121 'विदेह' ५४ म अंक १५ मार्च २०१० (वर्ष ३ मास २७ अंक ५४) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.सुभाष चन्द्र यादव-जगदीश प्रसाद मंडलपर २.२.विनीत उत्पल- कथा-निमंत्रण २.३.मनोज झा मुक्ति- मिथिला महोत्सव आ एकर उपलब्धि २.४.सुजीतकुमार झा-नेपालमे मैथिली भाषामे पढाइ: उत्साह कम निराशा बेसी २.५.बिपिन झा-कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र) २.६.१.बेचन ठाकुर, नाटक- ‘छीनरदेवी’ २.राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व २.७.१.ऋषि वशिष्ठ-अन्हरजाली २.उमेश मंडल ३.कपिलेश्वर राउत-तरकारी खेती २.८.जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २०म खेप ३.३.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.सरोज ‘खिलाडी‘-गीत ३.६.कामिनी कामायनी-बाजार मे स्त्री ३.७.१.बेचन ठाकुर- गीत२.मनोज कुमार मंडल-जिनगी ३.८.राजदेव मंडल-तीनटा कविता 4. बालानां कृते-. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा 5. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_IV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-Estranged Sleep विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय आचार्य रमानाथ झा रचनावली (पाँच खण्डमे)भारतीय भाषा संस्थानक सहयोगसँ वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित भऽ गेल अछि। एहिमे स्वर्गीय रमानाथ झाक मैथिली, हिन्दी, इंग्लिश आ संस्कृत लेखनकेँ एक ठाम समेटबाक प्रयास कएने छथि संकलनकर्ता-सम्पादक श्री मोहन भारद्वाज। एहिमे पहिल खण्डमे विद्यापति दोसर खण्डमे मैथिली साहित्य तेसर खण्डमे मिथिला ओ मैथिली चारिम खण्डमे विविध आ पाँचम खण्डमे संस्कृत रचना देल गेल अछि। स्वर्गीय रमानाथ झा जीक रचना सभ बड्ड दिनसँ अनुपलब्ध छल । एहि रचनावलीक सम्पूर्ण सेट रु.५०००/- मे उपलब्ध अछि। पुस्तक प्राप्ति स्थान: वाणी प्रकाशन, ४६९५,२१-A,दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२ ६८म सगर राति दीप जरए ०३ अप्रैल २०१० केँ जनकपुरमे भऽ रहल अछि, संयोजक छथि श्री राजाराम सिंह राठौर। मैथिलीक सुपरिचित गायक हेमकान्त जी नहि रहलाह, हुनकर आत्माक शान्ति लेल ईश्वरसँ प्रार्थना। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १३ मार्च २०१०) ९६ देशक १,१९४ ठामसँ ३९,८९० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३१,३३२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://groups.google.com/group/videha/web/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%95+%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE?hl=en ) बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.सुभाष चन्द्र यादव-जगदीश प्रसाद मंडलपर २.२.विनीत उत्पल- कथा-निमंत्रण २.३.मनोज झा मुक्ति- मिथिला महोत्सव आ एकर उपलब्धि २.४.सुजीतकुमार झा-नेपालमे मैथिली भाषामे पढाइ: उत्साह कम निराशा बेसी २.५.बिपिन झा-कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र) २.६.१.बेचन ठाकुर, नाटक- ‘छीनरदेवी’ २.राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व २.७.१.ऋषि वशिष्ठ-अन्हरजाली २.उमेश मंडल ३.कपिलेश्वर राउत-तरकारी खेती २.८.जगदीश प्रसाद मंडल--दूटा कथा सुभाष चन्द्र यादव जगदीश प्रसाद मंडल मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मंडलक पदार्पण किछु-किछु ओहिना भेल अछि जेना कहियो विवेकानन्द ठाकुरक भेल छल। जहिना विवेकानन्द ठाकुर अपन जीवनक उत्तरार्धमे बहुत बहुत आकस्मिक ढ़ंगे मैथिलीमे प्रगट भेलाह, तहिना जगदीश प्रसाद मंडल एकबैग अपन अनेक कथा आ उपन्यास लऽ कऽ उपस्थित भेल छथि। विवेकानन्द ठाकुरक काव्यमे पाठककेँ ग्रामीण परिवेशक जेहन टटका बिम्ब आ नव सुआद भेटल छलनि, जगदीश प्रसाद मंडलक कथामे ओहने टटका चित्र आ नव आस्वाद भेटतनि। दुनू रचनाकार मिथिलाक ग्राम्य-जीवन संस्कृतिसँ मोहाविष्ट छथि। दुनुक शैली वर्णनात्मक अछि। लेकिन आगमन, विषयवस्तु, दृष्टि आ शैलीमे समानता होइतहु दुनूमे क्यो ने तँ ककरो अनुकरण कएने छथि ने एक दोसरासँ प्रभाव ग्रहण कएने छथि। दुनुक अपन स्वतंत्र लेखकीय व्यक्तित्व छनि। ठेलाबला, रिक्शाबला, चूनवाली, इन्जीनीयर, डॉक्टर इत्यादि शीर्षकसँ लागत जेना जगदीश प्रसाद मंडल वर्ग संघर्षक कथाकार हेताह। लेकिन ओ जनवादी या प्रकृतिवादी कथाकार नहि छथि, जीवन-संघर्षक कथाकार छथि। हुनक कथाक सन्दर्भमे जे सर्वाधिक उल्लेखनीय बात अछि से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्यासिक विस्तार अछि। वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ हुनक कथा भिन्न अछि। हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। जगदीश प्रसाद मंडल जीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रतिष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि। विनीत उत्पल कथा निमंत्रण नीताक एकटा मेल सचिनक दिमागकेँ सोचैक लेल मजबूर कऽ देलकै। आजुक बाजारवादक युगमे संबंध एहने भऽ गेल छैक जे काज भेलाक बाद लोक एक-दोसराकेँ बिसरि जाइत अछि। संबंध एहन वस्तु भऽ गेल अछि जेकरा प्रयोग केलाक बाद छोड़हिमे लोक नीक बुझैत अछि। दू गोटेक अंतरंगताक मूल्य किछु नहि अछि। केकरोसँ अपनत्व मात्र स्वार्थ लेल बनाओल जाइत अछि। सचिनकेँ मोन पड़ै लागल नृत्यांगना नीताक दोस्ती आ अंतरंगता। ............................................. ओ जूनक महिना छल जहिया पहिलुक बेर ओ नीताकेँ देखने छल। ओहि काल सचिन दिल्लीसँ ठामे दूर फरीदाबादमे काज करैत छल। ओ देशक प्रतििष्ठत एकटा अखबारमे रिपोर्टर छल। काजक संगे हुनका पढ़ै-लिखैमे बेसी मन लागैत छल। जखन ओ फरीदाबादमे छल तखन एकटा संस्था ‘वाइस ऑफ फरीदाबाद’ नामक कार्यक्रम कएने रहै जइमे नीता निर्णायक बनि आएल छल। संजोग छल जे ओहि प्रोग्रामकेँ कवर करबाले सचिन अपन संस्थान दिससँ गेल छल। प्रोग्राममे नीतासँ ओकरा नीक जेकाँ भेंट तँ नहि भेलै मुदा सचिन ओकर फोन नंबर लऽ कऽ घुरि गेल। संगे कहि देलक जे काल्हि ओ फोन करत आ एकटा छोट सन इंटरव्यू लेत। दोसर दिन जखन आफिसक मीटिंग-सिंटिंगक निपटारा कऽ सचिन नीताकेँ फोन केलक तँ नीताक खुशीक ठेकाना नहि रहलै। गपे-गपमे सचिन जानि गेल जे ओ सेहि बिहारेक अछि। दिल्लीमे काकाक संग रहैत छलीह नीता। ओ दिल्लीक कथक केंद्रसँ कथकक प्रशिक्षण लेलक अछि। संगे-संग पूरा इंटरव्यू बड नीक भेलै जे दू दिन बाद अखबारमे छपलै। भोरे-भोर जखन सचिन सुतले छलाह तखने नीताक फोन मोबाइल पर अएलै। आँखिकेँ मिरने सचिन अपन मोबाइलपर नबका नंबर देखि कऽ अलसा गेल आ साइलेंटमे कऽ देलक। किछु काल बाद फेरसँ मोबाइल टनटनाए लागल। ताधरि हुनकर निन्न टूटि गेल छलै। -हेलो, के...? -हम नीता बाजैत छी। -की, की हाल ? -नीक अछि, आइ हमर इंटरव्यू छपल, अहाँक अखबारमे। -हँ, से तँ अछि। -आँय यौ, अहाँ तँ बड्ड नीक लिखैत छी। -नहि, ओतेक नहि, जतेक अहाँ सोचैत छी। -तखन कहियौ, दिल्ली कहिया आबि रहल छी। नीता बाजि गेलीह। -देखियौ, कहिया धरि आबैत छी, जहिया आएब, कहि देब। चलु हम फोन राखैत छी। एखन धरि बिछोनकेँ नहि छोड़ने छी। -हँ, हँ, अहाँ जाऊ, फ्रेश भऽ आऊ। -ओ.के. बाय। -ओ.के. बाय। ई तँ मात्र अरम्भक गप छल जकरा बाद दुनू गोटेमे राति-बिराती गप हुअए लागल। एहि बीचमे नीता किछु प्रोग्राम करबाक लेल अमेरिका गेलीह। हुनका जाइसँ पहिलुक साँझ सचिन फरीदाबादसँ दिल्ली आएल छल आ नीतासँ मंडी हाउसमे मिलल छल। मंडी हाउसमे ओहि समए वाणी प्रकाशनक एकटा किताबक दोकान छल, जाहि ठामसँ कतेको किताब ओ किनने छल। नेनेसँ सचिनकेँ पोथी किनैक शौक रहै जे एखनो धरि छलै। अमेरिका गेलापर दू दिन नीता सचिनकेँ फोन केलक। जखन नीता अमेरिकामे छल तखने सचिनकेँ अपन आफिसक नबका बॉससँ सामान्य गपपर झगड़ा भऽ गेलै। सचिन तखन किछु बाजल तँ नहि मुदा ओहि गपक पाँचम दिन ओ नोकरी छोड़ि देलक। ओ आगराक एकटा अखबार ज्वाइन कऽ लेलक। भरि ठंढी ओ सभ दिन फरीदाबादसँ पाँच घंटाक रस्ता ट्रेनसँ कऽ आगरा जाइत छल। बादमे एकटा डेरा फरीदाबादमे आ एकटा डेरा आगरामे राखलक। एहि बीच नीता अमेरिकासँ घुरि गेल छल। दुनू मोबाइल फोनसँ भोर आ साँझ एक-दोसराक हालचाल लैत छल। एक बेर तँ एहन भेल जे एक महीनाक मोबाइल फोनक बिल एत्ते अएलै जतेक सचिनक दरमाह रहै। कारण फरीदाबादमे जे मोबाइल फोन हुनका संग छल ओ आगरामे रोमिंगपर छलै। ओहिपर इनकमिंग अएलापर सेहो पाइ कटैत छलै। दुनू युवा छल आ ओहि समएमे वैलेंटाइन डे एकटा एहन ‘डे’ बनि गेल छल जाहि दिन सभ प्रेमी एक-दोसराकेँ ‘विश’ करैत छल। संजोग छल जे तेरह तारीकक रातिमे सचिन दिल्ली आबि गेल छल, कोनो काजक लेल। ई गप नीताकेँ बुझल भऽ गेल छलै। ओ सचिनकेँ नाकोदम कऽ देलकै जे आइ अहाँ मंडी हाउसक रेस्टोरेंटमे आऊ। भोर भेलापर सचिन भेँट करबाक लेल मंडी हाउस पहुँचलाह तँ नीता पहिनेसँ ओत्तै बाट ताकैत रहै। दुनू गोटे नास्ता कऽ चाह पीबि हाय-हेलो कहि कऽ बिदा भेल। साँझ खन जखन ओ आगरामे अपन ऑफिसमे काजमे लागल छल तखने नीताक फोन अएलै आ ओ ऊकरा प्रपोज कऽ देलकै। ओहि दिन नीता सचिनक जिनगीमे पहिल लड़की छल जेकरा ओ प्रेमक प्रस्ताव देने छल। ओकर दिमाग कनी काल लेल सुन्न भऽ गेलै जे ई की सुनि रहल छी। दोसर दिन पन्द्रह तारीख छल आ नीता ओकरा दिल्ली आबैक लेल जिद करए लागल। एखन धरि सचिनकेँ दिल्ली काटि रहल छलै आ ओ दिल्लीक नाम पर नाक-भौंह सिकुड़ैत छल। मुदा एहि गपक बाद ओकरा ताजमहलक नगरी आगरासँ विरक्ति होमए लगलै। ओ जिदिया गेल छल। दोसर दिन अपन बॉससँ छुट्टी मांगलक मुदा नहि भेटलै। ओकरा एतेक तामस उठलै जे ओ नोकरी छोड़ि कऽ दिल्ली बिदा भऽ गेल। नहि आगाँक सोचलक आ नहिये पाछाँक जे दिल्लीमे आगू की करब। खाली एकेटा गप मोनमे छलै जे आब ओकर जिनगीमे नीता आबि गेल छै, किछु ने किछु तँ कैये लेत। दिल्ली अएलापर ओकर शुरू भऽ गेलै द्वारि-द्वारि भटकब आ घूमब आ ताकब नोकरीक नब ठिकाना। एहि बीच सचिनकेँ गोसाँइ भऽ गेलै। जहि दिन ओकर जन्म दिन छल ओही दिन ओ गोसाँइक कारण बोखारसँ जड़ि रहल छल। एहि दिन पहिलुक बेर दिल्लीक शकरपुरक डेरापर नीता ओकरा देखबा लेल आएल छलि। सचिनकेँ सभ किछु एकटा सपना सन लागैत छलै। ओहि दिन गपे-गप मे सचिन नीतासँ पुछिये देलखिन। ‘नीता, अहाँ हमरासँ दोस्ती किऐ करैले चाहै छी।’ ‘अहाँमे हम एकटा किछु पाबैत छी, जे हमरा नीक लगैत अछि।’ ‘देखियौ नीता, जिनगी बड पैघ अछि, हमन एखन छी बेरोजगार। हमरा संगे अहाँ खुश नहि रहि सकब।’ ‘ओ सभ छोड़ि दियौ। से कहब तखन तँ हम तँ नृत्य करैत छी। जखन कोनो कार्यक्रम भेटैत अछि तखने हम कमबैत छी। से ताहि हिसाबे हम तँ अहूँसँ पैघ बेरोजगार छी।’ ई कहि कऽ नीता ठठा कऽ हँसि देलक। नीताक तर्क आ गोसाँइ भेलापर मना करबाक बादो देखैले आबैक गप सचिनक आत्मामे बसि गेलै। ओ सोचै लगलाह जे गोसाँइक कारण दुनियामे कतेक लोक मरि गेल। हुनकर नीक दोस्तो छाँह काटैए। ई छूतिक बीमारी छिऐ तखनो नीता हुनका देखबा लेल आएलि। ई कतेक सोचै बला गप अछि। समए बीतैत गेल, दुनूक दोस्ती प्रगाढ़ भेल गेल। एहि बीज सचिनकेँ एक ठाम नौकरी लगलै मुदा दू मास नहि बीतल होएतैक जखन ओकरा फेर नीक अखबारमे नौकरी भऽ गेलै। पी.एफ कटै लगलै, नीक दरमाहा भेटै लगलै। एहि बीच एक दिन जखन सचिन दिल्लीक पश्चिम-विहारमे नीताक घर गेलाह तँ ओ नीताकेँ चुम्बनक प्रस्ताव रखलखिन तँ ओ मानि मुदा दुनूक मुँह लाल-लाल भऽ गेलन्हि। एहि बीच दुनू एक-दोसराक पूरक भऽ गेल छल। जतए सचिन नीकसँ अपन ऑफिसमे काज करैत छल ओतए नीता बाल-उत्सव, बिहार-उत्सव आ आर कतेक कार्यक्रमक नीकसँ आयोजन कएलक। संगे-संग दुनू खूब घुमैत छल। कहियो सचिनक डेरापर नीता आबि जाइत छलि तँ कहियो नीताक घरपर सचिन पहुँचि जाइत छल। दुनू गोटेकेँ निन्न एक दोसराकेँ शुभ-रात्रि करबाक बादे आबैत छलै। नीताक सभटा मेल सचिन आपरेट करैत छल। अमृतसरक एकटा नामी स्कूल लेल नीताकेँ प्रोजेक्ट भेटलै। ओ ओतए जाए लगलीह आ बिदा करबाक लेल सचिन नई दिल्ली स्टेशन पहुँचल छल। ओ चिंतित छल जे जाहि लड़कीक लेल ओ एतेक समए बरबाद कऽ रहल छल से ओकर जिनगीसँ जा तँ नहि रहल छलै। गपमे सचिन कहि देलखिन- ‘हे नीता, एहन पागल लोककेँ अहाँ देखने छिऐ जेकरा बुझल छै जे ई ओकरा नञि भेटतै तकरा बादो ओ प्रेम करैत अछि।’ पत्रकार हेबाक कारण सचिन कोनो गप एहन आसानीसँ कहि दैत छल जे ककरो मोनकेँ तीत कऽ दैत अछि। ई ओकर आदति बनि गेल रहै जेकरा ओ चाहियो कऽ नहि बदलि सकैत छल। ई गप सुनि कऽ नीता ओकर हाथ पकड़ि लेलक आ आपन आंगुरकेँ ओकर आंगुरमे फँसा कऽ कहलक- ‘सचिन, एना अहाँ किऐ बाजैत छी। जे भगवान चाहलक तँ हम अहाँक भऽ जाइब।’ ‘तखन की हमर मरण होएत। एक दिस घरक लोक रहत, दोसर दिस हमर प्रेम।’ ई सुनि लागल जे नीताक देहमे जान नहि छैक। ओकर मुँह चुप रहि गेल आ ओ एकटक्कीसँ सचिनक मुँह देखए लागल। ताधरि शताब्दी ट्रेनक सीटी बाजि गेल आ दुनू गोटे एक-दोसरक गरा मिलि बिदा लेलक। जाधरि ट्रेन नई दिल्लीक एक नंबर प्लेटफार्मसँ निकलि नहि गेल ताधरि सचिन चलैत ट्रेनकेँ देखैत रहि गेल। सत मानू तँ दुनू गोटाक बीच प्रेम तकरा बादे बढल। अमृतसर तँ नीता चलि गेलि मुदा कोनो दिन नहि बीतल होएत जाहि दिन भोर ओ रातिमे सुतएसँ पहिने फोन नहि करथि। आठ दिन बीतल, एना लागैत छल जेना आठ बरख बीति गेल छल। बारह बजे राति तँ छोड़ि दियौ चारि बजे भोर सेहो नीता फोन करैत छल। जेखनकि ओ जानैत छल जे तीन बजे सचिन आफिससँ आबैत अछि। अमृतसरक डी.ए.वी. कॉलेजक छात्र-छात्राकेँ ओ नृत्य सिखाबैत छल। ओकर कोरियोग्राफी क्षमताक आकलन एना कऽ सकैत छिऐ जे ओहि साल डी.ए. वी. कॉलेज ऑल इंडिया इंटर कॉलेज कंपीटिशनमे पहिल रहल। जखन ओकर सिखायल टीम एनाउंस भेल छल, नीताक आँखिमे पानि आबि गेल छल। सचिनसँ फोनपर गप करबाक लेल ओ व्याकुल भऽ गेल। ठामसँ बाहर निकलि ओ फोनपर कहलक, ‘हेलो। सचिन अहाँकेँ बुझल अछि ?’ ‘की ?’ ‘हमर टीम देशमे फर्स्ट आएल छल। जहिना रिजल्ट एनाउंस भेल तहिना प्रिसिंपल सभ लोकक आगू मंचपर गरा लगा लेलक।’ ‘ओहो। की गप अछि, अहाँकेँ मेहनतिक फल भेटि गेल।’ ‘हँ, से तँ अछि’ तखने सचिन हंसी-ठठ्ठा कएलक। ‘मुदा अहाँ जेकरासँ प्रेम करैत छी से ई रिजल्ट नहि होइत तँ की होइत ?’ ‘हँ, अहाँक संग नहि भेटितए तँ ई नहि भऽ सकैत छल’- सकुचाइत नीता फोनपर बाजलि। ‘एहिमे हमर की योगदान अछि ? अहाँक मेहनति अछि।’ देर राति भऽ गेल छल। नीताक प्रेमक अंकुरण ओकर मोनमे भऽ रहल छलै। अन्तमे बाजल- ‘आइ अहाँक मोन पड़ि रहल अछि।’ ‘किए ?’ ‘किएक तँ हम अहाँसँ प्रेम करैत छी ।’ ‘चलू अहाँ खेनाइ खा कऽ जा कऽ सुति जाऊ, भोरेसँ कार्यक्रममे लागल छी ।’ एकर बाद दूनू गोटे फोन राखि देलखिन। दूनू गोटे कैरियरकेँ लऽ कऽ सीरियस रहथि। सचिन एहि बीच नीताक वेबसाइटो बना देलखिन। सभटा फोटो खीचाबैक लेल नीता सचिनक संग दिल्लीक लोधी गार्डन गेल छल। जेना-जेना सचिन कहलक तेहने-तेहने फोटोग्राफर फोटो खिचलक। सभटा फोटो हुनकर बेवसाइटपर धऽ देलखिन्ह। एहि बीच फोर्ड फाउंडेशनक फार्म भरैक आवेदन निकलल। अहाँकेँ बता दी जे जिनका फोर्ड फाउंडेशनक अन्तर्गत स्कॉलरशिप भेटल अछि ओ दुनियाक कोनो संस्थानसँ एम.ए. क पढ़ाइ कऽ सकैत अछि। सभटा पाइ संस्थान दैत अछि। सचिन अप्पन तँ नहि मुदा नीताक फार्म भरि देलखिन। संजोग एहन जे पहिलुक स्टेपमे नीताक चयन भऽ गेल। नीताक सफलता सचिनक सफलता छल। दुनू गोटे खुश भऽ गेलाह आ घरक लोक सेहो खुश भऽ गेल। भोरसँ लऽ कऽ रातिमे सुतै धरि पचासो बेर फोनसँ सभटा गप दूनू एक-दोसराकेँ बताबथि। दुनू झगड़ो खूब करथि मुदा प्रेममे कोनो कमी नहि आएल। सचिन तँ हुनका पर एकटा कवितो लिखने रहथि। दुनू दिल्लीक मंडी हाउससँ लऽ कऽ लक्ष्मीनगर, मयूर विहार फेज तीन, रमेशनगर, पश्चिम विहार आर कतेक ठाम जाइ छलाह। एहि बीच नीताक स्तनमे दर्द रहए लागल। हुनका डर भऽ गेलन्हि जे ब्रेस्ट कैंसर भऽ गेल छनि। दिल्लीमे ओ अपन काकाक संग रहैत छल से हुनका ई गप नहि कहि सकल। ओ सचिनकेँ ई गप कहलन्हि। नीता चिंतामे रहए लागल जे कैंसर भऽ गेल छन्हि। आब जिनगी तँ ओंगरीपर गनैक गप अछि। ओ डॉक्टरोसँ देखबैक पक्षमे नहि छल। मुदा सचिन अप्पन जिदपर नीताकेँ एस्कार्ट अस्पताल लग होली फैमिली अस्पतालमे देखाबैक लेल लऽ गेल। सचिनक कहब छलनि जे होली फैमिलीमे देखा लेब। नहि किछु भेटत तँ ठीक, नहि तँ दोसर अस्पतालमे देखाएब। दुनू गोटे अस्पताल गेलाह मुदा किछु नहि भेटलन्हि। डॉक्टर कहलखिन जे ‘पीरियड’ क आगू-पाछू भेलासँ एना भऽ जाइत अछि। किछु दिन बाद ठीक भऽ जाएत। नीता डॉक्टरक एहि गपसँ संतुष्ट नहि भेल। ओ किछु दिन धरि परेशान रहलि मुदा एकटा पुरान दोस्तक संग ‘सर गंगाराम अस्पताल’ मे जाँच करौलनि। दू दिन धरि भाग-दौड़ कएलनि आ सचिनकेँ ओतए आबैसँ मना कऽ देलखिन। ओतहु जाँच भेल मुदा रिपोर्ट पहिलुके जना रहल। अहाँ ई गप मानू वा नहि मानू मुदा अपना सभक इलाज सस्तेमे भऽ जाइत अछि तँ मोन संतुष्ट नहि होइत अछि। जखन कोनो डॉक्टर इलाजक खूब पाइ लैत अछि आ खूब आडंबर देखाबैत अछि तँ अपना सभकेँ लागैत अछि जे ई नीकसँ इलाज केलक। आर जखन कोनो डॉक्टर इलाज काल खूब इंतजार करबैत अछि तँ हम ई बुझैत छी जे ई डॉक्टर बेसी व्यस्त अछि ताहिसँ ई नीक डॉक्टर अछि। ई गप सत्तो होइत अछि मुदा देशमे 90 प्रतिशत डॉक्टर नौटंकी करैत अछि। नीता ओहि समाजसँ छल जे एहि गपकेँ नहि बुझैत छल। सर गंगाराम अस्पतालमे जखन पाइ खर्च भेल तखन हुनका संतुष्टि भेलन्हि जे हमर इलाज भेल। एहि बीच दुनू गोटेक घरक लोग ब्याह करैक लेल गप शुरू कएने छल। सचिनक घरक लोक ब्याहक लेल कएक गोटेक संग गप चलौलक मुदा पसीन नहि पड़लैल। दोसर कात नीताक ब्याहक लेल सेहो गप चलैत छल। दूनू एक-दोसराकेँ सभटा गप कहैत छल, दुनू एक-दोसरासँ प्रेम तँ करैत छल, मुदा बियाहक लेल चुप छल। एहि बीच भगवान जानए जे की भेल। नीताक बात-व्यहार बदलि गेल छल। कोनो ने कोनो गपपर ओ सचिनसँ झगड़ा कऽ लैत छल। सचिन तखन तँ नहि किछु बाजैत छल। घर एलाक बाद ओकर आँखिमे नोर आबि जाइत छल जे जकरासँ ओ प्रेम करैत अछि, ओ एना किए करैत अछि। नीता आब एहन भऽ गेल छल जे रिक्शापर, ऑटोपर, मेट्रोपर जतए मौका भेटैत छल ओ सचिनसँ झगड़ैत छल। जखन सचिनसँ काज पड़ैत छलै तखन ओ नीक भऽ जाइत छल मुदा काज भेलाक बाद मीन-मेख निकालैत छल। लोकक आगू सचिन लग एना ओ रहए लागल जे ओकरा नहि चिन्हैत अछि। जूनक मास छल जखन नीताकेँ फेर अमेरिका जएबाक छलै। एक महीना रहैक छलै आ कतेक कार्यक्रम छलै। दू दिन पहिने ओ सचिनकेँ अप्पन घर बजौलखिन। हुनकर परोक्षमे जे सभटा काज होएत, सभटा कागज, एतए तक तक जे अपन साइन कऽ खाली चेक दऽ देलक। घरमे कियो नहि छल। दूनू गोटा खूब एक-दोसराक प्रेममे डूमि गेल छल। संगे खेनाइ खएलक। तकर बाद अप्पन-अप्पन काजक लेल कनॉट प्लेस पहुँचि कऽ बिदा भऽ गेल। दुनूक बीच संबंध तहिना छल। कखैन झगड़ा भऽ जाइत कियो नहि जनैत छल। हँ एकटा गप जरूर छल जे बिना नागा दू सालसँ रातिमे सुतैसँ पहिने नीता ‘गुड नाइट’ क संदेश मोबाइलसँ जरूर दैत छल। कहियो ‘आई लव यू’ आ ‘आई किस यू’ क मैसेजो भेज दैत छल। जाहि दिन नीताकेँ अमेरिका जएबाक छल ओहि भोर ओ सचिनकेँ अपन घरपर बजौलखिन। जखन सचिन नीताक घर पहुँचलाह तँ ओ फोनसँ टैक्सीबलासँ गप कऽ रहल छल। ओ कहि रहल छल जे एयरपोर्टसँ ओकरा एक गोटाकेँ लऽ कऽ मुखर्जीनगर जाए पड़तै। मुदा नीता सचिनकेँ देखितहि तुरंत फोन राखि देलक। सचिन एहि गपकेँ अन्ठिया देलक। दुनू गोटे संगे चाह पीबि कऽ घरसँ बहरेलाह। नीता कहलक जे हुनकर काका एयरपोर्ट छोड़ए लेल जएताह। ताहिसँ ओ अपन काज करए। ओकरा कोनो दिक्कत नहि होएतैक। नीताकेँ नाट्य वैले सेंटर जेबाक छलै आ सचिनकेँ ऑफिस। शिकागोक होटलक टिकट नीताक मेलसँ निकालि कऽ, दऽ कऽ ओ शकरपुरक दोस्तक कमरामे आराम करै लेल आबि गेल। दोस्त संग गप करैत सचिनकेँ निन्न आबि गेलै। ओ ओतए सुति गेल। निन्न खुजल तँ साँझक चारि बजैत छल। हनकर ऑफिस साँझ छह बजेसँ छल। फटाफट तैयार भऽ कऽ आफिस लेल बिदा भेल तँ नीताकेँ कऽ फोन लगौलखिन। आवाज कोनो पुरूखक आएल- ‘हेलो’ ‘हेलो के’ ‘नीतासँ गप करबाक अछि’ ‘ओ तँ एतए नहि अछि’ ‘तँ कतए अछि’ ‘अहाँ कहू, की गप अछि आ के बाजैत छी’ ‘हम सचिन बाजैत छी, अहाँ के’ ‘हम समरेंद्र, नीता तँ घरपर अछि, हम घर पहुँचि कऽ अहाँसँ गप करबा देब’ ई सुनि कऽ सचिनक तामस सातम आसमान छुबै लागल। ओकरा नहि रहल गेलै- ‘अहाँ झूठ किऐ बाजि रहल छी’ ‘हुनका हम किछु काल पहिने कनॉट प्लेसमे छोड़ि कऽ आएल छी’ ‘ओ घर कतएसँ पहुँचि गेल’ ‘हम घर पहुँचि कऽ अहाँसँ गप कराबैत छी’ कहि समरेंद्र फोन काटि देलक। सचिन खून घोंटि कऽ रहि गेल। मुदा ओकरा ऑफिस जएबाक रहै से ओ चलि गेल। ऑफिस पहुंचि ओकरा मोन नहि लागलै। कनी देरीमे नीताक फोन आएल। खूब तमसाएल जे फोन उठाबै बलासँ एना किऐ बाजलिऐ। एहि गपपर सचिन आर तमसा गेल। दुनू गोटामे घोर बहस भेलै। नीता अपन घुंघरूक सप्पत खाइत रहि गेल जे ओ ओकरेसँ प्रेम करैत अछि। दूनू गोटामे ताधरि बहस होइल रहल जाधरि नीता हवाइ जहाजपर चढ़ि गेल। सचिनकेँ बेसी तामस एहि गपक छल जे समरेंद्र किए नीताकेँ छी लेल हवाइ अड्डा गेल छल। सचिनकेँ सभसँ बेसी तामस एहि गपक छल जे आगू बला लोक किए झूठ बाजैत छल। नीताक एकटा झूठ ई छल जे ओकर चाचा ओकरा एयरपोर्ट छोड़ै लेल जाएत आ गेल छल समरेंद्र। आ झूठ बाजैबला लोकक संग ओ एयरपोर्ट गेल। ओकरा मोनमे ओ गप आबि गेलै जे भोरमे नीता फोनपर करैत छल। मुखर्जीनगरमे समरेंद्र रहैत छल। आब साफ-साफ सभ किछु सचिनकेँ बुझबामे आबै लागल। अमेरिका गेलाक बाद आठ दिन तक नीताक कोनो फोन नहि अएल। ओहि बीच सचिनकेँ हैदराबाद जाए पड़लै, बहिनकेँ पहुँचाबैक लेल। हैदराबादसँ दिल्ली आबैक रस्तामे ओ छल जखन नीताक फोन आएल। ओ कहलक- ‘सुनु सचिन, हम समरेंद्रसँ ब्याह कऽ रहल छी, घरक लोककेँ ओ पसीन अछि।’ ‘अहाँ जनैत छी जे की कहि रहल छी’ ‘हँ, अहाँक संग हमर जिनगी नहि कटि सकत, आइ हम निर्णय लऽ लेलहुँ’ ‘आब, हम की कहू। अहाँ जे निर्णय लेने छी ओ नीके होएत’ ‘अहाँ नीकसँ रहू, खुश रहू आर हम की कहि सकैत छी।’- सचिन बजलाह। ‘मुदा, अहाँ नीक काज नहि कएलहुँ। समरेंद्र नीक आदमी नहि अछि’ ‘अहाँ हुनका लऽ कऽ किछु नहि कहू’ ‘हँ, हम तँ कहब किएक तँ ओ झूठ बाजैत अछि। आ हम नहि चाहब जे हमरासँ जे लड़की प्रेम करैत छल से कोनो झूट्ठाक संग जीवन जिऐ।’ ई सुनि नीता अपनाकेँ बिसरि गेल। ओ तमैस कऽ जतेक श्राप आबैत छलै से ओ आ॓ सचिनकेँ देलक। सचिन सुनि कऽ काँपै लागल जे नीता ओकरा एतेक श्राप कोना दऽ रहल अछि। सचिनक मुँहक खखार सुखा गेलै, कोनो बकार बाहर नहि आबैत छलै। ओ आस्तेसँ एतबे कहलक- ‘गिद्धक श्रापसँ गाए नहि मरैत अछि आ अहाँ अप्पन श्राप अपनहि लग राखू, हम नहि लेब, जखन जरूत होएय लेने जाएब अहाँ।’ कहिके फोन राखि देलक। एहि बीच नीता अमेरिकासँ घुरि गेल छल। दूनू एक-दोसरक सभटा समान घुरा देलक। दूनूमे गप बंद भऽ गेलै। सचिन अपनाकेँ असगर अनुभव करए लागल आ कहुना कऽ अपनापर नियंत्रण राखलक। दोसर कियो रहितए तँ पागल भऽ जैतए। एहि बीच एक दिन सचिनक मोबाइलपर नीताक फोन आएल- ‘हेलो सचिन’ ‘हँ’ ‘केहेन छी अहाँ’ ‘जी, नीक छी। अहाँक बात भऽ गेल। समरेंद्र मरि गेलाह।’ ‘ओह, अहाँ की कहि रहल छी’ ‘हँ, अहाँ आब खुश भऽ जाउ’ ‘अहाँ झूठि बाजि रहल छी, एना नहि भऽ सकैत अछि’ ‘हँ, ई सत अछि’ ‘कोना भेल ई गप’ ‘अहाँक श्राप हमरा लागि गेल’ ‘हम तँ अहाँकेँ कोनो श्राप नहि देलहुँ, अहीं देने छलहुँ’ ‘हँ, तँ सभटा हमरा परल’ ई गप सुनि कऽ सचिन जतए ठाढ़ छल ओतहि ठाढ़ रहि गेल। ओकरा नहि फुरल जे ओ की बाजै। ‘सचिन आजुक बाद अहाँ कहियो हमरा फोन नहि करब। हम अहाँक संग कोनो संबंध नहि रखैत छी।’ ई कहि नीता फोन काटि देलखिन। सचिन सोचए लागल जे ई की भऽ गेल। हुनकासँ जे प्रेम करैत छल ओ आइ एतेक दूर भऽ गेल छल जे चाहियो कऽ ओ किछु नहि कऽ सकैत छल। मुदा, समए सभकेँ अपना तरहे जीबाक योग्य बना दैत अछि। सभ लोक कालक मोहरा अछि आ शतरंजक प्यादासँ अलग केकरो अस्तित्व नहि अछि। समय बीतैत गेल आ सचिन आइ एकटा अखबारमे नीक पोस्टपर पहुँचि गेल अछि। असगरे जखन रहैत छल तखन नीताक याद ओकरा तंग कऽ दैत छल। ताहि लेल ओ हरदम अपनाकेँ व्यस्त राखैत छल। नीतासँ दूर भेलाक बाद एखन धरि ओ तीनटा किताब लिख लेने छल। एहि बीच नहि तँ नीता ओकरा कहियो फोन कएलक आ नहि सचिन नीताकेँ केलक। ............................................................. आइ कएक साल बाद नीताक संस्थान मेलसँ नीता सचिनकेँ अपन कार्यक्रमक निमंत्रण पठेने छल। मंडी हाउसक एल.टी.जी. सभागारमे मंगल दिन साँझमे नृत्यक कार्यक्रम अछि। आइ सोम दिन अछि। तखने सचिनक मोबाइल फोनक घंटी बाजल। दोसर तरफ ओकर बॉस छल। ‘जी सर’ ‘सचिन, अहाँकेँ आइ साँझमे न्यूयार्कक फ्लाइट पकड़हि पड़त। एखन दू बाजि रहल अछि, साँझ छह बजैत टिकट आबि जाएत। जल्दीसँ घर जा कऽ तैयार भऽ जाउ। ओतए अहाँकेँ तीन दिन धरि संयुक्त राष्ट्रसंघक अधिवेशनकेँ संबोधित करए पड़त। भारत सरकार एकमात्र अहाँकेँ अपन प्रतिनिधि बना कऽ पठा रहल अछि।‘ फोन राखि सचिन अमेरिका जाइ लेल तैयार होमए लेल मेल बंद कऽ आफिससँ बिदा भऽ गेल। मनोज झा मुक्ति- मिथिला महोत्सव आ एकर उपलब्धि –मनोज झा मुक्ति जगत जननी माता जानकी अर्थात माँ मैथिलीक जन्मस्थल, प्राचीन विदेह राज्यक राजधानी आ अखुनक परिवेशमे प्रस्तावित मिथिला राज्यक प्रमुख नगरी जनकपुरमें अखन ‘मिथिला महोत्सव’क तैयारी धुमधामसँ भऽ रहल अछि । जनकपुरके यथासंभव चिक्कन–चुनमुन देखयवाकलेल युद्ध स्तरपर काज कयल जाऽरहल अछि । ओना एहि तरहें जनकपुरकेँ सजएवाक काज ई पहिलके खेप नहिं भऽरहल अछि, एहिसँ पहिनहुँ बहुतोवेर जनकपुरके सजाओल गेल छल । कहियो मिथिला महोत्सवक नामपर त कहियो कोनो राजनीतिक पार्टीक महाधिवेशन, सम्मेलन आ कहियो विवाह–पञ्चमी त कहियो आन–आन प्रयोजनक नामपर । मिथिलाक संस्कृति केहन अछि, एतुक्का वातावरण केहन अछि, बाहरसँ आओल पाहुन सबके सैह देखएवाक लेल नाना प्रकारक तामझाम कएल जाइत अछि । जनकपुर संसारक सबठामक हिन्दूक लेल आस्थाक केन्द्रके रुपमे रहल अछि । जे कियो रामायण पढने या सुनने छथि, हुनका जीवनमें जनकपुर जाएव सम्भवतः एकटा प्रवल मनोभावना बढि जाइत छन्हि । ताँए बहुत दुर–दुरसँ लोक जनकपुर देखवाकलेल अवैत छथि । ईच्छा होइतो जे देशी/विदेशी कहियो जनकपुर नहि आएल रहैत छथि, हुनका सबके एहि तरहक सम्मेलन/महोत्सव अएवाकलेल नीक अवसर जुरवैत अछि । सम्मेलन/महोत्सवक दिनक अलावा आनदिन सेहो जनकपुरमे प्रायः भिडभाड रहिते अछि, तथापि विषेश अवसरमें अनदिनासँ तेब्बर–चौबर लोकक भिडभाड़ लागि जाइत अछि । एहि तरहक विषेश प्रयोजनकलेल जखन जनकपुरके सजाओल जाइए, तहन ई सोंचवाकलेल विवश होमय पड़ैए जे विषेश प्रयोजन बाहेक जनकपुरक कोनहुँ महत्व नहिं ? जौं आनदिन सेहो जनकपुरक महत्व हमसब बुझितहुँ त जनकपुरके ई दुर्दशा किया रहैत ? सामान्य दिनमे दूर्गन्धित आ अव्यवस्थित शहरक नमूना लगैत जनकपुरमें विषेश दिन या महोत्सवमें मात्र डेन्ट–पेन्ट कऽ कऽ हमसब कि देखबऽ चाहैत छी ? कोनहुँ पार्टीक महाधिवेशन या सम्मेलन जनकपुरमें होइत अछि त ओहि पार्टीक नेता आ कार्यकर्ता जनकपुरके जीजानसँ लागिकऽ सजवैत अछि । विवाहपञ्चमी या परिक्रमा सन धार्मिक प्रयोजनकलेल गुठी संस्थानक माध्यमसँ आ निजी स्तरसँ मठ–मन्दिरसब खर्च कऽ जनकपुरके सजाओल करैत अछि । तहिना मिथिला महोत्सव सन सन काजकलेल वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद अपन साधन–श्रोतसब परिचालन कऽकऽ जनकपुरके सजएवामे कोनो कसर बाँकि नहि रखैत अछि । आ ई अवस्था अर्थात जनकपुरके सजएवाक काज प्रत्येक ६ मास/एक वर्षपर होइते रहैत अछि, जाहिमें लगभग सऽभ मिलाकऽ करोड़ो रुपैया खर्च भऽ जाइत अछि । आ फेर–फेर हमसब एहि खर्चके निरन्तरता देवामे अपनाके गर्वान्वित महशुश करैत छी । मात्र आ मात्र क्षणिक प्रशंसाकलेल जनकपुरके सजएबाक काज हमसब कहिया धरि करैत रहब ? सम्मेलन/महोत्सवक बाद जनकपुरके किया ओ सम्मेलन/महोत्सवक आयोजक सबके जनकपुर बिसरा जाइत छन्हि ? जनकपुरक विकासकलेल दीर्घ योजना नहि बनऽमें कोन कारण अछि ? बेर–बेर जनकपुरेक सजाबऽमे जे खर्च कएल जाइत अछि से ठोसरुपसँ एकैबेर किया नहि करबाक सोंच किनकोमे अवैत अछि ? कोनो विषेश प्रयोजमे नीक आ सामान्य दिनमें अशान्त, अव्यवस्थित आ दूर्गन्धित रहऽवला जनकपुरके, सऽभ दिनलेल किया नहिं नीक आ आकर्षक/मनमोहक बनाओल जाऽ सकैया ? सम्मेलन/महोत्सवक वाहेक जनकपुरक विकासके ध्यान नहिं देवाक कारण बहुतो भऽ सकैय । राजनीतिक पार्टीक नेता सबहक गैर जिम्मेवारीपन, स्थानियवासीक जनकपुरक विकासमे अभिरुचि नहिं लेब, राज्यद्वारा जनकपुरके उपेक्षाक सिकार बनाएब, सार्वजनिक सम्पतिके व्यक्तिगत प्रयोजनमे नेता, मठाधिश सबद्वारा प्रयोग करबाक प्रवृति । एहिके अतिरिक्त जनकपुरक विकास नहिं होएबामे एकटा प्रमुख कारण अछि– एक्कहिटा काजक नामपर फेर–फेर खएबाक मनोवृति । किछुलोक एहनो छथि जिनकर सोंच रहैत छन्हि जे काज जौं एक्कहि वेरमे नीक भऽगेल त फेरसँ ओही नामपर पाई नहि निकालल जा सकैय, ताँए काज एहन कमजोर हुए जे फेरफेर करबाक मौका अवैत रहय । किछु काज जनकपुरमे एहनो देखलगेल जे दोसर प्रमुख जौं कऽदेने अछि त ओकरा फेरसँ तोरबाओलगेल आ पुनःनिर्माणक नामपर बजेटके उड़यबाक काज सेहो भेल । सबसँ प्रमुख बात ई अछि जे हमसब जनकपुरक विकासके नामपर कमाए चाहैत छी, कि वास्तविकरुपमे जनकपुरके विकास करऽ चाहैत छी ? ताइमे प्रष्ट होमय पड़त । मिथिला महोत्सव मनाएब बहुत नीक बात अछि, मुदा ई निर्भर करैत अछि एकरा आयोजन करबाक मनसाय पर । जौं वास्तविक रुपमे मिथिलाक संस्कृति, मैथिली भाषाक विकासक लेल एहि तरहक आयोजन होइत अछि त स्वागत योग्य आ प्रशंसनिय काज अछि । आ जौं अपना पार्टीक नेताके चाकड़ी करबाकलेल, एकर नामपर बजेट खएवाकलेल आ मात्र सुरखुरु बनवाक मनसायसँ महोत्सवक आयोजन कएल जाइत अछि त मिथिला एवं जनकपुरकलेल ओहिसँ पैघ दुर्भाग्य किछु नहि होएत । ‘चार दिनकी चान्दनी फिर आधेरी रात’ जे हिन्दीक कहवी अछि सैह जनकपुरके नियति बनल अछि । जनकपुरके एहिसँ उठएवाक दायित्व कि एहि तरहक सम्मेलन/महोत्सवक आयोजककेँ नहिं ? जनकपुर, मिथिला आ मधेशक राजनीतिकके प्रमुख केन्द्रक रुपमे रहल अछि । जनकपुर मिथिला, मधेश, नेपाल आ सम्पूर्ण हिन्दू सबहक परिचायक अछि । जौं जनकपुरके सबदिनलेल स्वच्छ आ व्यवस्थित हमसब राखऽसकलहुँ त जनकपुरके परिचय करेबाकलेल सम्मेलन आ महोत्सव अएनाइ या मनेनाई जरुरी नहि रहि जायत । मात्र सम्मेलन आ महोत्सवमे जनकपुरके सजाएव अखन कौआके बकुला बनाएब जकाँ हाँस्यास्पद काज मात्र प्रतीत होइत अछि । किया त अनदिना अर्थात सम्मेलन आ महोत्सवक बाहेकदिनक जनकपुर हमरा सबके वास्तविक परिचय दैत अछि । कहियाधरि जनकपुर नीक बनवाकलेल सम्मेलन आ महोत्सवेके बाट जोहैत रहत ? हमसब सोंचव की... ? सुजीतकुमार झा नेपालमे मैथिली भाषामे पढाइ: उत्साह कम निराशा बेसी अपन मातृभाषाक उत्थानक लेल नेपालक हरेक जनता जागल अछि । कोना बेसी अधिकार प्राप्त हुए ताहिमे सम्बन्धित भाषीसभ लागल रहैत अछि । नेपालक राजा सभद्वारा लागु कएल गेल एकटा भाषा आ एकटा भेषक सूत्रमे परिवर्तन भऽ रहल अछि । एहनमे सभ अपन अधिकारक लेल सचेत अछि । कोनो भाषाक विकासमे ओकर इतिहास, साहित्य आ लिपीके जहिना योगदान होइत छैक ताहि सँ कम ओकर भाषामे पढाइ आ भाषाक माध्यम सँ रोजागारीके सेहो नहि होइत छैक । मैथिलीके स्वर्णिम इतिहास अछि एकर अपन लिपी अछि एकर पढाई सेहो प्राथमिक विद्यालय सँ लऽ कऽ स्नात्तकोत्तरधरि होइत अछि । नेपाल आ भारतक लाखो व्यक्तिक मातृभाषा मैथिली अछि । मुदा एकर विकास जाहि गति सँ होएबाक चाही से नहि भऽ रहल अछि । उपलब्धी सेहो ओतेक नहि अछि । पढाइके स्थिति मैथिलीमे प्राथमिक विद्यालय सँ स्नात्तकोत्तरधरि पढाइ होइत अछि । नेपाल भारतक विभिन्न विश्वविद्यालय में एकर पढाइके मान्यता अछि । नेपालमे मिथिला राज्य स्थापनाकें चर्चा चलिते विद्यार्थीसभ मैथिली पढाइके अपन भविष्य बनाबय लागल छथि । नेपालक त्रिभुवन विश्वविद्यलय अन्तर्गत भऽ रहल एमएकेँ पढाईमे मैथिली विषय लऽ कऽ जनकपुरमे मात्र एक सय सँ बेसी विद्यार्थी अहि वर्ष नामाकंन करौने छथि । पाँच वर्ष पूर्व एमए मे दूटा तीनटा विद्यार्थी रहैत छल । मुदा तीन वर्ष सँ विद्यार्थीसभक चाप एकाएक बढल मैथिली विभागक तथ्यांक देखबैत अछि । तहिना नेपालमे एफएम रेडियो सभक विकासक कारण सेहो मैथिली भाषामे पढाइ दिस लोक अग्रसर भेल अछि । नेपालक ४० टा एफएम रेडियो मैथिली भाषामे समाचार आ कार्यक्रम प्रशारण करैत अछि । नेपालक किछ टेलिभिजन सेहो मैथिलीमे समाचार देबय लागल अछि । अहि सभ सँ मैथिली भाषा लिखय आ जानयबलाके मँाग कसि कऽ बढ़ल अछि । फेर प्राथमिक विद्यालयमे सेहो नेपालमे मैथिलीकेँ पढाइ होइत अछि । २०५६ सालमे मैथिलीकेँ प्राथमिक तहमे पढाइक लेल किताब छपाएल । तहिया सँ विभिन्न विद्यालय सभमे पढाइ होइत अछि । अहि क्रममे अखन फेर सँ प्राथमिक स्तरक पढाईक लेल ४० हजार किताब छपाबयकेँ काज चलि रहल अछि । नेपालक सप्तरीमे मैथिली पढाइकेँ केना व्यवस्थित कएल जाए ताहि लेल बभनगामा कट्टीक प्राधानाध्यापक जबाहर लाल देबक नेतृत्वमे मैथिली पढाइ उत्प्रेरक कार्यदल गठन कएल गेल अछि । ओ दल विभिन्न जिल्लामे कोना किताब पठाओल जाए सँ लऽ कऽ पढाइ केना शुरु कएल जाए ताहिमे अग्रसर रहल कार्यदलक सचिव देवेन्द्र मिश्र जानकारी देलन्हि । धनुषाक बहुअर्बा माध्यमिक विद्यालयक पूर्व प्राधानाध्यापक अयोध्यानाथ चौधरी धनुषामे पहिलवेर प्राथमिक तहमे पढाइ शुरु कएलन्हि । ओ विद्यालयमे प्राथमिक तह तथा ९ आ १० कक्षामे एखनो मैथिलीमे पढाइ होइत अछि । पढाईकेँ इतिहास भारतमे बहुत पहिनहि सँ मैथिलीमे पढाइ शुरु भऽ गेल मुदा नेपालमे २००८ साल सँ पढाइ शुरु भेल इतिहास अछि । जानकी आधार स्कुलमे एकर पहिल पढाई शुरु भेल अछि । ओना २०१९ सालमे सरकारद्वारा पूर्वीय भाषाके रुपमे ९ आ १० कक्षामे पढाइके लेल अनुमति देलाक बाद जोड सँ शुरु भेल अछि । जनकपुरक सरस्वती माविमे पण्डित सच्चिानन्द झा मैथिली पढाइ शुरु कएलन्हि । फेर धनुषाक विभिन्न विद्यालयमे क्रमशः मैथिली पढाइ शुरु भेल । धनुषाक बभनगामा मावि आ नगराइन माविमे बहुत विद्यार्थी रहैत छल । बभनगामामे मैथिलीक प्रसिद्ध नाटककार महेन्द्र मलंगिया लम्बा समयधरि मैथिलीमे पढबैत रहलाह । क्याम्पसक इतिहासक बात कएल जाए तऽ २०१४ साल साउन १४ गते इन्टर कलेजक नाम सँ क्याम्पसकेँ स्थापना भेल आ स्थापने काल सँ मैथिलीक अध्ययन शुरु भेल । मैथिलीक प्रथम प्राध्यापकक रुपमे पण्डित सूर्यकान्त झा नियुक्त भेलाह आ डा. धीरेश्वर झा धिरेन्द्रके आगमन १९६१ इ.धरि ओ कुशल शिक्षकके रुपमे सुशोभित रहलाह । डा. धीरेन्द्रक करिश्माई व्यक्तित्वक कारण सभक ध्यान मैथिली दिस आएल । डा. धीरेन्द्रक प्रयासमे २०३८ सालमे जनकपुरमे त्रिभुवन विश्वविद्यालय मैथिलीकेँ केन्द्रीय विभाग खोललक । ओहि साल सँ मैथिलीके स्नात्तकोत्तरमे पठन पाठन शुरु भेल । पहिल ब्याच मे १६ गोटे छात्र रहथि । एखन क्याम्पसक बात कएल जाएत तऽ जनकपुरक अतिरिक्त सिरहा, सप्तरी आ महोत्तरीमे मैथिलीके पढाइ होइत अछि । ई जिल्ला सभमे रहल प्लस टू क्याम्पस सभमे सेहो मैथिलीके पढाइ होइत अछि । अवरोधक रुपमे मैथिली विभाग नेपाल सरकार मैथिली भाषाक विकासक लेल त्रिभुवन विश्वविद्यालय अन्तर्गत केन्द्रीय मैथिली विभाग खोलने अछि । ओकर कार्यालय जनकपुरमे रहला सँ आ मैथिली भाषाक लेल सरकारक उच्च निकाय सेहो रहला सँ विभागक दायित्व किछ आओर बढि जाइत अछि । मैथिली भाषाक स्नात्तकोत्तरमे मात्र एक सँ बेशी विद्यार्थी नयाँ ब्याचमे अध्ययन कऽ रहल अछि । मुदा पढाई नहि होइत अछि । एकर मुख्य जिम्मेदार विभागाध्यक्ष डा. पशुपति नाथ झा छथि जे तलब भत्ता पकाबय पर मात्र ध्यान केन्द्रित कएने छथि । नेपाल सरकार सँ भाषिक शिक्षाक विकास विस्तारक जिम्मा पौने विभागकेँ अहि क्षेत्रक अन्य क्याम्पस सभमे मैथिलीमे पढाई विस्तारक लेल अखन धरि कोनो योजना नहि लौने अछि । आइए, बीए कोनो विषय सँ करु मुदा एमए मे मैथिली पढि सकैत छी मैथिली विभागद्वारा आनल गेल नयाँ नीति मैथिलीकेेँ समाप्त करबाक प्रयास रहल जानकारसभ कहैत छथि । मैथिली विभागद्वारा आनल गेल नयाँ पाठ्यक्रम सेहो विवाद सँ मुक्त नहि रहल अछि । मैथिली विभागमे कार्यरत सह–प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि कहैत छथि –‘मैथिली विभागक प्रमुख डा. पशुपति नाथ झा मैथिलीकेँ आन्दोलनी नहि मैथिलीक कर्मचारीकेँ रुपमे काज करैत छथि । हुनकर दीर्घ योजना किछ नहि छन्हि । ताहि लेल एतेक समस्या भऽ रहल अछि । ओना डा. झा नयाँ पाठ्यक्रममे किछ गल्ती भेल स्वीकार करैत अहिमे सुधार करब बतबैत छथि । ओना मैथिलीकेँ सभ सँ बडका आन्दोलनी अपने रहल प्रसंगक क्रममे बेर बेर कहलन्हि । पढाइक लेल बर्तमानमे प्रयास पढाईक लेल जे नेपालमे माहौल बनि रहल अछि । ताहि हिसाव सँ विशेष रुप सँ प्रयास नहि भऽ रहल अछि । तखन मैथिलीक यूवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक प्रयास सराहनीय रहल अछि । ओ कान्तिपुर एफएमक हेल्लो मिथिला मार्फत अभियान चला रहल छथि । मैथिली पढाई उत्प्रेरक दल सप्तरीक सचिव देवेन्द्र मिश्र स्वीकार कएलन्हि ‘यदि धीरेन्द्र प्रेमर्षि बेर बेर नहि खोंचारितथि तऽ सप्तरीमे कार्यदल नहि बनैत ।’ ओना जनकपुरक मिथिला नाट्यकला परिषद, युवा साहित्यकार नित्यानन्द मण्डल, मानवअधिकारवादी विजय दत्तक सेहो महत्वपूर्ण योगदान रहल छन्हि । जनकपुरमे अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवसक अवसर पर अहिबेर निकालल गेल जुलुसमे मातृ भाषा शिक्षा पर विशेष जोड देल गेल छल । आब की ? मैथिली भाषाक विकासक लेल बहुत काज भेल अछि । मुदा एतहि सन्तोष करबाक अवस्था नहि अछि । विश्वविद्यालयक पढाईमे हरेक तहमे मैथिली भाषाक पढाई सञ्चालन करबाक लेल लविङ्ग ,कैम्पानिङ्ग, प्रचार प्रसार, क्षेत्र विस्तार, अवसरके सृजना, योजना , अनुगमन, कार्यनीति, रणनीति आ व्यवस्थापनक आवश्यक्ता अछि । अहिके लेल त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाल सरकार, गैर सरकारी संस्था, स्थानीय निकाय सहितक अग्रसरताक आवश्यक्ता अछि । तहिना आवश्यक्ता अछि आन्दोलनक आ ओकर कुशल नेतृत्वकेँ । मुदा ई जिम्मेबारी के लेत ? मिथिला ओकर प्रतिक्षा कऽ रहल अछि । बिपिन झा बिपिन झा कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र) आजुक युवा में एकटा बहुत पैघ कमी देखै में आबय लागल अछि, जे बाहरी शत्रु पर तऽ ओ सहजता सँऽ विजय प्राप्त कय लैत छथि मुदा आन्तरिक शत्रु काम, क्रोधादि पर ओ विवश भय जाइत छथि। जाहि कारण बहुत बेर ओ सफलता सँऽ वंचित रहि जाइत छथि अथवा ई कहब उचित होयत जे आंशिक सफ़लता प्राप्त करैत छथि। Earl Nightingale केर अनुसार सफलता क आशय “Progressive realization of worthy goal” अछि। अस्तु, सफलता क्षणभरिक कार्य सँ नहि अपितु निरन्तर उद्यम सँ संभव अछि। एहि संदर्भ में किरातार्जुनीयम् (महाकवि भारवि केर अनुपमकृति, संस्कृत महाकाव्य) क प्रथम सर्गक एकटा श्लोक स्मरण में अछि जतय दुर्योधन कें एहि कारण प्रशंसा कयल गेलैक जे ओ अपन समस्त आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कय समय केर नियमपूर्वक विभाजन कय जनता क सेवा में लागल अछि। ओतय ओकर सम्बोधन दुर्योधन केर् अपेक्षा सुयोधन कहनाई उचित बुझल गेल छैक। यदि आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कयल जाय तऽ दुःसाध्य काज सेहो सम्भव छैक। क्षणभरि धैर्य नहि रहब साल भरिक परिश्रम कें व्यर्थजँका सिद्ध कय दैत अछि (’जका’ एहि कारण कहल गेल जे परिश्रम कखनहु व्यर्थ नहिं जाइत अछि )। धैर्य केर उदाहरण एहि प्रकारें देल जा सकैत अछि- एक व्यक्ति केर व्यापार ओहि समय ठप्प भय गेलैक जखनि ओ मात्र २१वर्षक छल। २२ वर्षक अवस्था में ओ चुनाव लडल आ हारि गेल। पुनः व्यापार में आयल जाहि में समुचित सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ मात्र् २४वर्षक छल। जखनि ओ २६ वर्षक छल अपन प्रियतमा सँ सदाक लेल दूर भय गेल, स्वाभाविक अछि ओ किछु वर्ष धरि नर्वस जका भय गेल। हारि नहिं मानलक पुनः कांग्रेसियल रेस में आयल किन्तु सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ ३४ वर्षक छल। एहि तरहें ओ जीवन रूपी समरांगण में सतत् संघर्ष करैत रहल हारि नहिं मानलक। अन्ततः ओ अमेरिका केर प्रथम राष्ट्रपति बनल। ओ छलाह अब्राहम लिंकन। कहबाक आशय मात्र एतवा अछि जे जाहि क्षेत्र में रुचि हो, ओहि क्षेत्र में बिना विचलित होइत निरन्तर आगू बढी कियाक तऽ एहि राष्ट्र कें विकसित राष्ट्र के पंक्ति में आनव मात्र सरकारी योजना सं संभव नहि अपितु समस्त नागरिक केर अथक, सांविधिक आ नैतिक नियमानुकूल समुचित कार्य सँऽ संभव छैक।
१. बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’२.राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार। ‘छीनरदेवी’बेचन ठाकुरक-
बेचन ठाकुर (चनौरा गंज) दृश्य तेसर
(स्थान-सुभाष ठाकुरक घर। दुनू परानी ललनक विषएमे गप-सप करैत छथि।) मीरा- यै ललनक बाबू, हमर विचार अछि जे आब ललनकेँ कोनो बढ़ियाँ धाइमसँ देखाए दियौक। सुभाष- यै ललनक माए, रातिमे अपन घरक गोसांइ काली बंदी हमरा सप्पन देलनि जे बौआकेँ कोनो चिक्कन धाइमसँ देखा। हम पुछलियनि जे के चिक्कन धाइम छथि तऽ ओ कहलनि जे खोपामे रोडक कातमे परवतिया कोइर नामक एकटा धाइम छथि, ओ एकदम सिद्ध धाइम छथि आ ओ जे किछु कहैत छथि से उचितो मे उचित। ओतए तोरा मोनक भ्रम दूर भऽ जेतौक। मीरा- ललन बाउ, घरक गोसांइ बड़ पैघ होइत छथिन्ह हुनक कहल नहि करबनि तँ किनक कहल करबनि। सुभाष- हँ हँ हुनक कहल करबाके अछि! ललन, ललन, बौआ ललन। (ललनक प्रवेश। ललन बताहक अवस्थामे छथि।) ललन- हमरा तों बौआ किएक कहैत छह? हम तोहर बौआ नहि छियह। हम तोहर नाना छियह। आइसँ तों हमरा नाना कहह। सुभाष- ललन नाना, हमरा सङे चलू एकठाम मेला देखै लए। मएओ जेतीह। ललन- हम पएरहि नहि जेबह। हम कनहापर जेबह। सुभाष- चलह ने, बेसी कनहेपर चलिह आ कने-मने पएरो। ललन- बेस चलह। हमरा ओतए रसगुल्ला, लाय मुरही, झिल्ली किनि दिह। बगियो कीनि दिह। मीरा- चल ने, सबटा कीनि देबौक। (सुभाष, मीरा ओ ललन जा रहलाह अछि परबतिया कोइर ओहिठाम। परबतिया गहबरमे बैसल छथि! मृदंग बाजि रहल अछि। किछए कालमे परबतियाक देहपर काली बंदी सवार भऽ जाइत छथिन्ह। मृदंग बजनाइ बन्द भऽ जाइत अछि) परबतिया- होऽऽऽ बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह हम। बोल जय गंगा। बाजह, के कहाली छह? बोल जय गंगा। जल्दी लग आबह। बोल जय गंगा जल्दी आबह। हमरा जेबाक छह बाबा धाम। फेर गंगोकेँ देखनाइ अछि।
(तीनू परानी लग जाइत छथि। ललन देह-हाथ पटकि रहल अछि। मूरी हिलाए रहल अछि। भगत पीड़ि परसँ माटि लऽ कऽ ललनक देहपर फेंकलथि। ललन शांत भऽ जाइत अछि। भगत ललनक माथक पूरा पकड़ैत छथि।) परबतिया- हओ बाबू, एकरा केलहा नहि छह। जे कियो तोरा कहैत छह जे एकरा केलहा अछि से तोहर कट्टर दुश्मन छियह। तोरा दुनू दियादमे झगड़ा लगाबए चाहैत छह। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह। हओ बाबू ओ तोरासँ ऊपरे ऊपर मुँह धएने रहैत छह। ओ आस्तीनक साँप छियह। हओ बाबू तोड़ै लऽ सब चाहैत अछि मुदा, जोड़ै लऽ कियो नहि। बोल जय गंगा। ओ बड़का धुर्त्त छह, मचण्ड छह। सुभाष- सरकार, हमरा बहुते लोक कहलक जे अहाँक छोटकी भाबो पहुँचल फकीर अछि। ओकरहि ई कारामात छी। परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, कने तोहुँ सोचहक, अकल लगाबहक जे जदि डाइनकेँ एतेक पावर रहितैक तँ ओ अपन विद्यासँ सौंसे दुनियाँपर शासन करैत रहितैक। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री, एस.डी.ओ., कलक्टर, थाना-पुलिस बैंक सभटा वएह रहितैक ने। बोल जय गंगा। हओ बाबू, डायनपर विश्वास केनाइ खाटी अंध विश्वास छी। ई मोनक भ्रम छी। ई मोनक शंका छी। बोल जय गंगा। हओ बाबू, अगर शंकाबला आदमी केकरो हँसैत देखि लेलक तँ ओकरो होइत छैक जे ओ हमरेपर हँसल। तें हम यएह कहबह जे तों नीक लोक लागैत छह, एहि भ्रममे नहि पड़ह। नहि जौं पड़लह तँ सत्यानाश भऽ जेतह। हम तोरहि घर गोसांइ काली बंदी बाजैत छियह। बोल जय गंगा। हओ बाबू, आब हमरा देरी भऽ रहल छह, हमर विमान ऊपरमे लागल छह। मीरा- सरकार, ई ठीक कोना होएत, से उपए बता दथुन्ह न? ई एना किएक करैत अछि? परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, एहि छौंड़ाकेँ छीनर देवी लागलि छह। सुभाष- छीनरदेवी हटत कोना? परबतिया- हँ हटत, नहि किएक हटत? जल्दी तों एकर बिआह केहनो लड़कीसँ करह। सभ ठीक भऽ जेतह। आओरो कोनो कष्ट छह? सुभाष- नहि सरकार, जदि अपने सहाय रहबैक तँ कोनो कष्ट नहि होएतैक। मीरा- सरकार, कने विभूति दए दिअ।
(परबतिया मीराकेँ विभूति देलनि।) परबतिया- बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। आब हम जाइ छियह। बाबा धाम। (कहैत कहैत काली बंदी चलि जाइत छथि।) सुभाष- सरकार, अपनेक दक्षिणा? परबतिया- पाँच टका मात्र। सुभाष- सरकार एतबै? परबतिया- हँ पाँचहि टका मात्र। उहो गहबरमे प्रसाद चढ़ाबए लेल। हमरा गहबरमे ठकै फुसलबै बला काज नहि होइत अछि। हमरा गहबरमे कलयाणक आ संतोषक गप होइत अछि। शंका वा भ्रम बढ़ाबए बला नहि, पूर्णतः हटाबए बला गप होइत अछि आब अपने सभ जाउ। एकर बिआह जल्दी करु, छीनरदेवी भागि जाएत। (तीनू परानी माथा टेक कऽ प्रणाम करैत छथि आ आर्शीवाद लऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि।) पटाक्षेप दृश्य चारिम क्रमशः 2. राधा कान्त मंडल ‘रमण’ जन्म- 01 03 1978 पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल गाम- धबौली, लौकही भाया- निर्मली जिला-मधुबनी षिक्षा- स्नातक
मैथिली एकांकी
कने हमहूँ पढ़व
पात्र परिचय 1. धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि। 2. चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ 3. दुखना गरीव व्यक्ति 4. दुखनी ‘‘ ’’ 5. अमर ‘‘ ’’ 6. रीता ‘‘ ’’
प्रथम दृश्य
(दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की तहि बीचमे दुखनाक प्रवेश)
दुखना- सुनै छहक ने?
दुखनी- अहाँ बाजू ने की भेल हेँ?
दुखना- आइ बच्चा सभ की खतौ घरमे किछो छौ कि नाइ, हम तू तँ भूख मेटा लेव आ बच्चा कोना रहतौ।
(अमरकेँ प्रवेश) अमर- बाबू बाबू हमरा भूख लागल अछि माए भनस कहाँ करै छै?
दुखनी- (अमरकेँ कोरामे लैत भगवानकेँ तरफ देखि कऽ छनि) हे भगवान हम तँ नोर पी कऽ अपन जीवन बीता रहल छी आ ई बच्चा कोना जीयत? (दुखनी यएह बजैत सोचमे डूबि जाइत अछि।)
दोसर दृश्य
(मुखिया जी आ हुनक मुंशीकेँ संग बात चीत)
धनिक लाल- (मुंशीकेँ इशारा करैत) हे रौ हे रौ मुंशिया से कतेक दिन भऽ गेलौ बही खाताकेँ लेखा जोखा, बही खाता ठीक छौ की ने।
चम्पतलाल- (डराइत बाजल चम्पतलाल मुंशी बाजल) जी ......जी मुखिया जी, ठीके -ठाक छै।
धनिकलाल- हेरौ आय कालि तँ लेन-देनक कार-बार भऽ रहल छै किने।
दुखनाक प्रवेश
दुखना- (मुखिया जीक पएरपर गीर पडैत अछि।) मालिक भऽ....भगवान हमर......।
(परएपर सँ दुखनाकेँ उठबैत मुखियाजी)
मुखिया- रै दुखन बाज तोरा की भेलौ जे तू एतै व्यग्र छे।
दुखना- मुखिजी हमरा घरवालीकेँ बहुत जोर मन खराप भऽ गेलै से अपने लँग दोगल एलौंहेँ घरमे फूटल कौड़ीओ नै छै जे इलाज करबै लऽ जेबे हम अहा पास रुपैआ ले ऐलौं हेन।
मुखियाजी- बाज तोरा कतेक टाकाक जरुरी छौ?
दुखना- पा..... पाँच सौ रुपैआ।
मुखियाजी- (मुंशी तरफ इशारा करैत) हे रौ मुंशीया तिजोरीसँ पाँच सौ टाका दुखनकेँ दही आ सुन ओकरा सँ वापसीक एग्रीमेट करबाले बुझलेँ की नै।
मुंशी- (रुपैआ दैत) ले रौ दुखना ई टाका ले आ हमरा सादा वहीपर एग्रीमेट कर।
दुखन- (औठामे निशान लगबैत) ई मालिक कतए कऽ देव, आइ अहीं हमर भगवान छी।
(दुखनकेँ प्रस्थान)
मंुशी- दुखनसँ सुन अगर ई टाका तों समएपर नहि देबही तँ तोरा टाकाक व्याजक ब्याज लगतौ आ सब गिरबी रखऽ पड़तौ से सुनि ले।
मुखियाजी- कतेक दिनक बाद ई एकट मोकिर धरैलो हेँ।
मुंशीजी- मऽ ... मालिक वहीपर दुखनक नाम कतेक मारबै?
मुखियाजी- (तमसाइत बजलाह) रौ मुऽऽ........मुंशीया तोरा हमर छाली घी मठ्ठा खा कऽ बुद्धिये ने तँ मोटा गेलौ।
मुंशी- (कपैत बाजलाह) जी......जी हुजूर हम आब बुझि गेलौं, जे...... जे पाँच हजारमे जेतै न मुऽऽ....मुखिया जी।
मुखियाजी- (हँसैत) ई भेलौ ने एकटा मुंशीया बुद्धि ई तँ बुझि जे हमरा अन्नक असर।
तेसर दृश्य- क्रमशः १.ऋषि वशिष्ठ-अन्हरजाली २.उमेश मंडल-रोहनियाँ आम ३. कपिलेश्वर राउत-तरकारी खेती १. ऋषि वशिष्ठ अन्हरजाली
कोर्ट परिसर भीड़सँ खचाखच भरल छलै। सह-सह करैत भीड़मे कियो प्रसन्न मुद्रामे नहि छल! सबहक मुँह-कान सुखाएल-टटाएल। फूफड़ी पड़ैत ठोर जेना जाड़क पछबापर राँइ-बाँइ फाटि गेल हो। वकील सभ वकालत खानामे बैसल बात-विचार करैत छलाह। कियो अपन मोकिरकेँ बुझबैत तँ कियो आश्वस्त करैत छल। मोकिर सबहक मुहेँ देखलासँ ओ असंतुष्ट आ दुविधाक सिथतिमे बुझाइत छल। वकील मुदा ओकरा विश्वास देबाक लेल अनेक उदाहरण दैत छल। एकटा मोकिर हाथ जोड़ने वकील सँ विनती करैत छल- ‘‘ओकील साहेब, हमर घर-घरारी सब दखल कऽ लेने अछि। कहुना उजड़ल के बसाउ, ओकील साहेब।’’ वकील साहेब ओकर स्थितिकेँ सुनैत बजलाह- ‘‘फैसला तँ अहाँक पक्षमे भइये जाएत, खाली अहाँ डाँड़ मजगुत केने ठाढ़ टा रहियौ।..........एखुनका समएमे जेहन माल तेहन कमाल।’’ मोकिरक मलिन मुखड़ापर जेना कनेक प्रसन्ताक रेखा उभरलै। वकील साहेब अपनैतीक भावसँ पुछलनि- ‘‘अहाँ समंगर छी कीने यौ?........कहबी ठीके छलै जे दस टके नै नितराइ, दस समांगे नितराइ।’’ मोकिरक कपाड़पर जेना तीनटा रेखा उभरि गेलै। चिन्ताक रेघा। वकील साहेब अपन बड़ाइक मुद्रामे बजलाह- ‘‘हमरा सभ लग नहि चलतै। अहाँकेँ किग्री दिया देब। उचित आकि अनुचित, हमरा सभ लग नहि चलै। जकरा चाहबै जीततै।..........मुदा, सहर जमीनपर कब्जा तँ अपनहि करए पड़त।’’ उदास भेल मोकिर बाजि उठल- ‘‘तखन तँ जेहने जिनते तेहने हारने। ओइ राक्षसक पालासँ जमीन छोड़ाएब हमरा बुते कहियो पार लागत? से जँ बुत्ता रहैत तँ न्यायालय किएक अबितौं।’’ वकील साहेबकेँ कोनो अशुभक अनुमान लगलनि। ओ मोकिरकेँ उत्साहित करैत बजलाह- ‘‘तैलय चिन्ता करबाक काज नहि छैक। सभ बेवस्था छै किने! पहिने हमरा केश तँ जीतऽ दिअ।’’ मोकिर जेना आरो गंभीर भऽ गेला। वकील साहेब रंग-बिरंगक आर व्यान सभ सुनबए लगलखिन- ‘‘एन्ना, फल्लाँ ठाँ मामिला छलै......... तँ एन्ना जीता देलियै!.......एसेटा पठेलियै कि बस्स......... सभ घर धऽ लेलकै! अपनहि जग्गह खाली कऽ देलकै।’’ मोकिर तैयौ जेना आश्वस्त नहि भऽ रहल छल। हल्ला-गुल्ला सबहक बेचैनी जेना बढ़ले जाइत छलै। भीड़मे कियो स्थित भऽ ठाढ़ नहि छल। सभ अपसियाँत भेल। एम्हर-ओम्हर झटकरैत। एकटा अधवयसू खसैत-पड़ैत वकालतखान दिस दौड़ल आएल। कहाँ छथि ओकील साहेब?..... हमरा बचाउ ओकील साहेब! हमरासँ घोर पाप भऽ गेलए।’’ वकील साहेब सभ साकंच भऽ बैसलाह। सभ एहि मोकिरसँ गप्प करए चाहैत छलाह। आखीर की बात छै? ओना ई मोकिर अछि बेस आर्त्त। अर्थात मोटगर असामी’’ तखन एकरासँ जे मांग करियौ भेटतै।....... मुदा ई लक्ष्मी ककरा कपारमे लिखल छथि से नहि जानि.........!’’ सभ वकील यएह सोचैत छलाह। एकटा सीनियर वकील जेना मोकिरकेँ झपटलनि- ‘‘की बात छै से तँ बाजू। तखन ने कोनो रास्ता निकालब हमसभ।’’ मोकिर मुँहसँ जेना अनायास बजा गेलै- ‘‘भोर-भोर टहलैत छलाह, सड़कक कातमे एकटा मुर्दा छलै। हम ठाढ़ भऽ ओकरा देखिते छलौं कि केम्हरोसँ पुलिस आएल।........ओ कहए लागल जे तोंही खून केलहीए?’’ सीनियर वकील गंभीर भऽ प्रश्न कएलनि- ‘‘पुलिस अहीकेँ खूनी कहैए?’’ - ‘‘हँ! मुदा.......?’’ - ‘‘मुदा तुंदा किछु नहि। पुलिस खूनी कहि देलक तँ अहाँ सरकारक घरमे खूनी घोषित भऽ गेलहुँ। .......आब जखन अहाँकेँ ई प्रायश्चित लागि गेल तँ एकरा कटेबाक प्रयास करु।’’ - ‘‘एहनो अनर्गल भेलैए?’’ - मोकिर आश्चर्यचकित भऽ प्रश्न कएलनि। सीनियर वकील मोकिरकेँ बुझबैत बजलाह- ‘‘देखियौ, उचित-अनुचितक फेरिमे जाएब तँ बातक बतंगर भऽ जाएत। बुधियारी अहीमे अदि जे कहुना एहिसँ फारकत्ती पाउ।’’ मोकिर चिन्तित भऽ बाजल- ‘‘तँ हमरा कहुना उबारु!’’ सीनियर वकील कागजपर किछु लिखए लगलाह। देासर टपकैत बाजल- ‘‘ओना तँ ई खूनी केश छै, एहिमे सजाए फाफ होएब आ सोंस-घड़ियारलक मुँहसँ जीबैत निकलब एक्के बात भेलै।’’ सीनियर वकीलकेँ जेना केश छिनेबाक अनुमान लगलनि। अेा दोसर वकीलकेँ डपटैत बजलाह- ‘‘खूनी केश छै तँ कि भेलै। हम दस आना गारेंटी लेबै जीतबाक।’’ दोसर वकील टेबुल ठोकलक- ‘‘सीनियर भऽ कऽ दसे आना गारेंटी? हम तँ बारह आना गारेंटी लेबनि।’’ मोकिर दुविधामे ठाढ़ भेल दुनूक मुँह तकैत छल। सीनियर वकील अपन बेइज्जतीक अनुभव केलनि ओ तमकेत बजलाह- ‘‘चलह, चलह! कीदन नै चलय तँ केराके भार! सीनियर भेलौं हम आ ठीका लेथिन ई! कहलके जे......मुहक खतियौन नहिये होइछै।’’ मोकिर गुम्मी लधने दुनूक उतरा चौरी देखैत रहल। सभ वकीलो किछु कहबाक लेल सगबगाइत छलाह मुदा सीनियर वकीलक तामस देखि चुप्प छलाह। दोसर वकील गप्पकेँ आगाँ बढ़बैत बाजल- ‘‘हम मुँहसँ दाबी नहि करै छियै, जीता कऽ देखा दै छियै। आइ तक हम एहन एकोटा केश नहि हारलैंहेँ.......ई हमर रेकार्ड अछि।’’ मोकिर देासर वकील दिशि आकृष्ट भेल। सीनियर वकील जेना दोसरकेँ चित्त करबाक प्रयास केलनि- ‘‘ई सरकारी केश भेलै आ सरकारी केश हम आइतक नहि हारलौंहेँ। हमरा आगाँ सरकारी वकीलक कहियो गजहा नहि ठहरै छै। ओ तँ हमरा देखिते नाङरि सुटकाकऽ बिल धऽ लैइए।’’ मोकिर किछु निर्णय लेबामे असमर्थ छल। सीनियर वकील अपनाकेँ निर्लोभ साबित करबाक प्रयार केलनि- ‘‘औ बाबू, हमरा अहाँक केश लड़बाक सेहन्ता नहि अछि अहींक नीक लए कहलौं। आब अहाँकेँ जे नीक बुझाए सएह करु....।’’ देासर वकील संकेतक भाषामे बाजल- ‘‘जाउ! कटाउ ग!’’ एतबा कहैत दोसर वकील ओतए सँ ससरि गेल। मोकिर आ सीनियर वकीलमे खूब विचार-विमश्र भेलै। समए बितैत गेल। वकील साहेब मोकिरकेँ ब्यान देबाक अभ्यास करबैत रहलाह। किछुए दिन कचहरीक दौड़-बढ़हा केने मोकिर सेहो चरफर भेल गेल। ......आइ मोकिरकेँ न्यायाधीसक सोझाँ ब्यान देबाक छलै। सरकारी वकील भिन्ने मोंछ ऐंठैत छल आ सीनियर वकील भिन्ने। न्यायाधीश न्यायालयमे बैसि गेल छलाह। खूनी मामिला छलै तेँ लोकोक भीड़ जूटल छलै- ब्यान सुनबाक लेल। बाहर लोकसब कलबल-कलबल करैत छल आ भीतर मोकिर, सरकारी वकील। सीनियार वकील आ पेशकार जजक समक्ष अपन-अपन भाव भांगिमा बना रहल छल। जजक आदेशसँ कार्यवाही शुरुह भेल-
क्रमशः २. उमेश मंडल रोहनियाँ आम
ओसारक ओछाइनपर सुतल सुगियाकेँ भोरहरबेमे निन्न टुटि गेल। निन्न टुटिते आंगन दिस तकलक। अमावश्याक बारह बजे रातिक अन्हार तँ नहि मुदा ओहिसँ कने साफ-फरिच्छ देखि तीनि बर्खक बेटा डोमनाक मँुह देखलक। मन कनए लगलै नीन टुटलापर की खाइले देबै..... साँझे सुति रहल तेँ ने, नै तँ रातियोमे कनैत।’’ दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि ओछाइनसँ उठि, बाढ़नि लऽ आंगन बहारए लगल। एहि आशाक संग जे नहि बहारने लछमीक बास नहि होइत छनि। मनमे उठलै, भोरसँ लऽ कऽ आध पहर राति धरि खटै छी तइयो दुनू साँझ चुल्हि नहि पजडै़त अछि। भुखल जिनगी जीवैसँ नीक बिनु दुख कटने मरि जाएब नीक। कोन लोभे जीवै छी। एत्तेटा दुनियाँमे हमर किछु नहि छी? जँ किछु नहि छी तँ रहब कतए? जँ रहौ चाहब तँ रहए के देत? विस्मित भऽ सोचैत टाटक खूँटामे बाढ़नि झाड़ि रस्ता दिशि देखए लगल। ओछाइनपर पड़ल गुलेतीक मनमे नचैत जे ने एको धुर खेत अछि जइमे खेती करब आ ने गाममे काज लगैत अछि जे खटियो कऽ गुजर करब। सरकारो तेहन धौंछ अछि जे घरारीक लेल चारि डिसमिल कि दू डिसमिल देत से जोड़िनिहारे ने कियो छैक। तखन ककरो घरारियो कना हेतइ। सोगक तर गुलेतीक मन पिचाए लगलै। मुदा तरे-तर बुद्धि ससरि बहराए गेलै। बुद्धिकेँ बहराइतै आंगन दिस तकलक तँ मन पड़लै चान। जहि ठाम लोक पहुँच रहल अछि। मनमे खुशी एलै जे एहिठामसँ नीक बास ओइठीन हएत। केहन शीतल जगह, मड़कड़ीक इजोत सन इजोत। अशोभक गाछ तर बुढ़िया टौकरी कटैए। मुदा लगले मन कसाइन हुअए लगलै। जहि चान सन रुपक आ अंगूर सन फलक बेटीक पाछु कते कोठा-कोठी, खेत-पथार डूबि गेल तेकर तयात नहि। अंगनाक मुहथरिये लगसँ सुगिया डोमन दिशि तकलक। मातृत्व जगलै। बाढ़िनिकेँ टाटक कातमे रखि बेटा लग आबि बैसलि। हवाक झोंक मनमे लगलै। अनायास मुँहसँ निकलए लगलै... नीन टुटतै कनिते उठत। साँझे सुति रहल तेँ ने, नइ तँ रातिमे सुतैयो नइ दइते। जेकरा दस मास पेटमे रखलौं तकर नोरो पोछै जोकर नइ छी। छातियो छुट्टिये गेले नइ तँ छतिये लगा लैतिऐक। तहि काल डोमन कनैत उठल। पुचकारि कऽ सुगिया कोरामे वैसाए कहलक- ‘‘धान रोपै जेबै। तइमे धान फड़तै। धान काटि अनवै। तेकर चूड़ा कुटबै। नीकहा थारीमे वौआकँे आम-चूड़ा देवई। वौआ हमर खेतै। माइयक गीति सुनैत-सुनैत डोमन चुप भऽ बाजल- ‘‘हमहूँ धान रोपए जेबउ।’’ मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘‘ताबे बुलू-भाँगू। लगले हम अबै छी।’’ सुगियाकेँ मन पड़ल रहै रोहनिया आमक चोकर। जेठक रोहणि नक्षत्र। वर्खा नहि भेने सुपक तँ नहि मुदा रौद-पक्कू रोहनिया पकै लगल। घरसँ थोड़वे हटिकेँ एकटा गाछी। आम नहि पकने बगवार नहि रहैत। आठ-दस दिनसँ चोकर सभ खसैत। जे सुगियाकेँ बुझल। तहूमे काल्हि एकटा पाकल सेहो भेटल रहै। ओहि आशासँ सुगिया गाछी गेलि। गाछक उपरमे कौआ सभ आँखि गुरेड़ि-गुरेड़ि पकलाहा आम तकैत रहए। कौआक लोल मारल दूटा आम खसल। दुनू आम नेने हँसैत सुगिया आंगन आबि बेटाकेँ दैत पुछलक-‘‘कोन आम छियै बौआ?’’ डोमन बाजल- ‘‘लोहनिया।’’ ३. कपिलेश्वर राउत तरकारी खेती
गणेश्वर नाथ महादेव स्थानमे हाट लगैत छले। हाटपर लोकक करमान लागल छल। गणेश्वर नाथ महादेवक स्थापना गणेश झाकेँ पोता जे एस. पी भेल छला, बाबाकेँ नामपर महादेवक स्थापना कऽ एकटा भव्य मंदीरक निर्माण करौलनि। अगल-बगलमे दोसरो-तेसरो भगवानक मंदिर अछि। आगाँमे पोखरि सेहो अछि। पोखरिक रकबा विघा पाँचेकसँ उपरे अछि। वएह पोखरिक पुबरिया मोहारपर हाट लगैत अछि। एकटा प्राइमरी स्कूल सेहो उत्तरबरिया मोहारपर अछि। बरसातक समए मे रौद आ पानिसँ बचबाक लेल एकटा पैघ बनौल अछि। ऊपरमे सिमटीक चद्दरासँ झाँपल अछि। ललन हाटपर कोबी बेचबाक लेल आएल अछि। हाटपर रंग-विरंगक समान सभ रहैत छै से रहै। करीब दस कट्ठामे हाट लगैत अछि। नून तेलसँ लऽ कऽ कपड़ा-लत्ता, सिनुर-टिकुलि, चन्द तरहक मसल्ला सभ, मास-माउस तककेँ बिकरी होइत अछि। माघ मास बित रहल छल आ फागुनक चढ़ंत रहै। कोवी, भाँटा, सीम, टमाटर, सालगम, आलू, मुरै, फर माने अरुआ, पालक साग, बथुआ, सरसो, तोरी, कोवी, लौफा इत्यादि ओहि दिन खूब पहुँचल छल जे पएर रक्खेक जगह नै छल। कोवी भाव दस रुपैये पसेरीसँ लऽ कऽ बीस रुपैये पसेरी छल। कोवीबला सभ माथा हाथ देने छल। ओहिमे एक शिवलाल आ ललन सेहो। ललन शिवलालकेँ पुछलक- ‘‘कि हौ भाय, की हालत छै?’’ शिवलाल कहलक- ‘‘धू, सभ चौपट्ट भऽ गेल। दुइये कट्ठामे एहि बेर मगही कोबी केने छलौं बर मेहनत भेल रहए। दस किलो डी.ए.पी, पाँच किलो पोटास, एक किलो जिंक आ छौड़-गोबरकेँ देने रहिये। तखन कोवी रोपने छलौं। दू बेर पानि से देलिये। कोबियो नीक भेल। देखि कऽ मन बड़ खुश रहए। दू किलोसँ छ-छ किलो धरि एकहक गो छत्ता अछि। मुदा भाव देखिते छहक जे पुजिओ उपर हएत कि नाइ। सुने छी जे पंडित सभ एहिबेर लगल नहि बनौने अछि। किछु लगन छैहो से जेठ-अखाढ़मे।’’ ललन बाजल- ‘‘हमरो हालत तँ सएह अछि। तू तँ दुइये कट्टामे केने छह। हमर तँ पाँच कट्टामे कएल अछि। मुदा, किछु रुपैआ नैै भेल।’’ थोडे काल उदास रहल मुदा चौंकेत शिवलाल बाजल- ‘‘हे प्याजक विआक हालत ठीक अछि। दू कट्टामे प्याजक विआ पाड़ने छी अखन सोलह रुपैयेसँ लऽ कऽ पच्चीस रुपैये तक अछि। तहन दुनूकेँ मिला कऽ घाटा नै लागत। मुदा, जे चाहैत छलौं से नै भेल।’’ ललन बाजल- ‘‘हुअअ तोरा मिला-जुला कऽ पुजी बँचलह।’’ दुनूक बीच गप-सप्प होइते छल आकि तखने बगलमे बैसल रामरुप पुछलक- ‘‘ऐना किए मुँह लटका कऽ दुनू गोटे गप-सप्प करै छह। की बात छियै?’’ ललन उत्तर देलक- ‘‘ऐँह, कोबी भावकेँ बारेमे गप-सप्प करै छी।’’ रामरुप- ‘‘धू, एहिक लेल कियो चिन्ता करए खेती छिये हौ। एकटमे जेतै तँ एकटामे आओत हम तू खेती करैत छह जँ ओकरा छोड़ि देबहक तँ कि करब। कोनो कि बाहरक आमदनी छहजे ओहिसँ गुजर जेतह। 1987ईमे बाढ़ि एलै तँ सभटा दहा भसिया कऽ लऽ गेले। मुदा लोक सभ कहाँ कोनो खेती छोड़ि देलकै। एहिबेर पानक हाल देखहक ने ततेक ने पाला खसले जे इलाकाक पान सुड्डाह भऽ गेलै। तइयो पानबला सभ पानक खेती छोड़ि देलकै। कहाँ ककरो मुँह मलीन छै। हँ तहन एकटा बात छै जे खेती एक्के रंगक नै करक चाही। जेना तरकारीये उपजाबै छह तँ दू कट्ठामे कोबी, त दू कट्ठामे बैगन, कमसँ कम दस घूरमे मूरै, दस धूरमे टमाटर, किछु मे प्याजक बिया एहिना थोरेक-थोरेक आनो-आनो खेती करक चाही। लाटमे इहो सभ रहत ने तँ मुँह मलीन कहियो नै हेतह। केहेन बढ़ियाँ शिबलाल कहलक हेन जे प्याजक बियाक बिक्रीसँ नीक आमदनी भेल। तेँ तरीकासँ काज मेहनत करह।’’ ललनकेँ रामरुपक बात जँचलै। मने-मन बिचारलक जे आगुसँ सभ तरहक खेती करब। जगदीश प्रसाद मंडल-दू टा कथा जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। प्रेमी
जगदीश प्रसाद मण्डल
फगुआक दिन। मुरगाक बाङ सुनितहि ओछाइन छोड़ि पक्षधर बाबा परिवारक सभकेँ उठबैत टोलक रास्ता धेने गौँआकेँ हकार दिअए विदा भेलाह। मनो गद्गद्। भीतरसँ खुशी समुद्रक लहरि जेकाँ उफनैत रहनि। गौँवाकेँ फगुआक भाँग पीवैक हकार दए दरबज्जाक ओसारपर बैसि गर अटबए लगलथि जे दस किलो चीनी, मसल्ला आ भाँगक पत्तीक ओरियान तँ कइये नेने छी। आब खाली बाजा-गाजा संग लोककेँ अवैक अछि। एते बात मनमे अवितहि उठि कऽ भाँगक पत्ती आ मसल्ला -मरीच, सोंफ, सनतोलाक खोंइचा, गुलाव फूलक पत्ती, काबुलि बदाम- लऽ आँगन जाए पुतोहूँकेँ कहलखिन- ‘‘कनियाँ, बुरहीकेँ पुआ-मलपुआक ओरियान करए दिअनु आ अहाँ भाँग पीसू। खूब अमैनियासँ पत्ती धुअब। तीनि सलिया पत्ती छी, जल्ला-तल्ला लगल अछि।’’ कहि ओसारपर सभ सामान सूपमे रखि दरबज्जा दिशि घुरि गेलाह। हँ-हूँ केने बिना गांधारी मसल्लाक पुड़िया निच्चाँमे रखि पत्तीकेँ सूपमे पसारि आँखि गड़ा-गड़ा जल्ला तकए लगलीह। मनमे उठलनि जे आइ बूढ़ा सनकि-तनकि तँ ने गेलाहेँ। एत्ते भाँग लऽ कऽ की करताह। मुदा किछु बजलीह नहि। आँखि उठा कऽ देखि विहुँसि नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। ओना मिथिलाक नारी आँखिमे गांधारी जेकाँ पट्टी बान्हि घरती सदृश्य सभ किछु सहैत ऐलीह। दरबज्जापर बैसि पक्षधर सोचए लगलाह- जिनगीक एकटा दुर्गम स्थान दुर्गा टपा देलनि। मने-मन दुनू हाथ जोड़ि हृदयसँ सटा गोड़ लगलनि। अपना विचारसँ सुकन्या जिनगीक प्रेमी चुनलक। कोना नहि आनन्दसँ जीवैक असिरवाद दितिऐक। जहि फुलवारीकेँ लगबैमे अस्सी सालक श्रम लागल अछि ओहि श्रमकेँ, जहिना छोट-छोट बेदरा-बुदरी टिकुली पकड़ि पुनः उड़ा दैत अछि तहिना हमहूँ उड़ा देव। कथमपि नहि। रुपनगर हाइ स्कूलक बोर्ड परीक्षाक सेन्टर प्रेमनगरक हाइ स्कूल भेल। देहाती स्कूल रहितहुँ परीक्षार्थीकेँ डेराक कोनो चिन्ता मनमे नहि। सभक मनमे एते खुशी जे डेरापर धियाने ने जाइत। सभ निश्चििन्त जे गाम-घरमे अखनो विद्याकेँ देवी स्वरुप बुझि सभ मदति करए चाहैत छथि। जँ मधुबनी सेन्टर होइतै तहन ने डर होइतए जे मेहता लौजमे सभ सामान चोरिये भऽ जाएत, तेँ असुरक्षित अछि आ प्रोफेसर कोलनीक भड़े तते अछि जे ओतेमे तँ विद्यार्थी परीक्षाक सभ खर्च पुरा लेत। ओना प्रेमनगरक सइयोसँ उपर कुटुमैती रुपनगरमे अछि, तेँ किऐक ककरो मनमे रहैक चिन्ता हएत। तहूमे प्रेमनगर हाइ स्कूलक हेड मास्टर तेहन छथि जे स्कूलक समएमे स्कूलक काज करै छथि बाकी बारह बजे राति धरि विद्यार्थीक खोज-पुछाड़िमे लगल रहैत छथि जे ककरो कोनो तरहक असुविधा तँ ने भऽ रहल छैक। तहूमे तेहन दरबज्जा अनन्दी बाबाक छन्हि जे इलाकाक लोक अपन रहैक ठौर बुझैत अछि। घर्मशल्ले जेकाँ। धन्यवाद यशोदिया दादीकेँ दिअनि जे बुढ़ाढ़ियोमे अभ्यागत सबहक ऐँठ-काँठ बारह बजे राति धरि उठबितहि रहै छथि। परीक्षासँ एकदिन पहिने लोचन सभ समान शुटकेशमे लए साइकिलसँ प्रेमनगर पहुँचल। लोचनक परिवारकेँ पक्षधरक परिवारसँ साठियो बर्ख उपरसँ दोस्ती अवैत रहनि। आजादीक हुड़-बड़ेड़ाक समए रहै। जहिना गामक धियापूता गुल्ली-डंटासँ क्रिकेटक मनोरंजन करैत तँ शहरक धिया-पूता जगहक अभावमे खेलक स्कूलमे नाओ लिखा मनोरंजन करैत अछि। तहिना पक्षधरो आ ज्ञानचन्दो आजादीक लड़ाइमे पढ़ाइ छोड़ि समाजक बीच आवि हुड़-बरेड़ामे शामिल भऽ गेला। समाजक काजमे हाथ बँटबए लगलाह। समाजमे ककरो ऐठाम बेटीक विआह होइत आ बरिआती अबैत तँ अपन बहीनि बुझि, बिनु कहनहुँ पाँच दिन निश्चित समए दिअए लगलखिन। तहिना आरो-आरो काज सभमे हाथ बँटबए लगलाह। मुदा अस्सी बर्खक उपरान्तो पक्षधर पक्षधरे आ ज्ञानचन्द ज्ञानचन्दे रहि गेलाह। कहियो कियो नेता नहि कहलकनि। हँ एत्ते जरुर भेलनि जे भाय-भैयारी भेने गाममे तते भौजाइ भऽ गेलनि जे बसन्त छोड़ि ग्रीष्मक रस्ते घेरि देलकनि। आब तँ सहजहि बुढ़ाढ़ीमे धियापूताक संग रंगो-रंग खेलै छथि आ जोगिड़ो गबै छथि। गाम स्वर्ग जेकाँ लागि रहलनि अछि। किऐक नहि मन लगतनि जहि गाममे कालीदास सन विद्वान, जे जही डारिपर बैसब ओहि डारिकेँ काटब, मुदा ने कुड़हरिक धमक लागत, ने डारि डोलत, ने दुनू हाथे कुड़हड़ि भाँजब तँ देह डोलत आ ने दुनू पाएरक वैलेंस गड़बड़ाएत। निश्चििन्तसँ जखन डारि खसए लगतै तखन ओहिपर बैसिले-बैसल धरतीपर चलि आएव, ऐहन विद्वान् सभसँ तँ गामे भरल अछि। एते दिन, अपराधीक कम संख्या रहने नजरि निच्चाँ रहैत छलैक मुदा आब ककरा कहबै अपनो घरवाली धमकी देती जे माए-बाप आ भाइ-भौजाइक पाछू लगल रहै छी आ अपना धिया-पूता लऽ किछु करबे ने करै छी। एहि जिनगीसँ जहर-माहूर खाए मरब नीक। हौ बाबू, हमरा ऐहन भ्रममे नहि दाए। एहि दुनियाँमे ने कियो अप्पन छी आ ने बिरान। सीता जेकाँ लक्ष्मणक रेखाक भीतर रहह। नहि तँ रावण औतह आ लऽ कऽ चलि जेतह। अपन-अपन पाएरपर ठाढ़ भऽ गंगोत्रीसँ निकलैत गंगाक पानि जेकाँ, जे साथीक संग उपर-निच्चाँ होइत प्रसांत महासागरमे मिलैत अछि तहिना समएक संग चलैत रहह। देखले पक्षधर बाबाक घर-दुआर लोचनकेँ। ककरो पूछैक जरुरते किऐक होइतैक। साइकिल हड़हड़ौने दरबज्जापर पहुँच साइकिलसँ उतड़ि घरक देवालक पँजरामे साइकिल ठाढ़ कए दुनू हाथे बाबाक पाएर छूबि गोड़ लगलकनि। बाबाकेँ बुझले रहनि, कहलखिन- ‘‘भने अखने चलि ऐलह। सभ सामान सरिया सेन्टरपर जा कऽ देखि-सुनि अविहह।’’ कहि पोती सुकन्याकेँ सोर पाड़लखिन। मुदा लोचनो तँ अंगना-घर जाइते अबैत रहए। सुकन्याकेँ लोचन आंगनसँ बजा अनलक। भाए-बहीनि जेकाँ दुनूकेँ देखि पक्षधर सुकन्याक कहैक बात विसरि दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, आब तँ हम चलचलौ भेलियह। तोरे सबहक पार एहि दुनियाँमे ऐहलहेँ। दुनियाँमे जते मनुष्य अछि ओ अपना समएक जिम्मा लऽ जीबैत अछि। अखन तू सभ सुकुमार कोमल किसलय सदृश्य छह। मनुष्य बनि जिनगी जीविहह। हम दुनू संगी -पक्षधर आ ज्ञानचन्द- दू जातिक रहितहुँ संगे-संग जिनगी बितेलहुँ। जे समाजोक लोक बुझैत छथि। मुदा हुनको धन्यवाद दैत छिअनि जे संगीक महत्व अदौसँ बुझैत आएल छथि। जेकरे फल छी जाति-कुटुम्बसँ कनियो कम दोस्तीकेँ नहि बुझल जाइत अछि। संगे-संग जहलो कटलौं आ एक ओछाइनपर सुतबो करैत छी। मिथिलांचलक कोनो राजनीतिक वा सामाजिक संगठनक बात होइ, मुदा कि एहि संस्कृतिकेँ आँखिक सोझमे नष्ट होइत देखियैक।’’ मन पड़लनि गाड़ीक ओ दिन जहि दिन जहल जाइत काल दुनू गोटेकेँ पैखाना लागल। हाथमे हथकड़ी। ट्रेनक पैखाना-कोठरीमे पानि नहि। की कएल जाए? जेबीसँ रुमाल निकालि दू टुकड़ी फाड़ि दुनू गोटे शुद्ध भेलहुँ। आँखि ढबढ़बा गेलनि। भरल आँखिसँ पोतीकेँ कहलखिन- ‘‘बुच्ची, दरबज्जापर रहने बौआकेँ पढ़ि नहि हेतइ। एक तँ पढ़वह कि खाक। बहुत लीलसा छल जे परिवारमे इंजीनियर डॉक्टर देखियैक मुदा हमरा सन-सन परिवारक लेल सपना नहि तँ आरो की अछि। एक दिशि पनरह-बीस लाखक पढ़ाइ आ दोसर दुइयो हजार महिनाक आमदनीक परिवार नहि। मुदा अखन बच्चा छह, आशासँ जीवैक उत्साह मनमे जगबैक छह।’’ जहिना जनकजीक फुलवारीमे राम आ सीताक प्रथम मिलन भेलनि तहिना सुकन्या आ लोचनक बदलल रुपक बीच भेल। अखन धरि जे बच्चा खेलौना सदृश्य परिवारमे छल ओकरा कानमे एकाएक जिनगीक बात पड़लै। जिनगीक लेल प्रेम भरल संगीक जरुरत होइत अछि। जिनगीक बात सुनि दुनूक देह सिहरि गेलइ। सिहरैत देह देखि पक्षधर कहलखिन- ‘‘बुच्ची, लोचन तोहर पाहुन भेलखुन। अंगनेक ओसारक कोठरी दऽ दहुन। सभ देखभाल तोरे उपर। कोनो तरहक असुविधा पढ़ैमे नहि होइन।’’ पक्षधरक बात सुनि सुकन्या शुटकेस माथपर उठा लोचनक पाछू-पाछू विदा भेल। कोठरी खुजले रहै अँटकैक कतौ जरुरते नहि पड़लैक। एक जनिया चौकी, कपड़ाक लेल अलगनी, एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी। कुरसीपर शुटकेश खोलि लोचन कपड़ा निकालि चौकीपर रखलक। चौकीपर रखितहि सुकन्या ओहि अलगनीपर रखलक जहिपर पहिनेसँ ओकर कपड़ा छलैक। साओनक झूला जेकाँ दुनूक कपड़ा झुलए लगल। किताब, काँपी, कलम निकालि टेबुलपर रखलक। एक्के कोर्सक किताव दुनूक। लोचन मैट्रिकक सेन-टप केंडीडेट आ सुकन्या मैट्रिकक विद्यार्थी। टेबुलक बगलमे लोचन लग ठाढ़ि भऽ सुकन्या किताव फुटा कऽ नहि राखि, सभकेँ जोड़ा लगा-लगा रखलक। दुनूक नजरि दुनू किताब-कापी-पेनक जोड़ापर अँटकि गेल। पहिनेसँ दोबर कितावक थाक भऽ गेल। अएना जेकाँ एक दोसरक हृदयमे अपन-अपन रुप देखए लगल। किताबक लिखावट प्रेसक होइत। तहूमे एक्के प्रेसक किताव। मुदा काँपी तँ अपन-अपन हाथक लिखल होइत। एक दोसराक काँपी उलटा-उलटा देखए लगल। देवनागरी लिखावट लोचनक सुन्दर मुदा अंग्रेजी लिखावट सुकन्याक सुन्दर। ऐना किअए भेल? एक्के हाथक लिखावट दब-तेज कोना भऽ गेल। मुदा उत्तर ककरो मनमे नहि अबैत। अनायास सुकन्याक मन नाँचल। एते काल भऽ गेल अखन धरि पानियो नहि अनलौं। धड़फड़ा कऽ कोठरीसँ निकलि छिपलीमे जलखै आ लोटामे पानि नेने आबि चौकीपर छिपली रखि हाथ शुद्ध करै लऽ लोटा बढ़ा, चौकीक गोड़थारी दिशि पलथा मारि बाबाक पाहुनकेँ खुआवए बैसि गेली। खेबाकाल पुरुख चुप रहैत, नोन-अनोनक प्रश्न किअए उठतै। समदर्शी मिथिला छियै कि ने? एक बजेसँ लऽ कऽ चारि बजे धरि परीक्षाक कार्यक्रम रहैक। पहिल दिन लोचनो दुर्ग टपै लऽ जाएत तेँ सुकन्याक मन मृगा जेकाँ नचैत। भिनसरेसँ सुकन्या लोचनपर नजरि अटकौने....... समएपर अपन काज पुरबैक अछि। हमरा चलैत जँ शुभ काजमे बाधा होयत तँ भगवानक ऐठाम दोखी हएब। मास्टर साहेबक सिखौल बात सुकन्याकेँ मन पड़ल। काजक भार तँ लोचनक उपरमे छन्हि हम तँ हुनकर मदतिगार मात्र छिअनि। तेँ नीक हएत जे हुनकेसँ पूछि लिअनि। चंचल मनमे उठलै-पूजाक तैयारीमे सभ किछु फुलडालीमे सजबैत होएत बीचमे बाधा देब उचित नहि। हो न हो फूल-पत्तीक जगहे बदलि जाइन। अनायास मनमे उठल-हाय रे बा घड़ी तँ देखबे ने केलहुँ। अगर बारह बजि गेल हेतइ तँ खुअबैक दोखी के हएत? मन व्याकुल, अव्यवस्थित वस्त्र, केश छिड़िआएल, कर्मक भारसँ भादबक अन्हरिया जेकाँ अन्हार आँखिक आगू सुकन्याकेँ पसरि गेल। कतऽ जाउ ककरा पुछियै। गाछो-बिरीछ नहि अछि जे पुछि लैतियै। अस्त-व्यस्त अवस्थामे सुकन्या माए लग पहुँच बाजलि- ‘‘भानस भेलौ?’’ ‘‘अखने। अखन तँ आठो नै बाजल हएत। ‘‘जलखै भेलौ?’’ ‘‘बच्चा कहलक एक्के बेर खा कऽ सबेरे जाएब।’’ जहिना केचुआ छोड़ैत समए साँपकेँ होइत, भले ही नव जीवन किऐक ने प्राप्त करै मुदा दर्द तँ हेबे करैत छैक। मीरा जेकाँ सुकन्या राजस्थानक तँ नहि। मिथिलाक वाला। परिवार आ समाजक सुकन्या अदौसँ समर्पित। बम्बईक धुन (गीतक धुन) बहुत मधुर होइत अछि तँ समवेत स्वरमे माए-वहिनक चैतावर, बारहमासा आ समदाउनक तँ मधु सदृश्य अछि। जहिना मधुमाछी उड़ि-उड़ि कखनो आमक गाछपर चढ़ि सोझे अपन प्रेमी मंजर लग पहुँच जाइत तँ लगले माटिपर ओंघराएल चमेलीक रसकेँ आमक रसमे महा मिश्रणक घोल बनबैत, तहिना ने छी। कोठरीसँ निकलितहि लोचनक आँखि सुकन्यापर पड़ल। हजारो रश्मि रुपी तीर दुनूक बीच टकराए लगल। मुदा दू रंग। जहिना लड़ाइक मैदानमे वीर असीम विसवासक संग मरै लऽ नहि बलिदान होइ लऽ बढ़ैत अछि, तहिना लोचनोक हृदयमे होइत। कलीक खिलैत फूल जेकाँ मुँह। मुदा सुकन्या मने-मन भगवानसँ आराधना करैत जे ‘‘कुरुक्षेत्रसँ लोचन हँसैत आबए।’’ उचंगल मन फेरि उचङि गेल। ओसारसँ निच्चाँ उतड़ितहि सुकन्याक हृदय लोचनकेँ पाछूसँ ठेलए लगल। जहिना बच्चा सभ माटिक पहीया, कड़चीक गाड़ी बना धनखेतीक माटि उघि-उघि अंगनाक ओलतीमे दऽ खुशी होइत जे हमर अंगना चिक्कन भऽ गेल, तहिना आगू-बढ़ैत लोचनकेँ देखि सुकन्याकेँ खुशी होएत। मुदा खुशी अंटकल नहि। लगले चारि बाजि गेल। मनमे उठलै भुखल भायकेँ जलखै कहाँ खुएलहुँ। जहिना किसानक खेत दहा गेलासँ व्यापारमे मंदी आबि गेलासँ, बेरोजगार भेलासँ कि भीख मंगोकेँ कियो भीख देनिहार नहि रहत तहिना जे धरती करोड़ो पतिव्रता नारी पैदा केलक वहए धरती पतिहत्यारा भऽ जहल कटबैत अछि। साढ़े चारि बजे बेरि-बेरि देखलोपरान्त सुकन्याक नजरि मौकनी हाथीपर चढ़ल गणेश जी जेकाँ लोचनकेँ अबैत देखि लोटामे पानि-थारीमे जलखै परोसि आंगनक ओलतीमे ठाढ़ भऽ देखय लगल। अखन धरिक लोचनक साइयो मनोहर रुप मनमे नाचए लगलै। कोठरी आबि लोचन गरमाएल देहक कपड़ा बदलि जलखै करए लगल। विस्मित भेल सुकन्याक मुँह बाजि उठल- ‘‘केहन परीछा भेल भाय?’’ ‘‘बहुत बढ़ियाँ। जरुर पास करब।’’ जरुर पास सुनि सुकन्याक हृदय हनुमानक राम जेकाँ देखलक। मनमे आशाक सिहकी उठलैक। संगिये तँ जिनगीक जीत दिअबैत अछि। अपन सुखद जिनगीक मनोहर रुप लोचनमे देखि सुकन्या मोहित होइत बाजलि- ‘‘औझुका पेपर तँ नीक भेल मुदा आन दिनक जँ अधला हुअए, तहन?’’ ‘‘ओ ओहि दिनक मेहनतपर निर्भर अछि। ऐकर जबाव हँ-नहिमे नहि देल जा सकैत अछि।’’ सातम दिन परीक्षाक अंत भेल। स्कूलसँ आबि पक्षधरकेँ गोड़ लागि लोचन बाजल- ‘‘बाबा परीछा समाप्त भऽ गेल। गाम जाइ छी।’’ असिरवाद दइसँ पहिनहि बाबाक मनमे उठलनि, जहन एहिठाम काज सम्पन्न भऽ गेलैक तहन रोकब उचित नहि। सबेर-अबेर भेनहुँ अपन घर तँ पहुँच जाएत। बात बदलैत बाबा पुछलखिन- ‘‘केहन परीछा भेलह?’’ मुस्की दैत लोचन- ‘‘पास करब बाबा।’’ लोचनक मुस्की पक्षधरक हृदयकेँ, सलाइक काठी जेकाँ, आनन्दक कोठरीकेँ रगड़ि देलकनि। मन पड़लनि जनकपुरक धनुष यज्ञ। ठहाका मारि कहलखिन- ‘‘भाग्य ककरो लिखल नहि होइ छैक, बनाओल जाइ छै बौआ।’’ आंगनक ओलती लग ठाढ़ि सुकन्याक मन मृगा जेकाँ व्याकुल भऽ नचैत। जहिना अपने नाभिक सुगंधसँ मृगा नचैत तहिना सुकन्याक मन परीक्षाक समाचार सुनै लऽ नचैत। मुदा दरबज्जो तँ दोसराक नहिये छी, सोचि आगू बढ़ल। दुनू गोटेकेँ माने सुकन्या आ लोचनकेँ देखि पक्षधर बाबा कहलखिन- ‘‘आइ तोँ विद्याध्ययनसँ गृहस्ताश्रममे प्रवेश कऽ रहल छह। तेँ बाबाक लगाओल फुलवारीक सुखल-मौलाएल डारिकेँ कमठौन कऽ खाद-पानिसँ सेवा करिहह। ओहिमे नव-नव कलश चलतै। जहिसँ हँसैत-खेलाइत जिनगी चलतह।’’ मूड़ी गोंतने लोचन आंगन आबि पानि पीबि किताव सरियवैक विचार केलक। कितावपर किताब गेटल देखि हाथ काँपए लगलै। सुकन्याक मन कानि उठल। जहिना कोनो धारक दुनू मोहारपर बैसल यात्रीकेँ होइत अछि तहिना सुकन्याक मनमे उठए लगल। लोचन सफलताक जिनगीमे पहुँच गेल आ हम? आशा-निराशाक क्षितिजपर लसकि गेल सुकन्या। सीमाधरि लोचनकेँ अरिआतए सुकन्या विदा भेलि। गामक सीमा बिला गेल। ने लोचन सीमा देखैत जे घुमैक आग्रह करितैक आ ने सुकन्या देखैत जे अंतिम विदाइ दइतैक। अजीव गामोक सीमा अछि। एक्को परिवारकेँ गाम मानल जाइत अछि -जेना भोजमे- तहिना दसोगाम माला बनि गाम बनि जाइत (दस गम्मा जाति) अछि। अरिआतने-अरिआतने सुकन्या लोचनक घर धरि पहुँच गेली। पनरह दिन बीतैत-बीतैत अनेको मौगिआही कचहरीमे फैसला लिखा गेल जे ‘सुकन्या पक्षधरक घरसँ निकलि अजाति भऽ गेलि।’ कचहरीक फैसला सुनि-सुनि दुनू गोटेक सुकन्याक माए-बापक करेज दड़कए लगलैक गेलइ। कनैत मन बाजए लगलैक, मनो ने अछि जे कहियासँ दुनू परिवारमे दोस्ती अछि। सभ तुर हमहूूँ जाइ छी आ ओहो सभ आबि रहैत छथि। मुदा आइ की देखि रहल छी। जाधरि पिता जीबैत छथि ता धरि एहि परिवारक हम सभ के होइ छी? समाजक लोकक जबाव ओ देथिन। पिताकेँ गामक लोकक बात कहलखिन। बेटा-पुतोहूक बात सुनि गरजि कऽ पक्षधर कहलखिन- ‘‘जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महीसि, खेत-पथार जेकाँ होइए कि ओहि समाजकेँ पँच तत्वक बनल मनुष्य कहल जा सकैत अछि। जँ से नहि त हमर कियो मालिक नहि छी। कियो ओंगरी देखाओत त ओकर ओंगरी काटि लेबइ। आइये दोस्तक ऐठाम जाइ छी आ देखि-सुनि अबै छी। जहन भाँग पानिमे अलगि गेल तहन पुतोहू बुझलनि जे भाँग पीसा गेल। पोछि-पाछि सिलौटकेँ धोय बाटीमे रखलनि। दरबज्जापर बैसल पक्षधरक मनमे उठलनि जे नअ बाजि गेल, अखन धरि किअए ने कियो आएल। फेरि मन उनटि कऽ भाँगपर गेलनि। भाँगपर नजरि पहुँचतहि मनमे उठलनि जे बिनु भाँग पीनहि तँ ने सभ निसा गेल अछि। तहन भाँगक जरुरते की? किछु दिन पहिने धरि सभ गाममे एकदिना फगुआ होइत छलै, मुदा आब तीन दिना भऽ गेल। ओना तीनि रंगक पतरो आबि गेल अछि। मुदा अपना गाममे तँ एकदिने अखनो धरि होइत आएल अछि आ जाधरि जीबि ताधरि होइत रहत। कीर्तन मंडलीक संग-संग आनो-आन पक्षधर ऐठाम पहुँचलाह। अनगिनित थोपरी बजौनिहार आ अनगिनत गबैयाक समारोह। चीनीमे धोड़ल भाँग। सभसँ उमरदार रहितहुँ पक्षधर भाँग परसिनिहारकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने नवतुरिया सभकेँ पिआबह। वहए सभ ने बेसी काल गेबो करतह आ नचवो करतह।’’ मुदा एक्कोटा नवतुरिया बाबाक बात नहि सुनलक। सबहक यएह कहब रहै जे बाबा सभसँ श्रेष्ठ गाममे छथि, अनुभवी सेहो छथि। तेँ जँ ओ गोबर खत्तेमे खसताह तइओ हम सभ नहि छोड़बनि। नवतुरियाक बात सुनि पक्षधरक मनमे उठलनि अखन आंगनमे कहाँ छी दरबज्जापर छी। दस गोटेक बीच छी। तहन के छोट के पैघ कोना हएत? सभ तँ ब्रह्मेक अंश छी। तहूमे एते टुकड़ी एकठाम एकत्रित छी। दू गिलास भाँग पीबि पक्षधर उठि कऽ ठाढ़ होइत फगुआ शुरु केलनि- ‘‘सदा आनन्द रहे एहि दुआरे, मोहन खेले होरी हो।’’ ढोलक, झालि, कठझालि, हरिमुनिया, मजीरा, खजुरी, डम्फा, गुमगुमाक संग सइयो जोड़ थोपड़ीक महामिश्रणक धुनक संग कोइली सन मधुर अवाजसँ लऽ कऽ टिटहीक टाँहि धरिक बोल अकासमे पसरि गेल। ओना जमीनो खाली नहि रहल। इंगलिश डान्ससँ लऽ कऽ जानी धरिक नाच आ मेल-फीमेलक जोगीड़ा जोर पकड़िनहि रहै। बजनियो सभ अपन-अपन बाजो बजबैत आ कुदि-कुदि नचबो करैत। गोसाँइ डूबै बेरि फेरि पक्षधर भाँग बनबौलनि। अपन शक्तिकेँ कमजोर होइत देखि दोबरा-दोबरा सभ पीलक। उत्साहो दोबरेलै। पुरनिमाक राति। हँसैत चान। फागुन मास रहने अकासमे कतौ बादल नहि। मुदा तरेगण मलिन भऽ अपन जान लऽ झखैत। किऐक नहि तरेगण अपना जान लऽ झखत? आखिर बसन्त-बसन्तीक समागमक दिन छी की ने। गामक दछिनवरिया सीमापर समन जरए लगल। समनक धधड़ाकेँ पक्षधर उत्तरसँ दछिन मुँहे कुदलाह। बाबाकेँ देखितहि सभ एका-एकी कूदए लगल। धधड़ा मिझा गेल। मुदा जरनाक आगि चकचक करितहि रहल। समदाउन गबैत सभ घरमुँहा भेलाह। 2.बपौती संप्पति
आसीन अन्हरिया चौठ। गोटि-पङरा खाऐन पीनि शुरु भऽ गेल। मातृनवमी-पितृपक्ष साझिये चलि रहल अछि। क्यो-क्यो बापो, दादा, परदादा नामसँ तँ कियो-कियो माइओ, दादी, परदादी इत्यादिक निमित्ते नति-नहि खुअबैत। जल-तर्पण सेहो परीबे दिनसँ शुरु भऽ गेल। मुदा इहो गोटि पङरे। किछु गोटे ठकिओने जे एकादशीकेँ जल-तपर्ण कऽ लेब। तहिना मातृपक्षक लेल नवमी आ पितृपक्षक लेल एकादशीकेँ न्योतहारी नति खुआ लेब। मुदा, गामक किछु जातिक बीच तेसरो तरहक होइत। ओ ई होति जे बेरा-बेरी सभ सौँसे टोलकेँ एक-एक दिन कऽ खुअबैत अछि। जेकरा ढढ़क कहैत अछि। किछु गोटे मातृपक्षक लेल महिलाकेँ आ पुरुष पक्षक लेल पुरुषकेँ न्योत दऽ सेहो खुअबैत अछि। पखक मातृपक्ष भिनौज भऽ गेल अछि। एकपक्ष मातृनवमी आ दोसर पितृपक्ष। जहिसँ नवमी मातृपक्षक हिस्सा आ एकादशी पितृपक्षक हिस्सा भऽ गेल दुनू टेंगारीकेँ घरसँ निकालि गुलटेन पच्चार दए सिलौटपर पिजबैक विचार केलक कि तमाकुल खाइक मन भेलै। चुनौटीसँ सकरी कट तमाकुल निकालि तरहत्थीपर डाँट बीछिते रहै कि पत्नी मुनिया आबि कहलक- ‘‘घरमे एक्को चुटकी नून नै अछि। भानसाक बेर भऽ गेल, कखैन आनब?’’ ‘‘अच्छा होउ, जाबे अहाँ सजमनि बनाएब ताबे हम दौड़ले नून नेने अबै छी। टेंगारी नेने जाउ कोठीक गोरा तरमे रखि देबै। हाँइ-हाँइ तमाकुल चुबए लगल। ठोरमे तमाकुल लइतै, मरचूनक दुआरे, कोनादन लगलै कि थूकड़ि कऽ फेकैत दोकान दिशि विदा भेल। एक तँ तमाकुल मनकेँ हौड़ि देलक दोसर काज टेंगारी पीजेनाइ पछुआइत देखि आरो मन घोर भऽ गेलैक। मनमे उठलै पुरने कपड़ा जेकाँ परिवारो होइए। जहिना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटब सीने दोसर ठाम मसकि जाइत तहिना परिवारोक काजक अछि। एकटा पुराउ दोसर आबि जाएत। मुदा चिन्ता आगू मुँहेे नहि ससरि रुकि गेलै। चिन्ताकेँ अटकितहि मनमे खुशी एलै। अपनापर ग्लानि भेलइ जे जहि धरतीपर बसल परिवारमे जन्म लैक सिहन्ता देवियो-देवताकेँ होइत छन्हि ओकरा हम माया-जाल किअए बुझै छी। ई दुनियाँ केकरा लेल छैक? ककरो कहने दुनियाँ असत्य भऽ जाएत। ई दुनियाँ उपयोग करैक छी नहि कि उपभोग करैक। गुलटेनकेँ देखि आमक गाछक छाँहमे बैसल भुखना कहलक- ‘‘तमाकुल खा लाए कक्का, तखन जइहह।’’ ठाढ़ भऽ गुलटेन भुखनाकेँ कहलक- ‘‘बौआ, अगुताइल छी, जल्दी दू धूस्सा दहक आ लाबह। बेसी काल नै अँटकब।’’ ऐँह कक्का, तोहूँ सदिखन अगुताएले रहै छह। तमाकुलो खाइक छुट्टी नै रहै छह।’’ कहि भुखना चून झाड़ि चुटकीसँ तमाकुल बढ़ौलक। मुँहमे तमाकुल दइते रसगर लगलै। सुआद पाबि बाजल- ‘‘बड़ टिपगर खैनी खुऔलेँ भुखन। ऐहन टिपगर माल कोन दोकानक छिऔ?’’ ‘‘काका की कहबह; दिन आठम एकटा समस्तीपुरक बेपारी साइकिलपर एक बोझ तमाकुल लऽ बेचए आएल रहै। रातिमे अपने ऐठीन रहल। ऐँह काका भरि राति हिसाबे जगौनहि रहल। जेहने खिस्सकर तेहने महरैया रहए। खाइसँ पहिने महराइ गौलक आ खेला बाद एक्के टा तेहन खिस्सा, रजनी-सजनीक, उठौलक जे ओरेबे ने करै जखन डंडी-तराजू पछिम चलि गेल तखन हमहीं कहलियै जे आब छोड़ि दिऔ। बड़ राति भऽ गेल। तखन जा कऽ छोड़लक। भिनसर भने पोखरि-झाँखरि दिशिसँ आएल तँ चाह पीआ देलियै। दलानसँ साइकिल निकालि तमाकुल सरिअबए लगल। हमहूँ गिलास धोय चक्कापर रखि एलौं कि जेबीसँ दस टकही निकालि दिअए लगल कि कहलियै- ‘‘ई की दइ छी।’’ ओ कहलक हम बेपारी छी कोनो अभ्यागत नहि, तेँ खेनाइक पाइ दइ छी। आब तोंही कहह कक्का ओकरासँ पाइ लेब उचित होएत। कि हम सभ अपन बाप-दादाक बनौल प्रतिष्ठाकेँ भँसा देब? ई तँ बपौती सम्पति छी की ने एकरा कोना आँखिक सोझमे मेटाइत देखब।’’ थूक फेकि गुलटेन कहलक- ‘‘ऐहनो कियो बूड़िबक्की करै। पा भरि खेने हएत कि नै खेने हएत, तइ ले लोक अपन खानदानक नाक कटा लेत। नीक केलह जे पाइ नै छुलै।’’ अपन बड़प्पन देखि मुस्की दैत भुखना बाजल- ‘‘ऐँह कि कहिह काका, ओहो बड़ रगड़ी, कहए लगल जे से कोना हएत। हम कि कोनो भुखल-दुखल छी, आ कि व्यापारी छी। मुदा हमहूँ पाइ नै छुलिऐक तखन ओ दस-बारह टा पात निकालि कऽ दैत कहलक, जहिना अहाँक अन्न खेलौं तहिना हमहूँ तमाकुल खाइये लऽ दइ छी। सएह छी।’’ आगू बढ़ैत गुलटेन- ‘‘बौआ अखैन औगताइल छी। नूनक दुआरे तीमन अनोन रहि जाएत।’’ थोड़बे अटि कऽ घोघन साहुक दोकान। गुलटेनकेँ देखितहि झिंगुर काका कहलखिन- ‘‘अखन धरि माथमे केश लगले देखै छिअह।’’ माथ हसोथि कऽ देखैत गुलटेन बाजल- ‘‘अखन कटबै जोकर कहाँ भेल हेन। जखन कानपर केश लटकऽ लगत तखन ने कटाएव।’’ ‘‘बिसरि गेलह। काल्हिये ने बावूक बरखी छिअह। हमरो चच्चा सहाएवकेँ छिअनि। दुनू गोटे एक्के दिन ने मरल रहथुन।’’ झिंगुर काकाक बात सुनि गुलटेनकेँ धक् दऽ मन पड़ल। बाजल- ‘‘हँ, ठीके कहलौं काका। आइ ज अहाँ भेंटि नै होइतौं तँ बरखी छुटिये जाइत।’’ ‘‘अखनो किछु नहि भेल हेन। जा कऽ कटा आवह। हमर तँ तेहन झमटगर दियाद अछि जे भोरेसँ चारि गोटे लागल अछि मुदा अखनो धरि पार नहि लागल हेन।’’ ‘‘अखन तँ हमहीं टा घरपर छी। दियादिक तँ सभ कियो अपन-अपन हाल-रोजगारमे चलि गेल। कियो झंझारपुर वेपारीक संग गछकटियामे तँ कियो सुखेतक चिमनीपर ईंटा बनवैए। अपने केश कटाएब, ओरियान बात करब आ कि ओकरा सभकेँ बजवै लऽ जाएब।’’ ‘‘असली कर्ता तँ तोहीं ने छिअह। तोहर कटाएव जरुरी छह। हमरा सभमे तँ पाँच बर्षी धरि सभ दियाद-वाद केशो कटबैट अछि आ कमसँ कम एगारह गोटेकेँ खाइयो लऽ दैत अछि। तोरा सेहो एकटा आरो हेतह। खाएन-पीनि माने मातृनवमी-पितृपक्ष चलिते अछि। चाचाजीकेँ तीर्थेपर वर्षी पड़ि गेलनि, तेँ दोहरा कऽ खुअबैक झंझट नहि रहलनि। मुदा तूँ सभ ते एकादशीकेँ खुअबै छह तेँ तोरा दोहरा कऽ सेहो करै पड़तह। ओना ई सभ मन मानैक बात छी। मुदा, चलनियो तँ कोनो अपन महत्व रखैत अछि की ने। झिंगुर काकाक बात सुनि दोकानदारकेँ गुलटेन कहलक- ‘‘हओ घोघन साहु, झब दे एक टका के नून दाए।’’ गमछामे नोन बान्हि गुलटेन लफड़ल घर दिशि चलल। मनमे पिता नाचए लगलनि। हृदय पसीज गेलनि। स्मरण भेलनि, अनका जेकाँ बाबू नहि छलाह। आगू-पाछुक बात जनैत छलाह। जँ से नहि जनितथि तँ किऐक ने अनके जेकाँ हमरो खेत-पथार कीनि देने रहितथि। कोनो कि कमाइ खटाइ नहि छलाह। जँ से नहि छलाह तँ कातिक मासमे ओते खरचा कऽ कऽ भागवत कोना करबै छलाह। तहिपर सँ भोजो-भनडारा करिते छलाह। हमरे ले कि कम केलनि। घर-गिरहस्तीक सभ लूरि सिखा देलनि। बारहो मासक काज। हम कि कोनो नोकरी करै छी जे सालो भरि कहियो बैसारी नहि होइत अछि। कमाइ छी खाइ छी ठाठसँ जिनगी बीतबै छी। जँ खेते रहैत आ खेतीक करैक लूरिये नहि रहैत तँ छुछे खेते लऽ कऽ की होइतै। गाममे देखबे करै छी खेतबला सभहक दशा। रौदी हुअअ कि दाही अछैते खेते हाट-बजारसँ मोटा उघैत छथि। हमरा तँ एक्को धुर घरारी छोड़ि नहि अछि। तेँ कि ककरोसँ अधला जीबै छी। अपन खुशहाल जिनगीपर नजरि अवितहि आनन्दसँ हृदय ओलड़ि गेलनि। मरहन्ना धान जेकाँ लटुआइल नहि अपन चढ़ल जुआनी जेकाँ खेतसँ आँड़िपर ओलड़ल। कोना लोक बजैत अछि जे जकरा अ आ नहि लिखल अबैत अछि ओ मुरुख अछि। बावू तँ औंठे-निशान दऽ मट्टियो तेल आ चिन्नयो कोटासँ अनैत छलाह। बड़का-बड़का सर्टियोफिकेटबला सभकेँ देखैत छिअनि जे दारु पीवि लेताह आ बीच सड़कपर ठाढ़ भऽ अंग्रेजीमे भाषण करैत लोकक रस्ता रोकने रहैत छथि। तहिसँ हजार गुना नीक ने बावू छलाह। खाइ बेरिमे अंगनामे नहि रहैत छलहुँ तँ शोर पाड़ि संगे खुअवैत छलाह। जहिया कहियो नीक-निकुत अनै छलाह आ थारीमे अन्दाजसँ वेसी बुझि पड़ैत छलनि तँ थारीसँ निकालि माएकेँ दैत छेलखिन नहि तँ ओते छोड़ि कऽ उठैत छलाह। आ हा-हा ऐहन बाप होएव कि अधला छी। जखन काज करऽ जाइत छलाह तँ संगे नेने जाय छलाह आ काजक लूरि सिखवै छलाह। जहन काजक लूरि भेल तहन ने बोइन करऽ लगलहुँ। केहन हुनकर सालो भरिक हिसाव छलनि। आसीन-कातिक गछपंगियाँ आ खढ़ कटिया हुनकेसँ सीखिलहुँ। तहिना अगहन-पूस धन कटिया, नार बन्हिया, दौन केनाइ, टाल लगौनाइ सीखने छी। किअए एक्को दिन बैसारी रहत। अखनुका छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे कहत काजे ने अछि। कि रस्तापर बालू उड़ाएव आकि पानि डेंगाएव। मुर्खो रहैत बावूए ने सिखौलनि जे फागुनसँ जेठ धरि घरहटक समए होइ छै। जेकरा घरहट करैक लूरि रहत वएह ने अपनो घर आ अनको घर बन्हैमे मदति कऽ सकैत अछि। जेकरा लूरिये ने रहतै ओकरा इन्दिरा आवासमे मुखिया, चिमनीबला, सिमटीबला नै ठकत तँ कि जेकरा अपन घर बनबैक लूरि रहत, ओकरा ठकत। अपनापर गुलटेनकेँ भरोष होइतहि मनमे खुशी उपकल। मुँहसँ हँसी निकलल। ओगरवाहीक गाछीक मचकीपर नजरि गेलै। कि हमरा सबहक दुनियाँ अछि। बड़क गाछपर सँ बड़्ड़् काटि बरहा बनबै छी। मूठबाँसीक बल्ला, पीढ़ियाँ आ कील बना गाछक डारिमे लटका झुलबो करै छी आ गेबो करैत छी। जे चौमासा, छहमासा, बारहमासा मचकीक स्टेटपर होइत अछि ओ बाजा-बूजी आ वैसि कऽ गबैमे कोना होएत? असकरे कृष्ण राधाक संग कदमक झूलापर चढ़ि नचबो करैत छलाह, बाँसुरियो बजवैत छलाह आ आसो लगबैत छलाह। मुदा, अखन तँ देखैत छी जे बाजा कियो बजवैत, नाच कियो करैत आ गीति कियो गवैत अछि। तेहने ने देखिनिहारो छथि। कियो कैसियोबलाकेँ देखैत तँ कियो ठेकैताकेँ, कियो नचनिहारक नाच देखैत तँ कियो ओकर कानक झुमकाकेँ। गौनिहारक आबाज सुनैत, नहि कि ओकर मुँह देखैत अछि। नोनक मोटरी पत्नीकेँ दैत गुलटेन कहलक- ‘‘बाबूक बरखी काल्हिये छी। बिसरि गेल छलौं। केश कटौने अबै छी। ताबे अहाँ बरखी लऽ जे चाउर रखने छी ओकरा निकालि रौदमे पसारि दिऔ। राहड़ि सेहो उलबए पड़त। बेरु पहर तीमन-तरकारी आ मसल्ला हाटसँ लँ आनब। दूध तँ आइये पौरल जाइत। ओना अमहौरपर सौझुको दूध जनमि जाएत।’’ पतिक बात सुनि मुनिया बजलीह- ‘‘ऐहेन जे अहाँ बिसराह छी, सब काज चौबीसमा घड़ीमे सम्हरत। ने कुटुमकेँ नोत देलौं आ ने बेटी-जमाइकेँ खबरि देलिएनि।’’ ‘‘अच्छा सभ हेतै। अनजान-सुनजान महाकल्याण। बाबू कोनो अधरमी रहथि जे कोनो बाधा हएत। उगलाहा सभ देखबो करै छथि आ पारो लगौताह।’’ कहि गुलटेन केश कटबए विदा भेल। केश कट करखीक जानकारी सबजना न्योत दऽ चोटे घुरि गेल। काजमे गुलटेन जेहने होशगर माने लुरिगर तेहने बिसराह। जे सभ बुझैत। उजड़ल गाम कोनो बसत। दरिद्र गाम कोनो सुभ्यस्त बनत, एहि कलाक प्रदर्शन गुलटेनक काज देखबैत। अनाड़ीकेँ काजक लूरि सिखाएब, हनपटाह गाए-महीसि दुहब, डरबूकसँ डरबूक गाएकेँ बहाएब माने साँढ़ लग लऽ जा पाल खुआएब, घोरनोबला आ चुट्टियाहो गाछपर चढ़ि आम तोड़ब, झोंझगर बाँसमे पत्ता तोरव, सुरुंगवा शीशो पाङब, सुआगर घर छाड़ब, सक्कत खेत जोतब, पनिगर खेतमे धान रोपब, सांङिपर ढेंग उठाएव, दुखताहकेँ खाटपर उठा डॉक्टर ऐठाम लऽ जाएब, फड़काह बच्छाकेँ पटकि नाथव, हर लागएव इत्यादि काज समाजमे ककरो कऽ दैत। कोना नहि करैत? एकरे तँ अपन बपौती सम्पति बुझैत अछि। वर्षी भोजक चर्चा जनिजातिक माध्यमसँ सगरे गाम पसरि गेल। अपन दायित्व बुझि एका-एकी मरदो आ स्त्रीगणो गुलटेन ऐठाम आबए लागल। जहिना अनका ऐठाम काज भेने गुलटेनो बिनु कहनहुँ पहुँच जाइत तहिना समाजोक लोक आवए लगलाह। रवियापर नजरि पड़ितहि गुलटेन कहलक- ‘‘रबी, तोरा ऐठाम तँ जाइये ले छलौं। भने आबिये गेलह। बहुत दिन जीबह।’’ रवि- ‘‘किअए भैया? अखने फोकचाहावाली काकी अंगनामे बजलीह; तब बुझलौं।’’ ‘‘ठीके सुनलक। बिसरि गेल छलौं। दोकानपर झिंगुर काका मन पाड़ि देलनि। मुदा काज तँ कौल्हुका बदला परसू नै हएत।’’ ‘‘हमरा बुते जे हेतह तइमे पाछू थोड़े हेबह।’’ ‘‘चाउर-दालि तँ घरेमे अछि। तेल-मसल्ला, तरकारी हाटेपर सँ लऽ आनब मुदा पंचकेँ दुइओ कौर दही नै खुऐबनि से नीक हएत?’’ ‘‘सौझका दूध अपनो रहत आ किसुनोसँ लऽ लेब। कत्ते दूध पौरबहक?’’ ‘‘दू मन चाउर रान्हब। अधोमन तँ दही चाही।’’ ‘‘अधा मन सँ हेतह?’’ ‘‘अपना सभमे दहिये कते परसल जाइत अछि। गरीब लोक अन्ने बेसी खाइत अछि। दूध-दही आ कि फल-फलहरी जे खाइयो चाहत से आनत कतऽ सँ।’’ ‘‘हँ, ई तँ ठीके कहलह। हम तँ कहबह जे तरकारियो किअए हाटपर सँ अनबह। अखन तँ सबहक चारपर सजमनि कदीमा आ बाड़ीमे भट्टा अछिये तइ ले पाइ किअए खर्च करवह। धड़फड़मे अदौरी बनौल नै हेतह। बैगन आ अदौरी नै बनेबह से केहन हएत?’’ ‘‘मन होइए जे बर-बरीक ओरियान करी।’’ ‘‘तों सनकि गेलह हेन। बड़-बड़ीक घाटि कते मेठनियाँ होइत अछि से नै बुझै छहक।’’ ‘‘हँ, से तँ ठीके कहलक।’’ ‘‘अखन जाइ छिअह। दहीसँ तू निचेन भऽ जाह। काल्हि दुपहरमे ने काज हेतह। आ कि पुजौनिहारो औथुन।’’ ‘‘अपना सभमे कत्ते पुजौनिहारकेँ देखै छहक। जतिया आगू कोनो पतिया लगै छै।’’ भगिन पुतोहू दालि दड़ड़ै लऽ अबैत छलि। डेढ़ियापर अवितहि गुलटेनपर नजरि पड़ितहि मुँह बीजकबैत बाजलि- ‘‘बुढ़हा अपनो मरताह आ दोसरोकेँ जान मारथिन काल्हि-परसू ई सब काज नै होइतै। कहि दालिक मुजेला लऽ जाँत दिशि बढ़लि। गोसांइ डुबिते भाय भजनाक संग सिंहेसरी पहुँचलि। अपना माथपर अपन पहिरएबला कपड़ा आ अल्लूक मोटरी आ भजनाक माथपर चाउर-दालिक। बिनु छँटले चाउर आ गोट्टे दलि। आंगन पहुँच सिंहेसरी कानल नहि। माए-बाप लग बेटीक कानव तँ सिनेहक होइत। मुदा सिंहेसरीक मन तखनेसँ लहकल जखने भजना बरखीक चर्चा केलक। मनमे उठै जे अपना खूँटापर लघैर महीसि अछि, बरखी सन काजमे जँ एक्को कराही दही नहि लऽ जाएब से केहन हएत? ओसारपर मोटरी रखि माएसँ झगड़ा शुरु करैत बाजलि- ‘‘ऐँ गे बुढ़िया, हमरा कोनो आए-उपाए नै यऽ जे, काल्हि बाबाक बरखी छिअनि आ आइ तू अबै ले कहलेँ?’’ तहि बीच गुलटेन सेहो हाटसँ आबि गेला। माथपर मोटरी रहबे करनि कि मुनिया बाजलि- ‘‘दाय, हमर कोन दोख अछि मासे-मास जे छाया करैत एलौं तेकर ठेकाने ने रहल। बापो तेहन विसराह छेथुन जे बिसरि गेलखुन। आइये बुझलौं।’’ माएक जबाव सुनि सिंहेसरीक तामस पिता दिस बढ़ए लगल। मुदा मुँह-झाड़ि बाजब उचित नहि बुझि माएकेँ अगुअबैत बाजलि- ‘‘जाबे बाबा जीवैत छलाह ताबे कत्ते मानै छलाह। आब जखन ओ नहि छथि तखन हुनकर किरिया-करम छोड़ि देबनि। एगारहो गोटेक तँ ओरियान कऽ कऽ अबितौं।’’ बेटी आ पत्नीक बात गुलटेन चुपचाप सुनैत। कखनो मनमे उठै जे गलती हमरे भेल। फेरि होइ जे कोनो काज करै काल ने उनटा-पुनटा भेने गल्ती होइत अछि। मुदा, हम तँ बिसरि गेल छलौं। सामंजस्य करैत गुलटेन बाजल- ‘‘पाहुन किअए ने ऐलखुन?’’ सिंहेसरी- ‘‘से तू नै बुझै छहक जे नोकरिया-चकरियाक घर छी जे ताला लगा देवै आ विदा भऽ जाएब। दुनू परानी लगल रहै छी तखन ते एक्को क्षणक छुट्टी नै होइए। ढेनुआर महीसिकेँ छोड़ि कऽ दुनू गोरे कना अबितौं।’’ बेटीक बात सुनि मुनिया बाजलि- ‘‘अइ घर ओइ घरमे कोन अन्तर अछि। तोरा लिये जेहने ई तेहने उ। अहूठीन ते दहीक ओरियान भइये रहल हेन। तइ ले तोरा किअए मनमे दुख होइ छौ। हम तोहर माए नइ छियौ। कोनो आइऐक छियै कि सभ दिनेक बिसराह छथुन। तइ ले तामस किअए होइ छह। मोटरी सभकेँ खोलि-खोलि चीज-बौस ओरिया कऽ राखह। पहिने पएर धोय गोसाँइकेँ गोड़ लगहुन।’’ पत्नी आ बेटीकेँ शान्ति होइत देखि गुलटेन मुस्की दैत बाजल- ‘‘गाममे जेकर काज हम केने छी ओ कि हम्मर नै करत। कते भारी काजे अछि।’’ घरक गोसाँइकेँ गोड़ लागि सिंहेसरी पिताकेँ गोड़ लगैले बढ़ल कि गुलटेनक आँखि सिमसिमा गेल। सिमसिमाएल मने पुछलक- ‘‘बुच्ची, कोनो चीजक दुख-तकलीफ ने ते होइ छह?’’ हँसैत सिंहेसरी कहलक- ‘‘बाबाक बात कान धेने छी। हाथ-पएर लड़बै छी सुखसँ दिन कटैए।’’ भोजमे खूब जस गुलटेनकेँ भेल। भरि-दिन ऐम्हर-दौड़ तँ ओम्हर-ताकमे दुनू परानीकेँ रहल। मुनियाक छाती केराक भालरि जेकाँ कपैत। बिना अन्ने-पानिक भरि दिन खटैत रहलीह। जेना भुख-पियास कतौ पड़ा गेलनि। मुदा भोजनक जस दुनू परानी गुलटेनकेँ, जहिना ऊसर खेतमे कुश लहलहाइत, तहिना लहलहा देलक। पिताकेँ सिंहेसरी कहलक- ‘‘सभ काज सम्पन्न भऽ गेल। आब अपनो सभ खा लाए।’’ खेला-पीला उपरान्त गुलटेनक मनमे, सिनेमाक रील जेकाँ, नाचए लगल- ठीके ने लोक कहैत छथि जे जेहन करत से तेहन पाओत। जहिना बाबूक मन शुद्ध छलनि तहिना ने क्रियो-कर्म हेतनि। आ-हा-हा ओंगरी पकड़ि-पकड़ि घर बन्हैक लूरि सिखौलनि। बारहो मासक काज जीवैक लेल सिखौलनि। मने-मन पिताकेँ गोड़ लगलक। ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २०म खेप ३.३.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.सरोज ‘खिलाडी‘-गीत ३.६.कामिनी कामायनी-बाजार मे स्त्री ३.७.१.बेचन ठाकुर- गीत२.मनोज कुमार मंडल-जिनगी ३.८.राजदेव मंडल-तीनटा कविता स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! नवदुर्गा !!
सिंह पीठ असवारि लगै छी अहॉ बऽर वढ़ियॉ । अति सुन्नरि सुकुमारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़िया ।।
हस्त त्रिशूल चक्र अति चकमक, रक्त पिपासित खप्पड़ भक् भक्, अखिल लोक अवाक् सभ ठकमक, चललहुॅ बनलि विहाड़ि लगै छी अहॉ बऽर बढ़ियॉ ।।
गत्र गत्र पर रक्तक छिटका, असुरक पीजु चरण तर टटका, क्रुद्ध नयन कर सॉपक सटका, ठाढ़ि महिष केॅ मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।।
भऽरल सभटा राक्षस सेना, तीतल ऑचर बहल पसेना, आऊ हौकि दी वॉसक बेना, बैसू मुस्की मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।।
हे दुर्गे जगदम्ब व्यथा हरू, अपना कोर माय हमरा करू, रामक भक्ति सुधा मुख मे भरू, हे पयस्विनी नारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़ियॉ ।।
!! रामावतार !!
डेग झटझारि चलू टेल्ह पट पारि चलू । राम अवतार भेल नरेशक द्वारि चलू ।।
दिवसो दू पहरक मासो अति मधुरी, सिहकल मलय पवन, गमकल अवधपुरी, त्यागि कऽ आड़ि चलू, खेत पथारि चलू । राम अवतार भेल........................................ ।।
संग मे शेष लखन भरतक शुभदर्शन, शंखे अरिमर्दन रामे मधुसूदन, नवो नरनारि चलू घोघ ऊघारि चलू । राम अवतार भेल..................................... ।।
बॉटु सभ विसु वन्हन लुटाउ आभूषण, परगट पुरूषोत्तम धैन छी अॅऽहू हम, घट सम्हारि चलू चहुमुॅख वारि चलू । राम अवतार भेल ..................................... ।।
शरणे आउ सखी उठाउ पदरजकण, लगाउ प्रेमांजन जुड़ाउ नैन अपन, जिनगी तारि चलू अहिल्या नारि चलू, राम अवतार भेल ............................. ।। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा २०म खेप -केहन आनन्द छैक राधा, करबा मे कोनो उपकारक काज ? स्वयं कोनो कारणें अशक्य-असहाय जे भ' गेल हो, क्यो नहि हो जकरा देखनिहार, क' देबा मे ओकर बहुत जरूरी काज ? केहन लगैत छैक मोन कें खुशी? विदेह २० म खेप व्यर्थ एतेक जे बौसलीयो छूबाक नहिं बाँचि जाइत छैक स्पृहा। तों दुक्ख नहि मान, एत' धरि जे बिसरि छें तों पर्यन्त राधा, तोहूँ हमरा। हमर आनन्द जकाँ भेटैत छें से बात ओही काज मे ओहिना... जेना मोन छौ-मनसुख दास कें बुढ़ारी मे जे बेदखल क' निकालि देने रहैक घर सँ बाहर अपन सहोदरे पहलवान भाय ? हाहाकार करैत असहाय मनसुख दास ! ओकर जीवन मे कतहु किछु ने बाँचल रहि गेलो उतर पहुँचि गेल रहीक तोंही, हँ तोंही ने आ मात्र एतबे तँ प्रबोधने रहीक ओकरा-' कका, नै दुख करू। एतबे टा नहि छैक ई संसार आ यैह टा नहि अछि एक टा भाय-सुन्नर दास।धैर्य धरू, नै दुख करू। बाँचल छै एखनो लोक आ समाज । स्वयं श्रीकृष्ण छथि एखन अपने गाम। चलू, आउ। दू घोंट जल पी लेब कका ? नहि हो तं विश्रामे क' लिअ' कनी काल। ऊपर सबटा देखै छथिन ईश्वर,करै छथिन निसाफ। तकैत छी हुनका, जानि नहि एखन कत' छथि, एहने बेर मे जखनि चाही समाज कें हुनकर हएब, अत्येब क' जेना भ' जएताह अलोपित ! कोना बिसरि गेलही राधा,अपने व्याकुलता अपन से काज? हम कोन्टा धेने रहियौ सब किछु सुनैत, देखैत तोहर अहुँछिया कटैत तोहर मातृ-भाव, राधा । किछुए काल पहिने तं फुरतीया दौड़ले गेल रहय, पहुँचि क' कहि चुकल छलय हमरा मनसुख दासक ई समाचार! कोना कहियौ नइं, तोरो मनक समाद तं सुनाएले रहय तत्काल । खौंझाइत-तमसाइत कोना रहें तिलबिखनी तों हमरा पर... दौगल-दौगल आएल रही...देखने रहियौ तोरा अपन काज करैत ! गछै छियौ देखैत ई सब दृश्य हृदय भ गेल पवित्र, चिन्ता-निश्चिन्त ! केहन बुधियारि अछि हमर ई बेकूफ राधा...। तें उपस्थित भेलियौ तोहर दासम दास । अएलियौ, प्रगट नहि भेलियौ राधा।...बिसरि गेलही ? हम तोरा प्रगट नहि, उपस्थित होइ छियौ राधा । तोरा लोकनि बूझ ई बात आ मानै जाइ जो। एहने एहने परिस्थिति मे बेर पर हमरा भरि संसार मे कत्तहु सँ आनि ले...हमर भाव-रथ केहन तेज आ केहन सुस्त चलैए, बुझले छौक ।.... अरे राधा, कनैत किएक छी ? की भेल, किएक कनै छी राधा ! कानब तं स्त्रीक नियति छैक। आँचर सँ नोर पोछब, जेना दैनिक काज। मुदा नोर खसबाक आशय बदलि रहलैये-प्रति पल। युगक अपन-अपन स्वभाव ! युग बदलि रहल छैक। युग बदलिते रहलैये। पण्डित जनक अपन-अपन बुद्धिक व्याख्या संग, आगत युगक स्थापना आ अतीतक बहिष्कार चलितहिं आएल छैक। कालगतिक ई एकटा अप्पन आ स्वायत्त प्रक्रिया छैक।सब मानैत छैक। सब के मान' पडैत छैक। कए बेर तेहन अभ्यागत जकाँ जे अभ्यागती कें बना लेने छथि-अकर्मण्यताक अभ्यास। स्वभाव, अतिथि देवो भव' कें हथिया लेने छथि बड़का नैतिकअधिकार हथकंडा औजार जकाँ। ओहन-ओहन हुनका हेतु परिवार भेदें अवस्से आब' लगलैये-सेवा भाव तत्परतामे किंचित उदासीनता सेहो, अवहेलना नहि,हुनक सेवा मे कतबा आ केहन आ केहन व्यवस्था लागति-समय सं ल' क' स्वागत-सत्कारक गृहस्थीक साधनक कतबा कएल जाय खर्च-वर्च ताहि पर होम' लगैत छैक विचार पर विचार । गरबैया पएर धोआ कम्मल-पटिया पर स्थापित क',आँगन जा भोजनादिक द' कहि,भ' जाइत अछि अपन दिनचर्या मे प्रवृत्त। अभ्यागत रहैत छथि दलान पर असकर स्थापित। युग सेहो, होइत छथि तेहने अभ्यागतो महराज। आब तं आरो, जखन बापो-माय बूझल जाय लागल तेहल्ला... कहू तं बेटा-भाय कतहु घर सं निकालि दिअय ? अपने बाप-भाय कें एना क' करैत तिरस्कार बनबैत असहाय ? ई एहन युग यैह एकर रंग ताल । आ से रहत जानि नै कतेक द्वापर-युग ? के जानय ! दुःख प्रगट करू तं कहताह बूढ़ पुरान, ज्ञानी-पंडित-' यैह थिकैक सृष्टि चक्र। कालगतिक यैह छैक प्रकृति-विधान ।अनादि काल सं चलि आबि रहल, अनन्त काल धरि चलैत रहत। मात्र यैह टा तं चलैत छैक-अमृत गतिक प्रवाह। नहिं मरैत छेक । मनुष्य समेत प्राणि मात्र तं अपना अपनी और्दें मरि जाइत अछि। जन्मे जकाँ मरण सेहो थिक अनिवार्य। मुदा ई कालचक्र जकर नाम युग कहैत छैक कतोक युग सँ लोक, समाज से अपने रहैत अछि अक्षुण्ण! अनथक चलैत, छलिते रहैत । किछु काल धरि लोकक जीवन मे आदरणीय अभ्यागत,आत्मीय, सर-सम्बन्धिक जकाँ...।तकरा बाद गृही कें अनुभव होम' लगैत छैक ओकर ओकर अभ्यागतीक छुच्छ कर्तव्य-निर्वाह। आगाँ सेहो स्थिति यदि एहने बनल रहि जाइछ तं अतिथि गृहस्थक करय लगैत अछि शोषण। अपन ताही कुटुम्बक, सम्बन्धक कर' लागि जाइत अछि उपयोग-उपभोग तें गृहस्थ, सम्बन्धी कर' लागि जाइत अछि ओकरा प्रति विचार अस्वीकार। तकरा पश्चात् ओकर अवहेला। यैह थिक प्रकृति इएह तकर तासीर।तखन बितैत वर्तमान जाइत- अबैत खारीक मध्य नव तरहें उठै छैक उद्वेग आ विचार-विमर्श ! अनन्तर विवाद । पिता-पुत्र पीढीक परस्पर विचार भेदक नऽवे यथार्थ जे दुहू कें अपन-अपन तर्क विश्वास मे कएने रहैत छैक लाचार, तैनात । होअ' लगैत छैक संघर्ष ! तकरा समाज आ समाजक विद्वत्समाज कहैत छथिन पीढ़ीक मनोभावनाक विभेद । विभेदक द्वन्द्व आ तज्जन्य दुविधा, तकरे प्रभाव, जीवन दशा आ परिवार-व्यवस्था कें कर' लगैत छैक देखार अनदेखार प्रेरित-प्रभावित।प्रारम्भ भ जाइछ युगक अन्तर्विरोध। स्वभावतः अन्तर्विरोधक कए टा नव नकारात्मक प्रतिफल ! एहि बीच नव सृष्ट शिशु पीढ़ीक होइत रहैत अछि एहि दुविधा-द्वन्द्वक घोर परिस्थितिक आगमन, दिनानुदिन विकास। बनैत-बढ़ैत अछि ओकरो मे अपन बुद्धि, दृष्टिकोण ! लगैये ओहो अपन पिता, पितामहक सोझाँ करय प्रश्न ठाढ़।जवाब चाही ओकरा । जे जवाब ओकर पिताक छलैक, आजुक आवश्यक ताहि सँ बहुत बेशी बढ़ि-चढ़ि क' चाही- नव खाढ़ी कें अपना प्रश्नक त्वरित समाधान ! समय अपने तं एकटा असमाप्त प्रश्न अछि। अपने पूछैत अपने जवाब दैत। अपने चलैत अपने ठाढ़ रहैत।ठाढ़े ठाढ़ चलैत, चलिते-चलिते ठाढ़ तहैत।पछिला क्षणक प्रश्न कें अगिला उत्तर लेल मथैत, आगाँक प्रश्न ठाढ़ करैत। पुनः वर्तमानक सोझाँ भविष्यक आकार-प्रकार, संवेदना आ तर्क तकैत-तैयार करैत-मनुष्य कें बनएबा मे तकर कहार। समय अंततः तँ होएत अछि-एकाधिकारी बुधियार ! अपना कें रखने सदति तटस्थ आ निर्विकार, करबैत रहैये सौंसे संसार लोक सँ आद्यन्तो कार्य व्यापार मुदा स्वयं रहैये यथायोग्य आत्मविश्वासी नाट्य कलाकार । अपन भूमिकाक प्रतीक्षा मे निश्चिन्त आ तैयार। मोह नहि किछु कोनो आग्रहो-दुराग्रह नहि किछु। मात्र अपन होएबाक आभास दैत देखैत रहैत अपन अस्तित्वक लक्षण सूक्ष्म सँ ल' क' बिकराल । निश्चिन्त विद्यमान रहैत अछि-लोककमोन मे। पृथ्वी,आकाश, प्रकाश सब मे स्थितिक मोताबिक जीवनक जल जकाँ सिक्त सूक्ष्म रंगें घुलल, मिज्झर । एक रती ने एम्हर एक रती ने ओम्हर। धर्मात्मा दोकानदार जकाँ तराजुक दुनू पल्ला बराबर। डंटी संतुलित ठीक मध्य मे। तौल बराबर। कतहु सँ कोनो पलड़ा कनियों लत नै, उठल नहि। तेहन पवित्र दोकानदार -ई समय ! कोना रहैये ललकारने,दुलारने आ हड़कौने मनुक्खक क्रिया कलाप कें? कतेक आवश्यक आ समयबद्ध प्रयोजन हेतु कएने रहैत अछि संसारी सुख-दुःखक आलाप-विलाप ! सबटा तँ लैत आखिर अपने मूड़ी पर बौक दास जकाँ सहैत चलि जाइत अछि- अनन्त काल। करैत रहेत अछि, प्रश्न, दैत चलैत अछि उत्तर । सजग अभिभावक सतत जेना चिन्तहि मे-साकांक्ष । ई तं भ' गेलैक आब ? अगिला... कालक कहार बनल मनुक्ख-जाति ओकरे भास पर नहि गबैत रहैये कर्मक गतिक गुणगान । कउखन उद् गार मे, कखनो दुःख-शोक मे मनुक्ख । कालक ई दुनू बोधे कें उघबा वास्ते तं लोक अछि। दुःख आ सुख । यैह दुनू टा तट आ बीच मे बहैत जलक धार । कउखन सरस्वती कखनो यमुना कतहु गंगा, कोशी कतहु कमला कल- कल धार ! जीवन ई धार थिक । मुदा ई धार कतोक दिन सँ अछि, स्थिर। अनपेक्षित। अनान्दोलित ठाढ़।आश्चर्य ! नदी होइतहुं स्थिर तेना जेना हो गामक पोखरि-इनार। यमुना मे कए दिन सँ किछुओ टा गतिविधि नहि। शान्त चुपचाप अछि धार। बड़ उदास । गुमसुम तकैत जानि नहि कोम्हर, ककरा कतेक काल... यमुनोक लेल काल ओहने निठुर। ओहिना बहीर अकान, मनुक्ख लेल बनल रहैत अछि जेना। कालक एतेक विराट विस्तार मे एक टा असकर प्राणि मात्र बाँचल रहि गेलय-नाम जकर राधा । (१२ मार्च,२०१० ई.) जगदीश प्रसाद मंडल जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। गीत अहीं कहुँ भाय आब की करबै? पएर पसारब तखने मन समेटब जखने शिव दर्शन कैलाशक ऊँपर भट्ठा नहि शिरापर तहन जे धारक लहरिमे हेलैत रहबे अहीं कहुँ भाय आब की करबै? दहिना हाथक गति बामा अछि आगू चलि कऽ देखिऔ मुदा पाछुओ भेने बाट नहि छोड़त की प्रकृति प्रदुशन करबै? अहीं कहुँ भाय आब की करबै नम्हर-नम्हर पोस्टर छापि बिड़ड़ो, दानो, ठंकाक दुर्गकेँ हेँड़क-हेँड़ कोना टपटै अहीं कहुँ भाय आब की करबै? नम्हर-नम्हर बात बना सुखले आँखिक नोर बहा जहर लगलाह हाथसँ कोना नोर पोछबै अहीं कहुँ भाय आब की करबै? शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न
!! चैतावर !!
आयल चैत मधुर रंग पॉचम, उपवन बुलबुल गावय ना ............ । सन - सन पुरबा मलय वसात, झन - झन देह झनकाबय ना............. ।।
कुहकै कुक कोइली बबुर वन, चहकै अलि पाटलि मधुवन, फड़कै मोर मोरनि लोचन, फनकै मृगी पद फन - फन, भन - भन मन भनकावय ना । सन - सन................................................. ।।
भाविनी खिलायलि गहवर, वहिना मुदित हिय फरफर, सखी नेह मातलि कोहवर भौजी रेह गावथि सोहर, क्षण - क्षण तन छनकावय ना । सन - सन................................................. ।।
प्रियतम व्यथित ई आखर, नोरक सियाही झरझर, कोमल शय्या भेल खरखर, सुखि देह वक सन पातर कण - कण पट सिहरावय ना । सन - सन................................................. ।।
उपटल फागुन केर रस वुन, हहरल नुपूर स्वर झुन - झुन, विकल नैन भेल अधर सुन्न अछि कोन कांता मे अवगुन? घन - घन घट सनकावय ना । सन - सन................................................. ।। !! व्रत एकान्त !! लुटकुन जी केर चकचक भाल, कपोल सिनुरिया बनल रसाल । टीशन चलला लऽ घटही कार, आवि रहल थिन्ह सासु आ सार । छहछह तन मन भरल उमंग, गृह घुरलनि विधि माताक संग । झटपट शांभवि चाह बनावू, पहिने रूहे आफजा लावू । मम्मी छथि वड़ जोड़ पियासलि भूक्खे समस्तीपूर सॅ मैसूर आयलि । जलखै सेवै दलिपूड़ी क बोर, मझिनी भुजल परोर आ इचना झोर । जुनि करू अकरहरि श्रवण जमाय, अहॅक सासु तऽ हमरो माय । माय हमर आडम्वरि धर्मी, सनातन पालिका संग षट्कर्मी । मतिसुन्न लक्ष्मीनाथ बजार गेलनि, फुलल परोर मॉछ इचना लेलनि । देखिते भऽरल मॉछक झोरा, फुजलनि सासु वन्न मुॅह वोरा । पाहुन देलथिन धऽर घिनाय, कोना करव हम नहाय खाय ? काल्हि हमर छी व्रत एकान्त मछैन गृह केर सगरो प्रान्त । फेकू मॉछ सटल तरकारी, ग्ंागाजल सॅ धोयब आंगन वारी । गैस चढ़ल अन्न नहि खायब, बौआ सॅ अंगूर सेव मंगायव । काल्हुक लेल चाही आमक चेरा, माटिक चूल्हि आ वॉस चडेÛरा । सिंगापूरी नहि चिनियॉ केरा, शुद्ध सुधा गुड़ सानल पेरा । शांभवि ई मैसूर नहि गाम, कतऽ हम ताकू जाड़नि आम? विकट भेल रवि व्रत एकान्त, एहि चक्कर हमर जीवन अशान्त । लुटकुन माथ मे शोणित अटकल, भाय वहिन मुॅह मुस्की फटकल । हम की करव सभ दोष अहॉ केॅ, पावनि मास किएक बजौलहुॅ मॉ के ? ताकय चललनि कर्नाटक केर गाम, हाथ चूल्हि मॉथ गठरी आम । सोझे आवि खाट पर खसलनि । शांभवि जोर ठहक्का हॅसलनि । सुनू प्रिये तारू सूखल अछि, जल विनु हम्मर हिय विकल अछि । एहेन व्यथा नहि हॅसि उड़ाबू, त्रास कंठगत नीर पियाबू । सरोज ‘खिलाडी‘ नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक गीत अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी । अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुका क तकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २ सब सँग मिल आहा खुब हसैछी भितरे भितर कनैछी २ मैर नहि जाय अहाँके प्रेममे हमरा किया जचैछी ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । बाजब केम्हरो इसारा अछी केम्हरो निक जका बुझैछी २ सामनेमे चुपचाप रहैछी परोछमे किया खोजैछी । ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी । अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुकाक तकैछी । अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २ कामिनी कामायनी बाजार मे स्त्री आे रूप कुॅमरि कियै ठाढ आेत्तए ऋ की छानि रहल अछि राह बाट ऋ छिटकल कारी घन केश पास हर्षित मुख मंडल मन उदार । आॅखिक भाखा किछु कठाेर सन दप दप चमकैत उन्नत ललाट । ताकि रहल किछु गुमल चीज बरखा बूनि मे रहल भींज । बटुआ छै काॅन्ह सॅ लटकि रहल । ऊचका सैंडिल छै अटैकि रहल । चालि चलै छै नापि नापि रहि जाए छ ैधरती काॅपि काॅपि । कत्तेक इर् उर्जावान बनल ज्ञान भरल अभिमान भरल । ककरा सॅ कम छै अहि जुग मे इर् अर्जुन के अभिमान ताेडल । वामन अवतार विराट बनल इर् ताकि रहल ब्रम्हांड दिस । करे छै सब कियाे नमस्कार देखियाे अहि जुग के चमत्त्कार । इर् रूप कुमरि खूब बूझि रहल । समरथ के नहि छै दाेख काेनाे सहलक आेहाे बड बसात घाम नहि लेलक क्षण भरि के विराम । आय बल बुद्वि के ताकत प्ऽ्ऽऽ आे रूप कुमरि अछि ठाढ आेत्तय । 12 ।3 ।10 १.बेचन ठाकुर- गीत२.मनोज कुमार मंडल-जिनगी १.बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार। गीत
खेलै छेलियै धुपै छेलियै करै छेलियै काम-2 भद्वारमे जे छहर टूटलै, दहा गेलै सौंसे गाम। भैया हो रामै राम, रामै राम सीता राम। आहो फोकटिया नेता, लुटलक गामकेँ। कुथि-काथि कऽ रोपनि केलनि, खेतमे हमर किसान बाढ़ि-डकुबाकेँ लाजो नहि भेलैक धानकेँ कएलक हरान। भैया हो......... पिपरौलिया गौवाँ रोडकेँ कटलक, बटौहीकेँ कएलक परेशान गंजबला बबूर पर से रोडपर बान्हलक मचान। भैया हो........ पंचायत समिति मुखिया वार्ड मेम्बर सभकेँ छुटलै धाम जिला परिषदकेँ गंजबला, बनौलक बेइमान। भैया हो............... गीत
रिलीफमे बीस किलो चाउर, सए टका नून तेलक दाम घर-घरमे तीन किलो गहूम सेहो कएलक नाम। भैया हो.............. घर खस्सीमे गरीब हेतु, घरक आएल अभियान मुदा पाँच सए टाका जे देताह हुनके होएत काम। भैया हो............ बड़का चोर मैझला घुसखोर छोटकाकेँ कोना मकान घुसखोरी देखि कहथि बेचनजी सभकेँ जाएत परान भैया हो................ २.मनोज कुमार मंडल जिनगी
असकर आएल अएकरे जाइत अछि ऐवा व जाइक बीच जीनगी कहाति अछि ई जीनगी फूलक बिछाओन नहि दुखक समुद्र नहि सुख-दुखक सामना करए पड़ैत अछि ई जीनगी संग्राम कहाति अछि असकर आबि दुनियाँक संग प्रित होइत अछि सदिखन मिलबा सुख आ बिछड़बा दुख होइत अछि ई सत्य भूलि संसारक संग रमि कऽ जेबाक बात भूलैत अछि सभ झूठ साँचमे बझैत अछि संबंधक जाल बना कऽ सभ अपने जालमे फसैत अछि कर्तव्य बोध बिसरि फूसिक पर्दा लगबैत अछि सत्य सत्ये रहत जाए सभकेँ पड़त ई बात की फूसि छी? एहिठाम आबि किछु सभ लेल कर्तव्य करी ओकरे सभ नाम जपैत अछि ऐतने टा दुनियाँमे नाना प्रकारक काज अछि ई करवा लेल सभ अबैत अछि क्यो आन ने कियो अपन छी की आँखिक देखल अपन छी वाँकि सभ बिरान छी उठू, जागू अपन कर्तव्य बुझू सभ कियोक अपन बना जिनगीक रास्ता तँइ करु ई जीनगी, जीनगी छी। १. राजदेव मंडल तीनटा कविता २.जय प्रकाश मंडल (अगिला अंकमे) १ राजदेव मंडल तीनटा कविता 1. जाति
ओ कहलथि- ‘कनेक भऽ जाउ कात आर दिअ अपन परिचए-पात’ हमरा कहए पड़ल- अपन नाम-गाम आओर काम बजलाह ओ महाशय- ‘हमर आशय नहि बुझि सकलहुँ साइत हम पुछै छी जाति’ मूनने अछि ओ नाक हम भऽ अवाक निहारि रहल छी हुनक मुख ओ नहि बुझि सकलाह हमर दुःख।
2. बदलैत बाट
सोझा राखल दर्पणमे देखैत स्वयंकेँ छुटय लागल निश्वास आ ओहि उच्छावासक भापसँ बनए लागल दरपन मध्य नव-नव आकृति कोनहुँ सुखद कोनहुँ दुखद जेना, बर्तमान, भूत, भविष्यक खेतमे उपजि रहल हो नव-नव बिम्ब कोनहुँ कल्पित कोनहुँ स्मृत ................... किन्तु जठराग्नि तेज भेलापर बिसरि गेलहुँ अपनाकेँ निहारब बिदा भऽ गेलहुँ भनसा घर दिशि रोटीक खोजमे।
3. भीतरिया जानवर
बन्हने छी बुद्धिक मजगूत कड़ीसँ एहि भीतरिया हिंशक पशुकेँ तइयो, कछमछाइते रहैत अछि कनेको दोग भेटलापर ठाढ़ भऽ जाइत अछि-फन-फनाक आ हम उनटे पाएरे आपस भऽ जाइत छी पुनः जंगली युगमे किन्तु भऽ जाइत अछि डर......... स्मरण कऽ ओहि युगक समस्याक तँइ आब करए पड़त सशक्त एहि कड़ीकेँ २. जय प्रकाश मंडल एम.ए. एल.एल.वी मझौरा निर्मली जिला- मधुबनी बिहार हिनक तीनटा गीत- अगिला अंकमे देल जाएत.... बालानां कृते- जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक कथा 71 दोस्तक जरुरत एकटा पैध पोखरि छल। ओकर उत्तरबरिया महार मे मोर रहैत छल आ दछिनबरिया मे मोरनी। दुनू असकरे-असकरे रहैत। एक दिन मोर मोरनी ऐठाम जा विआहक प्रस्ताव रखलक। मोरक प्रस्ताव सुनि मोरनी पूछलकै- अहाँ कऽ कैक टा दोस अछि? नजरि दौड़बति मोर उत्तर देलक- एकोटा नइ। मोरक जबाव सुनि मोरनी विआह करै स इनकार क देलक। तखन मोरक मन मे एलै जे सुख स जीबैक लेल दोस जरुरी अछि। ओतऽ स विदा भ मोर पूबरिया महार होइत चलल। पूबरिया महार मे सिंह रहैत छल। आ पछबरिया मे कौछु। सिंह बैसल-बैसल झपकी लैत छल। मोर सिंहक आगू मे ठाढ़ भ गेल। मोर कऽ बजैक साहसे ने होय। बड़ी खान धरि मोर कऽ ठाढ़ भेलि देखि सिंह पूछलकै। निराश मने मोर कहलकै- भैया! हम अहाँ स दोस्ती करै एलहुँ। किऐक त जिनगीक लेल दोस्तक जरुरत होइत छैक। सिंह मानि दोस्ती कऽ लेलक। सिंह स दोस्ती भेलाक बाद मोर पछबरिया महार आबि कौछु स सेहो दोस्ती केलक। पछबरिये महारक गाछ पर टिटही सेहो रहैत छल। जे अपन काज इमानदारी स करैत छल। जखन कखनो शिकारीक आगमन होय वा कोनो आफत अबैवला होय त टिटही सबकेँ जानकारी द दैत। दोस्ती केलाक बाद मोर मोरनी लग आबि सब बात कहलक। मोरनी विआह करैक लेल राजी भऽ गेलि। दुनूक बीच विआह भ गेलै। दुनू एक्के ठाम रहै लगल। एक दिन एकटा शिकारी शिकारक भाँज मे पहुँचल। भरि दिन शिकारी शिकारक पाछू हरान भेल रहै मुदा कतौ किछु नहि भेल रहैक। थाकियो गेल रहै आ भूखो लागि गेल रहै। गाछक निच्चा मे सुसताय लगल। गाछक निच्चा मे चिड़ैक चट देखि गाछ पर चढ़ि चिड़ै कऽ पकडै़क विचार केलक। गाछे पर स मोर-मोरनी सेहो शिकारी कऽ देखैत। शिकारी कऽ गाछ पर चढ़ैत देखि दुनू परानी (मोर-मोरनी) सोचै लगल जे आइ दुनूक जान जायत। मोर उडै़त टिटही लग गेल। टिटही जोर-जोर स बोली देमए लगलै। सिंह बुझि गेल। शिकार पकड़ै ले सिंह विदा भेल। ताबे कछुआ सेहो पानि स निकलि किनछरि मे आबि गेल। सिंह कऽ देखि शिकारी भगैक ओरियान करै लगल कि कौछु पर नजरि पड़लै। कौछु कऽ पकड़ै शिकारी किनछरि मे गेला कि कौछु ससरि पानि मे चलि गेल। शिकारी पानि मे पैइसै लगल कि गादि (दलदल) मे लसकि गेल। ने आगू बढ़ि होय आ ने पाछू भऽ होय। ताबे सिंह आबि शिकारी कऽ पकड़ि लेलक। शिकारी कऽ पकड़ल देखि मोरनी मोर कऽ कहलक- विआह करै स पहिने जे दोस्तक संख्या पूछने रही से देखलिऐक। आइ जँ दोस्ती नहि केने रहितहुँ त की होइत? 72 स्वार्थपूर्ण विचार एकटा बच्चाक मृत्यु भऽ गेलै। अभिभावक संग किछु गोटे ओकरा उठा कऽ असमसान (श्मशान) ल गेल। बरखा होइत रहै। असमसान मे सब विचारै लगल जे ऐहेन दुरकाल समय मे लाश कऽ की कैल जाय? अपना मे सब विचारितहि छल कि बिल से एकटा सियार निकलि कहलकै- ऐहेन समय मे लाश कऽ जरौनाइ से नीक माटि मे गारनाइ हैत। धरती माएक गोद मे समरपित करब सबसे नीक हैत। सियारक बात समाप्तो नहि भेलि छल कि कौछु कहै लगलैक- धार मे फेकि दिऔ। अइ स नीक दोसर नै हैत। ताबे एकटा गीध उड़ैत आबि कहै लगलै- सबसे नीक हैत जे ओहिना फेकि दिऔ धारे मे नहा लिअ आ गाम पर चलि जाउ। कठिआरीवला सब तीनूक चलाकी बुझि गेल। तीनू क धन्यवाद दैत विदा केलक। पानियो छूटि गेलै। सब मिलि चीता खुनि जारन द जरा देलक। 73 संगीक महत्व एकटा गाछ लग एकटा फूलक लत्ती जनमि क लटपटाइत बढ़ैत गाछक फुनगी धरि पहुँच गेलि। गाछक आश्रय पाबि ओ लत्त्ी फुलाय-फड़ै लगल। लत्तीक फड़-फूल देखि गाछ कऽ मन मे द्वेष जगै लगलै जे हमरे बले ई लत्त्ी एत्ते बढ़ि फड़ै-फुलाय अए। जँ हम सहारा नइ दैतिऐक त कहिया-कतै माल-जाल चरि नष्ट क देने रहितैक। लत्ती पर रोब जमबैत गाछ कहलकै- तोरा हम जे आदेश दिऔ से तू कर। नइ त मारि क भगा देबौ। वृक्ष लत्ती कऽ कहिते छल कि दू टा बटोही ओहि रस्ते जाइत छल। लत्ती स सुशोभित गाछ देखि एकटा राही दोसर स कहलक- संगी! एहि वृक्ष कऽ दखियौक जे कत्ते सुन्दर लगै अए। निच्चा मे कत्ते-शीतल केने अछि। ऐठाम बैसि बीड़ी-तमाकुल कऽ लिय तखन आगू बढ़ब। लत्ती संग अपन महत्व सुनि गाछक रोब समाप्त भ गेलै। ओहि दिन स दुनू मिलि प्रेम स रहै लगल। 74 उपहास कोनो अधलो (प्रचलन) चलैन वा ढ़र्रा कऽ तोड़ब अपने-आप मे कठिन कार्य होइत। जखन कखनो केयो समाज वा परिवार मे गलत कार्य कऽ छोड़ि स्वस्थ वा तर्कयुक्त कार्य आरंभ करैत त सिर्फ परिवारे टा मे नहि समाजो मे सब उपहास करैत अछि। जहि स धैर्यवान त स्थिर रहैत मुदा साधारण मनुष्य अधीर भ जाइत। पहिने इंग्लैंड मे छतरी (छत्ता) ओढ़नाइ गमारपन बुझल जाइत छलैक। जहि दुआरे लोक बरखो मे भीजैत चलैत मुदा छाता नहि ओढ़ैत। एहि गलत प्रथाक विरोध करैत हेनरी जेम्स छाता ओढ़ब शुरु केलनि। सदिखन ओ छाता संगे मे राखथि। जहि स जिमहर होइत चलैत व्यंग्यक बौछार हुुअए लगनि। मुदा तेकर एक्को पाइ परवाह नहि करथि। देखा-देखी लोक हुनकर अनुकरण करै लगल। किछु दिनक बाद सभ छाता रखै लगल। जहि स चलनि बनि गेल। चलैन एत्ते बढ़ि गेलैक जे स्त्रीगणो आ राजमहलोक सभ छाता ओढ़ै लगल। बाद मे जैह सभ व्यंग्य करैत वैह सभ हेनरी जेम्स कऽ बधाई देमए लगलनि। बधाई देनिहार केँ हेनरी जेम्स कहथिन- जे केयो उपहास आ व्यंग्यक विरोध सऽ नहि डरत वैह छोट स पैध धरि परिवर्तन कऽ सकैत अछि। चाहे शिक्षा हो वा खेती वा आन-आन जिनगीक पहलू रुढ़िवादी पुरान प्रथा कऽ तोड़ै पड़त। जाबे ओ नहि टूटत ताबे नव समाजक निमार्ण कल्पना रहत। तेँ किछु प्रथा कऽ तोड़ि आ किछु केँ सुधारि चलै पड़त। एहि लेल सभमे साहस आनै पड़त। 75 महादान अज्ञानक निवारण करब सबसँ पैघ पुण्य परमार्थ थिक। जे स्वध्याय आ ज्ञानार्जन स होइत अछि। उत्तराखंड मे एकटा पुरान नगर मे सुबोध नामक राजा राज्य करैत छलाह। हुनक (सुबोधक) नियम छलनि जे राजक काज शुरु करै स पहिने आयल याचक सभ कऽ दान दैत छलाह। एहि नियम मे कहियो भूल नहि भेलनि। एक दिन सब याचक कऽ दान दऽ देलखिन मुदा विचित्र स्थिति पैदा भऽ गेलनि। एकटा याचक ओहन आइल छल जे दानक लेल त हाथ पसारैत छल मुदा मुह स किछु नहि बजैत। सभ हैरान होइत जे हिनका की देल जाइन? एतथर्द बुद्धियार सभक सलाहकार बोर्ड बनौलनि। क्यो विचार दन्हि जे वस्त्र देल जाय त क्यो अन्न देवाक सलाह देथिन। क्यो सोना-चानीक विचार देथिन। मुदा समस्याक यथार्थ समाधान हेबे ने करैत। सुबोधक पत्नी उपवर्गो रहथिन। ओ (उपवर्गा) कहलकनि- राजन! जइ आदमीक मुह स बोल नइ निकलै ओकरा आन कोनो चीज देब उचित नहि। तेँ ऐहन लोक कऽ मुह मे बोल देब सबसँ उत्तम हैत। अर्थात् ज्ञानदान। ज्ञान स मनुष्य अपन सब इच्छा-आकांक्षा पूर्ति क सकैत अछि आ दोसरो कऽ मदति कऽ सकैत अछि। उपवर्गाक विचार सभकेँ जँचलनि। ओहि आदमीक लेल शिक्षा व्यवस्था कयल गेल। ओहि दिन सुबोध अपन दानक सार्थकता बुझलनि। 76 भाग्यवाद भाग्यवाद शकुन फलित ज्योतिष जेँका अनेको प्रकरण अछि जे जनसमुदाय कऽ जंजाल मे ओझरा शोषणक रास्ता शोषकक लेल खोलि दैत अछि। एकटा ज्योतिषी सुख-दुख जनम-मरणक बात कहि मनसम्फे धन जमा कऽ ताड़ी-दारु खूब पीबैत। एक दिन एकटा जमीनदारक ऐठाम पहुँच हुनक हाथ देखि कहलखिन जे एक बर्खक अभियनतरे अहाँक मृत्यु भ जायत। ज्योतिषीक बातक बिसवास कऽ जमीनदार दिन व दिन सोगाइ लगलाह। जमीनदार केँ तीनि गोट बेटा। तीनू पिताक आज्ञापालक। पिता केँ सोगाइत देखि मझिला बेटा पूछलकनि- बाबूजी! अपने दिनानुदिन किऐक रोगाइल जाइ छी? चिन्तित मने जमीनदार उत्तर देलखिन- बौआ! हमर औरदा पूरि गेल। सालक भीतरे मरि जायब। - ई अहाँ कोना बुझलिऐक? - ज्योतिषी हाथ देखि कहलनि। मझिला बेटा ज्योतिषी कऽ बजा पूछलखिन। पैछले बात कऽ ज्योतिषी देहरा देलकनि। मझिला बेटा ज्योतिषी केँ पुनः पूछल- अहाँ अपने कत्ते दिन जीबि? हँसैत ज्योतिषी उत्तर देलखिन- तीस बर्ख। ज्योतिषीक बात सुनि ओ घर स फरुसा आनि सोझे ज्योतिषीक गरदनि पर लगा देलक। ज्योतिषीक मूड़ी धर स अलग भ गेल। तखन ओ पिता कऽ कहलक- हिनकर उमेर तीस बर्ख बचले छलनि तखन आइ किऐक मरलाह? ई सब ठक छी। ठकक बात मे पड़ि अहाँ अनेरे सोगाइल जाइ छी। जमीनदारक भ्रम टूटि गेल। धीरे-धीरे निरोग हुअए लगलाह। 77 सद्वृत्ति स्कन्दपुराणक कथा थिक। एक बेरि कात्यायन देवर्षि नारद स पूछलकनि- भगवान! आत्म-कल्याणक लेल भिन्न-भिन्न शास्त्र मे भिन्न-भिन्न उपाय आ उपचार बताओल गेल अछि। गुरुजन सेहो अपन-अपन विचारानुसार कते तरहक साधन-विधानक महात्म्य बतौने छथि। जना-जप तप त्याग वैराग्य योग ज्ञान स्वध्याय तीर्थ व्रत ध्यान-धारण समाधि इत्यादि अनेको रास्ता कहने छथि। जे सब करब असंभवे नहि असाध्यो अछि। सामान्यजन त निर्णये ने कऽ सकैत अछि जे एहि मे ककरा चुनल जाय? कृपा कऽ अपने एकर समाधान करियौक जे सर्वसुलभ सेहो होय आ सुनिश्चित मार्ग सेहो होय। ध्यान स नारद कात्यायनक बात सुनि कहलखिन- हे मुनिश्रेष्ठ! सद्ज्ञान आ भक्तिक एक्के मार्ग अछि। जे थिक मनुष्य कऽ सत्कर्म मे प्रवृत्त करब। स्वयं संयमी बनि अपन सामथ्र्य स गिरल आदमी कऽ उठबै आ उठल केँ उछालै मे नियोजित करै। सत्प्रवृत्तिये असल देवी थिक। जकरा जे जत्ते श्रद्धा स सिंचैत अछि ओ ओते विभूति कऽ अर्जित करैत अछि। आत्म-कल्याण आ विश्व-कल्याणक समन्वित साधनाक लेल परोपकार रत रहब श्रेष्ठ अछि। चाहे व्यक्ति कोनो जाति वा धर्मक किऐक ने होथि। 78 आश्रम नहि स्वभाव बदली एकटा युवक उद्धत स्वभावक छल। बात-बात मे खिसिया कऽ आगि-अंगोड़ा भऽ जाइत छल। जँ क्यो बुझबै-सुझबै छलैक त ओ घर छोड़ि संयासी बनैक धमकी दैत छलैक। ओहि युवक स परिवारक सब परेशान रहैत। एक दिन पिता खिसिया कऽ संयासी बनै ले कहि देलक। घर स किछुऐ दूर हटि संयासीक आश्रम छलैक। जे ओकरा बुझल छलैक। घर स निकलि युवक सोझे संयासीक आश्रम पहुँच गेल। आश्रमक संचालक ओहि युवकक उदंडता स परिचित छल। युबक कऽ आश्रम मे पहुँचते संचालक रास्ता पर अनै दुआरे पुचकारि कऽ लग मे बैसाय पूछलक। ओ युवक संयासक दीक्षा लैक विचार व्यक्त केलक। दोसर दिन दीक्षा दैक (दइक) आश्वासन संचालक दऽ देलखिन। दीक्षाक विधान मे पहिल कर्म छल गोसाई उगै सऽ पहिने समीपक धार मे नहा कऽ ऐनाई। आलसी प्रवृत्ति आ जाड़ स डरैवला युवक कऽ ई आदेश खूब अखड़लै। मुदा करैत की? नियम पालन त करै पड़तैक। कपड़ा कऽ देवालक खूँटी पर टांगि युवक नहाइ ले गेल। जखन युवक नहाई ले गेल कि संचालक कपड़ा कऽ चिरी-चोंट फाड़ि देलक। नहा कऽ थरथराइत युवक आयल त देखलक। तामसे आरो थरथराइ लगल। मुदा करैत की? दीक्षाक मुहूत्र्त संचालक सौंझुका बनौलक। ताधरि मात्र किछु फल-फलहरी खायब छलैक। तेँ ओहि युवकक लेल नोन मिलाओल करैला परोसि क थारी मे देल गेलै। एक त करैला ओहिना तीत दोसर छुछे। कंठ स निच्चा युवक कऽ उतड़वे ने करै। भोर मे उठब जाड़ मे नहायब फाटल-चीटल कपड़ा पहिरब आ तइ पर स तीत करैला खायब। युबक खिन्न हुअए लगल। संचालक सब बुझैत। युबक कऽ बजा संचालक कहलक- संयासी बनब कोनो खेल नहि छियैक। एहि दिशा मे बढ़निहार कऽ डेग-डेग पर मन कऽ मारै पड़ैत छैक। परिस्थिति स ताल-मेल बैसाय संयम बरति अनुशासनक पालन करै पड़ैत छैक। तखन संयासी बनैत अछि। भरि दिन युवक अपन प्रस्ताब पर सोचैत-विचारैत रहल। तेसर पहर अबैत-अबैत ओ पुनः घुरि कऽ घर आबि गेल। संयम साधना आ मनोनिग्रहक नामे त संयास थिक। जे घरो पर रहि लोक पालन क सकैत अछि। स्वभाव बदलने बाताबरणो बदलि जाइत छैक। 79 पुरुषार्थ संसारक कुशल-क्षेम बुझै ले एक दिन भगवान नारद केँ पृथ्वी पर पठौलखिन। पृथ्वी पर आवि नारद एकटा दीन-हीन बूढ़ आदमी लग पहुँचला। ओ वेचारे (वृद्ध-आदमी) अन्न-वस्त्रक लेल कलहन्त छल। नारद जी कऽ देखितहि चीन्हि गेलखिन। कानैत-कलपैत कहै लगलनि- अहाँ घुरि क जब भगवान लग जायब तखन कहबनि जे हमरा सन-सन लोकक लेल जीबैक जोगार करति। बूढ़क बात सुनि उदास मने नारद आगू बढ़ला। आगू बढ़ितहि एकटा धनीक आदमी स भेटि भेलनि। ओहो नारद कऽ चीन्हि गेलनि। ओ धनीक नारद केँ कहलकनि- भगवान हमरा कोन जंजाल मे फँसौने छथि जे दिन-राति परेशान-परेशान रहै छी। कम धन दितथि जे गुजरो चलैत आ चैनो स रहितहुँ। तेँ भगवान कऽ कहबनि जे जंजाल कम कऽ दथि। दुनूक बात सुनला पर नारद मने-मन सोचै लगला जे क्यो धने तबाह त क्यो निर्धने तबाह। सोचैत-बिचारैत नारद आगू बढ़ला। थोड़े आगू बढ़ला पर बबाजीक झुण्ड भेटिलनि। नारद कऽ देखि बाबाजी घेरि कऽ कहै लगलनि- स्वर्ग मे तोँही सभ मौज करबह। हमरो सभ ले राजसी ठाठ जुटावह नहि त चुट्टा स मारि-मारि भुस्सा बना देवह। नारद घूमि कऽ भगवान लग पहुँचला। यात्राक वृतान्त भगवान नारद स पूछल। तीनू घटनाक वृतान्त नारद सुना देलखिन। हँसैत नारायण कहै लगलखिन- देवर्षि! हम ककरो कर्मक अनुसार किछु दइ ले विवश छी। जे कर्महीन अछि ओकरा कत्तऽ स किछु देबैक। अहाँ फेरि जाउ। ओहि वृद्ध गरीब कऽ कहबै जे भाइ अपन गरीबी मेटिबै ले संघर्ष करु। अपन पुरुषार्थ कऽ जगाउ। तखन सब कुछ भेटत। दोसर ओहि धनीक कऽ कहबै जे अहाँ कऽ धन दोसरा क उपकार करै ले देलहुऽ। से नहि कऽ संग्रही बनि गलहु तेँ अहाँ धनक जंजाल मे फँसि गेल छी। आ ओहि बावाजी सभ केँ कहवै जे परमार्थीक वेष बना कोढ़ि आ स्वार्थी बनि गेल छी तेँ अहाँ सभके नरक हैत। 80 नैष्ठिक सुधन्वा महाभारत मे सुधन्वा आ अर्जुनक बीच लड़ाइक कथा आयल अछि। दुनू महाबलि युद्ध विद्या मे निपुन। दुनूक बीच लड़ाई छिड़ल। धीरे-धीरे लड़ाई जोर पकड़ैत गेलै। लड़ाई ऐहन भयंकर रुप लऽ लेलक जे निर्णयक दौरि आबिये ने रहल छलैक। अंतिम बाजी एहि विचार पर अड़ल जे फैसला तीनि वाण मे हुअए। या त एतबे मे क्यो हारि जाय वा लड़ाई बन्न क दुनू हारि कबूल क लिअए। जीवन-मरणक प्रश्न दुनूक सामने। कृष्ण सेहो रहथिन। कृष्ण अर्जुन कऽ मदति करैत रहथिन। हाथ मे जल लऽ कृष्ण संकल्प केलनि जे गोवरधन उठौला आ ब्रजक रक्षा करैक पुण्य हम अर्जुनक वाणक संग जोडै़त छी। सुधन्वा संकल्प केलक- पत्नी धर्म पालनक पुण्य अपन अस्त्रक संग जोड़ैत छी दुनू अस्त्र आकाश मार्ग स चलल। आकाशे मे दुनू टकरायल। अर्जुनक अस्त्र कटि गेल। सुधन्वाक अस्त्र आगू बढ़ल मुदा निशान चूकि गेलैक। दोसर अस्त्र पुनः उठल। कृष्ण अपन पुण्य अस्त्रक संग जोड़ैत कहलखिन- गोहि (ग्राह) स हाथीक जान बचाएव आ द्रौपदीक लाज बँचबैक पुण्य जोड़ैत छी। अपन अस्त्रक संग जोड़ैत सुधन्वा बाजल- नीतिपूर्वक उपारजन आ दोषरहित चरित्रक पुण्य जोड़ै छी। दुनू अस्त्र आकाशे मे टकरायल। सुधन्वा क वाण अर्जुनक वाण कऽ काटि धरासायी क देलक। तेसर अस्त्र बाकी रहल। एहि पर निर्णय आबि गेल। अर्जुनक बाणक संग जोड़ैत कृष्ण कहलखिन- बेरि-बेरि एहि धरती पर अवतार लऽ धरतीक भार उताड़ैक पुण्य जोड़ै छी। अपन वाणक संग जोड़ैत सुधन्वा कहलक- अगर स्वार्थक लेल धन कऽ एक्को क्षण सोचने होय आ सदति परमार्थ मे लगाओल पुण्य जोड़ैत छी। दुनू वाण आकाश मार्ग स चलल। अर्जुनक वाण कटि क निच्चा गिरल। दुनू पक्ष मे के अधिक समर्थ इ जानकारी देवलोक मे पहुँचल। देवलोक स फूलक वर्षा सुधन्वा पर हुअए लगल। लड़ाई समाप्त भेल। भगवान कृष्ण सुधन्वाक पीठि ठोकि कहलखिन- नरश्रेष्ठ! अहाँ साबित कऽ देलौ जे नैष्ठिक गृहस्थ साधक कोनो तपस्वी सऽ कम नहि होइत छैक। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_IV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-Estranged Sleep DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –IV NAAGPHAANS PART IV Author- Dr. Shefalika Verma Translated by – Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma Associate Professors, Delhi University, Delhi. Brooding darkly over the tragic story of Vanya and Jalad, Dhara felt whether she is being meted out the same treatment – is Akash an emotional flirt ? – no, no Akash’s high thinking and plain living is reflected through his innocent eyes and straight talk. Dhara also used to forget everything in his company and always tried to question why she felt attached to him? Tagore’s letter became her life – “ akalyanak marg mein namhar yatra se thaki sandhya ke ahank achanak sakshatkar viruddha samyak madhya avanchhita parichaya.” In this long and unpredictable life, the relationship between human beings might take many forms – but her relationship with Akash Babu is different – is it physical, no…. not at all—is it mental attachment? Yes, but these days who believes and accepts it. Who understands that mind has its own world in which many palaces are built and demolished, it is like sand palace in which there is no durability, no longevity. Mind wants somebody, spends a few moment with that person – it is momentary but tempting and fascinating. Ramayana contains the qualities of ideal woman – Dhara had a bitter smile – the best woman was that who never thought of any other man even in her dream – really, our society subordinates womenfolk through these ideals. Why she is treated as property? Dhara wanted this sick society to get rid of ritual ridden religion. Sita had undergone ordeal by fire which is still continuing whatever may be the context. Vanya had once told Dhara – it is very difficult for a single woman to lead a peaceful life. Dhara realized it and replied – Thakur Saheb’s wife accompanied by some women visited me and inquired about Gautam Babu’s welfare. I was shocked and asked who is this Gautam? She told me why I am pretending as if I am not aware of our neighbour Gautam Babu. --- Vanya, in fact I had never thought about Gautam Babu. Vanya also discussed Akash Babu – these days everybody is talking about him. Dhara replied – people might discuss Akash Babu, but I will never sever my relationship with him. He is my friend, philosopher and guide. I would have severed the relationship had it been sinful. Vanya, why the relationship between man-woman is interpreted in only one context. Can there not be a normal relationship between the two based on Satyam ,Shivam and Sundaram? 2 Vanya replied – right from the beginning of civilization people attach just one meaning to this relationship. Dhara asked Vanya, you teach Arthasastra but you are specialist of philosophy of life. Vanya – I have not done any research but only leading life’s philosophy. In the process of understanding Arthasastra in portions, I have unintentionally divided my own life in portions. Telephone bell started ringing. Dhara ran and received the call. Hello, I am Simant speaking. Yes I am Dhara, speaking in a stable tone. Oh Dhara, you are yet to sleep. Dhara – can you come here for few days? Simant – what is the matter Dhara? Are you serious? Dhara—yes, if possible … Simant – okay, I will try my best. I will come on one condition. Dhara – what ? Simant – till I reach there, you will keep on smiling. You are speaking in such a dead tone, I feel dead. Dhara – why this silly and nonsense talk? I do not like it. Simant – oh sorry. Now I will speak directly in front of you. Six minutes are over – voice from Exchange interrupted. Simant – okay Dhara, I will definitely come. Good night. Dhara went to bed and tried to sleep. But her mind was troubled and disturbed due to the irresponsible talks and comments of the people. Simant always tried to console her -- Dhara, people cannot see the heights you have scaled. Immoral eyes always look for immoral things. Impure mind always think impure – erroneous heart always misconstrues – people lack the insight to understand you. -- Jaki rahi bhawna jaisi , prabhu murat dekhi tin taisi. You have more than performed your duties towards others, but in return what you have got? 3 Dhara started recollecting—she was the owner of a proud and satisfied family, with vast property in village. But after the death of father-in-law, the younger brothers of her husband became the owner of the property. Simant had once told her – you are the eldest in the house, owner of the property. I am always busy. You should go to the village to look after everything. Dhara - Nobody needs me there. Simant- why? my younger brothers are there, your sister-in-laws are there. Old mother…….Go there at regular intervals and look after agriculture and allied activities. Afterwards Dhara had spent some time in the village. One day , in the Gosai ghar i.e. place of worship, she recalled – why Sita left everything and accompanied her husband? Sita really loved Ram. It was not merely love , but she was incomplete without Ram. Dhara realized the same – why I am staying back in the village? Nobody needs me here. And when Dhara decided to leave village, nobody tried to stop her, rather everybody was overjoyed. What did she get in return for her sacrifices? She had to join service, followed by people’s comments on her character. Why people unnecessarily point finger at anybody’s character? Even Jesus Christ was tortured and nailed. Dhara also felt nailed, she wanted to leave the job and the city. But no city is bad by itself, but its culture, its contacts and its conservative attitude make it vulnerable. Till these distortions are rectified, human being will not change. Mrs. Thakur, Mrs. Jha , nobody is to be blamed as they are guided by these distortions. When Simant comes here, I will clearly tell him that I neither want to continue with the job nor want to remain in this city. To her, Simant was the life giving sun. God in the form of man. Dhara recalled her meeting with Kadamba’s neighbour Dr. Andrews and his doctor wife Reshmi. They had two small children Newla and Earl aged six and two years respectively – it was their small world. Doctor’s life in England was quite difficult and complex. They enjoyed all the richness of life, but at the same time were overworked. They were completely accountable to their patients – patients were considered as god and doctors as slave. Patients had the right to sue doctors for irresponsible behaviour and acts. Dhara felt the need for accountability on doctor’s part even in India. One day Reshmi asked Dhara – how do you spend the day? Dhara replied – reading and writing. I have already read the works of Shakespeare and Elliott. 4 Reshmi – Newla goes to school daily, but Earl is too small. He needs proper care. Can I leave Earl at your place for the whole day? Dhara – I will consider myself fortunate. Reshmi - Dharaji I will leave Earl at your place on one condition. You will have to accept four pound per hour for this. Dhara – Reshmi, I am not a child-minder. I will certainly look after Earl, but please no payment. You already know Kadamba is earning four thousand pound per month. Reshmi – Dharaji, do not take it otherwise. Everybody is earning here. Even unemployed gets bonus from the government. All old persons whether British or any other nationality get support from the government. Here money has no value – but work is valued as it represents the capability, the empowerment. Four pound per hour is nothing but you will feel working and even I will have no guilt. Dhara recollected – in India many students tried to take tution from her – many teachers were minting money through tution, but Dhara never agreed for it Once Simant had also advised Dhara to coach the students. But Dhara lived in a different world i.e. the world of Wordsworth, Shelley, Keats and Shakespeare. A college day friend had told Dhara – whenever I see you I remember these words from Wordsworth’s poem entitled She Dwelt Among Untrodden Ways, – ‘A violet by a mossy stone and Fair as a star, when only one is shining in the sky, half-hidden from the eye.’ Dhara was always lost in her own world. While teaching in the college she used to enter in the inner core of the poem recollecting words from Shakespeare’s poem entitled Carpe Diem –‘ O mistress mine, where are you roaming? Dhara always appeared to be searching – as if somebody was waiting for her. She behaved like the female character of Sharatchandra whom nobody could pull to the materialistic life. Dhara was wandering like Kamayani’s Shraddha to meet a complete human being. But when Dhara came out of the world of Wordsworth, Shelley and Keats, she came to understand the reality and remembered Shakespeare’s word –‘ Blow, Blow, thou winter wind, Thou art not so unkind As man’s ingratitude.’ TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York. Estranged Sleep Sweating in the melting day of summer Dreaming comet appearing like a demon Rushing to beloved crushing her neck Lover holds the locks of the comet Dropping into the pond Binding the feet with locks A hairy submarine of the pond in the hot summer day The saint of comet came out Taking stake of own life for sake of his beloved The lover awakes being melted by sun, wet with sweats The desire of deep sleep is lost Ignoring the watching countrymen Awake in the noon of mantras and tantras Very uncertain dream Becomes the fastest runner The most active wrestler of the group The voice of scolding master awakes him from solitude Black painted night’s sleep Breaking-coming-breaking Combination of sleep and dream Solving nation’s problem becoming a leader Receives many clapping, leadership is appreciated Solving the problems of religion-caste-militants Facing the fatal attacks and winning Awakens from sleeps but sleeps lack Loosing the satisfaction of deep sleep My friends poisoned my sleep gradually And I got estranged sleep. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर। महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com website: http://www.shruti-publication.com/ विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com "मिथिला दर्शन" मैथिली द्विमासिक पत्रिका अपन सब्सक्रिप्शन (भा.रु.288/- दू साल माने 12 अंक लेल भारतमे आ ONE YEAR-(6 issues)-in Nepal INR 900/-, OVERSEAS- $25; TWO YEAR(12 issues)- in Nepal INR Rs.1800/-, Overseas- US $50) "मिथिला दर्शन"केँ देय डी.डी. द्वारा Mithila Darshan, A - 132, Lake Gardens, Kolkata - 700 045 पतापर पठाऊ। डी.डी.क संग पत्र पठाऊ जाहिमे अपन पूर्ण पता, टेलीफोन नं. आ ई-मेल संकेत अवश्य लिखू। प्रधान सम्पादक- नचिकेता। कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता सम्पादक- प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह आ डॉ. अणिमा सिंह। Coming Soon: http://www.mithiladarshan.com/ (विज्ञापन) अंतिका प्रकाशन की नवीनतम पुस्तकेँ सजिल्द
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मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00
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रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00 छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00 शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00 कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00 भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00 मैथिली पोथी
विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00 संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00 एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00 दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00 सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य
आलोचना
इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन
सामाजिक चिंतन
किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र
उपन्यास
माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
कहानी-संग्रह
धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद जगधर की प्रेम कथा : हरिओम अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू। बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023, आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें। पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हमारा वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15%और उससे ज्यादा की किताबों पर 20%की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी । एक साथ हिन्दी, मैथिली में सक्रिय आपका प्रकाशन
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The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ (send M.O./DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI.) Amount may be sent to Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi and send your delivery address to email:- shruti.publication@shruti-publication.com for prompt delivery. Address your delivery-address to श्रुति प्रकाशन,:DISTRIBUTORS: AJAY ARTS, 4393/4A, Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ.Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107 Website: http://www.shruti-publication.com e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५४ म अंक १५ मार्च २०१० (वर्ष ३ मास २७ अंक ५४)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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