VIDEHA — Issue 51 / अंक ५१

Publication: VIDEHA · Issue: 51
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330 'विदेह' ५१ म अंक ०१ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५१) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.जगदीश प्रसाद मंडल--दोती विआह- कथा २.३.अतिश कुमार मिश्र-नेपालक राज्‍य पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली २.४.सुजीत कुमार झा-नेपालमे मिथिला राज्‍य की सम्‍भव छैक ? २.५.१.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २.-         प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि २.६.बिपिन झा-जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य २.७.१.पण्डित ओ हुनक पुत्र-शिवशंकर श्रीनिवास २.-ऋृषि वशिष्ठ-जुआनी जिन्दाबाद २.८.रामभरोस कापडि भ्रमर- एहि बेर सातम् अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलन काठमाण्‍डूमे हयत ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:राधा १७म खेप ३.३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.४.१.रामभरोस कापडि भ्रमर-गीत २.रमण कुमार सिंह- दिल्लीमे... ३.५.१.राजदेव मंडल- सिर बिहून धड़ २.कालीनाथ ठाकुर-एक अभिशाप बापक पाप ३.६.१.सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी- आह! जाड चलि गेल! २.दयाकान्त-ई छी मैथिल के पहचान ३.७.१.विनीत उत्पल-पुष्कर २मनीष झा "बौआभाई"- ऋतुपति बसंत (कविता)- ३.८.१.मो. गुल हसन-सभटा चौपट्ट भऽ गेल २.मनोज कुमार मंडल-बहीन३.कल्पना शरण-मिथिलाक तीला संकराति ४. बालानां कृते-१.. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु लघुकथा २.. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)३.कल्पना शरण-देवीजी ५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1Dr.Shefalika Verma-SUBLIME LOVE-Translated by poetess herself 6.2.NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr.Shefalika Verma-Translated by Dr.Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi. 7. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान नई दिल्लीमे मैथिली, हिन्दी आ अंग्रेजीक पोथी सभ नीचाँक स्टॉलमे उपलब्ध अछि: १.अंतिका प्रकाशनक स्टॉल हॉल नं. 12-ए,स्टॉल नं. 6 पर। २.हॉल नं. 14,स्टैंड-एस 1-2 मे मिथिला दर्शनक स्टॉल छैक। ३.मिथिलांगन सेहो हॉल नं. 2 मे स्टॉल संख्या 624-626 (फोनः23371275)पर उपलब्ध अछि। १. संपादकीय मैथिली समीक्षा (आगाँ) १२.      स्वतंत्रता/ आरक्षण- एहि दूटा पर घमर्थन। स्वतंत्रता सतही छल, मतदान नकली अछि आ आरक्षण भेदभावपर आधारित, ई घमर्थन करैत शोषक वर्ग। स्वतंत्रता मतदानकेँ जन्म देलक आ पाँच सालपर ई सामाजिक परिवर्तनक ढेर रास नव समीकरणकेँ जन्म दैत अछि- से शोषित वर्ग लेल हितकारी। असमान सामाजिक स्तरकेँ समान अधिकार देबाक कोनो मतलब नहि। तँ शोषक वर्ग कहत- ओहू आरक्षित वर्गमे ऊँच नीचक जन्म भऽ रहल अछि। मुदा से जातिक आधारपर तँ नहि भऽ रहल अछि आ पहिनेक तुलनामे कम भऽ रहल अछि। जे शूद्र ऋषि कवष ऐलूष वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, जे महिला अपाला वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, से करोटमे किएक ठाढ़ रहथि ? पुरातन व्यवस्थाक जातिक भीतरक स्तरीकरण, कर्णकायस्थ आ मैथिल ब्राह्मणक भीतर पञ्जी-प्रथा द्वारा कएल गेल स्तरीकरण, पाइ-पैरवी लऽ दऽ कऽ होइत स्तरीकरणक स्थितिमे नीचाँ ऊपर केनाइ। समाजक बाल-विवाह पक्ष आ विधवा-विवाह विपक्ष आधारित आ पञ्जी आधारित बतहपनीक प्रतीक रूपमे रहैत आइ काल्हिक व्यवस्था सभ। आत्मकेन्द्रित, भाषा-संस्कृति छोड़ैत समाज- कारण एहि सभसँ प्रेम मात्र प्रतीक रूपमे ओ बाल्यकालसँ देखने अछि। पढ़ाइक रूप एखनो असमानतापर आधारित अछिये मुदा पुरनका तुलनामे अकाश पतालक अंतर अछि। कियो पढ़ि-लिखि कऽ अपन समाजमे उच्चसँ उच्चतम स्तर प्राप्त कऽ सकैत अछि आ तखन ने ओकरा पाँजि चाही आ ने किछु आर। फेर ओ ग्राम पंचाएतसँ लऽ कऽ संसद सदस्य धरि पहुँचैत अछि। ठिकेदारी करबासँ लऽ कऽ बस-टेम्पू धरि चला-चलबा सकैत अछि। हम एहि द्वारे नहि पढ़ि सकलहुँ, कलक्टर नहि बनि सकलहुँ कहलापर आब लोक कहैत अछि जे तखन फलनांक बेटा कोना से बनि गेल। १३. शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत मरड़पर लिखल जाएबला कथा-कवितामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। १४.      मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर। युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार एहिमे नहि भेटत, से एहि अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्यक, बुश-सद्दामक आलोचनामे धार ओहि कारणसँ नहि आबि पबैत अछि। कोनो मन्दिर-मस्जिदकेँ जे ओ समर्थन-विरोध करैत छथि वा कोनो नन्दीग्राम-लालगढ़क सेहो तँ ओहिमे सेहो ताहि तरहक धार नहि अबैत अछि। दारू पीबि मँतल मानववाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, वामपंथ आ दक्षिणपंथपर हुनकर विचार लागत ओंघाएल। युगक सभ शब्दावली भरताह आ कविता-कथा तैयार। अमेरिकाक आलोचनामे धार कोना आओत आ वामपंथक पक्षमे सेहो- जखन अपन आजीविका दक्षिणपंथक मदतिसँ चलि रहल अछि। संघर्षक अभाव सृजनात्मकताक स्तरकेँ समए बढ़लासँ बढ़ेबाक बदला घटबैत अछि। युगक अनुरूप सभ चलैए, ओकर विपरीत चलब तखन ने सृजनात्मकताक संग चाही। दोसराकेँ पलायनवादी कहनिहार एहि तरहक सुविधावादी तत्वकेँ चिन्हित करू, गहींर पैसब जिनका लेल संभव नहि। इतिहाससँ जुड़ाव ऐतिहासिक मनोभावनासँ जोड़ि सकत। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाकेँ माटि देबामे धारक अभाव- हीनभावनाग्रस्त आ अपराध भावसँ भरल लेखकसँ संभव नहि। न्याय वैशेषिक आ सांख्य-योगक वस्तुवाद, बाह्यक यथार्थ आ मायाक विरोध, गृहस्थ जीवन, लोक हित। कला आ साहित्यक कृति, आत्माक भीतरक ज्ञान प्रज्ञापर आधारित होइत अछि जे अखण्ड अछि- गति, स्वतंत्रता, सर्जनात्मक परिवर्तन। इतिहास वा साहित्यक इतिहास हम बदलि नहि सकैत छी आ एतए उच्च आ मध्यवर्गक स्मृति आधारित मिथिलाक स्वर्णयुग। मुदा तकर महत्व दूरदर्शन आ चलचित्र टामे भऽ सकैत अछि। उदारवाद। औद्योगिकरण आ तकर आर्थिक विकासक सफलता-असफलता। सामाजिक रूपमे समाजक पिछड़ल वर्गक विरोधकेँ आरक्षण आ स्वतंत्रता पसारि देलक मुदा संगहि एकर तीव्रता कम केलक से चाहे ओ नक्सलवाद होअए वा माओवाद वा मर्क्सवाद-लेनिनवाद। बुर्जुआ वर्गक लेल ई फाएदा रहल। बुर्जुआ वर्गक राजनैतिक आ सांस्कृतिक संगठन पसरल आ सर्वहारा वर्ग धरि पहुँचए से प्रयास आ महिला लोकनिकेँ एहिमे सम्मिलित करबाक प्रयास। पाइ आ सुविधा अपना संग परम्परागत नैतिकताकेँ तोड़लक। कम्पनी अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनेलक आ परिवार आ व्यक्ति एहि तरहक कम्पनीकेँ नौकरीपेशा लोकक संग चलबए लागल। प्रकृतिपर नियन्त्रण आ मानवीय व्यवहारक अवलोकन। काजक लेल अन्न आ काजक बदला पाइ, रोजगार गारन्टी कार्यक्रम, जनवितरण प्रणालीक दोकान। रोजगार लेल देश-विदेश छोट होएब, परिवारक आधारपर आघात। पूँजीवादी विश्व अर्थव्यवस्था, परिवर्तन आपरूपी नहि वरन् संघर्ष आ प्रयाससँ भेटत। स्वतंत्र मानवीय संवेदना जे नीक भविष्यक गारंटी नहि दैत अछि तँ ई अधलाहक सेहो गारंटी नहि दैत अछि। हमरा लग विकल्प अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जीवनक जे किछु प्रमाण भेटि रहल अछि से कम नहि अछि। विकल्प हमरा सभकेँ तकबाक अछि जे सनसनी पसारी आकि कार्य करी। १५.  भारतमे राजनीतिक क्रान्तिक बाद औद्योगिक आ सामाजिक क्रान्तिक संकल्प कएल गेल, विकसित देशमे औद्योगिक क्रान्तिक पहिने सामाजिक क्रान्ति भेल। ताहि कारणसँ हमरा सभकेँ कठिन परिस्थितिक सोझाँ हेबऽ पड़ल। लोकाचार, चिन्तन क्रम आ दृष्टिकोणक अलाबे पोषण, स्वास्थ्य, सफाइ, चिकित्सा, शिक्षा, आयु-प्रत्याशामे वृद्धि, मृत्युदरमे कमी। आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता,  सत्ताक गतिशीलता,  उद्योगीकरण। १६.  समाजक धनाढ्य आ निर्धनमे विभाजन- दुनू वर्गक आकार, स्तर आ बीचक दूरी। १७.  स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्य राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, कखनो काल परस्पर विरोधी। मानवशास्त्रीय, जातीय, धार्मिक, भाषिक- प्राथमिक आ लघु निष्ठा- स्थानिक, जातीय, धार्मिक-भाषिक आस्था। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रिया। १८.  आदिवासी- सतार, गिदरमारा आदि विविधता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता। दिनकर, सामाजिक-धार्मिक उत्सव, सूर्य-चन्द्र-वृक्ष-पर्वत पूजा, पृथ्वी स्तुति आ जलाशय आ नक्षत्रक प्रति आस्था, जनक माने जन (विश)सँ निकलल, मिथिलावासीमे सेहो ई आस्था। १९.  व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति। किछुकेँ तिरस्कार आ हुनकर जीवन कठिन। अनुसूचित जाति (११००, पहिल सरकारी सूची) +पिछड़ल जाति ३७४३ (मंडल आयोग)= ४८४३. वर्ण-व्यवस्था धार्मिक नहि सामाजिक प्रथा जकर आब कोनो उपयोग नहि। विघटनकारी तत्वक रूपमे विदेशी मानसिकता आ जड़ मानसिकता द्वारा उपयोग संभव। २०.  महिला आ बाल-विकास- महिलाकेँ अधिकार, शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करब, पाठ्यक्रममे महिला अध्ययन, महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए। गतिशील प्रबन्धन, विकास-प्रक्रियामे स्थान। स्वतंत्रता आन्दोलन आ पर्यावरण आन्दोलन, दहेज-विरोधी आन्दोलनमे सहभागिता, आर्थिक समानता लेल संघर्ष, महिला श्रमिकक बच्चा लेल बालाश्रय-गृह, बालवाड़ी, आंगनवाड़ी। प्रतिद्वंदिताक कारण कम वेतन, काज करबाक दशा प्रतिकूल, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्वहीन स्थान। २१.  स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन। २२.  धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित- धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित। धर्म-आस्था वा सामाजिक मूलक आधारपर व्यक्ति वा समूहक बीच विभाजन अस्वीकार। सभ समुदाय शक्तिक उपयोग उत्तरदायित्व आ कर्तव्यक निर्वहन जेकाँ, माने वितरणात्मक न्याय। धर्म-आस्थाक आधारपर कोनो भेद नहि आ राज्य धर्म द्वारा नियंत्रित नहि होएत। २३.  टैगोरक कलात्मकतावाद, गाँधीक नैतिकतावाद, अरविन्द घोषक रहस्यवादी आध्यात्म दर्शन, विवेकानन्दक व्यावहारिक वेदान्तवाद। २४.  विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओहि विकासमे साझी भऽ सकैए। एहिसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। सामुदायिक आ राष्ट्रीय जीवन। २५.  विज्ञान आ प्रौद्योगिकी विकसित आ अविकसित राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा, आशा सुविधाक असीमित विस्तार आ आधार। एहिसँ वैयक्तिक आ राष्ट्रीय शक्तिक अभिवृद्धि होइत अछि। २६.  विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही। न्याय पंचायतकेँ पुनःजीवन। २७.  नागरिक स्वतंत्रता- मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति। अधिकारक उत्पीड़नसँ बचाव। २८.  प्रेस- शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे भूमिका, मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार। व्यवस्थामे स्थायित्व आ लोकतंत्रक प्रहरी आ संरक्षक। उद्योगपति प्रेसक मालिक आ सरकार शासन संचालक- प्रेसक स्वतंत्रताकेँ खतरा। नेपाल-भारत सन देश लेल ई खतरा आर बेशी। २९.  नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका। ३०.  जल थल वायु आ आकाश- भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कए प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन। ३१.  कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? सामाजिक संवेदनाक आ मानव क्रियाक एकटा रूप अछि कला। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। सौंदर्यक कला उपयोगिताक संग। कलापूर्णताक कलाक जीवन दर्शन- संप्रदाय संग। ३२.  भावनात्मक वातावरण- सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, सुन्दर-मूर्त, अमूर्त। प्रकृति कलाविशिष्ट प्रभावशाली स्थिति, शोकजनक, हास्य, मानवक सौंदर्यक अनुभव ओकर अनुभव बिना सम्भव नहि। एहिसँ समाजक सौंदर्यीकरणक प्रति दृष्टिकोण सोझाँ अबैत अछि। ३३.  मानसिक क्रिया- मनुष्य़ सोचैबला प्राणी, मानसिक आ भौतिक दुनूक अनुभूति करएबला प्राणी। शरीर आ मस्तिष्क, दिनुका काज आ रातुक स्वप्न। ३४.  विरोधाभास वा छद्म आभास- अस्पष्टता। सैद्धांतिक लाभ। ३५.  काण्टक दर्शन- मछहरमे दू इंचक अवकाश बला जाल फेकब तँ दू इंचसँ कमबला माँछ नहि भेटत, तखन ई निर्णय जे एहि पोखरिमे दू इंचसँ छोट माँछ नहि! समीक्षकक जाल जतेक महीन होअए ततेक नीक। ३६.  बाल-किशोर साहित्य- जे बच्चा किशोर पढ़त तँ बादोमे भाषाक प्रति घुरत- नोकरी-चाकरी स्थिर भेलाक बाद। कारण स्कूल-कओलेजमे जकर विषए मैथिली नहि अछि वा मैथिली बाल साहित्य नहि पढ़ने अछि से किएक मैथिलीसँ प्रेम करत- अहाँ ओकरा लेल नहि तकबै तँ ओहो नहि ताकत। ३७.  सगर राति दीप जरए आ मैथिली समीक्षा- युद्धक कारण- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक आ तात्कालिक। मात्र तात्कालिक रटि लिअ आ आर सभमे सभटा खरापे-खराप लिखि दियौ- आर्थिक स्थिति खराप- सामाजिक स्थिति खराप आदि। मुदा जे फ्रांसीसी क्रान्तिमे से लिखि देबै तँ ओहि समए ओतुक्का किसानक आर्थिक दशा इंग्लैंडसँ नीक रहै आ सैह फ्रांसकेँ क्रान्ति लेल सक्षम बनेलकै, प्रतिकार लेल सक्षम बनेलकै। तहिना  सगर राति दीप जरएमे समीक्षा होइए- शिल्प नीक कथ्य नीक...। ३८.  दलित साहित्य- महेन्द्र नारायण राम, बिलट पासवान विहंगम आदि केँ छोड़ि दियन्हि तँ मैथिलीमे दलित लेखक आ दलित साहित्य शून्य अछि। ३९.  खेसारी / माघ / आम आ शरद ऋतु / धूमकेतु  मोड़पर / यात्रीक उपन्यासमे आषाढ़क आ दोसर मासक तिथि दुइये पृष्ठक अन्तरपर / मोहन भारद्वाज । कुमार पवन मोड़पर पृष्ठ १- एक पाँतीसँ ठाढ़ आ कतौ अरड़ा कऽ ओलड़ि गेल धानक सीस- कोसक कोस पसरल हरियर कचोर खेसारीक गद्दा ( माने अंतिम स्थिति)- मुदा खेसारी तँ अगहनक बाद (धानक बाद- गद्दरि तँ आर पहिने होइए) होइत अछि। यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल। बलचनमाक समीक्षामे मोहन भारद्वाज लिखै छथि- क्यो यात्रीजीकेँ पुछलकन्हि जे बलचनमाक दोसर भाग लिखबा लेल..यात्री कहलखिन्ह जे बलचनमाकेँ तँ आब धोधि भऽ गेल होएतैक। यात्रीकेँ के पुछलकन्हि (काल्पनिक प्रश्नोत्तरी)- फेर जे बलचनमा पढ़ने छथि तिनका बुझल छन्हि जे बलचनमाकेँ मारि कऽ पाड़ि देल गेलै से मृत बलचनमाकेँ धोधि हेतै से यात्रीजी ओहि काल्पनिक प्रश्नकर्ताकेँ किएक कहथिन्ह। कुमार पवनक पइठ सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथा मुदा अहूमे अन्त दुनू भाइक लड़ाइ आदि..एकर बदला दोसर लक्ष्य होएबाक चाही-जेना शोषण। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... डगलस केलनरक नीचाँक आलेखकक पंकज पराशर द्वारा चोरि सिद्ध कएलक जे एक दशक पहिने एहि लेखक द्वारा अरुण कमलक चोरि सँ आइ धरि हुनकामे कोनो तरहक परिवर्तन नहि आएल छन्हि। हँ, आब ओ पटना विश्वविद्यालयक प्रोफेसरक रचना चोरेबासँ आगाँ बढ़ि गेल छथि आ कैलिफोर्निया वि.वि.क प्रोफेसरक रचना चोराबए लागल छथि। एहि सन्दर्भमे हमरा एकटा खिस्सा मोन पड़ैत अछि। २०-२२ बरख पुरान सत्य कथा। दरभंगामे रहैत रही, छतपर हम आ हमर एकटा पिसियौत भाइ साँझमे ठाढ़ रही। सोझाँमे सरवनजीक घरक बाअड़ीमे खूब लताम फड़ल छलन्हि। हमर पिसियौत भाइ हुनका इशारा दऽ कहलखिन्ह जे दस टा लताम आनू। ओ बेचारे दसटा लताम तोड़लन्हि आ आबि रहल छलाह आकि रस्तामे हमसभ देखलहुँ जे एकटा छोट बच्चा संग हुनका किछु गप भेलन्हि आ ओ पाँचटा लताम ओहि बच्चाकेँ दऽ देलखिन्ह। जखन सरवन जी अएलाह तँ कहलन्हि जे ओ बच्चा हुनका भैया कहि सम्बोधित कएलकन्हि आ पाँचटा लताम मँगलकन्हि- से कोना नञि दितियैक- सरवनजीक कहब छलन्हि। आब पंकज पराशर प्रसंगमे की भेल से देखी। प्रदीप बिहारीजीक बेटा प्रणवकेँ पंकज पराशर नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचना दैत छथिन्ह आ तकर अनुवाद करबा लेल कहै छथिन्ह। बेचारा जान लगा कऽ अनुवाद कऽ दैत छन्हि, ई सोचि जे जिनका ओ चच्चा कहै छथि- जे क्रान्तिकारी विचारक छथि (मार्क्सवादी!!!) से कोनो नीक पत्रिकामे ई अनुवाद छपबा देथिन्ह। मुदा छह मासक बाद चच्चाजी कहै छथिन्ह जे नोम चोम्स्की बला रचना हेरा गेल आ डगलस केलनर बला रचनाक अनुवाद नञि नीक रहए से रिजेक्ट भऽ गेल। मुदा क्रान्तिकारी कवि (चोरुक्का सेहो विवरण नीचाँमे अछि) दुनू रचना पहल पत्रिकामे पठा दै छथि- पहल-८६ मे डगलस केलनर बला रचना छपितो छन्हि (आ से अनुवादक रूपमे नहि वरन् मूल लेखकक रूपमे) आ ओ बैन सेहो कऽ देल जाइ छथि। हमर सरवन जी एकटा बच्चा द्वारा भैया कहलापर पाँचटा लताम ओकरा दऽ दै छथिन्ह मुदा हमर पराशरजी भातिजोक पाँचटा लताम निर्लज्जतासँ छीनि लैत छथि। आ हम हुनकर खिजबीन तखन करै छी जखन ओ विदेहंमे आइडेन्टिटी बदलि (उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....) हमरा गारि पढ़ैत छथि- हुनकर रियल आइडेन्टीटी नाङट करै छी। फेर सभसँ गप करै छी  आ पाठकक सहयोगसँ आरम्भ, पहल क पुरान अंक भेटि जाइत अछि जतए हिनकर कुकृत्य छन्हि। नीचाँक लिंकपर नीचाँक सभटा आर्टिकल आ कविता आ तकर पंकज पराशर द्वारा चोरिक रचनाक पी.डी.एफ. फाइल डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। http://www.box.net/shared/75xgdy37dr सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521

Fax  310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html Intellectuals, the New Public Spheres, and Techno-Politics The category of the intellectual, like everything else these days, is highly contested and up for grabs. Zygmunt Bauman contrasts intellectuals as legislators who wished to legislate universal values, usually in the service of state institutions, with intellectuals as interpreters, who merely interpret texts, public events, and other artifacts, deploying their specialized knowledge to explain or interpret things for publics (1987; 1992). He thus claims that there is a shift from modern intellectuals as legislators of universal values who legitimated the new modern social order to postmodern intellectuals as interpreters of social meanings, and thus theorizes a depoliticalization of the role of intellectuals in social life. ....... अरुण कमल Arun lives in Patna where he teaches English at the Science College of Patna University. नए इलाके में जहाँ रोज बन रहे नये नये मकान मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़ खोजता हूँ ढहा हुआ घर और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें मुड़ना था मुझे फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का घर था इकमंजिला चल देता हूँ या दो घर आगे ठकमकाता रोज कुछ घट रहा है यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ जैसे वैशाख का गया भादो को लौटा हूँ और पूछो - क्या यही है वो घर? आ चला पानी ढहा आ रहा अकास शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनबरी २०१०) ९३ देशक १,०६८ ठामसँ ३७,७३१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,२३,८२० बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr)बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। गजेन्द्र ठाकुर नई दिल्ली। फोन-09911382078 ggajendra@videha.co.in ggajendra@yahoo.co.in २. गद्य २.१.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ) २.२.जगदीश प्रसाद मंडल--दोती विआह- कथा २.३.अतिश कुमार मिश्र-नेपालक राज्‍य पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली २.४.सुजीत कुमार झा-नेपालमे मिथिला राज्‍य की सम्‍भव छैक ? २.५.१.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २.-         प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि २.६.बिपिन झा-जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य २.७.१.पण्डित ओ हुनक पुत्र-शिवशंकर श्रीनिवास २.-ऋृषि वशिष्ठ-जुआनी जिन्दाबाद २.८.रामभरोस कापडि भ्रमर- एहि बेर सातम् अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलन काठमाण्‍डूमे हयत प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक मिथिलाक इतिहास अध्याय–१३ मिथिलामे अंग्रेजी राजक अमल (१७६५–१९४६) १७६४क वक्सरक लड़ाई भारतक हेतु एकटा निर्णायक युद्ध छल कारण एकरा बाद इ स्पष्ट भगेल छल जे उत्तर भारतक कोनो शक्तिकेँ आब अंग्रेजसँ मुकाबिला करबाक क्षमता नहि रहि गेल छलन्हि। १७६५मे अंग्रेजी इस्ट इण्डिया कम्पनीकेँ जखन दिवानी भेटलैक तखनहिसँ भारतमे अंग्रेजी राज्यक स्थापनाक वीजारोपण सेहो भगेलैक। १८म शताब्दी उत्तर भारत आ दक्षिण भारतक महत्वाकाँक्षी नेता लोकनिक स्वार्थ पूर्त्तिक युग छल जखन लोग देशक पैघ स्वार्थकेँ बिसैरि अपन छोट–छोट स्वार्थक पूर्त्तिक हेतु देशक बलिदान करैत जाइत गेलाह। तिरहूत औरंगजेब समय धरि मुर्शिदाबादक नवावक मातहदीमे छल। १७४०सँ बिहार आ तिरहूतक भाग्य मुर्शिदाबादसँ मिलल छल आ ओहिठामक नवाव बिहारमे अपन उपनवाव बहाल करैत छलाह। अलीवर्दी खाँ पहिने बिहारेक उपनवाव छलाह। अलीवर्दीक कृपासँ अंग्रेज व्यापारी लोकनिकेँ थोड़ेक सुविधा प्राप्त भेल रहैन्ह। १७५६मे अलीवर्दीक मृत्यु भगेलैक आ तकर बाद सिराजुद्दौलाह बंगालक नवाव भेल। अंग्रेज लोकनि अपन कुचक्रसँ पलासीक युद्धमे सिराजकेँ परास्त कए मीरजाफरकेँ १७५७मे नवाव बनौलन्हि। १७६०मीरजाफरकेँ हटाकए मीरकासिमकेँ नवाव बनाओल गेल। मीरकासिम मूंगेरकेँ अपन राजधानी बनौलन्हि। हुनका अंग्रेजसँ पटैत नहि छलन्हि आ बरोबरि खटपट होइत रहन्हि आ अंग्रेज मीरकासिमक चुस्ती चालाकीसँ खार खाइत छलाह। १७६३मे अंग्रेज आर मीरकासिमक बीचक आर सम्बन्ध खराब भगेल आर मीरकासिम दिल्लीक शाह आलम आर अवधक नवाव शुजाउद्दौलाहक सहाय्यसँ अंग्रेजक पटनामे स्थित कम्पनीपर धावा करबाक विचार केलन्हि। एकरे नतीजा भेल १७६४क बक्सरक लड़ाई। एहिमे अंग्रेज लोकनि विजयी भेलाह आ १७६५मे हुनका दिवानी भेटलन्हि। बंगाल, बिहार आ उड़ीसाक ओ अप्रत्यक्ष रूपेँ मालिक भगेलाह। तहियेसँ मिथिलामे अंग्रेजी राज्यक अमल मानल जा सकइयै। १७६५मे राबर्ट बारकर अपन सेनाक संग उत्तरी बिहारमे विदोही जमीन्दारकेँ दबेबाक हेतु ऐलाह। बेतियाक जमीन्दार जे गत दू वर्षसँ अराजक स्थितिसँ लाभ उठाकेँ विद्रोहक झंडा गारि देने छलाह तनिका ई दतेलन्हि। ओ जमीन्दार अपन किलामे नुका रहल छला। बारकरक पहुँचलाक बाद ओ तुरंत हुनकासँ समझौता कऽ लेलन्हि आर सबटा बकिऔता चुका देलन्हि। बारकर बेतियाक सम्बन्धमे बड्ड बढ़िया विवरण देने छथि। १७७२मे जखन बोर्ड आफ रेवन्युक स्थापना भेल तखन तिरहूतक सेहो राजस्वक आधारपर समझौता भेल। १७७४मे तिरहूतकेँ पटनाक अधीन कदेल गेलैक। १७७२मे फ्रांसीस ग्रैण्ड तिरहूतक प्रथम कलक्टर भके एलाह। ग्रैण्ड नीलहा कोठीक संस्थापक सेहो छलाह आर हिनके प्रयासे समस्त तिरहूतमे नीलहा कोठीक जाल बिछा देल गेल छल। १७८७धरि ग्रैण्ड साहेब रहलाह आर एहि बीच ओ समस्त तिरहूतक सर्वेक्षण राजस्वक दृष्टिये केलन्हि। तकर वार्थस्ट एला। १७६२मे राज प्रताप सिंह भौरसँ हटाकेँ दरभंगामे अपन राजधानी लऽ अनले छलाह। १७७०मे जखन पटनामे रेवेन्यु कौंसिलक स्थापना भेल तखन पुनः प्रताप सिंहकेँ अपन जमीन्दारीक मुकर्ररी कम्पनीसँ भेटलन्हि। केली तिरहूतक राजस्व अधीक्षक भऽ कऽ एलाह। १७७१मे प्रताप सिंह आर केलीमे मतभेद प्रारंभ भेल। राजाक ओतऽ बहुत रास बकिऔता भऽ गेल छलन्हि आर अंग्रेज लोकनि हिनक पुरान स्तित्वकेँ नहि रहए देमए चाहैत चलथिन्ह। माधवसिंहक समयमे फेर नव हिसाबे कम्पनीक संग समझौत भेलन्हि, ओना राज्यारोहणक पूर्वहिं माधवसिंहकेँ धीरज नारायणसँ कैकटा परगन्ना भेटल छलन्हि। सबटा बकिऔता चुकौला पर राज्य पुनः माधवसिंहकेँ वापस भेलन्हि। ताहि दिनमे एक प्रकारक अस्थायित्व छल तैं लगले–लगले परिवर्त्तनो होइत रहैत छल। तथापि १७८१ सँ १७८९ धरि दरभंगा निस्तुकी रूपें माधव सिंहक अधीन रहल। वार्थस्ट्र कलक्टर दरभंगा आवि महाराजसँ भेटकए अनुरोध केलकन्हि जे दमामी बन्दोबस्त मानि लैथ परञ्च माधवसिंह बड़ा चिंतामे पड़ि गेल छलाह आर कोनो निर्णय लेवामे असमर्थ रझलाह। वो गवर्नर जेनरलसँ अनुरोध केलन्हि जे हुनक राज्य घुरा देल जान्हि। जखन ई सब वार्तालाप छल तखन हुनका कराम अलीक स्टेट सेहो प्राप्त भेलैन्ह (१७९५)। एहिमे १५परगन्नामे ३५टा गाम छल। सरकार बहादुर अहिबातकेँ नहि मानि एहि सब दान बला गाँव अपन राज्यमे मिला लेलक। पुनः झंझटक बाद १८००ई.मे इ सम्पत्ति राजकेँ भेटलैक। अतंतोगत्वा दरभंगा राज सेहो दमामीबन्दोबस्तक अधीन भगेल। महाराज छत्रसिंहक समयमे कम्पनीक संग सम्बन्ध आर बढ़िया भेलैक। कम्पनीकेँ तखन नेपालसँ खटपट होइत छलैक आर लड़ाईक संभावना बढ़ल जाइत छलैक। कम्पनीक प्रतिनिधि महाराजसँ भेंट केलक आर हिनकासँ अनुरोध केलकन्हि जे संभावित गोरखा आक्रमणक विरूद्ध हिनका लोकनिकेँ सतर्क रहबाक चाही। तिरहूतक कलक्टर सीलीकेँ सेहो लिखल गेलैक जे ओ क्षेत्रक सब जमीन्दार सबसँ सेना प्राप्त करबाक प्रयास करे। सीली सेजर बैडशाक नाम जे पत्र लिखने छलाह जनकपुरसँ ताहिसँ ज्ञात होइछ जे दरभंगा महाराजकेँ छोड़ि केओ सक्रिय सहयोग नहि देने छलन्हि। छत्रसिंह करीब ९हजार टाकाक मदति सेहो देने रहथिन्ह। योग्य सैनिकक व्यवस्था सेहो इ कऽ देने छलथिन्ह। हिनक खुफिया सब अंग्रेजकेँ गोरखाक आक्रमणक पूर्व सूचना एवं ओकरा सबहिक बढ़बाक बाटक संकेत सेहो देलकन्हि। नेपालक विरूद्धक संघर्षमे अंग्रेजक मुख्य सहायक (सब तरहें) छत्र सिंह छलाह आर अंग्रेज सेना तखन पुपरी तक पहुँच चुकल। खिसियाकेँ नेपालक राजा अपन सैनिककेँ ई आदेश देलन्हि जे वो तिरहूत जिलाक सब गामकेँ लूट–पाट शुरू करे। जखन नेपालक विरूद्ध अंग्रेजक जीत भेलैक तखन छत्रसिंहकेँ महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। युद्ध समाप्त भेला उत्तरो अंग्रेजक अनुरोधपर छत्रसिंहक सेना मोतिहारीमे बनल रहल। ई लोकनि सतत अंग्रेजक खैरखाह बनल रहल। महेश्वर सिंहक समयमे सिपाही विद्रोह भेल। अंग्रेजकेँ हिन्दुस्तानी जमीन्दारपर सन्देह होइते छलैक आर ताहि पर एकटा कारणो आवि गेलैक। एक अफवाह प्रसारित भेलैक जे बहेड़ाक डिपुटी मजिस्ट्रेट मिस्टर डोवटनपर महाराजक एकटा कर्मचारी बन्दुक उठौलक यद्दपि ई बात किछु दोसर छलैक। महाराज अपन स्वामीभक्ति प्रदर्शित करबाक हेतु अंग्रेजकेँ नाथपुर आर पुर्णियाँक बीच डाक व्यवस्था चालो रखबाक हेतु १६टा घोड़सवार देलथिन्ह। १०० सिपाही सेहो ओ अंग्रेजकेँ पठौलन्हि मुदा ओ लोकनि संशकित रहबाक कारणे ओकरा घुरा देलन्हि। १८५५मे संथाल विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु सेहो महाराज हाथी इत्यादि कम्पनीक सैनिककेँ देने छलथिन्ह। महाराज महेश्वर सिंहक बाद कोर्ट आफ वार्डस भऽ गेलैक। तिरहूतमे सिपाही विद्रोहक प्रभाव कोनो रूपें कम नहि छल। अंग्रेजक संग बढ़िया सम्बन्ध रखितहुँ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह देशक नब्जकेँ चिन्हलन्हि आर काँग्रेसक प्रारंभिक अवस्थामे जे जानसँ मदति केलन्हि जकर उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। सिपाही विद्रोहक बाद समस्त भारतपर अंग्रेजक एकछत्र राज्य कायम भेल आर तिरहूत कमीश्नरीक एकटा अंग जिलाक रूपमे दरभंगा राजक नामें प्रसिद्ध भेल आर उत्तर बिहारक प्रायः सब जिलामे किछु न किछु हिनका लोकनिकेँ रहबे करैन्ह। रामेश्वर सिंह आर कामेश्वर सिंहक समयमे सेहो ब्रिटिश सरकारक संग सम्बन्ध बढ़िये रहलैन्ह आर १९३५–१९३६मे महाराज कामेश्वर सिंह अपन स्तित्वकेँ आर दृढ़ केलन्हि आर हुनकमे बृद्धि भेलन्हि। नेहि भऽ राज्यक स्थिति प्राप्त करबाक हुनक पैघ अभिलाषा छलैन्ह आर अहि दिशामे ओ बहुत प्रयत्नो केने छलाह। सामान्य प्रतिष्ठाक हिसाबे आन जमीन्दारक अपेक्षा दरभंगा राज्यक विशेष महत्व छलैक आर अंग्रेज लोकनि एकरा अपन एकटा पैघ सम्बन्ध मानैत छलाह। १९३५क कानूनक बाद जे राष्ट्रीयताक एकटा वयार बहल तकरा फलें परिवर्त्तन स्वाभाविक भगेल आर १९४६मे भारतक स्वाधीनताक बाद बिहार पहिल राज्य छल जे जमीन्दारी उन्मूलनक हेतु कानून पास केलक आर बिहारसँ जमीन्दारी प्रथा समाप्त भगेल। बिहारक सब जमीन्दार समाप्त भगेला आर ओहि क्रममे मिथिलाक सबसँ पैघ जमीन्दार जे कहियो मिथिलेशो कहबैत छलाह। सेहो समाप्त भगेला। II तिरहूतमे नीलहा कोठीक इतिहासे:- उत्तर बिहार आधुनिक भारतक इतिहासक दृष्टिकोणसँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि कारण नीलक खेती अहिठाम होइत छल आर एकरा हेतु अंतर्राष्ट्रीय बाजार प्राप्त छल। नीलक अपन महत्व होइत छैक आर जखन ई बुझना गेलैक जे उत्तर बिहार एकरा हेतु उपर्युक्त स्थान अछि तखन इस्त इण्डिया कम्पनीक कार्यकर्त्ता लोकनिक ध्यान अहि दिसि जाएब स्वाभाविके। अंग्रेजक आगमनक पूर्वहिंसँ अहिठाम नीलक खेती बढ़िया जकाँ होइत छल। युरोपमे ई रंग ततेक जनप्रिय भगेल छलैक जे एकर माँग बढ़ि गेल छलैक। भारतवर्षमे सेहो एकर खेतीक प्रश्न किछु विवाद उठल हेतैक जकर कारण स्पष्ट नहि अछि मुदा १८३७ई.क लार्ड मैकौलक एकटा मेमोरेण्डम छैक जाहिसँ अहि वस्तुपर प्रकाश पड़इयै आर ई आभास भेटइयै जे तकर बादसँ बंगालमे नीलक खेती कम होमए लागल आर नीलक खेतीपर तिरहूत विशेष ध्यान दिये जाए लागल। १७८२ग्रैण्ड तिरहूत क कलक्टर भऽ कऽ आएल छलाह आर १७८५मे ओ लिखैत छथि जे ओ अपने तिरहूतमे नीलक खेतीक सूत्रपात युरोपिय पद्धतिपर केलन्हि। ई ओ सबटा अपने खर्चपर केने छलाह। अंग्रेजक सर्वप्रथम फैक्ट्री ओना तिरहूतमे १६५०–१७००क बीच हाजीपूरक समीप सिंधिया अथवा लालगंजमे भेल छल आर तहियासँ अहि क्षेत्रमे अंग्रेजक प्रभाव बढ़ैत गेल आर ग्रैण्ड जखन कलक्टर भऽ कऽ एलाह तखन नीलक खेतीकेँ विशेष प्रोत्साहन भेटल। ग्रैण्ड एकरा एकटा उद्योगक हिसाबे विकसित केलन्हि। १७८८क ४फरबरीक एकटा रिपोर्टमे कहल गेल अछि जे तिरहूत कलक्टरीमे जे बारह–गोटए युरोपियन रहैत छथि ताहिमे १०गोटए नीलक खेती करैत छथि। ई बारहो गोटए कम्पनीक नौकर नहि छलाह। एहिमे सँ ६ गोटएक नाम छल–पीटर डी रेजेरियो, जेम्स जेंटिल, जी. डब्लु. एस. शुभान, जेम्स गेलन, जान मिलर आर फ्रांसिस रोज। जेम्स गेलन रेजेरियोक मनेजर छलाह। फ्रांसीस रोज जबर्दस्ती तिरहूतमे राजवल्लभक जागीरमे अपन नीलक खेती शुरू कऽ देने छलाह। १७९३मे नील फैक्ट्रीक संख्या ९भऽ गेल छल। नील फैक्ट्रीक स्थापना कानूनी व्यवस्था जटिल भऽ गेल आर ओहिपर सरकारकेँ ध्यान देमए पड़ैत छलैक। एकर कारण ई छल कि ई लोकनि तरह–तरहक अन्याय आर जोर जबर्दस्ती करैत जाइत छलाह। १७९३मे तिरहूतक जज नीवकेँ बाध्य भऽ कए डोनबल नामक एक फ्रेंच नागरिक तथा टोमस पार्ककेँ तिरहूत छोड़बाक आदेश देमए पड़ल छलन्हि। टोमस पार्क सरैया आर सिंहियामे बिना कोनो लाइसेंसकेँ कतहु बसब ताहिदिनमे गैरकानूनी छल। ढ़ोलीक जेम्स आर्नल्डकेँ सेहो जज महोदय ताकिद कऽ देने छलाह जो स्थानीय लोकनिक कुलाचारपर ध्यान राखैथि आर ओकरा विरूद्ध कोनो काज नहि करैथ। एहेन आदेश देबाक कारण ई छल जे जेम्स आर्नल्ड एकटा ब्राह्मणकेँ मारि बैसल छलाह। एवं प्रकारे रोज कोनो ने कोनो समस्या उठिते छल आर एकर विस्तृत इतिहास हमरा लोकनिकेँ मिन्डन विलसनक “हिस्ट्री आफ बिहार इंडिगो फैक्ट्रीज”मे भेटैत अछि। ९टा प्रारंभिक नीलक कोठी जे फुगल छल तकर विवरण एवं प्रकारे अछि:- (i)  दाउदपुर - (ii) सराय -               विलियम औखी हण्टर (iii) ढ़ोली - (iv) अधर -              जेम्स जेंटिल (v) शाहपुर -              रिचार्डसन परविस (vi) काँटी -               अकेजेण्डर नामेल (vii) मोतीपुर - (viii) दयोरिया -           फिंच (ix) बनारा -              ल्पुयिस किक तथा शुभान १७९४मे मात्र ७६७ बीघा १४ कट्ठा जमीनपर नीलक खेती होइत छल मुदा थोड़वे दिनमे ओकर एतेक विकास भेलैक जे समस्त उत्तर बिहारक कोन- कोनमे नीलहा साहेब सब पसरि गेल आर बढ़ियासँ बढ़िया जमीनपर अपन अधिकार कऽ लेलक। १८०३मे २५टा नील कोठी छल जाहिमे प्रमुखक नाम अछि भवराहा (भौर), मुहम्मदपुर, बेलसर, पिपराघाट, दलसिंहसराय, जितवारपुर, तिवारा, कमतौल, चितवारा, पुपरी, शाहपुरूण्डी इत्यादि। १८१०मे कलक्टर अहिबातक अनुशंसा केलन्हि जे २५टा नील फैक्ट्रीकेँ खजानासँ कर्ज देल जाइक कारण ई लोकनि अपना क्षेत्र बेकार सबकेँ काज दैत छथि आर एवं प्रकारे बेकारीक समस्याकेँ दूर करैत छथि। १८१०मे लगभग १०,०००मन नील तिरहूतसँ कलकत्ता पठाओल जाइत छल। चम्पारणमे नेपाल युद्ध समाप्त भेलाक बाद कर्नल हीकी नामक एक व्यक्ति १८१३ई. मे नीलक खेती शुरू केलन्हि। हीकी बारामे अपन फैक्ट्री फोललन्हि। ओकर ठीक बाद राजपुर आर तुरकौलियामे मोरन आर नहल अपन अपन नीलक कारखाना खोललन्हि। १८४५मे सिरहामे कैप्टेन टाइलर अपन कारखाना खोललन्हि। १८१६मे चम्पारणमे नीलक खेतीक उल्लेख नहि भेटइयै मुदा १८३०क रिपोर्टमे एकर वर्णन अछि। चीनीक स्थानपर लोग नील उपजाएब शुरू केलन्हि। नीलक खेती अहि हिसाबसँ बढ़ए लागल कि तिरहूतक कलक्टर घबरा गेला १८२८मे लिखलन्हि जे आब अहिपर रोक लगाना चाही। १८५०मे तिरहूतमे (दरभंगा मुजफ्फरपुर)मे ८६टा नीलक कारखाना भगेल छल। सब गोटए चीनीक कारबार छोड़ि नीलपर उतरि गेल छलाह। नील उद्योगपर युरोपियन लोकनिक एकाधिपत्य छलन्हि। सिपाही विद्रोहक समयमे जे तिरहूतमे वेसी विस्फोट नहि भेल तकर कारण इएह छल जे अहि क्षेत्रमे नीलहा साहेबक बोलबाला आर दबदबा छल आर मजूर सब हिनका सबसँ रोजी रोटी पबैत छल आर तैं दबाबमे रहैत छल। सिपाही विद्रोहक समयमे अहि क्षेत्रमे शांति स्थापनाक भार सरकार हिनके लोकनिपर छोड़ि देने छलन्हि आर ई लोकनि ओकर नीक जकाँ निर्वाह केलन्हि। दलसिंहसराय, तिवारा आर जितवापुरक कारखाना पुरान छल आर ओहि सबहक बड्ड धाक छलैक। १८७४मे तिरहूतक सबसँ पैघ नीलक कारखाना पण्डौलमे छलैक जकर क्षेत्रफल ३०० वर्गमील छलैक। १८६७–६८मे नीलक खेतीक विरोधमे एकटा जबर्दस्त प्रदर्शन चम्पारणमे भेलैक। रैयतक शोषण चरमोत्कर्षपर छलैक आर ओकर कोनो निदान सेहो नहि बहराइत छलैक। मजदूरकेँ पूरा पारिश्रमिक नहि देल जाइत छलैक। मजदूर लोकनि नीलक खेती करबासँ इंकार करए लागल आर जिउकतिया नामक गाममे अहि विरोधक पहिल उदाहरण भेटैत अछि। आनगामक लोग सब सेहो एकर देखा–देखी शुरू केलक। अहि वस्तुकेँ जल्दी सोझरेवाक हेतु मोतिहारीमे तत्काल कचहरीक स्थापना भेल। रैयतक प्रति थोड़ेक सुविधा सेहो देखाओल गेल। अंग्रेजकेँ शक्क भेलैक जे अहि आन्दोलनकेँ केओ उसका रहल अछि। आर हुनका लोकनि दृष्टि बेतिया राजपर गेल। १८७६मे बेतिया राजमे अंग्रेज मनेजर बहाल भेल आर तकर बाद फेर अंग्रेज लोकनि नीलक खेती दिस ध्यान देलन्हि। १९म शताब्दीक अन्त धरि चम्पारणमे कुल २१ फैक्ट्री आर ४८टा ओकर शाखा छल। चम्पारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगाक नीलहा साहेब मिलि कऽ १८०१मे अपना सबहिक हेतु एकटा नियम बनौलन्हि आर १८७७ ओ लोकनि बिहार इण्डिगो प्लांटरस एशोसियेशन नामक संस्था सेहो स्थापित केलन्हि। एकर मुख्यालय मुजफ्फरपुरमे छल आर एकरा सरकारसँ मान्यता छलैक। मूंगेर, भागलपुर, पूर्णियाँक बिभिन्न भागमे नीलक खेती पसरि गेल आर बेगूसराय, सहरसा, पूर्णियाँ आर कटिहार जिलाक बिभिन्न नीलहा कोठीक ताँता लागि गेल छल। १८९६मे मंझौल, बेगूसराय, भगवानपूर, बेगमसराय, दौलतपुर आदि स्थानमे नीलक कारखाना खुजल छल। ओनासँ १८७७सँ अहि जिलामे नीलक प्रसार भऽ चुकल छल। बेगूसरायक कोठी १८६३मे बनल छल। सहरसामे चपराम, सिंहेश्वर, पथरघट, राघोपुर आदि क्षेत्रमे प्रमुख नीलक कोठी सब छल आर तहिना पुर्णियाँ आर कटिहारमे सेहो। एक्के नीलहा साहेबक कैकटा कोठी होइत छल। प्रतापगंज दिसि सेहो एकटा प्रसिद्ध कोठी छल। तिरहूत प्लांटरस लोकनि एकटा सैनिक टुकड़ी सेहो बनौने छलाह जकर नाम छल। ‘दऽ बिहार लाइट हार्स’। १८५७–५८क सिपाही विद्रोहक समयमे जखन हिनका लोकनिकेँ तिरहूतमे शांति सुरक्षा रखबाक भार देल गेल छलन्हि तखन ई लोकनि सरकारक समक्ष अहि आशयक एकटा आवेदन हेतु एक प्रकार सैनिक संगठन करबाक अधिकार भेटैन्ह। १८६१–६२ई. अधिकार हिनका लोकनिकेँ भेटलन्हि आर ई लोकनि ‘सूबा बिहार माउंटेड राइफिल्स’ नामक एकटा संस्था बनौलन्हि। १८८६मे ओकर नाम बदलिकेँ ‘बिहार लाइट हार्स’कऽ देल गेल। १९१४–१८क प्रथम विश्वयुद्धमे एहिसँ सरकारकेँ बहुत सहायता भेटल छलैक। १९२०मे एक कानून द्वारा एकरा ‘आक्जिलियरी फोर्स’मे परिवर्त्तित कऽ देल गेलैक। १९म शताब्दीक अन्तिम चरणमे नीलक खेतीकेँ बड़का धक्का लगलैक। १८९६मे जर्मनीमे एकटा सिंथेटिक सस्त नीलक आविष्कार भेलैक आर संसार भरिमे प्रसिद्ध भऽ गेलैक आर एकर परिणाम ई भेलैक जे अहिठामक नीलक खेती समाप्त होमए लगलैक। नीलक दाम २५०सँ घटिकेँ १५०/- मन भगेलैक। जाहिमे नील उपजैत छलैक ताहिमे लोग तम्बाकु आर कुसियारक खेती शुरू केलक। प्लैंटरस एशोसियेसन सेहो अहि प्रकारक निर्णय लेलक। १९१४मे विश्वयुद्धक कारण जब जर्मनीसँ नील एनाए बन्द भऽ गेलैक तखन फेर साहेब लोकनिक ध्यान अहि दिसि गेलन्हि आर पुनः नीलक खेत शुरू भेल मुदा से बहुत दिन धरि चलल नहि। नीलक खेती समाप्त भेल। III स्वातंत्र्य संग्राम आर मिथिला:- प्राचीन मिथिलाक सीमा अंग्रेज अमलमे आबिकेँ नहि रहि गेल। अंग्रेजक आगमन कालहिसँ प्रत्यक्ष एवँ अप्रत्यक्ष रूपेँ ओकर विरोध सबठाँ शुरू भऽ गेल छल कारण हुनका लोकनिक स्वार्थ अपन साम्राज्य विस्तारमे छलन्हि, जनताक कल्याणमे नहि। तथापि शक्तिशाली होयबाक कारणे आर अहिठाम आंतरिक फूट रहबाक कारणे हुनका लोकनिजे सफलता भेटलन्हि तकरा परिणाम स्वरूप ओ लोकनि २००वर्ष धरि अहिठाम शासन केलन्हि आर १९४७मे अहि देशक पिण्ड छोड़िकेँ ओ लोकनि गेला। मिथिलामे सिपाही विद्रोहक बाद जे विरोधक पहिल आवाज उठल छल से उएह जे चम्पारणमे किसान लोकनि नीलहा कोठीक साहबक विरूद्ध उठौने छलाह आर तिरहूतक हिसाबे ओ एकटा महत्वपूर्ण घटना भेल। ओहि विद्रोहक सूत्रकेँ महात्मा गाँधी १९१७मे चम्पारणमे पकड़लन्हि आर सत्यक संग अपन योग शुरू केलन्हि। अहि दृष्टिकोणसँ ई निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे वास्तविक अर्थमे स्वाधीनता संग्रामक श्रीगणेश गाँधीक युगमे मिथिलहिक आँगनसँ भेल। जँ कहियो महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लाउथर कास्टल कीनिकेँ काँग्रेसक सेसनक हेतु देने छलाह तँ काँग्रेस ओकर प्रतिदान चम्पारणमे गाँधीजीकेँ नियुक्त क देलक आर चम्पारणमे स्वातंत्र्य संग्रामक जे आगि पजरलसँ तातक जड़ैत रहल जातक कि भारत स्वतंत्र नहि भेल। वैशाली विदेहक गणराज्य परम्पराक अनुरूप अशोक द्वारा चिन्हित एवं शेरशाहक सुशाशनसँ पद्मांकित चम्पारणक पवित्र क्षेत्र गाँधीजीक कर्मभूमि बनि महावीरक अहिंसाकेँ साकाररूप प्रदान केलक। १९१७–१९४७धरि गण्डकसँ कोशी आर हिमालयसँ गंगाधरिक क्षेत्रमे एकसँ एक सपूत जन्म लेलन्हि जे स्वतंत्रताक हेतु अपन प्राणक आहूति देने छलाह। कलकत्तासँ आबि प्रफुल्ल चाकी आर खुदीराम बोस सेहो अपनाकेँ अहि भूमिमे अमर केलन्हि। राष्ट्रीय संग्रामक इतिहास लिखब हमर अभीष्ट एतए नहि अछि मात्र एतबे कहबाक अछि जे स्वातंत्र्य संग्राममे मिथिला कोनो प्रांतसँ ककरोसँ पाछु नहि छल। १९१७मे जँ गाँधीजी बाट देखौलन्हि तँ १९४२मे मिथिला सेहो अपन सर्वनिछावर कऽ देलक हुनके आह्वानपर आर उत्तर बिहार १९४२मे सब तरहें क्रांतिकारी लोकनिक गढ़ बनल छल। सब बिचारक भूमिकाक निर्वाह केलन्हि आर हुनके लोकनिक सत्प्रयासे १९४७मे भारतक स्वतंत्रता प्राप्त भेल–ओहिमे मिथिलाक योगदान ओतवे छल जतवा आन कोनो प्रांतक। क्रांतिकारी दलक इतिहासमे सेहो मिथिलाक नाम प्रख्यात छैक। j अध्याय–१४ मिथिलाक अन्यान्य राजवंशक विवरण (i.) गंधवरिया राजवंशक इतिहास:- स्वर्गीय पुलकित लाल दास मधुर अथक परिश्रम कए गन्धवरियाक इतिहास लिखि स्वनाम धन्य श्री भोला लाल दासक ओतए प्रकाशनार्थ पठौने छलाह। कोनो कारणवश ई पाण्डुलिपि जे कि आब जीर्णावस्थामे अछि। प्रकाशित नहि भऽ सकल आर गन्धवरियाक इतिहासक प्रसंग एकदिन जखन हमरा भोला बाबूसँ गप्प भेल तखन ओ एहि पाण्डुलिपि चर्च केलहि आर हमरा आग्रहपर ओ पाण्डुलिपि हमरा पठा देलन्हि। पाण्डुलिपि देखलापर ई बुझबामे आएल जे मधुरजी गन्धवरियाक इतिहास किवदंतीक आधारपर लिखने छथि मुदा ताहु हेतु हुनक परिश्रम स्तुत्य एवं सराहनीय अछि। जखन गन्धवरिया कतहु किछु प्रामाणिक इतिहासक सामग्री नहि एकत्रित भऽ सकल अछि ताहि दृष्टिकोणे मधुरजीक ई सत्प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय अछि। सोनबरसा राजकेसमे गन्धवरियाक इतिहास देल गेल अछि मुदा ओहुमे जे गन्धवरिया लोकनि सोनबरसाक विरोधमे गवाही देलन्हि ताहिमे हक एकटा प्रमुख व्यक्ति स्वर्गीय श्री चंचल प्रसाद सिंह मुइलासँ पूर्व हमरा व्यक्तिगत रूपें ई कहने गेला जे हुनक अपन जे वयान ओहि केसमे भेल छन्हि से एकदम उल्टा छन्हि तैं गन्धवरियाक इतिहासक हेतु ओकरा उपयोग करबामे ओकरा ‘रिभर्स’ ककए पढ़ब उचित। ओहु केसमे जे इतिहास बनाओल गेल अछि से बहुत किछु परंपरेपर आधारित अछि मुदा ओहिमे एक बहुत महत्वपूर्ण बात ई भेटल जे गन्धवरियाक द्वारा देल दानपत्र सब बहुत किछु उपस्थित कैल गेल छल जाहिमे किछु चुनल दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादक अंश हम अपन ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिमरूल इन तिरहूत’मे प्रकाशित कैल अछि। सहरसा जिलामे गन्धवरियाक एतेक प्रभुत्व छल तइयो ओकर कोनो उल्लेख पुरनका ‘भागलपुर गजेटियर’मे नहि छल आर जखन सहरसा जिला बनल आर ओकर नव गजेटियर बनल तखन ओहिमे इतिहास लिखबाक भार हमरा भेटल आर ओहिक्रममे हम एक पाराग्राफमे गन्धवरियाक चर्च कैल। एकर अतिरिक्त आर कोनो प्रामाणिक इतिहास गन्धवरियाक नहि बनल अछि आर नेऽ अधावधि एहि दिशामे कोनो प्रयासे भऽ रहल अछि। एहना स्थितिमे मधुरजीक लिखल गन्धवरियाक इतिहासक मूलकेँ हम अहिठाम प्रस्तुत कऽ रहल छी जाहिसँ ओहि मृतात्माकेँ अपन कृतिक स्वीकृति देखि आनन्द होन्हि। अनापेक्षित बातकेँ हटा देल गेल अछि। गन्धवरिया लोकनिक गन्धवारडीह एखनो शकरी आर दरभंगा टीसनक बीचमे अछि आर हुनका लोकनिक ओतए जीवछक पूजा होइत छन्हि। गन्धवरिया लोकनि पँचमहलामे पसरल छथि– वरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आर यदिया मानगंजकेँ मिलाकेँ पँचमहला कहल जाइत छल। जाहिठाम मधुरजीक अंश समाप्त होएत ओतए हम संकेत दऽ देब। दरभंगा ओ विशेषतः उत्तर भागलपुर (सम्प्रति सहरसा जिला)मे गन्धवरिया वंशज राजपूतक संख्या अत्यधिक अछि। दरभंगा जिलांतर्गत भीठ भगवानपुरक राजा साहेब तथा सहरसा जिलांतर्गत दुर्गापुर भद्दीक राहा साहेब एव वरूआरी, पछगछिया, सुखपुर, बरैल, परसरमा, रजनी, मोहनपुर, सोहा साहपुर, देहद, नोनैती, सहसौल, मंगुआर, धवौली, पामा, पस्तपार, कपसिया, विष्णुपुर एवं पारा इत्यादि ग्राम स्थित बहुसंख्यक छौट पैघ जमीन्दार लोकनि एहि वंशक थिकाह आर सोनबरसाक स्वर्गीय महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह सेहो एहि वंशक छलाह। ई राजवंश बहुत प्राचीन थिक ओ एहि राजवंशक सम्बन्ध मालवाक सुप्रसिद्ध धारानगरीक परमारवंशीय राजा भोज देवक वंशसँ अछि। एहिवंशक नाम “गन्धवरिया” एतै आविकेँ पड़ल। राजा भोज देवक ३५म पीढ़ीक पश्चात् ३६म पीढ़ीक राजा प्रतिराज साह अपन धर्मपत्नी तथा दू ई पत्रक संग ब्रह्मपुत्र स्नानक निमित्त आसाम गेल छलाह। एहि यात्रा जखन ओ लोकनि फिरलाह तँ पुर्णियाँ जिलांतर्गत सुप्रसिद्ध सौरिया ड्योढ़ीक समीप मार्गमे कतहु कोनो संक्रामक रोगसँ राजा–रानीक देहांत भऽ गेलन्हि। सौरिया राजक प्रतिनिधि एखनो दुर्गागंजमे छथि। माता–पिताक देहांत भेलापर दुनू अनाथ बालक भूलल–भटकल सौरिया राजाक ओतए उपस्थित भेलाह आर अपन पूर्ण परिचय देलन्हि। सौरिया राज्य ताहि समयमे बड्ड पैघ आर प्रतिष्ठित छल। ओ दुनू भाइकेँ यथोचित आदर पुरस्कार अपना ओतए आश्रय प्रदान केलन्हि तथा कालांतर उपनयन संस्कारो करा देलन्हि। उपनयनक समय उक्त दुनू भाइक गोत्र अवगत नहि रहबाक कारणे हुनका लोकनिकेँ परासर गोत्र देल गेल जबकि परमारक गोत्र कौण्डिल्य छल। दुहू राजकुमारक नाम लखेशराय आर परवेशराय छलन्हि। ओ लोकनि वीर आर योद्धा छलाह। सौरिया राजक जमीन्दारी दरभंगा राज्यमे सेहो पबै छलन्हि। कोनो कारणे ओहिठाम युद्ध उपस्थित भेलन्हि। राजा साहेब अहि दुनू भाइकेँ सेनानायक बनाए अपन सेना पठौलन्हि। कहल जाइछ जे दुनू भाइ एक राति कतहु निवास कैलन्हि कि निशीय राति भेलापर शिविरक आगाँ किछु दूरपर एक वृद्धा स्त्रीक कानव ओ दुनू गोटए सुनलन्हि। जिज्ञासा केला संता ओ स्त्री बाजलि “जे हम अहाँ घरक गोसाओन भगवती थिकहुँ। हमरा अहाँ लोकनि कतहु स्थान दिअह”। एहिपर ओ दुनू भाइ बजलाह जे हम सब तँ स्वयं पराश्रित छी तैं हमरा वरदान दिअह जे हमरा लोकनि एहि युद्धमे विजय पाबी। ओ स्त्री हुनका लोकनिकेँ एक बहुत उत्तम खड़ग प्रदान कैल जकर दुनू पृष्ट भागपर बहुत सूक्ष्म अक्षरमे समस्त दुर्गा सप्तशती अंकित छल। ई खड़्ग प्रथम दुर्गापुर भद्दीमे छल पश्चात् महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह ओकरा सोनबरसा आनलन्हि। ओहिमे कहियो बीझ नहि लागल छल। ओ खड़्ग एक पनबट्टामे चौचेतल बन्द रहैत छल आर झाड़ि देला संता ओ खड़्गक आकारक भऽ जाइत छल। दुनू भाई युद्धमे विजयी भेला। समस्त रणक्षेत्र मुर्दासँ पाटि गेल आर दुर्गन्ध दूर–दूर धरि व्याप्त भऽ गेल। एहिसँ सौरियाक राजा प्रसन्न भए एहिवंशक नाम ‘गन्धवरिया’ रखलन्हि। ई युद्ध दरभंगा जिलांतर्गत गंधवारि नामक गाममे भेल छल। गंधवारि आर अन्यान्य क्षेत्रक हिनका लोकनिकेँ उपहारस्वरूप भेटलन्हि। लखेशरायक शाखामे दरभंगा जिलांतर्गत (सम्प्रति मधुबनी) भीढ़ भगवानपुरक श्रीमान राजा निर्भय नारायणजी भेल छथि आर परवेशक शाखामे सहरसाक गन्धवरिया जमीन्दार लोकनि छथि। सहरसाक विशेष भूभाग एहि शाखाक अधीन छल। दुर्गापुर भद्दी एकर प्रधान केन्द्र छल। परिवेशरायकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– लक्ष्मण सिंह, भरत सिंह, गणेश सिंह, वल्लभ सिंह। गणेश सिंह आर वल्लभ सिंह निस्तान भेलाह। भरत सिंहक शाखामे धवौलीक जमीन्दार भेल छथि। लक्ष्मण सिंहकेँ तीन पुत्र भेलन्हि– रामकृष्ण, निशंक आर माधव सिंह। एहिमे माधव सिंह मुसलमान भए गेलाह नौहट्टाक शासक भेलाह। ‘निशंक’क नामपर निशंकपुर कुढ़ा परगन्नाक नामकरण भेल। प्रथम एहि परगन्नाक नाम मात्र ‘कुढ़ा’ छल बादमे ओहिमे निशंकुपर जोड़ल गेल। निशंककेँ चारि पुत्र भेलन्हि– दान शाह, दरियाव शाह, गोपाल शाह आर क्षत्रपति शाह। दरियाव शाहक शाखामे वरूआरी, सुखपुर, बरैल तथा परसरमाक गन्धवरिया लोकनि छथि। लक्ष्मण सिंहक ज्येष्ठ पुत्र रामकृष्णकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– वसंत सिंह, वसुमन सिंह, धर्मागत सिंह, रंजित सिंह। वसुमन सिंहक शाखामे पछगछियाक राज्य भेल। धर्मागत सिंहक शाखामे जदिया मानगंजक जमीन्दार लोकनि भेल छथि। रंजित सिंहक शाखामे सोनबरसा राज्य भेल। एहि वंशक हरिवल्लभ नारायण सिंहकेँ १९०८मे सोनबरसासँ १०–१२मील उत्तर कांप नामक सर्किलमे साढ़े नौ बजे रातिमे शौचक समय मारि देल कैन्ह। हिनक एक कन्याक विवाह जयपुरक स्टेटक संम्बन्धीक संग भेल छलन्हि। आर हिनका एकोटा पुत्र नहि छलन्हि। ओहि कन्याक पुत्र रूद्रप्रताप सिंह सोनबरसाक राजा भेलाह। एहि शाखामे सोहा, साहपुर, सहमौरा, देहद, वेहट, वराटपुर, तथा मंगुआरक गंधवरिया जमीन्दारी भेल छथि। एहिमे साहपुरक राजदरबार सेहो प्रसिद्ध छल–हुनका दरबारमे बिहपुर मिलकीक श्यामसुंदर कवि आर शाह आलमनगरक गोपीनाथ कवि उपस्थित छलाह। स्वर्गीय चंचल प्रसाद सिंह सेहो सोनबरसाक दमाद छलाह। वंसत सिंहकेँ जहाँगीरसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। राजा वसंत सिंह गंधवारिसँ अपन राजधानी हटाकेँ सहरसा जिलामे वसंतपुर नामक गाम बसौलन्हि आर ओतहि अपन राजधानी बनौलन्हि। मधेपुरासँ १८–२०मील पूब इ गाम अछि। वंसत सिंहकेँ चारि पुत्र छलन्हि– रामशाह, वैरिशाह, कल्याण शाह, गंगाराम शाह। प्रथम पुत्रक शाखा नहि चलल। वैरिशाह राजा भेल। कल्याण शाहक शाखामे रजनीक जमीन्दार लोकनि आर गंगारामक शाखामे वाराक जमीन्दार लोकनि भेलाह। ई अपना नामपर गंगापुर वासुका बसौलन्हि। वैरिशाहकेँ दु रानी छलन्हि– जाहिमे जेठरानीसँ राजा केसरी सिंह आर जोरावर सिंह भेलथिन्ह आर छोट रानीसँ पद्मसिंह। जोरावर सिंहक शाखामे मोहनपुर आर पस्तपारक जमीन्दार लोकनि भेलाह। पद्मसिंहक शाखामे कोड़लाहीक जमीन्दार लोकनि भेल छन्हि। राजा केसरी सिंह प्रतिभाशाली व्यक्ति छलाह। हुनका औरंगजेबसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। केसरी सिंहक पुत्र धीरा सिंह, धीरा सिंहक कीर्ति सिंह, कीर्ति सिंहक राजा जगदत्त सिंह भेलाह जे बड्ड प्रतापी, दयालु आर दानबीर छलाह। गंगापुर, दुर्गापुर आर बेलारी तालुका हिनका अधिकारमे छलन्हि। ई जनश्रुति विशेष प्रख्यात अछि जे ताहि समयमे दरभंगा राजक कोनो महारानी कौशिकी स्नानक निमित्त अवै छलीह। सिंहेश्वरक समीप बेलारीमे हुनक डेरा पड़ल। ई सुनिकेँ जे ई दोसरा गोटाक राज्य थिकाह ओ बजलीह जे हम आन राज्यमे अन्न जल ग्रहण नहि कऽ सकैत छी। जगदत्त सिंह तत्काल बेलारी तालुकामे दानपत्र लिखिकेँ महारानीसँ स्नान भोजनक आग्रह केलन्हि। उक्त बेलारी तालुका हेवनिधार बड़ागोरियाक खड़ौड़य बबुआन लोकनिक अधीन छल आर तत्पश्चात् राज दरभंगाक भेल। जगदत्त सिंहकेँ चारि पुत्र भेलैन्ह– हरिहर सिंह, नल सिंह, त्रिभुवन सिंह, रत्न सिंह। त्रिभुवन सिंह ‘पामा’मे अपन ड्यौढ़ी बनौलन्हि। मधुरजी विवरण संक्षेपमे एतबे अछि। मधुरजीक विवरणसँ आर आन विवरणसँ किछु तफात देखबामे अवइयै। पंचगछियाक राजवंश अपनाकेँ नान्यदेवक वंशज हरिसिंह देवक पुत्र पतिराज सिंहसँ उत्पत्ति मनैत छथि। पतिराज सिंह ‘गन्धवारपुर’मे अपन वास स्थापित केलन्हि आर तै गन्धवरिया कहौलथि। परञ्च इहो लोकनि अपनाकेँ पतिराज सिंहक पुत्र परवेश रायक वंशज कहैत छथि। रामकृष्ण सिंहक वंशज भेला पछगछिया स्टेट। हिनका लोकनिक वंश वृक्षक अनुसार– लक्ष्मण सिंहसँ राज्यक बटबारा एवं प्रकारे भेल– माधव सिंह               रामकृष्ण                       निशंक सिंह (मुहम्मद खान)           (दुर्गापुर, सोनबरसा               (पंचमहला) (नवहट्टा)                पछगछिया इत्यादि) सोनबरसा, पछगछिया तथा बरूआरी प्रसिद्ध स्टेट मानल जाइत छल। पंचमहलामे बरूआरी मुख्य स्टेट छल। निशंक सिंहक पुत्र दरिया सिंहक वंशज भेला बरूआरी स्टेट। अहिवंशमे राजा कोकिल सिंह प्रख्यात भेल छथि जनिका सम्राट शाह आलमसँ ११६५ हिजरीमे शाही फरमान भेटल छलन्हि। राजाक उपाधि हिनका सम्राटसँ भेटल छलन्हि। राजाक उपाधि हिनका सम्राटसँ भेटल छलन्हि। बरूआरी तिरहूत सरकारक अधीन छल आर कोकिल सिंहकेँ अहिक्षेत्रक ननकार हैसियत भेटल छलन्हि। गन्धवरिया लोकनिक कुलदेवी “जीवछ”क प्रतिमा वरूआरी राजदरबारमे छल आर ओकर पूजा नियमित रूपेँ होइत छल। ‘जीवछ’क प्रतिमाकेँ नोहट्टासँ अहिठाम आनल गेल छल। निशंक सिंह दानी सिंह          दरिया सिंह         क्षत्रपति सिंह        गोपाल सिंह (परसरमा)          (वरूआरी)                (गोबरगढ़ा)         (कुमुरखन) वरूआरी            सुन्दर सिंह         कृष्ण नारायण सिंह (सुखपुर)           (बरैल) एतवा सब किछु होइतहुँ गन्धवरियाक कोनो प्रामाणिक इतिहास नहि बनि पाओल अछि। जे किछु दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादमे केसमे भेटल अछि से वेसी भीठ–भगवानपुरक राजा सबहिक। भीठ भगवान गन्धवरियाक पैघ हिस्साक राजधानी छल आर हुनका लोकनिक स्तित्व निश्चित रूपें दृढ़ छलन्हि आर ओ दान पत्र दैत छलाह जकर प्रमाण अछि। दरभंगाक गन्धवरिया लोकनि सेहो अपन इतिहासक रूपरेखा नहि प्रकाशित केने छथि तैं ओहि सम्बन्धमे किछु कहब असंभव। हमरा बुझने ओइनवार वंशक पतनक बाद ‘भौर’ क्षेत्रमे राजपूत लोकनि अपन प्रभुत्व जमा लेने छलाह आर स्वतंत्र राज्य स्थापित केने छलाह। खण्डवलासँ हुनका संघर्षो भेल छलन्हि आर ओहि संघर्षक क्रममे ओ लोकनि भीठ–भगवानपुर होइत सहरसा–पुर्णियाँक सीमा धरि पसरि गेला। “गन्ध” आर “भर” (राजपूत)क शब्दक मिलनसँ गन्धवारि बनल (‘गन्धभर’) आर ओहि गाँवकेँ ओ लोकनि अपन राजधानी बनौलन्हि। कालांतरमे भीठ–भगवानपुर हिनका लोकनि प्रधान केन्द्र बनल। इतिहासक परंपराक पालन करैत इहो लोकनि अपन सम्बन्ध प्राचीन परमार वंशक संग जोड़लन्हि आर ‘नीलदेव’ नामक एक व्यक्तिक अनुसंधान केलन्हि। ओहिमे सँ केओ अपनाकेँ विक्रमादित्यक वंशज कहलैन्हि आर केओ नान्यदेव। भीठ भगवानपुरक वंश तालिका तँ हमरा लग नहि अछि मुदा सहरसाक गंधवरिया लोकनिक वंश तालिका देखलासँ ई स्पष्ट होइछ जे परमार भोज आर नान्यदेवसँ अपनाकेँ जोड़निहार गन्धवरिया लोकनि लखेश आर परवेशक अपन पूर्वज मनैत छथि। पूर्वजक हिसाबे सब श्रोत एकमत अछि। परंपरामे इहो सुरक्षित अछि जे नीलदेव गंधवारिमे आविकेँ बसल छलाह आर ‘जीवछ’ नदीकेँ अपन कुलदेवता बनौने छलाह। कहल जाइत अछि जे नीलदेव राजा गंधकेँ मारिकेँ अपन राज्य बनौलन्हि। सहरसा जिलामे भगवतीक आशीष स्वरूप राज्य भेटबाक जे गप्प अछि ताहुमे कैक प्रकारक कथा आर किवदंती भेटइयै। मात्र एक बातपर सब श्रोत एकमत अछि जे हिनका लोकनिकेँ उपनयनक अवसरपर अपन गोत्र याद नहि रहला संता ‘परासर गोत्र’ देल गेलन्हि। जा धरि कोनो आन वैज्ञानिक साधन उपलब्ध नहि होइछ ताधरि गन्धवरियाक इतिहास अहिना किवदंती आर परम्परापर आधारित रहत। ii. बनैली राज्यक इतिहास:- प्राचीनताक दृष्टिकोणसँ बनैली इतिहास सेहो अपन महत्व रखैत अछि। १४म शताब्दीमे गदाधर झा नामक एक विद्वान दरभंगा जिलाक वैगनी नवादा नामक गाममे रहैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हिनक विद्वतासँ प्रभावित भए गयासुद्दीन तुगलक हिनका काफी सम्पत्ति दानमे देने छलथिन्ह। हुनकासँ नवम पीढ़ीमे भेला देवनंदन झा जनिका परमानंद झा आर मानिक झा नामक दूटा पुत्र छलथिन्ह। परमानंद झा संस्कृत, फारसी आर अरबीक प्रसिद्ध विद्वान छलाह। शिकारक सेहो हुनका बड्ड शौख छलन्हि। बाघ मारबामे तँ वो सहजहि निपुणते प्राप्त केने छलाह। अपन पूर्वजसँ हिनका पर्याप्त धन सम्पत्ति भेटले छलन्हि आर तैं हिनक निपुणताकेँ देखि अठारहम् शताब्दीमे हिनका फकराबाद परगन्नाक चौधरी बना देल गेलन्हि। दिनानुदिन हिनक ख्याति बढ़ैत गेलन्हि परञ्च ई अपन काज सम्पादन करबामे असावधान होइत गेलाह। फलस्वरूप ई अजीमाबादक कोपभाजन बनला आर दरभंगासँ भागि कमला नदी बाटे फरकिया दिसि प्रस्थान केलन्हि। अजीमाबादक सरकारसँ डर बनले रहैन्ह तैं फरकियाकेँ छोड़ि ओ धरमपुर दिसि बढ़ला आर पुर्णियाँक क्षेत्रमे अमौर दिसि चल गेलाह। ताहि दिनमे नवाव आर अंग्रेजमे खटपट चलि रहल छल। एम्हर हिनका लाल सिंह चौधरी आर दुलार सिंह चौधरी दूटा पुत्र उत्पन्न भेलन्हि। हुनक भाए माणिक चौधरी देहांत भगेलन्हि। माणिक चौधरीक एक पुत्र छलथिन्ह हरीलाल चौधरी। ओहि समयमे आमौरमे भैरव मल्लिक नामक एकटा सम्पन्न कायस्थ सेहो रहैत छलाह जे बड्ड जनप्रिय, निपुण आर उत्साही लोक छलाह आर जिनकर प्रतिष्ठा ओहि क्षेत्रमे अपूर्व छल। ओ पूर्णियाँ आर दिनाजपुर क्षेत्रक कानूनगोय छलाह। इएह अपना ओहिठाम परमानन्द चौधरीकेँ रहबाक प्रश्रय देलन्हि। कृषिकार्य कए अपन पालन पोषण करबाक हेतु परती जमीन सेहो ओ परमानंद चौधरीकेँ देलन्हि। तकर बादहिसँ परमानंद चौधरीक भाग्य पलटल। पटसाराक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायण राय एक दिन अपन पालकीपर बैसल कतहु जाइत छलाह कि बाटहिमे परमानन्द चौधरी एकटा राहु माछ मारिकेँ हुनका समक्ष उपस्थित केलन्हि। राजा प्रसन्न भए हुनका अपना ओतए तहसीलदार मनेजरमे बहाल कऽ लेलथिन्ह। परमानन्द शक्तिशाली लोक भगेलाह आर ओहि क्षेत्रमे हुनक प्रभाव बढ़ए लागल। एक दिन पुर्णियाँक नवाव शिकारक हेतु एम्हर एला मुदा हुनका एक्कोटा शिकार नहि भेटलन्हि तखन परमानंद चौधरी हुनका देखितहि देखितहि एकटा बाघ मारिकेँ देलथिन्ह। नवाब पसिन्न भए हुनका “हजारी”क उपाधि देलथिन्ह आर वो आब हजारी चौधरीक नामे प्रसिद्ध भऽ गेलाह। हिनक पुत्र दुलार सिंह कृषि आर व्यापारक माध्यमसँ अपन आर्थिक स्थितकेँ सुदृढ़ केलन्हि। घी, इलायची, आर लकड़ीक व्यापार ओ नेपालसँ शुरू केलन्हि आर नवाबसँ मिलिकेँ ओहि सब वस्तुकेँ कलकत्ता धरि पठबे लगलाह। फेर हाथीक व्यापार शुरू केलन्हि जाहिमे बड्ड लाभ भेलन्हि। अहि क्षेत्रमे धनीमानी व्यक्तिमे हुनक गिनती होमए लागल। भैरव मल्लिकक धन बिलहि गेल आर ओ शोकाकुल भए मरि गेल। हुनका स्थानपर दुलार सिंह कानुनगोय नियुक्त भेला। एम्हर ताधरि परमानंद चौधरी असजा आर मोरंग तटक तीरा परगन्नाक अधिकारी सेहो भऽ चुकल छलाह। ओम्हर ताधरि राजा इन्द्रनारायण सिंहक महल कुरसाकाँटाक बन्दोबस्त दमामी बन्दोबस्तक समय ई लऽ लेने छलाह। राजा इन्द्रनारायण हुनक एहि विश्वासघाती कार्यसँ असंतुष्ट भगेल छलथिन्ह। हजारी चौधरीक परोक्ष भेलापर हुनका लोकनिमे आपसी मनमुटाव शुरू भेल। दुलार सिंह हरलालकेँ अमौरक इलाका अपन घरेलु कलहकेँ शांत केलन्हि। हरलालक उत्तराधिकारी अयोग्य बहरेला। दुलारसिंह बनैलीमे अपन निवास स्थान बनौलन्हि। ओतहिसँ हिनक प्रभावमे वृद्धि शुरू भेल। दुलार सिंहक दू पुत्र छलथिन्ह सर्वानन्द आर वेदानन्द– सर्वानन्द निसंतान मरि गेलाह। वेदानंदक कार्यकलापसँ वंशक कीर्ति बढ़ल। दुलार सिंहकेँ दोसर विवाहसँ कतेको संतान भेलैन्ह जाहिमे प्रख्यात भेलाह रूद्रानंद सिंह जे अपन पुत्र श्रीनंदनक नामपर श्रीनगर राज्यक स्थापना केलन्हि। कानूनगोय रहलाक कारणे सरकारक ओतए दुलार सिंहक वेश प्रभाव छल आर अपन प्रभावहिसँ ओ नवहट्टा, धपहर, गोगरी आदि क्षेत्र धरि अपन अधिकारक विस्तार केलन्हि। ओम्हर पुर्णियाँ आर मालदह धरि अपन जमीन्दारी बढ़ौलन्हि। नेपाल युद्धमे सेहो ई कम्पनी सरकारकेँ सहायता देने छलाह। नेपाल विजयक पश्चात् हिनका कम्पनी सरकारसँ राजाबहादुरक उपाधि भेटलन्हि। नेपाल आर अंग्रेजक बीच सीमा निर्णयक समयमे कम्पनी सरकार तीरा परगन्नाक समीप हिनका सातकोस भूमि बन्दोबस्तमे दऽ देलकन्हि। दुलार सिंहक बाद हुनक पुत्र वेदानंद सिंह राजा भेला आर हुनको कम्पनीसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। हुनका समयमे राज्य दू भागमे बटि गेल। वेदानंद अपन पैत्रिक बनैलीमे रहलाह आर रूद्रानन्द सौरा नदी टपिकए श्रीनगरमे बसलाह। वेदानन्द खरगपुर महाल कीनिके अपना राज्यमे मिलौलन्हि आर अपन रज्यक पूर्ण विस्तार केलन्हि। हिनके बनैली राज्यक संस्थापक कहल जा सकइयै। हिनक विवाह मिथिलामे महेश ठाकुरक वंशजमे भेल छलन्हि। ई विधा प्रेमी छलथिन्ह– प्रथम पत्नीसँ पद्मानंद सिंह आर तेसर पत्नीसँ कुमार कलानन्द आर कृत्यानंद सिंह भेलथिन्ह। लीवानंद सिंह अपना समयक मिथिलाक एक प्रमुख व्यक्ति छलाह। हिनक परोक्ष भेला पर राजा पद्मानंद सिंह राजा भेलाह आर हिनका अंग्रेजी राजसँ सरकारक उपाधि सेहो भेटल छलन्हि। हिनकहि समयमे राज्यमे बट्बाराक मामला शुरू भेल जाहिमे हिनका ७आना आत कुमार कलानंद आर कृत्यानंदकेँ ९आना हिस्सा भेटलन्हि। पद्मानंद सिंह अपना बापे जकाँ दानी छलाह। वैद्यनाथ मंदिरक फाटक बनेबामे हिनक पूर्ण योगदान छलन्हि। महादेवक प्रति हिनक निम्नलिखित कविता प्रसिद्ध अछि– __ ”जो अलका पति की सुख, सम्पत्ति देई मेरो प्रभु भौन भरेंगे। अङ्कलिये गिरि राज सुता, कर पंकज तेसिर आइ धरेंगे॥ चन्द्र विभूषण भाल धरे, दुख जाल कराल हमार हरेंगे। पद्मानंद सदा शिवकेँ, हरखाह मखाह निवाह करेंगे॥ करै पवित्र जाको दर्शनदिव्य देवन को, सेवाते होत जाके, सहजहि सनाथ है। गायें यश जाको, पावें मंगल मनोरथको, छाई छिति कीरति कृपाल गुणगाथ है॥ नाथनकेँ नाथको अनाथन के नाथ प्रभु, देवनकेँ नाथ मेरे बाबा वैद्यनाथ है॥ बनारसमे श्यामा मंदिर आर तारा मंदिरक स्थापना हिनके पत्नी लोकनिक प्रयत्ने भेल छल। हिनक पुत्र लोकनिक अकालमृत्यु भगेलन्हि। हिनक वंशजक रानी चन्द्रावतीक कोठी भागलपुरमे अछि। कलानंद सिंहकेँ सेहो सरकार बहादुरसँ राजा बहादुरक पदवी भेटलन्हि। हिनक दूटा पुत्र भेलथिन्ह कुमार रामानंद सिंह आर कुमार कृष्णानंद सिंह। कृष्णानंद सिंह। कृष्णानंद सिंह अपन निवास स्थान सुल्तान गंजक श्रीकृष्ण गढ़मे बनौलन्हि। कलानंद सिंहक बाद राजा कृत्यानंद सिंहक प्रभाव बनैली राज्यमे सबसँ विशेष छल। बिहारक जमीन्दारमे ई सर्वप्रथम ग्रैजुएट छलाह आर अंग्रेजी हिन्दी आर संस्कृतक असाधारण विद्वान सेहो। खेलकुद आर शिकारमे ई अद्वितीय छलाह। बंगाल–बिहारक काउंसिलमे सेहो ई सक्रिय भाग लैत छलाह आर पटनासँ बिहारी पत्रिकाक प्रकाशन सेहो करौने छलाह। तेजनारायण जुबिली कालेजक आपत् कालमे ई अपूर्व सहयोग दए ओहि कालेजकेँ जीवित रखलन्हि आर ताहि दिनक हिसाबे ६लाखक दान देने छलाह। हिनके दानक स्वरूप ओहि कालेजक नाम तेजनारायण बनैली कालेज पड़ल अछि। हिनको राजाबहादुरक उपाधि छलन्हि आर सनद देवा काल बिहारक राज्यपाल बेली साहेब तेजनारायण जुबिली कालेजमे देल हिनक सराहणीय दानक उल्लेख केने छलाह। भागलपुरमे आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक स्वागताध्यक्ष सेहो छलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीकेँ स्थान दियेबामे हिनक अपूर्व योगदान छल। बिहार प्रांतीय संस्कृत सम्मेलनक सभापति सेहो ई छलाह। वंशवृक्ष                                                                                                                                             गदाधर झा ११म पीढ़ी–दुलार सिंह चौधरी (१२) सर्वानंद सिंह       वेदानंद सिंह           रूद्रानंद सिंह लीलानंद सिंह         (श्रीनगर राज्य शाखा पद्मानंद सिंह         कुमार गंगानन्द सिंह) कलानंद सिंह कृत्यानंद सिंह पद्मानंद सिंह            कलानंद सिंह          कृत्यानन्द सिंह चन्द्रानन्द सिंह          रामनंद सिंह          श्यामानंद सिंह सूर्यानन्द सिंह           कृष्णानन्द सिंह       बिमलानंद सिंह (सुलतान गंज)        तारानन्द सिंह दुर्गानन्द सिंह जयानन्द सिंह नुनु जी iii. शंकरपुर राज्यक इतिहास:- शंकरपुर मधेपुरासँ उत्तर १२मीलक दूरीपर अछि। एकरा वड़गोड़िया स्टेट सेहो कहल जाइत छल कारण बड़गोड़िया स्टेट सेहो कहल जाइत छल कारण बड़गोरिया नामक एकटा गाम दरभंगामे अछि। जाहि नामपर अहि राज्यक नम करण अभेल छल। शंकरपुरक समीप दूटा प्रसिद्ध प्राचीन गढ़ अछि राय भीर आर बुधिया गढ़ी। एकरे समीपमे बेलारी गाम अछि। बेलारीक सम्बन्धमे किवंदन्ती अछि जे वल्लालसेन अहिगामक संस्थापक छलाह। शंकरपुरक समीप मधेली बजार आर वंसतपुर नामक प्रसिद्ध एतिहासिक स्थान अछि जाहिठाम सीत–वसंतक ध्वंसावशेष देखबामे अवइयै। बेलारी तालुका पहिने दुर्गापुरक अधीन छल। पाछाँ दरभंगा राज्यक अंतर्गत भेल। खण्डवला कुलक महाराज छत्रसिंहक तेसर पुत्र नेत्रेश्वर सिंहकेँ बबुआनीक हिसाबे शंकरपुर भेटलन्हि। तखनहिसँ शंकरपुर राज्यक स्थापना मानल जा सकइयै। हिनका दूटा पुत्र छलथिन्ह एकरदेश्वर सिंह आर जनेश्वर सिंह। जनेश्वर सिंह लक्ष्मीश्वर सिंहक अभिभावकत्वमे रहलाह। जनेश्वर सिंह प्रख्यात पुरूष भेल छथि। ई विधाप्रेमी छलाह आर मधेपुरामे संस्कृत विद्यालयमे स्थापना केने छलाह। हिनक पुस्तकालय अपूर्व छल जे हिनक परोक्ष भेलापर लक्ष्मीश्वर पुस्तकालय दरभंगामे पठा देल गेल। वैवाहिक दृष्टिकोणे एकरदेश्वर सिंहक सम्बन्ध शौरिया राज्य (संस्थापक राजा सुमेर सिंह चौधरी)सँ सेहो छल। एकरदेश्वर सिंहकेँ तीन पुत्र भेलथिन्ह– होमेश्वर सिंह, फुलेश्वर सिंह, चितेश्वर सिंह। वंशवृक्ष महाराज रूद्र सिंह नेत्रेश्वर सिंह एकरदेश्वर सिंह                   जनेश्वर सिंह होमेश्वर सिंह फुलेश्वर सिंह चितेश्वर सिंह iv. हरावत स्टेटक इतिहास:- ई राज्य सहरसा आर पूर्णियाँक सीमा रेखापर छल। हरावत परगन्नामे रहलाक कारणे अहि राज्यक नाम हरावत राज्य पड़ल। अहि राज्यक संस्थापक अग्निवंशीय चौहान छलाह परञ्च बादमे ई लोकनि जैन धर्ममे दीक्षा लेलन्हि। सम्राट शाहजहाँक समयमे हिनका लोकनिकेँ राजाक उपाधिसँ विभूषित कैल गेलन्हि आर राजस्थानसँ ई लोकनि मुर्शिदाबाद पहुँचलाह। हरावत परगन्नामे स्टेट संस्थापक रूपमे प्रतापसिंहक नाम अवइयै। हिनक व्यक्तित्वसँ प्रभावित भए दिल्ली सम्राट आर बंगालक नवाबसँ हिनका खिल्लत भेटल छलन्हि। हरावतक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायणक पत्नी इन्द्रावतीक कर्त्तापुत्र विजयगोविन्द सिंह प्रताप सिंहसँ महाजनी कारबार शुरू केलन्हि। इन्द्रनारायणक जमीन्दारी शौरिया राजक नामे प्रख्यात छल। जे हिनक पूर्वज सूमेरसिंह चौधरीकेँ मुसलमान सम्राटसँ भेटल छलन्हि। विजय गोविन्दसँ प्रताप सिंहकेँ झगड़ा भेलन्हि आर १८५०मे सम्पूर्ण हरावत परगन्नाक जमीन्दारीपर प्रतापक अधिपत्य भगेलैन्ह। एव प्रकारे शौरिया राज्यक एक महत्वपूर्ण भाग समाप्त भऽ गेल। हुनके नामपर प्रतापगंज बाजार बसल अछि। प्रतापगंज अहिवंशक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति भेलाह। अपना मृत्युसँ पूर्वहि ओ अपन सम्पत्ति अपन दुनू पुत्र लक्ष्मीपति सिंह आर धनपति सिंहमे बटबा देलन्हि। ई दुनु भाई सार्वजनिक काममे सक्रिय रूपसँ भाग लेलन्हि। धनपति सिंह सेहो काफी प्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि। हिनका तीनटा पुत्र छलथिन्ह– गनपत, नरपत, बहादुर। गनपत सिंह अपना नामपर गनपत गंज बजार बसौलन्हि। नरपत सिंह कैसरे हिन्द कहबैत छलाह। हिनक पुत्रमे शूरपत सिंह प्रसिद्ध भेल छथि। ओ महाजनी भाषाक अतिरिक्त आरो कैक भाषाक जानकार छथि। हिन्दीसँ हुनका विशेष प्रेम छलन्हि आर जैन धर्म ग्रंथक हिन्दीमे अनुवाद सेहो करौने छलाह। प्राचीनकालमे हरावत जंगल छल आर आइनी–अकबरीमे एकर राजस्वक उल्लेख अछि। नाथपुरक चलते हरावत्क बड्ड नाम छल मुदा कोशीक पेटमे सब जाके नष्ट भऽ गेल। वंशवृक्ष राजा सोमचंद ४८म प्रताप सिंह लक्ष्मीपत छत्रपत धनपत गनपत नरपत शूरपत महिपत भूपत बहादुर v. चक्रवारक इतिहास:- मिथिलाक पाँजि आर अंग्रेजक इस्ट इण्डिया कम्पनीक कागज देखलासँ ज्ञात होइत अछि जे मुगलकालक अंतिम दिनमे बेगूसराय इलाकामे एकटा छोट–छीन चक्रवार ब्राह्मण लोकनि बनौने छलाह जे सम्प्रति चक्रवार भूमिहारक नामे प्रसिद्ध छथि। शुद्ध भूमिहारक दृष्टिकोणसँ लिखल गेल स्वामी सहजानंदक ‘ब्रह्मर्षिवंश विस्तार’मे चक्रवारकेँ भूमिहारमे नहि गिनल गेल छैक आर बहुतो दिनधरि ओ लोकनि मैथिल कहबैत छलाह। चक्रवारक मूल छन्हि ‘बेलौंचे सुदई’। स्थानीय परम्पराक आधारपर ज्ञात होइछ जे चिरायुमिश्र नामक एक व्यक्ति बेलौंचे डीहसँ उपटिकेँ बेगूसराय जिलाक साम्हो ग्राममे आविकेँ बसि गेल छलाह। मुल्ला तकियाक वयाजसँ ई ज्ञात होइछ जे ओ हाजी इलियास तिरहूत राज्यकेँ दू भागमे बहने छल आर गंडकक दक्षिणी भागपर अपन अधिपत्य स्थापित कए बेगूसराय क्षेत्र धरि अपन प्रभाव बढ़ालेने छल। फिरोज तुगलक पुनः तिरहूतक सम्पूर्ण राज्य भोगीश्वर केंटस्तांतरितक देने छलाह। मिथिलाक ब्राह्मण शासक, ओइनवार वंशक लोग, आंतरिक मामलामे स्वतंत्र छलाह परञ्च दिल्लीक प्रभुताक मनैत छलाह। ओहि कालमे जे एक प्रकारक अस्त व्यस्तता छल तकरा चलते बहुत रास मैथिल ब्राह्मण अपन जीविकोपार्जनक हेतु चारोकात बहराइत गेलाह। तेरहम–चौदहम शताब्दीमे चिरायुँ मिश्र सेहो गंगा स्नान करबाक दृष्टिये साम्हो दिसि पहुँचलाह आर ओतुका प्राकृतिक छटा देखि आकृष्ट भए गेलाह आर ओतुके लोकक आग्रहपर ओतए बसि गेलाह। चक्रवार परम्परामे तँ ई कथा सुरक्षित अछि जे तहियेसँ हुनका लोकनि राज्य ओतए बनि गेलन्हि आर चक्रवारक प्रभाव पूर्णियाँसँ बक्सर धरि गंगाक दुनूकात पसरि गेल। तुगलक कालीन मलिक वायासँ संघर्ष हेबाक कथा सेहो चक्र्वार परम्परामे सुरक्षित अछि। (अहि प्रसंगमे देखु–हमरे लिखल–‘चक्रवारस आफ बेगूसराय’) अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मुगल साम्राज्यक विघटन प्रारंभ भऽ गेल छल। प्रांतीय राज्यपाल लोकनि अपन स्वतंत्रता घोषित करें लागल छलाह। एहना स्थितिमे चक्रवार लोकनि सेहो अपना बेगूसराय क्षेत्रमे स्वतंत्र घोषित कए देलन्हि। हुनक स्वतंत्र राज्य होएबाक सबसँ पैघ प्रमाण ई अछि जे चक्रवार राज्यक विभिन्न व्यक्ति अपन हस्ताक्षर आर मुदासँ युक्त अनेको दानपत्र देने छथि। चक्रवार राजा बख्तावर सिंहक एक भूमिदान पत्रसँ ई प्रतीत होइछ जे हुनक अधिपत्य दलसिंहसराय धरि छल “महाराज बख्तावर सिंह देवदेवानम्”–क उपाधिसँ सेहो ई सूचित होइछ जे ओ मात्र एक सामंतेटा नहीं अपितु अपना प्रदेशक एक स्वतंत्र शासक सेहो। कम्पनीक कागजातमे बख्तावर सिंहक उल्लेख चक्रवारक राजाक रूपेँ भेल अछि। राजा शिवदत्त सिंह चक्रवारक एकटा दानक मान्यता अलीवर्दी स्वीकृत केने छल आर ओहि दानकेँ ओ यथावत् रहए देने छल। इहो कहल जाइछ जे राजा वख्तावर सिंहक पिरव्य रूको सिंह फरकिया परगन्नाकेँ लूटने छलाह जे तखन राजा कुंजल सिंहक अधीनमे छल। रूको सिंह १७३०मे कुंजलासिंहक हत्या कऽ देलन्हि। कम्पनीक लेखसँ बुझि पड़इयै जे १७१९धरि चक्रवार लोकनि बेगूसरायमे प्रभुता संपन्न राज्यक रूपमे स्वीकृत भऽ चुकल छलाह। ओ लोकनि सरकारकेँ लगान देव बन्द कऽ देने छलाह आर मूंगेरसँ पटना धरि गंगा नदीक मार्गपर नियंत्रण सेहो कऽ लेने छलाह। ओहि मार्गसँ जाइबला सब नावकेँ रोकिकेँ ओ लोकनि कर वसूल करैत छलाह आर ओकरा लूटितो छलाह। अंग्रेज कम्पनीकेँ अपन नावक संग सेना सेहो पठवे पड़इत छलैक। कोन्ना आर अन्य स्थानमे चक्रवार लोकनि अंग्रेज सबल पड़इत छलाह। चक्रवार लोकनि अंग्रेजक नावपर आक्रमणो करैत छलाह आर अंग्रेज आर चक्रवारक बीच बरोबरि युद्ध होइत छल। अंग्रेज लोकनि 1721मे वख्तावर सिंहकेँ चक्रवारक राजा मानि लेलाह। अलीवर्दी चक्रवारकेँ पराजित करबामे सफल भेलाह। कहल जाइत अछि जे 1730मे विश्वासघात ककए अलीवर्दीक आदमी चक्रवार राजाकेँ मारि देलक। हालवेल अपन पोथीमे अहि विश्वासघातक वर्णन केने अछि। ओ चक्रवार राजा कोन छल तकर नाम नहि भेटैत अछि कारण वख्तावर सिंह अलीवर्दीसँ नीक सम्बन्ध स्थापित कऽ लेने छलाह आर बादमे अलीवर्दीक अभियानमे हुनक मदति सेहो केलथिन्ह। चक्रवारवंशक दलेल सिंह टेकारी राज्यक एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी छलाह आर राजा मित्रजित सिंहक प्राण बचेबामे सहायक भेल छलाह। 1793मे दमामी बन्दोबस्त चक्रवार दिग्विजय नारायणक संग कऽ देलक। अखनो धरि बेगूसराय जिलाक बारह गाम चक्रवार लोकनि पसरल छथि आर अपन प्राचीन इतिहासक अध्ययनसँ गौरवांवित होइत छथि। चक्रवार कालमे बेगूसरायक महत्व काफी बढ़ि गेल छल आर एकर प्रमाण हमरा कम्पनी रेकार्डससँ भेटैत अछि। vi. नरहनक द्रोणवार वंश :- द्रोणवार लोकनिकेँ छथि, कहाँसँ एलाह आर कोना अहिठाम अपन राज्यक स्थापना केलन्हि अथक परिश्रमक बाबजूदो हमारा कोनो ठोस सामग्री जुटेबामे समर्थ नहि भेलहुँ अछि। ईलोकनि पश्चिमसँ एलाह आर एक परम्पराक अनुसार कन्नौजसँ। जँ अहि परम्परामे विश्वास कैल जाइक तखन तँ हमरा बुझि पड़इयै जे कोलाञ्चसँ ब्राह्मण लोकनिकेँ बजाकेँ जे दान देल जाइत छल ताहिकालक ओहिमहक कोनो शाखा द्रोणवारक पूर्वज रहल हेथिन्ह। पंचोभ ताम्रपत्र अभिलेखसँ स्पष्ट अछि जे 13म शताब्दी धरि कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ आमंत्रित कए दान देल जाइत छलन्हि। द्रोणवार परम्परामे कहल जाइत अछि जे कन्नौज से जे द्रोणवारक शाखा तिरहूत अवइत छल ताहिमे सँ किछु गोटए बाटहिमे गाजीपुरमे रूकि गेलाह। कहल जाइत अछि जे तिरहूतमे ‘द्रोणवार’ लोकनि ‘द्रोणडीह’सँ आएल छथि। दोसर परम्पराक अनुसार हिमालयक तलहट्टीमे द्रोणसागर नामक कोनो ताल अछि जकर चारूकात बहुत रास ब्राह्मण बसैत छलाह आर तैं ई लोकनि द्रोणवार कहौलन्हि। रेलवे बोर्ड द्वारा प्रकाशित ‘तीर्थाटन – प्रदीपिका’ नामक पोथीमे काशीपुर द्रोणसागरक वर्णन अछि। पाण्डव लोकनि अपन गुरू द्रोणाचार्यक हेतु ‘द्रोणसागर’क निर्माण केने छलाह। सरैसा परगन्नाक द्रोणवारक ओतए जे मैथिल पंडितक लिखल हस्तलेख सब अछि ताहिमे ओ लोकनि द्रोणवारक हेतु ‘द्रोणवंशोद्भव’ शब्दक व्यवहार कएने छथि। द्रोणवार लोकनि अपनाकेँ द्रोणक वंशज कहैत छथि आर पश्चिमक वासी सेहो। मुसलमानी उपद्रव बढ़लाक बाद ई लोकनि अपन मूलस्थानसँ भगलाह आर ओहि क्रममे एक शाखा तिरहूतमे आबिकेँ बसलाह। विद्यापति अपन लिखनावलीमे द्रोणवार पुरादित्यक उल्लेख केने छथि जिनक राज्य नेपालक तराईमे छल आर जाहिठाम विद्यापति लखिमाकेँ लऽ कए प्रश्रय लेने छलाह। परमेश्वर झाक अनुसार शिवसिंह रानिपासक सब स्त्रीवर्गकेँ विद्यापति ठाकुरक संग कए नेपालक तराईमे रजा बनौली गाम सप्तरी परगन्नाक अधिपति निजमित्र पुरादित्य नामक द्रोनवंशीय द्रोणवार राजाक शरणमे पठौलन्हि। पुरादित्य द्रोणवार हुनका सबहिक सम्मानपूर्वक रक्षा केलन्हि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे ओइनवार वंशक शिवसिंह आर द्रोणवार वंशक पुरादित्यक मध्य घनिष्ट मित्रता छल। अहिठाम विद्यापति लिखनावली लिखलैन्ह आर भागवतक प्रतिलिपि सेहो तैयार केलन्हि। द्रोणवारक बस्ती देवकुलीक सम्बन्धमे परमेश्वर झा लिखैत छथि जे तेसर देवकुली मुजफ्फरपुर जिलामे शिवहर राजधानीसँ एक कोस पूर्व सीतामढ़ी सड़कसँ दक्षिण भागमे अछि, ताहिमे एक बहुत खाधिमे एक शिवलिंग भुवनेश्वर नामक छथि आर एहि गामक विषयमे बहुत रास पुरान कर्थापकथन अछि जाहिमे कौरव पाण्डवक उल्लेख सेहो अबैछ। संभवजे ई देवकुली द्रोणवारक मूल स्थान रहल हो आर एतहिसँ ओ लोकनि चारूकात पसरल होथि। द्रोणवारक संघर्ष बौद्ध लोकनिसँ तिरहूतक सीमामे भेल छलन्हि से हमरा लोकनिकेँ विद्यापतिसँ ज्ञात होइछ। एहिसँ इहो सिद्ध होइछ जे द्रोणवार लोकनि सेहो मिथिलाक उत्तरांचलमे प्रबल शक्तिक रूपमे विराजमान छलाह आर मैथिल ब्राह्मणहि जकाँ बौद्ध विरोधी सेहो छलाह। आन द्रोणवार वंशक एहेन प्रमाण आर कहाँ भेटैत अछि। द्रोणवार लोकनि मूलरूपेण तिरहूतक अंशमे प्राचीन कालमे रहल हेताह आर नेपालक तराई धरि अपन राज्यक विस्तार केने होथिसे संभव। द्रोणवार परम्परा एकटा कथा इहो अछि जे बुद्धक देहावसान भेलापर जखन हुनक अस्थि वितरण होइत छल तखन मिथिलामे द्रोण ब्राह्मण लोकनि हुनक अस्थि अनने छलाह। जँ ताहिकाल ‘द्रोणवार’ लोकनि मिथिलामे उपस्थित छलाह तखन तँ हमर तँ ई मत आरो पुष्ट होइछ जे द्रोणवार अहिठामक थिकाह आर मिथिलाक आन ब्राह्मण जकाँ हिनको उत्पत्ति तिरहूतेमे भेल छलन्हि। मात्र अस्थि संचय करबा लेल ओ द्रोण लोकनि ओतए दूरसँ एतए नहि आएल होएताह। काल क्रमेण ब्राह्मण कौलिक कार्यसँ अपनाकेँ फराक कऽ लेलापर ई लोकनि भूमिहार कऽ कोटिमे राखल गेल होथि से संभव। एक दोसर परम्पराक अनुसार नेपाल दरबारसँ द्रोणवार लोकनिकेँ राजाक उपाधि भेटलन्हि आर हिनक शौर्यकेँ देखैत मकमानी जिलाक भार हिनका लोकनिकेँ देल गेल छलन्हि। द्रोणवार राजा अभिमान राय प्रसिद्ध भेला आर मकमानीमे हिनक अधिपत्य छलन्हि आर ई लोकनि ‘पाण्डेय’ कहबैत छलाह। अभिमानक मृत्युक पश्चात् हुनक कर्मचारी लोकनि महारानीकेँ लऽ कए मिथिला प्रांतक दक्षिणी सीमापर स्थित बेलौंचे सुदई मूलक चक्रवार ब्राह्मणक राज्यमे पहुँचा देलन्हि। अभिमान रायक पुत्र छलाह गंग़ाराम। गंगाराम अहिवंशक सर्वप्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि आर हिनका सम्बन्धमे बहुत रास किवंदती अछि। चक्रवार राजा अपन कन्यासँ गंगारामक विवाह करौलन्हि। सार–बहनोईमे सामान्य बाताबाती भेलापर ओ राज्य छोड़ि देलन्हि आर अपन पत्नीकेँ संग लऽ कए ओतएसँ चलि देलन्हि। ससूरसँ सेनाक साहाय्य भेटलन्हि आर ओ सरैसा परगन्नामे अपन राज्यक स्थापना केलन्हि। सरैसा परगन्नाक “पुनाश” गाममे हिनक पूर्वज पहिने रहैत छलथिन्ह तैं सरैसा परगन्नामे राज्य स्थापनाक निर्णय ई केलन्हि। ताहि दिनमे ओहि सब क्षेत्रपर मुसलमानक आधिपत्य छल। ताजखाँ (ताजपुरक संस्थापक) आर सुल्तानखाँ (सुल्तानपुरक संस्थापक)केँ मारि ई मोरवामे अपन राजधानी बनौलन्हि। सरैसा परगन्ना नरहनसँ जन्दाहा धरि करीब ४०मील नाम अछि आर पो खरैरासँ सुल्तानपुर घाट धरि करीब २०मील चाकर अछि। हिनक एक विवाह मैथिल ब्राह्मण परिवारमे सेहो छलन्हि। पहिल पत्नीक नाम भागरानी आर दोसराक नाम मुक्तारानी छलन्हि। हिनक दुनुरानी मोरवा गढ़मे सती भेलथिन्ह। भागरानीसँ उत्पन्न पुत्र भेला राय बड्ड प्रतापी भेलाह। भेला राय मोरवा सुल्तानपुरमे रहलाह आर मालाराय ‘वीरसिंह पुर–पोखरैरा’मे भेला रायक वंशज नरहनक पूर्वज भेलाह। अहिवंशक लोग बनारसक गद्दीपर छथि। भेला रायक पुत्र विक्रमादित्य रायकेँ सरैसा परगन्नाक ‘चौधराई’ भेटलन्हि। विक्रमादित्य राय बड़ा पराक्रमी छलाह। ई अपना नामपर ‘विक्रमपुर’ गाम बसौलन्हि। हिनक पुत्र हरेकृष्ण राय नरहनमे अपन दोसर राजधानी बनौलन्हि।– प्रधान राजधानी मोरवा आर दोसर नरहन। वंशवृक्षक अनुसार इतिहास एवं प्रकारे अछि– द्रोणवार हरगोविन्द राय– चौधरी केशवनारायण राय (सरैसा, भूषारी, नैपुर परगन्ना) फतेह नारायण अजीत नारायण चित्र नारायण (इमाहपुर परगन्नाकेँ मिलौलन्हि) अजीतन नारायण–सम्राटसँ हमका, सुरौली, लोमा, विझरौली, ननकार, लाखिराजक रूपमे हिनका भेटलन्हि वैवाहिक सम्बन्ध टेकारीसँ छलन्हि हिनक जेठपुत्र दिग्विजय नारायण बनारसक राजा बलबंत सिंहक बेटीसँ विवाह केलन्हि - वारेन हेस्टिङ्गक मदतिसँ बलबंत सिंहक बाद चेतसिंह बनारसक गद्दीपर बैसलाह। जखन चेतसिंह वारेन हेस्टिङ्गसँ पराजित भेलाह आर बनारसक राजगद्दी खाली भेल तखन नरहनक अजीत नारायणक पौत्र आर दिग्विजय नारायणक पुत्र वारेन हेस्टिङ्गक अनुमतिसँ बनारसक गद्दीपर बैसलाह। हुनक नाम छलन्हि राजा महीप सिह आर ई सालाना ३८ लाख टाका वारेन हेस्टिङ्गकेँ देबाक वचन देलथिन्ह। तहियासँ बनारसक गद्दीपर हिनके वंशज शासन कै रहल अछि। महीप सिंह उदित सिंह ईश्वरी प्रसाद सिंह प्रभुनारायण सिंह आदित्य नारायण सिंह दिग्विजयक भ्राता अरहन स्टेटक मालिक भेला। महाराज दरभंगाक जे नवाबक संग कन्दर्पी घाटक लड़ाई भेल छल ताहिमे सर्वजीत सिंह नरेन्द्र सिंहक दिस छलाह। हुनक भाए उमराव सिंह नरहनक सैनिकक नेतृत्व करैत छलाह आर एकर विवरण हमरा लाल कविसँ भेटैत अछि। नरेन्द्र सिंह प्रसन्न भए हिनका दुनु भाईकेँ पुरस्कृत करए चाहैत छलथिन्ह मुदा ओ लोकनि पुरस्कार लेबासँ नकारि गेलाह तथापि फरकिया परगन्नामे हिनका लोकनिकेँ किछु गाँव भेटलन्हि। दरभंगा राज परिवारमे एहि हेतु नरहन राज परिवारक बड्ड सम्मान छलैक। हिनका लोकनिमे एतेक नीक सम्बन्ध छल जे महाराज प्रताप सिंहक समयमे जखन नवाबक दबाब बढ़ल तँ प्रताप सिंह अपन परिवारकेँ नरहन पठा देलन्हि आर अपने बेतिया च गेलाह। रामेश्वर सिंह धरि ई सम्बन्ध ओहिना बनल छल। सर्वजीत रणजीत रूपनारायण परमेश्वरी प्रसाद सिंह नरहन दरबारमे चित्रधर मिश्र आर चंदा झा सन प्रसिद्ध विद्वानकेँ प्रश्रय भेटल छलन्हि आर महामहोपाध्याय गंगानाथ झासँ सेहो हिनका लोकनिक बढ़िया सम्बन्ध छल। रामनारायणक सम्बन्ध नेपालक जंगबहादुर शाहसँ सेहो छल कारण दुनु गोटएकेँ सोनपुर मेलामे नेट भेल छलन्हि। रामनारायण नेपालो गेल छलाह। vii. बेतिया राज्यक इतिहास :- सोलहम शताब्दीक उतरार्द्धमे स्थापना भेल। गज सिंहकेँ शाहजहाँसँ राजाक पदवी भेटल छलन्हि। ई मिथिलाक राजा महिनाथ ठाकुरक समकालीन छलाह आर हुनका समयमे दुनुक बीच मनमुटाव आर खटपट सेहो भेल छल। मुगल साम्राज्यक कमजोर भेलापर उत्तर बिहारक सबटा राज्य स्वतंत्र हेबाक प्रयासमे लागि गेल छल आर बेतिया राज एकर कोनो अपवाद नहि कहल जा सकइयै। १७२९मे अलीवर्दी बेतिया राज्यपर आक्रमण कए ओकरा अपना अधीन केने छलाह। १७४८मे बेतियाक राजा लोकनि दरभंगा अफगानक संग मित्रता केलन्हि। दरभंगा अफगान अलीवर्दीक सेना द्वारा पराजित भेला। दरभंगा अफगानकेँ बेतियाक राजा सब बरोबरि मदति करैत रहैथ। अलीवर्दीक बाद पुनः बेतिया अपन स्वतंत्रता घोषित कए लेलक आर अंग्रेजी सत्ताक विरूद्ध ताधरि बनल रहल जाधरि कि १७५९मे अंग्रेजी सेनाक आक्रमण बेतियापर भेल। मीरजाफरक पुत्र मीरन अंग्रेजी सेनाक संग १७६०मे बेतियापर धावा मारलक आर बेतियाक स्वतंत्रता पुनः समाप्त भऽ गेल। १९६२मे मीरकासीम बेतियाक विरूद्ध सेना पठौलन्हि आर बेतियापर अपन अधिकार जमौलन्हि। १७६६मे राबर्ट बेकरक प्रयाससँ बेतियामे अंग्रेजी सत्ताक स्थापना संभव भऽ सकल। १७६२मे ओहिठाम जुगल केश्वर सिंह राजा छलाह। हुनका पुनः इस्ट इण्डिया कम्पनीसँ झंझट भेलन्हि कारण बहुतो दिनसँ बेतियापर करक बकिऔता खसल छलैक। करदेबाक बजाय बेतियाक राजा अंग्रेजी सेनासँ युद्ध करब उचित आर सम्मानीय बुझलैथ आर युद्धमे परास्त भेला उत्तर ओ भागिकेँ बुन्देलखंड चल गेला आर कम्पनी हुनक राज्यकेँ अपना अधीन कऽ लेलक। बादमे जखन राज्यक स्थिति अंग्रेजक बुते नहि सुधरलैक तखन अंग्रेज पुनः जुगलकेश्वर सिंहसँ वार्त्ता शुरू केलक आर हुनका घुरबाक लेल अनुरोध केलक। अंग्रेज जुगलकेश्वर सिंहकेँ मझवा आर सिमरौन परगन्ना सेहो देलक आर बाँकि क्षेत्रकेँ गजसिंहक पौत्र आर पितिऔत श्री किशुन सिंह आर अवधुत सिंहमे बाँटि देलक। उएह लोकनि बादमे क्रमशः शिवहर (मुजफ्फरपुर) आर मधुबन (चम्पारण) राज्यक संस्थापक होइत गेलाह। १७९१ जुगलकेश्वर सिंहक पुत्र वीरकेश्वर सिंहक संग कम्पनीक समझौता भेल आर वीरकेश्वरक नेतृत्वमे बेतिया राज्यक स्थिति सुदृढ़ भेल। कम्पनी आर नेपालक बीच जे युद्ध भेल ताहिमे वीरकेश्वर सिंह सक्रिय भाग लेलन्हि। १८१६मे आनन्दकेश्वर सिंह रजा भेला आर लार्ड विलियम बेरन्हिङ्गसँ हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। एकर कारण ई छल जे ओ अंग्रेजकेँ बड्ड मदति केने छलाह। हुनका बाद नवलकेश्वर सिंह राजा भेलाह आर १८५५मे राजेन्द्र केश्वर सिंह। सिपाही विद्रोहक अवसरपर ई अंग्रेजक अपूर्व सहायता केने छलाह। हुनका आर हुनक पुत्र हरेन्द्र केश्वरकेँ महाराज बहादुरक पदवी अंग्रेजसँ भेटल छलन्हि। १८९३मे हरेन्द्रकेश्वरकेँ के.सी.आई.ईक पदवी सेहो भेटलन्हि। बेतियाक शासक लोकनि भूमिहार ब्राह्मण छलाह। ई लोकनि अपना राज्यकालमे नीक अस्पताल आर पुस्तकालय बनौने छलाह। ई लोकनि साहित्य प्रेमी सेहो छलाह। हिनका लोकनिक दरबारमे कवि आर कलाकारक बड्ड आदर छल। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आर राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्दकेँ हिनका लोकनिक ओतएसँ बरोबरि सहायता भेटैत छलन्हि। ओना तँ बेतिया राज बड्ड प्राचीन मानल गेल अछि मुदा एकरा सम्बन्धमे अखन सब बात स्पष्ट नहि भसकल अछि। बेतिया राजक वंशावली एवं प्रकारे अछि। बेतिया राजक वंशावली गंगेश्वर देव मकेश्वर देव राजा देव घानोराज उदय करण राज, जदुराज उग्रसेन गज सिंह (राज सिंह ?) दिलीप सिंह पृथ्वी सिंह सत्रजित सिंह ध्रुवसिंह (बड्ड पैघ किला बनौने छलाह) अपन बेटीक बेटा जुगल केश्वरकेँ कोरामे लेलन्हि। कारण हिनका पुत्र नहि छलन्हि। शिवनाथ सिंह जुगलकेश्वर सिंह वीरकेश्वर सिंह वीरकेश्वर सिंह नवलकेश्वर सिंह महेन्द्र केश्वर सिंह आनन्दकेश्वर सिंह राजेन्द्र केश्वर सिंह हरेन्द्र केश्वर सिंह (महारानी शिवरतन–महारानी जानकी कुवँर) = भूमिहार ब्राह्मणक ईवंश अपनाकेँ बड्ड प्राचीन मनैत छथि। हिनका लोकनिक वैवाहिक सम्बन्ध बनारस राज्यसँ सेहो अछि। कामेश्वर वंश जकाँ इहो लोकनि अपनाकेँ सुगौनासँ जोड़ैत छथि मुदा एतिहासिक तत्वक अभावमे अखन किछु कहब असंभव। बेतियाक वर्णन १७८६मे वर्णन १७८६मे प्रकाशित गजेटियरमे भेटैत अछि। १७८६मे अहिठाम ईशाई मिशनक एकटा शाखा छल। * छोट छिन्ह राज्य सभहिक विवरण :- शिवहरक स्थापना बेतिया राज्यक शाखासँ भेल छल। सुरसंड राज्य सेहो भूमिहार ब्राह्मण वंशक राज्य जकर स्थापना महाराज प्रताप सिंह (दरभंगा)क समयमे भेल। एहिमे सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यक्ति चन्द्रेश्वर प्रसाद नारायण सिंह भेल छथि जे नेपाल क्रांति (१९५०)क समयमे भारतक राजदूत रहल छलाह। बनैली राज्यक शाखाक रूपमे श्रीनगर राज्य श्रीनगरक स्थापना भेल अछि। रूद्रानंद सिंह अपन पुत्र श्रीनन्दन सिंहक नामपर श्रीनगरक स्थापना केने छलाह श्रीनन्दन सिंहक तीन पुत्र नित्यानंद सिंह, कमलानंद सिंह आर कालिकानंद सिंह भेला। कमलानंद सिंह साहित्य सेवी छलाह आर हिन्दीक प्रगतिक हेतु लाखो टाका खर्च केने छलाह। ‘साहित्य सरोज’, ‘अभिनव भोज’, ‘कलियुगी हरिश्चन्द्र’, ‘कलिकर्ण’ आदि उपाधिसँ ई विभूषित छलाह। हिनके पुत्र भेल थिन्ह कुमार गंगानन्द सिंह जे मैथिली हिन्दी अंग्रेजी आर प्राचीन भारतीय इतिहासक प्रकाण्ड पण्डित छलाह। कालिकानंद सिंह आर गंगानंदक पुस्तकालय दर्शनीय छल। पुर्णियाँमे राजा पृथ्वी चन्द लालक राज्य सेहो प्रख्यात छल। छोट–मोट मुसलमान राज्यक संख्या सेहो ओतए बड्ड अछि। पुर्णियाँमे क्षत्रिय लोकनिक रजबारा सेहो छल जाहिमे सौरिया राज्यक इतिहास प्रसिद्ध अछि। मुसलमानी राज्यमे खगड़ाक मुसलमानी राज्य प्रसिद्ध छल। जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। कथा कथा- दोती विआह। पचास वर्षीए प्रोफेसर उमाकान्‍त दोहरा कए विआह कइये लेलनि। कोना नहि करितथि? संयमी रहने पचास बर्खक चेहरा पेंइतीस-चालीससँ उपर नहि बुझि पड़ैत छनि। पत्‍नी कऽ मुइने घर सुनसान लगए लगलनि। ढन-ढन चौघारा कोठरी सभ करैत रहनि। अपना छोड़ि ने दोसर भैयारी आ ने कियो आन परिवारमे रहनि। दुइयेटा सन्‍तानो! जेठ बेटी प्रोफेसर पतिक संग बनारसेमे रहैत छथिन। दुरागमनक पछाति मात्र आइ धरि मात्र  तीनि बेरि माए-बापसँ भेटि करए ऐलीह। बेटो तहिना। डॉक्‍टरीक अंतिम साल, बंगलोर मेडिकल कओलेजमे पढ़ैत छथिन। सालक दुर्गापूजाटा मे गाम अबैत छथि। किरिण फुटितहि तीनू बकरी घरसँ निकालि बाहरक खुट्टीमे बान्‍हि, कटहरक पात आगूमे दऽ बगलमे बैसि अपने फुड़ने असकरे बैसल बैहरी बजए लगलीह- ‘‘घोर कलयुग! घोर कलयुग आबि गेल। जते दिन ई दुनियाँ चलैए, चलैए, नै तँ धरती फाटत सभ ओहिमे चलि जाएत। सुआइत लोक कहै छै जे मनुक्‍ख तते पपियाह भऽ गेल अछि जे खिआइत-खिआइत चुट्टी-पीपरी जेँका भऽ गेल। हमरा सभकेँ भगवान पाड़ लगौलनि जे एतेटा मनुक्‍ख भेलहुँ। आबक लोक थोड़े एते-एते हएत। तेहेन हएत जे लग्‍गी लगा-लगा भट्टा तोड़त।'' ओना विआहसँ दू दिन पहिनहिसँ स्‍त्रीगणक बीच गुन-गुनी शुरु भऽ गेल छलैक मुदा कियो खुलि कऽ नहि बजैत छलीह। मुदा आइ सभक मुँह खुजि गेलनि। टोलक बीच सरकारीक तीनियेटा चापाकल अछि वाकी पाँचो अपन-अपन अंगनेमे गरौने छथि। जहिपर आन-आन नहि जाइत। तीनूमे सँ एकटाक हेडे खोलि तड़िपीबा सभ बेचि कऽ ताड़ी पीबि गेल। दोसराक फील्‍टरे फुटि गेल छैक। जहिमे पानिसँ बेसी गादिये अबैत अछि। मुदा चौराहा परहक कल बँचल अछि। मुदा ओहो कोन जनमक पाप केने अछि जे भरि दिनमे कखनो आराम नहि भेटैत छैक। चारु दिशिसँ पनिभरनी वाल्‍टी-घैल लऽ आबि-आबि चारु दिशिसँ घेरि बेरा-बेरा पानि भरैत। तेँ गप-सप करैक नीक अवसरो आ जगहो फइल। चिक्‍कारी मारैत मझौरावाली सोनरेवाली दिशि देखि कऽ बजलीह- ‘‘साओनक लगनक गीति अबै छनि, दीदी?'' मुस्‍की दैत सोनरेवाली उत्तर देलखिन- ‘‘जहिना एक्‍के लोरहीसँ सिलौटपर मिरचाइयो पीसल जाइत अछि आ मिसरिओ, तहिना ने डहकनो फागुनोक लगनमे गाओल जाइत अछि आ साओनोमे गाओल जाइत।'' दुनू गोटेक चिकारीमे गप्‍प सुनि बेलौंचावाली बजलीह- ‘‘अपना भैंसुरकेँ नहि देखै छहुन जे काठपर जाइ बिना दुइर भेलि जाइ छथुन आ तहिपर पुट्ठा खलीफा घर लऽ अनलखुन। से बड़वढ़िया। बड़ चिक्‍कन। आ प्रोफेसर भैयाकेँ अखन की भेलनिहेँ। मारे दरमहो कमाइ छथि आ उमेरे कते हेतनि। तीस-पेंतीस बर्खसँ बेसी थोड़े भेलि हेतनि।'' मझौरावालीक पछ लइत मुँह चमकबैत मोहनावाली बाजलि- ‘‘जानिये कऽ तँ पुरुख छुद्दर होइए। तहिमे उमाकान्‍ते जे छुद्दरपना केलनि तँ कोन जुलूम भऽ गेलइ।'' मोहनावालीक कड़ुआइल गप सुनि बेलौंचावालीक मन जरए लगलनि। तुरुछि कऽ बजलीह- ‘‘सभ पुरुख तँ छुद्दरे होइए मुदा मौगी तँ सभटा गिरथाइने होइए। सैह ने। सत-सतटा मुनसा देखैए मौगी आ छुद्दर होइए पुरुख। हिनकेँ पुछै छिअनि जे प्रोफेसर भैयासँ नीक अपन घरबला छन्‍हि?'' घरबलाक नाओ सुनि मोहनावाली काँख तरक घैल निच्‍चामे रखि आगू बढ़ए लगलीह। मुदा तहि बीच साठि वर्षीए झबरी दादी जोरसँ बजलीह- ‘‘मरदक कमाएल खाइ जाइ छह आ गरमी चढ़ै छह तँ कलपर झाड़ैले अबै छह। एक्‍को दिन कोइ उमा बौआ कऽ भानसो कऽ दइ छहुन आ कि एक लोटा पानियो भरि कऽ दए अबै छहुन। मुदा उल्‍लू जेँका मुँह दुसल सभकेँ होइ छह। वेचारा नोकरीपर सँ अबै छथि अपने हाथे बरतन-वासन धोए, पानि भरि भानस करए छथि से बड़बढ़ियाँ! मुदा विआह कऽ लेलनि से बड़ अधलाह।'' झबरी दादीक गप ओते मोहनावाली नहि सुनथि जते तरे-तर बेलौंचावाली जरैत रहथि। छह मास पूर्व प्रोफेसर उमाकान्‍तक पत्‍नी स्‍वर्गवास भऽ गेलनि। जाधरि जीवैत छलथिन ताधरि घरक कोनो भार प्रोफेसर सहाएवकेँ नहि बुझि पड़ैत छलनि। जहिना कोसीक धार अनवरत बहैत रहैत अछि तहिना उमाकान्‍तोक परिवार अपना गतिसँ छह मास पछाति धरि चलैत छलनि। ओना दस बर्ख पछाति धरि माए-पिताक नजरिमे उमाकान्‍त बच्‍चे आ पत्‍नी कनियेँ छलथिन। घरक भार दुनूमे सँ किनकोपर नहि छलनि। सोलहो आना माइये-बाबू सम्‍हारैत छलखिन। पढ़नाइ-पढ़ौनाइ उमाकान्‍तक आ दुनू साँझ भानस केनाइ पत्‍नीक काज छलनि। पत्‍नी मुइलाक उपरान्‍त उमाकान्‍तकेँ घर-आंगन सून-मशान बुझि पड़ए लगलनि। चौघारा घरक आंगन, नमहर दरवज्‍जा तहि बीच असकरे उमाकान्‍त रहैत छथि। परिवारकेँ डूबैत देखि उमाकान्‍तक मनमे बेचैनी बढ़ए लगलनि। जहिना भूमकमक समए धरतीक संग-संग उपरक सभ किछु कँपए लगैत तहिना मनक संग-संग उमाकान्‍तक बुधि-विवेक डोलए लगलनि। हृदय चहकए मन मसकए लगलनि। मसकैत-मसकैत ऐहेन चिरक्‍का भऽ गेलनि जे उपयोग करै जोकर नहि रहलनि। अनायास धैर्यक सीमा बालुक मेड़ि जेँका ढ़हए लगलनि। ढहैत-ढहैत सहीट भऽ गेलनि। सहीट होइतहि बरखा पानि जेँका रास्‍ता बनबए लगलनि। जहिसँ नव-नव विचार जनमए लगलनि। नव-नव विचारकेँ जनमितहि आँखि उठा आगू तकलनि तँ मेला-जेँका दुनियाँ बुझि पड़लनि। सभ रंगक देखिनिहार। सभ तरहक वस्‍तुक दोकानपर एका-एकी एवो करैत आ जेवो करैत। अपन-अपन धुनिमे सभ बेहाल। दोसर दिशि देखैक ककरो समए नहि। अपने ताले सभ बेताल। जहिसँ ककरो-ककरो आँखिसँ नोरो खसैत आ कियो-कियो ठहक्‍को मारैत। अनका दिशिसँ नजरि हटा उमाकान्‍त अपना दिशि मोड़लनि तँ जिनगीक लेल संगीक जरुरत पड़लनि। मन पड़लनि पत्‍नीक मृत्‍यु। मृत्‍युक उपरान्‍त सोग परगट करैले तँ बहुतो अएलाह, मुदा कि सबहक नोरमे एक्‍के रंग वेदना रहनि? एक घटना रहितहुँ एक रंगक विचार आ वेदना कहाँ छलनि? भरिसक सभ भाँज पुरबैले आइल छलाह। मुदा प्रोफेसर हरिनारायणक नोर किछु आरो बजैत छलनि। कि हुनकर नोर पत्‍नीक प्रति छलनि वा पढ़ैत बच्‍चाक प्रति छलनि आ कि हमर विधुर जिनगीक प्रति छलनि। मनपर भार पड़लनि। भारक तर मन दबेलनि। जहिसँ सोचै-विचारैक रास्‍तो अवरुद्ध हुअए लगलनि। मुदा तरमे दबल मन कहलकनि- ‘‘समाजक लोक की कहत?'' फेरि मनमे उठलनि, की कहत समाजक लोक! जते लोक तते विचार। जहिना ताड़ीक गंधसँ ककरो उलटी होइत तँ कियो सुगंध वुझि आत्‍म-तुष्‍टि करैत अछि। बूढ़-बुढ़ानुस परम्‍परानुसार कहताह ओ यैह कहताह जे संयुक्‍त परिवारमे व्‍यक्‍ति-विश्‍ोषक वेदना परिवारक बीच हराए, फुलाएल फूल जेँका हँसैत अछि। जहिसँ अभाव कोनो वस्‍तु नहि रहि जाइत अछि। फेरि मनमे एलनि जे जहि कओलेजमे शिक्षक रुपमे छी, बेटा तुल्‍य विद्‌यार्थीकेँ जिनगीक बाट देखवै छी ओ कि कहत? मुदा कोनो घटनो तँ अनिवार्य नहि होइत आकस्‍मिको होइत। जे सबहक संग घटबे करत? घटियो सकैत अछि नहियो घटि सकैत अछि। मन ओझड़ेलनि। किछु कालक वादमे एलनि जे जे मनुष्‍य एहि धरतीपर जन्‍म लइत ओ मृत्‍यु पर्यन्‍त हँसैत जीवए जाहैत अछि। से कहाँ भऽ रहल छैक। पहिलुका जेँका परिवारो नहि रहल। असकर जीवो कठिन अछि। दोसराक जरुरत सदति काल पड़ैत अछि। भलेहीं जिनगीक क्रिया निमाहि लेब मुदा मनक व्‍यथा के सुनत। सभ ठाम ने तँ लोक कानि सकैत अछि आ ने हँसि सकैत अछि। परिवार तँ हँसै-कनैक जगहे छी। जँ से नहि भेटए तँ गुर-घाव जेँका तरे-तर सड़ैन करैत रहत। जते सड़ैन करत तते शरीरसँ गंध निकलवे करत। जाहिसँ कष्‍टो होएत आ औरुदो घटैत। जखने औरुदा घटत तखने जिनगी सिकुड़त। जते जिनगी सिकुड़त तते मृत्‍यु करीब आओत। फेरि मन ओझरा गेलनि। मन ओझराइते नजरि घुमौलनि तँ कओलेजक इतिहास विभागक प्रोफेसर हरिनारायणपर पड़लनि। हरिनारायणे बाबूटा ऐहन जिज्ञासु रहथि जनिका आँखिसँ हृदयक वेदना, पहाड़पर सँ खसैत झरनाक पानि जेँका अनघोल करैत रहनि जे ‘बाप रे, अन्‍याय भऽ गेल।' उमाकान्‍त ठूठ गाछ सदृश्‍य भऽ गेलाह। जाहिमे फूल-फड़क संग छाहरियो अलोपित भऽ जएतनि। अपने जानटा लए कऽ पत्‍नी नहि गेलखिन। असीम वेदनाक पहाड़ सेहो माथापर पटकि रहल छथिन। सभ किछु छिड़िया जेतनि। कोना समेटि पओताह उमा भाय! की एकरे जिनगी कहबै?'' जेतना शून्‍य उमाकान्‍त दुनियाँक बजारमे हेरा गेलाह। चारु दिशक बाट बन्‍न बुझि पड़ए लगलनि। किमहर जाएब? रस्‍ते नहि। कि ओ खरहोरिक ओहन गाड़ल कड़चीक सदृश्‍य भऽ गेलाह जाहिसँ कोनो क्रिया नहि भेनहुँ आन ओगरवाह बुझैत अछि। अनायास मनमे जगलनि जे दुनियाँमे कियो अप्‍पन नहि। जाधरि आँखि तकै छी ताधरि दुनियों अछि नहि तँ ओहो नहि अछि। अपनहि करनीसँ कियो दुनियाँकेँ सुन्‍दर बनबैत अछि आ कियो अधलाह। आगू जीवैक लेल संगीक जरुरत सभकेँ होइत छैक। आनक अपेक्षा हरिनारायण बाबू लग बुझि पड़ै छथि। अखने हुनका ऐठाम जाए अपन मनक बात कहबनि। उमाकान्‍तकेँ देखितहि दुनू हाथसँ दुनू बाँहि पकड़ि हरिनारायण अरिआति कऽ अपन कोठरीमे वैसाए पत्‍नीकेँ पानि नेने अबए कहलखिन। वामा हाथमे लोटा दहिना हाथमे पानिसँ भरल चमकैत स्‍टीलक गिलास उमाकान्‍त दिशि बढ़ौलखिन। पत्‍नी विहीन उमाकान्‍त नजरि निच्‍चा केने शोभाक -हरिनारायणक पत्‍नी- हाथसँ गिलास लऽ पानि पीबए लगलाह। मुदा दू घोंटक बाद पानि कंठसँ निच्‍चा धसबे ने करनि। दोसर गिलास भरैक लेल शोभा बामा हाथक लोटा दहिना हाथमे लइत उमाकान्‍तपर नजरि गारने। ने उमाकान्‍त मुँहसँ गिलास हटबैत आ ने पानि पीबैत। उमाकान्‍तक व्‍यथा हरिनारायण बुझि गेलखिन। शोभा हाथक लोटा अपना हाथमे लइत कहलखिन- ‘‘अहाँ चाह बनौने आउ। भायकेँ हम पानि पीया दइत छिअनि।'' चाह बनबैले शोभा कीचेनरुम चलि गेलीह। मुँहमे गिलास सटल उमाकान्‍तक मनमे अबए लगलनि। जँ कहयो हरिबाबू हमरा ऐठाम जएताह तँ किनका चाह बनबैले कहबनि। उमाकान्‍त कऽ विचारमे डूबल देखि हरिनारायण कहलखिन- ‘‘भाय, अपनेसँ हम छोट छी मुदा एकरा धृष्‍टता नहि बुझि दिलक धड़कन बुझू। अपने बेसी दुनियाँ देखलिऐक मुदा.......।'' चौंकि कऽ उमाकान्‍त पुछलखिन- ‘‘मुदा की?'' आइसँ पहिने मनुष्‍य जते असुरक्षित जिनगी बितबैत छल ओहिमे बहुत कमी आएल अछि। सोलहन्‍नी सुरक्षित तँ नहि मुदा पहिलुका अपेक्षा सुरक्षित भेलि अछि। ओना खतरा पहिनेसँ अधिक भऽ गेल अछि मुदा बदलल रुपमे। पहिलुका रुपमे सुरक्षित भेलि अछि। जहिसँ जिनगीक नमती सेहो बढ़ि रहल अछि। ओना पूर्वज शतायु कऽ सही औरुदा बुझै छथिन। मुदा इहो बुझिनिहार तँ छथि जे चालीस कऽ घपचालीस बुझैत छथि। ओहो ओहिना नहि बुझैत छथि। अखनो चालीस वर्खसँ उपर कते गोटे छथि जे पूर्ण स्‍वस्‍थ छथि। मुदा किछु वर्ख पूर्व धरि अस्‍सी वर्खसँ उपर गोटि-पङरा पहुँचैत छलाह ओ आब अधासँ बेसी पहुँचए लगलथि अछि। तेँ, मोटा-मोटी नब्‍बे कऽ अधार बना हरिनारायण उमाकान्‍तकेँ पुछलखिन- ‘‘अपनेक आयु कतेक अछि?'' आयु सुनि उमाकान्‍त बिस्‍मित भऽ गेलाह। हृदय बमकैत रहनि मुदा मुँहसँ बोली निकलबे नहि करनि। किछु काल बिलमि कहलखिन- ‘‘पचास बर्ख।'' पचास बर्ख सुनि हरिनारायण उछलि कऽ बजलाह- ‘‘अधासँ किछु अधिक भेलि अछि मुदा अधा तँ बाकिये अछि। अधाक लेल.......।'' नमहर साँस छोड़ि, उमाकान्‍त आँखि उठा कखनो हरिनारायणपर दथि तँ लगले नजरि निच्‍चा कऽ धरती देखए लगथि। मुस्‍कुराइत हरिनारायण कहलखिन- ‘‘अपने दोसर विआह कए लेल जाउ। जरुरी नहि जे सभ औरत कुल्‍टे होइत अछि। ऐहनो औरतक कमी नहि जनिकामे मानवीय संवेदना गंगाक धार जेँका सदिखन उमड़ैत रहैत छन्‍हि। नारीक पहिल गुण मातृत्‍व थिक। जेकरा प्रबल बनेवाक लेल पुरुषक सहयोग जरुरी अछि। जखने अनुकूल परिस्‍थिति नारीक प्रति बनत तखने दुनियाँक रंग-रुप बदलल-बदलल बुझि पड़त।'' चाह पीबि, विदा होइत उमाकान्‍त कहलखिन- ‘‘अहाँक विचारसँ सहमत छी मुदा काजक भार अहाँपर।'' दुनू गोटे -उमाकान्‍त आ हरिनारायण- दू गामक। मुदा कोसे भरिक दूरी दुनूक बीच छन्‍हि। अपने गामक पच्‍चीस बरखक यशोदियाक संतप्‍त जिनगी हरिनारायणक सोझमे छन्‍हि। सोलह बर्खक देहरिपर जखन यशोदिया पहुँचलि अट्ठारह बर्खक गुणेश्‍वर फूलक सुगंध कऽ भौरा जेँका झपटि लेलक। जिनगीक हरियर-हरियर प्रलोभन देवाक संकल्‍प करैत, लोक-लाजसँ बँचैक लेल, गाम छोड़ि दिल्‍ली चल गेल। मुदा दिल्‍लीक सड़कपर जखन दिन-राति गुजारैत तखन यशोदिया कऽ छोड़ि गुणेश्‍वर निपत्ता भऽ गेल असकर यशोदिया वौआए लगलीह। हारि-थाकि यशोदिया एकटा कोठीक शरणमे गेलि। आठ वर्खक पशुवत जिनगी यशोदियाकेँ बदलैक लेल बाध्‍य केलक। नव बाट ताकए लागलि। अपना कऽ मृत्‍यु बुझि एक राति सभ किछु छोड़ि पड़ा कऽ गाम आबि गेलि। गाम आबि हरिनारायणक पाएर पकड़ि ताधरि कनैत रहलि जाधरि ओ बाँहि पकड़ि मनुक्‍खक जिनगी जीवैक भरोस नहि देलखिन। हरिनारायण परिवारमे यशोदिया रहए लगलीह। यशोदियाक मनमे तँ चैन आबि गेल मुदा हरिनारायणक बेचैनी बढ़ए लगलनि। समए पाबि, विलटैत दू जिनगीकेँ जोड़ि एक परिवारकेँ लहलहाइत देखलनि। मनमे खुशी एलनि। अखन धरि उमाकान्‍त यशोदियाकेँ प्रोफेसर हरिनारायणक बहीन बुझैत छलाह। यशोदियाक असली परिचए नहि छलनि तेँ मनमे खुशी रहनि जे सभ्‍य परिवारक लड़की घरमे औतीह। जहिसँ पहिलुके जेँका फेरि परिवार अपन पटरीपर आबि आगू मुँहे ससरए लगत। दिन -लग्‍न- बेरागन छोड़ि हरिनारायण उमाकान्‍तकेँ पुछलखिन- ‘‘अखन तँ विआहक समए नहि अछि तखन.....।'' ‘‘एक दिन पहाड़ लगि रहल अछि। विआहक जे कोनो बंधन अछि ओ काँच सूतसँ बान्‍हल जाइत अछि। जहिसँ सदिखन टूट-फाट होइत रहैत अछि। तेँ दुनूक -पुरुष-नारी- हृदयक योगसँ हेवाक चाही?'' हरिनारायणक प्रश्‍नसँ उमाकान्‍त गुम्‍म भऽ कहलखिन- ‘‘समए आ परिस्‍थितिकेँ देखैत.....।'' उमाअतिश कुमार मिश्र नेपालक राज्‍य पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली नेपाल अखन संघीय संरचनाके अन्‍तिम चरणमे अछि । संविधान सभा अन्‍तर्गतक राज्‍य पुनर्संरचना तथा राज्‍यक बाँड फाँड समिति देशके मिथिला भोजपुरा कोच मधेश सहित १४ टा राज्‍यक आवधारणा सहितक प्रतिवेदन संविधान सभामे प्रस्‍तुत कएलक अछि । नेपालक पूर्व झापा जिल्‍ला सँ पश्‍चिममे पर्सा आ दक्षिण मे भारतक सीमा धरिक पूर्वि मधेशक समथल भू भाग प्रस्‍तावित मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्‍य अछि । ई राज्‍य राजनीतिक, समाजिक, सांस्‍कृतिक, जनसंख्‍या आ अन्‍य आवश्‍यक पुर्वाधारक रुपमे नेपालक सभ सँ समृद्ध राज्‍य हएत अहिमे कोनो दू–मत नहि अछि । मिथिलाक इतिहास मिथिला राज्‍यक इतिहास अति प्रचिन अछि । त्रेता युग सँ शुरु भेल मिथिलाक इतिहाँस राज्‍यक रुपमे भलेही नहि हुए मुदा भाषिक समृद्धताक कारण नेपाल आ भारतक सीमामे बटायल मिथिला क्षेत्र अपन अस्‍तित्‍व जिविते रखने अछि । प्राचिन मिथिला पूर्वमे कोशी, पश्‍चिममे गण्‍डकी, उत्तरमे हिमालय सँ दक्षिणमे गंगा धरि छल । जे बृहदविष्‍णुपुराणक मिथिला खण्‍डमे अहि प्रकारे उल्‍लेख अछि । गंगा हिमवर्तो मध्‍ये नदी पञ्‍च देशान्‍तरे । तैरभूक्तिरिति ख्‍यातो देशः परम पावन ः ।। कौशिकीन्‍तु समारभ्‍य गण्‍डकीमधिगम्‍यबै । योजगनामि चतुर्विशत् ब्‍यायामः परिकीर्तित ः ।। अहि सँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे प्रचिन मिथिलाक भूमि वर्तमान नेपालक मोरङ जिल्‍ला सँ पर्सा धरि तथा भारतक दरभंगा सँ पूर्णियाधरि छल । नेपालक मध्‍यकालिन इतिहासमे त्रिशक्तीके स्‍थ्‍ाापना भेल छल जाहिमे मिथिला राज्‍यक स्‍थान प्रमुख रहल पाओल जाइत अछि । दक्षिण भारतक कर्णाट वंसीय नान्‍यदेव सन १०९७ (११५४ वि.स.)मे बारा जिल्‍लाक सिमरौन गढ़के राजधानी बना सम्‍पूर्ण मिथिलाके समेटि कऽ तिरहुत राज्‍यक स्‍थापना कएलन्‍हि । कर्णाट बंशक शासन १३२४ धरि चलल । ओहिके वाद अहि राज्‍य पर भारतक मुगल सम्राट गयासुद्धिन तुगलक अनिषर आ ब्राहमण वंशक औनियार आ तकर बाद फेर सँ मुगल सभक अधिपत्‍य रहल छल । इम्‍हर मल्‍लकालिन नेपालक इतिहास मे यक्ष मल्‍ल दक्षिण क्षेत्रक विजय अभियानक समयमे मिथिला छिन्‍न भिन्‍न भेल छल । ओहि समयमे पश्‍चिमक मगरात सभ बीच एकटा नयाँ शक्तिक उदयभेल जकर नेतृत्‍व मुकुन्‍द सेन कएलन्‍हि । ओ पाल्‍पाकेँ राजधानी बना कऽ अपन राज्‍य विस्‍तारक क्रममे पाल्‍पा सँ मोरङ्गधरि राज्‍य स्‍थापित कएलन्‍हि । मुकुन्‍द सेनक मृत्‍युक बाद हुनक बेटासभ बीच राज्‍यक बटबारा भेल जाहिमे पुर्वि भाग मकवानपुर छोटका बेटा लोहाङ्गसेनक हिस्‍सामे पड़लन्‍हि । ओ तराइक दक्षिण आ पुर्वी भाग विस्‍तार कएलन्‍हि । जाहि अनुसार पूर्वमे टिस्‍टा नहि सँ काठमाण्‍डू उपत्‍यकाक दक्षिणी भू भाग, भारतक चम्‍पारण, सारज, मुजफ्‍फरपुर आ दरभंगाधरि कायम कएने पाओल जाइत अछि । सेन वंशक अन्‍तिम राजा दिग्‍बन्‍धन सेनक समयमे अर्थात सन् १७७१ मे  ई रान्‍ज्‍य तत्‍कालिन नेपालमे समाहित भऽ गेल । सन् १८१४ सँ १९१६ धरि चलल नेपाल आ अंग्रेज बीचक लडाई मे मिथिलाक मोरङ्ग छोडि सम्‍पूर्ण भू भागपर अंग्रेज कब्‍जा कऽ लेने छल । सन् १८१६कें सुगौली सन्‍धीक बाद मिथिलाक किछ भाग पून ः नेपालमे आएल जे वर्तमान नेपालक, मोरङ, सुनसरी , सप्‍तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, वारा आ पर्सा अछि । राज्‍य पुनर्सरचना मे मिथिलाक अवस्‍था संविधान सभाक राज्‍य पुनर्संरचना एवं राज्‍यक शक्ति बाँडफाँड समिति झापा सँ पर्सा धरि मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्‍यक अवधारणा प्रस्‍तुत कएलक अछि । प्रस्‍तुत अवधारणा अनुसार अहि राज्‍यमे झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, सप्‍तरी, सिरहा, धनुषा महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा आ पर्साके समावेश कएल गेल अछि । प्राचिन मिथिलाक नेपाल स्‍थित भू–भागके केन्‍द्र बना कऽ बनाओल गेल अहि राज्‍यक राजधानीमे जनकपुरकेँ प्रस्‍ताव कएल गेल अछि । प्रमुख राजनीतिक दल एकीकृत नेकपा माओवादी आ एमालेक सहमतिमे समितिक वहुमत सँ अवधारणा पास भेल अछि । प्राचिन मिथिला सहित विभिन्‍न काल खण्‍डक इतिहासकेँ देखल जाय तऽ पूर्वके झापा छोडि अन्‍य जिल्‍ला मिथिला क्षेत्रमे रहल प्रमाणित होइत अछि । अखुनक कोशी पारक मोरङ, सुनसरी मैथिली भाषी क्षेत्र अछि । बिगतकेँ देखल जाय तऽ एतिहासिक, साहित्‍यिक आ साँस्‍कृतिक आधारसभ भेटैत अछि । मैथिली भाषा साहित्‍यक लेल स्‍वर्ण युग मानल गेल १३ अम शताब्‍दीकेँ मध्‍यमे जखन मैथिली भाषा अपन स्‍थान बना चुकल छल । ओहि समयमे विद्यापतिक समकालिन कविक रुपमे मोरङक लक्ष्‍मी नारायण, गोपीनाथ, वीरनारायण, धिरेश्‍वर, भिस्‍म कवि, गंगाधर आदी कविक स्‍थान अबैत अछि । अहि सँ ई प्रमाणित होइत अछि जे ओहि समयमे वर्तमानक सुनसरी आ मोरङ्ग सेहो मिथिला क्षेत्रमे छल । अर्थात अखुनक कोशी नदि मोरङ सँ पुर्व छलैक हएत आ बादमे कोशी अपन स्‍थान परिवर्तन कएने हेतैक । राज्‍य पुनर्संरचना समिति प्राचिन मिथिलाक इतिहासकेँ अपन आधार मानि मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक राज्‍य आवधारणा प्रस्‍तुत कएने अछि आ राजधानी सेहो जनकपुरकेँ बनौने अछि । प्रस्‍तावित राज्‍यमे मैथिलीक अवस्‍था सांस्‍कृतिक आ एतिहासिक दृष्‍टीकोण सँ समृद्ध मैथिली भाषाक इतिहास उल्‍लेख करब आवश्‍यक नहि बुझाइत अछि । ई.स. ८०० सय सँ शुरु भेल मैथिली भाषाक १२ सय वर्ष सँ वेशीक इतिहास अछि । मैथिलीक विकाश अहि गति मे भेल जे मिथिलाक अतिरिक्त अन्‍य क्षेत्रमे सेहो विस्‍तारित होइत गेल । १३ अम शताब्‍दीक उतारार्धमे मैथिली भाषा तत्‍कालिन नेपाल (काठमाण्‍डू उपत्‍यका पर) अपन अधिपत्‍य जमा चुकल छल । मुसलमान सभक आक्रमण सँ पराजित भऽ नेपाल पहुँचल हरिसिंहक रानी अपन नैहर भादगावमे शासन स्‍थापना कएलन्‍हि । हुनका संगे बहुत रास मैथिल विद्वानसभ कवि सभ सेहो उपत्‍यका प्रवेश कएने छल । ओही समय सिँ उपत्‍यकामे मैथिली भाषाक विकाश भेल पाओल जाइत अछि । ओतवे नहि मल्‍ल शासन कालमे अर्थात १३ अम शताब्‍दीक उतरार्ध सँ लऽ कऽ आधुनीक नेपाल एकीकरणक समय (१७६८ ई.) धरि नेपालक राज काजक भाषा सेहो मैथिली रहल । आ वर्तमान अवस्‍थामे सेहो मैथिली भाषा नेपालीक बाद दोसर स्‍थान पर अछि । २०५८ सालक जनगणना अनुसार नेपालक १२.३० प्रतिशत जनता मैथिली भाषा बजैत अछि । जे कुल जनसंख्‍या २ करोड़ ३१ लाख ५१ हजार ४२३ क १२.३० प्रतिशत अर्थात २८ लाख ४७ हजार ६२५ अछि । मैथिली भाषिक सम्‍पूर्ण क्षेत्रके समेटिक वनाओल गेल मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक कुल जनसंख्‍या ६७ लाख ६१ हजार ६७५ अछि । अर्थात प्रस्‍तावित अहि राज्‍यमे मैथिली भाषाक प्रमुख स्‍थान अछि । २०५८ सालक जनगणना सर्लाही आ रौतहट जिल्‍लाकेँ बज्‍जीका भाषाक सूचिमे रखने छथि जे कुल जनसंख्‍याक १.५ प्रतिशत अर्थात २ लाख ३१ हजार ५ सय १४ होइत अछि । जकरा मैथिली भाषाक विद्वानसभ विभेदकारी नेपालक राजनीतिकेँ परिणाम मानि रहल छथि । हुनका सभक तर्क छन्‍हि जे बज्‍जीका भाषा मैथिली भाषक सहबोली अछि ।  तहिना नेपाली आ भोजपुरी बाहेक अहि क्षेत्रमे बाजलजाय बला , थारु, दोनवार, अंगिका सहितक भाषासभ सेहो मैथिलीएक सहबोली रहल हुनकासभक दावी छन्‍हि । जँ मैथिलीक  संग सहबोली भाषाकेँ सेहो मिला देल जाय तऽ अहि राज्‍यक करिव आधा जनसंख्‍या मैथिली भाषीक हैत । बाकी आधामे अन्‍य भाषा । प्रस्‍तावित अहि राज्‍यमे भोजपुरी भाषाक सहो महत्‍वपूर्ण स्‍थान अछि एकरा नकारल नहि जा सकैया । नेपालक कुल जनसंखयाके ५.८५प्रतिशत अर्थात १३ लाख ५६ हजार ६ सय ७३ भोजपुरी भाषी अछि । जनसंख्‍याक आधारमानि कऽ प्रस्‍तावित अहि राज्‍यक मुख्‍य भाषा मैथिली हैत से लगभग पक्‍का अछि । प्रस्‍तावित राज्‍य सँ मैथिलीक अपेक्षा कोनो भाषाके दिर्घकालिन बनएबाक लेल ओहि भाषाके जनजनसँ जोडव आवश्‍यक होइत अछि । आ जनमुुखि बनएबाक लेल रोजिरोटी सँ जोरब, राज्‍यक अधिकारीक अर्थात कामकाजी भाषा बनाएब अछि । बोलीचालीक भाषामे मात्र सिमित होइत गेल मैथिली भाषा जँ अहि राज्‍यक मुख्‍य भाषा बनैत अछि तऽ मैथिली भाषाक लेल नव स्‍वर्णिम युगक शुरुवात हैत । मुदा अखनो विघ्न बाधासभ आवि सकैत अछि । मधेशवादी दलसभ अहि पुनर्संरचनाके स्‍वीकार नहि कऽ रहल अछि । तऽ किछ आन दल सभ सेहो एकर विरोधमे अछि । अपना भाषाके स्‍थापित करएबाक लेल समिति सँ प्रस्‍तवित संरचना यथावत संविधानसभा सँ स्‍वीकृत होइक  तहि लेल  सम्‍पूर्ण मैथिली भाषीकेँ एक जुट भऽ आगा आएव आवश्‍यक अछि । मिथिला राज्‍य स्‍थापना संघर्ष समिति सहित मैथिली भाषाक क्षेत्रमे कार्यरत संघ संस्‍थाक प्रमुख दायित्‍व बनैत अछि जे अहिके लेल आगा आवय, प्रस्‍तावित राज्‍य मे अन्‍यभाषी सभ सेहो छथि । तएँ हुनक भाषाके संरक्षणक विश्‍वास दियबैत मैथिली भाषाके स्‍थापित करायब आवश्‍यक अछि । मुदा काज कठीन अछि । एहि चुनौतीकेँ स्‍वीकार करहि परत। कान्‍त यशोदियाक बीच साओने मासमे विआह भऽ गेल। सुजीतकुमार झा नेपालमे मिथिला राज्‍य की सम्‍भव छैक ? नेपालक संविधानसभाक राज्‍य पूनर्संरचना तथा राज्‍यक शक्ति बाँटबखरा समिति अपन प्रतिबेदनमे मिथिला भोजपुर कोच मधेश नामक राज्‍य रखलाक बाद मिथिला नाम सँ राज्‍य बनत तकर सम्‍भावना बढल अछि । नेपालमे १४ टा राज्‍यक आवश्‍यक्ता रहल ओ प्रतिवेदनमे उल्‍लेख अछि । राज्‍य पूनर्संरचना तथा राज्‍यक शक्ति बाटबखरा समितिक सदस्‍य राम चन्‍द्र झा कहैत छथि –‘नयाँ संविधान निर्माणक लेल समितिक प्रतिवेदनकेँ आधिकारिकता महत्‍वपूर्ण रहल तएँ नेपालमे मिथिला राज्‍य हैत, अहि गप्‍पकेँ नजर अन्‍दाज नहि कएल जा सकैत अछि ।’ मिथिला राज्‍य संघर्ष समिति सेहो आव मिथिला राज्‍य हैत ताहिमे कोनो भाँगठ नहि रहल कहैत अछि । संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्‍वर कापड़ि कहैत छथि–‘नेपालमे राज्‍यक लेल जे तत्‍वसभ चाही से मिथिला लग मात्र छल तएँ ई तऽ होबहेके छल । तखन मिथिला संग आओर नाम जोडि देल गेल अछि , ताहि पर हमरा सभकेँ आपत्ति अछि ।’ (नीचाँक नक्शाकेँ पैघ रूपमे देखबा लेल क्लिक करू) ‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्‍थानपर मिथिला मात्र रहैत तऽ बेशी प्रशन्‍नता होइत’ कापडि आगा कहलन्‍हि । ओना राज्‍य पूनर्संरचना तथा राज्‍यक बाँटबखरा समितिक सदस्‍य एवं पूर्व मन्‍त्री राम चन्‍द्र झा कहैत छथि –‘नाममे सेहो मिथिला अछि फेर एकर राजधानी सेहो जनकपुर तखन अओर सँ की लेना देना ।’ ओना विश्‍लेषक सभ राज्‍य पूनर्संरचना तथा राज्‍यक शक्ति बाँटबखरा समिति देशक प्रमुख आधिकारिक शक्ति होइतो एकर रिपोर्ट पर बहुत रास अभ्‍यास करबाक बाँकी रहल कहैत छथि । तएँ बहुत उत्‍साहित होएबाक आवश्‍यक्ता नहि अछि । मिथिला राज्‍यक स्‍थापनामे बाधा एक दिस राज्‍य पूनर्संरचना तथा राज्‍यक शक्ति बाँटबखरा समितिक प्रतिवेदन मे मिथिला राज्‍य स्‍थापनाक बात अएलाक बाद जहाँ किछ मैथिल संघ संस्‍था सभ उत्‍साहित अछि ओतहि एकर प्रतिवेदन अबिते नेपालमे विवाद ठाढ भऽ गेल अछि । नेपालक मधेशवादी दलसभ मधेश राज्‍यमे मिथिला उपराज्‍यक बात कऽ रहल अछि । नेपालक प्रमुख मधेशवादी दल मधेशी जनअधिकार फोरमकेँ केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष उपेन्‍द्र यादव कहैत छथि –‘हम स्‍वयं मैथिल छी मुदा मिथिला क्षेत्रकेँ तखने विकास हैत जखन मधेश राज्‍यक स्‍थापना हैत आ ओहिमे मिथिला रहत ।’ ओ एक मधेश स्‍वायत्त प्रदेश बाहेककेँ बात बर्दास्‍त नहि कएल जा सकैत अछि कहलन्‍हि । मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्‍त्रिक, तराई मधेश लोकतान्‍त्रिक पार्टी आ सदभावना पार्टी संयुक्त रुपमे एक मधेश प्रदेशकेँ लऽ कऽ आन्‍दोलन कऽ रहल अछि । मधेशी दलसभक विरोध मिथिला राज्‍य स्‍थापनामे सभ सँ बेसी बाधक बनि रहल अछि  । मैथिल सभकेँ आपत्ति कतय बहुतो मैथिलकेँ नाम पर आपत्ति छन्‍हि । ओ सभ कहैत छथि ‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्‍थान पर मात्र मिथिला रहबाक चाही । मिथिला लग राज्‍य बनबाक सभ सँ बेसी आधार अछि ।’ आधारकेँ प्रष्‍ट करैत रामानन्‍द युवा क्‍लब जनकपुरक अध्‍यक्ष दिपेन्‍द्र ठाकुर कहैत छथि– ‘मिथिला संगे इतिहास भुगोल मात्र नहि वर्तमान मे सेहो सभ चीज अछि ।’ एखन मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्‍यक सीमा जे निर्धारण कएल गेल छैक से नेपालक झापा जिल्‍ला सँ पर्सा जिल्‍ला धरि अछि ।  जाहिमे करिव ४६ प्रतिशत मैथिली भाषी छथि । ५४ प्रतिशतकेँ नजर अन्‍दाज नहि कएल जा सकैत अछि । जँ सभ भाषाकेँ राज्‍य भाषाक रुपमे स्‍थान देल गेलै तऽ मैथिली भाषाकेँ बेसी क्षति हैत । जानकार सभक अनुसार मैथिली बाहेककेँ भाषा सेहो राज्‍यक भाषा भऽ सकैत अछि । ताहि सँ मैथिली भाषाकेँ जे अलग रुप सँ फाइदा होइतै से नहि हैत । ज्ञातहुए नेपालमे नेपाली भाषाक बाद सभ सँ बेसी बाजल जाय बला भाषा मैथिली अछि    । मिथिला राज्‍य स्‍थापनाक आन्‍दोलन कतय मिथिला राज्‍य स्‍थापनाक आन्‍दोलन जाहि रुपमे बढबाक चाही से नहि बढि रहल अछि । खास कऽ डकुमेन्‍टेशनकेँ विषयमे जेना किछो नहि भऽ रहल अछि । एमाले नेता शितल झा, साहित्‍यकार डा. सुरेन्‍द्र लाभ, डा. विजय कुमार सिंह, पूर्व मन्‍त्री राम चन्‍द्र झा वरिष्‍ठ राजनीतिक विश्‍लेषक सीके लाल, माओवादी नेता राम रिझन यादव ,डा. विरेन्‍द्र पाण्‍डे, साहित्‍यकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि सहितक व्‍यक्ति सभक किछ कार्यपत्र आएल अछि मुदा ओहो संग्रहित नहि अछि । मिथिला राज्‍य स्‍थापनाक माँग केँ लऽ कऽ मिथिला राज्‍य संघर्ष समिति गठन तऽ भेल अछि मुदा एक वर्ष भितर आन्‍दोलनकेँ नाम पर सडकपर कवि गोष्‍ठी बाहेक तेहन उल्‍लेखनीय काज किछ नहि भेल अछि । ओना संघर्ष समितिक सचिव रमेश रञ्‍जन झा संघर्ष समिति खासे काज नहि कएलक अहि बातकेँ मानयकेँ लेल तैयार नहि छथि । ओ कहैत छथि ‘संघर्ष समिति मिथिला राज्‍यक लेल लविङ्गकेँ काज करैत आएल अछि ।’ ओना मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर, रामानन्‍द युवा क्‍लबक अभियानकेँ सेहो नजर अन्‍दाज नहि कएल जा सकैत अछि । मुदा महिना दू महिना पर एकटा दू टा कार्यक्रम कऽ देलौं ताहि सँ ठोस उपलब्‍धि नहि भऽ रहल अछि । इतिहासमे मिथिला मिथिलाक परम्‍परागत सीमा बृहदविष्‍णुपुराणक मिथिला महात्‍म खण्‍डमे वर्णित अछि । जाहिकेँ आधार मानि कवीश्‍वर चन्‍दा झा मिथिलाक सीमा सम्‍वन्‍धमे अहि प्रकार वर्णन कएने छथि – गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिक धारा पश्‍चिम बहथि गण्‍डकी उत्तर हिमबत बल विस्‍तारा कमला त्रियुगाअमृतृता धेमुड़ा वागमति कृतसारा मध्‍य बहथि लक्ष्‍मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा अहि भूभागक विस्‍तार अहि प्रकार पूर्व पश्‍चिम करिव २९० किलो मिटर , उत्तर दक्षिण करिव १९३ किलो मिटर होइत अछि । जाहि अनुसार एकर कुल क्षेत्रफल ५५ हजार ९७० बर्ग किलो मिटर रहल अछि । ई क्षेत्र एखन नेपाल आ भारतमेँ बटि गेल अछि । जहाँ धरि मिथिलाक स्‍थापनाक बात अछि विदेध माधव सरस्‍वती तीर सँ आबि मिथिलामे आर्य सभ्‍यताक विस्‍तार कएलन्‍हि । आ विदेह वा जनक राज्‍य वंशक आधारशीला राखल गेल । अहि वंशमे जनक द्वितीय नाम सँ चर्चित शिर ध्‍वज भेल छलाह । जिनक पुत्री भगवती सीता रहथि । विदेह राज्‍य कुलक मिथिला पर शासनक समय ३००० ईश्‍वी पूर्व सँ ६०० ईश्‍वी पूर्व धरि अनुमानित अछि । नेपालमे मिथिला राज्‍य किया मिथिलाकेँ स्‍वर्णिम इतिहास अछि । मात्र नेपालेके लेल जाए तऽ कहियो मैथिली भाषाके प्रसार राज्‍य सभाधरि छल । राजधानी काठमाण्‍डूक मूल भाषा मैथिली छल । मुदा अखन मैथिली जनबोली धरि सिमित भऽ गेल अछि । एकर कला परम्‍पराक विकास होबय नहि सकि रहल अछि । भारतक मधुवनी पेन्‍टिङ्ग जतय विश्‍व बजारमे तहलका मचौने अछि ओतहि विश्‍व प्रसिद्ध मिथिला पेन्‍टिङ्गक एकटा सीमित बजार अछि । ओहु पर मैथिल सभक पहुँच नहि अछि । वरिष्‍ठ राजनीतिक विश्‍लेषक सीके लाल कहैत छथि ‘मिथिला राज्‍यक आवश्‍यकता आँगुर पर नहि गनाओल जा सकैया’ । ओ समग्र मिथिलाक विकासक लेल मिथिला राज्‍यक आवश्‍यकता रहल बतौलन्‍हि । हुनक अनुसार मिथिलाक गुमल पहिचान पुनः प्राप्‍तीक लेल मिथिला राज्‍यक आवश्‍यकता अछि । १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २.-         प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि १ डा.रमानन्द झा ‘रमण’ तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि। सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’, दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि। डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि। तन्त्रानाथ झाक अवदान तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन। तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि। तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब- 1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि। ‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य। 2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि: मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ। व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4 3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि - ‘अबला, भीरु, की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म, अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए, अबला भीरु कहाए मरब’6। एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ अभिभूत भए गुम्हरैत अछि - अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म। तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7 डा. सुुभद्र झा सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि - 1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत? एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि। 2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा, 3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि। एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि। सुुभद्र झाक कृृति: संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10 सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल। सुुभद्र झाक महत्व: 1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह। मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल। 2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल। 3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ। 4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत। 5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन ‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15 6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि। अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह। 1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84 2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ 3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2 ............................. ४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५ 5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5 6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68, 7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936 9. भारती,अप्रैल, 1937. 10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958 11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net 12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi 14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I & II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha - K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc. @5 15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ। हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी। 16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives, a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000. २ -         प्रकाश चन्द्र ‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि मैथिली नाट्य जगत मे ‘प्रयोग’ एकटा सशक्त एकांकी अछि, जाहि मे मात्र तीनटा पात्र नवीन मिसर, अमृत आ श्रुति छथि । ई तीनू गोटे कोनो नाट्य संस्थाक नाट्यकार / निर्देशक / अभिनेता / अभिनेत्री कोनो नाटक करबाक युक्ति मे लागल छथि । नाटककार या निर्देशक (जे कहि लियनु) नवीन अपन एहि दुनू पात्र के प्रेमक मादे किछु प्रयोग करबाक लेल कहैत छथि । तीनू पात्र प्रेमक विभिन्न आयमक कतेको प्रयोग करैत छथि । अंतत: ई प्रेम हिनका सबहक नाटकीय जीवन स’ निकलि व्यक्तिगत जीवन स’ नीक जेना ओझरा जाइत छथि । किछु ओहिना जेना विजय तेंडुलकरक चर्चित नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ मे घटैत अछि जे सभपात्र ग्रीन रूम मे किछु ओहिना अदालतक स्वांग रचैत छथि आ ओ धीरे धीरे ततेक ने बढ़ि जाइत अछि जे सभ पात्रक व्यक्तिगत जीवन सामने आबि जाइत छै । खैर ! एहि एकांकी मे नाटककार नचिकेता जी सेहो नवीनक माध्यमे स्वयं बजैत बुझाइत छथि । एक ठाम नावीनक संवाद छनि : “आइ-काल्हि जेहन नाटक होइत अछि ओ लोक घर जाक’ सपनेक संग बहा दैत अछि । एकर कोनो प्रक्रिया मोन नहि रहैत छैक । तेँ कोनो स्थायी वस्तु नहि द’ पबैत अछि आजुक नाटक । नाट्यकार लोकनि किछु टाइपमे बन्हा गेल छथि । अपन-अपन शिविरक । मुदा, ओ बात कहबाक लेल लिखैत छथि । केओ लाल छथि तँ केओ पीयर, केओ पूर्वी हावाक शौखीन छथि तँ केओ पश्चिमि हावाक । मुदा नवीन प्रयोग हुनका लोकनिक नाटकमे किन्नहुँ नहि भेटत ।” नवीन नामक एहि पात्रक कथन के आगू बढ़बैत लेखक कहैत छथिन “हमरा मोनमे भेल जे एकटा ओहन नाटक लिखी जाहि सँ नाटकक व्याकरणक सूते कटि जाए ।” – आ से एहि ‘प्रयोग’ मे भेबे कयल अछि । ‘प्रयोग’ नामक ई एकांकी ओहिना भ’ गेल जेना उड़ैत गुड्डीक तागा टुटि गेल हो । ओ क’ त’ जाएत से कोनो थाहे नै रहैत छै । ‘प्रयोग’ एकांकी स’ की भेलै, एकर कथ्य स्थापित भेलै, अभिनेता-अभिनेत्री स्थापित भेलाह, प्रकाश संयोजन स्थापित भेल, मंच व्यवस्था स्थापित भेल वा कि नै भेल से देखब जरूरी अछि । ओना आइ-काल्हि एहन प्रथा खूब चलल अछि जे कोनो एकटा शव्द वा परिस्थिति के पकड़िक सभ अभिनेता मंच पर अपन परिकल्पना स’ कथा के आगू बढ़्बैत छथि । तय मात्र एतबे रहैत अछि जे ई क्रिया कतबा समय तक होयत, आधा घंटा, एक घंटा वा जतेक हो । मुदा, एकरा सम्पूर्ण नाटकक संज्ञा नहि देल जा सकैत अछि । हँ, ई क्रिया कोनो अभिनेता अभिनेत्रीक प्रशिक्षणक रचना प्रक्रियाक लेल उत्तम भ’ सकैत अछि । एहि स’ हुनक निर्णयक क्षमता बढ़तनि, हुनका भीतर अपना आप मे विश्वास जगतनि, ओ अपन सहकर्मीक लेल कोना सहायक भ’ सकताह से अनुभव हेतनि, एकटा कथा के दोसर कथा सँ कोना जोड़ताह आदि आदि । ‘प्रयोग’ मे तीनटा दृश्य राखल गेल अछि । पहिल दृश्यक अंत तक पात्र नवीन यैहटा कहि पबैत छथि जे ओ एहि प्रयोग मे की करताह । तय होएत अछि जे नाटक विषय वस्तु भेल – प्रेम आ कथाक रूप रेखा मे पहिने मिलन ओकर बाद विरह आ अंत मे फेरो मिलन । एहि स’ इहो एही दृश्य मे दर्शक के जानकारी द’ देल जाइत छनि जे नाटक सुखांत अछि । एहि स’ इहो अनुमान लगाओल जा सकै छै जे दर्शक वाकि प्रेक्षक केँ जे कोनो उत्सुक्ता हेतनि एहि प्रयोग के ल’ क’ ओ निश्चित आधा भ’ गेल हेतनि । आब ओ मात्र उपर्युक्त रूप रेखाक प्रक्रिया देखबा लेल रहताह । मुदा एहन कोनो स्थिति नहि अबैत छै । अंत एकटा प्रेमिकाक हत्या स’ होइत अछि । नाटकक दोसर दृश्यमे अमृत आ श्रुतिक बीच प्रेम के केन्द्र मे राखि संवाद शुरु होएत छनि । मुदा पहिने तय कयल गेल रूप रेखाक क्रम बाधित होइत अछि आ अकस्मात निर्देशक नवीन प्रवेश करैत छथि । एहि तरहे दोसर दृश्यक अंत तक निर्देशक नवीन मिसरक अनुसार नाटक शुरू भेले नहि रहैत अछि । ओ फेर स’ प्रयोग आरम्भ करबाक आदेश दैत छथि । आब नाटकक तेसर यानी अंतिम दृश्य शुरू होइत अछि । एहि दृश्यमे तीनू पात्र पर हुनकर सभहक व्यक्तिगत जीवन बेसी प्रभाव मे आबि जाइत छनि । श्रुति अत्यधिक आवेशित भ’ जाइत छथि । अमृत सेहो अपना आ श्रुतिक बीच नवीन के बाधा रूप मे बूझैत छथि आ हुनका पर अन्हार मे हमला क’ दैत छथि । एक बेर फेर श्रुति अमृत पर आवेशित होइत छथि । अमृत पर कतेको तरहक आरोप लगबैत छथि । अमृत स’ सहन नहि होइत छनि आ ओ श्रुतिक गरदनि दबाक’ हत्या क’ दैत छथि । आब शुरू मे निर्देशक नवीन जीक संवाद कतेक कारगर भेलन्हि आ ओ प्रेक्षक पर कतेक प्रभावी भेल, नाटक देखला बाद दर्शक ‘प्रयोग’ के आने नाटक जेना सपना मे बहा देलन्हि , एकर कोनो प्रक्रिया मोन रखलाह कि नै रखलाह से अंवेषणक विषय थिक । एकांकी मे पात्रक संख्या सेहो तदनुसारे अछि ; ने बेसी आ ने कम, तीनटा । गम्भीरता स’ देखल जाय त’ नाटकक पात्र नवीन मिसर दू तरहे मंच पर अबैत छथि – पहिल त’ निर्देशक रूप मे (जिनकर सोच अछि प्रेम ल’ क’ किछु प्रयोग करबाक) आ दोसर प्रेम के ल’ क’ चलि रहल प्रयोग मे एकटा पात्रक रूप मे सेहो । पहिल दृश्य मे जे स्थापना निर्देशक नवीन मिसर करैत छथि ओ अंत मे जाक’ कोनो निष्कर्ष पर नहि ल’ जा पबैत छथि, ने प्रेक्षक के आ ने अपना आप के । पात्र अमृत हरदम अपने मे छथि । ओ पूरा नाटक मे अपन व्यक्तिगत जीवन जिबैत छथि । अंतिम दृश्यक परिणिति सेहो हुनक व्यक्तिगते होइत अछि तेँ ई पात्र नीक जेना स्थापित होएत छथि । श्रुति नामक महिला पात्र मंच पर निर्देशक नवीन मिसरक निर्देशानुसार चलैत छथि मुदा अपन पिछला आ वर्तमान व्यक्तिगत जीवन दुनू के मंच पर अनैत छथि । ओ ‘कि करू...  कि नै करू’ के स्थिति मे किछु निर्णय नै ल’ पबैत छथि । लेखक श्रुति केँ एकटा अस्थिर पात्र गढ़ने छथि । परिणाम होइत अछि जे एकांकीक अंत तक जाइत जाइत हिनकर हत्या भ’ जाइत छन्हि । एहि तरहेँ ‘प्रयोग’ मे तीनटा पात्र छथि जाहि मे नवीन मिसर छोड़ि दुनू पात्र नीक जेना स्थापित होइत छथि । नाटक मे मंच परिकल्पना संग प्रकाश प्ररिकल्पना सेहो लेखक अपना हिसाबे केने छथि । जाहि मे मंच के तीन हिस्सा मे बाँटल गेल अछि आ समयानुसार ओकर प्रयोग सेहो कयल गेल छै । एक कात एकटा कुर्सी अछि आ एकटा काठक बक्सा सेहो उनटल छै , बीच मे सीढ़ीक तीनटा चरण आ एकटा काठक फ्रेम आ दोसर कात मे फूल-पात युक्त एकटा ठाढ़ि लटकल अछि । एहिना प्रकाशक सेहो तीन का क्षेत्र बनाओल गेल छैक एकटा मे कुर्सी+बक्सा+सीढ़ी अछि । दोसर मे सीढ़ी आ मंचक सामनेक हिस्सा । तेसर मे सीढ़ी आ ठाढ़ि अछि । एहि तरहक प्रयोग मैथिली नाटकक लेल पहिल नै अछि तखन एहि एकांकीक मंचनक सन्दर्भ मे ई अति महत्वपूर्ण सुझाव अछि कोनो निर्देशक लेल । एहि मे कोनो शक नहि जे नाटककार नचिकेताजी नाटकक लगभग सभ विधा मे नीक हस्तक्षेप रखैत छथि । एहि तरहेँ निष्कर्ष यैह जे ई ‘प्रयोग’ एकांकी मात्र एकटा विचार बनि क’ रहि लेल अछि मैथिली रंगमंचक लेल । ओना नाटक मे द्वन्दक प्रयोग खूब नीक जेना बनल रहैत अछि । नाटक अपन ग्राफ के शुरू स’ बरकरार रखैत अछि । रंगमंचीय दृष्टि स’ ‘प्रयोग’ एकांकीक कथ्य स’ बेसी ओकर मंच परिकल्पना आ प्रकाश परिकल्पना बेसी महत्वपूर्ण अछि । ओना ‘प्रयोग’क मादे हमर ई विचार मात्र एकर एकटा पाठक रूपे राखल जाय । हँ ! एकर प्रस्तुति देखला वा मंचित केला बाद किछु आरो सार्थक तथ्य निकलि सकैत अछि । तखन ई निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य मे ई अपना तरहक पहिल कृति मानल जयबाक चही, जे रंगमंच स’ जूड़ल प्राय: सभ रंगकर्मी केँ किछु सोचबाक लेल प्रेरित करैत अछि । बिपिन झा जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य जा धरि भारतीय ज्ञान परम्पराक चर्चा नहि कयल जाइत अछि ता धरि ’ज्ञान’ पदक विवरण सम्पूर्ण नहिं होइत अछि। पुनश्च यदि भारतीय ज्ञानपरम्पराक चर्चा करी तऽ काश्मीर शैवदर्शनक चर्चाक बिना ई अधूरा रहत। तेरहम शताब्दीक बाद एकर परिगणना विद्वान सभ भारतीय दर्शन के अन्तर्गत केनाई बन्द कय देलथि कियाक तऽ सभक दृष्टि संकुचित भय मात्र छ टा दर्शन के आस्तीक आ तीन टा दर्शन के नास्तीक के रूप में प्रतिष्ठित करवा में व्यस्त भय गेलन्हि। वस्तुतः काश्मीर शैवदर्शन (एकरे अपरनाम प्रत्यभिज्ञादर्शन अछि) कऽ परम्परा एतेक समृद्ध अछि जे अभिनवगुप्त पाणिनि सदृश विद्वान के प्रतिष्ठित कयलक अछि। काश्मीर शैवदर्शनक विकास आठम सदी सँऽ बारहम सदी केर मध्य भेल। ई दर्श पूर्णतः व्यावहारिक पक्षपर बल दैत रहल अछि। एहि दर्शन में मूल तत्त्व के रूप में परमशिव कें स्वीकार कयल गेल अछि। सम्पूर्ण चराचरजगत शिवरूप अछि ई एहि दर्शनक मूल धारणा छैक। कुल ३२ तत्त्व के स्वीकृत भेटल अछि- ·         शिव ·         शक्ति ·         सद्विद्या ·         ईश्वर ·         मायाè कला, विद्या, राग, काल, नियति ·         पुरुष ·         प्रकृति è ( पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, मन, पंच महाभूत) एहिठाम प्रश्न उठनाई स्वाभाविक छैक जे सम्पूर्ण चराचर जगत शिवरूप केना भय सकैत छैक जखनि कि व्यवहार में पार्थक्य स्पष्टतः दृष्टिगत होइत अछि। एकर समाधान एहि दर्शनक तत्त्वमीमांसा करैत अछि जे ई स्पष्ट करैत अछि जे जतेक मात्रा में वस्तु वा व्यक्ति मलाच्छादित होइछ तावत मात्रा में  ओ न्यूनरूप में प्रकाशित होइछ। एहि क्रमक विवेचन हेतु विशद रूप सँ प्रकाश-विमर्श आ आणव कार्म तथा मायीय मल केर चर्चा कयल गेल अछि जे एहि दर्शनक अनुपम ग्रन्थ ’श्रीतन्त्रालोक’ में सुलभ अछि। एतय पुनः प्रश्न अछि जे जन सामान्य हेतु एहि दर्शनक की उपादेयता? एहि प्रश्नक समाधान करैत ई दर्शन कहैत अछि जे सर्वप्रथम तऽ आत्मविश्वास राखी जे हम स्वयं ओ परम सत्ता छी हमरा सँ कोनो कार्य असम्भव नहिं। अस्तु निराशा क कतहु स्थान नहि। अही संग दोसर संदेश ई छैक जे विभिन्न मल के दूर करवाक यत्न करी जाहि सँ शिवोऽहं केर भाव आवि सकय। अस्तु एहि तरहें ई कहल जा सकैत अछि जे ई दर्शन अपन दार्शनिक मर्यादा रखितो जनमानस केर व्यावहारिक समस्या दिस विशेष ध्यान दैत अछि। बिपिन  कुमार झा Cell for Indian Science and Technology in Sanskrit, HSS, IIT, Bombay http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home १.पण्डित ओ हुनक पुत्र-शिवशंकर श्रीनिवास २.-ऋृषि वशिष्ठ-जुआनी जिन्दाबाद १ शिवशंकर श्रीनिवास जन्म स्थान लोहना मधुबनी, बिहार । चर्चित कथाकार ओ आलोचक । गीत ओ कविता सेहो कहियो काल लिखैत छथि । प्रकाशित कृति : त्रिकोण, अदहन, गाछ-पात, गामक लोक (कथा संग्रह)। (मिथिलाक लोक-कथापर आधारित बाल कथा) पण्डित ओ हुनक पुत्र नैनापुर गाममे एकटा पण्डित रहथि। नाम रहनि- बौआ चौधरी। नैनापुर टोलक विद्यालयक ओ प्रधान गुरुजी रहथि। सभ हुनका बड़का गुरुजी कहनि। बड़का गुरुजीक पण्डिताइक सोरहा ओहि समयमे देश-विदेशमे छल। ओहि समएक प्रसिद्ध युवा विद्वान् मे बेसी गोटे हुनके शिष्य रहथि। देश-विदेशक लोक हुनका लग शास्त्रक गप्प बूझऽ अबैत छलाह। किन्तु बड़का गुरुजी रहथि बड़ क्रोधी, से सभ जनैत छल। क्रोध छोड़ि हुनकामे सभ टा गुणे रहनि। किन्तु हुनक क्रोधक चर्चा सभ करए। बड़का गुरुजीक एक मात्र संतानमे बेटा, नाम रहै धनंजय। धनंजय बड़ तेजस्वी रहय। लोक कहै धनंजय अयाची मिश्रक बेटा शंकरक दोसर अवतार छी। धनंजय बारहे-तेरह वर्षक उम्रमे बड़का विद्वान् भऽ गेल। इलाकाक लोक कहऽ लगलै- जेहने गुणमन्त बाप तेहने बेटा। किन्तु धनंजय उदास रहैत छल कारण जे बाप कहिओ नीक भाखा नहि कहथिन। ई कोनो विषयमे कतबो अंक आनय, परीक्षामे प्रथम घोषित होअए, कठिनसँ कठिन शास्त्रार्थ जीति कऽ आबय आ सोचय जे एहि बेर बाबू अवश्य प्रसन्न भऽ किछु कहता, किन्तु बाबू ओहिना धीर-गंभीर, किछु नहि कहलथिन। धनंजय अपन पिताक मुखसँ नीक गप्प सुनबाक लेल वा कोनो वाहवाहीक शब्द सुनबाक लेल ओहिना तरसय जेना उपासल पानि लेल तरसैत अछि। ओना बड़का-बड़का विद्वान् प्रशंसा करथिन, कतेको प्रसिद्ध विद्वान् हृदएसँ लगबथिन किन्तु पिताक मुँहसँ प्रशंसा सुनबाक हेतु मन रकटले रहै। अठारह वर्षक उम्रमे धनंजय न्याय शास्त्रक एहन पोथी लिखलक जे सर्वत्र चर्चामे आबि गेल। धनंजय अपन पोथी पढ़बाक लेल पिताकेँ देलक, किन्तु ओ पढ़ि घुमा देलथिन, किन्तु किछु कहलथिन नहि। एक दिन धनंजय साहस कऽ केँ पिताकेँ पुछलक- “बाबू, पोथी पढ़ि अहाँ किछु सम्मति नहि देलहुँ।” “थोड़े आर परिश्रम करू।” कहि पिता गंभीर भऽ गेलथिन। धनंजयकेँ पिताक गप्प बहुत अधलाह लगलै, ततबे नहि, मनमे घोर प्रतिक्रिया भेलै। सोचलक- “ई हमर शत्रु छथि, जावत जीता तावत हमर यश-प्रतिष्ठासँ जरैत रहताह, कहिओ प्रशंसा नहि करताह।” से सोचैत-सोचैत बुझू बताह भऽ गेल। मनेमन निर्णय कएलक जे आइ रातिमे जखन ओ भोजन कऽ आङनसँ बहरेता तँ खर्गसँ गरदनि काटि पड़ा जाएब। अन्हरिया छैके केओ ने देखत। दिन बीतल, साँझ भेलै आ तकर बाद राति। बड़का गुरुजी भोजन कऽ रहल छलाह, आगूमे पत्नी अंजनी बैसलि छलथिन। आ इम्हर धनंजय खर्ग लऽ कऽ ठाढ़ छल जे भोजन कऽ कोनटा लग औताह कि काटि कऽ पड़ा जाएब। अंजनी कहलथिन- “धनंजयक पोथीक सुनै छी बड़ चर्चा छै।” “हूँ”- पत्नीक गप्पपर बड़का गुरुजी बजलाह। “एकटा बात कहू, तमसायब तँ नहि।” अंजनी अपन क्रोधी पति बड़का गुरुजीकेँ पुछलनि। “कहू ने”- गुरुजी पुछलथिन। “पहिने कहू जे तामस नहि करब।” “अच्छा नहि करब, पूछू।” “अहाँ धनंजयपर तमसाय किएक रहै छियनि? ” “तमसाय किएक रहबनि? ” “अहाँ आइ तक हुनकर प्रशंसा कयलियनि? ” पत्नी गप्पपर बड़का गुरुजी बहुत हँसलाह आ कहलथिन- “अहाँ नहि बुझै छिऐ।” “हम बुझै छिऐ, ओ अहाँकेँ नहि सोहाइ छथि।” “के एहन अभागल होएत जकरा बेटा नहि सोहेतै? बेटे एकटा एहन होइ छै, जकरा लोक अपनासँ पैघ देखऽ चाहैए।”- गुरुजी बजलाह। ताहिपर पत्नी पुछलथिन- “कहू तँ अहाँक बेटा केहन पण्डित छथि? ” “बहुत पैघ पण्डित छथि। हमरासँ बहुत आगू बढ़ि गेलाह।” गुरुजी बहुत आनन्दमे अंजनीकेँ कहलनि। ओहिना आनन्दसँ आनन्द लैत अंजनी पुछलथिन- “ओ पोथी जे लिखलनि से केहन छै? ” “बहुत उत्तम, हम कएटा बात ओहि पोथीसँ जनलहुँ अछि, बूझू गदगद छी। धनंजय पुत्रे नहि, पुत्र रत्न थिकाह।” “तखन हुनकर प्रशंसा किएक ने करै छियनि?” पुनः पत्नीक गप्पपर भभा कऽ हँसैत गुरुजी कहलथिन- “बुझलहुँ, हम हुनकर बाप छियनि, प्रशंसा करबनि तँ घमण्ड भऽ जयतनि आ तखन विकास रुकि जयतनि।” “सुनू, हम अहाँक स्त्री छी। अहाँ जहिया हमर काजक प्रशंसा करै छी तहिया हम आरो नीकसँ काज करै छी। आ जहिया कोनोपर बिगड़ै छी तकर बाद आरो काज गड़बड़ा जाइए, ताहिपर अहाँ ध्यान देलिऐ? ” “हूँ...।” कहि पत्नीक गप्पपर गुरुजी गंभीर होइत पुछलनि- “अहाँ आइ ई सभ किए पुछैत छी? ” “अहाँ धनंजयकेँ पोथी दैत कहलियनि जे आर परिश्रम करू, से हुनका नीक नहि लगलनि। “अहाँ कोना बुझलहुँ? ” “हम माय छिऐ, हम ओतबो नहि बुझबै। तखनसँ हुनक माथ ठीक नहि बुझाइए।” “ओ ज्ञानी छथि, हुनका हमर बातक कतहु क्रोध होइन? ” “तखन अहाँकेँ क्रोध किए होइए? अहूँ तँ ज्ञानी छी।” “हँ, से...।” पत्नी गप्पकेँ स्वीकारैत गुरुजी सोचैत भोजन करऽ लगलाह। मने-मन सोचलनि अंजनी ठीक कहैत छथिन। ओम्हर कोनटाक अन्हारमे ठाढ़ गप्प सुनैत धनंजयक हालत विचित्र भऽ गेलै- “ओ एहन महान पिताक हत्याक लेल ठाढ़ अछि? ओ वस्तुतः पण्डित नहि मूर्ख अछि।” सोचैत धनंजय कानऽ लागल। भोजन समाप्त कऽ गुरुजी ओसारापर सँ उतरि अङना अएलाह आकि धनंजय पएरपर खसि कनैत कहलक- बाबू हम बिना विचार कएने अहाँक हत्या कऽ दैतहुँ। हम बताह छी। हम मूर्ख छी। पातकी छी।” “नहि धनंजय, अहाँ हमर हत्या करऽ लेल छलहुँ से बात नुका सकै छलहुँ, किन्तु अहाँ सत्यकेँ नुकेलहुँ नहि। अहाँ सत्यकेँ समक्ष अनबामे डरेलहुँ नहि। अहाँ वस्तुतः पण्डित छी।” “नहि बाबू। हम क्रोधमे रही। अहाँक हत्या करब सोचलहुँ, तकर प्रायश्चित? ” “प्रायश्चित् भऽ गेल।” “से कोना? ” “सत्यक खुलासासँ। आँखिक नोरसँ।” “किन्तु बाबू? ” “बेटा धनंजय, आइ अहाँक प्रसङसँ हमहूँ किछु सिखलहुँ।” “बाबू!” “जावत क्रोध रहत तावत ज्ञान हँटल रहत। हम सभ दिन विद्या सिखलहुँ आ सिखौलहुँ किन्तु हमरामे क्रोधक स्वभाव रहबे कएल आ...। ” “आ की बाबू? ” “सभकेँ, जे काज करए ओकरा प्रोत्साहन दीऐ। आ कोनो बात केओ कहए वा नहि कहए, दुनू स्थितिमे सोची, से नहि कएने अहाँ सन ज्ञानी बापकेँ मारब सोचैत अछि। ” २ ऋृषि वशिष्ठ प्रकाशित कृति- जे हारय से नाक कटाबय (बाल साहित्य), कोढ़ियाघर स्वाहा (बाल साहित्य), झुठपकड़ा मशीन (बाल साहित्य), मैथिली धारावाहिकक कथा, पटकथा आ संवाद लेखन। एकर अतिरिक्त कथा आ व्यंग्य पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। पता- तेजगंगाधाम, परिहारपुर, मधुबनी। जुआनी जिन्दाबाद सगरो टोलमे एक्कहि बातक चर्च-बर्च छलैक। बुढ़-बुढ़ानुस सभ साँझक चारि बजबाक बाट तकैत छलाह। सबहक मूँहे एक्के बात- ‘‘लाख छै तेँ कि, देखहक काली-बाबुक बेटाकेँ। एखनुको समएमे सरबन पूत होइ छै की !’’ कियो-कियो इहो कहैत छलै जे- ‘‘बाबू, काली बाबू बड्ड कष्टेँ बेटाकेँ इंजीनियर बनौने छथि।’’ -‘‘से तँ ठीके, मुदा आइ काल्हि ई कष्ट ककरो-ककरो सार्थक होइ छै ! आ से काली बाबूकेँ भेलनि।’’ यैह गर्मीक समए छिऐ। परुकाँ साल कालीबाबूकेँ दू-बेर मासे दिनपर हार्ट एटैक भऽ गेल छलनि। सगरो गामक लोक कहैत छलै जे आब हिनकर बाँचब मोस्किल छनि। आ स्थिति छलनिहों तेहने। दोसर बेरक हार्ट एटैकक खबरि जखने कालीबाबुक बेटा नबोनाथकेँ लगलनि तँ ओ तुरत अमेरिकासँ अपना गाम आपस आबि गेलाह। गाम आबि ओ कालीबाबुक हालत देखलनि। ओ अपना संग कालीबाबूकेँ अमेरिका लऽ जेबाक तैयारी कएलनि। पहिने तँ कालीबाबू तैयारे नहि होइत छलाह मुदा बुझा-सुझाकए नबो तैयार केलनि। नबो तँ चाहैत छलाह जे माइयो संग चलए। ओ मुदा एक्कहि ठाम कहि देलखिन जे- ‘‘हमरा लऽ जेबाक जिद्द करबह तँ हम माहुर खा लेब। हम बिलेँत जा कऽ एको दिन जीबि नहि सकै छी।’’ सभ कागज-पत्तर तैयार कऽ नबो अपन पिताक संग अमेरिका जेबाक तैयारीपर छलाह। टोल-पड़ोसक लोकक कहब छलै जे- ’’आब बेकारे बुढ़ाकेँ लऽ जेबहुन। आब अबस्थो भेलनि। साठि टपि गेलनि तँ आब की !’’ कालीबाबुक छोट भाए तँ रुष्ट भऽ कऽ एतेक तक कहि देने छलखिन जे- ‘‘अमेरिकासँ हमर भाए-साहेब घुमि कऽ औताह से उमेद त्यागिये कऽ लथु।’’ इंजीनियर नबोनाथ सभकेँ बुझेबाक प्रयास करैत छलाह। माइ पर्यन्त सदिखन कनैत रहैत छलीह। कालीबाबू चुप्पचाप सभटा तमाशा देखैत छलाह। नबोनाथक माइ ई कखनो नहि कहैत छलखिन जे बाबूकेँ नै लऽ जाहून। हुनका एहि बातक विश्वास छलनि जे कालीबाबू अमेरिका जा कऽ ठीक भऽ जेताह। जेना-तेना इंजीनियर साहेब कालीबाबूकेँ लऽ कऽ अमेरिका चल गेलाह। साल भरि बीत गेल अछि। एहि बीचमे रंग-बिरंगक समाचार आएल गेल। आइ वर्ष दिनपर कालीबाबू आपस आबि रहल छथि। कालीबाबूकेँ नबका हार्ट लगाओल गेलनिहेँ, से सभकेँ बुझल छैक। सबहक मोनमे विभिन्न तरहक जिज्ञासा छैक। कियो कहै जे- ‘‘अमेरिका जए कऽ की भेलनि ! रोगीक रोगिये रहि गेलाह ! कहाँदन दोसराक हार्ट लगाओल गेलनिहेँ।’’ ‘‘आब तँ आर अपस्थक भऽ गेल हेताह। अनेरे बुढ़ारीमे गंजन। कहू तँ बेकारे ने चीड़-फाड़ करौलनि।’’ समए बितैत कतेक देरी। चारि बाजि गेल। बारह बजे पटनामे हवाइ जहाज अएबाक समए छलै। पटनासँ अएबामे बेसीसँ बेसी चारि घंटा। आब जइ घड़ी जे क्षण ने अएलाह। सड़कपर अबैत सभ गाड़ीकेँ सभ ठिकियबैत छल। ‘‘यैह आबिये गेलाह।’’ ....मुदा ओ गाड़ी सुर्र...र्र.............दऽ आगाँ बढ़ि गेल। कालीबाबुक दलानसँ कनिके दूर चौराहा छलै। चौराहापर विशाल पिपरक गाछ आ सड़कक काते-कात चाह-पानक दोकान। गाछक छाँहमे बैसल बच्चा किशोर आ बुढ़-बुढ़ानुस तँ सहजहिँ। खास कऽ सभकेँ कालीबाबुक प्रति बेसिये जिज्ञासा छलनि। ‘‘केहेन भेल हेताह? साफे बदलि गेल हेताह कि ओहने हेताह! ककरो चिन्हबो करताह कि नै?’’ ‘‘जे जत्तहि सुनलक आगवानीमे पहुँचि गेल। कालीबाबुक दरवज्जापर एखनो भम्ह पड़ैत छनि मुदा एतए भीड़ जूटल अछि। पुरुष-पातकेँ गामपर नै रहने यैह दशा होइत छैक। भरि ठेहुन कऽ घास जनमि गेल छनि। सभ अही बातक चर्च करैत छल। मोन मुदा सबहक टाँगल छलै पच्छिम भरसँ आबएबला चारिपहिया वाहनपर। कालीबाबु प्राथमिक विद्यालयमे शिक्षक पदसँ रिटायर भेल छलाह। ठेंठ देहाती लोक। कोनो आधुनिकताक हवा नहि लागल छलनि। ओ वर्ष दिन अमेरिकामे कोना रहल हेताह। सभ यैह बात सोचैत छल। नबोक माइ कोनटा परसँ हुल्की मारि जाइत छलीह। ......यैह, लालरंगक चारिपहिया वाहन आबि कऽ रुकल। पीपर तरक भीड़ कालीबाबुुक दरवज्जापर पहुँचल। कियो दौड़ैत, कियो झटकैत आ कियो घिसियाइत। गाड़ीक आगाँक गेट खुजल। इंजीनियर नबोनाथ उतरलाह। आँखि परक करिया चश्माकेँ माथपर चढ़बैत हाथ जोड़ि सभकेँ प्रणाम केलनि आ पछिला गेट खोललनि। भीड़मे जूटल वृद्ध सभकेँ जेना साँस रुकि गेल छलनि। गेट खूजल.....। ..........अचरज! भारी अचरज!! कालीबाबू सूट-बूट पहिरने छलाह। करिया जिन्स आ लाल रंगक फोटो बनल टी शर्ट। आँखिपर करिया चश्मा। बेस चिक्कन-चाक्कन मूँह-कान। खूब निरोग। हाथमे गिटार लेने उतरलाह। बुढ़ सभ देखि कऽ अचरजमे पड़ि गेलाह। ‘‘देखहक हौ, ई की छनि कालीबाबूकेँ?’’ ‘‘सारंगी लेलनिहेँ।’’ ‘‘गुदरिया भऽ गेलाह-ए की?’’ ‘‘वाह रे वाह! यैह भेलै बुढ़ारीमे घी ढारी।’’ इंजीनियर साहेब टिका-टिप्पणी सुनलनि। ओ हँसैत बजलाह- ‘‘बाबू जीकेँ अस्पतालमे पड़ल-पड़ल अकच्छ लगैत छलनि। असलमे डाॅक्टर हिना पुछलखिन जे आहाँकेँ सभसँ बेसी रुचि कथीमे आछि? संगीत पढ़ाइमे आकि आन कोनो काजमे! बाबूजी कहलखिन- ‘‘रंगीतमे। सेहो संगीत गाबए आ बजाबएमे। गाएब तँ मना छनि मुदा बजेबाक लेल गिटार डाॅक्टर देबाक अनुमति देलनि।’’ एतबा कालमे तँ कालीबाबू एक हाथमे गिटार लेने आ दोसर हाथ माथमे सटबैत नमस्कार केलनि। किछु बुढ़ हँसि कऽ मूँह घुमा लेलनि आ हँसैत नजरिसँ नजरि मिलबैत रहलाह। कालीबाबू डेगाडेगी दैत नाचए लगलाह आ गिटारपर बेसुरा टुम टाम करए लगलाह। राजधर बुढ़ाकेँ नै रहल गेलनि। ओ व्यंग्य करैत बजलाह- ‘‘ई तँ कीदन भऽ गेलाह हौ इंजीनियर। चौबे चलला छब्बे बनए आ दुब्बे बनल अएलाह। अँइ हौ, ई तँ काली बताह भऽ गेलह-ए?’’ इंजीनियर साहेब सहज भऽ बजलाह- ‘‘असलमे बाबा, ओतुक्का तँ एहने माहौल छै किने।’’ ‘‘हैइ, किछु रहौ। ई तँ साफे पगलेठ जकाँ करै छै। जीवन भरि एतए रहलै तँ किछु नै आ एक बर्खमे ओतुक्का सबार भऽ जेतै?’’ गाड़ीबला सामान सभ उतारि कऽ विदा भऽ गेल। गाड़ी कनेक आगाँ बढ़ल। कालीबाबू मूँहकेँ गोल करैत सीटी बजबैत ड्राइवरकेँ बाॅइ.....बाॅइ केलनि। कोनटापर ठाढ़ भेल अपन पत्नीकेँ जखने देखलनि कि फेर मूँह चुकरियबैत सीटी बजौलनि.......‘हू......हूँ.......उ..... ’’ ’ओ बेचारी लजाइत कोनटापर सँ पड़ेेलीह। लोक सभ तमाशा देखि अपना घर दिस कऽ विदा होबए लागल। कालीबाबू फेर ओहिना सीटी बजबैत हाथ हिलबैत रहलाह। भीड़ तँ उसरि गेल मुदा लोकक मोनमे चैन नहि भेलै। एतए ओतए सगरो कालियेबाबुक चर्च। कियो बताह कहए तँ कियो घताह। एक्के बरखमे लोक एना कऽ बदलतै। ओहिठाम तँ हुनकर बेटो छनि। ओ तँ दसो सालसँ अमेरिकामे रहए छै। कहाँ कोनो चालि-ढालि बदललैए ! राजधर बुढ़ा अपना मंडलमे घोषणा करैत बजलाह- ‘‘नबो इंजीनियरकेँ नीकक काज होइ तँ बापकेँ कोनो माथाबला डाॅक्टरसँ देखबौक।’’ रंग-विरंगक टिका-टिप्पणी होइत रहल। देखलाहा दृश्य राति भरि लोकक सोझाँ ओहिना नचैत रहलै। कथीलए ककरो निन्नो हेतइ। कालीबाबुक रातिक निन्न तँ अमेरिकेमे छुटि गेलनि। ओ राति भरि कछमछ करैत आ गिटारकेँ टुनटुनबैत रहि गेलाह। भोरे-भोरे कालीबाबुक दलानक सोझाँमे फेर भीड़ जुटि गेल। एहन अनर्गल काज काली बाबुक नै होइतनि जँ माथ ठीक रहितनि। ओ अपना कहलमे नै रहलाह। सबहक निष्कर्ष एक्कहिटा। गर्मीक समए छलै। कालीबाबू भोरे-भोरे गंजी आ ठेहुन धरिक पैंट पहिरने, डाँड़ झुकलाहा सन अवस्थामे, माथक केश मेहदीसँ राँगल। ओ चौकीपर ठाढ़ गिटार बजेबामे अपसियाँत छलाह। मूँहक आकृति रंग-विरंगक भऽ रहल छलनि। गिटारक अवाज साफे बेसुरा। एहन उन्मत्त भऽ बजेनाइ नहि देखल-ए। देखलासँ कोनो प्रवीण गिटारवादक लगैत छलाह मुदा सुनलापर साफे अनारी। राजधर बुढ़ाकेँ कालीबाबुक बेस चिन्ता छलनि। ओ चिन्तित सन मुद्रामे बजलाह- ‘‘एहेन कोन पागलपन भेलै? कहह तँ जे काली कहियो नचारियो नहि गौलक तकरा ई बजेबाक कोन भूत सवार भऽ गेलइ।’’ नबोनाथ जेम्हरे निकलथि सभ बाबूक हालचाल पुछनि। ‘‘केहन छथि? आब नीक जकाँ रहए छथि कि ओहिना सारंगी लऽ कऽ नचै छथि?’’ कतेक कऽ की जबाब देथिन। सबहक कहब आ अपनो तँ देखिये रहल छलाह। नबो कालीबाबूकेँ मानसिक रोग विशेषज्ञसँ इलाज प्रारंभ केलनि। डाॅक्टर समूचा जाँच-पड़तालसँ मानसिक रोगक लक्षण नहि पौलनि। आब तँ मामला आरो ओझराएल जा रहल छल। इंजीनियर साहेब कऽ टपाक दऽ कहा गेलनि जे- ‘‘असलमे एहन सभ चालि-चलन आ व्यवहार हृदय प्रत्यारोपनक बाद भेलनिहेँ।’’ डाॅक्टर साहेब गंभीर अनुसंधानमे लगलाह। कालीबाबूकेँ जखन-तखन डाॅक्टर ओहिठाम बजाहटि होबए लागल। समए बितैत गेल। साँझक समए रहए। डाॅक्टर नर्सिग होममे मानसिक रोगी सभ भरल छलइ। रंग-विरंगक उटपटाँग हरकैत सभ भऽ रहल छलै। डाॅक्टर साहेब गंभीर भेल कुर्सीपर बैसल छलाह आ टेबुलपर राखल कागज सभकेँ उनटबैत छलाह। सामनेक कुर्सीपर कालीबाबू उत्सुक सन मुद्रामे बैसल छलाह। आ बामा कात इंजीनियर नबोनाथ चौंकल सन मुद्रामे छलाह। डाॅक्टर की कहथिन की नइ! डाॅक्टर साहेब सभ कागजकेँ पसारैत अपन लैप-टापकेँ आसस्तेसँ दबाबए लगलाह- ‘‘इंजीनियर साहेब, हम एहि केसक गंभीर अनुसंधान केलहुँ अछि संगहि सभटा सबूत जमा केलहुँ अछि।’’ इंजीनियर साहेब चौचंग भेलाह। ‘‘अहाँक पिताजीकेँ जे हृदय प्रत्यारोपित कैल गेल ओ वस्तुतः एकटा एक्कैस वर्षक मशहुर पाॅप गायकक हृदय छैक। ओ बेचारा एकटा दुर्घटनामे मारल गेल आ ओकर दान कएल हृदय आइ अहाँक पिताकेँ जीवन देने छनि।’’ ‘‘मुदा’’- इंजीनियर साहेब उत्साहमे बजलाह। - ‘‘हँ, इंजीनियर साहेब। कोशिकामे स्वभावक याददाश्त रहैत छैक।...... आ यैह कारण अछि जे ई रहि-रहि कऽ संगीतक पाछाँ बेहाल भऽ उठै छथि। एहि तथ्यकेँ युनिवर्सिटी आॅफ एरिजोना सेहो सिद्ध करैत अछि। ई युनिवर्सिटी अंग प्रत्यारोपनक कतेको मामिलापर शोध कऽ चुकल अछि।’’ डाॅक्टर साहेब आँगुरसँ लैपटाॅपक स्क्रीन दिस इशारा करैत बजलाह- ‘‘हे, देखियौ ने ! आब कोनो काज कठिन छैक? अहीठाम बैसले-बैसले सभटा शोधक जानकारी लऽ लिअ।’’ इंजीनियर साहेब झुकि कऽ लैपटाॅप दिशि तकैत बजलाह- ‘‘एकर मतलब आब बाबूजी अहिना रहि जेता?’’ डाॅक्टर हँमे मूड़ी डोलबैत बजलाह- ‘‘हूँ! कलाकारक जुआनी अवस्था छलैक ने! ओ तँ औनाहटि उचिते छैक।’’ कालीबाबू पीठपर टाँगल गिटार उतारलनि। खोलसँ बहार केलनि आ थैया-थैया...... दिग् दिग थैयाा करैत गिटार बजेबामे लीन भऽ गेलाह। रामभरोस कापडि भ्रमर एहि बेर सातम् अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलन काठमाण्‍डूमे हयत भारतक सम्‍विधानक आठम् अनुसूचिमे मैथिलीके सामेल करबाक तिथि २२ दिसम्‍वरकें स्‍मरणीय बनएबाक हेतु डा. बैद्यनाथ चौधरी बैजू विद्यापति सेवासंस्‍थानक अमलाक संग अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलनक रुपमे प्रत्‍येक वर्ष ताही तिथिकें मनबैत रहलाह अछि । ओहि सभ सम्‍मेलनमे दू चारि गोटे नेपालक प्रतिनिधि सहभागी भ अन्‍तराष्‍ट्रिय स्‍वरुप प्रदान करैत आएल अछि । एहु बेर ई सम्‍मेलन आन्‍ध्र प्रदेशक चित्तुर जिल्‍ला अन्‍तरगतक तिरुपतिमे आयोजित छल । संस्‍कृत विश्‍वविद्यालयक डीन झा जकि सहयोगे आयोजना होबा बला उक्त सम्‍मेलनमे वैजू बाबूक सभ तामझाम आमंत्रित छल । पहिने ई आयोजन विश्‍वविद्यालय परिसरमे सम्‍पन्‍न होइत, मुदा आन्‍ध्रप्रदेशमे चलैत तेलंगाना आन्‍दोलनक कारणें ई सम्‍मेलन तिरुपतिसं १० कि.मि. दक्षिण ब्रम्‍हर्षि आश्रममे सम्‍पन्‍न करबाक नेयार कएल गेल । ओत्तहि आवास, भोजन एवं कार्यक्रम स्‍थल । परिसर प्राकृतिक छटाक विच रमणीय छल । कार्यक्रम २२ दिसम्‍वर क ३ वजे प्रारंभ भेल । उद्घाटन कएलनि नेपालक सभासद् यदुवंश झा, प्रमुख अतिथि छलाह विश्‍वविद्यालयक रजिष्‍टार । विशिष्‍ट अतिथिमे दरिभंगाक विधायक सरावगी सहित पंक्ति लेखक सेहो रहथि । जेनाकि वैजूजीक सभ सम्‍मेलनमे होइत अछि कार्यक्रम पूर्व निर्धारित नहि छल । तत्‍काल अनुहार देखि बनाओल गेल हुनक कार्यक्रमक तीनटा चरण हेाइछ – पहिल शुभारंभ आ सम्‍मान, दोसर भाषण–भुषण आ तेसर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम । एही तरहें एहु कार्यक्रममे सम्‍मान कएल गेल । हमरा लेखें दू गोट सम्‍मान महत्‍वपूर्ण छल – डा. प्रफुल्‍ल कुमार मौन आ अयोध्‍यानाथ चौधरीक । सभासद यदुवंशजीक सम्‍मान औपचारिक छल । कार्यक्रमक शुरुआतेमे एहि बेर अगिला सम्‍मेलन काठमाण्‍डूमे हयत से बात चर्चामे छल । दरिभंगा–जनकपुर आवतजावत कएनिहार समदिया सभ एकर वीडा–पान पूर्वेमे उठा लेने छलाह आ काठमाण्‍डू सम्‍मेलनक हेतु वाह–वाही लुटबाक आत्‍मरति करब शुरु क देने छलाह । ई बात डा. बैजूक महा सचिवीय भाषणमे प्रकट भेलै जकर कडा प्रतिवाद पंक्ति लेखक अपन भाषणमे कएलक । अन्‍तराष्‍ट्रिय सम्‍मेलनक आयोजन खेल नहि छिऐक । डा. बैजूक कएल–धएल पर सपरानी तीर्थयात्रामे जाएब एक बात छैं, आमंत्रित अतिथि लोकनिकें उचित सम्‍मानक संग कार्यक्रमके औचित्‍यपूर्ण बनाएब दोसर बात । हमर दृढ धारणा छल – जाहि तरहें बैजूबाबू कार्यक्रमक आयोजन अस्‍त व्‍यस्‍त हालतिमे करैत छथि तेहन काठमाण्‍डू मे नहि हयत ।मंचसं हम सम्‍पूर्ण श्रोता, दर्शक सभक आगां बाजल छलहुं–काठमाण्‍डूमे सातम् अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलन हयत मुदा हमरा शर्त पर ।  अन्‍तराष्‍ट्रिय जिज्ञाशाक केन्‍द्रविन्‍दु काठमाण्‍डूमे महज भोज भातक हेतु भेडियाधसान उपस्‍थिति किन्‍नहुं नहि हयत । निर्धारित प्रतिनिधि, परिचयपत्र सहित सहभागी कराओल जएताह आ कार्यक्रममे स्‍थानीय कलाकार सभक सेहो उल्‍लेख्‍य उपस्‍थिति रहत । ई बात डा. बैजू आ काठमाण्‍डू आयोजक विच पूर्व निर्धारित रहत, जाहिमे फेरबदल संभव नहि । कहबाक जरुरति नहि हमर जानकारीसं वैजू बाबूक कैम्‍पमे निफिकिर भेाजन भात आ नंींदक आनन्‍दलेनिहार विच हडकम्‍प शुरु भ गेलै । बहुतोकें वुझएलै–काठमाण्‍डूक सम्‍मेलन आ पशुपतिक दर्शन कठिन भ गेल । यद्यपि वैजू बाबू मंचसं हमर शर्त आ प्रस्‍तावकें स्‍वीकार कएलनि मुदा अपन फौजकें तोष भरोस देबाक हेतु पशुपति दर्शनक युक्तिक आश्‍वासन दैत रहलाह । काठमाण्‍डू सम्‍मेलनक विशिष्‍ट पक्ष की ? जे केओ अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलन बैजू संस्‍करणमे गेल हयताह ओ शुरु सं अन्‍त धरि सहभागिताक अव्‍यवस्‍था अवश्‍य देखने हयताह । कार्यक्रममे सम्‍मान प्रदान आ सांस्‍कृतिक कार्यक्रम मात्र आकर्षक होइछ । काठमाण्‍डू सम्‍मेलन निर्धारित प्रतिनिधिक संग विशिष्‍ट विद्वानक सहभागितामे हयत । जाहिमे सरिपहुं विदेशी विद्वान सभकें समावेश कएल जाएत । उद्घाटन राष्‍ट्रपति वा प्रधानमंत्रीक हाथें हो से आयोजक चाहत, जे असंभवो नहि छैक । तओं कार्यक्रमक गरिमा बढत । सम्‍मान देबाक हेतु एकटा विशेषज्ञ कमिटी गठन हयत जे विभिन्‍न भाषामे काज करितो मैथिली वा मातृभाषा प्रति विशेष लगावकें प्राथमिकतामे राखि सम्‍मानक हकदार निर्धारित करत । सम्‍मानमे एकटा छपल कागजक टुकडी खुल्‍ला नहि ताम्रपत्रमे लिखित आकर्षक फ्रेम लागल रहत । प्रतीक चिन्‍ह जानकी मंदिर, पशुपतिनाथ, स्‍वयंभूक सीसा जडित मौडल हयत जाहिमे पाग, दुपट्टा रहबे करत । औचित्‍यपूर्ण कार्यक्रमक हेतु एकटा गंभीर प्रकृतिक विचार गोष्‍ठीक आयोजन हयत, जत्त विभिन्‍न विषयमे लगभग तीन चारि घंटाक छलफल चलाओल जाएत । गोष्‍ठीक एकटा केन्‍द्रिय विषय निर्धारित कएल जाएत । एहि गोष्‍ठीमे विभिन्‍न भाषा–भाषी विद्वान सभकें सहभागिता सुनिश्‍चित कएल जाएत । तहिना मैथिलीक स्‍थापित विद्वान, साहित्‍यकार सभकें सहभागी कराओल जाएत । एकटा आकर्षक कवि गोष्‍ठीक आयोजन हयतैक, जाहिमे पठित कविता सभके सम्‍पादन क पुस्‍तकाकार प्रकाशनक योजना आयोजक के छन्‍हि । सांस्‍कृतिक कार्यक्रममे डा. बैजूक हेंड़मे सामिल बहुतो महत्‍वपूर्ण कलाकार मध्‍ये उत्‍कृष्‍टकें छानि आमंत्रित कएल जएतनि । सम्‍मेलनक सांस्‍कृतिक प्रभारी कमलाकान्‍त जी सं परामर्श क ई गुरुत्तर काज सम्‍पन्‍न कल जाएत । नेपालोक विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक कलाकार सभकें अवसर उपलव्‍ध कराओल जएबाक कारणें सिमित समयमे सिमित कलाकारक प्रस्‍तुति आयोजक लोकनिकें बाध्‍यता हयतनि । एहि तरहें काठमाण्‍डू सम्‍मेलन आन समयक सम्‍मेलन सं किछु फूट आ सन्‍देशमूलक हयत । काठमाण्‍डू अन्‍तराष्‍ट्रिय मिडियाक चहल–पहल बला ठाम हयबाक कारणें जत्त कार्यक्रम पूर्ण कभरेज पाओत ओत्तहि ताहिमे पूस्‍तुत प्रत्‍येक गतिविधि संयमित, व्‍यवस्‍थित आ आकर्षक रखबाक जिम्‍मेवारी आयोजक लोकनिकें हयतनि । छठ्म अन्‍तराष्‍ट्रिय मैथिली सम्‍मेलनक मंच सं भेल एहि तरहक उद्घोषकें सभ पक्ष स्‍वागत कएलक अछि । विश्‍वविद्यालयक कुलपति तत्‍काले अएबाक स्‍वीकृति प्रदान कएलनि अछि तं चेन्‍नईक भाइ मणिकान्‍त दास, कलकत्ताक कामदेव झा, अशोक, मुम्‍वईक सुशील झा दिल्‍लीक गंगेश गुंजन–काठमाण्‍डू सम्‍मेलनक आकर्षण हयताह । मैथिली अनुरागी लाखों सहृदयी सभक संग हम आयोजन पक्ष सेहो एहि सुखद क्षणक प्रतिक्षामे छी । तखन एकरा सफल बनएबालेल सभ पक्षक सभ तरहें सहयोग जरुरी छैक । कोनो जिज्ञासा क हेतु हमर निम्‍न सम्‍पर्क पर अवश्‍य खोजवीन क सकैछी । अध्‍यक्ष ः साझा प्रकाशन, पुलचोक, ललितपुर ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:राधा १७म खेप ३.३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.४.१.रामभरोस कापडि भ्रमर-गीत २.रमण कुमार सिंह- दिल्लीमे... ३.५.१.राजदेव मंडल- सिर बिहून धड़ २.कालीनाथ ठाकुर-एक अभिशाप बापक पाप ३.६.१.सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी- आह! जाड चलि गेल! २.दयाकान्त-ई छी मैथिल के पहचान ३.७.१.विनीत उत्पल-पुष्कर २मनीष झा "बौआभाई"- ऋतुपति बसंत (कविता)- ३.८.१.मो. गुल हसन-सभटा चौपट्ट भऽ गेल २.मनोज कुमार मंडल-बहीन३.कल्पना शरण-मिथिलाक तीला संकराति स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! माॅथ पर धान !!

की लचकल अछरल पछरल डाॅड़, की मचकल आॅचर गछरल फाॅड़, चालि उत्तान छै, माॅथ पर धान छै ।।

बढ़ै छै रूनरून रूनरून शीस, पड़ै छै दीठि पायलक दीस, कंठ मे गान छै । माॅथ पर धान छै ।।

की चमकल बुट्टी - बुट्टी देह, ठोर पर हासक पातर रेह, गाल तर पान छै । माॅथ पर धान छै ।।

आॅखि पर लागल लाजक बोझ, घोघ सॅ ताकय सोझे सोझ, लक्ष्य खरिहान छै । माॅथ पर धान छै ।।

भक्त रहलै मंदिर केॅ झोलि, गेलै दू - दू शिव आसन डोलि, अभय वरदान छै, माॅथ पर धान छै ।

वियोगक वीतल कारी रैन, जुड़ायल आइ मुड़ायल नैन, गगन मे चान छै, माॅथ पर धान छै ।।

काटि कऽ माल भोग केर खेत, बान्हि कऽ बोझ चललि समवेत, गमागम प्राण छै । माॅथ पर धान छै ।।

वदन पर अनुचित अलुपित दृष्टि, चरण पर करू सिनेहक दृष्टि एतय भगवान छै । माॅथ पर धान छै ।।

हे चरऽरक चंडी धऽरक देवि, देश बढ़ि रहल अहाॅ केॅ सेवि, मोॅछ पर शान छै । माॅथ पर धान छै ।।

!! बुढ़ारी मे घीढ़ारी !!

बुढ़ारी मे ई घी की - एकरा कहियौ डालडा ढ़ारी ।। वरद जुआ कऽ हाॅफि रहल छथि - चमेर लेट्ट गाड़ी ।।

बुनलनि गहुमक लेट भेराइटी, दऽ सकलाह खाद नहि डाइटी, दाना बेगाना भेलनि, थे्रसर पर चैकल नारी ।।

मझिनी मे जलपान करै छथि, भरलो थार जियान करै छथि, उठि गेला चटनी चटैत, पड़ले तरूआ तरकारी ।।

हे देखू अकरहर करै छथि, पेंचर ट्यूब मे हवा भरै छथि, जोलही धोती केर आसन पर, पसरल सीफेन साड़ी ।।

बऽर सऽख सॅ दाॅत लगौलनि, खसि पड़लनि जहिना मुॅह बौलनि, कनियाॅ ओडÛठ़लि दरवज्जा पर, अपने बैसल बारी ।।

टीशन पर रोमांस करै छथि, हीरो सबहक कान कटै छथि, कारी केश खिजाबी ताहि पर - उगलनि उज्जर दाढ़ी ।। !! सारिक पत्र पाहुनक नाम !!

फोटो अहॅक टडÛबौने छी मन मे, हऽम छोट सारि अहॅक औ पाहुन, हमरे शपथ अहाॅ अबियौ फागुन मे ।।

जहिया सॅ गेलहुॅ हमर नीन लेलहुॅ, ओझा अहाॅ पर सुनू मरि गेलहुॅ, हमरा तऽ कंठी अछि अपने मॅछखौका औ, झोरे चटयलहुॅ कियक नेनपन मे । फोटो .............................................. ।।

साॅझे दैया लग परिते निनयलहुॅ, सपने मे झटकल अहाॅ चलि अयलहुॅ, ओझा बुझि धयलहुॅ जहिना हम बहिना केॅ, ओ हॅसलि हम दुःगंजन मे । फोटो .............................................. ।।

चाही ने हमरा सिनुरो आ चूड़ी, इच्छा अछि एक्के बहुत मजबूरी, एखन अहाॅ नेह क्षीर दारू बहिना केॅ, हमर मिलन होयत अगिले जनम मे फोटो .............................................. ।। !! राम बिना अवधपुरी !!

विलपि रहल वन उपवन भवन निःपरान गय, राम बिना अवधपुरी लागय मसान गय ।

पतनी चुड़ैल भेलि पति परेत सन सूझै, बेटा वैताल माय जोगिनी वनलि बूझै कोयलि कुलवधू आइ डाकिनी समान गय, राम बिना .......................................... ।।

शैल युता काली आ शंकर भैरव बनला, तांडव नत्र्तकक लेल, सोझे सरयू फनला, डमडम डमरू त्रिशूल चमकय असमान गय । राम बिना .......................................... ।।

धऽर धऽर मे विलाप द्वारि - द्वारि हहाकार, बूढ़क की बात हाय नेनो तजलक अहार, अप्पन ने ककरो क्यो सभक सऽभ आन गय । राम बिना .......................................... ।।

शीतल अछि आगि पानि अदहन भऽ उधिएलै, काॅट भेल कोमल आ फूले गड़ि - गड़ि गेलै, झडकावै चानिनियाॅ जड़ि रहलै चान गय । राम बिना .......................................... ।। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । राधा १७म खेप एना  किएक बेशी अनुभव आब अनचिन्हार लगइये एना किएक लोको सब, सखि पर्यंत बुझाइत रहैए आन कौखन तं ई घरो-आँगन,टोलक सब गाछ-बृक्ष बाट-घाट,गाय गोरू फूल पात, इनार | सब किछु अनुभव होइत अछि दूर दूरस्तक बस्तु, तेहल्ला | कौखन क' कोना बुझाय लागलय आन गाम आब अपनहिं ई गाम | बेशी लोक देखितहिं करय लागैत बुझाय उपहास एना कोना मोन हमर बन्हा गेलय अपनहि लाचारिक ठाठ? मामूली मूक मालजाल जकां नियतिक सोझां मे निहुरल जीवित अछि देह-प्राण यद्यपि ई तैयो बुझाय लागय निष्प्राण | कौखन तं सबटा जे एखनहिं छल सोझां मे प्रत्यक्ष अर्थवान सौंसे घर एक संग मिझा गेल डिबिया जकां अकस्मात भ' जाइछ अन्हार सबटा व्यर्थ | सब अनुभव तकर गतिविधि बेकार से व्यर्थ मन-भार क' दैत अछि नवे तरह सं व्याकुल सबटा सब तरहक जतबा जे बुधि अपन लगा-लगा थाकि जाइत अछि  इच्छा| सबटा जे अनसोहांत, अनिच्छित-अनपेक्षित परिस्थिति सब मे सं किछु ने किछु अंकुराय लगैत बुझाय लगइये दैत पेंपी, एक क्षण-दू क्षण जतबा धरि संभव ध्यान देब - से लगले ओ सबटा अंकुर सब अपन अपन दुपत्ति-तिनपत्ती बनि माटि पर पनगैत सघन जीवन स्पंदित वनस्पति भ' हरियर-हरियर लहलहाईत  बुझाय लागैत अछि  I सौंसे परिवेशक एहि एहि मनक सबटा व्यर्थ बोध , स्वयं सेहो जेना अपना स्वभावें अंकुराय लगैत अछि - देखितहिं देखैत बन' लागय अन्न,फल-फूलक से छोट-पैघ गाछ रमनगर, सभ टा अपना -अपना रंगक आशाक  हरियरीक आभास सद्यः अभिभूत करैत, क' दैतछि देखबा लेल बाध्य | देखबा लेल माने ओकर परिचर्या -सेवा .... अनायास तकैत छी घैल पानि, सभ कें पटब' मे लगैत छी| सभ कें जल पिया-पिया जखन होइ छी तृप्त तखन अपनहु देब' लगैत अछि कंठ मे त्रास पियासक उत्कट इच्छा ... अहा ! कंठगत होइत एको आंजुर ज'ल !.. हा कृष्ण ! कत' छथि ? मुदा जँ पीयब तं श्रीकृष्णेक हाथें. खाहे छुटि ने जाओ ई प्राण . देखिअनि आखिर कहिया धरि नहि लैत छथि हमर कुशल-समाचार कहिया धरि सहैत रहैत छथि- हमर पियास शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! आकुल जननी !! (बाल साहित्य)

सूति रहू हमर लाल, अर्द्ध रैनि बीतल । अहॅक अविरल नयन सॅ आॅचर तीतल ।।

घोंटि अछिंजल काटि रहलहुॅ अछि जीवन, तात दर्शनक आश छिन्न किएल अरपन, क्षीर बिनु दुहू वक्ष शुष्क पड़ल । सूति रहू ....................................... ।।

कोन सियाही सॅ लिखल विधना हमर कपार ? अपने प्रवास गेलनि छोड़ि हमरा व्यथा धार, चानन सन नेनाक हिय, भूख सॅ कानल । सूति रहू ....................................... ।।

हुनके की दोष दिअऽ स्नेहक ओ दिव्यमूर्ति, कायादीन विद्याविहीन करथि पंचजनक पूर्ति, अहॅक अश्रु मातृ नयन शोणित भरल । सूति रहू ....................................... ।।

कहबनि गौमाता आनू औता फागुन मे कामधेनुक सुधा भरब अहॅक कण-कण मे अहाॅ निन्न हऽम कल्पना मे उड़ल । सूति रहू ....................................... ।।

!! लंका !!

खुरखुर भैया सूट सियौलनि, बतही काकी क हाथ रूमाल ।

अध वयसि चोकटलही भौजी, बाट पसारलि प्रेमाजाल मैथिली कुहरथि पर्णकुटी मे, सूर्पनखा बनली रानी ।

नेना पेट क्षीर विनु आकुल, मोबाइल नचावथि पटरानी ।। अद्र्धांगिंनी नेत्री सॅ कुपित भऽ शंखनाद कयलनि मामा ।

हस्त ऊक लऽ मामी खेहलथिन्ह, फूजल मामा केर पैजामा ।। अपन पुतोहु केॅ झोंकि अन लमे, बनि गेलीह गामक सरपंच । धर्माचार्य देव मंदिर केर, मुदा हृदय भरल परपंच ।।

कतेक घऽर मे सान्हि काटि, शांति समिति केर आव प्रधान । रक्षक छथि चुटकी मे वैसल, कोना बाॅचत अवला केर मान ? विद्यालय केॅ मुॅह नहि देखल, धएने कुरसी शिक्षा सचिव । कुटिल तंत्र केर ईह लीला मे मारल गेलन्हि मूक गरीब ।।

मुंडी इनार मे हुरहुर जनमल, कमीशन लागत दस परसेन्ट । नौकरशाह मोटर मे घूमथि, आॅखि गोगल्स काॅखि मे सेन्ट ।।

सभ काज मे दिऔक भएट, शौच करू वा लघुशंका । रामराज्य केॅ बिसरि जाऊ, आर्यावत्र्त आव सद्यः लंका ।। राजनीति मे अज्ञ - विज्ञ केर, नहि कोनो अछि वर्ग विभेद । अपने पीबथि ताड़ी दारू, मंत्री विभाग मद्य निषेद्य

राग वसंतक गेल जमाना सुनू ब्रितानी विकट संगीत । डंकन कुरथी पाक बनल आ अप्पन वारिक पटुआ तीत ।।

!! होरी !!

हाथ अबीर काॅरव पिचकारी, भाल पर गदरल चाह उमंग । पूरन भैया होरी खेलथि, नव नौतारि सारि केर संग ।। कखनहुॅ डुबकी लैत अधर मे, जुट्टी मे कखनहुॅ हिलकोर । नील, वैंजनी लाल गुलाल सॅ, रंगलनि चम्पा पोरे - पोर ।।

‘टिल्लू’ नयन पर अचरज पसरल, देखि भ्राता केर बसन्ती वुन्न । एखनहुॅ श्रृंगारक आह भरल मुदा - आॅखि अन्हार कान छन्हि सुन्न ।। हऽम पुछलअनि कोना कऽ कयलहुॅ, मधु सॅ उबडुव मधुर प्रबंध । सकल तन अछि बेकार मुदा हम, ध्राण शक्ति सॅ सूॅघल गंध । भौजी लऽ वाढ़नि आ खापड़ि, झाड़ि देलनि भैया केर अंग । कुरता फाटल नयन नोरायल भूतल खसल होरी के रंग ।।

शिव कुमार झा

!! माॅडर्न जमाना !!

नुआ धोती मिल बरहर जनमल, आयल बरमूडा मिनी स्कर्ट । मुन्ना भैया चुनरी ओढ़ू, भौजी पहिरलनि जोलही सर्ट ।।

काकी मरौत काढ़ने बैसलि, कक्का गऽर धरम केर वाना । कदली कनियाक हाथ मे वीयर, आवि गेल माॅडर्न जमाना ।।

भरि दिवसक गणना जौ करवै, बहुआसिनक सात वेरि सतमनि । भरल साॅझ स्वामी आयल छथि, अॅइठार वैसलि लऽ मुॅह मे दतमनि ।।

अस्सी दशक मे माय सॅ मम्मी फेर माॅम आब भेली मम्मा । मायक भ्राता केर नाम की राखब? मामा पिघलि बनला झामा ।।

अपन नेना सॅ वेस पियरगर, संकर झवड़ा चायनीज कुकुर । भुटका - नाथ केॅ छाड़ि घऽर मे टाॅमी संग गेलि अंतःपुर ।।

चरण स्पर्श निर्वांण लेलक आव, छुट्टो कैंचा केॅ भऽगेल वाय । भौजी एकसरि मधुशाला मे भैया सॅ गेलनि मोन अघाय ।।

नेना पच्छिमक बोली उगलै । माॅ मैथिली कोना वजतीह दैया । बात अंगरेजिया माथ घुसल नहि, मुदा करै छथि या ! या ! या !!

तिलकोर मखान नीक नहि लागय, नहि सुस्वादु मकैयक लावा । पाॅपकाॅर्न चाउमीन दलिया लेल, मोॅछ पिजौने बैसलनि वावा ।।

१.रामभरोस कापडि भ्रमर-गीत २.रमण कुमार सिंह- दिल्लीमे... रामभरोस कापडि भ्रमर गीत ओ पवन, झिहिर झिहिर बहैत जाउ छूबि बताउ कने, पिया छथि कत्त ककरा संग वर्षहु गेला भेलन्‍हि, सुधिबुधि किछु ने छैन ! दिन भेल पहाड, दुख भेल जीवनक अंग । निष्‍ठूर समाज चाहे, नोचि नोचि खाइ जेना शेरक भूख बनल जवानीक तरंग जेना चारुभर शिकारी ताकमे वैसल अछि रहल ने कोनो उमंग ! ओ पबन, पिया छथि कत्त ककरा संग !! अधिकारक बात सभ लागुने भेल कखनो नारीक व्‍यथा कथा कमैनीक धंधा एखनो जान जोखिम बनल कत्त धरि घींचब त्‍यागब प्राण वियोगे कन्‍त ! ओ पवन, पिया छथि कत्त ककरा संग !! जानि जानि आगिसं खेली कोना हम शक्ति भरल मुदा तौली कोना हम शील, सुशील मिथिलाकेर ललना पतिक परोक्ष भेल शिथिल तरंग ! ओ पवन, पिया छथि कत्त, ककरा संग !! !!! गीत बाध बोनसं उपर उठियौ करियौ मनके चंगा देश दुनियांके हाल ने जनबै रहब सभ दिन उटंगा अखनो अनके मुंह तकबै कखनो ने भेटत जस, पिया अहां रहलहुं जस के तस । ठीक नीक ने उठब–बैसब कोना वुझबै जीवनक रंग अप्‍पन काज सुतारत सदिखन अहां चास वासमे दंग भुच्‍चर बनि क� आंगन सेबने जीवन तहस–नहस, पिया अहां रहलहुं जस के तस ! बाल बच्‍चा टेल्‍गर होइते पढएबै बोरडिंग नीके पढ़तै लिखतै बढ़का बनतै सभ किछु हयतै ठीके सपना मनमे राखि हम जिलौं भोगलहुं अहांक अजस, पिआ अहां रहलहुं जस के तस ! अहांके बोली कोंढ़ कटैए आबो करु अहां बस, पिया रहलहुं जसके तस ! गीत ऐ चन्‍दा अहां, खोजि पठाउ प्रिय कंत अहींक इजोरियामे गेला निरमोहिया बनल प्रतिक्षा अनन्‍त ! सजल सेज ओगरने सदिखन, हम बैसलि बौरायलि अओताह हृदय लगओताह, मनहिमन अकुलायलि राति–दिनकेर गणना विसरल सुधि वुधि भेल उसरन्‍त ! ऐ चन्‍दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कन्‍त !! लुच्‍चा पबन देह, छुबि–छुबि लसकए काम मोचरुवा हिय, रहि रहि चसकए ठाढ़स बान्‍ह भंग दुखदायी शील, कुल केर अन्‍त, ऐ चन्‍दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कंत !! दुनियां बैरी आंखि गड़ौने, लप–लप जीह करैए आनक चास खएबा अभ्‍यासी, हरिय घास तकैए आबहुं जं अहां भेद नुकएलहुं परतारब दिगदिगन्‍त । ऐ चन्‍दा, अहां खोजि पठाउ प्रिय कंत । अहींक इजोरियामे गेला निरमोहिया बनल प्रतिक्षा अनन्‍त!!! २ रमण कुमार सिंह दिल्ली मे... सालो भरि वसंत रहै छै दिल्ली मे जे चाही सब मोल बिकै छै दिल्ली मे मेट्रो -मल्टीप्लेक्स बने छै दिल्ली मे डेग -डेग पर लोक कनय छै दिल्ली मे गाड़ी बंगला कोठा सोफा दिल्ली मे बाट -बाट पर मौत के तोहफा दिल्ली मे दारू स्मैक गुटका खैनी दिल्ली मे हरपल भागम-भाग बेचैनी दिल्ली मे नवका -नवका बाट बनै छै दिल्ली मे लोकतंत्र के खाट खड़ा छै दिल्ली मे नित नव-नव बाजार बनै छै दिल्ली मे माय -बहिन के लाज लुटे छै दिल्ली मे सालो भर वसंत रहै छै दिल्ली मे जे चाही सब मोल बिके छै दिल्ली मे १.राजदेव मंडल- सिर बिहून धड़ २.कालीनाथ ठाकुर- एक अभिशाप बापक पाप १ राजदेव मंडल सिर बिहून धड़ गौंआ-घरुआ आओर बरियात कियो नहि बुझि रहल अछि बात किएक नहि वर कऽ रहल सिन्‍दूर दान कि कियो कएलक हुनक अपमान बराती सभ तोड़ए तान केहेन अछि ओछहा खानदान बन्‍न भऽ गेल अछि मंगल गान सिनूर लेने ठाढ़ दूल्‍हा भेल अवाक नाचि रहल अछि माथक चाक फानि रहल सभ कातहिं कात कन्‍याकेँ कहाँ अछि माथ सिन्‍दूर कतए देल जाएत देखतहि तँ सभ गोटे पड़ाएत सिर बिहून धड़ बैसल अछि मनमे संशय पैसल अछि नहि अछि सौंथ नहि अछि मांग पीने छह सभ गोटे भांग कियो नहि देखि रहल अछि साइत सिनूर कतए देल जाएत बढ़ल जा रहल अन्‍हरिया राति एक-दोसर दिशि रहल अछि ताकि अकचकाइत गौंआ पुछैत अछि किएक रुसैत अछि दूल्‍हा आर की लेताह ओझा लेखे गाम बताह। २ कालीनाथ ठाकुर एक अभिशाप बापक पाप पण्डितजी दण्डित भेलाह जखनहि कन्या पाँच पूर्व जन्म के कर्म फल, वा विधिक कोनो ई जाँच।

विधिक कोनो ई जाच, यैह चर्चा भरि गामक लाबथु नोट निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक। पनही गेलन्हि खियाय, कतौ नहि बसिलनि गोरा धन्यवाद क पात्र छथि ”कलियुग” के घोडा।

सत, रज, तम, सभ व्यर्थ थीक शिक्षा शील स्वभाव गुण एकहि अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव अवगुण अर्थाभाव भाव नहि अछि गुण रूपक कन्या कारी , गोर , मूर्ख वा दिव्यस्वरूपक। मायक दूध क दाम जोडि गनबओता टाका पुत्र हुनक गामक गौरब से कहलथि काका

बीतल शुद्ध आषाढ के अगहन  वैशाख। पहिल कुलच्छन बुझलनि, जखनहि घुरि अयला सौराठ॥ घुरि अयला सौराठ हाट करथु बेचारे विधिक लिखल के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥ छोरलनि बीस हजार , लोभ मे तीस हजारक। कए  रहला गणना जोतखी, एहि साल बजारक

सुनलनि जखनि सुषेण सँ , दहेज निरोधी न्यूज तखनहि जेना दिमाग केर ढिबरी भय गेल फ्यूज ढिबरी भय गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू घटकैती के करत घटक केर हाल न सूनू बर क हाथ कनिया बरियातीक हाथ हथकड, सरियाी सभ करथु दौडबडहा कचहरी।

लूटन झा त लुटि गेला कए दूई कन्या दान मोछ पिजौनहि रहि गेलाह करता की बरदान? करता की बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक उजरल बरदक हाट प्रथम ई बात कचोटक घटक राज केर संग करथु बरु तीर्थयात्रा करथु मन्त्रणा गुप्त मुक्त भय सफल सुयात्रा

जाति जनौ बाँचत कोना? कुल मर्यादा मान अन्तर्जाति ववाह में घोषित नकद ईनाम घोषित नकद ईनाम संग सर्विस सरकारी कहय शास्त्र ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी करथु ग्रहण ककरो कन्या हो डोम चमारक मन डोललनि पण्डित जी के जे उच्च विचारक

भेल मनन मन्थन बहुत, ई समाज केर पाप!! की दहेज बन्ले रहत समाजक अभिशाप!! समाजक अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक। बेचि आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक सिद्धान्त नहि व्यवहारहु केर करू प्रदर्शन तखनहि त भय सकत रोग उन्मूलन॥ १.सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी- आह! जाड चलि गेल! २.दयाकान्त-ई छी मैथिल के पहचान १ सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी आह! जाड चलि गेल! कहलखिन्ह बाबू साहब त हुनक आह में देखलहुं कतेक रास दुख कतेक रास अफसोस आ ओहि संग पसरल बोतल सभ, बसिया थारी जाहिमे कांट-कूश ओंघरायल कहि रहल छल कथा जाडक आह! जाड चलि गेल। बाबू साहब कहलथिन्ह जाड सन सोहनगर आर कुनो मौसम नहिं घरे रहू सभ किछु अगा पाछा घरक आगामे घूर घरमे घुरक सामान बस! बाबू साहब के की चाही। दिन जखन आंखि बन्न कऽलैत छलैक आ चढैत रातिमे ठिठुरन तेज भय जाइत छलैक तऽ बाबू साहब गरमाए लगैत छलाह आ जा धरि आंखि फुजल रहैत छलनि देह गरमायल रहैल छलनि आ दिन कऽ सेहो ओहने हवा-बसात ओहने करियौन मेघ त दिन सेहो घरमे गरमायल रहैत छलैक मुदा आई भोरे जखन आंखि फुजलैन तऽ नुकायल सूरज भक्क दऽ सुझलैन। आह! जाड चलि गेल। चहकि उठल जकांताक बेटा बेटी आ कनिया तखन काजमे लागल छलथिन्ह जकांताक बेटा सूरज देखिते फुर्र सऽ घर सँ निकलल। माए-बहिन अचरजमे ई छौंडा-एक मास सँ घरमे छल दुबकल। कोना फुर्ती आबि गेलै। आ जकांताक बेटा घर सँ सडक पर आबि दुनू हाथ ऊपर उठा कहि रहल छल आह! जाड चलि गेल। ई जाड ओहि जाड सँ बेसी कनकनी वला छल। दिन-राति एक्के धस स अनवरत बहैत बसात। तीरो सं चोख सोझे जेना छाती- पेट, पएर सँ होइत। पंजरामे धंसि जाइत छलैक बाबू साहबक दरवज्जा पर अनवरत सुलगैत घूर दूरे सं देखि संतोष करऽ पडैत छलैक। जारनि सँ चूल्हि जडत घूरक ले कतऽ सँ आयत तऽ सांझ पडिते जखन बसात तेज भऽ जाइत छलैक दांत ठिठुरऽ लागैत छलैक जकांताक बेटा फलालैन केर फाटल गंजी सँ उघरल देह केँ झांपक प्रयास करैत चुल्हाक आगामे बैसल मायक पांजडि सँ सटि जाइत छल। पटिया पर देह के संकोचने आ पटिया ओढने जकांताक परिवार बेढ वाला घरमे एक दोसराके सटने राति काटि लैत छलैक मुदा, जकांताक बेटा अपन बाप सँ कहियो ई पूछबाक साहस नहि केलक जे अतेक जाडे ओ अन्हरोखे दाऊन करऽ किएक चलि जाइत छलैक ओढय वाला पटिया तखन से नहि भेटति छलैक। मुदा आई-सभ खतम किएक तऽ सुनू कहैत अछि जकांताक बेटा आह! जाड चलि गेल। आह! जाड चलि गेल! २ दयाकान्त ई छी मैथिल के पहचान भरि दिन चुन-तम्बाकू खेsता चिबबैत रहताs गुटका, पान जम्हरे देखु थुकैत रहताs मार्केट, ऑफिस हो वा मकान ई छी मैथिल के पहचान

बात-बात पर झगरैत रहताs नहि बजवाक कोनो ठेकान एकबेर दोसर डपिट दैन तs लगताह भिजल बिलारी समान ई छी मैथिल के पहचान

गाम  छोरि परदेश बसै छैथ तखनो नहि दोसर सs मिलान भरि दिन दोसरक निंदा करताs टांग घिचाई मे सत्तत प्रधान ई छी मैथिल के पहचान

मैथिलि बजवा मे परहेज करताs नहि छैन दोसर भाषा के ग्यान कह्बैंन ई शब्द एना बाजु तs कहताs  हम छी कोनो अकान ई छी मैथिल के पहचान

अप्पन मेहनत लगन के बल सs कs लैत छैत कंपनी मे नाम परमोसन कs  बेर मे सदिखन नहि रहैत छैन बाँस सs मिलान ई छी मैथिल के पहचान

सरकारी हो व गैरसरकारी भेटत मैथिल उच्च स्थान कोनो कजाक आस राखब तs नहि होयत पुरा कुनु ठाम ई छी मैथिल के पहचान

सफल प्रत्यासी के लिस्ट मे सब सs आगु मिथिलाधाम हिनक लगन, प्रतिभाक आगु दैत अछि सब दंडप्रणाम ई छी मैथिल के पहचान

नहि मैथिल ककरो सs पाछु पाछु अछि मिथिलाक गाम रहलै हमर भुगोल मे सदिखन जिबछ, कोशी, कमला बालन ई छी मैथिल के पहचान

हमर मैथिलि भाषा सन मिठगर नहि अछि कोनो दोसर ठाम आपस मे सब मैथिलि बाजु चाहे लोक मुनैया कान ई छी मैथिल के पहचान १.विनीत उत्पल-पुष्कर २मनीष झा "बौआभाई"- ऋतुपति बसंत (कविता)- १ विनीत उत्पल 1978- आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। पुष्कर पुष्करक घाटपर बैसल ओहि साँझ पोखरिकेँ निङहारैत लोक-वेदक मुद्राकेँ देखैत वेदपुराण, वाल्मिकी रामायण आ महाभारत मनमे घुमैत एक-एक दृश्य  मनकेँ उमंगित करैत रहैत एहि ठाम ब्रह्म यज्ञ कईने छलाह एहि ठाम भगवान राम पिता दशरथक श्राद्ध कएलन्हि एहि ठाम श्रीकृष्ण दीर्घकाल धरि तपस्यामे लीन छलाह एहि ठाम सुभद्राक अपहरण कऽ अर्जुन विश्राम कएने छलाह चारू दिस अरावलीक पहाड़ सहृदय नाग पर्वतमालाक आंचरमे बावन घाटक ई सरोवर कतेक खिस्सा अपनामे समेटने अछि अगस्त्य, भतृहरि, जमदाग्नि ऋषि विश्वामित्र, कपिल आ कण्व मनीषीक तपस्या आ यज्ञ स्थली अछि ई तीर्थराज पुष्कर जयपुर घाटसँ सूर्यास्तक दृश्य रामानुज संप्रदायक विशाल बैकुंठ मंदिरकेँ तारैत आदि शंकराचार्यकेँ मन पाड़ैत मन प्रफुल्लित आ उद्वेलित भऽ जाइत अछि पुष्करक हवा-बसात,  मंदिर आ घाटक दृश्य गोकुलचंद पारेखक कएल जीर्णोद्धार मंदिर आ आदि शंकराचार्यक स्थापित कएल ब्रह्माजीक मूरूत एतए आबए बला लोककेँ मोन पाड़ैत अछि कहबी ‘सारे तीरथ बार-बार, पुष्कर तीरथ एक बार’ २. मनीष झा "बौआभाई" ऋतुपति बसंत (कविता)- स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत वर्णनीय छी अहाँ अनंत स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत नवपल्लवक संग सुशोभित मज्जर देखि होइत मनमोहित बाट बटोही सहजहि आकर्षित गाबथि वर्णन ऋषि-मुनि-संत स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत वीणा वादिनी देलन्हि प्रवेश वरमुद्रा में हरलन्हि क्लेश ऋतुराजक छन्हि गुण विशेष गुण वखानक कोनो ने अन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत मधुर सुगंध पसारैत महुआ टिप-टिप झहरैत आमक मधुआ गँहुमक खेतक हरियर बथुआ तीसी सरिसव बनल महंथ स्वागत अछि हे ऋतुपति बसंत रंग अबीरक संग में होली बूढ सियानक अलगहि टोली नेना भुटकाक टुनटुन बोली माटि लेटायल छोटका जन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसन्त कुहू-कुहू कोइली गीत सुनाबय मोर आ मोरनी पंख पसारय बोल पपिहराक बड़ मन भावय विहुँसैत "मनीष" निपोरैत दन्त स्वागत अछि हे ऋतुपति बसन्त १.मो. गुल हसन-सभटा चौपट्ट भऽ गेल २.मनोज कुमार मंडल-बहीन३.कल्पना शरण-मिथिलाक तीला संकराति १ मो. गुल हसन, आई. कॉम, जन्‍म तिथि- 5. 01. 1964 ई., पिता- अब्‍दुल रशीद भरहुम, ग्राम, पोस्‍ट- बेरमा, जिला- मधुबनी सभटा चौपट्ट भऽ गेल बड़ मेहनतसँ खेती कएलहुँ नीक-नीक धानक बीया लगेलहुँ गोबर-छाउरकसँ खेत भरि हम कादो कए हम धान लगेलहुँ मुदा नहि जानि विधना कि लिखि देल.... की कहुँ भाय सभटा चौपट भऽ गेल। धानक शान कहल नइ जाइ छल हरियर कंचन धान लगै छल तुलसी फूल-बासमतिसँ गम-गम करैत हमर खेत भरल छल मुदा, बाढ़िक चपेटमे सभ चल गेल की कहुँ भाय सभटा चौपट भऽ गेल कमला तँ मानि गेली मुदा, कोशी बिगड़ल छल आ भुतहीकेँ तँ बाते नहि करु जेना सोझहे ओ उलटल छल नहरक पानि आ वर्षा मिलि दुनू खेलल ऐहन खेल की कहुँ भाय सभटा चौपट भऽ गेल सरकारक अभियान चलल नेता सभ केलनि पहल... एक हजार रुपैआ आ एक क्‍वीन्‍टल अनाज देव से सुनि मनमे राहत तँ जरुर भेटल, मुदा हे, अढ़ाइये सए रुपैआ पचीसे किलो चाउर एतनेपर ओहो ब्रेक लागि गेल की कहुँ भाय सभटा चौपट भऽ गेल लिखैत ई बात गुल हसन कहैए की कहुँ भाय..... आब हमरा किछु नहि फुरैए... किऐक तँ हेँ केलहा-धेलहा तँ सभटा पानिमे चल गेल की कहुँ भाय सभटा चौपट भऽ गेल। २ मनोज कुमार मंडल पिता- श्री भगवान दत्त मंडल श्‍ौक्षणिक योग्‍यता- ग्राम, पोस्‍ट- बेरमा बहीन जखन बहीन अहि घर जनम लेल, लार-प्‍यार व स्‍नेहक बरखा केलहुँ स्‍नेहक पुतला बना हम हृदयक मंदिरमे बैठाउल जखन स्‍नेह यौवन छूलक दुनियाँ कहैछ जाइछथि ई हम पुछलहुँ की कहैत छी? सबहक बहीन जाइ छाथि। आँखिमे पानि व्‍यथित हृदयसँ हम बाजल- ‘जो बहिन तू अपन घर, जतए खुशीसँ भरल बाग होउ दुखक छाँह तोरा नहि भेटउ स्‍नेहक जतए राज होउ, कहैत-कहैत आँखिसँ गिरल पानिक दू गोट बून्‍न लोक सहृदए कहलक- ‘भुलि जाओ अहाँ हम पुछलहुँ की कहैत छी? सबहक बहीन जाइ छथि। महिना बीतल, बरखक बरख बीतल हमहुँ जेना भुलि जेँका गलहुँ नव बन्‍धनमे बान्‍द्धि हम मायामे समाए गेलहुँ जखन कहियो मन परल पुरने स्‍नेह उमैर परल, स्‍नेहक मोटरी बानिह पहुँचलहुँ लोग कहलक- ‘भुलि जाओ अहाँ हम पुछलहुँ की कहैत छी? सबहक बहीन जाइ छथि। डोली लागल बरात साजल छल, सबहक आँखि नोरसँ भरल छल पग भारी छल, आगू डोली, पाछु बरात छल हम पुछलहुँ केहन ई उत्‍सव? सभ कहलक- भूहल जाओ अहाँ हम....... ३ कल्पना शरण मिथिलाक तीला संकराति भाेरहरबामे नहायक छल याेग घूर तापैत चुड़लायक भाेग माय बाप सऽ तील बहबाक बात कऽ लेल स्वाद तीलबाक सप्‍ताह भरि सऽ तैयारी रहल घरमे साेन्हगर गंध छल भरल सूर्य मकर राशिमे प्‍्रावेश लेल सालक प्‍्राारम्भ पाबनि सऽ भेल दिनमे भेल खिचड़ीक महाभाेज अन्न दान लेल पंडितक खाेज पकवानक ढ़ेर भेल जहन राति इर् छल मिथिलाक तीला संकराति बालानां कृते- १. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक प्रसंग २. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) ३.कल्पना शरण-देवीजी १.जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक प्रसंग 41     धर्मक असल रुप श्रावस्तीक सम्राट चन्द्रचूड़ कऽ अनेक धर्म आ ओकर प्रवक्ता सभ स नीक लगाव छलनि। राज-काज स जे समय बचनि ओकरा ओ धर्मेेक अध्ययनो आ सत्संगे मे बितबथि। ई क्रम बहुत दिन स चलि अबैत छल। एक दिन ओ असमंजस मे पड़ि गेला। मोन मे एलनि जे जखन धर्म मनुक्खक कल्याण करैत अछि तखन एतेक मतभेद एक दोसर प्रवक्ता मे किऐक अछि? अपन समस्याक समाधानक लेल ओ (चन्द्रचूड़) भगवान बुद्ध लग पहुँचलाह। ओहिठाम ओ अपन बात बुद्ध कऽ कहलखिन। चन्द्रचूड़क बात सुनि बुद्धदेव हँसै लगलखिन। सत्कारपूर्वक हुनका ठहरै ले कहि दोसर दिन भिनसरे समाधानक बचन देलखिन। एकटा हाथी आ पाँच टा आन्हर ओ जुटौलनि। दोसर दिन भिनसरे तथागत (वुद्धदेव) चन्द्रचूड़ कऽ संग केने ओहि हाथी आ अन्हरा लग पहुँचलथि। एकाएकी ओहि अन्हरा सभ के हाथी छुबि ओकर स्वरुप बुझबै ले कहलखिन। बेराबेरी ओ अन्हरा सब हाथी कऽ छुबि-छुबि देखै लगल। जे जे अंग हाथीक छुलक ओ ओहने स्वरुप हाथीक बतबै लगलनि। क्यो खूँटा जेँका त क्यो सूप जेँका त क्यो डोरी जेँका त क्यो टीला जेँका कहलकनि। सभक बात सुनि तथागत (बुद्ध) चन्द्रचूड़ कऽ कहलखिन- राजन! सम्प्रदाय अपन सीमित क्षमताक अनुरुप धर्मक एकांकी व्याख्या करैत अथि। अपन-अपन मान्यताक प्रति जिद्द धऽ अपने मे सब लड़ैत छथि। जहिना एक्केटा हाथीक स्वरुप पाँचो अन्हरा पाँच रंगक कहलक तहिना धरमोक व्याख्या करैवला सभ करैत छथि। धर्म त समता सहिष्णुता उदारता आ सज्जनता मे सन्निहित अछि। 42     सौन्दर्य संगीतकार गाल्फर्ड लग पहुँच एकटा शिष्या अपन मनक व्यथा कहै लगलनि। कुरुपताक कारणे संगीतक मंच पर पहुँचते मन मे अवै लगैत अछि जे आन लड़कीक अपेक्षा दर्शक हमरा नापसन्द कऽ हँसी उड़बैत अछि। जहि स सकपका जाइ छी। गबैक जे तैयारी केने रहै छी ओ नीक जेँका नहि गाबि पबै छी। ओइह गीत घर पर बढ़ियाँ जेँका गबै छी मुदा मंच पर पहुँचते की भऽ जाइत अछि जे हक्का-बक्का भ जाइ छी। ओहि शिष्याक बात सुनि गाल्फर्ड एकटा नमगर-चैड़गर अयना ल आगू मे रखि गबैक विचार दैत कहलखिन- अहाँ कुरुप नहि छी जना मन मे होइ अए। गीति गौनिहारि केँ स्वरक मिठास हेबाक चाही। जकरा कुरुपता स कोनो संबंध नहि छैक। जखन भाव-विभोर भऽ गायब तखन अहाँक आकर्षण बढ़ि जायत। केयो सुनि निहार कुरुपता पर ध्यान नहि द स्वर पर ध्यान देत। जहि स मनक हीनता समाप्त भऽ जायत आ आत्म-विश्वास बढ़ि जायत। फ्रान्सक वैह गायिका मेरी वुडनाल्ड नाम स प्रख्यात भेलीह। 43    स्तब्ध दोसर विश्वयुद्ध समाप्त भ गेलैक। इंगोएशियन (आंग्ल-रुसी) संधि पर हस्ताक्षर करैक लेल चर्चिल मास्को अयलाह। संधि पर हस्ताक्षरो भऽ गेलैक। मास्को छोड़ै स एक दिन पहिने अनायास स्तालिन आ मोलोटोव चर्चिल लग पहुँच कहलकनि- लड़ाई-उड़ाई त बहुत भेल। नीक समझौतो भऽ गेल। काल्हि अहाँ जेबो करब तेँ आइ थोड़े मौज-मस्ती क लिअ। हमरा ऐठाम चलि भोजन करु। स्तालिनक आग्रह सुनि चर्चिल मने-मन सोचै लगलथि जे महान् तानाशाह स्तालिन नौत देबए अयलाह आइ जरुर किछु अद्भुत वस्तु देखैक मौका भेटत। चर्चिल नौत मानि स्तालिनक संग विदा भेलाह। रास्ता मे सिपाही सब अभिावादन करनि। थोड़े दूर गेला पर एकटा पीअर रंगक दुमहला मकानक आगू मे कार रुकल। सभ केयो उतड़लथि। स्तालिनक संग चर्चिल मकानक भीतर गेला। भीतर जा चर्चिल कऽ बैसबैत स्तालिन कहलखिन- ऊपरका तल्ला मे लेनिन रहैत छलाह। ओ गुरु छथि तेँ ओहि तल्लाक उपयोग हम नहि करै छी। ओ म्युजियम बनल अछि। निच्चा मे तीनि टा कोठरी अछि एकटा मे दुनू परानी रहै छी। दोसर मे बेटी रहैत अछि आ तेसर मे पार्टी सदस्यक लेल बैठकी बनौने छी। स्तालिनक बात सुनि चर्चिल छगुन्ता मे  पड़ि गेलाह जे जाहि तानाशाहक डरे पूँजीवादी जगत थरथराइत अछि ओहि तानाशाहक रहैक व्यवस्था ऐहने छैक। मने-मन सोचैत चर्चिल गुम्म रहथि कि स्तालिन कहलकनि- थोड़े काल हमरा छुट्टी दिअ। भोजन बनबै जाइ छी। ई सुनि चर्चिल अचंभित होइत पूछलखिन- अपने भानस करै छी? भनसिया नहि अछि? मुस्कुराइत स्तालिन उत्तर देलखिन- नहि। अपने दुनू परानी मिलि भानस करै छी। स्तालिनक बात सुनि चर्चिल हतप्रभ होइत कहलखिन- बड़ बढ़ियाँ। आइ घरेवाली केँ भानस करै कहिअनु। अहाँ गप-सप करु। हम लाचार छी। पत्नी घर पर नहि छथि। ओ पाँच बजे कपड़ा मिल स औतीह। चर्चिल स्तब्ध भऽ गेलाह। 44     एकता एकटा पैघ भवनक निर्माण होइत छलैक। निर्माणस्थल लग एक भाग पजेबा दोसर भाग बालू तेसर लकड़ी सीमेंट चून इत्यादि जमा छल। ढ़ेरी स पजेबा बाजल- अकास ठेकल कोठा हमरे स बनत तेँ कोठाक श्रेह हमरे भेटक चाही। पजेबाक बात सुनि सिमटी आ बालू प्रतिवाद करैत कहलकै- तोँ झूठ बजै छेँ। तोरा इ नहि बुझल छौ जे एक स दोसर पजेबाक बीच जँ हम नहि रहबौ त तू ढ़नमनाइते रहमे। संगे तोरा इहो नइ बुझल छौ जे जत्ते दूर तक तोँ जेमे तत्ते दूर तक हमहू संगे जेबौ आ तोरो स ऊपर हमही सुइत क रक्षो करबौ। बालू आ सिमटीक बात सुनि खिड़की आ केवाड़िक लकड़ी तामसे थरथराइत कहलकै- तोरा तीनू बूते बर हेतौ त देबाल बनि जेमे मुदा बिना हमरे ने छत बनि सकमे आ ने मुह-कान चिक्कन हेतौ। जाबे हम नइ रहबौ ताबे कुत्ता-बिलाईक घर रहमे। सब सामानक बीच कटौज चलैत छल। कारीगर चाह पीबि बीड़ी सुनगेलक। बिड़ियो पीबैत छल आ मने-मन हँसबो करैत छल। जखन भरि मन बीड़ी पीलक मूड साफ भेलै तखन तीनू कऽ चुप करैत कहलक- अगर तू सब मिलाने क लेमे तइ से की हेतौ? जाबे हम नहि इलम स तोरा सबके बनेवौ ताबे ओहिना माटि पर पड़ल रहमे। कौआ-कुकुड़ आबि-आबि गंदा करैत रहतौ। सभक विचार सुनि निर्णय करैत भवन कहलकै- अपना-अपना जगह पर सबहक महत्व छौ। मुदा जाबे एक-दोसर स मेल क कऽ नहि रहमे तावे भवन नहि कहेमे। वहिना पजेवा सिमटी चून लकड़ी रहमे। तेँ अपन-अपन बड़प्पन छोड़ि मिलानक रास्ता पकड़ जहि स कल्याण हेतौ। 45     विधवा विवाह राजस्थानक इतिहास मे हठी हम्मीरक विशेष स्थान अछि। ओ ऐहन जिद्दी छल जे जकरा उचित बुझैत छलैक ओ वैह करैत छल। भले ही कतबो विरोध आ निन्दा किऐक ने होय। जखन हम्मीर विआह करै जोकर भऽ गेल तखन विआहक चरचा शुरु भेल। विद्यार्थिये (छात्रे) जीवन मे हम्मीर विधवाक दुर्दशा क गहराइ स अध्ययन केने छल। पढ़ैऐक समय संकल्प क नेने छल जे हम विधवे औरत स विआह करब। हम्मीरक विआहक चरचा पसरलै। मुदा हम्मीर एकदम संकल्पित छल जे विधवे स विआह करब। कुटुम परिवार सब  हम्मीर पर बिगड़ै मुदा तकर एक्को पाइ गम नहि। पंडित सभक माध्यम स परिवारबला कहबौलक जे विधवा अमंगल सूचक होइत तेँ ऐहन काज नहि करक चाही। मुदा हम्मीर ककरो बात सुनै ले तैयारे नहि। एकटा बाल-विधवा क हम्मीर देखलक। विधवा देखि हृदय पसीज गेलै। तखने ओहि विधवा के हम्मीर कहलक- हम अहाँस विआह करब। भले ही परिवारक कतबो विरोध हुअए। हम्मीरक बात सुनि विधवा खुशी स अह्लादित भ उठल। हम्मीर विआहक दिन तय क कुटुम्ब-परिवार आ पुरहित-पंडित केँ छोड़ि अपन संगी-साथी आ सैनिक सभ कऽ संग केने जा विआह कऽ लेलक। जखन हम्मीर मेवाड़क शासक बनल तखन सभ विरोधी सहयोगी बनि गेलैक। पंडित सब घोषणा केलक- विधवा नास्ति अमंगलम्। 46     देशसेवाक व्रत सुभाषचन्द्र बोस बच्चे रहथि। एक दिन राति मे माए लग स उठि निच्चा मे सुतै लगला। बेटा कऽ निच्चा मे सुतैत देखि माए पुछलखिन जे ऐना किऐक करै छी? सुभाष जबाव देलखिन- माए! आइ स्कूल मे मास्टर साहेब कहने छेलखिन जे हमर पूर्वज ऋृषि मुनि जमीने पर सुतबो करथि आ कठिन मेहनतो करैत छलाह। हमहू ऋृषि बनव। तेँ कठिन जिनगी जीवैक अभ्यास शुरु कऽ रहल छी। सुभाषचन्द्रक पिता जगले रहथिन। सब बात सुनि सुभाष केँ पिता कहलखिन बेटा! जमीने पर सुतब टा पर्याप्त नहि होइत। एहिक संग ज्ञानोक संचय आ मनुक्खोक सेवा आवश्यक अछि। आइ माइये लग सुति रहू जखन नमहर हैब तखन तीनू काज संगे करब। सिर्फ शिक्षकेक बात नहि पितोक बात केँ सुभाष गिरह बान्हि लेलनि। आई.  सी. एस. केलाक उपरान्त जखन नोकरीक बात सोझा मे एलनि तखन ओ (सुभाष) कहलखिन- हम जिनगीक लक्ष्य तय कऽ नेने छी। नोकरी नहि करब। मातृभूमिक सेवा करब। 47     आत्मबल फ्रान्सक कथा थिक। रास्ता बगलक पहाड़ी पर बैसि एक गोटे अपन जुत्ता मरम्मत करबैत रहथि। एकटा ढ़ेरबा बच्चा जुत्ता मरम्मत करैत छल। ओहि बच्चाक बगए-बानि स गरीबी झलकैत रहए। मुदा आत्म-बल आ लगन मजगूत छलैक। जुत्ता मरम्मत करा ओ आदमी एक रुपैया पारिश्रमिक दऽ चलै लगल। मुदा माएक बिचार ओहिना ओहि बच्चाक हृदय मे जीबैत छल। बच्चा अपन उचित पाइ काटि बाकी घुमाबए लगल। ओ महानुभाव (जूत्ता मरम्मत करौनिहार) सब पाइ राखि लइ ले कहलक। बच्चा कहलक- हमर जतबे उचित मजूरी हैत ओतबे लेब। माए कहने छथि जे जतबे श्रम करी ओतबे मजूरी ली। बच्चाक बात सुनि ओ गुम्म भ आहि बच्चा केँ ऊपर स निच्चा घरि निंग्हारै लगल। वैह बच्चाक फ्रान्सक राष्ट्रपति दगाल भेलाह। 48   स्वाभिमान स्कूलक पढ़ाई समाप्त क सुभाष चन्द्र बोस कओलेज मे नाओ लिखाओल। ओहि कओलेज मे अंग्रेजीक शिक्षक अंग्र्रेज छल। नाम छलनि सी.एफ. ओटन। ओहुना सत्ता मे रहनिहारक बोली जनताक बोली स भिन्न होइत। मुदा ओटन मे आरो बेसी रोब छलैक। बात-बात मे ओ (ओटन) भारतीय जिनगीक मजाक उड़बैत। भारतवासीक जिनगीक प्रति घृणा पैदा करब ओ अपन बहादुरी बुझैत छल। सुभाष बाबू केँ ओटनक व्यवहार पसिन्न नहि होइन। मुदा विद्यार्थी रहने मन भसोसि क रहि जाथि।   एक दिन वर्गे मे सुभाष बैसल रहथि। ओटन भारतबासीक प्रति व्यंग्य करै लगल। व्यंग्य सुनि सुभाषक हृदय मे आगि धधकै लगलनि। क्रोधे ओ बेकाबू भऽ गेलाह। अपन जगह  स उठि आगू बाढ़ि ओटनक गाल मे कसि कऽ दू थापर लगबैत कहलखिन- भारतवासी मे अखनो स्वाभिमान जीवैत छैक। जँ क्यो एहि बात क बिसरि चुनौती देत त एहिना मारि खायत। 49     कलंक गामक कोन लेखा जे पचकोसीक लोक किसुन भाय केँ इमानदार बुझैत छनि। ओना ओ एकचलिया लोक छथि जबकि गामो आ परोपट्टाक लोक बहुचलिया। तेँ किसुन भाय कऽ जत्ते प्रशंसा होइत ओतवे निन्दो। ओना ज्ञान-अज्ञानक बीच सुख-दुखक बीच धरम-पापक बीच उत्थान-पतनक बीच प्रशंसा-निन्दाक बीच त पहिनहि स संघर्ष होइत आयल अछि। मुदा किसुन भाय अनकर प्रशंसा-निन्दा क ओते महत्व नहि दैत जत्ते अपन सैद्धान्ति जिनगी क। अपन जिनगीक रास्ता पर सदिखन सचेत रहैत छलथि। कैक दिन एहेन होइत जे किसुनभाइक बिचार स अलग सैाँसे गामक लोकक विचार होइत। मुदा तेकर एक्को पाइ गम हुनका नाहि। अपन रास्ता पर ओ असकरो निरभिक स ठाढ़ रहैत छलाह। मुदा बिचार बदलैक लेल तैयार नहि होथि। जिनगीक आरंभे किसुन भाय खेती स केलनि। खेत त बहुत नहि छलनि मुदा जतबे छलनि तहि स मेहनतक बले परिबार चला लथि। बाढ़ि रौदी आ आरो-आरो प्राकृतिक आफत तथा उपद्रव जेँका मानवीय आफत क मुकावला करैक लूरि सीखि नेने छथि। तेँ आन परिवार जेँका परिवार मे चिन्तो नहि होइन। खानदानी खेती कऽ कतौ बदलि त कतौ सुधारि क करति। जहि स गामोक खेतिहर अचता-पचता क हुनकेर अनुकरण करैत। तेसर साल टहलै ले पंजाब गेल रहथि। टहलै ले की जइतथि खेती देखै ले गेल रहति। पंजाबक खेती अगुआइल तेँ देखब जरुरी बुझि पड़लनि। पंजाव मे झिगुनिक (झिमनिक) खेती देखलखिन। मिथिला क्षेत्र मे जत्ते-जत्ते घेड़ा (नेनुआ घिया झिंगा) होइत तत्ते-तत्ते झिंगुनी देखलखिन। फड़ो अटूट। झिगुनी देख किसुन भायक मन मे गड़ि गेल। मने-मन सोचलनि जे जहि पंजाबक माटि गोंग अछि (दब माटि) तखन जब ऐहेन अछि त अपन माटि (मिथिलाक माटि) मे केहन हैत तत्काल ओ नहि सोचि सकलथि। मुदा ओ बीआ नेने ऐलाह। समय पर बीआ रोपलनि। ओहि चारि कट्ठा झिंगुनिक खेती स किसुन भाय एकटा जरसी गाय किनलनि। अपना ले ओते बीआ शुरुहेक फड़ रखि लेलनि जे छः कट्ठा खेती अगिला साल करब। धुर-झाड़ जखन झिंगुनी बेचै लगलथि तखन गामोक लोक बीआ मंगलकनि। पचता फड़क बीआ लोक सब ले रखि देलखिन अगता फड़क समय त निकलि चुकल छल। एहि बेर गाम मे झिंगुनिक अनधुन खेती भेल। किसुन भायक उपजा ते पैछिलेसाल जेँका भेल मुदा गामक लोकक दब भ गेलै। दब होइक कारण छलैक उपजवैक ढ़ंग आ पचता बीआ। सैाँसे गामक लोक हुनका ठक कहि कलंकित करै लगलनि। कतेक गोटे सोझहो मे कहलकनि। ठकक कलंक स किसुन भाय रोगाय लगलथि। जना कते भारी कुकर्म क नेने होथि। मन मे सदिखन यैह नचैत रहनि जे- ऐना भेलै किएक? एहि प्रश्नक उत्तर मन मे जगवे ने करनि। अनायास एक दिन हृदय स आवाज उठलनि- किसुन! तोहर दोख एक्कोपाइ नइ छह। अनेरे सोगाइल छह। तोहर कलंकक कारण बीआक मुरहन आ दौंजी गुने भेल छह। हृदयक आवाज सुनि किसुन भाय पूछलखिन- अगर हम एहि बात क मानि अपना क निरदोस बुझिये लेब तइयो आन कोना बुझत? -हँ तोरा ओहि दिन तक कलंकक मोटरी कपार पर रखै पड़तह जहि दिन तक ओहो सब मुरहन आ दौजीक भेद बुझि नहि जायत। 50     बुलकी एकटा खेत बोनिहारक घरवाली नाकक बुलकी ले रुसि रहलि। बुलकी कीनैक उपाय पति क नहि। हर जोति क जखन ओ (बोनिहार) आयल त घरबाली केँ रुसल देखलक। मुह-तुह फुलौने ओसार पर बैसलि। धिया-पूता खाइ ले कनैत। बोनिहार अपन तामस क घोटि घरबाली लग जा कहलकै- किअए रुसल छी? भूखे बच्चो सब लहालोट होइ अए। आबो भानस करु। अपन रोष झाड़ैत पत्नी बाजलि- जाबे बुलकी नइ आनि देब ताबे ने खायब आ ने किछु करब। खुशामद करैत पति कहलकै- आइये साँझ मे हाट स कीनि क आनि देब। अखन भानस करु। पतिक बात पत्नी मानि गेलि। बोनिहार कर्ज रुपैआ अनै ले विदा भेल। दश रुपैआ अना दर सूइद पर अनलक। रुपैआ घरवालीक हाथ कऽ द देलक। भानस भेलै। सब खेलक। बेरु पहर दुनू परानी हाट स बुलकी कीनि अनलक। दोसरि साँझ मे बुलकी पहिर सुगिया दादी कऽ गोड़ लगै बोनिहारिन गेलि। सुगिया दादी ओसार पर बैसि पोता-पोती क नल-दमयत्नीक खिस्सा सुनबति रहति। दादी कऽ गोड़ लागि बोनिहारिन बुलकी देखै ले कहलक। बुलकी देखि दादी कहै लगलखिन- कनियाँ। सोन चानी गरीब-गुरबा घर मे नइ रहै छै। जइ घर मे पेटेक भूख नइ मेटाइ छै ओइ घर मे सिंगारक चीज कन्ना रहतै। अनेरे अपन सख करै छह। कहुना-कहुना बच्चा सब के पालह जे कुल-खानदान जीबैत रहतह। दादीक बात सुनि बोनिहारिन आंगन आबि पति केँ कहलक- गलती भेल जे हम रुसि क अहाँ स बुलकी किनेलहुँ। अखैन रखि दइ छियै काल्हि घुमा क कर्जवालाक रुपैआ द ऐबै। २.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा एकतालीस नताशा बियालीस ३.कल्पना शरण- देवीजी देवीजी ः बिहारमे आर्थिक विकास 26 जनवरीके अवसर पर झण्डा फहरेलाके बाद देवीजी अपन भाषण प्‍्राारम्भ केने छलैथ। देवीजी कहलखिन जे गणतंत्र भारतमे आर्थिक विकास हेतु पंचवर्षीय याेजना बनाआेल गेल जाहि के अन्तर्गत एक दिशामे प्‍्रागति पर जाेर देल गेल। जेनाकि पहिल मे कृषि दाेसर मे कल कारखाना तेसरमे कृषिये मे चाउर उत्‍पादन पर जाेर चारिम मे बैकिंग तथा कृषि पर पाॅंचम मे बेराेजगारी आ गरीबी उन्मूलन तथा  न्याय व्यवस्थाकसुधार पर जाेर छठममे उद्याेग विशेषतः इन्फाेरमेशन टेक्‍नाेलाॅजीक तीब्र गति  स विकास पर जाेर सातममे  तकनीकी विकास द्वारा उद्याेगक उत्‍पादमे वृद्धि पर जाेर आठममे उद्याेगक आधुनिकीकरण पर जाेर नवममे राेजगार व्यवस्था गरीबी आैद्याेगिकरण आदि पर जाेर तथा दशममे सेहाे नवम जका ध्येय राखल गेल एवम दशम मे अहि सबहक अतिरिक्‍त शिक्षा पर्यावरण स्वास्थ्य महिला एवम् बच्चासबहक भलाइर् पर ध्यान देल गेल अछि।अहि  सबमे देशके आर्थिक विकासमे मददि भेटल अछि मुदा देवीजीके विशेष प्‍्रासन्नता अहि बातक छलैन जे 2008 09 स लऽ कऽ अखन तक बिहारके आर्थिक विकास बहुत नीक अछि। गणतंत्र दिवसके अवसर पर देवीजीक शब्दमे गामक बच्चा बच्चा के बिहारक विकासक सुन्दर सपना देखि रहल छल। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/  राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1Dr.Shefalika Verma-SUBLIME LOVE-Translated by poetess herself 6.2.NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr.Shefalika Verma-Translated by Dr.Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi. DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul Dr. Shefalika Verma SUBLIME LOVE All my extended affection The brute world did prune? How I panted under the unbearable Prangs and suffocations? My love? The wearied wide of time Surrounds me My tired fingers are still Searching the worth In life ...And you met me today Your soft vouschafe Did thrive my life… Never did I hanker after Overpowering your heart But would share your affection …The thirst   prevailing Life after life. Wish your sublime love …To sing me soft To tender me faith… translated by poetess herself NAAGPHAANS Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004. Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna. Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Associate Professors, Delhi University, Delhi. Standing near the transparent glass-wall of her flat, Dhara was looking at the boys and girls returning from their school. Dressed in navy blue uniform, some of them had also put on sweaters – they were divided into groups. Some girls were going alone –  snow also started falling. The frozen ice of last night had covered the black road like a white cloth and the garland of snow was sparkling like small ice sparklers – cool but pleasant and fresh air was refreshing the mind and body, the sky was overcast with black cloud as if the entire universe darkened like an unending night. Nature with all its proud movements made the whole environment enchanting. The British children were full of mirth and joy, playing with one another. Some children were throwing ice on their friends, some others were trying to collect ice in their hands like a flower, atmosphere was agog with enjoyment. Another group arrived, one girl collected a piece of ice and pushed it inside the shirt of a boy – the boy started jumping, dancing awkwardly as the ice entered inside his shirt. After sometime the boy retaliated and started chasing the girl with ice in his hands, caught hold the girl and pushed the ice inside her school dress, the girl screamed and all the students started clapping with joy. White cheek of that girl reddened but she kept on smiling. Dhara used to witness these scenes everyday. The activities of these students were the only active and dynamic point in the peaceful, disciplined and regulated life of England. It seemed the life existed here only, the movement was there, otherwise men working as robot, leading self-centred life. Dhara used to sit near the glass-wall of her flat at the time of Kadamba’s arrival, the speed on road made her static life active. She had always waited for Simant in the same way. The heart started crying – when she used to live with Simant, she always sat near the window waiting for him – at that time life was enjoyable and full of excitement in the midst of struggle. Dhara kept on thinking – her life was empty, only Kadamba was shining like a pole star. In England, she was with Kadamba for the last one year. He brought her to England through lots of love and persuasion. 2 What are you thinking Ma? Dhara got surprised to hear Kadamba’s voice. Nothing son, what to think of? Ma, please do not tell a lie. You are blessed with vast ocean like thoughts – I know all these and he kept his hands on mothers’s shoulder with love and care. Ma, let us go to Blackpool today to celebrate the weekend. Dhara tried to say, what is the use of visiting Darkpool/ Blackpool in this dark life? Simant has made her life dark but Kadamba is her life’s polestar – in this empty sky only shining polestar, outshining many suns and moons. Kadamba was an engineer, getting a job at Wigan in U.K. He owned a small flat with a beautiful garden and a car, but had no time to stand ,stare and spare. He worked all through the day, achieving too much in little time through hard labour and perseverance. But Simant was obsessed with worldly life and comforts and had no desire to meet his wife and son. Let us go Ma. Time is flying. I have no words to explain the beauty of Blackpool. Besides, we will not get parking space due to weekend. She wanted to keep some eatables. Why Ma? We will take lunch in some good restaurant. Dhara hurriedly dressed up and sat in the car. Kadamba fastened her seat belt and got himself tied in the seat belt. Dhara never liked the seat belt as she felt imprisoned. Ma, if you do not tie it, I will be fined $50 by the police – Kadamba told me while driving. Road was flanked by electric poles on both sides, fitted with TV camera. Here car maintains a speed of more than one mile in a minute , Kadamba tried his best to convince Ma. Really, Kadamba has become matured. So much of composure, so much of knowledge – and particularly so much devoted to mother. This song was being played in the car – Tum na jane kis jahan mein kho gaye, hum bhari duniya mein tanha ho gayein. Dhara rested her head on the seat- back. She has lost everything in her life. Where is Simant? What is he doing? He indulged himself in all kind of vices and  had earned money by hook or by croock. Right from beginning he was a pure businessman – running after money, ignoring himself, his family. Due to accumulated merits of past life, she was blessed with a son like Kadamba. Otherwise Dhara’s life was really pathetic. Ma, do not worry for anything. Man does not have anything in his hands. Whatever is to happen, will happen – we all are puppets—then Kadamba spoke in a serious voice – Papa may be somewhere nearby. They were crossing through a city named Entry which was an industrial centre, with second largest race course of the world – in future we might also visit this city. Dhara also started thinking about Simant’s whereabouts, but her face remained expressionless. She told Kadamba, look, wherever he is, should be hale and hearty.            I feel happy to just have vermilion in his name. The car was speeding, but Dhara’s thoughts moved faster. Why do not you drive the car, Dhara asked Simant, resting her head on his shoulder. Look, the master never drives the 3 car, but always hires a driver, it shows his status. What a status?  Many persons driving their own car are bereft of status or reduced to low-born? Dhara always wanted Simant to drive, to sing and she sitting besides dreaming seven colors of life. Simant used to spend minimum time with Dhara and if sometimes they were together in car, the presence of third person i.e. driver irritated Dhara. Right from beginning Dhara was a rebel, but not obstinate and in-disciplined – however, she never liked to carry out obsolete traditions. Dhara once asked Simant, who is the person whom you always give valuable and costly gifts? I have earlier pardoned Tarang didi, now who is this new person in your life? You may be of a good character, but money is not everything in life. Look Dhara, what is good, what is bad, leave this to me. You always try to impose your imaginative pictures on others. You are right. I always tried to impose my ideals on you all. I always run after others to fulfill my ideals, but yet to meet a complete human being. Complete human being, Simant laughed, Dhara, are you complete, do not you have weaknesses, limitations, demerits. You look for merits in others, why do not you look  the same for yourself ? The speeding car suddenly shifted from Highway to Motorways. Dhara’s thoughts also moved to the narrow lanes of motorways. It seemed Simant had really attacked her soul. Dhara always aspired for an ideal, disciplined and well-regulated life. She used to get up before sunrise which she inherited first from her parents and then from in-laws. Getting up on time, by 7 am everybody was free from daily chores, by 9 am coming together at breakfast table, the routine followed religiously by everybody right from master to servant in the house. Dhara’s disciplined attitude was reflected everywhere in home, dustless furniture, everything well- arranged, young ones paying respect to elders and elders caring for them, nobody was allowed to cross the limits of relationship. Everybody had a place in Dhara’s large heart. She considered other’s sorrow-happiness as her own, she tried to inculcate all good values in her husband and son. She tried to upgrade their existing good quality, she considered it as divine creative work and her precious gift to mankind and society. If she saw anybody with shallow heart and baser qualities, she was not able to tolerate that person and his very presence resulted into mental agony – this was the complex mental attitude of Dhara which was both easy and difficult to comprehend. Ultimately what happened to Dhara? Faces of Akash, Tarang, Simant, Vanya and Jalad all danced before her eyes. She considered Akash as the ideal person. I became overjoyed to see you laughing, Akash had once uttered. Laughter! Laughter has got so much of importance? Everybody heard the laughter but why only Akash was affected? Ma, this is Blackpool – the lights there appeared as countless stars dancing on earth- they were visible from a great distance. In the darkness of night, the lights presented a beautiful picture as if all planets, stars, sun and moon have descended there. The vast sea 4 appeared limitless and unending, couples in two piece clothes were moving, engrossed with themselves, unaware of the surroundings. Nobody bothered for others. Male- Female both liberated, enjoying cigarettes, satiating each others desires – really it was altogether a different world on this earth. Ma, this is Lancaster, the road was up and down and zig-zag. It was a hilly area. Kadamba told Dhara that car was now crossing through the Lancaster canal – both sides of canal were flanked by green fields on which the sheep were grazing. Under the canal bridge, rows of houses of uniform height and design looked distinct . They never go for white-washing ,Dhara asked. Yes,they can, but will have to seek government permission, but nobody has a spare time for these things. When they reached Blackpool, Kadamba told Dhara, Ma, this is roller-coaster, it is the largest and the fastest train of the world. Perhaps dangerous also, Dhara asked. Kadamba laughingly replied, Ma, you have always said that life is a challenge, accept it. Dhara smiled. She observed that many British children rode on the roller-coaster, tied the belt and when it moved ferociously at a break-neck speed, they started making loud noises, hue and cry, almost screaming. Dhara thought that the British made their children strong and independent through these activities. What a dangerous play roller-coaster was, as if people threw their children in fire to struggle, accept the challenge and  fight the battle. Sea waves were continuously returning to shore – trying to permanently get united with the shore, but constantly falling on the sands and returning back unsuccessfully. Dhara’s life perhaps resembled the sea waves. She was now all alone due to her insistence on high ideals to be followed by everybody. She felt almost tied in a Naagphaans and its venomous sting on her entire body. TO  BE  CONTINUED 7.VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXV संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- २५ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. पञ्चतिंशतितमः पाठः शक्नोमि, शक्नुवंत्, शक्नोति, शक्नुनः इत्येतेषाम् अम्भासं कृतवेतः इदानीम् स्तेषामः पुनः स्मरणः कुर्मः अहम् देवनागरी लिपिम् कर्त्तुम् शक्नोमि। एसः शीघ्रम् पठितुम न शक्नोति। सः कुर्मः इत मंदम् आगच्छति। महेशः–इत गर्जनम् करोति अहम शुकः इव समालणम् करोमि। इदानीम् रूचिवाचिकानाम् अभ्यासम कुर्मः। गुरस्य रूचिः मधुरः। शक्कराय रूचिः मधुरः। जम्मीरफलस्य रूचिः आम्लः। रूचिः काः। रक्तमरीचिकायाः रूचिः कटुः। एतत् लवणम्। तत् लवणम् लवणस्य रूचिः लवणः। आमलक फलानि– आमलक्स्य रूचिः का–आम्लः कारवेलस्य (करेला) रूचिः तिक्तः। एता तिंतिना। तित्रिण्याः रूचिः आम्लः। मरीचिकायाः रूचिः कटुः। कर्नवाचक–पुल्लिंग रूचिवाचक–पुल्लिंग एतम् भोजने षडरसाः भवंति तिक्तः–लवनः कटुः आम्लः मधुरः–षष्टः एकः रसः अस्ति। वृक्षस्य तिक्तः आयुर्वेदिक वैद्याः ओषधम् कुर्वंति। क्वथनम् कुर्वंति–त्वयम् क्वथयंति। ततः एक विध रसः भवति–तस्य रूचि कषाय भवति। एवम् षड् रसाः संति। कस्य वस्तुनः रूचिः का इति इदानीम् तदंति गतिक्ता अस्ति आम्रफलम् आम्लम् अस्ति अतलेहः कटुः अस्ति। स्वादफलम् मधुरम् अस्ति। स्वादुफलम् मधुरम् अस्ति। चाकलेहः मधुरः अस्ति। चाकलेहः मधुरम् अस्ति। नारिकेलस्य जलम् मम् गृहे मधुरम् भवति। एतत् मम् नूतनं पुस्तकम्। इतः पूर्वम् अहम् पञ्च पुस्तकानि लिखितवान्। इतः पूर्वम् पत्रिकाषु मम् बहु लेखाः प्रकाशिताः। इतः पूर्वम् अहम् आगरा नगरे आसम्। इतः पूर्वम् अहम् काशी–विश्वनाथम् न दृष्टवान्। इतः पूर्वम् अहम् कारवाहनम् न चलितवान्। इतः पूर्वम् एताद्वश वाक्यानि तदंति वा। इतः पूर्वम् अहम् आगरा नगरे आसम्। इतः परम् अहम् बेङ्गलुरू नगरे मतिष्यामि। अहम् विमानेन प्रयाणम न कृतवान विमानेन प्रयाणम् करोमि। - इतः परम् भवती कृतः गच्छति। - इतः परम् अहम् हिमालयम् गमिष्यामि। - इतः परम् एषा संन्यासिनी भतितष्यति। - इतः पूर्वम् महम् मूर्खः आसम् - इतः परम् वोद्वानभवामि चषकः स्क्तिः अस्ति– चषकः पूर्णः अस्ति– कूपी रिक्ताः अस्ति– चषकः पूर्णाः अस्ति– पात्रम् पूर्णम् अस्ति– मम् उद्टम् पूर्णम् अस्ति– 1.     पर्वदिने देवालयः प्ऊर्ण भवति– 2.     अन्य दिनेष्य रिक्तः भवति– पर्व दिनेष्य पूर्णः भवति पत्रम् रिक्तम् अस्ति। सुभाषितम् बहूनाम् अल्पसाराणां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नेः बध्यंते मत्तदंतिनः॥ तृणानि यद्यपि दुर्बलानि भवति–परंतु समूहरूपेण यदि वयम् तृणानाम् ग्रथनं कुर्मः–तर्हि तृणास्य एकः शक्तिः निर्मिता भवति–तृणानाम् समूहेन ग्रथेनेन एका रज्जु निर्मिता भवति। तृणनिर्मित–रज्जुमिः वयम् गजम् (मत्तम् गजमेंवव) बंधुम शक्नुमः। कारणम् ग्रथित तृणैहि शक्तिः। बलम् संपादयते। एवमेंव सामान्याः जनाः भवति ते असघटित स्थितौ अत्यतं दुर्बलाः परंतु यदि एकवारम् संघटिताः भवंति–तदा बलिष्ठाः भवंति–महत् कार्यम् साधयितुम् शक्नुवंति। संघे शक्तिः अस्ति। संघटनेन एव महत साधयितुम् शक्यते। कथा पूर्वम् ग्रंतिदेत नाम एकः महाराजः आसीत्। सः अत्यंतं श्रेष्ठः महाराजः इति प्रसिद्धः। यद्यपि सः उतमतया राज्यषालनांदिकम् करोति स्म–तष्य राज्ये समृद्धिः आसीत्–महाराजः उत्तमः इति कारणतः कालः एत उत्तमः आसीत्। काले काले वृष्टिः भवति स्म।प्राणिनः सुखेन वासेन कुर्वंति स्म। स्मृद्धिः बहूनि वर्षाणि–सः एवम् सुखेन राज्यम् पालितवान्। एकस्मिन् वर्षे वृष्टिः एव न आगता। केवलम् मेघाः आगच्छंति, गर्जंति, पुनः गच्छन्ति। वृष्टिः न भवति। एक वर्ष पर्यंतम् अपि वृष्टिः न भवति। परंतु महाराजः स्वकोलतः धनम् सर्वम्–धान्यम् सर्वम् अपि वितरति। दरिद्रा संति–भोक्तुन किमपि न संपादयंति–तेभ्यः सर्वेभ्यः अपि धान्यादिनम् वितरणम् करोति। एवम् दरिद्राः अपि शामकाले जीवंति। महाराजस्य औदार्यम् श्लाघ्नते जनाः। परंतु अपरस्मिन् वर्षे अपि वृष्टिः न भवंति। इदानीम् महाराजस्य कोषे धनम् धान्यम् इत्यादिकम् अधिकम् नास्ति। किंचित–प्रमाणेन वितरति। परंतु शामः अधिकः–सर्वम् शुष्कम् भवति–कृषिकानाम् कार्यम् न भवंति–धानयस्य वृद्धिः न भवति। मेघाः केवलं गर्जंति। वृष्टिम् न यच्छंति। वृक्षाः शुष्काः भवंति। प्राणिनं जलम् अप्राप्यम् भृताः भवंति। एतादश सन्निवंशे जनाः किं कुर्बंति। ते अनिवार्य वस्तु स्वीकल्प अन्यत्र गच्छंति। एवम् जनाः समूह रूपेण अन्य राज्यम् गच्छंति। महाराजस्य समीपे अपि एलु दिनेषु किमपि न भवति। पातुम वा खादितुम वा महाराजस्य एत दुः स्थितः भवति। महाराजस्य पत्नी भवति। पुत्र द्वयम् भवति। महाराजस्य पत्नी भवति। पुत्र द्वयम् भवति। पुत्रः द्वितीयः शिशुरूपेण अस्ति। तष्यापि पानार्थम् जलम् न भवति। तादृश दुःस्थितिः। महान् क्षामः। एतादृश समये महाराजः अपि राज्यगृहम् त्यजति–बहिः गच्छति। कष्टेनं एकत्र किन्चित जलम् कथंचित संपादयति। इतः परम शिशेव किंचित् जलम् ददामि, इति चिंतयति–परंतु तसमिन्नेव काले एकः कृषकायः दीनः वृद्धः आगच्छति। महाराजमेव पश्यति–महाराजः किं कुर्यात–एकत्र शिशुः अस्ति–रोदनं करोति–पिपासया–अन्यत्र दीनः कृशः–यदि न हदाति सः भृतः भवति–तदृश अस्तितौ अस्ति। महाराजस्य अनुकंपः जायते। सः सर्तम् जलम् तस्मै ददाति। दरिद्रायः कृशाय–सः पिबति–संतुष्टः भवति–परंतु तस्मितेव क्षणे सः शिशुः मुर्च्छितः भवति–तदृष्टता माता अपि मूर्च्छिता भवति। एतत् सर्वम् अपि सः दरिद्रः अपि पश्यति। दृष्टवा महाराजस्य समीपे वदति महाराजा अहम् भवतः स्थितिम् ज्ञातवान्–यद अप्लम् जलम् प्राप्तम् तदपि, दत्तम दानम् रूपेण–भवतः दानशीलता अत्यंतं श्लाघनीया अस्ति। मम् विशेष शक्तिः अस्ति–भवान् यम् कम अपि वरमू पृच्छतु–महाराजः पश्यति शिशुः मूर्च्छावष्यायाम अस्ति–पत्नी मूर्च्छावस्थायाम् अस्ति–तथापि महाराजः विशालरूपेण चिंतयति–तस्य दृष्टि एव विशाला–सः समग्र राज्यस्य चिंतम् मनसि एत आनयति। वरम् पृच्छति–अहम् राज्य न इच्छामि अहम् स्वर्गम् अपि अ इच्छामि, मोक्षम् न इच्छामि। परंतु येये प्राणितः दुह्खेन पीड़िता संति तेषाम् दुःखम् सर्वम् अपि अपगच्छतु–ते सर्वेपि सप्रक्त जीवनम् कुर्वंतु। तादृश स्थितः भवतु। इति वरम् पृच्छति। न त्वहन कामये राज्यम् न स्वर्गम् न पुर्नभवम् कामये दुःखत प्रानाम् प्राणिनाम् अर्थिनाशनम्। एवम् श्लोक रूपेण प्रश्नम् पृच्छति, वरन् पृच्छति। सः सामान्यः मनुष्यः न आसीत्, प्रातः सः देवः एव आसीत्। एतस्य परीक्षार्थम् आगतवान् आसीत्। सः महाराजे न यत पृस्टम् सर्वम् अपि ददाति। पुनः प्राणिनः सुखेन जीवनि। तथा वृष्टिः भवति। पुनः राज्ये समृद्धि भवति। सर्वे अपि सुखेन जीतंति। तथा वृष्टिः भवति। बहिर्गताः आगच्छंति–स्तराज्यम्। एवम् महाराजः प्रजाः सर्वे अपि संतुष्टाः भवंति। संस्कृत अनुवाद       मैथिली अनुवाद        अंग्रेजी अनुवाद अत्र हस्ताङ्कनं करोतु। कृप्या, एते हस्ताक्षर करू। Please, sign here. आगामि–सप्ताहे मां पश्यतु। कृप्या, आगूक सप्ताहमे हमरासँ मिलू। Please, see me next week. कार्यालये भवान् कस्मिन् स्थाने नियुक्तः? कार्यालयमे अहाँक की स्थान छल। What is your designation in the office? अहं विक्रयणविभागस्य व्यवस्थापकः अस्मि। हम व्यवस्थापक छलहुँ बैचेबला विभागमे। I am manager of the sales department. भवान् कति दिनानां विरामं स्वीकरोति? अहाँक कतेक दिनक छुट्टी स्वीकारल गेल अछि। How many days’ leave are you taking? प्रतिदिनं भवान् विलम्बेन आगच्छति। अहाँ प्रतिदिन देरिसँ आबए छलहुँ। You come late every day. कार्यालयस्य समयः समाप्तः, श्र्वः आगच्छतु। कार्यालयक समय खतम भऽ गेलि अछि, कृप्या, काल्हि आबू। Office time is over, please come tomorrow. आयकर–विभागतः पत्रम् आनीतं किम्? इन्कमटैक्सक विभागसँ पत्र आनले छलहुँ की। Have you brought the letter from the IT department? एतस्य प्रतिलिपिं सर्वेभ्यः प्रेषयतु। सभटा कॉपीक फोटोस्टेट भेजु। Send Xerox copy of this to all. तत् पत्रं कदा ददाति? ई पत्र अहाँ कते दैत छलहुँ। When will you give that letter? पञ्चनिमिषेषु कृत्वा ददामि। हम पाँच मिनटमे एकरा कऽ कए दऽ देए छलहुँ। I’ll do it in 5 minutes and give. सः विरामं स्वीकृतवान् अस्ति। उ छुट्टी लेले छलै। He was taken leave. तं देयादेशं वित्तकोषे निवेशितवान् किम्? अहाँ चेक बैंकमे जमा करा देलौ। की? Did you deposit that cheque in the bank? एतद्विषये श्र्वः मां पनरपि स्मारयतु। काल्हिकेँ बारेमे हमरा बता देब। Remind me about tomorrow again. एतेन आवेदन पत्रेण सह च्छायाचित्रमपि आवश्यकम्। एकटा फोटो ई आवेदनक साथ बड्ड जरूरी छलै। A photograph is also necessary with this application. भवतः कृते सन्देशद्वयम् अस्ति। दूइटा सन्देश अहाँक लेल अछि। There are two messages for you. कृपया उपविंशतु। कृप्या, स्थान ग्रहण करू। Please be seated. तस्य स्थानपरिवर्त्तनम् अभवत्। ओकर स्थान परिवर्त्तन भऽ गेलैए। He has been transferred. तस्याः पदोन्नतिः अभवत्। ओकर पदोन्नति भऽ गेल अछि। She has been promoted. मंत्रिणा सह मेलनसमयः निश्चितः अभवत् किम्? ओकर मिलेकेर समय मंत्रीकेर साथ निश्चित भऽ गेलैए। Has the appointment with the minister been confirmed? श्र्वः सर्वेषां कार्यालयसदस्यानाम् एकं मेलनं भविष्यति। सभटा कार्यालयक सदस्यक काल्हि मिलेकेर समय निश्चित अछि। There is a meeting tomorrow of all the office staff. मेलनस्य समयः कः? सभाक की समय छलै। What is the time of the meeting? सिन्हामहोदयः भवंतम् आहूतवान् । मि. सिन्हा अहाँक सूचना दऽ दैत। Mr. Sinha has called you. सः कदा आगमिष्यति? काल्हि कते आबे पड़त। When will he come? अस्तु, परिशीलयामः। ओके, अहाँक सोच ठीके अछि। Okey. Let us think over it. सा सञ्चिका कस्य समीपे अस्ति? उ सञ्चिका ककर लग अछि। Who has that file? आगच्छतु, चायं पिबामः। आबू, चाय लिअ (पिबू)। Come, let’s drink tea. भोजनविरामः कदा? भोजनकेँ की समय अछि। When is the lunch time? अस्माकम् अधिकारी शीघ्रकोपी अस्ति। हमर अधिकारी तुरंत गुस्साबेबला आदमी अछि। Our officer is short tempered. सः बहु समयपालकः। उ बड्ड समयक पालन करए बला आदमी छलै। He is very punctual. लेखा–परीक्षणं कदा अस्ति? लेखन आ परीक्षणक काज कतै होइछ। When is the auditing? श्र्वः सर्वेषां कर्मचारिणां कार्यावरोधःभविष्यति। सभटाकर्मचारी काल्हि हड़तालपर जाए रहल अछि। All the workers will be on strike tomorrow. तद्विषये अहं विस्मृतवान् एव। हम तुरंत सभटा बात बिसरि जाइत छलहुँ। I just forgot about that. एतत् कस्य उत्तरदायित्वम्? एते ककर उत्तरदायित्व छलै। Whose responsibility is this? भवतः कार्येण अहं संतुष्टः अस्मि। हम अहाँक कामसँ संतुष्ट छलहुँ। I am satisfied with your work. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर। महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:  Language:Maithili  ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)  (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) 

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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com  website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह।  Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur, Nagendra Kumar Jha and Panjikar Vidyanand Jha- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा" VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) X. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature XI. मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी XII. मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. Address your delivery-address to श्रुति प्रकाशन,:DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com

(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५१ म अंक ०१ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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