VIDEHA — Issue 49 / अंक ४९

Publication: VIDEHA · Issue: 49
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531 'विदेह' ४९ म अंक ०१ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ४९) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.१.शीतल झा-नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! २.पाकिस्तान मे सेक्स-विचाकुमार राधारमण १.चिड़ै-सुजीतकुमार झा२.. कामिनी कामायनी-डाविर्नक बानर३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह-मणिपद्मक कथा यात्रा ४.रामलोचन ठाकुर-समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा २.४.१.बिपिन झा-आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक ॥२.गोपाल प्रसाद-फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि ? २.५.१.दुर्गानन्द मंडल-बकलेल,२.कपिलेश्वर राउत-छूआ-छूत,३.राजदेव मंडल,रखबार (दोसर भाग) २.६.१.शरदिन्दु चौधरी-समय–संकेत २.शीतल झा-गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... ३. विजय–हरीश-किछु लघु कथा ४.सुनीता ठाकुर-अपहरणक सच-५.श्रीमति कुमुद झा-उच्चैठ भगवतीक महात्म-६.शम्भू झा वत्स-ग्राहर्स्थ्य जीवनक समस्‍या २.७.१.मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि -  प्रकाश २.२.राकेश कुमार रोशन-पञ्चैति (कथा)३.भीमनाथ झा-चन्‍दा झा, हरिमोहन झामिलिकऽ४.हेमचन्द्र झा दूटा कथा २.८.१.सुभाष चन्द्र यादव-पति-पत्नी सम्वाद २.मानेश्वर मनुज-‘जीत’३.(सं. सा. सं)नागेश्वर लाल कर्ण ४.डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी-विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग २.९.- जिनगीक जीत उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.१.लोकगीत संकलन–निशा प्रभा झा २.२.उमेश मंडल-लोकगीत संकलन ३.३.१. लक्ष्मण झा ‘सागर’-चुट्टीधारी २.विभूति आनन्द-एक- दू- तीन- चारि- पाँच- छओ- सात- आठ- नओटा- कविता ३.रमण कुमार सिंह ४.मायानाथ झा-मातृगिरा ५.विनीत उत्पल-समाज ३.४.१.जीवकान्‍त-जन-जन याचक ३.५.१.रघुनाथ मुखिया-किछु पद्य २.सच्चिदानन्द सौरभ-किछु पद्य ३.६.१.ई वर्ष-अजित मिश्र २.नव वर्ष ३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.७.१.अशोक दत्त-किछु कविता २.शीतल झा--किछु कविता ३.शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’--किछु कविता ३.८.१.डॉ. योगानन्‍द झाघर ४.१.किछु लघु कहानी   आशीष चौधरी  २.जगदीश प्रसाद मंडल-किछु लघुकथा ३. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) 5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 5.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English byDr.Anamika 5.2.1.Yogendra Yadava- Maithili 2.Sindhu Poudyal-Mithila :- mother land of Navya- Nyaya Language. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेलhttp://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscriptionबटन क्लिक करू आ खाली स्थानमेhttp://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।  http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार 2009- स्व.मनमोहन झाकेँ कथा संग्रह गंगापुत्रपर देल गेल छन्हि। मनमोहन झाक जन्म 1918 ई. मे सरिसबमे भेलन्हि आ मृत्यु 2009 ई. मे भेलन्हि। हिनकर रचना सभ छन्हि- अश्रुकण, वीरभोग्या, मिथिलाक निशापुरमे, गंगापुत्र। एहि बेरसँ पुरस्कार राशि बढ़ा कए एक लाख टाका कए देल गेल अछि। पुरस्कार 16 फरबरी 2010 केँ देल जाएत।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)

प्रबोध सम्मान 

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )

यात्री-चेतना पुरस्कार 

२००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा

कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान

२००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह “एना त नहि जे” २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”केँ नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० दिसम्बर २००९) ९१ देशक १,०२७ ठामसँ ३५,८७४ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,१७,३९८ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078  ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.१.शीतल झा-नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! २.पाकिस्तान मे सेक्स-विचाकुमार राधारमण १.चिड़ै-सुजीतकुमार झा२.. कामिनी कामायनी-डाविर्नक बानर३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह-मणिपद्मक कथा यात्रा ४.रामलोचन ठाकुर-समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा २.४.१.बिपिन झा-आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक ॥२.गोपाल प्रसाद-फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि ? २.५.१.दुर्गानन्द मंडल-बकलेल,२.कपिलेश्वर राउत-छूआ-छूत,३.राजदेव मंडल,रखबार (दोसर भाग) २.६.१.शरदिन्दु चौधरी-समय–संकेत २.शीतल झा-गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... ३. विजय–हरीश-किछु लघु कथा ४.सुनीता ठाकुर-अपहरणक सच-५.श्रीमति कुमुद झा-उच्चैठ भगवतीक महात्म-६.शम्भू झा वत्स-ग्राहर्स्थ्य जीवनक समस्‍या २.७.१.मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि -  प्रकाश २.२.राकेश कुमार रोशन-पञ्चैति (कथा)३.भीमनाथ झा-चन्‍दा झा, हरिमोहन झामिलिकऽ४.हेमचन्द्र झा दूटा कथा २.८.१.सुभाष चन्द्र यादव-पति-पत्नी सम्वाद २.मानेश्वर मनुज-‘जीत’३.(सं. सा. सं)नागेश्वर लाल कर्ण ४.डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी-विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग २.९.- जीत उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक मिथिलाक इतिहास अध्याय–१० मिथिला आ नेपाल नेपाल शब्दक उद्गम एखन धरि रहस्यमय अछि। अति प्राचीन कालसँ नेपालक इतिहास मिथिलाक इतिहास संग निकटतम रूपें संबंधित अछि। मिथिला एहेन स्थान रहल अछि जाहिठाम नाना प्रकारक धार्मिक आन्दोलन एवँ दर्शनक उत्पत्ति भेल छैक आर नेपाल ओहि आन्दोलन सबकेँ उर्वरा शक्ति देलकै जाहिसँ वो आन्दोलन सब पुष्पित वो फलदायक भेल। नेपाल मे आर्यत्वक विकास मिथिले बाटे भेलैक। एहि ठाम हम मिथिला आ नेपालक मात्र राजनैतिक सम्बन्धक चर्चा करब। किरातः- भूतकालक कुहेसक मध्य नेपालक प्रारंभिक इतिहासक विषयमे किछु विशेष ज्ञात नहि अछि। ई. पू. ५९०सँ ११०ई. धरि नेपाल किरात संस्कृतिक प्रधानकेँन्द्र छल। किरातक वर्णन शुक्ल यजुर्वेद मे आएल छैक। इहो कहल जाइत छैक जे अति प्राचीन कालसँ किरात लोकनि पूर्वी नेपाल मे रहैत जाइत छलाह।‘किराते’ शब्द जंगली अनार्य जाति केँ सूचित करैछ जे पहाड़ पर एवँ भारतक उत्तरपूर्वी भाग मे रहैत छलाह। सिल्वाँ लेवीक विचार छन्हि जे किरातक उत्पत्ति मंगोलसँ भेल छल आर दुनु एक्के छलाह। महाभारतसँ ज्ञात होइछ जे जखन अर्जुन हिमालयमे तपस्या करैत छलाह तखन महादेव किरातक भेष मे अर्जुनक परीक्षा लेने छलाह। महाभारतक वनपर्वमे एकटा किरातपर्व सेहो अछि आर यजुर्वेद शतरूद्वीपसँ सेहो एहि पर प्रकाश पड़इयै। भारतक उत्तरी पूर्वी सीमा सेहो किरात संस्कृतिसँ सम्बन्धित छल। ओ सब पूर्वी हिमालयक वासी छलाह। अपन दिग्विजयक क्रममे भीमकेँ विदेश देश छोड़लाक पश्चात किरात सबसँ भेंट भेल छलन्हि। किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। लेभीक अनुसार किरातक सम्पर्क चीन आर म्लेच्छसँ सेहो छलन्हि। रामायणसँ सेहो प्रमाणित अछि जे किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। विष्णु पुराण एवँ मार्कण्डे पुराणसँ ज्ञात होइछ जे ई लोकनि पूर्वी भारत मे रहैत छलाह। वो हिमालयक दक्षिणी मार्ग पर सम्पूर्ण उत्तर–पूर्वी भारतमे, नेपालसँ सटले उत्तरी बिहार मे आ गंगाक उत्तरी भागमे बसि गेल छलाह। ई उएह प्रवेश छल जाहि मध्यसँ चीनक व्यापार भारतक गंगावर्ती धरातलसँ होइत छलैक। नेपाल–मिथिलाक संस्कृतिक इतिहासमे हिनका लोकनिक महत्वपूर्ण स्थान छैक। प्रारंभऽ मे संभऽवतः किरात लोकनि नेपालक स्थानीय राजवंशी छलाह। नेपाल पर किरात लोकनिक राज्य बहुत दिन धरि छलन्हि। वो लोकनि ई. पू, ६००सँ संभऽवतः नेपाल पर राज्य करैत छलाह। हिन्दू संस्कृतिक विकास मे वो नेपाल मे भारतीय मंगोलियनक प्रमुखताक हेतु सब पृष्ठाधार बनौलन्हि। प्रायः ई.पू.३१२ मे जखन संभूत विजय मरि गेला तखन जैन धर्मावम्बी मे विभाजन भेल आर तकर पश्चात उत्तर भारतमे बारह वर्ष धरि अकाल रहलैक। भऽद्रवाहु नामक एक जैन साधु अकाल भेला पर दक्षिण दिसि चल गेला आ अकाल समाप्त भेला पर घुरला। जैन धर्मसँ छुटकारा लए ओ अपन शेष जीवन व्यतीत करबाक हेतु नेपाल चल गेला। जैनी सबहक जुटान पटनामे भेल आ हुनका तकबाक हेतु स्थूलभऽद्र नेपाल गेला आ ओतए हुनकासँ चौदह पर्व पओलन्हि। गौतम बुद्धक जन्म तँ नेपाल क्षेत्र मे भेल परञ्च ओ नेपाल भ्रमणकेँने छलाह अथवा नहि से कहब कठिन। अशोकक प्रयाससँ नेपाल मे बौद्ध धर्मक प्रसार भेल। कहल जाइछ जे कौटिल्यकेँ सेहो नेपालक पूर्ण ज्ञान छलन्हि। अशोकक समकालीन नेपालमे छलाह स्थुमिको। नेपाल उनक हेतु विशेष प्रसिद्ध छल। लुम्बिनी मे अशोक ४८ गोट स्तूपक निर्माण करौने छलाह आर स्थुमिकोक शासन काल मे वो स्वयं नेपालो गेल छलाह। अशोकक समयमे नेपालक शासन किरात लोकनिक हाथमे छलैक। अशोकक पुत्री आ जमाय नेपाल मे छलाह। अशोकक वादो दशरथक प्रभाव नेपालमे बनल छलैक। नेपाल आ मिथिलाक सम्पर्क मौर्य साम्राज्यक ह्रासक समय धरि बनल छलैक। शूंग कालक मुद्रा पश्चिमी नेपालसँ प्राप्त भेल अछि जाहि आधार पर ई अनुमान लगाओल जाइत अछि जे शुंग लोकनिक एक प्रकारक दुर्वल नियंत्रण नेपाल पर छलन्हि। कुषाण लोकनिक शासन चम्पारण धरि छल आर तिरहूतो पर हुनका लोकनिक प्रभाव छलन्हि। नेपाल पर कुषाण शासन हेबाक समर्थन स्वर्गीय जायसवाल महोदयकेँने छथि। कुषाण मुद्राक पता काठमाण्डु लग सेहो लगलैक अछि तैं जायसवाल महोदयक विचारकेँ मान्यता भेटैत छैक। ‘रधिया’ नामक ग्रामसँ सेहो कतेक रास ताँवाक मुद्रा विम कैडफ्रिसेज आर कनिष्कक भेटल छैक जाइक तँ कुषाण शासनक प्रमाण सिद्ध होइत छैक। कैक शताब्दी धरि नेपाल पर शासन करैत काल किरात सबकेँ जखन–तखन अनायास विड़रो सबसँ संघर्ष करए पड़लन्हि। राजनैतिक अस्थायित्वक रहितहुँ ओ सांस्कृतिक जीवन आ राजनीतिक नियमक स्थापनामे बहुत किछुकेँलन्हि। किछु विद्वानक मत छन्हि जे इण्डो मंगोलाइड सब सर्वप्रथम भारत पर शासनकेँलन्हि आ तब नेपाल गेला। सुसंस्कृत इण्डो मंगोलाइडक रूपमे नेपालक नेवारक उल्लेख भेल छैक। नेवार लोकनि प्रायः ई. पू. तेसर शताब्दीमे एला। ताधरि अशोक पाटनमे बहुत रास बौद्ध चैत्यक निर्माण कै चुकल छलाह। तहियासँ ओहि क्षेत्रमे बौद्ध धर्मक प्रसार बनले रहल आ बादमे महायान सम्प्रदायक पद्धति ओ विचार सेहो बिहारेसँ ओतए गेल। ओहिठामक शैव, शक्ति आर वैष्णव धर्मक सम्बन्धमे सेहो इएह कहल जा सकैत अछि। ई सभऽ आंशिक रूपमे उत्तरी बिहारक आरंभऽक मंगोलाइडक प्रतिक्रिया स्वरूप छल। आर्यीकरणक पूर्व मिथिला सेहो किरात संस्कृतिक प्रधानकेँन्द्र छ्ल। इण्डोलाइड एकटा सामूहिक संस्कृतिक विकासमे पैघ योगदान देलन्हि। ११०ई.क आसपास किरात वंशक अंत नेपालमे भेल आ तखनसँ लकए २०५ ई. धरि नेपालक इतिहास अन्धकारपूर्ण अछि। एहि बीच कोनो लिखित प्रमाण नहि भेटइयै। गुणाढ़यक ‘बृहकथा’मे नेपाल देशक शिव नामक नगरमे राजा यशकेतुक शासन करबाक उल्लेख भेटइयै। कखन आ कोन प्रकारे किरात लोकनिक ह्रास भेल से हमरा लोकनि नहि जनैत छी आ नेऽ तकर कोनो ठोस सबुते भेटैत अछि। इहो कहल जाइत अछि जे ‘निमिष’ नामक एक गोट राजा नेपालमे विजय प्राप्तकेँने छलाह आ निमिष राजवंश करीब १४५ वर्ष धरि ओतए शासनकेँने छलाह आ एहि वंशमे पाँच गोट राजा भेल छलाह– निमिषम मनाक्ष, काकवर्मन, पशु प्रेक्ष देव, पशु प्रेक्ष देव, आ भास्कर वर्मन। एहि राजवंशक समयमे आर्य लोकनिकेँ नेपालमे पशुपतिनाथक मन्दिरक स्थापनाकेँलन्हि आ भारतसँ आर्यसब केँ अनलन्हि। एकर बाद नेपालमे लिच्छवी वंशक शासन शुरू होइत अछि। लिच्छवी वंशक इतिहास:-     लिच्छवीक सम्बन्ध मनु लिखैत छथि– “द्विनातयः सर्वणासु जनयन्य व्रतांस्तुयान्। तांसावित्री परिभ्रष्यनं व्रात्यानितिविनिर्हिशेत्॥ व्रात्यातु जायते विप्रात्पापात्मा भूजकण्टकः। आवंत्यवाट घानौच पुष्पधः शैख एवचः॥ झल्लोमल्लश्च राजन्याद व्रात्यन्निच्छिवि देवच। नरश्य करणश्चैव खसाँ द्रविड एवच”॥ (एहि सम्बन्धमे देखु हमर “व्रात्यज इन एंसियेंट इण्डिया”) लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध नेपालसँ बड्ड घनिष्ट छलैक। किछु विद्वानक विचार छन्हि जे इहो लोकनि मंगोलाइडसँ अदभूत छलाह। नेपालक मल्ल, खास आदिक कोटि मे मनु लिच्छवी (निच्छवी)केँ रखने छथि। लिच्छवी लोकनिक प्रभाव मिथिलामे अत्यधिक विकसित छलैक आ ओतहिसँ ई लोकनि नेपाल धरि अपन शक्तिक प्रसारकेँलन्हि। नेपालमे किरात शासनक संदिग्ध प्रमाण अछि। निमिष वंशकेँ सोमवंशी कहल गेल अछि आ ओकर वादे सूर्यवंशी राज्यक स्थापना भेल। लिच्छवी लोकनि निमिष वंशकेँ उखाड़ि फेकलन्हि आर तकर बाद लगभऽग ५००वर्ष धरि नेपाल पर शासनकेँलन्हि। नेपाली संवत जे १११ई.सँ आरंभऽ छैक सैह संभऽवतः लिच्छवी लोकनिक राज्यारोहणक संकेत दैत अछि। ओहुना अखन इएह मान्य अछि जे लिच्छवी लोकनि नेपाल मे इस्वीसन् प्रथम शताब्दीक समीप अपन साम्राज्यक स्थापनाकेँने छलाह आ अपन संवतक प्रारंभऽ सेहो। सूर्यवंशी शासनक स्थापनाक पश्चाते नेपालमे यथार्थ एतिहासिक कालक प्रारंभऽ मानल जाइत अछि। दुनु राजवंश मिथिलासँ आएल छल एहि सब राजवंशक समय मे नेपाल आर मिथिला नियमित रूपें राजनैतिक आ साँस्कृतिक सन्दर्भ बनल रहलैक। प्रथम ऐतिहासिक राजा भेलाह जयदेव द्वितीयक बीचमे 33टा राजा भेल छलाह। समुद्रगुप्तक समय मे नेपाल गुप्त साम्राज्यक चाङ्गुरमे पड़ल छल। प्रयाग प्रशास्तिसँ एकर स्प्ष्टीकरण होइछ– नेपालक सीमांत शासकक सिवा प्राप्त करबाक संदर्भ अछि। सूर्यवंशी लिच्छवी कोनो शासक नेपालमे तखन रहल होयताह जनिका हेतु “प्रयत्न नेपाल नृपति” शब्दक व्यवहार कैल गेल अछि। मिथिलासँ नेपाल धरि तखन लिच्छवी लोकनिक विस्तार छलन्हि आर समुद्रगुप्त लिच्छवी दौहित्र छलाह तैं एहि घटनाकेँ मात्र घरेलु घटना मानल जासकइयै। एहि युगमे नेपालमे वैष्णव वादक प्रवेश भेल। मान देवक चंगुनारायण मन्दिरक शिलालेख एवँ आन–आन शिलालेखसँ ई ज्ञात होइछ जे लिच्छवी राजा लोकनि बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त आदि सबकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह। नरेन्द्र देवक शासन कालमे मत्स्येन्द्र नाथ नामक संप्रदायक प्रचलन भेल। लिच्छवीक समयमे महायान शाखा सेहो अपन आकार ग्रहणकेँलक। लिच्छवी लोकनि ३५०सँ ८९९ धरि शासनकेँलन्हि–बीचमे मात्र अंशुवर्मन आर जिश्नुगुप्त छोड़िकेँ जे स्वतंत्र शासनकेँने छलाह। अंशुवर्मन:- महासामंत अंशुवर्मन सातम शताब्दीक पूर्वाद्धक एकटा महत्वपूर्ण शासक भेल छथि। वो अपनाकेँ महासामंत कहने छथि। वो वेश शक्तिशाली शासक छलाह आर तराई राज्यक विशिष्ट भागकेँ अपना राज्यमे मिला लेने छलाह। अपन राज्यक विस्तार ओ वेतिया धरि कलेने छलाह जतए हुनक साम्राज्यसँ मिलैत छल। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य चन्द्रवर्मन एवँ नालन्दा विश्वविद्यालयक प्रसिद्ध शिक्षक अंशुवर्मनक दरबारक शोभा बढ़ौने रहथिन्ह। अंशुवर्मन जाहि नेपाल राज्यक स्थापनाकेँलन्हि ताहि परम्पराकेँ जिश्नुगुप्त रखलन्हि आर बढ़ौलन्हि। ६४३मे अंशुवर्मनक मृत्युक पश्चात नरेन्द्र देवक नेतृत्वमे नेपालमे लिच्छवी शासनक पुनर्जन्म भेलैक। लिच्छवी शासन नेपालमे किछु अवधि धरि रहलैक एकर प्रमाण हमरा मंजूश्री मूलकल्पसँ भेटैत अछि– “भऽविष्यति तदाकाले उत्तरां दिशिमा श्रृतः। नेपाल मण्डले ख्याते हिमाद्रे कुक्षिमाश्रिते॥ राजा मानवेन्द्रस्तु लिच्छवीनां कुलोद्भवः। सोऽपि मंत्रार्थ सिद्धस्तु महाभोगी भऽविष्यति॥ पतनक कारण–         “उदयः जिहनुनोह्यंते म्लेच्छानां विविधास्तथा। अभ्योधे भ्रष्ट मर्यादा बहिः प्राज्ञोपभोजिनः॥ शस्त्र सम्पात विध्वस्ता नेपालाधिपतिस्तदा। विधा लुप्ता लुप्तराजानो म्लेच्छ तस्कर सेविनः”॥ (राहुलजी द्वारा सम्पादित) मानदेव लिच्छवी छलाह आ तकर बादो कैकटा लिच्छवी शासक भेलाह। लिच्छवी शासनक प्रसंगक उल्लेख हियुएन संग सेहोकेँने छथि। अंशुवर्मन‘महासामंत’ कहबै छथि जाहिसँ मान होइयै जे जो ६३३ई.धरि लिच्छवी राजाक प्रभुत्वक स्वीकार करैत छलाह। नेपालक वैवाहिक सम्बन्ध सेहो बिहारसँ चलैत छल। सोमदेवक विवाह मौरवरी भोगवर्मनक पुत्री ओ आदित्य सेनक प्रपौत्री वत्स देवीसँ भेल छलन्हि। अहीर:- मंजूश्री मूलकल्पमे मानदेव द्वितीयक पश्चात राज विप्लवक वर्णन भेटइयै जाहिसँ ज्ञात होइछ जे नेपालमे गोलमाल भेल छल। अहीर लोकनिक आक्रमणसँ नेपाल आक्रांत छल। वंशावलीक अनुसार वो लोकनि भारतक समतलसँ आएल अहीर छलाह। हिनका लोकनि अहीरगुप्त सेहो कहल गेल छन्हि। ५००सँ ५९०क बीच एहिमे पाँचटा शासक भेलाह जाहिमे परमगुप्त पराक्रमी छलाह आ ओ लिच्छवी लोकनिकेँ शिकस्तकेँने छलाह। हुनक एकटा पौत्र सिमरौनगढ़मे शासन करैत छलाह। ओहि राजवंशक दोसर शाखा तराईमे शासन करैत छल। जयगुप्त द्वितीयक मुद्रा चम्पारण आ मगधमे भेटल अछि। ६४३–४४मे जिश्नुगुप्तक पश्चात अहीरवंश दू भागमे बटि गेल छल आ लिच्छवी लोकनि पुनः अपन राज्यकक स्थापना कलेने छलाह। तकर बाद नेपालकेँ तिब्बतमे मिलि जेबाक संभावना बुझि पड़इयै आ मंजूश्री मूलकल्पमे एकर अप्रत्यक्ष प्रमाण अछि। ई उएह समय छल जखन तिब्बती राजा चीनी राजदूतकेँ तिरहूत पर आक्रमण करबाक हेतु साहाय्य भेटल रहथिन्ह आ संभऽव जे ओहिक्रममे नेपाल पर तिब्बती प्रभाव बढ़ि गेल हो। मंजूश्री मूलकल्पसँ ज्ञात होइत अछि नेपाल शासन अन्यायी म्लेच्छ पर निर्भर रहए लागल छल तथा राज्यक प्रथा समाप्त भऽगेल छलैक। तिब्बती शासक श्राँगक विवाह अंशुवर्मनक बेटीसँ भेल छलैक। ७०३क बाद नेपाल विदेशी शासनसँ मुक्ति पेवाक हेतु माथ उठौलक। धर्मदेवक पुत्र मान देव तृतीय विजयक चारिटा स्तंभऽ निर्मितकेँने छलाह। लिच्छवी लोकनिक पुनरागमनसँ नेपालक सवतोमुखी विकास भेल। ७०५ ई. मानदेव तृतीयक चंगुनारायण अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे ओ मल्ल सबहिक संग युद्ध कएने छलाह आ गण्डक धरि पहुँचि गेल छलाह। स्वंयभुनाथ शिलालेखसँ तत्कालीन संविधान पर सेहो प्रकाश पड़ैत अछि। एहिठाम ई स्मरणीय थिक जे नेपालक लिच्छवी बरोबरि मिथिलासँ सम्पर्क बनौने रखैत छलाह। शिवदेवक विवाह आदित्यसेनक पौत्रीसँ छलन्हि। शिवदेवक जयदेव गद्दी पर बैसलाह आ हुनक पदवी छलन्हि‘परचक्रकाम’। जयदेव शक्तिशाली शासक छलाह। शिवदेव अपना शिलालेखमे अपनाकेँ–“भऽद्धारक महाराज लिच्छवी कुलकेतु” कहने छथि। जयदेवकेँ कश्मीर धरि विजयक श्रेय देल जाइत छन्हि। जयदेव मिथिलाक सीमा धरि अपन रज्यक विस्तारकेँने छलाह आ हुनक सम्पर्क पाटलिपुत्र आ गौड़सँ सेहो बढ़िया छलन्हि।८७९–८८०मे राघव देव नेपालक संवत चलौलन्हि मुदा हिनका जयदेवसँ कोन सम्बन्ध छलन्हि से हमरा लोकनि नहि जनैत छी। लिच्छवीक पश्चात नेपालक ठाकुरी राजवंशक सम्पर्क अपना सबहिक क्षेत्रसँ बढ़िया छलैक। नेपालमे महायानक प्रधानता छल आ ओहिठामक विद्यार्थी नालंदा (आ बादमे विक्रमशिला)मे पढ़बाक हेतु अवैत छलाह। पालवंशक समयमे ई सम्बन्ध आ घनिष्ट भऽगेल। रमेश चन्द्र मजुमदारक मत छैन्ह जे इमादपुर (मुजफ्फरपुर)मे जे पाल अभिलेख भेटल अछि ताहि पर जे संवत ४८मे पढ़ल गेल अछि से भ्रामक अछि आर ओकरा नेपाली (नेवारी) संवत–१४८ बुझबाक थिक जे १०४८ई.क बरोबरि होइत अछि आ जखन मिथिला पर महिपाल प्रथम शासन करैत छलाह। सब तथ्यक स्पष्ट अध्ययनकेँला उत्तर हुनक मंतव्य छन्हि जे मूर्तिक समर्पितकेँनिहार व्यक्ति नेपाल वासी रहल होयताह आ तैं ओ नेवारी संवतक व्यवहार कएने छथि। १०३८मे नेपाली लोकनि मिथिला बाटे विक्रमशिला गेल छलाह आ ओतएसँ अनीशक नेपाल पहुँचलाक बाद नेपाली महायानमे तंत्रक प्रवेश भेलैक। एग्यारहम शताब्दीमे नेपाल आंतरिक रूपें बटि गेल तीन राज्यमे–पाटन, काटमाण्डु आ भातगाँव आ ओहिठामकेँन्द्रीय सत्ताक सर्वथा अभाव भऽगेल आ एहिसँ लाभऽ उठाकेँ विभिन्न राज्यक आक्रमण नेपाल पर शुरू भऽगेलैक। चालूक्य, कलचुरी, यादव, जैतुंगी आदिक शिलालेखसँ ज्ञात होइछ जे ई सब नेपाल पर आक्रमण कएने छलाह। एहि स्थितिसँ लाभऽ उठाए नान्यदेव सेहो नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि। नान्यदेव नेपाल पर मिथिलाक आधिपत्य स्थापित करबामे समर्थ भेलाह। राजकरैत शासक सबकेँ पदच्युत कै वो अपन राजधानी भातगाँवमे बनौलन्हि। नेपाली परम्पराक अनुसार वो काठमाण्डुक जगदेव मल्ल एवँ पाटन–भातगाँवक आनंद मल्लकेँ बची बनौलन्हि आ जे सब हिनक प्रभुत्व स्वीकारकेँलन्हि हुनका ई माफ क देलथिन्ह। नेपाल नान्यदेवकेँ कहियो चैन नहि भेटलन्हि आ बरोबरि किछु ने किछु खटपट होइते रहलैन्ह। एकमत इहो अछि जे नान्यदेवकेँ पुनः दोसर वेर (११४१मे) नेपाल पर आक्रमण करए पड़लन्हि। नान्यदेवक प्रभुत्व तँ नेपाल पर बनल रहलैन्ह मुदा हुनक उत्तराधिकारी लोकनि ओकरा रखबामे समर्थ भेलाह कि नहि से एकटा संदिग्ध विषय। परम्परानुसार नान्यदेवक एकटा पुत्र नेपालपर शासन करैत छलाह। संभऽवतः मल्लदेव एहिठामक शासक छलाह आ भीठ भऽगवान पुर धरि हिनक राज्यक प्रसार छल। नरसिंह देवक समयमे मिथिला आ नेपालमे फेर खटपट भेलैक आ दुनु राज्य अलग भऽगेल। मिथिलासँ नेपाल पृथक भऽगेल। नान्यदेवक वादहिसँ नेपालमे कर्णाट शासन दुर्बल भऽगेल छलैक आ नेपालमे कर्णाट शासनकेँ ठाकुरी राजा लोकनि उखाड़ि फेकने छलाह। एहि आस पासमे नेपालमे मल्ल लोकनिक उत्थान सेहो देखबामे अवइयै। ई वंश अरि मल्लदेवसँ शुरू होइछ। नीलग्रीव स्तंभऽ अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे धर्ममल्ल आर रूपमल्ल नेपालक मल्ल लोकमोक पूर्वज छलाह। एहि वंशक प्रमुख शासक छलाह अरि मल्लदेव। मल्ल लोकनिक प्रभुत्वक कालमे मिथिलाक मंत्री चण्डेश्वर नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ नेपालक राजाकेँ पराजितकेँलन्हि। चण्डेश्वरक ‘कृत्य रत्नाकर’मे सेहो एकर विवरण अछि। वाग्मतीक तट पर एहि उपलक्षमे तुलापुरूष दानक उल्लेख सेहो अछि। १३१४मे नेपाल पर दक्षिणसँ (मिथिला) चढ़ाईक प्रमाण स्पष्ट अछि। हरिसिंह देव पराजित भेला उत्तर नेपाल गेला आर नेपाली शासक बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पणक देलखन्हि। हरिसिंह देवमे भातगाँवमे सूर्यवंशी राजवंशक परिपाटी स्थापितकेँलन्हि। ओ अपन शक्तिकेँ नेपालमे पुनः संगठितकेँलन्हि आ कर्णाट प्रभुत्वक स्थापना सेहो। भातगाँवसँ ओ शासन करैत छलाह आ ओतहि ओ तुलजादेवीक मन्दिरक स्थापनाकेँलन्हि। नेपालमे हुनक सार्वभौम होएबाक निम्नलिखित अभिलेखसँ स्पष्ट अछि– “जातः श्रीहरिसिंह देव नृपति प्रौढ़ प्रतापोरयः। तद्वंर्श विमले महारिपुहरे गाम्मीर्यरत्नाकरः॥ कर्त्तायः सरसामुपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षाप्रियो। नेपाले पुनरोध वैभऽवयुते स्थैर्य विधते चिरम्॥ हरिसिंह देवक नेपाल आक्रमणक प्रश्न पर इतिहास कार मध्य काफी मतभेद अछि। लुसिआनो पेतेकक विचार छन्हि जे मल्ल लोकनि स्वतंत्र छलाह आ अपनाकेँ महाराजिधराज परमेश्वर परमभऽद्दारक कहैत छलाह जाहिसँ ई मान होइछ जे हुनका लोकनि पर कोनो विदेशी सत्ताक शासन नहि छलन्हि। मिथिला पर चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक बातकेँ ओ मनैत छथि परञ्च ओ इहो कहैत छथि जे ओहि आक्रमणक फले मिथिलाक आधिपत्य नेपाल पर नहि भेलैक। मिथिलासँ भागला पर ओ नेपालमे अपन राज्य बनौलन्हि तकरा वो नहि मनैत छथि। एकटा वंशावली पोथीक आधार पर इहो सिद्ध कएने छथि जे हरिसिंह देव नेपाल पहुँचलाक बाद मरि गेला आर रजगाँवक माँझी मारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए वंदी बना लेलकन्हि आ धन–वित्त छीनि लेलकन्हि। एवँ प्रकारे हरिसिंह देवक वंश एहिठाम समाप्त भऽगेलैन्ह। लुसिआनो पेतेकक मतकेँ हम ओहिना राखि देने छी जेना वो लिखने छथि। इहो कहल जाइत अछि जे ओहि समयमे पश्चिमी नेपालसँ आदित्यमल्लक आक्रमण सेहो भेल छल। तिरहुतिया जगतसिंह सेहो किछु दिनक हेतु नेपालमे राज्यकेँने छलाह। एक विद्वानक अनुसार हरिसिंह देवक परिवार एवँ हुनक उत्तराधिकारी हुनका वादो नेपाल पर शासनकेँलक। उत्तराधिकारी लोकनिक नाम एवँ प्रकारे अछि– i. मतिसिंह–(१३१५–६९)–सिमरौनगढ़क राजगद्दी पर सेहो राज्यकेँलन्हि आर नेपाल पर सेहो। चीनक सम्राट सिमरौनगढ़ शासककेँ मान्यता दैत छलथिन्ह। शमशुद्दीन इलियास जखन नेपाल पर आक्रमण करबाक हेतु बढ़लाह तखन ओ सिमरौन गढ़क शासककेँ सेहो परास्तकेँलन्हि आ ओहि बाटे नेपाल गेलाह। मतिसिंहक नाम पर मोतिहारी अछि। ii. शक्ति सिंह iii. श्यामसिंह– हिनका कोनो पुत्र नहि भेल आ हुनक पुत्रीक विवाह मल्लवंशक राजकुमारसँ भेल। मतिसिंहक ओतए चीनक दूत आएल छल। चीनक सम्राटक ओहिठामसँ एकटा मोहर सेहो आएल छलैक आ शक्तिसिंहक ओहिठाम सेहो एकटा चीनी सम्राटक मोहर आ पत्र आएल छलैक। श्यामसिंहक राज्यारोहनक चीनी सम्राटक हाथे भेल छल। एहितथ्य सबसँ प्रत्यक्ष अछि चीनी सम्राट एहि कर्णाटवंशीयकेँ नेपालक सार्वभौम राजा बुझैत छलाह। अहु सम्बन्धमे पेतेकक मत अछि जे ई सब बात गलताथिक। १३८२ ई. क इथाम बहाल अभिलेखसँ स्पष्ट होइयै जे मदन रामक पुत्र स्जक्तिसिंह नेपाली अनेक रामक वंशज छलाह ने कि कर्णाट वंशीय। नेपालक इतिहास मे अहुखन कतेको मतभेद अछि आ रहत। रज्जलदेवीक पति जयार्जुनक शासनकालमे जयस्थिति मल्ल द्वारा राज्य शासनमे नियम विरूद्ध विप्लव कैल गेल। जयस्थितिकेँ सिमरौनक हरिसिंह देवक वंशज कहल गेल अछि। नायक देवी आ जगतसिंहक पुत्री रज्जलादेवीसँ जयस्थिति विवाहकेँलन्हि। जयस्थिति जयार्जुनकेँ पराजित कए नेपालक राजा भेलाह। ओ सूर्यवंशी कर्णाटक योग्य प्रतिनिधि सिद्ध भेलाह। पृथ्वीसिंहक आधिपत्य स्थापित होयबाक समय धरि हुनक वंश शासन करैत रहल। जयस्थितिमल्लक संग रज्जल्ला देवीक विवाह भेलासँ तीनटा शक्तिशाली शासक परिवार–ठाकुरी, कर्णाटओ मल्ल संयुक्त भऽगेल। जयस्थितिमल्ल शक्तिशाली शासक छलाह। हुनक उत्तराधिकारी यक्षमल्ल अपन अधिकार मिथिला धरि बढ़ौलन्हि। ओ अपन प्रतिद्वन्दीकेँ हराय राज्यकेँ चारि भागमे विभऽक्तकेँलन्हि। __ i. भातगाँव – अपन ज्येष्ठ पुत्र राज्यमल्लकेँ __ ii. बनेया – रणमल्लकेँ __ iii.काठमाण्डु – रत्नमल्लकेँ __ iv.पाटन – अपन पुत्रीकेँ। एकर परिणाम भैल नेपालक सर्वनाश। सत्रहम शताब्दीमे नेपाल अनेकानेक जागीरमे बँटि गेल। सबसँ पूबमे किरात प्रदेश छल जाहिमे दूध कोशीक समतल, ओकर शाखा तथा सून कोशीक पूबमे तराईक किछु भाग सेहो छलैक। मुसलमानी आक्रमणः- ऐतिहासिक सम्पर्क पकड़बाक हेतु पुनः ईस्वीसन् चौदहम शताब्दीक चर्चा करए पड़ैत अछि। कहल जाइछ जे अलाउद्दीन खलजी सेहो अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह यद्धपि एकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध नहि अछि। १३४६–४७मे बंगालक शासक शमसुद्दीन हाजी इलियास नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ एहिबातक उल्लेख स्वयंभूनाथक अभिलेखमे अछि। एहि शिलालेखक अनुसार हाजी इलियास काठमाण्डुकेँ घेर लेलक, शहरमे आगि लगादेलक, लूट पाट मचौलक एवँ मूर्त्ति सबकेँ ध्वस्तकेँलक। शिलालेखक तिथि अछि नेवारी ४९२=१३७१–७२ई.–मन्दिर पुनः निर्मित भेलैक आ स्तूप पुनर्स्थापित भेल आ ओकर समारोह मनाओल गेल। एहि शिलालेखक संपादनकेँ.पी.जायसवालकेँने छथि। तकर बादसँ पुनः कोनो आक्रमणक उल्लेख नहि भेटैत अछि। मल्लक शासनः- जयस्थितिक चर्च हमर पूर्वहि कचुकल छी। हुनक उत्तराधिकारी छलाह जगज्योतिमल्ल। ओ मैथिल वंशमणिक मिलिकेँ ‘संगीत भास्कर’ नामक पुस्तकक रचनाकेँने छलाह। हुनक उत्तराधिकारी ज्योतिमल्ल भेला आ हुनक यक्षमल्ल। यक्षमल्ल अपन अधिकारक विस्तार समतल भूमि दिसि सेहोकेँलन्हि। यक्षमल्लक तृतीय पुत्र रत्नमल्ल मैथिल ब्राह्मणक प्रभावक अधीन छलाह। रत्नमल्लक उत्तराधिकारी छलाह अमरमल्ल आ हुनक महेन्द्रमल्ल जे चानीक मुद्राक व्यवहार शुरूकेँलन्हि। ओ तिरहूतसँ हानी मंगवैत छलाह। एम्हर आवि मिथिला आ नेपालक बीचक सम्बन्ध खूब बढ़िया नहि रहल। खण्डवला कुलक राजा महिनाथ ठाकुर अपन राज्य विस्तारक क्रममे मोरंगकेँ जीति लेलन्हि। मिथिला, तिरहूति गीतक प्रचार एहि राजाक समयमे भेल छल। नेपाल तराईक लोग सब खटपट करैत छल आ तै मोरंगक जमीन्दार सबकेँ दबेबाक हेतु औरंगजेब गोरखपुरक फौजदार आ मिथिलाक फौजदारकेँ पठौलन्हि। सत्रहम शताब्दीमे मिथिला आ नेपालमे खटपट होयबाक एकटा कारण मकवानी राज्य ते तराई वो घाटीक उपहिमालय मार्गक सटले दक्षिण आ दक्षिण–पश्चिममे रहैक। एहिठाम एकटा प्रमुख शासक छलाह राजा हरिहर जे बड्ड महत्वाकाँक्षी छलाह। राघवसिंह जखन मिथिलाक राजा भेलाह तखन फेर एहि राज्यकेँ लकए नेपालसँ खटपट शुरू भेल। नेपाल तराईक पंचमहलाक राजा भूपसिंहकेँ युद्धमे हरौलन्हि आ भूपसिंह ओहिमे मारल गेला। दरभंगाक खण्डवला राज्यक सीमा मकवानी राज्यक सीमा मकवानी राज्य धरि पहुँचल। मोरंग राजाक ओतए सेहो मिथिलाक धाख बनल। बंजर सब सेहो तराईक क्षेत्रमे शरणलेने छलाह आ अलीवर्दी हुनका सबहिक विरूद्ध उचित कारवाईकेँने छलाह। बंजर लोकनि भऽपटिआटी टीसनसँ मकवानी राज्यक सीमा धरि पसरल छल। १७६५मे नेपालमे गोरखा लोकनि शक्तिशाली भऽगेलाह। १८०२ई.सँ नेपालक सम्पर्क इस्ट इण्डिया कम्पनीक अधिकारीसँ भेल जखन कि नेपाली लोकनि हुनकासँ भेंट करबाक हेतु पटना अवैत गेल। नेपाल आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक सम्बन्ध मधुर नहि भऽसकल आ दिनानुदिन झंझट बढ़ि गेल। अंग्रेज आ नेपालीक बीच युद्ध भऽइयैकेँ रहल आ ओ युद्ध भेल मिथिला भूमि पर। युद्धमे नेपाली लोकनि अपन अधिकारक विस्तार तराईमे छपड़ा (सारन) धरिक चुकल छलाह। चारूकात लड़ाई प्रारंभऽ छल। सारनसँ कोशी धरि आ वीचमे मकवानी होइत अंग्रेजक एकटा टुकड़ी नेपालक राजधानी दिसि बढ़ल। लड़ाईक भीषण रूप देखि गजराज मिश्र शांतिक वार्त्ता चलौलन्हि। १८१५मे एक समझौताक अनुसार ई निश्चित भेलैक जे नेपालकेँ ओहिभूमि पर अधिकार छोड़ि देवाक चाही जाहि पर ब्रिटिशक कब्जा भऽगेल छलैक। एहि संधिसँ कोनो संतोषजनक परिणाम नहि बहरेलैक। १८१६मे पुनः मकवानी पुर लग फेर भिड़ंत भेलैक आ गोरखा पराजित भेल १८१४ई.२८ नवम्बरक सुगौलीक संधिकेँ जखन गोरखा लोकनि बिना कोनो शर्त्त स्वीकारकेँलन्हि तखनहि अंग्रेज युद्धवंदी घोषणा १८१६मेकेँलन्हि। एवँ प्रकारे अंग्रेज आ नेपालक बीच संघर्षक मुख्य स्थल मिथिले रहल आ सुगौलीक सन्धिक पश्चात दुनु राज्यक वीचक सम्बन्ध सुधरल। अध्याय–११ मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार मिथिलाक इतिहास मुल्ला तकिया अकबरक समकालीन छलाह आ ओ अपन असमक भ्रमणक क्रममे मिथिला बाटे गेल छलाह। ओ मिथिलामे जे देखलन्हि–सुनलन्हि से आ अन्यान्य साधन केँ आधार अपन एकटा ‘वयाज’ (डायरी) लिखलैन्ह जे मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु सर्वथा अपेक्षित अछि। एहि वयाज पर आधारित एकटा विस्तृत निबन्ध पटनाक मासिर पत्रिकामे १९४६मे छपल छल आ दरभंगासँ प्रकाशित डॉ. लक्ष्मण झा द्वारा संपादित साप्ताहिक मैथिली “मिथिला” (२ फरबरी, ९ फरबरी आर १९ फरबरी १९५३क अंक सब)मे सेहो एकरा पर आधारित किछु अंश प्रकाशित अछि। मिथिलाक इतिहासक हेतु ई एकटा अपूर्व साधन मानल जा सकइयै आ एकर उपयोग हम अपन ‘हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत’मे सेहो कैल अछि। मैथिली पाठकक हेतु हम एहिठाम मुल्ला तकियाक वयाजक सारांश उपस्थित क रहल छी। मिथिला पर मुसलमानी राज्यक विस्तारक अध्ययन क्रममे सेहो एकर विवरण भेटत। वयाजक अनुसार राजा लक्ष्मणसेन पर आक्रमणक पूर्व वख्तियार खलजी मिथिलाक किछु भाग पर आक्रमण कयने छलाह। मिथिलाक राजा नरसिंह देव बंगालक राजा लक्ष्मण सेनक अधीन शासन करैत छलाह। पाछाँ ओ मुसलमान राजाक अधीनता स्वीकारकेँलन्हि आ तखनसँ ओ मुसलमान शासक गियासुद्दीन इवाजक समय धरि कर दैत रहलाह। १२२५मे जखन इल्तुतमिश बंगाल पर आक्रमणकेँलन्हि तखन गियासुद्दीन इवाज हुनकासँ मेल कलेलन्हि। बिहारकेँ बंगालसँ फराक कए फुटे प्रांत बना देल गेल आ मल्लिक अलाउद्दीन जानीकेँ ओहिठामक राज्यपाल नियुक्त कैल गेल। इल्तुतमिसक घुरला पर गयासुद्दीन नरसिंह देवक मदतिसँ पुनः बिहार पर आधिपत्य स्थापित कलेलन्हि। बदला लेबाक विचारसँ सुल्तानक बंगाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ गियासुद्दीन मारल गेला। नतसिंह देव हुनकासँ माँफी माँगिकेँ अपनाकेँ छोड़ोलन्हि आ कर देवाक वचन देलन्हि। रजिया बेगमक शासन कालमे बंगाल पुनः दिल्लीक नियंत्रणसँ मुक्त भऽगेल। राजा नरसिंह देव सेहो विद्रोह क देलन्हि तुगलक तुगान खाँ मिथिला विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु पठाओल गेलन्हि आ ओ ओहि राज्य पर अपन सत्ता स्थापित कए बहुत रास वस्तुजात लूटिकेँ लगेलाह। मिथिलाक राजा बहुत दिनधरि नजरबन्द रहलाह। १२४४मे ओ चंगेज खाँक आक्रमणक समयमे ओ अपन बहादुरी देखौलन्हि आ तकर पुरस्कार स्वरूप हुनका सुल्तान अलाउद्दीन मसूद प्रसन्न भऽए तिरहूत राज्य घुरा देलथिन्ह आ हुनका एकटा सम्मानित राजा घोषित कए बिदाकेँलथिन्ह। मिथिलाकेँ सूबेदारक मातहदीसँ हटा देल गेल आ एकरा सोझे दिल्लीक अधीन कलेल गेल। आव ई अपन कर दिल्लीकेँ देवए लगला। ‘तबाकते नासिरी’मे एहि आक्रमणक वर्णन अछि। विद्यापति सेहो अपन‘पुरूष परीक्षा’मे नरसिंह देवक दिल्ली प्रवासक चर्चा कएने छथि। हिनक पुत्र रामसिंह देवक समयमे सेहो किछु संघर्ष भेल छल। हिनके समयमे दरभंगामे राम चौक नाम मोहल्लाक स्थापना भेल। अलाउद्दीनक समयमे मिथिला पर पुनः मुसलमानी आक्रमणक चर्च भेटैत अछि। इतिहासमे एकर उल्लेख आनठाम नहि भेटैत अछि मुदा मुल्लाकवयाजमे एकर विस्तृत विवरण अछि। एहि आक्रमणक अंतर्गत मखदून ताज मोहम्मद फकीहक पुत्र शेख मुहम्मद इस्माइलक नेतृत्वमे तीन वेर युद्ध भेल छल। पहिल एवँ दोसर वेर शाही सेना पराजित भऽगेल छलाह आर मिथिलाक जीत भेल छल। प्रथम लड़ाईक स्थान दरभंगामे अखनो “मुकबेश” नामसँ प्रसिद्ध अछि। शेख मुहमद इस्माइल जखन राजा दोसर बेर आक्रमण करबाक विचारकेँलक तखन सेना पठेबाक हेतु बादशाहसँ निवेदनकेँलक। रजीउल मुल्क मलिक महमूदक सेना पतित्वमे शाही फौज मिथिलाक धरती पर उतरल। अहुबेर हुनका अपने सन मुँह लकए पराजित भऽकए घुरे पड़लैन्ह। ई लड़ाई जाहि स्थान पर भेल छल ताहि स्थान पर राजा अपन राजधानी दरभंगासँ उठाकेँ लगेला। शक्रसिंहक नाम पर ओ स्थान सम्प्रतिसकरी नामसँ विख्यात अछि। तेसर वेर पुनः युद्ध भेल जाहिमे मिथिलाक पराजय भेल आ राजा अपन मंत्री सबहिक संग पकड़ल गेला। गिरफ्त भेला उत्तर राजा क्षमा याचनाकेँलन्हि आ आजीवन कर देबाक वचन देलन्हि। एहिशर्त्त पर अलाउद्दीन हुनका राज्य घुरा देलथिन्ह। वादमे शक्तिसिंह (शक्रसिंह) अलाउद्दीन हिन्दू फौजक सेना पति सेहो नियुक्त भेल। जखन अलाउद्दीनकेँ हम्मीर देवसँ युद्ध भेलन्हि तखन शक्रसिंह अलाउद्दीनक आर्थिक आ सैनिक साहायता देलन्हि। शक्रसिंह स्वयं रणक्षेत्रमे उतरलाह आ एहिसँ अलाउद्दीनकेँ बड्ड बल भेटलन्हि। शक्रसिंह एवँ प्रकारे निथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह। दरभंगाक ‘सुखी दिग्घी’ अखनो शक्रसिंहक स्मारक स्वरूप अछि। हरिसिंह देव कर्णाट वंशक अंतिम राजा छलाह आ हरिसिंह पुर सेहो अपन राजधानी बनौने छलाह। गयासुद्दीन तुगलक जखन बंगालक विद्रोहकेँ दबाकेँ घुरलाह तखन ओ तिरहूत पर ध्यान देलन्हि। तिरहूतक राज्य ओ दखलकेँलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक राजा बंगालक मदतिमे छलाह। हरिसिंह देव अपन मजबूत किला, कठिन रास्ता ओ दुरूह जंगल आदिक बमे पहिने तँ गयासुद्दीनक विरोधकेँलन्हि परञ्च बादमे पराजित भऽए पकड़ल गेलाह। सुल्तान हुनका पकड़िकेँ दिल्ली लगेला आ मिथिलाक शासन भार अहमद खाँक हाथमे देलन्हि। गयासुद्दीनक मुहम्मद तुगलक दिल्लीक शासक भेलाह। राज्याभिषेकक अवसर ओ हरिसिंह देवकेँ मुक्त क देलैन्ह। हरिसिंह देव कर देवाक बचन देलन्हि तखन हुनका राज्य घुरा देल गेलैन्ह आ ओ प्रमुख सेनापतिक पद पर सेहो नियुक्त भेलाह। ई सब भेलाक बाद सुल्तानकेँ बुझबामे एलन्हि जे राजाक मंत्री वीरेश्वर ठाकुरक संग एक विचित्र पाथर छन्हि जकर संसर्गसँ सब प्रकारक धातु सोना भऽजाइत अछि। ई पाथर अलाउद्दीन खलजीकेँ नहि देल गेल छल। सुल्तान आदेश बाहरकेँलन्हि वाजाप्ता एक फरमान द्वारा जो ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा क देल जाइक। वीरेश्वर जखन पाथरक बदलामे हीरा उपस्थितकेँलन्हि तखन सुल्तान ओकरा लेबासँ अस्वीकारकेँलन्हि। तकर बाद वीरेश्वर बजलाह जे काशीमे गंगा स्नानकेँलाक उत्तर ओ ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा करताह। शाही सरंक्षणमे वीरेश्वरकेँ काशी आनल गेल। काशी एवाक पूर्व ओ राजा हरिसिंह देवसँ सेहो भेंटकेँलन्हि आ काशीमे स्नान करबाक क्रममे ओ पाथरकेँ गंगेमे राखि देलन्हि। शाही संरक्षक एहि प्रसंगकेँ लकए हरिसिंह देवक शिकायत सुल्तान लग कदेलक। एहि पर मिथिला राज्य जप्त भेल आ हरिसिंह देवकेँ कारावासक आदेश भेटल। एहिबातक सूचना राजाकेँ पहनहि भेट गेलन्हि आ ओ तरत पड़ाएकेँ नेपाल चल गेला। बादमे हुनक पता नहि लागल। मिथिलाकेँ तुगलक साम्राज्यमे मिला लेल गेल। सुल्तान तिरहूतकेँ एक अलग प्रांत बना देलैन्ह आ तिरहूतक महत्व बढ़ल आ दरभंगा ओकर राजधानी बनल। तिरहूतकेँ तुगलकपुर सेहो कहल गेल। ओतए एकटा किला आ जामा मस्जिदक स्थापना भेल। १३४०मे मुहम्मद तुगलक मिथिलाक शासन भार कामेश्वर ठाकुरकेँ देलन्हि। बंगालक शासनक भार सुल्तान शमसुद्दीन हाजी इलियासकेँ देलन्हि। मिथिलासँ कर वसूली करब आ राजा पर निगरानी रखबाक भार सेहो हिनके पर देल गेलैन्ह। कामेश्वर ठाकुर ओइनी गामक रहए वाला छलाह आ ई गाम हुनका पूर्वजकेँ कर्णाट शासकसँ जागीरक रूपमे भेटल छलैन्ह। कामेश्वर ठाकुर राज्य प्राप्तकेँला उत्तर अपनहि गामकेँ राजधानी बनौलन्हि। मुहम्मद तुगलकक जीवैत हाजी इलियास अपन निवास दरभंगामे रखलक परञ्च मुहम्मद तुगलकक मुइलाक बाद ओ अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कए देलक आ कर देव सेहो बंदक देलक। अपन साम्राज्य क्षेत्र विस्तारक योजनाक क्रममे ओ अपन आधिपत्य स्थापित कदेलक। ओ मिथिलाक राजाक संग युद्ध कए मिथिलाक राज्य रहल आ ओकर दक्षिणमे इलियासक राज्य भेल। एवँ प्रकारे नेपाल तराईसँ बेगूसराय धरि ओ अधिकारक स्थापनाकेँलक आ कामेश्वर वंशकेँ ओइनीसँ हँटोलक। मिथिलाक एहि अप्राकृतिक बटवाराक विरोधमे कामेश्वर ठाकुर विद्रोहक देलन्हि मुदा ओहि विद्रोहकेँ शख्तीसँ दवाओल गेल। एहि शख्तीसँ विद्रोह दवेबाक क्रममे बहुतो गाम नष्ट–भ्रष्ट भऽगेल। विद्रोह दबौलाक पश्चात ओ बूढी गण्डकक तट पर अपन राज्यक सुरक्षार्थ एकटा प्रशासनिककेँन्द्र बनौलक जे शमसुद्दीन पुर (समस्तीपुर)क नामे ताहि दिनमे प्रसिद्ध छल। गंगाक तट पर ओ हाजीपुर वसौलक आ ओतए एकटा किलाक निर्माण सेहोकेँलक। फिरोज तुगलककेँ जखन ई सूचना भेटलैक तँ ओ आगि वव्वुला भऽगेल आ समाचार सुनवहि ओ दिल्लीसँ मिथिलाक हेतु विदा भऽगेल। आवत फिरोज गोरखपुर पहुँचल तावत हाजी इलियास अपन बोरिया–विस्तर बान्हिकेँ पण्डुआ दिसि विदा भऽगेल। ओतहु अपनाकेँ सुरक्षित नहि देखि ओ ओतएसँ एकदला दिसि चलगेल। जखन फिरोज मिथिला पहुँचल तखन कामेश्वर ठाकुर तथा छोट–मोट जमीन्दार लोकनि उपहार लकए सुल्तानक समक्ष उपस्थित भेलाह आ हाजी इलियासक लूट–पाटक शिकायतकेँलन्हि। सुल्तान कामेश्वर ठाकुरकेँ पुरस्कृतकेँलथिन्ह। कामेश्वर ठाकुर हुनक अधीनता स्वीकारकेँलन्हि आ कर देवाक प्रतिज्ञाकेँलन्हि। फिरोज मिथिलाक दुनु भागकेँ मिलाकेँ फेर एक कदेलैन्ह आ ओहिठाम अपन काजी नियुक्तकेँलन्हि। सुल्तान ओहिठामसँ एकदला दिसि विदा भेला। १३५३ फिरोज तुगलक कामेश्वर ठाकुरकेँ छोट बालक भोगीश्वरकेँ राजा बनौलन्हि मुदा मुल्ला तकिया एहि प्रसंगमे चुप्प छ्थि। बरनी सेहो एहि विषयमे किछु नहि कहैत छथि। फिरोज विद्रोही इलियासकेँ दबाकेँ जखन घुरला तखन ओ मिथिलामे अपन हाकिम बहालकेँलन्हि। मुल्ला तकिया कोनो स्पष्ट संकेत एहि सम्बन्धमे नहि दैत छथि। मिथिलामे मुसलमानी शासनक प्रसारक सम्बन्धमे जखन विवरण प्रस्तुत करब तखन सब बातक समीचीन व्याख्या करब। एहिठाम तँ मात्र मुल्ला तकियाक वयाजक आधार पर वस्तुस्थितिकेँ उपस्थिति कैल गेल अछि। फिरोज तुगलक पुनः मिथिलाकेँ दिल्लीक एकटा प्रांत बनालेलन्हि आ एहिठामक राजा पुनः दिल्लीक अधीन भऽगेलाह भऽनेऽ हुनका स्वायत्ता प्राप्त रहल होन्हि से दोसर गप्प। कर वसूल करबाक हेतु फिरोज तुगलक एतए अपन आदमीकेँ नियुक्तकेँलन्हि। भोगीश्वर फिरोजक मित्र छलाह। दरभंगाक उत्पत्तिः- एहि प्रसंगमे दरभंगाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे दूएक बात कहि देव आवश्यक बुझना जाइत अछि। दरभंगा शब्दक उत्पत्ति कहिया आ कोना भेल एहि प्रश्न पर अखनो धरि मत विभिन्नता अछिए। तवारिखुल फितरत(फितरतक इतिहास)क अनुसार दरभंगाकेँ बसायवला गयासुद्दीन तुगलक छलाह। हरिसिंह देवकेँ पराजित कए ओ एहि नगरकेँ बसौलन्हि एहेन बुझल जाइत अछि। हरिसिंह देव पड़ायकेँ जंगल–पहाड़ दिसि चल गेल छलाह। सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक अपन आक्रमणक क्रममे हुनका पर कब्जा करबा लेल जंगल कटबा देलन्हि। एहि साफ कैल जंगलक नाम “दारू भंग” राखल गेल। संस्कृतमे “दारू”क अर्थ होइछ लकड़ी आ ‘भंग’क अर्थ भेल काटब, छाटब आ नष्ट करब। चूंकि स्वयं सुल्तान अपना हाथे तरूआरिसँ जंगलकेँ काटिकेँ नष्टकेँने छलाह आ ओहिठाम अपन ओहि स्थानकेँ“दारूभंग” कहल गेल जे क्रमेण दरभंगाक नाम प्रसिद्ध भेल। अखन धरि ई मत सर्वमान्य नहि भेल अछि। विलियम हण्टर दरभंगी खाँसँ दरभंगाक उत्पत्ति बतबैत छथि। दरभंगी खाँ आईसँ करीब १२५ वर्ष पहिने भेल छलाह आ ओ मुहम्मद रहीम रूहेलाक पौत्र छलाह। हिनक वंशज अखनो दरभंगा बाला सिद्धांत कोनो तरहे मान्य नहि बुझि पड़इयै परञ्च तइयो हम देखैत जे ओमैली सेहो हण्टरेक मतकेँ मानने छथि। दरभंगा ओहिसँ पुरान नगर अछि तैं हण्टर आ ओमैलीक मत अमान्य अछि। सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘द्वार–वंग’ अथवा दूर–वंग या दार–ई–वंगलसँ दरभंगा शब्दक निर्माण भेल अछि। दरभंगाकेँ ‘द्वार वंग’क संज्ञा देव उपयुक्त नहि बुझि पड़इयै कारण कोन रूपे एकरा बंगालक द्वार कहल जेतैक? ई बात ठीक जे मध्य युगमे दिल्लीक सेना एहि बाटे बंगाल जाइत छल। (१६१५–१६४८) मिथिलाक संस्कृत लेखक पण्डित गंगादत्त झा अपन अपन भृंगदूतमे दरभंगा शब्दक उल्लेख कएने छथि– “तस्याः पाथः परम विमलं सन्निपिया भिरामा– गारां कामायुध दरभंगा राजधानी मुपेयाः”। अहुँसँ ई सिद्ध होइछ जे दरभंगीक पूर्वहिसँ दरभंगा नाम प्रचलित अछि। १७७८मे प्रतापसिंह सेहो दरभंगामे अपन राजधानी बनौने छलाह मुदा हुनकासँ १०० वर्ष पूर्वसँ‘दरभंगा’ राजधानीक रूपमे प्रख्यात छल जकर प्रमाण हमरा ‘भृंगदूत’क कविसँ भेटैत अछि। ओहि कविक विवरणसँ इहो ज्ञात होइछ जे दरभंगा (राजधानी) वाग्मती नदीक तट पर स्थापित छल आ ओतए एहेन एहेन सुन्दर भऽवन सब छल जे देखबामे कामदेवक तरू आरि सन लगैत छल। भृंगदूतक आधार ई कहल जा सकइयै जे ‘दरभंगा’ १७म शताब्दीमे एकटा प्रसिद्ध दर्शनीय नगर छल। दरभंगामे ताहिदिनमे मुगल बादशाहक प्रतिनिधि रहैत छलाह आ खण्डवला कुलक राजधानी “भौर”मे छल आ भौर आ दरभंगाक मध्य मधुर सम्बन्ध छल। महाराज माधव सिंहक समयसँ खण्डवला कुलक महाराज लोकनि स्थायी रूपेँ दरभंगामे रहए लगलाह। एक इहो सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘दलभंग’सँ दरभंगाक उत्पत्ति भेल अछि–गजरथपुरमे शिवसिंहक पराजय भेला पर ओहि स्थानक नाम ‘दलभंग’ राखल गेलैक कियैक तँ ओहिठाम शिवसिंहक ‘दल’केँ ‘भंग’ कैल गेल छलन्हि। परञ्च अहुमे विशेष तथ्य नहि बुझा पड़ैत अछि। ओना तँ सब गोटए अपन–अपन तर्क उअपस्थित कएने छथि मुदा कोनो तर्क नेऽ अखन धरि मान्य भेल अछि आ नेऽ ओकरा हेतु कोनो प्रामाणिक साधने उपलब्ध अछि। १७म शताब्दीमे ‘दरभंगा’ नामक प्रचलन ई सिद्ध करैत अछि जे ई नाम बहुत पूर्वहिसँ प्रख्यात रहल होएत। तैं हमर अपन विचार ई अछि जे एहि शब्दक उत्पत्ति गयासुद्दीन तुगलकक समयमे भेल जे ‘दारू’–‘भंग’केँलैन्ह आ ओहि दारूभंगसँ दरभंगा शब्दक विन्यास भेल। ई जखन तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनल तखन मिथिला तुगलक पुरक नामे प्रसिद्ध भेल आ ओकरे राजधानी भेल ‘दरभंगा’। दरभंगा ताहि दिनमे जंग़ल छल आ तकरा कटबामे सबकेँ डर होइत छलैक तैं गयासुद्दीन अपनहि जखन जंगल काटब शुरूकेँलन्हि तखन आ सबकेँओ मिलिकेँ एहिमे योगदान देलथिन्ह आ जंगल साफ भेलैक आ ओहिठाम तुगलक साम्राज्यक प्रधान कार्यालय बनल। तिरहूतक तुगलक कालीन सिक्का सेहो भेटल अछि। अध्याय–12 मिथिलाक इतिहासमे मुसलमानी अमल २९४ सँ ३१६ कर्णाट वंशक समयसँ मिथिलामे मुसलमान लोकनि हुलकी–बुलकी देव शुरू कऽ देने छल। ७११ ई.जखन सिन्ध पर अरब लोकनिक आक्रमण भेलैक ताहिसँ पूर्वहुसँ अरब लोकनिक सम्पर्क पश्चिमी आ दक्षिणी भारतसँ छलैक आ ओ लोकनि ओहि क्षेत्रमे व्यापार करबाक हेतु अवैत छलाह। जखन अरब लोकनि सिन्ध पर आक्रमण केलन्हि तकर बादहिसँ भारत्क संग राजनैतिक सम्बन्धक शुरूआत मानल जाइत अछि। ७११ सँ १२०० ई.क बीच बहुत रास मुसलमान चिंतक आ संत उत्तर भारतक विभिन्न क्षेत्रमे पसरि गेलाह आ मिथिला क्षेत्र सेहो सूफी लोकनिक एकटा प्रधान केन्द्र छल। ओम्हर पूबमे बंगाल धरि वख्तियार खलजीक समय धरि मुसलमानी प्रकोप बढ़ि चुकल छल आ बिहारोमे गंगा दक्षिण भागमे मगध पर मुसलमान लोकनि अपन आधिपत्य जमा चुकल छलाह। मिथिलेश एकटा भाग बचल छल जाहि पर हिनका लोकनिक नियंत्रण अखन धरि नहि भेल छलन्हि यद्धपि ई लोकनि अहि बातक हेतु सतत प्रयत्नशील रहैत छलाह। मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार तँ मुसलमान लोकनि बख्तियार खलजीक समयमे मिथिलो पर आक्रमण कएने छलाह यद्धपि एकर कोनो आन प्रमाण ओना नहि भेटैत अछि। गंगाक मार्गसँ जेवा काल किवाँ गंगा कोशीक संगम दिसिसँ भनेऽ ई लोकनि लूट–पाट करैत होथिसँ दोसर कथा मुदा हिनका लोकनिक आधिपत्य तिरहूत पर भेलन्हि छलन्हि। पूबमे मिथिलाकेँ मुसलमानी प्रगतिक पथमे वाधक बुझल जाइत छलैक कारण ताहि दिनमे अहिठाम सशक्त कर्णाट लोकनिक शासन छल आ तैं सब ठामसँ विद्वान लोकनि पड़ायकेँ एतए अबैत छलाह। पश्चिमक मुसलमान लोकनितँ तत्काल मिथिलाकेँ अपना नियंत्रणमे नहि आनि सम्राट परञ्च बंगालक मुसलमान शासक गृद्ध दृष्टि सेहो मिथिलाक स्वतंत्र कर्णाट राज्य पर लगले रहैत छलैक आर तैं जखन कोनो मौका भेटैक तखने वो लोकनि मिथिला दिसि बढ़ि जाइत छलाह। गंगदेवक कर्णाट शासक लोकनिमे ओ शक्ति नहि रहि गेल छलन्हि जाहिसँ ओ लोकनि शक्तिशाली आक्रमणक विरोध करितैथ। १२११ आ १२२९क बीचमे बंगालक विजेता गयासुद्दीन इवाज मिथिलाक राजाक क्षेत्र अपन नाम घुसौलन्हि आ हुनकासँ कर वसूल केनाई प्रारंभ केलन्हि। अहिसँ पूर्व मिथिलाक राजा ककरो सामने नेऽ कर देने छलाह। बंगाल पड़ोसिया होइतहुँ मिथिला पर मुसलमानी आक्रमणक श्रीगणेश केलक। बंगालसँ तिरहूतमे एबाक हेतु रस्तो सुगम छलैक। कोशी, गण्डक आ गंगाक काते कात तिरहूत होइत बंगाल जाएव–आएव सुगम छल आ तैं ताहि दिन पश्चिम आ पूबक आक्रमण कारी लोकनि अहि मार्गक प्रश्रय लेने छलाह। बीचमे पड़ैत छल तिरहूतक राज्य जे समयानुसार ‘वेतसिवृति’क पालन करैत अपन स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु यथासाध्य परिश्रम करैत छल। कानूनगोय महोदयकेँ ई बात बुझबामे नहि अवैत छन्हि जे जखन मिथिला आ कामरूपक स्वतंत्र राज्यकेँ वख्तियार नहि जीत सकल तखन ओ तिब्बत दिसि बढ़बाक प्रयास कियैक केलक? वख्तियार खलजीक मूल उद्धेश्य छल प्रांत सबकेँ लूटब आ धन जमा करब तैं कोन प्रांत स्वतंत्र रहल अथवा गुलाम भेल तकर चिंता हुनका नहि छलन्हि। आखोमात्र अपन मात्र स्वार्थ आ महत्वा काँक्षाक पूर्त्तिक हेतु सब काज करैत छ्लाह। पश्चिमसँ एक्के वेर बंगाल धरि मुसलमानी राज्यक प्रसारक देव ताहि दिनमे कि कोनो कम उपलब्धिक बात भेलैक? बंगाल विजयक क्रममे नदीक मार्गक अवलंबनमे मिथिला दक्षिण पूर्वी सीमा देने जँ ओ गुजरल होथितँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि सेनवंशक संग बरोबरि खटपल रहलसँ मिथिलाक ई अंश विशेष काल अरक्षित रहैत छल आ तैं यदि अहि बाटे बंगाल जेबाक क्रममे मुसलमान लोकनि अपन प्रभाव क्षेत्र एकर बिना लेने होथि तँ सँ संभव। परञ्च एतए स्मरण रखबाक अछि जे गयासुद्दीन इवाजक पूर्व धरि कोनो मुसलमान शासक मिथिलाक राजासँ कर नहि वसूल केने छलाह। तैं वख्तियारक पुत्र इख्तियारोक तिरहूत पर आक्रमण लूट–पाटे जकाँ छल कारण ओहिसँ तिरहूत राज्यक अक्षुण्णता एवं अखण्डता पर कोनो आँच आक्रमण विश्वविद्यालयकेँ उहै नष्ट केलक आ अपन बहादुरीक प्रदर्शन कुतुबुद्दीन ऐबकक दरबारमे दिल्लीमे जाके केलक। बंग कामरूप आ तिरहूतक शासकसँ ऐतिहासिक तौर कर मूलकेँ निहार व्यक्ति छलाह गयासुद्दीन इवाज। कानूनगोएक मत जे तिरहूतक सम्बन्धमे छन्हि जे पूर्णतया भ्रामक मानल जाइत अछि आ ओकर कोनो ऐतिहासिक प्रमाण नहि भेटइयै। अरिमल्लदेव नामक कोनो राजा मिथिलामे नहि भेल अछि आ ओहिकालमे नरसिंह देव अहिठामक शासक छलाह। अहि शंकाक समाधानक हेतु हम प्रोफेसर, कानूनगोएकेँ लिखने छलियन्हि आ हुनके आदेशानुसार डॉ. रमेश मजूमदारकेँ सेहो। श्री मजूमदार महोदय ई लिखलैन्ह जे कर्णाटवंशमे अरिमल्लदेवक नामक कोनो शासक नहि भेल छथि जकर राज्य मिथिलाक पूर्वी भाग ताहि दिनमे लखनावतीक अधिकार भऽ गेल छलैक। कोन आधार पर कानूनगोए महोदय अहि निर्णय पर पहुँचल छथि तकर प्रमाण ओ नहि देने छथि आ अहिकालमे मिथिलाक राज्य तुकड़ा–तुकड़ामे बटबाक प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटल अछि। यदि ओ सिलवाँ लेवीसँ प्रेरित भए अपन निर्णय बनौने छथि तखन आव एतवे कहि देव उचित जे अत्याधुनिक शोधक आधार लेवी महोदयक मत मान्य नहि अछि। नरसिंह देवक शासन कालसँ मुसलमानी प्रकोप मिथिलामे बढ़ल सेटा मान्य अछि आ मैथिल परम्परामे सेहो अहिबातकेँ स्वीकार कैल गेल अछि आ विद्यापतिक पुरूष परीक्षा एकर साक्षी अछि। नरसिंह देव पहिल व्यक्ति छलाह जे कर देलन्हि आ दिल्ली आ बंगाल दुनु ठामसँ सम्बन्ध बनौलन्हि। ई सब होइतहुँ ओ अपन स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे सफल भेला। बछवाड़ाक समीप ब्रह्मपुरा गाममे एकटा मस्जिद अखनहु वर्त्तमान अछि जकरा इल्तुतमिशक प्रचुर मात्रामे दान देने छ्लैक। अहिसँ बुझि पड़इयै जे मिथिलाक अहि क्षेत्र पर इल्तुतमिशक प्रभाव रहल हेतैक आ तखने नेऽ ओ दान हेतैक। इल्तुतमिशक समयमे तुगान खाँ बिहारक राज्यपाल छलाह मुदा ताहि दिनक विहारमे मिथिला सम्मिलित नहि छल। मिथिला बिहारसँ फुटे एक स्वतंत्र राज्य छल जकरा जीतबाक लेल बंगाल आ दिल्ली दुनु समान रूपसँ प्रयत्नशील छलाह। तुगान खाँ अपनाके बंगाल आ बिहारक शासक बनालेलक आ रजिया बेगमसँ ओकर मंजूरी लऽ लेलक। अहि स्थितिकेँ देखि नरसिंह देव पुनः अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कलेलन्हि आ कर देव बन्द कदेलन्हि। मुदा थोड़बे दिनक बाद ओ गिरफ्त भगेला आ दिल्ली लजाएल गेलाह। चंगेज खाँक विरूद्ध अपन बहादुरी देखा ओ पुनः मिथिलाक स्वतंत्रता प्राप्त केलन्हि आ अहि आदेशसँ घुरला जे ओ सोझे दिल्लीकेँ कर देल करौथ। रामसिंह देवक समयमे मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप बढ़ि गेल छी। तुगान खाँक तिरहूत आक्रमण उल्लेख मुसलमानी श्रोतमे भेटैत अछि परञ्च ओहिमे राजाक नाम नहि अछि। कालक हिसाबे तखन रामसिंह देव मिथिला पर शासन करैत छलाह। तुगानक आक्रमणसँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ धक्का अवश्य पहुँचले परञ्च स्वतंत्रता सुरक्षित रहलै। तुगान प्रचुर मात्रा धन–विन प्राप्त केलक। तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे रामसिंहक शासनकालमे एतए आएल छलाहसँ अपना आँखि सब किछु देखलन्हि आ लिखैत छथि जे मुसलमानी प्रकोपसँ वैशालीक निवासी हड़कम्पित छलाह आ मुसलमानी सेनाक आवागमनसँ जे धुरा उड़ैत छल ताहिसँ सौसे मेघ अन्हार भजाइत छल। तुरूक आक्रमणक संख्या दिन प्रतिदिन बढ़िते जाइत छलैक आ तिरहूतक राजा रामसिंह देव मुसलमानी प्रकोपसँ बढ़िया किलाबंदी करौने छलाह। किछु संस्कृतक पाण्डुलिपिक पुष्पिकासँ सेहो ई ज्ञात होइछ जे रामसिंहकेँ मुसलमान सबसँ संघर्ष करए पड़ल छलन्हि। चारूकातसँ मुसलमानक प्रकोप रहितहुँ रामसिंह अपन पूर्वजक जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह आ एहि हेतु हिनक शासन काल मानल गेल अछि। शक्तिसिंहक समयमे मिथिला पर अलाउद्दीनक आक्रमणक विवरण मुल्ला तकियाकवयाजमे भेटैत अछि परञ्च कोनो आन साधनसँ एकर संपुष्टि नहि होइत छैक। अलाउद्दीनकेँ हम्मीरक विरूद्ध ई सहायता देने छलथिन्ह आ हिनका हम्बीरध्वांत भानुः कहल गेल छन्हि। हिनका संग देवादित्य ठाकुर आ देवादित्यक पुत्र वीरेश्वर सेहो गेल छलथिन्ह। चण्डेश्वरक कृत्यचिंतमणिमे एकर उल्लेख अछि। फरिश्ताक विवरणमे अछि जे अलाउद्दीन समस्त बिहारकेँ जीत लेने छलाह मुदा तहिया मिथिला बिहारसँ भिन्न छल आ बिहार कहलासँ मिथिलाक बोध नहि होइत छल। अलाउद्दीन मिथिलाक व्यक्तित्व आ वैभवकेँ देखि ओकरा मित्र बनौने होथिसँ संभव कारण ओहि मित्रतासँ हुनका कैकटा लाभ छलन्हि। सर्वप्रथम लाभतँ ई भेलैन्ह जे ओ मैथिल शासककेँ अपना पक्षमे कए हम्वीरक विरोधमे ठाढ़ केलन्हि आ देवादित्यकेँ ‘मंत्री रत्नाकर’ पदवीसँ विभूषित केलन्हि। अहि सबसँ बुझि पड़इयै जे ओ बिना युद्ध केनहि मिथिलाकेँ अपना मैत्री भावसँ मिला लेने होयताह आ ओहिठाम अपन प्रभाव क्षेत्र बढ़ौने होयताह। मिथिलामे प्रभाव क्षेत्र बढ़ाएब आवश्यक छल कियैकतँ ओम्हर बंगाल दिसि मुसलमान लोकनि मिथिला पूर्वी दक्षिणी क्षेत्रमे घुसि रहल छलाह। अहि प्रसंगक विवरणक पूर्व बलबनक संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक अछि। कहल जाइत अछि जे अपन बंगाल अभियानक क्रममे बलबन इकालिम–इ–लखनौती तथाअरशाह–इ–बंगालकेँ दबाकेँ अपना अधीनमे केने छलाह आ मुसलमानी बंगालक राज्यपालक रूपमे ओ अपन पुत्र बुगरा खाँकेँ ओतए नियुक्त केलन्हि। बुगरा खाँकेँ ओ कहलन्हि जे अहाँ “दियार–इ–बंगाल”केँ जीतवाक प्रयास करू। किछु गोटएक मत छन्हि जे सोनार गाँवक दशरथ दनुजराय (वंग)क राज्य ‘दिआर–इ–बंगाल’मे छलन्हि। अहिदिआर–इ–बंगालकेँ किछु तिरहूत जिलाक दरभंगा बुझैत छथि जे हमरा बुझबे अप्राँसगिक बुझि पड़इयै कारण अहिठाम दशरथ–दनुअरायक राज्य छल ने कि कर्णाट वंशक। बंगालक द्वारजँ एकरा बुझल जाइकतँ ई क्षेत्र कतहु बंगालक समीप रहल होइत कारण बलबनक समयमे मिथिलामे कर्णाट वंशक राज्य छल आ ओ तीर भुक्तिक नामे प्रसिद्ध छल आ ‘दिआर–इ–बंगाल’क नाम ताधरि प्रचलित नहि भेल छलैक। बलबनक समयमे बिहारकेँ बंगालसँ अलग कैल गेल छलैकसँ बात ठीक मुदा तखन मिथिला बिहारसँ फराकेँ एकटा स्वतंत्र राज्य छल। १९५५मे महेशवारा (बेगूसराय)सँ फिरूजएतिगिन (१२९०–९२)क एकटा सुप्रसिद्ध एवं अद्वितीय शिलालेख उपलब्ध भेल अछि जकरा हम पूजासँ प्रकाशित करौने छी। फिरोज एतिगीन बंगालक रूकनुद्दीन कैकश द्वारा नियुक्त एक प्रशासक छलाह जे अपनाकेँ ओहि अभिलेख द्वितीय सिकन्दर आ खानक खान। एहि प्रशासकक नामक एक गोट आ अभिलेख लक्खीसराय (मूंगेर)सँ सेहो प्राप्त भेल अछि। रूकनुद्दीन कैकस बलबनक वंशक छल आर मिथिला क्षेत्रमे ओकर अधिकारक प्रसार अहिबात संकेत दैत अछि जे शक्तिसिंह आ हरिसिंह देवक समय बंगालक शासक दक्षिणसँ गंगा पार कए गण्दक धरि बढ़ि चुकल छलाह आ कर्णाट शासककेँ ओहि क्षेत्रसँ धकिया चुकल छलाह। कर्णाट शासक लोकनि बंगालक दबाबसँ तबाह भऽ रहल छलाह। मुल्ला तकिआ अहिबातक उल्लेख नहि कएने छथि मुदा अभिलेख जखन साक्षाते मौजूद अछि तखन दोसर साधनक अपेक्षे कोन? गण्डक क्षेत्रसँ अहि शिलालेखक प्राप्ति अहि बातकेँ स्पष्ट कदैत अछि जे ओहिकाल धरि अवैत–अवैत कर्णाट लोकनिक शक्ति दक्षिणमे क्षीण भऽ चुकल छलन्हि। अहि क्षेत्रमे गंगाक दुनु कात बंगालक सीमा धरि दियारा सब अछि–अहि दियारा सबकेँ संकेत “दियार–इ–बंगाल”सँ होइत होसँ संभव कारण गंगाक दुनु काते बंगाल जेबा–एबाक रास्ता छल। अहि अभिलेखसँ कर्णाट राज्यक वास्तविक विस्तारक सम्बन्धमे प्रश्न उठब–स्वाभाविक बुझि पड़इत अछि। बलबनक बाद बलबनी शाखा बंगालमे स्वतंत्र शासन करए लागल छ्ल आ एतए धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ा लेने छल। एकर बाद छिट–पुट ढ़ंगसँ मुसलमान लोकनि एम्हर–ओम्हरसँ हुलकी–बुलकी दैत रहलाह आ लूट–पाट करैत रहलाह। चारूकात मुसलमानी प्रभावक वावजूदो जे मिथिलाक कर्णाट लोकनि अखन धरि अपन स्वतंत्रता सुरक्षित रखने छलाह, ई कोनो कम गौरवक विषय नहि। लखनौती जेबाक बाटमे मिथिला पड़ैत छल आ तैं अहि पर एबा–जेबा कालमे सब केओ अपन किछु ने किछु बनालैत छलाह। संगठित रूपेँ मिथिला पर सुनियोजित आक्रमण केनिहार व्यक्ति छलाह गयासुद्दीन खलजी। सुगति सोपानसँ ज्ञात होइछ मिथिलाक राजनैतिक स्थिति दयनीय भगेल छल। दान रत्नाकरक एक श्लोकमे कहल गेल अछि जे मिथिला म्लेच्छ रूपी समुद्रमे डुबि गेल छल (मग्नाम्लेच्छमहार्णवे. . .)। कहबाक तात्पर्य ई भेल जे हरिसिंह देवक समय तक अवैत मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप मिथिला पर बढ़ि गेल छल आ हरिसिंह देव अखन धरि ककरो समक्ष झुकल नहि छलाह जेना ज्योतिरीश्वरक विवरण सँ स्पष्ट होइछ। अपितु हमरा बुझना जाइत अछि जे वो कोनो सुरतानकेँ पराजित सेहो केने छलाह–आव ई सुरतानकेँ छलाहसँ कहब कठिन? नामक अभाव किछु निश्चित नहि कहल जा सकइयै। नाबालिक होएबाक कारणे हरिसिंह देवकेँ बहुत दिन धरि अपना मंत्री सबक अधीनमे रहए पड़ल छलन्हि। १३२३–२४मे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। मिथिला पर आक्रमणक पूर्व ओ बंगाल पर आक्रमण कएने छलाह मुदा कानूनगोए महोदय कहैत छथि जे ओ पहिने तिरहूत आ तब बंगाल पर आक्रमण केलन्हि। मुदा से मत मान्य नहि अछि। गयासुद्दीनक आक्रमणक विवरण सब मुसलमानी श्रोतमे भेटैत अछि, मुल्ला तकिआमे सेहो आ अहि घटनाक एकटा चश्मदीद गवाह सेहो छथि जनिक पोथी वशातिनुलउन्स अखनो उपलब्ध अछि आ जकर फोटो कॉपी पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थानमे अखनो राखल अछि। ओहि पाण्डुलिपिक बारहम पात पर मिथिलाक राजाक सम्बन्धमे कहल गेल अछि जे ककरो कोनो बात नहि सुनलन्हि, तर्क आ बुद्धिसँ काजनहि लेलन्हि आ अनेरो पहाड़ दिसि पड़ा गेलाह–आगि जकाँ पाथरक पाछु नुका गेला मुदा तइयो चकमक करिते रहलाह। इशामीक अनुसार गयासुद्दीन तिरहूत पर आक्रमण केलन्हि आ ओहिठामक राजा एत्तेक भयभीत भगेला जे बिना कोनो प्रकारक विरोध केने भागि गेला। हिन्दू लोकनि सेहो जंगलमे नुका रहलाह। सुल्तान जखन अपनहि हाथसँ जंगल काटब शुरू केलन्हि तखन सैनिक सेहो ओहिमे जुटिगेला आ तीन दिनमे सम्पूर्ण जंगल साफ भगेल। तकर बाद राजाक किला पर चढ़ाई भेल जे सातटा पैघ–पैघ पानि भरल खाधिसँ घेरल छल। किला पर विजय प्राप्त कए राजा धन सम्पत्ति सबटा लूटलन्हि आ विरौधीक हत्या केलन्हि। अहमदकेँ अहिठामक शासक नियुक्त कए ओ ओतएसँ वापस गेलाह। फरिश्ता आ मुल्ला तकिआमे हरिसिंह देवक गिरफ्तारक गप्प झूठ अछि कारणवशातिनुल–उंसक विवरणसँ ई बात कटि जाइत अछि। वशातिनुलउंस (लेखक–इखतिस्सान)क अनुसार–तिरहूतक राजाकेँ प्रचुर सामग्री उपलब्ध छलन्हि, जन–धनक कोनो अभाव नहि छलन्हि, मजबूत किला छलन्हि, नीक व्यक्तित्व छलन्हि मुदा ओ घमण्डे चूर रहैत छलाह आ विद्रोहक भावनाक्ल नेतृत्व सेहो करैत छलाह। राजद्रोह हुनकामे कूटि–कूटिकेँ भरल छल। अहिसँ पूर्वक शासकक प्रति कहियो ओ अपन माथ नहि झुकौने छलाह, नेऽ ककरो मातहदी गछने छलाह आ नेऽ कहिओ पराजित भेल छलाह। सुल्तानक आगमनक सूचनासँ ओ भयभीत भगेला आ संगहि चिंतित सेहो। ओ किकंर्तव्यविमूढ़ भए बैसि गेला। एतेक चिंतातुर आ अपाहिज जकाँ ओ भगेला जे सब किछु रहितहुँ ओ सुल्तानक विरोध करबाक वजाय किला छोड़ि भगवाक घोषणा करैत ओ सबसँ तेज घोड़ा पर चढ़िकेँ भागि गेलाह। भोरमे जे अपनाकेँ सम्राट बुझैत छलाह तिनके स्थिति साँझमे भिखारि जकाँ भऽ गेलैन। ओ ओतए पहाड़ दिसि भगलाह आ अपना पाथरक पाछु नुका लेलन्हि। सुल्तान ओहिठाम बहुत दिन धरि रूकला आ प्रशासनिक व्यवस्था केलन्हि। जे केओ सुल्तानक आज्ञा मानलन्हि हुनका क्षमादान भेटलन्हि आ बाँकीकेँ सजा। सब किछु ठीक ठाक केलाक बाद ओ ओहिठामसँ दिल्ली दिसि विदा भेला। तिरहूत तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनि गेल आ ओकरा तुगलकपुर सेहो कहल जाइत छल। एवँ प्रकारे कर्णाट कालक गौरव पूर्ण शासनक अंत भेल आ शुद्ध रूपे मिथिलामे मुसलमानी अमल शुरू भेल। एतवा दिन मुसलमान एम्हर–आम्हरसँ हस्तक्षेप करैत छलाह मुदा आव मिथिला दिल्ली सल्तनतक एकटा प्रांत बनि गेल आ एकर स्वतंत्र सत्ता समाप्त भऽ गेलैक जकरा पुनर्स्थापित करबाक प्रयास बादमे शिवसिंह आ भैरव सिंह केलन्हि। कर्णाट वंशक पराभव भेला पर मिथिलामे ओइनवार वंशक स्थापना भेल आ ई राजवंश तुगलक साम्राज्यक करद राज्य छल। ओना आंतरिक मामलामे जे स्वायतत्ता प्राप्त रहल हौक सँ दोसर बात मुदा वास्तविकता आव इएह जे कर्णाट कालीन स्वतंत्रता लुप्त भऽ चुकल छल आ मुसलमानी प्रभाव मिथिलामे काफी बढ़ि गेल छल। खास ककए तुगलक लोकनिक सम्बन्ध ओइनवार शासकक संग बरोबरि बनल रहलैन्ह आ जखन तुगलक वंशक ह्रास भेल तखन आन–आन शक्ति सब सेहो मिथिलाकेँ धमकावे लागल। बंगाल, जौनपुर, अवध आ दिल्ली सबहिक मुसलमान शासकक नजरि मिथिला पर बनल रहैन्ह आ जखन जे मौका पावैथि सैह हाथ मारि लैत छलाह। कोनो तरहे मिथिलाकेँ चैन नहि छलैक आ बेचारे शिवसिंह आ भैरवसिंहक सत्प्रयासक बादो मिथिला स्थायीरूपेण राजनीतिक क्षेत्र कर्णाटकालीन मर्यादा नहि प्राप्त कऽ सकल। ई तँ धन्य विद्यापति जे अहिवंशक गौरव गाथाक यशोगान कए एकरा अमरत्व प्रदान करेबामे समर्थ भेलाह। गयासुद्दीन तुगलकक समयमे तिरहूतकेँ बंगालसँ फूट करा कए एकटा अलग प्रांत बनाओल गेल छल आ दरभंगामे ओकर राजधानी छल। ताहि दिनसँ दरभंगा मुसलमानी शक्तिक प्रसारक जे एकटा केन्द्र बनलसँ बनले रहल जा धरि कि ओहि पर अंग्रेजक कब्जा नहि भऽ गेलैक। ओइनवार वंशकेँ तुगलक लोकनिक हाथे राज्य भेटल छलन्हि तैं ओ लोकनि ओहिवंशक उपकृत छलाह। मोहम्मद तुगलकक समयमे एकर आ प्रसार भेलैक आ तिरहूत पर तुगलक शक्तिक विस्तार सेहो मुदा महत्वाकाँक्षी लोकनिक तँ कतहुँ अभाव नहि अछि आ इएह कारण छल जे बंगाल शमसुद्दीन हाजी इलियास रक्षकक स्थान पर भक्षकक काज केलन्हि आ तिरहूत आ नेपाल पर आक्रमण कए देलन्हि। तुगलक साम्राज्यमे मोहम्मद तुगलकक पगलपनीक चलते जे अव्यवस्था उत्पन्न भऽ गेल छलैक ताहिसँ प्रोत्साहित भए गोरखपुर, ब्रह्मचर्य, चम्पारण, तिरहूत आदिक राजा ढ़ीट भगेल छलाह आ शमसुद्दीन इलियास अपन महत्वाकाँक्षाक पूर्त्ति करबाक हेतु हिनका लोकनिकेँ सजा देवाक ढ़ोंग रचलक। हिन्दू राजा लोकनि आपसमे बटल छलाह जकर परिणाम ई भेल जे ई लोकनि सम्मिलित भए ओकर मुकाविला नहि कऽ सकलाह आ हाजी इलियास अपन विजयक डंका बजबैत हाजीपुर धरि पहुँचि गेल। गोरखपुर धरि ओकर प्रभाव बढ़लैक आ मिथिलामे ओइनवार राजाक अधिकारकेँ ओ सीमित ककए बूढ़ी गण्डकक उत्तरी भागमे राखि देलक आ दक्षिणक समस्त भाग पर अपन आधिपत्य स्थापित केलक। समस्तीपुर सँ बेगूसराय धरि आ ओम्हर हाजीपुर धरि इलियासक आधिपत्य बढ़लैक आ समस्तीपुर सँ बेगूसराय धरि आ ओम्हर हाजीपुर धरि इलियासक संस्तापको इएह मानल जाइत अछि। हाजीपुरक सामरिक महत्व ताहि दिन सँ बनले रहल आर मुसलमान कालमे एकर महत्व छल। बंगालोक प्रतिनिधि अहिठाम रहैत छलाह। जखन फिरोजतुगलक गद्दी पर बैसलाह तखन इलियासक ढ़ीटपनी दिसि हुनक ध्यान आकृष्ट भेलन्हि आ तैं तुगलक साम्राज्यक निर्धारित सीमा पर अपन सत्ता स्थापित करबाक हेतु ओ अग्रसर भेलाह। एम्हर जे हिन्दू राजा सब इलियास सँ पराजित भेल छलाह सेहो सब इलियास सँ खिसियैले छलाह आ तैं ओ लोकनि हषोत्फ्फुल भेलाह। फिरोज तुगलकक स्वागतमे ठाढ़ भेला गोरखपुर, कारूष, चम्पारण आ तिरहूतक शासन लोकनि। अहि सब पर अपन सत्ता स्थापित कए फिरोज सरयु नदीसँ कोशी नदीक क्षेत्र धरिक इलाका पर अपन प्रशासनिक व्यवस्था ठीक केलन्हि आ ओकरा अपन अधीनमे पुनः आलन्हि। फिरोजक प्रगतिक सूचना सुनितहि इलियास तिरहूतसँ भागल आ फिरोज हुनका पाँछा गेला। इलियास पहिने पण्डुआ पहुँचल आ तकर बाद एकदला। फिरोज तुगलक तिरहूत बाटे बंगाल दिसि गेलाह आ झंझारपुर अनुमण्डलमे सम्प्रति एकटा पिरूजगढ़ अछि जे फिरोज द्वारा स्थापित कहल जाइत अछि। ओहिठामसँ ओ राजविराज लग कोशी पार करैत बंगाल पहुँचलाह आ इलियासकेँ हरौलन्हि। ओहिठामसँ घुरला पर मिथिलाक सहयोगक प्रतिदान स्वरूप ओ भोगीश्वरकेँ अपन प्रियसखा कहैत मिथिलाक राजा बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक दुनु भागकेँ मिलाकेँ ओ एक केलन्हि आ समस्त राजक भार ओइनवार लोकनिकेँ देलन्हि। मुदा किछु गोटएक मत छन्हि जे ई काजक श्रेय शिवसिंहकेँ छलन्हि। दिल्ली घुरबासँ पूर्व फिरोज मिथिलाक हेतु अपन कलक्टर आ काजी बहाल केलन्हि। हाजी इलियासकेँ मिथिलासँ भगाकेँ ओहि पर ओ पुनः अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आ ओइनवार वंशकेँ करद राज्यक रूपमे रहए देलन्हि। ई लोकनि वार्षिक कर तुगलककेँ दैत रहलाह। इलियास अपना अमलमे तिरहूतमे बहुत रास किला बनबौने छल मुदा ओकरा गेला पर ओहि सब किलाकेँ हिन्दू लोकनि तोड़ देलन्हि। फिरोज तुगलकक दिल्ली चल जेबाक बाद ओइनवार वंशमे आंतरिक संघर्ष प्रारंभ भेलैक आ एम्हर तुगलक लोकनिक हत्यासँ मिथिलामे एक नवस्थिति उत्पन्न भेल जकर चर्च हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। बिहारमे मालिक वीर अफगान तुगलक लोकनिक प्रतिनिधि छलाह मुदा तिरहूत पर हुनक कोनो अधिकार छलन्हि अथवा नहि से कहब कठिन कारण तिरहूत तखन बिहार सँ अलग राज्य छल। कीर्तिसिंह आ वीर सिंहक जौनपुर यात्राक उल्लेख पूर्वहि भऽ चुकल अछि आ ई लोकनिक जौनपुरक इब्राहिम शर्कीसँ मदति लेबाक हेतु विद्यापतिक संगे ओतए गेल छलाह। फिरोज तुगलकक पोता सुल्तान महमूद बिहार आ तिरहूतक राज्य अपन वजीर ख्वात्रा जहाँ (जकरा मालिक–उस–शके) सेहो कहल जाइत छैक)केँ देने छलाह आ ओ जखन देखलन्हि जे दिल्लीक गद्दी लड़खड़ा रहल अछि तखन ओ अपन स्वतंत्रता घोषित कऽ लेलन्हि। ओ अपन पद्वी सुल्तान–उस–शर्क रखलन्हि आ अपनाकेँ जौनपुरक शासक घोषित केलन्हि। आ अवध, बिहार, तिरहूत तथा गंगाक दो आव धरि ओ अपन आधिपत्य कायम रखलन्हि। एतवा धरि निश्चित अछि जौनपुरक आक्रमण मिथिला पर भेल छलैक मुदा ओ कीर्ति सिंह–वीर सिंहक हेतु अथवा बंगालमे मुसलमानी सत्ताक पुनर्स्थापितक क्रममे से कहब कठिन। मुल्ला तकिआ विवरणमे इब्राहिम शाह शर्कीक शिलालेख उल्लेख अछि जाहिसँ तथ्यक पुष्टि होइछ मुदा तत्कालीन घटना क्रमक सम्बन्ध ततेक रास नेऽ बात सब मिभझर भेल अछि जे ओहिमे सँ कोनो वास्तविक तथ्यकेँ बाहर करब कठिन गप्प। अहि हेतु अखन आरो प्रयास करए पड़त आ तखनहि हमरा लोकनि ओहि औझरैल जालसँ बाहर हैब। १४६० धरि मिथिला जौनपुरी राज्यक मातहदी राज्य छल तकर कोनो प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटैत अछि। मुसलमानी साधन सेहो एत्तेक स्पष्ट नहि अछि जाहि आधार किछु ठोसबात कहल जा सकइए। जखन तुगलक साम्राज्यक पतनक बाद चारूकात अस्थायित्व छल आ कोनो निस्तुकी राजाक शासन जमि नहि रहल छल तखनहि मिथिलामे शिवसिंहक उदय भेलैन्ह आ ओ मिथिलाकेँ मुसलमानी नियंत्रणसँ मुक्त कए अपन सोनाक सिक्का बाहर केलन्हि। बंगाल, जौनपुर, दिल्ली आ आन–आन, छोट–छोट राज्य जखन सब अपन डफली बजा रहल छलाह तखन शिवसिंहे कियैक चुप्प वैसितैथ? शिवसिंहक संघर्ष जौनपुरक शर्की राजाक संग भेल छलन्हि। ओना तँ अहि युद्धक पूर्ण विवरण नहि ज्ञात अछि मुदा कीर्तिपताकाक विवरणसँ एहि युद्धक संकेत भेट सकइयै। हुनका द्वारा घोषित मिथिलाक स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ अपन जानक बाजी लगौलन्हि। शिवसिंह लड़ैत –लड़ैत मारल गेला अथवा कतहु पड़ा गेला–सेकहब कठिन। शिवसिंहक बादसँ मिथिला पर आधिपत्यक हेतु दिल्ली, जौनपुर आ बंगालक बीच घीचांतीरी होइत रहल। शिवसिंहक पछाति कालक्रमेण इलियास वाला बटबाराकेँ बंगालक शासन पुनः जीऔलक आ ओहिक्षेत्र पर पुनः अपन स्तित्व कायम केलक। भैरवसिंहक समयमे ओहिक्षेत्र पर बंगालक प्रतिनिधिरहैत छल से वर्धमानक दण्डविवेक ग्रंथसँ ज्ञात होइछ– _ “गौड़ेश्वर प्रतिसरीरमति प्रतापः। केदार रायमवगच्छति दारतुल्यम्”॥_ ई केदार राय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि छलाह। ई हाजीपुरमे अपन मुख्यालय रखने छलाह। भैरव सिंह हिनका पराजित कए पंचगोड़ेश्वरक पद्वीसँ विभूषित भेल छलाह आ मिथिलाक दुनु भागकेँ एक वेर पुनः जोड़िकेँ एक केने छलाह आ संगहि अपनाकेँ स्वतंत्र सेहो घोषित केने छलाह। तकर बाद लोदी वंशक प्रभाव मिथिला पर बढ़लैक आ सिकन्दर लोदी मिथिलाक राजाक परम मित्र छलाह जकर उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। सिकन्दर जौनपुरकेँ हराकेँ अपन राज्यक विस्तार पटना, तिरहूत आ सारन चम्पारण धरि केने छलाह। वाकिआत–ई–मुस्तकीसँ ज्ञात होइछ जे ताहि दिनमे चम्पारणमे मियाँ हुसैन फारमुली जागीरदार छलाह। आधिपत्यक हेतु लोदी आ बंगालक शासकक बीच संघर्ष होइत रहल आ मिथिला पेड़ाइत रहल। लोदीक समयसँ मिथिला पर मुसलमानक प्रभाव एकदम प्रत्यक्ष होमए लगलैक। बेगूसरायमे एकटा लोदीडीह अखनो अछि आ तुगलकसँ लकए शाह आलम धरिक सिक्का ओतएसँ प्राप्त भेल अछि। दिल्ली आ बंगाल दुनु मिथिला पर अधिकार प्राप्त करबा लेल संघर्ष शील रहैत छलाह। भगिरथपुर अभिलेख अहिबातक साक्षी अछि जे मिथिला पर चारूकात सँ मुसलमानी प्रकोप खूब जोड़–शोर सँ बढ़ि गेल छल। १५२६मे पानीपतक पहिल लड़ाईमे इब्राहिम लोदी परास्त भेला। बाबरक लेख इत्यादिमे तिरहूतक राजा रूपनारायणक उल्लेख भेटइयै। तिरहूत बाबरकेँ कर दैत छल। बाबर सँ पूर्वहुँ तिरहूतमे अपन आधिपत्य कायम रखबाक हेतु मुसलमान लोकनि किछु उठा(उठौ)नहि रखलन्हि। बंगालक राजा नसरत शाह तिरहूतक राजाकेँ परास्त केलक आ नसरत शाहक एकटा अभिलेख बेगूसरायक मटिहानी गामसँ प्राप्त भेल छैक। नसरत अलाउद्दीनकेँ तिरहूतक गवर्नरक रूपमे नियुक्त केलक। नसरतक अवसान भेला पर मकदूम शाह विद्रोह केलक आ सासारामक अफगान नेता शेरशाहक संग मित्रता सेहो। शेरशाह चम्पारणसँ चटगाँव धरि जीतबाक प्रयास केने छल। हुमायुँक भारक प्रभाव नरहनमे छलैक जेकि महेश ठाकुर सर्वदेश वृतांत संग्रहसँ बुझना जाइत अछि। हाजीपुर पर शेरशाहक प्रभाव छलैक। १५४६मे हुमायुँ मिरजा हिन्दालकेँ हाजीपुर पर कब्जा करबाक आदेश देलकै। १५३० सँ १५४५ धरि मिथिलामे अराजकता रहलैक आर तकर किछु दिनक बाद केशव कायस्थ राजा भेल। दिल्लीये ई राज्यक भार हुनका भेटल छलन्हि। शेरशाह आ हुनक वंशजक शासन तिरहूत पर छलन्हि। तेघड़ा क्षेत्रमे मुगल–अफगानक संघर्ष भेल छल। मुगल साम्राज्यक समयमे मिथिलाक हेतु दिल्ली दिसि गवर्नर अथवा मुगलक प्रतिनिधि नियुक्त कैल जाइत छल। दरभंगामे बरोबरि फौजदार रहैत छल। महेश ठाकुरक शासनकालमे बहुत रास पठान सब हुनक संग देलन्हि। दाउदकेँ दबेबाक हेतु अकबर बिहार, तिरहूत आ हाजीपुरसँ सेना जमा केने छलाह। सैनिक दृष्टिकोणसँ मुगलकालमे हाजीपुरकेँ बरोबरि सुरक्षित राखए चाहैत छलाह आ खान–ई–आजमकेँ बंगाल आ तिरहूतक गवर्नर नियुक्त केने छलाह। मुजफ्फर खाँ चम्पारणक राजा उदीकरणक संग मिलि विद्रोही लोकनिकेँ दबौने छलाह। तिरहूतक राजा सम्राटकेँ कर दैत छलथिन्ह। १५८०क बाद शुभंकर ठाकुर भौरमे मिथिलाक राजधानी बनौलन्हि आ मुगल सम्राटसँ अपन बढ़िया सम्बन्ध बनाके रखलन्हि। शुभंकर ठाकुरक समयमे जखन अकबर काबुल दिसि गेल छलाह तखन एम्हर तिरहूतमे बदम्क्षीक पुत्र बहादुर शाह साम्राज्यक विरूद्ध विद्रोह केलन्हि आ अपन नामक सिक्का आ खुतबा शुरू कदेलन्हि। पश्चात् ओ आजम खाँक नौकर सब द्वारा मारल गेला। पुरूषोत्तम ठाकुर जखन राजा भेलाह तखन हुनका राजस्व जमा करबाक हेतु किला घाटमे बजाओल गेलन्हि आ ओतहि धोखासँ मारि देल गेलन्हि। हुनक पत्नी दिल्ली जाए जहाँगीरक दरबारमे एकर शिकायत कैलक आ पुरूषोत्तमक हत्याराकेँ मृत्युदण्ड देल गेलैक। रानी ओतहि जमुना नदीक निगम बोध घाट पर सती भऽ गेलीहे। हुनक बाद नारायण ठाकुरक शासन कालमे कोनो एहेन महत्वपूर्ण घटना नहि घटल आ मुसलमानक सम्बन्ध यथावत रहल। तब सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। १६६१मे औरंगजेब एकटा फरमान अछि जाहिमे उल्लिखित अछि जे महिनाथ ठाकुर पलामू आ मोरंगकेँ जीतबामे साहाय्य देने छलाह। हुनका समय नवाब मिरजा खाँ दरभंगाक फौजदार छलाह। पलामूक चेर्रा सरदार प्रतापराय सम्राटकेँ करदेव बन्द कऽ देने छलाह आ अपना क्षेत्रमे तहलका मचौने छलाह। हिनका दबेबाक हेतु औरंगजेबक आदेश एला पर फौजदार महिनाथ ठाकुरसँ मदति लेलन्हि आ पलामूक संग-संग मोरंगक विद्रोही लोकनिकेँ सेहो दबाओल गेल। ओहि हेतु औरंगजेब हिनका धन्यवाद सेहो देने छलथिन्ह। अहिसँ ई स्पष्ट अछि जे मुगल सम्राटक अधीन छलाह। हिनका पारितोषिक हेतु मूंगेर, हवेली, ताजपूर, पूर्णियाँ, धरमपुर आदिक जमीन्दारी भेटलन्हि आ माछक निशान सेहो। मोरंगक विरूद्धक लड़ाइमे नरपति ठाकुर सेहो संग देने छलथिन्ह। महिनाथक बाद नरपति ठाकुर राजा भेलाह। मिरजा खाँक पश्चात मासूमखाँ, नुसेरी खाँ, शाहनवाज खाँ आ हादी खाँक ओहिठामक फौजदार भेला। १.शीतल झा-नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! २.पाकिस्तान मे सेक्स-विचार-कुमार राधारमण १.शीतल झा नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! (1) नेपाल भारतके उत्तर‍दिस बिहार स उत्तर, पश्चिम बंगाल स पश्चिम, उत्तरप्रदेश स उत्तर पूर्वमे हिमालय पर्व‍तके एक अंशमे स्थित एकटा देश नेपाल अछि। २४० वर्ष पहिले गोरखा के एकटा लड़ाकु राजा पृथ्‍वी नारायण शाहके राज्‍य बिस्‍तारमे महत्‍वाकांक्षा स्‍वरूप उपत्‍यका सहित पूर्वमे तिस्‍ठा नदी आ पश्चिमे कांगड़ा किल्‍ला तक बिस्‍तारके क्रममे दक्षिणके सम्तल भूमिमे स्थित बिभिन्‍न ऐतिहासिक मुलुक पर बिजय प्राप्‍त करैत गेल ब्रिटिस्‍ट भारत सरकारके प्रतिरोधक बाद युद्ध भेल। १८१६ के सम्‍पन्‍न संधि नेपालके बर्तमान अवस्‍था कायम करैत १८६० के संधि सँ एकटा पूर्णता प्राप्‍त भैलै आ १९२३ के संधि एकटा देश मान्‍यता देलक। (२) मधेश मध्‍य एशिया स बनल शब्‍द मधेश नेपालक समतल भूमिमे रहल जाति जनजातिके मधेशी शब्‍द सँ सम्बोधन कएल गेल। एहि समतल भू-भागके तराई कहितोमे यही ठामक बासिन्‍दाके तराई बासी या मधेशी कहित खष भाषिक पहाडि वर्ग सम्‍बोधन करैत रहल १८१६ के सन्धिके खाकामें राप्‍ती आ कोशी के बिचक भूभाग ब्रिटिस्ट भारत लेने छल आ नेपालके २ लाख रुपैया देने छल। मुदा अन्तिम कालमे नेपालक अनुरोधपर ओ छोडि देलक। १८५९ भारतके प्रसिद्ध स्‍वतन्‍त्रता युद्ध सैनिक बिद्रोह के दमन करावक लेल नेपाली सेना भारतमो पठोलक बदलामे पश्चिमके चार जिल्‍लाके लएक जे सहित महाकालि सँ मेची तक समग्र २०-२२ जिल्‍ला मधेशक अछि आ एहि ठामक बासिन्‍दा मधेशी। (३) मधेशी प्रति ब्‍यवहार राजनीतिक-बर्तमान मधेशमे तत्‍कालिन अवस्‍थामे जे स्‍वतन्‍त्र राज्‍य सब रळे तकरा उपर प़थ्‍वी नारायण शाह हमला करैत गेल आ मिथिला राज्‍य सेहो कब्‍जा कएलक आ एकर १०००० ( दश हजार) सेनाके सहायता ल क पूर्वमे आक्रमण सफल कएलक आ तिरहुतिया सेनाके भंग कएलक। सम्‍पूर्ण मधेश पर ओ, साम्राज्‍य काएम करेके लेल सबपर जातिय साँस्‍कृतिक प्रशासनिक भाषिक दमन सुरु कएलक आ मधेशके पूर्ण उपनिवेश के रुपमे देखैत एकटा पूण्‍ति ओपनिबेशिक शासन चलव लागल। एही मधेशीके कहियो कोनो अधिकार नहि भेटलै जौँ कतहु नेपालक इतिहासमे मधेशीके चर्चा अवैतछैक ओ राजाके षडयन्‍त्र में ओकरा प्रयोग करवमे आएल छै। खस जातिमे २ जात शाह आ राणा आ क्षेत्री सत्ता संघर्षक क्रममे राजा के कटपुतली बनाक राखके काज जंग बहादुर राणा कएलक जेकर वंश १०४ वर्ष तक राजा आ प्राजा दुनुपर शासन कएल। जकरा कालमें चाक‍रीवाज शोषक पहाडी के शासनमें अंश रहलै, मुदा तहियो मधेशी निर्मम शोषण दमनके शिकार भेल। सम्‍पूर्ण मधेश शाह आ राणा सभक के जमिन्‍दार छलैक या दरवरियाक भाइभरदार दार के प्रशासन मार्फत राजनीतिक होइछलै आ प्रशासन मे मधेशी नहिं छलै । राणा शासनक अन्‍तथ आ शाह शासनक प्रारम्‍भ २००९ सालक कथित क्रान्तिमें। राजनीतिक स्‍वतन्‍त्रता नहीं, शाह वंशीय स्‍वतन्‍त्रता अएलै। २००७ साल सँ २०१७ सालतक विभिन्‍न राजनीतिक घटना क्रममें मधेशी के जनसंख्‍याके अनुपातमें कतहु राजनीतिक स्‍थान नही देल गेलै। जौ किनको स्‍थान भेटल ओ राजनीतिक आन्‍दोलनमें विशेष योगदान कएलनि तै। प्रशासनमें आ सुरक्षा क्षेत्रमें प्रवेश नही कतहु मधेशीकै देशक हरेक क्षेत्र पर रहल जाहिमे मधेश पूर्णत: पिसा गेल। एकरा अस्तित्‍वपर प्रत्‍येक क्षण खतरा रहै। नागरिकता ऐन कडा एकल गेल आ मधेशी के नागरिकता पर शंका करैत, देव में हाथ कठोर कएलक। एकरा कता संख्‍याके न्‍यून देखावक लेल पहाड स पूनर्वासिके नाम पर पहाडीके बसोवास मधेश में करौलक। जंगलके विचमे स राजमार्ग वनाक मधेशीके जनसंख्‍याक कम देखावकें खडयन्‍त्र करैत मधेशके मरभूमि बनावके चाल चलला। आसामी भुटानी वर्मेली नागरिक समेतके बसौलक आ सामाजिक अस्तित्‍व सेहो खतडा में पडैत गेल। एक भाष एकभेष एकराज्‍य एकदेश क निर्मम नीति के मधेश मे जे दमनपूर्वक प्रयोग क सकै तेहन मेधशी नेताके प्रयोग करैत रहल। तथापि २०४६ सालमें आन्‍दोलन भेले आ लोकत पुर्जीवित प्राप्‍त कएलक। मुदा मधेशीके जीवन में कोनो परिवर्तन नहीं भेल। राजनीतिकमें कोनो अधिकार नहीं, सतामे कतछु पहुँच नही। सरकारी नीति निर्माण में किनको स्‍थान नही। दलके उच्‍च तहमें कोनो संख्‍यात्‍मक परिवर्तन नही। कोनो सम्‍मानजनक स्‍थान नही। केवो टिकाउ नही। किनको स्‍वाभिमान नही। सवपर एकटा कलंक मढल रहैछ। मधेशी नेताक निर्यात इएह भेल। प्रशासनमें मधेशी न्‍यून होइत गेल। जनपद प्रारीमें सेहो घटे तगेल सेनामें कतहु प्रवेश नही प्रावधिक क्षेत्रमे रहल सभके दमन वेस्‍नी वृत्तिविकाश कम एहि यस अवस्‍था सभ दलमें देखल गेला कोना प्रगतिशील कोन प्रजातान्त्रिक अन्‍याय भेल कहि नहीं सकैछी तुरुन्‍त सम्‍प्रदायिक आरोप, तुरुन्‍त निस्‍कासन, एहन निति रहल ०४६ स ०६२ तक राजा ज्ञानेन्‍द्रक शाही कालमे विभिन्‍न जाति, जात सभक विचमें लोकहतान्त्रिक चेतना प्रवेश्‍ कएलक समावेशीकरण, समानुपातिक उपस्थिति जातीय स्‍वायाता संधीय संरचना आत्‍मनिणर्निक अधिकार आदि शब्‍दक राजनीतिक अर्थ जनतामें प्रवेश कएलक आ विभिन्‍न आन्‍दोलन भरहल अछि। राज्‍य पक्ष शब्‍दमें स्‍वीकार कएलक अछि मुदा नियतव एह पुरान छै, प्रवृति राणाकालीन छै। कपटपूर्ण मनशाय शाहकालीन छै। दलक केन्‍द्रीय निकायामें वएह रबैआ छै। मधेशी अधिकारक आन्‍दोलनपर वएह आरोप, वएह कलंक, वएह दमनक धम्‍की, वएह मिथ्‍या अस्‍वासन वएह स्‍थान, सम्‍मान नहिं देवाक सामन्‍ती प्रवृति। (४) आर्थिक मधेशी पर भ रहल आर्थिक शोषणक अनन्‍त स्‍वरुप अछि। 1816 के संधिताकाल में मधेश मांगल गेल छैक पहाडीके पलएवाक लेल चितौनके सामने मधेश नहीं मांगल गेल छेक1 किए ओतेक भूभाग में ओहि क्षेत्रक सामन्‍तक पोषण भजेतै भन्‍सार मधेसमें सव खर्च पदाडके लेल। कारखाना मधेश मधेशमें राजस्‍व पहाडके लेल। उत्‍पादन मधेश मधेशी नियन्‍त्रण वेचविखन भष्‍ट पहीके हाथ में कोनो निकायपर मधेशीके नियन्‍त्रण नही भ्रष्‍टाचार मे सलग्‍न पहाडी सजाय मधेशी के मधेशीस्थिति गाँव गाँवमें एकेटाकें पहाडी जीमन्‍दार के राजनीतिक हस्‍तक्षेप ओकरे प्रशासनिक पहुँच ओकरें। पूरे क्षेत्रमें आर्थिक शोष ओकरें । ओहे प्रभावशाली व्‍यक्ति। ओकरें सामाजिक हैसियत। गामक झगडाके न्‍यायधीश ओहे। सारा जमिनपर ओकरें कब्‍जा। कोनो छोअ जीमन्‍दार मधेशी त ओकरा उपर क जीमन्‍दार पहाडी । मध्‍य युगीन निर्मम सामन्‍ती शोषण अखनो देखल जाति अछि मधेश में। (५) सांस्‍कृतिक भाषिक, सामाजिक दमन नेपाल विभिन्‍न जाति आ वर्णके मिश्रित देश अछि स्‍वीकारितोमें विभिन्‍न जातिक विभिन्‍न भाषा, विभिन्‍न भेष अलग सामाजिक सम्‍बन्‍ध सांस्‍काृति पहिचानके स्‍वीकार नै कएकल कहिओ पहाडी सत्ता शाही प्रशासनके मजबूत आ निर्मम वनकेलेल एकहि भाषा, खस भासा अर्थात शाही भाषा, अर्थात गोरख भाषा, अर्थात नेपाली भाषा के दमनकारी नीति प्रयोग एकलक बाँकी सभ भाषा पर सम्‍बैधनिक रुपस प्रतिबन्‍ध लागल आ सरकारी कामकाजक भाषा भेष आ ओहि भाषाभाषीके जे पारम्‍परिक पहिरन रहै से पहिरनके के दरवारक पहिरन मानल गेल। ओहे भेष सरकारी भेष भेल ओ है प्रशासनिक भेष भेल पहिरन आ राजनीतिक भेष होइत आ अन्‍तमें जनप्रतिनिधिक औपचारिक भेष होइत-होइत सम्रग नेपाली नागरिकके भेष जकाँ ओकरें। ओपचारिक पोषाक मानल गेल। शिक्षामें सरकारी काम काजके आ इएह भाषा रहल आ अदालत एहि विषयमें शाही हाथक कठपुतली रहल। ६. जातिय जनजातीय शोषण आई प्रत्‍येक जातीय क्षेत्रमें खसजाति, पहाडी वर्गाके दमनकारी, नीति प्रवे भेल अछि। अल्‍पसंख्‍यक जाति, विलिन भ रहल अछि। कहाँ थाररु कहाँ दनुवार अहि सभक जातिय क्षेत्रक उन्‍मूलन भएरहल अछि सभक भाषाभेषक विलनक अवस्‍था में सांस्‍कृतिक अतिक्रमण आक्रमण प्रतीक्षा जनजातिक खस क्षेत्रमें। (७) प्रशासनिक प्रशासनिक क्षेत्रमें रहल पक्षपात उत्‍पीडन, शोषन दमन अति निर्मत आ उल्‍लेखनीय अछि। कर्मचारी तन्‍त्रके उच्‍च पद पर बहुत नगन्‍य मधेश्‍ी रहल छथिआ तिनका हतोत्‍साहित आ कमजोर बनाएल जाइत अछि। निचका कर्मचारी सव सेहो हुनका टेरैत नहि छनि। निक कार्य क नहि सकै छथि1 मधेशी पर दमन चलावके हुनकर योग्‍यता बनाबल जाइत छनिअ पहाडी ओकरा मधेशी पर दमनके लेल लाठी के रुपमे प्रयोग करैत अछि। ओ स्‍वयं भयभीत रहैत छ‍थि समग्र पहाडी वर्ग जातीय आ साम्‍प्रादायिक भावनासँ ग्रस्‍त रहैत अछि आ मधेशी पर सम्‍प्रदायिक आरोप लगवैत अछि। मधेशी के उपर मानव अधिकारके हनन होइत अछि आ ओकरा कतहु दर्ज करैत अछि। (८) न्‍याकि क्षेत्र अदालती कामकाजक भाषा खस भाषा अछि। न्‍याय‍धीशवादी प्रतिवादी के मर्म, भाषा, पीडा अर्थ विना बुझ्ने न्‍याय सम्‍पादन करैत छथि उल्‍टा अर्थ लगाक फैसला होइत अछि। सारा खस भाषामें होव के कारणस मधेशी न्‍या प्राप्‍त ने क सकैछे आ न्‍यायधीश सभ सेहो पहाडी (खस) र के हित में कहछथि आ स्‍वयं सम्‍पद्रायिक भावना स ग्रस्‍त रहैत छथि। (९) अन्‍य क्षेत्र कोनो निर्वाचित मनोनित संस्‍थामे मधेशी के पहुँच स्‍थाना, सम्‍मान नहिं अछि मानव अधिकार आयोग प्राध्‍यापकसंघ, चि‍कित्‍सक, संघ, अधिवक्ता संघ, इन्जिनियर संघ, विद्यार्थी संघ, शिक्षक संघ, महिला संघ, किसान संघ, कर्मचारी संघ, कतहु मधेशीके शायदे गोठे स्‍थान दैत अछि आ। तकरो नीति निर्माण में अल्‍पमत रहला के कारण वात रखवाक अवसर नीहं रहैछै। कोनी राष्‍ट्रयी दलक मातृ संगठन मे सेहो यह अवस्‍था अछि । तै शोषणा उत्‍पीडन, अवहेलना, दमन सर्वत्र व्‍याप्‍त अछि असहय अछि। (१०) प्रजातन्त्रिक आन्‍दोलन मा आ राष्‍ट्र निर्माण में मधेशक भूमिका राजा शासनके विरुद्ध में भेले प्रजातान्त्रिक आन्‍दोलनके केन्‍द्रीय स्‍थान मधेश छल। ओहि आन्‍दोलनके लेल मधेश भूमि मात्र नहीं देलक मधेशी आन्‍दोलनमें भाग लेलक आ रक्‍त देलक आ जान देलक २०१७ सालकेँ पचायती विरुद्धकेँ आन्‍दोलन सेहो मधेशमें केन्‍द्रीत रहल २०३६ सालक आन्‍दोलन मधेशमें सेहो भेल। विद्यार्थीद्वारा कएल गल प्रत्‍येक प्रगतिशील प्रजातान्त्रिक आन्‍दोलन में मधेशक व्‍यापक आ अग्र भूमिका छल । आ क जनआन्‍दोलन-2 त सेहो पूर्णत मधेश ओकरा उर्वराभूमि प्रदान कएलक आ अखनक संसद कमे पूनर्जीवन देलक। नेपालक कोनो प्रगति शील आ प्रजा‍तान्त्रिक नेता नहि छथि। जिनका मधेश राजनीतिक जन्‍म आ पालन पोषण आ कर्म भूमि देलक। मुदा मधेशक एतेक योगदान आ एकरा प्रति एतेक गद्धारी एतेक कृतध्‍नत्रा । एकटा प्रश्‍न प्रत्‍येक मधेशीके अनुतरित करैत अति जे मधेश सभक स्‍तरके पहाडी नेताके जितवैत अछि मुदा कोनो उच्‍च तहक मधेशक नेताक पहाड में टिकट भेटिते आ ओत स ओ जिविका अविर्त यह प्रश्‍न अछि जे कोनो मधेशी नेता मात्र नही पहाडी नेता के सेहो अनुत‍रित वना दैत अछि। निर्लज्‍ज वना दैत अछि। मुदा 2014 साल सँ अखन तक सभ चुनावमें कोनो भेदभाव नही राखि मधेशी पहाडी के भोट दैत अछि। टिकट पवाएक अधिकार होइतो में पहाडीके लेल टिकट छोडिदैन। अछि उत्‍साहपूर्वक ओकरा जिवैत अछि मुदा ओकर इज्‍जत ओतवे। ओकरालेल ओहे दुर्भाग्‍य ओहे विडम्‍बना। प्रत्‍येक आन्‍दोलनमें जेकरा पहाडी जेकरा राष्ट्रियता के आन्‍दोलन कहलकै, बुझने आ विना मधेशी ओहिमें सामेल भेल1 मुदा ओ राष्‍ट्रीय नागरिक नही, राष्‍ट्रीय व्‍यक्ति नही। इह छै मधेशी क नियति ! (११) शोषण, दमनक इएह स्थिति देखैत असहय भेला स ०६३ माघ में मधेशी आन्‍दोलन फुटि पडल मधडेशी आन्‍दोलनक किछु प्रमुख कारण: (क) हजारो वर्ष सँ (मधेशपुर) रहल सामन्‍ती शोषण उत्‍पीडन दमन दिक्कियाए अछि। (ख) गोर्खा राजा का शाह वंशीय राजतन्‍त्रात्‍मक निर्मता जे जनतापर हरेक क्षेत्रमें व्‍याप्‍त छैय, जे उपरोक्त बूँदा पर देखावल गेल अछि, जकर अन्‍तय लोक‍तान्त्रिक सरकार क अवस्‍थामें सेहो संभावना नहीं देखलगेल आ नैरश्‍यता आ असहयताक अवस्‍था आएल। (ग) लोक‍तान्त्रिक आन्‍दोलन उठावएकालमें दलक नेता सभद्वारा नमहर आश्‍वासन मुदा सरकार वनलापर उएह स्थिति, उएह दमन। (घ) मानवअधिकार, जातीय अधिकार, लोकतान्त्रिक अधिकार सम्‍बन्‍ध में वेसी सँ वेसी लेख, रचना, अन्‍तर्राष्टि्य जगतमें ख्‍याति प्रप्‍त विद्वान सभक महत्‍वपूर्ण विचार सब आएल वौधिक जगतमें हलचल पैदा करैत रहल, चेतना लवैत रहल आ आन्‍दोनलिन करैत रहल। (ङ) राजनीतिक दलमें मधेशी समुदायक नगव्‍य पहुँच रहितोमे ओकरा प्रति दमन, उत्‍पीडन स आएल ओकरा में उकुसमुकुस होइल रहल जे नीत वनिक फुटैल छल आक्रोस वनैत छल चाहे अपना व्‍यक्तिगत उत्‍थान के लेल मात्र सही। (च) माओवादी जनयद्धताका ओ विभिन्‍न जातीय स्‍वायतताके नारा लगौलक आ ओहि अनुसार संघीय संरचना के भ्रूण स्‍वरुप जातिय क्षेत्र निर्माण कएलक जे एकटा कान्तिकारी चेतना छलैक मुदा वाद में ओकर नीतिका व्‍यवहार नहिं रहलै। (ज) एहन सिर्जल वातावरणमें अन्‍तरिम संविधानक घोषणा। भेल जाहिमे कोनो दल विगतकेँ आस्‍वासन वचन, घोषणा लागु नही कएलक आ धैर्यताक सीमा टुटि गेल। (झ) जनप्रतिनिधिद्वारा बनावल गेल सभास सम्बिधानसभा वनत आ ओ जनताके संविधान होएत से मान्‍यता अनुकुल अपना सभानुपातिक उपास्थिति संविधान सभामें नही होएत से सम्‍भावना निश्‍चय देखैत आन्‍दोलन भ गेल। (ञ) जनसंख्‍या के आधारपर समानुपातिक निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण करव दल आ नेता सभ पछा र हल थि। ओ सभ मधेश स जिते मुदा मधेशक सीट कम रहैक से मनसाय देखि जनता नहि सहल। (ट) कोनो दल भितरके मधेशी एहन स्‍वतन्‍त्र आन्‍दोलन नहि उठावि सकैत अछि ओ दलक नीति, अनुशासन, लोभस वाहनहल रहलाके कारण सँ अलग आन्‍दोलन भँडकि उठल। (ठ) मधेशी जनअधिकार फोरमके किछु वर्ष स लगातार बौद्धिक क्षेत्रमें एकल गेल तथ्‍यांक सहित के चेतामूलक पुस्तिका पुस्‍तकके प्रकाशन आ मधेशी अधिकारका विषयमें करै काजसँ किछु प्रतिष्‍ठा आ विश्‍वास के कारण सँ आन्‍दोलन ई स्‍वरुप लेलक। (ड) शान्तिपूर्ण आन्‍दोलन में एकलगेल प्रहरी दमन आ सरकारी दमन सँ मधेश उत्तेजित भेल। (ढ) शान्तिपूर्ण बन्‍दके कार्यक्रम पर माओवादी के हिंसात्‍मक प्रहार सँ आ राहारतप्राप्‍त मधेशी कार्यकर्ता के मृत्‍यु सँ आगि मे घ्‍यूके काज एकलक आ माओवादी विरुद्धमें आन्‍दोलन केन्‍द्रीत होइत समग्रमें खस वादी सत्ता केँ विरुद्ध में उत्तेजित होइत गेल। (ण) प्रधानमन्‍त्रीको पहिल सम्‍बोधन कपटपूर्ण रहल वात में मधेशीले विश्‍वास भेल आ आन्‍दोलन उत्तेजित होइत गेल । (१२) वर्तमान अस्‍था (क) आठ दलद्वारा अनुमोदित प्रधानमन्‍त्री क देशक नाम सँ सम्‍बोधन के कतहु कोनो रुपमें लागु नहि भेल अछि। (ख) शान्ति तथा पुननिर्माण मन्‍त्री तथा वार्ता टोली संयोजनक साथ कएल गेल सहमति लागु नहि भेल छै। जाहिमे राजनीतिक मुद्दापर सहमति नहि वनलै सिर्फ प्राविधिक मुद्दा पर। (ग) संघीय संरचनाक अधार तय सरकार नही कएलक जाहिस मधेश आ जनजाति सबके शंका सरकार पर छै। (घ) सरकारद्वारा समानुपातिक उपास्थिति (राज्‍यके प्रत्‍येक अंगमें) के कोनो प्रयास नहि कएक गेल अद्धि पुराने खसवादी अहंकारी प्रवृत्ति कपट वर्तमानो मे अछि। (ङ) सात दलके पार्टी संगठन में तथा नीति निर्माणके स्‍थान पर कोनो समानुपातिकता अवलम्‍बन नहि कएलक अछि। (च) 1 दर्जन सँ वेसी हथियार धारी संगठन मधेशमें संचालन भेल जे अछि हिंसा, अपहरण, धम्‍की के माओवादी शैली अपनौने अछि। (छ) किछु हा‍थियारधारी समूह मधेशके एकटा स्‍वतन्‍त्र देश, राष्‍ट्र के नीति ‘क’आन्‍दोलन अछि। (ज) मधेशके उत्तरीक्षेत्रमें राजमार्ग के कातेकात परिस्थितिवस वस बसल आ बसाओल गेल पहाडी वर्ग मधेश आन्‍दोलन, मधेशी आ मधेशी आ मधेककके विरुद्धमें अपन शक्ति प्रयोग करेत अछि। राजमार्गपर कब्‍जा नियमित बन्‍द मधेशी पर हमला, मधेशी अधिकार प्रति विष वमन, संघीय अन्‍तर्गत मधेश राज्‍यके विरुद्ध मे अलग राज्‍यकमाग कत्‍यादिस मधेशमें एकटा खास प्रकारक शंका भय आ छै आ उत्तेजना के सम्‍भावना छै। ओनाक हुनका पहाडी समुदायक सभके मधेशमें अधिकार, सम्‍मान, सुरक्षा, स्‍थान इत्‍यादी खतडा देखैत आक्रोशित अछि। आ एकटा नयाँ द्वन्‍दक संभावना अछि । (झ) अखन कोनो एकता दल एकटा नेता मधेशक भावनाके प्रतिनिधित्‍व नहिक रहल अछि। संगिठत आवाज नहि आवि रहल अछि। समग्र मधेश अहिंसात्‍मक आ हिंसात्‍मक आन्‍दोलनमें केन्‍द्रीत अछि। (ञ) मधेश मे वर्तमान राज्‍यसत्ता प्रति अविश्‍वास आक्रोस आ आग्रह मात्र अछि मुदा एकरा अपराधिक कृयाकलाप के आरोप लगवैत सीमा कडा करारहल अछि जैस नेपाल भारतके सम्‍बन्‍धके गलत प्रयोग आ भविष्‍यमें गलत व्‍याख्‍या कएल जाएबाक संभावना अछि। (ट) राज्‍य पक्ष सँ जायज माग पूरा करके बदलामें या सहमति भेलवात के पुरा कर के बदलामें गृहमन्‍त्री तथा अन्‍य विशाल नेता सभक धमकीसँ सेहो आक्रोस में बृद्धि भ रहल अछि। मधेशकै हतियारधारी समूह उत्‍साहित अछि। आ उदाहरणीय बुझैत अछि। (ड) दिना‍नुदिन मधेशक होइत मरुभूमिकरण राज्‍यपक्षद्वारा उत्तरी मधेशमें कएल गेल जंगल विनास पहाडी मूलके नागरिकके बसोबास स मात्र भेल से मधेशमें बौद्धिक क्षेत्र आ राजनीतिक क्षेत्रमें व्‍यापक उठि रहल अछि। ई सभ अखन वर्तमान मनस्थिति आ पतिरि‍स्‍थति नेपालमें अछि। (१३) मेधशी समस्‍या के समाधान: (क) सुगौली सन्धि पश्‍चात मधेशमें रहल मधेशी के पहाडी सत्ता नेपाली ने बुझैत रहल अछि। मधेश नेपाल आ मधेशी इन्‍डीयन कहिक बुझैत रहल, व्‍यवहार करैत रहल, सनीति वनबैत रहल, अपमान करैत रहल, नागरिकता सँ ब‍ञ्चित करैत रहल। तैं मधेशी के नेपाली बुझैक सम्‍मान दैक व्‍यवहार नीक करैत। अर्थात मधेशी के अपन पहिचान सहित नेपालमें रहए पाएव। (ख) राज्‍यक प्रत्‍येक अंगमे मधेशीके समानुपातिक आ सम्‍मानजनक उपस्थिति:- राज्‍य नीति निर्माणक प्रत्‍येक अंगमें राज्‍यक प्रतीक्षा अंगमे मधेशीके उपस्थिति देखवनाई अति आवश्‍यक अछि। दलक केन्‍द्रीय निकाय, राज्‍यक अग सभमें शीघ्रतिशिघ्र मधेशीके स्‍थान नहीं भेटत मधेश शान्‍त नही रहत से सम्‍भावना। (ग) राज्‍यक पुनसंरचना राज्‍यक पुनर्संरचना होइक आ ओ संघीय संरचनाके निर्णय करैक आ संघीय संरचना जाति, संस्‍कृति, भाषा भौगोलिक एकरुपता, प्राकृतिक सम्‍पदा इत्‍यादिके आधारपर होइक जे मधेशक चाहना आ माग छैक। समग्र मधेश पर स पहाडी शोषणा उत्‍पीडन के अन्‍त्‍य होइक आ तहन संधीय संरचना के प्रत्‍याभूति होइत एहन संधीयता र पृथकतावादी आन्‍दोलन कमजोर होइछ। (घ) राज्‍स्‍वक समुचित उपयोग कर भन्‍सार, मालपोत इत्‍यादी राजस्‍वक जे आय छै तकरा मधेसमें नगणय मात्रामें व्‍यय करबाक नीति आव व्‍यवहार रहि आएल छै तै एकरा मधेशमें मधेशी प्रतिनिधिके राखि नीति निर्माण कएनाई आवश्‍यक छै। (ङ) सन्धि सम्‍झौता कालमें मधेशीक सहभागिता भारत नेपालक वीचमें ऐतिहासिक, भगौलिक, राजनैतिक सांस्‍कृतिक साहित्‍यक सम्‍बन्‍ध छै तकरा देखैत भारत के कोको सम्‍झौता, सन्धि के कालमे मधेशी प्रतिनिधि बुद्धिजीवी रहनाई आवश्‍यक छै, अन्‍यथा निर्णय अव्‍यवहारिक होइत छैक। खास के जल सम्‍बन्‍धी जलविद्युत सम्‍बन्धि कोनो सम्‍झौता में। (च) संविधान सभामें समानुपातिक सहभागिता: आगामी संविधानसभामें मधेशाकी केँ मधेशक जनजातिके समानुपातिक उपस्थिति, संविधान सभाके लेल अगामी संविधान के लेल देशक शान्तिकेँ लेल, मधेशाक समस्‍याके समाधान के लेल आ राष्ट्रिय धारमें मधेशीके सम्‍माहितक लेल नेपालके सवल राष्‍ट्र बनकेलेल आवश्‍यक अछि। (१४) अन्‍तमे मधेशके समस्‍या के तत्‍काल समाधान आ दीर्घकालीन समाधानक उपाय में उपरोक्त विविसभ दीर्घकालीन अछि त तत्‍कालीन समाधान के रुपमें मधेशके प्रत्‍येक शक्ति सँ विना धम्‍की वार्ता के ‘क’ समस्‍याक शान्तिपूर्ण समाधान करबाक चाही आ मधेशीके साथ विना कोनो छल‍कपट, विशवासमें लक राष्ट्रिय समाधानदिस जएवाक चाहि। शीतल जनकपुर, धनुषा कुमार राधारमण संक्षिप्त परिचयः *  श्रम आ रोज़गार मंत्रालय,नई दिल्ली में बतौर अनुवादक कार्यरत। आकाशवाणी दिल्ली में नैमित्तिक समाचारवाचक सेहो। * विविध विषयक पांच सए सं बेसी रचना प्रकाशित। * मैथिली साहित्य में वर्ग-पहेली केर सूत्रधार। *  दैनिक हिंदुस्तान,पटना केर रीमिक्स परिशिष्ट में शनिकए फिल्म पर स्थायी स्तंभ प्रकाशित। *  शिक्षा-एम.ए. हिंदी,एम.ए. मैथिली(स्वर्णपदक प्राप्त)। सम्प्रतिःएम.ए.(भोजपुरी)में अध्ययनरत। *  मूलतः बघांत(मनीगाछी,दरभंगा) निवासी,किंतु पालन-पोषण बनमनखी(पूर्णिया) सं। *  ब्लॉगः www.krraman.blogspot.com, www.maithilionline.blogspot.com पाकिस्तान मे सेक्स-विचार -कुमार राधारमण "बीमार" एन डी तिवारी सं फेर प्रमाणित भेल जे सेक्सवृत्ति नहिं जाइत छैक। स्वर्गीय एन.टी.रामाराव के मुइला पर बड्ड खिस्सा सभ बहरायल छलैक जे कोना ओ प्रतिमाह कतेक हजार टका उत्तेजक दबाई सभ कीनबालेल खर्च करैत छलाह। सुनबा में आयल अछि जे ओही रामाराव पर रामगोपाल वर्मा एकटा फिल्म सेहो बना रहल छथि जहि में अपन बिहारी बाबू मुख्य भूमिका में छथि। देखा चाही जे ओहि फिल्म में एहि एंगल सं किछु नव तथ्य प्रकाश में अबैत अछि कि नहिं ।एम्हर खुशवंतो सिंह अपन बहुचर्चित कॉलम बुरा मानो या भला में स्वीकार कएलन्हि जे ओ एतेक बूढ भेलहु पर एखनो रूमानी कल्पना करैत छथि। सेक्स देया इएह धारणा छैक जे करू आ बुझू खूब मुदा बाजू किछु नहिं। सकदम भेल रहू ।  ओशो जहिना बजलाह कि आध्यात्मिक सं हटा,सेक्सगुरू के टैग द देल गेलनि। आब ई गप्प दोसर छैक जे आइयो हुनकर संभोग से समाधि की ओरसभसं बेसी पढल गेल भारतीय पुस्तक छैक। कखनो पढबा में अबैत छैक जे सऊदी अरब में सेक्स चर्चा पर आधारित एक कार्यक्रम में शामिल हेबाक कारणें,एंकर के 60 कोड़ा लगएबाक सजा स्थानीय अदालत सुनओलक । सूडान में स्कर्ट पहिरला पर एक टा किशोरी के 50 कोड़ा लगलैक। ईरान में जनानी सभ में मेकअप क कए टीवी पर अएबाक मनाही छैक । देवबंद दारुल उलूम के कहब छैक जे कंडोम के इस्तेमाल उचित नहिं छैक। आओर त आओर,इंडोनेशिया में बनल एक ताजा कानूनक मोताबिक,अगिला साल जं कोनो जनानी के टाइट जींस में देखल जेतैक,त ओकरा ओही ठाम,तुरंत स्कर्ट पहिरएबाक बंदोबस्त कएल जेतैक।एना में के बाजत सेक्स पर। थोड़ बहुत जं बजितो छथि त पुरुखे सभ। मुदा एम्हर एकटा तथ्य प्रकाश में आएल छैक जे जहि पाकिस्तान में तालिबान द्वारा महिला सभहक लेल बुर्का केर अनिवार्यता अथवा एक लिमिट सं बेसी नहिं पढबाक तालिबानी फरमान जखन-तखन जारी होइत रहैत छैक,ओही पाकिस्तान में सेक्स विषयक(यद्यपि एहि में राजनीति पर सामग्री सेहो रहैत छैक) एकटा पत्रिका धमगिज्जर मचा देने अछि। एहि पत्रिक के रूप में पाकिस्तानी महिलालोकनि कें एकटा एहन मंच भेट गेल छन्हि जहि में ओ सेक्स पर खुलि क चर्चा क सकैत छथि। एहिमैगजीन कें प्रबंधक लोकनिक लेल, पत्रिकाक वेबसाइट पर पाठकीय प्रतिक्रिया के सम्हारभ मोसकिल भ रहल छैक। पछिला साल ई मैगजीन लाहौर के दू कन्या- कैला पाशा आ साराह सुहैल द्वारा शुरू कएल गेल छल।  नाम छैक- 'चे मैगजीन'। पाकिस्तान में "चे" ओहिना छैक जेना हिंदी में 'च' । 'च' सं बिखिन-बिखन गारि सभ शुरू होईत छैक आ मैगजीन एही 'च' अक्षर सं जुड़ल विडंबना के देखाबए चाहैत छैक। वेबसाइट के कहब छैक जे सेक्स पर बाजब बेजाए बूझल जाइत छैक,तें दैनिक जीवन के अप्रसन्नता, हिंसा, शर्म, तनाव आ सामाजिक कष्ट कें जाहिर करबाक लेल ई मैगजीन शुरू कएल गेल छैक। ओना,मैथिलीयो साहित्य में सेक्स कोनो नव विषय नहिं छैक। कविकोकिल विद्यापति एहन कतेको रचना क गेल छथि जनिका देया महिला प्रोफेसर लोकनि के ऩहिं बुझबा में अबैत छन्हि जे ओ कोना पढाओल जाए। वामरति पर अभिनव जयदेव लिखै छथिः- "किंकिनि किनि-किनि कंकन कन-कन घन-घन नूपुर बाजे रतिरणे मदन पराभव मानल जयजय डिंडिम बाजे" चंदा झा एहि तरहक रचना सभ पर खिसिआएल छलाह आ ओ एहन रचनाकार लोकनिकें "बोतुक" कहबा में संकोच नहिं केलनि। बोतुक अर्थात् एहन जीव जकर दाढी त पाकल जा रहल छैक मुदा उमर के ख्याल नहिं कए संभोगवृतांत में व्यस्त अछि। मुदा सेक्स विषय के लोकप्रियता में संदेह नहिं । ई एकटा तथ्य छैक जे इंटरनेट पर सभसं बेसी सर्च सेक्स विषय पर भ रहल छैक। मोहल्ला ब्लॉग पर सविता भाभी के ल कए बड्ड हो-हल्ला मचलैक। हालहि में कनाडा में भेल एकटा सर्वेक्षण के निष्कर्ष (http://krraman.blogspot.com/2009/12/blog-post_03.html) छैक जे पोर्न सं केओ नहिं बांचल अछि। बाहर गुरू-गंभीर बनला सं की,सभ केओ कखनहु ने कखनहुं कंप्यूटर पर पोर्न देखनहिं छथि। सेक्स संबंधी आलेखक प्रतिक्रिया में कतेको पाठक लिखैत छथि जे पूरा आलेख पढि गेलहुं मुदा कोनो "ठोस" सेक्स-चर्चा नहिं पाबि निराश भेलहुं;समय "खराब" भ गेल। मिथिलो में,एखन कंप्यूटर के पसार ओतेक नहिं भेल छैक,तें किछु गोटे बांचल छथि। पाठकलोकनिक रुचि जं नहिं रहितनि,तं सभ अखबार में किएक रंगीन तस्वीर समेत रोज़ कोनो ने कोनो सेक्स संबंधी खबरि छपितैक?आइयो,समय-साल पत्रिका में जे लतिका जी के लेख छपैत छनि,तेकर पाठकीयता बड्ड छैक। शारदा सिन्हा कतबो कहथु जे अश्लीलता लोकगीतक आत्मा के मारि दैत छैक,मुदा लोकगीत में प्रारम्भहिं सं अश्लीलता केर पुट रहल छैक। विवाहो-दान में जे गीतनाद होइत छैक,तहि में बड़का गामबला सभ त किछु मर्यादा रखैत छथि मुदा कनेक कम परिचय बला गामक अथवा आन जातिक बियाह में गीत-नाद सुनि कए देखियउ। गहे-गहे सेक्स भरल छैक। संसदीय समिति भने कहने हुअए कि स्कूल में सेक्स-शिक्षा उचित नहिं हएत,मुदा कोलकाता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी के कहब छन्हि जे "सेक्स" इच्छा के सघनीकरण,रूपान्तरण आ संशोधन करैत छैक। एहि सं सेक्स के दायरा बढ़ैत छैक। सेक्स ,विमर्श के दायरा सं बाहर नहिं हेबाक चाही। एकर गोपनीयता भंग भेलहि सं चुप्पी के कम कएल जा सकैत छैक।        फूको के कहब रहनि जे सेक्स कोनो एहन चीज नहिं छैक जकर अहां मूल्यांकन क सकैत छी। बल्कि, सेक्स एहन चीज छैक जकरा निगमित करए पड़ैत छैक । ओकर क्षमता सार्वजनिक होइत छैक। एकरा लेल प्रबंधन प्रक्रिया के जरूरत होइत छैक। सेक्स पर पुलिसिया पहरा ओकरा "टैबू" बना दैत छैक। सम्पूर्ण नेटवर्क सेक्स के इर्द-गिर्द घूमि रहल छैक । कोनो ने कोनो रूप में, थोड़- बहुत फर्क के साथ समस्त किस्म के विमर्श पर ओकरा थोपि देल जाइत छैक। सेक्स के नव दृष्टि सं देखब जरूरी भ गेल छैक । हम सभ अहू तथ्य सं परिचित छीहे जे खासकए मुस्लिम महिलालोकनिक ई समस्या गंभीर छनि जे हुनकर पति खाड़ी आ अरब देश में कतेको साल धरि बीवी-बच्चा सभ के छोड़िकए नौकरी करैत छथि जखन कि इस्लाम में कहल गेल छैक जे पति के अपन पत्नी सं,चारि महीना सं बेसी अलग नहिं रहबाक चाही।सेक्स देया जत्तेक बात हेतैक,ओकर ओतबे  स्वत:-स्फूर्त्‍त उपकरण आगू आओत। एतबा जरूर जे ई काज सीमित आ सतर्क ढंग सं संहिताबद्ध हेबाक चाही। १.चिड़ै-सुजीतकुमार झा२.. कामिनी कामायनी-डाविर्नक बानर ३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह-मणिपद्मक कथा यात्रा ४.रामलोचन ठाकुर-समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा सुजीतकुमार झा चिड़ै सुजीतकुमार झा  “ यदि नलिनी, अहिं सन होशियार रहितै अहाँ कतेक सुख दैत छी, आ एकटा ओ छथि, जे हमर दूटा बच्चाकेँ माय भऽ कऽ मात्र रहैत छथि । मनोजक स्वरमे विवशताक अभास नई छल । मात्र एकटा इच्छा छलन्हि — यदि नलिनी सेहो उषा जकाँ सुन्दरी, होशियार आ सुख देबऽ बाली रहितए तँ सम्भवतः उषाकेँ आइँखो उठा कऽ नहि तकतैथि । उषा दिश एकटक देखैत मनोज पुछलन्हि— “ की, नलिनीके विषयमे सोचिरहल छी ? ” नई, हम किए सोचू हुनका विषयमे ? हम तँ हुनका देखनो नहि छियैन— उषा मुस्कैत मनोजक गर्दैनिमे अपन बाँहि लेपटा देलन्हि ।  मनोज सोचऽ लगलथि जे पढ़ल लिखल रुपवती उषाकेँ कार्यालयमे डेग धरिते सभहक आँखि हुनकेपर नाचि उठैत हएत, कतेक मजामे रहैत हएत हिनकर हाकिम । जखन मोन करैत हेतन्हि लग बजा अपन आँखिक पियास मेटा लैत हेताह । ओना उषा ओहन नहि छथि । ओ मात्र हमरा चाहैत छथि ।  ओहि दिन मनोज बहुत प्रशन्न रहथि । कए दिनक बाद उषाक टेलिफोन आएल रहैक आ हुनका अपन घर बजौने छल ।  उषा अपन घरकेँ खूब सजौने छलिह । मनोजक पसिनक सिंगार कएने छलिह, पसिनक खाना सेहो बनऔने छलिह ।  मनोजकेँ घर पहुँचलापर उषा गप्पक क्रममे पुछलन्हि “ एना कहियाधरि चलत ? ”  “ की ? ” मनोज सहजहिं जिज्ञासा कएलन्हि । “ की, एहने सम्बन्ध रहत हमरा सभक ? ” “ तँ की गृहस्थीके झण्झटिमे पड़ऽ चाहैत छी ? धुर बताहि तहन एहन उल्लासमय क्षण नहि रहत आ ने एहन हल्लुक वातावरण ” मनोज हरेक शब्दपर जोड दैत बजलथि । प्रतिक्रियामे उषा किछु नहि बजलीह ।  “ तमसा गेलियै ? हम तँ सम्झा रहल छलहुँ । ठीके छै, कोनो ने कोनो बहन्ने नलिनीकेँ डाइवोर्स दऽ देबै । आब उठू ।” कए दिन सँ मनोज सँ भेट नहि होएबाक कारण उषा मने — मोन टूटऽ लागल छलिह । नै कार्यालयमे मन लगनि आ ने घरमे । ओहि दिन बहुत बियाकुल भेलापर आलमारी सँ एल्बम निकालि कऽ पन्ना उन्टाबऽ लगलि । उन्टबैत — उन्टबैत एकटा फोटोपर नजरि स्थिर भऽ गेलनि ।  अही सोफापर दूनु बैसल रहथि आ आटोमेटिक क्यामरा एडजस्ट कऽ जल्दि सँ उषाकेँ माथ अपन कन्हापर धएने रहथि मनोज आ ओम्हर ‘क्लिक’ ।  ‘कतेक स्वभाविक छैक ई चित्र ?’ ओहि दिन अनायसे मनोजक मुह सँ निकलि गेल रहनि । “ यू लुक बन्डरफूल.... लाइक ए ब्राइड”  “ तँ बना लिअ ने” ।  जँ सम्भव होइतै.... आ मनोज चुप भऽ गेलाह ।  किए चुप भऽ गेलियै ? नालिनी सँ डेराइत छियैक । उषा जानि — बुझि कऽ बात उठौने रहथि । नलिनी सँ तँ नहि मुदा डर तँ अछिए । लोक की कहत ?  “ लोक ? ओ तँ एखनो कहैत हैत ” उषा कटाक्ष कएलन्हि ।  तिर निशानापर लागल रहैक । मनोज तिलमिला कऽ रहि गेलथि । किछु काल तक खिडकी सँ बाहर देखैत रहलथि आ किछु कालक बाद बजलाह “ अहाँ हमर गर्ल फ्रेण्ड नहि, अहाँ तँ प्राण छी ।” मनोजकेँ स्वभाव बड़ विचित्र छलनि । सदिखन ओ उषाकेँ ओझराहटिमे धऽ दैत छलाह । ओहि दिन मुसलाधार पानि पडैत रहैक । एकाएक मनोज उषाक घर पहुँच गेलाह आ कहलन्हि चलू समान किनै छी । “ एतेक पानिमे ?” “ हँ, दोकानमे भीड कम हैते ।” आ हँसऽ लगलाह । कहियौ कोनो पावनि दिन चौकपर भिड होइतै तँ ओइ भिडमे मनोज उषाकेँ लऽ कऽ हेरा जाय चाहथि । जाहि सँ हुनक गतिविधि सँ लोक अनजान रहैक आ कहियो अबेर रातिधरि खाली सडकपर घुमैत रहबाक आनन्द लेबऽ चाहथि । कतेक विरोधाभास छल ।  कोनो— कोनो दिन तँ मनोज आबि कऽ घण्टो सोफापर सूतल चुपचाप अपनेमे हेराएल रहैत छलाह । तखन उषा सोचथि सायद विजनेसकेँ कोनो चक्कर हेतैक वा हिनकर ओझराहटि नलिनी नहि बुझैत हेतीह ।  चाँैक कऽ उषा घडी दिश तकली । एखन देर छन्हि हुनका आबऽ मे, हम नहा लैत छी । तखने डोरबेल बाजि उठल ।  एहि समयमे के आएल सोचिते द्वार खोलि कऽ देखलन्हि तँ मनोज ठाढ़ छलाह ।  “ अहाँ कार्यालय सँ चलि एलियै । मनोज अबिते उषा सँ प्रश्न कएलन्हि ।  “ गेबे नहि केलियै ।” “किए । ”  अहाँ जे आबऽ बला छलहुँ । “ से अहाँके पहिनहि सँ पता छल”— मनोज पुछलनि ।  हँ अहाँके पसिनक खाना बनौने छी । आई कोनो बहन्ना नहि चलत, आइ एतै खाय पडत— कहि बाथरुममे चलि गेली ।  लाल रंगक पारदर्शी साडीमे ओ बहुत सुन्दर लागि रहल छलीह । मनोज पत्रिकाक पन्ना उनटा रहल छलाह । सेन्टक सुगन्ध सँ उषाक समिपताकेँ आभास होइते मनोज मुडी उठा कऽ देखलन्हि आ लपकि कऽ हुनका अपन बाँहिमे कसि लेलन्हि ।  ओम्हर नलिनीकेँ फुर्सत कहाँ छलन्हि ? ओ मनोजक व्यस्ततापर अपन तामस देखाबऽ लगैत छली । महिनो नीक जकाँ गप्प नहि करथि, मनोजक ई उपेक्षा हरेक कार्यमे देखाइत छल । अपन आदत अनुसार घर अबिते स्कूलके बच्चा जकाँ घडी, पेन, चश्मा एम्हर ओम्हर राखि दैत छलथि । मुदा दोसर दिन सभ व्यवस्थित रहैत छल । यदि नलिनी तमसा जाइत तँ कोनो समान तकैत तकैत मनोजक धैर्य टूटि जाइत छल ।  नलिनी नुका कऽ सभ चिज देखैत रहैत छली आ आबि व्यवस्थित कऽ दैत छली । आ आँखिए आँखिमे सल्लाह भऽ जाइत छल ।  “ की सोचि रहल छी ?” उषाक प्रश्नपर मुस्कैत मनोज हुनका दिश देखैत बजलाह“ अहिंक विषयमे, कतेक काज करैत छी अहाँ ? एकटा नोकरनी राखि लिअ ने” आइ काल्हिक पढल लिखल लडकी नोकरी सेहो करैत अछि । घरके काम आ उपर सँ घर बला, साउस, ननदिके उलहन सेहो सहैत रहैत अछि ।  “ तएँ अहाँ बियाह नै कएलहुँ ? ” मनोज पुछलन्हि ।  “अहाँ सोचऽ के अवसर कहाँ देलहुँ” ई कहि मनोजकेँ अपना दिश खिच लेलन्हि ।  नलिनीक यादकें मनोज बिसरऽ चाहैत रहथि । तएँ हुनका अपना सँ अलग कऽ बजलथि — भूख लागल अछि, चलू खाइ छी ।  उषा नाना प्रकारके व्यञ्जन बनौने छलीह । आनि कऽ आगामे पडोसि देलीह । मनोज अपने धुनिमे खाइत रहलथि । उषा हुनक हरेक सुख सुविधामे जूटल रहलथि ताकी एतय आबि कऽ ओ कोनो प्रकारक कमी नहि महसूस करथि ।  खाना खाइत मनोज पुछलन्हि “ सिनेमा देखऽ चलब ?”  “ पिक्चर ? आइ, ?”— उषा सोचमे पडि गेली, महिनो बाद एतय अएला है आ अपन समय सिनेमामे बरबाद करब । ओ हरेक क्षणके संजोगि कऽ राखऽ चाहैत छलीह । एतेक प्रतीक्षाके बाद आई अवसर भेटल अछि । ओकरो सिनेमा घरमे बचकाना प्रेम प्रसंगके देखऽ मे बीता दी ? नहि एना नहि हैत सोचैत बजली । चारि बाजि गेलै इन्टरभल भऽ गेल हेतै ।  “ ठीक छै दोसर शो देखब ।” कहि ओछाओनपर पडि रहलाह मनोज । उषा टेपरेकर्डरमे गजलके कैसेट लगा देलन्हि । संगीतक मधुरता वातावरणकेँ मनमोहक बनाबऽ लागल । टेपरेकर्डर मनोजे देने रहन्हि ।  उषा टयूबलाइट अफ कऽ नाइटलैम्प बारलन्हि । पुरना जमानाबला लालटेन के आकारबला ओ नाइटलैम्प सेहो मनोजे देने रहन्हि । आब तँ हरेक पुरान चिज फैशन बनि गेल छैक । ओ केश झाडि कऽ जुट्टी गुहऽ लगली । मनोजकेँ एकटक अपना दिश देखैत ओ पुछलन्हि –“ की देख रहल छी ?”  “ अहिंक सुन्दर केश, किए बन्हैत छियै एकरा ? खोलि दियौ ? खूजले नीक लगैत अछि । हरेक सुन्दर चिजके स्वतन्त्र रखला सँ ओकर सुन्दरता अओर निखरैत छैक । केशमे एकटा क्लिप लगा दियौ , बस्स ।“ जुट्टी खोलि उषा केशमे क्लिप लगा लेली । हलका मेकअप कऽ कऽ साडी बदलऽ लगली । बहुत रास साडी मनोज किन देने छलन्हि मनोजकेँ तँ बहन्ना चाही । बाट चलैत कोनो महिलापर नजरि पडिते पुछि बैसथि “ चाही ओहन साडी ? ” तँ की हम ओकर साडी देखैत छलियै ? ओ तुनकि कऽ कहैत छलि । “ आओर की ? दोसर महिलाक रुपपर अहाँक नजरि थोडबे टीकत । की पता ओ अहाँ सँ सुन्दर .... । “ मनोज डोण्ट वी सिली ?” उषा प्रेम सँ...... ।  किए प्रेम करैत छी हुनका । हरेक साडीके पाछु एहने कोनो मधुर प्रसंग होइत छलैक । ओ सोचमे डूबि गेली कोन साडी पहिरु ? रातिमे सिल्क बढियाँ लगैत अछि अपने सँ कहैत आसमानी रंगक साडी, गलामे नेकलेस, कानमे हिराके टप्स आ हातमे सोनक चुडी पहिर ओ मनोजक आगाँमे ठाढ भेलि तँ रुपसीके देखि मनोज क्षणभरि स्तब्ध रहि गेलथि ।  अरे ! गहनाक प्रदर्शनी छै की ? एखन तँ सिनमा देखऽ जाइत छी । दिनमे जँ ई पहिरने रहितौं तँ कतेको महिला एहने गहना बनएबाक हेतु...........।  प्लीज मनोज, कहियोकाल तँ बाहर निकलै छी । अपने देल समानके एकबेर नहि देखब हमरापर केहन लगैत अछि ? एहने प्रेमालापक सँग दुनू घरसँ बाहर भऽ गेलाह । सिनेमा । प्रेमालाप, हीरोकेँ पराक्रम मुदा दूनु अपनेमे लीन । फिल्म समाप्त भेलै । दूनु बाहर अएलथि तँ रातिके एगारह बजैत छल । ठण्डा ठण्डा हवा बहिरहल छल आ ताहुमे इजोरिया राति एकाधेटा सवारी सडकपर चलैत छल । दूनु एक दोसरमे लीन मौसमक आनन्द लैत पैदले घर दिश बिदाह भेलथि । विजुलीके खम्भा पाछु छुटैत गेल । गप्पक जेना कोनो अन्त नहि छल, मुदा उषाकेँ घर चलि आएल गलीकेँ मोडपर मनोज गुडनाइट कहैत उषा सँ बिदा लेलन्हि ।  गलीमे प्रवेश करिते संयोग उषाके तीन चारिटा गुण्डा घेर लेलकन्हि । स्वयंके छोडबैत उषा मनोज मनोज चिचिआए लगली । मुदा मनोज तँ.........।  खाली आँखि सँ उषा उज्जर वस्त्रमे घुमैत नर्सके देखैत रहलीह । डाक्टर एखने जाँचि कऽ गेल छल । नर्स कहलन्हि —“ बेहोशीकेँ हालतमे कोनो पडोसी अहाँके एतँ पहुँचौने छल । चौबीस घण्टापर होश आएल अछि । “ नर्स दबाइ पिआ कऽ चलि गेली । तखने मुस्कैत मनोज उषाकेँ समिप आबि बैसि रहलाह । उषा निर्विकार भाव सँ खिडकीपर बैसल चिडैकेँ देखैत रहली जे बीच बीचमे उडि जाइत छल आ पुनः ओहिपर आबि कऽ बैसि जाइत छल ।  केहन हाल अछि उषा ? ” उषाक हाथ अपना हाथमे रखैत मनोज नहुँऐ सँ पुछलन्हि । “ बस जीवि रहल छी ।” आ दोसर दिश ताकऽ लगलि ।  पुलिसमे रिपोर्ट कएलियै ? बेसी चोट तँ नहि आएल ?  नहि रिर्पोट नहि कएलियै — उषा रुष्ट होइत बजली ।  उषा डियर, एम्हर देखू, गहना लूटागेल सैह दुःख अछि ने । जाए दियौ गहना फेर बनि जाएत ।  “ बन्द करु एहन बकवास । आब हमरा गहनाकेँ मोन नहि अछि । ओ जेना आएल ओहिना चलि गेल”— कहैत हिचुकि—हिचुकि कऽ कानय लगली ।  “ की देहमे बुहत दर्द अछि, उषा बताउ ने, अहाँकेँ कतँ चोट लागल अछि ।” “ चोट लागल अछि हमरा हृदयमे”— कहि अओर कानऽ लगली ।  “ प्लीज ठीक सँ बताउ ने ।” “ अहाँ तँ एना चलि गेलांै जेना हम अहाँके केउ नई छी” — ओ बजली ।  मनोज चुप रहलाह । कहू ने, नलिनीकेँ एना छोडि कऽ भागि जेतियै ? हम यदि नलिनी रहितहुँ तखन ?  .. तखन हम अपन प्राण दऽ कऽ सेहो हुनकर रक्षा करितियै ।  तखन हमरा छोडि किएक भागि गेलहुँ ।  उषा अहाँ नहि बुझबै ई बात । बदनामीके डर सभ व्यक्तिकेँ होइत छैक । बिजनेस मैन छी । समाचारपत्रमे नाम छपि जाएत तँ फेर .... ओ बजैत बजैत रुकि गेला ।  “ कहू न फेर की ? ” “ अहाँ... नलिनी...हमर मतलब...हमर कनियाँ तँ नहि ने छी ... ।  अहाँ तँ... अहाँ छी .... । 

२... कामिनी कामायनी

डाविर्नक बानर 23।12।09 ओहि सूनमसान बङका गाछी बला चौबटिया प’ ओकरा देखिते मातर. ‘ओ’ सिताहल नढिया सन दुम दबौने . . . पङाए . लागल। . ‘ओकर पङेनाय देखि ‘ओ’ गाछ प’ सॅ छरपल. . .धेलक ओकर पछोङ. . . ।मुदा ओ’ गहूॅमक चिक्कस . सायकिल प’ पाछॉ बन्हने कनियो घुरि क’ नहि तकलक़ . . आ’ ताबङतोङ पैडिल मारैत अप्पन दलाने प’ आबिक श्वॉस नेने छल . .। एना हॅफसैत . . . फागुन मास में .. घामें पसीने देख़ि दरवज्जा प’ बैसल पिताजी. कनि घबङैल सन पूछला. .. . . “कि बाऊ. . . कि गप्प .. . एना किएक फिरीशान छहक़ . . . .किछु अनसोहॉत त’ नञि. . .” पिताजी के चिंतित मुॅह देखि बाऊ मुस्कैत बजला. ‘नै. . नै . . तेहेन कोनो गप्प नहि . ।मुदा .. .गुमटी बला चौक प’ जे बतहबा दाढी बला बुढबा गाछ प’ बैसल दूनू टांग मग में झूलबैत रहै छै .. . . . किएक नै किएक हमरा देखिते मातर. . अपन बङका बङका पकलाहा दाढी प’ हाथ फेरैत .. . डरौन सन ऑखि चमकबैत .. . .अांगुर सॅ ईसारा करैत. . .थम. . . थम’ कहैत हमरा लग दौङि क’ आबए चाहैत अछि. . . . हमरा बङ डर होईत अछि .. . आय त’ ओ आमक मोटका डारि सॅ धम्म सॅ कूदि हमरा खिहारने खिहारने नरेशबा के आरा मिल धरि चलि आयल छल .. . मुदा बीचे में बहेङा बला रोड प’ मोटरक आवाजाही सॅ ओकर दौङनाय में व्यवधान उपस्थित भेलए. . . .आ’ हम देकुली .. .बला रस्ता धरि जान बचौने .चलि आबि रहल छी . ..।’ पिताजी बेस चिन्ता में पङि गेल छलथि. . ।सब लोक त’ ओहि बाटे सहर बजार जाईत अछि राति .. बिराति .. सेहो . . .केकरो किछु नै कहियो भेलए .. . .।ओहि बङका गाछी सॅ कनि हटि कए . . .रेलवे गुमटी लग . . .के दोकान दार सब सेहो किछु तेहेन नै कहलकै. . ‘कत्तो सॅ आबि गेल छै साधुबबा .ओ अपाहिज .. . .ओ कि खिहारतै . .. आ’ कि गाछ प’ चढतै. . ।’ मुदा बौआ . .उर्फ तंतू के डर अजस्त्र. . . ।गाम सॅ बहराए के एक मात्र सोझ बाट त’ वएह . छल. . ।आ’ बौआ घर में बन्न भ’ रहितथि त’ कोना ..कोनो छौमसिया त’ छलैथ नहि .. कओलेजिया .. . .किलास करए त’ जेबे करितथि. . .. ।तखन पिताजी रमकिसुनमा के छोटका सार के लगा देलखिन्ह संग़ . .जे विशेष डिलडौल क’ पहलवान लोक छल.. . “खाली तौं गुमती टपा दिहक ।” अपन बहिनक सासुर में भरि दिन ओ बैसले रहै. . . त’ गुमती प’ सेहो कओलेज जेबा आ’ एबा काल बैसै. . .पिताजी के पाय सॅ चाह बिस्कुट खा पीबि क’ समय काटि लैक . .।आश्चर्य कि ओकरा संगे रहला प’ तंतु ओहि दढियल के ऑखि में ऑखि दैत टकटकी लगौने रहै .. .तैयो ओ बङका गाछक जङि लग संचमंच भ’ निर्लिप्त भाव सॅ बैसल रहैक .. । मुुदा अहि सॅ समस्या नहि पङेलै . ..।आन प्रकारक उत्पात त’ बढिते चलल गेल छल. .।भेलए कि जे ओहि दिन दिनकर कका के छोटका बालकक विवाह छल. .. .. टोलक सबटा जर जुआन. .. बूढ पुरान पुरूष पात बरियाती चलि गेल रहैथ .. . । तंतु बाबू के एम ए फाइनलक परिच्छा चलि रहल छलैन्ह. . .त’ मोन मसोसिक’ रहि गेलाह. . .बरियाती के सरस खेनाय सॅ ऑखि मूॅदि नीरस किताब में धियान लगौल्ौन्ह. ।. .पराते भ’ क’ पेपर छल ..ताहि लेल ओ दलाने प’ रहि क’ पढि रहल छला कि आंगन सॅ चिकरैत मॉ कहलखिन्ह. . ‘बौआ रौ. . . कनि पछबरिया बाङी सॅ चारि टा नेबो तोङि क’ आनि दे. . .ओलक सन्ना में देबए . ..’।ओलक सन्ना हुनका बङ पसिन्न. . ।ओ जहिना पछवारि खेत दिस जाए लेल करिया कका के खङिहान सॅ मुङला . .कि हुनक एकमात्र बरद . . .अचौक उठि जोर जोर सॅ पोंछ हिलबैत .. कूदय लगलै. . . जेना ओकरा में बिजली प्रवेश करि गेल होय .. .ओ रंभाय लागल आ’ खूॅट्टा के एके झटका मे उपाङि .. .खूट्टा सहित हुनका पाछॉ पङैल. . . ।ओ बेचारे त’ ब्रिटीश एम्पायरक गर्वनर सबहक कार्यकाल में ङूबल . ..हाथ में कौपी नेने मूङी झुकौने . . . .नेबो के गाछ दिस बढल चलल जा रहल छला. . . कि पाछॉ सॅ बरद हुनका धक्का मारि क’ खेत में खसा देलकैन्ह . ..अकबकैल सन ओ .. . .कनिकाल त’ हुनका ठकबक्की लागि गेलैन्ह . .. ओ चारो नाल चित्त खेत में पङल रहला . . . मुदा ओहो बारह सॅ पनरह सोहाङि खाय बला . . .बेस तंदुरूस्त . .जुआन लोक छलाह .. .त’ नीचा खसले खसले बरदक दुनु सींग पकङि जोर सॅ जुमा क’ लात मारैत ओकरा कनि फराक ठेलवा में विजयी होइत .. . ठाढ भ’ क’ अपना के बचबैत ओकरा दिस झपटला .. . .मुदा बरद के नहि जानि की भ’ गेल छलै .. . .ओ फेर हुङकि क’ हुनका प’ पूरा जोर सॅ दौगल . . .आ’ ओहि गॅहुम बॉग भेल खेत में पटकि .. . .अपन खूर सॅ हुनक पैजामा के डोरी फोलबा के कोरसीस कयने छल .। . . .ताबैत में कोनो जनानीए अपन आंगन सॅ देखिक’ चिचिएलकै .. . तेकरा बाद आओर स्त्रीगणक जोर जोर सॅ सोर सुनि दोसर टोलवैया सब हाथ में डंटा नेने दौङल आ’ बरद सॅ तंतु के कहुना करि क’ छोङबेलकैन्ह. . . ।आ’ ओहि दिन सॅ बरद आ’ बौआ में अघोषित जुद्व शुरू भ’ गेल छल .. . . आब ओ बरद .. . . बरद नै भ’ क’ साक्षात. . . .पकलाहा दाढी बाला बुढबा भ’ गेल. . .क्रोध सॅ पागुर करैत. . हुनका घुईर घुईर क’ ताकए लागल छल. . । ओम्हर सबहक आश्चर्यक ठेकान नै रहलै. . . एतेक सीधा बरद. . . जेकरा पॉच बरक नेना सेहो सानी पानी दैत पीठ प’ .. मूॅह. . प’ . . हाथ फेर दैत छलैक .. .औचक ओ एहेन मरखाह. . .बदियल आ” डरौन कोना भ’ गेलय. . आ’ ओहो खाली तंतुए प’ किएक गुम्हरैत रहै छै .. . ।अपन मूॅह नमरा क’ कत्तो सॅ .. .तंतु के देखि पगुरैत भोकरए लागे छै .. । पिताजी के आश्चर्य त’ सातम आकास प’ .. .आन धिया पुत्ता छलैन्ह . .. टोल में सेहो जनसंख्या कम नै. . .मुदा एकरे प’ किएक़ . .लाल वस्त्र सेहो नहि पहिरति अछि ई. . . । सब गोटे मिलक’ एकर समाधान जे निकाललैन्ह. . . ताहि सॅ ओहि कात हुनक गेनाय वर्जित भ’ गेलन्हि . .. ‘कोन बेगरता छै उम्हर जेबा के. . ।’ंंमॉ के आदेश त’ सर्वोपरि .. . । इम्हर टोल में जखन सब कियो अपन अपन काज निबटा क’ हिनका लग जिज्ञासा करए पहुॅचल. . .ठट्टा केनाय शुरू. . ‘आखिर तोरे प’ किएक झपटै छ सब कियो. . ।’ तंतू कनि सीरियस भ’ क’ अपन टेबुल प’ खुजल किताब में मूॅह गोति क’ आई ए एस के तैयारी में लागि जायथ ।ओना जतेक प्रकारक प्रति योगी परीक्षा होईत छै .. . .आ’ आर्टस के छात्र ओहि में बैस सकैत अछि . ..ओ सबहक फारम मॅगबाबैथ . .. आ’ किताब खरीदथि. . ।एवम प्रकारेण ई त’ निश्चित छल जे हुनका अपना भीतर सॅ कोनो पद क’ लेल ‘हूबा’ नहि छलैन्ह .. .।जे कनि भरिगर पदक नाम सुनैथ .. .त’ ओकर फारम अनबाबए लेल लोक वेद के बजार दौङा दैथ ।दोसर उल्लेखनीय गप्प जे कोनो पोस्टक लेल एप्लाई करबा सॅ पहिने ओकर बेसिक सैलरी आ’ अपन ज्येष्ठ भ्राता के बेसिक सैलरी सॅ तुलना करि क’ प्रसन्न भ’ जायथ .. ।एकरा पाछॉ मनोवैज्ञानिक के कहबी छल . . . सिबलिंग रिवालरी .. .. ...े पिताजी सदिखन अपन ज्येष्ठ बालकक बङाई करैथ त’ ई बेचारे मन्हुआईलसन अपना के अस्तित्वविहिन पाबि मोने मोन तिलमिलाईत रहि जायथ आ’ ओंघीओ में इएह स्वप्न देखैत जे भायजी सॅ नीक पोस्ट हासिल करी जे तारिफ हमरो हुए. . . . . । रटबा में हुनका साक्षात देवी के बरदान जेना .. . .. मुदा बिसरियो ततबे करैथ. . . आ’ एक के पॉति दोसर में जोङि तेसरे वाक्य बना दैथ .. . .कतेक आलेख सब रटि क’ इस्कूल में पुरस्कार सब सेहो जीत चुकल छलाह. . . ।अहि रटबा के क्रम में अंग्रेजी हिन्दी डिक्शनरी सम्पूर्ण संपुट लगा क’ रटि चुकल छलाह .. .मुदा जखन भायजी के चिट्टी में “चूङा विल बी ट्रान्समिटेड” लिखला .. त’ जनानी के माध्यम सॅ गप्प पसैर क’ पिताजी के कान में पहुॅचलन्हि .. जे चूङा के कोन विद्वुत तरंग में बदलि क’ ट्रांसमिट करता . त’ एक क्षण लेल बाबूजी सेहो थकमका गेल रहथि .. ।अप्पन अहि ओजस्वी संतानक बुद्वि प’ त’ हुनको यदा कदा संशय भ’ जानि . ।मुदा गलती त’ केकरो सॅ भ’ सकैत अछि’ ई कहि क’ तंतू बाबू कहियो अपन नाक प’ माछी नहि बैसय देलथि। उत्तिष्ठतः .. .जागृतः. . . .धावत :’ ई हुनक बीज मंत्र . .. जेकरा ओ रोज घोटैथ. । . घोटैत घोटैत ओ बैंकक पी ओ के परीक्षा देबा लेल सेहो तैयार .. ।. गणितक कठिनाई. . . मुदा बहादुर बौआ. . . गणितक सवाल के .. . . एबीसीडी .. .इम्हर सॅ आ’ ई एफ जी उम्हर सॅ. . . ..ह्यग्रएातएर तहान्। । । ।।ल्एस्स् तहान्हृ ..... .. . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . .रटैत रटैत भरल दलान प’ ओहि दिन ई उदघोषित करि देला जे आब ओ पी .. ओ .. के परीक्षा लेल पूर्ण रूपेण लंगोट कसि क’ तैयार छथि. . . ..आ’ अहिबेर कत्तो नै कत्तो ओ अवस्स निकालि लेताह . . .सफलता आखिर जेत्तै कत्त .. . .ऋ बेस. . .मॉ दही चीनी सॅ जतरा करा क’ विदा करोलथि. . .।विशेष उत्साहक संग किसुनमा के सार आ” हुनक अप्पन दुनु अनुज दङिभंगा आबि पटना बाला बस प’ बैसा देलकैन्ह. .। परीच्छा दैत तेसरा दिन ओ घुरला. . .।किसुनमा के सार बस स्टैंड प’ पहिने सॅ मुस्तैद. .. .अपन सायकिल गौंआ पानबाला के दोकान सॅ उठबैत दुनु अपन अपन सवारी प’ बैसला .. ।मुन्हरि सांझ म्ों . . .प्रधानमंत्री विकास योजना के तहत बनल सुचिक्कन पीच रोड टपैत . .. गामक खरंजा प’ बढल चलल जा रहल छलथि. . .कि नहि जानि कतए सॅ एक गोट सङल पीलिया कुकूर आबि क’ हुनक बाम कातक पैंट भरि मुॅह पकङि लेलकैन्ह. . .अहि क्रम में ओ घुट्टी सॅ ऊपर हबैक सेहो लेलकैन्ह. . .।एकरा एकटा अपशगुन मानैत. .. . सबटा प्रसन्नता क्षणांश में कर्पूर जकॉ .. .उङि . . . .चारूकात जरल माछ जेकॉ गंधाए लगलै. . । पिताजी के चिन्ता जायज़ . . . ‘ई कत्तो नौकरी चाकरी करैथ . .. तखन नै .. .कत्तो विवाहोदान. . . .।वएस त’ भइए गेल छन्हि . . .।खरच दुनिया भरि के. . .। बङ दिन धरि ओ अपार चिन्ता में डूबल रहि गेल छलाह. .। बौआ. . . .ऊर्फ तंतु .. . . दुनिया जहान सॅ भिन्न . . .।पूब में किरिन फूटबा सॅ पहिने उठि क’ घंटा भरि दंड बैठक करैथ ।. ..कसरति करैत मातर. . . .ओ ‘मनुक्ख गंध’. . “मनुक्ख गंध’ जकॉ .. . ‘भोजन गंध’ ‘ भोजन गंध’ करैत खेनाय प’ झ्पटैथ. ।भूख त’ हुनका सुतलि रातियो में फिरिशान करि दैक .. . त’ ओ तुरंत जोङन देल दुध के उठा क’ पीबि जायथ .. . ।भिनसरे माय ताकिते रहि जायथ. ‘भरि सक बिलाङि पीबि गेल हेतए ..’आ’ दही पोरनिहारिके अक्षमता प’ आरोप लगबैत . .अपन मोनक भङास निकालि लैथ नीैक सॅ झपने नहि हेतैक .. ।’ मुदा कतेको बेर जखन ई प्रक्रिया दोहराओल तेहराओल गेल त’ मॉ पूतौह आ’ बेटी के कात करैत अपने हाथ सॅ मटकूङी के ऊपर चकला . . . . . ओहि प’ लोढी सेहो राखि देलथि .. .चूल्हि के एकदम लग’ में. . . भनसा घरक सबटा खिङकी केवाङ बन्न. . . ।मुदा तैयो जखन परात भेने मटकूङी खाली. . . भेटलैन्ह .. .त’ हुनक आश्चर्यक ठेकान नै. . . “कियो टोना टापर त’ नहि करि रहल अछि. . . .दियाद बाद त’ अहिना दुष्ट. . . नजरि त’ हमरे घर प’ लागल रहै छै .. .बजर खसुआ सबके’. . .. ।’तखने दनदनाईत जलखई करबा लेल बौआ तंतु अयला त’ मायक’ ई विलाप सुनि रहस्योदघाटन करैत बजला. . ‘गै््््ऽऽऽऽ. ..हमरा रातिक पढैत पढैत भूख लागि जाईत अछि. . ..हमहीं. . .पीबि लैत छियो।’ ताहि दिन सॅ मॉ चारिटा सोहारी आ’ तरकारी .. .अरबेस क’ हुनक चौकी प’ राखि दैथ. . . जतय ओ पढैत रहैत छलाह. . . जाहि सॅ सुतली राति में भनसा घर त’ नहि जायथ .. . ।मुदा भनसा घर सॅ की परहेज . . .ओ त’ भगबति के उसरगए लेल थारी में राखल केरा दूध. . .चिनबारि प’स’ दिन दहाङे उठा क’ खा गेलाह. . ..पाथर भेल मॉ. . .थरथर कॉपैत. . .भगबति लग क’ल जोङने कलपि कलपि क’ हुनक सदबुद्वि लेल प्रार्थना करए लगली. . । जहिया सॅ बरद पटकने रहैन्ह तहिया सॅ बाङी झाङी बाला खास करिक’ घरसॅ बहराए .. बला काज त’ छुटिए गेल  छल जे हुनक आलसी सुभाव लेल बरदाने सिद्व भेल छल । आब अपन विशेख समय शरीरे प’ लगाबैथ. . . मुनहरि सांझ में सेहो घंटा दू घंटा . .. .कसरत करैथ . . . .ड़ाऊ डाऊ करि क’ खेनाय प’ छूटैथ . . . .।सेर सवा सेर . . .चाऊर बूटक भुज्जा फॉकैत . . . .दरवज्जा प’ . . .लैम्प जरौने . . कुरसी प’ बैसल झूलि झूलि क’ आई ए. एस क’ तैयारी सुरू करि दैथ. . आठ बजैत बजैत. . .भोजन भात भइए जाए. . .दस बाजैत बाजैत ओंघी सेहो दबोचि लैक . .. .गाम में तहिया साढे आठ धरि त’ लोकवेद खा पीबि क’ निफिकिर भ’ क’ सुतियो रहै. . .। ओहि राति बङ धुऑ धार बरसा भेल रहै. . . भदवारि मास. . . चारो कात. . .बेंग़ . झिंगुरक जुगलबंदी. .. .सब तरि पिच्छङि. . . ..।परात भेने .. ..कनि अंधारे सन छलै. . . पिछौत में . . .नहाए लेल चप्पा क’ल चलब गेला . . ..।औचक में पएर पिछैङ गेलन्हि. . . . .आ दू .  मूॅहा घरक सीढी के कोन में पानि बुनी सॅ नूकैत घुरमुङिया क’ सूतल बिलाङि क’ उपर धंम्म सॅ खसला. . .. ओ त’ पहिने म्याऊ म्याऊ करैत एक दू .. .क्षण कराहलक .. .. मुदा तेकारा बाद खिसिया खिसिया क’ हुनका से भंभोरलक जे हिनकर होश हवास गुम .. .। ई अन्हार में पङल पङल ‘मॉ गै .. . मॉ . .’ करैत चिकरए लगला. . त’ बगलक कोठरी में चारि मसुआ नाति आ’ बेटी के संग सूतल मॉ चिहुक क’ भकुआयल ऑखि मीजैत मीजैत .. . बहरेली. . .।लालटेमक टेमी ऊच करैत .. .बेटा के ई रूप देखैत .. . हुनक एङी के पारा मगज प’ चढि गेलन्हि. . . ।सब किछु बिन कहने बुझि गेलथि. . ‘तोरा कहिया भगबत्ती अकिल देथुन. . .।धीया पुत्ता सेहो पिच्छङि के डरै . .. क’ल प’ ओहि दिस सॅ नहि जाए छै. . . ।’उम्हर चिल्का जे बीमार छलै. . आ’ भरि राति नहि सूतल छलै हिनकर चिकरनाए प’ नीद सॅ उठि क’ . चेंहुॅ चेहूॅ करैत गला फाङय लगलै. . .।आंैधाएल बहिन .. .कहुना करि क’ बैसैत .. . पलथा प’ ओकरा नेने .. . .आरे निनिया. . . . .आ’. . . ।’करि ओकरा सूतब में लागल .. . आ’ नहूॅ नहूॅ फुसफुसा क’ अपन ‘तंतूभाय’ प’ आन्तरिक पीत्त सेहो. . .व्यक्त करि लैत छली. ‘हिनकर ताल अलबत्ते. . . भरि भरि राति .. . लोक जागल छै. . .आ’ भोरे भोर हिनकर ताल. . ।’ बाजि भ्ुाकि क’ मायक ह्दय मोम जकॉ पिघैल गेलै. . . ओ कङूक’ तेल आगि प’ पका क’ आनलथि . .. ‘ला ऽऽऽऽदेखो. . . देखी त’ . . . एकटा .. बिलाङियो तोरा नै गुदानै छै.ा .. . आर सबसॅ लङबा लेल त’ सिंग निकालि क’ सदिखन तैयार .. . ।दादी के त’ सौंसे भंभोरने छलौ .. . .नै लागै . ..छै एकर विष . . .।ओना त’ तू कुकूरो बला सूईया सेहो त’ लगबैनेए छलैह . .।’ फरिच्छ भेने तंतू. . .चारि टा पजेबा आनि पिच्छङ दिस सॅ लगा देलथि. . ‘आब नै खसतै कियो. . ।’ भौजाए बहिन सब हॅसए लगली .. ‘ अपने नै खसू . ..सएह .. .बङ. . .छै. ।. . आन सब त’ ठेकनगर छै . .।’ पिताजी के कोनो जोतखी कहलकैन्ह. . जे तंतू बाबू के किछु दिन स्थान परिवत्र्तन भ’ जेनाय आवश्यक़ . .किएक त’ हिनक मंगल बङ खराप .. . ।तंतू अपनो बङ दिन सॅ. मोन में नियारने रहथि जे भायजी के’ पटिया क’ कहुना ..कुशीनगर प्रवासक इंतजाम करी. . .।आब ई सब ताल बेल देखि पिताजी सेहो सहर्ष तैयार भ’ गेला . . . ‘अहू ठाम तैयारी करै छ. . .ओहु ठाम करियह. . .।’ताकल गेल जे ओतय कोन संबंधी छथि. . . आ’ सबसॅ नजदिकक भायजीक सासुरक कुटुंब. . . ..ओही विद्दार्थीक डेरा प’ आसन जमौला. . । अजगुत लोक़ . .अजगुत पढाई. .. ।मुदा नीके छै. . .कसरति करैथ . ..होटलक खेनाय . ..भूख पेट सॅ फाजिल लागै. ..।कोठरी में चना . . मूॅग़ . . गेहुॅम फूला क’ अंकुरी क’ संग़ . . सलाद लेल पत्ता कोबी .. टमाटर खीरा . .के संग कॉच भॉटा सेहो अजमेलाह . .।मुदा भॉटा के सलाद देखिक’ ओहि ठामक’ विद्दार्थी सब ठट्टा केलकैन्ह आ’ अपनो रूचिगर नहि लगलैन्ह .. . त’ भॉटा के सलाद सॅ निर्वासित करि देलथि .. .। मुदा अहु ठाम सेहो हुनका बङका बङका दाढी बाला बूढबा के लाल टरेस ऑखि पछोङ नहि छोङलक़ . .।आ’ नीन में .. .जेना कियो घेंट मोईक रहल होयन्हि. . . जखन. तखन ओ घोंघियाय लागैथ .. .औंचक श्वास बन्न भ’ जायन्हि . . . .।तखन करितथि त’ की. . .घुईर अयल.ा अप्पन गाम. . ।मॉ कहली. . ‘जे जान रहतै. . त’ .गामे में रहि क’ खेत पथार देखतै. एत्ते त’ देने छथिन्ह भगवान।’ उम्हर कुटुमक’ संघतिया सब कौंचबैन्ह. . ‘ कि भाय. . . कत्तए गेला अहॉ के चिङिया घर सॅ पङाएल संबंधी ..? . .भाय हम त’ कहैत छी जे विशुद्वरूपेण ओ अपन गार्जियन के ठकि रहल छैक .।एहेन वज्र. . . दू दू घंटा कसरत. .। . ओहि दिन इम्हर सॅ हम जाईत छलौं .. .सुनलौं .. .अहॉ के कोठरी सॅ ठहक्का . ..भेल अहॉ अपन घर सॅ आपस आबि गेल होयब . . . खिङकी सॅ झकलौं .. . .त’ देखैत छी . ..कुटुम एकसरे जोर जोर सॅ ठहक्का लगा रहल छथि. . . .पूछलोपरांत कहलन्हि जे हॅसी बला कसरत करि रहल छी .. . .।’ तंतू दोबारा घुईर क’ कुशीनगर नहि गेलाह .. .।ओ स्थान सेहो हुनका नहि धारलकैन्ह .. . ।तखन आब की कयल जाओ. . .।बङ सोचि विचारि क’ अपन छोट पुत्र संग लगा क’ पिताजी हुन का अपन ब्ङका सुपुत्र लग मायानगर पठा देलखिन्ह .. । भायजीक विवाह सॅ पूर्व सेहो ओ मायेनगर में रहथि .. . ।मुदा कोचिंग .. . . .आई ए. . एस आ’ पी .. ओ क’. . . .समाप्त करि फेर सॅ गाम आपस आबि गेल छलाह .. ।आब त’ खाली तैयारिए करबा के न छै .. .एयह सोचि क’। पहिने त’ हुनक ईलाज कराओल गेल .. ..एना जौं सुतली राति में श्वॉस अटकि जेतै. . ऋ. . कतेक दिन भाय सब अगोरने रहतै. . . ।आ’ भगबतिक बङका असीरबाद जे डाक्टरी दवाए सॅ मास भरि के भीतरे श्वॉस निर्विघ्न सुचारू रूप सॅ चलय लगलैन्ह . ..।मुदा ओ भयौन स्वप्न ऋ.. . .ओ .. चिंहुकि क’ नीन सॅ उठनाय. .? . बूढबाक लाल टरेस ऑख़ि . ऋ. ड़ाक्टर सॅ पूछला प’ कहलकै .. .साइकियाटी्र.स्ट सॅ इलाज कराऊ । भायजी सॅ अनुरोध करि क’ मुदगर. . .वेट लिफ्टिंग के आन समान सब सेहो किन नेने रहैथ. . ।आ’ बेसी काल आब ड्राईंग रूम में वा .. .बालकनी में ठाढ भ’ क’ मुदगरि भॉजैथ .. .।कखनो काल त’ कनि अनसोहॉत भ’ जाय .. . जे भेटघॉट करबा लेल लोक वेद ड्राईंग रूम में आबै .. . आ’ ओ बीच दीवान प’ मूङी नीचा पएर ऊपर. . । अहि बीच भायजी अपन फ्लैट बदलि क’ कनि दूर दोसर ठाम चलि गेल छलाह .. .।बङ दिन सॅ ओतए रहैत छलाह .. .त’ सर कुटुम . ..गौंआ सब के आबए में कोनो फिरिशानी नै होय .।मुदा नबका पता .. . । ‘तंतू भायजीक मकान शिफ्ट करबा काल स्वयं मुस्तैद छलाह ।भाय के अनुरोध प’ ओ सब सर कुटुम के नबका पता लिखक’ पठा देलखिन्ह .. . ।अहि बीच ओ’ गाम चलि गेलाह .. । उम्हर सब कियो फिरीशान . . .नबका मकानक पता गलत छै. ।किएक आ’ केकरा कहने फूसियाही पता देल गेल ? .. .अहि में गामक लोक के नब न्ुाकूत कनिया के कूट चालि बूझाए पङलैन्ह. . .। कनिए दिनक बाद .. तंतु बाबू. . .फेर सॅ मायानगर प्रवासक लेल पधारलथि। ओहो भायजीक डेरा में केकरो आओर के पाबि क’ घबङा गेलथि. . ।ई की केलथि भायजी चालाकी . .।झोरा झपटा नेने अस .पस में पङल. . .कत्तजाऊ. .। .. .तखने मोन पङलै. . . . शुक्रवारी हाट त’ अहि सङक प’ लागैत छेै ।. ..ई पूछला प’ लोक हुनका पौकेट सी पठा देलकैन्क ।.. .आ’ अहि ठाम भाई जी मौजूद छलाह .. ।सी के स्थान प’ बी लिख क’ ओ सबके ईएह पता पठौने छलैथ. . ।एहेन गलती त’ ओ’ सदिखन करैत छलैथ ।मुदा हुनका के की सकैत छल . .। एहेन एहेन त’ कतेक रास प्रमाण छल .. .मुदा तखन तंतू बाबू अपन गलथोथरि प’ उतरि जायथ .. ‘हमरा जएह कहब सेएह नै. . ।’मायानगर प्रवास के ई खूब नीक जकॉ मुदगर घुमेबा में. . .अखबार में कपङा के सेल देखबा में .. . .आ’ छह मासक भतीजी के डिब्बा के दूध .. आ’ फैरेक्स चोरा क’ फॉकवा में . . ...कनि नुका क’ सङक प’ आबैत जाईत आईटम गल्र्स के देखबा में .. .आ’ सूतबा के संग किछु जेनरल नॉलेजक पत्रिका रटबा में लगौलथि .. । एक दिन सीढी सॅ उपरका फ्लैट में चढैत उतरैेत. . हुनका आध्यात्मिक भान भेलन्हि जे किंस्यात .. .ई सब गमला बाहर सॅ आबए वला शुद्व वायु के अवरूद्व करि दैत छै .. .आ’ ओहि प्रदूषित वायु के कारणे. . जे बी. बी . .सी . .के अनुसारे दिल्ली में बङ बेशी छै. . .हुनक नाक अवरूद्व करए लागै छैन्ह .. ।त’ ओ अपन भायक सोझा में एकर पुरकस विरोध . . .व्यक्त करि . .. हुनका प’ दबाव देलखिन्ह .. .जे पङोसी के गमला के सीढी प’ सॅ हॅटवा दियौ. . ।भाय के कनि संकोच त’ अवस्से भेलैन्ह. . .मुदा अगियाबेताल अनुजक आग्रह ओ नहि ठुकरा सकलन्हि. . । गमला त’ बाहर छलै . ..हॅटि गेलए .. ... मुदा हिनक दरवज्जा सॅ सटले ओकर दरवज्जा जखन खुजै. . .आ’ मोटका सिकङी सॅ बान्हल बङका अलशेशियन कुकुर पूरा पूरा मुॅह खोलि जीभ निकालने .. . हॉफैत हॉफैत .. . . . . .नौकरक हाथ के डंटा के अछैत हुनका दिस ताकि लैक .. . त’ ओ’ जेना पैजामा में नदी . .लग्घी करबा लेल प्रस्तुत .. ..।मुदा भायक एत्ते औकात कत्त जे .. ओ ब््िरागेडियर साहबक घर सॅ कुकुर के सेहो हॅटबा दैथ. . ।ताहि लेल ओ हुनक नौकर सॅ निहोरा पाति करि क’ टाईम पूछि लैत छलाह ओकर बहराय के . .।ओहि टाईम के ओ बङ मुस्तैदी सॅ व्यवहार में आनए लगला ्र।. . .किछु भ’ जाए .. .चाहे .. दुनिया एम्हर सॅ ओंम्हर ..  ओहि समय ओ घर सॅ बाहरि पएर नहि निकालथि. . । टा्रंजीस्टरक बङ पे्रमी .. . ।प्रायः सबटा समाचार आदि सॅ अंत धरि सुनैथ ।अहिना एक दिन शीर्षासन करैत न्यूज सुनि रहल छला ..्र। भीषण गरमी के बङका भोर. . । . .भायजी बाथरूम सॅ दौङल अयला ‘बौआऽऽऽऽ .. .कि कहलकै. . राजीव गॉधी के बारे में .. ?’ .. . ‘भायजी अहिना कहैत छै . ..दू टा . .बच्चा छै .. पैलवार में त’ की कहतै. ?’शीर्षासन जारी छल .।भाय ठाढ । ‘अवस्स किछु भ’ गेलए अछि ताहि लेल कहि रहल छै. .।’बस तङाक दिन पएर जमीन प’ ।.. ‘खट द’ उठि बैसला .. ‘कनिए काल में न्यूज जग जाहिर भ’ गेल छल। समय अपन यात्रा जारी रखने छल . ..।बरख प’ बरक बीतैत चलल गेल . . .हिनकर कंपीटीशन कहियो समाप्त होमए के नामे नहि लै. . . . जाहि परीक्षा सबहक उमैर . ..वा चांस बचल छल. . तेकरे नांगङि पकङि लैथ. . . ।उम्हर गाम में लोकवेद पिताजी के बूझबैन्ह. . “बङ भेलए कंपीटीशन सब. . . . ढेर रास नौकरी सब छै .. .अप्पन सामर्थ देखि कत्तो धय’ लेताह. . . . .मायानगर में नौकरी के कोन कम्मी छै. . ।वा’ अहिं के एतेक लोक जनैत अछि . .. कत्तौ लगवा दियौ. . . ।आन धिया पुत्ता प’ धियान देब . . . . . ओकरो विवाह दान .. ।. मायानगर में रहि क’ कंपीटीशनक तैयारी करैत छै. लङका . . सुनबा में त’ मधुर लगै छै. ..मुदा कत्तए छै . ऋ.. .. भायक कपार प’ कतेक दिन एना बोझ रखबै. . . ओ कोन टाटा वा अंबानी अछि .. . ..।’पिताजी के तखन दिमाग खुजलैन्ह . . ।आ’ व्यर्थक उम्मीदक किला ढाहैत ओ’ किछु ठोस कदम उठबतैथ. . .कि अहि सॅ पहिने हुनक तेसर बालिग पुत्र बाजि उठला ‘पिताजी .. . हुनका गाम कथि लेल बजैबैन्ह. . . व्यर्थक बदनामी. . . .लोक वेद अहिना खिस्सा गढैत अछि. . .आ’ ओ अलगटेंट . .. कोन गप्प प’ उखङि जेता तेकर कोन ठेकान. . . ।पोरकें. . .गगन चचा के बङका बेटा के करेज प’ बैसि क’ ततेक मारि मारने रहथि जे ओकरा सप्ताह धरि हरदि चून लगबए पङलै. . ।चाची गरिया गरिया क’ टोल भरि के’ एकट्टा करि लेलन्हि. . ‘ई मोचंड . . .मारि दैत हमर बेटा के. ।’ आ’ ओहो छोटसन गप्प प’ ।ओ’ कहलकै ‘तंतूभाय आब जंतू सब सॅ ड’र नहि होबैत अछि ..? ’अहॉ कत्तो बाहर गेल रहि. . ।ताबैत मे छोटका बेटा सेहो बाजि उठला “हॅ ..पिताजी .. .छोटका पीसा के सेहो अहिठाम अहि चौकी प’ पटकने रहथीन्ह. . . ।ओहो फुसियाहिए गप्प प’ ।पीसा त’ सप्पत खा लेलथि .. .जे जौं ई एत्तय रहता त’ ओ घुईर क’ सासुर नहि औता .. ।अपन हॅसी केर बलजोरि रोकैत . . .आगॉ बाजैत गेल ‘ओय दिन पीसा के सोझॉ हुनका बिरनी काटि लेलकैन्ह .. . बाम ऑखि आ’ गाल फुलि क’ लालटरेस .। .. .आ’ फेर हुनके माथ लग उङै. . .त’ हॅसैत पीसा बजला ‘बिरनी कटलकौ .. .तूंबा फुलेलकौ. . .फेर गुम्हरै छौ तोरे प’ से किएक हौ।’ अहि प’ कनि पीत्ता क’ ओ बजला ‘हे हॅसू जुनि . .. हमर जनम ओहि नक्षत्र में भेल छै. ..जाहि में गॉधी जी के भेल छलैन्ह. ।’ ‘जुलुम गप्प. ..तखन त’ तोरो हत्या कैल जेत्तऽऽऽऽ।’ कत्तेक कहल जाए . .. ‘बङका कका के ओत्तए विवाह में कुटुम सब आयल छलैन्ह .. .त’ किछु लोक हिनका दरवज्जा प’ पढैत देखिक हिनका लग आबि बैसला . .. सब पढल लिखल . ..नौेकरीहारा .. .।गप्प करबा में त’ तंतू भाय सबके पछाङि दैत छथिन्ह . .. ।चीन प’ गप्प चललै .. त’ ई बङ जोश में आबिक टांग झूला झूला क’ बाजय लगला ‘चीन में देखियौ .. .कत्तेक विकास भ’ गेलए .. .सांस्कृतिक रिवोल्युशन. . . . ‘चलू गामक ओर’ .. .नारा सॅ ओकर गाम गाम एकटा शहरिक कान काटबा में माहिर भ’ गेलै. . .देखैत देखैत .. .ओ’ सुपर पावर .. . .माओत्से तुंग की नेता छलै. . ।’ ‘मुदा ओकर नेता सब बङ अत्याचार सेहो केलकै. . ।’ कोने कुटूम हिनक गप्प काटिक बाजल त’ ई पिनकि गेलखिन्ह .. ‘की जनैत छी अहॉ माओत्से .. के बारे में. . . खाली नाम सुनला टा सॅ नहि होइत छै . ..गहीङ में जा कए जानए पङै छै. . ।’ताबैत बङका कका के सार फुद्दी बाबू बाजि देलखिन्ह. . ‘हौ. . माओत्से तोहर माम छ’ जे ओकर हिनताई प’ एतेक पिनकै . .छ ।’ ‘ंमाम त’ अहॉक हेताह . ..।’गप्प गरमै लगलै. . कि हम तुरंते हुनका मॉ के बहाना करि आंगन पठा देने रहियै. . । उम्हर अगत्ती धिया पुत्ता सब अपन दलान प’ बैसि बुझौब्बल खेलाय. . ‘खिस्सा कहै . .खिसनी .. सुन भाय मॅकङा जी जान लगा क’ चारि टांग केकरा. . .।’ ‘तंतू भाय के’ . . सब एके बेर चिकरै .बुेझक्कङ फेर सॅ पूछै. . . ‘खिस्सा कहे .. . . . . . . जी जान छोङि क’ चारि टॉग केकरा. . ।’ ‘तंतुभायके।’ ‘अ‍ै रौ .. .जी जान छोङियो क’ आ जी जान लगाबियो क’ तंतुए भाए कोना .. ।’ त’ चट दनी जबाब भेंट जाए. . . ‘जखन ओ’ चौकी प’ सूति क’ शवासन करैत छथि. ..तखन जी जान छूटले रहै छैन्ह .. .आ’ चौकी के चारि टांग .. . ।आ’ जखन ओ दंङ बैसकी लगाबैत छथि .. .तखन दुनू हाथ आ’ पएर धरती प’ रोपने. . .भेलै नै जी जान लगा क’ चारि टांग . .।’आ’ तखन जे समवेत ठहक्का के स्वर गूजै. . .तखने किये बाजि उठै. .हे . .सुनता कत्तो सॅ तंतु भाय त’ खिहारि खिहारि क’ अधमर्रू करि देथुन ।’छोटका बेटा अपन कान सॅ सुनने छल ई सब । मॉ सेहो अहि गंभीर समस्या प’ .. . . .भोजन करबा काल . . .पिताजी के सोझॉ में बैस क’ .. . . .बाजल छलीह . .. ‘ओहू ठाम त’ ओकरा दिक्कते होईत छै. . . भौजाए सॅ पटिते नै छै. . ।छोट सन बरख दिनक भतीजी. . . .तेकर लत्ता के बिलङबा. . . ह्य.टैडी बियर हृ .. . .सॅ खेलाईत खेलाईत .. .तेना नै . ..जोर सॅ फेकलकै. . .जे नेना मूहें भरि खसलै. . .दुनू दुधी दॉत उखङि .. . खुनम खुन चारहु कात .. . .।हमहुॅ त’ ओहि ठाम छलियै पोरकॉ . .. .ओ’ ततेक डेराए छै आब ओकरा सॅ. . ओकरा देखिते मातर पलंग .. .कुरसी केदोग में नूका जाय छै. . ओ त’ भाए एहेन नीक छै. . जे बर्दाश्त करि लैत छै. .. . .एतय गाम में लोकवेद घटक मोङि दैत छै. . . आब त’ सब ईहो कहय लगलै .. .मोचंडक संग ओकरा भूत सेहो खिहारै छै. . ।कहनिहारक मूॅह में ऊक लागै .. ।’ अहि बतकही सॅ फराक पिताजी गहन चिन्तन मनन के बाद अपन ज्येष्ठ संतान सॅ टेलिफोन प’ वार्तालाप करि मायानगरक रूख धेलन्हि .। . . .अहि होनहार बिरवान के’ क़त्तो नौकरीक जोगाङ में कत्तेक लोकक दरवज्जा खटखटबए लगला .. . .. ।अहि बेर हुनका लोक सब छुच्छ आश्वासन द’ क’ टारि देलकैन्ह . . .।भाग्य तंतू बाबू के. . .कत्तो दालि गलबे नहि करै. . .जे पिताजै केक्कर कहॉ के नौकरी लगबा क’ अपन हाई कनेक्शनक परचम लहरौने छलाह .. .अहि बीर बालक में .असोथकित भ’ गेल छलाह .. । अहि बीच गरमी के तातिल में छोटकी बहिनक विवाह में सब गोटे गाम गेला. . . ।गामक राजनीति . . .दिन प’ दिन विचित्रे भेल चलल जा रहल छल .. . .भोरे भोर लछमन कका आंगन में आबि क’ मॉ के सुनबए लगलाह. . .. ‘पूबरिया बाङी के मालभोग आमक गाछ हमरा जमीन प’ अछि .. .से . ..एकरा कटबा दियौ .. ।’ पिताजी कत्तो बाहर गेल छलथि. . .।मॉ तंतू के कहलखिन्ह. . ‘बौआ रे . ..ई त’ अजगुत गप्प करै छथुन .. एतेक सिनेह सॅ तोहर पिताजी अहि मालभोगक बिरबा के कत्तए दन सॅ नै आनि क’ अपने हाथ सॅ. ..रोपने छलाह .. . .एकरा एहेन मधुर फल अहि परो पट्टा में त’ कोने गाछक नहि छै. .।मुदा ई त’ आब नब गप्प .. . . .हमर जमीन में .. .जखन की अहि आङि सॅ दू बङका डेग आगॉ धरि अपने जमीन अछि।तू अमीन के बजबा ले आ’ अपना सोझा में नापि करबा क’ अहू कलेस के ... . पॉच लोकक सोझा में जल्दी सॅ फरीछा ले. . नहि त’ जनिते छी दियादबादक कूकूर चालि. .मांझ काज तिहारक आंगन में अङंगा लगा देत. . ।’ तंतू तखन भारतीय इतिहासक किछु पन्ना रटैत चौकी प’ बैसल.. बङका पितङिया बाटी में . दूध .. .चूङा चीनी बङ प्रेम सॅ पलथा झूलबैत खा रहल छला . .।मॉ मनेसरा के अमीन ओतए दौङा देने छलैथ. . ।मुदा एखन त’ आधो घंटा नहि भेल छलैक ।ओ खेनाय समाप्त करि हाथ में कॉपी नेने .. .अकबरक नीति संबंधी किछु पाठ घोटैत बाङी अयला. . . लछमन कका ओहि ठा’ विचित्र सन मनः स्थिति में ठाढ छलैथ. .।अहि बेर ई गाछ लुधकि क’ फङल. . . .बङका. . बङका टा के आम .. . । ‘तंतू बाबू . .. ई गाछ त’ हमरे नमीन प’ छौ .. .देखहक .. . .अहि ठाम सॅ ओ जे गाछी सोझे सोझ भीखना के दरवज्जा लग देखाय पङै छै. . एत्त सॅ लक’ ओत्त धरि .. . ।’ओ अपन आंगुर सॅ देखबए लगला . .. मुदा तंतू के कनि हङबङी छलैन्ह . . ‘बेस कका अहॉ फुसि थोङबे कहबै. . ..।एना करू . ..जौं अहॉ के जमीन में गाछ अछि त’ पहिने एकरा काटिए दियौ. ..।’ कहबा के देर छलै .. . . ..कोदारि हाथे में .. .लछमन कका तङातङि बङका मोटका गाछ के घ्ांटा. भरि लागि क’ जङ मूल फङ समेत . .. असहाय अवस्था में अनाथ सन. . . धरती प’ खसा देलखिन . .।ताधरि अमीन सेहो आबि गेल .. . . जमीन नपलक .. .त’ गाछ. .तंतूए के जमीन में आ’ दू डेग आगॉ धरि हुनके जमीन .. ।’ मॉ बाङी जाकए देखली . .. .हुनकर त’ माथे घुमि गेलन्हि. . ।कनि बेरक बाद तेना बियाकुल भ’ क’ करूण स्वर में क्रंदन करए लगली .. .जे लग पासक कतेक लोक जमा भ’ गेलए .. ।तीन दिन धरि मुॅह में पानिक एक ब्ूॉन नहि लेलथि .. . . .नै मुॅह सॅ एक आखर बहरेलैन्ह. . ।मुदा ऑखि अपन नोर बहा क’ मोनक उद्वेग के हल्लुक करैत रहलै. . । तंतू बाबू सॅ लोकवेद बङ सिनेह सॅ गप्प करै. . ।पिताजी सेहो हुनका परोछ में बाजैथ. . ‘हौ . .मुरूखक लाठी बीच्चे कपार. . ।कखन कोन नोकसान करि देत के जनैत अछि . .।आब जे छै . .से त’ भोगबा के छै । उम्हर बरियाती में बरक पिता के पाकल पाकल दाढी देखैत मातर. . ओ’ पंडाल छोङि लत्ते पत्ते पङेला .. . ।पिताजी पीत्ते आन्हर .. . ‘बरियाती के सुआगत करबा लेल कोन काबिलती के काज़ . . अहि काजक लेल त’ कोनो . ..कोचिंग के आवश्यकता नहि. . ।’ मुदा एकर परवाह नै करैत ओ’ अपन छोट भाय सॅ बजला. . ‘पिताजी के बूझेनाय हमरा बूता के बाहरक चीज़ . . .ओहि बूढबा.. के दाढी आ’ लाल टरेस ऑखि हमरा फेर सॅ खिहरनाय सुरू करि ग्ोलक़ . .आ’ हमरा प’ की बीतैत अछि . . .हमहीं जनैत छी. . ।’अनुज हुनका शांत करिक’ भरारक डयुटि संभारय लेल कहि अपने बरियातिक सुआगत में चलि गेल छला. . । भरार घर में राखल छोटका मचिया प’ बैसि आगॉ एक गोट स्टूल प’ अपन किताबक पन्ना खोलने .. .किछु रटबा में लागल छलाह .. . आ’ कागदक एक गोट प्लेट में . .किछु लडडु . ..पैनतोवा रखने खाईत सेहो छलाह . ..कि तखने रोशनदान दिस हुनक नजरि गेलन्हि .. ।लाल लाल बङका बङका ऑखि . .पाकल पाकल दाढी .. . अांगुर सॅ किछु ईसारा करैत. .. ।ठाकुरजी कोल्ड ड्रिंक्स के बोतल लेबए एलथि. . . त’ देखैत छथि .. . तंतू भाय .. . लडू के चंगेरा प’ ओंघराएल पङल छथि . .. ।सोर पाङलखिन्ह ‘तंतू भाए. . .औ’ तंतू भाय’. . .मुदा किछु कत्तो नै. . ।ओ घबङेलाह .. .आन सारसबके बजौला .. ‘तंतू भायके दॉति लागल छैन्ह .. .।’ भरि पॉज उठा पुठा क’ . .चारि चारि गोटा मिल क’ हुनका दोसर कोठरी में आनि पलंग प’ सुतौलन्हि . .।कनि प्रयासक पश्चात हुनक मुरछा टूटलैन्ह .. . पानि पीबी . .स्वस्थ भेला. . .।उम्हर दलान प’ बरियाती . ।. .एक गोटे के छोङि सब कियो दलान प’ भागल. . । कनि काल में तंतू बाबू उठि पुठि क’ बैसैत बजलाह. . ‘भरारक रौशन दान सॅ झॅकैत ओ पाकल पाकल दाढी वला बुढबा. . . ।’ठाकुरजी दौगला .. . भरारक रौशनदान सॅ कनि सटल. . . पङोसिया के खपरैल प’ कारी बिलाङि सूतल . . ।आब ई कोन काजक जोगर. . . कनि बिलमि क’ ठाकुर जी हुनक छुच्छ स्वाभिमानक रच्छा करैत कहलखिन्ह. . ‘भायजी अहॉ पढबे करू. . . भरार हमीं संभारि लैत छियै. . । ंमायक कबूला रहैन्ह. . बरहम स्थान में घोङा चढेबाक़ . .तंतूके हाथे. . . .।आ’ अहि कन्यादानक सेहो. ..। .जेठक धूप. . . सकाले जा कए बरम थान सॅ आपस भ’ जैब नै त’ बङका टहटहौआ रौद पकङा जैत. . .हालाकि एखन सातो नहि बाजल छलै. . मुदा सुरूज महराज अपन ढिठाई देखबए लगला जे हिनका सॅ पंगा नेनाए नीक नहि .. .यथाशीघ्र प्रस्थान करबा चाही. . । . ।त’ तंतू बाबू बाजा गाजा .. ठोल पिपही के संग गामक टेढ मेढ कच्ची रस्ता सॅ हाथ में घोङा नेने बढल चलल जाईत छलाह. . ।माय पितियानि .. मौसी पिसी .. .बहिन भौजाय .. .आहे माहे स्त्रीगण सब पाछॉ सॅ गीत गाबैत चलल आबि रहल छलाह. . .। एतबै में तंतू के हाथक घोङा सक्रिय होईत हुनका तेहेन कसि क’ दुलत्ति मारलकैन्ह . .कि ओ त’ सीधे जोतलाहा खेत में उनटल . . . ।संगक छौङा सब दौगल. . . ।माय पितियानि गीत गबैत लग अयली त’देखैत छथि जे पिपही ढोलबाला त’ आगॉ बढल चलल जा रहल छै. . मुदा धिया पुत्ता ओहि खेत में . . झूंड बनौने की क’ रहल छै .. .ऋ। तंतू कत्तो देखाए नहि पङि रहल छला. . ।मायक माथ ठनकलैन्ह . .. ओहो एकपेङिया सॅ नीचा उतरलिह. . . देखैत छथि . . .तंतू आ’ हुनक घोङा दूनू दू ठाम खसल. . .।तामसे त’ माहुर भ’ गेली. .मुदा क्रोध के’ पिबैत बजली. ‘रे अनमोल. . .तू घोङा उठा ले. . आ’ तंतू .. .चल झटकि क’ बेर बीतल जाए छै . . .आंगन में सेहो पूजा छै. . ।’ घर आबिक मायक कोढ फाटि गेलन्हि. . ‘आब त’ तंतुआ के माटियो के घोङा पटैक दैत छै. .कि विपत्ति छै . .किजाने. गेलियै. . . ।हुनका लेल ओ’ कोन व्रत उपास नै करै छलीह .. । तंतू के अहि बेर मायानगर जयबा काल माय बिलखि क’ अपन बङका होसियार पूत के कहलखिन्ह ‘तू ही देखही .. . हमरा त’ एकर लच्छन कोनो नी क नहि लगैत अछि. .कोनो नोकरी लगबा दही. . .सतमा अठमा पास लङकी सॅ. . गरीबक बेटी सॅ .. विवाह दान करा दही जे एकर घर बसा दैक़ . ।’ मुदा बङका बेटा हिम्मत नै हारलैन्ह .. ‘मॉ अहॉ निफिकिर रहूॅ . .सब नीक करथिन्ह भोलेनाथ . .।’  भायक एक गोट संगी जे हुनका बारहो बरीख सॅ जानि आ’ देख रहल छल. . .आ’ हुनक बौधिक क्षमता के संग .. .शारीरिक शक्ति के नापि तौल रहल छल . ..बङ सोचि बिचारि क’ गप्प के घुमबैत फिरबैत . . .जाहि सॅ हुनका खराप सेहो नहि लागैन्ह . . .आ’ बेचारा के जिनगी सेहो बनि जाए .. . सलाह देलकैन्ह. . ‘एकबेर हिनका बालाजी ल’ क’ जईयो राजस्थान में .. ।जौं किछु उपरि चक्कर हेतए त’ सेहो दूर भ’ जेतै. . ।’ अप्पन आफिस सॅ छुट्टी लईत भाय राता राती गाङी प’ हुनका बैसा क’ बालाजी के लेल प्रस्थान केलथि .. ।मई मासक ओ’ टहटहौआ .. रौद . . .चारो कात जेना आगि बरैस रहल छल. . .।मुदा भाय त’ अपन अहि भा एक लेल हिमालयक बरफ प’ सेहो बिशटी पहिर एक टंगा द’ तप करय लेल तैयार छला . . .त’ ई फौर्टी एट डिग्री तापमान की छल .. । आ’ आश्चर्य . . . .. . ओहि सीझैत गरमी में. . ओहि बङका गाछक चब्ूातराके नीचा . . ..लोबान अगर बत्ती के मॅहक सूॅघैत मातर . .. थरथर कॉपैत तंतू . . .अपन दूनू ऑखि सॅ दहो बहो नोर बहबैत  बाजए लगलाह “ हम त’ पिछला दू सौ बरीख सॅ अतृप्त अहि अखिल ब्रंहांड में भटकि रहल छी. .।अपन किछु आरोपित सिद्वांत प’ लोकवेद संगे हमरो संशय छल . .. ताहि लेल हम गाम गाम गली गली भटकैत ओहि सिद्वांत के परम सत्य के कसौटी प’ कसबा लेल बिलखि रहल छलहूॅ . . .कि . .कओलेजक पछौति में आमक गाछ प’ चढि क’ पोथी पढैत ई देखाए पङल. .।दोसरा दिन अपन बुशट के ऊपर पैजामा के बन्हने. . .एक बीत्त डोरी आगॉ में लटकल .. .संघतिया सबहक मखौलक परवाह नै करैत . .. जाहि आत्म विश्वास सॅ ई अपन कओलेज सॅ चलल आबि रहल छल कि हमर गॅहकी नजरि एकरा प’ पङल. . .।हमरा लागल छल . ..हमर ‘सबजेक्ट’ हमरा सोझॉ ठाढ . .एकर क्रिया कलाप .. एकर व्यवहार .. .गप्प .. शप्प .. . सबटा हमरा आदि मानव के मोन पाङैत रहल .।कतेक साल धरि . .. असंख्य . ..जीव जंतु सब प’ अनुसंधान करैत अहि निचोङ प’ पहुॅचल छलहुॅ .. .कि मनुक्ख . .. .बानरक विकसित रूप अछि .. .।मुदा अहि मनुक्ख के देखि हमरा आश्चर्य भेल . .कि मनुक्ख एखनो बानर अछि. . . वा . ..बानर मन्ुक्ख बनि क’ बूलि टहलि रहल अछि. . । हम अप्पन शंका के समाधानक वास्ते एकरा पाछॉ लागि एकर पैजामा उतारि क’ ई देखबा के प्रयास में छलहुॅ .. कि एकरा पोंछ छै. . .वा नहि .. . . ।आब .. . .जौं पोंछ नहियो हेतय .. . तैयो ई बिसवास भ’ गेल जे ई बानरे थीक .. .पोंछ विहिन बानर .. . ।हमर आत्मा जुङा गेल. . . परितृप्त भेल .. . ।हम एकरा स्वीकार करैत छी . .जे बानरक विकसित रूप मनुक्ख .. .नहिं .. .परंच .. .मनुक्ख आ’ बानरक आदि पुरूख कियो एके गोट छल होयत .. ।आब हमर भटकाव समाप्त भेल . . . लिअ .. . हम अप्पन ठाम चललहूॅ .. . ।’ तेकरा बाद तंतू त’ तंतुए रहला .. . मुदा फेर कोनो जंतु हुनका प’ कोनो उपद्रव नहिं केलकैन्ह. . . ।  . ३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह मणिपद्मक कथा–यात्रा स्वाधीनता–संग्राम विकट–प्रत्युहक पश्चात् देश जखन स्वतंत्र भेल तखन भारतीय शासन–व्यवस्था भेला पर आधुनिक भारतीय भाषामे साहित्य–सृजनक एक प्रबल ज्वार आयल परिणाम भेलैक जे साहित्य–सरितामे एक नव–स्पन्दनक संचार भेलैक आ प्रत्येक सृजक अपन–अपन साहित्यक विकासार्थ अभूत पूर्वगतिएँ साहित्य–सृजन दिस उन्मुख भेलाह तथा प्रत्येक विधामे अत्युच्य कोटिक साहित्य–सृजनक अभूतपूर्व परम्परा उद्भूत भेल। एहि दिशामे मैथिली–साहित्य पछु आयल नहि रहल; प्रत्युत निर्वाध गतिएँ साहित्य–सृजनक परम्पराक शुभारम्भ भेलैक जकर प्रकाशनक श्रेय समकालीन पत्रिकादिकेँ छैक जे नव–नव प्रतिभा सम्पन्न साहित्य सृजनिहारकेँ साहित्य–साधना दिस उन्मुखक कए प्रोत्साहित करब प्रारम्भ कयलक। एकरे प्रतिफल थिक जे स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली–साहित्यक सर्वांगीन विकास भेल तथा प्रत्येक विद्यादिमे नव–रूपें साहित्य–सृजनक परम्पराक श्री गणेश भेल। स्वाधीनोत्तर कालमे मैथिली गद्यक विकासमे वैदेही (1950), मिथिला दर्शन (1953) तथा मिथिला मिहिर (1960) अन्य पत्रिकादिक अपेक्षा दीर्घजीवी भेल साहित्य–सरिताक प्रवहमान वेगवती धारामे अवरोध नहि होमय देलक। मैथिली कथा साहित्यकेँ प्रोढ़, प्राणवंत, समुन्नत आ समृद्धशाली बनयबाक दिशामे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पुनर्प्रकाशन निश्चये मीलक पाथर प्रमाणित भेल जे सहस्त्राधिक कथाकारक एक वर्ग तैयार कयलक जनिक कथा एहि लब्ध–प्रतिष्ठ पत्रिकामे अनवरत प्रकाशित होइत रहल जकर श्रेय आ प्रेय छनि एकर विद्वत वरेण्य साहित्य चिंतक आ सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920–1990)केँ जे प्राचीन एवं अवाचीन कथाकारक अद्भुत समंवय कयलनि। एहि विषयकेँ ध्यानमे राखि एकर प्रत्येक अंकमे कम सँ कम दुइ आ अधिक सँ अधिक चारि कथाक समावेश कयलनि। एकर अतिरिक्त समसामयिक पृष्ठभूमिमे मिथिलांचलमे प्रचलित व्रत–त्योहारक कथा सेहो समय–समयपर प्रकाशित होइत रहल। मिथिला मिहिरक नव वर्षक प्रवेशांक कथा–अंकक रूपमे नियमित रूपेँ बहराइत रहल जे एकर साक्षी थिक मैथिली कथा–साहित्य अपन प्रौढ़ताकेँ प्राप्त कयलक। कारण मैथिली कथा–साहित्यक सर्वाधिक सशक्त ओ सम्पन्न विधा कथा ओ कविता थिक। निश्चयतः एहि कथानक सत्यताक अपलाप नहि कयल जा सकैत अछि। किंतु एहि स्थितिक संग–संग इहो विचारणीय विषय थिक जे कोन एहन तत्व सभ विशेषतया कथाकार लोकनिक मध्य काज कयलकनि जे अपनाकेँ स्थापित करबाक हेतु कठिन साहित्य–साधना कयलनि तथा निरंतर हुनक कथा धारा प्रवाहित होइत रहलनि, कारण कथा गद्य–साहित्यक विशिष्ट विधा थिक जकर प्रतिरूप मैथिली–कथामे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइत अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे डा. व्रजकिशोर वर्मा मरिपद्म (1918–1986) एक एहन प्रतिभा सम्पन्न कथाकार उद्भूत भेलाह जे एहि विधामे अपन अक्षय कथा कृतिक कारणेँ एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे निश्चये मैथिली–साहित्येतिहासमे एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक। क्वालिटी आ क्वानटिटीक दृष्टिसँ विश्लेषन कयल जाए तँ हिनक कथा–यात्रा अनंत छनि। ओ जाहि विपुल परिमाणमे मैथिली कथा–भण्डारकेँ भरलनि जे अन्यान्य कथाकार लोकनिक द्वारा सम्भव नहि भऽ सकल, किंतु एतय एक प्रश्न वाचक चिह्न अछि जे विपुल परिमाणमे कथा–रचना कयलो पर ई साहित्येतिहासमे सर्वथा उपेक्षिते रहि गेलाह। मैथिलीक वरिष्ठ इतिहासकार डा. जयकांत मिश्र (1922–2009) हुनक कथा–यात्राक प्रसंगमे A History Of Maithili Literature (Sahitya Academy New Delhi 1976) तथा मैथिली साहित्यक इतिहास (साहित्य अकादेमी नई दिल्ली 1988)मे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि, ने जानि किएक? साधारण पाठक तँ इएह अनुमान करत जे ओ मरिपद्मक कथादिसँ सर्वथा अनभिज्ञ वा अपरिचित छथि, वा जानकारीक अभाव छनि वा जानि बूझिक उपेक्षा कयलनि। राधाकृष्ण चौधरी (1924–1984) A Survey Of Maithili Literature (शांति निवास, बमपास टाउन, देवघर, झारखण्ड, 1976) मैथिलीक विस्तृत चर्चा करैत हुनक दुइ कथाक विशेष उल्लेख कयलनि अछि, Manipadm’s Purishaka Mula (Value Of Man) and Kona Elini (What brought you) (Page 247–248)| चेतना समिति पटना द्वारा आयोजित भारती–मण्डन–व्याख्यान मालाक अंतर्गत डा. जयधारी सिंह (1929–2000) मैथिली कथाक विश्लेषण करबाक क्रममे कथाकार लोकनिक उपलब्धिक मूल्याकंन करबाक अपेक्षा कथा संग्रह सभक परिचय दऽ कए ओहिमे संग्रहीत कथा कारक जे परिचय देलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे अप्रासंगिक प्रतीत होइत अछि। एहि क्रममे ओ परिपद्मक साहित्यकारक दिन (संचयिता), शाश्वत ऑल इण्डिया रेडियो (अभिव्यञ्जना), प्रतिद्वन्द्विता (पल्लव) एवं दक्षिणा (मिथिला मिहिर) कथाक उल्लेख कयलनि (मैथिली साहित्यक रूप–रेखा पृष्ठ 89–103)। मैथिली साहित्यक इतिहास (भारती पुस्तक केन्द्र दरभंगा 1991)मे डा. दुर्गानाथ झा श्रीश (1929–2000) मैथिली गद्य साहित्यक विश्लेषणक अंतर्गत आधुनिक गल्प–साहित्यक अंतर्गत नकटाक शिकार (वैदेही), पट्टीदार (वैदेही), एवं संयोग (वैदेही) मात्र कथाक उल्लेख कयलनि आ हुनक कथाक प्रसंगमे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि (381–382)। डा. दिनेश कुमार झा (1941–2002) मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना 1979)मे मैथिली कथाक प्रवृत्ति मूलक विश्लेषण करबाक क्रममे हुनक मात्र दुइ यथार्थवादी कथा शोणितक स्वाद (मिथिला मिहिर) एवं दछिना (मिथिला मिहिर)क उल्लेख कयलनि, किंतु हुनक कथा–धाराक वा प्रवृत्तिक कोनो विश्लेषण नहि कयलनि जे हास्यास्पद प्रतीत होइछ। हाल चाल (1986)क मरिपद्म–श्रद्धाञ्जिल अंकमे मात्र पैंतीस कथाक शीर्षक चर्चा कयल गेल अछि जे उपहास्पद थिक। साहित्य–अकादेमी आ चेतना समिति पटनाक तत्वाधानमे मैथिली गद्यक विकास (1994) पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठीमे मोहन भारद्वाज (1943) मैथिली कथा गद्यपर अपन आलेख प्रस्तुत कयलनि, किंतु मरिपद्मक सदृश सशक्त गद्यकारक गद्यक प्रसंगमे ओ विचार करब अनावश्यक बुझलनि जखन कि हुनक गद्य अत्यंत सशक्त ओ प्राणवंत अछि जकर यथार्थताक अवबोध पाठककेँ हुनक कथाक अनुशील नहिसँ पाठककेँ होयतनि। डा. मिघन प्रसाद (1961), मैथिली कथा कोश (1996)मे मरिपद्मक एक सय आठ कथाक शीर्षक वद्ध उल्लेख कयलनि जाहिमे सँ मुनरीक मोल (1964) कथा नहि; प्रत्युत एकांकी थिक जकरा हम अनमिल आखर (कर्ण गोष्ठी कोलकता 2000)मे संकलित कयल अछि। ओहिमे सँ तीन कथाकेँ अर्चित मानलनि अछि। (कथा कोश पृष्ठ-......), किंतु हमरा जनैत हुनक कथाकेँ मर्मकेँ आत्मसात करबाक दिशामे ओ सचेष्टता नहि देखौलनि तेँ एहन निष्कर्ष बहार कयलनि। डा. प्रसाद बहुचर्चित, चर्चित तथा अर्चित कथा क्रम जे एहन निर्धारण कयलनि अछि ताहिसँ हम असहमत छी, कारण कोन आलोचक प्रत्येक कथाकारक कथा–कृति धरि सीमित रहि जाइत छथि। किंतु जाहि समीक्षककेँ उपयुक्त अवसर भेटैत छनि तँ ओ समग्र कथा–कृतिक प्रत्येक पक्षसँ परिचित भऽ कए वास्तविक समीक्षा करबाक प्रयास करैत छथि। अवलोकन (1995)मे डा. अरूण कुमार कर्ण (1961) मरिपद्मक कथा–संसार शीर्षकसँ एक समालोचनात्मक आलेख अछि जाहिमे हुनक सम्पूर्ण कथा–कृतिक विश्लेषण नहि कऽ कए मात्र वैदेही ओ मिथिला मिहिरक जे कथादि हुनका उपलब्ध भेलनि, ओहि आधार पर हुनक आलेख केन्द्रित अछि। डा. कर्ण सेहो मुनरीक मोल (1964)केँ कथा कहलनि जे नितांत भ्रामक आ अशुद्ध थिक। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे आब आवश्यक भऽ जाइत अछि जे डा. व्रज किशोर वर्मा परिपद्मक कतेक कथा कृति अद्यापि मैथिलीक विभिन्न पत्र–पत्रिकादिमे आ कथा–संग्रहादिमे प्रकाशित अछि तकर यथार्थतासँ जनमानस पाठक परिचित भऽ जाथि। मैथिली कथा–द्वारपर मरिपद्म दस्तक देलनि बीसम शताब्दीक षष्ठ दशक आरम्भिक कालमे, जाहि हुनक लेखकक एक दिन (1950), जामवंत चारी (1952), धरतीक हाक (1953), नकटाक शिकार (1954), पट्टीदार (1954), संयोग (1955), ओ दिन आ ओह दिन (1957), दुनू छोर (1959), भट्ठापरक पीपर (1960), ओइ लेखक दुआरे (1960), क्षण आ मन (1961), तऽरमे एक्के (1962) एवं मिस फिट (1969) कुल तेरह कथा प्रकाशित अछि। दरभंगासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरमे हुनक इजोतदाइ (1951), जोगबा मिसर (1951) बाल गोविन्द (1953), सुमरिन महालन (1953) एवं राजकुमारी चैननक रोमांस (1953) कुल पाँच कथा पाठक सम्मुख आयल। किंतु हुनक कथा–यात्राक शिल्प विकसित भेल तखन, जखन पटनासँ ओकर पुनर्पकाशन प्रारंभ भेलैक जाहिमे साधनाक मोह (1960), सफलताक छड़पान (1960), युधिष्ठिक पत्नी (1961), माइक संस्कृति (1961), हमर अष्टग्रह (1962), विसरल नहि जाइत छैक (1962), मरूधारा (1962), बहिनिक दुलार (1963), मुक्ति दिवस (1965), ओ विश्व विद्यालय (1965), आकृतिक ओहि पार (1965), दछिना (1966), उजरा बीछ (1967), लेखा–जोखा (1968), शोणितक स्वाद (1968), करोरिया मुँह (1969), खण्डित – साधना (1970), एकटा लौंग मार्च (1971), केँ? (1971), झिंगुर टेल (1972), सरोकारी (1972), लवहरि कुशहरि (1973), दोस्ती (1973), तेसर प्रेत (1974), स्वगता (1975), एकटा खुटेसल बकरी (1976), सोनहुला कनतोड़ (1976), श्मशानसँ घुरलापर (1976), प्रतिशोध (1976), सर्पसागर आ सुन्दरी (1976), हीरो गिरगिट (1977), हुनका नहि कहबनि (1977), खोजक भेंट (1978), चमचा (1978), एयर होस्टेज (1978), बस स्टैण्डपर (1979), चाहवाला छौड़ा (1979), जहीहा (1980), अद्वैत (1982), समाद (1982), क्षतिपूर्ति (1982), बसक बात (1983), एवं दानी दार (1984) कुल पचास प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सहयोगसँ बङ्ग भूमिक महानगर कोलकातासँ प्रकाशित पत्रिकादिमे, मिथिला दर्शन (1953), कथीले (1955), लुतुक (1955), पोखरि खोर (1955), दुपरिया रातिक शिकार (1956), केशकरक इशारा (1957), बीसक ढ़ोलकिया (1958), प्रवासी एलाह (1960), मौनव्यथा (1960), हाफे हाफ (1960), कोव्रागर्लक खोजमे (1964), अदला – बदली (1973), एवं एकटा जरैल मोमबत्ती (1977) मैथिली प्रकाशमे एकटा फाजिल पोस्ट कार्ड (1976–77), आखरमे चिंतामरित (1968) तथा मैथिली दर्शनमे खंजरी लै कै (1976) एक–एक कथा प्रकाशित अछि। धीया पूतामे बिलाइक डायरी (1960), अभिव्यञ्जनामे तीन शाश्वत ऑल इण्डिया (1960), ओइ राति (1962), एवं बुझले छल, निर्माणमे तीन रखबाक आ भरिया (1954), जौं लोक चढ़ैत होइ (1955) एवं रौंग साइड (1955), पल्लवमे तीन घरमुँहा (1957), नीमाक तीन युग (1957) एवं प्रतिद्वन्द्विता (1958), अभियानमे एक तुलिका लऽ कऽ (1963), आहूतिमे सरिसवक सागर (1976), कथा दिशामे एक एकपहिया ट्रेक्टर आ दोसर (1980) देस कोसमे अहैत (1981), माटि पानि आधुनिकीकरण (1984) तथा स्मारिका (धनबाद)मे एक हुनका खोजमे प्रकाशित अछि। मरिपद्मक किछु कथा एहनो उपलब्ध होइत अछि जे नवीन पुस्तक प्रकाशनोपलक्षमे साहित्यकारक दिन (1953) टटका गप्पमे ओ दुनू (1964), गल्प–सुधामे क्रिमनल (1964), गल्प गुच्छमे नैका बनिजारा (1979), मैथिली ललित गद्यमे यात्रा (1973) तथा साहित्य–सौरभमे महाप्राण सलहेस (1987), अतएव ओकर प्रकाशन तिथि पुस्तक प्रकाशन तिथि मानव उचित हैत। केवल ओ दुनू कथाक पश्चात् जा कऽ मैथिली अकादमी पत्रिका (जनवरी–दिसम्बर 1985)क अंकमे प्रकाशित भेल। मैथिली प्राचीन ओ अर्वाचीन पत्रिकादिक अनुसंधान कऽ कए हमरा दृस्टिएँ कुल एक सएसँ बेसी कथा प्रकाशित अछि। हमरा अनुसंधानक क्रममे चारि कथाक सूचना आर भेटल अछि ओ थिक वैदेहीमे एक जामवंत चाही (1952), मिथिला दर्शनमे दू मिल औरो दिऔ (1959) तथा राधाकृष्ण चौधरी दू कथाक पुरूषक मोल एवं कोना अयलनिक चर्चा कयल;अनि अछि जे अनुसंधेय थिक। एहू सम्भावनाकेँ नहि अस्वीकारक जा सकैछ जे हिनक आर कथादि विभिन्न पत्रिकादिमे प्रकाशित हो जाहि दिस अद्यापि अनिसंधाता लोकनिक नजरि नहि गेलनि अछि। अद्वैत शीर्षकसँ सेहो मरिपद्म दुइ कथाक रचना कयलनि जकर उल्लेख भेटैत अछि। एक देस कोस नवम्बर 1981 तथा दोसर मिथिला मिहिर 3 जनवरी 1982क अंकमे प्रकाशित अछि आ दुनू कथाक भाव भूमि सर्वथा पृथक–पृथक अछि। किंतु कथा कोशकार मिथिला मिहिरमे प्रकाशित कथाकेँ अनुसंधान एवं कथानु क्रमणिकामे उद्वैत कहलनि अछि। ओ अपन सूक्ष्म दृष्टिक उपयोग करबामे अन्यमनस्कता देखौलनि अछि, कारण अद्वैत एवं उद्वैतमे हुनका कोनो अंतर नहि बुझना गेलनि। पाठकक एहि भ्रम दूर करबाक उद्देश्यसँ प्रस्तुत संग्रहमे हम दुनू कथाकेँ समाविष्ट कयल अछि। मरिपद्मक मसिजीवी साहित्यकार रहथि जनिक साहित्य–साधनाक अविरल धारा सतत कल–कल करैत साहित्य–सरितामे प्रवाहित होइत रहलजे मैथिलीक विभिन्न पत्रिकादिक अनुशीलनसँ स्पष्ट अछि। हुनक साहित्य–साधना निर्वाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहलनि तथा ओ जीवनक अंतिम क्षण धरि साहित्य–साधनामे तल्लीन रहलाह जकर साक्षी थिक हुनक अक्षय–साहित्य–भण्डार। मरिपद्म कथा–साहित्यमे प्रवेश कयलनि वैदेहीक माध्यमे, किंतु बिस्तर भेटलनि मिथिला मिहिरमे तथा कथा–जगतमे चिन्हस गेलाह बाल गोविन्द (1953) कथा लऽ कए जे हिनका अविस्मरणीय कथाकार बनादेलक। हुनक कथा परिधिक व्यापकताक अनुमान तँ एहीसँ लगाओल जा सकैछ जे हुनक समसामयिक कोनो एहन पत्रिकादि नहि अछि जाहिमे हुनक कथा नहि प्रकाशित भेल हो। मरिपद्म माने प्रवाह। मानवीय भावनाक प्रवाह। भाषण ओ लेखनमे प्रवाह। यथार्थताक नाम पर कलाक नाम पर ओ मानवीय भावनाकेँ थकुचि देबाक प्रबल विरोधी रहथि। कथा कहबाक शिल्पमे केवल संदेश देनिहार रहथि जे मानवीयताक हत्या नहि हो। समाजक हर व्यक्ति स्वर हिनक कथादिमे गुंजित होइत अछि चाहे ओ सामाजिक हो वा असामाजिक। सामाजिक यथार्थक मार्मिक मूल्याकंन हिनक कथा साहित्यक वैशिष्टय अछि। उपन्यास एवं कविता सदृश हिनक कथादिमे भावुकताक प्रभुसत्ता भेटैत अछि। एहि सभमे भोगल यथार्थ जीवनक विसंगति, जटिलता, कुण्ठा–संत्रास तथा यथार्थ जीवनक विविध आयामकेँ ओ अभिव्यक्त कयलनि। कविताक समानहि ओ गद्यमे उपमा–उपमानक झड़ी लगा देलनि अछि। आधुनिकताक परिवेशमे परिवर्तित होइत सामाजिक पृष्ठभूमिक यथार्थताक मूल्याकंन हिनक कथाक मर्मज्ञताक अछि। लोक–प्रचलित सहज–संवेद्य, बोध गम्य, सरल, सुकुमार शब्दावली जे मैथिलीमे विलुप्त भेल जा रहल छल ओहि सभक दस्तावेज थिक हिनक कथा जगत, जाहिमे प्रचुर परिमाणमे ओ ओकर प्रयोग भेल अछि। मरिपद्म कथा–धारामे एक–सँ एक महत्वपूर्ण हिलकोर अनलनि तथा जीवनक महत्वपूर्ण सूक्ष्माति सूक्ष्म धड़कन, शाश्वत एवं सम्प्रतिक समस्याक जीवंत चित्र प्रस्तुत कयलनि। हिनक कथा–साहित्यक वैशिष्टय थिक जे भाषा–शैलीमे रोचकता, गम्भीर दृष्टिकोणमे व्यापकता, धारावाहिकता–भावुकता प्रभुसत्ता, महत्वपूर्ण उद्देश्य हुनक कथामे सर्वत्र उपलब्ध होइत अछि। हिनक कथामे प्रभावोत्मादकता, कल्पनाक प्रौढ़ता, प्रकृति वर्णनक सश्रीकता, कथानक–क्षेत्रक विशालता, विश्वव्यापी अनुभूतिक उद्घाटन तथा पात्रक अंतः स्तलमे प्रवेश करबाक अद्भुत क्षमता अछि। कथा तत्वकेँ सुरक्षित रखैत चरित्रक सूक्ष्मता, वातावरण ओ परिस्थितिक निर्माण कऽ कए उत्कर्ष–विधान हिनक कथाक मार्मिकता अछि। हिनक कथाक दृष्टि ओ दृष्टिओ दृष्टिमे भिन्नतासँ भरल अछि। कथोमे अद्युनातन प्रवृत्तिक रचना आ रचनाकारक खबरि ओ रखैत छलाह चाहे ओ रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861–1941), की जार्ज बनार्ड शाँ (1856–1950) अथवा टी.एस.इलिएट (1888–1964)। हिनक कथामे सामाजिक ओ वैयक्तिक दुनू पक्षक सम्यक रूपसँ चित्रित भेल अछि। ओ कथामे देश एवं अंचलक समस्या पर अपन विचार निर्भीकताक संग प्रस्तुत कयलनि। मरिपद्मक कथा–गद्यक सूक्ष्म रूपेँ विश्लेषण कयल जाय तँ कतिपय आलोचनात्मक कृतिक सम्भावना दृष्टिगत भऽ रहल अछि। मैथिली कथा साहित्यपर पर्याप्त मात्रामे आलोचनात्मक कृतिक अद्यापि अभावे अछि। मरिपद्मक विशाल कथा–यात्राक परिधि अछि। ई जाहि परिमाण अमे कथा लिखलनि ओहि परिमाणमे अद्यापि मैथिलीमे कोनो कथाकार कथा–रचना नहि कऽ पौलनि। हिनक सम्पूर्ण कथा–यात्रा केँ एकहि संग प्रकाशित करब दुःसाध्य ओ असम्भव थिक, कारण समग्र कथा एक विशाल ग्रंथक आकार लऽ लेत जकर सम्भावना मैथिलीमे नहि दृष्टिगत होइत अछि जे क्यो प्रकाशक एहन विशाल–काय कथा–संग्रह प्रकाशित कऽ पौलाह। मैथिलीक हेतु दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति अछि जे हुनक जीवन–कालमे कोनो कथा–संग्रह नहि प्रकाशित भऽ सकल। एहन साहित्य–मनीषीक साहित्य–साधनाक एहिसँ पैघ पुरस्कार आन किछु नहि भऽ सकैछ जनिक स्मृति पटल पर मरिपद्मक साहित्य अद्यापि आच्छादित कयने अछि। पुस्तकाकार रूपमें हुनक कथा–कृतिक प्रकाशनो परांत हुनक कथा जनित प्रतिभाक वास्तविकताक यथार्थताक मूल्यांकनक सम्भावना अछि। ४.रामलोचन ठाकुर समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा आयू प्राय: समस्‍त समीक्षक- समालोचक लोकनि कहैत छथि, आ ऐ उचिते कहैत छथि, जे समकालीन मैथिली कथा-भारतक जे कोनो भाषाक समकालीन कथाक’समकक्ष अछि। अपन गुणवत्ताए नहि गुणालाकताक आधाऐ पर समकालीन मैथिली कथा आ कविता अन्‍यान्‍य विघासँ आगू अछि ताहिमे संदेहक कोनो अवकाश नहि। आ ई गुणवत्ता थिक’’ ओकर यथार्थपरकता जे आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एहिठाम’’स्‍पष्‍ट’’ कऽ दी जे मिथिलाक यथार्थसँ हमर तात्‍पर्य मात्र भौगोलिक मिथिलाक (जे वर्तमानमे अछिए नहि) रौदी–दाही, पाबनि–तिहार, भोज–भात, वर्ण–विद्वेष, अभाव–अभियोग, इच्‍छा–आकांक्षा, धरि–सीमित, नहि अछि अपितु राज्‍य-केन्‍द्रसरकार द्वारा वंचित-अवहेलिब मि‍थिलाक जलबल, जे अपन उदर पूर्ति आ परिवारक भारण–पोषण हेतु प्रवास पलयिन लेल बाध्‍य अछि, असम पंजाब, मुम्बई, मध्‍यप्रदेशसँ भारतक राजधानी दिल्‍ली धरि अवांक्षित- उपेहित गारि-मारि खाइत- जीवन व्‍य‍तीत–करबा लेल बाध्‍य अछि, तकरो–यथार्थ अछि; यद्यपि समकालीन कथा-साहित्‍यमे ई विषय-बात तेना भऽकेँ देखभगर रूपमे नहि आयल बुझना जाइछ। मैथिलीमे कथा-लेखन” बेस विलंबसँ प्रारंभ भेल। डॉ. जयकान्‍त मिश्रक अनुसार 1920 ई. धरि लोककेँ ई बोधे नहि छलैक जे कथा की थिक, वा कथा ककरा कही? डॉ रमानन्‍द झा ‘रमण’क अनुसार मैथिलीक प्रथम कथा थिक श्री कृष्‍ण ठाकुर ‘चन्‍द्र प्रभा’जकर’ रचनाकाल 1880 ई.सँ पूर्वक थिक। डॉ. जयकान्‍त मि‍श्रक अनुसार ‘चन्‍द्रप्रभा’1885ई.क रचना थिक जकर रचनाकार छथि-श्रीकृष्‍ण सिंह ठाकुर। मोहन भारद्वाज जनार्दन झा ‘जनसीदत्तक ‘ताराक वैधव्‍य’केँ प्रथम मौलिक कथा होएबाक ज्ञात कहैत छथि ई विडम्‍णना थिक मैथिली साहित्‍यक इतिहासक। विमर्शसँ ज्ञात होइछ जे विगत शतीक चारिम दसकसँ कथा-लेखन गति पकड़लक। मुदा ताहि कथा सभमे मिथिला नहि छल, मिथिलाक यथार्थ नहि छल। एहिमे संदेह नहि जे मैथिल समाज खंड-खंडमे विभक्‍त छल, प्रारंभसँ रहितो वृहत्तर मैथिल समाजक यथार्थमे साम्‍य तँ छलैके, जे विषय-बात मात्र कथा नहि, हमर समस्‍त साहित्‍यसँ असंभव रूपेँ अनुपस्थित छल। हमर समस्‍त साहित्‍य एक विशेष वर्गक, जकर संख्‍या दस शतांशसँ वेशी नहि छल, घुरखुर ओगरते रहल। एकर विडम्‍बला नहि तँ आर की कहल जाएत जे हमर लोकजीवनक यथार्थ हमर साहित्‍य-संस्‍कृति हमर कला-कौशल बाहरक लोककेँ आकर्षित- उद्वेलित करैत छैक, प्रेरित-प्रभावित करैत छैक, मुदा हमरा लोकति लेखे धनसन। हमर लोक साहित्‍य देखि ग्रियर्सन मुग्ध भेल छलाह, हमर चित्रकला देखि विलियम आर्चर आभिभूत भेल छलाह, हमर लोक जीवनक यथार्थ बंगला साहित्‍यकार सतीनाथ भादुरीसँ विभूतिभूषण मुखो पाध्‍याय धरिकेँ पेरित-प्रभावित कएने छल, परंच हमर सर्जक प्रतिभा एहि सभसँ विमुख साँफ पराती भोर बिहाग राग ढ़ेरबामे व्‍यस्‍त आ मस्‍त छलाह। कोनो विषय-वस्‍तु पर लिखबाक लेल ई आवश्‍यके नहि अनिवार्य थिक जे ताहि विषय-वस्‍तुक बोध हो! आ से होएब निर्भर-करैछ लेखकक स्थिति अवस्‍थान पर ओकर सामाजिक सरोकार आ संवदेना पर। कपोल कल्पित कथाक तँ तथाकथित यथार्थ पाठकीय विश्‍वसनीयता अर्जित कऽ पाओत ओकरा प्रभावित कऽ पाओत ताहिमे संदेह। एहि दृष्टिमे वि‍चार कएने पबैत छी जे मैथिलीक आरंभिक कथाकार लोकनिक अपन सीमा सरहद छलति जकर अतिक्रमण कऽ पाएब हुनका लोकनिक लेल संभव नहि छल। एहि सीमाक अतिक्रमण कएने छलाह काञ्चीनाथ झा ‘किरण’। वस्‍तुतः किरण जीक कोनो सीमा छलहे नहि, ओ सीमातीत छलाह। हिनक समाज छल वृहत्तर मैथिल समाज जाहिमे सभ जाति, सभ धर्मक लोक छल आ सभक संग हिनक सामाजिक सरोकार छलनि। 1941 ई.कऽ हिनक ‘धर्मरत्नाकर कथा’ केँ एहि सन्‍दर्भमे बानगीक रूपमे देखल जा सकैछ। किरण जीक प्राय: समस्‍त कथा तत्‍कालीन मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थक बानगी थिक। हिनक सर्वाधिक चर्चित-परिचित कथा थिक–मधुरमतिद्ध एक चित्रक चर्च विरले देखल-सुनल जाइछ। मुदार एहिमे लोक-जीवनक यथार्थ जाहि तरहेँ प्रखर मुखर भेल देखल जाइछ से अदभुते अछि। वस्‍तुतः किरण जी दस प्रतिशत उच्‍च वर्गीय अकर्मण्‍य लोकक विकृत विलास बहुल जीवन चरित नहि नब्बे प्रतिशत लोकक जीवनेच्‍छा–जिजीविषा, श्रम- संधर्षक कथा-गाथा लिखवाकेँ श्रेयष्‍कर बुझैत छलाह। जेना कि डॉ रमानन्‍द झा ‘रमण’ लिखैत छथि‘किरणक सम्‍पूर्ण कथा साहित्‍य यथार्थक धरती पर सुदृढ़ अछि। फलतः अपन चारूकात पसरल दीन दुखीक समस्‍याकेँ, जन-बोनिहारक समस्‍याकेँ, ओकर अन्‍तरक हाहाकारकेँ आशा-निराशाकेँ आ संघर्षशीलताकेँ अपन साहित्‍यक प्रेरणा स्रोत बनाओल अछि। चारुकात पसरल कथ्‍यकेँ अपन विशिष्ट शैलीमे दारल अछि। एहि लेल कल्‍पनाक उड़ान झा विजातीय परिवेशक संस्‍कार हिनक-कथामे नहि भेटैछ। अपितु भेटैछ सदिखन अपने टोल-पड़ोसक मानवीय समस्‍याक प्रभाव शाली अभिव्‍यक्ति आ अपने धरतीक सोहनगर महमही आ ओकरे आशा-आकांक्षाक संतुलित टिपकारी’। वस्‍तुत- किरण जी-मैथिलीक प्रथम कथाकार छथि जिनकर कथामे लोक जीवनक यथार्थ जकरा प्रकारान्‍तरसँ समाजिक यथार्थ सेहो कहल जा सकैछ, एते, प्रखर प्रगाढ़ रूपें चित्रित भेल अछि। एहिठाम लिखब प्रायः अनर्गल नहि होएत कि हिनक कथा ते मात्र सामाजिक यथार्थक कथा थिक अपितु सामाजिक चेतना सेहो अप्रतीम उदाहरण थिक जकर ई प्रयोक्ता–प्रवक्ता छथि, रूपकार छथि। विगत शतीक उत्तारार्धमे एहन प्रचुर कथा लिखल गेल अछि जाहिमे मिथिलाक लोकजीवनक यथार्थ अपन समग्रता–सम्पूर्णतामे चित्रित भेल अछि। अपवाहकेँ छोड़ि दी तँ प्राय: समस्‍त चर्चित प्रतिष्ठित कथाकारक एहिमे थोड़-बहुत योगदान-अवदान अछि। मोहन-भारद्वाज अपन-आलेख मैथिली कथामे सामाजिक चेतनामे एक सूची देने छ‍थि। हम एहिठाम कथा वा कथाकार सूची दए आलेखकेँ दीर्घायित नहि कए वर्तमान शतीक किछु टटका प्रकाशनसँ बानगी प्रस्‍तुत कऽ रहल छी जाहि- सँ विषय सुस्‍पष्‍ट भऽ पाबए । 2009 ई.मे प्रकाशित भेलए सुभाष चन्‍द्र यादवक कथा संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’। एहिमे एक कथा अछि ‘हमर गाम’। ई गाम लेखकेक नहि ई मिथिलाक कोसी अंचलक एक गाम थिक जे हमरो भऽ सकैए, अहुँक भऽ सकैए। एहि गामक एक घरक चित्र देखल जाए- घरक एककात दूटा चौकी लागल छै। चौकी पर मेल खट-खट भोटिया बिछा ओल छै। चौकीसँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सब रहैत छै। नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्‍ध अबैत रहैत अछि। कोसिकन्‍हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि। जानवरक संग। जानवरक समान। जानवरक हालत मे। आ ई कोनो नव बात नहि थिक। साठि वर्ष भारतकेँ स्‍वाधीन भेलाक पश्‍चातो जखन कि नितहु लाख-लाख टाका खर्च कए सरकारी, अर्ध सरकारी प्रचारतंत्र देशक बहुमुखी विकासक इन्‍द्रधनुषी छवि देखबैत अछि, हमर मिथिलाक स्थिति आर बदतर भेलए। ‘बहुत-पहिने जहिया कौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल चिड़ै अबैत रहै। पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै। आब कौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै। पहिने लोक कौआ, कास-पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छ्ल। जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल। खढि़या हरिन माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल। आब सब किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै। मुदा एहि आभाव अभियोग यंत्रणा वंचनाक अवस्‍थाओमे मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार अनामति छैक ‘डोम चमार मुसहर दुसाध तेली, यादव सब एके कलसँ पानि भरैत अछि एके पटिया पर बैसैत अछि’। आ जूड़शीतल दिन जेठ श्रोण्‍डजत चानि पर पानि दैत जुड़ाएल रहबाक आशीष देब नहि विसरल छथि। समकालीन कथाक विरल विलक्षण हस्ताक्षर सुभाषक मादे महाप्रकाश उचिते कहैत छथि- ‘हुनक रचनाकार समयक समुद्रमे डूबि-डूबि मोती माणिक ताकि अनैत अछि। एहि तरहेँ सुभाषक लेखन यथार्थक अमूल्‍य दस्‍तावेज बनि जाइत अछि’। आइ समय बड़ तेजीसँ बढ़ि-बदलि रहल अछि। महानगरीय प्रदूषन आ वैश्वीकरणक प्रभावमे ग्राम्य परिवेश प्रदूषित भऽ रहल अछि। सरकारी बयना-अवहेलनाक शिकार मिथिलाक प्रतिभा आ श्रम पलायन लेल वाध्य अछि, आ जखन ओ गाम अवैए, अपना संग विजातीय विकृत संस्‍कृर्ति नेने अबैह। प्रदीप बिहारीक ‘उग्रास’ कथा एहि विकृतिक स्‍पष्‍ट चित्रांकन थिक जे समकालीन लोकजीवनक यथार्थ बनल जा रहल अछि वा बनि चुकल अछि। शिक्षितो वर्गक धर्मभीकता अंधविश्‍वास आ कुसंस्‍कार तथा पाछूकेँ प्रतिष्‍ठाक मानक बूझि तकर प्रदर्शन जतबा चिन्‍तनीय किएक ने हो मुदा आजुक सत्‍य होइत देखल जा रहल अछि। राम भूषक बाबू अपन फुतहु आ पोताकेँ घरमे कते दिन राखि पओत। मिथिला-गामक देश थिक। सहजता-सरलता आ सामाजिकता गामक विशेषता रहलैए। मुदा आइ गर्मेया वा ग्रामीण जीवनक ई विशेषता विल्‍पुप्‍त भेल जा रहलए। नव खाढ़ीमे ई परिवर्त्तन बेस तीव्र आ त्‍वरित भेल देखल जाइछ। औदार्यक अभाव ओ स्‍वार्थपरता संक्रामक व्‍याधिक रूप लेने जा रहल अछि। तेँ कोनो पुतहु अपन वृद्ध ससुरक मादे निधोख बाजि सकैछ अइ कमासुतकेँ सखमे देखै जाही। ओइ दिनमे कहलिऐ जे बियाह कए लैह तँ नहि केलक। आब जे अइ उमरमे रंडीबाजी करत तँ से हम चलए देबै? बेचारा घूरन बुढ़बाकेँ बेकल भऽ गेनाइ स्‍वाभाविक छैक। फलतः ओ अपन गरीब विधवा भाउजकेँ अंग झँपबाक लेल नुआ की देत, भाउजोकेँ त्‍यागि दैछ। तारानन्‍द वियोगीक एहि त्‍याग कथाक भयावहता चरम पर तँ तखन पहुँचैए जखन घूरन मझिली पुतहु कहैत छैक ‘बेसी लबर लबर करबह तँ तते चप्‍पल मारबह जे चानि परहक सबटा केश खहरि जेतह....’। अपन ससुरक खुलेआम एहन अवज्ञा अपमान चौंक। बयवला बात रहितो आजुक यथार्थ थिक जे वैश्‍वीकरणक प्रभावें हमर सांस्‍कृतिक क्षरणक प्रतीक थिक। एहिठाम हम एक गोट आर कथाक चर्च करए चाहब। से थिक विभूति आनन्‍दक‘संक्रान्ति’ कथा। मन पड़ैए सकल विधा उदधि मिथिला विदित भरि संसार। आ ताहि मिथिलामे शिक्षाक की स्थिति अछि तकर जीवंत छवि थिक ई कथा एक तँ शिक्षक लोकनि पढ़बए नहि चाहेत छथि, मुदा जँ केओ चाहितो छथि तँ ताहि लेल मच औनाइते रहि जाइत छनि, छात्रक दर्शन नहि होइत छनि, जखन कि रजिस्टरमे छात्रक अभाव नहि। प्रधानाचार्यक कक्षमे गिलास आ बोतलक हल्‍लुक सन संगीतक भयावहता भावानात्‍मक स्तरहिसँ बुझल जा सकैछ शब्‍दमे व्‍याख्‍याचित करब सहज संभव नहि। एहि कथाक दोसर पक्ष तँ आर हृदय-द्रावक अछि। प्रवासी बालक पिताकेँ कम्‍प्‍यूटर सीखबा लेल कहैत छथि जे पितासँ संभव नहि भऽ पबैत छनि बचसाहु लोकक लेल ई तवे सहज छैको नहि जतबा किशोर युवा बच लेल। मुदा बालकक तर्क तऽ देखू- ’....अरे कम्‍प्‍यूटर, नेट आदिक जानकारी रहत तऽ दिन-दुनिया सऽ जुड़ल रहब....हमरो सभ-सऽ सम्बन्ध बनल रहत। ‘अएँ! की कहलह? ‘ठीके तऽ कहलौ! ककरा एते समय छै जे....। तँ ई थिक आजुक सत्‍य! आइ फलकेँ अपन पितासँ बात करबाक पलखति नहि छैक! हमरा लोकनि सरोकारक बाट करै छी, संवेदनाक बात करै छी कथाक सत्‍य ओकर आत्‍मा होइछ कथावस्‍तु। शिल्‍पक स्‍थान तकर बादे छैक जे कथावस्‍तुक प्रयोजनानुसार सहज स्‍वाभाविक रूपेँ अबैछ। बलात्‍कार शिल्‍पक व्‍यामोह जे बाह्य आवरण–आभूषण मात्र थिक, कथाक सत्‍यकेँ ओकर आत्‍माकेँ आंवष्ठित आच्‍छन्‍न कऽ लैछ आ अकसर पाठक लोकनि शिल्‍पक चाकचिक्यमे ओझरा मूलधरि पहुँचबासँ वंचित रहि जाइत छथि। साहित्‍यक अर्थ होइछ सहित, सभक संग, संभक हित अर्थात समाजक हित आ इएह समाजक हित-साधन साहित्‍यक उद्येश्‍यो थिक। ई भ‍नहि कहियो ‘टाइम पास’ करबाक लेल विनोद सामग्रीक रूपमे रचल जाइत रहल हो। आजुक साहित्‍यकार अपन कर्त्तव्‍यक प्रति पूर्ण सचेत आ सचेष्‍ट छथि, उद्येश्‍य साधनक प्रति प्रतिबद्ध छथि। एक दिस अपन सामाजिक स्थिति अवस्‍थानक सम्‍यक ज्ञान आ दोसर दिस विभिन्‍न भाषाक समकालीन साहित्‍यक अध्‍ययन अनुशीलन हुनक दृष्टिबोधकेँ रचनाशीलताकेँ प्रेरित प्रभावित करैछ। निष्‍कर्षतः कही जे समकालीन मैथिली कथाक यथार्थ आजुक मिथिलाक यथार्थ थिक। एकरा दोसर तरहे हम यथार्थक कथा सेहो कहि सकैत छी। आयामक विस्‍तार सामाजिक सरोकार आ संवेदनाक निखार एकरा महत आ महत्त्वपूर्ण बनबैछ। सहायक ग्रंथ- 1. अखियासल\डॉ. रमानन्‍द झा ‘रमन’ 2. मैथिली साहित्‍यक इतिहास (सा. अकादेमी) डॉ. जयकान्‍त मिश्र 3. एकल पाठ/मोहन भारद्वाज 4. बाङला कथा साहित्‍ये बिहारेर लोक जीवन/बारिद बरन चक्रवर्ती 5. कथा किरण/डॉ. कांचीनाथ झा ‘किरण’ 6. बनैत बिगड़ैत/सुभाष चन्‍द्र यादव 7. सरोकार/प्रदीप बिहारी 8. मिथिला दर्शन, जुला.-दि. 2005, संपा.-रामलोचन ठाकुर 9. मिथिला दर्शन, जुला.-अग.2009 संपा.-रामलोचन ठाकुर १.बिपिन झा-॥ आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक ॥२.गोपाल प्रसाद फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि ? बिपिन झा ॥ आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक ॥ शब्दतन्त्र जेकरा सामान्य रूप संऽ Word-Net रूप में कहल जाइत अछि, ई अखनि धरि मैथिली भाषा हेतु तैयार नहिं भय सकल अछि। एहि लेखक माध्यम सँऽ समस्त मैथिलीप्रियबन्धुगण कें एहि दिस आगू बढवाक हेतु उद्यत करय चाहैत छी। सबसँऽ पहिने ’शब्दतन्त्र’ एहि पद सँ की अभिप्राय ई स्पष्ट करब उचित बुझैत छी। शब्दतन्त्र एकटा   Lexical Database होइत अछि जे शब्द कें पर्यायवाची चयन करबा में अथवा शब्दक विवरण शीघ्रता सँऽ क्षण भरि में तकबा में उपयोगी होइत अछि। एकर उपयोग एतबा धरि सीमित नहिं अछि अपितु एकर उपयोग संगणकीय भाषाविज्ञान आ कृत्रिम प्रज्ञानं हेतु सेहो कयल जा सकैत अछि। शब्दतन्त्रक परिचय आओर विस्तृत विवरण हेतु विक्कीपीडिया द्रष्टव्य अछि[1]। आब प्रश्न उठैत अछि जे कोन-कोन भाषा हेतु शब्दतन्त्र बनल अछि आओर मैथिली हेतु कियाक आवश्यक अछि। अंग्रेजी[2], संस्कृत[3], उडिया[4], हिन्दी[5], आओर मराठी[6] हेतु शब्दतन्त्र निर्माण हेतु प्रयास कयल गेल अछि| मैथिली हेतु शब्दतन्त्रनिर्माणक दिशा में आइ धरि प्रयास नहिं कयल गेल। यदि मैथिली शब्दतन्त्र साफ्टवेयर के रूप में उपलब्ध भय जायत तऽ संगणकीय दृष्टि सँ मैथिलीक महत्त्व अवश्य बढत संगहि उपयोगकर्ता  हेतु ई भाषा सहजतम भय जायत। कोनो भाषा तखने धरि जीवन्त रहैत अछि जाधरि ओ उपयोग में रहैत अछि। ई शब्दतन्त्र मैथिली कें उत्कर्ष पर पहुंचेबा में समर्थ सिद्ध होयत। आजुक संसार एतेक आगू बढैत जारहल अछि जतय भाषा बाधक नहिं रहत। एक भाषा सँऽ दोसर भाषा में अनुवाद यन्त्र द्वारा[7] संभव अछि। यदि मैथिली भाषा हेतु निरन्तर प्रयास नहिं कयल जायत तऽ एकर एहि भाग दौड में पाछू छुटबाक संभावना अधिक अछि। अस्तु शब्दतंत्र निर्माणक दिशा में प्रयास हो ई आवश्यकता अछि। एहि सन्दर्भ में ध्यान आकर्षित करय चाहब The Global WordNet Association[8] दिस जे संसारक समस्त भाषा हेतु शब्दतन्त्र सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण प्लेटफार्म दैत अछि। अस्तु,  एहि दिशा में कार्य हो एवं यथाशीघ्र मैथिली शब्दतन्त्र क निर्माण हो ई जरूरत अछि। यदि एहि क्षेत्र में कतहु कार्य हो तऽ विदेहक माध्यम सँ सभ के अवगत कराओल जायत ई आशा अछि। बिपिन झा, CISTS, HSS, IIT, Bombay http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home [1] http://en.wikipedia.org/wiki/WordNet [2] http://wordnet.princeton.edu/ [3]  CISTS, HSS,IIT, Bombay, Sanskrit Word-Net निर्माण हेतु प्रयासरत अछि [4] http://www.onlineordbog.dk/wordnet/en/af/oriya.php [5] http://www.ling.helsinki.fi/filt/events/conferences/2004/msg01267.html [6] http://www.alphadictionary.com/directory/Languages/Indo,045Iranian/Marathi/ [7] यान्त्रिक अनुवाद द्वारा [8] http://www.globalwordnet.org/ २.-गोपाल प्रसाद फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि ?  ................................................................... जखन पृथक तेलंगाना राज्यक गठन भ सकैत अछि त फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि? मिथिलांचल के पूर्ण न्याय एखन धरि कोनो उद्योग एही क्षेत्र में प्रारंभ नहि कायल गेल अछि | सभ क्षेत्र में मिथिलांचल केर घोर उपेक्षा भ रहल अछि | केंद्र सरकार ओ बिहार सरकार एखन धरि कोनो उद्योग एही क्षेत्र में प्रारंभ नहि कायल गेल अछि, जाहिसँ एही क्षेत्रक लोक पलायन लेल मजबूर अछि | असमान विकासक करने दशक पिछरल राज्य बिहार में मिथिला अति पिछरा क्षेत्र बनि क रही गेल अछि | बिहार सरकार केर ध्यान मात्र पटना आ नालंदा के विकसित केनाई रहि गेल अछि | मिथिला मे पर्यटन ओ खाद्य प्रसंस्करण केर भरपूर संभावना केर बाबजूदो मिथिलाक संग नकारात्मक रवैया अपनओल जा रहल अछि| एही क्षेत्रक भाषा मैथिली आ मैथिली अकादेमी अपन अस्तित्व हेतु संघर्ष क रहल अछि | बिहार सरकार केर युवा महोत्सव आ दिल्ली केर प्रगति मैदान स्थित बिहार पवेलियन मे आईआईटीएफ केर दौरान आहूत सांस्कृतिक कार्यक्रम मे मैथिली केर घोर उपेक्षा कयल गेल | जाहिसँ सरकार केर नीति ओ नीयत मिथिलावासी लोकनि कें समझ मे आबी गेल अछि | एहि सभ समस्याक निदान केर एकमात्र विकल्प फराक मिथिला राज्य अछि | बिहार सरकार प्रवासी बिहारी लोकनि केर सुरक्षा , रोजगार आ न्याय दिलयबमे पूर्ण तरहे विफल रहल अछि आ एकर आ एकर ज्यादातर शिकार मिथिलाक लोक सभ रहल अछि | महाराष्ट्र , दिल्ली आ पंजाब केर बाद मध्यप्रदेशक राजनेता लोकनि सेहो बिहारी लोकनिक संग असंवैधानिक रूख अप्नौलानी आ बिहार सरकार मात्र बयां डी क अपन कर्त्तव्य केर इतिश्री क लेलनी | बिहार सरकार केर योजना विभाग , केद्र सरकार केर योजना विभाग मे बिहार टास्क फ़ोर्स आ बिहार फौन्डेसन केर बाबजूद मिथिला क बिहार मे पर्याप्त तवज्जो कियक नहि भेटल? आधारभूत संरचनाक विस्तारक बिना मिथिला कटल कटल जका अछि | पूर्व लोक सभा अध्यक्ष पी . ए .संगमा केर ओ बयान स्वागत योग्य अछि जाहिमे ओ कहने छलाह जे " क्षेत्रवाद - नक्सलवाद असमानता केर उपज अछि जाहिसँ छोट राज्य केर गठन क दूर कयल जा सकैत अछि " मिथिलाक लोकनि बाढ़ झेलय आ विकासक धारा अन्य क्षेत्र मे बहे ई नहि चालत आई भारत केर समस्त मिथिला वासी लोकनि के एकरा लेल आन्दोलन करय परत फराक मिथिला राज्य लेल अंतर राष्ट्रीय मथिली परिषद् द्वारा कानपूर मे २३ - २४ दिसंबर के मिथिलाक बुद्धिजीवी, स्वैक्षिक संगठन केर सम्मलेन भेल जाही मे आंदोलनक दशा दिशा तय कयल गेल|एहि वास्ते दिल्ली केर जंतर मंतर पर सेहो धरना देल गेल जाकर पूर्ण समर्थन भेटल| १.दुर्गानन्द मंडल-बकलेल,२.कपिलेश्वर राउत-छूआ-छूत,३.राजदेव मंडल,रखबार (दोसर भाग) दुर्गानन्द मंडल सहायक शिक्षक,  उ. वि. झिटकी-बनगावाँ, मधुबनी (बिहार)। बकलेल गर्मीक समय, जेठक दुपहरिया, प्रचण्ड रौद, बिजली लापत्ता। ऐहन बुझना जाइत छल, जेना दाता-दीनानाथ आइ मनुखक परीक्षा लेमए चाहैत छथि। कतौसँ वसातक कोनो आश नहि। नेेना-भुटका सभ एमहर भेँए तँ ओम्हर भेँह, एम्हर केँ तँ ओम्हर कें करैत छल। बुझना जाइत छल जेना मखना तेलीक पहरा होअए। माल-जाल गर्मी सँ परेशान भऽ एकहक हाथ जीभ बवैत छल। लेड़ू आ परड़ुक तँ तेरहो करम भऽ गेल छल। कोनो तरहें चंडलवा रौद आ दुपहरिया झुकल, मन कनेक थिर भेल मुदा राति खन उएह हाल, जतवे गर्मीसँ परेशानी ततवेक मच्छड़ आ उड़ीसक उपद्रव। ओकरा सभमे एकता ततेक जँ हाँ-हाँ नहि करियोक तँ सोझे उठालेत आ नेने-नेने सकरी चीनी मील लग रखि आओत। कतहुँ चैन नहि...। भोजनोपरांत देह-हाथ सोझ करवाक लेल विछाउनपर गेलौं, मुदा चैन नहि। कछमछ-कछमछ कऽ रहल छलौं। कती राति गुजारलाक वाद कने जा कि आॅखि लागल, आ कि ध्यान किछु आर-आर विषय दिस चल गेल। आॅखि यधपि बन्न मुदा चेतनामे अनेकानेक तरहक बात धुमए लगैत अछि। पड़ल छी विछौनपर मुदा मन जीनगीक चैबट्टीपर ठढ़ वर्तमानक अधरपर भूतसँ भविष्यक, भविष्यकेँ विषयमे सोचए लगैत अछि। सरकारी सेवामे रहवाक करणें कमे-काल गाम जेवाक मौका लगैत अछि। पावनियो तिहार जतै छी ततै करए पडै़त अछि। तखनो अस्सी बर्खक बुढ़ि माए आ करीब सय वर्खक बुढ़ बावूजीकेँ देखए लेल गाम जरुरे चल जाइ छी। टोला-पड़ोसाक सभकेँ भेंट कऽ सबहक कुशल छेम जानि अपना कऽ धन्य बुझैत छी।  एहि प्रकारे विभिन्न प्रकारक लोकक चारित्रिक विश्लेषण करबाक सेहो मौका लागि जाइत अछि। संभवतः ऐहने स्थितिमे मोन पड़ैत छथि एकटा सज्जन सरोज बावू। ओ ऐहेन व्यक्ति जे कोनो सुरतमे अपने कऽ किनकोसँ कम मानक लेल तैयार नहि होइत छथि। माए-बापक एक मात्र वेटा नान्हिएटा सँ पढ़ै-लिखैमे तेजगर मुदा ततवेक थेथरलोजीमे सेहो निपुण। विषय कोनो किएक नहि हो मुदा एक चैखड़ि थेथरलोजी जरुर करताह। जेना की ओ सर्वज्ञ होथि। तेँ हुनकर किछु संगी-साथी हुनका ‘‘मिस्टर नो आॅल’’ सेहो कहैत छलनि। लोक सभ बकलेल सेहो कहथिन्ह। परुकेँ साल अगहन मासमे हुनकर विआह झंझारपुरक बगलहि महरैल गाममे सम्पनन भेल।  विआहक मादे एकोटा सर-कुटुम नहि छुटथि एहि लेल ओ एकटा बही अलगसँ बना आ क्रमवद्ध सभकेँ नत-लिऔन आ हकार पठाएव नहि विसरलाह। विआहोत्सवमे सभ उपस्थित भऽ बराती गेलाह। जाहिसँ एक बात स्पष्ट भऽ गेल जे लड़का कोनो नीके समाजसँ जुड़ल छथि। गौवा-धरुआ आति प्रसन्न भऽ बढ़ि-चढ़ि कऽ बारातीक स्वागत-बात कएलैन्हि। ममिऔत-पिसिऔत सभ एहिसँ प्रसन्न जे बर-आ कनियाँ दुनूक जोड़ी सीता-रामक जोड़ी लगैत अछि। भगवानक असीम कृपासँ अनुगृहित भऽ नीके कथा सम्पन्न भेल। असली कथा आव एहि ठामसँ शुरु होइत अछि। विआहोपरांत कनियाँ कनिया विदागरी भऽ सासुर ऐलीह। दाइ-माइ लोकनि अरधि-परधि कनियाँ घर केलैन्हि। आ अइहव-सुहव होथू अशीरवाद दैत अपन-अपन घर चल गेलीह।  कनियाँ तऽ कनिए दिनमे अपन सासु-ननदिक दिल जीत लेलैन्हि। बर-कनियाँ समर्थ रहवाक कारणें विदागरी चैठारी दिन नहि भऽ साओन-भादोमे भेल। पहिल साओन-भादो नवकी कनियाँ नैहरमे मनवैत छथि, एहि तरहक मिथिलाक आ मैथिलक एकय मान्यता छैक। नीक दिन तका कनियाँ विदागरी भऽ सासुरसँ नैहर चल गेलीह। आव तँ भेल पहपटि। सरोज बावू जे एते दिन सदिखन घरेमे धुसल रहथि आ सदिखन कनियाँए कऽ निंधारैत आ गवैत छलाह ई गीत ‘‘मन होइए अहाँ केँ हम देखते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही, मन होइए अहाँकेँ........। आठ मास कोना वितल से नहि बुझि सकलाह आ कनियाँ आठे मासक फला-फलक रुपमे नौ मासक सनेश लऽ नैहर चल गलीह। से तँ, एको दिन, एको पहर, वितव सरोज बावूक लेल पहाड़ सन बुझना जाइत छलैन्हि। कोनो वातक सुधए-बुधिए नहि रहैन्हि। सदिखन एकदम बकलेल जेँका करथि। एहन सन वुझना जाइत छलैन्हि जे शरीर गाममे होइन्हि आ आत्मा सासुरमे। भोजनक प्रति अरुची जागए लगलैन्हि। समएसँ स्नान-भोजन करब सेहो सुधि-बुधि नहि। लोक सभ अपनेमे बाजथि जे सरोज बावू ऐना किएक करैत छथि- एकदम बकलेले जेकाँ  जहिना अपना गाम बेरमामे सरोज बावू तहिना अपना नैहर महरैलमे सरोजनी दुनू व्यक्ति एक दोसराक विरहाग्निमे जरैत। दिनो-दिन मुरझायल जाइत छलाह। स्वाभाविके थिक। किएक तँ बड़-कनियाँ समर्थ रहवाक कारण जीवनक अपूर्व आनन्द जे उठौने रहथि। एकय पूर्ण पति पत्नीक रुपमे।  एक-एक दिन पहाड़ भेल चल जाइत छलैन्हि। नहि तँ ऐम्हरे आँखिमे निन्न आ ने ओम्हरे एको मिन्टक चैन। माए-बापक डरे नहि तँ कनियाँ करैन्हि आ ने बावूजीक डरे सरोज सासुर जेवाक साहस कऽ पबथि। किएक तँ एखनो कतउ-कतउ ऐहन प्रथा छे जे विना दिन-दूरागमनक बर-सासूर नहि जाइत छथि। तेँ सरोज बावूक डेग सासुर जेवाक लेल नहि उठैन्हि। समय बीतेत देरी नहि लगैत छैक देखैत-देखैत चैठ-चन्द्र पावनि आएल....... चल गेल। जीतीआ बीतल आवि गेल आषीण मास.... सगरो दुर्गापूजाक तैयारी शुरु भऽ गेल। ओम्हर सरोजनीक नैहरमे जोड़ा करिआ छागर बलि-प्रदानक लेल राखल छल। जकरा ओ लोकनि खुब जतनसँ दाना-पानि खुआवथि-पिआवैथि। देखते-देखते दुनू छागर, सवाइयासँ डोढ़ा भऽ गेल। जँ जँ दूर्गापूजा लग आएल जाइत, सरोज बावू आ सरोजनीक हृदयक धड़कन हृदयागंम हेवाक लेल मचलए लागलि। देखते-देखते कलश स्थापन भेल। पहिल पूजा बीतल दोसर बीतल आवि गेल पंचमी। मुदा एखन धरि सासुरसँ सरोज बावूक लेल कोनो खोज-खवरि नहि कएल गेल! एकदिन माए पुछलथिन्ह- ‘‘बौआ, कनिआक खोज खवरि नहि केलहक? कोनो फोनो-तौनो नहि अवै छह? बेचारे की बजताह अपन हारल आ वहूक मारल क्यो की बजै छै? हारि-थाकि पंचमी राति फोन लगौलन्हि। घंटी भेल, फोन उठौलथिन्ह हुनकर शारि- कमलनी, ओम्हरसँ अवाज अवैत अछि- ‘‘हेलो.... हम महरैलसँ वजै छी? ‘‘हम छी सरोज बेरमासँ। कनी...... दीदी.......केँ फोन .....। कमलनी माँ दिस तकैत बाजि उठैत अछि- ‘‘माए गे माए जीजा जीकेँ फौन छिए। एम्हरसँ हेलौ-हेलौ होइत रहैत अछि। कमलनी फोन लऽ कऽ दैत छैक अपन दीदी सरोजनीकेँ। शेष आगाँ ....... २.कपिलेश्वर राउत- छूआ-छूत कपिलेश्वर राउत गाम-बेरमा, वाया-तमुरिया, जिला-मधुबनी, बिहार। छूआ-छूत दूर्गापूजाक समए रहए। सभ अपन-अपन उमंगमे मस्त। सभ कियो नव-नव परिधानमे सजल। कियो पूजामे मस्त तँ क्यो नाच देखएमे मस्त, कियो दारु पीवैमे मस्त। स्टेजक आगाँमे लग्धी-विरती कऽ देखएमे मस्त, कियो कुमारी भोजन करएवा व्यस्त। क्यो ब्राह्मण भोजनमे मस्त। एक-एकटा कुमारी आ ब्राह्मण पच-पच गोटेकेँ नोत खाइले तैयार छल। तखनहि शंभू मंडल लड्डू लऽ कऽ भगवतीकेँ चढ़ैवाक लेल गेल। ओकरा मंदिरक भीतर जेवा सँ पंडितजी रोकैत बजलाह- ‘‘तु सोलकन सभ भगवतीकेँ अपने हाथे ने लड्डु चढ़ा सकै छै ने प्रणाम कऽ सकै छै। एहि बातपर थोड़े काल हल्ला-गुल्ला सेहो भेल। अंतमे फैसला भेल जे पूजेगरी आ पुरोहित छोरि कऽ क्यो भीतर नहि जा सकैत अछि। चाहे ओ कोनो जातिक रहए। जखन चैकपर एलौं तँ एकटा देासरे नाटक पसरल छल। एकटा डोम चाहक दोकानपर बेंचपर वैसि कऽ चाह पीवाक लेल तैयार छल दोकानदार रोकि रहल छल। अन्तमे बल जोरी ओ बेंचपर बैसि गेल। आ ओ डोम दोकानदारसँ सवाल पूछलक। पहिल सवाल छल- ‘‘हम हिन्दु छी कि नै छी। दोसर सवाल छल जे जहन सभ जाइतक अहाँ आंइठ धोइत छी तँ हमर आंइठ किऐक नहि धोअव। तेसर सवाल छल जे एक तँ अहाँ बावाजी छी कंठी बन्हनै छी तहन अहाँ सबहक आंइठ धोइत छी से धोनाइ छोरि दिऔ आ से नहि तँ बावाजी जी बाला आडम्बर छोरि दिऔ, प्रश्न विचारनीय छल हम सोचमे परि गेलौं। ३.राजदेव मंडल,रखबार (दोसर भाग) ग्राम-मुसहरनियाँ, पो.- रतनसारा (निर्मली), जिला- मधुबनी (बिहार) पिन कोड- 847452 कथा रखबार 

कथा ‘रखबार’ क शेष अंश कम्रशः......

लगेबै जे एकटा बिआएल रहत तँ दोसर गाभिन। आब एकरहिं पाईल बढ़ेबाक छै। सम्हार नहि हैत तँ एक आधकेँ बेचि खेतो कीनि लेब। चारा कऽ दिक्कत छै तँ पछुआरक बाड़ीमे धासक बीया बुनि देबैक।’’ ओ कलेजाकेँ मजगुत कएलक। रखवारसँ कन्नी कटिकेँ आएले रहए। हाँय-हाँय धान छोपय लागल। पहिलेसँ काटल घासक पथियाक लगमे गेल। गम्हरैल छोपल धान छीटामे रखलक, उपरसँ धास फुलकैक राखि देलक जाहिसँ धान देखबामे नहि आबि सकय। तरका धान उपरका घाससँ झँपा गेल। तब जेना भीतरका थरथरी कम होअए लागल।  सुमनीकेँ बुझएलै जेना पाछूमे कियो ठाढ़ भेल हो। आ ओकर सभटा अधलाह काज देखैत हो। फेरि सोचलक- जे एतेक टह-टह करैत दुपहरियाकेँ रौदमे के एताह। ई सोचेत संतोख भेल। खर-खर जेना पाछूमे किछु खड़खड़ाएल हो। ओकरा डर पैसि गेल। साइत भूत-प्रेत न हो। घुमिकेँ पाछू दिस देखलक आ देखतहि रहि गेल। मुँहक बोली बन्न। छातीक धुक-धुकी तेज भऽ गेल। हाथ-पाइर जेना कठुआ गेल हो। किन्तु एहेन स्थिति बेसी काल तक नहि रहल।  तत्क्षण आएल परिस्थितिसँ लड़बाक क्षमता मनुक्खमे आबि जाइत छैक। ई क्षमता किनकोमे किछु कम किनको किछु बेसी होइत अछि।  अपना देह आ मनकेँ समान्य करबाक चेष्टा करैत सुमनी धासक पथिया उठेबाक चेष्टा कएलक। मुसबाक कड़कैत स्वर निकलल- ‘‘ऐ, धासक पथिया उठा नहि सकैत छेँ। आइ धरा गेलँह। दस दिन चोरकेँ त एकदिन साउधकेँ। ओहि दिन गामक लगीचमे रहि तँ गारि दैत गामपर चलि गेलँह। अखन चिचिएबो करबहि तँ एतेक दूरसँ कियो सुनतौं।’’ याइद पड़ल सुमनीकेँ ओहि दिन मुसबा सुमनीकेँ देखैत ऐँठिकेँ बाजल रहै- ‘‘बाधमे धान रहे चाहे घसबाहिनी सभहक मालिक मुसबा। जे मन हेतै से करबै।’’ इएह सुनिकेँ सुमनी गारि दैत चलि गेल रहैक।  सुमनीकेँ चुप देखि मुसबा फेर बाजल- ‘‘आब तँ तोरा जरिमाना लगबे करतउ। कियो नहि बचा सकैत छौ।’’ सुमनीकेँ स्मरण भऽ उठल-ससुरक लाठीक हूर। सौसक खोरनीक मारि। भरल पंचायतमे छौंड़ा सभक पिहकारी। जरिमाना जे लगत से अलगे। तइयो ओ हिम्मत बान्हलक- ‘‘हम देसराकेँ खेतमे हाथ नहि देलिए। हमरा पथियामे कहाँ किछु अछि। लोग घासो नहि कटतैक। माल-जालकेँ एतेक दिक्कत छैक। हमरा बेर भेल जाइत अछि। हम जा रहल छी। हमरा कियो नहि रोकि सकैत अछि।’’ पथिया उठा कऽ चलल। करोधमे आबि मुसबा घासक पथिया ठेल कऽ गिरा देलक। आ घास उझलिकेँ झिड़ियाबैत बाजल- ‘‘ई की छिओ? आब कोना बँचबे?’’ सुमनी लाजे कठुआ गेली किन्तु कोनो बहाना तँ करऽ पड़त सुमानीकेँ बाजलि- ‘‘ई धान हम अपना खेतमे काटलहुँ। माल-जालकेँ बचेबाक लेल तँ कोनो उपाय करऽ पड़त।’’ मुसबा ओकरा देहकेँ गहींकी नजरिसँ देखैत मुड़ी हिलाबैत बाजल- ‘‘हँ, अपना मालक जान बचा आ दोसरकेँ गरदनि काट। गे कहै छियौ-आबो लत हो। हमर बात सुन। साँपो मरि जाएत लाठियो नहि टूटत।’’ सुमनी सोचलक- कहीं कोनो नीके गप्प कहैत हुए। डुबैत काल तिनका भेेट जाए। पूछलक- ‘‘अच्छा की कहै चाहैत छहक।’’ मुँहक सुपारीकेँ चपर-चपर करैत। आँखि-मुँह चमकाबैत मुसबा बाजल- ‘‘कहबौ की। कतेक दिनसँ आस लगौने छी। कतेक बेर तोरा इशारासँ कहबो केलियौ। एक बेर हमरा मनक आस पूरा कऽ देखि, तोरा कोनहु गप्पक दुख-तकलीफ नहि होए देबौक। की मौगियाह फेकुआकेँ पाला पड़ल छेँ। सुन्नर जुआनीकेँ गारथ कऽ देतौक।’’ सुमनी थर-थर कँपैत, ललिआएल आँखि मुसबा दिस तकलक। आओर सोचलक-उमेर देखहक आ पपियाहाक गप्प सुनहक। जँ इज्जत नहि रहत तँ जीवि कऽ की करब। किन्तु लगैत अछि जे आइ देवी, महरानी बचैत तबे बाँचव। अपना शक्तिकेँ संग्रह करैत। कड़किकेँ बजली- ‘‘रे तोरा बाजैकेँ ठेकान छौ कि नहि। सभ धन बाइसे पसेरी बुझै छी। बड्ड खेत खेने छी। आई सभटा बोकरा देबौक।’’ कठहँसी हँसैत मुसबा एकरा मौगीक मलार बुझि लपकि सुमनीकेँ बाँहि पकड़लक। एहि बातमे मुसबा पहिलहुँसँ अभ्यस्त छल। कतेकोकेँ साथे कुकरम कएने छल, किन्तु आसक वीपरीत मुसबाकेँ सुमनी एक ऐँड़ मारलक। मुसबा फेर उठि सुमनी दिश बढ़ल। ओकरा बुझेलए घोड़ापर सवारी करबाक लेल एक दू चैताड़ तँ सहय पड़तैक। धाक छुटल नहि छैक। कने बलजोरी कऽ लेबै तँ कि कऽ सकैत अछि एहि सुन-मसान बाधमे। बात बढ़तैक तँ सिंहजी गिरहत अछिये। ओकर किरदानी देखि सुमनीक सौंसे देह आगि नेश देलक। आँखि लाले-लाल थर-थर कँपैत शरीर। बाजलि- ‘‘सोझहासँ भागि जो नहि त...। किन्तु मुसवा नहि रुकल। आगू बढ़ल हँसुआ नेने सुमनी हुड़कल। चर-चर-चराक हँसुआक प्रहार कुरताक सँगे मुसबाक कनेक छातीयो चिरा गेल।  आँखि उठा कऽ देखलक तँ बुझि पड़ल। ओ सेाझामे सुमनी नहि कियो आन ठाढ़ अछि। साइत गाछक झोंझिसँ कोनहु देवी ओकरापर सवारी भऽ गेल। हाथमे खूनसँ भीजल हँसुआ। साड़ीकेँ ढठा बन्हने करोधसँ करिआएल मुख, लाल-लाल आँखि, थर-थर काँपैत मुसबा दिश बढ़ल आबि रहल अछि। गरजैत बजली- ‘‘आइ सभटा खून बोकरा देबोक। सभटा पाप पेट फाड़िकेँ निकालि देबोक। ठाढ़ रह ओहिठाम।’’ मुसबाकेँ बुझेलै जे आब प्राण बँचाएब मोसिकिल। ओ खिखिर जेँका पाछू घुरि पड़ेलाह। धाँहि-धाँहि खसैत पड़ा रहल अछि। ओकरा बुझि पड़ैत अछि जे पाछूसँ खूनमे भीजल आँखि आ हँसुआ दौड़ल आबि रहल अछि। आबि रहल अछि। निश्चय मनुक्ख नहि देवी चढ़ल अछि ओकरा देहपर। ओ चिचिया उठल- ‘‘हौ मालिक, हौ गिरहत, दौड़केँ आबह हौ।’’ किन्तु कतउ कियो नहि आबैत अछि। ओ अपस्याँत भऽ गेल अछि। हलफ सूखि रहल अछि। आँखिक आगू अन्हार सन बूझि पड़ैत अछि। फेर मोन पड़ितहिं जोर-जोरसँ पाठ करै लागल- ‘‘जय हनुमान ज्ञान गुण सागर  जय कपीश निहुँ लोक उजागर। समाप्त। १.शरदिन्दु चौधरी-समय–संकेत २.शीतल झा-गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... ३. विजय–हरीश-किछु लघु कथा ४.सुनीता ठाकुर-अपहरणक सच-५.श्रीमति कुमुद झा-उच्चैठ भगवतीक महात्म-६.शम्भू झा वत्स-ग्राहर्स्थ्य जीवनक समस्‍या १.शरदिन्दु चौधरी समय–संकेत बलराज घरमे बैसल अपन आतीत दिस झाँकि रहल छल। एहन अवसर कहियो नहि भेटल छलैक ओकरा जे ओ अपन इतिहासकेँ स्वयं अपन नजरिसँ आंकि सकय। ईहो अवसर ओकरा एहि कारणे भेटि गेलैक जे कि ओकर पत्नी सेहो बेटा संग मुबंइ चलि गेल छलैक आ ओ घरमे नितांत असगर रहि गेल छल। वयस्कक अंतिम पड़ाव पर आइ ओ अपनाकेँ एकदम असगर पाबि रहल छल। ओ सोचय लागल जे किएक आइ ओ असगर भऽ गेल अछि? किएक एक–एकटा कऽ सभ ओकरासँ अलग भऽ गेलैक? पहिने दुनू बेटी अपन–अपन सासुर चलि गेलैक। फेर दुनू बेटाक समय अयलै। पहिने शोभराज पढ़बाक हेतु दिल्ली गेलैक आ पढ़ाइ समाप्त कयलाक बाद ओतहि एकटा कम्पनीमे काज करय लागल। फेर ओकर विवाह भेलैक। किछु दिन ओकर पत्नी पटनामे ओकरा सभ लग रहलैक आ फेर ओ अपन पति लग दिल्ली गेलि आ ओतहि रचि–बसि गेल। एहि तरहे केशव सेहो नोकरीक खोजमे मुंबइ गेल आ ओहीठाम स्थायी रूपेँ रहबाक निर्णय लऽ लेलक। मायक कोरपच्छु रहबाक कारणे आब मायकेँ सेहो अपना संग रखबाक हेतु किछु दिन लेल लऽ गेल अछि। मालती सेहो किछुए दिनमे बेटा ओतऽ रमि गेल अछि। ओना ओ जाइत काल कहि गेलि छलि जे जल्दीये आपस आबि जायत। बलराज सोचैत चल जा रहल छल जे आखिर किए एक दोसरासँ अपन लोक अलग भेल चल जाइत अछि जखन कि परिवारिक सभ सदस्य रक्त सम्बन्धसँ जुड़ल एकटा माला सदृश होइछ। ओ ई सभ सोचिये रहल छल कि ओकरा बुझयलैक जे ओकर दांतमे एकटा छोट–छिन केश फंसि गेल छैक जे बेर–बेर दांतसँ फराक करबाक हेतु ओकरा अपना दिस आकृष्ट कऽ रहल छैक। ओ सोचलक जे पहिने एहि केशकेँ दांतसँ बाहर कऽ देल जाय तकर बाद ओ निश्चिंतसँ बैसि कऽ अपन चिंतन प्रक्रियाकेँ आगाँ बढ़ाओत। ई सोचि ओ मुँहसँ नकली दांत बाहर निकालि ओहिमे फंसल केशकेँ ताकऽ लागल। मुदा ई की– ओकरा ध्यान अयलैक जे ओ चश्मा तँ लगौनहि नहि अछि तँ दांतमे फंसल केश ओकरा कोना सुझतैक? ओकरा स्मरण अयलैक जे चश्मा बगलवला कोठरीमे टेबुल पर राखल छैक। ओ चश्मा अनबा लेल ठाढ़ भेल। बगलवला कोठरीमे जयबा लेल डेग बढ़यबापर छल कि ध्यान अयलैक जे छड़ी तँ हाथमे लेबे ने कयलक तँ कोना ओहि कोठरीमे जा सकत? मुदा तुरंते ओकरा देवालसँ सटल छड़ी ओहीठाम भेटि गेलैक। हठात् ओकरा अनुभूति भेलैक जे जहि प्रश्नक उत्तर ओ ताकि रहल छलसँ तँ छड़ीक संगे भेटि गेलैक। ओ हँसय लागल आ स्वयंसँ कहय लागल–हमर दाँतजे हमर अपन छलसँ नहि अछि। हमर आँखि जे ज्योति प्रदान करैत छल, सेहो अपना भरोसे नहि रहल, हमर पैर जाहि भरोसे एतेक यात्रा कयलहुँ सेहो आब अपनापर निर्भर नहि अछि आ एहि सभक अछैत हम कृत्रिम अंगक सहयोगसँ जीवि रहल छी। फेर ओकर चिंतन प्रक्रियाक आगाँ बढ़लैक–ई सम्बन्धो सभ तँ कृत्रिमे छैक तखन एकरा जनबा लेल एतेक व्याकुल किए छी। की हम अपन सर सम्बन्धीक संगे धरती पर आयल छी। किए हमर ई अंग सभ अपन रहितो काज करब बंद कऽ देलक? आब ओकर चिंतन प्रक्रिया विराम लेबाक संदेश दऽ रहल छलैक। ओकरा ओ ई कहि देलकै जे समये ओ तंत्र छैक जे मनुष्यकेँ सभ साधन उपलब्ध करबैत छैक आ समय पर पुनः ओकरासँ आपस लऽ लैत छैक। ओ तँ एकटा माध्यम मात्र अछि जे समय–संकेतक पालन करैत अछि। सम्पादक, समय–साल २.शीतल झा-गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... जनकपुर, धनुषा, सुगा मधुकरही–५, नरहिया हम नान्हिटा रही कहिओ कहिओ बाबु संगे पोखरिमे नेहाए जाई। बाबु पानिमे डूबऽबेसँ पहिने एक बाकूट माटि पोखरिमे सँ कोड़िक मोहाड़ पर फेक देथिन्ह। एक दिन हम पूछलिएन्ह एकर कारण। हुनकर उत्तर रहन्हि “बौआ हम सब गरीब छी, पोखरि नहि कोड़ावि सकैछी। जिन्दगी भरि जौ एक मुट्ठीक माटि पोखरिमे सँ कोड़िक बाहर फेकि दै छै तँ एकटा पोखरि कोड़ाओलाक फल भेटै छै। वावुक एहि धारणामे की रहन्हि, अध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक नहि जानि मुदा एकटा बात तँ स्पष्ट भेल जे पोखड़िकेँ महत्व बहुत कारणसँ छै। पोखड़ि कोड़ाबएबलाकेँ धर्म होइछै, दश लोक स्नान करै छै, माल जाल पानि पिबै छै, इत्यादि। हम जाहि पोखड़िकेँ चर्चा कऽ रहल छी, ओकर की की काज छलै सँ हमरा मोन पड़ैए– कऽ, सौसे गामक लोक ओहिमे स्नान करैत छल, अखनो करैत अछि। एकटा घाट पर पुरूष, दोसर घाट पर स्त्रीगण कपड़ा खिचैछल। लगभग आधा गाँवकेँ मालजाल पानि पीबैत छल। पोखरिकेँ एकटा कोनमे शौच करैत छल जे शुद्धताक पहिल प्रतीक मानल जाइत अछि। गाम कोनो नमहर भोज होइत छलै तँ एहि पानिसँ दालि रन्हाइत छलै, जे केहनो दालि गलिक घाटि भऽ जाइत अछि। वर्षाक पानिक अभावमे पोखरिसँ नजदीकक खेतमे पानि पटाओल जाइत छलै, जाहिसँ किछु उपजा अवश्य भऽ जाइत छलै। पोखरिमे हेलब एकटा शौक छलै जे वास्तवमे एकटा सुखद व्यायाम छै आ खास समयक संकट पार करबाक उपाय। पोखरिकेँ मोहाड़, खरिहान, दाउनकेलेल बहुतोक प्रयोगमे अवैत छलै। मोहाड़परक बड़का पिपरक गाछतर गर्मीमे सब छाहरि पवैत छलै गामक नमहर पंचेती होइत छलै। मनुष्यकेँ जीवाक लेल, आ इ कहु जे जन्म लेवासँ पहिनेसँ जाहि अति आवश्यक चीजकेँ आवश्यकता होइछै ओ पानि पोखरिमे भण्डारण कएल जाइत छलै। करिब करिब वर्ष दिनक पानिक लोक आवश्यकताक पूर्त्ति पोखरि करैत छै। आइ धार्मिक भौतिक आ वैज्ञानिक कोनो आधार पर देखल जाएत भेटेछ जे हावा आ पानिकेँ विकल्प नहि अछि। एहि दूटाक लेल मनुष्यकेँ प्रकृतिए पर निर्भर करए पड़तै। ताहि जीवन तत्वकेँ संरक्षण करैत अछि पोखरि सभा। चिकित्सक कहैत छथि जे शरीरमे कखनो ८०% पानि चाही नहि तँ लघु रोग मात्र नहि दीर्घ सेहो लागि सकैत अछि। अध्यात्मिक ज्ञान तँ कहैत अछि जे शरीर बनएमे जे पाँच तत्वकेँ आवश्यकता अछि ताहिमे एकटा पानियो अछि अर्थात बनियो गेल पानिसँ आ रिकाब पड़ैछै सेहो पानिसँ। एहन आवश्यक जीवन रसकेँ पौड़ाणिक कालसँ प्रस्तुत कऽ रहल अछि आ आपूर्त्ति कऽ रहल अछि पोखरि आ नदी। तहिआ पोखरिमे माछ रहै छलै–स्थानीय माछ। सामूहिक रूपमे माछ विका कऽ आमदनी होइत छलै। एखन तँ आओर विकाशी माछ पालल जा रहल छै। पोखरिसँ लाखों आमदनी छै। प्रत्येक वर्ष दुर्गापूजामे ओहीकेँ आमदनी खर्च होइछै धूमधामसँ पूजा होइछै। पोखरिकेँ जीर्णोद्धार भऽ रहल छै। मोहाड़पर होइत सड़क गेलैए। ओ पोखरि आययूलक सेहो भेलैअ। पोखरि नया कोड़ावल होइककि पुरानकेँ माटि कोड़ाक गहिड़ कएल गेल होइक पोखरि मोहाड़पर जौ वृक्षारोपण नहि हेतै तँ पोखरि पुनः जल्दी भत्थन भए जेतै। आ पोखरि कार्यक नहि जेतै। तै पोखरिकेँ मोहाड़ पर पोखरिकेँ धरिमे जौ सघन वृक्षारोपण कएल जाइछै, घासपात लगाओल जाइछै तँ पोखरिकेँ आयु निश्चित रूप सँ दीर्घ हेतै। तैं गाछ वृक्ष लगाओलास ओकर जड़ि माटिकेँ कस्सिक पकड़ि लेतै छै आ भूक्षयकेँ नियंत्रण करैछै। जीवित जंतुकेँ लेल आवश्यक आक्सीजन तत्व आपूर्त्ति करैछ आ हवाकेँ ग्यास तत्वकेँ संतुलित करैत अछि। बहुत रोचक बात छैजे गाछ वृक्ष माटिकेँ पानि ग्रहण करबाक अमताके वृद्धि करैछ। आवश्यक बुझनाइ ई छै जे पर्यावरणकेँ बहुत रासे प्राकृतिक प्रक्रियाके निर्धारण करैत अछि आ संतुलनमे रखैत अछि। एतवे नहि अनेक प्रकारक चिड़ै–चुनमुनकेँ बासकेँ व्यवस्था इएह करैत अछि आ प्राकृतिक सुन्दरता लवैत अछि आ बढ़वैत अछि। औषधि जन्म झारपातकेँ महत्व तँ कहले नहि जा सकैअ। पुनः वृक्षारोपणसँ अन्धनक समस्या सेहो किछु हदतक समाधान। पोखड़िक मोहाड़पर चम्पा फूलक आवश्यकता आ रूचिकर छै। चम्पा फूलक गाछ होइत अछि झारपात नहि, घासक आकार नहि एकटा वृक्षाकारमे होइत अछि। ई करिब २० फुट तक उँच भऽ सकैत अछि एकर जड़ि सेहो बहुत गड़िहतक जाइत अछि। गाछ डाठिपातसँ सघन होइत अछि। एकरामे सुगन्ध होइत छैक मुदा उत्कट नहि, मनमोहक घ्राणनीय। वातावरणकेँ बहुत निकजका सुगन्धित कएने रहैत छैक। गर्मीमे पोखरिकेँ ठण्ढ़ा हवा आ एकर शीतल हाहरि ओहना कोनो थाकल पथिककेँ आकर्षित करैत अछि। पर्यावरणकेँ प्रदुषित होबए सँ बचावकेँ कार्य पोखरि आ वृक्ष मिलकए करैत अछि। पोखरि खुनाक वृक्षारोपण केनाई कोनो मैदानी क्षेत्रकेँ वासीकेँ जीवन पछाति मात्र नहि जीवनक आधार अछि। एहि बातकेँ हमर संस्कृति अछि जे धर्म परम्परा आ जीवन शैली सँ मात्र जुड़ल नहि अछि परंतु ई जीवनक मूल तत्वकेँ पकड़ने अछि आ पर्यावरणक चेतना दऽ रहल अछि। जखन कार्तिक मासमे शुक्ल पक्षमे अन्हार सांझमे किछु समूह गत कन्या लोकनि, विवाहिता लोकनि एकटा डालामे किछु छोट छोट माटिक मूर्त्ति एकटा मूर्त्तिमे किछु खर कोंचल एकटा मूर्त्तिमे किछु सन ठूसल, आ दीप बड़ल रास्ता पर गीत गवैत आंगनसँ निकलए आ समूहमे मिश्रित भऽ फुलोकलयमे लोकगीत गावए तँ उत्तर संस्कृतिकेँ लोक कोना बुझि सकैअ जे एहि गीतमे भाए बहिन अतुलनीय प्रेम आ ममता प्रतिध्वनित अछि, भाएक आयुकेँ हार्दिक कामना प्रतिबिम्बित अछि, भाएक वीर होवएबाक प्रेरणा मिश्रित अछि। भाएक बहुत तगड़ा होबएबाक शुभकामना आ आशीर्वाद अछि। सुखी सम्पन्न होएबाक चाहना अछि। चुगलखोरसँ सतर्क रहबाक चेतावनी अछि। चूगलाकेँ मूँहमे कारी पोति दण्ड देबाक न्याय पद्धति अछि। दुनू वाँहिकेँ जराए निर्मम दण्डकेँ न्याय व्यवस्था अछि। अर्थात् झगड़लगा व्यक्तिकेँ चुगलखोरकेँ, ग्राम कंटककेँ कोन रूपे मिथिला देखैत अछि श्वरकेँ मिथिलाक नारी वर्गमे ओकर कोन स्थान छैक? गोंदमे आगि लगैत वाते छोड़ु जौ वृन्दावनमे आगि लगैक तँ ओकर भाए मिझएबाक लेल साहसी होइछ पर्यावरणकेँ रक्षा करैकसँ बहिनक इच्छापूर्ण निर्देशन छै। जाहि लोक सांस्कृतिक गीतमे ननदि भाउजक परम्परागत परिहास छैक आ ओहि परिहास द्वारा भाएक सुखमय दाम्पत्य जीवनक कामना छै। तै महिला लोकनि कर्णयुद्ध श्वरमे गवैत छथिन्ह– ‘सामाक गीत’ “गामक अधिकारी अहो मोहन भैया यौ, भैया दस हाथक पोखरि खुनाए दियौ यौ, चम्पा फूल लगाए दियौ यौ”। काश! एहन लोकगीतक मर्म आशय प्राचीन मिथिलाक राजधानी जनकपुर संत महंथ पूजारी व्यापारी कर्मचारी बुझथि आ बुझथि ओ सेहो जे करैहथि ठेकेदारी आ नेतागिरी आ बचा देथि जनकपुरक पोखरि चारू मोहाड़ सहित। शीतल झा, जनकपुर, धनुषा, सुगा मधुकरही–५, नरहिया। ३. विजय–हरीश-किछु लघु कथा- छींट बला गमछा हम हुनका दिस दैखलियै तँ ओ बैसले–बैसल मुस्किया देलखिन। कने आर लग जे गैलियै तँ ओ खिलखिला कऽ हँसि देलखिन। हम अति–उत्साहित भऽ हुनक आरो लग जे गैलियै तँ ओ कने सइटि कऽ कानमे कहलखिन–“भाइयौ हमहुँ अहींक जाति–बिरादरी छी”। आ अपन माथ परक छींटबला गमछा हटा देलखिन। लघु कथा किकिऔनी विजय–हरीश दुइ गोट लेखक मित्र छलाह। एकटा नव तँ दोसर पुरान। पुरान किछु हद धरि एक मोकाम पर पहुँचि गेल छलाह। तँ नवका हुनका लग बेर–बेर दौड़थि। पुरनका बेचारे आजिज भऽ गेल छलाह अपन नव मित्रसँ। मुदा बाजताह की? कहबाके लेल, मुदा छलथि तँ मित्र। एक दिन ओ कविताक माध्यमे अपन पीड़ा व्यक्त केलखिन आ कविताक शीर्षक देलथिन–किकिऔनी। नोट-“सगर राति दीप जरय” सरसठिम कथा गोष्ठी, मानाराय टोल, नरहन (समस्तीपुर) मे पठित पता–विजय–हरीश डोमन–द्वारि ग्रा.+पो.–परसरमा भाया–सुखपुर जिला–सुपौल पिन.–852130 लघु कथा भावी–रणनीति विजय हरीश हम बच्चा सभकेँ ट्यूशन पढ़बैत छलहुँ। एक ठाम नव ट्यूशन शुरू करबाक छल। हम ओतय पहुँचलहुँ। मौसम कने गर्म छल। कुर्सीपर बैसते गमछासँ हाथ–मुँह–पोछऽ लगलहुँ। तखने कुसंयोगे हमरा दहिना आँखिमे किछु पड़ि गेल। आँखि लिबिर–लिबिर करऽ लागल। बगलेमे बच्चा सभक दादी बैसल छलि। ओ हमरा दिस कने नजरि कड़ा करैत बाजि उठलीह–“हो मास्टर! आइ तोहर पहिले दिन छिअ आ हमरा तोहर छिच्छा नीक नञि बुझबै छअ”। हुनकर इ गप्प हमरा टिकासन धरि लेसि देलक। मुदा हम पितमरू भेल हुनका कहलियनि–“नञि माताराम कोनो तेहेन गप्प नञि छै। हम तँ अपनेक आँखिक रोशनी टेस्ट करैत छलहुँ। किएक तँ ओहि हिसाबे ने हम अपन भावी–रणनीति तय करब”। विजय–हरीश डोमन–द्वारि ग्रा.+पो.–परसरमा भाया–सुखपुर जिला–सुपौल पिन.–852130 लघु कथा तृष्णा विजय हरीश हमरा टोलामे ‘एकगोट’ छल। नमरी कोढ़िया। पुरखाक अर्जल संपैत बेचि–बेचिक जीवन भरि अपन आत्मिक आ शारीरिक सुख मौज केलथि। जीह तँ बहसले रहनि अय्याशो तेहने। हुनक गप्प सुनिक तँ नवका छौड़ा सभ आँगुरमे दाँत काटे लागैत छलै। अपन छुतहरपनीक लेल ओ प्रसिद्ध छलाह आ एहि आगाँ ओ धियो–पुताक भविष्यक लेल कहियो नञि सोच–लनि। तँ समय एलनि तँ बेटा–पूतोह खूब ऐंराठेन, खूब दुर्गज्जन करनि। इ रोज–रोजक फजीहत देखि अड़ोस–पड़ोस बलाक अनसहज लागि जानि मुदा हुनका लेल कोनो हरख विढाद नञि। एहि क्रममे एक दिन एकटा हुनके मेरिया आजिज भऽ बाजि उठलाह–एह! हिनका जगह पर जौ दोसर कियो रहिते तँ निस्तुके बिख खा लित मुदा एहि चार्वाक प्रवृति इंसान लेल कोनो बात नञि। सभ किछुकऽ कुर्त्तामे पड़ल गदी जकाँ झाड़ि दैत रहथिन लागै जेना निर्लज्जताक सभ घाटक पानि ओ पीने रहथि। छिः छिः ऐना बेटा पूतोहूक खोरनाठबसँ मरि जाएब बेसतर एहेन जीनगी कतो मनुक्खल जीते। संयोगे एक राति हुनके घर लग बाटे हम जाइत छलहुँ कि एकटा आवाज हमरा कानमे सुनाई पड़ल ‘राम जानकी, राम जानकी’ हम अकनाबे लगलौ कि फेर वैह आवाज ‘राम जानकी, राम जानकी’ रक्षा करहुँ प्राण की ओं अपन मचानपर पड़ल रटेत छलाह। कने मुसकीयाबेत हम आगाँ बढ़ि गेलौं। ४.सुनीता ठाकुर-अपहरणक सच उम्र–२१ गाम–भवानीपुर, । अपहरणक सच वर्ष २००३ सितम्बरकेँ घटना अछि। हमर पितियौत भाइ श्री राजीव कुमार इंटरमीडिएटकेँ छात्र छलथि संगहि मेडिकलकेँ तैयारी सेहो करैत रहैथ। ओ पटनाक बोरिंग रोडमे एकटा भाड़ाक मकानमे संगीक संग रहैत छलाह। १५ सितम्बरक दिन हुनका एकटा संगी आशीष हुनके संगे रहैत रहय हुनका ठगि कऽ लय गेल जे चलु गया घुमि आबए लेल। राजीब संगीपर विश्वास कऽ हुनका संगे गया लेल बिदा भेलाह। दुनु गोटे रिक्शा पकड़ि पटना स्टेशन पहुँचलाह। ट्रेनमे बैसलापर किछु दूर गेला कि बगलमे एकटा लड़का आबि कऽ बैसि गेल। राजीब छलथि सीधा लड़का ओ किछु बुझि नहि सकलाह। किछु दूर गेला पर दूटा लड़का आ ओर बगलमे आबि कय बैसि गेलनि। आशीष कहलखिन जे इ सब हमरे संगी छथि। राजीब सोचलनि जे ठीक छैक सब गोटे संगे गया जायब तय मोन लागत। मुदा ओ कि बुझताह जे इ सब हिनकर जीवन बर्बाद करबाक तैयारीमे छथि। ट्रेनमे सब खूब बातचीत करैत जाइत गेलाह। बहुत दूर गेलाक बाद राजीब पुछलखिन जे एखन धरि गया नहि आयल तऽ आशीष कहलनि जे“देखियो ने राजीव हमर भैया सीवानमे रहैत छथि, हुनका हमरासँ कोनो जरूरी गप करबाक छनि फोन केलथि जे पहिने सीवान आऊ ताहि द्वारे पहिने चलु भैयासँ भेंट कय लैत छियैन, तकर बाद गया चलब। राजीबसँ बुझि सीवान पहुँचलाह मुदा ओ सब गोटे एकटा होटलमे नास्ता कयलनि। नास्ताक समय मिठाईमे बेहोशीक दवाई मिला कय राजीवकेँ खुआ देल गेल। मिठाई खाइत देरी ओ बेहोश भऽ गेलाह। तकर बादक घटना ओ किछु नहि बुझि सकलाह। संगी सब मिल कऽ हुनका देवरिया (यू.पी.)मे अपहरणकर्ताकेँ गिरोहमे दऽ देलनि। राजीवक पिता कटिहारमे कोनो साधारण नौकरी करैत छलाह। राजीवक फोन नहि लगलनि तऽ ओ चिंतित भेला आ पुनः अपन पैघ भाइ जे कि पटनामे रहैत छथिन हुनका लग एलथि। पूरा परिवार चिंतामे डुबल छ्लाह मुदा राजीवक कोनो खबरि नहि लगलनि। सब बहुत घबरा गेलाह। पुलिस स्टेशन जा कऽ रिपोर्ट लिखैलनि। बहुत ठाम पता लगैलथिन मुदा किछु पता नहि चलल। चारि दिनक बाद सांझ कऽ अपहरणकर्त्ता फोन कएलक आ राजीवक पापाक कहलनि जे“अहाँक बेटा हमरा लग अछि अहाँ २५ लाख टाका लऽ कऽ आऊ, तखन अहाँक बेटाकेँ छोड़ब”। ई सुनि राजीवक पापा कहलथिन जे “हम साधारण आदमी छी, एतेक टाका कतयसँ आनब”। आ बहुत चिंतित भय गेलाह। ओहि बेचाराक दुटा बेटीक बियाह करबाक रहनि, कतयसँ ओतेक टाका ओ अनतथि बहुत परेशान भऽ गेलाह। माँ, भाइ, बहीन, चाचा सब केओ सोचय लगलनि जे आब की होयत। कतयसँ ओतेक टाका इंतजाम होयत आ राजीवकेँ छोड़ा कऽ आनब। हमहुँ गेल छलहुँ चाचासँ भेट करबाक लेल। हमहुँ बहुत चिंतित भेलहुँ, आ चाचाकेँ समझेलियनि जे चिंता नहि करू सब ठीक भऽ जाइत। बीस दिन धरि बहुत घमर्थन भेल। अंतमे अपहरणकर्त्ता चारि लाख टाकाक इंतजाम कयलनि आ दुनू भाइ अपहरणकर्त्ताक गप पर टाका इंतजाम कयलनि आ दुनू भाइ अपहरणकर्त्ताक गप पर टाका लऽ कऽ छपरा गेलाह। ओतए गेला पर हुनका सभकेँ भरोस नहि होइत छल जे राजीव भेटत। बहुत परेशान कएलनि अपहरणकर्त्ता सभ कखनो फोन कऽ कऽ कहैन जे होटल आऊ तय कखनो फोन कहैत जे स्टेशन पर आऊ। बहुत परेशानी भेलनि मुदा अंतमे राजीव भेट गेलनि। राजीवकेँ देखलथि आँखि पर पट्टी बान्हल, पूरा कारी भेल, पूरा पातर सेहो भय गेल छलैक। एकटा चेन पहिरने रहैथ सेहो छीन लेने छल, मोबाइल, घड़ी, सेहो लऽ लेने रहै। पापा एवं चाचाकेँ देखि कऽ राजीव बहुत कानय लागल। ओ सब समझा बुझा कय हुनका पटना डेरा पर अनलथिन। राजीवकेँ देखि पूरा परिवार बहुत खुश भेला आ सब केओ पकड़ि कय कनलनि। राजीव सेहो कनलनि, तखन ओ सबकेँ जनौलनि जे एहन संगी भगवान दुश्मनोकेँ नहि देथि। आ पूरा जनौलनि जे केना कऽ ओ बीस दिन अपहरणकर्ताक संग बितौलनि। जंगल रहैथ पूरा आ ओतय एकटा घरमे बंद कऽ कऽ राखनि। खेनाइ –पिनाइमे दिक्कत नहि होइत मुदा ओ खेता कि ओ तय पूरा घबरायल रहथि आ हरदम कनैत रहथि। जेना तेना कय दिन कटलनि। बादमे पता चलल जे आशीष मधुबनी जिलाकेँ छल, हुनके सभटा हाथ रहैथ राजीवक अपहरणमे। हुनका गलत फहमी भऽ गेल रहनि जे राजीव बहुत बड़का बापक बेटा छथि। पुलिसकेँ जखन आशीषक नाम बताओल गेल तऽ ओ सभ छान बीन कऽ ओकरा थाना अनलक। बहुत दिन धरि मामिला चलल। ताहि बीचमे आशीषक पापा राजीवक पापाकेँ कहलनि जे चारि लाख टाका हम दैत छी हमरा बेटाकेँ नाम कटवा दियौ, मुदा ओ सभ तैयार नहि भेलाह। आ एखनो धरि आशीष जेलमे अछि। राजीव दिल्लीमे एम.बी.ए. कऽ तैयारी कऽ रहल अछि। इ छल अपहरणक सच। ५.श्रीमति कुमुद झा उच्चैठ भगवतीक महात्म श्रीमति कुमुद झा, उम्र ५१ वर्ष, ग्राम अरेड़ डीह टोल, जिला मधुबनी (बिहार) मधुबनी जिला अंतर्गत रहिकासँ लगभग २० किलोमीटर दूर भगवतिक स्थान छैनि। कहब अछि जे वर्षो पूर्व पोखरि जे एखन अछि वो नदी छल। नदीकेँ उत्तर संस्कृत विद्यालय रहैक, ओहि विद्यालयमे नियम रहैक जे प्रति दिन दू लड़का राति कऽ काली जीक आरती करैक लेल नदी पार कऽ कऽ आबैत छलाह, तथा वापस गेलाक बादे छात्र सब राति कऽ भोजन करैत छलाह। एक दिन नदीमे बाढ़ि आवि गेल छलैक कियो छात्र आरती करयकेँ लेल नदी पार करबाक हिम्मत नहि केलक। अंतमे हेड पंडित कहलथिन जे आई आरती छोड़ि दियौ आ सब आदमी भोजन करैय जाऊ। ओहि ठाम कलिया नामक एकटा नोकर छल, ओ कहलकैक जे हम आरती करय जायब तथा आरतीक बादे सब दिन जका भोजन हेतैक। जेना तेना नदीकेँ पार कय कऽ कलिया माताजीक दरबारमे आरती करय लेल पहुँचल। आरतीक विधि ओ नहि जनइत छल। कलिया आरतीक समान सब भगवतीक मुँहमे लेप देलकैन। ओहि पर माता बहुत प्रसन्न भेलीह आ कलियाके कहलथिन जे तू हमरासँ वरदान माँग। कलिया माताजीक कहलथिन जे हे माता हमरा सब मूर्ख कहैये से हमरा विद्वान बना दिअ”। माताजी वरदान देलखिन जे जतेक किताब तूँ आई रातिमे छू सकबय सब तोरा याद भय जेतौक। कलिया विद्यालयमे सब छात्रकेँ भोजन करा विद्यालयमे जतेक किताब रहैथ उपलब्ध सबकेँ राति भरिमे छू लेलक आ कलिया विद्वान भय गेलैक। तकरा बाद कलिया पूर्ववत विद्यालयमे कार्य करैत रहल। लेकिन छात्र सब गलती पढ़ै छलाह तँ कलिया टोकि दैत छलैथ तथा छात्र सबसँ मारि खाइत छलाह। एक दिन पण्डित जी वेदक कोनो अध्याय याद करय लेल छात्र सबकेँ कहलथिन। उच्चारण गल्ती भेला पर कलिया टोकलकनि तऽ छात्र सब तमसा कऽ कलियाकेँ बहुत मारलखिन, अंतमे पण्डित जी हल्ला कऽ एलाह। बात सब बुझलापर पण्डित जी कहलथिन कलिया ठीक कहैत छैक। पण्डित जी आश्चर्यचकित भेलाह जे वेदक ई अध्याय कलिया कोना जनलक। पण्डित जी कलियाकेँ अपन कक्षामे बजा कय आरतीक वृतांत सुनलाह, तथा कलियासँ कालीदास भेल। कलियाकेँ आदरपूर्वक विदाई दय कय विद्यालयसँ विदा केलखिन। वास्तवमे कलियाक वियाह राजकुमारी विद्योतमासँ शास्त्रार्थमे भेल छ्लैन। किंतु विद्योतमा तुरंत जानी गेलीह जे कलिया मूर्ख अछि। ओकरा देशसँ निकलि जायकेँ सजा भेटलाक उपरांते कलिया भगवति स्थानक विद्यालयमे पहुँचल छल। उच्चैठ भगवती स्थान काकी प्रसिद्ध अछि सब दिन दर्शनार्थीकेँ भीड़ लगैत छैक आ जे कामना सँ आहाँ ओतए जायब, माँ भगवती सबकेँ मनोरथ पुरा करैत छथिन्ह आ बारहो मास ओतए बलिप्रदान सेहो होइत अछि। खास कऽ कऽ आसिनक दुर्गा पूजामे अष्टमीक दिन बहुत प्रसिद्ध मानल जाइत छलै। हम सब ओहिठाम बराबर जाइत छलौ। आ माताक दर्शन कऽ कऽ गीत गवैत छलौ। पूजा पाठ कऽ खाना खा कऽ हम सब पूरा परिवार घर वापस आवैत छी। एहि तरहे उच्चैठ भगवतिकेँ इ कहानी अछि। भगवतीक गीत श्रीमति कुमुद झा हमर दुःखक नहि ओर हें जननी, हमर दुःखक नहि ओर जहिया साँ माता जन्म जे देलाँह दुःख छोड़ि सुख नहि मेल जननी हमर दुःखक नहि ओर, जहिया साँ माता पुत्र जे देलौहु दुःख छोड़ि नहि भेल हे जननी हमर दुःखक नहि ओर .....२। जहिया सा माता सम्पत्ती जे देलोंह दुःख छोड़ि सुख नहि भेल हे जननी .....२। माताकेँ सब पुत्र बराबर पण्डित मुर्ख गँवार हे जननी हमर दुःखक नहि अओर .....२। दोसर गीत भगवतीक श्रीमति कुमुद झा हम तय जनै छी माता अहाँ बरी दुर हे दुअरे पर आवि हे माता भये गेल कसुर हे। एकटा जे पुत्र देतौ धनकेँ सिंगार हे सेहो पुत्र होयत माता सेबक तोहार हे। गंगा जमुन साँओ जल भरि लायब हे भोर होइतहि माता पिढ़िया निपायब हे। मलिया आँगन साओ फुलबा मँगायब हे भोर होइतहि माता फुलबा चढ़ायब हे, पटवा दोकान साँओ आँचरी मँगायब हे। नित उठि आहे माता। आँचरी टँगायब हे। हाट बाजार साँओ धूमन माँगायब हे साँझ हेते माता धूप–दीप देखायब हे। श्रीमति कुमुद झा, उम्र–५१वर्ष, गाम–अरेड़, डीह टोल, जिला–मधुबनी। ६.शम्भू झा वत्स ग्राहर्स्थ्य जीवनक समस्‍या ग्राहर्स्थ्य जीवन बड संघर्षमय होइछ। शंकरो भगवान एहि संघर्षए उद्धेलित भए गेल छलाह। तारकासुरकेँ ब्रह्मा जीसँ वरदानमे सैह प्राप्त भेल छलैक जे शंकरसँ उत्पन्न छ: सालक बालक हमरा मारि सकैछ। आओर केओ देव गन्‍धर्व-राक्षसादि नहि मारि सकैछ जखन तारकासुर एहि वरदान प्राप्‍त कय उन्‍मत भए देवता सभ कए मारि भगा स्‍वर्ग पर शासन करए लागलए। तखन देवता लोकनि सभ एकत्रित भए पितामह ब्रह्मा जीके समक्ष उपस्थित भेलाह आ अपन दु:खक सम्‍पूर्ण वृतान्‍त कहि सुनौलक। ब्रह्माजी देवता सभ कए आश्‍वस्‍त कहि किछु दिन धैर्य धारण करबाक लेल कहलथिन। शंकर भगवान ब्रह्मचारी तपस्‍वी भय माया-मोहसँ मुक्त छलाह तँ तारकासुर एहेन वरदान माँगने छल जे हमरा शंकरजीसँ जन्मल ६ वर्षक बालके मारि सकैछ। आओर केओ नहि। नहि शंकर विवाह करताह आ नहि हुनका बालक होइतैन्हि। तँ से तारकासुर निश्चिन्त छल मृत्‍युसँ। ब्रह्माजी देवता लोकनि सभ गोटे शंकरजी केर समक्ष जाय करबद्ध प्रार्थना कैलेन्हि। हे महादेव? हमरा सभकेँ उद्धार करू। नहि ते देवता सभ आब नहि बचत। आव हमरा सभक कल्याण हेतु वियाह करू। शंकरजी ते गार्हस्‍थ्‍य जीवनकेँ कठिन बुझि तहूसँ मुक्त रहै चाहैत छलाह1 मुदा देवता सभ-केर कष्‍ट मेटावए लेल प्रथम सती दक्षप्रजापतिक पुत्रीसँ वियाह केलेन्हि। बादमे पार्वतीकेँ रूपमे दोसर जनम जे सती केर भेल छलैक। ताहि सँ पुनः वियाह भेलेन्हि। शंकरजी समक्ष आव गार्हस्‍थ्‍य जीवन केर समस्‍या उपस्थित होए लगलन्हि, पार्वती जी एलथिन्‍ह तँ “ऐसना-पोडर, लिपास्टिक” केर मांग होवे लगलन्हि। शंकर जी कहलथिन्‍ह– ए पार्वती? हमरा तए भसमे छाउरसँ काज चलैत छल अहाँकेँ हम ऐसनो-पोडर कतएसँ दैव पार्वती वजलीह- ई सभ कहने काज नहि होइत। नारीक श्रृंगार तँ इएहसँ होइत छैक। ”ई लेल तँ धन व्‍यय होयत? मुदा हम धन कतैसँ आनब? हम तँ बाबाजी छी”। शंकर जी वजलाह। ‘’बाबाजी भेले सँ काज नहि होएत। हम की खाएव? धिया-पुता की खाएत? त्रिशूल-कमण्‍डल राखू। पासैन- कोदारि धरू। बौनि बुता करू।‘’ पार्वती झुँझुहाति बजलीह। शंकरजी पार्वती केर एहेन प्रचंड रूप देखि सहमि गेलाह। हुनका स्मरण भए गेलेन्‍ह- यत्र नार्यस्‍तु पूज्‍यन्ते रमन्‍ते तत्र देवता। यत्रैतास्‍तु न पूज्‍यन्ते तत्र सर्वाफला क्रिया इयैह विचारि पार्वती जे-जे कहथिन्ह सँ सँ करए लगलाह। शंकरजी केर पारिवारिक समस्‍या बढ़ले गेलए। ध्‍यान-मनन-चिन्‍तन केर समय-कम पड़ि गेलन्हि। शंकरजी केर दूई टा वालक सेहो तेहने भेलन्हि। गणेशजी लम्‍बोदर गज-बदन मनोहर। शंकरजी जे कमाए-कौड़िकेँ आनथिन्‍ह। तहिमे गणेशजी केर पेट नहि भरन्हि। कऐक दिन तँ शंकर जीकेँ उपासे करए पड़ैन्हि। एक दिन शंकरजी स्‍नान-कए ध्‍यान चिन्‍तन कए रहल छलाह। हुनका पहिरनामे बाघक छाल छलैन्हि। सॉपकेर डाड़ॉडौर आ साँपए केर जनोऊ छलैन्‍ह। शंकरजी ध्‍यानमे मगन छलाह। एम्‍हर अवसर पावि कार्त्तिकजी केर वाहन मोर साँप पर दौड़ल। साँप डॉड़ सए ससरि पड़ा गेलए। ऐम्‍हर पार्वती केर वाहन बाघ, बसहा बड़द पर दौड़ल। बसहा बड़द होकाँहि-होकाँहि डिकरैत भागल। शंकरजी हड़बड़ा कए त्रिशुल लए दौड़ल की तावत डाँड़ सए बाघक छाल ससरि खसि पड़लए। शंकर जी झुँझुआई गेलाह। “हमरा सभ तबाह करएमे लागल अछि। केओ सुख देनिहार नहि। स्त्री-बेटा सभ तए सभ, ओकर वाहन धरि हमरा दु:खे दैत अछि। नहि। आब तँ अए सँ बढ़िया भीखे मांगि–चांगि खायब आ वोन–जंगलमे जीवन बितायब।“ ताहि दिनसँ शंकरजी भीख मांगि आनतथि आ रातिमें भीत पर खूट्टीमे टांगि देतथि। जखन सब सूति जा‍तथि तखन रातिमे गणेशक वाहन मूषिक समटा झोरा केर भीख फोंकि जाएकि। शंकरजी आव पगलाए गेलाह। “नहि केओ नहि सुख देनिहार।“ आब हम आक–भांग धथूर खाएकए रहब।“ आ श्‍मशान वास करब।‘’ स्‍वयं सुरेश: श्‍वसुरो नगेश: सखा धनेशस्‍तनयो गणेश:। तथापि मिक्षाटनमेव शम्भो, वलीयसि केवल मिश्‍वरेक्षा।। शंकर जी स्‍वयं देवसँ ऊपर महादेव छलाह, ससुरो पहाड़क राजा हिमालय, दलिदर नहि, हुनकर मित्र मण्‍डली सेहो धन-कुवेर, बेटा सैहो गणेश अग्रपूज्‍य, ऋद्धि सिद्धि दायक, तैयो शंकरजी भिखमंगे? कहल गैल छैक जे ईश्‍वरक ईच्छा बलगर हौइछ, गार्हस्‍थ्‍य जीवनमे जौ हुनको दुर्दशा भोगए पड़लन्हि तँ हमरा लोकनि कए गप्पे कोन। १.मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि -  प्रकाश २.२.राकेश कुमार रोशन-पञ्चैति (कथा)३.भीमनाथ झा-चन्‍दा झा,हरिमोहन झा मिलिकऽ४.हेमचन्द्र झा दूटा कथा कथा १.मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि -         प्रकाश सब कला मे श्रेष्ठतम कला मानल गेल अछि रंगकर्म के । से आइ नै, प्राचीने काल स’। इहो कोनो खास सभ्यता मे नै बल्कि विश्वक सब सभ्यता मे । जँ रंगकर्म केँ कला सँ संज्ञापित कयल जाय त’ सिवाय रंगकला के दोसर कोनो  कला - चाहे ओ चित्रकला होइ वा संगीतकला वा नृत्यकला; अपना छोड़ि दोसर कोनो प्रोफेशन मे (आजुक समय मे सेहो ) सपोर्टिभ नहि होइत छैक । सभ कला मात्र सीमित क्षेत्रक लेल उपयुक्त होइछ संगहि व्यक्तिगत बेसी । मुदा रंगकर्म व्यक्तिगत स’ बेसी सामाजिक होइछ, तेँ रंगकर्म के आन कोनो दोसर कला मे श्रेष्ठ कला मानल गेल अछि । हमरा समाजक समाजशास्त्रीक ई अंभिज्ञता या अज्ञानता बूझी, जे सर्व साधारण तक एहि कलाक विशेषता केँ नहि प्रचारित क’ एकर विपरित प्रचार प्रसार कयल गेल । परिणाम हमरा सभहक समक्ष अछि, जे आइ विश्व के एक्कैसम शताब्दी मे होबाक बाबजूद,सूचना तंत्रक क्रांतिक होबाक बादो हमर समाज रंगकला सँ जीविकाक प्रश्न करैत अछि वा एहि क्षेत्रक जानकारी मे अपन असमर्थता देखबैत अछि । आखिर एहन स्थितिकिएक ? ई सवाल हमर अपन समाजशास्त्री आ समाजक अगुवा माननिहार लोकनि स’ अछि । नाटक वा रंगमंचक संदर्भ मे मिथिला समाजक अधिकांश व्यक्ति अखनहु तक अत्यंत असमनजस मे छथि । ई विधा कतेको रास तर्क कुतर्क स’ घेरल अछि । जिनका जतेक कम ज्ञान छनि ओ ओतेक ज्ञानिक अभिनय क’ एहि विधा के अपना हिसाबे तोड़ि-मड़ोरि क’ समाजक आगू प्रस्तुत करैत छथि । एहि रंग विधाक प्रकृति की अछि, ई कोन व्याकरणक आधार पर चलैत अछि एहि स’ संबंधित बहुत थोड़  तथ्य उजागर भेल अछि वा ई कही जे ओहि दिस कम्मे लोकनि के ध्यान गेलन्हि अछि । रंगमंच के आइयो गम्भीरता स’ नहि लेल जा रहल अछि । जे किछु लिखल वा कहल गेल सेहो ततेक ने शास्त्रीय भ’ क’ जे ओ आरो बुझौबलि बनि समाजक बीच व्याप्त रहि गेल । एहि सँ कनी आरो आगू बढ़ी । जँ रंगमंच के मैथिली साहित्यकार लोकनि साहित्यक कोनो विधा हेबाक प्रमाणपत्र दैत छथिन त’ ओहू सभ विधा मे नाट्यकर्म अन्य दोसरा सँ बेसी फलदायी अछि । तकर सबूत देबाक आवश्यकता हमरा नहि बुझना जाइत अछि । एहि एक्कैसम शताब्दी मे होमाक बादो जँ किछु तथा कथित गणमान्य व्यक्ति मे शंकाव्याप्त छनि तँ हुनका समक्ष हम किछु तथ्य, किछु उदाहरण आ किछु प्रश्न प्रस्तुतकरबाक प्रयास करैत छियनि, जाहि सँ  हुनका सभहक बीच नाट्यविधाक लेल व्याप्त भ्रम दूर भ’ सकनि । किनको द्वारा ई कहि हीन देखायब जे रंगमंच मे कोनो तरहक जॉब नहि छैक, नाट्यकला केँ पेट भरबाक सामर्थ्य नहि छैक आदि आदि । ई एहि क्षेत्र के गंभीरता सँ अध्ययन नहि होबाक परिणाम थिक । हम आइ एतेक तक कहि सकैत छी, जे एहि तरहक भ्रम केँ मिथिला समाज मे प्रचारित करब एकटा सोचल समझल रणनीति मानल जयबाक चाही । मिथिला मे एहन तरहक काज बेसी संख्या मे ओहन व्यक्ति द्वारा भ’रहल अछि जे अपना आप केँ साहित्यकार घोषित केने छथि । आजुक समय मे कियो सज्जन पूर्णरूपेण ई दावा नहि क’ सकैत छथि जे ओ अपने (वा कोनो फलां धारे बाबू) मात्र कविता वा कथा वा उपन्यास लिखी क’ अपन आ अपन परिवारक भरन-पोषण करैत छथि । अहाँ सभ हमरा जनतब केँ कनि फरिछा सकैत छी त’ कहू जे कवि / कथाकार / उपन्यासकार / नाटककार / शिल्पकार / चित्रकार आदि लोकक अपन एहि कला मे महारथ हेबाक केहन प्रभाव हुनकर समसामयिक काज पर पड़ैत छनि ? की एकटा नीक कवि नीक शिक्षक भ’ सकैत छथि तकर कोन गारंटी अछि । एकटा नीक कथाकार नीक अधिकारी हेबे करताह से के कहि सकैत अछि ? एकटा नीक शिल्पकार वा की चित्रकार नीक वक्ता, प्रवक्ता, अधिवक्ता वाकि नेता हेताह से के दाबा संग कहि सकैत छथि  ? प्राय: ई देखल गेलैक अछि ओ मैथिलीए मे नहि दोसरो-दोसरो भाषा मे जे एकटा शिक्षक जँ कविता लिखता त’ नीके लिखताह, एकटा प्रवक्ता कथा लिख देलाह त’ ओ नीके होयत, एकटा अधिकारी कोनो फोटो बनेलाह त’ सभ स’ पैघ चित्रकार कहाब’ लगताह । आ मैथिली मे प्रोफेसर साहेब (जे किनको प्रासाद स’ एहि पद पर आसीन छथि, कोनो प्रतियोगिता परीक्षा वा की यू.जी.सी. आदि स’ चयनित नहि भेल छथि ) त’ सफेद कागज पर किछु घँसियो देताह त’ समीक्षक वा हुनके समगोत्री लोकनिकेँ ओहि मे आर्ट / कविक प्रखरता / कथाक गंभीर कथ्य / उपन्यासक जटिलता / नाटक मे प्रयोगात्मक्ता देखा जाइत छनि । एकर ठीक विपरीत अछि रंगविधा । एकटा व्यक्ति जँ रंगकर्मी छथि वा कि कहियो कम-सँ-कम एक्को महीनाक लेल सघन रूप सँ रंगकर्म केने छथि त’ हुनकर जीवनकप्राय: सभ क्षेत्र मे एकर प्रभाव देखार भ’ जाइत अछि । ई हुनकर जीवनक अंतिम क्षण तक संग रहैत अछि ।  जँ ओ रंगकर्मी छलथि / छथि त’ ओ छात्रक नजरि मे एकटा नीक शिक्षको हेताह से गारंटी अछि । ओ एकटा अनुशासित अधिकारी, नीक वक्ता, नीक प्रवक्ता, नीक अधिवक्ता वाकि नीक नेता हेताह से कहल जा सकैत अछि । एकटा शिक्षक जँ अभिनय करताह त’ ओ नीके करताह से किन्नौ नहि मानल जा सकैत अछि । एकटा अधिकारी वा प्रोफेसर नीके नाटक लिखताह / नीके अभिनय करताह / नीके निर्देशन करताह तकर संभावना नगन्ये मात्र होयत । उपर्युक्त तथ्य जँ कनियो सत्य लगैत अछि त’ कहल जाओ जे कोन विधा महत्वपूर्णअछि जीवनक लेल; रंगकर्म वा कि कोनो दोसर ? हँ रंगकर्म ततेक ने अनुशासनसिखबैत छैक जे ओ रंगकर्मी अपन जीवनो मे आवश्यक्ता स’ बेसी अनुशासित भ’जाएत अछि । तकर प्रभाव अखन तक मिथिला मे साफ उल्टा भेलैक अछि । कियो किम्हरो स’ अबैत अछि आ एक सिंह नाट्यकर्म केँ मारि चलि जाएत अछि । ई कतौ स’ उचित नहि ।  बिडम्बना त’ ई अछि जे जाहि विधा पर ई लोकनि अपन अपन तर्क-वितर्क वाकि कुतर्क करैत छथि ओहि समूह मे पहिने सँ रंगकर्म सँ जूड़ल व्यक्ति केँ बजायब आ हुनकर सहमति वा अहमति लेबाक कोनो प्रयोजनो नै महसूस करैत छथि । बंद कोठली मे निर्णय लैत छथि आ सम्पूर्ण समाजक पाई सँ बनल संस्था सभ सँ मोटगर-मोटगर ग्रंथ छापि नुका रहैत छथि । एहन लोकनि केँ लेशमात्र ग्लानि नहि होइत छनि जे नबका पीढ़ी के ओ की द’ रहल छथिन वा जहिया कहियो नवका  सभहक समक्ष सत्य ओतैत तखन एहि सभ ग्रंथ पर छपल नामक प्रति ओ सभ की प्रतिक्रिया करतैक । ओ पीढ़ी आजुक पीढ़ी सँ बेसी प्रतिक्रियावादी हेतैक से हमरा सभ के मोन राखक चाही । रंगकर्म एकटा एहन कला अछि जाहिमे सबस’ बेसी जोर होइत अछि ई जे ‘अपना आप के चिनहू/बूझू/जानू’ । जीवनोक यैह मूल मंत्र अछि । अहाँ अपना आप केँ, अपन सामर्थ्य केँ जतेक नीक जेना बूझब अहाँ ओतेक सफल होयब अपन जीवनमे । तेँ अति आवश्यक अहि जे सभ व्यक्तिकेँ एहि बिधा सँ जूड़ि लाभ उठाबय चाहियनि । मिथिला समाज मे रंगकर्मक महत्ता के प्रचारित प्रसारित करबाक अति आवश्यकताअछि । एहि दिस सभ विद्वान केँ आगू अएबाक चाहियनि । - प्रकाश झा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भगवान दास रोड, नई दिल्ली – 01 मो. – 9811774106 २.राकेश कुमार रोशन-पञ्चैति (कथा) लालापहि-६, सप्‍तरी हाल पो.ब. न: ५४३२ काठमाँण्‍डू पञ्चैति (कथा) थप!....थप!....थप!....खैनि तर‍हथि पर रगड़लाकेँ बाद चपड़ि ठोकि धूल उड़बैत बाजल सिफैत “आजुक पञ्चैतिमे बड़ मोन लागल....नहि रौ?....चन्‍ना। “खैनि खाइल जीसँ लेर चुबबैत बाजि उठल चन्‍ना “तँ!....आइ खुब मजा एतै....बड़ मोनसँ दुलारसँ आइ.ए., बि.ए. आ आओर किदन बिग्‍दन पढ़ेलक जिवछ। माटर....अपन दूनु बेटा आ बेटियोकेँ। कहै छल जे....बलु हमरा धन जोडबाक नहि अछि....बेटा बेटी सभक पढा लिखा देव तँ कमाइयोकेँ खेतै आ....निक लोकसेहो बनि जएतै”। “तह!....आइए माटरबाकेँ बुझा जाएत जे दुकट्ठा जमीन जोड़नेसँ फाएदा होइतै की बेटा पढ़ेनेसँ फाएदा भेलैय”। खैनिकेँ मोनसँ घुस्सादैत बाजल सिफैत/तखने सिफैतक गोहालिमे साँझुका खानपिन खा’ क’ हाथ सुखबैत पहुँच गेल दिलिफ आ चट् दऽ बाजि उठल “कथिकेँ बातचित चलैत छै....सिफैत का....महरो एक जुम खैनि दियह”।“धुर....खैनि खेता! ....बड़ सौख छौ तँ लगाकेँ खेबहि तँ नहि हेतौ?....अच्‍छा ले कनेक्शन खा हमहुँ तँ बेर–बेर माँगिक खाइत छी आ फटसँ दू जुम खैनिकेँ तिन भागल गाबैत आ बातक अगाड़ि बढ़बैत फेर बाजल सिफैत “तोँ आइ भरि दिन गाममे नहि छी से....नहि किछु बुझलि एखनी धरी”। बातकेँ जोंक नाहित नमराबैत देखि बिचेमे बाजि उठल चन्‍ना “रे!....जिवछा माटर द्या गफहोइत छलै....तोहर बाप तँ तोरा बेसि नहि पढेलकौ तँ बुढवा 14 कट्ठा खेतो त किनकेँ राखलक ने एकटा जे ई माटर हँ....देखैत नहि छि 4 कठ्ठा खेत छै ओ कनी दूटा घर।....कमाक नै एक्‍को कठ्ठा खेत किन लकै आ....नै दसो हजार रुपैया जम्‍मा कऽ सकलै....।प्रिन्सिपलक नाम पर भेटल पैसा बुढि़या बेटिकेँ बियाहोमे नहि जुमले तँ राखी की सकत। आब आइ ओकर पुतहु सभमे झगड़ा भऽ गेलै तँ बेटा सभ पञ्चैति बैठेने छै....भिन है ले....आब दे‍खैत रहि सार बुढवाकेँ पुछै छै”। बुढि़या बोछि एहि सन्‍दर्भमे कहने छल जे मास्‍टर अपन बेटीकेँ स्‍नानत्तक धरि पढा देलकै बाद वियाह कयने छल २१ वर्षक उमेरमे। दिलिफ सभ वात बुक्‍ततो अन्ठिया ल नाहित बाजल ए आइ पँञ्चैति छियै ने तब देखिलियै बुढवाकेँ द्वारपर दूटा विरिञ्च लागल छलै आ-आ हमरो घर गेल छलै ओकर पोता एकटा विरिञ्च लाबे”।....तह....देखह बुढबाकेँ आब गञ्जन भऽ जेतै.....एखन चलै बुलैत छै तँ कहुनाक दिन कटिए जेतै....आ जखन लोथ भए जेतै तँकेँ....केँ देखतै....देहमे पिलुबा फडि जेतै....”। आगिमे घी ढारैत बात बढौलक चन्‍ना” तँ देखैत जाहिने....पाँच कठ्ठा खेतमे दूओ कठ्ठा माटरकेँ पञ्च सभ द’ देत तैयो कोइ नहि राखैले तैयार होतै।....छोटका तँ ओर हरामी छै,....कहते वलु मरि जाउ बुढवा....हमरा कोनो मतलब नहि छै।....आ बढका।....कनि स्थिर गरे छैत की भेल....दूकठ्ठा खेतसँ कि होइतै बुढवाकेँ सो ओहो राखत।....आइसँ तँ जिबछा माटर अबस्‍से भिख मँग्गा भऽ जेते। एम्‍हर ठोर तरक खैनिमे सँ पच्‍च दऽ थुक फेकैत बाजल दिलिफ”....तह! आब बुढवा माटरकेँ देखह ने दमाक दवाइकेँ किनक लाइवदैत छै बजारसँ आ कोन पुतहु....भोर साझ एक लोटो पानि देतै ब्लडप्रेसरक गोटि खहिले”।“....ओना आब पँचैति शुरु भऽ गेल होत।....चलै चलहने ओते बुझवो तँ करवै केना केना करैत छै पञ्चसभ आ....आ बुढबाकेँ हालो तँ देख लेबै” बाजल सिफैत आ एहि वाले तीनु सहमति होइन डेग बढेल एक उत्‍सुक नजर लऽ कऽ जिबछक द्वार दिस। जिबछ एक आधुनिक सोंचक थिक। जिनकर शिक्षा प्रति विशेष झूकाव छल। ओना अपना तँ गामेक प्राथमिक स्‍कूलक शिक्षक छल आ मात्र मैट्रिक पास। मुदा अपन दुनु बेटा जेठका गनपैत आ छोटक धनपैतकेँ पढेमे कोनो कसैर बाकि नहि रखने छल। तैं गनपैत एम.ए. पास केन छल आ धनपैतो बी.ए. पुरा केने छल/गनपैत गामक लगेमे रहल एकटा छोट बजार कञ्चनपुरमे एकटा बोर्डिग स्‍कुलमे पढ़बैत छल ओही नोकरी ओकरा बड मुस्किलसँ भेटल छल आ एतेक ने कमाइ होइत छल जे खापीक बेटाबेटि पढबैत पढबैत एक्‍को टाका नहि बचैत छल। बेरोजगारीकेँ समस्‍यासँ ग्रस्‍त एहि समाजमे धनपैतकेँ एहन एक्‍को गोट नोकरी नहि भेटल छल ताहि लक ओ गामेमे भोर साझ टिसन पढावैत छल आ कहुना कहुनाक ओहो अपन गुजाराकर लैत छल। बुढबा एखन एतके उमरगर भऽ गेल छलथिसे ओ नोकरीसँ रिटाएर्ड भऽ गेल छल आ पेन्‍सनक नाम पर हुनका जे टाका भेटैत छलथि जे बल्‍डप्रेसर आ दमाक नियमित दवाइयोमे मुश्किलसँ जुमि जाइत छल । आइ बुढवा जिवछा माटरकेँ भरल छै। मडर मनेजर, राम्‍फल, भिक्‍खना सँगहि सिफैत, चना, दिलिफ लगाएत बहुटो लोग सभ गोल बृद्ध भए बैसल छल। द्वारक तिनुकातक घरक कोन्‍टा सभ भरल छल छौंडी आ जनिजाइत सभ सेँ आ सभक उत्‍सुकता पूर्ण आँखि केन्‍द्रीत छल पञ्चसभ दिस। साँझुक करिब साढें आठ बजयत होयत। गनपैत तस्‍तरीमे ‘सुपाडि, विडि, मोहलिसोंफ आ पान लैत आँगनसँ दुवार पर आएल आ सुभक वाट’ लागल। एम्‍हर मडर मौनताक भंग करैत बोलल” शुरु कर ने....की भैलेए....खातिर ई पञ्चैति बैसाओल गेल?’’ ओना सभ बुझैत छल जे बास्‍तविकताकी थिक? ई तँ बाट शुरु करैके औपचारीक घोषणा मात्र छल धनपैत बाजल ‘’हम दुनु भाय भिन होव चाहैत छी से बलु हमरा सभक’....सभ किछु बाँटिदिय। बडि सोक्‍त आ स्‍पष्‍ट भाषामे कहि गेल छोटका एम्‍हर राम्‍फल कनेक्शन गम्भिर होइत बाजल कहल जाइत अछि जे जतेक माथ ततेकबात तेँ बातक सुब मोथलक, चौहु तर्फ नजर दौडबैत- ‘’की हौ पञ्चसभ बढवाकेँ कतेक खेत जीवका देनसँ निक होयत। एम्‍हरसँ मनेजर बाजल‘’पाँच कट्ठा खेतमे की देवह बेटा बेटी सभक....ओना नहि देवह तैमो तँ नहि हो तै ने....से नहि....तीन कट्ठा आ ई छौडा सभी जेकर बाल बच्‍चा छै ओ सभक एक्‍के कट्ठाक....”। सभलोक अपन अपन हिसाबे आ बात ओझराइते गेल तावतमे मड़र पुछि उठल” क हौ!.... जिबछ मास्‍टर छे....सभ बरबैरक बाँटि दह दुनकेँ। बैसल सभ एक बेर जेना चौंक गेल कहल जाइत अछि जे जटेक माथ टटेकबा ते बातक खुब मोथलक, वातावरण कनेक गम्भिर बनि गेल आ ओइ गम्भिरक कारण छल बुढबाक ई गप। किएक तँ सभी सोचने छल जे ओ बाजत पाँच कट्ठा खेत आ छटा कोन्‍टाक की बाँटब कह....कहक बरु कमाकेँ खाएत आ ई सभ हमरा छाँटि देव। मुदा....ओकर विपरीत बुढबा आइ अपना हिस्‍सा सेहो नहि माँग‍लक।....कहलक जे हुनके बरोबरी बाँटि दहक/बुढबाकेँ ई बात सुनि नहि रहल गेल मनेजरक आ ओ जेना विलाड़ पठरुक झपैट लेना छौ आ बु‍ढ़िया ब‍करी भऽ देखैत रहैत हो। तहिने गम्भिर बाताबरणकेँ चिरैत बाजि उठल”। तुँ! तुँ कत जेबह।....केँ तोराकेँ राखत....भिख माँगब काल्हिसँ भिख....भिन भेलाक बाद ई बेटा सभ एकटा फूटलहो बाटि नहि देत भिखो माँगो बास्‍ते....”। बात पूरी नहि भेलछल ता गनपैत बाजि उठल”....अपन बाउकेँ हमहि राखब....हमहि राखब अपन बाउकेँ।....जिविका लेल आ नहि....मुदा हम अपन बाउकेँ बुड़हारिमे सेवा करब। एम्‍हर सभ आश्चर्य चकित भ गेल। एखन तक एहन पञ्चैति नहि भेल छल। आन पँचैति सभमे जिविको होइत जबरजस्ति लादहल जाइत छल बुढवा बुढियाके....ओकरे कोनो धियापुता पर आ....आ लाधनहार रहैत छल पञ्चसभ....ओहे पञ्चसभ एम्‍हर बुढवाकेँ आँखि नोरा गेल छल। ओम्‍हर....एक कातमे ठाढ़ धनपैतो तुरुन्‍ते बाजि उठल”नहि....हम राखब अपन बाउ केँ।....हम अपन बाउके बीन जी नजि सकैत छी....”। आब बुढबाकेँ याद परि गेल ओ दिन जखन बुढबा कतेक मेहनत सँ पालने छल ई दू बेटा। एक बेटिकेँ....। ओकरा सभक माय ते कनिएटामे छोडि चैल बैसल छलिथि एहि सँसारमे मुदा....मुदा बुढबा मास्‍टर माय आ बाप दुनुके भुमिका पुरा केने छल ओहि सभक लेल। से आब....आब अपन जीवनकेँ सफलताकेँ खुसिक नोर नहि रोकि सकल आ पानिक धार नाहित बनल बुढवाकेँ सिकुड़ल गालक चमडीकेँ बिचोबिचा वह लागल नोर एक सफलताक नोर। ३.भीमनाथ झा-चन्‍दा झा, हरिमोहन झा मिलिकऽ कवीशवर चन्‍दा झा महाप्रयाण कयलनि 1907मे तथा संसारमे हरिमोहनझाक आगमन भेलनि 1908मे। आधुनिक युगक प्रवर्तक अपन काज सम्‍पन कऽ लेलनि तँ ओहि काजकेँ आर विस्‍तार देबा लेल मानू ओहि लोक जाकऽ हरिमोहन झाकेँ एहि लोकमे पठा देलनि। कवीश्‍वर मैथिली साहित्‍य लेल बहुत-किछु कयलनि, की-की कयलनि तकरा दोहरयबाक प्रयोजन नहि। किन्‍तु, ई कहब एतऽ प्रासंगिक अछि जे ओ साहित्‍यकेँ जनताक बीच पसारि देलनि। पसारलनि तँ सभसँ अधिक विद्यापति, तकर दिनक बाद मनबोध सेहो, मुदा चन्‍दाझा तकरा ओलि-फटीक कऽचुनौटा बना देलनि। झाक समयमे मिथिलामे लेखनक भाषा बड़ अव्‍यवस्थित भऽगेल छल । एक दिस संस्‍कृत ह्रासोन्‍मख भऽ रहल छलैक। एहनामे मिथिलाक जे अपन भाषा छलेक मैथिली, तकरापर भारी आबऽ लगलैक। चन्‍दाझाक सोझाँ अपन मातृभाषाक सुच्‍चापनकेँ बचाकऽ राखब सभसँ बड़का चुनौती बनिकऽ ठाढ़ भऽ गेलनि। अपन भाषापर एहन विकट संकटक सामना हुनक पूर्ववतीकेँ नहि करऽ पड़ल छलनि जेहन कवीश्‍वरकेँ करऽ पड़लनि। जँ अपन भाषे नष्‍ट भऽ जायत तँ साहित्‍यक मोल भेनहि को? तेँ ओ मैथिली लेखनमे साहित्यिक मूल्‍यवत्तासँ कनेको कम नहि, कतहु-कतहु तँ अधिके भाषाक शुद्धतापर सावधान देखबामे अबैत छथि। ताहूसँ आगाँ बढि़कऽ ओ ईहो प्रमाणित करऽ चाहैत छलाह जे मैथिलीमे से सामर्थ्‍य छैक जे केहनो जटिल भावकेँ मौलिक भंगिमामे सहजेँ अभिव्‍यक्‍त कऽ सकैछ। यैह कारण थिक जे ओ स्‍थानीय लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्‍दक सौन्‍दर्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मै‍थिलीमे से सामर्थ्‍य लोकोक्ति-कहबी आ देशज शब्‍दक सौन्‍दर्य भरि मैथिली भाषाकेँ आर मोहक बना देलनि। सर्वथा विपरीत परिस्थितिमे मैथिलीकेँ माजि-चमकायस, ओकरा आर क्षिप्र बनाया एक दिस जनसामान्‍यसँ जोड़बाक आ दोसर दिस अन्‍य रचनाकारक समक्ष भाषाक आदर्श नमूना प्रस्‍तुत कऽ लेखन दिस प्रवृत्त करबाक काजक कारणहुँ, केवल ओहू टाक कारणहुँ, ओ युगप्रवर्तकक आसनक अधिकारी छथि। किन्‍तु से कयलनि पद्यक माध्‍यमे। ओ समये तेहन छलैक जे जनता गद्य दिस कनडेरियो नहि तकितैक। से ओ भाँफि लेलनि। साहित्‍यक माने होइक पद्य, जे बहुधा गीतक रूपमे अभिव्‍यक्‍त होइक। से गीत गहना बनि गेलैक, ओहन गहना, जकरा काजे-तिहारमे पहिरल जाइक। अनदिना कन्‍तोड़ीमे बन्‍द रहैक। चन्‍दाझा पद्यकेँ ‘गुआ-पन’बनौलनि, जे लोकक अमलमे आबि गेलैक। विषय चुनलनि सम‍सामयिक। लोक-आस्‍थाक अनुकूल रामायण लिखलनि। रामचरितमानसक प्रचार तहिया मिथिलामे ओतेक छलैक नहि। संस्‍कृत जनसामान्‍यसँ दूरे भऽ गेलैक। अंगरेजक दु:शासनसँ सीदित लोककेँ परितोष सेहो ओ देलथिन, महगीक मारिसँ पीडि़तक प्रति सहानुभूतियो देखौल‍थिन, धर्मक हानि दिस संकेतो कयलथिन। एतावता अपन समाजकेँ भगवत् भजनमे लागल रहि आस्त्कि जीवन जीवाक सन्‍देश देब ओ अपन कविकर्मक उद्देश्‍य बनौलनि। मुदा, हुनक कविता काज ओहिसँ बहुत बेसी कऽ गेल,मैथिली साहित्‍यकेँ नव दिशा दऽ गेल, नवयुगक आगमनक शंखनाद कऽ गेल। ई सभटा भेल काव्‍यक माध्‍यमे- पद्यमे, गीतमे। गद्यकेँ ओ छूलनि टा, तकर छविकेँ निखारि‍तथि, लोककेँ गद्योन्‍मुख करितथि- ततबा पलखति नहि भेटि सकलनि। हुनका जाय पड़लनि। ओ संसार छोडि़ चल गेलाह। आ, अपन ताही छूटल काजकेँ सम्हारबा ले’ लगले हरिमोहनझाकेँ पठा देलनि। 1929मे हरिमोहनझा ‘मिथिला’क माध्‍यमे मैथिलीमे उतरलाह आ मै‍थिलीकेँ साक्षर-निरक्षरक जीहपर चढ़ा देलनि, मिथिलाक घर-घरमे पहुँचा देलनि, ततबे नहि, एकर सौरभकेँ भारत भरिमे पसारि देलनि। ई चमत्‍कार कयलनि ओ गद्यक माध्‍यमे। लिखिकऽ टाल नहि लगौलनि ओ, मुदा लोकप्रियताक हिमालय ठाढ़ कऽ देलनि। अपन आ मैथिली-दुनूक लोकप्रियताक। चमत्‍कार भऽ गेल। एहन चमत्‍कार पूर्वमे कहियो ने भेल छल। विद्यापतिक चमत्‍कार लोक बुझैत-बुझैत बुझलका, हुनक गेलाक सय-सय वर्षक बाद बुझलक, मुदा हरिमोहनझाक चमत्‍कार तँ हिनक प्रवेश करितहिँ बुझऽ लागल। हिनक साहित्‍य समाजमे पसरल दू तरहेँ—एक तँ पाठकक व्‍यापक समर्थनसँ, दोसर तीव्र विरोधसँ। विरोध कयनिहार मिथिलाक सनातनी पण्डित रहथि, कर्मकाण्‍डी रहथि, जे हनिमोहनझा द्वारा अपन अन्‍धविश्‍वासपर होइत प्रहारसँ तिलमिला उठथि आ ओकर घनघोर विरोध करथि। विरोधक कारणेँ आर ई पढ़ल जाथि । आइ ओ विरोध कालक गालमे समा गेल अछि, आ हिनक साहित्‍य कालातीत मानल जाय लागल अछि। मुदा एकटा बात एखनो, किछु गोटे छथि जनिका कचोटैत छनि जे हरिमोहनझा अंगरेजी पढ़लनि तँ अंगरेजक समर्थक भऽगेलाह, ओकर सभ बात-विचार प्रिय भऽ गेलनि आ अपना लोकनिक सभ शास्‍त्र-पुराण फूसिक पुलिंदा बुझाय लगलनि। हुनका लोकनिकेँ दुख बातक छनि जे जतेक ई अपन ‘थाती’क खिधांस कयने छथि ततेक भरिसक कोनो साहित्‍यमे ओकर अपन साहित्‍यकार नहि कयने होयतैक। तहिना, जतेक ई देशक दुश्‍मन अंगरेजक बात-विचारक गुणगान कयने छथि ततेक क्‍यो अपन दुश्‍मनक रीति-रेबाजक प्रशंसा नहि कयने होयत। सभसँ पहिने तँ ई जे अंगरेजी पढि़योकऽ ओ अंगरेज नहि भेलाह, अंगरेजक रहल-सहन नहि अपनौलनि। सूट नहि पहिरलनि, सिगरेट-चुरुअ नहि पीलनि, शराब नहि छू‍लनि, घरमे गंगरेजी नहि चलौलनि। धोती-कुर्त्ता पहिरैत रहलाह, माछ-भात खाइत रहलाह, हास्‍य-विनोदक गप करैत रहलाह। दोसर, ओ मानैत छलहा जे अंगरेज तावते धरि हमर शत्रु छल जाधरि हमरापर शासन करैत छल। ओ भारत छोडि़कऽ चल गेल, अध्‍याय लागि गेलैक। शास्‍त्र, साहित्‍य, वैज्ञानिक बोध, प्रगतिक ललक-ककरो शत्रु नहि होइत छैक। ओ जँ शत्रुदेशोक छैक ओ नीक छैक तँ तकर प्रशंसा होयबाक चाही, तकर अनुकरण होयबाक चाही। ई नहि जे शत्रुदेशक थिक तँ केहनो नीक थिक, तकरा दिस ताकी नहि, ओकरा छूबी नहि। ओहि दिस नहि ताकब, ओकरा नहि छूअब तँ प्रगति कोना कऽ सकब, संसारक संग डेगमे डेग मिलाकऽ चलि कोना सकब? तहिना, अपन जे वस्तु अछि, शास्‍त्र-पुराण अछि, तकरा समयक निकणपर रगड़ब नहि, समकालीन सन्‍दर्भमे तकर पुनर्मूल्‍यांकन नहि करब तँ की होयत? ओहीमे ओझराकऽ खपि जायब, आगाँ बढि़ नहि सकब। अपन वस्‍तु खराप अछि, से के कहैत अछि? ओ तँ बहुमूल्‍य गहना थिक, ओकरा कन्‍तोड़मे जोगाकऽ राखू। सौंसे देहमे ओकरा छाडि़ लेब तँ अ‍कार्यक भऽ जायब। आन दूसत। हँसत। हरिमोहनझा बस एतबे कहलनि अछि, आ सभसँ स्‍पष्‍टतासँ‘खट्टर ककाक तरंग’मे कहलनि अछि। ओहिमे अपन किछु अन्‍धपरम्‍पराकेँ उघारिकऽ राखि देलनि अछि आ तकरासभकेँ आजुक सन्‍दर्भमे अनुपयोगी सिद्ध कयलनि अछि। मुदा, एहि पाछाँ अपन शास्‍त्र-पुराणपर अनास्‍था कि अपन संस्कारक प्रति अवहेलना-भाव नहि छनि। एहि बातक छनि- ‘’खट्टर ककाक तरंग’क द्वितीय संस्‍करणक भूमिकामे कऽ देलनि अछि। जखन पुछल जाइत छनि- ‘’खट्टर कका, एकटा बात कहू? अहाँ ई सभ भितरिया मनसँ करैत छिऐक कि केवल लोककेँ हँसाबक हेतु? ‘’ ताहिपर ओ कहैत छथिन- ‘’आब तोँ हमर सभटा भेद एक्के दिनमे बुझि लेबह? ’’हुनक मुँहसँ बहरायल ई ‘भेद’ शब्‍दे कहैत अछि जे हुनका ‘वेद’सँ विरोध नहि छलनि। तहिना, पश्चिमक आचार-व्‍यवहार सभटा नीके थिक-सेहो ई नहि मानैत र‍हथि। ओकरो खिल्‍ली उड़ौने छथि। पाशचात्‍य सभ्‍यता नीत अनेको व्‍यवहारपर कते तीक्ष्‍यण कटाक्ष ई कयने छथि, तकरो प्रमाण ‘खट्टर ककाक तरंग‘मे भेटि जाइत अछि। ‘खट्टर ककाक टटका गप्‍प’सँ निम्‍नलिखित उद्धरण प्रस्‍तुत कयल जा रहल अछि- ‘’खट्टर कका-भोजक अर्थ होइ छल ‘भरि पेट’। पार्टीक अर्थ‘भरि प्‍लेट’। अर्थात् एक फक्‍का दालमोट ओ एकटा सिंहारा। ई सिंहारा आबिकऽ सोहारी-तरकारीक संहार कऽ देलक। पहिने अढ़ेयामे चरण अखरिकऽ एक अढ़ैया मधुर आगाँ राखि दैत छल। आब अढ़ाइ चम्‍मच चीनी एक चुकरीमे दय ऊपरसँ गोमूत्र-रंगक काढ़ा चुआ दैत अछि। हम-हँ, आब तँ सभ ठाम ‘टी’..... खट्टर कका-हौ, यैह टी तँ सभक टीक काटि लेलक। पहिने सौजन्‍यक अर्थ छलैक अट्ठारहटा बाटी। आब केवल ‘टी’टा रहि गेलैक। आधुनिक सभ्‍यतामे ठोर दागि दैत छैक, भफाइत इन्‍होर लऽ कऽ। आचमनीयम् क स्‍थानमे चायमानेयम्। पहिने विवाहमे टाका भेटैत छलै। आब भेटे छैक ‘टा टा’। टी पियाकऽ टा टा कऽदेतौह। अर्थात् टिटकारी दऽ देतह। आइकाल्‍हुक सभ्‍यता बूझह तऽ ट अक्षरपर चलैत अछि। टोस्‍ट, टी, टेरेलिन, ट्रैंजिस्‍टर ओ टा टा। स्‍वाइत लोक टिटिया रहल अछि। हम-धन्‍य छी, खट्टर कका। अहाँकेँ तँ सभ बातमे विनोदे सुझैत अछि। उनटे गंगा बहा दैत छिऐक। खट्टर कका-हम बहबैत छिऐक कि आधुनिक महर्षि फ्रायडक चेला लोकनि बहबैत छथुन्‍ह? हुनका लोकनिक सिद्धान्‍त छैन्‍ह जे चोला छूटय, लेकिन चोली नहि छूटय। कदम्‍बसँ कदीमा धरि, सभ प्रतीके सुझैत छैन्‍ह। इन्द्रियनिरोधक स्‍थानमे गर्भनिरोध करै छथि। ‘मेन लाइन’ छोडि़ तेहन ‘लूप लाइन’ धैलन्हि अछि जे भावी पीढ़ी कूपमे जा रहल अछि। हम-वास्‍तवमे आब सभ बात उनटि रहल छैक। खट्टर कका-ताहिमे कोन संदेह। पहिने पुत्रजन्‍मक उत्‍सव होइत छलैक, आब जन्‍मनिरोधक उत्‍सव होइत अछि। आधुनिक नारी ‘पुत्रवती भाव’क स्‍थानमे ‘रूपवती भव, लूपवती भव’ आशीर्वाद चाहैत छथि। पहिने स्‍वामी स्‍त्रीक माँग भरैत छलाह। आब स्‍त्री स्‍वामीक माँग पुरैत छथिन्‍ह। स्‍वयं कमाकऽ। कतिपय ‘पति’ मे ‘तँ’ अक्षरक योग सेहो भऽ जाइत छन्हि। पहिलुक चेला चैला चिरैत छल, आब छैला बनल फिरैत अछि। छौँड़ा सभ छीट पहिरय लागल अछि, छौँड़ी सभ सूट कसय लागल अछि। चित्त-पटपर चित्रपट अंकित रहैत छैक। रानी सभ लीडरानी बनि गेलीह। राजनेत्री लोकनि अभिनेत्रीक कान काटि रहल छथि। पहिने अप्‍सरा होइ छलीह, आब अफसरा होइ छथि। ‘फैशन’ ओ ‘पैशन’ दिनदिन बढ़ल जाइत अछि। ..... तहिना, ‘अंगरेजिया बाबू’ नामक कथामे अंगरेजियतक भद्दा नकलपर जबर्दस्‍त उपहास कयल गेल अछि। अतएव ई कहब जे हरिमोहन झा अंगरेजी पढि़कऽ अंगरेजी सभ्‍यतापर लट्टू भऽ गेलाह आ अपन संस्‍कृतिकेँ निखट्टू मानि लेलनि-सत्‍यसँ दूर होयत। ई विशेषत: ध्‍यान देबाक बात थिक जे कवीश्‍वर भाषाकेँ मजबाक महत् काज जे पद्यक माध्‍यमसँ कयलनि, त‍करा हरिमोहनझा अपन गद्य द्वारा आश्‍चर्यजनक रूपसँ आकाश ठेका देलनि। ४.हेमचन्द्र झा दूटा कथा कथा बाट हेमचन्‍द्र झा रामाक बी.ए. (आनर्स)क परीक्षा खतम भऽ गेल रहैक। बिनु समय गमौने ओ तुरंत आगूक प्रतियोगिताक परीक्षा समक तैयारीमे जूटि जाई चाहैत छल। ऑनर्समे नाम लिखबितहि प्रतियोगिता परीक्षा सभक तैयारीमे लागि गेल रहता ओ। एक दूबेर बैंकक आ कर्मचारी चयन आयोगक लिपिक श्रेणी परीक्षामे बैसियो चुकल छल। आ तेँ प्रश्‍न पत्र सभक हाँज भाँज छलैक। संगहि पहिनेसँ विभिन्‍न पत्र-पत्रिका पढ़बाक कारणे हिम्‍मत कने खूजि गेल छलैक। हिम्‍मत केने छल जे यदि ढंगसँ एक-डेढ़ साल प्रतियोगिता परीक्षा सभक तैयारी कयल जाय, तँ कोनो ने कोनो लिपिकीय परीक्षामे उत्तीर्ण भेल जा सकैत अछि। तेँ अपन पहिल लक्ष्‍य लिपिकीय परीक्षा रखने छल आ बादमे किछु आर। तथापि शुरूआत कतऽ कयल जाय तेकर बाट नै देखाई छलैक। गामपर सँ परीक्षाक तैयारी असंभव छलैक, कारण एहिठाम एक तँ पत्र-पत्रिका भेटब मोशकिल छलैक, दोसर परीक्षा सभक फाँमौ भेटब दुर्लभ छलैक। आ तेँ कतौ बाहर रहब आनिवार्य छलैक। ओकर दोस्‍तो-महीम सभ सही प्रकरममे लागल छलैक। तथापि ओकर सभक लक्ष्‍य ‘पटना’मे रहि तैयारी करक छलैक, परन्‍तु दोस्‍त महीमसँ रामाक स्थिति किछु भिन्‍न छलैक। रामाक बाबूजी महेश बाबू पकिया गृहस्‍थ। बाप-पुरुषाक देल ९-१० बीघा जमीनक बलपर अ महेश बाबू अपन तीनू बेटा के बी.ए. करौने छलाह। दुनू जेठ बेटा बाहर छलनि आ अपन पायरपर ठाढ़ हेबाक उपक्रममे लागल छलनि। सभसँ छोट छलनि रामा। ओहो बी.ए. ऑनर्स कऽ चुकल छल। एहिबीच दूटा कनेदानो केने छलाह। एहि सभ द्वारे महेश बाबूक आर्थिक दशा नीक नहि छलैन। रामा एकरा अनुभव करैत छल आ तेँ बाबूसँ आगूक पढ़ाइक वास्‍ते पाई मंगबाक ओ हिम्‍मत नहि कऽ पाबि रहल छल। ऑनर्स परीक्षाक तुरंत बाद प्रतियोगिताक क्षेत्रमे भीड़बाक लक्ष्‍य पहिनेसँ बनने छल। दुर्गापूजामे बड़का भैया लग एहि संबंधमे प्रस्‍तावो रखलक, परंतु आश्‍वासनक बात तँ दूर ओ कहलनि जे एहि प्रतियोगिता परीक्षासँ किछु ने होयत, कतौ नोकरीक जोगार करू। संभवतः- बड़का भैयाक अपन व्‍यक्तिगत अनुभव रहनि। कारण ओहो एहि तैयारी सभमे दु तीन साल गमौने छलाह आ कतहु नहि चयन हेबाक स्थितिमे अंततः प्राईवेट कंपनीमे कलकत्तामे नोकरी पकड़ने छलाह। मझिला भैया बी.कॉम. केलाक बाद 5–6 महीना पहिने पूर्णत: स्थिरो ने भेल छलाह। एहन स्थितिमे बड़का भैयासँ मददिक आशा केनाई व्‍यर्थ छल। आब एक्के टा रास्‍ता छल जे कोनो शहरमे रहि ट्यूशन करय आ अपना बलबूतापर प्रतियोगिता सभक तैयारी करय। एहि लेल रामा तैयारो छल, परंतु शुरूआत कतऽ करय से नहि फुराईत छलैक। इंतजार छलैक फगुआक, जाहिमे ओकर मसिऔत भाय आबयबला छलथिन। ओकर मसिऔत पटने रहैत छलाह आ संजोगसँ ट्यूशन आदि सेहो करैत छलाह। फगुआमे मसिऔत भाई रमणजी गाम एलखिन। फगुआ प्राते रामा हुनका लग पहुँचल आ अपन सभटा समस्‍या रखलक। रमण जी पूर्ण सहायताक आश्‍वासन देलखिन आ कहलखिन जे हम पुन: मईमे गाम अबैत छी तँ हमरा संग पटना चलब। तथापि ओ कहथिन्‍ह “पटनामे रहनाई। खेनाईक खर्चौटा बेसी छैक तेँ ओतय बेसी ट्यूशन करय पड़त। लिपिकीय परीक्षाक तैयारीक लेल पटना रहब आवश्‍यक नहि छैक। एकर तैयारी मधुबनीमे रहिकेँ सेहो कयल जा सकैत छैक। तथापि अहाँ फेरसँ सोचि लिअ आ मईमे हमरा संग चलू”। मसिऔतक उक्‍त सुझाव रामाकेँ ठीक लगलैक। मधुबनी रहि गामोक संपर्कमे रहि सकैत छल आ जरूरत पड़लापर गामो आबि सकैत छल आ पटनासँ गाम अवैमे पर्याप्त समय आ पाई लगैत छलैक। संगहि अपन दुनू भायक बाहर रहने आ स्‍वयं पटना रहिने बाबूजी सेहो एसगर भक् जेताह, ई सभ सोचि ओ अपन पटना रहबाक प्रोग्रामपर फेरसँ सोचय लागल। तथापि पटना नहि रहत, तँ कतय रहत ? ई प्रश्‍न एखन धरि अनुत्तरित छल। एही ऊहापोहमे अप्रैलक महीना लगिचा गेलैक। मईक अंत धरि पटना जयबाक छैक रामाकेँ आ मधुबनीमे शुरूआत करक छैक। ऑनर्सक दौरान मधुबनीमे रहि चुकल छल तेँ सभटा देखल सुनल छलैक। बस समस्‍या छलैक जे शुरूआतमे कमसँ कम एकोटा ट्यूशन भेटि जाईत तँ नीक रहैत। बादमे आसे ट्यूशन भेटि जयबाक संभावना रहैत छैक। ट्यूशन मात्र अपन गुजर-बसर जोग करय चाहैत छल। मेसमे खयबाक पक्षमे छल ताकि भानस भात बनेबाक समय बचि जाय। ट्यूशन करैत अध्‍ययन जारी रखनाई कने कठिनाइ अवस्‍स छलैक तथापि दोसर कोनो उपाईयो तँ नहि छलैक। एही सभ उधेर-बुनमे एक दिन दलानपर बैसल छल कि तखने मंगनूकेँ अबैत देखलक। मंगनू ओकरे गामक एकटा छात्र छल आ एखन मधुबनीमे बी.एस.सी.मे पढ़ि रहल छल। मंगनू रामासँ तीन-चारि साल जूनियर छलैक आ मैट्रिक परीक्षाक समयमे रामा ओकरा पर्याप्‍त मददि कयने छलैक। से मंगनू रामाकेँ दलानपर खाली बैसल देखि ओतय आयल। कुशल मंगल भेलैक आ फेर शुरू भऽ गेलैक पढ़ाई-लिखाईक मुद्दा। रामा सविस्तार मंगनूकेँ अपन गप्प बतेलक। पटना जयबाक संबंधमे मसिऔत भायक विचार सेहो बतेलक आ अपन प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीक शुरूआत मधुबनी या दरभंगासँ करक अपन मंशा प्रकट केलक। मंगनू मैट्रिकक समयमे रामा द्वारा कयल गेल मददिकेँ बिसरल नहि छल। ओ प्रकटत: बाजल- “हम बी.एस.सी.मे पढ़ैत मधुबनीमे ट्यूशन करैत छी आ एतबा आमदनी भऽजाईत अछि जे बाबूजीसँ हरदम नहि माँगय पड़ैत अछि। अहाँ तँ हमरा पढ़ेने-लिखने छी। जँ हम ट्यूशनसँ अर्जितकेँ सकैत छी तँ अहाँ किएक ने कऽ सकैत छी। अहाँ शीघ्रे मधुबनी आऊ आ अपन शुरूआत करू। हम करब अहाँक लेल ट्यूशनक जोगार”। असमंजसक स्थितिसँ दू-तीन महीनासँ गुजरवला रामाकेँ जेना एकाएक अपन बाट भेटि गेलैक। ओ तुरंत अपन सहमति देलक। लगेमे रामाक बाबू बैसल छलथिन। दुनू गोटाक गप्प सूनि ओ बजलाह, “जहन तों स्‍वयं ट्यूशनसँ आगूक पढ़ाई जारी राखय चाहैत छह तँ जा धरि तोँ पूरा ट्यूशन नहि पकड़बह, हम तोरा मददि करबह”। बाबूजीक एहि बातसँ रामाकेँ आर सम्‍बल भेटलैक। ओ शीघ्रे मधुबनी गेल, डेरा डंटाक भाँज-पता लगेलक आ सभ सामान लऽकऽ मधुबनी पहुँचि गेल। मंगनू ओकरा तुरंत ट्यूशन तँ नहि दे सकलैक, तथापि कहलकै जे अहाँ पहिने एकटा पब्लिक स्‍कूल पकड़ू। ट्यूशन अनेरे भेटि जायत। रामा एक-दू दिनक भीतर एकटा पब्लिक स्‍कूल पकड़लक। शीघ्रे ट्यूशनो भेटि गेलैक। शुरूआत नीके जना भऽ गेलैक। ता कर्मचारी चयन आयोगक लिपिकीय परीक्षा‍क लिखित भागमे पहिले चांसमे सफलता भेटि गेलैक। ओकर खुशीक ठिकाना नहि रहलैक। सभटा खबरि ओ गाम आ भैया सभकेँ कयलक। ओकर बड़का भैया पहिने चांसमे भेटल ओकर सफलतासँ प्रभावित भेलाह आ पाई-कौड़ीक मददि देब शुरू केलनि। फेर की छल रामाक आगू बाट अनायासे खूजैत चलि गेल। तिथि 31/5/05 फरीदाबाद कथा अग्रसोची हेमचन्‍द्र झा आई महेश बाबू अपन तीनू बेटा अजय, विजय आ दुर्जयक संग कोनो विशेष मुद्दापर गप्प कऽ रहल छथि। गप्‍प कखनो फुसुर-फुसुर होईत अछि तँ कखनो तेज भऽ जाईत अछि। ओना महेज बाबू पकिया गृहस्‍थ। अपन गृहस्‍थीक बलपर तीनू बेटाकेँ पढ़ेलनि–लिखेलनि आ तीनू बेटीक वियाहो केलनि। सदिखन गाम घरसँ जूड़ल रहयवला महेश बाबू पहिले बेर दिल्‍ली अयलाह अछि, तीनू बेटा दिल्‍लीएमे छनि। अपने दुनू प्राणि गाममे छथि। तीनू बेटी सासुर बसैत छनि। खेत पथार बटाईपर छनि, तथापि ततेक भऽ जाईत छनि जे कोनो बेटासँ कहियो मंगबाक पयोजन नहि पड़ैत छनि। गाममे सभ कहैत अछि जे महेश बेस सुखितगर आदमी अछि, एकर परिवार बेस नीक छैक, सभ अपन पायरपर ठाढ़ छैक------आदि। आ तेँ महेशबाबू गाममे निश्चित छलाह। कहिया दिल्‍ली बेटा सभसँ भेंट करक लेल या धीया पुता सभकेँ देखबाक लेल ओ नहि अयलाह सालमे एक-आध बेर बेटे सभ गाम जाईत छलनि। तथापि एहिबेर मुद्दे से फँसि गेलनि जे दुर्गापूजाक बाद ओ अपन एकटा गौंआक संग दिल्‍ली अयलाह। सामने दियावाती या छठि रहबाक बावजूदो ओ एलाह। यद्यपि तीनू बेटामे थोड़-बहुत मतांतर रहैत छल, परन्‍तु ओ प्राय: प्रकट नहि होईत छल। मुदा एहि बेर फागुनमे अजयक जेठकी बेटीक कनेदानमे से नहि भेल। गप्प-शप्पक क्रममे नहि जानि कोन गप्‍पपर मझिली पुतोहु आत्‍मदाहक प्रयास केलकनि। यद्यपि दिनक समय छल आ कनेदान-दुरागमन रहबाक कारणे बेटियो सभ छलनि तेँ बात आगू नहि बढ़लैक आ मामिला थमि गेलैक। गाममे ई बात जंगलक आगि जेकां पसरि गेल आ देखैत-देखैत पूरा गामक लोक जमा भऽ गेल। महेश बाबूक सभटा संचित प्रतिष्‍ठा आ सुख-चेन जेना छनहिमे देखार भऽ गेलनि। कनिये दिनक बाद बेटा सभ सपरिवार वापस चलि गेलनि आ तीनू बेटियो अपन-अपन सासुर निचेनसँ आब महेश-बाबू पूरा प्रकरनपर विचार करय लगलाह जे एना भेल किएक। गाम-घरमे सेहो लोक सभसँ विचार-विमर्श केलनि ई बुझवामे भांगठ नहि रहलनि जे सभक जड़ि छैक पाई। मास्‍टर साहेब तँ प्रकटत: कहियो देलखिन जे अहाँ अपन जीबैत पाईवला झंझटि किएक ने फरिया दैत छियैक? वस्‍तुत: ६-७ साल प‍हनि महेश बाबू पाही पट्टीक एकटा एक बिघवा खेत बेचलनि। अपनासँ आब ओकर रखवाली कयल पार नहि लगैत छलनि, तेँ ओकरा बेच देलनि। किछु पाईं तँ जमीनमे फँसेलाह, किछु जमाय सभ लऽ गेलखिन आ बाँकी ४०,००० फिक्‍स कऽ देलाह। ओही साल अजयक बेटाक मूड़न जमा भेल। अजय येन-केन प्रकारेण दुनू छोट भायकेँ बुझा देलथि जे बैंकमे पाई राखलासँ की फायदा होयत। ई पाई हमरा दऽ दिअ। हम शेयर बजारमे एकरा लगायब आ गामक बाँकी सभ काज हमरा जिम्‍मामे रहत। हम एक्‍कहि सालमे एकरा दोबर-तेबर कऽ लेब आदि। परंतु से भेल नहि। कारण जे हो। दू-तीन साल बीतलाक बाद अजय राम कहानी शुरू केलनि जे हमरा शेयरमे घाटा लागि गेल। तथापि सभ सब्र केने रहल जे की पता शेयरक दाम बढ़ि जाई। परंतु ई की? एक दिन गप्प शप्पक क्रममे जेठकी दियादनी मझिली दियादनीकेँ कहलथिन्‍ह जे अहाँ सभ आब ओई पाईकेँ बिसरि जाईयौ। अहाँक भैंसुर घरक लेल ई केलथि ओ केलथि.....। आ एही मुद्दापर कनेदान आ दुरागमन संपन्‍न होईतहि उक्‍त घटना घटल। महेश बाबू शीघ्रातिशीघ्र एकर समाधान करय चाहैत छलाह। तथापि आषाढ़- सोनमे गामसँ बहरेताह कोना, तेँ दुर्गापूजाक बाद दिल्‍ली अयलाह, खास कऽ कऽ एहि मामिलाक पंचैती करक लेल। पहिने पहुँचलाह अजयक डेरापर, ओहिठाम हाँज-भाँज लेलनि ,परंतु ई नहि कहलनि जे एहि काजक लेल आयल छी। विजयक डेरा लगे छल। ओतहु गेला आ समटा बात बुझलनि। भरदुतिया दिन पहुँचलाह दुर्जयक डेरा। अजय आ विजय सेहो रहनि संगमे। फरिछौढ भऽ सकैत छल ओही दिन परंतु दुर्जयक बिनु हाँज-भाँज लेने ओ गप्प कहब उचित नहि बुझलाह। दुर्जयकेँ स्‍पष्‍टत: कहलनि जे हम एहि काजक लेल आयल छी आ एकर समाधानक रस्‍ता देखौलेन से तोँ ओई ४०,०००मे हिस्‍सा नहि लहक। हम कहि सुनिकेँ विजयकेँ किछु दिया दैत छियैक आ एहि तरहेँ हमर इज्‍जति प्रतिष्ठा बचा दय। चूंकि गप्प इज्‍जत प्रतिष्ठाक छल, दुर्जेय मानि गेल आ रवि दिन सभ भाईक बजाहटि भेल एहि लेल। पहिने तँ अजयक सामनेमे प्रस्‍ताव भेल जे तोँ ४०,०००×२ = ८०,००० केँ तीनू भाईमे बाँटि देहक। परंतु अजय तर्क रखलक जे हम एहि बीच गाममे अलान-फलान खर्च केलहुँ आ तेँ हम पाई नहि देब। संगहि ई परिवारक पहिल कनेदान छलैक, एहिमे हिनको सभकेँ शेयर देबय पड़तनि आ ई सभ शेयर नहि देलाह, तेँ हिनका सभक हिस्‍सा कटि गेल। तर्क सूनि सभ अकक् रहि गेल। दुर्जेय स्‍वयं कनेदानमे प्रस्ताव रखने छल जे अहाँक की पोजीशन अछि से कहू तँ हमहूँ किछु इंतजाम करैत छी। अजय मना कऽ देने छलाह। परंतु हुनका की बूझल छलनि से ओहि सझीवा पाईमे सँ हुनक हिस्‍सा कटि गेलनि। तहन अजयकेँ कहल गेल जे ई ठीक नहि केलह तँ ओ दोसर प्रस्‍ताव रखलनि जे अहाँ गाम जाउ आ खेत बेचिकेँ दुनू भाईकेँ ४०–४० दऽदियनु। ई प्रस्‍ताव तँ किन्‍नहु नै मानल जा सकैत छल। पर्याप्‍त कहा-सुनीक बाद अंतत: अजय २०,००० देबपर सहमत भेलाह आ ई फैसला भेल जे ओ २०,००० विजयकेँ दऽ देथिन। एवं प्रकारेण महेश बाबू एहि मुद्दासँ जान छोड़ेलनि। एहि सभ घटना क्रममे अग्रसोचीक बुद्धिक तारीफ करय पड़त। कनेदानसँ ६-७ साल पहिने योजना बद्ध ढंगसँ समटा सझेवा पाई अपन कब्‍जामे करब आ कनेदानक बाद हिस्‍साक नामपर काटब, वस्‍तुतः- हुनक धूर्तता आ चालाकीक उत्‍कृष्ट उदाहरण छल। अग्रसोची सुखी रहलाह। बिनु कोनो हुज्‍जतिकेँ पहिल कनेदान निकलि गेलनि। सभसँ घाटामे रहल दुर्जय। ओकरा हाथ किछु नै एलैक। लेकिन ओ पर्याप्‍त खुश छल जे सभटा पहिने देखार भऽ गेलैक। अन्‍यथा भाईमे सभसँ छोट रहने ओ सभ दिन सभक मददि करैत रहितय आ अपना बेरमे कियोनै आबि तैक मददि करय आ तटबक पछतेलासँ की लाभ होईतैक? तिथि 2/6/05 फरीदाबाद १.सुभाष चन्द्र यादव-पति-पत्नी सम्वाद २.मानेश्वर मनुज-‘जीत’३.(सं. सा. सं)नागेश्वर लाल कर्ण ४.डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी-विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग सुभाष चन्द्र यादव पति-पत्नी सम्वाद (एहि कथामे पहिल सम्वाद पति आ दोसर पत्नीक अछि।) (एहि नाटकमे पहिल पात्र पति आ दोसर पात्र पत्नी अछि।) यै, सुनै छिऐ? हमरा कान छै जे सुनबै? कखैन सँ हाक दाइत रही! की छिऐ? चाह बना रहल छी? बैठल लोग केँ एहिना चाह सुझै छै! करै की छी? सुतल छिऐ! तमसाएल छी की ? नै, हम किए तमसाएब! तखन एना किए बजै छी? अहाँ बहीर छी की? से किए? आबाज नै जाइए? कोन आबाज? सिल्ला के? अरे अहाँ किछु पीस रहल छी? तब ने बैठल-बैठल गीरब? की पीस रहल छी? मसल्ला, अओर की पीसब? अपन कप्पार! धुर, अहूँ कथी-कथीमे लागल रहै छी। चाह बनाएब से नै? अहीं कोन उनटन करै छी! हरदम कहब; चाह बनबै छी? चाह बनबै छी? हम एहिसँ अकच्छ भऽ गेल छी। तखन छोड़ू। छोड़ू किए? बना दै छी। लेकिन पीसल होएत तब ने! बेस, जे अहाँक इच्छा! २.मानेश्वर मनुज ‘जीत’ लोक गाममे रहए वा शहरमे सूर्य आ चन्‍द्रमा ओहिना उगैत छैक आ डुबैत छैक। सूर्योदय होइत छैक आ सूर्यास्‍त होइत छैक। साँझ होइत छैक आ भोर होइत छैक। दुपहरिया रौद आ बसातमे कोनो अंतर नहि होइत छैक। मुदा सुविधामे अंतर होइत छैक। विजुरी आ महल देखि गामसँ शहर आएल लोक छगुन्‍तामे पड़ि जाइत अछि। छगुन्‍तामे रघुवीर पड़ल छल। छगुन्तामे कमल सेहो पड़ल छल। जहाजक ड्यूटी ओहीमे सूतब–बैसब। अहीमे सभ नित्‍य क्रिया–कर्म। मुदा स्त्रीक दर्शन दुर्लभ। कहियोकाल केओ ककरो घुमबऽ–फिरबऽ अबैत छल तँ सभ देखिते रहि जाइत छलैक। कैसेट चलैत रहैत छलैक। बीच–बीचमे एनाउन्‍समेन्‍ट होइत छलैक। ककरो बजाएल जाइत छलैक तँ ककरो काजमे लगाएल जाइत छलैक। ड्यूटीकेँ बादो केओ कोनो काज करऽसँ मना नहि कऽ सकैत छलैक। तैँ जहाजसँ बाहर नि‍कलि घुमबऽ–फिरबऽ आवश्‍यक छलैक। कमल जहाजसँ निकलल आ मुम्बइयक महल, मुम्‍बइयक सड़क आ मुम्‍बइयक स्‍त्री–शरीरकेँ देखैत आगाँ बढ़ैत‍ जा रहल छल। मस्‍तीमे चलि रहल छल। कखनो रिजर्व–बैंकक सामने पार्कमे बैसैत छल तँ कखनो म्‍यूजियमक सामने बस–स्‍टेन्‍डपर कृष्‍ण चन्‍दरक कथाकेँ याद करैत छल तँ कखनो लव–प्‍वाइन्‍टपर बैसि लघु–कथा पढ़ैत छल। एक नजरि लघु–कथापर तँ दोसर नजरि अगल–बगलमे बैसल युगल जोड़ीपर रहैत छलैक। युगल जोड़ी पहिने समुद्र दिस पीठ कऽ कऽ बैसल छल आ जेना जेना सूर्य समुद्रमे समाएल जाइत छल युगल जोड़ी समुद्र दिस घुमल जाइत छल। सूर्य डुबल। युगल जोड़ी समुद्र दिस घुमल। आगाँ बढि़ नमहर–नमहर पाथरपर जा बैसल। जतए दस–बीसटा प्रेमी प्रेमिका ओतै ओकर व्‍यवसाय करऽ–वाली सेहो। के कहैत अछि प्रेम न बारी उपजे प्रेम न हाट बिकाय। जकरा प्रेम करऽ नहि अबैत छैक सेहो प्रेम कीनि सकैत अछि। कमल मंटोक कथा पढ़ि रहल छल। सभसँ प्‍यरगर बच्‍चा ओ अछि जे एखन धरि जमीनपर पैर रखलक नहि अछि। सभसँ प्रिय बात ओ अछि जे हमरा अहाँक कानमे एखन कहक अछि। जाहि हेतु हमर ठोर फुस–फुसा रहल अछि; किन्‍तु एखन धरि अहाँसँ कहलहुँ नहि अछि। बगलमे दूटा किशोरी बड़ स्‍वभाविक ढंगसँ गप्‍प–सप्‍प कऽ रहलि छलि, जेना दूटा सुग्‍गा वेदक चर्चा करैत होए जे:– वेद स्‍वयं प्रमाणित अछि कि एकरा प्रमाणित करक प्रयोजन छैक। किशोरी गप्‍प कऽ रहलि छलि जे प्रेम करब नीक बात छैक कि अधलाह। एक ओकर जवाब स्‍पष्‍ट शब्‍दमे जानऽ चाहैत छलि मुदा दोसर ओकरा सवालक जवाब किछु छिड़िआएल शब्‍दमे दैत छलि। पहिने ओ बाजलि:–प्रेम एक अधलाह काज छैक। फेर किछु प्रश्‍न कएलाक बाद बाजलि:–किछु सीमा धरि रहलासँ प्रेम एक नीक काज छैक। आ अंतमे एहि बात पर आएलि जे प्रेमसँ बढ़ि कऽ जीवनमे छैहे की। जी भरि कऽ प्रेम करू। अइमे कोनो पाइ खर्च होइत छैक। दुनियाकेँ अहाँ कने प्रेमक नजरिसँ देखियौक। दुनियोँ अहाँकेँ प्रेमक नजरिसँ देखत। प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय, राजा–प्रजा जेहि रूपें बँटि–बाँटिकेँ खाए। पहिल पुछलकैक:– देखला आ सुनलासँ प्रेम भऽ जाइत छैक; मुदा कि एतवासँ संतुष्टि भेटैत छैक आदमीकेँ? एना कऽ पहिल दोसरासँ एकपर एक सवाल करैत छलि आ चालाकीसँ दोसरक पेटक बात निकालि नोट कएने जा रहलि छलि। सभ बात ओ दोसराक पेटसँ निकाललाक बाद ठहक्का दऽ कऽ हँसऽ लागलि आ दोसर नम्बरक किशोरीसँ कहलक:तेँ नीक जकाँ अइमे रमलो छाँह आ हमरासँ सभ बात छुपबैत रहलाँए– हाँ। आब सत्त कह जे तोँ ककरासँ प्रेम करैत छाँह आ एखन तक तोँ कहाँ धरि पहुँचलाँ –हाँ?’’ कमल पाँछौ घुरि तकलक। सूर्य बाँस भरि पानिमे चलि गेल छलैक। कमल आ ओइ दुनू किशोरी छोड़ि सभ केओ अप्‍प्‍न मुँह समुद्रक अन्‍हार दिस कऽ लेने छल आ युगल जोड़ी–सभ एक दोसराकेँ कसि कऽ पकड़ि रहल छल। कमल दुनू किशोरीक बात सुनि रहल छल; मुदा जखन ओ दुनू बात करिते ओतँसँ उठि गेलि तँ ओहो उठि कऽ सड़कक कात पार्कमे जा बैँचपर एसगर बैसि गेल। सामनेक बैँच सभपर कतौ दू–एकटा स्त्री आ दू–तीनटा पुरूषक एक संग बातचित कऽ रहल छल। सामने एक ठाम एक पुरूषक संग दूटा स्‍त्री  छलैक। दुनू–स्‍त्री पुरूषक दुनू कात एक संग घासपर बैसल छलैक। कमलकेँ याद अएलैक गामक ओ गप्‍प। जखन ओ परिक केश पकड़ैत छल तँ शशि टीक पकड़ि लैत छलैक आ जखन परिकेँ छोड़ि शशिक केश पकड़ैत छलि तँ ओम्हरसँ परि बाँहि पकड़ि घिचैत छलैक। ताहिपर ओ खिसिया कऽ परिक गाल पकड़ैत छल। तखन शशि गरदनि पकड़ि लैत छलैक। एना कऽ दुनू ओकरा उछन्‍नर दैत छलि ताहिपर ओ खिसिएबाक नाटक कऽ दुनूक अंग–अंग संग खेलौड़ करैत छल। एक बेर परिक हाथ मचोड़ि जमीनपर खसाए देने छल आ हाथ–दुनू पकड़ि लेलकैक। फेर परिकेँ छोड़ि शशिकेँ जमीनपर ओघरा टाँग पकड़ि घिसियाबऽ लागल छल। खेल खतम हेवाक नाम नहि लऽ रहल छलै। गाल बाँहि कि आब ओ एका–एकी दुनूक छाती तक चलि जाइत छल। परि हारब नहि सिखने छलि। मुदा शशि बीच–बीचमे तंग आबि परिसँ मदैत मँगैत छलि आ परि शशिकेँ छोड़बऽ जाइत छलि, मुदा स्‍वयं ओकरा हाथमे आबि जाइत छलि। परिकेँ पीठ भरे जमीन पर लेटाए दुनू हाथ पकड़ि कि दुनू पैर पकड़ि घिचलासँ ओकरा साइत क्रँलिंग करऽमे नीके लगैत छलैक। पकड़ि कऽ घिचलाक बादो ओ हारि मानऽ–वाली नहि छलि आ तीनू लगातार हँस्‍सीक आ आनन्‍दक चरम उत्‍कर्ष तक बढ़ल जा रहल छल। शशि आ ओ पूर्ण परिचित छल। ओकरा दुनुक बीच एहि तरहक कोनो लज्‍जयाक बात नहि छलैक। ओ शशिकेँ संग औपचारिकता करैत छल आ चाहैत छल जे परि हारि मानि ओकर चोराएल चप्‍पल दऽ दियाए। एहि बेर ओ परिक देहपर पड़ि ककुड़ा बना शक्तिविहीन कऽ देलक। शशि चिचिया उठलि:– अहिरे दैवा। बीच अङनामे। जुलुम भऽ गेलै। मुदा नहि। परि साड़ीकेँ धोती बना अपना शरीरकेँ पूर्ण सुरक्षित रखने छलि आ एना जाँघमे केँच लगाए देलाक बादो ओ जीतऽ नहि देलकैक आ अंतमे वैह हारि मानि पाएरक चप्‍पल ओतै छोड़ि चलि देलक। दूनू जीतऽ नहिए ने देलकैक। ओकर जिद्द चकनाचूर भऽ गेलैक रातिमे जखन दुनुक मिलन अपना घरमे भेलैक तँ शशि पुछलकैक: अपना घरमे भेलैक तँ शशि पुछलकैक: आइ बीच अङनामे अहाँ परिकेँ किछु बाँकी नहि रखलियैक”। पार्कमे तहिना एक पुरूष आ दूटा स्‍त्री प्रेमालाप कऽ रहल छल। पुरूष जखन एककेँ पकड़ैत छल तँ दोसर छोड़बैत छलैक आ जखन दोसरकेँ पकड़ैत छलैक तँ पहिल छोड़बैत छलैक। एहि क्रममे पुरूष दुनुक अंग–अंग तक जाइत छल आ तहिना दुनू–स्‍त्री सेहो। कमलकेँ ओइ तीनूक खेल देखैत देखैत आकच्‍छ लागि रहल छलैक मुदा ओकर सभक खेल समाप्‍त नहि भऽ रहल छलैक। प्रति–पल उमंग–उत्‍साह आ उत्तेजना नव अनुभूतिक हेतु आगाँ बढ़ले जा रहल छलैक। एक बेर एक दिस मुड़ल फेर दोसर दिस। एक स्‍त्री छोड़बक बहन्‍ने अपना दिस घिचैत छलि आ जखन देह–स्‍पर्शक आनन्‍दक चरम–उत्‍कर्ष दिस जाइत देखाइ–दैत छलैक तँ दोसर ईर्श्या–वश ओकरासँ पुरूषकेँ हेट करैत छलि आ अपना दिस घीचि लबैत छलि। ई क्रिया त्‍वरित गतिसँ लगातार दोहराएल जा रहल छल, मुदा समाप्‍त नहि भऽ रहल छल। कमल सोचि रहल छल जे ई सभ एतँसँ कतऽ जाएत से देखी। कोनो घर दिस जाएत कि होटल दिस जाएत कि गाड़ीमे बैस चलि जाएत। मुदा समय जखन बहुत आँगा बढ़ि गेल छलैक आ ओ सभ ओतँसँ उठि नहि रहल छल तँ स्‍वयं सभ प्रश्‍न ओतै छोड़ि–अपना जहाजक लेल रस्‍ता नपलक। काल्हि सेलिंग छलैक। दू मास तक मुम्‍बइयक सड़क, मुम्‍बइयक महल आ अत्‍याधनिक–फैशनसँ रंगल–ढ़ंगल युगल–जोड़ीकेँ नहि देख सकत। मुदा नहि जहाजक सेलिंगक प्रोग्राम करीब पन्‍द्रह बीस दिनक हेतु स्‍थगित भऽ गेलैक। आन दिन ओ कोनो साहित्यिक पत्रिका हाथमे लेने एसगर घुमैत छल। कतौ कोनो गाछ तर बैसैत छल कि लगातार दूर–दूर चरि चलिते रहैत छल। आइ रघुवीर आ ओकर संगी इरफान कमलकेँ संग कऽ लेलक, ओतँ हेतु जतँ ओ दुनू बरमहल जाइत छल आ एक बस मात्र ओकरा दुनूकेँ सही जगहपर उतारि दैत छलैक। कोठापर सोफा लगाएल छलैक। तीनू बससँ उतरि सीढ़ी चढ़ल आ सोफापर जा बैस गेल। देह–श्रमिक सजि–धजि कऽ देह सुन्दरी बनलि छलि। एक–एकटा रघुवीर आ इरफानक बगलमे बैस गेलि। ओ सभ पूर्व परिचित छल। अपना प्रोग्रामक अनुसार एक–एकटाकेँ हाथ पकड़ि दबौलक। यानी आइ तोरा चुनि लेलियौक। आ इशारा केलकैक आँगा बढ़क हेतु। नम्हर हाँलमे नेवार मढ़ल लोहाक खाट लगाएल छलैक। थोड़ेक काल ओ दुनू गप्प–सप्प केलक आ नर्स जकाँ मरीजकेँ देखक हेतु खाटकेँ चारू दिससँ डंटा ठाढ़ कऽ परदा लगौलक  रघुवीर एक खाटक गद्दापर जा बैस गेल। इरफान सेहो दोसर खाटक गद्दापर जा बैस गेल। दुनू देह–सुन्‍दरी रति–क्रियाक हेतु खाटपर चलि गेलि। थोड़ेक काल गप्‍प–कएलक आ फेर गद्दापर पड़ि रहल। रघुवीर ओकरा देहक संग खेलब शुरू कऽ देलक। इरफान सेहो दोसरक संग आइ नव अन्दाज आ उमंगसँ खेलब शुरू कऽ देलक। दुनू दिलक मरीज बराबर ओतँ थोड़ेक शांतिक एहसास लैत छल। इरफान अपना उद्वेगक संग आतुर छल मुदा ओ, सीमा अप्पन मूड़ी परदासँ बाहर निकालि सिगरेट पीबऽ लागलि। ओकर गरदनि सेहो खाटसँ बाहर लटकि रहल छलैक। कमल ओम्‍हरे बैसल छल। ओ पूछि बैसलैक:– भऽ गेलैक? “तँ जवाब देलकैक–नहि।” कमल ओतँसँ उठि सीढ़ी दिस बढ़ल जे निच्चाँ उतरि आब बसे–स्‍टेन्‍डपर इन्‍तजार कएल जाए। ताबे एक देह–श्रमिक निच्चासँ उप्‍पर आबि रहल छलैक। छोट–गोर–नार मुदा कठगरि। तनल छाती देखि कमल अप्पन हाथ लपका जकाँ बढ़ा देलक आ आधा सीढ़ीसँ निच्चाँ उतरऽ लागल कि ओ ओकरा माथपर उपरेसँ हाथ मारलक। ताबे ऊपरसँ दुनू मालती आ सीमा आबि गेलैक आ पुछलकैक: की भेलौक गई? “तँ कहलकैक सीढ़ीपर पटसँ लपकि लेलकाए। पइसा बचा कऽ राखत आ मगनीमे मजा लेत”। इरफान आ रघुवीर ताबे बाथरूममे साफ ----------सफाई कऽ रहल छल। सीमा कहलकैक: हँम तँ एही–लाए एकरा निच्चाँसँ ऊपर बजौलियैक। हम सभ तँ अहीँ सभक छी ने। एतँ किछु करू अपराध नहि मानल जाएत। बाहरमे ई सभ अपराध छैक। कतौ ताकि झाँकि देबैक से अपराध। धक्का देबैक तँ अपराध आ एना लपकबैक–झपटबैक तँ से अपराध मानत। मुदा एतँ पाइ खर्च करू आ आनन्‍द लिअऽ। एतँ अहाँ बलात्‍कारी नहि कहाएब। लोक कमाइ–खटाइए कथी लाए?  ई पसंद अइ तँ ई अहीकेँ अइ। लऽ जाऽ एकरा आ करेजापर चढ़ि मड़मड़ा दिअऽ। एतँ केओ शर्माएत नहि। केओ लजाएत नहि। ओहो सीढ़ीसँ ऊपर चढ़ऽ–वाली कहलकैक :–हाँ तँ। ठीके तँ कहैत अइ। ताबे रघुबीर आ इरफान आबि गेल। दुनू पुछलकैक ओकरा सँ ;–की भेलैक? कमल कहलकैक:– चल, आगाँ कहबौक।” आ तीनू ओतँसँ विदा भऽ गेल। आ अपना अपना स्‍थानपर गेल। एक दिन इन्‍सटीच्यूट क टेरस पर कमल मदनक संग दू ग्‍लासमे रम भरि पहुँचल। मदन कमलकेँ अपना राधाक विषय घंटा–घंटा किछु सुनबैत छलैक। जिनगीक अनेक पक्षपर ओ ओकरा कहैत रहैत छलैक, मुदा कमल घोटँ भरैत छल कथा जगतक अथाह सागरमे डुबकी लगबऽ–लाए। ओ मदनकेँ कथा तत्‍व आ किछु उत्‍कृष्‍क कथाक विषय कहऽ लगलैक। मुदा मदन ओकरा मुँहपर हाथ धऽ राधाक विषय कहऽ लागल। ओकर ओ कथा सत्‍य कथा छलैक। पहिल बेर जखन राघा भेँट भेल छलैक तँ ओ ओकर हाथ दिस तकलक हाथ सुन्‍न लगैत छलैक। बाजल:–“एक दोकानमे एतेक सुन्‍दर चूड़ी सभ देखलियाए जे मोन ललचा गेलाए। ओ चूड़ी तोराँ हाथमे खुलतौक”। ताहिपर राधा कहलकैक: “हमरा कतँसँ पाइ आएत”? ताहिपर मदन चट्टसँ जेबीसँ बीस रूपैया निकालि कऽ देलकैक आ कहलकैक, “जो, ओइ दोकानमे चूड़ी पहिर ले गऽ”। राधा खुशीसँ रूपैया लऽ लेने छलैक आ चूड़ी पहिरि आएलि छलि। आ मदनक एहि उपकारसँ ओ बहुत खुश छलि। कतौ मदन जाइत अबैत छल तँ राधा दौड़ि जाइत छलि। ओ ओकरापर आकर्षित भऽ गेलि छलि। दुनूक बीच चारि–पाँच साल प्रेम रहलैक मुदा बादमे राधा ओकरा संग प्रेम तोड़ि लेने छलि; एकरे तड़प छलैक मदनक मोनमे। मदन तैँ कहि रहल छलैक जे आजक जीवन अनिश्‍चतासँ भरल अछि। चारू दिस पाथर जकाँ सिर्फ धोखे–धोखा पड़ल अछि। सदिखन ठेस लगबाकसँ भावना अछि। प्रेमोमे धोखा छिपल रहैत छैक। आजुक जीवन सिर्फ सत्तपर आश्रित नहि अछि। जीवनमे छल आ संदेहक अहं भूमिका छैक। चिड़ै कखन केमहर घूमि जाएत, हवा अप्‍पन रूखि कखन बदलि लेत, माल–जाल कखन बमकि जाएत आदमी नहि जनैत छैक। मदनकेँ भावुक भेल जाइत देखि कमल फेर कथा–जगतक बात उठौलक। ताहिपर मदन कहलकैक:– हमरा कोन काज अछि कथा जगतसँ; हमरा कोनो लेखक बनक अछि। हम तँ अप्‍पन जिनगी जिबैत छी। हमरा कोन काज अछि कल्‍पनासँ। हमरा कोन काज अइ अइ सभसँ। मदन ओकरा बातकेँ काटि दैत छलैक तैँ ओ लगातार ‘घूँट’ लैते गेल छल आ तहिना मदन राधाक गममे डुबल जाइत छल। दुनू तरमराइत ओतँसँ उठल आ बाहर निकलल आ चलैत–चलैत सोझे सिनेमा हॉलक सामने जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। थोड़ेक काल दुनू पोस्‍टर देखलक। मदन कहलकैक:– हम तँ सिनेमा देखब।” कमल कहलकैक, “हमरासँ सिनेमा हॉलमे तीन घंटा बैसल पार नहि लागत”। ई सिनेमा हॉल नहि जेल अछि। हम एहिमे बन्‍द नहि होएब। बाँकी दुनियाँ कतेक सुन्‍दर छैक! कतेक फलल फूलल छैक! कतेक हरियर–हरियर छैक! हम एहि फुजल दुनियाँमे रहब। केम्हरोसँ हवा चलैत छैक, तँ केम्‍हरोसँ विजुरी चमकैत छैक। केम्‍हरीसँ मेघ उठैत छैक तँ केम्‍हरोसँ वर्षा शुरू भऽ जाइत छैक। एकरा कहैत छैक फुजल दुनियाँ। पक्षी सन स्‍वतन्‍त्र दुनियाँ। आकाशमे जतँ तक जेवाक होए चलि जाऊ। जल आ जमीनसँ खेल करब। ओ हँलसँ बाहर निकलल तँ बदबदा कऽ वर्षा शुरू भऽ गेलैक। कमल देखलक–सड़कपर पाँनि लागि गेल छलैक, मुदा ओ सोचलक जे ई पानि अप्‍पन प्रोग्राम नहि बदलि रहल अछि तँ हम अप्पन प्रोग्राम केएक बदलू। वर्षा होइत रहत आ हम चलैत रहब। चम्‍पा रघुवीरकेँ बॉहिमे पजिया रूममे लऽ जाइत छलैक। जॉघपर बैसि गरदनि पकड़ि धरि रूममे रहैत छलि ओकरा संग। बाहर एलाक बादो ओकरा बगलमे सटि कऽ सोफापर बैसैत छलि। बिदा हेबाक काल फेरसँ पाँच मिनटक लेल अढ़मे लऽ जाइत छलि आ ओकर दुनू हाथ पकड़ि अपना करेजापर रखैत छलि आ ओकरा विदा कऽ खिड़कीसँ बहुत बहुत काल धरि ओम्हर निहारैत रहैत छलि। कमलकेँ दोस्‍त सभ अप्‍पन पर्स–आइडेन्‍टी कार्ड आ अउठीकेँ सम्‍हारि कऽ राखक हेतु लऽ जाइत छल। कमल रिसिप्‍सनमे चुपचाप बैसल छल। ओतुक्का स्‍टन्‍डर्ड किछु अधिक छलैक। फ्रिज, टी.वी., वाथरूम, एयर कूलर आ ए.सी. रूम सभक व्‍यवस्‍था छलैक। एक गोटे एकटा छौड़ाक संग एलैक आ किछु पीबाक आर्डर दैत अन्‍दर घुसि गेल आ कहलकैक ओकरा सभक हेडकेँ—संगमे एवाक हेतु। ओ सभ चीज लऽ अन्‍दर गेलैक आ वापस हँसैत अयलैक आ बाजलि:– “आइए छड़वेक दिन खराप छन्हि।” कमलक बगलमे परि सन एक देह–श्रमिक–सुन्‍दरी आबि कऽ बैसि गेलैक आ ओकर हाथ पकड़ि लेलकैक आ ओकरा हाथक आँगुरमे अप्‍पन आँगुर सन्हिया देलकैक। कमल ओकरासँ ओकर नाम, ठेकान, पता, इत्‍यादि पुछऽ लगलैक। ओ बुझौएल जकाँ छ–छी–च–ची–लगा कऽ– एक अजीब सन भाषामे ओकरासँ पूछि रहल छलैक आ ओ ओही भाषामे हँसि–हँसि कऽ जवाब दऽ रहल छलैक। कमल कुर्सीपर बैसल छल। ओ ओकरा जाँघपर आबि बैस गेलैक आ दोसरो हाथक आँगुरमे आँगुर सन्हिया देलकैक। कमल निजीर्व जकाँ अपना शरीरकेँ स्थिर रखने छल आ ओकरा शरीरमे उत्तजेना भरऽ चाहैत छलि। ओ कहैत छलैक जे ओ सभ गरीब अइ। बाप मास्‍टरक काज करैत छैक। दीदी नम्हर शहर देखबऽ लाए अनलकैक आ कहलकैक किछु दिन छोट–छिन काजो कऽ ले–घर–भाड़ाक। मुदा ओकरा आदमीकेँ प्रसन्‍न करक काज लगा देलकैक। आदमीकेँ प्रसन्‍न करैत ओकरा सुख भेट रहल छलैक आ ओ बजैत छलि जे ओ ओतँ बड्ड खुश अछि। दीदी मानैत छैक1 कथुक दुःख नहि छैक। अप्‍पन मानैत छैक। कहियो काल बाहरो जाइत अछि। केओ अप्‍पने घर लऽ जाइत छैक तँ केओ होटल। जहाजमे सेहो जाइत अछि। तीन दिन ओहीमे रहल अछि। बहुत पाइ कमौनी छलि। आब कतौ अबैत जाइत डर नहि होइत छैक। कहियो काल सजि–धजि कऽ सिनेमा सेहो जाइत अछि। ओ कमलक जाँघपर मोटर साइकिल जकाँ पैर फैला कऽ बैसलि छलि। ओ कमलकेँ कसि कऽ पजिया कऽ पकड़लक आ छातीकेँ छातीसँ मिलौलक। कमलक शरीरमे कोनो तरहक उत्तेजना नहि अएलैक। ओकर दुनू हाथ प‍कड़ि कपड़ाक तरसँ अपना छाती धरि लऽ गेलि आ ओकर तरहत्‍थीक ऊपर अप्‍पन तरहत्‍थी रखने रहल। कमल ने तँ ओकरा किछु करऽसँ प्रतिवाद करैत छलैक आ ने कोनो तरहक उन्‍माद देखबैत छल। ओ पाँछा दिससँ हुक छोड़ा लेलक। कमल हाथ हटबक कोशिश केलक तँ चट्टसँ ओकर हाथ पकड़ि लेलक आ ओकर हाथ अपना छातीपर लऽ गेलि। आब ओकरा लगलैक जे कमल हाथ हटबक कोशिश नहि कऽ रहल अछि। हाथ छोड़ि देलोपर हाथ ओतेँ रखने अछि। ओ अपन हाथ कमलक दुनू जाँघक बीच सन्हिया देलक। एहि क्रियासँ कमलक आँगुर नहूँ–नहूँ गतिमे आबऽ लगलैक। ओ प्रायः–कमलक हाथ अपना शरीरक सभ क्षेत्र तक लऽ गेलि छलि तहिना ओ बहुत देरी तक अप्‍पन हाथ ओकरा सम्‍पूर्ण शरीरकेँ टटोलैत–उत्तेजित करैत असफल देखल जाइत छलि। ओकर दीदी ओकरा अपस्‍याँत देखि धूप–दीपक संग कामदेवकेँ प्रसन्‍न करबाक हेतु नाचऽ–गाबऽ लागलि। ताबे इरफान आ रघुवीर रूमसँ निकलि गेल छल। आ ओ निराश भऽ मुँह विधुआ कऽ अलग–बैस गेलि छलि। हारि कऽ दोस्‍त सभकेँ कहलक:– एकरा कहकने चलक हेतु।” ताहिपर रघुवीर डाँटि देलकैक:– फाल्‍तू परेशान किएक करैत छही। ई अहिना हमरा संग आएल छल।” जाए काल ओकर दीदी गातिर देलकैक:– हिजरा नहि तन।” ताहिपर ओ जवाब देलकैक:– नइ गइ! से बात नहि छैक। ताहिमे तँ धाकर अछि मुदा की जानि एना किएक भेलैक।” एना किएक कऽ रहल छैक से रधुवीर नीक जकाँ जनैत छल। मेडिकल कॉलेजक जिमना जियमक बगलक घटनासँ कमल बहुत दु:खी छल आ ओ ओहने गलती फेरसँ दोहराबऽ नहि चाहैत छल जिमनाजियमक बगलमे रेल–लाइनसँ सटल एक साधारण साड़ीमे ठाढ़ि एक सम–वयस्‍काकेँ देखलक तँ बुझेलैक जेना– ओ ओकरे गामक पनि–भरनी होइक। ओ पुछलापर सैह कहलकैक जे मालिक गामसँ लऽ अनने छथि घरक काज करक हेतु। मोन एसगरि नहि लगै‍त अछि तँ एम्हर आबि जाइत छी। ओ जगह लव–प्‍वाइन्‍टक लगेमे छलैक। कमलक मोनमे सेहो लवक बात आबि गेलैक मुदा झाँझ उन्‍हारि भऽ गेल छलैक। ओकरा ओ जामुन बिछैत मालती लगलैक। ओ गाछीमे मालतीक पेटक चमड़ी पकड़ि दवा देने छलैक आ अपने हाथसँ जामुन नहि बीछि ओकरा खोइछामे सँ जामुन मंगैत छलैक आ जामुन लेबक बहन्‍ने ओकर नाभि स्‍पर्श करैत छल। मालती एसगरि छलि तैँ डेरा कऽ भागि गेलि छलि। मुदा ओकर हाथ पकड़लाक बादो ओ डेराएल नहि छलि, मुदा पुलिसकेँ देखि कमल ओतँसँ चलि देने छल। ओ रोकैत रहि गेल छलैक। कहैत रहि गेलि छलैक जे हवलदारसँ नहि डेराइ। ओकर बोल कमलपर नशाक काज कएने छलैक आ दोसरो दिन ओ कनेक्शन देरीसँ ओतँ चलि गेल छल। ओ कमलकेँ भांङ आ भाटिक बीच अढ़मे लऽ गेल छलैक। कमल किछु नहि बुझि रहल छल जे ओ ओकरा कतॅं लऽ जा रहल छलैक। ओ ओकरा जेबीसँ पर्श निकाललक। दू एकटा फोटो छलैक, किछु कार्ड आ किछु रूपैया। ओ सभ रूपैया गनऽ लागलि आ गनि कऽ ओकरा वापस कऽ देलकैक आ कहलकैक:– एहिमे सँ हमरा चालीस रूपैया दिअऽ? “ ओ पुछलकैक, “किएक?’’ “नहि, अबलाकेँ किछु देबक चाही। हम सभ अबला छी। पाइ देलासँ पाप कटित होइत छैक ने तँ श्राप पड़ैत छैक। ई सभ हमर मजूरी अइ।” ’’ ओ कहलकैक देब ने, एखन तँ बैसवे कएलहुँ अछि।” ओ बाबू, बौआ कहि तेना ने परतारि चुचकारि कऽ कहलकैक जे–ओकरा भेलैक जे अपन करेजो काटि कऽ दऽ दियैक। ओ पाइ निकालि कऽ दऽ देलकैक। ओ अप्‍पन बलाडजक बटन खोलि ओकरा जाँघपर मूड़ी धऽ सूति रहलि छलि। ओकरा भेल छलैक:– लवकेँ लिए कुछ भी करेगा। ओकरा ओ बिनु बियाहलि काँच कुम्‍मरि लागल छलैक जे ओकरापर तन–मनसँ न्‍योछावर छलैक। रघुवीर कहने छलैक:– तोँ सभसँ स्नेह रखैत छही ताहीपर तोरापर द्रवित भऽ जाइत छैक। जो जाहुकेँ सत्‍य स्नेहु, प्रभु कृपा मिलहुँ न कछु सन्‍देहु। हम पाँचे बजेसँ ओकरा ताकि रहल छिऐक मुदा हमरा ओ नहि भेटल आ तोरा भेट गेलौक। मुदा ओकरा बादमे पता चललैक जे एम्हर–आम्हर जे ठाढ़ रहैत अछि गन्‍दगीक कारण बीमारीसँ ग्रसित रहैत अछि। एकरा सभकेँ गामक गोरी नहि बुझियैक, कमल वर्षामे भिजैत–तितैत खतराक बिना पर्वाह कयने एस्गर ओकरासँ मिलऽ चाहैत छल जे ओकरा उत्तेजित करक ओतेक प्रयास कएने छलि आ विफल भऽ गेलि छलि। ओकर दीदी ओकरा हिजरा कहने छलै तँ वैह ओकरा दिससँ ओकरा लेल बाजलि छलि जे ई तँ धाकर पुरूष अछि, मुदा नहि–जानि एना किएक भऽ रहल छैक। आइ ओ अपना आपकेँ ओकरा समर्पित कऽ देबऽ चाहैत छल। मुदा लाख कोशिशक बादो ओतँ नहि पहुँच सकल। ओ तँ रघुवीर छल जे एक बेर ओतँ ओकरा ई–गली–ओ गली घुमवैत–फिरबैत लऽ गेल छलैक। ओकरा कोनो रोड आ गलीक ध्‍यान नहि छलैक। वर्षा नाली आ अन्‍हर–विहारिक चिन्‍ता तँ ओ नहि कएने छल। लौट कऽ एक बजे रातिमे सुराक्षित अपना घर यानी जहाजमे आएल। भिजल–तितल पेन्‍ट–शर्ट आ जुत्ता निकालैत लगलैक जे: वाह! आइयो हम जीत गेलहुँ। नशामे केहन खोँट बात मोनमे आबि गेल छल आ केहन खतरनाक प्रतीज्ञा लऽ लेने छलहुँ जे–पानि, विहाडि़ आ अन्‍हरसँ की हम हारि जाएब आ एकरा डरे सिनेमा हॉलक बन्‍द वातावरणमे अपना आपकेँ तीन घंटाक हेतु कैद कऽ देब।” ओकरा कहाँ बुझल छलैक जे एतँ पूराक–पूरा बस–ट्रक आ कार पानिमे कहियो डूबि गेल छलैक। ओकरा कहाँ बुझल छलैक जे एतँ पानि बहक हेतु सेडक निच्चा केहन–केहन नाला छैक। आइ तक कतेक की घटना आ दुर्घटना एतँ भेल छैक ओकरा थोड़े बुझल छलैक। तथापि ओ अपना बेडपर गेल तँ लगलैक: वाह हम योद्धा छी’’ गलत राहपर–पैर राखियो देलाक बाद ओकर आत्‍मा ओकरा गलत काज नहि करऽ देतैक। भोरमे सूर्य उगलैक तँ ओकरा नव संसार देखाइ देलकैक। वाह! गॉड ऑफ विग थिन्‍गस। एक सालक बाद ओ‍ही जगहपर अपनाकेँ आया कहऽ–वालीसँ ओ पुछलकैक:– अहाँ हमरा चिन्‍हैत छी? “ तँ चट्टसँ जवाब देलकैक, “अहाँकेँ एक्के सालक बाद बिसरि जाएब।” ओकरा आश्‍चर्य लगलैक। ओतेक ओतेक लोकसँ ओकरा सभकेँ मुलाकात होइत छैक मुदा एखन धरि कमलकेँ याद रखने अछि। पचीस–छबीस वर्षक बाद समुद्रक कात ओ अपना स्‍मृतिकेँ ताजा करक हेतु बैसल छल तँ सभ बात माथमे नाचऽ लगलैक आ ओकर माथ दर्दसँ फाटऽ लगलैक। ओ ओहिना सड़क पर दूटा किशोरीकेँ जाइत देखलक। एक मोटकी आ एक पतरकी। सोचलक:– ई सभ ओकर सभक बेटी भऽ सकैत अछि। ओ गाम गेल। ओकरा होइत छलैक जे एतेक दिनुका बाद परि ओ सभ बात विसरि गेल हेतैक। एक दिन ओ पुछलकैक: याद अइ की बिसरि गेलहुँ:– हमर सभक खेल। परि चट्टसँ जवाब देलकैक:– हाँ, देखलहुँ जीतऽ नइँ ने देलहुँ। आ ओकर करेजा तनि गेल छैलैक। ३.(सं. सा. सं)नागेश्वर लाल कर्ण गायन, कथक, सितार वादन गाजियाबादक शालीमार गार्डेन स्थित गायत्री भवनमे श्री चित्रांश कर्ण समाज द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रममे संगीतज्ञ डा. नागेश्वर लाल कर्ण केर निर्देशनमे गायन, सितार वादन एवं नृत्यक प्रस्तुति भेल। श्री नईम आओर मीनाक्षी द्वारा गायन, सिमरन द्वारा कथक नृत्यजे तीनताल आओर रास तालमे प्रस्तुति काएल गेल, सारंगीपर रऊफ अहमद केलाह। सुनील सक्सेना एवं हुनक पुत्र स्पर्ष सेहो सितार वादन केलाह, डा. नागेश्वर लाल कर्ण तबला संगति केलाह। संस्था द्वारा कलाकार सभक अभिनंदन काएल गेल। सांस्कृतिक कार्यक्रम–गिटार–वादनक प्रस्तुति नई दिल्ली, श्रीवास्तव वेलफेअर एसोशिएसन द्वारा पूर्व सांस्कृतिक केन्द्रमे वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन भेल। संगीतज्ञ डा. नागेश्वर लाल कर्ण केर निर्देशनमे गायन, वादन एवं नृत्यक प्रस्तुति भेल। श्री राजेश चन्द्रा, सीमा एवं मीनाक्षी द्वारा गायन, गुरू प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा तबला संगतिकेँ बाद सिमरन द्वारा कथक नृत्य जे तीनतालमे प्रस्तुति काएल गेल। जाहिमे सारंगीपर रऊफ अहमद आओर तबलापर डा. कर्ण कुशलतासँ तबला संगीत केलाह। मुख्य अतिथी पूर्व मंत्री माननीय सुनील शास्त्री केर कर कमलसँ हिनक अभिनंदन काएल गेल। कोलकाता केर युवा गिटार वादक रितोम सरकारककेँ विगत तीन दिवसक लगातार कार्यक्रम सम्पन्न भेल। अपन स्लाईड गिटारपर सोलो वादनमे लोधी रोड स्थित ‘लोक कला मंच’ केर सभागारमे क्रमशः राग कौंसी–कान्हडा, राग जोग, किडवाणी एवं हँसध्वनीमे आलाप, जोड–झाला, विलंबित तीनताल, मत्त ताल, मध्यलय, एवं द्रुत तीनतालमे निबद्ध तथा धुन केर प्रस्तुति केलाह। ‘संगीतज्ञ बाबा अलाउद्दीन खाँ म्युजिक फाउण्डेशन’ द्वारा–पूर्व सांस्कृतिक केन्द्, लक्ष्मीनगरमे राग बागेश्वरी जे विलंबित तीनताल, मत्त ताल, मध्यलय, एवं द्रुत तीनतालमे निबद्ध छल तकर प्रस्तुति केलाह। अरविन्दो आश्रम महरौली रोड स्थित ‘ध्यान सभागार’मे राग बागेश्वरी जे तीनताल, मत्त ताल, एकताल आओर तीनतालमे निबद्ध छल, पुनः राग हँसध्वनीमे धुन बजौलाह। हिनक संग दिल्लीकेँ तबला वादक डा. नागेश्वर लाल कर्ण कुशलतासँ तबला संगति केलाह। अहि अवसरपर उपस्थित गण्य–मान्य नागरिक देशी विदेशी क्षोता–दर्शक वृन्द दुनु कलाकारक प्रभावशाली प्रस्तुति केर खूब सराहना काएल। प्रस्तुति अध्यक्ष (सं. सा. सं) A27/SF3, रामप्रस्थ, गाजियाबाद–201011 ४.डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग– जमशेदपुर (झारखंड)। महाकवि विद्यापतिक चित्र लोकसभाक केन्द्रीय कक्षमे लगबाओल जाए एहि लेल झारखंड मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी आ दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक मैथिली साहित्यकार मंच, झारखंडक प्रदेश संयोजक डा. रवीन्द्र कुमार चौधरी एक ज्ञापन लोकसभाक अध्यक्षा श्रीमती मीरा कुमारकेँ देलनि। जकर प्रति लोकसभाक उपाध्यक्ष सांसद करिया मुंडा सहित झारखंड आ बिहारक कतेको सांसदकेँ देलन्हि। एल.बी.एस.एम. काँलेज, जमशेदपुरमे मैथिलीक प्राध्यापक आ साहित्य अकादमीमे मैथिली परामर्शदातृ समितिक सदस्य डा. चौधरी विद्यापतिक फोटोक संग प्रेषित ज्ञापनमे कहलन्हि जे मैथिलीक महाकवि विद्यापति अपन गीतक बलपर समस्त पूर्वोत्तर भारतमे काव्य रचनाक एक विशिष्ट परम्परा स्थापित केलनि। बंगालक महर्षि अरविन्द आ विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर धरि हुनक प्रतिभासँ प्रभावित रहथि। एहन महान कविक चित्र संसद भवनक केन्द्रीय कक्षमे लगलासँ देश भरिक मैथिलीभाषी सम्मानक अनुभव करतनि आ हुनक अपार आस्था लोकसभाक सदस्य प्रति बढतनि। डा. चौधरी एहो कहलन्हि जे जँ महर्षि अरविन्द आ टैगोरक फोटो संसदक केन्द्रीय कक्षमे लागल अछि तँ विद्यापतिक फोटो लगेबामे कोनो आपत्ति नहि हेबाक चाही। ज्ञातब्य अछि जे डा. चौधरीक अथक प्रयासक कारणेँ झारखंडक राँची विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पाठ्यक्रमक निर्धारण आ पढाई प्रारंभ भऽ सकल। विश्वविद्यालय द्वारा गठित मैथिली बोर्ड आँफ स्टडीजक सदस्य-सचिव स्वयं हिनका रहला कारणेँ ई पाठ्यक्रमक प्रकाशन सेहो लगले करबा लेलन्हि। डा. चौधरीक आगामी कार्यक लक्ष्य छैन्हि राँची विश्वविद्यालयसँ हालहिमे विभक्त भेल कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासामे स्नातकोत्तर मैथिली विभाग खोलाएब आ झारखंडक क्षेत्रीय भाषाक सूचीमे मैथिलीकेँ सम्मिलित कराएब। हुनक कहब छैन्हि जे जखन राज्यक क्षेत्रीय भाषाक सूचीमे मैथिली आबि जायत तँ स्वतः जे.पी.एस.सी.मे मैथिली मान्य भऽ जायत आ सरकारी नौकरीमे सेहो सुविधा भेटत। २.९.- जिनगीक जीत उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल जिनगीक जीत उपन्यास जगदीष प्रसाद मण्डल बेरमा, मधुबनी, बिहार। जिनगीक जीत:ः 1 छोट-छीन गाम कल्याणपुर। गाम क’ देखनहि बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुक्खसँ ल’ क’ आइ धरिक मनुक्ख हँसी-खुशीसँ रहैत अछि। मनुखेटा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्ची दूधवाली गायसँ ल’ क’ बीस लीटर दूधवाली गाय धरि। बकरीओक सैह नस्ल। ऐहनो बकरी अछि जकरा तीनि-चारि बच्चा भेने, एक-दूटा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जकरा चारि लीटर दूध होइत। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जहिमे एकछाहा शीशोएटा अछि तँ दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वैह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि तँ कोनो एकछाहा कलमीक। ततबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छपने अछि तँ ओहनो गाछी अछि जहिमे पनरह-पनरहटा आमक गाछ एक कट्ठामे फइलसँ रहि मनसम्फे फड़बो करैत अछि। ओझुका जेँका कल्याणपुर, चालीस बर्ख पहिने नहि छल। ने एकोटा चापाकल छलै आ ने बोरिंग। जेहने हर त्रेता युगमे राजा जनक जोतने रहथि तेहने हरसँ अखनो कल्याण पुरक खेत जोतल जाइत अछि। ने अखुनका जेँका उपजा-बाड़ी होइत छल आ ने बर-बीमारीक उचित उपचार। सवारीक रुपमे सभकेँ दू-दूटा पाएर वा गोट-पङरा बड़द जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैआ जिनगीमे मिसिओ भरि सुधार नहि भेल। जहिना जाँतमे दूटा चक्की होइत- तरौटा आ उपरौटा। तरौटा कीलमे गाड़ल रहैत। तहिना शहरी आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी तँ आगू मुहे घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्की जेँका ओहिना गड़ाइल रहि गेल अछि। बान्ह-सड़क, घर-दुआर सब ओहिना अछि जहिना चालीस बर्ख पहिने छल। तेँ की कल्याणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ैमे, भाग नहि लेलक? जरुर लेलक। दिल खोलि साहससँ लेलक। सगरे गाम क’ गोरा-पल्टन आगि लगा-लगा तीनि बेरि जरौलक। कत्ते गोटे बन्दूकक कुन्दासँ, तँ कत्ते गोटे मोटका चमड़ाक जूत्तासँ थकुचल गेलाह। जहल जाइबलाक धरोहि लागि गेल रहय। कत्ते गोटे डरे जे गाम छोड़ि पड़ायल ओ अखनो धरि घुरि क’ नहि आबि सकल। कत्ते गोटेक परिवार बिलटलै, तकर कोनो ठेकान, अखनो धरि नहि अछि। कल्याणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे रातिमे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहय। पहिलुके साँझमे स्त्री मखनीकेँ पेटमे दर्द उपकलै। प्रशबक अंतिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रशवक पीड़ा छी। अछेलालोकेँ सैह बुझि पड़लै। ओसरे पर चटकुन्नी बिछा मखनी पड़ि रहलि। चटकुन्नीक बगलेमे अछेलालो बैसि गेल। दरद असान होइतहि मखनी बाजलि- ‘‘दरद असान भेल जाइ अए।’’ मुह पर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असकरुआ छी कोना पलहनिक ओहिठाम जायब? कोना अगियाशी जोड़ब? जाड़क समय छियै। परसौतीक लेल जाड़ ओहने दुश्मन होइत अछि जेहने बकरीक लेल फौती। दर्द छुटितहि मखनी फुड़-फुड़ा क’ उठि भानसक जोगारमे जुटि गेलि। पानि भरैक घैल लए जखने घैलची दिशि बढ़ै लागलि कि अछेलाल(पति) बाँहि पकड़ि रोकि, कहलक- ‘‘अहाँ उपर-निच्चा नइ करु। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घर से बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धो क’ आनि देब।’’ मखनी चुल्हि पजारै लागलि आ अछेलाल लुरु-खुरु करै लगल। बरतन-बासन धोय ओहो चुल्हिऐक पाछुमे बैसि, आगियो तपै आ गप्पो-सप्प शुरु केलक। मुस्कीदैत अछेलाल बाजल- ‘‘एहिबेर भगवान बेटा देताह।’’ बेटाक नाम सुनि मखनी सुखक समुद्रमे हेलए लागलि। मने-मन सुखक अनुभव करैत विचारै लागलि जे बच्चाकेँ दूध पियाइब। तेल-उबटनसँ जाँतव। आखिमे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्मा लेब। कोरामे लए अनको आंगन घूमै जाएब। इस्कूलमे नाओ लिखा पढ़बैक विचार एलै, कि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालिमे सानल कौर मुहमे दइते, ओहन आँकर पड़ि जाइत जहिसँ जी (जीभ) कटि जाइत, तहिना भेलि। मनक सुख मनहिमे मखनी क’ अटकि गेलि। पत्नीक मलिन होइत मुह देखि पति बाजल- ‘‘गरीबक मनोरथ आ बरखाक बुलबुला एक्के रंग होइ छै। जहिना पाइनिक बुलबुला सुन्दर आकार आ रंग ल’ बढ़ैत अछि कि फॅुटिये जाइत, तहिना।’’ मखनीक मनमे दोसर विचार उठलै जे धन तँ बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार, गाय-महीसि, रुपैआ-पैसा मुदा एहि सब धनसँ पैघ बेटा धन होइत छैक। जे बूढ़मे माय-बापक सवारी बनि सेवा करैत अछि। ततबे नहि, परिवारो खनदानो क’ आगू बढ़बैत अछि। तोहूँमे जँ कमासुत बेटा होइत तँ जीवितहि माय-बापकेँ स्वर्गक सुख दैत अछि । भानस भेलै। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआर पर चटकुन्नी विछाओल, तहि पर जा मखनी सुति रहलीह। थारी-लोटा अखारि, चुल्हि-चिनमारक सभ सम्हारि अछेलाल चुल्हिये लग बैसि आगि तपै लगल। तमाकुल चूना मुहमे लेलक। चुल्हिये लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ै ले उठि क’ अंगनामे टहलै लगल। भक्क टुटिते फेर चुल्हि लग आबि अछेलाल आगि तपै लागल। मखनी निन्न पड़ि गेलि। मखनीक नाकक आबाज सुनि अछेलाल सोचै लगल जे जँ राति-बिराति दर्द उपकतै तँ महा-मोसकिलमे पड़ि जायब। अपने तँ किछु बुझैत नहि छी। दशमीक डगरक सिदहा द’ नहि सकलिऐक तेँ पलहनियो आओत की नहि? चुल्हिक आगि मिझाइत देखि अछेलाल जारन आनै डेढ़िया पर गेल। ओससँ जारनो सिमसल। लतामक गाछ परसँ टप-टप ओसक बुन्न खसैत। अन्हारक तृतीया रहने, चान तँ भरि राति उगल रहत, मनमे अबितहि अछेलाल मेघ दिशि तकलक। चान तँ उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीन पर इजोत अबितहि नहि। पाँजमे जारन नेने अंगना आयल। ओसार पर चुल्हि रहने सोचलक जे घरेमे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हैत किऐक तँ घरो गरमाइल रहत। अछेलालक पाएरक दमसिसँ मखनीक निन्न टुटि गेलै। धधकैत घूर देखि मखनियोकेँ आगि तपैक मन भेलै। ओछाइन परसँ उठि ओ घूर लग आबि बैसलि। बीचमे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुखसँ मखनी तहिना मोनक दुखसँ अछेलाल। बेबसीक स्वरमे अछेलाल बाजल- ‘‘अदहा राति तँ बीतिए गेल, अदहे बाकी अछि। जहिना अदहा बीतल तहिना बाँकियो बीतबे करत।’’ अछेलालक बात सुनि मखनी पूछलक- ‘‘अखन धरि अहाँ जगले छी?’’ ‘हँ, की करब। जँ सुति रहितौ आ तइ बीचमे अहाँकेँ दरद उठैत तँ फटोफनमे पड़ि जइतहुँ। सैाँसे गामक लोक सुतल अछि। ककरा सोरो पारबैक। एक्के रातिक तँ बात अछि। कहुना-कहुना क’ काटिये लेब। मनमे होइत छल जे बहिनकेँ बिदागरी कराकेँ ल’ अनितहुँ मुदा ओहो ते पेटबोनिये अछि। तहूमे चारि-पाँचटा लिधुरिया बच्चो छै। जँ विदागरी करा क’ आनव ते पाँच गोटेक खरचो बढ़ि जाइत। घरमे ते किछु अछि नहि। कमाई छी खाई छी।’’ ‘‘कहलिएै ते ठीके। अपना घरमे लोक भुखलो-दुखलो रहि जाइत अछि। मुदा जकरा माथ चढ़ा क’ अनितियै ओकरा कोना भूखल रखितियै?’’ दिन-राति चिन्ता पैसल रहै अए जे पार-घाट कोना लागत। भगवानो सबटा दुख हमरे दुनू परानीकेँ देने छथि। एक पसेरी चाउर घैलमे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत। तकर बाद बुझल जेतैक।’’ पसेरी भरि चाउर सुनि अछेलालक मोनमे आशा जगल। मुहसँ हँसी निकलल। हँसैत बाजल- ‘‘जँ हमर बनि बच्चा जनम लेत तँ कतबो दुख हेतइ तइओ जीवे करत। नहि जँ कोनो जनमक करजा खेने हेबै ते असुल क’ चलि जायत।’’ पतिक बात सुनितहि मखनीकेँ पहिलुका दुनू बच्चा मन पड़ल। मने-मन सोचै लागलि जे ओहो बच्चा नहि मरिते। जँ नीक-नहाँति सेवा होइतइते। मुदा मनुखे की करत? जकरा भगवाने बेपाट भ’ गेल छथिन। पैछला बात मनसँ हटबैत मखनी बाजलि- ‘‘समाजमे ओहनो बहुत लोक होइत जे बेर-बेगरतामे भगवान बनि ठाढ़ होइत।’’ ‘‘समाज दू रंगक होइछै। एकटा समाज ओहन होइ छैक जइमे दोसराक मदतिकेँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छैक जहिमे सब सभक अधले करैत अछि। अपने गाममे देखै छियै। अपन टोल तीस-पेंइतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसर स’ भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीनि घरक दियादी अछि। तीनू घरमे सुकनाकेँ दु सेर दू टाका छैक। ओकरा देखै छियै। सदिखन झगड़े-झंझटक पाछू रहैअए। टोलमे सबसे बाड़ल अछि। ओकरा चलैत हमरो स’ सब मुह फुलौने रहै अए। ने ककरो स’ टोका-चाली अछि आ ने खेनाई-पीनाई, आ ने लेन-देन। भगवान रच्छ रखने छथि जे सब दिन बोइन करै छी मौज स’ खाई छी नइ ते एक्को दिन अइ गाममे बास होइत।’’ अछेलालक बात सुनि मूड़ि डोलबैत मखनी बाजलि- ‘‘कहलौ ते ठीके, मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन ओइह ने पारो-घाट लगबै छथिन।’’ मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- ‘‘सगरे गाममे नजरि उठा क’ देखै छी त’ खाली बचेलालेक परिवारसँ थोड़-बहुत, मिलान अछि। सालमे दश-बीस दिन खेतिओ सम्हारि दइ छियै आ घरो-घरहट। पेंइच-उधार ते नहिये करै छी। हमर ब्रह्म कहै अए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबनि ते ओ बेचारी जरुर सम्हारि देती। कहुना राति बीतै भोर होय, तखन ने कहबनि। दुखक रातियो नमहर भ’ जाइ छै। एक्के निन्नभेर भ’ जाइ छले, से बितबे ने करै अए।’’ हाफी करैत मखनी बाजलि- ‘‘देहो गरमा गेलि आ डाॅड़ो दुखा गेल। ओछाइने पर जाइ छी।’’ मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भ’ मखनीक बाँहि पकड़ि ओछाइन पर ल’ गेल। मखनी पइर रहलि। पड़ले-पड़ल बाजलि- ‘‘मन हल्लुक लगै अए। अहूँ सुति रहू।’’ अछेलालक मनमे चैन आयल। मुदा तइयो सोचैत जे एहि देह आ समयक कोन ठेकान। कखन की भ’ जयतैक। गुनधुन करैत बाहर निकलि चारु भर तकलक। झल-अन्हारक दुआरे साफ-साफ किछु देखवे ने करैत। मूड़ी उठा मेघ दिशि तकलक। मेघोमे छोटका तरेगण बुझिये ने पड़ै। गोटे-गोटे बड़का देखि पड़ै। अयना जेँका चानो बुझि पड़ै। डंडी-तराजूकेँ ठेकना ताकै लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्हुआइल देखलक। डंडी-तराजू देखि अछेलाल क’ संतोष भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि क’ आबि घूर लग बैसल। आलस अबै लगलै। तमाकुल चुना मुहमे लेलक। बाहर निकलि तमाकुल थूकड़ि क’ फेकि पुनः घुरे लग आबि बोरा पसारि घोंकड़ी लगा, बाँहिएक सिरमा बना सुति रहल। निन्न पड़ि गेल। निन्न पड़ितहि सपनाइ लगल। सपनामे देखै लगल जे घरवाली दरदसँ कुहरैत अछि। चहा क’ उठि पत्नीकेँ पूछलक- ‘‘बेसी दर्द होइ अए?’’ मखनी निन्न छलि। किछु नहि उत्तर नहि देलि। घूर क’ फूँकि अछेलाल धधड़ाक इजोतमे मखनी लग जा निङहारि क’ देखै लगल। मनमे भेलै जे कहीं बेहोश तँ ने भ’ गेलि अछि, मुदा नाकक साँस असथिर रहै। कौआ क’ डकितहि अछेलाल उठि क’ बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोटेक घर थोड़बे हटल, मुदा बीचमे डबरा रहने घुमाओन रास्ता। बचेलालक माय क’ अछेलाल भौजी कहैत। दियादी संबंध तँ दुनू परिवारमे नहि मुदा सामाजिक संबंधे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्दन छोटे गिरहस्त, मुदा सामाजिक हृदय रहने सभसँ समाजमे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़िया पर ठाढ़ भ’ बचेलालक माय सुमित्राकेँ सोर पाड़लक। आंगन बहारैत सुमित्रा बाढ़नि हाथमे नेनहि घरक कोनचर लगसँ देखि, मुस्कुराइत बाजलि- ‘‘अनठिया जेँका दुआर पर किऐक छी? आउ-आउ, अंगने आउ।’’ अछेलालक मन्हुआयल मुह देखि सुमित्रा पूछलक-‘‘रातिमे किछु भेलि की? मन बड़ खसल देखै छी।’’ कपैत हृदयसँ अछेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘नइ रातिमे त किछु ने भेल मुदा भारी विपत्तिमे पड़ल छी। तेँ एलौ।’’ ‘‘केहन विपत्तिमे पड़ल छी?’’ ‘‘भनसियाकेँ संतान होनिहार अछि। पूर मास छियै। घरमे त दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला ते अपने बुझै नइ छी। तेँ अहाँ क’ कहै ले एलौ जे चलि क सम्हारि दिओ।’’ कनेकाल गुम्म भ’ सुमित्रा बजलीह- ‘‘अखन त दरद नहि ने उपकलै हेन?’’ ‘‘नै, अखन चैन अछि। साझू पहर दरद उपकल छलै मुदा कनिये कालक बाद असान भ’ गेलै।’’ ‘लोकेक काज लोक क’ होइ छै। समाजमे सभक काज सभकेँ होइ छै। अगर हमरा गेला स अहाँक नीक हैत त’ किअए ने जायब।’ कहि सुमित्रा फुसफुसा क पूछल- ‘‘परसौती खाइले चाउर अछि, की ने?’’ अछेलालक मोनमे एलै जे झूठ नहि कहबनि। कने गुम्म भ’ बाजल- ‘‘एक पसेरी चाउर घरमे अछि, भौजी।’’ एक पसेरी चाउर सुनितहि सुमित्राकेँ हँसी लगलनि। मुदा हँसी क’ दाबि, सोचलनि जे कमसँ कम एक मासक बुतात चाही। मास दिनसँ पहिने परसौतिक देहमे कोनो लज्जति थोड़े रहै छै। तेँ एक मासक बुतातक जोगार सेहो क’ देबै। बेर पड़ला पर गरीब लोकक मन बौआ जाइछै तेँ अछेलाल ऐना कहलक। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैत अछि। जखन हमरा बजबै ले आइल तखन बच्चा क’ एहि धरती पर ठाढ़ करब हमर धर्म भ’ जाइत अछि। सिर्फ बच्चा जनमि गेलासँ तँ नहि होइत। दुनू गोटे गप-सप करिते छल कि बचेलाल सुति क’ उठल। केबाड़ बन्ने छल कि दुनू गोटेक गप-सपक आवाज सुनलक। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी देलक कि दुनू गोटेकेँ गप-सप करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोटे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भ’ गेल। पुतोहूक दुआरे सुमित्रा बाजलि- ‘‘दरबज्जे पर चलू।’’ तीनू गोटे दरवज्जा पर आबि गप-सप करै लगल। अपन भार हटबैत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बच्चा! अछेलालक कनि´ाँकेँ सन्तान होनिहारि छै। बेचारा, जेहने सवांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगाा क’ अपना ऐठाम आयल। गाममे त’ बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किऐक ने गेल। जेँ हमरा पर बिसवास भेलै तेँ ने आयल।’’ मूड़ी निच्चा केने बचेलाल चुपचाप सुनैत। माएक बात सुनि कहलक- ‘‘जखन तोरा बजबै ले एलखुन ते हम मनाही करबौ।’’ ‘‘सोझे गेला से त नइ हेतै। कम स कम एक मासक बुतातो चाही की ने?’’ ‘‘जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरा से पूछैक कोन जरुरी? जे जरुरी बुझै छीही, से कर।’’ अछेलालक हृदयमे आशा जगै लगल। मने-मन सोचै लगल जे अखन धरि बुझै छलौ जे गाममे क्यो मदतिगार नहि अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलनि जे ऐठाम एलौ। कुस्कुराइत अछेलाल सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘बड़ी काल भ गेल भौजी, अंगनामे की भेल हेतै, सेहो देखैक अछि तेँ आव नइ अँटकब। चलू, अहूँ चलू।’’ सुमित्रा- ‘‘बौआ! अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठे पर अबै छी।’’ अछेलाल आंगन बिदा भेल। सुमित्रा बचेलालकेँ कहै लागलि- ‘‘बच्चा! मनुखेक काज मनुख क’ होइ छै। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घरमे जमा रहत। महीना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबै। भगवान हमरा बहुत देने छथि। कोन चीजक कमी अछि।’’ बचेलाल- ‘‘माए! तोरा जे नीक सोहाओ, से कर। जा क’ देखही।’’ दरबज्जासँ उठि सुमित्रा अंगनाक काज सम्हारै लागलि। सब काज सम्हारि सुमित्रा अछेलाल ऐठाम विदा भेलि। मखनी ओसार पर, विछान बिछा, पड़लि। पहुँचते सुमित्रा मखनीकेँ पूछलि- ‘‘कनि´ाँ, दरदो होइ अए?’’ कर घूमि मखनी बाजलि- ‘‘दीदी, अखन त दरद नइ उपकल हेन, मुदा आगम बुझि पडै़ अए।’’ मखनी क’ दूटा संतान भ’ चुकल छल तेँ आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलालकेँ कहलक- ‘‘ऐठाम हम छी हे। अहाँ पलहनिक ऐठाम जा बजौने आउ?’’ अछेलाल पलहनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पलहनि ऐठाम जेबा ले डेगे ने उठैत। मनमे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै द’ सकलिऐक, तेँ ओ आओत की नहि? मुदा तइयो जी-जाँति क’ विदा भेल। भरि रास्ता विचित्र स्थितिमे अछेलाल पड़ल रहय। एक दिशि सोचैत जे जँ पलहनि नहि आओत तँ बेकार गेनाइ हैत। दोसर दिशि होय जे जाबे हम इमहर एलौ ताबे घर पर की हैत की नहि। पलहनिक ऐठाम पहुँचते अछेेलाल देखलक जे पलहनि मालक थैरिक गोबर उठा, पथियामे ल’ खेत विदा भेलि अछि। जहिना न्यायालयमे अपराधीकेँ होइत तहिना अछेलालोकेँ बुझि पड़ैत। मुदा तइयो साहस क’ पलहनिसँ कहलक- ‘‘कने हमरा ऐठाम चलू। भनसिया क’ दरद होइ छै।’’ ‘‘माथ पर गोबरक छिट्टा नेने पलहनि उत्तर देलक- ‘‘हम नइ जेबनि। डगरक सिदहा हमर बाँकिये अछि। पेट-बान्हि कतेक दिन काज करबनि।’’ पलहनिक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्य क’ कोसैत। भगवान केहेन बनौने छथि जे जकरा-तकरासँ दूटा बात सुनै छी। मुह सिकुड़िअबति अछेलाल पुनः कहलक- ‘‘कनि´ाँ, अइ साल सिदहा नइ द’ सकलिएनि, तेँ कि नहि देबनि। समय-साल नीक हैत त अगिला साल दोबर देबनि। समाजमे सभक उपकार सभकेँ होइत छैक। चलू, चलू....। खिसिया क’ पलहनि डेग बढ़बति बाजलि- ‘‘किन्नहु नहि जेवनि।’’ एक टकसँ अछेलाल पलहनि क’ देखैत रहल। देहमे जना एको मिसिया तागते ने बुझि पड़ै। हताश भ’ दुनू हाथ माथ पर ल’ अछेलाल बैसि सोचै लगल जे आब की करब? आशा तोड़ि घर दिशि विदा भेल। आगू मुहे डेगे ने उठै, पाएर पताइत। जना बुझि पड़ै जे आखिसँ लुत्ती उड़ै अए। कहुना-कहुना क’ अछेलाल घर पर आयल। तेसर सन्तान भेने मखनी क’ दरदो कम भेलै आ असानीसँ बच्चाक जन्म भेलै। अपना जनैत सुमित्रा सेवोमे कोनो कसरि बाकी नहि रखलखिन। डेढ़िया पर अबितहि अछेलालकेँ बुकौर लगि गेलै। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसै लगल। अंगना आवि मुस्कुराइत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, ककरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हैत। भगवान बेटा देलनि। गोल-मोल मुह, मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पाएर छैक।’’ आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगै-डूबै लगल। हँसी होइत सुख निकलै चाहैत जबकि आखिक नोर होइत दुख। दुख। बेटा जनमितहि सुमित्राक अंगनाक टाट पर बैसल कौवा दू बेरि मधुर स्वरमे बाजल कौवाक बोली सुनि बचेलालक मुहसँ अनायास निकलल- ‘‘अछेलाल काका क’ बेटा भेल।’’ मुहसँ निकलितहि बचेलाल आखि उठा-उठा चारु कात देखै लगल जे क्यो कहलक नहिये तखन मुहसँ किऐक निकलल? आंगनसँ निकलि बचेलाल टहलैत डबराक कोन लग आयल। कोन पर ठाढ़ भ’ हियासै लगल जे बच्चाक जन्म भेलि आ कि दरदे होइत छै। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत। अगियासी जोड़ै ले अछेलाल डेढ़िया पर जारन आनै गेल कि बचेलाल पर नजरि पड़ल। नजरि पड़ितहि अछेलाल, थोडे़ आगू बढ़ि, बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, छैाँड़ा जनमल।’’ लड़काक नाम सुनितहि बचेलालक मोनमे आयल जे जा क’ देखिऐेक। मुदा सोचलक जे अखन जा क’ देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आंगन आवि पत्नी क’ कहलक- ‘‘अछेलाल काका क’ बेटा भेल।’’ बेटाक नाम सुनितहि मने-मन असिरवाद दैत रुमा बाजलि- ‘‘भगवान जिनगी देथुन।’’ बच्चाक छठियार भ’ गेल। सुमित्रा अपन अंगनाक काज सम्हारि अछेलालक आंगन पहुँचली। गोसाई लुक-झुक करैत। पतिआनी लगा बगुला पछिमसँ पूब मुहे उड़ैत अपनामे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सब धिया-पूता हाथक रोटी छीनै ले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया उपरमे नचैत। सुरुज अराम करैक ओरिआनमे लगल। अछेेलालक बीच आंगनमे बोरा बिछा सुमित्रा बच्चा क’ दुनू जाँघ पर सुता जतबो करति आ घुनघुना क गेबो करथि- गरजह हे मेघ गरजि सुनाबह रे ऊसर खेत पटाबह, सारि उपजावह रे जनमह आरे बाबू जनमह, जनमि जुड़ाबह रे बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश रे हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे मैलहि बसन सुतायत, छैाँड़ा कहि बजायत रे जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे पीयर बसन सुताबह बाबू कहि बजावह रे झुमि-झमि सुमित्रा गबितो आ बच्चा क’ जँतबो करति। आखिसँ आखि मिला स्नेहक बरखा बरिसबैत। बच्चाकेँ कोनो तरहक तकलीफ नहि होइ तेइ ले मुह दिशि देखैत। टाटक अढ़मे बैसि अछेलाल सुमित्राकेँ स्नेह देखि, दुनिया क’ बिसरि आनन्द लोकमे बिचरैत। ........ जिनगीक जीत:ः 2 रवि दिन रहने बचेलाल अबेर क’ उठल। मनमे यैह सोचि विछान पर पड़ल, जे आइ स्कूल नहिये जाएब। घर पर कोनो अधिक काजो नहिये अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजियेटा खिंचैक अछि। दुपहर तक तँ काजो एतवे अछि। बेरु पहर हाट जा घरक झूठ-फूस समान कीनि आनब। हाटो दूर नहि, गामक सटले अछि। सुति उठि बचेलाल नित्य-कर्मसँ निवृत भ’ दलानक चैकी पर आबि बैसल। रुमा चाह द’ गेलनि। दू घोंट चाह पीबितहि बचेलालकेँ पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़ितहि बचेलाल अपन तुलना हुनकासँ (पिता) करै लगला। मने-मने सोेचै लगल जे पिता साधारण किसान छलाह। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा क’ लिखि लथि। काजो ओतबे रहनि जे कहियो-काल रजिष्ट्री आॅफिस जा सनाक बनथि। भरि दिन खेतीसँ ल’ क’ माल-जालक सेबामे व्यस्त रहैत छलाह। मुदा एत्ते गुण अवश्य छलनि जे गाममे कतौ पनचैती होइत वा कतौ भोज-भात होइत वा समाजिक कोनो (दशनामा) काज होइत तँ हुनका जरुर बजौल जाइन। ततबे नहि, बूढ़-पुरान छोड़ि केयो नाम ल’ क’ सोरो नहि पाड़ैत छलनि। अपन संगतुरिया भाय कहनि आ धिया-पूतासँ चेतन धरि गिरहत बाबा, गिरहत काका कहनि। परिवारे जेँका समाजो क’ बुझैत छलथिन। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिना छुट्टिये एक्को दिन ने स्कूलमे अनुपस्थिति होइ छी आ ने एको क्षण बिलम्बसँ पहुँचै छी। जते काल स्कूलमे रहै छी, बच्चा सभकेँ पढ़विते छी। जना आन-आन स्कूलमे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छथि, कखनो जाइ छथि आ इष्कुलेमे ताशो भँजैत छथि। ओना हमहू ककरो उपकार तँ नहिये करै छी किऐक तँ दरमाहा ल’ काज करैत छी। आन शिझकक अपेक्षा इमानदारीसँ जीवितहुँ अपना पैघ कमी बुझि पड़ैत अछि। ओ कमी अछि समाजमे रहि समाजसँ कात रहब। स्कूलक समय छोड़ि दिन-राति तँ गामेमे रहै छी मुदा ने क्यो टोक-चाल करै अए आ ने क्यो दरवज्जा पर अबै अए। मनमे सदिखन रहे अए जे कमाई छी तँ दू-चारि गोटेकेँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा क्यो कनडेरियो आखिये नहि तकैत अछि। हमहू तँ ककरो ऐठाम नहिये जाइ छी। चेतन सभक कहब छनि जे दुआर-दरबज्जाक इज्जत छी चारिगोटेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइ अए। गाम तँ शहर-बजार नइ छी जे एक्के मकानमे रहितहुँ, आन-आन क्षेत्रक रहने, लोक आन-आन भाषा बजैत, आन-आन चलि-ढ़ालिमे अपन जिनगी वितवैत, ककरो क्यो सुख-दुखमे संग नहि होइत! मुदा समाज तँ से नहि छी? बाप-दादाक बनाओल छी। एक ठाम सइयो-हजारो बर्खसँ मिलि-जुलि क’ रहैत अयलाह। रंग-विरंगक जातियो प्रेमसँ रहैत अछि। सभ सभकेँ सुख-दुखमे संग रहैत अछि। बच्चाक जन्मसँ ल’ क’ मरण धरि संग पूरैत। ऐहन समाजमे, हमर दशा ऐहन किऐक अछि? जहिना पोखरिक पानिक हिलकोरमे खढ़-पात दहाइत-भसिआइत किनछरि लगि जाइत तहिना तँ हमरो भ’ गेल अछि। की पाइनिऐक हिलकोर जेँका समाजोमे होइत छैक? जँ पाइनियेक हिलकोर जेँका होइत छैक तँ हम ओहि हिलकोर क’ बुझैत किऐक ने छी? हमहू तँ पढ़ल-लिखल छी। जत्ते समाजक संबंधमे बचेलाल सोचैत तत्ते मन मलिन होइत जाइत। मुदा बुझि नहि पबैत। अधा चाह पीलाक बाद जे गिलासमे रहल ओ सरा क’ पानि भ’ गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि, बचेलाल क’। जना बुझि पड़ैत जे हम ओहन बनमे बौआ गेलहुँ जत्त’ एक्कोटा रस्ते ने देखैत छी। गंभीर भ’ बचेलाल बड़बड़ेबो करैत आ अपने-आपमे गप्पो करैत। आंगन स सुमित्रा आबि बचेलालकेँ देखि पूछलखिन- ‘‘बच्चा, कथीक सोगमे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?’’ बचेलालक मुहसँ निकलल- ‘‘नहि माए! भेल तँ किछु नहि। मुदा गामक किछु बात मोनमे घुरिआइत अछि। जकर जबाब बुझिते ने छी।’’ तारतम्य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘गाममे ते बहुत लोक रहैत अछि मुदा सभ थोड़े गामक सब बात बुझैै छै। गाममे तीनि तरहक रास्ता छैक। पहिल ओ जहि सँ समाज चलैत अछि। दोसर सँ परिवार चलैत आ तेसर सँ मनुक्ख चलैत अछि। मनुक्ख अपन चलि परिवारक चालिमे मिला क’ चलैत अछि। तहिना परिवार समाजक चालि स मिला क’ चलैत अछि तेँ, तीनूक अलग-अलग चालि रहनहुँ ऐहन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझवोमे नहि अबैत।’ मुह वाबि बचेलाल माएक बात सुनि, कहलकनि- ‘‘माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलहुँ। मनमे यैह होइ अए जे किछु बुझिते ने छी। अन्हारमे जना लोक किछु ने देखैत, तहिना भ’ रहल अछि।’ मूड़ी डोलबैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘अपने घरमे देखहक- दूटा बच्चा अछि, ओकर त कोनो मोजरे नहि। तीनि गोटे चेतन छी। तोँ भरि दिन इस्कूलेक चिन्तामे रहै छह। भोरे सुति उठि क’ नओ बजे तक, अपन सब क्रिया-कर्म स निचेन भ खा के इस्कूल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पाएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घर पर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखाना स अबैत-अबैत दोसर साँझ भ’ जाइ छह। दरबज्जा पर बैसि, कोनो दिन ‘रमायण’ त’ कोनो दिन ‘महाभारत’ पढै़ छह। भानस होइ छै खा क’ सुतै छह। फेरि दोसर दिन ओहिना करै छह। एहिना दिन बीतैत जाइत छह। दिने स मास आ मासे स साल बनैत छैक। कोल्हुक बड़द जेँका घर स इस्कूल आ इस्कूल स घर अबै-जाइत जिनगी बीति जेतह। मुदा जिनगी त से नहि थिक? जिनगी त ओ थिक- जना बसन्त ऋृतु अबिते गाछ-विरीछ नव कलश ल बढै़त अछि, तहिना। मनुक्खोक गति अछि। जिनगीक गतिये मनुक्खकेँ ब्रह्माण्डक गति से मिला क’ ल चलैत। अज्ञानक चलैत मनुक्ख, एहि गति क’ नहि बुझि, छुटि जाइत अछि। छुटैक कारण होइत व्यक्तिगत, परिवारिक आ सामाजिक जिनगी। जे सदिखन आगूक गतिक पाछु महे धकेलति अछि। जहि स मनुख समयक संग नहि चलि पबैत। मुदा तइ स की? बाधा कतबो पैघ किऐक ने हुअए मुदा मनुखोकेँ साहस कम नहि करक चाही। सदिखन सब अंग क’ चैकन्ना क चलला से सब बाधा टपि सकैत अछि। पुतोहूए जनिकेँ देखुन। भरि दिन भनसा आ धिये-पूतेक आय-पायमे लगल रहैत छथुन। हमरो जे शक लगै अए से करिते छी। घर त कहुना चलिये जाइ छह। मुदा परिवार त समाजक एक अंग छी। परिवारेक समूह ने समाज छी। तेँ समाजक संग चलैक लेल परिवार क’ समाजक रास्ता धड़ै पड़त। से नहि भ’ रहल छह। जना देखैत छहक जे रेलगाड़ीमे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै। जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छै। मुदा चलै काल सब संगे चलै छै। तहिना मनुक्खो छै।’’ सुमित्राक बात सुनि बचेलाल जिज्ञासासँ पूछल- ‘‘अपन परिवारक की गति अछि?’’ मुस्कुराइत सुमित्रा कहै लागलि- ‘‘अपन परिवार ठमकल अछि। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू मुहे जा रहल छी, मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिझक छी, नीक नोकरी करै छी। नीक दरमहो पबै छी। हँ, ई बात जरुर अछि। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुद्धियार छी। तखन हमरा बुद्धिक काज कैक गोटे क’ होइ छै। जे क्यो नहिये पढ़ल अछि ओहो त अपन काज, अपन परिवार चलबिते अछि। कने नीक कि कने अधला सब त जीवे करैत अछि। आइ तोरा नोकरी भ गेलह, तेँ ने, जँ नोकरी नइ होइतह तखन त तोहू वहिना जीवितह जहिना बिन पढ़ल-लिखल जीवैत अछि। एहिना पुतोहू जनि केँ देखुन, जना घर स कोनो मतलबे नहि अछि। हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल। हमहूँ कनियाँ छलौ मुदा आइ जे घरमे देखै छिअह तना त नहि छल। जखन हम नैहर स ऐठाम एलहुँ तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीविते रहथि। जखन चारि दिनक बाद चुल्हि छूलौ, तहिया स सासु कहियो चुल्हि दिशि नहि तकलनि। ने कोठी से चाउर निकालि क’ देथि आ ने किछु कहथि। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्को छल। जे सब काज नैहर मे करै छलौ सैह सब काज अहूठाम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्न आ कि कोनो वस्तु दुइर नहि हुअए दैत छलिऐक। अखन देखै छिअह जे पाँचे गोटेक परिवार रहनहु सभ सब स सटल नहि, हटल चलि रहलह हेन। सटि क’ चलैक अर्थ होइत सभ सब काजमे जुटल रही। ई त नहि कि क्यो काजक पाछू तबाह छी आ क्यो बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सीमा बुझि चलक चाही, से नहि छह। हम खेलहुँ कि नहि, तोँ खेलह कि नहि। भनसिया लेल धन्य सन। की खायव, कोन वस्तु शरीरक लेल हितकर हैत कोन अहितकर, से सब बुझैक कोनो मतलवे नहि। जे खाई मे चसगर लागत, भले ही ओ अहितकरेे किऐक ने हुअए, वैह खायब। जहि स घरमे बीमारी लधले रहै छह। जहिना सुरुजक किरिणमे देखै छहक जे अनेको दिशामे चलैत तहिना परिवारोक काज सब दिशा क’ जोड़ैत अछि, से नहि भ’ रहल छह।’’ बिचहिमे बचेलाल मायकेँ पूछलक- ‘‘माए! नीक-नाहाँति तोहर बात नइ बुझि रहलौ हेन?’’ बचेलालक बातकेँ तारतम्य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा, देखहक जहिना गाममे किछु परिवार आगू मुहे ससरि रहल अछि त किछु परिवार पाछू मुहे। किछु परिवार ठमकल अछि। जहि स गाम आगूू मुहे नहि बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारोमे होइत। परिवारोमे किछु गोटे आगू बढ़ैक चेष्टा करैत त किछु (आलस अज्ञान आदि क चलैत) पाछू मुहे ससरैत। किछु गोटे अदहा-छिदहा मे रहैत। तेँ परिवार केँ जहि गति मे चलक चाही, से नहि भ’ रहल अछि। ततवे नहि इ रोग मनुक्खक भीतरो मे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समय स जोड़ि क’ चलै चाहैत त किछु समयक गति नहि बुझि, पाछूऐ मुहे चलैत। ई बात जाबे नीक जेँका नहि बुझबहक ताबे ने मन मे चैन हेतह आ ने आगू मुहे परिवार बढ़तह।’’ माइक बात स बचेलालक मन घोर-मट्ठा भ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरिअबैत बचेलाल माए केँ कहलक- ‘‘माए! जखन मन असथिर हैत तखन बुझा-बुझा कहिऐं। एक बेरे नइ बुझब, दू बेरे बुझैक कोशिश करब। दू बेरे नइ बुझब तीन बेरे कोशिश करब। मुदा बिना बुझने त काज नहि चलत।’’ बचेलालक बात सुनि मुस्कुराइत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा जखन तोहर पिता जीविते रहथुन तखन घर मे पाथरक बटिखारा छल। ओहि स जोखै-तौलै छलहुँ। एक दिन अपने(पति) आबि कहलनि जे आब लोहाक पक्की सेर, अढ़ैया पसेरी सब आइल। हम पूछलिएनि जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तकरा फेकि देबै? ओ(पति) कहलनि-फेकबै किऐक? लोहा सेर क’ पथरक सेर स भजारि लेब। बटिखारा कम-बेसी हैत, सैह ने हैत, ओकरा अपन बटिखारा हिसाब स मानि लेबै। अओर की हेतै। बौआ अखन तोरो मन खनहन नइ छह, जा तोहू अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप्प करब।’’ अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खींचै विदा भेल। आंगन जा बाल्टी-लोटा, कपड़ा आ साबुन नेने कल पर पहुँचल। कपड़ा साबुन के कात मे रखि पहिने कलक चबूतरा साफ केलक। बाल्टी मे पानि भरि सब कपड़ा क’ बोइर देलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगल मे रखैत। जखन सब कपड़ा मे साबुन लगाओल भे गेलै तखन पहिलुका सावुन लगौलहा कपड़ा निकालि खींचै लगल। सुमित्रा खन्ती ल बाड़ी ओल उखाडै़ विदा भेलि। बाड़ी मे पतिआनी लगा ओल रोपने रहथि। तीन सलिया ओल। केंकटा गाछ फुला गेल। बाड़ी मे सुमित्रा हियासै लागलि जे कोन गाछ खुनब। सब गाछ डग-डग करैत। पतिआनीक बीच मे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भ गेल। पात क’ पीअर देखि सुमित्रा ओइह गाछ खुनैक विचार केलनि। ओल कटि नहि जाय तेँ फइल से खुनव शुरु केलनि। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी एकोटा नहि। टोंटी नहि देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे टोंटी रहैत त रोपियो दैतिऐक मुदा से नहि भेल। ओलक माटि झाड़ि गाछ के टुकड़ी-टुकड़ी काटि खधिये मे द उपर स माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहथि जे ओलो आ खन्तिओ ऐके बेर नेने जायब मुदा से गरे ने लगनि। दुनू हाथ स’ ओल उठा एक हाथ के ल दोसर हाथ से खन्ती लिअए लगथि कि ओल गुड़कि क’ निच्चा मे गिर पड़नि। कैक बेर कोशिश केलनि मुदा नहिये भेलनि। तखन हारि क’ पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग राखि, खन्ती आनै गेली। खन्तिओ मे माटि लगल आ ओलो मे। तेँ दुनू क’ नीक-नाहाँति घुअए पड़त। माए क’ ठाढ़ देखि बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ै लगल। कपड़ा ल बचेलाल चार पर पसरै गेल। सुमित्रा ओल के कलक निच्चा मे रखि कल चलबै लगली। गर उनटा-उनटा दश-पनरह बेर कल चलौलनि। मुदा तइयो सिरक दोग-दाग मे माटि रहबे केलै। तखन ओल क घुसुका बाल्टी मे पानि भरि लोटा स ओलो, खन्तिओ आ अपनो हाथ-पाएर धोलनि। आंगन आबि सुमित्रा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘आइ रवियो छी, बच्चो गामे पर रहता तेँ ओलक बड़ी बनाउ। बड़ निम्मन ओल अछि तेँ दू चक्का तड़ियो लेब।’’ सुमित्राक बात सुनि मुह-हाथ चमकबैत पुुतोहू उत्तर देलखिन- ‘‘हिनका हाथ मे सरर पड़ल छनि तेँ कब-कब नइ लगै छनि। हमरा त ओल देखिये के देह-हाथ चुलचुला लगै अए। अपने जे मन फुड़ैन से बनबथु। हम चुल्हि पजारि ताबे भात रन्है छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छनि।’’ पुतोहूक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे जाबाव दिअनि आ कि नहि? समय पर जँ जबाव नहि देब त दबब हैत। मगर जबाव देनहु त झगड़े हैत। अपना जे इच्छा अछि वैह करब मुदा बाता-बाती से त काजे रुकत। जत्ते बनबै मे देरी हैत तते भानसो मे अबेर हैत। मुदा सुमित्राक मन जबाव देइ ले तन-फन करैत। ओल क’ बीचो-बीच काटि, चारि फाँक करै लगली ओलक सुगंध आ रंग देखि सुमित्रा जबाव देलखिन- ‘‘कनियाँ, जे चीज सब दिन नीक लागल ओ आइ अधला कोना भ’ जायत? जाबे जीबै छी ताबे त खेबे करब। तेाँ जकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नहि छी। दुनू गोटेक नजरि मे अन्तर छह। जे अन्तर नीक-अधला मे बदलि गेल छह। दुनू गोटेक नजरि, एहि दुआरे दू रंग भ गेल छह जे दुनू गोटेक जिनगी दू रंग बीतल। तेाँ नोकरिहाराक परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाई छथुन जहि स हाट-बजार से समान कीनि आनि खइ छेलह। हम त सामान उपजवै वला परिवार मे रहलहुँ। कोन वस्तु कोना रोपल जाइ छै, कोना ओकर सेवा करै पड़ैत छै, से सब वुझै छियै। तेँ हमर नीक आ तोहर नीक मे यैह अन्तर छह।’’ दुनू सासु-पुतोहूक गप-सप बचेलालो दरवज्जा पर स सुनैत। बीच आंगन मे बैसि सुमित्रा ओल बनवति रहथि। घर मे पुतोहू भन-भना क’ बजैत रहति, जे सुमित्रा नीक जेँका सुनवो ने करैत। बच्चा नेने मखनी सेहो आइलि। मखनी के कोरा मे बच्चा देखि सुमित्रा दबारैत कहलखिन- ‘‘मासे दिनक बच्चा के अंगना से किऐक निकाललह? जँ रस्ता-पेड़ा मे हबा-बसात लागि जइतै तब?’’ हँसैत मखनी उत्तर देलकनि- ‘‘दीदी! अइ आंगन के अनकर आंगैन कहै छथिन। हमर नइ छी? अपनो अंगना अवै मे संकोच हैत।’’ मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत कहलखिन- ‘‘अनकर अंगना बुझि नइ करलियह। अखन बच्चा छोट छह तेँ बचा केँ राखै पड़तह। बेटा धन छी। घर से त निकलबे करत। पुतोहू केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘पहिले-पहिल दिन बच्चा अंगना आयल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घर मे नइ हुअअ ते तेले टा नेने आवह। ताबे चुल्हि मिझा दहक। पहिने बच्चा के जाँति-पीचि दहक।’’ घर स रुमा तेल आ विछान नेने आबि अंगने मे विछौलक। तेलक माली लग मे रखि बच्चा केँ कोरा मे लेलक। दुनू पाएर पसारि बच्चा केँ जाँध पर सुतौलक। बच्चाक मुह देखि रुमा मने-मन बाजलि- ‘‘मखनी केहेन भाग्यशाली अछि जे भगवान ऐहन सुन्नर बच्चा देलखिन।’’ उनटा-पुनटा क’ बच्चा देखलक। रुमाक मन मे ऐलै जे कोना लोक बजै अए जे फल्लाँक कपार खराब छैक आ फल्लांक नीक? जँ कपार अधला रहितैक त बेटी होइतै। जकर कपार नीक रहै छै, ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजरि मे सब बराबरि अछि। सभ त हुनके सनतान छी। कोन पापी बाप ऐहेन हैत जे अपना सन्तान केँ दूजा-भाव करत? अनेरे लोक, कपार गढ़ि, भगवान केँ दोख लगबै छनि। सुमित्रा हाथ स ओलो आ कत्तो ल मखनी ओल बनबै लगलीह। ओल देखि मखनी सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘ओल अंडाइल रोहू(माछ) जेँका बुझि पड़ैत अछि। दीदी ‘हाथ धो लथु, हम बना लै छी।’’ सुमित्रा हाथ धोय दुनू हाथ मे करु तेल लगा अपना पाएर मे हसोथि लेलनि। हाथक कबकबी मेटा गेलनि।ं विछान पर जा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘कनि॰ााँ, बच्चा लाउ। हम जाँति दइ छियै। अहाँ चुल्हि लग जाउ।’ सुमित्रा कोरा मे बच्चा के द’ रुमा चुल्हि पजारै गेलि। सुमित्रा बच्चा केँ जाँध पर सुतवैत मखनी केँ कहलक- ‘‘कनियाँ, बीचला चक्का ओरिया क’ काटब। ओ तड़ब। कतका सब उसनि क’ बरी बनाएब।’’ मुस्की दैत मखनी कहलकनि- ‘‘तेहेन सुन्नर ओल छनि दीदी जे चुल्हि पर चढ़िते गल-बला जेतनि। खेबो मे तेहने सुअदगर लगतनि। अइ आगू मे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।’’ सुमित्रा बच्चा केँ जतबो करैत आ घुनघुना क’ गेबो करैत- ‘कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे। कौने बाबी पीसल कसाय ओ जे बच्चा केँ उङारब हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल ओ जे सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौलीह बच्चा केँ उङारथि हे। जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्चा क’ जाँति-पीचि चानि मे काजरक टिक्का लगा निचेन भेलीह। मखनीक कोरा मे बच्चा द’ सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल द देलखिन। ........ जिनगीक जीत:ः 3 अधरतियेमे सुमित्राक निन्न टूटि गेलनि। ओछाइन परसँ उठि आंगन आबि, मेघ दिशि हियासै लागली। अन्हरिया राति। साफ मेघ। सिंगहारक फूल जेँका तरेगण चमकैत। घरसँ थोड़े हटल पूबरि भाग बाँसक बीटि। बासँक झोंझमे मेनाक खोंता। एकटा मेना क’ बाझ पकड़ि उड़ि गेल। बाझके उड़िते आन-आन मेना गदमिशान करै लगल। मेनाक आवाजकेँ सुमित्रा अकानए लगली। भिनसुरका बोली नहि बुझि सुमित्रा सोचै लगलीह जे किछु भ’ गेलै। तेँ एना बजै अए। कने काल ठाढ़ भेलो पर रातिक ठेकान नहि पाबि सुमित्रा पुनः ओछाइन पर जा पड़ि रहली। अनायास मनमे एलनि जे जहिना अछेलाल समाजमे रहितो समाजसँ अलग अछि तहिना तँ बचेलालो अछि। ओहि दिन वेचारा सत्ते कहलक जे ने ककरो ऐठाम जाइ छी आ ने क्यो हमरा ऐठाम अबै अए। ने ककरो स’ गप्प होइ अए आ ने गामक कोनो बात बुझै छी। रुमा सेहो उठिकेँ सासु लग ऐली। पुतोहूँकेँ सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘जखन दुरागमन भ’ ऐठाम आइल रही तखन दू-तीन साल अंगनेमे रहलौ। अंगनासँ बहार सासु नहि हुअए दथि। ओइह (सासु) बहराक काज सम्हारथि। कातिक मास। छठिक परातेसँ दुनू सासु-पुतोहू सामा गीत गाबी। समाजक सभ स्त्रीगण अपन-अपन अंगनामे सामाक गीत गबथि। ओ आगू-आगू कहथिन हम पाछू-पाछू। तीनि साल एहिना बीतल। चारिम साल सामा भसौनिक दिन हुनकर मोन खराब भ’ गेलनि। तत्ते जोर कफ आ उकासी होइन जे बजले ने होइन। भसाओनिक दिन रहने छोड़लो कोना जइतै। बेरुए पहर ओ एक पाँज धान काटि अनलनि। ओकरा मिड़लहु। अदनार धान तेँ ताड़ै-भाड़ैक जरुरते नहि। ओ (सासु) घानी लाड़थि, हम ऊखड़ि-समाठ ल’ कूटी। चूड़ा कुटलौ। बाटीमे अरबा चाउर भीजै ले दुपहरे द’ देने रहिये। ओकर पीठार पीसलौ। गोसांइ लुक-झुका गेल। काजो बहुत रहै तेँ हाँइ-हाँइ करी। तहूमे सासुक मन खराबे रहनि मुदा तइयो संग-साथ देथि। ने अखन धरि समा रंगने छलौ आ ने वृन्दावनक चुगला झड़कबै ले बनौने छलौ। किएक तँ घरमे सोन रहबे ने करै। हाँइ-हाँइ सामा-चकेबा सबकेँ पीठारसँ ढ़ौरलौ। ओकरा सुखै ले चंगेड़ा मे द’ देलियै। सामा रंगै ले एक्केटा पुड़िया गुलाबी रंग रहै। एके रंग से रंगलो नै जायत। कमसँ कम लाल, हरियर, पीअर आ कारी रंग ते जरुर चाही। दुनू सासु-पुतोहू गुनधुनमे पड़ल रही। अनाययास हुनका (सासु) मनमे एलनि जे सीमक पात तोड़ि हरियरका आ सिंगहारक फूलक डंटीसँ पीअरका रंग बनोओल जा सकैत अछि। मन पड़िते ओ (सासु) दश-बारहटा सीमक पात तोड़ि आनि हमरा पीसै ले कहलनि। अपने सिंगहारक गाछ लग जा बसिया फूल बीछि आनलनि। हम सीमक पात पीसै लगलहु आ ओ सिंगहारक डंटी तोड़ै लगलीह। मनमे सबुर भेलि। किऐक तँ काजरसँ करिया रंगक काज चलि जायत। रंग तैयार होइते दुनू गोटे सबकेँ रंगलौ। रंगल जखन भ’ गेल तखन हुनका मन पड़लनि जे झाझी कुत्ता, ढोलिया आ लड़ूबेचा तँ बनेवे ने केलहुँ। आब की हैत? विधि तँ पुरबै पड़त। गुनधुन करैत सासु कहलनि- ‘‘कनि॰ााँ, कने माटि सानि तीनू बना लिअ। मुदा धड़फड़मे सूखत कोना? तइयो तीनू बनेलहुँ। काँच दुआरे ओकरा नै ढोरलौ आ ने रंगलौ। सबके चंगेड़ामे सरिया क’ राखि भानसक जोगारमे लागि गेलहुँ। सासु मालक घरमे ओछड़ा दै ले गेली हम भानस करै लगलौ। भानस भेलो नइ छल कि उत्तरबारि टोलमे सामा गीत शुरु भेल। बाबू (ससुर) आ हुनका (पति) खुआ, दुनू गोटे खेलहुँ। थारी-लोटा, बरतन अखारि राखि देलिऐक। दीप जड़ेलहुँ। दुनू गोटे गीत गबै बैसलहुँ। जहाँ ओ (सासु) गोसाउनिक गीत उठौलनि कि उकासी उठलनि। एक लखाइते बड़ी काल धरि खोंखी करिते रहि गेलीह। उकासी बन्ने ने होइन। हम हुनकर (सासु) छाती दाबि ससारै लगलौ। तखन उकासी बन्न भेलनि। उकासी बन्न होइते कहलनि- ‘‘कनियाँ, हमरा गाओल नइ हैत। आइ उसरै अए, तेँ छोड़बो नीक नइ हैत। जैह अबै अए सैह गाबि विधि पूरा लिअ।’’ सासुक आग्रह सुनि तरे-तर खुशी भेलौ, जे हमरो लूरि देखतीह। पहिने तँ थोड़े नाकर-नुकर केलौ जे हमरा गीत नइ अबै अए। मुदा फेरि सोचलहु जे लूरिकेँ झाँपियो क’ राखब नीक नहि। गाबै लगलौ। आगू-आगू हम कहियै आ पाछूसँ ओ धरथि। उकासी दुआरे घुनघुनेबे करथि। आंगनमे गोसाउनिक गीति गाबि, चंगेरा उठा बटगबनी गबैत चैमास दिशि विदा भेलौ। चैमास जाइत-जाइत गीतो खतम भेलि। चैमासमे चंगेरा राखि, सामाक गीत शुरु केलहुँ। पहिल गीति समाप्त होइते सासु कहलनि जे लगले सूरे पाँचटा पुरा लीअ’। पहिलुक गीति तँ हुनको अबैत रहनि तेँ घुनघुनाइयोकेँ संग पूरि देलनि, मुदा दोसर नहि अबैत रहनि तेँ कखनो घुनघुनाइत तँ कखनो चुप भ’ जाथि। हम देखियो क’ अपना सूरे गबिते रहलौ। जहिना भरल कोठीक मुह खोललासँ चाउर भुभुआ क’ निकलैत तहिना हमरो हुअए। एकके सूरे दश-बारहटा सामाक गीत गाबि लेलहुँ। गामक जत्ते सामा खेलेनिहारि रहथि सब अपन-अपन सामा भसा आंगन गेलीह। हमहू सामा भसा सोहर गबैत अंगना विदा भेलौ। एक्के-दुइये गामक गीति गौनिहारि आबै लगली। पाछू-पाछू ओहो सभ भाँज पूरै लगली। एकटा सोहर गाबि दोसर उठेलहुँ। सासुक मन खराब रहनि तेँ खिसिया क’ ओ सुतै ले चल गेली पाँचटा सोहर गौलौ। नवकी कनियाँ सभ मुह दाबि-दाबि बजैत जे दीदी नाचमे रहैत छेलखिन तेँ हाथ चमका-चमका गबै छथि। साउसो ओछाइन पर घुनघुना क’ गवैत। कखनो घरे से चाबस्सिओ द’ दथि। सोहरक बाद समदाउन उठेलहुँ। नवतुरिया सभकेँ भास चढ़वे ने करै। घरेसँ माय कहलखिन-‘‘ठी-ठी केने समदाउन गौल जाइछै। मनुख जेँका मन असथिर क’ क’ गाओले ने होइ छनि।’’ अपन कमजोरी मानि मंगली कहलक- ‘‘भौजी समदाउन छोड़ि एकटा बरअमासा (बारहमासा) कहिऔ।’’ मंगलीक विचारकेँ सभ समर्थन दैत हूँ-हूँ कारी भरलक। हम बरहमासा शुरु केलौ- रघुवर जुनि जइयौ मिथिला नगर से सिया कोहवर से ना। अगहन सिया के विआह पूस सेजिया लगायब, माघ सीरक भरबायव रघुवर के, सिया कोहबर से ना। फागुन फगुआ खेलायब चैत माला गाँथि लायब बैशाख बेनि॰ाा डोलायब रधुवर के, सिया कोहवर से ना। जेठ तबे दिन राति आषाढ़ बरसे दिन राति सावन झुला झुलाय के, सिया कोहवर से ना। भादव राति अन्हार आसीन आस लगायब कातिक चलि जाएब मिथिला नगर से, सिया कोहवर से ना। बारहमासा गबैत-गबैत रातियो बेसी भ’ गेलै आ ओससँ सबहक नुओ सिमसि गेलै। मुदा तइयो उठै ले क्यो तैयारे ने होइत। हाँ-हाँ, हीं-हीं सब करैत। अपनो थाकि गेलहुँ। तखन दुनू हाथ जोड़ि कहलिऐक- ‘‘बड़ राति भ’ गेल। अखन जाइ जाउ। काल्हिसँ आबि-आबि सुनवो करब आ सीखवो करब। तखन सब गेलि। हमहू सुतै ले गेलहु। औझुका जँका ने पढ़ल-लिखल जनिजाति छलि आ ने पढ़ै-लिखैक सुविधा छलै। एक-एकटा गीति सीखैमे कै-कै दिन लागि जाइ छलै। हमहीं जे सीखलौ, ओ माएसँ सीखलौ। काजो करै काल सीखी आ रातिमे खेला-पीला बाद माएके जतै ले जाइ तखनो सीखी। जखन गीत (याद) इयाद भ’ जाय तखन भाएकेँ गावि सुना दियै। दोसरे दिनसँ गीति सीखै ले ढेरबासँ ल’ क’ जुआन कनि॰ााँ धरि आबै लागलि। गामक बेटी सभ तँ जखन-तखन आवि जाय मुदा कनियाँ (पुतोहू वर्गक) दोसरि तेसरि साँझमे आबै। अंगना काज बरदाइत देखि सभकेँ कहि देलियै जे साँझू पहरके आबह। सैह भेल। छह मास धरि सभकेँ गीत सिखेलहुँ। जखन अपने (बचेलालक पिता) मरि गेलखिन तखन घरक भार पड़ि गेलि। दुनू बच्चा लिधुरिया। की करितौ? खेती-बाड़ीसँ ल’ क’ अंगना-घरक काज सम्हारै पड़ैत छल। अपने काजमे तेना ओझरा गेलौ जे दोसराक सुधिये ने रहल। समाजमे कतौ विआह होय वा उपनयन हमरो हकार अबैत छल। हमहू जा क’ गोसाउनिक गीतिसँ ल’ क’ समदाउन तक गबै छलौ। जे सब छूटि गेलि। अखनो ओ सब जँ इमहर अबै अए तँ जरुर भेटि करै अए। मुदा आब तँ अपने सभकेँ बाल-बच्चा, नाति-पोता भ’ गेलै। सब अपने-अपने परिवारमे ओझरायल रहै अए। हमहू बूढ़ि भेलौ तेँ पहिलुका जेँका काजोमे नै सकै छी। जाधरि गामक लोकसँ लाट रहैत छल ताधरि सब नीक-अधला बुझैत छलिऐक। ककरा ऐठाम पाहुन आयल वा ककरा घरमे कते नोन-तेल खर्च होइ छलै, सब बुझै छलिऐक। समय जिनगी क’ छोट बना देलक। जाबे जीवै छी ताबे दोसराक भार नहि बनिऐक, तेहि ले भरि दिन लुरु-खुरुमे लगल रहै छी। अखनो बाड़ी-झाड़ीमे तीमन-साजन उपजवितहि छी। भानसो करिते छी। अंगना-घर बहारिते छी। चिक्कनि माटिसँ घर नीपिते छी। कखनो ई नै बुझि पड़ै अए जे अथबल भेलहुँ। जखने काजसँ हटब तखने जिनगी भार बुझि पड़त। जिनगी की थिक? जिनगी तँ यैह थिक जे हँसैत-खेलैत बीता ली। जे अखैन धरि निमहल, आगू बुझल जेतै।’’ भोर भ’ गेल। चिड़ै चुनमुनी जुटि बान्हि-बान्हि, खोंतासँ निकलि आकासक रास्तासँ पराती गवैत जिनगीक लीला करै विदा भेलि। ....... जिनगीक जीत:ः 4 आंगना बहारि सुमित्रा दरबज्जा बाहरै गेलीह। दरवज्जा बाहरैसँ पहिने बड़द पर नजरि पड़लनि। डेढ़िया पर बाढ़नि राखि मुह पर हाथ द’ बैसि, मने-मन सोचै लगली। बड़दक दशा देखि सुमित्राक दुनू आखिसँ नोर टघरै लगलनि। ताबे बचेलालो सुति उठि क’ दरवज्जा पर आयल मने-मन सुमित्रा सोचै लगली जे जाबे बचेलालक पिता जीबैत छलथिन ताबे जोड़ा बड़द खूँटा पर रहैत छल। दुनू बड़दकेँ खुआ-पीया पट्ठा बनौने रहैत छलाह। ने एकटा कुकुड़माछी देह पर रहै दैत छेलखिन आ ने एकोटा अठगोरबा रहैत छलै। जहिना लोक अपन बच्चाक सेवा करैत अछि तहिना ओ (पति) गाय-बड़दक सेवा करैत छलाह। जखन अपने जीवैत छलाह हमहू जुआन छलौ। दुनू बेकती मिलि घर-अंगनासँ ल’ क’ खेती-पथारी धरि सम्हारैत छलौ। आब बूढ़ि भेलहुँ आब कोना गाय-बड़दक सेवा कैल हैत? जँ कहीं अनचोकमे लथारे मारि दिये वा हूरिपेटे दिये तखन ते हाथ-पैर तोड़ा घरमे कुहरैत रहब। तइसँ नीक जे ओकरा लग जेबे ने करी। भरि दिन बचेलालो इस्कूले आइ-पाइमे लगल रहै अए। पुतोहूओ जनि तेहेन घर स’ आइलि छथि जे गाय-बड़दसँ कहियो भेटे ने। घास-पात दुआरे खूँटा पर बड़द कलपै अए। ने एक मुट्ठी केयो घास देनिहार आ ने एक डोल पानि पिऔनिहार। कखनो एक मुट्ठी घास आगूमे फेकि देलियै तँ कखनो एक डोल पानि पिआ देलिऐ। एहिसँ गाय-बड़द कोना पोसल जायत? सुमित्रा सोचवो करैत आ आखिसँ नोरो टघरैत। दलानक आगूमे बचेलाल दतमैनो करैत आ टहलबो करैत। अछेलालकेँ घरमे चून नहि रहने, मुट्ठीमे तमाकुल नेने चून मंगै आयल। सुमित्राक आँखिसँ नोर टघरैत देखि बचेलाल पूछलकनि- ‘‘माए, कनै किऐ छैँ?’’ सुमित्रा किछु नहि उत्तर देलखिन। दुनू आखिक नोर’ आँचरसँ पोछि माय बचेलाल दिशि देखै लगली। हाथमे तमाकुल रखने अछेलालो चुपचाप ठाढ़। ने चून मंगैक साहस होइ आ ने किछु बजैत। सुमित्राक मलिन चेहरा देखि अछेलालोक आ बचेलालोक चेहरा मलिन हुअए लगल। त्रिकोण जेँका तीनू गोटे। कियो ने किछु बजैत। कने कालक उपरान्त मिड़मिड़ा क अछेलाल सुमित्रासँ पूछल- ‘‘एते सोगाइल किऐ छी भौजी? कथीक दुख मनमे अछि?’’ पुनः आँचरसँ नोर पोछैत सुमित्रा बाजलि- ‘‘एत्तै आउ। लगमे बैसू। कहै छी। बौआ (बचेलाल) तोँहू मुह-हाथ धोनो आवह?’’ बचेलाल मुह-हाथ धोए ले कल पर गेल। अछेलाल लगमे आबि सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘चूनक दुआरे तमाकुलो ने खेलौ भौजी। मन चटपटाइ अए। पहिने कने चून आनि दिअ।’’ ‘‘अच्छा बैसू। आंगना से नेने अबै छी।’’- सुमित्रा कहि आंगन विदा भेलि। डेढ़िये परसँ बचेलाल जोरसँ घरवालीकेँ चाह बनौने अबै ले कहलक। दू घुस्सा द’ अछेलाल तमाकुल चूना मुहमे लेलक। दुनू गोटेकेँ सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘एक समैक बात छी। हमरा नैहरमे एकटा गौर (बाछी) बाबू देने रहथि। बड़ सुन्नर बाछी छलै। छह मास पोसलौ तखन पाल खेलक। ठीक नओ (270दिन) मास पूरिते बाछी तरे बिआइल। बड़ दूधगरि गाय भेल। दू सेर भिनसर आ डेढ़ सेर बेरु पहरके दूध हुअए। गाय तँ गाइये छल। जखन बेगरता हुअए तखन पा भरि आसेर दुहि ली। बड़ सहठुल छल। एगारह बिआन बिआइल। जहाँ तीनि मास बियेना होय कि पाल खा लिये। पाल खेला पर छह मास लागे। जखन तीनि मास बिआइ ले बाकी रहै छलै तखन अपने दुहब छोड़ि दइ छेलिये। जहिना नाम गाय तहिना सज्जनो। खाइयो पीबैमे कोनो चीज बगै नइ छले। लत्ती-कत्तीसँ ल’ क’ तीमन तरकारीक छाँट-छुट आगूमे दइते लप दे खा लैत। तीनि मास बियेना भेलै कि बड़ जोर दुखित पड़ल। गामक लोक सब जे-जे दवाई बतौलक सब केलियै मुदा दुख घटैक बदला बढ़िते गेलै। मनमे हुअए जे कोन जनममे पाप केलहुँ जे ऐहेन लागल फुलवाड़ी उजड़ि रहल अछि। दुनू परानीक आशा टूटि गेल। सोगे अन्नो-पानि नीकि नहि लागे। बच्चाकेँ देखि दयासँ हृदय पधिल गेल। गाय अपने दुखसँ तबाह ते बच्चाकेँ कोना लगमे जाइ दितै। जना बच्चा परसँ सुरता हटि गेलै। सिरियाक गाय विआइल रहै। ओकरेसँ पा भरि क’ दूध ली आ बच्चाकेँ खुरचनसँ पीआवी। मुदा पा भरि से बच्चाके की होइतै? फुलकी वला घास आ खिचड़ीक आदति धीरे-धीरे लगबै लगलौ। पड़ले-पड़ल गाय डिरियेबो करै आ चारु टाँगो पटकै। मनमे हुअए जे नैहरक गाय छी जँ मरि जायत तँ नैहराक लोक कहत जे धारबे ने करै छै। मुहसँ फुफड़ी उड़ै। हमरोसँ बेसी हुनके (पति) चिन्ता होइन। सोगे सदिखन चैकी पर पेटकानो लधने आ कुही भ’ भ’ कनबो करथि। बेर टगिते एकटा महात्मा (दाढ़ी-केश बढ़ौने) रस्ते-रस्ते कतौ जाइत रहथि। महात्माक नाम देवन छलनि। गाइक डिरियेनाइ सुनलखिन। थोड़ेखान रस्ता पर ठाढ़ भ’ हियासलनि। तखन ससरि क’ दुआर पर ऐला। मुड़ी गोति हम अथाह दुखमे डूबल रही। दुआर पर अबिते देवन निङहारि-निङहारि गाय क’ देखै लगलखिन। कने काल गुम्म भ’ पूछलनि- ‘‘कते दिनसँ गाय अस्सक अछि?’’ कपैत मनसँ कहलिएनि- ‘‘सात दिन से।’’ पुनः पूछलनि- ‘‘घरवाड़ी कहाँ छथि?’’ हाथक इशारासँ चैकी पर देखा देलिएनि। हाथेक इशारासँ ओहो हुनका लग अबै ले कहलखिन। लग अबिते मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘गाय मरत नै। दुनू बेक्ती मनसँ दुख हटाउ।’’ कहि अपना झोरासँ कथूक जड़ि निकलि द’ कहलखिन- ‘‘एकरा सिलौट पर खूब हलसँ पीसने आउ?’’ ओहि जड़ी क’ धोय, सिलौट परसँ पीसने एलौ। भरि गिलास पानिमे ओहि जड़ीकेँ घोड़ि गायके पीया देलखिन। तीनू गोटे गप्प-सप्प करै लगलौ। कनिये खानक बाद गाइक डिरिआइब बन्न भेलै। आखि उठा क’ गाय बच्चा दिशि तकलक। बच्चा पर नजरि पड़िते हुकड़ल। बच्चो बोली देलकै। बाछीकेँ खुजले छोड़ि देने रहियै। दौड़ि क’ बाछी गाय लग आबि ठाढ़ भ’ गेलै। चारु टाँग समेटि गाय ओरिया क बैसल। गरदनि उठौलक। उठल गरदनि देखि कतौ स’ परान आयल। मनमे खुशी भेल। अपने (पति) कहलनि- ‘‘गायक रोग छुटि रहल अछि। आब गाय बँचि जाइत।’’ एत्ते कहिते छलाह कि गाय उठि क’ ठाढ़ भ’ गेलि। मुदा चारु टाँग थरथरायते रहै। नेरु गायक थन दिशि बढ़ै लगल कि अपने डोरी गला देलथिन। घरसँ घास आनि हम आगूमे दलियै। गाय खाइ लागलि। हमर करेज चमकि उठल। जहिना जाड़क मासमे करिया पहाड़ पर ओस पसरल रहैत आ सुरुजक रोशनी पड़िते चानी जेँका चमकै लगैत, तहिना भेल। अपने देवनकेँ कहलखिन- ‘‘महात्माजी! अपने भोजन क’ लेल जाउ।’’ हँसैत देवन उत्तर देलकनि- ‘‘भोजन जरुर करब, मुदा एहि गायक दूधक खीर खायब। ताबत एक लोटा जल पिआ दिअ।’’ महात्माजीक बात सुनि दुनू परानीक मोन बिहुँसि उठल। घरक काते-काते जे घास रहै ओकरा नोचि-नोचि हम गायक आगूमे दियै लगलियै आ अपने बाँसक पत्ता तोड़ै गेलाह। आहूल भरि घास गायक आगूमे दियै आ ओ लप दे खा’ जायत। पँजरामे पँजरा जे सटल रहै से अलगै लगलै। इनारसँ पानि भरि अनलौ। आगूमे दइते बाल्टीओ भरि पी लेलक। फेरि एक बाल्टीन अनलौ, सेहो पी गेल। ताबे अपनो पात अनलनि। दुनू गोटे पात खोंटि-खेंटि दियै लगलियै। अधा बोझ पात खा गेल। तखन देवन कहलनि जे आब दुहि लीअ। थन लटकिकेँ ठेहुन लग चल आयल रहै। बच्चा क’ डोरी छिटिका देलियै। दौड़ि क’ बच्चा पीबै लगलै। अपने दुहै लगलथि। बाल्टीन भरि गेल। दूध देखि मनमे भेलि जे दुखीत गायक दूधो त’ दूषिते हेतै। मुदा देवन महात्माजी कहलनि जे दवायक गुण त’ सेहो दूध तक पहुँच गेल हेतै। तीनि दिनक भूखल दुनू परानी सेहो रही। जाबे गाय दुखित रहै ताबेतक भूखो ने बुझियै, मुदा अपनो भूख जगल। अपने भानस करै गेलहुँ आ ओ (पति) देवनसँ गप-सप करै लगलथि। सबटा दूधक खीर रन्हलौ। पहिने माहात्माजीकेँ खुआ अपने दुनू बेकती खेलौ। ओहि गाइक जरोह ई बड़द छी। जकर दशा देखि पैछला सब बात मन पड़ि गेलितेँ आँखिमे नोर आबि गेलि।’’ रुमा चाह नेने आइलि। सब क्यो चाह पीबै लगल। चाह पीबि अछेलाल तमाकू चुनवै लगल। तमाकुल चुना क’ खा सुमित्राकेँ पूछल- ‘‘तकर बाद की भेलै?’’ सुमित्रा बजलीह- ‘‘खेला-पीला बाद देवन विदा हुअए लगलाह। हम झोरा पकड़ि कहलिएनि कम स’ कम आइ भरि रहि जाउ। काल्हि चल जायब।’’ मानि गेला। खा-पीकेँ रातिमे ओ (देवन) अपन जिनगीक कथा कहै लगलथि। दुनू परानी सुनिनिहार रही आ ओ कहनिहार। कहै लगलथि- ‘‘जखन हम दशे वर्खक रही तखने माइओ आ बाबूओ दुखित पड़लथि। हम कमाई-खटाई जोकर नहि रही। हुनके (माए-बाबूजी) कमाईसँ घर चलैत छल। अनायास दुनू गोटे दुखित पड़ि गेलथि। खाइ ले घरमे किछु रहबे ने करै। एक तँ दुखसँ दुनू गोटे अब-तब करैत दोसर पेटमे अन्न नहि। सिर्फ पानिटा दिअनि। हमहू सदिखन लगेमे रहैत छलिएनि। हुनका सभकेँ छटपटाइत देखिएनि ते हमरो दुख हुअए। मुदा की करितहुँ? कोनो रस्ते ने सुझै। पाँचम दिन दुनू गोटे मरि गेला। जाबे दुखित रहथि ताबे समाजक क्यो ने अबैत छल आ ने किछु मदति करैत। मुदा जखन मरि गेला तखन जिज्ञासा करै किछु गोटा ऐला हमहू ककरो ने किछु कहलिऐक। मनमे आयल जे जई समाजमे क्यो ककरो देखैवला नहि आहि समाजमे रहिये के की करब? दुनू गोटे घरेक बिछान पर मुइला? हमरो हड़ल ने फूड़ल जते अंगनाक टाट-फड़क रहै सब के उजाड़ि घरमे द’ देलिए। मनमे आइल जे जरबैकाल नव-वस्त्र हेबाक चाही? मुदा सोचलौ जे जीबैत मे तँ दुनू गोटे फाटल-पुरान कपड़ा पहिरलथि मुदा जरै ले नव वस्त्रक कोन जरुरीछै? सब समान जमा क’ क’ घरमे आगि लगा देलियै। जखन आगि पजड़ल तखन अंगनामे एकटंगा द’ हाथ जोड़ि संकल्प केलहुँ जे अइ समाजमे नै रहब। जै समाजमे लोक अन्न बिना काहि कटैत, वस्त्र बिना नांगट रहैत, दवाई बिना रोगसँ मरैत ओहि समाजमे एको क्षण रहब कायरता छी। आंगनसँ विदा भ’ गेलौ। जाबे गामक सीमाक भीतर रही ताबे घुरि-घुरि पाछूओ ताकि आगि देखियै मुदा जखन गामक सीमान पर पहुँच गेलौ तखन तक घरो जरि चुकल छल। गामक सीमाने पर ठाढ़ भ’, दुनू हाथ जोड़ि, पाँच ठोप नोर चुवा, माय-बाबूकेँ सराध क’ विदा भ’ गेलौ। गामक सीमा टपिते मनमे हिलोर उठै लगल। एकटा फूलक गाछ, रासताक बामा भाग, देखलिएक। बड़ सुन्दर गाछ छलैक। निच्चोमे हरियर कचोर दूबि पसरल छलै। नीक जगह देखि ओहि गाछक निच्चामे वैसि गेलौ। मनमे भेल जे दुनू गोटे (माए-बावू) पछुऐने आवि, गाछ पर चढ़ि गेला। आखि उठा क’ उपर तकलौ। किछु ने देखलिऐक। एकटा भोम्हरा उड़ि-उड़ि फूलक रस पीबैत। सिहकी चलैत रहै। ओहि सिहकीक लहरिमे किछु आवाज होइत रहै। साकांछ भ’ कान पर हाथ द’ ओहि आवाजकेँ सुनै लगलौ। आवाज पिताक बुझि पड़ल। आवाज परेखि आरो ध्यानसँ सुनै लगलौ। बुझि पड़ल जे बावू किछु कहि रहल छथि। मुदा स्पष्ट बुझबे ने करियै। मने-मन कहलिएनि- ‘‘अपन पाँच बुन्न नोर चुबा हम अपन कर्तव्य पूरा क’ लेलौ। आव हम मुक्त छी। तखन अहाँ किऐक पछुऐने एलौ?’’ ई सुनि ओहो (पिता) कनैत-कलपैत स्वरमे कहै लगलथि- ‘‘बौआ, तोहर अवस्था दशे बर्खक छह तेँ तोहर कोनो दोख नहि। अखन तोँ खाइ-खेलाइ वला’ छह, कमाइ-खटाइबला नहि। तेँ तोहर कोन दोख। बड़ इच्छा छल जे बेटाकेँ पढ़ा-लिखा मनुख बनावी मुदा सब मनेमे रहि गेल। मुदा हमरो कोनो दोख नै अछि। जँ जीवैत रहितौ तखन ने, से त’ हमहू मरियेगेलौ। तोरा हम असिरवाद दइ छिअ जे जखन घर छोड़ि निकललह तँ दुनिया देखह। दुनियेमे सब कुछ छै। सदिखन मनुक्खक बीचमे रहिहह। मनुक्खेक बीचमे सरस्वती वास करैत छथि। ओहि बीच रहि तू पंडित भ’ जेबह। मुदा एकटा बात सदिखन मन रखिहह जे अपना मेहनतसँ जीवन-यापन करिहह। ककरो एको पाइक कर्जदार नहि बनिहह।’’ पिताक असिरवादसँ हमरा (देवन) नव ज्योति भेटल। नव शक्ति जगल। मनसँ चाउर-मड़ुआक भेद मेटा गेल। मेटा गेल गंगाजल आ डबरा पानिक भेद। मेटा गेल सजल-धजल फुलवाड़ीक फूलक सुगंध आ जंगलक अनेरुआ फूलक भेद। मेटा गेल उज्जर-कारी मनुक्खक भेद। नव उत्साह जगिते उठि क’ विदा भेलौ। विदा होइते माइक आवाज गाछ परसँ अबै लगल। रुकि क’ सुनै लगलौ। माए कहति रहथि जे बेटा, बड़ इच्छा छल जे भरल-पूरल परिवार देखब। मुदा सब मेटा गेल। जँ बेटा बनि जन्म भेल हेतह ते दुनिया देखबे करबह नहि तँ तोरा सन-सन बहुतो बौआइत-ढहनाइत मरैत अछि।’’ भूख स’ देह जरैत छल मुदा विवेक रुपी सारथी ओहि रुपे प्रेरित करैत छल जना नांगर घोड़ा रथ खिंचैत।’’ जाइत-जाइत एकटा गाम पहुँचलौ। जाड़क मास छलै। गामसँ हटल एकटा परिवार बाधमे। भिनसुरका समय सूर्य उगि गेल। ओहि परिवारमे दूटा बच्चा। दुनूूक उमेर पाँच बर्ख सात बर्ख। दुनू नंगटे। दुनू घरक पछुआरमे खढ़ बीछि-बीछि घूर लगवैत। हम रुकि गेलौ। मनमे आयल जे हमहू घूर लगवैमे बच्चाक संग दियै। हमहू नार-पात बीछै लगलौ। एकटा बच्चा अंगनासँ आगि अनलक। घूर सुनगेलौ। तीनू गोरे आगि तापै लगलौ। देह गरमाइल। कने कालक बाद ओहि बच्चाक माय छिपलीमे भात-तीमन लेने आबि आगूमे राखि देलकै। ओ औरत तीस-पैतीस बर्खक मुदा देखैमे अधबयसू बुझि पड़ैत। हमरा बैसल देखि ओ पूछलक- ‘‘बौआ, कोन गाम रहै छह?’’ हम कहलिऐ- ‘‘हमरा कोनो गाम नइ अछि। माए-बाप मरि गेलि। दुनिया देखै ले जाइ छी। जाबे तक जीवैत रहत ताबे तक चलिते रहब। मुदा बिना दुनिया देखने छोड़ब नहि।’’ हमरा देखि ओहि वेचारीकेँ दया लगलै। बच्चाक आगूक छिपली उठा अंगना गेलि। भाड़ामे जे भात-तीमन रहै काढ़ि क’ सब लेने आइलि। तीनू गोटे संगे-संग खेलौ। मुह-हाथ धोय पानि पीवि विदा हुअय लगलौ। तँ ओ औरत कहलक- ‘‘आइ नइ जो बौआ। जहिना दूटा बच्चा पोसै छी तहिना तोरो पोसबो। औरतक बात सुनि हम रुकि गेलौ।’’ बौआ (बचेलाल) भरि राति देवन अपन जिनगीक बात कहिते रहल आ हम दुनू परानी सुनिते रहलौ। आब बेरो बहुत भ’ गेल। काजो उदम बहुत अछि। फेरि कहियो अगिला बात कहबह।’’ जहिना निन्न टूटिते, सुतल आदमी विहान देखैत अछि तहिना अछेलाल आ बचेलालोकेँ भेल। दुनू गोटेक मुहसँ हँसी निकलै लगल। ओना दुनू गोटे आखि गड़ा सुमित्रे दिशि देखैत किन्तु हृदयमे हिलकोर उठै लगलै। जहिना भूमकमक समय पोखरिक पानि हिलकोर स’ किनछरिमे उपरो चढ़ैत आ पुनः टघरि अपना जगह पर चलि अबैत तहिना दुनू गोटेक मनमे हुअए लगल। अछेलाल सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘भौजी! आइ घरि ऐहेन खिस्सा नहि सुनने छलौ। औझुका खिस्सा सुनला स’ बुझि पड़ै अए जेना तरको आखि खुजि गेल।’’ अछेलालकेँ सुमित्रा किछु कहै लगलखिन कि बिचहिमे पानि पीबै ले बड़द हुकरल। बड़दक हुकरव सुनि, बचेलालकेँ सुमित्रा कहलकखिन- ‘‘बौआ, बड़द पियासल छह। अंगनासँ बाल्टीन आनि पानि पीया दहक।’’ मायक बात सुनि बचेलाल आंगनसँ बाल्टी आनि, कल परसँ पानि आनि, बड़द क’ पीआबै लगल। सौँसे बाल्टी पानि बड़द पीबि गेल। पुनः दोसर बाल्टी पानि आनै ले बचेलाल कल दिशि बढ़ल। पानि पीया बचेलाल नादिमे कुट्टी लगौलक। नाइदमे कुट्टी परिते बड़द हपसि-हपसि खाय लगल जहिना भूखल आदमी नोनगर अनोन नहि बुझैत तहिना बड़दो क’ भेलै। बड़दकेँ खाइत देखि सुमित्राक मुहसँ हँसी निकलल। हँसैत सुमित्रा बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, तोँहू जुआन छह आ घरोवाली जुआन छेथुन। मुदा....।’’ अकचकाइत बचेलाल पूछलक- ‘‘मुदा की?’’ सुमित्रा बाजलि- ‘‘मुदा यैह जे कनि॰ााँ जे छेथुन ओ मेहनतसँ हटल रहै चाहैत छथुन। सदिखन आरामे करब मनमे रहै छनि। पुरुष-नारीक जे वैवाहिक संबंध अछि, से नहि वुझैत छथुन। तोँहू अनका पढ़बै छह मुदा अपन बात वुझबे ने करै छहक। ऐहन बात हम एहि दुआरे कहि रहल छिअह जे आइ चालीस वर्खसँ हम एहि आंगनमे रहैत एलौ हेन। जहि रुपमे हमर जुआनी बीतल ओहिसँ बहुत दूर हटल कनियाँक छनि। हमरा खुशी होइ अए जे बेटाकेँ मास्टर बना ठाढ़ केलौ। तेँ अपन मेहनत क’ सार्थक बुझै छी। मुदा पुतोहू जनिक जे चालि-ढालि छनि ओहिसँ भोगी-विलाशीक परिवारक रुप-रेखा बनि रहल छह। मनुक्ख तँ भोगी नहि योगी होइत अछि। हम बूढ़ि भेलौ। कत्ते दिन जीवे करब। मुदा परिवार देखि अधमौगैत भ’ रहल अछि। जाबे आखि तकै छी ताबे घरक अधला कोना देखल जाइत? मुदा की करब? सदिखन रक्का-टोकी करब नीक हैत? तोँ असकरे कत्ते करबह। कोनो लोहाक मशीन तँ नहि छह। जते खेत एखन छह ततबे पहिनौ छेलह। जहिसँ परिवार नीक नहाँति चलै छेलह। परिवार स’ आगू बढ़ि दुनू बेकती समाजसँ जुड़ल छलौ। एखन दुख होइ अए जे बहुत निच्चा उतड़ि गेलौ मुदा तूँ दुनू परानी बुझै छहक जे आगू बढ़ि रहल छी। उन्नति भ’ रहल अछि। अखन घरक आमदनीक दूटा रास्ता भ’ गेल छह- एकटा नोकरी, दोसर खेती। मुदा घुसुकि रहलह हेन पाछू मुहे।’’ बिचहिमे बचेलाल बाजल- ‘‘माय, जते तू बुझै छीही तते हम थोड़े बुझै छियै?’’ मुस्कुराइत सुमित्रा उत्तर दैत कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, आइ बुझि पड़ै अए जे तोहर नजरि बदलि रहलह हेन किऐक तँ जँ ई बात पहिने बुझितहक त’ सीखैक कोशिश करितहक। मुदा जखने जागी तखने परात। जिनगीमे सबसँ पहिने सबकेँ अपन सीमा-सरहद बुझक चाही। जा घरि अपन परिचय लोककेँ नइ हेतैक ताधरि गरथाहक जिनगीमे रहत। तोरा होइत हेतह जे हम बड़ गरीब छी वा बड़ धनीक छी, मुदा जखन अपनासँ आगू-पाछू देखवहक तँ वुझि पड़तह जे हमरोसँ बेसी धनिक लोक अछि आ गरीबो बेसी अछि। जना देखिते छहक, जतबो तोरा छह ततबो अछेलालकेँ नहि छैक। भरल पेट रहने मनक विचारो नीक होइत छैक। जबकि जरल पेटमे कोन आओत?’’ नमहर साँस छोडै़त बचेलाल बाजल- ‘‘हूँ-अ-अ।’’ ‘‘हँ, ठिके बुझलहक। भूखल पेट मन क’ जरबैत छैक। जरल मनमे सिनेह कोना आओत? सिनेह तँ सिर्फ बजनहि वा उपदेश सुनने नहि आओत। जाधरि दुनूक बीच स्नेहक पुल नहि बनत ताधरि मनुख-मनुखक बीच द्वेष रहबे करतै। जाधरि द्वेष रहतै ताधरि छल-प्रपंच, वेइमानी-शैतानी, मारि-मरौबलि कोना मेटाइत।’’ निरीह भ’ बचेलाल पूछलक- ‘‘तखन की करब? माय।’’ मुस्की दैत सुमित्रा बाजै लगली- ‘‘जहिना अछेलालक बेटा जनमै काल सेवा केलियै तहिना जिनगी भरि करबै। भगवान सबकेँ दूटा हाथ दूटा पाएर, साढ़े तीन हाथक देह आओर सबसँ पैघ सम्पति बुद्धिक खजाना सेहो देने छथिन। अपना ऐठाम सबसँ दुखद बात यैह अछि जे किछु गनल-गुथल लोक सम्पत्ति हथिया लेने अछि जहिसँ गरीबी एत्ते बढ़ि गेल अछि। कुम्हराक आबा जेँका गरीब लोक भूखक आगिमे जरि रहल अछि। जहिसँ दुनूक बीच बड़का पहाड़ ठाढ़ भ’ गेल अछि। वेचारा अछेलाल जेहने चीजसँ तेहने सवांगसँ आ तेहने बुद्धियोसँ पाछू पड़ि गेल अछि। अखन धरि बेचारा उजड़ल-उपटल घरमे रहलतेँ ज्ञान प्राप्त करैक अवसरे कहिया भेटिलै। देवनक देखओल रास्ता हम जनै छी। तेँ जहिना तोरा बेटा बुझै छिअ तहिना ओहूँ वेचराकेँ बुझै छी।’’ तारतम्य करैत बचेलाल पूछलक- ‘‘कोना अछेलाल काकाकेँ अपन समांग बनायब?’’ ‘‘अखनेसँ खेत-पथार स’ ल’ क’ बड़दक सेवा करैक भार अछेलालकेँ द’ दहक। तू नोकरी करै छह मुदा खेती-पथारी तँ मरि गेल छह। अखन भार बुझि पड़तह, मुदा नहि! मनुक्खक भीतर जे सुतल शक्ति अछि ओकरा जगाबैक छह। जखने ओ जागि जायत तखने मनुक्ख अपन बदलल रुप देखै लगत। जे खेत परती अछि ओ सोना उपजै लगत। जहिसँ अपनो परिवारक आमदनी बढ़त आ ओहू वेचाराक परिवार हँसी खुशीसँ चलतै।’’ मायक बात सुनि बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका! आइसँ हमर अहाँक परिवार एक भ’ गेल। अखनेसँ खेत पथारक तरद्दुत शुरु क’ दिऔ। पाँच कट्ठा बाड़ी अछि, एहिमे, एक भागसँ घर बना लिअ आ बाकीमे उपजा हेतै। एक ठाम घर रहने चोरो-चहारसँ रक्षा हैत। बच्चा सबकेँ पढ़बै छी- जे एकटा ढेला छल आ एकटा पत्ता। दुनू जखन अपना जिनगी दिशि तकैत त’ ढेला क’ बुझि पड़ै जे बरखा हैत त’ गलिये जायब आ पत्ता क’ बुझि पड़ै जे हवा उठत त’ उधिआइये जायब। तेँ दुनूक जिनगी अनिश्चिते बुझि पड़ै। दुनू सोचलक जे अगर दोस्ती क’ लेब ते दुनूक जिनगी हँसैत-खेलैत चलैत रहत। दुनू दोस्ती क’ लेलक। जखन हवा उठै तखन ढेला पत्ता क’ दाबिक बचा लइ आ जखन पानि होय तखन पत्ता ढेलाकेँ झाँपि बचा लइ। तहिना त’ मनुक्खोक अछि।’’ बचेलालक बदलल बिचार सुनि गद्गद हृदयसँ अछेलाल कहलक- ‘‘बौआ! गरीबक हृदयमे छल-प्रपंच नइ होइ छै, आ ने मान-अपमान। क्यो जँ हमरा अपमाने करत त’ हम की ओकर क’ लेबै? हमरा की अछि जइसँ अपन मानक रक्षा करब। (सुमित्रा दिशि देखि) हमरो मनमे अछि भौजी जे जहिना अहाँ अपन बुझि बेटावला बनेलहुँ तहिना अहूँ क’ माय बुझि सेवा करब।’’ ....... जिनगीक जीत:ः 5 बचेलाल स्कूल गेल। घड़ी पावनि रहने तँ खुलल मुदा विद्यार्थी नहि आयल। पहिने तँ बचेलाल भकचकेमे रहला जे छात्र स्कूल किऐक ने आयल मुदा किछु कालक बाद एकगोटेसँ भाँज लगलनि जे पावनि छी। अपन दृढ़ता रखैत बचेलाल चारि बजेसँ पहिने स्कूल नहि छोड़ैक विचार मनमे ठानि लेलनि। असकरे ओसार पर कुरसी लगा बैसि मने-मन अपन जिनगीकेँ संबंधमे सोचै लगल अखन घरि सोचैक जे प्रक्रिया बचेलालकेँ छलनि ओ माएक विचार सुनला बाद बदलै लगलनि। जहि ढंगसँ अखन धरि सोचै छला। ओ ढंग बदलने किछु स्पष्ट बुझै लगलथि। आखि उठा क’ आगू दिशि तकलनि ते बदलल सब कुछ बुझि पड़ै लगलनि। माय पर ध्यान पहुँचते अनायास मुहसँ निकललनि- ‘‘ओ (माय) साक्षात् सरस्वती छथि। हुनकासँ बहुत कुछ सीखैक अछि। जहिना मनुक्ख अपन विशाल शक्तिक भंडार रहितहु, अज्ञानवश नहि बुझि पवैत, तहिना तँ हमहू छी। हर मनुष्यकेँ अपन लक्ष्य निर्धारित क केँ जान-परानसँ लागि जेबाक चाही, तखने जिनगीक सार्थकता बुझि पड़तै। अखन धरि हमही जे बुझै छलौ ओकरा इमनदारीसँ निमाहैत छलौ मुदा ओ असथिर चालि अछि। जहिना कोनो स्थान पर पहुँचबा लेल क्यो धीमी गतिसँ चलैत तँ क्यो मध्यम गतिसँ। मुदा तेज गतिसँ चलनिहारकेँ जल्दी सफलतो भेटैत आ दोसरो काज करैक मौका भेटैत। चालि तेज कोना हैत? ई मुख्य प्रश्न अछि। मुदा अप्पन चलब तँ जिम्मा अछि। अनको बुझायब ओहने जरुरी अछि जेहने अपना बुझब। मुदा दायित्व तँ अपन अछि। हम शिक्षक छी। आठ घंटा समय लगाएव आ बच्चा सभकेँ पढ़ाएव अछि। मुदा चैवीस घंटाक दिन-रातिमे एक तिहाई भेल। अहिना पत्नियोकेँ देखैत छियनि। छोटका बच्चाकेँ बेसी काल माइये रखैत छथि। बड़की बच्चिया स्कूलेमे बेसी काल रहै अए। अंगना-घर बहारनाइसँ ल’ क’ भानसोमे संग साथ माइये दैत छथिन। तखन जवान औरतक काज कते बँचल? जरुर विचारमे कतौ कमी अछि। की पति-पत्नीक जिनगी सिर्फ बच्चेटा पैदा करब छी? की परिवारक खर्च जुटाएव सिर्फ मरदे टाक जिम्मा छी? की मरद दुनियाक कोनो कोनसँ पसीना चुबा कमाकेँ आनथि आ स्त्री घरक छहर देवालीसँ नहि निकलथि, यैह प्र्रतिष्ठा छी? औरत अपना पाएर पर नहि ठाढ़ होथि, एहिक लेल पुरुखे दोषी छथि, महिला नहि? की गुलामीक जिनगी सभक लेल कष्टकरे होइत छैक सुखद नहि? ऐहन ढेरो प्रश्न अछि जे सिर्फ बैचारिक समाधानसँ समाधान नहि हैत। किऐक तँ प्रश्न समस्या रुपमे (कार्यरुप) अछि। जकर समाधान काजे क’ सकैत अछि। मुदा काजो के तँ ढेरो बाधा अछि जे काज हुअए नहि दैत। तखन की कैल जाय? एते विचार मनमे उठिते बचेलाल कुरसी परसँ उठि अंगनामे टहलै लगल। जहिना अधसुखू जारन देलासँ धुँआ अधिक होइत, मुदा धधड़ा हेबे ने करैत, तहिना बचेलालोक मोनमे हुअए लगल। मुदा बिना धधड़ा भेने इजोत कोना हैत, एहिक बिचमे बचेलाल पड़ल। एखन बचेलाल ने विद्यार्थीकेँ पढ़बैत शिक्षक छथि आ ने घरवाली ले पाँच सय नम्बर जर्दा पत्ती कीनिनिहार। ने एखन किसान परिवार कहौनिहार छथि आ ने आॅफिसक बड़ा बावूक जमाए। अखन बचेलाल मनुक्खक ओहि सघन बनमे बौआइत छथि जत्ते माटि पर पसरल हरियर-हरियर दूबि घास विशाल-विशाल गाछक निच्चामे अपन अस्तित्व हँसैत-खेलैत मौजसँ रखने अछि। की ओहि दूबि क’ अपन जिनगीसँ आनन्द नहि छैक? हाँ, जरुर छैक ओहो सजि-धजि अपन पूर्ण जुआनीमे आबि ओहि प्रियक (घसवाहक) प्रतिक्षामे दिन-राति तकैत रहै अए जे हमर अखुनका जे पुष्ट शरीर अछि ओ छीलि के ल जा ओहि गायक भोजन बनाओत, जे दूध सन अमृत दइ अए। की ओ दुबि अमृतक सृजनकर्ता हम नहि छी। बचेलालकेँ मनमे भेल जे एखन हम ओ बतहा बबाजी ने ते भ’ गेलौ जे शरीर स’ अलग भ’ नचैत अछि। टहलल-टहलल बचेलाल कल पर जा मुह-हाथ धोय पानि पीलक। जहिना धीपल लोहा पानिमे पड़िते सरा जाइत तहिना बचेलालोकेँ पाइन पीबितहि भ’ गेल। पानि पीबि, धोतीक खूँटसँ मुह-हाथ पोछि बचेलाल घड़ी देखलक, त’ चारि बजैत। कुरसी उठा कोठरीमे द’, केबाड़ बन्न क, ताला लगा घर दिशि विदा भेल। आन दिनसँ भिन्न मन। जहिना नसेरीकेँ निसाँ कम भेला पर भक्क लगल रहैत तहिना बचेलालोकेँ होइत। रास्ताक सुधिये नहि! कत्त’ पाएर पड़ैत तकर सुधिये नहि। विचारक दुनियाँमे मन बौआइत। मनमे उठैत जे हमर शक्ति सुतल अछि। ओकरा जागाएव अछि, मुदा ओ जागत कोना? मनमे अबै लगलनि जे डेढ़-डेढ़ घंटा स्कूल अबै-जाइमे लगै अए जँ साइकिल कीनि लेब तँ अधा समयक बचत जरुर होएत। अधा समयक मतलब डेढ़ घंटा। ततबे नहि पाँच-दश मिनट देरियो भेने, तेज स’ चलि क’ समय पूरा लेब। नहाइ-खाइमे सेहो डेढ़-दू घंटा लगि जाइ अए ओहूमे अधा समय बचा सकै छी। भोरु पहर क’ विछान पर पड़ल रहै छी जे पहिनहु उठि सकैछी। अगर सब समय क’ बचा एकटा नव काज ठाढ़ क’ लेब तँ खुशीसँ सम्हारि सकै छी। ततबे नहि फजिलाहा समयसँ जत्ते करब, ओइसँ कते वेसी तेज औजारोक (जीवनोपयोगी मशीन) उपयोगसँ होएत। तहूसँ बेसी काजक उत्साह ऐने सेहो हैत। घर पर आबि बचेलाल घड़ी देखलक तँ बीस मिनट पहिने, आन दिनसँ, आबि गेल। ई कोना भेल? मन पाड़ै लगल तँ रास्ताक चलब मने ने पड़ै। घर पर आबि बचेलाल दरबज्जेक चैकी पर कुरता, गंजी निकालि रखि बिना हाथ-पाएर धोनहि, चीत गड़े सुति, दुनू बाहि मोड़ि, चाइन पर ल’ आखि बन्न केने सोचै लगल। बाड़ीसँ अड़ूआ उखाड़ि सुमित्रा एक हाथमे खन्ती दोसरमे अड़ूआ नेने रस्ते परसँ बचेलालकेँ देखि, चुपचाप आंगन चल गेली। सुमित्रा मने-मन बुझि गेलखिन जे जहिना साइकिल परसँ गिरल आदमी हाथ-पाएर तोड़ि रोड पर चीते पड़ल रहै अए, सैह गति बचेलालो क’ भेल अछि। मुदा अंगनाक टाटक भुरकी देने रुमा बचेलालकेँ देखि मने-मन सोचैत जे आन दिन स्कूलसँ सोझे अपना कोठरीमे आबि कपड़ा निकालैत छलाह, मुदा आइ ऐना किऐक केलनि। मनमे शंका भेलनि जे भरिसक रास्तामे किछु भ’ गेलनि। धड़फड़ाइत अंगनासँ निकलि रुमा बचेलालक लगमे आबि पूछलखिन- ‘‘किछु होइ अए?’’ आखि खोलि बचेलाल रुमाकेँ देखि फेरि आखि मूनि लेलक। रुमाक करेजमे डर सन्हिया गेलि। मुह लग मुह ल जा रुमा पूछल- ‘‘की मन-तन खराब भ’ गेल?’’ आखि खोलि मन्द स्वर, मुदा सक्कत शब्दमे बचेलाल उत्तर देल- ‘‘नहि। किछु ने होइ अए। अखन ऐठामसँ जाउ। मनमे समुद्रक लहरि उठि रहल अए।’’ धड़फराइत रुमा, सासुकेँ कहै ले आंगन गेली। माथ परसँ साड़ी सड़कल रुमाक। सासु लग जा कहलखिन- ‘‘अखन अड़ूआ बनौनाई छोड़ि देथुन। बेटाक मन खराब भ’ गेलनि। ने बजै छथि आ ने मन उछटगर छनि। जना मुहक रंगो बदलल जाइ छनि। झब दे चलथु। देखथुन जे की भ’ गेलैनि।’’ दुनू हाथसँ अड़ूआ पकड़ि कत्तामे लगौने सुमित्रा रुमा दिशि देखि कहलथिन- ‘‘बच्चाकेँ किछु ने भेलनि। इस्कूल से अबैमे थाकि गेल हेता।’’ हड़बड़ करैत रुमा कहलकनि- ‘‘नै माए! नै। आनो दिन इस्कूलसँ अबै छला कि आइयेटा पाएरे ऐला। ऐना कहाँ आन दिन होइ छलनि। केहेन बढ़ियाँ आन दिन देखै छलिएनि?’’ सुमित्राक बाँहि पकड़ि रुमा घिचने-घिचने दलान पर अनलनि। दरबज्जा पर अबिते सुमित्रा रुमाकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ, झब दे चाह बनौने आउ। हम अछेलालकेँ सोर पाड़ै छी।’’ रुमा चाह बनबै गेली। सुमित्रा अछेलालकेँ सोर पाड़ै गेली। जरना ले अछेलाल सुखल कड़ची टोनिअबैत। एकटा कड़ची तौड़ै काल चिरा गेल। ओकर काप अछेलालक ओंगरीमे लगि गेलै। उपरका चमड़ा कटि गेलै। चमड़ा क’ कटिते छड़-छड़ खून बहै लगलै। तावे सुमित्रो लगमे पहुँचली। खून बहैत देखि सुमित्रा मखनीकेँ लत्ता नेने अबै ले कहलखिन। लत्ता नेने मखनी दौड़ल आइलि। मखनी हाथसँ लत्ता ल’ सुमित्रा अछेलालक ओंगरीमे नुरियाकेँ बान्हि देलखिन। खून बन्न भ’ गेलै। टोनियेलहा कड़ची समेटि मखनी चुल्हि लग ल’ गेलि। अछेलालकेँ संग केने सुमित्रा बचेलाल लग ऐली। रुमो चाह नेने एली। सभ क्यो चाह पीबै लगलथि। चाहक चुस्की लैत बचेलाल अछेलालकेँ पूछलखिन- ‘‘कक्का, ओंगरीमे लत्ता किअए लटपटौने छी?’’ अछेलाल- ‘‘अखने कड़ची टोनिअबै छलौ कि काप लगि गेल। अपना टेंगारियो ने, जइसँ छकड़ितौ, तेँ हाथेसँ तोड़ै छलौ। खून बहै लगल तेँ लत्ता बान्हि देलिऐ।’’ बचेलालक गप सुनि-सुनि रुमाक मन असथिर होइत। मुदा तइयो आखि उठा-उठा रुमा बचेलाल दिशि देखैत। अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बच्चा, छुछे अहाँ खेतीक भार देलौ। बिना ओजारे खेती कोना करब? ने हर अछि आ ने कोदारि। ने घरमे नीक हँसुआ अछि आ ने खुरपी। ने कुड़हरि अछि आ ने टेंगारी। तखन छुछे हाथे कत्ते काज चलत?’’ गाममे देखिते छी जे ने ककरो क्यो कोनो चीज दइ अए आ ने गरीबी दुआरे सबके सब चीज छै। तखन कोना काज चलत?’’ ़ अछेलालक बात सुनि बचेलाल मने-मन सोचै लगल जे साइकिलक दुआरे अपन समय नष्ट होइ अए। औजारक दुआरे अछेलाल कक्काक। मुस्की दैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा, जहिना समाज परिवारकेँ आगू बढ़बैमे सहायक होइत तहिना बाधको अछि। ओना कहै ले सभकेँ-सभ नीके बात कहैत मुदा व्यवहारमे उनटा छै। अखन जइ सीमा पर ठाढ़ छह पहिने ओतै पहुँचैक उपाय करह। ओना बुझैमे नइ अबैत हेतह, मुदा छह ओइ स’ बहुत निच्चातेँ अपन सीमा स’ निच्चा कोन-कोन रास्तामे पछुआइल छह ओ बुझि ओकरा पुरबै पड़तह। जखन औझुका सीमा पर ठाढ़ भ’ जेवह तखन आगू मुहे डेग उठतह। एक भग्गू भ’ आगू डेग उठबै चाहवह ते कतौ ने कतौ लसकि जेबह।’’ सुमित्राक विचार सुनि बचेलालक मनमे आशाक टेमी भुकभुकाइल। हृदयमे मद्धिम इजोत भेल। मुस्कुराइत बचेलाल मायकेँ कहलक- ‘‘माए, तोहर बात मनमे गड़ि गेल। एखन काज करै जोकर चारि गोरे छी। दू परानी अछेलाल काका आ दू परानी अपने। तू तँ बूढ़िये भेलै। जखन स्कूलमे छलौ तखन मनमे उठल जे सब दिन पाएरे चारि कोस अबै-जाइ छीतेँ एकटा साइकिल कीनि लेलासँ अधा समय बँचत। जे समय उगड़त ओकर उपयोग आगूक काजमे करब। जाबे आगू बढ़ैक चेष्टा नइ करब तावे आगू कोना बढ़ब?’’ मूड़ी डोलबैत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बच्चा! एखन दूटा रास्ता पकड़ैक छह। नोकरी करै छह तेँ नोकरियो आ दू बीघा खेत छह, ओहू मे जान फूकैक छह। जँ दुनू सुढ़िया क’ चलै लगतह तँ अनेरे घर उठैत देखबहक। बड़ चिक्कन बात अछेलाल बौआ कहलखुन। जाबे खेती करैक हथियार (औजार) नहि रहतह ताबे मुकाबला कोना करबहक?’’ सुमित्राक बात समाप्तो नहि भेलि कि बिचहि मे अछेलाल बाजल- ‘‘भौजी! काल्हि बेरु पहर जुगाय आबि क’ डेरिया पर बैसि रहल। हम अंगनामे बिछानक टुटल डोरी जोड़ैत रही। कने कालक बाद थूक फेकै ले उठलौ कि जुगायकेँ बैसल देखलिऐक। चोट्टै आंगन घुरि चक्का पर से तमाकुल चून ल चुनबैत डेढ़िया दिशि बढ़लौ। जुगाइक सुखल मुह देखि पूछलिऐ जे भाय किमहर-किमहर ऐलह? बड़ मन्हुआइल देखै छियह? किछु बजैक हिम्मते ने वेचारे के होय। तमाकुल देलियै। अपनो खेलहुँ। तमाकुल मुहमे लेलाक बाद जना बजैक हूबा भेलै। कहलक- ‘‘अछेलाल भाय, कहैक तँ साहस नहिये होइ अए मुदा तोहूँ कोनो बिरान नहिये छह, तेँ कहै छियह। देखबे करै छहक जे समय कते दुरकाल भ’ गेल अछि। ल’ द’ क’ चारि बीधा खेत छल। भगवान तीनिटा बेटी देने छथि। जेठकीक बिआह ते बाबूए सोझामे भेलै। दूटा बँचल। मैझलीक विआहमे सोमनसँ रुपैया कर्ज लेलहु। आशा छल जे खेतक उपजासँ कर्जा सठा लेब। मुदा पैछला तीन साल केहेन भेल से त’ बुझले छह। रुपैआ नइ देल भेल। एक दिन सोमन तना ने बजै लगल जे खिशि चढ़ि गेल। मनमे आइल जे एक्को घुर खेत बँचे वा नहि मुदा पाँच दिनक भीतर ओकर रुपैआ द’ देबै। मनमे तामस रहबे करै, डेढ़ बीघा खेत सस्तेमे बेचि क’ रुपैआ द’ देलियै। आब अढ़ाइये बीघा खेत बँचल अछि। छोटकी बेटी पनरह-सोलह बर्खक भ’ गेलि अछि। तेँ विआह करब जरुरी भ’ गेल अछि। कथा ठेमाइल अछि मुदा बिना खरचे दिन-ठेकान कोना करब? तेहेन भूत लोककेँ लगल छै जे सबके मचोड़ि-मचोड़ि खाइत अछि। सूदी रुपैआ लैत डर होइ अए। तेँ तोरा लग एलौ जे रुपैआक कोनो जोगार लगा दाय। जुगाइक बात हृदय क’ पघिला देलक। मुदा गरीबक हृदय पिघलनहि की? अपने त’ तेरह दण्डक संकराति बीतै अए तखन दोसरक मदति की करबै? मुदा मन आयल जे बचेलाल तँ नोकरी करै छथि तेँ हुनके कहबनि । समाजक बेटी आ अपना बेटीमे की अंतर होइ छै? जाबे विआह-दुरांगमन नइ भेल रहै छै ताबे माए-बापक समाजमे बेटी रहै अए, तकर पछाति त’ सदाके लेल चलि जाइत अछि।’’ अछेलालक बात ध्यानसँ सुनि बचेलाल मूड़ी गोति विचारै लगल। समाजमे हम नोकरी करै छी। रुपैआ कमाई छी। समाजोक तँ आशा हमरा कमाईमे छैक। अगर रुपैआ हम नहियो देबै तइयो कोनो ने कोनो तरहे विआह भइये जेतै। मुदा हमरा की बुझत? हमरा प्रति कत्ते घृणा बेचाराकेँ हेतै। जाबे जुआन बेटी ककरो घरमे रहै छै ताबे माय-बापक हृदय तिल-तिलकेँ जरैत रहैत छैक। ऐहन समयमे मदति मदति नहि जिनगीक पैघ बोझ उताड़ब हैत। हमर रुपैआ बैंकमे अछि। सुदिये कत्ते देत? जत्ते सुइद देत तइसँ बेसी महगी बढ़तै जइसँ रुपैआक मोले (अंसनम) कमतै। तखन तँ मूड़ोसँ कम भेटत। ओइसँ नीक जे बिना सुदिये रुपैआक मदति क’ दियै। एत्ते बात मनमे अबिते बचेलाल मूड़ी उठा माय दिशि तकलक। सुमित्रो बचेलाल दिशि तकलक। दुनू गोटेक विचार आखियेसँ भ’ गेल। बचेलाल माएकेँ कहलक- ‘‘माय, चारु भर ते अभावे-अभाव देखै छी। अभावके बिना मेटौने लोक कोना आगू मुहे ससरत? व्यक्तिसँ ल’ क’ परिवार आ परिवारसँ समाज धरि सभ अटकि गेल अछि। कोना ससरत? जहिना जिनगी रुपी जमीनमे नीच जमीनमे बहैत पानि ऊँच जमीनमे नहि चढ़ि पबैत, तोहूँमे जँ माटिक आड़ि बनल रहै, तखन तँ आरो मोसकिल होइत तहिना त’ जिनगीयोमे लोककेँ होइत। जिनगी तँ हवाक गतिसँ नहि चलि सकैत जे उपर-निच्चाक भेद नहि बुझि, चलैत।’’ मुस्कुराइत सुमित्रा बचेलालकेँ कहै लगलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर बात बच्चा कहलह। निच्चाक पाइन जखन जमा भ’ मोटाइत अछि तखन उपर चढ़ैक आशा होइत। बाधा रुपी आड़ि तोड़ै ले साधनक जरुरत होइत। अखन धरि सामाजिक रीति-रिवाज, चालि-ढ़ालि ऐहेन बना देल गेल अछि जे एकटा डेग उठाउ तँ दोसर लसकत आ दोसर उठाउ त’ तेसर लसकत। मुदा धैर्य आ साहसक आवश्यकता सभकेँ अछि। एक स्थान पर ठाढ़ भ’ वा बैसि देखलासँ दूर धरि देखि पड़ैत, मुदा बातके गौरसँ बुझै पड़त जे जहिना आखिसँ निकलैत ज्योति पहिने लगसँ देखैत दूर तक देखैत अछि। सबसँ पहिने मनुक्खकेँ अपने देखै पड़तै। जँ अपनाकेँ देखि लेत तखन दुनिया देखैत रास्ता भेटतैक। जखने दुनियाक रास्ता पर चलब शुरु करत, तखन थाल-खिचार छोड़ि सक्कत माटि पर पैर पड़तै। अखन तोरा सोझामे तीनि तरहक काज उपस्थिति भेलि छह। पहिने अपना ले साइकिल कीनि लाय। जइसँ शरीरोक रकछा हेतह आ समयोक बचत। दोसर खेतीक सब समचा कीनि लाय।’’ मायक बात सुनि बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, काल्हि शनि छी। जेँ एत्ते दिन खगल तेँ एक दिन आरो खगह। हमहुँ जे एत्ते दिन पाएरे स्कूल गेलौ तेँ एक दिन आरो जायब। परसू रवि छी। छुट्टियो रहत। दुनू गोटे सबेरे जलखै क’ बाजार चलब। साइकिलो कीनि लेब आ खेतिओक सब ओजार। जुगाइयोक बेटीक विआहमे मदति क’ देबै। जे रुपैआ बैंकमे अछि ओ सब उठा परिवारसँ समाज धरिमे उपयोग क’ लेब। एक परिवारकेँ आगू बढ़ने तँ समाज नहि अगुआइत। समाजकेँ अगुुआइक लेल सब परिवार क’ अगुआइ पड़त। जहिना एकटा इंजन बड़का-बड़का कोठरीकेँ जोड़ि अपना गतिमे चलवैत अछि तहिना जँ समाजोके रास्ता पर आनि खिंचल जाय तँ ओहो ओहि गतिसँ जरुर चलत।’’ बचेलालक बिचार सुनि सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, तू साइकिल कीनिवह। अपने तँ एक्के बेर इस्कूल जेवह ऐवह। मुदा तकरबाद तँ साइकिल घरेमे पड़ल रहतह। तेँ समाजमे ककरो साइकिलक जरुरी हेतै तँ ओकरो दिहक। अपनो काज चलतह आ दोसरोक चलतै। जहिना पहिलुका लोक पोखरि खुनबै छला। जहिसँ अपनो काज होइत छलै आ समाजोक होइ छलैक। जाधरि समाजमे प्रेम नहि बढ़त, एक-दोसरकेँ मनुक्ख बुझि मदति नहि करत, ताधरि समाज लड़खड़ाइते रहत। जखन सब-सबहक लेल देह से ल’ क’ चीज धरि स’ ठाढ़ हैत, तखन समाज निश्चित आगू मुहे ससड़त। जहिसँ सबहक कल्याण हैत। जुगाइक बेटीक विआहमे रुपैआ जरुर दिहक। ओ जँ खेत भरना दिअए चाहतह तँ ओकरा कहि दिहक जे खेत बटाई वैह करै। वेचारा सुदियोसँ बँचि जायत आ उपजो हेतै। ओकरो तँ परिवार छै। ओहो तँ अन्ने खेतै।’’ साँझू पहर जुगाय अछेलाल ऐठाम आयल। अछेलाल सब काज सहिआइर पोखरि दिशि जाइक विचार करैत। जुगायकेँ देखि अछेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय तोहर काज सुतरि गेलह। जखनसँ तू कहलह तखनसँ मनमे खुटखुटी पकड़ि लेलक। मुदा ककरोसँ कोनो बात करैक समय होइ छै। समय पाबि बचेलालकेँ कहलिएै। वेचारा मानि गेल। ओ तोरा रुपैआ सम्हारि देथुन। तोँ निश्चिन्त भ’ विआहक दिन-ठेकान करह।’’ अछेलालक बात सुनि जुगाय बाजल- ‘‘भाइ, अखनो दुनियाँमे नीक लोकक कमी नइ छै। जे अनका बेर पर ठाढ़ हैत, ओकरो बेर पर भगवान ठाढ़ हेथिन। हमहू तँ अपना मुहे हुनका (बचेलाल) किछु ने कहलिएनि। संगे चलह। अपने स’ कहबनि।’’ अछेलाल बाजलि- अखन तोरा कहैक काज नइ छह। नीक हेतह जे परसू रविदिन संगे बजार चलि रस्तेमे सब गप्प करब।’’ ‘‘बड़बढ़िया भाय।’’ जुगाय कहि विदा भ’ गेल। ....... जिनगीक जीत:ः 6 देवन क’ पाबि दीनमा आ भुखनी वेहद खुशी भेल। भुखनी क’ मनमे आयलि जे कमाइबला बेटा भगवान पठा देलनि। मनमे एकटा पैछला बात एलै। हमरा स’ एक दिन पहिने दुखनीक जनम भयलै बच्चेसँ दुनू गोड़े संगे रहबो करै छलौ आ खेलबो करै छलौ। जब कने नमहर भेलौ तब संगे पत्तो बीछी, गोबरो बीछि-बीछि आनी आ चिपड़ियो पाथी। धासो छिलै जाय आ बकरियो चरबी। बाधमे रखबारक खोपड़ी लग बैसि चैरखियो-चैरखी खेली। खेसारी मासमे, अंगनेसँ नून लेने जाय आ खेसारी मूड़ीक झक्खो बना-बना खाय। आमक जखन टुकले होय तखनेसँ बीछि-बीछि खाय। अंगने स’ चून पत्तामे लेने जाय आ खटहो आममे लगा दियै त’ ओहो खट्टा नइ लागे। जब ढेरबा भेलौ तब माइयेक संगे धानो-गहूम काटी आ लोढ़बो करी। खेसारियो मौसरीक बोइन करी। किछु दिनक बाद धानो-मड़ूआ रोपै लगलौ। हमरासँ पाँच बरख पहिने दुखनीक वियाह भेलै। ओ सासुर बसै लागलि आ हमर वियाहो ने ताबे भेलि। दुखनीक बेटो ढेरबा भ’ गेलै, हमर लिधुरिये अछि। मुदा भगवान हमर दुख बुझलनि। कमाईबला बेटा अनासुरती पठा देलनि। दीनमा बुझैत जे बाँहि पूरैबला समांग भ’ गेल। दुनू गोड़े संगे खेतो तामब आ धानो-मड़ूआक रोपैन करब। एक जनक बोनि त’ बेसी हैत। जँ कहीं गिरहस्त, बच्चा बुझि देवनकेँ नइ अढ़ौत ते काजे ठीक्का ल लेब। अपने कने बेसी भीड़ पड़त त’ एकटा बोइनो बेसी हैत। तीनिटा कमेनिहार भेलौ। आब कोनो चीजक दुख नइ हैत। कपारमे जाबे दुख लिखल छल ताबे कटलौ। आब सुखक दिन आबि गेल। पूस-माधक जाड़, दीनमा आ भुखनी कोना बितवैत रहय, देवन गौर स’ देखै लगल। ने घरमे सीरक आ ने एक्कोटा कम्मल। फाटल-पुरान साड़ी-धोती पहिर दुनू परानी दीनमा दिन वितवैत पहिलुका गुदरी-चेथरी साड़ी-धोती सरियाकेँ साटि, ओकरा सीबि सुजनी बनौने। वैह ओढ़ैत रहय। जइ दिन बेसी जाड़ होय तइ दिन अखरे पुआर पर सुति बिछानो ओढ़ि लियअ। सात हाथक एक्केटा घर तहिमे सब तूर हँसी-खुशीसँ रहैत। ओही घरमे भानसो होय चीजो सब रखै आ सुतबो करै। एक भाग भानस करैक चुलही, दोसर दिशि विछान आ बीचमे करसीक (सुखल गोबर) घूर लगबै। ओना घर गरम रहैक नीक व्यवस्था मुदा बिना लेबल टाटक घर रहने, चारु दिशिसँ ठंढ़ आबि घरो केँ पाइन जेँका ठंढ़ा क’ दैत। रातिमे जाबे भानस होय ताबे धिया-पूताक संग दीनमा घूर तपै। एक दिन भोरहरबामे पछिया हवा चललै। दीनमाक दुनू पाएर (ठहुनसँ निच्चा) उघारे रहै। ठंढ़ी हवासँ दुनू पाएर कठुआके सुन्न भ’ गेलै। दीनमाक निन्न टूटल। ओछाइनसँ उठि वाहर जेबाक मन भेलै। जहाँ उठै लगल कि पाएर सोझे ने होय। उठि क’ बैसि पाएर टोबै लगल। ठेहुनसँ उपर बुझे आ निच्चा किछु बुझबे ने करैत मने-मन दीनमा सोचै लगल ऐना किअए भेल? जँ ठहुनसँ निच्चा पाएर दुइर भ’ जायत तँ चलब कोना? डरे दीनकाक छाती धक-धक करै लगल। घरवालीकेँ उठौलक। मुह उधारिते भुखनी कहलकै- ‘‘बड़ कन-कन्नी अछि, मुह झाँपिकेँ सुइत रहू।’’ कहि अपन मुह झाँपि लेलक। मुह झँपैत देखि दीनमा जोरसँ कहलकै- ‘‘हमरा पाएरमे भरिसक साँप काटि लेलक। सुन्न बुझि पड़ै अए।’’ सापक नाम सुनिते भुखनी धड़फड़ा क’ उठल। उठिके चुलही लग राखल छोलनी ल’ पाएरमे भिरा पूछलक- ‘‘केहेन लगै अए। की भीरौने छी?’’ दीनमा जवाब देलक- ‘‘आँखिसँ ते छोलनी देखै छी मुदा भिरल नइ बुझि पडै अए।’’ छोलनी राखि भुखनी बिठुआ कटैत पूछलक- ‘‘केहेन बुझि पड़ै अए?’’ दीनमा- ‘‘किछु बुझवे ने करै छी।’’ अखियास करैत भुखनी पूछलक- ‘‘छुछुनैरो-तुछुनैरोक बोली सुनलिएहेँ मध्यम तामससँ दीनमा कहलक- ‘‘से हम जगले छलौ। अखैन नीन टुटल ते उठिये ने भेल। तब बुझलियै।’’ मने-मन भुखनी बजै लागलि- ‘‘हे भगवान ऐहेन समैमे कोन दुख पठा देलह। दुखे पठबैके छेलह ते दिन-देखार पठैबतह। एत्ती रातिमे हम की करबै। हे भगवान कन्ना पार-घाट लागत।’’ भुखनीकेँ आहि-आलम करैत देखि दीनमा कहलकै- ‘‘अगियाशी करु। पछवा बहै छै। भ’ सकै अए ठंढ़ी लागि गेल हुअए।’’ ओछाइन पर पड़ल-पड़ल देवन सभ बात सुनैत। चुलहीसँ भूमहूर बला आगि निकालि भुखनी घूर पजारै लगल। शीताइल जरना रहने घूर पजरवे ने करै। धुँऐ बेसी होय। धुँआक दकसँ खोंखी करैत देवनो उठल। घरमे धुँआ भरि गेलै। धुँआ दुआरे कोइ किछु देखवे ने करै। देवन भुखनीकेँ कहलक- ‘‘मौसी! ओछाइनेक पुआर ल’ के घूरमे देही।’’ हथोरि के भुखनी एक मुट्ठी पुआर निकालि घूरमे देलक। धुँआ दुआरे भुखनीकेँ तते खोंखी होय जे फुकले ने होय। तरे-तर दीनमाकेँ तामस उठै। मनमे होय जे एहि मौगियाके दू घरमेचा दुनू कनगोजमे लगा दी। हम उठैबला नइ छी अइ मौगियाके कोनो लूरिये ने छै। मुदा फेरि होय जे एकटा दुख तँ लधले अछि, दोसर बेसाहनाइ नीक नै हैत। तेँ चुप्पे छल। घूर धधकलै। धुँआ सब हवाकेँ चाटि गेलै। घूर धधैकते शीशीमे सँ भूखनी तरहत्थी पर करु तेल लेलक। दुनू तरहत्थीमे मिला, आगिमे ताव लगा, दीनमाक ठहुनमे रगड़ै लागलि। कने कालक बाद दीनमाकेँ ठेहुनक गिरह हल्लुक भेलै। ठेहुन हल्लुक होइते दीनमा पाएर मोड़लक। अपने हाथे पाएरक गिरह टोवै लगल। पाएर टोबि दीनमा भूखनीकेँ कहलक- ‘‘कने डिबिया तेल आ करुतेल मिला तरबा रगड़ि दिअ।’’ डिबिया तेल आ करुतेल मिला भुखनी पतिक तरबा रगड़ै लागली। तरबा क’ रगड़िते दीनमाक झुनझुनी छुटि गेल। मन हल्लुक होइते दीनमा उठिके बहार भेल। बहारसँ आबि भुखनीकेँ कहलक- ‘‘जाड़क सुख धनीक लोककेँ होइछै। गरीब-गुरबाक हिस्सामे अनेरे भगवान जाड़ देने छथिन।’’ बसन्तक आगमन भेल। काल्हिये सरस्वती पूजा सेहो छी आ किसान सब हर ठाढ़ सेहो करत। समय सेहो गरमाइ लगल। छोट दिन सेहो रसे-रसे नमहर हुअए लगल। कत्ते हरवाह (हरजोतिनिहार) गिरहत बदलैक विचार क’ नवका (दोसर) गिरहत ठेमौलक। दीनमा ऐठाम सेहो कैकटा गिरहत आबि हर जोतै ले कहलक। मुदा दीनमा ककरो ने गछलक। किऐक तँ वसन्त पंचमीमे जे हरवाह जइ गिरहतक हर ठाढ़ करैत ओकरा सालो भरि हर जोतै पड़तैक। बन्हुआ काज दीनमाकेँ पसिन्न नहि। छुट्टा रहने बोनिहार स्वतंत्र भ’ काज करैत। जइ ठाम काज करैक मन हेतै तइ ठाम काज करत, बोइन लेत। अखन धरि गाममे यैह प्रथा चलैत जे हरबाहकेँ पाँच कट्टा खेत बटाई करैै ले भेटैत छल। मुदा एहिवेर अदहा लोक पंजाब-दिल्ली चलि गेल तेँ हरवाहक मंहगी भ’ गेलै। हरबाहि करैबला सब अपनामे विचारि लेलक जे हरबाहिक बोइन एक अढ़ैया (कच्ची) सँ बढ़ा पाँच किलो बोइन लेब नहि तँ हरबाहि नहि करब। संगे बटाई खेतक उपजा अदहा नइ दबै। तिहाइ देबै तइ पर जँ किसान तैयार हुअए त’ बड़बढ़िया, नइ तँ अपन-अपन हर अपने जोतह। दश वरिससँ भुटकुमरा राधाकान्तक हर जोतैत अबै छल। ऐबेर हर ठाढ़ करैसँ तीन दिन पहिने जबाव द’ देलक। हर ठाढ़ होइसँ एक दिन पहिने राधाकान्त भुटकुमरा ऐठाम आबि हर ठाढ़ करै ले कहलक। भुटकुमरा हर ठाढ़ करैसँ इनकार करैत कहलक- ‘‘गिरहत पाँच किलो बोइन लेब। सब हरबाह अपनामे बैसि निर्णय केलक। जँ पाँच किलो हरबाही बोइन देवै तखन ते हर ठाढ़ करब, नइ तँ नहि ठाढ़ करब।’’ भुटकुमराक बात सुनिते राधाकान्तक उज्जर आँखि लाल हुअए लगल। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत राधाकान्त कहलक- ‘‘गामक जँ सब गिरहत पाँच किलो बोइन तौलत तँ हमहू देबै। जँ से नहि देत त’ असकरे हमही किऐक देबै।’’ राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमरा उत्तर देलक- ‘‘आन गिरहत आ आन हरबाह जे करै, मुदा हम पाँच किलो बोइन लेबे करब। जँ से नइ देब त’ हरबाहि नइ करब।’’ हरबाहि नइ करब सुनि राधाकान्त आगि-बबूला होइत भुटकुमराकेँ कहलक- ‘‘अगर सब गिरहत पाँच किलो देत त’ हमहू देवह। जँ नहि देत हमहूँ नहि देबह। मुदा काल्हि पाबनिक दिन छी तेँ हर ठाढ़ करबे करिहह।’’ भुटकुमराक मनमे एलै जे ई गिरहत सबहक चलाकी छी। जखने हर ठाढ़ करब तखने बन्हा जायब। जखने बन्हा जायब तखने बलजोरी, पनचैती बैठा, हर जोतेबे करत। तेँ अखुनके फरियेलहा नीक रहत। मुह चोरौने काज नै चलत। खुलिके खेलाइये पड़त। दृढ़ भ’ भुटकुमरा कहलक- ‘‘क्यो बोइन दइ वा नइ दइ, मुदा हम पाँच किलो नेने बिना हर ठाढ़ किन्नहु नहि करब।’’ भुटकुमराक सक्कत बोली सुनि राधाकान्त अकड़िकेँ कहलक- ‘‘क्यो किछु करे, मुदा तोरा पुरने बोइन पर हर ठाढ़ करै पड़तह जँ नहि करवह तखन बुझल जेतै।’’ जहिना राधाकान्त कठोर होइत बाजल तहिना भुटकुमरो कहलक- ‘‘अइं भागक सुरुज ओइ भाग किअए ने उगै मुदा भुटकुमरा अपन बात कोनो हालतमे बदलि नहि सकै अए।’’ तेबर वदलैत राधाकान्त कहलक- ‘‘हर नइ ठाढ़ करवह त’ हमर करजा चुका दाय। तोहू घर हमहू घर। जाबे करजा नहि चुकेबह ताबे गट्टा पकड़ि हर जोतेवे करवह।’’ भुटकुमरा- ‘‘बहुत गट्टा पकड़िनिहारकेँ देखलिऐ जँ तोरा हिम्मत हुअ-अ त’ गट्टा पकड़िके देखि लिहह। मरदक गट्टा छियैक मौगीक नहि।’’ राधाकान्त- ‘‘बड़बढ़िया, हर नहि ठाढ़ करैक मन छह ते नहि ठाढ़ करिहह। मुदा हमर करजा तँ देवह। चलह हमरा ऐठाम। बहीमे जत्ते लिखल हैत तत्ते द’ दिहह। तोहूँ घर हमहू घर।’’ राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमराक मनमे एलै जे जँ कहीं ओइठाम जाय आ सब समांग मिलिके मारे। तखन ते नाहकमे मारि खा जायब। गुनधुन करैत भुटकुमरा कहलक- ‘‘एतै बही नेने आबह। जे बाकी हैतै से द’ देबह।’’ राधाकान्तक मनमे आयल जे जँ ऐठाम बही ल’ के आबी आ छीनिके निशान फाड़ि दियै, तखन तँ सब चैपट भ’ जायत। दुनू गोटेमे गप-सप चलिते छल कि भुटकुमराक बेटा गुलेतिया पंजाबसँ आयल। तीनि साल पहिने गुलेतिया मामा गामक लोक सबहक संग दिल्ली गेल। दिल्लीमे नोकरी भेबे ने केलै। पनरह दिन घुरि-फिरि दिल्लीमे ठमौलक। मुदा कतौ गर नहि देखि पंजाब विदा भेल। गाड़ियेमे एकटा नवयुवक पंजावी सरदार जीसँ भेटि भेलै। सरदारजी दिल्लीमे पढ़ैत। ओहि सरदार जीक संग गुलेतिया पंजाब गेल। ओहि युवक सरदार जीक पिता सुभ्यस्त गिरहस्त। जहिना खेती-बाड़ी तहिना मालो-जाल। ओहिठाम गुलेतिया रहि गेल। पंजाब जेवा काल गुलेतिया कोनो चिन्हरवासे भेटि नहि केने रहै। अनका मने गुलेतिया हरा गेल। क्यो कहै जे गाड़ीमे चप्पा पड़ि गेलै ते क्यो कहै चोरीमे पकड़ा गेल। एखन जहलमे अछि। क्यो कहै अरब चलि गेल त’ क्यो कहै दलाल ठकिके बेचि लेलकै। क्यो कहै क्रिमिनलक गैंगमे अछि ते क्यो कहै पाॅकेटमारी करै अए। मुदा भेटि ककरो ने होय। जना-जना दिल्लीक लोक गप्प उड़बै तहिना-तहिना गामोमे समाद अबै। रंग-बिरंगक गुलेतियाक समाचार सुनि दुनू परानी भुटकुराक कान बहीर भ’ गेलै। सालभरि जखन भ’ गेलै आ गुलेतियाक कोनो चिट्ठी-पुरजी वा रुपैआ गाम नहि ऐलै तखन माइयों बाप छातीमे मुक्का मारि सबुर क’ लेलक। जइ सरदार ऐठाम गुलेतिया रहै छल ओ साझू पहरके गुलेतियाके खिस्सा-पिहानीसँ ल’ क’ खेती-पथारी, परिवार-कुटुम्ब सबहक संबंधमे कहै। मने-मन गुलेतिया तय क’ लेलक जे ने नोकरी करै ले दोहरा क’ आयब आ ने घर रुपैआ पठाएब। जइ दिन बुझि पड़त जे अपन कारबार ठाढ़ करै जोकर कमा लेलै तइ दिन सब हिसाब-बारी क, रुपैआ ल’ गाम चलि जायब। सैह केलक। गुलेतियाके देखि भुटकुमरा चिन्हबे ने केलक। पंजाबी पैजामा-कुरता, हाथमे काड़ा, खूब नमहर-नमहर केश-दाढ़ी गुलेतियाके रहै। दरबज्जा पर अबिते गुलेतिया झोरा, एटैची राखि भुटकुमराकेँ गोड़ लगलक। माथ ठोकि भुटकुमरा आसिरवाद तँ द’ देलक, मुदा चिन्हलक नहिये। एक बेर मनमे एलै जे गुलेतिया ने ते छी, फेरि भेलै जे ओ त’ मरि गेल। राधाकान्त गुलेतियाकेँ देखि ससरि गेल। ताबे गुलेतियाक माइयो अंगनासँ मुह झपनेहि निकलि ओलती लग ठाढ़ भ’ गेलि। तरे-तर गुलेतिया हँसबो करैत आ चुप-चाप ठाढ़। टोलक धिया-पुता सभ हल्ला करैत- ‘‘हींगवला एैल, हींगबला एैल।’’ बजैत जमा हुअय लगल। थोड़ै कालक बाद, अचताइत-पचताइत भुटकुमरा गुलेतियाकेँ पूछलक- ‘‘बौआ, अदहा-छिदहा चिन्हवो करै छिअह आ नहियो चिन्है छिअह, तेँ ठीकसँ अपन चिन्हारै दाय?’’ मुस्कुराइत गुलेतिया-पिताकेँ कहलक- ‘‘गुलेतिया छिअह।’’ गुलेतिया नाम सुनिते भुटकुमरा हक्का-बक्का भ’ गेल। आखिसँ नोर टघरैत, माय दौड़ल आबि दुनू हाथे भरि पाँजके पकड़ि छाती लगौलक। जना तेज हवाक बीच घनघोर बरखा होइत काल, उपरसँ ठनका खसैत आ पृथ्वीमे भूमकम होइत, तहिना भुटकुमरा ऐठाम बुझि पड़ै लगल। गुलेतिया मात्र पाइयेटा कमा क’ नइ अनलक। ओ अनलक जिनगी जिवैक ढेरो लूरि, ओ अनलक संकल्प, ओ अनलक कठिन मेहनत करैक उत्साह, ओ अनलक परिवार रुपी मोटा क’ उपर फेकैक उदे्ष्य। राधाकान्त सोझे घर दिशि चलल। मनमे एलै जे, की आइ वेइज्जत भेलौ? प्रश्न उठितहि जबाव फुरलै इज्जत छीयै धन। तखन बेइज्जत कोना भेलौ। जँ ओकरा अपना हाथसे पाँच किलो बोइन तौलि देबै तखन ने बेइज्जती। मनमे हँसी उठलै- जे करजा तरमे दाबल अछि। दावल मात्र लेलहे नहि, ओकर जिनगी करजेक रास्तासँ चलैत अछि। तखन पानिमे रहि मगर से बैरि। आन सालक हिसाबे अइ साल दीनमा दोबर खेत तमिया केलक। सरस्वती पूजा दिनसँ दीनमा खेत तमनीमे हाथ लगौलक जे वैशाखक जानकी नवमी दिन धरि तमैत रहल। तमनी त’ किछु दिन आरो चलितै मुदा बिहरिया हाल नइ भेने खेत सब सक्कत भ’ गेलै, तेँ छोड़ि देलक। आन सालसँ बेसी गरमी अइ बेर बैशाखेमे पड़’ लगलै। दीनमा घरसँ थोड़े हटि, बीच बाधमे एकटा आमक गाछ रहै। ओ गाछ जेहने नमहर तेहने झमटगर। सब तूर दीनमा ओहि गाछक निच्चामे वैशाख-जेठक रौद बितबैत। अखार चढ़िते घनघनौआ बरखा भेल। बरखाक आनंद, सभतूर दीनमा, बांधेमे लेलक। बरखाक आनंद लइ काल दीनमाक मनमे एलै अनेरे भगवानकेँ लोक बेइमान कहैत छनि। जँ ओ बेइमान रहितथि त’ एते आनन्द गरीब-गुरबाकेँ किऐक दितथिन्ह। असकरे देवन वैसि मने-मन जोड़ै लगल जे साल लागि गेल। आब ऐठाम एक्को दिन नहि रहब। जँ एक्के ठाम रहि समय बिताएब तँ दुनिया कोना देखि पाएब। ककरोसँ किछु कहनहि बिना देवन नवटोल सँ विदा भ’ गेल। ....... जिनगीक जीत:ः 7 नवटोलसँ देवन विदा भ’ गेल। देवन रस्तो कटै आ मने-मन सोचवो करै जे अगिला केहेन गाम हैत। दू तरहक विचार देवनक मन क’ घेरने। एक तरहक विचार होय जे आगूक मतलब नीकमे आगू आ दोसर तरहक विचार होय जे अधलामे आगू। फेरि मनमे उठलै जे नीकमे आगूक मतलब सेहो दू तरहक होइत। एकक मतलब होइत देहक सेवामे आ दोसरक होइत आत्माक (बुद्धि विवेक) सेवामे। फेरि मनमे उठलै आत्मा त’ प्रकाश स्वरुप होइत। तखन बिनु प्रकाषे होइत की? तहिना अधलो दू तरहक होइत। जकर आधार होइत, जाति, धरम आ धन। जना कोनो गाममे उच्च जाइतिक बोलवाला होय, तँ नीच जाइतिक लेल अधला भेलै। तहिना नीच जातिक बोलवाला बला गाम उच्च जातिक लेल अधला भेलै। तहिना धरमो आ धनोक आधारसँ होइत। बच्चा देवन जत्ते सोचै चाहै तते ओझराइल जाय। उम्मस रहने जना लोकक मन औल-बौल करैत तहिना देवनोकेँ होइत। रास्ता दिश धियाने ने रहलै। पैछला जना सभ कुछ विसरि गेल हुअए आ अगिलाक दरबज्जे बन्न देखै। देवन बैसि रहल। मनमे कोनो विचार उठबे ने करै। सरदक समय रहने सुरुजेक किरिणिक रंग निन्नो आवि गेलै। मनमे किछु रहबे ने करै तेँ देह हल्लुक रहै । निन्नकेँ खुजल दरवाजा भेटिलै। देबनक देहमे घोसिया गेल। रस्ते पर देवन सुति रहल। बुद्धि-विवेक तँ पहिनहि सँ बच्चे छल, मायक कोरामे सुरुजक गरमी भेटिलै, निभेर भ’ सुति रहल। मुदा छोटके निन्न छलै। ज्ञान त’ जगलै मुदा देह पड़ले रहै। जना क्यो ज्ञान क’ कहलकै- ‘‘हइअ बटोही, सुतने रस्ता कटतह जे दुनिया देखवह। तेहेन बाधमे सुतल छह जे, खेतक आड़ि सबमे सापक बिल देखै छहक। जल्दी उठि क’ रास्ता नापह नइ ते साप आबि क’ धैय लेतह। पड़ले रहि जेवह।’’ देवन उठि क’ बैसल। चारु भर आखि उठा क’ तकलक। निनाइल आखि रहने साफ-साफ किछु ने देखलक। दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि आंगुरसँ काँची निकाललक। काँची निकलिते फरिच्छ देखै लगल। उठि क’ ठाढ़ भेल। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू एकटा गाम नजरि पड़लै। काते स’ हियासै लगल जे गाम नमहर अछि, की छोट? जत्ते गामक लग पहुँचैत जाय तत्ते आखि झलफलाइत जाय। गाम नमहर अछि की छोट, बुझिये ने पड़ै। दछिनवारि भाग देखलक जे एकटा खूब नमहर कोठा झलकै छै। खूब नमहर-नमहर तारक गाछ सभ सेहो छै। एक टकसँ देखि देवन उतरवारि भाग तकलक तँ देखलक कत्ते खुलोमे आ कते गाछक नीचोमे, दश-बारह हाथ नमती आ चारि-पाँच हाथ चैड़गर टाटकेँ मोड़ि घर बनौने। अदहा छिदहा खजूरक गाछ आ अदहा-छिदहा लताम, नेबोक गाछ बुझि पड़लै। देवन देखबो करै आ चलवो करै। गाम पहुँच गेल। गाम पहुँचते देवन देखलक जे रास्ताक दहिना भाग एकटा औरत बताहि जेँका बगए बनौने, पाँच बर्खक बेटाकेँ कहैत- ‘‘इस्कूल जेमे की नै?’’ कुही भ’ भ’ कनैत बेटा कहलकै- ‘‘मरि जेबो मगर उसकूल नै जेबौ। माहटर सहायब अपनोसँ नमहर ठेंगा ल’ क’ मारै-इये।’’ बेटाक बात पर ध्यान नहि द’ माय (बुधनी) पुचकारि क’ कहलकै- ‘‘बौआ, नै पढ़मे ते वियाहो ने हेतौ।’’ ‘‘नै हैत ते नै हैत।’’ माय-बेटाक बात देवन ध्यानसँ सुनवो केलक आ सोचबो केलक। रास्तासँ उतड़ि देवन बुधनीक अंगनाक बाट धेलक। डेढ़िया पर पहुँचते बुधनी देखलकै। देखिते बुधनी देवनकेँ पूछलकै- ‘‘बौआ, कत-अ रहै छह।’’ परिचित जेँका देवन उत्तर देलक- ‘‘हमरा गाम-ताम नइ अए। जत्ते मन-फुड़त रहि जायब।’’ छगुन्ता मे पड़ि बुधनी सोचै लगली। कहै अए गाम-ताम नै अए। कोराक बच्चा झूठ बाजत? माय-बाप त’ जरुर हेतै। फेरि मनमे एलै जे मनुक्खो त’ माले-जाल जेँका जिनगी बितवै अए। बगए-बानिसँ अनाथ बच्चा जेँका बुझि पड़ै अए। ने किछु खाइ ले छै आ ने भरि देह बस्तर देखै छी। पुनः बुधनी पूछलक- ‘‘माए-बाबू कत्त’ छथि?’’ निधोख भ’ देवन उत्तर देलक- ‘‘दुनू गोटे मरि गेेल। असकरे छी।’’ असकर सुनि बुधनी पूछलक- ‘‘ऐठाम रहबह?’’ मुस्कुराइत देवन कहलक- ‘‘हँ, रहब। मगर जहिया मन हैत तहिया चैल जायब।’’ देवनक बात सुनि बुधनी मने-मन सोचै लागलि। मनमे एलैनि हमहू त’ असकरे छी। आदमीक जरुरी हमरो अछि। जँ कने समरथ रहैत त’ खेतियो-पथारी करैत, मुदा तइयो तँ पुरुखे छी। कहलक- ‘‘बौआ, एत्तै रहि जाह।’’ देवनो रहै ले तैयार भ’ गेल। देवनकेँ राजी देखि बुघनी पूछलक- ‘‘रातिमे खेने छेलह कि नै।’’ देवन कहलक- ‘‘हँ, खेने छलौ। अखनी भुख नै अए।’’ बुधनीक मनमे आशा जागल। जहिना कोनो फूलक गाछकँे बकरी सभ पात खा लैत, सिर्फ डारि आ गोटे आधे फूलक कोढ़ी बचल रहैत, जे समय पाबि खिल उठैत, तहिना भेल। घर स’ विछान निकालि बुधनी देवनकेँ बैइसै ले बिछा देलक। देवन आ रमुआ (बेटा) बैसल। बुधनी अंगनाक काजमे लागि गेलि। देवन रमुआकेँ पूछलक- ‘‘बौआ, बाबू कत्त’ गेलखुन?’’ रमुआ उत्तर देलक- ‘‘बौअ मैर गेल।’’ रमुआक बात सुनि देवनक मनमे एलै जे बपटुगर जेँका नै बुझि पड़ै अए। मुदा झूठ तँ नै कहने हैत। वासन-कुसन अखारि, चुल्हि लग जारन राखि, पानि भरि बुधनी देवन लग आबि वैसि गेलि। बुधनीकेँ ओछाइन पर वैसिते देवन पूछलक- ‘‘अहाँक पति कहाँ छथि?’’ पतिक नाम सुनिते बुधनीक दुनू आखि नोराइ लगल। मुहक बोली क’ सोग धकिअबै लगल। दुनू चुप। ने देवन बजैत आ ने बुधनी। मुदा दुनूक चारु आखि आगू-पाछू, उपर-निच्चा, दहिना-वामा भागो देखै आगू बढ़ि एक ठाम भ’ गेल। एकठाम होइते बुधनी कहै लगलखिन- ‘‘बौआ! पौरुकाँ सालक गप छी। अखैन ते एकोटा नांगरि नै अैछ। असकरुआ छी। खूँटा परक महीस उठल। बड़ दुधगैर छेले। अपनो सब तुर दूध खाइ छेलौ आ बेचबो करै छेलौ। हाथ-मुट्ठीमे दू-पाइ, चैर पाइ रहिते छेलै। गौँवा सब मिलिके एकटा पारा पोसने अछि हमहू पाँच रुपैआ बेहरी देने रेहियै। बड़ सहठुल पारा छै। महीस उठल ते पारा लागि गेलै। दुनू एक्केमे खेबो करै आ रहबो करै। साँझ पड़ि गेलै। अनहरिया पख। तेँ दोसरे साँझसँ अन्हार गुप-गुप वुझि पड़ै। अन्हारेमे एकटा अनठिया पारा चलि एलै। भैसीक घर पैसि पारासँ लड़ै लगलै। रमुआक बाप, एकटा भराठ ल’ क’, अनठिया पाराकेँ भगवै चाहलखिन। लड़ब छोड़ि पारा हुनके खिहारिके पटकि सींगसँ हुरा लियै लगलनि। हम जोर-जोरसँ हल्ला करी-जे हौ लोक सभ रमुआ बापके पारा खुन क’ देलकनि दौड़े जा....., जाबे लोक सब जुटल ताबे हुनका अघमौगैत क’ देलकनि। छातीक हाँड़ थकुचा-थकुचा भ’ गेलनि। राति रहै। की करितौ? भरि राति हुनके टहल-टिकोरामे बीत गेल। गाममे डाकडर नै। ओ (पति) कखनो कुहरवो करथि आ कखनो निसपरान भ’ जाथि। तखन हुअए जे परान छूटि गेलनि। हाथसँ किछु-किछु करवो करी मुदा आखिसँ तते लोर खसल जे अँचरा भीज गेल। अपनो अहलदिली पैसि गेल। भोरे खाट पर उठा श्रीबाबू डाकडर लग गेलौ। जन्तर लगा-लगा डाॅक्डर सैब देखलखिन। देखिकेँ कहलखिन- ‘‘जत्ते दिन रोगी जीयत, तत्ते दिन कष्टे हेतनि। नइ बँचत। घरे पर ल’ जैअनु जाबे जीता ताबे सेवा करवनि।’’ डाकडर सैहबक बात सुनि हमरा चैन्ह आबि गेल। भुइयाँमे खसि पड़लौ। बड़ी काल तक किछु बुझबे ने केलियै। जखैन मन नीक भेलि तखन बुझलियै जे दू-चारि दिनमे मरि जेताह। एक्केटा पिलुआ भेल छलै। मुदा मन नै मानलक। लोको सब कहलक जे मरथुन नहि। बड़का-बड़का ओझहा गुनी सब अछि। बढ़मोतरा बला ओझहा गाछ हँकै अए। ओकरा ऐठाम ककरो पठावहक। सैह केलौ। ओझहा आयल पूजा ढारलक, भौअ खेलायल। कहलक जे ठीक भ’ जेतहुन। पान सात सय रुपैआ खरच भेल। मुदा किछु ने भेलनि। एहिना-एहिना परोपट्टामे जते धाइम, भगता, तांत्रिक अछि, सबहक ऐठाम गेलौ। खरचो माइर भेल आ छुटबो ने केलनि। सातम दिन मरि गेला। ने अपने खेती करैक लूरि आ ने माल-जाल पौसैक। महीसो चैल गेल। गाछो-बाँस उपटि गेल। आब पनरह कट्ठा खेतेटा अछि। कन्ना जिनगी चलत से बुझवे ने करै छियै।’’ बुधनीक बात सुनि देवन सोचै लागल- ‘‘हमहू तँ बच्चे छी। अनायास मनमे एलै जे सिरिफ दीदीये (बुधनी) टा त’ खेतवाली नइ अछि। गाममे बहुतो खेतवला अछि। अनके सबकेँ पूछि खेती करब। तेइ ले चिन्ता की करब?’’ समाज समुन्दर छी। दोसराक सहारा ल’ पार-घाट लगायव।’’ एते बात मनमे अबिते देवनक मुहमेँ हँसी आयल। उठि क’ ठाढ़ भेल। बाड़ी दिशि घूमै ले विदा भेल। चुल्हि पजारि वुधनी भानस करै लागलि। घुरि-फिरि क’ आबि देवन चुल्हियेक पाछूमे बैसल। भानस भेलै। देवनकेँ वुधनी खाइ ले देलक। खाइते काल देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘अहाँ क’ हम दीदी कहब आ रमुआकेँ बच्चा।’’ देवनक बात सुनि मुस्की दैत वुधनी बाजलि- ‘‘तोरा बेटा कहबौ। तीनू गोटेक संबंध स्थापित भ’ गेल। खेलाक बाद देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी! जत्ते खेत अछि ओ बेरु पहर हमरो देखा देव।’’ कनिये दिनमे देवनकेँ संगे वुधनी अपन खेत देखबै चललि। पनरहो कट्ठा खेत तीनि कोलामे बँटल। तीनू कोला देखि दुनू गोटे घुरि क’ आंगन आयल। आंगन आबि देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, हमरा खेत तमैक लूरि अछि। कोदारि अपना अछि की नइ।’’ देवनक बात सुनिते बुधनी घरसँ बीझेलहा ठेठा कोदारि निकालने आयलि। कोदारि क’ देवन निङहारि-निङहारि देखै लगल। कोदारि राखि देवन सोचलक जे काल्हि भोरे कोदारि क’ सिलौट पर रगड़ि धरगड़ बना लेब। दुनू गोरे एकके कोदारिसँ बेड़ाबेड़ी तामब। भोर होइते देवन कोदारि पीजवै लगल। बुधनी जलखै बनवै लगलीह। तीनू गोटे जलखै खा खेत विदा भेल। खेत पहुँच देवन तमै लगल। तमबो करै आ गोलो फोड़े। थोड़े कालक बाद देवन थकि गेल। देवनकेँ थकिते बुधनी तमै लागली। जहिना-जहिना देवन तामि गोला फोड़ैत, तहिना-तहिना बुधनियो करै लगली। फेरि थोड़े खानक बाद वुधनी थाकलि कि देवन कोदारि पाड़ै लगल। दुनू गोटे मिला दश-बारह धुर खेत तामि गोला फोड़ि अंगना विदा भेल। रास्तामे देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, कोदारियेसँ हरक काज क’ लेब। जखन पानि हेतै बीआ पाड़ि लेब।’’ देवनक विचार सुनि बुधनी सोचै लागली जे कहुना-कहुना खेती कइये लेब। जखने खेत अबाद भ’ जायत तँ नइ सोलहन्नी त’ अठन्नियो चैवन्नियो उपजा हेवे करत। अदहो-छिदहो उपजा भेने नइ साल भरि त’ छओ महिना गुजर चलबे करत। अंगना पहुँचल। अंगना अबिते बुधनी पाएर पर एक चुरुक पानि द’ घरसँ विछान निकालि छाहरिमे बिछा, देवनकेँ आराम करै ले कहलक आ अपने भानसक जोगारमे लगि गेलि। सब दिन दुनू गोटे खेत तामै लगल। महिनो ने लगलै, सब खेत दुनू गोटे मिलि तामि लेलक। जेठ मास। रौदसँ जमीन जरै लगल।। गाछ-बिरीछक पत्ता पीअर-भ’ भ’ गिरै लगलै। इनार पोखरिक पानि किछु उड़ै लगल आ किछु अपन जान बँचवै ले पतालक रास्ता पकड़लक। तीनि बर्खक बाद एहिबेर आम फड़ल। टुकला बिछै ले देवन रमुआकेँ संग क’ सब गाछीक आम देखलक। आम देखि देवन बुधनीसँ पूछलक- ‘‘दीदी! अहाँकेँ आम गाछ नइ अए?’’ आमक गाछक नाम सुनि बुधनीक आँखिमे आँसू अवै लगलै। जेहने दुख कमाईवला बेटामुइने, उपजल जजात दहेने, देनुआर गाइक बच्चा मुइने होइत तेहने दुख फड़ैवला आमक गाछ सुखने वा बेचने होइत। करेज असथिर करैत बुधनी देवनकेँ उत्तर देल- ‘‘बौआ! आमक गाछ तँ अपनो छल मुदा विपत्ति पड़ल तँ बेचि लेलौ बुधनीक बात सुनि देवनकेँ मनमे कचोट एलै मुदा किछु बाजल नहि। मने-मन सोचै लगल जे गाममे तत्ते आम फड़ल अछि जे मास दिन कतबो लोक खाइत तइयो उगड़बे करतै। जकरा बेसी हेतइ ओ बेचवो करत। देवन पूछलक- ‘‘सबसे बेसी आमक गाछी ककरा छै?’’ ‘‘नसीबलाल काकाकेँ।’’ ‘‘हुनका ऐठाम बेरु पहर जायब। हुनका कहबनि जे दूटा आमक गाछ हमरा हाथे बेचि लिअ। दूटा गाछ कीनने अपनो खायब आ फजिलाहा बेचि क’ हुनकर दामो द’ देवनि।’’ मेहनतक बले नसीवलाल काका बहुत किछु अरजि लेलनि। साले भरिक जखन नसीबलाल रहथि तखने पिता मरि गेलनि। असकरे मायटा परिवारमे। छोट बच्चाक ममता मायक हृदयकेँ हिला देलक। वेचारी सासुरसँ नैहर चलि ऐली। बेटीक बगए देखि माए बताहि जेका करै लगली। मने-मन भगवानकेँ गरिऐवो करति-जे केहेन चंठ छथि। अखन बेटी खइ-खेलाइक उमेरक अछि तखन ओ विपत्तिक पहाड़ गिरा देलखिन। मुदा पतिक बात- ‘‘जहिना बेटी हमरा घरमे जनमल आ सेवा केलिएैक तहिना जाबे जीबि, ताबे करवै।’’ सँ मन असथिर भेलै। नाना-नानीक छाहरिमे नसीवलालक पालन भेल। जहिना धीपल लोहा हथौरीक चोट खा नीक वस्तु बनैत तहिना नसीवलालोक जिनगीमे भेल। बच्चेसँ नानाक संग नसीबलाल रहि काजक लूरि सीखै लगल। नसीबलाल जुआन भेल। नाना-नानी मरि गेलनि। अपन मेहनत आ लगनसँ ओ गुजरो केलक आ खेतो कीनलक। खेतीक आमदनीसँ गाय कीनलक, घर बनौलक। गाछी लगौलक। दिन-राति अपन जिनगीक लीलामे रमि गेल। तीस बर्खक मेहनतसँ नसीवलाल गामक सबसँ पैघ गिरहस्त बनि गेल। खेती-बाड़ीसँ जे समय बचै ओहिमे पढ़वो-लिखवो करै। सदिखन मनुक्खक बीच रहै लगल। हृदय ऐहन विशाल भ’ गेलै जे ढेरो मनुक्खक बीच रहनौ, असकरेे बुझि पड़ै। जहिना मेघमे लाखो तरेगण रहनहुँ सूर्य अलग बुझि पड़ैत, तहिना। देवन नसीवलाल ऐठाम पहुँचल। नसीवलाल अपराजित फूलक लत्ती टाट पर बान्हि-बान्हि सरिअबैत। अनभुआर देवनकेँ देखि पूछलखिन- ‘‘तोरा चिन्हलिअ नै बौआ?’’ पायर छूबि गोड़ लागि देवन कहलकनि- ‘‘काका, आब हम अही गाममे रहब। अपना घर-दुआर नइ अछि।’’ चैंकैत नसीवलाल पूछलखिन- ‘‘अइ गाममे कत्ते रहै छह?’’ ‘‘बुधनी ऐठाम। वेचारीकेँ चारि-पाँच बर्खक बेटा छनि आरो क्यो ने।’’ नसीवलाल- ‘‘ऐठाम किअए ऐलह?’’ ‘‘आमक मास छियै। वेचारीकेँ एक्कोटा आमक गाछ नहि छनि। तेँ सोचलौ जे अहाँ से दूटा गाछक आम मोल ल’ लेब। अपनो खायब आ बेचिकेँ दामो द’ देब।’’ उपर-निच्चा देवनकेँ निङहारि नसीबलाल कहलखिन- ‘‘दरवज्जा पर चलह। बैसिकेँ निचेनसँ गप करब। तोहर माए-बाप कत्ते छथुन?’’ माए-बापक नाम सुनि, देवन उदास भ’ कहलकनि- ‘‘दुनू गोरे मरि गेला। असकर बुझि घरसँ निकलि दुनिया देखै ले विदा भ’ गेलौ। सालभरि नवटोलमे दीनमा आ भुखनी ऐठाम रहलौ। साल पुरिते नवटोलसँ विकासपुर आबि बुधनी ऐठाम छी। आइह बेचारी अपनेक संबंधमे कहलनि। तेँ एलौ।’’ देवनक बात सुनि, नसीवलाल अपन जिनगी पर नजरि दौड़बैत, गंभीर भ’ कहलखिन- ‘‘हँ, हमरा बहुत आमक गाछो अछि आ आमो। अगर ओइ वेचारीकेँ नइ छैक, ते चलह, एकटा बरहमसिया आमक गाछी अछि। ओ देखा दइ छिअह। बारहो मास फड़बो करै अए आ खाइयोमे सुअदगर होइ अए। ओइमे जे तोरा पसिन्न हुअ-अ, दूटा गाछ ल’ लिह। ओकरे ओगरबो करिहह आ तामो-कोर कहियह। सालो भरि आम होइते रहतह।’’ नसीवलालक बात सुनि देवनक मन खुशी स’ नाचि उठल। आशाक दुनियामे देवन भ्रमण करै लगल। गाछी देखै दुनू गोटे विदा भेला। गाछी पहुँचते देवनकेँ बुझि पड़ल जे आमक ढेरीक बीच आबि गेलौ। नमगर-चैड़गर गाछी। मझोलका गाछक संग बड़को-बड़को गाछ। जहिना गाछ सबहक सुन्दर रुप तहिना आमसँ लदल गहना। एक-दोसर गाछमे एत्ते स्नेह जे सब अपन-अपन बाँहि समेटि-समेटि हटल। ने बड़का गाछ छोटका पर ओंगठल आ ने छोटका अपना क’ हीन बुझि दवाइल जइ गाछमे जत्ते बुत्ता तते बेसी फड़ल। नसीवलाल बीच गाछीमे ठाढ़ भ’ हियासैत आ देवन घुमि-घुमि सब गाछ देखैत सगरे गाछी देखि देवन नसीवलालक लग आबि कहलकनि- ‘‘अपने धन्य छी काका जे एते नमहर आ एते सुन्नर गाछी लगौने छी। हम तँ मोल लइक विचारसँ आइल छलौ मुदा अपने ओहिना दइ छी तेँ हम गाछीक ओगरवाहिये क’ देव हमर मेहनतक जे मजूरी हैत, ततबे लेब।’’ देवनक जिज्ञासाकेँ अंकैत नसीवलाल कहलथिन- ‘‘अखन तू बच्चा छह तेँ गाछी लगौनाई सीखह। ताबे एकटा गाछ वहिना ल’ लाय आमो खेवह आ आँठीकेँ रोपि अपनो गाछी लगा लेबह। जखन फड़ै लगतह तखन अपन गाछीक सेवा करियह।’’ नसीवलालक गप सुनि हँसैत देवन विदा भेल। घर पर आबि देवन सब बात वुधनीकेँ कहलक। दोसर दिनसँ देवन टुकला विछैक विचार केलक। मनमे एलै जे टुकला बिछै ले नीक झोरा चाही। मुदा आइ तँ नइ अछि। तेँ दीदी क’ एकटा झोरा सिबै ले कहि दइ छियै आ आइ मौनिये ल’ क’ जायब। मौनी नेने देवन टुकला बिछै विदा भेल। गाछीमे टुकला पथार लागल। मने-मन देवन सोचलक जे अखन दोसर काजो ने अछि तेँ जँ सब टुकला क’ बीछि लेब आ सोहिकेँ आमील बना लेब ते माइर पाइ हैत। मनमे अबिते देवन टुकला बिछै लगल। मौनी भरिते देवन विदा भेल। घर पर आबि बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, गाछीमे टुकला पथार लागल अछि। अहूँ चलू। बड़का छिट्टा सेहो ल’ लिअ। मौनीमे बीछि-बीछि छिट्टामे राखब। तीनू गोटे टुकला बिछै विदा भेल। टुकला देखि बुधनीकेँ अचंभा लागि गेल। भरि छिट्टा बुधनी, मौनीमे देवन आ दुनू हाथमे रमुआ टुकला लेने आंगन आयल। आबि देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, अहाँ अंगनाक काज करु, हम टुकला सोहै छी।’’ देवन टुकला सोहै लगल। बुधनी भानस करै गेलि। पनरहे दिनमे, धान-चाउरक पथार जेँका, आमिलक पथार भ’ गेल। आमील सुखा-सुखा बुधनी दू कोठी भरलक। अंतिम जेठमे झमझमौआ बरखा भेल। धरतीक ताप आ पानिक ठंढ़कक बीच हाथा-पाइ हुअए लगल। हाथा-पाइ करैत दुनू अलिसा क’ सुति रहल। पैछला सालक बात देवनकेँ मन पड़ल। जे बीआ बाओग करैक समय आबि गेल। मुदा कथीक बीआ वाओग हैत से वुझवे ने करैछी। बुधनियेक घर लग सजनाक घर। सजन गिरहस्त। देवनकेँ मनमे एलै जे सजन गिरहस्त छथि तेँ हुनकेसँ पूछि लेब, नीक हैत। सजन ऐठाम देवन गेल। हाल देखि सजन हरक सामान सभ, गठूलासँ निकालि, डेढ़िया पर झोल-झाल साफ करैत छल। देवनकेँ देखि सजन पूछलक- ‘‘बौआ, किमहर-किमहर ऐलह?’’ देवन- ‘‘अहींकेँ पूछै एलौ जे पानि भेलि हेन से कथीक बीआ अखन पाड़बै?’’ सजन बाजलि- ‘‘बौआ, गिरहस्ती तँ हम जरुर करै छी, सब काज करैक लूरिओ अछि। मुदा पढ़ल-लिखल तँ छी नहि! तेँ महीना लछत्तरक ठेकाने ने रहै अए। अखैन हरक सब सामान जोड़िया लइ छी आ बेरु पहर नसीवलाल कक्का ऐठाम जा क’ बुझि लेब। तोँहू संगे चलिहह। जे बुझैक हेतह से पूछि लिहौन।’’ ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि देवन चल आयल। बेर टगिते देवन सजनक संग नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। दरवज्जे पर बैसि नसीवलाल बेटाकेँ बीआ बाओग करैक संबंधमे कहैत रहथिन। देवन आ सजन पहुँचल। दुनू गोटेकेँ देखि नसीवलाल पूछलथिन- ‘‘दुनू गोटे किमहर-किहर चललियैक?’’ सजन कहलकनि- ‘‘काका, हम तँ अहाँसँ पूछि खेती करै छी। आइ भिनसरे देवन हमरासँ पूछै आयल। तखन हम हरक समचा जोड़िअवैत रही तेँ कहलियै जे बेरु पहर दुनू गोरे चलि क’ काका से बुझि लेब। तेँ एलौ।’’ मुस्कुराइत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘पहिने तमाकू खुआवह। तखन गप्प-सप करब।’’ कहि नसीवलाल चुनौटी निकालि सजनक हाथमे देलखिन। सजन तमाकुलो चुनबै आ कहवो करनि- ‘‘काका, तेहेन बरखा भेल जे मन खुशी भ’ गेल। हूँ कारी भरैत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘छोट-छीन बरखा होइत तँ रस्ते-पेरे रहि जाइत। मुदा झमकौआ बरखा भेने जमीनमे तेहेन हाल भेल जे गिरहत बीओ-बाइल खसा लेत आ दश दिन अफारो खेत जोतत।’’ घासो सभ, जे सूखा गेल छल ओहो पौनगत। जइसँ मालो-जालकेँ खोराकी बढ़तै।’’ चुटकीमे तमाकुल ल’ सजन नसीवलाल दिशि बढ़ौलक। वामा तरहत्थी पर तमाकुल ल’ नसीवलाल दहिना अैाँठासँ दू बेरि रगड़ि नाकमे अैाँठ भीरा नोइस ल’ तमाकुल मुहमे लेलक। नोइस लगिते छिक्का भेलनि। छिक्का होइते नसीवलालक मन हल्लुक भेलनि। मन हल्लुक होइते नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘जेठ अंत भ’ रहल अछि। बड़ सुन्दर हाल भेल। पुरना ढंगक गिरहस्तीमे मड़ूआ, गरमा धान आ अगहनी (नीचला खेतक) बीआ खसबैक समय आबि गेल। आँखि मूनिकेँ लोक बीआ पाड़त। हमरा त’ बोरिंग अछि तेँ मकईओ तिलकै अए आ गरमाधान सेहो कटै छी। बैशाखा तरकारी (सजमनि, रामझिमनी, झिमनी, ठढ़िया साग इत्यादि) भरखैर निकलै अए। महिना दिन आरो चलत। रामझिमनी बरिसातिओ होइत। सजमनि झिमनी साग इत्यादि सेहो बरिसातिओ होइत तेँ ओहो सब लगाओल जायत। मुदा सबसँ पैघ बात अछि जे सब गिरहतो त’ एक रंग नहि अछि तेँ फुटा-फुटा अपन-अपन बुझै पड़तै।’’ नसीवलालक बात सुनि सजन संतुष्ट भ’ गेल। मुदा देवनक मनमे अनेको सवाल उपकि गेल। देवन पूछलकनि- ‘‘काका, हमरा दीदी केँ त’ पनरहे कट्ठा खेत अछि आ दुनू गोटे अनाड़िये छी। हम कोना की करब?’’ नसीवलाल- ‘‘तीनि गोरेक परिवारमे बहुत जमीन अछि। जँ ढंगसँ उपजा हैत ते सालो भरि गुजर क’ क’ उगड़वो करत।’’ उगड़व सुनि देवन उठि क’ ठाढ़ भ’ गेल। नसीबलाल देवनकेँ बैसवैत कहलखिन- ‘‘सबसे पहिने देवन सालकेँ मनसँ निकालि लाय। तीन तरहक मौसम होइछै आ तीनू मौसमक फसल सेहो होइ छै। तेँ अखन तू गरमाधान जे चारि मासमे भ’ जाइत। मडू़आ, तीमन तरकारीक खेती शुरु करह। कम्मे समयमे तीमन-तरकारी फड़ै लगतह जईसँ गुजरो चलतह। जे अपने भरि करबह ते खेवेटा करबह अगर जे वेसी करवह ते अपनो खेवह आ बेचि के गुजरो करबह।’’ देवन- ‘‘काका, बीआ कते स’ आनव?’’ नसीवलाल कहलथिन- ‘‘सब चीजक बीआ हम द’ दइ छिअह।’’ देवन- ‘‘तीनिटा कोली हमरा दीदीकेँ अछि। चारि कट्ठाक कोली गहीरगर अछि बाकी दूटा कोली मध्यम आ भीठ छनि अपने बुझा-बुझा कहि दिअ कोन कोलीमे कोन अन्नक खेती करब ध्यानसँ देवनक बात सुनि नसीवलाल कहलथिन- ‘‘नीचला खेतमे छिपगर धान रोपै परतह। किएक तँ ओहिमे अधिक पानि बसत। मुदा इमहर जे दूटा कोली बँचलह ओहिमेसँ जे मध्यम छह ओहिमे गरमा धानक किऐक तँ बहुतो किस्मक धान अछि जे 70 दिन स’ ल’ क’ 150 दिनक होइत। से खेती करह। जे नीक-जेँका उपजतह ते पाँच कट्ठामे कहुना-कहुना सात क्वीन्टल धान हेतह। एकटा कोलीमे मड़ूआ रोपि लाय। मड़ूआ कम्मे दिनमे होइ छै। जँ सवारी समय (अधिक बरखा) हेतै ते मड़ूआ काटि क’ तीनि मासी गरमा क’ लिहअ आ जँ रौदियाह समय हेतै ते राहड़ि, तेबखा, कुरथीमे सँ कोनो वाउग क’ दिहक। बाड़ी-झाड़ी छह की नहि?’’ देवन- ‘‘घरे लग अछि। पहिने ओइमे दूटा आमक गाछ छलै।, जे कटि गेलै।’’ नसीवलाल- ‘‘अगर दशो धुर हेतह तइओ सालो भरिक तीमन-तरकारी ओइमे उपजि जेतह। ओहिमे थोड़े साग वाउग क’ लिहअ। थोड़े रामझुंगनी रोपि लिअह। एकटा लत्ती सजमनि लगा लिहअ।’’ देवन- ‘‘काका, एकटा लत्ती कत्ते फड़त?’’ देवनक प्रश्न सुनि नसीवलालकेँ हँसी लगलनि। मुदा मनमे एलनि जे बच्चा अछि। तेँ नइ बुझै अए। बुझवैत कहलखिन- ‘‘बौआ, एकटा सजमनिक लत्ती जँ समढ़ि जाय त’ सय तक फड़त मुदा डेढ़ सय फड़बै लेल रोपिनिहारो केँ मुसताइज रहै पड़तै।’’ देवन- ‘‘की मुसताइज?’’ नसीवलाल- ‘‘जहिना लोक घर बनबै अए तहिना ओकरा ले बाँसक मजगूत खूँटा पर मचान बनवै पड़तह। कीड़ी-फतींगीक देखभाल करै पड़तह। जहिमे छाउर-गोबर, डी.ए.पी. खाद दिअए पड़तह ततबे नइ जखने लत्ती ठमकै कि यूरिया खाद, टौनिक दवाई देमए पड़तह। फल नीक होइ दुआरे पोटाश खाद सेहो देमए पड़तह।’’ अपनाकेँ कमजोर (पछुआइल) उपजौनिहार बुझि देवन कहलकनि- ‘‘काका, अहाँक विचार तँ मनमे जँचै अए, मुदा अखन त’ हम सभ तरहे पछुआइल छी। तेँ अखुुनका हमर स्थिति देखि रास्ता बता दिअ।’’ देवनक बात सुनि नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, भगवानो गरीबकेँ मदति करै छथिन। भगवानक वास छनि माटि, पानि हवा आरो-आरो जगह। जइ ठाम (जइ खेतमे) जे जजात पहिले पहिल लगाओल जायत ओहि फसलकेँ माटि, पानि, हवा आ रौद अपन खजाना स’ आनि क’ द’ दैत। तेँ, देवन तोँ ठीक समयमे रोपि देखभल, कमठौन, आरो-ओरो जे जोगार छै, ततबे करिहह। मुदा करह। जखने करै लगवह दुख पड़ाइ लगतह। जत्ते करवह तते दुख भगतह।’’ नसीवलालक विचार सुनि देवन खिलखिलाकेँ हँसै लगल। देवनकेँ हॅसैत देखि नसीवलालक हृदय, जहिना जूरशीतल पावनिमे माए-बाप, बेटा-बेटीकेँ माथ पर जल द’ जुड़बैत, तहिना भेलनि। आँखि उठा दुनिया दिशि देखै लगलथिन। मनमे एलनि जे ई दुनिया तँ कर्मभूमि छी। देवन जरुर कर्मनिष्ठ बनत। मुदा कर्मनिष्ठोक रास्ता (साधना) तँ ज्ञाने क’ संग केने चलैत। अखन धरिक जे अनुभव अछि ओ देवनकेँ जरुर बुझा देवै। देवनकेँ बीआ दैत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘बौआ, साग, तरकारीक बीआ अंदाजेसँ आ धान मड़ूआक बीआ तौलि क’ द’ दइ छियह। पाँच-पाँच किलो धानक बीआ अछि। एकरा पाँच धुर खेतमे पाड़ि लिहअ।’’ पाँच धुर सुनि देवन पूछलकनि- ‘‘पाँच धूर कोना बुझबै?’’ देवनक जिज्ञासा देखि मुस्कुराइत नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, एहि गाममे साढ़े छह हाथक लग्गी अछि। एक लग्गी, एक लग्गी एक धूर खेत भेलै। मुदा पुरुखा सभ तीनि-डेग, तीनि डेगकेँ एक धूर नापि छेलखिन।’’ देवन- ‘‘काका, सभ तरहक लोकक डेग तँ एकके रंग नहि होइत?’’ नसीवलाल- ‘‘बड़ सुन्दर बात बौआ पूछलह। तीनि डेगकेँ मतलब, ओहन डेग जे दू हाथसँ कनेक बेसी होय। दू हाथक डेगकेँ माने ने बड़का धाप आ ने सासुरक डेग। दुनू पाएरक दूरी डेढ़ हाथ होय। किएक त’ एक बीतक पाएर होइ छै। दुनू पाएरक नमती एक हाथ भ’ जाइत। तेँ डेगमे एक पाएरक आ डेढ़ हाथ बीचमे।’’ नसीबलालक बात सुनि देवन उठिकेँ ठाढ़ भ’ खिलखिला क’ हँसवो करै आ दुनू हाथे थोपड़ियेा बजवै लागल। मने-मन नसीवलाल सोचै लगला जे एत्ते खुशी देवन किअए भेल? पूछलखिन- ‘‘बौआ, ऐना किअए करै छह?’’ देवन- ‘‘काका, अहाँ हमरा धरती नपैक लूरि बता देलौ। आब हम जरुर दुनियाकेँ नापि लेब।’’ धान, मड़ूआक बीआ ल’ देवन विदा भेल। रास्तामे सजन देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, तेहेन गामक लोक जहिया अछि जे ककरोसँ गप्पो करब मोसकिल भ’ जाइ अए। असकरे अपन दुख-धंधामे लगल रहै छी तेँ, नइ ते कोन जालमे के कखन ओझरा देतह से बुझवे ने करबहक।’’ आब त’ दू भाइ भेलौ, दुनू गोरे निचेनमे गप-सप करब।’’ साझू पहर सजन टहलल-टहलल बुधनी ऐठाम आयल। बुधनी भानस करैत छलि। एक्केटा डिबिया बुधनीकेँ। जे चुल्हि लग राखि भानस करैत। अंगना अनहारे। अन्हारे अंगनामे देवन आ रमुआ बैसि एक-दू सँ बीस तक गनैत। सजनकेँ देखि देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, डिबिया मोख लगमे द’ दिऔ। घरोमे इजोत हैत आ अंगनोमे हेतै।’’ बुधनी डिबिया मोख लग राखि देलक। सजनकेँ बैसबैत देवन कहलक- ‘‘भैया! गाममे के केहेन लोक अछि से हमरो बुझा दिअ। किऐक त’ आब हमहू अही गाममे रहब की ने।’’ देवनक बात सुनि सजन क’ मनमे भेलै जे देवन हमरा बेसी मानै अए। अपन बड़प्पन बुझि सजन कहै लगलै- ‘‘बर्ख पाचमक बात छी। जोगिनदरक गाय विआइल। बड़ सुन्दर पहिलेठे गाय छलै। जेहने रंग तेहने खाढ़। बसुलिया सींग मझोलका थूथून। आगूसँ देखैमे तते नीक लगै जे होय देखते रही। तहिना पाछूओसँ। ओना लोक कहैछै बड़दक आगू गायक पाछू। मुदा ओहि गायक जेहने थन तेहने थूथून। देशी गाय रहिते जरसिये जेँका बुझि पड़ै। दूधहो बढ़ियाँ होय। सब तूर मिलि जोगिन्दर सेवा करै। पहिलोठ गाय रहने दुहै काल गुदगुदी लगै। तेँ हनपटा जाय। ने बच्चा क’ पीबै दैइ आ ने दूहै देइ। दोसर दिन (वियेलाक एक दिन बाद) जोगिनदर ननुआकेँ कहलक। ननुओ गाय पोसैत मुदा अछि नेत-घट्टू। जोगिनदरकेँ ननुआ तेहेन चीज पीअबै ले कहलक जे पिअबितहि गाय बगदि गेल। ने घास खाय आ ने पानि पीवै। ने ककरो लगमे जाय देइ आ ने बच्चाकँे देखै चाहै। जहिना दारु पीबि मनुक्ख करै अए तहिना गाइयो करै। दुनू परानी हबो-ढ़कार भ’ भ’ कानल फिड़ै। बच्चा सेहो लर-तांगर जेँका भ’ गेलै। एक-फुच्ची दूध रतनासँ उठौना केलक। मुदा एक फुच्ची दूधसँ बच्चाके की होयतै। बड़ आशासँ बेचारा जोगिनदर गाय पोसने, जे बिआइत ते दश दिन दूध खा बेचि लेब, जहिसँ बेटीक विआहो क’ लेब आ उगरत ते एकटा बाछियो कीनि लेब। तेसर दिन जेागिनदर बुझलक जे ननुआ अन्ट-सन्ट दवाई द’ गायकेँ दुरि क’ देलक। जोगिनदर त’ बरदास केने रहल मुदा घरवाली ननुआकेँ गरिअबै लागलि। घरवालीकेँ गरिअबैत देखि जोगिनदर कहलकै- ‘‘गाइयो दुरि भेलि आ मारिओ खायब। देखै नै छियै जे गाममे सबसे जेरगर दियादी ननुआक छै। केहेन-केहेन हुरनेठगर समांग सबछै। मुह बन्न करु नइ ते अनेरे मारि खायब।’’ सय बीधा बाधक बीचमे, दू-अढ़ाइ कट्ठाक एकटा परती। परती पर एकटा साहोरक गाछ। नमहर तँ बेसी नहि मुदा सघन छोट-छीन अछार लोक ओतें बीता लैत। ओहि गाछ पर ठनका खसलै। साहोरक गाछ पर ठनका गिरब सुनि नसीवलाल भोरे देखै ले जोगिनदरे घर लग देने जाइत। दुनू परानी जोगिनदरकेँ कनैत देखलखिन। ससरि क’ नसीवलाल जोगिनदर लग जा पूछलखिन- ‘‘किअए दुनू परानी जोगिन्दर कनै छह?’’ नसीवलालक बात सुनि आरो हुचकि-हुचकि दुनू परानी कनै लागल। अंगनामे ढेरबा बेटी लुरुओ-खुरु करै आ आखिकेँ नोरो पोछै जोगिनदरक बेटा जेठ बहीनिसँ कहै- ‘‘दाय, कहै छेलै जे गाय बियेतै ते दूध देबौ, से कहाँ दइछै।’’ छोट भाइक बात सुनि बहीनिक हृदय बरफ जेँका पघिलैत। मुदा वेचारी की करैत। मुह पर हाथ सहलबैत बहीन कहलकै- ‘‘बौवा, अल्लू पकाके रखने छी। ओकरा चटनी क’ दइ छी। रोटी आ चटनी खा लिअ। भगवान कोनो गाम गेलखिन। जब खूँटा पर गाय अछि ते दूध खेवे करब।’’ अंगना स’ ल’ क’ दरवज्जा तकक दृश्य नसीवलाल देखैत। आशा जगबैत नसीवलाल जोगिनदरकेँ कहलखिन- ‘‘कनलासँ की हैतह? ऐहन कोन दुखछै जकर दवाई नइछै। मुह बन्न करह आ कहह जे की भेलह?’’ नसीवलालक बाहि पकड़ि जोगिनदर गायक-बच्चा क’ देखवैत कहलकनि- ‘‘काका! पाँच दिन गायकेँ बियेना भेल हेन, एक्को चैठी दूध नइ होइ अए। बच्चो क’ थन तर नै जाय दइछै। पा भरि दूध रतनासे उठौना लइ छी, ओइह पिया बच्चा क’ अखन धरि जिऔने छी। ने ते ऐहो मरि गेल रहिते।’’ मुह पर हाथ द’ नसीवलाल थोड़े काल गुम्म रहि, पूछलखिन- ‘‘बियेला पर की सब केलहक?’’ ‘‘थन तर गाय जाइये ने दिअए। तखन ननुआ भैया क’ पूछलियै। ओ एकटा दवाई घरसँ आनिके देलक आ कहलक जे एकरा पीआ दिहक। सब ठीक भ’ जेतह।’’ मने-मन नसीवलाल विचारि कहलखिन- ‘‘नीक भ’ जेतह। दूधो हेतह। कानह नहि। हम बाधसँ साहोरक गाछ देखने अबै छी। तखन संगे डाॅक्टर ऐठाम चलिहह।’’ कहि नसीवलाल बाध दिशि विदा भेला। बाधक परतीपर जा साहोरक गाछ देखै लगलखिन। ठनका स’ साहोरक गाछ दू फाँक भ’ गेल छल। दुनू फाँक दुनू भाग गिरल। जहिना-जहिना ठनका निच्चा मुहे गेल तहिना-तहिना गाछो झड़कल। मनमे एलनि जे अखन धरि सब वुझैत अछि जे साहोरक गाछ पर ठनका नइ खसैछै मुदा आखिक सोझामे देखै छी। गाछक बगलेमे बैसि नसीवलाल सोचै लगला। थोड़े कालक बाद मनमे एलनि जे ई बात (साहोर पर ठनका नहि खसब) गाछी-विरछीमे भ’ सकै अए जइ ठाम आन गाछ नमहर-नमहर रहैत छैक आ साहोरक गाछ छोट। मुदा एक गछ्छामे त’ भ’ सकै छैक। एहि निष्कर्ष पर पहुँच नसीवलाल घुरि क’ घर दिशि विदा भेला। दुनू परानी जोगिनदर, डेढ़िया पर बैसि, नसीवलालक प्रतिक्षा करैत। दुरेसँ नसीवलालकेँ अबैत देखि जोगिनदर रास्ता पर ठाढ़ भ’ गेल। जोगिनदरकेँ देखिते नसीवलाल कहलखिन- ‘‘अखने चलह। घर पर गेला स’ काजमे ओझरा जायब।’’ दुनू गोटे मवेशी डाॅक्टर ऐठाम विदा भेला। डाॅक्टर कमल, एकटा महीसि इलाज क’ क’ आयले छल, कि दुनू गोटेकेँ देखिते, हाँइ-हाँइ कल पर जा हाथ-पाएर घोए लगल। हाथ-पाएर धोएकेँ आबि कमल नसीवलालकेँ गोड़ लगलकनि। दुनू गोटेकेँ बैसवैत, आंगन जा घरवालीकेँ चाह बनवै ले कहलखिन। डाॅक्टर कमलक व्यवहार देखि जोगिनदरकेँ आश्चर्य लगै। डाॅक्टर कमल नसीवलाल लग आबि पूछलखिन। जोगिनदर सब बात कहलकनि। अलमारीसँ दवाइ निकालि टेवुल पर राखि, बुझवैत कमल कहै लगलखिन- ‘‘तीनि दिनक दवाइ देलौ हेन। छोटका पुड़ियामे बच्चाक दवाइ छी। दुनू साँझ खुरचनमे घोड़ि बच्चाकेँ देबै। आ दू रंगक दवाई गाय ले देने छी। रोटी संगे गायके खुआएव। दू खोराक देलाबाद गायक मन नीक हुअए लगत। काल्हि साँझसँ दुहवे करब। तीनि-चारि दिनमे गाय नीक भ’ जायत। अगर नइ ठीक हुअए ते फेरि आयब।’’ दवाई ल’ फेरि जोगिनदर डाॅक्टर कमलकेँ पूछलकनि- ‘‘कत्ते दाम भेल?’’ मुस्की दैत कमल कहलखिन- ‘‘पाँच रुपैआ भेल।’’ रुपैआ द’ जोगिनदर नसीवलालक संग विदा भेल। घर पर अबिते गायो आ बच्चोकेँ दवाइ पिऔलक। जहिना-जहिना डाॅक्टर कहने रहथिन तहिना-तहिना गाय नीक हुअए लगल। तेसर दिनसँ बढ़ियाँ जेका गाय दुहै दिअए लगल। मास दिन सब परानी जोगिनदर दूध खा सात हजारमे गाय बेचि लेलक। ओहि रुपैआसँ बेटीक विआहो केलक आ एकटा डेढ़ सालक बाछियो कीनि लेलक। आँखि मूनि देवन सजनक बात सुनैत। जखन सजन चुप भ’ गेल तखन देवन आँखि खोलि कहलक- ‘‘भैया! अहाँ तँ हमर बन्न आखि खोलि देलौ।’’ देवनक बात सुनि जोगिनदर कहलक- ‘‘बौआ, ऐहेन-ऐहेन खिस्सा सबहक अछि। हम जे ककरो दरवज्जा पर नइ जाइ छी से अही दुआरे। जखन सैाँसे गामक लोकक किरदानी सुनबहक ते हेतह जे सैाँसे गाम लुच्चे-लफंगा अछि। ने कोइ एक्कोटा सत बजतह आ ने ककरो कोइ नीक करतह। जँ ककरो किछु पूछबहक ते तेहेन मीठ बोली कहतह जे बुझि पड़तह जे ऐहेन शुभचिन्तक गाममे दोसर नहि अछि मुदा तेहेन घुरछी लगा देतह जे पेपिआइत रहबह।’’ भानस क’ बुधनियो आबि बैसलि छलि। खिस्सा सुनि बुधनी सजनकेँ कहलखिन- ‘‘भैया, भानसो भ’ गेल, आब खा लोथु तखन जहिएथि।’’ हँसैत सजन कहलक- ‘‘कतौ आन ठाम छी। जहिना ई घर तहिना ओ घर।’’ बौआ देवन ऐहेन-ऐहेन बहुत बात अछि। दोसर दिन आरो सुना देवह। अखन रातिये बेसी भ’ गेल। तोँहू सभ खा -पीयह।’’ ....... जिनगीक जीत:ः 8 अधरतियेमे बचेलालक निन्न टूटि गेल। दू बेरि खोंखी क’ ओछाइने पर पड़ल रहल। एक करोटसँ दोसर करोट उनटि मनेे-मन सोचै लगल। अखन धरि हमर जिनगी की रहल? बच्चेसँ मन पाड़ै लगल। जखन तीनि वरखक रही तखने पिताजी स्वर्गवास भ’ गेला। मायक उपर परिवारक भार पड़लनि। ओ जना-तना घर सम्हारि चलवै लगली। औरत होइतहुँ परिवारकेँ सम्हारि, दुनू भाय-बहीनिकेँ पढ़ेबो केलक। मैट्रिक पास करा हमरा शिक्षक बनौलक। जे बहुुत मरदो बुते नइ होइ अए। एतइ प्रश्न उठैत जे की औरतकेँ मरदसे शक्तिहीन बुझल जाय? कथमपि नहि। पुरुखसे औरतकेँ कम बुझब नादानी क’ सिवा आओर की भ’ सकैत अछि। हँ, ई बात जरुर अछि जे आइ धरिक जे जिनगी औरतक रहल, ओ कमजोर जरुर बनौलक। जहिसँ पुरुष औरतक बीच नमहर दूरी अवश्या भ’ गेल अछि। जकरा समतल बनवैमे समय साधन आ श्रमक जरुरी अवश्य अछि। मुदा एकर अर्थ ई नहि जे समतल नहि बनि सकत। जहिना पुरुषमे असीम शक्ति होइत तहिना तँ औरतोमे होइत। एत्ते बात बचेलालकेँ मनमे अबिते अपन पत्नी दिशि नजरि दौड़ा क’ देखलनि। अपन पत्नीक चालि-ढालि देखि मनमे एलनि जे अदहा कोन चैथाइयो मनुखसँ कम क्रियाशील छथि। जँ ओ घर सम्हारि लोथु त’ हम नोकरीक संग किछु समाजोक सेवा करितहुँ। दरमाहासँ परिवारोक खर्च चलैत आ किछु समाजोक उपकार होइतै। मुदा से कहाँ होइ अए। एत्ते बात मनमे अबिते बचेलाल देवालमे टंगल घड़ी क’ चोरबत्तीसँ देखलक। रातिक एक बजैत रहै। चोरबत्ती सिरमाक बगलमे राखि पुनः सोचै लगल। आइ परिवा (परीब) छी। परीब रातिक चान घसकट्टो हाँसूसँ पातर बुझि पड़ैत। मुदा जहिना-जहिना दिन बढ़ैत तहिना-तहिना चानो बढ़ैत। बढ़ैत-बढ़ैत ओइह चान पुरनिमा दिन सुरुजे जेँका विशाल भ’ रातिके दिन जेँका बना दैत अछि। तहिना त’ मनुक्खोकेँ भ’ सकैत। मुदा मनुक्ख चानक गति नहि भ’ पबैत। ओइह चान पुरनिमाक परातसँ छोट हुअए लगैत आ छोट होइत-होइत अमावश्या दिन विलीन भ’ जाइत अछि। आखिर ओ (चान) कत्ते चलि जाइत अछि? जँ कतौ चलि जाइत अछि तँ पुनः परातेसँ अबैत कोना अछि? की मनुक्खोकेँ वहिना होइत? जहिना दुनियाँक बोध घटैत-घटैत व्यक्ति लग पहुँच जाइत तहिना त’ शक्तियो कमैत-कमैत एत्ते कम भ’ जाइत अछि। जे अस्तित्वो मृत्यु प्राय बनि जाइछ। पुनः बचेलालक मनमे प्रश्न उठल जे दुनियामे सबसँ श्रेष्ठ जीव मनुष्य मानल जाइछै। मात्र मानले नहि जाइछै। वास्तविक अछियो। दुनियामे जत्ते जीव-जन्तु अछि ओहिमे मनुक्खे टाकेँ विवेक होइत। आन-आन गुण त’ कमोवेश सभमे पाओल जाइ छै। आइ धरि मनुक्ख विवेकक उपयोग जत्ते बजैमे करैत अछि तकर एक अन्नियो जिनगीमे नहि क’ रहल अछि। ई दुनिया कर्मभूमि थिकैक आ मनुक्ख कर्मकार। मुदा से नहि बुझि उधिकांश लोक दोसराक श्रमकेँ लुटि अपन ऐश-मौजक जिनगी बनबैक पाछू विवेककेँ ताक पर राखि दैत अछि। जहिसँ मनुक्खक बनमे सदिखन आगि लगले रहै अए। आ ओ आगि ताधरि धधकैत रहत जाधरि विवेकक सीमा मजगूत नहि बनत। शुरुहेसँ जना-जना मनुख होशगर होइत गेल तना-तना अल्लढ़ मनुष्यकेँ जानबरक श्रेणीमे धकलैक गेल। धकलैत-धकलैत ऐहेन रास्ता बनि गेल जे सब-सभकेँ निच्चे मुहे धकलैत अछि। धकलाइत-धकलाइत जे सबसे नीचा पहुँच गेल अछि। ओकरा आगू मुहे बढ़ैक कोन बात जे तकलो ने होइ छेक। तकबो कोना करत? दुनिये उनटि गेलै। जिनगीक सभ रास्ता उनटि गेलै। उनटि गेलै विवेक। जहिसँ साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, दर्शन, एकोटा बाकी नहि रहल। जँ थोड़-थाड़ बँचलो अछि त’ वहिना, जना लछमन (लक्ष्मण) केँ शक्तिवाण लगला पर हनुमानकेँ सिर-सजमनि अनै ले कहलकनि आ ओ सिर-सजमनि नहि चीन्हि पहाड़े अनै ले मजवूर भेला, तहिना। सवाल उठैत अछि जे बिना अनुकूल दिशामे ऐने मनुक्खक कल्याण कोना भ’ सकैत अछि? कथमपि नहि भ’ सकैत अछि। मुदा मनुक्खेक भीतर ओहन शक्ति छैक जे क’ सकैत अछि। जँ मनुक्ख अपन शक्तिकेँ चीन्हि उपयोग करे, तखन। ई बात मनमे अबिते बचेलाल केबाड़ खोलि, घरसँ निकलि, आंगन आबि अकास दिशि देखै लगल। सन-सन करैत अन्हार। आंगनसँ निकलि बचेलाल बाट पर आबि, उत्तरसँ दछिन आ दछिनसँ उत्तर मुहे जाइत रास्ताके, ध्यानसँ देखै लगल। एक्केटा रास्ता जहि पर उत्तर मुहे चललासँ उत्तरी ध्रुव पर पहुँचैत आ दछिन मुहे चललासँ दछिनी ध्रुव पर पहुँचैत आ दक्षिन मुहे चलला पर दछिनी ध्रुव पर। रास्ता ते एक्के अछि मुदा दिशा बदलने स्थानो बदलि जाइछै। एहिना त’ जिनगीयोक रास्ता अछि। एक दिशि गेने लोक पापी बनि जीबैत जबकि दोसर मुहे गेेने धर्मात्मा बनि जाइत अछि। मुदा प्रश्न उठैत जे असकर चलव आ समूहक संग चलबाक। समूहक संग चलने व्यबस्था बदलैत जबकि असकर चलने व्यवस्था नहि बदलैत। एत्ते मनमे अबिते, बड़बड़ाइत बचेलाल घर आबि विछान पर पड़ि रहल। अपने सवालो उठबैत आ जाबाबो तकैत। रुमाक निन्न सोहो टूटि गेलनि मुदा बचेलालक बड़बड़ेनाई सुनि गबदी मारि सुनै लगली पतिक बोलीमे रुमा संकल्प, धैर्य, उत्साह देखथि। जहिना आगिक धधड़ामे काँच बस्तु पकैत जाइत तहिना बचेलालमे साहस जगै लगल। साहसक संग धैर्य सेहो अवै लगलनि। आइ धरि जे बात रुमा पतिक मुहे कहियो ने सुनने छली ओ सुनै लगली जिनगीक रास्ता कोना बदलल जाय, ई बात बचेलालक मनकेँ झकझोड़ै लगल। बिना रास्ता बदलने आगू बढ़व कठिन? मुदा रस्तो बदलब तँ असान नहि। एहि गुनधुनमे बचेलालक मन, धोर-मट्ठा पानि जेँका, होइत। कछमछ करैत बचेलाल। कखनो पड़ैत त’ कखनो उठि क’ बैइसैत। मुदा रास्ता देखबे ने करैत। चीनक एकटा खिस्सा बचेलालकेँ मन पड़ल। चीनक एकटा पहाड़ी इलाकामे एक गोटे रहैत। घरसँ निकलि बाहर जेबामे ओकरा एकटा पहाड़ टपै पड़ैत छलैक। एक दिन ओकरा मनमे एलै जे पहाड़ काटि रास्ता बनौलासँ चलवोमे सुगम हैत आ समयोक बचत हैत। ओ आदमी छेनी, हथौरीसँ पहाड़ कटै लगल। कटिते समय दोसर गोटे देखलक। पहाड़ कटैत देखि ओ कहलकै- ‘‘ऐहेन पहाड़केँ कोना काटि सकबह?’’ छेनी-हथौरी रोकि ओ उत्तर देलकै- ‘‘जिनगी भरिमे जते कटत ओते त’ असान भ’ जायत। तकर उपरान्त बेटा काटत। एक नइ एक दिन पहाड़ कटवे करत जइसँ सुगम रास्ता बनबे करत। जे अबैवला पीढ़ीक लेल सुगम हैत।’’ खिस्साके ध्यानसँ सोचि बचेलाल आगूक जिनगीक लेल कार्यक्रम बनबै लगल। पतिक बोलीकेँ रुमा ध्यानसँ अंकैत। कोनो बात निक्को लगै आ कोनो अधलो। कोनो-कोनो बात बुद्धिक बखारीमे रुमाकेँ अँटबे ने करैत। रुमा मने-मन सोचै लागलि जे भरिसक हिनका कोनो बीमारी ते ने भ’ गेलनि। मुदा बीमारीसँ जे बड़बड़ेनाई होइछै ओ तँ जहिना-जहिना रोगक धक्का कम बेसी होइत तहिना-तहिना होइत। मुदा से नहि सुनै छी। एक रसमे बजैत छथि। अपन दहिना हाथ रुमा बचेलालक छाती पर द’ धड़कन देखै लगलीह। छाती पर हाथ परिते बचेलाल पूछलक- ‘‘अहूँ जागि गेलौ?’’ अपन विचार छिपबैत रुमा उत्तर देलकनि- ‘‘अखने नीन टूटल। अहाँ कखनसँ जागल छी?’’ गंभीर स्वरमे बचेलाल कहलक- ‘‘बारह बजे रातियेसँ जगल छी। निन्ने ने होइ अए।’’ ‘‘हमरो किअए ने उठा देलौ?’’ ‘‘उठबैक मन भेल मुदा सोचलौ जे जाबे अपने नइ जागव ताबे दोसरकेँ कोना जगा सकब? तेँ नइ उठेलहुँ।’’ सुमित्रा उठि क’, मोख लग राखल बाढ़नि ल’, अपन घर बहारि ओसार बहरै लगली बहारैत-बहारैत जखन बचेलाल घरक मुह लग गेली ते सुनलखिन जे घुनघुनाके बचेलाल रुमाकेँ किछु कहैत छथिन। बाहरब छोड़ि सुमित्रा बोली अकानए लगली। बचेलाल बजैत जे अपना परिवारमे दू गोटे जुआन छी। दूटा बच्चा अछि आ माय बूढ़ि छथि। जखन पिताजी मुइलाह तखन हम दुनू भाय-बहीनि बच्चे रही। जत्ते खेत अखन अछि ततबे ओेहू समयमे छल। असकरे माए दुनू भाय-बहीनिकेँ पोसबो केलक आ पढ़बो केलक। बहीनकेँ मिड्ल तक पढ़ा विआहो केलक। हमरा मैट्रिक तक पढ़ा शिक्षक बनौलक अपन विआहमे मायक विचार हम कटलौ। हुनकर मन रहनि जे गिरहस्तक बेटीसँ वियाह करब जबकि हम नोकरिया परिवारमे वियाह केलौ। हमहू आगू-पाछू नहि बुझियै। मुदा आब बुझै छी जे गलती केलौ। वियाह ते सिर्फ लड़के-लड़कीक नहि होइत अछि। जहिना उमेरक खियाल लड़का-लड़की (बर-कनियाँ) मे देखल जाइत तहिना परिवरो आ समाजोक खियाल हेवाक चाही। पुरुष-नारीक संबंध तँ सृष्टिक सृजनक एक प्रक्रिया छी। मुदा एहिसँ भिन्न जिनगी होइत। जे व्यक्ति, परिवार आ समाजसँ जुड़ल रहैत अछि। हम पढ़ल-लिखल, लहक-चहक परिवार बुझि विआह केलौ मुदा परिवार आ समाज दिशि नजरिये ने गेल। एखन धरि परिवार साधारण किसानक रहल जबकि अहाँक परिवार तीनि पुस्तसँ नोकरी करैत आइल अछि। नोकरिया परिवारक आ किसान परिवार चलैक ढ़ंग अलग-अलग होइत। दू तरहक चालि-ढालि, दू तरहक जीवैक ढंग दुनूक बीच होइछै। तेँ आब वुझै छी जे मायक विचार नीक छलनि। एत्ते सुनिते गहूमन साप जेँका रुमा फूफकार कटैत ओछाइनसँ उठि ठाढ़ भ’ गेली। ठाढ़ भ’ कहै लगलखिन- ‘‘हमर बाप-माय, खरचा दुआरे बोइर देलक। नइ ते नीक शहरमे अफसरनी बनि ठाठसँ रहितौ। अइ गाममे देखै छी जे ने एक्को बीत पीच सड़क अछि आ ने बिजली। ने एक्कोटा कोठा अछि आ ने कोनो सवारी। दम घोटि हम कहुना-कहुना जीवै छी। आ उल्टे ठका गेलौ अहाँ। बाह-बाह रे दुनिया।’’ केबाड़ लग ठाढ़ सुमित्रा, बचेलालक मुँहसे अपन गलती सुनि, मने-मन सोचै लगली, जे आब बचेलालकेँ होश जागल। होश जगैये मे मनुक्खकेँ देरी होइत अछि, मुदा जगला पर ते ओ अपन रास्ता बनवैत आगू बढ़ै लगैत अछि। जहिना सलाईक काठीसँ छोट-छीन आगिक लौ निकलैत अछि मुदा अनुकूल स्थिति पाबि ओ कत्ते विराट रुपमे बदलि जाइत, जे एक घरक कोन बात जे गामक-गाम के क्षण-पलकमे स्वाहा क’ दैत। ई बात मनमे अबिते सुमित्रा ओसारसँ निच्चा उतड़ि अंगना बहारै लगली। फूफकार भरल रुमाक बात सुनि बचेलाल बाँहि पकड़ि बुझबैत कहै लगल- ‘‘बिगड़ू नहि! बुझू। अखन धरिक जिनगीक जे नीक-अधला भेल ओकरा बिसरि, आबो होशसँ चलू।’’ पतिक बात सुनि रुमा धड़फड़ाकेँ कहलकनि- ‘‘हँ, आब पोथी-पतरा उलटा क’ जोतखी बनू। दिन गुनू। तकदीर देखू।’’ ‘‘हँ, जिनगीक लेल ज्योतिक (ज्ञानक) जरुरत सबकेँ होइत। जाधरि मनुक्खमे ज्योति नहि आओत ताधरि अनभुआर बटोही जेँका कतय बौआएत तकर ठीक नहि। जाउ, घर-अंगनाक काज सम्हारु। हमरो बजार जाइक अछि। अछेलाल काका सेहो तैयार भेल हेता।’’ एत्ते कहि बचेलाल घर स’ निकलि हाँइ-हाँइ अपन क्रिया-कर्ममे जुटि गेल। कने कालक उपरान्त जुगायक संगे अछेलाल पहुँच गेल। सुमित्रा आंगन बहारि डेढ़िया बहारति रहथि कि दुनू गोटेकेँ देखलनि। मुस्कुराइत सुमित्रा अछेलालकेँ कहलखिन- ‘‘बड़ बनल-ठनल भोरे-भोर देखै छी। की रातिमे नीन नहि भेल?’’ मने-मन अछेलाल सोचै लागल जे भौजी कोना बुझि गेलखिन? मुस्कुराइत बचेलाल कहलकनि- ‘‘बारह बजे रातियेमे निन्न टुटि गेल भौजी। मन पड़ि गेल जे बजार जाइ ले बचेलाल कहने रहथि। तखनसँ निन्नो ने भेल। जहाँ कने निन्न अबै की चहा क’ उठी जे भोर भ’ गेलै। कौआ डकिते पर-पाखानासँ आबि तमाकुल चुनबैत रही कि जुगाय आबि गेल। काल्हिये जुगायकेँ कहि देने रहियै जे तोँहू बजार चलिहह। रस्तेमे निचेन से गप्पो करब आ बाजारक काजो करब। दुनू गोरे तमाकुल खा विदा भेलौ।’’ दुनू गोटेकेँ दरवज्जा पर बैसाय सुमित्रा चाहक जोगार करै लगली। जाबे बचेलाल धोती-कुरता पहिर तैयार भेल, ताबे चाहो बनि गेल। सभ क्यो चाह पीलनि। तीनू गोटे चाह पीबि, बाजार विदा भेल। गामक सीमा टपला बाद बचेलालकेँ अछेलाल कहलक- ‘‘बौआ, हम ते मुरुख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी तेँ अहाँ जेँका कन्ना बुझबै। मुदा भौजीक गप्प सुनलासँ मने बदलि गेल। अखनो हुनका दखै छियनि जे भोरे सुति उठि अपन काजमे लगि जाय छथि। सब काज सम्हारि समय पर नहा-खा क’ आराम करै छथि। ने कोनो तरहक हरहर-खटखट आ ने कखनो मनमे क्रोध आ कि चिन्ता रहै छनि। जखन देखै छियनि तखन ठोर पर हँसिये रहै छनि। ने ककरोसँ मुहा-ठुठीसँ होइ छनि आ ने ककरो अधला गप कहै छथिन। गाम मे देखै छी जे हुनकर बतारी बुढ़िया सभ भोरेसँ गारि-गरौबलि, उकटा-उकटी शुरु क’ दैत अछि। गारि सुनैत-सुनैत जखन मन अकछा जाइ अए तखन भौजी लग आबि अपन दुख-धंधाक गप-सप करै लगै छी।’’ अछेलालक बात सुनि बचेलाल पूछलक- ‘‘ऐना किऐक होइछै?’’ मनुख त’ कुत्ता-बिलाई नइ छी जे एक-दोसरकेँ देखिते आखि गुड़ारि पटका-पटकी करै लगै अए।’’ मुँह सकुचबैत अछेलाल बाजल- ‘‘बौआ, देखै छी जे धिया-पूता सब खाइ ले कनै अए मुदा मौगी आ मरदाबा सब किअए झगड़ा करै अए। से नइ बुझै छी। जँ ककरोसँ पूछबै ते दोसर कहत जे फल्लाँ-फल्लाँकेँ चढ़बै छै। तेँ ककरो पूछबो ने करै छियै। गामोमे, तेनाहे सन लोक सबसँ बज्जो-भुक्की अछि। सदिखन अपन दुख-धंधामे लगल रहै छी।’’ अछेलालक बात सुनि बचेलाल जुगायकेँ कहलक- ‘‘भाय, अपनो दुनू परानी आ बेटो-बेटीक नाम से बैंकमे रुपैआ जमा अछि। ओहीमे से उठाके अहूँक बेटीक वियाह निमाहि देव। आ जँ आगुओ कोनो खगता हैत त’ ओहो सम्हारि देव। तेँ मनसँ चिन्ता हटा लिअ। एकठाम रहने एहिना-सबहक काज सभकेँ होइछै।’’ बचेलालक बात सुनिते जुगाायक मुहसँ हँसी निकलल। बिलाइल आशा मनमे पहुँचल। जहिना कतौ जाइमे रास्ता बदलैत तहिना जुगायक जिनगीक रास्ता चैबट्टी पर पहुँच, मुड़ै लगल। अपन मजबूरी देखबैत बचेलालकेँ कहलक- ‘‘भाय! पाइक दुआरे घरवालीकेँ डाक्टर लग नइ ल’ जाइ छी। बेचारी तीन सालसँ दुखकेँ अंगेजने अछि। पाइक लार-चार नै देखै अए तेँ चुपचाप देह मारने अछि। मुदा हम ते देखै छी जे दिनो-दिन खिआइले जाइ अए। जत्ते काज बेचारी पहिने करै छलि तेकर अदहो आब नै क’ होइ छै। मुदा की करब? खरचा दुआरे धिया-पूताके इस्कूलो ने जाइ दइ छियै। कहुना-कहुना दिन कटै छी। करजाक डर होइ अए। गाममे देखै छी जे तेहेन चंठ महाजन सब अछि जे एक के तीनि कहि घर-घरारी लिखैने जाइ अए। अखैन थोड़े खेत अछि तेँ दिके कि सिके गुजर क’ लइ छी। जँ ओहो चलि जाइत तखन ते अपनो आ धियो-पूतोकेँ भीख मांगै पड़तै। गामेमे देखै छी जे जनकाके पहिने जोड़ा बड़द छलै। करजामे फँसि गेल। सब सम्पत्ति बोहा गेलै। एहिना मुनेसरा करजे दुआरे गामसँ भागि नेपालमे बसि गेल। मुदा हमरा कुल-खनदानक मोह लगै अए। कोना बाप-दादाक धरारी पर, अनका हर जोतैत देखवै। अखैन तँ इहो आशा अछि जे मरबो करब ते अपन बाप-दादाक लगौलहा कलम-गाछीमे जराओल जायब। मुइलहा सब पुरखाक संग एक ठाम रहब। जिनगी ने थोड़ दिनक होइत मुदा मृत्यु तँ अधिक दिनक होइत अछि।’’ जुगायक बात सुनि बचेलालक मनमे आशा-निराशाक, सुख-दुखक हिलकोर उठै लगलै। जहिना शिकारीक तीर लगलासँ कोनो चिड़ै गाछ परसँ छटपटाके निच्चा गिरैत तहिना बचेलालक विचार कल्पना लोकसँ यथार्थ लोकमे गिरल। यथार्थलोकमे गिरिते बचेलालक हृदय, मोम जेँका, पघिलै लगल छल। दुनू आखि उठा जुगायकेँ देखि कहलक- ‘‘भाय! बजार लग आबि गेलौ? आब ओ सब बात छोड़ू। बजारमे जे काज अछि से सब मन पाड़ि लिअ। नइ ते काज छूटि जायत। परिवारक गप करै ले त’ दुआर-दरवज्जा अछिये।’’ अछेलाल बाजल- ‘‘बौआ! इस्कूल जाइ-अबै ले पहिने साइकिल कीनि लेब। तखन खेती-बाड़ी ले कोदारि, खुरपी, हँसुआ, कुड़हरि, टेंगारी, पगहरिया कीनब। हमरा नजरिमे एतबे अबै अए।’’ अछेलालके चुप होइते धड़फड़ाकेँ जुगाय बाजल- ‘‘भाय, अपना टोलमे ने एक्कोटा लाइट अछि आ ने दड़ी। जखन कोनो नमहर काज बजरै अए तखन अंगने-अंगनेसँ बिछान, लालटेम आ बरतन मांगि-मांगि काज चलै अए। तेँ ओहो सब कीनब जरुरी अछि।’’ जुगायक बात सुनि मूड़ि डोलवैत बचेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय! अहाँ बड़ सुन्नर काज मन पाड़ि देलौ। मनमे अपनो छल। मुदा सोचै छलौ जे सैाँसे टोल मिलाकेँ कीनब, नीक हैत। मगर सब एक्के रंग त’ नइ अछि। क्यो हुबगर छी ते क्यो खगल। ई सोचि चुप्पे रहि जाइ छलौ।’’ बचेलालक बात सुनि मुस्की दैत अछेलाल कहलक- ‘‘बौआ! सझिया चीज दू तरहक होइछै। एक तरहक जे अहाँ कहलियै। आ दोसर तरहक होइछै जे असकरे कीनि समाजमे द’ देब। जेकरा लोक धरम कहैछै।’’ धरमक नाम सुनितहि उत्साहित भ’ बचेलाल बाजल- ‘‘ओना हम रुपैआ जुगाय ले अनने छी, मुदा वियाहमे अखन देरिओ अछि आ हमरो रुपैआ बैंकमे अछिये। तेँ ई काज पाछुऐ करब। अखन जहि समानक चर्चा केलौ, से सब कीनि लिअ।’’ बचेलालक बात सुनि अछेलालोक आ जुगाइयोक मनमे खुशी भेल। बाजार प्रवेश करिते तीनू गोटे साइकिल दोकान पर जा साइकिल कीनलक। साइकिले दोकान पर दू-टा लाइटो कीनलक। साइकिलकेँ गुड़केने बचेलाल लोहा-लक्कड़ दोकान पर गेल। दोकान पर जा सभ लोहाक सामान कीनि, बोरामे राखि सुतरीसँ बान्हि साइकिलक कैरियर पर लादि, तीनू गोटे बरतनक दोकान पर गेल। बरतन दोकान मे दूटा पितरिया बरतन कीनि, दड़ी दोकान पर गेल। बीस हाथ नमती दड़ी कीनि, दोकानेमे राखि, ओही नापसँ कपड़ा दोकानमे जाजीम सेहो कीनलक। सभ सामान कीनि तीनू गोटे हलवाइक दोकान पर जा जलखै केलक। सभ सामान घर पर कोना जायत? तीनू गोटे गर अँटबै लगल। अछेलाकेँ गर अँटि गेल। बाजल- ‘‘एकटा बरतन हम कान्ह पर ल’ लेब आ एकटा जुगाय। एक-एकटा लाइट दुनू गोरे हाथमे लटका लेब। बाकी सब चीज साइकिल पर ल’ लेब। तीनू गोरे गप-सप करैत चलि जायब।’’ जिनगीक नव रास्ता भेटिने तीनू बचेलाल, अछेलाल आ जुगायक मन उधिआइत। बचेलालकेँ होय जे आइ रास्ता पर एलौ। अछेलालकेँ मनमे होय जे जाधरि मनुक्खकेँ काज करैक साधन नहि हेतइ ताधरि लूरि-वुद्धि रहनौ बेकार रहत। मुदा हाथमे औजार ऐने काजोक गति बढ़ैत आ अपने संतोष होइत। जबकि जुगायकेँ होय जे जइ दुआरे अपनो आ परिवारो अटकि गेल छल, ओ आगू ससरत। आइ धरिक दुख काल्हिसँ मेटा जायत। जहिना अन्हार राति समाप्त होइते दिनमे सभ कुछ देख पड़ैत तहिना तीनू गोटेकेँ होइत। घर पर अबैत-अबैत मुन्हारि साँझ भ’ गेल। घर पर आबिते अछेलाल सुमित्राके सोर पाड़ि कहलक- ‘‘भौजी, लालटेन नेने आउ।’’ असकरक दुआरे सुमित्रा आंगन आ दरवज्जाक बीच ओलती लग विछान विछा, लालटेनके पछबरिया घरक कोनचरमे टाँगि, बैसलि छली। कखनो-कखनो उठि क’ सुमित्रा रस्ता पर आबि-आबि देखवो करैत। अछेलालक आबाज सुनि सुमित्रा लालटेन नेने दुआर पर ऐली। नव-नव सामान देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे, जे काज आइ भेल ओ बहुत पहिनहि हेबाक चाहै छलै। मुदा देरियो भेने काज तँ भेलि। लालटेन राखि सुमित्रा, चोट्टे घुरिके आंगन जा, पुतोहूकेँ कहलनि- ‘‘कनियाँ बौआ आइल। झब दे चाह बनाउ।’’ कहि दरवज्जा पर ऐली। अछेलाल आ जुगाय ओसार पर बरतन आ लाइट रखि, साइकिल परक सामान उताड़ै लगल। बचेलाल कुरता-गंजी निकालि, चैकी पर रखलक। चप्पल क’ चैकी तर मे रखि धोतीके खोंसि फाँड़ बान्हि, गर लगा-लगा सभ चीज रखै लगल। साइकिलके ओसारक दावामे सेहो लगौलक। ताबे रुमा चाह बनौने ऐली। रुमा हाथसे चाह ल’ सुमित्रा तीनू गोटेकेँ हाथमे द’ पूछलखिन- ‘‘बौआ, पाइनियो पीबि।’’ अछेलाल- ‘‘नइ भौजी। अखैन ते चाहो ने पीवितौ। गरमा गेल छी। जावे दू डोल पानि देह पर नइ ढारब तावे ठंढ़ाइब नहि।’’ कातमे ठाढ़ भ’ रुमा सभ सामान देखैत। सामानो देखैत आ तरे-तर जरबो करैत। मने-मन विचारैत जे साइकिल लेलनिसे बड़वढ़िया, मुदा आन चीज किऐक लेलनि? अनेरे पायके दुइर किअउ केलनि? खुलिके त’ रुमा किछु नहि बजैत मुदा तरे-तर गुम्हरैत। तामसे आंगन जा चुल्हि लग बैसि अन्ट-सन्ट बचेलालकेँ कहथिन। अछेलाल आ जुगाय, चाह पीबि दरबज्जाक कोठरीमे सभ वस्तु सरिया क’ रखि देलक। अछेलाल जुगायके कहलक- ‘‘जुगाय जखन चाह पीबे केलौ ते तमाकुलो खाइये लाय।’’ जुगाय तमाकुल चुनबै लगल। अछेलाल सुमित्राके कहलक- ‘‘भौजी, जे मनमे छलै से आइ पूरा भ’ गेल। भिनसरमे दड़ियो उधारिके देखा देब। बड़ सुन्दर अछि। यैह दड़ी ते कत्ते दिन चलत।’’ सुमित्रा मने-मन खुशी होइत। ई दुनू गोटे तमाकुल खा, चलि गेल। बचेलाल धोती बदलि माय लग बैसि, सामानोक चर्चा करैत आ दामो कहैत। एक्के परिवारमे हर्ष-बिषाद लड़ै लागल...! बचेलाल मने-मन सोचैत जे कोनो नीक काज परिबारमे भेने, परिवारक सभ समांगके एक्के रंग खुशी किऐक ने होइछै? हँ, ई बात जरुर जे खास व्यक्तिकेँ खास वस्तु भेने खुशी जरुर होइछै, किन्तु दोसरके ओहिसँ जलन त’ नहि हेबाक चाही। मुदा औझुका जे वस्तु अछि ओ त’ व्यक्तिगत नहि छी? जखन जकरा जहि वस्तुक जरुरत हेतै से उपयोग करत। तइमे दुख कत्तसँ चलि आयल! रुमाक आवाज दुनू माय-पुत सुनैत रहथि। मुस्की दैत सुमित्रा बचेलालके कहलक- ‘‘बौआ! जहिना ककरो बिढ़नी काटि लइ छै आ दरदे छड़पटाइये तहिना कनि॰ाोंके भ’ रहलनि हेन। कमाइल पाइ तोहर खरच भेलह, हुनकर ते किछु नहि भेलनि? तोरा खुशी छह आ हुनका किऐक एत्ते दुख भ’ रहलनि?’’ सुमित्राक बात सुनि बचेलाल बाजल- ‘‘माय! हमहू तँ यैह सोचि रहल छी जे हुनका किऐक एत्ते दुख भ’ रहलनि अछि?’’ बचेलालके वुझबैत सुमित्रा कहलखिन- ‘‘बौआ, यैह छियै स्वभाव। मनुक्खक रोगक जड़ि। जेहन जेकर स्वभाव रहैछै, ओ ओहने काजके नीक वुझैत अछि, भलेही ओ अधले किअए ने होय। अखन तोहूँ थाकल छह। जँ नहाइकेँ मन होइ छह ते नहा लाए। अगर नहेवह नहि ते देहे-हाथ धोय लाय। मन चैन भ’ जेतह।’’ ‘‘नहाइक मन त’ अपनो होइ अए। भरि दिन ठाड़हे छलौ। मुदा सब काज भ’ गेल।’’-बचेलाल कहलक। सुमित्रा आंगनसँ बाल्टीन आ लोटा आनि बचेलालकेँ देलक। बचेलाल नहाइ ले कल पर गेल, सुमित्रा लालटेनक इजोतमे खुरपी, हँसुआ देखै लगली। नहा क’ बचेलाल सोझे अंगना जा खाइ ले बैसल। बचेलालकेँ ओसार पर देखि रुमा जोर-जोरसँ अन्ट-सन्ट बजै लगलि। गौरसँ रुमाक बात सुनि बचेलाल कहलक- ‘‘ऐना तामस किऐक उठल अछि? कोन अधला चीज देखलिऐ जे एत्ते बिगड़ल छी?’’ बचेलालक बात सुनि रुमा गरजिकेँ कहै लगलनि- ‘‘जखन लोकके मैत खराब भ’ जाइछै, तखन एहिना करै अए।’’ मने-मन बचेलाल सोचै लागल जे जत्ते अपन पुरुषत्वकेँ दाबि रखने छी तत्ते ओ कंठ पर चढ़ल जाइ अए। तेँ एक नै एक दिन मुह खोलै पड़त। असथिर मुदा सक्कत शब्दमे बचेलाल रुमाके कहलक- ‘‘बहुत सुनलौ। मुह बन्न रखू। अपन सीमा टपब ते बुझि लिअ हम पुरुख छी। जत्ते अहाँकेँ सिनेह केलौ तत्ते अहाँ हमरा कमजोर बुझैत गेलौं। आबो चेत जाउ!’’ बचेलालक बात सुनि रुमा चुप भ’ गेलि। किन्तु मुँहेटा...! ...... जिनगीक जीत:ः 9 अदहा अखाढ़ बीति गेल। जेठुआ बरखाक बाद बीचमे दूटा अछार भेल छल। सबहक बीआ रोपाउ भ’ गेलै। अड़िया-लंघन बरखा भेल। पानि छुटिते गिरहस्त सभ कोदारि ल’ ल’ खेत दिशि विदा भेल। क्यो अपन खेतक आड़ि बन्हैत ते क्यो अपन खेतक पानि बहाबैत। क्यो आड़ि-कोन बनबैत ते क्यो हाँइ-हाँइ धानक बीआ उखाड़ैत। एक खेप सजन हरखाड़ा आ चैकी खेतमे राखि आयल आ दोहराके बड़द आ कोदारि लइ ले गाम पर आयल। सजन केँ घरवाली कहलक- ‘‘रोटियो पकिये गेल तेँ जलखै कइये लिअ। हमहू पानि पीबि बीआ उखाड़ै चलि जायब।’’ सजन हाथ-पाएर धोय जलखैयो करैत आ घरोवालीकेँ कहैत- ‘‘तीनि कठबा कोली रोपि लेब। हम जाइ छी, खेतो जोइत लेब आ कोनो-कान सरिया देबै। अहूँ जा क’ चारि जोड़ा बीआ खीचि लेब आ आबिके भानसो क’ लेब। अखन बीआ उपरेमे हैततेँ उखाड़ैमे देरियो ने लागत। ओना खेत जोतले अछि तेँ हमरो अबेर नहिये हैत। अखन जे कदबा आ बीआ उखरि जायत ते बेेरु पहर दुनू गोटे साँझ धरि रोपिओ लेब।’’ जलखै क’ सजन बड़द जोड़ि, खेत विदा भेल। दक्षिनबरिया बाध ऊँचतेँ गामक अधिक गिरहस्त ओही बाधमे। देवन आ बुधनी सेहो गेल। हरक जोगार नइ रहने देवन कोदारियेसँ खेत तैयार करैक विचार केने। देवन खेत तीन कोला आगू सजनक खेतसँ। तेँ सजनेक आड़ि पर देने तीनू गोटे देवन जाइत। देवनके कान्ह पर कोदारि देखि सजन पूछलक- ‘‘देवन, तोँहू अही खेतके रोपबह?’’ ‘‘हाँ, भैया। पाँच कट्ठाक कोला अछि। दू-तीनि दिनमे रोपि लेब।’’-देवन बाजल। सजन- ‘‘देवन! जा दुनू गोरे बीये उखाड़िहह। हमरो तीनिये कट्ठा खेत अछि। लगले भ’ जायत। तोरो खेत तँ तमले छह। एकटा चास क’ देबै तेही मे कदबा भ’ जेतह। पहिल पानि छियै, एक रत्ती अबेरे ने हैत मुदा तोरा त’ काज चलि जेतह। कदबा भेलि रहतह, निचेनसँ रोपैन करैत रहिहह। जखने खेतमे चैकी पड़ि जायछै कि पानि सुखैक डर कम भ’ जाइछै।’’ सजनक बात सुनि बुधनी मने-मन सोचै लागलि। जे नीक सगुनसँ निकललहुँ। अदहा काज ओहिना भ’ गेल। एक झोक जे दुनू गोरे बीआ उखाड़ब तेही मे तँ अदहा खेतक बीआ उखाड़ि लेब। खेतो जोताइये जायत। बीओ हल्लुके अछि, तखन ते रोपिनाइयेटा ने रहत। बैसि-उठिके दू दिनमे रोपि लेब। ‘रोपिलेब’ बुधनीक मनमे अबिते, खुशीसँ मन नाचि उठलै! सोचै लागलि जे पाँच कट्ठा खेत अषाढ़ भेने कहुना-कहुना तीन मासक बुतातक ओरियान त’ भइये जायत। तीनि मासक बुतात ले मिहनत कत्ते भेल। एहिना पनरहो कट्ठा अबादैमे आठ-दस दिन लागल। दुनू गोटे विदा भेल। सजनक खेतक आड़ि टपला बाद देवन बुधनीके कहलक- ‘‘दीदी, भरिगरहा काज सम्हरि गेल।’’ खेतमे पहुँचते बुधनी साड़ीके समेटि, खोंसि लेलक आ बीआ उखाड़ैमे, भीड़ि गेल। देवन कोदारिसँ खेतक कोन-कान तामै लगल। जाबे देवन तीनटा कोन, एकटा कोन पर बीये रहै, बनौलक ताबे बुधनी एक जोड़ा (दश आँटी) बीआ उखाड़ि लेलक। आड़ि बना देवन सेहो बीआ उखाड़ै ललग। हल्लुक बीआ देखि बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, उखाड़लो बीआ आठ दिन तक रहै छै। अगर सबटा बीआ उखड़ि जायत ते रोपिनाइयेटा ने रहत। एकटा काज ते सम्पन्न भ’ गेल रहत। जँ सब बीआ उखाड़ि लेब ते खेतो खाली भ’ जैत। जहिसँ जोताइयो जैत। नइ ते पाछू तामि-तामि रोपै पड़त।’’ बुधनीक बात सुनि देवन कहलक- ‘‘हँ, ठीके कहै छी दीदी। जाबे सजन भैया अपन खेत जोतत ताबे अपनो दुनू गोरे सबटा बीआ उखाड़ि लेब।’’ दुनू गोटे बीयो उखाड़ै आ गप्पो करै। बेसी काज देखि सजन बड़द रबाड़िकेँ हँकै लगल। सजन हरो जोते आ मने-मन सोचबो करै जे मनुक्खेक काज मनुखकेँ होइत अछि। आइ जकरा हम नीक करबै, एक नइ एक दिन ओहो जरुर नीक करत! तहूँमे जे गरीब अछि ओ जँ नहियो बदला सठायत तइयो गरीबक उपकारकेँ लोक धरम कहैछै। काजो भरिगर नहिये अछि। पहिल दिन कदबा करै ले एलौ हेन, बड़दो सब कोनो थाकल थोड़े अछि। जहिना खेत सहगर अछि तहिना बड़दो जिड़ाले अछि। एकटा चास मेंहीकेँ क’ लेब आ समारक बेड़िमे लाभरो-जीभरकेँ क’ जोति लेब तइयो कदबा बनबे करत। तोहूँमे जरल जमीनमे बरखा भेल। खेत ओहिना माँड़-माँड़ भेल अछि। थोड़े काल बीआ उखाड़ि देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, ताबे अहाँ बीआ उखाड़ू, हम सजन भैयाकेँ देखने अबै छी।’’ कहि देवन सजन लग गेल। देवनकेँ देखिते सजन कहलक- ‘‘बौआ, कते बीआ उखाड़ै ले रहलह हेन? हमरा लगिचा गेल।’’ चोट्टे देवन घुरिकेँ खेत आबि बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ू सजना भैयाके कदवा लगिचा गेलै।’’ दुनू गोटे हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ै ललग। जहाँ तीनि गफ्फी बीआ भ’ जाय कि आँटी बान्हि लिअए। आँटी बन्हैत बुधनी कहलक- ‘‘बौआ, जहिना सजन भैया कदबा क’ देथुन तहिना हुनको कहिहनु जे आइ-काल्हि त’ अपने रोपब। जखन अपन खेत रोपा जैत तखन अहूँ क’ सम्हारि देब। किएक तँ हुनका बेसी खेत छनि। जँ अपनो दुनू गोटे हुनका रोपैन सम्हारि देवनि ते हुनको रोपनि अगते भ’ जेतनि।’’ अपन कदबा क’ सजन चैकी लधले बड़द आ हर कान्ह पर नेने बुधनीक खेत पहँुचल। खेत पहुँच बरहा लगले चैकी खोलि, घिसिओने दोसर खेतमे रखलक। हर लाधि सजन देवन लग आबि कहलक- ‘‘बौआ, बीआ तँ भइये गेलह। सब आँटीकेँ आड़ि टपा क’ राखि दहक। हमरा जोतै मे देरी नइ हैत।’’ सजन बैसि तमाकुल चुनबै लगल। बीआ टपा बुधनी सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, हमरा त’ पनरहे कट्ठा खेत अछि। जँ दू दिन सम्हारि दथि ते अगते काज हमरो ससरि जैत। हिनका ते बेसी खेत छनि, हमहू दुनू गोरे रोपि देवनि।’’ बुधनीक बात सुनि सजनक मनमे उत्साह बढ़लै! ठोरमे तमाकुल दैत सजन बाजल- ‘‘कनियाँ, बेसिओ खेत रहने रोपैनमे जन नइ लगबै छी, किअए नइ लगबै छी से बुझै छथिन। तेहेन गामक जन सब अछि जे सोलहो आना धियान ओकरा बोइने पर रहैछै। कहै ले आँटी गनिके उखाड़ै अए मुदा रोपै काल मूठक-मूठ बीआ गाड़ि देत। गिरहत हुअए कि जन, ओकरा मनमे ई हेवाक चाहियै जे खेती नीक जेँका होय। जखन खेती नीक जेँका हैत तखने ने उपजो नीक हैत। उपजा नीक हैैत तखने ने सबहक हालत सुधरत। से ककरो नेत म’ छइहे नहि।’’ बुधनी बाजलि- ‘‘भैया, सब रंगक लोक सब गाममे रहैछै। ने सब नीके होइत आ ने सब अधले। तखन ते लोकके अपने नीक-अधला देखि चलै पड़तै। क्यो किछु करह, मुदा सबकेँ अपने नीक बनैक कोशिश करक चाही ने?’’ तमाकुल खा सजन हर जोतै उठल हरक लागनि पकड़ि जहाँ एक मोड़ घुमल कि पूबरिया खेतमे (चारि कोला पूव) के हरबाह पटाक-पटाक मारैत सुनलक। पहिने ते हरवाहके कोनो शंके ने रहै जे हमरे मारै ले फुसियाहा अबै अए। मुदा जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे मारि लागि गेलै। किसुनमा बुफगर। हर ठाढ़ क’ फुसियाहाके पकड़ि खेतेमे पटकलक। पटकिकेँ छाती पर बैसि किसुनमा मुहे-मँुह खूब चोटिएलक। सैाँसे बाध हल्ला भ’ गेलै। बीओ उखारनिहार आ हरो जोतिनिहार सब जम्मा भ’ गेल। दुनू गोटेक झगड़ा छोड़ा पूछै लगल। ताबे नवकी बीआ उखाड़व छोड़ि घर दिशि लफड़ल विदा भेलि। नवकी टोल पर जा पहिने फुसियाहा घरवालीके कहलक- ‘‘कनियाँ, तू अंगनामे छह आ घरवालाकेँ किसुनमा खुन क’ देलकह?’’ कहि नवकी लफड़ल किसुनमा अंगना गेल। किसुनमो अंगना जा किसुनमा भनसियाके कहलक- ‘‘कनियाँ! घरवला खून भ’ गेलह!’’ कना खून भेल?’’-किसुनमाक घरवाली बाजलि। ऐँह की कहवह, फुसियाहा लाठी नेने गेल आ हाँइ-हाँइ देह पर चलबै लगल!’’ फुसियाहाक घरवाली किसुनमाकेँ अंगनेसँ गरिअबैत विदा भेलि। तहिना किसुनमोक घरवाली टोलसँ निकलि कनिये आगू बढ़ल कि दुनूक रास्ता एकठाम मिलि, एक्के रास्ता बाधक बनि जाइत। जइठाम दुनू रास्ता मिलैत तहि ठाम दुनूकेँ भेटि भ’ गेलै। एक दोसरके देखिते चिकैड़-चिकैड़ गारि पढ़ैत। एक ठाम होइते दुनूकेँ पकड़ा-पकड़ी भ’ गेलि। दुनू-दुनूककेँ झोंटा पकड़ने। घिचम-तीरा होइत-होइत दुनू गिरि पड़लि। मुुदा झोंटा दुनूक-दुनू पकड़िनहि। तरमे किसुनमाक भनसिया आ उपरमे फुसियाहाक। तरेसँ किसुनमाक भनसिया नाकेमे दाँत काटि लेलक। दाँत कटिते छड़-छड़ खुन फुसियाहा भनसियाकेँ बहै लगल। खुन गिरैत देखि फुसियोहोक भनसिया गालेमे दाँत काटि लेलक। ओकरो खून बहै लागलै। मुदा क्यो-ककरो छोड़ै ले तैयारे नहि। अपना आंगन आबि नवकी भानस करै लागलि। नवकीकेँ, गामक लोक एहि दुआरे नवकी कहै जे पैछले साल वसुआसँ चुमौन क’ एहि गाम आइलि। नवकीक वसुआ चारिम पति। पहिल विआह नवकीकेँ रतुआर भेल। तीनिटा धियो-पुतो भेलि। एक दिन पतिसँ झगड़ा भेलै पड़ा क’ नैहर चलि आइल। धियो-पूतोकेँ छोड़ि देलक। साल भरिक बाद दोसर वियाह विसुनपुर केलक। नवकियोकेँ दोसर वियाह रहै आ घरोबला केँ। विसुनपुरोमे दूटा बच्चा भेलै। ओकरो छोड़िकेँ पड़ा गेलि। तखन तेसर केलक। तेसरोमे झगड़ा भेलै छोड़ि क’ पड़ा गेलि। चारिम सासुरमे नवकी। चारिम वियाह (चुमौन) चालिस-पेइतालिस बर्खक उमेरमे भेलै। तेँ गामक लोक सब नवकी कहैत। फुसियाहा आ किसुनमा दुनू भजैत। दुनूकेँ एक-एक्केटा बड़द। खोतो कम्मे। अखाढ़क बरसा तेँ सबहक खेतो खसले आ बीओ रोपाउ। भोरहरबामे पानि भेल तेँ खेत रोपैक जोगार क्यो ने केने। सभ दिन अपन-अपन भाँजमे खेत जोतैत। पानि देखि फुसियाहा भोरे बड़दकेँ घरसँ निकालि, कुट्टी लगा, बीआ उखड़ै दुनू परानी खेत गेल। किसुनमोक खेत पनिआइल। हर खोलै बेरमे किसुनमा बड़द अनै फुसियाहा ऐठाम गेल। फुसियाहा घर पर नहि। तेँ दुनू गोटेमे भेटि नहि भेलै। भजैती बुझि किसुनमा बड़द लेने चल आयल। घर पर आबि अपना बड़दमे जोड़ि कदवा करै खेत गेल। थोड़े बीया उखाड़ि फुसियाहा हर लइ ले घर पर आयल। ते बड़दे नहि! हाथमे हरवाही पेना रहबे करै। किसुनमा ऐठाम आयल। ने बड़द ने किसुनमा घर पर। घर पर भाँज लगा फुसियाहा किसुनमाक खेत गेल। खेतमे किसुनमाके हर जोतैत देखलक। बिना किछु कहनहि-सुननहि किसुनमा पर पेना बरिसवै लगल। जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे फुसियाहा सात-आठ पेना लगा देलक। थाल-पानि मे फुसियाहाकेँ पटकि किसुनमा खुब चोटियेलक। आन-आन हरवाह सभ दुनूकेँ छोड़ौलक। झगड़ा छुटलाक बादो दुनू-दुनूकेँ अनधुन गरिअबैत। दुनूकेँ सभ वुझा-सुझा, हर खोलि विदा केलक। अपन बड़द ल’ क’ फुसियहो विदा भेल। किसुनमा बड़दकेँ चरै ले छोड़ि देलक। घर पर अबिते फुसियाहा घरवालीके देखलक। सैाँसे देह खून लागल। मुदा नाकक खुन बन्न भ’ गेल। घरवाली फुसियाहाकेँ सैाँसे, देह थाल लगल देखै। दुनू अंगनाक ओसार पर बैसि एक-दोसरकेँ देखैत। मने-मन फुसियाहा शपत खेलक जे किसुनमासँ बड़दक भजैती नइ राखब। दुनूक भजैती छुटि गेल। गामक सभ अपन-अपन खेती करै लगल। ने एक्को धुर फुसियाहा धान रोपलक आ ने किसुनमा। किऐक तँ एकटा बड़दसँ हर कोना जोतैत?’’ साँझू पहर सजन वुधनीक ऐठाम आयल। भरि दिनक मेहनतसँ वुधिनियो आ देवनो थाकल। अंगनामे बिछान विछा वुधनी पड़ल (सुतल) आ देवन पाएरसँ जँतैत। सजनकेँ देखिते देवन कहलक- ‘‘आउ-आउ, भैया!’’ देवनक बात सुनिते वुधनी फुड़फुड़ा क’ उठि, देहक साड़ी सरिया, सजनके कहलक- ‘‘आबथु भैया। भरि दिन तते भीड़ भेलि जे देह दुखाइ अए तेँ देवनके जतै ले कहलियै।’’ सजनो बाजल- ‘‘आइ रोपनिक पहिल दिन छल, तेँ देह दुखाइ अए। जखन दू-चारि दिन एक लखाइत रोपैन करबै तखन अभियास भ’ जैत। तब देहमे दरद नै हैत।’’ बुधनी- ‘‘भैया! हमरा त’ कम्मे खेत अछि, हिनका ते बेसी छनि। आइ जे कदबा क’ देलनि, काल्हि तक ओकरे रोपब। एहिना ज दू दिन आरो सम्हारि देता तेहीमे हमर सब खेती भ’ जायत। अपन खेत जखन भ’ जायत ते हिनको जाबे हेतनि ताबे हमहू दुनू गोरे रोपि देवनि। अगते खेती दुनू गोड़ेक भ’ जायत।’’ सजन- ‘‘देखियौ कनियाँ, अगर लोक मिलानसँ काज करत ते सबहक काज असान भ’ जेतै। मुदा से नइ ने होइछै। आइये फुसियाहा आ किसुनमाकेँ देखलियै।’’ बिचहिमे देवन सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, ओइ दिन जे खिस्सा कहैत रहियै आ कहलियै जे दोसर दिन आगू कहब से कहियौ।’’ देवनक बात सुनि सजन अखियास करै लगल। मन पड़िते हँसैत बाजल- ‘‘अच्छा सुनह। (इशारा दैत) ओ रवियाक घर छियै। तूँ अनभुआर छह तेँ चिन्हा दैत छिअह। रविया आमक गाछी लगबैक विचार केलक। गाछ त’ पहिनहु रहै मुदा गाछ सब बुढ़हा गेलै। कैकटा सुखियो गेलै आ कैकटा बेचियो लेलक। सिर्फ एक्केटा पुरना गाछ बँचलै। जे कोनो साल फड़ै आ कोनो साल नै फड़ै। ओ हमरा आबिके पूछलक जे कोन-कोन आमक गाछ रोपी? आमक गाछ रोपब सुनि हमरा खूब खुशी भेल। खुुशी अइ दुआरे भेल जे समाजमे ककरो गाछी भेलासँ गामेमे आम बेसी हैत। अपनो खैत आ दोसरो खेतै। हमरो धिया-पूता टुकला बीछत। हम कहलियै- ‘‘रवि, नीक-नीक आमक गाछ(जे मीठो होय आ नम्हरो) रोपियह।’’ ओ कहलक जे- ‘‘गाछ कत-अ स’ आनव?’’ हम कहलियै- ‘‘अगर बजारमे कीनिवह ते ठका जेबह। कहतह कलमी आमक गाछ दइ छी आ भ’ जेतह सरही। तेँ आमक दोकानमे जा चुनि-चुनिकेँ नमहरका आम कीनि लिहह। गुद्दा खाकेँ सुआद देखि लिहक। जे नीक बुझि पड़तह ओकर आँठी रोपि दिहक। पनरहे दिनमे पिपही जनमि जेतह। आमक गाछकेँ पिपही लोक एहि दुआरे कहैछै जे आँठिक तरमे जे गुद्दा जेँका रहैछै ओकरा लोक सिलौट पर रगड़ि पिपही बनवैत अछि। तेँ ओकरा पिपही कहैछै। पिपहीकेँ ताक-हेर करैत रहिहह, जे बकरी छकरी ने खा। नमहर गाछके जँ बकरी खेबो करैछै ते निच्चासँ कनोजड़ि चलैछै मुदा पिपही वाला गाछकेँ खेने सूखि जाइछै। जखन पिपही कने नमहर हेतह ते ओकरा उखाड़ि ओकर मुसरा निच्चा दबाके काटि फेर रोपि दिहक। साले भरिमे डेढ़ हाथ-दू हाथक भ’ जेतह। तखन ओकरा थल्ला काटि दिहक। तीनिये सालमे फड़ै लगतह।’’ रविया सैह केलक। ओंगरी इशारासँ सजन छठुआक घर देखवैत देवनके कहै लगल- ‘‘ओ छठुआ की केलक ते रवियाक आमक गाछ गनि लेलक। बारहटा गाछ रहैक। अपन बाड़ीमे जनमल अनेरुआ बारहटा गाछ उखाड़ि क’ रखि लेलक। रातिमे रवियाक बारहोटा गाछ, उखाड़ि अपनामे रोपि लेलक आ अपन रवियामे रोपि देलक। रविया अनाड़ी, बुझबे ने केलक। तीनि सालक उपरान्त जब आम फड़ै लगलै, तखन रविया तजबीज करै लगल जे जेहेन आमक आँठी रोपने रही तेहेन त’ एक्केटा ने अछि। ऐना किऐक भेल? छठुआ अपन आमक बड़ाई जत्ते-तत्ते करै लगल। रवियाकेँ सेहो छठुआक आम देखि मनमे एलै जे जेहने आमक आँठी रोपने रही तेहने बुझि पड़ै अए। मुदा कहबै कोना?’’ ‘‘रवियाक आंगनवाली आमक गाछ रोपैयेकालमे कबूला केने रहै जे पहिल बेरक फलसँ ब्राह्मण भोजन ब्रह्म स्थानमे करायव। जखन आम पकै लगलै, तखन सब गाछक आम मिला क’ दू चँगेड़ा सैंति क’ रखलक। एक मटकूरी दही पौरलक। एक अढ़ैया धानक चूड़ा कुटलक। बेरागन वुझि शुक्र दिनक नौत परोहित केँ द’ देलकनि। सबेरे आठ बजेमे पुरहित स्नान-पूजा क’ माथमे त्रिपुण्ड केने पहुँच गेलखिन। ब्रह्म स्थानक आगूमे सब सामान-चूड़ा, दही, चीनी, अँचार, आम, रखलक। पुरहितक नजरि आम पर पड़िते झुझुआ गेला, मुदा दही आ चूड़ा देखि सबुर भेलनि। रविया सब चीज परसलक। पुरोहित सब आमके बागि देलखिन, जे खट्टा अछि। खट्टा सुनिते दुनू परानी रविया तामसे आगि भ’ गेल। मुदा की करैत? चारि सालक मेहनत रविया, चोरकेँ उसरैग, छातीमे मुक्का मारि लेलक। फेरि रविया ओहि गाछीके उपटा दोहराकेँ रोपैक विचार केलक। हमरा आबिकँे पूछलक। हम कहलियै जे नसीवलाल कक्का ऐठाम चलि जा ओ सुतिहार छथि। ओ जना-जना कहथुन तेना-तेना करिहह।’’ ‘‘रविया नसीवलाल काका ऐठाम पहुँच, पहिने पैछला खिस्सा कहलकनि। तखन गाछी लगवैक बात पूछलकनि। नसीवलाल काका रवियाके बुझवैत पूछलखिन- ‘‘कत्ते खेतमे गाछी लगेवह?’’ रविया बाजल- ‘‘बहुत खेतबला तँ हम नहिये छी। पाँचे कट्ठा उँचगर खेत अछि। जइ मे गाछी लगौने छलौ, ओहीमे लगाएव।’’ नसीवलाल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। छअटा कलमी- एकटा बम्वई, एकटा रोहनिया एकटा जरदालू, एकटा मालदह, एकटा फैजली आ एकटा राइर-लगावह। एहि आमके रोपलासँ अदहा जेठसँ अदहा साओन धरि, बेराबेरी, चलैत रहतह। ई छबो आमक गाछ हम द’ देवह। पाइ-कौड़ी नइ लेबह। पाँचटा सरही सेहो रोपि दिहक। एकटा बेल, दूटा धात्री, एकटा गुलजामुन आ दूटा लतामक गाछ सेहो रोपिहह। सब मिलाके बढ़िया बगीचा भ’ जेतह। जँ सबटा कलमिये आम रोपवह त’ मौका-कुमौका मे जँ जारनक काज हेतह ते दिक्कत भ’ जेतह।’’ नसीवलालक बात सुनि रवियाक मन खुश भ’ गेल। नसीवलाल सेँ गाछ ल’ जा रविआ लगौलक। सभ गाछमे बेरही द’ देलक। दुनू परानी रविया गाछक ताक-हेरि करै लगल। ओइह गाछी अखन छै। दू सालसे फड़वो करैछै। सजनक बात सुनि देवन कहलक- ‘‘भैया! आरो किछु कहिऔ?’’ देवनक जिज्ञासा देखि सजनक मुँहसँ मकईक लावा जेँका हँसी निकलल। हँसीकेँ कम करैत सजन हाथक इशरासँ तेतराक घर देखवैत कहलक- ‘‘ओ तेतराक घर छियै। वेचारा बड़ मुह सच्च। मुदा काज करैमे भूते छी। जहिना करीन पटबैमे तहिना कोदरवाहि करैमे। काज करैमे तेहेन पीतमरु अछि जकर जोड़ा गाममे नइछै। घरवाली बड़ होशगर। खानदानी घरक बेटी छी। ओना देखैमे पीरसियामे अछि मुदा रिष्ट-पुष्ट देह, पाँच हाथक नमगर-छड़गर। घर-आंगन स’ ल’ क’ खेत पथारक सब काजक लूरि। घरक जुइत अपने हाथमे रखने अछि। तेतरो निधैन रहै अए। घरवाली जैह करै ले कहलक सैह केलक। वेचारी घरक लछमी छी। खूँटा पर चारिटा माल रखने अछि। मालक सेबा तेहेन करै अए जे अनका सेहन्ता लगै छैक। जखन ओकरा बथान पर जेबहक ते हेत’ जे एत्तै बैसि रही। ने एक्को चोत गोबर कखनो थैरमे देखवहक आ ने थाल-खिचार। चानी जेँका थैर चमकैत रहैछै। माल-जाल पोसि क’ वेचारी सवा बीघा खेतो कीनलक, तीनिटा घरो बनौलक आ दुनू बेटीक वियाहो केलक। बेटिओ सब तेहेन लूरिगरछै जे नीक-नाहाँति गुजर करै अए। गामक क्यो ने कहि सकैत अछि जे तेतरा हमर एको-पाइ ठकने हैत। आ ने ककरो-कहियो गारि पढ़ने हैत। मुदा भगवानो कहियो वेचाराकेँ अधला नहि केलखिन। अगर कतौ जाइत रहत आ नजरि पड़तै ते सहटि के लगमे आबि तमाकुल खुऔत। अइ तीनि कोसीमे जँ कतौ नाच हेतै आ ओकरा भाँज लगतै ते आबिकेँ कहत। खेला-पीला बाद रातिमे घरवालीकेँ कहतै जे सजना भैयाक मन खराप भ’ गेलै तेँ ओ कहलक जे एतई आवि क’ सुतिहह। तेँ ओतइ जाइछी। बेचारी घरोवाली मन खराब सुनि मानि जायछै। दुनू गोटे नाच देखै जाइछी।’’ जइठाम नाच देखै जाइ छी तइ ठाम विपटा आ नटूआकेँ एक्को-दू रुपैया देबे करत। बर्ख आठम, सजमनिया टोलक रुपलाल चैरी खेतक मोटका धानक बीआ सासुरसँ अनलक। वास्तवमे धानो नीक छलै। सैाँसे गामक गिरहस्त ओहि धानक प्रशंसा केलकै। पाँच मनक कट्ठा उपजबो केलै। ई गाम (विकासपुर) राघोबावूक जमीनदारीमे पहिने छल। राघोबावू अपन बेटीक वियाहमे खोंइछमे ई गाम द’ देलखिन। जइ दिनसँ खोंइछमे बेटीकेँ देलखिन तइ दिनसे उपजाक ससिये चलि गेलै। केहनो सुन्दर खेत आ केहनो सुन्दर धान होइते कट्ठा मनसँ बेसी हेबे ने करै। नइ ते आध मन, छअ पसेरी, पाँच पसेरी कट्ठा होय। मुदा जखन रुपलाल पाँच मनक कट्ठा उपजौलक तखन गिरहतक मनमे सुनगुनी एलै। तहियासँ गिरहत खेतमे खादो देमए लगल। आ जोतो-कोर बेसी करै लगल। बेसी उपजनमा धानक बीओ आन-आन गामसे अनै लगल। मुदा गामक बनावटो अजीव अछि। जत्ते धनहर खेत अछि ओ तीनि किसमक अछि। अधहा खेत गहीर अछि जकरा चैरी कहै छियै। छअ आना खेत उपरारि अछि आ दू आना निचरस। जइसँ की होइछै जे अधिक बरखा भेल त’ उपरका खेत उपजि जाइत आ निचला दहा जाइत। तहिना जँ कम बरखा भेल त’ निचला खेत उपैज जाइत आ उपरका मरहन्ना भ’ जाइत। मोटामोटी अदहा उपजा गिरहतकेँ होइत। मुदा तइयो किसान, भगवानक लीला बुझि, हँसैत-खेलैत समय बीता लैत।’’ रुपलालक धानक उपजा देखि तेतरा अपन स्त्री लड़ूबतीकेँ कहलक। लड़ूबती अपन पनरहो कट्ठा चैरी खेत ले पनरह सेर धान बदलि अनलक। ओइ धानके तेतरा नारक झट्टाक मोइर बना रखि लेलक। फागुन-चैत मे जखन चैरी खेत उखड़लै तखन खूब महियाकेँ जोइत धान वाओग केलक। बड़ सुन्दर धानक गाछ जनमलै। सभ दिन तेतरा दुनू परानी बेरा-बेरी जा-जा देखै। बीत भरि-भरिक जखन गाछ भेलै तखन दुनू परानी आठ दिनमे खुरपीसँ कमठौन केलक। बैशाखमे एकटा बिहड़िया हाल भेलै। कच्चे-बच्चेकेँ धान चलल। खेत भरि गेलै। अखाढ़मे डुमौआ बरखा भेल। आठे दिनमे धानक गाछ सड़किकेँ भरि-भरि जाँघक भ’ गेल। दुनू परानी तेतरा विचारलक जे सुरर्ा कमठौन करब। परात भने दुनू गोरे कमाइ ले गेल। आड़ि पर ठाढ़ भ’ दुनू परानी हियासि-हियासि धान देखै लगल। धान देखि लड़ूवती तेतराकँे कहलक- ‘‘तेहेन धान अछि जे थारी छिछलि जायत।’’ तेतराक मन सेहो गद्-गद् रहै, खिलखिलाके हँसै लगल। अपन खेत देखि तेतरा अनको-अनको खेतक धान देखि अपन धान से तुलना करै लगल। जेहेन धान तेतरा खेतमे छल ओहन आड़ि-पाटिमे ककरो नै। हँसैत तेतरा लड़ूबतीके कहलक- ‘‘अइ बेरि लछमी महरानी खुशीसँ तकलनि।’’ तेतराक बातमे अपन बात जोड़ैत लड़ूवती बाजलि- ‘‘जब भगवान दइ पर होइ छथिन ते छप्पर फाड़ि क’ दइ छथिन।’’ कहि दुनू परानी हँसै लगली हँसिते दुनू गोरे, कमठौन करै ले, खेतमे पैसल। कमठौन शुरु केलक। कनिये खानक बाद दुनू गोरेकेँ ठेंगी पकड़ि लेलक। बुझलक क्यो ने। खुन पीबि जखन ठेंगी लटकल तखन तेतराक नजरि पड़लै। नजरि परिते तेतरा फानिकेँ खेतक आड़ि पर ठाढ़ भ’ जोरसँ लड़ूबतीकेँ कहलक- ‘‘सबटा खुन ठेंगी पी ने जाइ अए। झब दे छोड़ाउ नइ ते जेहो देहमे खून बँचल अछि सेहो पीबि लेत।’’ तेतराक बात सुनि लड़ूबती खेतसँ उपर हुअए लागलि कि अपनो बाँहिमे ठेंगी लटकल देखलक। बाँहिमे ठेंगी लटकल देखि धड़फड़ाकेँ उपर हुअए लगल कि धानमे साड़ी लटपटा गेलै। साड़ी लटपटाइते आड़ि पर गीरि पड़लि। फेरि उठि पहिने लड़ूवती अपन ठेंगी छोड़ौलक। ठेंगीकेँ छोड़विते छड़-छड़ा क’ खून बाँहिसँ निकलै लगलै। चुटकीसँ माटि ल’ ठेंगी दाढ़मे लगौलक। खून बन्न भेलै। ताबे तेतरो अपन ठेंगी छोड़ा खेतमे फेकलक। फेरि कमाई ले खेतमे पैइसै लगल कि देखलक जे खेतमे सह-सह ठेंगी करै अए। मकठौन छोड़ि दुनू गोटे घर दिशि विदाभेल।’’ उपरका खेत सभ किसान अबादै लगल। पनरहे दिनमे सैाँसे गामक खेत अबाद भ’ गेलै। खेत ते अबाद भ’ गेल मुदा बरखो बन्न भ’ गेलै। उपरका खेत सभ सुखै लगलै। जेहो पानि खेतमे छलै ओहो बहि-बहि निच्चा खेतमे जमा भ’ गेल। जहिना जे गब किसान खेतमे रोपने छल ओहिना ओ लगि क’ ठाढ़। मने-मन सभ किसान सोचै लगल जे समय रौदियाह भ’ गेल। खेत सभमे दरारि फटै लगल। धानक निचला पात पीयर भ’-भ’ सूखै लगल। मुदा चैरी खेतक धान किसानक मुँहकेँ हरियर रखने।’’ ‘‘दुर्गापूजासँ पाँच दिन पहिने एकटा अछार भेल। मुदा ओ पानि रस्ते-पेरे रहि गेल। मात्र चैरिये खेतटा मे ठेहुन भरि पानिक सलाढ़ पकड़ने। आब जँ आगू बरखा नहियो हैत तइयो चैरी उपजबे करत, ई बात सभ गिरहस्तक मनमे। हर्ष-विषादक बीच गामक सभ किसान। मुदा जहि गिरहस्तक अधिक खेत चैरीमे ओ बेसी खुशी आ जकर कम खेत ओ कम। तेतरा आ लड़ूबतीक खुशी अधिक। दुनू परानी तेतरा एहि दुआरे खुशी अधिक जे आन सालसँ बेसी धान हैत। डेढ़ बीघा खेत तेतराकेँ रहै। पनरह कट्ठा उपराड़ि आ पनरह कट्ठा चैरी। कोनो साल बीस मनसे बेसी धान नहि होय मुदा अइबेर नवका धानक आशा। चैरी खेतक धान, दुनू परानी तेतराकेँ नव उत्साह आ नव स्नेह दुनू परानीक बीच सेहो पैदा क’ देलक। जखन दुनू एकठाम बैसि परिवारक गप्प करै तखन पहिने चैरिये धानक चर्चा करैत।’’ ‘‘गभहा सकरातिक(गभा संक्रान्तिक) दिन। आइ गामक सभ गिरहत अपन-अपन खेत जा कहत- ‘‘उखरि सनक बीट, समाठ सनक सीस’’ दुपहरेसँ दुनू परानीक बीच तेतराकेँ रक्का-टोकी हुअए लगल। रक्का-टोकीक कारण छल जे तेतरा कहैत जे हम चैरी जा कहवै। आ लड़ूबती कहैत जे हम जा कहबै। तेतरा कहैत जे पुरुख खेतमे जा कहैत, तेँ हम जायब। लड़ूबती कहै जे घरक गारजन जा क’ कहै छैतेँ हम कहबै। मुह दुब्वर तेतरा खिसिया लड़ूवतीकेँ कहलकै- ‘‘जाउ, अही जाकेँ कहिऔ।’’ मने-मन लड़ूवती सोचैत जे पनरहे कट्ठा खेत अछितेँ घूमि-घूमि सैाँसे खेत कहबै। अंगनाक सभ काज सम्हारि लड़ूवती खेत विदा भेलि। मनहूस भेल तेतरा दुआर पर बैसि, बीड़ी पीवि-पीवि मनकँे शान्त करै लगल। मन शान्त होइते तेतरा कुट्टी कटै लगल। घरक गोसाईकेँ गोड़ लागि लडू़वती सोचलक जे जँ क्यो रस्तामे टोकवो करत ते उनटिके जबाव नइ देबै। नइ त’ विधि भंग भ’ जायत। सनतौलिया आ बेटी अंगुरिया रस्ते कातमे मरहन्ना धान कटैत छलि। लड़ूवतीकेँ देखि सनतौलिया कहलकै- ‘‘एहिवेर हिनके बाजी सुतरल छनि। हमरा सबहक कपारमे आगि लगि गेलि।’’ सनतौलियाक बातक जबाव नहि द’ लड़ूवती मुह घुमा आगू बढ़ि गेली। जखन लड़ूवती दश लग्गी आगू बढ़लि तखन अंगुरिया मायकेँ कहलक- ‘‘एक्को बेर काकी बजवो ने कैल। संतोष दैत सनतौलिया बेटीकेँ कहलक- ‘‘बुच्ची, धने ऐहेन चीज छियै जे लोकके टेढ़ बना दइछै। भाय-भायमे गरदनि कटौबलि करा दइछै। स्त्री-स्वामीमे गरमेल करा दइछै। बाप-बेटामे खुन करा दइछै। तइ ले दुख किअए करै छैँ। दश कट्ठा अल्हुआ रोपने छी। कहुना-कहुना ते सय मन हेबे करत। कत्ते खेमे। अदहा बेचिके धान कीनि लेब। एक साँझ भात आ एक साँझ अल्हुआ उसनिके चाहे रोटी पकाकेँ खायब। कोनो की सबहक दिन कटतै आ हमर नइ कटत?’’ खेतक चारु आड़ि घूमि लड़ूवती धान क’ गोड़ लागि खेतमे धँसल। तर-तर गम्हरा धानमे। आंगुर सन-सन मोट। एकदम पोछल-पाछल शाही काँट जेँका। तरे-तर लड़ूवती खुशीसँ गदगद। चारि फेरा खेतमे लड़ूवती लगा, खेतसे निकलि मने-मन गोड़ लागि विदा भेलि। रास्तामे सोचै लागलि जे घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछि, एत्त’ धान कत्ते राखब। से नहि त’ अखन महीना दिन धान हेबोमे लगत। तेँ एखने एकटा नमहर ढक बनवा लेब। अंगना अबैत-अबैत लड़ूवती तय क’ लेलक जे काल्हिये ढक बनौनिहारके कहि देबै। सूर्यास्त भेने तेतरा माल’ घर क’ ओसारक खूँटा लगा बैसल, मुस्की दैत लड़ूवती तेतराक लगमे आबि कहलक- ‘‘चैरीक धान ते फाटिकेँ उपजल अछि। घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछितेँ एकटा नमहर ढक बनवा लिअ’?’’ तेतराक दिनका तामस पुनः जागि गेल। खिसियाकेँ पत्नीके कहलक- ‘‘ढक बनाउ की बखारी हमरा की पूछै छी? हमहू कोनो मनुखे छी? बहिया-खबास जेँका रहै छी आ रहब।’’ तेतराक कड़ुआइल बात सुनि कनडेरिये आँखिये लड़ूवती तेतराक आखिमे आखि गड़ा, दहिना हाथ माथ पर द’ पुचकारि क’ बाजलि- ‘‘ऐना जँ भैंसा-भैंसीक कनारि दुनू परानीमे लोक करै लगे तखन ते भ’ गेल। खेते देखैक मन अछि ते काल्हि जा क’ देखि आउ। खेत कतौ पड़ा जायत। तइ ले एत्ते तामस किअए केनेछी।’’ लड़ूवती अपन गल्ती अपन आखियेसँ मानि लेलक। तेतराक आखि गल्ती माफ करैत अपन बड़प्पनक आनन्द महसूस केलक। मुस्की दैत तेतरा कहलक- ‘‘छोटे-छोटे दूटा ढक बना लेब। एकटा बनोलासँ गड़बर भ’ जायत। एकछाहा ओते धान हैत तब ने। जँ से नइ हैत ते मोटका धानमे मेहिक्का धान कोना राखब?’’ मूड़ी डोलवैत लड़ूवती वाजलि- ‘‘कहलौ त’ ठीके। जकरा वेसी खेत रहैछै ओकरा वेसी धानो होइछै। तेँ नमहर-नमहर ढक वा बखारी बनवै अए। मुदा जे जेहेन गिरहत अछि ओ त’ ओहने कोठी आ कि ढक बनौत। गरीब-गुरबा भुरकुरी वा घइलेमे अन्न-पानि रखै अए।’’ दोसर दिन भोरे तेतरा ढक बनवै दे कहै ले लेलहा एहिठाम गेल। लेलहा गछि लेलक। दोसर दिन आबि लेलहा चारिटा भौर परहक अधपक्कू बाँस कटलक। दू दिनमे लेलहा चारु बाँस क’ चीड़ि-फाड़ि, छीलि-छालि क’ तैयार केलक। तेसर दिन ढक बनौनाइ शुरु केलक। लड़ूवती लेलहाकेँ कहलक- ‘‘भैया, एकटा मनही ढकिया सेहो बना दिहथि। छठिमे घाटो परक काज क’ लेब आ धान-तानक लड़ती-चड़ती हैत तँ धानो राखब।’’ मने-मन लड़ूवती छठि क’ हाथी कबूला केलक।’’ अगहन आयल। धनकटनी शुरु भेल। उपरका खेतमे त’ धान तेनाहे सन, मुदा तइयो जरलो-मरल धान काटि-काटि अनै लगल। पनरह अगहनसँ चैरी खेतमे हाथ लगल। तेतराक खेत बीचमे, तेँ पहिने किनहरिक धान कटत तखन ने रास्ता बनतै। रखवार किनहरिवला गिरहत सभकेँ धान कटै ले कहलक आ बीचक खेंतवलाकेँ कटैक मनाही क’ देलक। आठ दिन कटनीक उपरान्त तेतरा खेतक रस्ता खुजल। साँझेमे आबि रखवार तेतराकेँ कहि देलक। भोरे लड़ूवती भानस क’ दुनू परानी खेलक आ धान कटै विदा भेल। जाइसँ पहिने माल-जाल क’ खुआ-पीया लेलक। शीतलहरी दुआरे पानियो ठरल। रौदक पता नहि। आड़ि पर पहुँच, दुनू परानी तेतरा धानके निङहारि-निङहारि देखै लगल। धानक सीस ठारहे मुदा दाना एक्कोटामे नहि। लड़ूवतीक मनमे एलै जे भरिसक लोक चोरा क’ सुररि लेलक। तेँ रखवारकेँ तकै लगल। कनिये कालक बाद मनमे एलै जे कतका न’ सुररलक मुदा बीचला त’ नइ सुररने हैत। पाइनमे पैसि क’ धान देखै लगली। बीचोमे गक्कोटा धान नहि। झड़ल सीस देखि लड़ूवती हताश भ’ गेलि। अना भेल किअए? चारु आड़ि तेतरा घुरि-फिरि देखलक ते एक्के रंग बुझि पड़लै। ठकुआ क’ तेतरा आड़ि पर ठाढ़ भ’ गेल। ने किछु तेतरा बजैत आ ने लड़ूवती। दुनूक देहमे जना कनियो लज्जतिये नै रहल। एक त’ खेतक ठरल पानि, दोसर धानक सोग, कठुआ क’ लड़ूवती खेतेमे गिर पड़लि। अचेत। लड़ूवतीकेँ गिरल देखि तेतरा पजिया क’ कोरामे उठौलक। मूड़ी उठा-उठा लोककेँ देखैत जे सोर पाड़बै। मुदा लगमे क्यो नहि छल। कहुना-कहुना तेतरा लड़ूवतीकेँ उठा सुखलाहा खेतमे अनलक। लड़ूवती ओंघरा गेलि। जना एको-पाइ होशे नहि। मने-मन तेतरा सोचै लगल जे- ‘‘आब की करब?’’ किछु फुरबे ने करै। अनासुरती मनमे एलै जे पाएरक दुनू तरबा रगड़ने देहमे गरमी औतै, तखन उठि क’ ठाढ़ हैत। लड़ूवतीक तरबा तेतरा रगड़ै लगल। थोड़े कालक बाद लडू़वती आखि तकलक। आखि तकिते साड़ी सरिया लड़ूवती चुक्की माली भ’ बैसि गेली देह गरमाइते दुनू गोटे आंगन विदा भेल। अंगना अविते तेतरा घूर पजारलक। दुनू परानी भरि मन आगि तपलक।’’ बेरु पहर तेतरा हमरा ऐठाम आवि कहलक- ‘‘भैया, गरदनि कटि गेल। एक्कोटा धान खेतमे नइ अछि। जना क्यो सुररि नेने हुअए तहिना बुझि पड़ल।’’ हम पूछलियै- ‘‘धान सुररने छह कि झड़ल छह?’’ ‘‘अगर सुररने क्यो रहैत ते अदहो-छिदहो तँ बँचल रहैत से एक्कोटा ने बँचल अछि।’’ हम कहलियै- ‘‘तोहर बीये खराब छेलह। अपने घरक बीया छेलह कि ककरो से नेेने छेलह?’’ -‘‘रुपलालसे नेने छलौ।’’ -‘‘ओइह तोरा ठकि लेलकह। उ चोट्टा औझुका ठक छी। गाममे ककरो नीक देखै चाहै अए। ओते जे चीज ढेरिऔने अछि से सबटा अपने कमेलहा छियै। मुह दुब्बर लोक डरे किछु कहबे ने करै छै तेँ छजल जाइ छै। जेहने चोट्टाक मुह छुटल अछि तेहने लठिधरो अछि। तेँ क्यो किछु कहबे ने करैछै। आब की करबह? सबुर करह।’’ टूटल आशा, विचलित मन, कनैत आखिसँ तेतरा कहलक- ‘‘भैया, एक्को कनमा धान नइ भेल। भरि साल की खायब?’’ आशा जगबैत हम कहलियै- ‘‘तोरा अपन सम्पत्तिक पते नहि छह। बहुत धन छह। एकटा बच्छा बेचि लेबह तेहिसँ छह मासक बुतात चलि जेतह। तकर बाद बुझल जेतै। तावे छह महीना कि कोनो हाथ पर हाथ ध’ बैसल रहबह।’’ ‘‘जाइ छी भैया?’’ ‘‘तमाकुल खा लाय।’’ ‘‘तमाकुल खाइक मन नै होइ अए।’’ मन असथिर करह। कमाइवला बेटा लोकक मरि जाइ छै, सेहो सबुर लोक करिते अछि। तोरा ते खेतक उपजा गेलह। खेत छह ते फेरि ओइसँ नीक उपजा देखबहक।’’ अंगना आबि तेतरा सभ बात लड़ूवतीकेँ कहलक- लड़ूवतीक आखि लाल भ’ गेलि। जोर-जोरसँ बजै लगली- ‘‘रुपललवा गरदनि कट्टा छी। जेहने फौतिबा अपने अछि तेहने बौह छै। (तेतराकेँ कहलक) अहाँ अंगनेमे रहू, हम ओइ रुपललबा क’ सराध-बिटारि केने अबैछी। जाबे ओकरा सिरा आगू थूक नइ फेकबै, ताबे नइ बुझत।’’ विचित्र असमंजसमे तेतरा पड़ि गेल। कखनो होय जे अनेरे घरवालीकेँ कहलियै। त’ कखनो होय जे दुनू गोटे जा क’ रुपलालक दरवज्जा पर गरिआबी। फेरि होय जे रुपलाल समंगर अछि, बिना मारने छोड़त नहि। धनो गेल आ नाहकमे मारिओ खायब। अंतमे सोचलक जे भने अंगनासँ घरवाली गरिअबै अए। लड़ूबती अंगनेसँ रुपलालकेँ गरिअबैत रास्ता पर चलि आइलि। तेतरा आगूमे ठाढ़ भ’ बाँहि पकड़ि लेलक। जते तेतरा लड़ूवतीक बाँहि पकड़ि रोकैत तइसँ बेसी लड़ूबती कुदि-कुदि आगू बढ़ैक कोशिश करैत। आ चिकैड़ि-चिकैड़ि गरिऐवो करैत।’’ रास्ता धेने रुपलाल कतौसँ घर दिशि अबैत छल। लड़ूवतीक गारि सुनि चैंकि गेल मुदा आखि निच्चा केने अपना एहिठाम चलि आयल। हल्ला सुनि हमहू (सजन) गेलौ। तेतराक घरवालीकेँ देह परक साड़ी उधिआइल, केश खुजल, आखि लाल, गरैज-गरैज गारि पढ़ब सुनि कहलियै- ‘‘कनियाँ, चुप रहू। धैनवाद अहींकेँ दइ छी जे रुपलालके मुह पर गरिऐलौ। की करबै? जाबे अपना चीज नइ अछि ताबे एहिना ठक सब ठकत। देखबे केलियै जे रवियाक आमक गाछ छठुआ उखारिके रोपि लेलकै। चुप हौ, चुप हौ।’’ हमर बात सुनि बेचारी साड़ी सरिऔलक, माथ झपैत घुनघुना क’ बाजलि- ‘‘हिनका पैघ बुझै छिअनि भैया, तेँ बात मानि लेलिएनि, नइ ते आइ ओहि डकूबा के खापड़िसँ चानि तोड़ि दितिऐक।’’ आँखि मूनि देवन ध्यानसँ सजनक खिस्सा सुनैत। लड़ूवतीक बात सुनि आखि खुजलै। मने-मन देवन सोचै ललग जे रुपलालकेँ जत्ते सजा हेबाक चाहिऐकसँ नइ भेलै। किऐक ने भेल? शायद एकर यैह कारण रहल हैत जे समाजोमे शासक आ शासित लोक अछि। शासकक गलतीक जबाव देमएवला क्यो ने अछि। मुदा गरीब-गुरबाक गलती क’ उचितो स’ बेसी सजा देल जाइछै। कने काल गुम्म भ’ देवन सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, अहाँ गियानक बखारी रखने छी।’’ हँसैत सजन कहलक- ‘‘बौआ, रातियो बेसी भ’ गेल। भरि दिनक थाकल सेहो छी। तोहूँ खा क’ आराम करह आ हमहू जाइछी।’’ ...... जिनगीक जीत:ः 10 भोर होइते, एका-एकी टोलक लोक बचेलाल एहिठाम अबै लगल। लोककेँ अबैत देखि, सुमित्रा आंगन बाहरब छोड़ि, दरवज्जा पर आबि सभकेँ बैइसै ले कहै लगलखिन। सबहक मनमे जेहने खुशी तेहने जिज्ञासा। लोकक गल-गुल सुनि बचेलालो बिछानसँ उठि, लोकक बोली अकानै लगल जे कतौ किछु भ’ नेते गेलै। मुदा गल-गुलक तेहने बाढ़ि आबि गेल छल जे कोनो बात साफ-साफ बुझाइये ने पड़ैत। आखि मीड़िते बचेलाल दरवज्जा पर आबि देखलक। किछु गोटे चैकियो पर बैसल, किछु ठाड़हो आ किछु गोटे रस्ते-रस्ते अबितो। सबहक मन खुशी तेँ मुहमे हँसी। बचेलालकेँ सुमित्रा कहलक- ‘‘बच्चा, समाज सब, काल्हि जे दड़ी लाइट, बरतन कीनि क’ अनलह, वैह देखै ले एलखुन।’’ सुमित्राक बात सुनि बचेलाल कल पर जा माटियेसँ चारि घूसा दाँतमे लगा कुड़ूर क’ आयल। दरवज्जाक कोठरी खोलि सब सामान बचेलाल निकाललक। दड़ी आ जाजीमकेँ दरवज्जाक निच्चामे बिछा सभकेँ बैसवैत बचेलाल कहै लगल- ‘‘हम सिर्फ कीनिलहुँ मुदा छी अहाँ सभक। जिनका जाहिया काज हुअए, ल’ जायब। एहि दड़ी, जाजीम, लाइट आ बरतनकेँ अपन बुझि उपयोग करब।’’ बचेलालक बात सुनि सभ थोपड़ी बजौलक। अछेलाल सेहो आयल। सुमित्रा चाहक ओरियानमे आंगन गेली लोकक हिसाबे हुनका गरे ने अँटैन जे कथीमे चाह बनाएव आ पीबै ले कथीमे देब। घरमे चाहो-चीनी आ दूधो कम्मे अछि, अइ से पारो ने लागत। विचित्र असमंजसमे सुमित्रा। मुदा मनमे होइत जे दरवज्जा पर आइल समाजकेँ जँ चाहो ने पिऐवनि त’ घरक मोले कोन? अंगनेसँ सुमित्रा हाथक इशारासँ अछेलालके बजौलनि। सहटि क’ अछेलाल सुमित्रा लग आयल। अछेलालकेँ सुमित्रा कहलखिन- ‘‘बौआ, आइ पहिल दिन समाज दुआर पर ऐला, अगर चाहो नइ पीऐबनि ते केहेन हैत।’’ हूँ-हँ कारी भरैत अछेलाल कहलकनि- ‘‘हँ, इ त’ बड़ पैघ अपमान समाजकेँ हेतनि। आ समाजोसँ पैघ अपन घरक प्रतिष्ठाक हैत। सब चीज तँ अछिये तखन प्रतिष्ठाकँे मंगनीमे किऐक जाय देब। हम दूध नेने अवै छी। चाह-चीनी दोकान स’ ल’ आनब। चाह बनवै ले बड़का बरतन अछिये। पीबै ले जँ कप-गिलास नइ अछि ते दोकानेसँ सैकड़ा हिसाबसँ प्लास्टिकक गिलास कीनि आनव। कने करै पड़त मुदा असंभव काज त’ नहि अछि। जुगाइयोकेँ सोर पाड़ै छिएै। ओ दोकानक काज करत अहाँ चुल्हि पजारि बरतन चढ़ा दिऔ। जावे चुल्हि पजारि बरतन सरिआइब ताबे ऐहो दुनू काज भ’ जैत।’’ सुमित्रा बाजलि- ‘‘जुगायकेँ सोर पड़िऔ?’’ जुगायकेँ अछेलाल सोर पारि कहलक- ‘‘जुगाय तूँ कन्ने दोकान जा। चाह-चीनी, गिलास आ तमाकुल बीड़ी ,सुपाड़ी कीनने आबह। हौ भागमन्ते ऐठाम दश गोरे अबै अए।’’ जुगाय दोकान गेल आ अछेलाल दूध ले। इम्हर बचेलालक माय सुमित्रा हाँइ-हाँइ गिलासमे पानि ल’ चुल्हिकेँ शुद्ध करै ले छीटै लगली। ओसार पर बैसि रुमा गुम्हरैत। बजैत किछु ने मुदा बिना आगिये मन क्षण-क्षण जरैत। जना सभ जान मारै पर लागल होय। खुशीसँ बचेलालक मन ओहिना दहलाइत जना पोखरिमे पानिक उपरका चीज हवामे। चाह बनल। सभ क्यो पीवि, क्यो तमाकुल तँ क्यो बीड़ी, तँ क्यो सुपारीक टूक मुहमे द’ जूट बान्हि-बान्हि विदा भेल। जहिना पुरुखक जुटान बचेलाल ऐठाम तहिना टोलक बूढ़ि-पुरानक जुटान परती परहक जामुनक गाछक निच्चामे। ढेरवा बच्चियाँ सभक बैसार, पोखरिक मोहारक कनैलिक फूलक गाछक तरमे। सब अपना-अपनामे मस्त। जना ककरो घर-आंगनमे कोनो काजे ने होय, तहिना। ठीठर, डोमन, कुजाइ आ बोतल संगे चारु गोटे ठीठरक दलान पर बैसल। सबहक मन खुशी। आइ धरि जे टोल भानस करैक बरतन, इजोत आ बिछानक लेल दुख भोगैत आयल ओ दुख पड़ा गेल। डोमन बोतलकेँ कहलक- ‘‘भाय बोतल, अपनो सबहक उपरमे किछु जिम्मा आबि गेल। ओना तँ गामक चीज भेल मुदा मुख रुपसँ अपना टोलक त’ भेवे कैल। अपना सभक जिम्मा भेल जे एक लगनमे दू या दूसँ अधिक काज नइ करब। किऐक तँ समान कम अछि। तेँ एक लगनमे एक्केटा वियाह करब नीक हैत।’’ डोमनक बात सुनि ठीठर कहलक- ‘‘बेस कहलहक डोमन। जतबे नुआ रहै ततबे पाएर पसारी। ओहो त’ बचेलालेकेँ धैनवाद दी जे एतबो केलक। कमाई ते बहुत लोक गाममे अछि मुदा ककरो ऐहेन बुद्धि किअए ने भेल? बन राखे सिंह आ सिंह राखे बन। जहिना बेचारा बचेलाल समाज कल्याण ले डेग उठौलक तहिना अपनो सभ डेगमे डेग मिला क’ चलह। ओइ वेचाराक परिवार लटपटा गेलै, मसोमाती कारोवार भ’ गेलै। मुदा तइयो ओइ मसोमातकेँ धैनवाद दी जे घर थथमारि क’ रखलक।’’ खेनाइ-पीनाइ, काज-उदयम जना सभ बिसरि गेल। चारु गोटे गप्प-सप करिते रहल। नअ बाजि गेल। बचेलाल, अछेलाल आ जुगाय, तीनिये गोटे दरवज्जा पर रहल। जुगायकेँ बचेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय, हम स्कूल जायब। अहाँ दुनू परानी डाॅक्टर ऐठाम पहुँच जायब। स्कूलसँ हम सोझे डाॅक्टर ऐठाम पहुँच जायब। जाबे आखि तकै छी ताबे ई दुनिया, जखने आखि मूनि देब दुनिया बिला जायत। तेँ शरीरक रोगके मजाक नइ बुझि दुश्मन बुझै पड़त। अखन अहाँक उमेरे की भेल हेन, तखन ते गरीबी लोकके अछैते औरुदे मारि दइछै। अखन अहूँ जाउ, घर परक काज देखियौ, हमहू नहा-खाके स्कूल जायब।’’ जुगाय उठिकेँ विदा भेल। अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, जहिना भूमकम भेला पर गाम दलमलित भ’ जाइछै तहिना आइ बुझि पड़ल।’’ बचेलालक मन खुशीसँ गद्गद। हँसैत कचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, जहिना अहाँ असगर छी तहिना ते हमहू छी। जखन स्कूल चलि जाइछी तखन दुआर-दरवज्जा भकोभन रहैत अछि तेँ ऐहेन काज ठाढ़ क’ लेलासँ काजो चलत आ दरबज्जो सुन नइ रहत। अहँूकेँ एक्केटा घर अछि आ कम्मे घरारियो। तेँ एत्तै घर ल’ आनू। एकठाम घर भेलासँ दुनू गोटेक रक्छो हैत आ मालो-जालक सेवा हैत। खूँटा पर जे गाय अछि ओ पुरना नस्लक अछि, जहिसँ दूधो कम होइ अए। तेँ एकटा नीक गाय (जरसी) सेहो कीनि लेब। अपना चीज रहलासँ कोनो बेर- बेगरता नइ खगत। एत्ते दिन आन्हर जेँका छलौ जइसँ परिवार समाज नई बुझै छलौ। आब जखन नजरि खुजल तखन ई सब बुझै लगलिएै। हमरे रुपैआसँ बड़का-बड़का उद्योगपति कमा क’ मोट भेलि जाइ अए आ जे कमाई अए ओ बेटे-बेटीक पढ़ौनाइ-लिखौनाइ स’ ल’ क’ वियाह-दुरागमन करैत-करैत जिनगी समाप्त क’ लैत अछि। हमरो साइकिल भइये गेल। जत्ते समय बचत ओहिमे टोलक बच्चा सबके पढ़ा देबै। स्कूलमे दरमाहा भेटिते अछि तेँ ककरोसँ एक्को पाइ नइ लेबै। खेती करैक लूरि नइ अए मुदा पढ़ैक लूरितेँ अछि। तेँ खेतीक किताब पढ़ि, रेडियो सुनि खेती करैक लूरि अपनो सीखि लेब आ अहूँ सबके नव ढंगक खेतीक जानकारी देब। आब अपनो बुझै लगलौ जे शिक्षक भेनहुँ जिनगी जीवैक ज्ञान नहि अछि। जहियासँ स्कूल छोड़लौ आ शिक्षक भेलौ तहियासँ बड़ पढ़ैछी ते साँझू पहरकँे दू-चारि पाँती रामायण वा महाभारतक। सेहो पढ़ै नइ छी गाबि लइ छी। ओकरामे जे गूढ़ विषय छिपल छइ से बुझवे ने करै छी। जिनगी अन्हरायलकेँ अन्हराइले रहि जाइत अछि। जाबे सब मनुक्खके जिनगी जीवैक ढंग नइ हेतै ताबे जिनगी अपन कोनो माने नहि रखत। आब समयो भ’ गेल हमहू नहा-खा क’ स्कूल जायब।’’ साढ़े चारि बजे बचेलााल डाॅक्टर एहिठाम पहुँचल। दुनू परानी जुगाय तइसँ पहिने पहुँच चुकल छल। अपराहान समय भेने डाॅक्टर एहिठाम रोगियोकेँ बेसी भीड़ नहि। बचेलालकेँ देखि डाॅक्टर पूछलखिन- ‘‘मास्टर सहैव अपने देखाइब कि क्यो रोगी छथि?’’ जुगायके देखबैत बचेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘डाॅक्टर सहैब, हिनके पत्नीके देखायब अछि।’’ डाॅक्टरक कुरसीक बगलमे एकटा इस्टूल राखल छलै। ओहि पर जा जुगायक पत्नी बैसली। डाॅक्टर हुनाका पूछै लगलखिन। सब बात सुनि डाॅक्टर बचेलालकेँ कहलखिन- ‘‘तीनि-चारि तरहक जाँच करबै पड़त। जाँचक रिपोट देखला बाद दवाइ लिखि देब। अखन तावे दू खोराक दवाइ द’ दइ छी, काल्हि बाजाप्ता लिखि देब। पनरहसँ बीस दिनमे मरीज नीक भ’ जेती।’’ डाॅक्टरक बात सुनि जुगायक मनमे घरवालीक नव जिनगी नचै लगल। वेचारा जुगाय घरवालीक आशा तोड़ि चुकल छल। जहिना पाइनिक वेगमे भसैत चुट्टीके खढ़क सहारा भेटिलासँ जिनगीक आशा होइत अछि, तहिना जुगाइयोकेँ भेल। रुमाक दाबल क्रोध मिझाइल नहि तरे-तर धधैकते रहल। साँझू पहर बचेलाल टहलि-बुलि क’ आबि, हाथ-पाएर धोय दरवज्जा पर बैसल। सुमित्रा सेहो आबि, जरैत लालटेनकेँ तेज क’ देलनि। चाह नेने रुमा सेहो आइली। एक घोंट चाह पीबि पत्नीकेँ बचेलाल कहै लगल- ‘‘देखू, अखन तीनिये गोटे छी। तीनू गोटे एक्के परिवारक सेहो छी। परिवार एकटा संस्था होइत। जेकरा अहाँ मंदिरो, देवस्थानो कहि सकै छियै। जहिना पुजेगरी मंदिरकेँ जीवित रखैक लेल दिन-राति लगल रहैत अछि तहिना परिवारोकेँ जीवित रखैक लेल, परिवारक सभकेँ ओहि रुपमे करै पड़त। परिवारमे एकगोटे मिहनत करी आ दोसर गोटे बैसिकेँ रहै चाहबै त’ ओ घर कैक दिन ठाढ़ रहत। प्रश्न ईटा, खढ़-बाँसक नहि अछि। प्रश्न अछि मनुक्खक। जकर पहिल मानदंड अछि जे-मनुक्ख केहेन हेवाक चाही? नजरि उठा क’ देखबै ते बुझि पड़त जे अनेको चालि-ढ़ालिक मनुक्ख अछि। मुदा से नहि, मनुक्खक मानदंडकेँ आगूमे राखि विचार करबै तखन बुझि परत। सब मनुष्यक दायित्व होइत जे मनुष्य बनि जिनगी जीबी। आब कोनो बच्चा नइ छी। जँ कोनो काज वा बात अपने नइ बुझैत होय ते दोसर स’ बुझैमे कोनो मान-अपमानक बात नहि होइत। जुगायक पत्नीक रोग रसे-रसे कमै लगलनि। जना-जना रोग कमैैत तेना-तना काजो करै दिशि शक्ति बढ़ैत आ अन्नो दिशि रुचि बढ़ै लगलनि। पत्नीक हालत सुधरैत देखि जुगाय दवाईक संग पथ्य आ गायक दूध सेहो उठौना क’ लेलक। आठ दिन बीतैत-बीतैत धनमाक (जुगायक पत्नी) देह चिष्टा गेलि। स्त्रीकेँ स्वस्थ होइत देखि जुगायक टूटल आशा पुनः जगै लगल। अखन धरि रुमाक नजरि सासुक प्रति जेहेन हेबाक चाही से नहि भ’, क्यो छी, छलनि। सासुक प्रति पुतोहूक केहेन व्यवहार हेवाक चाही? से जना रुमा बुझिते नहि आ कि बुझिओ क’ अनठबैत। जँ किछु करै ले सुमित्रा पुतोहूकेँ अढ़बैत ते सुनिये क’ रुमा बड़बड़ा लगैत। करब ते दूरक बात। जे देखैत-देखैत सुमित्रा अढ़ौनाइये छोड़ि देलखिन। मनमे यैह छलनि जे जँ हम ककरो गारजन नहि छी ते हमरो गारजन क्यो ने छी। मने-मने गजैत जे सासु-ससुरक प्रति वा बेटा-बेटीक प्रति जे कर्तव्य होइत अछि ओ त’ नीक जेँका निमाहि चुकल छी, तेँ क्यो जिनगीमे आँगुर उठाक’ नहि देखा सकै अए। पुतोहू अपन कर्तव्य करती आ बेटा अपन करत। जँ बेटा-पुतोहू नहिये सेवा करत ते नहि करह। जाधरि अन्न खाइछी देहमे शक अछि ताधरि आखि निच्चा कोना क’ लेब। की फेरि दोहरा क’ जनम लेब? सब मनुक्ख अपन कर्मसँ मनुष्यता प्राप्त करैत अछि। आ जकरा मनुष्यता प्राप्त भ’ जाइछै। ओकरा देहक सुख-दुख थोड़े पथभष्ट बना सकत। कथमपि नहि! भ’ सकै अए जे पुतोहू हमरा बैधव्य वुझि निःसहाय बुझैत होथि? ई तँ जिनगीक क्रम थिकैक। की सब महिला पुरुषक (पति) अछैते मरै छथि? एकदम नहि। मरबाक कारण भिन्न अछि आ पारिवारिक संबंध भिन्न। भ’ सकै अए जे ओ (पुतोहू) अपन नैहरमे कोनो वैधव्य महिला केँ कष्टमय जिनगी देखने होथि वा पुतोहूक दुव्र्यवहार सहन करैत देखने होथि। एत्ते बात सुमित्राकेँ मनमे अबिते जना आखि गरमीसँ लाल हुअए लगलनि। निर्भीक स्वरमे मुहसँ निकललनि- ‘‘आन महिला हमरा नहि बुझथु। हम जिनगी क’ जनै छी तेँ जीवैक ढग बुझै छियै। ओ (पुतोहू) हमरा पैघ माए तुल्य बुझती त’ हमहू बेटी तुल्य वुझवनि, नइ तँ अपना मनक मालिक जँ छथि तँ हमहू अपना मनक मालिक छी।’’ मुदा किछु दिनसँ रुमाक बदलल (सुधरल) रुप सुमित्रा देखै लगलखिन। मने-मन तारतम्य करै लागली जे देखबै ले करै छथि वा जिनगीमे सुधार एलनि। मुदा सुमित्राक मन पुतोहूक दोषकेँ ओते महत्व नहि द’ बेटाकेँ बेसी बुझैत। किऐक त’ आन घरक मनुक्ख आन घर आबि एत्ते कोना बढ़ि सकत। बढ़ैक कारण होइछै। ओना कारण तँ अनेको अछि मुदा सबसँ महत्वपूर्ण कारण अछि पुरुखक दुर्बलता। जे पुरुख हाथी सन अबोध जानवरके बसमे क’ लैत, की ओकरा बुते सबोध स्त्रीकेँ मनुख बनाओल नहि हेतैक? किछु दिन पहिने तक रुमा आंगनमे सबसे पाछू सुति क’ उठै छेली ओ आब सबसँ पहिने उठै लगली। उठि क’ बिना मुँह-कान घोनहि आंगन-घर बहारि, चीनमार नीपि, बरतन-वासन धोय, तखन अपन क्रिया कर्म मे लगै लगली सासुके माय तुल्य वुझै लगली मायक प्रति पुतोहूक जे कर्तव्य होइत ओ कर्तव्य पूर्ति हेतु रुमा जे अपने बुझैत से करै लगली। जे काज नहि बुझैत ओ सासुसँ सीखि-सीखि करै लगली। सुमित्रो, पुतोहूक बदलैत रुप देखि, बुझा-बुझा कहै लगलखिन- ‘‘कनियाँ! आइ धरिक जे अनुभव हमरा अछि ओ सीखि जिनगीमे उताड़ू। अहूँ जे नैहर स सीखि क’ आइल छी ओ नीक अधलाकेँ विचारि, अधलाकेँ छोड़ि नीककेँ पकड़ि चलू। अखन धरिक जे परिवारक व्यवहार रहल आ आइ जे समयानुकूल बदलाव आबि रहल अछि ओहि पर धियान द’ आगू बढ़ू। तखने समयक संग चलि सकब। जे क्यो एहि स अलग भ’ जीवै चाहत ओकरे मनमे सदिखन उत्तेजना (तनाव) रहतै। जहिसँ चैन मनसँ पड़ा जेतै।’’ सासुक विचारकेँ रुमा अंगीकार क’ चलै लगली। पावनिक दिन। स्कूल बन्न। मुदा बचेलाल, पहिलुका जेँका नहि, भोरे चारि बजे उठि अछेलालकेँ सोर पाड़लक। जाबे अछेलाल अबैत तहिसँ पहिने सुमित्रो आबि गेली। तीनू गोटे गप-सप करै लागली बचेलाल अछेलालकेँ पुछलक- ‘‘काका, आब तँ खेती-बाड़ीक काज असानी स’ करैत हैब?’’ बचेलालक बात सुनि अछेलाल कहै लगल- ‘‘बौआ, एहिठामक गिरहस्तक जे रुपरेखा अछि ओ नीक कम आ अधला बेसी अछि। तेँ गिरहस्तक जिनगी आ खेतीक ढाँचा बदलै ले बहुत किछु करै पड़त। जाबे से नइ करब ताबे जे चाहैछी से नइ हैत। हम तँ सब बात बुझवो ने करै छी। अखन तक हम बोनिहार रहलौ तेँ गिरहस्तक जिनगी नीक-नहाँति कोना बुझवै? मुदा भौजी तँ नैहरसँ एहिठाम धरि गिरहस्ते परिवारमे रहबो केलनि आ बहुत दिन गिरहस्तियो केलनि तेँ हुनका बेसी अनुभव छनि। वैह कहती।’’ अछेलालक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे अछेलाल त’ ठीके कहलक। मुदा हमहू तँ बूढ़ि भेलौ तेँ बहुत बिसरियो गेलौ किऐक त’ काजो बहुत छुटि गेल आ छोड़ियो देलौ। मुदा बिना माटि पर ठाढ़ भेने ने मनुख रास्ता पर आओत आ ने परिवार। जाबे मनुक्ख जमीन पर ठाढ़ नइ हैत ताबे आगू मुहे कोना ससरत? हँ, ई भ’ सकै अए जे हवा-बिहाड़िमे उड़ि क्यो बहुत आगू चलि जाय मुदा ओ अनिश्चित जिनगी हेतै। एक पीढ़ी बहुत आगू चलि जायत मुदा अगिला पीढ़ी ओहिसँ आगू बढ़त कि पाछू हैत, ई कहब कठिन अछि। किएक त’ जत्ते उपर जे चलि जायत ओ ओतै लसकि जायत। ने ओकरा जमीन पकड़ैक बोध हेतै आ ने आगू बढ़ैक रास्ता भेटितै। किएक त’ दू विचारधारा आ दू रास्ताक संघर्ष चलैत अछि आ आगू आरो मजगूत भ’ चलत। तेँ जाधरि दुनू रास्ताकेँ बिना बुझने जँ क्यो आखि मूनि चलै चाहत तँ ओ निश्चित लटपटेबे करत। मुदा प्रश्न अछि जहिना मनुक्ख समयक संग चलैत आयल तहिना चलैक। जे कठिन अछि। एत्ते बात मनमे अबिते सुमित्रा बजै लगली- ‘‘बौआ, कोनो परिवार ताबे नीक जेँका नइ चलि सकै अए जाबे परिवारक सब आदमी रास्ता ध’ नइ चलत। अपने परिवार छह, तूँ भरि दिन अपसियाँत रहै छह मुदा पुतोहू जनिक लेल धनि सन। जहिना ओ (पुतोहू) भरि दिन काजसँ छिटकैत रहैत छथि तहिना जँ तोहूँ छोड़ि दहक तखन घरक दशा की हेतह? मुदा जहिना तूँ नोकरी क’ कमा अनै छह तहिना जँ ओहो घरे पर काज करथि ते घरक उन्नति हेतह की नहि। तेँ परिवारमे जे जेहेन रहै ओकरा ओहि रुपमे मेहनत करक चाही? परिवारक जे गारजन होथि हुनको, आदमी देखि, काज ठाढ़ करक चाही, जहिसँ घरक आमदनियो बढ़त आ बेकारियो भागत। अहिना देखै छी बाढ़ि-रौदीक दुआरे सब परिवार निच्चे मुहे जा रहल अछि। मुदा बारह मासक सालमे चारि मास बरसातक होइत यैह चारि मास साल क’ संचालन करैत। मुदा तज्जुब लगै अए जे बरसातक चारि मास छोड़ि शेष आठ मासक कोनो महत्वे ने अछि। सबसँ दुखद बात तँ ई अछि जे एहि आठ मासक लेल गिरहस्त किछु सोचबे ने करैत। खेतीक मुख्य चीज पानि छी। जकरा दिशि लोक तकबे ने करैत। अगर खेत पटबैक उपाय लोक क’ लिअए त’ जहिना उपजामे बढ़ोतरी हैत तहिना फसलोमे। जखन लोके पानि, खाद नीक बीआ नइ बुझैत छल तखनो गिरहस्ती चलैत छल। अपन खेत एक बध्धु छह, एक ठाम नइ छह, मुदा थोड़े हटि-हटि क’ तँ छेबे करह। अगर बोरिंग गरा पटबैक जोगार क’ लाय त’ की वुझि पड़ै छह जे जहिना उपजा अखन खेतसँ अनै छी तहिना तबो आओत? जहिना चैबिसे घंटा दिन रातिमे देखै छहक जे रातिमे केहेन अन्हार रहै अए आ दिन होइते केहेन इजोत भ’ जाइछै। तहिना सब चीजक छह। अखन दू परानी तू छह आ दू परानी अछेलालो। चारि गोरे त’ समकस काज करै वला छह मुदा काज कत्ते होइ छह। ई हिसाब जोड़ि क’ काज शुरु करै परतह। अनाड़ी-धुनाड़ी जेँका कहवह जे, कोन काज ठाढ़ करब? मुदा आखिक सोझहामे छह जे खेतमे पाइनिक सुविधा बनौने, खेतमे सालो भरि फसिल लहलहेतह। खाद देवहक, नीक बीआ रहतह ते तत्ते उपजा हेतह जे घरमे रखैक जगह नइ रहतह। नारो-पात तते हेतह जे दूटा चारिटा माल हड़ाइले रहतह। माल पोसवह ते दुदहो खेबह आ बेसी हेतह ते बेचवो करवह। जते घरक आमदनी बढ़तह तत्ते ने आगू मुहे ससरवह।’’ मायक बात सुनि बचेलालकेँ भक्क खुजल। भक्क छुटिते मायके कहलक- ‘‘माए, आइ धरि एहि दिशि नजरिये ने गेल छल। मुदा आब देखै छी काज केनिहार लोक हँसी-खुशीसँ जिनगी बिता सेकै अए। काका, सबसे पहिने एकटा बोरिंग आ दमकलक जोगार करैक अछि। आइ तँ छुट्टी नइ अछि। परसू रवि छी। दुनू गोरे बजार चलि पहिने बुझि लेब। तखन जे जना गर लागत से करब।’’ अछेलाल- ‘‘बौआ, बैंकोवला सब बोरिंग दमकल दइछै। ओकरा साले-साल वियाज लगा रुपैआ दैत जेबै तइयो भ’ जायत।’’ बचेलाल- ‘‘जखन अपने एत्ते दरमाहा अछि तखन शौखक कर्जा किअए लेब। अखन जे रुपैया जमा छल से सठि गेल। मुदा अगिला सोमे के ते दस हजार रुपैआ भेटत। जेँइ एत्ते दिन बीतल तेँइ आठ दिन आरो बीतह। मुदा बिना उपारजनक साधन बनौने त’ आमदनी नहि बढ़त।’’ भोरे सुमित्रा उठि, दलान पर आबि बाढ़नि ल’ दरवज्जा बाहरैक ओरियान करितै रहति कि अछेलालो आयल। अछेलालक चुनौटीमे चून नहि, तेँ चून लिअए आयल। आन दिन अछेलालकेँ निन्न टूटिते, ओछाइन परसँ उठि, लोटामे रौतुके राखल पानि ल’ दू बेर कुड़ड़ा करैत आ जे पानि बचैत ओ पीबि, तमाकुल खा पराती गबै लगैत। मुदा आइ चूनक दुआरे पराती नहि गाबि चून ले आयल। आंगन स’ चून आनिकेँ देलखिन। चून ल’ अछेलाल तमाकुल चुनबै लगल। तेहि बीच दुनू गोटे गप-सप सेहो करै लगल। दुनू गोटेक गप-सपकेँ अकानि बचेलाल सेहो आबि क’ ठाढ़ भ गेल। सुमित्रा अछेलालकेँ कहैत रहथिन- ‘‘बौआ, जहिया अपन घर भरल-पूरल छल सासु-ससुर, पति जीवैत छलाह तखन हम जुआन छलौ। गामक चुनल गीतिहारि। गाममे जत्त’ कतौ कोनो काज होय त’ हमरा हकार अबिते छल। हमहू राति-दिन किछु बुझबे ने करियै। अपन अंगना-घरक काज सम्हारि हकार पूरै जाइ छलौ। हमर नैहर पचही परगनामे पड़ै अए। ऐठामक गीति-नाद, बोली-वाणी, चालि-ढालि अल्लापुर परगनासँ नीक अछि। मुदा अपना गाममे बेसी अल्लेपुरक सुआसिन बसै अए। गोटि-पङरा भौरो परगनाक अछि। पचही आ भौरक त’ बहुत किछु मिलबो-जुलबो करैछै मुदा अल्लापुरक दोसरे रंगक छैक। हँ, एकटा बात जरुर छै जे अल्लापुरक सुआसिन बेसी कमासुत होइछै। मरदे जेँका साड़ी क’ फाँड़ बान्हि लेत आ भरि-भरि दिन खेते-पथारमे काज करैत रहत। रौद-बसात किछु बुझवे ने करत। एक बेरक गप कहै छी। हमरा घरे लग पंडित काकाक घर सेहो अछि। पंडित काका इलाकाक सब संस्कृत विद्यालयमे पढ़ौनी केने छलाह। ओ तत्ते नियम-निष्ठावला छेलखिन जे कोनो विद्यालयमे शिक्षक सबसँ पटबे ने करनि। जाबे क्यो टोकनि नहि ताबे ओहो ककरो नहि टोकितिहीन। ने बिना काजे ककरो ऐठाम जाइ छेलखिन। ओना हुनका कखनो निचेनसँ बैसलि नहि देखिएनि। सदिखन कोनो ने कोनो काजमे लगले रहैत छलाह। एक दिन पछबरिया इलाकाक एकटा पंडित ऐलखिन। ओहो बड़ भारी पंडित। भिनसरे दुनू गोटे पूजा-पाठ क, दू-दू छिमड़ि केरा खेलनि आ शास्त्रार्थ करै ले वैसि गेलाह। पंडित काका की कहथिन आ ओ पंडित की कहनि से आन क्यो बुझवे ने करैत। गप्प-सप्पमे दुनू अपस्याँत। बड़ी कालक बाद पंडित काका तीनि बेरि थुक माटिपर फेकि देलखिन। ओहि पछबरिया पंडितक मुह कनै-कनै सन भ’ गेलनि। दुपहरमे खूब नीक जेँका खुआ-पीया, वेरु पहर धोती, कुरता, चद्दरि, पाग द’ अरिआतिकेँ विदा केलखिन।’’ हँ कहै छलौ जे सैाँसे गाम हकार पूरै छलौ। जखन अपने (पति) मरि गेला तहियासँ हकार पूरब छोड़ि देलौ।’’ ‘‘अखुनका आ पहिलुका लोकके मिलबै छी ते अकास-पतालक अंतर बुझि पड़ै अए। हमरे दूटा बच्चा भेलि, ने एकोटा सूइयाँ लेलौ आ ने एकोटा गोटी खेलौ, तइयो कोनो रोग कहाँ दबलक। पहिल सन्तानक बेरिमे, सासु हाट परसँ सठौरा कीनि अनलनि, सैह खेलौ। अखन देखै छी जे हाट-बजार घूमै बेरिमे, सिनेमा-सरकस देखै बेरिमे, मेला-ठेला घूमै बेरिमे निरोग छी मुदा काजक बेरिमे जत्ते दुनियामे रोग छै से सबटा हमरे दबने अछि। जाइ जाउ आब काजोक बेरि भ’ गेल।’’ चाह पीवि, सभ दिन बचेलाल टोलक बच्चा सभकेँ पढ़बै लागल। जाबे स्कूल जेबाक समय होय ताबे पढ़वैत। ककरो से एक्को पाइ नहि लैत। टोलक सब धिया-पूता पढ़ैमे सुढ़िया गेल। बचेलालक अपनो प्रतिष्ठा बढ़ै लगल। बचेलालक काज देखि सुमित्रा मने-मन खुश होइत। ....... जिनगीक जीत:ः 11 शिवकुमार आ रामनाथ फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास केलक। बिरड़ो जेँका रिजल्टक प्रचार भ’ गेल मुदा ने स्कूलमे रिजल्ट आयल आ ने अपने आखिये अखबारमे देखलक। शिवकुमार बचेलालक बेटा आ रामनाथ अछेलालक। रिजल्टक चर्चा त’ सभक कानमे पहुँचगेल मुदा बिना अपने देखने सोलहन्नी बिसवास कोना कयल जाय। शिवकुमारकेँ सोर पाड़ि बचेलाल कहलक- ‘‘बौआ! आन दिन त’ अखबारबला आठे बजे अखबार द’ जाइ छल मुदा आइ ऐबे ने कैल। तेँ झंझारपुर जा क’ अखबार कीनने आबह।’’ शिवकुमार आ रामनाथ, दुनू गोटे साइकिलसँ झंझारपुर अखवार आनै ले विदा भेल। बचेलाल मने-मन तारतम्य करै लगल जे बिना रिजल्ट निकलने, लोक कोना बुझलक? जे अखबारवला सब दिन अखबार वेचै अबैत छल ओकर अखबार रस्तेमे घोरि विद्यार्थियो आ गारजनो कीनि नेने हैत। तेँ भरिसक अखबार नइ बँचलै जे अपन गहिकी केँ दैति। स्कूलमे सेहो विद्यार्थी सब रिजल्ट देखै पहुँचै लगल। मुदा हेडमास्टर अखबारसँ अपन रजिष्टरमे लाल रंगक पेनसँ, प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी आ तृतीय श्रेणीक चेन्ह लगा, बहरामे रिजल्टक कटिंगकेँ टाँगि देलखिन। अछेलाल मने-मन खुश होइत। खुशीक कारण रहै जे एकटा मुरुखक बेटा, जे सब तरहे विपन्नताक जिनगी जीबैत, पास केलक। सुमित्राक मन एहि दुआरे खुशी जे जकरा जनमै स’ ल’ क’ अखन धरि सेवा केलहुँ ओ एकटा सीढ़ी पार केलक। रुमा तँ खुलि क’ नहि बजैत। मुदा मनमे अपन बेटा शिवकुमारकेँ मैट्रिक पास केने ओते खुशी नहि होइत जत्ते रामनाथक पास केने दुख। रामनाथ आ शिवकुमार बुक स्टाल पर गेल। जे अखबारक होलसेलर। ओहि ठाम सब अखवार बिका गेल छल। दुनू गोटे अचताइत-पचताइत बाजार गेल। बाजारमे एकटा दोकानमे अखबार देखलक। शिवकुमार ससरि क’ दोकानदार लग जा कहलक- ‘‘अहाँ तँ अखवार पढ़ि लेलहुँ। हमरा एकर काज अछि। एहिमे मैट्रिकक रिजल्ट निकलल छै तेँ हमरा द’ दिअ। जे दाम अखबारक छैक ओ हम द’ दइ छी।’’ दोकानदार राजी भ’ गेल। मुदा आखि लाल करैत बेटा ओहि दोकानदारकेँ कहलकै- ‘‘दू रुपैआमे अखबार नइ दिऔ। आइ एकर दाम पचास रुपैआ हेतै।’’ बेटाक बात सुनि बाप कहलकै- ‘‘बौआ, कमाइ ले तँ एत्तेटा दोकान छह, तखन ऐहेन काज किऐक करबह?’’ तरंगि क’ बेटा कहलकै- ‘‘बाबू जँ अहाँ ऐहेन दयालु छी ते, लौका-तुम्मा ल’ के, वृन्दावन चलि जाउ।’’ लौका-तुम्मा सुनि पिताकेँ नरसिंह तेज भ’ गेल। बाघ जेँका झपटैत बेटाकेँ कहलक- ‘‘जिनगी भरिक कमाइक ई दोकान छी। एहि चारि कोसीमे हमरा सब इमानदार बनिया बुझै अए, तकरा हम माटिमे मिला देव।’’ गद्दी परसँ अखबार उठा, शिवकुमारक हाथमे दैत पुनः बाजल- ‘‘ बच्चा ल’ जाउ। एक्को पाइ दाम नइ लेब।’’ अखबार ल’ दुनू गोटे (शिवनाथो आ रामनाथो) अपन रिजल्ट देखलक। रिजल्ट देखि दुनूक हृदयमे खुशीक हिलकोर उठै लगलै। साइकिल पकड़ि विदा भेल। रास्तामे होय जे हवाई जहाज जेँका उड़ि क’ घर पहुँची। दुइयेटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल छलै। एकटा शिक्षक, अखबार नेने बचेलाल ऐठाम आबि दुनू गोटेकेँ कहै एलखिन। ओहि शिक्षकक अपनत्व देखि बचेलालकेँ मनमे भेल जे अखनो नीक लोकक कमी नहि अछि। मास्टर सहैब जलखै क’ चाह पीविते रहति कि दुनू विद्यार्थी आयल। दुनू गोटे गुरुदेवकेँ प्रणाम क’ असिरवाद मंगलकनि।’’ सुमित्राक मन गद-गद। बचेलाल लग आबि कहलखिन- ‘‘बौआ मास्टरो साहैब छथिये। जते बच्चाकेँ घर पर पढ़बै छह सभके नोत द’ दहक। तोहर बेटा, मुदा हमरो तँ पोते छी, एहि खुशनामामे भोज क केँ सभकेँ खुआवह। बीस वर्ख पहिने, ग्रामीणक सहयोगसँ, एकटा हाई स्कूल खुजल अछि। तीनि-चारि साल धरि मात्र दुइये सय विद्यार्थी स्कूलमे। शिक्षको सब पचासे रुपैआ दरमाहा पर शिक्षण करैत। देहातमे पढ़लो-लिखलक संख्या कम्मे। मुदा सब शिक्षकक मनमे ई धारणा बनल जे इलाकामे शिक्षाक प्रसार हुअए। तेँ किछु कष्ट उठेनहुँ जँ स्कूल चलै त’ किऐक ने चलत। सब शिक्षक अपन-अपन घरेसँ अबैत-जाइत। लगमे स्कूल भेने शिवकुमारो आ रामनाथो नाओ लिखेलक। स्कूलक पढ़ाइयो नीक होइत। अठमेसँ शिवकुमार फस्ट करैत आ रामनाथ सेकेण्ड। जे मैट्रिकक टेस्ट परीछा धरि करैत रहल। शिवकुमार साइंस रखने आ रामनाथ आर्ट। नवमा धरि बचेलाल दुनू गोटेकेँ, घरो पर खुब मेहनत कराबथि। पढ़ैक रास्ता दुनू सीखि लेलक। हिसाव (मैथमेटिक्स) मे जेहने तेज शिबकुमार तेहने तेज भूगोलमे रामनाथ। वार्षिक परीक्षामे सौकेँ सौ अंक शिबकुमार हिसावमे अनैत दू-चारि नम्वर कम रामनाथ भूगोलमे। सालमे एक्को दिन स्कूल दुनू गोटे नागा नइ करैत। दुनू गोटे स्कूल जाइ काल, पँच-पँचटा अंग्रेजी शब्द, अपन तरहत्थीमे लिखि घोकैत (याद करैत) जाइत। स्कूल पहुँचैत-पहुँचैत दुनू, दुनूकेँ सुना दैत। स्कूल लग पहुँच दुनू गोटे अपन तरहत्थी कल पर घो लैत। फेरि छुट्टी भेला पर पँच-पँचटा शब्द लिखि, घर पर अबैत-अबैत याद क’ लैत। जाड़क मासमे छोट दिन आ जाड़ भेने जँ विद्यार्थीकेँ किछु बिलंबो भ’ जाय ते हेडमास्टर, समय बुझि, हाजरी बनबा देथिन। हुनका मनमे यैह रहनि जे कने बिलंबोसँ त’ विद्यार्थी स्कूल अबै अए। तेँ विद्यार्थीक बीच काफी प्रतिष्ठा रहनि। शिक्षक सभकेँ ओ कहथिन-जे पढ़वेसँ बेसी छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा पैदा करु। जहि छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा जगि जाइत ओ निश्चित पढ़वे करत। जहिसँ हमरो-अहाँकेँ पढ़बैमे सहूलियत हैत। जहि विद्यार्थीकेँ किताब नइ रहै वा देह पर मैल-कुचैल कपड़ा देखथिन, ओकरा आॅफिसमे बजा परिवारक दशा पूछि। मदति सेहो करथिन। ओना हेडमास्टर सुखी सम्पन्न परिवारक रहथि। मुदा जहिना गरीबो मनुक्खक देहमे धनिकक बुद्धि धोंसिया जाइत तहिना हुनका सुभ्यस्त रहनौ गरीबक बुद्धि देहमे घोसिआइल। स्कूलमे रिजल्टक कापी आ मार्कसीट आबि गेल। सभ विद्यार्थी अपन-अपन मार्क-सीट अनै स्कूल जाय लगल। शिवकुमारो आ रामनाथो गेल। दुनू गोटेक नम्बर, एक टकसँ हेडमास्टर देखि, दुनू गोटेकेँ पूछलखिन- ‘‘बौआ, आगू नाओ लिखेबह की ने? अगर जँ कोनो दिक्कत हुअअ ते कहिहह। अखन मार्क सीट नेने जा काल्हि दुनू-गोटे अपन-अपन पिताकेँ बजेने अबिहनु।’’ दुनू गोटे अपन-अपन नम्बर ल’ चलि गेल। दिनेश बावूक (हेडमास्टरक) योगदान, स्कूल बनबैमे, अग्रगण्य छलनि। ओ अपनाकेँ सिर्फ शिक्षकँे नहि बुझति। आजुक शिक्षक जेँका सिर्फ दरमहे पर गिद्ध-दृष्टि नहि रखथि। ओ सोचथि जे जहिना अपन बेटा-बेटी तहिना छात्र-छात्रा। माय-बाप बेटा-बेटीकेँ जन्म दैत, पालति-पोसैत मुदा षिक्षक गुरु ओ ब्रह्मस्वरुप कुम्हार छथि जे मनुष्यकेँ चाक पर गढ़ैत। अपन परिवारोसँ दिनेश बावू बेहद खुशी रहैत छथि। दिनेशबावूक पिता लोअर प्राइमरी स्कूलक शिक्षक छलथिन। हुनके पढ़ाओल आ रास्ता देखओल दिनेशबावू। जहि स बी.ए. पास क’ हाई स्कलमे शिक्षक बनलाह। जखन बेटा (दिनेशबाबूक) एम.ए.पास क’ कओलेजमे प्राध्यापक भेलखिन, तखन दुनू परानीक हृदय ओहन सरोवर जेँका बनि गेलनि, जहिमे हजरो कमल फुलाइत। रंग-विरंगक चिड़ै-चुनमुनी विहार करैत। जबसँ दिनेशबावूक बेटा सुनील नोकरी शुरु केलनि तब से ओ (दिनेषबावू) अपन दरमाहा गरीब-गुरबा विद्यार्थीकेँ देमए लगलखिन। बचेलाल आ अछेलाल, दुनू गोटे दिनेशबावूसँ भेटि करै विदा भेला। दुनू गोटे शिवकुमारो आ रामनाथोकेँ संग क’ लेलक। दिनेशबावू सेहो दुनू गोटेक प्रतीक्षेमे रहथि। दुनू गोटे दिनेशबावूकेँ प्रणाम क’ आफिसमे बैसल। बचेलाल दिनेशबावूकेँ पूछलखिन- ‘‘शिवकुमार आ रामनाथक माध्यमसँ अपने बजाओल।’’ दिनेशबावू- ‘‘हँ। बजबैक कारण अछि जे दुनू विद्यार्थी पढ़ैवला अछि तेँ दुनू गोटेक नाम बढ़ियाँ कओलेजमे लिखा दियौ।’’ बचेलाल- ‘‘विचार अपनो अछि। स्कूलक सब कागजात भेटला पर जत्ते जल्दी भ’ सकत ओते जल्दी नाओ लिखा देबै।’’ दिनेश- ‘‘स्कूलक सब कागजात आइये द’ दइ छी। जँ सम्हरि जाय तँ काल्हिये नाम लिखा दिऔ। नइ तँ परसु।’’ बचेलाल- ‘‘हमहू ते प्राइमरी स्कूलमे काज करै छी। काल्हि जा क’ परसुका छुट्टी ल’ लेब आ परसु जा क’ नाम लिखा आयब।’’ दिनेशबावू किरानीकेँ बजा सब काज कए देलखिन। दुनू गोटे बचेलालो आ अछेलालो विदा भ’ गेल। दोसर दिन बचेलाल स्कूल जा छुट्टीक आवेदन द’ देल। साझू पहर सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘माए, काल्हि शिवकुमारो आ रामनाथोक नाओ लिखवै ले मधुवनी जायव।’’ काओलेजमे पोताक नाओ लिखायव सुनि सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा, शिवकुमार तोहर बेटा छिअह मुदा पोता तँ हमरो छी। रामनाथोकेँ जनमेसँ सेवा करैत एलौ तेँ ओकरो मदति करब उचित भ’ जाइ छह। बेचारा अछेलाल मुरुख अछि मुदा समांग जेँका तँ ओहो अछि। जब तू मैट्रिक पास केलह तब हमरो मन मे छल जे तोरा कओलेजमे नाम लिखा दिअ। मुदा घरक जरजर हालत देखि मनक बात मनेमे रहि गेल। मुदा तइ ले बहुत दुखो ने भेल। किऐक तँ दुख तखन होइत जखन पिता हाइ स्कूल धरि पढ़ने रहितथुन्ह। हम अबला रहितौ बहुत केलियह। मुदा आइ तोरा ले अनिवार्य भ’ जाइ छह जे कम स’ कम बी. ए. तक बेटाकेँ पढ़ा दहक। ओना रामनाथ ले ओ भार नहि छह मुदा ओकरो तँ बेटे बनौने छी। काल्हि जखन मधुवनी जेवह ते अछेलालोकेँ संग क’ लिहह। किऐक तँ ऐहन-ऐहन काज लोककेँ जिनगी भरि मन रहैछै। सिर्फ अछेलाले टाकेँ नहि रामनाथोकेँ मन रहतै।’’ निरमलीसँ जयनगर जाइ वाली गाड़ी पाँचे बजे निरमलीसँ खुजैत अछि। तेँ अपना स्टेशन (तमुरिया) साढ़े पाँच तक पहुँच जेवाक अछि। ई बात बचेलाल मने-मन सोचैत। साढ़े नअ बजे मधुवनी गाड़ी पहुँच जाइत अछि। दस बजे कौलेजक आॅफिसो खुजैत हैत। तेँ दस बजे आॅफिस पहुँच शुरुहेमे अपन काज केलासँ साढ़े तीन बजे धरि स्टेशन चलि आयब। जहिसँ वैह गाड़ी (जयनगर-निरमली) पकड़ि सबेर-सकाल घर पर चलि आयब। जेवा कालमे गाड़ीसँ उतड़ि टीशने कातक होटलमे सब खा लेब आ रिक्शा पकड़ि चलि जायब। ई सब बात बचेलाल अछेलालो आ दुनू बच्चोकेँ कहि देलक। साढ़े चारिये बजे बचेलाल उठि तीनू गोटेकेँ उठा देलक। पर-पखानासँ आबि बचेलाल स्नान क’ लेलक। अछेलालो, शिवकुमारो आ रामनाथो नहा लेलक। पौने पाँच बजे गाड़ी पकड़ै चारु गोटे विदा भेल। छअ बजे गाड़ी तमुरिया पहुँच गेल। चारु गोटेक टिकट शिवकुमार कटा नेने छल। चारु गोटे गाड़ीमे बैसि गेल। बचेलाल छोड़ि क्यो ने मधुबनी देखने। तेँ तीनूक मनमे रंग-विरंगक बात अबै लगल। बचेलाल अपन काजक हिसाव जोड़ैत जे ई काज पहिने आ ई काज पाछू करब। अछेलाल मने-मन सोचैत जे गाममे झगड़ा-झंझट क’ मधुबनियेमे लोक केश-फौदारी लड़ैत अछि। सेहो कोट-कचहरी देखवै। जहलो देखबै जे केहेन होइ छै। फेरि कहिया जायब कहिया नै, तेँ जब जाइये रहल छी ते सब देखने आयब। साढ़े नअ बजे गाड़ी मधुबनी पहुँच गेल। गाड़ीसँ उतड़ि चारु गोटे विदा भेल। टीशने कातक होटलमे चारु गोटे खेलक। खेलाक बाद रिक्शा पकड़ि आर.के. कौलेज विदा भेल। आॅफिस जा अपन सब कागजात किरानीकेँ देलक। सब कागजात देखि किरानी लगले नाम लिखि रसीद द’ देलकनि। बचेलाल रुपैआ निकालि द’ देलखिन। कितावक सूचि दैत कहलकनि जे पनरह तारीखसँ पढ़ौनी चलत। एगारहे बजे सब कालेजसँ विदा भेल। बाजार आवि किताबक दोकान गेल। दोकान जा कितावक सूचि दोकानदारकेँ द’ सब किताव दै ले कहलखिन। दोकानदार बचेलालकेँ दोकानक भीतरे बैसाय एक-एक विषयक तीनि-तीनि, चारि-चारि लेखकक किताब निकालि आगूमे देमए लगलनि। मने-मन बचेलाल सोचैत जे ओते तँ समय नहि अछि जे पढ़ि-पढ़ि क’ किताब चुनव। मुदा किताबक संस्करण देखि-देखि किताव छँटिअबै लगल। जइ विषयक दूटा किताव पसिन होइन ओ दुनू ल’ लथि। कोर्सक किताव कीनि एकटा हिन्दी शव्दकोष आ एकटा अंग्रजी शब्दकोष सेहो कीनि लेलनि। सब विषयक लेल काॅपि सेहो कीनलनि। बचेलालक विचार देखि दोकानदार मने-मन खुशी होइत। ओ नोकरकेँ चाह-पान अनै ले पठौलक। चाह पीवैत समय दोकानदार बचेलालकेँ पूछलकनि- ‘‘अपनेक की जीविका अछि?’’ मने-मन बचेलाल सोचै लगल जे हमरा जीविकासँ दोकानदारकेँ की मतलब छैक। मुदा जब पूछलक ते नहियो कहब नीक नहि। मुस्कुराइत बचेलाल कहलक- ‘‘लोअर प्राइमरी स्कूलमे शिक्षक छी।’’ शिक्षकक नाम सुनि दोकानदार एकटा ‘‘अष्टावक्र गीता’’ वहिना दैत कहलकनि- ‘‘जहिया मधुबनी आबी तहिया हमरो भेटि जरुर दी।’’ ‘‘वड़बढ़ियाँ’’ कहि बचेलाल कितावक दाम द’ विदा भेल। कितावक एकटा थाक शिवकुमार आ एकटा रामनाथ लेलक। अखबारमे चैपेत क’ बान्हल गीता अपने बचेलाल लेलक। रास्तामे बचेलाल सोचलक जे जखन आइले छी आ अढ़ाई-तीनि घंटा समयो अछि, तखन डेरो किऐक ने ठीक कइये ली। अखन हमहू छी। जँ डेरा ठीक भेल रहत तँ फेरि नहि आबै पड़त। नबका-नवका, मोट-मोट किताब देखि शिवकुमार सोचैत जे सब विषयक काॅपियो भइये गेल, खूब मेहनतसँ पढ़ब। दश-दशटा अंग्रेजी आ हिन्दी शब्द सब दिन रटब। ओना सब विषयक अपन-अपन शब्द होइत छैक ओहो याद करै पड़त। जाबे काॅलेज खुजत ताबे सैह सब शब्द सीखि लेब जहिसँ क्लासमे बुझैमे परेशानी नइ हैत। सब विषय पढ़ै ले समय बाँटि लेब नइ तँ एकभग्गू पढ़व भ’ जायत। महत्व तँ सब विषयक छैक आ पासो त’ सब मे करै पड़त, तखने ने पासो हैत। नइ तँ कोनो विषयमे खूब नम्बर आओत आ कोनोमे फेल भ’ जायब। तेँ पहिने सब विषयक तैयारी ओहि रुपे करै पड़त जे पास नम्बर सब विषयमे आबे। तखन ने अधिक नम्वर आ नीक डिवीजनक तैयारी करब। रामनाथ व्याकरणक किताब खोलि क’ दोकाने पर देखने छल। जहिमे वैह सब देखने रहै जे हाइयो स्कूलमे पढ़ने छल, थोड़े विस्तारसँ अछि, तेँ कम्मे नव चीज पढ़ै पड़त। तेँ मने-मन खुशी होइत। चारु गोटे आगू-पाछू स्टेशन दिशि अबैत छल कि एक गोटे आगूमे साइकिल रोकि बचेलालकेँ प्रणाम केलकनि। मूड़ि निच्चा केने बचेलाल चलैत रहति। प्रणाम सुनि मुह उठा क दुनू हाथ जोड़ि प्रणामक जबाव देलखिन। प्रणामक जबाव तँ द’ देलखिन मुदा चिन्हलखिन नहि। तेँ ओहि आदमी दिशि तकैत जना किछु मन पाड़ै लगलाह। ओ आदमी बुझि गेल जे भरिसक नहि चिन्हलनि। धाँय द’ ओ कहलकनि- ‘‘मास्सैब, हम रमेसरा छी। अइ ठाम कोओपरेटिभ बैंकमे नोकरी करै छी।’’ रमेसराक बात सुनिते बचेलालकेँ धक दे मन पड़लनि जे ई तँ पढ़ाओल विद्यार्थी छी। मुस्कुराइत कहलकखिन - ‘‘बौआ, तोहर तँ चेहरा देखि चिन्हवे ने केलियह। एक चेराक देह छेलह जे अखन हाथी जेँका भ’ गेलह। परिवारो एतै रखै छह?’’ विहुँसति रमेसरा कहलकनि- ‘‘अप्पन घर बना नेने छी। आइ एतै पहुँनाइ करै पड़त। हमर सौभाग्य जे अहाँ एत’ एैल छी। हमहू गाम कम्मे जाइछी। तोहूमे धड़फड़ाएल गेलौं आ धड़फड़ाइले ऐलौं। तेँ भेंटो-घाँट करै नइ जा होइ अए।’’ बचेलाल- ‘‘बाल-बच्चा कैकटा छह?’’ रमेसरा- ‘‘दूटा अछि। दू परानी अपने छी। चारि गोड़ेक परिवार अछि। अपने किमहर-किमहर आइल छलिऐक?’’ ‘‘दुनू बच्चाकेँ कओलेजमे नाओ लिखवै आइल छलौ। आब रहै ले डेराक भाँज लगबैक अछि।’’ जँ नजरि पर कतौ एकांत डेरा बुझल हुअअ तँ ठीक क’ दाय।’’ जखन हम ऐठाम रहै छी तखन अपने केँ डेरा नइ हैत। पहिने चाह पीबि लेल जाउ। तखन आगूक गप-सप हेतइ।’’ एते कहि रमेसरा एकटा होटलमे सबकेँ संगे गेल। सभकेँ जलखै करा करा चाह पिऔलकनि। पान खुऔलकनि। पाँचो गोटे रेलवे स्टेशन दिशि चलला। मुसाफिरखाना आबि रमेसराकेँ बचेलाल कहलखिन- ‘‘अखन बैंकक समय अछि, तोँ जाह?’’ ‘‘मास्सैव, आब बैंक नहियो जायब तइयो ने किछु हैत। बैंके काजसँ एक गोड़े ऐठाम नोटिश दइ ले गेल छलौ। तेँ अखन बाहरेक काजमे छी। काल्हिये जबाव देबै।’’ ‘‘अखन गाड़ी अबैमे देरी अछि। ताबे डेराक भाँज लगा दाय। अच्छा एकटा बात कहअ जे होस्टल नीक हैत कि लौज?’’ मास्सैब, ने होस्टल नीक हैत आ ने लौज। मधुबनीक हवा ऐहन बिगड़ल अछि जे विद्यार्थी सब पढ़नाई छोड़ि-छोड़ि भरि दिन जातिवादीक गुट बना-बना झंझटे-फसादमे रहै अए। पढ़ैवला विद्यार्थी अपन-अपन अंगीतक ऐठाम रहि-रहि पढ़ैत अछि। हमरो डेरामे चारिटा कोठरी अछि। तीनिये कोठरीसँ अपन काज चलि जाइ अए। एकटा कोठरी पड़ले रहै अए।’’ ‘‘भाड़ा कोना की लेबहक?’’ मुस्कुराइत रमेसरा कहलकनि- ‘‘अपनेसँ भाड़ा नइ लेब। अहींक परसादे हम नोकरी करै छी। जहिना अहाँक विद्यार्थी तहिना तँ हमरो भाई भेला की ने?’’ ‘‘दश-पाँच दिनक बात रहैत तँ ठीक छल मुदासे तँ नइ अछि।’’ ‘‘भाड़ाक संबंधमे हम किछु ने कहब। एत्ते जरुर कहब जे दुनू बच्चाकेँ रहै ले डेरा जरुर देब।’’ असमंजसमे पड़ल बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, अहीं भाड़ा कहिओ?’’ धड़फड़ा क’ अछेलाल पचास रुपैआ महिना कहि देलक। दुनू गोटे सहमत भ’ गेला। सहमत होइत बचेलाल रमेसराकेँ पूछलखिन- ‘‘खाइ-पीवैक जोगार कोना हेतइ?’’ ‘‘चाउर-दालि गामसँ पठा देवइ। अपनो परिवारमे खेनाइ बनिते अछि ऐहो दुनू गोटे खेता।’’ ‘‘चाउर-दाइलिक अतिरिक्तो तँ नोन-तेल, तरकारीमे खरच हैत। तइ ले सय रुपैया महीना सेहो देव।’’ ‘‘बड़बढ़ियाँ।’’ सब जोगार लागि गेल। बचेलाल अछेलालकेँ कहलखिन- ‘‘काका अहाँ सब जा क’ डेरा देखि लियौ। हम एत्तै आराम करै छी।’’ तीनू गोटे केँ संग केने रमेसरा विदा भेल। स्टेशनसँ पूबारि भाग चकदहमे रमेसराक घर। एकांत जगह। सब केयो डेरा देखि लगले घुरि क’ आबि गेल। गाड़ीक टिकट कटौलक। थोड़े कालक बाद गाड़ी एलै। चारु गोटे गोसाइ उगले अपना स्टेशन पहुँच गेल। स्टेशनसँ गाम अबैक रास्तामे अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ! औझुका दिन बड़ सगुनिया छल।’’ बचेलाल- ‘‘से की?’’ ‘‘एक्के दिनमे कत्ते काज भेल। हमरा तँ होइ छल जे कै दिन लगत कै दिन ने। जाइये कालमे हमरा होइ छल जे धोती, चद्दरि ल’ लइ ले कही, मुदा नइ कहलौ।’’ ‘‘कक्का, काज करैक ढंग होइछै। ओना संयोगो होइछै। जकरा काज करैक ढंग होइछै ओ कम्मे समयमे बहुत काज क’ लइ अए। आ जकरा ढंग नहि होइछै ओकरा कम्मो काजमे बेसी समय लगैछै। संयोग संयोग अइ दुआरे कहलौ जे जना कओलेज गेलौ आ किरानिये नहि रहैत। चाहे किरानियो रहैत आ कोनो कागजे निह रहितै। चाहे जाइ कालमे गाड़िये छूटि जाइत। यैह सब कुसंयोग छियै।’’ शिवकुमारक आ रामनाथक मन चटपट करैत जे कखन घर पर पहुँच किताब देखब। रामनाथ अखबारक विशेषांक सब गत्ता लगबै ले रखने छल। किऐक तँ बिना गत्ता लगौल कितावक उपरका पन्ना गन्दो भ’ जाइछै आ ओदरबोक डर रहैछै। स्टेशनसँ घरक दूरी चारिये किलोमीटर। तेँ अबैमे वेसी देरियो ने लगल। तहूमे घरमुँहा। घर पर अबिते शिबकुमार हाथ-पाएर धोय, अंगा निकालि दलानक चैकी पर बैसि दादी (सुमित्रा) केँ सोर पाड़लक। सुमित्राकेँ अबिते किताब सब देखबै लगल। किताब देखि सुमित्रा कहलक-‘‘ बौआ मन लगाकेँ पढ़ियह। औझुका दिन तोरा जिनगीक एकटा चैबट्टी पर पहुँचा देलकह। एहिठामसँ जिनगीक आगूक रास्ता खुलतह। अखन, ने तोरा कोनो घरक भार छह आ ने आन कोनो। मात्र पढ़ैक छह। अखन जत्ते मेहनत क के पढ़वह ओत्ते अपने गुण करतह। मैट्रिक धरि बापो पढ़ल छथुन, तेँ ओत्ते धरि सरस्वतीक वास घरमे भ’ गेल छह। आब आगू कोन रहथुन ई तँ तोरे पर छह। भगवान ककरो अधला थोड़े करै छथिन, ओ तँ सबकेँ नीके करै छथिन। तखन तोरे अधला किअए करथुन। रामनाथोकेँ अपन सहोदरे भाय जेँका वुझिहक।’’ शिवकुमारकेँ सुमित्रा बुझबिते छलि कि अछेलालो आयल। अबिते अछेलाल सुमित्राकेँ कहै लगलनि- ‘‘भौजी! एत्ते उमेर बीति गेल आइ मधमन्नी देखलौ। येह बाप रे बड़ीटा बजार छै। बड़का-बड़का दोकानो सबछै। जाइ कालमे ते नीक-नाहाँति नइ देखलियै किअए ते रिक्शा पर चढ़ल रही। मुदा अबै कालमे देखलियै। बड़कीटा कौलेज छै। मारे मास्टर आ मारे चट्टिया देखलियै। बचेलाल दुनू गोड़ेकेँ नाम लिखबैत रहे आ हम घूमि-घूमि देखबे करी। बड़का-बड़का कोठा। एकटा घरमे मारे साइकिल देखलियै। ओते गनलो ने होइत। एक गोरे ओइ ठीन बैठल रहै ओ हमरा कहलक- ‘‘भाइ जी, तमाकुल खाइ छी।’’ हमहू बुझलौ जे किअए ने तमाकुले लाथे किछु बुझिओ ली। हम कहलियै- ‘‘हँ।’’ ससरिकेँ ओकरा लग गेलौ। मुदा वेचाराकेँ एक्केटा कुरसी रहै, जइ पर उ बैठल रहै। हम बगलेमे ईंटा-समटीक बनौल कम्मे खड़ा देवाल रहै ओही पर बैसलौ। दुनू गोड़े गप-सप करै लगलौ। ओ कहलक जे अपना जिलाकेँ सब गामक विद्यार्थी अइ कौलेजमे पढ़ै अए। ऐह कत्ते कहब भौजी, ओते की मनो अछि।’’ ....... जिनगीक जीत:ः 12 विकासपुर ऐला देवनकेँ साल लगि गेल। सालभरिक समयो नीक रहलै। ने बेसी बरखा भेल आ ने काम। जँ बेसी बरखा होइत तँ दहार होइत जँ नहि होइत तँ रौदी। ऐहेन समय गोटे-गोटे साल संयोगसँ होइत। किऐक तँ अखन धरिक जे समय होइत आइल अछि ओ एहिना होइत आइल अछि। गोटे साल बेसी वरखा भेल तँ गोटे साल जरुरतसँ कम। समय नीक भेने उपजो नीक भेलै तेँ सभहक मन हरियर। चारिये मास- अखाढ़ स’ ल’ क’ आसिन धरि- सालक ताला-कुन्जी रखैत। मुदा आठ मास-कातिक स’ ल’ क’ जेठ-धरिक कोनो मोजरे ने होइत। यैह, अपन मिथिला किसानक इतिहास रहल। सालो भरि देवन नसीवलाल काकासँ खेतीक लूरि सीखि-सीखि खेती करैत रहल। देवनकेँ नसीवलाल काका खेतीक लूरियो सीखवथि आ बीओ-बाइल दैत रहलखिन। नसीवलाल काकाक बताओल रास्ता आ मदतिसँ बुधनीक टूटल मन जागृत भ’ अगिला सालमेँ हँसी-खुशीसँ प्रवेश केलक। एक मनसँ उपरे वुधनी टिकुला आमक आमील बनौने छलि जे बहरवैया व्यापारी हाथे पाँच रुपैये सेर बेचलक। दू सय रुपैया भेलै। जइसँ तीनू गोटेक (वुधनी, देवन आ रमुआक) नुआ-वस्तर भ’ गेलै। दुनू आमोक गाछमे तत्ते आम भेलै जे मारि-धुसि क’ खेबो केलक आ तीनि सय रुपैया क’ बेचवो केलक। पनरह सेर अम्मटो बेचलक। पाँच सेर अपनो ले रखलक। जे कहियो काल खेबो करब आ मातृनवमी, जितिया ले रखबो करब। आमक आँठी, फकुआ बनबै ले, दुनू घरक चार पर अदहा फेकलक आ अदहा गाछ जनमै ले बाड़ीमे जमा केलक। जखन पिपहीमे हरियरी धेलकै कि सबके उखाड़ि-उखाड़ी बाड़ीमे एक-एक हाथ पर रोपि देलक। आठे-नअ मासमे डेढ़-दू हाथक गाछ सब भ’ गेलै। यैह बैशाखमे माटियो सक्कत भ’ गेलै आ गाछ रोपैक समयो आबि गेलै। सब गाछकेँ थल्ला काटि-काटि देवनो आ बुधनियो उखाड़ि लेलक। धानक नारक खोंचड़ि बना सब थल्लाकेँ बान्हि लेलक। मधुवनीक एकटा व्यापारी, जे नर्सरी खोलने, आबि पँच-पँच रुपैये छओ सौ गाछ कीनि लेलक। तीन हजार रुपैआ एक्के ठाम भ’ गेलै। अपनो ले देवन दसटा गाछ रोपि लेलक। मोटगर आमदनी देखि बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, चरि कठवा खेतमे चापाकल गड़ा लाय। ओइ दिन तोँ बजलो रहअ जे नसीवलाल काका कहलनि जे कम्मो खेत किऐक ने हुअए, मुदा पाइनिक जोगार भेने खेतक हस्तियो बढ़ि जाइछै आ उपजो।’’ घरक छप्पर पर जे आमक आँठी फेकने रहए ओ सूखि गेल। कातिकमे सब आँठी क’ उतारि लेलक। दुनू गोटे-देवनो आ बुधनियो सब आँठीकेँ सिलौट पर लोढ़हीसँ फोड़ि फकुआ (सुखल गुद्दा) एक दिशि रखलक आ बखलोइया दोसर दिस। बखलोइयाकँे चुल्हिमे जरा लेलक आ फकुआकेँ जाँतमे पीसि चिक्कस बना लेलक। ओहि चिक्कसकेँ रोटी पका-पका खाय। थोड़े फकुआकेँ देवन फोड़ि-फोड़ि सुपारी टूक जेँका बना मलसीमे रखि लेलक। जखन काज करै जाय तखन पान-सातटा टूक, डाॅड़मे खोंसि क’ नेने जाय आ सुपारिये जेँका खाय। बारहे सयमे कल गड़ा गेलै। अट्ठारह सय रुपैया बँचिये गेल। ओइ अट्ठारह सयमे सँ, चारि सय रुपैये कट्ठा चारि कट्ठा खेत, अपने खेतक आड़िमे, कीनि लेलक। डेढ़ सय रुपैया रजिष्ट्रीमे खरच भेलै। कल गड़ौलासँ आठ कट्ठा खेतमे धान पटबैक ओरियान भ’ गेलै अखाढ़मे बुधनी अपन पनरहो कट्ठा रोपने छलि। ओना खेतमे जोत-कोड़ तेनाहे सन भेल रहै मुदा तइयो बीआ आ समयक परसादे डेढ़ मनक कट्ठा धान भेलै। जँ खेतमे नीक-जेँका जोत-कोड़ ढकिया-पथिया आ खाद पड़ल रहितै तँ दोबरोसँ बेसी धान होइतै मुदा से नइ भेलै। साढ़े बाइस मन धान देखि वुधनी मनमे जीवेक आशा जगि गेलै। जखन पति मरल रहए तखन बुधनी क’ जीवैक आशा टूटि गेल रहै। अगर बेटा नहि रहितै तँ वेचारी या त’ जहर-माहूर खा मरि गेल रहैत वा चुमौन क दोसर घर चलि गेल रहैत। मुदा खेतक उपजा आ अपन मेहनतक हूबासँ जीवैक आशा बना लेलक। बरसात खतम भ’ गेलै। धानो सब आसिने-कातिकमे कटि गेलै। देवनकेँ नसीवलाल काका कहि देने रहथिन जे कम खेतवलाकेँ तरकारी खेती जरुर करक चाहिएै। एगारह कट्ठामे गहूमक खेती केलक आ चारि कट्ठामे तरकारीक खेती। एगारहो कट्ठामे गहूमक गाछ तँ नीक जनमलै मुदा पटबैक कोनो आशा रहबे ने करै। जइ बाधमे बुधनीक खेत ओइ बाधमे एक्केटा बोरिंग। जे बुधनीक खेतसँ बहुत हटिकेँ रहय। ने नाला ने पाइप। पटबै ले देवन औना-पौना क’ रहि जाइत मुदा नहिये पटै। संयोगसँ पूसमे एकटा बरखा भेलै। बरखाक पानि पीविते गहूमक गाछ हू-हू आ क’ उठलै। वियानो खूब केलकै। ओसो खूब गिरै। तेँ हाल अधिक दिन धरि धेने रहलै। ओहि हाल पर गहूम गम्हरा गेलै। गम्हरा देखि वुधनीकेँ मनमे आशा जगलै। पटौलहा गहूम जेँका तँ गहूम नहिये भेलै मुदा तइयो एक-तरहक भेलै। हरा-हरी पान-छ पसेरी कट्ठा गहूम भेलै। दुनू मिला क’ साढ़े छह मन गहूम भेलै। फगुआक सात-आठ दिन बाद गहूम कटल हेन। नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे चैतक-अन्हारमे वाओग खेरही बढ़िया हाइछै। तेँ चारिये दिनमे दुनू गोटे एगारहो कट्ठाकेँ तामि-कोड़ि खेरही वाओग क’ लेलक। अदहा जेठमे खेरही पकै लगलै। दुनू गोटे-वुधनियो आ देवनो-खेरही बीछि-बीछि तोड़ै लगल। अंतिम जेठ धरि सब खेरही तैयार क’ लेलक। तरकारी खेती ले जे चारि कट्ठा रखने रहै, ओहि खेतक धान कटिते, तैयार करै लगल। अदहा कातिक अबैत-अबैत खेत तैयार क’ लेलक। नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे तरकारी उपजबैक लेल पाइनिक ओरियान करै पड़त। जकरा पोखैर छै ओ पोखैरसँ पटबै अए। जकरा बोरिंग छै ओ बोरिंग से पटबै अए। मुदा जकरा ने पोखैर छै आ ने बोरिंग आ ने कल (चापाकल), ओ की करत? मुदा नसीवलाल काकाकेँ अपन जिनगीक अनुभव छलनि, ओ देवनकेँ कहने रहथिन जे चारि कट्ठामे जँ दूटा कूप खुनि ली, आ गर लगाकेँ खेती करी तँ, काज चलि सकै अए। खेत तैयार क’ देवन दूटा कूप खेतक दूटा कोन पर खुनि लेलक। कुपो खुनैमे देवनकँे बेसी भीड़ नहिये भेल। दुइये दिनमे एकटा कूप खुनि लिअए। छबे-साते हाथ खुनलासे पानि छूटि जाय। मुदा सबसँ कठिन बात ई अछि जे तरकारीमे तँ एक्के रंग पटौनियो नहि लगैत। किछु चीजक खेतीमे अधिक पटौनी लगैत आ किछुमे कम। बोरिंग जेँका तँ पानियो कूपमे नहिये होइत मुदा दुनू बेर-भिनसर आ साँझ-मिलाकेँ दस धुर तक खेत जरुर पटि जाइत। दुनू कूपमे बाँसक खूँटा गाड़ि दूटा ढेकुल गाड़ि नेने छल। जइसँ पटबैक ओरियान क’ नेने छल। तरकारी खेती देवन दू हिसाबसँ केलक। पहिल अपन परिवारक लेल आ दोसर आमदनीक लेल। गिरहस्तक लेल कातिक धरम मास होइत किऐक तँ जत्ते रंगक अन्न, तरकारी आ फलक खेती (लगौनाइ) कातिकमे होइत ओते सालक कोनो मासमे नहि होइत। मसल्लोक खेती करैक मुख्य मास कातिके छी। परिवारमे सब कथूक-अन्न, तीमन तरकारी, फल, मसल्ला जरुरत होइत। नोकरिया वा व्यापारी परिवार तँ पाइ कमाइत आ सब चीज कीनि-बेसाहि क’ काज चला लैत। मुदा किसान जँ नहि करत तँ ओ आओत कत्तेसँ। ई सोचि देवन सब वस्तुक खेती करैक विचार केलक। जे किसान जते नमहर अछि ओ ओते बेसी करैत आ जे जत्ते छोट अछि ओ ओते कम करैत। संगे जहि किसानकेँ बेसी खेते छै आ अपने नोकरी करैत अछि वा खेते छै मुदा ने पानिक जोगार छै आ ने होशगर अछि ओहो पछुऐबे करत। मुदा जे किसान लूरिगर आ हिम्मतगर अछि, जँ ओकरा अपना साधनक-खेत, बोरिंगक कमी छै, तइओ ओ आगू बढ़िये जायत किऐक तँ अपना इलाकाक (मिथिलाक) सौभाग्य रहल जे पोखरिकेँ धर्मक वस्तु मानल गेल। आ ऐहेन-ऐहेन धरमात्मा (धर्मात्मा) सभ भ’ चुकल छथि जे गाहीक-गाही पोखरि खुनौने छथि। ऐहनो-ऐहनो गाम सब अछि जहिमे अठारह गंड़ासँ उपरे पोखरि अछि। ततबे नहि, उत्तरसँ दछिन मुहे दरजनो नदी बहि रहल अछि। ततवे नहि गामो सबहक जे बनावटि (बुनावटि) अछि जहिमे एक-चैथाइ सँ ल’ क’ तीन चैथाई धरि गहीर खेत (चैर) अछि जे अपना पेटमे जेठ-अखाढ़ धरि पानि भरने रहैत अछि। तइ परसँ बोरिंग, नहरि वा आन-आन सेहो साधन मौजूद अछि। तहिना माइटिक आछि। दुनियामे जत्ते किस्मक नीक माटि अछि ओ मिथिलाक धरोहर थिकैक। इन्द्रो भगवान कहियो-काल खिसिआ जाइत छथिन, नइ तँ बेसी काल खुशिये रहै छथिन। जीव-जन्तु आ चिड़ै-चुनमुनी एहि रुपे भरल अछि, जे सदिखन मनुक्खक सेवाक लेल, जे सतत् धरती माताक गोदमे रहि, रकछा (रक्षा) करैत अछि। नसीवलाल काकाक विचारकेँ मनमे अरोपि देवन तरकारी खेतीमे जी-जानसँ पड़ि गेल। अपन परिवारकेँ लेल एक कट्ठा तरकारी- साग ठढ़िया, पालक। मुरै, गाजर, कोवी अल्लू, मटर अमाटर लगौने रहै, दस धुर मसल्ला-सेरसो, धनिया, लसुन, जमाइन, मेथी मिरचाइ आ पिऔज सेहो लगौने रहए। आमदनीक लेल- कोवी, टमाटर अल्लू लगौने। फागुन अबैत-अबैत बंधा कोबी आ टमाटर छोड़ि सब कटि गेल। ओना टमाटर माघेसँ तोड़व शुरु केने रहै, मुदा अखनो (फागुन) मनसम्फे रहबे करै। तरकारी आमदनीसँ बुधनी एकटा घर बनौलक। ओना बेचारिक मनमे रहै जे एकटा बड़द कीनव। मुदा घरक जरजर हालत देखि विचार बदलि लेलक। बुधनी ऐठाम देवन क’ ऐला बर्ख दिन भ’ गेल। बरखे दिनमे देवन बहुत किछु सीखबो केलक आ विकासेपुरमे किछु दिन आरो रहैक विचारो केलक। मुस्की दैत देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, बड़ सुन्दर गाम अछि। जइ गाममे नसीबलाल कक्का सन ज्ञानी आ खेतिहर लोक, सजन सन इमानदार आ बेर-बेगरतामे ठाढ़ रहनिहार लोक हुअए, ओ गाम किऐक ने नीक हैत।’’ अपन दुखड़ा सुनवैत बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बच्चा! जहिया रमुआक बाप मरि गेलखिन तहिया हुअए जे हमहू हुनके लागल मरि जाय। किऐक तँ ने कोनो लूरि छल आ ने क्यो कमा क’ खुऔनिहार, तखन दुख काटब छोड़ि दोसर रस्ते की छल। खेते बेचि-बेचि कइअ दिन खइतौ। मुदा रमुआ क’ देखि आखिसँ नोरो खसै आ देहो भुटकि गेल। मनमे आयल जे अखन ने रमुआ बच्चा अछि मुदा पाँच बरखक बाद तँ नोकरी-चाकरी करै जोकर भइये जायत। ताबे कुटौन-पिसौन क’ कहुना-कहुना गुजर करब। जँ कतौ चलि जायब वा जहर-माहूर खा मरि जायब तखन त’ वंश, खानदान उपटि जायत। मुदा तोरा पाबि आ नसीवलाल कक्काक देखओल रास्ता आ मदतिसँ आब बुझि पड़ै अए जे हँसी-खुशीसँ जिनगी काटि लेब। पैछला सुख ने भगवान छीनि लेलनि मुदा अगिला सुख तँ भगवान देबे करताह।’’ दोसर दिन भोरे देवन जलखै खा बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी! जत्ते बीआ-बाइल नसीवलाल काका देलनि, ओकर सवाई लगा सब चीज द’ दिअ। हुनका सब कुछ घुमा देवनि, जइसँ आगूओक रास्ता बनल रहत। नइ तँ मने-मन कहता जे देवन बेइमान अछि।’’ देवनक बात सुनि बुधनी घरसँ धान, गहूम, खेरही निकालि ओसार पर रखलक। हिसाब जोड़ि-जोड़ि देवन तीनू चीज ल’ मोटा बान्हलक। तीमन-तरकारीक तँ बीआ नइ रहै तेँ अंदाजेसँ सबहक दाम जोड़ि रुपैया लेलक। माथ पर मोटा ल’ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। नसीवलाल, दरबज्जा पर बैसि, बेटाकेँ बुझवैत रहथिन- ‘‘बौआ, मनुक्खक समरथाइ (जुआनी) जे होइछै, यैह जिनगीक सार अवस्था (मुख्य उमेर) थिक। एहि उमेरकेँ सदुपयोग (घरमक काजमे लगाएव) करक चाही। एहि उमेरमे जे जत्ते कठिन मेहनत करत ओकर जिनगी ओतेक सुन्दर बनतै। सुन्दरे जिनगी महामानवक जिनगी होइत। जत्ते मेहनत कैल हुअए ओहिमे कंजूसी नइ करी। कंजूसी केलासँ लोक चढ़ाइक रास्ता (आगू बढ़ैक) सँ भटकि जाइत अछि। तेँ इमानदारीसँ मेहनत करक चाही। जँ अपनासँ बेसी उपारजन हुअए तँ ओकरा बाँटि दी। बँटवाक प्रवृति बड़ पैघ वस्तु छी। किऐक तँ बँटलासँ जमा नइ होइत। संगे, जे अपने बँटनिहार अछि ओ दोसराक वस्तुक लोभे किऐक करत। लोभ तँ ओकरा होइछै जे संचय करै चाहैत अछि। जकरामे संचयक प्रवृति जगबे ने करतै ओकरामे लोभ आओत कोन रस्ते।’’ एते नसीबलाल बेटाकेँ कहिते रहथिन कि माथ पर मोटरी नेने देवन पहुँचल। देवनकेँ देखि नसीबलाल हँसैत कहलखिन- ‘‘देवन, बड़का मोटा माथ पर देखै छी। की आइ विकासपुरसँ विदा भ गेलियै?’’ नसीवलालक आगूमे मोटा रखि देवन कहलकनि- ‘‘काका, साल भरिसँ अपने ऐठामसँ मोटरी बान्हि-बान्हि बहुत चीज ल’ गेलौं, वैह दइ ले आइ एलौ।’’ नसीवलाल- ‘‘अच्छा, पहिने बैसू। भारी मोटा उठौने एलौ तेँ सुसता लिअ। तखन आगू गप-सप करब।’’ देवन बैसि पसीना पोछै लगल। पसीना पोछि देवन उठिकेँ कल पर जा भरि पेट पाइन पीलक। पानि पीबि आबि देवन कहै लगलनि- ‘‘काका, अहाँक असिरवादसँ हमरा दीदीक हालति एते सुधरि गेलै जे हँसैत जिनगी जीवि रहल अछि। हमरा तँ अपनेसँ बहुत आशा अछि। तेँ पैछला लेलहा दइ ले एलौ आ आगू जे लेब ओ आगू देब।’’ नसीवलाल- ‘‘बौआ, तोरा हम कोनो करजा देने रहियह जे तू घुरबै ले ऐलह। हम अपन काज केलौ, जइसँ तोरा लाभ भेलह। मोटा घुमौने जा। ई कखनो, मनमे नइ अनिहह जे काका खिसिया गेला। तेँ आब नइ देताह। सब मनुक्खकेँ अपन-अपन कर्तव्य होइत। जेकरा करब ओकर धरम होइत। जे हमहू केलौ। तोरो अपन कर्तव्य छह जे तोरा करै पड़तह। जहिना हम तोरा बुझेवो केलियह आ थोड़-थाड़ मदतियो केलियह, तहिना तोहू करह।’’ मोटा नेने देवन अपना ऐठाम चलि आयल। मोटा घुमल देखि बुघनी पूछलक- ‘‘बौआ, मोटा किअए घुमौने ऐलह?’’ ओसार पर मोटा रखि देवन उत्तर देलक- ‘‘दीदी, काका कहलनि जे कोनो हम करजा देने छेलियह जे घुमबै ऐलह। हम अपन कर्तव्य केलौ। तोहूँ जा अपन कर्तव्य करह।’’ असकरे नसीवलाल दरवज्जा पर बैसि, मने-मन सोचैत रहति जे चालीस बर्खसँ हम एहि गाम(विकासपुर) मे रहि अनबरत अपनो आ समाजोक उन्नतिक लेल सोचवो आ करबो करैत एलौ, मुदा अपने तँ आगू जरुर बढ़लौ मुदा समाज ओते नइ बढ़ि सकल जत्ते चाहैत छलौ। सवाल साधारण रहितौ जटिल अछि। जना पोखरिमे नमहर गोला फेकलासँ पाइनमे हिलकोर उठैत मुदा धीरे-धीरे असथिर भ’ ओहिना क’ ओहिना भ’ जाइत। जेना पहिने छल। ऐना किऐक होइत? समाजक तरमे ऐहन कोन शक्ति छिपल अछि जे पाइनिक हिलकोरकेँ शान्त क’ पुनः ओहि रुपमे ल’ अबैत। ........ जिनगीक जीत:ः 13 चारि बर्खक उपरान्त शिवकुमार हिसाब (मेथमेटिक्स) सँ आ रामनाथ भूगोल सँ आनर्स केलक। दुनूकेँ आनर्समे सत्तरि प्रतिशतसँ उपरे अंक आइल छलै। कओलेजोक पढ़ाई नीक चलैत छल। अरुन कुमार दत्त प्रिसिपल रहथि। ओ अपनो मेथमेटिक्स क’ जानल-मानल विद्वान। दत्त साहेव मात्र विद्वानेटा नहि बल्कि एक कुशल शासक आ कुशल अभिभावक सेहो। अपने बच्चा जेँका विद्यार्थियोक संग व्यवहार करथि। जहि विद्यार्थीकेँ कोनो वस्तुक अभाव देखथिन ओकरा भरपूर मदति सेहो करथिन। सदिखन मोनमे रहनि जे हमरा कओलेजक विद्यार्थी कोना नीक जेँका पढ़त। औझुका शिक्षक जेँका, हुनकामे एकको पाइ जाति-पाँतिक भेद-भाव नहि रहनि। रिजल्ट निकलला बाद शिवकुमारो आ रामनाथो जाकेँ हुनका (दत्त साहेव) सँ भेंट केलकनि। दुुनूकेँ देखि दत्त साहेव वेहद खुशी भेलखिन। हँसैत अरुण कुमार दत्त दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ! आब अहाँ सब देशक सुयोग्य नागरिक भेलहुँ, अहीं सब पर देशक भविष्य निर्भर करैत अछि। तेँ एक सुयोग्य नागरिकक जे दायित्व होइत छैक, ओकरा अपन लगन आ इमानदरीसँ पूरा करब परिवार स’ ल’ क’ समाज होइत देश भरिक भार अहाँ सभक कन्हा पर अछि तेँ ओकरा नीक जेँका निमाहब। यैह हमर असिरवाद अछि।’’ दत्त साहेवक विचारसँ दुनू (शिवकुमारो आ रामनाथोक) गोटेक आँखिमे स्नेहक नोर आबि गेल। भरभराइल अवाजमे शिवकुमार दुनू हाथ जोड़ि कहलकनि- ‘‘गुरुदेव! अपनेक असिरवाद जिनगी भरि निमाहैक कोशिश करब।’’ बचेलाल, अछेलाल आ सुमित्रा, तीनू गोटे दरबज्जा पर बैसि शिवकुमारो आ रामनाथोक संबंधमे गप-सप करैत रहति। तीनूक हृदय खुशीसँ गद-गद। मुदा आगू की करब? से ककरो मनमे अबिते नहि। बचेलाल बाजल- ‘‘काका! दुनू गोरे (षिबकुमार आ रामनाथ) बी. ए. पास तँ क’ लेलक। मुदा आगू की करवै?’’ बिना कोनो लागि-लपट क’ अछेलाल कहलकनि- ‘‘बौआ, हम तँ मुरुख छी, पढ़ै-लिखैक बात बुझबे ने करै छी, तेँ की कहब।’’ सुमित्रा दुनू गोटेकेँ सोर पाड़लक। शिवकुमारो आ रामनाथो आयल दुनू गोटेकेँ अबिते सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बौआ अहाँ दुनू गोरेक पढ़ाइसँ हमर छाती जुड़ा गेल। जखन बचेलालक पिता मुइला तखन हमरो हृदयमे छल जे बेटाकेँ खूब पढ़ाबी। मुदा सब तरहे दुखी रही तेँ मैट्रिके धरि पढ़ा सकलौ। मुदा आइ ओ इच्छा पूरि गेल। आब अहू दुनू गोरे पढ़ल-लिखल भेलौ तेँ आगू की करैक विचार अछि, से तँ अहीं सब सोचबै।’’ शिवकुमार कहलकनि- ‘‘दादी, काल्हि ललित मास्टर साहेव कहलनि जे मारवाड़ी काॅलेज दरभंगामे टीचर्स ट्रेनिंगक पढ़ाइ दू सालसँ होइछै। दस मासक कोर्स छैक। हमर मन होइ अए जे टेªनिंग क’ ली। जखन टेªंड भ’ जायब तँ कतौ ने कतौ, कोनो हाईस्कूलमे नोकरी भइये जायत।’’ शिवकुमारक बात सुनि बचेलालकेँ मनमे हूबा जगल। मारबाड़ी काॅलेजक नाम सुनि बचेलाल गुम्म भ’ किछु मन पाड़ै लगल। किछु कालक बाद मन पड़लनि जे बर्ख पाँचम धनश्यामपुर गेल रही। चुनावक समय रहै। ओहिठाम मारवाड़ी काॅलेजक उप प्राचार्य देवीदत्त पौद्दार सेहो चुनावी प्रचारमे आइल रहथि। ओ (देवीदत्त) सामाजिक कार्यकर्ता। मारवाड़ी रहितो अलग चालि-ढालिक लोक। एक्को मिसिया मारवाड़ी जेँका नहि बुझि पड़ैत। घुमैत-घुमैत, जत्ते हम रही ओतै ओहो चारि-पाँच गोटेक संग ऐला। जीप स्कूले पर लगा देने रहथिन आ पाएरे गाममे घूमैत रहति। जेही चैकी पर हम बैसल रही ओही पर ओहो आबि बैसलाह। हुनक नामक प्रचार तँ होइत रहै मुदा चेहरासँ नहि चिन्हैत रहिएनि। साधारण बगए-बानि। मारवाड़ी रहितो धुर-झाड़ मैथिली बजैत। चैकी पर बैसिते कहै लगलथिन- ‘‘जाधरि अपना देशमे समाजवादी शासन नहि हैत ताधरि किछु गनल गूथल धनीक (पूँजीपति) बहुसंख्यक गरीबकेँ लुटिते रहत। आ ओ ऐश-मौज करिते रहत। 1947 ई. मे अपना सबकेँ आजादी भेटल मुदा ओ पूर्ण आजादी नहि भेटल। नेँगड़ा आजादी भेटल। मोटा-मोटी सैह बुझू जे अंग्रेज भारतक गद्दी परसँ उतड़ल। कोनो देश कानूक-कायदासँ चलैत अछि। अपना ऐठाम अखनो ओकरे (अंग्रजेक) बनाओल कानूनसँ शासन चलैत अछि। तेँ सब गरीबकेँ एकजुट भ’ ओहि व्यस्थाके तोड़ै पड़त।’’ ओ बजिते रहथि कि हम पूछलिएनि- ‘‘समाजवाद ककरा कहै छै?’’ हमर प्रश्न सुनिते ओ (देवीदत्त पौद्दार) धाँय-धाँय कहै लगलथि। जना सब बात हुनका जीये पर रहनि, तहिना। ओ बुझा-बुझा कहै लगला- ‘‘उत्पादनक जे साधन अछि ओहि पर, व्यक्तिगत नहि, सामूहिक अधिकार समाजवाद होइत। जना खेत, खान आ कारखाना अछि। अखनो देखै छी जे एक-एकटा जमीनदार छथि जे सय कोन, हजार कोन जे लाख-लाख बीघा जमीन हथिऔने अछि। दोसर दिस देखै छी जे जोतैक लेल कोन बात जे घरो बन्हैक जमीन नहि छेक। तहिना खानोक अछि। जहि खानसँ अमूल्य वस्तु सब निकलैत अछि। ओहो किछु गनल-चुनल लोकक पल्लामे अछि। तहिना कारखनोकेँ देखै छी। एक-एकटा कारखानामे लाखो-लाख मजदूर काज करै अए, मुदा ओकरा कते दरमाहा भेटैक छैक।’’ एते कहि उठि क’ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘अखन चुनावी दौर छी तेँ समयक अभाव अछि।’’ हुनका संग हमहू उठि क’ ठाढ़ भेलौ। परिचय पूछलनि। हम कहलिएनि-एत एतैय कुटुमैतीमे आइल छी। हमर घर ऐठामसँ तीस-पेइतीस किलोमीटर उत्तर अछि। मधुबनी जिलामे पड़ैत छैक। तखन ओ कहलनि- ‘‘हम मारवाड़ी काॅलेजमे उप-प्राचार्य छी। जँ कहियो कोनो काज हुअए तँ भेटि करब।’’ एते बात मन पड़िते बचेलाल नमहर साँस छोड़ैत श्विकुमारकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ! काज (नाम लिखौनाइ) भ जेबाक चाही। काल्हि हम भोरुके गाड़ीसँ दरभंगा जा बुझि अबै छी। तखन जे-जना हैत से ऐलाक बाद कहब।’’ दोसर दिन भोरे गाड़ी पकड़ि बचेलाल दरभंगा विदा भेल। नअ बजे, गाड़ी दरभंगा पहुँचल। मुदा बचेलालकेँ काँलेज देखल नहि। स्टेशनसँ निकलि दोकानमे जलखै करै गेल। दोकानदारेकेँ बचेलाल काॅलेजक संबंधमे पूछलखिन। दोकानदार कहलकनि अहाँ देहातमे रहै छी, बौआ जायब। तेँ नीक हैत जे रिक्शा पकड़ि लिअ। ओ पहुँचा देत। बचेलालो सैह केलक। रिक्शावला काॅलेजक गेट पर बचेलालकेँ उताड़ि देलक। संयोगसँ देवीदत पौद्दारो तखने पहुँचलथि। दुनू एक-दोसर दिशि देखैत। चेहरा चिन्हार दुनू गोटेकेँ बुझि पड़नि। बचेलाल देवीतत्त पौद्दार केँ कहलखिन- ‘‘हमरा देवीदत्त बावूसँ भेटि करैक अछि।’’ देवीदत पूछलखिन- ‘‘कोन काज अछि? हमही छी।’’ प्रणाम क’ बचेलाल कहलखिन- ‘‘टीचर्स टेªनिंगमे दूटा विद्यार्थीकेँ नाम लिखबैक अछि।’’ देवीदत्त- ‘‘विद्यार्थी कहाँ छथि?’’ बचेलाल- ‘‘आइ बुझैइये ले एलौ। जँ भ’ जायत तँ काल्हिये तैयार भ’ क’ आयब।’’ देवीदत्त- ‘‘जाउ, भ’ जायत। काल्हि निश्चित चल आयब।’’ लगले बचेलाल घुमिकेँ स्टेशन आबि बारह बजे गाड़ी पकड़ि लेलक। दोसर दिन दुनू विद्र्थीक संग बचेलाल जा नाम लिखा देलक। दस मासक उपरान्त दुनू- रामनाथो आ शिवकुमारो प्रशिक्षित शिक्षक (ट्रेंड टीचर्स) भ’ गेल। जहि हाई स्कूलमे शिवकुमार आ रामनाथ पढ़ने छल, ओहि हाई स्कूलमे पहिलुका बैचक चारि गोट शिक्षक, मासे दिनक अन्तरमे, सेवा निवृत्ति भेला। सुदूर देहातमे स्कूल। चारु शिक्षक जगह पर नव शिक्षकक नियुक्तिक लेल भेकेन्सी भेल। अखवारोमे निकलल। मुदा ऐहेन हवा बहि गेल अछि जे नवयुवक गामक बातावरणमे रहै नहि चाहैत। इलाकाक जे पढ़ल-लिखल युवक अछि, ओ अधिकांश बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली जा क्यो कारखानामे तँ क्यो सेठ-साहूकारक दोकानमे, तँ क्यो सड़क पर रिक्शा चलबैत अछि। गाममे मात्र बूढ़-पुरान आ धिया-पूता मात्र रहि गेल अछि। जकरा चलैत किसान परिवार दिनानुदिन टूटि-टूटि नीचे मुहे ढड़कि रहल अछि। ने मेहनत करै वला लोक आ ने आधुनिक ढंगक खेती करैबला गाममे रहि गेल। जहिसँ ग्रामीण सम्पदा दिनानुदिन नष्ट भ’ रहल अछि। जाधरि देहात (ग्रामीण इलाका) मे पढ़ल-लिखल आ कर्मठ लोक जी-जाँति क’ नहि रहत ताधरि गामक उत्थान मात्र कल्पला बनि रहत। शहर-बजार देहातेकेँ श्रम-शक्तिसँ गन-गनाइत आगू मुहे बढ़ि रहल अछि जबकि गामक देश कहैबला भारत पाछू मुहे तेजीसँ ससरि रहल अछि। स्कूलक हेड-मास्टरकेँ बुझल जे शिवकुमार आ रामनाथ शिक्षक प्रशिक्षण केने अछि। ओ (हेडमास्टर) एकटा पत्र शिवकुमारकेँ लिखि चपरासीकेँ पठौलखिन। पत्रमे लिखल छल- प्रिय शिष्य शिवकुमार अहाँकेँ बुझले हैत जे स्कूलमे चारि गोट शिक्षक सेवा निवृतत्त भेला। हुनका जगह पर नव शिक्षकक बहाली अछि तेँ अहाँ दुनू गोटे-शिवकुमार आ रामनाथ- अवश्य आवेदन दी। अहाँ दुनू गोटे छात्र रहि चुकल छी, संगे घर लग स्कूलो अछि। बहालीक पूर्ण आश्वासन तँ हम नहि द’ सकै छी किऐक तँ बहाली कमिटीक माध्यमसँ हैत। मुदा एत्ते जरुर आश्वासन दइ छी जे अनुचित बहाली नहि हैत। प्रध्यानाध्यापक शिक्षकक बहालीसँ पनरह दिन पहिने विज्ञापन निकलल। अखबारोक माध्यमसँ प्रसारित भेल। प्रध्यानाध्यापक चिट्ठी देखि शिवकुमारकेँ मनमे पूर्ण विश्वास भ’ गेलै जे हमरा दुनू गोटेक बहाली जरुर हैत। पराते भने दुनू गोटे, अपन सब कागजात नेने स्कूल पहुँचल। आॅफिससँ फारम ल’ ओकरा भरि, अपन सब कागजातक नकल (सच्ची पतिलिपि) लगा आवेदन द’ देलक। आवेदन देनिहारक रफ्तार बहुत मन्द। पहिल-पहिल आवेदन शिवकुमार आ रामनाथे केलक। आवेदनक रफ्तार मन्द रहैक कारण छल जे गाम-घरमे बेसी पढ़लो-लिखल नहि। शहर-बजारक लोक गाममे नोकरी नहि करै चाहैत। बहालीक चारि दिन बँचल। अखन धरि मात्र दुइयेटा आवेदन पड़ल। स्कूलक सचिव स्कूल आवि प्रध्यानाध्यापककेँ पूछलखिन- ‘‘अखन धरि कतेक दरखास्त पड़ल?’’ प्रध्यानाध्यापकोकेँ नीक जेँका नहि बुझल। ओ किरानीकेँ बजा पूछलखिन। किरानी दुइयेटा दरखास्तक नाम कहलकनि। हेडोमास्टर आ सेक्रेट्रीओ गुम्म। दुनू गोटेक मनमे सैह होइत जे एते बेरोजगारी रहनहुँ आवेदन किऐक ने भ’ रहल अछि। मुदा दुनू गोटे गुम्मे-गुम्म रहि गेला। अंतिम दिन तीनिटा दरखास्त पड़ल। नियुक्तिक तिथि पूर्व निर्धारित। तेँ हेवे करत। सब उम्मीदवार नियुक्तिक दिन पहुँचल। तीनि गोटेक समिति बनल छल। हेडमास्टर, सेक्रेट्री आ जिला शिक्षा पदाधिकारी ओहि समितिक सदस्य छलाह। बिना कोनो झड़-झमेल क’ नियुक्ति भ गेलै। एक गोटे अनट्रेन्ड छला तेँ हुनका नहि भेलनि। हाथक-हाथे चारु गोटेकेँ चिट्ठीयो भेटि गेलै। घर पर आवि शिवकुमार दादी(सुमित्रा) केँ गोड़ लागि सब बात कहलक। गोड़ लागि रामनाथ पँजरामे चुपचाप ठाढ़। रामनाथकेँ सुमित्रा कहलक- ‘‘बेटा रामू, तोरा देखि हमरा एत्ते खुशी भ’ रहल अछि जेकर पारावार नइ अछि। शिवूक तँ बापो मास्टर छथिन मुदा तूँ ते उस्सर खेतक आमक गाछ जेँका भेलह।’’ ....... जिनगीक जीत:ः 14 शिवकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल स्कूलमे त्यागपत्र द’ देलक। बचेलालक त्यागपत्रसँ सौँसे गाम टीका-टिप्पनी चलै लगल। किछु गोटेकेँ दुख एहि दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदति भ’ जायत। किछु गोटेकेँ खुशियो होइत। किऐक तँ भने आमदनी बन्न भ’ गेलनि। मुदा सुमित्राकेँ ने हरख (हर्ष) आ ने विस्मय। किएक ते ओ नीक नहाँति बुझैत जे जत्ते मनुक्खक भीतर कमाइक शक्ति छै, ओते तँ नोकरीमे नहिये होइ छैक। संगे नोकरियो तँ जिनगी भरिक लेल नहिये होइछै। जाधरि लोक जुआन रहै अए ता धरिक लेल नोकरी होइछै। मुदा जखन शरीरक शक्ति कमै लगै छैक तखन नोकरी छुटिये जाइछै। नोकरी छुटला पर दरमाहाक अदहो स’ कम पेंशन भेटैत छैक। जबकि उमेर बेसी भेने शरीरक सब अंग धीरे-धीरे कमजोर हुअए लगैछै, जहि लेल नीक-निकुत भोजन आ दवाईक जरुरत हुअए लगै छैक। मुदा पेंशन कम भेटने सब खर्च पूरा नइ क’ पबै अए। जहिसँ जिनगी बोझ बनि जाइछै। संगे गिरहस्त परिवारमे जे नोकरिया काज होइ छैक। ओहो करैक लूरि नहि भ’ पवैत छैक। जहिसँ नोकरिया लोक अथबल भ’ जिनगी जीवेत अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे नोकरी कत्त’ करी? चाहे तँ सरकारमे वा पूँजीपति ऐठाम। ई बात सत्य जे प्रजातंत्र शासनमे, सरकारो अपने होइत तेँ शासन पद्धति चलेबाक लेल सहयोग करब अनिवार्य अछि। नइ तँ शासन चलत कोना? मुदा जे सरकार गनल-गूथल लोकक सेवा करैबला होय, आ विशाल जनसमूह कँ लेल मात्र जहलेटा होय, ऐहन शासनमे कोन रुपे सहयोग कयल जाय। दोसर बात अछि जे कारखाना। कल-कारखानामे नोकरी केनिहारक संग जे व्यवहार होइत ओ की गुलामीसँ कम होइछै। अगर स्वतंत्र देशक नागरिककेँ गुलामीक जिनगी जीवै पड़ै, तखन आजादीक महत्वे की? जे देश गामक देश कहबैत आ गामक सम्पदा या तँ ठमकले रहै वा पाछुऐ मुहे ससरैत जाय तखन देशक उन्नति, कल्पना छोड़ि आरो की हैत। तेँ जरुरत अछि जे गामक सम्पदा-खेत, पोखरि नदी, इत्यादिक समुचित व्यवस्था दुनू दिशिसँ- सरकारो दिशिसँ आ गामोक श्रम शक्तिसँ- कयल जाय। ई के करत? हम गाममे रहनिहार जँ गाम छोड़ि बजार दिशि भागैए तखन कोना हेतैक? एहि सब बातकेँ तर्क-वितर्क करैत बचेलाल नोकरीसँ त्यागपत्र देलक। साँझक समय। अन्हारक तृतीया रहने बेसी अन्हारो नै। बचेलाल, खेतसँ रिन्च-हथौरीक झोरा आ अछेलाल पटबैबला प्लास्टिकक पाइप आ कोदारि नेने घर पर अबैत। अबेर भेने रुमा दलानक आगूमे ठाढ़ भ’ दछिन मुहे रास्ता देखैत। आगू-आगू बचेलाल आ पाछू-पाछू अछेलालकेँ अबैत देखि रुमा ससरिकेँ थोड़े आगू बढ़ि बाजलि- ‘‘भगवान हमरो दुनू परानी पर खूब खुशी छथि। एक गोरे गोबर पाथै छी आ दोसर गोरे डीजल-मोबीलसँ देह-हाथ रंगै छै।’’ रुमाक बात सुनि अछेलाल भभा क’ हँसल, मुदा किछु बाजल नहि। मुस्की दैत बचेलाल बाजल- ‘‘अगर भगवान खुशी नइ छथि तँ जीवैक लेल एत्ते लूरि आ करैक शक्ति कोना देने छथि। काजके खेलौना बना कर्मशीले (कर्मनिष्ठे) टा खेलैत अछि।’’ एत्ते बजैत-बजैत दरबज्जा पर पहुँच गेल। दरवज्जा पर अबिते सब सामान रखि, सावुन ल’ स्नान करै बचेलाल कल पर गेल। सुमित्रा लालटेन लेसि, चारक बत्तीमे लटका देलक। रुमा चाह बनवै गेलि। जाबे बचेलाल नहा क’ दरवज्जा पर आयल ताबे रुमा चाह बना लेलक। चाह बना रुमा दरवज्जा पर आबि बचेलालक आगूमे राखि देलक। अछेलालो नहा क’ आबि गेल। तीनू गोटे चाह पीवै लगल। एक घोट चाह पीबि बचेलाल रुमाकेँ कहलक- ‘‘परिवारमे एहि रुपे काज केलासँ परिवार आगू मुहे ससरैत अछि। अखने देखियौ, जाबे हम नहेलहुँ ताबे अहाँ बनेलहुँ। माय लालटेन लेसि लेलक। दसे मिनटमे कत्ते काज भ’ गेल। अगर जँ अहलाइत-महलाइत सब करितौ ते कत्ते समय लगैत।’’ तीनू गिलास ल’ रुमा भानस करै आंगन गेलि। अछेलाल तमाकुल चुनबै लगल। बचेलाल मायकेँ पटौनीक संबंधमे कहिते छल कि ताबे गोनर आबि अछेलाल लग बैसल। अछेलाल अपनो तमाकुल खेलक आ गोनरोकेँ देलक। तमाकुल मुहमे लैत गोनर अछेलालकेँ कहै लगल- ‘‘भाय, अइ (एहि) सालसँ दुख पड़ा गेल।’’ उत्सुक भ’ अछेलाल पूछलक- ‘‘से की?’’ गोनर- ‘‘भाय! जहियासँ मोन अछि तहियासँ आइ धरि नदी कातक खेतमे एत्ते धान कहियो नै भेलि छल, जत्ते अइबेर (ऐबेर) भेल। बारह कट्ठाक कोला अछि, जइमे पनरह मनसे बेसी धान कहियो ने भेल छल। ऐबेर बारह क्वीन्टल धान भेल। जे खेत फागुनसँ अखाढ़ धरि परती बनल रहैत छल। गइबार-महीसबार सब गाइयो-महीसि चरबै छले आ गुल्लियो-डंडा खेलै छले। ओइमे एत्ते उपजा भेल जे सालो भरि बुतात चलत। घरवाली कहै छलि जे घरमे लछमी आबि गेलि। तेँ पाँचो मुरते साधूकेँ चूड़ा-दहीक भनडरा करब।’’ गोनर बजिते छल कि एका-एकी टोलक लोक अबै लगल। जना बरिआतीमे हँसी-मजाक होइत तहिना अपनामे सब करै लगल। हँसी-चैल समाप्त होइते एका-ऐकी अपन-अपन भरि दिनुका काजक गप शुरु केलक। अपन हूसलाहा काजक चर्चा, अपने मुहे क’ अपनो हँसै आ दोसरो हँसैत। एक हरफी सब अपन-अपन बात कहि चुकल। सबहक बात सुनि बचेलाल समूहेँकेँ पूछलक- ‘‘आगू की करैक विचार केने छी?’’ बचेलालक सवाल सुनि धनिकलाल बाजल- ‘‘भाय! एकटा नवका धानक बीआ मामा गामसँ अनलौ हेन। हमरे सोझामे दाउन (दौन) भेलै। ममिऔत भाय जोखलनि। जोखिकेँ कहलनि जे भाय चारि कट्ठामे छह क्वीन्टल धान भेल।’’ गोनर पूछलक- ‘‘देखैमे धान केहेन अछि?’’ धनिकलाल- ‘‘नमगर-नमगर, खूब मेही, उज्जर-उज्जर धान अछि। गमकबो करै अए।’’ गोनर- ‘‘भात केहेन होइछै?’’ धनिकलाल- ‘‘ऐह भैया, जखने थारी आगूमे औतह कि गम-गम करै लगतह। ओना हम ते टटके धानक चाउर कुटा क’ भात खेलौ, मुदा तइयो की कहबह।’’ गोनर- ‘‘कत्ते बीआ अनलह?’’ धनिकलाल- ‘‘एक्के पसेरी अनलौ। अइ से पाँच कट्ठा रोपाइत। अगिला साल तँ सबके वीआ देबइ।’’ गोनर- ‘‘तोँ ते एक्केटा खेतमे रोपबह। मुदा दू-दू आँटी जँ आनो बाधवलाकेँ देवहक ते ओहिसँ आनो बाधमे जँचा जाइत। किऐक तँ सब धान सब तरहक माइटमे एक्के रंग नइ धड़ै छै। ओहो जाँच भ’ जायत।’’ धनिकलाल- ‘‘बड़वढ़िया बात कहलह। जँ दश आँटी बीआ देलासँ सब बाधक उपजा जँचा जाइत, ओहो नीके हैत।’’ गाममे सिर्फ खेत पटबैक सुविधा भेलासँ गामक रुप-रेखा बदलै लगल। गृहस्तमे नव उत्साह जगल। अनिश्चितताक खेती निश्चिततामे बदलै लगल। जबकि खेतीक लेल पानि सिर्फ एकटा साधन छी। नीक वीआ, खाद, खेत जोतै-कोड़ैक औजार, नव ढंगक खेती करैक लूरि सब बाकिये अछि सिर्फ एकटा साधन भेलासँ उपजामे दोबर-तेबरक वृद्धि भेल। गृहस्तक बीच प्रेम-भाव सेहो बढ़ल। खेतीक जिज्ञासा सेहो बढ़ै लगलै। जइ किसान केँ गरीबी कखनो मुहमे हँसी नइ आवै दैत, ओहि किसानक मुहमे सदिखन हँसी-खुशी अबै लगल। खाई-पीबै राति भ’ गेल। दरबज्जा खाली देखि शिवकुमार आ रामनाथ आयल। दुनू गोटेकेँ देखि बचेलाल पूछलखिन- ‘‘बौआ, पढ़बैमे मन लगै छह की नहि?’’ दुनू गोटे-शिवकुमारो आ रामनाथो कहलकनि हेँ।’’ दुनू गोटेकेँ मुहसँ हँसी सुनि बचेलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ मनमे कखनो ई नै अनिहह जे दरमाहा लइ छियै तेँ पढ़बै छी। सब बच्चाकेँ अपन छोट भाई बुझि पढ़विहह। ओ (बच्चा) कोना पढ़त? एहि पर सदिखन ध्यान रखिहह। ओहि बच्चाक जिनगी ओहि अवस्थामे होइत जहि अवस्थामे उगैत सुरुजक होइत। उगैत सुरुजक समयमे जँ मेघ लगि जाइत छैक तँ रातिये जेँका दिनो बुझि पड़ैत छैक। तेँ जत्ते शक्ति अछि ओहिमे एक्को मिसिआ कलछप्पन पढ़बैमे नहि करिहह। अखन तक तू दुनू गोरे एकपेरिया रास्तासँ चलैत एलँह मुदा आब चैबट्टी पर पहुँच गेलह। तेँ चारु दिशि देखिकेँ चलै पड़तह। जना पहिल रास्ता भेल नोकरीकेँ इमानदारीसँ निमाहैक दोसर भेल परिवार, तेसर भेल माए-बाप आ चारिम भेल समाज। एकर संग-संग अपन अध्ययन सेहो अछि। आइ हाई स्कूलक शिक्षक भलहेँ, तेँ की एतबेमे अपनाकेँ समेटि क’ राखि लेवह। आगूक डिग्री प्राप्त कयलासँ कओलेजोक, शिक्षक भ’ सकै छह। जिनगीमे सतत चलैक कोशिश करक चाही। सतत चलनिहारे जिनगीक महत्व बुझैत अछि। हमही शिक्षक छलौ। स्कूलसँ त्यागपत्र द’ गृहस्तीक जिनगीमे प्रवेश केलहुँ। पहिनेसँ कनियो कम आनन्द अखन नहि होइत अछि नव-नव काजक लूरि सेहो सीखि रहल छी आ नव-उत्साहक संग जिनगी सेहो बीतबै छी। मुदा तइयो एकटा अभाव जिनगीमे अखन ध्रि रहिये गेल ओ अभाव थिक। देषाटन। धुमब-फीरब सेहो जिनगीक लेल बड़ पैध काज थिक। बिना घुमने-फीरने दुनियाँकेँ देखि कोना सकबै? कोन ठामक मनुक्ख केहन अछि, कोना रहैक अछि? कोन तरहक जिनगी जीवैत अछि। से त’ घुमलाक बादे बुझबै। अनेको पहाड़, अनेको पठार, अनेको झील, अनेको टावू, अनेको सागर, अनेको झड़ना, अनेको जंगल आ अनेको रंगक माटिक इलाकाक देश भारत अछि। अनेको तरहक प्राचीनसँ अद्यतन सभ्यता, संस्कृतिसँ सम्पन्न देश, बिना देखलासँ कोना बुझल जायत। पहाड़क उपर स’ ल’ क’ समुद्रक किनछरि धरि बसैवला लोक, हजारो रंगक फल-फूलसँ सजल देश बिना देखलासँ कोना कियो बुझि सकै अए। तेँ देशक भ्रमण सभक लेल ओहने जरुरत अछि जेहने जिनगीक दोसर-तेसर जरुरत। तेँ जे समय बीति गेल ओ तँ घूरिके नइ आओत मुदा जे बँचल अछि ओहिमे जहाँ धरि संभव भ’ सकत, ओ तँ पुरबैक कोशिश करब।’’ ....... जिनगीक जीत:ः 15 फागुन मास। मौसमक बदलल रुखि। समुद्री तूफान क’ चलैत, सओने जेँका मेघो लटकल आ हबो चलैत। कखनो-कखनो बून्दा-बुन्दी पानियो होइत आ हबो कम-बेसी होइत। कखनो काल तेज बरखो आ तेज हबो बहै लगैत जहिसँ सब जाड़े सिरसिराइ लगैत। समयक रुखि देखि, बाध-बोनक काज छोड़ि सब घरे-अंगनक आइ-पाइमे लगल। कियो-कियो घुर पजारि आगिये तपैत। देवन मने-मन सोचै जे फागुन सनक मासमे ऐना किअए होइ अए। मौसमोक कोनो ठेकान नइछै। जहिना लोकक कोनो ठेकान नहि जे, बाजत किछु आ करत किछु। तहिना भगवानोक कोनो ठेकान नहि। कहू जे फागुन सनक सुन्दर मास, तहिमे ऐना किअए होइछै। एते हवा कत-अ जमा छै जे एते बहिकेँ पछिम मुहे चलि गेल, मुदा अखनो धरि सठल हेन नहि! कहू जे कते आशा लगाकेँ लोेक मसुरी, खेसारी, केरावक खेती केने छल, उखाड़ि-उखाड़ि सब घर अंगनासँ ल’ क’ खरिहान धरि सुखै ले पसारने अछि आ ई पाइन सबके सड़ाओत। ने भुस्सी मालक खाइ जोकर रहत आ ने दाना। सब दाना पानिमे भीजि-भीजि सड़त। कने-मने जे जाड़ो चलि गेल छल, सेहो घुरि क’ चलि आओत। फेरि मनमे एलै जे भने हमहीं केने छी, जे खेसारी-मौसरीक खेतिये ने केने छी। गहूमक लेखेते सोना बरसि रहल अछि। अइबेर एक्कोटा मिरहिन्नी दाना नइ हैत। नसीबलाल कक्काक हिसाब ठीके छनि। जे कतिका धान, गहूम आ खेरही एक खेतमे करी। फगुनिया हाल भेल, मन खुशी क देलक। आठे दिनक बाद गहूम काटि लेब आ खेरही बाओग क’ देबइ। पटबीये खेत जेँका खेरही भुभुआकेँ जनमत। फँकलो-फुकल बीआ जनमिऐ जायत। मुदा पिऔजमे गरदनि कटि जायत। काल्हिये पटेलहुँ, तइ परसँ तेहेन बरखा होइ अए जे पनरहो दिनमे खेत फड़हर नइ हैत। जइसँ सड़त। मुदा की करबै? लोक अपना भरि ने सोचि क’ करै अए मुदा अनहोनी के के रोकत। असकरे देवन मालक घरक दलानमे बैसि सोचैत। एक्केटा घरमे, अदहामे माल बन्हैत आ अदहामे वैइसै-उठै ले दरबज्जा बनौने। असकरे देवनकेँ बैसल देखि बुधनीयो आइल। बुधनीकेँ बैसितहि देवन कहलक- ‘‘दीदी, आब हम छबे मास रहब। किऐक ते एगारह बर्ख छअ महीना भ’ गेल। तेँ जहियासँ हम एलहुँ तहियासँ कोन-कोन काज भेल आ कोन-कोन पछुआइल अछि, से दुनू गोरे हिसाब जोड़ि लिअ।’’ देवनके नहि रहब सुनि बुधनीक मनमे धक्का लगल। उदास भ’ बुधनी कहलकै- ‘‘बौआ, तोरा पाबि हमरा बहुत भेल। हमरा सन-सन कते लोक बौआ-ढहनाकेँ मरैत अछि। मुदा तू हमरेटा नहि हमरा कुल-खनदानकेँ जीया क’ रखले।’’ बुधनी देवनकेँ कहिते छलि कि सजन सेहो चद्दरि ओढ़ने आयल। सजनकेँ चैकी पर बैसबैत देवन कहलक- ‘‘भैया, कोन काज करै छेलह जे हाथ-पाएरमे थाल लागल देखै छिअह?’’ सजन- ‘‘बौआ कि कहिअ’ मालक घर छाड़ै ले खढ़ अटियाकेँ रखने छलौ। ओहो भीजि गेल आ घरो खूब चुबल। बड़दक देह परहक झोली भीजि गेलै। ओइह हटा क’ सुखलाहा बोरा देह पर देलियै। थैरमे पानि अटकि गेल छले, ओकरे खड़रिकेँ बहार केलौ। सैह थाल लगल अछि।’’ अदहा मुह झँपने, मुस्की दैत बुधनी बाजलि- ‘‘भैयाक जेहने बड़द मोटाइल छनि तहिना दीदीयो मोटाइल जाइ छनि।’’ बुधनी बात सुनि सजन खुशियो भेल आ मने-मन सोचोओ लगल जे ऐहेन बात किअए कहलनि। कनिये काल चुप रहि सजन कहलकनि- ‘‘कनियाँ, भनसिया मोटाइल जाइ अए कि फुलै अए, से अपनो मनमे अबै अए। आन चीज ते नइ देखै छियै, मगर अल्लू बर खाइये। से अल्लुऐ कोनो करामति तरे-तर करैछै कि की?’’ बात बदलैत बुधनी बाजलि- ‘‘आइ तँ हमरा बड़का पहपैट भेल गेल। कुसमयक बरखा होइ अए, एक्कोटा सुखल जरना काठी घरमे नइ अछि। कथि ल’ क’ भानस करब? गोरहो मचाने पर अछि आ चिपरी पाथि-पाथि, सुखा-सुखा जे भानस करै छलौ से सबटा भीजियो गेल।’’ सजन- ‘‘हमरो ते सैह होइत। मुदा एकटा सुखल ढेंग छलै ओकरे फाड़ि क’ चुल्हि लगमे द’ भनसियाकेँ कहलिये जे आइ खिच्चैड़ आ अल्लूक चोखा बनाउ। हुअए ते सेरसोक चटनी सेहो बनाएब।’’ बुधनी- ‘‘सेरसोक चटनी कोना बनबै छथिन?’’ -‘‘से नइ बुझल अछि। बड़ सुन्दर चटनी होइछै। जत्ते गोरे ले बनावी ओइ हिसाबसँ सेरसो ल’ ली। ओहि हिसाब से लसुन सेहो ल’ ली जम्बीरी नेबो हुअए ते बड़बढ़िया नै ते कागजियो नेबोसँ काज चलि जाइछै। हिसाबेसँ नून आ मिरचाइ सेहो ल’ ली। सेरसो, लसुन, नून-मिररचाइकेँ खूब हलसँ पीसि ली आ नेबो गाड़ि दिअए। भ’ गेल चटनी।’’ - ‘‘बाह, ई ते सब दिना चटनी हैत।’’ सजन आ बुधनीक बातकेँ विराम दैत देवन- ‘‘भैया, भने दुनू गोरे छी। ऐठाम ऐना हमरा साढ़े एगारह बर्ख भ’ गेल। छअ मास पुरिते हम चलि जायब। तीनू गोरे छी तेँ कहि देलहुँ जँ नइ कहितौ आ चलि जाइतौ ते अहू सब कहितौ जे बिना कहने-सुनने चलि गेल।’’ देवनकेँ प्रशंसा करैत सजन कहै लगलै- ‘‘तोरा पाबि बेचारीकेँ सबकुछ भ’ गेलै। खेतो-पथार भ’ गेलै, मालो-जाल भ’ गेलै, घरो-दुआर भ’ गेलै। रमुआ सेहो विआह करै जोकर भइये गेलै। हमरा बुझने आब वैहटा काज पछुआयल अछि।’’ सजनक बात सुनि देवन- ‘‘भैया, अपनो मनमे अछि। मुदा मन अचताइ-पचताइ अए। किऐक ते इलाका-इलाकाक कन्या अलग-अलग चालि ढालि आ जिनगी छैक। तेँ कोन इलाका कुटुमैती करी, ई बड़ भारी सवाल अछि। ओना समाजमे नवका हवा लगने किछु बदललै मुदा अखनो ग्रामीण इलाकामे सत्तरिसँ अस्सी प्रतिशत वैह छैक। अपना इलाकाक कुटुमैती, पूवमे भागलपुर, पछिममे मुजफ्फरपुर, दछिनमे गंगाकात आ उत्तरमे नेपालक तराई इलाका धरि होइ अए। मुदा सब जाइतिक नहि। राजपूत, भूमिहारक कुटुमैती पछिम आ दछिन अधिक होइत, जे भोजपुरी आ मगही भाषाक इलाका छी। जहिसँ एहिठामक (ऐठामक) भाषा पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ैत। किऐक तँ ओहि इलाकाक सुआसिनक संग भाषो आ व्यवहारो चलि अबैत। तहिना ब्राह्मणक कुटुमैती भागलपुर दिशि होइत, जहिसँ अन्तिका बोली आ भगलपुरिया व्यवहार सेहो चलि अबैत। मुदा पछुऐलहा जाइतिक कुटुमैती नेपालक तराइ सँ ल’ क’ अल्लापुर, धरमपुर, पचही, नारे दिगर, भौर परगनामे अधिक होइत। पचही परगनाक बोली आ व्यवहार अल्लापुर परगना आ नेपालक तराइ इलाकाक बोली आ व्यवहारसँ बहुत नीक अछि। मुदा जे मेहनती कन्या अल्लापुरक, नेपालक आ कोशी इलाकाक होइत ओ पचही, नारेदिगर आ भौरक नहि होइत। तें गरीब लोकक लेल अल्लापुर, कोशीइलाका आ नेपालक नीक होइत।’’ देवनक बातकेँ धियानसँ सुनि बुधनी मुस्कुराइत बाजलि- ‘‘हमरो नैहर भौरे परगनामे पड़ैत अछि। जाबे नैहरमे छलौ (दुरागमनसँ पूर्व) ताबे घास छीलब छोड़ि, ने दोसर काज केलहुँ आ ने लूरि भेलि। हँ, अंगना-घरक काज (नीपनाइ, बहारनाइ, कोठी पाड़नाई, चुल्हि पाड़नाई, भानस-भात केनाई) माय जरुर सिखा देलक। मुदा जिनगी जिबैक लेल तँ कमाईक (उपार्जन) लूरि जरुरी होइत, से नइ भेलि। अही ठीन देखै छी जे अल्लापुरवाली अछि जे पुरुखोक कान कटै अए। हर जोतनाई छोड़ि, ऐहेन एक्कोटा काज नै अछि जेकर लूरि ओकरा नइछै।’’ बुधनीक बात सुनि सजन कहलक- ‘‘कनियाँ, हमरा-अहाँ घरमे कमासुते कनि॰ााँ चाही।’’ बुधनी- ‘‘हँ भैया! ढोरबा कक्काकेँ देखै छथिन, दान-दहेजक लोभे केहेन चमचिकनी पुतोहू उठाकेँ ल’ अनलक जइसँ घरमे सदिखन मुहे फुल्ला-फुल्ली होइत रहैछै। ओहन पुतोहू हमरा नइ आनि दोथु। हमरा दान-दहेजक लोभ नइ अछि। पुतोहू कमासुत हुअए।’’ चारि मास बीति गेल। रमुआक विआहो भ’ गेल। जेहने पुतोहू बुधनी चाहैत छलि तेहने पुतोहू भेलै। मुदा समाज अखनो बुधनीकेँ उपराग दइते अछि जे ऐहेन दब खेनाइ बरिआतीमे कतौ ने खेने छलौ। जेहिना खेनाइ देलक तेहिना सुतै ले पटेरक पटिया आ नारक आँटीक सिरमा देलक। मुदा दही ओहन खुऔलक जे जिनगीमे नै खेने छलौ।’’ परसू देवनकेँ बारह बर्ख पूरि जायत। देवनक मनमे विचित्र द्वन्द उत्पन्न भ’ गेल। एक दिशि विकासक प्रक्रियामे आगू बढ़ैत समाजक मोह तँ दोसर दिशि दुनिया देखैक जिज्ञासा मनमे। तर्क-वितर्क करैत देवन एहि निष्कर्ष पर आबि गेल जे आर्थिक विकासक प्रक्रिया गाममे चलि रहल अछि मुदा दुनिया देखैक जिज्ञासा तँ बौद्धिक विकासक प्रक्रिया छी। विकास तँ ओहो छी। बिना बौद्धिक विकास भेने आर्थिको विकास तँ रास्ता ध’ क’ नहिये चलत। किऐक तँ जतबे ऊँचाई पर बुद्धि रहत ततबे तक ने आर्थिक विकास हैत। जहिसँ जिनगीक विकास अवरुद्ध भ’ जायत। मनुक्ख, समाज आ दुनिया कत्ते आगू तक बढ़त, ई तँ अखन अनुमानेसँ कहल जा सकैत अछि। जे सहियो आ गलतियो भ’ सकैत अछि। तेँ दुनियाँ देखब जरुरी अछि। जहिना वौद्धिक विकासक लेल देवनक मन छटपटाइत तहिना आर्थिक विकासक सुख सेहो शरीरकेँ अपना दिशि खिंचैत। किऐक तँ जहि देवनकेँ बच्चा सँ ल’ क’ किछु दिन पूर्व तक ने भरि पेट अन्न भेटल आ ने भरि देह बस्त्र। ने नीक घरक सुख भेटल आ ने बिसबासू जिनगी। एहि बीच देवनक मन आ शरीर खिंचा-तिरी करैत। कखनो देवन इमहर झुकैत तँ कखनो ओमहर। मुदा जिनगीक संकल्प मनुष्यकेँ सिद्धान्तनिष्ट बनबैत। ई विचार मनमे अबिते देवन बुधनी ऐठामसँ जाइक विचार पक्का क’ लेलक। पुनः। देवनक मनमे आइल जे विकासपुर छोड़ैसँ पहिने नसीवलाल कक्कासँ भेटि क’ लेब जरुरी अछि। किऐक तँ हुनके (नसीवलाल) पाबि हम अइ गाममे बारह वर्ख हँसी-खुशीसँ बितेलौ। खाली जिनगिये नइ बितेलौ बल्कि बहुत किछु अनुभवो केलौ आ सिखबो केलौ। दोसर दिन भोरे सुति-उठिकेँ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। गायकेँ सानी लगा, हाथ धोय, नसीबलाल दरबज्जा पर आबि चैकी पर बैसि मने-मन सोचति रहति जे मनुष्य खूब पढ़ि-लिखि लिअए, खूब समृद्धिशाली बनि जाय। परिवारसँ ल’ क’ देश समृद्धिशाली बनि जाय, मुदा की ततबेसँ जिनगीमे शान्ति आ चैन आबि जायत? की मनुष्य-मनुष्यकेँ मनुष्य बुझै लगल? की मनुष्यक बीचसँ अपराध मेटा जायत? की मनुष्यक बीचसँ भोगक प्रवृत्ति समाप्त भ’ जायत?’’ एहि तरहक ढेरो प्रश्न नसीबलालक मनमे उपकै लगल। जहाँ कोनो प्रश्न पर गौरसँ विचार करै लगथि कि घौंदा जेँका प्रश्न मनमे उठै लगनि। फेरि मनमे उठलनि जे आइ अमेरिका सबसँ समृद्धि शाली आ शिक्षित देश अछि। अनेको देश ओकरासँ कर्ज ल’ क’ अपन विकास क’ रहल अछि। मुदा कि अमेरिकामे चोरी, डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार नइ होइछै। की अमेरिकामे भिखमंगा नइछै? की अमेरिकामे सब मनुष्यकेँ मनुष्य बुझल जाइछै आ कि जानवरोसँ बदतर बुझल जाइछै। की अमेरिकामे माए-बहीनिक इज्जत-आवरु सुरक्षित छै? नसीवलालक मन जत्ते दौड़ैत तत्ते समस्याक बनमे ओनाइत। ने सोझ रास्ता देखैत आ ने भेटनि। मन असथिर करै दुआरे चुनौटीसँ चून आ तमाकुल निकालि चुनबै लगलाह। तमाकुल चुना मुहमे लेलनि। मन बहटरै दुआरे उठि क’ टहलै लगलथि। टहलैत-टहलैत थूक फेकै ले मुह उठौलनि कि देवनकेँ अबैत देखलखिन। देवन पर नजरि पड़ितहि मने-मन विचार करै लगलथि जे ऐहेन-ऐहेन बच्चा, प्रतिदिन कते मरैत हैत तेकर कोनो ठेकान नहि। मुदा एहि बच्चाकेँ धन्यवाद दी जे एत्ते पैघ संकल्पक संग हँसी-खुशीसँ जीवि रहल अछि। आव तँ जुआन भेल। आब तँ ओहन शक्ति ओकरा भीतर जगि चुकल छै जे किछु क’ सकै अए। एते बात नशीवलाल मने-मन विचारिते रहथि कि देवन लगमे आबि पाएर छुवि गोड़ लगलकनि। असिरवाद नसीवलालक मनेमे घुरआइते, तइसँ पहिनहि आखि देवनक जिनगीकेँ पढ़ै लगल। ने किछु देवन बजैत आ ने नसीवलाल। दुनू अप्पन-अप्पन दुनियाँमे। देवनक मन अंतिम असिरवाद तकैत आ नसीवलाल देवनक पुरुषत्व देखैत। उत्साहित मन, विचलित करेजसँ देवन कहलकनि- ‘‘काका, काल्हि हम अइ गाम (गा) से चलि जायब। तेँ आइ अंतिम असिरवाद लइ ले एलौ हेन।’’ नसीवलाल- ‘‘बौआ, तोरा हम अंतिम असिरवाद अखन कोना देवह? अखन तोरो नमहर जिनगी जिवैक छह आ हमहू अखन मरब नहि। एकटा दुनिया के खंड-पखंड क’ लोक देश, राज गाम, टोल बना नेने अछि। मुदा अछि तँ एक्केटा धरती। अही धरती पर तोहूँ कतौ रहबह आ हमहू कतौ रहब। दुनियाँक कोनो कोनमे चाहे तू रहअ कि हम, हमहूँ तोरा देखवह आ तोहू हमरा देखवह।’’ देवन कक्का, हम जे असिरवाद लइ ले एलहुँ, ओ दैहिक छी। बारह बर्खसँ दुनू गोरे एकठाम रहलौ, आब कने हटि हटिकेँ रहब। यैह जे कनी हटब अछि ओहि ले असिरवाद मंगै छी।’’ देवनक बात सुनि नसीबलाल मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘असिरवाद कि कोनो मुहसँ कहला स’ होइछै ओ तँ हृदयक उद्गार छी। तोहूमे तू हमरासँ असिरवाद मांगह आ हम परसादी जेँका द’ दिअ, से कहूँ भेलै अए। जखन कौल्हुका नियार क’ नेने छह ते जरुर जइहह। मुदा आइ ऐठाम रहअ। खा-पीअ, भरि मन गप्पो करब। साँझमे चलि जइहह।’’ सूर्योदयसँ पहिनहि। सबतुर बुधनी सुतले छलि। गामोक सब सुतले। देवन उठि क’ उत्तर मुहे विदा भ’ गेल। जतबे वस्त्र पहिरने छल, बस ओतबे। ने किछु खाइ ले लेलक आ ने कोनो आन वस्तु। ज्ञानक भुख देवनकेँ एते लागल जे कोनो आन वस्तुक सुधिये नहि। मुदा जिनगी जीवैक लूरि ओ सीखि नेने छल। गामक सीमा पर पहुँच देवन मने-मन सोचै लगल जे गामो-घर देखि लेलियै आ गाम-घरक लोको देखि लेलियै तेँ आब देवस्थान दिशि जाय। एते बात मनमे अबिते देवन देवस्थान दिशि विदा भेल। जाइत-जाइत जखन बहुत दूर गेल तखन देखलक जे सइयो मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर अछि। देखि क’ अबूह लगि गेलै जे कते देखब। जँ सबकेँ देखै लगब ते कते बर्ख लगि जायत। मनुक्खक औरुदे कते होइछै। ठाढ़ भ देवन सोचलक जे छोटका स्थान सबके रस्ते-रस्ते देखि लेब आ बड़का-बड़का स्थानके भीतर जा-जा देखब। मन्द-मन्द हवा सिहकैत। रौउदोमे ओते गरमी नहि। मुदा अधिक चललासँ थकि गेल। रास्ताक कातेमे एकटा खूब झमटगर गाछ। गाछकेँ उपरसँ निच्चा धरि देखलक ते अनठिया गाछ बुझि पड़लै। गाछक निच्चामे दूबि पसरल। हरियर कचोर दूबि। मनमे भेलइ जे जेमा तँ जेबे करब मुदा थोडे काल ऐठान सुसता ली। गाछक निच्चामे देवन बैसि रहल। कनिये-काल बैसल कि मन अलिसाय लगलै। दुबिये पर पइर रहल। पड़ितहि निन्न आबि गेलै। कनिये काल पड़ल कि चहा क’ उठल। (निन्न टूटि गेलै) मनमे दू तरहक विचार उठै लगलै। एकटा विचार होय जे थाकल छी तेँ भरि मन अराम क’ ली। दोसर विचार होय जे जँ सुतिये क’ समय बीता लेब ते देखबै की। उठिकेँ ठाढ़ भेल। आगू तकलक ते झल बुझि पड़लै। दुनू हाथसँ दुनू आखि मीड़ि क’ पोछलक। आखिकेँ पोछितहि साफ-साफ देखै लगल। मुदा सब कुछ बदलैत बुझि पड़लै। जहिना चाउरसँ भात बनैत, दूधसँ दही बनैत। दुनियाँक सब कुछ तेज गतिसँ आगू मुहे बढ़ैत देखलक। ठाढ़ भ’ देवन हियाबै लगल जे कियो खाधि दिशि आखि मूनि क’ दौड़ल जाइ अए तँ कियो काँटक बोन दिस। कियो आगि दिशि दौड़ल जइ ते कियो सुन्दर फुलवारी दिशि। फेरि देवनक मनमे द्वन्द उठल। पहिल विचार उठलै जे बिना खाधिमे खसने खाधिक अनुभव कोना हैत? बिना आगिमे गेने आगिक ताप कोना वुझवै? फेरि मनमे उठलै जे जँ खाधिमे खसि पड़ब ते उपर कोना हैब। जँ आगिमे झड़कि जायब ते जीवि कोना? जँ मरिये जायब ते दुनियाँ कोना देखवै? असमंजस करैत पुनः बैसि रहल। बैसले-बैसल देवनक मन उठै लगल जे मृत्युक रास्तामे जीवन छैक कि जीवनक रास्तामे मृत्यु। सुखक रास्ता दुख छैक आ कि दुखक रास्तामे सुख। पापक रास्तामे पुण्य छैक आ कि पुण्यक रास्तामे पाप। विचित्र सवाल देवनक मनमे अवै लगल गुलाबक फूल तोडै़ काल हाथमे काँट गरिते अछि। रास्ता पर चलनिहार पिछड़ि क’ खसिते अछि। मुदा कि काँट गरैक डरे लोक गुलाब फूल नहि तोड़ै। पिछड़ि क’ गिरै दुआरे लोक चलबे ने करै! अजीव प्रश्न देवनक मनमे उठै लगल। जिनगियेक पाछू तँ मृत्युओ छाँह जेँका सदिखन चलिते अछि। मुदा सवहक पाछू संकल्प अछि। जे कियो गुलावक फूल तोड़ैक संकल्प क’ लेत, ओ काँट गरैक चिन्ता नहि करत। जे आगिक गुण बुझि आगिमे जाइत ओ झड़कैक परवाह नहि करत। तहिना हमरो (देवन) दुनियाँ देखैक संकल्प मनमे अछि तेँ जाबे जीबि तावे चलिते रहब, भलेही रास्ता कतबो कठिन किऐक ने हुअए। ई बात देवनक मनमे अबिते फेरि उठि क’ विदा भेल। उत्तर दिसक रास्ता देवन धेलक। थोड़े आगू बढ़ला पर काँटक बोन देखलक। बोन देखि देवन हियावै लगल जे कोना अइ बोनमे जायब। चिक्कन रास्ता तँ अछि नहि! हियबैत-हियबैत देखलक जे ने चिक्कन रस्ता अछि आ ने चैड़गर। मुदा खुरपेड़िया रास्ता जरुर अछि जइसँ मालो-जाल आ चरवाहो अबै जाइ अए। अपना दिशि देवन देखलक। देखलक जे हमरो तँ किछु अछि नहि मात्र देहेटा अछि। मनमे विसवास जगलै जे हमहूँ टपि सकै छी। आगू चलल। थोड़े आगू गेला पर देवन देखलक जे बोनक (काँटक बोन) पूबे-पछिमे नमती तँ बेसी छैक मुदा चैराइ तँ कम्मे छैक। बोन पाड़ भ’ गेल। रास्तामे कतौ किछु खेने नहि तेँ भूखो लगि गेलै। मुदा अइ बोनमे खाइक की भेटत। भूख क’ दबैत आगू बढ़ल। आगू बढ़ितहि देखलक जे फेरि दोसर बोन अछि। बड़का-बड़का गाछ-विरीछ ओहि बोनमे। मुदा काँट नहि, फलक बोन। अनेरुआ फलक गाछ तेँ सब रंगक फलक गाछ। एकछाहा नहि। हिया क’ देवन फल सबहक गाछ देखै लगल। रंग-विरंगक फलसँ लदल गाछ। गाछ देखि मन शान्त भेलै। शान्त चित्तसँ देवन सोचै लगल जे अखन तँ छोटके बनमे प्रवेश केलौ, तखन तँ एत्ते रंग-विरंगक फल चकचकाइत अछि, जँ अहूँसँ आगू बढ़ी तखन ते ओहूसँ बेसी, पैघ आ सुन्दर-सुन्दर फल भेटत। बड़का-बड़का गाछोक बन भेटत। तेँ जँ पैघ फल प्राप्त करै चाहै छी ते अइ छोटका फलक बोनकेँ टपि आगू बढ़ै पड़त। फेरि मनमे एलै जे चैबे से छबे नइ भ’ कहीं दुबे बनि गलौ, तखन तँ सब गुर गोबर भ’ जायत। मुदा नहि! जिनगीमे कोनो वस्तु प्राप्ति, दू तरहे होइत अछि। एक, वस्तुक प्राप्ति आ दोसर विचारक प्राप्ति। ओना कखनो काल दुनूक प्राप्ति भ’ जाइत मुदा कखनो काल विचारक प्राप्ति होइत, वस्तुक नहि। तेँ जिनगीमे कखनो एहि बातक चिन्ता नहि करक चाही जे प्राप्ति हैत कि नहि। सतत् मनुष्यकेँ आगू बढ़ैक उत्साह मनमे, आ कर्म करैक लेल डेग उठैक चाही। जिनगीमे हारि ककरा कहबै आ जीत ककरा कहबै? अंधकार प्रकाशक लड़ाई तँ सदिखन मनुष्यक भीतर चलिते रहै अए, जँ एक रुपमे अंधकार हारै अए ते दोसर अहूँसँ पैघ रुपमे, आगू आबि ठाढ़ भ’ जाइ अए। सूर्य सन प्रकाशमान सेहो अंधकारक चद्दैरमे झँपा जाइत अछि। हमरा सबहक बीच सेहो एकटा जबरदस भ्रम पसरल अछि जे पैछला जनमक केलहा एहि जन्ममे भेटै छैक। मुदा अहू प्रश्नकेँ दू दृष्टिये देखल जा सकैत अछि। पहिल, पैछला जन्म जे विकासक प्रक्रियामे एक-दोसरमे बदलैत जाइत आ दोसर जे एहि जन्मक पूर्व समय। जना अफसरक पूर्व समय विद्यार्थीक होइत। डाॅक्टरक पूर्व समय सेहो विद्यार्थीक होइत। मुदा हमरा सबहक बीच पहिल बातकेँ मानल जाइत, तेँ ई जबरदस्त भ्रम। जते बात देवन सोचैत तत्ते मन घोर-मट्ठा होइते जाइत। खिसियाकेँ देवन उठि क’ विदा भेल। मुदा उठि क’ विदा होइते तामस मिझहा गेलै। शरीरमे नव शक्तिक संचार भेलै। अपन संकल्प क’ माथ पर उठा साहससँ डेग उठवैत आगू बढ़ल। देवनक पेटक भूख मिझा गेलै। शरीरमे नव शक्तिक संचार भेलै। अपन संकल्प क’ माथ पर उठा साहससँ डेग उठवैत आगू बढ़ल। देवनक पेटक भूख मिझा गेल। मुदा मनक भूख बढ़िते। जाइत-जाइत जखन देवन किछु दूर गेल ते एकटा विशाल आमक गाछ देखलक। रस्ताक वामा भाग ओ गाछ। गाछमे काँचसँ पाकल धरि फल लटकल। निच्चोमे गिरल। गाछ लग ठाढ़ भ’ देवन सोचै लगल जे ई गाछ अनेरुआ (बिन रोपल) छी वा लगाओल अछि। चारु कात देवन आखि उठा-उठा देखै लगल। देवनकेँ बापक सुनौल एकटा खिस्सा मन पड़ल। बाप कहने रहै जे अपना एको धूर खेत नहि जे गाछी-कलम लगा दितियै। तीरथ-बरथ करै ले पाइ नहि, पूजा-पाठ करैक लूरि नहि, मुदा धरमक काज तँ सबके होइछै। तेँ रस्ता कातमे पाँचटा आमक गाछ रोपि देलयै। कहीं ओहने रोपिनिहार ते ने इहो रोपने अछि। पाँचटा पाकल आम बीछि देवन गाछक अलगलहा सिर पर बैसि खाइ लगल। आम स्वादिष्ट। पाँचो आम खा देवन सोचलक जे आइ एतै रहि जायब। दुबि मे हाथ पोछि, हाथेसँ मुहो पोछि लेलक। पानिक जरुरते नहि। असकरे देवन ओहि गाछक छाहरिमे पड़ि रहल। गाछक उपरमे अनेको रंगक चिड़ै-चुुनमुनी पकलाहा आमो खाय आ अपनामे गपो-सप करै। चोरो-नुक्की खेलय आ हँसियो-चैल करै। रंग-विरंगक चिड़ै रहनहुँ, सब अपन-अपन डारि पर बैसि अपना जिनगीक गप्पो करै। चीत गरे देवन पड़ल। तेँ गाछक उपर सब चिड़ै देखए। अगिला-पछिला सब जिनगी बिसरि देवन चिड़ै सबहक दुनियामे पहुँच गेल। किरिण डूबि गेल। आनो-आनो गाछ परक चिड़ै सब ओहि गाछ पर अवै लगल। जना सबके बुझले रहै तहिना सब अपन-अपन ठौर ध’ लेलक। किछु काल धरि, जाबे साफ (इजोत) रहै, सब गप-सप करैत रहल आ जना-जना अन्हार पसरैत गेलै तना-तना ओहो सब गबदी मारैत गेल। तेसरि साँझ होइत-होइत सब (चिड़ै) सकदम भ’ गेल। देवनकेँ ओ गाछ कल्प वृक्ष जेँका बुझि पड़लै। नव-नव विचार रास्ता, नव-नव जिनगी जीबैक ढंग देवनक मनमे अबै लगल। बिचारेक दुनियामे, देवनकेँ कखन निन्न एलै से अपनो ने बुझलक। पौ फटिते एकटा चिड़ै क’ नीन टुटलै। निन्न टुटिते ओ सबकेँ जगवै लगल। धीरे-धीरे फरिच्चो होइत गेलै आ चिड़ैइओ सब जगि गेल। जगितहि सब चिड़ै, अपन जिनगीक कर्म करै, उड़ि-उड़ि विदा भेल। चिड़ै के उड़ैत देखि देवनो उठल। उठिके अपन सैाँस देह देखलक। पानि तँ रहै नहि जे मुह-कान धोइत, मुदा हाथेसँ आखि कान पोछि विदा भेल। उबर-खाभर रास्ता। कतौ सोझ, कतौ टेढ़। कतौ भौक तँ कतौ खाइध। मगन भ’ देवन सरा-सरि आगू बढ़ैत जाय। रास्तामे जानवरक तँ कमी नहि मुदा मनुक्ख एक्कोटा नहि। किन्तु तइयो देवनक मनमे ने शंका आ ने घवड़ाहट। असकरे देवन आगू बढ़ैत जाय। किछु दूर गेला पर देवन बाजार जेँका देखलक। देवनक मनमे सवुर भेल जे आब मनुक्खसँ भेटि हैत। मुदा ओ बाजार नहि कसबा। छोट-छोट कारोवार चलैत। दुनू भाग घर बीच देने रास्ता। गोटे-गोटे घर पुरने ढंगक मुदा गोटे-गोटे टीप टापसँ सजल। मनुक्खोक वैह रुप। मुदा अकसरहाँ लोक रुढ़ि -वादी विचारसँ ग्रसित। किछु गोटे पुरान रुढ़िवादसँ जकड़ल तँ किछु नवकासँ। रुढ़िवादी रहितहुँ सबमे मिलान नहि! एक दोसरकेँ गरिअबैत। सब-सभकेँ कहैत- ‘‘तू गलत’, ते तू गलत।’’ रास्ता धेने देवन आगूओ बढ़ैत आ लोकक करतूतो देखैत। थोड़े दूर आगू बढ़ला पर देवन एकटा पैघ पीपरक गाछक निच्चामे एक मनडिल (मंदिर) देखलक। मनडिलक आगूमे यात्री सबकेँ रहै ले एकटा धर्मशाला सेहो। खाइ-पीबैक सेहो व्यवस्था। भानस करै ले एकटा भनसा धर सेहो। मंदिरक चारु कात फुलवारी। छोटका-छोटका फूलक गाछक संग बड़को-बड़को फूलक गाछ। जहिना रंग-बिरंगक गाछ तहिना रंग-विरंगक फूल सेहो गाछमे। पहिने तँ देवन कातेसँ (रस्ते परसँ) देखलक मुदा मनमे भेलइ जे भीतर (छहर देवालीक) जा क’ देखियै। अनभुआर जेँका भीतर प्रवेश केलक। रास्ताक बगलेमे इनार। पानि भरैक लेल ढेकुलमे डोल बान्हल। डोलमे लोहाक जंजीरक उगहनि बान्हल। इनार पर जा देवन डोलमे पानि भरि हाथो-पाएर धोलक, देह पर एक चुरुक छिटियो लेलक आ दोसर डोल पानि भरि पीबियो लेलक। पानि पीबि देवन पहिने मंदिर दिशि बढ़ल। मंदिरक ओसार पर महंथ जीकेँ एक गोटे ताड़क पातक बनाओल बड़का पंखा, पाएरक ओंगरीमे डंटाक निचला भाग लगा, ठाढ़े-ठाढ़ डोलबैत। दोसर गोटे महंथजीक पसारल पाएरमे कड़ूतेलसँ पालिश करैत आ तेसर गोटे महंथजीक बाँहिमे तेल लगा अमिठति। महंथजी असुआइल आखि बन्न केने। देवन, महंथजीकेँ देखि मने-मन सोचै लगल जे पकिया साधक जेँका बुझि पड़ैत छथि। किऐक तँ सौ बरिखा गाछक सील जेँका देह, हाथी पाएर जेँका दुनू जाँध आ क्वीनटलिया बोरा जेँका पेट महंथजीक। लालबुन्द शरीर, दाढ़ी-केश नमहर-नमहर। तीस-पइतीसटा अगरबत्ती एक्केठाम जरैत। रंग-बिरंगक सेन्टक शीशी, गमकौआ तेलक शीशी महंथ जीकेँ पजराक खिड़की पर राखल। पुनः देवनक मनमे एलै जे जखन ऐठाम धरि आबि गेलहुँ तखन भगवानक दर्शन आ महंथजीकेँ प्रणाम कइये लेबनि। ओसारसँ आगू बढ़ि देवन दर्शन क’ महंथजीकेँ ठाढ़े-ठाढ़ प्रणाम केलक। प्रणाम सुनि महंथजी आखि तकलनि। एक टकसँ देवनकँे देखि महंथजी मने-मन गुम्हरैत, जे पाएर छुवि किऐक ने गोड़ लगलक। देवन, अपना ढंग अपने लोक। ओ मने-मन विचारै लगल जे हमरा कोनो ऐठाम रहैक अछि जे खुशामद रहत। राही छी रास्ता ध’ क’ एलौ, कनीकालक बाद चलि जायब। मने-मन महंथजी गुम्हरितहि रहथि देवन बाहर चलि आयल। महंथजी पुजेगरीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘अखन जे एकटा दर्शनार्थी आयल छल, ओ हमरा उचक्का बुझि पड़ल तेँ ओकरा जल्दी हातासँ निकालू।’’ महंथजीक आदेश सुनि पुजेगरी देवनके तकै लगल। मंदिरक चारु भाग जे फुलवाड़ी लगाओल छलै देवन देखै ले चलि गेल। पुजेगरी धरमशालामे तकैत, देवन फुलवाड़ीमे फूल देखैत। एक गोटे (अनठिया बवाजी) केँ पुजेगरी पूछलक- ‘‘अखन कियो अनठियो आयल छल?’’ ओ वेचारे एक टकसँ पुजेगरी दिशि ताकि, बिना किछु बुझनहि-सुझनहि, कहि देलक- ‘‘जे आयल छल से चलियो गेलथि। नवका एक्को गोटे नइ छथि। हम ते परसुऐ एलौ आ आरो जे सब छथि ओ पहिनहिसँ छथि।’’ चोट्टे पुजेगरी घुरि महंथजी लग जा कहलकनि- ‘‘ओ चलि गेल।’’ देवन फूल सबकेँ तजबीज करै लगल। किछु फूल सुगंधित आ किछु नहि किछु देषी (भारतीय) फूल किछु विदेशी। सैाँसे फुलवाड़ी देखि देवन मंदिरक पाछुमे जे पीपरक गाछ रहै, ओकरा देखै लगल। गाछ पुरान बुझि पड़लै। किऐक तँ मोटका-मोटका डारि सब रहै। गाछो नमहर। मुदा गाछक एक सुखल आ दोसर भाग हरियर। गाछ देखि देवन सोचै लगल जे ऐना किअए छै, जे अदहा सुखलछै आ अदहा जीयल। छगुन्तामे पड़ि गेल। तत्-मत् करैत देवन गाछक जड़ि लग पहुँचल। गाछक जड़ियोमे बुझि पड़ै जे एक भागसँ सुखलछै आ एक भागसँ जीवितछै। मुह पर हाथ ल’ देवन विचारै लगल। किछु कालक बाद देवनक मनमे एलै जे भरिसक गाछक जड़िमे गराड़ लगलछै। गराड़ मनमे अबिते ओ एकटा सुखल मजगूत ठौहरी ल जड़िमे खोधिअबै लगल। चारिये आंगुर खोधिऐलक कि एकटा मोटगर गराड़केँ गाछक खोंइचा खाइत देखलक। खोंइचा खाइत देखितहि देवनक मनमे खुशी आयल। खुशी अबितहि देवन ओही ठौहरीसँ गराड़केँ निकालि कात दिशि फेकलक। माटि पर खसिते गराड़ क’ कौआ ल’ क’ मंदिरेक गुम्बज पर बैसि क’ खाय लगल। गराड़केँ फेकि देवन फेरि गाछक जड़िकेँ खोधिअबै लगल। मुदा जैड़िक माइटो सक्कत रहै आ गाछक सिरो सब रहै तेँ ठौहरीसँ खोध्आिइले ने होय। देवन छोड़ि इनार पर जा हाथ-पाएरमे लगल माटि क’ धोलक। इनार परसँ सोझे आबि धरमशालामे बैसि गेल। कनिये कालक बाद रसोइया आबि, धरमशालामे बैसल आदमी सबकेँ, गनै लगल। निद्वन्द्व देवन। कोनो गम नहि। बगलमे बैसल बवाजी (दाढ़ी-केश बढ़ौने) के पूछलक- ‘‘अहाँ कते दिनसँ बवाजी छी?’’ देवन मुह देखि ओ बवाजी कहै लगल- ‘‘बौआ, अहाँ ते जुुआन-जहान छी। मुदा जखन पुछलौ ते कहबे करब। हम गिरहस्त परिवारक छी। चारिटा बेटा अछि। सबके वियाह-दुरागमन करा देलियै। सबके धियो-पूतो छै। हमर स्त्री मरि गेलि। चारु बेटा बराबरि क’ खेत बाँटि लेलक। हमरा सझिये रखलक। साल भ्ािर तँ बड़बढ़ियाँ तीन-तीन मास खुऔलक। मुदा दोसर साल चढ़िते सब अनठा देलक। कियो खाइ ले देबे ने करै। दू-चारि दिन, अपन जे हित-अपेछित सब रहै ओकरे ऐठाम खेबो केलौ आ बेटाक किरदानी कहबो केलियै। ओहो बेचारा सब आबि-आबि कहलकै। मुदा ककरो बातक मोजर नइ देलकै। घरसँ निकलैत मोह लगे। मुदा की करितौ। गामेक एकटा बवाजीक संग ध’ लेलौ। घुमैत-घामैत ऐठाम छी।’’ देवन- ‘‘ऐठाम कते दिन रहबै?’’ - ‘‘जाबे रहै देत ताबे रहब। जखन भगा देत तखन कोनो दोसर असथान पर चलि जायब।’’ देवन चुप भ गेल। मुदा मनमे ढेरो सवाल उठै लगलै। ओहिठामसँ उठि इनार पर जा क’ वैसि रहल। इनारक लहरामे ओंगठि मने-मन सोचए लगल जे सिर्फ ऐहेन परिस्थिति अही वेचारा टाकेँ नहि भेल। वल्कि ऐहेन परिस्थिति तँ सब गाममे होइ छै। तेँ ऐहेन समस्याक लेल समाजकेँ सोचए पड़त। सिर्फ सोचए नहि पड़त बल्कि समाधानक लेल किछु करैयो पड़त। गामे-गाम निःसहाय औरत, निःसहय पुरुख आ अपलांग-विकलांक सब अछि। जे अछैते औरुदे काहि कटै अए। तेँ सब गाममे, ऐहेन लोकक लेल, सार्वजनिक तौर पर व्यवस्था करै पड़त। एहि समस्या बीच देवनक मन ओझरा गेल। सोचैत-सोचैत सुति रहल। खेबो ने केलक। रातिक बारह बजे। हवाक सिहकी चलक। हवाक सिहकीसँ देवनकेँ जाड़ हुअए लगलै। जाड़ होइतहि निन्न टूटि गेलै। निन्न टुटितहि इनार परसँ उठि धरमशालाक कोनमे आबिकेँ बैसि गेल। हवा जोरे होइत गेलै। देवन धरमशालासँ निकलि बाहर आबि अकास दिशि तकलक। अकास दिशि देखि बुझि पड़लै जे अन्हर-बिहाड़ि आओत तेँ घर (धरमशाला) सँ नीक बहरेमे रहब हैत। पुनः इनारक जगत (निचला लहरा) पर आबि क’ बैसि गेल। महंथजी, पुजेगरी मन्दिरमे सुतल। हवाक ठंढ़सँ महंथजीक निन्न आरो कड़गर भ’ गेल। किऐक त’ मंदिर तीनि भागसँ घेरल। मात्र एक्के भाग अबै-जाइ ले खुजल। फोफ कटैत महंथजी आ पुजेगरी। संयोग स कर (करबट) घुमै काल महंथजी वामा हाथ महंथजीक छाती पर चल आयल। तेँ सपना सपनाइ लगल सपनामे महंथजी देखैत जे हम रथ पर चढ़ि स्वर्ग जा रहल छी। देवलोकक रथ। बड़का-बड़का घोड़ा ओहि रथमे जोतल। अप्सरा सब नचैत। देवलोककक दूत सब रथक आगू-पाछू अरिअतने चलि रहल अछि। जबर्दस्त अन्हर-बिहाड़ि उठल। महंथजी निन्न भेरि। बिहाड़िमे मंदिरक पैछला पीपरक गाछक सुखलाहा भाग टूटिकेँ मंदिर पर गिरल। ओना माइटिक तर तक गाछ सूखल, मुदा गाछक जड़ि चिराइल नहि। दू फेड़ा लगसँ टूटल। विशाल डारि। मंदिर पर डारिकेँ खसितहि पहिने मंदिरक गुम्बज टूटल तकर बाद सैाँसे मंदिर टूटि क’ गिर पड़ल। पुरान मंदिर तेँ टूटैमे देरियो नइ लगलै। महंथजी निन्न भेरि, तेँ मंदिरकेँ गिरैत बुझबे ने केलनि। तरमे महंथ जी आ पुजेगरी, तइ उपर मंदिरक ओसाराक छत आ तइ उपर गाछक मोटका डारि। महंथ जीकेँ उपर जखन, सबटा (दुनू) टूटि क’ लदा गेलनि तखन निन्न टूटलनि। मुदा निन्न टूटिनहि की? थकुचा-थकुचा देह भेल। मात्र साँसेटा चलैत। सेहो अवरुद्ध भ’ गेलनि। दुनू गोटे (महंथ आ पुजेगरी) ओहि तरमे दबि क’ परान त्याग केलनि। मुदा तइयो अन्हर कमल नहि। ओना आन दिनक अनहर ओहन होइत छल जे अबै छल आ लगले चलि जाइ छल। मुदा ओझुका अन्हर बड़ी खान धरि रहल। धरमशाला मंदिर सँ हटल। चारु कात स खुलल तेँ हवाक झोंक एक भागसँ पइसे आ दोसर भागसँ निकलि जाय। धरमशाला गिरल नहि, बँचि गेल। इनार पर बैसल-बैसल देवन सब कुछ देखैत मुदा ने हल्ला केलक आ ने उठल। अन्हर चलि गेल। मुदा पाइन-पाथर नइ खसलै। अन्हरके जाइते धरमशालाक सब निकलि हल्ला करै लगल। जे मंदिर गिर पड़ल। महंथजी आ पुजेगरी ओहि तरमे दवाइल छथि। मुदा अन्हर तँ सिर्फ स्थाने (असथाने) भरि नहि आयल छल, सब अपन-अपन उधिआयल घर-अंगना सम्हारैमे लागल, तेँ कियो ने आयल। पौ फटिते देवन विदा हुअए चाहलक, मुदा फेरि मनमे एलै जे जाइसँ पहिने कने महंथजीक अन्तिम दर्शन क’ लेब उचित हैत। रुकि गेल। मुदा अन्हारक दुआरे ने अखन धरि मंदिरक छज्जी परसँ गाछक डारि हटाओल गेल आ ने महंथजी छज्जी तरसँ निकालल गेल छेलाह। किएक तँ डारिओ छोट-छीन नहि जे दू-चारि गोटे धीचि (खिंची) के कात क’ दैत। बिना कुड़हरि स’ कटने डारि हटैवला नहि। जे अन्हारमे कोना होइत। डारिक तरमे मंदिरक छज्जी आ मंदिरक छज्जी तरमे महंथजी आ पुजेगरी। पुनः देवनक मनमे एलै जे जहि महंथजी आ पुजेगरीकेँ देखै ले अँटकल छी, ओ जीवित हेताह कि मुइल? तर्क-वितर्क देवन करै लगल। तर्क-वितर्क करैत देवनक मनमे एलै जे जखन मंदिरे गिर पड़ल महंथ आ पुजेगरी कोना बँचत। अनेरे हम कोन भाँजमे पड़ल छी। ऐठाम से रवाना भ’ जाय ऐठाम जते खिन रहब तते खिन असमसान (श्मशान) मे रहब हैत। असमसानमे रहि अनेरे किअए जिनगी (समय) गमाएव। ओह, जते जल्दी हुअए तते जल्दी ऐठामसँ विदा भ’ जाय। देवन विदा भ’ गेल। रास्तामे थोड़े दूर गेला पर देवनक मनमे उपकल जे मृत्यु की थिक? आइ धरि देवनक मनमे ऐहन प्रश्न कहियो आइले ने छल, किएक तँ अखन धरि आखि से जे मृत्यु देखैत छल, ओकरे मृत्यु बुझैत। मुदा आइ, महंथजीक मृत्यु देखला पर, देवनक मनमे एहि दुआरे प्रश्न उठल जे लोकक मुहक सुनल बात झूठ बुझि पड़लै। लोकक मुहे सुनैत आयल छल जे जेहन करत ओकर मृत्यु ओहने हेतइ। मुदा महंथजी आ पुजेगरी तँ भरि दिन भगवानेक मंदिरमे रहि, हुनके टहल टिकोरा करैत, तखन ऐहेन मृत्यु की थिक ई प्रष्न उठितहि ऐवन सोचै लगल जे मृत्युकेँ जीवनक पूर्व पक्ष कहबै आ कि उत्तर पक्ष। पूर्व पक्ष एहि दुआरे जे नीक विचारक जन्म होइतहि पुरान (गलत) विचारक मृत्यु भ’ जाइत अछि। तहिना नव जीवक जन्म होइतहि पुरना जीवन समाप्त भ’ जाइत छैक। एहि द्वन्द्वमे देवनक मन नीक जेँका ओझरा गेल। पुनः दोसर प्रश्न मनमे उठलै जे हमर संगीत शास्त्री लोकनि सब गीतिकेँ अवसर विशेषक आधार पर गीतक निर्माण केलनि मुदा सोहर आ समदाउनकेँ किऐक जन्मोत्सवोमे आ मृत्योत्वोमे मानि लेलखिन। जबकि दुनू दू अवसर छी। एते बात मनमे अवैत-अवैत देवनक मन घोर-मट्ठा भ’ गेलै। जहिना नसेरी अपने धुनिये रास्ता कटैत तहिना देवनो आगू बढ़ैत जाय। चलैत-चलैत देवन बिन खेने-पीने, दुपहर तक चलिते रहल। ने भूख दिशि मन जाय आ ने पियास दिशि। जना कोनो सुधिये नहि। जाइत-जाइत देवन एकटा फूलक गाछ लग पहुँचल। फूलक गाछ लग पहुँचते देवनक भक्क खुजल। रुकि गेल। ओहि फूलक गाछके निग्हारि-निग्हारि देखै लगल। फूलक गाछ देखि देबनक मुहसँ अनायास निकलल- ‘‘ऐहेन फूल तँ आइ धरि नहि देखने छलौ।’’ सुन्दर आ सुडौल गाछ। जगह-जगह डारि फुटल। जेहने गाछक धड़ चिक्कन तेहने डारिओक। हरियर-हरियर, चैड़गर-चैड़गर पात नमहर -नमहर, लाल-लाल फूल। मखानी गुलाब जेँका फूलसँ लदल गाछ। एकान्त जगह। ओहि फुलक गाछ देखि देवन मने-मन सोचलक जे अखन (भरि दुपहर) एतै रहब। रहैक विचार क’ ओ फूलक निच्चामे बैसि रहल। मन्द-मन्द, शीतल हवा बहैत बारह बजेक समय। तेज धूप। गरमी स’ वायुमंडल गर्म होइत जाइत। राही-बटोही, जहाँ-तहाँ रुकि-रुकि, दुपहर वितबैक ठौर पकड़ि लेलक। भूख-पियास देवनक मेटा गेलै। गाछक निच्चेमे ओ चीत गड़े सुति फूल सबकेँ देखै लगल। आॅखि फूले पर रहै मुदा मन अपन जिनगी क’ उद्धेश्य पर पहुँच गेलै। जिनगीक उद्धेश्य पर मनकेँ पहुँचते देवन सोचै लगल जे मनुष्यक जिनगीक रास्तामे कहियो फुलवारी भेटैत तँ कहियो काँटक बोन। दुनूक बीच होइत जिनगी चलैत। मुदा काँटक बोन देखि मनुष्य घवड़ा जाइत जबकि फुलवारीमे सतत रहैक कोशिश करैत। मुदा फूले गाछमे काँटो होइत आ काँटे गाछमे फूलो। तखन मनुष्य कोना अगबे फूलवाड़ीमे रहि पाओत। चारि बजि गेल। राही-बटोही अप्पन-अप्पन रास्ता-बाट ध’ चलै लगल। राही-बटोहीकेँ देखि देवनोक मनमे एलै जे सुतलासँ तँ नहि हैत, जँ किछु हैत त’ चलनहि। जँ आइ चलि क’ एहि फूलक गाछ लग नहि पहुँचल रहितहुँ त’ ऐहेन फूलक गाछसँ दर्शन कोना होइत। उठि क’ बैसि हियाबै लगल कि एकटा बटोहीकेँ उत्तरसँ दछिन मुहे अबैत देखलक। बटोहीकेँ देखि देवनक मन मे एलै जे भरिसक हमरे जेँका इहो बटोही अछि किअए तँ ने देहमे अंगा देखै छियै, आ ने माथ पर कोनो वस्त्र। सिर्फ हाथमे एकटा छोटे मोटरी लटकौने अछि। मुदा उत्तरसँ आबि रहल अछि तेँ उत्तर दिशाक रास्ता त’ जरुर वुझल हेतैक। किऐक तँ हमरो ओम्हरे जेबाक अछि। अबैत-अबैत बटोही ओहि फूलक गाछ लग आबि रुकि गेल। बटोहीक नजरि देवन पर आ देवनक नजरि बटोही पर। मुदा दुनूमे स’ कियो ककरो नहि टोकैत। दुनू मगन। अपना-अपना तालमे दुनू बेहाल। मुदा देवनक मनमे एलै जे हम बच्चा छी आ ओ बटोही चेतन छथि तेँ हमरा पूछब उचित हैत। देवन ओहि बटोहीकेँ पूछलक- ‘‘दादा, हमरा उत्तर मुहे जेवाक अछि तेँ अपने रास्ताक संबंधमे किछु बता दिअ?’’ देवनक बात गौरसँ बटोही सुनि कहलक- ‘‘बौआ, तू भूखल वुझि पड़ै छह, किऐक तँ तोहर मुह सुखाइल छह, तेँ पहिने खा लाय। हमरो ई मोटरी भारी लगै अए। तोरो पेट भरि जेतह आ हमरो जान हल्लुक भ’ जायत।’’ बटोहीक बात सुनि देवन किछु नहि बाजल। बटोही बुझि गेलै जे वेचारा भुखल अछि। खाइक इच्छा भ’ रहलछै तेँ ने किछु बाजल। उठि क देवन लग आबि मोटरी आगूमे द’ देलक। देवन मोटरी खोलकक ते देखलक जे खाइ-पीबैक ओहन विन्यास सब अछि जे आइ धरि खाइक कोन बात जे देखनहुँ नइ छलिऐक। भरि पेट खा देवन पुनः पुछलक- ‘‘दादा, अपने आगूक रास्ता (उत्तर दिशाक) बता दिअ?’’ बटोही- ‘‘आगूक रास्ता बुझि क’ कि करबहक?’’ -‘‘दादा, दुनियाँ देखैक खियालसँ घर स’ निकलल छी, तेँ दुनियाँक देखैक लिलसा मनमे अछि।’’ मुस्कुराइत बटोही कहै लगल- ‘‘दुनियाँ किछु ने छी। माटि, पानि, अकास, आ हवाक बनल एकटा गोला छी। अही सबसँ जनमि-जनमि, जइ दुनियाँकेँ देखैछी, ई ठाढ़ भेल अछि। मुदा सैाँसे एक रंग नहि भ’ एक भगाह भ’ गेल अछि। एक भाग निरोग अछि आ दोसर भाग सड़ल अछि। तहूमे सब स’ अजीब बात ई अछि जे एकरा (दुनियाँके) बीचोबीच एकटा रेखा खिंचल अछि, जकरा लोक विषुवत रेखा कहैछै। रेखा पूबे-पछिमे अछि। रेखाक दुनू भाग (समान दूरी पर) एक्के रंग रौद-वसात आ उपजा-बाड़ी होइछै। गाछो-बिरिछ एकरंगाहे अछि। मुदा सब कुछ एक रंग रहितहुँ, मनुक्ख दू रंग अछि। एक भागक अगुआइल अछि आ दोसर भागक पछुआइल। तहिना देखवहक जे दुनियाँक मनुक्खो दू दिशि भ’ गेल अछि। एक भागक खूब पछुआइल (अवनतिक शिखर पर) अछि। मुदा सब किछुमे विषमता रहितहु एक चीजमे समता अछि। ओ थिक नंगापन। जे अगुआइल मनुक्ख अछि ओ देखैमे दूध जेँका उज्जर धप-धप, गाय-महिसि जेँका ओकर देह आ हाथ-पाएर छै। खाइओ-पीवैक आ रहैओक व्यवस्था नीक छैक। मुदा ओ (महिला) सब जे कपड़ा पहिरैत अछि, ओ ओहन झकझकौआ मेही होइछै जे देखलासँ वुझि पड़तह जे कपड़ा पहिरनहि नइ अछि। ओहिना सैाँसे देह देखवहक। तहूमे जँ कतौ देखैमे झल बुझि पड़ह ते चश्मा लगा लिहह। तहिना दोसर दिशि देखबहक जे मनुक्खकेँ गरीबी ओहि रुपे जकड़ने अछि जे ने भरि पेट अन्न भेटै छै आ ने देहमे वस्त्र। तेँ अभावे ओ सब नांगट रहै अए। ने खाइ के ठेकान आ ने रहै के। ने वस्त्रक कोनो उपाय। तेँ नांगट रहै अए। देहक हाँड़ चारि लग्गी हटलेसँ गनि लेबहक। कंकाल जेँका ओकर देह। कारी खट-खट रंग, साबे जेँका केश बेचारी सबहक रहैछै। मनुक्खक समाजमे वस्त्रकेँ परदा मानल गेल अछि, आ अहीसँ इज्जत-आवरु देखल जाइछै। मुदा एकटा सवाल पूछै छिअह, कहअ जे दुनू (जकर चर्चा उपर भेल) औरतमे ककर इज्जत-आबरु बँचल छै आ ककर नहि?’’ बटोहीक बात सुनि देवन धड़फड़ा क’ बाजल- ‘‘जकरा देह पर वस्त्र छै ओ इज्जतदार।’’ बटोही- ‘‘धुः बूड़ि, एतबो ने बुझै छहक। अच्छा कोनो बात ने। तू अखन बच्चा छह तेँ नइ वुझै छहक। देखहक, लोके-लाज दुआरे ने लोक कपड़ा पहिरै अए। किऐक तँ मनुक्खमे बुद्धि-विवेक होइ छै। तेँ किछु अंगके गुप्त अंग मानल गेल अछि। जेकरा देह पर वस्त्र छै ओकरा पर आखि गड़ाकँे देखिनिहोरो बेसी अछि। जेकरा अंगके वस्त्र नहि झँपैत छैक। मुदा जेकरा देह पर वस्त्र नहि छैक, नरकंकाल जेँका अछि, ओकरा पर नजरिये केकर पड़त जे लोक-लाजक प्रश्न उठतै। आब कहअ जे केकर इज्जत-आबरु बँचल अछि जेकर बँचल छैक सैह ने इज्जतदार।’’ बटोहीक बात सुनि देवन मूड़ी डोलबैत हूँ-ह कारी भरलक। बटोही- ‘‘आब दोसर बात सुनह। दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सब मनुख छी। सभकेँ एक्के रंग सब अंग छै। हाथ, पाएर, मुह, नाक, कान इत्यादि। सब अन्न खाइ अए, पानि पीबै अए, कपड़ा पहिरै अए, रौद-वसात, पाइन पाथर, जाड़सँ बँचै दुआरे घरमे रहै अए। अस्सक पड़ला पर दवाइक जरुरत होइ छै। बुद्धिक दुआरे पढै़ अए। मनोरंजनक दुआरे नचवो करै अए आ गेबो करै अए। तेँ सबहक लेल एक रास्ता हेबाक चाही। नीक रास्ताकेँ धर्मक रास्ता मानल गेल अछि आ अधला रास्ताकेँ पापक। तखन आब तोँही कहह जे भदबरिया बेंग जेँका एते सम्प्रदाय किएक अछि? एक काजक लेल, रास्ता अनेको भ’ सकैत अछि, मुदा सबसँ नीक रास्ता तँ एक्केटा हैत। जखन एक्केटा रास्ता नीक होइत, तखन एते रास्ताकेँ कोन जरुरत। तइ ले लोक एते मारि-मरौबलि, गारि-गरौबलि किअए करै अए।’’ मूड़ी डोला देवन समर्थन केलक। देवनक मूड़ी डोलौनाइ आ मुहक रुखि देखि बटोही मनमे खुखी होय। मनमे खुशी एहि दुआरै होय जे हम्मर बात देवनक हृदयमे चुभि रहल अछि। ओरो आहलादित होइत बटोही कहै लगल- ‘‘बौआ, अजीव अछि दुुनियाँ। कहए तँ बहुत चाहै छी मुदा तोहूँ अनतै छह आ हमहू छी। तोहूँ कतौ जा रहल छह आ हमहू बाटेमे छी। मुदा तइओ जतबे समय अछि तेहिमे किछु बुझि लाय किऐक तँ जिनगीमे काज औतह। तहूमे अखन तू बच्चा छह बहुत दिन एहि धरती पर जीवैक छह। जहिना घर बान्हैक लेल एक्के ढ़ंग (लूरि) सँ अनेको घर बनैत, एक्के किताब पढ़लासँ अनेको लोककेँ ज्ञान होइत तहिना तँ जिनगीक आवश्यकताक लेल एक्के लूरिसँ काज चलि सकै अए। तखन एते रंग-बिरंगक चालि किअए महंथ (सम्प्रदाय चलौनिहार) किअए धरबैत अछि। जना देखहक जे कते अजगुत बात अछि जे कियो खा क’ पूजा करै ले कहै अए तँ कियो भुखले। तहिना कियो दाढ़ी-केश बढ़ा पूजा करैत अछि तँ कियो दाढ़ी-केश कटाकेँ। कियो माइटिक भगवान बना, तँ कियो पाथरक तँ कियो ओहिना(बिना भगवानक मूर्ति बनौने)। तहिना कियो मन्दिर बना, तँ कियो मस्जिद बना, तँ कियो गिरिजाघर बना, नहि जानि कते रंगक देवालय होइत, तँ कियो ओहिना (बिना मंदिर, मस्जिदेक) कियो भगवानकेँ परसाद चढ़बैत तँ कियो बिना परसादेक पूजा करैत। कियो ताड़ी-दारु पीबि, माछ-माउस खा पूजा करैत तँ कियो ओकरा अधला कहि निन्दा करैत। कियो नारी (औरत) के मुक्तिक मार्गक बाधा बुझैत तँ कियो नारियेक पूजाकेँ उद्धारक रास्ता बुझैत। अजीव अछि ई दुनिया आ अजीव अछि अहि दुनियाँक लोक। कियो वेश्याकेँ अधला बुझैत तँ कियो पूजा काल वेश्या नचवैत। कियो-ढोलक-झालि, मजीरा बजा कीर्तन-भजन करैत तँ कियो ओहिना बिना साजे-बाजकेँ।’’ जहिना कोनो खेलौना वा पढ़ै-लिखैक कोनो वस्तु ले बच्चा सब अपनामे छीना-छीनी करैत तहिना देवनक मनमे, हुअए लगल। देवनक मुहक बिजकब देखि बटोही मने-मन सोचै लगल जे वेचारा द्वन्द्वमे पड़ि गेल अछि। कखनो मन गुड़कि क’ इम्हर तँ कखनो ओमहर होइत। मन असथिरे ने भ’ रहल छैक। कने-काल बटोही गुम्म भ’ देवनक भावनाकेँ अँकै लगल। देवनक मन कखनो खुश होइत तँ कखनो चिन्तित भ’ जायत। कखनो मुहसँ हँसी निकलैत तँ कखनो कनै सन भ’ जाय। मुदा बटोही मने-मन हँसैत। मुदा मुहसँ बाहर हँसीकेँ निकलै नहि दैत। बटोहीक मनमे एलै जे आब विषय बदलि दी। बजै लगल- ‘‘बौआ, देखै छहक ने जे ककरो घरमे अन्न सड़ैत अछि तँ कियो भुखले रहै अए। ककरो गामक-गाम खेत छै ते ककरो घरो बन्हलै नहि छैक। ककरो धरमे कपड़ा सड़ै छै तँ कियो नंगटे रहै अए। कियो कोठा भीतर कोठा बनौने अछि तँ कियो गाछक निच्चामे रहै अए। ककरो बोरे-बोरा नून ते ककरो रोटियो पर ने होइत। कियो दबाइकेँ सड़ा-सड़ा पाइनमे फेकैत तँ कियो दवाइ बिना मरैत अछि। कते कहवह पहिनहि कहि देलियह जे अइ दुनियाँक एक भाग निरोग अछि तँ दोसर भाग सड़ल छै।’’ देवनक चेहरा उदास हुअए लगल। मुह मलीन, आखिक ज्योति बदलल, मुदा ज्ञानक भुख मनमे जगै लगलै। मने-मन देवन सोचै लगल जे जखन एतबे दूर ऐला पर एते भेटल तँ एहिसँ आगू गेला पर कते भेटत। ई बात मनमे अबिते देवन बटोहीकेँ कहलक- ‘‘दादा, जखन एते दूर आबिये गेलौ ते अगिला रास्ता बता दिअ। ओहो देखनहि घुमब।’’ मुस्कुराइत बटोही कहै लगल- ‘‘ऐठामसँ कोस भरि पर मनपुर अछि। जखन ओइठाँ महुँचबह ते देखबहक जे किछु गोटे पल्था मारि बैसल अछि आ मने-मन जिनगीक हिसाब जोड़ैत अछि जे जते समय खटै छी ओहिसँ जे उपारजन होइ अए, ओहिक भीतर अपन जिनगी क’ राखि जीबी। आ सैह करबो करैत अछि। मुदा भेड़िया-धसान लोककेँ देखवहक जे खड़क बैलून जेँका हवामे उड़ैत अछि आ कते फुइट जाइत अछि आ कते गिरैत अछि, तकर कोनो ठेकान ने छैक। तेँ तू ओहि बैसलाहा लोक सबहक दर्शन करिहह। ओकर दर्शन सीखि जिनगी बनबिहह। जिनगी की थिक? जिगी तँ वैह छी जे मनुक्ख बनि जिनगी जीबि लेब छी। मनपुरसँ कोस भरि आगू बुद्धिपुर अछि। जखन बुद्धिपुर पहुँचबह तँ देखवहक जे एहिठाम जत्ते लोक अछि सब जुआरी अछि। भरि दिन भरि राति जुऐ (जुअए) खेलाइत अछि। ओ पासा (जुआ खेलाइक) तीनि तरहक अछि। एक तरहक पाशा अछि जहिमे बाप-बेटा खेलाइत अछि। खेलाइत-खेलाइत अपनामे गारि-गरौबलि करै लगैत अछि। बाप बेटाकेँ कहै छै- ‘‘सार तू बेइमान छैँ?’’ तहिना बेटो बापकेँ कहै छै जे- ‘‘सार, तू बेइमान छह?’’ देखबहक जे बाप-बेटा सार-बहानचोद करै अए। मुदा ओहिठाम बेसी नहि अँटकियहह। देखिकेँ आगू बढ़ि जइहह। किऐक तँ ओ सार दुनू चोट्टा छी। जहिना छोटका माछक बोर द’ बंसी खेलेनिहार, बड़का माछ मारि लइ अए तहिना ओ सब छोटका गारि देखा फंसा लेतह आ गारि पढ़तह। तेँ देखि क’ तुरत हटि जइहह। दोसर पासा देखबहक जे भाई-भाई आमने-सामने बैसि जुआ खेलाइत अछि। खेलाइत-खेलाइत देखवहक जे दुनू एक-दोसर क’ बेइमानी करै लगैत अछि। जहिसँ गारि-गरौबलि, मारि-मरौबलि करै लगैत अछि। मुदा ओहो दुनू नमरी चोट्टा छी। तेँ ओकरो देखि क’ लगले हटि जइहह। जँ अँटकवह तँ धोखामे पड़ि जेबह। तेसर पासा जे देखवहक ओ असली पासा छी। ओहिमे देखबहक जे दू परिवारक लोक जुआ खेलाइत अछि। कसमकस खेल ओहि पासा पर होइत छै। दुनू खेलाड़ी सब तरहक शक्ति ल’ क’ खेलाइत अछि। गाइरिक जबाव गारिसँ, माइरिक जबाव मारिसँ, लाठीक जबाव लाठीसँ आ बम-बारुदक जबाब बम-बारुदसँ देल जाइछै। ओहि पासाकेँ देखि मनमे हेतह जे हमहूँ एक भाँज खेलि ली। ओहिठाम अटकि जइहह। जते दिन देखैक मन हुअ-अ तते दिन ओतइ रहिहह।’’ बटोहिक बात सुनि देवनक मनमे खुशी भेल। मुस्की दैत पूछलक- ‘‘ओहिठाम (ओइठिन) से कियो भगाओत तँ ने?’’ बटोही- ‘‘हँ, एक पासाक खेलाड़ी भगौनिहार अछि मुदा दोसर रखनिहार। जे बचैनिहार हेतह। ओकरा भाइ बुझि पीठि पर रहिहक। ओ जे जीतत तेहिसँ तोरो लाभ हेतह। ओ सिर्फ अपनेटा ले नहि खेलैत अछि तोरो ले खेलैत अछि।’’ बटोही- ‘‘ओहिठाम देखि आगू बढ़ि जहिहह। ओइठिनसँ विवेकपुर कोसे भरि आगू अछि। जखन बुद्धिपुरसँ आगू बढ़वह तँ विवेकपुर लगे बुुझि पड़तह। जाइ कालमे सेहो नइ बुझि पड़तह। मुदा बिना विवेकपुर गेने (पहुँचने) वापस नइ घुमिहह। जखन विवेकपुर पहुँच जेबह तखन विवेक बाबासँ भेटि हेतह। विवेके बाबाकेँ लोक ज्ञानेश्वर, धर्मगुरु, जगतपिता सेहो कहैत छनि। ओहिठाम देखवहक जे रंग-बिरंगक ढेरो घोड़ा अछि। एकसँ एक सुन्दर, एकसँ एक तेज चलैबला। ककरो बान्हल नइ देखबहक। ओहिना (बिना बन्हले) सब रहै अए। विवेके बाबाक टहलू हम छी। टहलि-टहलि दुनियाँ देखै छी।’’ देवन- ‘‘ऐठाम किअए आइल छलौ?’’ बटोही- ‘‘अही फुलकगाछकेँ देखै ले आइल छलौ। हँ, जे कहै छेलियह से सुनह। ओहिठाम पहुँचते विवेक बावा भेटि भ’ जेथुन। घोड़ा सब हीं-ही आइत देखबहक। अनेरे लगमे आबि-आबि चारु भरसँ घोड़ा सब घेड़ि लेतह।’’ देवन- ‘‘घोड़ा बदमाशियो करै छै?’’ बटोही- ‘‘नहि। हँ तखन एकटा बात जरुर छै जे गोटे-गोटे घोड़ा ऐहेन अछि जे घोड़ी देखि क’ थोड़े रस्ता काटि दइ छै, मुदा घूरि क’ फेरि रस्ता पर चलि अबै अए।’’ साँझ पड़ि गेल। मुदा अन्हार नइ बुझि पड़ै। बजैत-बजैत बटोही किमहर चलि गेल से देवन देखबे ने केलक। देवनो तँ असकरे चलनिहार तेँ मनमे कोनो शंके ने होय। मनमे होय जे आइ एतै रहि जाइ। फेरि मनमे होय जे जते रास्ता काटि लेब, ओते तँ अपने असान हैत। किऐक तँ जते चाहै छी ओ तँ केनहि हैत। दोसर दिन भोरे देवन विदा भेल। पहिलुका जेँका देवन आब नहि। सोलहन्नी तँ नहि मुदा अठन्नी जरुर बदलल। रास्तामे मंदिर देखितहि आखि निच्चा केने आगू बढ़ि जाय। भिनसुरका समय तेँ रउदो बेसी तीख नहि। हवाक सिहकी चलैत तेँ चलैमे बेसी मन लगैत। जाइत-जाइत देवन एकटा बड़का मंदिर देखलक। शंखमरमरसँ बनल। हालेमे रंग-टीप भेने विशेष आकर्षक। मंदिरक चारु भाग छहर देवाली। सइयो बीधासँ उपर मंदिरक अगवास। छहर-देवालिएक भीतर एकटा नमहर पोखरि, करीब दस बीघाक कलम, जहिमे अगबे बम्बई आम। हजारोसँ उपर नारियलक गाछ। कमोवेश सब फल। पोखरिक मोहार पर धरमशाला। नहाइ ले पोखरिमे सिमटीक घाट बनाओल। रस्ताक तर देने बिजली तार। एक्केटा रास्ता। जहिमे लोहाक फाटक लगल। फाटकमे खूब नमहर पितरिया ताला झुलैत। चारि बजे भोरमे फाटक खुलैत आठ बजे साँझमे बन्न भ’ जायत। फाटक बन्न भेला पर ने बाहरक लोक भीतर आबि सकैत आ ने भीतरक बाहर जा सकैत। जे महंथजीक कड़गर आदेश छल। इलाकाक लोक महंथजीकेँ जेहने कड़गर बुझैत तेहने चरित्रवान। तेँ विशेष इज्जत। मंदिर लग पहुँचते देवनक मन डोलि गेल, जे कने भीतर जा क’ देखिऐक। थोडे़ काल रास्ता पर ठाढ़ भेल। बाहरोक लोककेँ भीतर जाइत देखलक आ भीतरोक लोककेँ बहराइत देखलक। देवन सेहो भीतर गेल। भीतर पहुँच देवन हियासि-हियासि मनुक्खोकेँ आ मंदिरक व्यबस्थाकेँ देखै लगल। बड़ सुन्दर व्यवस्था बुझि पड़लै। चकचक करैत मंदिर। मंदिरक आगूमे पाइनसँ धुअल अग्नेय। अगरवतीक सुगंधसँ मंदिरक चारु भाग मह-मह करैत। फुलडालीमे फूल आ कियो तमही लोटामे तँ कियो पितरिया लोटामे जल ल’ पूजा करै ले जाइत। तँ कियो पूजा क’ घुमितो। मंदिरक आगूमे ठाढ़ भ’ देवन गोड़ लगलक। गोड़ लगिते देवनकेँ बुझि पड़लै जे जहिना ई तीर्थस्थान अछि तहिना तँ मनुक्खक देहो छैक। एकाकार भ’ गेल। अपना देहेमे तीर्थस्थान बुझि पड़लै। मंदिरसँ निकलि देवन धुमै लगल। फुलबारीक फूल देखि मन गद-गद भ’ गेलै। फुलवाड़ीसँ निकलि देवन सोझे धरमशालामे पहुँचल। धरमशालाक निच्चामे ठाढ़ भ स्थानोक बावाजी आ बाहरोसँ आयल यात्रीकेँ हियासि-हियासि देखै लगल। दुनू तरहक मंदिरक बाबाजी आ यात्री- लोक दू रंग देवनकेँ बुझि पड़लै। दुनू तरहक लोकमे, दू रंग विचार आ काज, देवन देखलक। दू रंग देखि देवन आरो लगमे जा देखै लगल। बाहरक जे यात्री रहै, ओकर मन आ हृदय पवित्र (षुद्ध) वुझि पड़लै। छल-प्रपंचसँ दूर। भगवानक प्रति श्रद्धा। मुदा मंदिरक जे बावाजी सब छल, ओकर चालियो-चलन आ मनो अषुद्ध बुझि पड़लै। यात्री सब परसँ नजरि हटा देवन स्थानक बावाजी सब पर गड़ाकेँ देखलक। बाबाजी सबकेँ देखै जे सब अपन-अपन रुप बना रहल अछि। कियो सैाँसे देह भस्म (छाउर) लगा, डाँड़मे मात्र चारि आंगुरक बिसटी पहिर रहल अछि त’ कियो सोलहन्नी सैाँसे देह छाउर ओंसि नंगे तैयार भ’ रहल अछि। कियो रेषमी धोती कुरता पहीरि साधारण तिलक लगा तैयार भ’ रहल अछि। ते कियो भिखमंगाक रुप बना रहल अछि। रुप बना सब कियो गांजा पीबि, कियो अफीम खा, कियो दारु पीबि ते कियो भाँग खा तैयार भेल। सबहक आँखि तरेगण जेँका चमकै लगल। अप्पन-अप्पन सब समान ओरिया क’ धरमषालामे रखि निकलै लगल। धरमषालामे मात्र बाहरक जे यात्री छल ओतबे रहल। ओहो सब अपन-अपन मोटरी सम्हारि जाइक तैयारी करै लगल। रंग-बिरंगक रुप देखि, देवनक मनमे सबहक करतूत बुझैक जिज्ञासा जोरसँ जगल। मुदा कहत के? मने-मन देवन सोचै लगल जे के ऐहेन लोक भेटत, जकरा स’ पूछिबैक। गुन-धुन करैत देवन भनसिया (धरमषालाक रसोइया) लग पहुँचल। ओ सब (रसोइया) बरतन-बासन मँजैत। एकटा बरतन ल’ देवनो मँजै लगल। अनठिया देवनकेँ देखि एक गोटे पूछलकै- ‘‘भाइ, तू कते रहै छह?’’ भनसियाक बात सुनि देवनमे संतोष भेलै जे एकरासँ सब बातक भाँज लगि जायत। उत्तर देलक- ‘‘भाइ, हम त’ बहुत दूर देहातमे रहै छी। बहु दिनसँ अइ स्थानक विषयमे सुनै छलौ। मुदा ने बटखरचा होइ छले आ ने अबै छलौ। अइवेर खरचाक जोगार भ’ गेल ते आबि गेलौ।’’ भनसिया- ‘‘कते दिन रहबह।’’ देवन- ‘‘जते दिन मन लागत।’’ भनसिया- ‘‘बड़वढ़िया! हमरे सब संगे भंडारमे रहह। कोनो-कोनो काजो करिहह आ जे मन हेतह से खेबो करिहह।’’ देवन- ‘‘बड़बढ़िया।’’ देवनकेँ बात बुझैक जोगार भ’ गेलै। जोगार देखि देवन मने-मन खुष होइत पूछलक- ‘‘भाइ, अखन जे बावाजी सब निकलल ओ कखन घुरि क’ आओत?’’ -‘‘किरिण डूबैक समय।’’ - ‘‘भरि दिन कत’ रहत आ की करत?’’ देवनक प्रष्न सुनि हँसैत एक गोटे कहलकै- ‘‘कियो स्थानक नामसँ चंदा करत, हाथ देखि-देखि दैछना लेत। कियो भीख मांगत। इत्यादि। - ‘‘जखन सबकेँ खाइ ले भेटिते छै तखन चंदा, दैछना आ भीख की करत?’’ - ‘‘जे भीख मांगत ओ एक्को पाइ स्थानमे जमा नहि करत मुदा जे रसीद काटि चंदा करत ओ अधा-अधी स्थानमे जमा करत।’’ - ‘‘बाकी रुपैआ ल’ क’ की करत?’’ - ‘‘देवनक बात सुनि सब भनसिया ठहाका मारलक। एक गोटे हँसित-हँसिते बाजल- ‘‘भने ऐठाम ऐलह। दू-चारि दिन रहह तखन सब किरदानी आखियेसँ देखबहक। मुहसँ कहला पर किछु विसवासो हेतह आ किछु नहिये हेतह।’’ - ‘‘महंथजी कोन मकानमे रहए छथि?’’ ओंगरीसँ देखवैत कहलकै- ‘‘ओ दू महला कोठा देखै छहक, ओकर निचला हन्नामे स्थानक राषन-पानी रहैछै आ उपरका हन्नामे आठ गो कोठली छै। आठो कोठली असकरे रखने अछि।’’ - ‘‘ओइमे सबके जा नइ दइछै। कने हमहू जा क’ देखितियै?’’ - ‘‘नै। ओइमे सब नइ जाइ अए। अगर देखै के मन हुअअ ते भिनसुरका पूजा समाप्त भेला पर कातमे ठाढ़ भ’ क’ देखिहक।’’ - ‘‘की सब होइछै?’’ - ‘‘पूजाक बाद सब अपन-अपन ठर पर चलि जाइ अए। तेकर वाद लीला शुरु होइछै। मुदा बेसी नइ कहबह। ओइ कोठा छोड़ि सैाँसे सब घुमि सकै अए। तेँ जलखै खा लाय आ सैाँसे देखि आबह।’’ - ‘‘बड़बढ़िया।’’ कहि देवन जलखै खा धूमै विदा भेल। दछिन मुहे देवन विदा भेल। दछिनवारि भाग बजार जेँका बनल। कने हटि क’ देखला पर छोटे बुझाइ मुदा भीतर पैसितहि खूब नमहर देखि पड़ैत। उत्तरे-दछिने रास्ता। रास्ताक दुनू बगल डेरानुमा घर। पाइन, बिजली सैाँसे। बहरीक ओसार पर गद्दीदार कुरसी लगल। सइयोसँ उपरे डेरा, जहिमे ढ़ेरबा लड़की सँ ल’ क’ अधबयषू औरत धरि। मरदक नामो-निषान नहि। वेष्यावृत्ति सँ ल’ क’ गान विद्यामे सब निपुण। स्थानक धूप-आरती सँ ल’ क’ अप्पन वृत्ति धरि सबहक काज। रस्ते-रस्ते देवन आगूओ बढ़ै आ दुनू बगली देखबो करै। जाइत-जाइत देवन दछिनवरिया छोर लग पहुँचल। डेरा सबहक रुप-रंग देखि देवनक मनमे एलै जे किछु दिन एहिठाम रहब जरुरी अछि। बिना रहने नीक-नहाँति नहि बुझि सकब। जखन ऐठाम आबि गेलहुँ तखन सरिया क’ बुझने बिना चलि जायब बचपाना हैत। फेरि मनमे होय जे अबैत-अबैत कत’ आबि गेलौ। लोक अधलासँ नीक दिषि बढ़ैत अछि आ हम अधले दिषि चलि एलौ। फेरि मनमे होय जे अधला जगह होइछै, अधला काज होइछै, अधला विचार होइछै, मुदा ओहो तँ ज्ञान रुपमे होइत अछि। तेँ ज्ञान अरजन करब तँ अधला नहि छी। तहूमे अधला काज केनिहारो तँ कम नहि अछि। अगर जँ हम अधला काजके नहि जानब ते ओहि के अधला बुझि परहेज कोना करब। तत्-मत करैत देवन दछिनवरिया छोर पर ठाढ़ भ’ आखि उठा-उठा चारु भाग देखै लगल। पूबारि भागक डेराक ओसार पर एकटा शील भंग जुआन लड़की (बच्चा नहि भेल) देवन दिषि देखैत। ओहि लड़कीकेँ अपना दिषि देखैत देवनो ओकरे दिस तकै लगल। दुनू दुनूकेँ दखैत मुदा आखिमे आखि मिलितहि लड़की आखि निच्चा क’ लइत। देवनोक मनमे ओहि लड़कीक प्रति उत्सुकता जगलै। मुदा धड़फड़ा क’ पूछत की? बड़ी काल धरि देवन ओतइ ठाढ़ रहल। डरो होय तेँ मुह सुखल जाइ। देवनक उतड़ैत चेहरा देखि ओ लड़की पूछलक- ‘‘किनको तकै छिअनि?’’ देवन- ‘‘तकै नइ छिअनि। देखै ले एलौ हेँ।’’ - ‘‘आउ, ऐठाम आबिके बइसू।’’ बैसू सुनि देवन ससरैत आगू बढ़ल। एक बेर क’ ओ लड़की देवनो दिस मूड़ि उठा क’ देखैत आ फेरि मूड़ि निच्चो क’ लइत। जहिना कियो आन मुलूकक जहलमे जिनगी भरिक (आजन्म) सजा कटैत, जहि ठाम ने अपना मुलूकक एकोटा लोक रहैत आ ने घुरि क’ अपना मुलूक अबैक आषा रहैत, वैह दषा ओहि लड़कीकेँ मने-मन होइत। देवन आबि क’ ओसारक कुरसी पर बैसल। देवनक सुखल मुह देखि ओ (लड़की) मने-मन सोचलक जे भरिसक ई (देवन) भुखल अछि। मुदा देवनक मुह भूखसँ नहि डरसँ सुखल। ओ लड़की पूछलकै- ‘‘किछु खायब।’’ देवन- ‘‘अखने खेलौ हेँ। खाइक इच्छा नइ अछि।’’ -‘‘ऐठाम अहाँ किऐक एलौ? ई जगह मनुक्खक नहि छी।’’ ओहि लड़कीक बात सुनि देवन मने-मन चैंकि गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारि क’ बाजल- ‘‘अगर मनुक्खक रहैक जगह नइ छी ते अहाँ कोना रहै छी?’’ देवनक बात सुनि शान्तीक (ओ लड़की) दुनू आखिमे आँसू आबि गेल। मनक सीमाने पर बोली अँटकि गेलै। चकभाउर कटैत चिड़ै जेँका आखि घुमै लगलै। उपरसँ नीचा धरि देवनकेँ निङहारै लागलि। बड़ी काल धरि शान्तीक आँखि देवनके देखैत रहल आ मन जिनगीक समुद्रमे उग-डुम करै लगलै। ने किछु शान्ती बाजै आ ने देवन। दुनू दुनूकेँ पढ़ैत। बड़ी कालक बाद शान्ती देवनकेँ कहलक- ‘‘अहाँक प्रष्नक जबाब हम अखन नइ देव। भानसो नइ केलौ हेँ। अहूँ आयल छी। तेँ अखन भानस करै जाइ छी। निचेनमे अहाँ सवालक जबाव देब। ताबे अहूँ नहा लिअ।’’ देवनकेँ शान्ती ओसार परसँ उठा भीतर (कोठरी) ल’ गेल। भीतरमे आंगन जेँका बनल। चारु भरसँ छहरदेवाली। बाहरक केबाड़ शान्ती बन्न क’ देलक। भीतरेमे व्यवस्था। नहेवोक, भानसोक। छोटवेटा आंगन तेहिमे टहलबोक। शान्ती भानस करै ले चुल्हि पजारलक। देवन अंगा निकालि नहाइक जोगारमे लगि गेल। मुदा, जना शान्तीयोक मन आ देवनोक मन एक-दोसरकेँ सोर पाड़ै लगलै। टंकी पर देवन ठाढे़ आ चुल्हि लग शान्ती बैसलि। मुदा दुनू एक दोसर दिषि देखैत। जहिना अजेगर सापक आखिसँ आखि मिलला पर मनुक्ख वेवस (आँखिक आकर्षणसँ) भ’ हटि नहि सकैत तहिना देवनो आ शान्तीयोक बीच होइत। टंकी परसँ ससरि देवन चुल्हि लग आबि गेल। खुला देह। सिर्फ धोतियेटा पहीरने। शान्तीयो देहक आंगी निकलि सिर्फ सये-साड़ीटा पहीरिने रहलि। देहक चिन्ता ने देवनके आ ने शान्तीके जहिना बच्चामे भाइ-बहीनि नंगटे खेलाइत तहिना दुनू भाइ-बहीनि जेँका, एकठाम वैसि जिनगीक गप-सप करै लगल। शान्ती- ‘‘अहाँ ऐठाम किअए एलौ?’’ देवन- ‘‘बहीनि, दुनिया देखैक खियालसँ घर स’ निकलल छी, तेँ ऐठाम एलौ हेँ। मुदा अहाँ किअए ऐहेन बात पूछुलहुँ?’’ देवनक बात सुनि शान्तीक हृदय दहलै लगलै। मन विचलित भ’ गेलै। वोली थरथराइ लगलै। नमहर साँस छोड़ैत शान्ती कहै लगलै- ‘‘भैया, जँ अहाँ ऐहिठाम पहुँच गेलहुँ ते नीक केलहुँ। किऐक तँ बिना देखने दुनियाँकेँ बुझवै कोना? जहि जगह पर आबि गेल छी, तहि ठाम दिनक क्रिया-कलाप भिन्न छै आ रातिक भिन्न। तेँ दिनके जे देखवै, ठीक ओकर विपरीत रातिके देखवै। ओना जँ अहाँ देखै ले आयल छी ते दिनको आ रौतुको, दुनू देखि लिअ। मुदा तइ सबसँ पहिने हमर जिनगी देखि लिअ।’’ शान्तिीक बात सुनिते देवनक मनमे जुआर-भाटा (ज्वार-भाँटा) उठै लगल। शरीर कपै लगल। जहिना तेज हवा, ठाढ़ भेल मनुष्यकेँ अपन झोका (गति) सँ ठेलि दैत तहिना देवन मन शान्तीक बातसँ घुसकै-फुसकै लगल। लाख परियास केनहु देवनक मन डोलै लगल। जहिना रथमे जोतल घोड़ा जखन अपन चालि पकड़ि लइत आ सहीस जँ कतवो छोर खींच कावू करै चाहैत तइयो किछु नहि किछु दूर घोड़ा बेकावू भ’ बढ़िये जाइत, तहिना देवनोक मन भ’ गेल। मुदा, मनके काबू करै दुआरे देवन मुह बन्न क’ आखियेसँ अध्ययनो आ गप्पो करै लगल। जहिना शान्तीक मनमे विचित्र स्थिति पैदा ल’ लेलक तहिना देबनोक मनमे। दुनू दुनूकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगल। ने किछु शान्ती बजैत आ ने देवन। जना दुनूक मन, एकठाम भ’ धारक रेतमे भसिआइल जाइत। बड़ी कालक बाद देवनक मन असथिर भेल। ताबे चुल्हिक आगि सेहो मिझा गेल। जहिना गाइयक बच्चा, देह पर हाथ सहलेलासँ, आखि बन्न क’ असुआ जाइत तहिना शान्ती सब सुधि-बुधि बिसरि गेलि। मन असथिर होइतहि देवन पूछलक- ‘‘अहाँक जिनगी!’’ -‘‘ह, हम्मर जिनगी!’’ बिसमित भ’ देवन- ‘‘कहू।’’ शान्ति हमर जन्म एकटा सुभ्यस्त किसान परिवारमे भेल अछि। जखन सात-आठ बर्खक छलौ तखन माइक संग मेला देखै, गामसँ दू कोस हटि, गेलौ। सहस्र चंडी यज्ञ होइत रहै। नअ दिनक यज्ञो आ मेलोक कार्यक्रम रहै। तीनि दिन तक ते मात्र यज्ञेक कार्यक्रम चललै चारिम दिनसँ नाच-तमाषा शुरु भेलै। बड़का रास, थियेटर, नाच सब रहै। दिनमे यज्ञक प्रक्रिया, विषय कीर्तन आ छकड़वाजी चलै मुदा रातिक मेला जवरदस रहै। इजोतक ऐहेन व्यस्था रहै जे जहिना दिन तहिना राति बुझि पड़ै। दोकानो-दौड़ी तहिना पतिआनी लगा क सजल रहै। बगलमे पच्चीस-तीस बीधाक आमक गाछी रहै जहिमे मेला रहै। पाँचम दिन, हमरा गामक लोक सब मेला देखै गेल। हमहू माइक संग गेलौ। सैाँसे मेला, एक्के बेर, घुमैत-घुमैत दुखा गेल। सबकियो जा क’ एकटा आमक गाछक निच्चामे वैसि गेलहुँ। सबहक विचार भेलइ जे रौतुको मेला देखनहि जायब। खाइ-पीबैक कोनो कमिये ने रहै। ढेरो दोकान रहै। आठ बजे रातिमे रासो आ थियेटरो शुरु भेल। दुनूक उँचगर मंच बनल रहै, तेँ कतौ से कतौक लोक असानीसँ देखए। इजोतक तेहेन व्यवस्था। दर्जनो जेनरेटर चलैत रहै। लोकोक तेहने भीड़। मरद-मौगी मिझराइले। करीब दस बजे, एक्के बेर सब जेनरेटर बन्न भ’ गेलै। बिजली गुम्म होइते सैाँसे मेला हल्ला हुअए लगलै। तहि बीच एक गोरे हमरा उठा लेलक आ दोसर गोरे मुह दाबि, भीड़सँ निकलि गेल। हम जे किछु बजवो करी ओ बोली निकलबे ने करै। तहूमे ततेक हल्ला होइत रहै, जे के सुनत। दुनू गोरे एकटा जीपमे बैसा देलक। जीपो अन्हार। तेँ नीक जेँका देखवो ने करियै। तीनटा जीप आगू-पाछू लगल। तीनू एक्के बेर खुजल। मेलासँ करीब अधा मील जीप गेल, मेलामे इजोत भेलइ आ हल्लो कम भेलइ। जीपक इजोतो बड़ल। जखन जीपमे इजोत भेल, तखन आठटा आरो लड़कीकेँ जीपमे देखलिऐक। मन उड़ि गेल छल। डर हुअए जे कतौ मारि देत कि फेकि देेत। अबधारि लेलौ जे आइ मरले छी। मन पड़ल अपन गाम, अपन परिवार आ अपन कुटुम-परिवार। मुदा की करितौ।’’ शान्तीक मुहसँ एते बात निकलितहि शान्तीयोक दुनू आखिसँ आ देवनो आखिसँ दहो-बहो नोरो निकलैत आ दुनू बोम फाड़ि कनै लगल। देवनक मनमे अप्पन मरल माए-बाप एलै आ शान्तीक मनमे जीवित माए-बाप। दुनूक देहमे, जेना एक्को पाइ लज्जतिये ने रहल। जना मुइलाक बाद मुरदा लड़-तांगर होइत, तहिना। घाड़ा-जोड़ी क’ दुनू छातीमे छाती लगा, कनै लगल। आखिसँ नोर खसै, मुहसँ दुख निकलै, आ छातीमे छाती सटौने पैछला जिनगीक अंत आ अगिला जिनगीक रुप-रेखा बनै लगलै। मुहमे मुह सटा, वोलीसँ नहि, दुनूक मन अप्पन-अप्पन शेष बात कहै लगलै। बड़ी काल धरि दुनू एक-दोसरसँ मिलल रहल। ताधरि दुनू सटल रहल जाधरि दुनूक मनक सब व्यथा नहि निकलि गेलै। जहिना अन्हार रातिमे दुनियाँक सब कुछ अन्हारक चद्दरि ओढ़ि सटि जाइत अछि, तहिना देवन आ शान्तीयो सटि गेल। मुदा सूर्य क’ उगितहि सब अलग-अलग भ’ जाइत तहिना सब व्यथा कहलाक बाद दुनू हटि गेल। दुनू हाथसँ दुनू आखि पोछि देवन शान्तीकेँ कहलक- ‘‘ऐठामसँ निकलैक कोन उपाय अछि?’’ शान्ती- ‘‘जखन फाटकक ताला खुलि जाइछै तखन बहरेबाक उपाय अछि। मुदा किछु ल’ क’ नहि छुछे देहे।’’ देवन- ‘‘पहिने एहिठामसँ निकलि चलू, तखन आरो गप-सप हेतइ।’’ चारि बजे भोरमे फाटकक ताला खुजल। ताला खुजलाक अधा घंटा बाद लोकक आवा-जाही शुरु भेल। पाँच बजे दुनू गोटे दस लग्गा आगू-पाछू विदा भेल। देवनो चारु भर तकैत जे कियो देखै ते ने अछि आ शान्तीयो। मुदा देखियो के कियो किछु ने पूछैत। फाटक टपिते शान्ती नव दुनिया देखलक। दुनियाँक सब कुछ नव। दुनू सोझे उत्तर मुहे विदा भेल। ने देवन शान्तीकेँ किछु पूछैत आ ने शान्ती देवनकेँ। जाइत-जाइत दुनू मनपुर पहुँच गेल। मनपुर पहुँचते दुनूक मनमे शान्ती एलै। दुनू एक दोसरसँ किछु पूछै चाहै कि तहि बीच ओहि बटोही (पछिला) केँ अबैत देखलक। ध्यान (धियान) से ओहि बटोहीकेँ देखितहि देवनक मुहसँ हँसी निकलल। ताबे ओहो (बटोही) लग आबि देवनकेँ पूछलक- ‘‘वौआ, तू अखन धरि एतै छह? हम ते विवेक पुर से घुरि क’ दोहरा क’ एलौ हेँ।’’ देवन- ‘‘दादा, रास्तामे शान्ती भेटि गेलि तेँ गप-सप करैमे समय लगि गेल।’’ बटोही- ‘‘बड़सुन्दर। भने दुनू गोटे एक संग भ’ गेलह। जे देखैक मन छेलह, से आब नीक नाहाँति देखबहक। अखन हम काजे जा रहल छी तेँ नइ अँटकवह।’’ देवन- ‘‘दादा, जतेकाल ऐठाम छी तते कालमे किछु कहि दिअ?’’ देवनक बात सुनि मुस्की दैत बटोही कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, सबहक इच्छा होइ छै जे हम्मर बात अधिकसँ अधिक लोक सुनए। मुदा ओहि सुनने हेतइ की? किऐक तँ जते मनुक्ख अछि, सभकेँ अप्पन-अप्पन जिनगी छैक। सब तँ एक ठाम ठाढ़ नहि अछि जे एकटा बात सुनने सरपट चालि पकड़त। जँ से होइतइ ते सब दौड़ैत रहैत। से कहाँ छै। तेँ जरुरी अछि जे सबसे पहिने अपने उठि क’ मनुक्खक रास्ता पर ठाढ़ होय। जखन मनुक्खक रास्ता पर ठाढ़ भ’ चलै लगब तखन जे गिरल मनुक्ख अछि ओकरा उठवैक कोषिष करक चाही। उठबैक दुनू उपाय अछि। ककरो बाँहि पकड़ि खिंचैक अछि ककरो पाछूसँ धक्का द’ धकेलैक अछि। यैह जिनगीक जीत छी जे हमरा केने कते मनुक्ख मनुष्य बनल। ‘‘हरि अनंत हरि कथा अनंता।’’ ....... ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.१.लोकगीत संकलन–निशा प्रभा झा २.२.उमेश मंडल-लोकगीत संकलन ३.३.१. लक्ष्मण झा ‘सागर’-चुट्टीधारी २.विभूति आनन्द-एक- दू- तीन- चारि- पाँच- छओ- सात- आठ- नओटा- कविता ३.रमण कुमार सिंह ४.मायानाथ झा-मातृगिरा ५.विनीत उत्पल-समाज ३.४.१.जीवकान्‍त-जन-जन याचक ३.५.१.रघुनाथ मुखिया-किछु पद्य २.सच्चिदानन्द सौरभ-किछु पद्य ३.६.१.ई वर्ष-अजित मिश्र २.नव वर्ष ३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.७.१.अशोक दत्त-किछु कविता २.शीतल झा--किछु कविता ३.शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’--किछु कविता ३.८.१.डॉ. योगानन्‍द झाघर स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज,समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंडकर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभकयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादकडाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! सरस्वती वंदना !!

अधर हास करतल वर वीणा हंस वाहिनी परम प्रवीणा । श्वेत अंबरे परे शुद्धि दे, अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।।

भावक सर विश्वासक शतदल, पर पसरल श्रद्धास्पद परिमल, हस्त स्फटिक माल मनोहर सहज तपस्विनी आत्म शुद्धि दे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।

आसीना कल्पना हंस पर पद सौन्दर्यक पंक वंश पर व्योम नायिके कथा गायिके हरू हमरो कुण्ठाबरूद्धि हे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।

सींचू ज्ञान कमंडल जल सॅ पोंछू माॅ प्रेमक आंचल सॅ उक्ति द्वार पर रसाहार करबू त्यागू युग युगक क्रुद्धि हे अपरे परमेश्वरि सुबुद्धि दे ।।

!! भदैया होली !!

डीहो धरि डूबल जखन बुर्ज बालुका पंक । रंग कोना पकड़त कहू तखन होलिका अंक ।। असली होरी बाढ़ि विच माॅचल छल नैहऽर, आङी डूबल घऽर मे, साड़ी भासल चऽर ।। फगुओ सॅ भऽ गेल अछि, अधिक नीक भदवारि, बूढ़ी पत्नी बेड़ पर कोरा मे नव सारि ।। भौजी कहलनि हुलसि कऽ लाउ लगा दी रंग । तेवर तेसर नयन लग, पसरल अजर अनंग ।। अपने छी परदेश मे हम छी बान्हे पऽर । यौवन खतरा बिन्दु लग, देह करय थर - थऽर ।। प्रेमक जल नेपाल सॅ छूटल अछि चलि आउ । चैते मे डूबब पिया, शीघ्र नाव बनवाउ ।। डिम-डिम ढ़ोलक ढ़ेंप सॅ छिटकल देहक पानि । उज्जर केश अबीर तर, बुढ़ियो भेलि जुआनि ।। मंत्री उड़थि अकाश मे, पब्लिक गेल पताल । धरती पर नेता लोकनि कऽ रहला रंगताल ।। सम्मत जहिना जड़ि रहल तहिना जड़ल करेज । दुहू जीव कछमछ करी पड़ल उपासक सेज ।। भोजन पैकेट पानि मे, गूड़ चूड़ा सभ गूम । फाउन्टेन पेनक धार मे भासल बूट गहूम ।। टूटल बलुआहा जखन खसला भीम उतान । अर्धांगिनीक चरण पकड़ि बचैलन्हि कहुना जान ।।

!! वनिवासक अंत !!

घुरल आव अवधक दिवस भाग जागल, बुड़ल नाव देखू नदी कात लागल ।। भरथि कान हनुमान संवाद अमरित, भरत भऽ रहल छथि मगन मोन तिरपित, विरागी हृदय भाव अनुराग जागल । बुड़ल नाव.................................. ।।

नगर आबि रहलनि लखन राम - सीता, प्रजा कंठ गीता नृपकि प्राण प्रीता, विगत कालरात्रिक पहर प्रीत जागल । बुड़ल नाव.................................. ।।

उठू तीनु जननी नयन नोर पोछू, सुनू कैकेयी त्यागु परिताप सोचू, उड़ल प्राण बहुरल पुनः गात लागल । बुड़ल नाव.................................. ।।

प्रमोदी चमन वर्ख - वर्खक सुखयल, हुलसि आइ पनकल विहंसि कऽ फुलायल, मृगक अक्षि अपलक विहग प्रेम पागल । बुड़ल नाव.................................. ।।

!! मिथिलाक दुःदशा !!

नकशा सॅ मिटा रहल मिथिला केर नाऊॅ गय । कतऽ हमर पीढ़ी अछि कतऽ हमर ठाॅऊ गय । भारत सॅ भिन्नो बऽ बनलै बंगाल देश, मुदा अपन देशे मे दावल मिथिला प्रदेश, राज्यक की बात कठिन पाॅचो टा गाऊॅं गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

हमर अमर षड़दर्शन हमर अचर साधु संत, हमर अजर वन उपवन हमर अपन वर बसंत, कवि कोकिल निकट काक करै काउॅ - काउॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

लोकवेद जागि रहल ओंघायल नेता छथि, अपने मे लड़ि - लड़ि कऽ घायल विजेता छथि, पूछत के हाल दशा ककरा सुनाऊॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

महिषी वा करियन हो, वाजितपुर मंगरौनी, सरिसब सॅ चैमथ धरि बनला सभ क्यो मौनी, देशक सभ सॅ दरिद्र मैथिल कहाॅऊ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

!! माला !!

सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।। जनम - जनम जपि रहब विपटतर, राखू बन्न अपन मधुशाला ।। देवि, सुखक परबाहि न हमरा, मिलनक अल्पो आहि न हमरा  हम नर दुःखकाटब धरती पर, अपने बनलि रहू सुरवाला ।। सुन्दरि अहाॅ अकाशी गंगा, हम भूमिक प्यासल भिखमंगा । युग-युग बरू बौरायब मरू मे - अइॅठायब नहि पावन प्याला ।। सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।। नहि श्रृंगार रौद्र हुंकारे । हम एहि पार, अहाॅ ओहि पारे  दुहुक बीच कठोर कत्र्तव्यक - भरल अथाह भयंकर नाला ।। सुरभित अहॅक सिनेहक माला ।।

!! जागरण गान !!

असम, वंग पंजाब, गुजरात जागल । अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। सुरूज त्यागि आयल निशा केॅ उषा मे, खिड़ल जागरण ज्याति दऽशो दिशा मे । सगर श्रृंग - सागर धरिक निन्न जागल ! अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। चिकरि हॅसि रहल स्यार सिंहक दशा पर । चलल बकगणक हंस पर क्रुर थापर । निठूर काक कर सॅ पिकक कंठ दागल, अहीं टा पड़ल छी, उठू औ अभागल ।। विदेहक सुतक देह दुवेहि बनल अछि । ग्रसित कऽ रहल मैथिली केॅ अनल अछि । परक लेल दर्शन अपन आॅखि लागल, अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। हरण भऽ रहल अछि हमर मीठ बयना । कोना कऽ सिखत आन बोली ई मयना । विवश अछि वधिक हाथ सॅ ठोर तागल । अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। कतऽ पितृ स्वर अछि कतऽ मातृवाणी । फंटऽ जा रहल जीह बचबू भवानी । ब्नब गोड़ ई गुनि हमर प्राण पागल । टहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।। बहुत भेल हे आब ककरो ने मानू ! निकसि द्वारि प्राचीन तरूआरि तानू । अहह जाहि मे युग युग मे जंग लागल, अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल ।।

!! मिथिलाक दुःदशा !!

नकशा सॅ मिटा रहल मिथिला केर नाऊॅ गय । कतऽ हमर पीढ़ी अछि कतऽ हमर ठाॅऊ गय । भारत सॅ भिन्नो बऽ बनलै बंगाल देश, मुदा अपन देशे मे दावल मिथिला प्रदेश, राज्यक की बात कठिन पाॅचो टा गाऊॅं गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

हमर अमर षड़दर्शन हमर अचर साधु संत, हमर अजर वन उपवन हमर अपन वर बसंत, कवि कोकिल निकट काक करै काउॅ - काउॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

लोकवेद जागि रहल ओंघायल नेता छथि, अपने मे लड़ि - लड़ि कऽ घायल विजेता छथि, पूछत के हाल दशा ककरा सुनाऊॅ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

महिषी वा करियन हो, वाजितपुर मंगरौनी, सरिसब सॅ चैमथ धरि बनला सभ क्यो मौनी, देशक सभ सॅ दरिद्र मैथिल कहाॅऊ गय । कतऽ हमर ...................................................... ।।

!! तोहर ठोर !!

कि जहिना कुरकुर पानक ठोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। लगौलह बातक पाथर चून । सजौलह कऽथ कपोलक खून । कि रहलह एक्के बातक चूक, कतऽ छह प्रेमक पुंगी टूक ? कि जहिना लाली पसरल भोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। देखि कऽ लहरल हमर करेज, त्यागि अयलहुॅ उदयाचल गेह । अहाॅ बिनु व्याकुल वाटक माॅझ , सुमुखि भऽ रहल जीवनक साॅझ । कि जहिना वक्र सुधाकर गोर । कि जहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। पिपासित आयब अहॅक दुआरि, प्रेम पीयूष पीयब झटढ़ारि, बधिक जॅ बनत अहॅक बर बाहु तऽ हमहूॅ बनव विखंडित राहु, कि जहिना सुधा स्वर्ग मे थोर, कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। सीखि विश्वकर्मा सॅ विज्ञान, बनायब सकरी मिल महान । भरब माधुर्यक कोषागार, सेहंतित भऽ जायत संसार । जेना कुसियारक पाकल पोर, कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। बनव हम पुर्नजन्म मे धान, धान सॅ भऽ जायब चिष्टान्न । पड़ब पुनि अहॅक प्रतीक्षापात अछिंजल सॅ सद्यः स्नात । जेना छाल्ही साजल नव खोर । कि तहिना सुन्दरि तोहर ठोर ।। भऽ रहल वर्ण - वर्ण निःशेष, शब्द सॅ प्रगटल नहि उद्य़ेश्य । मने मे रहल मनक सब बात  अनल मे पड़ल नवला जल गात । जेना आगू अलभ्य चित चोर । कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर ।। स्वः काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘

!! नचारी !!

गाबैत चलल छी बमबम, नाचैत चलल छी छमछम लगबैत ताल दुलकल डेगक सजवैत स्वरक नव सरगम ।। काॅवरि मे आबह गंगे  तोॅ लागह हमरा संगे  लऽ चलह जतऽ कैलाशी

छथि चिता भूमि सन्यासी, हे करूणामयि दुख भंगे, देखबैत चलह पथ हर दम ...... ।। प्रेमक मस्ती मे भासल शंकर छथि परम पियासल श्रद्धा केर धार बहाबह विश्वाक पात्र बनावह बौरहबा अधिक उपसाल हुनका संतुष्ट करब हम .... ।। कंठे मे पचल हलाहल छाती पर काली बान्हल पदतल तर विश्वक वैभव ई महिमा हमरो जानल छथि आशुतोष ओंघायल तेॅ डमरू बजबह हरदम ..... ।। मानल हम शरणागत छी, तैयो तेॅ अभ्यागत छी स्वागत कऽ दहक यथोचित साधक छह चरण समर्पित अपने कंजूस कहयबह करूणा करबह जॅ कमसम ।।

!! सुनू आब मन जेहन लगैए !!

सुनू आब मन जेहन लगैए - जिन्दाबाद रहय गयघट्टा, रानी परती मुरली छौनी, कछमछ कऽ कऽ राति बितावी, बान्हि धोधि पर दनही तौनी, धन्य हऽम छी फल्लाॅ बाबू जजिमनिके मे क्षुधा जगैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

अपना घर मे रखने नहि छी, कप्प गिलासक फूटलो टुकड़ी, बहराइछ पावनि तिहार मे मोरा मूनल गूड़क चुकड़ी धन्य - धन्य छथि मास्टर साहेब जेॅ ओ छथि तेॅ चाह चलैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

मूड़क नहि परवाहि रहल अछि, शूलि उठय सूदिक कपचन मे पाइ पाइ केॅ जोड़ि आइ धरि सेठ कहयलहुॅएहि जीवन मे  धन्य हऽम छी फल्लां बाबू ओहो धन्य नोत जे दैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

बाहर सॅ जेहने बलबुतगर, भीतर सॅ तेहने पनिमऽरू, सज्जन हम जेहने दलानपर आंगन मे तेहने दुरजऽरू धन्य हऽम छी फल्लां बाबू बाढ़निये सॅ देह झरैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

नोन मात्र कीनी दोकान मे स्ेहो जजिमानी ढ़ेबुआ सॅ मोन पड़य नहि किनने होयब, हम देहक सूतो देबुआ सॅ धन्य हऽम छी फल्लां बाबू खर्च देखिकऽ मांस गलैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

समधिक हाथे देल गेल छल, हमरो आदर्शक गरदनिया बेटा मंगनी बिका गेल हम बनि कऽ रहलहुॅ बुरबक बनियाॅ धन्य हऽम छी फल्लां बाबू अखनो रहि - रहि चोन्ह अबैए । सुनू आब मन जेहन लगैए ।।

!! गहवर जननी केर !!

चमकि रहल चकमक औ, गहबर जननी केर । देखिते टूटल भक औ गहवर जननी केर ।। गुंबज गगन दिशा देवाल अछि, पंडा बनि कऽ ठाढ़ काल अछि चान सुरूज दीपक औ गहवर जननी केर ।। पदतल पर स्वयं शिव शंकर नारायण सूतल सुअंक पर  विधि व्याकुल ठकमक औ गहवर जननी केर ।। गगनक गंगा चन्द्रकूप अछि उषा किरण ओढ़ुल अनूप अछि सकल भुवन पूजक औ गहवर जननी केर ।। टप - टप सुधा चरण सॅ चूबय वरद हस्त सुत मस्तक छूबय फलप्रसाद परिपक औ गहवर जननी केर ।। १.लोकगीत संकलन–निशा प्रभा झा २.२.उमेश मंडल-लोकगीत संकलन १.लोकगीत संकलन–निशा प्रभा झा छठिक गीत 1. हाथ सटकुनिया हो दीनानाथ हे घूमई छी संगहि संग आजु दिन उगई छी हे दीनानाथ आहे भेर भिनसर ॥2॥ आजु के दिनमा हो दीनानाथ हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छही हे अबला एक त अन्हरा पुरूख              ॥2॥ कानि–कानि कहई छही गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छही हे अबला एक तऽ बाझिनियॉ ॥2॥ पुत्र कनई छऊ गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ बाट धेने जाई छै गे अबला एकटा कोरिया पुरूख ॥2॥ कानि–कानि कहै छही गे अबला हे लागल एतीबेर ॥2॥ 2. माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया घर सऽ बहार भेली माँ छठि मईया कोढ़िया छथि काया लेल ठाढ। माँ छठि हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया घर सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे अन्हरा छथि नयना लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया दरबज्जा सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे बाँझिन छथि पुत्र लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। जखन छठि मईया गाम सऽ बहार भेली माँ छठि मईया हे निर्धन छथि धन लय ठाढ माँ छठि मईया हे सुनु ने अरजिया हमार। 3. कल जोड़ी ठाढ़ भेली पोखरी केऽ कात हे शिव के दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। अरघ उठैबे दीनानाथ अंकुरी हजार हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। दूध चढ़ैबे दीनानाथ केराक घउड़ हे। शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। हाथी बैसायब दीनानाथ अच्छत पान हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। दीप जरायब दीनानाथ धूप–गुगुल संग हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। नहाय–सोनाए दीनानाथ पोखरी के कात हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। कल जोड़ी ठाढ़ भेली पोखरी के कात हे शिव केऽ दुआरी हे, दीनानाथ निर्मल धार हे। संकलन–निशा प्रभा झाक गौरीक गीत। 1. गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ गेन्दा तोहर बड़ लाल। तीन सिन्दुर लय गौरी हम पूजब, पीपा आ भटिया अचीन गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन फूल लय गौरी हम पूजब, चम्पा अड़हुल गुलाब गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन फल लय गौरी हम पूजब केरा पेड़ा अनार गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन वस्त्र लय गौरी हम पूजब लाल पीयर पीताम्बर गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ तीन जल लय गौरी हम पूजब गंगा यमुना सरयुग गे। गेन्दा तोहर बड़ लाल गे मलिनिया ॥2॥ 2. चलु गे सुन्दरि गौरी पूजय लय नटुआ नचायब आजु गे। नटुआ जे नाचत बजना जे बाजत देखत नगरक लोक हे। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजब, मटिया आ पीपा अचीन गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन फूल लय गौरी हम पूजब,बेली,चमेली अड़हुल गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन वस्त्र लय गौरी हम पूजब पीयर,पीला,पीताम्बर पटोर गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन जल लय गौरी हम पूजब, गंगा यमुना सरयुग गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। तीन नेवैद्ध लय गौरी हम पूजब, केरा पेड़ा नारियल गे, चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। नटुआ जे नाचत बजना जे बाजत, देखत नगरक लोक हे। चलु गे सुन्दरि गौरी पूजब लय नटुआ नचाओत आजु गे। संकलन–निशा प्रभा झाक फूल छिटबाक गीत 1. फूल छीटय मे लागे सोहाओन, सिया जी के कोबर मे कथी मे लोढ़ब हे, बेली–चमेली, कथी मे लोढ़ब गुलाब सिया जी के कोबर मे। डाली मे लोढ़ब हे, बेली–चमेली, फुलडाली मे लोढ़ब गुलाब सिया जी के कोबर मे। किनका चढ़ायब हे, बेली–चमेली किनका चढ़ायब गुलाब सिया जी के कोबर मे। शिव जी चढ़ायब हे, बेली–चमेली, गौरी चढ़ायब गुलाब सिया जी के कोबर मे। किनका सँ माँगब हे,अनधन लक्ष्मी, किनका सँ माँगब सोहाग सिया जी के कोबर मे। शिव जी सँ माँगब हे, अनधन लक्ष्मी, गौरी सँ माँगब सोहाग सिया जी के कोबर मे। फूल छीटय मे लागे सोहाओन, सिया जी के कोबर मे। 2. भोला शंकर पार्वती (नचारी) भोला शंकर पार्वती जगपालक जगदीश्वर ईश्वर हमर अहाँ सुधि ली भोला शंकर पार्वती। दुःख जनम भरि भोगल बाबा, की अनाथ हम छी। कार्तिक, गणपतिसन हम नहि छी, छी अपराधी भोला शंकर पार्वती। उतरब पार अहीं बल बाबा अढ़रन ढ़रन अहीं भष्म विभूत कंठ विषधारी तांडव तान करी। भोला शंकर पार्वती। मुंडमाल सर्पक संग सभ दिन गंगा–चन्द्रधरी, पूरत आस मनोरथ बाबा गौरी के नगरी। भोला शंकर पार्वती। २.उमेश मंडल-लोकगीत संकलन कोबरक गीत कोबर लिखय गेलि रानी कौषिल्या, चारु कात लिखल मयूर। ताहि कोबर सुतला फल्लाँ दुलहा, संग लागि सीता सुकुमारि। मुह उधारि सुन्दरि के पुछलनि कोन कोन अभरन हे। हाथ कंगना अपन बाबा देलनि, सिकरी लखन देओर हे। सिरक सिन्दुर प्रभु अहीं जे देलहु यैह तीन अभरन भेटल हे। कोबर नीपक गीत देखू देखू हे सखि सीता आइ रुसि रहली। आधा निपलनि कोबर आधा छोड़ि बैसली। सीताक बापके बजाउ ओ भाय के बजाउ। की की सीता के सिखाय कइलनि विदा। सुनि सासु कौषिल्या मोहर लेलनि हाथ। कंगना गढ़ायब टीका गढ़ायब सिया किय रुसली। कन्या पक्ष तुलासी गौड़ीक गीत फूल लोढ़य गेलि गौरी माली फुलबाड़ी बसहा चढ़ल षिव आइ गे माइ। लोढ़ल फूल षिव देलनि छिरिआइ। कनैत खीजैत गौरी अम्मा लग ठाढ़ि। के तोरा मारलक के पढ़ल तोरा गारि। हम नहि कहब अम्मा कहितहुँ लाज। पूछू गय सखि सभके कहत बुझाय। महेषवाणी हम नहि आजु रहब एहि आंगन, जौं वूढ़ होयत जमाय गे माई। एक त बैरिन भेल विधि विधाता, दोसर धिया के बाप गे माई। तेसर बैटी भेला नारद ब्राह्मण, हेरि लयला बूढ़ जमाय गे माई। धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब लेबनि छिनाय गे माई। जौं किछु बजता नारद ब्राह्मण, दाढ़ी धऽ देबनि धिसिआइ गेमाइ। अरिपन लेपलनि पुरहर फोरलनि, फेकलनि चैमुख दीप गे माई। धिया लऽ मनाइनि मन्दिर पैसलीह, केओ जुनि गाबथि गीत गे माई। भनहि विद्यापति सुनु ए मनाइनि, इहो थिक त्रिभुवन नाथ गे माई। शुश्षुभ कऽ षिव गौरी विवाहू, इहो वर लिखल ललाट गे माई। समदाउन बारह बरस केर छल उमिरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कौने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथि देखि रहब लोभाय। घरभरीक गीत माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कयल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धिया जमैया मोर जाय। धान पान देल हाथहिँ सखि हेे दुनु मिलि देल छिड़िआय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। अवसर विषेष वा समसामयिक पावस नव घन गरजत माला। एक सघन तिपिराछन रजनी कूजित दुतिय मराला। तेहर सेज सुनि लखि पहु बिनु उठल अन्तर ज्वाला। रहिश्रहि चहुदिषि चपला चमकत विहरिनि जन जिमि भाला। खेपब राति कौन विधि सखि हे चिन्ता हृदय विषाला हे जलधर अहाँ जाउ ततय झट जहाँ बसथि नन्दलाल। करबनि विनय चरण धय लबि कऽ आबथु शीघ्र कृपाला जौं झट दऽ मोहन नहि औता करता निमिप अभेला। तौं ब्रज मे एको नहि जीउति विरहिनि सब व्रजवाला। कजरी सखी हे पिया नहि घर अयला, मेघवा वरिसन लागे ना। जौं हम जनितौं पिया नहि औंता रखितहुँ हृदय लगाय। हमरा सँ की त्रुटि भेल सखि हे आइधरि नहि आय। जौं जनितौ पिया ऐहन करता दितियनि नहि हम जाय। सखी हे पिया नहि घर अयला। (2) सखिया सावन ने डर लागै जियरा धड़श्धड़ धड़कै ना। ष्याम घटा चहुँ ओर देखायत बिजुरी चमकै ना। पिया मोर परदेष गेला सुन सेजबा न भावै ना। झींगुर दादुर मोर पपिहरा कोइली कुहकै ना। सखिया सावन मे डर लागै ना। उदासी तिरहुत मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकंल बिसललनि रे जते छल अहिबाती। सुतलि छलहुँ अपन गृह रे निन्न गेलौ सपनाइ कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाई कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरब गरानी। आनक धन लय धनबन्ती रे, कुबजा भेलि रानीश्तिरहुत। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारी। वन मे डोलय पिपर पात रे बहय सेमरि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारी। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारि। हरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) एते दिन भ्रमर हमर छल सखि हे, आब गेल सारंग देष। मधुपीबि भ्रमर लोभित भेल सखि हे। मोहि किछु कहियो ने गेल। ककराश्ककरा कहब, अपन दुख सखि हे, नयन निन दुरि गेल। जे बिरहे हम व्याकुल सखि हे भ्रमर हमर रुसि गेल। आंगन मोर लिये बिजुवन सखि हे, घर भेल दिवस अन्हार। पुरुषक वचन ऐहन थिक सखि हे, सपतक नहि विसवास। अवसर विषेषक गीत मलार (1) अलि रे प्रीतम बड़ निरमोहिया। आतुर वचन हमर नहि मानय, परम विषम भेल रतिया। काँपत देह घाम घमि आबत, ससरि खसत नव सरिया। आवत वचन थीर नहि आनन, बहत नीर दुहू अँखिया। रमानन्द भामिनि रहु थीर भय सुख बिच कहु दुख बतिया। (2) हे उधो लिखब कोन विधि पाती। अंचल पत्र नयन जल कज्जल नख लिखि नहि थीर छाती। चन्द्र किरण बध करत एतए पिय ओतए रहू दिनश्राती। रेषम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जीव घाती। कहथि रमानन्द सुनू विरहिनि आओत श्याम विरहाती। (3) अलि रे हम रघुवर संग जायब भूखल पायब भोजन करायब निर्मल जल पियेबै। थाकल पायब चरण दबायब शीतल बेनिया डोलेबै। औंघैल पायब वन पत्र लायब तहि पर आँचर ओछेबै तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस को रघुवर चरण लेपटेबै। योग (1) भात खेआय मन मारलन्हि हे अपन सासु हे। जाय ने देथि अपन देष हे अपन सासु हे। अम्मा होयती बाट देखैत करवन बाबू औताह हे। पान खेआय मति मारलन्हि हे सरहोजिनि अपन हे। जाय न देथि निज देष बुझाय रखतीह हे। कर जोरि विनती करै छी सुनू रघनन्दन। बान्हत अहाँ के प्रेम अहाँ अपने छी जगवन्दन। (2) प्रिय पाहुन मन सँ जिमि लिअ। अपने योग बनल अछि किछु नहि सेहो मनहि विचारि लिय। बुझब तखन हम जौं किछु माँगव और दिअ। भावक भुखल स्वभाव अहाँ के तेँ हम सब हरसाइत छी। भनहि विद्यापति इहो मंगल मिथिला विधि जानि लिअ। (3) हमर अपन करिये छथि पाहुन ताहि सँ मतलब अनका की। अपन बल पर अपन खुषी थिक ताहि मे कानून जहाने की। अपन बहिनि यदि फेकिये देता ताइ सँ मतलब अनका की। साठि हतार जनभूलखिन पुरखिन तकर करै छी निन्दा की। प्रसव कास मे दषा जे भेलनि ताहि सँ मतलब अनका की। गटश्गट गारि सुनै छथि लालन मगर मरम्मति करताकी। स्नेहलता मुसकाथि लजाइत उचित बात मे बजता की। उचिति(1) श्यामा वरन श्री राम हे सखि! देखैत मुख अभिराम। आइ हमर विध बाम हे सखि! मोहि तेजि पहु गेल आन। पढ़ल पंडित भान हे सखि! पहुक नहि करि अपमान। भनहि ‘विद्यापति’ भान हे! स्ुापुरुष गुणक निधान। (2) श्याम गोकुल तेजि गेल रे, हमर कोन दोख भेल रे। हमरा सँ नित अपराध रे, तोहे प्रभु गुणक अगाध रे। कत गुणकरब बखान रे, जग भरि के नहि जान रे। भनहि ‘विद्यापति’ भान रे, सुपुरुष गुणक खान रे। (3) जओं करु सुजन सिनेह रे, उपला पाहुन नेह रे। हेमकर मण्डप हेम रे, चाानन वन कत नीम रे। हिंगु हरदि कत बीच रे, गुनहि चिन्हल ऊँच नीच रे। मणि कादब लेपटाय रे, तैओ ने तनिक गुण जाय रे। अलि के कुसुम अनेक रे, मालति के अलि एक रे। काक कोइलि एक कांति रे, भेम्ह भ्रमर दुई भाँति रे। कह ‘बादरि’ अवधारि रे, सुपुरुष जन दुइ चारि रे। बारहमासा (1) चैत हे सखि मत्तकोकिल कुहुकि काम जगाव यो। कठिन श्याम कठोेर मानस ऋृतु बसन्त विदेष यो। बैषाख हे सखि देखि उपवन ललित कुसुम विकास यो। देखि निज कुच कुसुम मौलल रहत चित्त न थीर यो। जेठ हे सखि तेल चन्दन पंक लेप शरीर यो। बिन नाथ चन्दन शीतलादिक धघकि जारत देह यो। आषाढ़ हे सखि झमकि झमकत नीर बिजुरी जोर यो। देखि काँपत देह थर नयन धारा नोर यो। आयल साओन मेघ बरिसत घुमुड़ि घोर समीर यो। सुमरि यौवन उमड़ि आबत प्राणमति नहि पास यो। भादब जलधर धड़कि ठनकत खसल चैकि अचेत यो। काहि कहु अब श्याम बिनु सखि जात जीवन मोर यो। आस आसिन अन्त कय सखि बैसल कंत दुंरंग यो। शरद चन्द्रक चाँदनी देखि चित्त चंचल मोर यो। देखि कातिक नारि एकसरि तानि शर रतिनाथ यो। करत आंकुल जीव छनश्छन कठिन कन्त न बूझ यो। लबिजात धान समान अगहन कमल सन कुच मोर यो। झट नाथ-नाथ पुकार कय सखि पड़ल सेज अचेत यो। पूस ओस बेहोष भय सखि खसत प्रीतम पास यो। हम अकेलि सून पहु बिन काटब कोन विधि राति यो। माघहे सखि जाड़ लागत जुलुम करि गेल कंत यो। अंगअंग अनंग ज्वाला ताप तापित देह यो। रमानन्द रहु धीर कामिनि धीर धय मन मारि यो। आओत फागुन मिलत बालम खेलत हुनि संग फागु यो। (2) कहत मैना सुनू यो मुनि जन गौरी कोना रहत कुमारि यो। गौरी जोग बर खोजि आनू चढ़ल मास बैसाख यो। जेठ नारद फिरति चहु दिषि जोहल भंगिया भिखारि यो। कहथि नारद सुनहु त्रिभुवनपति चलह व्याहन आज यो। अखाढ़ हेमन्त घर बरियात लायल देखल सकल समाज यो। काज राज सब छोड़ि सखिसब देखु हर बरियात यो। सावन वर बौराह आयल बसहा पीठ असवार यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल पैर फाटल बेमाय यो। भादब मैना भेलि व्याकुल धुनथि माथ कपार यो। घटक के हम की बिगाड़ल की विधि लिखल लिलाट यो। आसिन मैना गेलि अंगना मन दुख अगम अपार यो। आब हम विष घोरि पीअब मरब जल बिच जाय यो। कातिक शंकर भस्म तेजल कयल गंगा स्नान यो। रगड़ि चानन अंग लेपल भेल सुन्दर रुप यो। अगहन मैना भेलि हरसित लावथि गाइनि बजाय यो। चलह सखि सब गीत गाबह त्रिभुवनाथ जमाय यो। पूस सखि सब छोड़ि बैसलि देखथि रुप अनूप यो। चलह सखि सब करह मौहक देखि नैन जुड़य यो। माघ शंकर भेल व्याकुल जोहथि आक धथुर यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल भाँग हुनक अधार यो। फागुन षिव सँ कहथि गौरी सुनू षिव अरजी हमार यो। एक बेरि भस्म उतारु शंकर देखत हेमन्तक समाज यो। चैत मैना भेलि हरसित पूरल मनक अभिलाष यो। भनहि विद्यापति ई पद गाओल मिलल त्रिभुवन नाथ यो। (3) अगहन सीता के विवाह, पूस कोवर तैयार। माघ सीरक भराय देव रधुवर जी के। फागुन फगुआ खेलायब, चैत फूल लोढ़ि लायब, बैषाख बेनिया डोलायब रधुवर जी के। जेठ घाम परे भारी, आषाढ़ वुन्द झरे सारी, सावन झूलबा लगा दे, रधुवर जी के। भादव राति अन्हार, आसिन करब सिंगार कातिक आवि गेल मिथिला रधुवर जी के। (4) कातिक अयले कलकतिया जोहन बटिया। अगहन चुड़वा कुटायब पूस दही पौरायब। फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढ़ि लायब। बैषाख बेनिया डोलायब जोहन बटिया। जेठ हेठ भऽ गमायब अषाढ़ घर चल जायब। सावन दुनु मिलि खेलब जोहन बटिया। भादब नहि घहराय आसिन आस लगायब। कातिक ऐलै कलकंतिया जोहन बटिया। छौमासा(1) साओन सर्व सोहाओन सखि हे फुलल बेलि चमेलि यो। रभसि सौरभ भ्रमर भ्रमि भ्रमि करय मधुरस केलि यो। आरे केलि करथु पहु मन दय सखि अधिक विरह मन उपजय। भादव घन घहराय दामिनि गरजि गरजि सुनाय यो। बरसु घन झहर बून्द रिमिझिमि मोहि किछु नहि भाय यो। आरे भामिनि भय घन दमसय सखि मुरुछि खसु महिमय। परिणाम कोन उपाय हे सखि करब कोन परकार यो। मास आसिन अधिक ज्वाला विरह दुख अपार यो। आरे कतेक सहब दुख पहु बिनु सखि ककरो नाह बिछड़ि जनु। नाह विछुड़ल मोर हे सखि होयत जीवक अन्त यो। अरुण कातिक धसिय धायब जतय लुबधल कंत यो। आरे कंत जोहय हम जायब सखि जतय उदेष हम पायब। अगहन हे सखि सारि लुबधल लबल जीवन मोर यो। योगिनि भय हम जगत जोहब जतय जुगल किषोर यो। आरे हमर प्रभु जौं अहोताह सखि कर गहि कंठ लगोताह। पूस धैरज धरय चाहिए भमर रहल विदेष यो। हुनि विदेषी सुखहि खेपत हमर तरुण वयस यो। आरे विदेसहि वैसि गमओताह सखि हमर गृह नहि अओताह। माध झिहिर पवन डोलय देह झाँझड़ मोर यो। हँसथि, बसन उधारि सखि सब कहथि मोहि विजोर यो। आरे शोक वियोग मनहि मन सखि चित्त नहि थिर रहे एको छन। (2) वैषाख मास तनि तलफत घाम चुबै अबिरल। वैसि बेनिया डोलायब कोठरिया मे। जेठ दहकत अकास, घाम सहलो न जात पैस बैसब भीतर मन्दिरिया मे। अषाढ़ वुन्द अपार पावस बरसे हजार देखि हरषथ अपन कोठरिया मे। साओन बरखा बहार, झुला करब तैयार झुला झुलबै हम फुलवरिया मे। भादब भरु गदी नार, नैया करब तैयार अहाँ झिझरी खेलायब नदिया मे। आसिन शरद बहार चाँदनी के झलकार रास रचालेब कंचन महलिया मे। कातिक दुतिया मनायब सबके एतहि बजायब करब सब सुख साज कोठरियामे। अगहन पन्चचमी मनायब नवका चड़बा कुटायब प्यारे परसि खुआयब ससुररिया मे। चैमासा (1) माध मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेष यो। ओहि रे परदेषिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाड़ि बयस यो। फागुन हे सखि आम मजरल कोइली सबद घमसान यो। कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय नैना सँ झहरय नोर यो। चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो। आन धन रहितय बेचि हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो। बैषाख हे सखि विषम ज्वाला घाम सँ भीजल शरीर यो। रगड़ि चन्दन अंग लेपितहुँ जौं गृह रहितथि कन्त यो। (2) कैसे खेपव बिनु कामिनि दामिनि दमसय रे। सखि री सुखक मास अषाढ़ आस नहि पूरल रे। दादुर करत पुकार झिंगुर झंझकारत रे। सखी री सावन चहुँ ओर घटा मयूर बन कुहकत रे। भादव मे मेघ झंहरत मोर मन झहरत रे। सखी री हरि बिनु मंदिर शून गुण कत सुमिरब रे। ‘सूरदास’ प्रभु गावल सखी समुझाओल रे। सखी री धैरज धरु चहु मास आसिन हरि आओत रे। वसन्त (1) सरस वसन्त समय भेल सजनी गे दखिन पबन बहु धीरे। सपनहुँ रुप वचन एक भाखिय मुखा सँ दूर करु चीरे। तोहर बदन सन चान होथि नहि यदपि जतन विधि देथि। कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि। लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने। तै पुनि जाय नुकायल ज लमे पंकल एहि अपमाने। मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि। भनहि विद्यापति सुनु वर यौवति उपमा सुझय न मोहि। (2) समय वसन्त पिया परदेष असह सहब कत विरह कलेष सुमरि पहु मन नहि थीर मदन दहन तन दगध शरीर षीतल पंकज चम्पाक माल हृदय दहन करु विषधर ज्वाला श्रवण दहन करु कोकिल गान चान दहन तन अनल समान (3) रंगीली रंगश्महल मे खेलतु आज वसन्त। संगश्सखी श्रृंगारश्सजी सब सरस तरंग वसन्त। रंगीली... सुश्कर कनक पिचकारीश्धारी, सोहत श्री सिय कन्त। भीजतश्भूषणश्वसनश्रमणश्तन, अनुपमश्छवि दर्षन्त। रंगीली... तिरहुत (1) मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकल बिसरलनि रे जते छल अहिबाती। सुतल छलहुँ अपन गृह रे निन्द गेलौं सपनाइ। कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाइ। कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरम गरानी आनक धन लय धनवन्ती रे कुबल भेलिरानी। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारि। वन मे डोलय पिपर पात रे जल बहय सेमारि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारि। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारी ळरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) सुतल छलहुँ हम घरवा रे गरवा भोतिहार। राति जखन भिनसरवा रे पहु आयल हमार। कर कोषल कर कपइत रे मुखचन्द्र निहारे। केहन अभागलि बैरिन रे भागल मोर निन्द। विद्यापति कवि गाओल रे धनि मन धरु धीर। समय पावि तरुबर फरु रे कतबो सिंचु नीर। बटगवनी (1) तरुणी वयस मोर बीतल सजनी गे पिया पिया बिसरल मोर नाम। कुसुम फुलीय फूल मौलल सजनी गे भ्रमरो ने लेल विश्राम। सिर सिन्दुर नहि भावय सजनी गे मुखहि खसय एहि ठाम। उठ दूत परम व्याकुल सजनी गे नयन ढ़रकि खसु वारि। अधरस ओतय गमाओल सजनी गे दय गेल सौतिनक बारि। युगल नयन मन व्याकुल सजनी गे थिर नहि रहय गेयान। विद्यापति कवि गाओल सजनी गे ई थिक दुखक निदान। (2) चानन बुझि हम रोपल सजनी गे भय गेल सिमरक गाछ सजनी गे। ताहि रे गमक पिया जागल सजनी गे। चलि भेल पिया परदेष सजनी गे। बारह बरस पर आयल सजनी गे, लायल कंगही सनेस सजनी गे। ताहि कंगही लय आयल सजनी गे, कय लेल सोलह श्रृंगार सजनी गे। खोंइछ भरि लोढ़लहुँ चंगेरी भरि सजनी गे, सब फूल सेजिया लगैब सजनी गे। फगुआ (1) मिथिला मे राम खेलथि होरी।  मिथिला मे... अतर गुलाब कुम कुम केषरि, रंग अबीर भरल झोरी। सखि सब सजि धजि रधुवर के देल अबीर भरल झोरी। होइछ बाद्य विधान विविधश्विधि नाचश्गान ओ झिकझोरी। मारथि मर्स पूर्ण पिचकारी राम सकुचि जाइछ गोरी। सुरश्गण सुमन गगन सौ उझलथि, अबीर गुलाल बीच घोरी। कूदथि बालक वृन्द मुदित मन, मिलाश्मिला निज-निज जोरी। धै फगुआ के रुप मिथिलापुर, घरश्घर मचि रहल होरी। ‘हरेकिृष्ण’ शोभा लखि सकुचित, शेषश्षारदाश्षत् जोरी। (2) गलिअन बिच धूम मचायो री, गलियन... ग्वालवाल संग लिये कन्हैया नित भोरे उठि आयो री। हाथ अबीर गुलाल पिचकारी सिर डारो री। वन्षी वीणा झाल बजाओ देत गारी गायो री। -गलियन...... (3) गोरी संग कृष्ण खेलय होरी ग्वाल वाल संग कृष्ण कन्हैया सुन्दर रंग भरी झोरी। बाजत आबत झाल मृदंग सब सब जन आबत रस बोरी। गिरिधर दास गाओल बाल संग युग युग जीबओ यह जोरी। गोरी संग... (4) परदेसिया लै अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया नगर बीच आयल खुटे खुट अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया आंगन बीच आयल रचि रचि केसिया बन्हावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया घर बीच आयल झाड़ि झाड़ि पलंग ओछावे गोरिया। परदेसिया... (5) परदेसिया के नारि सदा रे दुखिया। चारिम मास फागुन अब बीतल कहियो ने आयल पहुँ पतिया।  परदेसिया.... पाचम मास चैत जब बीतल अपनो ने सूनल हुनि बतिया।  परदेसिया... (6) होरी खेलत श्री रघुवर रसिया। धूम मचावत, डंफ बजाबत घाटश्बाट सब रोक लिया। श्री रघुवंषी छैल छबीले, श्री मिथिलेष दुलारी सिया। ललकारत दोऊ ओर परस्पर जीत लिया होरी जीत लिया अबीर उड़ावत रंग वरसावत जनक नगर के गलि गलिया। ‘प्रेमनिधि’ अबला प्रबला भऽ, उमड़ि चली हे रंगरलिया। (7) होरी मे लाज न करु गोरी। प्रेम ब्रजवासी तु गोरी भली बीनहै यह जोड़ी। जौ इससे सीधे नहि खेलहुँ मार मार कर वरजोरी। सुरदास निकले सब बन मे लिये जाय वन मे जोड़ी। चैताबर (1) कृष्ण तेजल मधुवनमा हो रामा कौन करनमा कृष्ण तेजल मधुवनमा। यमुना तट पर वंषी वट पर सेहो नहि लागत सोहनमा कौतुक हास रास वृन्दावन सेहो सब भेल सपनमा हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। जौं हम जनितौं कृष्ण नहि औता रहितौ अपन भवनमा। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को हरि मुख भेल सपनमा। हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। (2) चैत रे महिनमा पिया बिनु आबै नहि निंदिया, हो रामा... पिया परदेष गेल सुधि बुधि हरि लेल भुलि गेल घर के सुरतिया हो रामा पिया बिनु..... जब सुधि आबै पिया तोहरो सुरतिया कुहुकि उठय मोर छतिया हो रामा पिया... केहन कठोर भेल पिया के करेजवा एको नहि लिख भेजय पतियाश्हो रामा घर जब अइहे। पिया कोरा लै बैसिहें नखरा लगैंहें आधी रतिया हो रामा... कहत महानन्द सुनु हे सहेलिया ऐसे मे बितैं हें सारी रतिया हे रामा.... (3) डिम डिम डमरु बजाबै हो रामा, षिव रंगरसिया। अपने सदाषिव पूजा पर बैसता गौरी सँ टहल कराबै हो रामा... अपने सदाषि भाँग उपजावै गौरी सँ भाँग पिसाबै, हो रामा.... अपने सदाषिव बसहा चराबै गौरी सँ डोरी धरावै, हो रामा.... अपने सदाषिव माँगिश्माँगि आनथि, गौरी स धान कुटावै, हो रामा.... (4) रुसल पियबा मना दे कोइलिया तेरी मीठी बोलिया। सगर रैनि हम कतेक मनाओल ओ नहि मानल मोर बतिया। केओ नहि हितश्बंधु ककरा जगायब के पिया देत मनैया। आमक गाछ पर तोही जे कुहुकब हम कुहुकब दिन रतिया हो रामा... सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को कओन हरल हुनि मतिया। हो रामा तेरी मीठी बोलिया (5) कौन कयल योग टोनमा, हो रामा सब गेल वनमा राम लखन सिय वनहि सिधारल, दषरथ तेजल परनमा, हो रामा.. मातु कौषिल्या रोदना पसारल सुन भेल नगर भवनमा, हो रामा.. तुलसदास प्रभु तुम्हरे दरस को, धन इहो कोप भवनमा, हो रामा.. झूला (1) यमुना तीरे कदमक डारी झूला रेषम के डोर गे। षोभा देखि भेल चितबौरी ज्ञान हरन भेल मोर गे। एक दिष राधा एक दिष कन्हा दोउ कर झिकझोर गे। राधा वदनमा पर शोभे माला निरखत नंद किषोर गे। नभ धेरि अयलै कारी बदरिया भेलै गगन मे शोर गे। विरहिन के चित्त चंचल भेलइक नयना झहरे नोर गे। राधाकृष्ण युगल अति सुन्दर एक श्यामल एक गोर गे। (2) आयल सावनक मास, मन मे बढ़ल हुलास मनमा लागि गेलै वृन्दावन नगरिया मे। झुला परम अनमोल, लागत रेषमक डोर झूलत नन्द किषोर इजोरिया मे। सखियन संग राधा रानी से छवि कोना के बखानी सुन्दर बाजन बाजै हुनका पैजनिया मे। झूलवै मिलिकय सखी सहेली, सुमुखी राधा अलबेली झूलत राधे श्याम यमुना किनरिया मे। एक सखि लेने कर मे माला, कहाँ गेल नन्दलाला सूरदास पुछथिन्ह छोड़ि डगरिया मे। (3) झूला लगे कदम की डाली, झूले कृष्ण मुरारी ना। कौने काठ के बनल हिड़ोला कोन वस्तु के डोरी। झूला.. राध झूलय कृष्ण झुलावय बारीश्बारी ना। झूला.. छठि (1) अंगना मे पोखरी खुनायल छठि मइया औती आइ। दुअरा पर तमुआ तनायल छठि मइया औती आइ। अँचरा सँ गलिया बहारब तैपर पियरी ओढ़ायब छठि मइया औती आइ। (2) डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर केओ ने छै लेसबैया परमेसरी मैया सोना के दियरा मइया, पाटश्सुती बाती हे अबला नारी लेसबैया परमेसरी मइया निर्धन कोढ़ी बाटे-घाटे ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर पान सुपारी पकवान नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। (3) हमरो पर होइयौ सहाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयौ सहाय। चारि पहर राति जलश्थल सेबलौं सेबलौ छठि गोरथारि, हे छठि मइया। हमरो पर होइयौ सहाय। अपना ले मंगलौ अनश्धन लछमी जुगश्जुग मांगल अहिबात, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। घोड़ा चढ़ै लेल बेटा एक मंगलौ हमरो पर होइयो सहाय। वयन बिलहै लेल बेटी एक माँगल माँगल पण्डित जमाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। (4) केरवा जे फरल छै घौद सँ, ओइ पर सुग्गा मड़राय। मारबौ रे सुगवा धनुष सँ, सुगा खसल मुरुझाय। सुगनी जे कानय वियोग सँ, आदित होउ ने सहाय। काँचहि बाँस केर बहिंगा, ओइ मे रेषमक डोर भरिया जे फल्लाँ भरिया, भार नेने जाय छै बाटहि पूछै बटोहिया स, ई भार किनकर जाई। आन्हर होइबे रे बटोहिया ई भार छठि माई के जाइ। ई भार दीनानाथ के जाय। समदाउन (1) बड़ रे जतन सँ सिया जी के पोसल सेहो रघुवंषी नेने जाय। कौने रंग दोलिया कौने रंग ओहरिया लागि गेल बतीसो कहार। लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया ओहि बन केओ ने हमार। केयो जे कानय राजमहल मे केओ कानय दरबार। केओ जे कानय मिथिला नगर मे जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय। आजु धीया कोना अमा बिनु रहती छनश्छन उठति चेहाय। (2) भेल विवाह चलल षिवषंकर गौरी सहित कैलाष। बसहा पीठ षिव दोलिया पठाओल बाघ छाल पड़ल ओहार। बड़ रे जतन सँ गौरी के पोसल घृत मधु दूध पीआय। सोनाक मुरुति सन गौरी हमर छथि वर भेल तपसि भिखारि। हमर गौरी कोना तपोवन जैतीह झाँखथि राजदुलारि। (3) सुग्गा जौं पोसितहुँ भजन सुनविते धीया पोसि किछु नहि भेल। घीवक घैल जकाँ पोसलौं हे धीया बेटा जेँका कयल दुलार। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। ओलतिक छाहरि जकाँ पोसलौं हे धीया मधुर जेँका राखल जोगाय। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। (4) बारह बरस केर छल उमेरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कोने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथी देखि रहब लोभाय। (5) जखन महादेव निज घर चललाह गौरी सहित कैलाष। बसहा चढ़ल षिव डोलिया पठौलनि बाघछाल कयल ओहार। घर सँ बाहर भेला हेमन्त ऋृषि भय गेल बाप पीठी ठाढ़। घर सँ बाहार भेलि माय मनाइनि सुसुकि बहाबथि नोर। सब दिन खाथि गौरी माखन मिसरी सक्कर करथि अहार। से गौरी कोना धतुर भाँग खयती आन की हयत आधार। पराती (1) उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। छल एक पापी महाबली जाय मगह मरि गेल। ओकरा तनके कौओ कुकुर ने खाय, गिद्ध गीदर देखि डराय। उठि... गलि गेल माँस हाड़ भेल बाहर रोमश्रोम भेल विकलाई। कणिका एक उड़ि पद पंकज, सुर विमान लय धाई। उठि... पंछी एक उड़ल गंगा मे ऊपर पाँखि फहराई। देखू गंगाजी क महिमा जे ओ कोना तरि जाई। उठि... गेल बैकुण्ठ मुदित मन देखू, आरति सुर उतराई। भोलाजी गंगाक महिमा, कहइत अधिक लजाई। (2) कोन गति होयत मोर हो प्रभु कोन गति होयत मोर। जनम जनम हम पाप बटोरल कहिओ न भजलहुँ तोर। बेरि बेरि अँखिया कमल मुख हेरलहुँ सुधि नहि तोर एको बेर। अबहु सुमति गति दिय त्रिभुवन पति शरण रहब हम तोर। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के दुख संकट हरु मोर। (3) रथ पर निरखत जात जटाई रथ पर निरखत जात। रथ के उपर बैठ वैदेही नाजत निठुराई। रथ पर... है कोइ वीर राम के दलमे रथ के ले बिलमाई। कोन वंष के सूत रघुराई कौन हरने आई।  रथ पर ... सूर्यवंषक राजा नृप दषरथ तनिके सुत रघुराई। तनिके प्रिया नाम जानकी निषचर हरने जाइ।  रथ पर... करुण वचन जब सूनेउ जटाई रथ चढ़ि कयल लड़ाई। अग्निवाण मारल सो धरती गिरल मुरदाई - रथपर मन सँ आषिष देल माता जानकी प्राण रहे घट छाई। एहि बाटे आओता रघुवर ताकय सव बात कहव बुझाई। रथ पर... (4) जागहु राम कृष्ण दोउ मूरति दषरथ नन्द दुलारे। उदय होय उदयाचल आवत जोति पलंग पसारि। जय जयकार करत सब आयो सुर नर मुनि तुअ दुआरे। जा.... क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल मुरली धनुष सम्हारि। कब देखिहौं नयनन दोउ मुरति सन्तन केर रखबारे। - जा.... पायो दरस परस पद पंकज पापी पुरुष निवारे। रहे एक आस दास तुलसी के तीन लोक के न्यारे। सीता पति राधा वर जोरी लेइय सुधि न हमारे। - जागहु.... (5) जुनि करु राम वियोग हे जननी। जुनि.. सुतल छलहुँ सपन एक देखल, देखल अवधक लोक हे जननी। - जुनि.... दुइ पुरुष पथ अबइत देखल, एक श्यामल एक गोर हे जननी। - जुनि.... कंचन गढ़ हम जरइत देखल, लंका मे उठल किलोल हे जननी। - जुनि..... स्ेातु वान्ह हम बन्हाइत देखल, समुद्र मे उठल हिलोर हे जननी। - जुनि.... नचारी (1) रहबौ हम तोहरे नगरिया हो भंगिया, रहबौ हम तोहरे नगरिया। झारी मझारी मे कुटिया बनायब, सब दिन बहारब डगरिया हौ भ्ंगिया। भांगो धथुर पीसि तोहरा पियायब, भोर साँझ दुपहरिया, हो भंगिया....। भांगक बाड़ी मे बसहा चराएव, जीवन भरि करबौ चकरिया, हो भंगिया... धथुर के फूल बेलपतिया चढ़एव, चानन चढ़ायब केषरिया, हो भंगिया.... कतबो हटेला सँ हम नहि हटबह, कहियो ने छोड़वह दुअरिया, हौ भंगिया...। सब दिन नवीने नचारी सुनाकय अप्पन बितायब उमरिया, हौ भंगिया... नेको अनेको जनम मे बसविहह, अपन घरक पछुअरिया, हो भंगिया... ‘मधकर’ सतत बाट हम तोरे ताकब कहियो त फेरबऽ नजरिया, हौ भंगिया...। (2) आइ मयना के अंगना सोहाग बहिना। जेना जूटल छै शोभा के खान बहिना। गौरी ओ शंकर युगल रुप मोहन। कए के सकै अछि बखान बहिना। घरश्घर नगर ओ डगर पर विराजय। तानल वसन्त वितान जहिना। छवि के छटा पर कपिक घन घटा अछि। तै पर स्वर लय के जुटान बहिना। मोदो प्रमोदो प्रमोदो पाबि उमड़ल। उदधि देखि पूनम के चान जहिना। षिवराति षिवमय करय विष्व भरि कैं। ‘मधुकर’ सब फागुन के मास एहिना। (3) गौरी तोर अंगना बड़ अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करै हुलना दोसर बड़द छैन सेहो बउना। पैंच उधार लय गेलहुँ अंगना सम्पत्ति के मध्य देखल भाँग घोटना। खेती ने पथारी सिव के गुजर कोना मंगनी के आस छनि वरिसो दिना। कातिक गणपति दुइ जन बालक एक चढ़ै मोर एक मूस लदना। भनहि विद्यापति सुनु उदना दारिद्र हरण करु घैल शरणा। गौरा... (4) नारद बहुत बुझा हम कहलहुँ गौरी लय एहन वर अनलहुँ यो। हमरो गौरी छथि बारह बरख केर बुढ़वा वर लय अयलहुँ यो। नारद बड़ अजगुत अहाँ कयलहुँ। गौरी लय एहन बर लयलहुँ यो। तीनि भुवन बर कतहुँ न भेटल तँ घर घूरि फिरि अबितहुँ यो। बेटि गौरी छथि अल्प वयस केर कनिको नहि बिचारलहुँ यो। भनहि विद्यापति सुनिय मनाइनि त्रिभुवन पति लय अयलहुँ यो। (5) जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। भिखियो ने लिअय बाटो नहि छोड़य गौरी कोना जयती                                   अंगनमा मे। देह अछि सह सह विषधर शतश्षत भूतश्प्रेत छनि संगवा मे। बरहा चढल षिव डमरु बजाबथि जटा बीच गंग तरंगना मे जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। सामाक गीत (1) डाला लय बहार भेली बहिनो से फल्लाँ बहिनो फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनु राम सजनी.... समुआ बैसल तोहें बाबा बड़ैता तोर बेटा लेल डाला छीनि सुनु राम सजनी... कथी केर आहे बेटी डालवा तोहर छौ कथी बान्हल चारु कोन सुनु राम सजनी... काँचहि जे बाँस केर डलवा यौ बाबा बेलीश्चमेली चारु कोन सुनु राम सजनी ... जौं तोरा आहे बहिनो डलवा जे दय देब हमरा के की देब दान सुनु राम सजनी.... चढबाक घोड़ा देव पढ़वाक पोथी देब छोटकी ननदिया देब दान सुनु... (2) चानन बिरिछ तर भेलि बहिनो से फल्लाँ बहिनो ताकथि बहिनो भाइ केर बटिया एहि बाटे औता भैया, से फल्लाँ भैया .. दखि लेबनि भरि अँखिया पैर पकड़ि जनु कानू हे बहिनो, से फल्लाँ वहिनो फाटत मोर छतिया। (3) हमर भैया कोना आबै हाथी चढ़ल भैया हँसैत आवै पान खय मुह रंगैत आबै रुमाल लय मुह पोछेत आबै। दरपन लय मुह देखैत आबै चुगिला कोना के आवै गदहा चढ़ल हिहिआइत आबै कोइला सँ मुह रंगैत आबै गुदरी सँ मुह पोछैत आबै। (4) गे माइ कौने भइया जयता अटना पटना कोने भैया जयता मुंगेर। कोने भइया जेता दिल्ली कलकत्ता कौने भइया जयता रंगून। कौने भइया लौता आलरिश्झालरि कौने भइया लौता पटोर कौने भइया लौता झिलमिल केचुआ। कौन भइया लौत कामी सिन्नुर कौने बहिना पहिरथि आलरि झालरि कौने बहिनी पहिरु पटोर। कौने बहिना पहिरथि झिलमिल केचुआ कौने भौजी कामि सिन्नुर। युगेश्युगे लीबथु इहो सब भैया, भौजी के बाहु अहिवात। (5) नदिया के तीरे तीरे फल्लँा भैया खेलथि सिकार। कहि पढ़ोलनि भाइ फल्लाँ बहिनो के समाद भैया आओताह पाहुन हे। कोठी नहि मोरा आरब चाउर बसनो नहि बीड़ा पान हे। कौन विधि राखब माइ हे, फल्लाँ भाइक मान हे। हाट बजार सँ चाउर मंगायब, तमोली सँ बीड़ा पान हे। पटना शहर से धोतिया मंगायब, राखब भैया के मान हे। (6) गाम के पछिम ठुठि पाकड़ि रे ना ना रे ताहि पर बाबा बसेरा लेल ना। खेलितेश्धुपैते गेली फल्लाँ बहिनी ना। एक कोस गेली बहिनी दू कोस ना। तेसर कोस बहिनी हेराय गेलौ ना। तकैत तकैत गेलथिन फल्लाँ भौया ना। एक वन तकलनि भैया दुइ वन ना। कतहुँ ना भेटय बहिनिया मोर ना। देहरि बैसल भैली खुष भेली ना। ना रे भेल ननदी हेराय गेली ना। (7) गाम के अधिकारी भैया हे भैया हाथ दस पोखरी खुना दिय। चम्पा फूल लगा दिय हे। फुलवा लोढ़ैत बहिनी आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्नुर नयन भरु काजर हे। छता लेने आवथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनी एहि छाह आषीष देहु हे। युगेश्युगे जीवथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ू हे। राग संबंधी ललित राग मे मेघ समय पर जलदान करे। पृथ्वी धनश्धान्य सँ भरल रहे। पिसुन पाबि जनु नृपतिक काने। गुन बुझि भूप करथु सनमाने। चिरै जिबथु हिन्दुपति देओ। गुन कीरथि गाबहि सब केओ। राजविजय राग मे जय जय परिजात तरुराज। पाओल पुरुब पुन दरसन आज। सरगक भूखन गुनक निवास। सुरहुक तोहें परिपूरह आस। सेवक सब तुअ दानव देबा। मानव जानव की तुअ सेवा। सुरमति निअ कर करथि किआरी। सची देथि सुरसरि जल ढ़ारी। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। आसावरी राग मे जायब हरिक समाजे। पाओब नयन सुख आजे। कि आरेश्ध्रुवमद। जोगहुँ न जानिअ जन्ही। दिठीभरि देखब तन्ही। ब्रह्म सिव सेव जाही। काहि भजब तेजि ताही। मनहि भगति लेब माँगी। समय परमपद लागी। हिन्दुमति जिउ जाने। महेसरि देइ बिरमाने। सुमति उमापति भाने। पुनमति भजु भगमाने। वसन्त राग मे अनगिनत किंषुक चारु चम्पक वकुल बकुहुल फुल्लियाँ। पुनु कतहुँ पाटलि पटलि नीकि नेवारि माधबि मल्लियाँ। कर जोरि रुकुमिनि कृष्ण संग वसन्त रंग निहार हीं। रितु रभस सिसिर समापि रसमय रमथि संग बिहार हीं। अति मज्जु बन्जुल पुन्ज मिन्जल चारु चूअ बिराजहीं। निज मधुहिं मातलि पल्लबच्छवि लोहितच्छवि छाजहीं। पुनु केलि कलकल कतहु आकुल कोकिल कुल कूजहीं। जनु तीनि जग जिति मदननृपमनि विजयराज सुराजहीं। नव मधुर मधु रसु मुगुध मधुकर निकर निक रस भावहीं। जनि मानिनि जन मान भन्जन मदन गुरुगुन गावहीं। बराडीराग मे अब तरु अबनी तेजि अकास। न थिक दिवाकर न थिक हुतास। धोती धबल तिलक उपबीत। ब्रह्म तेज अति अधिक उदीत। बैनब दण्ड वेद कर सोभ। आवथि नारद दरसन लोभ। परम जुगुत तिनि जगतक हीत। ब्रह्मासुत मोर सम्भुक मीत सुमति उमापति भंन परमान। जगमाता देवि हिन्दुपति जान। पंचम राग मे सखि हे रभस रस चलु फुलवारी। तहँ मिलत मोहि मदनमुरारी। किनक मुकुट महँ मनि भल भासा। मेरु सिखर जनि दिनमनि बासा। सुन्दर नयन बदन सानन्दा। उगल जुगल कुबलय लय चन्दा। बनमाला उर उपर उदारा। अन्जनगिरि जनि सुरसरि धारा। पिअर बसन तन भूखन मनी। जनि नव घन उगल दामिनि। जीवन धन मन सरबस देबा। से लय करब हरि चरनक सेवा। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। नटराग मे कि कहब माधब तनिक बिसेसे। अपनहु तनु धनि पाब कलेसे। अषनुक आनन आरसि हेरि। चानक भरम कोप कतबेरी। भरमहु निअ कर उर मर आनी। परम तरस सरसीरुह जानी। चिकुर निकर निअ नयन निहारी। जलधर जाल जानि हिअ हारी। अपन बचन पिकरब अनुमाने। हरि हरि तेहु परितेजय पराने। माधव अबहु करिअ समधाने। सुपुरुष निठुर ने रहय निदाने। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। मालव राग मे हरि सउँ प्रेम आस कय लाओल। पाओल परिभब ठामे। जलधर छाहरि तर हम सुतलहुँ आतप भेल परिनामे। सखिहे मन जनु करिय मलाने अपन करम फल हम उपभोगव तोहें किअ तेजह पराने।  ध्रुवम् पुरुब पिरिति रिति हुनि जउँ विसरल तइओ न हुनकर दोसे। कतन जतन धरि जउँ परिपालिअ साप न मानय पोसे। कवहु नेह पुनु नहि परगासिअ केवल फल अपमाने। बेरि सहस दस अमिअ भिजाबिअ कोमल न होअ परवाने।  ध्रुवम् गुरु उमापति पहु देव दरसन मान होएव अबसाने। सकल नृपतिपति हिन्दुपति जिउ महरानि विरमाने। ध्रुवम्। केदारराग मे मानिनि मानह जउँ मोर दोसे। साँति करह बरु न करह रोसे। भौंह कमान बिलोकन बाने। बेधह बिधुमुखि कय समधाने। पीन प्योधर गिरिबर साधी। बहु मास धनि धरु मोहि बाँधी। की परिनति भय परसनि होही। भूखन चरनकमल देह मोही। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। भल्ला राग मे माधब करह हमर समधाने। देह मोहि पारिजात तरु आने। एहिखन तोरित करिअ परयाने। नहि तइँ हमर अबस अबसाने। एहि परि हमर पुरत अभिमाने। हयत हसी नहि होअ अपमाने। सुमति उमापति भन परमाने। पटमहिखी देह हिन्दुपति जाने। विभास राग मे सहस पूर्णससि रहओ गगन बसि निसिबासर देओ नन्दा। भरि बरिसओ विस बहओ दहओ दिस मलय समीरन मनदा। साजनि आब जिबन किअ काजे पहु मोहि हिन करु अपजस जग भरु सहय न पारिअ लाजे। ध्रुवम् कोकिल अलिकुल कलरब आकुल करओ दहओ दुहु काने। सिसिर सुरभि जत देह दहओ तत हनओ मदन पचबाने। सुकवि उमापति हरि होए परसन मान होएत समधाने। सकल नृपति पति हिन्दुपति जिउ महेसरि देइ विरमाने। ध्रुवम् ........................... १. लक्ष्मण झा ‘सागर’-चुट्टीधारी २.विभूति आनन्द-एक- दू- तीन- चारि- पाँच- छओ- सात- आठ- नओटा- कविता ३.रमण कुमार सिंह ४.मायानाथ झा-मातृगिरा ५.विनीत उत्पल समाज १. लक्ष्मण झा ‘सागर’ २. जन्‍म– ०१.०४.१९५३ ३. पिताक नाम– श्री तारकेश्‍वर झा उर्फ श्री मोला झा ४. मायक नाम– स्‍व. गंगादेवी ५. गामक पता– ठढ़बितिया, घोघरडीहा, मधुबनी (बिहार) ६. स्‍थाई पता– ३बी, तिस्‍ता अपार्टमेंट ९४, एवेन्‍यू साउथ रोड संतोषपुर, कोलकाता-६५ (पच्छिम बंगाल) ७. दूरभाष (आवास)– ०३३-२४१६६४१८ ८. मोबाइल–०९४३२५–४५३४९ ९. आजिविका–रूपा एण्‍ड कंपनीक इस्‍पात संयन्‍त्र इकाईमे वरिष्‍ट क्रय प्रबन्‍धकक पद पर कार्यरत-      -  कोलकातामे। १०. रुचि-साहित्यिक आ सामाजिक सरोकारसँ जुड़ल रहबाक। ११. अरुचि– मैथिलीक नाम पर अनर्गल आ अनसोंहाँत क्रिया-कलाप। १२. रचानाधर्मिता- १९६८सँ मैथिलीक विभिन्‍न विघापर मैथिलीक विभिन्‍न पत्रिका सममे रचना      -   प्रकाशित होइत रहल अछि (बीचमे १९८३–१९९६ छोडि़केँ)। चारिटा पोथीक (कविता, कथा,   -   निबन्‍ध विविधा) प्रकाशन योग्‍य सामग्री उपलब्‍ध। छपेबाक जोगार नहि। प्रकाशक लोकनिक -    खोज जारी। १३.सेहेन्‍ता–मिथिलांचलक समस्‍त (कन्‍वेंट छोडि़केँ) प्राथमिक विधालयसँ लऽकेँ उच्‍च माध्‍यमिक   -  विघालयमे पढ़ौनीक माध्‍यम मैथिली मात्र मैथिलीए ता होइतैक। प्रकाशनार्थ:- चुट्टीधारी लक्ष्‍मण झा ‘सागर’ कविता ओना नहि देखबैक हरसट्ठे उड़ैत एक्‍कोटा गिद्ध। मुदा, जहन कोनो निर्जन बाध-बोनमे मुइल पशुक खाल उधेडि़ लेल जाइ-ए; तँ, देखि’ लिअ’ उड़न जहाज जेकाँ उतरैत हेँजक-हेँज गिद्ध!! औना नहि देखबैक कौएकेँ कुचरैत कत्तहु जेर बान्हिकेँ....; मुदा, जहन बीच चौबट्टीपर बिजलीक तारमे सटि कोनो अभागल काग हति लइ-ए अपन प्राण.... तँ देखि लिअ’ काँउ....काँउ करैत करमान लागल कौआ। मुदा, हमर कविताक दृष्टि एत्तहिटा घेरायल नहि अछि; घरक कोनो अन्‍हार कोणमे छीटल हो चीनीक किछुओ दाना किवा पिचाएकेँ/मरि गेल हो अझट्टे कोनो चुट्टा! हमर कविताक दृष्टि पंतिआनीमे ससरैत ओहि तुच्‍छ जीवपर अटकि जाइत अछि जे नहि अरजने अछि कोनो विद्या....; मुदा, छैक तइयो ओकरो अपन जैविक संस्‍कार! हमर कविता गिद्ध....कौआ....आ चुट्टीक संसारकेँ भजारि रहल अछि! संवेदना सिद्धान्‍तक चुल्हिमे आदर्शक आगि पजारि रहल अछि!! लक्षमण झा ‘सागर’ ३०–०९–०९ २.विभूति आनन्द-एक- दू- तीन- चारि- पाँच- छओ- सात- आठ- नओटा- कविता परिचय जन्म      :    4.10.1955 स्थान     :    शिवनगर, मधुबनी शिक्षा      :    पी.एच.डी., पटना विश्वविद्यालय, पटना वृत्ति       :    दैनिक मिथिला मिहिरमे कार्यालय                          संवाददाता मैथिली अकादमी, पटनामे                            शोधसहायक,जिला स्कूल, मुंगेरमे +2                               व्याख्याता सम्प्रति    :    आर. एन कालेज, पण्डौलमे अध्यापन गतिविधि   :    पूर्वमे विभिन्न राजनीतिक दल, भाषा                                   आन्दोलन ओ रंगमंचसँ सम्बन्ध।                            तहिना मैथिलीभाषी छात्र संघ,भंगिमा,                         जानकी महोत्सव समिति, जखन-तखन                         आदि संस्थाक संस्थापक-सदस्य। 74क                           छात्र आन्दोलनमे जेल यात्रा सम्मान    :    साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 2006                                दिनकर राष्ट्रीय सम्मान-2008 सम्पर्क     :    09431857613 विभूति आनन्दक चास–बास कवितासंग्रह                       :       डेग, उपक्रम, पुनर्नवा होइत ओ                                                        छौंड़ी, नेहाइपर स्वप्न, उठा रहल                                                     घोघ तिमिर, झूमि रहल पाथर–मन कथासंग्रह   :      प्रवेश, खापड़ि महक धान, काठ उपन्यास   :      गाम सुनगैत, पराजित–अपराजित नाटक     :      समय–संकेत, तित्तिरदाइ, हाली–हाली                                     बरिसू, फ्रेममे बन्द एकटा उखरल                                    फोटो समीक्षा    :     श्री ललित आ हुनक कथायात्रा,                                         स्मरणक संग, ललित, भाषा–टीका संपादन    :     गीतनाद, विद्यापति पदावली, मैथिली                                     कथा–साहित्य, अहुल, एकटा छला                                       गोनू झा, कथा कहिनी, विद्यापतिक                                    पदावली (सभटा पुस्तक) संपादन    :    लालधूआँ, माटिपानि, भाखा,                                       हालचाल, मैथिली अकादमी                                        पत्रिका, दैनिक मिथिला मिहिर,                                           दृष्टि, कूस, अंग मैथिली, समाद,                                              भंगिमा, हाक, मनीषा, डगर,                                          जनता। सम्प्रति    :     जखन–तखन (सभटा पत्रिका) एकर                                अतिरिक्त ‘प्रो. हरिमोहन झा                                       अभिनन्दनग्रंथ’ तथा ‘निखिल                                         भारतीय मैथिली भाषी                                              छल’,‘अरिपन’ ओ ‘प्रो. हरिमोहन                                   झा अभिनन्दन समारोह’ स्मारिकाक                                        संपादन सेहो अनुवाद   :    मैथिल शहीद बैकुण्ठ शुक्ल                                          (बंगला), मूल          :     विभूति भूषण दास गुप्त तथा जीव                                विज्ञान (हिन्दी) मूल          :     सुबोध बिहारी सहाय यंत्रस्थ          :     एकटा रहए गप्पू (उपन्यास), ताला,                                          एकटा उड़ल फुर्र! (कथासंग्रह),                                    एकटा साम्यवादीक आत्मकथा                                      (कवितासंग्रह), गामक चिट्ठी                                        (स्तम्भ), हरिमोहन बाबूक रचना–                                      संसार, स्मरणक संग    :    भाग–दू (समीक्षा) सम्प्रति       :    अनथक लेखन जारी.... एक- दू- तीन- चारि- पाँच- छओ- सात- आठ- नओटा- कविता ।। प्रतिपक्ष : एक ।। जखन दिन भरिक उठापटकसँ थाकल-हारल सन घुरैत छी डेरा तँ मोन करैए, जे कोनो क्‍लासिकल संगीत कानमे अबैत हाथमे गरम-गरम चाह, आ ‘सूगर फ्री’ विस्‍कुट हड़ारतिकेँ दूर करैत गामघरक हवा-बसातकेँ, आकि नगर-महानगरक चालि-कुचालिकेँ अकानैत कनियाँक तनावरहित आकृतिकेँ निहारितहुँ संतानक कुशल-क्षेमक मादे बातेऐतहुँ । जखन दिन भरिक उठापटकसँ थाकल-हारल सन घुरैत छी डेरा तँ मोन करैए, जे कोनो बिसरल-बिछुरल सखाकेँ मोन पाडि़तहुँ ! 1.आकि बीतल साल भरिक सभसँ सुखद कोनो एकटा, मात्र एकटा दिनकेँ हियासितहुँ ! आकि आगत सालक लेल कोनो नीक सन एकटा, मात्र एकटा सपना बुनितहुँ ! मुदा एहन सन कहाँ किछु भऽ पबैए! अपन अनुकूल किछु नइ बुझाइए ने खान-पान, ने इच्‍छा-आकांक्षा ने सोच, ने अपसोच......! लगैए जेना, हम यंत्र-मानव बनल सन जीबऽ लागल छी अपना अनुकुल किछु नहि होएबाक यंत्रणा दिन-प्रतिदिन बढ़ले जाइए..... ओ जे देखाबऽ चाहैए, सएह देखै छी ओ जे खोआबऽ चाहैए, सएह खाइ छी ओ जे सोचाबऽ चाहैए, सएह सोचै छी हम बदलि रहल एहि चर्चासँ खूबे चिंतित बुझा रहल छी बंधु ! जखन दिन भरिक उठापटकसँ थाकल-हारल सन घुरैत छी डेरा, तँ ई चिन्‍ता आर-आर गाढ़ भऽ अबैए आ तखन हम एहि आरोपित जीवन-शिल्‍पसँ खूबे परेशान भऽ उठैत छी ! ।। प्रतिपक्ष: दू ।। प्रश्‍न ई नइ छै, जे हमर मोनक प्रतिपक्ष अपन समस्‍त ऊर्जाकेँ सुता देलक अछि निश्‍चेष्‍ट आकि, कहियोक करजन्‍नी सन आँखिमे मोतियाबिन्‍द प्रवेश कऽ गेलैए ! प्रश्‍न इहो नइ छै जे एहि विलासी अन्‍हड़मे ओ मृतयुक कामना करऽ लागल अछि 2.आकि, विकलांगी नदीमे ठठबाक लेल नग्‍न भावसँ पडि़ रहल अछि ! प्रश्‍न ई छे, जे जखन चिनमार धरिमे प्रवेश कऽ गेल हो गर्म हवा जादूगरी कला-कौशल कऽ रहल हो अपन-अपन आरम्भिक प्रदर्शन, आ जकर स्‍वादक लेराह वातावरणमे भऽ रहल हो समटा जीवन-संदर्भ गडमड- तखन की करबाक चाही? तखन की करबाक चाही, जखन पक्ष आ प्रतिपक्षक बीच नहि रहि गेल हो कनियोंटा विभाजक रेखा! जखन एक दिस कएल जा रहल हो युद्धक जैविक उदघोष, आ दोसर दिस ओही मुँहेँ कएल जा रहल हो शान्तिक वैश्विक मंत्रोच्‍चार- प्रश्‍न ई छै जे तखन की करबाक चाही? प्रश्‍नक एहि जटिलताक बीच बाझल हम ताकि रहल छी ठाम-ठामक जीवन जीवनमे खिच्‍चा-भाव, आ ताहि खिच्‍चा-भावमे नव मानवीय उत्‍सुकता बंघु हमर एहि अनुसंघानमे जरूरे अहाँक कर्त्तव्‍य रहत से विश्‍वासि लेलहुँ अछि अपना अन्‍दर सहजेँ । ताबत सहि लिअऽ गर्म हवाक थापड़ बेसी सीदित करए जँ दर्द तँ कैंसरक रोगी जकाँ तिल-तिल तकरा अपन मोनक हाथेँ सोहरबैत सहैत रहूँ, सहैत रहूँ..... इएह हाथ एक दिन बनत गऽ मुट्ठी आ मुट्ठीक संख्‍यामे जेना-जेना होइत जेतै बढ़ोत्तरी, तँ अनेरो संघीय गप-सप भऽ जेतै मजबूरी 3.संवाद‍हीनता नहि भेलैए दीर्घजीवी— कहियो नहि, कखनो नहि ताबत दू डेग पाछू आबि दू डेग आगू अएबाक करैत रहू दयनीय चेष्‍टा किएक तँ चक्रवातक एहि धाहीमे पड़ल प्रतिपक्ष लेल एखन जरूरी अछि- ‘वेट एण्‍ड वाच’! ।।मदारी युग ।। हमरा होइत रहैए, जे क्‍यो हमरा पोल्‍ह‍एबाक चेष्‍टा कऽ रहल अछि हम चीन्हि रहल छी ओकरा ओ हमर मित्र नहि अछि मुदा तैयो मित्र होएबाक घोषणा कऽ रहल अछि बाजार-भाव गर्म छै, जे हमरा दुनूमे मित्रता भऽ गेल अछि समादियाकेँ पठा-पठा, अथवा दूरभाषे पर उठा-उठा अपन चालिकेँ ओ ठोकि रहल अछि कखनो-कखनो अपन करतबसँ डेरा सेहो रहल अछि फँसएबाक सरनरिया-शिल्‍प सेहो अपना रहल अछि नहि सहज, तँ असहजे भऽ भऽ कऽ ककरो अन्‍दर पैसबाक ओकर ई कला बहुतोकेँ मोहविष्‍ट कऽ चुकल अछि तेँ अपन विजय-बाटपर रभसि सेहो रहल अछि एम्‍हर हम बेस चौकऽ लागल छी ओकर अबरजात बढ़ले जा रहल अछि ओना, इहो ओकर अपन शिल्‍प छै कहियो लगातार अबैत रहत तँ कहियो बाटे विसरि जाएत 4.कहियो-कहियो तँ अपन वाणीक माध्‍यमे अबरजात बढ़ाओत आ से, तकर अनेक अर्थ लागत ओना ओ बुझा देत जे एहन सन किछु नइ छै मुदा तैयो तंग करबै तँ विराम-अर्धविराम-विस्‍मय आदि संकेतक रहन-एहन प्रयोग कऽ कऽ बुझा देत, जे अहाँ चकित रहि जाएब! छकित सेहो भऽ जाएब आ एहना स्थितिमे जँ एक अहाँ मात्र गफ्फाक बीचसँ ससरि गेलिऐ तँ ओकरा लेल धन सन तकर एबजमे दोसर-तेसर अनेक भक्त ओकर वाकचातुरीक सोझाँ नतशिश भऽ जेतै आ ओ एक तरहेँ अहाँक, समर्थन-शिल्‍पमे अभिनन्‍दन कऽ अहाँक बिखरल विरोधीकेँ सँगोरि लेत..... एहन सन नइ छै जे हम कमजोर भऽ रहल छी ! शत्रु, मित्र नइ भऽ सकैए शत्रु वास्‍तवमे एकटा जीन थिक जकर सभटा संबंध अनुबंध पर रहैत छी आ से हम नीक जकाँ बुझैत छी हम तँ संक्रमण-कालक सभसँ पैघ अस्‍त्र कविता द्वारा ओकर मन-मयूरक पएरपर नजरि देबऽ कहैत छी जकर रंगक संबंध ओकर मनक संग तँ ने जुड़ल छै, से सोचऽ कहैत छी हम विभिन्‍न ढंगे साकांक्ष रहऽ कहैत छी मदारी-युगसँ सोझाँ-सोझी भऽ रहल छी ! ।। नब पी‍ढ़ी।। ओ हमर उल्‍लासित गामक बीतल वसंत छल जे हमर डेराक मेन गेट लग 5.थाकल-ठेहिआएल सन उदास, ठाढ़ छल अनायास ओकरापर नजरि पडि़ गेल भीतर आबऽ कहलिऐ मुदा जेना ओ किछु नइ सुनलक चीनीक रोगी सन लागल तथापि बड़ी काल धरि ठिकियबैत रहल आ हमरा अन्‍दर जेना किछु दरकैत रहल किछु काल बाद ओ भिझाएल हँसी हँसि देलक लागल जेना, ओकर अंदरक बीतल वसंतक आर किछु पखुरी झडि़ कऽ हमर मेन गेटक माटिपर आबि लेढ़ा गेल हमरा अंदरक विकराल होइत पीड़ा किछु सोचि नहि पाबि रहल छल अनुत्तरित छल पूर्वक सभटा हल कएल प्रश्‍न हम ‘ई मेल’ फोललहुँ हम ‘नेट’मे ओझरएल हुँ हम ग्‍लोबल चिंतनपर पुनर्चित न कएलहुँ..... एहि क्रममे बहुत किछु भेटल नवीनतम सेहो। संभावित सेहो मुदा ओ नइ भेटल, जे हमर डेराक मेन गेटपर लेढ़ाएल सन ठाढ़ छल, आ जे हमरासँ हमर नेनपनक हिसाब माँगि रहल छल हम एकरासँ लडि़ रहल छी लगातार लगभग दू-ढाइ दशकसँ तँ निश्चिते मुदा एहि दू-ढाइ दशकक अन्‍दर फूटल नव पीढी लग कहाँ देखैत छी एहन सन कोनो पीड़ा! ओ तँ अपन मास्तिष्‍कक ‘मैसेज बॉक्‍स’सँ एहन सन भावकेँ प्राय: खाली कऽ निराशक्त अछि पुछबै किछु, तँ तेहन पूछि देत 6.जे हम महोमहो भऽ जाएब ओकरे दुनियाँमे बहि जाएब एखन स्थिति ई अछि, जे हम सम एक दोसरसँ आँखि चोरा सेहो रहल छी एक-दोसरकेँ देखिकऽ आँखि जुटा सेहो रहल छी! ।।अराडि़ जोतैए।। ई समय अतुकान्‍त अछि एहनामे जँ हम तुकक गप करी तँ से समय-सापेक्ष नहि होएत एखन हम अनुवादमे जीबि रहल छी, जे शुद्ध अतुकान्‍त अछि ओहिमे लय तँ छै, मुदा तुक नइ आजुक युगमे एकर, आकि एकरेटा अस्तित्‍व अछि से, जहियासँ सिकुरि गेल अछि पृथ्‍वी, 7.एकर अनिवार्यता ‘बेडरूम’ धरि आम भऽ गेल अछि सम सभक गप बुझि रहल अछि स्‍वाद बुझि रहल अछि स्‍वर बुझि रहल अछि एहि स्‍वर आ स्‍वादपर दलाल स्‍ट्रीटक महिमा अछि सेंसेक्‍सक उतार-चढ़ाव अछि नन्‍दीग्राम अछि नासा आ सुनीता विलियम्‍स अछि लाल मस्जिद आ बाढि़ अछि ..... समटा नीक-अघलाह आइ एही सोचपर नृत्‍यमान अछि तेँ आजुक समयमे किछु असंभव नहि अछि किछुओ लग-दूर नहि अछि सम किछु पारदर्शी, किछु अदर्शी नहि जेँ ई समय अतुकान्‍त अछि तेँ कविता आ जीवनक भाषा एकाकार भऽ गेल अछि तेँ कैमराक लेंस धरि कविता लिखैत अछि विज्ञापनक भाषा कविता बजैत अछि सम्‍पूर्ण जीवने कवितामय भऽ गेल अछि जतऽ ओकर सर्वांगीण समस्‍यापर विमर्श सम्‍भव मेल अछि तेँ एहनामे जँ हमर सुचिता ओ संस्‍कार संस्‍कृति ओ आचारसँ कोनो अमूर्त्त भाव सनक परिचिति अपन अस्तित्‍व लेल, अपन-अपन श्‍वेतपत्र जारी करैत जा रहल अछि लगातार ‘नेट’ धरिमे ‘फीड’ करैत जा रहल अछि अपन गौरवमय परम्‍परा तँ हम की कऽ सकैत छी। 8.हमरा तँ लगैत अछि जे हमर ई परिचितिजन्‍य ढाल बुढ़बा साँढ़ जकाँ जीवनक गति ओ प्रवाहकेँ अहेर कऽ कऽ रोकि राखऽमे विश्‍वास करैए समयक आदि-अन्‍तकेँ अपन एही हुकहुकी छरपानमे जीबैत देखैए सुप्‍त चेतनामे आएल सपना संग भ्रम पोसैत अराडि़ जोतैए ।।वस्‍तुत:।। अजीब अछि ई महानगर हम एकरासँ जतबे परिचित होबऽ चाहैत छी ई ततबे अपरिचित बनि जाइए हम भिनसरे जाहि निर्जन बाट धऽ कऽ जाइत डेराइत रहैत छी घुरती खेप ओतऽ बाट नइ भेटैए ! भऽ सकैए, मास दिन छओ मासपर जाइ तँ ओतऽ गोटेक अपार्टमेंट देखी खेलाइत-धुपाइत....मुस्‍कैत-खिलखिलाइत..... हम अपइ अपन परिचित किराना पट्टीसँ राशन ली आ पुन: मास दिन बाद आबी, तँ किरानापट्टीक अपन ओहि परिचित परिसरपर मल्‍टीस्‍टोरीज बिल्डिंग सनक बजार..... .... नहि नहि, ‘माँल’ देखी, आ जकर अन्‍दर जाइते जेना हाँल ढुकि जाए ! से, अपन अन्‍दर उगि आएल एहि अनिश्चितताक पाँखि संग उडि़या जाइ आकि जकथ‍क रही- ई सोचब-गूनब बड़ भयाओन लगैए पहिल-पहिल जहिया एकर दर्शन भेल छल, हमरा अन्‍दर तँ अदंक लऽ लेने रहए! सभ चेहरा व्‍यस्‍त सभ आँखि चौचंक सभ डेग अपस्‍याँत सभ इच्‍छा अतृप्त अजीब तरहक भागमभाग...... ओतहि अध्‍ययनरत अपन पुत्रसँ सड़क पार करबा लेल ठाढ़ सहसा एक दिन पूछि बैसल रही एहि प्रकारक अस्थिरताक कारण? मुदा ओ तकर उत्तर नहि दऽ सकल छल ओकर नजरि ट्रैफिक-बत्तीपर टिकल रहलै....टिकल रहलै..... आकि सहसा हमरा छोडि़ आ हाथक संकेत दऽ बजबैत, सड़क पार कऽ गेल! सड़कक एहि पार हम सड़कक ओहि पार ओ बीचमे भागमभाग......अफरातफरी...... अजीब अछि ई ठाम बेर-बेर अपरिचित बनि अबैत रहैए हमर समक्ष, आ हम ताहिमे हेराएल जारहल छी, हेराएल जा रहल छी..... से, वस्‍तुत-अपरिचित ठाम नहि, हम भेल जा रहल छी हम भेल जा रहल छी.... ।।अंतिम पीढि़क बयान।। मौसम कुहेसक सीरक ओढ़ा।। सूर्यकेँ सुतबा लेल विवश कएने अछि एकरे मारल बीच घुना रहल अछि अनेक टुस्‍सा नेंगरा रहल अछि तोतराइत सुनि रहल छी फूलकेँ सेहो 10.मौसमक मरखाह चाँगुरसँ डेराएल हमर आँखिमे बैसल विश्‍वास अपन डेरा रहल विश्‍वस‍नीयतासँ भयभीत भऽ रहल अछि विवश सूर्य सूतल अछि, आ सात समुद्र पारसँ रंग-रंगक पेय रंग-रंगक स्‍वप्‍न आ ओकर संसार ‘नेट’ द्वारा परसल जा रहल अछि हमर आँखिमे मोतियाबिन्‍द फुला रहल अछि हम ओकरा संग रभसि रहल छी चुभकि रहल छी ओकरा संग सर्दिया रहल छी सर्वांग तथापि मुस्किया रहल छी अनवरत एहि विपरीत मौसममे तैयो हम प्रतिरोधक संग जीबि रहल छी हम मोन पाड़ैत छी— हथिया-नक्षत्रक पानिमे नहाइत कोना सिहरैत रही पाँतरक पीपरक गाछ तर घमाएल जेठक दुपहरियामे कोना सुस्‍ताइत रही फगुआमे कोना गबैत रही जोगीड़ा....... हम मोन पाड़ैत छी— जाड़क साँझक पजरैत घूर आ भोरक गाँती बन्‍हने कटकटाइत दाँत। जूडि़शीतलमे उराही होइत पोखरि-इनार, आ आ थाल-पानिसँ जुड़ाइत अंग-अंग....... हम चिक्‍का खेलैत मचकी झुलैत मोन पाड़ैत छी बाध-बोन, चर-चाँचर प्राती....सोहर....महराइ....लोरिकाइन.... गबैत मोन पाड़ैत छी ओ सभटा हेराएल जीवन-शिल्‍प.... 11.हम मोन पाड़ैत छी— कनसारसँ अबैत लाबा-भूजाक सोन्‍हगर गंघ हम मोन पाड़ैत छी— मालजालक गरदनिमे बान्‍हल घंटीक संगीत हम मोन पाड़ैत छी— पारिवारिक अटूट संबंध, आ सदाबहार सामाजिक सौहार्द्रक गान हम मोन पाड़ैत छी— मोन पाड़ैत रहैत छी जखन-तखन ओ सभटा खुशी, जे बेदखल कऽ देल गेल अछि हमर भावना, हमर परिचिति, हमर मौलिकतासँ.... हम मौसमक एहि बदलल नेत संग एकरा प्रतिरोध मानि एहिना जीने जा रहल छी अनथक....अनवरत.... हम एहि शताब्‍दीक अंतिम एहन पीढ़ी छी जे प्रतिरोधक एहि शिल्‍पक संग लडि़ रहल छी मुदा....मुदा सत्‍य तँ ई अछि जे ताही अनुपातमे जल्‍दी-जल्‍दी अपन संतानसँ अनचिन्‍हार भेल जा रहल छी.... ।।एकटा साम्‍यवादीक आत्‍मकथा।। अपन जन्‍मकथाक मादे एतबेटा बूझल अछि जे ओ बरोबरि हमर आँखिमे आँजन करैत रहै छलि कजरौटीसँ मांगि कऽ ओकर रंग हमर कपारक कातमे ठोप जकाँ लगबैत छलि भरिसक, अपन अन्‍दर कोनो यात्राक सपना रोपैत हमरा नजरि-गुजरिसँ बचएबाक ओ एकटा भावुक सन प्रयास करैत रहै छलि हमु कने छेटगा भेल रही तँ ओ हमरा ठेहुनमे भरबाक लेल कूबत ’लड़े लड़े’ कऽ ध्‍वनि संग चलब सिखौने छलि.... बादमे तँ हम अपने चलऽ लागल रही.... से, किछु समय घरितँ ओकर छाती धरकैत रहलै 12.‘लड़े लड़े’ कऽ ध्‍वनिमे पराजयक कम्‍पन बुझाइत रहलै मुदा बादमे तँ समटा डर-भय पड़ा गेलै आ ओ हमरा दिससँ निचैन भऽ गेलि.... अहाँ बूझि गेल होएब जे ओ आन क्‍यो नहि, हमर माँ छलि! दोसर अध्‍याय किछु समय बीतल, हम अपन जन्‍मकथा बिसरि गेलहुँ जीवनकथा लिखबा लेल पाछू तकबाक पलखति नहि भेटल हमरा संग संगी-साथीक एकटा गोल बनि गेल छल, जकरा अन्‍दरमे नहु-नहु सिहकैत बसात छलै.... आँखिमे उजासस, कतहु कोनो खटास नहि किछु नव करबाक सिखबाक मात्र जिज्ञास..... हमर जीवनकथाक प्रेम-संबंधक ई केहन रूप छल, सहजेँ बूझि नहि पओलहुँ हम टूटल ताग सभकेँ जोड़ा लगलहुँ हम गुदरीकेँ सीबि-सीबि सुजनी बनबऽ लगलहुँ.... ई तँ बादमे जाकऽ बुझल भेल जे हमरा अपन जीवन-संदर्भक प्रसंग भेटि गेल आ एकटा अनाम अपरिचित ऊर्जासँ जेना हमर मन-प्राण रोमाचित भऽ उठल अपन खानगी कहि दी जे ई हमर, सृजनसँ जुड़बाक समय छल ! तेसर अध्‍याय समय-सापेक्ष हम अपन उत्‍कर्षक तमाम निष्‍कर्षकेँ पूर्ण मानबासँ सभ दिन अस्‍वी कारैत कखनों कालकऽ पाछू सेहो ताकऽ लागल रही हम तकैत रही अपन किछु विशिष्‍ट स्‍वप्‍नदर्शी संगी सभक पूर्वपरिचित पदचापकेँ, किएक तँ हम बीच सरोवरसँ काढि़कऽ अनने रही किछु रक्तकमल पीठपर पाँखि उगा जीवन-रफ्तारक तमाम हदसँ आगू बहरा जएबाक अकूत आकांक्षा छल हमरा अन्‍दर.... हमरा अन्‍दर चिन्‍तनक टटकापन वैश्विक जनाधारक संग, वर्त्तमान रहए चारूकात दिपदिपा रहल छल जीवनक समेकित सौन्‍दर्य बंघु! ई हमर गतिमान अवधिक शिखर-काल छल चारिम अध्‍याय आइ एहि जन-अरण्‍य मध्‍य चलैत एसगर, नितांत एसगर लागि रहल छी हम मोन पडि़ रहल अछि अपन गाम सनक अछि अपन गाम सनक अनेक गाम ओकर हवा, ओकर नदी ओकर हँसी, ओकर रुदन, जतऽ अपन अनेक स्‍वप्‍नदर्शी संगी संग मुखर हम, किछु बुनने रही आपसमे बहुत-बहुत यात्राकेँ गुनने रही आइ एहि जन-अरण्‍य मध्‍य चलैत चलैत-चलैत चकुआइत-चौंकैत हम अजीब तरहक दहशतमे जीबि रहल छी 14.स्‍वप्‍न, कोनो दीयर सन उदास ताकि रहल अछि— कतऽ गेल ओ स्‍वप्‍नदर्शीक समूह ? कतऽ गेलै ओकर स्‍वर, ओकर सुभाव ? ठीके, काफी असोकर्यमे छी— एहि जन-अरण्‍य मध्‍य चलैत तकैत रहै छी चतुर्दिक जखन-तखन चौंकैत-चकुआइत रहै छी जखन-तखन आ ओकर सभक पूर्व परिचित पदचापक अधीरतासँ प्रतीक्षा करैत रहै छी, ई सोचैत जे आखिर एहन कोन बिसंजोग भऽ गेलै जे विराट सामूहिकताक ओ सपना एना छहोछीत कोना भऽ गेलै। आजुक एहि वैश्विक बाजारमे हमरा लेल ई विचलन, ई विखण्‍डन चिताक ताप सन लागि रहल अछि आ हम खोजी नजरि लेने चकुआइत ताकि रहल छी बाट..... तेँ कहबामे कोनो हर्ज नहि जे दिशाहीनताक विरुद्ध ई हमर आत्‍मंथनक काल थिक। पाँचम अध्‍याय आइ हम अचम्मित छी, भयमीत सेहो किएक तँ आश्‍चर्यजनक रूपसँ हम किछु तेहन चित्र देखबा लेल बाध्‍य भेलहुँ अछि जकर तेहम कोनो अपेक्षा न‍हि कएने रही— हम देखलहुँ जे हमर किछु अनन्‍य संगी अपन-अपन हाथमे मल्‍टीनैशनलक झालि लऽ लेलनि तँ किछु भगवा धारण कऽ लेलनि 15.क्‍यो-क्‍यो, छिट फुट लालबत्तीमे अपन-अपन रूप ताकऽ लगली तँ अधिकांश, एकटा कऽ चौकठि अँगेजि अपना-आपकेँ दादी-नानी बना लेलनि.... आ सभ जेना एक-दोसरसँ अनचिन्‍हार भऽ गेलहुँ! की पौलहुँ, की गमौलहुँ, तकर हिसाब-बही जेना कमला-कोसी सन कोनो-कोनो नदीमे प्रवाहित भऽ गेल....दहा-भसिया गेल अंनत सागरमे.... किछु जे तैयो अपनाकेँ चिन्‍हार राखि सकल, सेहो अपनेमे सहस्‍त्र दल भऽ गेल दलदलमे फँसैत चलि गेल, अथवा कोनो-कोनो राज्‍य, आकि देशक संसद मध्‍य, नहि तँ कोनो-कोनो कल-करखानाक व्‍यवस्‍था संग व्‍यवस्थित जीवन जीबऽ लागल.... वर्त्तमान अध्‍याय ओना ई अध्‍याय पूर्ण नहि गेल अछि तथापि जतऽ गामसँ नगर-महानगर लेल फुटै छै रस्‍ता हम ठाढ़, अपन हेराएल-भुतिआएल संगी सभकेँ हियासि रहल छी, संगहि जे बाटक प्रतीक्षामे अछि, तकरो अपना दिस हकारि रहल छी... हियासबाक आ हकारबाक ई क्रम आविराम जारी अछि .... आ से, एहन विपरीत परिवेशमे सहसा हमरा अपन माँ मोन पड़ैए आ हम ओकरे जकाँ सौंस जारनिक अभावमे खुहरी जोडि-जोडि़ पुन:पुन: आगि पजारबाक व्‍योंत धरा रहल छी हम तमाम विपरीतक बीच पिरीत ताकि रहल छी वस्‍तुत:, ई तँ हमर उजरल खोंतामे भगजोगनी अनबाक काल थिक आ तेँ हम फेरसँ नेना बनि गेल छी आ हमरा एकटा माँक बेगरताक पुन:पुन: अनुभव भऽ रहल अछि । ।।कुहेसक अन्‍हड़।। इजोरिया रातिमे पसरल अछि अन्‍हार रजनीगंधाक गाछसँ बहरा रहल अछि दुर्गंध बाटपर चलि रहल अछि थाकल डेग बहुत दूरसँ प्राय: चलल छै कुहेसक अन्‍हड़, जे छापि लेबऽ चाहैए जेना कुमुदिनीक खिलखिल हँसीकेँ हम एहि दूरीकेँ नापऽ चाहै छी— अपन विचारक घोषणापत्रसँ आ फेरसँ लिखऽ चाहै छी पुनर्जागरणक सपना आइ लोक सपना देखैए बहुत नीक-नीक सपना देखैए मुदा, तकरा ताही नीक ढंगे बिसरि सेहो जाइए हम सपनाकेँ बिसरऽ नहि चाहै छी हम अपन अततिक संग वर्त्तमानसँ लड़ैत फेरसँ भविष्‍यक कविता लिखऽ चाहै छी हम अपन कविता मे निगुर्ण नहि, सोहर आ पराती गाबऽ चाहै छी ३.रमण कुमार सिंह गुमशुदगी रिपोर्ट राजधानी के एही रोशनी से नहायल सड़क पर एक दिन हमर बेटीक हंसी पता नै कते गुम भ गेलै हमरा गामक रामधन काका के बुढ़ौती के लाठी एहि महानगर भीड़ मे हेरा गेलै महामहिम जी आ अपन हाल की कही गाम सं चलैत काल एगो उम्मीद एगो सपना ल के आयल छलहुं हम एहि महानगर मे पता नहि राति-दिन के भागम-भाग आ हलतलबी मे उहो सपना हेरा गेल हे महामहिम जी, सुनै छीयै राजधानी के पुलिस बड्ड माहिर होय छै हमरा सन अदना लोक के त बातो नै सुनतै कने अहीं खोजबा दियअ ने हमर बेटी के हंसी रामधन काका के बुढ़ौती के लाठी आ हमर ऊ सपना जे ल के आयल रही हम राजधानी मे... ४.मायानाथ झा-मातृगिरा लेफ्टिनेंट कर्नल मायानाथ झा (सेवा निवृत), जन्म–तिथि–5.5.1946, शैक्षणिक योग्यता–स्नातक (1966) व्यवसाय–सेना डाक सेवामे बिभिन्न पद पर 19.09.1969 सँ 31.05.2006 धरि। अवकाश प्राप्तिक बाद लेखनोन्मुख कृति–जकर नारि चतुर होइ (कथा–संग्रह–मैथिलीमे), तब और अब कविता–संग्रह–हिन्दीमे), अनूठी सूक्तियाँ (संकलन), Unique Utterances (Collection), श्रद्धा–सुमन (कविता–संग्रह मैथिलीमे, प्रेसमे), जन्मस्थली–भराम, मधुबनी। मातृगिरा बनब केवल अंगरेजिया बाबू, की राखब मातृगिराओक किछु ज्ञान? कण्ठ खखारि हम पूछि रहल छी, बनि मलेच्‍छ की बिसरब अपन पहिचान? भऽ रहल अछि युग परिवर्त्तन, बदलि रहल अछि आइ संसार। उलझि अहाँ ध्रुबीकरणक जालमे, बिसरल जाइत छी मिथिलाक व्‍यवहार। प्रगतिक डोरि पकडि़कऽ चलब, बात तऽ नीक अवश्‍मे थीक। किन्‍तु निरादर जननीभाषा केर, से तऽ आखिर विडम्‍बने थीक। देश-विदेश की गेलहुँ अहाँ, माइयेक बोलीकेँ बिसरलहुँ। अपना संग-संग धीयो-पुताकेँ, ओहिसँ विमुख कयलहुँ। लिखबा-पढ़बाक तऽ कथे कोन, बाजब तक छोड़ि देलहुँ। रही जे निर्मम पितृ-मातृ लेल, निज भाषाओ लेल निष्‍ठुर भेलहुँ। घरक भाषामे गप्‍प-सप्‍प करब, आइ हेठीक बात बुझाइत अछि। चारि आखर अंगरेजी बाजी तँ, ताहिमे बड़प्‍पन देखाइत अछि। सपना भेलैक नेना-भुटकाकेँ, दादी आओर नानी केर संग। खिस्‍सा-पिहानी पाछुए रहलैक, रंगि गेल ओ सब टी.वी.क रंग। माय-बापकेँ फुर्सति नहि छन्हि, पाइयेक पाछू छथि बताह। फूहड़ आ घृणित विनोद दूरदर्शनक, बच्चा सबकेँ केलक घताह। की निष्णात विद्वान मैथिलीक, अंगरेजियोक उपासकनहि छलाह? घरमे सभ दिन बाजि मैथिली, की ओ आ.ए.एस. नहि भेलाह? एहन मनीषीक नाम नहि गनाएब, मात्र इंगित हम करैत छी। अपन भाषा केर महत्वकेँ बुझू, सएहटा तऽ हम कहैत छी। सब भाषा गरिमामय होइत अछि, किंतु सर्वोपरि निज भाषा। जँ पारंगत होयब ताहिमे, सुदृढ़ होयत अभिलाषा। भगवद् पूजा जेना करैत छी, सब दिन किछु समय बचाय। तहिना पूजू माँ मैथिलीकेँ, दिअ एकर पुनि मान बढ़ाय। नहि अछि थोड़ पाठ्य–सामग्री, अछि भरल मैथिलियोक भण्डार। भटकि गेल छी अहाँ मार्गसँ, तैँ घटल अछि मोनक उद्गार। केवल नाम पाबि अस्टम सूचीमे, नहि होयत मथिलीक उद्धार। अछि प्रयोजन प्रबल प्रयोगक, तखनहि सम्भव एकर विस्तार। जँ पण्डित हैब मातृगिरा केर, आनहु शीश नबाओत। जड़ियेकेँ जँ त्यागि देब तऽ, के पुनि लाज बचाओत? ५.विनीत उत्पल समाज अंगरेजी मे एकटा फकरा अछि अहां प्रेम कऽ सकैत छी अहां घृणा कऽ सकैत छी मुदा, अहां हमरा नकारि नहि सकैत छी ककरो छोट कहबा स कियो पैघ नहि भऽ जाइत अछि ककरो चोर कहबा स कियो हवलदार नहि भऽ जाइत अछि ककरो सऽ संबंध बनबा सऽ कियो संबंधि नहि भऽ जाइत अछि ‘मां’ शब्द बजलाह सऽ कियो अपन मां नहि भऽ जाइत अछि ककरो सऽ नहि बजलाह सऽ कियो बौक नहि भऽ जाइत अछि ककरो निंदा करला सऽ कियो प्रशंसाक पात्र नहि बनि जाइत अछि ककरो मित्र नहि बनबै छी तऽ कियो दुश्मन नहि बनि जाइत अछि ई सभ गप एकटा पहेली नहि अछि हकीकत अछि समाज कऽ जतय समाज, संस्कृति, परंपरा आ कतेक ‘वाद’ कऽ नाम पर अपन दोष नुकैबे लेल दोसर कऽ दोषी ठहरायल जाइत अछि सदियो स। १.जीवकान्‍त-जन-जन याचक जीवकान्त कविता जन-जन याचक अगिते देखल सूर्य तरणिसँ माँगल थोड़ प्रकाश कहलनि-“मुट्ठी बान्हि ठाढ़ रह अपनहु करहि प्रयास’’ मुट्ठी तँ भरि गेल खोलि कए देखी अति उत्‍साह जते हजीरिया तते अन्‍हरिया दूनू धार प्रवाह माँगल धरतीसँ हम याचक अन्‍न-फलक भंडार गाछ फड़ल बड़ आगाँ देखी आधा खाली थार नदी देखि कए भेल खुशी तँ माँगल आँजुर पानि बैसक्‍खामे बालु उड़ाबए भादवमे नकमानि लत्ती-लत्ती बहुत हरियरी कोँढ़ी होइत फूल फूल-कुंजमे समय बिताबी तृष्‍णा लाल अढ़ूल हवा उड़ाबए खढ़क खण्‍डकेँ तहिना भासल जादू बहुत डारिपर बहुत फूलकेँ सिहरन नहि बिसराइ कहल देशकेँ- दैह सुरक्षा, घूमी जंगल-झाड़ घर-घुसनाकेँ नोति बजाबए सागर आर पहाड़ रहलहुँ सभतरि निष्‍कण्‍टक भए गड़ल ने कूशक काप बन्‍न कोठलीमे चेहाइत छी भरि घर सापे-साप देशो माँगइ- नित्‍य करी हम सभ जन बाट प्रशस्‍त बहिर भेल किछु, सुनि नहि पाबी अपन स्‍वार्थमे मस्‍त कहियो माँगए धार-धरित्री कहियो गगनक छोर- किछु नहि सुनलहुँ जतबो सुनलहुँ देल ने हृदय कठोर श्री गणेशाय नम: कुल देवताभ्‍यो नम:, ग्राम देवताभ्‍यो नम:, सर्वोभ्‍यो देवम्‍यो नम:, सर्वेभ्‍यो ब्राह्मणेभ्‍यो नम:, सर्वेभ्‍यो गुरुवेभ्‍यो नम:। ऊँ शक्ति-ऊँ.......... १.रघुनाथ मुखिया-किछु पद्य २.सच्चिदानन्द सौरभ-किछु पद्य रघुनाथ मुखिया नेनो बासा ग्राम+पो.–बलहा भाया–सुखपुर जिला–सुपौल पिन कोड–852130 मो.–09472032749 दूधक धार हम देखैत छी हमरा सोझाँमे दूध आ अन्नक लेल हमर दूधमुँहा नेना कोना छटपटा रहल अछि हमर कोढ़ ओहिखन फाटि जाइछ जखन ओ अपन आंगनक ड्योढ़ी दिस अपन तुरियाक दूध आ भातबला कटोरा दोड़िकेँ छीनऽ चाहैत अछि आ हमरा चिन्हबऽ लगैत अछि दूध आ भात ओकर रंग आ स्वाद ओहिखन मोन होइत अछि जे हमरा कानमे पसिझल पाथर किएक नञि भरि देल गेल वा ई गप्प सुनबासँ पहिनहि हमर प्राण–पखेरू किएक नहि उड़ि गेल? किएक तँ कलम क्रांति उठा सकैछ शांतिक समुद्र लहरा सकैछ बुद्धक लहाँस खसा सकैछ नव–नव सृष्टिक विनाश आ निर्माण कऽ सकैछ शोणितक धार बहा सकैछ मुदा शिशुक लेल दूधक धार जुटाएब ओ संभव अछि कलमसँ छाँहक–सुआद बेरोजगार लोक आ बिनु फरै–फुलाबै बला गाछ–बिरीछ दुनुमे की भेद आ की समानता मरि जाए बरू कटि जाए तँ बेजायै की। लोक–वेदक कहब छनि जे लोक नञि हरियर नोट कमाबऽ आ नञि काया पोसबाक लेल सुन्नर फऽर उपजाबऽ ओकर बेगरते कोन एहि संसारमे? हे देखु! तकनीकी शिक्षासँ परिपूर्ण डंकल अंकल आ चार्ल्स वॉवेजक उत्पाद नान्हिएटा गाछ जड़िसँ छीप धरि लदम–लद आ खाद पानिसँ कोना तोपल अछि आ हे एकबेर ओम्हरो देखू ओ.... बऽड़, पीपर आ पाखरिक ढ़ुठिआइत गाछ–बिरीछकेँ जूरो शीतलमे एक ठोप भेटाइत हेतै की नहिए तखनो सदति टटाइत ठाढ़ अछि अनका लेल। आ हेओ बाबू, भैया, साहेब हजूर ओहि बऽड़, पीपर आ पाखरिक छाँहक सुआद तेँ जेठक दुपहरियामे बाट नपैते मोसाफिरे बुझैत हेतै, नञि? मनुक्खक सूखौंत ओ कंठ मोकि हँसाबैए मुक्कासँ कटहर पकाबैए। जुनि माँगू पानि मुखिया–सरपंचक दालानपर ओ देशी दारूक धार बहाबैए पंचायती राजक विकासपुत्र कहेबा लेल मनुक्खक सूखौंत बनाबैए। ओ कंठ.... काल्हि कथीक पंचैती होएत तकर जोगार आइये लगाबैए जौं जोगार नञि लागल तँ निचेन बैसल मनुक्खपर अपन हुलाबैए। ओ कंठ.... पंचैतीसँ पहिनहि जे दारू आ मनुक्खक साना पहुँचाबैए ओ आँखि मुनिकेँ सुति रहैत अछि आ सरपंच, एक तरफा फैसला सुनाबैए। ओ कंठ.... सौ दिनक रोजगारक कार्ड दुइ–चारि टकामे बिकाबैए जे किओ नञि देलकै निशान ओकरा बीच्चे सड़कपर सदस्य सभ मुकियाबैए। ओ कंठ.... तेखगर जनताक मुँह बन्न करबा लेल जोरगर लोकसँ पहरेदारी कराबैए कमीशनक मोट रकम केर वास्ते सड़कमे तीन नम्बरा ईंटा लगाबैए। ओ कंठ.... मजाल अछि जे किओ करताह विरोध सोलहो पंच चमेटा देखाबैए जौं फूजल मुँह अहाँ केर बत्तीसे हाथक बीच कंठ धराबैए। ओ कंठ.... जमल शोणित सुनै छियै जे हमरो गाममे जमींदार सभ रहै खूब पैघो नञि तखन रहै तँ जमींदारे ओ अपन सिपाही आ मुँह लगुआक संगे–संग अठबारा छोटकाक टोलपर घुमै लऽ आबै आ जाहि टोलपर आबै बुझू जे पूरा टोले डोलमाल ओ डोलमाल कोनो बाढ़ि आ भूकंपसँ नञि मालिकक छुछन्नरि चालिसँ होइत छल मालिक बेधड़क ककरो आँगन घुसि ककरो बौह, बेटी आकि पुतोहूएसँ कहैत रहै जे हे गे फलनाक बौह, फलनाक बेटी, फलनाक पुतोहू उघार, उघार, उघार *तोहर पएर बड्ड सुन्नर छौ तँ ओ कतेक सुन्नर हेतौ आ कनियो बिलमि गेलापर दुनुटा सिपहिया हुनक तनक वस्त्रकेँ उपर उठा दैत रहै आ मालिक अपन दुनु हाथसँ कोनो–कोनो अंगकेँ मीड़ैत निर्लज्जताक आँखिसँ निहारैत पतित मुँह लगुआक संग खिलखिलाइत आँगने–आँगने छिछियाबैत रहै आ टोलक–टोल पुरूखक शोणित जमल जाइत रहै। कालचक्र गोरकाक समयमे किछु लोक सभ परोसि दैत रहनि अपन घरक जनानी सभकेँ ओकर चानीक थारीमे। किएक तँ हुनक देह की थोड़बे घटि जाइत रहनि? मुदा बाढ़ि जाइत रहनि बिनु किछु बेचने हुनके बखारीमे सोन आ चानीक भार आ नमरि जाइत रहै हुनक श्वेत–पधार छिड़िया जाइत रहनि हुनक नाम चान–सूरजक इजौत जकाँ भारतसँ बिलायत धरि। आ ओकरा गेलाक बाद एतुक्का बोनिहारिन जनानी सभसँ ओसुली भेलै सूदिक–सूदि अल्हुआक कंदसँ खेत–पथारक करमी सागसँ मड़ूआ, कोंनी, साम, कोदो आ खुद्दीक रोटी सभसँ बदलल जाए लागल रहै बोनिहारिन जनानीक अंग प्रत्यंग। आ एखन पंचायत प्रतिनिधि किछु अदला–बदली करबाक लेल बी.पी.एल, अन्त्योदय, आवास आ पेंशन लाभसँ दहाबोर कऽ देबाक शर्त्तपर भिक्षू वेषमे हाथ जोड़ने देह तकैत आँखि निपोड़ने ठिठिआइत ठाढ़ अछि एकटा नव–योवना मसोमातक ड्योढ़ीपर। कोशीक आगमन कहैत छथिन जोतखी–पण्डित पोथी–पतरा उचारिकेँ एहिबेर भगवती एतीह मनुखपर। तखन हम कहलिअनि कोशीक बिपटल मशान बनल एहि भूमिपर हेराएल–भुथिआएल लच्छक–लच्छ अनचिन्हार लहासक हिसाब–किताब देबाक लेल आब ओ नञि औतीह मनुख दिस। किएक तँ हुनके बहिन कोशी हुनका संगे छऽल केने संहारिणीक रूप धेने गाम–गाम सुड्डाह करैत लच्छक–लच्छ लहास हेलबैत सवा मास पहिनहि कुशहासँ सवार भेल चल एलीह मनुखपर। आब ओ ओहि हाड़क–हार सजेबामे लागल रहतीह शोणितक नीसाँमे माँ तल आ बिसरल रहतीह आगाँमे कल जोड़ने ठाढ़ भेल त्रस्त अरदसुआ सभकेँ अगिला आवाहन धरि। एम्हर बगुला भगत सभ जान बकसि देबाक लेल गोहारिक आश्वासन दैत सहयोगक अक्षत छीट रहल अछि आ, धीरज धरबैत अछि जे आब अहाँ सभक फूल हासि जरूर हेतै अपन–अपन डालीमे पान–परसाद सजौने एहिना पाँच बर्ख धरि कऽल जोड़ने, चुपचाप ठाढ़ तँ रहू। एक सालमे तेरह महीना आउ, आउ बाउ बैसू बड्ड दुखी देखै छी किछु खगता अछि की? बाजू–बाजू लजाउ नञि एतऽ अबिते छैक खगल लोक सभ अहाँकेँ की अछि? बेटीक बिआह आकि बापक सराध बेटाक अछि मूरन वा, माथक आँखिक अछि अपरेशन भेंटि जाइत छैक तखन हँ अहाँकेँ किछु जत्था–जाल वा किछु माल–जाल अछि की नञि? हँ, हँ अछि अपनेक आड़िमे ब्रह्मोत्तरेमे बचल अछि पचकठबी तखन आब ऐ कागतपर दहक ओठाक निशान आ, ई लैह नओ सय टका एक सय टका मास भरिक सूदि काटि लेलिऽ आ हँ, सुनऽ एहिबेर जेठ नञि टपऽ दिहक आखाढ़ेमे मलेमास हेतै आ, तखन तेरह मासक साल हेतै। बिखाह चाङुर पड़ाइत जटायुक वंशजसँ भेट भेल छल शांत आ एकांतमे अपस्याँत भागल जाइत देखि हम टोकालिअनि एक क्षण बिलमलाह आ, ओ हमरा पड़ाइते–पड़ाइत कहि गेल हे महामानव! अपनेक नित–निर्मित बिखाह वायुमण्डलसँ हमर वंश उपटि गेल कतेको डीह–डाबर पर बैंगन–भाँटा रोपा गेलै हमर तँ प्राणे बाँचल अछि जे एहि अन्हरियोमे भागि रहल छी अपनेक छत्र छायासँ आ हिआसि रहल छी ओहेन ठाँ जतऽ अपनेक जातिक आवागमन नञि हो। ओना तँ हमरो मोन रहऽ मंगल आ चान मुदा ओत्तहुँ पहुँचि चुकल अछि अपनेक यान नदी फिरिये देने अछि यूरो गागरिन आ राकेश श्रीमन् आन कतेको हाँ मुति घिनेने अछि अपनेक श्वान। हमर तँ दुखक नञि ओर मुदा बचाँ सकब तँ बचाउ अहाँ अपन संतानकेँ अपन बिखाह चाङुरसँ ई नेना बाढ़िमे भसियाओल मायक लहासकेँ धारक कातमे तकैत नेना दस बर्खक बलात्कृत मुइल बहिनक मुँह तकैत नेना फेकल पातपर लुधकल कुकूरकेँ चल जयबाक बाट तकैत नेना आतंकवादी विस्फोटमे चिथड़ी भेल मजूर बापक खंड–पखंड देहकेँ तकैत नेना भायक कफनक लेल मनुक्खक हेंजमे हाथ पसारने नेना हम पुछै छी–ई नेनाकेँ छी? हम देखैछी–ई नेना अहुँ भऽ सकैत छी अहुँक नेना भऽ सकैए ई नेना। आइ पहिल बेर गामक गाम पथार खेनिहारक गलामे लागि गेल रहै डोरि आइ पहिल बेर। हटिया–बाजारक भीड़मे आगाँमे राखल हरियरी ओकरा अनसोहाँत लगैत रहै आइ पहिल बेर। ओ खस्सी हरियरी छोड़ि चमकाबैत छूरी आ गलाक डोरि पकड़ने लोककेँ निहारैत रहै आइ पहिल बेर। दादागिरी बेसी दौड़बे तँ दौनीक बरद जकाँ कराममे जोड़ि देबौ! हाथ–मुँहमे जाय लागलौ? आ भरेऽ लागलौ पेट? जाबी बान्हि देबौ, जाबी!! पाँखि बढ़ल जाइ छौ? लोकतंत्र चाही तोरा? संविधान लेबे संविधान? आ ने लुक्कासँ झरका देबौ, लुक्कासँ! ईह! नाचैए कोना छम–छम मुंगरीसँ घुट्ठी ससारि देबौ, घुट्ठी नञि तँ मोन ठंडा केने रह, ठंडा चिन्है नञि छिही हमरा? भकसी झोंका देबौ, भकसी। कलमुच टुकुर–टुकुर तकैत रह कानमे तूर–तेल देने सूतल रह जाधरि हम तोहर कंठ मोकि साँस नञि निकासि दियौ। राजमहल राजमहलक देबालसँ अबैत अछि कनबाक सिसकी बेवशक माँउस सड़बाक गन्ह आ टपकैत अछि बूँद–बूँद शोणित। एकर एक–एक गोट ईंटा ओहि शोषित–मजूरक हाड़ अछि आ गिलावा ओकर मॉउस जकर पसेनासँ पटाकऽ ओकर शोणितसँ रंगल गेल देबाल। एहि देबालक चमकि देखिकऽ सहजहि अंदाज लागि जाइत अछि जे केहन लाल टुह–टुह शोणित रहै ओहि दमित–शोषित देहमे जे साफ–साफ देखार पड़ैत अछि अहि अट्टालिकापर। जतय चारू भरक हरियरीमे देखार पड़ैत अछि ओकर श्रम–शोषणक मूक गबाही जे जनम भरि परिश्रम करैत खिन्न मनसँ पेट पकड़िकेँ बितेलनि राति। वैह नर–कंकाल प्राचीरक नेओसँ जकरा छातीपर ठाढ़ अछि ई राजमहल चित्कार करैत शोर पाड़ि रहल अछि जे आबो तँ हमरा आजाद कराउ एहि मोटक देबाल आ लोहाक जंगलासँ जनैत छी! की भेल रहै? हमर गलती तँ मात्र एतबे भरि रहै जे फकत दुनू साँझक रोटी माँगलिअनि तेँ हमरा पएरमे बेड़ी बान्हि कऽ उनटा लटका देल गेल अछि तहियासँ आइ धरि समयक आँच सहैत आएल छी अपन विद्रोही संततिक प्रतीक्षामे। किऐ तँ आइ फेरसँ हुनक संतति किछु ओहने करबाक लेल एहि प्राचीरकेँ देखिकऽ यशोगान करऽ लगलाह अछि जे ई हमरे पुरखा बनौने छलाह। २.सच्चिदानन्द ‘सौरभ’ देखू नै.... ओ जनानी.... हमर भाउज थिकय से बूझल–ए अभकेँ तैयो, कनफुसकी देखि चोन्हराय छी, कियै, ऐना? देखनाइये–ए तँ देखू नै.... सिनेमा हॉलमे पार्क आ होटलमे स्कूल–कॉलेजमे आ’ मंदिर परिसरमे देखू–देखू नै घरमे, बाहरमे.... गाम आ शहरमे खेत–खरिहानमे.... कोना–कोना होइत रहै–ए छौड़ा–छौड़ीमे कनफुसकी मुंसा–मौगीमे मशखरी आऽ नेना–भुटकामे मुँहदुशी ओना, हमरा बूझल–ए ई सभ अहाँकेँ नीके लागत कियै तँ, अहुँ.... एहि युगक थिक बस हमही–टा अहाँकेँ सतयुगी बूझि पड़ै छी ग्राम+पो.–सुखपुर जिला–सुपौल भोरऽक आसमे सच्चिदानन्द ‘सौरभ’ चारि दिनसँ कविजी! आधे पेट खाइत छथि दुइये पसेरी चाउर आऽ तीनिये पसेरी चिकसमे मास खपेबा लेल साँझे सँ ओ परतारैत रहै छथि धीया–पुताकेँ सूतय लेल आऽ घरनीसँ फूलि बाजि ताकतऽक बदला निन्नऽक गोली खा लैत छथि कविजी! भरिपोख सूतबा लेल मुदा, तैयो कविजी उठिये जाइत छथि भुरूकबासँ पहिने कविता लिखबा लेल कविता! जकरा हुनक घरनी सौतिन कहि गरियाबैत रहै छन्हि कविता! जकरा हुनक सम्बन्धी डाइन कहि लतियाबैत रहै छन्हि तकरे सृजनमे फरिच्छ धरि अपस्याँत रहै छथि कविजी सहज, सरस आऽ चोखगर–चोखगर शब्द हेरय लेल ओ.... काटय छथि अहोछिया ठीक ओहिना जेना कमलऽक पंखुरी मध्य कैद भौंरा अतुल रस–पानसँ अफरिकेँ औनाइत रहै–ए भोरऽक आसमे.......... सम्पर्क आशीष ट्यूशन सेंटर सतीश राज कैम्पस पानी टंकीकेँ समीप, सुपौल अन्हारऽक संग रहैत – रहैत सच्चिदानद ‘सौरभ’ चहुँ दिस पसरल अछि घुप्प अन्हार अन्हारमे बाट हेरबा लेल दऽ रहल छी हथोरिया मुदा, नहि भेटय अछि बाट आऽ नहि भेटय अछि अन्हारऽक ओर–छोर कतबो नोचय छी अपन देह–हाथ वा पीटय छी कपार रहै छी सदिखन ओतय ठाढ़ जतय अछि अन्हारऽक एक छत्र राज! बुझि पड़ै–ए हमर मोनऽक इजोत सेहो भेटाय लागल–ए हे अन्हार! अहाँ संग रहैत–रहैत हमर आत्मा सेहो भऽ गेल अछि आन्हर तखन नै ओकरा देखि नहि पड़ै–ए कर्ममार्ग आऽ अपस्याँत अछि ओ हेरबा लेल मुक्ति मार्ग! १.ई वर्ष-अजित मिश्र २.नव वर्ष ३.शिव कुमार झा-किछु पद्य १.अजित मिश्र ‘’  सूर्यक प्रकाश सन जीवनमे ज्योति बस , चन्द्रमासन  शीतल मन  बाँटए  ई वर्ष दस । पग-पग पर भेटए जन , दिन-दिन बढ़बए यश , कामना कण-कणमे, घोलए सुख-शान्ति रस ।। ‘’ आगत नववर्षक शुभ – अवसर पर हमर अशेष शुभकामना  । अजीत – मैसूर । २.विनीत ठाकुर, मिथिलेश्वर मौवाही – ६, धनुषा ( नेपाल ) 

नव वर्ष 

नव वर्षक ललकी कीरीणियाँ सुखक समाध लऽ पसरल दुनियाँ सभ केउ सुखित भऽ जिबै–जागै पूरे मिथिला मंगलमय लागै

होइनै ककरो आव जाइ–बेजाइ मेहनतकें रोटीसँ नेना पोसाइ सभकें घरमें जुरै रुचै अन्न प्रशन्न मुद्रामें रमकै मोन

जे बुझे अपनाकें बलशाली देश काज किछु एमकी करै विशेष जलवायू प्रदूशन पर राखै ध्यान पृथ्वीकें कम करै तापमान ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

!! कंतक आवाहन !!

आजु मुदित मन बालारूण केर - करू मंगल गुणगान अय । जड़ उपवन मे सुमन फुलाओल यौवन महमह भान अय ।। श्रैंगारिक वेला मे सपनहिं प्रियतम छूलनि कपोल हमर । अर्द्ध निन्न मे चिहुॅकल जहिना, सासु मरोडलि लोल हमर । अभिनव औता आजु सुनल दुरभाष मे अपने कान अय । जड़ ............................................................. ।।

झट उठि देखल धर्म मातृ केर, आनन परिमल पुष्प बनल । पूत दर्शनक आश मे डूबलि, मंजुल मुसकी पनकि रहल, चलू रम्भा भंडार चढ़ाबू हेता भुखल अहॅक परान अय । जड़ ............................................................. ।।

असमंजस मे दुहु भैरवी, मातृक लोचन सुधा भरल । वामा हम तऽ नेहक लुत्ती, तनय अनल प्रेम धधकि रहल । जननी हृदय छोह सॅ आकुल स्वार्थहि हमर जहान अय । जड़ ............................................................. ।।

चरण छूबि नाथक माता केर, कयलहुॅ चटपट स्नान हम । कुमकुम केसर जूही चमेली, कुलदेवी गमगम अनुपम । देवकी नन्दन बंसी बजाबथु बोरि - बोरि द्राक्षा तान अय जड़ ............................................................. ।।

संभवि अहाॅ ननदि नहि अनुजा, बनि कम कयलहुॅ ताप हमर । नहि तऽ फॅसि विरहक संतापे, पीवि लेतहुॅ कखनहुॅ जहर । आनव उपहारे मे अहीं लेल विज्ञ, धान्यवर चान अय जड़ ............................................................. ।।

!! अतृप्त नयन !! आकुल पड़ल विगलित नभ दिशि तकैत, छलहुॅ रैनि केर निर्वांणक प्रतीक्षा करैत । कोना काटव एहि संतापी जामिनी केॅ, ओ तऽ छलीह हमरे कटैत । झकझोड़ि देलक अन्र्तमन केॅ नयना क पूछल अंतिम प्रश्न - अहूॅ अहिना करब की ?

पददलित कयलक विष रहित फन केॅ । दुहू नैन नोर सॅ सरावोरि, देलनि हमर आत्मा केॅ मडोरि । निःछल करूणामयी भऽ भाव विभोर देखऽ लगलहुॅ अवलाक धधकैत ज्वार सुनैत गेलहुॅ सुनैत गेलहुॅ । निरूत्तर हमर व्यथा क्षीण भऽ गेल - मंच सॅ नेपथ्य भरिगर लागल की सोचैत छलहुॅ ? वास्तविकता............ चाननक सेज पर पड़लि अर्धांगिनी धान्य, रजक, कांचन, भरल.......... मुदा ! सदिखन खसैत् वेदना केर दामिनी ? छल अपूर्ण यौवन अतृप्त नयन हा ! तात कोना कएल वरन एक गाही वयसक सुकन्या केर कंतक वयस पचपन..... । गामक चुलबुली मोनालिसा कुहरि रहलि कनक गृह मे - असहाय तातक देल विपदा केॅ  भोगि रहलि जोगि रहलि । केना पार करती लछिमन रेखा - अपन विंहुसल हिलोर केॅ कतऽ करतीह प्रस्फुटित हमरा सॅ कयलीह अपन पीड़ा प्रकट पाषाणी नर कऽ देलनि जीवन विकट बूढ़ कंतक डोलि गेल आसन शंकाक अजगर तोड़ि देलक प्रीति स्तंभ कठोर आदेश देलनि अपन दारा केॅ - आजुक पश्चात् पर पुरूष सॅ गप्प कथमपि नहि करब नहि तऽ ? हऽम अचंभित सुन्न शिथिल कलंकित चरित्र लऽ कऽ धूरि गेलहुॅ निःतरंग अपन पुरान पथ पर काॅपि रहल दुहु पग .... कोन अपराध कयलहुॅ हऽम तऽ छलहुॅ पोछैत नोर । अतृप्त नयन सॅ झहरैत नोर ।।

!! कुरूक्षेत्र मे राधा !!

नवनीत अहाॅ पतवार बनू एहि करूस सरोवर जीवन केॅ, ठिठुरल कदम्ब जमुना ठहरल सखी हॅसी उडाओल अर्पण केॅ ।।

आक्रांतित चहुॅ दिशि सुमन तरू, विकल जड़ चेतन नभ धरती, जल बुन्न बनल घन घनन घटा, त्रासित राधा मन अछि परती । नवनीत............................................ ।।

सत् असत कर्म बीचि घूमि रहल, सभ जनितो अहाॅ अनजान बनल, भेंटत की जन संहारे सॅ, अवला चित्कार आ नोर भरल । नवनीत............................................ ।।

शापित करती ओ हिन्द सती, जनिक नाथ लुप्त भू आंचल सॅ, स्ंागहि करूणित वृन्दा - मथुरा, लेब पाप सभक युद्ध माॅचत जॅ, नवनीत............................................ ।।

खोलू रण कर्मक डोरा डोरि, डुबू पीयूष राधा - रस मे, उत्ताप प्रेम तिल सुनगि रहल नहि आब ई यौवन अछि वश मे नवनीत............................................ ।।

!! हिंसक नानी !!

खापड़ि बेलना केर कहानी, आब नहि दोहराबू अय नानी ।।

नाना बऽनल छथि सियार, भक् छथि जेना हुलुक बिलार, दंतक गणना घटि कऽ बीस हुरथि गूड़ - चूड़ा केॅ पीस गावथि दारा दरद जमानी । आब............................................ ।।

वरन् केर वर्ख भेल चालीस, अर्पित अहॅक चरण मे शीश, अहाॅ लेल लबलब दूध गिलास, नोर पीबि अपन बुझावथि त्रास, क्षमा करू ! छोड़ू आब गुमानी । आब............................................ ।।

अवकाश क बीति गेल दस साल, पेंशन सॅ आनथि सेब रसाल, भरि दिन पान अहाॅ केर गाल ऊपर सॅ मचा रहल छी ताल, चमेली सॅ भीजल अछि चानी आब............................................ ।।

कतेक दिन सुनता पितृ उगाही, संतति पूरि गेलनि दू गाही, मामा मामी क बिहुॅसल ठोर, माॅ छथि, चुप्प ! साधने नोर, कोना बनि जेता आत्म बलिदानी आब............................................ ।। १.अशोक दत्त-किछु कविता २.शीतल झा--किछु कविता३.शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’--किछु कविता १.अशोक दत्त कविता आह्वान निर्दोष मानव रक्‍तसँ रक्‍त र‍‍ञ्जित धराक छाती कुहरि रहल अछि। कारामे बन्‍द कऽ देल गेल कलम अन्‍हार खोहमे धकियाओल जाइछ आवाज कोना करू शान्तिक बात, सर्वोच्च आसनपर विराजमान अछि दुराचार, अपराध जोड़पर अछि। आतङ्क कुकर्म। खुंखार कुकुरक नोचसँ सोनिताएल देह लेने कोना सूति सकै छी कोना भऽ सकै छी निश्चिन्‍त जखन तागसँ कटल गुड्डी जेकाँ पताए लागल अछि वर्तमान/भविष्‍य ते उठबैछी गाण्डिव अर्जून जेकाँ, सिंहानाद कऽ जगबै छी सुतनाहरकेँ हौ उठऽ/ देखहक देश बनल छह कुरूक्षेत्र समधातऽ लक्ष्‍य शान्ति लए। अस्मिता लए। २०६२/९/१६ कविता ओघि उपाड़ उपहास करैत इतिहासक नितरा रहल अछि सफलतापर, सफलता जे छैक पानिक बुलबुल्‍ला जेकाँ। सन्हिआएल छै अदक कोँढ़मे उड़ल छै निन्‍न तकने घुरैछ सुरक्षा कवच मुदा, उताहुल भेल अछि मुँहमे जाबी लगाकऽ मेहमे बान्‍हल बड़द जेकाँ जोतबाक लेल, छै दश-पाँच गोट लगुआ-भगुआ छै बन्‍दुक ते फँकैए गुँड़-चाऽर मने-मन नित नवीन आडम्बरकऽ। नइँ छै चौवन्‍नीमरि जनाधार तैयो नितरा रहल अछि, सफलताक नाम दऽ अतीतके गुनैत वंशा बढ़बऽमे उनमत्त। बुझैत अछि ओ करची पङने दू-चारि गोट बाँस कटने नइँ उपटै छै बाँस तेँ नितराइत अछि बनल अछि ढीठ। देश उएह अछि परिवेश नव देखैत छल पहिनहुँ करूआइत छलै आँखि आब बूझऽ लागल अछि बच्चासँ बुढ़धरि नइँ होइत छै फूल बाँसमे नइँ होइत छै सुगन्‍ध नइँ लगैत छै फल मुदा, पनपऽ नइँ दैत छै ककरो अपना लगमे मात्र बढ़बैत अछि अपन साम्राज्‍य। आब करची पङलासँ नइँ दू-चारि गोट बाँस कटलासँ नइँ उपटाबऽ पड़त ओधि जडि़सँ कोरिकऽ तहन फुलएतै फूल छिरिअएतै सुगन्‍ध लगतै फल मुस्किअएतै ठोर। २०६२ माघ २९ गीत नाटक-इहो बच्‍चे छै (लए) कहे रहि-रहिकऽ हमरा सभ अमगला रे हमर कसूर कथी भेलियै बेटा जे हम गरीबहाके हमर कसूर कथी अछि हमरो उमेरिया पढ़ऽलिखके सङी-साथीके सङमे हँसऽ खेलके मुदा गारी, हम गारी, छियै गारी हँ-हँ गारी गारी सुनै छी अनकर दु‍अरिया रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . पेट जरल अछि तेँ ने छी एत्तऽ पड़ल घरमे रहितै जे कोठी बरवारी भरल रहितौं हमहूँ, हमहूँ रहितौं हँ-हँ रहितौं, हँ रहितौं रहितौं अम्‍माके हमहूँ दुलरूवा रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . . . . दर्द मनके अपन हम कत्ते सुनाउ हमहँ बच्‍चे छी केओ तऽ छाती लगाउ घूरि जएतै, हँ घूरि जएतै, हँ-हँ घूरि जएतै घूरि जएतै हमरो समैया रे हमर कसूर कथी, भेलियै बेटा . . . . . . . . . नौटङ्की नाटक-नइँ आब नइँ (लए) सर्व साधारण घरके कथा कही अहि बेर। मेहनति छल संसार जकर दुरमतिया देलकै घेर।। दुरमतिया देलकै घेर बुझलकै अपन धीयाकेँ भारी। जकर एहन परिणाम भेलै भेल दिन सियाह राति कारी।। दिन सियाह राति कारी रेतलक धीया-पूताकेँ घेँट। अंचिया बनलै आगि बेदीके दर्दे रहलै शेष।। लौल कएलक सुनू केहन अज्ञातमे अजोहेमे देलकै कनियाँ बना। आब देखू अहाँ सभ जे की-की भेलै चूक कएलक जे तक्‍कर की परिणाम छै।। नौटङ्की नाटक-नइँ आब नइँ (लए) बूधि गेलै बिला देलकै सासुर पठा पढ़ऽ लिखऽकेँ बेरिया देल कनियाँ बना। भेलै खाक मनोरथ आब नोरेँ बचल भरि जिनगी लए दोषेटा माथा चढ़ल।। तील-तीलकऽ जरल धुधुआकऽ जरल धीयाकेँ बियोगेटा रहि गेल पड़ल। शोक-सन्‍तापमे आब अपनो जरत यादमे आब धीयाकेँ ओ पल-पल मरत।। सुनू अहाँ समकेओ बाबू-भैया यौ एहन परिणाम रौदियाकेँ भेलै किए। नइँ करितै धीयाकेँ नेनहिमे बियाह तहन भोगितै नरक सन ओ जिनगी किए।। गीत लोहियामे दाइल केली अढि़यामे भात छिपा लऽकेँ काढ़ऽ गेली बहुमारलक लात आरे बाप रे बाप थाकल हारल घर आबी बहरा कमा अङनोमे दैहए लगले काम अढ़ा उल्टे कपाड़ पीटैत धरे जाके खाट अरे बाप रे बाप लोल रैङ सुत अपने तोशक बिछा हुकुम करे हमरा जो खाना बना कुच्‍छो जे कहली दैहए नहिराकेँ धाख अरे बाप रे बाप करमे छल फूटल जे कैली बियाह हट्ठोघड़ी मौगी हमर दैहए घिता कहियो ने सुने हमर एक्‍कोगो बात अरे बाप रे बाप दू आखर पढि़ बुझे हमरा मुरूखा आङन-घर छोडि़ कहे सदखिन घुमा सोङरपर टीकल हमर घरके टाट अरे बाप रे बाप कविता की लिखू कविता? की लिखू कविता ने रङ्गक उमङ्ग आ ने पुआक मिठास जीवनकेर कवितामे टीसक अनुप्रास। बस्‍तीमे करैत अछि ताण्‍डव नर्तन भूख, नइँ बजैत अछि डम्‍फ आ झालि एखन होलीमे, नइँ छे ककरो ठोरपर फगुआक गीत रङ्ग-अबीर नइँ उडै़त अछि सोनित तेँ शोकाएल अछि होलीक उमङ्ग, गरम तावापर पड़ल पानिक बुन्‍द जेकाँ उडि़ गेल अछि मुस्‍की। कतबो करओ केओ आत्‍मप्रशंसा मुदा, ठाढ़ होबऽ पड़तै काल्हि कठघारामे देबऽ पड़तै जबाब ओकरा जे सोनितओने अछि फगुआ, अओतै समय अएबे करतै खेलबै होली रङ्ग-अबीरसँ तहन लिखब कविता/ एखन की लिखू कविता? २०६२/१२/१ गीत पुरूष चान आएल उतरि आइ मोर अङना छिटैत इजोर बजैत मधुर बयना स्त्री   हमरा भेटल सिनेहक अनूप गहना आइ नाचब छमा-छम बजाए कङ्गना स्त्री   मनकेँ कियारीमे जुही-चमेली चम्‍कए नयन बीच हिराकेँ ढ़ेरी पुरूष हुअए पूरा अहाँकेँ मधुर सपना रहओ सदिखन अहाँकेँ हँसैत‍ नयना स्त्री   हमरा भेटल सिनेहक . . . . . . पुरूष यौवनक मधुरसँ साँठल चङेरी प्रेमक हमर घरकेँ अहाँ बड़ेरी स्त्री   अहीं छी पूजा हमर अहीं अर्चना सोलहो सिंगार हमर अहीं सजना पुरूष चान आएल उतरि . . . . . . . स्त्री   उमङ्गकेर धारकेँ आब किए घेरी पुरूष एम्हर सहटि आउ करू ने देरी स्त्री   हृदय बीच राखब सदति अपना पुरूष पूरा भेल कहियो जे छल सपना चान आएल उतरि . . . . . . . स्त्री   हमरा भेटल सिनेहक . . . . . . गीत पुरुष  गोरी नइँ कर एते गुमान, तोरेपर मन जे अटकल सुन बात हमर तोँ मान, आब छोड़ एना नइँ हठ कर स्‍त्री  तोरा सन बहुत अकान, दुनियाँमे हम अछि देखल छौ केहनो मुँह ने कान, करे काग जेकाँ किए करकर पुरुष  हमरासँ नीक तोरा आओर कतऽ भेटतौ ओल सनक बोल सूनिकेँ तोरा पुछतौ जुआनी हेतौ जियान, एहिना जँ रहबे भड़कल स्‍त्री  लेर चुअबैत किए घुमए पाछा-पाछा छी हम जुआन तैसँ तोरा कोन बाधा रे एखनों करै गियान, मरपाँखि किए छौ जनमल पुरुष नयनक कटारी तोहर हीयाकेँ बेधलक मस्त जुआनी जे छौ चैन उएह लुटलक दऽ दे हमरा पर ध्यान, मन तोरे लए अछि ककछल स्त्री   चालि एहन छौ जेना कोनो वंश कुरहरि छाती पीटैत रहबे देखि-देखि सुन्‍नरि छिछिआइते जेतौ परान, जिनगी मरि रहबे रकटल शिव गीत बाबाक महिमा अपरम्‍पार गंग-राशि जटामे शोभए गरबामे साँपक हार, बाबाक महिमा. . . . . अपना खाइ छथि भाङ-धथुर आ रने-वने भटकै छथि सभक करथि मनोरथ पूरा औढ़रदानी कहबै छथि अपन अङ्ग विभुत-बाघम्‍बर अनका लए गृवहार, बाबाक महिमा. . . . . शिवकेँ महिमा जानि सकलकेँ पढ़ि-पढ़ि वेद-पुराण जग रक्षा लए विषकेर छाँकल बास बसथि समसान त्रिभुवन स्‍वामी अन्‍तर्यामी जगकेँ पालनहार, बाबाक महिमा. . . . . सभक हृदय बसै छथि महादेव सभक जनै छथि हाल अहूँक सूदि लेतऽ स्‍वयंभू टूटत दु:खक सञ्जाल देवक रक्षा कएलनि गौरी वर दुष्‍टक कऽ संहार, बाबाम महिमा. . . . . कविता अहुरिया पटापट भुजा रहल अछि भ्रष्‍टाचारक कनसारमे जिनगी। चेतनाशून्‍य सम्‍वेदनाशून्‍य कलमक तरूआरि हनहनबैत रेतैत अछि घेंट स्‍वेच्‍छाचारी शासक तेँ छटपटाइत छी। एक टुकड़ी रोटी लए भूखल पियासल मशिन जेकाँ श्रम कर लए बाघ्‍य गरीब मजदूरकेँ खैनीक नोसि जेकाँ सुड़कैए बीड़ीक धूआँ जेकाँ उड़बैए ओ, जकरा भेटैत छे आसन, जे बनाओल जाइछ भ्रष्टाचार नियंत्रक उन्‍मूलक ओहो बहैए अनन्‍त प्रलोभनमे बढ़ऽ लगैछ नह ओकर निकलि जाइछ सिङ्घ राक्षस जेकाँ हुड़कि कऽ फाँड़ऽ लगैए पेट आ नोचि-नोचिकऽ करैए शान्‍त अपन उदरक ज्‍वाला। चहुँदिश पसरल अछि भ्रष्‍टाचारीक साम्राज्‍य, भ्रष्‍टक महासागरमे फँसल उजबुजाइत जिनगी किछेर खोजैत कऽ रहल अछि रक्‍त तर्पण असन्‍तोष आ चरम घृणाक बीच। नइँ देखाइत अछि कोनो मन्दिर जतऽ चढ़ाउ आस्‍थाक फूल, रफ्फू पर रफ्फू करैत छी तैयो फाटलकेँ फाटले अछि जिनगी, दम फुलैए चेहो उठै छी सपनोमे नइँ भेटैत अछि जखन भ्रष्‍टाचारक सोइरकद अन्‍त तैयो हथोड़ैत रहै छी घवाह विगतकेँ ढ़ोइत निरोग भविष्‍य। टङाएल अछि जनमसिद्ध अधिकार भ्रष्‍टाचारीक जेबमे चौपेतल कागत जेकाँ आ हम घवाह कुकुर बनल एहि गलीसँ ओहि गली करैत रहै छी भुकबाक अभ्‍यास अपन स्‍वरमे आक्रोश आ क्रन्‍दनकेँ मिझरबैत जे घूरि ताकत कोनो समाङ निकालत समवेत् स्‍वर ओ स्‍वर जे स्‍वर ढ़ाहत भ्रष्टाचारक किला लगाओत जाबी भ्रष्‍टाचारीक मुँहमे। २०६२/१२/१५ कविता सङ्केत‍ पुष्‍ट वक्षक मर्दनमे जूटल वलत्‍कारी बुझैत अछि पट्ठा अपनाकेँ। बिसरि गेल उन्‍मादमे जाहि वक्षक उरोजकेँ चूसिकऽ आइ बनल अछि मर्दन करबा जोग ओही छातीकेँ करैत अछि छत-विछत जकर पीड़ासँ आधा हलाल कऽ छोड़ल गेल खसी जेकाँ छटपटा रहल अछि वर्तमान मुदा नइँ छै फिकर तकर नोचैत आएल अछि आओर नोचऽ लए उद्धयत अछि। कर्पुर जेकाँ उड़ैत अछि शान्ति, बढि़ रहल अछि मूख! क्रन्‍दन! टुग्‍गर होइत धीया-पूता! आह! अहुरिया कटैत अछि बिनु मोइसक कलम मुदा, आश, जिवित अछि फड़फराए जे लागल अछि वलात सीयल ठोर अधिकार लए, फड़कऽ लागल अछि बाँहि मसोरऽ लए ओकर गर्दनि जे प्रयत्‍न करैत अछि इदिअमिन आ हिटलर बनबाक जे दोहराबऽ चाहैत अछि ’शिकागो’-क बीच सड़कपर घोड़ाक टापसॅं कएल लतखुर्दन जे लगाकऽ आगि मस्‍त भऽ बजबैत अछि अपन बाँसुरी ‘निरो’ जेकाँ । ठोरक फड़फराएब, बाँहिक फड़कब सुखद सङ्केत अछि वलत्‍कारीक अन्‍तक । २०६२/१२/२५ शिव गीत भोलेदानी हमर अहाँ विनती सुनू खाली झोरी लऽ अएलहुँ दयासँ भरू अछि जन-जनमे सगरो अहींकेँ गुणगान दिअ हमरो अधरकेँ यौ, बाबा मुस्‍कान हमरा भेटए ने बाट जाए ककरा कहू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . होशे हराएल नइँ किछियो अछि भान हमरा लगैए कारी एखन सुरूज आ चान नाव भवसागरसँ पार जिनगीक करू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . . छी अहाँक शरण आएल, राखि लिअमान भोले अहाँ ने सुनब हम तेजब परान अछि हमरो अहाँसँ ई हट्ठे बुझू भोलेदानी हमर अहाँ . . . . . . . . बाल गीत (लोरी) आगे निनियाँ आ-आ बौवा लए निन ला-ला देबौ तोरा नवका साड़ी दौगल-दौगल आ-आ बौवा हम्‍मर मिसरीक ढ़ेपा तोरा माथा जूड़ा-खोंपा खीर देबो तोरा भरिथारी सुन्‍दर सन गीत गा-गा आगे निनियाँ . . . . . . . मैना बनबए घरमे खोंता सिरोलिया करए ओहिमे चोंचाँ दाना आनय फोडि़ बखारी सभ मिल बाजय खा-खा आगे निनियाँ . . . . . . . चुनियाँ पढ़ए बड़का पोथा सह-सह ढिल करैछै झोंटा नम्हर केश ओकर बड़कारी दौड़ कऽ ककही ला-ला आगे निनियाँ . . . . . . . कविता अभियान भाइ-भतिजा मारिकऽ जे अछि शादी हथियौने, उन्‍मादमे ताण्‍डव नर्तनकेँ अछि देशमे रक्‍त बहओने। देशमे रक्‍त बहाबए किए कनिको नइँ छै भान, जागल जनता छेडि़ चूकल अछि गणतंत्रक अभियान चलल से आब ने किन्‍नहुँ रूकतै, अहंकारी आ अत्‍याचारी मुँहे भरे खसतै। मुँहे भरे खसतै खुनलक ‘ज्ञाने’ अपने खद्धा, छै ककरामे कुब्‍बत जे एहि बेरक सहिले धक्‍का । अही बेदकेँ धक्‍कामे भऽ जाएत चकनाचूड़, जनसमुद्रकेर लहरक आगाँ सभक टूटल गुरूर। सभक टूटल गुरूर तखन ई ‘ज्ञाने’ पारस की छै, ‘हिटलर’ तऽ धूल-धुसरित भऽ गेल ई तऽ बस मुसरी छै। मुसरी सङ टुनमुसरी जिनगीक जडि़ कटैए, छून लागि गेल कटैए, घून लागि गेल बाँहिमे से ई भरम पोसैए। नइँ लागल अछि छून बाँहिमे खुन भेल ने ठण्‍ढो सभ केओ मिल सङे लहराएब आजादीकेर झण्डा। आजादी सभक होइत छै जनमासिद्ध अधिकार, तकरा कोना छिन सकत ई सँड़ल-गलल दरबार। एहि दरवारकेँ सभ केओ मिलकऽ ईंटसँ ईंट बजादी, अही बेरकेँ उघबामे ‘नामो-निशान’ मेटा दी। ’नामो-निशान’ मेटा दी तैं लए बुलन्‍द करू आवाज, सिंहनाद कऽ सभ केओ बाजू लोकतंत्र जिन्‍दाबाद। लोकतंत्रकेर हएत बहाली राज करतै जनता, मेचीसँ महाकाली बजतै जन-विजयकेर डङ्का। जन-विजयकेर डङ्का बजने घर-घर हएत खुशियाली, लोकतंत्रकेर नामपर बजाउ जोड़सँ ताली। २०६२/१/७ बाल गीत छुनमुन-छुनमुन बौवा हम्‍मर फुदकैत फुद्दी जेकाँ रहैए कखनो मुस्‍की कखनो मटकी कखनो दि‍दीकेँ चुप्‍प कहैए, छुनमुन. . . . . खुब हिलसगर बौवाक गात चुन-चुन बजैए सभ बात मिसरी सनकेँ बोली सूनि-सूनि मोन जुड़ाइए मोन जुड़ाइए, छुनमुन. . . . . थाहि-थाहि कऽ उठबए धाप रूनझुन बाजए पायलक चाँप कारी लट जे घूरमल-घूरमल गोर गालकेँ चूमल करैए, छुनमुन. . . . . . गोल-गोल पुआ सन गाल चान जेकाँ चम्‍कैए भाल हिरणी सनकेँ नयनक पुतली सभक मनकेँ मोहल करैए, छुनमुन. . . . . हाथमे धऽ कऽ हम्‍मर हाथ स्‍कूल जएतै रटतै पाठ हमरे सनकेँ बौवा हम्‍मर हाथसँ कलम धरल करैए, छुनमुन. . . . . २०६३/३/२ बाल गीत सुन-सुन-सुन-सुन एगो बात चल रोपै छी ढ़ौवाक गाछ लुच्‍ची जेकाँ ढ़ौवा फड़तै बढ़तै अपनो तै दिन ठाठ एक दिन ढ़ौवाक गाछी बढ़तै खूब झमटगर हएतै घौर्छे-घौर्छे ढ़ौवा गाछमे फड़ते आ फलएतै तोडि़-तोडि़ करबै सभटा काज, सुन-सुन. . . . . . . फुलबारीमे पोखरि खुनएबै सुन्‍दर घाट मढ़एबै आम लताम जामुन संग मिठका बैरक गाछ रोपएबै ताहिपर झुलब साथे-साथ, सुन-सुन. . . . . बरबिघबा सन चौरमे अपनेसँ मेला लगबएबै अजब-गजबकेँ खेल-तमाशा आ सर्कस बजबएबै घुमएतै परी पकडि़कऽ हाथ, सुन-सुन. . . . . . किन कम्‍प्‍यूटर सेहो अनबै, मास्‍टर आबि सिखए तै दुनिया भरिके ज्ञानसँ जे हमरो परिचित करबएतै रहतै मोटरो गाड़ी पास, सुन-सुन. . . . . . गीत एक खाड़ा रोटी लए कुकुर बनल लोक अछि केओ एतऽ मलछैए केओ ककरो झपटैए रोटीए लए करैत कते देहक व्‍यापार अछि अभावकेर छूआँसँ आँखि पथराइ छै भूखकेर आरीसँ हृदय चिराइ छै एहन सन हालमे छै एक नइँ अनेक एतऽ पेटे बनल जकर जीके जञ्जाल अछि रोटीए लए करैत. . . . . . . मुँह भऽ जाइ चून सन देह पीरा जाइ छै नेनाहिमे ठोरसँ मुस्‍की हेरा जाइ छै ओकरा नइँ पुछियौ छै नीत आ अनीत कतऽ खेलबाक बयसमे एतऽ भेल जे लचार अछि रोटीए लए करैत. . . . . कोकनल घाओ जेकाँ जिनगी दुखाइ छै जुआनी सराप भेल दिन-राति बिकाइ छै झरकै छै निस दिन जिनगीक अंग ततऽ रोटीक भूगोल पाछा बौरल संसार अछि रोटीए लए करैत. . . . . २. शीतल झा, पिताक नाम–स्व. लक्ष्मी कांत झा, माताक नाम–स्व. दाई रानी झा, जन्म स्थान–सुगामधुकरही–५, ग्राम–नरहिया,धनुषा, नेपाल।, वर्तमान बसोबास–जनक पुर–६, जानकीनगर पगला धर्मशाला, महाराज सागरसँ दक्षिण, जिला धनुषा, नेपाल।, जन्म भिति–२०१२/०१/०१ जूड़शीतल।, शिक्षा–बी.ए., बी.एड., बी.एल.।, राजनीतिक संलग्नता–नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) पद–सलाहकार, के.क. नेकप्पा एमाले।, रूचि आ प्रकाशन–(i) संघीय संरचना आ मिथिला राज्य। मिथिलाक राजनीतिक इतिहास आ मिथिला (नेपालक सन्दर्भमे मात्र),(ii) संस्कृति, राष्ट्र आ मधेशक सम्बन्धमे विभिन्न रचना।, (iii) कविता (प्रकाशित विभिन्न पत्रिकामे), (iv) सुगौली सन्धि आ मिथिला (अप्रशित), “सुगौली सन्धि”मीन राज उपाध्याय नागरिक उड्डयन विभाग बाबरमहल (१) भारतक भूमिनिर्माण पौराणिक कथा, नक्शा, नेमूनि, निथि, ऐतिहासिक चर्चा (२) तत्कालीन राजाक इतिहास, भूगोल, नक्शा (३) भारतक लिखित इतिहास–(मौर्य, अश्लके, मानव इतिहास) (४) मुगल (ब्रिटिश साम्राज्य, हिमखण्ड) (५) मिथिला–वर्ड–तिरहूत मुंशी जी पगला बाबा धर्मशाला। टी..ऽऽऽऽ..स शीतल झा हमरोमे अहुँमे एकटा टी..ऽऽ..स अछि, नहि कहि ककर उन्नैस ककर बीस अछि। किनका आस पर हम छाति तानि चलु, हुनके तँ बिछुआएल निहुरल शीश अछि। जीबाक जोगाड़ वड्ड कष्ट प्रद अछि, बाउ रे, पूजारीक हाथमे अमृत कहाँ विष अछि। शांतिक शब्द थारसँ मोन आब उऽठि गेल, भभक्त रीक्त पेटसँ से मात्र रीस अछि। मुक्तक शीतल झा (१) हिन्दी पढ़लहुँ व्याकरण धोकलहुँ, हाकिम, नेता होइछ पुलिङ। छुटिएलौ मोंछ, भूमि, भाषा, सीमा, जनता होइछ स्त्रीलिङ॥ (२) आँखिमे नोर भरि गेल बिनु सर्दीकेँ जखन भय बढ़िगेल हथियार बिनु बर्दीकेँ, की हे तै वर्दीवाला हथियार सेहो नरसिंहक छैने, तै हिंसक हथियार देखबाक आब हिंसक छैने॥ (३) सब तरकारी छोड़ि नीक लागए लागल नेबो देल ओल, प्रशंसा तँ मात्र चाकड़ी अछि नीक अछि कटु बोल॥ (४) अभावक चिन्ता सदा अछि बढ़ि जाइयै हाटमे, मित्रत सर्वत्र छथि भय अछि जे छथि सङे बाटमे॥ (५) भूमि नहि भाषा नहि आकाश तँ अपन ललिअ चाकड़ीक नोकरी अछि अबकाश्त अपन ललिअ। बोकरे सन शीतल झा हम बुझलिऐ जकरा अपन, ओत रहल छल ओकरे सन, बधिआकेँ लिए खसी बनौनलिऐ, ओत रहिगेल बोकरे सन। पद, प्रतिष्ठा, पैसा छन्हि आब, भल मानुष त कहबनि ने? बात करैथ ओ नमहर मोटगर, मित्री चालि सब छोकरे सन, नीति, नियत, व्यवहारमे अंतर पैंचमे धोकल बजता हे, लाल, डम्हाएल, पुष्टक भ्रम अछि, मुदा रहल छथि चोकरे सन। की करब चेतु जन, मनसँ आबो चिन्हकेँ केँ छथिओ, मालिक बनाकए देखलहुँ ओ छथि हेहर थेथर नोकेर सन। शांति ! ! ! शीतल झा I. की उठौने छी? बम्! की पकड-अने छी? बन्दूक! की खोजैछी? शांति! भेटथिन्ह? नहि! II. की देखैछी? लास! की गिंजैछी? खून! की खोजैछी? चैन! भेटलाह? नहि! III. कऽ तँऽ बौआई छी? कोने कोने! कत छिछि आई छी? घाटे घाटे! की खोजैछी? सुरक्षा! भेटलाह? नहि! तहन ...... धैर्य धरू! बुद्ध आवि रहल छथि बन्दुक ने नहि, शांतिकेँ घिसिओने! बम् उठौने, चयनकेँ चिचिअबैत! सुरक्षाकेँ लति अबैत !!!! सब केव उदास रहैअ! शीतल झा सब केव एहिठाम उदास रहैअ, केव हमर, केव हुनकर, केव अहाँकेँ दास रहैअ! केब प्रधान, केब महान, केव गणमान्य होइथ, देखिओन कने नीक जकाँ, ओ ककरो खबास रहैअ! भाषण तँ मंत्री, प्राज्ञ आ संतकेँ नहि होइक, उतारि देखु हुनके पर, ओ कोरा नकवास रहैअ!! जीवित साँसक दम्यमे जे किछु गति दैछ ओ यंत्र लगाए देखलिअ ओ तँ एकटा लास रहैअ!! हमर संस्कारक गीत शीतल झा (१) की गल्ली, की सड़क़, की मन्दिर की मोहाड़? जखन नाक मूनिक, “पैर बारिक” चलैछी (२) पोखरि ऐतिहासिक होइक आ धनिकक कोड़ावल मोहाड़परक घर नमरैत गेलै पनिआब घटैत गेलै तहन कोनो मासमे मोन पड़िआइए शामाक गीत ”गामक अधिकारी तोहे बड़का भैआ हो! भैआ हाथ दस पोखरि खनाए दहो चम्पा फूल लगा दहो हो! (३) एहि ठामक मन्दिर की भेलै? हाकिम साहेब कब्जाक लेलखिन! आ मूर्त्ति? ओ तँ चोरा...अ...लेल कै! केँ? से तँ भयंकर पैघ लोक रहै! आ जयिन जग्गह? महान् जी बेच लेलखिन! सब? नहि किछु माइरामकेँ। किछु ओकरे भतिजाकेँ! तहन, मोन पड़ैअ आ गुनगुनाए लगैछी– “एहन पतित केर अही पति राखब हे महारानी सीया, अहीकेँ चरण केर आश् हे महारानी सीया!! कवि जी तबाह छथि शीतल झा कवि जी तबाह छथि हुनकासँ, गाल परक कारी बुन्कासँ! कविताक लेल खोजलनि एकटा नारी, श्रृंगार रस लेल पकड़लनि ओकर साड़ी कविक नाक टेढ़ भेलनि हुनकर ठुन्कासँ! कविजी मग्न भेलाह हुनक प्रेम चिन्तामे मन अटकि गेलनि कखनो केस कखनो फित्तामे बहकि गेलनि पत्नी पड़ोसीक नन्कासँ! मिथिलाक दशा३.शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’ मिथिला मैथिल की भए गेलैए परदेशी व्यवहार सनातन पश्चातक रङ्ग रङ्गि गेलैए मिथिला मैथिल की भए गेलैए कतए गेलैए मण्डण केर गरिमा विद्यापतिक केर गीत। पहिरब औढ़ब डिस्को भए गेलैए विसरि गेलैए सभ रीति। वेद–मन्त्र केर ध्वनि हता गेलैए सुनि लिअ फिल्मी तान। दिन–राति डिस्को लहरीसँ फाटि रहल अछि कान। कत गेलैए ओ पाग–दुपट्टा चन्दन–चर्चित भाल। साँची धोती–अंगपोछा आ पावन रेशम शाल। डिस्को पाछाँ देश बिका गेलैए बिगड़ि गेलैए संस्कृति। दुल्हा–दुल्हिन सेहो बदललि आयल केहैन नव रीति। मोनसँ पढ़ू बढ़ू अओ बाउ। सीमा हीन क्षितिजमे बढ़ि कए अपन लक्ष्‍य कए पाउ। मोनसँ पढ़ू बढ़ू अओ वाउ। जीवन-कठिन तपस्‍या बढ़ि गएल। बेरोजगारीक समस्‍या बढ़ि गएल। मिटए क्‍लेश देशक जन-जन कए। प्रतिभा एहन देखाउ। मोनसँ पढ़ू बढ़ू अओ बाउ। नेता ठग कए भाषण पढ़ि गएल। कपट-कुटिल कुशासन बढ़ि गएल। धन-लोलुप भ्रस्ट प्रशासन बढ़ि गएल। धवल कीर्त्ति ध्‍वज वाहक बनि कए राष्‍ट्रक अलख जगाउ। मोनसँ पढ़ू बढ़ू अओ बाउ। बिपत्तिसँ उवरव आस टूटि गएल। नेता परसँ विश्‍वास उठि गएल। प्रबल राष्‍ट्र इतिहास छूटि गएल। क्षेत्रवाद सामत्त कहरसँ राष्‍ट्र कए तुरत‍ वचाउ। मौनसँ पढ़ू बढ़ू अओ वाउ। अनाचार कुशिक्षा बढ़ि गएल। विनु पढ़ाए परीक्षा बढ़ि गएल। लुटि-मारि बुमुक्षा बढ़ि गएल। देशक अहाँ कर्णधार यो बिपदा दूरि भगाउ। मोनसँ पढ़ू बढ़ू अओ वाउ। मिथिलाक बचाउ शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’ हे प्रभो! झटसँ बचाउ हमर मिथिला देशकेँ विपद् ग्रस्त संत्रस्त जन केर दूर करू दुःख क्लेशकेँ श्रृंखला परतंत्रता केर चिन्ह एखनो नहि छूटल। शांति केर रोटी सेहो जे आइ धरि नहि भेट सकल। जाति–भाषा धर्ममे भायसँ भाय अछि लड़ि रहल। कतोक आगिक कुंडमे धन–जन भसम कए जाए रहल। सद् बुद्धि समता शांति आ ओर विश्वास भेटल जाए रहल। आचार अनुशासन नियम आदर्श छूटल जाए रहल। परम्परा–पावन–पुरातन पतन ओकर भए गेलैए उपदेश गीता बुद्ध केर संदेश सुक्ति कतए गेलैए प्रार्थना भगवानसँ अछि नेताकेँ सद् बुद्धि दी। ऐहेन गद्दीसँ ओकरा की स्वर्ग केर ओ गद्दी दी। बेरोजगारीक समस्या शंम्भु नाथ झा ‘वत्स’ अही कहू हम जीवैत छी? पढ़ि–लिखि घर बैसल छी घरनीक बात सुनैत छी। अही कहू हम जीवैत छी? रोजी रोटीक बात नहि पूछब महगीक बोझ ढ़ुबैत छी। दिन–राति फेर काल्हि की खायब उहैए टा गीत गवैत छी। अही कहू हम जीवैत छी? बेर–बेर बहरायल वेकेंसी आवेदन तए करैत छी। अंतर्वीक्षा दए फुटपाथपर ऐखन धरि घुरैत छी। अही कहू हम जीवैत छी? पहिरन ओढ़न भए गेलैए गुदरी फाटल धोती सीवैत छी। घरनीक ताना सुनि सिनि बुझू विषक घूंट पीवैत छी। अही कहू हम जीवैत छी? हमर दुःखकेँ सुनताह हम ककरो कहवए की। हम “शम्भु नाथ” दुःखक गाथा गीत गावि सुनवैत छी। कतोक सुनायब दुःखक खिस्सा कोनो विधि दिन वितवए छी नहि कोनो काज अछि बैसल–बैसल किछु सँ किछु लिखैत छी। अही कहू हम जीवैत छी। परिचय पण्डित शम्भुनाथ झा “वत्स” योग्यता साहित्याचार्य, वेदविद् ज्योतिर्विद् अध्यापन कार्य–१९८४ सँ १९९० धरि संस्कृत महाविद्यालय, विराट् सरोवर फारबिसगंज अररिया वर्तमानमे कार्य कर्मकाण्ड सम्पादन निवास स्थल ग्राम–बहोरा, थाना–सरसी, जिला–पूर्णियाँ (बिहार) १.डॉ. योगानन्‍द झाघर १.डॉ. योगानन्‍द झा परिचय–पत्रक नाम                        :    योगानन्‍द झा पिता का नाम                :    स्‍व. रामलखन झा माताक नाम                 :    श्रीमती भाग्यवती देवी पारिवारिक सदस्‍य             :    श्रीमती केवला झा–पत्‍नी :    श्रीमिलिन्‍द कुमार झा–पुत्र :    श्रीधीरज कुमार झा–पुत्र :    सुश्री कीर्त्ति झा–पुत्री जन्‍म तिथि                  :    11 जनवरी 1955 स्‍थायी पता                  :    भगवती स्‍थान मार्ग, कबिलपुर, लहेरियासराय दरभंगा-846001 (बिहार) दूरभाष सं.                   :    06272-244161 चलवार्त्ता सं.                  :    09334493330 शिक्षा                       :    एम.ए. (मैथिली एवं हिन्‍दी), पी.एच.डी. मातृभाषा                    :    मैथिली अन्‍य भाषा                  :    हिन्‍दी, संस्‍कृत, अँग्रेजी, बंगला एम.ए. मतबन्‍ध              :    काष्‍ठ व्‍यावसायिक मैथिली शब्‍दावलीक               व्याख्‍यात्‍मक अध्‍ययन शोध प्रबन्‍घक विषय           :    मैथिलीक प्रमुख पारम्‍परिक जातीय व्यवसाय (पी.एच.डी. हेतु)                             सम्‍बन्‍धी शब्‍दावलीक व्याख्यात्मक अध्ययन उत्तीर्ण                       :    यू.जी.सी. राष्‍ट्रीय पात्रता परीक्षा, 1990 कम्‍प्‍यूटर                                  अप्‍लीकेशन प्रमाण पत्र परीक्षाDOEAC 2006 वृत्ति                        :    अंकेक्षक, बिहार राज्‍य विद्युत् बोर्ड पटना सदस्‍य                      :    भारती कला परिषद्, कबिलपुर :    तुलसी मानस गोष्‍ठी, कबिलपुर मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर कर्णामृत, कर्णगोष्‍ठी, कोलकाता चेतना समिति, पटना अखिल भारतीय साहित्‍य परिषद्, नई दिल्‍ली           मिथिला परिषद् भागलपुर मैथिली लेखक संद्य, पटना मैथिली भाषा परामर्शदातृ समिति, साहित्‍य            अकादेमी, नई दिल्‍ली (1998-2002) स्‍थापित                     :    लक्ष्‍मी अभिनय (नाट्य संस्‍था), कबिलपुर                   कीर्त्तिलता साहित्‍य साहित्‍य समिति (प्रकाशन        संस्‍था) प्रेरक                       :    पं. श्रीचन्‍द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ (मैथिली कवि) डा. रामदेव झा (मैथिली कथाकार एवं मनीषी)   पं. सुरेन्‍द्र झा ‘सुमन’ (मैथिली कवि-पत्रकार) डा. सुभद्र झा (विश्‍वविख्‍यात भाषा शास्‍त्री) प्रतिबद्धता                   :    माता, मातृभूमि, मातृभाषा रंगमंचीय सक्रियता            :    भारती कला परिषद्, कबिलपुर लक्ष्‍मी अभिनयम्, कबिलफर संकल्‍प लोक, लहेरियासराय रुचि                        :    लोक संस्‍कृति एवं साहित्‍य, अध्‍ययन, शोध-कार्य कविता-कथा-निबन्‍ध-समालोचनादि प्रथम रचना                  :    वर्षा (कविता) 1969 प्रथम प्रकाशित कृति          :    मिथिलाक डोम जाति ओ ओकर जातीय शब्‍दावली, मिथिला सांस्‍कृतिक परिषद् स्‍मारिका, बोकारो, 1982 प्रकाशित कृति                :    लोकजीवन ओ लोक साहित्‍य (निबन्‍ध) 1986,   परिणीता (कथाकव्‍यांश) 1987, फकीर मोहन     सेनापति (अनुवाद) 2000, आलेख सञ्चयन      (निबन्‍ध) 2002, बिहारक लोककथा (अनुवाद)   2003, स्‍नेहलता (विनिबन्ध) 2006, मैथिली पत्रकारिताकेँ सौ वर्ष (निबन्‍ध) 2006,   गहबरगीत (निबन्‍ध) 2007,लोक, साहित्‍य ओ शब्‍द-सम्‍पदा (निबन्‍ध) 2007, मैथिलीक पारम्‍परिक जातीय व्‍यवसायक शब्‍दावली (शोघ   ग्रन्‍थ) 2009 सम्‍पादित कृति               :    संकल्‍प स्‍मारिका 3,4,5 (वर्ष 1985,87 एवं 89)        युगदीप तुलसी 2004, अनमोल भजनावली2005, मैथिली हनुमान चालीसा, 2007 पुरस्‍कार                     :    पी.सी.राय चौधरी कृत ‘फाँक टेल्‍स ऑफ              बिहार’क मैथिली अनुवाद ‘बिहारक लोककथा’        पर साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली द्वारा 2005 मे                  पुरस्‍कृत सम्‍मान                     :    मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर 1970,             बिहारी जनसेवा समिति, मुम्‍बइ 1986, श्रीसुमन अभिनन्‍दन समिति, वल्‍लीपुर 1998,          विद्यापति समिति, दुमका 2000, राष्‍ट्रीय शिखर साहित्‍य सम्‍मान, साहित्‍यकार           संसद, समस्‍तीपुर 2003,2005,2007, सरस्‍वती समभ्‍यर्चना,भारती परिषद् प्रयाग2004,        चेतना समिति, पटना 2006, अखिल भारतीय साहित्‍य परिषद्, दरभंगा शाखा        2006, बिहार स्‍टेट इलेक्ट्रिक सप्‍लाइ वर्कर्स यूनियन,          मिथिला क्षेत्र 2008, सिद्धाश्रम, कलीपीठ, सिमरिया घाट 2008,             मिथिला विकास मंच, भागलपुर 2008, मिथिला सेवा संस्‍थान, खगड़िया 2009, प्रमुख साहित्यिक गतिविधि     :    राष्‍ट्रीय-अन्‍त:राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठीमे सहभागिता,            आकाशवाणी, दरभंगा से वार्त्ता प्रसारित, साहित्‍य         अकादेमी अनुवाद कार्यशालामे सहभागी 1990,           मैथिली कथा आन्‍दोलन, ‘सगर राति दीप जरय’मे सहभागी, कवि गोष्‍ठी एवं काव्‍य संध्‍यामे सहभागी, साहित्‍य अकादेमी नई दिल्‍ली द्वारा प्रस्‍तावित यात्रा अनुदानकेँ माध्‍यमसँ उड़िया   साहित्‍य एवं संस्‍कृतिक परिचय; राष्‍ट्रीय- अन्‍त:राष्‍ट्रीय पत्रिकामे शोध एवं अनुवाद कार्य    प्रकाशित; अभिनन्‍दन ग्रन्‍थमे लेखकीय सहयोग    आदि । अग्रिम प्रकाशन योजना        :    सुमनजीक स्‍वदेश अमरजी: सम्‍पादक मंगल-प्रभात मैथिली गणकाव्य: श्री सीता–राम विवाह पदावली मैथिली लोकसंस्‍कारपरक गीत वर्षा (कविता संग्रह) संतसेवीक बोधकथा (अनुवाद) सुख-दु:ख (अनुवाद) प्रतिशोध (नाटक) स्‍नेह वाटिका (सम्‍पादन) सीतावतरण (खण्‍ड काव्‍य) तीरन्‍दाज (अनुवाद) पगधूलि चरित (प्रवचन काव्‍य) डा. रामदेव झा ओ हुनक संजीवनी समालोचना योगानन्‍द झा घर भीतेटा चहकल नहि सगरो चारो धरि उजड़ल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि कहिया धरि आशापर जीबइ कहिया धरि सपनामे भाग्‍य-भरोसे निर्यात कते दिन लड़ब-कटब अपनामे एहन दशा सभ घरवासी केर जनु भाग्ये फूटल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि जकरा जेम्‍हरे अवसर भेटल कयलक लूट-खसोट अपन-अपन कऽ सभ अछि चिन्तित सभहक मनमे खोट चालनि जे बनि गेल स्‍वयं से सुपहुकेँ दूसल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि स्‍वार्थक मदमे सभ अछि मातल अनकर की परवाहि कहियर धरि ई खतम भऽ सकत दलित-पीडि़तक आहि कुकुर-कटाउझि मचल दहोदिश ओत्तहि सभ जूटल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि मन्दिर-मस्जिद रण-प्राङन अछि धर्मक ककरा ध्‍यान सभहि सुखी सभ रोगमुक्‍त नहि भारत कोना महान सन्‍तति सभ एहि घरमे एखनो अलस पड़ल सूतल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि केओ नृप होय हमे का हानी कखनो ई संवाद हमर जाति केर लोक थिका ई कखनो उठय विवाद गमलक नहि मघुऋतु शिशिरोमे अन्‍तर, कतहु कुशल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि कालक नहि लीला ई सभ थिक ब्रहमक नहि थिक माया ई करनी मानव-दानव केर भोग-वृत्ति केर छाया संघर्षक आह्वान करी तँ कर्म कतहु रूसल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि ताकि रहल छी माटि राष्‍ट्र केर माटिक सोन्‍ह सुगन्‍ध संस्‍कृति आ संस्‍कार अपन पुनि परम्‍परित अनुबन्‍ध स्‍वर्णमुकुट धरणी केर कहिया ककरोसँ झूसल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि पर-पड़ोसी फूट देखि, घर लुटबा लय तैयार कखन करयकेँ, नहि जानी जयचन्‍द सरिस व्‍यवहार विश्‍व भरिक चोरा मुँह बओने परिखा लग जूटल अछि यैह हमर घर केर थिक नकसा हृदय हमर टूटल अछि बालानां कृते- १.किछु लघु कहानी   आशीष चौधरी  २. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु लघुकथा ३. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) आशीष चरैया, अररिया किछु लघु कहानी क.1.एकटा कार सँ एकटा चिड़ियाँ टकराए गेल आर बेहोश भऽ गेल। 2.कार मालिक बढ़ियाँ (बड्ड नीक) आदमी छलै। 3.कार मालिक चिड़ियाँ केँ उठाए केर अपन घर आन लक आर चिड़ियाँ केँ पिंजड़ा मे डाएल (बन्द क) देलक। 4.आर सोचलक जखन चिड़ियाँ ठीक भऽ जाएत तखन उड़ाए देब। 5.जखन चिड़ियाँ केँ होश आएल तँ चिड़ियाँ सोचलक लागेये जँ कार मालिक टकराएबे मे (दुर्घटना मे) मरि गेल ये तँ हमरा उम्र केद केँ सजा भऽ गेल ये। ख.1.जहाज केर अपन उड़ब पर बड्ड (बहुत) घमंड छलै। 2.लेकिन एक दिन जहाज केँ पास सँ एकटा रॉकेट बड्ड तेजि सँ निकलि गेल। 3.जहाज केँ बड्ड हेरानि लागल (भेल) जे हमरो सँ तेज कोई उड़ि सकैत ये। 4.जहाज केँ नहि रहल गेल आर रॉकेट केँ पुछलक भाइ अहाँ एतना तेज कोना उड़ैत छिये? 5.रॉकेट कहलक भाइ जखन अहाँ केँ पाछु मे आगि लागल रहत ने तखन अहों एतना तेज उड़ै लागब। २.जगदीश प्रसाद मंडल लघुकथा 21     बुझैक ढ़ंग एकटा यात्री वृन्दावन विदा भेल। किछु दूर गेला पर रास्ताक बगल मे मीलक पत्थर पर नजरि पड़लै। ओहि मीलक पत्थर मे वृन्दावनक दूरी आ दिशा लिखल छलै। ओ यात्री ओतइ अटकि बैसि रहल आ बजै लगल जे पाथरक अंकन त गल्ती नहि भऽ सकैत अछि किऐक त विश्वासी (बिसवासी) लोकक लिखल छियैक। वृन्दावन त आबिये गेल छी, आगू बढ़ैक की प्रयोजन?’ थोड़े कालक बाद एकटा बुझनिहार आदमी ओहि रस्ते कतौ जाइत रहथि ते सुनलखिन। मन-मन खूब हँसलथि। कने काल ठाढ़ भऽ हँसैत ओहि यात्री कऽ कहलखिन- ‘पाथर पर सिरिफ (सिर्फ) संकेतमात्र  अछि। एहिठाम स वृन्दावन बहुत दूर अछि। जँ अहाँ ओतइ जाय चाहै छी त तुरनते सब सामान समेटि विदा भ जाउ नहि त नइ पहुँचव।’ भोला-भाला यात्री अपन भूल मानि विदा भेल। ऐहन बहुतो लोक छथि  जे शास्त्रो पढ़ैत छथि, शास्त्रीय बातो सुनै छथि, मुदा धरम धारण करैक रास्ता पकड़बे ने करैत छथि तखन ओ धर्म कोना बुझथिन। जे धर्म की थिकैक?’ 22    श्रमिकक इज्जत अपन संगी-साथीक संग नेपोलियन टहलै ले जाइत रहथि। जेरगर रहने सैाँसे रास्ता छेकायल छलैक। दोसर दिशि स एकटा घसबाहिनी माथ पर घासक बोझ नेने अबैत छलि। ओहि घसबाहिनी पर सबसँ पहिल नजरि नेपोलियनक पड़लैक। ओ पाछू घुरि क देखल। सैाँसे रास्ता घेरायल छलैक। अपन पैछला संगीक हाथ पकड़ि खिंचैत कहलखिन- ‘श्रमिकक सम्मान करु। एक भाग रास्ता खाली कऽ दिऔक। यैह देशक अमूल्य संपत्ति थिक। ऐकरे बले कोनो देशक उन्नति होइत छैक।’ घसबाहिनी टपि गेलि। थोड़े आगू बढ़ला पर पुनः नेपोलियन संगीसभ सँ कहलखिन-‘सद्प्रवृत्ति कऽ बढ़ेबाक चाही। ओकरा जत्ते महत्व देबैक ओत्ते जन-उत्साह जगतैक। जहि स देशक कल्याण हेतैक।’ 23     वंश (कुल) एक दिन महान् विचारक सिसरो कऽ एकटा धनिक सरदार स कोनो बाते कहा-सुनी हुअए लगलनि। ने ओ धनिक पाछू हटै ले तैयार आ ने सिसरो। दुनूक बीच पकड़ा-पकड़ीक नौबत अबै लगलै। खिसिया क ओ धनिक सिसरो कऽ कहलक- ‘तूँ नीच कुलक छेँ, तेँ तोरा-हमरा कथीक बराबरी?’ एहि बात स सिसरो बिचलित नहि भऽ साहस स उत्तर देलखिन- ‘हमरा कुलक कुलीनता हमरा स शुरु हैत जबकि तोरा कुलक कुलीनता तोरा स अंत हेतौ।’ सभ्यता आ कुलीनता जन्म स नहि बल्कि चरित्र आ कर्तव्य स पैदा लैत अछि। 24     तियाग (त्याग) सत्संग, भागवत आ प्रवचन मे बेरि-बेरि तियागक महिमाक चर्चा होइत। त्याग क ईश्वर प्राप्तिक रास्ता बताओल जाइत। बेरि-बरि जरायुध एहि चरचा के सुनैत। तेँ मन मे बिसवास भऽ गेलनि जे सत्ते तियाग स ईश्वर प्राप्ति होइत। ओ (जरायुध) अपन सब सम्पत्ति दान कऽ देलखिन। मुदा दान केलो उपरान्त हुनका ने मन मे शान्ति एलनि आ ने ईश्वर भेटिलनि। निराश भ जरायुध महाज्ञानी शुकदेव लग पहुँच पूछल-‘जनक त संग्रही छलाह मुदा तइयो हुनका ब्रह्मज्ञान प्राप्ति भऽ गेल छलनि आ हम सब कुछ तियागियो के ने ब्रह्मज्ञान पाबि सकलहुँ आ ने शान्ति भेटल। एकर की कारण छैक?’ ध्यान स जरायुधक बात सुनि सुकदेव उत्तर देलखिन- ‘आवश्यक वस्तु कऽ परमार्थ मे लगा देव त नैतिक आ सामाजिक कर्तव्य बुझल जाइत। आध्यात्मिक स्तरक त्याग मे सब वस्तुक ममत्व छोड़ि ओकरा ईश्वरक घरोहर बुझै पड़त। शरीर आ मन सेहो सम्पदा छी। ओकरा ईश्वरक अमानत मानि हुनके इच्छानुसार कयला पर बुझबै जे सही त्याग भेलि आ मोक्षक रास्ता भेटत।’ 25     सद्विचार एकटा न्यायप्रिय राजा साधुक भेस (वेष) मे अपन प्रजाक कुशल-क्षेम बुझैक लेल निकललथि। जहिया कहियो ओ (राजा) साधुक भेस मे निकलथि तहिया सिर्फ एकटा मंत्री क चेलाक रुप मे संग क लथि। ने अंगरक्षक रहनि आ ने अमिला-फमिला। आ ने ककरो जानकारी दथिन। बहुतो गोटे स सम्पर्क करैत राजा एकटा बगीचा मे पहुँचलाह। ओहि बगीचा मे एकटा वृद्ध किसान नवका (बच्चा) गाछ रोपैत रहैत। गाछ देखि राजा किसान कऽ पूछलखिन- ‘ई त अखरोटक गाछ बुझि पड़ैत अछि।’ मुस्कुराइत किसानकहलकनि- ‘हँ भैया! अहाँक अनुमान बिलकुल ठीक अछि।’ ‘बीस-पच्चीस बर्खक गाछ भेला पर अखरोट फड़ैत छैक, ताधरि अहाँ जीविते रहब?’ ‘एहि बगीचा क हमर बाप-दादा लगौने छथि। खून-पसीना एक क कऽ एकरा पटौलनि, देखभाल केलनि। जेकर फड़ हम सब खाइ छी। तेँ आब हमरो कर्तव्य बनैत अछि जे ओते हमहू रोपि दियैक। अपने टा ले गाछ लगौनाइ त स्वार्थक बात भऽ जाइत छैक। हम ई नहि सोचै छी जे आइ एहि गाछक उपयोगिता की छैक? भविष्य मे दोसर क फल दइ, वस यैह इच्छा अछि।’ किसानक विचार सुनि राजा मंत्री कऽ कहलखिन- ‘जँ एहिना सब बुझै लगै जे हमरा लगबै स मतलब अछि त समाजो आ परिवारो मे सद्वियार पसरि जायत। जाधरि समाज मे सद्वृत्तिक प्रसार (पसार) नइ हैत ताधरि नीक समाज बनब, मात्र कल्पना रहत।’ 26     साहस सोंवियत संघक नेता लेनिन पर, एकटा सिरफिरा पेस्तौल चला देलकनि गोली त निकलि गेलनि मुदा छर्रा (छर्रा) गरदनि मे फँसले रहि गेलनि। तहि बीच देश मे एकटा पुल टुटि गेलै। पुल मुख्य मार्ग मे छलै। तेँ जत्ते जल्दी भऽ सकैत ओते जल्दी पुल बनायब छलैक। आपात् स्थिति घोषित कऽ ओहि पुलक मरम्मत युद्धस्तर पर हुअए लगलैक। देशप्रेमी जनता ओहि काज मे लगि गेल। लेनिन सेहो ओहि काज मे जुटल। श्रमिकेक जेँका लेनिनो काज करैत रहथि। गरदनि मे गोली रहनहुँ ओ बीस-बीस घंटा काज करति रहथि। काज करैत देखि एकटा श्रमिक पूछलकनि तखन ओ कहलखिन- ‘अगर हम अगुआ भऽ काज मे पाछू रहब तखन जन उत्साह कोना बढ़तै?जकर जरुरत देश मे अछि।’ बरदास्त अब्राहम लिंकन अमेरिकाक राष्टपति रहथि। हुनक पत्नी चिड़चिड़ा आ कठोर स्वभावक छलथिन। जहि स लिंकनक परिवारिक जीवन दुःखमय छलनि। कैक दिन ऐहन होइत छलैक जे जखन परिवारक सब सुति रहैत छलै तखन ओ (लिंकन) चुपचाप पैछला दरवाजा स आबि सुइत रहैत छलाह। आ सुरुज उगै स पहिनहि तैयार भ निकलि आॅफिस चलि जाइत छलाह। दिन भरि अपन कार्य मे मस्त भ¬ऽ बीता लैत छलाह। संगी-साथीक संग हँसी-मजाक क मन बहला लैत छलाह। एक दिन परिवारक एकटा नोकर केँ हुनक पत्नी गारिओ पढ़लखिन आ फटकारबो केलखिन। ओहि नोकर कऽ बड़ दुख भेलैक। ओ कोठी स निकलि सोझे लिंकनक आॅफिस जा सब बात कहलकनि। नोकरक सब बात सुनि लिंकन कहलखिन- ‘अए भले आदमी! पनरह बर्ख स हम एहि परिस्थिति स मुकाबला करैत शान्ति स रहैत एलहुँ। आ अहाँ एक्के दिनक फटकार मे एत्ते दुखी भऽ गलहुँ। बरदास्त क लिअ।’ अचताइत-पचताइत वेचारा नोकर लिंकनक बात मानि लेलक। 27     भूल प्रख्यात दार्शनिक बरटेªण्ड रसेल अपन जीवनी मे लिखने छथि, जे हमर पहिल स्त्री सचमुच विचारबान छलीह। जखन ओ मन पड़ैत छथि तखन हृदय दहकि जाइत अछि। दुनू गोटेक बीच अगाध प्रेम छल। एक दिन कोनो बाते दुनू गोटेक बीच अनबन भऽ गेल। खिसिया कऽ हम बिनु खेनहि आॅफिस विदा भऽ गेलहु। रास्ता मे एकाएक मन मे उपकल जे अपन क्रोधक बात पत्नी कऽ कहि दिअनि। रस्ते स घुरि गेलहुँ। घुरि कऽ घर ऐला पर पत्नी घुरैक कारण पूछलनि। हमर क्रोध आरो उग्र भऽ गेल। हम कहलिएनि- ‘आब अहाॅ लेल हमरा हृदय मे मिसिओ भरि जगह नहि अछि।’ पतिक बात सुनि पत्नी स्तब्ध भऽ गेलि, मुदा किछु बाजलि नहि। बेचारीक हृदय मे ई बात जरुर पकड़ि लेलकनि जे हमरा ओ (पति) कपटी बुझैत छथि। आइ धरि हम भ्रम मे छलहुॅ। दुनूक बीच खाई बढ़़ैत गेलइ। होइत-होइत पति पत्नी क तलाक द देलक। वेचारी रसेलक घर स सदा-सदाक लेल चलि गेलि 28     धैर्य इंग्लैंडक प्रसिद्ध विद्वान टामस कूपर अंग्रेजीक शब्दकोष तैयार करति रहथि। काज मे ओ (कूपर) तेना ने लीन भऽ गेल रहथि जे घरक कोनो सुधिये-बुधिये ने रहनि। पत्नी कँे घरक सरंजाम जुटबै मे परेशानी होइन, तेँ ओ पति पर खूब बिगड़थि। मुदा तकर कोनो असरि कूपर कऽ नहि होइन। एक दिन कूपर कतौ गेल रहथि, तहि बीच पत्नी खिसिया कऽ शब्दकोषक सब काॅपि जरा देलकनि। जखन ओ घुरि क अयलाह ते देखलखिन जे बरसोक मेहनत जरि गेल। मुदा धैर्य एत्ते प्रबल रहनि जे एको मिसिया तामस नहि उठलनि। ने एकोरत्त्ी पत्नी पर बिगड़लखिन आ ने अफसोस केलनि। मुस्कुराइत सिर्फ एतबे कहलखिन- ‘आठ बर्खक काज अहाँ आरो बढ़ा देलहुँ।’ 29     मनुष्यक मूल्य एक दिन सिकन्दर आ अरस्तू कतौ जाइत रहथि। रास्ता मे एकटा नदी छल। जहि नदी मे नाओ पर पार हुअए पड़ैत छलैक। पहिने अरस्तू पार हुअए चहैत छलाह मुदा सिकन्दर हुनका रोकि अपने पार भेलाह। जखन सिकन्दर दोसर पार गेलाह तखन अरस्तू कऽ पार हुअए कहलखिन। पार भेला पर अरस्तू सिकन्दर के पूछलखिन-‘पहिने हमरा पार हुअए स किऐक मना केलहुँ?’ हँसैत सिकन्दर उत्तर देलखिन- ‘अगर हम नदी मे डूबि जइतहुँ तइओ अहाँ हमरा सन-सन दशो सिकन्दर पैदा क सकै छी, मुदा जँ अहाँ डूबि जइतहुँ त हमरा सन-सन दशो टा सिकन्दर बुते एकटा अरस्तू नहि बनाओल भऽ सकैत अछि।’ सिकन्दरक बिचार सुनि अरस्तू अपन जिनगीक मूल्य बुझलनि। 30     मदति नइ चाही। ग्रीस (मिश्र) मे एकटा किलेन्थिस नामक लड़का एथेंसक तत्ववेत्ता जीनोक पाठशाला मे पढ़ैत छल। किलेन्थिस बड़ गरीब छल। ने खाइक कोनो ठेकान आ ने देह झाँपैक लेल वस्त्रक। मुदा पाठशाला मे सही समय पर फीस दऽ दैत। पढ़ै मे चन्सगर रहने सुभ्यस्त परिवार सभक विद्यार्थी ओकरा स ईष्र्या करैत। किलेन्थिस कऽ दबबैक लेल एकटा षड्यंत्र ओ सब रचलक। षड्यंत्र यैह जे ओ (किलेन्थिस) पाठशाला मे जे फीस दैत अछि ओ चोरा क अनैत अछि। चोरीक मुकदमा किलेन्थिस पर भेलै। पुलिस पकड़ि कऽ जहल लऽ गेलै। जखन ओकरा न्यायालय मे हाजिर कयल गेलै तखन ओ जज केँ कहलक- ‘हम निरदोस (निर्दोष) छी। हमरा फँसाओल गेल अछि। तेँ हम अपन वयानक लेल दू टा गवाही न्यायालय मे देब।’ जजक आदेश स दुनू गवाही बजाओल गेल। पहिल गवाही एकटा माली छल आ दोसर वृद्धा औरत। माली स पूछल गेल। माली कहलकै- ‘सब दिन ई लड़का हमरा बगीचा मे आबि इनार स पाइन भरि-भरि गाछ पटा दैत अछि। जकरा बदला मे हम मजूरी दैत छियैक।        तखन वृद्धा स पूछल गेल। ओ वृद्धा कहलकै- ‘हम वृद्धा छी। हमरा परिवार मे क्यो काज करैवला नहि अछि। सब दिन ई बच्चा आबि गहूम पीसि दैत अछि, जकरा बदला मे मजूरी दैत छियैक।’ गवाहीक बयान सुनि जज मुकदमा समाप्त करैत सरकारी सहायता स पढ़ैक लेल सेहो आदेश देलक। परन्तु किलेन्थिस सरकारी सहायता लइ स इनकार करैत कहलक- ‘हम स्वयं मेहनत कऽ पढ़ब तेँ हमरा दान नहि चाही। हमरा माता-पिता कहने छथि जे मनुष्य कऽ स्वावलंबी बनि जीबाक चाही। ३.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा पैंतीस नताशा छत्तीस नताशा सैंतीस बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य 

एखन  ठाम  जकर,तकर  तनिकर  अछि 

अग्राह्य  अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं। 

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English byDr.Anamika 8.2.1.Yogendra Yadava- Maithili 2.Sindhu Poudyal-Mithila :- mother land of Navya- Nyaya Language. DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by  Translated by ……… Translated by             Dr. Anamika Dept. of English Satyawati college, Ashok Unquenched  thirst Dr. shefalika verma I asked for a drop of water My thirst  loomed larger than the ocean A maid in penance I was Nothing could lure me , for sure. Clouds floated by without a drop of rain In my yard Yet my heart knew no cpmlaints My heals hot on desert sands Di not even crave For a shadow Away from shore Caught up in a whirlpool I leapt up like a wave With woes unsung And glories all undone My dreams were drenched in The rain of tears I held my pain in a drop Unshed The rays of light scattered With many ifs and buts How could you tell the fragrence From the flower ? I was crushed  in the arms of darkness Wherever  you are I  am here With you Nothing in or beyond life Can break us apart Even when you are not around My songs of sufferings Keep us bond……………. Translated by             Dr. Anamika Dept. of English Satyawati college, Ashok Vihar Delhi University 1. 1.Yogendra Yadava- Maithili 2.Sindhu Poudyal-Mithila:- mother land of Navya- Nyaya Language. 1.Yogendra Yadava Maithili[1] 1. Background information 1.1 Alternative names As its name implies, Maithili is, properly speaking, a language of Mithila, the prehistoric ancient kingdom, which was ruled by King Janak and was the birthplace of Janaki or Sita (Lord Ram's concubine). This region was also called Tairabhukti, the ancient name of Tirhut comprising both Darbhanga and Muzaffarpur districts of Bihar, India. Mithila is now a region located in north Bihar (India) and the south-eastern part Nepal Terai, where its speakers have been residing since the ancient times. It has also been alternatively called Mithilaa Bhaakhaa, Tirhutiyaa, Dehaati,Thethi, Avahata or Apabhramsa. 1.2 Affiliation There has been some controversy regarding the genetic affiliation of Maithili. According to Grierson (1981, 1903) and others, this language belongs to the Eastern subgroup of the Indo-Aryan group within the Indo-Iranian branch of the Indo-European language family besides Oriya, Bengali, and Assamese. Jeffers (1976; as cited in Yadav (1996:5)), however, places Maithili among “Bihari languages”, along with Bhojpuri and Magadhi. Maithili thus forms a subgroup with Bhojpuri and Magadhi and is linguistically closer to Assamese, Bangla, and Oriya than to its more contiguous languages, namely, Hindi and Nepali, which belong to the Central and Western subgroups of Indo-Aryan, respectively. 1.3 Geographic spread and number of speakers The Maithili language is spoken mainly in the northeastern part of Indian state of Bihar and eastern part of Nepal's Terai region. There are also Maithili speaking minorities in adjoining Indian states like West Bengal, Maharashtra and Madhya Pradesh and the central Nepal’s Terai. There have been reported 31,900,000 (2000 census) and 2,800,000 (2001 census) Maithili speakers in India and Nepal, respectively, totalling 34,700,000. Maithili ranks 31st among the world’s languages in terms of number of speakers (http://www.ethnologue.com/show_language.asp?code=mai). Besides, the Maithili language is also spoken by many others as a second language in India and Nepal. In Nepal, it is the language of approximately 12.3 percent of the total population and figures second in terms of the number of speakers- next only to Nepali, the only official language. 1.4 Linguogeographical information 1.4.1 Principal dialects Being a cross-border language and having contact with different languages, Maithili exhibits different dialectal variations in India and Nepal. According to S. Jha (1958:5-6), there exist seven regional dialects of Maithili in India. They are the standard, southern, eastern, Chikachiki, western, Jolhi, and the central colloquial dialects. Of them, standard Maithili is spoken in the north of Darbhanga district (Bihar state, India), which now forms the part of the Madhubani district. So far little attempt has been made to study the social dialects of the language. It may, however, be said that Maithili exhibits social variations in its pronunciation, vocabulary and grammar in terms of the speaker's caste, sex, education, interpersonal relationship, and other social factors. In Nepal a preliminary study reveals that there are three regional dialects: eastern (Morang and Sunsari districts), central (Saptari, Siraha, Dhanusha and eastern Mohattari districticts) and western (western Mahottari, Sarlahi and eastern Rauthat districts). There are approximately two social dialects of Maithili in Nepal: Brahmin and non-Brahmin although there are also observable some ethnic variations.  These variations are, however, just approximations and need to be verified with a sociolinguistic survey. 1.4.2 Sociolinguistic situation 1.4.2.1 Communicative and functional status of the language In both India and Nepal Maithili is predominantly used in all the contexts of role relationship of home domain within its speech community (Yadav 1990:225). It also functions as lingua franca in communicating with non-Maithili speakers such as Hindi, Urdu and Nepali speakers in the region. Recently it has been included in the Eighth Schedule of the Indian Constitution. In Nepal the Interim Constitution (2007) has recognized it as a national language like other mother tongues spoken in the country. Despite this Maithili has received no status of official language in both the countries though there has been strong thrust on making it a medium of provincial administration in Nepal’s forthcoming federal constitution. 1.4.2.2 Level of standardization Maithili has a long tradition of written literature. As a result, the language used by great Maithili writers has been accepted as standard. Besides, Maithili is rich in vocabulary and has standard dictionaries and grammar. It has, however, been realized that the colloquial Maithili be recognized as standard as it has been used by most of its speakers. It would be a political anachronism to accept the variety of Maithili used by a few elites as standard. There has also been an effort for reforming Maithili spellings which differ from modern spoken Maithili. 1.4.2.3. Using in education In India Maithili has been taught as subject from secondary to doctoral levels as subject.   In Nepal, however, it has been recently been introduced as subject from the primary to higher levels of education. Under the Education for All national programme of Nepal Maithili is soon going to be used as medium of instruction in primary education for reasons such as ease in learning and quality education. Both PEN (Poets, Essayists, Novelists) and Sahitya Akademi have recognized Maithili as the 16th largest language of India and has been included in the Eighth Schedule of the Indian constitution. 1.5 Writing type Previously, Maithili had its own script, called Mithilakshar or Tirhuta, which originated fromBrahmi (of the third century B.C. Asokan inscription) via the proto-Bengali script and its similar to the modern Bengali and Oriya writing systers. Besides the Mithilakshar script, the Kaithi script was also used by Kayasthas (belonging to a caste of writers and clerks), especially in keeping written records at government and private levels. These two scripts are now almost abandoned. For the sake of ease in learnability and printing (and also perhaps under the influence of the Hindi writing system), they have been gradually replaced by the Devanagari script used in writing Hindi, Nepali and some other languages of both Indo-Aryan and Tibeto-Burman stocks spoken in adjoining areas. 1.6 Brief periodization of the history of the language Like other Indo-Aryan languages, Maithili is believed to have evolved from Vedic and Classical Sanskrit through several intermediate stages of Magadhi Prakrit, Proto-Maithili andApabhramshas. It emerged as a distinct modern Indo-Aryan language between A.D.1000 and 1200. Maithili has a long rich tradition of written literature in both India and Nepal. The earliest written record can be traced back as early as Vernaratnaakara, the oldest prose text in Maithili written by Jyotdirisvara Kavisekharacharya in the 14th century. The most famous Maithili writer is Vidyapati Thakur, popularly known as Mahakavi Vidyapati. Apart from being a great Sanskrit writer, he composed melodious poems in Maithili, entitled Vidyapati Padavali, which mainly deal with the love between Radha and Krishna. It is this anthology of poems that has made him popular and immortal to the present day. Maithili flourished in its region and even outside till the 16th century. It was used in all socio-cultural activities by its speakers. It had the status of being used as mother tongue by the-then royal dynasties such as Karnatas, Oinibars, and khandwalas in Mithila, Mallas in Nepal and Sens in Morang (now a district of Nepal) (Jha 1999: iv). Maithili was also practised as a court language in the Kathmandu valley during Malla period. Several literary works (especially dramas and songs) and inscriptions in Maithili are still preserved at the National Archives in Kathmandu. It also served as a lingua franca in the south-east Bihar (India), north-east Nepal, and also Bengal, Orissa and Assam. In the present context there have been literary writings in all literary genres, especially poetry, plays, and fiction, from both Indian and Nepalese writers. Apart from literature, Maithili writers have also been contributing to other fields like culture, history, journalism, linguistics, etc. In addition to written texts, Maithili has an enormous stock of oral literature in the forms of folktales in both prose and verse, ballads, songs, etc. Of them the ballads of Ras Lila (expressing the love between Radha and Krishna) and Salhes (a prehistoric king) are well known specimens. 1.7 Linguistic phenomena likely conditioned by contacts with other languages Maithili speech community is more or less multilingual. Consequently, it has been influenced by the languages in contact, viz. Hindi/Urdu in India and Nepali/Hindi in Nepal. 2.0.0. Grammar / Structure 2.1.0. Phonology Not all the characters in Maithili script are distinctive and phonemic. For example, theDevanagari alphabet makes short/long vowel contrasts, but they are not distinctive at the phonological level of the Maithili languages; that is to say, Maithili has only short vowels and no long ones. Besides, each consonant in writing incorporates the inherent vowel [ə], which is pronounced with the consonant in isolation but dropped if it occurs with other vowels in the sequence of a word. Except for a few, all consonants are pronounced like their symbols. The consonants that are spoken differently are: <s, sh, s.> =[s]; <kr> =[kri];<jna>=[gya]; and <ksa>=[kcha]. Maithili writing also uses diacritical marks like the chandrabindu [ँ]or anuswar [ं] for nasalization of a vowel. 2.1.1. Inventory of phonemes There exist 26 consonants and eight oral vowels in Maithili: Table1: Consonants (Yadav 19984, 1996) Bilingual Dental Retroflex Palatal Velar Glottal Stops p pʰ b bʰ t tʰ d dʰ t̺ t̺ʰ d̺ d̺ʰ k kʰ g gʰ Affricates c cʰ j jʰ Nasals m n N Tap R Fricatives S h Lateral L Approxi-mants (w) (y) Table 2: Pure Vowels (Yadav 1984, 1996) Front Central Back High i u Mid e ə o Low ӕ a ɔ Maithili also has a few diphthongs. Both pure vowels and diphthongs can be nasalized and are phonemic. The germination of consonants is an important feature of the Maithili sound system. A consonant is geminated intervocally if the preceding vowel is stressed, e.g., sukkha 'draught', but *gi'rra (gi'ra) 'cause to fall' (Yadav 1996: 29-30). Stress is, however, not very significant in Maithili and has a marginal role in differentiating words. Consonant clusters in Maithili are more common in formal educated speech than in informal uneducated speech. 2.2.2. Morphophonology The morphophonemic alternations that are very productive in Maithili include schwa /ə/ deletion (e.g., sərək-e →[sərk-e] 'only the road') and a →ə (e.g., kam-ai →kəm-ai 'salary') (Yadav 1996: 51-59; also Jha 2001). 2.3       Lexical borrowings Most of the foreign words in Maithili have been borrowed from Sanskrit. Technical terms are mostly loanwords from English. From Sanskrit: ədətt 'extreme', ənərgəl 'improper', əbəstha 'age', ar 'and' From Persian: ədna 'not related', ədalət 'civil court', admi 'human being' From English: tisən 'station', pen 'pen' kapi 'copy; notebook', tebul 'table' 2.4.0. Parts of speech 2.4.1. Nominal Morphology The pronouns of Maithili distinguish person, honorificity (glossed in the article as "hh" for high honorifics, “h” for honorific, "mh" for middle honorifics, and "nh" for non-honorifics ), proximity and case: Nominative                 Dative             Genitive 1                                  ham                      hamraa                  hamar 2nh                              tun                        toraa           tohar 2mh                             ton                               toraa                tohar 2h                               ahaan                           əhaa-ken          ahaan-k 2hh indirect                 apne                             apne-ken          apne-k 3nh proximate             i                                   ekraa                ekar 3nh remote                  u                                  okraa               okar 3h/hh proximate          i                                   hinkaa              hinak 3h/hh remote               o                                  hunkaa             hunak With regard to most categories, pronouns are equally or less differentiated than verbal inflections. They are less specific with regard to the "honorific" vs "non-honorific" distinction among third person, which are registered as -aith and -athinh, respectively, on the verb. In either case, the pronoun is o. Moreover, if third person reference is proximate, all honorificity (h) distinctions are neutralized to i. Among second persons, pronouns are equally discriminatory as verb forms. However, the distinction between honorific əhaan and high-honorific apne is not encoded synthetically. Rather, apne combines with a periphrastic passive-like construction that contrasts with the active form agreeing with ahaan: apne pad̺h-al ge-l-aik. (2hhN read-PCL AUX-PT-3)'You (hh) were reading', vs. ahaan padh-ait cha-l- aunh. (2hN read-IP AUX-PT-3) 'You were reading.' Mid- and non-honorific second persons are differentiated by tun vs. ton, respectively, but this contrast is not always maintained. It is especially among lower-caste speakers (Bickel et al. 1999). This distinction between honorific degrees is not limited to pronouns. Proper nouns can be marked by an honorific (h) suffix (-ji) or a non-honorific (nh) suffix (-jaa, -baa, -maa), triggering corresponding verb inflection. Hari-ji bhajan gab-ait ch-aith (H.-h religious.song sing-IP AUX- 3hN) 'Hariʰ is singing a bhajan, honorific form', Hari-yaa bhajan gab-ait ai-ch (H.-nh religious.song sing-IP 3-AUX) 'Hariⁿʰ is singing a bhajan, non honorific form.' Without such making, a name has a neutral to mid-honorific value. Common nouns sometimes differentiate an honorific and non-honorific lexical form, such as bauaa 'boyʰ' vs. chauraa 'boyⁿʰ', or daiyaa 'girlʰ' vs. chauri 'girlⁿʰ'. Grammatical gender in Miathili nouns is rather very much restricted both as a morphological category and as a syntactic category. There exist declensions like -i  (chauraa 'boy'/ chauri 'girl'), -aain (guru/guruain 'teacher masculine/feminine'), etc., but they are confined to a limited number of nouns and do not apply across the board. Maithili pronominals do not encode gender distinctions at all. But in highly formal speech, Maithili verbs encode, as a syntactic category, the feminine gender associated with third person honorific nouns and pronouns in past and future tenses: o daur-l-ih/daur-t-ih. (3h run-PAST-3hN: FEM run-FUT-3hN: FEM) 'She ran/will run', o daur-l-aith/daur-t-ah. (3h run –PT-3hN run-FUT-3hN) 'He ran/will run'. It is to be noted, however, that unlike Hindi and Nepali, possessive modifiers do not agree with their nominal heads in gender: okar pati/patni 'his/her husband/wife'. However, if the modifier is an adjective it does agree with its human head noun in gender: okar pahilkaa betaa/ okar pahilki beti 'his/her first son/ his/her first daughter'. Both Maithili nouns and pronouns are formed plural by taking sab(h), which has been grammaticalized from a full form sab(h)’all’. Alternatively, they also take lokain as a plural marker in case they are honorific. 2.4.2 Verb Morphology The most striking feature of Maithili grammar is the extremely complex verbal system. Like other Indo-Aryan languages, Maithili has a polymorphomic inflectional verb paradigm. It consists of several elements normally to the right of the verb stem. Its structure may be expressed as follows: Verb →Stem (Asp) (Suff be) (Asp Suff) (Aux) Tense Agr1 (Agr2) (Agr3), as illustrated in: (1)   hari-ji         daur-ait rah-ait                        cha-l-aah. Hari-3h      run-IP be-IP               AUX-PT-3.h 'Hari had been running.' Maithili verbs encode three tenses: present, past, and future: (2)        a.         u          cithi     likh-ait             ai-ch he        letter    write-IP           pres.3.nh-AUX ‘He writes a letter.’ b.         u          cithi     likh-l-ak he        letter    write-PT-3.nh ‘He wrote a letter.’ c.         u          cithi     likh-at he        letter    write-FUT.pres.3.nh ‘He will  write a letter.’ These three tenses can combine with four aspects: simple, imperfect, progressive and perfect, thereby yielding twelve verb forms (For details see Yadava 1980a). Unlike most of the Indo-Aryan languages, however, Maithili encodes one of the most complex agreement system of Indo-Aryan languages. In this language, not only nominative and non-nominative subjects, but also objects, other core arguments, and even non-arguments are cross-referenced, allowing for a maximum of three participants encoded by the verb affixes. An example of an intransitive clause where one argument is marked on the verb is ham sut-l-aun (1N sleep-PT-1N) 'I slept'. In a transitive clause, two arguments may be marked on the verb: ham hun-kaa madat kar-l-i-ainh (1N 3h-ACC help do-PT 1N-3h.ACC) 'I helped him'. And a ditransitive verb may have three cross-referenced arguments: ham to-raa hun-ak kitaab de-l-i-au-nh (1N 2mh-ACC 3h-GEN book give-PT-1N-2mhACC-3hGEN) 'I gave his book to you'. The controllers of verb agreement in all the three types of verb agreement include not only the arguments of a predicate and the possessors but also non-arguments like nominals in postpositional phrases and possessors therein, as well as deictic referents in discourse: ton hun-kaa-lel kaaj kai-l-ah-unh (2mhN 3h-OBL-for work do-PT-2mhN-3hOBL) 'You worked for him (agreement with a non-argument)', ham toh-ar ghar-par ge-l ch-al-i-ah (1N 2mh-GEN house-at go-PCL AUX-PT-1N 2mhGEN) 'I had been to your house (agreement with a possessou)', and ham o-kraa maar-l-i-ah (1N 3nh-ACC beat-PT-1N-2mh) 'I bit him(who is related to you, etc., agreement with a deictic referent)'. However, it has been found that the system is partly reduced by lower caste speakers, who are least interested in maintaining this style, especially its emphasis on hierarchy (Bickel et al 1999; Yadava 2001). The categories reflected in the morphology are three persons with four honorific degrees and, in the case of third person only, masculine vs. feminine gender, proximate vs. remote spatial distance and in focus vs. out of focus reference. However, not all combinations of category choices are equally represented, and there are many cases of neutralization. A related issue in Maithili grammar is the optionality of pronouns. Not only the subject pronoun, but also the direct object and possessive within the direct object may be dropped. ham toraa maar-b-au (I-[1] you-[2nh] beat-FUT-1SUB+2nhDO) 'I will beat you' may have the following realizations: toraa maarbau, ham maarbau, or maarbau. Like other South Asian languages, Maithili nominals involve a rich case system. They encode three types of case markings: zero-marking, clitics and –(a)k +postposition. There are two cases in Maithili that are zero-marked, viz. nominative and accusative with nonhuman nouns: nominative u daur-l-ak (he.NOM run-PT-3nh) 'he ran', accusative u kitaab kin-l-ak. (heNOM book-ACC buy-PT-3nh) 'He bought a book'. The clitic –ken marks accusative/dative case. Ram chaura-ken maar-l-ak (Ram boy-ACC beat-PAST-3nh) 'Ram beat the boy', hari-ken bhukh laag-al (Hari-DAT hunger feel-PAST) 'Hari felt hungry'. The clitic –(a)k (on nouns and honorific pronouns) and (-(a)r with non-honorific pronouns) mark the genitive case: ham raam-ak ghar dekh-l-i-ainh (Ram-GEN house see-PT-1-3h) 'I saw Ram’s house', ham ahaan-k ghar dekh-l-aunh (I 2h-GEN house see-PT-1) 'I saw yourʰhouse', ham-ar ghar dur ai-ch (my-GEN house far 3-AUX) 'My house is far away'. The clitic -san marks instrumentals or sources: hari pensil-san likh-l-ak (Hari pencil-INS write-PT-3nh) 'Hari wrote with a pencil', hari-ji apan gaam-san ai-l-aah (Hari-h self village-SRC come-PT-3h) 'Hari came from his village'. The clitics -me and -par mark locatives: hari-ji kothari-me ch-aith (Hari-h room-LOC AUX-PRES.3h) 'Hari is in the room', hari-ji ghar-par ch-aith (Hari-h home-LOC AUX-PRES.3h) 'Hari is at home'. It is to be noted, however, that in contrast to many other Indo-Aryan languages including Hindi and Nepali, Maithili has no ergative case marking. An example of genitive case marker with a postposition is: ham kitaab-ak-lel/baaste ae-l ch-i (I book-GEN-P come-PCL AUX-PRES.1) 'I have come for the book'. Like Nepali, Hindi and several other south Asian languages, there is no one-to-one correspondence between cases and grammatical relations in Maithili (Bickel et al 2000). For example, the subject of a clause may take non-nominative case marking and appear in the following cases: dative(DAT), instrumental(INS), genitive(GEN), and locative(LOC), as well as logical subject in a passive constructions: hunkaa bhukh lag-l-ain(h) (3h-DAT hunger-feel-PT-3h)'He felt hungry'. hunkaa cithi likhai-ken cha-l-ain(h) (3h-DAT letter to write be-PT-3hNN) 'He had to write a letter', hunkaa-san i kitaab padh-al nahi bhe-l-ain(h) (3h-INS this book read-PCL not become PT-3hNN) 'He could'nt read this book', hunak paisaa haraa ge-l-ain(h) (3h-GEN money lose go-PT-3hNN) 'He lost his money', hunkaa-me saaphe dayaa nahi ch-ain(h) (3h-LOC at.all mercy not be PRES3hNN) 'He has no mercy at all', hunkaa-san i cithi likh-al ge-l-ain(h) (3h-by this letter write-PCL go-PT-3hNN) 'This letter was written by him'. There are derivational morphological processes in Maithili which apply to verbs and change their valence. These processes either increase or decrease their arguments. Causativization is a valence-increasing process. Like Hindi but unlike Nepali, a verb in Maithili employs two types of causative verbs, e.g., kataa-/katbaa- 'have cut by someone/cause someone to have cut by someone'. Furthermore, the first causative is derived from its transitive counterpart kaat- 'cut something', which is further derived from its intransitive form kat- 'cut' (as in 'the tree is cutting well'). Another valence-increasing process is transitivization, whereby an intransitive verb is changed into a transitive verb by adding the suffix –au (3)        a.         geetaa  daur-l-ih. Geeta   run-PT-3.FEM ‘Geeta ran.’ b.                  Hari     geetaa-ken       daur-au-l-ak Hari     Geeta-ACC     run-CAUS-PT-3.nh ‘Hari made Geeta run.’ Maithili valence-decreasing devices include passivization and noun incorporation. There are two types of passivization in Maithili: morphological and periphrastic. The morphological passive is formed by adding the suffix –aa to the verb whereas the periphrastic passive is formed by adding the past participle –al to the main verb which is followed by the verb jaa ‘go’(Yadav 1996:209): (4)        a.         ham     kitaab  kin-l-aunh. 1          book    buy-PT-1 ‘I bought a book.’ b.      ham-raa-sa             kitaab  kin-ae-l. 1-ACC-by             book    buy-PASS-PT ‘A book was bought by me.’ c.       ham-raa-sa             kitaab  kin-al ge-l. 1-ACC-by             book    buy-PCL go-PT ‘A book was bought by me.’ Like several South Asian languages, Maithili also involves noun incorporation as a valence-decreasing device. In this process a verb root combines with a noun root to form a single complex verb (or predicate), thereby decreasing the number of argument: (5)        a.         ham     aai        i           kitaab  bec-ab 1          today   this      book    sell-FUT.1 ‘I’ll sell this book today.’ d.      sitaa     peshaa-k rup me          kitaab bec-ait               aich Sita         as a profession                     book       sell-IMP PRES.3.nh-AUX ‘Sita does book selling as a profession.’ A verb in Maithili can be expanded in another way also, namely, in the form of a serial verb construction (often referred to as "compound verb") which involves a sequence of two verbs. The first of these verbs is in the form of conjunctive participle (CP) and may be referred to as a "host", while the second one is in the finite form and may be called a "light verb", e.g. (6)        hari-ji   kitaab paedh              le-l-aith Hari-h book     read.CP           take-PT-3h) 'Hari completed the reading of the book'. Apart from aspectual functions, serial verbs in Maithili also express other semantic functions, e.g., volitionality and control of the action by the agent as well as the speaker's attitude. In addition, there exist other types of complex predicates in Maithili. For example, a verb can combine with a noun or adjective to a complex verb: (7)        a.         raam    cor-ak              pichaa              kae-l-ak           (Noun+Verb) Ram     thief-GEN       pursueN           do.IP-PT-3nh 'Ram chased the thief.' b.                              raam          ghar     saaph   kae-l-ak. (Adjective+Verb) Ram     house   clean    do-PT-3nh 'Ram cleaned the house.' 2.4.3 Adjectives Adjectives in Maithili can be used both attributively and predicatively as shown in (a) and (b), respectively: (8)        a.         i           kitaab  nik       ai-ch. this      book    nice      PRES.3.nh-AUX ‘This book is nice.’ b.         ham     nik       kitaab  kin-l-aunh. 1          nice      book    buy-PT-1 ‘I bought a nice book.’ They do not inflect for number but sometimes take gender inflections. Unlike Hindi and Nepali, possessive modifiers do not agree with their nominal heads in gender: okar pati/patni'his/her husband/wife'. However, if the modifier is an adjective it does agree with its human head noun in gender: okar pahilkaa betaa/ okar pahilki beti 'his/her first son/ his/her first daughter'. Unlike English Maithili adjectives do not take comparative and superlative inflections: (9)        a.         i           gaach   namhar                        ai-ch this      tree      tall                   PRES.3.nh-AUX ‘This tree is tall.’ b.         i           gaach   ohi       gaach-san        namhar ai-ch this      tree      that      tree-COMP     tall       PRES.3.nh-AUX ‘This tree is taller than that one.’ this      tree      all-COMP        tall       PRES.3.nh-AUX ‘This tree is the tallest of all.’ However, there exist a few Maithili adjectives of Sanskrit origin which inflect with comparative –ar (e.g. brihat ‘great’>  brihat-ar ‘greater’ and superlative –tam (e.g. unc‘high’ > unc-tar>’higher’ >unc-tam ‘highest’. 2.5 Simple clause The normal order of constituents in Maithili is S(ubject) V(erb) O(bject), e.g., raam kitaab kinat (Ram book will.buy) 'Ram will buy a book(SVO)'. However, these constituents can be permuted in any order: kitaab raam kinat (OSV), kitaab kinat raam (OVS), kinat raam kitaab(VSO), kinat kitaab raam (VOS), and raam kinat kitaab (SVO). The order SOV is unmarked and stylistically neutral, whereas the various permuted orders are generally accompanied by phonological and semantic effects like topicalization, focusing, afterthought, definiteness, etc (See Yadava 1997). The freedom of word order also extends to indirect object and adverbials of various types. What is more interesting about Maithili word order is that even elements like adjectives within NPs and auxiliaries within verbal sequences can be permuted with other elements of the sentences: e.g. (10)      gitaa    hariyar            saari    pahir-ne          ai-ch Geeta   green               sari       wear-PERF     PRES.3-AUX 'Geeta is wearing a green sari' This sentence may have the following permutations: (11)      a.         gitaa hariyar pahirne aich saari b.         gitaa saari pahirne aich hariyar The change in word order is not only restricted to simple sentences and phrases in Maithili but also extends to complex sentences. Consider the unmarked order of the constituents in the complex sentence and how the elements of both main and subordinate clause can be juxtaposed with one another: raam hari-ken kitaab padh-baak-lel kah-l-ak (Ram Hari-ACC book read-INF tell-PT-3.nh) 'Ram told Hari to read the book' = hari-ken  raam padh-baak-lel kitaab kah-l-ak, etc. Taking the unmarked order into consideration, Maithili, like all languages of the South Asia sprachbund ('linguistic area'), is a head-final language, whereby we mean that the head of a phrase follows its complements. Thus, the head of a verb phrase (VP) is a verb (V) and it follows its complements (object NP); the head of a postpositional phrase (PP) is a postposition (P) and it follows its complement (object NP); and the head of a noun phrase (NP) is a noun (N) and it follows its complement (genitive marker -ak): raam [VP hari-ken maar-l-ak] (Ram3nhN Hari-ACC beat-PT-3.nh) 'Ram beat Hari', [PPnepaal me] (Nepal in) 'in Nepal', [NP raam-ak kitaab] (Ram-GEN book) 'Ram's book'. 2.6 Complex constructions In this section we will discuss two major types of complex constructions: coordination and subordination. 2.6.1    Coordination Maithili has these semantic types of the coordinations (the terms used by Payne (1985) and Liljegren (2008)): conjunction, disjunction and rejection. Conjunction The coordinator aa, alternatively aar, is often used to combine two noun phrases, adjective phrases and clauses, as shown in (12a) and (12b), respectively: (12)      a.         ham     ek-got kitaab  aa ( r) du-got   kalam   kin-l-aunh 1          one-class book and     two-class          pen      buy-PT-1 ‘I bought a book and two pens.’ b.         i           kitaab  rucikar             aa( r)    upyogi ai-ch. this      book    interesting       and      useful  PRES.3nh-be ‘This book is interesting and useful.’ c.         ham     ek-got              kathaa  padh-l-aunh aa(r) caah pi-l-aunh 1              one-class               story       read-PT-1     and  tea    drink-PT-1 ‘I read a story and took tea.’ Noun phrases are, however, also conjoined by juxtaposition, in a list-like manner: (13)      ham     kitaab  kalam   kin-l-aunh. 1          book    pen      buy-PT-1 ‘I bought a book and a pen.’ Two clauses can be combined by mudaa to give an adversative meaning to indicate semantic contrast: (14)      hari      aai        aa-ot    mudaa ham     ghar    par       nahi     rah-ab. Hari                 today               come-FUT3nh                        but                  I                       home               at                     not                   remain-FUT31 ‘Hari will come today but I will not be at home.’ Disjunction Disjunction in Maithili often uses ki or yaa between two alternative noun phrases or clauses: (15)      a.         raam    bhaat ki/yaa     roti       khae-t Ram     rice    or           bread   eat-FUT3nh ‘Ram will eat either rice or bread.’ b.         raam    padha-at          ki/yaa   TV       dekh-at. Ram     read=FUT3nh             or         TV       watch-3nh ‘Ram will either read or watch TV.’ Rejection Rejection is formed in Maithili by phrase- or clause-initial ne (ta)…ne: (16) a.   raam    ne        bhaat   khae-t              ne        roti Ram     neither             rice      eat-FUT3nh     nor       bread                                                   ‘Ram will neither eat rice nor bread.’ b.         raam    ne        padha-at          ne        TV       dekh-at. Ram     neither read=FUT3nh             nor       TV       watch-3nh ‘Ram will neither read nor watch TV.’ 2.6.2    Subordination Maithili has the following types of subordination: 1.      Clausal complementation, 2.      Relativization, 3.      Converbal constructions 4.      Adverbial clauses Clausal complementation One of the major strategies employed in Maithili subordination is complement clauses. It has been found that Maithili has two major forms of complement clauses: finite and non-finite. Both these forms, which can occur as subject or direct object, are selected by the intrinsic properties of the predicates which require them. (17)raam          ghar     par       ai-ch se                                    se         u          kah-l-ak. Ram          home   at         PRES.r.nh-AUX           that      he.3nh say-PT-3.nh ‘He said that Ram would come home.’ (18)u    kah-l-ak           je         hari      bimaar ai-ch. 3nh say-PT-3.nh   that      Hari     sick      3.nh-AUX ‘He said that Hari was sick.’ In these examples the predicate kahab is a verb. There can be non-verbal predicates such as an adjectival or nominal as shown in (19a) and (19b), respectively. (19)      a.         raam    ghar     par       ai-ch se                                    se         nishcit ai-ch. Ram     home   at         PRES.3.nh-AUX          that      certain  PRES.3nh-AUX ‘That Ram will come home is certain.’ b.         sitaa     ghar     nahi     pahuc-l-ih        se         tathya   ai-ch. Sita      home   not       reach-PT-3.Fem           that     fact      3.nh-AUX ‘It is a fact that Sita did not reach home.’ Non-finite clausal complements in Maithili can be one of the following types (Yadav1996): (i)         infinitival (20)      ham     kitaab   kin-a    caah-ait            ch-i. ham     book    buy-INF want-IMP       AUX-PRES.1 ‘I want to buy a book.’ (ii)        nominalized (21)                        hin-kaa          padh-ab                   /padh-naai        nik       lag-ait   ch-ainh 3.h-ACC  read-NOM   read-NOM      good    feel-IMP          AUX-PRES.3h.ACC The identical subject in (20) involves equi-NP deletion. Also note that the case of the subject hin-kaa in the nominalized clause of (21) is demoted from nominative to accusative. A finite complement clause functioning as subject may be extraposed. When extraposed, the complementizer se is replaced by je and expletive i ‘it’ is used as the subject of the matix clause: (22)      a.            i              nishcit      ai-ch        je             raam        ghar         par           ai-ch it              certain      PRES.3.nh               that          Ram         home       at     PRES.3.nh-AUX ‘It is certain that Ram is at home.’ b.         i               tathya       ai-ch                        je             sitaa         ghar         nahi         pahuc-l-ih it              fact          PRES.3.nh-AUX      that          Sita          home       not           reach-PT-3.FEM Non-finite complement clauses, however, take no complementizer nor do they involve extraposition. 2.      Relativization A relative clause in Maithili is formed by the use of a relativizer, which is the relative pronounje and its inflected forms. The following examples illustrate the restrictive and the non-restrictive relative clauses respectively: (23)      ham[ je       kitaab        mahag              ch-aek                          se/u 1      REL    book        expensive        be-PRES.3nh  COREL that nahi  le-b not  take-FUT.1 ‘I won’t buy the book which is expensive.’ ((24)    mukesh  [je       netaa        ch-aeth]                 aai     bhasan    de-t-aah Mukesh    REL   leader     be-PRES.3h          today speech  give-FUT.3h. ‘Mukesh, who is a leader, will deliver a speech today.’ In a restrictive relative clause, the relativizer je(in its various forms) can occur with or without an accompanying common noun:when the latter is present the relativizer serves as a determiner.The NP of the relative clause is coreferential with the head NP of the main clause. The head NP consists of the correlative pronoun se(in its various forms), either with or without an accompanying common noun. Both the relativized and the head NP may be either present or suppressed-depending upon the relative word order of the head noun and the relative clause.The following examples illustrate the Syntactic Strategy used in the formation of the restrictive relative clauses in Maithili: sentences are relative subordinate clauses : (25)      [ je     khet   hariyar       ai-ch]             se           o/u     ham-ar         ai-ch REL  field   green     be- PRES.3.nh COREL    that  1-GEN    be- PRES.3nh ‘The field that is green is mine.’ (26)      u    vidyaarthi   [je  o  raait   pada-l-ak]     (se)o        ekhan  sut-al     ai-ch that student       Rel    night  read-PT-3nh        COREL      now    asleep         PRES.3nh-AUX ‘ The student who read last night is now asleep.’ Basing our analysis on the relative position of the head   NP vis-a-vis the   relative clause, there are three types of restrictive relative clauses in Maithili; postnominal, prenominal and internal. Postnominal: In a postnominal relative clause the head NP (consisting of a determiner and a common noun or a personal pronoun) occurs outside the relative clause and the relative clause follows the head NP.  The typical word order is thus: determiner + head + relative clause. The examples which follow illustrate: (27) u     maaster  [ je   iskul    me  nahi  ch-al ]       se           hat-aa that  teacher  REL school in   not   be-PT.3nh COREL  move-CAUS de-l                      ge-l give- PCL   go- PT.3nh ‘The teacher who was not in the school was sacked.’ .     (28) mithiles-ak            bhaai      [jin-kar                 tang   rel     me  kaet mithilesh-GENIT   brother  REL(H)-GENIT  leg   train  in   cut ge-l-ainh ]     (se)         æ-l                    ch- aith Go-PT-3h)  COREL  come-PERF  AUX-PRES.3h ‘Mithilesh’s brother whose leg got cut in the train has come.’ Sentences in (27) and (28) are all postnominal relative clauses as the head   u   maastar(27), and mithiles-ak bhaai  (28)  occur outside the relative clauses and  the relative clauses follow the head  NPS. The relative clauses are marked by the relativizer   je   and its honorific and case – inflected forms. The common noun which might otherwise accompany the relativizer within the relativized  NP has been deleted in all sentences . Prenominal: In a prenominal relative clause the head NP occurs outside the relative clause and the relative clause precedes the head NP. The Typical word order thus is: relative clause + determiner+ head, as exemplified below: (29) [je        kaailh           raait      naac-əl  ]           se/         u              natuaa REL   yesterday  night dance-PT.3nh              COREL DEM       dancer akhan    sutal    ai-ch now        asleep  PRES.3nh-AUX ‘The dancer who danced last night is now asleep.’ (30) [ jak-raa                 ahaan       nahi  rakh-l-auh ] REL-ACC/DAT you (H)     not  keep – PT-2h tahi/         ohi              nokar     ke              ham   raaikh   le-l-aunh COREL   DEMONS   servant  ACC/DAT    1       keep  take-PT-1. ‘I have employed the servant whom you did not keep.’ Note that unlike postnominal relative clauses, pronominal relative clauses require that there head NP contain a correlative/demonstrative determiner. Internal: In an internal relative clause (traditionally known as relative- correlative) the head NP occurs inside the relative clause .The main clause too may have the head NP repeated in it, in which case the head NP is preceded by the correlative- demonstrative-determiner; usually, however, the head NP is deleted and only a correlative-demonstrative-third person pronoun is used. The following examples are illustrative: (31) [je    sherpaa      everest   par   pahine      cadh -  l ]             se/    u    tenzing       ch-əl REL sherpa   Everest  on    first    climb-PT-3nh              REL he Tenjing  be-PT.3nh ‘The sherpa who climbed  Mt. Everest first was Tenjing.’ (32) [je    natuaa      raait       naac-al ]                         ok-raa/ REL dancer    night    dance – PT.3nh                 3nh-ACC/DAT ohi           natuaa    ke               mahendr     paac rupaiyaa   de-l-thinh. DEMONS  dancer  ACC/DAT  mahendra    five rupees    give- PT-3h ‘Mahendra gave five rupees to the dancer who danced last night.’ Although prenominal and internal relative clauses are treated above as two separate types of restrictive relative clauses, it may be possible to treat them as subtypes of what have traditionally been called the correlative clauses. Converbal constructions Most of the South Asian languages (including Indo-Aryan, Tibeto-Burman, Dravidian and Austric languages) typically employ non-finite clauses instead of finite clauses to realize clause linkage (cf. Masica, 1976). One of such constructions is sequential converbal constructions (also known as 'conjunctive participle/participial clauses', 'absolutive' or'purvakaalik kriyaa 'prior tense verb'). The simultaneous or progressive converbal clause encode 'simultaneity', i.e. the activity overlapping with the activity encoded in the matrix clause. They are exemplified as follows: (33)      padh-aet         u           bhaat khae-l-ak. read-CONV  he          rice   eat-PT-3.nh ‘He ate rice while reading.’ The sequential converbal marker in Maithili is -ka/-ke, which follows the verb stem: (34)      snaan ka ka/ke o          khaa-it             ch-aith. (Jha, 1971:74) bath   having done he  eat-Hab.          Aux-Pr.3.hon. 'Having taken bath, he eats.' The sequential converbal basically refers to 'anteriority' ( to use Givon's term), i.e. the event occurring immediately prior to the event encoded in the following verb, which may be another sequential converb or a finite verb in the matrix clause. It is exemplified as follows: (35)     khaanaa khaa-ka/ke sab aadami suit rah-al. meal      eat-CONV all  people sleep remain-PT.3nh ‘ Having eaten meal, everyone went to sleep.’ Thus, the sentence in (35) contains a sequence of events: 'Everyone ate meal and then went to sleep.' It is, however, to be noted that Maithili, as several other South Asian languages, have non-specialized sequential converbs, which are open to a range of meanings including cause (as shown in (36)) and manner (as shown in (37)), apart from its core meaning, viz. anteriority or temporal priority ( as shown in ()). (36)      okar     saphaltaa-k                  khabar suin-ka             ham                    his     success -POSS             news   hear-CONV     I bahut   khush               bhe-l-aunh much  happy    become-PT-1 'I was very happy to hear of his success.' A sequential converbal clause is normally joined to the left of the matrix clause in Maithili, as shown in (37). They can be also postposed in marked constructions as a discourse strategy to express afterthought or focus: (37)      ham bahut       khush   bhe-l-aunh okar           saphaltaa-k      khabar suin-ka The tense and the mood of the matrix verb have broad scope which extends to the sequential verb. In sequential converbal constructions both negation and question have narrow scope; i.e. their scope remain restricted to the matrix clause and do not extend to sequential converbal constructions (See Yadava for details). The subject of a sequential converb in Maithili can be either a null NP, viz. PRO or a lexically overt NP. These two options for Maithili have been illustrated in (38a) and (38b), respectively. (38)     a. [ PROi ghar   aaib -ka/ke]    raami    sut-al. home come-CONV     Ram     sleep-PT3.nh ‘Having come home Ram slept.’ b.[tor-aa kaail              nahi aaib-ka/ke]           kuc kaam nahi ho-yat.                 2nh-DAT tomorrow            not   come_CONV      some work not happen-FUT Mention must, however, be made of certain lexically specified expressions such as time/weather expressions where subject identity constraint is violated: (39)      ghar   khais ke     das aadmi mair gel. house fall CONV ten persons died 'The house having collapsed, ten persons died.' It is, however, to be noted that lexical subjects occur only in such converbal clauses which express cause and effect relation, temporal clauses and the clauses with opposite verbs. They are banned from sequential converbal clauses. Other adverbial constructions Besides converbs, Maithili uses some other adverbial constructions including time, place, Time Time constructions are formed by correlatives such as jakhan –takhan, jahiyaa –tahiyaa, etc., e.g. (40)      jakhan  ham     ghar     pug-l-aunh       takhan sab       sut-al   ch-al when      1              home      reach-PT-1            then        all            sleep-PTCP AUX-PT.3.nh ‘When I reached home all had slept.’ Place Place constructions take the coorelative jata-tata: (41)         jata         ahaan    ch-i                         tata         ham        ae-b. where     you         be-PRES.1             there       1              come-FUT.1 ‘I’ll come where your are.’ Conditional clauses Conditional clauses are generally formed by the correlative jaun/jadi – ta: (42)         jaun/yadi              ahaan    kaaj        kar-ab                   ta            saphal    hae-b. If                             2h           work       do-FUT.2h            then        success   be-FUT.2h ‘If you work then you’ll succeed.’ 2.7       Sentence modifications The two major types of sentence modifications are interrogative and negative. 2.7.1    Interrogatives Maithili interrogatives do not involve change in word order. They are mainly polar and constituent interrogatives. Polar interrogatives or ‘yes-no questions’ are expressed optionally by ki attached to the end of a declarative sentence: (43)      hari      ghar     bech-at                        (ki)? Hari     house   sell-FUT.3.nh Q ‘Will Hari sell the house? They also involve rising intonation at the end. In constituent interrogatives the questioned constituents are replaced by interrogative words in situ; i.e. the interrogative words remain in their original position: (44)      hari      ki         bech-at                        ? Hari     what    sell-FUT.3.nh ‘What will Hari sell? 2.7.2    Negation Negative sentences are formed by adding the negative particle nahi preverbally: (45)      ham     raam-ke           kitaab  nahi     de-l-aunh I           Ram-ACC       book    not       give-PT-1 ‘I did not give the book to Ram.’ Selected Bibliography Bickel, Balthasar, Walter Bisang, and Yogendra P. Yadava. 1999. "Face vs. Empathy: The Social Foundation of Maithili Verb Agreement." In Linguistics 39:37:3:481-518. Bickel, Balthasar, and Yogendra P. Yadava.2000. "A fresh look at grammatical relations in Indo-Aryan", Lingua Burghart, R. 1992. Introduction to Spoken Maithili in Social Context Parts 1-3. Universität Heidelberg, Südasien-Institut Abteilung für Ethnologue, MS. Davis, A.I. 1973. "Maithili Sentences." In Hale, A. (ed.), Clause, Sentences and Diccourse Patterns, Vol.1, Kathmandu: SIL Tribhuvan University Press. ______. 1984. Basic Colloquial Maithili: A Maithili-Nepali-English Dictionary. 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In Bhaskararao and Subbarao, eds,Nonnominative subject, Amsterdam: John Benjamins ______.2007.“Anaphoric relations in Maithili and linguistic theory, Linguistic Theory and South Asian languages, Amsterdam: John Benjamins Yadava, Y.P. and D.N. Yadav.2008."Clausal complementation in Maithili", a paper presented at 29th annual conference of Linguistic Society of Nepal. [1] A version of this article will appear in Languages of the World  in Russian medium. 2.Sindhu Poudyal-Mithila :- mother land of Navya- Nyaya Language. Sindhu Poudyal, Ph. D Scholar HSS, IIT, Bombay http://sites.google.com/site/jahnabi1984/ Mithila :- mother land of Navya- Nyaya Language. Nyaya as a school of thought is one of the important orthodox schools (among six other) of Indian philosophy. It is a school of realistic pluralism and focuses mainly on the epistemology and logic rather than metaphysics and theology. In the later developments, this school divided into two schools viz. traditional Nyaya and Navya-Nyaya. Here in this section I am going to give a brief outline of the development of the Navya-Nyaya school of Indian philosophy. Mithila is said to be the mother Land of Navya- Nyāya School. As one of the advanced school of thought, its origination and development traced back to Thirteen century AD in the hands of Gangesa Upādhyāya of Mithila. He developed the traditional Nyaya philosophy and tried to give a new outlook in his famous work ‘Tattvachintāmaņi’. This work carried all the fame to the origination of new thinking in Mithila. Many students visited to Mithila with the development of philosophy of this kind. Among the important texts of the school are, Tattvachintāmaņi as cited above, written by Gangesa Upadhyaya, two commentaries viz. Nyaya Kusumanjali Prakash andNyaya Nibandha Prakash are written by Gangesa’s son Bardhaman. Apart from these, Translation of Tattvachintāmaņi named ‘Dhiditi’ by Raghunath, Tārkika Rakşā of Baradarāja, Tarkabhāşā of keśava Miśra, Tarka Samgraha of Annam Bhaţţa are prominent. These works glorified the heritage of Navya Nyaya School so richly that, without knowing the text knowledge of Nyaya it becomes incomplete and it developed its scope gradually. The contribution of Navya Nyaya philosophy lies in the development of technical language in all affairs of philosophical discourse. With the implication of highly sophisticated language and conceptual schematicism it tried to resolve philosophical problems like epistemological and more specifically the logical problems. Most of the works of this school are following the rigorous use of the Sanskrit language. Though it has developed technical language of its own but still unlike the contemporary analytical trend it is non- symbolic in nature. Its importance lies not only in philosophy but also linguistics and in some domain of natural sciences as well as cognitive sciences. I would like to give here the famous example to illustrate the point. ‘A man is standing with the stick’ to translate this expression in ordinary Sanskrit it will be ‘दण्डधारी पुरुष अस्ति’ but in the Navya Nyaya philosophy its translation would be, ‘दण्डनिष्ठ-दण्डत्वावच्छिन्न-संयोगसम्बंधावच्छिन्न-आधेयतानिरूपित-आधारतावान् पुरुषः’ This expression tires to reveal all the possible meanings related to the contexts we can use with the stick and a man. The kind of translation and the presentation which they tried to present is in my view is to give the holistic understanding of the statement. The text,Tattvacintamani is generally regarded as the Jewel of Thought on the Nature of Thing; is the basic text for the development of this school. Later logicians of this school are primarily interested in defining the terms and concepts. Invention of special terminologies to give precision to logical thought and reasoning is a significant aspect of this school. It tried to develop some of the drawbacks of traditional Nyaya philosophy. As we all know all the problems of philosophy are due to our misuse of language. And in this connection the attempt made by Navya Nyaya logicians is really an admirable one. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर। महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:  Language:Maithili  ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)  (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) 

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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com  website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह।  Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य,उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते,महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )  खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह“नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड(मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/-US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य),$२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur, Nagendra Kumar Jha and Panjikar Vidyanand Jha- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ"बलचन्दा" VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) X. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature XI. मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी XII. मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर Details of postage charges availaible onhttp://www.shruti-publication.com/  (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. 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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' ४९ म अंक ०१ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ४९)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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