VIDEHA — Issue 52 / अंक ५२

Publication: VIDEHA · Issue: 52
Open original PDF at Internet Archive

237 'विदेह' ५२ म अंक १५ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५२) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.भालचन्‍द्र झा--बाल-शिक्षणपर निबन्ध हमर शिक्षण-यात्रा २.२.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (अध्याय- १५सँ १८) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल--दू टा कथा-१.डंका २ कोना जीवि? २.४.१.सपथमे मैथिली-सुजीतकुमार झा २.बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’ २.५.जनकपुरमे मिथिला महोत्‍सवक आयोजन : नवअध्‍यायक शुभारंभ--रामभरोस कापडि भ्रमर २.-कथा-ऋषि बशिष्ठ-पूत कमाल २.६.१.प्रकाश चन्द्र-नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण २.बिपिन झा-युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग" (वेलेण्टाइन डे विशेष पर) २.७.१.कुमार मनोज कश्यप-कथा- कचोट २.कथा-मुसिबत–सन्‍तोष कुमार मिश्र ३.दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी २.८.१.विद्यानन्द झा-किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा २श्‍यामसुन्‍दर शशि- जनकपुरके खवरि ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा १८म खेप ३.३. कामिनी कामायनी-वसंत ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.आमोद कुमार झामैथिल नँइ–छोटका ३.६. सरोज ‘खिलाडी‘-गीत ३.७.१.सत्यक जीत-सतीश चन्द्र झा२.मनोज कुमार मंडल ३.कल्पना शरण-नुकाएल दिनकर ३.८.कालीनाथ ठाकुर, -एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ२.तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक ४. गद्य-पद्य भारती अन्नावरन देवेन्दर-अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल)-(तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजपी. जयलक्ष्मी द्वारा,  अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) ५. बालानां कृते-१.. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा २.. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)३.कल्पना शरण-देवीजी ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_II-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-In the depth of my heart विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय कविता: कविता लोक कम पढ़ैत अछि। संस्कृतसन भाषाक प्रचार-प्रसार लेल कएल जा रहल प्रयास, सम्भाषण-शिविरमे सरल संस्कृतक प्रयोग होइत अछि। कथा-उपन्यासक आधुनिक भाषा सभसँ संस्कृतमे अनुवाद होइत अछि मुदा कविता ओहि प्रक्रियामे बारल रहैत अछि। कारण कविता कियो नहि पढ़ैत अछि आ जाहि भाषा लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता भऽ गेल अछि, ताहि भाषामे कविताक अनुवाद ऊर्जाक अनर्गल प्रयोग मानल जाइत अछि। मैथिलीमे स्थिति एहन सन भऽ गेल अछि, जे गाम आइ खतम भऽ जाए तँ एहि भाषाक बाजएबलाक संख्या बड्ड न्यून भऽ जएत। लोक सेमीनार आ बैसकीमे मात्र मैथिलीमे बजताह। मैथिली-उच्चारण लेल शिविर लगेबाक आवश्यकता तँ अनुभूत भइए रहल अछि। तँ एहि स्थितिमे मैथिलीमे कविता लिखबाक की आवश्यकता आ औचित्य ? समयाभावमे कविता लिखै छी, एहि गपपर जोर देलासँ ई स्थिति आर भयावह भऽ सोझाँ अबैत अछि। एहना स्थितिमे आस-पड़ोसक घटनाक्रम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, आक्षेप आ यात्रा-विवरणी यैह मैथिली कविताक विषय-वस्तु बनि गेल अछि। मुदा एहि सभ लेल गद्यक प्रयोग किएक नहि ? कथाक नाट्य-रूपान्तरण रंगमंच लेल कएल जाइत अछि मुदा गद्यक कवितामे रूपान्तरण कोन उद्देश्यसँ। समयाभावमे लिखल जा रहल एहि तरहक कविता सभक पाठक छथि गोलौसी केनिहार समीक्षक लोकनि आ स्वयं आमुखक माध्यमसँ अपन कविताक नीक समीक्षा केनिहार गद्यसँ पद्यमे रूपान्तरकार महाकवि लोकनि ! पद्य सर्जनाक मोल के बूझत ! व्यक्तिगत लौकिक अनुभव जे गहींर धरि नहि उतरत तँ से तुकान्त रहला उपरान्तो उत्कृष्ट कविता नहि बनि सकत। पारलौकिक चिन्तन कतबो अमूर्त रहत आ जे ओ लौकिकसँ नहि मिलत तँ ओ सेहो अतुकान्त वा गोलौसी आ वादक सोंगरक अछैतहुँ सिहरा नहि सकत। मनुक्खक आवश्यक अछि भोजन, वस्त्र आ आवास। आ तकर बाद पारलौकिक चिन्तन। जखन बुद्ध ई पुछै छथि जे ई सभ उत्सवमे भाग लेनिहार सभ सेहो मृत्युक अवश्यंभाविताकेँ जनै छथि? आ से जे जनै छथि तखन कोना उत्सवमे भाग लऽ रहल छथि। से आधुनिक मैथिली कवि जखन अपन भाषा-संस्कृतिक आ आर्थिक आधारक आधार अपना पएरसँ नीचाँसँ विलुप्त देखै छथि आ तखनहु आँखि मूनि कऽ ओहि सत्यताकेँ नहि मानैत छथि, तखन जे देश-विदेशक घटनाक्रमक वाद कवितामे घोसियाबए चाहै छथि, देशज दलित समाज लेल जे ओ उपकरि कऽ लिखऽ चाहै छथि, उपकार करऽ चाहै छथि, तँ ताहिमे धार नहि आबि पबै अछि। मुदा जखन राजदेव मंडल कविता लिखै छथि- .... टप-टप चुबैत खूनक बून सँ धरती भऽ रहल स्नात पूछि रहल अछि चिड़ै  अपना मन सँ ई बात आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति कि नहि बाँचत हमर जाति...? तँ से हमरा सभकेँ सिहरा दैत अछि। कविक कवित्वक जाति, ओहि चिड़ैक जाति आकि..। कोन गोलौसी आ आत्ममुग्ध आमुखक दरकार छै एहि कविताकेँ। कोन गोलौसीक आ पंथक सोंगर चाही एहि सम्वेदनाकेँ। तँ कविताकेँ उत्कृष्टता चाही। भाषा-संस्कृतिक आधार चाही। ओकरा खाली आयातित विषय-वस्तु नहि चाही, जे ओकरापर उपकार करबाक दृष्टिएँ आनल गेल छै। ओकरा आयातित सम्वेदना सेहो नहि चाही जे ओकर पएरक नीचासँ विलुप्त भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारकेँ तकबाक उपरझपकी उपकृत प्रयास मात्र होअए। नीक कविता कोनो विषयपर लिखल जा सकैत अछि। बुद्धक मानवक भविष्यक चिन्ताकेँ लऽ कए, असञ्जाति मनकेँ सम्बल देबा लेल सेहो, नहि तँ लोक प्रवचनमे ढ़ोंगी बाबा लेल जाइते रहताह। समाजक भाषा-संस्कृति आ आर्थिक आधारक लेल सेहो, नहि तँ मैथिली लेल शिविर लगाबए पड़त। बिम्बक संप्रेषणीयता सेहो आवश्यक, नहि तँ कवि लेल पहिनेसँ वातावरण बनाबए पड़त आ हुनकर कविताक लेल मंचक ओरिआओन करए पड़त, हुनकर शब्दावली आ वादक लेल शिविर लगा कऽ प्रशिक्षण देल जएबाक आवश्यकता अनुभूत कएल जएत आ से कवि लोकनि कइयो रहल छथि !  मिथिलाक भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता आ राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म आ दर्शन सेहो साहित्यमे अएबाक चाही। आ से नहि भेने साहित्य एकभगाह भऽ जएत, ओलड़ि जएत, फ्रेम लगा कऽ टँगबा जोगड़ भऽ जएत। कविता रचब विवशता अछि, साहित्यिक। जहिया मिथिलाक लोककेँ मैथिली भाषा सिखेबा लेल शिविर लगाओल जएबाक आवश्यकता अनुभूत होएत, तहिया कविताक अस्तित्वपर प्रश्न सेहो ठाढ़ कएल जा सकत। आ से दिन नहि आबए ताहि लेल सेहो कविकेँ सतर्क रहए पड़तन्हि। मैथिली आ ब्रेल लिपि फ्रांसक लुइस ब्रेल -अठारह सए नौ ई. मे जन्म आ अठारह सए बावन ई.मे मृत्यु- जे अपने आन्हर छलाह पन्द्रह बर्खक अवस्थामे ब्रेल लिपिक आविष्कार आँखिसँ विहीन लोकक लेल कएने रहथि। एहि लिपिमे कागजपर विशेष प्रिंटरसँ उठल-उठल बिन्दुक माध्यमसँ -जकरा हाथक स्पर्शसँ अनुभव कएल जा सकए- भाषाक संप्रेषण होइत अछि। एकरा दुनू हाथक स्पर्शसँ पढ़ल जाइत अछि। दहिना हाथ संदेशकेँ रूपान्तरित कए संप्रेषित करैत अछि आ वाम हाथ अगिला पंक्तिक प्रारम्भक अनुभव करैत अछि। एहि लिपिकेँ सामान्यतः डेढ़ सए शब्द प्रति मिनटक गतिसँ पढ़ल जा सकैत अछि जे आँखि द्वारा पढ़ल जाएबला सामान्य शब्द संख्या तीन सए शब्द प्रति मिनटक अदहा अछि। एहि लिपिक आधारकेँ सेल कहल जाइत अछि। एकटा सेलक निर्माण छह टा बिन्दुक संयोजनसँ होइत अछि। एहिसँ तिरसठि प्रकारक विभिन्न वर्णक –अक्षर-संख्या आ विराम-अर्द्धविराम आदि चेन्ह- निर्माण होइत अछि। हमर लिखल सहस्रबाढ़नि जे मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक अछि (ISBN:978-93-80538-00-6) २००९ मे रिलीज भेल आ पुअर होम दरभंगा स्थित ब्लाइन्ड स्कूलकेँ पठाओल गेल अछि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ फरबरी २०१०) ९५ देशक १,१०० ठामसँ ३८,५०३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,२६,५९६ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr)बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... १.डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइडक कथा अंग्रेजी विषएमे स्कूलमे पढ़ने रही। एकटा वैज्ञानिक रहथि डॉ. जेकील हृदएसँ कलुषित। मोन करन्हि जे चोरि-उच्क्कागिरी करी। से एकटा द्रवक खोज कएलन्हि जकरा पीबि कऽ ओ मिस्टर हाइड बनि जाथि आ रातिमे चोरि-उच्क्कागिरी करथि। एक रातुक गप अछि जे मिस्टर हाइड ककरो हत्या कऽ भागि रहल रहथि मुदा भोर भऽ गेल रहै से लोक सभ हुनका खेहारए लगलन्हि। ओ डॉ.जेकीलक घरमे पैसि गेलाह (कारण डॉ.जेकील तँ ओ स्वयं छलाह) आ केबार भीतरसँ लगा लेलन्हि। लोक सभ चिन्तित जे डॉ. जेकीलकेँ ई बदमाश मारि देतन्हि से ओ सभ केबार पीटए लगलाह। मिस्टर हाइड द्रव पीअब शुरु केलन्हि मुदा ओहि दिन दवाइमे रिएक्शन नहि भेलैक आ हुनकर रूप डॉ. जेकीलमे नहि बदलि सकलन्हि। आब एहि कथाक अन्तमे मिस्टर हाइड माथ नोचि रहल छथि जे हुनका अपन समस्त पापक प्रायश्चित मिस्टर हाइड बनि करए पड़तन्हि। २. पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ..... हिनकर रियल आइडेन्टिटी हम नाङट करै छी आ ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। ३.मैथिलमे ई एकटा तथ्य छै जे चुपचाप जे गारि सुनै अछि तकरा कहल जाइ छै जे ओ बड्ड नीक लोक छथि। मुदा समए आबि गेल अछि मिस्टर हाइड सभकेँ देखार करबाक आ ओकरा कठोर सजा देबाक। मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि। मैथिलीमे बहुत गोटे छथि जे हिन्दीमे बैन भेल लेखककेँ पोसै छथि (मैथिली सेवाक लेल) जे जखन ककरो गारि पढ़बाक होए तँ ओ तकर प्रयोग कऽ सकथि। ४.एहि ब्लैकमेलरक डॉ. जेकील आ मिस्टर हाइड बला चरित्र मैथिल सर्जनाक विरोधमे मैथिल-जन पत्रिकामे एक दशक पहिने उजागर भऽ गेल छल मुदा लोक हिनका पोसैत रहल। ५.आरम्भमे सेहो ई एकटा चिट्ठी मैथिलीक सम्पादकक विरोधमे देलन्हि जे छपि गेल आ ओकर घृणित भाषाक कारण भाइ साहेब राजमोहन झाकेँ माफी माँगए पड़लन्हि आ फेर ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि। ६.एकटा आग्रह आ आह्वान: सुभेश कर्ण आ समस्त मैथिली-प्रेमी-गण- एहि मिस्टर हाइडक ब्लैकमेलिंग आ एब्युजक द्वारे अहाँ सभकेँ मैथिली छोड़ि कऽ जएबाक आवश्यकता नहि अछि, कारण पापक घैला भरि गेलाक बाद ई आब अभिशप्त छथि अपन शेष जीवन मिस्टर हाइड रहि अपन कुकृत्यक सजा भुगतबाक लेल। जे.एन.यू.मे छात्र-छात्रा सभसँ पोस्टकार्ड पर साइन लऽ ओहिपर अपन रचना लेल प्रशंसा-पत्र पठबैत घुमैत अपस्याँत कथित गोल्ड मेडेलिस्ट(!!!) मिस्टर हाइडकेँ चिड़ैक खोता तोड़बाक सख शुरुहेसँ छन्हि। पहिल कथा गोष्ठीमे जखन ई सहरसामे सभसँ पुछने फिरै छथि जे साहित्यकार बनबासँ की-की सभ फाएदा छै तखन ई एकटा पाइ आ पुरस्कारक लेल अपस्याँत मैथिल युवा-पीढ़ीक प्रतिनिधित्व करै छथि, जे राजमोहन झा जीक शब्दमे मैथिलीसँ प्रेम नञि करैत अछि। ई मिस्टर हाइड सेहो ओहि सम्पादकसँ लिखितमे माफी मँगलन्हि आ जखन ओ माफ कऽ देलखिन्ह तखन फेर हुनका गारि पढ़ब शुरु कऽ देलन्हि। हमरासँ लिखित मेल-माफी अस्वीकार भेलाक बाद मिस्टर हाइडक माथ नोचब स्वाभाविके। मिस्टर हाइड ककरो इनकम टैक्स, कस्टम वा सरकारी नोकरीमे देखै छथि, सुनै छथि तँ पाइक मारल जेकाँ हिनका मोनमे ब्लैकमेलिंग कुलुबुलाए लगै छन्हि, प्रायः आनन्द फिल्मक एक गोट कलाकार जेकाँ- जे एहने मिस्टर हाइड लेल कहै अछि- जे ई डॉक्टर रहितए तँ किडनी बेचितए, से ओ जतए छथि ओतहु ब्लैकमेलिंगक धन्धा शुरू कैये देने छथि। मुदा चिड़ैक खोता उजाड़ैत-उजाड़ैत मधुमाखीक छत्ता उजाड़बाक गल्ती एहेन ब्लैकमेलर कैये दैत अछि। जे सरकारी नोकरी वा इन्कम-टैक्स, कस्टममे ई ब्लैकमेलर रहितए तँ देश जरूर बेचि दैतए। kellner@ucla.edu" <kellner@ucla.edu Dear Gajendra thanks for the detective work. was there a response? best regards, Douglas Kellner Philosophy of Education Chair Social Sciences and Comparative Education University of California-Los Angeles Box 951521, 3022B Moore Hall Los Angeles, CA 90095-1521

Fax  310 206 6293 Phone 310 825 0977 http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html dear Gajendraji, apnek mail milal. Pankajjik kritya janike bar dukh bhel. Ahi se maithilik nam kharab hoyat achhi. Apnek kadam ekdum uchit achhi. Rajiv K Verma These People are hellbent to bring down the literary discourse down to the gutter. Now you have been receiving mails like one. We are with you and i have forwarded your mails to Maithili speaking people all across the country  

-- VIJAY DEO JHA dhanyvad. muda ehne lok sabjagah aadar pabait achi shridharam

अहां कें सूचनार्थ पठेने छी जे पंकज पहिनेहो इ सब काज करैत रहय छलैए। aavinash

Dear Gajendra g

You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head jai Maithili jai Mithila Sunil Mallick President MINAP, Janakpur

Dear Gajendra g

You are doing very well in the field of collecting all the documents related to the Maithili. Videha. Com realy a adventureous collection. I will also find some time to learm the article published through the videha. Now your detective style theft the sleeping of many of the so called literary personnel. Go a head jai Maithili jai Mithila

Sunil Mallick President MINAP, Janakpur

your efforts are commendable. Anysuch ghost writer or fake identity holder must be boycotted from literature at once Thanks.

shyamanand choudhary

Namaskar. Chetna samitik sachiv ken mailak copy hastgat kara del achi. Dr. Ramanand Jha' Raman' गजेन्द्र जी , चेतना समिति हिनका सम्मानित कएलक अछि सेहो हमरा ज्ञात नहिं | यद्यपि हमहू चेतना क  स्थाई सदस्य | जे हो. मुदा निंदास्पद घटना तं ई थिके तें दुखी कयलक |  कतिपय नव मैथिल-प्रतिभाक आकलन-मूल्यानकनक हमर अपन स्नेग्रही स्वभाव, एहि दुर्घटनाक बाद तं आब  चिंता मे ध' देलकय|    देखी, सस्नेह ---गं गुंजन     प्रिय गजेंद्रजी हम अपने विस्मित भेलहुँ| बहुत दु:खद दृश्य | सृजन विरूद्ध साहित्यिक सन्दर्भ मे ई घटना आधुनिक मैथिलीक बहुत कुरूप प्रसंग क' क'  स्मरण कैल जायत सस्नेह, गंगेश गुंजन. PRIYA MAITHILJAN APPAN BHASHA- SANSKAR-SANSKRITI KE ASMARAN KARU AA EHAN VIVADAASAPAD LEKANI B KARANI KE VIRAM DIYA. ESWAR KE SAKCHI MANI - DIL PAR HATH RAKHI AA KULDEVI KE ASMARAN K-K YAD KARU KI SACHHAI KE KATEK KARIB CHHI.NIK BATAK LEL MANCH KE UPYOG KARI TA UTTAM. DHANYABAD. SAPREM,PK CHOUDHARY Gajendra babu pankaj puran chor achhi. Ham sab okar likhit ninda das sal pahine aarambh me kene rahi. Okra ban k kay ahan nik kayal. Chetna samiti ke seho samman wapas lebak chahi aa okar ninda karbak chahi. subhash Chandra yadav प्रिय ठाकुरजी! (माननीय संपादक) “विदेह ई-पत्रिका” [मैथिली] एखन धरिक उपलब्ध साक्ष्यक आधार पर हम अपनहिक संग जाएब पसिन्न करब। शंभु कुमार सिंह Sir I have sent the link of Parashar's duplicacy to several people along with Pranabh Bihari who had traslated that article. I had telephonic conversation with him also and he was quite upset over Parashar;s duplicay Pranav is my junior and a good friend of mine. since you have referred Pranav who had traslated that article it is unfortunate that he was misused by Parashar. But i must congratulate you for exposing scam run by Parashar and his team. Parashar, though must not be blamed if he lifted the article of Nom Chomskey . Now i must doubt the artistic sensibility of Parashar who is now a pseudo-- intellectuals. I am amazed that how did he dare to publish the article of Nom Chomskey as his own. God bless him no more        Vijay Deo Jha Dear Gajendraji, I fully agree with you that we must fight against blatant cases of wrongful appropriation. हां अपन मेल में लिखने छी जे विदेह आर्काइव से संबंधित लेखक'क सबटा रचना हटा लेल जायत। अहि से आर्काइव सं ई प्रसंग सेहो, एकर साक्ष्य  सेहो मेटा जायत। हमर मत ई जा साक्ष्यब रहबाक चाही निक आ अधलाह दुनु तरहक काज'क। अहां अप्पसन कामेंट आ र्निणय सेहो आर्काइव मे जा के संबंधित रचना के पोस्टा-स्क्रिाप्टर के रुप मे भविष्या'क पाठक'क लेल सुरक्षित राखि सकैत छियन्हिि। ई दोहरेबाक बहुत औचित्यक नहि जे विदेह निक लागि रहल अछि आ अहांक परिश्रम एकदम देखा रहल अछि। ईति, सदन।

Sadan Jha Sadan Jha

Thank you and same to you.

Nishikant Thakur

Thanx Gajendraji, for your immediate response. I must congratulate you for the work you have done to save the sanctity of the literature world as a whole.

I feel proud for the person like you who shows the courrage to bell the cat. If the so called writers like Parasharji are there to spoil the sea, on the other side it is very hopeful sight to have a person like you who is alert enough to take care of such filth & keep the sea clean.

Thanx for enlightening me on the subject.

Regards, Bhalchandra Jha.

पंकज पराशरकेर एहन कार्य पर स्मरण अबैत अछि करीब बीस-पचीस साल पहिलुक घटना, जहिया आकाशवाणी दरभंगासँ म,म,डॉ, सर गंगानाथ झाक एकमात्र मैथिलीक कारुणिक पदकेँ एक गोट कवि द्वारा अपन कहि प्रसारित कए देल गेल छल, जे बादमे (सजग श्रोता द्वारा सूचना देलाक बाद) आजन्म बैन कए देल गेलाह । कहबाक तात्पर्य जे जँ हम मैथिल दरभैगा- मधुबनीमे गंगानाथ बाबूक पदकेँ अपन कहि सकैत छी तँ ई कोन बड़का गप । निश्चये एहन रचनाकारकेर सङ्ग कड़गर डेग उठाएब आवश्यक । ajit mishra

Dear Gajendrajee, We should take strong step to prevent such intellectual cheats. My support is always with you. K N Jha This seems to be a dangerous trend and we should also try and refrain from publishing anything from such authors. Regards, Prof. Udaya Narayana Singh प्रियवर ठाकुर जी, मैथिल साहित्यकार आब साइबर क्राइम सेहो क रहल छथि, ई जानि अपार प्रसन्नता भेल | पंकज पराशर  के नकारात्मक बुद्धिक पूर्ण उपयोग करबाक लेल हम नोबेल प्राइज सा सम्मानित कराय चाहैत छी | बुद्धिनाथ मिश्र Sampadak Mahoday Apne ehi prakarak durachar rokwak lel je prayash ka rahal chhee ohi lel dhanyabad.Ehen blackmailer sa maithili ken bachayab aawashyak achhi Sadar SHIV KUMAR JHA

गजेन्द्र भाई, नमस्कार ! मैथिली मे एहि तरहक काज लगातार भ' रहल अछि । किछु व्यक्ति एहि धंधा मे अग्रसर छथि । मैथिलीक सम्पादक लोकनिक अनभिज्ञताक फायदा कतेको अंग्रेजी पढ़निहार तथाकथित साहित्यकार लोकनि उठा रहल छथि । पंकज जीक पहल मे छपल लेख के हम सेहो पढ़्ने र्ही आ किछुए दिनक बाद हम नेट पर मूल लेखकक आलेख के सेहो पढ़लहु । हमरा त' आश्चर्य लागल छल जे पंकज जी आलेखक कम स कम शीर्षक त' बदलि लैतथि मुदा हुनका एतेक ज्ञान रहितनि तखन की छल । 

एतबे नहि , हिनक बहुत रास कवितो अंग्रेजी साहित्य स' हेर-फेर कयल गेल अछि । खैर ! जे करथि ... । मुदा एहि बेर कहाबत ठीक होबाक चाही " सौ सोनार के त' एक लोहार के " । प्रकाशन मे जे भी कियो व्यक्ति गलती क' रहल छथि हुनका गंभीर क्रिमिनल बुझबाक चाही ।

धन्यवाद एहि लेल अहाँ के जे एतेक जोरदार तरीका स' एहि गप्प के उठैलहु ।

अहाँक

प्रकाश चन्द्र । pankaj parashar vala prasang bar dukhad laagal ,, kamini Gajendr jee, maamailaa ke tool jatabe debainhi, sabhak oorjaa otabe svaahaa hetai. हमर मनतब एतबे, जे एक बेर अहां देखार क देलहुं, आब छोडि देल जाओ. हिन्दीयो मे एहिना भ रहल छै. बेर बेर आ खराब भाषा मे लिखल मोन के दुखी करैत अछि. फेर लागैत अछि जे अहि मे समय कियैक नष्ट करी? हिन्दुस्तान मे जाति आ सेहो मैथिली से जाति नयि जाएत. हम एकरा नयि मानैत छलहुं मुदा आब 30 बरख से मैथिली मे लिखनाक बाद आब देखल जे एक ओर 1 मैथिली साहित्य मे लिली जी, उषा जी आ शेफलिका जी के बाद यदि किओ नाम लैत अछि त हमर. 2 एखनो कोनो पत्रिका बै छै त हमरा लेल रचनाक आग्रह होइते छै. 3 एखनो हम ओतबे सक्रिय छी आ निरंतर लिखि रहल छी. 4 दुखद जे हमरा बाद (सुस्मिता पाठक आ ज्योत्स्ना मिलन के हम अपने तुरिया बुझैत छी) के बाद एहेन कोनो सशक्त कोन, महिला लेखने नयि आएलए. 5 ई स्थिति रहलाक बादो, आब जहन हम देखै छी, त पाबै छी जे हमरा पर, हमर रचना यात्रा अथव हमर रचना पर किछु नयि लिखल गेलए, चाहे ओ मोहन भारद्वाज रहथु अथवा आन किओ. जहन हमर दशक केर चर्च होइत छै, तीन चारिटा नाम पर सविस्तार चर्चा होइत छै, जाहि मे हमर नाम नयि रहैत छै. हमर नाम मात्र सन्दर्भ लेल जोडि देल जाइत छै. 6 एतेक दिन मे मात्र रमण जी हमरा पर एक गोट लेख लिखलन्हि. हम ओकरा पुन: टाइप करबा के अहां लग पठायब. 7 जाति पाति धर्म आ द्वेष पर कहियो ध्यान नयि देलाक कारणे त कही हमर ई स्थिति नयि छै, आब हमरा ई सोचबा मे आबि रहल अछि. 8 हमर शिक्षक, जे स्वयं हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार छथि, हमरा बुझेने रहलाह जे हम मैथिली मे लिखब बन्न क; दी, कियैक त हम गैर मैथिल (जाति विशेष) से नयि छी, तैं हमर लेखन के कहियो मैथिल सभ नयि नोटिस करताह, कहियो किछु नयि करता.. अपन भाषाक प्रति प्रेम के आगरह कारणे हम हुनकर बात नयि मानलियै, लिखैत गेलहुं, मुदा आब लागि रहलअए जे हुनकर कहबी सही छलन्हि की? 9 एखनो की हाल छै मैथिली मे, देखियो. ओकरा विरुद्ध किछु करियु. मैथिली मे जे पैघ पैघ संस्था चाइ, चेतना समिति सनक, सभ बेर विद्यापति पर्व मनबैत छथि. लाखो खर्च करै छथि, मुदा नीक लेखक केर पोथी सभ बेर 5-7 टा निकालैथु, से नयि होबैत छन्हि. 10 हमरा भेटल जानकारी के मोताबिक विद्यापति हॉल किराया पर चढै छै. तकरा मे कोनो आपत्ति नयि, यदो ओकरा से किछु आय होबै. मुदा ओकरा मैथिलीक काज अथवा नाटक आदि लेल मांगल जाएत, त; नयि भेटै छै. यदि ओकर शुल्क चुका दी, तहन त किरायाके रूप मे किऊ ल' सकि छै. एकरा सभ के उजागर करी. 11 व्यक्ति से संस्था पैघ होइत छै. जतेक संस्था सभ छै, तकरा पर लिखी, साहित्य अकादमीक मैथिली विभाग सहित. 12 लिली रेक सभटा रचनाक अनुवाद अधिकार हमरा देने छथि. हुनक साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त पोथी 'मरीचिका' केर हिन्दी अनुवाद लेल पिछला 2-3 साल से हम लिखि रहल छी.  साहित्य अकादमीक पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य" मे हम पिछला 25 साल से अनुवाद सहित छपि रहल छी. मुदा हमरा से अनुवादक नमूना मांगल गेल. ओहि कुर्सी पर जे स्वनाम धन्य बैसल छथि, हुनका हमरा मादे नयि बूझल त कोनो मैथिल साहित्यकार से पूछि सकैत छलाह. ई तहिने भेलै, जेना एक बेर एक गोट चैनल ऋषिकेश मुखर्जी से हुनकर बायोडाटा मंगने छल आ एखनि पढल समाचारक अनुसारे आ. जानकी वल्लभ श्हस्त्री से हुनकर बायोडाटा पद्मश्री लेल मांअगल गेलैय. 13 अपन विनम्रता दर्शाबैत हम लिली जीक दू तीन टा कथाक हिन्दी अनुवाद हम पठा देलियन्हि. तैयो अई पर कोनो विचार नयि. लिखला के बाद हमरा कहल गेल जे हम लिली जी से साहित्य अकादमी के अनुवादक अधिकार दियाबे मे मददि करी. आरे भाई, अहां के अनुवाद से मतलब अछि ने, आ जहन हम अनुवाद क; के देब' लेल तैयार छी तहन अकादमी के किअयैक अधिकार चाही? अई लेल जे अकादमी अपन पसीनक आदमी के अनुवाद लेल द; सकय. एखनि धरि ओकरा पर निपटारा नयि भेलैये. अकादमी से फेर कोनो पत्र नयि आएल अछे. अनुवाद तैयार राखल छै. लिली जी आब बहुत बुजुर्ग भ; गेल छथि. हुनक मात्र इयैह इच्छा छै (आ बहुत स्वाभाविक) जे हुनकर पोथी सभ हुनका सोझा मे प्रकाशित भ; जाए. 14 लिली जी के पोथी हिन्दी मे आनबाक श्रेय हमरे अछि, ई मनितहुं ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. 15 मैथिली के भारतीय ज्ञानपीठ से पुस्तक प्रकाशन लेल हमही आगां एलहुं आ प्रभास जी आ लिली जी के पोथी बहार भेलै.भारतीय ज्ञानपीठ से मैथिली  पुस्तक प्रकाशन के श्रेय हमरे छन्हि, ईहो मनैत ओकरा रेकॉर्ड केनाए मैथिल समीक्षक आवश्यक नयि बुझैत छथि. एकरा पर लडू. गजेन्द्र जी, मैथिलीक ई सभ मानसिकता पर आन्दोलन करी जाहि से रचनाकार आ वरिष्ठ रचनाकार सभ के अपमानित नयि होब' पडै. अहां चाही त' एकरा विदेह पर द' सकै छी. हम दोसर बात सेहो लिखि के पठायब. मुदा हम फेर कहब, जे हम व्यक्ति के नयि संस्था आ व्यक्ति के मानसिकता के दोष देबन्हि. लोक पढथु आ पूचाथु ई स्वनामधन्य सभ से जे जकरा से अहां के गोलौंसी अछे, तकरा पर अहां लिखब आ जकरा से नयि अछे, जे मौन भावे लिखि रहलए कोनो विविआद मे पडल बगैर, हुनका लेल ई व्यवहार? -विभा रानी. Shri gajendraji

good work.

Anha sa ehina neer khshir vivekakak ummeed lagatar banal rahat.

chor ke ehina dekhar kelak baad dandit seho karbak prayas karbaak chahi. anha bahut raas neek pahal ka rahal chhi.

Saadhuvaad.

manoj pathak. संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ फरबरी २०१०) ९५ देशक १,१०० ठामसँ ३८,५०३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,२६,५९६ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr  and detailed article and reactions at http://groups.google.com/group/videha/web/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%95+%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE?hl=en ) बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.भालचन्‍द्र झा--बाल-शिक्षणपर निबन्ध हमर शिक्षण-यात्रा २.२.प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (अध्याय- १५सँ १८) २.३.जगदीश प्रसाद मंडल--दू टा कथा-१.डंका २ कोना जीवि? २.४.१.सपथमे मैथिली-सुजीतकुमार झा २.बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’ २.५.जनकपुरमे मिथिला महोत्‍सवक आयोजन : नवअध्‍यायक शुभारंभ--रामभरोस कापडि भ्रमर २.-कथा-ऋषि बशिष्ठ-पूत कमाल २.६.१.प्रकाश चन्द्र-नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण २.बिपिन झा-युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग" (वेलेण्टाइन डे विशेष पर) २.७.१.कुमार मनोज कश्यप-कथा- कचोट २.कथा-मुसिबत–सन्‍तोष कुमार मिश्र ३.दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी २.८.१.विद्यानन्द झा-किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा २श्‍यामसुन्‍दर शशि- जनकपुरके खवरि भालचन्‍द्र झा--बाल-शिक्षणपर निबन्ध हमर शिक्षण-यात्रा भालचन्‍द्र झा- मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, मराठी, अग्रेजी आ गुजरातीमे निष्णात। १९७४ ई.सँ मराठी आ हिन्दी थिएटरमे निदेशक। बीछल बेरायल मराठी एकांकी-मराठीसँ मैथिली अनुवाद। बाल-शिक्षणपर निबन्ध हमर शिक्षण-यात्रा १ ई गोट पचीस- तीस बरख पुरान गप्‍प अछि। तहिया हम नव-नव ए.टी.डी. (आर्ट टीचर्स डिप्‍लोमा) कएने रही। मुम्‍बइक (तखन बम्‍बइ रहै) एक गोट प्रसिद्ध स्‍कूलक प्राथमिक विभागमे सहायक शिक्षकक रूपमे नाकरी धऽ लेलहुँ। आध दिन नोकरी आ अ‍ाध दिन अपन कॉलेजक अगिलुका पढ़ाइ। किछुए दिनमे हमर पढ़एबाक पद्धतिकेँ लऽ कऽ अभिभावक सभक उपराग आबऽ लगलैक। नहूँ-नहूँ ई उपरागक स्‍वर कनेक ऊँच बुझाए लागल। बात मुख्‍याध्‍यापक धरि पहुँचि गेलै। मुख्‍याध्‍यापक शैक्षणिक क्षेत्रमे राष्‍ट्रपति अवार्ङसँ विभूषित छलाह। अपन काजक प्रति एतेक समर्पित, जे जाहि दिन हुनकर अपन बेटीक बियाह रहनि, ओहू दिन अपन काजक क्षतिपूर्तिक वास्‍ते भोरमे पाँचे बजे अपना टेबुलपर हाजिर। आ ककरो कानोकान खबरि धरि नहि। ने किओ प्‍यून आ ने कोनो सहायक। मुहूर्तक समएसँ किछु पहिने फोन कऽ देल गेलनि तँ कन्‍यादान करबाक हेतु विवाह मण्‍डपमे पहुँचलाह (महाराष्‍ट्रमे विवाह दिनमे होइत छै)। एकदिन हठात प्‍यून आबिकऽ हमरा हुनक समाद देलक जे ‘हेड गुरूजी अपनेकेँ याद कएलनि अछि’। एहने बिना कोनो कारणक ओ ककरो डिस्‍टर्ब नहि करैत छलाह। खासकऽ हमरा। हमरा सँ कनेक विशेष लगाव होएबाक कारण। जे हम ओहिकालक शिक्षक सभक लॉटमे नवतुरिए रही। दोसर जे कला शिक्षकक हैसियतसँ हम बिनु ककरो कहने अपने मोनसँ स्‍कूलमे अनेक तरहक विधाक काज करी। रूटीनसँ हटिकऽ किछु-किछु नब-नब प्रयोग करबामे हमरा बड्ड मोन लागए। किछु विषयान्‍तर तँ होएत मुदा एतऽ उदाहरणक वास्‍ते एक-दू गोट छोट-छिन प्रसंग कहब आवश्यक हएत। शिशु-वर्गक नेन्ना सभ जहन पहिल-पहिल बेर स्‍कूल अबैत अछि तँ माए-बापकें छोड़ैत नञि रहैत छैक। कनैत-कनैत अपस्‍यॉंत भेल रहैत छैक। झौहरि तँ एतेक पड़ैत छैक जे कान नञि देल जाइत छैक। स्‍कूलक पूरा स्‍टाफ ओकरा सभकें तरह-तरहसँ बौंसऽ मे लागल रहैत अछि। हमहूँ ओहि प्रयासमे लागल रही। नेन्ना सभक ध्‍यान बँटेबाक वास्‍ते हम किछु कागज आ ऑइल पेस्‍टल (मोमक रंग-पेन्सिल) आनि कऽ ओकरा सभक सोझाँमे राखऽ लगलिऐक। परिणामो जल्‍दीये देखाए लागल। ओहिमे सँ किछुकें तँ ओ कागज आ पेन्सिल देखिते मातर तरबा ल‍हरि मगजमे पहुँचि गेलै। ओ सभ कागजकेँ हाथमे लऽ कऽ ओकरा चिर्री-चिर्री कऽ देलकै। पेन्सिल टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कऽ बीगि देलकै। एक गोट नेन्नाकें जहन हम बहुत फोर्स केलिऐ तँ ओ हमरा हाथसँ पेन्सिल छीनि कऽ सामने राखल कागजपर जेना टूटि पड़ल। हाँ‍‍ञि-हाँ‍‍ञि कऽ पेन्सिलकेँ कागजपर घसऽ लागल। एक बेर जे कागजपर पेन्सिल रखलकै से फेर बिनु उठौनहें पूरा कागजकें भरि देलकै। मुदा एहि के बाद ओ शांत भऽ गेलै। भऽ सकैये, ओकर एनर्जी जबाब दऽ देने होइ। अथवा ओ हमर प्रतिक्रियाक प्रतीक्षा करऽ लागल हुअए। वा हमर प्रति अपन क्रोधक प्रदर्शन करबाक वास्‍ते ओ एहि माध्‍यमक उपयोग केलाक बाद शांत भऽ गेल। बहुत दिन धरि हम एहि विषएमे सोचैत रहलहुँ। से किएक तँ पूर्ण विश्‍वास अछि जे छोटोसँ छोट, प्रत्‍येक कृतिक (Act) किछु अर्थ होइत छैक, किछु प्रयोजन होइत छैक। भने आइ ओहि विशिष्‍ट कृतिक सार्थकता दृष्टिपथमे नहि आबए। मुदा बिना कोनो प्रयोजने कृति भऽ नञि सकैत अछि। कमसँ कम एतेक तँ बुझबामे आबिये गेल जे आत्‍म-प्रगटीकरण हेतु चित्रकला सन प्रभावी दोसर माध्‍यम नहि। जाहि माध्‍यममे बिना कोनो संस्‍कार वा व्‍याकरणकेँ नेन्नो अपन मोनक गप्‍प व्‍यक्‍त कऽ सकैत हुअए, ओहिसँ सरल आ श्रेष्‍ठ कोन माध्‍यम भऽ सकैत अछि ? किछु दिनक बाद जहन नेन्ना सभ स्‍कूलक माहौलसँ घुलि-मिलि गेल, हम एही तरहक एक गोट आर प्रयोग कएल। एक गोट कक्षाक साफ-सफाइ करा कऽ पूरा फर्शपर उज्‍जर प्‍लेन कागज पसारि देलिऐक। कोठरीमे एक गोट स्‍पीकर टँगवा देलिऐक । आ डोलमे भित्र-भित्र रंगकें घोरि कऽ कोठ‍रीक बाहरक जमीनपर हेरा देलिऐक, जाहिसँ कोठरीमे जाइ काल ओकरा सभकें ओहि रंगेपर सँ जाए पड़ैक। आ तकर बाद कोठरीक स्‍पीकरपर नेन्ना सभक कोनो परिचित गीत शुरू कऽ देलिऐक। नेन्ना सभकें खालीए पएर ओहि कोठरीमे जएबाक लेल कहि देल गेलैक। अनेक रंगसँ पोताएल तरबा लऽ कऽ गीतक तालपर नेन्ना सभ ओहि उज्‍जर प्‍लेन कागजपर नाचऽ लागल। ओहि कागज परक रंग-बिरंगा छापकें देखि कऽ ओकर सभक जे प्रतिक्रिया भेलैक तकर वर्णन कोनो प्रतिभाशाली, संवेदनशील कवि कऽ सकैत छल। तकरा बाद तँ ओ सभ अपनेसँ बाहर जा-जा कऽ अपना पसंदक रंगमे पएर पोति-पोति कऽ भरि पोख अपन तरबाकें ओहि कॅनवासपर अंकित करऽ लागल। एहि तरहें बनल रंग-छापकें (Colour Print) चुनि-चुनि कऽ जहन ओकर फ्रेम बनाओल गेलै, तहन तँ ओकर सौंदर्य आर निखरि गेलैक। ओहि फ्रेमकें शिशुवर्गक कक्षा सभमे टाँगि देल गेलैक। तकरा बाद बहुत दिन धरि नेन्ना सभ अपन-अपन पएरक छाप चीन्‍हऽ मे अपन आनन्‍द हेरैत रहल। कहक माने ई जे एहि तरहक प्रयोग सभसँ हमर मुख्‍याध्‍यापक बड्ड प्रसत्र होथि। प्‍यून जखन हुनक समाद देलक तँ हम पहिल फुर‍सतिमे हुनकर केबिनमे पहुँचि गेलहुँ। ओ जाहि तरहें वातावरण बनबऽ लगलाह ओहिसँ ई बुझबा मे कनेको भाङ्गठ नहि भेल जे कोनो गम्‍भीर बात छैक। खैर ओकर अधिक विस्‍तारमे नहि जाइत एतऽ एतबे कहब जरूरी अछि, जे अभिभावक सभ हमर पढ़एबाक पद्धतिक विरोधमे हुनका धरि पहुँचि गेल रहथि। मिला-जुला कऽ उपराग एतबे जे ‘अहाँ नेन्ना सभकेँ चित्र बनाएब नञि सिखबैत छिऐक। घरमे नेन्ना सभक चित्र पूरा करबाक जिम्‍मेदारी माए-बापकें उठबऽ पड़ैत छैक।’ उपराग सुनिते एहि तरहक सोचक मूल स्रोत बुझबामे भाङ्गठ नञि भेल। एहि तरहक सोचक मूल स्रोत छैक प्रचलित शिक्षा पद्धति। हम सभ जाहि शिक्षा-व्‍यवस्‍थाकें अंगिकार कएने छी, ओकर सभसँ भारी समस्‍या हमरा जनितब इएह जे एहि शिक्षा-पद्धतिसँ नेन्ना सभक मोनपर जाहि तरहक संस्‍कार पड़ब अपेक्षित‍ से नञि भऽ रहल छैक। विद्यार्थीकें स्‍वयंसिद्ध बनएबामे जाहि तरहक ज्ञान, मेहनत आ संयमक आवश्‍यकता होइत अछि, ओकर पूर्ण अभाव। किताबमे छपल शब्‍द पढ़ि देलहुँ वा पढ़वा देलहुँ। ओही महक किछु शब्‍दक पर्यायवाची शब्‍दक अर्थ  कहि कऽ पड़सि देलहुँ। भऽ गेलै! छुतिका छुटि गेलै। स्‍वाइत गुरूदेव रविन्‍द्रनाथ ठाकुरकें ‘शान्तिनिकेतन’ आरंभ करबाक आवश्‍यकता बुझेलनि ! आ हम सभ एखनो धरि वएह लकीरक फकीर बनाबऽ मे लागल छी। नवीनताकेँ स्‍वीकारब तँ हमरा सभकें जेना पापे बुझाइत रहैत अछि। तें एहि युगक महान वैज्ञानिक आइन्‍सटाइनकें ई कहऽ पडलनि, जे ‘हमर शिक्षा-दीक्षा तँ ओही दिन समाप्‍त भऽ गेल, जाहि दिन हमरा स्‍कूलमे भर्ती करा देल गेल।’ कला जकाँ सृजनशील विषएक अवस्‍था कोनो भित्र नञि अछि। ब्‍लैकबोर्डपर कोनो चित्र खीचि देल आ नेन्ना सभकेँ ऑर्डर भऽ गेल, जे एकरा देखिकऽ चित्र बनबै जाऊ। भऽ गेलै। आब अपने टाइम-पास करबाक हेतु फ्री छी। गार्जियनो सभ एहिना सिखने छथि। तें नेन्नाकें कॉपी भरल देखलन्हि आ भऽ गेलाह प्रसन्न, जे चलू, पढ़ाई भऽ रहल छैक। कॉपी भरि रहल छैक। मुदा ओ सभ ई नञि सोचैत छथि, जे ब्‍लैकबोर्डपर बनाएल चित्र तँ कोनो वयस्‍कक दिमागक प्रतिमा (Image) छैक। नेन्ना सभक दिमागमे ओहि प्रतिमाकेँ स्‍थापित करबाक धडफड़ी किएक ? नेन्ना सभक दिमागक विकास-क्रमक अनुरूप ओकर अपनो किछु प्रतिमा हेबे करतैक। ओकरा सोझा अनबाक प्रयास किएक ने, जाहिसँ ओकर अपन स्‍वतंत्र विकास होइ? एहि बातकें एहि तरहें बूझल जाए। मानि लिअ जे वयस्‍क शिक्षक अपन विकसित (! ) दिमागसँ एकगोट फुजल छत्ताक चित्र ब्‍लैकबोर्ड पर बना कऽ नेन्ना सभकें ओकरा बनाबऽ लेल कहैत छथि। ब्‍लैकबोर्डपर चित्रित फुजल छत्ता, भौमितिक आकारक अनुरूप साधरणतया अर्धगोल देखाइत छैक। मुदा अहाँ देखबैक जे नेन्ना सभक मानस पटलपर भौमितिक आकारक मिती (Dimension) स्‍पष्‍ट नहि भेल छैक। पचमा- छठमा दर्जामे जहन भूमिती पढ़ाएल जेतैक तँ ओकरो दिमागमे मितीक अंतर स्‍पष्‍ट भऽ जेतै। एहि अवस्‍थामे वयस्क शिक्षक जहन अपन चित्रक तुलनामे नेन्ना सभक चित्रमे ‘गलती’ सुधारऽ लगैत छैक तँ नेन्ना सभ बाजि तँ किछु नञि सकैत अछि। मुदा भीतरे-भीतर ओकरा सभक दिमागमे घोंघाउज (Confusion) शरू भऽ जाइत छैक। किएक तँ ओकरा जनितबें ओहो वएह चित्र बनौने अछि। तहन गलती कोन तरहक भेलैक, से बुझबाक प्रगल्‍भता एखन ओकरामे विकासित नहि भेल छैक। नेन्ना सभक चित्र वयस्‍क सभक चित्रसँ भिन्न भने देखाइत हुअए, मुदा गलत नहि भऽ सकैत अछि। तें हमरा जनितब नेन्ना सभक चित्र देखबाक नञि पढ़बाक वस्‍तु होइत अछि। एहि बातकें जखन चित्रकला सिखाबऽ बला शिक्षके नञि बुझैत छथि तँ सामान्‍य स्‍त्री-पुरुषक कथे की ! ब्‍लैकबोर्डपर चित्र बना कऽ पढ़ाएब नेन्ना सभक स्‍वतंत्र सोचपर अन्‍याय करब भेलैक। ओकरा आश्रित बनेनाइ भेलैक। हम योजित विषयपर नेन्ना सभक स्‍तरपर चर्चा कऽ ओकरा सभकें प्रेरित करबामे अधिक विश्‍वास राखैत छी, जाहिसँ ओकरा सभक मानस पटलपर ओहि विषएकेँ लऽ कऽ ओकर अपन स्‍वतंत्र बिम्‍ब बनौ, आ तकरा बाद ओ सभ अपन क्षमताक अनुरूप कागजपर ओकरा उतारए। भनहि ओ चित्र वयस्‍क सभक दृष्टियेँ कतबो बेढब, आकारहीन, मितिहीन होइ मुदा ओहि चित्रमे नेन्ना सभक अपन व्‍यक्तित्‍व हेतैक, ओकरासँ अपनत्व हेतैक, ओकर आत्‍मविश्‍वास बढ़तैक, स्‍वतंत्र रूपसँ अपन दिमाग लगएबाक आदति लगतैक। नेन्ना सभक चित्रमे एहिसँ अपेक्षा हमरा अपराध बुझाइत अछि, किएक तँ एखन ई विषए पढ़एबाक मूल उद्देश्‍य, एहि विषएक प्रति ओकरा मोनमे आत्‍मीयता उत्‍पन्न करब छैक, ओकरा चित्रकार बनेनाइ नञि। ई तँ काले तए करतै जे ओ चित्रकार बनत की नञि। एहि विषएक माध्‍यमसँ ओकरामे खाली नवनिर्माणक क्षमताक प्रति आस्‍था जागृत कएल जा सकैत अछि। एक गोट ठोस उदाहरणसँ एहि संकल्पनाकें आर बेसी स्‍पष्‍ट कएल जा सकैत अछि। साधारण रूपसँ जहन नेन्ना सभकेँ मुर्गीक चित्र बनेबाक लेल कहल जाइत छैक तँ ओ मुर्गीक पेटमे अन्‍डा सेहो देखबैत छै। आब हम सभ तथाकथित संस्कारसँ ग्रस्‍त लोक जहन ई चित्र देखैत छी, तँ गुम भऽ जाइत छी। जे केहन मतसुन्न नेन्ना अछि ई ? मुर्गीक पेटमहुक अन्‍डा कतऽ सँ देख लेलक ई ? बस लगलहुँ ओकरा हूथऽ ... तरह-तरहसँ ओहि महक गलती बुझाबऽ। चीजक ‘असलियत’ बुझने, लगलहुँ ओकरा ‘असली’ चीजक अर्थ बुझाबऽ। असलियत ई अछि जे आठ-दस साल धरि नेन्ना सभकें यथार्थ दृष्टि प्राकृतिक रूपसँ भेटल रहैत छैक। एकरा दोसर शब्‍दमे ‘एक्‍स रे’ दृष्टि सेहो कहि सकैत छिऐक। प्रत्‍येक वस्‍तुकें देखबाक ओकर अपन दृष्टिकोण होइत छैक। वस्‍तुकें आर-पार ओ देख सकैत अछि। मुदा हमरा सभक दृष्टिमे ओकर एहि दृष्टिकें कोनो मोजरे नञि। हम सभ सदखनि अपन तथाकथित वयस्‍क (!) संस्‍कारित दृष्टिकोणसँ सभ चीजकें नपबाक अभ्‍यस्त छी। तैं ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोणकेँ पढबामे हम सभ सक्षम होइत छी। ई रहने हमरा आओर तँ बुझितिऐक जे नेन्ना जहन मुर्गीक आङ्गिक विशेषताक बारेमे ख्‍याल करैत छैक तँ ओकर यथार्थवादी दृष्टिकोण इएह कहैत छैक जे मुर्गी अन्‍डा दैत छै। ई सोचिते ओकर मोन कहैत छै, एकर माने कतहु अन्‍डा जमा हेतैक। तुरत ओकर स्‍मरण ओकरा मदद करक वास्‍ते हाजिर भऽ जाइत छैक। माएसँ सुनने अछि, मुँहसँ खाएल अन्न पेटमे चलि जाइत छैक। माने पेटमे जमा होएबाक जगह छैक। ओ पेटमे अन्‍डा देखा दैत छैक। एहि प्रक्रियामे ओ गलत कोना आ कतऽ भेल? रहल वैज्ञानिक सत्‍यताक गप्‍प। तँ जेना-जेना ओकर उम्र बढतैक, उपरका दर्जामे ओ जाएत, ओकरा ईहो स्‍पष्‍ट भऽ जेतैक। एखनि तँ शिक्षकक उद्देश्‍य ई होबाक चाही जे ओ निडरतासँ अपना आपकें व्‍यक्त करबामे सक्षम हुअए। हमरा बुझने अपन कल्‍पना लादि कऽ शिक्षक आ गार्जियन सभ ओकर प्राकृतिक यथार्थकें, तार्किक दृष्टिकोणकें, ओकर स्‍मरणशक्तिक विकासकें कुंठित करबामे लागल छथि। सभाक उपसंहार करैत हम एतेक अवश्‍य कहलियन्हि, जे जाहि दिन नेन्ना सभक चित्रमे अपने सभ दखल देब बन्न कऽ देबन्हि, ओही दिनसँ नेन्ना सभक मानसिक विकास शुरू भऽ जेतैक। २ दुइये बरखमे मास्‍टरीसँ हमर मोन उपटि गेल। नोकरी छोडि देलहुँ। मुदा ई भाव सदिखन बनल रहल जे हम स्‍कूल नञि, अपन सिखबाक प्रयोगशाला  छोडि़ रहल छी। मुदा ईहो स्थिति बहुत दिन धरि नञि रहल। पुरना स्‍कूलक एक गोट स्‍टाफ हमर अभित्र छलाह। एकदिन हमरा अचक्‍के भेट गेलाह। कहऽ लगलाह जे एक गोट शिक्षक एक गोट झुग्‍गी बस्‍तीमे स्‍कूल खोलि रहल छथि। ओकर विशेषता ई अछि जे ओहि स्‍कूलमे ओ एहने विद्यार्थीकेँ एडमिशन देबऽ चाहैत छथि जकरा कोनो आन स्‍कूलमे एडमिशन नहि भेटैत छै। गप्‍प वास्‍तवमे ध्‍यान देबऽ योग्‍य रहैक। एहन स्‍कूल खोलबाक हेतु तेहन ध्‍येयवादी शिक्षक सभक आवश्‍यकता हेतैक। अपन अभिन्नक मंतव्‍य बुझबामे हमरा कनियो भाङ्गठ नहि भेल। मुदा हमरा एकहि नोकरीमे ई बुझबामे आबि गेल छल जे मास्‍टरीमे जाहि तरहक संयम, स्‍थैर्य आ धैर्यक आवश्‍यकता होइत छैक, हमरामे ओकर लेशो मात्र नञि अछि। हुनका तत्‍काल हम कोनो वचन नञि देलियन्हि। असलमे हम फेरसँ ओहि रुटीनमे फँसऽ नहि चाहैत छलहुँ। मुदा ओ अपनहिसँ हमर नामक सिफारिश कऽ देलन्हि। किछुए दिनमे हमरा ओहि मुख्याध्‍यापकजीक समाद भेटि गेल। ई १९८१-८२ क गप्‍प अछि। एक गोट शिष्‍टाचारक धर्म बुझि हम हुनकासँ भेंट करबाक निश्‍चय कएल। मुदा हुनक कथा-वार्तासँ हम बड्ड प्रभावित भेलहुँ। ओहो हमर प्रतिक्रिया स्‍वरूप टिप्‍पणीसँ प्रभावित बुझएलाह। हम ट्रायल बेसिसपर किछु दिनक हेतु हुनकर ऑफर स्‍वीकार करबाक निश्‍चय केलहुँ। एहिबेर हमर नियुक्ति माध्‍यमिक दर्जा (पँचमा सँ दसमा दर्जा) हेतु भेल रहए। झुग्‍गी बस्‍तीक ओहि स्‍कूलमे सभ तरहक अपराध बेरोकटोक चलै छल। दारू बनेनाइ, बेचनाइ, पिनाइ आ जूआ खेलेनाइ तँ बड्ड साधारण गप्‍प। बस्‍तीक स्‍वाभाविक अस्‍वच्‍छतासँ पसरल दुर्गन्धि आ दारूक गंधसँ स्‍कूलमे नाक नञि देल जाइ। स्‍कूलक खिड़कीक निच्‍चा जुआक दाँव लगै। ओ तँ धन्‍य कही मुख्याध्‍यापकजीक जे ओ निडरतासँ एहिसभ सँ निपटैत छलाह। लाठी लऽ कऽ खिहारि-खिहारि कऽ ओकरा सभकेँ भगबथि। आ स्‍कूलमे ओकरे सभक बेटा-बेटीकें पढ़एबाक भार उठाबथि। बेरोजगार युवक सभ महिला शिक्षिका सभकें बड्ड उछन्नरि दै। जान मुट्ठीमे लऽ कऽ सभ व्‍यवहार चलैक, किएक तँ कखन ककरासँ उट्ठा-बज्‍जरि भऽ जाए, एकर कोनो गैरेंटी नञि। अनुकूल परिस्थितिमे कोनो काजकें सफल बनेनाइ कोनो विशेष गप्‍प नञि। मुदा सभ तरहसँ परिस्थितिक प्रतिकूलतामे कोनो काजकें सफल बनेनाइ एकटा उपलब्धिये कहल जा सकैत अछि। आ सेहो शिक्षा जेकाँ एक गोट गंभीर तथा जिम्‍मेदारीबला क्षेत्रमे। मुख्‍याध्‍यापकजीक एहि साहसकें एक तरहें तपस्‍ये कहल जएबाक चाही। बस इएह एक गोट बात छल जाहि सँ हम हुनका दिसि आकर्षित भेलहुँ। एक गोट भित्र तरहक, शिक्षाक असली बेगरताबला नेन्ना सभक संग साथक अनुभव। स्‍कूलक टाइम-टेबुलमे ‘चित्रकला’ एकतरहें जगह भरऽ बला (Filter) विषयक तौरपर लेल जाइत अछि। टाइम-टेबुलमे सभसँ अग्रिम स्‍थान पाबऽ बला विषए होइत अछि गणित (हिसाब), दोसर मान विज्ञानक, तेसर मान देल जाइत अछि भाषाकें, ताहूमे अंग्रेजीक स्‍थान प्रथम, तहन मातृभाषा, तकरा बाद द्वितीय भाषा। चारिम स्‍थानपर इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्‍त्रकें कोनहुना फिट कऽ देल जाइत छैक। तहन अबैत छैक नम्‍बर पॉलिसी मैटरबला विषए सभक, जेना कार्यानुभव, हस्‍तकला, चित्रकला, पी.टी., जकरा ‘खेल’ क नामपर शहीद कऽ देल जाइत छैक। सप्‍ताहमे एक-दू बेर सांस्‍कृतिक कार्यक नामपर अनेक तरहक छूटल-छिरियाएल विषएसँ छुतिका छोड़ा लेल जाइत छैक। अइ कथापर गौर केलासँ शिक्षाक दर्जा आ ओहिसँ होबऽबला परिणामक अंदाज अ‍ाबि सकैत अछि। आटा पीसऽबला मशीनकें देखियौ। ओकर मुँहमे गहूम अथवा आन कोनो अनाज उझील देल जाइत छैक। आ किछुए कालमे दोसर दिसिसँ पिसाए आटा बहरा जाइत छैक। आजुक शिक्षा-पद्धतिकें देखिकऽ हमरा ई स्‍कूलो सभ विद्यार्थी बनाबऽ बला बड़का-बड़का मशीने बुझाए लगैत अछि, जाहिमे प्रत्‍येक वर्ष विद्याक अर्थी उठाओल जाइत अछि। त्रुटि दृष्टिकोण (Vision) मे नञि, त्रुटि कार्यान्‍वयन (Execution) मे अछि। प्रत्‍येक विषयक अपन किछु विशिष्‍टता छैक। समय आ स्‍थानक मर्याद अछि। तैँ सम्‍प्रति मात्र किछु पॉलिसी मैटरबला विषएक सन्‍दर्भमे हम अपन विचार राखब। असलमे एहि सभ विषएकें दू गोट श्रेणीमे राखल जा सकैत अछि। दिमागमे तनाव पैदा करऽ बला विषए आ दिमागी तनावकें ढील (Relax) करऽ बला विषय। मुख्‍य विषए सभ कोनो ने कोनो सिद्धान्‍तक व्‍याकरणक ज्ञान दैत छैक। एहि तरहक विषए सभमे शरीर स्थिर रहैत छैक मुदा दिमागी एकाग्रता, सतर्कता, आ जागरूकता अपन चरमपर, जाहिसँ दिमागपर दबाव बनैत छैक। दोसर दिस हस्‍तकला, चित्रकला, संगीत, कार्यानुभव, पी.टी. (खेल) एहि तरहक विषए सभमे एक तरहक नवनिर्मितिक आनन्‍द भेटैत छैक। संपूर्ण शरीरमे भित्र-भित्र तरहक लय, ताल आ भंगिमामे कृतिशील रहलासँ मनोरंजनक अनुभति होइत छैक। एहिसँ तनाव आ दबावकें ढील होमएमे मदति भेटैत छैक। तें नेन्ना सभक टाइम-टेबुलमे एहि दूनू तरहक विषएकें एहि तरहें बान्‍हल जएबाक चाही, जाहिसँ समतोल (Balance) बनल रहै। जतेक सम्‍भव भऽ सकै, तनाव उत्‍पत्र करऽबला विषएक बाद, तनावकेँ मुक्त करबाक वास्‍ते दोसर तरहक विषएक रचना करबाक चाही। जाहि सँ अगिलुका विषएक तनाव झेलबाक क्षमता उत्‍पत्र भऽ सकए। अइमे मेहनति छैक, दिमागी छैक। योजनाबद्ध तरीकासँ काज करबाक परीक्षा छैक। के करत ? मुदा एहि विषए सभक योग्‍य नियोजनसँ की चम‍त्‍कार भऽ सकैत छैक तकर प्रत्‍यक्ष अनुभव हमरा एहि स्‍कूलमे कएल अपन प्रयोगसँ भेल। जाहि तरहक वातावरणसँ ई स्‍कूल घेराएल छल तकर वर्णन तँ ऊपर केनहे छी। एहन वातावरणमे के टिकए ? तें शिक्षक सभक कमी सदिखन बनल रहैक। कोटा पद्धतिसँ शिक्षकक नियुक्ति, तकरामे आर अड़चनि पैदा करए। बहुत रास विषएक शिक्षके नहि भेटै। आपसमे कहुना कऽ ऐडजस्‍ट करैत विषए सभ पढ़ाअ‍ोल जाइ। हमरो कोनो ने कोनो शिक्षकक क्षतिपूर्ति करबाक वास्‍ते बेगरतू कक्षामे पठा देल जाए। हमहूँ एकरा एक गोट मौका बूझि कऽ टाइम-टेबुलपर देल विषए पढाबऽ लागी। कतहु अंग्रेजी तँ कतहु मराठी, कतहु हिन्‍दी तँ कतहु आन कोनो विषए। ताबत ए.टी.डी. कएलाक बाद हम रुपारेल कॉलेजसँ बी.ए. कऽ लेने रही। थिएटर डिप्‍लोमा चलि रहल छल। तैं पँचमासँ दसमा धरिक नेन्ना सभकें विषए पढ़ेनाइ ततेक कठिन नञि बुझाए। हम बी.ए. अर्थशास्‍त्र लऽ कएने रही। तें दसमा वर्गमे अर्थशास्‍त्र पढ़एबाक जिम्‍मा हमरे दऽ देल गेल रहए। नियामनुसार ई ठीक नञि छल। किऐक तँ हमर नियुक्ति रहए स्‍पेशल शिक्षकक रूपमे। मुख्‍य विषए पढ़एबाक हेतु हम प्रशिक्षित नञि रही। मुदा मुख्‍याध्‍यापको मजबूर छलाह। दोसर कोनो उपाये नञि रहनि। अहिना एकदिन हमरा दिमागमे एक गोट बात आएल। जे एकहि कक्षामे एक गोट विद्यार्थी प्रथम अबैत छैक। आ ओकरे बगलमे बैसऽबला फेल भऽ जाइत छैक, से किएक ? दोसर बात जे फेल विद्यार्थियो कोनो विषएमे बढिञाँ  अंक आनैत अछि तँ कोनोमे खराप, से किएक ? जखन कि कक्षा, शिक्षक, समए सभ एके रंगक होइत छैक। किछु कारण तँ अवश्‍ये हेतैक। विचार केला सन्‍ता ई बुझाएल जे जाहि विषएमे ओ बेसी अंक आनैत अछि ओहिमे अवश्‍ये एहन किछु गप्‍प छैक जे ओकरा पसिन्न छैक। तें ओहि विषएमे ओकर मोन अधिक रमै‍त छैक। दोसर विषएमे ठीक एकर उल्‍टा हेतैक। यदि ओहि विशिष्‍ट विषएमे सँ ओकर पसीन (Interest) केँ ताकि लेल जाए तँ दोसर विषएमे ओकर ओहि पसीनकें पैदा कऽ कऽ परिणाम बदलल जा सकैत अछि की नहि ? हम एहि दिशामे प्रयत्‍न करबाक निश्‍चए केलहुँ। ओहि समएमे प्रत्‍येक कक्षाकें विद्यार्थी-संख्‍याक अनुसार ‘अ’-‘ब’-‘क’-‘ड’-‘ई’ ...एहि तरहेँ भिन्न-भिन्न विभागक संरचना कएल जाए। एहि व्‍यवस्‍थामे ‘अ’-‘ब’ मे बढिञाँ, पास होबऽ बला विद्यार्थी आ ओकरा बादक दर्जामे सभ भुसकौल, फेल होबऽबला विद्यार्थी सभ राखल जाइ। आब अइ तरहक भिन्न-भिनाऊज करबाक अनुमति नञि छैक। मिझ्झर कऽ बैसाएल जाइत छैक। तँ हम आठमा ‘ड’ क चारि गोट विद्यार्थीकेँ हेरि ओकरा सभकें दत्तक लेबाक विचार कएलहुँ। माने एहि चारि गोट विद्यार्थीक परीक्षा-परिणाममे परिवर्तन अनबाक दृष्टिसँ हम ओकरा सभक मार्गदर्शन करबाक जिम्‍मा उठा लेलहुँ। विद्यार्थी सभक मानसिकताकें परखऽ लेल हम चित्रकलाकें आधार बनाओल। हमरा सफलतो दृष्टिगोचार होमए लागल। एहि प्रयोगक पराकाष्‍ठामे हमरा आश्‍चर्यजनक गप्‍प सभक पता लागल। पँचमा दर्जाक एक गोट विद्यार्थी हमरा एहेन भेटल, जकरा कोनो चित्र बनाबऽ कहिऐक तँ ओ अपन चित्रकलाक कॉपी ठाढ़े (Vertical) अवस्थामे पकड़ैक। पहिने तँ एहि बातकें हम कोनो गम्‍भीरतासँ नहि लऽ पेलहुँ। मुदा जहन एकर पुनरावृत्ति होमए लगलैक तखन हमर ध्‍यान एहि दिसि गेल। तकरा बाद तँ हम जानि-बूझि कऽ ओकर प्रत्‍येक कृतिकें अपन अध्‍ययनक (Study) विषए बना लेलहुँ। ओकर रचना, आकृतिक बनावट, रंगक चुनाव, रंगबाक पद्धति... ओकर प्रत्‍येक कृतिकें कखनो हम अलग (Isolate) कऽ कऽ देखिऐक तँ कखनो आन विद्यार्थी सभक तुलनामे। ई क्रम बहुत दिन धरि चलैत रहलैक। एकर चरम आबि गेलै ओहि दिन, जहिया हम विषए देने रहिऐक ‘हमर परिवार’ (My family) । ओकर ई चित्र जेना भक दऽ हमर आँखि फोलि देलक। एहि चित्रसँ जाहि तरहक निष्‍कर्ष निकलल ओहिकें ठीकसँ बुझबा लेल सर्वप्रथम ओकर चित्रक बनावटकेँ ठीकसँ बूझए पड़त। सभसँ पहिने ओकरा द्वारा कागजकें ठाढ़ कऽ कऽ पकड़बाक पाछाँक रहस्‍य बूझि ली। कॉपी ठढ़का आयतक आकार लऽ लैत छैक। जाहिमे चौड़ाइ कम आ लम्‍बाइ बेसी होइत छैक। एहिसँ ओ ‘जगहक संकोच’ दिसि हमर सभक ध्‍यान आकृष्‍ट करऽ चाहैत छल। छोट जगह ओकर नियति बनि गेल छलैक। स्‍थानक ई अभाव ओकरा दिमागपर एतेक हाबी छलैक जे ओ एहिसँ बाहर सोचिये नहि सकैत छल। आब ओकर चित्रक संरचनाक (Construction) विषएमे। कागचक भीतर दिसि चारूकात अंदाजसँ एक-दू इन्‍चक बॉर्डर छोडि़ कऽ ओ रेघ खिचने छल। जेना ठाढ़ आयताकार कागजक भीतर एक गोट आर ठाढ़ आयत। चित्रक परिपूर्णतामे ई डायनिंग टेबुल जकॉं देखाइत छल। डायनिंग टेबुलक छवि (Image) ओकरा लेल आइ-काल्‍हुक सिनेमा आ टीभी प्रोग्रामक देन छलैक, ई बूझल जा सकैत अछि। टेबुलक उपरका हिस्‍सामे दू गोट अल्‍पवयी नेन्नाक बीचमे एक गोट वयस्‍क स्‍त्रीकेँ चित्रित कएल गेल रहैक। ई सम्‍भवत: ओकर माए आ भाएक छवि छलैक। आ ओकरा सभक आगूमे थारी, बाटी, आ गिलास सदृश किछु समान सभ। निचलुका हिस्‍सामे केवल एक गोट नेन्नाक आकार। सम्‍भवत: ओ स्‍वयं। ओकरो आगूमे ओहिना किछु बासन सभ। टेबुलक बिचला पूरा हिस्‍सा खाली। रंगक नामपर जे रंग भेटलैक ओकरा ओ पोछि-पाछि देने रहैक। एहिमे प्रत्‍येक वस्‍तुक प्रति ओकर उदासीनता प्रकट भऽ रहल छलैक। मुदा ओहूमे गौर करबाक गप्‍प ई जे लाल रंगक उपयोग प्रमाणमे किछु बेशिये बुझाइत रहैक। ई ओकर मरखाहा (Aggresive) प्रवृत्तिक निदर्शक छलै। आर किछु छोट-मोट विशेषता (Details) भऽ सकैत अछि जे हम बिसरि गेल होएब। मुदा कुल मिला कऽ ओहि नेन्नाक मानसिकता बुझबाक दृष्टिसँ ओकरा द्वारा चित्रित दृश्‍यक एतबा वर्णन काफी अछि। ओहि चित्रकें लऽ कऽ एक गोट कला शिक्षकक रूपमे तथा प्रत्‍येक कृतिक पाछाँक सत्‍यक सन्‍धानमे रुचि राखऽबला एक गोट विद्यार्थीक रूपमे हमरा अपना जे बुझाएल ताहि दिसि देखी। चित्रक विषए रहैक हमर परिवार (My family)। ई चित्रित करबाक वास्‍ते विद्यार्थी द्वारा ‘खाइक बेर’ क दृश्‍यक चुनाव करब, हमरा जनितब ओहि नेन्नाक जागृत बुद्धिकेँ देखाबैत छल। किएक तँ मुम्‍बइ सन शहरमे साधारण रूपसँ इएह ओ बेर होइत अछि, जाहिमे परिवारक सभ सदस्‍यक एक संगे बैसब संभावित छैक। वास्‍तवमे किओ बैसैत छैक कि नञि ई आन गप्‍प अछि। आन नेन्ना सभमे किओ एकरा लेल ‘बगीचा’ क चुनाव कएने छल, तँ किओ कोनो समारम्‍भक। एहि सभ विभिन्ना दृश्‍यक चुनावक पाछाँ सम्‍बन्धित पारिवारिक स्थितिकें लऽ कऽ बनल मानसिकताक छाप स्‍पष्‍ट रूपसँ बुझाइत छलैक। आब चित्रक रचनाक मादे। डायनिंग टेबुलक एक छोरपर बनल दू गोट नेन्नाक बीचमे बैसल स्‍त्री तथा दोसर छोरपर चित्रित एकसरि नेन्ना। ई पारिवारिक समबन्‍धमे आएल कोनो तरहक दूरी दिसि इंगित करैत अछि। सभसँ चौंकाबऽबला गप्‍प तँ ई छल जे एहि चित्रमे वयस्‍क पुरुषक रूपमे ककरो चित्रित नहि कएल गेल रहैक। हमरा बुझने ई बात परिवारसँ गाएब पिताक अस्तित्‍वक सम्‍बन्‍धमे छल। टेबुलक दोसर कोन्‍टा महक एक गोट नेन्नाक आकारक माध्‍यमसँ ओ ककरो एकसरिपन (Loneliness) देखा रहल छल। साइत परिवार-समूहसँ दुराएल नेनपन! कोनो ठोस निर्णयपर पहुँचबाक पहिने विचार कएलहुँ जे ओहि विद्यार्थीसँ एहि सम्‍बन्‍धमे गप्‍प कएल जाए। ओकरा अपन विश्‍वासपात्र बनएबाक दृष्टिसँ प्रयत्‍न शुरू कएलहुँ। किछुए दिनमे ओ बधि गेल। तकरा बाद फुसिए आहे-माहे करैत, ओकरा पोल्‍हा-पोल्‍हा कऽ जाहिसँ ओकरा कोनो तरहक शंका नञि होइ, ई ख्‍याल रखैत ओकर दिन क्रम, घरक वातावरण, माता-पिता, भाइ-बहिन इत्‍यादि जीवन सम्‍बन्‍धी बातक लेबऽ लगलहुँ। गप्‍प करिते सभ चीज फरिछा गेल। दुर्भाग्‍यसँ हमर कयास ठीके रहए। आब ओकर बापसँ गप्‍प करब हमरा बड्ड आवश्‍यक बुझाए लागल। दू-तीन बेरुक समादक बाद ओ भेंट करऽ आएल। किछु परिचय-पात्र भेलाक पश्‍चात जतबे गम्‍भीरतासँ हम ओकर बेटाक बारेमे चिन्‍ता व्‍यक्त करैत गेलहुँ, ओतबे दृढ़तासँ ओ एहि गप्‍पक खंडन करैत रहल। ओकरा मोने हम अनेरे एहि गप्‍पकें गंभीर बुझि रहल छलहुँ। हारि कऽ हम ओहि विषएकें छोड़ि ओकर नोकरीक विषएमे, ओकर परिवारक विषएमे, ओकर दिनचर्याक विषएमे गप्‍प करऽ लगलहुँ। बेटा नान्हिएटा रहैक, जखन ओकर पहिल स्‍त्री स्‍वर्ग सिधारि गेल रहैक। टुअर नेन्नाकें माएक कमी नञि बुझाइ, तैं ओ दोसर बियाह कऽ लेलक। नव माउगिसँ दू गोट आर नेन्ना, एक गोट बेटा, एक गोट बेटी। घरमे कमाए जोगरि वएह एके टा बेकति। भोरे काजपर चलि जाए तँ आबए साँझखनि। ई सभ बढिञाँसँ चलि रहल रहैक, एक तँ दोसर माउगि अपन नेन्ना आ ओकर पहिल नेन्नामे कहिओ कोनो फरक नहि केलकै। ई छल एहि दिसि देखबाक ओकर दृष्टिकोण। तैयो हम अपना मर्यादामे ओकरा हृदए धरि एतेक बात पहुँचा देलाइक जे एहि बेटाक बारेमे जतबा ओ बूझैत अछि ओतबा सभ किछु ठीक ठाक नञि छै। तैं तरहें आस-पड़ोससँ, दोस्‍त महीमसँ, आन कोनो स्रोतसँ एहि गप्‍पक वास्‍तविकताक जतेक जल्‍दी पता लगा लेत, ओकरा हेतु ओतबे योग्‍य हेतैक। खैर, बात आएल-गेल भऽ गेलैक। हमहूँ रुटीनमे लागि गेलहुँ। एकदिन अचानक शिक्षक-कक्षमे ओ हाजिर भऽ गेल। नमस्‍कार पातीक पश्‍चात हम अपन व्‍यक्तिगत काजमे लागि गेलहुँ। हमरा भेल अपन कोनो काजसँ ओ आएल होएत। मुदा जहन बड़ी काल धरि बिना कोनो एहन विशेष व्‍यवहारक मूड़ी खसौने बैसल देखलिऐक तँ शंका भेल। औपचारिकतावश पूछि देलिऐक जे कोनो विशेष कार्यसँ आएल छह की विद्यर्थीक रुटीन रिपोर्ट लेबाक वास्‍ते। हालाँकि अहि बातक संभावना कम्‍मे रहैक। कनेक कालक दुबिधाक बाद ओ कहलक जे अहींसँ भेंट करबाक अछि। अपन देह-भंगिमासँ ओ बड्ड डिस्‍टर्ब्‍ड बुझाएल। किछु संकोचमे सेहो रहए। हमरा कने-मने ई बुझबामे आबि गेल जे हम जे ओकर बेटाक मादे कहने रहिऐक, ओही सम्‍बन्‍धमे कोनो हेतैक। ओकरा सहज करबामे कनेक बेर तँ लागल मुदा हमरा लऽ कऽ सभ तरहें आरश्‍वस्‍त भेलाक बाद गरम बालुमे फुटैत मकइक लाबा जकाँ ओ भड़भड़ाए लागल। संपूर्ण रामायणक सार ई जे हम विद्यार्थीक चित्रकलाक आधारपर जे गप्‍प ओकरा कहने रहिऐक तकर वास्‍तविकता ओकरा समक्ष आबि गेल रहैक। हम जाहि शंकाक बीज ओकरा हृदएमे रो‍पि देने रहिऐक ओ राति-दिन ओकरा खिहारऽ लगलैक। ओहिसँ पाछाँ छोड़एबाक हेतु ओ एहि बातक तहमे जएबाक निश्‍चय केलक, जाहिसँ हमर सिद्धान्‍तक झूठ वा सत्‍य सामने आबि गेलापर ओकरा कमसँ कम एहि दुबिधासँ छुटकारा तँ भेटिये जेतैक। मुदा भेलै उन्‍टा। सत्‍यक ई चेहरा ओकर कल्‍पनोसँ अधिक भयंकर छलै। नव पत्‍नीकें अपन संतान भेलाक बादक परिस्थितिमे भेल बदलावसँ ओ पूर्णरूपेण अनभिज्ञ छल। भोरूक गेल नोकरीसँ साँझ धरि घुरए। बेटा किछु कहबो करैक तँ नेन्ना सभक गप्‍प बूझि कऽ बातकें टारि जाए। पत्‍नीयो हँसी-मजाकक आधार लऽ कऽ गप्‍पक गंभीरताकें स्‍पष्‍ट नहि होमऽ दैक। पतिक परोक्षमे ओहि नेन्नासँ ओकर व्यवहार पास-पड़ोसक लोक सभक नजरिमे सेहो आबऽ लागल रहैक। मुदा मुंबइ सन महानगरमे अनकर जीवनमे केओ जल्‍दी पैसार नञि करैत अछि। ककरो एतेक फुरिसतिए कतऽ ? केओ किछु कहियो दैक तँ पत्‍नी कानि-भाखि कऽ ओहि बातकें एना घुमा देथि जे ओकरा पत्‍नीक बातपर अविश्‍वास करबाक कोनो कारणें नहि रहि जाइक। हमरासँ चर्च भेलाक बाद ओ काजपर सँ कोनो ने कोनो बहन्ने औचक्‍कें घर घूरऽ लागल। घरबाक व्‍यवहारपर दूरेसँ नजरि राखऽ लागल तँ परिणामो दे‍खाए लगलैक। लोक सभक मुँहसँ सूनल गप्‍पक सत्‍यता दृष्टिमे आबऽ लगलैक। पहिने तँ एकाध दिनक बात बूझि कऽ अनठेलक। मुदा अनुभवक पुनरावृतिसँ ओ ठहकल। स्‍कूल छुटलाक बाद बेटा घर लौटए तँ सतमाय दरबज्‍जो नञि फोलए। बेरहटिया धरि भोजन-भात निपटा कऽ दुनू नेन्नाक संग सूति रहए। आ ई दरबज्‍जा ठोकैत-ठोकैत कानि –बाजि कऽ भूखल-पिआसल चौकठेपर बस्‍ता लेने ओकर उठबाक बाट जोहैत बैसल रहि जाए। पड़ोसी सभक नजरि पड़ैक तँ ओ सभ किछु खुआ दैक। स्‍त्री उठैक तँ बहन्ना बना दैक जे मोन खराप छल, आँखि लागि गेल तैं नञि बुझलिऐक। ऊपरसँ डरो देखा दैक जे बाबूकें कहबही तँ बूझि लिहें। छोट-छोट गप्‍पपर लोहछा देनाइ तँ सामान्‍य गप्‍प रहैक। नेन्ना नहूँ-नहूँ अपना कोश (Cell) मे घुसऽ लगलैक। ओकरा असुरक्षाक भाव घेरऽ लगलैक। नेन्ना सभक ‘अहं’ बहुत व्‍यापक होइत छैक। ओहि ‘अहं’ केँ नान्हियोटा धक्‍का लगलासँ ओ लोहछि जाइत अछि। मुदा नेन्ना सभ लग ओहि भावनाकें, दर्दकें, व्‍यक्त करबाक हेतु सियान सन साधन नञि होइत छैक। योग्‍य शब्‍द संग्रह नञि होइत छैक। दोसर शब्‍दमे एहि उम्रक नेन्ना सभ लग हम-अहाँ आसानीसँ बूझि सकिऐ एहि तरहक भावनाक आदात-प्रदानक कोनो स्‍पष्‍ट भाषा विकसित नहि भेल रहैत छैक। तैँ ओ सभ अपन भावनाकेँ प्रतीकात्मक रूपसँ व्यक्त करबाक प्रयत्न करैत देखाइत अछि। ई प्रतीकात्मकता उम्रक विभिन्न अवस्थामे भिन्न–भिन्न तरहक होइत जाइत छैक। उदाहरणार्थ, शैशवावस्थामे नेना सभ अनेकानेक तरहसँ कानि कऽ अपन भावना व्यक्त करैत छथि। आइ तँ एहि तरहक भाषाक विश्लेषण सेहो सम्भव भऽ गेल अछि। एहि भाषाकेँ ज्ञाता वा अभ्यासक, नेना सभक कानब सुनि कऽ ओहि विशिष्ट समएमे हुनक जे माँग आ समस्या छनि तकर निदान कऽ सकैत छथि। बाल्यावस्थामे अपन विरोध जतएबाक हेतु नेना सभ रूसि कऽ खेनाइ बारि कऽ अथवा कोनो आन तरहक नोकसान कऽ कऽ अपन भावनाकेँ व्यक्त करैत देखाइत अछि। नेना सभक व्यक्त करबाक इएह प्रतीकात्मक भाषाक कड़ीमे चित्रकला एक गोट महत्वपूर्ण अध्याय अछि। तैं हमर कहब अछि, जे नेना सभक चित्रकला देखबाक नहि अपितु पढ़बाक वस्तु होइत अछि। विद्यार्थीक पिताकेँ हम जतेक बुझा सकलिऐक, बुझेलिऐक। ‘जे बेटा भीतरसँ पूर्ण रूपेण टूटि गेल अछि, ओकरा शीघ्रातिशीघ्र मूल स्वभावपर आनब अति आवश्यक अछि। सभसँ पहिने ओकरा भीतरसँ असुरक्षाक भावनाकेँ निकालब जरुरी अछि। ओकर हेराएल आत्मविश्वासकेँ पुनः प्रस्थापित केनाइ जरूरी अछि। पाछाँ छुटि गेल माता–पिताक अस्तित्वकेँ ओकरा जीवनमे सम्मिलित करब जरूरी अछि। ओकरा भीतर ई  विश्वास जगेनाइ जरूरी अछि जे ओहो एहि परिवारक एक गोट महत्वपूर्ण सदस्य अछि। एहि परिवारक ओकरो आवश्यकता छैक आ आन सदस्य जकाँ ओकरो सभ तरहेँ सभपर समान हक छैक। अन्यथा एहि परिवारक व्यवहारसँ एखन धरि ओकरा भीतर जाहि तरहक शत्रुत्व (Hatred) पनपि रहल अछि, ओ आगू चलि कऽ एहन भयानक रूप लऽ सकैत अछि, जकर एखन कल्पनो नञि कएल जा सकैत अछि’। ई सुनि कऽ ओ किछु ठहकल। पूछलक, ‘तखन आब उपाय की’? हम कहलियन्हि- ‘उपाय ई जे सभसँ पहिने अपना घरबालीकेँ बुझबिऔन्ह जे हुनकर व्यवहारक की परिणाम भऽ सकैत अछि। तकरा बाद किछु दिनक छुट्टी लऽ लिअ। एहि माहौलसँ ओकरा बाहर निकालू। सपरिवार पन्द्रह–बीस दिनक लेल कतहु बाहर घुमि आउ। मुदा एहि पूरा समएमे ओकरा ई अनुभव कराओल जाए जे आइ धरिक अनुभवसँ ओकर जे भावना बनल छलैक से गलत छै। खास कऽ सतमाएक माध्यमसँ ई सन्देश जाए। एहि यात्राक सभ कार्यक्रम ओकरा केन्द्रमे राखि कऽ बनाओल जेबाक चाही। मुदा सतभाय, सतबहीन, सतमाय तथा पिताक समान सहभागिता रहौक। ओकरा प्रति सभक व्यवहार सहज रहौक। ओहिमे कोनो तरहक देखाबा नहि रहौक। नेनाकेँ ई शंका नञि होइ जे जानि–बुझि कऽ हमरापर विशेष ध्यान देल जा रहल अछि। एहिसँ अपन पुरनका अनुभवकेँ ओ एक गोट दुःस्वप्न मानि कऽ ओहिसँ बाहर आबि जाएत। मुदा ओकर बाद एहि पुरनका अनुभवक ने चर्चा होए आ ने पुनरावृत्ति’। ओकर किछुए दिनक बाद हम स्कूल छोड़ि देने रही। मुदा हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे ओहि विद्यार्थीक जीवनमे अवश्ये किछु सकारात्मक उद्यम भेल हेतैक, जकर पूर्ण श्रेय जएबाक चाही चित्रकला सन सृजन शील विषएकेँ जकरा माध्यमसँ ओ अपन आंतरिक भावनाकेँ व्यक्त करबामे सक्षम भऽ सकल। प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक मिथिलाक इतिहास (अध्याय- १५सँ १८) अध्याय–15 मिथिलाक प्रशासनिक इतिहास प्राचीन कालमे मिथिला एक एहेन स्थान छल जतए जनक सन शासक छलाह; याज्ञवल्म्य सन विधि विशेषज्ञ एवँ विधिकर्त्ता तथा गौतम सन प्रख्यात नैयायिक। एक ठाम एहेन त्रिरातक जुटब कोनो सामान्य बात नहि अपितु ओहि माँटिक विशेषता कहल जा सकइयै। जनक कालीन मिथिला अपना युगमे राजतंत्रक प्रधान केन्द्र छल मुदा ओ राजतंत्र सब तरहे आदर्श राजतंत्र कहल जा सकइयै आर एकर प्रमाण हमरा उपनिषदसँ भेटइत अछि। अलफातुनक दार्शनिक राजाक कल्पना मिथिलहिमे जनक युगमे साकार भेल छल आर हमर एहि कथनकेँ कोनो रूपेँ अतिशयोक्ति नहि कहल जा सकइयै। बृहदारण्यक उपनिषदसँ ज्ञात होइछ जे राजामे अपन प्रजाक हाल–चाल बुझबाक हेतु बरोबरि अपन राज्यमे भ्रमण करैत रहैत छलाह आर राजाक अहि परिभ्रमणक क्रममे गामक बृद्ध लोकनि राजाक ठहरबाक आर सुख सुविधाक व्यवस्था करैत छलाह। जाधरि राजा अहि प्रकारक यात्रापर रहैत छलाह ताधरि ओ लोकनि राजाक संग रहैत छलाह। गामक मुख्य पदाधिकारी उग्रकर्मासूत कहबैत छलाह आर ओ गामक बृद्धक संग मिलि शासन कार्य चलबैत छलाह। राजा अपन प्रजासँ प्रेम करैत छलाह आर प्रजाक स्थितिक ज्ञान प्राप्त करबाक लेल स्वयं बरोबरि भ्रमणशील रहैत छलाह। उग्रकर्मासूतकेँ पुलिस पदाधिकारी सेहो कहल गेल अछि। प्राचीनकाल ग्यारह रत्निनमे एकटा ‘सूत’ सेहो होइत छलाह आर बादमे इएह इतिहासकारक काज सेहो करए लागल छलाह। जनक कालीन मिथिलामे हिनक मुख्य काज ग्रामीण शासन व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनाके राखब आर जनताक कल्याणपर ध्यान देब। एतबा सब किछु होइतहुँ ताहु दिनमे अकाल पड़ैत छल आर जनकक समयमे अनावृष्टिक कारणे अकाल पड़ल छल जाहिमे जनककेँ स्वयं हर जोतए पड़ल छलन्हि। वैदिक कालमे मिथिलामे राजतंत्रिय व्यवस्था छल आर वंशानुगत राजतंत्र प्रणालीक जड़ि जमि चुकल छल। पवित्रताक भावना राजा लोकनिकेँ रहैत छलन्हि। राजा लोकनि शक्तिशाली होइत छलाह। राजदरबारमे ब्राह्मणक प्रधानता छल आर संगहि सेनापति आर रथकार सेहो रहैत छलाह। एतरेय ब्राह्मणक अनुसार ककरोसँ कोनो काज लेब राजाक विशेषाधिकार बुझल जाइत छल। राजा समस्त मानवक एक मात्र शासक मानल जाइत छलाह आर ओहिमे जे गैरजबाब देह होइत छलाह हुनका प्रजाक भोक्ता काल जाइत छल। जनप्रिय राजा लोकनिकेँ देवक संज्ञा भेटइत छलन्हि। ब्राह्मण साहित्यमे राजा जनककेँ सम्राट सेहो कहल गेल छन्हि। राजा जनकक समयमे राजतंत्र मिथिलामे चरमोत्कर्षपर छल। अत्याचारी राजापर अंकुश रखबाक हेतु प्राचीन मनीषि लोकनि अधिकाधिक नियम बनौने छलाह। राज्याभिषेकक अवसरपर जे शपथ ग्रहण होइत छल ताहिमे राजाकेँ ई प्रतिज्ञा करए पड़ैत छलन्हि जे ओ अपना प्रजाक हेतु किछु उठा नहि रखताह। राज्यमे सूत, ग्रामणी आर अनान्य अधिकारी वर्गक बड्ड महत्व छल आर राजाक निर्वाचनमे इएह लोकनि सर्वेसर्वा होइत छलाह। तैं तँ शतपथ ब्राह्मणमे हिनका लोकनिकेँ “राजकृत” सेहो कहल गेल छन्हि। वैदिक युगमे विदथ, सभा आर समितिक उल्लेख सेहो भेटैछ। विदथ बड्ड बड्ड पुरान संस्था छल आर मिथिलामे एकर प्रचलन छलैक अथवा नहिसे कहब असंभव। सभा समिति प्राचीन वैदिक वैधानिक संस्था छल आर एहि माध्यमसँ राजापर अंकुश राखल जाइत छल। गिलगिटसँ प्राप्त बौद्ध पाण्डुलिपिमे एहिबातक उल्लेख अछि जे मिथिलाक राजाक ओतए ५००अमात्य रहैत छलाह जाहिमे ‘खण्ड’ अमात्य अग्रगण्य छलाह। खण्ड शक्तिशाली अमात्य छलाह आर समस्त मिथिला राज्यमे हुनक धाक जमल छलहि। खण्डक वक्तव्यसँ ई स्पष्ट अछि कि जखन वैशालीमे गणराज्यक स्थापना भऽ चुकल छल तखनो मिथिलामे राजतंत्र प्रतिष्ठित राजनैतिक व्यवस्था छल। महाउम्मग्गजातकसँ ई ज्ञात होइत अछि जे मिथिलामे राजा विदेहक ओतए केवट नामक एकटा प्रधानमंत्री छलाह। मिथिलापर एकबेर जखन उत्तर पाँचाल दिसिसँ आक्रमण भेल छल तखन मिथिलाक रक्षार्थ केवट किछु उठा नहि रखने छलाह। केवटक कथा विशद विश्लेषण जातक कथामे भेटैत अछि। कराल जनकक कुकृत्यसँ तंग भए मिथिलाक जनता राजतंत्रक जूआकेँ उठा फेकलक आर ओहि स्थानपर वैशालीक देखादेखी गणतंत्रक स्थापना केलक। किछु दिनक पश्चात् विदेह गणराज्य अपन सुरक्षार्थ वैशालीक गणराज्यसँ मिलि जुलिकेँ रहए लागल आर वज्जीसंघ प्रमुख सदस्य सेहो भऽ गेल। वैशालीक गणराज्य शासन पद्धति :- वैशालीक लिच्छवी लोकनिक शासन गणतांत्रिक छल। राज्यक शक्ति जनतामे निहित छल। कौटिल्य लिच्छवी लोकनिक हेतु ‘राजशब्दोपजीवीसंघ’क व्यवहार कएने छथि। ‘ललितविस्तार’क अनुसार वैशालीक प्रत्येक व्यक्ति अपना सम्बन्धमे इएह बुझैत छल जे ओ राजा अछि। केओ अपनाकेँ ककरोसँ छोट नहि बुझैत छलाह। ओहिठामक राज्यशक्ति समूहमे निहित छल। शासक राज्यक सेवक बुझल जाइत छलाह। परिषदक बैसक जाहि भवनमे होइत छल तकरा ‘संथागार’ कहल जाइत छल। संथागारेमे बैसिकेँ सब केओ राजनैतिक आर सामाजिक प्रश्नपर विचार विमर्श करैत जाइत छलाह। परिषदक स्भापति अथवा गणमुख्य सेहो राजा कहबैत छलाह। वैशालीमे ७७०७राजाक उल्लेख भेटैत अछि। संभवतः ई सब गोटए कुलीन परिवारक छलाह आर शासन सत्ता हिनके लोकनिक मध्य निहित छल। इएह कारण अछि जे वैशालीक शासनकेँ कुलीनतंत्र सेहो कहल गेल अछि। आजुक संसद जकाँ ताहि दिनक संथागारमे सेहो सबटा कार्य नियमानुसार होइत छल। सदस्य लोकनिक बैसबाक प्रबन्धकेँ आसन कहल जाइत छल अर परिषदक कार्यवाहीक हेतु निश्चित गणपूर्त्ति करेनिहार पदाधिकारीकेँ गणपूरक कहल जाइत छल। परिषदमे उपस्थित प्रस्तावकेँ प्रतिज्ञा कहल जाइत छल। प्रस्तावपर बाद विवाद होइत छल आर तकर बाद ओहिपर मत लेल जाइत छल। मतकेँ गुप्त राखल जाइत छल आर पारित प्रस्तावकेँ सबकेम मानए पड़ैत छलन्हि। गणक मुख्य अधिकारी होइत छलाह राजा, उपराजा, सेनापति, भांडागारिक इत्यादि आर सेना, अर्था आर न्याय शासनक मुख्य अंग छल। बौद्ध साहित्यमे हिरण्यक, सारथी आदि कर्मचारीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। नायक नामक एक पदाधिकारीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। न्याय विभागक अधिकारीकेँ विनिमय महामात्य कहल जाइत छल। अभियुक्तकेँ सर्वप्रथम हिनके समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल आर अहिठाम सर्वप्रथम आरोपक जाँच होइत छल। निरपराध भेलापर अपराधीकेँ मुक्त कऽ देल जाइत छल आर अपराध सिद्ध भेलापर पुनः ओकरा व्यावहारिक अथवा वोहारिक महामात्यक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। निरपराध सिद्ध भेलापर अपराधी मुक्त कऽ देल जाइत छल अन्यथा ओकरा पुनः अट्ठकुलकक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। क्रमशः अभियुक्तकेँ सेनापति, उपराजा आर राजाक समक्ष उपस्थित कैल जाइत छल। अभियुक्तकेँ दण्ड तखने देल जाइत छल जखन ओकर अपराध पूर्णतया सिद्ध भऽ जाइछ। समस्त न्याय प्रणालीक रिकार्ड राखल जाइत छल जकरा ‘पवेणीपुस्तक’ कहल जाइत छलैक। न्याय व्यवस्था समता आर स्वतंत्रताक सिद्धांतपर आधारित छल। अपील करबाक व्यवस्था सेहो छल। नगर व्यवस्थाक भार नगर गुत्तिकपर रहैत छल। नगरमे शांति स्थापनाक दायित्वक भार ओहि पदाधिकारीपर छलैक। नगर गुत्तिककेँ रातिक राजा सेहो कहल जाइत छलैक। अहिठाम ई स्मरण रखबाक अछि जे वैशाली लिच्छवी संघक राजधानी छल आर संगहि वृज्जि गणसंघक सेहो तैं वैशालीक अत्यधिक महत्व बौद्धयुगमे भगेअ छल। विदेह आर लिच्छवी संयुक्त रूपसँ संवज्जि कहबैत छलाह आर वृज्जिसंघ आठटा गणराज्य सम्मिलित छल। कल्पसूत्रक अनुसार लिच्छवीक एहेन सम्बन्ध एकबेर मल्लक संग सेहो छल आर ई दुनु गोटए मिलिकेँ एकबेर संयुक्त परिषदक निर्माण केने छलाह जाहिमे १८सदस्य छलाह–९लिच्छवी आर ९मल्ल। इहो लोकनि राजा कहबैत छलाह। साम्राज्यवादी आक्रमणक प्रकोपसँ बचबाक हेतु ई लोकनि समय–समयपर अपन संघ बनबैत छलाह। वैशाली सबमे प्रमुख छल तैं सब छोट–छोट, गणराज्य वैशालीक संग मिलिकेँ संघ बनेबाक हेतु उत्सुक रहैत छल। वृज्जिसंघ शासनकेम परामर्श देबाक हेतु एक संस्था छल अष्टकुलक जाहिमे आठो गणक प्रतिनिधि रहैत छलाह। संघक सब सदस्यक अधिकार बरोबरि छलन्हि। उच्चतम न्यायालयकेँ अष्टकुलक कहल जाइत छल। संघ शासन प्रणालीक अपन नियम छल जाहिसँ संघ शासन संचालित होइत छल। वैशाली ताहि दिनमे सर्वश्रेष्ठ संघ राज्यक केन्द्र छल। बुद्ध वैशाली गणतंत्रक मतैक्य, सौहार्द, आदर, दृढ़ता, पराक्रम आदिक भावनासँ बड्ड प्रभावित छलाह आर बेर–बेर वैशाली अवैत रहैत छलाह। बुद्धक अनुसार जे गणराज्य निम्नलिखित सातटा आदर्शक (सप्तअपरिहाणिसुत) पालन करैत रहत तकर कहिओ ह्रास नहि हेतैक– -       i) नियमित एवँ व्यवस्थित रूपें सदति सभाक आयोजन करब– -       ii) विचार, उत्थान एवँ व्यवहारमे सदस्यक मतैक्य रहब– -       iii) व्यवह्रत सिद्धांतक प्रयोग करब– -       iv) बृद्ध लोकनिक प्रति आदर, श्रद्धा, सहयोग एवँ प्रतिष्ठाक भाव राखब– -       v) संघक चैत्यक प्रति श्रद्धा एवँ सहयोगक भावना राखब– -       vi) पराजित देशक स्त्रीक संग उचित व्यवहार करब– -       vii) अर्हत् क प्रति समुचित सहयोग एवं रक्षाक भावना राखब– महापरिनिर्वाणसुतसँ ज्ञात होइछ ज वृज्जीसंघक शासन व्यवस्थामे– -       i) विभिन्न संघक सभाक अधिवेषन बरोबरि नियमित रूपेँ होइत रहैत छल– -       ii)  वृज्जीसंघक सदस्य लोकनि बरोबरि आपसमे मिलैत–जुलैत रहैत छलाह आर शासन चलेबा सतर्कताक परिचय दैत छलाह। -       iii) ओ लोकनि अपन परम्परागत नियमक पालनक प्रति जागरूक रहैत छलाह। -       iv) शासनमे बुझनुक बृद्ध लोकनिक हाथ रहए दैत छलाह। वैशालीमे कोना आर कहिया गणराज्यक स्थापना भेल से कहब असंभव। बुद्ध तँ लिच्छवी लोकनिक प्रशंसा ‘तावतिंश देव’ कहिकेँ केने छथि आर ओ स्वयं गणशासन प्रणालीसँ एतेक प्रभावित भेल छलाह जे ओ एहि प्रणालीकेँ अपन संघ संगठनक आदर्श मानलन्हि। ७७०७राजा ओहिठाम राजकुलोद्भव मानल जाइत छलाह आर ओहिना व्यवहारो करैत छलाह। वैशालीक पुष्करिणी हिनके लोकनिक हेतु सुरक्षित रहैत छल। ई लोकनि वैशालीक एकविशिष्ट क्षेत्रसँ संबन्धित छलाह। जैन कल्पसूत्रसँ इहो स्पष्ट होइछ वैशाली शासनक एकटा कार्यकारिणी समिति सेहो छल। वैशाली सन प्राचीन न्यायवस्थाक कोनो दोसर उदाहरण संसारमे नहि भेटैत अछि। अभियुक्तकेँ तखने दण्डित कैल जा सकैत छल जखन ओ क्रमशः सातो न्याय समितिसँ एकमतसँ दण्डित घोषित हुए। वृज्जीसंघक शासनमे सेहो समानताक सिद्धांतक पालन होइत छल। अजातशत्रुक आक्रमणक बादो जखन वैशाली मगध साम्राज्यक अंग बनि गेल तखनो एकर गणतांत्रिक स्वरूप अपना क्षेत्रमे बनले रहल। मौर्य युगसँ वैशाली–विदेह मौर्य साम्राज्यक एकटा अंग बनिकेँ रहल। अशोकक समयमे वैशालीआर चम्पारणक प्रशासनिक महत्व बढ़ल होइत कारण अहि दुहुठाम अशोकक स्तंभ अछि। अशोकक स्तंभसँ ई अनुमान लगाओल जाइछ जे प्रशासनिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक महत्व घटल नहि छल अपितु बढ़ले छल। अहि बाते नेपाल जेबाक मार्ग छल तैं प्रशासनिक दृष्टिये सीमासँ सटल वैशाली–विदेह राज्यकेँ सुरक्षित राखब आर ओकरा नीक संबन्ध बनौने राखब साम्राज्यवादी शासकोक अभीष्ट रहैत छलन्हि। वैशालीसँ पुर्णियाँ धरिक सीमा मिथिला प्रांतक अंतर्गत छल आर मिथिला उत्तर बिहारक एकटा प्रमुख प्रशासनिक केन्द्र छल। साम्राज्यवादी छत्रछायाक अंतर्गत रहितहुँ मिथिला अपन प्रजातांत्रिक प्रणालीकेँ सोहागक सिन्दुर जकाँ संजोगने छल। पतञ्जलिक महाभाष्यमे सेहो जतए–ततए मिथिला जनपदक उल्लेख भेटैत अछि। मौर्य साम्राज्यक समाप्त भेलापर वैशाली पुनः अपन स्वतंत्रता प्राप्त केलक से बुझि पड़इयै। वैशालीक उत्खननसँ जे बहुत रास मोहर सब भेटल अछि ताहिपर श्रेणी, सार्थवाह, कुलिक, निगम आदिक उल्लेख भेटइयै। एहेन बुझना जाइत अछि जे वैशालीमे श्रेष्ठी, सार्थवाह आर शिल्पी लोकनिक सम्मिलित निगम छल आर एहि निगमक काज विभिन्न नगर सबमे पसरल छल। श्रेष्ठी सार्थवाह कुलिक निगमक २७४टा मोहर वैशालीसम भेटल अछि जाहिमे ७५टा ईशानदासक, ३८टा मातृदासक ३७टा गोभिस्वामीक मोहर अछि। संभवतः ई लोकनि निगम शाखाक अध्यक्ष रहल होयताह ठाम–ठाम मोहर सबक अतिरिक्त भगवान, जिन्न, पशुपति आदिक नामएक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। गुप्तकालमे वैशाली तीरभुक्ति प्रांतक राजधानी छल आर ओहिठामसँ प्राप्त मुद्रामे एकरा अधिष्ठान सेहो कहल गेल छैक। एहि प्रांतक महत्व अहुँसँ बुझना जाइत अछि जे स्वयं गोविन्द गुप्त एहि प्रांतक राज्यपाल छलाह आर हुनक एक अभिलेख सेहो अहिठामसँ भेटल अछि। - महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी– अहिठामसँ बहुत रास मुद्रा, अभिलेख आदि भेटल अछि। प्रांतीय शासकक रूपमे राजकुलक लोग नियुक्त होइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ युवराज कुमारा माअत्य कहल जाइत छलन्हि। प्रान्तीय शासककेँ अपन अपन महासेनापति, महादण्डनायक आर अन्यान्य कर्मचारी होइत छलन्हि। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति आर तीरभुक्तिक क्षेत्र ताहि दिनक मिथिला प्रांतमे छल। युवराज कुमारमात्यक अधीन भुक्तिक शासनक हेतु उपरिक नियुक्ति होइत छल आर पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे करण कायस्थ ‘दत्त’ पदवी धारी ‘चिरात दत्त’क ३–४पुस्त उपरिकक पदपर विराजमान छलाह। उपरिककेँ प्रांतीय शासक अथवा गवर्नर कहल जाइत छल। प्रांतीय शासकक मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित छल– -       i) शांति–व्यवस्थाकेँ सुरक्षित राखब -       ii) कर वसूलीक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ राखब -       iii) प्रजाक रक्षा करब -       iv) सुख–समृद्धिक प्रबन्ध करब -       v) राजाक प्रति प्रजामे बिश्वास उत्पन्न करब -       vi) सीमावर्त्ती राज्यक आक्रमणसँ अपन क्षेत्रकेँ सुरक्षित राखब। गुप्तकालमे प्रादेशिक शासक लोकनिक सभक सोझे राजासँ छलन्हि। सामंतवादक विकास अहियुगमे प्रारंभ भऽ चुकल छल आर एकर प्रभाव शासनपर पड़ब स्वाभाविके चल। उत्खननसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर प्रांतीय शासनसँ सम्बन्धित निम्नलिखित कर्मचारीक विवरण भेटइत अछि। उपरिक, कुमारपालाधिकरण, (राजकुमारक मंत्रीक कार्यालय), बलाधिकरण(सेनापतिक कार्यालय), दण्डपाशाधिकरण, (पुलिस अधिकारीक कार्यालय), महादण्डनायक (प्रमुख न्यायाधीश), विनय स्थिति स्थापक (कानून आर व्यवस्था मंत्री) गुप्तकालमे केन्द्रीय शासनक विभिन्न विभागकेँ अधिकरण कहल जाइत छलैक आर एक प्रकारक राष्ट्रीय सेवाक प्रावधान सेहो छलैक। जकरा ‘कुमारामात्य’ कहल जाइत छलैक। ‘कुमारामात्य’ साम्राज्यक शासन प्रणालीक स्थायी सेवामे रहैत छलाह आर हुनका कतहु कोनो काजमे पठाओल जा सकैत छल। ओ लोकनि प्रशासनिक सेवाक सदस्य होइत छलाह। कवि हरिषेण सेहो अपनाकेँ कुमारामात्य कहने छथि। कुमारामात्यकन सम्बन्ध प्रांतीय आर स्थानीय शासनसँ सेहो रहैत छल। वैशालीसँ प्राप्त सूचना प्रशासनिक सम्बन्धमे एवँ प्रकारे अछि। -       i)  कुमारामात्यधिकरणस्य– -       ii) युवराज पादीयकुमारामात्यधिकरण– -       iii) परमभद्दारक पादीय कुमारामात्यधिकरण– -       iv) –वालाधिकरणस्य– -       v) रण भाण्डागारिधिकरणस्य– -       vi) दण्डपाशाधिकरणस्य– -       vii) तीरभुक्तौपरिक्रमधिकरणस्य– -       viii) तीरभुक्तौ विनय स्थिति स्थापकाधिकरणस्य– -       ix) तीरभुक्तौ कुमारामात्यधिकरणस्य– -       x) वैशालयाधिष्ठानाधिकरण– भुक्तिक अधीन विषय (जिला) होइत छल। विभिन्न श्रोतसँ ई ज्ञात होइत जे पाल युग धरि अवैत–अवैत तीरभुक्तिमे चामुण्डा, होद्रेय, कक्ष विषय छल आर नौलागढ़सँ प्राप्त अभिलेखक अनुसार एक ‘रक्षमुक्त विषयाधिकरण’ नामक सेहो एकटा प्रशासनिक केन्द्र छल। विषयमे पादितारिक आर गौल्मिक नामक अधिकारी होइत छलाह। अक्षपटलाधिकृत गामक जमीनक लेखा–जोखा रखैत छलाह। विषयमे चारि सदस्यक एकटा परामर्शदातृ समिति सेहो होइत छल जाहिमे नगर श्रेष्ठी, सार्थवाह, प्रथमकुलिक आर प्रथमकायस्थ सदस्य होइत छलाह। विषयपति अपन जिलाक प्रमुख व्यक्तिक संग मिलिकेँ शासन करैत छलाह। वैशालीमे नगर शासन स्थानीय निगमक हाथमे छल। अहिठाम पुण्ड्रवर्द्धन–पुर्णियाँ (जे कि पूर्वी मिथिलाक अंश रहल अछि) किछु कहिदेव आवश्यक। प्राचीन कालहिसँ प्रशासनिक, सामरिक आर साँस्कृतिक दृष्टिकोणसँ पुर्णियाँक महत्व रहल अछि आर मिथिलाक सुरक्षा सेहो पुर्णियाँक सुरक्षासँ सम्बद्ध मानल गेल अछि। गुप्तलोकनि पूर्वी प्रदेशपर अपन नियंत्रण रखबाक हेतु अहिठाम अपन शासनक एक प्रमुख केन्द्र बनौने छलाह। कनिघंमक अनुसार वैशालीक वृज्जीसंघ सेहो एहि प्रदेश अपन नियंत्रण रखैत छलाह। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिक समीकरण पुर्णियाँसँ करब अत्यंत स्वाभावित बुझना जाइत अछि। अभिलेखमे कोकामुखस्वामी आर स्वेतवाराहस्वामी उल्लेख भेटइत अछि जे नेपालक धनकुट्टा नामक स्थान लग अछि आर पुर्णियाँ जिलाक अभ्यंतर सेहो। बादमे जे आर अभिलेख सबमे वराहक्षेत्र किंवा ‘पुण्ड्र’क उल्लेख भेटैछ से सब पुर्णियाँक संकेत दैत अछि। पुर्णियाँक प्रशासनकेँ नियंत्रणमे राखब अहुलेल आवश्यक छल कारण पुर्णियाँक सीमा नेपाल, असम, बंगालसँ मिलैत छल। पुण्ड्रवर्द्धन भुक्ति बंगाल–बिहारक पूर्वी अंश मिलाकेँ छल आर पुर्णियाँ ओकर प्रमुख केन्द्र छल। हर्षक शासन कालमे सेहो मिथिलाक प्रधानता बनल रहल। राज्यसत्ताक कमजोरीक कारणे राजतंत्रक विकेन्द्रीकरण भए गेल छल आर हर्षक मृत्युक पश्चात् तिरहूतमे अराजकता पसरि गेल छल जे लगभग ५०वर्ष धरि बनल रहल। दोसर बात इहो जे अहियुगमे सामंतवादी प्रवृत्ति दृढ़ता भेल आर शासनयंत्रमे एकर प्रभाव स्पष्ट होमए लागल। चीनी यात्री हियुएन संग सेहो एहि बातक समर्थन केने छथि। हर्षक शासनक मुख्य आधार छल व्यक्तिगत भ्रमण एवँ निरीक्षण आर तैं हर्षक परोक्ष भेलापर शासन यंत्र एकदम ढ़ील भऽ गेल आर चारूकात सब केओ अपन–अपन हाथ–पैर पसारे लगलाह। तहियासँ लकए पाल शासनक स्थापना धरि एक प्रकारक अस्थायित्व बनल रहल आर मिथिलाक क्षेत्रपर चारू दिसिसँ आक्रमण होइत रहल। एहि अराजकताक कालोमे तीरभुक्ति एक प्रमुख प्रांत छल आर उत्तर गुप्त शासक लोकनिक मुख्य शासन केन्द्र सेहो जकर प्रमाण हमरा कटरासँ प्राप्त ताम्रलेखसँ भेटैत अछि। कटरा (मुजफ्फरपुर)सँ प्राप्त जीवगुप्तक अभिलेखमे तीरभुक्तिक चामुण्डा विषयक आर तिष्टिहल पाटकक उल्लेख भेटैत अछि। तारा नामक स्थानसँ ई तँ मान्य देल गेल छल आर ओहिमे सुरभकार, याम्या आर हरिग्रामक नामक गामक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। एहि ताम्रलेखमे निम्नलिखित शासनाधिकारीक वर्णन अछि– -       i) महासन्धि विग्रहिक -       ii) अक्षपटालिक -       iii) सर्वाधिकाहिक -       iv) प्रतिहार -       v) सेनापति आर -       vi) महासामंत– पालयुगमे तीरभुक्ति एकटा प्रधानकेन्द्र छल। ओनातँ नारायन पाल भागलपुर ताम्रलेखमे तीरभुक्तिक कक्ष (कौशिकी–कच्छ=छै परगना) विषय आर गाम सबहिक वर्णन भेटिते अछि मुदा तिरहूतक केन्द्र वनगाँवसँ जे ताम्र अभिलेख (विग्रट पाल तृतीयक) भेटल अछि ताहुसँ तीरभुक्तिक शासनपर प्रकाश पड़इयै। पालकालमे जखन कलचुरी वंशक आक्रमणक प्रकोप बढ़ल तखन पल लोकनि अपनाकेँ समेटकेँ तीरभुक्तिमे सुरक्षित रखलन्हि आर एवं प्रकारे अपन साम्राज्य आर प्रतिष्ठाकेँ वचौलन्हि। मिथिला भौगोलिक दृष्टिये सुरक्षित छल तै ओ लोकनि एम्हरे दासकिकेँ एलाह। वनगाँवक अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे तीरभुक्तिमे हौद्रेय (आधुनिक हरदी गाँव सहरसा) विषय सेहो छल। गुप्तयुगसँ कर्णाटवंशक स्थापना धरि तीरभुक्ति शासनज्क एकटा प्रधान केन्द्र बनल रहल। ११म शताब्दीक दूटा अभिलेख चम्पारणसँ हालहिमे उपलब्ध भेल अछि जाहिसम ताहि दिन शासन प्रणालीपर किछु प्रकाश पड़इयै। गोरखपुरसँ चम्पारण ध्रिक क्षेत्रकेँ दरदगण्डकीवंश कहल जाइत छल आर प्रशासनिक इकाईक हिसाबे दरद–गण्डकी–मण्डल जकरा अधीनमे विआलिसि विषय (४२ग्राम) छल। एहि लेखसँ ई स्पष्ट अछि जे अहिठाम विषय मण्डलक एकटा छोट अंग मानल गेल अछि। चम्पारणक ई दुनुटा अभिलेख कर्णाटक पूर्वथिक आर प्रतिहार लोकनिक सत्ताक कमजोर भेलापर ई लोकनि संभवतः एहि क्षेत्रपर अपन सत्ता स्थापित केने छलाह। एहि दुनु अभिलेखमे निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावली भेटइत अछि। i) राणक, ii) ठाकुर, iii) अमात्य, iv) पुरोहित, v) महामत्तक, vi) महासन्धिविग्रहिक, vii) महाप्रतिहार, viii) महाक्षपटलिक, ix) महासाधनिक, x) महापीलुपति, xi) महासेनापति, xii) महाकटकाध्यक्ष, xiii) दुष्टसाध्यासाधनिक, xiv) दाण्डिक, xv) दण्डपाशिक, xvi) शौल्किक, xvii) गौल्किक, xviii) दूतसंप्रेषणिक, xix) तलवर्गिक, xx) अंगरक्षक, xxi) चाट–भाट,–इत्यादि– एहिमे वर्णित बहुत रास शब्दावली पाल अभिलेखमे सेहो भेटल अछि। एहि अभिलेखसँ इहो अनुमान लगाओल जाइछ जे मिथिलाक सीमा पश्चिममे श्रावस्ती भुक्तिसँ पश्चिमोत्तरमे दरद–गण्डकी–देशसँ आर पूबमे पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिसँ मिलल जुलल छल। एवँ प्रकारे स्मस्त उत्तर बिहारक प्रतिनिधित्व प्राचीन कालक तीरभुक्ति करैत छल आर अहि दृष्टिकोणे एकर प्रशासनिक महत्व अद्वितीय छलैक जे मुगलकाल धरि बनल रहलैक। उत्तरमे कर्णाट लोकनि सिमरौन गढ़ धरि बढ़ले रहैत आर ओतए अपन राजधानी बनौने रहैत। ग्राममे ग्राम पंचायतक व्यवस्था छल आर अभिलेख सबमे पञ्चमण्डली आर पञ्चकुलक उल्लेख भेटैत अछि। १०९७मे जखा कर्णाटवंशक स्थापना भेल तखन पुनः शासन व्यवस्थाक संगठन मिथिलाक आवश्यकताक अनुकूल गठित भेल यद्धपि एकर आधार छल सामंतवादी व्यवस्था। नान्यदेव अहिठामक शासन व्यवस्थाकेँ सुगठित केलन्हि आर मिथिलाक निजीगौरव एवँ विशिष्टताक विकास सेहो। नान्यदेव स्वयं कर्णाट वंशक संस्थापक छलाह तैं शासनमे हुनक प्रधानता रहब स्वाभाविके। शासकक प्रधान राजा होइत छलाह। प्रजाक रक्षा करब उचित बुझल जाइत छल–चण्डेश्वरतँ प्रजाकेँ विष्णु कहने छथि। राजा शासन, न्याय एवँ प्रशासनिक यंत्रक अध्यक्ष होइत छलाह। शासनकेँ सुरूचिपूर्ण ढ़ँगसँ चलेबाक हेतु राजा बरोबरि प्राचीन परम्परा एवम मान्यताकेँ ध्यानमे रखैत छलाह। शासकक संगहि संग मिथिलाक राजा प्रसिद्ध विद्वानो होइत छ्लाह आर उदाहरणस्वरूप हमरा लोकनि नान्यदेव, रामसिंह देव, शिवसिंह, लखिमा, विश्वास देवी आदिक नाम लऽ सकैत छी। राजा लोकनि परमेश्वर, परमभद्दारक, महाराजाधिराज, महानृपति, क्षितिपाल, भूपाल, मिथिलाधिपति, भूजवल भीम, भीमपराक्रम, कर्णाटचूड़ामणि, दशमदेव अवतार; एकादश अवतारा, भूमिपति, मुकुटमणि, आदि पदवीसँ विभूषित होइत छलाह। नान्यदेव, गंगदेव, रामसिंहदेवक शासन धरि तँ कोनो प्रकारक गोलमाल देखबामे नहि अवइयै परञ्च शक्तिसिंहदेवक शासनकालमे मंत्री लोकनि शासन सत्ता अपना हाथमे लऽ लेने छलाह। सामंते मंत्री होइत छलाह। शक्तिसिंहक कठोर शासनस ओ लोकनि उबि गेल छलाह तैं हुनकासँ सब अधिकार छीनिके अपना हाथमे लऽ लेलन्हि। मंत्रियेक संरक्षणमे बहुत दिन धरि हरिसिंह देव नाम मात्रक शासक छलाह सामंतवादी व्यवस्थाक फलें राजाक शक्तिक्षीण अवश्य भेल छल मुदा शक्तिशाली शासक अपन अधिकारक उपयोग कइये लैत छलाह। हरिसिंह देव, शिवसिंह देव, भैरव सिंह देव आदि शासक एकर उदाहरण छथि। सामान्यतः राजाकेँ सामन्तक बलपर निर्भर करए पड़ैत छलन्हि। राजकेँ सहायता देबाक हेतु मंत्रिपरिषदक व्यवस्था सेहो छल। मिथिलामे प्रधानमंत्रीकेँ महामत्तक कहल जाइत छल। अन्हराठाढ़ी आर हावीडीह अभिलेखमे प्रधानमंत्री लोकनिकेँ मंत्रीक नामसँ सार्बाधित कैल गेल अछि। मंत्री लोकनिकेँ संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैकीभाव, आर संश्रयक पूर्णज्ञान रहब आवश्यक बुझना जाइत छल। श्रीधरदास एवँ रत्नदेवक वंशज मिथिलामे बहुतो दिन धरि मंत्री पदक भार सम्हारने छलाह। श्रीधरदासकेँ सेन वंश दिसिसँ महामण्डलिकक पदवी भेटल छलन्हि। रत्नदेवक वंशजकेँ सामंतवादी पदवी ‘रउत’ रहैन्ह आर विद्यापतिमे रत्नदेवक वंशज रउत रजदेवक उल्लेख अछि। रामादित्य, कर्मादित्य, वीरेश्वर, देवादित्य, गणेश्वर, चंडेश्वर आदि सेहो प्रमुख मंत्रीगण मिथिलामे भेल छथि। शक्तिसिंहक निरंकुश शासनसँ जखन मंत्रीगण उबि गेल छलाह तखन ओ लोकनि सात बृद्धक एकटा परिषद बनौलन्हि आर शक्तिसिंहकेँ गद्दीसँ उतारि ओहि परिषदक हाथमे शासन भार देलन्हि। एहिसँ मंत्रिपरिषदक व्यापकता एवँ अधिकारक पता लगइयै। पाछाँ जखन हरिसिंह देव वयस्क भेला तखन हुनक राज्याभिषेक भेल। ताहिसँ पूर्व संभवतः चण्डेश्वर राज्यक भार सम्हारने छलाह। चण्डेश्वर साँधि विग्रहिक छलाह। हुनका महावर्त्तिक नैबन्धिक सेहो कहल गेल अछि। एहिसँ प्रत्यक्ष अछि जे चण्डेश्वर बड्ड शक्तिशाली मंत्री छलाह। मंत्री लोकनि सामंत, महासामंत, मांडलिक, महामाण्डलिक, महाराज, महामतक आदि पदवी एवँ उपाधिसँ विभूषित होइत छलाह। ई लोकनि हृदयसँ दान इत्यादि सेहो करैत छलाह आर एहि दिशामे वीरेश्वर आर चण्डेश्वरक नाम अग्रगण्य अछि। चण्डेश्वरक अधीन जे एकटा सामन्त हरिब्रह्म छलाह तिना एकटा पद प्राकृत पैगंलम् मे सुरक्षित अछि। मंत्रिपरिषदक अतिरिक्त आरो कतैक पदाधिकारी होइत छलाह जेना– i)             महामुद्राधिकृत ii)            महासर्वाधिकृत iii)           महाधर्माध्यक्ष iv)           धर्माध्यक्ष v)            प्राड् विवाक vi)           कोषाध्यक्ष vii)         स्थानांतरिक इत्यादि। ग्राम शासनक न्यूनतम इकाई छल। ग्रामक अध्यक्षकेँ ग्रामपति कहल जाइत छल। ग्रामपति कर वसूल कए राजाक ओतए पठबैत छलाह। गुल्म सेहो एकटा ग्राम पदाधिकारी होइत छलाह। तीन अथवा पाँचटा ग्रामकेँ मिलाकेँ एकटा गुल्म नियुक्त होइत छलाह। एकर अतिरिक्त दश ग्रामपति, विंशति संग्रामपति, त्रिंशति ग्रामपति, सहस्त्र ग्रामपति, इत्यादिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। प्रत्येक ग्राममे एकटा मुखिया होइत छल। केन्द्रीय शासन ग्राम शासनक सफलतापर निर्भर करैत छल। ग्राम सभामे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, आर साँस्कृतिक आदि विषयपर विचार विमर्श होइत छल। ग्रामक झगड़ा दान ग्राम सभामे फरियैल जाइत छल। जखन ग्राम सभा फरियैबामे असमर्थ होइत छल, तखने उपरका अधिकारीक ओतए ओ पठाओल जाइत छल। मिथिलाक समस्त राजनैतिक संगठनक आधारशिला छल ग्राम सभा। ग्राम सभाक पदाधिकारीकेँ पारिश्रामिक भेटैत छलन्हि जकर विवरण निम्नाकिंत अछि– i)             दशेश–दश गामक अधिकारीकेँ जोतबाक हेतु ओतेक जमीन भेटैत छलन्हि जतेक ओ एकहरसँ स्वयं जोति सकैत छलाह। ii)            विशंतिश–बीस गामक अधिकारीकेँ चारिटा हरसँ स्वयं जोति सकबा जोकर जमीन भेटैत छलन्हि। iii)           सतेश–एक सौ गामक अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण गामे भेटइत छलन्हि। iv)           सहसाधिपति–एक हजार अधिकारीकेँ एकटा सम्पूर्ण नगर भेटइत छलन्हि। ग्राम शासन संगठनक प्रसंगमे गंगदेवक नाम अग्रगण्य अछि। मिथिलामे एकर सर्वश्रेष्ठ श्रेय हुनके चन्हि। ओ समस्त मिथिला राज्यकेँ राजस्व प्रशासनक दृष्टिकोणसँ कतेको परगनामे बटने छलाह आर प्रत्येक परगनाक हेतु चौधरी आर कोतवाल नियुक्त केने छलाह। इएह लोकनि ग्राम शांति आर राजस्व वसूलीक हेतु उत्तरदायी होइत छलाह आर हिनके लोकनिक योग्यता आर सहयोगपर केन्द्रीय शासनक सफलता निर्भर करैत छल। ग्राम शासन आर केन्द्रीय शासनक मध्य सम्पर्क स्थापित करबाक हेतु आर ओकरा बनाकेँ रखबाक हेतु एक प्रकारक विशेष कर्मचारी होइत छलाह जकरा ‘स्निग्ध’ कहल जाइत छल। ‘स्निग्ध’केँ ग्राम विभागक मंत्रियो कहि सकैत छी। यदा कदा ‘स्निग्ध’क स्वार्थपूर्ण आचरणसँ ग्रामीण तबाहो होइत छलाह। ‘स्वार्थ चिंतकम्’ नामक एकटा अधिकारी आर होइत छलाह जिनका ग्रामीण लोकनि ‘राहु’ बुझैत छलथिन्ह। ग्राममे पंचायतक चुनावे जनतांत्रिक पद्धतिसँ होइत छल आर मिथिलामे एकर परम्परा बड्ड प्राचीन छल। प्रत्येक गामक हेतु पुलिस (आरक्षी)क नियुक्ति सेहो होइत छल। प्रत्येक दिन पुलिस लोकनिकेँ अपन काजक ब्योरा गामक मुखियाकेँ देमए पड़ैत छलन्हि। जँ कतहु कोनो गड़बड़ी भेल तँ ओहि हेतु पुलिसकेँ उत्तरदायी ठहराओल जाइत छल। मिथिलाक अभिलेख आर प्राचीन पोथी सबमे बहुत रास प्रशासनिक शब्दावली भेटैत अछि जाहिसँ बुझि पड़इयै जे ओ सब ताहि दिनमे व्यवहारमे छल। संग्रामगुप्तक पंचोभ ताम्रलेख(१३म शाताब्दी)मे निम्नलिखित अधिकारीक विवरण भेटइत अछि– i)  महाराजा धिराज–                                       वर्णनरत्नाकरमे– ii) महामाण्डलिक–                                           i)भूपाल– iii) महासन्धि विग्रहिक–                                  ii)माण्डलिक– iv) महाव्युहपि–                                               iii)सामन्त– v) महाधिकारिक–                                            iv)सेनापति– vi) महामुद्राधिकारिक–                                     v)पुरपति– vii) महामतक–                                                vi)मंत्री– viii) महासाधनिक–                                          vii)पुरोहित– ix) महाकटुक–                                                viii) धर्माधिकरण– x) महाकरणाध्यक्ष–                                          ix) सान्धि विग्रहिक– xi) वातिनैबन्धिक–                                          x) महामत्तक– xii) महादण्डनायक–                                         xi) प्रातबलकरणाध्यक्ष– xiii) महापंचकुलिक–                                        xii) शांतिकरणिक– xiv) महासामन्त राणक–                                  xiii) दुर्गपाल– xv) महाश्रोष्ठि दानिक–                                     xiv)राजगुरू–इत्यादि– xvi) गुल्मपति– xvii) खण्डपाल– xviii) नरपति– xix) महौथिक– xx) महाधर्माधिकरणिक– इत्यादि– चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर:- भारतीय राजनैतिक विचारधाराक विकासक इतिहासमे मिथिलाक चण्डेश्वरक स्थान अग्रगण्य अछि। ओनातँ भारतमे राजनीति शास्त्रपर प्राचीन कालहिसँ ग्रंथ लिखल जा रहल अछि आर एकर प्रमाण हमरा महाभारत, शुक्र, उकानस आर कौटिल्य तथा कामन्दकमे भेटइत अछि। एहिमे कौटिल्यक ग्रंथ सर्वश्रेष्ठ अछि आर पाछाँ सब केओ ओकरे–अनुकरण केने छथि। चण्डेश्वर ग्रंथ राजनीति रत्नाकरमे सब पूर्वाचार्यक मत उद्धत अछि। मध्ययुगीन विचारकमे चण्डेश्वरक नाम विशेष रूपें उल्लेखनीय अछि। ओ एक संभान्त, प्रतिष्ठित एवँ विद्वान परिवारमे जन्म ग्रहण केने छलाह। ओ देवादित्यक पौत्र आर वीरेश्वरक पुत्र छलाह आर ई तीनु गोटए कर्णाट शासक हरिसिंह देवक शासन काल मंत्री पदकेँ सुशोभित केने छलाह। हिनक पिती धीरेश्वर, शुभदत्त आर लक्ष्मीदत्त तथा गणेश्वर सेहो पैघ–पैघ राज्याधिकारी छलाह। ओ लोकनि अपना युगक धुरन्धर विद्वान सेहो छलाह। चण्डेश्वर मिथिलाक प्रसिद्ध निबन्धकार भेल छथि आर कृत्यरत्नाकर, दानरत्नाकर, व्यवहार रत्नाकर, शुद्धि रत्नाकर, पूजा रत्नाकर, गृहस्थ रत्नाकर, विवाद रत्नाकर, राजनीति रत्नाकर हिनक प्रमुख रचना भेल छनहि। मिथिलाक धर्म व्यवस्था आर कानूनक प्रसंगमे हिनक विवाद रत्नाकर आर वाचस्पतिक विवाद चिंतामणि प्रामाणिक ग्रंथ मानल जैत अछि। स्मृति विषयपर लिखल हुनक ग्रंथ कृत्य चिंतामणिमे उत्सव–संस्कारक वर्णन अछि। चण्डेश्वरक व्यक्तित्व एवँ कृतित्वक प्रभाव उत्तरवर्त्ती विद्वानपर सेहो देखबामे अवइयै। मैथिल आर बंगाली विद्वान हुनकासँ प्रभावित देखल जाइत छथि। मिसरूमिश्र, वर्द्धमान, वाचस्पति मिश्र, आर रघुनंदन चण्डेश्वरसँ एतेक प्रभावित छथि जे ओ लोकनि अपना ग्रथमे हुनक ग्रंथक असंख्य उदाहरण देने छथि। ओइनवार वंशक राजा भवेशक आज्ञासँ चण्डेश्वर राजनीतिरत्नाकरक रचना केलन्हि। ओहियुगक दृष्टिये एहि ग्रंथक बड्ड महत्व अछि। राजनीति विषयपर ई एकटा प्रौढ़ ग्रंथ मानल गेल अछि। एहिमे १६टा तरंग अछि आर सबहक व्यवस्था एवं क्रमबद्धतापर चण्डेश्वर विशेष ध्यान देने छथि। विषय प्रतिपादनक द्रष्टिये सेहो ई महत्वपूर्ण मानल जा सकइयै। सोलहो तंरग एवँ प्रकारे अछि– i) राजाक निरूपण,                                           x) सेनापतिक निरूपण ii) मंत्रीक निरूपण,                                           xi) दूतक निरूपण iii) पुरोहितक निरूपण,                                    xii) राजाक सामान्य कार्यक          निरूपण iv) प्राडविवाकक निरूपण,                                xiii) दण्डक निरूपण v) सभ्यक निरूपण,                                         xiv) राज्यव्यवस्थाक निरूपण vi) दुर्गक निरूपण,                                           xv) पुरोहित आदि द्वारा              राज्यदान निरूपण vii) मंत्रणाक निरूपण,                                     xvi) राज्याभिषेक निरूपण viii) कोषक निरूपण, ix) सेनाक निरूपण, अहिठाम द्रष्टव्य जे चण्डेश्वर पहिने विजिगीषु राजा अमात्य एवँ अन्यान्य प्रवृत्ति आर राज्यव्यवस्थाक प्रतिपादन केला उत्तर राज्याभिषेकपर सबसँ अंतमे विचार करैत छथि। राजाक वास्तविक एवँ न्यायसंगत उत्तराधिकारी भेला ज्येष्ठ पुत्र आर तैं राज्याभिषेक हुनके हेतैन्ह आर ताहि प्रसंगक एहिमे विस्तृत विवरण अछि। प्रत्येक विषयक निरूपण करबाक पूर्व चण्डेश्वर प्रारंभमे कोनो प्रामाणिक विधिग्रंथ अथवा राजनीतिज्ञक मतक उदाहरण दैत छथि आर तखन अपन मत स्थापित करैत छथि। पारस्परिक मतांतर एवँ विषमतामे समन्वय स्थापित करब हुनक लक्ष्य बुझना जाइत अछि। एहि ग्रंथक प्रणयनक क्रममे ओ वेद, पुराण, धर्मग्रंथ, स्मृति ग्रंथ, सूत्र ग्रंथ, राजनीति विषयक ग्रंथ आदि अध्ययन कए ओकर समन्वय स्थापित करबाक दृष्टिये सर्वमान्य सिद्धांतक स्थापना सेहो। प्रत्येक विषयक सांगोपांग विवेचन करबामे ओ बीच–बीचमे अपन स्वतंत्र टिप्पणी सेहो देने छथि जाहिसँ ई स्पष्ट अछि जे ओ कोनो बातकेँ आँखि मुनिकेँ नहि मानए बाला छलाह। एहि आलोचनात्मक टिप्पणीसँ ग्रंथक उपयोगिता आर विलक्षणता बढ़ि गेल अछि। कोनो दृष्टिये देखला उत्तर ई निर्विवाद अछि जे ‘राजनीति रत्नाकर’ अपना ढ़ँगक एक अपूर्व ग्रंथ अछि आर राजनीति चिंतनक क्षेत्रमे मिथिलाक इ अनुपम देन अछि। प्राचीन पारिभाषिक शब्दक अर्थबोधक हेतु चण्डेश्वर जे पद्धति अपनौने छथि से विशेष रूपे उल्लेखनीय अछि। विभिन्न प्रमाणसँ अपन तर्ककेँ पुष्ट कऽ कए ओ अपन मतक स्थापना केने छथि आर ओहिमे समन्वय स्थापित करबाक प्रयास सेहो। अपन ग्रंथक अंतमे ओ लिखैत छथि–“मनु एवँ अन्य स्मृति ग्रंथमे निरूपित राजनीतिक अगाध एवम विशाल सागरसँ सार स्वरूप रत्नक चयन कए हम एहि ग्रंथक रचना कैल अछि जे भगवानकेँ मान्य हेतैन्ह, राजा द्वारा समादृत होएत आर उदार व्यक्तिक ऐश्वर्य वृद्धिक हेतु लाभदायक सिद्ध हेतैन्ह”। मध्य युगमे जखन कि राजनीति विषयक पुस्तकक कोनो अभाव नहि छल तखन चण्डेश्वरकेँ ई पोथी लिखबाक आवश्यकता कियैक भेलैन्ह। से एकटा विचारणीय विषय। ई ग्रंथ लिखबाक पाछाँ चण्डेश्वरक अभिप्राय ई छल जे प्रत्येक राजा धर्म आर अर्थमे सामंजस्य स्थापित करैत न्यायोचित मार्गपर चलिकेँ राजनीतिक वास्तविक कर्तव्य एवँ दायित्वक निर्वाह करैथ। सोलहो तरंगक प्रतिपाध विषय देखला उत्तर ई स्पष्ट भऽ जाइछ। i) राजा:-  चण्डेश्वर मनुक मतक उद्धरण दैत लिखने छथि जे संसारक रक्षार्थ। प्रजापति राजाक सृष्टि केने छलाह। प्रजाक रक्षा कैनिहार राज्याभिषेक पुरूषकेँ राजा मनल गेल अछि। याज्ञवल्म्य द्वारा वर्णित राजाकेँ अपेक्षित गुणक वर्णन सेहो कैल गेल अछि। एहि गुणक अतिरिक्त चण्डेश्वरक अनुसार राजाकेँ धार्मिक सेहो हेबाक चाही। तीन प्रकारक राजाक वर्णन ओ करैत छथि–सम्राट (चक्रवर्त्ती), सकर (कर दै वाला) आर अकर (कर नहि दै वाला) तीनुक धर्म आर गुण एक समान होएबाक चाही। प्रजाक पालन, विद्वान, बृद्ध एवँ ब्राह्मणक रक्षा राजाक मुख्य कर्तव्य मानल गेल अछि। राजाकेँ विभिन्न विषयक ज्ञान रहबाक चाही। व्यसन रहित राजाकेँ एहिक आर पार लौकिक सफलता भेटैत छैक आर अन्याय केनिहार राजाक शीघ्रहि नाश भऽ जेबाक संभावना रहैत छैक। चण्डेश्वर कौटिल्य द्वारा निर्धारित राजाक कर्तब्य आर अधिकक चर्च नहि केने छथि। ii) अमात्य:- राजाकेँ चाही जे ओ सात–आठ सुपरिक्षित व्यक्तिकेँ अमात्य नियुक्त करैथ कारण ओहि बिनु राज काज चलब असंभव। सन्धि विग्रह आदि प्रश्नपर राजाकेँ अमात्यक संग विचार विमर्श करबाक चाही। अमात्यक परिषदकेँ मंत्रिपरिषद कहल गेल अछि। iii) पुरोहित:- वेद–वेदार्थक ज्ञाताके पुरोहितक पदपर नियुक्त करबाक चाही। श्रौत–स्मृति कार्यमे राजाकेँ पुरोहितक संग महात्विजक नियुक्ति करबाक चाही। iv) प्राडविवाक:- धर्म एवम न्याय व्यवस्थाक हेतु प्राडविवाक (मुख्य न्यायाधीश)क नियुक्ति आवश्यक मानल गेल अछि। प्राडविवाकक कुलीन, शील सम्पन्न, गुणवान, सत्यवक्ता, निर्भीक, चतुर आर निपुण होएबाक चाही। प्राडविवाक तीन सभ्यक संग मिलिकेँ निर्णय दैथ से सर्वोत्तम–एकमतसँ निर्णय हो तँ ओकरे धार्मिक निर्णय मानबाक चाही। v) सभा–सभ्य:- चारि प्रकारक सभाक वर्णन भेल अछि– i)             प्रतिष्ठिता–नगर अथवा राजा द्वारा निश्चित कैल गेल स्थानपर जे सभा आहूत हो तकरा प्रतिष्ठिता कहल गेल अछि। ii)            अप्रतिष्ठिता–कोनो गाममे आयोजित होइवाला सभाकेँ अप्रतिष्ठिता कहल गेल अछि। iii)           सुमुद्रिता–जाहिमे अध्यक्ष एवँ न्यायाधीश विराजमान होथि। iv)           शासिता–जाहिमे राजा विद्धमान होथि। सभाक दश अंग कहल गेल अछि–राजा, अधिकारी, वक्ता, सभासद, धर्मशास्त्र, गणक, लेखक, सुवर्ण, अग्नि, जल आर दण्डधारी। राजा शासन करैत छथि, अधिकारी, वक्ता भेला, सभासद निरीक्षणक कार्य करैत छथि, धर्मशास्त्र निर्णयक काज करैत छथि अछि, गणक हिसाब लिखैत छथि, लेखक न्यायालयक कार्यवाही लिखैत छथि, सुवर्ण, अग्नि आर जल सपथक सामग्री भेल। उत्तम कार्यक अधिष्ठाता, सत्य–धर्मक प्रति अमुरक्त निर्लोभ एवँ निष्पक्ष व्यक्तिकेँ राजाकेँ सभ्य चुनबाक चाही। एहने लोग धर्म आर कर्ममे निष्णात होइत छथि। निर्णयक शुद्धता सभासदक शुद्धतापर निर्भय करैत अछि। अधार्मिक बातक्ल प्रतिवाद करब हुनक प्रमुख कर्त्तव्य छल। vi) दुर्ग:- राजाक हेतु दुर्गक निर्माण करब आवश्यक छल। छह प्रकारक दुर्गक   चर्च कैल गेल अछि। राजाकेँ स्वयं गिरि दुर्गक चर्च कैल गेल अछि। राजाकेँ स्वयं गिरि दुर्गमे आश्रय लेना चाही कारण सब दुर्ग ओकरे श्रेष्ठ मानल गेल छैक। प्रत्येक दुर्गमे सब किछु रहबाक चाही। vii) मंत्रणा:- एकांत राजभवन अथवा जंगलमे जतए मंत्रभेदक कोनो आशंका नहि हो ततए गुप्त मंत्रणा करबाक चाही। मंत्रणाकेँ सब तरहे गुप्त राखब आवश्यक। viii) कोष:- एहने कोषकेँ प्रशंसनीय मानल गेल अछि जाहिमे द्रव्य जमाहो मुदा बाहर नहि कैल जाए। राजाकेँ कोषक वृद्धिक हेतु सतत प्रयत्नशील रहबाक चाही। ix) सेना:- राजाकेँ सेना आर बलक व्यवस्थापर पूर्ण ध्यान देबाक चाही। एहिमे छह प्रकारक सेनाक संयोजनक चर्च भेल अछि। x) सेनापति:- हस्ति, अश्व, रथ, पदाति सेना, सेनापतिक अधीन रहैत अछि आर एहि पदक सेहो ओतवे महत्व अछि जतवा पुरोहित आर अमात्यक। पुरूषार्थयुक्त, लोकप्रिय, दक्ष, शस्त्रास्त्रसँ युक्त, रण विद्यामे कुशल, प्रवासक संकटकेँ सहएवाला व्यक्तिकेँ सेनापतिक पदपर नियुक्त करबाक चाही। xi) राजदूत आर गुप्तचर:- सन्धि एवँ विग्रहक दायित्व राजदूतपर निर्भर करैत अछि। एहिपर एहि ग्रंथमे विशेष विचार कैल गेल अछि। दूतकेँ सच्चरित्र, चतुर, मेधावी, देशकालक ज्ञाता, निर्भीक, आर सुवक्ता होएबाक चाही। दूतकेँ राजाक मुँह कहल गेल अछि। दूतकेँ मारबाक नहि चाही चाहे ओ मलेच्छे कियैक ने हो? गुप्तचर सेहो राज्यक प्रमुख अंग मानल गेल अछि। स्वराष्ट्र आर परराष्ट्रक वस्तुस्थितिक पता लगाएब गुप्तचरक मुख्य कार्य छल। xii) राजाक सामान्य कार्य:- एहि प्रसंगमे मनुक सहारा लैत चण्डेश्वर लिखैत छथि– -       i) युद्धसँ विमुख नहि हैव। -       ii) प्रजाक पालन। -       iii) ब्राह्मणक सेवा। -       iv) सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय (षड्गुण)क चिंतन–मनन करब -       v) साम–दाम–दण्ड–भेदपर विचार करब–दण्डक प्रयोग तखने करब चाही जखन सब उपाय निरर्थक सिद्ध हो– -       vi) राजाकेँ धनक टोहमे बरोबरि रहबाक चाही। -       vii) राज्यक रक्षा आर अपन सुरक्षा– xiii) दण्ड:- शारीरिक–आर्थिक–देशकालकेँ ध्यानमे राखि दण्ड–विधान बनेबाक चाही। xiv) राज्यक उत्तराधिकार:- सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्रकेँ देवाक चाही। xv) पुरोहितक हाथे राज्याभिषेक:- उत्तराधिकार सौंपबाक पूर्वहि जँ देहावसान भऽ जाए तँ पुरोहित आर मंत्री द्वारा ज्येष्ठ पुत्रकेँ अभिषिक्त करबाक चाही। जँ कोनो पुत्र नहि ओ तँ राजवंशक कोनो उपयुक्त व्यक्तिकेँ चुनबाक चाही। xvi) राज्याभिषेक:- राजा अपन जीवन कालहिमे ज्येष्ठ पुत्रकेँ युवराज पदपर नियुक्त कऽ सकैत छथि। जँ कोनो पुत्र नहि हो तँ प्रजा आर ब्राह्मणक परामर्शसम कोनो समीपवर्त्ती अन्यव्यक्तिकेँ ओहि पदपर आनिकेँ राज्याभिषेक कैल जा सकइयै। अभिषिक्त युवराजकेँ मान्य परम्पराक अनुसार चलबाक चाही। धर्मशास्त्र आर अर्थशास्त्रमे विरोध भेलापर मध्यम मार्गक अवलवन कए अपन व्यावहारिक बुद्धिसँ राज्यक संचालन करबाक चाही। चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे अमर सिंह, कात्यायन, कामन्दक, कुल्लूक भट्ट, कौटिल्य, नारद, भागवत, मनु, याज्ञवल्म्य, रामायण–महाभारत, लक्ष्मीधर, वसिष्ठ, विष्णु, बृहस्पति, व्यास, शुक्र, श्रीकर, हारीत, आदिसँ मत उद्धृत केने छथि। राजनीति रत्नाकर एक प्रकार संग्रह ग्रंथथिक आर मध्य युगमे जखन लोग सब मौलिक ग्रंथक अवगाहन करबामे असमर्थ छल तखन चण्डेश्वर एहि ग्रंथक रचना कए ओहि अभावक पूर्त्ति केलन्हि। एकर लोकप्रियता एवँ प्रसिद्धिक इएह कारण अछि। चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर मिथिलाक हेतु एकटा आदर्श ग्रंथ भेल आर तदनुसार मिथिलामे शासन पद्धति संगठित भेल जकर प्रमाण हमरा ओइनवार वंशक शासन पद्धतिसँ लगइयै। देवसिंह अपना जीवतहि शिवसिंहकेँ युवराज बनौने छलाह। अहिठाम इहो स्मरण रखबाक अछिजे १३२५क बाद मिथिलमे मुसलमानी अमल प्रारंभ भऽ चुकल छल आर अहिठाम मुसलमान शासकक प्रतिनिधि सेहो रहैत छलाह। अहिबातकेँ ध्यानमे राखियेकेँ चण्डेश्वर अपन राजनीति रत्नाकरमे विचारक प्रतिपादित केने छथि आ अपन समन्वयताक प्रवृत्तिक परिचय सेहो देने छथि। सामंतवादी कुलीन लोकनिक प्रभाव तँ सहजहि बढ़िये गेल छल। विद्यापतिक रचना आर अन्यान्य साधन सबसँ निम्नलिखित मंत्री आर कुलीनक नाम भेटैत अछि। i) अच्युत, ii) महेश, iii) रतिधर iv) रतिपति आर शंकर v) वाचस्पति (परिषद छलाह) vi) रउत रजदेव vii) अमृतकर आर अमिञंकर, viii) गणेश्वर, ix) चण्डेश्वर न्याय व्यवस्थाक क्षेत्रमे मिथिलाक योग दान विशेष रहल अछि आर ताहुमे फौजदारीक क्षेत्रमे सेहो। वर्धमानक दण्डविवेक कानूनक एक प्रमुख पोथी मानल गेल अछि। न्याय व्यवस्थामे जाति सेहो देखल जाइत छल आर तदनुसार अभियुक्तकेँ सजा देल जाइत छल। सब किछु होइतहुँ वर्द्धमान बहुत अर्थमे स्पष्ट बला छलाह आर मूल सत्यकेँ पकड़ने छलाह। हुनक विश्वास छलन्हि जे लोग आ अज्ञानतावशे दिवानी मुकदमाक संख्या बढ़ैत अछि। हुनक विचार छलन्हि जे अभियुक्तकेँ एहि हिसाबे सजा देल जाइन्ह जे पुनः ओ ओहन काज नहि करए आर ओकरा चरित्रमे सुधार भऽ जाइक। ब्राह्मण अभियुक्तकेँ सुविधा भेटैत छलन्हि। गैर कानूनी ढ़ंगसँ दोसराक चीज वस्तु लेबकेँ चोरी कहल गेल अछि आर एहि प्रकारक तीनटा वर्गीकरण वर्द्धमान कएने छथि– i) साहस कृत (डकैती) ii) प्रकाशतस्कर (ठग) iii) अप्रकाशास्कर (चोर) वर्द्धमान दण्डक वर्गीकरण एवँ प्रकारे केने छथि– दण्ड वाक् धिक् धन् वध् निर्वासन् धन् धनदण्ड सर्वस्वहरण वध पीड़न अंगच्छेद प्रमापण पीड़न ताण्डव अवरोधन बन्धन विडम्बन वाचस्पति मिश्रक अनुसार सजा देबाक अधिकार राजाकेँ छन्हि। न्यायपालिकाक अध्यक्ष राजा होइत छलाह आर हुनका कानूनक पालन करए पड़ैत छलन्हि। कानूनमे साक्ष्यक रूप ‘बृषल’केँ विश्वास नहि कैल जाइत छल आर तैं साक्षी ओ नहि भऽ सकैत छलाह। कानून आर राजनीतिक दृष्टिये वाचस्पतिक विवादचिंतामणि, नीतिचिंतामणि आर विवाद निर्णय महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। विद्यापति सेहो एकटा कानून ग्रंथ लिखने छलाह जकर नाम छल विभागसार। वकीलकेँ मिथिलामे व्यावहारिक कहल जाइत छल। मुसलमान लोकनि शांतिसुरक्षाक हेतु ठाम–ठाम कोतवालक नियुक्ति करैत छलाह आर कोतवाल शब्दक व्यवहार हमरा विद्यापतिमे सेहो भेटैत अछि जाहिसँ ई स्पष्ट होइछ जे कोतवाल मिथिलाक शासन प्रणालीक एकटा प्रमुख अंग बनि चुकल छल। विद्यापतिमे कोतवालक हेतु कोहवार शब्दक व्यवहार अछि। बादमे कोतवालक स्थान फौजदार लेलक। काजी, ख्वाजा, मखदुम आदि शब्दक व्यवहार मिथिलाक शासन प्रणालीमे शुरू भऽ चुकल छल। वज्रघंटक विवरण सेहो भेटैत अछि। कीर्त्तिपताकासँ निम्नलिखित व्यक्ति (पदाधिकारी लोकनि?)क नाम उपलब्ध होइयै। सूरज, राजनन्दन, हरदत्त, भिखु, पुण्डमल्ल, गोपाल मल्लिक, जयसिंह, हरिहर, रजदेव, केदारदास, सोहन, मुरारि, रामसिंह, पृथ्वीसिंह, विदु, दामोदरा, जनरंजन, सोने, विद्याधर, कमलाकर, श्रीराम, श्रीशाखो, सनेही झा। ई सब गोटए राज्यक पदाधिकारी छलाह। गोपाल मल्लिक आर पुण्डमल्ल धनुर्विद्यामे निपुण छलाह। रउत रजदेव योद्धा छलाह। युद्धक वर्णनक क्रममे ज्योतिरीश्वर ठाकुर ३६प्रकारक वस्त्रास्त्रक नाम गिनौने छथि आर विद्यापति सेहो सेनापति, दलपति आर राउतक वर्णन केने छथि। ज्योतिरीश्वर ‘राजनीति’ शब्दक व्यवहार केने छथि आर राजनीतिक केनिहारक हेतु ‘तत्वज्ञ’ शब्दक। राजनीतिकताक तत्वज्ञ्क क्रममे “मंत्रगोपन, मत्यमरण, देशरक्षा, वलावलज्ञान, कोषसंचय, व्युहरचना, व्युहप्रवेश, व्युहभंग, शंशय”क विवरण वर्णन रत्नाकरमे अछि। विद्यापतिक लिखनावलीमे निम्नलिखित शब्दावली भेटैत अछि– -       i) महापत्निक ठक्कुर -       ii) महामत्तक ठक्कुर -       iii) महासूपकार पति -       iv) महापार्णागारिक ठक्कुर -       v) स्वस्त्रागरिक -       vi) पानियगरिक -       vii) महादश नैबन्धिक ठक्कुर -       viii) महादेव गारिक ठक्कुर -       ix) कोषागार -       x) महाभानुगारिक -       xi) दलपति -       xii) राउत -       xiii) कार्यि -       xiv) ओसथि -       xv) मोकद्दम–इत्यादि। खण्डवला कुलक समयसँ मुगल अधिकारी तिरहूतमे रहए लागल। सम्प्रति मिथिला तीन प्रमण्डलमे विभक्त अछि–तिरहूत, दरभंगा आर सहरसा। अध्याय – 16 मिथिलाक सामाजिक इतिहास मिथिलाक अस्तित्व वैदिक कालहिसँ अद्यावधि सुरक्षित अछि। मिथिलामे आर्यक आगमनक पूर्व मिथिलाक सामाजिक व्यवस्थाक रूपरेखा केहेन छल से कहब असंभव। ओकर ठीक–ठीक अनुमान लगायबो संभव नहि अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अविछिन्न प्रभाव रहल अछि। आजुक मिथिलामे हमरा लोकनि जे देखैत छी ताहिसँ बहुत भिन्न ओहि दिनक अवस्था सामान्य जनक हेतु नहि छल। प्रत्येक देशक अपन अपन देशगत विशेषता होइत छैक आर ओहिपर ओहि देशक भूगोलक प्रभाव रहिते छैक। मिथिला एहि नियमक अपवाद नहि रहल अछि आर रहबे कियैक करैत? सामाजिक नियम एवँ अबधक निर्माण कोनो एक दिनमे नहि होइत छैक आर सामाजिक व्यवस्थापर मात्र भूगोलक नहि अपितु आर्थिक व्यवस्थाक प्रभाव सेहो पड़ैत छैक। पूर्व वैदिक कालमे समाजक व्यवस्था कठोर नहि बनल छल आर बहुत दूर धरि ओ व्यवस्था स्वच्छन्द एवँ मुक्त छल। समाजमे प्रत्येक व्यक्तिकेँ मुक्त वातावरणक अनुभव होइत छलैक आर ओ लोकनि कोनो स्थायी नियमक निर्माण कए नहि बैसि गेल छलाह। गतिशील समाज छल आर तैं विकासोन्मुख सेहो। एवँ प्रकारे ई समाज बहुतो दिनधरि चलल आर शनैः शनैः आर्यक विस्तार जहिना भारतवर्षक विभिन्न भागमे होमए लगलैक तहिना समाजोमे तदनुकुल परिवर्त्तन अवश्यम्भावी बुझना गेलैक आर समाजक महारथी लोकनि ओहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। साम्राज्यक विस्तारक संगहि अर्थनीतिक पेंच कसेऽ जाए लागल आर समाज ओहिसँ भिन्न नहि रहि सकल। वर्णाश्रमक व्यवस्था, भनेऽ कोनो इँच्च आदर्शसँ भेलहो, पछाति ओ अपन दुर्गुणक संग हमरा लोकनिक समक्ष उपस्थित भेल आर जेना जेना वर्ग विभेद बढल गेल तेना-तेना एकर स्वरूप दिन प्रतिदिन विकृत होइत गेलैक। जँ से नहि होइत तँ मिथिलामे पुनः जनक सन शासक, याज्ञवल्म्य सन विधिनिर्माता एवं गौतम सन सूक्ष्म विचारक कियैक नहि अवतीर्ण भेलाह? आर नेऽ फेर उत्पन्न भेलीह कोनो गार्गी आर मैत्रेयी? एहि मूलतथ्यकेँ जाधरि हमरा लोकनि अवगाहन करबाक चेष्टा नहि करब ताधरि हमरा लोकनिक कल्याण नहि आर ने तत्वक उचित दिगदर्शन। सर्वप्रथम चारि वर्णक उल्लेख ऋगवेदक पुरूष सूक्तमे भेटइत अछि। प्रारंभमे एहेन बुझि पड़ैत अछि जे जखन आर्य लोकनि विस्तार भेलैन्ह आर हुनका लोकनिकेँ अहिठामक मूलनिवासीसँ सम्पर्क भेलैन्ह तखन दुहुक संस्कृतिमे पर्याप्त भिन्नता छल आर ओ लोकनिकेँ वर्णक विभाजन उचित बुझलन्हि आर तदनुकुल वर्णक विभाजन भेल। मिथिलामे आर्यक प्रसारक समय वर्णव्यवस्थाक प्रचलन भए चुकल छल। मुदा ताहि दिनमे अझुका कट्टरता देखबामे नहि अवइयै। विवाहादिक प्रसंगमे ऋगवेद आर शतपथ ब्राह्मणमे भिन्नता देखबामे अवैछ। ब्राह्मण आर क्षत्रियकेँ अपनासँ छोट वर्गमे विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि। ब्राह्मण कालमे शूद्र लोकनिक अवस्था शोचनीय भए गेल छल। एतरेय ब्राह्मणमे शूद्रक दुर्दशाक वर्णन भेटैत अछि। शूद्र लोकनि सब अधिकारसँ वंचित छलाह आर समाजमे हुनक स्थान निकृष्टतम् छलन्हि। कालांतरमे किछु एहेन व्यवस्था बनल जाहिमे ब्राह्मण-क्षत्रिय लोकनि सम्मिलित रूपें निम्नवर्गक शोषणमे रत भए गेलाह। एकर मूल कारण ई छल जे जँ-जँ सामाजिक व्यवस्था गूढ़ होइत गेल तँ तें ई दुहु वर्ग उत्पादनक साधन एवं तत्संबधी ज्ञानक कुंजी अपना हाथमे दबौने गेलाह आर निम्न दुहु वर्गक लोग हिनका सबहिक अधीन होइअत गेल। जखन आर कोनो चारा नहि रहलैक आर परिस्थिति दिनानुदिन बदतर होइत गेलैक तखन शूद्रकेँ वेदोसँ वंचित कैल गेलैक। एहि सब घटना क्रमक उल्लेख तत्कालीन साहित्य एवं कथा सबमे सुरक्षित अछि। दरिद्र लोकनिक की दशा रहल होइत तकर पूर्वाभास तँ महाभारतक अध्ययनसँ भेटैत अछि जतए इन्द्रोकेँ ई कहए पड़ल छन्हि जे दुःखक अनुभव करबाक हो तँ मर्त्यलोक जाकए हुनका लोकनिक संग रहिकेँ देखि आउ। महाभारतक अनुशासन पर्वमे एहि दृष्टिकोणक बहुत रास घटना वर्णित अछि। समाजक वर्गीकरण दिनानुदिन विषम होइत गेल। शूद्र एवं अन्यान्य छोट छीन वर्ग़क लोग सब जमीनक अभावमे मजूर अथवा बेगारीक अवस्थाकेँ प्राप्त केलक आर ओम्हर दोसर दिसि गगन चुम्बी अट्टालिका ओकरा लोकनिक दयनीय एवं उपेक्षित आर असहाय अवस्थापर अट्टहास करए लागल। सूत्र एवं स्मृति साहित्यमे एहिबातक पुष्ट प्रमाण अछि। करहुक ममिलामे वैश्य-शूद्रेकेँ तंग होमए पड़ैत छलन्हि। वैदिक युगमे जाति वा वर्गक निर्णय कर्मसँ होइत छल आर आन वर्णक लोगों अपन कर्मसँ ब्राह्मण भऽ सकैत छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार राजा जनक याज्ञवल्म्यक उपदेश एवं अपन कर्तव्यसँ ब्राह्मण भेल छलाह। तैतरीय ब्राह्मणमे विद्वानेकेँ ब्राह्मण कहल गेल अछि। स्त्री, शूद्र, श्वान आर गायकेँ "अनृत"क संज्ञा देल गेल छैक। विवाहमे खरीद-बिक्रीक प्रथा छल। बहु विवाहक प्रथा सेहो छल। धनसंम्पत्तिसँ सेहो स्त्रीगणकेँ वंचित राखल जाइत छल। पूर्व वैदिक कालक जे मुक्त वातावरण छल से आव समाप्त भऽ चुकल छल आर ओकर स्थान लऽ लेने छल संकीर्णता। सामाजिक दृष्टिकोणसँ संकीर्णताक समावेश घातक सिद्ध भेल। संकीर्णताक भावनाकेँ प्रश्रय देवाक हेतु अत्यधिक साहित्य एवं कर्मकाण्डी नियमक निर्माण भेल। ओना उपरसँ देखबामे तँ इएह बुझि पड़ैछ जे स्त्रीगणक स्थान समाज बड्ड उँच्च चलन्हि मुदा ई स्थिति वास्तविकतासँ बड्ड दूर छल। गार्गी आर मैत्रेयीक नामसँ कोनो देश अपनाकेँ गौरवांवित बुझओ परञ्च हमरा लोकनिकेँ एतए ई स्मरण राखब आवश्यकजे ओ लोकनि नियमक अपवाद मात्र छलीह। ओहिठाम याज्ञवल्म्यक दोसर पत्नी कात्यायनीकेँ देखिऔक तँ बुझबामे असौकर्य नहि होएत जे समाजमे स्त्रीक वास्तविक स्थिति की छल? सुलभा आर गार्गीक देनसँ भारतक दर्शन भरपुर अछि। जतए एक दिसि मनुक्खकेँ अधिकाधिक विवाह करबाक अधिकार प्राप्त छलन्हि ओहिठाम एक स्त्रीकेँ दोसर विवाह करबाक आर दोसराक संग मेल जोलक अधिकार नहीं छलैक। सुरूचि जातकमे एकटा कथा सुरक्षित अछि जकर सारांश भेल-"मिथिलाक राज्य बड्ड विस्तृत अछि आर एहिठामक शासककेँ १६०००(सोलह हजार) पत्नी छन्हि"। एहिसँ प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जे सामाजिक व्यवस्थामे स्त्रीगणक की स्थिति छल? एतरेय ब्राह्मणमे कहल गेल अछि जे पुतोहु अपन श्वसूरक सोझाँ नहीं जाइत छलीहे। जँ अनचोकसँ श्वसूरक नजारि पुतोहुपर पड़ि जाइत छलन्हि तँ पुतोहु बेचारी नुका रहैत छलीहे। मिथिलामे पर्दा प्रथा आर पुतोहु-श्वसूरक सम्बन्धक ई प्राचीनतम उदाहरण भेल आर मैथिल समाजमे ताहि दिनसँ अद्यावधि कोनो विशेष परिवर्त्तन नहीं देखबामे अबैछ। विधवाक स्थितिओ प्रायः अझुके जकाँ छल। समाजमे विधवाकेँ हेय दृष्टिये देखल जाइत छल आर स्थिति बदतर छल। रखेल रखबाक प्रथा, दासी पुत्रक साथ दुर्व्यवहार, व्यभिचार एवं वेश्यावृत्तिक उल्लेख सेहो भेटैछ। राजदरबारमे असंख्य दासी पुत्री आर रखेलक व्यवस्था रहैत छल। मिथिलाक विभाण्डक मुनिक पुत्र ऋषि श्रृंग्यकेँ अंगक एकटा सुन्दरी फुसला लेने छलन्हि। किंवदंती अछि जे अंगक राजा लोमपाद अपन बेटी शांताकेँ एहि कार्यक हेतु अगुऔने छलाह। एहि घटनाक उल्लेख अश्वघोष सेहो कएने छथि। -"ऋष्य श्रृंग मुनि सुतं स्त्रीष्व पंडितम्। उपायै विविधैः शांता जग्राहच जहारच"॥ पुराण आर जातकमे वर्णित समाजमे बहुत किछु समानता अछि। दिन प्रति दिन समाजमे कट्टरता एव अनुदार भावना जड़ि पकड़ने जाइत छल। धनक महत्व बढ़ए लागल छल आर विद्या आर विद्वानक महत्व क्रमशः घटए लागल छल। ओना तँ लक्ष्मी-सरस्वतीक आपसी द्वेष बौद्धयुगमे आविकेँ विशेष रूपें चरितार्थ भेल छल मुदा ओहुँसँ पूर्वहुँ हमरा एहि सब वस्तुक स्पष्ट उदाहरण भेटइत अछि। ब्राह्मणक अपेक्षा धनाढ्यक प्रतिष्ठा बढ़ि रहल छल। आवश्यकतानुसार आब लोक अपन रोजगार चुनए लागल आर प्राचीन कालमे ब्राह्मण लोकनिक लेल जे खेती निषिद्ध मानल जाइत छल से आब नहि रहि गेल। ब्राह्मण खेती आर व्यवसाय दुहुमे लागि गेलाह। पुराणादिक अध्ययनसँ ई सब बात स्पष्ट भऽ जाइछ। बौद्धसाहित्यक अनुसार ब्राह्मण लोकनि अपन जीविकाक हेतु सब काज करैत छलाह। जातक तँ एहि प्रकारक कथा सबसँ भरले अछि। सामाजिक नैतिकतामे सेहो परिवर्त्तन भेल आर प्राचीन मूल्याँकनक मापदण्डमे सेहो समयानुसार उचित संशोधन आर परिवर्त्तन कैल गेल। मनुक्खक जीवनक कमसँ कम तीनटा विभाजन सर्वप्रथम छान्दोग्य उपनिषदमे देखबामे अवइयै। उपनिषद कालमे मिथिलामे क्षत्रिय ब्राह्मणक स्तर धरि पहुँचि चुकल छलाह। ज्ञान एवं ब्रह्मविद्याक क्षेत्रमे ओ कोनो रूपें ब्राह्मणसँ कम नहि छलाह। उपनिषदमे कर्मकाण्डक विरोधमे उठैत भावनाक प्रदर्शन सेहो देखबामे अवइयै। उपनिषदमे हम जे देखैत छी ताहिसँ स्पष्ट अछि जे ओ युग मिथिलाक सामाजिक-साँस्कृतिक इतिहासक उत्कर्षक युग छल आर सब तरहे सुखी सम्पन्न सेहो। एक बात जे स्मरणीय अछि उ भेल ई जे मिथिलाक क्षत्रिय शासक कोनो रूपेँ ब्राह्मणसँ अपनाकेँ कम नहीं बुझैत छलाह आर ब्राह्मणोकेँ ई स्वीकार करबामे कोनो आपत्ति नहि छलन्हि। स्वयं याज्ञवल्म्य जनकक एहि गुणकेँ स्पष्ट रूपे मनने छथि आर गीतामे सेहो एकर संकेत अछि। वर्ण व्यबस्था ताहि दिनमे एतेक दृढ़ नहि भेल छल। बौद्ध एवं जैन धर्म कार्य क्षेत्र सेहो मिथिलामे छल आर एकर प्रभाव तत्कालीन समाजपर पड़ब स्वाभाविके छल। अवैदिक धर्मक विकासक मुख्य स्थान छल मगध आर वैशाली सेहो ओहि प्रभावसँ अक्षुण्ण नहि छल। बौद्ध युग धरि अबैत अबैत ब्राह्मण सत्ताक भीत ढ़हि रहल छल आर क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव चारूकात दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। भोजन भावक नियमादमे सेहो परिवर्त्तन अवश्यम्भावी भऽ गेल छल। जातकक अनुसार एहि युगमे ब्राह्मण लोकनि सबहिक संग भोजन भाव करैत छलाह आर एहेन ब्राह्मण सबकेँ कट्टर वैदिक लोकनि अपना पाँतीसँ फराकेँ रखैत छलाह। सभहिक संग खेनिहार ब्राह्मण लोकनिकेँ पतित कहल जाइत छल। सामाजिक मान्यताक हेतु एहि युगमे संघर्ष चलैत रहल आर तरह तरहक उथल-पुथलक कारणे समाजमे सतत अस्थायित्व बनल रहल। आजीविक, जैन, आर बौद्ध संप्रदायक प्रसारसँ वेदक अपौरूषेयतामे लोगक संदेह उत्पन्न होमए लगलैक आर एवं प्रकारे समाजक वर्गीकरणमे सेहो कारण उपरोक्त तीनू सम्प्रदायक नेना वर्नव्यवस्थाक कट्टर विरोधी छलाह। एकरे प्रभाव स्वरूप जाति पातिक खाधि भोथा रहल छल आर एहि अग्निधार बहुत रास सड़ल विचारक होम सेहो भए रहल छल। प्रारंभमे वैशालीसँ आगाँ एहि विचार सबहिक दालि नहीं गलल छलैक परञ्च काल क्रमेण एकर प्रभावसँ मिथिला मुक्त नहीं रही सकल-वैशालियो पूर्णतः वर्ण-व्यवस्थासँ मुक्त नहि भऽ सकल यद्दपि बौद्ध लिच्छवी लोकनिकेँ तावतिंशदेव कहने छथि। धनक प्रभाव एहि सब क्षेत्रमे सेहो बनले छल आर गरीब मानवता कहिओ अपनापर होइत अन्यायक विरोधमे सशक्त भऽ कए ठाढ़ नहीं भऽ सकल। लिच्छवी लोकनिक रहन सहन सेहो वर्गगत छलन्हि जँ एहि व्यवस्थामे कतहु कोनो प्रकारक घूंट देखबामे अवैत हो तँ ओकरा नियमक अपवाद कहब। समाजक भद्र लोकनि चाण्डालकेँ हेय दृष्टिसँ देखैत छलाह आर समाजमे चाण्डालक स्थिति बदतर छल। ओ लोकनि नगरसँ बाहर रहैत छलाह। घृणित कार्य हुनके सबसँ कराओल जैत छल। हुनका लोकनिक अवस्थामे सुधारक कोनो आसार देखबामे नहि अबैत छल। भृत्य, गुलाम, बहिया आदिक स्थिति तँ आर चिंतनीय छल कारण ई लोक्नि तँ शूद्रक कोटिमे छलहि। स्वयं बुद्ध जे अपना मुँहसँ गुलामक अवस्थाक वर्णन कएने छथि ताहिसँ रोमाँच भऽ जाइछ। जातकमे चारि प्रकारक गुलामक वर्णन अछि। वहियाक प्रथा मिथिलामे अति प्राचीन कालसँ चलि आबि रहल अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आर अन्यान्य ग्रंथ सबमे एकर उल्लेख भेटइयै। वेश्याक प्रचलन ऐहु युगमे छल आर वैशालीक अम्बपालीक नाम तँ सर्वविदित अछिये। यद्दपि बुद्ध स्वयं एहि व्यवस्थाक विरोधी छलाह आर एतए धरि जे ओ स्त्रीकेँ संघमे एबासँ वर्जित करैत छलाह मुदा तइयो जखन अम्बपाली हुनका प्रति अपन भक्ति दरसौलक तखन बुद्ध ओकर निमंत्रण स्वीकार कए ओतए गणिकाक ढ़ेर लागल रहैत छल। एहिमे बहुतो नृत्य एवं संगीत कलामे निपुण होइत छलीहे। कोनो कोनो राजदरबार १६०००गणिका उल्लेख भेटइयै। पर्दा प्रथाक संकेत बौद्धयुगमे भेटैत अछि। बौद्धकालमे धनसंपति आर राज्याधिकार सामाजिक मापदण्ड भेल आर क्षत्रिय लोकनिक महत्व समाजमे एतेक बढ़लन्हि जे ओ लोकनि आब विशेषरूपेँ आहूत होमए लगलाह। विदेह-वैशालीमे ओ लोकनि आर शक्तिशाली छलाह। वर्ण-व्यवस्थामे एवं प्रकारे सेहो थोड़ेक परिवर्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। अशिक्षित ब्राह्मण लोकनि निम्नस्तरकेँ प्राप्त भेलाह। क्षत्रिय लोकनिक प्रभाव वृद्धिक सबसँ पैघ उदाहरण इएह भेल जे वैशालीक अभिषेक पुष्पकरिणीमे लिच्छवी राजा लोकनि अनका स्नान नहि करए दैत रहथिन्ह। समस्त लिच्छवी क्षेत्र तीन हिस्सामे वर्ग अथवा वर्णक आधारपर बटल छल आर प्रत्येक क्षेत्रक रहनिहार अपनहि क्षेत्रमे विवाहादिक सकैत छल। पैघ वर्णक बालक जँ छोट वर्णक कन्यासँ विवाह करए तँ ताहि दिनमे एकर मान्यता छल मुदा एहिबात एकबात स्मरण राखबाक ई अछि जे राजकुमार नाभाग जखन एक वैश्य कन्यासँ विवाह केलन्हि तखन हुनका गद्दीसँ वंचित कए देल गेलन्हि। एहिसँ अनुमान लगाओल जाइत अछि जे राजदरबारमे अंर्तजातीय विवाहकेँ प्रोत्साहन नहीं देल जाइत छल। कुलेन परिवार एवँ अभिजातवर्गक सदस्य गण ताहु दिनमे एकर कट्टर विरोधी छलाह। ब्रह्मचारी एवं धर्मप्रचारक लोकनि कतहु भोजन कऽ सकैत छलाह। ओ लोकनि जातीयताक बन्धनसँ अपनाकेँ मुक्त मनैत छलाह। शूद्र लोकनि भनसिया नियुक्त होइत छलाह। माँछ-माँउसक व्यवहार ब्राह्मण लोकनिक ओतए सेहो होइत छल। भोजन-भावमे मध्ययुगीन कट्टरता ताहि दिनमे नहि छल। गैर ब्राह्मण लोकनि सेहो सब किछु खाइत-पीबैत छलाह। छुआछूतक कट्टरता नहि रहितहुँ ई देखबामे अबैछ जे चाण्डालसँ सब केओ फराकेँ रहैत छलाह आर चाण्डाल नगरक बाहर रहैत छल। चाण्डालकेँ अछूत बुझन जाइत छल आर जँ ओकर नजरि ककरो भोजनपर पड़ि जाइत छल तँ ओहि भोजनक परित्याग कैल जाइत छल। बुद्धक संघक स्थापनाक पछाति बहुतो शूद्र आर छोट वर्णक लोग सब ओहिमे सम्मिलित भेल छल। वर्णाश्रमक प्रधानता तथापि बौद्धयुगमे बनले रहल। एहि युगमे ब्रह्म चर्याश्रमक प्रधानता विशेष छल। विभिन्न आश्रमक महत्वपर एहि युगमे बेस विवाद चलि रहल छल। विवादक मुख्य प्रश्न इएह छल जे व्राणप्रस्थ आर सन्यासमे कोन उत्तम? ओना तँ एहि युगमे हमारा ई देखैत छी जे सन्यासक प्रवृत्ति दिनानुदिन बढ़ि रहल छल। मार्कण्डे पुराणक कथाक अनुसार वैशालीक राजा लोकनि-खनित्र, मरूत्त, वरिष्यंत, मंखदेव आदि-सन्यास ग्रहण कएने छलाह। ब्रह्मचर्य, ग्रार्हस्थ, वाणप्रस्थ आर सन्यासी सम्बन्धी नियम एखनो पूर्णरूपेण स्थायी नहि भेल छल। बौधायन धर्मसूत्रमे तँ वाणप्रस्थ आर सन्यासक प्रतिकूल वातावरण देखबामे अवइयै। किछु धर्मसूत्र सबमे गृहस्थाश्रमक अपेक्षा वाणप्रस्थक सराहना कैल गेल अछि मुदा इहो विचार ततेक संदिग्ध रूपे प्रगट भेल अछि जे ओहि सब आधारपर किछु निश्चित बात कहब अथवा कोनो मत निर्धारित करव असंभव। एहियुगमे परिवारक चर्च सेहो भेटैत अछि। ताहि दिन भिन्न-भिनाओज नीक नहि बुझल जाइत छल। कन्याक हेतु विवाहक निश्चित आयु १६वर्ष छलैक आर जाहि कन्याकेँ भाई इत्यादि नहि रहैत छलैक से अपन पैत्रिक धनक उत्तराधिकारिणी सेहो होइत छल। 'स्त्रीधन' सिद्धांतक विकास एहि युगमे भेल छल। सती प्रथाक उल्लेख सेहो ठाम-ठाम भेटैत अछि। वैशालीक राजा खनित्र आर वरिष्यंतक पत्नी सती भेल छलथिन्ह। मादरी जे अपनाकेँ एहि सतीत्वमे अनने छलीह ताहुसँ सती प्रथाक संकेत भेटैत अछि। बौद्ध युगक ओना इतिहासमे अपन विशेष महत्व छैक परञ्च वैशालीक हेतु तँ ई स्वर्णयुग छल। जाहि पुश्करिणीक उल्लेख हमारा पूर्वहि कऽ चुकल छी ताहिमे स्नान करबाक हेतु श्रावस्तीक सेनापति बन्धुल मल्लक स्त्री मल्लिका व्यग्र छलीह आर एकर वर्णन हमरा जातकमे भेटैत अछि। जातकमे कहल गेल अछि- -"वैशाली नगरे गणराज्य कुलानाम्। अभिषेक मंगल पोक्खरी नम्॥ ओतरित्वा नहातापानीयम्। पातुकम् अहि समीति"॥ बन्धुल अपना पत्नीकेँ लए ओहिठाम गेलाह मुदा पहरू लोकनि हुनका दुहुकेँ नहीं जाए देलथिन्ह आर अंतमे एहि लेल युद्ध भेल आर ओ दुनु गोटए ओहिमे स्नान कए घुरइत गेलाह। एकर अतिरिक्त वैशालीमे आर कतेको दर्शनीय वस्तु छल-उदेन चैत्य, गोतमक चैत्य, चापाल चैत्य, कपिनय्य चैत्य. मर्कट हृदतीर चैत्य, मुकुट बन्धन चैत्य, इत्यादि। वैशालीमे एहि युगमे महालि, महानाम, सिंह, गोश्रृंङ्गी, भद्द आदि नामक प्रधान व्यक्ति भेल छलाह। चुल्लुवग्गमे लिच्छवी भद्रक उल्लेख एहि प्रसंगमे अछि जे एकबेर हुनका बौद्धसंघसँ निष्काषित कए देल गेल छल मुदा पुनः सुधार भेलापर हुनका लऽ लेल गेल छल। ओहि समयमे समाजसँ निष्काषित करबाक प्रथा एवं प्रकारे छल=जाहि सभ्यकेँ निष्कासित करबाक होन्हि तिनका भोजनार्थ निमंत्रण देल जाइत छलन्हि आर आसनपर बैठला उत्तर हुनक जल पात्रकेँ उलटि देल जाइत छलन्हि। पुनः जखन हुनका समाजमे लेल जाइत छलन्हि तखन ओहिपात्रकेँ सोझ कऽकेँ राखल जाइत छलैक। जाहि समयमे तोमर देव वैशालीक प्रधान छलाह तखन लिच्छवी लोकनि साज गोज कए हुनक स्वागत कएने छलाह। केओनील, केओ स्वेत आर केओ लालरंगक शास्त्रास्त्र एवं आभूषण आर वेशभूषासँ सुसज्जित भए बु्द्धक स्वागतार्थ उपस्थित भेल छलाह। महा विष्णुमे एकर विवरण एवं प्रकारे अछि- -"संत्यत्र लिच्छवयः पीतास्या प्रीतरथा पीत रश्मि प्रत्योदयष्टि। पीतवस्त्रा, पीतालंकारा, पीतोष्णीशा, पीतछत्राः पीतखङ्ग मुनिपादुका। पीतास्या पीतरथा पीतरश्मि प्रत्योदमुष्णीशा। पीता च पंचक कुपा नीलावस्त्रा अलंकारा:॥ वैशालीक आम्रकानन जाहिमे अम्बपाली रहैत छलीहे सेहो बड्ड प्रसिद्ध छल। बौद्ध धर्मक इतिहासक दृष्टिकोणसँ सेहो वैशालीक अत्यधिक महत्व अछि। अहिठाम ई निर्णय लेल गेल छल जे स्त्री लोकनिकेँ संघमे प्रवेशक अनुमति देल जाइन्ह। एतहि भिक्षुणी संघक स्थापना सेहो भेल छल। आनंदक कहलापर बुद्ध एहिबातकेँ मनने छलाह आर एहिपर अपन स्वीकृति दैत बौद्धधर्मक सम्बन्धमे भविष्यवाणी सेहो कएने छलाह-"स्त्री जातिक प्रवेशसँ बौद्ध धर्म आव ५००वर्ष धरि जीवित रहत"। वैशालीसँ जेबा काल बुद्ध ई कहीं गेल छलाह जे आब ओ पुनः एतए घुरिकेँ नहि आवि सकताह। वैशालीक लोग सब ई सुनि बड्ड दुखी भेलछल- -"दं अपश्चिमं नाथ वैशाल्या स्तव दर्शनम्। न भूयो सुगतो बुद्धो वैशाली आगमिष्यति"॥ हुनका महापरिनिर्वाणक सय वर्ष बद वैशालीमे बौद्धसंघक दोसर संगीति भेल छल। मिथिलाक माँटिमे एहेन प्रभाव जे अहिठामक लोग सब वेस तार्किक होइत छलाह। नागार्जुनक शिष्य भिक्षुदेव जखन वैशाली जेबाक हेतु प्रस्तुत भेलाह तखन नागार्जुन कहलथिन्ह-"ओना अहाँ जाए चाहैत छी तँ जाउ मुदा ई स्मरण राखब जे ओहिठामक नदीनो भिक्षुक लोकनि बड्ड जबर्दस्त तार्किक होइत छथि"। जैन ग्रंथ सबसँ सेहो ताहि दिनक सामाजिक अवस्थाक विवरण भेटइयै। वैशालीमे क्षत्रिय, ब्राह्मण आर वणिक भिन्न-भिन्न उपनगरमे रहैत छलाह। सामाजिक क्षेत्रमे हुनका लोकनिक मध्य सहयोग एवं सहकारिताक भावना व्यापक छलन्हि। दालि, भात, तरकारीक अतिरिक्त ताहि दिनमे माँछ-माँउसक प्रचलन सेहो छल। अपना नगरसँ हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रेम छलन्हि। हीरा, जवाहिरात, सोना, चानीसँ हुनका लोकनिक हाथी, घोड़ा, आर सवारी सजल रहैत छलन्हि। शिकार हुनका लोकनिकेँ बड्ड प्रिय छलन्हि। अंगुत्तर निकायक अनुसार लिच्छवी बालक लोकनि बड्ड चंचल आर नटखटिया होइत छलाह। लिच्छवी लोकनि स्वतंत्रता आर स्वाभिमानक प्रेमी छलाह। शिक्षा प्राप्त करबाक हेतु ओ लोकनि दूर-दूर देश धरि जाइत छलाह। विवाहक नियमावली लिच्छवी लोकनिक हेतु कठोर छलन्हि। जाहि कन्याकेँ विवाह करबाक विचार होन्हि से लिच्छवी गणकेँ सूचना दैत रहथिन्ह आर गणक दिसि हुनका लेल सुन्दर वर चुनल जाइत छल। स्त्रीक सतीत्वक रक्षार्थ लिच्छवी लोकनिक किछु उठा नहि रखैत छलाह। एहिमे राजा आर रंकमे कोनो कानूनी भेद नहीं छल। मृतकक दाह संस्कारक सम्बन्धमे सेहो हुनका लोकनिक अपन नियम छलन्हि-मुर्दा जरेबाक, गारबाक, अथवा ओहिना छोड़ि देबाक प्रथा हुनका ओतए छलन्हि। मुर्दाकेँ गाँछमे लटकेबाक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। हुनका लोकनि ओहिठाम एकटा उत्सव होइत छल जकरा "सब्बरतिवार" कहल जाइत छल जाहिमे ओ लोकनि भरि राति जागिकेँ नाच गान करैत छलाह आर एकर उदाहरण अंगुत्तर-निकायमे भेटैत अछि। मौर्य युगमे सर्वप्रथम समस्त भारतक राजनैतिक एकीकरण भेल आर मिथिलाक क्षेत्र अखिल भारतीय साम्राज्यक अंग बनल। सामाजिक दृष्टिकोणसँ सेहो ई युग महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। राज्यक स्वरूप मंगलकारी छल यद्दपि राजाक शक्तिमे अपार बृद्धि भेल छलैक। आर प्रत्येक व्यक्ति जीवनकेँ सुखी रूपे व्यक्त करबा लेल इच्छुक छल। ताहि दिनमे मनुष्य सुगठित, स्वरूप आर बलवान होइत छल। वस्त्राभूषणक प्रति हुनका लोकनिक स्नेह बिशेष रहैत छलन्हि आर खेल कूद, नाच गाना आर संगीतक प्रचलन बढ़िया छल। मगधक राजधानी पाटलिपुत्र ताहि दिनमे संसारक सर्वश्रेष्ठ नगर छल आर प्रधान क्रीड़ा केन्द्र सेहो। एहि क्रीड़ाक अंतर्गत शाल-भंजिका एवं अशोक पुष्प प्रचायिका विशेष रूपे प्रचलित छल। कौटिल्यक अर्थशास्त्र आर अशोकक अभिलेखमे उत्सव, समाज, आर यात्राक उल्लेख भेटैत अछि जाहिमे आमोद-प्रमोदक व्यवस्था छल आर सब केओ बड्ड उत्साहसँ ओहिमे भाग लैत छलाह।                                                                                                                                                                                          कौटिल्य वर्णाश्रम धर्मक बड्ड पैघ समर्थक छलाह। एहि धर्मक समुचित पालन कराएब राजाक कर्तव्य छल। अशोकक शासन कालमे वर्णाश्रम धर्मपर विशेष ध्यान नहि देल गेल कारण अशोक स्वयं बौद्ध छलाह आर हुनका एहि व्यवस्थापर पूर्ण आस्था नहि छलन्हि। चन्द्रगुप्त मौर्य स्वयं शूद्र छलाह तैं हम देखैत छी जे एहि युगमे शूद्रक प्रति कौटिल्यक विचार मनुक अपेक्षा विशेष उदारवादी छल। वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत कतेको जाति–उपजाति बढ़ि गेल। मनु तँ बहुतों विदेशी जाति सबकेँ क्षत्रियक श्रेणीमे रखने छथि। मिथिलाक लिच्छवी लोकनिकेँ सेहो मनु व्रात्य कहने छथि। व्रात्यकेँ सेहो ओ चारि वर्णमे बटने छथि–व्रात्य ब्राह्मण, व्रात्य क्षत्रिय, व्रात्य वैश्य एवँ व्रात्य शूद्र। यवन दूत मेगास्थनीज लिखने छथि जे एहिठाम युनान जकाँ गुलामक व्यवस्था नहि छल। एहि युगमे स्त्रीकेँ अवस्थामे सेहो परिवर्त्तन भेलैक। कौटिल्य स्त्रीकेँ सम्पत्ति अर्जित करबाक आर रखबाक अधिकार देने छथिन्ह। अपना जेवरपर खर्च करबाक अधिकार सेहो हुनका लोकनिकेँ छलन्हि। जँ कोनो व्यक्तिकेँ बेटा नहि रहैक तँ ओकरा बेटीकेँ ओहि सम्पत्तिक स्वामित्वधिकार भेटैत छलैक। स्त्रीक कल्याणक हेतु अशोकक समयमे “स्त्री–अध्यक्ष–महामात्र”क नियुक्ति भेल छलैक। गुलाम लोकनिक प्रति सेहो राज्यक विचार उदार छल। प्रत्येक गुलामकेँ अपन स्वतंत्रता प्राप्त करबाक अधिकार छलैक। मौर्यौत्तर कालमे चारि वर्णक व्यवस्था बनल रहल। जति आर उपजातिक संख्यामे विशेष बृद्धि भेल। चारूवर्णक लोग अपना–अपना वर्णक अभ्यंतरहिमे वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करैत छलाह। वराहमिहिरक वृहत्संहिताक अनुसार नगरमे चारूवर्णक भिन्न–भिन्न क्षेत्र होइत छल। चीनी यात्रीक विवरणसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण लोकनि पूज्य बुझल जाइत छलाह। ब्राह्मण लोकनिक शुद्ध जीवन व्यतीत करबाक प्रसंग सेहो ओहिमे भेटैत अछि। समाजमे ब्राह्मणक प्रतिष्ठा विशेष छल आर मनु ओकरा आर प्रतिष्ठित बनौलन्हि। नारदक अनुसार श्रोत्रिय लोकनिकेँ कर नहि लगबाक चाही। ब्राह्मण वर्गकेँ सब प्रकारक सुविधा प्राप्त छलन्हि। गुप्त युगमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण वैदिक शाखाक अनुरूप भेल। पाछाँ आविकेँ एकर आर वर्गीकरण भेल। मौर्यौत्तर कालीन भारतमे क्षत्रिय लोकनिक प्रधानता बढ़ल। शूंग वंश आर कण्ववंशक स्थापनासँ मिथिलामे पुनः ब्राह्मण धर्मक पुनर्स्थापन सम्भव भेल आर ब्राह्मण लोकनिक सत्तामे बृद्धि सेहो। एहियुगमे मिथिलाक ब्राह्मण मिथिलासँ बाहर जाए अपन शाखा–प्रशाखाक स्थापना कएने छलाह। शासन भार जे केओ लैथ हुनक धर्म क्षत्रिय युद्धविद्या, कला, संगीतमे तँ पारंगत होइते छलाह संगहि ओ लोकनि विद्वान सेहो होइत छलाह। समुद्रगुप्तक प्रयाग प्रशस्तिसँ एहिपक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै। जे केओ शासक अथवा राजा होइत छलाह हुनके क्षत्रियक संज्ञा भेटैत छलन्हि। गुप्तशासक लोकनि ओना तँ क्षत्रिय नहि छलाह मुदा जखन राजा भऽ गेलाह तखन ओ क्षत्रिय कहब लगलाह। राजाक गुणक विवरण बाणक हर्षचरितमे सेहो भेटैत अछि। कृषि आर व्यापारक भार वैश्यपर छलन्हि। ई लोकनि दान आर धर्मक प्रपक्षी होइत छलाह। स्थान–स्थानपर धर्मशाला, अस्पताल आर सत्रक स्थापना ई लोकनि बड्ड प्रेमसँ करबैत छलाह। व्यापार आर उद्योगक संचालनार्थ ई लोकनि अपना मध्य जे संगठन बनौने छलाह तकरा श्रेणी अथवा गिल्ड कहल जाइत छल। मिथिलामे श्रेष्ठी आर सार्थवाहक जे उल्लेख भेटैत अछि सेहो हिनके लोकनिक तत्वावधानमे बनैत छल। शूद्र लोकनिक स्थिति चिंतनीय छलन्हि। ओ लोकनि छोत छीन रोजगारक संग खेती गृहस्थी सेहो करैत जाइत छलाह। हुनका लोकनिकेँ वेद पढ़बाक अधिकारसँ वंचित राखल गेल छल। बिना मंत्रक ओ लोकनि अपन यज्ञादि करैत छलाह। मूल रूपें ओ लोकनि दू भागमे बटल छलाह–सत्–शूद्र आर असत्–शूद्र। असत्–शूद्रकेँ अछूत कहल जाइत छलन्हि। अनुलोम–प्रतिलोम प्रथाक कारणे कतेको मिश्रित जातिक अर्विभाव समाजमे भ चुकल छल। चाण्डालक स्थिति यथावत् छल। मिथिलाक उत्तरी छोरपर थारू आर किरात नामक जाति सेहो बसैत छल। विवाहादिक नियममे कोनो विशेष परिवर्त्तन एहियुगमे नहि भेल। अपन–अपन जातिक अंतर्गतहिमे विवाहादि होइत छल। अनुलोम–प्रतिलोम विवाहक उल्लेख सेहो यदा–कदा भेटिते अछि। एहियुगमे स्त्रीगणक स्थितिमे आर अवनति भेल। हुनका लोकनि शूद्रे जकाँ वेदक अध्ययनसँ वंचित राखल गेल। वेद मंत्रोच्चारण ओ लोकनि नहि कसकैत छलीह। किछु गोटए पढ़ल–लिखल सेहो होइत छलीहे मुदा ओहन स्त्रीगणक संख्या महान समुद्रमे एकठोप तेल जकाँ छल। पर्दा प्रथाक सम्बन्धमे कालिदास घूंघट–घोघक उल्लेख केने छथि। एहि युगमे स्मृतिकार लोकनि विधवाक सम्बन्धमे आर कठिन नियम बनौलन्हि। शंख, अंगीरस आर हरीत स्मृतिमे तँ एतेक धरि कहल गेल आछि जे विधवाकेँ अपना पतिक चितापर जरिकेँ प्राणांत कए लेबाक चाही। तत्कालीन अभिलेखमे सेहो सतीक उल्लेख भेटइयै। वस्त्राभूषणमे ताहिदिनक लोग शौकीन होइत छलाह। रेशमी सूती आर ऊनी कपड़ाक विशेष प्रचलन छल। धोती, साड़ी, साया, दुपट्टा, आंगी, जनउ, बाला इत्यादिक व्यवहार होइत छल। मिथिलाक क्षेत्रसँ प्राप्त मूर्त्तिसँ तत्कालीन वेशभूषाक ज्ञान होइछ। लोग सब नामीक नीचासँ धोती पहिरैत छलाह आर स्त्रीगण सब साड़ी सेहो ओहिना। स्त्रीगण अब साड़ीक संगे दूपट्टो ओढ़ैत छलीह। टोपीक व्यवहार सेहो होइत छल। नौलागढ़सँ जे एक गोटए बेस सुन्दर मुरेठा बन्हने अछि। ई मुरूत गुप्तकालीन थिक। ओहुसँ पहिलुका आर एकटा सुन्दर स्त्रीक माटिक मुरूत ओताहसँ भेटल आछि जाहिमे केश विन्यास शैली आर विशेषता देखबामे अवइयै। सौन्दर्य प्रसाधन एवँ श्रृंगार प्रक्रियाक रूप एहि दुहु माँटिक मुरूत बढ़िया जकाँ ज्ञात होइत अछि आर संगहि दु युगक सौन्दर्य साधनक ज्ञान सेहो। स्त्रीक मुरूत शुंगकालीन थिक। मिथिला आर वैशालीसँ प्राप्त माँटिक मुरूतसँ तत्कालीन सौन्दर्य प्रसाधनक चित्र भेटइयै। औंठी, कर्णफूल, कण्ठहार, बाला, इत्यादिक व्यवहार होइत छल। ताहि दिनमे जे मिथिलाक स्त्रीगण पाइत पहिरैत रहैथ तकरो अन्यतम नमूना मिथिलाक मुरूत सबमे भेटैत अछि। सुगन्धित तेल आर अन्यान्य सौन्दर्य साधनक व्यवहार सेहो ताहि दिनमे होइत छल। दाँतमे मिस्सी लगेबाक प्रथा सेहो छल आर हियुएन संग एकर उल्लेख कएने छथि। गुप्तयुगक पछाति एवँ कर्णाटवंशक उत्थान धरि वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता बनले रहल आर ठाम–ठाम कठोर सेहो भेल। स्मृतिकार लोकनिक रचनासँ एकर मान होइछ। अनुलोम–प्रतिलोमक फले अनेको वर्णशंकर उपजाति आदिक विकास भेल। असत् शूद्र अंतयजक नामसँ पाँचम वर्गमे परिगणित भेल। एहियुगमे पंचगौड़क कल्पना सेहो साकार भेल आर पंचगौड़ ब्राह्मण लोकनि दोसरो वर्णक जीविकाकेँ अपनौलन्हि। यज्ञल संगहि संग ओ लोकनि मूर्त्तिपूजा आर पुरोहिताइक पेशा सेहो अपनौलन्हि। ब्राह्मण लोकनि सेनापतिक काजमे सेहो निपुण होमए लगलाह। पालवंशक अधीन बहुतो ब्राह्मण सेनापति रहैथ जकर उल्लेख पाल अभिलेखमे अछि। एहियुगमे ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर मात्रामे खेत दानमे भेटल छलन्हि आर ओ लोकनि पैघ–पैघ सामंत भएल छलाह आर जमीनकेँ दोसरा हाथे खेती करबाय ओ लोकनि अपन सामंत प्रदत्त राजनैतिक अधिकारक सुरक्षामे व्यस्त रहैत छलाह। ब्राह्मण–क्षत्रिय आब खेतियो दिसि भीर गेल छलाह। शूद्र लोकनिक अवस्था आर दयनीय भगेल छलैक। एहियुगसँ डोम, चमार, नट आदिक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। भाटक उल्लेख तँ सहजहि भेटितहि अछि। एहियुगमे जातिकर्म, नामकरण, उपनयन, विवाह, श्राद्ध इत्यादि संस्कारक उल्लेख भेटैत अछि। विवाह संस्कार प्रधान सामाजिक संस्कार मानल जाइत छल। बहु पत्नित्वक उदाहरण सेहो भेटैत अछि। ब्राह्मण अन्य जातिज भोजन अथवा जल नहि ग्रहण करैत छलाह। एहियुगमे प्रायाश्चितक विधान सेहो बनल। माँछ, माउँस आर मदिराक व्यवहार होइत छल। सिद्ध कवि लोकनिक लेखतँ एहि सब विवरणस भरल अछि। चर्यावद(मैथिलीक आदि रूप)मे एकठाम लिखल अछि जे स्त्री लोकनि मदिरा बेचइत छलीह। क्षत्रिय लोकनि विशेष मदिरा पान करैत छलाह। पहिरब–औढ़बमे कोनो विशेष फर्क देखबामे नहि अवइयै। मूर्त्ति सबसँ श्रृंङ्गभरिकताक मान होइछ। कर्णफूल, हार, भुजदण्ड, करघनी, कंगन, बाला आदि आभूषणक व्यवहार होइत छल। कुमकुम लगेबाक प्रथा सेहो छल। सतीप्रथाक प्रचलन तँ चलिये आबि रहल छल। एकलेखमे दीपावलीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि– “दीपोत्सव दिने अभिनव निष्पंत प्रेक्षा मध्य मण्डपे”। संगीत आर नृत्यक आयोजन तँ बरोबरि होइते छल। चर्यापदमे सतरंजक उल्लेख सेहो अछि। जूआक प्रथा प्रचलित छल। एहियुगमे अन्धविश्वास आर तंत्रमंत्रक प्रधानता बढ़ि चुकल छल। ज्योतिषपर लोकक आस्था जमि चुकल छल। विजय सेनक देवपारा अभिलेखमे ग्राम ललनाक नगर जीवनक अनभिज्ञता आर अबोधपनक उल्लेख भेल अछि। मुसलमान लोकनि भारतमे पसरि चुकल छलाह तैं एहि युगमे शुद्धिक सिद्धांतक प्रतिपादन सेहो भेल। मिथिलामे पान आर चौपाड़िक प्रचलन खूब छल। शबरस्वामीक लेखसँ तत्कालीन मैथिल समाजक झाँकी भेटैत अछि। ओ ‘हूराहिरी’क उल्लेख कएने छथि। शतपथ ब्राह्मणमे कहल अछि– “तस्माद वराहं गावोऽन्य धावंती”। गम्हारी, दही, दूध, चूड़ा, आदिक उल्लेख सेहो शबरस्वामीमे भेटइयै। इहो दास आर गुलामक उल्लेख कएने छथि। हुनका लेखनीसँ चिड़इ खेबाक प्रथाक अप्रत्यक्ष रूपे उदाहरण भेटइयै। दही भातक उल्लेख सेहो ओहिमे भेटइयै। माछ खेबाक निपुणताक वर्णनमे तँ एहने बुझि पड़ैत अछि–जेना शबरस्वामी नाचि उठल होथि। ओ खीर बनेबाक उल्लेख सेहो केने छथि। - “ये एकस्मिन कार्यिन विकल्पेन साधकाः श्रूयंते ते परस्परेण विरोधिनोभवंति। लोकवन्–यथा मत्स्यांन् न पयसा समश्नीयादिति। यद्दपि सगुणमत्स्या भवंति तथापि पयसा सहन समश्यंते”। एहियुगमे जातिक रूप कायस्थ जातिक विकास आर उत्थान भेलैक। उशनस आर वेदव्यासक स्मृतिमे कायस्थक उल्लेख जातिक रूपमे भेल अछि। याज्ञवल्म्य स्मृतिमे सेहो कायस्थक उल्लेख भेल अछि। गुप्तकालीन अभिलेखमे सेहो प्रथम कायस्थक उल्लेख भेटइत अछि। गुणैगार ताम्रपत्रमे सैनिक मंत्री लोकनाथकेँ कायस्थ कहलगेल छन्हि। बंगाल–पूर्णियाँ क्षेत्रक पुण्ड्रवर्द्धन भुक्तिमे तीन चारि पुस्त धरि चिरातदत्त (करण कायस्थ) राज्यपाल छलाह। ५५०ई.क पश्चात् कायस्थ लोकनि एक जातिक रूपमे समाजमे स्थापित भए चुकल छलाह। ‘प्रथम कायस्थ’ मुख्य सचिव होइत छलाह। कायस्थमे अखन विशेष उपजातिक वृद्धि नहि भेल छल। ‘करण’ सेहो कायस्थक द्दोतक छलाह ओना ई एकटा ‘पद’ छल जाहिपर काज केनिहार सब केओ करणिक कहबैत छलाह आर जतए एकर मुख्यालय होइत छल तकरा अधिकरण कहल जाइत छल। मिथिलामे करण कायस्थक प्रभुता कर्णाटवंशक स्थापनाक संग बढ़लैक। वैशाली क्षेत्रमे ११–१२म शाताब्दीक एकटा लेख प्राप्त भेल अछि जाहिमे करण कायस्थक उल्लेख अछि। ई लेख बुद्धक प्रतिमाक पादपीठपर खोदल अछि। एहि मूर्त्तिक दान केनिहार करणिक महायान पंथी भक्त छलाह। -       “देय धर्मोऽयम् अवरमहायानयार्यिनः -करणिकोच्छाहः माणिकसुतस्य”– एवँ प्रकारे हम देखैत छी जे कर्णाट वंशक स्थापना धरि मिथिलाक समाज सब स्टेजसँ गुजरि चुकल छल। नान्यदेवक पछाति मिथिलाक अपन निखार प्रत्यक्ष भेलैक आर सामाजिक क्षेत्रमे जे क्रांतिकारी परिवर्त्तन भेलैक तकरे हमरा लोकनि हरिसिंह देवी प्रथाक नामे जनैत छी जकर प्रभाव अखन धरि मिथिलामे बनल अछि। पंजी प्रथाक विकास:- महाराज हरिसिंह देव कर्णाटवंशक अंतिम शासक छलाह जे मुसलमान द्वारा पराजित भए पड़ा गेला। पड़ेबासँ पूर्व मिथिलाक सामाजिक नियमनक हेतु ओ जे एकटा विस्तृत व्यवस्था केलन्हि ओकरे अखुना हमरा लोकनि–‘हरिसिंह देवी’ प्रथाक नामे जनैत छी अथवा सुसंस्कृत भाषामे एकरा पंजी प्रथा कहल जाइत अछि। एहि सम्बन्धमे अखनो धरि कैक प्रश्नपर विद्वानक बीच मतभेद बनले अछि। ओना एहि प्रथाक जन्म देनिहार तँ हरिसिंह देवकेँ मानल जाइत छन्हि मुदा किछु विद्वानक अनुसारे एकर इतिहास प्राचीन अछि। कुलीन प्रथाक स्थापना जँ जन्मक विशुद्धतापर भेल छल तखन तँ एहि प्रसंगपर मीमाँसक कुमारिल भट्टक मंतव्य जे तंत्रवार्तिकमे प्रसारित अछि से देखब आवश्यक– -       “विशिष्टेनैवहि प्रयत्नेन महकुलीनाः -परिरक्षंति आत्मानम्। -अनेनैव हेतुना राजभिर्ब्राह्मणैश्च -स्वपितृपितामहादि पारम्पर्या– विस्मरणार्थ समूहलेख्यानि प्रवृत्तितानि तथाच प्रतिकूलं गुणदोष स्मरणात्तदनुरूपः प्रवृत्ति निवृत्तयो दृश्यंते”॥ अर्थ भेल जे कुलीनकेँ अपन जातिक रक्षाक हेतु बड्ड प्रयत्न करए पड़ैत छन्हि। तहितँ क्षत्रिय एवँ ब्राह्मण लोकनि अपन पिता पितामह प्रभृति पूर्वजक नाम बिसरि नहि जाई तैं “समूह संख्य” रखैत छथि आर प्रत्येक कुलमे गुण–दोषक विवेचन कए तदनुसार साबिध करबामे प्रवृत होइत छथि। जँ एहि प्रमाणकेँ कुलीन प्रथा अथवा पाँजि रखबाक प्रथाक प्रारंभ मानल जाहक तँ ई कहए पड़त जे सर्वप्रथम एकर उदगम मिथिलामे भेल आर बादमे जखन लोग एकरा बिसरि गेलाह छल तखन हरिसिंह देव ओकरा वैज्ञानिक पद्धतिपर पंजीबद्ध करौलन्हि। सातम–आठम शताब्दीसँ हरिसिंह देव धरिक कालमे जँ लोग एहि ‘समूह लेख’ पद्धतिकेँ विसैरि गेलाह तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि कारण एहि बीचमे मिथिलापर चारूकातसँ आक्रमण होइत रहल छल आर एक अस्थिरताक स्थिति व्यापक छल। कर्णाटवंशक स्थापनाक बाद पुनः एक प्रकार स्थायित्व आर नवजागरण आएल आर तैं सामाजिक उच्छृखंलतापर पूर्णविराम लगेबाक हेतु सामाजिक नियमनक आवश्यकता लोककेँ बुझि पड़लैक आर हरिसिंह देवकेँ ई श्रेय छन्हि जे ब्राह्मण–क्षत्रिय मध्य प्रचलित प्राचीन पद्धति अपना शासन कालमे पूर्ण रूपेण वैज्ञानिक बनौलन्हि। स्वर्गीय रमानाथ झाक अनुसारे समूह लेख्य पाँजि जकाँ राखल जाइत छल आर प्रत्येक वैवाहिक सम्बन्ध भेल उत्तर ओहिपर टीपि लेल जाइत छल। कुमारिलक ‘समूह लेख्य’ समस्त ब्राह्मणक एकत्र संग्रहित भए पंजी कहाओल। एहि परिचय सबहिक आधारपर एक एक कुल एक एकटा नाम दए देल गेल जे नाम ओहिकुलक पूर्वजक आदिम ज्ञात निवास स्थान गामक नामपर भेल ओ सैह ओहि कुलक मूल कहाओल। कुमारिलक सभ्यमे गुणदोषक विवेचन लोग स्वयं करैत छल मुदा हरिसिंह देवीक बाद आब परिचयक आधारपर गुण–दोषक विवेचण होएब प्रारंभ भेल। बंगालक कुलीन प्रथा जाति मूलक छल आर अकुलीनक संपर्क होइतहुँ कुलीन अपन कुलीनत्वसँ पतित भए जाइत छल। मिथिलामे उच्चता–नीचताक अवधारण स्मृतिक अनुसारहि भेल। मनुक उक्ति देखबा योग्य अछि– -       “कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदाध्ययनेन च -कुलान्यकुलताँ यांति ब्राह्मणाइक्रमेण च”– -       उतमैरूतमैर्नित्यं सम्बन्धाना चरेत्सह -निनिषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत्”॥ -       उपरोक्तसँ स्पष्ट अछि जे जातिक अपकर्ष किंवा उत्कर्ष वैवाहिक सम्बन्धसँ नियमित होइत छल। मुदा मात्र जन्मक शुद्धिमात्र एकर नियामक नहि छल। भवभूतिक मालती माधवक टीकामे धर्माधिकरणिक जगद्धर लिखने छथि– -       “जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते -विधया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते”॥ एतवा सब किछु रहितहुँ विधा ओ आचारकेँ गौण मानि मात्र जन्मक उत्कर्षकेँ प्रधानता दए सामाजिक नियमन जहियासँ आरम्भ भेल तहियेसँ एहि व्यवस्थामे दोष आवए लागल। विवाहक सम्बन्धमे प्राचीन कालहिसँ किछु नियम बनल छल–विवाहक अधिकार ओहि कन्यासँ भऽ सकैत अछि जे– -       i) एक गोत्रक नञ् हो। -       ii) एक प्रकारक नञ् हो। -       iii) माएक सपिण्ड नञ् हो। -       iv) बापोक दिसि कोनो पूर्वजक ६पुश्त धरि निम्ननञ हो। -       v) माएक दिसिसँ कोनो पूर्वजक ५पुश्त धरि निम्ननञ हो। -       vi) पितामह–मातामहक संतान नञ हो। -       vii) कठमाम (सतमाएक भाई)क संतान नञ हो। स्वजनक संग विवाह नहि भऽ सकैत चल कारण ओहन विवाहसँ उत्पन्न संतानकेँ चण्डाल कहल जाइत छलैक। मिथिलामे स्मृतिसारक रचयिता हरिनाथसँ एहने गलती भऽ गेल छलन्हि आर तैं हरिसिंह देव पंजी प्रथाक निर्माण केने छलाह सैह कहल जाइत अछि। सब केओ ई कथा जानने छथि तैं अहिठाम एकरा दोहराएब हम आवश्यक नहि बुझैत छी। हरिनाथ अनधिकारमे विवाह कऽ लेने छलाह कारण हुनक पत्नी हुनक साक्षात पितिऔत भाईक दौहित्री छ्लथिन्ह। जाहि समूह लेखक उल्लेख हम पूर्वहि कैल अछि हरिसिंह देव ओकरे वैज्ञानिक पद्धतिपर आनि पंजी प्रथाक जन्मदाता कहबैत छथि। हरिसिंह देवक आदेशानुसार सब ब्राह्मणक परिचय संग्रहित भेल आर ओहि संग्रहकेँ विशिष्ट पंडितक जिम्मा लगा देल गेल जे सब किछु देखि अधिकार निर्णय करैथ आर विवाहक हेतु प्रमाण पत्र दैथ–ओहि प्रमाण पत्रकेँ ‘अस्वजन’ पत्र कहल जाइत छैक। संग्रहित परिचयमे प्रत्येक विवाह आर विवाहक संतानक नाम जोड़ल जाइत छल आर उएह परिचय पञ्जी कहाओल आर जिनका जिम्मा एकर भार देल गेलन्हि सैह पञ्जीकार कहौलथि। ‘अस्वजन पत्र’ लिखके देबाक प्रथा सिद्धांत कहाओल जे अद्यावधि ब्राह्मण आर करण कायस्थमे प्रचलित अछि। जे लोकनि परिचय एकत्र करैत छलाह से ‘परिचेता’ कहबैत छलाह–एहि प्रसंगमे गोत्र, प्रवर आर शाखा सेहो लिखल जाइत छल। सब परिचयकेँ गोत्रक अनुसार अलग–अलग रखलासँ प्रत्येक गोत्रक भिन्न–भिन्न कुलक चित्र समक्ष आवि जाइत छल। कुलक नाम कुलक प्राचीनतम ज्ञात निवास स्थान पर राखल गेल जे ओहि कुलक “मूल” कहाओल। बादमे गोत्र आर मूलसँ प्रत्येक वंशक संकेत भेटए लागल। गुप्त युगहिंसँ एहिबातक प्रमाण भेटइत अछि जे ब्राह्मण अपन ग्राम अथवा निवास स्थानहिसँ चिन्हल जाइत छलाह आर गुप्तयुगसँ पाल युग धरिक अभिलेख सबमे ब्राह्मण लोकनिक चारि–पाँच पुस्तक विवरण भेटइत अछि। ब्राह्मण लोकनि जाहि–जाहि गाममे निवास करैत छलाह ताहि–ताहि गामक प्रशंसा सेहो अभिलेख सबमे भेटइत अछि। मध्ययुगमे राढ़क ब्राह्मण लोक ५६उपजातिमे बटि गेल छलाह आर हिनका लोकनिक वर्गीकरण गाम–गाँइ–गामीकक आधारपर भेल छलन्हि। ११–१३म शताब्दीक अभिलेखमे एकर उल्लेख भेटइत अछि। ठीक अहिना हरिसिंह देव मूल–निवासक आधारपर ब्राह्मण लोकनिकेँ करीब १८०मूलमे बँटने छलाह आर मिथिलाक करण कायस्थकेँ करीब ३५०मूलमे। अहिना अम्बष्ट कायस्थ सेहो करीब १००घरमे बटल छथि। ब्रह्मवैवर्त्त पुराणक ब्रह्मखण्डमे कहाबत अछि जे देश भेदसँ जाति भेद उत्पन्न होइछ आर मध्ययुगीन पंजी परम्परा जे जोड़ देल गेल अछि से एहिबातक सबूत मानल जा सकइयै। गाम–गामक महत्व बढ़ए लागल। संग्रहित पाँजिमे जे सबसँ प्राचीनतम ज्ञात पुरूषक नाम उपलब्ध भेल उएह ‘बीजी–पुरूष’ कहौला। जँ एक्के गामक वासी दु कुलमे भेटला तँ हुनक भेदकेँ स्पष्ट करबाक हेतु कुलक मूलक संगहि–संग नव निवास स्थानक नाम जोड़ि देल गेल। मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि सामवेद आर शुक्ल यजुर्वेदक अनुयायी छथि–सामवेदी कौयुम शाखीय छथि आर यजुर्वेदी माध्यान्दिन शाखीय। क्रमशः ई दुनु छन्दोग आर वाजसेआथि कहबैत छथि। सामवेदी–छन्दोगमे मात्र शाँडिल्य गोत्र प्रचलित अछि आर माध्यान्दित वाज सेवाथिमे वत्स, काश्यप, पराशर, कात्यायन, सावर्ण आर भारद्वाज। एहि सात गोत्रक कुल व्यवस्थित कहबैत छथि। ब्राह्मणक आर ग्यारहटा गोत्र जे मिथिलामे अछि से भेल–गार्ग्य, कौशिक, अलाम्बुकाक्ष, कृष्णात्रेय, गौतम, मौदगल्य, वशिष्ठ, कौण्डिन्य, कपिल आर तण्डि। प्रत्येक गोत्रमे कैकटा मूल अछि। ओना तँ लगभग २००मूलक आभास भेटैत अछि परञ्च ब्राह्मण विद्वान लोकनि मात्र सात गोट गोत्र आर ३४या ३६टा मूलकेँ व्यवस्थित मानैत छथि। मिथिलामे कुलीनताक परिचायक छल जन्मक विशुद्धता, आचारक चारूता आर विधा व्यवसाय–एहि तीनुसँ युक्त व्यक्तिकेँ श्रोत्रिय कहल जाइत छलन्हि। एहिठाम स्मरणीय जे पाँजिमे मात्र परिचय संग्रहित अछि जाहि आधारपर विवाहक अधिकारक निर्णय होइत अछि। हरिसिंह देव ब्राह्मणकेँ तीन श्रेणी (श्रोत्रिय, योग्य, जयबार)मे बँटने छलाह–ई कथन निराधार अछि। आदर्शकेँ बिसरिकेँ जखन हमरा लोकनि केवल भेदपर जोड़ देब प्रारंभ कैल तखनहिसँ एहि व्यवस्थामे कुरीतिक प्रवेश भेल। जे जे नीच काज करैत गेलाह से क्रमशः नीच होइत गेला। ब्राह्मण पाञ्जिक अनुसार अधिकार निर्णयक नियम एवँ प्रकारे अछि– -       i) कन्याक पिताक पितामहक पितामह। -       ii) कन्याक पिताक पितामहक मातामह। -       iii) कन्याक पिताक पितामहीक पितामह। -       iv) कन्याक पिताक पितामहीक मातामह। -       v) कन्याक पिताक मातामहक पितामह। -       vi) कन्याक पिताक मातामहक मातामह। -       vii) कन्याक पिताक मातामहीक पितामह। -       viii) कन्याक पिताक मातामहीक मातामह। -       ix) कन्याक माताक पितामहक पितामह। -       x) कन्याक माताक पितामहक मातामह। -       xi) कन्याक माताक पितामहिक पितामह। -       xii) कन्याक माताक पितामहीक मातामह। -       xiii) कन्याक माताक मातामहक पितामह। -       xiv) कन्याक माताक मातामहक मातामह। -       xv) कन्याक माताक मातामहीक पितामह। -       xvi) कन्याक माताक मातामहीक मातामह। आठम पीढ़ीसँ सपिण्डत्व हटि जाइत छैक। मिथिलामे पाञ्जिक अध्ययन अखनो वैज्ञानिक पद्धतिसँ नहि भेल अछि कारण ओकर साहित्य एतेक जटिल अछि जे सब केओ ओकर अध्ययन कइयो नहि करि सकैत छथि। रमानाथ बाबूक अतिरिक्त आर एकाध गोटए पाञ्जिक  अध्ययन कएने छथि मुदा पूर्णरूपेण वैज्ञानिक ढ़ँग आर तालपत्रपर लिखित पाञ्जिक अध्ययन मेजर विनोद बिहारी वर्मा अपन “मैथिल करण कायस्थक पाञ्जिक सर्वेक्षण”मे कएने छथि। ई अध्ययन अपना ढ़ँगक अद्वितीय अछि आर पाञ्जिक अध्ययनक क्षेत्रमे ई अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केलक आछि। तालपत्र हिनक काफी प्राचीन अछि आर पाँजि प्रथाक स्थापनाक लगभग ५०वर्षक अभ्यंतरहिमे लिखल अछि। एहि आधारपर अखन आरो कतेक अध्ययन प्रस्तुत कैल जा सकइयै। पाँजि प्रथाक नीव जाहि आधारपर पड़ल तकरा सम्बन्धमे मेजर वर्मा लिखैत छथि– चण्डेश्वर ठाकुरक गृहस्थ रत्नाकरसँ उद्धत किछु स्मृतिकारक कथन उद्धृत कैल जाइछ जाहिपर पाँजी प्रथाक नींव पड़ल।– मनुशातातपौ:- -       असपिण्डा तुया मातुर सगोत्रा चयापितुः। -सा प्रशस्ता द्विजातीनाँ दार कर्म्मणि मैथुने॥ एवँ प्रकारे ओ गौतम, याज्ञवल्म्य, हारीत, विष्णुपुराण आदिस विभिन्न मत उपस्थित कएने छथि। पाँजि जखन उपस्थित कएल गेल तखन देशक स्थिति चिंतनीय छल। करण कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट होइछ जे कठोर बन्धनक पश्चातो पाँजिमे “स्वयं गृहीता” कन्या, “चेचिक विजाती”सँ व्याहक उल्लेख, “कुलाल” जातिक उल्लेख, “चेटिका धृताः” आदिक यत्र–तत्र विवरण भेटैत अछि। जातिक रक्षा करब पाञ्जिक एकमात्र प्रयोजन छा परञ्च कायस्थ पाञ्जिक अध्ययनसँ स्पष्ट अछि–जे किछु अंतर्जातीय विवाह सेहो होइत छल। करन कायस्थक पाञ्जिमे गोत्रक उल्लेख नहि अछि। बलायिन मूलक आदि पुरूष मंधदासक गोत्र राढ़मे अत्रि, कुचबिहारमे वशिष्ट आर मिथिलामे काश्यप लिखल गेल अछि। पाञ्जिमे कतहु नहि कहल गेल अछि जे अमूक मूल श्रेष्ठ आ छोट अछि आर नेऽ भलमानुसे–गृहस्थक चर्च ओहिमे कतहु अछि। पाञ्जिक पूर्ण शिक्षा प्राचीन कालमे पञ्जीकार लोकनिकेँ देल जाइत छलन्हि आर प्राचीन पाठशालामे मिथिलामे पाञ्जि शास्त्रक पढ़ाइ होइत आर जे एहिमे उत्तीर्ण होइत छलाह सैह ‘पञ्जीकार’ होयबाक योग्यता प्राप्त करैत छलाह। पञ्जीकारकेँ निम्नलिखित वस्तुसँ अवगत हैव आवश्यक छल– -       i) मूल निर्णय, -       ii) डेरावली, -       iii) वंशावली, -       iv) सादा उतेढ़। पाञ्जि लिखबाक हेतु किछु नियमक पालन आवश्यक छल। पञ्जीक एक पातक एक पृष्ठक सोलह कालम आ गाम एवं प्रकारे विभक्त कैल गेल अछि– -       मायक वंशक हेतु आठ कालम आ गाम। -       पितामहीक वंशक हेतु चारि कालम आ गाम। -       प्रपितामहीक वंशक हेतु दू कालम आ गाम। -       वृद्धा प्रपितामहीक वंशक हेतु एक कालम आ गाम। -       अपन स्वयंक ५पीढ़ी पूर्वजक हेतु एक कालम आ गाम। पाञ्जिक १६कालम विभक्त देखबामे अवइयै। एक पातक एक पृष्टमे १६मूल गामक उल्लेख रहैत अछि–३१व्यक्तिक नाम आर १६कन्याक नामक उल्लेख रहैत अछि। अहुना पाञ्जि देखबाक अथवा अध्ययन करबाक अवगति आब पञ्जीकारोकेँ नहि छन्हि। कायस्थक पञ्जीकार मूलतः दुई वंशक छथि–महुनी आर सरिसव। पाञ्जिमे जातीय इतिहास सुरक्षित अछि।– पंज्जीक तिथि:- पञ्जीक तिथिक सम्बन्ध सेहो विद्वानक बीच मतभेद अछि। सब तथ्यक अनुशीलन केला उपरांत हमरा अपन विचार ई अछि जे पञ्जीक प्रारंभ १३१०सँ १३२७धरिक तिथि जे मनैत छथि से हमरा बुझने मान्य नहि भऽ सकइयै कारण १३२३सँ १३२७क बीच हरिसिंह देव मुसलमानी आक्रमणसँ ततेक तबाह आर व्यस्त छलाह जे ओहि समयमे कोनो एहेन काज करब असंभव छल। नेपाली श्रोतसँ इहो ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव १३२६ई. धरि मिथिलासँ पड़ा चुकल छलाह आर तकर बादक हुनक इतिहासक कोनो निस्तुकी पता हमरा लोकनिकेँ नहि अछि। काठमाण्डुक वीर पुस्तकालयक गोपाल वंशावलीक मूल एतए विज्ञपाठकक हेतु देल जा रहल अछि – - “स माघ शुदि 3 तिरहूतिः हरशिंहु राजासन मिह्लोसन तासत्र गही टो ढ़ीलीस तुरूक याके वंङ रायत मानालपं थमु अगु गन याङ वस्यं शिमरावन गड्ढ़ भङ्ग याङ तिरहूतिया राजा महाथ आदिन समस्त वडङ व्यसन वंग्व हो ग्वलछिनो लिन्दुंबिल ववः ग्वलछिनो राजगाम द्वलखा धारे वंग्व। हिंपोतस राजा हरसिंह तो शिकध्वस काय नो मआथ नो उभय बंधि यंङा कूलन ज्वोङाव हंग्व राज गामया मझीधारो धायान समस्त धन कासन”। उपरोक्त वंशावलीसँ स्पष्ट अछि जे हरिसिंह देव ७जनवरी १३२६केँ शिमराँव गढ़क नष्ट भ्रष्ट भेला पड़ेला आर तकर बाद ओ मरि गेला। राजगाँवक माम्झी भारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए कैदी बना लेलकन्हि आर हुनक सब वस्तुजात लूटि–पाटि लेलकन्हि। ओ शरणार्थीक श्रेणीमे छलीह शासक हिसाबमे नहि। एहि प्रसंगकेँ जखन हमरा लोकनि ध्यानमे राखब तखन बुझना जाएत जे पञ्जी प्रबन्धक आदिमे एहि तरहे श्लोक अछि– “शाके श्री हरिसिंह देव नृपते र्भूपार्क १२१६ तुल्ये जनि– स्तस्माद्दंत मितेऽ ब्दकेँ द्विजगणैः पञ्जी प्रबन्धः कृतः”॥ १२१६+७८=१२९४ई. जखन हरिसिंह देव एकटा नाबालिकक रूपमे छल। अहु समयमे अहु समयमे पञ्जी प्रबन्ध सन मूल प्रश्नपर विचार करबाक दमिता हिनकामे तखन नहि हेतैन्ह तैं इहो तिथि हमरा बुझने अमान्य अछि। शक्तिसिंहक समयसँ मिथिलामे अस्तव्यस्तता छल। चण्डेश्वर ठाकुर हरिसिंह देवक मुख्य सलाहकार छलाह आर राज्यक हेतु सब काज करैत छलाह। नेपाल विजयक अवसरपर तुला पुरूष सेहो केने छलाह। १३१४ल आसपास हरिसिंह देव वयस्क भेलापर अपन राज्यक भार सम्हारलन्हि आर तखने चण्डेश्वरक तत्वावधानमे नेपाल विजयक खुश खबरी सेहो भेटलन्हि। ओम्हर मुसलमानी प्रकोप जोरसँ बढ़ि रहल छल तैं हेतु सामाजिक नियम निष्ठाकेँ सुदृढ़ करबाक हेतु हिनक ध्यान आकृष्ट कैल गेलन्हि आर एहि दिसि ध्यान देलन्हि आर पंजी प्रबन्धक व्यवस्था केलन्हि। पाञ्जिमे छोट–पैघक गप्प नहि छल–ई सभ कल्पना मात्र थिक। सब जातिक हेतु पञ्जी प्रबन्ध भेल छल मुदा मैथिल ब्राह्मण आर कायस्थ छोड़िकेँ ई चलल नहि। सूरी लोकनिक बीच सेहो पाञ्जि छल आर रहरिया तथा मधेपुरमे एकर संकेत भेटल अछि। सूरीमे पञ्जिआर पदवी एखनो विराजमान अछि। एतए पैघ काज करबाक हेतु काफी समय आर पलखतिक आवश्यकता छल तैं १३१०सँ १३१४क बीच पञ्जी प्रबन्धक प्रारंभ हैव बेसी युक्ति संगत बुझि पड़इयै। निम्नलिखित तीनटा श्रोतपर एहि प्रसंगमे विचार करब आवश्यक– - “शाके युग्म गुणकि सम्मित वरे भूपाल चूड़ामणिः श्रीमच्छृ हरिसिंह देव बिजयी पञ्जी प्रबन्धः कृतः तस्मात कर्ण बीजकलितं सुद्विंश्व चक्रेपुरा। कायस्थ मति प्रदस्थ गुणिनः श्री शंकर दत्तभान”॥ शंकर दत्त मल्लिककेँ (सरिसव मूल)केँ १३१०–११मे हरिसिंह देव पञ्जी प्रबन्ध करबाक आदेश देने छलथिन्ह। श्यामलाल चौधरी लिखित “वंशावली मैथिल कर्ण कायस्थ उपाख्यान पुस्तक वंश कुलदीपक” (ई पांडुलिपि सम्प्रति नैशनल लाइब्रेरी, कलकत्ता,क ‘शांति देवी–राधा कृष्ण चौधरी संग्रह’मे सुरक्षित अछि आर ओहिठाम कायस्थ पञ्जीक तालपत्र पोथी सेहो)मे कहल गेल अछि जे शंकर दत्त मल्लिक अपन भागिन मोहिनवार मूल ग्रामसँ लडूआरी डेरा अवस्थित गुणपति दासकेँ पाञ्जि देलथिन्ह तैं ई वंश पञ्जीकारक वंश कहाओल। श्याम लाल चौधरी एवम प्रकारे श्लोक लिखने छथि- - “शाके युग्म गुणार्क सम्मित परे भूपाल चूड़ामणि तस्मात् करण विज कलितं कायस्थ पञ्जी प्रबन्धः कृतः तस्मात् मंत्र गुणीनां श्री गुणपतिः दत्तवान॥ तेसर श्रोतकेँ स्पष्ट केनिहार छथि मेजर विनोद बिहारी वर्मा। हुनका द्वारा प्रस्तुत अध्ययनक श्रोतमे एकठाम लं.सं. २३३(=१३५२)मे लिखल कोनो ‘दत्त मल्लिक’क सबूत भेटलन्हि अछि। ई ओहि ‘दत्त मल्लिक’केँ शंकर दत्तक पुत्र शंभू दत्त मल्लिक मनैत छथि। शंभूदत्त मल्लिक पाञ्जिक नकल करब १३५२ई.शुरू केलन्हि। शंकर दत्त कवि सेहो छलाह। एहिसब तथ्यकेँ एकठाम संग्रहित कए जखन हम अध्ययन करैत छी तँ हमरा ई स्पष्ट बुझना जाइत अछि जे पाञ्जि निर्माणमे प्रमुख रूपे ब्राह्मण आर कायस्थ लोकनिक योगदान छ्लैक आर १३१०सँ १३१४क मध्य पञ्जी प्रथा व्यवस्थापित भेल। तकर बाद जखन हरिसिंह पड़ाकेँ चल गेल। तखन–पण्डित लोकनि बैसिकेँ ओकरा सरि औलहि आर ताहिमे ताहि दिनमे १५–२०वर्ष लगले हेतैन्ह तैं संभव जे ब्राह्मण–कायस्थक पाञ्जि आर वंश संग्रह करबामे जे समय लागल हेतैन्ह तकर बाद जे एकटा साँगोपाम्ग विवरण प्रस्तुत भेल होएत से १२४८ शक=१३२६/२७मे प्रकाशित भेल होएत। मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक स्थितिमे देखैत उपरोक्त तर्क हमरा बेशी युक्ति संगत बुझि पड़इयै आर तैं एकर तिथि निर्णय करबाक प्रश्नपर ओहि तथ्यकेँ ध्यानमे राखब आवश्यक। कर्णाट आर ओइनवार युग मिथिलाक सामाजिक इतिहासक दृष्टिये महत्वपूर्ण मानल गेल अछि बौद्ध धर्मक ह्रास भेलापर एतए ब्राह्मण व्यवस्थाक पुनर्स्थापन भेल आर जातीयताक व्यवस्थामे जे थोड़ बहुत लचड़ एहि बीचमे आबि गेल छल तकरा मैथिल निबंधकार लोकनि अनेकानेक स्मृति ग्रंथादि लिखिकेँ ठोस बनौलन्हि। सामाजिक कार्य कलापक हेतु सेहो बहुत रास ग्रंथ लिखल गेल जाहिमे चण्डेश्वरक गृहस्थ रत्नाकर सर्वश्रेष्ठ अछि। कुलीन प्रथाक विकास मिथिलामे एहियुगमे भेल। ओना एकर विश्लेषण पञ्जी प्रबन्धक प्रसंग भेल अछि परञ्ज ओकर एतिहासिक पृष्ठभूमि एहिठाम राखब आवश्यक। कुलीन व्यवस्थाक संस्थापक छलाहे आदि सूर जे पूर्वी मिथिलामे कतहुँ शासन करैत छलाह आर वृद्ध वाचस्पति हुनके ओत्तए रहि अपन न्यायकणिका नामक पुस्तकक रचना कएने छलाह। आदिसूर (९म शताब्दी)मे मिथिला आर बिहारमे बौद्धधर्मक प्रधानता छल आर तैं ब्राह्मणत्वक रक्षार्थ ओ कोलाञ्चसँ पाँचटा शुद्र ब्राह्मणकेँ बजाय अपना ओतए आश्रय देलन्हि। आदिसूरक दरबारमे ब्राह्मण लोकनिक वर्गीकरण प्रारंभ भेल छल आर पाछाँ ब्रल्ला सेन अपनाकेँ आदिसूरक वंशसँ मिलाप अपनाकेँ कुलीन प्रथाक जन्मदाता घोषित केलन्हि मुदा एहिठाम ई स्मरणीय जे मिथिलाँचलसँ प्राप्त दू ताम्र पत्र (बनगाँव आर पंचोभ) अभिलेखमे दान देबाक हेतु कोलाञ्च ब्राह्मणक उल्लेख स्पष्ट अछि। मिथिलाक पाञ्जिमे जे मूल ग्राम अछि सैह ओकर प्राचीनताक सबसँ पैघ प्रमाण मानल जा सकइयै। एवँ प्रकारे कुलीन व्यवस्थाक जन्म सर्वप्रथम मिथिलहिमे भेल छल आर पाछाँ एहिठामसँ बंगाल आर असममे ई पसरल। हरिसिंह देव ओहिसब पुराण व्यवस्थाकेँ एकत्र कए पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केने छलाह। एहि प्रथाक बादसँ विवाहादिक नियम सेहो श्रृंखलाबद्ध भेल। पञ्जिआर आर घटकक प्रथा चलल। एहि प्रथाकेँ जँ रमानाथ बाबू समाजक नियमनक हेतु सर्वश्रेष्ठ मनने छथि तँ उपेन्द्र ठाकुर एकरा प्रति क्रियावादी कहने छथि। एकरा चलते सामाजिक संकीर्णता दिनानुदिन बढ़ैत गेल आर बिकौआक प्रथा प्रचलित भेल। एहि युगमे क्षत्रियक रूपमे राजपूत लोकनिक विकास भेलन्हि–हुनको लोकनिमे पाञ्जिक प्रथा चललैन्ह मुदा बहुत दिन धरि नहि रहि सकलैन्ह। ओना मिथिलामे ताहि दिनमे गन्धवरिया राजपूतक विकास भऽ चुकल छल तथापि ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकरमे ३६टा राजपूत जातिक वर्णन भेटैत अछि। वैश्यमे व्यापारी वर्ग, कर्मकार, कलाकार, पशुपालक, खेतिहर, साहूकार, आदि लोकक गिनती छलैक। वैश्य मूल रूपेण खेती करैत छलाह आर व्यापार सेहो। आर्थिक उन्नतिक भार हिनके लोकनिपर छलन्हि। शूद्रक स्थान दयनीय छल। तेली, सूरी, धाँगर, यादव, धानुक, केओट, अमात आदि शूद्रक श्रेणीमे गिनाइत छलाह आर हिनका लोकनिकेँ क़ॉणॉ विशेष सामाजिक अधिकार नहि प्राप्त छलन्हि। मुख्यतः ई लोकनि बान्हल मजूर होइत छलाह आर हिनका लोकनिक सब किछु अपन मालिकपर निर्भर करैत छलन्हि। जँ वर्ण रत्नाकरमे एकर उल्लेख अछि तँ विद्यापतिक लिखनावलीमे हिनका लोकनिक दयनीय स्थितिक वर्णन। वर्ण रत्नाकरमे दू प्रकारक छोट जातिक वर्णन अछि–i) अनिर्वासित आर,ii) निर्वासित। एकर अतिरिक्त ज्योतीरीश्वरक ‘मन्द–जातीय’क एकटा पैघ सूची उपस्थित कएने छथि। ओहि सबसँ छोट जातिक सामाजिक स्तित्वक पता चलइयै। गुलामी आर बेगारीक प्रथा सेहो छल। स्त्रीक अवस्थातँ आर दयनीय भऽ गेल छल। समाजमे स्त्रीकेँ कोनो उच्च स्थान प्राप्त नहि छलन्हि आर एकर स्पष्टीकरण तँ ज्योतिरीश्वरक निम्नलिखित वाक्याहि भऽ जाइत अछि।–“स्त्रीक चरित्र अइसन दुर्लभ्य; स्त्रीक चरण अइसन दारूण”= विद्यापति सेहो स्त्रीकेँ “अलप गेआनी” कहने छथि। ई बात ठीक जे एहि युगमे लखिमा, धीरमती, विश्वास देवी सेहो भेलीहे आर चन्द्रकला सन निपुण स्त्री सेहो परञ्च हिनका लोकनिक आधारपर ई नहि कहल जा सकइयै जे समस्त मिथिला स्त्रीक स्थान हिनके सब जकाँ छल। सती प्रथाक प्रचलन सेहो छल आर ई राजपूतमे बेसी छल। चौठम (मूँगेर)सँ प्राप्त एकटा कागजसँ एहि बातक ज्ञान होइछ। भवसिंहक दुह पत्नी सेहो वाग्मतीक तटपर सती भेल छलथिन्ह। स्त्री शिक्षापर विशेष ध्यान नहि देल जाइत छल। पर्दा प्रथाक प्रचलन छल अर वैश्यावृत्तिक प्रचलन सेहो। विवाहिता स्त्री लोकनिकेँ सुहागिन कहल जाइत छलन्हि आर ओ लोकनि सिन्दुरक व्यवहार करैत छलीहे। पाटी फारबाक, काजर लगेबाक, तरहथी रंगबाक, नह रंगबाक प्रथा स्त्रीगणक मध्य विशेष प्रचलित छल। पानसँ दाँत लाल आर मिस्सीसँ दाँत करबाक प्रथा छल। गोदना पड़ेबाक उल्लेख सेहो लोकगीतादिमे भेटइत अछि। घोघ काढ़बाक प्रथा छल। धोती साड़ीक प्रचुर व्यवहार छल आर स्त्री लोकनि साया आर चोलीक व्यवहार सेहो करैत छलीहे। कसीदा काढ़बामे मैथिलानी निपुण बुझल जाइत छली। छौड़ी सब लंहगा, घघरा आर कंचुरी पहिरैत छल। पनटीक व्यवहार होइत छल। भोज भातक प्रथा सेहो छल आर मैथिल तँ भोजन भट्ट होइते छलाह। ज्योतिरीश्वर ‘पुर्नभोज वर्णनाः’ लिखने छथि। चूड़ा दहीक विशेष व्यवहार होइत छल। लिखनावलीमे जे पत्रादिक नमूना अछि ताहिसँ छोट जातिक सामाजिक अवस्थाक ज्ञान होइछ। स्वयं विद्यापति लिखने छथि– “उच्चैः कक्षमधः कक्षे समकक्षे नरंप्रति नियमे व्यवहारे च लिख्यते लिखन क्रमः”। हिन्दू मुसलमानक सम्पर्क बढ़लासँ हिन्दू लोकनिक मध्य एक प्रकार अस्तव्यस्तता आबि गेल छल। विद्यापति अपन कीर्तिलतामे एकर विस्तृत वर्णन कएने छथि– - “धरि आनए बाभन बटुआ, मथा चढ़ाबए गाइक चुड़ुआ। फोट चाट जनेउ तोड़, उमर चढ़ाबए चाह घोड़। हिन्दु बोलि दुरहि निकार, छोट ओ तुरूका भभकी मार। हिन्दुहि गोटओ गिलिये हल, तुरूक देखि होइ भान”॥ चण्डेश्वरक कृत्य रत्नाकरमे ओहियुगक पूजा–पाठ, पविनितिहार एवँ उत्सवादिक वर्णन भेटइत अछि। गौरी पूजा, दुर्गाव्रत, दुर्गारथ, वाराह द्वादशी, मतस्यद्वादशी, रासकल्याण, महाष्टमी आदिक उल्लेख भेटइत अछि। एकर अतिरिक्त उदकोत्सव महोत्सव, विनायक पूजा, भाष्कर पूजा, सूर्यपूजा, आदिक उल्लेख सेहो भेटइत अछि। फगुआक उल्लेख सेहो भेल अछि। (विस्तृत विवरणक हेतु देखु हमर पोथी–“मिथिला इन द एज आफ विद्यापति”)। स्मृतिकारक दृष्टिकोण:- सामाजिक समस्याक प्रति मैथिल स्मृतिकारक अपन विशिष्ट दृष्टिकोण छलन्हि जकर मूल उद्देश्य छल समन्वयात्मक प्रवृतिकेँ प्रोत्साहन देव। ओ लोकनि वैदिक एवँ अवैदिक तत्वकेँ अपन स्मृतिमे स्थान एकटा विशिष्ट समन्वयात्मक प्रवृतिकेँ जन्म देलन्हि कारण ताहिदिनक परिस्थितिमे ओकर आवश्यकता छल। एहि दृष्टिकोणसँ ओ लोकनि गौड़ीए आर उत्कलीय स्मृतिकारसँ बड्ड आगाँ छलाह। श्रीदत्त उपाध्याय, चण्डेश्वर आर विद्यापतिक कार्य एहि क्षेत्रमे प्रशंसनीय अछि। कीर्तिलतासँ जे स्थितिक भान होइछ ताहिसँ बुझना जाइत अछि जे मिथिलोमे हिन्दूक स्थिति दयनीय छल आर ओ लोकनि लाचारीक हालतमे रहैत छलाह। जखन राजकुमारे इब्राहिम शाहक प्रति कहलन्हि–“अज्ज पुष्पा पुरिसथ्थ, पातिसाह–पापोस पाइअ”, तखन दोसरा कोन गप्प? कन्याक बिक्री सेहो होइते छल। मुदा तखन मिथिलामे उपाये कि छल? विद्यापति हिन्दू मुसलमानक प्रसंगमे प्रायश्चितक कोनो चर्च नहि केने छथि। वाचस्पति सेहो एहि दिसि कोनो विशेष ध्यान नहि देलन्हि आर मात्र एतवे कटिकेँ छोड़ि देलन्हि जे मलेच्छक भाषा नहि सिखबाक थिक(मलेच्छ भाषां न शिक्षेत्)। ताहि दिन धरि बुझि पड़इयै जे मिथिलामे एहेन कोनो समस्या नहि उठल हेतैक कारण कतवो मुसलमानी प्रकोप कियैक नेऽ बढ़ल हौक एहिठाम हिन्दू शासक छल आर सूफी लोकनिक विशेष प्रभाव रहलासँ मनोमालिन्य कर्म छल। अगर ककरो जबर्दस्ती मुसलमानी बनाइयै देल गेलैक प्रायश्चित् कराके घुरेबासँ कोन लाभ। ओहिठामक लोग तँ ओहिना विशेष कट्टर होइत छल तैं समस्या एखन धरि जटिल नहि भेल छलैक। हिन्दूधर्मकेँ सुरक्षित रखबाक हेतु बहुत रास पारिजात, रत्नाकर इत्यादि निर्माण भेल परञ्च लोक एतेक आलसी भऽ गेल छल जे ककरो एतेक पढ़बाक–बुझबाक पलखति नहि छलैक। बहुत गोटए कोनो नियमोक पालन नहि करैत छलाह। एहिसबकेँ ध्यानमे राखि शंकर मिश्र एकटा संक्षिप्त ‘छन्दोगाट्रिकोद्वार’ रचना केलन्हि आर ओकरा अंतमे लिखलन्हि–“एतावत्यपि कृते न प्रत्यवेयात्, अन्यथा तु प्रत्यवेयात्”। रूद्रधर अपन शुद्धि विवेकमे लिखलन्हि– “सत्यमेव रत्नाकर–परिजात मिताक्षरा–हारकता दयोऽन्ये। तत्रापि तत्रालसमानसानां भवेद प्रमोदम्य मम प्रयासः”। चण्डेश्वर अपन गृहस्थरत्नाकरमे विवाहक नियमक प्रतिपादन कएने छथि। मैथिल परम्परामे प्रतिलोम विवाहकेँ मान्यता नहि चैक यद्दपि एहिपर विचार आर विवाद दुनु भेल छैक। मैथिल स्म्रतिकार लोकनिक सामन्त दरबारमे रहैत जाइत छलाह आर तैं ई लोकनि अपन रचनामे ब्राह्मणेटाक महत्व दैत छलाह अनका नहि। शासक आर सामन्त सेहो ब्राह्मण छलाह आर स्मृतिकार लोकनि अपने सेहो। शूद्रकेँ तँ कोनो स्थाने नहि देल जाइत छलैक। शूद्र प्राड़विवाक सेहो नहि भऽ सकैत छलाह। तथापि रूद्रधरक ई वाक्य देखबा योग्य अछि–“शूद्रस्य वृषोत्सर्ग वाक्ये एव वेद पाठाधिकारो नान्यत्र इति सर्वप्रामाणिक सिद्धम्”–(श्राद्धविवेक)। ई कतेक हास्यास्पद बुझि पड़इयै जे जखन मुसलमान अथवा आन विदेशी ब्राह्मण–शूद्रकेँ एक्के रंग बुझैत रहन्हि आर जखन दुनुक एक भऽ कए चलब अत्यावश्यक छल तखन ब्राह्मण स्मृतिकार लोकनि अपन समन्वयात्मक प्रवृतिक बाबजूदो सबकेँ मिलाकेँ एक संग नहि लऽ चलि सकलाह। बहु विवाहक प्रथा पंजी प्रबन्धक कारणे बढ़ि गेल छल। गृहस्थ रत्नाकरक अध्ययनसँ स्पष्ट अछि जे दोसर विवाह करबाक पूर्व प्रथम पत्नीक प्रबन्ध कऽ देबाक चाही। विधवा विवाहक सम्बन्धमे कोनो स्पष्ट निर्देश नहि भेटइयै। चण्डेश्वर विवाहक सम्बन्धमे मात्र एतबे कहैत छथि जे पूर्व वर कन्याक पक्षक दिसिसँ कोनो बात ककरोसँ नुकाकेँ नहि रखबाक चाही। कोनो दोष कोनो पक्ष दिसि हो तँ ओकरा स्पष्ट कहि देबाक चाही आर जँ कोनो बात नहि कहल गेल आर विवाहक बाद ओकर पता चलल तखन ओहि हेतु दण्डक निर्देश सेहो देल अछि। मैथिल स्मृतिकारक प्रयत्नसँ हिन्दू कानूनक मिथिला स्कूलक स्थापना भेल। एहिमे ओ लोकनि लक्ष्मीधरक कृत्य कल्पतरूसँ बड्ड प्रभावित भेलाह। सामाजिक दुश्मनक विवरण वर्धमान अपन दण्ड विवेकमे ‘प्रकाश तस्कर’ कहिकेँ केने छथि–मांत्विक, ताँत्रिक, व्यापारी, वैध, झूठ गवाही देनिहार, इत्यादि भला आदमीक वेशमे समाजक हेतु खतरनाक बुझल गेल छथि। दानपर मिथिलामे विशेष बल देल जाइत छल। चण्डेश्वरक दान रत्नाकर, रामदत्तक षोडस–महादान–पद्धति, वाचस्पतिक महादान निर्णय एवँ विद्यापतिक ‘दान वाक्यावली’ एहिबातक प्रमाण अछि। दोनोमे सप्तसमुद्रदान, हेमहास्तिरथदान, विश्व चक्रदान आदिक उल्लेख अछि। एहि सबसँ स्पष्ट अछि जे ई सब ग्रंथ राजा–महाराजा, सामंत लोकनिक हेतु लिखल जाइत छल आर सामान्य गरीब लोककेँ एहिसँ कोनो लाभ नहि छलैक। विद्यापतिकेँ छोड़ि कोनो मैथिल स्मृतिकार गरीबक हेतु दानक रास्ता नहि बतौलन्हि अछि। मैथिल स्मृतिकार लोकनि तंत्र पंचरात्र एवँ पाशुपत साहित्यसँ प्रभावित छलाह। समन्वयवादी होइतहुँ ओ लोकनि पंचोपासनाक समर्थक छलाह। दैनन्दिन जीवनकेँ नियमित रखबाक हेतु ओ लोकनि धर्मपर विशेष जोड़ देलन्हि। समाजपर एकर प्रभाव पड़ल। संस्कृतक सुरक्षा हिनका लोकनिक पचासे भेल। समाजमे गुलामक प्रथा सेहो प्रचलित छल। गुलामीक एहेन विकराल रूप छल जे पुछु जनि। सामंतवादी व्यवस्था छल आर बन्हिल मजूर छल। वहियाक खरीद बिक्री होइत छल। गौरीव वाटिका पत्र, बही–खाता, अजातपत्र, अकरारपत्र, जनौढ़ी, निस्तार पत्र, लिखनावली आदिसँ बहिया सबहिक स्थितिक पता लगैत अछि। १८–१९म शताब्दी धरि एकर प्रचलन मिथिलामे छलैक। बहियाक स्वत्वाधिकारक प्रश्नपर बरोबरि लोककेँ आपसमे झगड़ा–झाँट होइत छलैक आर अंततो गत्वा ओकर निर्णयक चटरीमे जाके होइत छलैक। प्राचीन कालसँ ई व्यवस्था चल अबैत छल। जातक, बौद्ध साहित्य आर कौटिल्यक अध्ययनसँ एहिपर पूर्ण प्रकाश पड़ैत अछि। मिथिलामे प्राचीन कालहिसँ दास–दासीक संख्याक विवरण प्राचीन साहित्यमे भेटैत अछि। नारदक अनुसार जँ कोनो गुलाम अपन मालिकक जीवनक रक्षा केलक आर मालिक बचि गेला तँ ओकरा गुलामीसँ मुक्तक देल जाइत छलैक। विवाद चिंतामणिमे नारदक मतकेँ वाचस्पति उद्धृत केने छथि जाहिसँ मत मान्य छल। मिथिलाक सामंतवादी समाजमे हेवनिधार खवास लोकनिक जे महत्व छलैक ताहिसँ बुझना जाइत अछि जे प्रिय पात्र गुलाम, खवास आर वहिया अपन मालिकक मोनकेँ जीतिकेँ बहुत किछु प्राप्त करिअत छल। विद्यापतिक लिखनावली आर मैथिल स्मृतिकार लोकनिक रचनादिमे सेहो एहि प्रसंगक विशेष बात भेटइत अछि। दू ब्राह्मण परिवारमे एकटा गुलाम लकए जे झगड़ा भेल आर ताहि पर न्यायालयापन निर्णय देलन्हि से अद्यावधि सुरक्षित अछि आर तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थापर प्रकाश दइयै। वहिया लोकनिक स्थिति बड्ड दयनीय होइत चल आर ओकरा सबहिक इज्जत सदति खतरेमे रहैत छलैक। बहिया सभहिक अदला–बदला, लिखा–पढ़ी, ककए होइत जाहिसँ केओ कत्तौसँ भागे नहि। भगलापर ओकरा सजा देल जाइत छलैक। १७७०आर १८११क दूटा एहनो उदाहरणक प्रमाण हमरा लोकनिकेँ भेटल अछि। गुलामक अंतर्गत निम्नलिखितकेँ हमरा लोकनि राखि सकैत छी–गुलाम, नफर, खवास, धानुख, केओट, अमात, कहार, आदि जातिक लोग खवासीमे राखल जाइत छल आर बहियाकेँ बान्हल मजूर बुझल जाइत छ्लैक। एहि सबहिक लोग घर गृहस्थीसँ खेती आर बहलमानी धरि करैत छलैक। चमार जूता आर चमड़ाक कारबारक हेतु राखल जाइत छल आर ओहुना वर्गसँ बान्हल मजूर होएत छल। मिथिलाक कोन–कोनमे छोट पैघ जमीन्दारक संख्या ततेक नेऽ छल जे कोनो एहेन गाम नहि छल जाहिठाम खबासी आर बहिया गिरी नहि हो। जखन एकर अभाव होमए लागल आर तंग भऽ कए पीड़ित–शोषित लोग भागे लागल तखन एहि व्यवस्थाकेँ दृढ़ करबाक हेतु कतेको उपाय रचल गेअ आर लिखापढ़ी शुरू भेल। जे गुलामी या वहियागिरीसँ छुटैत छल तकरा हेतु निस्तार पत्र लिखल जाइत छल। मिथिलाक सामंतवादी व्यवस्थाक ई एकटा प्रमुख अंग छल। जकर उदाहरण हेवनिधरि मिथिलामे देखबामे अवइत छल। अपना शताब्दीक उतरार्द्धमे एहि प्रथाक ह्रास देखबामे अवइयै कारण आव मिथिलाक शोलकन्हक विशेष भाग अपना गामकेँ छोड़ि कमेबाक हेतु बाहर चल जाइत अछि। अध्याय–१७ मिथिलाक आर्थिक इतिहास मिथिलाक आर्थिक अवस्था अति प्राचीन कालसँ अद्यपर्यंत कृषिपर आधारित रहल अछि। प्राचीन कालमे अखन जकाँ जलक अभाव नहि छल। मिथिलाक प्राकृतिक बनाबट किछु एहेन अछि जाहिसँ एहिठाम कृषिक प्रगति नीक जकाँ होइत अछि। वैदिक कालमे खेत जोतबाक, बीआ पारबाक, काटल आर फसिल तैयार विस्तृत रूपे उल्लेख भेटइत अछि। पकला उत्तर अन्नकेँ काटल जाइत छल आर तखन ओकरा बोझ बाटिकेँ खरिहानमे आनल जाइत छल। दाउन होइत छल तकर पश्चात् ओसौनी होइत छल आर तखन ओकरा सरियाकेँ व्यवहारक हेतु राखल जाइत छल। एहि लेल कृषक लोकनिकेँ बड्ड परिश्रम करए पड़ैत छलन्हि। नापतौलक आधार छल ‘खाड़ी’। बरबारीक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। मिथिलामे चाउर, जौ, मूँग, मकई, गहूम, तिल, मसुरी, आदि वस्तु उपजैत छल। जौक रोपनी शीतकालमे होइत छल आर गर्मी मासमे ओकरा काटल जाइत छल। धानक रोपनी बरसातमे होइत छल आर अगहनमे ओकर कटनी होइत छलैक। अन्हर, बिहाड़ि, बसात, अतिवृष्टि आर अनावृष्टिक संगहि हिड्डीक प्रकोपसँ कृषिकेँ धक्का पहुँचैत छलैक। अनावृष्टिसँ अकालक संभावना सेहो रहैत छलैक। सामान्य किसानक स्थिति बढ़िया नहि छल आर हुनका मालिक लोकनिक अत्याचारसँ तबाह होमए पड़ैत छलन्हि। कृषकक समूह विशाल होइतहुँ हुनका लोकनिकेँ कोनो विशेषाधिकार नहि छलन्हि आर हुनका लोकनिकेँ पर कर्जक बोझ बरोबरि बनले रहैत छलन्हि। उपनिषदमे जे जनकक बहुदक्षिणा यज्ञक उल्लेख अछि ताहिसँ ई अनुमान लगाओल जा सकइयैजे मिथिला ताहि दिनमे एक समृद्धशाली राज्य छल। राजकोश धन–धान्यसँ अवश्ये भरल होइत अन्यथा एतेक पैघ यज्ञ ओ कइयै कोना सकितैथ। ओहि यज्ञमे हजारोक संख्यामे गाय आर सोनाक दान भेल छल। गाय बड़दपर विशेष ध्यान देल जाइत छल ताहि दिनमे। बृहदारण्यक उपनिषदक अध्ययनसँ बुझि पड़इयै जे मिथिला ताहि दिनमे सुखी सम्पन्न राष्ट्र आर ओतए कोनो वस्तुक अभाव नहि छलैक। ओहिमे सामानसँ लदल बैलगाड़ीक उल्लेख सेहो अछि। आवागमनक हेतु रथ एवँ नावक व्यवहार होइत छल। ‘स्वर्णपाद’क व्यवहार एहि बातक संकेत दैत अछि जे ताहि दिनमे सोनाक सिक्काक प्रचलन छल। आर्थिक निश्चिंतताक कारणे देशमे आध्यात्मिक एवँ बौद्धिक विकास संभव भेल छल। मैथिल लोकनि ताहि दिनमे स्वभावसँ शांत एवँ क्रियशील छलाह। पढ़ब–लिखबपर विशेष ध्यान दैत छलाह तथापि सैनिकक रूपें सेहो ओ लोकनि ककरोसँ कम नहि छलाह आर तीर चलेबामे तँ अग्रगण्ये। वृषि मनुष्यक मुख्य कार्य छल। लोक सब विशेष कए गामे रहैत छल। गाममे ३०–४०सँ लकए १०००परिवार धरि रहैत छल। गामक समीपहि गाछी–बिरछी सेहो रहैत छल। गामक अध्यक्ष अथवा गण्यमान्य व्यक्ति गाम भोजक होइत छलाह। गामक हेतु ई सर्वश्रेष्ठ एवम महत्वपूर्ण पद छल। राजाक हेतु कर वसूल करब, कृषि व्यवस्थाक निरीक्षण करब, ग्रामीण झगड़ा–झंझटकेँ फरिछैब हिनका लोकनिक मुख्य कर्तव्य छल। जँ उपजा नहि होइत छल तँ ग्रामीण लोकनिक भोजनक व्यवस्था हिनके करए पड़ैत छलन्हि। उपजनिहार खेतमे पहरूदार सेहो राखले जाइत छल। उत्पादनक साधन मूल रूपें धनीमानी लोकक हाथमे छल तैं साधारण कृषकक स्थिति दयनीय रहब स्वाभाविके छल। जँ कोनो कारणे अन्न नहि उपजल तँ हिनका लोकनिकेँ अपार कष्टक सामना करए पड़ैत छलन्हि। अकाल पड़बाक उल्लेख प्राचीन साहित्यमे भेटैत अछि। महावस्तुमे एहि बातक स्पष्ट उल्लेख अछि जे वैशालीमे एक वेर भीषण अकाल पड़ल छल। भूखसँ पीड़ित भए असंख्यलोक मुइल छल आर मुर्दाक दुर्गन्ध पूर्ण भए गेल छल। एहि युगमे बाढ़िक प्रकोपक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। गण्डकसँ पूर्वक क्षेत्रमे जलक बाहुल्य रहैत छल। मौर्यकालीन अभिलेखमे अकाल आर अभावक उल्लेख भेटइयै। मिथिलाक अंतर्गत विदेह, वैशाली, चम्पारण, अंगुतराय, पुण्ड्र, कौशिकी कक्ष, आदि स्थान सब कृषिक हेतु प्रसिद्ध छल आर एहि समस्त प्रदेशकेँ अन्नक भण्डार कहल जाइत छल। अंगुतरायक अपन गाम सुखी सम्पन्न छल। खेती करबाक हेतु खेतकेँ छोट–छोट टुकड़ीमे बाटल जाइत छल आर खेतक बीच सबमे आड़ि सेहो होइत छल। मिथिलामे ई प्रथा अद्यपर्यंत अछिये। ताहि दिन मिथिलामे जमीनपर स्वत्वधिकारक प्रश्न लकए विद्वानमे मतभेद बनल अछि। अखन जतवा जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधारपर कोनो निर्णयात्मक मतक प्रतिपादन करब कठिन अछि कारण जमीनपर दुनू पक्षक विचारक हेतु सामग्रीक अभाव नहि अछि जे प्राचीन कालमे औपचारिक रूपे समस्त जमीनक अधिकारी राजा होइत छलाह कियैक तँ परम्परागत विचारे ‘सर्वे भूमि गोपाल की” मानल जाइत छल आर राजा ईश्वरक प्रतिनिधि हिसाबे जमीनक मालिक सेहो होइत छलाह। विद्वान लोकनि तीनटा मत प्रतिपादन केने छथि–व्यक्तिगत, सामूहिक आर राजकीय स्वत्वाधिकार आर तीनू मतक पक्ष–विपक्षमे एक्के रंग तर्क देल जा सकइयै। फाहियान लिखने छथि जे केओ राजकीय जमीन जोतैत छथि हुनका ओहिमे सँ किछु अंश राजाकेँ देमए पड़ैत छन्हि। अर्थशास्त्रमे राज्य नियंत्रित कृषि व्यवस्थाक विवरण अछि। जातकमे सामूहिक स्वत्वाधिकारक विवरण भेटैत अछि। जमीन प्राचीनकालक आर्थिक जीवनक नींव छल जाहिपर समस्त आर्थिक रूपरेखा ठाढ़ छल। जातकमे भोगगाम आर अर्थशास्त्रमे ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख भेटइयै। एहि सभक व्याख्या प्रत्येक विद्वान अपना–अपना ढ़ँगे करैत छथि। अर्थशास्त्रमे कौटिल्य कर्मचारीकेँ नगद वेतन देबाक व्यवस्था केने छथि मुदा ‘आयुधीय’ गामक उल्लेख किछु विद्वानकेँ दोसर अर्थ लगैत छन्हि। जखनसँ प्रचुर मात्रामे जमीनक दान शुरू भेल तखनसँ सामंतवादक वीजारोपण सेहो भेल आर भारतक अन्य प्रांत जकाँ मिथिलामे सेहो सामंतवादी प्रथाक विकासक सूत्रपात भेल। सामंतवाद मिथिलामे मध्ययुगमे अपन चरमोत्कर्षपर छल। सामंतवादक प्रभावे जमीनक टुकड़ी–टुकड़ीमे बहब बढ़ए लागल आर बंगार प्रथाक श्रीगणेश सेहो भेल। गुप्त युगसँ जे प्रथा प्रारंभ भेल से मिथिलामे बनल रहल आर सामंतवादी व्यवस्थाक प्रभाव हमरा लोकनिक दैनन्दिन जीवनपर सेहो पड़ल। सिक्का एवँ कर व्यवस्था:- एहि प्रसंग्मे कर व्यव्स्था एवँ सिक्काक प्रसंगपर विचार करब अप्रांसगिक नहि होएत। टाका–पैसाक व्यवहार होइत छल अथवा नहि से निश्चित रूपसँ कहब असंभव मुदा वैदिक साहित्यमे हिरण्य, अयस, श्याम, लौह, शीशा, कार्षापण आदिक उल्लेख भेटैत अछि। चानीक टाकाकेँ ‘निष्क’ कहल जाइत छल। सिक्काकेँ कृष्णल, सतमान, हिरण्य, पिण्ड, आर कार्षापण सेहो कहल जाइत छल। ‘स्वर्ण’ सेहो सिक्काक हेतु व्यवहार होइत छल। कतहु–कतहु सिक्काकेँ ‘पाद’ सेहो कहल गेल छैक। राजजनक अपन यज्ञमे प्रत्येक गामपर दश–दश ‘स्वर्ण पाद’ लगौने छलाह। ओहिमे प्रत्येक ब्राह्मणकेँ तीन–तीन सतमान सेहो देल गेल छलन्हि। बौद्ध साहित्यमे सेहो एहि हेतु बहुत शब्दक व्यवहार भेल अछि। चानी आर तामाक प्राचीन सिक्का प्रचुर मात्रामे मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ प्राप्त भेल अछि–हाजीपुर, चम्पारण, वैशाली, असुरगढ़, गोरहोघाट, पटुआहा, बहेड़ा, जयमंगलागढ़, पुर्णियाँ, बलिराजगढ़, मंगलगढ़ इत्यादि। एहि सभ स्थानसँ तँ घैलक–घैल सिक्का बहराएल अछि। जातक कथामे वस्तुकदाम ‘पण’क माध्यमसँ देल गेल जाइत छल। सिक्काकेँ पण सेहो कहल जाइत छल। साधारणतः सिक्काक तीन नाप छल–२४, ३२ आर ४०रत्ती। ‘पाद’ १००रत्तीक चौथाई भाग होइत छल। लोककेँ राजाकेँ किछु कर सेहो देमए पड़ैत छलैक। डी. आर. भण्डारकरक अनुसार जनक कालीन आर बौद्धकालीन मिथिलामे “पाद” करक व्यवहार विशेष प्रचलित छल। राजस्व प्रशासनक जे मान्य सिद्धांत छल तदनुसार मिथिलाक शासक लोकनि कर संचय आर ओसूली करैत छलाह। ‘षडभाग’ सिद्धांत तँ सर्वमान्य छल। राजा प्रजाक रक्षा करैत छलाह आर तकरा बदलामे प्रजा राजाकेँ कर दैत छल। ‘कर’क रूपमे जमीनसँ प्राप्त कर सभसँ प्रमुख छल। समाहर्त्ता राजस्व प्रशासक होइत छल। हुनका सहायतार्थ गोप तथा स्थानिक सेहो होइत छलाह। पतञ्जलिक अनुसार क्षेत्रकर नामक एकटा पदाधिकारी महत्वपूर्ण व्यक्ति होइत छलाह जे कृषियोग्य भूमिक सर्वेक्षण कए ओहिपर कर लगेबाक अनुशंसा करैत छलाह। बलि, भाग, होग, कर, हिरण्य, उदक भाग, उद्रंग, सीत आदि कैक प्रकारक कर होइत छल। एहिमे किछु कर तँ बड्ड कष्टकर छल। उपरोक्त शब्दक विश्लेषण करबामे विद्वान लोकनिक बीच मतभेद छन्हि तथापि उपरोक्त सबटा कर प्रचलित छल सेहो मान्य अछि। एकर अतिरिक्त शुल्क, क्लिप्त, उपक्लिप्त, प्रणय, विष्टी, उत्संग आदि सेहो करेक क विभिन्न नाम छल आर ई राजकीय आयक मुख्य श्रोत मानल जाइत छल। ई सब प्रकारक कर मिथिलामे व्याप्त छल आर ओहि ठामसँ प्राप्त शिलालेख आर तत्सम्बन्धी प्राचीन साहित्यमे सेहो एकर उल्लेख अछि। सामूहिक आर्थिक जीवन:- बौद्ध साहित्यसँ इहो स्पष्ट होइछ जे मिथिलामे मिलि जुलिकेँ रहबाक व्यवस्था आर श्रेणीवद्ध भए काज करबाक आदत बहुत पुराण अछि। जातक कथासँ ई ज्ञात होइत अछि जे विदेहक निवासी बंगाल होइत समुद्रक मार्गसँ विदेह जाए व्यापार करैत छलाह। ओ लोकनि एहि हेतु सामूहिक व्यवस्था करैत छलाह–आर नाव आर जहाज सेहो बनबैत छलाह। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी लोकनि अबैत छलाह। एहि मानेमे पूर्व–पश्चिम दुनूसँ मिथिलाक घनिष्ट सम्बन्ध छल। आर्थिक जीवनक क्षेत्रमे एहि प्रकारक सामूहिक संगठन लाभदायक सिद्ध होइत छल आर मैथिल लोकनि लोकनि एहिसँ विशेष लाभांवित होइत छलाह। बृहदारण्यक उपनिषदसँ एकर प्रमाण भेटैत अछि। समूहिकताक हेतु गण, ब्रात, पूग, संघ, जाति, श्रेणी आदि शब्दक व्यवहार होइत छल। ‘श्रेणी’ मूलतः व्यापारी लोकनिक संगठन छल। व्यापारी लोकनि व्रार्णक कहबैत छलाह। व्यापारक संचालनक हेतु व्यापारी लोकनि अपन ‘श्रेणी’ आर संघ बनबैत छलाह। किछु गोटए एकरा गणक संज्ञा सेहो दैत छथि। रामायण–महाभारतमे सेहो व्यापारी संघक उल्लेख भेटैत अछि। रामायणमे ‘नैगम’ शब्दक व्यवहार भेल अछि। वैदिक साहित्यक ‘श्रेष्ठी’ आर उपनिषदक ‘श्रोष्ठिन’ शब्दो सेहो सामूहिकताक परिचायक थिक। मनु आर पाणिनिमे सेहो श्रेणी शब्दक उल्लेख अछि। बौद्ध साहित्य तँ श्रेणी शब्दसँ भरले अछि। लोहार, सोनार, कुम्हार, तेली, व्यापारी, मछुआ, कुमार इत्यादि लोकनिक अपन अलग–अलग श्रेणी होइत छलैक। हुनका लोकनिक अपन नियम कानून सेहो भिन्ने छलन्हि। ओ लोकनि अपन नियम अपने मिलिकेँ बनबैत छलाह। हिनका लोकनिक मध्य जे कोनो मतभेद होइत छलन्हि तँ ओकरो निपटारा ओ लोकनि अपन संघेक द्वारा करैत छलैथ। संघ श्रेणीक प्रधान लोकनिकेँ राजदरबारमे समादर होइत छलन्हि आर कानून इत्यादि बनेबा काल हुनका लोकनिक राय–विचार लेल जाइत छलन्हि। मिथिलाक महत्वक वर्णन एहि दृष्टिकोणे महाउमग्ग जातकमे अछि जाहिसँ ई ज्ञात होइत अछि जे नगरक चारू कोनमे निगमक संगठन छल। श्रेणीक प्रधानकेँ प्रमुख, प्रधान, जेट्ठक अथवा सेठी कहल जाइत छलैक। कमार, सोनार, लोहार, मालाकार, ताँती, कुम्हार आदि सभ वर्गक अपन–अपन प्रधान होइत छलैक। श्रेणीक अंतर्गत काज केनिहार पदाधिकारीक वेतन इत्यादि श्रेणीसँ देल जाइत छलैक। समय–समयपर राजा श्रेणीक प्रधानकेँ विचार–विमर्श करबाक हेतु बजबैत छलथिन्ह। व्यापारी वर्गक प्रतिनिधिकेँ बरोबरि राजदरबारसँ सम्पर्क राखे पड़ैत छलैक। श्रेणीकेँ बहुत रास वैधानिक अधिकार सेहो प्राप्त छलैक। सामूहिक जीवनक सभसँ पैघ प्रमाण हमरा वैशालीक उत्खननसँ प्राप्त अवशेष सबसँ भेटइत अछि। सार्थवाह, कुलिक, निगम आदि शब्दक व्यवहार ओहिठाम प्रचुर मात्रामे भेल अछि। नगर शासनमे हिनका लोकनिक बड्ड–पैघ हाथ छलन्हि। ओहिठामक बहुत मुद्रापर “श्रेष्ठी निगमस्य” उल्लिखित अछि आर ओहिपर बहुत गोटएक नाम सेहो भेटैत अछि–जेना हरि, उमा भट्ट, नागा सिंह, सालिभद्र, धनहरि, उमापालित, वर्ग्ग, उग्रसेन, कृष्ण दत्त, सुखित, नागदत्त, गोण्ड, नन्द, वर्म्म, गौरिदास इत्यादि ई सभ गोटए कुलिक छलाह। सार्थवाहमे डोड्डकक नाम आर श्रेष्ठिमे षष्ठिदत्त आर श्रीदासक नामक उल्लेख अछि। बेगूसरायसँ प्राप्त एकटा माँटिक मुद्रापर ‘श्री समुद्र’ आर दोसरपर ‘सुहमाकस्य’ लिखल भेटैत अछि। वैशालीमे बैकिंग प्रथाकेँ चालू रखबाक श्रेय हिनके लोकनिकेँ छन्हि आर वैशाली व्यापारी एवँ सम्पत्तिधारी लोकनिक केन्द्र छल। एहि युगमे मैथिल लोकनि अपन आश्चर्यकारी साहसिक भावनाक परिचय देने छलाह। उद्योग–व्यापारक स्थानीयकरणक कारण श्रेणीकेँ बल भेटल छलैक आर व्यापारक उत्कर्षक कारणे सेट्ठी लोकनिक उत्थान भेल छल। अपन संगठनकेँ मजबूत ककए रखबाक आवश्यकता अहू लेल छलैक जे हुनका लोकनिकपर कोनो–कोनसँ कोन प्रकार घातक आक्रमण नहि आर हुनका लोकनिक स्वार्थपर आँच नहि आबे। सामूहिकताक भावनासँ जे बल भेटैत छैक तकर अनुभव ओ लोकनिक लेने छलाह आर ओकर लाभकेँ देखि चुकल छलाह। हुनक संगठित शक्तिकेँ नजर अन्दाज आब शासको नहि क सकैत छलाह। प्रत्येक व्यवसायक पृथक–पृथक सघ छल। मुग्ग–पक्क–जातकमे १८टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख अछि। रमेश मजुमदार २७टा श्रेणी (गिल्ड)क उल्लेख केने छथि। एकटा जातकमे मिथिलाक चारिटा श्रीणीक उल्लेख अछि। श्रेणी कैक प्रकारक अर्थ व्यवस्थाक सहायक छल।– -         i) बैकिंङ्ग प्रणालीकेँ जीवित राखब। -         ii) सब तरह वस्तुकेँ न्यास रूपमे सुरक्षित राखब। -         iii) कर्ज देबाक व्यवस्था करब। -         iv) अपना क्षेत्रक अंतर्गतक भूमिक व्यवस्था करब। -         v) राजस्व ओसुलीक काजमे सहायता देब। -         vi) आपसमे सद् भावना बनाके राखब। -         vii) अपना सदस्यक दिसि ठीका, पट्टा इत्यादि लेबाक व्यवस्था    करब। -         viii) बिक्री व्यवस्थाकेँ नियमित करब। -         ix) अपना सदस्यकेँ अनुशासित राखब आर समय–समयपर   सामयिक कर लगाएब। -         x) सामूहिक कार्यक व्यवस्था करब। -         xi) आवश्यक वस्तु जात पैदा करब। -         xii) विज्ञापन प्रसारित करब। -         xiii) आवश्यकता भेलापर स्थानीय तौरपर व्यवहारक हेतु सिक्का बाहर करब। श्रेणीकेँ समाज आर राज्यमे प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त छलैक। जातकक अनुसार भाण्डागारिकक कार्यक्षेत्र श्रेणीक निरीक्षण धरि सीमित छल। श्रेणीक नियमक मान्यता राजाकेँ देमए पड़ैत छलन्हि। प्राचीन कालक सामूहिक जीवनमे एकर विशेष महत्व छलैक आर जातकक अनुसार मिथिलामे सेहो श्रेणी बद्ध सामूहिक जीवनक प्रमाण भेटैत अछि। व्यापार एवँ उद्योग:- अति प्राचीन कालसँ मिथिलामे उद्योग आर व्यापारक काफी प्रगति भेल छल। मिथिला चारू कात नदीसँ घेरल अछिये आर तैं आवागमनक कोनो असुविधा कहियो रहबे नहि केलैक। विदेह्सँ तक्षशिला धरि राजमार्ग बनले छल। जातक सभ तँ मिथिलामे उद्योग–व्यापार सम्बन्धी कथा सभसँ भरल अछि। विदेहमे बाहरोसँ व्यापारी अवइत छलाह आर चीज बिक्रय करबाक हेतु श्रावस्तीक व्यापारी वैशाली आर विदेह मुख्य व्यापारक मार्गपर छल। राज गृह, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, वैशाली, कुशीनगर, कपिलवस्तु, श्रावस्ती आर मिथिलाक बीच आवागमनक मार्ग प्रशस्त छल। कश्मीरसँ होइत गाँधार धरि मिथिलासँ सोझे एक सड़क अबैत छल जकरा मिथिलासँ उज्जैन, बनारस, चम्पा, ताम्रलिप्ति, कपिलवस्तु, इन्द्रप्रस्थ, शाकल, कुशावती, पाटलिपुत्र आदि स्थानक सड़कसँ सम्बन्ध छल। सामुहिक व्यापारकेँ इ लोकनि बड्ड महत्व दैत छलाह आर समुद्रमे चलए बाला जहाजकेँ ‘वाहनम्’ कहैत छलाह। मैथिल लोकनि दक्षिणी चीनमे अपन एक साँस्कृतिक उपनिवेश सेहो बसौने छलाह आर ओतए किछु स्थानक नाम विदेह आर मिथिला सेहो रखने छलाह। रामायणमे वैशालीकेँ उद्योग व्यापारक केन्द्रक संगहि एकटा बन्दरगाह से कहल गेल अछि। चीन, तिब्बत आर नेपालक संग मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध छल। सूती कपड़ाक कारबार ताहि दिनमे मिथिलामे बेसी होइत छल। बौद्ध साहित्यक अध्ययनसँ एहि पक्षपर विशेष प्रकाश पड़इयै–तंतु, ताँती, तंतभण्ड, तंत–वित्थनम् आदि शब्द ताँतीसँ सम्बन्धित काजक संकेत दैत अछि। मिथिलाक ‘कोकटी’ अखनहुँ प्रसिद्ध अछि आर तखनहुँ प्रसिद्ध छल। एकर अतिरिक्त मिथिलाक मुख्य उद्योगमे अवइत अछि चीनी, तेल, हड्डीपर कैल काज, धातु उद्योग, वेंत, तारक पातक बनल वस्तु, सिलाई+फराई, इत्यादि। जहिना आई ई सब वस्तुक हेतु मिथिला प्रसिद्ध अछि तहिना प्राचीन कालहुमे छल। कुसियारक चर्च तँ तेरहम शताब्दीक तिब्बती यात्री सेहो कएने छथि। ढ़ोल, बाजा, आर अन्यान्य छोट–मोट उद्योगक निर्माण सेहो मिथिलामे होइत छल। युद्ध कालीन अस्त्र–शस्त्र सेहो बनैत छल आर कहल जाइत अछि जे लिच्छवीक विरूद्ध युद्ध शुरू करबाक कालमे अजातशत्रु रथ मूसल आर ‘महाशील कांतार’ सन यंत्रक व्यवहार केने छलाह। लिच्छवी लोकनि कुंकुम आर सुगन्धित द्रव्यक व्यापार करैत छलाह। कमार लोकनि काठपर तरह–तरहक कलाकारी करइत छलाह आर पाथर धातुक माला सेहो बनबैत छलाह। माँटिक सौन्दर्यपूर्ण वासन आदि बनैत छल आर ओहिपर तरह–तरहक पालिश आर कलाकारी होइत छल। माँटिक बासन एकटा कारी चमकैत पालिश होइत छल जकरा “नादर्न ब्लैक पालिश वेयर” कहल जाइत छलैक आर जे समस्त भारतमे एकर माँग छल। मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रसँ ई प्रचुर मात्रामे प्राप्त भेल अछि। मिथिलामे कपूर, चानन, नोन, रेशमी, उन, अफीम, कागज, सोना, तामा, पाथर, चूना, आदि वस्तु बाहरसँ मंगाओल जाइत छल। व्यापारिक दृष्टिकोणसँ मिथिलाक सम्पर्क पूबमे ताम्रलिप्ति आर पश्चिममे भरू कच्छसँ छलैक। मिथिलासँ सभ प्रकार अन्न, दलहन आदि वस्तु बाहर जाइत छल। फल फलहारी से बाहर पठाओल जाइत छल। व्यापारक दृष्टिकोणे निम्नलिखित पथ महत्वपूर्ण छल– -         i) मिथिला–राजगीर -         ii) मिथिला–श्रावस्ती -         iii) मिथिला–कपिलवस्तु -         iv) विदेह–पुफलावती -         v) मिथिला–चम्पा -         vi) मिथिला–सिन्धु -         vii) मिथिला–प्रतिष्ठान -         viii) मिथिला–ताम्रलिप्ति -         ix) मिथिला–नेपाल–तिब्बत स्थल मार्गक अतिरिक्त ई लोकनि समुद्र मार्गक व्यवहार सेहो करैत छलाह। गण्डकसँ गंगा आर चम्पाक मार्ग बाटे ई लोकनि ताम्रलिप्ति धरि पहुँचैत छलाह आर ओहिठामसँ सुवर्ण भूमि आर अन्यान्य स्थानपर जाइत छलाह। जातकक कथासँ ई ज्ञात होइछ जे सिन्धुक घोड़ाक व्यवहार मिथिलामे होइत छल आर सिन्धुक सम्पर्क भेलासँ मिथिलाक व्यापारिक सम्बन्ध पश्चिमोसँ घनिष्ट हैव बुझि पड़इयै। भारतक व्यापारी लोकनि वेविलोन धरि जाइत छलाह तैं संभव जे मैथिल व्यापारी सिन्धु बाटे आन व्यापारी सब संग ओम्हर जाइत होथि। प्रशस्त स्थल आर समुद्र मार्गक कारणे मिथिला का व्यापारिक प्रगति अपन उत्कर्ष पर छल आर जातक एकर सबूत अछि। (एहि विषय पर विस्तृत अध्ययनक हेतु देखु–मुहम्मद अलीक लिखल–“इकोनौमिक हिस्ट्री आफ मिथिला”)। मौर्य युगकेँ मंगलकारी राज्यक युग कहल गेल छैक। एहि युगमे जनताक सर्वांगीण आर्थिक जीवनक नियंत्रण राज्यक माध्यमसँ होइत छल। खान इत्यादिपर राज्यक प्रभुत्व छल। राज्यक जमीन आर कृषि कार्यक निरीक्षणक हेतु अधीक्षक नियुक्त होइत छलाह। राज्यक प्रत्येक विभागक हेतु अलग–अलग निरीक्षक रहैत छलाह। राज्यक दिसिसँ कृषिकेँ विशेष महत्व देल जाइत छलैक आर जनकल्याणकेँ ध्यानमे राखि ई स्वाभाविको छल। बंजर जमीन सभमे खेती करबाक हेतु शूद्र लोकनिकेँ बसाओल जाइत छलैक। पुरोहित आर विद्वान ब्राह्मण लोकनिकेँ दानमे जमीन भेटैत छलैक। सिंचाई–पटौनी आर मालक व्यवस्था राज्यक दिसिसँ होइत छलैक। प्राकृतिक उपद्रवसँ बचबाक हेतु राज्यक दिसिसँ सभ प्रभन्ध होइत छल। गाम सभमे सहयोग समितिक व्यवस्था सेहो छल आर केओ एहिमे सम्मिलित नहि होइत छलाह हुनका दण्डित कैल जाइत छल। उद्योग, व्यापार आर वाणिज्य सेहो प्रगतिक पथपर छल। प्रशस्त राजमार्गक व्यवस्थासँ व्यापारक प्रगतिमे सहायता भेटैत छलैक। बाजारमे निर्धारित मूल्यपर सभ वस्तुक बिक्री होइत छल आर मूल्य नियंत्रण आर वेतन निर्धारणक सिद्धांतक प्रति पादन आइसँ २३००वर्ष पूर्व कौटिल्य केने छलाह। जे केओ राज्यकर देबामे असमर्थ छलाह हुनका ओहि बदलामे बेगारी करए पड़ैत छलन्हि। व्यापारीकेँ पूर्ण मात्रामे कर देमए पड़ैत छलन्हि। गुप्त युगमे कोनो विशेष परिवर्त्तन देखबामे नहि अवइयै। कृषि, उद्योग, व्यापारक प्रगति अहुयुगमे भेल। वैशालीसँ प्राप्त मुद्रा एहि युगक आर्थिक जीवनपर प्रकाश दैत अछि। फाहियान आर हियुएन संगक यात्रा विवरणसँ ई ज्ञात होइछ जे मिथिलाक आर्थिक अवस्था ओहि युगमे बेजाय नहि छल। एहि युगमे सामंतवादी प्रथाक विकास भेल। लोककेँ आब जमीन्दारी प्रथाक अनुभव होमए लागल छलन्हि। जनताक विशिष्ट समूह अहुखन गामेमे बसैत छल आर कृषि आजीविकाक प्रधान आधार छल। ‘कर’क मात्रामे हेर–फेर आब जमीनक अनुसारे हैव प्रारंभ भेल। जाहिठाम पटौनीक व्यवस्था छल ताहिठाम कर वेसी लगैत छलैक आर वंजर जमीनक कम। हियुएन संगक अनुसार एहिठामक किसान होइत छलाह आर अधिक अन्न उपजबैत छलाह। जमीन मूलरूपसँ तीन भागमे बाँटल जाइत छल– i) गोचर–जाहिमे भिन्न प्रकारक घास उपजैत छल। ii) बंजर–कोनो प्रकारक उपजा नहि होइत छल। iii) उपजाऊ– हाटक व्यवस्था सेहो प्रारंभ भए गेल छल। हाटक निरीक्षणक हेतु ‘हट्टपति’ नामक एकटा अधिकारी सेहो नियुक्त होइत छलाह। ब्राह्मन आर क्षत्रियकेँ कर रहित जमीन छोट–छोट टुकड़ामे बाँटि चुकल छल। भूमि नापबाक प्रणाली प्रचलित भए चुकल छल आर गुप्तयुगमे एकरा कुलवाप्य कहल जाइत छल। अन्न नापबाक प्रणाली सेहो प्रचलित भए चुकल छल आर ओकरा ‘द्रोण’ कहल जाइत छलैक। खेतीबारी हरसँ होइत छल। एहि युगमे व्यापारक प्रगति सेहो खूब भेल छल। एहियुगमे बहुतो गोटए मिथिलासँ काशी जाइत छलाह। सिक्काक रूपमे कौड़ीक प्रचलन सेहो भऽ चुकल छल। लहना–तगादाक व्यवसाय वेश बढ़ल–चढ़ल छल आर सूदक दर ९% सँ १२% धरि छल। भोजन वस्त्रक सामग्री एकठामसँ दोसर ठाम पठाओल जाइत छल। कैक प्रकारक आभूषण बनाओल जाइत छल। एक स्थानसँ दोसर स्थान सामान बैलगाड़ी आर नावपर पठाओल जाइत छल। आर सभपर चूंगीकर सेहो लगैत छलैक। एक बैलगाड़ीपर बीस बोझसँ बेसी सामान लदलासँ दू टाका शुल्क लगैत छल। कथा सरित्सागरसँ ज्ञात होइत अछि जे काशीक चारूकात रस्ताक जाल बिछाओल छल। पुण्ड्रवर्द्धनसँ पाटलिपुत्र धरि मिथिले बाटे रस्ता छल। एहि सबसँ स्पष्ट होइछ जे प्राचीन मिथिला सब तरहे सम्पन्न छल। आर देश–विदेशसँ ओकर सम्पर्के बनल छलैक। सामान्य मनुक्खक जीवनमे कोनो विशेष परिवर्त्तन नहि भेल छलैक। धनी लोकनि अपना धनकेँ गारिकेँ रखैत छलाह। मध्ययुगीन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक जनबाक हेतु साधनक अभाव अछि तथापि तत्कालीन साहित्यक अध्ययनसँ हमरा लोकनिकेँ पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होइछ। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे एहि युगक आर्थिक स्थितिक विवरण भेटइत अछि। ओहि ग्रंथसँ ई प्रतीत होइछ जे ताहि दिनमे मिथिलाक ग्रामीण स्वर प्राञ्जल भए उठल छल। चाउर, जौ, विभिन्न प्रकारक दालि, बाजरा, मटर, तेलहन, कुसियार, रूई, पिआज, लहसून, दाना इत्यादि मिथिलामे प्रचुर मात्रामे उपजैत छल। चूड़ा आर चाउरक भूजाक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। सोआ, मेथी, मंगरैल आर सोंफक खेती सेहो होइत छल। आम, खजूर, नेमो, नारंगी, अनार, अंजीर, जामून, कटहर, सपाटु, लताम, पपीता आदि फलक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। चूड़ा दहीक प्रथा विशेष प्रचलित छल। अन्न रखबाक हेतु बखारी बनैत छल। चीनी आर गूड़क प्राचुर्य छल। पानक बड़का व्यवसाय मिथिलामे होएत छल। पान लगेबाक विधिपर ज्योतिरीश्वरतँ विभिन्न प्रकारक विधानो बतौने छथि। ओहिमे तरह–तरहक मशाला पड़इत छलैक आर ओ सभ मशाला देशक विभिन्न भागसँ मनाओल जाइत छलैक। तीस प्रकारक वस्त्रक वर्णन ज्योतिरीश्वर स्वयं कएने छथि। दामी वस्त्रक अंगपोछा बनैत छल। ओ रंगरेज आर मुशहरीक उल्लेख सेहो कएने छथि। विभिन्न प्रकारक धातुसँ अनेकानेक प्रकार बासन–बर्त्तन बनैत छल। वर्णरत्नाकरमे अष्ट धातुक उल्लेख सेहो भेल अछि लोहा आर अन्यान्य धातु गलेबाक कलामे मैथिल निपुण होइत छलाह। एहिठामक लोहार लोहा गलाकेँ हऽर, खुरपी, कैंची, चक्कू, कुरहड़ि आदि बनबैत छलाह। खपरैल घरक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। कमार लोकनि काठक अनेको वस्तु बनबैत छलाह। ज्योतिरीश्वर ३६प्रकार शास्त्रा शस्त्रक उल्लेख केने छथि। वर्णरत्नाकरसँ ज्ञात होइछ, जे मैथिल लोकनि तंजोर, सिलहट, अजमेर, कँची, चोलप्रदेश, कामरूप, बंगाल, गुजरात, काठियावाढ़, तेलगंना, आदि स्थान सभसँ अपन वस्त्र मंगबैत छलाह। ओहिमे श्रीखण्ड, मलय आर सूरतक उल्लेख सेहो अछि। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि सिद्धहस्त छलाह। एकर विवरण धर्मस्वामी सेहो उपस्थित केने छथि। नाव सबमे सिंह, बाघ, घोड़ा, बत्तक, साँप, माँछ आदिक चेन्ह रहैत छल। नाव बनेबामे मैथिल लोकनि अपन सौन्दर्य बोधक परिचय दैत छलाह। स्वास्थ्यपर सेहो विशेष ध्यान देल जाइत छल। मिथिला ताहिदिनमे दूध दहीक हेतु प्रसिद्ध छल आर ओहिठाम लोग स्वस्थ होइत छल। देहक श्रृंगारक संग देहक सेवाक विन्यास सेहो छल। देह मालिश कएनिहारकेँ मरदनिया कहल जाइत छलैक। भोजनमे गरम मशालाक प्रयोग होइत छल। आर शरीरक सौन्दर्यक हेतु अगुरू, कर्पूर आदिक व्यवहार प्रचुर मात्रामे होइत चल। जीवनक एहन कोनो अंश अथवा सौन्दर्य सामग्रीक एहेन कोनो अवयव नहि जकर उल्लेख वर्णरत्नाकरमे नहि हो। पंचशायकमे एक दिसि स्त्रीक प्रसाधनक सभ विषयक वर्णन अछि तँ दोसर दिसि परिवार नियोजन आर गर्भ निरोधक तकक विधि लिखल अछि। कामसूत्रसँ कोनो अंशमे एहि ग्रंथक महत्व कम नहि अछि। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर, पंचशासक आर विद्यापतिक कीर्तिलता एवँ लिखनावली पढ़लासँ बहुत बातक ज्ञान होइछ। विद्यापतिक लिखनावलीसँ ई ज्ञात होइत अछि जे राजस्वकर सेहो वसूल होइत छल। भूमि नपबाक उल्लेख सेहो ओहिमे अछि। दानपत्रक सूची सेहो राखल जाइत छल। एहि ग्रंथमे ऋण–पत्र, खेती–व्यवस्थापत्र, बन्धकी–व्यवस्थापत्र आदिक विवरण भेटइत अछि। दानवाक्यावलीमे राहरि, साठी आर लतामक चर्च अछि आर ओहिमे कैक प्रकारक वस्त्रक उल्लेख सेहो भेल अछि–कार्पासिक वस्त्र, समेम वस्त्र, क्षौम वस्त्र, कौशेय वस्त्र, कुश वस्त्र, कृमिज वस्त्र, मृगलोमजवस्त्र, वृक्षविक संभव वस्त्र आर आविक वस्त्र। कीर्तिलतामे बाजार, हाट, नगर, आदिक विशिष्ट वर्णन अछि। बजारमे पनहट्टा, धनहट्टा, सोनहट्टा, पकवानहट्टा, मछहट्टा इत्यादिक उल्लेख अछि। ओहि ग्रंथमे दरिद्रताक उल्लेख सेहो अछि। तत्कालीन दरिद्रताक विवरण ओहिमे अछि। कीर्तिपताकामे विद्यापति कहने छथि जे राजाक मुख्य कर्त्तव्य होना चाही दरिद्रताकेँ खतम करब। ऋणक उल्लेखो कीर्तिलतामे अछि आर दरिद्रताक विवरण तँ पदावलीक कतेको गीतमे। आर्थिक इतिहासक दृष्टिकोणसँ इ युग अखनो एकटा विशिष्ट अध्ययनक अपेक्षा रखइयै कारण नेऽ तँ उपेन्द्र ठाकुर आर नेऽ मोहम्मद अकीक एहि कालपर कोनो प्रकाश देने छथि। थोड़ बहुत विवरण हम मिथिला इन द एज आफ विद्यापतिमे कैल अछि। मुसलमानी प्रसारसँ आर्थिक जीवनक रूपरेखामे सेहो थोड़ेक परिवर्त्तन भेलैक मुदा तइयो मैथिल अपन कट्टरताक कारणे आन प्रांतक अपेक्षा एहिठाम अपनाकेँ फराकेँ रखलन्हि आर अपन विधि–विधानकेँ यथा शक्ति सुरक्षित सेहो। मुसलमानी शासन कालमे मिथिलाक आर्थिक जीवनमे कोनो विशेष उल्लेखनीय प्रगति नहि भेलैक अपितु स्थिति यथावते रहलैक। शाहजहाँक समयमे जखन समस्त भारतमे अकालक स्थिति उत्पन्न भेलैक तँ मिथिलो ओहिसँ वाँचल नहि रहल। कास्तकार आर सामान्य किसानक स्थिति बड्ड दयनीय भऽ गेलैक। तिरहूतमे ताहि दिनमे बंजारा लोकनिक उपद्रव जोरपर छल। बरानिअरक यात्रा विवरणसँ ज्ञात होइछ जे बंजारा समस्या उभरिकेँ ऊपर आएल छल। कृषक लोकनिक स्थिति बदत्तर भऽ गेल छल आर औरंगजेबक परोक्ष भेलापर तँ स्थिति आर चिन्तनीय आर दयनीय भऽ गेल छल। भारतमे अंग्रेज आर अन्यान्य विदेशी लोकनिक कारवार आ व्यापार शुरू भऽ गेल छल आर शोषण प्रक्रियामे एकटा नव गति आवि गेल छलैक। १७५७मे पलासीक लड़ाईक बादक स्थितिकेँ भारतीय अर्थनीतिक इतिहासमे अंधकारपूर्ण कहल गेल अछि। अंग्रेज, मुसलमानी अमला–फैला, हिन्दू–जमीन्दार, बंजारा, सन्यासी सभ मिलिकेँ जनताकेँ लूटबामे लागल छल आर संगहि अपन–अपन जेबी गरम करबामे। देशक चिन्ता ककरोनहि छलैक। चारूकात हाहाकार आर अकालक स्थिति छल। १७५७क पछातिमे मिथिलामे बरोबरि अकाल पड़ैत रहल। बेकारीक समस्या उत्पन्न भऽ गेल। कृषि आर उद्योगक स्थिति दिन–प्रतिदिन खसए लागल। तिरहूतक गामक गाम उजार होमए लागल। १७७०मे बड़का अकाल पड़ल आर ओहिठामक लोग खेती बारी छोड़िकेँ पड़ाए लागल। ओहि वर्षमे दरभंगाक विशेष भागमे चासक कोनो काज नहि भऽ सकल आर स्थिति एहेन भऽ गेल जे १७८३मे दरभंगाक कलक्टर एहि आशयक प्रस्ताव रखलन्हि जे अवध प्रांतसँ खेतिहर मंगाकए दरभंगामे खेतीक व्यवस्था कैल जाइक। एहि अकालक कारण मुजफ्फरपुरक कलक्टरीसँ प्राप्त कागज सभसँ ज्ञात होइछ। हाजीपूरसँ पुर्णियाँ धरि अभूतपूर्व अकाल पड़ल छल। एकर मुख्य कारण ई छल जे सरकार अकारण सभ बातमे हस्तक्षेप करैत छल, आवागमन एवँ यातायातक असुविधा छल आर ताहि दिनमे केओ एहेन योग्य नेता नहि छलाह जे एहि सभहिक निराकरणक कोनो प्रयास करितैथि। एहेन अराजक स्थितिमे जकरा जतए जे हाथ लगैक से सैह करेऽ आर जमीन्दारी अत्याचार आर शोषणक तँ कोनो कथे नहि छल। १७८२मे बाध्य भऽ कए ई नियम बनबे पड़लैक जे बिना अंग्रेजी सरकारक अनुमतिकेँ केओ जमीन्दार अपन जमीनकेँ एम्हर–आम्हर नहि कऽ सकइयै। वार्थहस्ट्र साहेब १७८७मे तिरहूतक शासक भेला। दरभंगाक महाराज आर इस्ट इण्डिया कम्पनीक बीच एहि प्रश्नकेँ लकए बरोबरि झंझट होइते रहलन्हि (देखु–हमर ‘द खण्डबालज आफ मिथिला’)। स्थिति एहेन विभत्स भऽ गेल छल जे परगन्ना पचही, आलापुर आर भौरमे किछु उपजावारी नहि होइत छल आर ई सभ जंगलमे परिवर्त्तित भऽ गेल छल। एहि सभ क्षेत्रमे जंगली जानवरक वास भऽ गेल छल। अंग्रेजकेँ अपन राज्यक सुरक्षाक चिंता छलन्हि आर जमीन्दार लोकनिकेँ अपन सम्पत्तिक आर बीचमे पिसाइत छल दरिद्र जनता जकरा हेतु चारूकात अन्हारे अन्हार छलैक। सरकार आर जमीन्दारक अतिरिक्त महाजन लोकनि सेहो निर्दय भऽ कए जनताक पसीनाक कमाई छीन लैत छलैक। मानव–कृत शोषण यंत्रकेँ साहाय्य देनिहार प्रकृति सेहो छलैक। अतिवृष्टि आर अनावृष्टि तँ अपन रूप देखिबते छल आर ताहिपर नदीक बाढ़ि तँ अपन नङटे नाच देखिबते छल। मिथिलामे नदीक तँ अभाव अछि नहि आर प्रति वर्ष एकर बाढ़ि अखने जकाँ ताहि दिनमे अबैत छल। गंगा, गण्डक, वाग्मती, कमला, कोशी, बलान, करेह, लखनदै आदि नदीक बाढ़ि बरसातमे तीन मास धरि मिथिलाकेँ समुद्रमे बदैल दैत छलैक जाहिसँ एकर आर्थिक जीवन अस्त–व्यस्त भऽ जाइत छलैक। कोशीकेँ तँ सहजहि ‘दुखक नदी’ कहले गेल अछि। एहिसँ सब फसिल नष्ट भऽ जाइत छल, महामारीक प्रकोप बढ़ैत छल आर आवागमन एवँ यातायातक सुविधा लुप्त प्राय भऽ जाइत छल। एहना स्थितिमे बरोबरि अकाल हैव स्वाभाविके–१५५५सँ १९७५धरि मिथिलामे कतेको बेर अकाल पड़ल अछि आर महामारीक प्रकोप बढ़ल अछि–१५७३–७४, १५८३–८४, १५व९५–९६, १६३०, आर अंग्रेजक समय १७७०सँ १९००क बीच १५–२०बेर अकालक दर्शन लोककेँ भेल छलैक। १६३०क अकाल तँ अद्वितीय छल। ओहि साल मिथिलासँ बहुत रास लोगकेँ दोसर ठाम चल गेल छल। मिथिलामे बाढ़ि तँ वार्षिक क्रम जकाँ अबैत अछि आर एहेन शायद कोनो वर्ष होएत जाहिमे बाढ़ि नहि आएल हो। बाढ़ि आर अकाल मिथिलाक आर्थिक इतिहासक एकटा अभिन्न अंग मानल जाइत अछि। १७७०क अकाल मिथिलाक इतिहासमे अद्वितीय छल आर मिथिलाक जनसंख्या घटिकेँ एक दम्म कम्म भऽ गेल छल। १८७३–७४मे पुनः एकटा ओहने अकाल मिथिलामे भेल छल जकर विवरण हमरा फतुरी लाल कविक अकाली कवितसँ भेटइयै–अकाली कवित अप्राक्शित अछि। अकालकेँ दूर करबाक हेतु आर मजूरकेँ राजे देबाक हेतु ताहि कालकेँ रेलगाड़ीक योजना चलाओल गेल जकरा सम्बन्धमे फतुरीलाल लिखैत छथि– -         “कम्पनी अजान जान कलनको बनाय शान। -पवन को छकाय मैदानमे धरायो है॥ -छोड़त है अड़ादार बड़ा बीच धाय–धाय। -सभेलोग हटाजात केताजात खड़ा है॥ -तारकी अपारकार खबरि देत वार वार। -चेत गयो टिकसदार रेल की उवाई है॥ -करत है, अनोर शोर पीछे कत लगत छोर। -जोर की धमाक से मशीन की बड़ाई है॥ -कम्पूसन पहरदार कोथी सब अजबदार। -कोइला भर करल कार धूआँसे उड़ायो है॥ -बाजा एक बजन लाग हाथी अस। -पिकन लाग जैसा जो चढ़नदार वैसाधर पायो है॥ -गंगाकेँ भरल धार उतरि गयो फतूर पार गाड़ीकी। -अजबकार कवित यह बनाया है”॥ अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ि, अभाव, एवँ प्राकृतिक प्रकोपसँ मिथिलाक आर्थिक जीवन परम्परागत रूपे प्रभावित रहल अछि आर अहुखन अछिये। अंग्रेजक अमलमे आबिकेँ जखन रेलगाड़ीक सुविधा बढ़ल आर आवागमन एवँ यातायात आर संचार व्यवस्थामे सुधार भेल तखन मिथिलाक आर्थिक इतिहासक रूपरेखामे परिवर्त्तन हैव स्वाभाविक भऽ गेल। उद्योग आर व्यापारक प्रगति सेहो भेल परञ्च ओकरा अखनो पर्याप्त नहि कहल जा सकइयै। प्राचीन कालहि मिथिलामे उद्योग–व्यापार विकसित अवस्थामे छल आर मध्य कालक विशिष्ट भागमे एकर से स्थिति बनल रहलैक मुदा इस्ट–इण्डिया कम्पनीक समयमे आबिकेँ एहिमे थोड़ेक ह्रास अवश्य भेलैक। खाद्य सामग्रीक अतिरिक्त मिथिलाक क्षेत्रमे कुसियार, तम्बाकु आर पाट आर मिरचाई बेस मात्रामे उपजैत अछि एहि लऽ कए मिथिलाक व्यापारो अछि। सब प्रकारक खादीक कपड़ा सेहो एहिठाम बनैत अछि। कोकटीक हेतु तँ मिथिला सर्वप्रसिद्ध अछिये। मिथिलामे व्यापारक प्रसिद्ध केन्द्र छल–हाजीपुर, लालगंज, बगहा, गोविन्दपुर, सतराघाट, दरभंगा, कमतौल, खगड़िया, रोसरा, पूसा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, रानीगंज, नबाबगंज, नाथपुर, साहेबगंज, राजगंज, रामपुर, अलीगंज, खबासपुर, दुलालगंज, कालियागंज, देवगंज, किसनगंज, बहादुरगंज, बारसोई, बेगूसराय, तेघड़ा, दलसिंहसराय इत्यादि। एहिमे नाथपुर तँ अंतराष्ट्रीय व्यापारक मुख्य केन्द्र छल जाहिठाम प्रचुरमात्रामे नेपाली लोकनि सामान लऽ कए अबैत छलाह आर एहिठामसँ सामान लऽ कए जाइत छलाह। अंग्रेजक अमल धरि नाथपुर एक प्रख्यात व्यापारिक केन्द्र छल। १८३६ नारेदिगर आर नाथपुरक सर्वेक्षण अंग्रेज द्वारा कैल गेल जकर रेकर्ड सम्पत्ति सुरक्षित अछि। सिन्दूर, कागज, आर अफीमक व्यापार बेस होइत छल। अफीमक कारखाना विदुपुर, लालगंज, दरभंगा, वैगनी, नवादा, आदि स्थानमे छल। पाटक कारबार पुर्णियाँ आर सहरसामे सबसँ बेसी होइत छल आरनीलक सम्बन्धमे पूर्ण विवरण हम पूर्वहिं दऽ चुकल छी। एतवा होइतहुँ मिथिलामे २०म शताब्दीमे कोशीक प्रकोपक बढ़लासँ आर्थिक स्थिति दयनीय भऽ गेल छल। रेलमार्ग सबटा टूटि फाटि गेल, गामक गाम उजरि गेल छल। नाथपुरक व्यापारिक महत्व नष्ट भऽ गेल छल आर जे प्राचीन उपलब्धि आर्थिक दृष्टिकोणे मिथिलाक छल से आब इतिहासक वस्तु बहिकेँ रहि गेल। राष्ट्रीय आन्दोलन आर स्वदेशीक पुनरूत्थानक क्रममे कोकटीक हेतु प्रसिद्ध तिरहूत (मिथिला)केँ पुनः अखिल भारतीय खादीक प्रधान केन्द्र बनाओल गेल आर मधुबनीमे एकर मुख्यालय राखल गेल। बहुत गोटएक गुजर एखनो एहिसँ चै रहल अछि। १९५५मे कोशीकेँ बन्हबाक प्रयास भेल आर वीरपुरमे कोशी बैरेजक निर्माण भेलासँ दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ आर उत्तर मूंगेर आ भागलपुर पूर्णतः लाभांवित भेल अछि। मिथिलामे आर सब नदीकेँ जँ बान्हल आर नियंत्रित कैल जाइक तँ मिथिलाक आर्थिक स्थितिक रूप रेखा बदलि जेतैक। पूर्णियाँ–सहरसा जतबे कष्ट कोशीक कारणे भोगने छल अखन ततबे सुभ्यस्त आर सम्पन्न भऽ गेल अछि। स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र जखन रेल मंत्री बनलाह तखन ओ अहि सभ क्षेत्रक टुटल फाटल रेलवे लाइनकेँ चालू करौलन्हि। एहिसँ एहि क्षेत्रक आर्थिक विकासक संभावना आर बढ़ि गेल आर दुर्भाग्यक गप्प ई एहने एक लाइनक उद्घाटनक हेतु जखन ओ ०२/०१/७५केँ समस्तीपुरमे पहुँचलाह तँ ओतए एक संदिग्ध स्थितिमे बम बिस्फोटक कारणे मारल गेलाह। एहिसँ मिथिलाक लोक सभकेँ भारी क्षति पहुँचलाह, जकर खानापूर्ति अखन धरि नहि भेल अछि। जगदीश प्रसाद मंडल- दू टा कथा-१.डंका २ कोना जीवि? जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। दू टा कथा- १.डंका चूड़लाइ, तिलकुट आ चूड़ा-मूढ़ि गमछाक एक भागमे बान्हि दोसर भाग दहिना हाथमे पकड़ि लटकौने जीवानन्द उत्तर मुँहेक रास्ता धेने डेग झाड़ने जाइत रहए कि भौयाकाकाक नजरि पड़लनि। दरबज्जाक ओसारक दछिनबरिया अखड़े चैकीपर बाँहिक सोंगरक कान्हपर माथ अड़कौने रस्ते दिस देखैत रहति कि नजरि पड़ितहि जीवानन्दकेँ किछु पूछए चाहलनि कि मन रौकए लगलनि। सोगाएल मन। मुदा जीवानन्दक आकर्षित रुप देखि मन धिक्कारए लगलनि जे सभ दिन एकठीम बैसि नीक-बेजाएक, गप्प-सप्प करैत एलहुँ आइ तँ सहजहि तिलासंक्रान्ति सन पावनि छी। तहन जँ टोकब तँ केहन होएत। गंभीर मन मुदा मुस्की दैत पुछलखिन- ‘‘कतए एत्ते हड़बड़ाएल जाइ छह जीवानन्द?’’ भैयाकाकाक टोकब कऽ अनठा आगू बढ़ि जाएव जीबानन्द उचित नहि बुझि रस्तेपर ठाढ़ भऽ कहलकनि- ‘‘की कहू काका, अइबेरक पावनि रीब-रीबेमे रहि गेल।’’ जीवानन्दक परेशानीक मिलल बात सुनि भैयाकाकाक मनमे गुदगुदी लगलनि। जहिना आत्मा खूँटा (रस्सी) सदृश्य ब्रह्यसँ मिलैत तहिना भैयाकाकाक मन जीवानन्दक व्यथा-कथा सुनै लऽ सुरसुरेलनि। चैवन्नियाँ मुस्की दैत पुछलखिन- ‘‘तिलासंक्रान्ति सन खाइ-पीबैबला पावनि तहन तोरा कोना रीब-रीवेमे जा रहल छह?’’ भैयाकाकाक बातमे जीवानन्द ओझरा गेल। मनमे उपकल नीक काज भेने खुशीसँ हँसी लगैत अछि मुदा अधला काज भेने कि हँसी नहि लगैत छैक? रास्तापर ठाढ़ भेल जीवानन्दकेँ किछु फुड़बे ने करै। जहिना खेतमे हाल कम रहने अंकुड़ नहि होइत तहिना जीवानन्दोकेँ भेल। असमंजसमे पड़ल मन सोचलकै जे भोरसँ अखन धरिक अपने बात सुना दिअनि। जँ किछु कहबनि नहि तँ मनमे हेतनि जे कोनो उकड़ू काज केने अछि। मुस्कुराइत कहए लगलनि- ‘‘काका की पूछै छी, चारि बजे भोरेक पोखरिक घाट परक पी-पाह सुनि निन्न टुटि गेल। उठैक विचार करिते रही कि पत्नी आबि कऽ  कहलनि जे रतुपारवाली दीदीकेँ भरिसक दर्द उपकि गेलनि। पूर मासो छिअनि। भरिसक वएह कुहड़ैत छथि। सुनितहि मन खुशी भऽ गेल जे खूब पावनि हएत? मुदा अपन दियाद नहि रहने असथिर भेलौं। उठि कऽ गेलौं तँ देखलिऐक जनानी सभ घेड़ने। मुदा हमरा देखते सिवावाली काकी कहलनि जे बौआ गामपर नहि समहरतह डाकडर लग लऽ जाहक।’’ डाक्टरक नाओ सुनि लगमे गेलौं तँ देखलियै जे गाए-महीसि जेकाँ देहो-टाँग छिड़िऔने आ अड़ऽ-बोऽऽऽ करैत। एको क्षण विलंब करब उचित नहि बुझि खाटक ओरियान केलौं आ तमोरिया लए गेलौं। ककर मुँह देखि कऽ उठलौं जे दू कप चाहेटा पीने छी। दतमनियो पछुआएले अछि।’’ ‘‘की भेलनि?’’ ‘‘बेटा।’’ ‘‘बेसी तबाही ने तँ भेलह?’’ ‘‘ऐँह की कहू काका, जनिजाति तेहन भाउनी होइत अछि जे एक बर हेतइ आ सातबर भभटपन करत। जखन खाटपर चढ़बैत रहिएनि तहन तेना ने हाथ-पाएर कठुआ देलनि जे बुझि पड़ल दाँती लगि गेलनि। मुदा मुँहमे बोल रहबे करनि। पकड़ि-पकड़ि हाथ-पाएर सरिऔलिअनि। मन तेहन लहरि गेल जे हुअए दू ऐँड़ उपरोसँ लगा दिअनि। मुदा फेरि भेल जे अधिक दर्द भेने लोकक बुद्धियो बाँइत जाए छै। हो न हो कहीं सएह भऽ गेलि होनि।’’ मुस्की दैत भैयाकाका- ‘‘डाॅक्टर लग ने तँ बेसी भंङठी लगलह?’’ ‘‘नहि। संयोग नीक रहल जे एकमुहरी काज सुढ़िआइत गेल। साते बजे निकास भऽ गेलनि। मुदा तते ने काजक ओझरी रहए जे सम्हारैत-सम्हारैत डेढ़ बजे विदा भेलौं।’’ ‘‘पबनौट कत्तए लऽ कऽ जाइ छह?’’ ‘‘तीन पुस्तसँ यूनूशक परिवारसँ आवा-जाही अछि। आइ भोरे हुनकर छोटकी बेटी एक मुजेला तरकारी दऽ गेल छलाए। सभ साल दइए। अपने कारोवार छन्हि। ओना पावनि सभमे सेहो पवनौट दैत छथि। तहिना हमहूँ दैत छिअनि। सैह छी। आन बेरि आठे-नअ बजे दऽ अबैत छलिएनि। मुदा आइ तँ दोसरे भाँजमे पड़ि गेलौं।’’ ‘‘हमर तिल-चाउर कखन खेवह, आकि अपने ताले-बेताल रहबह?’’ ‘‘की कहूँ काका मरैयोक पलखति नइए। निचेन भऽ कऽ आएब। अखन ओहो बच्चा सभ बाट तकैत हएत। सभ भोरे नहाएल आ हम दतमनियो नहि केलौंहेँ।’’ ‘‘अच्छा जाह। बाट तकबह?’’ -भैयाकाका कहि चुप भऽ गेला। ‘‘तेहन माया-जालक झमेल अछि जे विचार कऽ घुसका-फुसका दैत अछि। जहिसँ समएक झूठा बनि जाइ छी। काजक अपन गति छैक। समएक गतिसँ मिलिकेँ चलैक लेल ओकरा कोना छोड़ब?’’ रस्तेपर जीवानन्दकेँ यूनूशक कोरैला बेटा आ छोटकी बेटी देखलक। देखितहि दुनू दुआरपर सँ आंगन जाए माएकेँ कहलक- ‘‘जीवानन्द कक्का अबै छथिन। बड़ीटा मोटरी हाथमे छन्हि।’’ हाटक कोबी सरिऔनाइ छोड़ि माए (यूनूशक पत्नी) अंगनाक मुँहथरिपर आबि देखलनि। तहि बीच भाए-बहीनिकेँ कहलक- ‘‘बड़का लाइ हम लेबौ।’’ बेटाक बात सुनि माए किछु बाजलि नहि। मुस्किया कऽ रहि गेलि। जीवानन्दकेँ पहुँचते माए बेटीकेँ कहलक- ‘‘कक्का ऐलखुन, प्लाष्टिक वला ओछाइन बइसै लऽ ओछा दहुन।’’ हाथक गमछा दैत जीवानन्द कहलक- ‘‘नइ दाइ, अखैन नै बैसव। झब दे गमछा अजबारि कऽ लावह।’’ जीवानन्दकेँ गेलोपर भैयाकाकाक नजरि जीवानन्देक बात ‘‘मरैयोक पलखति नहि अछि’’ पर नचैत। पावनियो रहने दतमनि करैक पलखति जेकरा नहि छैक, ओकरा लेल पावनिये की? मन आगू बढ़लनि ई दुनियाँ विचित्र रंगमंच छी। जेहने कलाकार तेहने ई रंगमंच। सुपात्रक लेल जँ इन्द्रासन सदृश्य अछि तँ कुपात्रक लेल गंध करैत नर्क जेकाँ सेहो अछि। बीरक लेल बीरभूमि, तपस्वीक लेल तपोभूमि, साधकक लेल साधना भूमि तँ चोर-डकैतक लेल सोनाक चिड़ियाँ। मधु चढ़ौनिहारक लेल मधुशाला तँ इज्जत खोरक लेल वेश्यालय सेहो छी। पार्ट खेलेनिहार सेहो अजीव अछि। कतौ पुरुख महिला बनि कलाप्रदर्शित करैत अछि तँ कतौ महिला पुरुष बनि सेहो करैत अछि। मुदा तेँ कि पुरुख पुरुख बनि आ महिला महिला बनि अपन पार्ट अदा नहि करैत छथि। जरुर करै छथि। मन आगू बढ़ि रामायण दिस बढ़लनि। हँसी लगलनि। जे मार्यादा पुरुषोत्तम राम दसमुँहा रावणकेँ मारलनि (नाश केलनि) वएह वन जेबा काल कौशल्याक संबंधमे की केलनि। माएक सेवा बेटाक धर्म नहि थिक? पितासँ कम माए होइत? मन ओझराए लगलनि। मुदा कने घुसुकि कृष्ण दिशि चलि गेलनि। कृष्णपर जाइते हँसी लगलनि। ठोर पटपटेलनि जे नान्हि-नान्हिटा छौड़ा बड़का-बड़का जहलक छहर देवाली तोड़ि बहरा जाइत अछि मुदा जे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकेँ नचैनिहार छथि हुनका बुते उखरिक बनहन (ऊखल बन्धन) नहि टुटलनि। भैयाकाकाकेँ छगुन्तासँ नजरि निच्चाँ भेलनि, मुदा लगले बदलि गेलनि। नजरि बदलितहि जोरसँ हँसी लगलनि। मनमे एलनि शिवजी। हद केलनि ओहो शिवसँ शिवनियो बनैमे देरी नहि लगलनि। फेरि घुरि कऽ भैयाकाकाक मन जीवानन्देपर चलि एलनि। जाधरि जीवानन्द सन-सन बेटा समाजमे नहि जन्म लेत ताधरि समाजक उन्नति कागजपर बनाओल फूल-फलक गाछ सदृश्य होएत। जहि समाजक लोक पावनिक पाछू पनरह-पनरह दिन पहिनेसँ लगल रहैत अछि। तहूमे एकटा नहि कतेको पावनि सालक भीतर अछि, खर्चाक बाट तँ चैड़गर देखै छियै मुदा आमदनीक बाटपर नजरिये नहि अछि। कियो चारि बजे भोरे स्नान कऽ लाइ-मूढ़ी खाए लगल कियो चारि बजे अपराहनमे तदमनि करत। कि चारि बजे भोरक सूर्य चारि बजे उपराहनोमे रहैत छथि। सूर्य तँ महाविशाल रुपमे अवस्थिति छथि। तहन मौसम किऐक बदलैत अछि? कि तहि सदृश्य मनुष्यक नहि अछि। रस्तेक बँसबीटीमे दतमनि तोड़ि रस्तेसँ करैत जीवानन्द आंगन आबि बाल्टीन-लोटा लाए सोझे कलपर पहुँचल। हाँइ-हाँह कुड़ुड़ कऽ अधे-छिधे नहा आंगन आबि पीढ़ीपर बैसि पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने लाइ-मुरही आ तिलवा नेने आउ?’’ ‘‘आब कलौ खाएब कि भुज्जा-भरड़ी खाएब।’’ ‘‘हद करै छी अहूँ भोरुका स्नान अखन केलौं आ खाइ बेरिमे साँझ पड़ि गेल। सभ सखी सासुर गेल हमरा लेखे चैत पड़ि गेल। ठीके लोक कहै छै। भिनसरसँ बाहर बजे धरि लोक जलखैक बेर बुझैत अछि आ बारह बजेसँ पहिल साँझ धरि कलौक समए। जइ समएक काज पछुआ गेल पहिने ओकरा ने पुराएब। जँ से नइ करब तँ दुनियाँक संग कोना चलि सकै छी।’’ जीवानन्दक बात सुनि पत्नी -सुधा- भरि थारी चूड़ा-मुरही लाइक संग-संग तरुओ तरकारी घरसँ आनि आगूमे रखि ठाढ़ भऽ गेली। भरल थारी देखि मुस्कुराइत जीवानन्द बाजल- ‘‘एते किअए अनलौं। बिधे पुरबैक अछि। जहिना नइ पान तँ पानक डंटियोसँ काज चलैत अछि तहिना लाइ मुरहीक बिधे पुराएब। मुदा खिच्चैड़ो तँ लइये भऽ गेल हएत?’’ पतिक बात कटैत सुधा बाजलि- ‘‘नै जखन अबैक चाल-चूल पेलहुँ तखन खिचड़ी बनेलौं। धीपले अछि।’’ ‘‘तखन तरुआ किअए पानि भेल अछि।’’ ‘‘तरकारी आ तरुआ सबेरे बनेलहुँ। तेँ सरए गेल अछि।’’ दू-तीनि फँका फकितहि जीवानन्दकेँ तरास जोर केलक। गिलास भरि पानि पीबि निच्चाँमे रखितहि सुधा बाजलि- ‘‘तिलासंक्रान्तिमे सभ अपन-अपन बहीनि ऐठाम पवनौट लऽ कऽ जाइत अछि अहाँ छोड़ि देवइ?’’ पत्नीक बात सुनि जीवानन्दक मन थारीसँ हटि बहीनिपर पहुँच गेल। सासुर बसैसँ पहिलुका बहीनिपर नजरि पड़ितहि गठुलाक टाटपर सँ कोना तिलकोरक पात तोड़ि आनि माएकेँ तरै लऽ दइत छलि। जहन भानस करै जोगर भेलि तहन कत्ते सिनेहसँ तरुआ तरि खुअबैत छलि। उझुक मारि-मारि पत्नीक बात मनमे उठैत। सोचए लगल, जँ एक्के दिन अपनो बेटाक विआह आ साढ़ूओक बेटाकेँ विआह होय, तहन की करैक चाही। विचारमे अबितहि अपना दिस तकलक। पावनिक दिन छी, बेरि झुकि गेल मुदा नहायोक छुट्टी नहि भेलि छलए। अखनो धरि चैन नहि भेलहुँ। भैयाकाकाक तिल-चाउर पछुआएले छन्हि। कि हमरा हिस्सामे पैघ लोक लग बैसि एक्को घंटा बुझै-सुझैक लेल नहि अछि? सदिखन काजक टिकटिकिया कपारपर चढ़ले रहैत अछि। मन घुमि कऽ भरदुतियापर पहुँचल। ठाँउ कऽ अरिपन बना पीढ़ी धोय केहन आसन बनबैत अछि। तहिपर बैसि जोड़ल दुनू हाथ धोय सिन्नुर पिठार लगा फुल-पान रखि आराधना करैत अछि। कि ओहि बहीनिकेँ विसरि जाएब। कथमपि नहि। मुदा बहीनो कि हमरासँ अधला जिनगी जीवैत अछि। सभ तरहे ओ नीक अछि। भागिन कओलेजमे पढ़ैत अछि। केहन ठाठसँ भगिनियोक विआह केलक। अपन सभ लूरि सिखा माए अपने जेकाँ बना देने छैक। कोनो चीजक कमी छैक। ओ कि हमरे पवनौटक भरोसे हएत। मनमे खुशी एलै। मुस्की दैत बाजल- ‘‘आइ तँ सभ ठाम पावनि छीहे। कोनो कि दुइर होइबला वौस अछि। काल्हि भोरे गेलासँ एते तँ हएत जे सभहक एकदिना तरुआ हमरा दू दिना हएत।’’ कहि हाँइ-हाँइ कऽ खा जीवानन्द भैयाकाका एहिठाम विदा भेल। अखन धरि भैयाकाका आँखि बन्न कऽ चैकीपर डूबले रहथि कि फड़िक्केसँ जीवानन्द कहलकनि- ‘‘गोड़ लगै छी काका। तिल-चाउर खाइ लऽ एलौंहेँ।’’ जीवानन्दक बोली सुनि भैयाकाका आँखि खोलि असिदवाद दैत कहलखिन- ‘‘बहुत दिन जीवह जीवानन्द। हम तँ लटकि गेलियह। देहसँ कम्मो लटकलहुँ मुदा मनसँ बेसी लटकि गेलहुँ। बुझि पड़ैत अछि जे लहास ढोइ छी। अनेरे अनकर हिस्सा अन्न-पानि दुरि करै छी। मुदा तरे-तर गणेशजी जेकाँ पेट फुलल जाइए। भने तूँ आबिये गेलह। होइए जे टन दे प्राण तियागि दी मुदा पेटक जे अकुरी सभ अछि ओ जाधरि नहि निकलत ताधरि प्राणो कोना छोड़त?’’ हँसैत जीवानन्द कहलकनि- ‘‘अंकुरी तँ लोक छठिमे घाटपर खाइत अछि अहाँ आइयो खुआएब तँ खुआ दिअ।’’ भैयाकाका- ‘‘जहिना जनमौटी बच्चाक मल मृत्युकाल निकलैत अछि तहिना छोटका बाबाक खुऔल अंकुरी तोरा दए दैत छिअह। अपन गामक चारिम बसान छी। शुरुमे दू परिवार धारक मुँह बदलने आबि कऽ बसल। खेती शुरु भेल। जानवरक उपद्रवक संग-संग मनुक्खोक उपद्रव शुरु भेल। अपन रक्षाक लेल उपजौनिहार तैयार भेल। मुदा सोलहन्नी रक्छा तइयो नहि भऽ सकल। पानिक सुविधा दुआरे गाम धुधुआ कऽ बढ़ल। जानवरो आ मनुक्खोक उपद्रवसँ बचैक लेल बलक जरुरत भेल। गाम-गाममे अखड़ाहा बनए लगल। लोक कुश्ती लड़ि अपन शक्तिक परिचय दिअए लगल रहै। गामे-गाम डंको हुअए लगल रहै। तहियेसँ अपना गाममे तिलासंक्रान्तिक दिन अपनो गाममे डंका शुरु भेल।’’ भैयाकाका बजितहि रहति कि जीवानन्दक मुँह बाजि उठल- ‘‘कक्का अपन बात कने रोकि कऽ राखू। हम बिसरि जाएब।’’ मुस्की दैत भैयाकाका- ‘‘बाजह?’’ जीवानन्द- ‘‘पावनिक दिन रहने मन छनगल रहै। तमोरिया (डाॅक्टर ऐठाम) मे इलाज शुरु होइते भौजी (रतुपारवाली) केँ खलास भऽ किछु सूढ़िआएल देखि ड्योढ़वाली काकीकेँ गाम पठा देलिएनि। मन खुशी रहबे करनि। होइन जे के पहिने भेंट हएत जेकरा सोझामे पेटक गुदगुदी बोकरि दिअनि। संयोगो नीक रहलनि। मदनावालीकेँ अंगनासँ मुड़ियारी दैत देखलखिन। छुतका (अशौच) दुआरे हाँइ-हाँइ अंगनेक चुल्हिपर लोहियामे तरकारी तरैत छलीह। सोझामे देखि काकी (ड्योढ़वाली) ससरि कऽ आंगन बढ़ली! नजरि पड़ितहि मदनावाली भौजी आग्रह करैत कहलकनि- ‘‘एत्तै आवथु काकी। बिना पाएर-हाथ धोनहि चुल्हिक पाछूमे बैसि गेलीह। तीनसल्ला अड़ुआक तरुआ बढ़बैत कहलकनि- काकी कने नोन देखि लेथुन।’’ दुनू गोटे चुल्हिये लग बैसि खाए लगली। जीवानन्दक बात सुनि ठहाका दैत भैयाकाका कहए लगलखिन- ‘‘अच्छा, तोहर बात भऽ गेलह। आगूक सुनह। केवल अपने गामटा मे डंका नहि होएत, आनो-आनो गाममे होएत छलए। तीन बजे भोरेसँ ढोलिया गाछपर चढ़ि वा बड़की पोखरिक मोहारपर सँ ढोल बजवए लगैत। बेरुका समए डंका होइत छलए। किछु दिनक पछाति रुपैयाक प्रवेश भेने डंका दंगलमे बदलि गेल।’’ विचहिमे जीवानन्द- ‘‘दू साल पहिने तक तँ होइत छलैए।’’ जीवानन्दक बात सुनि कनेकाल गुम्म रहि भैयाकाका कहए लगलखिन- ‘‘जाधरि मालिक (जमीन्दार) केँ मालगुजारिये धरि होय ताधरि गाम शान्त छलए। मुदा जखन मालगुजारी तरे लोकक खेत निलाम हुअए लगल तहन ओ पाएर पसारए लगल। महाजनी सेहो करए लगल। छपरिया सिपाहीक आगमन गाममे भेल। पहिने तँ ओ कचहरियेक हातामे माने कम्पाउण्डमे अखड़ाहा ख्ुनि लडै़, मुदा किछु दिनक पछाति गामक डंका अपना अखड़ाहापर लए गेल। साले-साल डंका करवए लगल। एकाएकी परोट्टाक खलीफा पीठ देखवए लगल। अपन इज्जत बचा हम मकरक रविकेँ डंका करवैत रहलहुँ। मुदा ओ सभ (छपरिया) डंकामे बलउमकी करए लगल। साले-साल झंझट हुअए लगल।’’ भैयाकाकाक बात सुनि जीवानन्दक आँखि भरि गेलइ। जीवामन्दक भरल आँखि देखि बजलाह- ‘‘जाधरि छोटका बावा छलाह ताधरि कोनो गम नहि छलए। ओना समयो करबट लेलक। समएकेँ दहिन होइतहि शक्ति बढ़ए लगल। तिला-संक्रान्तिसँ अढ़ाइ मास पहिने मन बेकाबू भऽ गेल। पुरने अखड़ाहाकेँ छीलि-छालि खुनलौं। लपटनिहार सभ संग दिअए लगल। मालिकक खलीफाकेँ माटि पठा कहलियै जे जँ एक माएक दूध पीने हुअए तँ कचहरीक हात्तासँ बाहर आबि जतए तोरा फड़िअवैक हुअए, फड़िया लाय। देशक हवा देखि बुझि पड़ल जे सभ जागल अछि केवल हमहींटा मुरदा भेलि छी।’’ जीवानन्द- ‘‘तहन की भेल?’’ भैयाकाका- ‘‘ओहो (छपरिया) लक्ष्मण रेखा (सरकारी हाता) छोड़ि बाहर अबैक मानि लेलक। डंका भेल मुदा बाह रे संतोष ढोलिया। ओहि दिनक ओकरो हाथकेँ (बजवैक) धन्यवाद दी जे जहिना कुरुक्षेत्रमे कृष्णक शंखक आवाज रहनि ताहिसँ मिसियो भरि ढोलक अवाज नहि रहैक। कहए लेल तँ अधिक गामक देखिनिहार (कुश्ती देखिनिहार) रहथि मुदा संख्या कम रहैक। तहूमे ओहन देखिनिहार बेसी रहए जे ओहि खलीफाक (छपरिया) पीठि ठोकैत। मुदा नजरि पड़ितहि देखि लेलियेक जे मुँहक ठोर कारी सियाह छै। मनमे एहेन शक्ति उठि गेल, जहिना आगिमे घीउ देलासँ उठैत, तहिना। लंगोटो नहि पहीरए लगलौं, धोतियेक ढट्ठाकेँ बरहा जेकाँ वाँटि कसि कऽ बान्हि लेलहुँ। इम्हर ढोलपर संतोष अवाज दिअए लगल- चट-धा, गिड़-धा, चट्-धा गिर-धा।’’ ‘‘अवाज सुनि कूदि कऽ अखड़ाहापर गेलहुँ। मनमे उठल जे अनेरे हाथ की मिलाएव। बाँहि पकड़ि लेलहुँ।’’ ढोलिया हाथ बदललक। ढाक्-ढिना, ढाक-ढिना, ढाक-ढिना बजवए लगल। ढोलक अवाज तँ दहिन रहए मुदा देखिनिहारक अवाज वाम भऽ गेल। फेरि ढोलिया हाथ बदलि- ‘‘चट्-गिड़-धा, चट-गिड़ धा, चट-गिर धा’’ बजवए लगल। हमरो साहस बढ़ल। भय मनसँ निकलि गेल। मुदा माटिपर चलि गेलहुँ। माटिपर जाइते ढोलिया (संतोष) हाथ बदललक। मेही अवाजमे- ‘‘धाक्-धिना, तिरकट-तिना। धाक्-धिना, तिरकट-तिना।’’ माटि परक दाँवसँ उपर भेलहुँ। देखिनिहारक आँखि सेहो बदलल। उपर होइतहि ढोलिया मोट अवाज आ भौड़ी अवाजमे बजवए लगल- ‘‘चटाक-चट-धा, चटाक-चट-धा।’’ अवाजेक संग ओकरा उठा कऽ पटकि देलियै। मुदा पीठ गरे खसल। माटिपर खसितहि ताल बदललक। बजवए लगल- ‘‘धिक-धिना, धिक-धिना।’’ अवाज सुनि धाँइ दऽ चित केलहुँ। चीत करितहि ढोलसँ अवाज निकलए लगल- ‘‘धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़। भैयाकाकाक बात सुनि जीवानन्द कहलकनि- ‘‘अहाँ ऐहन चैनक समुद्रमे पहुँच गेल छी जे मगन भऽ जीवैत हएब?’’ मगन सुनि भैयाकाकाक हृदय, बाढ़िसँ उमड़ल गंगा जेकाँ जे अपन घर (नदी) छोड़ि गाछी-विरछी, खेत-पथार पहुँच पवित्र (गंदा साफ) करए लगैत, तहिना भऽ गेलनि। विहृल भऽ कहए लगलखिन- ‘‘बौआ तोरा देखि हृदय शान्तसँ प्रशान्त भऽ जाइत अछि आब तँ तोरे सभपर छहरो-महर हएत आ दारो-मदार अछि। मुदा हवाक गंदगी तेना ने विहारिमे पसरि गेल जे एक्को क्षण जीवैक मन नहि होइत अछि। लीला सभ जे देखै छी तँ शूल जेकाँ सदिखन हृदयकेँ बेधैत रहैत अछि। आजुक पीढ़ी जीवनक रास्तासँ एते दूर हटि रहल अछि जे मनुष्यक औरुदा (सए वर्ख) सँ घटि कुत्ताक औरुदा (बारह वर्ख) मे बदलल जा रहल अछि। दुख एतवे नहि होइत अछि जे औरुदे टा घटि रहल छैक, मनुष्यक वृतियो टुटि-टुटि ओम्हरे जा रहल अछि। जहि रुपक व्यवहार भऽ रहल छैक ओहि सभसँ आगम बुझि पड़ैत अछि जे माए-बाप, भाए-बहीनि, सभहक संवंध आ शिष्टाचार एहि रुपे नष्ट भऽ रहल अछि जे साधना भूमिकेँ मरुभूमि बनब अनिवार्य छैक। २ कोना जीवि? सेवा निवृत्तिक सातम सालक सातम मास, सातम मासक सातम दिन सात बजे साँझमे दू-जनियाँ सोफापर दुनू परानी प्रोफेसर शंकर कुमार ओंघराएल माने पड़ल छलाह। दुनू बेकतिक मन खटाइल। दस बजे करीब दिनेमे सुनने छलाह जे संगीक संगिनी चुल्हिक गैसक रिसावसँ झड़कि अस्पतालक सीटपर चिकड़ि-चिकड़ि कानि रहल छथि। सत्तरि बर्षक अवस्थामे संगी अपने दौड़-धूप कऽ रहल छथि। मुदा अस्पतालक डाॅक्टरो नर्सो आ कम्पाउण्डरो जी-जान बँचवै पाछु लगौने छथि। तेकर कारण अछि जे एक तँ पाइक कमी नहि दोसर पहुँचो नीक। संगिनीक घटनाकेँ तँ सरस्वती लगसँ नहि देखने छलीह मुदा समाचारक रुपमे सुनने छलीह। जहिसँ करेज तेना दहलि गेलनि जे साँसक गतिसँ छातीक धकधकी तेज भऽ गेलनि। नस-नसमे डरक भूत समाए गेलनि। अन्हारक वाण जेकाँ चारु कातसँ मृत्युक तीर बेधए लगलनि। जहिना बेरागी अनुचित काजसँ डरैत, जोगी भोगसँ डरैत तहिना सरस्वती मृत्युक भयसँ। पाँच सए एम.एल.बला हृीस्कीक बोतल प्रो. शंकर कुमारकेँ बेअसर बुझि पड़लनि। मनक चिन्ता रुपी तीर हृीस्कीक तीरकेँ रस्तेमे रोकने। लग अबै नहि दन्हि। कछ-मछ करैत पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘चाह पीबू।’’ सरस्वतीक मन चाह पीबिसँ सुरक्षित चुल्हि नहि जराएव बुझनि। अपन अज्ञाक उल्लंघन होइत देखि शंकरक मन महुराए लगलनि। जहिना भोज्य-पदार्थक बरतनमे गिरगिट खसि महुरबैत, तहिना। डेग भरि पाछु घुसुकि मुस्की दैत दोहरा कऽ कहलखिन- ‘‘चलू, हमहीं चाह बनाएब। कीचेनक तँ सभ किछु देखल नहि अछि। अहाँ देखा-देखा देब।’’ जिनगीक अंतिम अवस्थामे पतिपर जीति देखि ढेग सन देह कऽ उठा कीचेन दिस बढ़लीह। चाह बना कीचेनमे पीवए लगलथि। मुदा तइओ गप-सप करैक मन किनको नहि करैन। मनक सोग नव विषएकेँ मनमे आबै नहि दन्हि। जहिना घी नहि अरघिनिहारकेँ थारीमे देखितहि जीह ओकिया लगैत तहिना नव विचारपर नजरि पड़ितहि जीह माने मन पचपचाए लगनि। चाह पीबि दुनू गोटे कोठरीमे आबि पुनः सोफापर परि रहलाह। गुम-सुप। जहिना साधक साधनामे लीन भऽ समाधिस्त होइत तहिना दुनू गोटे अपन-अपन विचारक दुनियाँमे औनाए लगलाह। सरस्वतीक नजरि पाँच वर्खक अवस्थापर पहुँचलनि। की छलए माए-बापक राज? खेनाइ, खेलेनाइ, पढ़नाइक संग पावनिमे उपास केनाइ आ फूल तोड़ि पूजा केनाइ। बस। यैह छलए जिनगी। मनमे सुख-दुखक जनमो कहाँ भेलि छलै। सोहनगर वातावरणमे विआह भेलि। नैहरसँ सेवा करैक लेल नोकरनी आएल छलि। सासुरो सम्पन्ने रहए। कोनो अभाव सासुरोमे नहिये रहए। नोकरे पानियो भरैत, आ भानसो करैत रहए। अपनो प्रोफेसरे छलाह। पाइक संग प्रतिष्ठो बनौने छलाह। विद्यार्थीसँ शिक्षक धरिक बीच सम्मानित छलाह। अपनासँ बीसे बेटोक पढ़ैपर खर्च केलनि। आजुक जे महगाइ शिक्षामे आबि गेल अछि ओ इमानदार कमेनिहारक लेल असंभव भऽ गेल अछि। दरमाहासँ तँ नहिये मुदा पिताक देल सम्पत्तिसँ तँ एत्ते जरुर केलनि। अमेरिकामे बेटाकेँ पढ़ा लिलसा मेटौलनि। मुदा अखन की देखै छी? एहि अबस्थामे दिन-राति तीनि मंजिलापर उतड़ब-चढ़ब पार लागत। ओहिना तँ देह-हाथ बिनबिनाइत आ देह भारी बुझि पड़ैत अछि। तहिपर परिवारक सभ काज? एहि उमेरमे बूढ़ि-कनियाँ बनि जीवि रहल छी। तरे-तर पसेना चलए लगलनि। अनायास मुँहसँ निकलिलनि- ‘‘एहि जीवनसँ मरब नीक।’’ पत्नीक बात सुनि शंकर कुमारक भक्क खुजलनि। अखन धरि हिनकर चेतनाहीन भेलि मन देखैत छलनि अपन पैछला जिनगी। गामक स्कूल। कते सिनेहसँ पिताजी घरक देवताकेँ गोड़ लगा, कन्हापर चढ़ा ‘सरस्वती माताक जय’ आंगनसँ निकलि सरस्वतीक मंदिरमे लऽ गेलाह। की हम ओहिसँ कम अपना बेटाकेँ केलहुँ? कथमपि नहि। डेरामे गाड़ल देवता तँ नहि अछि मुदा देवालमे टांगल फोटो आ अष्टद्रव्यक बनाओल मुरती तँ अछिये। बाड़ीक बसन्ती गुलाब तँ नहि मुदा मह-मह करैत भकराड़ रुपमे बनल प्लास्टिकक फूल तँ चढ़ौनहि छिअनि। धुमन-सरड़क धुपक बदला गुगूल आ अगरबत्ती तँ चढ़वितहि छिअनि। मोटर-साइकिलपर चढ़ा शहरक सभसँ नीक विद्यालयमे पढ़ेवे केलिएनि। जते पिता जी हमरा पढ़ौलनि, हमरा की पढ़ौलनि एक सीमा धरि पहुँचा देलनि। तहिना तँ हमहूँ केलिएनि। नोकरी भेलापर ताधरि पत्नी गाममे रहलीह जाधरि बावू-माए जीबैत रहलाह। मरैइयो काल धरि माए संगे खाइले कहथि। मुदा संगे नहि खाए एकठाम बैसि कऽ खाइ। मुदा बेटाकेँ जहिये कनभेंटमे नाओ लिखेलहुँ तहियेसँ एक शहरमे रहनहुँ फुट-फुट रहए लगलहुँ। समएक अनुकूल शिक्षो बदलल। एकाएक नजरि आगू बढ़ि जिनगीक अवस्थापर गेलनि। चारिम अवस्था। जहि अवस्थामे सभ कथूसँ सम्पन्न भऽ, अभावकेँ निर्मूल नष्ट कऽ परिवारसँ उपर उठि समाजमे मिलि जाएब होइत छैक। हमर समाज केहन? जहि समाजमे मनुष्यक संग-संग जीव-जन्तु माटि-पानि, घर-दुआर धरि एक-दोसरकेँ नीक-अधला सुख-दुखमे संग दैत अछि। एकठाम बैसि सभ भोज-काजमे खाइत अछि तहिना दसगरदा उत्सवो हॅसी-खुशीसँ मनवैत अछि। ढोल-डम्फापर होरी गाबि-गाबि नचबो करैत अछि। जूरशीतलमे इनार-पोखरि उड़ाहबो करैत अछि। शिव-पार्वती बना बाजाक संग गामो घुमैत अछि। जहिना बाढ़ि अएलापर एक किस्मक माने लेभेलक जमीन पानिमे संगे डूबि जाइत अछि। तहिना गाछी-कलम पानि-बिहाड़ि सहैत अछि। बेटाकेँ अमेरिकामे पढ़ेलहुँ। ओ ओहि समाज आ संस्कृतिमे तेना मिलि गेल जे अपन सभटा बिसरि गेल। आइ जँ हम अमेरिका जाए रहए लगी तँ कि ओहिठामक जिनगी दुनू बेकतीकेँ कतेक दिन जीवए देत? कि दुनियाँमे मृत्यु छोड़ि हमरा लेल किछु नहि शेष बचल अछि। निराश मनमे एलनि ‘करनी देखिहह मरनी बेरि।’ जिनगीमे कतए चूक भेल? जँ चूक नहि भेलि तँ एहि अवस्थामे पहुँच कोना गेल छी? पत्नीक बात ‘एहि जीवनसँ मरब नीक’ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि बजलाह- ‘‘अखन सुतै बेरि अछि जे सुति रहलौं?’’ - ‘‘सुतल कहाँ छी। भानस करैसँ मन असकताइत अछि।’’ - ‘‘तँ की भुखले रहब।’’ शंकर कुमार बाजि तँ गेलाह मुदा मन पाछु घुरि कऽ तकलकनि। एक तँ ओहिना करैक बाट धेने छी तहूमे जे दस-बीस वर्ख जीवो करितहुँ से तेहन रोग भेलि जाइत छनि जे भुखले मरब। रातिमे खाएव नहि तँ नीन कोना होएत? जँ नीन नहि हएत तँ जीवि कते दिन? पत्नी- ‘‘कता दिन कहलहुँ जे नोकर राखि लिअ?’’ नोकर सुनि शंकर अमती काँटक ओझरीमे पड़ि गेलाह। देखैमे नान्हि-नान्हिटा मुदा छाँह जेँका छोड़ैले तैयार नहि। मनमे जोर मारलकनि जे अपने जिनगी भरि नोकरी केलहुँ। बेटो-पुतोहू -दुनू इन्जिनियर- अनके नोकरी करैत अछि आ अपने नोकर रक्खू। जहन ड्यूटी करैत छलहुँ बेसी तलब उठवै छलहुँ तहन नोकरे ने रखलहुँ। कारणो छलए जे पत्नी थेहगर छलीह। बेटा-पुतोहूक अशो छलनि। थोड़े बुझै छेलथिन जे बुढ़ाढ़ी ऐहन हएत। आइ-काल्हि नोकर कते महग भऽ गेल अछि से थोड़े बुझै छथिन। तकलीफ हेतनि बजवे करतीह। भलेहीं हमरा बुते पुराओल हुअए वा नहि। पहिले जेकाँ पाँच रुपैआ दस रुपैआमे नोकर भेटत। तहूमे बाल-बोधकेँ थोड़े रखि सकै छी। अनेरे लेनी कऽ देनी पड़त। घरक सुख जहलमे भेटत। जँ सियान राखब तँ तीनि हजारसँ कम लेत। तहूमे कि कोनो स्कूल-कओलेज आ कि मिल-फैक्टरीक नोकरी हेतइ। घरमे काज करत तँ खाइ लऽ नहि देबइ से हएत तहूमे तँ नीक-निकुत बेसी वएह खाएत। तहूमे तेहेन समए आबि गेल जे सम्पत्तिये दुनू बेकतीक जानो लेत। जानपर नजरि पड़िते आँखि ढबढ़बा गेलनि। जाने नहि तँ जहान की? जहिना वीणाक तार टुटलापर अवाज निकलैत तहिना टूटल जिनगीक स्वरमे शंकर कुमार पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँक मन असकताइत अछि तँ पड़ू। कहुना-कहुना कऽ क्षुधा तृप्त करै जोकर टभका लइ छी।’’ मने-मन सरस्वती बजलीह- ‘‘कोना जीबि?’’ १.सपथमे मैथिली-सुजीतकुमार झा २.बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’ १.सपथमे मैथिली सुजीतकुमार झा नेपालक उपराष्‍ट्रपति परमानन्‍द झा उपराष्‍ट्रपति पदक सपथ मैथिली भाषामे लेलन्‍हि अछि । उपराष्‍ट्रपतिक सपथकेँ पुरे मिथिलाञ्‍चलमे चर्चा अछि । बहुतो गोटे मैथिली आन्‍दोलनकेँ सपथ सँ जोडैत छथि । उपराष्‍ट्रपति कार्यालयक अनुसार मैथिली भाषामे सपथ लेलाक बाद उपराष्‍ट्रपति झाकेँ सयकडो बधाई अहि दुआरे एलन्‍हि जे ओ मातृ भाषामे सपथ लेलथि ।  ओ अहि सँ पूर्व हिन्‍दी भाषामे सपथ लेने रहथि । मुदा हुनकर ओ सपथ नेपालमे भारी विवादमे आएल छल । मुदा मैथिलीमे लेलाक बाद ठिक विपरित भेल अछि । नेपाली भाषीसभ सेहो एकरा प्रशंसा कएने अछि । मैथिलीक युवा साहित्‍यकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि कहैत छथि ‘नेपालमे विकल्‍पकेँ रुपमे हिन्‍दीकेँ प्रस्‍तुत करयबलाकेँ उपराष्‍ट्रपतिक नयाँ सपथ सँ चटकन लगलैक अछि । मिथिला राज्‍य संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्‍वर कापड़ि आब मैथिलीकेँ कियो नहि रोकि सकैत अछि  तकर एकटा छोटका उदाहरण रहल बतबैत छथि । नेपालमे मैथिली भाषामे सपथ लेबाक परम्‍परा नेपालमे मैथिली दोसर सभ सँ बेशी बाजय बला भाषा रहल अछि । कहियो काठमाण्‍डू उपत्‍यकाक राज्‍य भाषा मैथिली छल । ओतयकेँ राजासभ मैथिलीमे साहित्‍य लेखन सेहो करैत छलथि । मल्‍ल कालमे कएटा राजा एहन भेलथि । जिनकर एकटा साहित्‍यकारक रुपमे एखनो आदरकेँ साथ नाम लेल जाइत अछि । मुदा सपथकेँ इतिहास बहुत लम्‍बा नहि अछि । नेपालक संसदक तथ्‍याङ्क अनुसार डा. बंशीधर मिश्र नेपालक संसदमे पहिल बेर मैथिली भाषामे सपथ लेलन्‍हि । नेपाल कम्‍युनिष्‍ट पार्टी (एकीकृत मार्क्‍सवादी लेलिनवादी)क नेता रहल डा. मिश्र २०५१ सालमे सपथ लेने रहथि । जहिया ओ मैथिली भाषामे सपथ लेलथि तहिया मैथिलीकेँ बात करब अपराध मानल जाइत छल, एहन स्‍थितिमे सपथ लेने रहथि । आब तऽ मिथिलाञ्‍चलक अधिकाँश नेता मैथिलीमे सपथ लैत छथि । हिन्‍दी भाषाकेँ गुणगान करयबला मधेशी जनअधिकार फोरमक सह अध्‍यक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्‍ता सनक व्‍यक्ति सेहो मैथिलीमे सपथ लेने छलथि । अहि बेरक संविधान सभाक चुनावमे एकीकृत नेकपा माओवादी तऽ अपन सभासदसभ केँ अपन अपन मातृ भाषामे सपथ लेबाक लेल िह्‍वप जारी कएने छल । मैथिलीक चर्चित युवा साहित्‍यकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिक शब्‍दमे मैथिली आन्‍दोलन सही दिसामे जा रहल अछि । तकर संकेत अहि बेरक संविधानसभाक सपथ देखलाक बाद लगैत छल । मन्‍त्रीक रुपमे पहिल बेर एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्‍कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव सपथ लेने रहथि । मैथिलीयोमे कम विवाद नहि उपराष्‍ट्रपति परमानन्‍द झा हिन्‍दीमे सपथ लेलाक बाद भारी विवाद भेल छल । एतेक तक की हुनका फेर सँ मैथिली भाषामे सपथ लेबय पडलन्‍हि । अहि सँ कम मैथिलीमे सपथ लेबयबलाकेँ नहि भेल छल । एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्‍कालिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव मैथिली भाषामे मन्‍त्रीपदक सपथ लेबाक इच्‍छा प्रगट कएलाक बाद तत्‍कालिन प्रधानमन्‍त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला किछ घण्‍टाक लेल सपथ कराबय सँ रोकि देने रहथिन । मुदा मात्रिका यादव नहि झुकलथि आ ओहि समयक सरकारकेँ झुकय पडल छल । मात्रिका यादव कहैत छथि ‘ प्रजातन्‍त्र चलि एलैक, गणतन्‍त्र चलि एलैक आ एकटा भाषा एकटा भेषक नीति रहबे करतै, ई स्‍वीकार नहि अछि ।’ मैथिल छी अहि बातक गर्व अछि प्रसंगक क्रममे ओ कहलन्‍हि । संासदक रुपमे जहिया डा. बंशीधर मिश्र सपथ लेने रहथि तहियो विवाद भेल छल । आ ओ अडलथि तखन मैथिलीकेँ जीत भेल छलैक । सपथमे एतेक माथापिच्‍ची किएक मैथिली भाषामे सपथ लेला सँ मैथिलीकेँ की भेट जएतैक वा की भेट गेलैक ? कोनो नेताद्वारा सपथ लेलाक बाद एकटा छोटछिन कनफुसकी बहस अवश्‍य होइत अछि । मुदा मैथिली आन्‍दोलनीसभ अहि सँ आन्‍दोलनमे बल पहुँचैत अछि  कहैत छथि । काठमाण्‍डू सँ प्रसारण होइत आएल कान्‍तिपुर एफएमक हेल्‍लो मिथिला कार्यक्रमक प्रस्‍तोता एवं चर्चित युवा साहित्‍यकार धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि कहैत छथि ‘मैथिलक पहिचानक जतय संकट छैक ओतय छोट छोट चिज महत्‍व रखैत छैक । भारतक संसदमे जखन कीर्ति अजाद पाग पहिर कऽ जाइत छथि तऽ लोककेँ गौरव होइत अछि । तहिना नेपाल हुए वा भारत जखन मैथिल नेतासभ मिथिला मैथिलकेँ पहिचान बला कोनो बात करैत छथि तऽ गौरव होइत अछि । आ अहि सँ मैथिली आन्‍दोलनमे बल पहुँचैत अछि । सपथक लेल नेपालमे प्रयास नेतासभ मैथिलीमे सपथ लौथु ताहि लेल मैथिली आन्‍दोलनी संस्‍थासभ पञ्‍चायते काल सँ प्रयास करैत आएल अछि । नेतासभ चुनाव जितैथ तऽ अन्‍य व्‍यक्तिकेँ अन्‍य काज रहैक मुदा जनकपुरक मिथिला नाट्य कला परिषदक संस्‍थापक स्‍व.योेगेन्‍द्र साह नेपाली नेता सभकेँ घर घरमे जा कऽ मैथिली भाषामे सपथ लेबाक लेल आग्रह करथि । मैथिली विकास मञ्‍च काठमाण्‍डू आ धीरेन्‍द्र प्रेमर्षिकेँ योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैत अछि । जनकपुरक आकृति संस्‍था, राजविराजक मैथिली संस्‍थासभ सेहो अहिकेँ लेल काज कएने अछि । २. बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार। ‘छीनरदेवी’ एकांकी मैथिली नाटक ‘छीनरदेवी’ पात्र परिचय- पुरुष पात्र 1.     सुभाष ठाकुर- एक साधारण शिक्षित व्यक्ति। 2.     ललन ठाकुर- सुभाष ठाकुरक इकलौता पुत्र। 3.     पवन- ’’                ’’ भातिज। 4.     मटुक- सुभाष ठाकुरक पड़ोसी। 5.     राजू- सुभाष ठाकुरक वुजुर्ग भागिन। 6.     संजय- सुभाष ठाकुरक भागिन। 7.     सुखल कियोट- एकटा साधारण भगत। 8.     यदुलाल ठाकुर- सुभाष ठाकुरक छोट भाए। 9.     सोमन ठाकुर- यदुलाल ठाकुरक इकलौता बेटा। 10.    परबतिया कोइर- एकटा प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक। 11.    घटकराज ठाकुर- सुभाष ठाकुरक पीसा। 12.    बलदेव महतो- एकटा साधारण किसान। 13.    विनोद झा- काली मंदिरक पुजारी। स्त्री पात्र- 1.     मीरा देवी- सुभाष ठाकुरक पत्नी। 2.     सुकनी देवी -यदुलाल ठाकुरक पत्नी। 3.     मालती देवी- बलदेव महतोक पत्नी। 4.     अनु अंजना- बलदेव महतोक इकलौती बेटी। पहिल दृश्य- (स्थान- सुभाष ठकुरक घर। मीरा देवी सुभाष ठकुरक पत्नी छथिन्ह। ललन ठाकुर हिनक इकलौता बेटा छथिन्ह। ललन बताह अवस्थामे अपन दरवाजापर अंट-संट करैत छथि। हिनक उपद्रवकेँ देखि सुभाष ओ मीरा मनहुस अवस्थामे) मीरा-          स्वामी, ई छौंरा हमरो बताह बनए देत। सुभाष-   सहए तँ हमहुँ कहैबला रही। हमर मुहक बात छीनि लेलहुँ।                      हमरा किछु नहि फुराइत अछि। की करी की नहि। ककरासँ               देखाबी, ककरासँ नहि। यै ललन माए, मोन होइत अछि जे               एकरा राँची वा दरिभंगा लऽ जाय। की विचार अहाँक? मीरा-    हमर विचार इएह अछि जे राँची दरिभंगा लऽ जायसँ पूर्व एकरा                   कतउ एम्हर-ओम्हर देखए दियौन। नजरि-गुजरि सेहो भए                      सकैत अछि। सुभाष-   तहन ककरासँ देखए दियन्हि? मीरा-    यै ललन बाप, सुनैत छी सुखलाहा कियोट एहि सभमे बड़                पहुँचल अछि। हुनकहिसँ देखाए दियौन्ह। सुभाष-   हुनक नाम तँ हमहुँ बड़ सुनैत छी। (ललन घरामसँ खसि पड़ैत छथि आ मुँह रगड़ए लगैत छथि।                    दुआरिपर ललन ओंघराए रहल अथि।) मीरा-    (अफसियाँत भऽ) बौआ रओ बौआ। की भए गेलौक रओ बौआ? ललन-   (माथ पटकैत) हम तोरे संग जएबौक। हम आब नहि जीबौक।                    हम तोरो लऽ जेबौक अपनहि संग। हम तोरो खएबौक। हम                   कोनो भात-दालि खाइत छी। हमरा चाही पियोर खून। हमरा                     बगिया देने रहौक। बगिएमे सबटा कारामात छल। (सौंसे दुआरि                     ललन ओंघरए रहल अछि। कपड़ा-लत्ता फारि लैत अछि। पवन,           मटुक, राजू आ संजयक प्रवेश। ललनक दृश्य देखि रहल छथि                सभ कियो। सुभाषकेँ अक-बक किछु नहि फुराइत छन्हि।) मटुक-   यौ सुभाष, बौक जेकाँ ठाढ़ रहने काज नहि चलत। अहाँ सुखल                  कियोट लग जाउ। हुनका जल्दी बजौने आउ। (सुभाष, सुखल कियोटक ओहिठाम गेलाह। किदुए खानक बाद                    सुभाषक संग सुखलक प्रवेश।) सुखल- अहाँ सभ कने कात भऽ जाउ। (सभ कियो कात भऽ जाइत छथि। सुखलकेँ देखि कऽ ललन                    आओर माथ पटकए लगैत अछि।) सुभाष-   कने जल्दी देखियौक सरकार। सुखल- अहाँ सभ हरबराउ नहि। हम बैसल नहि छी सभ देखि रहल                     छी। (अपन जेबीसँ किछु निकालि कऽ ललनपर फेंकैत छथि।                ललन बिल्कुल शांत भऽ जाइत अछि।) ललन-   आब नहि हओ। आब कहियो नहि अएबह। सुखल- तों, के छिअएँ? ललन-   हम नहि कहबह-5 सुखल- नहि हओ। तों हमर के छह, जे तोरा हम कहबह। सुखल- हम तोहर बाप छियौक। ललन-   हमहुँ तोहर बाप छियह। (सुखल ललनकेँ एक चाट गालपर मारि दैत छथि।) आब नहि अएबह। सुखल- नाम कऽ ह। ललन-   हमर नाम छी देवकी कुमारी। सुखल- के रखने छौक? ललन-   छोटकी काकी। सुखल- कत्तए रखने छौक? ललन-   से नहि कहबह-3 (फेर सुखल एक चाट छऽ कऽ माथा हाथ दैत छथि।) सुखल- आब कहबें। ललन-   हँ हओ। आब कहबह। सुखल- तहन कह। जल्दी बाज। नहि तँ बुझि ले। ललन-   मारह नहि, कहि दैत छियह। कोहामे। पैखाना घरमे। सुखल- किएक अएलें? ललन-   ललनकेँ लऽ जेबाक लेल। एकसरे हमरा मोन नहि लगैत अछि।                  हम ललनकेँ नहिए छोड़बै। (सुखल ललनकेँ कसिकए माथा हाथ दैत छथि। भूत भागि                      जाइत अछि। ललन चंगा भऽ जाइत अछि। देह-हाथ झारि कऽ               कुर्सीपर बैस जाइत छथि।) बाबूजी, एतेक भीड़ किएक अछि? सुभाष-   नहि कोनो खास बात। हिनका सभकेँ हमरासँ किछु विशेष गप्प                   छेलन्हि। ललन, तों जाह बौआ। (ललनक प्रस्थान) सुखल गोसांइ, हमर बेटा कोना ठीक होएत? एकरा अछि की? सुखल- एकरा केलहा अछि? एकरा केनिहारि अहाँकेँ अपनहि परिवारमे                     अछि। सुभाष-   गोसांइ, एकर इलाज अहींकेँ करए पड़त। सुखल- सुभाष बाबू, एकर इलाज हमरासँ असंभव अछि, हम आब ई                      काज छोड़ि देलहुँ। हाथ जोडैत छी, दोसर जुगार कए लिअ। (प्रस्थान) (पटाक्षेप) दृश्य दोसर- अगिला अंकमे.... १.जनकपुरमे मिथिला महोत्‍सवक आयोजन ः नवअध्‍यायक शुभारंभ २.-कथा-ऋषि बशिष्ठ-पूत कमाल १ रामभरोस कापडि भ्रमर नेपाल सरकारक संस्‍कृति मंत्रालय द्वारा २०५५ सालक ऐन द्वारा गठित वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् एहिसं पूर्वो तीन बेर ‘मिथिला महोत्‍सव’क आयोजन २०६३, २०६४ आ २०६५ सालमे कऽ चुकल अछि । मुदा ओ तीनू आयोजन खेल तमासा सं आगां नहि जा सकल । राजनीतिक हस्‍ती सभक जमघट आ तेहने सन पृष्‍टपोषण करैत सम्‍पूर्ण आयोजन । एमहर दीगम्‍वर राय जखन परिषद्क अध्‍यक्ष भऽ अएलाह तं मिथिला महोत्‍सव किछु फूट करबाक सोच बनौलनि । फूट एहि मायने मे जे ओ मिथिलाक परम्‍परागत लोक संस्‍कृति आ जविनशैलीके मूर्त्त अमूर्त्त रुपें प्रस्‍तुत कएल जएबाक विचार रखलनि । तकरालेल स्‍थानीय जानकार सभक चारि पांच बैसार भेल आ तखन जे ढांचा तैयार भेलै तकरे आधारपर सम्‍पूर्ण कार्यक्रम करबाक नियार भेल अछि । अगामी रामनवमीक अवसर पर चैत्र ९ गते सं १३ गते (२२ मार्चस २६ मार्च धरि) आयोजन होब’ बला ई महोत्‍सव स्‍वयं अपनामे एखन धरिक नव हयत । औचित्‍य एवं विशेषता प्राचीन मिथिलाक स्‍थापना माधव विदेह द्वारा आइसं पांच हजार वर्ष पूर्व भेल ई इतिहास सत्‍य अछि । तहिया सं आइधरि तीन राजवंश मिथिलामे शासन कएलक । राजा जनकक वंश समाप्‍त भेलाक बाद १०९७ ई. मे नान्‍यदेव मिथिलाराजक नओ ठाढ कएलनि जे २२७ वर्ष धरि चलल । तकरा वाद हेरायल मिथिला पुनः १५५६ ई. मे ओइनवारवंशक संग उजागर भेल जे दरिभंगा महाराजक राजपाट गेला धरि चलल । एहि विच अनेकों तरहक सामाजिक, राजनीतिक उथल–पुथल होइत रहल । मुसलमानी शासक सभक आक्रमणसं पीडित मिथिलाञ्‍चलक राजा वा श्रेष्‍ठ व्‍यक्तित्‍व, विद्वान सभ नेपाल दिश शरण लेलनि । अपन संस्‍कृति आ भाषाक संग पलायन कएल ई महापुरुष लोकनि मैथिल संस्‍कृतिक छापकें अक्षुण्‍ण रखलनि । ओकर परम्‍परागत सम्‍पदा, लोक व्‍यवहार, जीवन शैली, आचार–व्‍यवहार सभकें वर्षहुं धरि वचा कऽ रखलनि । जकर प्रभाव समस्‍त मिथिलाक आवादीपर पड़लैक । मिथिलाक विशिष्‍ट जीवनशैली, सांस्‍कृतिक परम्‍परा, धार्मिक सहिष्‍णुता एखनो मननीय रहल अछि । माछ–मरुवाक रोटी, खेसारीक साग आ आलुक सन्‍ना, तिलकोरक तरुआ, छाल्‍हिगर दही–मुंहसं पानि आबि जाए तेहन भोजनक सामग्री रहल अछि । धोती, अंगपोछा, मुरेठा, गोलगाला–खास पहिरन अछि तं जट–जटिन, सामाचकेवा, झिझिया, लोक पर्व । अरिपन, टाटपरक चित्रांकन मौलिक चित्र अछि तं पोखरि मे चुभक्‍का मारि उजी–उजीक खेल अपन पहिचानक साक्षी बनल अछि । पौती, पेटारी, खुरपी–हंसुआ, जांत–ढेकी, खेत–खढ़िहान जीवन पद्धतिक अंग रहल अछि । सोहर, झूला, पराती, पावस, महराई, पजनिया,ं गोदना, पमरिया गीत – घर–आंगनक शोभा बनैत आबि रहल अछि । हजाम, लोहार, कुम्‍हार, डोम गृहस्‍थी चलब’ बला पसारी सभ अछि । एहने तत्‍व सभक सहयोगसं वनैत अछि एकटा मैथिल परिवार, मिथिलाक जनजीवन । ‘मिथिला महोत्‍सव’ तेहने जीवन शैलीक ताही रुपमे प्रस्‍तुति हयत । आजुक नवका पीढि अपनो परम्‍परागत लोक व्‍यवहार, जीवनशैलीकें विसरने जा रहल अछि, एहि प्रदर्शनीसं अप्‍पन पहिचान प्रति आर उर्जावान बनत से विश्‍वास कएल जा रहल अछि । एकर आयोजन वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् जनकपुरधाम कऽ रहल अछि । एकर नारा छैक, हम्‍मर संस्‍कृति हम्‍मर पहिचान ः समृद्ध मिथिला हम्‍मर अभियान’ । महोत्‍सवक आकर्षक पक्ष ्र मिथिलाञ्‍चलमे पहिल बेर एक्‍के ठाम मिथिलाक गौरब गाथाक विभिन्‍न पक्षसभ, इतिहास, भूगोल, संस्‍कृति, कला एवं लोक जीवनक झांखीसभ जीवंत रुपें प्रदर्शन कएल जाएत । ्र मैथिलीमे लिखित प्राचीन पाण्‍डुलिपि, दस्‍तावेज तथा पुरातात्‍विक सामग्री सभक प्रदर्शन हयत । ्र मिथिलामे रहनिहार जनजाति, आदिवासी एवं विभिन्‍न जाति सभक परम्‍परागत व्‍यवसाय देखब’ बला फूटफूट स्‍टल सभ राखल जाएत, जाहिमे व्‍यवसायिक, उत्‍पादनक क्रियात्‍मक रुप देखाओल जाएत । ्र मिथिलामे परम्‍परागत रुपें प्रचलित भेषभूषा, परिधान आ आभूषणक सेहो ओत्त प्रदर्शन कएल जाएत । ्र मैथिल खानपानक विविध रुपरंगक स्‍वाद आ अनुभूति लेल जा सकत । ्र सभ धार्मिक सम्‍प्रदायक फूटफूट स्‍टल द्वारा अपनअपन धर्म ज्ञानक प्रचार प्रसारक अवसर उपलव्‍ध कराओल जाएत । ्र लोक जीवनमे आब बला बारहो मासक पर्वतिहारक विशिष्‍टता दृश्‍य द्वारा देखाओल जाएत । ्र लोक गायकगायिका सभक माध्‍यमसं जन्‍मसं मृत्‍यु धरिक भावदृश्‍यक अनुभूति गायन द्वारा कराओल जाएत । ्र लोकमंचक प्रस्‍तुतिकरण क्रममे राजा सलहेस, दीनाभद्री, लोरिक, दुलरा दयाल, जया विसहरक नाचक संगहि जटजटिन, समाचकेबा, झिझिया नृत्‍यसभ देखाओल जाएत । ्र लोकशिल्‍पक विभिन्‍न पक्षकें देखब’ बला प्रदर्शनीक आयोजन कएल जाएत । ्र प्रचलित लोक गाथाक नायक आ कथा प्रसंगकें माटिक मूर्ति द्वारा सजीव रुपें प्रस्‍तुत कएल जाएत । ्र मैथिलीमे प्रकाशित पत्रपत्रिका सभ, पुस्‍तक सभक प्रदर्शनी सेहो रहत । ्र महोत्‍सव अबधि भरि विचारगोष्‍ठी, कवि सम्‍मेलन, वाल गोष्‍ठी, फिल्‍म उत्‍सव, सभासद् सम्‍मेलन, व्‍यवसायिक एवं औधोगिक प्रदर्शनी, खेलकूदक संगहि मनोरंजनक आनो सामग्रीक भरमार रहत । एहि तरहें विभिन्‍न आयोजनक तैयारि चलि रहल अछि । प्राचीन तिरहुतिया गाछीकें एकर आयोजन स्‍थल बनाओल गेल अछि । एकरालेल ४९ गोट उपसमिति बनाओल गेल अछि । लगभग ५० लाख टकाक खर्चसं सम्‍पन्‍न होब बला ‘मिथिला महोत्‍सव’ सम्‍पूर्ण मैथिली भाषीक हेतु दर्शनीय तं हएबे करत, आन्‍तरिक पर्यटनकें सेहो बढाबा एहिसं भेटतैक । नेपालमे अगामीसन् २०११ कें पर्यटन वर्षक रुपमे मनएबाक तैयारी चलि रहल अछि । एहि तरहक आयोजन ताहिमे सहयोगीक काज करत से विश्‍वास कएल जा सकैछ । २. कथा ऋषि बशिष्ठ पूत कमाल अर्जुन चौधरीक विआह गाममे चर्चक विषए बनल छलै। अर्जुन चौधरी एकटा सुभ्यस्त गृहस्थ रहैत अपन बेटाकेँ कोनो ने कोनो जोगाड़े विदेश पठा देने छला। चौधरीक बेटा दस सालपर गाम घुमल छल। सौंसे गामक लोक पहिने यएह कहैत छलै जे अर्जुन चौधरीकेँ ओहि बेटे पोता नहि होमएबला छनि। ओकर लोटिया डूमले बुझू! ओकी आब गाम आओत? एह! ओ छौंड़ा आब चौधरीक कहने विआह दान करतनि......... ओ तँ ओम्हरे कतहुँ साइट-धाइट लगौने हेतनि की! अर्जुन चौधरीक बंश बुड़ले बुझू। अर्जुन चौधरीकेँ अपन एकमात्र पुत्र बंशीपर भरोस छलनि मुदा लोकक बात सुनि-सुनि हुनको करेज दलमलित होमए लगैत छलनि। खास कऽ जखन बंशीक माए ककरो बेटाक चर्च करैत छलखिन जे ओ बाहरेमे विआह कऽ लेलकनि। तखन तँ चौधरीकेँ जेना करेज कटि कऽ खसि पड़ैत छलनि। जहियासँ बंशी आएल अछि सगरो गाममे ओकरे चर्च होइत रहैत छैक। ओना आबक बंशी आ दस साल पहिनेक बंशीमे कतहु मेल मिलाप नहि छैक। दस साल पहिने जखन बंशी कोरिया गेल छल तँ थुल-थुल करैत देह दशा, कौड़ी सन-सन लटकल आँखि आ धरतीकेँ जेना धमकबैत चालि।......... आर तँ जे, ओकर वेश-भुषा आ बगए-बानिसँ ओ साफे विदेशी बुझाइत। ओ बंशी आब बंशी नहि रहल अपन नाम बदलि कऽ डब्बू कऽ लेने अछि। गामक लेल डब्बू चिड़िघरमे आएल नव जानवर जेकाँ छल जकरा सभकियो देखए चाहैत छल। आ डब्बूक लेल ई गाम-घर आ लोक सभकिछु नब बथान लगैत छल। ठीक ओहिना जेना माल-जाल लेल नबका बथान। सभ किछुकेँ सुँधैत। धियापूता स्कूलसँ हेँजक-हेँज अबैत छल डब्बूकेँ देखवाक लेल। डब्बूक थुलथुल देहदशा पएरमे उज्जर दप-दप जुत्ता, लाल रेगक घुट्टी भरिक मौजा, तैपर कारी रंगक ठेहुन धरि पहिरने पैंट। पैंटमे बसोटा जेबी जेना जगह-जगह चेफड़ी साटल होइ। ऊपर बंदगलाक गंजी आ माथपर मुजैला पथियाक टोप। आँखिमे कारी खुंझा चश्मा, पाछाँसँ डोरी बान्हल। धीया पूताक लेल जेना एकटा खेल उखड़ि गेल छलै। केम्हरोसँ आएल आ डब्बूकेँ देखि कऽ ठिठिया लेलक। एतबेमे जेना ओकर सबहक सभटा ठेही मेटा जाइ। अर्जुन चौधरी डब्बूक विआह करेबाक लेल गोटीपर गोटी फिट करैत रहलाह। पहिने तँ हुनकर अनुमान छलनि जे बेटाकेँ अबिते घटक झपट्टा मारत। लड़का विदेशमे कमाइए। भेल मुदा उनटे। ओ जतए बेटाक विआहक चर्च करथि सभ यैह कहि कऽ टारि दैत छलनि जे बिलेँती लड़काक कोन ठेकान। ओकरासँ वियाहि कऽ के अपन बेटीक जिनगी खराप करत......... एकटा बुढ़ा तँ एतेक तक कहि देलखिन जे- ‘‘औ बाबू, तोहर बेटा छह भारत छोड़ो आन्दोलनकारी आ हमसभ छी सुच्चा भारती। गाँधीक भारत छोड़ो आन्दोलन छलनि फिरंगीकेँ भारत छोड़ेबाक लेल आ तोहर बेटा तँ अपनहि भारत छोड़ने छह......। आब तोहीं कहह जे के एहन धरकट बाप होएत जे एतेकटा बेटीकेँ पोसि-पालि कऽ अपनहि हाथेँ गरदनि काटि लेत?’’ ......अर्जुन चौधरीकेँ जेना सटाक्........चाट लगलनि ओहि बुढ़ाक बातक। ओ जेना तेना बेटाक विआह कराबक लेल मोने-मोन निश्चय कऽ लेलनि। डब्बूक लेल लोकक व्यवहार सामान्य नै छलै आ गामक लोकक लेल डब्बुक व्यवहार असमान्य छलै। ठीक ओहिना जेना ओझाक लेखेँ गाम बताह आ गामक लेखेँ ओझा.........। गाम भरिमे टुनटुन एकमात्र ओहन लड़का जकरासँ डब्बू जखन-तखन गप्प करैत छल। टुनटुन डब्बूक बालसंगी छलै जे पढ़बा-लिखबामे तेज रहितो परिस्थितिवश गामेमे रहैत छल। .......जेना-तेना अर्जुन चौधरी अपन बेटाक रामनगर तँइ केलनि। ओ अपन बेटाक बदलल व्यवहारसँ कनेक बेसिये चिन्तित छलाह। विआह तँ तँइ भऽ गेलै मुदा किछु तेहन ने भऽ जाइ जाहिसँ सभ कएल-धएल चौपट्ट भऽ जाए। ........आइ विआहक दिन अछि। अर्जुन चौधरीक घरमे जेना उत्सवक माहौल छनि। आँगनसँ कखनो-कखनो महिलाक सामुहिक स्वरमे गीत आ कखनो हँसी-ठट्ठाक अवाज दलान धरि पहुँचैत अछि। आंगनमे बजैत साउण्ड वॉक्ससँ निकलैत रीमिक्स गीत........‘‘सैंया दिलमे आना रे......’’ मुदा बेसी सुनाइ पड़ैत छल। दलानपर हथपड़ीक लेल आएल पाँच गोट सुभ्यस्त भेल बैसल छथि। गाम-समाज अपन-अपन तर्कसँ डब्बू आ अर्जुन चौधरीक गुणगान करबामे जुटल अछि। पाहुन सभ कखनो-कखनो गप्पोमे सहमति आकि असहमति टा व्यक्त करैत छथि। एकटा प्रौढ़क कहब छनि जे- ‘‘बस्स एकटा संतानकेँ विदेश पठा दिऔ! देखियौ सभ कष्ट दूर....!’’ दोसर टिपैत छथिन- ‘‘विदेश पठाएब सबहक बशमे बात नै छै औ बाबू! विदेश पठाबहिमे केहन केहनकेँ ढोंढ़ी ढील भऽ जाइ छै।’’ प्रौढ़ जेना दोसराक गप्पकेँ मलहम लगबैत छथि- ‘‘से तँ होइते छै, फाउ-दावमे जँ विदेश जैतै तँ सभ अपन बेटाकेँ विदेशे पठा दितै।’’ अर्जुन चौधरीक जेना जीह टाँगल छलनि। ओ कछमछीमे रहथि। कखनो आँगन कखनो दलान। आँगनमे स्त्रीगणक भीड़ आ दलानपर पुरुषपातक। डब्बू विआहक लेल तैयार भऽ गेल छल। ओ कोट पैंट पहिरि गलामे टाइ लगा कऽ तैयार छल। स्त्रीगण सभ ओकरा धोती-कुर्त्ता पहिरेबाक लाख कोशिश केलनि ओ साफे नकारि देलकनि। डब्बू धोती-कुुर्ता आ डोपटा-पागकेँ ‘‘पूअर’’ ड्रेस कहैत अछि। डब्बूक माए जखन कपड़ा बदलबाक लेल कहलखिन तँ ओ तमकैत बाजल- ‘‘हम ड्रेसमे कोनो कम्प्रोमाइज नै कऽ सकै छी।’’ महिला सभ कनफुसकी करए लगलीह। ‘‘मए गै माए, एहन अन्हेर नै देखल-ए! ई मैथिल ब्राहमणक विआहमे कतौ अंगरेजिया ड्रेस चललै-ए?’’ बेराबेरी सभ बुझबैत रहलीह मुदा डब्बू ककरो बात मानबाक लेल तैैयार नहि भेल। हथधड़ीक बेर भेलै। महिला सभ कनफुसकी करैत सभ बिधकेँ पूरा करैत गेलीह। क्रमशः अगिला अंकमे देल जाएत....... १.प्रकाश चन्द्र-नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण २. बिपिन झा-युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग" (वेलेण्टाइन डे विशेष पर) १ प्रकाश चन्द्र नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा भगवान दास रोड, नई दिल्ली – 01 नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण प्रियंवदा उदय नारायण सिंह नचिकेता द्वारा लिखित एकांकी आछि । एकरा सम्पूर्ण नाटकक रूप द’ क’ मनोज मनुज मंचित केलथि । एहि प्रस्तुति के देखबाक सौभाग्य हमरा नहि प्राप्त भेल, मुदा प्रस्तुति आलेख हमरा उपलब्ध भेल । ओही नाट्यालेख के अध्ययन केलाक बाद हमर निम्न अनुभव अछि । जेना कि नाम स’ लगैत अछि जे प्रियंवदा कोनो ऎतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक होयत मुदा से अछि नइ । ई मात्र नाटकक एकटा केन्द्रित पात्रक नाम अछि जिनका इर्द-गीर्द नाटकक कथानक घुमैत अछि । नाटकक कथ्य एना अछि जे प्रियंवदा नामक एकटा लड़की कोनो शहर में एसगर रहि रहल छथि आ कोनो कम्पनीक लेल मार्केटिंग सर्वे करैत छथि । ओही शहर मे शर्व नामक एकटा युवक सेहो  रहैत छथि । शर्व के कविता लिखब खूब पसिन छनि आ प्रियंवदा के कविता सूनब नीक लगैत छनि । शर्वक कविता स’ प्रभावित भ’ प्रियंवदा शर्व संग प्रेम विवाह क’ लैत छथि । बाद मे किछु घटना घटैत अछि । सर्व प्रियंवदा के छोड़ि कतौ चलि जाइत छथि । नाटक मे प्रियंवदाक भैया आ भौजी छथिन संगहि किछु कोरस पात्रक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । एहि तरहे नाटक मे कुल जमा दस गोटे छथि । नाटक प्रियंवदा छ: दृश्य मे बाँटल गेल अछि । पहिल मे प्रियंवदा आ हुनकर भौजीक संवाद छनि । दोसर दृश्य मे कोरस, प्रेमी-प्रेमिका, प्रियंवदा आ शर्व छथि । तेसर दृश्य मे कोरस, शर्व आ प्रियंवदा तथा चरिम दृश्य मे शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी  छथि । पाँचम दृश्य मे एक बेर फेर शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी तथा छठम दृश्य मे शर्व आ प्रियंवदा दुनू मात्र छथि । ई नाटक दूटा स्थान पर घटित होएत अछि – पहिल शर्व के घर में आ दोसर सार्वजनिक पार्क मे । शर्व के घर मे चरिटा दृश्य होइत अछि – पहिल, चरिम, पाँचिम आ छठम तथा पार्क में दोसर आ तेसर दृश्य होइत अछि ।  घरक दृश्य मे कुर्सी, किताब, काग़ज़, लैम्प होइत अछि आ पार्क मे संबंधित सामान राखल जा सकैत छैक । प्रियंवदा नाटक फ्लैस बैक मे चलैत अछि । उदय नारायण सिंह नचिकेताक ई प्रिय शैली छनि ।  एकर प्रयोग नचिकेता जी एक छल राजा मे सेहो केने छथि । नाटकक मे एहन तरहक शैली प्राय: नाटक के कमजोर करैत अछि । हँ ! ज’ नाटकक बीच मे किछु कालक लेल वा कोनो एकटा दृश्य फ्लैस बैक मे अबैत हो तखन त’ कोनो विशेष नहि मुदा, नाटकक पहिल दृश्यक बाद सम्पूर्ण नाटक एहि फ्लैस बैक शैली मे चलय त’ निश्चित नाटकक लेल ओतेक प्रभावी नहि भ’ सकैत अछि । कारण, कोनो नाटक एकटा लय मे चलैत अछि, जकर ग्राफ शून्य स’ आगू उठैत छै । दर्शक मे हरदम ई उत्सुकता बनल रहैत छनि जे आब की हेतैक । जखने ई उत्सुकता समाप्त भ’ जाइत अछि नाटक अपना संग दर्शक के बन्हबा मे कमजोर पर’ लगैत अछि । प्रियंवदाक अंतिम पड़ाव जे कि पहिले दृश्य मे अछि कोनो ओतेक प्रभाव नहि छोड़ैत अछि । खैर ... आब एहि नाटकक कथ्य पर विचार करबाक चाही । नाटकक शुरुआत कथ्यक समापन स’ होइत अछि । तात्पर्य ई जे शर्व अपन प्रियंवदा के छोड़ि क’ चलि जाइत छथि जिनका स’ किछुए पहिने ओ प्रेम विवाह केने रहथि । प्रियंवदा वियोग मे रहैत छथि आ हुनकर भौजी हुनका समझा-बुझा रहल छथिन । मुदा, ओ अपना आप मे रहनाइ बेसी उचित बुझैत छथि । हुनकर एकटा संवाद बुझू नाटकक मूल अछि : “सेल्स गर्लक काज करैत – करैत हम स्वयं मार्केट पोडक्ट बनि गेल रही ” । आब प्रियंवदा अपन जीवनक कथा दोहरबैत छथि । कोना ओ अपना नौकरी स’ जुड़ल छलीह, कोना हुनका शर्व भेटलखिन, कोना एक दोसर स’ प्रेम भेलन्हि जे विवाह मे परिणत भेल, कोना दुनूक जीवन चलैत रहैन, कोना शर्व पर हुनक पिछला जीवन हॉबी भ’ जाइत रहनि, कोना शर्व कविता लिखनाई स’ प्रेम करैत छलाह, कोना एक दिन भैया भौजी अकस्मात घर अयलखिन, कोना हुनका सभ संग शर्वक व्यवहार बदललनि, कोना शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा संग दुरव्यवहार क’ र’ लगलाह, कोना शर्वक दिमाग बदलि गेलनि आ ओ  प्रियंवदा  के छोड़ि घर स’ कतौ चलि गेलाह । आब  प्रियंवदा हुनकर वियोग मे आइयो ओहिना ठाढ़ छथि । एहि नाटक मे कथ्यक दूटा धारा अछि । एकटा त’ बिलकुल सामान्य जे तुरत नाटकक नामे स’ देखाइत अछि जे स्त्रीक सामाजिक स्थिति केहन अछि । आइ नै आदि काल स’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति मे कोनो परिवर्तन नै एलैन्ह अछि । हँ ! एकर रूप जरूर बदल अछि । आदि काल मे नल अपन दमयंती के सुनसान जंगल मे छोड़ि क’ चलि गेल छलाह, दुश्यंत त्यागि देलनि शकुंतला के । आइयो शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा के आदमी रूपी जंगल मे छोड़िक’ चलि गेलाह । प्रेमक परिणति, वियोग मे -  ओहू समय आ आइयो । नाटकक कथ्यक दोसर धारा सेहो अछि जे पहिलुक कथ्य स’ अति महत्वपूर्ण आ सारगर्भित सेहो छैक । शर्व एकटा कवि छथि हुनका पर हुनकर अतीत हरदम सबार रहैत छनि । एहि ठाम शर्व एहि नाटक पात्र मात्र नहि छथि बल्कि आजुक मानव समाजक प्रतिनिधित्व क’ रहल छथि । लोक चाहे जे किछु भ’ जाइछ या बनि जाइछ  हुनकर अतीत हरदम हुनका पर छाया जेना मँडराइत रहैत छनि । एहि अतीत स’ किछु समर्थ व्यक्ति अपना आप के बचा लैत छथि आ ओहने व्यक्ति महान होइत छथि । मुदा अधिकांश व्यक्ति ओकर प्रभाव मे आबि जन सामान्यक जीवन जीबैत छथि या शर्व जेना अमानवीय व्यवहार क’र’ लगैत छथि । ई अति महत्वपूर्ण अछि आ एतबे नहि एखुनका सन्दर्भ मे ई विश्व स्तर पर गम्भीर प्रश्न बनल अछि । मुदा प्रियंवदा नाटक मे एहि गम्भीर मुद्दा के दाबि क’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति सन सार्वजनित मुद्दा के प्रमुखता स’ प्रभावी बना देल गेल अछि ।  जँ एहि नाटकक नाम प्रियंवदा क’ बदला किछु आर होइत त’ ई निर्देशकक मोनक विचार आ कुशलता भ’ सकैत छल जे ओ कोन पक्ष केँ बेसी उभारैत छथि । पात्रक चुनाव उदय नारायण सिंह नचिकेताक नाटकक अत्यंत प्रभावी अंग थिक । कारण, सभ पात्र गठल आ कथ्यक माँगानुसार होइत छनि । एहू नाटक मे पात्रक संख्या आ ओकर विस्तार कथ्यक अनुसार उचित अछि । संगहि कोरसक प्रयोग क’ क’ आरो आसान बनाओल गेल अछि । कोनो छोट स’ छोट संस्था एहि नाटक केँ आसानी स’ प्रस्तुत क’ सकैत अछि । नाटक मे प्रियंवदा सबस’ महत्वपूर्ण चरित्र छथि आ ओहि के बाद शर्व  । मुदा एकटा अभिनेताक लेल सबस’ महत्वपूर्ण आ चुनौतीपूर्ण चरित्र छथि शर्व । ई पात्र जतेक साधारण देखाइत अछि कविक रूपमे ओतबे जटिल अछि आंतरिक रूपे । अभिनयक जे सबस’ महत्वपूर्ण अंग अछि अंतरद्वन्द से एहि पात्र में दुनू तरह स’ भरल अछि – बाहरी आ आंतरिक सेहो । बाहरी मे अपन प्रियंवदा आ समाज सँ, आ आंतरिक मे हुनक अपन अतीत स’ । एहि तरहक चरित्र कोनो अभिनेता लेल पसंदिदा चरित्र होइत अछि ।  तेँ हम शर्व के एहि नाटक मे महत्वपूर्ण चरित्र मानैत छी । भैया आ भौजीक रूप मे दूटा पात्र आरो छथि । नाटक लेल ई दुनू सहयोगी पात्र छथि । अहू मे भौजी कनी बेसी महत्वपूर्ण । पहिने कहने छी जे कोरस के प्रयोग नीक अछि । तेँ प्रियंवदा पात्रक अनुसार एकटा महत्वपूर्ण नाट्य रचना थिक । नाटक मे नाटकीय भाषाक जे प्रयोग भेल अछि से शास्त्रीय थिक । चुँकी नचिकेता जी स्वयं नीक कवि सेहो छथि तेँ हिनक कविता बेसी प्रमुखता संग नाटक मे रहैत छनि । यैह कारण अछि जे बहुत बात ओ बहुत कम्मे शब्द आ सुगठित भाषा मे कहि लैत छथि । मुदा प्रियंवदा मे कविताक प्रयोग किछु विशेष भ’ गेल अछि । ओना शर्व कवि छथि तेँ कविता अधिक - सेहो कोनो उचित तर्क नहि बुझना जाइत अछि । आ एहन तरहक भाषाक प्रयोग नाटक के भ्रमित करैत अछि ओ एना कि भाषाक आधार पर प्रियंवदा के की कहल जाय शास्त्रीय नाटक, ऎतिहासिक नाटक, यथार्थवादी नाटक या आर कोनो । हाँ, भाषा आ कथ्यक आधार पर ई यथार्थवादी नाटकक वैचारिक नाटकक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि । मुदा, कोरसक भाषा नाटकक संग नहि जाएत अछि । संगहि किछु आर मुद्दा सेहो कोरस के माध्यम स’ सामने राखल गेल अछि ओ कनि आरो मूल कथ्य के भ्रमित करैत छै जेना प्रेमी-प्रेमिका मे विवाहेत्तर संबंधक मुद्दा उठायब । ई मुद्दा कमजोर या अप्रासांगिक अछि से हम नहि कहि रहल छी मुदा एहि ठाम एकरा उठायब नाटकक मूल कथ्य के कमजोर करब अछि । रंगमंचीय दृष्टि सँ प्रियंवदा एकटा सामान्य कृति अछि । ने कोनो अतिमहत्वपूर्ण आ ने निराशाजनक । एहन कोनो खास नै छै जे किनो निर्देशक वा संस्था एक बेर पढ़िते एकरा मंचनक परिकल्पना क’ र’ लागथि आ इहो नहि कहल जा सकैत अछि जे कोनो निर्देशक एकरा मंचित क’ र’ चाहथि त’ प्रभावी नहि बना सकैत छथि कनि फेर बदल क’ क’ । २ बिपिन झा युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग"। (वेलेण्टाइन डे विशेष पर) प्रेम दिवस एकदा मन्यते यत्र रक्तपातोऽल्पि कारयति, वर्षस्य प्रतिदिवस घ्रृणादिवस सम कुर्वन्न शर्म लभते। न कोऽपि कथयति तं किमपि, यः वितरति विषयुक्ता हाला, किन्तु सर्वे निन्दन्ति यदा मधु वितरति मधुशाला॥ सामान्यतया ई देखल जाइत अछि जे प्रेम दिवस अर्थात वेलेण्टाइन डे दिन यदि कोई विशेष उत्साह रखैत अछि तऽ समाज नीक नहि बुझैत छैक। एतय प्रश्न उठैत अछि जे प्रेम केर इजहार करब उचित वा अनुचित? एहि सन्दर्भ में जहाँ तक हमर दृष्टि अछि - प्रेम जीवन केर महत्त्वपूर्ण शक्ति छियैक जे भावना पर आश्रित होइत छैक। आब एतय प्रश्न स्वाभाविक अछि जे प्रेमक अभिव्यक्ति केना हो? एतय सजतया अपन विचार के प्रस्तुत करवाक लेल हम गीता केर ’भक्ति’ आ ’कर्म’ केर अवधारणा क माध्यम बना रहल छी। यदि निष्पक्ष भाव सँ देखल जाय तऽ प्रेम क्यल नहि जाइत छैक सहजतया भय जाइत छैक (we 'fall in love' not 'get it'). एहि स्थिति में समस्त प्रेमी के भक्तिमार्ग आ कर्ममार्ग में बिभक्त कय सकैत छी। भक्ति मार्ग में जतय व्यक्ति एकता दास जकाँ समर्पित भाव सँ काज करैत छैक ओतहि कर्म मार्ग में व्यक्ति स्वामी जकाँ आचरण करैत छैक। भक्ति मार्ग केर अपनबै बला प्रेमी विविध भावनानुकूल आचरण करैत छथि ओतहि कर्ममार्ग केर श्रेयस्कर बुझयबला मैत्री आ आनन्द केर अनुगमन करैत छथि। ई शब्दावली यदि आंग्ल पर्याय रूप में देखी तऽ विशेष स्पष्ट होयत। उक्त दुनू मार्ग एकांी दृष्टिगत होइछ। यदि दुनू केर समन्वय  कय प्रेम केर गाडी आगू बढायल जाय तऽ ओ प्रेम निश्चित रूप सँ सफल होयत एहि में कतहु सन्देह नहि।

प्रेमक मह्त्त्व बुझैत सन्त वेलेण्टाइन अपन जीवन एहि कार्य हेतु युवा के प्रेरित करबा लेल अपन जीवन कें सर्वस्व न्यौछावर कय देलथि। राजा केर अवज्ञाक कारण हुनका मृत्युदण्ड भेटलन्हि।

एतय एकटा गप्प कहब अनिवार्य बुझैत छी जे वर्तमान समय में एहि पावन अवसर के अनुचित प्रयोग होइत अछि। अस्तु युवा वर्ग कें एहि दिस ध्यान देव अत्यावश्यक जे  प्रेम दिवस कें नैतिकता क संग प्राणी मात्र हेतु मनायल जाय। आओर बुजुर्ग सँ आग्रह जे एहि पावन दिवस कें संकुचित दृष्टि सँ नहि देखि एकरा उत्साह क संग मनेवा हेतु युवा वर्ग कें प्रेरित करथि। (लेख केर कोनोशब्द जनभावना के ठेस पहुँचवैत हो ओहि लेल सतत क्षमाप्रार्थी छी)

बिपिन झा, पी एच. डी स्कालर आय. आय. टी. मुम्बई http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home १.कुमार मनोज कश्यप-कथा- कचोट २.कथा-मुसिबत–सन्‍तोष कुमार मिश्र ३.दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी कुमार मनोज कश्यप जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित। कचोट 'डिवोर्स इज ग्रांटेड। नाऊ यू बोथ आर लीगली सेपरेटेड ऑफ इच अदर' - कंहि कंऽ जज अदालतकं कंार्यवाही समाप्त कंऽ कंऽ उठि गेल छलाह। ओकंरा चेहरा पर पैघ सन मुस्कंान पसरि गेल छलै़माथकं बोझ हल्लुकं होईत सन बुझेलै। ओ विजयी भाव सँ तकंलकं मीरा दिस । मीराकं कंातर नजरि सेहो एकं पल लेल ओकंरा दिस उठलै ; पेᆬर जल्दी सँ अदालत सँ बहरा गेलि मीरा । ओ ठाढ़े रहि गेल अदालत मे । सोचैत़आई स्थिति कंोना एकंाएकं बदलि गेलैकंअप्रात्याशित। मीराकं वकंील बहस मे कंतेकं जोर दऽ कंऽ कंहैत छलै जे विवाह भारतीय समाजकं एकं टा पवित्र बंधन छई आ एहि बंधन के कंोनो उद्वेग मे तोड़ल नहि जा सकैछ । ओकंरा मोन पड़लै जखन मीराकं वकंील ओकंरा पर आरोप लगबैत कंहने छलैकं - 'योर ऑनर ! वास्तविकंता तऽ ई आछ जे श्रीमान विकंास हमर मुवक्किंल मीरा सँ तलाकं लऽ कंऽ दोसर विवाह अपन प्रोमिकंा सँग कंरय चाहैत छथि, जे पहिने परिवार आ समाजकं दवाबकं कंारणें नहि कंऽ सकंल छलाह । हमर मुवक्किंल कें पहिने रस्ता सँ हटेबा हेतु ओ तरह-तरह के प्राताड़ना दैत रहलाह़मारि-पीट, गारि-गंजऩक़ंी कंी नहि । ' किं तखने मीरा ठाढ़ भऽ कंऽ अपन वकंील के रोकैत  जज दिस ईशारा कंरैत कंहने छलीह - ' हमरा क्षमा कंरब , ई सभ सत्य नहि आछ जज साहेब । हमर पति देवता-तुल्य छथि । हमरा ओ कंहियो अधलाह वचन तकं नहि कंहलनि ; हाथ उठेबाकं तऽ बाते नहिं । ओ किंयैकं हमरा सँ अलग होमय चहैत छथि से तऽ वैह जानथि । ' मीराकं एहि वत्तᆬव्य पर समूचा अदालत स्तब्ध रहि गेल छल। मीराकं भाय तामसे माहुर भऽ रहल छलाह। हुनकंर अँखि सँ व्रᆬोधकं ज्वाला पुᆬटय लागल छल़ठोर पटपटा रहल छल मुदा शब्द नहिं बहरायल। पाशा तँ तखन पलटि गेलै जखन एकंर वकंील कंहने छलै--'मी लॉर्ड ! हमर मुवक्किंल के अदालत सँ तलाकं मँगबाकं मुख्य कंारण आछ श्रीमति मीराकं व्यभिचार जे हिंदु मैरिज एक्ट-१९५५ के धारा-१३    के अंतर्गत तलाकंकं एकंटा पैघ कंारकं भऽ सकैछ । हमरा लग कैकंटा एहन दृष्टांत आछ जे हमर एहि आरोप के पुष्टि कंरत़। ' एहि सँ पहिने किं वकंील अपन फाईल कें पढ़ि कंऽ किंछु आगु बजतथि, किं मीरा उठि कंऽ ठाढ़ भऽ जज सँ कंहने रहै--' जज साहेब ! हम अपन पति कें तलाकं देबा लेल तैयार छी । हमरा बताओल जाय जे कंोन कंागज पर कंतऽ दस्तखत कंरऽ पड़तै । ' समूचा अदालत मे पेᆬर सँ सन्नाटा पसरि गेलै। सभ स्तब्ध भेल अड़ोस-पड़ोस ताकंय लगलै ; कंाना-पुᆬसी शुरू भऽ गेलै। केयो एहन उम्मीदो नहि केने छल । तलाकं भेटलाकं क्षणिकं खुशी के तुरते बाद ओकंरा भान भेलै जे मीराकं चरित्र पर एहन पैघ लाँछन लगा कंऽ ओ नीकं नहि केलकं । एकंरा एकंोटा किंछु एहन घटना नहि बुझल छै जाहि सँ मीराकं चरित्र पर कंोनो टा संदेह होई । चरित्रे तऽ नारीकं सभ सँ पैघ गहना होईत छैकं । पेᆬर सोचलकं तलाकंकं हेतु आन कंोनो कंारणो तऽ नहि छलै ओकंरा लेल़वकंीले कंहने छलै जे एहि ग्राउँड पर सद्यः तलाकं भेट जयतै एकंरा । ई धरि सत्य जे ओ अपन ईच्छा के विरुद्ध परिवार-समाजकं दवाब मे मीरा सँ विवाह केने छल । मुदा ओ अपन प्रोमिकंा के नहि बिसरि पओलकंविवाहकं बाद तऽ ओकंर प्रोम बढ़िते गेलैकं। पत्नि आ प्रोमिकंाकं वास्तविकं भेद के जनितो ओ पत्नि मे प्रोमिकंाकं गुण ताकंऽ लागल । परिणाम भेलै जे पत्नि सँ विरत्तिᆬ बढ़ऽ लगलै । जखन प्रोमिकंाकं ईशाराकं हवा भेटलै तऽ पत्नि सँ विरत्तिᆬ अदालत तकं तलाकंकं मुकंदमा रूप मे पहुँचि गेलै़घर-परिवार, गाम-समाज सभ सँ विद्रोह कंऽ कंऽसभ सँ सम्बंध विछोह कंऽ कंऽ । अपना के धिक्कंारऽ लागल ओ़चरित्र तऽ एकंर स्वयं कंलुषित छैकं जे व्याहता पत्नि के छोड़ि़। ओकंरा सन पतित भरि संसार मे केयो नहिं हेतैकं । मीरा सन धवल चरित्र पर कंलंकंकं दाग तऽ कंम सँ कंम नहिं लगावऽ बुझैत छलैकं ओकंरा । मीरा़! मीरा तऽ वीराँगना आछ़ज़खन एकंर वकंील ओकंर चरित्र के कंलंकिंत कंहऽ लगलै तऽ ओ अपन चरित्र पर लाँछना सुनबा सँ पहिनहि ओ तलाकंकं कंागज पर दस्तखत कंऽ देब नीकं बुझलकं। घर आबि कंऽ ओ पलंग पर धड़ाम सँ पड़ि रहल। सामनेकं देवाल पर एखनो एकंरा दुनूकं फोटो टाँगले छलैकं। ओकंर ध्यान ओहि फोटो पर टँगि गेलै़क़ंतेकं ध्यान राखैत छलैकं मीरा एकंर   एकं-एकं जरूरति के ध्यान राखैत छलैकं। एकंरा तऽ मोनो ने छैकं जे द्विरागमनकं बाद सँ अपन जरूरति के कंोनो समान ई घर मे मँगने होईकं वा स्वयं उठा कंऽ लेने हुअय़ज़रूरति सँ पहिने मीरा सामान लऽ कंऽ हाजिर । लुड़ि-वितपनी, आवेश-वात सभ मे मीरा अव्वल । भरि गाम मे लोकं कंहै छै जे पुतोहू हुअय तऽ भोलबाबू सन। आस-पड़ोस, घर-परिवार, जन-हरवाह सभकं प्रिाय बनि गेल छलैकं मीरा। एकंो क्षण सासु-ससुर के नजरि नहिं पड़नि तऽ कंनियाँ-कंनियाँ के शोर। ननदि-देयोर भौजी-बौजीकं अनघोल केने। एकंरो तऽ कंोनो शिकंायत नहिये छलैकं मीरा सँ। मुदा किंश्मत बीचहिं मे अपन चालि चललै आ पूर्व-प्रोमिकंा सँ एकंर लगाव बढ़ऽ लगलै  नहि चाहितो ओ प्रोमिकंा के प्रोम-जाल मे पँᆬसैत चलि गेल आ पेᆬर दुनू निश्चय केलकं मीरा सँ अलग भऽ विवाह कंरबाकं। एकंरा नीकं जकँा बुझल छलैकं जे मैथिलानी लेल पतिकं आतरित्तᆬ ओकंर कंतहु स्थान नहि आ सौतीन सेहो  कंथमपि स्वीकंार्य नहि; तैं अंतिम रस्ता अदलते सँ तलाकं लेब बुझेलैै। गाम-समाज मे जे सुनलकं से थू-थू कंरय लागल। बाप जे धड़ खसेलनि से खसेनहिं रहि गेलाह़माथकं पाग बेटा खसा देने छलनि। ओकंर विद्रोहकं आगाँ सभ विफल भऽ गेल़ओ घर छोड़ि कंऽ पड़ा गेल ऩहिं जानि कंतऽ। आई ओकंरा प्राचंड   झंझावातकं   बाद पसरल  विरानगि सन बुझा रहल छलै अपना भीतऱकिंछु टा नहिं नीकं लागि रहल छलै ओकंरा । अपराध-बोध सँ दबले जा रहल छल़किं पओलकं ओ़उनटे पुरखाकं मर्यादा मटियामेट भऽ गेलै़बाबू लोकंलाजें दलानो पर तकं नहि निकंलैत छथिऩमायकं आँखिकं नोर सँ आँचरकं खूट तीतले रहैत छै़हँसैत-खेलैत परिवार मे आई मरघटकं सन्नाटा सन पसरि गेल छै । एहि सभकं दोषी तऽ यैह आछ । ओ जतेकं सोचय; आत्म-ग्लानि सँ ततबे दबल जाय । प्रोमिकंाकं बेर-बेर फोन अबैत छलैकं। मोबाईल स्वीच-ऑफ कंऽ कंऽ ओ कंात मे पेᆬकं देलकं । उठल़दू-चारि टा कंपड़ा-लत्ता जल्दी-जल्दी ब्रीफकेश मे ठुसलकं आ घर मे ताला लगा बाहरा गेल । दलान पर बाबू आ कंक्कंा कंोनो गूढ़ विचार-मंथन मे लागल छलाह। ओ दुनूकं पायर छुलकंनि  कंकंरो दिस सँ कंोनो प्रातिव्रिᆬया नहिं। ओ अप्रातिभ भऽ गेल। कंने कंाल ओहिना ज़डवत ठाढ़ रहल पेᆬर समान उठा कंऽ आँगन दिस विदा भेल । कंोनटा लग माय ठाढ़ छलैन, दबले स्वरे पुछलकंनि ' निके छी किंने?' ओ स्वीकृति-सूचकं मुड़ी डोलबैत अपना कंोठली मे चल गेल। मीराकं कंपड़ा-लत्ता, वस्तु-जात सभ किंछु ओहिना राखल जेना एखने नीकंलल होथि  ओहि कंोठली सँ । माय चौखटि लग नुआँकं खूट सँ नोर पोछैत आबि कंऽ ठाढ़ भऽ गेलखिन। पेᆬर नहुयें-नहुयें कंहय लगलखिन-'बौआ आहाँ अपना पर ध्यान राखब़अहीं पर सदिखन चिंता लागल रहैत आछ । सुनै छियै कंनियाँकं भाय आहाँकं जान लेबा लेल उदवीर्त भऽ गेल आछ । गोनमाकं माय बजैत छलैकं जे ओ तऽ बंदूकं निकंालि कंऽ आहाँ के मारबाकं लेल निकंलि गेल छल। मुदा कंनियाँ ओकंर पैर गछेड़ कंऽ पड़ि रहलै जे भैया एहन पाप नहिं कंरू । एखन हम कंम सँ कंम सधवा तऽ कंहबैत छी़सींथ मे सिनूर पहिरैत छी़माँछ-माँसु खाईत छी। तलाकंकं कंागज पर दस्तखत मात्र कंऽ देने जन्म-जन्मांतरकं सम्बंध नहिं टुटि जायल कंरैत छै । हुनकंा कंरय दियनु ओ जे कंरैत छथि । अहुँ के जँ हम बोझ बुझाईत होई तऽ हमरा छोड़ि दिय़हम वुᆬटौन-चुरौन कंऽ कंऽ पेट पोसि लेब़संसार बड़कंा टा छै । ' सुनि कंऽ ओ ठामहिं ठाढ़ भऽ गेल- ' माय हम गंगापुर जा रहल छी मीरा सँ भेंट कंरय । ' माय अचम्भित भेल कंोनो आनष्टकं  आशंकंा सँ ओकंरा रोकिंते रहि गेलखिऩओ मोटरसाईकिंल स्टार्ट कंऽ कंऽ आँखि सोंझा सँ दूर भऽ गेल। बाबू - कंक्कंा बौकं बनल दलान पर ठाढ़े रहि गेलाह। २ मुसिबत–सन्‍तोष कुमार मिश्र दुरागणे दिनसँ जे कननी–रोइनी ओकरापर सबार भेलै से एखन धरि छुटल नहि छलै । तें हम साँझखनकऽ जखन कतौसँ आबि त सबहे दिन लोड–सेडिङ्गकें कारणे अन्‍हार ताहुमे ओ असगरे कनैत । कहियो मैनबत्ति बरैत त कहियो अपने बारऽ परैछल । हुनका कनैत देखिकऽ हम मैनबत्ति लऽकऽ हुनकर मुँहके चारु दिश घुमऽबैति कहऽलैगितीए –“आको माइ चाको, पहलाद माइ रोको, सँझा माइ तरणी, सबहे दुःख हरनी, हसनी–खेलनी आगु आ, डिठ–मुठि नजरि–गुजरि सब पाछु जो, .........” एते कहिते ओ छमसिया बच्‍चा जकाँ खिलखिला– खिलखिलाकऽ हंसऽ लैगतथिन । हम त कनहि बिलाइ, मारे तिरपित । हुनका हसिते हमर सुपसन करेज भऽजाइछल । आ, हम खुसीसँ दङ्ग परैत कैहितिए “सो डारलिङ्ग ह्‍वाट टु डू ?” जेना बापक जिमदारी हुए तहिना ओ तखनसँ काज अढ़ाबऽकें शुरु करैछलखिन । हम त धोखासँ अंग्रेजीमे बजैछली आ, तकर बाद ओकर अग्रेजी शुरु होइछल । इहे त बात छै, कहूँ माथ पर बैसल त सोचिलिअ, दिशा करबाक चान्‍स बेशी रहत । समय एहिना बड़ निकसँ शुद्ध पत्‍नीवर्ता पुरुष जकाँ चलैत रहे । मुदा एकबेर अफिसके काजसँ काठमाण्‍डू जाए पड़ल । समय त किछु बेशिए लागऽवाला रहै । करिब एक महिना । आ, सबहे दिन फोन पर बात करब से बचन सेहो देनेहे रहि । आबऽबेरमे ओ बेर–बेर कहैत रहथिन –“काठमाण्‍डूमे ठन्‍ढा बेशी छै, अहाँके मिसेज डि–कोल्‍ड कें आवश्‍यक पड़त ।” हम बेर–बेर जबाब दिए–“अच्‍छा, जरुरत बुझएतै त किनलेबै ।” हमर जबाब ओ सुनिते हैसिदे । मुदा ई बात जखन बसमे हमरा ठन्‍ढ़ा लागल तखन महसुस भेल जे ओ डि–कोल्‍ड के आगुमे मिसेज किए लगै? ओ त अपना लेल कहे । तखन मतलब साफ नजरि आएल जे हुनको काठमाण्‍डू आबऽके मोन छलनि । काठमाण्‍डू पहुचलाके बाद एक दिन पहिने बात कएने रहि मुदा काल्‍हिखन दिन भरि फोन लागले नहि रहे । जखन फोन लगबिए त आवाज अबै–“तपाइले .....” मतलब सम्‍पर्क नहि होएत । मुदा, तकरे प्रातः कलंकीसँ फोन कनिञाके फोन आएल –“हम अग्‍नी बसके काउन्‍टर लग ठाढ़छी जलदीसँ लेबऽ आउ” ओ माइ गोड, अखन त साढ़े चारिए बजलैए । पुछलिए टेक्‍सीके बारेमे त जबाब आएल जे आइ उपत्‍यका बन्‍द छैक । कनिञा आएल काठमाण्‍डू, एकटा मुसिबत । उपत्‍यका बन्‍द, दोसर । हम होटलके स्‍टाफकें खुसामद कऽकऽ गाड़ी त मगलहूँ मुदा ओ कलंकीमे मात्र छोरत ओतऽसँ फिर्ता नहि आओत । कहाँदोन हड़तालमे टुटफूटके इन्‍स्‍योरेन्‍स कभर नहि करैछैक । हम कलंकी पहूचली । हुनका देखलियनि; ओते ठन्‍ढ़ामे पातर ओढ़ना, मुदा ओढ़ना जतबे पातर छलै लोलमे लिपस्‍टिक ओतबे मोट ते सायल ओतबे मोट लाठीसँ हुनका पिटऽके सेहो मन भऽगेल । मुदा ..... । हम हुनक नजदिक जाकऽ बड़ प्रेमसँ मुस्‍कैत कहलिए –“चलु डारलिङ्ग, ... अहाँके बेग कतऽ अछि ?” ओ क्‍लोज–अप स्‍माइल दैत अप्‍पन ह्‍याण्‍ड बेग दैत कहली –“हम त एतबे लऽकऽ आएलछी ।” ओ त काठमाण्‍डू आबिकऽ बड़ खुस मुदा हमर मन त हुनक बेग देखिकऽ खौझागेल । तैयो हमसब आगु बढ़लहुँ । किए त पैदले जाएके आश छल । करिब एक किलोमिटर चललो नइ रही कि ओ कहऽ लगली –“चाह पियब ।” कनिके आगु जाकऽ देखलिए एकटा महिला टेबुलपर स्‍टोभ धऽकऽ चाह बेचैत छली । हम दुनूगोटे ओतै चाह पिलहुँ । आ ओतऽसँ बिदा भेलहुँ । ओतऽसँ बिदा भेला दुइयो मिनट नइ भेल रहे कि ओ अपन पेटपर हाथ हौस्‍तैति कह लगली –“हे यौ ....यौ सुनुने, एहन रस्‍ता दने चलु जतऽ लगमे ट्वाइलेट हुए ।” आब ई परेसानी संग पकड़लक । मतलब जे हम भोर खनकऽ हिनका बेड टि दै छलियनि तखन ई ट्वाइलेट जाइछलखिन । आदतसँ लाचार, कि करु । जखन–जखन जोरसँ लगैनि तखन–तखन मुहँ घोकचऽबित पेट पकरैत बजथिन–“आहऽऽऽ” आ जखन कने ठिक जकाँ जे हुएन त बजथिन– “दरऽऽऽ, बज्‍जरखसो एहि काठमाण्‍डूमे, एकटा ट्वाइलेटो नहि ।” फेर कने आगु सेहे ताल । करिब एक किलोमिटर आगु जाकऽ कालीमाटीकें पुलक निचा एकटा सार्बजानिक सौचालय भेटल । मुदा ओतौ खाली नइ । मुदा हुनक छटपटाहट देखिकऽ एकटा ट्वाइलेटकें केबार हम ढकढकादेलिए आ कने दुर हटिकऽ ठाढ़ भऽगेलीए । तुरत्ते एकटा मोटचोट महिला ओहि ट्वालेटमेसँ निकलली आ एक थप्‍पर हुनका मारिकऽ फेर ओहिमे पसिगेली । हुनकर मुहँ त लाल रहबेकरै आब कि ? कनिके देर बाद एकटा दोसर ट्वाइलेटमेसँ एकटा पुरुष निकलल आ ओ ओहिमे गेली आ सायद ओतै ओे उपत्‍यका बन्‍दसन पावनिकें सेलीब्रेट कएली । ३.दुर्गानन्द मंडल- कथा- लाल भौजी दुर्गानन्द मण्डलजीक पछिला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत एहि बेरक जाड़ पाँछा छोड़ि देलक। कहबी छैक जाड़ मासमे रुइये आकि दुइये मुदा रुइ ततैक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माधो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दूइएक सवाल अवैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नहि अछि। जँ क्यो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छथि तँ राति सपनाइते वितैत छन्हि, आ बुढ़हा-बुढ़िक तँ कथे नहि पुछू किऐक तँ आइ ने ओ बुढ़ भेलाहहेँ मुदा ऐहेन कतेको जाड़ कऽ ओ लोकनि देखने छथि आ खेपने छथि। तेँ फलक रुपमे केराक घोड़ जेकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छन्हि। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखति नहि। ताहू परसँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबैथि तँ घरक सवर्था अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहू अलगे छेकने। तेँ बुढ़ा-बुढ़िक लेल तँ माध मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहैत छनि। कोनो तेहन अवसरे नहि भेटि पबैत छनि जे समए सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठाबथि। तेँ ओम्हर बुढ़ि कोनेा कोन मे धोकरी लगा पुआर मे धोसिआइल रहैत छथि। आ ऐम्हर बुढ़हा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ सर्घष करैत रहैत छथि। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुढ़हा-बुढि) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से कते दिन धरि? एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुढ़िकेँ हाक दैत छथिन- ‘‘सुनै छै हाथ-पाएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबो तऽ। बुढ़ि आंगनेसँ उतारा दैत छथिन हँ हँ सुनै छियै एते जोरसँ किए हाक दै छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छियै। ताबे माले घरमे आगि तापो। बुढ़हा पुनः बाजि उठैत छथि- ‘‘हे जल्दी सँ औते हम माले घरमे छी।’’ बुढ़ि करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखे सँ हाक दैत छथिन- ‘‘कतए छै हइया लौ।’’ बुढ़हा फेरि बाजि उठैत छथि- ‘‘एम्हरे लेने आबो ने हइया छियै।’’ बुढ़ि लग अबैत बाजि उठैत छथि- ‘‘ई किछो नइ बुझै छै? जे बेटी-पुतोहूबला अंगना-घर भेलै। सुतौ तेल लगा दैत छियै।’’ बुढ़हा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइत छथि आ बुढ़ि तेलक मालीश करए लगैत छथिन। कने कालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइत छथि। प्रेमसँ बुढ़िकेँ पुछै छथिन- ‘‘भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अंगना दऽ आबौ खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापो।’’ बुढ़ि आंगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहू सभकेँ दैत अपने बुढ़हा लग आबि जाइत छथि आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैसि आगि तापए लगैत छथि। दुनू परानीक गप्प-सप्प करैत बुढ़हा हाथ-पाएर सुग-बुगबए लगैत छथि। आ अपन दहिना हाथ बुढ़िक बामा......... शेष अगिला अंकमे १.विद्यानन्द झा-किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा २श्‍यामसुन्‍दर शशि- जनकपुरके खवरि १ विद्यानन्द झा किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा नैतिक योग कोनो गाममे एकटा नापित छल ओ अपन कार्यमे तँ निपुण छलैहे, जाहिसँ गामक लोक ओकरापर प्रसन्न रहैत छल, ओकर दोसर गुण छलैक जे छोट–मोट घाव घोंसकेँ चीर–फाड़ि कऽ के जड़ी–बूटी दऽ ओकर इलाज कऽ दैत छल। लोक नीकेना भऽ जाइत छल। गामक लोक सभ प्रशंसा करैत छल। ओकर ई चिकित्सा सम्बन्धी कार्य खूब चलैत छलै। पाइयो नीके कमाइत छल, बड्ड दिन धरि ओकर कार्य चलैत रहल। किछु दिनक बाद ओहि गाममे एकटा डाक्टर साहेब अएलाह। ओ नीक सर्जन छलाह, बड्ड पैघ–पैघ डिग्री सेहो छलन्हि। ओहि गाममे ओ डाक्टर साहेब अपन क्लीनिक खोललन्हि। हुनका लग चीर–फाड़िक सभटा यंत्र छलन्हि, नीक–नीक औषधिक व्यवस्था सेहो कएलन्हि। पर्चा–पोस्टर छपाए आस–पासक गाममे सटबेलन्हि। ओकर बाद डाक्टर साहेब नियमित रूपसँ अपन क्लीनिकमे भरि दिन बैसथि। मुदा ई की ? रोगीक कोनो पता नहि, डाक्टर साहेब बैसि कऽ झख मारथि। डाक्टर साहेबकेँ किछु फुरैबे नहि करन्हि, की करी की नहि करी। डाक्टर साहेब कम्पाउण्डर सेहो रखने छलाह, तकरा घरेसँ वेतन दै छलाह। आमदनीक कोनो रस्ता नहि छलन्हि। क्लीनिकक खर्च सेहो अलगेसँ। बेचारा डाक्टर साहेब मन मसोसि बैसल रहथि। ओम्हर गामक लोक सभकेँ एहि पढ़ुआ डाक्टरसँ बेसी ओहि नापितक कएल चिकित्सापर विश्वास छलैक। एक दिन डाक्टर साहेब ओहि गामक परम बृद्ध ओ नीतिज्ञ लोकक शरणागत भेलाह। डाक्टर साहेब हुनकासँ सविस्तार अपन हाल सुनाओलन्हि। ओहि नीतिज्ञ बृद्धक संग समस्त गामक लोक सभ हिनक समस्या सुनलन्हि। डाक्टर साहेब कहलखिन्ह जे हम एतेक दिन धरि पढ़ि–लिखि चिकित्साक उचित वैज्ञानिक शिक्षा पाबि तखन एहि कार्यक लेल क्लीनिक खोललहुँ अछि। जाहिसँ गामक लोकक इलाज नीक ढ़ंगसँ होएत। ओकर बाबजूदो समाजक लोग सभ हमर क्लीनिक नहि आबि ओहि नापित देहातीसँ इलाज करबैत छथि। नीतिज्ञ, बृद्ध लोकनि डाक्टर साहेबक समस्या सुनि किछु उपदेश देलखिन्ह आ कहलखिन्ह जे अहाँ ई तरीका अपनाउ शीघ्रे समस्या मुक्त भऽ जाएब। डाक्टर साहेब हुनक आदेश शिरोधार्य कऽ वापस डेरापर अएलाह। अगिला दिन सुरूचिगर भोजनक ओरियाओन कऽ ओहि नापितकेँ अपना ओहिठाम भोजन करबा लेल आमंत्रित कएलन्हि। डाक्टर साहेब अपनेसँ जा कऽ ओहि नापितकेँ नोत देने छलखिन्ह। ओ नापित खुशीसँ ओत-प्रोत भए गेल, नचैत–नचैत भरि गामक लोककेँ ई संवाद कहि आएल जे डाक्टर साहेब हमरा गुरू मानि लेलन्हि अछि। भोजनक बेरमे ओ नापित डाक्टर साहेबक ओहिठाम पहुँचल। डाक्टर साहेब ठाढ़ भए आह्लाद पूर्वक ओहि नापितकेँ बैसाओल। भरि पोख भोजन करौलन्हि, आदर देलन्हि आ कहलखिन्ह जे अपनेक चिकित्सा विद्यासँ हम प्रसन्न छी। हम डाक्टरी पढ़ियोकऽ जतेक नहि सिखलहुँ ताहिसँ बेसी अहाँ अपन अनुभवसँ कल्याण करैत छी। जँ एतेक करिते छी तँ कनेक आओर ध्यान देबैक तँ पैघसँ पैघ आपरेशन अपने कऽ सकैत छी, मात्र थोड़बे ध्यान राखए पड़त। ओ नापित परम प्रसन्न भेल डाक्टर साहेबक मुँहे अपन प्रशंसा सुनिकऽ डाक्टर साहेबसँ पुछलक जे कोन–कोन बातक ध्यान राखए पड़त। डाक्टर साहेब ओकरा अपना दिश उन्मुख होइत देखि भीतरे–भीतर प्रसन्न होइत बजलाह-–जेना पएर परक घाव भेलापर किछु नश–नाड़ीकेँ चीन्हि ओकरा कटबासँ बचा कऽ अहाँ पैर परहक घावकेँ चीर–फाड़ि कए चिकित्सा कए सकैत छी। ओ पुछलक जे डाक्टर साहेब पएर परहक नश कटलासँ की होएतैक? डाक्टर साहेब बतौलखिन्ह जे ओ नश कटलासँ तीव्र रक्तस्राव होएत जे साधारण ढंगे नियंत्रणमे नहि आओत, तखन रोगीक रक्त शुन्यताक स्थितिमे प्राणांत भए सकैछ। तहिना धौना परहक नशकेँ देखबैत बतौलन्हि जे एहि ठामक घावक आपरेशन करए काल नश सभपर बेसी ध्यान राखऽ पड़त, से नहि कएलासँ नश कटबाक भए बनल रहत। एहिसँ रोगीकेँ लकबा मारबाक सम्भावना बढ़ि जाएत। जँ नश सभकेँ चिन्हि–चिन्हि आपरेशन करब तँ सफल रहत। ई सभ सुनि नापित घर दिश बिदा भेल, आब ओ अगिला दिनसँ नशक ज्ञान प्राप्त करबामे लागल। ओकर नैसर्गिक बुद्धि हेड़ाए गेल। जखन ओ चीर–फाड़ दिश सोचलैक की नश कटबाक भए सतबए लगैक। ई नश कटत तँ ई रोग होएत, आ ओ नश कटत तँ ओ रोग होएत। परञ्च ओकरा लेल एहि समस्यासँ पार पाएब सम्भव नहि भेलैक आ अंततः ओ चिकित्सा कार्यसँ विरक्त भए गेल। आ ओम्हर डाक्टर साहेबक क्लीनिक ताबड़तोड़ चलए लगलन्हि। २ दीप तर अन्हार दूटा मित्र छल। दुनहुँक मध्य बड्ड प्रेम छल। जतए जाए संगहि, भोजन संगहि, खेलाइत संगहि, मुदा घरक कोनो काज ओ दुनू नहि करैत छल। सतत् काल दुनू योजना बनबैत छल। शेख–चिल्ली जकाँ गप्प बघारब मुदा कोनो जोगरक नहि। घर–परिवारक लोक सभ आजिज भए दुनूकेँ गामसँ भगा देलन्हि। दुनू मित्र वापस अपन गाम जाए किछु काज कए पाइ जमा कएलक आ आपसमे दुनू विचार कएलक जे गामसँ बहुत दूर शहरमे जाए कोनो काज करब ताहिसँ खूब पाइ कमाएब आ तखन गाम वापस आएब। दुनू मित्र पाइसँ गामहिमे किछु बट खर्चाक ओरियाओन कएलक। ओ ओढ़ना, बिछौनाक मोटरी बनाए दुनू मित्र बिदा भेल। शहरसँ जखन बहुत दूर छल तँ संध्या भए गेलैक। कतहु कोनो गाम नजरि नहि अबैत छल। चलैत रहल–चलैत रहल अन्हार गुज्ज साँझ भए गेलैक। चोर सभ सतबए लगलैक आब की करत? कतए जाएत? दुनू मित्रकेँ किछु फुरएबे नहि करैक। इतस्ततः करैत–करैत जंगलक बीच जा रहल छल। तखन एकटा बरगदक गाछ नजरि अएलैक। ओ दुनू मित्र थाकि गेल छल। ओहि गाछ तर राति बितएबाक बिचार कएलक। ओहि बरगदक गाछ तर मोटरी राखि धम्मसँ बैसि रहल। एक तँ बाटक थकान दोसर अन्हार गुज्ज राति। दुनू बिछौना बिछा कऽ पड़ि रहल। दुनू मित्र आपसमे निर्णय कएलक जे बेरा बेरी सुति कऽ राति बिताएब, एहिसँ चोर उचक्का सामान आ पाइ नहि चोराबै सकत। परंतु से सम्भव नहि भेलैक। दुनू ततेक बेसी थाकल छल जे कखन दुनूक आँखि लागि गेलैक से दुनू नहि बुझलक। खूब सूतल, भोरहरबामे जखन एकटाकेँ निन्न टुटलैक तँ ओ मोटरी नहि देखि चिचिआबै लागल, दोसरो उठल ओहो चिचियाबै लागल। दुनू एक दोसराकेँ चोरि करबाक आरोप लगबए लागल, बहुत काल धरि दुनू झगड़िते रहल। ओहिठाम तँ तेसर क्यो रहैक नहि जे ओकर दुनू लोकनिक झगड़ा छोड़बितैक। अपनहि थोड़ेक कालक बाद शांत भए निर्णय कएलक जे नजदीकक कोनो गाम जाए ओहि गामक पंचसँ निसाफ कराएब जे दोषी के ? दुनू मित्र बिदा भेल। थोड़े दूर चलैत–चलैत जखन जंगलसँ बाहर भेल तँ एकटा खेतमे हर जोतैत एकटा हरबाह नजरि अएलैक। दुनू मित्र ओहि हरबाह लग पहुँचल, एकटा मित्र बाजल जे भाए हो–रातिमे हमर दुनू मित्रक सामान आ पाइ कौड़ी चोरि भऽ गेल, तेसर तँ क्यो छलै नहि तखन तोहीं कहऽ जे–(दोसर मित्र दिश आंगुर देखबैत)–एकरा छोड़ि दोसर के लेने होएत ? दोसर मित्र फेर बमकल। ओ पहिलकेँ गारि श्रापक तर कऽ देलक। ओ हरबाहा बेचारा स्वयं अपनाकेँ निसाफ देबामे असमर्थ पाबि कहलक जे एहि बातक गाममे एकटा नीक पंच छैक हरि चरण। तोँ सभ ओकरे ओहिठाम जा कऽ सभ वृतांत बता दहक, ओ निजगुत फैसला कऽ देतौक। दुनू मित्र आगाँ बढ़ल। अपरिचित गाम छलैक, बेर–बेर चौक चौराहापर पंचक घरक मादे पुछऽ पड़ैक। तखने एकटा जोन–बोनिहार भेटलैक। एक मित्र ओकरासँ पूछि बैसल जे हौ हरिचरण पंचक घरक पता बता देबह। ओ पुछलक जे अहाँकेँ ओहि पंचसँ कोन काज अछि। तखन दुनू मित्र बताबऽ लागल जे हमरा सभक बीच विवाद भेल अछि हुनकासँ निसाफ कराए। ओ बोनिहार बाजल- ओ की फैसला करताह ओ तँ बड बेइमान छथि। दुनू मित्र अचम्भित होइत आगाँ बढ़ल। किछु दूर आगाँ गेलाक बाद एकटा समर्थगरि कुमारि कन्या नजरि अओलैक। तखन दुनू हुनकासँ पंचक घरक रास्ता देखा देबऽ लेल कहलकैक। ओहो कन्या हिनकासँ प्रयोजन पुछलकन्हि। दुनू मित्र रातुका सभटा खिस्सा कहलकैक। ओ कन्या बाजलि जे ओ की निसाफ करताह ओ तँ आन्हर छथि। दुनू मित्र घोर निराशामे पड़ि गेल। किछु नहि फुरए जे आब कतऽ जाए। लेकिन दुनू मित्रकेँ हरबाहाक कहल गप्पपर बिश्वास छलैक ओ आगाँ बढ़। राहमे एकटा अधेड़ महिला पुछलकै। ओ सभ स्त्रीगण बाजलि जे जँ अहाँ सभ कोनो निसाफ लए जाइत छी तँ बेकार होएत। ओ दिन खाइ छथि तँ राति लेल झखै छथ। आब तँ दुनू मित्र भयंकर असमंजसमे पड़लाह जे आब हरिचरण पंचक ओहि ठाम जाइ आकि नहि। ई सोचिते बढ़ि रहल छलाह की पंचक घर आबि गेल। हरिचरण दलानेपर सुतरी कढ़ैत छलाह। दुनू मित्र हुनकर दलानपर जाए प्रणाम कएलन्हि। सरपंच हुनक लोकनिक समस्या सुनि युक्तिपूर्वक न्याय कऽ देलखिन्ह। दुनू मित्र प्रसन्न भेलाह। परञ्च मनमे ओ सभटा बात उमड़लन्हि जे पंच तँ बड़ निसाफी छथि तखन ओ लोकनि हिनकर मादे एना किएक कहलन्हि। नहि रहल गेलन्हि। एकटा मित्र पंचसँ रास्ताक सभटा वृतांत कहलखिन्ह। हरिचरण गम्भीर भए कहलखिन्ह जे हम एखन गरीबीमे छी। ओहि बोनिहारक किछु बोनि हमरा लग बाँकी छैक जावत दऽ नहि दैत छिऐक तावत् ओकरा लेल बेइमान थिकहुँ। ओ कुमारी कन्या हमर बेटी थिकीह। तों सभ देखने होएबह जे हमर बेटी वियाह करबाक जोगरि भऽ गेल अछि। हम ओकर विवाह नहि करा सकलिऐक अछि तैँ ओकरा हेतु हम आन्हर छी। अंतमे जे महिला भेटल छलीह ओ हमर दोसर पत्नी थिकीह। हम एक दिन बिता कऽ हुनका लग जाइ छी तैँ ओ कहलन्हि जे एक साँझ खाइ छथि दोसर साँझ उपासल रहैत छथि। तैँ ओ सभ अनर्गल तँ नहिए कहलन्हि। २ श्‍यामसुन्‍दर शशि- जनकपुरके खवरि रेल सेवा बन्‍द । नेपाल सरकार कानमे तेल तूर धऽ सूतल श्‍यामसुन्‍दर शशि , जनकपुरधाम । गत एक सप्‍ताहसँ जनकपुर रेल सेवा बन्‍द अछि । भारत एवं पूर्वी धनुषाके आवागमनके वास्‍ते प्रयोगमे आवएवला एकमात्र रेल सेवा बन्‍द भेलासँ दुनू देशक नागरिकके सास्‍ती भोगए परि रहल छनि । मुदा रेल व्‍यवस्‍थापन,स्‍थानीय प्रशासन,सरकार आ राजनितीकदलसभ कानमे तेल तूर धऽ निषवद्ध पडल अछि । ककरो कोनो चिन्‍ता नहि । हँ सोमदिन नेपालक राष्‍ट्रिय मानव अधिकार आयोग मध्‍यमांचल क्षेत्रीय कार्यालय जनकपुर एहि विषयपर चिन्‍ता व्‍यक्‍त कएलक अछि । आयोगके प्रमुख प्रदीपकुमार झा प्रेस विज्ञप्‍ति प्रकाशित कऽ रेल सेवा अविलम्‍ब सुचारु कएल जएवाक वातावरण सृजना करवालेल स्‍थानीय प्रशासन तथा सम्‍बन्‍धित पक्षसँ सकृय पहलके अपेक्षा कएलक अछि । नेपालके एकमात्र रेल्‍वे सेवा बन्‍द भेलाक बाद धनुषाक पूर्वी भागसँ दैनिक जनकपुर आवागमन करएवला हजारौ सर्वसाधारणके कठिनाई भेलैक अछि आ एहि बन्‍दीसँ बन्‍द—व्‍यावसाय सेहो प्रभावित भेल अछि । अतः बन्‍दक सम्‍पूर्ण कार्यक्रम फिर्ता लए अपन जायज मांगके वार्ताक माध्‍यमसँ समाधान करबाकलेल आयोग सम्‍बन्‍धित पक्षसंग आग्रह करैत अछि । झा विज्ञप्‍ति मार्फत आह्वान कएने छथि । गत सातदिनसँ रेल्‍ा सेवा अवरुद्ध भेलाक बाबजुदो स्‍थानीय प्रशासन चुप्‍प अछि । रेल्‍वे व्‍यवस्‍थापनके कोनो फिकीर नहि छैक । सरकार एतेक वेपर्वाह अछि जे तीन सप्‍ताह पूर्व नियुक्‍त कएल भेल महाप्रवन्‍धक भोला पंजियारके एखन धरि हाजिर होवए नहि पठौने अछि । एम्‍हर रेल सेवा बन्‍द कऽ आन्‍दोलनमे उतरल कर्मचारीसभक वास्‍ते सेहो साँप छुछुन्‍नरिके ताल भऽ गेल छनि । ओसभ अपने मोने रेल खोलैत लजा रहलाह अछि आ कोनो निकाय खोलवालेल आग्रह नहि कऽ रहल छनि । हुनकासभक आरोप अछि जे कोनो निकाय हमरासभक मांग प्रति सकारात्‍मक नहि अछि । दोसर दिस सेवाग्राहीसभ सरकार आ कर्मचारीक प्रवृति विरुद्ध आन्‍दोलनमे जएवाक धमकी देलक अछि । हुनकासभक कहब छनि जे यात रेल नीक जकाँ चलाओल जाय वा बन्‍द क देल जाय । मधेसी जनअधिकार फोरम आ नेपाली काग्रेस निकट श्रमिकसभक एक समूहले चारि सूत्रीय मांग राखि रेल्‍वे प्रशासन,लेखा आ प्रवन्‍धकके कार्यालयमे तालाबन्‍दी कएने छल । जकर विरोधमे माओवादी निकट अखिल नेपाल यातायात मजदुर संघ रेल सेवा बन्‍द करौने छल । संलग्‍न तस्‍वीर शहीद धोषणामे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ श्‍यामसुन्‍दर शशि गणतन्‍त्रान्‍त्रिक आन्‍दोलनके प्रथम शहीद दुर्गानन्‍द झाके एखनधरि औपचारिक रुपमे शहीद घोषणा नहि कएल जएवापर मधेसी नागरिक समाजक अगुवासभ कडा प्रतिवाद कएलनि अछि । हुनकासभक आरोप छनि जे देशमे शहीद घोषणा करबाक विषयमे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ बाटल जा रहल अछि । लोकतन्‍त्रके गरदनि दवा क्रुड पंचायती व्‍यवस्‍था सूत्रपात करएवला राजा महेन्‍द्रउपर २०१८सालमे वम प्रहार कएनिहार शहीद दुर्गानन्‍द झाके ४७सम् वलिदानी दिवसके अवसरपर वृहस्‍तपतिदिन जनकपुरके जानकी मन्‍दिर प्रांगणमे आयोजित प्रवचन गोष्‍ठीक वक्‍तासभ ई आरोप लगोने छलाह । ‘देशमे शहीद घोषणा करेवाक दौर चलल अछि । चोर,डकैतसभ सेहो शहीद घोषित भेल मुदा अदालतके निर्णयसँ फाँसीक सजाय पावएवला दुर्गानन्‍द झाके एखनोधरि  शहीद घोषणा किए ने कएल गेल ।’ स्‍वर्गीय झाके सहकर्मी एवं वम काण्‍डके दोसर जिवित शहीद अरवीन्‍द ठाकुरके प्रश्‍न छलनि । जनकपुर वौद्धिक समाजके अध्‍यक्ष राजेश्‍वर नेपालीके मांग छलनि जे स्‍वर्गीय झाके राष्‍ट्रिय विभूति आ गणतान्‍त्रिक आन्‍दोलनके प्रथम शहीद घोषणा कएल जएवाक चाही । लोकतन्‍त्रके हत्‍या कऽ पंचायती व्‍यवस्‍था सूत्रपात कएनिहार राजा महेन्‍द्र विरुद्ध लोकतन्‍त्रवादीसभमे आक्रोश छल । लोकतन्‍त्र स्‍थापनार्थ नेपाली काग्रेस सशस्‍त्र जनयुद्धके घोषणा कएने छल । एहि बीच राजा महेन्‍द्रके जनकपुर भ्रमण तय भेल छल । नेपाली काग्रेस राजाउपर वम प्रहार करवाक निर्णय कएलक । एहि वास्‍ते सीमावर्ती भारतीय नगर उमगाउॅमे अध्‍ययनरत्त १९वर्षिय दुर्गानन्‍द झा आ अरवीन्‍द ठाकुरके जिम्‍मा देल गेल । काग्रेस पार्टीक निर्णय अनुसार २०१८साल माघ ९गते राजा महेन्‍द्रउपर जानकी मन्‍दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएल गेल छल । अरवीन्‍द ठाकुर वम सहित पकडल गेलाह मुदा दुर्गानन्‍द झा राजा महेन्‍द्रउपर मन्‍दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएलनि । राजा अपने बाचि गेलाह मुदा मोटर क्षतिग्रस्‍त भेल छल । लगभग १८महिनाक चरम यातना पश्‍यात तत्‍कालीन मुलुकी ऐनमे परिवर्तन कऽ दुर्गानन्‍द झाके राजकाज अपराध सजाय ऐनके दफा ४अन्‍तर्गत फाँसीक सजाय देल गेल आ ठाकुरके उर्म कैदक सजाय । झाके २०२०साल माघ १५गते केन्‍द्रिय कारागारमे फाँसीपर लटका हत्‍या कएने छल । चुकी तत्‍कालीन कानूनमे गाई आ ब्राहृमनके हकमे मृत्‍यु दण्‍ड वर्जित छल तें ऐनमे संशोधन कऽ दुर्गानन्‍द झाके फाँसी देल गेल छल । ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा १८म खेप ३.३. कामिनी कामायनी-वसंत ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.आमोद कुमार झामैथिल नँइ–छोटका ३.६. सरोज ‘खिलाडी‘-गीत ३.७.१.सत्यक जीत-सतीश चन्द्र झा२.मनोज कुमार मंडल ३.कल्पना शरण-नुकाएल दिनकर ३.८.कालीनाथ ठाकुर, -एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ२.तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! डहकन !!

मोॅछ लागल औ करकर मोॅछ लागल औ, बुडहा समधिक नाकक नीचाॅ कर - कर मोॅछ लागल औ ।।

खोंच लागल औ खरखर खोॅच लागल औ, भृत्या समधिनक गालक ऊपर बरबर खोॅच लागल औ,

सऽमधि बनला वन विलार चढला बोहुक चिनुआर ताबरतोड़ करौछक मारि देखि कऽ सोच लागल औ, खोंच लागल..................................................... ।।

समधिन पड़ले पड़लि ऊतान, झाड़थि अपन पुरनकी शान, सऽमधि गोरथारी दिसि ठाढ़ कपै छथि कोच लागल औ खोंच लागल..................................................... ।।

समधिन ऊपर सऽमधि तऽर हुड़ियाठल गतर गतऽर नूआ केर मुंडी सॅ डोराडोरि मे, घोॅच लागल औ, खोंच लागल..................................................... ।।

!! राघव सरकार !!

सुनिऔ औ राघव सरकार केहेन कऽ देलिऐ उपकार गमकल चरण कमल रज सॅ हम्मर सऽड़ल जिनगी ।।

दुलकल दुलकल राजभवन सॅ आयलऊॅ आश्रम हुलसल मन सॅ, अकारण देखि ऐहेन उपकार चकित भऽ रहल सकल संसार गमकल....................................................................... ।।

लुटा गेल सर्वस्व हमर छल के सुधि लितय मजाल ककर छल, अपने दया सिन्धु अवतार कयलहुॅ बरका चमत्कार । गमकल....................................................................... ।।

मानव की कीट पतंग चरि हमरा त्यागि पड़ायल हे हरि, हरलहुॅ भारी पापक भार कयलहुॅ डूबल नैया पार । गमकल....................................................................... ।।

चरण बढ़ाउ कृपालु खड़ाडी नेह नोर सॅ लाउ पखारी, पोछि आॅचर सॅ बांटवार करब हम तरवे केॅ श्रृंगार । गमकल....................................................................... ।। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा १८म खेप ओना ई सबटा आत्मप्रतारणाक जे थिक हमर अपनहिं उपाय अंततः थिक कि एकर जड़ि आ आरंभ ? किएक बनल रहैत अछि हमर एहन दिन-राति-दिन? जीवन जगतक कोन आवश्यकता आ तकर उद्योग हेतु हमर ई निष्क्रिय जीवन-चर्या, आइ आइ भ' गेल कए दिन ।हम जे एना एहि तरहें सब सं कटि क', छूटि क' सबसं सौंसे समाज कें क' एक कात हम जे चलि रहल छी अपन आ अपनहिं एकान्त बाट तकर अर्थ की आ महत्व ? सबटा अछि गति विधि ठप्प, सब किछु ठाढ़ । गाछ-बृक्ष ठाढ़ से तं बेश, लगैत छैक बेजाय मेघक तारा पर्यन्त जे जानि नहि, चलैत छैक आ अपन-अपन स्थान बदलि लैत छैक बा नहिं, ज्ञात नहिं, धरतीक लोक कें तं बुझाइत रहैत छैक स्थिरे भने कौखन क' बुझाइत टिमटिमाइत जेकां मुदा ई मनुक्ख आन प्राणी ई नहिं रहबाक थिक ठाढ़ बेशी काल नहि चाही स्थिर ई थिक अधलाह, असुन्दर । कारण जे ठाढ़ रहब थिक निष्क्रिय कर्म । मनुष्यक महिमा तँ अछि-सकर्मके सकर्मक । भने ओ ठेहुन मोड़ने बैसल-बैसल बाँटि रहल हो साबेक जौर। बीच-बीच मे करैत सक्कत अपन मुरेठा, भने रोमि रहल हो कुकुर-बिलाड़ि, भने मोछे पिजबैत हो बड़ी-बड़ी काल-आत्मलीन ! भने मनुक्ख तोड़ैत बेलपात-फूल । लोढ़ा करैत कटनी भ' गेल खेत मे मनुक्ख । एत' धरि जे नीक लगैत अछि-नीक ! अर्थात सक्रिय किछु करैत । मुदा बच्चा कें करैत दुलार । बैसोने कान्ह पर अपना लगैत अछि लोक दिव्य आ विश्वासी । लगा रहल सानी-पानी माल जालक मनुष्य। आ तहिना पोखरि, धार मे गाय-गोरु-बाछी कें नूरी सं मलि मलि क' नहबैत। एहि सबटा परिस्थिति आ रूप मे मनुष्य सत्तेक मनुष्य बुझाइत अछि। स्त्रीयो तहिना लगैत अछि पिहुआ कें अपना स्तन सँ लगा पिआ रहल दूध ! सुन्दर, वास्तविक । स्त्रियो थिक तखनहिं मनुक्ख। ओहो नहि लगैत अछि बिनु किछु करैत, निष्क्रिय बैसलि बा सूतलि-नीक नहि लगैत अछि स्त्री। कम सं कम अयनाक सोझाँ बैसलि निंहारैत अपन देह-मुख । कम सं कम यत्न आ मन सँ दुनू आँखि केन्द्रित क' दर्पण मे सटैत भाल पर मोन पसिन्न टिकुली , स्त्री एतबा करैत नीक लगैत अछि।बैसलि आ चुप्प स्त्री कथमपि नीक नहि लगैत अछि। बैसलि स्त्री बुझाइत अछि-गृहस्थीक बस्तु जात, जेना-खाट-चौकी-चूल्हि-घैल आ हाँसू बाढ़नि इत्यादि...। स्त्री एहन आ एतबे कदापि ने नीक लगैत अछि। घोघ तनने डेराएल-धाखें दबल-सहमल बेमोनक मर्यादा ऊघैत सेहो नहि लगैत अछि-स्त्री। किछु मास,दिन कनियाँ-बौआसिन बनलि रहबाक अतिरिक्त बड़ दिब लगैत अछि ओ तथापि,घोड़ैत रंग, बनबैत फाहा करैत चित्रकला,बना रहलि धुरखुर पर कदमक गाछ सप्त पुरइन पात । सूर्य-चन्द्रमा-तारा आ नब नब कोहबरक करैत विन्यास,गबैत गौरी-पूजा काल गीत।अर्थवान सत्य आ तें बड़ विश्वसनीय लगैए स्त्री। सखिसंगीक हेंज मे माथ पर काँख तर लेने घैल पोखरि इनार सँ अबैत हँसी ठट्ठा करैत स्त्री। प्रेमासक्त पुरुष-मुख चुम्बित होइत लगैत अछि विलक्षण ।मुदा टटका घैल सदृश् भरल दूध-वक्ष धरौने नेना, बनि जाइछ स्वयं एकटा अनिर्वचनीय कलाकृति ।एक संग अपने कला आ अपने कलाकार! स्त्री-आँचर तर शिशु पल्लव मुख मे देने निज प्राण-रस थन, नीक लगैए।-दिव्य अलौकिक । -" से तों कोना क' बुझलहिक राधा ? तों ? ई तं छौक नहि तोहर अपन अनुभव। तखन...?" चिहुँकि उठली राधा-ऐं प्रश्न अछि कि ई कोनो आकाशवाणी ? एकान्तहु असकर मे सम्हारि लेलनि माथ पर नूआ, झाँपि लेलनि छाती। नख-शिख सम्हारैत आँचर भ' गेलीह अस्तव्यस्त। लाजें निहुंरि गेलीह। भ' गेलीह कठौत । ठकमूड़ी लागि गेलनि। सोझाँ मे ठाढ़ सद्यः श्रीकृष्ण ! सरस कुटिल मुस्किआइत, चाहैत जवाब एहि स्त्री रूपक। -" माधव अहाँ ?" एतबे तं बाजि सकलीह राधा। तत्क्षणें भ' गेलीह तुरन्ते स्पर्शित लजबिज्जी !- फेरो एक बेर धोखा ,पुनः कएल छल । जानि नहि ई कपटी सं कहिया भेटत कल ? ने सोझाँ अबैत छथि ने चल्ले जाइत छथि चित्त सँ । कामिनी कामायनी वसंत नाचि रहल नब नब तरंग नूतन बसंत नूतन बसंत । नब ताल वृन्द़   नब छाग फाग़ न्ब गेह देह नब पात़ साग । नब बाट हाट नब प्रीत गीत नब लाेभ क्षाेभ  नब हास्य रूदन नवनीत रूप नब कमल नयन । मन हर्षित भ’ नितराति कहल आयल बसंत नबका वसंत । नब सखी  सखा नब मधुर रास नबका सूरूज नबका प्रकास । नब तालमेल नब धूर खेल नब जान माल नब वृद्द  बाल । सब तर मदमातल छै अनंग नब नब बसंत नूतन बसंत़ । नब स्वप्‍न नयन मे उठल उठल उल्लास हिय मे भरल भरल । रज कण सॅ झाॅकैत अछि पर्यन्त नबका बसंत नबका बसंत । नब कुसुम कली सकुचाय उठल मदमस्त भ्रमर मॅडराय रहल कुहुक काेयलिया गाबि रहल रस रंग सुधा बरसाय रहल । अल्हड बसात चलै सनन सनन गंंंमकि उठल नंदन कानन । आयल गायल मन माेहि चलल नूतन वसंत नब नब वसंत । शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! अंतिम छंद !! (बाल साहित्य)

सात बरख केर जखन वयस छल, विहुंसल मन उजड़ल मकरन्द । एखनहुॅ क्षण - क्षण हिय सॅ उफनय, माय जे वाजलि अंतिम छंद ।। सुनू पूत हम छाड़ि अवनि केॅ, जा रहलहुॅ विधना केर घऽर । अपन तात केॅ कोॅचा पकड़ू, मानि जननि शीतल आॅचर ।। हमर चरण धऽ लियऽ अहाॅ प्रण, तनय धरम केर राखब मान । कर्म डगरि पर हमर छाॅह संग, बढ़ब करैत पितृक सम्मान ।। हंसवाहिनी चरण मे अर्पित, अपन शीश दऽ सोखब ज्ञान । नीच बाट पर डेग नहि राखब, जीवन मे करब नहि सुरापान ।। केहन दृष्ट अदृश्य व्याधि ई, सभ किछु बूड़ल अहाॅ भेलहुॅ दीन । हिय नहि हारू एहि अखिल भुवन मे, छथि कतेक लाल साधन विहीन ।। अम्बुज अहाॅ केॅ हमर शपथ थिक - विलोचन सॅ जुनि बहबू नोर । शिखर लक्ष्य केॅ निश्चित साधव, दैत मातृ स्मृतिक वोर ।। हुनक दिव्य आशीष प्रताप सॅ, भेल धन, मन, यश पूरित जीवन । मुदा ‘माय’ गुंजन जौ सुनि हम, रोम - रोम सॅ उपटय क्रन्दन ।।

!! ऋृतुराज !!

सोहर गावथि कोइली बहिना, कीर मधुर ध्वनि बजबथि साज । जननी वीणा वादिनी हर्षित, अवतार लेलनि सद्यः ऋृतुराज ।। गर्वित उपवन मधुपक गुंजन, वर्णक पुष्पक दिव्य सोहनगर । सरिता लवलव शांत उदधि छथि, मऽहु रसाल में उमड़ल मज्जर ।। माघक सातम धवल इजारिया, भेल नवल ऋृतु नृप छठिहार । चिनुआर भरल पायस पूआ सॅ, कुलदेवी साजल उपहार ।। भगजोगिनी केर पंचम सुर सुनि, आंगन महमह मुग्ध दलान । दशोदिशि मलमल गेना फूलल, सरिसब बूट भरल खरिहान ।। रवि संग सुषमा अछिंजल उष्मा, पात-पात पर पछवा वसात । विरहिनी बैसलि कंत आश मे वयः ताप सॅ उपटल गात ।। मातु उमा मन मुदित विभूषित, सजल नुपूर चरण चमकल । शिवरात्रिक अवाहन भेलै, नाथ कुशेश्वर छथि गमकल ।। संवत जड़ल आ होली आयल, अबीर गुलाबी हरियर लाल । क्षितिज धरित्री एक बनल छथि, ढ़ोलक डुग्गी झाॅझक ताल ।। छोट पैघ केर भेद मिटायल, वृद्ध जुआन संग मे बाल । छोटकी कनियाॅ ठोर रंगलि आ - बऽरक भरल पान सॅ गाल ।ं भैया भांग सुधा मे सानल, शिथिल पड़ल छथि माॅझ ओसार । रंगलहुॅ हऽम भौजीक चरण केॅ, विदा बसन्त एहि लोक सॅ पार ।। आमोद कुमार झा, पिता: श्री दयानन्द झा, ग्राम : मोगलाहा, पोस्ट: मिसरौलिया, भाया: बाबूबरही, जिला : मधुबनी, जन्म : 01/11/1968, शिक्षा: बी.ए.(मैथिली), एम.ए. (मैथिली), एन.इ.टी–जुलाइ–1996, बी.इ.टी। मैथिल नँइ–छोटका नइ हइ ककरो गरज शहरे अउरमे करे हइ बड़का–बड़का पार्टी आ सम्मेलन गाम अउरमे हमरा सुहूनकेँ नइ बुझइ हइ मैथिल.. हमरा अउरकेँ बुझइ हइ ‘छोटका’ गिरहत अइयग एक दिन बजलिऐक आ बइसे गेलिऐक.. खुर्सीयेपर फज्झति कऽ कऽ उठा देने छऽल गऽ बभना हमरा सुहून नइ बुझइ–गमइ हिअइ ‘मैथिली’ हइ हमरा अउरक भाषा सभ दिन बएह अउर बुझलकै माने विद्यापति हइ ओकरे अउरक बुझू दादा–परदादा ई युग हइ लोकक कहबी हइ दस टके नइ नितराय दस सगे नितराय नइ करइ हइ कहियो राजा लोरिकक समारोह देवता सलहेसक फंगसन कारिख पघियारक गाथा कियो कहाँ याद करइ हइ बंठा चमारकेँ.. करौक एकर परचार–परसार गाम–घर चौराहा अउरपर देखियौक ने छिनि लेतइक कियो हमरा अउरक माइक भाषा ककर बापक दिन हइ सिर लेबइ आ सिर कटा देबइ। सरोज ‘खिलाडी‘ नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक गीत भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान ऐइ आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २ चन्‍द्रमा सँ गिरल चन्‍द्रमाके टुक्रा ओ बनिगेल अछि आँहाके मुखरा स्‍वर्गक परि आँहा आकककक स्‍वर्गक परि आँहा दुखिके सपना आँहा छि सबहक मुस्‍कान ऐइ आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २ भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान ऐइ आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २ नै देखि आँहाके त मननै लगैय देखि जँ आँहाके त मननै भरैय खिलैत गुलाफ आँहाकककककक खिलैत गुलाफ आँहा कविके रचना आँहा छि गजलके भाव ऐइ आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २ भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग कतेक निक सुन्‍दर मुस्‍कान ऐइ आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — ३ १.सत्यक जीत-सतीश चन्द्र झा२.मनोज कुमार मंडल ३.कल्पना शरण-नुकाएल दिनकर १ सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र, समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन। सत्यक जीत किछु विलंब सँ मुदा सत्य कें जीत होइत छै। बुन्द-बुन्द सँ सागर कें निर्माण होइत छै। कतबो बादल झाँपि देत दिनकर कें नभ मे जागत तैयो प्रात,राति नहि अमर होइत छै।

नहि भेटत अधिकार माँगि क’ इएह विधान छै। बाँटि सकी जे जते , सत्य के असल ज्ञान छै। अपने सँ अनुरोध स्नेह दुख सुख सभ बाँटी अपने दै छै संग, विपति मे आन- आन छै।

एखनो धरि मिथिला के नित अपमान होइत छै। अधिकारक संघर्ष करब सम्मान होइत छै। एक डेग सभ चलब मैथिली बढ़तै आगा अपने भाषा पर सभकें अभिमान होइत छै।

लिअ आइ संकल्प करब संघर्ष फेर सँ जय मिथिला के शंखनाद हम करब फेर सँ। छटतै लागल धुइन बाट पर चलबै जखने फुटतै अपने किरिण भले ही किछु विलंब सँ।

जे छी जतय ओतै सँ आगाँ चलू झटकि क’। अछि संम्मानक बात लेब हम कहियो लड़ि क’। एक बेर सभ लिअ प्रतिज्ञा स्वच्छ मोन सँ अपने भुस्सा हैत बाट कें बाधा जड़ि क’। २ मनोज कुमार मंडल जाहि प्रांत रहैत छी हम। जाहि प्रांत रहैत छी हम। मोती सनक चमकैत पानि, सोना सनक जाहिठाम माटि, सोनित पानि बना कए खटैत अछि मजदूर जाहिठाम जाहिठाम घरती उगलैत हीरा मुदा खेद अछि एखनो अन्न-अन्नकेँ मरैत लोग, जाहि प्रांत रहैत छी हम। नदीक जाल बिछाउल जाहिठाम कहबाक लेल पानि खजाना अहिठाम, पानियो सँ बिजली बनैत सातवाँ दसक आजादीक बितल परन्तु एखनो दीया जलैत जाहिठाम सभ किछु बिलिन भऽ जाइत रातिक अन्हारमे जाहि प्रांत रहैत छी हम।। बागक हरियाली एतबा सुन्दर जे, भगवानो स्वर्ग लोकसँ अएबा लेल तरसैत अहि छटाकेँ देखैत हर्सित सभ अहि हरियाली अनबा लेल आतूर छनमे अबैत बाढ़ि सभ किछु बहा लऽ जाइत जाहिठाम जाहि प्रांत रहैत छी हम। भरल रहबा जाहि अन्नसँ डाबा किंतु भरैत छोट-पैघ नेतासँ जाहि माटि-पानि मुद्दा बना कअ बनैत छोटसँ पैघ राजनेता लूटल मे, लूटल जाइत जाहिठाम लोक जाहि प्रांत रहैत छी हम। ३.कल्पना शरण नुकायल दिनकर नुका नुका कऽताकि रहल छथि अपने दिनकर एना रहि रहि कऽ लाेक सबके अपार कष्ट मे बाेरने अपन मनाेरंजन लेल स्वार्थी भऽ अपन विश्रामक सुधि लेने छथि सबहक सुविधाक अव्हेलना कऽ आकि ई मेघक कुटिल बुद्धि अछि सूर्यदेवके दूर करक पृथ्वी वासी सऽ अपन आढ़िमे झॅंपने अछि उष्मा बसाताे मेघक संग दैत शीतल भऽ जे काेनाे किरण आबि गेल बचि सेहाे शक्‍तिहीन भेल बसात सऽ १.कालीनाथ ठाकुर-एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ २.तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक कालीनाथ ठाकुर, सर्वसीमा, दरभंगा, बिहार एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ हे कवि किरीट "मैथिल कोकिल, ऐलहुँ मनबए पुनि" स्मृति-पर्व"। सभ दिनु का ई         गोरखधंधा; "हमहूं मैथिल छी  "    मात्र गर्व॥१॥

                 सब  वर्ष   तोहर     वरषी मनाए,                  कए    बेर   कते   संकल्प लेल।                   छी अखनहुँ ओहिना पछुआएल;                 आगूक जनमल  जनु कतय गेला ॥२॥ बिस्फी कनैछ      महिषी        कनैछ, छह    कानि रहल   अप्पन   भाषा। तोहरे सब पँच कोशी कनैछ; चुप करबो ले तोहरे आशा ॥३॥

                    चच्लणि एखनहुँ कय कोटि पूत,                     परनाति     नाति घर आँगनि भरि।                     तोहरे बिछोह सँ कोर सुन्न;                     मायक ममता छह बजारहल॥४॥

ई इन्द्र धनुष कें देखि देखि, अपनहि जडि   के खोदि रहल । घर एकहि अछि तेरह चुल्हा; की बना सकब सपनाक महल॥५॥

                      कर्तव्य नाम "खाली लिफाफ"                       अछि स्वार्थ सिद्धि केर मन्त्र प्रबल।                       ई तीन पाँच केर समावेश     ;                       की बना सकब ? सपनाक महल ॥६॥

श्रद्धा क सुमन मौलाए गेल , अछि दग्ध भेल माय’क छाती। आकांक्षा आ आदर्श छुच्छ; बिनु तेलक की दीया बाती॥७॥ 2. तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक हथियारक सभा जमा भेल सभ अस्त्र-शस्त्र पहिरने अछि खूनियाँ वस्त्र उच्च आसनपर संच-मंच बैसल अछि पाँच पंच सभसँ पैघ कोन हथियार निर्णय करबाक लेल तैयार के अछि श्रेष्ठ के अछि हीन गुण-अवगुणकेँ रहल अछि गिन कएने होएत जे पैघ संहारक काज वहए पाओत ई रक्तिम ताज कतेक बेर भेल अछि प्रहार कतेक कएने अछि नरसंहार सतयुगसँ कलियुग धरि आदिम युगसँ वर्तमान धरि सभ हथियारक बनल अछि इतिहास के कतेक बनौलक दास कतेक के कएलक विनाश पाषाण, लाठी आर अणुबम कियो नहि अछि ककरोसँ कम शक्तिक मदमे सभ रहल फानि ताल ठोकैत अछि देह तानि वीर, महारथीक जहिया बनल छलहुँ भक्त पीने रहि ओहिदिन भ्रिपोख रक्त सभ बाजए-हम छी जेठ हमरा सोझा सभ अछि हेठ पंच बजलाह- सुनह लगाबह घ्यान खोलह अपन-अपन कान तब भेटतह आजुक सम्मान बिनु देहसँ गिरौने रकत कऽ सकैत छह दोसर जुगत आँखिसँ बिनु गिरौने नोर दोसर तरहें लगा सकैत छह जोर बिना कोनो दबावकेँ जे करबौने होएत स्वीकार अपन सर्वोतम विचार बिनु हिंसाकेँ जे कएने होएत हृदयपर राज ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज एखनुक निर्णय इएह भेल ठीक आगू आएत विचार आओर नीक पंचक निर्णय सुइन सभ लेलक कान मुइन सबहक माथपर गिरल गाज अहिंसा दिश बढ़ल ताज ककरो मुँहसँ नहि फुटय बकार सत्य अहिंसाक जय-जयकार घातक गंध आसमानसँ बरसैत आगि त्रसित जीव रहल अछि भागि लाल-लाल जेना काल रुप विकराल सँ बँचबाक हेतु आश्रयकेँ अन्वेषणमे भागि रहल अछि हरिणी कतऽ भेटत निरापद धरणी सोचैत मनमे गहन बनमे खोजि रहल अछि छाया बचेबाक लेल कोमल-काया दौड़ि रहल अछि छोट-पैघ तरुवरकेँ छाँहमे सनाहमे किन्तु गाछ सभसँ निकलि रहल तीव्र आर मन्द घातक दुर्गन्ध ओ सहि नहि पाबैत अछि किनको कहि नहि पाबैत अछि जेना बनि गेल जीभहीन गनि-गनि काटि रहल अछि दिन किन्तु कहिया तक काटत झड़क तेँ ओ जना रहल अछि आ बना रहल अछि फेसमास्क आओर छाता मोकाबिला करत आब ओ ओहि दुर्गन्धसँ कवच पहिरि ठाढ़ भेल अछि अपनहि सुगन्धसँ कुहेसक परदा कुहिेसक सघन आवरणसँ आवृत भऽ गेल छी हम निर्जन पथपर भयत्रस्त भेल खोजि रहल छी चिर परिचित मार्ग गंतव्य प्राप्तिक हेतु किन्तु दिशा भ्रमित भऽ गेलासँ ज्ञात नहि भऽ रहल अछि जे पूरब चलि रहल छी वा पश्चिम तखनहि हमरा देहसँ टक्कर मारैत अछि तीक्ष्ण प्रकाश झन-झना उठैत अछि मन चौन्हिया गेल चक्षु सँ देखैत छी जे हमर छाँह ठाढ़ भऽ गेल अछि भूत बनि कुहेसक परदापर ओ करए चहैत अछि भयभीत हमरा किन्तु इजोत देखा देलक बाट जे अछि सपाट। विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद- पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर

कवि अन्नावरम् देवेन्दर आन्ध्र प्रदेशक करीमनगर जिलासँ छथि आ तेलुगु भाषाक तेलंगाना बोलीमे तेलंगाना राज्यक संवेदना आ संस्कृति आ ओकर अलग राज्यक लेल संघर्षकेँ स्वर दैत छथि। हुनकर छह टा कविताक संग्रह छपल छन्हि। महात्मा जोतिबा फुले फेलोशिप २००१, रंजनी कुन्दुरती कविता पुरस्कारम् २००६, डॉ. मलयश्री साहिति पुरस्कारम् २००६, रांगिनेनी येनम्मा साहित्य पुरस्कारम् २००७ पुरस्कारसँ सम्मानित। ओ जिला परिषद, करीमनगरक पंचायती राज विभागमे सीनियर असिस्टेन्ट छथि। पी.जयलक्ष्मी, ओस्मानिया विश्वविद्यालयक , निजाम कॉलेज हैदराबादमे अंग्रेजी विभागमे एसोसिएट प्रोफेसर छथि। विगत ३० बरखसँ अंग्रेजीक अध्यापन। हुनकर विशेषज्ञता अंग्रेजीमे भारतीय कविता, अनुवाद आ अनुवादशास्त्र अछि।२००३ मे भार्गवी रावक संग मिलि कऽ शीला सुभद्रा देवीक सितम्बर ११ आ ओकर परिणामपर तेलुगु काव्यक अंग्रेजीमे वार अ हर्ट्स रैवेज नामसँ अनुवाद। २००७ मे गोपीक ननीलू केर अंग्रेजी अनुवाद। स्प्रिन्ग नामसँ अन्नावरम् देवेन्दरक कविताक अंग्रेजी अनुवाद प्रेसमे अछि। (तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल) “लछम्मा, प्रिय! हम छोड़ि कऽ जा रहल छी हमर शिक्षा मोन राखू...अपन बच्चाक नीक पालन करब ई हमरा सकमे नहि अछि- जीब कर्ज देनिहार सभ बनि गेल छथि यम। आइ काल्हिक समए नहि अछि किसानक लेल हम छोड़ि कऽ जा रहल छी ओ सभ हमरा नहि छोड़ताह जीवित हम कतबो चाही ई जिनगी कोन तरहक जतए अन्न नहि अछि खएबाक लेल महाजन सभ तीरि रहल छथि कर्जदाता हमर सम्मानकेँ लज्जित कऽ रहल छथि हम नहि जीबि सकब लछमी, नहि, नहि आब आर! एकटा बीस वा चालीस हजार हमरापर कर्ज छै समाजक- सुनै सएह छी आर पचासेक देबाक अछि साहूकारकेँ आ एकर अलाबे, सुनू! ऋण मारिते रास एत्तऽ आ ओत्तऽ अपनासँ घृणाक अनुभूति एहि जिनगीकेँ जीबाक विचार मात्रसँ छी लज्जित। एहि ऋण सभकेँ प्लेग जेकाँ बढ़ैत देखि! ऋण देनिहार सभ आबए लागल छथि घर सेहो रोकए लागल छथि बाटे-घाटे पछोड़ धऽ लैत छथि जखने तखने अपन जिनगीक बाद जतए कतहु हम जाएब जिबैत अपन मुख, बार्लिस सन पातर की हम करब आ कोना हम जीब? ई समए नहि अछि छोड़ि कऽ एहि जगकेँ जएबाक कतहु पानि नहि मुदा नोर बहैत हुहुआइत पोखरि कहियासँ ने सुखाएल इनारमे हरियरी देखाइत बोरवेल सँ पाइ मात्र जाइत खुनैत सए फीटसँ बेशी, पाताल धरि कोनो टा मे मुदा पानि नहि हम पिटैत हाथसँ कपार खुनल माटिक पहाड़ देखैत हँसीक उद्गम सभक लेल! बोरवेल लेल एकड़क-एकड़ बेचैत जे एना अछि तँ कतए अछि कटही गाड़ी आ कतए अछि खेती आ कोना जिबै अछि बच्चा सभ? आउ आब! बरखा नहि हएत नहिये जाएत अकाल आकि भुखमरी पानि नहि बहत नहिये जाएत अपन नोर खेत सभ तपि कऽ सुखाएल समए सेहो उनटि अछि गेल बरखा जाहिसँ नहि खसै अछि एक्कोटा बुँद बीया बाओग करैत काल सएह बहैत अछि मोनसँ कटनीक समएमे जे एकाध टा दाना रहए बचल बहि गेल बाढ़िक पनिमे जे दाना जाइत कंठमे से बहि गेल नालामे कपासक खेती सेहो तेहने कीड़ा..सभटा कीड़ा, खतम भेल दहोदिश बीयासँ रसायन धरि धोखा...धोखा..बेइमानी चारू दिश बेइमानी बोनिहारसँ सभटा क्षति, जेम्हरे देखू तेम्हरे हानि..आ ओहूसँ बड़का हानि ओकरा दबेबा लेल बिन प्रयोजन कतबो बरिखसँ करैत होइ खेती बिनु प्रयोजन हमर बच्चा सभ अछि पैघ भऽ रहल किसान सभ अछि मरि रहल हमरा ई कहए दिअ, हम सेहो छी मरि रहल हम नहि जीबि सकब आर अधिक काल हे लच्छैय्या! छी हम जा रहल! हाल-फिलहालक पाइ के अछि मँगने? की ओ सभ चाहै छथि जे किसान बन्न कऽ देअए खेती? जकरा चाही दरमाहा जीबाक लेल? कोना जीब आ कोना मरब.. कोना कऽ भरब कर्जक अम्बार.. अपनो बेचि कऽ की चुका सकब? की अपन खेतिहर भूमि सेहो बेचि दी? मुदा से एहि अकालमे कीनत के? जे हमर जीवन-संघर्ष तेहेन अछि सुनलहुँ धनिक लोक सभक ओहेन शब्द-सभ? “मरैत अपच होइत जे ओ सभ लेने छथि”। हमर बाउ! कतएसँ आनै छी ओ सभ दाना जे अहाँ खाइ छी? एक बेर फेर, ई अछि हिस्टीरिया रोग! जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि रोगमे? जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि जुआमे? आ बढ़ा लेलन्हि अपन धोधि? की अहाँ नहि देखि पाबि रहल छी किसानक अँकड़ल पेट? की अन्न देनिहार भऽ गेल रोगी? नहि एकटा चातकक माउस ओकरा देहमे, हमर बाउ! धानक खेतीसँ पोसल ई देश आ आब हमरा दाना देबासँ मना कऽ देलहुँ अहाँ, नञि की? ओ कहै छथि हम मरि रहल छी अनुकम्पा राशि लेबाक लेल ओ कोना ई कहि सकै छथि...एहन शब्द सभ? की अहाँ देखने छी, हमर लच्छैय्या? ई शब्द सभ दाह उत्पन्न करैत अछि हमरा देहमे, अहाँक पाइक खगता? ककरा छै ई खगता? हम सभ गाए जेकाँ छी पवित्र, अहाँ से कहै छी? अहाँ सभ मरब हमरा सभक शाप माथपर लेने हम सभ नहि छी ऋणखौक हृदए राखू..हम सभ छी स्वाभिमानी मनुक्ख मरि जाएब से एतए फेर लेब जन्म एतए अपन जिनगी काटल गंगासन पवित्रतासँ हम सभ छी ऋणमे डूमल आ ऋणदाता सभ बनि गेल छथि यम, प्रिय हम आब नञि..हम आब नञि.. छी जा रहल ............................. लच्छय्या! लच्छय्या! अहाँ एना किएक छी कलपि रहल? ई अछि लिखल अपना सभक भाग्यमे ततेक दिन जीब जतेक दिन अछि लिखल हम जा रहल छी जहिया हमरा जेबाक छल ......................... हमर दिनक गणती शुरु अछि भऽ गेल नहि स्वीकार करब लच्छैय्या, अनुकम्पा राशि हमरा गेलाक बाद सरकार ई देबाक गप करत ओ नहि कहैत अछि जे, हम जे छी मरि रहल से, जे खेलहुँ तकर अपच भेलासँ छी मरि रहल? ओकरा लऽ जाए दियौ ओ पाइ अपना सारामे? धिक् ओहि घरकेँ। हम जा रहल छी... अहाँकेँ हानिमे दैत, लच्छा! बच्चा सभक लेल नहि कियो आर हम जा रहल छी..जा रहल छी ऋण देनिहार सभक द्वारे” (मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ “आखरी माता”) बालानां कृते- १. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक प्रसंग २. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) ३.कल्पना शरण-देवीजी १.जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक कथा 51     भद्रपुरुष एक दिन एकटा वृद्धा कोठी स निकलैत एकटा भद्रपुरुष केँ पूछलखिन- अहाँ एहि कोठीक मालिक स कने भेटि करा दिअ? ओ भद्र पुरुष कहलखिन- कोन काज अछि कहू? वृद्धा- हमरा बेटीक विआह छी। तीनि सय रुपैआक जरुरत अछि। अगर रुपैआ नइ हैत त विआह रुकि जायत। चलू। ओ भद्रपुरुष अपन कार मे बृद्धा क बैसाय ल गेलखिन। थोड़े दूर गेला पर कार स उतरि सामनेक मकान मे प्रवेश केलनि। वृद्धो कऽ संगे नेने गेलखिन। भीतर गेला पर वृद्धा केँ ओसार पर बैसाय अपने कोठरी मे गेला। कोठरी मे जा पाँच सय रुपैआ नोकर कऽ द ओहि वृद्धा क द अबै ले कहलखिन। पाँचो सौ रुपैया नेने आबि नोकर वृद्धा केँ दैत कहलक- भाई! पाँचो सौ रुपैआ अछि। तीनि सय मे बेटीक विआह सम्हारि लेब आ दू सय स कोनो धंधा शुरु क लेब। जहि स आगूक जिनगी आसानी स चलत। रुपैआ हाथ मे ल वृद्धा ओहि नोकरक मुह दिशि देखैत कहलक- भाइ! कोठीक मालिक कहाँ भेटिलथि? नोकर- जनिका संग अहाँ कार मे एलौ ओइह एहि कोठिक मालिक बावू चितरंजन दास छथि। जहि आदमीक लेल सैाँसे समाज परिवार होइत जे अनको दुख क अपन दुख बुझि जीबैक प्रेरणा दैत ओइह त भद्रपुरुष होइत। 52     झूठ नइ बाजब बंगालक पूर्व मुख्यमंत्री डाॅक्टर विधानचन्द्र राय बच्चे स मानवीय गुणक अंगीकार करति रहथि। जे गुण हुनक पिता स भेटति रहनि। सत्य कऽ प्रति निष्ठा आ साहस दिनानुदिन बढ़ैत गेलनि। जखन विधानचन्द्र डाॅक्टरी पढ़ति रहति तखने अध्यापक मोटर एक्सिडैंटक संबंध मे झूठ गबाही देइ ले कहलकनि। अध्यापकक इच्छा रहनि जे विधानचन्द्र छात्र छी तेँ जे कहबैक से करत। मुदा झूठ नहि बाजैक संकल्प विधानचन्द्र केने रहथि। अध्यापकक कहला पर विधानचन्द झूठ बजै स इनकार करैत कहलकनि- हम जे देखलिऐक सैह कहबै। मुदा झूठ नइ बाजब। जकर परिणाम विधानचन्द्र केँ भोगै पड़लैक। परीक्षा मे फेल कऽ देल गेला। मुदा फेल होइ स ओ ओते दुखी नहि भेला जते खुशी अपन संकल्प निमाहै स भेलाह। 53     आर्दश माए आर्मेनियाक सर्वोच्च सेनापति सीरोज ग्रिथक व्यक्तित्व हुनक माइयेक बनाओल छलनि। जखन ग्रिथ बच्चे रहथि तखने पिता मरि गेलखिन। विधवा नार्विन ग्रिड कपड़ा सीबि-सीबि गुजरो करति आ बेटो क पढ़बति। गरीब परिबारक ग्रिथ अछि ई बात स्कूलोक शिक्षक सभ जनैत। फीस माफ होइ ले ग्रिथ आवेदन देलक। फीस माफो भ गेलै। फीस माफक समाचार ग्रिथ माए केँ कहलक। माए बिगड़ि क बाजलि- हम मेहनत क कऽ गुजर करै छी तखन फीस किऐक ने देबैक। हम मेहनती छी नहि की गरीब। हमर अपन स्वाभिमान कहैत अछि जे गरीब नइ छी। स्वाभिमानी माए अपन बच्चाक ऐहन चरित्र बनौलक जे देशक सर्वोच्च सेनापति भेल। 54     नारीक सम्मान नेपोलियन बोनापार्ट अपन टुइ लेरिस नामक महल मे स्नान घरक मरम्मत करबै ले सचिब कऽ कहलखिन। सचिव महलक अधिकारी के फ्रान्सक कुशल कारीगर कऽ बजा मरम्मत करबै ले कहलखिन। कारीगर आबि मरम्मत करै लगल। जखन मरम्मत भ गेलै तखन नारीक नग्न चित्र सब सेहो बना देलकै। नेपोलियन नहाइ ले गेला। नहाइ स पहिने चित्र सब देखलखिन। चित्र देखि नेपोलियन चोट्टे घुरि क आबि अधिकारी कऽ बजौलखिन। अधिकारी आयल। हृृदयक क्रोध क दबैत नेपोलियन 55     अनुशासन अंग्रेजी शासनक खिलाप आन्दोलन उग्र रुप धेने जा रहल छल। आन्दोलन चलबैक लेल क्रान्तिकारी दल केँ डकैतियो करै पड़ै। एक दिन राम प्रसाद विस्मिलक नेनृत्व मे एकटा गाम मे डकैती करैक लेल पहुँचल। एकटा परिवार मे सब घुसल। जत्ते जे किछु दल कऽ भेटिलै लऽ कऽ निकलल। सभ एकत्रित हुअए लगल कि अपन साथीक गिनती करै लगल। गिनती मे एक गोटे कमैत छल। घरे मे चन्द्रशेखर एकटा बुढ़ियाक कैद मे पड़ल छल। ओ बुढ़िया अपन जेबर आ नगदीवला बक्सा पर बैसि चन्द्रशेखरक गट्टा पकड़ने छलि। चन्द्रशेखर चुपचाप आगू मे ठाढ़। ने बाँहि झमारैत आ ने किछु बजैत। सब केयो घर पैसि देखलक जे चन्द्रशेखर बुढ़ियाक पाला मे पड़ल छथि। क्रान्तिकारी पार्टीक बीच अनुशासन छल जे ने महिला पर हाथ उठाओल जाय आ ने ओकर जेबर लेल जाय। आजाद बुढ़िया कऽ बुझबति कहथिन- माता जी! अहाँ बक्सा पर स हटि जाउ। हम सिर्फ नगद लेब। जेबर नहि लेब। आजादक विनम्र बात स बुढ़ियाक साहस बढ़ि गेल छलैक। जखन चन्द्रशेखर स संगी सब पूछल तखन ओ सब बात कहलखिन। आजादक बात सुनि सभ ठाहाका द हँसै लगल। गट्टा छोड़बै ले एक गोटे बढ़ै लगलथि कि चन्द्रशेखर कहलखिन- माताजीक सब सम्पत्ति घुमा दिऔन। सम्पत्तिक नाम सुनि भावुक बुढ़िया चन्द्रशेखरक गट्टा छोड़ि देलकनि। तखन ओ घर स संगी सभक संगे निकललाह। 56     सादा जीवन सन 1949 ई0 क बात थिक। ओहि समय स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री उत्तर प्रदेश सरकार मे गृहमंत्री रहथि। एक दिन लोक निर्माण विभागक किछु कर्मचारी हुनका डेरा मे कूलर लगबै ले आइल। शास्त्री जी डेरा मे नहि रहथि। परिवारक बच्चो आ पत्नियो केँ कूलर देखि खुशी होइत। साँझ मे लालबहादुर शास्त्री डेरा अयलाह। डेरा अविते देखलखिन जे कूलर लगबै लोक निर्माणक कर्मचारी सब छथि। कूलर स शास्त्री जी केँ खुशी नहि भेलनि। ओ कूलर लगवै स मना कऽ देलखिन। परिवारक सभ स्तब्ध भऽ गेल। पत्नी कहलकनि- जे सुविधा सरकार द रहल अछि ओकरा मना किऐक करै छी? गंभीर स्वर मे शास्त्री जी उत्तर देलखिन- ई जरुरी नइ अछि जे हम सब दिन मंत्रिये रहब। कूलर स सभक आदति बिगड़ि जायत। परिवार मे बेटियो अछि जेकर बिआहो हेतैक। दोसर घर जायत। अगर जँ ओकरा ओहि परिवार मे जँ ऐहेन सुविधा नहि होय तखन त कष्ट हेतैक। 57     विचारक उदय गाँधीजी बच्चे रहथि। हुनक बड़का भाई हुनका मारलकनि। गाँधीजी कनैत माए लग आबि कहलखिन। गाँधीक बात सुनि माए कहलखिन- तोहूँ किऐक ने मारलह? माएक बात सुनि गाँधीजी कानब छोड़ि कहलखिन- जे गलती भैया केलनि सैह करै ले हमरो कहै छी। आ की हुनका मनाही करबनि। बेटाक बात सुनि माए कहलखिन- बौआ हम तोहर परीछा लेलिअह। अगर तोरा मे ऐहन विचारक विकास हेतह त आगू चलि क सैाँसे दुनियाँक प्रति सिनेह आ प्रेम पौबह। बच्चाक समुचित विकासक आरंभ परिवारे स शुरु होइत अछि। 58पुष्ट इकाइ स समर्थ राष्ट बनैत। फ्रान्स हालैंड पर आक्रमण क देलक। फ्रन्स नमहर देशो आ सम्पन्नो। जबकि होलैंड छोटो आ पछुआइलो। मुदा फ्रान्स हालैंड स जीति नहि पबैत। ई देखि फ्रन्सक राजा लुई चैदहम बिगड़ि मंत्री कालवर्ट क बजा पूछल- हमर देश एत्ते पैघ आ सामरिक सम्पन्न रहितहुँ पछड़ि किऐक रहल अछि? राजाक बात सुनि कालवर्ट नम्र भ उत्तर देलकनि- महत्ता आ समर्थता। कोनो देशक  विस्तार आ बैभव पर निर्भर नहि करैत। ओ निर्भर करैत ओहि देशक देश भक्त आ बहादुर नागरिक पर। जे अपना देशक अपेक्षा हालैंड मे मजगूत अछि। मंत्रीक बात सुनि राजा अपन सेना वापस बजा लेलक। हालैंड मे बच्चा-बच्चाकऽ राष्ट्रक सशक्त इकाईक रुप मे ढ़ालल जाइत। जहि स ओ शक्तिशाली बनि ठाढ़ अछि। 59 डर नहि करी उगैत सुरुज जेँका जिनगी अपन दिशा मे अपना ढ़ंग स बढ़ैत जा रहल छलि। एक विराम पर जा जिनगी पाछू मुहे घुरि क तकलक ते चैंकि पड़लि। चंडालिनी सन कारी आ कुरुप छाया पाछू-पाछू अबैत छलि। छाया क देखि जिनगी ललकारि कऽ पूछलक- अभागिनी! तोँ के छियै? हमरा पाछू-पाछू किऐक अबै छेँ? तोहर कारी आ कुरुप काया देखि हमरा डर होइ अए। जो भाग। हमरा स हटि कऽ रह। छाया छिप गेलि। मुदा जिनगी घिंघिआइत बढ़ल। पुनः छाया आबि कहलकै- बहिन! हम तोहर सहचरी छिअहुँ। तोरे संग हमहू चलि रहल छी। आ अंत मे दुनू गोटे संगे रहब। तेँ डरैक कोनो बात नहि। तोँ हमरा नहि चिन्है छेँ हमरे नाम मृत्यु थिक। मृत्यु क पाछु लगल अबैत देखि जिनगी डरि गेल। सकपका क गिर पड़ल। 60     असिरवाद उलटि गेल एक गोटे कऽ दू टा बेटा छलैक। दुनूक बीच तीनि बर्खक जेठाइ-छोटाइ छलैक। गामेक स्कूल मे दुनू भाई पढ़बो केलक। अपर प्राइमरी स्कूल रहने दुनू-भाइ पचमे तक पढ़लक। दुनू बेटाक विआह बाप-माए क देलक। जाबे धरि छोटका बेटाक दुरागमन नहि भेल छलैक ताबे धरि त परिवार शान्त रहलै मुदा छोटकाक दुरागमन होइते परिवार मे खटपट शुरु हुअए लगलै। एक्को दिन ऐहेन नहि होय जहि दिन दुनूक  बीच झगड़ा नहि होइत। सब दिन दुनू दियादनी कऽ झगड़ा करैत देखि बाप कऽ बरदास नहि भेलैक। दुनू बेटा कऽ बजा बाप कहलकै- बौआ सब दिन झगड़ा केने घर स लछमी पड़ा जेथुन तेँ अखन हमहू जीविते छी दुनू भाइ भिन्न भ जाह। जे चीज छह दुनू कऽ बाँटि दइ छिअइ। जेठका बेटा कऽ नगद आ जेवर-जात हिस्सा भेलै आ छोटका क दू बीघा खेत आ बड़द भेलै। दुनू भाइ खुशी स भिन्न भऽ गेल। नगद आ गहना-गुरिया पाबि जेठका खूब ऐश-मौज करै लगल। दुनू परानी छोटका दिन-राति मेहनत करै लगल। गामक लोक जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहै लगलैक। समय बीतै लगलै। दुइये सालक बाद पाशा पलटै लगलै। जेठका बेटाक रुपैओ आ गहनो सठि गेलै मुदा छोटकाक उन्नति हुअए लगलै। नगद आ जेबर सठने जेठका चोरि करै लगल। एक दिन चोरि करै गेल त घरे मे पकड़ा गेल। जहि स मारिओ खूब खेलक आ जहलो गेल। गामक लोकक असिरवाद उनटै लगल। जेही मंुह स जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहैत छलैक ओहि मंुह स लोक जेठका कऽ करमघटू आ छोटका कऽ करमगर कहै लगलैक। २.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन। विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.) नताशा: (नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू) नताशा तैंतालीस नताशा चौआलीस ३.कल्पना शरण- देवीजी देवीजी  ः मुस्कुराहट देवीजी विद्यालय एली तऽ देखलखिन जे एकटा बच्चा कानि रहल छल आ बाॅंकि सब दूर जा कऽ ठाढ़ छलैथ। देवीजी आेहुना देखैत रहैथ जे नब आयल इर् बच्चा सब संगे मिलि नहिं पाबि रहल छल।तखन देवीजी सबसऽ बात केली तऽ बुझलखिन जे अहि बच्चा के स्वभाव मे कनि खराबी छल आ सबसऽ खाैंझाकऽ बात करै छल।ताहि पर देवीजी के एक विचार बनलैन। आे आेहि असगरूआ बच्चाके बजाकऽ कहलखिन जे हमरा एकटा किताब अपन कक्षाके बच्चा सऽ मांगि क दे। आे भीड़मे आेकरे लग गेल जे स्वभाव सऽ नम्र छल आ अकरा हॅंसि कऽ जवाब दैत छल। जे बच्चा पढ़ै मे भने तेज छल लेकिन स्वभाव सऽ कड़क छल तकरा लग अकरा जायके नहिं माेन भेलै। टाहि पर देवीजी कहलखिन जे जहिना अहाॅंके विनम्र स्वभाव नीक लागैत अछि तहिना दाेसराे के हाेयत छै। आ अपन विनम्रता दर्शाबऽके सबसऽ नीक तरीका छै मुस्कुरेनाइ। देवीजी इहाे कहलखिन जे हॅंसैत रहबला व्यक्‍तिअपने तऽस्वस्थ रहिते अछि संगे दाेसराे के माेन हल्लुक कऽ दैत अछि।साैहार्द्र सऽ भरल हॅंसी केहनाे कुदरूपके सुन्दर बना दैत छै आ अकर विपरीत कियाे कतबाे सुन्दर कियैक नहिं हुए विनम्रता आ सुभाषिताक अभाव मे सबसऽ एकहरबा भऽ जायत अछि। देवीजीके अहि ज्ञानसऽ आे बालक बहुत लज्जित भेल आ अपन स्वभाव बदलैके निर्णय लेलक। फेर की छल देवीजीके इर् चेला तऽ सबहक कान कटलक। शबहक बीचमे हॅंसैत चहचहायत अहि शिष्य के देखिकऽ देवीजीक माेन गदगद भऽ गेलैन।7 फरवरीकऽ ‘स्माएल डे’ पर देवीजीके सबसऽ पैघ उपहार यैह भेटल छलैन। आहि बच्चा सबहक व्यक्‍तित्‍व के विकास पर विशेष ध्यान देेने रहैथ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/  राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_II-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-In the depth of my heart DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –II Once Dhara had visited Liverpool with Kadamba. Dhara was surprised to see the historical grandeur and culture of Liverpool. This place was situated near the mouth of river Mersy which was 142 kms. long. Mersy river has originated from Irish sea. The earliest construction in Liverpool was an 11 kms. long dock built in 1715. Dhara stood near the dock and listened to Mersy river’s scaring sound. On the other side of the river Dhara saw beautiful lights and inquired from Kadamba about it. Ma, it is Viral, Kadamba replied. How can people go to Viral – is there any bridge? No Ma, there is a tunnel inside the river and people cross to other side through it. Dhara was shocked and scared with mere imagination of a tunnel under river. Car, bus, truck all crossed through it – it was well-lit and airy. Dhara felt suffocating just thinking about it. Kadamba laughed – Ma       everything is possible- all these are fruits of science and technology – men have made tremendous progress – Do you see this Albert dock , it is the earliest dock. England traded with the outside world through this dock – the African slaves were brought to this dock and spices arrived from the West Indies. Ma, let us go to the oldest restaurant of  Liverpool, Kadamba said. The restaurant was located on one side of the dock. Large buildings hovered the road from both sides – they represented the architectural style of the early times. Bombay’s Taj Hotel, Gateway of India and Kolkata’s Victoria Memorial were all parts of this style of architecture.We reached near a secluded forest area. Small restaurant named Brittania was located there. Following was written on a copper plate – Wheat Bread, P.L.C. 1742 , which meant this restaurant was constructed in the year 1742. Parking space was packed. There were several wooden tables and benches outside the small restaurant. The lights of the Viral city were clearly visible and enjoyable even from this distance – I do not know why there was Diwali everyday in England ? Summer had already arrived but the wind was cool and refreshing – but Dhara went into past, recalling  – to whom she became close, they left her, to whom she loved, they deserted her- it was Dhara’s fate – nothing remained , nothing ….. Ma, come inside the restaurant. Dhara followed him. Everywhere British people sitting in close proximity – all couples. Air was full with cigarette smoke. Pub was located in one corner. Kadamba took his mother to non-smoking zone from where Dhara was able to observe through glass panes the sorrow, pain and loneliness of River Mersy. Beautiful, scantily dressed British girls worked as waitress, moving in a mechanical manner and continuously smiling like machines. Really, they were quite disciplined. Restaurant was 2 over-crowded, yet peaceful – no hue and cry, no tension. A boy wearing a track suit entered the restaurant with a beautiful girl but with heavy bottom resembling two falling big stones. Both sat on chair facing each other, looking directly into eye , forgetting the world. The secrets of body and soul are really astonishing, what kind of pleasure is derived, nobody is certain, different ways to satiate and seek pleasures can never be explained. Dhara had become used to visiting these places with Kadamba. Initially she had felt uncomfortable. But search for Simant had made it possible as he could be located in one of these places. He must be a great drunkard, a money making machine and a women seeker. Kadamba was silently looking in the eyes of his mother. Since the time he gained consciousness, he remembered the resemblance between the lotus flower of his village pond with that of the emotional eyes of mother. Mother’s eyes always had a kind of sadness resembling the evening sky, but her face always smiling. Both mother and son shared a very loving relationship but there was a sea like distance between them due to son’s respect towards mother. Inner feelings are one thing, but to exhibit the same is altogether a different matter. Ma, why you have named me Kadamba?- he had inquired this when he was a child- this Kadamba flower becomes lifeless in two days. Mother had embraced him saying , no son, you are not the Kadamba flower of this earth, you are that Kadamba tree on whose stems lord Krishna used to climb – I have filled you with  love as vast as the universe. You are the ornamental symbol of your parents’ vast love and faith. We have inculcated in you the feelings of universal brotherhood. Listening to these words Kadamba was overjoyed to be linked with lord Krishna. Ma had taught her the great lessons of love and faith. Whenever human beings chose dark, doubtful, faithless path, their fall was imminent and inevitable. This earth survives on faith – faith in god helps in day-to-day life, faith in mother secures love and protection for child and faith in teacher secures knowledge for him. A newly married bride leaves the loving and protected world of parents to lead life with an unknown person – this relationship is also based on faith. When this faith will disappear, human life is bound to touch the lowest ebb like the unlimited and unmeasured depth of sea. Human beings will feel excommunicated or exiled like Pandavas through gamble. Dhara remembered her mother’s utterances– Dhara is now grown up, we must look for a suitable match. Papa used to laugh and said, Dhara is not our daughter, but our son –        do  you not see how educated and cultured she is? You always consider her as your son, but we have to get her married. – I am also worried, I also understand everything, but right now let her complete her studies, if we marry her at this juncture, her career will be ruined in household chores.--- If we wait right now, then when we look for the bridegroom, we must not get the ideal choice – mother’s voice was unstable and full of doubts. If I fail to express like you, do not think I am not serious – Papa spoke laughingly 3 – I am also worried about my daughter’s future. Look Dhara’s mother, when some drop of swati nakshatra falls on earth it disappears, but if falls in an oyster, it gets converted into pearl. I am waiting for the same oyster for Dhara where our Dhara will live as pearl – Look People give birth to children, make them capable, get them married and become free from their responsibilities. After that love for grand-son, grand-daughters and the worldly life moves so on and so forth ….. Mother replied philosophically, alright, when we get a good match, we will get her married. Father said mockingly, how can we judge the goodness of a human being. If the parents are cultured, liberal and tolerant, the offspring must be good, Mother’s  words surprised both Dhara and her father. Ultimately fathers’ words became a reality. After her Post-Graduation, she was married to Simant, meritorious and good natured. But nobody on this earth  knows what is stored in future. Dhara recalls the wedding song— ‘Dhir dharu janani adhir ati jani hou, kahu kiyo bheti sakai vidhi ker rachna …’ As parents’ loving daughter, adolescent Dhara, playful and lost in her dream world now enters her sasural as Simant’s wife, overburdened with new responsibilities. How the freedom loving daughters with their happy go lucky attitude make their sudden transition as daughter-in-laws at someone else’s home—ready to fulfill high expectations of people all the time. No one feels the pain she goes through – she was the loving daughter of her father who overlooked all her mistakes and gave freedom and liberty required for development of personality. But with Dhara’s marriage, her sasural got a full time unpaid maid for life time who worked tirelessly for her in-laws, then for her husband and lastly for her children and their off-springs – a maid without salary. The family is complete with the coming of daughter-in-law, but the girl gets imprisoned fulfilling family’s aspirations with all restrictions imposed on her. In spite of performing all household chores, she lacked the right to question anybody. But there were always some exceptions to this rule. The preparation for Dhara’s marriage was in full swing, everybody was overjoyed. Dhara’s heart was also full of hope, joy as well as the unknown fear – looking at the seven colors of Rainbow Dhara wondered – where was she going from here, what kind of life she was going to have? Birds in several rows flying in the sky singing the song of freedom, Dhara also started flying high in the large unending sky- free , uninterrupted and uncontrolled. Dhara’s thoughts were blowing like a wind. Dhara’s body, mind, heart and soul were satiated with Simant’s love. Simant never imposed any kind of restrictions on her mind and thought. Simant’s love energized her to face the unknown challenges of life. Dhara remembered – one day she was asleep. When Simant came back from morning walk, he hold a beautiful fragrant red flower in his hand. He secretly kept it on Dhara’s face. Dhara got awakened due to soft touch of fragrant flower. Simant murmured in her ear,  Princess of Flower. Dhara laughed freely. It seemed goddess of nature dawned on this earth. You will  love me forever, Dhara 4 asked. Is there any doubt? Dhara felt Simant’s loving and caring hand on her soul, on her body. Simant also started playing with Dhara’s long and beautiful cloud like hair and entered into his sea depth thoughts to attain the pearl like happiness. It was such a bliss undiscovered in any garden of the world. Kadamba was born. Dhara felt like goddess due to labour pain and her contribution in this new creation leading to continuity of universe. Birth of Kadamba added to her responsibilities. Kadamba’s oil massage, his bathe, his daily chores – whenever he slept Dhara tried to finish her household work. Sometimes when Kagamba awakened in the midst of work, Dhara ran to calm and pacify him. Simant was sitting nearby but he never took the child in his arms to calm him. Instead he used to shout, what are you doing? Kadamba is crying. She came from kitchen almost running and hold the child with either flour or spice laden hands. Simant always reacted, BAAP RE, you do not have any manners. You do not know how to live. You behave like a village girl. Initially Dhara was shocked with these outbursts. But gradually she undersood that in some cases the birth of a child brings parents closer and in other cases the vice-versa happens. Simant developed the feeling that Dhara was paying more attention to child thereby ignoring him. Dhara always thought that Kadamba was known by her fathers’ name, not by her name. Whenever she visited her parents home people used to say, look at Dhara’s son, her total replica – Dhara derived satisfaction. Yes, Kadamba is my son, my child, --there nobody even took the name of Simant. But outside NAIHAR , from SASURAL to anywhere within own country or foreign, everywhere he was known as the son of Simant – then why women are ceaselessly working at home day and night?, What do they get in return even after surrendering their very existence? Child is born. The entire family is overjoyed. Child descends like a moonlight. But nobody is sure about the future of the child. In child’s innocent eyes and smile parents forget their sorrows. Child automatically understands the love and very presence of mother. Mother in turn understands child’s gesture. But these things will continue for how long……………………………… …….. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York. In the depth of my heart Forgotten in mirth Keeping all sorrow apart Also my ambitions alongside The sign of possibility inspires The confidence enhanced by working The fulfilment of wishes creates desires When my eye lids meet My worries vanishes Just like the waves of a sea Cleans the beaches All anxiety are swiped away From the beach of my heart Diving into the deep sleep I will talk to the love The possibility of this only Brings so much lights of positivity But on the contrary............................... १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर। महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:  Language:Maithili  ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)  (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi) 

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage) 

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

https://sites.google.com/a/videha.com/videha/ 

http://videha123.wordpress.com/  

(send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A,

Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.

Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107

e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com  website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह।  Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द 

मीडिया, समाज, राजनीति और इतिहास

डिज़ास्टर : मीडिया एण्ड पॉलिटिक्स: पुण्य प्रसून वाजपेयी 2008 मूल्य रु. 200.00  राजनीति मेरी जान : पुण्य प्रसून वाजपेयी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.300.00 पालकालीन संस्कृति : मंजु कुमारी प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 225.00 स्त्री : संघर्ष और सृजन : श्रीधरम प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु.200.00 अथ निषाद कथा : भवदेव पाण्डेय प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.180.00

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु.125.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 200.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 180.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00 बडक़ू चाचा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 195.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 200.00

कविता-संग्रह

या : शैलेय प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 160.00 जीना चाहता हूँ : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 300.00 कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00 लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00 लूओं के बेहाल दिनों में : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 195.00 फैंटेसी : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.190.00 दु:खमय अराकचक्र : श्याम चैतन्य प्रकाशन वर्ष2008 मूल्य रु. 190.00 कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00 पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन

अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन,एकसटेंशन-II गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-6475212 मोबाइल नं.9868380797, 9891245023 ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in, antika.prakashan@antika-prakashan.com http://www.antika-prakashan.com (विज्ञापन) श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur, Nagendra Kumar Jha and Panjikar Vidyanand Jha- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा" VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) X. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature XI. मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी XII. मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. Address your delivery-address to श्रुति प्रकाशन,:DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com

(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५२ म अंक १५ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

ही | भर : . ~*~ 4 *

io PZ ro भी दि; ! i -_ Ley { j ayes i

> के ं 5 = 7 ae i ty on | ie} ie Tica ives wares ‘as Sas ei. | Ne AR all ‘| | ae fee = thas थे नि की कि eT pear 2 जद | OD yy i gee

AY 3) .

अर Ne 3 ; कम fa

शव ie oh ak Ss a ~ प्र Oy annie om » =a " 4 a 3 Bf : \ - i [Al a 3, ol # fe र os) || D> 3 i \ जा:

j | RAAAA 2 * =

न कर : , ii ae ee _— _ —— aa) oe एल: (si नर जा रत हेड ag = ; — 4 |= F के 2 “i! q at in! Z5are | ही MUL EL Maa ue vests | WHITE VE An 80% | i. <a [= 3 am co. ia = A — ta VESTS: #5) el ee — : } ; Tan . f है | ‘ ७ a ho : _ ——— ao a . . | ' » लाल iF x t A

———— ° 4

aa 2 Ho कका cont | ae ats, e 7 _ |. | एक at aot is किक ना | 2cl ! 2 pitta - (/ Age eek । "| wes तिथि ( ae ~ थी ‘ Loom _ visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.com हम उ chet में .....औरकदा भोर मे i ( के गहि atayet| | कंवका, BARI कलीकूरति नहि मंकंडीकं जीलंक | | हमर नौकर atateft a opetiepfa? | |अंहौँक एतेंक मेहनंती along \ fea aetferet.... afst om घंटा afk] LOA) ———— (i पर आवचं् भ' RSet StS fe |e i ली a 2 ja Be) i | ee | tf | | aml) Ze सस्प ty ZILA) i दि रे | & ‘ rr { XC (निया EVE है हूं BS) जो, BS? | Oe re. Oe € CARS | aes तु जया ae lq CI Yu दी iN कि कि Paes r a rt s&s ey = KOS? [| a Dee SO RS

I ही ही मल: ico / Dh. . . a i = कर 4 f = ३ जी . P on) ” ‘ } ete दब oy. | Re — श्र ¥ Wy ‘ee 7 ४ y M a! a4 . Ww | . ‘iv Re vi | 3 } » ae li fu 4 j \ et A ir a. a दम Goer | . ¥ 5 “sl | के के. ee | = प्‌ - . La के on त मर कि i la ॥ ‘ a - ; j x! | a - है सन 7 4 L » ही _ Ys ve 4 ९ a poe जै | वर vi ~ A दि सर ड | s 5 हर | 7 Wee oa | is ४ | कि = ge if @ " ; om | — : " ie — हाथ ' = | जद द | ——— _ a j j rare i Jeera the) Pn rye . SSE EN ELS शक मे eft eb ei) “A af f Re Bihari ToS ong Se

™ a + mee ei

ह ह J ee ee ee ee

थी हु a ’ J Pies Ar ‘ ie 7 ~t . i tt | ie हर दे ! iy = E tb i जे az 7 कद i Tk, me am " q i. " न a % : Riek . ha i A j f i ; [| y " : ‘Waa 2m | ही : SESS Pe tga ~ Be Sat 3 ae ee eg ae % fr: EE TEE: pete > “ying : ae \ > SRS Ses दर BEE LE GE y To be % age P53 न दर, विन बिक... के. ea i कि जुदा. गए भर 2 पट wars sa ee Seen Sl EE é A हि ५-५ 4 PMS ie he 8h : eg VE 7 Nin vied |. (पा Bit Tg 9. ES e fy ho “ oe + ee a Saat रे * न shale it $ wie Me TRL rata eee re a Cae कै. रे न. \ Wh oT i Bled irs PRAM, fae RS) See Bat as ces fee pes १, ५ ‘ 5 al ‘ gees sh 5: Ke कि Mar) < o74 ah a की x op hee ean me oo er aan उसी 3० et bees Bes NPR ee SM कर ह rai ease ean ie eRe ta - ही वर ere i toa Ag We Fe A ig 2 ec eae 0: की ‘eh - sal am = = 6 li roe oe ie ant PEL) Meme CONS मिट GVM oe पट पी नर भी 5 yo‘ |

पिकनिकक योर्जना otf बहल छल... eee हम पूड़ी आ STE... ae sc Li Ca oe we i fo की न itt g s) FUP Cae A ws | © देवांशु वत्स Rom, "S| Hadise el visit : www.devanshuvatsa.com E-mail - devanshuvatsa@gmail.con hd atar BH St st Ae | | अहीँ art a’ art चीज हम माय-पंपा केँ ap atict आनंब॑ acta) | आनिय॑ et... अहिंलेल... Sak नि लेन !! a nat

—— fr) 2 | —_— rr ? = ढक अही हर [है ‘sz oat |i है. खिक... ज | | . 2 | ds a : = — , a x = जी { MO, a रॉ की है ‘ % 2 DB. ' NY n

पेश = t Si Bas A aN Se we va Ech कर ce mS ० Zi | eer । भा ५ Th ud , ey) i aks Si aS ही R 2 ‘alg PIE. ep ce fi .. gece 32 PCRS Webs टू zat क्रिस 0 रु ye ye GEE रद teats. Tareas © 7 : ear ae Bn he aay रे 4 Bat ¢ tel ep yc पक oe कै 2 कुकर ई) शी ce : डी = rot iy. कर eer = =. = अर 7 जि [ yl aK ey id ila ae Sy oa ase tee है पा a A, था 4 = = = = a | | | | i ay 3 न See Se, sa mor x Lay {) के का! {jee es aq | ; i — ee —— ‘S$ aa a! Sie — = = a जि ही win. t \ ia) | : == } bebe ky iw ' hs i) im कक =—— — Ss = <a ——— Fs \ —_ थे —_ = oa f | - L a . = = =e 2