432 'विदेह' ५० म अंक १५ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ५०) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- विशेष: प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलकसाक्षात्कार १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा २.२.१.परमेश्वर कापड़िकथा- धुमगज्जर २.आशीष चमन- कथा- पछता रोटी ३.प्रेमशंकर सिंह-जयकान्त मिश्र जीवन आ साहित्य–साधना २.३.१ कमला चौधरी-कथा--गुणनफल २.दुर्गानन्द मंडलबकलेल (कथाक दोसर आ अन्तिम भाग) २.४.१.प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार २.सुशान्त झा-विकासक तेजीमे कहीं छुटि नै जाय मिथिला ३.नवेन्द्र कुमार झा-पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश/1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण/ सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य ४.केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि २.५..१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सखी कुन्ती २.बिपिन झा-के करत मिथिलाक्षरक रक्षा ३. फूलचन्द्र झा प्रवीण- मैथिलीक बाल साहित्य २.६.१.श्यामसुन्दर शशि-नमन गुरुदेव- (साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष) २.सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष २.७.कुमार मनोज कश्यप-कथा- अन्हेर २.८. १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. ऋृषि वशिष्ठ- जुआनी जिन्दाबाद ३. शिवशंकर श्रीनिवास- पण्डित ओ हुनक पुत्र ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.१.श्री काली नाथ ठाकुर-सून मिथिलाञ्चल…..। २.एकइसम सदीक नाम-प्रेम विदेह ललन ३.विनीत ठाकुर- जाढ़ ३.३.१.पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता २. सुदिप कुमार झा-दूटा रचना ३.४.१.एक भुम जोड़ एक सत्य बराबर दू क्षण- अयोध्यानाथ चौधरी २.हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा ३.नवका साल, पुरने हाल !धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३.५.१.सतीश चन्द्र झा २.मधेशक आवाज-वौएलाल साह ३.हिमांशु चौधरी-पाथर ४.-क्षणिका-प्रशांत मिश्र-हड़ाहि ३.६.१.अरविन्द ठाकुर-गजल २.महेन्द्र कुमार मिश्र-पद्य ३.इन्कलाव सुरेन्द्र लाभ ३.७.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.८.१.कुमार पवन-नहि बिसरैछ/ काल्हि तँ रवि छै २.रोशन जनकपुरी-चप्प्ाल आ सड़क ३.ओम कुमार झा-थर-थर कापिँ रहल छौ तोहर पयर ४.राजदेव मंडल-कविता ४. मिथिला कला-संगीत-कल्पनाक चित्रकला ५. गद्य-पद्य भारती -पाखलो (धारावाहिक)-भाग-७- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह ६. बालानां कृते-१.प्रसंग- आशीष चौधरी २. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु लघुकथा ३. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Sindhu Poudyal-Indo-Nepal Relations: A Personal Reflection विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीक वर्तमान समस्याकेँ आ विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनक कार्ययोजनाकेँ एहि कसौटीपर कसै छी। Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल – मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे एहि भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ एहि मे मैथिली नहि बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। एहि भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जाहिमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। एहि भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता – प्रशंसा परम्परा जाहिमे दोसराक निन्दा सेहो एहिमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक। परस्पर प्रशंसा सेहो एहिमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नहि बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ एहिमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ एहिअँ की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ एहि लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। Opportunity- अवसर, योग, अवकाश – विशिष्ट विषयक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नहि भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नहि देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि। Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् – हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि। विदेहक मैथिली साहित्य आन्दोलन मैथिलीकेँ जनभाषा बनएबाक प्रक्रममे लागल अछि। पाक्षिक रूपेँ मासमे दू बेर एहिपर विचिन्ता होइत अछि। नकारात्मक चिन्तन, परदूषण आ अभाव भाषण द्वारा ई आन्दोलन नहि अवरोधित होएत आ एकरा न्यून करबाक आवश्यकता अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषय अछि, आ भाषणक नहि कार्यक आवश्यकता अछि आ से हम सभ कऽ रहल छी। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नहि स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। प्रबोध सम्मान २०१० जीवकान्तकेँ भेटलन्हि। एहि बेरुका पुरस्कार चयन प्रक्रियामे २१ गोटेक शुरुआती दौड़मे छलाह। पहिल बेरमे ७ गोटे बहार भेलाह (लेबल १), दोसर बेर आठ गोटे बहार भेलाह (लेबल २), तेसर दौड़मे मात्र छह गोटे बचलाह (लेबल ३)। ओहि छह गोटेक क्रम एहि प्रकारसँ रहल:- जीवकान्त: ४८ अंक सोमदेव: २२ अंक भीमनाथ झा: १७ अंक रमानन्द रेणु: १७ अंक चन्द्रभानु सिंह: १२ अंक चन्द्रनाथ मिश्र अमर: १२ अंक जज एहि प्रकारेँ रहथि: एल-१- १०/१० एल.२- ९/१० एल.३- १०/१० सभ मिला कऽ २९/३० जज जाहिमे २६ गोट जज रिपीट नहि छलाह, माने २६ विभिन्न गोटे जज छलाह। सभटा वोट एहि तरहेँ रहल: 30 x 3 = 90 आ 30 x 2 = 60 आ 30 x 1 = 30 = 180 वोट छह टा कम माने १७४ टा देल गेल, जाहिमे छह गोटे जे ऊपरमे रहलथि हुनका एहि मे सँ १३१ टा वोट भेटलन्हि। जीवकान्तकेँ १७४ मे ४८ वोट भेटलन्हि-२७.५९% ( संगहि १३१ मे सँ ४८ भेल- ३६.६४%) अंतिम लेबलमे दसमे सँ आठटा जज हुनका पहिल वोट देलन्हि। जीवकान्तजीकेँ बधाई। मैथिली पत्रकारिताक विकास कें ध्यान मे राखि तथा युवा पत्रकार कें प्रोत्साहित करबाक उद्दश्यें वर्ष २०१० सं ५०००/- टाका राशिक मिथिला दर्शन पत्रकारिता पुरस्कार आरभ कयल गेल अछि. समकालीन समस्या सम्पर्कित साहित्येतर आलेख जे मिथिला दर्शन मे प्रकाशित होयत तकरे आधार पर ई पुरस्कार देल जायत. साल भरिक विभिन्न अंक मे प्रकाशित आलेख मे जे सर्वोत्तम होयत तेकर लेखक कें पुरस्कृत कायल जायत. एहि सन्दर्भ मे सम्पादक मंडलक निर्णय अंतिम होयत. प्रथम मिथिला दर्शन पत्रकारिता पुरस्कार स्वस्ति foundation प्रदत प्रबोध साहित्य सम्मानक संगहि फरवरी २०११ मे प्रदान कयल जायत. रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति – 09 प्रथम : प्रियंका झा (जनकपुर ) सुश्रीप्रियंका झाक जन्म प्राचीन मिथिलाक राजधानी जनकपुर धाम नेपाल मे भेलन्हि । संगहि जनकपुरे के ई अपन कर्मभूमि बनेली । त्रिभूवन विश्वविद्यालयक जनकपुर कैम्पस स’कॉमर्स विषय स’अंतरस्नातक तक अहाँ अपन पढ़ाई केलहु । प्रियंका के रंगमंच धरोहरिक रूप मे हुनकर पिता श्री रमेश झा स’ प्राप्त भेलन्हि । हिनक पिता मैथिली रंगमंचक अति महत्वपूर्ण हस्ताक्षर छथि । प्रियंका अपन जीवनक छोटपने स’ मैथिली रंगमंच पर अपन महत्वपूर्ण उपस्थिति देब’ लगलीह । अहाँ प्रस्तुति विधाक लेल कतेको तरहक प्रशिक्षण प्राप्त केने छी जाहि मे महत्वपूर्ण संस्थान अछि गुरुकुल, आरोहण, एक्सन एड, शिल्पी आदि । संगहि मैथिली रंगमंचक सुप्रसिद्ध संस्था मिनाप, जनकपुर स’ लगातार मैथिली रंगकर्म क’ रहल छी । प्रियंका अखन तक लगभग 6 टा मैथिली नाटकक लगभग 37 टा प्रस्तुति आ 10 टा मैथिली सड़क नाटकक लगभग 5 सौ स’ बेसी प्रस्तुति क’ चुकल छथि । हिनका द्वारा कयल गेल प्रमुख नाटक अछि : ओ खाली मुँह देखै छै, छुतहा घैल, ओकरा ऑगनक बारहमासा, सुनिते करैये हरान, हाय रे हमर घरबाली आ बगिया । संगहि सड़क नाटक अछि : चिन्हियौ नेपाल, लेहुआयल आँचर, नै आब नै, ककर लाल, कोंटा सिंगार आदि । द्वितीय : रूपम श्री ( सहरसा ) सुश्री रूपम श्रीक जन्म सहरसा में भेलन्हि । अहाँ स्नातक मे पढ़ैत छी संगहि संगीत स’ सेहो प्रभाकर क’ रहल छी । रंगमंच स’ लगाव अहाँ के सुजीक प्रयास स’ 1995 स’ भेल । रूपम श्री विभिन्न संस्था संग रंगमंच क’ रहल छथि । जाहि मे प्रमुख अछि इप्टा, पंच कोसी । हिनका द्वारा कयल गेल महत्वपूर्ण नाट्य प्रस्तुति अछि : मधुश्रावणी, कनिया पुतरा, पाँच पत्र । रूपम श्रीक प्रिय नाटककार छथि महेन्द्र मलंगिया आ प्रिय निर्देशक छथिन उत्पल झा । मैथिली रंगमंच में काज क’र’ में नीक लगैत अछि । 2003 में खगौल, पटना मे अहाँके सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री स’ सम्मानित कयल गेल, तरंग महोत्सव मे उत्कृष्ठ नृत्यक लेल द्वितीय पुरस्कार राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा सिंहदेवी पाटील स’ अहाँ ग्रहण केलहुँ । तृतीय : कल्पना मिश्रा ( दिल्ली ) सुश्री कल्पना मिश्राक जन्म मिथिलाक नागदह गाम मे भेलन्हि । बच्चे स’ कल्पना जीक लगाव संगीत स’ भ’ गेलन्हि । अहाँ शास्त्रीय संगीतक प्रशिक्षण प्रयाग विद्यापीठ संगीत समिति, इलाहाबाद स’ प्राप्त केलहुँ । अहाँक शिक्षा दिक्षा बेगूसराय मे भेल । पहिने हिनक झुकाव मैथिली संगीत दिस भेल, तत्पचात ई अभिनय दिस सेहो आकर्षित भेलीह । अहाँ दिल्ली स्थित मिथिलांगन संस्था स’ रंगकर्म क’ रहल छी । मैथिलीक संग भोजपुरी, हिन्दी मे सेहो अहाँ लगातार अपन पहचान बनेबा मे सफल भेलहुँ अछि । रंगमंचक संग अहाँ लगातार फिल्म, टेलीविजनक लेल काज क’ रहल छी । कल्पना जी कतेको मैथिली नाट्य प्रस्तुति मे अपन अभिनय प्रतिभा देखा चुकल छथि । जाहि मे प्रमुख अछि : जट जटिन, उगना हॉल्ट, सामा चकेबा आदि । हिनक इच्छा छनि जे महिला कलाकारक प्रति मिथिला समाजक नजरिया मे बदलाव अयबाक चाही । कल्पना जीक प्रिय निर्देशक छथि संजय चौधरी आ प्रिय नाटककार महेन्द्र मलंगिया । पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... पंकज पराशरकेँ बैन कए विदेह साहित्य आन्दोलनसँ। निकालल जा रहल अछि। कारण नीचाँक लिंकपर देल गेल अछि। http://www.box.net/shared/75xgdy37dr विदेहमे किछु अनोनिमस ई-मेल अएलाक बाद ओकर इन्क्वायरीक बाद चेतना समिति द्वारा पंकज पराशरकेँ देल सम्मानकेँ वापस लेबा लेल आ एहि लेखककेँ बैन करबा लेल ई हमर (चेतना समितिक आजीवन मेम्बरक हैसियतसँ) आधिकारिक अनुरोध अछि आ इन्क्वायरीक विस्तृत विविचन नीचा देल जा रहल अछि। कृपया चेतना समिति एहि विषयपर अपन आपात बैसकी करए आ उचित निर्णय लए से अनुरोध। -गजेन्द्र ठाकुर इन्क्वायरीक विवरण: पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि । प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि।
विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। blackmailer pankaj parashar ke viruddha google ke likhit complain usa sthit karyalaya me official channel se patha del gel chhai aa google ke Douglas Kellner se sampark karbak lel kahi del gel chhai. ehi blackmailer ke sabhta pseudo id identify kay lel gel achhi. In Indian Constitution we all have certain rights, If somebody in the name of freedom of expression, in the name of Literary Criticism(????) and in the name of freedom on web is blackmailing you or abusing you then remember that the freedom is available to you too and all these are punishable cognizable offences. SAY NO TO BLACKMAIL. FOR FURTHER INFORMATION contact me at ggajendra@gmail.com 2.ANNOUNCEMENT:NATASHA FOR KIDS: IN MAITHILI WE HAVE CHEATS LIKE PANKAJ PARASHAR BUT AT THE SAME TIME WE HAVE CREATIVE PEOPLES TOO LIKE DEVANSHU VATS. VIDEHA ANNOUNCES FIRST EVER MAITHILI COMICS NATASHA BY DEVANSHU VATS- the pdf version will be sent through email to you all in a few days, the print version is available (48 cartoon sories) for just Rs. 50/- HOWEVER THE PDF VERSION can be downloaded and printed without any restriction. SO SHARE THIS NEWS WITH ALL THE MAITHILI SPEAKING KIDS IN YOUR VICINITY. and congratulate Devanshu Vats on email devanshuvatsa@gmail.com 3.VIDEHA LANGUAGE AND LITERATURE MOVEMENT IS HERE TO STAY. WE CARE FOR YOU BUT AT THE SAME TIME WE ARE STERN WITH THE INTELLECTUAL PROPERTY RIGHT THIEFS. LET THEM TRY AGAIN WE WILL EMERGE EVEN STRONGER. REGARDS GAJENDRA THAKUR VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
अन्तर्जालपर ब्लैकमेलिंग विरुद्ध गूगल, चिट्ठाजगत आ ब्लोगवानीकेँ सूचित करू, साइबर क्राइम आ ब्लैकमेलिंग रोकबा लेल सेहो ढेर रास प्रावधान छै, विशेष जानकारी ggajendra@gmail.com पर सम्पर्क करू। अहाँसँ पत्रकार, न्यूजपेपर, पत्रिका आ हिन्दीक गणमान्य लेखकगण/ प्रोफेसर/ विश्वविद्यालय आदिकेँ एहि घटनासँ सूचित करेबाक अनुरोध अछि। विशेष जानकारी लेबाक आ देबाक लेल ggajendra@gmail.com पर सूचित करू। Reply 01/26/2010 at 01:56 PM 2 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
you may also brought this episode before sanjay@jagran.com Thanks readers. Reply 01/26/2010 at 12:25 AM 3 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
But this time he has not used his name as maithil, mithila aa subodhkant but as Pankaj Parashar pparasharjnu@gmail.com Reply 01/25/2010 at 09:48 PM 4 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
The same blackmail letter has been sent by the blackmailer to my email address which has been spammed through ISP ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 and has been forwarded for taking Police action immediately. Reply 01/25/2010 at 09:45 PM 5 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
Professor Kellner has thanked me for this detective work, but it all your efforts dear reader. Reply 01/25/2010 at 08:21 PM Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521
Fax 310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html 6 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
pahal=- 86, aarambh -23 aa arunkamalak naye ilake me ka sambandhit prishtha pathebak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/25/2010 at 08:16 PM 7 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
http://www.gseis.ucla.edu/courses/ed253a/newDK/intell.htm ehi link par douglas kellner ke lekhak anuvad pahal-86 ke page 125-131 par achhi- soochnak lel dhanyad pathakgan. Reply 01/24/2010 at 08:16 PM 8 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
ehi ghatnakram me kono pathak lag je Arun Kamal jik kavita "Naye Ilake Me" hoinh aa Aarambh (ank 23, maithili magazine editor Sh. Rajmohan Jha (March 2000) me prakashist maithili kavita "Sanjh Hoit Gam Me" te kripya ggajendra@gmail.com par soochit karathi- Dhanyavad. Reply 01/24/2010 at 08:02 PM 9 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
ehi ghatnakram me bahut ras aar jankari aa dher ras samarthan debak lel dhanyavad pathakgan. Reply 01/23/2010 at 11:40 PM 10 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
विदेहक पाठकक सूचनाक बाद ई पता चलल अछि (आ ओकर सत्यापन कएल गेल) जे एहि लेखकक ई एहि तरहक पहिल कृत्य नहि अछि। ई लेखक पहिने सेहो Douglas Kellner क Technopolitics क पंक्तिशः अनुवाद मूल लेखकक रूपमे नामसँ ज्ञानरंजनक हिन्दी पत्रिका "पहल"मे धोखासँ छपबओलक। तकर पता चललाक बाद "पहल"मे एहि लेखकक रचनाक प्रकाशन बन्द भऽ गेल। एहि सम्बन्धमे विस्तृत आलेख विदेहक अगला अंकक सम्पादकीयमे देल जाएत। २.एहि सभ घटनाक बाद पंकज पराशरकेँ विदेहसँ बैन कएल जा रहल अछि। विदेह आर्काइवसँ "विलम्बित कइक युगमे निबद्ध" पोथीकेँ हटाओल जा रहल अछि आ एकटा इनक्वायरी द्वारा एहि पोथीक ( डगलस केलनर बला घटनाक्रमक बाद) जाँच किछु चुनल लेखक-पाठक द्वारा कएल जएबा धरि रहत। प्रकाशककेँ सेहो उचित पुलिसिया कार्यवाही (यदि आवश्यक हुअए तँ) लेल एहि समस्त घटनाक्रमक सूचना दऽ देल गेल अछि। ३.पाठक डगलस केलनरसँ ई-मेल kellner@gseis.ucla.edu पर "पहल" पत्रिका वा तकर सम्पादक श्री ज्ञानरंजनसँ editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in वा info@deshkaal.com पर आ दैनिक जागरणसँ nishikant@jagran.com, response@jagran.com, mailbox@jagran.com, delhi@nda.jagran.com पर सम्पर्क कए विस्तृत जानकारी लऽ सकैत छथि। डगलस केलनरक आर्टिकल गूगल सर्चपर technopolitics टाइप कए ताकि सकै छी आ पढ़ि सकै छी। पहल पत्रिकाक वेबसाइट www.deshkaal.com पर सेहो पहल पत्रिकाक पुरान अंक सभ आस्ते-आस्ते देबाक प्रारम्भ भेल अछि।
विस्तृत जानकारीक लेल सुधी पाठकगण अहाँक धन्यवाद। भविष्यमे सेहो एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हुअए ताहि लेल अहाँक पारखी नजरिक आस आगाँ सेहो रहत। एहि तरहक कोनो घटनाक जानकारी हमर ई-पत्र ggajendra@gmail.com पर अवश्य पठाबी। Reply 01/22/2010 at 12:03 PM 11 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
out of these three addresses of the spammer i.e. pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com the address pkjpp@yahoo.co.in, is fails verification test and addresses pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com stands verified and confirmed. Reply 01/21/2010 at 10:00 PM 12 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
the htpps host matches reliance communications and the corresponding email gamghar at gmail dot com and maithilaurmithila at gmail dot com is fake ids related with the actual spammers id i.e.pkjpp@yahoo.co.in, pparasharjnu@gmail.com and pkjppster@gmail.com Reply 01/21/2010 at 08:50 PM 13 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
The office premise has been located, the blackmailer works in Dainik Jagran, Process to file complaint against Cyber Crime Act is being initiated and the organisation being taken into confidence. Reply 01/21/2010 at 06:13 PM 14 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
maithil, mithila aa subodhkant nam se abhadra aa blackmail karay bala blackmailer ke cheenhi lel gel achhi,ISP address 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243 aa ban kayal ja rahal achhi, agan ohi organisation se seho sampark kayal jaayat jatay se ee email aayal achhi. Reply 01/18/2010 at 11:19 PM 15 VIDEHA GAJENDRA THAKUR said...
comment moderation lagoo kayal ja rahal achhi Reply 01/18/2010 at 09:27 PM 16 सुबोधकांत said...
ist Pankaj Parashar told Pranav (Son of Maithili Story writer Sh. Pradip Bihari) to translate that article (and also one by Noam Chomsky) and he promised him to publish that hindi article as translation.The young boy translated it and handed over to him but after six months Pankaj Parashar told Pranav that the translation was not upto mark and was rejected and the translation of Noam Chomsky was misplaced. Then Pranav by chance saw that article in Hindi magazine PAHAL (86th issue) and started weeping, then when everybody saw it it was detected that Pankaj Parashar was shown as author of that article, the editor of Pahal banned him and said that a pirated article of Noam Chomsky that was sent to him by Pankaj Parashar will not be published. Arun Kamal's Poem and its blatant translation in Maithili and a series of these act by Pankaj Parashar led me to ban him the he started abusing me through false ids like gamghar@gmail.com, and maithilaurmithila@gmail.com and ISPs 220.227.163.105 , 164.100.8.3 aa 220.227.174.243
2.from ISP 220.227.174.243 of Dainik Jagran he abused many times earlier too to others .doc is attached. अविनाशकेँ सेहो 220.227.174.243 आइ.एस.पी.सँ एहि प्रकारक ई-पत्र अबैत रहै मुदा ओ मामिला खतम कs देने रहथिन। ओ टिप्पणी सभ एतेक घृणित छैक जे एतए नहि देल जा रहल अछि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ जनबरी २०१०) ९३ देशक १,०४२ ठामसँ ३६,७१७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,१९,८९१ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा २.२.१.परमेश्वर कापड़िकथा- धुमगज्जर २.आशीष चमन- कथा- पछता रोटी ३.प्रेमशंकर सिंह-जयकान्त मिश्र जीवन आ साहित्य–साधना २.३.१ कमला चौधरी-कथा--गुणनफल २.दुर्गानन्द मंडलबकलेल (कथाक दोसर आ अन्तिम भाग) २.४.१.प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार २.सुशान्त झा-विकासक तेजीमे कहीं छुटि नै जाय मिथिला ३.नवेन्द्र कुमार झा-पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश/1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण/ सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य ४.केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि २.५..१.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सखी कुन्ती २.बिपिन झा-के करत मिथिलाक्षरक रक्षा ३. फूलचन्द्र झा प्रवीण- मैथिलीक बाल साहित्य २.६.१.श्यामसुन्दर शशि-नमन गुरुदेव- (साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष) २.सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष २.७.कुमार मनोज कश्यप-कथा- अन्हेर २.८. १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. ऋृषि वशिष्ठ- जुआनी जिन्दाबाद ३. शिवशंकर श्रीनिवास- पण्डित ओ हुनक पुत्र २.१.जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। दूटा कथा ठेलाबला टाबरक घड़ीमे बारह बजेक घंटी बजितहि भोलाक निन्न टूटि गेलनि। ओछाइन परसँ उठि सड़कपर आबि हियासय लगला तँ देखलनि जे डंडी-तराजू माथसँ कनिये पछिम झुकल अछि। मेघनक दुआरे सतभैया झँपाएल। जिमहर साफ मेघ रहए ओम्हुरका तरेगण हँसैत मुदा जेमहर मेघोन रहए ओम्हुरका मलिन। गाड़ी-सबारीसँ सड़क सुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीक सिपाही टहलैत रहए। सड़क परसँ भोला आबि ओछाइनपर पड़ि रहला। मुदा मन उचला-चाल करैत रहनि। सिनेमाक रील जेकाँ पैछला जिनगी मनमे नचैत रहए। जहिना चुल्हिपर चढ़ल बरतनक पानि तरसँ उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुशी हृदएसँ निकलि चिड़ै जेकाँ अकासमे उड़ैत अछि। किएक नहि खुशी अओतैक ? हराएल वस्तु जे भेटि गेलैक अछि। मन गेलनि परसुका पत्रपर। जे गामसँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बुझि विश्वासे नहि होइत रहनि। पत्र तँ नहि पढ़ल होइत रहनि मुदा पढ़बै काल जे पाँती सभ सुनने रहथि, ओहिना आँखिक आगू नचैत रहनि। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखै लगलथि। ‘‘बाबू, पाँच तारीखकेँ दुनू भाइ ज्वाइन करै जाएब। इच्छा अछि जे घरसँ विदा हेबा काल अहाँकेँ गोर लागि घरसँ निकली। तेँ पाँच तारीखकेँ दस बजेसँ पहिनहि अपने गाम पहुँचि जाइ।’’ पत्रक बात मनमे अबितहि भोला गाम आ शहरक बीचक सीमापर लसकि गेलाह। मनमे ऐलनि, समाजसँ निकलि छातीपर ठेला घीचि, दूटा शिक्षक समाजकेँ देलिऐक, की ओहि समाजक आरो ऋण बाकी छैक ? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जाहिसँ मनमे खुशी उपकलनि जे जहिना गामसँ धोती गोलगोलाटा दू टाका लऽ कऽ निकलल छलहुँ, तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि एहिठाम लऽ जाएब। चिड़ै टाँहि देलकै, फेर ओछाइन परसँ उठि निकललाह, तँ देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आबि गेल अछि। चोट्टे घुरि कऽ आबि संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन, अपनाले खाली टिकटक खर्च, सनेसटा पाँकेट खर्च मिला सए रुपैया राखि, कपड़ा पहीरि, धर्मशालाकेँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेलाह। जखन आठे बर्खक भोला रहथि तखनहि माए मरि गेलखिन।। तीनिये मासक पछाति पिता रघुनी चुमाओन कऽ लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीसँ चारि सन्तान भेल रहनि। मुदा खाली भोलेटा जीवित रहल। सत्मायक परिवारमे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलनि। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखोकेँ होइत जे सत्माय भोलाकेँ अलबा-दोलबा कऽ घरसँ भगा देतैक, नहि तँ परिवारमे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सबहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घरसँ सोलहन्नी फ्री भऽ गेलाह। फ्री सिर्फ काजे टामे भेला, मान-दान बढ़िये गेलनि। दुनू साँझ भानस होइतहि माए फुटा कऽ भोलाले सीकपर थारी साँठि कऽ राखि दैत छलीह। भलेही भोला दिनुका खेनाइ साँझमे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाथि। परोपट्टामे जालिम सिंह आ उत्तम चन्दक नाच जोर पकड़ने। सभ गाममे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाममे नाच भेने चारि कोसक लोक देखै अबैत। भोलाक गामक विषौलक नाच पार्टी सभसँ सुन्दर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जाहिसँ पार्टीक प्रतिष्ठा दिनानुदिन बढ़ितहि जाइत। घरसँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भऽ गेलाह। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीन घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी, तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ छौँड़ा-मारड़ि घर भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ता। ने नाच पार्टीकेँ रुपैआ दिअए पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयोले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनिकेँ दैत छलखिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल, डिग्री सेदैक जिम्मा भेटि गेलैक। डिग्री सेदैक जिम्मा भेटितहि काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करै पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्त रहै लगल। मुदा एतबेसँ ओकर मन शान्त नहि भेलैक। काजक सृजन ओ अपनोहु करै लगल। स्टेजक आगूमे जे छोटका धिया-पूता बैसि पी-पाह करैत, ओकरो सभपर निगरानी करै लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमिकेँ महफिलोक निगरानी करै लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सेहो लगबै लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीब सीखि लेलक। किछुए दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भऽ गेल। किएक तँ एक्के-दू दम जँ पीबए तैयो भरि रातिमे तीस-पैंतीस दम भऽ जाइत छलैक। जाहिसँ भरि राति मूड बनल रहैत छलैक। बीड़ीक कसगर चहटि भोलाकेँ लागि गेलै। रातिमे तँ नटुऐ सभसँ काज चलि जाइत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत तँ मन छटपटाए लगैत छलैक। मूडे भंगठि जाइत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबै लगल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खाइत। एक दिन एक्केटा बीड़ी रघुनीकेँ रहनि। भोला चोरा कऽ पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गामपर अएलाह तँ बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया परसँ अनै गेलाह तँ बीड़ी नहि देखलनि। चोटपर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रघुनी भोलापर उताड़ि देलखिन। मारि खाए भोला कनैत उत्तर मुहेक रास्ता पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल आकि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलाक कानब सुनि ओ बुझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागल छै। चुचुकारिकेँ पुछलखिन- ‘‘की भेलौ रौ भोला?’’ करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कनै लगल। हिचुकैत भोला कनिये जोरसँ काकाकेँ कहलकनि, जे कानबक अवाजमे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि, दहिना डेन पकड़ि रघुनीकेँ कहै बढ़लथि। काकाकेँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- ‘‘रघुनी, भोला बच्चा अछि किऐक तँ विआह नञि भेलै अए। तेँ नीक हेतह जे विआह करा दहक। अपन भार उतड़ि जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोषी हेबह, समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैत छैक। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक ओ कहतह जे ‘‘माइ मुइने बाप पित्ती।’’ करिया काकाक विचार रघुनीक करेजकेँ छेदि देलक। आँखिमे नोर आबि गेलैक। अखन धरि जे आँखि रघुनीक करिया काकापर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघारपर पहुँचि अटकि गेलैक। मारिक चोट भोलाक देहमे निजाइये गेलैक जे संग-संग विआहक बात सुनि मनमे खुशियो उपकलै। बुद्धिक हिसाबसँ भलेही भोला बुड़िबक अछि मुदा नाचमे मेल-फीमेल गीत तँ गबितहि अछि। पिताक हैसियतसँ रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- ‘‘काका, हम तँ ओते छह-पाँच नहि बुझैत छिऐ, काल्हिये चलह कतौ लड़की ठेमा कऽ विआह कइये देबै।’’ ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि करियाकाका रास्ता घेलनि। भोलाक विआह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनीकेँ कहलकनि- ‘‘विआहसँ पहिने हम सभ नहि बुझलिऐक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टीमे रहै अए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाए देब। तेँ ई संबंध नहि रहत। अपना सभमे तँ खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ बियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीक दोसर विआह कऽ देब।’’ कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह। ससुरक बात सुनि भोलाक बुद्धिये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिरड़ो उठलापर सभ किछु अन्हरा जाइत छैक तहिना भोलोक मन अन्हरा गेल। दुनियाँ अन्हार लगै लगलैक। ओना तीन मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलैक। एकटा नटुआ एकटा लड़की लऽ कऽ पड़ा गेल छलैक, जाहिसँ गाम दू फाँक भऽ गेलैक। दू ग्रुपमे गाम बँटा गेलैक। सैाँसे गाममे सनासनी चलै लगलैक। ताहि परसँ भोला आरो दू फाँक भऽ गेल। पाण्डु रोगी जेकाँ भोलाक देहक खून तरे-तर सुखै लगलैक। मुदा की करैत बेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्लानिसँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्कारै लगल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्म देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे एहि गामसँ कतौ चलिये जाएब नीक होएत। घरसँ भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँहसँ दिल्ली, कलकत्ता, बम्बइक विषयमे सुननहि रहए। जाहिसँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहए। ने जेबीमे पाइ रहए, ने बटखरचा। सिर्फ दुइयेटा टाका संगमे रहए। अबधारि कऽ कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक। हबड़ा स्टेशन गाड़ी पहुँचते भोला उतड़ि बिदा भेल। टिकट नहि रहनहुँ एक्को मिसिया डर मनमे नहि रहैक। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेर पनरह अगस्तकेँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि आएल रहए। प्लेटफार्मक गेटपर दूटा सिपाहीक संग टी.टी. टिकट ओसुलैत। भोलाकेँ देखि टी.टी.क मनमे भेलै जे दरभंगिया छी भीख मंगै आएल अछि। टिकट नहि मंगलकै। सिपाहियोकेँ बुझि पड़लै जे जेबीमे किछु छैक नहि। टिकटेबला यात्री जेकाँ भोलो गेट पार भऽ गेल। सड़कपर आबि आँखि उठा कऽ तकलक तँ नमहर-नमहर कोठा चौरगर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखिमे ने किछु भऽ गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्के चान सात बुझि पड़ैत तहिना। दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि फेर देखलक तँ ओहिना। भीड़ देखि मनमे एलै जे जखन एत्ते लोकक गुजर-बसर चलैत छै तँ हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानै लगल। तेँ ककरो बाजब बुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाए-महीस सभ ठाम एक्के रंग बजैत अछि तहिना ने मनुक्खो बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलैक जे भरिसक हम मनुक्खक जेरिमे हरा ने तँ गेलहुँहेँ। फेर मनमे एलै जे लोक तँ संगीक बीच हराइत अछि, असकरमे कोना हराएत। विचित्र स्थितिमे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होइ आ ने ककरोसँ किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मूहे बिदा भेल। सड़कक किनछरिये सभमे खाइ-पीबैक छोट-छोट दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्मते ने होइत। जेबी टोबलक तँ दूटकही रहबे करै। मन पड़लैक मधुबनीक स्टेशन कातक होटल, जहिमे पाँच रुपैये प्लेट दैत। ई तँ सहजहि कलकत्ता छी। एहिठाम तँ आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ गर अँटबै लगल जे नहि भात-रोटी तँ एक गिलास सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- ‘‘आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?’’ अपन बोली सुनि भोला घुसुकि कऽ दोकान लग पहुँचि पुछलक- ‘‘दादा, कोना खुआबै छहक?’’ तीन मास पहिने धरि आठे आनामे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आनामे खुआबै छिऐ।’’ भोलाक मनमे संतोष भेल। पाइयेबला गहिकी जेकाँ बाजल- ‘‘कुरुड़ करैले पानि लाबह।’’ भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना तँ रंग-विरंगक बस्तु देखैत मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम अँटकैत। देवाल सभमे साटल सिनेमाक पोस्टरपर आ सड़कपर चलैत ठेलापर। जाहि पोस्टरमे डान्स करैत देखए ओहि ठाम अटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी आकि पुरुख। गाम-घरमे तँ पुरुखे मौगी बनि डान्स करैत अछि। फेर मन पड़लै संगीक मूहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्य हरिश्चन्द फिल्ममे मर्दे मौगिओक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल तँ अपने जेकाँ छौड़ाकेँ ठेला ठेलने जाइत देखि सोचै लगल जे ई काज तँ हमरो बुते भऽ सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी तँ करै नहि अबै अछि। बिना सिखने रिक्शो कोना चलाओल हएत ? ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगलेमे एकटा ठेलाबलाकेँ चाह पीबैत देखलक। ओहिठाम जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। चाह पीबि ठेलाबला पुछलक- ‘‘कोन गाँ रहै छह?’’ ‘‘विषौल।’’ ‘‘हमहूँ तँ सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।’’ गप-सप करैत दुनू गोटे धर्मतल्लाक पुरना धर्मशाला लग पहुँचल, ठेलाकेँ सड़केपर छोड़ि दीनमा भोलाकेँ धर्मशालाक भीतर लऽ जा कऽ कहलक- ‘‘समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।’’ टंकीपर हाथ-पाएर धोए भोला दीनमासँ बीड़ी मांगि पीबि, पीलर लगा ओँगठिकेँ बैसि गेल। आँखि उठा कऽ तकलक तँ झड़ल-झुरल देवालक सिमटी, तैपर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनमल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगूमे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पार्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भऽ गेल। सोचितहि-सोचितहि निन्न आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सुति रहल। गोसाँइ डूबितहि बुचाइ -दोसर ठेलाबला- आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- ‘‘कोन गाम रहै छह?’’ आशा भरल स्वरमे भोला बाजल- ‘‘बिषौल।’’ विषौलक नाओ सुनितहि मुस्की दैत बुचाइ पुछलक- ‘‘रुपनकेँ चीन्है छहक?’’ ‘‘उ तँ हमरा कक्के हएत।’’ अपन भाएक ससुर बुझि भोलासँ सार-बहिनोइक संबंध बनबैत कहलक- ‘‘चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेनसँ गप-सप करब।’’ कहि टंकीपर जा बुचन देह-हाथ धोए, कपड़ा बदलि भोलाकेँ संग केने दोकानपर गेल। आखिक इशारासँ दोकानदारकेँ दू-दूटा पनितुआ, दू-दूटा समौसा दैले कहलक। दुनू गोटे खा, चाह पीबि पानक दोकानपर पहुँचि बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोला बाजल- ‘‘पान छोड़ि दियौ। बीड़िये कीनि लिअ।’’ बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मशालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलाबला सभ अबै लगलैक। बिषौलक नाओ सुनितहि अपन-अपन संबंध सभ फरिअबै लगल। संबंध स्थापित होइतहि चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगीमे एहन स्नेह पहिल दिन भेटलै। ठेलाबला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सभ व्यवस्था ठेलाबला सभ कऽ देलक। दोसर दिनसँ ठेला ठेलए लगल। शनि दिनकेँ सभ ठेलाबला रौतुका नाइट शो सिनेमा देखै जाएत। ओहि शोमे एक क्लासक कन्सेशन भेटैत अछि। भोलो सभ शनि सिनेमा देखै लगल। चौदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आएल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभले कपड़ा अनने अछि। धिया-पूताकेँ दू-दूटा चौकलेट देलक। धिया-पूताकेँ चौकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबै लगलीह। झबरी दादी आबि भोलाकेँ देखि बजै लगलीह- ‘‘कहू तँ एहिसँ सुन्नर पुरुख केहेन होइ छै जे सौंथ जरौनिया छोड़ि देलकै।’’ दादीक बात भोलाकेँ बेधि देलक। आँखि नोराए लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानै लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की तकै घरसँ निकलल। ओना लड़कीक तँ कमी नहि, मुदा गाम-घर देखि कऽ कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मनमे रहै। लड़कीक कमी तँ ओहि समाजमे अधिक अछि जहिमे भ्रूण-हत्याक रोग धेने छैक। समयो बदलल अछि। गिरहस्त परिवारसँ अधिक पसन्द लोक नोकरिया परिवारकेँ करैत अछि। बगलेक गाममे भोलाक विआह भऽ गेल। विआहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भऽ गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक। सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाममे गुजारै लगल। गाम अबैत तँ अपनो घरक काज सम्हारि अनको सम्हारि दैत। तेसर साल चढ़ितहि भेलाकेँ जैाँआ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़ितहि ओ गाम आबि गेल छल। मनमे आशो बनले रहैक जे पाइ-कौड़ीक दिक्कत तँ नहिये हएत। सभ ठेलाबला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध अपने केने अछि। मुदा पहिल बेर छी, कनियाँक देखभाल तँ कठिन अछिये। सरकारीक कोनो बेवस्थो नहिये छैक। मुदा समाजो तँ समुद्र थिक। बिनु कहनहुँ सेवा भेटैत अछि। जाहिसँ भोलोकेँ कोनो बेसी परेशानी नहिये भेलैक। समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरितहि भोला दुनू बेटाकेँ स्कूलमे नाओ लिखौलक। शहरक वातावरणमे रहने भोलोक विचार धिया-पूताकेँ पढ़बै दिशि झुकि गेल रहैक। मनमे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाए मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नीक ऑपरेशन करा देलक। जाहिसँ परिवारो समटले रहलैक। पढ़ैमे जेहने चन्सगर रतन तेहने लाल। क्लासमे रतन फस्ट करैत आ लाल सेकेण्ड। सातवाँ क्लास धरि दुनू भाए फस्ट-सेकेण्ड स्कूलमे करैत रहल। मुदा हाइ स्कूलमे दुनू भाए आर्ट लऽ पढ़ै लगल जाहिसँ क्लासमे कोनो पोजीसन तँ नहिये होइत मुदा नीक नम्बरसँ पास करै लगल। मैट्रिकक परीक्षा दऽ दुनू भाय कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेशी जेकाँ अपनो पिताकेँ बुझैत छल। तेँ मनमे रंग-विरंगक इच्छा संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत, छातीक बले ठेला घीचैत देखि- पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाय कऽ लेलक। पितेक जोरपर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छाकेँ मनेमे दुनू भाय दाबि लेलक। मुदा तइयो भोला दुनू बेटाकेँ फुलपेंट, शर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनिकेँ देलखिन। तीन मासक उपरान्त मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाय-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणीसँ पास केलक। फस्ट डिवीजन भेलोपर आगू पढ़ैक विचार मनमे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचै लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लगल। नोकरियोक तँ ओएह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जाहिसँ समाजक मूल पूँजी –मानवीय- आगिमे जरैत सम्पति जेकाँ नष्ट भऽ रहल अछि। समय मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरबज्जा खुजल। गामक स्कूलमे शिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जाहिसँ नव ज्योतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवानमे भेलैक। ओना समएक हिसाबसँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि, मुदा बेरोजगारीक हिसाबसँ तँ नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूलमे रतनो आ लालोक बहाली भऽ गेलैक। पाँच तारीककेँ दुनू भाय ज्वाइन करत। आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाइक मनमे नहि रहैक ताहिसँ बेसी खुशी नोकरीसँ भेलैक। कोपर बुद्धिमे कलुषताक मिसियो भरि आगमन नहि भेलैक अछि। दुनू भाय बैसि कऽ अपन परिवारक संबंधमे विचारै लगल। रतन लालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, कोन धरानी बाबू अपना दुनू भायकेँ पढ़ौलनि से तँ देखले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहँचि गेल छी। तेँ अपनो सभक की दायित्व बनैत अछि, से तँ सोचै पड़तह ?’’ रतनक बात सुनि लाल बाजल- ‘‘भैया, अपना सभ ओहि धरतीक सन्तान छी जाहि धरतीपर श्रवण कुमार सन बेटा भऽ चुकल छथि। पाँच तारीकसँ पहिनहि बाबूकेँ कलकतासँ बजा लहुन। हम सभ ठेलाबलाक बेटा छी, एहिमे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हएत जहन ओ ठेला घीचताह आ अपना सभ कुरसीपर बैसि दोसरकेँ उपदेश देबै।’’ मूड़ी डोला स्वीकार करैत रतना बाजल- ‘‘आइये बाबूकेँ जानकारी दऽ दैत छिअनि जे जानकारी पबितहि गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीखकेँ दुनू भाय ज्वाइन करै जाएब। दुनू भायक विचार अछि जे अहाँकेँ गोर लागि घरसँ डेग उठाएब।’’ दुनू भाइक विचार सुनितहि माएक मन सुख-दुखक सीमापर लसकि गेलनि। जरल घरारीपर चमकैत कोठा देखै लगलीह। आखिमे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि। कामिनी अन्हरगरे भैयाकाका लोटा नेनहि मैदान दिशिसँ आबि रस्ते परसँ बोली देलखिन.......। हमहूँ मैट्रिकक परीक्षा दैले जाइक ओरियान करैत रही। ओना हमर नीन बड़ मोट अछि मुदा खाइये बेरिमे माएकेँ कहि देने रहिऐ जे कने तड़गरे उठा दिहें नञि तऽ गाड़ी छुटि जाएत। किऐक तँ साढ़े पाँचे बजे गाड़ीक समय अछि। आध घंटा स्टेशन जाइयोमे लगैत अछि। तेँ, पौने पाँच बजे घरसँ बिदा होएब तखने गाड़ी पकड़ाएत। जँ ई गाड़ी छुटि जाएत तँ भरि दिन रस्तेमे रहब। निरमलीसँ जयनगरक लेल एक्केटा डायरेक्ट गाड़ी अछि। नहि तँ सभ गाड़ी सकरीमे बदलै पड़ैत अछि। तहूमे बसबला सभ तेहेन चालाकी केने अछि जे एक्कोटा गाड़ीक मेलि नहि रहए देने अछि। तीनि-चारि घंटा सकरीक प्लेटफार्मपर बैसू तखन दरभंगा दिशिसँ गाड़ी आओत। तहूमे तेहेन लोक कोंचल रहत जे चढ़बो मुश्किल। तेँ ई गाड़ी पकड़़ब जरुरी अछि। ततबे नहि, अपन स्कूलक विद्यार्थियो सभ यैह गाड़ी पकड़त। अनभुआर इलाका तेँ असगर-दुसगर जाएबो ठीक नहि। सुनै छी जे ओहि इलाकामे उचक्को बेसी अछि। जँ कहीं कोनो समान उड़ौलक तँ आरो पहपटिमे पड़ि जाएब। भैया कक्काक बोली सुनि चिन्हैमे देरी नञि भेल। किऐक तँ हुनकर अबाज तेहेन मेही छनि जे आन ककरोक बोलीसँ नहि मिलैत। बोली अकानि हम दरबज्जेक कोठरीसँ कहलियनि- ‘कक्का, आउ-आउ। हमहूँ जगले छी। पँचबजिया गाड़ी पकड़ैक अछि तेँ समान सभ सरिअबै छी।’ रस्ता परसँ ससरि काका दरवज्जाक आगूमे आबि कहलनि- ‘कने हाथ मटिया लै छी। तखन निचेनसँ बैसबो करब आ गप्पो करब।’ कहि पूब मुहे कल दिशि बढ़लाह। हमहूँ हाँइ-हाँइ समान सरिअबै लगलौं। कलपर सँ आबि काका ओसारक चौकी तरमे लोटा रखि अपने चौकीपर बैसलाह। चौकीपर बैसितहि गोलगोलाक जेबीसँ बिलेती तमाकुलक पात निकालि तोड़ैत बजलाह- ‘भाइ सहाएब कहाँ छथुन?’ ‘ओ काल्हिये बेरु पहर नेवानी गेला, से अखन धरि कहाँ ऐलाहहेँ।’ हमर बात सुनि, भैयाकाका चुनौटीसँ चून निकालि तरहत्थीपर लैत बजलाह- ‘अखन जाइ छी, होएत तँ ओइ बेरिमे फेरि आएब।’ काकाक वापस होएब हमरा नीक नहि लागल। किऐक तँ लगले ऐलाह आ चोट्टे घुरि जेताह। तेँ बैसै दुआरे बजलहुँ- ‘अहाँ तँ कक्का गाममे दगबिज्जो कऽ देलिऐक। एत्ते खर्च कऽ कऽ कियो कन्यादान नहि केने छलाह। अहाँ रेकर्ड बना लेलिऐक।’ अपन प्रशंसा सुनि भैयाकाका मुस्कुराइत बजलाह- ‘ बौआ, युग बदलि रहल अछि। तेँ सोचलहुँ जे नीक पढ़ल-लिखल वरक संग बेटीक विआह करब। हमरो बेटी तँ बड़ पढ़ल-लिखल नहिये अछि। मुदा रामायण, महाभारत तँ धुरझार पढ़ि लैत अछि। चिट्ठियो-पुरजी लिखिये-पढ़ि लैत अछि। घर-आश्रम जोकर तँ ओहो पढ़नहि अछि। ओकरा की कोनो नोकरी-चाकरी करैक छैक, जे स्कूल-कओलेजक सर्टिफिकेट चाहिऐक। अपना सभ गिरहस्त परिवारमे छी तेँ बेटीकेँ बेसी पढ़ाएब नीक नहि।’ ‘किए?’ अपना सबहक परिवारमे गोंत-गोबरसँ लऽ कऽ थाल-कादो धरिक काज अछि। ओ तँ घरेक लोक करत। तइमे देखबहक जे जे स्त्रीगण पढ़ल-लिखल अछि ओ ओहि काजक भीड़ि नहि जाए चाहतह। आब तोंही कहह जे तखन गिरहस्ती चलतै कोना?’ काकाक तर्कक जबाब हमरा नहि फुड़ल। मुदा चुप्पो रहब उचित नहि बुझि कहलिएनि- ‘जखन युग बदलि रहल अछि तखन तँ सभकेँ शिक्षित होएब जरुरी अछि की ने?’ सभ पढ़त सभ नोकरी करत। नीक तलब उठाओत। जाहिसँ घरक उन्नति आरो तेजीसँ होएत। तहूमे महिला आरक्षण भेने नोकरियोमे बेसी दिक्कत नहिये होएत।’ भैयाकाका- ‘कहलह तँ बड़ सुन्दर बात मुदा एकटा बात कहह जे दुनू गोटे ,मर्द-औरत, एक्के स्कूल वा ऑफिसमे नोकरी करत तखन ने एकठाम डेरा रखि परिवार चलौत। मुदा जखन पुरुष दोसर राज्य वा दोसर जिला वा दस कोस हटि कऽ नोकरी करत तखन कोना चलतै। परिवार तँ पुरुष-नारीक योगसँ चलैत अछि की ने? परिवारमे अनेको ऐहेन काज अछि जे दुनूक मेलसँ होएत। मनुष्य तँ गाछ-बिरीछ नहि ने छी जे फलक आँठी कतौ फेकि देबै तँ गाछ जनमि जाएत। आब तँ तोहूँ कोनो बच्चा नहिये छह जे नै बुझबहक। मनुष्यक बच्चा नअ मास २७० दिन माइक पेटमे रहैत अछि। चारि-पाँच मासक उपरान्त माइक देहमे बच्चाक चलैत कते रंगक रोग-व्याधिक प्रवेश भऽ जाइत छैक। किऐक तँ माइक संग-संग बच्चोक विकासक लेल अनुकूल भोजन, आराम आ सेवाक आवश्यकता होइत। तखन माए असकरे की करत? नोकरी करत आ कि पालन करत ? एहि लेल तँ दोसरेक मदतिक जरुरत होइत।’ ‘आन-आन देशमे तँ मर्द-औरत सभ नोकरी करैत अछि आ ठाठसँ जिनगी बितबैत अछि।’ भैयाकाका- ‘आन देशक माने ई बुझै छहक जे जत्ते दोसर देश अछि सबहक रीति-नीति जीवन शैली एक्के रंग छैक ? नहि। एकदम नहि। किछु देशक एक रंगाहो अछि। मुदा फराक-फराक सेहो अछि। हँ, किछु ऐहन अछि जहि ठाम मनुष्य सार्वजनिक सम्पति बुझल जाइत छैक। ओहि देशक व्यवस्थो दोसर रंगक अछि। सभ तरहक सुविधा सबहक लेल अछि। तहि ठामक लेल ठीक अछि। मुदा अपना ऐठाम अपना देशमे तँ से नहि अछि। तेँ एहिठामक लेल ओते नीक नहि अछि जते अधलाह।’ अपनाकेँ निरुत्तर होइत देखि बातकेँ विराम दैक विचार मनमे उठै लगल। तहि बीच आंगनसँ माए आबि गेलीह। माएकेँ देखितहि हम अपन समान सरिअबै कोठरी दिशि बढ़ि गेलहुँ। भैयाकाकाकेँ देखि माए कहलकनि- ‘बौआ अहाँ तँ गाममे सभकेँ उन्नैस कऽ देलिऐ। आइ धरि गाममे बेटी विआहमे एते खर्च कियो ने केने छलाह।’ अपन बहादुरी सुनि मुस्कुराइत भैयाकाका कहलखिन- ‘भौजी कामिनीकेँ असिरवाद दियौ जे नीक जेकाँ सासुर बसए।’ माए- ‘भगवान हमरो औरुदा ओकरे देथुन जे हँसी-खुशीसँ परिवार बनाबए। पाहुन-परक तँ सभ चलि गेल हेताह?’ भैयाकाका- ‘हँ भौजी। काल्हि सत्यनारायण भगवानक पूजा कऽ हमहूँ निचेन भऽ गेलहुँ। पाहुनमे-पाहुन आब एक्केटा सरहोजि टा रहि गेल अछि। ओहो जाइ ले छड़पटाइ अए। मुदा ओकरा पाँच दिन आरो रखै चाहै छी।’ माए- ‘जहिना एकटा बेटीक विआहक काजकेँ खेलौना जेकाँ गुड़केलहुँ, तहिना दोसर ई सरहोजिकेँ आब गुड़कबैत रहू।’ सरहोजि दिशि इशारा होइत देखि कक्का बुझि गेलखिन। मकैक लावा जेकाँ बत्तीसो दाँत छिटकबैत बजलाह- ‘धरमागती पूछी तँ भौजी एते भारी काज- जे ने खाइक पलखति होइत छल आ ने पानि पीबैक। तीनि राति एक्को बेरि आँखि नहि मुनलौं। मुदा सरहोजिकेँ धन्यवाद दिअ जे घिरनी जेकाँ दिन-राति नचैत रहलि। ओते फ्रीसानी रहए तइओ कखनो मूह मलिन नहि। सदिखन मुहसँ लबे छिटकैत। तेँ सोचै छी जे पाँच दिन पहुनाइ करा दिऐ।’ माए- ‘बच्चा कइए टा छैक?’ ‘एक्कोटा नहि। तीनिये सालसँ सासुर बसै अए। उमेरो बीस-बाइस बर्खसँ बेसी नहिये हेतै।’ ‘आब तँ लोककेँ बिआहे साल बच्चा होइ छै आ अहाँ कहै छी जे तीन सालसँ सासुर बसै अए।’ ‘ऐँह, हमरा तँ अपने पान सालक बाद भेल आ अहाँ तीनिये सालमे हदिआइ छी। अच्छा एकटा बात हमहीं पूछै छी जे भैया ने हमरासँ साल भरि जेठ छथि मुदा अहाँ तँ साल छौ मास छोटे होएब। अहों कोन-कोन गहबर आ ओझा-गुनी लग गेल रही।’ अपनाकेँ हारैत देखि बात बदलैत माए बाजलि- ‘सभ मिला कऽ कते खर्च भेल ?’ भैयाकाका- ‘धरमागती पूछी तँ भौजी हमहूँ कंजुसाइ केलिऐ। मुदा तैयो पाँच लाखसँ उपरे खर्च भेल। तीन लाख तँ नगदे गनि कऽ देने छलिऐक। तइपर सँ डेढ़ लाखक समान, गहना, बरतन, लकड़ीक समान, कपड़ा देलिऐ। पचास हजारसँ उपरे बरिआतीक सुआगतमे लागल। तइपरसँ झूठ-फूसमे सेहो खर्च भेल।’ ‘एते खर्च केलिऐ तखन किए कहै छिऐ जे हमहूँ कंजुसाइ केलिऐ?’ ‘देखिओ भौजी, हमरा दस बीघा खेत अछि। तेकर बादो कते रंगक सम्पति अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल। अइ सभकेँ छोड़ि दै छी। खाली खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाममे दस हजार रुपैये कट्ठासँ लऽ कऽ साठि हजार रुपैये कट्ठा जमीन अछि। ओना सहरगंजा जोड़बै तँ पेंतीस हजार रुपैये कट्ठा भेल। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहन नहि अछि जेकर दाम चालीस हजार रुपैये कट्ठासँ कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाबसँ जोड़ै छी तँ आठ लाख रुपैये बीघा भेल। दस बीघाक दाम अस्सी लाख भेल। तीनि भाइ-बहीन अछि। हमरा लिये तँ जेहने बेटा तेहने बेटी। अनका जेकाँ तँ मनमे दुजा-भाव नै अछि। आब अहीं कहू जे कोन बेसी खर्च केलिऐ।’ बातक गंभीरताकेँ अंकैत माए बाजलि- ‘अहाँ विचारे बेटीक विआहमे कते खर्च बाप कऽ करै चाहिऐक?’ भैयाकाका- ‘देखियौ भौजी, जे बात अहाँ पुछलहुँ ओकर जबाब सोझ-साझ नहि अछि। किऐक तँ जते रंगक लोक आ परिवार अछि तते रंगक जिनगी छैक। मुदा अनका जे होउ, हमरा मनमे ई अछि जे बेटा-बेटी एक-रंग जिनगी जीबए। मुदा समस्यो गंभीर अछि। धाँइ दे किछु कहि देने नहि हेतै।’ ‘एते लोक सोचै छै?’ ‘से जँ नहि सोचै छै तेँ ने एना होइ छै। जँ अपने कोनो बात नहि बुझिऐ तँ दोसरसँ पूछैयोमे नहि हिचकिचेबाक चाही।’ कामिनीक विआह लालाबाबू संग भेल। जेहने हिरिष्ट पुष्ट शरीर कामिनीक तेहने लालबाबूक। दुनूक रंगमे कने अन्तर। जहिठाम लालबाबू लाल गोर तहि ठाम कामिनी पिंडश्याम। ने अधिक कारी आ ने अधिक गोर, जाहिसँ दाइ-माएक अनुमान जे किछु दिनक उपरान्त दुनूक रंग मिलि जाएत, अर्थात् एकरंग भऽ जाएत। विआहक तीन मास बाद लालबाबूक बहाली कओलेजक डिमोंसट्रेटरक पदपर भेल। नोकरी पबितहि सासुरेक दहेजबला रुपैयासँ दरभंगामे डेढ़कट्ठा जमीन कीनि घर बना लेलक। गामसँ शहर दिशि बढ़ल। जाहिसँ जिनगीमे बदलाब हुअए लगल। एक दिशि बजारु आधुनिकता जोर पकड़ै लगलै तँ दोसर दिशि ग्रामीण जिनगीक रुप टूटै लगलै। रंग-विरंगक भोग-विलाशक वस्तुसँ घर सजबै लगल। पाइक अभावे ने बुझि पड़ैत। किऐक तँ भैयारीमे असकरे। तेँ गामक सभ सम्पति बेचि-बेचि आनए आ मौज करए। मिथिला कन्या कामिनी। तेँ पतिक काजमे हस्तक्षेप नहि करै चाहैत। पति-पत्नीक बीच ओहने संबंध जेहेन अधिकांशक। शिक्षाक स्तर खसल। अजाति सभ सरस्वतीक मंदिरमे प्रवेश केलक। जहिठाम प्राइवेट टयूशन पढ़ाएब अधलाह काज बुझल जाइत छल, से प्रतिष्ठित भऽ गेल। परिणाम भेल जे टयूशनकेँ अधलाह आ पाप बुझनिहार शिक्षक स्वयं मूर्खक प्रतीक बनि गेलाह। अवसरक लाभ अज्ञानीकेँ बेसी भेलै। पाइ-कौड़ीबला लालबाबू कोना नै अवसरक लाभ उठबैत। बीसे हजारमे एम.एस.सी. फिजिक्सक सर्टिफिकेट कीनि लेलक। विश्वविद्यालयोमे कानून पास केने जे नवशिक्षकक बहालीमे कओलेजक डिमोसट्रेटरकेँ प्राथमिकता देल जाएत। लालोबाबू फिजिक्सक प्रोफेसर बनि गेल। हाइ स्कूल वा सरकारी ऑफिस जेकाँ प्रोफेसरकेँ ड्यूटियो नहि। सालमे कओलेज छह मास बन्ने रहत बाकी समयमे कहियो ड्यूटी होएत कहियो नहि होएत। तइपर सँ अपन सी.एल. आ मेडिकल पछुआइले। पाँच बर्ख बीतैत-बीतैत लालबाबूक माए-बाप मरि गेल। मरने लाभे। घरारी धरि बेचि कऽ बैंकमे लालबाबू जमा कऽ लेलक, । मुदा एकटा बात जरुर केलक, ओ ई जे घरारीक रुपैआ - घरारीक दाम अखनो मिथिलांचलमे अधिक होइत, कारण नञि बुझै छी- सँ पाँचटा आलमारी आ जते किताबसँ आलमारी भरत, ओते किताब जरुर कीनि लेलक। एक तँ पाइक गर्मी दोसर किताबक गर्मी, अध्ययनक गर्मी नहि देखलाहा गर्मी- सँ लालबाबूक मति ऐहेन बदलि गेल जेहेन ठंढ़ा पानि आ ठंढ़ा दूधसँ चाह बनैत। अखन धरि छह बर्खमे दूटा सन्तान सेहो भेल। अपन दुनियाँक बीच कामिनी नचैत तेँ लालबाबूक जिनगी कोना देखैत ? दोसर उचितो नहि किऐक तँ हर युवा आदमीकेँ अपन जिनगीक बाटपर नजरि राखक चाहिऐक। साँझू पहर लालबाबू होटलसँ सीधे आबि कोठरीमे कपड़ा बदलै लगल। देहक सभ कपड़ा उताड़ि लेलक। उपरसँ लऽ कऽ भीतर धरि शरीरमे आगिक ताव जेकाँ लहकैत। पंखाक बटन दबलक। मुदा भगवानक मूर्तिक आगूक जे कोठरीक दिवारक खोलियामे रखने छल, बौल जरौने बिना अपन कोठरीक बौल कोना जरबैत। तेँ पहिने ओ बौल जरौलक। मुदा मूर्तिक आगू बौल जरौला बाद अपन कोठरीक बौल जरौनाइ बिसरि गेल। पियाससँ कंठ सुखैत। मुदा टंकीपर जाइक डेगे ने उठैत। लटपटाइत। कहुनाकेँ कुरसीपर बैसल आकि टेबुल तरक जगपर नजरि पड़लै। दिनुके पानि। जग उठा पानि पीलक। जग रखि कुरसीपर अंगोठि मने-मन अकासक चिड़ै हियासय लगल। उड़ैत मृगनयनीपर नजरि गेलै। कओलेजक छात्रा मृगनयनीकेँ किछु देर देखि पत्नी कामिनीपर नजरि देलक। मनमे उठलै दू बेटीक जिनगी। फेर मन देखलकैक चहकैत मृगनयनी। निर्णय केलक जे अपना घर मृगनयनीकेँ जरुर आनब। रसे-रसे मन शान्त हुअए लगलै। दोसर दिन कोर्ट होइत लालबाबू मृगनयनीक संग घर पहुँचल। मृगनयनीकेँ देखि कामिनी घबड़ाएल नहि। मन पड़लै दादी मूहक सुनल खिस्सा। तेँ पुरुखक लेल दूटा पत्नी होएब कोनो अधलाह नहि। अपन दुनियाँमे मस्त। काजक कोनो घटती नहि, कनी-मनी बढ़तिये। तेँ जुआनीक आनन्द कामिनीमे। विआहक आठ बर्ख वाद जे लालबाबू डिमोसट्रेटरसँ प्रोफेसर बनल, ओ आइ स्त्रीक खिलौना बनि गेल। ऐहन-ऐहन लोकक कते आशा। आठ बजे साँझ। बजारसँ दुनू परानी मृगनयनी आ लालबाबू मोटर साइकिलसँ उतड़ि कोठरीमे पहुँचल। अगल-बगलक कुरसीपर बैसि ब्राण्डीक बोतल निकालि टेबुलपर रखलक। मुदा टेबुल कहऽ चाहै जे ‘भाइ सोझा-सोझी बेइज्जत नञि करह, हम किताब रखै बला छी, नञि कि बोतल। मुदा बेचाराक विचार, मिथिलाक कन्या जेकाँ, तेँ सभ कुछ सहि लैत। जहिना राज-दरबारमे मिथिलाक राजा जनककेँ जननिहार पंडित सहि लैत। असेरी गिलाससँ दुनू बेकती एक-एक गिलास ब्राण्डी चढ़ा अपन दुनियाँमे विचरण करै लगल। प्रश्न उठल कामिनीक। मृगनयनी- ‘हम्मर एकटा विचार सुनू।’ ‘बाजू।’ ‘पत्नीक सभ सुख जँ एक पत्नीसँ पूर्ति हुअए तखन दोसर रखबाक की जरुरी?’ ‘कोनो नहि।’ ‘तखन सौतीन कामिनीकेँ रखि की फएदा? कने गुम्म भऽ लालबाबू सोचै लगल। मन पड़लै कामिनी। निस्सकलंक, स्वच्छ, कोमल-कोमल पंखुड़ी गंध युक्त कामिनी। दोहरा कऽ मृगनयनी बाजलि- ‘बस, ईएह पुरुखक कलेजा छी। कामिनीकेँ रस्तासँ हटाएब हम्मर जिम्मा भेल।’ मृगनयनीक रुप देखि विधातो अपन गल्तीपर सोचितथि। जे नारी-पुरुषक बीच जेहेन थलथलाह पुल बनोलिऐ तेहेन नारी-नारीक बीच किअए ने बनोलिऐ । मृगनयनी आ लालबाबूक दुनू गोटेक बीचक बात कामिनीओ सुनैत। जहिना मृगनयनीक करेजमे कामिनीक प्रति आगि धधकैत तहिना मृगनयनियोक प्रति कामिनीक करेजमे आगि पजरि गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत ओ कामिनीक घरसँ निकलि जाएब नीक बुझलक। किऐक तँ तीन जिनगीक प्रश्न आगूमे आबि ठाढ़ भऽ गेलै। तहूमे दूटा ओहन जिनगी जे दुनियामे अखन पएरे रखलक अछि। चुपचाप कामिनी अपन रहैबला कोठरी आबि दुनू बेटीकेँ एक टक देखि, छह बर्खक रीताकेँ पएरे आ तीन बर्खक सीताकेँ कोरामे नेने घरसँ निकलि गेल। मनमे आगि लगल, तेँ कोनो सुधि-बुधि नहि। स्टेशन आबि कामिनी ट्रेन-गाड़ीक पता लगौलक। चारि घंटाक बाद गाड़ी। दुनू बच्चाक संग ओ प्लेटफार्मपर गाड़ीक प्रतीक्षामे बैसि रहलि। मनमे अनेको रंगक प्रश्न उठै लगलैक। मुदा सभ प्रश्नकेँ मनसँ हटबैत एहि प्रश्नपर अॅटकल जे, जे माए-बाप जन्म देलक ओ जरुर गरा लगौत। जँ नहि लगौत तँ बड़ी टा दुनियाँ छैक, बुझल जेतैक। तेँ सभसँ पहिने माए-बाप लग जाएब। डेढ़ बजे रातिमे गाड़ी पकड़ि, दुनू बच्चाक संग भोरमे अपना नैहरक स्टेशन उतड़ल। भुखे तीनू लहालोट होइत। मुदा ऐठामक नारीमे तँ सभसँ पैघ ई गुण होइत जे धरती जेकाँ सभ दुखकेँ सहि लैत। मुदा दुनू बेटीक मूह देखि चिन्ताक समुद्रमे डूबै लगल। की ककरोसँ भीख मांगि बच्चाकेँ खुआबी ? कथमपि नहि। की बच्चाक जिनगीकेँ एतै अन्त हुअए दिऐ ? अपन साध कोन। मुदा नाना ऐठाम तक पहुँचत कोना ? जी जाँति कऽ एकटा मुरही-कचड़ीक दोकानपर कामिनी पहुँचि मुरही बेचइवाली बुढ़ियाकेँ कहलक- ‘दीदी, हमर नैहर दुखपुर छी। ओतै जाइ छी। दुनू बच्चा रातिमे खेलक नहि, तेँ भुखे लहालोट होइ अए। दू रुपैआक मुरही-कचड़ी उधार दिअ। काल्हि पाइ दऽ देब।’ बिना किछु सोचनहि-विचारने बुढ़िया बाजलि- ‘बुच्ची, तोरा पाइ नञि छह, तेँ की हेतै। हमरो एहेन-एहेन चारि गो पोता-पोती अछि। हम बच्चाक भुख बुझै छिऐ।’ कहि दुनू बच्चाकेँ मुरही-कचड़ी देलक। तीनू खा कऽ विदा भेलि। कामिनीक नैहर पहुँचैत-पहुँचैत सूर्य एक बाँस उपर चढ़ि गेल। दुखपुरक दछिनवरिया सीमापर एकटा पाखरिक गाछ। पाखरिक गाछसँ आगू बढ़ैक साहसे ने कामिनीकेँ होए। गाछक निच्चामे बैसि ठोह फाड़ि कनै लगल। दुखपुरक सइओ ढ़ेरबा बचिया घास छिलैत बाधमे। कामिनीक कानब सुनि सभ पथिया-खुरपी नेनहि पहुँच गेलि। दुनू बच्चाकेँ दू गोटे कोरामे लऽ कामिनीकेँ संग केने घरपर आइलि। २.२.१.परमेश्वर कापड़िकथा- धुमगज्जर २.आशीष चमन- कथा- पछता रोटी ३.प्रेमशंकर सिंह-जयकान्त मिश्र जीवन आ साहित्य–साधना १.परमेश्वर कापड़िकथा- धुमगज्जर २.आशीष चमन- कथा- पछता रोटी ३.प्रेमशंकर सिंह-जयकान्त मिश्र जीवन आ साहित्य–साधना –परमेश्वर कापड़ि -धनुषा, नेपाल नामीगरामी वंशक कहबैका– बड़ैता लोक छथि डागडर साहेब । मैथिली विभागक पहुँचल प्रोफेसर । ई आओर बात जे जतेक छथि नइँ, ततेक देखबऽ लेल अफसियाँत रहैत छथि । बपौती धनक बले घाँटी बजबऽमे कानोे चुक– कोताही नहि करैत छथि । ताहूमे एमरी शहरक तीन कठबा ओऽऽ खुआखानि घराड़ी बिकाएल छैन्हि । धन दंरभंगा के दोहरी अङा रहबे करतनि । से एहि शुद्धि लागनमे हिनकर छोटकी दुलरी ननकिरबीक कन्यादान छन्हि । एहि बेर अगौते नियार भेलै जे बरियातीके भोजन बास्ते अपना हाथक, अपन आँखिक देखल शुद्ध नीक माँउस खातीर किछु पूर्वे खँसी कीनिली । तऽ से कैला तऽ असल भितरिया बात रहै जे हिनकर पड़ोसिया पैकारके खँसी रहै आ गप्पसप्प दऽ कऽ नफगरे माल बेचऽ लाथे उन्टा–सुन्टा पढ़ा अन्हरझौली मारि देलकैन्हि । दू ढौैआक खँसी तीनमे किना अपन सुरखुरु भऽ गेल फेरहा । तहूमे कि तऽ रहनि खगता दू गोट खँसिक तऽ घटी–बेसी लेल तीनटा बेसहि लेलाह । नइँ कहू बरियातीके कनिको कमि गेलै तऽ नाहँसी आ सोहरा भऽ जाएत तैला जैं चालीस तैं घपचालिसो रहओ । तिरपित नेहाल डागडरनी खँसीके आबऽ बला बरियातीयोसँ बेसीए ध्यान देबऽ लगलथिन्ह । कोनो उपेक्षा कोताही नइँ हुअ पाबए । आबऽला तऽ अएलै हेंड़े किनाकऽ आब भऽ गेलै गराक घेघ – एकरा चराएत–बझाएत के ? कनिके कालमे ततेक ने झौहरा– अंकाल कएलक जे डागडर साहेबके टेन्शन बढ़ऽ लागलनि । टहलनी कहलकै – मर, अपन दूध उठओनाबाली हएबे करै । चराओन पोसान ओ.करे दऽ दियौन । उहे चरा–बझाकऽ पोसतै । बड़ बेस बड़ बढियाँ, शुभ–शुभकऽ नीक जेकाँ पक्का–पक्की गछा खरियारिकऽ ओकर जिम्मा लगाओल गेल । गम्हरियाबाली दूधबालीक सैंझली ढ़िलही बेटी गछने छलै– ओकरा बास्ते सेहो किटुआ पोसान छुटिया देल गेलै । खँसी पिच्छे दू–चारि मुट्ठी चाउर, बदाम भुजा बास्ते अलगसँ सेहो । भुजा भूजऽला आमक ढेङ जरना ला भेटलै । ढिलही माइ आबले बलैया नितराए लगली– गे माइ, अगबे चाउर दालि देने तऽ पेटमे चलि जएतै । जौले रिहन्तै नइँ तौले खएते केना ? मर तेकरो ला भनसिया चाही । ओहि भनसियाकेँ पेटपर लात हिनका आउरके मारल जएतनि ? हे लिअ भेल दू पसेरी चाउर अहूँक े। गुड़िया बियाहमे अहुँ जै सँ प्रसन्ने रही। गम्हरियाबाली सतखेलिया रहए, असली घैंहरि खेलाड़ि । खँसीके बूझऽ लागलि गोनू बाबूक बिलाड़ि । दिन दशो नइँ बीतल हएतै कि दौड़ल आएल हबेलीमे । गुड़िया माय हपसले बहरएली महखरसँ –यैे गम्हरियाबाली । खँसीक कया–समाङ नीके ना अइ ने । दुर कि नीक रहतै । पहिलका बान्हल खुटेसल खँसीकेँ पेट बैठल रहै । तैला खखाएले अहगरेसँ छौड़ियासभ लपेलप भुजाभरी देलकै से आब पेट–मुँह चलै है । से सूनिते हहाएले गेलीह डागडरनी गोसाइ घर– हे भगवती ! केहन भाग करम भऽ गेलै एहि छौड़ियाके से नइँ जानि । ओइ दिन गहुम पीसबऽ गेलै तऽ आटे दोखरा रहि गेलै । दहीक खोर पौड़बला जेकरासँ साइ गछाकऽ अएलै तेकर महिसे दू दिन रहिकऽ बिका गेलै । केहुनाकऽ खँसी बचाकऽ भरमा इज्जति बचादा हो देवता पितर । जिउके बदलामे झाँप आ सभटा नीकेना सिद्ध भऽ जएतै तऽ पातरि सेहो देबऽ हे गोसैंयाँ । मर अइमे देवता पितर की करतै– गम्हरीयाबाली एहन समधानल चोट ठोकि े देलकनि जे छिलमिला गेलीह गुड़िया माय – जे करत सेैे बैदा ने करतै । सुइया–दवाइ दिअएबै तैसँ ने ठीक होतै । नइँ तऽ झाँप पातरि पड़ले रहिजाएत आ खँसी जाएत टिङ। –हे देवता पितर नामे एखन एहन कुभाख नै बाजू । – हे अब दबे–दारुसँ मालो–जाल ठीक होइ छै । गेठरी खोलू हम चलब । फिस आ दबाइमे सवा सात सय खरच भऽ गेलनि । डागडर साहेब उसास फेरलनि – मर बंहि , ढौओ लागिकऽ केहुना खँसीक बलाय तऽ टरल । चिकबा लुचैया नदाफक सलाहे खँसीके एक–आध चम्मच घीउ उठौना शुरु भेेल । एहिसँ खँसी एबरसँ दोब्बर भिसिण्ड लगले भऽ गेल । दिनके बितैत देरी नइँ लगलै । धराएल शुभ दिनमा भल अएबे कएलै । उँजबड़ेड़ा आ भीड़ भरक्काक बरनेमा नइँ । सख–सोहर लेनदेनके लेखा–जोखा नइँ । पाल–पण्डालके कोन खेरहा । मुज्जफरपुरके ऊ नामी हलुवाइ मिठाइ बनबऽ बला, जनकपुरके बढ़का स्टार होटलके “कूक” खाना बनबऽ बला आ काठमाण्डू मीट हाउसक भनसीया स्पेशली माछ–मँाउसके परिकार बनबऽलेल मंगाओल गेल रहै । एम्हर तरुआ–बघरुआ, तिलौरी, दनौरी, बड़ी–कढ़ी बास्ते गाम गमैतक बूढ़ पुरैनियाँ सभ रहबे करथिन्ह । ठाम–ठाम भिडियो कैमरा चालू रहै । एकदम सिनेमा माफिक । जेकरा नहियो काम रहै सेहो अफसियाँत, कैला तऽ भिडियो सिडीमे देखार होएब । रातिमे मन माफिक रंग–विरंगक मधुर मिष्ठान संगे माछक व्यबस्था रहै । माछ रहे से देख पड़ोसनी जैर मरऽ बला । बीस–बीस किलोकेँ । बनबऽ कालमे दू–दू पट्ठा जुआनके सम्हार नइँ धरै । ओकर बनौनाइ देखबऽलए भिडियो कैमरा एकदम रेडी । धन कही सुखरा मलहबाक पहलमनमा बेटा सोंसियाके जे े माछा काटि बना देलकै । दैव रे दैव माछ रहौ कि बनेल से नइँ जानि, सोसिया मलाहके कएल खेती गमल बात रहै तँए बना सकलै नइँ तऽ नइँ बैनतै । मुड़ा निकलै पँँच–पँँच किलोके आ कुटिया याह–याहटाके खाइतकाल एक छोड़ि दोसर कुटिया कोनो बरियतिया नै गछनि । सौसे मुरा एक्केगोटा लेलनि । तिनको सोसै नइँ अघरलनि । बिहान भने भतखइमे माउस एकदम अलेल । डब्बुके लकऽ परसल गेल । घरबैयाके होइ जेना माउससे तोइपकऽ तऽरकऽ दी । खनाइसँ इज्जती बढ़ै छै । जेहन भोज तेहन मान प्रतिष्ठा । बराइ आ परशंसासँ डागडरो साहेबके बराती निहाल कऽ देलकनि । आब गच्छ अघाएल बरियाती ढेकारसंग मुँह प्रशंसा करऽ लगलथि । –नै विलक्षण । गच्छ अघाएल बराती अछिनरे रहलै । –हँ तऽ काल्हियो आ आइयो मधुर मिष्ठानसँ थैहर–थैहर कऽ देलथिन । माछ–माउस अनपूछे रहलै । जहिना परसऽमे उपरौंझ तहिना बड़ाइ प्रशंसामे रहलै । अघएला उत्तर मूल्याङ्कन किछु गोटे खोदवेदक रुपमे शुरु कएलनि । –नइँ–नइँ बड़ बेस, बड़ बढिंयाँ रहलनि । खाली माछ बेसी जुआएल छलनि । व्यग्र डागडर साहेबके पछताबा हुअ लगलनि– केहन हम रजिनराके बात नइँ मानि सेरिए– असेरी माछ किनने रहितहुँ तऽ आइ ई खिधान्स नइँ होइत । –ततबे, कुटिया कने छोटछोट रहितनि । –कने तरल झूर छलनि । घरबैयाके होइक सभ बूरल आ से भनसिया कारणे । सरबेके बोइने काटि लेबनि । – इह । माउस कनेे बेसिए सीझल रहनि । एकगोटे व्यंगसँ बजलाह – से नइँ बूझल गेलै । स्पेशल भनसिया भेने एहिना होइ छै । खाएला तऽ हमहुँ खएबे कएलियै । पाइ लागल रह,ै धरि एते तऽ अबश्य कहब जे खसी बेसी तेलाह रहैक से कोनो खास स्वाद नइँ रहैक । जतेक मुँह ततेक छेद । डागडर साहेब झाम घुरैत मथाहाथ दैत सभ कएल–धएल अकारथ गेल । ओहिमे एकगोटे एहन बरियाती रहथि जे वरपक्षके नइँ रहथि । खाली अइ दुआरे मार्कण्डेय झा जीके लाएल गेल रहनि जे हुनकर कामे रहनि बहुते खाएब । चूड़ा दही भेल तऽ अढ़ैया चूड़ा, खोरभरि दही, बिन ढेकारेके देख देताह । खाएल–पियलपरसँ साठि–सत्तरि रसगुल्ला देखि देताह । आम महिना चालीस–पचास आम उठितो–उठितो गींर जएता । से पुरुष अहू बरियातीमे खएनाइए देखऽ वास्ते मङाओल गेल छलाह । ओ देखहि जोग खएने छलाह । ई दिगर बात जे भोजमे हुनकर मन नइँ भरलनि । खौंझाएल मार्कण्डेय खिन्न होइत बजला– हँ कहऽ तऽ पड़लै जे नीके खएनाइ रहनि । मुदा मन पछताइए जे कएक ठामसँ बरियातीमे खाए चल लए बजाहटि आएल रहए । ओम्हर गेल रहितहुँ तऽ पछताए नहि पड़ल रहितए । एहि बीचमे, एकगोटे जे खाइतकाल हुनकर बहुत रास फोटो खिचने रहथि से देखा देलकनि– देखियौ तऽ फोटोमे अपने केना–केना कते–कते खएने छियै । अएना जेकाँ आब फोटबो बजै छै साँच, से देखि भड़कि गेला मार्कण्डेय – रौ साऽऽर, ऐमे हमरा बजनियाँ के बना देलक ? लोको उत्सुकतासँ फोटो देखऽ लागल तऽ देखलक जे ई दुनू हाथे कोकाकोलाके जे बोतल पिबैत छथि से फोटोमे बुझाइक सहनाइ बजबै छथि । चौल करैत एकगोटे बजला – होउ आब इएह फोटो देखा–देखा साइयो बान्हब । – आऽरौ बहिं, से ओतबे, के ने के याहटाके बेढब मूड़ा हमरा पातपर राखि देलक । – होउ तऽ एहन मूड़ा आनठाम कतौ देखनहुँ ने हएब तकर प्रमाण भेल । माने कि जे से, कि जेसे सेहे रहितै तऽ नीक । ओइमे तऽ हमरा मरपर लुधकल सनके बुझाइए । –छीया–छीया । आरे बापरे बा, अन्हेर कएलक ई सभ मार्कण्डेय जी ! अहाँके तऽ गया–गांग लागल । होउ धोती जनउ जल्दीसँ बदलु आ गंगाजली छीटि शुद्ध होउ । आशीष चमन मूल नाम- आशीष कुमार मिश्र पिता-श्री सच्चिदान्द मिश्र अधिवक्ता जन्मतिथि-7 जनवरी 1973 टीचर्स क्वाटर, जिला गर्ल्स हाइ स्कूल सहर्षा। योग्यता- बी.ए. (प्रतिष्ठा) राजनैतिक कार्य कलाप- प्रारम्भ मे S.F.I के संयुक्त सचिव, पुन: अ.भा.वि.प. के कार्यालय एवं बौद्धिक प्रमुख, विहिप के नगर मन्त्री, पश्चात् राजनीतिसँ मोहभंग। सामाजिका सांस्कृतिक गतिविधि- सांस्कृतिक चेतना समिति के संस्थापक सचिव आ एहि बैनर सँ प्रायः- दुइ दशक बाद सुपौल मे विद्यापति पर्व समारोहक संचालन, प्रलेस के जिला सचिव, विप्लव फांउडेशन के सचिव आ एहि बैनर के तत्वावधान मे नागार्जुन जयंती, सगर राति दीप जरय के आयोजन। वृति:— कौलिक दबाइ व्यवसायक सफल संचालन किन्तु आपसी कलह के कारण निष्कासन, पुन: जीविका हेतु अनेक जगह छिछियाएब आ पूर्णत: द्ररिद्र बनलाक बाद लघु उद्यम सँ पारिवारिक पोषण । लेखन: 1984 सँ सक्रिय आरंभ मे कविता बाद मे हिन्दी कहानी लेखन आ परती पलार संवदिया आदि मे प्रकाशित पुन: मैथिली मे लेखन आ भारती मंडल मिथिला चेतना, घर बाहर, कर्णामृत प्रवासी मैथिल, अंतिका आदि अनेक पत्रिका सभ मे प्रकाशित वर्तमान पता:-द्वारा सच्चिदानन्द मिश्र अधिवक्ता चकला निर्मली सुपौल जिला-सुपौल बिहार मोo 9199062081 पछता रोटी ‘की रौ भीम ! मोटरसाइकिल सभक बहु भीड़ देखैत छियैक....’’ गजीन्दर बाबूक ओहिठाम करमान लागल लोक सभकेँ देखैत ओ पुछलकैक ....ओहिकाल भोरूक लगभग छओ बजैत छलैक....। ’गजीन्दर बाबू मरि गेलथिन....’। ओंघाएल स्वरेँ भीमा उतारा देलकैक। ओकर बढ़ैत डेग अकस्तात् रूकि गेलैक आ अनायास मुँह सऽ निकललैक-‘अँय कखनि....आ की भेल छलनि हुनका? ‘की भेलैक? किछुओ नहि, राति मे केहन बढि़या छलथिन, किन्तु अकस्मात्। भीमा पूर्ववते जेकाँ बाजल। ई कने काल लेल गुम्म पड़ि गेलैक। ओम्हर भीमा केँ ओहिठाम सँ जल्दी हटबाक हलतलबी छलैक मुखाकृति पर एकरा उद्वेग तकरा ओ दबने छल-, किन्तु ओ पहिने कोना हरितऽ चमन भैया ठाढ़ छथि अपना सँ दस पनरह बरखक जेठ। ओकर आतुरता केँ पारेख करैत ई ओतऽ ससरि कऽ चलि गेलैक जतऽ दुइ जन अपना मे बात करैत सिकरेट धुकैत छलैक, ओतऽ ई सहारे कऽ देखलैक, भीमा मनोयोग पूर्वक भरि रातुक संचित लग्धी केँ बहार कऽ रहल छलैक, एकरा निवृत्तिक भाव केँ अपन चेहरा पर पसारने । ’ओ स्वाइत!’ ओ मोनहि-मोन बाजल आ आगाँ चौबटिया दिशि बढि़ गेल। चौबटिया, लग आबल जा रहल छलैक- ओकरा अजय चौधरीक ओहिठाम जयबाक छलैक। अजय चौधरी पानमसाला, सिकरेट सभक फेरिया छल जे साइकिल पर माल लादि गामे-गाम आ हाट-बाजार सभ मे बौआइत रहेक, किन्तु किछु लक्ष्मी कृपा आ किछु जन्मजात वाणिक बुद्धि एहि दुनुक संयोग सँ ओ दुइये-तीन बरख मे कमा कऽ टाल लगा देने छलैक....। ओ ओकरे लग जा रहल छल उपेक्षा आ बेकारी भरल जिनगी सँ त्राणण्यबा लेल, किछु राय विचारक हेतु अपन पुरान जान-चिन्हक संचित निधि लऽ कऽ। ओ भरि रातुक संकल्प लऽ कऽ भोरे चलल छल जे प्रात-काले ओकरा सऽ भेंट भऽ सकैत अछि, भरि दिन तऽ ओ पतनुकात धयने रहैत अछि। ओकर मोन मे विभिन्न प्रकारक विचार उठि-बैसि रहल छलैक। ‘गजीन्दर बाबूक मृत्यु....,तीन टा लड़का दुइटा तऽ बड्ड कमबैत छैक मुदा जेठका कने गड़बड़ा गेलैक- तकरा सम्हारक लेल ओ दोकान खोलि देलथिन-ओना दोकान पहिनो दुइ-दुइ बेर खोलल गेल छलैक मुदा तकरा ओ खा पका नेने छलैक.... तेँ एहिबेर ओ-स्वयं बेसीकाल बैसथि....एकटा आशा तीन फूके चानीक-ओवर बेटा माने अपन पोता केँ ओ मोट डोनेशन दऽ कऽ राँचीक इस्कूल मे भर्ती करौलनि-बेटा नहि तऽ की भेलैक पोते सुतरि जाइक-एकरा मृग-मरीचिका....। ओ आब चौबतिया लग आबि गेल छलैक भोरूका पहर मे चाहक दोकान पर भीड़ कने बेशीये रहैत छैक ओ सोझे आगाँ बढि़ गेलैक आ थोड़े दूरक बाद एकरा गली होइत अजय चौघरीक घर लग आबि गेलैक....। ‘की यौ चाचा जी! अजय बाबू उठलाह....?’ अपन स्वर मे चीनीक चाशनी सन घोरैत ओकर शिक्षक पिता सऽ पुछलकैक....। ‘अबह आबह! अजय लैट्रिन मे छैक....। ई कहि गृहपति ओहिठाम पहिने सऽ बैसल आन लोक सभ सँ गप्प करय लगलाह....। एकरा पेट मे खलबली छलैक- ‘गजीन्दर बाबूक’ घर सऽ ई घर आधा माइल पर छैक आ एतेक भोर मे ई घटना एकरा सभकेँ तऽ नहिये टा बूझल होयतैक....। ओ चर्चा करऽ चाहैत छल गजीन्दर बाबूक असामयिक निधन करि। हुनक शिक्षक संघक विषय मे, हुनक व्यक्ति व ओ कृतित्वक चर्चा कऽ ओ स्वयं ओहि दरबज्जा पर बैसल समस्त लोकक केन्द्र-बिन्दु बनऽ चाहैत छल....लोक सभकेँ चौकाएब अचंभित करय चाहैत छल- ‘अँय कखनि मुइलाह गजीन्दर बाबू? आ हा-हा-केहन स्वस्थ लोक रहथि ....भगवानक लीला अपरम्पारक कहू चमनजी अहाँ कखनि बुझलहु आदि आदि....। ओ, बाजब शुरू कयनहि छल कि दीर्घ-श्वास छोड़ैत गृहपति बाजि उठलाह-‘ की करबहक ओहिना होइत छैक....बड्ड नीक लोक छलाह....शिक्षक समुदायक बड्ड पैघ हितैषी....,हुनक देहावसान सँ हम सभ लोक बड्ड मर्माहत छी....। ’के मुइलाह? ‘उपस्थित लोक-सभ मे सँ एक गोटे पुछलथि। ’अरे वैह मास्टरसाहेब ने रातिए....।’ दोसर गोटे यन्त्रवतद्य सन बाजल....। अच्छा तऽ वैह ने....।’ ‘अच्छा तऽ ई बात एकरा सभ सँ हमरा पहिने बुझल छलैक आ एकटा नव गप्प ई जे गजीन्दर बाबू भोर मे नहि अपितु रातिए मुइलाह....ई खबरि एकरा सभक लेल आब बासी भऽ गेलैक अछि....।“ओ सोचए लागल....। ताऽ धरि अजय आबि गेल छलैक....। ओतए सँ घुमलाक बाद ओ पुन-चौबटिया लग ठाढ़ भऽ गेलैक....। चाहक दोकान लग आब भीड़ बेसी भऽ गेल छलैक। एकरा नेता सन लोक-चाहक मफाएल गिलास धऽ कऽ भाषण झाड़ि रहल छलैक मुदा महगीक छैक आ केन्द्र सरकारक पतन के भविष्यवाणी सेहो-आगाँ, के सरकार बनाओल तकरा पर विचार-विमर्श चलि रहल छल। मोहल्लाक एकरा पैघ व्यक्तिक मृत्यु पर कोनो चर्चा नहि भऽ रहल छलैक ओ कनेकाल ठाढ़ रहल आ फेर घुमिते चाहैत छल की लतीफ भेटलाह-‘की यौं पंडीजी! अहाँक पीसा छथि, की गाम गेलाह’? लतीफ एहि गा्मक पुरान काश्तकार अछि आ पीसा सऽ मोकदमाबाजी सेहो करैत अछि....। उत्तर देलाक बाद ओ जहाँ गजीन्दर बाबूक चर्चा शुरू कयलक तऽ लतीफ बाजि उठल-‘अल्ला हो अल्ला’! जखनि सुनलियेक तखनि सऽ भरि राति नीन्दे नहि भेलैक....। ई सुनितहि ओ आगाँ बढि़ गेल ओ अपन विचारक कड़ी केँ सोझराबऽ चाहिते छल कि ‘बड़े’ भेट गेलैक। बड़े माने अनिल झाक माझिल बेटा-ब्रेन पारालैसिसक पुरान शिकार, आब कने सुधारक संकेत देखैत छियैक ओकरा मे....। अनिल भैया ओकरा लेल चौराहा पर “सोना जेनरल स्टोर” खोलि देने छथि आ बेटाक बदला मे स्वयं बेसीकाल गद्दी पर बैसैत छथि....। ओ मजाक मे बेसीखन बजैत रहैत अछि-‘की यौ भाइ साहेब! खोललहँ बड़े के लेल आ बैसेत छी अपने....। अनिल बाबू बिझुँसैत उत्तर दैत रहैत छथि-‘की करबैक ओहिना होइत छैक चिल्हकाक लाथे चिल्हकौर सेहो....।’ बड़े राति कऽ दोकाने मे सुतैत अछि। ओ बड़े केँ सभ दिन जेकाँ एखनुहुँ सैल्युर ठोकैत अछि....। ओ ओकर स्वाभाविक मित्र अछि भातिज नहि समान धर्मा....। ओ कहि उठैत ‘अछि- ‘चचा! गजीन्दर बाबू, आ आँगुर केँ आडर केर मुद्रा मे उठा दैत अछि । ओफ्फ! तऽ ईहो बूझि गेल अछि?’ ओ पुन: घर दिशि विदा भऽ जाइत अछि। गजीन्दर बाबूक घर सऽ एकर घर कने बेसी दूर पर छैक बीच मे जनशून्यता छैक आ बसबिटारि तथा कलमबाग सेहो छैक....। ‘निश्चित रूप सँ हुनक मृत्युक खबरि घर पर नहि गेल होयताह’ ओ झटकि कऽ विदा होइत अछि कत्तहु नहि रूकबाक संकल्प लऽ कऽ–मुदा ओकर मोन पर विचार पुन-हावी भऽ रहल छैक-‘बड़े पारालौसिसक शिकार अबोध रहि गेल मस्तिष्कबला एकरा जवान मानव देह धारी, गजीन्दर बाबूक जेठ नशेरी बालक, दुनूक पिता करि अपन-अपन ओहि अक्षम सन्तान लेल भगीरथ श्रम....। ओकरा लगलैक जे गजीन्दर बाबूक नशेरी बालक आ बड़े चलि रहल अछि आ जाइत लटपटा कऽ खसि पड़ैत अछि दुनू बूढ़ पिता अपन-अपन धोती सम्हारैत दौगैत छथि आ भीजल स्वर सँ पूछि रहल छथि- ‘बाज’ चोट तऽ नहि लगलौ?’ ओ आँखि मुनने कने बिलमि जाइत अछि। फेर ओ देखैत अछि- जे ‘पुन’ ओ दुनू जा रहल अछि आब दुनूक घर पर एक-दोसराक मूड़ी लागि गेलैक अछि फेर ओहि घर पर सँ मूड़ी फिर भऽ गेलैक अछि।’ सभटा असंगत लेतरल चित्र सभ, चलचित्र जेकाँ एकर मानस पटल पर आबऽ जाऽ लगलैक....। एक दिशि गजीन्दर बाबू अनिल भैया आ दुनूक संतान, एकटा ई आ एकटा एकर बाप....? सर्वत्र, स्वरचित, कपोल कल्पित एकर अक्षमताक ढ़ोलहा पीटैत....। ओकर मोन तिवूत भऽ गेलैक, भेलैक जे ‘वैह कियैक ने अनिल झा आ गजीन्दर बाबूक बेटा भऽ कऽ जनमलैक....बस अक्षमे सही....। ओ एक बेर मूड़ी झमकारलक आ पुनः घर दिशि बिदा भऽ गेल-विचार पुन: अपन तारतम्य बैसाबऽ लगलैक- ‘ओ गजीन्दर बाबूक मृत्युक खबरि सभ सँ पहिने बाँटि, लोक केँ अचांभित करैत पहिने पत्नी केँ कहतैक....घरबाली एकरा सऽ सोझ मुँहे कहियो नहि बजैत छैक...,जेना झुरापित्ती सन उठल रहैत छैक....। ओ पत्नी केँ संमाद देतैक ओ अपन प्रकृतिक अनुरूपेँ लहोछि केँ पुछतैक- ‘के गजीन्दर बाबू’? तकरा अनसून करैत ओ बाजत-‘अरे! वैह राजाक दादा! वैह राजा जे अपन सनिक संग पढ़ैत छलैक आ आब राँची मे एडमीशन करौलक अछि....।’ पत्नी आँखि गोल करैत कहतीह-‘अच्छा तऽ ओ....? । ओ तकर बाद बुढि़या माए अर्थात् दादी लग जाएत, बूढ़ी एकरा आइ-काल्हि मछी दैत छथि....। अरे कियैक नहि, जखनि घरक मुखिया सभ नहि छलथिन तऽ वएह ने ओहि राति बुढ़ी केँ दर्द भेला पर अड़ोस-पड़ोस एक करनैत दवाइ विरोक व्यवस्था कयने छलैक....। बूढ़ी सिनेह देखबैत बजने छलथिन-‘तऽ हौ बच्चा! तोँ नहि रहितह तऽ हमर प्राण नहि बचितह....। पहिल बेर ओकरा अपन व्यक्ति व सम्पूर्ण रूपेँ सार्थक बुझना गेलैक....। जे-सें ओ बूढ़ी लग जाइत आ एहि आकस्मिक मृत्युक ओकरा हाल-चाल कहत....। तखनि दुइ-चारि आँगन मे हल्ला मचि जयतैक- ‘कखनि मुइलाह आ हा-हा....ओ....हो....तो कोना बुझलहक हौ चमन....। तखनि ओ फडि़छा फडि़छा कऽ आद्योपान्त सभ गप्प कहत आ लोक सभ ओकरा दिशि मुँह बाबि ताकत...सर्वत्त चमन, क्षणभंगुरे सही मुदा सर्वव्यापी चमन....। ई सोचैत ओ आँगन दिशि विदा भेल। ड़योढ़ी लग पत्नी छिटटा छाउर काढ़ने जाइत छलीह, ओ डुर्लास कऽ बाजल-‘अय सुनैत छी।’ पत्नी छाउरक छिट्टा उनटबैत लहोछि कऽ बजलीह-‘इह कमैनी ने धमैनी आ टहंकार केहन....एकोटा जारनि काठी ने....छओड़ाकऽ इस्कूल के भऽ रहल छैक ऊपर सऽ छओंड़ीक नंगो-चंगो....आइ ओकरा हम खून कऽ देबैक। ‘ई कहि ओ द्रुतगति आँगन गेलि आ बेटी केँ ओध-बाध उठाबऽ लागलि.... छओंड़ी चीत्कार कऽ उठलि....। एकर भीतर मे आक्रोश बिरंड़ो तांडव करऽ लगलैक तकरा दबौने ओ दादी गेलैक, आ बाजल ‘बुढि़या माँ गय। गजीन्दर बाबू....।’ बूढ़ी बात केँ बिच्चन्ह सँ कटैत बजलीह-‘हम तऽ रातिये बूझि गेल हूँ....आह केहन भद्र लोक....एकूटा हम छी....हमर बही जमराज लग सऽ हरा गेल अछि, आं आगाँक जनमल लोक सभ उठल जा रहल अछि।’ ‘अच्छा तऽ ईओ बुढि़या बुझि छल....तखनि हमही देरी सँ बुझलहुँ....सत्ते हम पिछड़ल छी-पत्नी ठीके कहैत अछि जे अहाँ पछता रोटी खयने छी....।’ ओ स्वयं केँ धिक्कारऽ लागल ओकर समस्त उत्साह आब तिरोहित भऽ गेलैक ओ अपरतीब भऽ गेलैक। तथापि बात केँ बढ़बैत बाजल-मर्र, ओ की कोनो कम उमेर के छलथिन सत्तरि सँ कदापि कम्म नहि। बूढ़ी हाथ नचबैत बजलीहा-दुर बतहा नहितक्ष । सत्तरि के तऽ इन्जीरा आ मंदाग्नि सेहो नहि अछि। ओ अपन समस्त कुण्ठा आ हतबुद्धि केँ बूढ़ी पर कुतारैत मुँह दुसलक- ‘हुँह ! इन्जीरार आ मन्दाग्नि कईक बेर कहल हूँ ले इन्दिरा आ मंदाकिनी बाजू....। बूदी प्रत्योक्रमण करैत बजलीह-‘रौ बाउ! हम नहियों पढ़लहुँ तथापि ओहि कोशीक विकराल सभटा मे छओ गोंट बच्चा सभ केँ पढ़ा-लिखा मनुक्ख बनेलहुँ जगह-जमीन आ मकान बनेलहुँ केओ धिया-पुता मुँह नहि दुसैत अछि आ एकटा काबिल तोँ छेँ बड्ड बुधियार छेँ तेँ ने ई हालाति छैक जे बापो सऽ नहि पहैत छैक क अछि आदि कहैत बूढि़ घर-चलि गेलीह। ओ हतबुद्धि भेल जड़वत ठाढ़ छल ओकर समस्त उत्साह कखनि ने बिला गेल छलैक आ ऑंखिं नोरा गेलैक....। कनेक्शन कालक बाद पत्नी आचलि आ गौर सँ मुँह देखैत बाजलि- ‘अरे आठ बजैत अछि- किछु जलखै खा लितहुँ फेर तऽ भरि दिन अहाँ केँ की करबैक काजक जोगाड़ आ टाका-पैसा कोनो अपना हाथ मे छैक की.... जहिया जे हेबाक हैतैक से तऽ हेबे ने करतैक....। ओ अपन हाथक घड़ी देखलक आ बाजल- ‘सते आइयो फेर बहु अबेर भऽ गेलैक.... ३ प्रेमशंकर सिंह जयकान्त मिश्र जीवन आ साहित्य–साधना मिथिलांचलक पावन भूमिमे कतिपय मातृभाषानुरागी जाज्ण्वलमान नक्षत्र उदित भऽ सुधी साहित्य–मनीषी अनवरत साधनारत रहलाह, किन्तु विगत शताब्दीक तृतीय दशकमे अपन अविरल साहित्य–साधना, आन्दोलनात्मक आ रचनात्मक सृजन द्वारा विश्व स्तरपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करबामे, स्वावलम्बी बनयबामे, विधिध अभावादिक पूत्यर्थ, मातृभाषाक माध्यमे प्राथमिक शिक्षा नीति लागू करयबामे सतत संघर्षरत, वैज्ञानिक आलोचनात्मक ग्रन्थक प्रणयन करबामे, शोध एवं अनुसंधानकेँ नव दिशामे, साहित्यक हेड़ायल–भुतिआयल विभूतिकेँ प्रकाशमे अनबामे, दिवारात्रि चिन्ताग्रस्त रहनिहार एक एहन दिव्य अक्षर पुरुष प्रादूर्भूत भेलाह जे अपन बहुआयामी व्यक्तित्वक प्रभावसँ मातृभाषा नुरागी निरन्तर एकर उत्थानार्थ कार्यरत रहलाह ओ रहथि प्रोफेसर डाक्टर जयकान्त मिश्र (१९२२-२००९), विगत लगधक सात दाशकक दीर्घ अन्तराल धरि अनबरत एक रस आ एक चित्त भऽ कए मातृभाषाक निष्प्राण धमनीमे नव रक्तक संचारक अभिनव साहित्यिक वातावरणक निर्माणक ओकर भरण–पोषण कयलनि। मैथिली भाषा आ साहित्य जखन अन्धकारमे टापर–रोइया दऽ रहल छल तखन अते अपन अनुसंधान द्वारा एक आलोकक रश्मि विकीर्ण कयलनि। प्रथम दर्शन मैथिलीक अध्ययन–अनुशीलनमे निरत रहबाक कारणेँ छात्रावस्थाहिसँ एहि अक्षर पुरुषक नामसँ अवगत छलहुँ, किन्तु हुनक दर्शन करबाक सुअवसर नहि भेटल छल। हिनक पहिल दर्शनक अवसर भेटल बिहारक राजधानी पटनामे जतय ओ बिहार पब्लिक सर्भिस कमीशनमे, बिहार विश्वविद्यालयक मैथिली विभागक रीडर एवं विभागाध्यक्ष एक इन्टरभ्यू देबाक हेतु आयल रहथि1 कमीशन आफिसमे हम अपन गुरुदेव प्रोफसर शैलेन्द्र मोहन झा (1929-1994)क दर्शनार्थ गेल छलहुँ। ई घटना थिक सन् 1963 ईo क जखन हम पटना विश्वविद्यालयक एम.ए. मैथिलीक अन्तिम वर्षक छात्र छलहुँ। ओतहि हुनका प्रथमे प्रथम देखलियनि आ हमर विस्तृत परिचय शैलेन्द्र बाबू हुनका देलथिन। जखन हम भागलपुर विश्वविद्यालयमे मैथिलीक लेक्चरर भऽ अयलहुँ आ शहरमे विद्यापति पर्वकेँ आयोजनमे सम्मिलित हैबाक हेतु आमंत्रित कयलनितँ ओ सहर्ष स्वीकार कऽ कए आयोजनमे अपन सारगर्भित गम्भीर व्याख्यान दऽ कए जनमानसमे मातृभाषानुरागक वीज वपन कयलनि आ सफल बनौलनि। हम जखन शोध कार्यमे तल्लीन छलहुँ तँ मैथिली प्राचीन पत्रिकादिमे प्रकाशित कतिपय रचनादिक संकलनार्थ हुनक निजी पुस्तकालय देखबाक हेतु इलाहाबाद गेलहुँ। हमर मुख्य कार्य छल हरिमोहन झा (1908–1984)क बहुचर्चित उपन्यास कन्यादान (1933) एवं द्विरागमन (1943) पर श्रीकृष्ण मिश्र (1918–1991)क एक वृहत समालोचना मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल छल तकरा देखबाक हेतु ओतय गेलहुँ। हमर शोधकेँ सारगर्भित बनयबाक उद्देश्यसँ हमर इच्छानुरूप आवश्यक सामग्री सभकेँ टाइप करबा देलनि, कारण ओहि समयमे जिराक्सक आविष्कार नहि भेल छलैक। ओ टाइप काँपी अदयापि हमर व्यक्तिगत पुस्तकालयमे स्मृतिक धरोहरक रूपमे वर्त्तमान अछि। मेथिलीक एहन सम्पन्न पुस्तकालय हम नहि देखने छलहुँ। हुनकासँ कतेक बेर भेट भेल तकर ठेकान नहि, किन्तु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं विश्वविद्यालय स्तरपर, चेतना समितिक संगोष्ठीमे, मिथिला सांस्कृतिक संगम प्रयागक आयोजनोत्सव पर तथा व्रजकिशोर वर्मा (1918–1986)क हुनकासँ भेट भेल छल (2009) पुस्तकक सम्पादनक क्रममे मैटर एकत्रित करबाक लेल सहस्राधिक बेर हुनक दर्शन आ सान्निद्ध प्रप्त करबाक अवसर हमरा भेटल तथा सतत अपन अशेष शुभकामनासँ उत्प्रेरित करैत रहलाह मातृभाषक सेवार्थ। पृष्ठभूमि हिनक पारिवारिक पृष्ठभूमिमे संस्कृतक पठन–पाठनक प्रति अगाध आस्था आ श्रद्धा छलनि, कारण हिनक पितामह महामहोपाध्याय पण्डित जयदेव मिश्र ( ) आ पिता महामहोपाध्याय डाक्टर उमेश मिश्र (1895–1967)केँ संस्कृत शिक्षणक प्रति अनुराग छलनि1 किन्तु उपर्युक्त वातावारणक विपरीत हिनक पठन–पाठन पाश्चात्य–शिक्षानुरूप पिता एवं प्रोफेसर अमरनाथ झा (1897–1955)क छत्र छायामे भेलनि कारण ओहि समय समग्र उतर भारत वर्षमे इलाहाबाद आधुनिक यूरोपियन परम्पराक केन्द्र–विन्दू छल जतय अमरनाथ झा सहश बहुभाषाविद अंग्रेजी विभागक सर्वेसर्वा रहथि। यद्यपि ओ पाश्यात्य–शिक्षा पद्धतिसँ अवश्य शिक्षित भेलाह, किन्तु हिनका हृदयमे भातृभाषानुराग एतेक बलवती छलनि जे जीवन पर्यन्त विभिन्न रूपेँ सक्रिय रहि ओकर उत्थानार्थ सतत दत्तचित रहलाह। अध्यापन प्रोफसर जयकान्त मिश्रक विलक्षण वैदुव्य आशैक्षणिक योग्यताकेँ ध्यानमे राखि मात्र 21 वर्षक अवस्थामे इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे स्टडीज एण्ड मार्डन यूरोपियन विभागमे लेक्चररक पदकेँ ई सुशोभित कयलनि सन् 1944 ईo मे1 उक्त विभागमे रीडर, युनिभर्सिटी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद पर आसीन भऽ ओ सन् 1983 ईo मे अवकाश ग्रहण कयलनि। किन्तु अवकाशोपरान्त हिनका अध्यापन कार्यसँ मुक्ति नहि भेटलनि, कारण हुनक वैदुव्यसँ प्रभावित भऽ सागर विश्वविद्यालय हुनका भिजीटिंग फेलोक रूपमे चयन कयलकनि जतय ओ सन् 1985 सँ सन् 1988 धरि कार्यरत रहलाह। एही अवधिमे अर्थात् 1986 ई मे हुनक चयन आँल इण्डिया बोर्ड फार रिसर्च एवाड इन ह्यूमैनिटीजक हेतु मैसूर विश्वविद्यालय आमंत्रित कयलक। अध्ययन–अध्यापनक प्रति विशेष अभिरूचिक कारणे हुनका पुनः आमंत्रित कयलक चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय जतय ओ सन् 1992 सँ 1994 धरि डीन फैक्लरी आँफ लैंग्वेजज एण्ड सोसल साइन्स विभागमे अध्यापन करैत रहलाह। अनुसंधान–प्रेरणा निष्प्राण मैथिली साहित्यमे नव प्राणक रचन्दन भरनिहार प्रोफेसर जयकान्त मिश्र प्रथम मैथिल सरस्वतीक वरद पुत्र प्रादुर्भूत भेलाह जे मातृभाषाकेँ जीवनदान देलनि अपन गहन अनुसन्धान द्वारा। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक शैक्षणिक पृष्ठभूमि आ अध्यापन वृत्तिमे संलग्न रहलाक कारणेँ ओ अनुसन्धानक दिशामे उन्मुख भैलाह। हिनका हृदयमे अनुसन्धानक तीव्र आकांक्षा छलनि जे हुनक अनुसन्धोत्तर कृतिक अवलोकनिसँ स्पष्ट होइत अछि1 जेँ अंग्रेजी विभागमे अध्ययनक शुभारम्भ कयलनि तेँ आवश्यक छल जे ओ उपर्युक्त विषय पर शोध करथि। एहि लेल विचार-विमर्श करबाक हेतु ओ अपन गुरुवर प्रोफेसर अमरनाथ झाक लग गेलाह। ओ अपन विचार व्यक्त कयलनि जे हम शेक्सपियरक ड्रामा पर काज करय चाहैत छी। एहि पर ओ कहलथिन ‘नहि काराक पढ़त? शेक्सपियर पर विश्वक विभिन्न भाषामे हजारो पोथी उपलब्ध छैक1 ककरो ध्यान जयतैक अहाँक पोथी पर। भारतीय छात्रों आक्सफोर्डक पब्लिकेशन पढ़त ? इण्डियन राइटरक पोथी नहि पढ़य चाहत।’ प्रोससर झाक एहन बात सुनिक ओ अवाक् भऽ गेलाह। हुनका साहस नहि भेलनि जे झा साहेबक बातकेँ काटथि। हुनकासँ ओ जिज्ञासा कयलथिन, अपने कहल जाओ जे कोन विषय पर शोध करी’। ओ कहथिन, ‘मैथिलीक काज’। ओ सन्न रहि गेलाह जे अंग्रेजी साहित्यक शोध–प्रबन्धक विषय मैथिली कोना होयत ? हुनका किछु नहि फुरलनि ओ पुन: साहसक जिज्ञासा कयलथिन, ‘मैथिली?’ डाo झा उत्तर देलथिन, ‘हँ, मैथिली! साहित्यक विषयमे अमैथिल भाषी जानकारी प्राप्त करत। अंग्रेजी भाषामे लिखल रहतैक तँ अंग्रेजीमे डी.फिल.क डिग्री प्राप्त होयत’। प्रोफेसर झा एक दूरदर्शी साहित्य–मनीषी रहथि तेँ उपयुक्त सलाह आ प्रेरणा हुनका देलथिन संगहि इहो कहलथिन जे इएह अहाँकेँ अजर, अमर आ अक्षुण्ण यशक भागी बनाओत जकर फलस्वरूप हुनक भाग्योदय भेलनि। हुनक ई अनुसन्धान वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे मैथिली आ प्रोफेसर मिश्रक हेतु एक दोसराक पर्याय बनि गेल अछि। बिनु हुनक नामोल्लेख कयने मैथिलीक कोनो कृति अनोन लगैछ। हिनक अनुसंधानात्मक कृति A History Of Matheli Literature पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिनका सन् 1948 ईo डी. फिल.क उपाधिसँ अलंकृत कयलक। पश्चात् जा कऽ हिनक कृति प्रकाशित भेल दुइ खण्डमे जे प्रकाशित होइतहि मैथिली साहित्यक अमूल्य निधिक रूपमे उदधोषित भेला कारण हिनकासँ पूर्व मैथिलीक कोनो साहित्येतिहासिक ग्रन्थ नहि छल, तें हिनक अनुसंधान मैथिलीमे अनुसंधानकेँ दिशा–बोधक अनुसन्धान कहब तँ कोनो अत्युक्ति नहि हैत। हिनक अनुसंधान मात्र मैथिलीक हेतु नहि, प्रत्युत निखिल विश्वमे आधुनिक भारतीय भाषा साहित्यान्तर्ग विशिष्ट अवदानक रूपमे चर्चित–अर्चित अछि। हिनक अक्षय अनुसन्धानक फलस्वरूप अन्यान्य भाषाभाषीकेँ बोध भेलैक जे मैथिली साहित्य एक सम्पन्न भाषा साहित्य थिक जकर क्रमवद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तेरहम शताब्दीसँ अविच्छिन्न रूपेँ चलि आबि रहल अछि1 एहि ऐतिहासिक अनुसन्धानक प्रथम खण्ड पर विश्रुत भाषा शास्त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी (1890–1977)क कथन छनि जे पथमे प्रथमे एहि भाषा साहित्यक इतिहास प्रकाशित भेल अछि तेँ ई स्वागतेय थिक1 ई श्रेय आ प्रेय हिनके छनि जे एहि साहित्यक गरिमाकेँ जन मानसक समक्ष प्रस्तुत कयलनि द्वितीय खण्ड पर प्रोफेसर अमरनाथ झा आमुख लिखलनि जाहिमे मातृभाषानुरागी साहित्य मनीषीक कीर्तिकेँ ई अवगत करौलनि। एहि पर प्रियरंजन सेन जे हुनक शोध–प्रबन्धक निर्देशक छलथिन हुनक कथन छनि जे एहि विस्तृत साहित्य गौरवमय इतिहास आधुनिकताक परिप्रेक्ष्यमे मूर्त्त रूपमे प्रस्तुत कऽ कए अत्यन्त साहसिक काज ई कयलनि अछि। हिनक गहन अनुसन्धात्मक प्रृत्तिक परिचय भेटैछ हिनक महत्त्वपूर्ण कीर्ति An Introduction to the folk leterafse of Mithila जाहिमे इ मिथिलांचलक परिसरमे उपलब्ध लोक साहित्यक विश्लेषण कयलनि अपन शोध साहित्यक संचयनक क्रममे लोक साहित्यसँ सम्बन्धित जतेक सामग्री हिनका उपलब्ध भेलनि तकरा संकलित कयलनि आ अंग्रेजीमे विश्लेषणक प्रमाणित कयलनि जे एकर समृद्धशाली विपुल; लोक साहित्य जनमानसमे छिड़िआयल अछि ताहि दिशामे अनुसंधानक प्रयोजन अछि। अपन अनुसन्धानक तीव्र आकांक्षाक पूत्यर्थ ओ दुइ बेर पड़ोसी राष्ट्र नेपालक यात्रा कयलनि। प्रथम यात्रा तँ ओ शोध-प्रबन्धक सामग्री संकलनार्थ गेलाह आ द्वितीय यात्राक हुनक उद्देश्य छलनि जे प्रथम यात्रामे जाहि सामग्रीक पाण्डुलिपि नहि उपलब्धक पौलनि तकरा मूर्त्तरूप प्रदान करबाक निमित्त पुन: ओतय गेलाह। एहि क्रममे ओ मैथिली भाषा आ साहित्यक बहुमूल्य नाटकादिक पाण्डुलिपिक संचयन कऽ कए प्रकाशित करौलनि जकर विवरण हुनक कृतित्वक अन्तर्गत कयल जायल। ओहि नाटकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप भावी अनुसन्धितसुक पथ-प्रदर्शन कयलनि1 उक्त कृतिक सम्पादनक क्रममे ई सारगर्भित भूमिका अंग्रेजी आ मैथिलीमे लिखि ओकर मूल्यांकनक संगहि ओकर ऐतिहासिकताकेँ उदघाटित कयलनि जकर फलस्वरूप मैथिलीक कतिपय समस्यादिक ओझरौठ केँओ सोझरा देलनि। हिनक अनुसंधान सम्पूर्ण अवधारणाकेँ बदलि देलक आ ओ सकारात्मक भेल। आब मैथिली गम्भीर अध्ययनक विषय मानल जाय लागल। ई अवधारणा एवं सकारात्मकता मैथिली साहित्यक बड्ड विधि विकास मार्ग प्रशस्त कयलक। एहि दिशामे हुनका द्वारा कयल गेल प्रयास स्तुत्य अछि। साहित्य–याधना जयकान्त मिश्रक साहित्य–साधनाक अन्तर्गत मौलिकक, सम्पादित एवं स्वतन्त्र आलेखादिक रचनावली पाठकक समक्ष ओ थिक अंग्रेजी एवं मैथिलीमे1 ओ मैथिली साहित्यकेँ नव दिशा देबाक निमित्त उपर्युक्त दुनू भाषामे समान रूपेण लेखन कयलनि जकरा पाछाँ हुनक उद्देश्य छलनि अमैथिल भाषी सेहो एकर गौरव-गरिमाकेँ जानय, बुझय जकर विवरण एहि प्रकारेँ अछि: अंग्रेजीमे मौलिक i. A History of Maithiki Literafuse Valume–I–1949 ii. A History of Maithili Leterature Volume–II–1950 iii. An Introduction to folk Leterature of Mithils volume–I–1950 iv. An Introduotion to folk literature of Mithila Volume–II–1951 v. A case of Maithili–1963 vi A History of Maithili Leterature–1976 मौलिक मैथिली i. कीर्त्तनिञा नाटक–1965 ii. तिरहुता ककहारा–1967 iii. मैथिलीमे प्राथमिक शिक्षा–1969 iv. वृहत मैथिली शब्दकोश खण्ड–1–1973 v. मैथिली साहित्यक इतिहास–1988 vi. वृहत मैथिली शब्द कोश खण्ड– 2–1995 मौलिक अंग्रेजी जीवको पार्जन अंग्रेजीक प्रोफेसरक रूपमे भेलनि तेँ ओहू साहित्यमे रचनात्मक प्रवृत्तिक परिचय देलनि: i. Leetures on Thomas Hardy–1955 एवं 1965 ii Leetoores on Four Poets–1957 एवं 1963 iii iComplez style in English Poetry–1977 vi Leetares on Four Poets (Romantic Poets) –1987 v Leetorees on four Poets (Victoriam Poets) –1992 सम्पादित कृति नेपाल यात्रामे हुनका मैथिलीक बहुमूल्य धरोहर नाटकादि एवं अन्य कृति उपलब्ध भेलनि नेपाल दरबार लाइब्ररी जे धूल-धूसरित भऽ रहल छल तकरा सयत्न आनि ऐतिहासिक भूमिका लिखि सम्पादित कयलनि आ प्रकाशित कयलनि: i. धूर्मसमागम–ज्योतिरीश्वर–1960 ii. गौरी परिणय–शिवदत्त–1960 iii. गौरी स्वयंवर–कान्हाराम–1960 iv. गोरक्षविजय–विद्यापति–1961 v. रुक्मिणी परिणय–रमापति–1961 vi. कृष्ण केलिमाला–नन्दीपति–1961 vii. श्री कृष्णजता रहस्यव–श्रीकान्तगणक–1961 viii. गौरीस्वयंवर–लालकवि –1962 ix. विद्या विलाप–भूपलीन्द्रभल्ल- 1965 x. Eneyelopadie of Indian Leteeahese Medieval & Modern Indian Leteratuse Maithili Seetion. Xi. आधुनिक गद्यक निर्माता महामहोपाध्याय डाo उमेश मिश्र–2006 सह सम्पादन कीर्तिपताका–विद्यापति–1960 अनुवाद जयकान्त मिश्र् सफल अनुवादक रहथि जे साहित्य अकादेमी द्वारा भारतक साहित्य निर्माता सिरीजक अन्तर्गत गोविन्द झा (1923) द्वारा मैथिलीमे लिखित उमेश मिश्र ( ) मनोग्राफक अंग्रेजीमे अनुवाद कयलनि जे साहित्य अकादेमी द्वारा सन् ई. मे प्रकाशित भेल। उपर्युक्त रचनाबलीक अतिरिक्त मैथिलीमे हिनक निम्नस्थ निबंध मैथिली पत्रकादिमे प्रकाशित होइत रहल जे निम्नस्थ अछि: 1. प्रोफेसर गंगापति सिंहक सुशीला उपन्यासक समीक्षा, मिथिला मिहिर–1943 2. मिथिलाक जन साहित्य, चौपाड़ि मधुमास–2011 3. मिथिलाक इतिहास सम्बन्धी किछु समस्या, प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्मलेन, रचना संग्रह प्रथम भाग, –1956 4. प्रथम अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन, नाटक विभागक अध्यक्षीय भाषण–1956 5. आधुनिक मैथिली साहित्य पर अंग्रेजीक प्रभाव, वैदेही नवम्बर–दिसम्बर–1957 6. हमर नेपाल यात्रा, वैदेही जनवरी–1958 7. पूर्वाo चलीय भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक पारस्परिक प्रभाव, चेतना समिति संगोष्ठी–1972 8. आधुनिक मिथिलामे कीर्त्तनकचेतना, चेतना समिति संगोष्ठी–1973 9. परम्पराक परित्याग: साहित्यक अस्तित्वक प्रश्न, चेतना समिति संगोष्ठी–1974 10. मैथिली नाटक ओ रंगमंच: वर्त्तमान स्थिति एवं भविष्य, चेतना समिति संगोष्ठी–1977 11. भारतीय संविधान: मैथिलीक समस्या, चेतना समिति स्मारिका–1977 12. जीवित जातिक जीवित भाषा, मिथिला मिहिर 11 जून–1978 13. संगीत शास्त्र ओ पूर्वाञ्चलीय गीति काव्य, चेतना समिति संगोष्ठी–1979 14. साहित्य ओ प्रतिवद्धता, चेतना समिति संगोष्ठी–1980 15. साहित्य मे परिवर्तनक स्वर, चेतना समिति संगोष्ठी–1984 16. राष्ट्रीय ओ आञ्चलिक संस्कृतिक विकास, चेतना समिति संगोष्ठी–1986 17. साहित्यिक समालोचना: सन्दर्भ इतिहास लेखनक, चेतना समिति संगोष्ठी–1987 18. विद्यापति पर्व कोनाकरी, स्मारिका चेतना समिति स्मारिका–1987 19. महाकाव्यमे युगीन संकेत, चेतना समिति संगोष्ठी–1988 20. मैथिली आन्दोलन: अद्यतन स्थिति, चेतना समिति संगोष्ठी–1989 21. यात्रीक मूल्यांकन कविक रुपमे करबाक थिक, चेतना समिति संगोष्ठी 2000 22. मैथिली उपन्यासमे चित्रित समाज, चेतना समिति संगोष्ठी–2003 हुनक समग्र कृतिक अवलोकनसँ हुनक साहित्य–साधनाक यथार्थ परिचय भेटि जाइछ जे ओ अपन मातृभाषाक विकासार्थ सतत कार्यरत रहलाह। ओ अपन अक्षय कृति परवर्ती पीढ़ीक छोड़ि गेलाह तकर आलोकमे मैथिली साहित्यमे नव जीवनक संभावना दृष्टिगत होइछ। ओ अपन अद्धितीय वैदुव्यक एक आदर्श प्रस्तु त कयलनि जे वर्त्तमान पीढ़ीक लेल पाथेय बनल। सम्मान मातृभाषानुरागी एवं साहित्यानुरागी कीर्ति पुरुष जयकांत मिश्र जे मैथिलीक सम्मानार्थ जे योगदान देलनि ओहिसँ अनु प्राणित भऽ कए भारतक नेशनल एकेडेमी आँफ लेटर्सक संगहि विभिन्न मातृभाषा सेवी संस्थादि द्वारा समय–समय पर हिनका सम्मानितक गौरवान्वित भेल। 1. भारतक आर्थिक राजधानी मुम्बईक मिथिला मण्डल द्वारा आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलनक अवसर पर 31 दिसमबर 1969मे सम्मान पत्रसँ अलंकृत कयलक। 2. बिहारक राजधानी पटनाक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्था चेतना समिति 1990मे मातृभाषाक अतुलित सेवाक कारणेँ मिथिला विभुति ताम्रपत्रसँ सम्मानित कयलक। 3. मातृभाषा नुराग आ ओकर विकासार्थ हिनका द्वारा जे साहित्यिक, रचनात्मक आ आन्दोलनात्मक कार्य कयल गेल ताहिसँ अनुप्राणित भऽ मिथिला सांस्कृतिक संगम प्रयाग–1995 ई.मे सम्मान पत्र समर्पित कयलक। 4. झारखण्डक धनवाद स्थित विद्यापति समिति विगत शताब्दीक अवसान बेलामे अर्थात् 1999 ई. मातृभाषाक उत्थानार्थ कार्यसँ अनुप्राणित भऽ सम्मान पत्र समर्पित कयलक। 5. विगत शताब्दीक अन्तिम वर्षमे अर्थात् 2000 ई.मे नेशनल एकेडेमी आँफ लेटर्स अर्थात् साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा कालजयी मध्यकालीन मैथिली साहित्यक विशेषज्ञक रुपमे भाषा सम्मानसँ विभूषित कयलक। 6. हिनक बहुमूल्य मातृभाषाक सेवाक परिप्रेक्ष्यमे साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं मिथिला सांस्कृतिक संगम प्रयागक संयुक्त तत्वावधानमे मीट दऽ आथर अर्थात् लेखकसँ भेट कार्यक्रमक आयोजन कयलक 28 मई 2000 मे। 7. बंगभूमिक जगता ज्योति संस्था मिथिला सांस्कृतिक परिषद कोलकाता 2006 अभिनन्दन कयलक। संस्था–संस्थापक प्रयाग अति प्राचीन कालहिसँ मैथिल मातृभाषानुरागी मैथिलीक कार्य स्थल रहल अछि तकर दू कारण अछि। प्रथमत: धर्माम्बलवी मैथिल समाज गंगा–यमुना आ विलुप्त सरस्वती नदीक संगम रहल आ द्वितीय एतय विद्याक केन्द्र हैबाक कारणेँ विद्यानुरागी लोकनिक जमावड़ा रहल अछि। स्वाधीनतासँ पूर्व प्रयागक मातृभाषानुरागी जयकान्त मिश्र एतय मैथिलीक विकासार्थ दू संस्थाक स्थापना कयलनि तीरभुक्ति पब्लिकेशन्स आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समितिक स्थापना सन् 1944 ई मे कयलनि जकर वर्त्तमान परिदृश्य ऐतिहासिक भऽ गेल अछि जे जनजागरण अनलक तत्कालीन साहित्यकार लोकनिमे। एहि दुनू संस्थाक द्वारा कतिपय समकालीन साहित्यकार लोकनिक पुस्तकक प्रकाशन कयलक जकर ऐतिहासिक महत्त्व अछि। एहि संस्थाक द्वारा मैथिली समाचार एक अनियति कालीन पत्रिका मात्र सूचनात्मक समाचारक अतिरिक्त नव प्रकाशनसँ पाठककेँ अवगत करबैछ। वर्त्तमान परिदृश्यमे स्वतन्त्र मिथिला राज्यक समर्थनमे विभिन्न समाचार आ प्रयासक विभिन्न आयात पर विगत दुइ दशकसँ प्रकाशित करैत आबि रहल अछि। एकर सम्पादन ओ स्वयं करथि। पी.ई. एन.मे मैथिली अन्तर्राष्ट्रीय एवं साहित्यिक सोफिया वाडिया द्वारा संस्थापित साहित्यिक संस्था Poets, Essayist and Novelist जकरा संक्षेपमे पी.ई.एन. कहल जाइछ। उक्त संस्थाक ई सक्रिय सदस्य भऽ भारतीय भाषा साहित्यानुरागी लोकनिक ध्यान मैथिली भाषा आ साहित्य दिस आकर्षित कयलनि1 एकर अधिवेशनमे ओ सहभागी भेलाह बड़ौदा (1957), भुवनेश्वर (1959) आ लखनऊ (1964)मे सम्मिलित भऽ कए मैथिली भाषा आ साहित्यक पुनराख्यान कऽ कए ओहि संस्था द्वारा मैथिलीकेँ भारतक प्राचीनतम भाषाक रुपमे मान्यता दिऔलनि। एहि संस्था द्वारा मान्यता भेटलाक पश्चात् एकर अग्रिम योजनाकेँ क्रियान्वित करवामे अभूत पूर्वक सहायता भेटल। उक्त अधिवेशनमे पठित हिनक भाषणादि ओकर कार्य विवरिणीमे प्रकाशित अछि। पुस्तक प्रदर्शनी बिहारक तत्कालीन राज्याल डा. रंगनाथ रामचन्द्र दिवाकर आँल इण्डिया पर एक भाषण देलनि जाहिमे हृदयसँ अपन उद्ऽगार व्यक्त करैत उद्ऽघोषणा कयने रहथि जे मैथिली ज्ञान ग्रन्थस्थ प्राचीन भाषा थिक जे एकर विकासमे अति मत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। जखन जयकान्त मिश्र ई व्याख्यान सुनलनि तँ ओ अत्यधिक उत्साहित भऽ जोर–सोरसँ काज करब प्रारम्भ कयलनि। ई एक ऐतिहासिक परिदृश्य अछि जे मैथिलीक भविष्यक दिशा–निर्देश करैछ। पुरातन कालसँ इलाहाबाद विश्व विद्यालय प्राच्य एवं प्रतीच्य उच्च शिक्षाक हृदय स्थल अछि जतय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रक लब्ध प्रतिष्ठ विद्धत समाजक निवास स्थल रहलनि। हिनक कर्मभूमि सेहो ओही विश्व विद्यालयमे रहलनि जतय गणतन्त्र भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरूक जन्म भूमि छलनि। ओ अवकाश भेटला पर निश्चित रुपेँ ओतय अबैत–जाइत रहथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्य समितिक अध्यक्ष आ विश्वविद्यालयक अंग्रेजी विभागक व्याख्याताक रूपमे ओ तत्कालीन प्रधानमंत्री सँ सन् 1960 ई. आनन्द भवनमे दर्शनार्थीक रुपमे मैथिली दू पुस्तक वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998)क काव्य–संग्रह चित्रा आ गल्पाञ्जलि कथा–संग्रह हुनका उपहार देलथिन, संगहि अनुरोध कयलथिन जे मैथिली भाषा आ साहित्यक गौरवशाली साहित्यिक परम्परा तेरहम शताब्दीसँ उपलब्ध अछि, किन्तु सरकारी मान्यताक अभावमे ई सर्वथा उपेक्षित अछि पण्डित नेहरू ध्यानसँ हुनक कथनकेँ स्नेहपूर्वक सुनलथिन आ कहलथिन Institutional reorganization is not soul management of the richness of a language we enjoy with sound literature. एही क्रममे हुनका ओतहि भेटलथिन इलाहाबाद हाईकोर्टक चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति बी. मल्लिक। ओ कहलथिन एहि रूपेँ अहाँक मातृभाषाकेँ मान्यता नहि भेटि सकैछ। ओ सलाह देलथिन जे एहि लेल आन्दोलनक तरीका अपना बय पड़त तखनहि अहाँक मातृभाषाकेँ मान्यता भेटि सकैछ। आन्दोलनक तरीका थिक जे अपन साहित्यक समृद्धशाली, गौरवशाली आ वैभवशाली परम्परासँ जनमानसक संगहि संग साहित्य चिन्तक लोकनिक ध्यान कर्षित करबाक उपक्रम करू। न्यायमूर्ति मल्लिकक सत्प्रेरणा आ विचारसँ उत्प्रेरित भऽ कए ओ इलाहाबादमे सरगंगानाथ संस्कृत रिसर्च इन्सच्यूटमे 15 दिसम्बर 1961 ई. केँ मैथिली पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि तथा ओकर उद्घाटन करबाक हेतु जस्टिस मल्लिकसँ अनुरोध कयलनि तथा ओकर उद्घाटन करबाक हेतु जस्टिस मल्लिकसँ अनुरोध कयलथिन। ताधरि जस्टिस मल्लिकक भारत सरकारक कमीशन फाँर माइनोरोटी लैंग्वेजजक चेयरमैनक पद पर सुशोभित भऽ गेल रहथि। ई सुखद संयोग थिक जे उक्त पुस्तक प्रदर्शनीक उद्घाटन जस्टिस मल्लिक स्वीकार कयलथिन जाहिमे आेहिठामक प्रवुद्ध साहित्य चिन्तक लोकनि मैथिली भाषा आसाहित्यक प्राचीनतम गौरवशाली परम्परासँ अवगत भेलाह जे हुनका सभ पर अपन अमिट छाप छोड़लक। एहि अवसर पर यशस्वी कवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री मैथिलीमे काव्यपाठ कयने रहथि। इलाहाबादक पुस्तक प्रदर्शनीसँ अनुप्राणित आ अनुप्रेरित भऽ कए ओ सोचलनि जे एहन प्रदर्शनीक आयोजन गणतन्त्र भारतक राजधानी दिल्लीमे कयल जाय तँ निश्चित रूपेँ मैथिलीकेँ सरकारी मान्यता भेटबामे कोनो वाधा नहि आबि सकैछ। एकर आयोजनार्थ ओ अपन प्रोभिडेण्ड फण्डसँ लोन लऽ कए 8 आ 9 जनवरी 1963 ई. मे दिल्लीक आजाद भवनमे ऐतिहासिक राष्ट्रीय पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि जाहिमे मिथिलांचलक विभिन्न क्षेत्रसँ चन्दा एकत्रित कयल गेल आ भालण्टीयर गेल रहथि। प्रदर्शनीक सजावट हृदयाकर्षक छला बहुतायादमे पुस्तकादि एकत्रित कयल गेल छल जाहिमे मिथिला इन्स्टीच्यूट दरभंगा आ पटना विश्वविद्यालय विशेष उल्लेखनीय अछि। सांसद रूपमे ललितनारायण मिश्र एवं यमुना प्रसाद मंडल सहभागी भेल रहथि। भारत सरकार संसदीय कार्य मंत्री बाबू सत्यनारायण सिंहक सहयोगसँ प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू एकर उद्घाटन कयलनि यद्यपि ओ पन्द्रह मिनट विलम्बसँ पहुँचलाह, किन्तु पुस्तकक अम्बार देखि हतप्रद भऽ गेलाह। अपन भाषणमे ओ जे बजलथिन ओ कल्पनाक विपरीते अनुभव भेलनि प्रोफेसर मिश्रकेँ। भीजिटिंग रजिस्टर ओ टिंप्पणी कयलथिन, I was ray to inaygware Maithali Book Exibition and to see the large Colleetion of books and Manuseripts in Maithli . This domonst trated that Maitili hasd been for long time and is today a living among the people of that areas the Language deseirurs encouragement एहि प्रदर्शनीकेँ सफल बनयबाक लेल हास्य - व्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा मायानन्द मिश्र (1934), रामस्वरूप नटुआक अतिरिक्त अनेको गण्यमान्य राजनैतिक, साहित्यिक, मैथिली प्रेमी उनटिक’ प्रदर्शनी सफल बनयबाक हेतु उपस्थित भेलाह। एकर शानदार सजाबटक कारणेँ समग्र कार्यक्रमक झाँकी सिनेमा हाँलमे प्रदशित भेंल जे मिथिलीक हेतु ऐतिहासिक घटना थिक। उपर्युक्त पुस्तक प्रदर्शनी एहि बातक सबल प्रमाण थिक जे ओ एक सफल आयोजक रहथि मैथिली आन्दोलन एक डेग आगू बढ़ल। साहित्य अकादेमीक सामान्य परिषदमे प्रवेश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त भारतक विश्वविद्यालयक अक्षरानुक्रमसँ बीस प्रतिनिधि पाँच वर्षक कालावधि हेतु साहित्य अकादेमीक सामान्य परिषदक सदस्य मनोनीत करबाक प्रक्रिया थिक, जकर नामक अनुशंसा सम्बद्ध विश्वविद्यालयक कुलपति करैत छथि। जीवनक परिणत वयमे बिहार सरकार हिनक पिता श्री महामहोपाध्याय डाo उमेश मिश्रकेँ सर कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक कुलपति नियुक्त कयलक। ई सुखद संयोग छल जे हुनक कार्य कालमे साहित्य अकादेमीक सामान्य परिषद्क सदस्यक नाम अनुशंसित करबाक सूचना उक्त विश्वविद्यालयक कुलपतिकेँ भेटलनि। मातृभाषानुरागी कुलपतिक अतीव इच्छा छलनि जे एहन व्यक्तिक नाम अनुशंसित कयल जे मैथिलीक मान्यतार्थ एहि भाषाक पुरातन परम्पराक उपस्थापन सबल तर्क द्वारा प्रस्तुत कऽ कए ओकर अध्यक्ष पण्डित जवाहर लाल नेहरूकेँ कनभीन्स कऽ सकथि अंग्रेजीमे। कुलपति कार्यालय तीन बेर प्रोफेसर जयकान्त मिश्रक नाम प्रस्तावित कऽ हुनक अनुमोदनार्थ प्रस्तुत कयलक, किन्तु कुलपति बारम्बार विनु कोनो टिंप्पणी कयने फाइलकेँ वापस कऽ देथि। हुनका एहि बातक आशंका छलनि जे जनमानस ई आरोप लगाओत जे अपन पुत्रक नाम अनुशंसित कयलनि। अन्तत: सामाजिक दबाबक कारणेँ कुलपति जयकान्त मिश्रक अनुशंसित कयलथिन आ ओ अकादेमीक सामान्य परिषदक सदस्य भऽ गेलाह। सामान्य परिषदक सदस्य बनि तहि ओ मैथिलीक मान्यतार्थ आन्दोलन प्रारम्भ कयलनि जे एकर विकासक अवरुद्ध द्वारा शनै:-शनै: खुजय लगलैक। अन्यान्य भाषा भाषी सदस्य लोकनिक ध्यान मैथिलीक गौरवशाली साहित्यिक परम्पराक दिशामे ध्यान आकर्षित करब ओ प्रारम्भ कयलनि। मैथिलीक मान्यता मैथिलीकेँ मान्यता साहित्य अकादेमी दिअ, ताहि हेतु ओ फाँड़ बान्हि कऽ एकरा पाछाँ पड़लनि तकरा पाछाँ हुनक त्याग आ बलिदानक इतिहास जनमानससँ नहि नुकायल अछि। ओ सामान्य परिषदक माननीय सदस्य लोकनिक ध्यानकर्षित करबाक आ मातृभाषा मैथिलीक महत्त्व निरुपित करबाक निमित्त अंग्रेजीमे दू बुकलेट लिखलनि A cabe for Maithili एवं Cohal They say about Maitheili तकरा सदस्य लोकनिक बीच वितरित कयलनि। यद्यपि दिल्लीक पुस्तक प्रदर्शनीमे पण्डित नेहरू जे अकादेमीक अध्यक्ष सेहो रहथ ओ एहि बातक संकेत देने रहथि जे एहि भाषाकेँ मान्यता भेटबाक चाही1 किन्तु दुर्भाग्यसँ हुनक मृत्यु भऽ गेलनि आ हुनक मृत्युपरांत प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी एकर अध्यक्ष बनलाह जे मैथिलीक गौरव-गारिमा आ महत्त्वसँ पूर्व परिचित रहथि। हुनका अध्यक्ष बनितहि ई अत्यधिक आशान्वित भऽ गेलाह जँ आब मान्यता भेटवामे मात्र वैधानिक प्रक्रिया शेष अछि। एहि लेल एक समिति गठित कयल जाहि मे भाषाविद डाo सुकुमार सेन (1900–1992) प्रोफेसर हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979) आ डाo सुभद्र झा (1909–2000)केँ सदस्य मनोनीत कयल गेलनि जकर बैठक दिल्लीमे आहूत भेल। एहि सँ पूर्व कोलकाताक प्रवासी मातृभाषा सेवी संस्थादिक संग मिथिलांचल मे जनजागरण भऽ गेल ओ पोस्टकार्ड अभियान चला कऽ एहि माँग कऽ समर्थन कयलक जकर फलस्वरूप भेटल। एहि दिशामे प्रोफोसर मिश्रक सत्प्रयास ऐतिहासिक घटनाक रूपमे सतत चिरस्थायीय रहताह। तिरहूता लिपिक संरक्षक अन्य स्वतंत्र साहित्यिक आधुनिक भारतीय भाषादिक समान मैथिली भाषाकेँ अपन प्राचीन स्वतन्त्र लिपि छैक जकरा तिरहुता वा मिथिलाक्षर वा मैथिलाक्षर वा मैथिली लिपि कहल जाइछ। तिरहुता नामसँ ज्ञान होइत अछि जे ई लिपि तिरहुत देशक थिक। जहिना भाषा आ सभ्यता परस्पर अन्योन्याश्रित अछि तहिना लिपि आ भाषाक सम्बन्ध छैक1 अपन लिपिसँ जहिना–जहिना सम्बन्ध छूटल जायत तहिना–तहिना भाषाक प्रति ताहि अनुपातमे आकर्षण कम होइत जायत तकर प्रत्यक्ष प्रमाण थिक मैथिली। एहि लिपिक जाननिहारक संस्था दिनानुदिन नगण्य भेल जा रहल अछि जे मैथिली हेतु चिन्तनीय विषय थिक। एहि प्रश्न पर जयकान्त मिश्र गम्भीरता पूर्वक विचार कयलनि जे एकर संरक्षणार्थ प्रयासक प्रयोजन अछि। साहित्य अकादेमी मैथिलीक मान्यताक प्रसंगमे एक प्रश्न उपस्थित भेल छल जे एकर स्वतन्त्र लिपिक अस्तित्त्व छैक वा नहि? ओ एकर उत्तरमे तर्क देलथिन जे एकरा अपन स्वतन्त्र लिपि छैक जकर पुरातन इतिहास छैक। हुनक मान्यता छलनि जे मैथिलीक स्वतन्त्र अस्तित्त्व स्थापित करबामे जे कठिनता लिपिक कारणेँ भेलनि आ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य मे भऽ रहल अछि से नहि होइत जँ हमरा लोकनि एकरा संरक्षित रखने रहितहुँ तँ ई प्रश्न कथमपि नहि उठैत। वार्तालापक क्रममे ओ हमरा एक बेर कहने रहथि जे पुरातन कालमे समग्र मिथिलाञ्चलमे तिरहुताक संगहि कैथी लिपिक प्रचलन छलैक। दरभंगा राजक कार्य–कलापमे सेहो तिरहुता लिपिक प्रयोग होइत छलैक किन्तु ओकरा बहिष्कृत कऽ कए हिन्दी बहुल देवनागरी लिपिकेँ लादि देल गेलैक जकर भयंकर दुष्परिणाम भेलैक जे शनै:-शनै: जनमानससँ ई विलुप्त होइत गेल। एकर फलस्वरूप मैथिली सदृश प्राचीनत्तम भाषाकेँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे हिन्दीक अंगक उद्घोषणा विद्धान लोकनि कयलनि जेना व्रजभाषा आ अवधीक प्रसंगमे कहल जाइछ। जँ तिरहुता लिपि प्रचलित रहैत तथा एकर साहित्य एही लिपिमे लिखल जाईत तँ एहन विवादक उद्भावना कथमपि नहि होइत। संस्कृतक हेतु वैकल्पिक रूपमे समस्त भारतमे देवनागरी लिपि व्यवहृत होबय लागल तकर प्रभाव मिथिलाञ्चल पर पड़ल आ मैथिली साहित्य निर्माता लोकनि तिरहुताक स्थान पर देवनागरी लिपिक प्रयोग करय लगलाह। यद्यपि एहि लिपिक संरक्षणार्थ कतिपय प्रयास अवश्य कयल गेल, किन्तु कोनो प्रयास सफल नहि भऽ सकल। दरभंगासँ तिरहुता लिपिमे समाचार पत्र बाहर करबाक प्रयास कयल गेलैक, किन्तु ओहोक विफल रहल। मैथिली भाषी जनमानस तिरहुता आ कैथी लिपिमे पढ़ैत–लिखैत छल आ एहिसँ अतिरिक्त कोनो लिपिक प्रयोगक ज्ञान लोककेँ नहि छलैक। यद्यपि एकरा पुनर्जीवित करबाक नेयारभास पुस्तक भण्डारसँ जीवनाथ राय (1891–1964) बाडण्ला लिपिक प्रभाव काँटा अवश्य बनाओल गेल आ ओ ‘मैथिलीक प्रथम पुस्त्कक रचना अवश्य कयलनि, मुदा ओ सफल नहि भऽ सकल। जखन मैथिली कोश प्रकाशित करबाक प्रश्न उपस्थित भेलनि तखन ओ विशुद्ध तिरहुता लिपिक टाइप बनयबाक अथक प्रयास कयलनि, कारण हुनक बलवती इच्छा छलनि जे तिरहुता लिपिमे कोश प्रकाशित हो। एहि भावनासँ ओ उत्पेरित भऽ तिरहुता ककहारा (1967) नामक एक पुस्तक लिखलनि1 दैव दुर्योग एहन भेल जे हुनक ओ प्रयास सफली भूत नहि भऽ पौलनि। हुनक मान्यता छलनि जँ हमरा लोकनि एकरा अपनौने रहितहुँ तँ मैथिलीक अस्तिरण, प्राचीन एवं मध्ययुगीन कालजयी साहित्यक रिसर्च अधिक सुकर होइत। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे एकर पुनरुत्थान करब प्रयोजनीय अछि रिसर्च आ सांस्कृतिक कार्यादिमे अलंकरणक रूपमे विशेष उपादेय होयल। प्रत्येक मैथिली प्रेमी जनमानससँ आ विशेषत: मैथिली पढ़निहार छात्र समुदायकेँ एहि लिपिकेँ सिखबाक प्रेरणा देलनिओ। परामर्श माण्डलक संयोजक साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक मान्यता भेटलाक पश्चात् समग्र मिथिलाञ्चल एवं प्रवासी मातृभाषानुरागीमे प्रसन्नताक लहरि परिव्याप्त भऽ गेल। जनमानस आनन्दक सागरमे डुब्बी मारय लागल आ आशांवित भेल जे मैथिलीक विकासक अवरूद्ध मार्गमे एक नव किरण विकीर्ण अवश्य होयत। मैथिली परामश्र मण्डलक प्रथम संयोजक भेलाह रमानाथ झा (1906-1971)क आकस्मित् निधनोपरान्त जयकान्त मिश्रकेँ एकर संयोजक बनाओल गेल। यद्यपि ओ दू खेप परामर्श मण्डलक संयोगक रहला, किन्तु हुनक कार्य कालमे कोनो एहन उल्लेखनीय प्रकाशन नहि भेल। हुनक कार्यावधिमे निम्नस्थ पुस्तक प्रकाशमे आयल ओ थिक उमानाथ झा द्वारा सम्पादित विद्यापति गीत शती ( ) आ जयधारी सिंह द्वारा संग्रहीत मैथिली कथा संग्रह ( ) इत्यादि। हिनकहि संयोजक कालक दुइ घटना मैथिलीक चिरस्मरणीय अछि। ओ थिक अकादेमी द्वारा मैथिलीक स्वीकृति पश्चात् इतिहासकार प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (1924–1984)केँ अंग्रेजीमे मैथिली साहित्यक इतिहास लिखबाक दायित्व सौंपलक। ओ यथा समय ओकर पाण्डुलिपि साहित्य अकादेमीमे समर्पित कयलनि जकरा परामर्श मण्डलक समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत कयल गेल। किन्तु हुनक पाण्डुलिपि एहन बभन पेंचमे पड़ल जे कतिपय कारणसँ ओकरा प्रकाशनसँ वंचित कऽ देल गेल। एकर प्रमुख कारण छल जे मैथिलीक इतिहास लेखन पर प्रोफेसर मिश्रक एकाधिकार छलनि1 ओ अपन पूर्व प्रकाशित इतिहास प्रथम खण्ड आ द्धितीय खण्डकेँ संक्षिप्त कए अकादेमी द्वारा प्रकाशित करौलनि A History of Maithili Leterature (1976)। तत्पश्चात् ओकर मैथिली अनुवाद मैथिली साहित्यक इतिहास (1988) स्वयं कयलनि, कारण हुनका एहि विषयक शंका छलनि जे कदाचित अन्य अनुवादक एम्हर-ओम्हर ने कऽ देत। किन्तु उपर्युक्त पाण्डुलिपिकेँ प्रोफेसर चौधरी सेहो प्रकाशित करौलनि A Seervey of Maithili Leterature (1976) नामे। उक्त दुनू इतिहास मैथिलीमे विवादास्पद रहल। हिनक कार्यावधिमे अकादेमी एक पुस्तक प्रकाशित कयलक Indian Leterature Since Independence (1973) जाहिमे अकादेमी द्वारा स्वीकृत भाषादि स्वातन्त्र्योत्तर कालक प्रगतिक विकास–यात्राक मूल्यांकन करबाक छलैक। मैथिली भाषाक स्वातन्य्योत्तर काजक विकास गतिक प्रसंगमे प्रोफेसर मिश्र आलेख प्रस्तुत कयलनि जे प्रकाशनोपरान्त साहित्य जगतमे एक पैध विवाद केन्द्र बिन्दू बनि गेल। स्वातन्त्र्योत्तर मैथिलीक साहित्यक यथार्थ मूल्यांकन करबामे अज्ञानतावश वा यथार्थ सूचनाक अभावमे जे भ्रामक विचार प्रस्तुत कयलनि तकर विरोधमे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पचीस अंकक लगधक भिन्न–भिन्न लेखक द्वारा साहित्यक यथार्थताक मूल्यांकन कयल गेल। मिहिरक सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920–1990) वादे–वादे जायते तत्वबोध नामे एक सीरिज चलौलनि जाहिमे उक्त आलेखाहि प्रकाशित भेल जाहिमे हुनक कटु आलोचना कयल गेल। दिशा बोधक समीक्षक यद्यपि ओ जीवन पर्यन्त अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन–अध्यापन निरल रहलाह जाहिमे समीक्षाक प्रचूर सामग्री उपलब्ध छैक, किन्तु मातृभाषामे समीक्षाक सर्वथा अभाव देखि ओकरा अभिवर्द्धित करबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भऽ मैथिलीमे समीक्षा लिखबाक शुभारम्भ कयलनि। हिनक वृहत समीक्षात्मक कृति प्रकाशमे आयल प्रोफेसर गंगापति सिंह (1894–1969)क सद्रय: प्रकाशित उपन्यास सुशीला () पर जे दरभंगासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक सम्पादक सुरेन्द्र झा सुमन ( 1910–2002) प्रकाशित कयलनि। एकर महत्त्व एहि कारणेँ अछि जे उपन्यासकार उपन्यासमे कतिपय स्थल पर मैथिली शब्दक बदलामे हिन्दी शब्द–समूहक प्रयोग कयने रहथि तकर आ सतर्क प्रतिवाद कयलनि। इएह आलेख हिनका मैथिली आलोचनामे प्रवेशक द्वार खोललक तथा हिनका यशस्वी बनौलक। जनमानसक ई धारणा छलैक जे मैथिलीमे जे लिखल जाइत छैकसे ठीक छैक तकर आलोचना नहि होमक चाही। एहि पर कतेक विवाद चलल। मैथिलीक युवा साहित्य चिन्तक बाबू भुवनेश्वर सिंह भुषन (1907–1944) हिनका अत्यधिक प्रोत्साहित कयलथिन। यद्यपि हिनकहिसँ मैथिलीमे इतिहास–लेखनक परम्पराक शुभारम्भ होइत अछि जे वस्तुत: समीक्षाक श्रेणीमे परिणत अछि। एहि ऐतिहासिक ग्रन्थक जे उपयोगिता छैक ताहि प्रसंगमे हम बिस्तार पूर्वक विवेचन कयल अछि हिनक अनुसंधान उपशीर्षकान्तर्गत। तेँ एतय गाओल गीतकेँ गायब समुचित नहि। आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे तथा कथित आलोचकक कथन छनि हुनक इतिहासमे कतिपय दोष अछि। किन्तु एहि बातकेँ ओ सर्वथा बिसरि जाइत छथि जे हुनका समक्ष कोनो प्रतिमान नहि छलनि जकर आलोकमे ओकर विस्तृत विश्लेषण करितथि। अपन इतिहासक अन्तर्गत ओ एहि विषय–वस्तुक विश्लेषण नहि कऽ पौअनि तकरा हमरा लोकनि अनुसंधान कऽ प्रकाशमे अनबाक प्रयास करी। जँ हुनक इतिहासकेँ मात्र डाँक मेटैशन कहबैक तँ ओकर आलोकमे ओ अनेक दिशा निर्देश कयलनि जाहि दिशामे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे गहन अनुसंधानक प्रयोजन अछि जे परवर्ती पीढ़ीकेँ करबाक छैक। हिनक इतिहास मैथिली आलोचना साहित्यकेँ दिशा बोध करौलक जाहिसँ आगाँ हमरा लोकनि नहि बढ़ि पौलहुँ अछि जे चिन्तनीय थिक। मैथिली लोक साहित्यसँ सम्बन्धित हिनक An Introdution to Folk Literatuse of Mithila एहि विधाक प्रथम ग्रंथ थिक जाहिमे मिथिलाञ्चलमे हुनका लोक साहित्यसँ सम्बन्धित जतेक सूचना उपलब्ध भऽ पौलनि तकर लेखा–जोखा ओ दुइ खण्डमे प्रस्तुत कयलनि1 प्रथम खण्डमे लोक गीतसँ सम्बन्धित प्रचुर सामग्री, लोकनाट्य सम्बन्धी गीत आदिक विवेचन ओ कयलनि। द्वितीय खण्डांतर्गत लोक विश्वास, लोक परम्परा एवं कतिपय लोक कथादिक चर्चा भेल अछि। आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे लोक साहित्य पर जतेक कार्य भेल अछि वा भऽ रहल अछि तकर प्रेरणा स्रोत उपर्युक्त समीक्षा थिक जे परवर्ती पीढ़ीक लोक साहित्यकारक पाथेय बनल। वैदेही समिति द्वारा आयोजित प्रथम अखिल भारतीय लेंखक सम्मेलनक अवसर प्रकाशित रचना संग्रहमे मैथिली इतिहास सम्बन्धी किछु समस्या दिस जनमानसक संगहि प्रबुद्ध वर्गक ध्यानाकर्षित कयलनि जे दिशा बोध करबैछ जे जाधरि उपर्युक्त समस्यादिक समाधान नहि होयत ताधरि इएह स्थिति रहता उपर्युक्त अवसर पर अपन अध्यक्षीय भाषणमे नाट्य साहित्यक भविष्य पर प्रकाश दऽ कए कतिपय नव–बिन्दुक संकेत देलनि आ जोर देलनि जे एकरे माध्यमे मैथिलीक भविष्य सुरक्षित रहि सकैछ जे हुनक आलोचनात्मक प्रवृत्तिक संकेत करैछ। हिनक समग्र उपलब्ध आलेखक अनुशीलनसँ आब बोध होइछ जे ओ मैथिल संस्कृति, साहित्यिक परम्पराकेँ अक्षुण रखबाक दिशा–बोध करौलनि। एहि प्रसंगमे हुनक अवधारणा छलनि जे भेष–भूषा, भाव–भाषा, कला–कौशल, चित्र–कला–संगीतकेँ उद्धार करबाक प्रयोजन अछि। एहि उद्देश्यक पूत्यर्थ अपन आलेखादिमे विस्तार पूर्वक विचार कयलनि आ संकेत देलनि जे युवा पीढ़ीकेँ अग्रसर भऽ कार्य करबाक प्रयोजन अछि। हुनक मान्यता छलनि जे मैथिली नाटक आ रंगमंचक माध्यमे एकर भविष्यकेँ सुनिश्चित कयल जा सकैछ। नाट्य साहित्य जीवित रहल–पढ़बाक ओ सुतबाक एवं देखबाक प्रक्रियामे सजीवता छैक, मूर्तमय वस्तुकेँ उपस्थित करबाक क्षमता छैक तथा अभिनयमे सौन्दर्य ओ कलाक वास्तवितकता, मनुष्यता एवं सत्यता छैक, से साहितयक अन्यान्य विधामे भेटब असम्भव छैक। बीसम शताब्दीमे मैथिली साहित्यमे परिवर्त्तनक स्वर गुंजित भेल तकर ओ समर्थकक रूपमे अयलाह। आधुनिक शिक्षाक प्रचारसँ लोकक ज्ञान ओकर दृष्टि विकसित भेलैक तथा मातृभाषानुरागी लेखक लोकनिक लेखनी ओहि परिवर्त्तनकेँ अंकित करय लागल जे साहित्यमे नवीनताक संचार भेलैक। परिवर्त्तनक स्वरक मुखरताक कारण अछि नूतन वैज्ञानिक आविष्कारक चमत्कार, औद्योगिकरणक वृद्धि, एहिसँ उत्पन्न जन–जीवनक संकुलता, आर्थिक विचारक क्षेत्रमे मार्क्सवादक उदय, फ्रायडक सिद्धान्त, बौद्धिकता वृद्धि। साहित्यक क्षेत्रमे एकर प्रभाव पड़ल आ परिवर्त्तनक स्वर गुंजित भेल तकर ओ पक्षपाती रहथि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे हिनक समग्र रचनादि हिनका दिशाबोधक समीक्षक रूपमे प्रमाणित कयलक। कीर्त्तनिञा नाटक A History of Maithili Leterature क Volume–I मे मिथिलामे उपलब्ध नाटकादिकेँ ओ कीर्त्तनिञा नामे संबोधित कयलनि जाहि प्रसंगमे आपत्ति प्रस्तुत कयलनि रमानाथ झा अभिव्यञ्जनाक प्रथम अंकमे हुनका द्वारा स्थापित मनक खण्डन करैत ओकरा कीर्त्तनिञा नाच कहलनि। एहि पर मैथिली आलोचनाक क्षेत्रमे विवादक एक परम्पराक शुरुआत भेल। प्रोफेसर मिश्र हुनक मतक खण्डन कयलनि उक्त पत्रिकाक अग्रिम अंकमे । तत्पश्चात् रमानाथ झा प्रबन्ध संग्रह (1371 साल)मे मैथिली नाटकपर एक बृहत् आलोचना कयलनि। इहो कीर्ननिञा नाटक (1965) नामक एक स्वतन्त्र पुस्तक अपन मतक समर्थनमे प्रकाशित कयलनि जाहिमे हुनक मतक खण्डन तर्क देलनि जे मैथिलीमे शोध कोना हो, इतिहासमे परम्पराक नामकरण कीर्त्तनिञा नामक सार्थकता, नटुआ आ नटकियामे भेद, नाच ओ नाटकक अभेद सम्बन्धी प्रमाण, नाटक शब्दक व्यापक अर्थ, मिथिलामे अभिनयक परम्परा, कीर्तनिञामे पात्रक प्रवेश - निष्क्रमण, पात्रक संख्या, योग्यता, मिथिलामे कीर्तनिञाक परम्परा, मिथिलामे नाटकक परम्पराक अभाव, कीर्तनिञा संस्कृत नाटक थिक तथा एकर नटुआक अयोग्यता आदि विषय पर प्रकाश देलनि। एहि प्रसंगमे हुनक मान्यता छलनि, जे ई नेपालक जगाओल धनराशि थिक। इतिहास बुझबाक हेतु बड़ तहमे जाय पड़त। हुनक कथन छलनि जे इतिहासकारकेँ इमानदार आ निष्पक्ष होयब परमावश्यक अछि। रमानाथ झा वाज ए कन्जरभेटिव इमैजनेटिव हिस्टोरियन। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे मैथिली आलोचक लोकनि दू भागमे विभक्त भऽ गेलाह1 किछु वर्षक पश्चात् प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह (1942) मैथिली नाटक ओ रंगमंच (1978) एक नव बिन्दु दिस संकेत कयलनि जे ई ने कीर्त्तनिञा नाटक थिक ने कीर्तनिञा नाच, प्रत्युत एहि सब नाटकादिककेँ ओ लीला नाटक कहलनि। प्रोफेसर सिंह एहि दिशामे विचार करबाक एक नव दिशाक बोध करौलनि जे विचारणीय थिक। आन्दोलनक सजग प्रहरी अनुसन्धानोत्तर एक नव प्रवृत्तिक जागरण हुनक मस्तिष्कमे भेलनि जे मैथिलीक गौरव–गारिमाकैँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे जागृत करबाक निमित्त ओ रचनात्मक आ आन्दोलनात्मक मार्गक अनुसरन कयलनि। एहि लेल ओ अकर्मण्य निष्क्रिय, सुसुप्त, धार्मिक कट्टरता, रुढ़िग्रस्त जीवनक अन्धकूपमे डूबल समाजमे नवजीवनक संचार करबाक हेतु जनजागरणक अभियानक सूत्रपात कयलनि जे मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नव चेतना अनबाक हेतु ओ रचनात्मक आ आन्दोलनात्मक रूख अख्तियार कयलनि जकर प्रभाव मिथिलावासी पर पड़ल। हुनक आन्दोलनकारी स्वरूप पहिल परिचय भेटैछ जे साहित्यक समृद्धशाली परम्पराकेँ जनमानसकेँ अवगत करयबाक हेतु ओ इलाहाबाद आ दिल्लीमे दुइ बेर अति उत्साहित भऽ पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि। साहित्य अकादेमीक सामान्य परिषदक सदस्यक मनोयननक पश्चात् अपन मातृभाषाक साहित्यिक परम्परासँ अन्य भाषाभाषीकेँ एकर महत्त्वसँ अवगत करयबाक निमित्त ओ संधर्ष करब प्रारम्भ कयलनि। हुनक एहि सकारात्मक आन्दोलनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबामे मिथिलाञ्चल आ प्रवासी मातृभाषानुरागी संस्थादि अपरिमित सहयोग भेटलनि जकर एतय पुनराख्यानक प्रयोजन नहि। एहि आन्दोलन मे मात्र हिनके नहि, प्रत्युत समस्त मैथिली भाषी जनमानसक सहयोगकेँ अस्वीकारल नहि जा सकैछ जकर परिणाम भेल भारतक सर्वोच्च साहित्यिक संस्था नेशनल लेटर्स ऐकेडमी अर्थात् साहित्य अकादेमी द्वारा एहि भाषा साहित्यिक परम्परासँ अवगत भऽ मान्यता प्राप्त भेलैक। बिहार एवं केन्द्र सरकारक उदासीनताक कारणेँ ई भाषा सर्वथा उपेक्षित देखि हुनका हृदयक आक्रोश भेलनि आ ओ कविवर सीताराम झा (1891–1975)क निम्नस्थ पंक्तिसँ अतिशय प्रभावित भेलाह: अछि सलाइ मे आगि, बरत की बिना रगड़ने। पायब निज अधिकार, कतहुँ की बिना झगड़ने।। कविवरक उपर्युक्त पंक्तिक व्यापक प्रभाव जनमानस पर पड़लैक जाहिसँ अभिभूतओ जन जागरणक अभिनव अभियान चलौलनि जे जनमानस अपन लेल मातृभाषाक महत्त्वकेँ जानय, बुझय आ अपन समुचित अधिकार प्राप्त करबाक दिशामे हुनका सहयोग देमक हेतु उताहुल भऽ गेल। कारण ओ अनुभव कयलनि जे मिथिलांचल वासीमे भाषा चेतनाक सर्वथा अभाव छैक। भाषा चेतनाक अर्थ थिक मातृ भाषाक प्रति प्रेम, दायित्व–बोध, कर्त्तव्य–बोध, गौरव–बोध आदि समस्त विषय चेतना शब्दमे सन्निहित अछि। भाषाक उन्नति आ विकास ओहि भाषा भाषीक चेतना पर निर्भर करैछ, किन्तु मैथिली भाषी जनमानसमे अपन भाषा आ साहित्यक सर्वांगीन विकासक अकाँक्षाक अभाव देखि ओ सर्वप्रथम भाषा चेतना जगयबाक निमित्त आन्दोलन कयलनि जे हम मैथिल छी, हमर मातृभाषा मैथिली थिक आ हम मिथिलावासी छी। एहि भावनासँ ओ उत्प्रेरित भऽ मिथिलांचल वासीसँ अनुरोध कयलनि जे जाति–भेद, वर्ग–भेद छिद्रान्वेषणक प्रवृतिक परित्यागक एक जुट भऽ मिलजुलिक भाषाक विकास कार्यक प्रति सम्बद्ध भऽ आन्दोलन करी। ओ मैथिली आन्दोलनकेँ नव स्वरूप प्रदान करबाक आकांक्षी रहथि, कारण हुनक प्रबल इच्छा छलनि जे आन्दोलन सम्बन्धी कार्यक्रमकेँ रूपायित करबाक झुण्ड बान्हिक ढ़ोल बजा कऽ गाम–गाममे घुमि कऽ मातृभाषाक महत्वकेँ बुझायब। एहि लेल मुख्य–मुख्य स्थान पर मीटिंगक आयोजन करब आ मातृभाषाक वास्तविक महत्त्व आ तज्जनित विविध समस्यादिसँ जनमानसक ध्यानाकर्षित करब। एहि भाषा पर एक जातिक वर्चस्वकेँ समाप्त करबाक लेल सेहो आन्दोलनक आवश्यकता अछि तकर अनुभव हुनका भेलनि। ओ मिथिलांचलक मुसलमानकेँ आन्दोलनक संग जोड़ेबाक हुनक बलवती इच्छा छलनि। ओ एहन आन्दोलनक आकांक्षी रहथि जे सामान्य जनक वैह प्रतिनिधत्त्वक ओहि अंचलक, ओहि क्षेत्रक, समाजक सर्वांगीन उन्नतिक हेतु सतत सक्रिय रहथि। किन्तु हुनका पीड़ा एहि बातक छलनि जे मिथिलांचलवासी आन्दोलनक प्रति उदासीन अछि। मैथिली आन्दोलनमे तीव्रता अनबाक हेतु जाधरि क्षेत्रीय सांसद आ विधायक सहयोग नहि करताह ताधरि ई धारधार नहि भऽ सकैछ। किन्तु ओ एहि बातसँ अत्यधिक दु:खी रहथि जे मिथिलांचलसँ निर्वाचित प्रतिनिधि लोकनिमे जागरणक अभाव परिलक्षित भेलनि। मैथिली आन्दोलन दधीचि बाबू भोला लाल दास (1894–1977) कथनछनि जे चुप्पचाप बैसने न्याय नहि भेटि सकैछ। मिथिलांचलक सर्वांगीन विकासक हेतु मिथिलावासीकेँ एकबद्ध भऽ सिंहनाद करबाक प्रयोजन अछि आ अपन अधिकारक लेल संघर्ष करबाक ओ आह्वान कयलनि यथा: अन्यायी सत्ता छी प्रलय, गगन सम अति विषम। हमरहिं लधु हुँकार सँ, महाप्रलय होइछ नियम। मैथिली आन्दोलनकेँ ओ नव रूप देबाक प्रयास कयलनि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि राष्ट्रीय रूप एकरा नहि प्रदान कयल जायत ताधरि मैथिलीक विकासक सम्भावना नहि। जहिना ओड़िया भाषी, असमिया भाषी आ नेपाली भाषीकेँ अपन भाषाक प्रति अगाध श्रद्धा छैक जे अपन चिर स्नेही ‘अमार भाषा जननी’क नारा लगबैत अछि तहिना मैथिली भाषीकेँ अपन भाषाक प्रति स्नेह उत्पन्न करबाक लेल आन्दोलनक प्रयोजन अछि। जाहि–जाहि भाषाकेँ साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त छैक ओहि सब भाषाकेँ भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे नहि सम्मिलित कयल जायत तकरा लेल राष्ट्रीय स्तर पर आन्दोलनक प्रयोजन अछि1 एहि लेल आन्दोलनकेँ तीव्रतर करबाक लेल मिथिलांचलक गामक पद्–यात्रा कयल जाय आ जिला–जिलामे जन आन्दोलन करबाक ओ आह्वान कयलनि। मैथिली आन्दोलन तँ पत्र–पत्रिका, पत्रकार, साहित्यकार आ सहृदय मैथिली प्रेमी धरि सीमित अछि तकरा व्यापक परिधिमे अनबाक आवश्यकता अछि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि एकरा राष्ट्रीय रूप नहि देल जायत ताधरि एहि भाषाक कल्याणक सम्भावना हुनका नहि छलनि। जहिना पौल रोबसनक लिखल जाहि गीतकेँ लूथर किंग नामक निग्रो नेता अपन निग्रो आन्दोलनमे उपयोग कयलनि तहिना तकरा हमरा लोकनिकेँ भाषा समूहक संग्राम गीत धोषित करबाक आवश्यकता अछि: We Shall OverCome, We Shall Over Come We Shall over come, Some day, o ! deep in my hewck I do seelieve, We Shall OverCome Someday We will have in peaee, We will go hand in hand जाधरि मिथिलांचल वासीकेँ उपर्युक्त काव्यांशसँ अनुप्राणित नहि हैताह ताधरि हमरा लोकनिक आन्दोलन सफलीभूत नहि भऽ सकैछ। जयकान्त मिश्र मैथिली नाम पर चलाओल आन्दोलनकेँ टिमटिमाइत दीप मानैत रहथि। मैथिलीक नाम पर जतेक संघर्ष चलाओल जाइत ओ साधारणत: हमर आन्दोलनकेँ उजागर करैत अछि। छोट–छोट बातकेँ लऽ कए आन्दोलन करब तकरा कथमपि आन्दोलनक संज्ञासँ नहि अलंकृत कयल जा सकैछ। मैथिली आन्दोलनकेँ चलयबाक लेल विराट शक्ति प्रयोजन अछि। मैथिली भाषी द्वारा जे आन्दोलन चलाओल जा रहल अछि ओकरा एकर विकास नहि–प्रत्युत विनाश मानैत रहथि। मैथिली आन्दोलनक असफल भऽ जयबाक कारणक उल्लेख करैत हुनक कथन छलनि जे पंजाबी आ उर्दू सहश हमर भाषा कोनो धर्मक संग सम्बद्ध नहि अछि। मैथिली बजनिहारक संख्या भारतमे सातम अछि। हमर भाषाकेँ स्वतंत्र लिपि छैक। एकर अतीत अत्यंत समुज्जवल अछि। एकर महान सांस्कृतिक परम्परा छेक। सांस्कृतिक अस्मिताक रक्षाक लेल आन्दोलन आजुक धर्म थिक। आन्दोलनमे तखने बल आओत जखन हम संस्कृतिक शंखनादकरब जन–जन भाषिक चेतनाक हुँकार भरब। एहि प्रसंगमे ओ आरसी प्रसाद सिंह (1911–1996)क प्रसिद्ध काव्य बाजि गेल रनडंक उल्लेख करैत रहथि: बाजि गेल रनडंक, ललकारि रहल अछि गरजि–गरजि कय जनजनकेँ परचारि रहल अछि आबहु की रहतीह , मैथिली बनलि वन्दिनी ? तरूक छाँहमे बनि उदासिनी जनकनन्दनी? मैथिली आन्दोलन सतत गतिशील रहल जकर परिणम अछि जे ओ नीचाँसँ ऊपर ससरल अछि। ई एकरे परिणाम थिक जे साहित्य अकादेमी, भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूची, संघलोक सेवा आयोग, बिहार लोक सेवा आयोग, उच्चत्तर माध्यमिक, विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययनक रूपमे स्वीकृत भेल। इएह तँ मैथिली आन्दोलनक अद्यतन स्थिति अछि। जतेक सुविधा हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध भेल अछि तकरा ओ उपयोग करबाक मंत्र देलनि। मैथिलीक वास्तविक विकासक हेतु अद्यापि आन्दोलन अपेक्षित अछि। आवश्यकता अछि जे हमरा लोकनि आन्दोनोन्मुख भऽ प्रयास करबाक चाही जे राजभाषाक रूपमे एकरा स्वीकृति भेटैक। जीवनक परिणत वयमे ओ मिथिला राज्यक स्थापनार्थ आन्दोलनक हेतु संघर्ष करबाक शुभारम्भ कयलनि। अपन सम्मानक रक्षार्थ ओ पुन: एहि अग्निकेँ प्रज्वलित कयलनि जे अद्यापि जनमानस संघर्षरत अछि। हुनक आकांक्षा छलनि जे राष्ट्रक अखण्डता एवं एकता रहओ, किन्तु अपना घरमे, अपना जिलामे, अपना प्रान्त वा राज्यमे अपन भाषा आ संस्कृति अक्षुष्ण राखि अग्रसर होइ। लोक भरिपोख, भरि मन जीवित रहि देशक उन्नतिमे सहभागी हैत। कुंठित, कलुषित, हीन, व्यक्तित्वक विकास कहियो नहि सम्भव छैक। मातृभाषाक माध्यमे प्राथमिक शिक्षा शिक्षा आ भाषा दुनूक विकास परस्पराश्रित अछि। शिक्षा मानव जीवनक मेरुदण्ड थिक। शिक्षाक उद्देश्य ज्ञानार्जन थिक। ज्ञानार्जनक हेतु भाषा माध्यम थिक। अतएव कोना भाषाक सफलता एहि बातपर अवलम्वित अछि जे कोन सीमा धरि ज्ञानार्जन आ अर्जित ज्ञानक अभिव्यक्तिमे सहायक होइछ जकरा द्वारा व्यक्तितत्त्वक निर्माण होइछ आ आन्तरिक शक्तिक विकास होइछ तथा ओ एक उत्तरदायी नागरिक रूपमे जनमानसक समक्ष अबैछ।मातृभाषाक माध्यमे प्रथमि शिक्षा एक सिक्काक दू पहलू थिक। अतएव प्रारम्भिकावस्थामे जीवनमे मातृभाषा आ प्राथमिक शिक्षा दुनूमे प्राथमिकता अपेक्षित अछि। एहि प्रसंग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850–1885) क कथन छनि: निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति की मूल बिनु निज भाषा ज्ञानकेँ मिटय नहि हृदयक सून। मातृभाषाक माध्यमे शिक्षा नहि देलाक कारणेँ हुनका हृदयमे अपार कष्ट छलनि। एहि लेल ओ पृथकसँ जन आन्दोलनक चलयबाक अभियान चलौलनि, किन्तु हुनक ई स्वप्न साकार नहि भऽ पौलनि बिहार सरकारक उदासीनताक कारणेँ। हमरा जनैत मिथिलावासी अपन मातृभाषाक महत्त्व नहि बुझबाक ई दुखद परिणाम थिक। जँ लोक अपन नेना–भुटकाकेँ मातृभाषाक महत्त्वसँ वस्तुत: अवगत करबितथि तँ एक एहन स्वस्थ वातावरणक निर्माण होइत जे बिहार सरकारकेँ वाध्य भऽ कए शिक्षा नीति लागू करय पड़ितैक। जखन जगन्नाथ मिश्र बिहारक मुख्यमंत्री भेलाह तखन जयकान्त मिश्र अत्यधिक आशान्वित भेलाह, किन्तु ओकर कोनो फलाफल नहि बहरायल। हुनक अवधारणा छलनि जे जँ प्राथमिक शिक्षा मैथिलीक माध्यमे होइत तँ मिथिलांचलक अधिकांश समस्याक समाधान स्वत भऽ जाइत। मातृभाषाक माध्यमे शिक्षा नहि भेटबाक कारणेँ प्राथमिक स्तर नेना सभकेँ शिक्षाक प्रतिअरुचि भऽ जाइछजकर परिणाम होइछ जे विद्यालयसँ छात्रक पलायन भऽ जाइछ। तेँ प्राथमिक स्तर पर मातृभाषाक माध्यमे शिक्षाक कार्याययनक हेतु ओ सतत संघर्ष करैत रहलाह। मैथिलीकेँ प्राथमिक स्तर पर शिक्षा नीति लागू करयबाक हेतु ओ समस्त मिथिलांचलमे पद–यात्रा, बैसार, प्रचार तँ करबे कयलनि, एतेक धरि ओ कानूनी लड़ाई लड़बासँ पाछू नहि रहलाह। एहि प्रसंगमे हुनक कथन छनि आन–आन देश उन्ततिक शिखरपर पहुँचल अछि तकर प्रमुख कारण थिक जे ओ सव मातृभाषाक महत्त्वसँ अवगत अछि। रुस, जापान, इंग्लैण्ड, अमेरिका आदि देशमे प्राथमिक शिक्षा ओकर मातृभाषाक माध्यमे देल जाइछ जे प्रगतिक पथ पर दिनानुदिन अग्रसर भेल जा रहल अछि। किन्तु मिथिलांचलमे जन जागरणक अभाव कारणेँ अभिभावक अपन भाषाक श्रीवृद्धि करवाक हेतु प्रयत्न नहि करैत छथि। मैथिल शिक्षक मैथिली पढ़यबाक हेतु प्रयत्न नहि करैत छथि। यावत मैथिल समाज एहि प्रश्नक समुचित उत्तर नहि देत, तावत मैथिलीकेँ आगाँ बढ़यबाक कोनो आन्दोलन सफल नहि भऽ सकत। सन् 1969 ई.मे मिथिला मण्डल मुम्बई द्वारा आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्मेलनमे विचारणीय बिन्दु मातृभाषाक माध्यमे प्राथमिक शिक्षा ओहि सम्मेलनमे हमहुँ सम्मिलित भेल छलहुँ। जयकान्त मिश्र अपन विचार प्रस्तुत कयने रहथि जे निम्नस्थ अछि: 1. शैशवावस्थामे मातृभाषाक माध्यमे शिक्षाक व्यवस्था रहला पर ओकर मस्तिष्कक विकास सहज, सुगम आ विषय-वस्तुक ज्ञान प्रारम्मिक संस्कार स्थायी होइछ। ओ सुगमता पूर्वक ग्रहण करैछ जे विषय-वस्तु बुझवामे सहायक होइछ। एहिमे कोनो सन्देह नहि जे सुगमतासँ ओकर विकासक सम्भावना अछि। 2. प्रजातन्त्रक प्रथम शर्त थिक जे जनमानसकेँ शिक्षित करब, जाहिसँ ओ कोनो कार्य सम्पूर्ण शक्तिक संग सहर्ष करता ओकर शक्ति विषय-वस्तु बुझबामे सहायक होइछ। जतय कोनो समस्या उत्पन्न हैत तँ ओकर समाधान ओ आसानीसँ कऽ पबैछ। जीवित प्रजातन्त्रक मूल मन्त्र थिक प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्यमे देल जाय। 3. एहिमे कोनो सन्देह नहि जे प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्यमे देल जाय, कारण मैथिली एक प्राचीनतम जीवित भाषा थिक तेँ एकरा अनिवार्य रूपेँ लागू करबाक दिशामे प्रयासक प्रयोजन अछि आ सरकार पर एकरा लागू करबाक हेतु वाध्य करबाक प्रयोजन अछि। बिहार एवं झारखण्ड राज्यक अधिकांश जिलामे ई बाजल जाइत अछि ततय अनिवार्य रूपेँ एकरा लागू करबाक हेतु सरकार पर दबाव बनायब आवश्यक अछि। किन्तु दुर्योग विषय थिक जे सरकारक उदासीनताक कारणेँ नहि तँ मैथिलीमे प्राथमिक शिक्षाक पुस्तक प्रकाशित भेल आ ओकर अध्यापनक व्यवस्था अछि जे चिन्तनीय विषय थिक। अतएव आवश्यक अछि एकर विरोधमे जनमत संग्रह कऽ कए सशक्त आन्दोलन कऽ कए बधिर सरकारकेँ जगयबाक प्रयोजन अछि। सुसुप्त सरकारकेँ जाधरि जगाओल नहि जायत ताधरि मिथिलांचलमे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिलीकेँ मान्यता नहि भेटत। मिथिला आ मैथिलीक सर्वतो भावेन विकास आ विविछ समस्यादिक निदान ओकर निराकरण ताधरि सम्भावित नहि अछि जाधरि ओहिसँ लड़बाक शक्तिक लेल मातृभाषाक माध्यमे प्राथमिक शिक्षा अपेक्षित अछि। जयकान्त मिश्र द्वारा चलाओल एहि आन्दोलनकेँ साकार रूप देबाक हेतु घर–घरमे बच्चा सभकेँ प्राथमिक शिक्षा देबाक दिशामे प्रयास अपेक्षित अछि। ई विषय बुझबामे नहि अवैछ जे भारतीय संविधान, साहित्य अकादेमी आ अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक एवं साहित्यिक संस्था, पी.इ.एन. द्वारा एहि भाषा आ साहित्यकेँ मान्यता प्राप्त तखन बिहार सरकार प्राथमिक शिक्षाक रूपमे एकरा लागू किएक नहि करैत अछि? एकरा लागू कयला सँ सरकारक प्रतिष्ठा बढ़तैक। नि:सारण मैथिली साहित्यक प्राचीनतम परम्पराकेँ सुदृढ़ करबाक दिशामे जनजागरणक जयकान्त मिश्र द्वारा जे अभियान चलौलनि एकर मान्यतार्थ ओ जे संघर्ष कयलनि, दधीचिक समान हड्डी गलौलनि तनिक अक्षय अवदानकेँ अक्षुण्ण रखबाक आ ओकरा अग्रगति करब प्रत्येक मैथिली भाषी जनमानसक पुनीत कर्त्तव्य थिक। एहि परिप्रेक्ष्यमे हुनक आलेखादि यत्र–तत्र विविध संग्रहादिमे, पत्रिकादिमे प्रकाशित अछि वर्त्तमानमे धूलधूसरित भऽ रहल अछि तकरा संकलित कऽ कए प्रकाशमे आनब प्रत्येक मैथिली भाषीक पुनीत कर्त्तव्य थिक।इएह एहि युगपु रुषक प्रति वास्तविक श्रद्धाञ्जलि हैत जे हुनक मातृभाषानुरागक प्रति व्यक्त विचारादि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे प्रकाशित कऽ कए परवर्त्ती एवं भावी पीढ़ीक दिशा–बोध करयबामे सक्षम भऽ पाओत अन्यथा ओ अक्षय कीर्ति कालक प्रवाहमे गिरि–गहवरमे विलीन भऽ जायत। ई श्रेय आ प्रेय हिनके धनि जे ओ अपन सत्प्रयाससँ मिथिली साहित्यकेँ समृद्ध आ व्यापक स्वरूप प्रदान कयलनि जे मैथिलीक अस्तित्त्व सुरक्षित कऽ सकल। हुनका समक्ष कोनो आदर्श नहि छलनि तथापि मातृभाषाक सम्वर्द्धनार्थ ओ आदर्श पुरुष रहथि। ओ मार्ग निर्देशक बनि मातृभाषानुरागक बीजक वपन कयलनि आ ओकर उन्नयनार्थ अति महत्त्वपूर्ण कार्य कयलनि। हुनक तप, त्याग, तपस्या, कर्मशीलता, वैचारिक स्तरपर सतत अटल–अडिग रहनिहार मैथिली प्रेमी जनमानसकेँ चिरन्तन प्रेरणा–स्रोत बनल रहता। ओ अपन अद्वितीय वैदुष्यक जे आदर्श छोड़ि गेलाह ओ मातृभाषानुरागी सतत प्रेरणा–स्त्रोत बनल रहता परवर्ती पीढ़ी पर। हिनक मातृभाषाक बहुमूल्य साहित्यिक अवदानसँ अतिशय प्रभावित भऽ विश्रुत भाषाशास्त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी मैथिली शब्द कोशक प्रथम खण्डक फारवार्ड लिखलनि जे डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1850-1941)क पश्चात् भारतमे मैथिलीक सबसँ पैघ चिन्तकक रूपमे अजर, अमर आ अक्षुष्ण रहता His name will be handed down to Posterity in India as the greatest been factor of Maithili at present day after that of illustrious George Abraham Geierson, and will earn for him gratitude of sixteen millions of Maithili speakers in the first instance and of the Senolarly world of India, in the see and वस्तुत: हिनका हेतु ई सौभाग्यक बात रहलनि जे अपन जीवन कालमे ओ मैथिलीक विकास आ विस्तार देखि पौलनि। २.३. १ कमला चौधरी-कथा--गुणनफल २.दुर्गानन्द मंडलबकलेल (कथाक दोसर आ अन्तिम भाग) १. कमला चौधरी-1953-कृति- मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली, प्रकाशनाधीन: बाटे बिलायल पानि (कथा संग्रह), पिया मधुमास (कविता संग्रह), आशापूर्णा देवीक बंगला लघु उपन्यास मन मंजूषाक मैथिली अनुवाद। मुजफ्फरपुरसँ प्रकाशित मैथिली साहित्यिक पत्रिका स्वातीक सम्पादन (१९८४-८५)। कथा- गुणनफल मीरा माइक प्रसन्नताक कोनो सीमा नहि। आइ भोरेसँ छोट–मोट मोटरी बन्हवामे लागलि छथि। आखिर नव गृहस्थी बसतैक। कतेक छोट–छिन वस्तुक खगता होइत छैथ। ताबत ध्यानमे अयलनि जे थोड़ेक कोबीक सुखौत आ चिक्कस सेहो बान्हि देबाक थिक। नहि तऽ जाइते बजारक मुम्ह देखय पड़तैक। ई सभ करैत–करैत आँखि नोरा गेलनि। मीरा–फूल सन कोमल आ सादा कागत सन स्वच्छ। आँखिक आगाँ चमकि गेलनि विवाहक ओ दिन। परिछन करैत काल दाइ–माइ सबकेँ मीराक भाग्यपर ईर्ष्या भेल रहनि। केओ टिपैत कहने छलीह–गे दाइ ई तँ सत्ते मीरा आ क्रष्णक जोड़ी हेतै। वर जहिना कुर्ता आ गंजी खोललनि कि सभक नजरि हुनक उन्नत आ पुष्ट छाती पर रूकि गेलनि। मीराक माए जल्दीसँ जमाएकेँ डोपटा ओढ़ाए, काजर लगाए, देलथिन्ह आ गोसाऊनि घर लऽ कऽ चलि गेलीह। आङ्गन घर शुभे हे शुभेसँ मुखीत भऽ गेल रहए। सिनुरदान नीक जकाँ सम्पन्न भऽ गेलैक। मीरा माए निश्चित नहि रहि सकलीह। चारि दिनुक बादे ओझाक नाकर–नुकुर कानमे पड़ए लगलनि। ओझा माने सुनील बाबू–खबासक संग स्नान करए जएबाकाल आङनेमे ठाढ़ि सासुकेँ सुनबैत कहलनि–हमरा तऽ सूनल छल जँ मीरा मैट्रिकक परीक्षार्थी छथि। मुदा, हिनका तँ मिडिल मात्रक योग्यता छनि। हम शहरमे रहनिहार लोक छी। पढ़ल–लिखल लोक सभक संग उठब बैसब अछि। ओहिमे मीरा कोना एडजस्ट करतीह? मीरा माए कमलपुर वाली अति विनम्र शब्देँ ओझाकेँ बुझबैत कहने छलीह, मीरा एखन मात्र चौदह वर्षक अछि। ओकरा जेना जे पढ़बए चाहथिन से पढ़ि लेतनि। हम एकसरि अपना भरि मीराकेँ सुयोग्य स्त्री बनबाक शिक्षा देने छिऐक। आब आगाँ हिनकर थिकन्हि। जेहन बनाबथि। जेना राखथि। सप्ताह दिन मात्र सासुरमे रहि ओझा विदा भऽ चल गेल छलाह। सासुक बहुत आग्रह पर फगुआमे अएबाक भरोस देलथिन। मुदा, तीन फगुआ बीति गेल। ओझाक कोनो पता नहि। शिवरात्रिक मेलामे ओझाक कोनो गौआँ बौआ ककाकेँ कहने रहथि जे हुनकर जोगर कनिञा नहि भेलनि। तेँ आन–जान छोड़ने छथि। ई बात बुझिते कमलपुर वाली कबुला–पातीक आभार लगा देलनि। बेटीक मुँह देखिते ह्रदय टुकड़ी–टुकड़ी होबए लगनि। मुदा साध्य की! तीन वर्ष तीन युग सन बीतल छल। ओझाकेँ नहाएकेँ घर जाइत देखि कमलपुर वालीक ध्यान टूटलनि। मोटरी बान्हब छोड़ि दौड़लन्हि भानस घर। जैधीकेँ चूल्हि लग बैसा आयल रहथि। कटोरी सभमे तीमन तरकारी सजबए लगलीह। ओझाकेँ भोजन पठाकेँ फेर पेटी सरिआबए लागल रहथि। जेठकी दियादिनीकेँ सोर पाड़ि मीराकेँ नूआ बदलि केश खोपा कऽ देबए कहलनि। सभ ओरिओन होइत बेर खसि पड़लैक। ओझाक सम्बाद आयल जे पटना पहुँचैत राति भऽ जाएत, ते जल्दी विदा होएब जरूरी। आङनमे आइ माइ जुमि गेल छलीह। कमलपुर वाली मीराके भरि पाँज पकड़ि घर लऽ गेलीह। हृदयमे हाहाकार भऽ रहल छलनि। किछु फूटि कऽ बाहर होबए चाहैत छल, मुदा अपनाकेँ नियंत्रित कैने छलीह। इहो दिन भेल जे तीन बरखक बाद ओझा मीराकेँ लेबए अयलाह अछि। दुनू हाथेँ बेटीक गाल पकड़ि बुझबैत कहलनि, दाइ, आइसँ सभ किछु वैह छथुन। जेना रखथुन तहिना रहिहेँ। बिनु पुरूषक स्त्री पाथर होइए। बिसरि जइहेँ सभ किछु। बस कहियो काल पोस्टकार्डपर कुशल मंगल खसा दिहे। आर किछु नहि। माए, काकी, काका सभकेँ गोर लागि विदा भऽ गेल छलीह मीरा। बसमे चुपचाप बैसलि मीराक आँखिक आगाँ झुलैत रहलनि सभ दृश्य–पोखरि, इनार, कलम, सरिसोक साग आ संगी बहिनिया–जोड़ी, फूल, लौंग....। माएक बात मोन पड़ि गेलनि। इ सभ तऽ बिसरि जएबाक थिक। मन रखवा लेल छथि, बस इएह टा! पटना पहुँचि अपन गृहस्थी बसएबामे मीरा लागि गेलीह। बहुत किछु तँ माए संग कऽ देने रहथिन। बाँकी आवश्यक वस्तु सुनील जुटाए देलथिन्ह। मीरा अपन गृहस्थीमे लीन भऽ गेलीह। मास दिन तँ पाँखि लगा उड़ि गेल। मुदा एहि बात दिस मीराकेँ आइ ध्यान गेलनि। ऑफिस जएबाक तऽ एकटा कोनो निश्चित समय होइत छैक। सुनीलकेँ बाहर जएबाक तँ कोनो निश्चित समय नहि छन्हि। ओ ई बात आब सुनीलकेँ पूछबे करतीह। एक दिन उदास स्वरमे सुनील कहने रहथिन्ह मीरा, हम बहुत दुविधामे जीबि रहल छी। अहाँसँ नुकाएब थीक नहि। वस्तुतः हमर नोकरी छोटि गेल अछि। इम्हर–ओम्हरसँ पैंच–उधार लऽ घरक खर्च चला रहल छी। आब दोस्तो–महीम संग छोड़ि देलथि अकि। एहन समौअमे अहीं हमर मददि कऽ सकैत छी। मीरा हतप्रभ भऽ गेलीह। ओ कोना मददि कऽ सकैत छथि? ओ तँ अधिक पढ़लो–लिखल नहि छथि। हुनक मनोभाव पढ़ि सुनील बुझओने रहथिन, ‘यैह कातहिमे सौंदर्य केन्द्र छैक। ओहिमे तीन मासक प्रशिक्षण लऽ लिअ आ फेर ओतहि काज करब शुरू कऽ दिअ। दू–तीन हजार मास कमायब साधारण बात अछि। ओहिना ठाढ़ि रहली मीरा। हुनका बुझबामे किछु नहि अयलनि। सौंदर्य केन्द्र?, प्रशिक्षण? रूपैया? तीनू शब्द मनमे बेर–बेर–हौड़ए लगलनि। ओ तँ स्त्रीक काज घर सम्हार बुझैत छलीह। ई हुनकासँ की करबए चाहैत छथि? सुनील मीराकेँ हाथ पकड़ि चौकीपर बैसा लेने रहथिन–मीरा, हम सभ बुझा देब। बस, जेना हम कहैत छी, से करैत चलू। अहाँ सुंदरि छी। कने स्मार्ट भऽ जाउ। फेर देखू मे, हमर सभक दरिद्रा कोना भागि जाएत। ई सभ किछु सुनबामे मीराकेँ नीक नहि लागल रहनि मुदा माइक कहल जहिना रखथुन, तहिना रहिहै’ मन पड़ि गेलनि। ठीके तँ छैक, जहिना रखताह तहिना रहब। ओहि दिन साँझमे सुनील नव ‘डिजाइन’क साड़ी, रेडिमेड ब्लाउज, हिल चप्पल एवं अन्य फैशनक वस्तु मीराक आगाँ पसारि देलनि। -ई सभ पहिरिकेँ तँ अहाँ परी जकाँ लागब मीरा। मुदा, हमरा बिचारेँ अहाँक नाम बदलिकेँ जँ ‘रूबी’ रहितए तँ बेसी नीक होइत। मीरा! बहुत ‘ओल्ड’ फैशनक नाम थिक। आइसँ हम अहाँकेँ रूबी कहल करब। सभ किछु स्वीकार करबाक अतिरिक्त ओ कए की सकैत छलीह? प्रातःकाल सुनीलक संग हुनका सौंदर्य–केन्द्र जयबाक छलनि। सुनीलक बिचार छनि जे प्रशिक्षणसँ पूर्व हुनकर अपन सौंदर्यमे निखार आबि जयबाक चाही। तखनहि ओ ठीक ढ़ँगसँ प्रशिक्षण लऽ सकैत छथि। आज्ञाकारी नेना जेना अभिभावकक संग पाठशाला जाइत अछि, तहिना दोसर दिन सुनीलक पाछाँ–पाछाँ मीरा विदा भेलीह। सौंदर्य केन्द्रक व्यव्स्थापिका मिस डेजीसँ मीराक परिचय दैत सुनील कहने रहथिन, ई हमर पत्नी रूबी छथि। हिनका कने अहाँ स्मार्ट बना दियनु–जाहिसँ इहो अहाँक ‘एसिसटेंट’ बनि सकथि। बेस, तँ जावत हिनका निखारबामे समय लागत, ताबत हम एकटा मित्रसँ भेंट कऽ अबैत छी। सुनील तँ चलि गेल छलाह मुदा मीरा बलिक छागर जकाँ भयभीत दृष्टिसँ मिस डेजी दिस तकिते रहलीह। तकिते तँ रहि जइतथि मुदा मिस डेजी मीराकेँ केन्द्रक भीतर लऽ कऽ चल गेलीह। ओतए मोट–मोट स्त्रीकेँ कुर्सीपर ओंघरल आ मुँहपर लेप लगौने देखि मीराक मन भिनकि गेलनि। ओतुका बात व्यवस्था बड़ अजगुत बुझना जाइनि। ई कोन दुनियाँ थिक? एहि दुनियाँक खिस्सा तँ कतहु नहि सुनने छी। किछु काल मीराक सुधि–बुधि जेना हेरा गेलनि। ध्यान तखन भंग भेलनि जखन मिस डेजीक कैंची हुनक केशपर चलब शुरू भेल। मीरा, ‘नहि नहि’ कहैत उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलीह। -देखू, अहाँक पति जे निर्देश देलनि अछि, सैह हम कऽ रहल छी। हमर समय बर्बाद नहि करू। भौं चढ़बैत मिस डेजी बजलीह। ठीके तँ ओ सुनीलक निर्देशक अनुसार सभ किछु करैत छथि। तखन विरोध कथीक? मीरा धब्ब दऽ कुर्सी पर बैसि गेलीह। किछु कालक बाद हुनक केश आ भौंहुक आकार–प्रकार बदलि चुकल छल। कुर्सीक नीचाँ काटल केशकेँ देखि भीतरे–भीतर कुहरि गेलीह मीरा। केश बन्हैत काल माइक मुँहसँ झहरैत गीत मन पड़ि गेलनि केशक पोरे–पोरे तेल लगा केहन सीटिकेँ केश बन्हैत रहथिन। आब से सम्भव नहि भऽ सकत। नोरक प्रबल वेगकेँ बलात नियंत्रित कएने रहलीह। केन्द्रक दाइ सुनील बाबूक अयबाक सूचना दऽ गेल रहनि। मीराक संग मिस डेजी सेहो बाहर अयलीह। मिस डेजी आ सुनीलमे किछु गप्प–सप्प भेलनि आ निश्चित भेल जे काल्हिसँ दस बजे ओ अपन पत्नीकेँ ओतए पहुँचाए देल करताह। रिक्शापर सुनील मीराकेँ चुटकी लैत कहने रहथि–वाह, हमर रूबी! आइ तँ अहाँ कमाल लागि रहल छी। चलू एही बातपर एकटा सिनेमा देखल जाए। रिक्शा सिनेमा हॉल दिस बढ़ि गेल छल। सिनेमा हॉलमे आँखिक आगाँ अबैत–जाइत चित्र मीराकेँ कनेको नीक नहि लागि रहल छलनि। चित्रमे एकटा खूब अधिक आधुनिकाकेँ देखबैत सुनील कहलनि–रूबी! छौ मासमे अहाँ एहने स्मार्ट भऽ काएब। तखन तँ अहाँकेँ गामक सखी बहिनया चिन्हबो नहि करतीह।-आ सुनील मीराक हाथ अपना हाथमे लेबए चाहलनि। मीराकेँ किछु नीक नहि लागि रहल छलनि। ओ ओहिन चुपचाप निर्जीव सन बैसल रहलीह। हुनकर चुप्पीकेँ सुनील लक्ष्य कऽ रहल छलाह। घर अयलापर ओ विशेष तमसाए गेल रहथि–अहाँ अपन देहाती चालि–ढ़ालि छोड़ब कि नहि? पति जँ पत्नीसँ हँसी मजाक करए चाहैत अछि तँ ओकर काज थिक ओहिमे संग देब। अहाँ एना–पाथर सन किए बनल रहैत छी? गामसँ की अहाँकेँ हम पूजा करए अनलहुँ अछि? हम कर्ज लऽ कए अहाँपर खर्च कऽ रहल छी, एकर बदलामे अहाँसँ किछु चाहैत छी तँ से अहोकेँ नीक नहि लगैए। मीरा, समदाउन आ सोहरक आब समय नहि अछि! प्रैक्टिकल बनू प्रैक्टिकल। जतयसँ आयल छी से बिसरि जाउ। जतय आइ छी बस ओकरे टा ध्यानमे राखू। नहि तँ बाजू, काल्हिए माए लग पहुँचा आबी? दुनू हाथेँ कान बन्द कऽ लेने छलीह मीरा। नहि, नहि ओ माए लग नहि जयतीह। तीन वर्ष धरि माइक अंतःपीड़ाकेँ ओ भोगने छलीह। फेरसँ हुनका वैह दुःख देबय नहि जयतीह। मीरा ओछाओनपर कछमछाइत रहलीह। सुनील नीन पड़ि गेल छलाह। काल्हिसँ ओ नव दुनियाँमे प्रवेश करए जा रहल छथि। नहिजे नीक लगैत ओहिमे मन लगेबाथ छनि। माइक कहब पुनः मन पड़ि गेलनि। जहिना रखथुन, तहिना....’। भिनसरे मीरा सुनीलक उठबासँ पहिनहि घरक काज धन्धासँ निश्चिंत भऽ स्नान कऽ रहल छलीह। सुनील हुनक फुर्ती देखि अचंभित छलाह। देखू, हम तैयार छी। अपने विलम्ब करब तँ हमर दोष नहि।-स्नान घरसँ बहराइत मीरा बजलीह। सुनील सेहो तैयार भऽ मीराकेँ प्रशिक्षण केन्द्र धरि दए अएलाह। लऽ जयबाक ओ लऽ अनबाक ई क्रम सप्ताह भरि चललाक बाद मीरा सुनीलकेँ एहि भारसँ मुक्त कऽ देलनि। आब हुनकामे आत्मविश्वास आबि गेल छल। नियत समयपर जाएब आएब हुनक जीवनक अभिन्न अंग बनि गेल छल आ एकर संगहि दिन प्रतिदिन मिस डेजीक कुशलता अपन आङ्गुरमे समेटने जाथि। तीन मास बितैत–बितैत श्रृंगार-कलामे मीरा निपुण भऽ गेलीह। कटिंग, फेशियल, ब्लीचिंग, वैक्सिंग, मैनीक्योर, पैडीक्योर आदि, सौंदर्यक सभ विद्यापर हुनका दक्षता भऽ गेल छलनि। ओना तँ केन्द्रमे आर प्रशिक्षिता सभ रहथि मुदा मिस डेजीक बाद दोसर नाम रूबीक सएह छल। मिस डेजी सेहो अपन ग्राहकक सोझाँ रूबीक नाम गर्वसँ लैत छलीह। कोनो आकस्मिक काजक दिन केन्द्रक चाभी रूबीक ओतए दऽ अबैत रहथि। रूबीकेँ आमदनी सेहो नीक होबए लगलनि। पहिल आमदनी लऽ जहिया सुनीलक हाथमे देलनि त ओ अनन्दसँ मीराकेँ कोरामे उठा लेने रहथि। ओना, मीराक भीतर किछु भिनकि गेलनि मुदा बाहर सँ प्रसन्न होयबाक नाटक कैने छलीन्ह–‘अच्छा कहू, आब हम अहाँ जोगर ‘स्मार्ट’ आ ‘प्रैक्टिकल’ छी कि नहि? आब तँ ने हमरा गाम दए आएब? -सेन्ट परसेन्ट! रूबी आब अहाँ ‘फर्स्ट क्लास’ भऽ गेल छी। अहाँकेँ भला हम गाम छोड़ि आएब? कथमपि नहि। जनैत छी रूबी, अहाँक ई रूप गढ़बामे हमर मित्र प्रकाशक बड पैघ हाथ अछि। ओ अहाँक फोटो देखि हमरा बिचार देने छल, तोहर पत्नी तँ सुन्दरि छथुन्ह। हुनका पटना आनि ले आ प्रशिक्षित कऽ काजमे लगा दहुन। फेर तँ ओ ‘सोनाक अंडा’ देनिहारि मुर्गी भऽ जयथुन। भभाकऽ हँसि देने छलाह सुनील। ‘सोना अंडा देनिहारि मुर्गी’? मीराक मनमे चोट लगलनि। मुदा, आब तँ ओ ओहि चोटक अभ्यस्त भऽ गेल छथि। जल्दीसँ कपड़ा बदलि जलखै बनबए चल गेलीह। मुदा, मुर्गी शब्द माथमे नचैत रहलनि। मीराक मूल्य बस यैह अछि। हृदय हाहाकार करए लगलनि। एहन समयमे माएक स्मृति मनकेँ शांति दैत छलनि। मुदा, एहि सभ पीड़ासँ माएकेँ अनचिन्हार रखने छलीह। ओ बरोबरि अपन माएकेँ अपन सुख आ खुशीक मिथ्या वर्णन पत्र द्वारा दैत रहैत छथि। मीराक माए ओ पत्र टोल–परोसमे लोकसँ पढ़ा कऽ कतेक आनन्दित होइत होयतीह से मीरा खूब जनैत छथि। बस, यैहटा खुशी तँ ओ अपन माएकेँ दऽ सकलीह अछि। मुदा, माए हुनका अनवा लेल ककरो किएक नहि पठबैत छथि? मीराक आँख भरि गेलनि। ओ जनैत छथि जे माइक आशंकाकेँ जे अनलासँ फेर कतहुँ ओझा छोड़ि ने देथि। माइक बिचारे बिना पुरूषक स्त्री देवाल बराबरि थिक। स्मृतिक झंझावातकेँ बसात रोकि मीरा सुनीलक आगाँ जलखै दऽ अयलीह। आब मीराक बेसी समय केन्द्रमे बितैत अछि। ओहिसँ आमदनी सेहो बढ़ि गेलनि। तेँ सुनीलकेँ कोनो विरोध नहि। हँ घरक टहल टिकोरा लेल एकटा बीरू नामक टेल्हकेँ राखि लेल गेल अछि। मीरा संध्यामे घर आबथि। सुनीलकेँ मित्र मण्डली संग ताश खेलाइत देखथि। बीरू चाह जलखैक ओरिआओनमे लागल। मीराकेँ मोन होइनि जे जखन ओ थाकि कऽ अबैत छथि तँ सुनील हुनका लग आबथि। हाल चाल पूछथि। मुदा सुनील तँ आबि गेलहुँ पूछिकेँ अपन खेलमे लागि जाइत छथि। एम्हर मीराक मन किछु दिनसँ खराब लागि रहल छनि। एक दिन केन्द्रपर जोरसँ कै भऽ गेलनि। मिस डेजी बुझाकेँ कहने रहथिन, अहाँकेँ डॉक्टरसँ देखाए कए आरामक जरूरी अछि। घर आबि सुनीलकेँ मीरा अपन स्थिति कहने रहथि। सुनील एहि बातसँ बहुत चिंतित आ व्यग्र भऽ गेलाह। रूबी, ई ठीक नहि भेल। एखन अहाँ कुशलताक चोटीपर छी। यैह समय तँ अछि कमएबाक। एहिमे बाल बच्चाक समस्या बड़ बाधक होएत। एहि लेल तँ एखन पूरा जीवने पड़ल अछि। हमर बात मानू। डॉक्टरक ओतए चलू। एकरा खतम कए आबी। मीराकेँ सुनीलक मुँह दिसि ताकि नहि भेलनि। लगलनि जेना हजारक हजार संख्यामे पील्लू सुनीलक चेहरापर ससरि रहल अछि। घृणासँ मन भरि गेलनि। एहने पुरूष बिना स्त्री देवाल थिक? -मीरा ओछाओनमे मुँह गाड़ने कनैत रहलीह। मनक विषाद दूर करवाक हुनका लग आर दोसर कोनो रास्ता नहि छलनि। जँ कनेक काल लेल हुनका उड़बाक शक्ति भेटि जाए तँ माएकेँ जा कहि अबितथि। एहुना तँ ओ देवाले बराबर छथि; जकरा मकान मालिक अपन मनोनुकुल रंगमे समय–समय पर रङैत रहैत अछि। मुदा, माइक भ्रम तोड़िकेँ ओ शांत तहि सकतीह? सुनीलक इच्छा आगाँ झुकि गेल छलीह मीरा। सप्ताहक भीतरे डॉक्टरक ओतए सुनील हुनका लऽ गेल छलाह। आ, मीरा खाली मन आ खाली हाथेँ घर फिरल छलीह। मुदा ओकर बाद मीरा कखनो सहज नहि रहि पाबथि। घरक आगाँ दए कोरामे नेनाकेँ नेने जाइत कोनो स्त्रीकेँ देखि भीतरसँ जेना ओ कुहरए लागथि। दोकानपर धीया–पूता लेल टाङल छोट–छोट वस्त्र दिस टकटकी लागि जाइनि। एक दिन केन्द्रसम फिरैत काल पता नहि कतेक काल एकटा दोकानक आगाँ ठाढ़ि रहि गेलीह। दोकानमे किनबा लए आएल स्त्री लोकनिक नेना आ किनल जाइत वस्तुकेँ अपलक देखैत रहलीह। संयोगे कात दऽ जाइत केन्द्रक सहायिका नीलू टोकि देने रहथिन। परिस्थितिक आभास होइतहि सङ्कित भऽ गेल छलीह। आ घर दिस झटकल डेगे विदा भऽ गेल रहथि। घर पहुँचि देखलनि जे सुनील ज्वरमे पड़ल छथि। समीपेक डॉक्टरकेँ बजा अनने छलीह। दवाइ चलए लागल। सौंदर्य केन्द्रसँ थाकल आबि फेर सुनीलक सेवामे लागि जाथि। केन्द्रसँ फिरबाकाल सुनीलक हेतु फल, दूध, अंडा आ दवाइ लऽ आबथि। सुनीलकेँ पूर्ण स्वस्थ्य होएबामे करीब मास दिन लागि गेल रहनि। डॉक्टर पूर्ण आरामक बिचार देने रहथिन। मीरा अपन कर्त्तव्यमे रत्ती भरि कमी नहि आबए देने छलीह। मुदा कखनो कऽ जीवन भार सदृश लगनि। पटरीपर निर्विकार भावेँ दौड़ैत निर्जीव ट्रेन सन अपन जीवन बुझाइनि। ओ आगाँ बढ़वा लेल विवश छथि। ओहि दिन मीरा केन्द्र जयबाक लेल तैयार भऽ रहल छलीह। बीरूक शिकायत करैत सुनील कहने रहथि–बीरू दुपहरियामे सूति रहैत अछि। लाख बजौलासँ नहि उठैए। दुपहरियाक दवाइ आ जूस लेबामे देरी भऽ जाइए। नहि हो, तँ किछु दिनक छुट्टी लऽ लिअ। एखन हमरा विशेष सेवा चाही। से तँ अहीं कऽ सकैत छी। मीराकेँ कंघीक दाँत जेना माथमे गड़ि गेलनि। भीतरसँ छतपटा उठलीह। एतेक दिनमे ओ बहुत सहनशीलता भऽ गेल रहथि। मुदा, आजुक बात कानमे पघिलल शीशा सन बुझयलनि। शरीरमे एक संचार जेना बहुत तीव्र भऽ गेल रहनि। कनपट्टीक नस तनि कऽ टूटबा लेल तैयार भऽ गेल छल। आइ कतबो चाहलनि मुदा चुप नहि रहि सकतीह! ____बस करू आब! सहन करबाक सेहो एकटा सीमा होइत छैक। चाही....चाही....अहाँकेँ बस चाहबेटा करी। कहियो किछु देबए तँ नहि जनलहुँ। हमर शरीर हमर कमाइ, हमर मातृत्व सभ तँ अहाँ लऽ चुकल छी। हमरा लग आब देबा लेल किछु अछि नहि। मन पाड़ू....। हम मीरा नहि....रूबी छी। सौंदर्य केन्द्रक शीर्षस्थ प्रशिक्षिका। अहाँक शब्दमे सोनाक अंडा देनिहारि मुर्गी। से तँ अहाँक हाथमे सोना दैते छी। मुदा, आब हमरो किछु चाही....। हमरो आब अपन किछु व्यक्तित्व अछि....। दस लोकक बीच उठब–बैठब अछि। कत्र्को ‘कस्टमर’ रूबीक प्रतीक्षा कऽ रहल होएतीह। हमरा जाएब जरूरी अछि। अहाँ लग सेवा लेल बीरू तँ अछिए। धैर्य राखू। अहींक निर्देशनमे हम प्रैक्टीकल बनब सिखलहुँ अछि....। पर्स कान्ह पर लटकबैत, परदाकेँ तेज हाथेँ उठा मीरा बाहर निकलि गेल छलीह। सुनील बाबू परदाक डोलब बहुत काल धरि देखैत रहल छलाह। २. दुर्गानन्द मंडल सहायक शिक्षक, उ. वि. झिटकी-बनगावाँ, मधुबनी (बिहार)। बकलेल (कथाक दोसर आ अन्तिम भाग) सरोजनी फोन लइत- ‘‘परनाम करै छी। अहाँ नीके छी की नै? माँ बावूजी कोना छथि? अपना शरीरपर ध्यान दैत छी की नै? मन लगैए की ने? मेला देखऽ कहिआ ऐवै? कमलनी आ अजय, विजय अहाँक विषयमे पुछैत रहैए। दीदी गै दीदी, जीजा जी कहिया ऐतौ?'' सरोज बावूक जवाव छल एको राति मन नहि लगैत अछि। संभवतः दूर्गापूजामे नहि आवि सकब। धिया-पूताकेँ मेला देखक लेल दस-दसटा टाका दऽ देवई। तामसे टीक ठाढ़ केने फोन काटि दैत छथि। सरोज बावूक लेल असमंजसक स्थिति रहनि, जे जकरा घरमे जोड़ा छागर बलि प्रदान हेतै, से एखन धरि एको बेर अएवाक लेल नहि कहलैन्हि। ऐहेन कोन सासुर, कोन सासु आ ससुर, केहेन सारि आ शरहोजि। तामसे मन अधोड़ आ टीक ठाढ़। की करी आ की नहि करी? ई द्वन्द्वात्मक स्थिति बनल रहैन्हि। किछु नहि फुरैन्हि। मुदा अष्टमी अवैत-अवैत- ये दिल है कि मानता नहीं ये वेकरारी क्यों हो रही है, ये जानता नहीं....। अपना कऽ नहि रोकि सकलाह। आ चलि गेला अपन सासुर महरैल। भगवती दर्शन कऽ जहाँ की पानक दोकानपर जाए छथि, पान खेवाक लेल, आकि मेला देखक लेल आएल सारि-शरहोजिक नजरि हुनकापर पड़ैत अछि आ ओ सभ पकड़ि लैत अछि हिनकर गट्टा। जीजा जी, जीजा जी अहाँकेँ गामपर चलए पड़त। दीदीयो कहने छलि, सप्पत दऽ कऽ। मुदा सासु ससुरक आग्रह नहि तेँ एखनो धरि हिनक टीक ठाढ़े। अन्ततः थाकि-हारि एक किलो मधुर लऽ सारि-शरहोजिक संग चललाह सरोज बावू सासुर। पहिल-पहिल बेर सासुर गेल छलाह तेँ स्वागत बातमे कोनो कमी नहि रहल। चाह-पान बढ़ियासँ भेल। मुदा खेवा काल ओ पसारलैन्हि बड़का नाटक, जे हम नहि खाएब। हम खाऽ आएल छी, भुख नहि अछि। सासु आग्रह केलथिन कोनो असर नहि, ससुर हाथ पकड़लथिन्ह, कोनो फरक नहि, बड़का सार सेहो खुशामद् केलथिन्ह मुदा कोनो असर नहि। एकहि ठाम जे हम खा कऽ आएल छी, भूख नहि अछि। आ ओ भोजन नहिए केलैन्हि। ओम्हर दुनू छागर जे बनल ओकर सुगन्धसँ टोला-पड़ोसा गम-गम करैत। टोलाक निमंत्रित सज्जन सभ आबि माउस-भात अर्थात छागर रुपी प्रसाद पावथि आ ओकर स्वादक सविस्तार चर्चा करथि। ऐह छागर जे जुआएल छल, चर्वी केहेन तरहथ्थी सन छलै आ प्रसाद बनल कतेक सुन्दर अछि! वाह मन तँ भीतरसँ प्रसन्न भऽ गेल, चर्चा करैत बाँका सीक्कीसँ खैरका करैत कुकुर कऽ पान खा ओ लोकनि तृप्तिक ढेकार लैत चल जाइ गेला। एम्हर सरोज बावूक पेटमे बिलाड़ि कुदऽ लागल। ओत भुखे लहालोट। राति खसल जाए, बहरवैआक बाद घरवैयो सभ खा कऽ सुतए गेलाह। मुदा किछु लिऔन वाली सभ एखनो जगले, ओ लोकनि पाँछा काल कऽ भोजन करथि, फैलसँ पलथा मारि माउस आ भात, खाथि आ ओहि छागरक माउसक चर्चा करथि। आग्रह अलग जे दीदी कलेजी दू पीस लिअ। हे यै फल्लाँ गाम वाली हे ई चुस्ता लिअ। हे यै दाय, हे, ई हड्डी वाला दूटा पीस लिअ। आग्रहपर आग्रह। आ ओ लोकनि बड़ी काल धरि गप्प-सप्प करति, भोजन करए गेली। एम्हर सरोज बावू जठराग्नि आओर तेज भेल चल जा रहल छल। आव होएत छलैन्हि जे क्यो आवि आग्रह करितथि तऽ भरि पेट माउस-भात खइतौं। मुदा से तऽ आव सभ क्यो सुतऽ चल गेल छल। धियो-पूता माउस-भात खा फोफ कटैत छल। आव तँ हिनका किदुन- ‘‘जे अपने करनी गै मुसहरनीक परि भऽ गेल छल। थाकि हारि किछु कालक वाद हरलैन्हि ने फूरलैन्हि सरोज विदाह भेलाह भनसा घर दिस। आ अपनहिसँ मॉस-भात भरि थारी निकालि आ चुपे-चाप भोकसए लगलाह। किनको एहि बातक पत्तो नहि। जागल जे सभ रहथि से सभ हिनका खोजए लागल जे पाहुन कतए, पाहून कतए। आ पाहून तऽ भनसा घरकेँ केवाड़ तर नुका कऽ गुप-गुप माउस-भात दऽ रहल छथिन्ह। तात गणेश जीक वाहन एहि कोठीसँ ओहि कोठी जा कि छरपल आ कि कोठीपर राखल खापड़ि पाहूनक कपारपर खसल। अवाज सुनतहि लोक सभ ओहि घर दिस दोगल। देखलक जे पाहून तऽ केवाड़क दोगमे नुका कऽ माउस-भात भोकसि रहल छथि। परल बड़का पिहकारी, शारि-शरहोजि मारलक ताली खुब जोरसँ शोर-गुल सुनि सुतलहो लोक सभ जागि गेल। ताली आ पिहकारी पड़ि रहल अछि। पाहून तऽ लाजे कठौत भऽ गेलाह। रति जखन सुतए घर गेलाह तँ कनियाँक कटू व्यंग वाणक वर्षा होमए लागल। पाहूनक तँ मने शांत। किछु नहि फूरैन। सोचलाह जे अन्हरोखे गाम चल जाएव। विदाहो भैलाह, मुदा अन्हार वेशी रहवाक कारणे कुकुर सभ झॉउ-झॉउ करए लागल। लोक सभ जागि गेल देखलक जे आँगा-आँगा पाहून आ पाछाँ-पाछाँ कुकुर हिनका खिहारने जाइत अछि। लोक सभ दोड़र महरैलिक हाटपर आवि हिनका पकड़लक। धुरि जएवाक आग्रह कयलक। मुदा हिनकर मन तँ तामसे अधोड़ छल। किनको वातक मोजर नहि, दऽ हाक दैत दैत धोती पकड़लक से हुनकर ढेका खुजि गेल, धरफरा खसलाह, मुदा ओ तइयो नहि रुकि लटपटाइत धोती खोलि फेकेत गारि दैत परात होइत-होइत अपन घर पहुुँचलाह। कहू तँ ऐतेक पढ़ल-लिखल लोकक ई काज कोनो वकलेल जेकाँ काज केलैन्हि। सरिपों जँ अधलाह नहि लागए तँ हुनका बकलेले न कहवैन्हि। २.४१.प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार २.सुशान्त झा-विकासक तेजीमे कहीं छुटि नै जाय मिथिला ३.नवेन्द्र कुमार झा-पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश/1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण/ सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य ४.केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि मूर्खता पीबि कऽ विषवमन करैत अछि समीक्षक - जीवकान्त प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार
विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कतए भेल आ दिन-वर्ष की छल? लालन-पालन कतए भेल? जीवकांत : २७ जुलाई, १९३६ क मामाक गाम सुपौल जिलाक अभुआढ़ मे हमर जन्म भेल। किछु दिन तक तँ हमर लालन-पालन मामक गाममे भेल। तकर बाद अपन गाम मधुबन क डेओढ़मे भेल। हमर पिता चारि भाइ छलथि। संयुक्त परिवार छल आओर हम सभ १५-१६ बच्चाक लालन-पालन संगे भेल।
विनीत उत्पल : एखन अहाँक परिवारमे के सभ अछि आओर ओ सभ की करैत अछि? जीवकांत : हम दू भाइ छी। जेठ हम छी आ नवकांत झा छोट अछि। नवकांत सेंट्रल बैंकक नौकरसँ अवकाश ग्रहण कए दरभंगामे रहैत अछि। एक बहिन आब नहि छथि। दोसर बहिन गोदावरी सुपौलमे ब्याहल गेल, जे सहरसामे रहैत अछि। तीन बच्चा अछि। पैघ बेटा अरुण चेन्नइमे बैंकमे कार्यरत अछि। छोट वरुण लखीसरायमे एलआईसीमे काज करैत अछि। बेटी प्रेम नेपालक राज विराजमे ब्याहल अछि।
विनीत उत्पल : घरमे आन लोक मैथिली पढ़ैत आ लिखैत अछि? कनियाक सहयोग लेखनमे कतेक भेटल? जीवकांत : हमर घरमे भाइ हुअए आकि कोनो बच्चा, मैथिलीमे नहि लिखैत अछि। शुरूमे कनियाँ शुचि किछु नहि बुझैत छलीह। हुनका लगैत छल जे फालतूक काज कऽ रहल छी। हुनका अनिद्राक बीमारी छलन्हि ताहिसँ रातिमे लाइट मिझा दैत छलीह। मुदा, बादमे सहयोग करए लगलीह। धन्य ओ जे हम लिखैत छी। ओना ओ ज्योँ विरोध करतीह तँ हम किछु नहि लिखि सकैत छी। एकरा लेल हम कनियाँक आभारी छी।
विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोना आकृष्ट भेलहुँ? विस्तारसँ बताऊ? जीवकांत : हम जाहि कालमे पैदा भेलहुँ, ताहि कालमे पढ़ैक महत्व नहि छल। हमरो पढ़ाइ देरीसँ शुरू भेल। स्कूलमे नाम लिखेबा लेल कियो नहि गेल छल। हम अपने गेल छलहुँ। ओहि कालमे हम सभ माटिपर लिखैत छलहुँ। हमर गाममे तुलसीदासक रामायणक पाठ होइत छल। द्वारपर लोक ताश खेलाइत छल आ रामायणक श्लोकक दसटा अर्थ करैत जाइ छलाह। श्लोककेँ लऽ कऽ तर्क-विर्तक सेहो होइत छल। हमरो घरमे बेंकटेश्वर स्टीम प्रेससँ छपल मोटका रामाएण छल, जकरा पढ़ैत आ सुनैत छलहुँ। तखन धरि मैथिलीक कोनो गप नहि छल। नेना रही, सोचैत रही, जखन तुलसीदासक लिखलपर एतेक तर्क-विर्तक होइत अछि, तखन हमहूँ किएक नहि लिखै छी। शुरूमे कविता लिखलहुँ, जे आर्यावर्तमे छपल। आइ.एस.सी. कऽ कए साल भरि बाद १९६४ ई. मे प्राइवेटसँ बी.ए. कएलहुँ। छह मास धरि अहापोहमे रहलहुँ, जे हिंदीमे लिखी आकि मैथिलीमे। ओहि काल मे मिथिला मिहिर पढ़ैत छलहुँ। ओहिसँ बेसी प्रभावित भेलहुँ। रवींद्रनाथ टैगोरक साहित्यसँ सेहो प्रभाविल भेलहुँ। हिंदीमे लिखी आओर मैथिलीमे सेहो। किछु काल बाद निर्णय लेलहुँ जे हम नित दिन लिखब। गृह जिला मधुबनीमे नौकरीक मादे खजौली, देहोल, पोखराम आदि गाममे रहलहुँ आ जीवनानुभवक व्यापक अनुभव लिखलहुँ।
विनीत उत्पल : अहाँक कालमे संस्कृतक विस्तार बेसी छल। तखन मैथिली दिश कोना प्रवृत भेलहुँ? जीवकांत : स्वतंत्रता प्राप्तिक कालमे इंगलिश मीडियम स्कूल खुजल रहै। हिंदी स्कूलमे मैथिली पढ़ाओल जाइत छल। इंगलिश स्कूल खुजलासँ लोक संस्कृत बिसरि गेल। मुदा हम गामक लोक गामसँ प्रभावित। २४ जनवरी १९६५ मे मिथिला मिहिरमे पहिल कविता 'इजोरिया आ टिटही’ छपल। एकरासँ हमरा जोश भेटल।
विनीत उत्पल : अहाँ केकर लेखनीसँ प्रभावित छी? जीवकांत : कविता हमर प्रिय अछि। लिखैमे आनंद अबैत अछि, ओकर गंधसँ प्रभावित होइत छी। मुदा गंधक प्रतीकमे तुलना साफ नहि होइए। कोनो गप कवितामे बेसी नीकसँ कहल जा सकैत अछि। आलोचक कहैत अछि जे अहाँ कथामे सब किछु अलग-अलग नहि करैत छी। पाठककेँ अपन दिशसँ सूत्र जोड़ए पड़ैत अछि। सबहक गंध अपन-अपन तरहक होइत छै। हमर लेखनक मूल कविता अछि, आओर अपन गप कविताक संग प्रेषित करैमे नीक लगैत अछि।
विनीत उत्पल : लेखनमे कोना प्रोत्साहित होइत छलहुँ? जीवकांत : अहाँ सोमदेवक नाम सुनने होएब। हमर कविता पढि़ कऽ यात्री जी हुनका कहलथिन जे जीवकांतकेँ कहियौ ओ उपन्यास लिखताह। एकरा संगे मिथिला मिहिरसँ लिखबाक आमंत्रण आएल। एकरा एक तरहसँ हम चुनौतीक रूपमे लेलहुँ आ जे ओ लिखबैत रहल, फरमाइश करैत छल, से लिखैत रही। शिक्षक संघसँ सेहो जुड़ल रही ताहिसँ पटना जाइत रही। ओहि काल पटनामे लोकसँ भेट होइत रहए आओर प्रोत्साहन भेटैत रहए। तीनटा उपन्यास फरमाइशपर लिखलहुँ जे धारावाहिक रूपमे छपल।
विनीत उत्पल : अहाँकेँ ई नहि लगैत अछि जे साहित्य अकादमी देरीसँ अहाँक लेखन~पर विचार केलक? जीवकांत : साहित्य अकादमीक पुरस्कारकेँ लोक संदेहक दृष्टिसँ देखैत छैक। ओतए जाएज लोककेँ किनारा कऽ दैत छै। हम साहित्य अकादमीक पॉलिटिक्स नहि जनैत छी। गाममे रहैत छी। कोनो दोस्त नहि बनेलहुँ। ओहिनो मिथिला समाज आ लोक अनौपचारिक अछि। भऽ सकैत अछि साहित्य पुरस्कार विलंबसँ भेटल। मुदा एहि सभमे हम नहि पड़ैत छी।
विनीत उत्पल : पैघ-पैघ पत्रिकामे कोना लिखए लगलहुं? जीवकांत : एखनसँ तीस साल पहिने समकालीन भारतीय साहित्य शुरू भेल, तखन हम किछु अनुवाद कएलहुँ। मैथिलीमे पहिल कहानी हमरे आएल। पहिल बेर मैथिली विशेषांक आएल। एकटा अनुवाद केदार कानन केलथि। मैथिली कविता पठबैत रही। हिंदी संपादक आ हिंदी पत्रिका खूब आदरसँ हमर रचना छपैत रहए। समय अंतरालपर कोलकाता, मुंबइ, दिल्लीसँ प्रकाशित पत्रिका सेहो छपै लागल।
विनीत उत्पल : पहिल कविता संग्रह कोन छल आओर के छपलथि? जीवकांत : 2003 मे 'तकैत अछि चिड़ै’ कविता संग्रह छपल, जेकरा ऊपर साहित्य अकादमी पुरस्कार देलक। ओकर हिंदी अनुवाद 'निशांतक चिडिय़ा’ छपल। एकरो साहित्य अकादमी छपलक। ढेरे विश्वविद्यालयमे शोध भऽ रहल अछि। प्रखर आलोचक सेहो लेखनक प्रशंसा कए रहल अछि।
विनीत उत्पल : अहांक कविता 'रहस्य’ मे गूथल बुझाइत अछि? जीवकांत : कविताक आरंभ कतहुसँ जे होइत अछि से तार्किक परिणति तक जरूर पहुँचैत अछि। लोक कहैत अछि जे हमर कविता आखिर मे 'टर्न’ लऽ लैत अछि। लोक काल आ पाठक हमर सामने नहि रहैत अछि, ताहिसँ अलग-अलग पाठक हमर कवितामे अलग-अलग गप देखैत अछि।
विनीत उत्पल : अहाँ तँ खूब समीक्षा केने छी? जीवकांत : समीक्षक तौर पर हम ओते प्रोफेशनल नहि छी। बैसल रहैत रही तँ पढ़ैत रही। नव पोथी पढ़लाक बाद छोट-छोट टिप्पणी करैत छी। पूरे ४० साल मे ६०-७० टा पोथीपर छोट-छोट टिप्पणी केने छी। एकरा बाद मन बहलबैत छी, हास-परिहास आ चर्चा, बहुत रास गप करैत छी।
विनीत उत्पल : नव लेखक आ हुनकर रचनाकेँ कोना देखैत छी? जीवकांत : एखन नवलेखक तेजीसँ आबि रहल अछि। देहातसँ सेहो लेखक आबि रहल अछि। बीच वाला पीढ़ी्मे अद्भुत लेखक भेल। महाप्रकाश आ सुभाषचंद्र यादव लोक विवशता, निर्धनताक विलक्षण चित्रण अपन रचनामे करैत छथि। मैथिली कविता सेहो गंभीर भऽ रहल अछि। ओकर स्तर बढि़ गेल अछि, सोच काफी आगू तक अछि।
विनीत उत्पल : मैथिलीक साहित्यमे समीक्षकेँ अहाँ कोन दृष्टिसँ देखैत छी? जीवकांत : समीक्षा यूरोपसँ आएल अछि। यूरोपमे अन्वेषणक संग समुचित परिप्रेक्ष्यमे समीक्षा होइत अछि। हिन्दुस्तान एहि विधामे पिछड़ल अछि। हिंदी भाषा्मे सेहो नीक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। लोक वेद कहैत अछि जे हिंदीक पैघ समीक्षक नामवर सिंह समीक्षा नहि कऽ भाषण दैत छथि। तटस्थ भऽ कऽ मूल्यांकन नहि भऽ रहल अछि। नीक लेखककेँ पएरसँ दबा देल गेल आओर जेकरा किछु नहि अबैत अछि ओकरा कन्हापर बैसा देल जाइत अछि। विद्यापतिपर आइ धरि कियो मैथलीमे नीक समीक्षा नहि केलक अछि। रामानाथ झाक समीक्षा जयकांत बाबूक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। अंग्रेजीमे नीक बुद्घि होइत अछि। अंग्रेजीसँ एम.ए. केलाक बाद लोकक नीक बुद्घि होइत अछि, मुदा मैथिलीसँ एम.ए. कोर्स करबाक बाद छात्र बरबाद होइत अछि। नाश कऽ दैत अछि ओकर भविष्य। जखन महीसे खराब होएत तखन कोनो नीक चीज आनि कऽ दियौ खेनाइ खरापे बनत। सोनारक काज लोहारक हथौड़ीसँ नहि भऽ सकैत अछि। समीक्षामे कोनो नीक काज नहि भऽ रहल अछि। 'अपन बट्टी भरि पनबट्टी’ सनक लोक अछि। जाइत-पाति बेसी अछि। लोक एक-दोसरकेँ छोट बुझैत अछि। रचना्क मूल भावनमे कमी आएल अछि। अपन रचना आ अपन लगुआ-भगुआमे लोक फंसल जाइत अछि। सब अपनाकेँ पैघ बुझैत अछि। सभटा लोक काजक क्रेडिट अपना लेल लेबाक लेल मारि कए रहल अछि।
विनीत उत्पल : रचना्मे अनुभवक की भूमिका होइत अछि? मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल अहाँक विचार की अछि? जीवकांत : सभ लोकक अपन अनुभव होइत अछि। ओकरे ठीक-ठाक कए लेखक शास्त्र बना दैत अछि। सभटा लेखक अपन अनुभवकेँ पुनर्जीवित करैत अछि। जहिना-जहिना शिक्षक स्तर बढ़त, तहिना-तहिना मैथिलीक प्रचार-प्रसार बढ़त। मिथिलामे शिक्षकक कमी अछि। स्त्री शिक्षा एखनो बेसी नहि अछि। साक्षरता जेना-जेना बढ़त आर्थिक स्थिति तेना-तेना नीक होएत। मैथिली बढ़त। इंटरनेटेपर मैथिली बढि़ रहल अछि। गौरीनाथ नीक काज कए रहल छथि। कोलकाताक स्वस्ति फाउंडेशन सेहो नीक काज कए रहल अछि।
विनीत उत्पल : अहाँक रचना विद्रोही प्रवृतिक अछि, से किए? जीवकांत : सरकार बनेने छी। जनताकेँ सुरक्षा चाही, सडक़ चाही। आजादी भेटल, त्रुटि सेहो भेटल। कमजोर लोकक संग दुर्व्यवहार भऽ रहल अछि। अन्यायक खिलाफ आवाज उठबैत हमर मनोदशा अछि। १९७० ई. मे कोलकातामे 'किरणजी’सँ भेट भेल छल। ओ कहलथि जे हमर स्टैंड तँ सत्ता विरोधी अछि। हुनकर गप ठीक छल। विनीत उत्पल : मार्क्सवादकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी? जीवकांत : मार्क्सवादक पहिने सेहो गरीबी छल। विद्यापति अपन कवितामे गरीबीक व्यापक वर्णन कएने छथि। 'कखन हरब दुख मोर’ गीतमे एक तरहेँ गरीबीक वर्णन कएल गेल अछि। 'नहि दरिद्र सब जुग माही’ आ संस्कृत श्लोक 'सर्वे गुणा कांचन भाजयंति’ मे सेहो दरिद्राक गप अछि। गरीबीक खिलाफ गरीबक पक्षमे सभ दिन लिखल जाइत रहल अछि।
विनीत उत्पल : अहाँ आ अहाँक लेखन ककरासँ प्रभावित अछि? जीवकांत : हम सेहो मार्क्सवादसँ प्रभावित छी। लोहियासँ सेहो प्रभावित छी। बराबरी आ समानताक विचारकेँ प्रमुखता दैत छी। मार्क्सक समर्थक रही। एकरा लेल दीक्षा नहि लेलहुँ, कियो ई गप पैदा नहि केलक, अपने पैदा भेल।
विनीत उत्पल : तखन अहाँ मार्क्सवादक विरोध किए कए रहल छी? जीवकांत : मार्क्सवाद उत्तम विचार छी, मुदा हिंसाक पक्षमे बेसी अछि। भारतीय राजनीति आ संस्कृतिमे मार्क्सवादक संभावना कम अछि, ताहिसँ एतए समाजवाद प्रबल भेल। भारतीय संस्कृति 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित अछि। एतए गांधी प्रासंगिक छथि। मार्क्सवाद बारंबार अपन रास्तासँ भटकैत अछि। मार्क्सवादक नीतिकेँ जमीनपर उतारब कठिन अछि। रूसक जमीनपर उतरल मार्क्सवाद राष्ट्रवादक प्रबल समर्थक बनि गेल। तिब्बत, भूटान, नेपाल आ पाकिस्ताक बलधकेल जमीनमे चीनी झंडा फहराइत अछि।
विनीत उत्पल : 'सुमन’ जीक अहाँ हमेशा विरोध कएलहुँ, तखन अभिनंदन ग्रंथमे बड़ाइ करबाक की मतलब अछि? जीवकांत : 'सुमन’ जीक बड़ाइ लिखलहुँ तँ हम अछूत(......)भऽ गेलहुँ। हुनकर अध्यात्मपर लिखल अद्भुत अछि। संस्कृतमे लिखलन्हि। ओ आगि लगबैक क्षमता रखैत छथि। ओ संस्कृति आ मूल्यक विषयक ध्वजवाहक छलाह। ओ मैथिली कविताकेँ उत्कृष्टता तक लऽ गेलथि। हम मार्क्सवादी भऽ जाइ तकर माने ई तँ नहि होएत जे हम वेद-पुराणकेँ बिसरि जाइ। अभिनंदन ग्रंथ लेल फरमाइशी लेख लिखाओल गेल छल। हम हुनकर काव्य आ आध्यात्मपर लिखलहुँ। सही काल छल, एकरा लेल हम खुश छी।
विनीत उत्पल : कवितामे विशेष परिवर्तन कतए तक जाएज अछि? जीवकांत : हमरा संग ढेर लोक एलाह। सभ पछुआ गेल। पाँच साल बाद हम अपन विषय परिवर्तन केलहुं। हर क्षेत्र~मे अपनेकेँ परिवर्तन करबाक चाही। जे परिवर्तनक समर्थक होएत ओ कालजयी होएत। हमहुँ विषय बदलैत गेलहुँ ताहिसँ जीवित छी। असहमतिक कविता पंजाब आ बंगालसँ आएल। बंगालमे सुभाष मुखोपाध्याय भेलाह जे कहलथिन 'हे कृष्ण, कुरुक्षेत्र मे घोड़ाक रास छोडि़ कए फेरसँ वंशी बजाउ।’ कविताक विषय सभ दिन बदलैत रहैत अछि। विद्यापति शृंगार आ भक्तिकेँ लऽ कए लिखलथि। एखन शृंगारसँ लोककेँ वैर भऽ गेल अछि। देश प्रेमक कविता लिखल गेल। मुदा दोसर विश्वयुद्घमे देशप्रेमक गपमे देखल गेल जे ई मनुष्यकेँ बर्बाद कऽ रहल अछि। राजनीतिपर कविता लिखब बेवकूफी अछि। आदमी, मित्रता, सुख-दुख कविताक विषय रहैत अछि। जेना-जेना समय बदलत, तेना-तेना विषय सेहो बदलत। जहिना कविता बदलत तहिना एकर रूपो बदलत। एकरा एना देखी, बच्चाक छठियार करैत छी, ओकरा बाद बच्चा्मे कतेक परिवर्तन होइत अछि।
विनीत उत्पल : मैथिली समाजक स्थिति लेल की कहबाक अछि? जीवकांत : पैरवी-पैगाम आ गुटबाजी होइत अछि। अपन गाम आ समाज सिद्घांतवादी नहि अछि। जवाहरवादी अछि ताहिसँ तुरंत झुकि जाइत अछि। क्वालिटीसँ समझौता भऽ जाइत अछि। नीक लोकक नाम लेबासँ लोक अपवित्र भऽ जाइत अछि।
विनीत उत्पल : अहाँपर लोक आरोप लगबैत अछि जे 'चेला’ बनाबैत छी जेना महाप्रकाशपर रेखाचित्रमे रमेशकेँ उद्घृत करैत सुषाष चन्द्र यादव लिखै छथि। ई गप कतेक सच अछि? जीवकांत : हम गुरुजी रही। साइंस टीचर रही तँ शिष्य तँ बनबे करत। सभ आदमी अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। कुणाल, प्रदीप बिहारी आदि ई नाम अछि। हालमे शिवशंकर कहलथिन जे अहाँक रचना हम पढ़ैत रही। तारानंद वियोगी कहलथिन अहाँक कविता मासमे दूटा पढ़ैत रही, मिथिला मिहिरमे, ताहिसँ प्रेरित भेलहुँ आ लेखनक मुख्य धारासँ जुड़लहुँ। हमहुँ कहैत छी, यात्रीजीक लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ। हमहुँ कहैत छी जे हम यात्रीजी आ विद्यापतिक चेला छी। हम कमांडो नहि बनेने छी। हम कोनो पुरस्कार लेल पैरवीकार नहि बनेने छी। हम दलाल नहि बनेने छी। हमर रचनासँ प्रभावित भऽ कऽ कियो रचना कर्ममे आएल, एहिमे हमर की गलती? हम अपन समर्थनमे भीड़ नहि जुटेलहुँ, वोट नहि मांगलहुँ, समीक्षाक लेल पैरवी नहि कएलहुँ। तखन जे कियो कहैत अछि जे हम हुनकर 'चेला’ छी तँ एहि~मे गलत की अछि ?
विनीत उत्पल : विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रहकेँ लऽ कऽ मोहन भारद्वाज जी समीक्षाक पर खूब विवाद भेल छल? ताहि लेल अहाँ की कहैत छी? जीवकांत : मोहन भारद्वाज विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रह 'गामक कविता, कविताक गाम’ पर एकटा समीक्षा केने रहथिन। ओहिमे मोहन भारद्वाजजी लिखलथिन्ह जे हिनकर कविता सभटा समकालीन संभावनाकेँ खारिज करैत अछि। एहि संदर्भमे हम गौरीनाथकेँ एकटा पत्र पठेने छलहुँ। एतेक घटिया समीक्षा आ तुलनात्मक अध्ययन नहि भऽ सकैत अछि। संगे-संग पत्रक फोटोस्टेट कॉपी आओर लोककेँ पठेने छलहुँ। एकहि रचनासँ सभटा कविता खारिज भऽ जाए, एहन संभव नहि अछि। हमर विरोधक पत्र कोनो पत्रिकामे नहि आएल। मुदा गौरीनाथ एकरा मुद्दा बना देलक। विनीत उत्पल: मोहन भारद्वाजक समीक्षाकेँ किछु गोटे गदगदी समीक्षा कहलन्हि मुदा ओ सभ बादमे अपने सेहो गदगदी समीक्षा कएलन्हि, मात्र किताब आ लेखक बदलि गेल! जीवकांत: ई सभटा समीक्षक दारू पी कऽ, पैसा पी कऽ, मूर्खता पी कऽ विषवमन करैत अछि।
विनीत उत्पल : अपनेसँ अनुदित पुस्तक पर मूल पोथीक लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार लेखक सभ लेमए शुरू कए देलन्हि अछि। जेना अहाँ हालेमे अपन निबन्धमे मायानंद मिश्र द्वारा अपन लिखल हिन्दीक पोथीक स्वयं मैथिलीमे अनुदित पुस्तक 'मंत्रपुत्र’पर पुरस्कार लेबाक विषयमे लिखलहुँ? जीवकांत : एहि मुद्दापर हमरा किछु नहि कहबाक अछि। मुदा मायानंद मित्र पुरस्कार लेलन्हि तँ किछु जरूर सोचने हेताह, सोचिए कऽ लेने हेताह। वैहि कहि सकैत छथि जे किए लेलन्हि।
विनीत उत्पल : साहित्य आ साहित्य लेखनमे इमानदारी आ नैतिकता कतेक आवश्यक अछि? जीवकांत : लोककेँ सभ ठाम ईमानदार हेबाक चाही। 'पंजरि प्रेम प्रकासिया’मे हम खूब ईमानदारीसँ लिखने छी। मुदा, लोक गंगाजल लऽ कऽ अपन जीवनी लिखैत अछि। कविता, कहानी, नाटक तकमे लोक गंगाजल छींट कऽ लिखैत अछि। लेखनमे प्रेम, खून, हत्या, लार नहि अबैक चाही। हम सभ पाखंड करैत छी। मुदा जे लेखक जीवनक सत्य आ समाजक स्थिति लिखलक ओ अपन धरतीपर बदनाम भऽ गेल। राजकमल चौधरी साहित्यमे समाजक सत्य लिखलक, बदनाम भऽ गेल। ओ सत्य लिखलन्हि तँ हुनका 'अय्यास प्रेतक विद्रोह’ कहल गेल।
विनीत उत्पल : मिथिलाक केंद्र मानल जाएबला शहर 'मधुबनी’मे मैथिलीक पोथी नहि भेटैत अछि, एना किए? जीवकांत : हम तँ देहातमे रहैबला लोक छी। बासन तँ दिल्ली, मुंबई, कोलकातामे बिकाइत अछि। मधुबनी, दरभंगा, घोघरडीहामे तँ घास छिलैबला लोक रहैत अछि। पढ़ै वाला लोक तँ बाहरे चलि जाइत अछि। मधुबनीमे पोथी नहि बिकाइत अछि, ओहिमे लेखकक कोन दोष? पब्लिशर्स आ सर्कुलेशनक मामला्मे समर्पित लोकक जरूरत अछि। गीता प्रेसक पोथी सभ ठाम बिकाइत अछि। हिंद पॉकेट बुक्सक पोथी ठामे-ठाम भेटैत अछि। हिंदीमे धर्मयुग, सारिका बंद भऽ गेल अछि। हमर सबहक पोथी दोकानमे नहि भेटि रहल अछि। लोक-वेद खैरातमे पोथी लएले चाहैत अछि।
विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2010 प्राप्त करबाक लेल बधाई। २. सुशान्त झा-ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक (इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी (भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा (2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आ न्यूज वेबसाईटमे काज, दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। विकास के तेजी मे कहीं छुटि नै जाय मिथिला….। बिहार विकास के चर्चा जोरशोर सं आबि रहल अछि। जीडीपी विकास दर मे बिहार गुजरात सं कनिए पाछू आयल अछि-ओहो तखन जखन कि राज्य मे कोनो तरहक उद्योग धंधा या व्यवसाय के विकास नहि भेल अछि। साफ अछि जे ई विकास कृषि क्षेत्र आ सरकारी योजना सबके लगभग सही ढ़ंग सं लागू करैके बदौलत भेल अछि। एम्हर केंद्र सरकार के कतिपय योजना-जेना नेरेगा, मध्यान्ह भोजन, सर्वशिक्षा अभियान, राजीव गांधी विद्युतीकरण आ पंचायत पर बेसी ध्यान दै के कारणे सेहो ई विकास देखा रहल अछि। ओना नीतीश कुमार सरकार के तारीफ ई जे ओ अहि योजना सबके सही तरीका सं बिहार मे लागू कयलक। अगर आंकड़ा पर गौर करु त पायब जे बिहार के अर्थव्यवस्था पिछला चारि साल मे लगभग 11 प्रतिशत के दर सं आगू बढ़ल। लेकिन, दोसर दिस अगर राजधानी पटना मे संपत्ति के मूल्य पर गौर करी त आंखि फाटि जायत। पटना मे पिछला 2-3 साल मे रीयल स्टेट के मूल्य मे लगभग 100 सं लय क 300 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी भेल अछि। जहि फ्लैट के दाम पटना मे 2 साल पहिने तक 12 लाख रुपया छल ओ आब 25 सं लय क 40 लाख तक भेटि रहल अछि। पटना देश के ओहि किछु गिनल चुनल शहर के श्रेणी मे पहुंचि गेल जतय हवाई यात्रा करैबला के संख्या मे सबसं बेसी बढ़ोत्तरी भेल अछि। साफ अछि जे पटना के विकास या पटना मे धन के उपलब्धता बिहार के आम लोग के आमदनी सं बहुत बेसी अछि। ई बात एकटा खतरनाक संकेत के दिस इशारा कय रहल अछि जे बिहार के तमाम विकास राजधानी मे सिमटि रहल अछि या फेर बिहार मे धन के संकेंद्रण राजधानी मे अश्लील रुप लय लेलक अछि। एकरा दोसर तरीका स एना बूझि सकैय छी जे बिहार मे धन के केंद्रीकरण किछ खास हाथ मे बेसी भेल आ ओ आम जनता के हाथ कम पहुंचल। प्रतिशत मे बृद्धि के दर कयकटा दोसर फैक्टर सं ध्यान हटा दैत अछि, ई विकास के पूरा तस्वीर नहि कहैत अछि। विकास त भेले लेकिन ओहि विकास मे सम्पूर्ण जनता के भागीदारी संदेह के घेरा मे अछि। लेकिन चिंता के बात सिर्फ एतबे नहि। मुख्य बात ई जे बिहार के अपेक्षाकृत विकास त भेले आ यदि स्थिति ठीक-ठाक रहल त आबै बला दिन मे औरो तेजी सं विकास हेत-लेकिन विकास के चरित्र जे संकेत दय रहल अछि ओ मिथिला के लेल शुभ नहि बुझा रहल अछि। बिहार के नक्शा के गौर सं देखू-अंदाज लागि जायत जे आबै बला बिहार- गंगा के उत्तर आ गंगा के दक्षिण- एकटा भयंकट आर्थिक विषमता के बाट जोहि रहल अछि। बिहार के उत्तरी भाग-खास कय मिथिला क्षेत्र ऐतिहासिक रुप सं बाढ़ग्रस्त अछि, आ एतय बहुत कम सरकारी निवेश भेल अछि। आधारभूत संरचना, प्रतिवर्ष बाढ़ि के भेंट चढ़ि जायत अछि। एहन मे गंगा के दक्षिण के इलाका के भौगोलिक बढ़ित हासिल अछि। बिहार मे हुअय बला वर्तमान निवेश आ अबैबला निवेश के जिनका अंदाज छन्हि ओ जनैत छथि जे सबटा मोट निवेश गंगा सं दक्षिण खासकय मगध आ भोजपुर मे जा रहल अछि। चाहे नालंदा विश्वविद्यालय हुए या गया के निकट निजी क्षेत्र मे लागय बला बिजली घर। दोसर गप्प ई जे ई इलाका पहिने सं संपर्क मार्ग पर अछि-चाहे ओ जीटी रोड हुए या दिल्ली-कलक्तता रेल मार्ग। अहि इलाका मे बाढ़ि नहि अबैत छै आ पटना एहेन नगर अही इलाका मे छै। बिहार के आमदनी दै बला मुख्य पर्यटन क्षेत्र गया-राजगीर अही इलाका मे अछि। ई इलाका स्वाभाविक लाभ के स्थिति मे अछि। लेकिन ओहू सं बेसी बिहार सरकारक मौजूदा चरित्र अहि हालत के और प्रोत्साहित कय रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजगीर, नालंदा आ गया के विकास के लेल बेसी उत्साहित छथि। नीतीश जहन, केंद्र मे मंत्री छलाह तखनो ओ बाढ़ मे एनटीपीसी आ नालंदा मे आयुध कारखाना(जार्ज के तत्कालीन संसदीय क्षेत्र आ नीतीश के प्रभावक्षेत्र) लगबौने छलाह। एमहर केंद्रीय योजना के बात चलल त बिहार के भेटय बला एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी चलि गेल-सिर्फ हाथ आयल किशनगंज या कटिहार मे प्रस्तावित अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कैम्पस। मिथिला के जे मूल समस्या अछि ओहि दिस नीतीश सरकार के कम ध्यान अछि। मिथिलांचल, जकर आबादी बिहार मे कोनो दोसर क्षेत्र सं बेसी अछि ओतय के लेल बहुत कम पैघ सरकारी प्रोजेक्ट प्रस्तावित अछि। एकर मूल मे अछि एहि इलाका के बाढ़िग्रस्त भेनाई, तखन फेर नीतीश सरकार बाढ़ि के निदान के लेल किएक नहि उत्साहित अछि? अहि इलाका मे साक्षरता के दर कम अछि, स्वास्थ्य के हालत ठीक नहि। तैयो सरकार के एजेंडा पर अहि इलाका मे एकोटा विश्विविद्यालय खोलनाई नहि छैक। नहिए, सरकार अहि इलाका मे एकोटा मेडिकल या इंजिनियरिंग कालेज खोलैके दिशा मे उत्साहित अछि। ओनहियो, अगर ई मानि लेल जाई जे बाढ़ि के वजह सं अहि इलाका मे कोनो बड़का प्रोजेक्ट नहि लागि सकैये, आ एकर निदान केंद्र के हाथ मे छैक, तैयो की नितीश सरकार के ई दायित्व नहि जे ओ केंद्र पर दवाब डाले? पिछला साल कोसी के बाढ़ि के बादों हमसब एकर पूर्णकालिक निदान के कोनो संकेत नहि पाबि रहल छी। हमरा सबके विकास के अहि रफ्तार सं चेति जाय के चाही। समय आबि गेल अछि जे हम सब अपन मांग जोरशोर सं उठाबी-नहि त अबैबला बिहार मे तमाम निवेश गंगा सं दक्षिण होयत आ मिथिला के लोग सिर्फ ओतय चाकरी करय ले जेता। हमर-अहांके हालत वैह भ सकैत अछि जेना पंजाब मे एखन बिहारी के छैक। ३ नवेन्द्र कुमार झा नवेन्दु कुमार झा पचास वर्षक भेल प्रादेशिक समाचार एकांश 1993 मे प्रारंभ भेल छल मैथिली मे समाचारक प्रसारण आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश 28 दिसम्बर 2009 के अपन स्थापनाक पचास वर्ष पूरा कएलक अछि। आकाशवाणीक पटना केन्द्र सँ 28 दिसम्बर 1959 के जे प्रादेशिक समाचारक प्रसारणक प्रांरभ भेल ओ बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ पाछा नहि देखालक आ समाचार पर अपन गहिर नजरि रखने समाचार के जनता धरि पहूचैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़लक अछि। प्रारंभहि सँ एहि एकांश सँ जूड़ल समाचार संपादक आ हुनक सहयोगीक दल सीमित साधनक बावजूद एकरा मजभूत स्तम्मक रूपमे ठाढ़ कएलनि। बिहारक जनता के समाचार जगत सँ जोड़बाक जे काज आकाशवाणीक प्रादेशिक समाचार एकांश कएलक से अनवरत चलि रहल अछि । आजादीक बाद देशभरि मे आकाशवणीक पाच टा केन्द्र छल। ओना आजादी सँ पहिने देश भरि मे आठरा केन्द्र छल जाहिमे देशक बैटवाराक बाद तीनरा केन्द्र पाकिस्तान मे रहि गेल। स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एहि संचार माध्यमक विस्तार प्रारंभ भेल आ सौभागय सँ एकहि वर्षक भीतर 26 जनवरी 1949 के आकाशवाणीक पटना केन्द्र सँ समाचार क प्रसारण पहिल बेर 1959 मे प्रारंभ भेल। समाचार एकांश दिल्लीक तात्कालिक सहायक समाचार संपादक गुरूदत्त विधालंकारक नेतृत्व मे समाचारवाचक रामरेणु गुप्त आ संवाददांता रवि रंजन सिन्हाक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक आ संवाददाता रवि रंजन सिन्हाक दल काज करब प्रारंभ कएलक। हुनक प्रयास सँ एकरा रोमांचक क्षण आएल आ 28 दिसम्बर 1959 के सांस सात बाजिकऽ पाच मिनट मे प्रादेशिक समाचारक पाच मिनटक पहिल बुलेटि आकाशवाणी पटना सँ प्रसारित भेल। देश-दूनिया सँ बिहारक जनता के जोड़बाक लेल प्रारंभ भेल ई प्रयास अपन गति पकड़लक आ एकर समय क संगहि समाचारक अवधि में परिर्वतन आएल। प्रादेशिक समाचारक बढ़ैत लोक प्रियता के देखि पाच मिनटक ई बेलेटिन दस मिनटक भऽ गेल सा सांझ मे सात बाजिक तीस मिनट पर प्रसारित होमए लागल आ आइयो शहर सँ लऽ भऽ सुदूर गाम-धरमें एहि बुलेटिनक सात बाजिक तीस मिनट पर लोक सभी प्रतिक्षा करैत रहैत छथि। देश आ प्रदेशक बदलैत चातुर्दिक परिस्थित के देखि प्रतिदिन मात्र एकटा बुलेटिन सँ काज नहि चलैत देखि 10 अप्रील 1978 के एकटा आर बुलेटिनक प्रसारण प्रारंभ भेला। ई बुलेटिन प्रतिदिन दुपहरण मे तीन बाजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित होएब प्रारंभ भेला। पाँच मिनटक ई बुलेटिन सेहो बिना कोनो बाधा के प्रसारित भऽ रहल अछि। एकांश द्वारा दू टा बुलेटिनक सफलता पूर्वक प्रसारणन बाद तेसर बुलेटिन सेहो प्रसारित होएब प्रारंभ भेल जे प्रतिदिन प्रात: काल मे आठ बाजिक दस मिनट पर प्रसारित अछि जे दरस मिनट अछि। प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा प्रदेशक उर्दू भाषी जनता क लेल उर्दू समाचारक प्रसारण सेहो कएल गेल। 16 अप्रील 1989 सँ एकांश द्वारा उर्दू बुलेटिन इलाकाई खबरें’ दूपहर तीन बजि कऽ दस मिनट पर प्रसारित कएल जा रहल अछि। पाँच मिनटक एहि बुलेटिनक माध्यम सँ आकाशावणी पटना क समाचार एकांश अपना के उर्दू भाषी जनता सँ जोड़लक। अपन यात्राक अगिला कड़ी मे एकांश मैथिली भाषी जनता के जोड़बाक योजनाके मूर्त रूप देलका 2 अक्टूबर 1993 सँ मैथिली भाषी जनताक लेल मैथिली समाचार बुलेटिन ‘ संवाद’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। सांझ छह बाजिक पन्द्रह मिनट पर प्रसारित होमए बाला पाच मिनटक बुलेटिन प्रारंभ मे सप्ताह तीन दिन प्रसारित होइत छला संवादक बढ़ैत लोप्रियता के देखि पाच मिनटक ई बुलेटिन 16 अगस्त 2003 दिन सँ सांझ मे छह बाजि कऽ पन्द्रह मिनट पर प्रतिदिन प्रसारित भऽ रहल अछि। ‘ संवाद’ आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार एकांश द्वारा तैयार कएल जाइत अछि आ एकर प्रसारण प्रतिदिन आकाशवाणीक दरभंगा केन्द्र सँ होइत अछि। एकांश द्वारा समाचाराक अलाबा समकसामयिक विषय पर सभीक्षातमक वातीक कार्यक्रम ‘समसामयिक चर्चा’ 1992 सँ प्रारंभ भेला ई साप्ताहिक कार्यक्रम सभ शनि दिन प्रसारित होइत अछि। आकाशवाणीक समाचार एकांश अपन डेग आगा बढ़ौलक आ विधायिकाक नतिविधि सँ जनता के जोड़बाकक लेल विधान मंडल सभीक्ष कार्यक्रम प्रसारण प्रारंभ कएलका विधान सभा आ विधान परिषद्क सत्रक दरमियान एकांश द्वारा प्रतिदिन आठ बाजि कऽ बीस मिनट पर ‘ विधान मंडल समीक्षा’ प्रसारित करैत अछि। देशमे आएल सूचना क्रान्तिक प्रभाव सेहो प्रादेशिक समाचार एकांश पर पड़ल। एकांश आधुनिक सूचना तंत्र सँ लैस भेल आ वर्ष 2003 मे रोमांचक क्षण आ एल। एहि वर्ष एकांशद्वारा ‘दूरभाष समाचार सेवा’ क प्रसारण प्रारंभ भेल। श्रोता अपन फोन पर समाचार सूनऽ लगलाह। एतबा नहि वर्ष 2005 मे एकांश आधुनिक मीडिया क साधनक उपयोग करैत डी टी एच पर सेहो अपन सेवा उपलब्ध करौलक आ प्रादेशिक समाचार डी टी एच पर सेहो उपलब्ध भऽ गेल। एफ एम चैनलक बढ़ैत लोकप्रियताक देखि वर्ष 2006 सँ प्रमुख समाचार तीन टा बुलेटिन 10.30, 11.30 आ सांझ 6.30 बजे एफ.एम चैनल पर सेहो प्रसारित भऽ रहल अछि। समाचार सेवा प्रभागक वेब साइड www. Newsonair.nic in आ www. newsonair. com पर सेहो वर्ष 2007 सप्राइज़ प्रादेशिक समाचार उपलब्ध होमए लागल अछि। दूनियाक कोनोमे बैसल व्यक्ति एहि वेव साइट के खोलि आकाशवाणी पटनाक प्रादेशिक समाचार के पढि़ आ सूनि सकैत अछि। समाचार सेवा प्रभागक तर्ज पर प्रभागक रिदशा निर्देशक अनुसार प्रादेशिक समाचार मे संवाददाताक वाइस डिस्पैच, वाईस कास्ट आ साउट बाइटक कऽ प्रयोग कऽ समाचार के रोचक बनैबाक प्रयास प्रारंभ भेल। ई प्रयास अक्टूबर 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाजमे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक। संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि1 वर्ष 2006 मे मूर्त रूप लेलक । संवाददाताक आबाज मे समाचारक प्रसारण जे प्रारंभ भेल से एखनो चलि रहल अछि। वर्ष 2006 मे समाचार सेवा प्रभागक पहल पर जिलाक गतिविधि पर आधारित कार्यक्रम ‘जिले की चिह्ठी’ क नाम बदलि कऽ ‘जिले की हलचल’ कऽ देल गेल ‘जिले की चिट्ठी मे प्रदेशक विभिन्न जिलाक अंशकालिक संवाद दाताक प्रेषित समाचारक आलेखक प्रसारण होईत छल मुदा एकर परिवर्तित रूप ‘जिले की हलचल’ मे जिलाक समाचार आधारित एहि कार्यक्रम के संवाददाताक आवाजमे प्रसारित कऽ एकरा आर जीवंत बनाओल गेल अछि। ई कार्यक्रम प्रतिदिन प्रादेशिक समाचारक बाद प्रसारित होईत अछि। प्रादेशिक समाचार एकांशक स्थानाक संगहि जाहि इमानदारीक संग गुरूवारदत्त, रामेरणुगुप्ता आ रवि रंजन सिन्हा आकाशवाणी समाचार सँ बिहारक जनता के जोड़बाक काज प्रांरभकएलनि ओकरा पूरा इमानदारीक संग हुनक बाषजूद प्रादेशिक समाचार एकांश जनता के त्वारित आ विश्वसनीय समाचार देबाक लेल तत्पर अछि। अपन कर्तव्यक निर्वाह एकांश देश-दूनियाक हलचल सुदूर गामधरि पहूचा रहल अछि। सताक प्राप्ति बनल भाजपाक उद्देश्य ‘पार्टी विथ डिफरेन्स’ क दाबा करए बाला भारतीय जनता पार्टी आब अपन चालि आ चारित्र के आन दलक डांचा मे ढालि रहल अछि। राजनीतिक अपराधी करण आ भ्रष्टचारक विरूद्ध संघर्षक शंखनाद करए बाला भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टाचारीक आगां नतमस्तक भऽ गेल अछि। ई स्वाभावि को अछि। राजनीति दलक एकमात्र उद्देश्य् सत्ताक प्राप्ति अछि आ एकर प्राप्तिक लेल सभ किछु जायज अछि। ज्यो ई नहि रहैत तऽ पार्टी विथ डिफरेन्स बाला भाजपा जाहि शिक सोरेनक विरुद्ध संसद सँ लऽ कऽ सड़क धरि संधष्र कएलक दलक संग झारण्ड मे शासन करबा लेल बेचैन नहि रहैत। देशक बहुचर्चित सांसद घुस काण्ड आ शशिनाथ झा हत्याकांड क आरोपी झारखण्डा मुक्ति मोर्चाक अध्यक्ष शिबू सोरेन के झारखण्डक मुख्य मंत्री बनैबाक लेल भाजपा अपन समर्थन दऽ अपराध आ भ्रष्टाचारक एकरा नव परिभाषा लिखबाक प्रयास कऽ रहल अछि। झारखण्ड मे त्रिशंक विधान सभा बनलाक बाद सोरेन पहिने कांग्रेसक चिरौरी कएलनि ओ काँग्रेस आलाकमान द्वारा मुख्य मंत्री पद देबा सँ मना बएलाक बाद पाला बदलि राजग केँ खेमा मे गेलनि आ जेना भाजपाक नेता सत्ताक प्राप्तिक लेल बेचैन छलाह, शिबूक सभ कुकर्म के बिसारि हुनक आगां नतमस्तक भऽ गेलाह। शिबूक संग भाजपा के प्रदेश मे स्थायी सरकारक एतबा चिन्ता छल तऽ एहि चुनावक आवश्यकता नहि छल। मधु कोड़ाक मुख्य मंत्री पद सँ विदाई समय भाजपा ओहि सभ सँ पैघ दल छल। सदनमे ओकर 30 रा सदस्य छल आ झामुमो के सेहो 18 सदस्य छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्त कऽ झामुमोके सेहो 18 सदस्य छल। आ दूनू दल आरामदायक बहुमत प्राप्त कऽ सरकार चला सकैत छल। मुदा सरकार सजानाक जे बाबादी भेल एकरा लेल भाजपा जिम्मेदार नहि अछि? मात्र काँग्रेसके सत्ता सँ बाहर रखबाक लेल भाजपाक ईनाटक पार्टीक बदलि रहल चालि चरित्र आ चेहरा कहल जा सकैत अछि। राष्ट्रीवादी विचारक पोषक आ अपन ईमानदार छवि क तगमा लेने धुमि रहल भाजपाक भ्रष्टाचारक विरुद्ध संघर्ष नारा लोकक आखिमे झाउर झोकब बुझि पड़ैत अछि। ओना पार्टी अपन नीति आ सिद्धांत पर चारि डेग चलि दू डेग पांछा हटबामे कोनो परहेज नहि करैत अछि बशर्ते सत्ताक गांरटी हो। राम मंदिरक मामिला होकि धारा 310, अथवा समान अचार सँ हिताक मामिला पार्टी अपन एहि भूल सिद्धांत सँ समझौता कएलक आ केन्द्र से गांरटेड सत्ता हाथ लागल। एकर बाद तऽ जेना पाटी मनुकख खूनक स्वाद लऽ चूकल शेर मऽ गेल आ सत्ताक ई स्वाद लेलाक बाद बिनू सत्ता प्राप्ति रहब दुष्कर भऽ गेल। झारखण्ड भूख के शांत करबाक प्रयास कहल जा सकैत अछि। बदलैत राजनीतिक परिदृश्याक मध्य राष्ट्रवादक झण्डा दो रहल भाजपा आब अपराधी आ भ्रष्टचारीक कन्हापर चढि़ कोनो हाल मे सत्ता प्राप्तिक नीति पर चलि रहल अछि। पार्टीक बदलैत चाहि। चरित्र आ चेहरा ज्यो वर्ष 2010 मे बिहार मे होमए बाला विधान सभा चुनावक दरमियान सोझा आबि सकैत अछि। प्रदेशक बदलि रहल राजनीतिक बातावरणमे बिहार मे सेहो त्रिशंकू विधान सभाक संभावना बुझि पड़ैत अछि। ज्यों ई मेल 13 सत्ताक कुसीक लेल भाजपा पशुपालन घोटालाक लेल चर्चित राजद अध्यक्ष लालू प्रसादन आगां साष्टांग दण्डबत भऽ कोनो आश्चर्य नहि होएत। ई सत्त अछि जे राजनीतिक दलक लेल सत्ताक प्राप्तिक एकमात्र लक्ष्य होईत अछि। चुनावक मैदान मे उतरबा सँ पहिने भने पैघ-पैघ दाबा कएल जाईत हो। जनताके दिन मे चाद आ तारा देखैबाक आश्वासन देल जाईत हो मुदा मत गणनाक बाद बदलैत राजनीतिक परिदृश्यक अनुरूप नीति आ सिद्धांत बदलैत अछि। आ ई सभ झारखण्ड मै पान मे ताल ठोकड बाला दल प्राप्तिक लेल नव-नव सभीकरण बनबड लागल आ सफलता भाजपाके भेटला। सांसद घुस काण्ड मे संसदक कार्यवाही के पन्द्रह दिन घरि ठप्प कऽ जनताक टाका बर्बाद करए बाला आ शिबू सोरेन पाक साफ लगलनि। राँची सँ लऽ कऽ दिल्ली धटि बैसल भाजपाई शिबू के क्लीन चीर दैत रहलनि आ ओम्हर शाशिनाथ झाक परिजन शिबू के मुख्य मंत्री नहि बनैबाक चिरौरी करैत रहलाह। सत्ता प्रप्तिक एहि जोशमे स्वoझा के न्याय दे एबाक बात दबि गेल अछि। भाजपाक नेतृत्व घृतराष्ट्र जकां आखि पर पट्टी बान्हि न्याय सँ आँखि चोरा रहल अछि। मामिला स्पष्ट अछि। ज्यो शिबू सोरेन एतबा पाक साफ छलाह तऽ फेर आखिर कोन कारण भाजपा शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहला ईहो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध संघर्ष करैत रहल। ई हो सत अछि जे शिबूक विरूद्ध कानूनक अनुसार मामिला पर निर्णय होएत आ निर्णय भेलो अछि। ओ न्यायालय द्वारा बरी कएल गेल छथि आ आब मामिला सर्वोच्च न्यायालय मे अछि। न्यायालय अपन धारा आ साक्ष्यक आधार पर निर्णय देत मुदा सच तऽ झारखण्डक एक जनता जनैत अछि। ज्यों न्यायालय द्वारा बरी कएलाक बाद दोस्ती जायज अछि तऽ बिहार मे पशुपालन धोटालाक किछु मामिलामे राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के सेहो राहत भेटल अछि तऽ भला हुनक विरूद्ध संघष्र जारी राखब बिहारक जनता के मुर्ख बनाएब नहि अछि। वर्ष 2009 मे लगातार हारिक स्वादाक बाद वर्षक अंतमे विजेता बनबाक अवसर हाथमे अबैत देखि भाजपा अपन नीति आ सिद्धांत के फिक्स डिपाजिट कऽ देलक अछि। एक दिस भाजपा अपराध भ्रष्टाचारक संरक्षण दऽ सत्ता चलाओत दोसर दिस ओकर नीति आ सिद्धांत बढ़ैत रहत। सताक सहयोगी बनलाक बाद भने भाजपाई मदहोश भेल होथि मुदा स्वoशशि नाथ झा क आत्मा भाजपाक एहि निर्णय पर जरूर आश्चय्र चकित होएत शिबूक मुख्य मंत्री बनलाक बाद स्वoझाक परिजनके न्याय भेरत एकरतऽ कल्पना करब बेक्कूफी अछि। झामुमो सुप्रीमो जतए स्वo झाक हत्याक मामिलामे अपना आप के पाक साफ करबाक सभ संभव प्रयास करताह ओतहि भाजपाई पूर्व मुख्य मंत्री मधु कोड़ाक साम्राज्यक अनुरूप एहि तरहक अपनो छोअ साम्राज्य बनैबा मे कोनो कसरि नहि छोड़ता । किएक तऽ झारखण्डक ई नियति बनि गेल अछि । ४.केदार कानन-जगदीश प्रसाद मंडलक पछताबा पर एक दृष्टि गंभीर साम्यवादी दृष्टि, रचल पचल जीवानानुभव आ ताहि अनुभवक सहज मुदा परिपक्व अभिव्यक्ति, अभिव्यक्तिमे कहबाक अपन ढ़ंग, मैथिल जीवन आ परम्पराक श्रेष्ठ अंकन-चित्रण कथाकार जगदीश प्रसाद मंडलक निजी पहचान थिक। एक बएसपर आबि गेलाक बाद ई लेखनक शुरुआत कएलनि अछि मुदा से हिनक कृतिक परायणसँ बुझाइत नहि अछि। तकर कारण ई रहल अछि जे हिनक मानसमे ई सभ वस्तु कागतपर उतरबासँ पहिनहि रचित-खचित रहल अछि। जीवनक सघन-बीहड़ झंझावात सहि-अंगेजि लेखनक क्षेत्रमे उतरय बला जगदीश जी सनक श्रेष्ठ शिल्पीक स्वागत करैत प्रसन्नता होइत अछि। हिनक पछताबा कथा हमर टेबुलपर राखल अछि। सुपौलमे आयोजित कथा गोष्ठीमे ई कथा पढ़ल गेल छल। एकटा स्वतंत्रता सेनानीक घरसँ बहराएल रघुनाथ अपन इंजीनियरिंगक पढ़ाइक पछाति नोकरी लेल पत्नीक संग अमेरिका चलि जाइत अछि, अपन माता-पिता, परिवारक, सर-सम्बन्धी, समाज सभकेँ छोड़ि। ओहिठामक चाक-चिक्य आ भोगवादी समाजमे रचल-पचल रधुनाथ लेल पाइ कमएबाक अतिरिक्त कथूक चिन्ता नहि छनि। एम्हर शिवनाथ आ हुनक पत्नी, रघुनाथक माता-पिता गामपर रहि जाइत अछि। थोड़ेक दिन पुत्रक वियोगमे मालिन रहि ई दुनू परानी ढ़ंगसँ अपन जीवन जीबैत छथि आ सुखसँ रहैत छथि। फ्लैश बैंकमे ई कथा चलैत अछि आ अनेक-अनेक उपकथा कथा सभ उदघाटित होइत अछि। अमेरिकाक जीवनसँ पहिने उबैत अछि रघुनाथक पत्नी। ने क्यो संगी ने क्यो गप कएनिहार। एक दिन यैह पश्चाताप रघुनाथोकेँ होइत छनि। मगर ओ अपन ओछाइनपर छटपटाइत टा रहि जाइत अछि। गाम अएबाक कार्यरुप अथवा कोनो आन परिणति नहि देखाबऽ दैत अछि। कथा मोनलग्गू अछि। पढ़बामे क्रम भंग कतहु नहि होइत अछि। कथामे मैथिल अभिव्यक्तिक निम्नांकित रुप नीक लगैत अछि - जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछ पर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। दुनूक मन एहिरुपेँ चूर-चूर भऽ गेलनि, जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फूटल फुकना बैलूनक हवा जेकाँ वायु मंडलमे मिलि गेलनि। पाकल आमक आँठी जेकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलनि। अंडीक तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ। जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम व्यक्तिगत रूपेँ बधाइ दैत छियनि आ आशा करैत छी जे ओ अपन अनुभवकेँ आरो व्यापकता प्रदान करैत नव-नव कृतमे हमरा सभकेँ परिचित करौताह। २.५. १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-सखी कुन्ती २.बिपिन झा-के करत मिथिलाक्षरक रक्षा ३. फूलचन्द्र झा प्रवीण- मैथिलीक बाल साहित्य डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-जन्म(८ फरबरी १९६७-) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद। ‘सखी कुन्ती’ हम करीब तेरह वर्षक भऽ गेल रही। रही बड्ड खुर्लच्ची आ अगाध बदमास। कहियो एहेन नहि होइत छल जहिया ककरोसँ झंझट नहि होइत हो। माय हम्मर लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छलीह। सब उपाय केलन्हि; डांटब, बुझाएब, मारब। मुदा बेकार हम अपन खुर्लुच्ची स्वभावकेँ नहि त्यागलहुँ। एहनो बात नहि छल जे हमरा अपना मोनमे अपन कर्मक प्रति घमण्ड हो। प्रति दिन सूतबा काल ई निर्णय लैत रही जे आब लोक सभसँ झगड़ा–फसाद नहि करब। खूब मोन लगाकऽ पढ़ब। लोक आब माय लग ई कहय अयतन्हि जे आहाँक बेटा अपन कक्षाक सबसँ नीक विद्यार्थी अछि। लोक सभसँ आपसी प्रेम बना रखैत अछि। आदि–आदि। “मुदा ई सब किछु क्षणक निर्णय होइत छल। भोर होइतहि हम अपन बदमासीक प्रवृत्तिमे पुनः संलग्न भऽ जाइत रही। माय सोचलन्हि; “आब ई बर्बाद भऽ जाएत”। तामससँ घोर होइत बाढ़नि उठा एक दिन कतेको बेर मारलन्हि। बीचमे हफैत रहली या कहैत रहलन्हि “राघव! तोरासँ नीक कुकुर! कमसँ कम अपन पोसनहारक बात तऽ मनैत अछि”। माएक हाथ चलैत रहलन्हि, आ हम मारि खाईत रहलहुँ। फेर ओ बजलीह; तूँ तँ बतहा कुकुर छै मारैत मारैत माए थाकि कऽ चूर भऽ गेलीह। ओना तँ कतेको दिन माएसँ मारि खाईत छलहुँ मुदा ओहि दिनक बात जीवनपर्यंत याद रहत। शरीर बेदनासँ कराहए लागल। माए केँ सेहो बुझेलन्हि जे आई ओ किछु ज्यादे मारि देलन्हि। हम बिना किछु कहने मण्डिल (मन्दिर)केँ पाछा जाए कानए लगलहुँ। आधा घंटाक बाद माए मालीमे करूक तेल लेने अयलन्हि। पाछासँ हमर झोटकेँ सहलाबए लगलन्हि। हमरा भेल फेर मारतीह। मुदा जखन हुनका दिस ध्यान गेल तऽ देखलहुँ आँखिसँ नोर चुबैत छलन्हि। कहए लगलन्हि; “चारिटा बाल बच्चा भगवान देलन्हि। तीनटासँ कहियो कुनो शिकायत नहि भेल। सबहक कसरि तो पूरा कऽ देलह राघव। माए कहैत रहलीह आ माथा सहलाबैत रहलीह। आब हमहुँ कानए लगलहुँ। कहलियिन्ह “माए! आब हम बदमासी नहि करब! हमरा आई आहाँ बड्ड मारलहुँ। पूरा शरीर गूड़ घाव जकाँ दर्द करैत अछि”। ई कहि हम माएकेँ पकड़ि हुनकर गरसँ लागि बड्ड जोरसँ कानए लगलहुँ। पूरा शरीरमे बाढ़निकेँ ओदरा परि गेल छल। माए ओकरा देखैत हमरे जकाँ जोरसँ कानए लगलीह। फेर तेल लगौलन्हि। स्नान केलहुँ आ भोजन केलहुँ। माए दिन भरि कनैत रहलीह। दिन भरि अन्न नहि खेलन्हि। लोक सब आग्रह केलकन्हि तँ कहलखिन्ह जे हम्मर प्रायश्चित यैह थीक जे हम 24 घंटा अन्न जल ग्रहण नहि करी”। जखन हमरा पता चलल हम दीदीकेँ हाथसँ चाह लए माए लग गेलहुँ। हमरा बुझल छल जे माए अन्न बेतरे तँ रहि सकैत छथि मुदा चाहकेँ बिना नहि। हम कहलियन्हि माए! अहाँ चाह पी लिअ। आब हम कहियो गलती नहि करब। लोक कहत ‘राघव केहेन नीक लड़का छैक’। माए हमरा दिस देखलन्हि आ बजलीह; चुपचाप चाह लऽ कऽ घर चलि जो। जाई हम किछु नहि खैब! रातियोमे माए नहि खेलीह। भोरे भईया दरभंगासँ अयलाह। आबिते मातर माए हुनका कहलथिन्ह; “पवनजी, राघब हमर जीनाई दुर्लभ कऽ देने अछि। लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छी। काल्हि जानवर जकाँ मारिलियैक। कचोट बादमे बड्ड भेल। ई महामुर्ख निकलि गेल। तेँ एकरा पिताजी लग सिमडेगा भेज दहक। रामनगर वाली बहिन कहैत छलीह जे रोहित चारि पाँच दिनक भीतर राँची जाए बला छथि। हुनके संगे पठा दहक। बाबूजीकेँ एकटा चिट्ठी लिख दहुन”। हम्मर घरमे माएक राज चलैत छलन्हि। भैया हुनकर आज्ञाकेँ स्वीकार केलन्हि। साँझमे भैया रोहित भाईकेँ लऽ कऽ अयलाह रोहित भाई माएकेँ कहलथिन्ह; कुनो बात नहि कनिया काकी, हम राघबकेँ सिमडेगा बला बसपर बैसा देबैक। सिमडेगामे बसे स्टेंड लग खादी भण्डार छैक। बसक कण्डक्टर राघबकेँ ककाजी लग पहुँचा देतैक”। माए हमर जएबाक तैयारी करए लगलीह। हमरा गामसँ सिमडेगा गेनाई नीक नहि लागि रहल छल, जे एकबेर जे कुनो बात माए मोनमे ठानि लेलन्हि तकरा दुनियाक कुनो ताकत नहि टारि सकैत अछि। ताहि बिना कुनो प्रतिकार केने हमहुँ सिमडेगा जेबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। अपन तीन चारिटा लंगौटिया यार सबकेँ कहि देलयैक; “हम आब सिमडेगा चललीयौक। तूँ सब रह अतय केर राजा”। चारि दिनक बाद हम रोहित भाई संग सिमडेगा लेल प्रस्थान केलहुँ। आबए काल माए बड्ड कनलीह। बड़ हृदयसँ लगौलन्हि। पहिल बेर पता चलल जे माए हमरा कतेक मानैत छलीह। कहलीह; “बाबूजी लग, मनुक्ख जकाँ रहबाक प्रयत्न करिहैं राघब। तंग नहि करियेन्ह। माए एकटा चिट्ठी सेहो बाबूजी केँ लिखलथिन्ह। चिट्ठी अंतिम भागमे लिखल रहैक; “राघब बड्ड बदमास अछि। प्रतिदिन लोकक उपरागसँ मोन आजिज भऽ गेल अछि। ताहिसँ एकरा अहाँ लग पठा रहल छी। शायद अहाँक डरसँ बदमासी कम करत। हम जनैत छी ई हमर कोर पछुआ अछि। तइयो एकर उत्तम भविष्य केर लेल अपन छातीपर पाथर राखि अहाँ लग दूर देशमे पठा रहल छी। एकरा डॉट फटकार अवश्य करबैक, मुदा अहाँकेँ हम्मर आ चारू धीया–पुताक सप्पत अछि, एकरा मारबै नहि”। माएक चिट्ठी हम सिमडेगा अयलाक आठ दिनक बाद पढ़लहुँ। माएक यादमे चुपचाप बड्ड कनलहुँ। लागल केहेन महान चीजक नाम छैक ‘माए’। स्वयं तँ मारैत छलीह, मुदा जखन बाबूजी लग भेजलन्हि अछि तँ बाबूजीकेँ सब तरहे बुझा रहल छथिन्ह जे राघबपर हाथ नहि उठेबैक। बाह रे माएक ममता! बाबूजी माएकेँ बड्ड मनैत छलथिन्ह। ओ हमरा बुझबैत छलाह; “राघब, अहाँ खूब मोनसँ पढ़ु। अहाँकेँ जे कुनो चीज चाही से लिअ जा पढ़ु। लोक सबसँ झगड़ा–दान नहि करू”। अगल–बगल केर चारि–पाँच लड़का–लड़की सबसँ बाबूजी हमर परिचय करा देलन्हि। हम अपनामे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन अनलहुँ आ लोक सबसँ लड़ाई–झगड़ा त्यागि देलहुँ। बाबूजी प्रसन्न छलाह, जे चलू राघबमे एहेन परिवर्त्तन अयलन्हि। हमरा लोकनिक घरक बगलमे एकटा तमाकुल बेचय बला बनिया छल। ओकर नाम रहैक सोहन साहु। सोहन साहु केर बेटी शीला छलैक। हलांकि शीला हमरासँ एक कक्षा जुनीयर छलि। शीलाक नाक नक्श बड़ सुन्दर, रंग कारी मुदा सोहनगर। शीला जवान भऽ रहलि छलि, से शरीरक अंगसँ स्पष्ट परिलक्षित होइत छलैक। पातर ठोर, डोका सनहक आँखि, मध्यम कद। कपड़ा–लत्ता सेहो ठीक पहिरैत छलि। शीलाक माए हमरा बड्ड मानैत छलीह। कहैत छलथिन्ह; “बेचारा राघब,! बिना माएकेँ सिमडेगामे रहैत अछि”। शीला सेहो हमरा बड्ड मानैत छलि। पिताजी हमर नाम सिमडेगाक सरकारी स्कूलमे लिखा देलन्हि। हमर स्कूलकेँ ठीक पाछा शीला कन्या विद्यालयमे पढ़ैत छलि। हलांकि शीला बरसमे हमरासँ डेढ़ वर्षक पैघ छलि, परंतु कक्षामे हमरासँ एक कक्षा पाछा। स्कूलक समय दूनू स्कूल एकै रहैक। हम प्रतिदिन स्कूल शीलेक संग जाइत रही। शीलाक संग शीलाक एक सहछात्रा सेहो हमरा लोकनिकेँ संग विद्यालय जाइत छलि। ओहि छात्राक नाम रहैक कुंती। कुंती मध्यम कदकेँ करीब पन्द्रह वर्षक स्वस्थ आ गोर लड़की छलि। नमहर कारी–कारी केश, सुन्दर नाक, कान। कनीक वरससँ ज्यादे बुझना जाइत छलि कुंती। शनैः शनैः कुंतीसँ हमर नीक बातचीत होमए लागल। पता नहि कियाएक कुंती हमरा शीलासँ ज्यादे नीक लगैत छलि। निश्छल, सहज आ सुन्दरि। ओकर आंखि दिस जखन–कखनो ध्यान जाइत छल तँ एना बुझाइत छल जेना ओ सहज भावसँ मोनक कुनो बात हमरासँ बांटए चाहैत अछि। बात क्रममे पता चलल जे कुंती मैथिल ब्राह्मणी थीकि। पूरा नाम रहैक कुंती झा। चुंकि हमरा लोकनि सभवयस्क आ संगीक रूपमे रहैत रही, आ उपर कुंती हमर सखी शीलाक अभिन्न संगी रहैक ताहिसँ हम सब ओकरासँ तूँ कहि कऽ बात करियैक। हलांकि एक दिन शीलाक माए हमरा कहलन्हि, राघव, अहाँ सब कुंतीकेँ तूँ नहि कहियौक”! हम पुछलियन्हि, “कियाएक काकीजी? कुंती आ शीला दूनू हमर संगी जकाँ थीकि। हम शीलोकेँ तूँ कहिकऽ बजबैत छियैक मुदा अहाँ कहियो मना नहि केलहुँ, परंतु कुंतीक लेल ई बात कियाएक कहि रहल छी”? शीलाक माए हमर प्रश्नक जवाब देमए लगलीह, यही बीचमे शीला आ शीलाक पिताजी हुनका रोकि देलथिन्ह। शीलाक पिताजी शीलाक माएसँ कहलथिन्ह; “अहाँ बच्चा सबकेँ बीचमे कियाएक टांग अरबै छी? “जखन कुंतीकेँ कुनो समस्या नहि छैक, तँ अहाँकेँ की समस्या अछि? राघबकेँ अनेरे अहाँ शिक्षा नहि दियौक”। शीला सेहो अपन माएकेँ भाषण देमए लागलि; “गे माए, ई तोहर बड़का समस्या छौक। अपना जे करक छौक से कर। जकरा जेना बजबै चाहैत छैं, बजा। हमरा सभहिक बीचमे नहि बाज। हम कुंती आ राघब ओहिना रहब जेना रहि रहल छी। हमरा सबकेँ व्यर्थमे नैतिकताक शिक्षा नहि दे माए”। हमरा बूझ’मे नहि आयल जे एकाएक बाप–बेटी मिलकेर बेचारी शुद्ध महिलाकेँ कियाएक बजबासँ रोकि देलकैक। ओना शीलाक माएक बातपर हमरा किछु विस्मय जकाँ सेहो लगैत छल। शीला हमरा दिस देखैत बाजलि; “राघब,! तों जेना चाहैत छैं तहिना कुंतीकेँ सम्बोधित कऽ सकैत छैं। जेना कियाएक, ओहिना जेना हमरा कहैत छैं। तहिना कह” कुंती कहैत रहलि। समय चलैत रहल। हम अपन माएक देल वचन पर थोड़ेक प्रतिबद्ध रहलहुँ। खूब मोनसँ पढ़ी। लोक सनसँ झगड़ा–फसाद लगभग छोड़ि देलकै। स्कूलक शिक्षक सब सेहो हमर व्यवहार आ कुनो चीज अथवा ज्ञानकेँ सीखबाक उत्कंठा या जिज्ञासासँ प्रसन्न छलाह। बाबूजी हमर प्रशंसा सुनि गद्–गद् भऽ गेलाह। झट दनि माएकेँ चिट्ठी लीखि देलथिन्ह। चिट्ठीक मजबून ई रहैक। राघबमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन भेलैक अछि। गामसँ एकरा सिमडेगा ऐनाई करीब 7 मास भऽ गेलैक मुदा भाई धरि ककरो कुनो शिकायत राघबकेँ खिलाफ नहि भेटल अछि। शिक्षक सबसँ राघबकेँ सम्बन्धमे हमेशा जानकारी लैत रहैत छी। सब कियोक मुक्त कंठसँ राघव केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हमरा राघव कुनो तरहसँ परेशान नहि करैत अछि। राघब अतेक नीक भऽ जाएत तकर तँ हम कल्पनों नहि केने रही”। पिताजीक पत्र पढ़ि माँ बड्ड प्रसन्न भेलीह। तुरत निर्णय लऽ लेलन्हि जे कमसँ कम दुइयो मासक लेल सिमडेगा अयतीह आ हमरा सब संगे रहतीह। माँ पिताजीकेँ पत्र द्वारा सूचना देलथिन्ह जे धनकटनीक पश्चात् ओ सिमडेगा आबि रहल छथि। किछु दिनक बाद माए सिमडेगा आबि गेलीह। हम बड्ड प्रसन्न रही। माएक स्नेह, माए हाथक भोजन भेट रहल छल बाबूजी सेहो प्रसन्न छलाह। लगभग हमर झंझटसँ स्वतंत्र किछु दिन लेल भऽ गेल छलाह। माए अपन मिलनसार स्वभावक कारणे सिमडेगाक नीचे बजार मुहल्लामे प्रशंसाक पात्र भऽ गेलीह। स्त्रीगण सब अपन तमाम नीक कार्यमे हुनका बजबय लगलन्हि। हमरा सिमडेगा आयलाह आब लगभग एक वर्ष भऽ गेल छल। एहि बीचमे किछु अप्रत्याशित घटना घटित भेलैक। कुंती लगातार चारि–पाँच दिनसँ नहि आबि रहलि छलि। शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंतीक घरमे किछु झंझटि चलि रहल छैक, ताहि कारणे ओ नहि तँ स्कूले आबि रहल छलि आ ने हमरा सब लग। लगभग दस दिनक बाद कुंती शीलाक घर आयलि। हम शीलेक घरमे रही। हमर माए सेहो ओतय छलीह। कुंतीक चेहरा उतरल रहैक। मुँह कारी स्याह। आँखिक उपर–नीचा फूलल। अहिसँ पहिने कि हम किछु ओकरासँ पुछितियैक, हमर माए आ शीलाक माए कुंतीकेँ आबितहि ओकरा भाषण देमय लगलन्हि। माए हमर बाजए लगलीह; “देखू कुंती! अहाँक ब्राह्मण कुलक स्त्रीमे जन्म भेल अछि। पति नीक, अधलाह जेहेन होइत छैक, स्त्रीगण हेतु भगवान होइत छैक। अहाँकेँ भोलाझा पति छथि। अहाँकेँ हुनकर आज्ञाकेँ अवश्य मानक चाही। बिना हुनकर आज्ञाकेँ कुनो कार्य केनाइ या कतहुँ जेनाइ उचित नहि। अहाँ अप्पन गलतीकेँ स्वीकार करू आ जीवनकेँ आनन्द पूर्वक जीबू”। हम माएक बातकेँ सुनलहुँ तँ आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ। पहिल बेर इ ज्ञात भेल जे कुंती कुमारि नहि अपितु ब्याहित महिला थिक। आब बुझना गेल जे शीलाक माए हमरा कियाएक कहैत छलीह जे कुंतीकेँ तूँ कहिक नहि बजेबाक हेतु! चिंताक अथाह सागरमे डुबि गेलहुँ। कतए 17 वर्षक कुंती आ कतए 52 वर्षीय भोला झा। केहेन अनमोल विवाह!!! हे भगवान, ई केहेन जोड़ी बना देलयैक! लोहामे सोना सटि गेल। भरल दुपहरियामे अन्हार!! एक क्षण लेल एना बुझना गेल जे कुंतीक आत्मा हमर शरीरमे प्रवेश कऽ गेल! हम अपना –आपकेँ कुंती बुझि मोनहि मोन कानए लगलहुँ, काँपए लगलहुँ। अपन पितयौत बहिनक विवाहक कालक स्त्रीगण सब हारा गाएल गीतक एक पांति बेर–बेर मोनमे हुमरय लागल; “लोहामे जड़ि गेल हम्मर सोना। हम जीबै कौना”!! मुदा कुंती पाथरक मूर्त्ति बनलि हम्मर माएक आ शीलाक माएक अनर्गल भाषण सुनैत रहलि। बिना कुनो उचाबच केने। कुंतीक माथ जमीन दिस रहैक। किछु कालक बाद देखलियैक जे धरतीपर नोरक बुन्द मारितै पड़ल छैक। मुदा ओ सब ठोप बेकार भऽ गेलैक। दकियानूशक परिवेशमे हमर माए ततेक रमलि छलीह जे हुनका कुंतीक नोर नहि देखेलन्हि। किछु कालक बाद कुंती मुँह ऊपर उठा अपन गालपर हाथक लाल निशान भोला झा चमेटाक निशान छलैक। माए अपन हाथसँ कुंतीक गालकेँ सहलाबए लगलथिन्ह। माएक ममत्वकेँ देखि कुंतीकेँ हृदय फारि गेलैक। कुहेस फारि कानए लागलि। हम्मर माए अपन छातीसँ लगा लेलथिन्ह। कहाथिन्ह; “अहाँ आब नीकसँ रहूँ। भोला झा गलत कार्य केलन्हि अछि। हम मैनेजर साहेब (हम्मर पिताजीकेँ बारेमे) कहबन्हि जे हुनका समझेथिन्ह। अहाँक जेठ बहिनसँ हुनकर छोट भाएकेँ बियाह भेल छन्हि आ अहाँक जेठकी भगिनी अहाँसँ एकै वर्षक छोट अछि। मुदा आगू नीकसँ रहूँ। केवल स्कूल जायकाल स्कर्ट आदि पहिरू। स्कूलसँ वापस अयलाक बाद सारी पहिरू, नीक जकाँ रहूँ। जतए–ततए नहि बौआऊ। छौरा सबसँ हसी–ठट्ठा नहि करू”। आ लाचार कुंती हम्मर माएक बातकेँ सुनैत रहलि। एना बुझना जाइत छल जेना ई सब माए–बेटी हो। अही बीचमे शीलाक माए चूराक भूजा आ कचरी बनाए सबकेँ खाए लेल देलथिन्ह। कुंतीक नहि लैत छलि मुदा हम्मर माए एवं शीला ओकरा बड्ड आग्रह केलथिन्ह तँ कुंती खाए लागलि। नोर मुदा एखनहुँ खसि रहल छलैक। ओहि दिन साँझमे शीला हमरा कुंतीक सम्बन्धमे तमाम जानकारी देलक। भेलैक ई जे कुंतीक जेठ बहिनक वियाह भोला झाक छोट भाएसँ भेल रहैक। कुंतीक बहिनकेँ दूइ लड़की आ दूइ लड़का छलैक। भोला झा समस्तीपुरक कुनो गामसँ कम्मे वरसमे सिमडेगा आबि गेल छलाह। अतय आबि गुजर–बसर करबाक लेल मुख्य सड़क केर कातमे एक लाइन होटल खोलि लेलन्हि। होटलकेँ बगलमे सिमडेगाक नामी पेट्रोल पंप रहैक। पेट्रोल पंपक अगल बगलमे गाड़ी–घोड़ा ठीक करबाक मारिते दुकान आ मेकेनिक सबहक भरमार। अहि सब कारणे पाँच–दस बस–ट्रक आ अन्य गाड़ी सदरिकाल ओतए लागल रहैत छलैक। आ गाड़ीक ड्राईवर, सहायक इत्यादि भोला झाक लाईन होटलमे सामान्यतया खाटपर बैसि भोजन करैत छलैक। लाईन होटल केर भोजन होइत छलैक अति स्वादिष्ट आ चहटगर। कहियो कालक हम्मर पिताजी ओहि होटलसँ तरकारी इत्यादि मंगबैत छलाह। तँ भेलैक ई जे भोला झा अपन परिवारकेँ ठीक करयमे लागल रहलाह। तीन कुमारि बहिनक विवाह, माए–बापक संस्कार, क्रिया कर्म, दूटा छोट भाएक रोजगारक तलाश आ वियाह दान करैत–करैत कहियो अपना बारेमे सोचबे नहि केलन्हि। अही बीच जखन कुंती करीब 14 वर्षक छलि तँ अपन जेठ–बहिन लग सिमडेगा आयलि। ओहि समयमे भोला झा 51 वर्षक छलाह। कुंतीक शरीर भरल रहैक। आ देखबामे 18–19 वर्षक लगैत छलि। भोला झाकेँ अचानक वियाह करबाक इच्छा भेलन्हि। अपन छोट भाए अर्थात् कुंतीक जेठ बहिनोईकेँ कहलथिन्ह जे ओ कुंतीसँ वियाह करैत छथि। तावेत धरि कुंतीक पिताक स्वर्गवाश भऽ गेल छलन्हि। विधवा माए ओहि जमानामे चारि हजार टकाक लोभसँ कुन्तीक वियाह भोला झासँ करा देलकैक। पहिने तँ कुंतीक नहि बुझि सकलि अहि सब चीजक परिणाम। मुदा नइ–नइ स्थिति स्पष्ट होमए लगलैक। हालहिमे भोला झा कुंतीकेँ रातिमे हवशकेँ शिकार बनबय चाहैत छलथिन्ह, जकर ओ प्रतिकार केलकन्हि तँ झोटा नोचि गालपर बड्डपर मारलखिन्ह। शीला ईहो कहलक जे भोला झा दिन भरि गाजा पीबैत रहैत छथि, राक्षस जकाँ मोछ रखैत छथि, मुँहसँ गंध अबैत रहैत छन्हि, ताहि सब कारणे कुंती हुनका लग जाएसँ बचय चाहैत अछि। खैर! अहि घटनाक बाद आ कुंतीक अतीत जनबाक कारणे हम्मर व्यवहार ओकर प्रति बदलि गेल। कुंती आन ठाम जेनाई बन्द कऽ देलक परंतु शीला आ हमरा लग एनाई नहि रूकलैक। हम आब ओकरा किछु सम्मानसँ बचबय लगलियैक तँ बाजि उठलि; “नहि राघब, ई ठीक बात नहि। तो हमर परम मित्र छैह! हमरा पूर्वे जकाँ कुंती कहि सम्बोधन कर तँ नीक लागत। हम एकबेर पुनः कुंतीक संग वैह पुरनका व्यवहार करए लगलहुँ। समयक चक्र चलैत रहलैक। एहि बीच हमरा लोकनि दसमी कक्षामे पहुँच गेलहुँ। हम्मर उम्र करीब सोलहकेँ भऽ गेल। कुंतीक लगभग अठारह वर्षक। एकाएक कुंतीक शरीरमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन आबए लगलैक। ओकर वक्ष एकाएक बड्ड भारी भऽ गेलैक, गाल मोट भऽ गेलैक। शरीरक वजन बढ़ि गेलैक। आँखि छोट भऽ गेलैक। हलांकि एहि तमाम परिवर्त्तनकेँ बादो कुंतीक सौन्दर्यमे कुनो कमीनहि भेलैक। एखनो हमरा कुंती अजीब सुन्दरि लगैत छलि। करीब आठ मास पहिने एकबेर पता नहि कियाएक कुंती हमरा भरि पांज पकड़ि अपन हृदयसँ सटा लेलक आ हम्मर माथा चूमि लेलक। हम सन्न रहि गेलहुँ। लाजे किछु नहि कहलियैक। मुदा तहियासँ सदरिकाल मोनमे यैह सपना आबए लागल, जे किनसियायत कुंती हमर जीवन संगिनी बनि जाईत। हलांकि हमरा ई नीक जकाँ बुझल छल जे ई संभव नहि अछि। एक दिन हम कौतुहलमे पुछलियैक, “कुंती तोरामे अतेक परिवर्त्तन कियाएक भऽ रहल छौक। तौं कियाएक अचानक मोट भऽ रहल छै”? हम्मर कौतुहल सुनि कुंती हँसय लागलि। केवल कहलक; “राघव, तौ नहि बुझबै!! से कहि कुंती चलि गेल। एहि घटनाक लगभग एक मास बाद कुंती स्कूलो गेनाई बन्द कऽ देलक। कुंती हमरा ई कियाएक कहलक जे “राघव, तौं नहि बुझबै”!! हमरा किछु नहि फुराइत छल। अंततः एक दिन जखन स्कूलसँ डेरा आबैत रही तँ बाटमे जेल लग शीला भेट भऽ गेल। शीलासँ कुंतीकेँ बारेमे जानकारी लेबए लगलहुँ तँ पता चलल जे कुंती गर्भवती थीकि। आब बूझऽ मे आएल जे कुंती कियाएक हँसलि आ कहलक जे तौं नहि बुझबै”!!! हम शीलाकेँ पुछलियैक; “आब कुंतीकेँ पढ़ाईकेँ की हेतैक”? शीला कहलक; “किछु नहि भोला झा कहलकैक अछि पढ़ाई छोड़ि देबाक हेतु। आब डेढ़ मासमे कुंती अपन बच्चाकेँ जन्म देत आ बच्चाल लालन पालनमे। पढ़ाईक अंत भऽ गेलैक। खैर, छोड़ राघब! हमरो पिताजी आब हमरा लेल लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लडकाक फोटो छैक। हम तोरा देखा देबौक”। मुदा हमरा कुनो लड़काक फोटोसँ कुन मतलब! खैर! करीब डेढ़ मासक बाद एक दिन शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंती सरकारी अस्पतालमे एक लड़्काकेँ जन्म देलकैक अछि। दोसरे दिन भोला झा दू किलो मिठाई लऽ कऽ हमर पिताजीकेँ दऽ गेलथिन्ह। भोला झा खुशीसँ गद्–गद् छलाह। अहि घटनाक किछु दिनक बाद पिताजी स्थानांतरण सिमडेगासँ गिरिडीह भऽ गेलन्हि। पिताजी संग हमहुँ गिरिडीह आबि गेलहुँ। करीब चारि वर्षक बाद सिमडेगा गेलहुँ तँ शीला नहि भेटलि। शीलाक माए कहलन्हि जे शीलाक वियाह राऊरकेला भऽ गेलैक। लड़का चाऊरक व्यवसायी छैक। शीलाकेँ एक सालक एकटा लड़की छैक। शीला अपन पति आ बच्चा संगे बड्ड प्रसन्न अछि। हलांकि कुंतीसँ भेट नहि भऽ सकल मुदा शीलाक माए बतौलन्हि जे कुंतीकेँ एकटा लड़की सेहो छैक। आब ओकर पति भोला झा अपन माएसँ भिन्न भऽ गेल छथि। कुंती पूर्णरूपेण एक सफल गृहणी, पत्नी आ माए बनि गेल अछि। सदरिकाल अपन परिवार, बेटा, बेटी आ पतिक सेवामे लागलि रहैत अछि। शीला नहि छलि तँ हमरा कुंतीसँ भलाकेँ मिला सकैत छल। इच्छा रहितहुँ हम कुंतीसँ नहि भेंट कय सकलहुँ। इमहर करीब 20 वर्षक बाद कुनो प्रयोजने सिमडेगा गेल रही। राँचीसँ जखन सिमडेगा लेल बस पकड़लहुँ तँ कुनो विशेष परिवर्त्तन ओहि क्षेत्रमे नहि बुझना गेल। किछु मकान इत्यादि अवश्य बनि गेल रहैक। सिमडेगामे कुनो विकास नहि बुझना गेल। पिताजीक मित्र श्री देवचन्द्र मिश्रजीक ओतए हम ठहरलहुँ। पाँच दिन सिमडेगामे रहलहुँ। बहुत पुरान लोक सबसँ मुलाकात भेल। शीलाक छोट बहिनक विवाह सेहो भऽ गेल रहैक। ओकर माए एखनो ओहिना नीक स्वभावक स्वामिनी छलि। शीलाक छोटका भाई दीपू बड़ पैघ पीबाक भऽ गेल रहैक। हम्मर घरमे कार्य करए बला दाई असहाय जीवन जीबि रहल छलि। पति मरि गेलैक आ बेटा नालायक। चन्दन मिश्र वकील साहेबकेँ नक्शली सब हुनका बेटा संगे कुट्टी–कुट्टी काटि देलकन्हि। आ अंततः जखन कुंतीक सम्बन्धमे जनबाक प्रयत्न केलहुँ तँ पता चलल जे जाहि छोट भाए लेल भोला झा अतेक त्याग केलन्हि, अपन जवानी बर्बाद केलन्हि, बुढ़ापामे ब्याह केलन्हि, सैह छोट भाई हुनका संगे बेइमानी केलकन्हि। लाईन होटलसँ बेदखल कऽ देलकन्हि। भोला झाकेँ दम्मा भऽ गेलन्हि। पैसाक तंगीमे ठीकसँ इलाज नहि भऽ सकलन्हि। कुंती आब सिलाईकेँ कार्य कऽ रहल अछि। आ अपन बच्चा सबहिक पोषण कऽ रहल अछि। बच्चा सब की, तँ बेटी 10वीमे पढ़ैत छैक, आ बेटा एक नम्बरकेँ नालायक। देवचन्द्र मिश्रक पत्नी कहलन्हि; “राघव, अगर अहाँ चाही तँ साँझमे हम सभ कुंतीक दुकान जाएब”। मुदा हम मना कऽ देलयन्हि। हम ओहि कुंतीकेँ नहि देखए चाहैत छी जकर चेहरा पर वैधव्य होइक, श्रीहीन हो, कष्टसँ कनैत हो। हम जीर्ण–शीर्ण कुंतीकेँ नहि देख सकैत छलहुँ। तैं हम पुरनके कुंतीक यादमे जीबए चाहैत छलहुँ। पाँचम दिन दुपहरियामे सिमडेगासँ बसपर बैसि राँचीक हेतु प्रस्थान कैल। मोनमे एखनहुँ वैह हँसैत, खेलाईत, मचलैत कुंती आ अपन सखी कुंतीक यादमे मग्न। मुदा ईहो सोचैत रही जे आब कहियो सिमडेगा नहि आएब । २.बिपिन झा- के करत मिथिलाक्षरक रक्षा!! किछु दिन पूर्व एकटा ग्रन्थ पढने रही। ग्रन्थ केर नाम छल ’भुवमानीता भगवद्भाषा’। ई ग्रन्थ संस्कृत मे अछि आओर एहि ग्रन्थक उद्देश्य मानव मात्र में एहि विचार कें आनव अछि जे सदिखनि प्रयत्न कय अपन संस्कृति कें रक्षण करब संभव होइत छैक। एहि ग्रन्थ में यहूदी संस्कृति केर विवरण दैत एहि तथ्य के स्प्ष्ट कयल गेल अछि। एहि ठाम सहज रूपे ई प्रश्न उठत जे प्रकृत निबन्धलेखनक क्रम में संस्कृतिक चर्चा तर्कसंगत अछि वा नहि? अवश्य तर्कसंगत अछि कियाक तऽ कोनो संस्कृति केर रक्षा केर प्रथम चरण होइत अछि ओकर भाषा आओर लिपिक संरक्षण। यदि ई गप्प मिथिलाक परिप्रेक्ष्य में करी तऽ आओर स्पष्ट होयत| मैथिली बाषा तऽ निरन्तर उत्कर्ष दिस अछि मुदा ओतहि यदि एकर लिपि केर चर्चा करी तऽ देखैत छी जे ई सदिखनि उपेक्षिते भय रहल अछि। किछु वर्ष पूर्वतक ई परिपाटी छल जे पत्राचार मिथिलाक्षर (तिरहुता) मे हो आ एहि कारण ई प्रचलन मे छल मुदा आब तऽ ई कदाचित विलुप्त नहिं भय जाय ई आशंका केनाय कोनो अनुचित नहि। एहि सम्बन्ध में विशेष ध्यान देवाक आवश्यकता अछि जे पुनर्जागरण हो आ सभ मैथिल मिथिलाक्षर सँ कम सऽ कम परिचित अवश्य होई। कियाक तऽ आजुक स्थिति एहेन भय गेल जे अधिकांश मैतिल तऽ मिथिला कें अपन लिपि सेहो छैक अहू सं अपरिचित छथि एहेन स्थिति में मिथिलाक्षर केर संरक्षण कतेक कठिन अछि सहजतया बुझल जा सकैत अछि। एहि सन्दर्भ में श्री गजेन्द्र ठाकुर केर प्रयास सराहनीय छन्हि जे Learn International Phonetica Alphabet through Mithilakshara.++ नामक ग्रन्थ लिखि एहि दिस लोक केर ध्यन आक्र्षित कराओलथि। यद्यपि ई ग्रन्थ सीमित जानकारी प्रस्तुत करैत अछि मुदा प्रारम्भिकदृष्ट्या उत्तम अछि। ई ग्रन्थ Online pdf फार्मेट में सेहो उपलब्ध अछि। पुनश्च ई निवेदन जे एहि ग्रन्थक विस्तृत रूप में परिवर्द्धन हो आ व्यवहार में मिथिला क आखर समस्त मैथिल केर हृदय में पुनः विराजमान हो एकर समुचित प्रयास कयल जाय। ++मिथिलाक्षरक विस्तृत जानकारी Learn MithilakShara by Gajendra Thakur आ Learn Braille through Mithilakshara by Gajendra Thakur मे उपलब्ध अछि, जे मैथिली पोथी डाउनलोड एहि लिंक पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। ३.बाल साहित्य- फूल चन्द्र झा ‘प्रवीण’ जन्म तिथि: 10 अक्टूबर 1961 पिता: श्री श्याम सुन्दर झा माता: श्रीमति चन्द्रकला देवी सम्पर्क: ग्राम–तुमौल, पत्रालय–पुतइ, जिला–दरभंगा (बिहार) व्यवसाय: अध्यापन अभिरूचि: लेखन, चित्रकला, अभिनय, गीत–संगीत, सामाजिक कार्य। रचना संसार कविता–संग्रह * आयल नवल प्रभात * वसंतक बजनिञा * पाङल गाछक छाहरि * हमरा मोनक खंजन चिड़ैया नाटक * आन्दोलन*लुत्ती*सामाजिक न्याय * गुरूआइनि*स्वागत हे गणतंत्र भारती कथा–संग्रह भूत होइत भविष्य निबंध–संग्रह हमरा जनैत संकलन–सम्पादन बाबू भोलालाल दास रचनावली, पहिल खण्ड मधुपजी बीछल बेरायल कविता अनुवाद मल्लिनाथ (अंग्रेजीसँ) सम्मान साहित्यकार संसद द्वारा राष्ट्रीय शिखर सम्मान-* कविचूड़ामणि पं. काशीकांत मिश्र ‘मधुप’ (2006)*विद्यापति(2008)*सुमन स्मृति सम्मान (2009)। एकर अतिरिक्त ‘जखन–तखन’ पत्रिकामे सम्पादन सहयोग,राष्ट्रीय–अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कविसम्मेलनमे सहभागिता, विभिन्न पत्र–पत्रिकामे गीत, कविता, कथा, लेख, निबंध आदिक रचनात्मक सहयोग। मैथिलीमे बाल साहित्य मैथिली शिशु साहित्य लोक फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ मैथिली लोक साहित्यमे शिशु लोक साहित्यक अम्बार लागल अछि। किछु लिपिबद्ध आ बेसी मौखिक। शिशु लोक साहित्य अज्ञात समयमे, अज्ञात लोक रचनाकारक द्वारा भेल होयत। जहियासँ एकर रचना भेल तहियासँ ई वेदक रचना जकाँ हजारो वर्ष धरि मौखिक परम्परामे जीबैत रहल। तकर बाद किचु तँ लिपिबद्ध कयल जयबाक प्रयास भेल आ बेसी एखनो धरि लोकक कंठमे अपन स्थान बना कऽ रखने अछि। प्रत्येक पीढ़ीक लोक अपन पछिला पीढ़ीक लोकसँ एकरा सुनैत आ सीखैत आबि रहल अछि। मौखिक परम्परामे जीबाक कारणेँ एकर मौलिकता दिनानुदिन नष्ट भेल जा रहल अछि। लोक–विशेष, वर्ग–विशेष आ क्षेत्र–विशेषक कारणेँ एकर शब्द आ उच्चारणमे अंतर पाओल जाइत अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्य प्रायः सब विधामे उपलब्ध अछि, मुदा एहि आलेखमे पद्य विधाकेँ केन्द्रमे राखि थोड़ बहुत आनो विधा सब पर विचार कयल गेल अछि। एखनधरि जे मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ लिपिबद्ध रूपमे संकलित करबाक प्रयास भेल अछि ताहिमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”क मैथिलीक नेना गीत डा. अणिमा सिंहक “शिशु गीत आ खेल” तथा एहि सम्पूर्ण बाल साहित्यकार डा. दमन कुमार झाक एकटा समालोचनात्मक ग्रंथ “मैथिली बाल साहित्य”क प्रकाशन बहुत हद धरि उपयोगी सिद्ध भेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछिः- 1. लालन–पालनसँ सम्बद्ध। 2. खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध। 3. ज्ञानोपयोगी। लालन–पालनसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्य एहि प्रकारक लोक साहित्यक परिवेश पैघ नहि होइछ। ई घर–आँगनसँ दलान धरि सीमित रहैत अछि। नेनाकेँ जन्म लितहि ‘सोहर’ ओकरा कानमे पड़ैत छैक आ जेना–जेना नेनाक अवस्था बढ़ैत छैक, बदलैत छैक तेना–तेना शिशु लोक साहित्य परिवर्त्तित होइत जाइत अछि। जन्मक बाद ओकरा दिन–राति मिला कऽ कतेको बेर कड़ूतेलसँ जाँतल–पीचल जाइत छैक आ जतनिहारिक ठोर पर अनायास चल अबैत अछि– चैं–चैं–चैं बौआ सूतभैं बौआ मत्था पच्चनि तेल मुद्दै मत्था फुट्टनि बेल। चानि पर तेल पचाय, अपन दुनू टाँगपर नेनाकेँ पारि, देह उँगारैत कहैत छथि बौआ ईलसन, कील सन धोबियाक पाट सन कुम्हराक पाठ सन अद्दै–मुद्दैक छाती पर लात दिअऽ पृथ्वी पर भऽर दिअऽ। तकर बाद नेनाकेँ हाथसँ लोकैत छथि। नेना डरे कानए लगैत अछि। पुनः कहैत छथि–बौआ आम तोड़ू/बौआ जाम तोड़ू। तकर बाद टाँग पकड़िकऽ, उनटाकऽ झुलबैत कहैत छथि– बौआ मामा गाम देखू बौआ नाना गाम देखू बौआ अपन गाम देखू। एहिमे एकटा बात देखयमे अबैत अछि–जँ नेना मामा गाममे रहल तँ ओकर दादा–दादीक, जँ अपन गाममे रहल तँ नाना–नानीक चौल कयल जाइत अछि। पहिल साँझ दीप लेसलाक बाद छोट–छोट नेनाक रक्षार्थ संझा–मैयासँ प्रार्थना कयल जाइत अछि। आको मैया चाको, संझा मैया राको पहरा मैया हेरणी, सब दुःख फेरनी जे बौआकेँ दिअय दृष्टि, तकरा बान्हू गोला विष्ठी काल–भैरव रक्षा करय, सोनक दीप, पाटक बाती बौआ सूतय सुखक राती दुःख–दरिद्र पाछू जाउ, सुख–श्रृंगार आगू आउ। तहिना बेसी देखनुहुक नेनाकेँ क्यौ नजरि–गुजरि ने लगा दिअय, एहि क्रममे ई पाँती द्रष्टव्य– हँसनी–खिलनी गेल बजार/हँसनी चल आयल खिजनी रहि गेल/जहिना हस्से राजा धनपाल तहिना हस्से बालक/दोहाइ राजा धनपाल दोहाइ मौरगनी माए। दीपक इजोत पर नेना अपन दृष्टिकेँ केन्द्रित कऽ डिम्हा घुमबैत, आनन्द लैत रहैत अछि। जनश्रुति अछि, प्राचीन कालमे छठिहारक रातिक दीप मिझाकऽ लोक राखि लैत छल तथा छः वर्ष धरि बेटाकेँ आ तीन वर्श धरि बेटीकेँ एहि दीपसँ ई टोटमा करैत छल, मुदा वर्त्तमानमे एहन कम देखबामे अबैत अछि। जखन नेना बैसऽ लगैत अछि, संकेत पर आँगुर पकड़ब सीखि लैत अछि तखन लोक कोनो बातक जिज्ञासाक क्रममे, बालबोध बुझि अपन बिचला दू गोट आँगूरकेँ नेनाक कपारपर घुमबैत कहैत छथि–आनी–मानी हम जानी/खारा रोटी खाए नहि जानी आए–बापकेर ना नहि जानी/सत्त छोड़ि असत्त नहि बाजी। तकर बाद नेनाकेँ आँगुर देखबैत पकड़बाक लेल कहल जाइत अछि। जँ नेना बिचला आँगुर पकड़ि लैत अछि तँ जिज्ञासा पूरा होयबाक सम्बावना प्रबल मानल जाइछ। जखन नेना ठाढ़ होयब आरम्भ करैत अछि तखन बेर–बेर खसि पड़ैत अछि। घर–परिवारक लोक ओकरा बेर–बेर आँगुरक भऽर दैतठाढ़ होयबाक लेल आ डेग उठएबाक लेल प्रोत्साहित करैत कहैत छथि– था.....था.....दिग्–दिग् था था.....था.....थैया.....था डेग बढ़ैया.....हम्मर बाबू.....हम्मर भैया। एहि संग नेना डैग उठबैत अछि, बेर–बेर खसैत अछि आ ई सुनि–सुनि पुनः ठाढ़ होएबाक आ डेग उठएबाक प्रयास करैत अछि। एहि पदक माध्यमसँ नेनाकेँ बूलब सिखाएल जाइत अछि। झौलाएत नेनाकेँ कोरामे लऽ घुमयबाक क्रममे कथा–गीतक परम्परा रहल अछि। एकर स्वरूप पैघ आ छोट दुनू प्रकारक देखबामे अबैत अछि। जेना चन्नामामाकेँ देखबैत नेनाकेँ कहल जाइत अछि– चन्ना मामा आ रे आ, पारे आ/नदियाकेँ किनारे आ सोनाकेँ कटोरामे/दुध–भात नेने आ/बौआक मुँअमे घुटुक सन। दोसरः- चन्नामामा आरे आ पारे आ/केराक भार ला पूड़ी–पकमान ला/फोका मखान ला/बौआ मुँहमे ठुस। एतेक कहैत अपन हाथसँ नेनाकेँ खोअएबाक अभिनय करैत छथि। तहिना तरेगण दिस तकबैत– एक तारा दू तारा/तारा बेटी बड़ बुधियारि गंगाकातसँ बालु अनलक/सेहो बालु कनुनियाँ लेलक सेहो कनुनियाँ फुटहा देलक/सेहो फुटहा चरबहबा लेलक सेहो चरबहबा घस्सा देलक/सेहो घस्सा गैया खेलक सेहो गैया दूध देलक/सेहो दूध बिलैया पीलक सेहो बिलैया मूसा देलक/सेहो मूसा चिलहोरबा खेलक सेहो चिलहोरबा पंखा देलक/सेहो पंखा राजा लेलक सेहो राजा हाथी देलक/सेहो हाथी मामा लेलक सेहो मामा गिलास देलक सुतयबाक काल नेनाकेँ जाँघपर लऽ, बेर–बेर ओकर कनपट्टी आ माथकेँ सोहरबैत, जाँघकेँ नीचा–उपर करैत, अपनो देहके डोलबैत, ई लोरीक परम्परा एखनो धरि मिथिलाक सब घरमे देखबा सुनबामे अबैत अछि–आगे निनियाँ आ आ/बौआ लए निन ला ला निनियाँ एलै बिढ़िनियाँसँ/बौआ एलै मातृकसँ बौआक मामा गामकी–की बिकाय। अंगा बिकाय, टोपी बिकाय/सेहो अंगाकेँ पहिरय/बौआ पहिरय एकरा कत्तौ–कत्तौ दोसर प्रकारेँ एना सुनबामे अबैत अछि– निनियाँ अयलै बिरहिनियाँसँ/बौआ अयलै ममहरसँ ममहरमे बौआ की–के खाए/आरब चाउरक भात सोरहिया गायक दूध/हाली–हाली खो रे बौआ जयबेँ बड़ी दूर हुअमाकेँ पियासल बौआ गेल पोखरि पोखरिक टेंगस लेल टेंगराय बोनक बगुला देल छोड़ाय/ऐहेँ रे बगुला खेत–खरिहान एक सूप देबौ देसरिया धान/तेकरे कुटिहे नाम–नाम चूड़ा बैसि जिमबिहेँ ब्राह्मण पूरा देल आसीस जिबिहेँ सै बौआ लाख बरीस। एहि लोरी सभक माध्यमसँ नेनाकेँ सुतयबाक संग–संग ओकर दीर्घायु होएबाक कामना सेहो कएल जाइछ। नेनाक सुति रहला पर माए, निश्चिंत भऽ अपन घरक काज–रोजगारमे लागि जाइत छथि। नेनाक संग अपनो मनोरंजन करबाक क्रममे लोक अपने उतान भऽ पड़ि रहैत अछि आ नेनाकेँ पैरपर बैसाय, बेर–बेर पैर उपर–नीचा करैत एहि पालन गीतक आनन्द अपनो लैत छथि आ नेनोकेँ सेहो दैत छथिन। एकरा कत्तौ–कत्तौ “घुघुआ–मना” आ कत्तौ–कत्तौ “धुआँ–चुआँ” नामसँ सेहो जानल जाइत अछि। घुआँ घूँ लल्ले छूँ लल्ले मनसा नाम की सोनमन झा, टीक पकड़ि ला, पोखरि खुना पोखरिक कात–कात चम्पा लगा/चम्पा फूल उधिआयल जाए परती फुलायल जाए/सीकीक डगमग कोकाक फूल चकमक देवता चल बड़ी दूर/कत्ते दूर/मधेपुर मधेपुरमे की सब, तार छै बेतार छै काजर–बीजर कएल छै/टीकुली बैसाएल छै मामा गेलै पटना/मामी सुतलै अंगना मामा घरमे चोर पैसल/दोड़ऽ हो भगिनमा तकर बाद “नव घर उठे” कहि पैर उठाएल जाइत अछि आ “पुरान घर खसे” कहि पैर नीचाँ खसाएल जाइत अछि। ई खेल नेना सब बेर–बेर खेलएबाक लेल कहैत अछि आ आनन्द विभोर होइत रहैत अछि। जावतकाल घरि नेना जागल रहैत अछि, ओकरा एक ने एकटा लोकक सानिध्य चाही, नहि तँ ओ कानय लगैत अछि। एहना स्थितिमे गायक अतिरिक्त नानी, दादी, दीदी आदि ओकर मोनकेँ बहटारबाक लेल रंग–बिरंगक पद्य, भास लगाकऽ गाबऽ लगैत छथि– अलिया गै, मलिया गै/गोला बड़द खेत खाइ छौ गै कत्तऽ गै, डीहपर गै/डीहपर रखबार के गै/बाबा गै सासुकेँ नहि देतौ गै/सिरमातरमे रखतौ गै अपने सबटा खयतौ गै। दोसरः- लाल गाछी गेली, लाला आम पेली बाबाक देली, बाबा हौ/आब नहि जाएब मकैया खेत। बाघ छै, बघिनियाँ छै, कोठीपर हरमुनियाँ छै बाबा आँगनमे चूड़ा कुटाय/पड़बा बीछि–बीछि खाइ छै कोन बेटखउकी नजरि लगौलक/पड़बा रूसल जाइ छै। नेनाक लालन–पालनमे माए, दादी, नानीक संग–संग दीदी अर्थात पिउसिक सेहो बड़ महत्वपूर्ण योगदान रहलैक अछि। तेँ किछु दीदीपरक द्रष्टव्यः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/डलिया दे मिरचाइ तोड़ए लेल ककरामे/पुलिसबामे/सबे पुलिसबा हुलिसन आएल ककरा घर नुकाएब गे/बाबा घर नुकाएब गे बीचे बाट पर खसली गे/सब बरियतिया हँसली गे दोसरः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/बेटा कनै छी खोपड़ीमे कानय दहिन पुतखौकाकेँ/नाचय दहिन पमरियाकेँ खाइ लेल देलहुँ दालि भात/खाए लेलक सोहारी सुतइ लेल देलहुँ अलंग–पलंग/सूति रहल गोरथारी गेलहुँ मोँछ पकड़ि कऽ उठबए/फोलि देलक केबाड़ी। तेसरः- लाल दीदी गे/की दीदी गे/एक रत्ती छाल्ही चटलियौ गे तै लेल बाबा मारलकौ गे/बाबा बड़ चण्डलबा गे। अपना ओहिठामक बेटीकेँ जखन संतानक योग्यता होइत छनि तखन प्रायः नैहर आनि लेबाक परम्परा एखनो धरि बाँचल अछि। एहना स्थितिमे नेनाकेँ मामा, मामी, नाना, नानीक बेसी दुलार–मलार भेटैत रहलैक अछि, तेँ किछु मामा–मामीसँ जुड़ल पालन–पद्य द्रष्टव्य– मामा हौ पोखरी भीड़पर जइहऽ चिक्कन पड़बा मारिकऽ आनिहऽ मामी हाथकेँ दीहऽ/तेल फोरन मिलाकऽ करिहऽ अपने खइहऽ लाल–लाल कुटिया/हमरा दीहऽ झोर ई सब देखिकऽ बहि रहलैए/हमरा आँखि सँ लोर। दोसरः- मामी यै भात उधिआए/मामी यै दालि उधिआए कोठी पर सुग्गा स्नान करैए। तेसरः- आब नहि जएबै मामाक अँगना अपने खाइ छै लाल–लाल कुटिया/हमरा दै छै झोर। खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध शिशु–लोक साहित्य एहिसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्यक परिवेश बेसी विस्तृत अछि। रस्ता–पेरा, परती–पराँत, विद्यालय–परिसर, खेलक मैदान आदि ठाम नेनाक झुण्ड भोर साँझ जमा होइत अछि आ रंग बिरंगक खेल खेलाइत अछि। छोट–छोट नेना, जे खेल, बेसीकाल खेलाइत अछि, ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य– अटकन–मटकन दहिया चटकन/पूस महागर पुरनी पत्ता हिल्लय–डोल्लय/माघ मास करैला फरए/तै करैलाक नाम की आम गोटी, जाम गोटी, तेतरी सोहाग गोटी। सिंगही लेबै की मुँगरी जँ उत्तरमे नेना ‘सिंगही’ कहैत अछि तँ ओकरा बिट्ठू काटल जाइत अछि आ जँ ‘मुँगरी’ कहैत अछि तँ मुक्कासँ मारल जाइत अछि। एकरा दोसर प्रकारेँ सेहो सुनबामे अबैत अछि– अटकन मटकन दहिया चटकन/केरा कूस महागर जागर पुरनिक पत्ता हिल्लै–डोल्लै/माघ मास करैला फूलै आमुन गोटी, जामुन गोटी/तेतरी सोहाग गोटी सिंगही लेबेँ की मुँगरी? दोसरः- गाछ करै ठाँए–ठाँए, नदी गौंगिआए कमलक फूल दुनू अलगल जाए/सीकीक डाली चमेलीक फूल चकमक देवता चलबड़ी दूर/हाथीपर हथबरबा भैया घोड़ापर रजपूत सब रजपूतनी खोपा गुहने/बंका छै मजबूर बंका बिकाइए तीन–तीन बंका/बाजूकेँ गरदाग रामजीकेर सुतल पुतहुआ/कूटैत रहए धान। बाल मनोविज्ञानकेँ ध्यानमेँ राखि, नेनाक समुचित विकासक, उल्लासक लेल मैथिली शिशु लोक साहित्य थोड़ नहि प्रतीत होइछ। खेलसँ सम्बद्ध एकटा बाल–कथा काव्य द्रष्टव्य– एकटा छलै फुद्दी, ओ बैसल कुसपर कुस ओकर पेट चीरि देलक ओहिसँ निकलल तीनटा धार दूटा सुखले–सुखले छल, एकटामे पानिएँ नहि जाहिमे पानिएँ नहि, ताहिमे पैसल तीनटा हेलबार दूटा डुबिए–डुबिए गेल, एकटाक पते नहि जकर पते नहि,से नोतलक तीनटा ब्राह्मण दूटा भुखले–भुखले रहल, एकटा खएबे नहि कएलक जे खएबे नहि कएलक, तकरा भेल तीन मुक्का दण्ड दूटा हुसिए–हुसिए गेल, एकटा लगबे नहि कएल एहि प्रकारक लोक साहित्य नेना सब बड़ मनोयोगसँ सुनैत अछि। कखनोकाल नेना–भुटका झुण्ड एक–दोसरक डाँर पकड़िकऽ रेलगाड़ी बनबैत अछि। एहिमे एक गोटा इंजिन आर सब नेना डिब्बा बनैत अछि आ घुमि–घुमिकऽ कहैत अछि। रेलगाड़ी झकमक/पहिया लोहारकेर, बेल सरकारकेर कुँइआमे पानी, मकोलामे तेल/आ गेलि मइयाँ, पी गेलि तेल भैया रे भैया, कुटुम्ब कहाँ गेल/एक सय हाथी बान्ह पर गेल। मिथिलाक खेलमे कबड्डीक बड्ड पुरान परम्परा रहल अछि। एहिपर आधारित किछु पद्य देखल जाए– कबड्डी–कबड्डीकार/मैना बच्चा अण्डापार दोसरः- चेत कबड्डी आबऽ दे/तबला बजाबऽ दे तबलामे पइसा/बाग–बगइचा। तेसरः- कबड्डी खेलऽ गेलहुँ कपार फुटि गेल रेशमकेर डोरामे हाथ कटि गेल श्रवणकेम देखिकऽ पियास लागि गेल हाथीक देखिकऽ हदास उड़ि गेल/आम चकलेट चीनी प्लेट एकटा खेल अछि गिरगिटरानी ई खेल मिथिलाक कन्या लोकनिक मध्य खेलाएल जाइत रहल अछि। एहिमे एकटा कन्या गिरगिट बनैत अछि आ दूटा, ओकर दुनू जाँघ पकड़िकऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि आ एकटा कन्या ओकर दुनू पैर पकड़िकऽ, ओहि पर बैसि जाइत अछि आ कहैत अछि– गिरगिटमाला–गिरगिटमाला/कहाँ–कहाँसँ आएल छी बौआ लाला–बौआ लाला/देस–देससँ आएल छी। की सब लाएल छी। आम छोड़ि गुद्दा/ककरा देलहुँ राजाक बेटीक हाथमे/राजाक बेटी कत्तऽ अछि मजे कोठलिया/मजे कोठलिया की सब साँप छै, बाघ छै। एहि कथा–काव्यकेँ दोसर तरहेँ सेहो कहल जाइछ– हे गिरगिटियाँ रानी! तोँ कतएसँ अएलह हमरा लेल की–की अनलह कान खोड़ि गुजुआ/सेहो गुजुआ ककरा लेल राजा बेटी हाथक लेल/राजा बेटी की सब देल हाथी छोड़ि घोड़ा देल/सेहो घोड़ा कहाँ गेल विरदावनमे चरए गेल/विरदावनमे की–की देखल साँप देखल, बाघ देखल/नाचे गिरगिटिया। जे कन्या गिरगिट बनल रहैत अछि ओ अपन मूड़ी उठा आ हाथ पसारिकऽ उत्तर दैत रहैत अछि आ ओ तीनू सहयोगी कन्या ओकरा घुमबैत रहैत अछि। एकटा खेल अछि–कटहरक गाछ बला एहिमे एकटा नेना ठाढ़ भऽ गाछक अभिनय करैत अछि तथा आओर नेना सब ओकर पैर पकड़ि, मूड़ी गोंतिकऽ, बैसि रहैत अछि आ कटहर फलक अभिनय करैत कहैत अछि– हमरा बाड़ी–हमरा बाड़ीकेँ हुहुआए राज कोतवाल/की–की मँगैए आरब चौरा, नव ढ़कना तकर बाद कोतवाल, फलक अभिनय करैत नेना सबकेँ, हाथसँ टेबैत अछि तखन गाछ कहैत अछि– काँच छै तऽ छोड़ि दू/पाकल छै तऽ लऽ लू। एकटा खेल अछि– “झिझिर कोना”। ई खेल पाँचगोट नेना द्वारा कोनो खाली घरमे खेलाएल जाइत अछि, जाहिमे चारिटा कोन होइ। ई खेल बेसीकाल नेना खाली दलानक कोठली वा विद्यालयमे खेलाइत अछि। एहि खेलमे प्रयुक्त लोक साहित्यकेँ देखल जाए– झिझिर कोना–झिझिर कोना कोन कोना जैब एहि कोना जैब, ओहि कोना जैब। एकटा खेल अछि– “साँप डिग–डिग”। ई एकटा सामुहिक खेल थिक, जाहिमे बहुत नेना एक संग हत्था – जोड़ि कऽ केँ सोझ पाँतीमे ठाढ़ होइत अछि। एकटा कहैत अछि – की रे बकरिया की रे छकरिया/बकरी कत्तऽ खेतमे/धान किएक खेलकौ खेत्तौ/रोज लेब्बौ नहि देब्बौ। तखन दू हाथक बीच दऽ नेनासब बन्हएबाक अभिनय करैत अछि आ बजैत अछि– साँप–डिगडिग/साँप–डिगडिग जेना पशु–पक्षी सब अपन अबोध नेनाकेँ आत्मरक्षाक उपाय दौड़िकऽ बाजिकऽ, खेलाएकऽ सिखबैत रहैत अछि, तहिना शिशु लोक साहित्यमे सेहो आत्म–रक्षार्थ अनेक प्रकारक खिस्सा–पिहानी गद्य आ पद्य दुनूमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध अछि। उदाहरणस्वरूप–बगिया गाछक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा एहिमे सबसँ बेसी लोकप्रियता पौलक अछि। ओना आरो कतेक अछि। जेना–ननदि–भाउजसँ जुरल आँझुलक खिस्सा ‘सातो भाइ परदेस गेल आँझुलकँ दुःख देने गेल’। तहिना झाँझी कुकुरक सौतिनक खिस्सा– मोर मन मोर मन नहि पतिआइ सौतिनक टाँग दुनू झुलिते जाइ। किछु एहेन लोक–साहित्य देखबामे अबैत अछि जाहिमे निरर्थक शब्द सभक प्रयोग बुझना जाइछ। जेना– औका–बौका, तीन तरौका/लौआ–लाठी, चानन काठी चाननकेँ बागमे इजय–विजय/गल–गल पुअबा–पचक। दोसरः- ईटा–माटी सोनेक टाट/आठम लड़की भागल जाइ आलू बम बेटा बम/भौजी नाचए छमाछम। ज्ञानोपयोगी शिशु लोक साहित्य “परिवारकेँ सामाजिक जीवनक पहिल पाठशाला” कहल गेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यक माध्यमेँ नेनाकेँ अनेक प्रकारक शिक्षा देल जाइत रहल अछि। किछु उदाहरण द्रष्टव्य– अंक ज्ञानक लेल एकटा खेल अछि– “अट्टा–पट्टा” एहिमे नेनाक दहिना हाथपर अपन दहिना हाथसँ थापर मारल जाइत अछि आ बेरा–बेरी आँगुर पकड़ि कहल जाइत अछि– अट्टा–पट्टा बौआकेँ पाँचगो बेट्टा एगो गेल गायमे, दोसर महींसमे तेसर बड़दमे–चारिम गेल बकरीमे/पाँचम गेल छकरीमे। तकर बाद तरहत्थीपर, अपन आँगुर रखैत– एतऽ बुढ़िया स्नहलक, पकौलक, खएलक, पीलक ई कहैत अपन आँगुरकेँ डेगा–डेगी बढ़वैत ओकर हाथसँ काँख धरि लऽ जाएल जाइत अछि आ कहल जाइत अछि– एतऽ सँ जे चलल बुढ़िया..../गुद्दू गैयाँ। नेना गुदगुदी लगलापर जोर–जोरसँ हँसैत–हँसैत लोट–पोट भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारेँ नेनाकेँ एकसँ पाँच धरि अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना दोसर खेल अछि जाहिमे दू आ दूसँ अधिक नेना ठाढ़ भऽ आँगुरसँ संकेत करैत खेलाइत अछि– दस, बीस तीस, चालीस, पचास/साठि, सत्तरि, अस्सी, नब्बे, सौ सौमे लागल धागा, चोर निकलिकऽ भागा रानी बेटी सोइती, फूलकेँ माला गोइती मेम खाए बिस्कुट/साहेब बाजए भेरी गुड। एहि खेलक माध्यम सँ नेनाकेँ दहाइ आ सैकड़ा धरिक अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल अछि– “घो–घो रानी”। एहि खेलमे एकटा नेना बीचमे ठाढ़ होइत अछि आ चारूकात नेनासब हत्था जोड़ी कऽ केँ वृत्ताकार ठाढ़ होइत कहैत अछि– घो–घो रानी कत्ते पानी–एड़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ठेहुन धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–जाँघ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–डाँढ़ धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–ढ़ोढ़ी धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–पेट धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–छाती धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–गरदनि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–मुँह धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–नाक धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–आँखि धरि घो–घो रानी कत्ते पानी–माँथ धरि अंतमे ‘चुभुक’ कहि सब नेना डूबिकऽ नहयबाक अभिनय करैत अछि। एहिमे माध्यमसँ नेना सबकेँ अंगक ज्ञान कराओल जाइत अछि। एकटा खेल नेना सब एहि प्रकारेँ खेलाइत अछि–एकटा नेना अपन दुनू हाथकेँ उठाकऽ पैघ आकार बनबैत अछि आ तकर बाद क्रमशः छोट करैत जाइत अछि आ कहैत अछि– एतेक टा की–छिट्टा/एतेक टा की–पथिया एतेक टा की–मउनी/एतेक टा की–चुक्का चुक्कामे की–अण्डा/के फोरए–कउआ के गीजए–हमसब। ई कहि– ती–ती–ती–ती....कहैत सब नेना कूदऽ लगैत अछि। एहि लोक साहित्यक माध्यमसँ छिट्टा, पथिया, मउनी, चुक्का सभक आकारक ज्ञान कराओल जाइत अछि। तहिना एकटा खेल अछि जकरा माध्यमसँ किछु वस्तुक उपयोगक ज्ञान कराओल जाइत अछि– खेलए–धूपए गेलिऐ/एगो लोहा पेलिऐ सेहो लोहा कथी लेल/हाँसू गढ़ाबऽ लेल सेहो हाँसू कथी लेल/खड़ही कटाबऽ लेल सेहो खड़ही कथी लेल/बंगला छराबऽ लेल सेहो बंगला कथी लेल/भैसी बन्हाबऽ लेल सेहो भैसी कथी लेल/चोतबा पड़ाबऽ लेल सेहो चोतबा कथी लेल/अंगना निपाबऽ लेल सेहो अंगना कथी लेल/गहूँम सुखाबऽ लेल सेहो गहूँम कथी लेल/आटा पिसाबऽ लेल सेहो आटा कथी लेल/पूरी पकाबऽ लेल सेहो पूरी कथी लेल/भौजीकेँ मँगाबऽ लेल सेहो भौजी कथी लेल/बेटा जनमाबऽ लेल सेहो बेटा कथी लेल/कोरामे खेलाबऽ लेल अंतमे–टाइल–गुल्ली टूटि गेल/बौआ रूसि गेल। उपरोक्त विवेचनसँ लगैत अछि जे मैथिली शिशु लोकसाहित्य नेनाक प्रत्येक पक्षसँ जुड़ल रहल अछि। लालन–पालन आ खेल मनोरंजनसँ सम्बद्ध लोक साहित्यक अधिकता पाओल गेल अछि। खेलक मध्यमसँ मनोरंजनक संग–संग नेना भुटकामे एकता, सहयोग, सहानुभूति आ प्रेमक भावना जगैत अछि। एकर अतिरिक्त अभिनय, नृत्य, गीत आदिक ज्ञान सेहो आरम्भहिसँ होमए लगैत अछि। एखन हमरा सबकेँ मैथिली शिशु लोक साहित्य सन अमूल्य धरोहरकेँ सहेजिकऽ समेटबाक प्रयोजन अछि कारण दिनानुदिन ई अपन मौलिकताकेँ त्यागि विकृत रूप अपनौने जा रहल अछि। जँ एहि दिशामे हमरा सभ सचेष्ट नहि होएब तँ एहि धरोहरक मूल्यवान वस्तु नष्ट भऽ जयबाक प्रबल सम्भावना लगैत अछि। ओना हम आरम्भेमे कहि चुकल छी जे एहि विषयपर पहिनो बहुत गोटा काज कयलनि अछि आ प्रायः एखनो कऽ रहलाह अछि, मुदा एकर फलक ततेक विस्तृत अछि जे उपलब्ध संकलन यथेष्ट नहि मानल जा सकैत अछि। कारण संकलित शिशु लोक साहित्यसँ कैक बड़ बेसी लोक साहित्य एखनो धरि लोकक ठोरपर छिड़िआएल अछि। वर्त्तमानमे जखन पाश्चात्य–सभ्यता मिथिलाकेँ चारूकातसँ गछारने जा रहल अछि। लोक “चन्न मामा आ रे आ”केँ त्यागि “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” दिस आँखि मुनिकऽ भागल जा रहल अछि आ अपन जे विशिष्ट–वस्तु तकरा त्यागने जा रहल अछि। एहना स्थितिमे हमरा सभक समक्ष यक्ष प्रश्न अछि जे मिथिलाक एहि अमूल्य–निधिकेँ, जे कि, एहिठामक संस्कृतिक, एकटा अपन विशिष्ट परिचिति दैत रहल अछि, तकरा कोनाकऽ अक्षुण्ण राखल जाए। आइ जखन हमसब इक्कीसम शताब्दीक देहतिकेँ पार कऽ रहल छी, विज्ञान अपन विस्तारकेँ सुदूर देहातधरि पसारि चुकल अछि, तेहना स्थितिमे नव–नव तकनीक द्वारा एहि असंकलित शिशु लोक साहित्यकेँ, चिरकाल धरि, संकलित कऽ जोगा कऽ राखल जा सकैत अछि, जन–जन धरि एकर प्रचार–प्रसार कराओल जा सकैत अछि, परंच एकरालेल जरूरी छै–एहि दिशामे एकटा समधानल डेग उठएबाक आ जोरगर प्रयास करबाक। ... २.६. १.श्यामसुन्दर शशि-नमन गुरुदेव- (साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष) २.सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष १ साहित्यकार डा़. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष नमन गुरुदेव श्यामसुन्दर शशि जनकपुरधाम नेपालीय मैथिली साहित्यक जनक एवं जनकपुरक चटिसारके अन्तिम प्राचार्य गुरुदेव डा़धीरेश्वर झा ‘धिरेन्द्र’क छठम् स्मृतिसभा पुस २७ गते सम्पन्न भेल अछि । हुनकर वरदहस्त प्राप्त क एखन धुरन्धर खेलाडी बनल साहित्यकारलोकनि हुनका स्मरण कएलनि कि नहि से ओएह जानथि मुदा हुनके प्रेरणासँ जन्मग्रहण कएने मिथिला नाट्यकला परिषदधरि हुनका अवश्य स्मरण कएने छल । एहि अवसरपर भाषण भुषण आ किछु घोषणा सेहो भेल । सभके बुझल अछि जे नेतासभक भाषण निष्प्रभावी भ रहल आजुक युगमे भाषणप्रतिक आमजनके विश्वास घटि रहल छनि । ओना हुनका कोनो मन्चपर चढिक स्मरण करी वा मोने मोन, कोनो अन्तर नहि छैक । कारण देवताक पूजा मोने मोन सेहो कएल जा सकैए । आ असली पूजा त देवताक देखाओल बाटपर चलब थिक । हुनकर आदर्शके पालना करब थिक । हँ जहाँधरि घोषणा करबाक गप्प अछि त एतुका वहुत संस्था आ व्यक्ति बहुत किछु घोषणा क चुकल छथि । आव देखवाक अछि जे ई घोषणासभ कार्यरुपमे आएल कि नहि ? हम जहन गुरुदेवके जनकपुरक चटिसारके अन्तिम प्राचार्य लिखए लागल छलहुँ त मोनमे नानाप्रकारक चिन्ता व्याप्त छल । कारण जनकपुरमे सम्प्रति जे कलमजिवीसभ सकृय अछि ,ओहोसभ कोनो हिसावसँ कम नहि छथि । सभक संग नाम,दाम आ मुकाम छनि । एहना अवस्थामे केओ कहि सकैत छथि जे ‘ओ अन्तिम प्राचार्य कोना भ गेलाह ।’ मुदा एहि वास्ते हम मैथिली एमएक पहिल बैचक जमावडाक दृश्य उदघाटन करए चाहव । ओना उमेरक कारणे हमरा एहि भितरके तिरीभिटीक जानकारी नहि अछि मुदा हम जे देखल से कहए चाहव । गुरुदेवके भागिरथी प्रयाससँ राराव क्याम्पसमे मैथिलीमे एमएक पढाई सुरु भेल छल । मैथिलीक बादे राजनिती शास्त्र,अर्थशास्त्र किंवा अन्य विषयमे स्नातकोत्तरके पढाई सुरु भेल । सभके सुखद आश्चर्य लागि सकैए जे मैथिलीक एमएक पहिल बैचक विद्यार्थीसभ छलाह सर्वश्री डा़राजेन्द्रप्रसाद विमल,जानकी रमण लाल,रामभरोस कापडि‘भ्रमर’डा़पशुपतिनाथ झा,डा़रेवतीरमण लाल, रुद्रकान्त झा ‘मडई’,प्रो़परमेश्वर कापडि,नमोनाथ ठाकुर,नागेश्वर सिंह आदि आदि । ताहु समयमे सभके सभ अपन अपन मुकामपर छलाह । चुकी अधिकांश विद्यार्थी नोकरियाहा छलाह ते कक्षा भोरमे संचालित होईक आ अधिकाश कक्षा गुरुदेवके घरेपर संचालित होईक । चाह पानक दौर चलैक आ पढाई लिखाई सेहो । हम,घुटुल आ पुटुल चाह पान लावएमे परेसान रही । हँसीक पमारा छुटैक ,विभिन्न विषयपर गंथन मंथन होईक आ गुरुदेव डिक्टेशन लिखवथिन । हमरा मोन अछि भाषा विज्ञानके कापी तैयार करैत काल गुरुदेव जानकी बाबू आ विमलसरसँ बेर बेर राय सल्लाह कएल करथि । यदि अधलाह नहि लागय त स्वीकार करए पडत जे ओएह कापीक आधारपर एखनो मैथिलीक एमएक विद्यार्थीसभ परीक्षामे पास करैत छथि । एखनो जनकपुरमे मैथिली विद्वानक कमी नहि अछि । मैथिलीक प्राध्यापकके सख्या सेहो पहिनेसँ बेसी अछि । कि एखन गुरुदेवद्वारा चलाओल गेल चटिसार चलैत अछि ?यदि नहि त हुनका जनकपुरक चटिसारक अन्तिम प्राचार्य कहवामे कि हर्ज ? गुरुदेवके स्मरण करैत काल एकगोट आओर विषय मोन परैत अछि । ओ ई जे ओ मैथिली भाषाक साहित्यकारटा नहि छलाह । साहित्यकार श्रृजना करएवला ब्रम्हा सेहो छलाह । केओ मानथि वा नहि मानथु ओ महेन्द्र मलंगियाके नाटक लिखवाक प्रेरणा आ सिख दुनू देलथिन । रेवती रमणलालके रिपोर्ताज लिखवाक आदेश देलथिन । रामभरोस कापडिके कविता आ गीत एवं भुवनेश्वर पाथेयके कविता आ कथा लिखवाक जिम्मेवारी देलथिन । प्रतिभा आ रुचिक अनुसार गुरुदेवद्वारा कएल गेल ई जिम्मेवारी विभाजनके पाछा बहुत पैघ उद्येश्य छल हेतनि । ओ चाहने हेताह जे नेपालीय मैथिलीमे सेहो सभ विधामे रचना हो । पाछा जा से भेवो कएल । भलेहि भारतीय हुनके किछु शिष्यद्वारा षडयन्त्र कएल गेल हो मुदा ‘नेपालीय मैथिली साहित्य’क नामाकरण ओएह कएने छलाह । हे गुरुदेव । अहाँ प्रेरणा दियौ जे जनकपुरमे फेरसँ गुरुकुल परम्परा चलि सकए । चुकी एखन साहित्य श्रृजनसँ बेसी मैथिलसभके अधिकारक आवश्यकता छैक । मैथिलके अपन राजपाट होईक आ अपन भाषामे काज क सकए । ओना हमरा मोन अछि अपनेक ओ जीद्द नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी हारब ने किन्नहु ,हमर जीत निश्चित ।। अपनेक अनुचरलोकनि अपनेक ईक्षाके अवश्य पूरा करत । २.सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष नेपालमे एकटा कहावत अछि नेपालक एकीकरणक समयमे पृथ्वीनारायण शाह कतेको ठाम हारि गेल रहथि । निराश भऽ अपन घरमे अराम कऽ रहल रहथि की देखलखिन एकटा चुट्टी किछ पर चढयकेँ प्रयास करैत छल आ ओ बीचमे खसि परैत छल । चुट्टी के देखलखिन चारि पाँच वेरक प्रयासक वाद ओ चढि गेल । एकरवाद हुनका एकटा ज्ञान भेटलन्हि आ पृथ्वीनारायण शाह फेर सँ एकीकरण अभियानमे जुटि गेलाह , एखनकेँ नेपाल अछि तकर निर्माण भऽ सकल । करीब—करीब नेपाल पत्रकार महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष धर्मेन्द्र झा सँग एहने स्थिति भेल अछि । ओ चुट्टी तऽ नहि देखलथि मुदा पत्रकारक नेतृत्व करबाक अछि से अठोट हुनका केन्द्रीय अध्यक्ष बना देलक । धर्मेन्द्र २०५१ सालमे नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाक कोषाध्यक्षमे हारल रहथि । फेर २०५४ सालमे केन्द्रीय सदस्य पदमे, २०५९ सालमे केन्द्रीय सचिव पदमे , २०६२ सालमे महासचिव पदमे हारल रहथि । किछ गोटे तऽ हुनका हरुवा पुरुष तक कहय लागल छलनि । मुदा २०६५ सालमे नेपालक पत्रकार सभक सभसँ वडका पद महासंघक केन्द्रीय अध्यक्ष भऽ गेलथि । नेपाल पत्रकार महासंघक पूर्व अध्यक्ष तारानाथ दहाल कहैत छथि– ‘महासंघक नेतृत्व करबाक अछि से अठोट आ पत्रकार सभ बीच सम्वाद कायम राखब धर्मेन्द्रकेँ अहि स्थान पर पठौलक ।’ धर्मेन्द्र अहि बीचमे २०५६ सालमे केन्द्रीय सदस्यमे मात्र जितल छलथि । ओ स्वंय कहैत छथि — ‘केन्द्रीय कमिटीक विभिन्न पदमे हारलौ तहुँ सँ बेसी जनकपुरमे कोषाध्यक्ष पदमे हारल छलौं तहिया बड दुःख भेल छल ।’ ३०/३५ गोटे सदस्य रहल जिल्लामे हारि गेलौं तकर बाद प्रण लेने रही जे केन्द्रक प्रमुख पदपर पहुँच सभकेँ देखा देबै । कहियो नेता बनयकेँ सपना देखने धर्मेन्द्र रामस्वरुप रामसागर बहुमखी क्याम्पस जनकपुर अन्तर्गतक स्वतन्त्र विद्यार्थी युनियनक सदस्य आ नेपाल विद्यार्थी संघ धनुषाक उपाध्यक्ष सेहो भेल रहथि । मुदा स्ववियू कालमे २०४३ सालमे चहल पहल नामक भिते पत्रिका निकाललथि । आ सम्पादक भेलाक बादक लोकप्रियता वा प्रभाव हिनका अहि दिस खिच लेलक । ओ अपन स्ववियूकालमे जागृति नामक पत्रिकाक सम्पादक सेहो भेल रहथि । मैथिली आ राजनीति शास्त्र सँ एम.ए आ इन्डियन इन्स्टिच्यूट अफ मास क्म्युनिकेशन दिल्ली सँ डिप्लोमा धरिकेँ पढाइ कएने धर्मेन्द्र पत्रकारिता केँ पेशा बनौलथि । धर्मेन्द्रक बाबु राजेन्द्र झा कहैत छथि– ‘धर्मेन्द्र लग क्याम्पसमे टिचिङ्ग करब, अन्य सरकारी नोकरी दिस जाएब आ पत्रकारिता करब तिनटा विकल्प छल । मुदा हम देखलियै धर्मेन्द्रक इच्छा पत्रकारिता दिस वेसी अछि । पत्रकारितामे बहुत रास कठिनाइ छैक बुझलाक बादो हमसभ कोनो रुकाबट नहि कएलौ ।’ जाहि लगन सँ ओ काज करैत छलथि हमरा विश्वास छल ओ एक दिन बढिया करता राजेन्द्र आगा कहलन्हि । २०२३ चैत ४ गते माता मनोरमा झा आ पिता राजेन्द्र झाक जेष्ठ पुत्रक रुपमे सिरहा जिल्लाक गोविन्दपुर वस्तिपुरमे जन्म लेनिहार धर्मेन्द्र जहिना पत्रकारक नेता छथि तहिना लेखन क्षेत्रमे सेहो चोटी पर छथि । काठमाण्डू सँ प्रकाशित अन्नपूर्णापोष्ट दैनिकक समाचार संयोजक छथि । धर्मेन्द्र हिमालय टाइम्स दैनिककेँ कार्यकारी सम्पादक सेहो रहि चुकल छथि । जनकपुरमे धर्मेन्द्रक सम्पादनमे प्रकाशित नवविचार साप्ताहिक पत्रकारितामे एकटा अलग चिज देने छल । प्रत्येक हप्ता अन्तरवार्ता, व्यंङ्ग, समाचारमे विविधता ओहि पत्रिकाक विशेषता छल । ओना व्यवसायिक पत्रकारिता माधव आचार्यक सम्पादनमे जनकपुर सँ प्रकाशित जनआकांक्षा आ विएम खनालक सम्पादनमे प्रकाशित विदेह साप्ताहिक सँ शुरु कएने छथि । साहित्यमे सेहो धर्मेन्द्रके प्रयोगवादी कविक रुपमे चिन्हल जाइत अछि । धर्मेन्द्रक रस्ता तकैत जिनगी, एक श्रृष्टी एक कविता , एक समयक वात, धुनियाएल आकृतिसभ सनक हिनक मैथिली संग्रह आएल अछि । तहिना नेपालीमे गोनु झाका कथाहरु , कौशलका परिहास सहित दर्जन सँ बेसी पुस्तक प्रकाशित अछि । पुरस्कारक बात जँ कएल जाए तऽ २०५५ सालमे नेपाल विद्याभूषण ‘ख’, रिपोर्टस क्लबद्वारा २०६० सालमे वेष्ट जर्नलिस्ट अवार्ड , २०६४ सालमे नागाअर्जुन वेष्ट पब्लिकेशन पुरस्कार , २०६५ सालमे राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार देल गेल अछि । भारत , अमेरिका , श्रीलंका, बंगला देश, कतार, नर्बे, फिन्लैण्ड , डेनर्माक, स्वीडेन आ जर्मनीके भ्रमण कऽ चुकल धर्मेन्द्र के आगा बढाबयमे माता पिताक अतिरिक्त कनिया मुन्नी झाक सेहो महत्वपूर्ण योगदान रहल ओ प्रसंगक क्रममे वेर वेर कहलन्हि । देशक पत्रकारसभके श्रमजीवि ऐन अन्तर्गत मिडियासभ तलब दौक, विना नियुक्ती पत्रके देशक कोनो पत्रकार के काज नहि करय परैक ताहि अभियानमे ओ आ हुनक नेपाल पत्रकार महासंघ अखन लागल अछि ओना मैथिलीक अभियानी लोक सेहेा छथि । मैथिली भाषा साहित्य कला साँस्कृतिकेँ कोना बढाओल जाय ताहिमे लागल रहैत छथि । फेर सफलताक शिखर पर चढलाक बादो धर्मेन्द्र अपन कैरियरकेँ प्रति ओतबे गम्भीर छथि जतेक २०/२५ वर्षक युवा रहैत अछि । २.७. कुमार मनोज कश्यप-जन्म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित। अन्हेर
बड़ एकंात्मता बुझा रहल आछ हमरा स्वयं आ एहि ट्रेन मे---दुनू पड़ायल जाईत -- कंोनो-कंोनो स्टेशन पर बिलमैत -- नव-नव लोकं सँ परिचय आ पुरान सँ संग छुटब --तथापि ने मिलनकं खुशी ; ने वियोगकं दुःख----चरैवेति़ चरैवेति ।
टुगर हम क़ंक्कंा -कंाकंीकं कृपा पर जीबैत भैंस-बकंरी चरबैत । मोने आछ हमरा जे हम, जीबछा, मलहा सभ केयो टाईल-पुल्ली खेलबा मे एतेकं ने मस्त रही जे महींस के हाँकंबो बिसरि गेलहुँ । सभटा महींस भोकंनी साहुकं खेसारी खेत मे हुलि गेलै । एके-दू बेर तऽ मुँह मारने हेतै महींस सभ किं कंतऽ ने कंतऽ सँ दनदनाईत भोकंनी साहु जुमि गेलै़तामसे-पित्ते माहुर भेल़़बिखिन्न-बिखिन्न के गारि पढ़ैत । सभकं महींस तऽ हाँकिं कंऽ लईये गेलै ओ ; भोलबा सेहो पक़ंडा गेल । सभ छौंड़ा सभ जेम्हरे पओलकं तेम्हरे जान बचा कंऽ पड़ायल । डरे हमहुँ बेछोहे प़ड़ेलहुँ । डर भोकंनी बाबू सँ बेसी तऽ कंक्कंा आ कंाकंीकं छल़़दुनू बात-बात पर कंोना अधमौगति कंऽ मारैत आछ लाते-मुक्के, जे पओलकं ताहि लऽ कंऽमरबा-जीबाकं कंोनो ठेकंान ने ।
हम रेलवे कंाते-कंात पड़ायल जाईत रही किं लागल केयो पाछु सँ हमर आँगी पकंड़ि लेलकं डरे हमर होश गुम्म भऽ गेल अधमरू सन भऽ गेलहुँ । बफाड़ि कंटैत हम कंहुना एहि चाँगुर सँ अपना के छो़ड़ेबाकं अंतिम प््रायास कंरैत आगु दिस जोर लगबैत रहलहुँ । पेᆬर धम्म् दऽ मुँहे भरे खसलहुँ । देह सँ माटि झाड़ैत हम पाछाँ तकंलहुँक़ेयो नहिं छल । जान मे जान आयल । हमर आँगी सिगनलकं तार मे ओझड़ा गेल छल । दूर तकं देखलहुँक़ेयो एम्हर नहिं आबि रहल छल । डर किंछु कंम भेल । ताबते कंोनो ट्रेन सिगनल पर आबि कंऽ ठाढ़ भेल । नुकंा कंऽ हम ओहि मे चढ़ि गेलहुँ डरे एकं कंोन मे दुबकंल ठाढ़ रही । एकंटा आदमी कंने कंात सहटि कंऽ हमरा बैस जेबाकं ईसारा केलकं । असोथकिंत तऽ भईये गेल रही ; बैसिते आँखि लागि गेल । आँखि खुजल तऽ सौंसे डिब्बा खाली छलैकं । धड़फ़डा कंऽ ट्रेन सँ नीचा उतरलहुँ । लोकंकं एहि अजश्र भीड़ मे एकंहुटा चेहरा चिन्हार नहिंज़गह अनचिन्हार; लोकं अनचिन्हार अनभुआर हम आब कंतऽ जायब ?क़ंी कंरब ?? बुकंौर लागऽ लागल हमरा डरे जाँघ थरथराय लागल - 'नहिं जानि कंोन दुरमतिया घेरने छल जे गाम सँ पड़ा गेलहुँग़ाम पर मारिये खैतौं ने ! पहिनहुँ किं कंोनो कंम्म मारि खेने छी ।क़ंी बिगड़ितै मारि खा कंऽ ? देह मे भूर तऽ नहिं ने भऽ जैतै ? मरि तऽ ने जैतौं ? एहि परदेश मे तऽ आब बिलटि कंऽ मुईनाईये लिखल आछ । बौड़ल लोकं अपन देश कंहाँ आपस जा पबैत आछ़़ओकंरा सभ के सुख-सराध लोकं ओहिना कंऽ दैत छै । ' डरे हदास उड़ऽ लागल जोर-जोर सँ हिचुकंऽ लागल रही ।
बुझायल जे केयो हमरा कंान्ह पर हाथ रखलकं चौंकिं कंऽ तकंलहुँ । एकंटा अधवयसु पुरूष हमर कंनबाकं कंारण जानऽ चाहि रहल छल । ओकंर स्नेह सँ हमर कंरेजा फाटि गेल मोन भेल भरि ईच्छा कंानी । हम किंछु ने बाजि सकंल रही । ओ हमरा स्टेशनकं खाली बेंच पर बैसा कंऽ मारते रास कंचड़ी-मुड़ही-घुघनी कंीनि कंऽ खेबा हेतु देलकं । भुख सँ तऽ अँतरी बैसल जाईत रहै़हम खाय लगलहुँ । कंने सुभ्यस्त भेलहुँ तऽ ओ पोल्हा कंऽ सभ बात पुछय लागल । पहिने तऽ हमरा किंछु नहिं बाजल भेल खाली हिचुकैत रहलहुँ । परदेश मे एकंटा अनचिन्हार द्वारा एहन स्नेह पओला सँ हम ओकंर कृतग्य भऽ गेल रही । हम ओकंरा सभ बात बता देलियै आ कंहलियै जे ओ हमरा गाम बला ट्रेन पर बैसा दिअय । ओ हमरा बड़ बोल-भरोस देलकं आ कंहलकं जे आब आई तऽ कंोनो ट्रेन नहिं छैकं ; कंाल्हि ट्रेन धड़ा देत । ता राति भरि लै अपना बासा पर लऽ गेल । मुदा ओ हमरा गामकं ट्रेन नहिं धड़ओलकं नित नव-नव बहाना । हमरे तुरिया ओकंरो बेटा रहै । खेलाईत-खाईत हमरो दिन बीतऽ लागल़़ग़ामकं सुरता धिरे-धिरे कंम होईत गेल ।
ओकंरा सभकं हमरा प््राति स्नेह व्रᆬमशहे कंम्म होईत गेलैकंआब हमरा उपर घरकं कंाजकं संगहिं माल-जाल , खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ी सभ टा जिम्मेदारी छल़़क़ंान वुᆬरियेबाकं तकं के पलखति नहिंताहि पर गारि-गंजन सेहो हुअय लागल । आजिर भऽ कंऽ एकं दिन सिन्हा साहेब सँगे ओहि ठाम सँ पड़ा गेलहुँ ।
सिन्हा साहेब हमरा भोरे-भोर सभ दिन भेंट भऽ जाथि ओ टहलय निकंलैत छलाह आ हम मलिकंाईनकं पूजा लेल पूᆬल तोड़य निकंलैत छलहुँ । आपस मे देखि कंऽ मुस्किंयेनाई , पेᆬर प््राणाम आ तकंरा बाद बढ़ैत गेल अपनत्व । सिन्हा साहेब कंोनो पैघ ऑफीसर रहथि । हमरा अपन माय-बाप के मुँह तकं मोन नहिं लोकं कंहई अलच्छा जनमिते माय-बाप के खा गेलई । मुदा सिन्हा साहेब मे हम अपन माय-बापकं छाँह साफ देखैत छलहुँ । हम हुनकंा अपन देवता समान बुझैत रहलहुँ आ ओ हमरा अपन संतान सँ बढि कंऽ मानैत छलाह । अपने जतऽ-जतऽ जाईत रहलाह हमरा संगे रखलनि । एकं दिन अनचोके मे हुनकंो साहचर्य हमरा सभ के छुटि गेल आब ओ एहि दुनियाँ मे नहिं रहलाह ।
हम आब हुनकंर बेटाकं कंारखाना मे कंाज कंरैत छी । कंारखाना के कंाज सँ जयनगर जा रहल छी । ट्रेनकं ख़िडकंी सँ पाछु पड़ायल जाईत खेत-पथार, कंलम-गाछी, बाध-बोन, ईनार-पोखरि अचानकं हमरा मोन मे हमर बाल्यकंाल एकंटा छाँह जकंाँ पसरि गेल आछ । ट्रेन एके बेर धक्कंा संग रूकिं जाईत आछ । यात्री सभ एम्हर-ओम्हर तकैत एकं दोसरा सँ ट्रेन रूकंबाकं कंारण पुछि रहल आछ । किंछु गोटे तऽ कंारणकं खोज मे ट्रेन सँ नीचा उतरि गेल आछ । हमरो मोन उबिया गेल वा ई कंहु जे रेलकं पटरी कंातकं मनभावन दृश्य हमरो ट्रेन सँ नीचा उतरबा लेल विवश कंऽ देलकं। लोकं बजैत छै जे माओवादी सभ ट्रेन के पटरी उड़ा देने छै़आब ट्रेन आगू नहिं जा पाओत । हम चारू कंात मुड़ी घुमा कं चर -चित लैत छी - सामने पुल पर बोर्ड लागल छैकं -- कंमला पुल सं० ७ । हमर दिमाग पर जोर पड़ल हमरो गामकं पुल के तऽ लोकं साते नम्बर पुल कंहै । ओहु ठाम एकंटा एहने झमटगर पीपड़ के गाछ छलै । हम तजबीज कंरैत छी । यादकं आर कंोनो चिन्ह नहिं बुझाईत आछ । मुदा ई कंमला नदी जकंरा लोकं मोईन कंहैत छलैकं आ एकंर भीड़ पड़हकं ई पीपड़कं गाछ !? हम ट्रेन सँ अपन बैग लऽ कंऽ नीचा उतरि जाईत छी ।
रस्ता कंात मे गुम-सुम ठाढ़ हम आखयास कंऽ रहल छी समय कंतेकं जल्दी बदलि जाईत छैकं मोईनकं कंात मे पीपड़कं गाछ तर बदरिया के चाहकं दोकंाऩ़ओकंर दस पैसी नागीन बिस्वुᆬट कंी सुअदगर ! साँझ-भिनसर भरि गामकं लोकं जुटै एहि दोकंान पऱ़ग़ाम-घर, देश-दुनियाँ, खेती-पथारी सभ टा गप्प होई एहि ठाम । हमरो कंक्कंा घर मे कंतबो चाह पीने होऊ जाबत भोर-साँझ एतुक्कंा चाह नहिं पिबैत छल ताबे चैने नहिं क़ंाकंी भने कंतबो अपन कंपाड़ नोचौ । हमरा मोने आछ जे एकं बेर धानकं सीस लोढ़ि कंऽ ओहि पाई सँ चाह पिबैत रही कंी कंतऽ ने कंतऽ सँ कंक्कंा आबि गेल रहै आ बिना किंछु पुछने तेहन घरमेच्चा मारने रहै जे गाल पर लिला-मशा पड़ि गेल रहै । गिलास तऽ दुर पेᆬकंा कंऽ चूड़-चूड़ भऽ गेल रहै । लोकं सभ कंते दुर् छीः केने रहै कंक्कंा के । ई मोईनो कंतेकं चौड़गर रहै ताहि दिन । कंी मजा अबै पीपड़कं पुᆬनगी पर चढ़ि कंऽ पानि मे वुᆬदई मे । कंते-कंते कंाल हम डुब्बी मारने रहि जाई पानि मे एके सुरूकिंया मे आधा मोईन के पार कंऽ जाई । देखनाहर अचम्भित रहि जाई । मोईनकं ओहि कंछाड़ पर कंतेकं रास जामुनकं गाछ रहै़ख़ाईत-खाईत अघा जाई केयो रोकं-टोकं केनहार नहिं । खायल भऽ जाय तऽ जामुनकं डारि तोड़ि दातमनि कंरब़़ सभ चेन्ह मेटल । कंतेकं मजा अबैत छलै ! एखनो मोने आछ मोकंना जे महेशकं बाड़ि सँ केरा घौड़ चोरा कंऽ कंाटि अनने रहै आ सभ मिलि कंऽ नहरिकं कंछेड़ मे खाधि खुनि कंऽ ओकंरा गाड़ने रही । झलफल अन्हार होईते सभ ओहि ठाम जमा होई आ भरि ईच्छा केरा खाई ।
हम बान्ह दिस नजरि दौड़बैत छी । साँझकं मैलछौंह अऩहार पसरल जा रहल आछ । चरबाहा, घासबाली, गोबर-गोईठा बिछयबाली सभ अपन-अपन घर आपस भऽ रहल आछ । रस्ता कंात मे ठाढ़ हम बितल समय के अपन मुट्ठी मे बंद कंरबाकं अंतहीन प््रायास कंऽ रहल छी । बगल सँ एनहार - गेनहार किंछु अचम्भित सन हमर मुँह देखि आगू बढ़ि जाईत आछ ।
- 'बड़ी कंाल सँ आहाँ के एतऽ ठाढ़ देखि रहल छी। कंतऽ जेबई अपने? '
- ' एहि गाम मे कंतऽ जेबई से तऽ हमरा अपनो नहिं बुझल आछ । बस एतबे टा मोन आछ जे साईत हम कंहियो एहि गामकं वासी रही । बाबूकं नाम तऽ नहिं मोन आछ कंारण हम हुनकंर मुँहों नहिं देखने छलहुँ । हँ हमर कंक्कंा के नाम बुधन छल । '
- 'कंोन बुधन? '
- 'बुधन मंडल । '
- 'तोहर नाम मदना तऽ ने छह ? ' - 'हँ हमर नाम मदन आछ । '
सुनिते ओ आदमी हमरा भरि पाँज कंऽ पकंड़ि लेलकं - ' मदना रौ ! कंतऽ छलैहैं एतेकं बरख धरि ? हमरा सभ के तऽ भेल जे कंतौ मरि-खपि गेलैं । हमरा नहिं चिन्हलैं?हम जीबछा !तोहर लंगोटिया यार !! ' पेᆬर हमरा माथ सँ पैर तकं निघारैत बाजल- 'तों तऽ साहेब भऽ गेलैं हमरा आऊर तऽ गाम मे ओहिना के ओहिना---दुनियाँ-जहानकं फिरेसानी !!! खैर छोड़ ई बात सभ । ई कंह जे एतेकं दिन कंहाँ पतनुकंान लेने छलैहैं ? बुडिबकं कंहाँ के ! अहुना केयो गाम बिसरैत आछ ? ' पेᆬर ओहि ठाम एकंत्र लोकं सभ के हमर परिचय दैत कंहलकै - ' कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ! ई अपन मदना छी ! अरे ! दछिनबाड़ि टोल मे जे बुधन मंडल छल ओकंरे भातिज हम सभ तऽ संगे उठी -बैसी , खाई-खेलाई़़ । ' लोकंकं आन्भग्यता देखैत बाजल - 'अरे ! तों सभ कंी जानऽ गेलही एकंरा बुधन मंडल के मरलो तऽ जमना बीति गेलै़आ ईहो मदना तऽ गोड़ चालीस बरखकं बाद गाम आयल हैत । ' ओ हमरा जनाबऽ लागल- 'तोहर कंक्कंा-कंाकंी दुनू आन्हर भऽ कंऽ मुईलउ अंतकंाल मे केयो एकं घोंट पानि तकं ने देबऽ बला़। संतान तऽ भगवान देबे नहिं केलखिन । डीह पर ओहिना जंगल-झाड़ जनमल़़निपुत्रकं डीह पर केयो किंयैकं जायत ?'
लाठी टेकंने एकंटा वृद्ध भीड़ के चीड़ कंऽ बीच मे आयल । 'कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ?ई बुधन मंडलकं भातीज मदना थीकं जे अहींकं मारिकं डरे महींस छोड़ि कंऽ जे पड़ायल से आई एते बरिख के बाद उपर भेलै । ' जीबछा कंहने रहै ।
'अच्छा ई मदना छी ! एकंदमे बदलि गेल ! कंतऽ छलह हौ एतेकं दिन? कंोना मोन पड़लह गाम -घर एतेकं युगकं बाद? ' हम गुम्मे रहलहुँ ।
'कंक्कंा ई मदना नान्हि टा गलती केलकं जे एकंर महींस आहाँकं खेत चरि गेल ताहि लेल एकंरा चालीस बरखकं वनबास भोगय पड़लैकं आ ई नक्सलबादी अताई सभ जे एहन - एहन पैघ जुलुम कंरैत आछ तकंरा देखऽ बला केयो नहिं ! सत्ये अन्हेर भऽ रहल आछ एहि कंलयुग मे । ' कंहि कंऽ ओ आकंाश दिस तकंलकं । पेᆬर हमर बाँहि पकंड़ि कंऽ कंहलकं - 'चल यार घर पर बैसि कंऽ दुनू दोस्त भरि मन बतियायब । ' लोकंकं हुजूम हमरा पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छल । २.८. १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. ऋृषि वशिष्ठ- जुआनी जिन्दाबाद ३. शिवशंकर श्रीनिवास- पण्डित ओ हुनक पुत्र डा.रमानन्द झा ‘रमण’ तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि। सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’, दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि। डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि। तन्त्रानाथ झाक अवदान तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन। तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि। तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब- 1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि। ‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य। 2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि: मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ। व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4 3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि - ‘अबला, भीरु, की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म, अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए, अबला भीरु कहाए मरब’6। एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ अभिभूत भए गुम्हरैत अछि - अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म। तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7 डा. सुुभद्र झा सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि - 1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत? एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि। 2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा, 3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि। एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि। सुुभद्र झाक कृृति: संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10 सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल। सुुभद्र झाक महत्व: 1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह। मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल। 2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल। 3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ। 4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत। 5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन ‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15 6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि। अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह। 1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84 2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ 3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2 ............................. ४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५ 5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5 6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68, 7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936 9. भारती,अप्रैल, 1937. 10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958 11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net 12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi 14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I & II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha - K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc. @5 15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ। हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी। 16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives, a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000. ऋृषि वशिष्ठ प्रकाशित कृति- जे हारय से नाक कटाबय (बाल साहित्य), कोढ़ियाघर स्वाहा (बाल साहित्य), झुठपकड़ा मशीन (बाल साहित्य), मैथिली धारावाहिकक कथा, पटकथा आ संवाद लेखन। एकर अतिरिक्त कथा आ व्यंग्य पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। पता- तेजगंगाधाम, परिहारपुर, मधुबनी-847235 जुआनी जिन्दाबाद सगरो टोलमे एक्कहि बातक चर्च-बर्च छलैक। बुढ़-बुढ़ानुस सभ साँझक चारि बजबाक बाट तकैत छलाह। सबहक मूँहे एक्के बात- ‘‘लाख छै तेँ कि, देखहक काली-बाबुक बेटाकेँ। एखनुको समएमे सरबन पूत होइ छै की !’’ कियो-कियो इहो कहैत छलै जे- ‘‘बाबू, काली बाबू बड्ड कष्टेँ बेटाकेँ इंजीनियर बनौने छथि।’’ -‘‘से तँ ठीके, मुदा आइ काल्हि ई कष्ट ककरो-ककरो सार्थक होइ छै ! आ से काली बाबूकेँ भेलनि।’’ यैह गर्मीक समए छिऐ। परुकाँ साल कालीबाबूकेँ दू-बेर मासे दिनपर हार्ट एटैक भऽ गेल छलनि। सगरो गामक लोक कहैत छलै जे आब हिनकर बाँचब मोस्किल छनि। आ स्थिति छलनिहों तेहने। दोसर बेरक हार्ट एटैकक खबरि जखने कालीबाबुक बेटा नबोनाथकेँ लगलनि तँ ओ तुरत अमेरिकासँ अपना गाम आपस आबि गेलाह। गाम आबि ओ कालीबाबुक हालत देखलनि। ओ अपना संग कालीबाबूकेँ अमेरिका लऽ जेबाक तैयारी कएलनि। पहिने तँ कालीबाबू तैयारे नहि होइत छलाह मुदा बुझा-सुझाकए नबो तैयार केलनि। नबो तँ चाहैत छलाह जे माइयो संग चलए। ओ मुदा एक्कहि ठाम कहि देलखिन जे- ‘‘हमरा लऽ जेबाक जिद्द करबह तँ हम माहुर खा लेब। हम बिलेँत जा कऽ एको दिन जीबि नहि सकै छी।’’ सभ कागज-पत्तर तैयार कऽ नबो अपन पिताक संग अमेरिका जेबाक तैयारीपर छलाह। टोल-पड़ोसक लोकक कहब छलै जे- ’’आब बेकारे बुढ़ाकेँ लऽ जेबहुन। आब अबस्थो भेलनि। साठि टपि गेलनि तँ आब की !’’ कालीबाबुक छोट भाए तँ रुष्ट भऽ कऽ एतेक तक कहि देने छलखिन जे- ‘‘अमेरिकासँ हमर भाए-साहेब घुमि कऽ औताह से उमेद त्यागिये कऽ लथु।’’ इंजीनियर नबोनाथ सभकेँ बुझेबाक प्रयास करैत छलाह। माइ पर्यन्त सदिखन कनैत रहैत छलीह। कालीबाबू चुप्पचाप सभटा तमाशा देखैत छलाह। नबोनाथक माइ ई कखनो नहि कहैत छलखिन जे बाबूकेँ नै लऽ जाहून। हुनका एहि बातक विश्वास छलनि जे कालीबाबू अमेरिका जा कऽ ठीक भऽ जेताह। जेना-तेना इंजीनियर साहेब कालीबाबूकेँ लऽ कऽ अमेरिका चल गेलाह। साल भरि बीत गेल अछि। एहि बीचमे रंग-बिरंगक समाचार आएल गेल। आइ वर्ष दिनपर कालीबाबू आपस आबि रहल छथि। कालीबाबूकेँ नबका हार्ट लगाओल गेलनिहेँ, से सभकेँ बुझल छैक। सबहक मोनमे विभिन्न तरहक जिज्ञासा छैक। कियो कहै जे- ‘‘अमेरिका जए कऽ की भेलनि ! रोगीक रोगिये रहि गेलाह ! कहाँदन दोसराक हार्ट लगाओल गेलनिहेँ।’’ ‘‘आब तँ आर अपस्थक भऽ गेल हेताह। अनेरे बुढ़ारीमे गंजन। कहू तँ बेकारे ने चीड़-फाड़ करौलनि।’’ समए बितैत कतेक देरी। चारि बाजि गेल। बारह बजे पटनामे हवाइ जहाज अएबाक समए छलै। पटनासँ अएबामे बेसीसँ बेसी चारि घंटा। आब जइ घड़ी जे क्षण ने अएलाह। सड़कपर अबैत सभ गाड़ीकेँ सभ ठिकियबैत छल। ‘‘यैह आबिये गेलाह।’’ ....मुदा ओ गाड़ी सुर्र...र्र.............दऽ आगाँ बढ़ि गेल। कालीबाबुक दलानसँ कनिके दूर चौराहा छलै। चौराहापर विशाल पिपरक गाछ आ सड़कक काते-कात चाह-पानक दोकान। गाछक छाँहमे बैसल बच्चा किशोर आ बुढ़-बुढ़ानुस तँ सहजहिँ। खास कऽ सभकेँ कालीबाबुक प्रति बेसिये जिज्ञासा छलनि। ‘‘केहेन भेल हेताह? साफे बदलि गेल हेताह कि ओहने हेताह! ककरो चिन्हबो करताह कि नै?’’ ‘‘जे जत्तहि सुनलक आगवानीमे पहुँचि गेल। कालीबाबुक दरवज्जापर एखनो भम्ह पड़ैत छनि मुदा एतए भीड़ जूटल अछि। पुरुष-पातकेँ गामपर नै रहने यैह दशा होइत छैक। भरि ठेहुन कऽ घास जनमि गेल छनि। सभ अही बातक चर्च करैत छल। मोन मुदा सबहक टाँगल छलै पच्छिम भरसँ आबएबला चारिपहिया वाहनपर। कालीबाबु प्राथमिक विद्यालयमे शिक्षक पदसँ रिटायर भेल छलाह। ठेंठ देहाती लोक। कोनो आधुनिकताक हवा नहि लागल छलनि। ओ वर्ष दिन अमेरिकामे कोना रहल हेताह। सभ यैह बात सोचैत छल। नबोक माइ कोनटा परसँ हुल्की मारि जाइत छलीह। ......यैह, लालरंगक चारिपहिया वाहन आबि कऽ रुकल। पीपर तरक भीड़ कालीबाबुुक दरवज्जापर पहुँचल। कियो दौड़ैत, कियो झटकैत आ कियो घिसियाइत। गाड़ीक आगाँक गेट खुजल। इंजीनियर नबोनाथ उतरलाह। आँखि परक करिया चश्माकेँ माथपर चढ़बैत हाथ जोड़ि सभकेँ प्रणाम केलनि आ पछिला गेट खोललनि। भीड़मे जूटल वृद्ध सभकेँ जेना साँस रुकि गेल छलनि। गेट खूजल.....। ..........अचरज! भारी अचरज!! कालीबाबू सूट-बूट पहिरने छलाह। करिया जिन्स आ लाल रंगक फोटो बनल टी शर्ट। आँखिपर करिया चश्मा। बेस चिक्कन-चाक्कन मूँह-कान। खूब निरोग। हाथमे गिटार लेने उतरलाह। बुढ़ सभ देखि कऽ अचरजमे पड़ि गेलाह। ‘‘देखहक हौ, ई की छनि कालीबाबूकेँ?’’ ‘‘सारंगी लेलनिहेँ।’’ ‘‘गुदरिया भऽ गेलाह-ए की?’’ ‘‘वाह रे वाह! यैह भेलै बुढ़ारीमे घी ढारी।’’ इंजीनियर साहेब टिका-टिप्पणी सुनलनि। ओ हँसैत बजलाह- ‘‘बाबू जीकेँ अस्पतालमे पड़ल-पड़ल अकच्छ लगैत छलनि। असलमे डाॅक्टर हिना पुछलखिन जे आहाँकेँ सभसँ बेसी रुचि कथीमे आछि? संगीत पढ़ाइमे आकि आन कोनो काजमे! बाबूजी कहलखिन- ‘‘रंगीतमे। सेहो संगीत गाबए आ बजाबएमे। गाएब तँ मना छनि मुदा बजेबाक लेल गिटार डाॅक्टर देबाक अनुमति देलनि।’’ एतबा कालमे तँ कालीबाबू एक हाथमे गिटार लेने आ दोसर हाथ माथमे सटबैत नमस्कार केलनि। किछु बुढ़ हँसि कऽ मूँह घुमा लेलनि आ हँसैत नजरिसँ नजरि मिलबैत रहलाह। कालीबाबू डेगाडेगी दैत नाचए लगलाह आ गिटारपर बेसुरा टुम टाम करए लगलाह। राजधर बुढ़ाकेँ नै रहल गेलनि। ओ व्यंग्य करैत बजलाह- ‘‘ई तँ कीदन भऽ गेलाह हौ इंजीनियर। चौबे चलला छब्बे बनए आ दुब्बे बनल अएलाह। अँइ हौ, ई तँ काली बताह भऽ गेलह-ए?’’ इंजीनियर साहेब सहज भऽ बजलाह- ‘‘असलमे बाबा, ओतुक्का तँ एहने माहौल छै किने।’’ ‘‘हैइ, किछु रहौ। ई तँ साफे पगलेठ जकाँ करै छै। जीवन भरि एतए रहलै तँ किछु नै आ एक बर्खमे ओतुक्का सबार भऽ जेतै?’’ गाड़ीबला सामान सभ उतारि कऽ विदा भऽ गेल। गाड़ी कनेक आगाँ बढ़ल। कालीबाबू मूँहकेँ गोल करैत सीटी बजबैत ड्राइवरकेँ बाॅइ.....बाॅइ केलनि। कोनटापर ठाढ़ भेल अपन पत्नीकेँ जखने देखलनि कि फेर मूँह चुकरियबैत सीटी बजौलनि.......‘हू......हूँ.......उ..... ’’ ’ओ बेचारी लजाइत कोनटापर सँ पड़ेेलीह। लोक सभ तमाशा देखि अपना घर दिस कऽ विदा होबए लागल। कालीबाबू फेर ओहिना सीटी बजबैत हाथ हिलबैत रहलाह। भीड़ तँ उसरि गेल मुदा लोकक मोनमे चैन नहि भेलै। एतए ओतए सगरो कालियेबाबुक चर्च। कियो बताह कहए तँ कियो घताह। एक्के बरखमे लोक एना कऽ बदलतै। ओहिठाम तँ हुनकर बेटो छनि। ओ तँ दसो सालसँ अमेरिकामे रहए छै। कहाँ कोनो चालि-ढालि बदललैए ! राजधर बुढ़ा अपना मंडलमे घोषणा करैत बजलाह- ‘‘नबो इंजीनियरकेँ नीकक काज होइ तँ बापकेँ कोनो माथाबला डाॅक्टरसँ देखबौक।’’ रंग-विरंगक टिका-टिप्पणी होइत रहल। देखलाहा दृश्य राति भरि लोकक सोझाँ ओहिना नचैत रहलै। कथीलए ककरो निन्नो हेतइ। कालीबाबुक रातिक निन्न तँ अमेरिकेमे छुटि गेलनि। ओ राति भरि कछमछ करैत आ गिटारकेँ टुनटुनबैत रहि गेलाह। भोरे-भोरे कालीबाबुक दलानक सोझाँमे फेर भीड़ जुटि गेल। एहन अनर्गल काज काली बाबुक नै होइतनि जँ माथ ठीक रहितनि। ओ अपना कहलमे नै रहलाह। सबहक निष्कर्ष एक्कहिटा। गर्मीक समए छलै। कालीबाबू भोरे-भोरे गंजी आ ठेहुन धरिक पैंट पहिरने, डाँड़ झुकलाहा सन अवस्थामे, माथक केश मेहदीसँ राँगल। ओ चौकीपर ठाढ़ गिटार बजेबामे अपसियाँत छलाह। मूँहक आकृति रंग-विरंगक भऽ रहल छलनि। गिटारक अवाज साफे बेसुरा। एहन उन्मत्त भऽ बजेनाइ नहि देखल-ए। देखलासँ कोनो प्रवीण गिटारवादक लगैत छलाह मुदा सुनलापर साफे अनारी। राजधर बुढ़ाकेँ कालीबाबुक बेस चिन्ता छलनि। ओ चिन्तित सन मुद्रामे बजलाह- ‘‘एहेन कोन पागलपन भेलै? कहह तँ जे काली कहियो नचारियो नहि गौलक तकरा ई बजेबाक कोन भूत सवार भऽ गेलइ।’’ नबोनाथ जेम्हरे निकलथि सभ बाबूक हालचाल पुछनि। ‘‘केहन छथि? आब नीक जकाँ रहए छथि कि ओहिना सारंगी लऽ कऽ नचै छथि?’’ कतेक कऽ की जबाब देथिन। सबहक कहब आ अपनो तँ देखिये रहल छलाह। नबो कालीबाबूकेँ मानसिक रोग विशेषज्ञसँ इलाज प्रारंभ केलनि। डाॅक्टर समूचा जाँच-पड़तालसँ मानसिक रोगक लक्षण नहि पौलनि। आब तँ मामला आरो ओझराएल जा रहल छल। इंजीनियर साहेब कऽ टपाक दऽ कहा गेलनि जे- ‘‘असलमे एहन सभ चालि-चलन आ व्यवहार हृदय प्रत्यारोपनक बाद भेलनिहेँ।’’ डाॅक्टर साहेब गंभीर अनुसंधानमे लगलाह। कालीबाबूकेँ जखन-तखन डाॅक्टर ओहिठाम बजाहटि होबए लागल। समए बितैत गेल। साँझक समए रहए। डाॅक्टर नर्सिग होममे मानसिक रोगी सभ भरल छलइ। रंग-विरंगक उटपटाँग हरकैत सभ भऽ रहल छलै। डाॅक्टर साहेब गंभीर भेल कुर्सीपर बैसल छलाह आ टेबुलपर राखल कागज सभकेँ उनटबैत छलाह। सामनेक कुर्सीपर कालीबाबू उत्सुक सन मुद्रामे बैसल छलाह। आ बामा कात इंजीनियर नबोनाथ चौंकल सन मुद्रामे छलाह। डाॅक्टर की कहथिन की नइ! डाॅक्टर साहेब सभ कागजकेँ पसारैत अपन लैप-टापकेँ आसस्तेसँ दबाबए लगलाह- ‘‘इंजीनियर साहेब, हम एहि केसक गंभीर अनुसंधान केलहुँ अछि संगहि सभटा सबूत जमा केलहुँ अछि।’’ इंजीनियर साहेब चौचंग भेलाह। ‘‘अहाँक पिताजीकेँ जे हृदय प्रत्यारोपित कैल गेल ओ वस्तुतः एकटा एक्कैस वर्षक मशहुर पाॅप गायकक हृदय छैक। ओ बेचारा एकटा दुर्घटनामे मारल गेल आ ओकर दान कएल हृदय आइ अहाँक पिताकेँ जीवन देने छनि।’’ ‘‘मुदा’’- इंजीनियर साहेब उत्साहमे बजलाह। - ‘‘हँ, इंजीनियर साहेब। कोशिकामे स्वभावक याददाश्त रहैत छैक।...... आ यैह कारण अछि जे ई रहि-रहि कऽ संगीतक पाछाँ बेहाल भऽ उठै छथि। एहि तथ्यकेँ युनिवर्सिटी आॅफ एरिजोना सेहो सिद्ध करैत अछि। ई युनिवर्सिटी अंग प्रत्यारोपनक कतेको मामिलापर शोध कऽ चुकल अछि।’’ डाॅक्टर साहेब आँगुरसँ लैपटाॅपक स्क्रीन दिस इशारा करैत बजलाह- ‘‘हे, देखियौ ने ! आब कोनो काज कठिन छैक? अहीठाम बैसले-बैसले सभटा शोधक जानकारी लऽ लिअ।’’ इंजीनियर साहेब झुकि कऽ लैपटाॅप दिशि तकैत बजलाह- ‘‘एकर मतलब आब बाबूजी अहिना रहि जेता?’’ डाॅक्टर हँमे मूड़ी डोलबैत बजलाह- ‘‘हूँ! कलाकारक जुआनी अवस्था छलैक ने! ओ तँ औनाहटि उचिते छैक।’’ कालीबाबू पीठपर टाँगल गिटार उतारलनि। खोलसँ बहार केलनि आ थैया-थैया...... दिग् दिग थैयाा करैत गिटार बजेबामे लीन भऽ गेलाह। शिवशंकर श्रीनिवास (मिथिलाक लोक-कथापर आधारित बाल कथा) पण्डित ओ हुनक पुत्र नैनापुर गाममे एकटा पण्डित रहथि। नाम रहनि- बौआ चौधरी। नैनापुर टोलक विद्यालयक ओ प्रधान गुरुजी रहथि। सभ हुनका बड़का गुरुजी कहनि। बड़का गुरुजीक पण्डिताइक सोरहा ओहि समयमे देश-विदेशमे छल। ओहि समएक प्रसिद्ध युवा विद्वान् मे बेसी गोटे हुनके शिष्य रहथि। देश-विदेशक लोक हुनका लग शास्त्रक गप्प बूझऽ अबैत छलाह। किन्तु बड़का गुरुजी रहथि बड़ क्रोधी, से सभ जनैत छल। क्रोध छोड़ि हुनकामे सभ टा गुणे रहनि। किन्तु हुनक क्रोधक चर्चा सभ करए। बड़का गुरुजीक एक मात्र संतानमे बेटा, नाम रहै धनंजय। धनंजय बड़ तेजस्वी रहय। लोक कहै धनंजय अयाची मिश्रक बेटा शंकरक दोसर अवतार छी। धनंजय बारहे-तेरह वर्षक उम्रमे बड़का विद्वान् भऽ गेल। इलाकाक लोक कहऽ लगलै- जेहने गुणमन्त बाप तेहने बेटा। किन्तु धनंजय उदास रहैत छल कारण जे बाप कहिओ नीक भाखा नहि कहथिन। ई कोनो विषयमे कतबो अंक आनय, परीक्षामे प्रथम घोषित होअए, कठिनसँ कठिन शास्त्रार्थ जीति कऽ आबय आ सोचय जे एहि बेर बाबू अवश्य प्रसन्न भऽ किछु कहता, किन्तु बाबू ओहिना धीर-गंभीर, किछु नहि कहलथिन। धनंजय अपन पिताक मुखसँ नीक गप्प सुनबाक लेल वा कोनो वाहवाहीक शब्द सुनबाक लेल ओहिना तरसय जेना उपासल पानि लेल तरसैत अछि। ओना बड़का-बड़का विद्वान् प्रशंसा करथिन, कतेको प्रसिद्ध विद्वान् हृदएसँ लगबथिन किन्तु पिताक मुँहसँ प्रशंसा सुनबाक हेतु मन रकटले रहै। अठारह वर्षक उम्रमे धनंजय न्याय शास्त्रक एहन पोथी लिखलक जे सर्वत्र चर्चामे आबि गेल। धनंजय अपन पोथी पढ़बाक लेल पिताकेँ देलक, किन्तु ओ पढ़ि घुमा देलथिन, किन्तु किछु कहलथिन नहि। एक दिन धनंजय साहस कऽ केँ पिताकेँ पुछलक- “बाबू, पोथी पढ़ि अहाँ किछु सम्मति नहि देलहुँ।” “थोड़े आर परिश्रम करू।” कहि पिता गंभीर भऽ गेलथिन। धनंजयकेँ पिताक गप्प बहुत अधलाह लगलै, ततबे नहि, मनमे घोर प्रतिक्रिया भेलै। सोचलक- “ई हमर शत्रु छथि, जावत जीता तावत हमर यश-प्रतिष्ठासँ जरैत रहताह, कहिओ प्रशंसा नहि करताह।” से सोचैत-सोचैत बुझू बताह भऽ गेल। मनेमन निर्णय कएलक जे आइ रातिमे जखन ओ भोजन कऽ आङनसँ बहरेता तँ खर्गसँ गरदनि काटि पड़ा जाएब। अन्हरिया छैके केओ ने देखत। दिन बीतल, साँझ भेलै आ तकर बाद राति। बड़का गुरुजी भोजन कऽ रहल छलाह, आगूमे पत्नी अंजनी बैसलि छलथिन। आ इम्हर धनंजय खर्ग लऽ कऽ ठाढ़ छल जे भोजन कऽ कोनटा लग औताह कि काटि कऽ पड़ा जाएब। अंजनी कहलथिन- “धनंजयक पोथीक सुनै छी बड़ चर्चा छै।” “हूँ”- पत्नीक गप्पपर बड़का गुरुजी बजलाह। “एकटा बात कहू, तमसायब तँ नहि।” अंजनी अपन क्रोधी पति बड़का गुरुजीकेँ पुछलनि। “कहू ने”- गुरुजी पुछलथिन। “पहिने कहू जे तामस नहि करब।” “अच्छा नहि करब, पूछू।” “अहाँ धनंजयपर तमसाय किएक रहै छियनि? ” “तमसाय किएक रहबनि? ” “अहाँ आइ तक हुनकर प्रशंसा कयलियनि? ” पत्नी गप्पपर बड़का गुरुजी बहुत हँसलाह आ कहलथिन- “अहाँ नहि बुझै छिऐ।” “हम बुझै छिऐ, ओ अहाँकेँ नहि सोहाइ छथि।” “के एहन अभागल होएत जकरा बेटा नहि सोहेतै? बेटे एकटा एहन होइ छै, जकरा लोक अपनासँ पैघ देखऽ चाहैए।”- गुरुजी बजलाह। ताहिपर पत्नी पुछलथिन- “कहू तँ अहाँक बेटा केहन पण्डित छथि? ” “बहुत पैघ पण्डित छथि। हमरासँ बहुत आगू बढ़ि गेलाह।” गुरुजी बहुत आनन्दमे अंजनीकेँ कहलनि। ओहिना आनन्दसँ आनन्द लैत अंजनी पुछलथिन- “ओ पोथी जे लिखलनि से केहन छै? ” “बहुत उत्तम, हम कएटा बात ओहि पोथीसँ जनलहुँ अछि, बूझू गदगद छी। धनंजय पुत्रे नहि, पुत्र रत्न थिकाह।” “तखन हुनकर प्रशंसा किएक ने करै छियनि?” पुनः पत्नीक गप्पपर भभा कऽ हँसैत गुरुजी कहलथिन- “बुझलहुँ, हम हुनकर बाप छियनि, प्रशंसा करबनि तँ घमण्ड भऽ जयतनि आ तखन विकास रुकि जयतनि।” “सुनू, हम अहाँक स्त्री छी। अहाँ जहिया हमर काजक प्रशंसा करै छी तहिया हम आरो नीकसँ काज करै छी। आ जहिया कोनोपर बिगड़ै छी तकर बाद आरो काज गड़बड़ा जाइए, ताहिपर अहाँ ध्यान देलिऐ? ” “हूँ...।” कहि पत्नीक गप्पपर गुरुजी गंभीर होइत पुछलनि- “अहाँ आइ ई सभ किए पुछैत छी? ” “अहाँ धनंजयकेँ पोथी दैत कहलियनि जे आर परिश्रम करू, से हुनका नीक नहि लगलनि। “अहाँ कोना बुझलहुँ? ” “हम माय छिऐ, हम ओतबो नहि बुझबै। तखनसँ हुनक माथ ठीक नहि बुझाइए।” “ओ ज्ञानी छथि, हुनका हमर बातक कतहु क्रोध होइन? ” “तखन अहाँकेँ क्रोध किए होइए? अहूँ तँ ज्ञानी छी।” “हँ, से...।” पत्नी गप्पकेँ स्वीकारैत गुरुजी सोचैत भोजन करऽ लगलाह। मने-मन सोचलनि अंजनी ठीक कहैत छथिन। ओम्हर कोनटाक अन्हारमे ठाढ़ गप्प सुनैत धनंजयक हालत विचित्र भऽ गेलै- “ओ एहन महान पिताक हत्याक लेल ठाढ़ अछि? ओ वस्तुतः पण्डित नहि मूर्ख अछि।” सोचैत धनंजय कानऽ लागल। भोजन समाप्त कऽ गुरुजी ओसारापर सँ उतरि अङना अएलाह आकि धनंजय पएरपर खसि कनैत कहलक- बाबू हम बिना विचार कएने अहाँक हत्या कऽ दैतहुँ। हम बताह छी। हम मूर्ख छी। पातकी छी।” “नहि धनंजय, अहाँ हमर हत्या करऽ लेल छलहुँ से बात नुका सकै छलहुँ, किन्तु अहाँ सत्यकेँ नुकेलहुँ नहि। अहाँ सत्यकेँ समक्ष अनबामे डरेलहुँ नहि। अहाँ वस्तुतः पण्डित छी।” “नहि बाबू। हम क्रोधमे रही। अहाँक हत्या करब सोचलहुँ, तकर प्रायश्चित? ” “प्रायश्चित् भऽ गेल।” “से कोना? ” “सत्यक खुलासासँ। आँखिक नोरसँ।” “किन्तु बाबू? ” “बेटा धनंजय, आइ अहाँक प्रसङसँ हमहूँ किछु सिखलहुँ।” “बाबू!” “जावत क्रोध रहत तावत ज्ञान हँटल रहत। हम सभ दिन विद्या सिखलहुँ आ सिखौलहुँ किन्तु हमरामे क्रोधक स्वभाव रहबे कएल आ...। ” “आ की बाबू? ” “सभकेँ, जे काज करए ओकरा प्रोत्साहन दीऐ। आ कोनो बात केओ कहए वा नहि कहए, दुनू स्थितिमे सोची, से नहि कएने अहाँ सन ज्ञानी बापकेँ मारब सोचैत अछि। ” ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.१.श्री काली नाथ ठाकुर-सून मिथिलाञ्चल…..। २.एकइसम सदीक नाम-प्रेम विदेह ललन ३.विनीत ठाकुर- जाढ़ ३.३.१.पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता २. सुदिप कुमार झा-दूटा रचना ३.४.१.एक भुम जोड़ एक सत्य बराबर दू क्षण- अयोध्यानाथ चौधरी २.हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा ३.नवका साल, पुरने हाल !धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३.५.१.सतीश चन्द्र झा २.मधेशक आवाज-वौएलाल साह ३.हिमांशु चौधरी-पाथर ४.-क्षणिका-प्रशांत मिश्र-हड़ाहि ३.६.१.अरविन्द ठाकुर-गजल २.महेन्द्र कुमार मिश्र-पद्य ३.इन्कलाव सुरेन्द्र लाभ ३.७.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.८.१.कुमार पवन-नहि बिसरैछ/ काल्हि तँ रवि छै २.रोशन जनकपुरी-चप्प्ाल आ सड़क ३.ओम कुमार झा-थर-थर कापिँ रहल छौ तोहर पयर ४.राजदेव मंडल-कविता स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! शिव शक्ति पूजन !!
उमा संग शंकर केॅ पुजबनि पागल प्रेम मगनमा । गंगा जल भरि भार चढ़यबनि लेप देवेनि चंदनमा ।।
आक धतूर बेल पातक संग सजि - सजि सुभग सुमनमा, दारूण दुर्दिन दीप जरा कऽ दुःखक धूप धुमनमा । उमा संग ................................................................... ।।
अक्षत छीटि दूभि सॅ झपवनि सुन्नर गोर बदनमा, नीलकंठ केॅ भोग लगयबनि अमरित कनमा - कनमा । उमा संग ................................................................... ।।
श्रद्धा सागरक बीच विश्वासक राखब मेरू मथनमा, केशर कुमकुम कस्तूरी सॅ गमका देबेनि भवनमा । उमा संग ................................................................... ।।
छम-छम नाचि नचारी सुनयबनि माॅ गौरी क अंगनमा, आशुतोष तैयो नहि ढ़रता तऽ खसि पड़ब चरणनमा । उमा संग ................................................................... ।।
!! विरहिनी !!
रहि - रहि कऽ अहॅक लेल देह फेर धयलहुॅ अछि, लागल अहींक एक ध्यान, आऊ-आऊ रूसल हमर भगवान । सहलहुॅ कतेको हम जन्मक असहय ज्वाल, कहुना वितयलहुॅ अछि मरणक बहु अंतराल, मधुवन मे हे मोहन आइ हमर अवसर अछि, राखि लियऽ राधिका केर मान । आऊ............................................................... ।।
वृन्दावन कुहरैछ यमुना कनैछ हाय, गोदावरी आॅचर तर छाती हहरैछ आय । गोकुल मे लाख - लाख मोन बहटारल हम तैयो वर व्याकुल परान । आऊ............................................................... ।।
अहॅक रूप राखि नैन युग - युग सॅ जागलि छी, मुरली केर मधुर वैन गुनि - गुनि कऽ पागलि छी। परकीया पतिता हम प्रेमक पुजारिन केॅ, नहि - चाहि गीता केर ज्ञान । आऊ............................................................... ।।
जकरा छै लागल हा विरहक प्रचंड रोग, तकरा की कऽ सकतै निष्कामी कर्मयोग। हमरा लग अपने छी चीर नवनीत चोर अंतः बनू बरू महान । आऊ............................................................... ।।
अहॅक लेल अपयश केॅ जीवन मे जोगि लेब, पापो जौं लागत तऽ नरको केॅ भोगि लेब, इच्छा नहि मृत्युक अपवर्गक आ स्वर्गक अछि, अहॅक छाड़ि चाही ने आन, आऊ............................................................. ।।
!! नचारी !!
दहिना कऽ अपन भाग्य वाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम । त्यागि भाई बन्धु घऽर गाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।
कामनाक कामरू केॅ गंगा मे बोरि - बोरि, आयल छी अजगैबी नाथ शरण हाथ जोरि, नाचि - नाचि गाबि ठाम - ठाम, जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।
दुःखक अथाह धार भैरव जी पार करू, बरका टा पापी हम हमरो उद्धार करू, लैत रहब जीवन भरि नाम जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।
चुट्टी केर धारी सन धामो मे भीड़ देखि, छाती मे धकधकी सभ केॅ अधीर देखि, कोना की करबै हे राम ? जा रहलहुॅ बैद्यनाथ धाम ।।
!! गीत !!
राम मंत्रवत अहॅक नाम जपि - जपि दिवस बितावै छी , रातुक बीच चान पर तपि - तपि ध्यान लगावै छी ।
कहू अहाॅ की आन हमर छी, देहक रूसल प्राण हमर छी हे पाथरक देवता जागू अहीं एक भगवान हमर छी हम निर्दोष फूल तैयो निरमाल बनावै छी, रातुक..................................................... ।।
जाहि बाट केॅ नित्य बहारी हम तीतल आॅचर सॅ झारी, जकरा अपना मे रखने अछि, हमर आॅखि ई कारी-कारी आई ताहि पर किएक अलसित गति सॅ आवै छी रातुक..................................................... ।।
हमरा लेल राजपद त्यागू भवन छोड़ि कानन केॅ भागू, पाछूक सीता सन सुन्नरि दौड़ि पड़ि औ आगू - आगू, प्यासल प्रेमक जलद मर्यादा किएक जगावै छी रातुक..................................................... ।।
आऊ - आऊ हे प्रिय अभ्यागत् अछि पसरल हृदयासन स्वागत् प्रियतम अहॅक पलकहुॅ लकि सॅ, हमर जन्म जन्मान्तर जागत लाऊ पखारि चरण नयन सॅ जल छलकाबै छी, रातुक..................................................... ।।
!! गय नानी !!
गय नानी गय नानी बड़ बदमास भेलैं गय नानी । नाना संगे लड़ाई काल समाठ लेलैं गय नानी ।। तोरे धरि नाना केर बातो, तो उनटौले पिड़ही सातो, तोरा डरे करथि ई थरथर त्यागि देलेनि सौंसे आंगन घर, नड़रौने तैयो हुनका खरिहान गेलैं गय नानी । गय नानी.............................................. ।।
नाना खतिर छिपली कारी तोरा छौ स्टीलक थारी नाना पावथि नोन सोहारी अपना लय तरूआ तरकारी अधजनमू दही केर मूड़ी काटि खेलै गय नानी, गय नानी.............................................. ।।
रहलनि आब कतऽ की हुनका, लागि गेल छनि तोहर ठुनका मुॅह मे रखने टुटल दाॅत छथि, खून देखि कऽ अपस्यांत छथि, भनसा घर सॅ नाचि - नाचि बथान गेलैं गय नानी । गय नानी.............................................. ।।
!! नेना गीत !! (हीरा - बेटी)
हीरा बेटी हमर बड़ दुलरैतिन । देखि कनियो कसरि चट् रूसि जयथिन ।। भोरे उठिते निनायल माॅगथि बिस्कुट, नहबऽ काल हेरथि नव बाबासूट, बुच्ची हम्मर सरोवर केर छोटकी मीन । देखि ............................................... ।।
बाप गेलथिन बजार आनथिन केरा, चाही नितः चैपाड़ि परक दू पेरा, बिनु दूधक ई सहि जेती भरि दिन । देखि ............................................... ।।
चाह जेबऽ मे माॅ जौं करथि देरिये, ई ताकथि बाबू केॅ कनडेरिये, खाइते - खाइते आॅगन सॅ एक - दू - दिन । देखि ............................................... ।।
आइ भोरे सॅ खेलनि बऽत मुक्का, मूॅहे भेलेनि जेना फूटल चुक्का , छथि हेहरि ई फेरो करथि बिनबिन । देखि ............................................... ।।
!! स्वागत गान !!
आऊ - आऊ - आऊ सभक स्वागत करै छी, नैन मे समाउ हृदयासन धरै छी ।। उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन, उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन, भ्रमर झुण्ड प्यासल छथि विहग वृन्द बड़ भूखन, मुरूझल छथि आम - मऽहु रऽसक सरिता सूखल, बबुरे वन कवि कोकिल लाजे मरै छी । आऊ............................. ।।
विद्यापति शिव स्वरूप मृत्युंजय मऽरल छथि, हमरा सबहक अभाग अजरो भऽ जऽड़ल छथि, मात्र ई समारोही गोष्ठी सॅ की हेतै ? स्थिति जहिना तहिना संवत एतै जेतै मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै छी, आऊ............................. ।।
काव्य पाठ करू मुदा कान्ह पर लियऽ लाठी, एक हाथ रसक श्रोत दोसर मे खोर नाठी पुरना किछु त्यागि - त्यागि पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग - संग अहाॅ गीत गाउ मुदा हऽम हहरै छी, आऊ............................. ।।
अहॅक चपल चरण ऋृतुराजक सूचक अछि, अपने आत्मस्वरूप आशय तऽ ‘बूचक’ अछि, दीन हीन साधन सभ सॅ विहीन यद्यपि हम, उद्वेलित श्रद्धा समुद्र नहि तरंगो कम । शर्वरीश स्पर्शक लेल हहरै छी । अभ्यागत आउ सभक स्वागत करै छी । आऊ............................. ।।
विशेष:- ई छल विद्यापति स्मृति पर्व समारोह 1984 ( आयोजन स्थल - ग्राम - बैद्यनाथपुर प्रखंड रोसड़ा, जिला - समस्तीपुर ) मे आगत अतिथिक स्वागत मे स्व0 कविक ओहि कालक मैथिलीक दशा पर पीड़ादायक प्रस्तुति ।
!! मातृ गीत !!
तोरे मुस्की मे अभिनव आनंदक अनुपम देश गय ! तोरे दयादृष्टि मे नव नव सौन्दर्यक परिवेश गय !!
चिता भस्म तन, कर कपाल छल, रूप अशुभ गर मुंडमाल छल, सर्पकंठ, विष असन दिगम्बर, मरूघट वास कतऽ आंग़न घर ? तोरे हाथ पकड़ि भिखमँगबा भोला भेला महेश गय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।
माइक हाथ पकड़लनि बाबू, ओहि हाथ पर हुनके काबू, बेटो तऽ चरणक अधिकारी उठलै तखन प्रश्न ई भारी, तोहर हाथ पैर दु दुहू मे महिमा ककर विशेष गय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।
शिशुक लेल आरामदेह माइक शरीर मोमक चाही, मक्खन सन कोमल करेज आ, हास शरद सोमक चाही, तखन किए पथरयलहुॅ धयलहुॅ अपन पाथरक भेष अय । तोरे दयादृष्टि ..................................................................।।
!! सोन दाइ !!
रहतौ ने हास, बहि जेतौ विलास गय, दुई दिवसक जिनगी सॅ हेवेॅ निराश गय ।।
भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ, मोहक उमंग बीच, प्राण किएक पागल छौ, चलि जेतौ सुनेॅ कंठ लागल पियास गय । दुई............................................................... ।।
बाल वृन्द जा रहला, नव - नव युवको चलला, बूढ़ - सूढ़ जरि - मरि कऽ माटि तऽर परि गलला, तैयो छौ अपना पर व्यर्थ विश्वास गय । दुई............................................................... ।।
अपना केॅ चीन्हे तोॅ नाम तोहर ‘‘सोन दाइ’’ टलहा सॅ मेझर भऽ मूॅह छौ मलीन आइ देश कोश विसरि - काटि रहलेॅ प्रवास गय । दुई............................................................... ।।
नेनपन चलि भागलि आब इतिवस्था एतौ, कहेॅ कनेक गुनि धुनि कऽ तकर बाद की हेतौ, कहिया धरि कऽ सकबेॅ पर घर मे वास गय । दुई............................................................... ।।
!! हील हाइ - हाइ !!
खुडियौलक कसि - कसि कऽ नीपल करेज केॅ, धुरियौलक धीपल मनक हाइ वेज केॅ, कहऽ पड़ल आइ - नील - नील चप्पल केर हील हाइ - हाइ ।।
बेकसूर केश अधगेड़ेॅ सॅ काटल छै, कोन घसबहबाक हाथेॅ छपाटल छै, अथवा हय दाइ - ठढ़िया गेन्हारी केॅ चरि गेलै गाइ ।।
पर्स लटकौने कमरच्छा सॅ आयलि छै, नवसिक्खू डानि जकाॅ भूखलि पियासलि छै, बचबऽ हौ भाइ - हऽम एक दूइये ओ आखड़ अढ़ाइ ।।
एखनो धरि भौजी केॅ लजवन्ती जगिते छनि, बूढ़ि भेली भैया लग लाज कते लगिते छनि, सुनहक ढ़ोढ़ाई - देखिये कऽ खा लै छी, घिबही मिठाइ ।। !! मिथिला क बेटी !!
सीता केॅ सितिया बनौलक सौभाग्य हमर, रघुपति केॅ महुअक करौलक अनुराग हमर, मिथिला केर धरती अकाशे सॅ ऊॅच जतऽ जगदम्बे दुलरैतिन दाइ, जतऽ पुरूषोत्तम रामे जमाइ ।।
हमर उर्मिला सनि जनमलि कक्कर कन्या, जकरा सॅ तिरहुत की ? अवधो भेलै धन्या, कोन सतवंती सॅ संवल लऽ लखन लाल, काले पर कयलनि चढ़ाई । इहो बात मने मोन पड़ल आइ ।।
सूर्यवंश वैभव लग तुच्छ इन्द्रआसन छल, ताहि त्यागि योगासन पूर्ण अनुशासन छल, भरत भक्ति दिव्य दीप जगमग जग कऽ उठलै, माण्डवी केर सेवा सलाइ । वास लेला नंदिग्रामे जमाइ ।।
अखिल भुवन विजयी भऽ शंकर आदिगुरू बनलनि, महिषी मे आवि मंडन केॅ मर्दित कयलनि मुदापस्त भऽगेलनि मिथिलाक बेटी सॅ शारदा बनलि भारती दाइ । गर्वित मिथिला भूमि आइ ।।
!! जेठी करेह !!
गय जेठी करेह तोॅ सवेरे उधिआइ छेॅ । वरखा तऽ हेठै भेलै अनेरे उपलाइ छेॅ ।।
तोरो वाटर वेज बनल छौ, डेभलाॅप मेन्टक डेज बनल छौ, बहुत ऊॅच खतराक विन्दु गय, एना किए अकुलाइ छेॅ ? गय ...................................................... ।।
ई इन्होर पानि चमकै छौ, मोर - मोर पर भौरी दै छौ, काटि - काटि डीहक करेज केॅ, तऽरे तऽर समाइ छेॅ । गय ...................................................... ।।
बहकल तोहर रेतक धक्का, चहकल हम्मर धैर्यक पक्का, सत्यानाश सभक कऽ देवेॅ आवै छेॅ आ जाइ छेॅ, गय ...................................................... ।।
जत्र - तत्र भऽ जेतौ मौॅका, इंजीनियर बनतौ बुरिबौका, वान्हि तोड़ि कऽ प्रलय मचेवेॅ एहने दाइ बुझाइ छेॅ गय ...................................................... ।।
!! ऊँ नमः शिवाय !!
श्याम छटा पर राधा गंगा धार देखू बहिना, वाम जटा तर वामा केर श्रृंगार देखू बहिना ।
वदन मनोहर कुंद ईन्दु सन भुवन वृत्त केर मध्य विन्दु सन, जड़ चेतन मोहक मृदु मुस्की लऽ रहलाह विक्ख केर चुश्की,
लुटा रहल छथि अमृत केर भंडार देखू बहिना । श्याम छटा ............................................................ ।।
दीपित कुंडल लोल - लोल अछि, प्रति विम्बित दुहू कपोल अछि, सर्पराज केर छत्र मनोहर, ममता मे विभोर डमरू धर,
कर त्रिशूल उर उरगक गिरिमल हार देखू बहिना । श्याम छटा ............................................................ ।।
केहरि छालक पट विभूषित तन, चंद्रालं कृत शिव प्रमुदित मन, वाम अंक गिरिराज कुमारी, गर लटकल गणेश भयहारी
हिनके शरणागत सगरो संसार देखू वहिना । श्याम छटा ............................................................ ।।
!! मणिद्वीपक महरानी !!
अयली जगदम्बा दुर्गा देवी कल्याणी अय, मणिद्वीपक महरानी अय ! नाऽ ऽ ऽ।।
सध्यः सुधा सिन्धु स्नात, मांजल गंगा जल सॅ गात, सेवक खातिर तजलनि नवरतनक रजधानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।।
टपि कऽ अट्ठारह प्राकार देवी भऽ गेली साकार सभकेॅ सुना रहलि छथि अप्पन अभयावाणी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।।
हरि पीताम्बर सॅ पद झारथि, विधि सुरसरि सॅ चरण पखारथि, तरबा रगड़ि रहल छथि, रहि - रहि शंकर ज्ञानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।।
महिषासुरक आव की डऽर, माता छाड़ू सिंहक भऽर, लोके राच्छस भऽ कऽ कऽ रहलै मनमानी अय, मणिद्वीपक .............................................. ।। १.श्री काली नाथ ठाकुर-सून मिथिलाञ्चल…..। २.एकइसम सदीक नाम-प्रेम विदेह ललन ३.विनीत ठाकुर- जाढ़ श्री काली नाथ ठाकुर, आत्मज शिवनाथ ठाकुर प्रसिद्ध लोचन ठाकुर ग्राम सर्वसीमा, मधुबनी, बिहार JK सिंथेटिक्स लि० कानपुर में १९७३ सँ १९९५ तक कार्य कयला कऽ उपरान्त स्वास्थ्यक प्रतिकूलता सँऽ स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लय सम्प्रति कानपूर सारस्वत साधना मे संलग्न। सून मिथिलाञ्चल…..। सून मिथिलाञ्चल, जनु बूझि पडल छथि रूसि रहल- धरती सुखा कऽ भय गेल टाँट पडती पराँट फाटल दराडि-’ के देखि देखि अछि - कानि रहल जन जीवन, अन्नक क- अभाव पेटक चिन्ता, सर्वत्र व्याप्त अछि- मँहगी सँ जन जन तवाह सभ जन कनैछ छै धँसल आँखि ओ रुच्छ केश भऽ गेल सुखा कऽ काँट काँट सटि पेट- पीठ में एक भेल तन पर माँसक नहिं छैक लेश। छ्थि पूँजीपति बाबू भैया नेता मुखिया कर्ता-धर्ता पालनकर्ता सौँसे गामक छथि कर्णधार के बाजि सकत? कर तनि विरोध देथिन उजाडि दय दय मुसकी कसि व्यंगवाण, अव्वल गरीब पर चलनि रोऽऽब बैसल दलान पर रचल करै छथि षड्यन्त्र सतत निज घोघि बढेवाक हेतु दू- चारि वा दस बीस रुपैया कर्ज देथि- आ’ सादा कागज पर- औंठा निशान लगवावथि बिहुंसैत छथि रखैत कजरौटी बगलहि मे सदखनि के कय सकैछ दुनकर परतड बुधियारी में से बुझा दैत छथि अपनहि सभकें हे भारत भूमिक पुत्र आवहु चेतह, ई धर्मराज सभ रक्त तोहर रहतह चूसैइत सदा यदि नहि होयबह जागरूक लडह अपन अधिकार हेतु लोकतन्त्र केर रक्षा भय सकैछ तोहरे बलपर एवं लोक तन्त्र केर रक्षहि सँऽ बचतह तोहरो प्राण- इज्जति – मान॥ २.एकइसम सदीक नाम — प्रेम विदेह ललन अजगूत एकइसम सदी अछि क’ रहल होएबाक ने चाही जे सएह अछि भ’ रहल करैत छल धनिक यौ शोषण गरीबके गरीबे गरीबपर जुलुम आइ क’ रहल बदलि गेल अछि आब अपनक परिभाषा अपन त’ अपनेके घेंट अछि काटि रहल दहेजक बेपार अछि बनल विवाह प्रेमक नाटक आइ फैसन अछि भ’ रहल करैत रहू मंचपर जाति–पाति अंत जातीय संगठन अछि दिन–दिन बढ़ि रहल एखाने अछि अनपढ़मे भाइ इमानदारी पढ़लहबा जिलास’ देशधरि लूीट रहल चीउजे नै,मनुक्खो आब भेटैए नकली नाङट उघार ललन सदी अछि भ’ हल । ३.विनीत ठाकुर- जाढ़ मिथिलेश्वर मौवाही – ६, धनुषा, नेपाल जाढ़ गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ दुःखक पथार आव पसरल एकचारी थर–थर कापै बैसल बुधनी बेचारी हाथ–हाथ नहि सुझे लागलछै बड़ धूनी लाही लत्तिपर बरसै परै जेना फूँहीँ सुनि नहि पराती शब्दै नहि चिड़ीया कोक्रीया गेलै आइ की दादी बुढ़ीया गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ घूर की फूकब भटे नहि निङ्हाँस–पोरा करेजामें साटगे बुधनी नेनाके लऽ कोरा कोपित भऽ धर्ती–जलवायु उगलै छै जहर ताँय नागिन फूफकार छोरै शितलहर गत्तर–गत्तर जाढ़ दागे की कहु भाइ यौ राति काटब कोना ओढ़ीकऽ चटाइ यौ १.पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता २. सुदिप कुमार झा-दूटा रचना पूर्णियाँ कवि स्व. प्रशान्तक कविता- करू की वृद्ध अथबल छी पित्त तँ चढ़ैत अछि बहुतो करू की वृद्ध अथबल छी सुदमिया माय जे आयल छलि नैहरसँ महफापर चढ़ि कऽ तनिका साइकिलपर चढ़ि देखि सड़कक कातमे दुबकल छी करू की वृद्ध अथबल छी नवका पैसा सन बुधियार बनि चमकैत अछि छौंड़ा! पियरक्का दुअन्नीसँ अकार्य भेल बैसल छी- करू की वृद्ध अथबल छी मोकामा पुल बनि गेने सिमरिया घाटक स्टीमर जेकाँ अकार्य भेल बैसल छी करू की वृद्ध अथबल छी पित्त तँ चढ़ैत अछि बहुतो करू की वृद्ध अथबल छी (स्मृतिपर आधारित) सुदिप कुमार झा दूटा रचना ः— गामक सिमानपर फाटल दरारि चिबाब’ बबलगम लाब’ कोदारि मनमे छा’ पोसने किए गनगुआरि बांइट लेब मसुरी तोड़’ ई आरि एक पत्र प्रेमके लिखक’ त’ भेज’ सांठब हम भार अपन आंचर पसारि उठब’ मानवता, छोड़ि अड़ारि तों हमरा दुवारि हम तोड़ा दुवारि ०० पहाड़क उचाइपरस’ एकटा गुम्बाक खिड़की दने एकटा लड़की निचा देखैत छै उपत्यकामे बहुत–रासे गुड्डीसब आकाश्मे झुलुवा झूलि रहल छै अस्ताइत सुरुजक कातमे एकटा गुड्डी डुबकी मारैछ धरतीके चुम्मा लैत उठैछ आकाश दिस जखन घन्टी बजै छैक निस्तब्धतामे हेराइत ओकर पपनी भीज जाइत छैक नइ जानि किए उपर आकाशक लेल वा निचा संसारक लेल । १.एक भुम जोड़ एक सत्य बराबर दू क्षण- अयोध्यानाथ चौधरी २.२.हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा ३.नवका साल, पुरने हाल !-धीरेन्द्र प्रेमर्षि १ एक भुम जोड़ एक सत्य बराबर दू क्षण अयोध्यानाथ चौधरी १ कौखन हमरा सभक मौन आक््र�ामक बनि जाइछ आ विवेक सहजहि कोनो खिड़कि द’ उड़िया गेल रहैछ तावतधरि किछु निराश क्षणक प्रतीक्षा फेर ओकरा बजालैछ आ तावते ओकर काया–कल्प भ’ जाइछ सब मनुपुत्र मोम भ’ जाइत छथि एक–दू क्षणक जिनगीमे । कहियो चौंकल अछि अहांक दुनू तरहथ्थी ? आ तदुपरान्त किताब बनाक’ पढ़�हुं असछ ओकरा ः तहिए गिरह बान्हिगेल हमर बातक निर्जीब भेल आंखिके निहारैत रहि जायब अहां पलक टो–टो क’ फुसियाही आवेश करैत । मोने–मोने गुनैत ।। एक क्षण बाद हाथ अपनाके समेटि क’ अहांक माथपर चढ़िक’ बाजत नियामकस’ चकित छी अहांक दुष्ट व्यवहार पर’ आ’ ओ ओहि एक दिन सबसं बजै छथि भ्रम आ प्रवंचनाक कथा सएह पुछलक अछि की ः? केहन टांट सत्य राखि देलियह अछि सोझामे एकोबेर चुमिलैह टांट भेल गर्दनि, आ माथ, आ मुंह एहिना बुझबहक की जीबैत मस्किआइत गुलाबमे कांटने होइछ किदन । करन्द्वमे गछारल अहांक हीरक, मुक्ता, रुपरानी वा जे किछु ठीके बड़ कोमल आ सुन्दर अइ मुदा ततबे सत्य छैक विधान आ परम्परा ततबे कटु आ अनिवार्य । उधियाइत विवेक कें गछारिक’ मुनुपुत्र सुखी भ’ पायब निर्बिवाद । दुष्टता, भ्रम, प्रवंचना आ’ एकरा सभक संज्ञामात्र उधियाइत कोनो गैस थिक । एक परिवोधन आ शेष कविता २ एक मुट्टी अखरा बालु फंकबाक वाध्यता जतबे छोट भ’ सकैछ, ततबे विरात आ डूबल अछि हमरा घरमे एक–एकटा सीताक आक्रोश, आब बुझल जे सीता माने कोन दुःख । एकटा दृष्टान्त आ और किछु नहि मात्र एकटा निर्मम दृष्टान्त चाहिएक एहि लोकके, समाजके ओहि एकटाक पाछां सहस्त्रो कत्लेआम होइत रहैं निर्विध्न.... जीह नहि टकसैंत छैक एखनि । एकटा दूरन्त परम्परा किंबा रीति सहैत, बकार बन्न केनेछी हम–अहां आ सब अयाची हड्डी लुटौलन्हि, सेहो ठीक एकाएकी घाब बनाओल जाइत अंग अंगके निनिर्मेष तकैत रहु तखनि, सबटा ठीके–ठीके समाज चाहैए जे ओकरामे रहनिहार लोथ भ’ जाए ओकर एक एकटा प्राणी बीत राग बनल रहय आजीव, आ संघर्ष करैत रहय अपना गराक घेघंस । अहां अपनाकें खुदे परिवोधि लिअ एहिना कतेक छोट–छीन जीवन सामान्यरुपे वितैत–बितैत कौखन मनोरंजन हेतु आ’ कौखन अज्ञात, अनचेकामे कतेक कीड़ा–फतिंगा पोसि वा पीचि देल जाइछ । सरिपहुं तनुक अइ ई जीब । छुइ मुइ । कोने ने, ई सब कोनो बात छैक, एतेक निश्चय राखू जे परिबोधि नहि रहल छी हम अहांके, किएक त अहां आरो भयाक्रान्त क’ देब अहुं सएह कहैत छी कहि । एतबे बुझि राखु जहियांस अहां दृष्टान्त बनल छी हमरा अहांस’ सहानुभुति अछि । मनुक्खक पीड़ासं मनुक्खके सहानुभुति होइ ककरो दूटा आंखि पनिछा जाइ एहि स’ पैघ जीवनक कोन उपलब्धि भ’सकैछ ? हम किछुटा नहि कहब । आत्महत्या दूबेर प्रायः नहि भ’सकैछ , ई त, महज मामुली बोध थीक ओना अहांक कोना बिकल्प हमरा नीक लागत । जखन जीवन माने तनुक त’ की हर्जनृ एकटा द्दृष्टान्त बनल रही ? ओना हम पुछबाक व्याज मात्र करैत छी । २.हमर माय- डॉ. शेफालिका वर्मा आय हम अपन मृत्यु देख्लों लहास पडल छल लोग फुटि फुटि कानि रहल छल हमर जिनगी में ,हमर बाट पर कांट बिछावे वाला सव हिचुकी रहल छल जकरा हमर जीवन से कोनो मतलब नहीं छल सबहक मुंह से हमर प्रशंसा निकलि रहल छल (जेकरा लेल जीवन भरि हम तरसैत रहलों ) घढ़ी घढ़ी क गप्प फुलझरी जकां छुटि रहल छल ..... आह ? भीतर से ओ कतेक खुश छलाह असगर आकास में हम चान सन चम्कब दम्कब ई ते छल मोनक बात आंखि सावन भादोक आकास हमर बेटा सव स्तब्ध्ह हुनक चीकरब भोकरब देखि अपन नोर बिसरी गेल अपन दुःख बिसरि गेल जिनका लेल माय भरि जीवन तरसैत रहलीह की वैह लोग छथि ई सभ ?चैन से माय के एकोटा सांस नहीं लेबे देलान्ही की वैह लोग छथि ई सभ ??आ हुनक अंतरात्मा विद्रोह कै उठल चुप भय जाओ अहाँ लोकनि बंद करू तमाशा , ई कानब बाजब जिनगी भरि हमर माय दीयाजकां जरैत रहलीह आय जखन ई चैन से सुति रहल ऐछ गहीर निन्न में परल ऐछ तखन अहाँ सब किएक हल्ला मचा रहल छि किएक चिकरी रहल छि ??? सभ चुप भै गेल ..मायक मृत्यु से बेटा पगलाय गेल ऐछ .. आ दुनू बेटा झुकि के हमर माथ चुमलक ईश्वर: हमर माय के चैन देब , अगलों जनम हम एही माय के कोखि से जनम ली आ अचक्के ओ चिकरी कनैत बेसुध भय गेलाह "हमर माय " ३.नवका साल, पुरने हाल ! -धीरेन्द्र प्रेमर्षि फेर आबि गेल नवका साल हमर मुदा अछि पुरने हाल बदलल पतड़ा बढ़ि गेल खतरा एमकी कोना टहलतै काल! पाप बढ़ए जनु कोपर बाँस पुण्यक उखड़ि रहल छै साँस लोकक मूहक मुस्की देखू लगै जेना खरिदल मधुमास बाटघाट बिछबैत भ्रमजाल फेर आबि गेल नवका साल भेल पात झड़ि नाङट गाछ पोखरि छोड़ि पड़ाएल माछ सुग्घड़ रस्ता चलनिहारसभ लोथ भेल अछि लगने काछ मानवताकेर झुकबैत भाल फेर आबि गेल नवका साल फूटैत बम्म आ छूटैत गोली बन्द कऽ रहल न्यायक बोली नव-नव सालमे नव-नव ढङ्गे खेलल जाइ सोनितसँ होली धरतीक आँचर बनबैत लाल फेर आबि गेल नवका साल मिझाइत कालक दीप बुझी रातिक अन्त समीप बुझी दर्द निकालैत सृष्टिक घाओ बहा रहल अछि पीप बुझी ठोकैत एक नव-युगलए ताल फेर आबि गेल नवका साल धीरेन्द्र प्रेमर्षि- गीतसङ्ग्रह कोन सुर सजाबी? सँ १.सतीश चन्द्र झा २.मधेशक आवाज-वौएलाल साह ३.हिमांशु चौधरी-पाथर ४.-क्षणिका-प्रशांत मिश्र-हड़ाहि सतीश चन्द्र झा-राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। गरीबक स्वर्ग खसलै कोना ठिठुरि क' दुखिया माघक जाढ़ हार मे लगलै। काठी देह बयस अस्सी के क्षण मे देहक प्राण निकललै। छलै एकटा फाटल कंबल पुत्रक माया ओकरे देलकैं। अपने दुखिया आगि तापि क' पिता धर्म के मान बढ़ेलकै। भाग्यहीन जीवन गरीब के भूखल पेट बृद्ध के काया। बिना स्वार्थ के दान कहाँ छै। के बुझतै सरकारक माया। मुक्त भेल कहुना झंझट सँ माया मोह त्यागि क' भागल। गाम टोल के लोक सहटि क' सद्गुण ओकर बखान' लागल। कते नीक छल दुखिया सभकें दैत रहल ई संग गाम मे। जायत स्वर्ग भक्त छल भारी लीन रहै छल ‘राम नाम' मे। लगलै हँसी जोर सँ सुनि क' पड़ल देह दुखिया के तखने। कते लोक अछि एखनो पागल आइ बुझलियै हमहूँ मरने। दुख अभाव पीड़ित जन जीवन कोना स्वर्ग केर सीढ़ी चढ़तै। धर्म कर्म धन कें शोभा छै निर्धन की ईश्वर ल' करतै। २.मधेशक आवाज- वौएलाल साह
मँा जानकी सँ कामना करैछी, शहीदक सवहक चिर शान्तिक लेल बढ़ु मधेशी आगा बढ़ु मधेशक अधिकार प्राप्ति लेल युवा, विद्याथीिर् आंदोलन करु,मधेशक अधिकार प्राप्ति लेल, एही आंदोलनमे नै लड़लौ, त भाग्य बुझु जे फुटीए गेल व्यापारी, कर्मचारी सेहो लरु, अपन भविष्य वचाव लेल काम,काज छोइर आँन्दोलन करु, हजुरी प्रथा छोरावैइ लेल मधेशी शहीद पुकाइर रहलछै, मधेशक अधिकार प्राप्तिलेल सहीदक सपना पुरा करु, मिटा दिअ शासक के खेल इ नेपाल को छै वाटल, हिमाल, पहाड़, तराइ तै कैला एही मधेशीके “मधेश‘ वाँटमे छै पुरे ऊरीए गेल हिमाल, पहाड़,तराइ तँ’ कैला छुटियौलनि, कधेश शाषक के जेव मे गेल जागु मधेशी जेवी फारु, अपन मधेश पावै के लेल, मधेश,तराइ के वोट लकँ’ शाशक सव आगा वढ़ि गेल। तराइन, मधेशी, लडि रहल अइ, देखु केहन शाशकके खेल पानिस’ ठंढ़ा आगी स गरम, एही आब आंदोलनके गती छै भेल, मधेशी आयोग कायम हो, एही शाशक वर्ग शवहक लेल ३.हिमांशु चौधरी पाथर १ पाथरकें आगां दीप बारैत किएक समयके बरबाद कएने छी ओकर आंखिमे एतेक गर्दा पड़ल छैक जे फुल आ गाछ धरिकें ने देखैत अछि फुल आ गाछक जीवन कलासन अछि काव्यसन अछि दृश्य आ द्रष्टाक प्रतीकसन अछि तें किएक ने पंचम स्वरमे फुल आ गाछक गान करब विश्वास अछि एहि दुनूकें गानसं पतझड़ सेहो मधुमास भ’ क’ आबि जाएत ताहि कारणे पाथरकें सुतए दियौ किएक की पाथर तं निद्राक अन्तिम अवस्था होइत अछि । २ कथा शुन्यभाव शुन्यकाश होइतहुं ने बिसरल छी व्यथा ने खतम होइबला अछि अनन्तता सुनल अछि विश्वास आ प्रेमहिसं संसार बनल अछि शुन्य नकारने छैक शुन्य तं पुर्णक गर्भमे होइत अछि शुन्यसं सभ उठैत अछि आ ओहीमे सभ लीन होइत अछि कतेक बड़का अछि पृथ्वी तरहथीके भीतर अछि एकर आयतनजे कखनो सुटैक जाइत अछि त क कखनो फुलि जाइत अछि तें इतिहास आ वर्तमान बीचक अन्तरकें सड़क साक्षी रखैत बिसङगतिक खाद्यि आ आत्मकथाकें कथा बीच बांचल छी सर्व सत्ये प्रतिष्ठितः ल’ क चेतनाक संवाहक सभके प्रतीक्षामे छी जे एकटा स्मृतिक दोसर ताजमहल बना देत तत्वमसि निर्मित मुल्यके प्रतिष्ठित क’ देत । ३ की भार सांठू लाते–लातसं घाहिल लाशे–लाशस’ गन्हाएल सङक्रान्तिक पीड़ामे की भार सांठू थुराएल चानी फुफुड़िआएल अहिबक फड़ शोकाएल चाउर पिपाएल आंजुर दन्तकथाक पात्रजकां कचोट द’ रहल अछि गत्र–गत्रमे बेधल भाला–गड़ांस टीसे–टीस द’ रहल अछि फाटल–चिटल कपड़ा–लत्ता मूंह कतहु हाथ कतहुं स्ट्रेमे राखल सिगरेटक ठुट्ठीसन लावारिश भ’ गेल इतिहासमे बहल नोर फेर एहिबेर सेहो बहि गेल गन्हाएल लाशक भार कोना क’ सांठू ? अनिष्टकारी अमरौती पीने अछि ओकरा लेल सत्यम, शिवम आ सुन्दरमक सर्जक बाधकतत्व बाधकतत्व मरि जाए माहुरे–माहुर भ’ जाए अन्याय अमरलती द्रौपदीक चिरसन नमरैत चलि जाए एहन सनकमे सनकैत ओकर अमरौती कखनो बारुद फेकैए कखनो धराप रखैए बारुद आ धरापमे पोस्तादाना कत’ ताकू जे अनरसा बनाएब आ भार सांठब... क्यानभासमे फाटल गाछदेखि अन्हड़ि–बिहाड़ि अएबे करत विश्वासक जयन्ती अङ्कुरित भेल अछि परन्च बहुतो धोएल सींथक सेनुरक कारुणीकताक भार कोनाक सांठू ?.... ४ गीत उड़ैत धुआंमे करेज उड़ैत जा रहल अछि जीवित इच्छा सिसकी भरैत जा रहल अछि पियाला भितर मदमस्त चेहरा देखैत छलहुं ओहि चेहराकें रेखा कोरैत छलहुं हम गरम बुन्नीमे चेहरा पकैत जा रहल अछि सिनेहक कसगर बन्हनमे बान्हल छलहुं हम ओहि बन्हनकें तोरण बनौने छलहुं हम झहरैत नोरमे बन्हन खुजैत जा रहल अछि सोनित एके होइतो पेराएल हलहुं हम बित–बितपर तिरस्कारस पीड़ाएल छलहुं हम सिलेटके आखरसन सभ मेटाइत जा रहल अछि ५ बाल गीत कुत–कुतामे जितलहुं तं गोटरसमे ओसरा गेलहुं गोटी देखि–देखि चकित छी, की करु चकरा गेलहुं आस रखने छी जितैत जाइ झिझिरकोनामे घेरा जाइत छी आस–पास कहैत–कहैत धप्पा कहए ले बिसरा जाइत छी कट्टी करु ककरांस’ झुला झुलैत ओझरा गेलहुं एक सलाइ, दु सलाइ तेसर बेरमे चोन्हरा जाइत छी पानि–पानि कहैत–कहैत अंगनेमे ओंघरा जाइत छी माछ–माछ बेंग कहए काल, अंगुरी मोड़एमे गड़बड़ा गेलहुं कौड़ी तासमे पाइ हारने मन्हुआ जाइछि तीर–धनमी चलबैत काल सङीएके आखि फोङि देलहुं ४. क्षणिका-प्रशांत मिश्र हड़ाहि एकटा हड़ाहि जे राति मे पटकलन्हि साँए के तोड़लन्हि चौकी भोरे-भोर पड़ोसनी के गरिअबैत कहलखिन्ह हँ,चुप्प रह गे सत्तबरती राँड़ी, छुच्छी, सँएखौकी १.अरविन्द ठाकुर-गजल २.महेन्द्र कुमार मिश्र-पद्य ३.इन्कलाव सुरेन्द्र लाभ अरविन्द ठाकुर गजल कोना अजुका दिन ससरतै, राति कटतै हओ भजार एक–एकटा पल हमरा लेल सूनामी केर प्रहार बिसरि गेलछि मोन पछिला बेर कहिया खुश भेलहुँ डाकिया आइयोने आनलक अछि कोनो खुशखबरीक तार ई महाजन, ऊ महाजन, नञि कतहु अछि रामाबाण बाण बेगरताक अछि भोंकल करेजक आर–पार यओ अन्हारक दास! आबहुँ संततिक हित कामनासँ बजरगुम्मी तोड़ि, करू किछु आगि बारयकेँ जोगार पीड़सँ लड़बाक लेल राखय पड़त निज पर भरोस पीड़ हरय के लेल नित्तह नञि एताह कोनो औतार आधा–छिछा रहि जाइछ ‘अरबिन’ जीवनक सभटा गजल ओझरल रदीफो–काफिया आ माथ पर मिसरा सवार गजल कानिकए बड़ी काल नेना हारिकए चुप भए गेलै लगैए एहि ठामकेँ सभकान दिल्ली भए गेलै पागधारी मगन छथि अपनहि बनायल कूप मे हाथ भरि नम्हर जखनकि टीक दिल्ली भए गेलै पेट, बासन, मुँह, जेबी, लोक–वेदक सभ सिंगार गाम, घर, सीमान सभ केँ छुछ दिल्ली कए गेलै ठेठ दिल्ली सँ चलल अछि प्रगतिक दाबा सूनामी अनघोल दिल्ली मे भेलै जे देश दिल्ली भए गेलै जे भेला औतार, पैगम्बर, मसीहा सन कनेको सभ केँ पोसुआ बना ‘अरबिन’ दिल्ली लए गेलै। गजल मोन केँ छः पाँच छोड़ू, गिरह राखब नीक नञि हाथ मे साबून लए कए फागू खेलब नीक नञि आदम जकाँ जन्नत के वर्जित फल पर नण्ज़ि हा लगाऊ क्षण भरिक जे खेल, सदिखन सएह खेलब नीक नञि शब्द के औजार सँ भड़कायब लोकक भाव केँ खेल छै ई सहज किंतु ई खेल खेलब नीक नञि ’ढ़ाइ आखर प्रेम’ पढ़ि पंडित भेला फक्कर कबीर अहाँ एकरा खेल बूझि एकरा सँ खेलब, नीक नञि हे! मखौलक वस्तु नञि थिक एहि प्रकृतिक उपादान माटि, पानि कि रौद, हवा स द्धुत खेलब नीक नञि खन आजादी, खन किरांती, खन चुनाओक खेल–बेल पहिर खद्धर खेलैत अयलहुँ, आर खेलब नीक नञि मृत्यू केँ खेलौर बूझि खेललहुँ सगर जिनगीक खेल आब लगैछ जिनगी सँ ‘अरबिन’ एना खेलब नीक नञि। गजल की कही एहि बाढ़ि मे डगरक कथा–खिस्सा खराब समाधिआरय मे खराब, ससुरारि मे बेसी खराब बाढ़ि मे छप्पर निपत्ता, भेटल तारपोलीन खराब चाऊर खरबहे छलै आ दालि किछु बेसी खराब बाढ़ि मे भेटत कतय किछु नीक बोली कि वचन मुखियाक बोली ओलसन, बीडीओ के मुँह खराब डाग्डरक त कथे नञि, एहि बाढ़ि मे औषधि खराब एहि खरबहा हाल मे धीया–पूता के मोन खराब चढ़ल बाढ़ि आ सूचना–सम्वाद के साधन खराब हाकिम सभक वाहन खराब अछि, नाह के पेनी खराब की धसय छी बाढ़ि पर ‘अरबिन’, अहाँक माथा खराब मतला त बकबासे जकाँ, मकता कने बेसी खराब २.महेन्द्र कुमार मिश्र, पूर्व सांसद, चेला चम्ाच आ दलाल राखू अपनेटा संग सेबाके सुविधा मिलत जनतामे रहत रंग जनतमे रहत रंग चम्चा बहुत जरुरी चम्चा जौं होय संग होएत सब आशा पुरी चर्चा अछि ओहि महा पुरुषके जे रामके वरण करए जनता सभहक वात नहि वुझे अपने खुट्टा धरए अपने खुट्टा धरै विवेेकक रति नहि लेस संवेदनाक स्वर कतौ नहि,जड़ै रहए मधेश जिरीजा माधव आ हो प्रचण्ड,किएक चाही लोकतन्त्र लोकततन्त्र आव लोप भेल भोग तन्त्र ला’ लडू जनता सभहक हकहीत की,अपन झोड़ा भरु अपन भरु नहि त’ पछतावा हेायत वैर विरोधक चिन्ता नहि अपन परार कतै जायत जुरल रहु यहि जोगारमे अपन परिजन नहि छुटए लुटव अछि संस्कार हमर लुइट सकी से लुटए गाथ कथमैप नहि छोडूु धयने रहू झोड़ा पात्र अपने वायह लायेक छी जेना सल्हेसक घोड़ा मंत्री नहि महामंत्री एहि धरतीक द्वय पुत शरमस’ं मिथिला कानि रहल, देख हिनक करतुत देख हिनक करतुत जनता धिक्कारि रहल अछि लोभ लालचमे फसल नेताक,े आव जनता झटकारि रहल अछि संविधान सभा निर्वाचनमे देखल एहन ताल जनतासभ आराम करैछ, नेता अछि वेहाल पैसा सभहक लोभमे फसल, विकायल मधेशी नेता टेण्डर भरि भरि मधेशक टिकट एत’ देता गुन्डा बदमास आ उच्चका पौलक मधेशक टिकट जेकरा विरोधमे मरल पचासो वायह मांग सिटत आवहु जागू, जागूु औ मधेशी भैया जिनगी भरि पछतावि रहव, करव,हाय दैया ३.इन्कलाव सुरेन्द्र लाभ अन्हर उठल, विहारि उठल अछि, आगि उठल अछि, पानि उठल अछि, हर दिलमे दावानल धधकए गाम गाममे बाढ़ि उठल अछि बच्चा उठल, जवान उठल अछि, जनी उठल अछि, जाति उठल अछि, गली गल्लीमे आगि पसरलै आइ हमर श्मशान उठल अछि आइ राम उठल, रहमान उठल अछि, कुरान उठल अछि,रामायण उठल अछि । शंख चक्रलए कृष्ण सभामे महाभारतमे अखनि तुफान उठल अछि । बन्दूक उठल, गोला उठल अछि बारुद उठल अछि, बुट उठल अछि छैने ओतेक पेस्तोलमे गोली बच्चा बच्चा जाति उठल अछि । भार उठल,साँझ उठल अछि, बेर उठल अछि, राति उठल अछि नसनसक खून अछि खौलि रहल चुल्हीक छाउरमे आगि उठल अछि । शोषित उठल,शासित उठल अछि दबल उठल अछि, थकुचाएल उठल अछि शाषक वर्गक नीन्न उड़ल अछि ओकर डरे थर–थर काँपि उठल अछि । नारा उठल , आकाश उठल अछि, बस्ती उठल अछि, गाम उठल अछि, घर–घरमे अन्घोल उड़ैए मुट्ठीमे इत्कलाब उठल अछि । शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! ऋतुराज मे विरहिनी !! पिया कोना कऽ बिततै फागुन मास अपार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥ कोइली कुहकै ठाढ़ि पात होईछ मन मे अघात एकसरि डूबि रहल छी, अहीं बिनु हम मझधार औ जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥ भ्रमरक गुंजन लागय तीत, केहेन निष्ठुर भेलहुॅ मीत कोना कऽ सूखि सकत ई फूटल अश्रुधार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥ सखी सभ सदिखन अछि कवदाबय, बिछुरन रोदन लऽ कऽ आबय बिहुंसल यौवन पसरल मेघ आ अभिसार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥ देखिते अबीर गुलालक रंग विरह बनौलक कलुष उमंग कहू कोना उठत ई मृत शय्या क कहार औ, जीवन भेल पहाड़ औ ना ..... ॥ !! चश्माक बोखार !! सोलहम मे कएल अंतःस्थ प्रवेश, हुलसल मन गेलहुॅ नवल देश । हिय बसथि कला । धयलहुॅ विज्ञान, राखल जननी ईच्छाक मान । वैद्य अंगरेजिया वनि बचाबू दीनक परान, अर्थहीन मिथिला मे बढ़त शान । धऽ ध्यान सुनल सृष्टिक इच्छा, गॉठि बान्हि लेलहुॅ लऽ गुरूदीक्षा । कॉलेज मे बीतल पहिल सत्र, आओल तातक आदेश पत्र । पढ़िते आबू अहॉ अपन गाम, हैत ज्येष्ठक विवाह विद्यापति धाम तन झमकि गेल, मन गेल गुदकि भौजी केॅ देखबनि हऽम हुलकि । आगत रवि पहुॅचल जनम ग्राम, शत अभ्यागत छथि ताम-झाम । चहुॅ - दिशि भऽ रहल चहल पहल, चिन्ह - अनचिन्ह सखा सॅ भरल महल । एक नव नौतारि बहुआयामी, पूछल सॅ छथि छोटकी मामी । प्रथमहि हुनका सॅ भेंट भेल, भेल दुनू गोटे मे क्षणहिं मेल । सॉझे औतीह दीदी अनिता, आकुल मॉ केर एक मात्र वनिता । देखिते देखैत आबि गेल सॉझ, मॉ तकिते बाट ओसार मॉझ । दीदी आंगन अयलि हॅसिते हॅसैत मॉ गऽर लगौलनि ठोहि कनैत । दीदीक नयन हेरायल रिमलेस मे, देखि मामी पड़लनि पेशोपेस मे । चश्मा मे सुन्नर दाईक विभा, बढ़ि रहल हिनक नयनक शोभा । मामी ! ई सऽख नहि अॉखिक इलाज, मॉथ दर्द सॅ छल वाधित सभ काज । सुनि मामी मोन भऽ गेल अलसित, हुनक वाम अॉखि मे पीड़ा अतुलित । नोचिते नोचैत भेल नयन लाल, दर्द पसरि रहल सम्पूर्ण भाल । आंगन दलान पीड़ा किल्लोल, अॉखि धोलनि लऽ जल डोले डोल । फूलि गेल नयन केर अधर पऽल, हऽम सेकलहुॅ लऽ गुलाब जऽल । वैद्यो आयल नहि कोनो असरि, कछमछ कऽ रहली - रहली कुहरि । माते कयलनि बाबूजीक ध्यानाकर्षण, अॉगन मे आबि ओ दऽ रहला भाषण । सभ दोष सारक नहि दैछ ध्यान, वयस तीस मुदा एखनहुॅ अज्ञान । रक्त जमल विलोचन झिल्ली मे, सैनिक कंत पड़ल छथि दिल्ली मे । सरहोजि सॅ पुछलनि पीड़ाक काल, पहिल बेरि भेल छल परूॅका साल । मॉ सऽ कहलनि लाउ नव अंगा, हिनका लऽ जायब दड़िभंगा । तिरस्कार करब नहि हएत उचित, कनिया दरद सॅ अति विहुंसित । काल्हि अछि विवाह अहॉ जुनि जाऊ, करैत छी उपाय नहि घबराऊ भोरे ‘टिल्लू' जेता हिनक संग, नहि विवाह मे कऽ सकलनि हुड़दंग । भातृक सासुर जेता चतुर्थी मे, मातृ आदेश लागल हम अर्थी मे । नहि बात काटल शांत छलहुॅ सुनैत, राति बितल सुजनी मे कनिते कनैत । कोन बदला लेलक बापक सार, अपन संकट बान्हल हमरा कपार । मामी केॅ हम नहि चीन्हि सकल, भीतर सॅ इन्होर ऊपर शीतल । नहि जा सकलहुॅ हम वरियाती, गाबै छी हुनक दुःखक पॉती, भोरे उठि दड़िभंगा जा रहलहुॅ, नैनक शोणित सॅ नहा रहलहुॅ । पहुॅचल डॉक्टर मिसिर केर क्लिनिक, चक्षुक चिकित्सक सभ सॅ नीक दुआरे पर कम्पाउन्डर नाम पुछल, मामी नुपूर कहनि ओ कुकुर लिखल । देखऽ मे भऽल पर वज्र बहीर, उपरि मन हॅसल, भीतर अधीर । वैद्य मिसिर कहल नहि दृष्टि दोष दुहू अॉखिये देखै छथि कोसे - कोस । नेत्रक आगॉ नहि अछि अन्हार हिनका लागल चश्माक बोखार । हम लिखि दैत छी शून्य ग्लास, बुझा दिऔन हिनक रिमलेशक प्यास । ताहू सॅ जौं नहि हेती नीक, अॉखि सेकू बनि स्नेही बनिक, अधर पर मुस्की आगॉ अन्हार, कानल मन सोचि विवाहक मल्हार । डॉक्टर बनऽ केर तृष्णा मन सॅ भागल, एहेन मरीज भेटत तऽ हएब पागल । धुरि गाम माता केर करब नमन, तोड़ू जननी हमरा सॅ लेल वचन । चशमिश नैन मामी छथि अति गदरल, हमर योजना हिनक भभटपन मे उड़ल । १.कुमार पवन-नहि बिसरैछ/ काल्हि तँ रवि छै २.रोशन जनकपुरी चप्प्ाल आ सड़क ३.ओम कुमार झा- थर थर कापिँ रहल छौ तोहर पयर ४.राजदेव मंडल- कविता कुमार पवन, वास्तविक नाम–डॉ. पवन कुमार झा जन्मतिथि–27/12/1958, स्थायी पता– ग्राम+पत्रालय–मुरैठा, भाया–कमतौल, जिला–दरभंगा, बिहार पिन कोड–847304 वर्त्तमान पता–द्वारा–डॉ. पी. के. झा, पी. जी. टी. (हिन्दी), केन्द्रीय विद्यालय, कटिहार (बिहार), पिन कोड–854105 मो. 09430038969 शिक्षा–एम. ए. (हिन्दी), बी. एड., पी. एच. डी., आजीविका–केन्द्रीय विद्यालय संगठन मे पी. जी. टी. (हिन्दी)क रूपमे कार्यरत लेखन–विगत शताब्दीक नवम् दशकक प्रारंभमे कविता लेखन सँ साहित्य–कर्म प्रारंभ। प्रायः डेढ़ दशक धरि कविता, कथा, व्यंग्य आ आलोचनात्मक निबंधक विरल लेखन। एक दशकक मौनक बाद लेखनक दोसर पारी 2008 ई. मे प्रारंभ। शीघ्रहिं कविता–संग्रह कथा–संग्रह आ व्यंग्य–संग्रहक प्रकाशनक तैयारी। नहि बिसरैछ नहि बिसरैछ....नहि बिसरैछ एको पलक लेल नहि बिसरैछ जाड़क ओ ठिठुरैत कनकनायल भोर.... सघन कुहेस केँ चीरैत मध्यम गतिएँ आगाँ बढ़ैत बिलमल छल मुजफ्फरपुर टीसन पर अवध आसाम एक्सप्रेस स्लीपरक कोच नम्बर सात मे इक्का दुक्की लोक सभ टायलेट दिस अबैत जाइत बाकी यात्री सभ मारने गुबदी अलसाइत.... चाहवला बिस्कुटवला अघन अघन स्मानक सस्वर विज्ञापन करैत कऽ रहल छल जड़ता केँ भंग.... कि तखनहि ओ चढ़ल छल बॉगी मे चुपचाप प्रायः दस बर्खक दुब्बर–पातर धुआ कँचि आयल आँखि बहैत सुड़सुड़ाइत नाक मैल–चिक्कट फाटल शर्ट सँ कहुना कऽ झँपने अपन देह गर्दनि सँ ठेहुन धरि मुलकल कठुआयल खाली–खाली पएर.... निःशब्द लागल बहारय ओ बॉगी मे छिड़िआयल प्रयुक्त–परित्यक्त पदार्थ सभ खाली डिस्पोजेबुल कप खोइया चिनिञा बादामक सिगरेटक मिझायल शेषांश सिट्ठी तमाकुलक अँइठ–कुइठ भरल कागजी प्लेट.... मारि कऽ ठेहुनियाँ निहुरैत निचला बर्थ तर ढुकैत चीज वस्तु सभ केँ एम्हर ओम्हर घुसकबैत एतऽ सँ ओतऽ धरि बॉगी भरि बहारैत रहल....बहारैत रहल खुजि कऽ ट्रेन अपन गति सँ बढ़ैत रहल.... खतम कऽ काज पसारि देने रहय ओ अपन कठुआयल हाथ एम्हर बॉगी भरि पसरल देखि गंदगी राति मे जे यात्री सभ भेल रहथि परेशान तनि गेल छलनि एखन हुनके सभक चेहरा देखि कऽ एहि अवांछित याचक केँ क्यो असहज देखि छौड़ाक घिनायल धुआ प्रश्नाकुल क्यो जे कोन लापरबाहक ई अछि संतान देशक बेसम्हार जनसंख्याक प्रति चिंतित क्यो विस्मित क्यो आखिर विदाउट टिकट ई सभ चलैत अछि कोना क्यो–क्यो तँ एकदम स्पष्ट छलाह– चोरक गिरोहक तँ ई अछि एजेंट.... जाड़क ओहि कनकनायल भोर मे कोच नम्बर सातक बोनाफाइड यात्री सभ मसृण कम्बलक उष्णता मे सुटकल करैत रहलाह धुरझाड़ विमर्श जनसंख्या विस्फोट पर असुरक्षित यात्रा पर बाल मजदूरी पर सरकारक असफलता पर देशक दुर्दशा पर आ ओम्हर ओ दस बर्खक गरजू अबोध मजदूर सभ किछु सुनैत रहल सुनियो कऽ टारैत रहल ठोर–पर ठोर सटौने एक–एक व्यक्ति लग जाइत रहल अप्पन नान्हिटा खाली हाथ बेर–बेर पसारैत रहल.... नहि बिसरैछ....नहि बिसरैछ एको पलक लेल नहि बिसरैछ खजूर–पातक बाढ़नि पकड़ने ओ वाम हाथ याचना मे पसरल ओ खाली–खाली दहिन हाथ आ काँची सँ भरल ओ चमकैत आँखि दून नहि बिसरैछ....। काल्हि तँ रवि छै ओ आइ मुदित छलाह दूनू बेकती कामकाजी कहुना कऽ एक दोसरा सँ राजी बूढ़ छलथिन माय बाप तीन तीन टा बाल बच्चा अध्ययनरत पलखति नहि दम लेबाक एक दोसराक हाल पुछबाक दगमगाइत सम्हरैत कोसक कोस दौगैत कण–कण केँ दुहैत क्षण–क्षण हकमैत मुट्ठी मे बसात पकड़ैत ठेहिआयल छलार मुदा, आइ मुदित छलाह मुदित छलाह जे सप्ताहक आइ छैक अंत काल्हि तँ रवि छैक रहब कल्हि निश्चिंत काल्हि तँ रवि छैक.... जदपि ओ नीक जकाँ जनैत छलाह राखल छनि तैयार कयल काजक दीर्घ पुर्जी काजक आगाँ अपन कोन मर्जी बजौने छनि काल्हिए दर्जी काल्हिए जुटयबाक छनि घरक खर्ची कीनबाक छनि माय–बापक लेल दबाइ ट्यूटर बिनु अटकल छनि बेटाक पढ़ाइ ठीक करयबाक छनि टी. बी. कतोक दिन सँ पत्नी चथिन्ह परेशान गैसक चूल्हि कऽ रहल छनि हरान नोकरी करथु कि भुकभुकाइत चूल्हि सँ संघर्ष स’ख तँ भइए गेलनि सुड्डाह मुदा, कैयो नेञ सकैत छथि आह.... से ओ नीक जकाँ जनैत छलाह जे पछिले अनेक रवि जकाँ कल्हुको रवि आयल जेना अबैत रहल अछि आबि कऽ चलि कायत जेना जाइत रहल अछि औचके मोन चलल छलनि प्रश्नोत्तर की सरिपहुँ काल्हि रवि रहए? की सरिपहुँ काल्हि रहब निफिक्किर? नहि! जिनगी मे कोनो रवि कहाँ? समय बीतैत अछि अविराम जिनगी मे कतय अछि आराम? तदपि पता नहि किएक बना कऽ रखैत एकटा सुखद भ्रम ओ आइ मुदित छलाह चलू सप्ताहक आइ छैक अंत काल्हि त रवि छैक रहब काल्हि निश्चिंत काल्हि तँ रवि छैक २.रोशन जनकपुरी चप्प्ाल आ सड़क तहिया सडक गर्म कएने रहै ओ चप्पल सब जकर चुल्हा रहै ठंंढा आ पेट रहै खाली, अपन चुल्हाके पक्षमे अपन चुल्हाके पक्षमे, चप्पलक चापस’ आ ठंढा चुल्हाके तापस’ जनमलै एकटा ज्वालामुख्ी आ एकटा भूकम्प, आ हमर चप्पलवाली मायके आंइखमे आश भइर गेल रहै गर्म चुल्हा के आ अखन, चप्पल सबत अखनो सड़केपर अछि मुदा जुत्ता सब जे तहिया चप्पल संगे सड़के पर दौड़ैत रहै, दिशा बदलि लेने आदि हमर चप्पल वाली मायके पेट अखनो खालिए अछि चुल्हा अखनो ठंडे अछि आ हम्मर चप्पलवाली मायके आंइखमे आक्रोश भइर गेल अछि तैं, आक्रोशके गीत लिखाइते रहबाक चाही अग्नी गीत गबैते रहबाक चाही आ चप्पल सब के सड़क गर्म करिते रहबाक चाही ३.ओम कुमार झा
थर थर कापिँ रहल छौ तोहर पयर रे खसवादी तो वाजल छें मधेशीया होइत अछि कायर मुदा मधेशीयाक जोस देखि थरथर काँपि रहल छौ तोहर पायर। जागी गेल छै मधेशी अपन अधिकार हथियाब लेल घरघर सँ उमरल छै मधेशी मधेशी सरकार बनाब लेल पचसि शहीदक खुन कहि रहल छै, उठ मधेशी उठ उठ धोखा, फरेब देखा रहल छौ, गिरिजा कोइराला उँट । हिरण्य कश्यप प्रचण्ड वाजल ओ बन्दुक उठाओल मधेशीके मार लेल मधेशीक बच्चा बच्चा प्रहलाद वनी खनत गड़दा ओकरो गार’ लेल मधेशक भुमिसँ आन्दोलनक ज्वाला धधकल छै जे आओत ओकरा मिझाब ओ ओहि जरि मरलै झुकल गिरजा, झुकल प्रचण्ड झुकल मधेशी दलाल सभ पयर पकड़ि गिरगिरेनै गिरजा– दलाल सभ । वहुत खएले मधेशीक कमाई आव नहि तोरा पचतौ रे मधेशी अप्पन हिस्सा नेने आब तोरा नहि छोड़तौ रे। दू शय अठतीस वरिस सँ मधेशिया के वड़ ठकले रे छद्म रुप तोहर देखार भ गेलौ आव तो नहि बचवे रे । लोकतंत्रक नकाब लगा राक्षसी रुप तों नुकाओले रे हमरे घर फुटाक हमरे भाइके बंधुआ–वहिया बनौले रे खबरदार आब सुने नङटा आव नहि चालि चलतौ रे अप्पन अधिकार लेव’ लेल मधेशिया सिंहदरबार बँटतौ र । जनसंख्याक आधारमे चुनावी क्षेत्र ल छोड़बौ रे तोहर नाक रगड़ि संघीय व्यवस्था ल लेबौ रे । आई मधेशीयाक हुनकर सुन जन जन वजै छै एके बात मधशी एकता जिन्दावाद मधेशी एकता जिन्दावाद । ४. राजदेव मंडल 1.झाँपल अस्तित्व नहि जानि कहियासँ चाँपल अछि हमर अस्तित्व एकटा आकृतिसँ झाँपल अछि कखनहुँ काल ओ देखबैत अछि-त्रास बारम्बार हटेबाक हम कऽ रहल छी-प्रयास किन्तु ओ नहि छोड़ैत अदि-बास टकराइत रहैत अछि हमरा मतिसँ निर्बाध अपना गतिसँ देखऽ चाहैत छी हम सरुप नहि अछि हुनक कोनहुँ-रुप सुनने छलहुँ हम खिस्सामे एहन अनजानकेँ देखि सकैत अछि शीशामे हम मानैत छी खास ज्ञानेन्द्रियाँसँ जानैत छी भीतरमे ओ लगा रहल अछि-फानी सुनि रहल छी वक्र-वाणी प्राप्त करबाक लेल उत्कर्ष करऽ पड़त आब संधर्ष नहि तँ बना सकैत अछि हमरा जोगी किन्तु अस्तित्वक लेल अछि एहो उपयोगी। 2. रहब अँहीं सभक सँग चिचियाकेँ सोर पाड़ैत हमर कंठ दुखा गेल पियाससँ जेना ठोर सुखा गेल चारुभर भरल लहाश कऽ रहल अछि हमर उपहास कियो नहि सुनैत अछि हमर आवाज कतऽ चलि गेलाह हमर समाज जरुरी छल एहि रुढ़िकेँ तोड़ि देब भविष्यक हेतु नव दिशा मोड़ि देब अहाँ सभ तँ अपनहि छी अगाध अग्रसर होऊ छोड़ू विवाद नहि रोकि सकत कोनो बिध्न बाध हम नहि कएलहुँ कोनहु बड़का अपराध हेओ एमहर आउ नहि खिसिआऊ नहि करब आब नियम भंग नहि करब अहाँ सभकेँ तंग लिअ अपन राज नहि चाही हमरा ताज नहि बदलब आब अपन रँग रहब मिलि जुलि सभक सँग। 3.आह- लिअ पड़त आह करुणा अथाह बाहर शीतलता किन्तु भीतरमे दाह चारुभरसँ घेरलक आह लोग कहि रहल वाह-वाह अछि विश्वास छूबि लेब आकाश किन्तु पाइर तर अछि असंख्य लहाश चिचिआइत दास तइयो बढ़ल जा रहल मनक चाह पार लगाउत कोन नाह बिनु लेने आह कि भेटि सकत वाह-वाह परंच, नहि छी लापरवाह खोजब नवका राह। 4. ज्ञानक झंडा अनन्त अभिलाषा बदलि देलक परिभाषा आकाश सब जगह भरती भऽ गेल चिरई चह-चह लोग सह-सह गन्ध मह-मह अन्न गह-गह भरल जान-माल टूटि गेल जर्जर जाल ज्ञान आब तोड़य ताल भागल तंत्र-मंत्र सर्वत्र चलि रहल यंत्र आब नहि चलत अंधविश्वासक हथकंडा फहरा रहल विज्ञानक झंड़ा चहुँदिश छँटि गेल अन्हार भऽ रहल जय-जायकार नित नूतन आविष्कार अपरम्पार बना रहल धराकेँ स्वर्ग सन किन्तु कतऽ सँ आनत ओहन जन-मन तइयो लगौने आस कऽ रहल प्रयास नहि जानि झंडा आब कतऽ गड़त कोन नव दुनियाँ केँ खोज करत। बालानां कृते- १. आशीष चौधरी २. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक प्रसंग ३. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) आशीष चरैया, अररिया नाम: आशीष कुमार चौधरी पिताक नाम: श्री नवल किशोर चौधरी पता: गाम–चरैया, जिला–अररिया, बिहार। लघु कथा जीत गयो मोर कान्हा बड्ड पुरान एकटा सच कथा अछि। एकटा मगंलवार गामक लड़का छलै जकर नाम विद्यानंद छलै। ओकर बियाह नहि होमए छल। किऐक तँ उ आंखिसँ आन्हर छलै। बड्ड दिनक बाद एकटा धीमा गामक लड़कीसँ बियाह तए भेल आ बड्ड पैसा लऽ कए ओकर बियाह धीमा गाममे तए भेल। किएक तँ उ लड़का हाई स्कूलमे मास्टर सेहो छलै। ई द्वारे ओकरा बड्ड रास पैसा दऽ कए लड़कीक बाप बियाह तए केलक। बड्ड रास बरियाती लऽ कए लड़काक बाप पहुंचल लड़की बलाक ओतए। ओतए विधि विधानसँ ओकर दुनूक बियाह भेल रातिमे सब बरियाती गण खाना खऽ कए सभ सुते चलि गेल। भोरमे बिग्जी कऽ कए सभक इच्छा भेल लड़की देखैक। किऐक तँ ब्राह्मण सभक नियम छलै लड़कीक सुहाग देबेक तखन जाकै सभ लड़कीक देखैत छलै तखन ओकरा बड्ड रास समान आ पैसा देल जाए छलै। लड़काक बाप रातिमे बियाहक बाद लड़कीक देखैत कहलक रहै “जीत गयौ मोर कान्हा” तखन जा कए लड़कीक बाप कहलक “भोर भयो तब जानो” किऐक तँ लड़की जे छलै उ एकटा पैरसँ लाचार छलै। तँ जा कए लड़कीक बाप ढ़ेर रास टका पैसा दऽ कए अपन लड़कीक बियाह मास्टर लड़कासँ बियाह करबाक बड्ड खुश छलै। ते उ कहलक जे भोर भयो तब जानो। भोर होबेपर जखन लड़काक बाप कहलक कनेकटा लड़कीक खड़ा करू हम लड़कीक लम्बाई देखब तँ लड़की जब खड़ा भेल तँ लड़काक बापकेँ लागल जे हम हारि गेलो आ सब बरियाती गण वापस अपन गाम मगंलवार चलि गेल। लेकिन ई एकटा कहानी बनि गेल। उ दुनू लड़का आ लड़की बड्ड खुश रहै लागल किऐक तँ उ मास्टर सेहाब छलै। अखन उ सुमरित हाई स्कूलमे हिन्दीक मास्टर छलै। आ बड्ड नीक मास्टर अछि। किऐक तँ हमहुं उ मास्टरसँ पढ़लै छलौ। २.जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक प्रसंग 31 मेहनतक दरद एकटा लोहार छल। मेहनत आ लूरि स परिवार नीक-नहाँति चलबैत छल। मुदा बेटा जेहने खर्चीला (खरचीला) तेहने कामचोर छलैक। बेटाक चालि-चलनि देख लोहार कऽ बड़ दुख होय। सब दिन दश टा गारि आ फज्झति बेटा कऽ करै मुदा तइयो बेटा कऽ धनि सन। कोनो गम नहि। लोहार सोचलक जे इ ऐना नै मानत। जाबे एकरा खर्च करै ले पाइ देनाइ नहि बन्न कऽ देवैक ताबे एहिना करैत रहत। दोसर दिन स पाइ देब बन्न कऽ कहलकै- अपन मेहनत स चारियो टा चैवन्नी कमा कऽ ला तखन खर्च देबौक। नइ त एक्को पाइ देखब सपना भऽ जेतौक। बापक बात सुनि बेटा कमाइक परियास करै लगल। मुदा लूरिक दुआरे हेबे ने करै। अपन पैछला रखल चारि टा चैवन्नी नेने पिता लग आबि कऽ देलक। लोहार (पिता) भाँथी पजारि हँसुआ बनबैत छल। चारु चैवन्नी के लेाहार आगि मे दऽ कहलकै- ई पाइ तोहर कमाइल नइ छिऔ। पिताक बात सुनि बेटा लजाइत ओतऽ स ससरि गेल। दोसर दिन बेेटा के कमाइक हिम्मते ने होय। चुपचाप माए स चारि टा चैवन्नी मंगलक। माए देलकै। चारु चैवन्नी नेने बेटा बाप लग पहुँचल। बेटाक मुहे देखि बाप बुझि गेल।। चारु चैअन्नी बेटा बाप केँ देलक। भीतर स बाप कऽ तामस छलैक। ओ चारु चैवन्नी हाथ मे ल पुनः आगि मे फेकि देलक कि हल्ला करैत बेटा बापक हाथ पकड़ि कहलक- बाबू ई हमर मेहनतक पाइ छी। एकरा किऐक बेदरदी जेँका नष्ट करैत छियैक? बाप बुझि गेल। मुस्कुराइत बेटा के कहै लगल- बेटा! आब तोँ वुझले जे मेहनतक कमाइक दरद केहेन होइ छै। जाधरि अन्ट-सन्ट मे हमर कमेलहा खरच करै छलै ताबे हमरो ऐहने दरद होइ छलै। पिताक बात बेटा बुझि गेल। तखने शपथ खेलक जे एक्को पाइ फालतू खर्च नइ करब। 32 मैक्सिम गोर्की बच्चे स मैक्सिम गोर्की निराश्रित भऽ गेल रहथि। ओहि दशा मे जीवैक लेल झाड़ू लगौनाइ स लऽ कऽ चैका-बरतन चैकीदारी सब केलनि। कैक दिन त कूड़ा-कचड़ाक ढ़ेरी स काजक बस्तु ताकि-ताकि निकालि बेचि क अपनो आ बूढ़ि नानीक पेटक आगि बुझावथि। ऐहन परिस्थिति मे पढ़ब-लिखब असाघ्य कार्य थिक। ऐहन असाध्य परिस्थिति स मुकावला क अनुकूल बनौनिहार मैक्सिम गोरकियो भेलाह। रद्दी-रद्दी पत्रिका फाटल-पुरान अखबार सब एकत्रित क पढ़नाई सिखलनि। जखन पढ़ैक जिज्ञासा बढ़लनि तखन समय बचा क वाचनालय जाय लगलाह। रसे-रसे लिखैक अभ्यास सेहो करै लगलथि। कोनो-कोनो बहाना बना साहित्यकार सभ स संबंध बनबै लगलथि। जे किछु ओ (गोर्की) लिखथि ओकरा साहित्यकार सभ स सुधार करबथि। वैह मैक्सिम गोर्की रुसक महान् साहित्यकार भेलाह। अन्यायी शासनक विरुद्ध जनताक अधिकारक लेल सिर्फ लिखबे टा नहि करथि बल्कि हुनका सभक बीच जा संगठित आ संघर्षक नेतृत्व सेहो करथि। जखन हुनकर लिखल किताब तेजी स बिकै लगल तखन ओ अपन खर्च निकालि बाकी सब पाइ संगठन चलबै ले द देथिन। 33 मूलधन एकटा बृद्ध पिता तीनि बरखक लेल तीर्थाटन करै निकलै चाहथि। निकलै स पहिने चारु बेटा केँ बजा अपन सब पूँजी बरोबरि क बाँटि कहलखिन- तीनि सालक लेल हम तीर्थाटन करै जा रहल छी। अगर जीबैत घुमलहुँ ते अहाँ सभ पूँजी घुरा देब नहि त कोनो बाते नहि। अपन हिस्सा रुपैआ क जेठका बेटा सुरक्षित रखि पिताक प्रतीक्षा करै लगल। मझिला बेटा सूद पर लगा देलक। सझिला ऐश-मौज मे फूँकि देलक। छोटका ओकरा पूँजी बुझि व्यवसाय (कारोवार) करै लगल। तीनि सालक बाद पिता आयल। चारु स पूँजी आपस मंगलक। घर स आनि जेठका वहिना रुपैआ घुरा देलक। मझिला सूद सहित मूलधन घुरौलक। सझिला त खर्च क नेने छल तेँ अगर-मगर करैत चुप भ गेल। छोटका व्यवसाय स खूब कमेने छल तेँ चारि गुणा घुमौलक। चारिम (छोटका) बेटा कऽ प्रशंसा करैत पिता कहलक- रुपैआ त वियाजो पर लगा बढ़ाओल जा सकैत अछि मुदा ऐहेन काज अधिक पूँजीवलाक छियै। मुदा जे अपने पूँजी दुआरे बेरोजगार अछि ओकरा लेल नहि। ओकरा त जैह पूँजी छैक ओकरा अपन श्रमक संग जोड़ि जिनगी कऽ ठाढ़ करै पड़तैक। ताहू मे परिवारक दायित्ववला केँ आरो सोचि-विचारि इमनदारी स चलै पड़तैक। तखने परिवार चैन स चलि सकै छैक। 34 कपटी दोस्त एकटा सज्जन खढ़िया छल। ओ (खढ़िया) कतेको स दोस्ती केलक। दोस्ती एहि दुआरे करैत जे बेरि पर हमहू मदति करबै आ हमरो करत। एक दिन शिकारीक कुत्ता ओकरा पकड़ै ले खेहारलक। खढ़िया भागल। भागल-भागल खढ़िया दोस्त गाय लग पहुँच कहलकै- अहाँ हमर पुरान दोस छी। कुत्ता हमरा रबारने अबै अए। अहाँ ओकरा अपन सींग स मारि कऽ भगा दिओ जइ स हमर जान बचि जायत। खढ़ियाक बात सुनि गाय कहलकै- हमरा घर पर जाइक समय भ गेल। बच्चा डिरिआइत हैत। आब एक्को क्षण ऐठाम नइ अँटकब। गायक बात सुनि खढ़िया निराश भ गेल। कुत्ता सेहो पाछू स अबिते रहै। ओ (खढ़िया) ओइठाम स पड़ायल घोड़ा लग पहुँचल। घोड़ो पुरान दोस्त खढ़ियाक छलैक। घोड़ा लग पहुँच खढ़िया कहलकै- दोस अहाँ अपना पीठि पर बैसाय लिअ। जइ से हमरा ओइ कुत्ता स जान बँचि जायत। घोड़ा कहलकै- हमरा पीठि पर कोना बैसब? हम त बैसबे बिसरि गेलहुँ। घोड़ाक बात सुनि खढ़िया निराश भ पड़ायल। जाइत-जाइत गदहा लग पहुँच कहलकै- दोस! हम मुसीबत मे पड़ि गेल छी। अहाँ दुलत्ती चलबै जनै छी। कुत्ता के मारि क भगा दिऔ जइ स हमर जान बँचि जायत। खढ़ियाक बात सुनि गधा कहलकै- घर पर जाइ मे देरी हैत ते मालिक मारत। तेँ हम जाइ छी। फेरि खढ़िया भागल। जाइत-जाइत बकरी लग पहुँच कहलकै- दोस! हम मरि रहल छी। अहाँ जान बचाउ। अपन ओकाइत देखैत बकरी उत्तर देलकै- दोस! झब दे ऐठाम से दुनू गोटे भागू नइ त हमहू खतरा मे पड़ि जायब। बकरीक बात सुनि खढ़िया आरो निराश भ गेल। मन मे एलै जे अनका भरोसे जीवि बेकार छी। अपने बूते अपन दुख मेटा सकै छी। भले ही मन-मुताबिक जिनगी नहि जीवि सकी। तखन खढ़िया छाती मजगूत क पड़ायल। पड़ायल-पड़ायल एकटा झारी मे नुका रहल। कुत्ता देखवे ने केलकै। दौड़ल आगू बढ़ि गेल। खढ़ियाक जान बँचि गेलै। 35 भीख एकटा मच्छर मधुमाछी छत्ता लग पहुँचल। छत्ता मे ढ़ेरो माछी छलै। छत्ता लग बैसि मच्छर माछी कऽ कहलकै- हम संगीत विद्या मे निपुण छी। अहूँ सब संगीत सीखू। हम सिखा देब। जकर बदला मे थोड़े-थोड़े मधु देब जहि स हमरो जिनगी चलत। मधुमाछी सब अपना मे बिचार करै लगल। मुदा बिना रानी माछीक बिचार स क्यो किछु नहि कऽ सकैत तेँ रानी स पूछब जरुरी छलैक। सब बिचारि एकटा माछी कऽ रानी लग पठौलक। रानी माछी सब बात सुनि कहलकै- जहिना संगीत-शास्त्रक ज्ञाता मच्छर भीख मंगै ले अपना ऐठाम आइल अछि तहिना जँ हमहू सब मेहनत छोड़ि देब त ओकरे जेँका दशा हैत। तेँ मेहनतक संस्कार छोड़ि सस्ता संस्कार अपनौनाइ मुरुखपना हैत। अगर अहूँ सब कऽ संगीतक शौक होइ अए ते मेहनतो करु आ बैसारी मे संगीतों सीखू। 36 भगवान सिद्ध पुरुष भऽ कबीर प्रख्यात भ गेल छलाह। दूर-दूर स जिज्ञासु सब आबि-आबि दर्शनो करैत आ उपदेशो सुनैत। मुदा कबीर अपन व्यवसाय (कपड़ा बुनब) नहि छोड़लनि। कपड़ो बुनैत आ सत्संगो करथि। एकटा जिज्ञासु कबीरक व्यवसाय देखि पूछलकनि- जाधरि अपने साधारण छलहुँ ताधरि कपड़ा बुनब उचित छल मुदा आब त सिद्ध-पुरुष भऽ गेलिऐक तखन कपड़ा किऐक बुनै छी? जिज्ञासुक विचार सुनि मुस्कुराइत कबीर उत्तर देलखिन- पहिने पेटक लेल कपड़ा बुनैत छलहुँ। मुदा आब जनसमाज मे समाइल भगवानक देह ढ़कैक लेल आ अपन मनोयोगक साधनाक लेल बुनैत छी। एक्के काज रहितहुँ दृष्टिकोणक भिन्नताक उत्पन्न होइवला अंतर कऽ बुझला स जिज्ञासुक समाधान भऽ गेलनि। 37 एकाग्रचित इंग्लैडक इतिहास मे अल्फ्रेडक नाम इज्जतक संग लेल जाइत अछि। ओ (अल्फ्रेड) अनेको साहसी काज परजाक लेल केलनि। तेँ हुनका महान् अल्फे्रड (अल्फ्रेड द ग्रेट) नाम स इतिहास मे चरचा अछि। शुरु मे अल्फ्रेड साधारण राजा जेँका क्रिया-कलाप करैत छलाह। जहिना बाप-दादाक अमलदारी मे चलैत छल तहिना। खेनाई-पीनाई ऐश मौज केनाई यैह जिनगी छलनि। जहि स एक दिन ऐहेन भेलैक जे हुनकर कोढ़िपना दुश्मनक लेल बरदान भऽ गलैक। दुश्मन आक्रमण कऽ अल्फ्रेड क सत्ता स भगा देलक। नुका क ओ एकटा किसानक ऐठाम नोकरी करै लगल। बरतन माँजब पानि भरब आ चैकाक काज अल्फ्रेड करै लगल। नमहर किसान रहने अल्फ्रेडक देख-रेख हुनकर पत्नी करैत छलीह। एक दिन ओ (पत्नी) कोनो काजे बाहर जाइत छलीह। बटलोही मे दालि चुल्हि पर चढ़ल छलै। औरत अल्फ्रेड कऽ कहि देलक जे दालि पर धियान राखब। अल्फ्रेड चुल्हि लग बैसि अपन जिनगीक संबंध मे सोचै लगल। सोचै मे एत्ते मग्न भऽ गेल जे बटलोहीक दालि पर धियाने ने रहलै। बटलोहिक सब दालि जरि गेलै। जखन ओ औरत घुरि क आइल त देखलक जे बटलोहिक सब दालि जरि गेल अछि। क्रोध स अल्फ्रेड केँ कहलक- अरे मुर्ख युवक! बुझि पड़ै अए जे तोरा पर अल्फ्रेडक छाप पड़ल छौक। जहिना ओकर दशा भेलै तहिना तोरो हेतौ। जे काज करै छेँ ओकरा एकाग्रचित भऽ कर। बेचारी औरत कऽ की पता जे जकरा कहै छियै ओ वैह छी। मुदा अल्फ्रेड चैंकि गेल। अपन गलतीक भाँज लगबैै लगल। मने-मन ओ संकल्प केलक जे आइ स जे काज करब ओ एकाग्रचित भऽ करब। सिर्फ कल्पने कयला स नहि होइत। अल्फ्रेड नोकरी छोड़ि देलक। पुनः आबि अपन सहयोगी सभ स भेटि कऽ धनो आ आदमियोक संग्रह करै लगल। शक्ति बढ़लै। तखन ओ दुश्मन पर चढ़ाई केलक। दुश्मन केँ हरौलक। पुनः सत्तासीन भेल। सत्तसीन भेला पर पैघ-पैघ काज कऽ महान भेल। 38 सीखैक जिज्ञासा महादेव गोविन्द रानाडे दछिन भारतक रहथि। ओ बंगला भाषा नहि जनैत रहथि। एक दिन रानाडे कलकत्ता गेलाह। कलकत्ता मे अपन काज-सब निपटा आपस होइ ले गाड़ी पकड़ै स्टेशन ऐलाह त एकटा बंगला अखवार कीनि लेलनि। बंगला अखवार देखि आश्चर्य स पत्नी कहलकनि- अहाँ त बंगला नइ जनै छी तखन अनेरे इ अखवार किऐक कीनि लेलहुँ? मुस्कुराइत रानाडे जबाव देलखिन- दू दिनक गाड़ी यात्रा अछि। आसानी स बंगला सीखि लेब। नीक-नहाँति रानाडे बंगला लिपि आ शब्द गठन पर ध्यान दऽ सीखै लगलथि। पूना पहुँच पत्नी केँ धुर-झार अखवार पढ़ि क सुनवै लगलखिन। ऐहन छलनि साठि वर्षीय रानाडे क मनोयोग। तेँ अंतिम समय धरि हर मनुष्य केँ सीखैक जिज्ञासा रहक चाही। 39 अनुभव व्यक्ति अपन अनुभव स सीखवो करैत अछि आ दोसरोक लेल दिशा निर्धारित करैत अछि। एक दिन झमझमौआ बरखा होइत रहै। मेधो गरजै। बिजलोको चमकै। तेज हवो बहै। ओहि समय रास्ता पर भगैत एक आदमीक मृत्यु भ गेलैक। बरखा छुटलै। लग-पासक लोक जखन निकलक ते रास्ता पर ओहि आदमी केँ देखलक। चारु भर स लोक जमा भऽ क्यो कहै- बादलक आवाज स मृत्यु भेलै। त क्यो किछु कहै त क्यो किछु। ओहि समय एक अनुभवी आदमी सेहो पहुँचलथि। ओ कहलखिन- जँ आवाज स मृत्यु होइत त बहुतो लोक आवाज सुनलक। सबहक होइतैक। तेँ मृत्यु आवाज स नहि लग मे ठनका गिरला स भेल। 40 असिरवादक विरोध ईश्वर चन्द्र विद्यासागर अभाव आ गरीबीक बीच पढ़ि पचास टाकाक मासिक नोकरी शुरु केलनि। हुनक सफलता देखि कुटुम्ब-परिवार सभ असिरवाद देमए पहुँचै लगलनि। एकटा कुटुम्ब कहलकनि- भगवानक दया स अहाँक दुख मेटा गेल। आब आराम स रहू आ चैन स जिनगी बिताउ। ई असिरवाद सुनितहि विद्यासागरक आखि स नोर खसै लगलनि। नोर पोछैत कहलखिन- जइ अध्यवसायिक बले हम ओहन भीषण परिस्थितिक मुकावला केलहुँ ओकरे छोड़ि दइ ले कहै छी। अहाँ कऽ ई कहैक चाहै छल जे जहि गरीबीक कष्ट स्वयं अनुभव केलहुँ ओहि परिस्थिति कऽ बिसरु नहि। अपन असाध्य श्रम स ओहि अवरुद्ध रास्ता क साफ करु। ३.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा अड़तीस नताशा उनचालीस नताशा चालीस बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.Sindhu Poudyal-Indo-Nepal Relations: A Personal Reflection DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul Sindhu Poudyal- Indo-Nepal Relations: A Personal Reflection The contrasting attitude among the states and nations around the world is quite obvious. But the history itself shows that the most important aspect of the war and dirty politics has been caused by the important factor called religion. But striking fact which strikes me is that how the two nations which can generally be called as having the same religious and secular outlook come with such a rebellious attitude with each other. In 1950’s with the introduction of ‘Indo- Nepal Treaty of Peace and Friendship’, both the countries come together to initiate their relationship with each other including the security affairs. This treaty is said to be the continuation of the ‘Sugauli Treaty’ which was signed on December 2, 1815 and ratified by March 4, 1816, between the India (under the British domination) and then existing Kingdom of Nepal. The Treaty which was signed in 1950 carries with it some of the crucial issues like allocation of the citizenship to the Indian Nepalese including the security and other external affairs. Though in its detailed analysis the Contract deals with many important issues to enhance the relationship among the two nations but I am trying to give here a very short analysis of the issue of Citizenship for the Indian Nepalese. In that contract one of the important fact which came out is the as I mentioned in earlier paragraph as the issue of the Citizenship where both the nations agreed on the fact that, "neither government shall tolerate any threat to the security of the other by a foreign aggressor" and obligated both sides "to inform each other of any serious friction or misunderstanding with any neighboring state likely to cause any breach in the friendly relations subsisting between the two governments. "This will be in return give "special relationship" as well as the promotion of the preferential treatment to Nepal. This is also followed by the point of allocation of the equal economic and educational rights to the Nepalese as the Indian citizens, who are residing in India for a long period of time. This togetherness for Peace and Friendship also focuses on the issues like, the problems pertaining to citizenship, Economic developments and cultural relations between two countries- The importance of the contract in this very matter of fact is crucial from the point of view of identity and inhabitance of the Indian Nepalese. Indian Nepalese have their long history of inhabitants as Indian citizens starting from the education to the economic development of the country we can not ignore the contribution of these peoples especially at the time of independence, the bravery and the sense of Nationalism which they showed can never be denied. Hence in such a situation to regard them as non Indians and to discriminate is in no way acceptable. Moreover in some cultural aspects, Nepalese and traditional north Indians having similarity. With viewing the fact of the matter it is necessary and justified in my view to give the citizenship to the Nepalese in India. India and Nepal both the countries are rich in their historical and cultural perspectives. But there are certain factors which sometimes cause severe problems and tension for the country from time to time and for which both the nations are facing difficulties starting from Geographical and Economic problems to the minor problems like common ethnic, linguistic and cultural problems. The problem as such is not a new one. India and Nepal are having the cold war amongst themselves. Though the problem has not been with such a larger gratitude; its outcomes are in no way going to serve any fruitful purpose. It will create communal tension and unnecessary burden to the peoples of both the nations. Though the Contract among the two nations have focused on some of the crucial issues but still I found the citizenship issue most important for discussing here. Though most of the times the issues revealed and signed in the treaty are not seen to be successful but this type if issues enhance the friendly relation among the Nations, not only with the India but with the all the Nations at a large. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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(send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A,
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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द
मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास
डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00 राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00
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मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
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रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00
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या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण
उपन्यास
मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
कहानी-संग्रह
रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी
विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य
आलोचना
इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन
सामाजिक चिंतन
किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र
उपन्यास
माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
कहानी-संग्रह
धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन
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The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. 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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५० म अंक १५ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ५०)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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