आहाँकं आँखि जेना हमरा आँखि सँ कंहने रहै--'हम अपन हाथ सँ नहि दऽ सकंलहुँ एहि मे हमर कंोन दोष? बीच मे बाधा तऽ हमर पिताजी बनि रहलाह आछ।' सत्ये हम अपन सुधि-बुधि बिसरि गेल रहि निशा। हमर कंान आहाँकं पूजाकं घंटी सन टुन-टुन आवाज सुनबाकं लेल व्यग्र छल। मोन होईत छल आहाँ संगे असीम कंाल धरि बात कंरैत रहि। मुदा आहाँकं पिताजी बिच मे आबि जाथि। हुनके सँ पता चलल जे आहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय मे साहित्य के छात्रा छी; साहित्यिकं लेखन मे सेहो आभरुचि आछ। आहाँकं पिताजी बैंकं आधकंारी छथि आ गर्मी छुट्टी मे गाम जा रहल छी। हमरा सेहो पटना तकं जयबाकं आछ से जानि आहाँकं पिताजी कंहने रहथि, 'चलू बढ़िआ भेल ।गप्प-शप्प कंरैत हमरा सभकं सफर आसानी सँ कंटि जायत।'' तकंरा बाद किंछुये कंाल मे आहाँकं पिताजी ऊंघाय लागल रहथि । आहाँ सँ बात कंरबाकं यैह उपयुत्तᆬ समय भऽ सकैछ, से बुझि हम पुछने रहि-''आहाँ के बोतल मे पानि आछ किं?''तखने आहाँकं पिताजी हड़-बड़ाकंऽ बाजल रहथि- ''हँ!हँ!य़ैह लियऽ।'' जाबत आहाँ किंछु बजितहुँ; बोतल हमरा हाथ मे धरा देलनि। हमर ईहो प््रायत्न बेकंारे चलि गेल छल। हम मोने-मोन गुम्हरि कंऽ रहि गेल रहि अपन हत-भाग्य पर आ आहाँकं पिताजीकं दखलंदाजी पर। मुदा कंईये किं सकैत छलहुँ? राति मे हमर मोन बेचैने रहल। आहाँ तऽ उपरकंा बर्थ पर निश्िचंत सुतल छलहुँ; मुदा हमर मोन आहाँकं सौंदर्य-पान लेल जागले रहि गेल। हम टॉयलेट जेबाकं बहाना सँ ठाढ़ भऽ कंऽ आहाँकं आनंद्य-सौंदर्य के अपलकं निहारैत रहलहुँक़ंोनो मूर्ति-शिल्पी जेना बड़ मनोयोग सँ स्वेत संगमरमर के तारासि-तरासि कंऽ ई आकंार देने हो़ यथा नाम, तथा रूप़़ओहने पूर्णिमाकं धवल चाँद सन मुख़डा़ग़ुलाबकं पंखुरी सन ठोऱ़क़ंाम-कंमान सन भौंह़़ अंग-प््रात्यंग सुघड़़़ज़ेना एकं-एकं टा कंविता़ । चेहरा पर लटकिं रहल अल्हड़ लट जेना कंहि रहल हो-'हम एहि ठाम नहि रहबई तऽ आहाँकं नजरि नहि लागि जयतै?'' तखने निशा आहाँ कंरोट पेᆬरने रहि। अपन चोरि पक़ंडल जेबाकं डऽरे हम टॉयलेट दिस चलि गेल रहि। भोर मे ट्रेन कंखन पटना पहुँचि गेल से बुझियो ने पौलहुँ ; नहि जनि पौलहुँ जे हमरा सभकं मिलन एतेकं क्षणिकं होयत। ट्रेन सँ उतरि कंऽ जयबा कंाल आहाँ घुमि-घुमि कंऽ कंतेकं हमरा दिस तकैत रहलहुँपेᆬर भीड़ मे कंतहु गुमि गेलहुँ। निशा हम एकंनो ओहि भीड़ सभ मे आहाँ के ताकिं रहल छि़ऩहि जानि कंहिया भेटा जायब आहाँ। २.राजदेव मंडल,ग्राम-मुसहरनियाँ, पो.- रतनसारा (निर्मली), जिला- मधुबनी (बिहार) पिन कोड- 847452 कथा रखबार
धान सँ भरल खेतमे गाछ सुतल अछि। पछिला साल तेहेन भयंकर बिहाड़ि आएल जे एकहिं थप्परमे गाछ केँ सुता देलक। तहिया सँ ई सुतलो अछि आ जागलो। एकर पाँच टा डारि पहरुदार जेँका ठाढ़ अछि आर टकटकी लागौने सौंसे बाधक पसरल गम्हरैल आ पाकल धान दिस ताकि रहल अछि। ‘‘खबरिदार, कियो भरल चासमे हाथ लगेबेँ तँ भारी डण्ड जरिमाना लगतउ।’’ ई शबद सुन-मसान बाध मे हवा पर हेल रहल अछि। आ एहि शबद केँ सभ नहि सुनैत अछि। सुनैत अछि चोइर कर्म मे संलग्न बेकती। ओकरा तँ अन्हार मे ठाढ़ गाछ लोक सन आ भुक-भुकाइत भकजोगनी हथबत्तीक इजोत सन बुझि पड़ैत अछि। चंचल मन आ भितरिया डर....। चोर कहुँ इजोत सहै। ओना लोक कहैत अछि- ‘‘जे ई गाछ संगहि ई बाध देवगनाह अछि। आ गाछक खाली जगह मे ई पाँचोटा मोंटका डारि कतेक दिन सँ ठाढ़ आछि। ओ मुईल वा जीअत रखवार थोड़े भऽ सकत। एहि भरल दुपहरिया मे असल रखबार तँ भेटत गामपर। चैबटिया गाछतर। सरुपा, गणेशी, भोली आओर चोरेबाल ताशक पत्ता फेकबा मे अपस्याँत। बुइधक कैंची चलबैत पूरा तागद केँ साथ। जे हारि जएताह ओकरा साँझ मे मूढ़ी केँ जलखई आ चाह पियाबऽ पड़तैक। तैं सभ अपन दाव-पेंच लगेबाक लेल सतर्क। ओना चिन्ताकेँ कोनो गप्प नहि। किछु गिरहतक धान पाकि गेल अछि। दू-चारि दिन मे कटि जएतैक। कटतैक किएक नहि। ओ सभ बुइधगर आ चंखार गिरहत अछि। धानक बीया शहर-बजार आ बाहर सँ मंगा केँ समे सँ पूर्व लगौने अछि। मास दिन पहिले काटियो लेत। नवका धान, बलौकिया बीज। बूढ़ सभ ओहिना चिचिआइत रहत- जे एहि अँगरेजिया धान में ताकत नहि होयत अछि। ई पुरनका राग अलापलासँ देस-दुनियाँ ठाढ़ थोडे़ रहतैक। ई तँ आगू बढ़ैत रहल अछि आ बढ़ैत रहत। नव अविसकार केँ रोकि सकैत अछि। किन्तु एहि नवका धानक चोर बड्ड-बेसी चिड़ई-चुनमुनी आ जीव-जन्तु सँ लऽ कऽ लोंक-वेद धरि। चोराक धान छोपताह रखवार। मूरही लेताह आ चाह पिबताह आ नाम लगतैन्ह चोर केँ। चोरेबाल केँ गामक लोक कहबा मे सुभीताक लेल चोरबा कहैत अछि। चोरबा नाम रहितो ओ इमनदार अछि। किछु खेती सँ आ किछु रखवारिक धान बचा केँ हरेक साल जमीन किनैत अछि। एहिना ढोलाय मड़र परिश्रम करैत आर ईमान के साथ रखवारि करैत छल। आई ओ सम्पन्न गिरहत बनि गेलाह। तहिना चोरबो बनि जाएत। कियक नहि बनत?’’ ओ अपन इमान बचैने अछि लगन लगा केँ काज करैत अछि। असल चोर आ लुच्चा तँ अछि मुसबा रखबार। केकर जजैत आ फसिल कखन काटि छोपि लेत वा कटवा दैत से ककरो पता नहि। गामक कतेक लोक विरोध कएलक- ‘‘जे मुसबा केँ अगिला बरिस रखवार सँ हटा देबैक। किन्तु अगिला बरिस पुनः रखवारिक लेल एक नंबर पर मुसबा केँ नाम। एकर सबसँ पैघ कारण रामशरण सिंह। सिंह जी गामक सभसँ पैध गिरहत। सब दृष्टिकोण सँ। कुनक खेत-पथार केँ देखवा-सुनबा आओर रखवारिक पूर्ण जिमेवारी मुसबे पर रहैत अछि। बारहो मासक लेल। मुसबा केँ नामो बदलि गेल अछि। सभ गोटे ओकरा रखबारे कहैत छैक। मुसबा केँ रखवार रहला सँ सिंह जी केँ दुई फैदा। रखवार सौंसे गामक किन्तु सिंहजीक खेती केँ विशेष देखभाल। दोसर ई जे बारह मासक मजदूरी मुसबाक भेटबाक चाही। किन्तु सिंह जी तीन मासक मजदूरी कम दैत छल। आ ई कहि संतोख दैत छल- ‘‘जे तीन मासक लेल तँ तू गामक रखवार रहैत छी। तोरा गाम दिश सँ रखबारि मे अनाज भेटतहि छौ। तैँ तीन महीनाक काटि केँ भेटतौक।’’ सब गप्प बुझितो मुसबा अपना समांग जेँका सिंहजीक खेती-पथारी केँ देखैत छल। आर अपना केँ धन्य बुझैत छल। ओ सोचैत छल- जे सिंहजीक किरपा रहत तँ हमरा कियो रखबारि सँ हटा नहि सकैत अछि। सँगहि समाज मे जे नीक-अधलाह करैत छी वा बजै छी तेकर बादो हमरा पर किछु नहि होइत अछि। सिंह जीक परभाव सँ बचल रहैत छी। आब रखबारो चुनैत काल गाम मे बड्ड राजनैति होइत अछि। के बेकती कोन पैघ गिरहत सँ मिलल अछि आ केकर गप्पक परमुखता समाज देतैक। केकरा रखवार राखि लैत आ केकरा हटा देतैक से कहब मोसकिल। पहिले ई सामाजिक व्यवस्था छल जे गामक पंचायत मे सबसँ बेसी जमीन-बाला मालिक जेकरा सभकेँ चुनि दैत छल ओ सभ रखवार भऽ जाइत छल। किन्तु बाद मे एहि गप्पक विरोध भेलैक। धन आ शिक्षा बढला सँ सभ जाति अपन-अपन सिर उठौलक। तँ आब सभ जाति सँ एक-एकटा रखवार राखल जाइत अछि। जेकर संख्या कम अछि तँ दू जाति मिलि एकटा केँ राखल जाइत अछि। ऐना मे के रखवार रहताह के हटताह से कहब मोसकिल। कोन गिरहकत सँ केकरा बेसी परेम भाव अछि। जे ओकरा लेल पंचायत मे लड़त। आ ओकर गप्प रहिये जाएत, कहब कठिन। ओना रखवार बनैक लेल बहुत गोटे तैयार रहैत अछि। एहि सँ दू टा लाभ। अपना खेती केँ रखबारि नीक जेंका तँ होएतहि अछि। संगहि रखवारि सँ प्राप्त विशेष आमदनियो। तेँ एहि कारजक लेल बहुत गोटे तैयार। किन्तु बनताह तँ भाग्यवाला। तईयो किछु एहनो तेज आ गुणी बेकती अछि जे सब साल रखवार बनबे करताह। ओहने बेकती अछि-मुसबा। पाँचो रखवार मिलि रखबारि वाला धान मुसबा एहिठाम जमा रखता। ओहिठाम दौनी करा केँ पाँचटा कुड़ी लागत आ सबसँ बड़का कुड़ी मुसबे उठा कऽ लए जएताह। मुसबाक परिबारो मे कोनो बेसी काज नहि। रखवारकि लेल एकदम ठीक बेकती। राति-बिरैत न चोर-डकैतक डर आ नहि साँप-कीड़ा केँ। चाकर-चैरठ, भुटगर कारी देह। पैंतालीस बरख उमेर भेला बादो जुआन सन लगैत अछि। अकेल खड़ खाईवाला। गाम मे मारा-पीटी कएला केँ कारणे दूई बेर जहल सँ खिचड़ी खा कऽ आपस आएल अछि। पत्नी दमा रोगक कारणे दिन-राति खोंखिआएत पड़ल रहैत अछि। चारि बरस पूर्व एक राति पुतोह सँ थप्पर-मुक्का करैत छल। जुआन बेटा किमहरो सँ आएल। पत्नी केँ बेसी मारि लगैत देखि ओहो मुसबाक केँ मारय लागल। मुसबा करोध मे आबि मोटका डेढ़हथ्थी सँ बेटाक कपार फोड़ि देलक। ओहि दिन सँ बेटा-पुतोह भिन्न भऽ गेल। बेटा दिल्ली मे कमाइत अछि। आ जाईत काल ओ अपना पत्नी केँ भाला-बरछी देने गेल अछि। आर कहि गेल अछि- ‘‘जँ हमर बाप तोरा सँ झगड़तौ तँ सीधे भाला भोंकि दिहैक। ओ तोहर ससुर नहि काल छिओ।’’ एहि गप्पक पूरा पत्ता मुसबा केँ छै। तैं ओकरा कतउ डर नहि किन्तु आँगन मे डैरा जाइत अछि। हेओ अपनो गाछी बड्ड भुताह। भरि दिन मुसबा बाधक ओगरबाहि करैत अछि आ साँझखिन केँ चैक पर सँ ताड़ी पीबि आबैत अछि। आर निंसा मे मातल अधरतियो मे अल्हा-रुदलक गीत गाबै लगैत अछि। चोर-चहार धसबाहिनी बाध जाइते ओकरा डरे थर-थर कँपैत। कहीं मुसबा आबि गेल तँ कि होयत पता नहि। बेसी काल मुसबा ओहि सुतलाहा गाछक झोंझि मे बैसल रहैत अछि। किन्तु एखन तँ ओहिठाम अछि-सुमनी। सिहारबाली अर्थात सुमनी। जोखन केँ पुतौह। कद-काठी बेस नमगर, छरगर गोर पतरिया चमड़ी। ओकर पति फेकुआ चारि मास बाहर खटैत अछि तँ दू मास गामपर रहैत अछि। अगहन आ अखाढ़क समे मे गिरहतक काज करैत अछि। सुमनी केँ तीन बरख पहिले एकटा संतान भेल रहैक। तेकरो छठिहारक राति पछुआ दाबि देलकै। तकर बाद सँ कोखि नहि भरल। किन्तु सुमनी एहि बात सँ निराश नहि अछि। ओ बुझैत अछि जे आइ नहि काल्हि बाल-बच्चा हेबे करत। आब तँ शहर मे बड़का-बड़का डागदर बैसैत अछि। ओकरा बाल-बच्चा सँ अधिक चिन्ता ख्ेाती-पथारी बढेबाक अछि। आओर ओ उन्नैत माल-जाल सँ उन्नैत करबाक लेेल परेशान रहैत अछि। तैं दुपहरिया केँ टह-टह करैत रौद मे सुमनी धास छिलबाक लेल निकलल अछि। की करत बेचारी। घर-आँगनाक काज ओकरहिं करऽ पड़ैत अछि। बूढिया सौस हरदम बेमारे रहेत अछि। ससुर कखनहुँ-काल खेत-पथार देखि आबैत अछि। से बात ठीक। किन्तु दुआर पर आबितहिं बूढबा केँ अस्सी मन दुख सवार भऽ जाइत छैन्हि। आ अनका दरबज्जा पर खूब गप्प हाँकैत रहैत अछि। सबकेँ फरियाक कहैत रहैत अछि- ‘‘बेटाक बाहर चलि गेला सँ बेसी काजक भार हमरहिं पर पड़ि गेल। एको पलऽक पलखति नहि।’’ किन्तु सबटा फूसि। सबसँ अधिक खटनी सुमनी केँ। तइयो सुमनी अपना सौस-ससुर केँ निदादर नहि करै चाहैत अछि। कारण ई अछि जे बियाह मे सुमनीक बाप सँ एकोटा रुपया दहेजक नाम पर नहि लेलक। बादो मे एहि बातक लेल उलहन-उपराग नहि देलक। संगहि सुमनी जँ बेमार पड़ैत अछि तँ ओकरा ससुर दबाई-विरो करबा मे एको रती कोताही नहि करैत अछि, सौस दिन-राति सुमनीक सेवा-टहल मे लगल रहैत अछि। सुमनीक सब दिन सँ कनेक झनकाहि आ बाजै-भुकऽ मे टेटियाह। किन्तु सौस-ससुर ओकर बात केँ सहज भाव सँ स्वीकार करैत अछि तेँ सौस-ससुर आ पुतौह मे खूब गाढ़ परेम...। जहिना माइक दुलारि तहिना सौसक दुलारी। कोनो बात मे अड़ि जाएव। अपना मोनक अनुकूल। ई लक्षण ओकरा बेदरहिं सँ अछि। मात्र दूई दिन दियारी केँ रहि गेल अछि। जाहि सँ काज आरो बढ़ि गेल अछि। जिनकर घर टाट-बाँसक अछि। दिनभरि घर-आँगन मे गोबर-माटि सँ घरबा-दुअरबा खेलैत रहू। कतबो नीपब-पोतब तइयो एकटा कोनचार टूटले रहत। तइयो सब अपना पड़ोसिया सँ प्रतिस्पद्र्धा करैत काज मे व्यस्त। गाछक छाँह मे बैसल सुमनी सोचि रहल अछि। सोचबाक नहि चाही। चोइर सँ पूर्व जँ कियो सोचय लागत तँ चोइर हेबै नहि करतैक। फेरि पुलिस-दरोगा, काम केँ। कोर्ट-कचहरी कोन कमाऽ कऽ। किन्तु चोरो केँ कखनहुँ-काल सोचय पड़ैत अछि। खास कऽ नवका चोर केँ। चोरो तँ बहुत प्रकारक होइत छैक। ताहू मे ई तँ चोर नहि चोरनी छल। तेँ बेसी सोचैत छलीह। ‘‘लार-पुआरक अभाव भऽ गेला सँ गाय-माल केँ सबसँ बेसी दिक्कत। आब जँ टगली बेर मे घास छिलब तँ साँझतक घास छिलैत रहि जाएब। बगल मे खसलाहा धान अछि। छाँह मे धान तँ हेतैक नाहि। ओहो गाछतर दबल अछि। ऐतेक बड़का गिरहतक अछि। दस मुट्ठी छोपि लेला सँ एकर की बिगड़तै। किन्तु हमर तँ बिगड़त। दुधगर गाय केँ खाइक तिरोटी भेला सँ दूध सूखि जएतैक। दोसर बहनजोग बाछी केँ भरि पोख धास नहि भेटला सँ ओ कमजोर भऽ जएतैक। एखन तँ बेबस आ लाचार छी, नचार केँ आगू बिचार की। एकरा कुकरम नहि कहल जा सकैत छैक। एहि बेर सँ हम अपना पति केँ बाहर कमाऽ लेल नहि जाय देबैक गेल छैक। रुपया कमा कऽ आनबे करता। एकटा औरो खरीद लेब। तीनू गायकेँ पालब-पोसब आ दूध चैक पर उठौना लगा देबैक। तेना केँ रास्ता
कम्रशः आगाँ देल जाएत......... ३. पद्य ३.१.गुंजनजीक राधा- १६म खेप ३.२. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ ३.४.१.रघुनाथ मुखिया २.कल्पना शरण-क्षितिजक साक्षात दर्शन ३.५.१.सतीश २.रूपेश ३.सुबोध ३.६.शेफालिका- तीनटा पद्य ३.७.१.महाकान्त ठाकुर २.शिव कुमार झा-दू टा गीत ३.८.१.निमिष २.धर्मेन्द्र गुंजन डॉ. गंगेश गुंजन राधा-१६म खेप बुझायल त एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत,माइयो के सहबैत प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा माएक एक-एक साँस के दुर्घट करैत हम अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल। ओ यद्यपि कहैत छैक- सन्तानक जन्म महासुख ! हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ? ...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ? भरिसक पिता...वैह हुनके राखल जे, होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया ! एक दिन...सुनै छी एहि गामक धरती पर ......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह। सेहो सुनै छी, माए तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता। भेलियनि जे बेटी, ककर दोख यदि दोखे त ? जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा । बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट माय पर थोपल दोख किएक, कथीक ? ओना, जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा- एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे, बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत, सौंसे चतरल गेल हरियर गाछ समान। भ त गेवे कएलौं। जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं बेसी बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज ।
राधाक मन बड़े बौआइत छैक। एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ? की ? दुनू मे की ? बा एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा तेसर परिणाम थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि- किये रूसल छथि कृष्ण ? आ कि हमहीं छियनि रूसलि हुनका सँ ! की ? के करओ पुरबा साही एकर- यदि रुसले अछि त ककरा सँ के ?... राधाक कंठ सुखाएल- ओह,जल पीबितौं दू घोंट ! पियास आकुल घैलची सँ ढारऽ गेली- घैल रिक्त, ढन-ढन करैत... (अगिला अंकमे) स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज,समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंडकर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभकयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादकडाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! भगवती वंदना !!
जनमि - जनमि कऽ बहुत भटकलहुॅ सभदेवक डगरिया । आयल छी आखिर उदास भऽ, अम्ब अहीक दुअरिया ।।
अहॅक कोर मे विष्णु सुतल, सम्मुख ब्रह्या कानैत छथि । अहीक शक्ति बिनु स्वयं शिवो, अपना केॅ शव मानैत छथि ।।
आन देव केर बात कोन सभ, बनि गेला पमरिया । जनमि ............................................ ।।
प्रलय काल मे जीवक संग, भगवानो केॅ सुतवैत छह, तमसा देवि शक्ति तोरे सॅ देव दनुज पावैत छह, मोहगत्र्त ममतावत्र्तक ई, जाइ भरल नगरिया, जनमि .......................................... ।।
दुर्भाग्य आलस्य हटाकऽ जगा दिअऽ नवचेतना, सम्मोहित कऽ दियौ दुष्ट केॅ भरू माॅ भीषण बेदना । हे माता मृतपाय पुत्र पर, ढ़ारू अमृत गगरिया । जनमि ............................................................ ।।
!! भौजीक अवाहन !!
कौआ माॅझे घर बड़ेरी पर भोरे सॅ कुचड़ै । भौजी अबिते हेती राॅची सॅ सगुन उचडै़ ।।
अपने भैया भात पसौलनि, हमरो सॅ किछु काज करौलनि, बारी सॅ तिलकोर पात किछु आनै ‘बूच’ रै ।।
कौआ ............................................................. ।
दुःखी मोन केॅ पोटि रहल छथि, काॅच दालि केॅ घोटि रहल छथि, पुरूखो हाथे दलिघोटना वर बढ़िया उसरै ।।
कौआ ............................................................. ।
जल्दी - जल्दी केश छटौलनि, गुलरोगन केर तेल लगौलनि, दहिन आॅखि फड़कै छनि लागथि बर खुश रै ।।
कौआ ............................................................. ।
भौजी औती ई रूसि रहता, नोरे मे सभ व्यथा सुनौता, हिनका खातिर आबि रहल छनि लेमनचूस रै ।।
कौआ ............................................................. । !! स्वप्न सुन्दरि !!
स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी । निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।
भोग भोगल जते जे बनल कल्पना, आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना, हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी । निन्न .................................................... ।।
मात्र उत्तापदायी बसंती छटा, आब संतापदायी अषाढ़ी घटा, काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी । निन्न .................................................... ।।
रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ, विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ? घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी । निन्न .................................................... ।।
वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्, अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्, कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी । निन्न .................................................... ।।
!! कचोट !!
अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन । केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन ।। तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही, जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन । रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर, चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन । मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक, अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन ।।
!! श्रृंगार वा वैराग्य !!
सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे । सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे ।। विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल, मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।।
अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्, आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।।
दुनियाॅ हमर एकातक गहवर, भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे । सहजो ..................................................... ।।
दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ, घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे, सहजो ..................................................... ।।
!! अकाल !!
ई अकाल नहि, महाकाल अछि, भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सॅ, चारे पर ठोकैत ताल अछि ।।1।।
फूके सॅ पताल खड़ड़ौलक, अनावृष्टि केर आगि लगौलक, एहि मंहगी क प्रचंड पसाही सॅ - उनचास बसात जगौलक ? हे देखह जड़ि रहल गाम घर, आकाशे भऽ गेल लाल अछि ।।2।।
भारत आइ भेल अछि लंका, बजि रहल अछि मरणक डंका ! बाॅचि सकत एहि वेर विभीषण केर - कुटी अछि बड़का शंका । डोरि - डोरि सॅ बान्हल, एहि वेरूक विभीषणक मंडमाल अछि ।।3।।
आंगन - आंगन हैया दैया, वाहिनिक कोर मरै छथि भैया । पूत परेम छाड़ि धरती केॅ, भरि - भरि कऽ धरै छथि मैया । वीसहुॅ आॅखि ओनारि दसानन, घुटुकि घुटुकि हिलवैत भाल छथि ।।4।।
!! नोर !!
हंसलहुॅ एक बेर जीवन मे, बेरि - बेरि कनैत रहल छी । बसलहुॅ एक बेर जीवन मे, फेर - फेर उजड़ैत रहल छी ।।
चलि - चलि भटकि - भटकि कऽ कखनो, कखनो कऽ हम दौड़ि रहल छी । एक बुन्न जीवन क लेल मरि - मरि कऽ मरू मे बौड़ि रहल छी । अपन मोन केॅ उघबा कऽ आनक तन केॅ उछहैत रहल छी ।। बसलहुॅ .................................................................................. ।।
एक - एक सायक क चोट केॅ, गुनि - गुनि छोट ध्यान नहिं देलहुॅ । बड़ कचोट चालनिक रूप मे, देखि - देखि चुप्पे रहि गेलहुॅ । ठोप - ठोप चारक चुआठ केॅ आॅगुर सॅ उपछैत रहल छी ।। बसलहुॅ .................................................................. ।।
शिल्पक छाॅछ कल्पना पूरा, भावक दही विचारक चूड़ा । आनलक जे बेगाड़ भूख मे, पाबि रहल अछि खुद्दी गूड़ा । नवनीतक अछि लूट मुदा हम छाॅछी छोरक लैत रहल छी ।। बसलहुॅ............................................................ ।।
!! श्रावणी !!
आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया । प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब, खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब, पाशतर थीर छाती लगौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।
भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई, उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई, पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।। मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी, तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली, श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया, प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।
!! गामे मोन पड़ैए !!
रोटी एक्के कोण गय बधुओ साग अनोन गय, तैयो कलकत्ता मे रहि रहि, गामे पड़ैए मोन गय ।।
गऽर गृहस्थी कलटि रहल अछि, धीओ पूता विलटि रहल अछि, अजुके मिथिला सॅ चलि अबियौ, एलै टेलीफोन गय ।।
आन - आन सभ टलहा चानी, रानी बनि बसलै राजधानी, धूमि - धूमि कऽ भीख मंगै छथि, हमर मैथिली सोन गय ।।
खेते लग करेह केर सोती पानि पटा उपजायब मोती, हुगली केर बाबू सॅ बढ़ियाॅ कमला कातक जोन गय ।।
ताकल हावड़ा सॅ दमदम धरि परतर नहि मोरतर वाली केरि ईडेन गार्डेन सॅ सुन्नर अछि, कोशी कातक बोन गय ।। पड़लि पार्क माॅडर्न बाला छथि , पतिए चढ़ा रहल माला छथि, तिरहुतनी अपना भोला लय ताकय धतुर अकोन गय ।। !! भगतालाभ !!
साधना - भावना आॅठी - गुद्दा साधना क गंगा जे चललीह से - चलिते रहलीह आ- बिनु घूरल सागर मे समा गेलीह! ई छल, भगीरथ प्रयास । हा! हन्त! साधना क सेहन्ता क ई अंत! रहि गेल भावना क जऽल जे नहिएॅ जा सकऽल । भरल रहल ओ आलय सॅ सागर धरि, सिनेहक भंगिमा पर एक बेर धूरऽ लेल, सुअवसर पावि घूरल, आ तहिया सॅ - गंगा लाल की हेतैक ककरो ! भऽ गेलनि गंगे केॅ - भगतालाभ अर्थात् विद्यापति लाभ !!!!!
!! सिया सॅ रामक परतर !!
मानै छी सुनियौ रघुवंशी पुरूष अहाॅ बेजोड़ औ, हमरा सिया सखी लग लेकिन लागै छी किछु थोड़ औ । अपने केॅ जन्मौलनि माता, सीता हमर सहज संजाता, कतबो सुन्नर श्याम मुदा छी, कतबो गुनगर राम मुदा छी, अपने नीलाकाश जानकी, लाली पसरल भोर औ ।। मादक दृष्टि कमल दल लोचन मुस्की कामदेव मदमोचन, नशा बनल चढ़ि रहल नेह अछि, बिसरल छी हम कतऽ देह अछि, मुदा सियाक दिव्य दर्शन मे अमृते केर बोर औ ।। धनुषा तोड़ल पाबि जुआनी, तहिये सॅ छी नामी गामी, बाउ अधिक जुनि बनू गुमानी ताहि धनुखा केर सुनु पिहानी तकरा बाल्यावस्थे मे ई उठा लेलनि कऽ कोर औ ।। उच्च विचार आचरण सादा, सदिखन संयोगल मरयादा, आइ कतऽ रहि गेल बपौटी, पिछरल चरण करीनक पौटी
फलक साधिका सीता हम्मर अपने फूलक चोर औ ।। हमरा सिया ............................................ ।।
!! गौरी बनलि जोगिनियाॅ !!
रूसल पिया केर गौरी बनलि जोगिनिया, पुनि हर बरब बनव कनियाॅ । सती विरह शिव मरूघट सेवल, कयल भस्म अन्वेषण केवल, बनि - बनि लावण्यक नोनिया ।। पर्ण सलिल खासो पुनि त्यागलि, युग-युग पिय तप मे लय लागलि भागलि योगेशक निनियाॅ ।। पुरबिल प्रीत रहल नहिं झाॅपल, भेल प्रतीति सकल तन काॅपल, बहल नैन प्रेमक पनियाॅ ।। गौलक स्वर्ग तलातल नाॅचल उमा अमि महिमा नम बाॅचल, जय हे कैलाशक रनियाॅ ।।
!! काली रूप वर्णन !!
मइक चरण कमल लाले लाल गय, भाल अढ़ूल फूल आॅचर पर, उड़ियौलक परिमल लाले लाल गय ।। श्यामल तन झाॅपल झोंटक बिच, बिहुंसल अधर विमल लाले लाल गय ।। लाले रंग लाल खप्पड़ अछि, वरदायक करतल लाले लाल गय ।। दया द्रवित विगलित छाती पर, मुंडमाल लटकल लाले लाल गय ।। उरसुमेरू उमड़लि पयस्विनी, चुरूअक खून चुअल लाले लाल गय ।। ममतामय मन भयदायक तन, भद्रकालिका नाम् कमाल गय ।।
!! चलि अबियौ पटना सॅ गाम !!
बी0 ए0 कैये लेलहुॅ एम0 ए0 ओ कऽए लियऽ नहि लियऽ नौकरीक नाम प्रियतम औऽऽऽ चलि आबि पटना सॅ गाम
हमरा नहि चाही घरवैया नोकरिहारा सिलिक नहि चाही नहि सोनक सिक्कड़ि गारा करबे एक्के संझे बरू टुटली मरैया दू नमरी धंधा हराम ।।
अहाॅ घास काटब, हम चूल्हि केॅ पजाड़ि लेब, अहाॅ हऽर लादब हम घऽर केॅ सम्हारि लेब, हऽम आड़ि ठाढ़ि सजल रोहिणी नक्षत्र जकाॅ अहाॅ हमर खेतक बलराम ।।
रहतै ने रौदी ई आद्र्रा बरसि जेतै पनि एतै परती ओ निश्चय कदबा हेतै अहाॅ धान रोपब ठेहूनिया दऽ दोहरि मे जलखै मे गाड़ब हम आम ।।
थाकल झमारल घुरि आयब मुन्हारि साॅझ पाटी ओछायब हम हॅसिते दुआरि माॅझ लक्ष्मी बनि तड़वा हम रगरब हे नारायण घऽर हम बैकुण्ठी धाम ।।
धन्य - धन्य मेहनति के गंगा जे बहबै छथि, अपने पसीना सॅ धरती केॅ नहबे छथि, खटि रहला भूखल पेयासे देहाते मे हुनका दिय बिअनु विराम ।।
श्रमक कोन मानि? जतऽ बुद्धिक विलास छै, पेरा दलाल गाल श्रमक पेट घास छै, दिल्ली कलकत्ता आ बम्बई केर बात की ? छोटो शहर बदनाम ।।
घूसखोर मच्छड़ उड़ीस जकाॅ जीवै छै शोणित तऽ ओ - अवशिष्ट पीवै छै हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी खगले केर तीड़ै छै चाम ।।
!! पहुना !!
हमरो नेने चलियौ, अहाॅ अपन गेह पहुना । हमहूॅ कऽ नेने छी, अहाॅ सऽ सिनेह पहुना ।। अपने केॅ चाही वैदेही हम सम देह एक ओ देही हमरो बाप बनल छथि देखू ने विदेह पहुना । हमरो ......................................................... ।।
शून्य गगन केर श्याम घटा छी, मरू पर उमड़ल दिव्य छटा छी, मधुरी मुस्की लागै विजुकी क रेह पहुना । हमरो ......................................................... ।।
सभक जीवनक एक प्राण छी, सगरो गगनक एक चान छी, हहरै छाती जहिना सागरक रेह पहुना, हमरो ......................................................... ।।
हॅसि हॅसि अहाॅ सॅ नयन जुड़यलहुॅ, चलऽ काल हा ! ई की कयलहुॅ दशा कतऽ अछि मोन कतऽ ई देह पहुना हमरो ......................................................... ।।
!! बेटी बनलि पहाड़ !!
गेलै कतऽ विवेक विचार भेलै केहेन लोकाचार हाथक फुलडाली सन बेटी बनलै माथे परक पहाड़ ।।
प्राणो सॅ जे अधिक पियरगरि, पोसलि गेली अंक मे भरि - भरि । काल्हुक ई दुलरैतिन बेटी, आइ घैल बनि लागलि घेंटी । आगाॅ भोगक पोरवरि पाछाॅ अपमानेक इनार ।।
बेटी अहाॅ बेटों सॅ बढ़िकऽ, अयलहुॅ उड़नखटोला चढ़िकऽ अपने तों लक्षमिनियाॅ देवी, बापक मुदा सुन्न छह जेवी । हे देखू हरि गरूड़ त्यागि कऽ मांगि रहै छथि कार ।। कम्मे दामे भीठ बुड़यलहुॅ सोना पैंतीस ग्राम पुड़यलहुॅ । ब्याह राति केर खर्चा चाही, बरियाती औता दस गाही । बाहर भीतर बल्ब जड़ै अछि माॅझे ठाम अन्हार ।। म्ंागलनि दशरथ एक पाइ नहि, बजला किछु रामो जमाइ नहि । श्री कृष्णक तऽ लव मैरेज छल, हिस्ट्री हमर केहेन सुन्नर भल । मुदा आइ वृष भानु जनक कऽ रहला हाहाकार ।। बेटा बनलै बेबस बकरा, बापे कंठ पकड़लनि तकरा । जीवन जब्बह भेल मनुक्खक, मानवता रहतै ककरा लग । घऽर घऽर मे बूचरखाना गामे गाम बजार ।।
!! हमर जिनगी !!
बिनु घनश्यामक बेकार हमर जिनगी, धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। मेवा सड़ि जाऊ, फऽल फूलो सभ उसरि जाउ, मधुवन जड़ि जाउ नन्द राजभवन पजड़ि जाउ, सूखल जमुनिया केर धार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। भृकुटी पर क्रोध रहेॅ हृदय मे भरल सिनेह, मक्खन मन अर्पित अछि नोक - झोंक दही देह, ककरा सॅ करतै तकरार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। चोटी मे कस्तूरी एड़ी केसर कुमकुम मलि मलि कऽ बौसथि ओ, हम तॅ रूसलि गुमसुम कतऽ एहेन पेतै दुलार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। आगि जकाॅ दागि रहल चन्द्रमुखी केर उपाधि सोना सन देह हमर भस्म करब जोगसाधि पड़ल गोर्वधन पहाड़ हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। भवसागर घाटपरक ज्ञानी घटवार कृष्ण कर्मक पुरान नाव धर्मक पतवार कृष्ण प्रेमी बिनु केॅ करतै पार हमर जिनगी । धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।। उमेश मंडल बरियाती खेबा कालक गीतश् (1) समधि गारि नइ दै छी विनती करै छी, समधिक माए पितिआइन गोअरबा के दै छी। गोअरबा सँ दूध मंगबै छी, लके समधि जिमबै छी। समधि... समधि के दादी नानी ल बनियाँ के दै छी बनियाँ सँ चीनी मंगा समधि के दै छी। श् समधि.... समधि क मौसी पीसी ल मड़बड़िया के दै छी। मड़बड़िया स धेती कीनि समधि के दै छी। श् समधि गारि.... (2) निज कुल कामिनि समधिन छिनरो महिमा अगम अपार। सगर नगर घर एको ने छोड़लनि के थिक अपन परार। बनियाँ मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका टाका हजार। पढ़ूआ मे जे डाक्टर के गछलनि जे भोकतनि सूई बारम्बार। राजपूत मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका ढ़ालश्तलवार। गोआर मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका धेनु हजार। सोनरा मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका जेवर भण्डार। तमोलिन मे जे फल्लाँ के गछलनि के करतनि उपर लाल। कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फल्लाँ अम्मा लिखू पूरैन हे। ताहि पैसि सुतय गेला फल्लाँ दुलहा सीता कोवर धय ठाढ़ि हे। बैसू सीता दाइ लाले रे पलंगिया बुझि लिय हमरो गेयान हे। जनकपुर (2) नव खटिया नव पटिया नव सब पुरहर हे। आहे नव नव जोड़ल सिनेह सोहाग राति निन्द नहि हे। ताहि पैसि सुतलाह फल्लाँ दुलहा संग सिया दाइ हे। सीताअति सुकुमारि सोहाग राति निन्द नहि हे। हटि सुतु हटि सुतु ससुर जी के बेटिया अहाँ धामे गरमी बहुत हे। एतबा वचन सुनि कनियाँ सुहवे रुसि बाहर चलि जाइ हे। हम नहि घुरबै ककरो वचनियाँ कोवरक वर बड़ ठेकर हे। महुअक कालक गीतश् बर रे जतन सासु मौहक रान्हल खिरियो ने खाथि जमाय। गे माइ गौरी जाय दहिन भरि बैसलि थार बदल दुइ भेल। मनाइनि जाय पाँछा भय बैसलि वर करा एक देल। गे माइ सेहो करा हम कुकुर जिमायब से पान वर के देल। घरभरी कालक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कैल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धीया जमैआ मोर जाय। धानश्पान देल हाथहि सखि हे दुनू मिलि देलि छिड़आय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। खोंइछ झाड़ैक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करता बिआह गे माइ। भौजी के खोंइछा मे हीरा मोती आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गे माइ। तेहन घर ने भैया बिआहल, भौजी खोंइछ दुबिश्धान गे माइ। जनु कानू जनु खीजू बहिन दुलरुआ, हम देव गहना गढ़ाय गे माइ। कोवर परातीश् अब ने विलासक बेरि हे माधव, आब ने विलासक बेरि। मुखहुक पान बिरस सन लागत, दीपक जोति मलीन। श् हे माधव..... चेरिया आय बहारय आंगन, चन्द्रक जोति मलीन। श् हे माधव..... ग्वाला आय गौ दूहन लागे, बछड़ डगरि बन गेल। श् हे माधव...... सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को, सुर्य उदय भय गेल। श् हे माधव....... कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनू हे सखिया सिया मुँह देखू शुभ काल। पहिने जे देखथि सासु कौषिल्या, देखू हे सखिया मोहर देखि शुभ काल। तखन जे देखथिन गोतनि बड़ैतिन। देखू हे सखिया कंगना देथि शुभ काल। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन, देखू हे सखिया टाका देथि शुभ काल। तखन जे देखथि परश्परोसिन, आषीष देथि शुभ काल। सुनू हेे सखिया.... कोबर नीपै कालक गीतश् नीक नीपू नीक नीपू दुलहिनिया। नहि नीक नीपब ते सुनब कहिनिया। कुम्हराक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। माटि आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। जोलहाक जनमल थिकहुँ दुलहिनिया। पाट आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। बहियाक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। पानि आनि नीपू नै ते सुनब कहिनिया। कोबर नीपै काल कनियाँ क ठकैक गीतश् देखू देखू हे सखि सीता रुसि रहली, आधा निपलनि कोबर आध छोड़ि बैसली। श् देखूश्देखू ..... सीताक बापकेँ बजाउ, सीता माए केँ बजाउ की सब सीता के सिखा क वदा कयली। श् देखू.... सुनलनि सासु कौषिल्या हाथ मोहर धयली कंगना गढ़ायब टीका मंगायब सीता किए रुसली। श् दुखूश्देखू... गौरी पूजाक गीतश् गौरी पूजय चलल रुक्मिनि संग सखी दस पाँच यो। तीन फूल लय गौरी पूजल बेली चम्पा गुलाब यो। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजल मोटिया पीपा अचीन यो। तीन नेवेद्य लय गौरी पूजल नेवो नारंगी अनार यो। तीन वस्त्र लय गोरी पूजल लाल पीयर पटोर यो। तीन बेरि कल जोरि पूजब लय गंगाजल नीर यो। हड़ीर पानक गीतश् रतन सिंहासन बैसथु सुलपाणि रवाथि ने हरीर पान पीवथु जूड़ी पानि। जेहने महादेव के गौरीदाइ परान तेहने फल्लाँ दुलहाके फल्लीं दाइ परान। जेहने रामचन्द्र के सीता दाइ परान तेंहने फल्लाँ दुलहा के फल्लों दाइ परान। जेहने हड़ीर खेने मधुर पानि तेहने फल्लाँ दुलहाक फल्लों दाइ मधुर हे। मुट्ठी खोलैक गीतश् सखि मुट्ठियो ने खोलय जमैया हे हारि गेला रधुरैया। हमरो सीता मुट्ठी कसि के बान्हल खोलियो ने सकला जमैया हे।हारि गेला... हमरो सिया दाइक कोमल आँगुर धीरे स खोलब जमैया हे। हारि गेला... चतुर्थीक कालक गीतश् चलुश्चलु कामिनि कर असनान। प्रखर भानु मुख करत मलान। शीतल शुरभीत जल घट देल। पंकज नायक नभगत भेल। आजु चतुर्थीक अवसर थीक। किछुओ ने भिजतह लोहित सारि। लहु लहु जल हम ढा़रब बारि। दुहु जन रहु गय अमर कहाय। वरुण देव नित रहथु सहाय। कुमर चतुर्थीक उत्सव तोर। विधिकरी विधि करु भऽ गेल भोर। नहायकालक गीतश् राम लखन सन सुन्दर वर के जनु पढ़ियनु केओ गारि हे। केवल हास विनोदक पुछिअनु उचित कथा दुइ चारि हे। प्रथम कथा ई पुछिअनु सजनी कहता कनेक विचारि हे। गोरे दषरथ गोरे कौषल्या, भरत राम किएक कारी हे। सुनु सखि एक अनुपम घटना, अचरज लागत भारी हे। खीर खाय बालक जनमौलनि, अवध पुरी के नारी हे। अकथ कथ की बाजू सजनी, रघुकूल के गति न्यारी हे। साठि हजार बालक जनमौलनि सगरक नारि छिनारि हे। नेहलता किछु आब ने कहियनु, एतवे करथि करारी हे। हँसी खुषी मिथिला से जेता, पठा देता महतारी हे। वेदी उखारै कालक गीतश् सखि यदि एक बापक बेटा हेता दोसर हाथ ने लगेता हे। दू बापक बेटा हेताह तखने दोसर हाथ लगोता हे। दू कोन के वेदी उखारलनि तेसर आंगन मे ठाढ़ हे। कहियनु गऽ सासु ससुर सँ आंगन मे रुसल छथि जमाय हे। कहियनु जाय जमाय बाबू सँ औंठी देवनि गढ़ाय हे। पटिया समटय कालक गीतश् रघुववर पटिया देलनि ओछाय सीता फेकल जुमाय कोवर घर मे। गाइन मंगल गीत गाय विधिकरी विधि कराय। सखि सब करथि विनोद कोवर घर मे। कहथिन सरहोजि बुझाय जुनि अहाँ अगुताइ। विधि करियौ आइ कोवर घर मे। सौजनक गीतश् मेही भात जतन भनसीआ साँठि लयल भरि थारी जी, राहड़िक दालि बटा भरि उत्तम ताहि देल घी ढ़ारी जी। ओल पड़ोर तरल तरकारी खटरस भेग लगावै जी। महिसिक दही छाँछ भरि उत्तम परसय प्रेम पियारी जी। दही खयवा कालक गीतश् हे वर दही किये ने खाइ छी माय अहाँक गोआरक बहु छथि अहाँ संग किएक ने लयलहुँ संग संग अयली टीसन सँ घुरली टीकट मास्टर देखि डेरेयली हे वर चीनी किये ने खाइ छी माय अहाँक छथि बनियाक बहुआ स्ंाग किये नहि अनलहुँ स्ंागे अयली दरबजा सँ घुरली समधी देखि डेरेयली। हे वर... चित्ती साटक गीतश् भितिया मे चितिया सटि हे योगिया जाहि ठाम लागल सिन्दुर पिठार। जहाँ जहाँ सुमिरन करबे रे योगिया रखिहे हिरदय लगाय। नून तेल पैंच लेल सिन्दुर सपन भेल पिया भेल डुमरीक फूल। भितिया.... मधुश्रावनीश् गोसाउनिक गीतश् (1) विनती सुनियौ हे महरानी, हम सब शरण मे ठाढ़। अक्षत चानन अहाँ के चढ़ायब, आरती उतारव ना। बेली चमेलीक माँ के हार चढ़ायब अढ़ूल चढ़ायब ना। करिया छागर धूर बन्हायब, उजर चढ़ायब ना। (2) महिमा तोहर अपार हे जगजननी महिमा तोहर अपार हे। बामे रवप्पर दहिने कताबहै सोनितक घार हे।महिमा..... पहिरन चीर गले मुण्डमाला पैर मे नुपुर अपार हे। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस के सदा रहिय रखवार हे। महिमा.... बिसहाराक गीतश् साओन मास नागपंचमी भेल। बिसहरि गहवर सोहाओन भेल। केओ नीपै गहवन केओ चैपारि। हमही अभागिन निपी दुआरि। केओ लोढ़े अढ़ूल केओ बेलपात। हमहू अभागिन हरिअर दूबि। केओ माँगे अनधन केओ माँगे पूत। हमहू अभागिन सिरक सिन्दुर। पावनिक गीतश् पाबनि पूजू आजु सोहागिन प्राण नाथ के संग मे। कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ मे। चानन घसू मेहदी पीसू लिखू मैना पात मे। पावनि साजि भरिश्भरि आनल जाही जूही पात मे। कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे। आँखि मूनै कालक गीतश् नहुँ नहुँ धरु सखी बाती, धरकय मोर छाती। नहुँ नहुँ पान पसारह, नहुँ नहुँ दृग दुहु झाँपह। मधुर मधुर उठ दाह मधुर मधुर अवगाहे। कुमर करह विधि आजे, मधुश्रावनी भेल आजे। टेमी कालक गीतश् क्दली दल सन थर थर कापय मधुश्रावनी आजे। स्कल सिंगार समारि साजथि सब मधुमय कैल समाजे। क्मल नयन पर पानक पट दै नागर जखनहि झाँपै। विधकरी हाथ चन्द्रकर बाती देखि सगर तन काँपै। आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख किये पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय कियै कामिनि पल पल लैह उसासे। कुमर नयन सँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावनी विधि परम कठिन इहो रीते। बटसावित्रीश् बड़क पूजाक गीतश् जेठ मास अमावस सजनी गे सब धनि मंगल गाव। भूषण वसन ठीक करु सजनी गे रचि रचि आँग लगाव। काजर रेख सिन्दुर भेल सजनी गे पहिरथु सुबुधि सयानि। हरखित चललि अक्षयवट सजनी गे गवितहि मंगल गाने। घर घर नारि हकारल सजनी गे आदर सँ सभ गेलि। आइ थिक बड़साइति सजनी गे तैँ आकुल सभ भेलि। घुरुमिश्घुरुमि जल ढ़ारल सजनी गे बांटल अक्षत सुपारी। फतुर लाल देल आषिष सजनी गे जीबथु दुलह दुलारी। (2) कतेक जतन भरमाओल सजनी गे, दै दै शपथ हजारे। सपथहुँ छल जौं जनितहुँ सजनी गे, नहि करितहुँ अंकारे। आब जगत भरि मानिनि सजनी गे, केओ जनि करय पिरीते। मुँह सँ अधिक बुझावथि सजनी गे, वचन त राखथि थीर हुनक हिया दगधल मोर सजनी गे, जसु नलिनी दल नीर। गुन अवगुन सब बुझलहुँ सजनी गे, बुझलुँ पुरुषक रीत। मनहि विद्यापति गाओल सजनी गे, पुरुषक कपटी प्रीति। कोजगरा चुमाओनश् भैया के करियनु चुमाओन कोजगरा मे। बाबू जी पुछि पुछि परसथि मखान भोजघरा मे। आंगन चानन नीपल गेल अछि। गजमोती चैक पुराय देल अछि। भैया के कहिऔन चुमाओन कोजगरा मे। मानिक दीप जराओल दय दय। काँच बाँस के डाला लय लय। भैया के करियौन चुमाओन कोजगरा मे। पचीसी गीतश् खेलू खेलू यौ भैया बाजी लागइ के। सीता जीतथि रामजी हारथि बाजी लगाइ के। सखि सब देथिपिहकारी बाजी लगाई के। सीता हारथि रामजी जितथि बाजी लगाइ के। सखी सब गेल लजाय बाजी लगाइ के। धन्य धन्य सखी हम मिथिलावासी। रामजी भेला जमाय बाजी लगाइ के। जुआ खैलै लेल एल जनकपुर वाजी लगाइ के। हारला भाय बहिन पितिआइन हे वाजी लगाइ के। दुरागमनश्कनियाँ परिछनिश् सीता एली अंगना परिछन चलु सखि सब। कथी के महफा कथी के लागल ओहार हे। सोनाक महफा रेषमक लागल ओहार हे। सीता एली अंगना परिछन चलु सखी सब। कथी के साड़ी कथीक लागल किनारी हे। रेषमक साड़ी गोटा लागल किनारी हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। कतय गेली सासु ओ ननदि जी हे। सीता के अरिछिश्परिछि घर लय चलू हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। चमाओन गीतश् चुमाबहु हे राम सिया के चुमाबहु हे। आंगन चानन निपल कौषिल्या, गजमोती चैक पुराइ हे। अलष कलष लय पुरहर साजल, मानिक दीप जराय हे। काँचहि बाँस के डाला बनल अछि, दही ओ धान सजाई हे। दूभि अक्षत लय मुनि सब अयला, शुभ शुभ शब्द सुनाई हे। चुमबय बैसली मातु कौषिल्या, सखि सब मंगल गावे हे। देहरि छेकक गीतश् राम सिया मिलि अयला अवधपुर, बहिन छेकलनि दुआरि हे। हमरा दान देव जहन अहाँ भैया, तहन छोड़व हम दुआरि हे। सासु ससुर हमरा किछु नहि देलनि, कि देव अहाँ के देहरि छेकाइ हे। हाथक औंठी भैया खोलि देलखिन, बहिन लेलनि देहरि छेकाइ हे। खोंइछ झारक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। भौजीक खोंइछ मे सोना चानी आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गेमाई। तेहना ठाम ने भैया बियहला, भौजीक खोंइछ दुभि धान गे माई। सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। मोरि बैसक गीतश् मोरि बैसल अहाँ अपन सासु, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। पुतहुँ होयत गलजोर, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। मोरि बैसल अपन पितिया सासु, मुंह जनु बाजब हे। पुतोहू होयती गलजोर, मुँह जनु अहाँ बाजब हे। कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनु हे सखि सिया मंुह देखु शुभ काल। पहिने जे देखथि अपन सासु कौषिल्या। तखन जे देखथिन गोतिन बड़ेतिन। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन। तखन जे देखथि पर परोसिन सब। आषीष देथि सब मिलि शुभ काल। सुनु हे सखि.... कोवर परातीश् आब न बिलासक बेर हे माधव आब न बिलासक बेर। मुखहुक पान निरस सन लागय, दीपक जोति मलीन। ग्वाला आबि गो दुहन लागे, गैया हमर बन गेल। चेरिया आबि झारु दियै, सुरुज उदय भय गेल। सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को चन्द्रक जोति मलीन। आब न.... (अगिला अंकमे) १.रघुनाथ २.कल्पना १.रघुनाथ मुखिया, नेने बासा ग्रा. पो.- बलहा, वाया- सुखपुर, जिला-सुपौल पिन कोड- 852130 (1) अनुत्तरित प्रश्न सहोदर अर्णवानन्द आ प्रणवानन्दक मघ्य बैसलि हमर अपूर्णे त्रिवेर्षे तनया मैथिली एकलव्या स्वतेत्रता संग्र्रामक इतिहास उलटेबामे मग्न भेल गांधी, तिलक, लोहिया, सुभाशक फोटो सभपर तर्जनी राखि पुछैत गेलि पप्पा ई के छियै? हम कहैत गेलौं-‘बबा!’ फेर पन्ना उनटि गेल आब मैथिलीक समक्ष भेल रहै जनरल ओडारक ओ विकराल चित्र जकरा देखितहि हमरा यादि पड़ि गेल छल देबालसँ घेरल मैदानक एक मात्र निकास द्वारपर सँ निहत्था पर तोपसँ चलाओल गेल 1450 राउण्ड गोली तावत मैथिली अपन तनल भृकुटी सँग प्रश्न दागि देलक पप्पा ई के हेतै? आ हम अबाक एहि बेर ई नहि कहि सकलहुँ जे इहो तोहर बब्बे हेतऽ। हम सकदम्मे रही मुदा मैथिली हमरासँ आँखि भिरेने तावत मैथिलीक नजरि घरमे दंड खिचैत मूसरीपर पड़ि गेल फँसल पन्नो उलटि गेल प्रश्नो बदलि गेल आ हमरो पिण्ड छुटल नेनाक अनुत्तरित प्रश्नसँ
(2) कविताक शीर्षक जकाँ
एहि माटिपर जतऽ कहियो सुग्गा पढ़ैत छल वेद बुझि पड़ल जे गार्गी कोना तैयार भेल हेतीह विद्रोइक लेल। भारती कोनो मसल्ला पिसलनि धुरंधर सन्यासीक छातीपर तकर चर्चा एखनहुँ होइत अछि महिषीक माटिपर एखनहुँ चर्चा होइत झैक जे सहुआक फेरमे सिबरानी कोना प्रेमचन्दकेँ मारि देलनि आ भारती कोना शंकराचार्यकेँ परास्त कऽ मंडन मिश्रकेँ तारि देलनि आ से एकटा अचरज देखियौ जे भारतीक पराजित हेबाक कोन धूजा पुरातत्व विद् फनीकांत मित्रकेँ कतौका संग्रहलयमे भेटि गेलै जकरा ओ अपन बपौती आकि खतियौनी बुझि किएक मिथिलामे फहराबऽ लगलाह? ई सभ किदु कहबाक लेल मंडन संततिक रुपमे प्रचण्ड रौदमे तप्त भेल नहि, नहि दुनुक बीचमे सत्यक स्वरुपमे ‘वियोगी’ ठाढ़ अछि सत्यकेँ सत्य कहबा लेल भगवती उग्रताराक खड्गपर अपन माथ रखने। २.कल्पना शरण क्षितिजक साक्षात दर्शन
सुनै छलहुँ क्षितिजके अर्थ अछि आकाश आ पृथ्वीक मिलन यथार्थमे बहुत अवास्तविक कल्पना असम्भव अछि एहेन संगम मुदा लागल पृथ्वी बादल के छूलक सर्दीके कुहास देखलहुँ जखन वातावरण अस्पष्ट देखायत एक आर्द्र धुऑं सऽ भरल हरदम फेर बर्फक आकाशगंगा टपऽ लागल पृथ्वीक वेग भेल तेज तखन मेघक मध्य भाग रहै ई सर्दीमे बर्फ खसैत देखलहुँ जखन आर आखिरमे ऊपरि पहुँचलहुँ पसरल चारूकात उज्जर तूर सन हिमावरित भूमि जेना पाबि गेल मेघाच्छादित एक श्वेत गगन एक अत्यन्त अलौकिक दृश्य क्षितिज के साक्षात दर्शन १.सतीश २. रूपेश ३. सुबोध १.सतीश चन्द्र झा नव वर्ष बनल धरोहर नव इतिहासक बीत गेल ई साल ससरि क’। आउ करी स्वागत नव वर्षक घृणा,द्वैष के बात बिसरि क’।
बीत गेल सभकें ओरियाक’ एक बरख जीवन के कहुना। भेटल कखनो हर्ष खुशी त’ कखनो टूटल मोनक सपना।
कतौ बनल संबंध स्नेह के कतौ स्नेह मे पीड़ा जागल। सुख-दुख,हर्ष व्यथा मे जीवन डगमग चलिते आगा भागल।
काँपि उठल ई जीवन कहियो हृदय विदारक किछु घटना सँ। भेंट चढ़ल आतंकबाद के बिछुड़ल कते लोक अपना सँ।
नुका गेल नेन्ना आँचर मे मुदा आब की ममता जगतै। सानल देह रक्त मे सांैसे की स्तन सँ दूध निकलतै।
बाढ़ि,सुखाड़, अकाल, अग्नि सँ ठहरि गेल किछु क्षण ई जीवन नहि मानै छै पेट,जाइत छल फेर सहटि क’ आगा जीवन।
बिलटि गेल घर बार छेाड़ि क’ कते लोक झगड़ा फसाद में। लागल आगि कतौ भाषा के राजनीति के नव प्रमाद में। बढल गेल सभ दाम वस्तु के रहल अभाव साल भरि अहिना। ताकि रहल छी बाट कोना क’ बीतत शुभ- शुभ पूरा महिना।
जीवन अछि संघर्ष चलब हम फेर बिसरि क’ घाव विगत के। स्वागत करब पुष्प सँ हम सभ नव- नव आशा मे आगत के।
हमर प्रार्थना नया साल मे सबके मंगल करथि विधाता। दीप जड़य सबके आंगन मे शांति, हषर््ा, सुख दैथि विधाता। २.रूपेश कुमार झा ‘त्योंथ', पिता-श्री नवकान्त झा, ग्राम+पत्रालय-त्योंथा, भाया-खिरहर, थाना-बेनीपट्टी, जिला-मधुबनी, सम्प्रति कोलकाता मे स्नातक (अन्तिमवर्ष) मे अध्यनरत, साहित्यिक गतिविधि मे सक्रिय, अनेक रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकादि मे प्रकाशित। चाही हमरा मिथिला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला मान करै छी हिन्द देश केर, हम्मर झंडा तिरंगा एकर नीचां चाही हमरा, एकटा अप्पन मिथिला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला पुरा काल मे मिथिला मे छल, ज्ञानी-प्राणी बड-बड मुदा हाल आब देखू एकर भऽ गेल केहन जर्जर भेल उपेक्षा हमर सभक, कयलहुँ बड्ड डिन मर-मर आब ने खायब टपला, चाही हमरा मिथिला माटि एतय केर उपजाऊ अछि, नहि बूझू यौ उस्सर प्रतिभा सभ अछि भरल-पडल, नहि बूझू अहाँ भूधड सुतल छलथि यौ मैथिल जन सभ, आब सभ क्यो जगला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला सुख-सुविधा केर अता-पता नहि, सउँसे थिक अन्हारे बाढि प्रभावे फसल बहैए, भऽ जाइछ लोक बिनु चारे कथा सडक केर कहल जाय ने, लगै जेना हो डबरा आब ने रहब फुसला, चाही हमरा मिथिला भेटल आजादी सगर देश मे, मिथिला जेना परतंत्रे कोनो लाभ लेल हमरा सभ, तकै छी पाटलिपुत्रे मुदा भेटै अछि किछुओ नहि यौ, भऽ जाइछ ओम्हरे घपला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला शुरुए सँ कतियाएल कनै छी, दुनू हाथ धऽ माथ करै मिथिला राज अलग, नहि चलतौ कोनो लाथ मात्र ङङ्गत्योंथ' नहि एकहि संग यौ, सभ मैथिल जन बजला ई ने पूछू कथिलए, चाही हमरा मिथिला ३.सुबोध कुमार ठाकुर आशा जीवनक ज्योति ओ प्रकाश सबहक जीबए कऽ एके गो श्रोत होइत अछि सुखमए सुन्दर आश, सोचू जे आशा नहि होइतए जीवनक परिभाषा नहि होइतए एकरे बलपर विश्वक सभ क्षेत्र चाहे ओ होए कोनो परिवेश, एकरे बलपर सभ पर्व उल्लास, जीवनक ज्योतिक प्रकाश नान्हिये टाक बच्चा लए कए पोसथि छथि माए एहि आशा लए कए पैघ भेला पर ईएह राखत हमर विश्वास, सबहक जीबए कऽ एके गो श्रोत होइत अछि सुखमए सुन्दर आश, बिलटि गेल जन कुनु परिवार भए गेलै जन अर्थक अभाव तैयो ओ जीबि लैत अछि काल्हिक बलपर आइ खेपैत अछि सुखले रोटीमे भेटए मालपुआक आभाष सोचू होइत अचि कतेक सुन्दर आश सरिपहुँ आशा विहीन प्राणी होइत अचि जेना नदी बिन प्राणी कहीं गेला अए दिव्य ज्ञानी आबि जाए हुनक जीवन लीलामे खटास जीबए लेल जरूरी चए तँए आस शेफालिका डॉ. शेफालिका वर्मा अनबुज्हल अंतरिक्ष सँ अकास सँ अन्तरक उजास सँ स्वर पर स्वर आबि रहल अछि कान मे गूंजि रहल अछि................ हम अहांकेँ देखने छी मुन्हारि संझाक रुसल बेरिया मे .. जखन अन्हार किरनक छाती सँ प्रकाश निचोरि पिबैत अछि अक्सर अहांकेँ देखने छी गुज्ज गुज्ज अन्धकार मे इजोतक निर्माण करैत हतास निरास मानवकेँ जीवनक वरदान दैत : अहांक अंतर्मन अबाध लेखनी थिक अनकहल परिभाषा केँ जाहि सँ आकार भेटल शब्द केँ अर्थ भेटल स्वप्नक सिनेह भेटल तैयो अहांकेँ बुझवाक प्रयत्न केओ नहि केलनि त्यागमयी बनी पीबि रहल छी विष बांटि रहल छी अमृत अहाँ शांतिप्रिय शांतिप्रिय प्रसंग चाहे जे होइ सम्बन्धक सीमा मे सिनेह नहि स्वार्थ बसैत अछि , मानवक भेख मे राम नहि रावण घुमैत अछि ... स्वार्थ पर जोड़ल संबंधक देवारक प्लास्टर झरि जाइत छैक विश्वासक कांच रंग कालक रौद मे उड़ि जाइत छैक .... रंगहीन गंधहीन निर्जीव रिस्ताक लहास केँ क्रोंस जकां अपन कांह पर उठेनाइ अनुचित मे अपन उचित के मारनाइ ई परिभाषा रिश्ता नाताक खूब अछि ........... नाम केओ लाख राखि लैक राम सन राजा लक्षमण सन भ्राता सुग्रीव सन दोस्त नहि तँ भेल अछि आ नहि तँ होएत हंह ... सीता मौन मूक भए अग्निपरीक्षा मे जरबाक परम्पराक जन्म देलीह आ तैं सीता आइयो जरि रहल अछि प्रसंग चाहे जे होए .............. वचनक मास अहांक वचन हम आएब हमर आँचर मे इन्द्रधनुष उतरल सतरंगी भावना मे मोनक रस रूप पसरल आ क्षण पर क्षण कपूर जकां उड़ैत रहल कैलेंडरक पन्ना फाटैत रहल वचनक ओ मास कहियो नहि आएल कहियो नहि आएल जरैत सिगरेट जकां मोन हमर दहैत रहल कामना छाउर बनैत रहल मृत्युक महक पसरैत रहल वचनक ओ मास कहियो नहि आएल कहियो नहि आएल............ महाकान्त शिव १.महाकान्त ठाकूर, जन्म भूमि-,बाबू पाली (पाली मोहन), खजौली, मधुबनी, मिथिला। प्रकाशन- 1. धरती आ चान (बाल साहित्य), 2.केहन स्वर्ग (काव्य संग्रह) आ अनेको पत्र पत्रिकामे कविता, कथा तथा निबंध प्रकाशित। (1) की चाहलौ मुक्ति चाहय वला लेल जेल ऐ धरती के जेल बना देल गेल ऐ कहाँ चाहलौ हमर जन्म हुअय?
छुच्छे भूख प्यास अकाल देखल जननीक आँखिमे घुमरैत हाहाकार देखल ठिठुरैत पूस मे कहाँ चाहलौं हमर जन्म हुअय?
सर्दी गर्मी वस्त्रहीन सहल नेन्ना ने नेनपन बूझल स्वान तुल्य जीवन लेल कहाँ चाहलौं हमर जन्म हुअय?
देश जँ डकैत लेेल शांति ऐ लठैत लेल भूख सँ ऐंठल कोखि सँ कहाँहा चाहलौं हमर जन्म हुअय?
कहु कतय भूल ऐ? पापक कि मूल ऐ? भ्रूण हत्याक सुविधा छल कहाँ कहलौं हमर जन्म हुअय? नंगटे तऽ सभ छलौं कहाँ कियो मर्द भेलैं नपुंसक संसार मे कहाँ चाहलौं हमर जन्म हुअय?
सम्राट कहय शांत रहू भले कते क्लांत बहू आत्मधाती बम बनय लेल कहाँ चाहलौ हमर जन्म हुअय?
सूर्य सन इजोत होयत कर्म नित्य कष्ट घोयत देवतो सँ श्रेष्ठ नर तेँ चाहलौं हमर जन्म हुअय!!
(2) उदारीकरण
हाथ मे कटोरी ऐ मौनी चंगेरी चंगेरा ऐ विश्वबैंक संग अमेरिका मुसिआइए भूतपूर्व जगत गुरु थोड़बो ने लजाइए। आर माँगू आर माँगू जे -जे फूड़ाइए। जी- 8 देशक तिजौरी फूजल ऐ लीअ उधार बीकय दिऔ नालको बालाको बैंक बीमा कंपनी गैस तेल भंडार नदी पुल पहाड़ साकिन होबय धरि खाइत रहू उधार। हरीशचन्द्रक वंशजकेँ राज पाट घुमा देत महाधिपति अमेरिका स्टार वार के बाद। २.शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न
!! मधु श्रावणी !!
मधुप विना सुन्न उपवन रे, मधुश्रावणी आयल । कंत विनय विवश कतऽ रे हिय ‘आरती’ हेरायल ।।
सुनू शिव छलिया स्वांगी बनि हमरा विरहय लहुॅ, संग महादेव नाम देवर केॅ कलंकित कयलहुॅ मधुप ................................................................. ।
हम कएल कतेक अनुग्रह रे अहूॅ हमरा वचन देल, मंजुल मिलन कतऽ गेल रे, कतय बात कलित गेल, मधुप ................................................................. ।
हऽम अभागलि मैथिली रे, अपनहि देल घात, नुपूर खनकि दुःख कातर रे, तोड़ल दामिनी गात, मधुप ................................................................. ।
विकल मल्हार सुनि शिव, आनन हॅसी सॅ उमड़ायल, जुनि हहरू सिये, अहाॅ लखन रघुवर संग आओल, मधुप ................................................................. ।
!! बरहमासा !!
प्रियतम आकुल कुम्हरल दारा मन, टिहुकि उठल ना ।।
मूक शिशिर पुचकारथि कोना ? दूर द्वीप सजना । जामिनी बनल कंत बिनु विजन, तरूणी माघ मनाओल क्रन्दन, सरस वसन्त क ललित रात्रि मे - हहरै कंगना । प्रियतम................................................ ।।
दादुर ठहकय तृप्ति सरोवर, अश्रुधार सॅ सींचित कोबर, कीर मृदुल सुनि चैतो बीतल, विह्वल नयना । प्रियतम ................................................................. ।
अहॅ सॅ सिनेहक धंधा कयलहुॅ, पौन आस बैशाख बुड़यलहुॅ हृदयक मीन नीर बिनु व्याकुल - सुन्न पलना । प्रियतम ................................................................. ।
जेठक रौदी काटि रहल छल, सूखल कानन झाॅटि रहल छल, उदधि अकाशे जल सॅ तिरपित - लवालव अंगना । प्रियतम ................................................................. ।
परिमल साओन मौन मनाओल, तुहिन गात तर आश्विन आयल, कातिक - अगहन बिहुॅसथि - पूस माॅगै छथि ललना । प्रियतम ................................................................. । १. निमिष २. धर्मेन्द्र
१. निमिष झा असमर्पित उन्माद अहाँक वएह नयन, वएह मोन आ वएह तन हम देखिरहल छी, सुनिरहल छी आ भोगिरहल छी समयक लम्बा अन्तरालक बाद सेहो आँखि खोलैत आ मिचैत सेहो आ अहाँ हमर शरीरक अदृश्य सरित प्रवाहमे सर्वाङ्ग समाहित छ, सज्जित छी ।
ई अभीष्ट रूप अहीँक थिक जकर अनुपस्थितिमे हमर चित्त शुष्क सिकतातुल्य भऽ गेल अछि ई शीतल छाहरि अहीँक थिक जकर अभावमे हरेक निमिष हमरा लेल नीरस आ उदास वसन्त बनि गेल अछि ।
अहाँ पनि छी हमर पियासक अहाँ वसन्त छी हमर बतासक तएँ एकटा अतृप्त उन्माद नाचिरहल अछि भैरव बनि हमर मानसमे ।
हमर स्नायुक रोब–रोबमे एकटा विषाक्त तृष्णा बहिरहल अछि आ बहिरहल अछि हमर धमनीक कण–कणमे एकटा उन्मुक्त तृषा ।
बहुत बेर उघारि दलियै, फारि देलियै नृशंस बनि आवेशसँ लज्जाक पर्दासब आ बन्द कऽ देलियै नैतिक मूल्यसँ पाशविक उन्मादसब ।
हँ ! आईयो ओहिना स्मृतिमे लटपटायल अछि अहाँक गरम साँसमे गुञ्जित हमर जीवन सङ्गीत अहाँक आँचरमे ओझरायल हमर सर्टक बट्टम अनार जकाँ अहाँक दाँत पर पिछरैत हमर जीह अहाँक ब्लाउजक हुकसँग खेलैत हमर दसो आँगुर आ अहाँक सुन्दर छाल पर दौड़ैत हमर ठोर ।
तथापि किएक नहि मिझाइत अछि छातिक ई उन्मत्त मोमबत्ति किएक निष्काम नहि होइत अछि मोनक उत्तप्त बोखारसब जेना अहाँ दारुक प्याला होई आ हम चुस्की लऽ रहल छी मदहोस भऽ रहल छी अहाँक स्वप्निल लज्जानत तनमे निमिष निमिषमे ।
मुदा उफ ! ई केहन विडम्बना ! नित्यशः एक्केटा विन्दू पर दुर्घटना होइत गेल हमर उच्छृङ्खल वासनासब अहाँक दर्शन आ सिद्धान्तक शिखरसँ नितदिन एक्के रस्ता घुरि जाइत छल अभिशप्त अहाँक विचार हमर अभिशून्य मस्तिष्कके झकझोरैत छल ।
शायद कमजोरी हमरा मे छल कि गिद्ध बनि हम युद्ध नहि कऽ सकलौं अहाँक तनसँ शायद महानता अहाँक छल माला बनि अहाँ समर्पित नहि भऽ सकलौं हमर गलासँ ।
जीवन एकटा दुरुह कविता
अर्थहीन शब्दक अर्थ खोजबाक अभिलिप्सामे अनायास थमि जाइत अछि आँखि फारि दैति छियै पन्नाक पन्ना चेतनाक शब्दकोश आ भोगैत छी एकटा पराजयक थकान जत्त नहि भेटैत छै जीवनक यर्थाथक अर्थ आ तएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा दुरुह कविता छै ।
बजैत छै लयात्मक गीत जीवनक मधुर सङ्गीत आ छम...छम...कऽ नचैत सङ्गीतसँग असंख्य कलात्मक पएर आ प्रस्फुटित भऽ जाइत छै जीवन उपवनमे मुदा अनायास फेर बन्द भऽ जाइत छै सङ्गीतक धुन थाकि जाइत छै पएर मुरझा जाइत छै उपवनक फूल आ तएँ बुझाइत अछि जीवन एकटा सारहीन सङ्गीत छै ।
आन्नद छै माछ जकाँ जीवन सरोबरमे हेलब उल्लास छै एकटा गुड्डि जकाँ आकाशमे उड़ब मुदा उड़ि नहि सकैत अछि हमर आल्हादित मोन आ अनायास उल्लासक धरातलसँ दुर्गतिक चट्टान पर अनवरत खसैत छै मोन आ डुबि जाइत छै सरोबरमे आ तएँ बुझाइत अछि गुड्डि जकाँ उड़ि नहि सकबाक आ माछ जकाँ हेलऽ नहि सकबाक नियतिक भोग छै जीवन । २.धर्मेन्द्र विह्वल ब्रम्हबाबाक अवसान सरधुवा जोनिडाहा जानि ने कत’ सँ फेर आबिगेल लाठि टेकि चलैत एकटा वृद्धाक मूहँसँ अस्फूटरुपेँ किछु अक्षरक उच्चारण भेलै कहुना सही हम अपना मोने जीवैत त’ छलौँ मुदा, मुदा ई जोनिडाहा ओकर मूहँ अनायस बन्द भ’ गेलै, ओ वृद्धा जे पागलि घोषणा क’ देलगेल छलि ब्रम्हथानक डिहवारक पँजरा ओकर आश्रय बनल छल सभकिछु नष्ट भ’ गेल आब ई ब्रम्हो बाबा रहताह कि नहि ? ओकर मूहँक बनैत बिगडैत आकृतिसँ ओकर चिन्ताक पराकाष्ठाक अनुमान कएल जा सकैत अछि एखनधरि त’ ब्रम्हबाबा जीवित छथि आब रहताह कि नहि ? वृद्धाक आँखि घोकचैत जा रहल छै । बालानां कृते- १.जगदीश प्रसाद मंडल-लघुकथा २.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) ३.कल्पना शरण: देवीजी १.जगदीश प्रसाद मंडल लघुकथा 11 उग्रघारा द्वापर युगक संध्याकालीन कथा थिक। महाभारतक लड़ाई सम्पन्न भऽ गेल छल। एक दिन एकांत मे बैसि अर्जुन त्रेताक राम-रावणक लड़ाई आ द्वापरक कौरव-पाण्डवक लड़ाइक तुलना मने-मन करति रहथि। अनायास मोन मे उठलनि जे लंका जेवा काल रामक सेना एक-एक पाथरक टुकड़ा कऽ जोड़ी जे समुद्र मे पुल बनौलनि, ओ त एक तीरो मे बनि सकैत छल। एहि प्रश्न पर जत्ते सोचति तत्ते शंका बढ़ले जाइन। अंत मे, यैह सोचलनि जे पम्पापुर मे हनुमान तपस्या कऽ रहल छथि तेँ हुनके स किऐक ने पूछि लेल जाय। हनुमान केँ भजिअबै ले अर्जुन विदा भेला। जाइत-जाइत हनुमानक कुटी पर पहुँचलथि। हनुमान तपस्या मे लीन रहथि। कुट्टीक आगू मे बैसि अर्जुन हनुमानक ध्यान टूटैक प्रतीक्षा करै लगलथि। जखन हनुमानक ध्यान टूटलनि तऽ अर्जुन कऽ देखलखिन। आसन स उठि अतिथि-सत्कार करैत हनुमान अर्जुन केँ पूछलखिन- ‘अहाँ के छी, कोन काजे एहिठाम एलहुँ? अपन परिचय दइत अर्जुन कहै लगलखिन- ‘अपने त्रेताक महावीर छी तेँ एकटा शंकाक समाधानक लेल एलहुँ।’ ‘पुछू?’ ‘लंका जेबा काल जे समुद्र मे एक-एक टा पाथरक टुकड़ा जोड़ि जे पुल बनाओल, ओ त एक तीरो मे बनि सकैत छल?’ अर्जुनक बात सुनि, किछु काल गुम्म भऽ हनुमान उत्तर देलखिन- ‘हँ, मुदा ओ ओते मजगूत नहि होइतैक जते एक-एक पाथरक टुकड़ा जोड़ि कऽ भेलैक।’ हनुमानक उत्तर स अर्जुन असहमत होइत कहलखिन- ‘तीरोक बनल पुल त ओहने मजगूत भऽ सकैत छलैक।’ एहि प्रश्न पर दुनूक बीच मतभेद भऽ गेलनि। अंत मे परीक्षाक नौबत आबि गेलैक। दुनू गोटे समुद्रक कात पहुँचलाह। तरकश स तीर निकालि अर्जुन धनुष पर चढ़ा, समुद्र मे छोड़लनि। पुल बनलै। अपन विकराल रुप बना हनुमान पुल पर कुदैक उपक्रम केलनि। अन्तर्यामी कृष्ण सब देखति रहथि। मने-मन सोचलनि जे महाभारतक नायक अर्जुन हारि रहल छथि। हुनक हारब हमर हारब हैत। संगहि महाभारतक लड़ाई सेहो झूठ भऽ जेतैक। तेँ प्रतिष्ठा बँचबैक घड़ी आबि गेल अछि। जहि सोझे हनुमान पुल पर खसितथि तहि सोझे कृष्ण अपन कन्हा पुलक तर मे लगा देलथिन। हनुमान कुदलाह। पुल त टूटै स बचि गेलैक मुदा कृष्णक करेज चहकि गेलनि। जहि स पानि मे खून पसरै लगलैक। खून स रंगाइत पानि देखि हनुमान ध्यान करै लगलथि जे ऐना किऐक भऽ रहल छैक। भजिअबैत ओ ओहि जगह पर पहुँच कृष्ण कऽ देखलखिन। अचेत कृष्ण कऽ देखि, दुनू हाथ जोड़ि हनुमान क्षमा मंगलखिन। 12 व्यवहारिक जीवनी (व्यवहारिक) आ अनाड़ीक (अव्यवहारिक) प्रश्न असान नहि। एहि विशाल संसार मे लाखो-करोड़ो ढ़ंगक जिनगी बना लोक जीवैत अछि। एकक जिनगी दोसर स मिलबो करैत आ भिन्नो होइत। तेँ एकक व्यवहारिक ज्ञान दोसराक लेल नीको होइत आ अधलो। चारि गोट स्नातक महाविद्यालय स निकलि घर (गाम) जाइत रहथि। चारु केँ अपन-अपन ज्ञान पर गर्व। दुपहर भऽ गेलइ। सभकेँ भुखो लगलनि। रास्ता मे रुकि खाइक ओरियान मे चारु गोटे जुटि गेलाह। तर्कशास्त्री आँटा अनै दोकान गेल। पोलीथीनक झोरा मे आँटा कीनि अबैत छल। मन मे फुड़लै जे झोरा मजबुत अछि कि नहि। तथ्य जनैक लेल झोरा कऽ हाथ स दबलक। झोरा फटि गेल। आँटा हरा (छिड़िया) क माटि मे मिलि गेल। फेरि घुरि कऽ चाउर कीनि ओरिया कऽ नेने आयल। कलाशास्त्री जारन अनै गेल। हरियर-हरियर सुन्दर गाछ देखि मुग्ध भऽ गेल। गाछ स सुखल जारन नहि तोड़ि काँचे झाड़ी काटि कऽ नेने आयल। कहुना-कहुना क तेसर (पाक शास्त्री) ओइह कँचका जारन पजारि बटलोही चढ़ौलक। अदहन जखन भेलइ त चाउर लगौलक। कनिये कालक बाद बटलोही मे चाउरो आ पाइनियो खुद-वुद करै लगल। बटलोही मे खुद-वुद करैत देखि पाकशास्त्री मग्न भ गेल। चारिम जे व्याकरण जननिहार छल बटलोहीक खुद-वुद अवाज देखि-सुनि, व्याकरणक उच्चारणक हिसाव स गलत बुझि, तमसा क ओकरा उल्टा देलक। भात चुल्हि मे चलि गेल। एक गोटे सब तमाशा देखैत छल। चारु कऽ भुखल देखि दया लगलै। ओ अपन मोटरी स नोन-सत्तू निकालि कऽ चारु गोटे केँ खाइ ले दैत कहलक-‘किताबी ज्ञान स व्यवहारिक अनुभवक मूल्य अधिक होइत।’ 13 समरपन (समर्पण) समुद्र स मिलैक लेल धार (नदी) विदा भेलि। रास्ता मे बलुआही इलाका पड़ैत छल। जुआनीक जोश मे धार विदा त भेलि मुदा रास्ता क बालू आगू बढ़ै ने दैत। सब पाइन सोखि लैत। धारक सपना टूटै लगलैक। मुदा तइयो साहस क धार अपन उद्गम स्रोत स जल लऽ लऽ दौड़ि कऽ आगू बढ़ै चाहैत मुदा धारक सब पानि बालू सोखि लैत। जहि स धार आगू बढ़ै मे असफल भऽ जायत। झुंझला कऽ निराश भऽ धार बालू के पूछलकै- ‘समुद्र मे मिलैक हमर सपना अहाँ नहि पूर हुअए देव?’ बालू उत्तर देलकै- ‘बलुआही इलाका होइत जायब संभव नहि अछि। अगर अहाँ अपना प्रियतम सँ मिलै चाहैत छी त अपन सम्पत्ति बादल केँ सौंपि दिऔक, तखने पहुँच पायब।’ अपन अस्तित्व कऽ समाप्त करैक अद्भुत समरपनक साहस हेबे ने करै। मुदा बालूक विचार मे गंभीरता छलैक। किछु काल विचारि धार समरपनक लेल तैयार भऽ गेलि। तखन ओ पानिक बुन्नक रुप मे अपना क बदलि बादलक सबारी पर चढ़ि समुद्र मे जा मिलल। 14 स्रष्टाक समग्र रचना सृष्टि निरमानक (निर्माणक) काज सम्पन्न भ गेलि। प्राणी सभ क बजा ब्रह्मा अपन-अपन कमीक पूर्ति करा लइ ले कहलखिन। सब प्राणी अपन-अपन कमीक चरचा करै लगल। मुद एक्के बेरि जे सब बजै लगल ते हल्ला मे केयो ककरो बात सुनबे ने करैत। तखन सभकेँ शान्त करैत ब्रह्मा बेरा-बेरी बजै ले कहलखिन। सभक बात सुनि ब्रह्मा ककरो अठन्नी ककरो चैवन्नी, ककरो दस पैसी सुधार कऽ देलखिन। अखन धरि मनुक्ख पछुआइले छल। पहिने ब्र्र्र्र्र्रह्मा नारी के पूछलखिन। ‘अहाँ मे की कमी रहि गेल अछि, बाजू?’ तमतमाइत नारी कहलकनि- ‘हमरा त बड़ सुन्नर बनेलहुँ, मुदा अपना सन दोसर नारी के देखि मन मे जलन हुअए लगैत अछि। तेँ एक रंग दू टा नारी नहि बनबियौक।’ मुस्कुराइत ब्रह्माजी एकटा अयना आनि नारीक हाथ मे द देलखिन आ कहलखिन- ‘बस, एक्केटा सहेली अहाँ सन बनेलहुँ। जखन मन हुअए तखन आगू मे अयना राखि देखि लेब। जँ सेहो देखैक मन नहि हुअए त अयना देखबे ने करब।’ 15 देवता मनुक्खक रोम-रोम मे ईश्वर परब्रह्म समाइल छथि। ककरो अहित करैक इच्छा करब अपना लेल पाप कऽ बाजाएव थिक। दधीचिक पुत्र पिप्लाद अपन माइक मुहे अपन पिताक हड्डी देवता द्वारा मांगब आ ओहि स बनाओल बज्र स अपन परान बचाएव सुनलनि। सुनितहि पिप्लाद क देवताक प्रति असीम घृणा मन मे उठलनि। मने-मन सोचै लगलथि जे अपन स्वार्थ सधैक लेल दोसरक प्राण हरब, कत्ते नीचता थिक। मन मे क्रोध जगलनि। पिताक बदला लेबा लेल ओ (पिप्पलाद) तप करैक विचार केलनि। पिप्पलाद तप शुरु केलनि। तप शुरु करितहि मनक ताप कमै लगलनि। बहुत दिनक उपरान्त भगवान शिव प्रकट भऽ कहलखिन- ‘बर मांगू?’ प्रणाम क पिप्पलाद शिव केँ कहल- ‘अपने अपन रुद्र रुप धारण क एहि देवता सभ केँ जरा भस्म कऽ दिऔक।’ पिप्पलादक बर (बात) सुनि शिव स्तब्ध भऽ गेला। मुदा अपन वचन त पूरबै पड़तनि। तेँ देवता क जरबैक लेल तेसर आखि खोलैक उपक्रम करै लगलथि। एहि उक्रमक आरंभे मे पिप्पलादक रोम-रोम जरै लगल। अपन अंग क जरैत देखि (बुझि) जोर स हल्ला करैत शिव क कहै लगलखिन- ‘भगवान! ई की भ रहल अछि? देवताक बदला हम खुदे जरि रहल छी।’ मुस्की दैत शिव कहलखिन- ‘देवता अहाँक देह मे सन्हिआइल छथि। अवयवक शक्ति हुनके सामथ्र्य छिअनि। देवता जरता आ अहाँ बँचल रहब। से कोना हैत? आगि लगौनिहार स्वयों जरैत अछि।’ पिप्पलाद अपन याचना घुमा लेलनि। तखन भगवान शिव कहलखिन- ‘देवता सभ त्यागक अवसर द अहाँ पिताक काज क गौरवान्वित केलनि। मरब त अनिवार्य थिक। एहि से ने अहाँक पिता बँचितथि आ ने वृत्तासुर राक्षस।’ पिप्पलादक भ्रम टूटि गेलनि। ओ आत्म कल्याण दिशि मुड़ी गेलाह। 16 पाप आ पुण्य अपन पोथी-पतरा उनटबैत चित्रगुप्त आसन पर बैसल छलाह। तहि बीच दू गोटे कँे यमदूत हुनका लग पेश केलक। पहिल व्यक्तिक परिचय दैत यमदूत कहलकनि- ‘ई नगरक सेठ छथि। हिनका घनक कोनो कमी नहि छनि। खूब कमेबो केलनि आ मंदिर, धरमशाला सेहो बनौलनि।’ कहि यमराज सेठ क कात मे बैसाय देलक। दोसर क पेश करैत बाजल- ‘ई बड़ गरीब छथि। भरि पेट खेनाइयो ने होइत छनि। एक दिन खाइत रहति कि एकटा भूखल कुत्ता लग मे आबि ठाढ़ भ गेलनि। भूखल कुत्ता क देखि थारी मे जे रोटी बँचल रहनि ओ ओकरा आगू मे दऽ देलखिन। अपने पानि पीबि हाथ धोय लेलनि। आब अपने जे आज्ञा दियैक।’ यमदूतक बयान सुनि चित्रगुप्त पोथिओ देखति आ विचारबो करथि। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत निर्णय देलखिन- ‘सेठ के नरक आ गरीब के स्वर्ग ल जाउ।’ चित्रगुप्तक निर्णय सुनि यमराजो आ दुनू व्यक्तियो अचंभित भऽ गेल। तीनू गोटे केँ अचंभित देख अपन स्पष्टीकरण मे चित्रगुप्त कहै लगलखिन- ‘गरीब आ निःसहाय लोकक शोषण सेठ केने अछि। ओहि निःसहाय लोकक विवशताक दुरुपयोग केने अछि। जहि स अपनोे ऐश-मौज केलक आ बचल सम्पत्तिक नाम मात्र लोकेषणक पूर्ति हेतु व्यय केलक। तहि स लोकहितक कोन काज भेलैक? ओहि मंदिर अ धरमशल्ला बनबैक पाछू ई भावना काज करैत छलैक जे लोक हमर प्रशंसा करै। मुदा पसेना चुबा के जे गरीब कमेलक आ समय ऐला पर ओहो कुत्ते क खुआ देलक। जँ ओकरा आरो अधिक धन रहितैक ते नहि जानि कत्ते अभाव लोकक सेवा करैत।’ 17 परख एकटा किसान कऽ चारि टा बेटा छल। बेटा सभक बुद्धि परखैक लेल किसान सभकेँ बजा एक-एक आँजुर धान द कहलक- ‘तू सब अपन-अपन विचार स एकरा उपयोग करह।’ धान के कम बुझि जेठका बेटा आंगन मे छिड़िया देलक। चिड़ै सब आबि बीछि-बीछि खा गेल। ओहि धान कऽ माझिल बेटा तरहत्थी पर ल-ल रगड़ि-रगड़ि, भुस्सा क मुह से फूकि, खा गेल। बापक देल धान क सम्पत्ति बुझि साँझिल बेटा कोही मे रखि लेलक, जे जँ कहियो बाबू मंगताह ते निकालि कऽ द देवनि। छोटका बेटा, ओहि धान कऽ खेत मे बाउग क देलक। जइ स कैक बर बेसी धान उपजलैक। किछु दिनक बाद, चारु बेटा केँ बजा किसान पूछलक ‘धान की भेल?’ चारु बेटा अपन-अपन केलहा काज कहलकनि। चारु बेटाक काज देखि किसान छोटका बेटा क बुद्धियार बुझि परिवारक भार दैत कहलक- ‘परिवार मे ऐहने गुण अपनबै पड़ैत छैक। ऐहने गुण अपनौला स परिवार सुसम्पन्न बनैत छैक।’ 18 आलसी एकटा गाछ पर टिकुली आ मधुमाछी रहैत छलि। दुनूक बीच घनिष्ठ दोस्ती छलैक। भरि दिन दुनू अपन जिनगीक लीला मे लगल रहैत छलि। अकलबेरा मे दुनू आबि अपन सुख-दुखक गप्प-सप्प करैत छलि। बरसातक समय एलै। सतैहिया लाधि देलकै। मधुमाछीक लेल त अगहन आबि गेलैक मुदा टिकुलीक लेल दुरकाल। भूखे-पियासे टिकुली घरक मोख लग मन्हुआइल बैसलि छलि। मुह सुखायल आ चेहरा मुरुझाइल छलै। चरौर क आबि मधुमाछी टिकुली कऽ पूछलकै- ‘बहिन! ऐहन सुन्नर समय मे एत्ते सोगाइल किऐक बैसल छी?’ मधुमाछीक बात सुनि कड़ुआइल मने टिकुली उत्तर देलकै- ‘बहिन! मौसमक सुन्नरता स पेटक आगि थोड़े मिझाइत छै। तीनि दिन स कतौ निकलैक समये ने भेटलि, तेँ भूखे तबाह छी।’ उपदेश दैत मधुमाछी कहलकै- ‘कुसमयक लेल किछु बचा क राखक चाही।’ ‘कहलौ त बहिन ठीके मुदा बचा क रखला स आलसियो भऽ जैतहुँ आ भूखलक नजरि मे चोरो होइतहुँ।’ 19 प्रेम जखन परिवार मे पति-पत्नी आ बच्चा सभक बीच स्नेह रहैत छैक तखन परिवार स्वर्गो स सुन्दर बुझि पड़ैत छैक। नमहर स नमहर विपत्ति परिवार मे किऐक ने आबे मुदा ढ़ंग स चलला पर ओहो आसानी स निपटि जाइत छैक। एकटा छोट-छीन गरीब परिवार छल। दुइये परानी घर मे। सब साल दुनू परानी-सुनिता आ सुशील- अपन विवाहोत्सब मनबैत। गरीब रहने त बहुत ताम-झाम स उत्सव नहि मनबैत मुदा मनबैत सब साल छल। छोट-मोट उपहार एक-दोसर क, याद स्वरुप दैत छल। साले-साल एहि परम्परा क निमाहैत। अहू बर्ख ओ दिन एलै। उत्सवक दिन स किछु पहिनहि स उपहारक योजना दुनू मने-मन बनवै लगल। मुदा दुनूक हाथ खाली। भरि पेट खेनाइयो ने पूरै तखन जमा क की राखैत। मने-मन सुशील योजना बनौने जे पत्नीक केश मे लगबै ले क्लीप नहि छैक तेँ एहि बेरि ओइह (क्लीप) उपहार देबैक। तहिना सुनितो सोचैत जे पति घड़ीक चेन पुरान भ गेल छनि तेँ एहि बेरि चेन कीनि कऽ देबनि। दुनू अपन अपन जोगार मे। मुदा नाजायज कमाई नहि रहने जोगारे ने बैइसै। उत्सवक दिन अबै मे एक दिन बाकी रहलै। अंतिम समय मे सुशील सोचलक जे आइ साँझ मे घड़ी बेचि क्लीप कीनि लेब। सुनीतो सोचलक जे अपन केश कटा क बेचि लेब तहि स घड़ीक चेन भ जायत। साँझू पहर दुनू गोटे- फुट-फुट बाजार गेल। सुशील घड़ी बेचि क्लीप कीनि लेलक आ सुनिता केश बेचि चेन कीनि लेलक। खुशी स दुनू गोटे घर आबि अपन-अपन वस्तु-चेन आ क्लीप- ओरिया क रखि लेलक। सबेरे सुति उठि कऽ दुनू परानी हँसैत एक-दोसर क उपहार दइ ले आगू बढ़ल। सुनिता टोपी पहिरने छलि। क्लीप निकालि सुशील सुनिताक टोपी हटा क्लीप लगबै चाहलक, मुदा केशे नहि। तहिना चेन निकालि सुनिता घड़ी मे लगबै चाहलनि ते हाथ मे घड़िये नहि। आमने-सामने दुनू ठाढ़। दुनूक मुह से ते किछु नहि निकलैत मुदा, दुनूक हृदय मे हर्ष-विस्मयक बीच घमासान लड़ाई छिड़ गेल। अंत मे हृदय बाजल- ‘जे सिनेह दूधक समुद्र्र मे झिलहोरि खेलैत अछि ओकर लेल क्लीप आ चेनक कोन महत्व छैक। 20 हैरियट स्टो अमर लेखिका हैरियट एलिजावेथ स्टो विश्व-विख्यात पोथी ‘टाम काकाक कुटिया’ लिखने छथि। जहि समय ओ पोथी लिखैत रहति ओहि समय ओ कठिन परिस्थिति मे जिनगी बितवति रहथि। ओना अकसरहाँ लोक एहि पोथी कऽ अमेरिकाक दास प्रथाक विरोध मे लिखल मानैत छथि। अपन परिस्थितिक संबंध मे अपन भौजी कऽ कहलखिन- ‘चुल्हि-चैकाक काज, नुआ-बस्तर धोनाइ,सिआई केनाई, जूता-चप्पल पौलिस आ मरम्मत करब जिनगीक मुख्य काज अछि। बच्चा आ परिवारक सेवा मे भरि दिन सिपाही जेँका खटै छी। छोटका बच्चा लग मे सुतैत अछि तेँ जाधरि ओ सुति नहि रहैत अछि ताधरि किछु ने सोचि सकै छी आ ने लिखि पबै छी। गरीबी आ परिवारक काज एहि रुपे दबने अछि जहि स समये कम बँचैत अछि। मुदा तइयो एक-दू घंटा सुतैक समय काटि, अपने सन लोकक लेल,जनिका परिवारक अंग बुझैत छिअनि, तनिका लेल किछु लिखि-पढ़ि लैत छी।’ हुनके (स्टोक) लिखल पोथी स उत्तरी अमेरिका आ दछिनी अमेरिका मे दास प्रथाक खिलाप क्रान्ति भेल। २.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा चौंतीस २.कल्पना शरण: देवीजी देवीजी : बिहारमे शिक्षा आ रोजगार बच्चा सबहक परीक्षा परिणाम वितरण के बाद देवीजी छुट्टीक समयके सदुपयोग करऽ चाहै छलैथ। महात्मा बुद्धक कर्मभूमि बिहारमे कुशाग्र बुद्धि तऽ बिन मँगने भेट जायत अछि। मुदा उपर्युक्त शिक्षा आ कार्यकौशल्य के अभावक कारण बिहारमे बहुत बेसी बेरोजगारी अछि। देवीजीक आहिके बैठक ओहि विषय पर जानकारी देबै लेल छल। बिहारके विद्यार्थी सब देशके उच्चस्तर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थामे अग्रणी छैथ।अपन राज्यमे सुविधाक अभावक कारण ओ सब आन राज्य दिस विदा भऽ जायत छैथ।तैं बिहारक आर्थिक विकासक दर बहुत कम अछि। कमाईके जुगार सेहो कम अछि आ कौशल्य प््रााप्तिक साधन सेहो नहिं अछि।आन राज्यमे हुन्का सबके अनेको समस्याक सामना करै पड़ैत छैन।बिहारमे साक्षरताक स्तर 47 प््रातिशत अछि जखन कि भारतमे अकर स्तर 66 प््रातिशत अछि।अहि तरहे बिहार साक्षरतामे भारत के आन सब राज्यमे सबसऽ पाछा अहि। देवीजी कहलखिन जे प््रााचीन भारतके दू टा विख्यात विश्वविद्यालय नालन्दा आ विक्रमशिला बिहारमे छल जकर गणना विश्वके प््राथम शैक्षणिक संस्थानमे होयत अछि। नालन्दा विश्वविद्यालयमे राजनीतिशास्त्र आ अर्थशास्त्रक शिक्षा देल जायत छल तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालयमे तन्त्रज्ञान देल जायत छल।अहि दुनुमे विश्व भरि सऽ विद्यार्थी आबैत छलैथ। सातम् शताब्दीमे करीब 10.000 विद्यार्थी नालन्दा विश्वविद्यालयमे दाखिल छलैथ। सम्प््राति सरकार कनिक सचेष्टता तऽ देखा रहल छैथ बिहारमे शिक्षा विकासमे। कारण देशके 11हम पंचवर्षीय योजनामे पटनामे आई आई टी के स्थापनाक प््राावधान अछि। नालन्दा विश्वविद्यालयके सेहो पुनस्र्थापित करबाक बात भऽ रहल अछि।तकर अतिरिक्त इंदिरा गॉंधी राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय द्वारा बिहारमे 400 ठाम ट्रेनिंग सेंटर खोलि रहल अछि।जाहिमे कम्प्यूटर के व्यवस्था अछि। अहिमे डिस्टेन्स एडुकेशन के तरीका सऽ विभिन्न विषय पर विद्यार्थी सबके तथा सरकारी कर्मचारी सबके ट्रेनिंग देल जायत।अनुमान अछि जे अहि व्यवस्था सऽ 200र्910 मे करीब 25.000 सरकारी कर्मचारी के फायदा हेतैन। अन्तमे देवीजी कहलखिन शिक्षा साक्षरता आ रोजगार मे जे स्थान बिहारके वर्तमान भारतमे अछि सैह स्थान मिथिलांचल ह्यभारत स्थितहृ के बिहार मे अछि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English byAnulina mallik. 8.2.Story by Ilarani Singh DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by Translated by ……….Anulina mallik Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. I do not have to give more introduction of her as her achievements speak for themselves. GOPAL KRISHNA Dr. Shefalika Verma Joy that lies in beauty, fragence And hymn Tranquility that lies between Laughter and tears Brightness and darkness Dawn and Dusk Almighty ? …….its all your charisma constantly I am engulfed every moment I am inspired. Desperate to unshackle Myself Attain sublimation Lifelong wrapped grief of all Treasured their faith and trust No one could fathom my agony Ceaselessly This desire kept me Burning Scorching Oh god ? Liberate me Unfetter me from desire And aspirations.. Hunt For A Mean Fellow (कुपुरुषक खोज) Translated by: Vishwajeet K Singh Translator’s Note The present story “Hunt for a mean-fellow” is the translation of “Kupurushak Khoj” – a Maithili short story published in a collection of fables entitled “tatka gap” in the year 1964 by Maithili Art Press, Kolkota. The stories published in the handbook are an exercise to document the oral tradition of story telling in Mithiilaanchal. They reflect the age-old interesting customs practiced in Mithiilaa families with an essence of witty humor and fulsome entertainment. The title of the original text, “tatka gap”: itself refers to the cultural exercise of story telling in a family get-together. Overtly, these stories belonging to the genre of “tatka gap” always have the elements of laughter, irony, sarcasm etc, but covertly, they all have one or the other moral at the end of the story. Thus, I can say that it falls into category of “Gonu Jha’s Stories” and “Birabal’s Stories”. Because of this nature of these stories, they are never old, and rather, they are always told-retold and enjoyed in all generations with basically slight change or no change at all, in the story line. The present translation is again a similar effort, supposed to fill the gap of cultural knowledge in the newer generations, especially, when the modern technologies have set the society at the pace of digital age. Translation becomes more important in these situations, especially for them, who stay away from their native culture across the time and space and are educated in urban set-up and sometimes in a foreign set-up, totally cut off from their own culture. It also becomes important for foreigners interested in knowing a popular culture, such as “Mithiilaa Culture” for any number of reasons. In this case, there are socio-cultural motivations, which inspire a translator to render the original text in a target language, such as English—the global language; to popularize precious aspects of a culture and find a place for it in the global cultural market. In this work, since I happen to have strong affiliations with Mithiilaa culture, translation of this text becomes more relevant from a socio-linguistic perspective. Fishman, a socio-linguist formulates: A translator need learn “who speaks what to whom, where and why.” The answer to these questions supports my position as a translator (WHO) of a Maithili text (WHAT), especially when it is matter of preserving the essentialities of the source text both of matter and manner. The answer is very much clear from the fact that these stories are immensely popular in their original form in its native socio-cultural context. It becomes significantly paramount to render it to the target audience—here the Mithiilaa people (WHOM) across the globe, at the point of time (WHEN), they are distanced from their native culture and to offer them the aroma of the their cultural values and uniqueness (WHY). Despite all the theoretical positions and translatorial practices such as the above, there are possibilities that the translation of a cultural text does not suffice the purpose of the audience. Of course, it is difficult to retain the joy and thrill of the original in English, however it is not totally impossible. Says Jakobson’s: “All cognitive experience and its classification are conveyable in any existing language. Whenever there is deficiency, terminology may be qualified, and amplified, by loanwords or loan translations, neologisms, or semantic shifts, and finally by circumlocutions.” --Jakobson, Roman; On Linguistic Aspects of Translation;(1966), Oxford University Press, NY. The above view suggests that there is always possibility to render a text in any language, may be it is not possible to render it depending fully on the target language, but then, a translator is free to use various tools to meet his/her goal. Perhaps, this creates a space for the genetic mutation of a language in terms of R. K. Narayan. Keeping in view all the points, which make a translation successful, I have cruised through the marvelous piece of the story “kupurushak khoj”. The original text “Kupurushak Khoj” was authored by Ilarani Singh, a contemporary of Mayanand Mishra and Kanchinath Mishra, is an author by hobby. She uses a unique diction of her own in conveying her message in a dialect of Maithili spoken in Northwest Mithiilaanchal. It has the cultural connotations widely entertained in the Mithiilaa, for which, there are hardly single English expressions. Yet, I have made a novice and humble effort to depict the humorous and cultural beauty of her story, bringing the translation as close to the original as possible within the idiom and expression of the English language. While doing translation, I have made every attempt to avoid loss of meaning and message loaded in original text. I have used the culture-specific expressions as it is in the original to give the reader the essence of original text. To help them, I have used annotations as and when required without breaking the fluency and rhythm of the story. I have taken some liberty by collating short sentences and phrases without losing the images—the reeling effect of the story absorbing the reader but not at the cost of the original flavor. Prof Kapoor’s (teaching at JNU, New Delhi) comment regarding this is noteworthy: “Such distortions of ideas can be fatal—they lead to a complete misunderstanding of a system of ideas” An extreme care has been taken to avoid succumbing to English and to sustain the very purpose of translation. Since Maithili falls into a category of languages, which have verbless expressions, I have to, sometimes, expand the hidden meaning in the original text to make it equate in English in terms of meaning. English and Maithili, though, belong to one language family—Indo-European, they are distantly related to each other and have least similarity at surface level. There are extreme variations at structural level also. Take an example of intonation pattern—English uses a different pattern compared with Maithili to express the same information. To achieve the equivalence at meaning level, in Nida’s terms, I have rendered sentences in accordance to retain the original taste. Of course, it always helps to have efficiency in both the source and target languages, specially, when you are translating text of your culture into a target language. Despite all my efforts, there are occasions when I have failed to capture the meaning of honorificity conveyed through Maithili in English translation. Maithili being rich in honorific terms and inflexions sounds very sweet, which I cannot convey through any of the English expressions and bring the aesthetic pleasure. Similarly, I faced troubles translating gender-specific terms. Since, Maithili being practiced in patriarchal society, it has gender-biased terms. I do not know why everything when personified in the story e.g. bird, utensil, food etc, as a default, gets masculine gender. It is really tough for me to construe the biasedness. Instead of my personal resistance, I have rendered translation in consonance with the original text and have not manipulated them for my personal set of beliefs. While translating I have also to work with the fabric of the story, which seems to have gaps in its structure. It is, perhaps, because of author’s limitations. I have brought certain change in the style and form of story for the proper navigation. Except a few hitches, I am sure that the story will bind the Mithiilaa people in closer bonds of love and understanding of their culture, irrespective of time and space distance. May be, it makes Mithiilaa culture more palatable and impresses the others also to the unexplored virgin land of Mithiilaanchal full of legends and mysteries and above all, the hospitability. Vishwajeet Kumar Singh MA (LIN), IV-SEM, JNU. Hunt for a Mean-Fellow Long back when King Dasharatha ruled Ayodhya, Ramchandra, the eldest son of the king Dasharatha, in his early after-marriage life, had been to Janakpur, then used to be a part of Mithiilaanchal, now in Nepal. Ramchandra, now onwards Ram, was immensely impressed by the treatment extended to him by his in-laws—father-in-law, mother-in-law and sisters-in-law. He got lost in the very love and affection offered to him. The delicious dishes—makhaanak khiir1, bhetak laawaa2 etc; cooked in Mithiilaa style, arrested him. Apart from the dishes, the melodious song sequences followed by every meal was just something, he never imagined. Everyday varieties of surprise items and varieties of titillating affairs. Ram, consequently, had not a single thought of Ayodhya, back his home. Perhaps, this is what happens at in-laws’. Week after week passed, month after month passed, Ram never thought of returning home. Back in Ayodhya, the King Dasharatha was terribly worried about Ram. Dasharatha smelt the central problem and suspected if Ram turned to be a “ghar-jamaai3”. He consulted the family teacher Vashishtha and in his consultation, he sent an errand with a letter to King Janaka. Through that the King Dasharatha expected Janaka to send him four items—a nasty bird, a horrible-food, a useless-utensil and a mean-fellow. 1makhaanak khiir: a kind of pudding, a fruit grown in lake-water boiled in milk served as dessert 2bhetak laawaa: flakes of special kind of fruit grown in Mithila 3ghar jamaai: a son-in-law, who lives at in-laws’ and does not return home to his parents Receiving the letter, King Janak got lost—what to do and what not to do. He called up the minister and asked him to gather the four items demanded. The matter spread like jungle fire. Everyone around started looking for the items one by one. The councilors suggested going for a nasty-bird first. Some of them suggested a crow “kauwa” fit for the purpose. The crow was summoned to the court. The minister commanded him to go to Ayodhya, “It’s no use staying here, dear crow. They say that you are a nasty-bird.” The crow reacted, “Honorable minister, how I can be a nasty-bird!? We always wake people up early in the morning. We clean the places killing harmful, disease-spreading insects.” He added, “Pandits call us Futurists. How come, we are nasty”. The minister shot back, “Then, who is the nasty-bird?” The crow replied, “Owl is the nasty-bird. He hides round the day to escape any labour. He makes faces at others and never serves any social purpose.” The minister agreed and ordered owls to go to Ayodhya. Then came the turn of the horrible-food. The councilors named Marua4. The poor Marua was summoned. Marua said, “We are not the horrible food. In stead, we are the food for the poor—the only food support for the poor.” He added, “Without us, the poor populace of Mithiilaa shall die” and 4Marua: a kind of cereal grown in infertile land, similar to the size of mustard seeds and black in color. It is used to get flour. explained, “When we are served with fish, they devour it afresh” and further he explained, “ we are grown up anywhere. We are ready without any wastage of time. People get it any time”. “How I can be the horrible food.” clarified Marua. The minister asked, “Then, who is the horrible food?” Marua answered, “Kushiar5 is the horrible food. It is difficult to grow. The poor cannot touch it because it is very costly. ” The minister agreed and commanded the Kushiar to go to Ayodhya. Now, it was the turn of a useless-utensil. On the advice of the councilors, Khapari6 was summoned. The minister told to Khapari, “Your are a useless-utensil, so you must leave for Ayodhya. King Dasharatha is in great need of you.” Khapari reacted, similar to others, “How come, I am useless?! In my absence, can you roast anything? The poor live their lives on bhuja-phutaha7 only. Don’t think me to be useless, just because I look blackish and brownish.” He asserted, “ I am a very useful item.” 5Kushiaar: sugar cane grown for sugar and jaggery 6Khapari: a broken earthen pot used to bake bread etc. 7bhujaa-phutahaa: cereals and grams roasted and served as a part of evening break. The minister once agreed and asked, “Then, who is a useless-utensil?” Khapari argued, “Sir, Piyaalaa8 is a useless utensil. It is used to drink daaruu-taarii9. He makes people irreligious and digress them” and continued, “better, send him to Ayodhya.” The minister agreed and asked Piyaalaa to go to Ayodhya. Lastly, it was the turn of a mean-fellow. Councilors discussed it. Someone suggested “nat10” to be a mean-fellow. Nat was summoned and asked to go to Ayodhya. Nat, on the same line, put his side, “How come, I am a mean-fellow. I entertain all the people through my art” and further explained, “I keep my physique so flexible for public-shows, and besides that, I belong to Rishi Bharat’s clan.” The minister agreed in his usual style and asked, “Then, it’s better, you tell us. Who the mean-fellow is? ” Nat replied, “The mean-fellow is one, who lives at in-laws’ and whiles away the precious time.” and he demanded, “Is there no one in Janakpur? Someone at in-laws’.” 8Piyaalaa: a cup used to serve wine and other liquors 9 daaruu-taarii: juice yielded from the palm tree and served as a part of intoxicant after fermentation 10 nat: someone who is similar to a eunuch There went the bell. Everyone in the court was dumbstruck. Ram, too, was in the court and he took no time learning the fact. Next morning, at the dawn only, which fell to be the day of Madhushravani11, he set out for Ayodhya without paying any heed to the invitations proffered by in-laws. 11Madhushravani: a socio-religious occasion, generally celebrated after marriage at married daughter’s home in the beginning five to seven years. Son-in-law is invited by in-laws for the rituals. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द
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मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
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रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी
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आलोचना
इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन
सामाजिक चिंतन
किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र
उपन्यास
माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
कहानी-संग्रह
धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन
अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य,उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रु.१००/- ४. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह“नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड(मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/-US$ २५/-) ५/६. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ७. गामक जिनगी (कथा संग्रह)- जगदीश प्रसाद मंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य),$२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ८/९/१०.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. ११.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- Indian & abroad) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ"बलचन्दा" VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) X.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी Details of postage charges availaible onhttp://www.shruti-publication.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. Address your delivery-address to श्रुति प्रकाशन,:DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website:http://www.shruti-publication.com e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com
(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल,तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथीकुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- दास जी द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। मैथिलीमे उपरझपकी पढ़ि लिखबाक जे परम्परा रहल अछि तकर ई एकटा उदाहरण अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोगक हम भर्त्सना करैत छी-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जेअपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि..(स्पष्टीकरण-क्यो नाटक लिखथि आ ओहि नाटकक खलनायकसँ क्यो अपनाकेँ चिन्हित कए नाटककारकेँ गारि पढ़थि तँ तकरा की कहब। जे क्यो मराठीमे चितपावन ब्राह्मण समितिक पत्रिकामे-जकर भाषा अवश्ये मराठी रहत- ई लिखए जे ओ एहि पत्रिकाक माध्यमसँ मराठी भाषाक सेवा कए रहल छथि तँ ओ अपनाकेँ मराठीभाषी पाठक मध्य अपनाकेँ हास्यास्पदे बना लेत- कारण सभकेँ बुझल छैक जे ओ मुखपत्र एकटा वर्गक सेवाक लेल अछि। ओना मैथिलीमे एहि तरहक मैथिली सेवक लोकनिक अभाव नहि ओ लोकनि २१म शताब्दीमे रहितो एहि तरहक विचारधारासँ ग्रस्त छथि आ उनटे दोसराक मादेँ अपशब्दक प्रयोग करैत छथि-सम्पादक)...ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।( स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ- विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए। ओना अहाँक मंत्रपुत्र हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित भेल, जे जीवकांत जी अपन आलेखमे कहै छथि। एहि अनूदित मंत्रपुत्रकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, सेहो अनुवाद पुरस्कार नहि मूल पुरस्कार, जे साहित्य अकादमीक निअमक विरुद्ध रहए। ओना मैथिली लेल ई एकमात्र उदाहरण नहि अछि। एकर अहाँ कोन रूपमे विरोध करब?) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्याससहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनकसेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँकजुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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