VIDEHA — Issue 55 / अंक ५५

Publication: VIDEHA · Issue: 55
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196 'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.अनमोल झा- गामक बताह २.-कामिनी कामायिनी-घडियाली नोर २.२.१.जगदीश प्रसाद मंडल--तिलासंक्रान्तिक लाइ २.कुमार मनोज कश्यप-मास्टर साहेब २.३. १.राजदेव मंडल-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर २.जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्‍यास-जीवन संघर्ष-२ २.४.१.बेचन ठाकुर -नाटक छीनरदेवी- आगाँ २.सरोज ‘खिलाडी’-नाटक- ललका कपड़ा २.५.प्रेमशंकर सिंह: चेतना समिति ओ नाट्यमंच २.६.१.     प्रकाश चन्द्र -नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा -विश्व रंगमंच दिवस : 27 मार्च २.बिपिन झा-भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल २.७.डॉ.शेफालिका वर्मा-प्रतिवादक  स्वर २.८.सत्यानंदपाठक-कथा- स्वान विमर्श ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.सत्येन्द्र कुमार झा-पॉंच लघु कविता ३.३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.४.जय प्रकाश मंडल ३.५.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २१म खेप ३.६.राजदेव मंडल दूटा कविता ४. बालानां कृते-. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा ५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_V-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-Leaning towards the truth with own knowledge विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिली गजल शास्त्र गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जे एहि अरकान सभक समुच्चय अछि से फारसीक छी। फेर ओतएसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि। मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतए ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक शब्दावली भेल अरूज । बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नहि। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। एहि उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। आ किएक तँ देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नहि अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतए देल जाएत। जाहि बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन  आ जाहि बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्द्स । एतए मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानए पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नहि भेटत। जाहि बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जाहिमे एकटा सँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर। दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत। मिसरा आ शेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा मिसरा वा शेर कहै छी। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओहि दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी होएत। ऊला आ सानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल।  दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल। अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्। तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कएक टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि । काफिया आ रदीफ: तुकान्त काफिया आ ओकर बादक शब्दकेँ रदीफ कहैत छिऐ।  काफिया बदलत मुदा रदीफ नञि बदलत। मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग मुदा मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक मुदा मतलाक रहब अनिवार्य। पञ्जीपर किछु तथ्य मालद्वार – पंचप्रवर- करमहे नरुआर वत्सगोत्री, राजा रामलोचन चौधरी-मालद्वार- २५०० वर्ष पूर्व- राजा दुर्गा प्रसाद चौधरी- -राजा बुद्धिनाथ चौधरी(मालद्वार)-कुमार वैद्यनाथ चौधरी - छत्रनाथ चौधरी (दुर्गागंज)-टंकनाअथ चौधरी-कर्मनाथ/ शेषनाथ/ रुद्रनाथ एक छलि महारानी- डॉ. मदनेश्वर मिश्र सुरगणे लौआम- गोत्र पराशर लौआम गाम मूलतः बसैठीसँ पूर्णियाँक बीचमे- आब नहि छैक। तिलैबार मूलक शाण्डिल्य गोत्री बनैली गाम- अगरू राय- हिनकर जमाए सुरगणे लौआम मूलक प्राणपति- हिनक बालक समर झा १५७५-१६२५ (लगभग १६म शताब्दी), दिल्ली सल्तनतसँ जमीन्दारी किनलन्हि आ समर चौधरी भऽ गेलाह, महाराज भऽ गेलाह। लौआमक दू शाखा -महाराज कृष्णदेव (पहसरा बसैटी) -महाराज भगीरथ- सौरिया (कटिहार-सोनालीक बीचमे)- एकटा स्थान दण्डखोड़- एतए अपराधीकेँ सजा देल जाइत छल (सौरिया शाखा द्वारा)। पाँच वंश बाद पहसरा बसैटी- कृष्णदेव-देवनारायण-वीरनारायण-रामचन्द्र नारायण (जॉन बुकानन पूर्णियाँ गजेटियरमे हुनकर वर्णन किंग ऑफ पूर्णियाँक रूपमे कएने छथि)- इन्द्रनारायण (बिना सन्तान) रानी इन्द्रावती(सासुरक नाम- असल नाम लीलावती) हिनकर मृत्युतिथि १५-११-१८०३ मृत्युस्थान पूर्णियाँ, समए- मध्याह्ण काल, श्राद्ध खर्चक हेतु पूर्णियाँ जजसँ प्राप्ति- रु.५०००/- माँग रु.१५,६७०/-( बोर्ड ऑफ रेवेन्यु, फोर्ट विलियममे २९.११.१८०३ ई. केँ कार्यवाही)। इन्द्रनारायणक समकालीन सौरिया दिश राजा राजेन्द्रनारायण आ राजा महेन्द्रनारायण। महाराज इन्द्रनारायणक मृत्यु १७७६ ई. मे, तकर बाद २७ बर्ख धरि रानी इन्द्रावती राज कएलन्हि। राज बनैली- रामनगर/ श्रीनगर/ गढ़बनैली/ सुल्तानगंज/ चंपानगर। श्यामा मन्दिर बनारसमे संस्कृत पढ़बाक वृत्ति- रानी चन्द्रावती- कोइलख (राजा पद्मानन्द सिंह, पुतोहु-कुमार चन्द्रानन्द सिंहक पत्नी)- रामनगर। विशेश्वर झा बैगनी नवादासँ पहसरा नोकरी करबा लेल अएलाह। हिनकर बेटा दीवान देवानन्द फेर चातुर्धरिक मनसबदार परमानन्द- संध्यागायत्रीसँ लोप बनैली समर सिंहकेँ मानि लेलन्हि। दुलार चौधरी/ फेर सिंह (बनैली राज), बुकानन हिनका चौधरी कहि सम्बोधित करैत छथि, मात्र एक बेर सिंह कहै छथि। १६८०-१७०० ई.-दरभंगा राज, कन्दर्पीघाटक लड़ाई, राजा नरेन्द्र सिंह- दिल्ली सल्तनत आ जनताक बीचमे, बागमती तटपर समस्तीपुर ब्रह्महत्याक आरोपी नरेन्द्र सिंहकेँ बारि ब्राह्मण सभ पूर्णियाँ सुरगणे लौआम महाराज समर सिंह सन्तति महाराज नरनारायण, पहसरा बसैटी (कोशीक पूर्व)- फारबिसगंजसँ दण्डखोड़ा कटिहार तक बसाओल गेलाह। फेर माधव सिंहक समएमे दरभंगा आपस भेलाह। खुद्दी झा/ परमेश्वर झाकेँ आशुतोष मुखर्जीक समए दरमाहा राज बनैली देलकैक। पञ्जीमे दरभंगा राजक विरुद्- विविध विरुदावली विराजमान् मानोन्नतमान् प्रतिज्ञापदर्योधिक परशुराम समस्त प्रक्रिया विराजमान् नृपराज महोग्रप्रताप मिथिलाङ्कार महाराजाधिराज माधव सिंह बहादुर कामेश्वर सिंह। धकजरीक नवलक्षाधिपति लक्ष्मीपति मिश्र कोदरिये मूल शाण्डिल्य पाञ्जि भेटि गेलन्हि, रमेश्वर सिंहकेँ १ १/२ लाख टाकाक चन्दा देलन्हि, पिण्डारुछक चौधरी सभकेँ सेहो पाँजि भेटलन्हि (नित्यानन्द चौधरी)। गुणाकर झा –हरसिंहदेवक समकालीन ई.१३२६ ततैल ग्राम- १० खाढ़ी पाछाँ ककरौड़ गाम-जिला मधुबनी रघुदेव झा- आनन्द झा- देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा दरभंगा नरेश माधव सिंहक (शाखा पुस्तकक प्रणयन आदेश) समकालीन १६५० ई.क आसपास- मित्रानन्द प्रसिद्ध झोंटी झा- गोपीनाथ झा प्रसिद्ध होरिल झा- हरखानन्द प्रसिद्ध हरखी झा- एखसँ १५९ वर्ख पूर्क दिनकर टिपणी (जन्म) रसाढ़ पूर्णियाँ बनमनखी लग- श्री भोलानाथ प्रसिद्ध भिखिया झा- श्री मोदानन्द झा- पञ्जीकार विद्यानन्द झा प्रसिद्ध मोहनजी- मूल पड़ुआ(पण्डुआ) महिन्द्रपुर, गोत्र काश्यप त्रिप्रवर। खाँ- कुजिलवार उल्लू- कात्यायन गोत्र उतेढ़- सिद्धांत लिखबाक पहिने वर ओ कन्या पक्षक अधिकार ताकल जाइत छैक आ ई मात्र मूलक आधारपर बनाओल जाइत अछि आ समगोत्री विवाह नहि होअए ताहि लेल गोत्र आ प्रवर सेहो देखल जाइत अछि। मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि, किछु अपवादो छैक। जेना ब्रह्मपुरा मूल- काश्यप/ गौतम/ वत्स/ वशिष्ठ (सात टा), करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्सगोत्री, दुनु करमहामे विवाह संभव। चन्दा झा- माण्डर रजौरा रामोऽवेत्ति नलोऽवेत्ति वेत्ति राजा पुरुरवा। अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यदेवोनृप भविष्यति॥ नान्यदेव घोड़ापर चढ़ल हकासल-पियासल अएलाह, गाछतरमे घोड़ा बान्हलन्हि, घोड़ा लेल खाद्य छीलए लगलाह तँ फन काढ़ि साँप नाग आएल, किछु लिखल जे नान्यदेव मिथिलाक भाषा नहि पढ़ि सकलाह। कामेश्वर ठाकुर जे गाममे रहथि पढ़ि बतओलन्हि जे अहाँ मिथिला राजा नान्यदेव छी। कामेश्वर ठाकुर संतति चण्डेश्वरकेँ हरसिंहदेव राज लिखितमे सौंपि पलाएन कएल। चण्डेश्वरक पाछाँ सिपाही आएल। एकरापर जल फेंकि ठाढ़ भऽ गेल, दोसर खेहारलक, ओकरापर जल फेकलन्हि ओ आन्हर भऽ गेल (अन्हरा ठाढ़ी)। वर्षकृत्य- अयलीह बिहुला देलन्हि पसारि, गेलीह सामा लेलन्हि ओसारि। पञ्जी- अधिकारक नियमावली- पञ्जी अयाची मिश्रक पौत्र ढाका कवि- ढाकामे जागीर भेटलन्हि। हल्ली झा तांत्रिक आ शिव कुमार शास्त्रीक बीच शास्त्रार्थ- प्रत्याहार वाक तंत्र द्वारा हल्ली शिवकुमार शास्त्रीक वाक् बन्न कए देलन्हि। तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा- गाम जमसम। महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल, गाममे पोखरि खुनाओल, मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह। केशव झा लड़कीकेँ लए गाम आबि गेलाह। धोती रंगाइत छल। पता केनिहार जे आएल तकरा पकड़ि कन्यादान करबाओल। तकर बाद राजा की करताह, पञ्जीकारकेँ बजा कऽ ओकर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशव श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहितन्हि। पाञ्जि आ पानि अधोगामी, पछबारि पारक प्रथम श्रेणी आब नहि अछि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० मार्च २०१०) ९६ देशक १,२३० ठामसँ ४०,६५१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३३,३८९ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr  and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html  बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१.अनमोल झा- गामक बताह २.-कामिनी कामायिनी-घडियाली नोर २.२.१.जगदीश प्रसाद मंडल--तिलासंक्रान्तिक लाइ २.कुमार मनोज कश्यप-मास्टर साहेब २.३. १.राजदेव मंडल-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर २.जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्‍यास-जीवन संघर्ष-२ २.४.१.बेचन ठाकुर -नाटक छीनरदेवी- आगाँ २.सरोज ‘खिलाडी’-नाटक- ललका कपड़ा २.५.प्रेमशंकर सिंह: चेतना समिति ओ नाट्यमंच २.६.१.     प्रकाश चन्द्र -नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा -विश्व रंगमंच दिवस : 27 मार्च २.बिपिन झा-भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल २.७.डॉ.शेफालिका वर्मा-प्रतिवादक  स्वर २.८.सत्यानंदपाठक-कथा- स्वान विमर्श १.अनमोल झा-गामक बताह २.-कामिनी कामायिनी-घडियाली नोर `अनमोल झा गामक बताह बताह, बुरि, बकलेल पत्ता नै की-की ने गामक लोक कहै। सगर गाम इएह बात। हौ कोनाकेँ इ भुसकौलहा सुभषवा मैट्रिक पास कऽ गेल आ कोन दके इंजिनीयरीमे नामों लिखा गेलै। हौ ओकर तँ एक फेजे पार छै। कहह तँ गामक छौड़ा कऽ संग कऽ-कऽ पत्ता नै की-की नियार भास करैत रहैत अछि। आ छौड़ो सभ खुब ओकर आगा पाछा करैत रहैत अछि, हमरा तँ लगैत अछि इ रूतबा रहलै तँ छौड़ा सभहक तँ छोड़ह, गामे कऽ नै उड़हारि चल जैह। सभहक नजरि गाम अबैत मांतर ओकरापर गड़ि जाइत छलै। आ सुभाषो एक आध दिनमे गाममे रहि, गामक हाल-चालसँ अवगत भऽ छौड़ा सभहक बैठार कऽ चल जाइत छल सिन्दरी। गाम अति पिछड़ल-गमार आ हँसी-कुचिष्टाक समुद्र छल। सभहक एक बात, एक विचार कियो तेहेन पढ़ल लिखल नै, तै छल मूर्खक लाठी बिचे कपार सेहो छल। ककरो नेना-भुटका नीक जकाँ पढ़ाइ-लिखाइमे नै भीरल छल आ जे भीरलो छल से प्रोत्साहनक अभावमे डारटुट्टु जकाँ बैसी जाइत छल। तखन पत्ता नै कोनाकेँ सुभाष ओहि गाम आ ओहि समाज आ ओहि वातावरणमे रहि मैट्रिक पास कय, इन्जीनियरीमे पढ़ि रहल अछि आ पाँच हजार रूपैया स्कॉलरसीप पाबैत अछि। आ पत्ता किएक नै थालमे जे कमल फुलाइत छै से कोना। जे अपने खराप रहैत अछि ओकरा सौसे दुनियाँ खरापे लगैत छैंक। आ ताहीमे नीक, नीक तँ आर तीत ओकरा बुझाइत छैक। सैह बात छलै सुभाष मिसिया भरि नै सोहाइत छलै। ई गामक विकास लेल गाम अबैत देरी नीक-नीक योजना बनायब। जाहिमे नियम कानून छल-सभ छात्र स्व अध्यायमे लागल रही, दोसरो कऽ पढ़ाइ-लिखाइमे सहायता पहुँचाबथि, गामक रस्ता परहक गंदा कऽ मासमे 2 बेर नै तँ एक बेर अवश्य सभ युवा वर्ग मिलि - कोहारि खुशीसँ साफ सुथरा करैए। गामक सभ बिजली पोल सभपर चंदा लऽ बिजली लगा देल जाए। उसराहा बाबाक ढ़हैत मन्दिरपर ध्यान देल जाए। गाममे एकटा लाइब्रेरी होमक चाही, पत्र-पत्रिका ओतए नित्य आयल करए। गामक स्कूल मास्टरकेँ जा कऽ कहल जाए जे चटिया लोकनिपर नीक नजरि राखनिहार गामक कोनो काज श्राद्ध, उपनयन, आदि-आदिमे बिना कहने सभ ओतए जा हुनका परिश्रमसँ सेवा कयल जाए। गामक विकास लैल ब्लौंकसँ सम्पर्क स्थापित कयल जाए आ ओहि सँ गामक लोक कऽ लाभ होइन। आदि-----आदि---------। यैह छल सुभाषक बतहपन्नी आ देखितहि-देखितहि ओ एकटा नव जागरण युवा संघक गठन कऽ बैसल। आ योजना सभ लागू भऽ जैह तैही हेतु सभ कृत संकल्पित भऽ गेल। एम्हर गामक लोक कहए "केहेन-केहेन गेला तँ मोंछ बला एलाह" नूनू, रामचन्द्र, गोनाई आ गुर कते बेर एहेन-एहेन योजना बना, चकापर राखलक से रखले छनि आ हुनका सभक केश पाकि गेलनि, दाँत टुटि गेलनि आ लाठी लऽ चलैत छथि, आ योजना-योजने रही गेलैन हूँ-----। देखैत छीयैन लैटसहिबो कऽ------? बीस गोटए मुदे बीस रंगक बात। एहि बेर सुभाष गर्मीक छुट्टीमे मास दिन गाममे रहल, आ गुहकट्टीसँ लऽ कऽ मन्दिर तकमे हाथ लगा देलक। अपनेमे दस-बीस रू. प्रति माह चन्दा लऽ पत्र पत्रिका मंगबय लागल। मन्दिरमे बेस पाइ लगितै तै धनिक लोक ओतए संघक सभ गोटा जाए भीख माँगए, दतखीसरी कऽ दैत छल, तेना तेना कऽ मन्दिर चमकए लागल। गामक कोनो नेना कऽ पढ़बाक समएमे बड़द-महीस किछु खोलने देखैत छल सुभाष तँ अपनेसँ खुट्टामे बान्हि अबै छल आ ओकर बाबू कऽ शिकायत करै छलै....हे हम अहाँक माल बान्हि देलौ अछि। उत्तर भेटै बड़का काज केलौ है, हम अपना बेटासँ माल चरबै छी, अहाँक मतलब। सुभाष कहैए से नहि भऽ सकैत अछि, पढ़ए कऽ समयमे पढ़त दोसर समएमे अहाँ अपना बेटासँ किछु कराउ। नेनों-भुटका सभकेँ रुचि खुजलै पढ़ै-लिखैएकेँ ओ सभ माए-बापकेँ ठाए-फटाए उत्तर दऽ दैक, हम नै महीस खोलबौ। हमरा कोपी-किताब दे, आ कंठपर ठाढ़ भए किनबाबए। ओना जकर आर्थिक स्थिति एकदमे खराप छलै, सुभाष अपना पाइसँ स्कूलमे नाम लिखा दैक, किताब कॉपी कीनि दैक आ अपने गेलापर संघ कऽ भार द दैक ओकर कॉपी-कितापक, सिलेट-पेंसिलक। गामक नवतुरमे अनुशासन जगजगार होमए लगलै। एक दोसरामे छोट-पैघ, अचार-विचार, उचित-अनुचित धारा फूटलै। जहाँ-तहाँसँ थोड़-थोड़ पोथी जमा भेल आ तामे एकटा तामे टटघर बना पुस्तकालय सेहो बनि गेल। एतेक भेलाक बादो कुचिष्ट समाज कहै यौ सुभाष बाबू हमरा सभ कऽ पैखाना करैएमे दिक्कत होइत अछि, जल्दी रस्ता साफ कराउ, तखन ने हम सभ पतियानी लगा बैसब। सुभाष कहए जेहन अहाँ सभक विचार। अहाँ सभ जतेक गंदा करबै, हमरा सभ ओतेक साफ करबै। कारण आब गाम अहाँ सभक नै, हमरा सभक छी। एकर नीक अधलाहसँ अहाँ सभ कऽ कोन काज। अहाँ सभ तँ पाकल आम भेलौहुँ नै। "गेल माघ उंतीस दिन बाँकी" समए छन-छन बितैत गेल आ किछु दिनुका बाद देखएमे आबए लागल जे गाम पूर्ण विकासमे लागि गेल आ एका एकी गाममे पोल सभपर बल्ब लागि गेल, पुस्तकालयमे बेस पोथी सभ जमा भऽ गेल, पत्र-पत्रिका बेस जुटए बिना पुस्तकालयपर गेने छात्र सभ कऽ चैन नहि आबैए रस्ता दुधसँ घोल, उसराहा बाबापर जे चढ़ाएल अछत माल-जाल चटैत रहै छल से आब ओहिमे खुब निसन केबाड़ लागी गेल। छतपर लाउडिस्पीकर भजन गबैत गामक मनोरम कऽ आर बढ़बए छल। ब्लौकसँ कल आएल, पहिले पुस्तकालयपर आ तकरा बाद सगर गाममे गोट बीसेक लगभग कल गरा गेल। लाउडिस्पीकर सुभाष अपन स्कॉलरसीप बला पाइसँ कीनल धरि ईटाक घर पुस्तकालय ब्लौकक फण्डसँ बनाएल गेलै। आँखिक आगूमे एतेक परिवर्त्तन देखि आइ पूरा गाम छुब्द, चकित आ विस्मित अछि। कोना कऽ नव जागरण संघ, आ जाए संघ तै नै इ सोना बनैत गाम। एहि समाजकेँ नै आगू चलि नै पाछु। जे कालि कहैए सुभषवा बताह, बुरि, बकलेलहा, सैह समाज आइ कहैत छैक सुभाषक बुद्धिक आ परिश्रमक इ परिणाम छी, चमकैत, खनकैत, हमर गाम। सैह जे गामक बताह छल, अपन हीनता अपन खिध्यास सुनैत रहैत छल, से बताह बनी की-की नै कए देलक। मुदा वास्तविक बताह के...सुभाष आ गामक लोक.....? आइ गाममे घर-घर बी.ए., एम.ए. पास अछि आ मैट्रिक कतेक गनाऊ। पूरा गाम मात्र एकों सुभषवाक बतहपनीसँ शिक्षित आ नोकरी-चाकरीमे लागी गेल अछि। नै तँ गामक लोकक अनुसार लोक एखनो घिर सेवने तहितए। सुभाष अपन प्रतिभाक बले स्वीडनमे रीसर्च करैत अछि। आ गाम एखनो ओतसँ जाइत अबैत रहैत अछि। ओकरे सन कतेक प्रतिभाशाली लोक सभ ओहि गामक गौरव बढ़ा रहल अछि। ओकर गाम आदर्श गाम भऽ गेल अछि। संघ एखनो कार्यरत अछि आ जऽ जऽ छोटगर लोक गाम छोड़ने जाइत अछि पढ़ै लिखै लेल बाहर गेलासँ छोटतुरक बच्चा सभ ओहि क्रमक आगाँ बढ़बैत रहैत अछि। सुभाषक एखनो अपना गामपर गर्व छैक आ पुरा गामक सुभाषपर। एखनो ओकर फोन जे अबैत छैक विदेशसँ तँ घंटाक-घंटा गामक मादे चर्च आ पुछताछ करैत रहैत अछि ओ। २.-कामिनी कामायिनी घडियाली नोर प्रिय रत्‍ना हम अहिठाम कुशल सॅ रहैत अहि विश्वासक संग चिट्टी  लिख रहल छी जे अहूॅ सकल पेलवार स्वस्थ आ़ प्रसन्न हाेयब ।स्नातकक परीक्षा के उपरांत हमहूॅ खाली बैसल छी  हाथ प़ हाथ धेने घर में अहिं जकाॅ ।विचारैत छी मिथिला पेंटिंग सीखू ।अहाँ बड नीक काज केलहूॅ जे बी एड में एडमीशन ल़ लेलहूॅ । हाँस्टल में हम सब वर्त्तमान राजनीतिक चर्चा में कत्तेक समय बिताबी ।अहाँ बरमहल हमर सबहक प्रगतिशील मंच में आबि अपन शहऱ अपन समाज आ़’ आेकर कथा व्यथा जाहि रूपें प्रस्तुत करी ताहि सॅ सब कियो मर्माहित भ’ जाए छल । अहाँ सदिखन अनका सबके कहैत छलिए जे अहाँ त’ हमरा अपन बेस्ट फ्रेंड मानैत छी मुदा हम अहाँ के कोनाे वैल्यू नहि दैत छी ।अहाँ के इर् धारणा निराधार अछि ।कि कहियो हम अहाँ के अनुचित सलाह देलहुँ   हमरे कहबा प’ अहाँ इंटर में अंगे्रजी नहि नेने रही़  जनैत छलहूॅ जे अंगरेजी सम्हारब अहाँक बसक गप्‍प नहि छल    आ’  देखू कत्तेक नीक रिजल्ट रहल अहाँके । सीमा सॅ हमर घरक पता लए क’ अहाँ इर् चिट्टी लिखलहूॅ ताहि लेल  धन्यवाद ।हमरा प्रति  अपन माेन में एतेक श्रद्वा आ’ इर्ज्जत राखए लेल सेहाे थन्यवाद   मुदा हमरा विचार सॅ केकराे दाेस्त बूझनाए मात्र बड पैघ गप छैक । घर में सबके हमरा दिस सॅ यथाेचित कहबैन्ह । अहाँक सखी शैली । प्रिय  रत्‍ना अहाँक टेढ बाकुड हैंडराइर्टिंग़    खराप नहि मानब़  हॅस्सी कए रहल छी़    में लिखल मुदा अतिशय प्रेम सॅ भरल चिठ्ठी एखन तुरत हस्तगत भेल ।इर् जानि क’ प्रसन्नता भेल कि अहाँ बी ए सेकेंड डिविजन सॅ पास करि गेलहूॅ । अहाँ बी़ एड कइर्ए रहल छी मुदा अहाँ के पढेबा में विशेष अभिरूचि नञि अछि । तखन हमरा विचार सॅ अहाँके स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशनक तैयारी करब चाही ।अहाँ सब लेल त’ कत्तेक सीट रिजर्व छै ।   एकरा हमर अहंकार कदापि नञि बूझब    । एक त’ अहाँ कन्या  ऊपर सॅ अनुसूचित जाति   एकर लाभ अहाँ किएक नहिं उठाबी   ।कोनाे तरहक गायडेन्स जाै हमरा सॅ चाही त’ निधाेक हमरा घर आबि सकैत छी वा चिठ्ठी पतरी के माध्यम सॅ सेहाे जानकारी लए सकैत छी । क्षितिज सॅ उतरि  सांझ गाछ बिरीछ के अपना गिरफ्‍त में लेबए लागल छै ।हम बाहर जा रहल छी बूलए टहलए ।शेष गप सप्‍प दाेसर चिठ्ठी में     । पैघ के प्रणाम छाेट के आर्शिवाद अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना अहाँक एडमिट कार्ड आबि गेल  इर् जानि प्रसन्नता भेल ।अहाँ अपन एक्‍जाम सेंटर अहि शहरि में देने छी से जानि आआेर प्रसन्नता भेल ।अहाँ लिखलहूॅ जे अहाँक कोनाे संबंधी हमर घरक लग़ पास में रहै छथि  अहाँ आेतए आयब हमर सहयोग लेबा लेल   स्वागत अछि  अवश्य आऊ़  ।आेना अहि बीच में जे राइर्टर्स के किताब आ’ प्रतियोगी पत्रिका सब पढबा के लेल लिखने रही से सब अवश्य पढब ।किछु उपयोगी पुस्तक जे अहाँ के शहरि में नहिं उपलब्ध भ’ सकैछ़  आ’ किछु नाेट्रस हम डाक सॅ पठा रहल छी  ।बूझल अछि जे अहाँक रटबाक क्षमता बड तीव्र अछि   सबटा चीज ताेता जकाॅ  आॅखि मूनि क’ रटि जायब ।अहि गप के दुख नहि करब जे कोचिंग नहि करि सकैत छी ।स्वाध्याय सॅ सेहाे सफलता क बाट क’ सब टा विध्न बाधा हरण भ’ जाय छै ।हॅ लिखबाक खूब अभ्यास करब   अहि सॅ लिखावट में सुधार हाेयत आ’ स्मरण सेहाे रहत ।सफलता अवस्स भेंटबाक’ चाही  इर् हमर अन्तः करणक स्वर थीक । अहि बेर कतेक गरमी पडि रहल छै़   तहिना गाछी सब में आम लुधकल छै। शेष सब यथावत ।                                            अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना अहाँ के परीक्षा दिन देखने छलहॅू मुदा गप नहिं भ’ सकल ।चश्मा लगा क’ सत्ते अहाँ गैजटेड आफीसर लागि रहल छलहूॅ ।अधिकांश प्रश्न त’ तीन साल पहिलुका रिपीट छल इतिहास आ’ राजनीति शास्त्र वला प्रश्न त’ वएह सब छल जे हम लिख क’ अहाँ के पठाैने रही   अहाँ नीक जकाॅ घाेंकि गेल रहाैं ।एडवांस मुबारक  रिटेन त’ अहाँ निकालिए लेब आ’ इंटरव्यु में अहाँक वाक ् शक्‍ति के आगाॅ भला के टिक सकैय ।अहि गप सॅ अहाँ के दुख अछि जे बजबा काल अहाँ के स्त्रीलिंग पुलिंगक भान नञि रहैत अछि ।व्याकरण बड कमजाेर अछि ।कमजाेर व्याकरण अहाँ के किछु नहि बिगाडि सकैत अछि   अहाँ में बड आत्‍म विश्वास अछि ।आेना इर् कहबी अवस्स माेन पाडने रहब जे  ‘नाे बडी कैन मेक यू इनफीरियर विदाउट योर परमीशन’ । अहाँ इर् की लिखलहू जे सिडुल कास्ट में सेहाे बड भीड छै  ।हेतैक  मेडिकल  इंजीनियरिंग में हेतैक  पी सी एस में पुरूखक हेतै  मुदा स्त्री उम्मीदवार कत्तेक छै  ।आ उपर सॅ आेतेक डल सेहाे नहि छी ।दुर्गा माॅ के पूजा करू  हनुमान चालिसा पढू देखबै अहाँक सेलेक्‍शन अवश्य अवश्य अवश्य हाेयत । मध्य   रृात्रि भ’ रहल छै़  हम रा बड कैस क’ आेंघि लागि रहल अछि । अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना अहाँक विवाहक कार्ड आ’ चिठ्ठी दूनू एके संगे भेंटल । इर् की    लिखलाैं जे अहाँ बड उदास छी   से किएक    डाक्‍टर वर सॅ विवाह भ’ रहल अछि   आ’ अहाँ आेहि करिलुठ्ठा मजनूॅ के लेल फिरीशान भ’ टिपना नाेर बहा रहल छी जे अहाँ के अशुद्वि सॅ भरल चिठ्ठी लिखैत छल ।आय आे कत्तए अछि   अपन बाबू के तेल डीजल के दाेकान प’ तेल बेचि रहल हाेयत ।कि अहाँ आेकर तेल सॅ गंधाति वस्त्र सूॅघि सूॅधि क’ अपन जीनगी बिताएब  । भाग्य अहाँ के डाक्‍टर क’ अर्द्धागिंनी बनबाक अवसरि द’ रहल अछि   ।साफ सुथरा वातावरण में रहब ।अपनहूॅ नाैकरी करब आ’ अपन धिया पुत्ता सब के नीक भविष्य देब ।दूरक साेचूॅ  छुच्छ  भावुकता मनुक्‍ख के रने बाेने बाैआबए  छिछियाबए लागै छै । ंमाेन छाेट जुनि करू ।साेचू  अहाँ के कत्तेक आगाॅ जेबाक अछि ।आेहि मजनूॅ के धमकी सॅ नहि डरायब   जे करतै से करए देबै   आेकरा पुरना फिल्मक गीत गाबैत़  देवदास बनल रहए दियाै । हॅ  अहाँ के विवाह में अयबा के माेन त’ बड छल   मुदा हमर पितियाैत बहिनक विवाह सेहाे आेहि दिन छै़  भिलाइर् जा रहल छी । हमर शुभेच्छा अहाँक संग अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना बड दिनक विराम के पछाति अहाँ के चिठ्ठी भेंटल।अहाँ पी सी एस कम्पीट करि गेलहूॅ  ।हृदय गद गद भ’ गेल ।बङ बड बधाइर्  ।अहाँ प’ हमरा बङ विश्वास छल ।देखलाहा सपना सच भ’ गेल । मुदा इर् की   लिखलहूॅ ।सासुरक लाेक बड खराप निकलल ।गारिये सराप सॅ गप आरंभ’ करैत छैथ ।छाेट छाेट गप प’ अहाँक बाप ददा संग छत्तीस पुरखा के उकैट क’ राखि दैत छैथ ।घरबाला सेहाे मतारी के आॅचरक खूॅट सॅ बंंधेल़     कनिक सन उकसेला प’ सम्पूर्ण काया ततारि क’ ध’ दैत छै । अहाँक तीन दिन धऱि     अहि प्रचंड गरमी मास में   बिन दाना पानि के़  एक गाेट छाेट कोठरी में   जाहि में नहि कोनाे जंगला  नहि राेशनदाऩ   बंद करि क’ रखने छल ।बेसुध़   अहाँके त’  दाॅती प’ दाॅती लागि रहल छल़   आे त’ माॅ दुरगा के कीरपा सॅ़  आैचक में अहाँ के बाबूजी आबि गेला आ’ आेह़ि जहन्नुम सॅ पिंड छाेडा क’ अहाँके अपना संगे ल’ अयला । एहेेन त’ स्वप्‍नाे में नहिं साेचल   अहाँ सन पित्तमरू आ’ सहमिल्लू संग एहेन व्यवहार  ।केहेन केहेन मनुक्‍ख हाेइर्त अछि अहि दुनिया में   ।देखू  किंस्याति आे सब अहाँक महत्त्‍व बूझैथ । कनि दिन माेन के एकदम शांत राखि पूजा पाठ करब  ।संसारक मालिक अवस्स कोनाे नै कोनाे नीक बाट सूझा देता । भगवति अहाँ के रच्छा करैथ ।हम अहाँ लेल पूजा करब । अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना अहाँक अहरा ब्लॅाकक प्रभारी नियुक्‍त कएल गेल अछि ।फेर सॅ मुबारक हाे   इर् बङ प्रसन्नताक’ के गप अछि   हमर विनती छलैन्ह भगवति माॅ सॅ जे अहाँ के जिनगी सॅ दुखक कारी कचाेर  मेघ यथाशीघ्र  उङि क’   नील लाेहित  अध्यात्‍म आ’ सुखक चादरि बिछ बैत समय शीघ्र आबए । अहाँ उचित अर्थ में अपन पएर प’ ठाढ एक सफल सुयोग्य स्त्री भ’ गेलहूॅ ।आब अपन आे न्याय पूर्ण प्रशासनिक क्षमता देखबियाै  जाहि लेल काआेलेज में एतेक भाषण दइर्त छलहूॅ । आशा अछि जे अहाँ अपन दायित्‍व के नीक जकाॅ निभायब बी डी आे साहिबा । शेष शुभ अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना बङ नमहर प्रतीक्षा के बाद अहाँ क चिठ्ठी भेंटल  ।इर् जानि हार्दिक दुख भेल जे अहाँ के तलाक भ’ गेल ।खैर   जे भवित्‍व्य छल तेकरा के मेटा सकैत अछ़ि  ।आेना अहाँ जे  राेइर्ंया राेइर्ंया ठाढ करए बला  वर्णन    कएने रही आेहेन परिस्थिति में अहाँ सन पढल गुनल आफिसर के निर्वाह केना दुष्कर छल ।अपना दिस सॅ त’ अहाँ बङ कोरसिस केलियै निभाबए के  मुदा़  शराब पीबि क’ प्रतिदिन मार पीट करय वला मनुक्‍ख के भाग्य आ’ भगवान भराेसे  सुधरए लेल लाेक कत्तेक दिन धरि आस लगाैने दिवस गमावैत रहतै   । अहाँ अपन माय आ’ छाेटका भाइर् बहिन के अहरा लइर् अनलहू से नीक कएल ।आब अहाँ अपन राजनीतिक पटल  कनि आआेर विस्तृत करू ।देश विदेशक न्यूज सूनितै रहबै । लिखलहू जे अहाँक स्वर्गीय नाना बङ पहिने एम पी छलाह   आ’ आब आेत्तय के लाेक अहाँ के अपन प्रतिनिधि चुनि पार्लियामेंट में पठबए चाहैत अछि ।इर् त’ बङ नीक गप भेल ।अहाँक वक्‍तृत्‍व क्षमता आब खुजि क’ लाेकक साेझाॅ आयत । अहाँ पहिने आेहि क्षेत्र विशेषक जातिगत आंकङा   आेकर   समस्या   आ’ विकासक लेल की सब आ केहेन कदम उठेबाक चाही अहि सब प’ गहीङ शाेध प्रारंभ करि दियाै  ।अहि क्रम में घरे घर जा कए स्त्रीगण सब सॅ गप करि आेकर सबहक दिल जीतबा के प्रयास करब   एक त’ आे रिजर्व सीट छै़  आ’ अहाँ के नाना के नाम तीस बरखक बादाे लाेकक ठाेर प’ आेहिना छैक  ।अहाँ सीधे ब्लाॅक सॅ देशक पालियामेंट में नहि पहुँच गेलहु त’ हमर नाम प’ कूकूर पाेसि देब । बाहर अन्हार भ’ गेलै़  सांझ मे त’ घर में रहनाए उचित नै । टहलए जा रहल छी । बेस    फेर दाेसर चिठ्ठी में । अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना अहाँ के चिठ्ठी में हमरा फेर सॅ मानसिक भटकाव के गंध लागि रहल अछि ।इर् की   लिखलहूॅ जे खैरा जिला के कलक्‍टर   जे अहींक बिरादरी के अछि  सदिखन रेशमक’ डाेरी नेने अहाँक पाछाॅ पडल रहैत अछि ।आेकराे वैवाहिक जीवन तेहने सन छै ।कनिया नै छै  गत भ’ गेलै  वा छाेडि देने छै  ।हॅ आेहाे दाताैन के स्थान प’ भरिसक दारूए सॅ मुॅह धाेबति हेतैक़  लाल टरेस आॅख़ि  जेना   कोनाे हिंसक पशु़  ।मुदा अहाँके इज्जत सेहाे बङ करैत अछि    ताहि लेल अहाँ आेकर अवगुण नहि देख पाबै छी।खैऱ  अहि में हम अहाँ के की मशविरा दिय अहि क्षेत्र में त’ अहाँ अपने बङ चतुर सुजान छी । ंमुदा कनि साेचू़  अहि में अहाँ के कोन उत्तकृष्ट भविष्य देखाय पङि रहल अछि ।आय नै काल्ह़ि  अपनाे त’ अहाँ कलक्‍टर बनिए जायब    ।हमरा जनतब अहाँ के अपन धियान इलेक्‍शन लङबा दिस लगेबाक चाही ।अपन प्रतिभा नष्ट नै हाेमए देबै  पैघ काज लेल अहाँ के जनम भेल अछि । अखन घर में किछु पाहुन पङक आयल छथि ताहि में व्यस्त छी । आर सब कुशल मंगल अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्त्‍ना अहाँके बङका पार्टी चुनाव लङबा लेल टिकट द’ देलक़   बधाइर् हाे  ढेर रास उम्मीदवार क’ मध्य अहाँक टिकट भेंटनाए  सरिपहॅू एक गाेट पैघ गप अछि ।अहाँ के आग्रह जे हम मास दिन अहाँ के संगे रही़     अहाँ हमर ऋण कोशकी में पानि रहतै ता धरि नहिं बिसरब़  अपन माए बाबू सॅ बेशी हमर आभारी छी  जे घींच घाॅचि क’   सजा सॅवारिक’ मनुक्‍ख सॅ विशिष्ठ मनुक्‍ख बना देलहूॅ      आेहि जन्मक माए़  बाप   भाय बहिनी   किछु नै किछु अवस्स छी  नै त’ के करै छै अनका लेल एतेक़  ।आन संगी सब त’ एको टा चिठ्ठी के उत्तर नहि पठाेलक । ंहमरा विचारैं इर् सब गप बिसरि जाऊ  ।हाँस्टल में त’ नहिए   मुदा तेकरा बाद अहाँ के भाव विह्यवल चिठ्ठी सबहक उत्तर दइत दइर्त हम अहाँ के संगी अवश्य बूझय लागलाैं हैं   आ’ अ ‘ फ्रेंड इन नीड  इज अ फ्रेंड इन डीड  ।’दाेस्ती अपना आप में एक टा मजगूत नाता छै  आेहाे दैवीक महान गिफ्‍ट छै । हम नाेमिनेसन दिन अहीं के संग छी ।हमरा सॅ ज़त्तेक भ’ सकत तैयार रहब । एतय बारिश झमाझम भ’ रहल छै़  कत्तेक दिन सॅ मेघ लदने छलै   आय अपन माेनक सबटा मवाद जेना निकालि रहल हाेय । शेष सबटा गप भेंट भेला प’ हाेयत । अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना बधाइऱ्  बधाइर्  बधाइर्   ।ढाइर् लाख वाेट सॅ अहाँ जीत गेलहूॅ ।काउंटिंग काल कोनेा अपरिहार्य कारणे हम उपस्थित नहिं रहि सकलहूॅ ।बङ प्रसन्नता अछि सबटा वाेट अहाँ दूनू हाथे अपन झाेरा में हसाेथि लेलाैं ।आय एहेन लागि रहल अछि जेना  नब सूरूज अपना संगे नव प्रभात नेने चाराें दिशा सॅ मंगल गान करैत सिंहनाद करि रहल अछि ।अहाँ सॅ हमरा एहने सफलताक उम्मीद छल ।आब मनाऊ भरि छाॅक हाेरी  गाऊ खूब फाग  झाल मृदंग बजा बजा क’। मुदा एक गाेट गप सदिखन माेन पाङने राखब़  सांसद बनला उत्तर  क्षेत्र के जनता सॅ विश्वासघात नहिं करबै  आे सबटा वादा अवश्य पूरन करबै़  जाहि आधार प’ इर् महासंग्राम जतिलहुँ । माेन पङि रहल अछि माॅ के कहबी  ‘संगे संगे गाय चरेलहु  किसना भेल गाेसैयाॅ  । शेष शुभ । एक बेर फेर हार्दिक बधाइर् । अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना़ दूरदर्शन सॅ खबरि भेटल कि अहाँके स्त्री आ’ अनुसूचित जाति   दूनू हाेबाक कारणे केबिनेट मिनिस्टरक पद सॅ नमाजल गेल अछ़ि    साेशल वेल फेयर मिनिस्टर    हिप  हिप  हुर्रे़   ।बङ प्रसन्न छी आय हम   एकदम गदगद   ।अपन परिजन संगे खुशी मनाबए जा रहल छी  । अहू ठामक सांसदक विजय के खुशी में बङका विशाल जूलूस  ‘जिन्दा बादक’ नारा लगबैत हमर घरक साेंझा राेड सॅ गुजरि रहल अछि । अपार शुभ कामना के संग अहाँक संगी शैली । प्रिय रत्‍ना कत्तेक बेर अहाँ के चिठ्ठी लिखलहूॅ  टेलिग्राम  सेहाे पठाैलहूॅ  मुदा कोनाे जवाब नॅ भेंटल ।कत्तेक ताकि तुकि क’ अहाँ के फाेन नंबर उपरेलहूॅ   फाेन सेहाे कयलहूॅ  अहाँ के कोनाे पी ए  उठाैलक  नाम पता पुछि  कनि कालक’ बाद कहैत अछि ‘ मैडम बाहर गेल छथि   बाद में कखनाें गप करब ।’बाद में सेहाे कत्तेक बेर फाेन कयलहूॅ   एयह जवाब  । हम इर् बूझै लेल व्यग्र छी  जे मंत्री के रूप में अहाँ के केहेन केहेन अनुभव भ’ रहल अछि ।कि सब करि रहल छी आदि । जाैं चिठ्ठी भेटै त’ अवस्स पहुँचनामा पठैब ।लिखबा के जाैं टाइर्म नै भेटै त’ फाेन सएह खटखटा देबए ।आब त’ अहू शहरि में टेलिफाेन एक्‍सचेंज लागि गेल छै     आ’ घरे घर फाेन  भ’ गेलए ।फाेन नं पठा रहल छी   आ’ पी ए के सेहाे लिखा देने छी । यथाशीघ्र संपर्क करब । अहाँक  शैली । प्रिय रत्‍ना आय अहाँ के अहि शहरक नव निर्मित स्टेडियम के उदघाटन करबा के छल ।अहाँ त’ हमरा बिसरिये गेलहूॅ  मुदा माेन नै पतियाय छल़   भेल   हमर लिखलाहा वा’ संदेश अहाँ धरि नहिं पहुँच रहल हाेयत । भाेरे सॅ हम स्टेडियम के प्रबंधक आ’ गण मान्य जनक संग अहाँ के प्रतीक्षा में एक पएर प’ ठाढ रही किंस्यात अहाँ सॅ भेंट भ’ जाए । ‘अहाँ अयलहूॅ   उज्जर झक झक सिल्कक नूआ   माथ प’ बङ हल्लुक सन आॅचरि रखने़   आॅखि के धूपक करिका चश्मा सॅ झॅपने   भीङ सॅ फराक़  एक गाेट भव्य व्यक्‍तित्‍व ।  मुदा आॅखि प’ चढल चश्मा के  कारण प्रबंधकक कात मे ठाढ हमरा   शैली प’ एकटा दृष्टिपात सेहाे नञि कय सकलहूॅ ।कनि ढीठ बनि  हम आगाॅ बढलहूॅ त’ एक गाेट अपरिचित सन ‘आैपचारिक  ‘नमस्ते’ के मुद्रा में   दूनू हाथ जाेङि   लाल रिबन काटि गङगङाति ताली के मध्य उदघाटन समाराेह क’ बाद बङ व्यस्त सन लगैत अपन ताम झाम अमला संग निकलि गेल छलाैं  कत्ताै के आर प्राेग्राम छल । अनायास सब टा गप हमरा बूझबा में आबि गेल छल    वा  हमर भ्क खूजि गेल छल ।लागल जे भरल बाजार मे कियो हमरा चाकू मारि क’ हमर करेज निकालि क’ नेने चलि गेल हाेय ।कत्तेक काल थरि हमर बकार नै फूटल छल । अहीं के माेताबिक   हाँस्टल में हम अहाँ के अपन ‘ बेस्ट फ्रेंङ’ नहिं बूझैत छलहूॅ  आब लागि रहल अछि    ‘अहाँ एतेक पैघ नाटक किएक रचने छलहूॅ ।अहाँ के बेचैनी छल किछु करबा के   मुदा गाइर्ड के करितै़  आब जखन अहाँ ‘ एलीट क्‍लास ‘के कहबए लगलहूॅ  पएरक नीचा के सबटा साेपान उखाङि फेंकलहुँ   स्वाभाविक छल   कियाक त’ अहाँ कहियो  क कराे बेस्ट की  फ्रेंड थरि कहाबए के जाेगर नहिं छलहूॅ आ’ नहिं हाेयब । अहाँक सबटा मगर मच्छी नाेर हमरा एकए क करि क’ माेन पङि रहल अछि  आ’ हमर आत्‍मा जेना हमरे धिक्‍कारि रहल हाेय ।आेना उपरि सॅ खसबा के आेकरे ड’र रहैत छे जे ऊपर छै  हमरा की़ हम त’ नीच्चे ठाढ छी  ही दैट इज डाउन  नीड्स फियर नाे फाैल  ।हॅ जेना ताेता जकाॅ हमरा सॅ नजरि फेर लेलहूॅ तेना कंस्टीचुएंसी के लाेक संग नहि फेरबै़  प्रजातंत्र में जनते जनार्दन हाेइर्त छै़  जाैं आेहाे अपन मुॅह फेर लेत त’ मूहे बल धङाम सॅ धरती प’ खसब ।इर् हमर एक गाेट पहिल आ’ आखिरी व्यक्‍तिगत काज बूझब । धन्यवाद एक टा शुभेच्छु १.जगदीश प्रसाद मंडल--तिलासंक्रान्तिक लाइ २.कुमार मनोज कश्यप-मास्टर साहेब जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। तिलासंक्रान्तिक लाइ धानक लड़ती-चड़ती पतराइते गमैया विद्यालयमे तिलासंक्रान्तिक पढ़ाइ शुरु भऽ गेल। विद्यालयक लेल ने जगहक कमी आ ने पढ़ौनिहारक। इनार-पोखरिक घाट सन पवित्र स्थान आ बिनु आरक्षणक महिला शिक्षक। शिक्षको इमानदार। ने टयूशन फीस लइत आ ने दरमाहा। पढ़वैक लेल एते उताहुल जे खेनाइयो-पीनाइक चिन्ता नहि। छोट दिन होइतहुँ भानस-भातक कौड़ियो भरि ढकार नहि। पावनिक विषय नमहर तेँ पूरा विषयक शिक्षक तँ नहि मुदा टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कए अपना-अपना ढंगसँ अपन हिस्साक विषय पढ़बए लगलीह। पाँच दिन पहिनहि केदार कलकत्तासँ गाम आबि गेल। ओना ओ दुर्गोपूजामे सभ साल देबे करैत छथि, तिलोसंक्रान्ति सेहो नहिये छोड़ै छथि। कोना छोड़ताह? आब कि कलकत्ता ओ कलकत्ता रहल जे तीनि-तीनि दिन गाड़ीमे बैसल-बैसल देह-हाथ अकड़ि जाएत। आब तँ छह घंटाक रस्ता कलकत्ता थिक। तहूमे केदार अपन गाड़ी रखने छथि चाह-नास्ता कलकत्ताक डेरामे करैत छथि आ कलौ गाममे। हुनके सबहक तँ ई दुनियाँ आ देश छी। एक तँ बैंकक मैनेजरक दरमाहा दोसर कुरसीक कमीशन आ तहिपर सँ अपनो बैंकक शाखा खोलनहि छथि। कमीशने बेकतन तेँ स्टाफोक कमी नहि। कलकत्ता सन शहर जहिठाम भीखमंगो करोड़पति अछि। ‘‘गाममे जँ कियो मरद अछि तँ केदार छथि। गाममे के आँखि उठा कऽ हुनका दिशि तकलनि। अखनो सत्तरहटा अँचार, बीकानेरक पापड़ केदार छोड़ि तिलासंक्रान्तिमे के खाइत अछि। विधि पूर्वक जँ कियो पावनि करैत अछि तँ केदार छोड़ि दोसर के बाजत- ‘‘दतमनि करैत पोखरिक घाटपर जगदरवाली कछुबीवालीकेँ कहलखिन। साड़ी-साया रखि कछुबीवाली घाटपर बैसि झुटकासँ पाएर मजैत छलीह। मन चिन्तामे बाझल छलनि। काल्हिये पावनि छी ने चूड़ा कुटलौंहेँ आ ने मुरही भुजलौं। जाबे चूड़ा-मुरही नहि हएत ताबे लाइ कथीक बनाएव। गलती अपनो भेल जे अगते-ओरियान नहि केलहुँ। फेरि मनमे उठलनि, एक दिनक पावनि लेल महीना दिन पहिनेसँ ओरियान करए लागब। एतवे काज अछि। काजक दुआरे एको दिन ने समएपर नहाइ छी आ ने खाइ छी। जेकरा काज नइ छै सालो भरि पावनिये करह। कोनो की हम जनै छेलियै जे पनरह दिन पहिनेसँ शीतलहरी लाधि देतइ जहिसँ चूड़ा-मुरहीक ताड़ल धान भारले ने जाएत। जहि देवताकेँ पावनि करबनि हुनका एतबो बुत्ता नइ छन्हि जे अपनो पावनिक ओरियानक चिन्ता करितथि। फेरि मनमे एलनि जे चूड़ा-मूढ़ी तँ दोकानो-दौरीमे बिकाइत अछि। कीनि लेब। मुदा लाइ कोना हएत? चूड़ा-मुरही तँ अखड़ा होइत अछि अमैनियाक जरुरत नहि अछि। मुदा लाइ? केेेहन-कहाँ हाथे, केहन-कहाँ बरतनमे बनौने हएत। तहूमे आइ-काल्हिक बनियाँ सभ तेहन गइ-खोर भऽ गेल अछि जे गुड़क बदला छुऐमे बना पाइ टलिया लेत। दिनेमे मुरही-चूड़ा लऽ आनब आ रातिमे खेला-पीला बाद बना लेब। मन असथिर होइत रहनि कि जगदरवालीक बात मन पड़लनि। फेरि वापसी क्रोध रस्तासँ घुरि गेलनि। तुरुछ भऽ उत्तर देलखिन- ‘‘सत्तरह रंगक आ कि पचासे रंगक जे अँचार केदरबा ख-ए-त तइसँ कछुबीवालीक जीहक पानि मेटेतइ।’’ श्यामा काकी चुपचाप नहा कऽ घर दिसक रस्ता धेलीह। अपना धुनिमे श्यामाकाकी। ने समाजसँ कोनो मतलब आ ने समाजक काजसँ। समाजक काजे बेढ़ंग अछि। ककरो कोनो ठेकान नहि। की बाजत आ की करत तेकर कोन ठेकान। एक्के मुँह जत्ते लोकसँ गप करत, एक्के गप तते रंगक बाजत। लगले किछु लगले किछु। तहूमे आब तेहन-तेहन अगिमूत्तू सभ भेलहेँ जे, जूरशीतलक मुइल नढ़ियाकेँ जहिना कुत्ता सभ अपना-अपना दिस दाँतसँ पकड़ि-पकड़ि घिचैत, तेहने भऽ गेल अछि। नै तँ कतौ ऐना हुअए जे एक्के गाममे एक्के पावनि दू-दिना, तीन दिना दुनू होय। तहन तँ जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। सभ करत अपना मने आ हम करब लोकक मने। अपन जिनगी अछि अपन दुख-सुख अछि। अपनासँ पलखति हएत तँ दोसरो बच्चा दिशि देखब। नहि तँ अपन के सम्हारि देत? यएह सभ विचार श्यामा काकीक मनमे नचैत रहनि। चूड़ो-मूढ़ीक लाइ भइये गेल। तिलबो बनाइये लेलहुँ। कुरथियो-तेबखाक दालि अछिये। लोको सभ जीहक चसकी दुआरे कियो खेरही तँ कियो राहड़ि तँ कियो बदामक दालिक खिचैड़ बनबैत अछि। एते बात मनमे उठितहि काकीक विचार रुकि गेलनि। कुरथीक तुलना राहड़ि, खेरहीसँ करए लगलीह। पूसक संक्रान्तिक दिन पावनि होइत। राहड़ि चैत-बैशाखमे जहनकि बदाम फागुन आ खेरही जेठ-अखाढ़मे होइत अछि। तहिक हिसावे कुरथिये ने नवकी कनियाँ बनि घर अओतीह। ई बात मनमे अवितहि काकीक मन आगू बढ़लनि। हमरा सन दही ककर हेतइ? कियो लोहा महीसिक दूध पौरने हएत तँ कियो पोखरिक पानिक। मुँहसँ हँसी निकललनि। जेहने लोक सभ ठक भऽ गेल अछि तहने देवयो-देवता। अनदिना कियो दूधमे पानि फेटि कऽ बेचैए तँ बेचैए, पावनिमे जे हुनको सभकेँ खुआवैत छन्हि से ओ नहि बुझै छथिन। किऐक ने हड़हरी बज्जर खसा दैत छथिन। एते दिन हुनको सभकेँ शक्ति छलनि आब ओहो सभ डलडाक मधुर खा पेट बिगाड़ि लेलन्हि अछि। फेरि मन अपना दिस घुड़लनि। खिचैड़मे जम्बीरी नेबो नीक आ कि घीउ। मुदा एहि प्रश्नपर मन नहि अँटकलनि। खाइ बेरमे बुझल जाएत। फेरि मनमे खुशी एलनि। मुस्की दैत आँखि उठा कऽ तकलनि तँ दिनकरपर नजड़ि पड़लनि। मने-मन प्रणाम कए कऽ कहए लगलखिन- ‘‘एहनो जाड़मे अहाँ चास-वासकेँ भरि देने छियै। अपना लेल कोठी माल-जाल लेल टाल खेतक-खेत तरकारी, बाधक-बाध गहूम, दलिहन-तेलहनसँ सजल खेत। हे दिनकर बहुत जाड़ सहि जीवि रहल छी कल्लह फेरु। आँखि निच्चाँ होइतहि मनमे एलनि। आइये ने सीमापर (मकर रेखा) जएताह। काल्हिसँ तँ तिले-तिल ऐवे करताह।’’ पावनिक छुट्टीमे ज्योतिषी काका गाम नहि अएलाह कि काकीकेँ आफद भऽ गेलखिन। ओना साल भरिसँ काकियोक मन बदलि रहल छन्हि। जत्ते वुधियार काकी भेलि जाइ छथिन तते काकासँ मत-भेद भेलि जाइ छन्हि। ज्योतिषी काकाकेँ काकीक ओहि किरदानीसँ हृदयमे चोट लगलनि, जहि दिन काकी काकाक पाइ (कमाएल रुपैआ) चोरा कऽ बुइधिक सर्टिफिकेट कीनि लेलखिन। ओही दिनसँ काकीक आफद कक्का आ काकाक आफद काकी भऽ गेलखिन। विद्यालयसँ अबैतखिन बाटेमे पावनिपर नजरि गेलनि। कने काल गुम्म भऽ उत्तर-दक्षिण -उत्तरायण आ दक्षिणायण-क सीमापर आँखि रोपलनि। आँखि रोपितहि हृदयमे हँसी उठलनि। जाधरि लोक दक्षिणायणमे मरैत अछि नर्क जाइत अछि आ उत्तरायणमे स्वर्ग। स्वर्ग तँ मनुष्य निर्मित छी जहन कि मकर संक्रान्ति ग्रह-नक्षत्रक प्रक्रिया छी। दुनू एक ठाम कोना भऽ गेल। बाटेसँ ज्योतिषी काकाक मनकेँ हौड़ने रहनि। आंगनमे पाएर रखितहि काकी टोकि देलखिन- ‘‘तलब भेटल कि नहि? अखन धरि कोनो ओरियान नहि भेलि अछि।’’ काकीक बात सुनि काकाक मन लहड़ि गेलनि। आँखि गुड़ेरि काकीकेँ देखि ओसारक चैकीपर झोरा रखि हाथ-पाएर धोअए कल दिशि बढ़लाह। मने-मन काका सोचति जे सबकाज कालमे फँड़बन्ही करतीह आ टाका बेरिमे काका मन पड़ै छन्हि। काका अप्पन धुनिमे आ काकी पावनिक धुनिमे। तिलासंक्रान्ति संक्रान्तिसँ पावनि जे दंगलक अखाड़ापर उतरैबला अछि ओहि लेल अखन धरि हाथपर हाथ जोड़ि बैसलि छी। मुदा पहिलुके नजरि काकीकेँ डोला देलकनि। करेज काँपि गेलनि। मन निर्णय कऽ लेलकनि जे परिवारक गारजन पुरुख होइत अछि, मान-अपमान पुरुखक कपारपर चढ़त। हम तँ अनेने तबाह छी। जे आनि कऽ देता ओ बना कऽ आगूमे देबनि। कलपर पानि पीबि, आंगन आबि ज्योतिषी काका चैकीपर बैसि तमाकुल चुनवए लगलाह। अपन भलाइ सोचि काकी बाड़ी दिस टहलि गेलीह। मुँहमे तमाकुल लैत काका आँखि घुमा कऽ पत्नी दिस देलखिन। मन खुट-खुट करनि जे फेरि ने किम्हरोसँ आबि किछु फरमा दथि। मुदा सोझमे नहि देखि मन असथिर भेलनि। मनमे उठलनि, काल्हि मकर संक्रान्ति छी। जहिठाम सँ सूर्य दछिन मँुहे नहि बढ़ि उत्तर मुँहे घुमताह। सूर्यकेँ उत्तरायण होइतहि जीव-जन्तुमे सूर्यक प्रकाश नव स्फूर्ति पैदा करैत अछि। मौसमक बदलाव हुअए लगैत अछि। जहिसँ परिवर्तनक रुप देख पड़ैत अछि। मुदा लोकमे परिवर्तन की आओत? जे दछिनपंथी विचार व्यवहारिक रुपमे पर्वत सदृश्य अपन रुप बनौने अछि ओ चूड़ा-लाइ खेने भेटि जाएत। संक्रान्तिक पहिल संध्या अबैत-अबैत भोरमे नहेबाक कार्यक्रम तैयार भऽ गेल। एहि प्रश्नपर विद्यालयक सभ शिक्षिका एकमत भऽ गेलीह। एहि कार्यक्रममे एकटा फनिगा आबि गेल। फनिगाक गंधसँ वातावरणमे गंध आवि गेल। गंध ई जे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरी (कमलेश्वरी) महरानी चूड़लाइक छिट्टा रखने छथिन। जे पहिने नहाइले जाएत ओकरा देथिन। टेल्हुक धिया-पूतासँ लऽ कऽ ढेरबा धरि अपन दावा ठोकए लगल जे पहिने हम नहाएव आ कमलेसरी महरानीक चूड़-लाइक छिट्टा आनव। अपन-अपन शक्तिकेँ जगबैत संकल्पित हुअए लगल। जारन तोड़ि कऽ अबैत काल अझप्पे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरीक चूड़-लाइक छिट्टा गोपला सुनलक। मुदा किछु दोहरा कऽ नहि बुझए चाहलक। माथपर ठहुरीक बोझ रहै। मुदा भारीकेँ मनसँ हटा चूड़ा-लाइक छिट्टापर पड़लै। बड़का छिट्टा। जेहन बड़का छिट्टा भत-भोजमे भात-झकैक लेल होइत छैक। भरिये दिन ने पावनि छी, कते खाएव। मनमे खुशीक अंकुरा उगलै। घरपर आबि जरनाक बोझ रखि संकल्प केलक जे सभसँ पहिने हम घाटपर जाएब। गहीर गोपला विचारकेँ गोपनीय रखलक। माइयो-बापकेँ नहि कहलक। बारह बजे रातिमे नीन टुटितहि गोपला माए-बापकेँ बिनु किछु कहनहि पोखरि दिस विदा भेल। माए बुझलनि जे लघी-तघी करए निकलल। बुधबा (पिता) नीन, तेँ बुझबे ने केलक। जहिना प्रेमीकेँ अपन प्रिय छोड़ि दुनियाँमे किछु नहि देखि पड़ैत तहिना लाइक छिट्टा छोड़ि गोपला किछु नहि देखैत। दुलकी मारैत पोखरि दिस बढ़वो करै आ आँखि-कान उठा-उठा आगुओ ताकै जे क्यो दोसर ने तँ बढ़ि गेल। ने कानसँ कोनो भनक बुझि पड़ै आ ने अन्हारमे किछु देखए। किछु काल देखि माए बान्हपर आबि तकलक तँ गोपलाकेँ नहि देखलक। मनमे टराटक लगए लगलै। जे एते अन्हारमे कतए चलि गेल। भरिसक भकुआएलमे किम्हरो चलि ने तँ गेल। मुदा अन्हारमे देखबे कते दूर करब। ओह से नहि तँ हुनाको (पति) उठा दुनू गोटे चोरबत्तीक हाथे तकबै। सएह केलक। पनरह-बीस दिनसँ शीतलहरी चलैत। लागल-लागल पछियो संग दैत। घुरक आगियो मैलमुँह भेल रहैत अछि। गोपलाकेँ ने रस्ता अन्हार बुझि पड़ै आ ने पोखरि दूर, ने जाड़ बुझि पड़ै आ ने पोखरिमे पानि। साक्षत् ब्रह्ममे लीन भक्त जेकाँ गोपलो लाइमे लीन भऽ गेल। पोखरि पहुँच घाटक तरमे गोपला हथोरिया दिअए लगल। जाधरि लाइक आशा मनमे रहए ताधरि खूब हथोड़लक। हथुरैत-हथुरैत बर्फ जेकाँ मन जमि गेलइ। जाड़ बुझि पड़ए लगलै। सौँसे देह थरथर कँपैत रहए। गोपालक मन मानि गेलै जे मरि जाएब। पोखरिसँ उपर भऽ घर दिसक रास्ता धेलक। ताधरि चोरबत्तीक हाथे आगू-आगू माए आ दू लग्गा पाछु पिता पेना नेने जाइत। फड़िक्केसँ माए थर-थर कँपैत गोपलाकेँ पुछलक- ‘‘गोपाल।’’ गोपाल सुनि बुद्धूकेँ खौंझ उठल बाजल- ‘‘मिरगी उठल छलौ जे पोखरि आएल छेलँे?’’ थरथराइत गोपलाकेँ अपन आँचारसँ माए पानि पोछए लगली। गोपलाक दशा देखि पिताक मन पघिलए लगलैक। जहिना गंगा स्नानक बाद नीक विचार मनमे उपकैत अछि तहिना बुद्धुकेँ मनमे उपकलैक। सोचए लगल आइ जँ परि जाइत तँ दिनमे ककरा तिल-चाउर दैतियैक के तिल बहैत। दछिनबारि टोलमे दखै छी सबहक बेटा-पुतोहू बाप-माएकेँ छोड़ि चलि गेल अछि। अपने सभ बुढ़ियाँसँ नवकी कनियाँ जेकाँ तिलकोर तडै़ छथि। तिलकोरक तरुआ केहन होइ छैक ई तँ बुढ़िये कनियाँ सभ वुझै छथिन। जिबठ बान्हि बुद्धु गोपलकेँ पजिया कऽ पकड़ि कोरामे लए डेगगरसँ आंगन दिस बढ़ए लगल। आंगन आबि पुआर धधकबए लगल। जहिना गोपलाक देह भीजल तहिना देहमे सटल गंजी-पेन्ट। मुदा कपड़ा बदलैक साहस नहि भेलइ। देह कठुआएल, हाथ बिधुआएल, ओंगरी ठिठुरल। मुदा कनियेँ कालक बाद टनकल। दुनू परानी बुधबो जाड़सँ ठिठुरल रहए। तीनू टनगर भेल। टनगर होइतहि गोपाल माएकेँ कहलक- ‘‘अंङी-पेंट आनि दे।’’ गोपाल पेंट-शर्ट पहीरए लगल। अखन धरि तीनूक सिरसिराएल मन आगिक गरमी पाबि बसन्ती हवामे टहलए लगल। बुद्धु पत्नी दिस देखि हाथ पकड़ि पहुँचल फकीर जेकाँ बाजल- ‘‘आइ गोपला हाथसँ चलि जाइत। सबहक अंगनामे पावनिक उत्साह रहितै आ अपना दुनू गोटे बेटाक सोगमे करैत दिन बितैबतौं।’’ पिताक बात सुनि आशा चैंक गेलि। जना भूमकमक धक्का धरतीकेँ लगैत तहिना आशाक हृदयमे धक्का लगल। धड़फड़ा कऽ उठि कोठीपर राखल मुजेलासँ दूटा गोल-गोल लाइ लेने गोपलाक हाथमे देलक। हाथमे चूड़ाक लाइ अबितहि हबक मारलक। मुदा तेहन सक्कत जे ठोर चँछा गेलइ मुदा दाँतसँ लाइ नहि कटलै। माएकेँ कहलक- ‘‘लाइ कहाँ टुटैए।’’ बेटाक बात सुनि आशाक मनमे खुशी उपकल। अपन कारीगरीक परीछामे पास देखि मुस्की दैत पति दिशि देखि बाजलि- ‘‘तेहेन पाकमे लाइ बनौने छी जे बिना सिलौट-लोढ़ीसँ सुनत।’’ बेटाकेँ बुद्धू पुछलक- ‘‘आइ तँ कतौ नाचो-ताँच ने होइ छै तखन किअए तू रातिमे एते दूर चलि गेलेँ।’’ बितहिमे आशा बाजलि- ‘‘लघी-तघी करैले उठल हेतै, भकुआएलमे बौआ गेल हेतै।’’ हाँइ-हाँइ गोपाल मुँहक लाइ कऽ चिबा घोटि कऽ माए दिस देखि बाजल- ‘‘लोक सभ साँझमे बजै छेलै जे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरी महरानी लाइ रखै छेथिन। वहाए अनैले गेल रहौं।’’ गोपलाक बात सुनि बुद्धुक मन माहुरा गेल। मने-मन बाजल जे अपना कमेने नहि होएत ओ भोला बावा बड़दक.......। मुदा क्रोधकेँ एहि दुआरे मनमे दबने रहल जे गामक लीला सभ आँखिक सोझमे नचए लगल रहैक। जे सभ जुआनीमे, मद-मस्त भोम्हरा जेँका जिनगी बितौलनि, बेटा-पुतोहूक चलैत मुँहसँ धुँआएल चुल्हि फूकए पड़ैत छन्हि। जाहिसँ दुनू आँखिमे नोर टघरैत रहैत छन्हि मुदा ओ हृदयक व्यथा नहि, धुँआ लागब बुझैत छथि। बुद्धूक हृदय पसीज गेल। मुरखो अछि तइयो तँ बेटे छी। बरखे ने चैदहटा भऽ गेलइ, मुदा भरि दिन तँ असकरे लग्गी लऽ कऽ बोनाएल रहैए। ने खाइक ठेकान रहै छै आ ने नहाइक। तहन बुद्धिसँ भेंट कोना हेतइ? बेटाक बात सुनि माएक मन उमड़ि गेलनि। बुझबैत बजलीह- ‘‘रौ औआ अपना की कोनो चीजक कमी अछि। जते रंगक धान गिरहतकेँ होइ छै तते अपनो ने होइए। सतरियाक चूड़ा कुटने छी, लाइ बनौने छी आ ओकरे खिचैड़ियो रान्हव।’’ पछुआरक रस्तापर गल्ल-गुल्ल सुनि आशा घरसँ निकलि डेढ़ियापर पहुँचलीह कि महरैलवालीक बाजब सुनलनि। डेढ़ियेपर ठाढ़ि भऽ कए सुनए लगलीह। महरैलवाली हड़ड़ीवालीकेँ कहलखिन- ‘‘हम तँ आध पहर रातिये नहेलहुँ। अखन धरि अहाँ पछुआएले छी।’’ हड़ड़ीवाली- ‘‘अहाँ जेकाँ रातिमे कुकुड़ घिसियेने छलहुँ जे भोरे नहा पाक हएव।’’ दुनू गोटेक गपकेँ दबैत तमोरियावाली जोर-जोरसँ पुतोहूकेँ कहैत रहथिन- तीनि दिनसँ बोखार छेलह तहन किअए भोरे ऐहन समएमे नहेलह?’’ मुदा पुतोहू उत्तर नहि देलकनि। आशाकेँ मन पड़लनि जाड़सँ कँपैत गोपाल। २. कुमार मनोज कश्यप मास्टर साहेब परोपट्‌टा भरि मे मास्टर साहेब के नाम सँ चिन्हल जायवला  भगवानबाबू आब एहि दुनिया मे नहि रहलाह --ई समाचार सुनिते भरि गामक लोकक बीच मे हुनकर व्यत्तिᆬत्व आ कृतित्वक मादें क्रिया-प्रतिक्रिया होमय लागल । हुनकर अंतिम दर्शनक हेतु लोक सभ जुटऽ लागल । मास्टर साहेब नेनपन मे पढ़ेने तऽ हमरो छलाह़़ओ गामक स्कूल मे मास्टर आ हम गामक बच्चा़हुनका सँ नहि पढ़ितौं तऽ जयतौं कतऽ ? हमरो मोन कहलक जे गुरूदेवक अंतिम-दर्शन कऽ अपन श्रद्धांजलि दऽ आबी । अपन बाल सखा आलोक सँ पुछलियै- ' चलबैं ?' ओ छुटितहिं मुँह बीचकबैत बाजल- 'धुर्‌ ! की जाऊ देखय हुनका । तेना पढ़ेलनि जे कतहु गोड़ा नहि बैसल । ' ओकर स्वर मे विषाद तऽ स्पष्ट छलैक मुदा मुईनाहर के बारे मे एहन वत्तᆬव्य तऽ साईत नहिये हेबाक चाही । पढ़ाई तऽ मास्टर साहेब के ठिके शून्ये छलनि। क्लास मे आबते ककरो ठाढ़ करा कऽ कहैत छलखिन कोनो पाठ जोर सँ पढ़ऽ आ अपने टेबुल पर पैर पसारि लगैत छलाह फोंफ काटऽ । जहाँ केयो कनेको बाजल किं एक दिस सँ सभ के छौंकिंया दैत छलखिन । बच्चा सभ मास्टर साहेब के 'दुख-हरणी '(पाकल बाँसक छौंकी) नामे सँ थर-थर कँपैत छल। आलोक पर तऽ मास्टर साहेब के खास ध्यान रहैत छलैन । हुनकर घर आ स्कूल सटले छलै । जऽन-हरवाहक  पनपीयाई स्कूले लऽ आबथि आ आलोक जा कऽ ओकरा सभ के पनपीयाई कराबय । एकदिन बहाना बनबैत कहबो केने रहनि जे हमर पढ़ाई छुटि जायत । मास्टर साहेब ओहो बहाना के विफल करैत कहने रहथिन - 'तों जो, ताबत हम पढ़ाई रोकने छी । ' ओकरा गेलाक बाद बाजल रहथि - 'कहुना कऽ बईलेलौं ओकरा । ओ क्लास मे रहैत तऽ ककरो पढ़ऽ नहि दैत ।' पनपीयाई पहुँचेबाक बाद व्रᆬमशहे आलोक मास्टर साहेबक कपड़ा खिचब सँ लऽ कऽ घरक अनयान्यो काज करऽ लागल । एक दिन मास्टर साहेब क्लास मे आबते आलोक के ठाढ़ होमय कहि कऽ ओकरा कहलखिन- 'अलोक ! काल्हि तोहर बाबू भेटल छलाह। कहैत छलाह जे आलोक हिन्दी मे बड़ कमजोर आछ से कने आहाँ ओकरा पर ध्यान दियौ़साँझ मे एक घंटा पढ़ा देल करियौ । ' पेᆬर आदेशक स्वर मे बजलाह -'तों काल्हि सँ पाँच बजे साँझ मे हमरा ओतऽ आबि जायल कर पढ़बा लेल ।' सभ विद्यार्थी आलोकक मुँह दिस ताकऽ लागल छल । जे मास्टर साहेब क्लास मे नहि पढ़बैत छथिन से आलोक के ट्यूशन पढेथिन  ककरो विश्वासे नहि होई । स्कूलक छुट्‌टी होईते तमतमायल आलोक सीधा अपन बाबू सँ जा कऽ पुछलकै जे मास्टर साहेब के की कहि देलियैन । ओ तऽ पहिने चवुᆬएलाह पेᆬर याददाश्त पर जोर दैत बजलाह--' अच्छा, अच्छा । अरे हम किंयैक कहबनि ट्यूशन पढ़ेबाक हेत ु। काल्हि चौक पर अपने कहऽ लगलाह जे आहाँक बेटा हमर विषय मे बड़ कमजोर आछ । ओकरा किंयैक नहि पठा दैत छियै हमरा ओतऽ पढ़ऽ लेल़़हम किं कोनो पाई लेबै। ' से मास्टर साहेब आब नहि रहलाह। हुनकर अंगना मे  लोकक भीड़ बढ़ले जा रहल छल । जनि-जाति ओघढ़िया दऽ रहल छल़़पुरूष-पात्र अंतिम-यात्राक तैयारी मे जुटल छल । मास्टर साहेबक नश्वर शरीर भने पंच-तत्व मे विलिन भऽ जाउन ; मुदा हुनकर व्यत्तिᆬत्व के लोक कोना विसरि सकत । १.राजदेव मंडल-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर २.जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्‍यास-जीवन संघर्ष-२ १ राजदेव मंडल जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रुपमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छथि। हिनक जन्म १९५७ ई. मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि। एहि उपन्यास ‘उत्थान-पतन’ क माध्यमसँ लेखक गामक जिनगीकेँ यथार्थ आ नव रुपमे उपस्थित करबाक चेष्टा कएने छथि। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज स्वभाव आदि सहज रुपमे आबि गेल अछि। तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु घ्यानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जाहिपर उपन्यासक कतेक रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि। जाहिमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक। उत्थान-पतनमे गंगानंद, यमुनानंद, पंडित शंकर, सुधिया, ज्ञानचंद, भोलिया, विसेसर, भोलानाथ, सुकल, निलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ, गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि। कथावस्तुमे बिच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- ‘‘गामे-गाम, कतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ तँ कतौ सहस्त्र चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह बच्चाकेँ भेने तँ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह ग्रह एकत्रित अछि तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमिसान होइत।........ जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबितहि.......... बच्चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि। व्यथाककेँ दबैत सभ आँखिक नोर होइत बहबैत।’’ सामाजिक उत्थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करऽ पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधविश्वासकेँ तोड़ि परिवर्तन अनबाक प्रयास कएने छथि। साहित्यक भाषा होएबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज रुपसँ पचा सकए। एहि उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजहि नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग एहि उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोपकथनमे सहजता संक्षिप्तता आओर स्वभाविकता अछि। जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि- ‘‘अगर दसखत कएल नइ होइत होअए तब?’’ ‘‘तब की? औंठा निशान दऽ देतइ।’’ ‘‘भाय दूटा समांग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।’’ ‘‘अच्छा थमहह। किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।’’ कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़बाक लेल समएक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिशि घिचि लैत अछि। ताहि गुणसँ भरल-पूरल एहि उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि। ‘‘गौर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोंछ, बड़दक आँखि सन नम्हर-नम्हर आँखि सुकलक रहै। कोठीक गेटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सुकल सेठक करैत।’’ एकहि वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक बिशेषता अछि। जेना- ‘‘माथपर छिट्टा, दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकड़ने, दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब, सैंया भेल किसनमा घुनघुनाइत आंगन दिशि लफड़ल चललीह।’’ केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। एहि दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा कएलनि अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भहिसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि। सामाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहैत छथि जे टूटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जाहिसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतैक आ गामक सम्पूर्ण विकास होएतैक। सबहक संगे सामाजिक न्याय होएतैक। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जाहिसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। एहि माध्यमसँ लेखक देखाबए चाहैत छथि जे अपनहुँ गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नहि जाए पड़तैक आ पलायन रुकि जएतैक। एखनहुँ गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नहि पहुँचि सकल अछि। ताहि कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध कएने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजहि एहि उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि तरहेँ देखैत छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित कएने छथि, संगहि आदर्श रुप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि। 2 जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। जगदीश प्रसाद मंडल उपन्‍यास जीवन संघर्ष-  2 अमावास्‍‍या दि‍न। आइये सॉंझमे ि‍दवाली आ ि‍नशांराति‍मे कालीपूजा हएत। अखन धरि‍क जे काजक उत्‍साह सभमे रहै ओ ठमकि‍ गेल। काजो आखि‍री रूपमे आि‍ब ओरा गेल। जहि‍ना साल भरि‍क अध्‍ययनक आखि‍री दि‍न परीछा दि‍न होइत, तहि‍ना। काल्‍हि‍ धरि‍ काजक गति‍सँ चलैत रहल। जइ दि‍न जेहन काज तइ दि‍न तेहन रफ्तार। मुदा आइ तँ आखि‍री ि‍दन छी तेँ काजक उनटा ि‍गनती कऽ लेब जरूरी अछि‍। हो न हो ि‍कछु छुि‍ट गेल हुअए। जँ छुि‍ट गेल हएत तँ पूजामे ि‍बध्‍न-बाधा पड़त। तहि‍ दुआरे पूजा समि‍ति‍क बैसार सबेर साते बजे बजौल गेल। आठे दि‍नमे गामक चुहचुहि‍ये बदलि‍ गेल। जहि‍ना हरोथ बॉंसक जि‍ड़ अधि‍क मोट रहि‍तहुँ बीचमे भुर कम होइत मुदा आगू आेहि‍सँ पात रहनहुँ भूर बेसी होइत तहि‍ना बँसपुरोमे बुि‍झ पड़ैत। जखन पूजाक दि‍न आगू छल तखन काज बेसी आ जखन लग आएल तँ कमि‍ गेल। काल्‍हि‍येसँ गामक धी-बहीनि‍ आबि‍ रहल अछि‍। ओना गामक सभ अपन-अपन कुटुमकेँ हकार देने, मुदा अबैमे दि‍वाली बाधक बनल छलै। दि‍वाली दि‍न घरमे नहि‍ रहने भूतक बसेराक डर सबहक मनमे नचैत। जहि‍सँ आगू आरो पहपटि‍ हएत। तेँ गामक जे धी-बहीनि‍ असकरूआ छलि‍ ओ भरदुति‍या ठेकना कऽ दि‍वालीक परात आओत। मुदा जेकरा घरमे दि‍यादनी वा सासु अछि‍ ओ ि‍कअए ने एक ि‍दन पहि‍ने आओत। नैहर छि‍यै ने। कते दि‍न माए-बाप, भाए-भौजाइ आ गामक सखी-सहेलीसँ भेंट भेना भऽ गेल छैक। तहूँमे जेकर नैहरक परि‍वार जेरगर छै ओ तँ साले-साल वा सालमे दुइओ-तीनि‍ बेरि‍ आि‍ब जाइत अछि‍ मुदा, जेकर परि‍वार छोट छै, जइमे कम काज होइ छै, ओ तँ दस-दस सालसँ नैहरक मुँह-ऑंखि‍ नै देखलक। गामक सौभाग्‍य जे काली-पूजा शुरू भेल। मुदा एकटा अजगुत बात भऽ गेलै। गामक धी-बहीनि‍सँ बेसी गामक सारि‍-सरहोजि‍ आबि‍ गेलै। गाममे बेसी साइर-सरहोजि‍ ऐलासँ गामक चकचकि‍ये बढ़ि‍ गेल। जइसँ छौड़ा-मारड़ि‍सँ लऽ कऽ बूढ़-पुरानक मुँहमे चौवन्‍नि‍यॉं मुस्‍की आि‍ब गेल। तहूँमे परदेशि‍या साइर-सरहोजि‍ आि‍ब कऽ तँ आरो रंग बदलि‍ देलक। दुखक दि‍न गौँआक कटि‍ गेल। सुखक दि‍न आि‍ब रहल अछि‍। ि‍कऐक तँ आठ दि‍न जे बीतल अो ओहन बीतल जे ने ककरो खाइक ठेकान रहै आ ने सुतैक। मुदा, आब तँ सभ पाहुन-परकक संग अपनो पहुनाइये करत। मरदक कोन बात जे जनि‍जाति‍यो खुशी जे भनसि‍या आि‍ब गेल। नीक-नि‍कुत खेनाइ, दि‍न-राति‍ तमाशा देखनाइ, अइसँ सुखक दि‍न केहेन हएत। तहूसँ बेसी खुशी ई जे भरि‍ मेला ने ककरो पैंइच-उधार करए पड़तै आ ने दोकान-दौरीक झंझट रहतै। ि‍कएक तँ दू ि‍दन पहि‍ने सभ अपन-अपन काज सम्‍हारि‍ नेने छल। महाजनोक बही-खाता बन्‍न रहत। मुदा, दि‍वालीक बोहनि‍क दुख महाजनक मनमे जरूर हेतइ। कतबो रेड़गड़ मेला ि‍कअए ने होउ मुदा, दूध-दही, माछ-माउसक अभाव नै हएत। पॉंच दि‍न पहि‍नहि‍ सुधा दूधक एजेन्‍ट आ माद-माउसक व्‍यापारीकेँ एडभांस दऽ देने अि‍छ। तहूमे काली-पूजा छी। ि‍बना बलि‍-प्रदाने पूजाे कोना हएत। बँसपुराक जनि‍जाति‍यो तँ ओते अनाड़ी नहि‍ये अि‍छ जे जोड़ा छागर कबुला नहि‍ केने होथि‍। पहि‍ल साल पूजाक छी। ि‍बना नव बस्‍त्र पहि‍रने पूजा कोना कएल जाएत आ धि‍या-पूजा मेला कना देखत? जँ से नइ हएत तँ ि‍क देवीक अपमान नहि‍ हेतनि‍। जइ जगहपर काली मंडप बनल ओइ ि‍ठमक आठे-दस कट्ठाक परती। सेहो आम जमीन। जइसँ एकपेरि‍यासँ लऽ कऽ खुरपेरि‍या लगा सौँसे परती रस्‍ते बनल। ओइ परतीक पछि‍म-उत्तर कोनमे लोक फुटल-फाटल माटि‍योक बरतन आ कपड़ो-लत्ता फेकैत। पूब-उत्तर कोनमे ि‍धया-पूजा झाड़ा फि‍रैत। दछि‍न-पछि‍म भागमे घसबाह सभ घास-घास खेलाइ दुआरे कतेको खाधि‍ खुनने आ दछि‍न-पूब कोनमे कबड्डी आ गुड़ी-गुड़ीक चेन्‍ह दऽ घर बनौने। काली-पूजाक आगमनसँ सौँसे परती छीलि‍-छालि‍ एक रंग बना देलक। जहि‍ तरहक मेलाक आयोजन भऽ रहल अछि‍ ओहि‍ ि‍हसावसँ जगहो छुछुन लगैत। मुदा रौदि‍याह समए भेने परतीक चारू भागक खेतक धान मरहन्‍ना भऽ गेलै, जेकरा काटि‍-काटि‍ सभ अगते माल-जालकेँ खुआ नेने छलै। तेँ मेलाक लेल जगहक कमी नै रहल। पनरह बघासँ उपरे खेतक आि‍ड़-मेि‍ड़ तोि‍ड़ चट्टान बना देलक। अगर जँ से नइ बनौल जाइत तँ मुजफ्फरपुरक ओहन नाटकक अँटावेश कोना हएत? ि‍कएक तँ जइ पार्टीमे बाजा बजौनि‍हारसँ लऽ कऽ स्‍त्री पाट खेलेनि‍हारि‍ धरि‍ मौि‍गये संगीतकार आ कलाकार अछि‍। परोपट्टाक लोक उनटि‍ कऽ नाटक देखए लेल आउत। तेँ कमसँ कम पॉंच बीघाक फील्‍ड देखि‍नि‍हार लेल चाहबे करी। से तँ भइये गेल। तइपर सँ वृन्‍दावनक रास सेहो अछि‍। नाटकसँ कनि‍यो कम नै। एकपर एक कलाकार अछि‍। मोट-मोट, थुल-थुल देह, हाथ-हाथ भरि‍क दाढ़ी-केश लऽ लऽ पार्टो खेलत आ नचबो करत। तेँ देखि‍नि‍हारोक कमी नहि‍ये रहत। मेल-फि‍मेल कौव्‍वालीक संग महि‍सोथाक मलि‍नि‍यॉं नाच सेहो अछि‍। एकपर एक चारू। ि‍कअए ने धमगज्‍जर मेला लागत। पूजा-समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे खुशी होइत मुदा, एकटा शंका सबहक मनमे रहबे करै। ओ ई जे एत्ते भारी मेलाकेँ सम्‍हारल कोना जाए? कतबो गौँवा जी-जान लगौत तइओ लफुआ छौँड़ा सभ छअ-पॉंच करवे करत। पौकेटमारो हाथ ससारबे करत। मुदा, की हेतै, मेला-ठेलामे कनी-मनी ई सभ होइते छै। केकरा के देखत आ ककर के सुनत। तहूमे रौतुका मसीम रहत की ने? दोकानो-दौरीक आयोजन सेहो बेजाए नहि‍। दुनू ढंगक दोकान। पुरनो आ नवको। नवका समानक लेल न्‍यू मार्केट एक भाग आ दोसर भाग पुरना बजार बैसल। ओना अखन धरि‍ दोकान-दौरी नीक-नहॉंति‍ नहि‍ जमल अछि‍ मुदा बेर टगैत सभ बनि‍ जाएत। न्‍यू मार्केटक चाक्-चि‍क्‍य दोसरे ढंगक अछि‍ जइमे ि‍बनुदेखलेहे समान बेसी रहत। दोकानदारीो सभ बहरबैये रहत। ऐहन-ऐहन सुन्‍नर चूड़ी एहि‍ इलाका लोक देखनौ हएत ि‍क नहि‍ ि‍क नहि‍ तेहन-तेहन चूड़ीक दोकान सभ आि‍ब गेल अछि‍। देखि‍नि‍हारोकेँ ऑंखि‍ उठि‍ जाएत। ि‍कअए ने उठत? एते दि‍न देखैत छल जे चूड़ी स्‍त्रीगणे बेचै छलि‍ अइबेरि‍ देखत जे पुरूखो बेचैए। तइमे तेहन-तेहन फोटो सभ दोकानक भीतरो आ बाहरो लगौने अछि‍ जे अनेरे आगूमे भीड़ लागल रहत। असली मनुक्‍ख छी आि‍क नकली से सभ थोड़े बुझत। फोटोए टा नहि‍ गीतो गबैबला तेहन-तेहन साउण्‍ड-बक्‍स सभ सजौने अि‍छ जे सभ ि‍कछु ि‍बस‍रि‍ जाएत। चूड़ी बजारक बगलेमे चेस्‍टरक दोकान लगल अछि‍। चूड़ी बजारसँ कम थोड़े ओहो बेपारी सभ सजौने अछि‍। काल्‍हि‍येसँ ऐहन-ऐहन प्रचारक मशीन सभ लगौने अछि‍ ि‍कयो थोड़े परखि‍ लेत जे आदमीक मुँह बजै छै ि‍क मशीन। परचारो ि‍क अरही-सुरही छै। समानक संग-संग पहि‍रैक लूरि‍ सेहो ि‍सखबैत अछि‍। धन्‍यवाद ओि‍ह बनौनि‍हारकेँ दी जे हाथी सन-सन मोट देहसँ लऽ कऽ खि‍रकि‍ट्टी देह धरि‍मे एक्‍के रंगक चेस्‍टरसँ काज चलि‍ जाएत। तहूमे तेहन डि‍जेनगर सभ अछि‍ जे एकटा छोड़ि‍ दोसर पसन्‍दो करैक जरूरत नहि‍ पड़त। जेकरा पाइ छै ओकरा एकटासँ मन भरत ओ तँ गेटक गेट कीनत। ि‍बल्‍कुल औटोमेटि‍क। दामो कोनो बेसी नहि‍ये रखने अछि‍ जे समानक बि‍क्री कम होतै। मात्र एगारहे रूपैया। बेपारि‍यो सभ तेहन ओसताज अछि‍ जे पहि‍ने पता लगा समान डि‍क देने अछि‍। चेस्‍टरक दोकानक बगलेमे खेलौनाक बजार अछि‍। वाह रे खेलौना बनौनि‍हार आ पँूजी लगा व्‍यापार केनि‍हार। दस रूपैयासँ लऽ कऽ हजार धरि‍क। बन्‍दूक, तोप, रौकेट, हवाइ जहाजक संग बम साइजि‍क खेलौना सभसँ दोकान भरने अछि‍। देखैमे असलि‍ये बुि‍झ पड़त मुदा, अछि‍ नकली। अोना असलेहे जेकॉं गोलि‍यो छुटैत, अवाजो होइत आ उड़बो करैत अछि‍। तीनि‍टा दाढ़ी केश बनवैबला बम्‍बैया शैलून सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तीनूमे महि‍ले कारीगर। मरदे जेकॉं अपन रूप बनौने। मुदा, मरदोसँ बेसी फुरति‍गरो आ बजबोमे चंगला। दाढ़ी कटबैकाल बुझि‍ये ने पड़त जे उनटा हाथ पड़ैए आि‍क सुनटा। हाथो मरदे जेकॉं मुदा, कने गुलगुल बेसी। शैलूनक बगलेमे साड़ीक बाजार। साि‍ड़यो सभ अजबे टँगने अछि‍। पुरजीमे रेशमी लि‍खि‍-लि‍खि‍ सटने मुदा, पटुआ जेकॉं छल-छल करैत अछि‍। कतौ ओचि‍ला नहि‍, एकदम पलीन। तेहन-तेहन पटोर सभ रखने अछि‍ जे बुझबे ने करबै ई भगलपुरि‍या रेशम छी ि‍क पटुआक। प्‍लास्‍टि‍कक मनुक्‍ख बना तेहन सजौने अछि‍ जे बुझि‍ पड़त ऑंखि‍क इशारासँ दोकान अबैले कहैए। राम-हि‍लोरा, मौतक कुऑं, हेलि‍केप्‍टर, जवाइ-जहाज, रेलगाड़ी, ि‍दल्‍लीक चौकक चरि‍ पहि‍या, छह पहि‍या गाड़ीक दौि‍ड़-बरहा सभ अछि‍। मुदा, जखन न्‍यू मार्केट घुमि‍ये लेलौं तँ बजार घुमि‍ये लि‍अ। क्‍यो छपड़ीक दोकान बनौने तँ ि‍कयो फट्ठाक खूँटापर बातीक कोरो बना प्‍लास्‍टि‍क दऽ घर बनौने अछि‍। ि‍कयो ि‍तरपाल टँगने अछि‍ तँ ि‍कयो ओहि‍ना घैला-डाबा इत्‍यादि‍ माटि‍क बरतन पसारने अछि‍। दोकानदारो सभ सुच्‍चा ग्रामीण। ऐँ ई तँ ि‍चन्‍हरबे दोकानदार सभ छी। पहि‍लुके दोकान झुनझुनाबला बुढ़बाक छी। चालि‍सो बर्ख उपरेसँ झुनझुना बेचैए। आब तँ बुढ़हा गेल। दुनू परानी दुनू दि‍शि‍ बैसि‍ ताड़क पत्ता झुनझुनाे बना रहल अछि‍ आ खजुरक पातक पटि‍या, बीअनि‍ सेहो सजौने अछि‍। तोरा तँ कनी कऽ चि‍न्‍है छि‍यह हौ झुनझुनाबला।’’ ‘‘बौआ चसमा लगौने छी तेँ धकचुकाए छह। पहि‍ने चसमा नै लगवै छलौं। ऑंखि‍यो नीक छलाए। दू साल पहि‍ने ऑंखि‍ खराब भऽ गेल। तेँ अहीबेर लहानमे ऑंखि‍ बनेलौं।’’ मुदा, झुनझुनावाली परेखि‍ कऽ बाजलि‍- ‘‘बौआ सोनमा रौ। जहि‍यासँ परदेश खटै लगलेँ तहि‍यासँ नै देखलि‍यौ। तूँ हमरा चि‍न्‍है छेँ?’’ ‘‘नै।’’ तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्‍केठीन अछि‍। अंगने-अंगने झुनझुनो आ बि‍अनि‍यो पटि‍या बेचै छी। अहीसे गुजर करै छी। आब तँ भगवान सब ि‍कछु दए देलनि‍। दूटा बेटा-पुतोहू अछि‍। सातटा पोता-पोती अछि‍। दुनू बेटा घर जोड़ैया (राज ि‍मस्‍त्री) करैए। खूब कमाइए आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा, दुनू परानी तँ ि‍जनगी भरि‍ यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना दुनू भॉंइ मनाहि‍यो करैए। मगर हाथपर हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लागत। तेँ जावे जीवै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्‍चेसँ बहि‍ना लागल अछि‍। जहि‍या तोरा घर दि‍स जाइ छी तहि‍या ि‍बना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि‍ दि‍हैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि‍। तोरा कइअ टा बच्‍चा छौ?’’ ‘‘एक्‍केटा अछि‍।’’ ‘‘एकटा झुनझुना बौआले नेने जाही।’’ ‘‘ओहि‍ना नै लेबौ मौसी। अखैन हमरो संगमे पाइ नै अछि‍ आ तोहूँ दोकान लगैब‍ते‍ छेँ। ि‍बकरी बट्टा थोड़े भेलि‍ हेतौ।’’ ‘‘रओ बोहनि‍क सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बि‍द करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइ लए बोहैनक काज अछि‍।’’ दोसर दोकान रमेसराक लोहोक समान आ लकड़ि‍योक समानक अछि‍। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्‍कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्‍चा सभक तीन पहि‍या गाड़ीक दोकान लगौने अछि‍। असकरे रमेसरा समान पसारि‍ खूँटामे ओगठि‍, टॉंग पसारि‍ बीड़ी पीवैत अछि‍। ‘‘रमेसरा रौ। सुनने रहि‍यौ जे तोहूँ दि‍ल्‍ली धए लेलेँ।’’ ‘‘धुड़ बूि‍ड़, दि‍ल्‍ली हौआ ि‍छयै। जहि‍ना लोक कहै छै ने जे ि‍दल्‍लीक लडू जेहो खाइए सेहो पचताइए आ जे नै खेलक सेहो पचताइए। ि‍दल्‍लीसेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेि‍डयो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछौही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलियै आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क -बरही- ऐठाम नोकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपैया महीना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटलासँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ ऐलौं। जहि‍या सुनलि‍यै जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पॉंच हजारक समान अछि‍। कोनो ि‍क सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझ पड़ै छौ जे ि‍दल्‍लीमे हुंडी गारल अछि‍। हम तँ एक्‍के मासमे बुझ गेलि‍यै। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछ तखन अनकर तबेदारी ि‍कअए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ ि‍कअए ने रहब। तू सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पत्ति‍ कऽ अपन बुझै छीही। मुदा, ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।’’ ‘‘ई तँ रौदि‍या भैयाक चाहक दोकान बुझि‍ पड़ैए। अपने दोकान खोललह भैया?’’ ‘‘हँ, बौआ। गामक मेला छी। एकर भीड़-कुभीड़ तँ गौँऐपर ने पड़त। ओहि‍ना जे टहलैत-बुलैत रहि‍तौं, तइसँ नीक ने जे दू पाइ कमाइयो लेब आ मेलाक ओगरबाहि‍यो करब।’’ ‘‘बेस केलह। बरतन-वासन अपने छेलह?’’ ‘‘नहि‍। रघुनाथ लग बजलौं तँ वएह अपन पुरना सभ समान देलक।’’ ‘‘रघुनाथक दोकान तँ बड़ स्‍टेनडर भऽ गेलै।’’ ‘‘चाहे दोकानक परसादे तीनि‍टा बेटि‍ओक ि‍वआह केलक आ ईंटाक घरो बना लेलक।’’ ‘‘वाह बड्ड सुन्‍दर, बर बेस।’’ कते छोटका दोकानदार छपड़ि‍यो ने बनौने। काति‍क मास रहने ने वेसी गरमी आ ने वेसी जाड़। तहन ि‍कअए अनेरे बॉंस-बत्ती कीनि‍ घर बनौत। दूटा बॉंसक खूँटा गाड़ि‍ उपर बल्‍ला दऽ देत। ओहि‍पर केराक घौर टॉंगि‍ बेचत। कचड़ी पापड़ फोफी लेल माटि‍येमे चुल्‍हि‍ खुनि‍ लोहि‍या चढ़ा बनौत। मुरही पथि‍येमे रखि‍ ि‍डब्‍बासँ नापि‍-नापि‍ बेचत। झि‍ल्‍ली बनवैक सॉंचा तँ सभकेँ रहि‍तो ने छै, जे बनौत। झंझारपुरक आ मधेपुरक दस-बारहटा दोकानदार आि‍ब कऽ मेलाक चुहचुहि‍ये बदलि‍ देलक। गहि‍ि‍कयो ि‍चन्‍हरवे आ दोकानदारो सएह। तेँ सभसँ नीक कमाइ ओकरे सभकेँ हएत। नगद-उधार सभ चलतै। एक पॉंतीसँ सभ दोकान बना रहल अछि‍। पि‍तोझि‍या गाछ लग के झगड़ा करैए। कनी ओकरो देखि‍ लि‍अए। अरे ई तँ दुनू परानी ढोलबा छी। ‘‘ऐना ि‍कअए ढोल भाय अि‍बते-अबि‍ते ढोल जेकॉं दुनू परानी ढवढ़बाइ छह?’’ अवाज दाबि‍ ढोलबा बाजल- ‘‘हौ भाय, देखहक ने अइ मौि‍गयाकेँ, मेलासँ जेकरा जे हानि‍-लाभ होउ मुदा हमरा तँ सीजि‍न पकड़ाएल अछि‍। आगूमे छठि‍ अछि‍। परोपट्टाक लोक तँ कोनि‍यॉं, सूप, छि‍ट्टा, डगरी कीनबे करत। अोइ हि‍सावसँ ने समान बनवैत। से कहैए जे तीसे गो छि‍ट्टा-पथि‍या ि‍मला कऽ अछि‍। अट्ठारह गो सूप आ गोर पचासे कोनि‍यॉं अछि‍। उँटक मुँहमे जीरक फोरनसँ काज चलत?’’ ‘‘अइ लेल झगड़ा ि‍कअए करै छह? फेरि‍ लऽ अनि‍हह।’’ ढोलबा कने गम खेलक मुदा, झपटि‍ कऽ तेतरी बाजलि‍- ‘‘अइ मरदावाकेँ एक्‍को ि‍मसि‍या बुइध छै। एतनो ने बुझैए जे आठे दि‍नमे कते बनवि‍तौ। दूटा ढेनमा-ढेनमी अछि‍ ओकरो सम्‍हारए पड़ैए। ई तँ भरि‍ दि‍न बॉंस, बत्ती, कैमचीक जोगारमे रहैए। कोनो ि‍क बजारक सौदा छि‍यै जे रूपि‍या नेने जाइतौं आ कीनि‍ अनि‍तौं।’’ ढोलबा- ‘‘तूँ नै देखै छीही जे महि‍नामे पनरह दि‍न, काजक दुआरे नहेबो ने करै छी। तोँही छातीपर हाथ राखि‍ बाज जे एक्‍को दि‍न टटका भात-तीमन खाइ छी। डेढ़ बजे दू बजे हकासल-पि‍यासल बॉंस आनै छी, तखन गोटे दि‍न नहाइ छी ने तँ नहि‍ये नहाइ छी। धड़-फड़ा कऽ खाइ छी आ काजेमे लगि‍ जाइ छी। नि‍चेनसँ बीड़ीयो-तमाकुल नइ खाए-पीबए लगै छी। खा कऽ अराम केकरा कहै छै से तँ दि‍नकेँ सि‍हि‍नते लागल रहैए। तूँ की बुझबीही जे बॉंस टोनै, फाड़ै, गादि‍ लइमे कते भीर होइ छै। बैसल-बैसल बानि‍ चलबै छै तँ बुझि‍ पड़ै छौ एहि‍ना होइ छै। ई थोड़े बुझै छीही जे उठ-बैठ करैत-करैत जॉंघ चढ़ि‍ जाइए। अइसँ हल्‍लुक सए बेरि‍ डंड-बैठकी करब होइ छै। एते काज केला बाद जा कऽ बैसारी काज अबैए। बैसि‍यो कऽ कारा-कैमची बनैबते छी। गुन अछि‍ जे ताड़ी पीबै छी तेँ मन असथि‍र रहैए। मूड फरेस रहैए। तेँ ने कोनो काज उनटा-पुनटा होइए। ने तँ केकर मजाल छि‍यै जे एक्‍के दि‍नमे एते रंगक काज सरि‍या कऽ कए लेत। अच्‍छा हो, दोकान लगा। दोकान की लगेमे, कोनि‍यॉंकेँ तीनि‍ मेल बना ले। डगरी, सूप तँ एक्‍के रंग छौ आ छि‍ट्टाकेँ दू मेल बड़का एक भाग छोटका एक भाग कऽ के लगा ले। पॉंच गो रूपैया दे कनी ताड़ी पीने अबै छी।’’ ‘‘अखैन रौद चरहन्‍त छै। अखैन जे ताड़ी पीबैले पाइ देवह से ि‍क हमरा गारि‍ सुनैक मन अछि‍।’’ ‘‘ऑंइ गै मौगि‍या, तोरा बजैत एक्को पाइ लाज नै होइ छौ जे पुरूख रहि‍तो घरक भार सुमझा देने ि‍छयौ। संगीयो-साथी सदति‍ काल ि‍कचाड़ैए।’’ ‘‘अच्‍छा रूपैया दइ छि‍य, मुदा फेरि‍ बेरू पहर नै मंगि‍हह। जाइ छह ते जा मुदा झब दऽ अबि‍हह। मेला-ठेला ि‍छयै असकरे हम दोकान चलाएब ि‍क बेदरा-बुदरी सम्‍हारब।’’ ‘‘से ि‍क हम नै बुझै छि‍यै, मुदा दसटा दोस-महि‍म अछि‍। अगर भेंट-घॉंट भऽ जाएत तँ ि‍क कुशलो-क्षेम नै करब।’’ बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेबहार सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे भेल ओहि‍ घटनाक समाचार तरे-तर चारू भरक गाममे पसरि‍ गेल छल। जेकर टीका-टीप्‍पणी गामे-गाम होइत छल। मुदा, एक रूपमे नहि‍। अधि‍कतर लोक एि‍ह घटनाकेँ ि‍नन्‍दा करैत तँ अल्‍पांश मनोरंजन कहैत। ि‍कछु गोटे फैशन बुझि‍ पाछुसँ अबैत बेबहार मानि‍ बजवे ने करैत। मगर सभ ि‍कछु होइतो ि‍ससौनीबला बँसपुराबलासँ सहमल। ऐहन घटना आगू नहि‍ हुअए तहि‍ लेल सि‍सौनीक बुद्धि‍जीवी सबहक मनमे खलबली मचि‍ गेल। ि‍ससौनि‍एक दयानन्‍द दरभंगा कओलेजमे प्रोफेसरी करैत छथि‍। गामक लोक तँ हुनका एकटा नोकरि‍हरा बुझैत छन्‍हि‍, मुदा, कओलेजमे छात्रोक बीच आ ि‍शक्षकोक बीच प्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍ बुझल जाइत छथि‍। अइबेर ओ दुर्गा-पूजामे गाम नहि‍ आि‍ब संगीक संग रामेश्‍वरम् चलि‍ गेल छलाह। मुदा, बालो-बच्‍चा आ पत्‍नि‍यो गाम आइल रहनि‍। वएह सभ रामेश्‍वरम् सँ एलापर घटनाक जानकारी देलकनि‍। घटना सुनि‍ प्रोफेसर दयानन्‍द मने-मन जरि‍ गेलाह। गुम्‍म-सुम्‍म भऽ सोचए लगलथि‍ जे ई कोन तमाशा भऽ गेल जे धरमक काजक दौर ऐहन अधर्म भऽ गेल। कोना लोकक मनमे धरमक प्रति‍ आदर रहत। धर्मस्‍थलमे जँ ऐहन-ऐहन वृत्ति‍ होयत तँ कैक दि‍न ओ स्‍थल जीवि‍त रहत? ककरो माए-बहीनि‍ कोनो घरसँ नि‍कलि‍ देबस्‍थान पूजा करए वा सॉंझ दि‍अए आओत। जते घटनाकेँ टोब-टाब करति‍ तते पैघ-पैघ प्रश्‍न मनकेँ हौड़ए लगलनि‍। मुदा, जे समए ससरि‍ गेल ओ उनटि‍यो तँ नहि‍ सकैत अछि‍। कोन मुँहे ओहि‍ गाम पएर देब। लोक की कहत? ओहू गामक (बँसपुराक) तँ अनेको वि‍द्यार्थी पढ़बो करैत अछि‍ आ पढ़ि‍ कऽ नि‍कललो अछि‍। ओ सभ की कहैत हएत। मुदा, आगू ऐहन घटना नहि‍ हुअए तेकर तँ प्रति‍कार कएल जा सकैत अछि‍। पाप तँ प्राश्‍चि‍तेसँ कटैत अछि‍। तहूमे अगुरबारे बँसपुरासँ काली-पूजाक हकार-कार्ड सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तत्-मत् करैत मनमे एलनि‍ जे एकटा बेंग मरलासँ लोक इनारक पानि‍ पीि‍व तँ नहि‍ छोड़ि‍ दैत अछि‍। ओकरा नि‍कालि‍ गंधकेँ मेटबैक उपाइ करैत अछि‍। बँसपुराक काली-पूजाक आरंभ सेहो सि‍सौनि‍एक घटनाक प्रति‍क्रि‍या स्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। हो न हो ऐकरे जबावमे ओहो सभ ने घटना दोहरा दि‍अए? काली-पूजा शुरू होइसँ तीन ि‍दन पहि‍ने प्रो. दयानन्‍द गाम आि‍ब, बीना कोनो मान-रोख केने गामक पढ़ल-लि‍खल उमरदार सभसँ सम्‍पर्क कए कहलखि‍न- ‘‘ि‍कछु गोटे गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझबो करैत छलाह आ ि‍कछु गोटे बुझौलासँ बुझलनि‍। बुझला बाद एकमुँहरी सभ गाममे बैसार कए एकर नि‍राकरण करैक ि‍वचार व्‍यक्‍त केलकनि‍। दयानन्‍दक मनमे आगू डेग बढ़बैक साहस जगलनि‍। साहस जगि‍तहि‍ कओलेजक ि‍वद्यार्थी सभकेँ बैसार करैक भार देलखि‍न। दू ि‍दन समए बीति‍ गेल। जइ ि‍दन काली-पूजा शरू होएत तहि‍ ि‍दन भोरे सात बजे बैसार भेल। सात बजेसँ पहि‍नहि‍ दुर्गेस्‍थानमे सभ एकत्रि‍त भेलाह बैचारि‍क रूपमे गाम दू फॉंक जेकॉं भऽ गेल। तेँ अपन-अपन ि‍वचारकेँ मजबूत बनबैक ि‍वचार सभक मनमे। तीनू कार्यकर्ताक -जे सभ घटनामे शामि‍ल रहए- पि‍ता बैसारमे नहि‍ आएल। नहि‍ अबैक कारण ि‍वरौध नहि‍ लाज होय। तहूमे जखनसँ प्रो. दयानन्‍द दरभंगासँ आि‍ब घटनाक चर्चा चलौलनि‍ तखनेसँ मुँह नुकबए लगल। मुदा, मौलाइल घटना पुन: पोनगि‍ गेल। ओना गामक एक ग्रुप, जेकरा कुकर्मी ग्रुप कहि‍ सकै छि‍यै, बल प्रयोगक योजना तरे-तर बनौने रहै। जहि‍सँ कोनो रस्‍ते ने गाममे खुजतै। मुदा, गामक ि‍वशाल समूहक, जे अधला काजसँ घृणा करैत, एक रंगाह ि‍वचार। एक तरहक ि‍वचारक पाछु कते तरहक सोच अछि‍। ि‍कछु गोटेक सोच जे गाममे एकटा कुकर्मी समाज अछि‍ जे सदति‍काल ि‍कछु नहि‍ ि‍कछु करि‍ते रहैत अछि‍। परोछा-परोछी तँ एक-दोसरकेँ गाि‍र पढ़ैत अछि‍ मगर, बेर ऐलापर सभ एक मुहरी भऽ जाइत अछि‍। तेँ घटना ओहन अस्‍त्र छि‍यै जहि‍सँ ओि‍ह समाजकेँ काटि‍-काटि‍ लति‍औल जा सकैत अछि‍। ि‍कछु गोटेक वि‍चार जे जहि‍ना तीनू गोरे दसगरदा जगहपर जुल्‍म केलक तहि‍ना समाजक बीच लति‍औल जाए। ि‍कछु गोटेक ि‍वचार जे हम सभ मनुष्‍यक समाजमे रहै छी नहि‍ ि‍क जानवरक समाजमे। तेँ मनुष्‍यक समाज बने। भलेहीं मनुष्‍यक समाज बनबैक जे प्रक्रि‍या होइत अछि‍ ओि‍ह प्रक्रि‍याकेँ क्रि‍यान्‍वि‍त कएल जाए। ललबाक ि‍वचार सभसँ भि‍न्‍न। ि‍कएक तँ जहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार भेल छलै ओ ओकर ममि‍औत बहीन। ललबा कलकत्तामे डाइबरी करैत अछि‍। दुर्गापूजामे गाम आएल रहै। जहि‍ दि‍न घटना भेल ओइ दि‍न ओ बुझबे ने केलक। जखैनसँ बुझलक तखैनसँ देहमे आि‍ग लगि‍ गेलै। मनै-मन योजना बना नेने रहए जे धनि‍कक टेरही कोना झाड़ल जाइ छै से समाजकेँ देखा देब। नीक मौका। हाथ लागल हेन। मुदा, मनमे इहो शंका होय जे दयानन्‍द कक्‍काक आयोजन छि‍यनि‍ जँ कहीं आगूमे आि‍ब जेताह तँ सभ वि‍चार चौपट भऽ जाएत। सोचैत-ि‍वचारैत तँइ केलक जे चाहे जे होय मुदा, ि‍बना जुत्ति‍यौने नहि‍ छोड़ब। भलेहीं जि‍नगी भरि‍ जहलेमे ि‍कअए ने रहै पड़ै। गामक सभ टोलक लोक, गोटि‍-पंगरा छोड़ि‍, बैसारमे आइल। प्रो. दयानन्‍द उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ कहए लगलखि‍न- ‘‘अइ बेरक दुर्गा-पूजामे जे घटना गाममे घटल ओ समाजक लेल बड़का कलंक छी। एहि‍ घटनाकेँ जत्ते ि‍नन्‍दा कएल जाए ओते कम होयत। कते गोटे बुझैत हेबइ जे अनगौँवा लड़की छल मुदा, ई बुझब हमरा सबहक पलायनवादी ि‍वचार हएत। जइसँ रंग-वि‍रंगक अधलासँ अधला घटना रहत आ हम सभ मुँह तकैत रहब। तेँ ऐहन-ऐहन घटनाकेँ रोकए पड़त।’’ ि‍वचहि‍मे जे ग्रुप हंगामा करए चाहैत छल उठि‍-उठि‍ हल्‍ला करए लगल। हल्‍ला देखि‍ सभ उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ ि‍वरोध करए लगल। ललबा प्रो. दयानन्‍द दि‍शि‍ तकलक। दयानन्‍द मुँहक रूखि‍ तँ नहि‍ बदलल मुदा, नोरसँ ऑंखि‍, करि‍या मेघ जेकॉं, लटकि‍ कऽ ि‍नच्‍चॉं मुँहे जरूर भऽ गेल दलनि‍। ि‍बजलोका जेकॉं ललबा चमकि‍ कऽ फॉंइट चलबए लगल। तीनूकेँ असकरे ललबा मारि‍ कऽ खसा देलक। जाबे सभ शान्‍त भेल ताबे तँ तीनूक गाल-मुँह फुइल गेल मुदा, तइयो ललबाक गरमी कमल नहि‍। जहि‍ना खून केनि‍हारकेँ आरो खून करैक गरमी खूनमे आि‍ब जाइत तहि‍ना ललबोकेँ भेल। मुदा, चारू दि‍ससँ सभ पकड़ि‍ घि‍चने-ि‍घचने कात लऽ गेल। दुनू हाथ पकड़ि‍ दयाबाबू फुसफुसा कऽ कहलखि‍न- ‘‘अगर समाजमे एक्‍कोटा बेटा अन्‍यायक ि‍खलाफ अपनाकेँ उत्‍सर्ग कऽ देत तँ सैकड़ो बेटा धरतीमाता गोदमे पैदा भऽ जाएत। मन थीर करह। ओना समाजक सभ तरहक समस्‍याक समाधान खाली मारि‍ये टा सँ नहि‍ होएत आ ने केवल पनचैति‍येसँ हएत। ि‍कएक तँ समस्‍या दू तरहक होइत अछि‍ पहि‍ल घटना वि‍शेषक परि‍स्‍थि‍ति‍ वि‍शेषक होइत जबकि‍ दोसर सत्ता-वि‍शेष वा व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक होइत अछि‍। अखुनका जे समस्‍या अछि‍ ओ व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक छी तेँ ऐहन समस्‍याकेँ बलेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। नहि‍ तँ कोनो नहि‍ कोनो रूपमे चलि‍ते रहत, मरत नहि‍।’’ प्रोफेसर दयानन्‍दक ि‍वचार सुि‍न ललबा बाजल- ‘‘कक्‍का, अहॉं लग ि‍कछु बजैत संकोच होइए मुदा, आइ तीनूक खून पीवि‍ ि‍लति‍ऐक। भलेहीं ि‍जनगी भरि‍ जहले कि‍अए ने कटि‍तौं। फॉंसि‍येपर ि‍कअए ने चढ़ि‍तौं। की लऽ कऽ एलौं आ ि‍क लऽ कऽ जाएब। जखन मरनाइ अछये तँ लड़ि‍ कऽ ि‍कअए ने मरब जे सड़ि‍ कऽ मरब।’’ ललबाक बात सुनि‍ मुस्‍कुराइत प्रो. दयानन्‍द कहलखि‍न- ‘‘अल्‍होमे लोक गवैत अछि‍ ‘रनमे मरे दोख नहि‍ लागे।’ तहि‍ना महाभारतमे व्‍यासोबाबा कहने छथि‍न जे इन्‍द्रासनक अधि‍कारी वएह छी जे अन्‍यायक ि‍वरूद्ध रनक्षेत्रमे ठाढ़ भऽ अपन बलि‍ चढ़ौत। मुदा, जे भेल से उचि‍त भेल। एहि‍सँ आगू नहि‍ बढ़ह। अगर जँ एहि‍सँ सुधरि‍ जाएत तँ बड़बढ़ि‍यॉं नहि‍ तँ ओकर फल आन थोड़े भोगत। तूँ एतै रहह।’’ कहि‍ आगू बढ़ि‍ दयानन्‍द सोचए लगलाह जे समाजक अध्‍ययन नीक नहॉंति‍ नहि‍ भेल अछि‍। लोकक जे रूखि‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओ कखनो बेकाबू भए सकैत अछि‍। तेँ सभकेँ गामपर जाइले कहि‍ दि‍अए। कहि‍ तँ देलखि‍न मुदा ि‍कयो मैदान छोड़ै लऽ तैयार नहि‍ भेल। सभ अड़ल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे अपनोहु पड़ि‍ गेलाह। मनमे नाचए लगलनि‍ जे सभसँ पहि‍ने हमहीं कोना मैदान छोड़ि‍ देब। मुदा, रहनहुँ तँ लोक मानि‍ नहि‍ रहल अछि‍। दोहरा कऽ कहलखि‍न- ‘‘सभ गोटेक परि‍वार आइयेसँ नहि‍ बहुत दि‍नसँ एकठाम रहैत एलहुँ आ आगुओ रहब। तेँ सभकेँ मि‍लि‍-जुलि‍ रहैक अछि‍। ककरो संग ि‍कयो अधला करबै तँ झंझट हेबे करत। एक परि‍वारक झगड़ा गामक माने समाजक झगड़ा बनि‍ जाइत अछि‍। तेँ झगड़ाकेँ रोकैक उपाए एक्‍केटा अछि‍ जे ओहन कारणे ने उठै जहि‍सँ झगड़ा हुअए।’’ कहि‍ घर दि‍सक रास्‍ता पकड़लनि‍। मुदा सभ मैदानमे डँटले रहल। प्रो. दयानन्‍दक ि‍वचारक असरि‍ तेनाहे सन लोकक मनपर पड़ल। ि‍कऐक तँ ऐहन-ऐहन घटना पूर्वमे अनेक भऽ चुकल अछि‍। जे सबहक मनमे उपकए लगल। दयानन्‍द बाट धेने आगूओ बढ़ल जाइत आ पाछु घुरि‍-घुरि‍ सेहो देखथि‍। जे फेरि‍ ने कहीं पटका-पटकी शुरू हुअए। ओना ककरो हाथमे ने लाठी अछि‍ आ ने हथि‍यार मुदा, देह तँ छैक। पॉंच बीघा आगू बढ़लापर पेशाब करैक लाथे बैसि‍ हि‍या-हि‍या देखथि‍। जे ि‍कयो हाथ-पएर ने तँ फड़कबैए। मुदा, से नहि‍ देखथि‍। पहि‍ने पारि‍ खेलहा सभ मैदान छोड़लक। पाछुसँ सभ अपन-अपन रास्‍ता धेलक। ठंढ़ाएल रूखि‍ देखि‍ अपनो उठि‍ कऽ वि‍दा भेलाह। घरपर आि‍ब प्रो. दयानन्‍द पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- ‘‘बँसपुरा जाइक समए दसे बजेक बनौने छलहुँ मुदा, बैसारेमे बेसी समए लगि‍ गेल। तेँ आब नहाए नहि‍ लगब। झब दऽ खाइले ि‍दय। ताबे हाथ-पएर धोइ लइ छी।’’ पति‍क बात सुि‍न पत्‍नी ि‍कछु नहि‍ बजलीह। बुझल रहनि‍ जे ऐना कते दि‍न भेल अछि‍ जे काजक धड़फड़ीमे नहाइये नहि‍ लगैत छथि‍। नउ बजे। बगुरबोनीक भगत कफलाक संग बँसपुरा काली-स्‍थान पहुँचल। भगतजीक हाथमे लोटा आ जगरनथि‍या बेंत। डलि‍बाह मनटुनक हाथमे सि‍क्‍कीक चौड़गर चंगेरी, जे मधुबनी बजारमे कीनने रहै। चंगेरीमे फूल-अछत, अगरबत्ती आ सलाइ रखने रहै। नि‍रधनक कन्‍हामे ि‍मरदंग लटकल। सवि‍या आ सैनि‍याक हाथमे झालि‍। सोमनाथ हाथमे एकटा बसनी; सरही आमक पल्‍लो आ पान-सातटा सुखल कुश। बुधबाक कान्‍हपर एकटा मुँठवासी बॉंस, जेकरा छीपमे आठ रंगक पताका आ तीन हाथ जड़ि‍सँ उपर ओहने रंगक कपड़ा टुकड़ा बान्‍हल। सभ एक सूरे ‘काली महरानीक जय’ क नारा लगबैत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य बैसि‍ अपन काजक ि‍हसाब लगबैत रहै। छलगोरि‍या मुरतीक अंति‍म परीक्षण मंडपमे करैत रहए। भगतजीक ि‍क्रया-कलाप देखए लेल एक्‍के-दुइये लोक जमा हुअए लगल। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य अपन हि‍साब-वारी रोकि‍ भगतजी सभकेँ देखए लगल। काली मंडपक ओसारपर भगतजीक मेड़ि‍या सभ अपन-अपन समान रखि‍ हाथ-पएर धोय लेल बगलेक पोखरि‍ वि‍दा भेल। अछीजल भरै लेल सोनमा वसनी लऽ लेलक। भगतजीक हाथमे लोटा। हाथ-पएर धोय सभ ि‍कयो काली मंडपक आगू आि‍ब एकटंगा दऽ दऽ गोड़ लगलकनि‍। गोड़ लाि‍ग नि‍रधन मि‍रदंग चढ़बए लगल। सैनि‍यॉं, रवि‍या झालि‍ बजबए लगल। पोखरि‍सँ आि‍ब भगतजी हाथमे लोटा नेने ठोर पटपटबैत मंउपक आगू ठाढ़ भऽ ऑंखि‍ बन्‍न कऽ सुमि‍रन करए लगल। बुधवा मंडपक आगूमे थोड़े हटि‍ कऽ धुजा गाड़ए लगल। बरसपति‍या भगैत उठौलक- ‘‘हे काली मैया।’’ जना सभ काजक बँटबारा पहि‍ने कऽ नेने हुअए तहि‍ना। ठाढ़े-ठाढ़ भगतजी देह थरथरबए लगल। गोसाँइ आबि‍ गेलखि‍न। भगतजीक आगूमे डलि‍बाह दुनू हाथे डाली पकड़ने। थोड़े कालक बाद भगतजी चंगेरीमे सँ फूल-अछत लऽ उत्तर मुँहे खूब जुमा कऽ फेकलक। फेरि‍ फूल-अछत लऽ गंगाजीक नाओ लऽ दछि‍न मुँहे फेकलक। चाि‍र मुट्ठी चारू दि‍स फेि‍क पॉंचम मुट्ठी उपर फेकि‍ जोरसँ बाजल- ‘‘ओ..... ओ.....। कहि‍ अपन परि‍चए कालीक नाओसँ देलक। कालीक नाओ सुि‍न डलि‍बाह बाजल- ‘‘हे माए, ि‍कछु वाक् दि‍औ?’’ भगत- ‘‘अइ जगहक भाग्‍य जमि‍ गेल। एकरा नि‍च्‍चॉंमे साक्षात् गंगाजी बहै छथि‍न ई स्‍थान बनने, गाममे कोनो डाइन-जोगि‍नक ि‍कछु नहि‍ चलत। एते दि‍न गामक लोक बड़ कलहन्‍तमे रहै छलै मुदा, आब सभ खुशीसँ रहत। कोनो कुशक कलेप ककरो नै लगत।’’ गामक खुशहाली सुनि‍ पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे नव आनन्‍दक जन्‍म भेल। देवनाथ पूछलक- ‘‘हे माए, अहॉं की चाहै छी?’’ ‘‘ई स्‍थान हमर छी। अखन धुजा गारि‍ पीरी बनेलौं। सभ दि‍न पूजो करब आ बेरागने-बेरागन गोसाँइ खेलब। जेकरा जे कोनो उपद्रव देहमे हेतै ओ डाली लगौत। फूल दइते छुरि‍ जेतइ।’’ धुजा गारि‍, पीरी बना बुधबा तुलसि‍यो गाछ रोपि‍ देलक। समि‍ति‍क सभ चुपचाप भऽ देखैत रहै। ककरो मनमे कोनो शंके नहि‍ उठल। ि‍कएक तँ अनेको स्‍थानमे गहवरो रहैत अछि‍। मुस्‍की दैत देवनाथ पूछलक- ‘‘हे मैया, अपन कोनो पहचान दि‍औ?’’ झपटि‍ कऽ भगत बाजल- ‘‘तू जे जानक बदला जान गछने रहह से देलह। जखैन जान गड़ूमे रहह तखैन के बचौने रहह। गड़ू मेटा गेलह तँ सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ गेलह। अखनो धरि‍ जे बचल छह से स्‍त्रीऐक धरमे। जेहने तोहर स्‍त्री धरमात्‍मा छह तेहने तू पापी छह। ओकरे धरमे अखन धरि‍ बचल छह। नइ तँ कहि‍या ने तोहर नाश भऽ गेल रहि‍तह।’’ भगतक बात सुि‍न देवनाथक मनमे लड़कीबला घटना ठनकल। मुदा, ि‍कछु बाजल नहि‍। चुपचाप दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- ‘‘हे माए, ि‍बसरि‍ गेल छलौं भने मन पाड़ि‍ देलह।’’ देवनाथपर सँ नजरि‍ हटा भगत जोगि‍नदरकेँ कहलक- ‘‘तूँ जे कबुला केलह से देलह। जखैन जान उकड़ूमे फँसल रहह तखन कते बेर कहि‍ कऽ गछने रहह। ओना तोहर बारह आना ग्रह कटि‍ गेलह सि‍र्फ चारि‍ आना बँचल छह। तेँ दान-पुन कऽ कऽ जल्‍दी ओकरो मेटाबह।’’ जोगि‍नदरकेँ ओहि‍ राति‍क घटना मन पड़ल जहि‍ राति‍ रूपैया लऽ सेठक ऐठामसँ पड़ाएल रहै। दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- ‘‘हे मैया, ठीके बि‍सरि‍ गेल छलौं। जलदि‍ये तोहर कबुला पूरा करबह।’’ बीच-बचाव करैत डलि‍वाह बाजल- ‘‘आइ पहि‍ल दि‍न गोसॉंइ जगबे कएलाह अइसँ बेसी आब कोनो काज ने हएत।’’ डलि‍बाहक बात सुि‍न भगत उत्तर मुँहे ठाढ़ भऽ दुनू हाथ उठा ऑंखि‍ मूनि‍ लेलक। काली देहसँ नि‍कलि‍ गेलखि‍न। सामान्‍ये आदमी जेकॉं भगतो भऽ गेल। झालि‍-मि‍रदंग, भगैत सेहो बन्‍न भऽ गेल। ऑंखि‍क इशारासँ भगत डलि‍बाहकेँ कहलक- ‘‘काज सुढ़ि‍आइल अछि‍।’’ ऑंखि‍क इशारासँ डलि‍वाह उत्तर देलक- ‘‘हँ।’’ समि‍ति‍क सदस्‍य भगत लगसँ हटि‍ पुन: बैसारमे आि‍ब गेल। मुदा, एकटा नव समस्‍या समि‍ति‍क सामने उपस्‍थि‍त भऽ गेल। समस्‍या ई जे ि‍क गहबरो बनौल जाए आि‍क धुजा उखारि‍ कऽ फेि‍क देल जाए। मुदा, दुनू तरहक वि‍चार उठि‍ गेल। ि‍कदु गोटे गहवरक समर्थनो केलक आ ि‍कछु गोटे ि‍वरोधो केलक। बीचमे मंगलकेँ ि‍कछु फुरबे ने करै। मने-मन सोचै जे ई तँ बेरि‍ परक भदबा आि‍ब गेल। जँ मनाही करव तँ शुभ काज अशुभेसँ शुरू िहएत। जँ नहि‍ करब तँ सभ दि‍ना भदवा टाढ़ भऽ जाएत। भगतकेँ मंगल ि‍चन्‍हतो नहि‍ रहए मुदा, बगुरबोनीक भगतक ि‍वषएमे बुझल रहै जे एकटा कोखि‍या गुहारि‍ केनि‍हार भगत जहल गेल रहए। क्रमश: ........ १.बेचन ठाकुर-नाटक छीनरदेवी- आगाँ २.सरोज ‘खिलाडी’-  नाटक- ललका कपड़ा १ बेचन ठाकुर नाटक छीनरदेवी- आगाँ दृश्‍य चारि‍म (स्‍थान- सुभाष ठाकुरक आवास। सुभाषक पीसा घटकराज ठाकुर थि‍काह। दुनू    आदमी दलानपर बैसि‍ कऽ गप-सप्‍प करैत छथि‍। ललन चश्‍मा आ फाटल-    चि‍टल वस्‍त्र पहि‍र बताह भेषमे एम्‍हर-ओम्‍हर, दर्शकक बीचमे घुि‍म रहल अछि‍।) घटकराज-   बौआ, राति‍मे ि‍कएक फोन कएने रही? तखन हम गामपर नहि‍ रही,             पोखरि‍ ि‍दशि‍ गेल रही। सुभाष-     की कहि‍यऽ पीसा। कहैत लाजो होइत अछि‍। मुदा कहबह नहि‍ तँ             बुझबहक कोना? हओ, ललनमाकेँ छीनरदेवी लागल अछि‍ तेँ ओ बतहपनी           करैत अछि‍। एगो नीक भगत कहलनि‍ जे एकर ि‍बयाह जल्‍दी कर,              ठीक भए जेतौक। एहि‍ ि‍वषयमे गप केनाइ अनि‍वार्य छल। एकरा लेल            केतौ लड़ि‍कीक जोगार करहक। घटकराज-   बौआ, हमरा लग लड़ि‍का-लड़ि‍कीक जुगार सदि‍खन रहि‍तहि‍ अछि‍। मुदा          एखन तँ नहि‍ अछि‍ आ तोरा करबाक छह जल्‍दीए। खएर एगो उपए              छह एकरा कहुना कऽ दवाइ ि‍खया-पि‍या कऽ शांत कऽ अमोलागाछी लऽ          चलह। ओतय एहेने जरूरीबला ि‍बयाहक लड़ि‍का-लड़ि‍की प्रति‍दि‍न आबैत         अछि‍ आओर काली मंदि‍रमे ि‍बयाह होइत अछि‍। आइ एगो लड़ि‍की              अवश्‍य आएल हेतीह। मुदा ओतए लेन-देनक कोनो गप नहि‍ होइत             अि‍छ। मंदि‍रक पुजारी दु-चाि‍र बेर फोन हमरा प्रति‍दि‍न करैत छथि‍। घटकराज-   ि‍बलंब जुि‍न करह, नहि‍ लड़ि‍की उठि‍ जेतीह। ओना हम पुजारीकेँ फोन               कऽ दैत छि‍यन्‍हि‍ जे हम लड़ि‍का लऽ कऽ जल्‍दी आबि‍ रहलहुँ अछि‍। (घटकराज पुजारीकेँ फोन करैत छथि‍। एहि‍ बीच सुभाष ललनकेँ दवाइ ि‍खया-     पि‍या कऽ शांत करैत छथि‍। मीराकेँ बजा कऽ ललनकेँ चि‍क्‍कन कपड़ा पहि‍राबैत छथि‍। पूर्ण तैयार भऽ कऽ सुभाश, ललन आ घटकराज अमोलागाछी जाए रहलाह अछ। ि‍कदु देर ओ सभ ओतए पहुँचि‍ गेलाह। पर्दा हटैत अछ।      काली पंदि‍रमे पुजारी श्री ि‍वनोद झा घंटी डालए पूजा करैत छथि‍। सुभाष,   ललन अो घटकराज माथ टेि‍क प्रणाम करैत छथि‍। ि‍वनोद झा उँ श्री काल्‍यै    नम: मंत्र जपि‍ रहल छथि‍। सुभाष तीनु आदमी कालीकेँ प्रणाम कऽ बैसैत छथि‍। दोसर कात लड़ि‍की अनुअंजना अपन माए-बापक संग बैसल छि‍थ।      लड़ि‍कीक बाप बलदेव महतो आओर माए मालती देवी छथि‍न्‍ह।) बलदेव-     पंडीजी, हमरा लोकनि‍ कखनसँ बैसल छी? वि‍नोद-     से हम की करब? लड़ि‍का अएलाह एखन। ि‍बना लड़ि‍कहि‍ ि‍बयाह             होयतए। मालती-     पंडीजी, लड़ि‍का ओतए छथि‍। की? ि‍वनोद-     हँ हँ, वएह होएताह छोट अहॉंक दमाद। मालती-     हनु अंजना बाउ, लड़ि‍का तँ बड खाप-सूरत कच्‍छे नि‍मन अछि‍। आओर         समधि‍ सेहो राज कुमाररहि‍ जेकॉं छथि‍। यै अनु अंजना बाउ, एक गोट        गप्‍प कहु। बलदेव-     कहु ने, की कहए चाहैत छी? मालती-     हमहुँ आइए समधि‍सँ ि‍बयाह कऽ लि‍अ। बलदेव-     हँ हँ हँ हँ, औगतहु नहि‍। जुलूम भऽ जाएत। हम कोना जीयब।              एक्‍कोटा बकरीयाे नहि‍ अछि‍। ि‍वनोद-     आउ जजमान सभ। आबै जाइ जाउ आ मैया कालीक दरवारमे बैसै            जाउ। (एक कात लड़ि‍काबला, दोसर कात लड़ि‍कीबला आ बीचमे पंडीजी बैसैत    छथि‍। पंडीजी लड़ि‍का-लड़ि‍कीक हाथमे गंगा जल दैत छथि‍न्‍ह।) पढ़ु- ओम अपवि‍त्रो पवि‍त्रो भव- 5 दुनू (ललन ओ अनु अंजना) ओम अपवि‍त्रो पवि‍त्रो भव- 5 ि‍वनोद-     अपन-अपन देहकेँ ि‍सद्ध कऽ लि‍य। (ललन अो अनुअंजना जल देहपर छीटि‍ लैत छथि‍।) पढ़ु- ओम श्री गणेशाय नम: -5 दुनू-       ओम श्री गणेशय नम: -5 ि‍वनोद-     ओम श्री काल्‍यै नम: -5 दुनू-       ओम श्री काल्‍यै नम: -5 ललन-     पंडीजी, ि‍बयाह कखन होएत, से मंत्र पढ़ुने। वि‍नोद-     एखन कुम्‍हारम भए रहल अछि‍ आओर ि‍बयाह राति‍मे हएत। बलदेव-     पंडीजी, एना ि‍कएक यौ? अनुअंजना-   ठीके कहैत छथि‍ लड़ि‍का। एत्ते देरी कतउ ि‍बयाहमे होअए। हम ि‍बयाह          नहि देखने छी की? एहेन-एहेन कतेको ि‍बयाह देखने छी आ कऽ कए              छोड़ि‍ देने छी। ‍     (दुनू पक्ष एक-दोसरकेँ मुँह देखैत छथि‍।) ि‍वनोद-     अहॉं सभ औगतउ नहि‍। एि‍ह दरबारमे सभ कलेश नष्‍ट भए जाइत             अि‍छ। अहॉं माए कालीपर पूर्ण भरोसा राखू। पढ़ु अहॉं दुनू गोटे- गौरीशंकरभ्‍याम् नम: -5 दुनू-       ओम गौरी शंकराभ्‍याम नम: -5 (दुनूकेँ ि‍सन्‍दुरदान करए कहैत छथि‍ पंडीजी।लड़ि‍का-लड़ि‍कीक मांगमे भुसना सेनुर दैत छथि‍। पंडीजी दुनूकेँ लठबंधन कराए काली देवीकेँ गोर लगबैत छथि‍। फेर सभ ि‍कयो गोर लागैत छथि‍। हल्‍लुक नश्‍ता-पानि‍ होइत अछि‍।) ललन-     पंडीजी, आब हमरा लोकनि‍ जा सकैत छी घर? ि‍वनोद-     हॉं हॉं हॉं हॉं, रूकु। सुभाष बाबू ओ बलदेब बाबू, पहि‍ने दक्षि‍णा दि‍अ           तहन जाएब। सुभाष-     कतेक पंडीजी? ि‍वनोद-     मात्र एक सए एक टाका। बलदेव-     हमरा कतेक लगतैक पंडीजी? ि‍वनोद-     अहॉंकेँ मात्र एकावन टका। (दुनू आदमी पंडीजीकेँ दक्षि‍णा देलनि‍ आ आशीर्वाद लऽ कऽ अपन-अपन घर हेतु प्रस्‍थान। लड़ि‍का-लड़ि‍की दुनू एक-दोसरक कन्‍हापर हाथ राखि‍ कऽ शानसँ जा रहल छथि‍ पाछु-पाछु) पटाक्षेप दृश्‍य पॉंचि‍म क्रमश: २. सरोज ‘खिलाडी’ नाटक- ललका कपड़ा नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक (पहिल दृृश्‍य ) (रबिन्‍द्रबाबुके दलानपर बेटीवला आयल छैक अपन बेटीके विवाहके लेल बातचित चलावला । दलानपर रविन्‍द्रबाबु आ लिलाम्‍बरजी (बेटीबला) विवाहक बातचित चलारहल छथि ।) रबिन्‍द्रबाबु – ( समझबैत ) देखियौ अहँा सँ सम्‍वन्‍ध करबाकेलेल हम एकदम तैयार छि । अहाँके घरमे हम अपन बेटाके सम्‍बन्‍ध करब यि त सपनोमे नै सोचने छलौ । लिलाम्‍बरजी – नै–नै अपने यि कि कहल जाय छै । अपनेसँ हम कुटमैती करव यि त हमरालेल  अहो भाग्‍य अछि । हम आय बहुत खुश छि । रबिन्‍द्रजी – मुद्दा एकटा बात । लिलाम्‍बरजी – ( घवराति ) कोन बात  ? रबिन्‍द्रजी – हमर इच्‍छा अछि कि, आन विवाह स या कहि दोसर गाउँके विवाह स कनेक हटि क अपन बेटाके विवाह करी । ताकि लोको कहे कि हँ रबिन्‍द्रबाबु किछु नाँयापन देखिलखिनहँ अपन बेटाके विवाह स । लिलाम्‍बरजी –कहलजाय  न त केहन नयाँपन ? रबिन्‍द्रबाबु – देखियौ विवाह दानमे कतौ देवलेव नै होइछै मुदा अै विवाहमे हम अहँा देबलेव करु । लिलाम्‍बरजी – देबलेब ? ( घबराक ) केहन देबलेब ? रबिन्‍द्रबाबु –( मजाक क कऽ ) केहन देबलेब । किछ ददिअ, ५ छिटी मकै ददिअ । मरुवा ददिअ, धान ददिअ । जाय स सारा गाँउमेे यि हल्‍ला चले कि, फलना गाँउमे फलनाके घरमे बिवाहमे धान,मकै मरुवा सन चिज लेलकैय । लिलाम्‍बरजी– ( हसैत ) मकै, धान, मरुवा,  ठिक छै कोनो बात नै, हम अहँाके देवाके लेल तैयार छि । चलु ओमहर जा कऽ बातचित करिछि । ( दुनु आदमी उठिछथि आ आगा बढिछथि ) रबिन्‍द्रबाबु – हमरा बिचारमे अैगला महिनामे विवाहके दिन राखलजाय । लिलाम्‍बरजी – जी, हमरो बिचार सयाह अछि । ( ओ सव बातचित करैत आगा बढतिछथि । रस्‍तामे एकटा घैला राखल रहैय । घैलामे कोनो राक्षसके मुहँ बनाओल रहिछै । रविन्‍द्रबाबु बातचित करबाके क्रममे वै घैलाके लात सँ मारिछथि आ वो घैला फुटिजाइछै । घैला फुटिते एकटा तुरुन्‍तके जन्‍मल मुद्दा आन बच्‍चा सँ फरक किसिमके बच्‍चा निकलैय आ जोर जोर सँ हाँस लगैय । हसैत–हसैत वो बच्‍चा उडिजाइछै । आ जा क बैसैछै एकटा पहाड पर । ) नेपथ्‍यसँ ः– ( अहि प्रकार स गाउँ गाउँमे विवाहमे किछ ल कऽ विवाहके उत्‍सव मनेबाके चलन चल लागल । आ जन्‍मल ( बच्‍चाके अवाजमे ) दहेज–१० ) ( दृश्‍य २ ) ( गाउँके दृश्‍य अछि । साँझके समय बस्‍ती स कनेक आगा खेत दिस ३ टा युवा मदिरा सेवन क कऽ एक दोसरके बातके काट पर भिरल छथि । ) युवा १– सुन हमरवात । हम ओहिना नै दारु पिलीयौव्‍ा । अपना गाउँके खपटी बुढीया जे छौनै उ बुढीया चलैत –चलैत गीरपरलैय । हमरा दाया लागिगेल आ जा कऽ ओक्रा हम उठादेलियौव वै के वाद ओ बुढीया हमरा कथि कहलक बुझल छौ ? ( युवा २ आ ३ ) ( एकवेर )ं–कथि ? युवा १ –धन्‍यबाद बौवा । जहिना तो हमरा उठादेलेहँ तहिना भगवान तोरोउठादेथुन । हमरा जे भगवान उठादेतै त हमर बाल–बच्‍चाके के पोसि देतै ? युवा २ – तोहर दुख कोनो दुख नै छौ हमरा दुखके आगामे । सुन ह म कथिला मदिरा सेबन कैलियौव । हमरा घरमे एतेक मच्‍छर छौ । राइतमे जे हम सुतऽ जबौ, हमरा उ मच्‍छरसब एतेक माया करतौ, एतेक माया करतौ कि कि कहियौ । सव मच्‍छरसव मिलक ऽहमराउठाकऽ घरके  खपरा छुवाबके प्रयाश करतौ ओमहर उडिससव मिलकऽ हमरा भितर स जोर स पकरने रहतौ । बलु नै लजायदेबौ । बातो ठिके है । मच्‍छर सब जे हमरा लजायत खपरा छुवाबला आ कहु उपर छोरिदेलक त हम त गेली हाबा खाय । देह हात टुटीजायत । धन्‍यवाद देइछी वै उडिससबके जे कमतीमे पकरने रहैय । राइतभैर अै मच्‍छर आ उडिसके लडाइ स तंग भऽक हम मदिरा सेबन कैलीयौव । युवा ३ – तोहर दुनुके समस्‍या त–किछ नै छौ हमरा सामनेमे । -       घोडाके अवाज अवैत अछि । तखने एकटा युवक जोर जोर सँ बाजलगैय । भागु–भागु दहेज आवीरहल अछि । हो काका हो भागा होउ गे दाइ गे भाग गेइ मँगलाके माइ गे भाग गेइ दहेज आबिरहल छौ । गाउँमे कुताके भूकनाइ तक बन्‍द । तखने राक्षस सन मनुष्‍य सबके घोडापर प्रवेश होइत अछि । १ टा राक्षस आगा–आगा आ ६–७ टा राक्षस पाछा–पाछा घोडा सँ अबैत अछि ) दृृश्‍य ३ – (राक्षस पुरा गाउँ पर नजर फेरैत बजैय ।) दहेज–दहेजके अै गाउँमे अबिते कुताके भुकनाइ बन्‍द । सुन गँउवासब तोरा सबके साइत हमरा नै समझाव परत कि, जे हमर बात नै मानै छै  ओकर कि हाल  होय छै । जखन हम सबके कहिदेने छियौ कि, अै गाँउमे, पुरा देशमे संसारमे यदि ककरो विवाह होतै त देवलेव होवहीके चाहि । वैके बाद सब स पहिले हमरा न्‍यौता परके चाहि, मुद्दा अै गाउके चलितरा हमरा अपन माउस खायके लेल नेयौता देलक । (बजबैत) हिरिङगा । ( पाछा स घोडा पर बैसल एकटा राक्षस ) हिरिङगा – भगवान । दहेज – चलितराके घरमे जो ओकरा पिटैत निकाल । -       हिरिङगा चलितरके पिटैत धकियबैत निकालै छै आ घरक लोक चलितरके छोडाबके लेल हात पैर जोरैत कनैत निकलैय ) हरिङगा –  ( दहेज स ) भगवान, सार आबके लेल माइन्‍ते नै छल । दहेज – हिमऽऽ । किरे चलीतरा, बेटाके विवाह मंगनीएमे करैछे नइ ? हमरा न्‍यौता तकनै पठौले । ( घोडा  पर सँ उतरैत घेटके तरबार स उठबैत ) दहेज ः– हरिङगा । हरिङगा – जी भगवान । दहेज – लाद एकरा घोडा पर आ लचल । आइ एकरे माउस आ मकैके भुटन चलतै । -       घोडा पर  लदैत ओकर घरक लोकके लात स मारैत घोडापर बैसैय  हरिङगा ) दहेज – याद कले गउवाँसब, जे अपन बेटाके विवाह बिना दहेज के करबे तकर याह हाल हौतौ । -       प्रस्‍थान ) ( दृश्‍य ४ ) -       नेपथ्‍यस – समय वितैत गेल । बहुतो मरल बहुतो बिलटल आ बहुतो बरवाद भेल दहेजके कारण । समय परिवर्तन होइतगेल ।ं) -       किछ युवा सब क्‍याम्‍पसके प्राङगनमे बैसकऽ छलफल करैत ) युवा १ – आखीरमे कहिया तक चलतै यि दहेजक मनोमानी । गाउँमे आबीकऽ ककरो पिटैछ,ै ककरो मारैछ,ै धमकबै छै दहेज लेबाके लेल । अहि दहेजके कारण कतेके बेटी कुमारी बैसल छै । कतेक आत्‍महत्‍या कलेलकै आ कतेक डूविकऽ मरिगेलै । आखीर हमअहाँसब नै भिरबै त यि  अत्‍याचार दिनके दिन बढल जतै । एकरा रोक परलै । युवा २ – खाली विचार कैला सँ किछ नै हयात । हम त कहैछि  चलु अखन आ सब केउ मिलकऽ वै दहेजके कपाड हात फोरि देइछि । युवा ३ – नै–नै । औगता क निर्णय नै कर । युवा २ – अरे भारमे जाए तोहर सल्‍लाह । ( युवा तर्फ ) रेइ चल अखन सारके कपार हात फोरिदेइछियै । -       किछ युवासब युवा २ के साथमे पाछा–पाछा जाइछथि ) (दृश्‍य ५) -       दहेज अपन अंगरक्षकके साथ पहाड पर थारमे माउस राखीक खाति रहैय ) दहेज – ( हसैत ) चलितराके माउस बडि स्‍वादिष्‍ट छौ रौ ? बड निक माउस छौ आइके । -       तखने युवा सबद्धारा दहेजपर आक्रमण होति अछि । एकटा युवा दहेजके चैला सँ १०–२० बेर कपारपर मारैछथि । मुद्दा दहेजके किछ नै होति अछि । दहेज हसैत रहैय । बल्‍कि दहेज २–३ टा युवाके पकैर कऽ मारि देइछै आ किछु युवा भागि जाति अछि । (दृश्‍य ६) -       फेर सँ किछु युवासबके जमघट बैसल अछि । ) युवा १ – वै राक्षसके कतबो मारलकैय कपारपर किछ नै भेलैया । हमरा बुझाइय मारला पिटला सँ यि दहेज हटवला नै छौ । युवा २ – मारला पिटला सँ कहादुन । रेइ ओकरा तरवार स मारलीयैय ५–६ बेर तैयौनै किछ भेलैय । युवा ३– हमरा बुझाइय नै–त यि हटतै नैत कटतै नै त मरतै । युवा ४ – हमरा लंग एकटा उपाय छौ । ( सब युवा सब एकेबेर ं) युवा सब – कोन उपाय ? -       युवा ४ एकटा युवाके कानमे किछु कहैछथि अछि प्रकार सँ सबके सब एकदोसरके कानमे किछ कहैछथि ) (दृुश्‍य ७) -       एकटा युवा दहेजके पहाडपरजाकऽ कनिका दुरे सँ दहेजके अकेले–अकेले फर्चियाबके लेल– धम्‍की देइछथि । बाकी १०–१२ टा युवा नुकायल ढुक्‍का लागल रहैछथि ।) युवा – रेइ दहेज रे मर्दाबाके बेटा छे त आ अकेले–अकेले फर्चियाले । रे दहेज लेइछे काहाँदुन । माइ करे कुटाओन पिसाओन पुतके नाम दुर्गादत । कोढीया । आ एकले देखैछियौ कतेक मायके दुध पिने छे । ३२ सो दात नै तोरिकऽ  हातमे धरादेलियौ त देखिहे । (दृश्‍य ८) -       दहेज गरम लोहाजका लाल भऽक सबटा अंगरक्षक राक्षसके आदेश देइछथि । ) दहेज – हम ऐकरा माइर कऽ अवैछि । तोसब अहि ठाम रह । -       दहेज अकेले दौरैछथि युवाके मारला । युवा भगैत भगैत कनेका दुर लजाइत अछि । तखने १०–१२ टा युवा आर्दश विवाह लिखल बरका लाल बैनर लऽक अबैय । दहेजके ओ बैनेर देखेत होस उडी जाइछै । दहेजक अंगरक्षकसब हमला करैछथि युवासबपर मुद्दा युवासब केउ अपना जेवी सँ रुमाल निकालैछथि त केउ सर्ट खोली कऽ गंजी मात्र पहिरकऽठारह भजाइछथि । तहिना केउ बैनर पकरने रहैय । गंजी आ रुमालपर आर्दश विवाह लिखल रहैछै । ओ देख देख कऽ सब राक्षस सब केउ घेट पकैरक त केउ तलमला तलमलाकऽ चिच्‍चा–चिच्‍चा कऽ मैर जाति अछि । दहेज भागऽ लगैये पहाडदिस । सबयुवासब दहेजके खेहार लगैय । खेहारैत खेहारैत दहेजके पकैर कऽ अर्दश विवाह लिखल ललका कपडा सँ दहेजके झापी देइछै । आ ललका पकडाके हटैलाके बाद ओहि ठाम छाउर मात्र रहैछै ।              जाहिके देख कऽ युवासबके मुखपर मुस्‍कान आविजाइछै । ओसब आर्दश      विवाहके ललका कपडा लऽक अगा बढैत फ्रिज भजाइछै । १. बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’२.राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार। ‘छीनरदेवी’बेचन ठाकुरक-

बेचन ठाकुर (चनौरा गंज) दृश्य तेसर

(स्थान-सुभाष ठाकुरक घर। दुनू परानी ललनक विषएमे गप-सप करैत छथि।) मीरा- यै ललनक बाबू, हमर विचार अछि जे आब ललनकेँ कोनो बढ़ियाँ धाइमसँ देखाए दियौक। सुभाष- यै ललनक माए, रातिमे अपन घरक गोसांइ काली बंदी हमरा सप्पन देलनि जे बौआकेँ कोनो चिक्कन धाइमसँ देखा। हम पुछलियनि जे के चिक्कन धाइम छथि तऽ ओ कहलनि जे खोपामे रोडक कातमे परवतिया कोइर नामक एकटा धाइम छथि, ओ एकदम सिद्ध धाइम छथि आ ओ जे किछु कहैत छथि से उचितो मे उचित। ओतए तोरा मोनक भ्रम दूर भऽ जेतौक। मीरा- ललन बाउ, घरक गोसांइ बड़ पैघ होइत छथिन्ह हुनक कहल नहि करबनि तँ किनक कहल करबनि। सुभाष- हँ हँ हुनक कहल करबाके अछि! ललन, ललन, बौआ ललन। (ललनक प्रवेश। ललन बताहक अवस्थामे छथि।) ललन- हमरा तों बौआ किएक कहैत छह? हम तोहर बौआ नहि छियह। हम तोहर नाना छियह। आइसँ तों हमरा नाना कहह। सुभाष- ललन नाना, हमरा सङे चलू एकठाम मेला देखै लए। मएओ जेतीह। ललन- हम पएरहि नहि जेबह। हम कनहापर जेबह। सुभाष- चलह ने, बेसी कनहेपर चलिह आ कने-मने पएरो। ललन- बेस चलह। हमरा ओतए रसगुल्ला, लाय मुरही, झिल्ली किनि दिह। बगियो कीनि दिह। मीरा- चल ने, सबटा कीनि देबौक। (सुभाष, मीरा ओ ललन जा रहलाह अछि परबतिया कोइर ओहिठाम। परबतिया गहबरमे बैसल छथि! मृदंग बाजि रहल अछि। किछए कालमे परबतियाक देहपर काली बंदी सवार भऽ जाइत छथिन्ह। मृदंग बजनाइ बन्द भऽ जाइत अछि) परबतिया- होऽऽऽ बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह हम। बोल जय गंगा। बाजह, के कहाली छह? बोल जय गंगा। जल्दी लग आबह। बोल जय गंगा जल्दी आबह। हमरा जेबाक छह बाबा धाम। फेर गंगोकेँ देखनाइ अछि।

(तीनू परानी लग जाइत छथि। ललन देह-हाथ पटकि रहल अछि। मूरी हिलाए रहल अछि। भगत पीड़ि परसँ माटि लऽ कऽ ललनक देहपर फेंकलथि। ललन शांत भऽ जाइत अछि। भगत ललनक माथक पूरा पकड़ैत छथि।) परबतिया- हओ बाबू, एकरा केलहा नहि छह। जे कियो तोरा कहैत छह जे एकरा केलहा अछि से तोहर कट्टर दुश्मन छियह। तोरा दुनू दियादमे झगड़ा लगाबए चाहैत छह। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह। हओ बाबू ओ तोरासँ ऊपरे ऊपर मुँह धएने रहैत छह। ओ आस्तीनक साँप छियह। हओ बाबू तोड़ै लऽ सब चाहैत अछि मुदा, जोड़ै लऽ कियो नहि। बोल जय गंगा। ओ बड़का धुर्त्त छह, मचण्ड छह। सुभाष- सरकार, हमरा बहुते लोक कहलक जे अहाँक छोटकी भाबो पहुँचल फकीर अछि। ओकरहि ई कारामात छी। परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, कने तोहुँ सोचहक, अकल लगाबहक जे जदि डाइनकेँ एतेक पावर रहितैक तँ ओ अपन विद्यासँ सौंसे दुनियाँपर शासन करैत रहितैक। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री, एस.डी.ओ., कलक्टर, थाना-पुलिस बैंक सभटा वएह रहितैक ने। बोल जय गंगा। हओ बाबू, डायनपर विश्वास केनाइ खाटी अंध विश्वास छी। ई मोनक भ्रम छी। ई मोनक शंका छी। बोल जय गंगा। हओ बाबू, अगर शंकाबला आदमी केकरो हँसैत देखि लेलक तँ ओकरो होइत छैक जे ओ हमरेपर हँसल। तें हम यएह कहबह जे तों नीक लोक लागैत छह, एहि भ्रममे नहि पड़ह। नहि जौं पड़लह तँ सत्यानाश भऽ जेतह। हम तोरहि घर गोसांइ काली बंदी बाजैत छियह। बोल जय गंगा। हओ बाबू, आब हमरा देरी भऽ रहल छह, हमर विमान ऊपरमे लागल छह। मीरा- सरकार, ई ठीक कोना होएत, से उपए बता दथुन्ह न? ई एना किएक करैत अछि? परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, एहि छौंड़ाकेँ छीनर देवी लागलि छह। सुभाष- छीनरदेवी हटत कोना? परबतिया- हँ हटत, नहि किएक हटत? जल्दी तों एकर बिआह केहनो लड़कीसँ करह। सभ ठीक भऽ जेतह। आओरो कोनो कष्ट छह? सुभाष- नहि सरकार, जदि अपने सहाय रहबैक तँ कोनो कष्ट नहि होएतैक। मीरा- सरकार, कने विभूति दए दिअ।

(परबतिया मीराकेँ विभूति देलनि।) परबतिया- बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। आब हम जाइ छियह। बाबा धाम। (कहैत कहैत काली बंदी चलि जाइत छथि।) सुभाष- सरकार, अपनेक दक्षिणा? परबतिया- पाँच टका मात्र। सुभाष- सरकार एतबै? परबतिया- हँ पाँचहि टका मात्र। उहो गहबरमे प्रसाद चढ़ाबए लेल। हमरा गहबरमे ठकै फुसलबै बला काज नहि होइत अछि। हमरा गहबरमे कलयाणक आ संतोषक गप होइत अछि। शंका वा भ्रम बढ़ाबए बला नहि, पूर्णतः हटाबए बला गप होइत अछि आब अपने सभ जाउ। एकर बिआह जल्दी करु, छीनरदेवी भागि जाएत। (तीनू परानी माथा टेक कऽ प्रणाम करैत छथि आ आर्शीवाद लऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि।) पटाक्षेप दृश्य चारिम क्रमशः 2. राधा कान्त मंडल ‘रमण’ जन्म- 01 03 1978 पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल गाम- धबौली, लौकही भाया- निर्मली जिला-मधुबनी षिक्षा- स्नातक

मैथिली एकांकी

कने हमहूँ पढ़व

पात्र परिचय 1. धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि। 2. चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ 3. दुखना गरीव व्यक्ति 4. दुखनी ‘‘ ’’ 5. अमर ‘‘ ’’ 6. रीता ‘‘ ’’

प्रथम दृश्य

(दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की तहि बीचमे दुखनाक प्रवेश)

दुखना- सुनै छहक ने?

दुखनी- अहाँ बाजू ने की भेल हेँ?

दुखना- आइ बच्चा सभ की खतौ घरमे किछो छौ कि नाइ, हम तू तँ भूख मेटा लेव आ बच्चा कोना रहतौ।

(अमरकेँ प्रवेश) अमर- बाबू बाबू हमरा भूख लागल अछि माए भनस कहाँ करै छै?

दुखनी- (अमरकेँ कोरामे लैत भगवानकेँ तरफ देखि कऽ छनि) हे भगवान हम तँ नोर पी कऽ अपन जीवन बीता रहल छी आ ई बच्चा कोना जीयत? (दुखनी यएह बजैत सोचमे डूबि जाइत अछि।)

दोसर दृश्य

(मुखिया जी आ हुनक मुंशीकेँ संग बात चीत)

धनिक लाल- (मुंशीकेँ इशारा करैत) हे रौ हे रौ मुंशिया से कतेक दिन भऽ गेलौ बही खाताकेँ लेखा जोखा, बही खाता ठीक छौ की ने।

चम्पतलाल- (डराइत बाजल चम्पतलाल मुंशी बाजल) जी ......जी मुखिया जी, ठीके -ठाक छै।

धनिकलाल- हेरौ आय कालि तँ लेन-देनक कार-बार भऽ रहल छै किने।

दुखनाक प्रवेश

दुखना- (मुखिया जीक पएरपर गीर पडैत अछि।) मालिक भऽ....भगवान हमर......।

(परएपर सँ दुखनाकेँ उठबैत मुखियाजी)

मुखिया- रै दुखन बाज तोरा की भेलौ जे तू एतै व्यग्र छे।

दुखना- मुखिजी हमरा घरवालीकेँ बहुत जोर मन खराप भऽ गेलै से अपने लँग दोगल एलौंहेँ घरमे फूटल कौड़ीओ नै छै जे इलाज करबै लऽ जेबे हम अहा पास रुपैआ ले ऐलौं हेन।

मुखियाजी- बाज तोरा कतेक टाकाक जरुरी छौ?

दुखना- पा..... पाँच सौ रुपैआ।

मुखियाजी- (मुंशी तरफ इशारा करैत) हे रौ मुंशीया तिजोरीसँ पाँच सौ टाका दुखनकेँ दही आ सुन ओकरा सँ वापसीक एग्रीमेट करबाले बुझलेँ की नै।

मुंशी- (रुपैआ दैत) ले रौ दुखना ई टाका ले आ हमरा सादा वहीपर एग्रीमेट कर।

दुखन- (औठामे निशान लगबैत) ई मालिक कतए कऽ देव, आइ अहीं हमर भगवान छी।

(दुखनकेँ प्रस्थान)

मंुशी- दुखनसँ सुन अगर ई टाका तों समएपर नहि देबही तँ तोरा टाकाक व्याजक ब्याज लगतौ आ सब गिरबी रखऽ पड़तौ से सुनि ले।

मुखियाजी- कतेक दिनक बाद ई एकट मोकिर धरैलो हेँ।

मुंशीजी- मऽ ... मालिक वहीपर दुखनक नाम कतेक मारबै?

मुखियाजी- (तमसाइत बजलाह) रौ मुऽऽ........मुंशीया तोरा हमर छाली घी मठ्ठा खा कऽ बुद्धिये ने तँ मोटा गेलौ।

मुंशी- (कपैत बाजलाह) जी......जी हुजूर हम आब बुझि गेलौं, जे...... जे पाँच हजारमे जेतै न मुऽऽ....मुखिया जी।

मुखियाजी- (हँसैत) ई भेलौ ने एकटा मुंशीया बुद्धि ई तँ बुझि जे हमरा अन्नक असर।

तेसर दृश्य- क्रमशः प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार। चेतना समिति ओ नाट्यमंच सांस्‍कृतिक, साहित्यिक आ कलाक मुख्‍य केन्‍द्र रहल अछि बिहारक प्रशासनिक राजधानी पटना। जीवकोपार्जनार्थ मिथिलांचलवासी प्रचुर परिमाणमे एहि महानगरमे निवास करैत छथि। मैथिली भाषा-भाषीक एतेक विशाल जनसंख्‍या वाला महानगरक मातृभाषानुरागी लोकनिक सत्‍प्रयाससँ अपन भाषा आ साहित्‍य ओ रंगमंचक विकासमे महत्‍वपूर्ण भूमिका निर्वाह कयलक समानार्थी अछि, कारण एहि क्षेत्रमे जे किछु अवदान अछि ओ पटना आ चेतना समितिक योगदान एकहि बात थिक। आब ई प्रयोजनीय भ’ गेल अछि जे जनमानस ओहि अवदानकेँ जानय आ जँ महत्‍वपूर्ण अछि तँ ओकर मुक्‍त कण्‍ठे प्रशंसा क’ कए ओकरा स्‍वीकार करय। रंगमंचक क्षेत्रमे चेतना समितिक नाट्यमंचक अवदानक पूर्ण मिथिलाञ्चल एवं मिथिलेत्तार क्षेत्रक अवदानसँ परिचित होयबाक हेतु प्रेमशंकर सिंह (1942)क मैथिली नाटकक ओ रंगमंच (1978), मैथिली नाटकक परिचय (1981), जीवन झा (1987),  नाट्यान्‍वाचय (2002)क एवं चेतना समिति ओ नाट्यमंच (2008)क अवलोकन कयल जा सकैछ। ई निर्विवाद सत्‍य थिक जे मिथिलाञ्चल आ मिथिलेत्तर क्षेत्रमे मैथिली रंगमंचक शौकिया रंगमंचक संख्‍या अत्यन्‍त सीमित अछि। यद्यपि बीसम शताब्‍दीक तृतीय, चतुर्थ आ पंचम दशकमे समग्र भारतीय स्‍वतंत्रता-संग्राममे संलिप्‍त रहला, जाहि कारणेँ नाटकक सदृश समवेदक कलात्‍मक सृजन विकसित नहि भ’ पौलक, तथापि यत्र-तत्र पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक नाटकक मंचन होइत रहल। एहन प्रस्‍तुतिक मूल उद्देश्‍य छलैक राष्‍ट्र आ समाजक समक्ष एक उच्‍च कोटिक आदर्श प्रस्‍तुत करब। एहन शौकिया रंगमंच अत्‍यल्‍प संख्‍यामे समाजक संग जुड़ल आ एहिसँ आगॉं बढ़ि क’ ओ ने तँ जीवनक अभिन्‍न अंगे बनि सकल आ ने सांस्‍कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्‍मक विकासक माघ्‍यमे। स्‍वतंत्रात्‍मक पश्‍चात् व्‍यक्ति-व्‍यक्तिक दृष्टिकोणमे परिवर्त्तन भेलैक आ समाजमे सांस्‍कृतिक साहित्यिक एवं कलात्‍मक विकासक अवरुद्ध द्वार खुजि गेलैक। स्‍वाधीनोत्तर युगमे सांस्‍कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्‍मक स्थितिक यथार्थ चित्रण जानबाक, बुझबाक आवश्‍यकता महसूस भेलैक समाज एवं जनमानसकेँ। सामान्‍य जनमानसक सुख-दु:ख, आशा-निराशा, कुण्‍ठा संत्रास, असन्‍तोष, क्षोभ, क्रोध एवं जीजिविषाकेँ वाणी देबाक हेतु नाटकककारक अन्‍तर उद्वेलित भेलनि आ एहि दिशामे सोझे-सोझ स्थितिक वर्णन करबाक हेतु नाटकक आश्रय लेलनि । शनै:-शनै: रंगमंच सामाजिक जीवनक सन्निकट अबैत गेल आ वर्त्तमान स्थितिमे तँ ओ एक अभिवाज्‍य अंग बनि गेल अछि। एकर परिणाम एतबे नहि भेलैक जे शौकियाक संगहि-संग अर्द्ध व्‍यावसायिक वा व्‍यावसायिक स्‍तरपर जनमानस रंगमंचक महत्‍वकेँ स्‍वीकारलक। एहिमे सबसँ क्रा‍न्तिकारी परिवर्त्तन भेल जे महिला समुदाय एहिमे अपन सहभागिता देब प्रारम्‍भ कयलनि। हुनका सभक सक्रिय सहभागिताक फलस्‍वरूप शनै:-शनै: ई मानव जीवनक अविभाज्‍य अंग बनय लागल, किन्‍तु अत्‍यन्‍त दुर्भाग्‍य पूर्ण स्थिति थिक जे मिथिलाञ्चल वा मिथिलेत्तर क्षेत्रमे अद्यापि व्‍यावसायिक रंगमंचक प्रादुर्भावे नहि भेलैक। पटना सदृश महानगरमे चेतना समितिक तत्‍वावधानमे नाट्यभिनयक यात्राक शुभारम्‍भ भेलैक तकरे फलस्‍वरूप नाट्यमंचनक परम्‍पराक सूत्रपात भेलैक जाहिमे गृहिणी महिला वर्गक सहभागितासँ एकर प्राणमे नव स्‍पन्‍दन भरलक जे अनुर्वर छल। चेतना समितिक स्‍थापनोपरान्‍त सांस्‍कृतिक गतिविधिक संगहि-संग रंगमंचक क्षेत्रमे नवजागरणक संचार भेलैक सन् 1954 ई. सँ। किन्‍तु आम्भिक कालमे अनवरत एकाँकीक मंचन होइत जकर विवरण्‍ा आगाँ प्रस्तुत कयल जायत, मुदा सन् 1973 ई. सँ अद्यपर्यन्‍त एकांकी वा नाटकक मंचन होइत अ‍ाबि रहल अछि। भारतीय गणतंन्‍त्रमे एहन कोनो महानगर, नगर आ कस्बा नहि अछि जतय नियमित रूपसँ नाट्य-प्रस्‍तुति नहि होइत अछि, किन्‍तु नाट्यमंच अपन प्र‍स्‍तुतिसँ एकरा मूर्त्त रूप प्रदान करबामे सक्षम सिद्ध भेल अछि। चेतना समितिक तत्‍वावधानमे आयोजित विद्यापति पर्वक प्रति शनै:-शनै: जनमानसमे एक प्रबल ज्‍वारक उद्भावना होइेत देखि एकर कार्यकारिणी समितिक अघ्‍यक्ष दिवाकर झा (1914-1997) एवं सचिव जटाशंकर दास (1923-2006) अनुभव कयलनि जे ई संस्‍था मात्र साहित्यिक गतिविधिपर केन्द्रित नहि रहय, प्रत्‍युत एकरामे अत्‍यधिक गतिशीलता अनबाक हेतु आ ओहन जनमानसक संग।जोड़बाक प्रयोजन बुझलनि जकरा हेतु मनोरंजनक किछु एहन कार्यक्रम सुनिश्‍चित कयल जाय जे अधिकाधिक संख्‍यामे जन्‍मानस एहि आयोजनमे सहभागी बनि सकथि तथा एकर क्रिया-कलापमे अपन उपस्थिति दर्ज करा सकथि। एहि सोचकेँ क्रिया रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक उपसमिि‍तक गठन कयलक जाहिमे बाबू लक्ष्‍मीपति सिंह (1907-1979), आनन्‍द मिश्र (1924-2006), गोपाल जी झा गोपेश (1931-2007) एवं कामेश्‍वर झाकेँ ई भार देल गेलनि जे एकरा कोना क्रियान्वित कयल जाय ताहि प्रसंगमे अपन ठोस विचार कार्यकारिणी समितिक समक्ष प्रस्‍तुत करथि। उपसमितिक सदस्‍य लोकनि एक स्‍वरेँ अपन विचार कार्यकारिणीक समक्ष प्रस्‍तुत कयलनि जे मिथिलांचलक गौरव-गरिमाक पुनर्राख्‍यान आ नाट्य साहित्यिक पुरातन परम्‍पराकेँ पुनरूजीवित करबाक हेतु एहि मंचसँ नाट्यभिनयक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कलय जाय। उपसमितिक विचारसँ सहसत भ’ कार्यकारिणी समिति जनमानसक हृदयमे मातृभाषानुरागकेँ जागृत करबाक निमित नाट्योजनक प्रयोजनीयताक आवश्‍यकता अनुभव कयलक तथा एकरा क्रियान्वित करबाक दिशामे प्रयासरत भेल। समिति अपन प्रयोगवस्‍थामे नाट्ययोजनक शुभारम्‍भ नाटकसँ नहि क’ कए एकांकीसँ करबाक निश्‍चय कयलक, कारण ओहि समय मैथिलीमे अभिनयोपयोगी नाटकक सर्वथा अभाव छलैक आ एकहि नाटकककेँ बारम्‍बार अभिनीत करब समुचित नहि बुझलक उपसमितिक स्‍दस्‍य लोकनि अभिनयोपयोगी एकांकीक अन्‍वेषण करब प्रारम्‍भ कयलनि। अभिनयोपयोगी एंकाकीक हेतु मैथिलीक वरेण्‍य साहित्‍य-मनीषी लोकनिक संग सम्‍पर्क साधल गेल। एहि दिशामे उपसमितिकेँ सफलता भेटलैक जे समकालीन मैथिली साहित्‍यपर अपन अमिट छाप छोड़ निहार बहुविधावादी रचनाकार हरिमोहन झा (1908-1989) सँ सम्‍पर्क साधल गेल आ हुनकासँ अनुरोध कयल गेल जे एक एहन एकांकी अभिनेयार्थ समितिकेँ उपलब्ध कराबथि जाहिमे मिथिलाक विद्या-वेदायन्‍ताक गौरवगाथाक उल्‍लेख हो। ओ समितिक एहि आग्रहकेँ स्‍वीकार क’ मण्‍डन मिश्र (1958) एकांकीक रचना क’ कए ओकर पाण्‍डुलिपि समितिक तत्‍कालीन पदाधिकारी लोकनिकेँ उपलब्‍ध करौलथिन जे मिथिलाक अतीतकेँ उद्भाषित करैछ जाहिसँ जनमासन रचित भ’ सकथि। अभिनयोपयुक्‍त एकांकीक पाण्‍डुलिपि उपलब्‍ध भेलाक पश्‍चात् समितिक पदाधिकारी लोकनि अत्‍यधिक उत्‍साहित भ’ निर्णय लेलनि जे अद्यापि मैथिली रंगमंचपर महिला अभिनेत्रीक भूमिकामे मिथिलाञ्चल वा मिथिलेत्तर क्षेत्रमे पुरुष अभिनेतहि द्वारा अभिनेत्रीक भूमिकाक निष्‍पादन कराओल जाइत छल, ताहि परम्‍पराकेँ खण्डित करबाक दिशामे समिति सोचब प्रारम्‍भ कयलक। ई अनुभव कयल जाय लागल जँ महिला कलाकार उपलब्‍ध भ’ जाथि तँ नाट्य मंचन विशेष स्‍वाभाविक भ’ जायत। मुदा ई एक जटिल समस्‍या छल। महिला कलाकार औतीह कतयसँ? कोनो मैथिलीक मंचपर आबि अभिनय करथि से सोचनाइयो साहसक काज छल, तखन प्रस्‍ताव राखब आ मना क’ हुनका मंचपर उतारब आ ओर कठिन छल। समिति मैथिली रंगमंचपर एक क्रान्ति अनबाक दिशामे प्रयासरत भेल, कारण समितिक सतत प्रयास रहल अछि ले एहि मंचसँ एहन अभिनव कार्य कयल जाय जकर सुपरिणाम हैत जे जनमानसक हृदयमे रंगमंचक प्रति आकर्षण भावनाक उदय होयतैक तथा नाट्यभिनयमे स्‍वाभाविकता आ ओ तँ कोनो मैथिलानी रंगमंचार आबि अभिनय करथि ई सोचबो निराधार छल। ई अत्‍यन्‍त साहसक काज छल, तखन किनको समक्ष एहन प्रस्‍ताब रखबाक आ हुनका मना क’ मंचपर उतारब ओहूसँ कठिन छल। समिति सोचलक जे ओही मैथिलीनीक समक्ष प्रस्‍ताव राखल जाय जनिका हृदयमे मैथिल संस्‍कृतिक उत्‍कर्षमय परम्‍परामे आयोजित होइत सांस्‍कृतिक अनुष्‍ठनावा कार्यक्रमक प्रति आकर्षण आ आगाध श्रद्धा होइन। समिति एहि विषयसँ पूर्ण परिचित छल जे हरिमोहन झा उदारवादी प्रगतिशील विचार-धाराक साहित्‍य-मनीषी छथि तेँ समितिक पदाधिकारी लोकनि हुनक आश्रयमे उपस्थित भ’ अपन मनोभावनाकेँ रूपायित करबाक निमित्त हुनकासँ सविनय साग्रह अनुरोध कयलक जे एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित्त कृपया अपन धर्मपत्‍नी सुभद्रा झा (1911-1982)केँ अपन एकांकीमे भारतीक भूमिकामे अभिनय करबाक अनुमति प्रदान कयल जाय। किछु क्षणतँ ओ इत्तस्‍ततःक स्थितिमे आबि गोलाह जे की कयल जाय? ओ अपन रचनादिमे मिथिलाञ्चल नारी जागरणक गखनाद करैशं रहथि तेँ ओ अपन उदारवादी दृष्टिकोणक परिचय दैत सहर्ष सांस्‍कृतिक चेतना सम्‍पन्‍न, मैथिल समाजक समक्ष एहि चुनौतीकेँ स्‍वीकार क’ कए युग-युगसँ आबि रहल बन्‍धन केँ तोड़ि मंचपर अयलीह आ सुभद्राकेँ मण्‍डन मिश्रक पत्‍नी भारतीक भूमिकामे रंगमंचपर उपस्थित हैबाक अनुमति देलथिन जे सर्वप्रथम मैथिलानी रंगकर्मीकरूपमे मैथिली रंगमंचपर अवतारित भ’ एहि अवरुद्ध धाराक द्वारकेँ भविष्‍यक हेतु खोलि देलनि जकरा एक ऐति‍हासिक घटना कहब समुचित हैत आ मैथिल समाजक हेतु प्रकाश स्‍तम्‍भ बनि गेलीह। मैथिली रंगमंचपर सुभद्रा झा पदार्पण महिला रंगकर्मीमे एक क्रान्ति आनि देलक। चेतना समिति एवं रंगमंच हेतु ई एक ऐतिहासिक घटना भेलैक आ मैथिली रंगमंचक इतिहासमे एक नव अघ्‍यायक शुभारम्‍भ भेलैक। हुनकासँ अनुप्राणित भ’ पटना विश्‍वविद्यालक स्‍नातकोत्तर विभागक एक छात्रा पनिभरनीक भूमिकामे रंगमंचपर उपस्थिति दर्ज करौलनि ओ छलीह अहिल्‍या चौधरी। एहि एकांकी अभिनय भेल छल लेडी स्‍टीफेन्‍सस हालमे। मण्‍डन मिश्रक भूमिकामे उतरल रहथि आविर्तक उपसम्‍पादक यदुनन्‍दन शर्मा आ हुनक पत्‍नी भारतीक भूमिकामे सुभद्रा झा। पनिभरनीक भूमिका कयने रहथि अहिल्‍या चौधरी आ ठिठराक भूमिकाक निर्वाह कयने रहथि इण्डियन नेशनलक इन्‍द्रकान्‍त झा। विगत शताब्‍दीक षष्‍ठ दशकक उतरार्द्ध अर्थात् सन् 1958 ई. मे चेतना स‍मितिक रंगमंचपर एहि एकांकीक सफलतापूर्वक मंचस्‍थ कयल गेल तथा महिला रंगकर्मी अपन सहभागितासँ एकरा अधिक प्राणवन्‍त बनौलनि। सुभद्रा झा एवं अहिल्‍या चौधरीक मैथिली रंगमंचपर उपस्थिति आ हुनका सभक अभिनय कौशल एतेक बेसी प्रभावोत्‍पादक भेल जे महिला वर्ग एहि कलाक प्रदर्शनमे अपन कुशल कलाकारिताक परिचय देलनि जाहिसँ प्रोत्‍साहित भ’ अधुनातन रंगमंच एतेक विकसित भ’ सकल अछि तकर श्रेय आ प्रेय हुनके लोकनिकेँ छनि। समाजक प्रति सोच, अपन उतरदरयित्‍वक प्रति प्रतिवद्धता, त्‍याग, सेवा-भावना आ कर्म निष्‍ठाक परिणाम थिक जे महिला रंगकर्मी सचेष्‍टता, तत्‍परता आ अपन अभिनय-कौशलक परिचय द’ रहल छथि। मैथिली रंगमंचक इतिहासमे एकर ऐतिहासिक महत्‍व छैक। समि‍ति द्वारा प्रस्‍तुत एंकाकीक मंचन अनेक दिन धरि पटनाक अतिरिक्‍त अन्‍यो स्‍थानपर चर्चित-अर्चित होइत रहल, जाहिसँ अनुप्राणित भ’ समितिक पदाधिकारी लोकनिक विचार भेलनि जे प्रतिवर्ष विद्यापति स्मृि‍त पर्वोत्‍सवपर कोना-ने-कोनो रुकांकीक मंचन अवश्‍य कयल जाय, कारण जनमानसक अभिरुचि नाट्यमंचन दिस विशेष जागृत भेल आ अधिकाधिक संख्‍यामे जनमानसक सहभागिता होमय लागल। पुन: ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमिपर अाधृत गोविन्‍द झा (1923) एकांकी वीर कीर्ति सिंहक मंचन कयल गेल जाहिमे कीर्ति सिंहक अग्रज वीर सिंहक राजतिलक कराय हुनके हाथे कीर्ति सिहंकेँ सिंहासनारूढ करयबाक जटिल समस्‍या छल जे मौलिक एवं मातृस्‍नेहक विलक्षण आदर्शकेँ रंगमंचपर प्रस्‍तुत करब कठिन समस्‍या छल। एहू एकांकीक मंचन स्‍थानीय लेडी स्‍टीफेन्‍सस हालक प्रागंनमे भेल छल। समितिक तत्कालीन सचिव रूपनारायण ठाकुरकेँ आशंका छलनि जे ऐतिहासिकताक पृष्‍ठभूमिमे लिखित एकांकीक मंचन कठिन होइछ, तेँ बारम्‍बार ओकर असफलताक आशंका व्‍यक्‍त करैत रहथि, किन्‍तु संयोगसँ एकर प्रस्‍तुति अत्‍यन्‍त सफल भेल। दर्शकक मानस पटलपर एकर स्‍वस्‍थ प्राभाव पड़लैक। यद्यपि गणपति ठाकुरक मुहेँ असलानसँ दान रूपमे प्राप्‍त राज्‍य स्‍वीकार करयबासँ हुनक उज्‍ज्‍वल चरित्र धूमिल भ’ जाइछ तथापि निर्देशक हुनक चारित्रिक उत्‍कर्षकेँ एक्शनसँ प्रस्‍तुत कयलनि। सा‍माजिक पृष्‍ठभूमिपर आधारित एकांकी गोविन्‍द झाक मोछसंहारक (1965) कतोक घटना एहि रूपेँ विन्‍यस्‍त अछि जकरा मंचपर प्रस्‍तुत करब ओहि समय मे मंचीय-कौशलक अभाव रहितहुँ अत्‍यन्‍त सफलता पूर्वक ओकर मंचन भेल। एहि एकांकीमे महिला अभिनेत्रीक अभाव छल तेँ एकर प्रस्‍तुतिमे कोनो प्रकारक कठिनताक अनुभव निर्देशककेँ नहि भेलनि। एकर निर्देशन कयने रहथि गोपाल जी झा गोपेश।मिथिलाक प्रतिनिधि (1963) एकांकीक मंचन सेहो चेतनाक मंचपर भेल अछि जकर लेखक आ निर्देशन गोविन्‍द झा स्‍वयं कयलनि। एहिमे दू महिला अभिनेत्रीक छैक जकर अभिनयमे महिला अभिनेत्रीक भूमिकामे पुन: प्राचीन परम्‍पराकेँ स्‍थापित कयल गेल जे पुरुष द्वारा महिला अभिनेत्री भूमिकाक निर्वाह करओल गेल। सन् 1962 ई. मे चीनी आक्रमणक पृष्‍ठभूमिमे गोपालजी झा गोपेश लिखित गुड़ूक चोट धोकड़े जानय तथा भारत-पाक युद्धक समय विनु विवाहे द्विरागमक मंचन चेतनाक तत्‍वावधानमे विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर मंचित भेल छल लेडी स्‍टीफेन्‍सस हालक प्रंतगनमे। एहि प्रस्‍तुतिमे भारती ब्‍लाक वर्क्‍सक प्रोप्राइटर अर्जुन ठाकुरक संगहि-संग नगीना कुमर एवं निरंजन झा महिला अभिनेत्रीक रूपमे मंचपर उपस्थित भेल रहथि। पुरुष पात्रकेँ महिलाक भूमिकामे देखि क’ जनमानसँकेँ कोनो आश्‍चर्य नहि होइत छलैक एवं नायक-नायिकाक क्रिया-‍कलाप मे मर्यादाक वचनपर कोनो आश्‍चर्य वा व्‍यवधान नहि होइत छलैक। एहि अभिनयमे भाग लेनिहार अन्‍य कलाकारमे इण्डियन नेशनक बेचन झा, प्रियनारायण झा आ राजेन्‍द्र झा प्रभृति अपन-अपन भूमिकाक निर्वाह सफलता पूर्वक कयलनि। उक्‍त दुनू एकांकीमे गीतगाइनिक भूमिकामे कमला देवी एवं हुनक सखी लोकनिक सहयोग चेतनाक मंचकेँ उपलब्‍ध भेल छलैक। चेतना द्वारा नियमित मंचक स्‍थापनाक पूर्व विद्यापति पर्वोत्‍सवपर जे एकांकी मंचित भेल ओ निम्‍नस्‍थ अछि: वर्ष          एकांकी               एकांकीकार 1958          मण्‍डनमिश्र                हरिमोहन झा 1959          मोछ सहांर               गोविन्‍द झा 1960          मिथिलाक प्रतिनिधि         गोविन्‍द झा 1961          चंगेराक सनेस             गोविन्‍द नारायण झा 1962          गूड़क चोट धाकडे़ जानय    गोपाल जी झा गोपेश 1965          वीर कीर्ति सिंह            गोविन्‍दझा            1966    बिनु वि‍वाहे द्विरागमन       गोपाल जी झा गोपेश उपर्युक्‍त परम्‍पराक जे शुभारम्‍भ भेल छलैक ताहिमे कतिपय अपरिहार्य कारणेँ व्‍यतिक्रम भ’ गेलैक तथा समिति द्वारा रंगमंचक दिशामे जे प्रयास भेल छल ओ किछु अन्‍तरालक पश्‍चात् अवरुद्ध भ’ गेलैक। किन्‍तु ताराकान्‍त झा (1927) जखन समितिक सचिवचक पदभार ग्रहण कयलनि तखन ओ एकर क्रियाकलापकेँ व्‍यापक फलक पर अनबाक प्रयास कयलनि। हुनक सोच छलनि समितिक विविध आयोजनादि एकहि स्‍थानपर केन्द्रित नहि रहय: प्रत्‍युत प्रचार-प्रसारक दृष्टिएँ पटना स्थित विभिन्‍न मुहल्‍ला सभमे एकर आयोजनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान कयल जाय। ओ अपन एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित्त अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजन कंकड़बागक लोहिया नगरमे आयोजित करबाक निर्णय कयलनि जाहिमे समितिकेँ गजेन्‍द्र नारायण चौधरी, वासुकिनाथ झा, गणेशशंकर खर्गा सदृश कर्मठ कार्यकर्ता उपलबध भेलैक। नाट्यमंच : शनै:-शनै: चेतना समितिक अपन उतरोत्तर विकास-यात्राक उत्‍थान वा उत्‍कर्षमे पहुँचि विविध रूपे मिथिलाक सांस्‍कृतिक एवं साहित्यिक विधाकेँ सम्‍पोषित करबाक दिशामे प्रयासरत भेल। ई अपन गौरवमय परम्‍पराक अनुरूप विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर नाट्य मंचनक परम्‍परा पुर्नस्‍थापित करबाक तत्‍कालीन अघ्‍यक्ष कुमार तारानन्‍द सिंह (1920-) एवं सचिव ताराकान्‍त झा सोचलनि जे समितिक गतिविधि अत्‍यधिक प्राणवन्‍त बनाओल जाय, कारण ओ लोकनि दूरदर्शी व्‍यक्ति रहथि जनिका कार्यकालमे समिति कतिपय नव-नव योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक प्रयास कयलक। मैथिली नाटकक ओ रंगमंचकेँ विस्‍तृत एवं व्‍यापक रूप देबाक निमित्त कार्यकारिणी समिति एक अनौपचारिक समितिक गठन कयलक जकर थींक टैंकक सदस्‍य रहथि गजेन्‍द्र नारायण चौधरी, वासुकिनाथ झा (1940), छत्रानन्‍द सिंह झा (1946) एवं गोकुलनाथ मिश्रकेँ अधिकृत कयल गेलनि आ एहि योजनाकेँ कोना मूर्त्त रूप देल जाय ताहि हेतु प्रस्‍ताव देबाक भार देल गेलनि ज‍कर सुपरिणाम भेल जे नाटकक ओ रंगमंचक विकासार्थ रंगकर्मीक नाट्यमंच (1972) नामक एक प्रभावी प्रभागक स्‍थापना कयलक जकर उद्देश्‍य भेलैक नवीन टेकनिक नाटकक अन्‍वेषण ओकर मंचन तथा प्रकाशन। नाट्यायोजनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबाक उत्तरदायित्‍व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छत्रानन्‍द सिंह झाकेँ जे रेडियोसँ सम्वद्ध रहथि आ नाट्यमंचक तकनिकक सैद्धान्तिक एवं व्‍यवाहारिक पक्षक अधिकारिक जानकारी छलनि। अत्‍याधुनिक नाटकक आ रंगमंचक दिशामे समिति क्रान्तिकारी डेग उठौलक जकर प्रयाससँ रंगमंचकेँ नव-दिशा भेटलैक तथा नाट्यमंचनक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेलैक समिति द्वारा। नाट्यमंचक स्‍थापनाक पश्‍चात् मौलिक नाट्य रचना हेतु प्राचीन एवं अर्वाचीन नाटकककारक आह्वान क’ कए नव-नव नाटकक अन्‍वेषणक प्रक्रिया प्रारम्‍भ भेल। एहि प्रकारेँ रंगमंचक एक सुदृढ परम्‍पराक स्‍थापना भेल जे विद्यापति स्‍मृति पर्व समारोहक अवसरपर वा समिति द्वारा आयोजित कोनो महत्‍वपूर्ण अवसरपर नाट्यमंचनक एक सशक्‍त माघ्‍यम स्‍थापित भेल। समितिक नाट्यमंच एक सार्थक भूमिकाक निर्वहण कयलक जकर लाभ नाटकककारक संगहि-संग रंगमंचकेँ निम्‍नस्‍थ लाभ भेटलैक: 1. आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे नवीन नाट्य-साहित्‍यक विकास यात्राक शुभारम्‍भ। 2. आधुनिक तकनिकक रंगमंचक स्‍थापना। 3. राष्‍ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तरपर मैथिली नाटकक आ रंगमंचकेँ स्‍थापित करबाक प्रयत्‍न। 4. अभिनेता-अभिनेत्रीक संगहि-संग कुशल निर्देशकक अन्‍वेषण। 5. नाटय-लेखनक दिशामे प्रतिभान नाटकककारकेँ प्रोत्‍साहन। 6. अमंचित एवं अप्रकाशित नाटकक पाण्‍डुलिपिकेँ आमंत्रित क’ कए विशेषज्ञक अनुशंसा पर मंचन। 7. मंचनोपरान्‍त नाटकक प्रकाशन। बीसम शताब्‍दीक सप्‍तदशकोत्तर कालावधिमे समितिक नाट्यमंच प्रभाग नाटकक लेखक लोकनिसँ नव-नव प्रवृत्ति आ नव-शिल्‍पक नाट्य रचनाक अनुरोध करब प्रारम्‍भ कयलक तथा मंचोपरान्‍त ओकर प्रकाशनक भार वहन करबाक दायित्‍व स्‍वीकारलक। नाट्यमंच प्रभाग द्वारा विद्यापति स्‍मृतिपर्वोत्‍सव वा अन्‍याय कोनो आयोजनोत्‍सवपर मौलिक, अनूदित वा उपन्‍यास वा कथाक नाट्य-रूप प्रस्‍तुत करबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलक जे नाट्यलेखन आ मंचनक दिशामे ऐतिहासिक घटना थिक जे नव-नव प्रतिभाशाली नाट्य-लेखक लोकनिकेँ प्रोत्साहन भेटलनि तथा प्राचीन आ अर्वाचीन अभिनेता, अभिनेत्री आ निर्देशक लोकनि एकर प्रस्‍तुतिमे सहभागी बनलाह। अभिनयोपयोगी आ मंचोपयोगी नाटकक जे अभाव साहित्‍यान्‍तर्गत छल तकर पूत्‍यर्थ समितिक नाट्य प्रभागक ई निर्णय निश्चित रूपेण नाट्य-लेखन ओकर मंचन तथा ओकर प्रकाशनमे नव-दिशाक संकेत कयलक। चेतना अपन कार्यक्रमकेँ व्‍यापक बनयबाक हेतु पूर्व निर्णयानुरूप सन् 1973 ई. मे अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजन कंकड़बाग कॉलनीक लोहियानगरमे हैैबाक निर्णय भेलैक तथा इहो निर्णय भेलैक जे एहि अवसरपर एक नाट्याभिनयक आयोजन कयल जाय जाहिमे सहयोगी भेलाह वासुकिनाथ झा, गणेशशंकर खर्गा, अमरनाथ झा एवं छत्रानन्‍द सिंह झा। जखन ई प्रचार भेलैक जे एहि कॉलनीमे अमरनाथ झा जयन्‍तीक अवसरपर नाट्याभिनयक सेहो योजना छैक तखन कौलनीवासी सभक सहयोग पर्याप्‍त मात्रामे भेटय लगलनि। ओहि अवसरपर जनमानसक मनोरंजनार्थ हवेली रानी नाटकक मंचन भेल छल, जाहिमे रोहिणी रमण झा जे आब मैथिलीक नाटकककार आ अभिनेताक रूपमे चर्चित छथि अभिनेत्री रूपमे रंगमंचपर उतरल रहथि। एहि नाट्य योजनामे कतिपय सहयोगीक बल भेटल जाहिमे उल्‍लेखनीय छथि इण्डियन नेशनक इन्‍द्रकान्‍त झा बेचन झा, आर्यावर्त्तक शिवकान्‍त झा, राजभाषा विभागक महादेव झा मिथिलेन्‍दु एवं वेदानन्‍द झा जनसम्‍पर्क विभागक एहि आयोजनक ऐतिहासिक महत्‍व छैक जे बिहारक तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री केदार पाण्‍डेय एही मंचसँ बिहार पब्लिक सर्भिस कमीशनमे मैथिलीक स्‍वीकृति आ मिथिला विश्‍वविद्यालयक स्‍थापनाक उद्घोषणा कयने रहथि। प्रारम्भिकावस्‍थामे अभिनयोपयुक्‍त नाटकक अभाव रहलैक ओकरा संगहि-संग रंगमंचकेँ नवरूप देबाक प्रयास भेलैक। समयाभावक कारणेँ समितिक नाट्यमंच प्रभाग द्वारा एकर प्रयोग प्रारम्‍भ भेलैक दिगम्‍बर झा लिखित एकांकी टुटैत लोकसँ। पुन: समितिकेँ महिला अभिनेत्रीक अन्‍वेषणक प्रक्रिया प्रारम्‍भ कयलक जाहिमे ओकरा कठिनताक सामना करय पड़लैक, किन्‍तु संयोगसँ रेडियोक अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी भारती मिश्र तथा अभिनेयताक रूपमे छात्रानन्‍द सिंह झा, जगन्‍नाथ झा, नरसिंह प्रसाद आ वेदानन्‍द झाक अविस्‍मरणीय सहयोगक फलस्‍वरूप ई प्रदर्शन अत्‍यन्‍त सफल भेल जाहिसँ आयोजक संगहि-संग संयोगकक सेहो उत्‍साहवर्द्धन भेलनि। एहि एकांकीक निर्देशन कयने र‍हथि गणेश प्रसाद सिन्‍हा तथा बिहार आर्ट थियेटरक संस्‍थापक अनिल कुमार मुखर्जीक अपरिमित तकनिक सहयोग भेटलनि। एहि एकांकीक मंचनक संग प्रथमे-प्रथम आधुनिक रंगमंचक अवधारणाक एकरा बानगी प्रस्‍तुतमे भेल। नाट्यमंचक विधिवत स्‍थापानोपरान्‍त जनमानसक मनोवृत्तिमे नाटकक आ रंगमंचक प्रति प्रतिवद्धताक संगहि-संग नाट्यमंचनक हेतु प्रतीक्षातुर रहब एक औत्‍सुकयक भावनाक उदय होइतहि समितिक पदाधिकारी लोकनि एकरा प्रति अपन सचेष्‍टता आ तत्‍पारता देखायब प्रारम्‍भ कयलनि तकरे परिणाम थिक जे नाट्यमंच मौलिक आ नव तकनिकक नाट्यक हेतु अन्‍वेषण करब प्रारम्‍भ कयलक। नाट्यमंचक संयोगक छत्रानन्‍द सिंह झाकेँ ई गुरुतर भार देल गेलनि जे अग्रिम वर्ष चेतनाक नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे समसामयिक समस्‍यासँ सम्‍‍बन्धित एहन मौलिक नाट्य लेखकसँ सम्‍पर्क क’ कए नव तकनिकक नाटकक हेतु प्रयास करथि। एहि हेतु ओ हिन्‍दीक वरिष्‍ठ नाटककार आ मिथिला मिहिरक तत्‍कालीन सम्‍पादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920-1990)सँ सम्‍पर्क साधि हुनकासँ एक एहन नाटकक अनुरोध कयलनि जे जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कयनिहार हो। एहि प्रसंगमे नाटककारक कथन छनि, आकाशवाणी पटनाक बटुक भाइक आ चेतना समितिक वर्त्तमान सचिव गजेन्‍द्र नारायण चौधरी ठोंठ मोकि हमरासँ भफाइत चाहक जिनगी लिखा लेलनि आ हम मैथिली नाटककारक रूपमे चीन्‍हल आ जानल जा सकलहुँ। (भफाइत चाहक जिनगीक आत्‍म-कश्‍य) ओ हुनक अनुरोधनि मैथिलीमे प्रथमे-प्रथम काल खण्‍डी नाटकक लिखलनि भफाइत चाहक जिनगी जकरा नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे सन् 1974 ई. मे शहीद स्‍मारकक प्रांगणमे प्रस्‍तुत कयल गेल जाहिमे प्राय: पैंतीस हजारसँ बेसी मैथिल समाजक छॉंटल-बीछल लोक दम साधि नाटकक एक-एक शब्‍द पीबैत रहल, एक-एक दृश्‍यकेँ अपलक देखैत रहल। एहि प्रदर्शनक सफलताक प्रमुख करण छलैक जे एहि प्रकारक नाट्यायोजन चेतना समिति द्वारा पूर्वमे नहि भेल छल तेँ दर्शककेँ ई सर्वथा नवीनताक आभास भेटलैक। नाटकक सफलता एहिमे रहलैक जे अपेक्षित घ्‍वनि प्रकाश अा उपयुक्‍त प्रेक्षागृहक अभावोमे नाट्यमंच चुनल बीछल कलाकारक सक्रिय सहभागिताक फलस्‍वरूप एकरा रूपायित कयल जा सकल। अग्रिम वर्ष ओकर प्रकाशनक व्‍यवस्‍था कयल गेलैक जकर परिणाम भेलैक जे जनमानसक जन-मन-रंजनक साधनक संगहि समकालीन समाजमे व्‍याप्‍त वेरोजगारीक समस्‍याक हृदयस्‍पर्शी कथानक जनमानसक आकर्षणक केन्‍द्र विन्‍दु बनि गेलैक। एहि प्रस्‍तुतिमे सहभागी रहथि छत्रानन्‍द सिंह झा, हृदयनाथ झा, वेदानन्‍दझा, अशर्फी पासवान आजनवी, बन्‍धु, फन्‍नत झा, परमानन्‍द झा, चन्‍द्रप्रकाश झा, मोदनाथ झा, मनमोहन चौधरी, शम्‍भुदेव झा, रामनरेश चौधरी, प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी रमा चन्‍द्रकान्ति, सुरजीत कुमार एवं सुनील कुमार। अपार जन समुदायक उपस्थितिमे ई नाटक प्रशंसिते नहि, प्रत्‍युत बहुतो दिन धरि चर्चाक विषय बनल रहल। नाटकक सफलतामे नाटकमे कलाकार लोकनिक ओ अदम्‍य उत्‍साहक संग-संग बिहार आर्ट थियेटर जन सम्‍पर्क विभाग आ भारत सरकारक संगीत एवं नाटकक विभागक कलाकार लोकनिक सहयोगकेँ अस्‍वीकारल नहि जा सकैछ। वस्‍तुत: एहि प्रस्‍तुतिक सफलतासँ समितिक पदाधिकारी लोकनि पुन: हुनकासँ एक नव नाटकक रचनाक अनुरोध कयलक। आधुनिकताक सन्‍दर्भमे एक सेटक नाटककमे सुधांशु शेखर चौधरीक कथा-वस्‍तु मूल प्रवाह संग-संग एक वा एकसँ अधिक अन्‍तर प्रवाहक प्रयोग रहल अछि। ओ नाट्य मंचक संयोजक छत्रानन्‍द सिंह झाक प्रस्‍तुतिसँ एतेक प्रभावित भेलाह जे अपन दोसर नाटकक ढ़हैत देवाल लेटाइत आँचरक रचना क’ कए हुनका देलथिन प्रस्‍तुति करबाक हेतु। पुन: एहू काल-खण्‍डी नाटकक प्रदर्शन एतेक प्रभावकारी भेल आ जनमानस नवनाट्य प्रस्‍तुतिक हेतु वर्षभरि प्रतीक्षातुर रहय लागल। एहि प्रकारेँ नाट्यमंच नाटकक आ रंगमंचक दिशामे अपन डेग आगू बढबैत गेल। नाट्य-प्रदर्शनक सफलताक पाछॉं नाट्यामंचक प्रतिवद्ध कलाकार लोकनिक अदम्य उत्‍साहक फलस्‍वरुप एकर नाट्याभिनय अपार जनमानसक समक्ष भेल। एहि नाटककमे प्रतिभगी कलाकार लोकनिमे हृदयनाथ झा, मोदनाथ झा, अशर्फी पासवान अजनवी, शंभुदेव झा, रामनरेश चौधरी, सत्‍यनारायण राउत, वीरेन्‍द्रकुमार झा, फन्‍नत झा, बालाशंकर, कल्‍पनादास एवं प्रेमलता मिश्र प्रेम। एहि नाट्ययोजनक सब श्रेय कलाकार लोकनिक परिश्रमक संगहि-संग बिहार आर्ट थियेटर एवं जनसम्‍पर्क विभागक कलाकारकेँ रहलनि। चेतना समितिक ई अभिनव प्रयास भेलैक जे मिथिलाञ्चलक पुरातन सांस्‍कृतिक विरासत तथा नाट्य साहित्‍यक अविच्छिन्‍न समृद्धिशाली आ गौरवशाली परम्‍परामे एक नव प्राणक स्‍पन्‍दन भरबाक निमित नियमित रूपेँ प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रतिभाशाली नाट्य-लेखकक आह्वान क’ कए नाट्य लेखनक दिशामे प्रोत्‍साहन, मंचोपरान्‍त ओकर प्रकाशनक व्‍यवस्थित परम्‍पराक व्‍यवस्‍था कयलक सन् 1973 ई. सँ जे जनमानसक मनोरंजनक संगहि-संग नाट्य-साहित्यिक सम्वर्द्धनक दिशामे गतिशील भेल जे विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर संगहि-संग अमरनाथ झा, हरिमोहन झा, ललितनारायण मिश्र एवं जयनाथ मिश्र जयन्‍तीक अवसरपर मौलिक, अन्‍य भारतीय भाषासँ अनूदित वा मैथिलीक प्रसिद्ध उपन्‍यास वा कथाक नाट्य रूपान्‍तरणक परम्‍पराक शुभारम्‍भ कयलक जे अद्यपर्यन्‍त अव्‍याहत रूपेँ चलि आबि रहल अछि। एकर सुपरिणाम एतबा अवश्‍य भेलैक जे अद्यापि निरस्‍थ नाटकक मंचन समितिक तत्‍वाधानमे भेल अछि जकरा ऐतिहासिक घटना कहब विशेष समुचित हैत, कारण भंगिमा (1984)केँ छोड़ि क’ मिथिलाञ्चल वा मिथिलेत्तर क्षेत्रक कोनो नाट्य संस्‍था अद्यापि एतेक परिभाषामे नाट्यायोजन नहि क’ सकल अछि। एकरा द्वारा मंचित नाटकककेँ विविध काल-खंडमे सुविधानुसार विभन्‍न दशकमे प्रदर्शित नाटकक तिथिक अनुसारेँ कयल जा रहल अछि। अमरनाथ झा जयन्‍तीक आयोजनपर महेन्‍द्र मलंगिया (1946) क ओकरा आडन्‍नक बारहमासा, गुणनाथ झाक पाथेय, गंगेश गुंजन (1941)क चौबटियापर/बुधिबधिया एवं रोहिणीरमण झाक अन्तिम गहना, हरिमोहन झा जयन्‍तीपर हुनकहि द्वारा लिखित एकांकी अयाची मिश्र (1956), हुनक प्रसिद्ध कथा पॉंच पत्रक एकल अभिनय एवं छत्रानन्‍द सिंह झाक आदर्श कुटुम्‍बक नाट्य रूपान्‍तरण, ललित नारायण मिश्र जयन्‍तीपर तन्‍त्रनाथ झा (1909-1994)क उपनयनाक भोज (1949) एवं अरविन्‍द अक्‍कू गुलाब छडी तथा जयनाथ मिश्रक जयन्‍तीपर हरिमोहन झाक प्रसिद्ध कथा कन्‍याक जीवनक नाट्य रूपान्‍तरण विभूति आनन्‍द द्वारा तित्तिर दाइकेँ मंचस्‍थ कयल गेल जकर विवरण निम्‍नास्‍थ अछि : विगतीत शताब्‍दीक अष्‍टम दशकमे मंचित एकांकी / नाटकक: तिथि         नाटकक       नाटकककार       अभिनीत स्‍थान       अवसर        निर्देशक 10 नवम्‍बर 1973    टुठैत लोक         दिगम्‍बर झा         शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व        गणेशप्रसाद सिन्‍हा 10 नवम्‍बर 1974    भफाइत चाहक जिनगी    सुधांशु शेखर चौधरी शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      गणेशप्रसाद सिन्‍हा 18 नवम्‍बर 1975    ढ़हैत देवाल/लेटाइत आँचर सुधांशु शेखर चौधरी  शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      गणेशप्रसाद सिन्‍हा 6 नवम्‍बर 1976     पसिझैत पाथर                               रामदेव झा      शहीद स्‍मारक        विद्यापति पर्व   नवीनचन्‍द्रा मिश्र 6 नवम्‍बर 1976     एक दिन एक राति      सीताराम झा श्‍याम  शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 23 नवम्‍बर 1977    एकरा अन्‍तर्यात्रा                              जर्नादन राय     शहीद स्‍मारक        विद्यापति पर्व   जनार्दन राय 25 नवम्‍बर1977     इन्‍टरव्‍यू            जनार्दन राय        शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      जनार्दन राय 25 नवम्‍बर 1977    रिहर्सल            रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर      शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      रवीन्‍द्रनाथठाकुर       25 नवम्‍बर 197     ओझा जी                दमनकान्‍त झा       शहीद स्‍मारक     विद्यापती पर्व   रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 14 नवम्‍बर 1978    पाहिल सॉंझ         सुधांशु शेखर चौधरी   शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      अखिलेश्वर 14 नवम्‍बर 1978    हॉस्‍टल गेस्‍ट                                सच्चिदानन्‍द चौधरी शहीदस्‍मारक         विद्यापति पर्व   सच्चिदानन्‍द चौधरी 25 फरवरी 1979    ओकरा आङनक बारहमासा महेन्‍द्र मलंगिया     आइ.एम.ए.हॉल              अमरनाथ झा जयन्‍ती            अखिलेरवर           4 नवम्‍बर 1979     ओंकरा आङनक बारहमासा महेन्‍द्र मंलगिया          शहीद स्‍मारक     विद्यापति पर्व        अखिलेश्‍वर 4 नवम्‍बर 1979     चानोदाइ           उषाकिरण खाँ        शहीद स्‍मारक              विद्यापति पर्व      अखिलेश्‍वर 22 नवम्‍बर1980     एक कमल नोरमे        महेन्‍द्र मलंगिया    शहीद स्‍मार‍क                 विद्यापति पर्व        अखिलेश्‍वर एहि दशकक कालावधिमे कुल पन्‍द्रह एकांकी/नाटकक प्रस्‍तुति कयल गेल जाहिमे पॉंच नाटकक आ शेष दस एकांकी अछि। एहि दशाब्‍दक अन्‍तर्गत ख्‍याति अर्जित कयलक भफाइत चाहक जिनगी, ढ़हैत देवाल, लेटाइत आँचर। पहिल सॉंझ एवं ओकरा आङनक बारहमासा, कारण नाटकककार सामाजिक परिप्रेक्ष्‍यकेँ घ्‍यानमे राखि क’ एकर कथानक संयोजन कयलनि जे जनमानसपर अपन अमिट छाप छोड़बामे सहायक सिद्ध भेल। उपर्युक्‍त नाटकादिक कथानक द्रुतगामिता, घटना-उपघटनादिक विस्‍तारक संग समन्वित क’ कए नाटकककार नाट्य साहित्‍यान्‍तर्गत तेहन मानदण्‍ड स्‍थापित क’ देलनि जे अन्‍यतम भ’ गेलाह। एहि संस्‍था द्वारा जखन-जखन नाट्यायोजन कयल गेल तखन-तखन दर्शकक रूपमे सम्‍पूर्ण मैथिल समाज उनटि आयल जे एकर लोक प्रियताक प्रतिमान थिक। बीसम शताब्दीक नवम दशकमे मंचित एकांकी/नाटकक : तिथि            नाटकक         नाटकककार     अमिनीत स्‍थान         अवसर       निर्देशक 22 फरवरी1961         पाथेय              गुणनाथ झा        आइ. एम. ए. हॉल            अमरनाथ झा जयन्‍ती  रमेश राजहंस 11 नवम्‍बर 1981        अागिधधाक रहल छै      अरविन्‍द अक्‍कू                बाल उदद्यान प्रांगण            विद्यापति पर्व                  मादनाथ झा 22 फरवरी ट 1982      चौबयिापर/बुधिबधिया      गंगेश गंजन             आइ. एम. ए. हॉल     अमरनाथझा जयन्‍ती   विभूति आनन्‍द 28 नवम्‍बर1982         अन्तिम प्रणाम          गोविन्‍दझा               बालउद्यानप्रांगण        विद्यापतिपर्व       जावेद अखतर खाँ 28 नवम्‍बर 1982        बेचारा भगवान          अनुवादक शैलेन्‍द्रपटनिया   बालउद्यान प्रांगण         विद्यापति पर्व                  कौशलदास दास 28 नवम्‍बर 1983        भर्तृहरि                              अनुवादक शारदानन्‍द झा    बालउद्यानप्रांगण                 विद्यापतिपर्व        जावेद अख्‍तर खाँ 8 नवम्‍बर1984          प्रायश्चित                             छात्रानन्‍दसिंह झा            बाल उद्यान प्रांगण            विद्यापतिपर्व       विनोद कुमार झा 8 नवम्‍बर 1984         नवतुरिया                             उषाकिरण खाँ               बान उद्यान प्रांगण            विद्यापति पर्व                  त्रिलोचन झा 8 नवम्‍बर 1984         टूलेट             रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर       बाल उद्यान प्रागंण            विद्यापति पर्व                  रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर 26 नवम्‍बर1985         एना कत्तेदिन ?         अरविन्‍द अक्‍कू      बाल उद्यान प्रांगण              अमरनाथ झा जयन्‍ती   प्रशान्‍त कान्‍त अन्‍हार जंगल अ‍रविन्‍द अक्‍कू बाल उद्यान प्रांगन विद्यापति पर्व त्रिलोचन झा 5 नवम्‍बर 1987        जादूजंगल                           अनुवादक रोहिणीरमण झा        बालउद्यानप्रांगण              विद्यापतिपर्व       अरविन्‍द रंजनदास 23 नवम्‍बर 1988       विद्यापति बैले         सरोजा वैद्यनाथ                  बालउद्यान प्रांगण             विद्यापतिपर्व         सरोजावैद्यनाथ 23 नवम्‍बर 1988       जखते कहल कक्‍का हो  रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर      बालउद्यानक प्रांगण           विद्यापतिपर्व       मनोज मनु 23 नवम्‍बर 1988       रुकमिणी हरण        गोविन्‍द झा                 बालउद्यान प्रांगण      विद्यापति पर्व      कुणाल 18 सितम्‍बर 1989      अयाची मिश्र          हरिमोहन झा               विद्यापति भवन                   हरिमोहन झा      जयन्‍ती          13 नवम्‍बर 1989       आतंक                 अरविन्‍द अक्‍कू                बाल उद्यानक प्रांगण             विद्यापतिपर्व                  त्रिलोचनझा 2 फरवरी1990         अपनयनाकभोज        तन्‍त्रनाथ झा               विद्यापति भवन             ललितनारासण मिश्र जयन्‍ती भवनाथ झा 4 मार्च 1990          तितिरदाइ                           रूपकार विभूति आनन्‍द          विद्यापति भवन                          जयनाथमिश्र जयन्‍ती    किशोर कुमार झा 18 सितम्‍बर1990       आदर्श कुटुम्‍ब         रूपकार छात्रानन्‍द सिंह झा   विद्यापतिभवन                       हरिमोहनझा जयन्‍ती     उमाकान्‍त झा 2 नवम्‍बर 1990        राजा सल्‍हेस         रोहिणीरमण झा           मिलरहाइस्‍कूल प्रांगण   विद्यापतिपर्व         प्रशान्‍तकान्‍त अपन अस्तित्‍वक एक दशक पूर्ण कयलाक पश्‍चात् नाट्यमंच द्वारा 26 नवम्‍बर 1984 ई. मे ई एक नाट्य प्रतियोगिताक आयोजन कयलक जाहिमे प्रतिभागी नाट्यसंस्‍थाहि नाट्याभिनय कयलक। पटनामे प्रादुर्भूत रंगकर्मी सहमागी बनल। भंगिमाक प्रस्‍तुति छल प्रायश्चित छत्रानन्‍दसिंह झा द्वारा लिखित आ विनोद कुमार झा द्वारा निर्देि‍शत ई नाटकक अति प्राचीन कथ्‍‍थक संग मंचस्‍थ भेल। सीताक पाताल प्रवेश चिरपरिचित कथानकेँ नारी-मुक्ति-आन्‍दोलन चश्‍मासँ देखलापर एहि नाटकक कथानक प्रासंगिक छल अन्‍यथा गीत गाओल छल। नाटकक सम्‍वाद अत्यधिक सशक्‍त रहलाक कारणेँ नाट्य प्रस्तुति प्राणवन्‍त बनि गेल एहि नाटकक निर्देशन कयने रहथि विनोद कुमार झा हुनक अथक परिश्रमक झलक भैटल दर्शककेँ। ओना रामक गौरांग शरीर निर्देशकक राम-कथाक स्‍पष्‍ट अघ्‍ययन दिस प्रश्‍न चिह्न उपस्थित करैछ। एहि नाटकककेँ दर्शनीय बनयबाक पाछॉं विशिष्‍ट चमत्‍कारिक संवाद-योजना। प्रकाश-परिकल्‍पना आ प्रभावोत्‍पादक घ्‍वनिक माघ्‍यमे सीताक पाताल प्रवेश देखाओल गेल। एकर मंच-सज्‍जा पटनामे अद्यापि मंचित मैथिली नाटककमे सर्वोत्‍कृष्‍ट छल। अरिपनक प्रस्‍तुति छल वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक उपन्‍यास नवतुरिया (1954)क नाट्य रूपान्‍तरण कयने छलीह उषाकिरण खॉं जकर निर्देशन कयने रहथि त्रिलोचन झा। मृतपाय समस्‍यावला कथ्‍य आ छोट-छोट रेडियो टाइप दृश्‍यक रहितहुँ निर्देशक अपन प्रतिभाक बलेँ नीक प्रस्‍तुति कयने छलहि। अभिनेता लोकनिमे चुनि-चुनि क’ संवाद बजबाक प्रवृत्ति छल। किछु कलाकारक अभिनय अतीव प्रभावशाली छल, किन्‍तु शेष कलाकार पिछड़ि गेलाह, मंच-सज्‍जा नाटकक अनुरूप छल तथा पार्श्‍व-संगीत तथा प्रकाश अवस्‍था सामान्‍य छल। नवनिर्मित नाटय-संस्‍था अभिनव भारतीक प्रस्‍तुति छल टूलेट जकर लेखक आ निर्देशक रहथि रवीन्‍द्रनाथ ठाककु,। निर्देशककेँ कलाकार लोकनिपर कोनो नियंत्रण नहि छलनि आ ओ सभ मंचपरक फूलदानसँ अत्‍यन्‍त हल्‍लुक हास्‍य उत्‍पन्‍नकरबामे सफल भेलाह। एकर प्रस्‍तुति ग्रामीण मंच सदृश प्रहसनक श्रेणीमे आबि गेल। उपर्युक्‍त प्रतियोगितामे भंगिमाकेँ प्रथम, अरिपनकेँ द्वितीय आ अभिनव भारतीकेँ तृतीय घोषित क’ कए क्रमश: दू हजार एक सय, एकहजार पॉंच सय आ एक हजार एक सयक पुरस्‍कार चेतना समिति प्रदान कयने छल जे नाटकक आ रंगमंचक क्षेत्रमे एक साहसिक प्रयास कहल जा सकैछ। विगत शताब्‍दीक अन्तिम दशकमे मंचित एकांकी/नाटक : तिथि          नाटकक                  नाटकककार       अभिनीत स्‍थान        अवसर        निर्देशक 21 नवम्‍बर 1991        रक्‍त                अरविन्‍द अटकूम                    मिलरहाइस्‍कूलप्रांगण          विद्यापतिपर्व                      मनोजमनु 10 नवम्‍बर 1992                   लीडर                वनदेवी पुत्र भवनाथ        मिलरहाइस्‍कूलप्रांगण        विद्यापति पर्व        रघुनाथ झा किरण 28 नवम्‍बर 1993                  ओरिजन काम         महेन्‍द्र मलंगिया           मिलरहाइस्‍कूल प्रांगण         विद्यापति पर्व         महेन्‍द्र मलंगिया 17 नवम्‍बर 1994                  अथअद्भुतानन्‍द         संजय कुन्‍दन            मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण       विद्यापति पर्व         कुमार शैलेन्‍द्र 6 नवम्‍बर 1995       एकरा चिनसा          विनोद कुमार मिश्र बन्‍धु      मिलरहाइ स्‍कूल प्रांगण       विद्यापति पर्व          प्रशान्‍त कान्‍त 29 नवम्‍बर 1996       केकर?               अरविन्‍द अक्‍कू           मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण                 विद्यापति पर्व        कौशन किशोरदास 27अगस्‍त 1997      बरेहर हम आ बाहरे हमर नाटकक अरविन्‍द अक्‍कू                    विद्यापति भवन             स्‍वतंत्रातक स्‍वर्णजयन्‍ती   विनीतझा 14 नवम्‍बर 1997                 पदुआ कक्‍का अयुल गाम   अरविन्‍द अक्‍कू           भारतीय नृत्‍यकला मंदिर       विद्यापति पर्व           विनीतझा 4 नवम्‍बर 1988      गुलाबछडी               अरविन्‍द अक्‍कू         मिलर हाइ स्‍कूल प्रांगण       विद्यापति पर्व           विनीत झा 2 फरवरी 1999      गुलाब छडी                          अरविन्‍द अक्‍कू         विद्यापति-भवन              ललित जयन्‍ती          विनीतझा 23 नवम्‍बर 1999                 अग्निपथक सामा        कुमार शैलेन्‍द्र            कृष्‍णमेमोरियलहॉल           विद्यापतिपर्व                      किशोरकुमारझा 11 नवम्‍बर 2000                 सेहन्‍ता                  रोहिणीरमण झा            भारत स्‍काउट एण्‍डगाइड प्रांगण    विद्यापतिपर्व-         रघुनाथझा किरण नाटकक ओ रंगमंचक प्रगतिक प्रारूप भेटैछ विगत शताब्‍दीक अन्तिम दशकमे प्रदर्शित नाटकादिमे। यद्यपि एहि दशाब्‍दमे मात्र बारह नाटकक प्रस्‍तुति भेल। भारतीय स्‍वतन्‍त्रताक पचास वर्ष पूर्ण भेलापर विहार सरकारक कला संस्‍कृति एवं युवा विभाग 15 अगस्‍तसँ 1 सितम्‍बर 1977 धरि विद्यापति भवनमे नाट्य समारोहक आयोजन कयलक जाहि मे चेतना समितिक नाट्यमंचकेँ प्रतिभागीक रूपमे आमंत्रित कयलक जाहि प्रतिभागी भ’ मैथिली नाटकक प्रस्‍तुति कयलक वाह रे हम आ वाह रे हमर नाटकक। एहिसँ प्रमाणित होइछ जे सरकारी स्‍तरपर सेहो चेतनाक नाट्यमंचक स्‍वीकृति प्राप्‍त अछि। आधुनिक समाजमे व्याप्‍त विभिन्‍न समस्‍यादिक परिप्रेक्ष्‍यमे नाटकककार लोकनि कथानक संयोजन कयलनि जकरा जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कयलक। एकैसम शताब्‍दीक प्रथम दशकमे मंचित नाटक : 30 नवम्‍बर 2001      नवघर उठे         कमल मोहल चुन्‍नू       भारत स्‍काउटएण्‍ड गाइड प्रांगण       विद्यापति पर्व          रघुनाथ झा किरण 19 नवम्‍बर 2002      शपथग्रहण         कुमार गगन           भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण      विद्यापतिपर्व     किशोरकुमार झा 8नवम्‍बर 2003        राज्‍याभिषेक        अरविन्‍द अक्‍कू        भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण      विद्यापति पर्व    उमाकान्‍त झा 26 नवम्‍बर 2004      छूतहा घैल        महेन्‍द्रमलंगिया          भारत स्‍काउट एण्‍ड गाइड प्रांगण      विद्यापति पर्व    किशोर कुमार झा 15 नवम्‍बर 2005      जयजयजनताजर्नादन  कुमार गगन           विद्यापति भवन                  विद्यापति पर्व    कुमार गगन 2 नवम्‍बर 2006       नदी गुगिआयलजाय   मनोज मनु           कॉपरेटिभफेडरेशन प्रांगण            विद्यापतिपर्व     मनोजमनु 24 नवम्‍बर 2007      अलखनिरंजन       अरविन्‍द अक्‍कू         कॉपरेटिभफेडरेशन प्रांगण            विद्यापति पर्व    कौशल किशोरदास वर्त्तमान शताब्‍दीमे अद्यापि सात नाटकक मंचन भेल अछि जाहिमे सभक प्रस्‍तुति दिनप्रतिदिन प्रगतिक पथपर अग्रसर अछि। प्रत्‍येक नाटकक अपन कथ्‍यक नवीनतासँ अनुप्राणित अछि तथा ओकर प्रस्‍तुतिमे शनै:-शनै: विकास भ’ रहल अछि जकर सुपरिणाम भेलैक जे अलखनिरंजनक प्रस्‍तुति एतेक आकर्षक आ कथानकक नवीनता आ समसामियक रहबाक कारणेँ जनमानसक हृदयकेँ स्‍पर्श कयलक। एहि प्रस्‍तुतिक सफलतासँ अनुप्राणित भ’ समितिक पदाधिकारी लोकि प्रतिभागी कलाकार लोकनि केँ पुरस्‍कृत करबाक निर्णय कयलना ई आयोजन 14 दिसम्‍बर 2007 केँ विद्यापति भवनमे आयोजित कयल गेल छल तथा नाटकक ओ रंगमंचक लब्‍धप्रतिष्‍ठ विद्वान प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह द्वारा प्रतिभागी कलाकार लोकनिकेँ नगद राशि एवं प्रमाण पत्रसँ सम्‍मानित कयल गेलनि जे हुनका सभक मनोबलकेँ बढ़यबाक दिशामे अहं भूमिकाक निर्वाह कयलक आ भविष्‍यक हेतु पाथेय सिद्ध हैत। प्रकाशन : रंगमंचक क्षेत्रमे चेतना समितिक नाट्यमंच प्रभाग एक प्रतिमान प्रस्‍तुत कयलक जे अद्यापि कुल मिला क’ सनतावन एकांकी/नाटकक अपन तत्‍वावधानमे मंचित करौलक अछि जे उपर्युक्‍त विवरणसँ स्‍पष्‍ट अछि। नाट्यमंचक तत्‍वावधानमे जतेक नाटकक अद्यापि मंचित भेल अछि तकर सूची वृहत्तर अछि जकरा देखलासँ अनुमान कयल जा सकैछ जे समिति नाट्य प्रेमीक समक्ष एक कीर्तिमान स्‍थापित करबामे पूर्ण सफल भेल अछि। समितिक ई प्रभाग द्वारा नवोदित नाट्यकारक नाट्य-कृतिकेँ प्रकाशित कयलक अछि जे अद्यापि मैथिली जगतक कोनो संस्‍था द्वारा नहि कयल गेल अछि। नाट्य लेखन, मंचोपरान्‍त ओकर कमी बेसीकेँ सुधारिक क’ प्रकाशित कयलक अछि यथा दिगम्‍बर झाक टूटैत लोक (1974), सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी (1975) एवं ढ़हैत देवाल/लेटाइत ऑंचर (1976), महेन्‍द्र मलंगियाक ओकरा आङनक बारहमासा (1980), अरविन्‍द अक्‍कूक आगि धधकि रहल छै (1981), एना कत्ते दिन? (1985), अन्‍हार जंगल (1987), आतंक (1994), के ककर? (1986), वाह रे हम वाह रे हमर नाटकक (1998), पढ़ुआ कक्‍का अएला गाम (1994), गुलाबछड़ी (1999) राज्याभिषेक (2005), अलख निरंजन (2008), गंगेश गुंजनक चौबटियापर। बुधि बधिया (1982) गोविन्‍द झाक अन्तिम प्रणाम (1982) एवं रुक्मिणी हरण (1989), रोहिणीरमण झाक अन्तिम गहना (1929) एवं राजा सलहेस (1990), विभूति आनन्‍द का तित्तिर दाइ (1994) वनदेवी पुत्र भवनाथक लीडर (1994), कुमार शैलेन्‍द्रक अग्नि पथक सामा (2000), कमल मोहन चुन्‍नूक नव घर उठे (2001), कुमार गगनक शपथग्रहण (2003) एवं विनोद कुमार मिश्रक एकटा चिनमा (2006) आदि। चेतनाक नाट्यमंचपर निम्‍नस्‍थ एकांकी/नाटकक मंचपर तँ अवश्‍य मंचित भेल, किन्‍तु ओ पुस्‍तकाकार रूपमे पाठकक समक्ष नहि आबि सकल अछि तकर एकमात्र कारण आर्थिक दवाब समितिक समक्ष रहल वा अन्‍यान्‍य भाषासँ अनूदित वा उपन्‍यासकेँ रूपान्‍तरित क’ कए मंचस्‍थ कयल गेल हो यथा सीताराम झा श्‍यामक एकदिन एक राति, जनार्दन रायक एकटा अन्‍तर्यात्रा एवं इन्‍टरव्‍यू, रवीन्‍द्रनाथ ठाकुरक रिहर्सल टूलेट, एवं जखने कहल कक्‍का हो, दमनकान्‍त झाक ओझा जी, सच्चिदानन्‍द चौधरीक हॉस्‍टलक गेस्‍ट, उषाकिरण खाँक चानोदाइ एवं नवतुरिया, शैलेन्‍द्र पटनियॉंक बेचारा भगवान, शारदानन्‍द झाक भर्तृहरि, रोहिणीरमण झाक जादू जंगल एवं सेहन्‍ता, छत्रानन्‍द सिंह आदर्श कुटुम्‍ब, संजय कुन्‍दनक अथ अद्धदानन्‍द, कुमार गगनक जयजय जनार्दन, महेन्‍द्र मलंगियाक छूत घैल, मनोज मनुक नदी गोंगिआयल जाय एवं अखनीन्‍द अक्‍कूक अलख निरंजन आदि। समिति द्वारा मंचस्थ किछु नाटकक एहनो उपलब्‍ध भ’ रहल अछि जकर प्रकाशनमे निरर्थक विलम्‍ब देखि नाटककार ओकरा अन्‍यान्‍य संस्‍थादिसँ प्रकाशित करयबाक सयत्‍न प्रयास कयलनि यथा सुधांशु शेखर चौधरीक पहिल सॉझ (मैथिली अकादमी पटना 1989) रामदेव झाक पसिझैत पाथर (संकल्‍य लोक, लहेरियासराय 1989) अरविन्‍द अक्‍कूक रक्‍त (शेखर प्रकाशन, पटना 1992) महेन्‍द्र मलंगियाक ओरिजनल काम (ललित प्रकाशन, मलंगिया 2000) एवं छत्रानन्‍द सिंह झाक प्रायश्चित/सुनूजानकी (शेखर प्रकाशन, पटना 2007) आदि। चेतनाक नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा प्रस्‍तुति एतेक बेसी लोकप्रियता अर्जित कयलक, जनमानसकेँ आकर्षित कयलक जे नाटककमे भाग लेनिहार अभिनेतामे अभिनेत्रीकेँ पुरस्‍कृत करबाक घोषणा नाट्यप्रेमी जनमानस द्वारा भेल जाहिसँ नाट्यत्‍योजनामे प्रतिभागी कलाकार लोकनिकेँ प्रोत्‍साहन भेटब प्रारम्‍भ भेलनि तथा ओ सभ अत्‍यन्‍त मनोसोग पूर्वक एहिमे प्रतिभागी बनब प्रारम्‍भ कयलनि। एहि प्रकारक दू पारितोषिक चेतनाक मंचसँ घोषित भेल जकर आर्थिक भार ओ वहन कयलनि जनिक स्‍मृतिमे एकर स्‍थापना कयलनि। शैलवाला मिश्र स्‍मृति पारितोषिक : मधुबनी जिलाक चानपुरा ग्राम निवासी साइन्‍स कॉलेज पटनाक प्राक्‍तन प्रधानाचार्य एवं विश्‍वविद्यालय सेवा आयोगक प्राक्‍तन अघ्‍यक्ष सूर्यकान्‍त मिश्र अपन दिवंगता धर्मपत्‍नीक स्‍मृतिमे हुनक सांस्‍कृतिक कार्यक्रमक प्रति अनुराग विशेषतः अभिनयमे अभिरुचिक लेल चेतना समितिक नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा आयोजित विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर अभिनीत नाटकक अभिनयमे सर्वोत्तम अभिनयक लेल शैलवाला स्‍मृति परितोषिकक घोषणा कयलनि। एहि निमित्त 1984 वर्षक लेल एक सय एक एवं भविष्‍यक हेतु एक हजार एक टाका फिक्‍स डिपोजिटमे रखबाक हेतु समितिकेँ समर्पित कयलनि। तदनुसार चेतना समितिक नाट्य प्रभाग नाट्यमंच द्वारा शैलवाला स्‍मृति पारितोषिक योजना प्रारम्‍भ कयलक जकरा अन्‍तर्गत निम्‍नस्‍थ सर्वोतम कलाकारकेँ सर्वोतम अभिनयक हेतु पुरस्कृत कयल गेल अछि, यथा : वर्ष                       नाटकक                   नाटकककार                 पुरस्‍कृत कलाकार 1984                    नवतुरिया                   नाटयरूपकार उषाकिरण खॉं       हेमचन्‍द्र लाभ 1985                    एनाकते दिन?               अरविन्‍द अक्‍कू               त्रिलोचन झा 1986                    अन्‍हार जंगल                अरविन्‍द अक्‍कू               अशोक चौधरी 1987                    जादू जंगल                 रोहिणी रमण झा              प्रशान्‍त कान्‍त 1988                    रुकमिणी हरण               गोविन्‍द झा                 प्रेमलता मिश्र प्रेम 1990                    राजा सलहेस                रोहिणीरमण झा               सुनीलकुमार झा 1991                    रक्‍त                      अरविन्‍द अक्‍कू               शारदा सिंह 1992                    लीडर                     वनदेवी पुत्र भवनाथ                        शरारदा सिंह 1993                    ओरिजनलकाम               महेन्‍द्रमलंगिया                सुभद्राकुमारी                                    1994 अथ अद्भुदानन्‍द              संजय कुन्‍दन                लक्ष्‍मीनारायण मिश्र 1995                    एकटा चिनमा                विनोद कुमार मिश्र                        शारदा सिंह 1996                    के केकर ?                 अरविन्‍द अक्‍कू               रघुवीर मोची 1997                    पदुआ कक्‍का अएला गाम        अरविन्‍द अक्‍कू               अनीता मन्‍नू 1998                    गुलाबछडी                  अरविन्‍द अक्‍कू               अनीता मन्‍नू 1999                    अगिनपथक सामा             कुमार शैलेन्‍द्र                रश्मि 2000                    सेहन्‍ता                    रोहिणीरमण झा               रश्मि 2001                    नवघर उठे                  कमल मोहन चुन्‍नू             कुमार गगन 2002                    शपथ ग्रहण                 कुमार गगन                 मिथिलेश कुमार मिश्र 2003                    राज्‍याभिषेक                 अरविन्‍द अक्‍कू               कुमार गगन 2004                    छूतहाघैल                  महेन्‍द्र मलंगिया               रामश्रेष्‍ठ पासवान 2005                    जय जय जनता जनार्दन        कुमार गगन                 उमाकान्‍त झा 2006                    नदी गोगिंआयल जाय          मनोज मनु                 रामश्रेष्‍ठ पासवान 2007                    अलख निरंजन               अरविन्‍द अक्‍कू               रामश्रेष्‍ठ पासवान कामेश्‍वरी देवी पुरस्‍कार : मिथिलाक सर्वांगीन विकासार्थ अपन जीवनक आहूति देनिहार मिथिलाक वरदपुत्र ललितनारायण मिश्रक धर्मपत्‍नी कामेश्‍वरी देवीक निधनोपरान्‍त हुनक स्‍मृतिमे हुनक ज्‍येष्‍ठ पुत्र विजयकुमार मिश्र चेतना समितिक वर्त्तमान अघ्‍यक्ष एवं हुनक परिवारक सहयोगसँ नाट्याभिनयमे प्रतिभागी कलाकारकेँ विद्यापति स्‍मृति पर्वोत्‍सवपर अभिनीत नाटकक लेल सर्वश्रेष्‍ठ अभिनयक लेल पुरस्‍कृत करबाक परम्‍पराक शुभारम्‍भ भेल एकैसम शताब्‍दीक प्रथम दशकमे। 2002      शपथ ग्रहण             कुमार गगन         आती 2003      राजयभिषेक             अरविन्‍द अक्‍कू        गुडि़या 2004      छूतहा घैल              महेन्‍द्र मलंगिया        गुडिया 2005      जय जय जनताजनार्दन      कुमार गगन         स्‍वाती सिंह 2006      नदी गुगुआएल जाय        मनोज मनु          सपनाकुमारी 2007      अलखनिरंजन            अरविन्‍द अक्‍कू        विजय लक्ष्‍मी मैथिली रंगमंचकेँ व्‍यवस्थित स्‍वरूप प्रदान करबामे चेतना समितिक माँ पुत्र नाट्यमंच प्रभाग वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे मिलक पाथर बनि गेल अछि जे जाहि दिशामे एकर प्रयास प्रारम्‍भ भेलैक आ ओकरा मूर्त्तरूप प्रदान करैत गेल तकर श्रेय आ प्रेय एकर समर्पित कलाकार लोकनिकेँ छनि। समितिक ई प्रयास कतेक सार्थक भेलैक जे नाट्यमंचक स्‍थापनोपरान्‍त नव-नव तकनिकसँ संयुक्‍त कयक नवीनतासाँ संयुक्‍त एकसँ एक कलाकारकेँ मंचपर आनि हुनका अपन यथार्थ प्रतिभाक प्रदर्शनार्थ स्‍वर्णिम अवसर प्रदान कयलक। चेतना द्वारा नाटकक ओ रंगमंचक विकास यात्राक मार्गकेँ प्रशस्‍त करबाक हेतु जे अभियान चलौलक ओ साहित्‍येतिहासमे स्‍वर्णक्षरमे अंकित होयबाक योग्‍य थिक। एकरा इहो श्रेय आ प्रेय छैक जे एकर समर्पित कलाकार लोकनि अपन अभिनय कौशलक प्रदर्शनार्थ समितिक नाट्यमंचसँ अनुप्राणित भ’ कतिपय नव-नव नाट्य-संस्‍थादि स्‍थापित भेलैक अरिपन (1982), भंगिमा (1984), कलासमिति, आङन, भाव तरंग, अभिनव भारती आदि-आदि रंगकर्मी संस्‍थादिक जन्‍मक मूलमे चेतना समितिक नाट्यमंच प्रभाग अछि। चेतनाक नाट्यमंचक नियमित प्रदर्शनिक फलस्‍वरूप जनमानसकेँ नाटकक देखबाक लुतुक पड़ि गेलैक अछि जाहिसँ दर्शकक संख्‍यामे अपार वृद्धि भेलैक ताहिमे सन्‍देह नहि। मैथिली रंगमंचीय गतिविधिक व्‍यौरा अछि जे रंगकर्मक क्षेत्रमे चेतनाक नाट्यमंच प्रभागक अवदानसँ हमरा परिचय करबैत अछि जे इतिहासक दृष्टिएँ उल्‍लेखनीय अघ्‍याय थिक। एहिमे सन्‍देह नहि जे मैथिली रंग जगतकेँ चेतनाक देनक चर्चा-अर्चा रंगमंचक इतिहासमे सतत स्‍मरणीय रहत, कारण एकरा स्‍थायित्‍व प्रदान करबाक दिशामे ई एहन ठोस कार्य कयलक अछि एकर नाट्य प्रभाग आ करैत आबि रहल अछि आ आशा कयल जाइत अछि जे भविष्‍यमे सेहो उज्‍ज्वल आ कर्मरत हैत से विश्‍वास अछि। वस्‍तुतः चेतना समिति नाटकक ओ रंगमंचक माघ्‍यममे मिथिलाक सांस्‍कृतिक, साहित्यिक आ कलाक प्रचार-प्रसारक सुकार्य करैत आबि रहस अछि। समिति रंगमंचक माघ्‍यमे सांस्‍कृतिक आ साहित्यक आन्‍दोलन चलौलक जे जनचेतना जगयबामे सहायक सिद्ध भेल। एकर प्रयासक फलस्‍वरूप नाट्य-लेखन आ मंचनक विकासक दिशामे लोकक प्रतिवद्धता बढ़लैक। निजी निर्देशक, निजी तकनिशियन आ विशुद्ध मैथिल अभिनेता-अभिनेत्रीक सहयोगसँ नाट्य-प्रस्‍तुति करबामे निजी व्‍यक्तित्‍व निर्माण कयलक अछि संगहि अपन प्रदर्शनसँ राष्‍ट्रीय स्‍तरक कतिपय कलाकार बनौलन्हि। समितिक सत्‍प्रयासक फलस्‍वरूप नव नाटकक, नव-शैली आ नव-कथ्‍यक जन्‍म द’ कए नव जागरणक शंखनाद कयलक अछि। एकरासँ प्रेरित भ’ नव-नव संस्‍थादिक उदय आ विकास रंगमंचकेँ निस्‍सन्‍देह स्‍मृद्धि कयलक अछि। एकरा ई श्रेय आ प्रेय छैक जे नाट्यान्‍दोलनमे तीव्रता अनलक आ रंगमंचकेँ स्‍थायीत्‍व प्रदान करबाक निमित्त अत्‍यधिक क्रियाशील अछि। * * मैथिली आन्‍दोलनक सजग प्रहरी जयकान्‍त मिश्र विगत शताब्‍दीक प्रारम्‍भ भारतीय जनमानसक राष्‍ट्रीय जनमानसक राष्‍ट्रीय आ सांस्‍कृतिक जनजागरणक प्रत्‍यूष बेला थिक। एही बेलामे समाज सुधार आ राजनीतिक आन्‍दोलनक देश-व्‍यापी चेतना सर्वत्र परिव्‍याप्‍त भेल। भारतीय संस्‍कृति आ सभ्यताक आत्‍म सुधारक लेल भारतीय जीवनगत दोषादि स्‍वीकृतिक प्रति मुखरित भेल। फलत: हिन्‍दू समाजक परिष्‍कार आ परिमार्जनक लेल बंग भूमिपर राजाराम मोहन रायक उदय भेलनि। उत्तर भारतमे आर्य संस्‍कृतिक पुररुत्‍थानक निमित्त स्‍वामी दयानन्‍द आर्य समाज द्वारा हिन्‍दू जागरणक नव मन्‍त्र फूकलनि। ई वैह स्‍वर्णिम बेला थिक जे जनमानस अपन दोषादिकेँ सुधारि क’ संसारक प्रगतिशील जातिक प्रतिद्वन्द्वितामे अग्रसर हैबाक दृढ़ संकल्‍प कयलक। भारतीय राजनीतिक क्षितिजपर महात्‍मा गांधी सदृश प्रबल शक्तिक आबिर्भाव भेलनि, जनिक नेतृत्त्वमे समस्‍त भारतवासी ब्रिटिश साम्राज्‍यवादक जड़ि उन्‍नमुलनार्थ कटिवद्ध भ’ गेल। असहयोग आन्‍दोलनक ई राजनैतिक चेतनाक मूर्त्त रूप छल। विदेशी वस्‍तुक वहिव्‍कार, स्‍वदेशीक प्रचार, हिन्‍दु-मुस्लिम एकता, सत्‍यक आग्रह नेने देश भक्‍त लोकनिक अहिंसात्मक युद्ध, विभिन्‍न भंगिमाक बुनियादकेँ ल’ कए ई पुनीत आन्‍दोलन सम्‍पूर्ण देशमे परिव्‍याप्त भ’ गेल। ई मात्र राजनैतिक आन्दोलन नहीं छल, प्रत्युत राष्ट्रक महान सांस्कृतिक आन्दोलन सेहो छल। महात्‍मा गांधीक राजनीति वस्‍तुत: सत्‍य, अहिंसा, पारस्‍परिक प्रेम, शान्तिक उज्ज्वल आदर्शसँ अनुप्राणित छल जे भारतीय संस्‍कृतिक सर्वोपरि निधि थिक। समाज सुधार आ राजनीतिक ई आन्‍दोलन ने केवल निजातीय संस्‍कृति आ शासनक प्रतिरोध कयलक, प्रत्‍युत मातृभूमि, मातृभाषा एवं संस्‍कृतिकेँ सजग आ प्रवुद्ध बनौलक। ई आन्दोलन जतय मातृभूमि, मातृभाषा एवं संस्‍कृतिसँ देशवासीकेँ प्रेमक पाठ पढ़ौलक ओतहि समाज-सुधार आन्‍दोलनादिक माध्‍यमे एहि संस्‍कृतिक एक अत्‍यन्‍त भव्‍य आ उज्ज्वल रूप समक्ष आयल। वर्त्तमान समस्‍याक समाधान, भविष्यक सुखद नवनिर्माण तथा विदेशी संस्‍कृतिक प्रबल प्रवाहसँ अपन सभ्‍यताकेँ उबारबाक, मातृभूमि आ मातृभाषाक गौरवमय अतीतक आश्रय लेलक। एहि प्रकारेँ विदेशी शासनसँ आतंकित मातृभूमिक निष्प्राण धमनीमे पुरातन संस्‍कृतिक भव्य आदर्श, आचार आ निष्‍ठाक उष्ण रक्‍त प्रवाहित करबाक लेल युगक चेतना अत्‍यन्त तीव्र गतिएँ गतिशील भ’ गेल। साहित्‍यक माध्‍यमसँ युग-चेतनाक ई प्रवुद्ध स्‍वरूप विविध रूपमे व्‍यक्‍त होमय लागल। अपन सीमामे समटल ओहि समयक समस्‍त साहित्‍य वस्‍तुत: मातृभूमि, मातृभाषा एवं सांस्‍कृतिक जागरणक भाव भूमिपर स्थिर अछि। स्‍वदेश प्रेम, अतीतक प्रति गौरवगान, गांधीवादी विचार धाराक प्रति श्रद्धा सम्‍मान, राष्‍ट्रीय अखण्‍डताक समर्थन, जातीय संस्‍कृतिक नव-निर्माण, सामाजिक कुण्ठादिक निवारण विविध भाव सामग्री समकालीन साहित्‍य-सृजन आ पोषण कयलक। उपर्युक्‍त वातावरण परिप्रेक्ष्‍यमे तत्‍कालीन साहित्‍यमे उच्चादर्शवादिता, मातृभाषाक प्रति अगाध श्रद्धा तथा ओकर मान्‍यतार्थ अधिकार प्राप्‍त करबाक लेल आन्‍दोलनक शुभारम्‍भ भेल। उपर्युक्‍त पृष्‍ठभूमिमे विगत शताब्‍दीक तृतीय दशकमे एक एश्‍न अ‍क्षर पुरूष प्रादुर्भूत भेलाह जनिक बहुआयामी व्‍याक्तित्त्व, मातृभाषाक उत्‍कर्षक लेल, अविरल नव-नव आयामक प्रेरणा स्रोत, अनुसंधान, आन्‍दोलन, इतिहास-लेखन द्वारा विश्‍व स्तरपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करब, मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक कार्यान्वयनक हेतु संघर्षरत आ कानूनी लड़ाइ लड़निहार, दिशाबोधक, आलोचक तथा हेड़ायल-भुतिआयल मातृभाषानुरागी विभूतिकेँ प्रकाशमे आनि, दिवारात्रि चिन्‍ताग्रस्‍त रहनिहार आन्‍दोलनकारी मातृभाषाक उत्‍थानार्थ महत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलनि ओ रहथि प्रोफेसर डॉक्टर जयकान्‍त मिश्र (।922-2009)। विगत सात दशक धरि अनवरत एक रस एक चित्त भ’ मातृभाषाक निष्‍प्राण धमनीमे उष्ण रक्‍तक संचार क’ कए अभिनव साहित्यिक वातावरणक निर्माणक क’ कए ओकर पोषण कयलनि। मैथिली भाषा आ साहित्‍य जखन गहन अन्‍धकारमे टापर-टोइया द’ रहल छल तखन ओ अपन अभिनव अनुसन्‍धान आ एक सजग आन्‍दोलनकारीक रूपमे एक नव आलोकक रश्मि विकीर्ण कयलनि। हिनक समकालीन परिदृश्‍य छल भारतक स्‍वतन्‍त्रताक महासंग्राम जाहिमे कतिपय महासपूत अपन प्राणक आहूति देलनि आ रक्‍तसँ तर्पण कयलनि। भारतक स्‍वतन्‍त्रता संग्रामक इतिहासमे सन् उन्‍नैस सय वियालिसक अगस्‍त क्रान्ति, जाहि मे भारत छोड़ो क’ आन्‍दोलनक शंखनादक अति महत्त्वपूर्ण स्‍थान अछि, एहि महाक्रान्ति मे बूढ़-बूढ़ानुस नेतासँ अधिक जुआन-जहानक रक्‍त विशेष गर्म छलैक आ अंग्रेजी शासनक विरूद्ध ओकरा सभक स्‍वर अधिक मुखर छलैक। मिथिलाञ्चलक कतिपय स्‍वतन्‍त्रता सेनानी एहि महासंग्राममे सहभागी बनि एकरा सफल बनयबामे सक्रिय सहभागिता देव प्रारम्भ कयलनि, जाहिमे मैथिलीक महान सपूतक संगहि अपन बहु विधादिक साहित्‍य सृजनिहार डा. व्रज किशोर वर्मा मणिपद्म (।9।8-।986) मनसा वाचा कर्मणा जेल यात्रा कयलनि, ब्रिटिश शासकक निर्मम कठोर यातना सहलनि, भूमिगत भेलाह आ फरारी मे जीवन व्‍यतीत कयलनिं एहि दृष्टिऍं हिनक संस्‍मरण वियालसीक फरारीक सात दिन (।953) एवं फरारीक पाँच दिन (।96।) प्रकाशित अछि, हुनकासँ भेट भेल छल (2004) जाहिमे स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलनक क्रममे ओ जे डायरी लिखलनि तकर दारूण पीड़ादायक वर्णन कयलनि। एहिमे रचनाकारक सद्य: प्रस्‍फुटित भाव वा विचारकेँ अभिव्‍यक्ति देलनि वा अपन अनुभवक रेखाकंन कयलनि जे अत्‍यन्‍त मार्मिक अछि। प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्रक जीवन धाराक दू रूप हमरा समक्ष अबैछ ओ थिक साहित्य आ आन्दोलन। दूनू क्षेत्र हिनक अत्यंत विस्तृत आ व्यापक अछि जकरा माध्यमे निष्प्राण मैथिली साहित्यमे नव स्पन्दन भरनिहार ई प्रथम सरस्वती पुत्र प्रादुर्भूत भेला जे मातृभाषाकेँ जीवन दान देलनि। ओ ने तँ स्‍वतन्‍त्रता संग्रामक महासमरमे सहभागी भेलाह आ ने तँ कोनो राजनीतिक दलसँ सम्वद्ध भेलाह, अपन मातृभाषाक उन्‍नयनार्थ सतत आन्‍दोलनोन्‍मुख रहला, दिशा निर्देशा दिर्नेश कयलनि, अपन उचित माँगक प्रति सचेष्‍ट रहला, संघर्षरत रहला आचार, व्‍यवहार वेष-भूषामे पूर्णत: मैथिल संस्‍कृतिक प्र‍तीक रहला जे वर्त्तमान परिदृश्‍यमे अनुकरणीय थिक। हुनक समस्‍त जीवन-दर्शन, समस्त विचार-प्रवाह, युग चेतनाक व्‍यापक सन्निवेश हुनक वाणीक परिधान पहिन क’ मिथिलाक सांस्‍कृतिक परम्‍परा आ मैथिली साहित्‍यक भूमिपर दृढ़तासँ प्रतिष्ठित अछि। हुनक जीवनक सार्थकता अर्थ उपार्जनमे नहि छलनि, ख्‍यातिमे नहि छलनि, अधिकारक विस्तारमे नहि छलनि, लोकक मुखसँ साधुवादमे नहि छलनि, भोगमे नहि छलनि, हुनक जीवनक सार्थकता मात्रद जीवनकेँ गम्‍भीर रूपमे उपलब्‍ध करबामे, मातृभाषाक महत्त्व बुझबाक चेष्‍टा करबाक आनन्द मे छलनि। पैघ व्‍यक्तिक जीवन जीबाक एक ट्रेड सीक्रेट होइत छैक, से हिनका स्‍वत: प्राप्‍त छलनि। हुनक जीवनक मूल उद्देश्‍य छलनि To know how to live in any trade. नामी-गिरामी व्‍यक्तिक साहित्‍य संसार बहुत दूर धरि एक प्रतिभाशाली परिवार सदृश रहैछ जाहिमे ओ जीवनयापन कयलनि। आन्‍दोलन-स्‍फुरण : अनुसन्‍धानोत्तर एक नव प्रवृत्तिक जागरण हुनक मस्तिष्कमे भेलनि जे मैथिलीक गौरव-गरिमाकेँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे जागृत करबाक निमित्त ओ रचनात्‍मक आ आन्‍दोलनात्मक मार्गक अनुसरन कयलनि। एहि लेल ओ अर्कमण्‍य, निष्क्रिय, सुसुप्‍त, धार्मिक कट्टरता, रूढ़िग्रस्‍ता, जीवनक अन्‍ध कूपमे डूबल मिथिलाञ्चल एवं प्रवासी मैथिल समाजमे नव जीवनक संचार करबाक हेतु जनजागरणक अभियानक सूत्रपात कयलनि जे मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवनमे नवचेतना अनबाक हेतु ओ रचनात्‍मक आ आन्‍देलनात्‍मक रूख अख्तियार कयलनि। जकर व्‍यापक प्रभाव मैथिली भाषीपर अत्‍यन्‍त व्‍यापक रूपेँ पड़ल। केन्‍द्र एवं विहार सरकारक उदासीनतासँ भाषाकेँ सर्वथा उपेक्षित देखि हुनका हृदयमे असीम पीड़ा आ आक्रोश होइत छलनि। ओ कविवर सीताराम झा (।89।-।975)क निम्‍नस्‍थ पंक्ति अतिशय प्रभावित भ’ आन्‍दोलनोन्‍मुख भेलाह : अछि सलाइमे आगि बरत की बिना रगड़ने। पायब निज अधिकार कतहु की बिना झगड़ने। कविवरक उक्‍त पंक्तिक व्‍यापक प्रभाव हुनकापर पड़लनि जाहिसँ अभिभूत भ’ ओ जन जागरणक अभियान चलौलनि जे जनमानस अपन मातृभाषाक महत्त्वकेँ जानय, बुझय आ अपन समुचित अधिकार प्राप्‍त करबाक दिशामे आन्‍दोलनोन्‍मुख हो, हुनका मान्‍यता छलनि जे मिथिलाञ्चल वासीमे भाषा चेतनाक सर्वथा अभाव छैक। भाषा चेतनाक अर्थ थिक मातृभाषा प्रति प्रेम, दायित्‍व बोध, कर्त्तव्‍य बोध, गौरव बोध अ‍ादि समस्‍त विषय चेतना शब्‍दमे सन्निहित अछि। भाषाक उन्‍नति आ विकास ओहि भाषीक चेतनापर निर्भर करैछ, किन्‍तु अकर्मण्‍य मैथिली भाषी जनमानसमे अपन भाषा आ साहित्‍यक सर्वांगीन विकासक आकांक्षाक अभाव देखि ओ सर्वप्रथम भाषा चेतना जगयबाक उपक्रम कयलनि जे हम मैथिल छी, हमर मातृभाषा मैथिली थिक आ हम मिथिलावासी छी। एहि भावनासँ उत्‍प्रेरित भ’ मि‍थिलाञ्चलक जन-जनसँ अनुरोध कयलनि जे जाति-भेद, वर्ग-भेद, छिद्रान्वेषणक प्रवृत्तिक परित्‍याग क’ एक जुट भ’ सम्मिलित रूपसँ मातृभाषाक विकास कार्यक प्रति समवद्ध भ’ आन्‍दोलन करो, कारण कोनो भाषा भाषीकेँ विनु संघर्ष कयने कोनो उपलब्धि नहि भेलैक जे ऐतिहासिक दस्‍तावेजक रूपमे ओकर भाषा साहित्‍यमे नुकायल अछि। मै‍थिली आन्‍दोलन दधीचि बाबू भोलालाल दास (।894-।977)क कथन छलनि जे चुपचाप बैसने व्‍यक्ति वा संस्‍था वा भाषाकेँ न्‍यायो‍चित अधिकार नहि प्राप्‍त भ’ सकैछ, अतएव मिथिलाञ्चलक सर्वांगीन विकास ओकर भाषा आ साहित्‍यक मान्‍यातार्थ समग्र मिथिलावासीकेँ एक सूत्रमे बान्हि, एकता प्रदर्शित क’ भयंकर सिंहनाद करबाक प्रयोजन अछि आ अपन समुचित आधिकार प्राप्ति करबाक लेल अतुलित संघर्ष करबाक आह्वान ओ जीवन पर्यन्‍त कयलनि। हुनक प्रसिद्ध पंक्ति थिक : अन्यायी सत्ता छी प्रलय गगन समाचार अतिविषम। हमरहि लघु हुँकारसँ महाप्रलय होइछ नियम॥ हिनक नेतृत्वमे जाहि आन्दोलनक शुभारम्भ भेल तकर प्रभाव मातृभाषानुरागी साहित्य सृजनिहार लोकनिपर सेहो पर्याप्त मात्रामे पड़लनि तथा एहि निमित्त काव्यक माध्यमे जन–जनमे अपन सांस्कृतिक अस्मिताक रक्षार्थ आन्दोलनोन्मुख भेलाह। आन्दोलनमे तखने बल आओत जखन हम अपन संस्कृतिक शंखनाद करब आ जन–जनमे भाषिक चेतनाक हुँकार भरब। एहि भावनासँ उत्प्रेरित भ’ महाकवि आरसी प्रसाद सिंह (1911–1996)क सुप्रसिद्ध कविता बाजि गेल रण डंक एक उद्बोधनात्मक गीत रूपमे मैथिली प्रेमीक जिह्वापर झंकृत होमय लागल : बाजि गेल रण डंक, ललकारि रहल अछि। गरजि-गरजि कय, जन-जनकेँ परचारि रहल अछि। आबहु की रहती मैथिली बनलि वन्‍दनी ? तरुक छाँहमे बनि उदासिनी जनक नन्‍दनी ? (माटिक दीप) उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे ओ जनमानसकेँ उत्‍प्रेरित करबाक उद्देश्‍यसँ मातृभाषाक समुचित विकासार्थ जन आन्‍दोलनक सूत्रपात कयलनि। अखिल भारतीय भाषा सर्वेक्षणमे मैथिली भाषीक संस्‍था शनै:-शनै: विलीन होइत देखि कयलनि जे जनगणनाक अवसरपर मुखातिब भ’ अपन मातृभाषा मैथिली लिखावथि। ओ जतय कतहु सभा सोसायटीक मिटींगमे सहभागी होथि ततय सेहो समय बहार क’ मैथिली आन्‍दोलनक अद्यतन स्थितिकेँ उजगार करबाक अवसर निकालि लैत रहथि। हुनका एहि नाक कचोर छलनि जे स्‍कूल आ कॉलेजमे जतय मैथिलीक पठन-पाठनक सुविधा छैक ततय अभिभावक लोकनि अपन मातृभाषाकेँ उपेक्षाक दृष्टिसँ किएक देखेत छथि आ छात्रकेँ प्रोत्साहित नहि करैत छथि। पुस्‍तक एवं पत्रिका प्रकाशित होइत अछि, किन्‍तु ओकर क्रेताक अछि। मैथिली आन्‍दोलनक प्रति जनमासक उदासीनताकेँ दूर करबाक निमित्त आन्‍दोलन करबाक आवश्‍यकताक ओ अनुभव कयलनि। मातृभाषाक जागरणक सबसँ प्रबल आ सबसँ समर्थ स्‍वर मिथिलाक जनमानसकेँ झंकृत क’ देलक। विगत सात दशकसँ मातृभाषा प्रेमी जनमानसकेँ अधिक प्रवुद्ध आ उर्जस्वित स्‍वरूप देबाक लेल ओ एक महान तपस्वीक समान अखण्ड साधनामे रत रहला। वर्त्तमान युग धर्मक अनुरूप हुनक साधना अत्यन्त विराट आ भव्य अछि। आन्दोलन–नेओ: मातृभाषा मैथिलीक समुचित मान्‍यताक अभाव हिनका हृदयमे सतत खटकैत रहलनि, जाहिसँ उत्‍प्रेरित भ’ ओ आन्‍दोन्‍मुख भेलाह। कारण पुरातन कालहिसँ इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय प्राच्‍य एवं प्रतीच्‍य उच्‍च शिक्षाक हृदय स्‍थल रहल अछि जतय साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक क्षेत्रक लब्ध प्रतिष्ठ मातृभाषानुरागी साहित्‍य चिन्तक लोकनिक निवास रहलनि लकर दू कारण अछि। प्रथमत: धर्म-व लम्‍बी मैथिल समाज गंगा-यमुना विलुप्‍त सरस्‍वती नदीक संगम स्‍थल थिक आ विद्याव्रती लोकनिक जमाबड़ा रहल अछि। स्‍वाधीनतासँ पूर्व मातृभाषानुरागी जयकान्‍त मिश्र एकर विकासार्थ दू संस्‍थाक स्‍थापना कयलनि तीरभुक्ति पब्लिकेशन्स आ अखिल भारतीय मैथिली सहित्‍य समितिक मैथिल आन्‍दोलनक नेओ सन् ।944 ई.मे रखलनि। हुनक उत्‍कट अभिलाषा छलनि जे सोफिया वाडि़या द्वारा संस्‍थापित अन्‍तर्राष्‍ट्रीय, साहित्यिक एवं सांस्‍कृतिक संस्‍था पी. ई. एन. (poets Essayist and Novelist) द्वारा मैथिलीकेँ मान्‍यता प्राप्‍त हो। उक्‍त संस्‍थाक ई सक्रिय सदस्‍य भ’ भारतीय भाषा एवं विदेशी साहित्यानुरागी लोकनिक ध्‍यान मैथिली भाषा आ साहित्‍यक परातन एवं अधुनातन उत्‍कर्षसँ अवगत करयबाक निमित्त आन्‍दोलनोन्‍मुख भ’ एकर पुनराख्यान क’ उक्‍त संस्‍था द्वारा मैथिलीकेँ मान्‍यता दिऔलनि जकर विस्‍तृत विवरण ओकर कार्य विवरिणीमे प्रकाशित अछि। बिहारक तत्‍कालीन राज्यपाल डा. रंगनाथ रामचन्‍द्र दिवाकर ऑल इण्डिया रेडियोपर एक भाषण देलनि जाहि मे ओ हृदयसँ अपन उद्गार व्‍यक्‍त करैत उद्घोषणा कयने रहथि जे मैथिली ज्ञान ग्रन्‍थस्‍थ प्राचीनतम भाषा थिक जे हिनका आन्‍दोन्‍मुख करबामे अति महत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। ई घटना सन् ।956 ई. क थिक। उक्‍त भाषणक एक ऐतिहासिक परिदृश्‍य अछि जे मैथिली अन्‍दोलनक सक्रियतामे हिनका दिशा निर्देश कयलक। हिनक कर्मभूमि सेहो इलाहाबाद विश्‍वविद्यालयमे रहलनि जतय गणतन्‍त्र भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरूक जन्‍मभूमि छनि। ओ अवकाश भेटलापर निश्चित रूपेँ ओतय अबैत-जाइत रहथि। अखिल भारतीय मैथिली साहित्‍यक अध्‍यक्ष आ विश्‍वविद्यालयमे अङरेजी विभाग व्‍याख्‍याताक रूपमे ओ प्रधानमंत्रीसँ सन् ।960 ई. मे आनन्‍द भवनमे दर्शनार्थीक रूपमे मैथिलीक दू पुस्‍तक वैद्यनाथ मिश्र यात्री (।9।।-।998)क काव्‍य-संग्रह चित्रा आ गल्पाञ्जलि कथा-संग्रह हुनका उपहार देलथिन, संगहि अनुरोध कयलथिन जे मैथिली भाषा आ साहित्‍यक गौरवशाली साहित्यिक परम्‍परा तेरहम शताब्‍दीसँ उपलब्‍ध अछि, किन्‍तु सरकारी मान्‍यताक अभावमे ई सर्वथा उपेक्षित अछि। पण्डित नेहरू ध्‍यान पूर्वक आ स्‍नेह पूर्वक हुनक नात सुनलथिन आ कहल‍थिन Institutional reorganization is not soul management of the richness of a language. We enjoy with sound literature? प्रदर्शनी-प्रेरणा: ओतहि हुनका भेटलथिन इलाहाबाद हाईकोर्टक चीफ जस्‍टीस न्‍यायमूर्ति बी. मल्लिक। ओ हुनका कहलथिन, एहि रूपेँ अहाँक मातृभाषाकेँ मान्‍यता नहि भेटि सकैछ। ओ सलाह देलथिन, एहि लेल आन्‍दोलनक तरीका अपनाबय पड़त, तखनहि अहाँक मातृभाषाकेँ मान्यता भेटि सकैछ। आन्दोलनक तरीका थिक जे अपन मातृभाषाक समृद्धशाली, गौरवशाली आ वैभवशाली परम्परासँ जनमानसक संगहि-संग साहित्‍य चिन्‍तक लोकनिक ध्‍यानाकर्षित करबाक उपक्रम करू। न्‍यायमूर्त्ति जस्‍टीस मल्लिकक सत्‍प्रेरणा आ यथार्थ विचारसँ उत्‍प्रेरित भ’ कए ओ इलाहाबादमे सर गंगानाथ झा संस्‍कृत रिसर्च इन्‍सच्‍युटमे ।5 दिसम्‍बर ।96। ई. मे मैथिली पुस्‍तक प्रदर्शनीक प्रथम आयोजन कयलनि तथा ओकर उद्घाटन करबाक लेल जस्‍टीस मल्ल्किसँ अनुरोध कयलथिन। ताधरि जस्‍टीस मल्लिक भारत सरकारक कमीशन फॉर माइनो रीटी लैग्वेजजक चेयरमैन पदपर सुशोभित भ’ गेल रहथि। ई सुखद संयोग थिक जे उक्‍त पुस्‍तक प्रदर्शनीक उद्घाटन करबाक दायित्त्व जस्‍टीस मल्लिक स्‍वीकार कयल थिन, जाहिमे ओहिठामक प्रबुद्ध साहित्‍य चिन्‍तक लोकनि भाषा आ साहित्‍यक प्राचीनतम गौरवशाली परम्‍परासँ अवगत भेलाह जे हुनकापर अमिट छाप छौड़लक। उक्‍त अवसरपर यशस्‍वी कवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री मैथिलीमे काव्‍य-पाठ कयने रहथि। इलाहाबाद पुस्‍तक प्रदर्शनीसँ अनुप्राणित आ अनुझोरित भ’ कए ओ सोचलनि जे एहन प्रदर्शनीक आयोजन गणतन्‍त्र भारतक राजधानी दिल्‍लीमे कयल जाय तँ निश्चित रूपेँ मैथिली भाषा आ साहित्‍यकेँ मान्‍यता भेटबामे कोनो बाधा नहि आबि सकैछ। हुनकापर आन्‍दोलनक भूत एहन सवार भ’ गेल छलनि। एकर आयोजनार्थ ओ अपन प्रोभिडेण्‍ड फण्‍डसँ लोन ल’ कए 8 आ 9 जनवरी ।963 ई. मे दिल्‍लीक आजाद भवनमे ऐतिहासिक राष्‍ट्रीय पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि जाहिमे मिथिलाञ्चल एवं प्रवासस्‍थ मैथिली प्रेमी लोकनिसँ चन्‍दा एकत्रित कयल गेल आ भालण्‍टीयर सहभागी भेल रहथि। प्रदर्शनीक सजावट हृदयाकर्षक छल। बहुतायाद मैथिली पुस्‍तकादि पाण्‍डुलिपि एकत्रित कयल गेल छल जाहिमे मिथिला संस्‍कृत रिसर्च इन्‍स्‍टीच्‍युट दरभंगा आ पटना विश्‍वविद्यालय विशेष उल्‍लेखनीय भूमिकाक निर्वाह कयलक। सांसद रूपमे ललितनारायण मिश्र (।922-।975) एवं यमुना प्रसाद मण्‍डल सहभागी भेल रह‍थि। भारत सरकारक संसदीय आ ऑल इण्डिया व्राडकास्टिंगक मंत्री बाबू सत्‍यनारायण सिंहक अपरिमित सहयोगसँ प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू उक्‍त प्रदर्शनीक उद्धाटन कयलनि। यद्यपि ओ पन्‍द्रह मिनट विलम्‍बसँ पहुँचल रहथि, किन्‍तु पुस्तक एवं पाण्‍डुलिपिक अम्‍बार देखि ओ हतप्रद भ’ गेल रहथि अपन उद्घाटन भाषणमे जे बजलथिन ओ कल्पनाक विपरीते अनुभव भेलनि आयोजक जयकान्‍त मिश्रकेँ। भीजिटिंग रजिस्‍टरमे ओ टिप्‍पणी कयलथिन, I was happy to inaugurate Maithili Book Exhibition and to see the largecollectio  of books and Maneserispts in Maithili, this demonstnated that Maithili has been for long time and is to day a living among the people of that area. The lagnage deerves encou rgemend ?  एहि प्रदर्शनीकेँ सफल बनयबाक लेल हास्‍य-व्‍यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा (।908-।984), मायानन्‍द मिश्र (।934), रामस्‍वरूप नटुआक अतिरिक्त अनेको गण्य-मान्‍य राजनैतिक, मैथिली साहित्‍य प्रेमी उनटि क’ प्रदर्शनीकेँ सफल बनयबाक हेतु उपस्थित भेल रहथि। प्रदर्शनीक शानदार सजावट मिथिलाञ्चल पेंटिंगक कारणेँ समग्र कार्यक्रमक झाँकी सिनेमा होलमे प्रदर्शित भेल जे मैथिलीक हेतु एक ऐतिहासिक घटना थिक। उक्‍त प्रदर्शनीक सफलता एहि बातक सबल प्रमाण थिक जे ओ एक सफल आयोजक रहथि तथा मैथिली आन्‍दोलनकेँ एक डेग आगू बढ़ौलनि। साहित्‍य-अकादेमी-सामान्‍य परिषद मैथिली पुस्‍तक प्रदर्शनी मै‍थिली आन्‍दोलनकेँ तीव्र करबा प्रियासक शुभारम्‍भ कुशल नेतृत्त्व मे आगाँ ससरल। एही अवधिमे एक ऐतिहासिक घटना भेल। हिनक पिताश्री महामोपाध्‍याय डॉक्टर उमेश मिश्र (।895-।967)क नियुक्ति सर कामेश्‍वर सिंह संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय दरभंगाक कुलपित करूपमे भेलनि। ई सुखद संयोग छल जे हुनक कार्यकालमे साहित्‍य अकादेमीक सामान्य परिषदक विश्‍वविद्यालयक प्रतिनिधित्त्व करबाक हेतु एक प्रतिनिधिक नाम अनुशंसित करबाक सूचना भेटलनि। मातृभाषनुरागी कुलपतिक अतीव इच्‍छा छलनि जे एहन व्‍यक्तिक नाम अनुशंसित कयल जाय जे मैथिलीक मान्‍यतार्थ एहि भाषा आ साहित्‍यक पुरातन परम्पराक उपस्‍थापन सबल तर्क द्वारा प्रस्‍तुत क’ कए ओकर अध्‍यक्ष पण्डित जवाहर लाल नेहरूकेँ कन्भीन्‍स कहलि सकथि अंग्रेजीमे। कुलपति कर्यालय तीन वेर प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्रक नाम प्रस्‍तावित क’ हुनक अनुमोदनार्थ प्रस्‍तुत कयलक, किन्‍तु कुलपति बारम्‍बार बिनु कोनो टिप्‍पणी कयने फाइल वापस क’ दे‍थि। हुनका एहि बातक आशंका छलनि जे जनमानस ई आरोप लगाओत जे अपन पुत्रक नाम अनुशंसित कयलनि। सामाजिक दवाब एवं मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी जयकांत मिश्रक नाम अनुशंसित कयलथिन आ ओ सामान्‍य परिषद्क सदस्‍य मनोनीत भ’ गेलाह। ओ अपन मातृभाषा मैथिलीक मान्‍यतार्थ साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषदमे आन्‍दोलन प्रारम्‍भ कयलनि। मैथिलीक मान्‍यता मैथिलीक मान्‍यता साहित्‍य अकादेमी अबिलम्‍ब दिय, ताहि हेतु ओ फाँड़बान्हि क’ आन्‍दोलनक शुभारम्‍भ कयलनि तनिक बलिदानक इतिहास जनमानससँ नुकायल नहि अछि। सामान्‍य परिषदक सम्‍मानीय सदस्‍य लोकनिक मैथिलीक गौरव गरिमाक ध्‍यानाकर्षित करबाक आ एकर महत्त्व निरुपित करबाक निमित्त अङरेजीमे दू बुक लेट ओ लिखलनि A Case for Maithili आ What they say about Maithili तकरा सदस्‍य लोकनिक बीच वितरित करब प्रारम्‍भ कयलनि। यद्यपि दिल्‍लीमे आयोजित पुस्‍तक प्रदर्शनीमे पण्डित नेहरू एहि बातक संकेत देने रहथि जे एहि पुरातन भाषाकेँ मान्यता भेटबाक चाही, किन्‍तु मैथिलीक दुर्भाग्‍य रहल जे अ‍कस्‍मात हुनक निधन भ’ गेलनि। हुनक मृत्‍यु परान्त मैथिलीक परम हितौषी प्रख्‍यात भाषाशास्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चट्टोपाध्‍याय (।890-।977) अकादेमीक अध्‍यक्ष बनलाह जे एकर गौरव-गरिमा आ पुरातनतासँ नीक जकाँ परिचित रहथि। प्रोफेसर चट्टोपाध्‍यायक अध्‍यक्ष बनितहि ई अत्यधिक आशान्वित भ’ गेलाह जे मैथिलीक मान्‍यता भेटबामे मात्र वैधानिक आशान्वित्त भ’ गेलाह जे मैथिलीक मान्‍यता भेटबामे मात्र वैधानिक प्रक्रिया शेष रहि गेल अछि। अकादेमी एहि लेल एक समिति गठित कयलक जकर सदस्‍य रहथि भाषाविद् प्रोफेसर डॉ. सुकार सेन (।900-।992) प्रोफेसर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (।907-।979) आ डॉ. सुभद्र झा (।909-2000)। ई बैसक दिल्‍लीमे आहूत भेल एकर मान्‍यतार्थ। समितिक अनुशंसापर साहित्‍य अकादेमी सन् ।965 ई. मे मैथिली भाषा आ साहित्‍यकेँ आधुनिक भारतीय भाषाक रूपमे मान्‍यता प्रदान कयलक। एहि दिशामे प्रोफेसर जयकान्त मिश्रक आन्‍दोलनात्‍मक स्‍वरूप ऐतिहासिक घटनाक रूपमे सतत चिरस्‍मरणीय रहत मैथिली आन्‍दोलनक इतिहासमे। लिपि-संरक्षण : अन्‍य स्‍वतंत्र साहित्यिक आधुनिक भारतीय भाषादिक समान मैथिली भाषाकेँ अपन प्राचीन स्‍वतन्‍त्र लिपि छैक जकरा तिरहुता वा मिथिलाक्षर वा मैथिलाक्षर वा मैथिलीलिपि कहल जाइछ। तिरहुता नामसँ ज्ञात होइछ जे ई लिपि तिरहुत देशक थिक। जहिना भाषा आ सभ्‍यता एवं संस्‍कृति परस्‍पर अन्‍योन्‍याश्रित अछि तहिना लिपि आ भाषाक सम्‍बन्‍ध छैक। अपन लिपिसँ जहिना-जहिना सम्‍बन्ध विच्छेद होइत जायत तहिना-तहिना भाषाक प्रति ताहि अनुपातमे आकर्षण कम होइत जायत तकर प्रकृष्‍ट उदाहरण थिक मैथिली एहि लिपिक जाननिहारक संख्‍या दिनानुदिन नगण्ण होइत देखि जयकान्त मिश्रकेँ मर्मान्‍तक पीड़ा होइत छलनि। एहि समस्‍यापर ओ गम्‍भीरता पूर्वक विचार कयलनि आ एकर संरक्षणार्थ आन्‍दोलन चलौलनि। साहित्‍य अकादेमीमे मैथिलीक स्‍वीकृति प्रश्‍नपर बारम्बार ई समस्‍या उत्‍पन्‍न भेल छल, की एकरा अपन स्‍वतन्त्र लिपि छैक वा नहि ओ एहि समस्‍याक समाधानमे तर्क देलथिन जे एकरा अपन स्‍वतन्‍त्र लिपि छैक जकर इतिहास अति प्राचीन छैक। हुनक मान्‍यता छलनि जे मैथिलीक स्‍वतन्त्र लिपिक अस्तित्त्व स्‍थापित करबामे जे कठिनता लिपिक कारणेँ भेलनि आ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे भ’ रहल से नहि होइत जँ हमरा लोकनि एकरा संरक्षित रखने रहितहुँ तँ ई प्रश्‍न कथमपि नहि उठैत। वार्त्तालापक क्रममे ओ हमरा एक बेर कहने रहथि जे पुरातन कालमे समग्र मिथिलाञ्चलमे तिरहुता लिपिक संगहि कैथी लिपिक प्रचलन छलैक। दरभंगा राजक कार्य-कलापमे सेहो तिरहुता लिपिक प्रयोग होइत छलैक, किन्‍तु ओकरा वहिष्कृत क’ कए हिन्‍दी बहुल देवनागरी लिपिकेँ लादि देल गेलैक जकर भयंकर दुष्‍परिणाम भेलैक जे शनैः–शनैः जनमानससँ ई विलुप्त होइत चल गेल। एकरे फलस्‍वरूप मैथिली सदृश प्राचीनतम भाषाकेँ वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे हिन्‍दीक अंगक रूपमे उद्घोषणा कयलनि जेना व्रजभाषा आ अवधीक प्रसंगमे कहल जाइछ। जँ तिरहुता लिपि प्रचलित रहैत आ एकर साहित्‍य सृजन एही लिपि मे होइत तँ एहन विवादक उद्भावना कथमपि नहि उपस्थित होइत। संस्‍कृतक हेतु वैकल्पिक रूपमे समस्‍त भारतमे देवनागरी लिपि व्‍यवहृत होमय लागल तकर प्रभाव मिथिलाञ्चलपर पड़ल आ मैथिली साहित्‍यक निर्माता लोकनि तिरहुताक स्‍थानपर देवनागरी लिपिक प्रयोग करय लगलाह जे मैथिलीक लेल कालदिवसक इतिहास प्रारम्‍भ भेल। यद्यपि एहि लिपिक संरक्षणार्थ कतिपय आन्‍दोलन अवश्‍य कयल गेल, किन्‍तु कोनो प्रयास सफल नहि भ’ सफल। दरभंगासँ तिरहुता लिपिमे समाचार पत्र बहार करबाक प्रयास कयल गेलेक, मुदा ओहो विफल रहल। मैथिली भाषी जनमानस तिरहुता आ कैथी लिपिमे पढ़ैत-लिखैत छल आ एहिसँ अतिरिक्‍त कोनो लिपिक प्रयोगक ज्ञान भण्‍डारसँ जीवनाथ राय (।89।-।969) बाङला लिपिक आधारपर टाइप अवश्‍य बनाओल गेल आ ओ ‘मैथिली’ प्रथम पुस्‍तकक रचना कयलनि, परन्‍तु ओहो प्रयास सफल नहि भ’ पौलक। जखन मैथिली कोश प्रकाशित करबाक प्रश्‍न उपस्थित भेलनि तखन ओ विशुद्ध तिरहुता लिपिक टाइप बनबयबाक अथक आन्‍दोलन कयलनि, कारण हुनका बलबती आकांक्षा छलनि जे तिरहुता लिपिमे कोश प्रकाशित हो। एहि भावनासँ उत्‍प्रेरित भ’ तिरहुता ककहारा (।967) नामक एक बुक‍लेट छपौलनि। दैव दुर्योग एहन भेल जे हुनक ई आन्‍दोलन सफल नहि भ’ पौलनि। हुनक तर्क छलनि जँ हमरा लोकनि एकरा साहित्‍यक रिसर्ज अधिक सुकर होइत। वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे एकर पुनरूत्थान करबाक हेतु ओ आन्‍दोलनोन्‍मुख रहथि कारण रिसर्च आ सांस्‍कृतिक कार्यादिमे अलंकरणक रूपमे विशेष उपादेय होयत। हम व्‍यक्तिगत रूपेँ जनैत छी जे कतेक बेर विश्‍वविद्यालय अनुदाय आयोगक मीटिंगमे किछु गोरे तिरहुता लिपिकेँ वहिष्‍कृत करबाक सुनियोजित योजना वद्ध भ’ आयल रहथि कारण ओ सभ तिरहुता लिपिसँ सर्वथा अनभिज्ञ रहथि। हम उक्‍त मीटिंगमे सहभागी छलहुँ। ओ अडिग रहला जे एकर पुरातन अस्तित्त्वकेँ संरक्षित राखब नितान्त प्रयोजनीय थिक। प्रत्‍येक मैथिली प्रेमी जनमानसक संगहि-संग विशेषत: मै‍‍थिली पढ़निहार छात्र आ मैथिली पढ़ौनिहार शिक्षक समुदायकेँ सतत ओ उत्‍प्रेरित करैत रहथि तिरहुता लिपि सिखबाक। अधिकांश मातृभाषानुरागीकेँ ओ उक्‍त लिपिमे पत्र लिखथि जनिका एकर ज्ञान छनि। एहन कतिपय पत्र हमरो लग अछि। प्राथमिक शिक्षा-मातृभाषा प्राथमिक शिक्षा आ मातृभाषा दुनूक परस्‍पराश्रित अछि। शिक्षा मानव जीवनक मेरुदण्‍ड थिक। शिक्षाक उद्देश्‍य थिक ज्ञानार्जन। ज्ञानार्जनक हेतु भाषा माध्‍यम थिक। अतएव कोनो भाषाक सफलता एहि बातपर अवलम्वित अछि जे कोन सीमा धरि ज्ञानार्जन आ अर्जित ज्ञानक अभिव्‍यक्तिमे सहायक होइछ, जकरा द्वारा व्‍यक्तित्वक निर्माण होइछ आ आन्तरिक गुणक शक्तिक विकास तथा ओ एक उत्तरदायी नागरिक रूपमे जनमानसक समक्ष प्रस्‍तुत होइछ। मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा एक सिक्‍काक दू पहलू थिक। अतएव प्रारम्भिकावस्‍थामे जीवनमे मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा दुनूक प्राथमिकता अपेक्षित अछि। एहि प्रसंगे भारतेन्दु बाबू हरिश्‍चन्‍द्र (।950-।885)क कथन छनि : निज भाषा उन्‍नति अहै, सब उन्‍नति की मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान केँ, मिटय न हृदयक मूल। मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक नहि व्‍यवस्‍था रहलाक कारणेँ हुनका हृदयमे अपार पीड़ा छलनि। एहि लेल ओ पृथकसँ जन आन्‍दोलन चलयबाक अभियान अवश्‍य चलौलनि, किन्‍तु बिहार सरकारक उदासीनताक कारणेँ हुनक ई स्‍वप्‍न साकार नहि भ’ पौलनि। हमरा जनैत मिथिलावासी अपन मातृभाषाक महत्त्व नहि बुझबाक ई दुखद परिणाम थिक। जँ जनमानस अपन बाल-गोपालकेँ मातृभाषाक महत्त्वसँ वस्‍तुत: अवगत करबि‍तथि तँ  एहन स्‍वस्‍थ वातावरणक निर्माण होइत जे सरकारकेँ बाध्‍य भ’ कए प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्‍यमे लागू करय पड़ितैक। जखन डॉ. जगन्‍नाथ मिश्र बिहारक मुख्‍यमंत्रीक पदपर सिंहासनारुढ़ भेलाह तखन जयकान्‍त मिश्र अत्‍यधिक आशन्वित भेला जे मातृभाषानुरागी मुख्‍यमंत्री मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक उद्धोषणा अवश्‍य करता। किन्‍तु ओकर कोनो फलाफल नहि बहरायल। हुनक अवधारणा छलनि जे जँ प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा मैथिलीक माध्‍यमे होइत तँ मिथिलाञ्चलक अधिकांश समस्‍याक समाधान स्‍वत: भ’ जाइत। मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा नहि भेटबाक कारणेँ नेना-भुटकाकेँ शिक्षाक प्रतिरुचि भ’ जाइछ, जकर परिणाम होइछ जे विद्यालयसँ ओकर पलायन भ’ जाइछ। इएह प्रमुख कारण थिक जे प्राथमिक स्‍तरपर मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक कार्यान्‍वयन हेतु ओ जीवन पर्यन्‍त आन्‍दोलनक संघर्ष करैत रहला। मिथिलाञ्चलमे मातृभाषा मै‍‍थिलीकेँ प्राथमिक स्‍तरपर शिक्षा नीति लागू करयबाक हेतु ओ पदयात्रा, वैसार, प्रचार अभियान तँ करबे कयलनि, एतेक धरि जे ओ कानूनी लड़ाइ लड़बामे पाछू नहि रहला। एहि प्रसंगमे हुनक कथन छलनि जे आन-आन देश उन्‍नतिक शिखरपर पहुँचल अछि तकर प्रमुख कारण थिक जे ओ अपन मातृभाषाक महत्त्वसँ पूर्ण अवगत अछि। रुस, जापान, इंग्‍लैण्‍ड, अमेरिका आदि देशमे प्राथमिक शिक्षा ओकर मातृभाषाक माध्‍यमे देल जाइछ जे प्रगतिक पथपर दिनानुदिन अग्रसर भेल जा रहल अछि। ओ एहि विषयसँ मर्माहत रहथि जे मिथिलाञ्चलमे जनजागरणक अभावक शिक्षा लागू करयबाक दिशामे प्रयत्‍नशील नहि छथि। मै‍थिली शिक्षक मैथिली पढ़यबाक हेतु सचेष्‍ट नहि छथि। यावत् मैथिल समाज एहि प्रश्‍नक यशोचित उत्तर नहि देत, तावत मैथिलीकेँ आगाँ बढ़बाक कोनो आन्‍दोलन सफल नहि भ’ सकैछ। सन् ।969 ई. मे मिथिला मण्‍डल मुम्‍बईक तत्त्वावधान मे आयोजित अखिल भारतीय मैथिली सम्‍मेलनमे विचारणीय विन्‍दु छल मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा। उक्‍त सम्‍मेलनमे विश्‍वविद्यालयक प्रतिनिधि रूपमे हम सम्मिलित भेल छलहुँ। ओतय मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक कार्यान्‍वयनार्थ एक समिति गठित भेलैक जकर सदस्‍य हम सेहो छलहुँ आ प्रोफेसर जयकान्‍त मिश्र ओ अध्‍यक्ष रहथि। निर्णय निम्‍नस्‍थ अछि। 1. शैशवावस्‍थामे मातृभाषाक माध्‍यमे शिक्षाक व्‍यवस्‍था रहलापर ओकर ज्ञान आ मस्तिष्क विकास सहज, सुगम आ सुव्‍यवस्थित होइछ। विषय वस्‍तुक ज्ञान आरम्भिक संस्‍कार स्‍थायी होइछ। ओ सुगमता पूर्वक सब वस्‍तुक ज्ञान आरम्भिक संस्‍कार स्‍थायी होइछ। ओ सुगमता पूर्वक सब वस्‍तु ग्रहण करैछ जे विषय-वस्‍तु बुझबामे सहायक होइछ। एहिमे कोनो सन्‍देह नहि जे सुगमता पूर्वक ओकर विकासक सम्भावना अछि। 2. प्रजातन्‍त्रक प्रथम शर्त्त थिक जनमानसकेँ शिक्षित करब, जाहिसँ ओ कोनो कार्य सम्‍पूर्ण शक्तिक संग सहर्ष करता ओकर शक्ति विषय-वस्‍तु बुझबामे सहायक होइछ। जखन कोना समस्‍या उत्‍पन्न हैत तँ ओकर समाधान ओ आसानीसँ क’ पबैछ। मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा जीवित प्रजातन्‍त्रक मूल मन्‍त्र थिक। 3. एहिमे कोनो सन्‍देह नहि जे प्राथमिक शिक्षा मातृभाषाक माध्‍यमे देल जाय, कारण मै‍थिली एक प्राचीनतम जीवित भाषा थिक तेँ एकरा अनिवार्य रूपेँ लागू करबाक दिशामे प्रयासक प्रयोजन अछि आ बिहार राज्‍यक अधिकांश जिलामे ई बाजल जाइत अछि ततय अनिवार्य रूपेँ एकरा लागू करबाक हेतु सरकारपर दवाब बनायब आवश्‍यक अछि। किन्‍तु दुर्योगक विषय थिक जे सरकारक उदासीनताक कारणेँ ने तँ मै‍थिलीमे प्रा‍थमिक शिक्षाक पुस्‍तक प्रकाशित भेल आ ने तँ ओकर अध्‍यापनक व्‍यवस्‍था अद्यापि भेल अछि जे चिन्‍तनीय विषय थिक। अतएव सरकार एहि नीतिक विरोधमे जनमत संग्रह क’ कए सशक्‍त आन्‍दोलनक प्रेरणा ओ देलनि जे मूक बधिर सरकारकेँ जगयबाक प्रयोजन अछि। सुसुप्‍त सरकारकेँ जाधरि जगाओल नहि जायत ताधरि मिथिलाञ्चलमे प्राथमिक शिक्षाक माध्‍यम मैथिलीकेँ नहि भेटला मिथिला आ मै‍थिलीक सर्वतो भावेन विकास आ विविध समस्‍यादिक निदान ओकर निराकरण ताधार सम्भावित नहि अछि जाधरि ओहिसँ लड़बाक शक्तिक लेल आवश्‍यकता अछि जनमानसक चेतन विचार आ सक्रिय सहयोग। एहि लेल मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षा अपेक्षित अछि। हिनका द्वारा चलाओल गेल एहि आन्‍दोलनकेँ साकार रूप देबाक दिशामे प्रयास अपेक्षित अछि। ई विषय अद्यापि अस्‍पष्‍ट अछि जे भारतीय संविधान, साहित्य अकादेमी आ अन्‍तर्राष्‍ट्रीय साहित्यिक संस्‍था पी.ई.एन. द्वारा एहि भाषा आ साहित्‍यकेँ मान्‍तता प्राप्त अछि तखन बिहार सरकार प्राथमिक शिक्षाक रूपमे एकरा लागू किएक ने करैत अछि? एकरा लागू कयलासँ सरकारक प्रतिष्‍ठामे विकास होयतैक आ जनमत ओकरा पक्षमे अनायासहि आकर्षित भ’ जायत। आन्दोलन-नवआयाम : जयकान्‍त मिश्र मैथिली आन्‍दोलनकेँ नव स्‍वरूप प्रदान करबाक आकांक्षी रहथि, कारण हुनक प्रबल इच्‍छा छलनि जे आन्‍दोलन सम्‍बन्‍धी कार्यक्रमकेँ रुचित करबाक निमित्त झुण्‍ड बान्हिक, ढोल बजा क’, गाम-गाममे घूमि क’ मातृभाषाक की महत्त्व छैक तकरा बुझायब परमावश्‍यक अछि। एहि लेल मुख्‍य-मुख्‍य स्‍थानपर मीटिंगक आयोजन करब आ मातृभाषाक वास्‍तविक महत्त्व आ तज्‍जनित विविध समस्‍यादिसँ जनमानसक ध्‍यानार्षित करबा मैथिली भाषापर मात्र ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक वर्चस्वकेँ समाप्त करबाक लेल सेहो आन्दोलनक आवश्यकता अछि तकर ओ अनुभव कयलनि। ओ मिथिलाञ्चलक मुसलमानकेँ मै‍थिली आन्‍दोलनक संग जोड़बाक बलवती इच्‍छा शक्ति छलनि हुनका। ओ एहन आन्‍दोलनक आकांक्षी रहथि जे जनमानस वैह यथार्थ रूपेँ प्रतिनिधित्त्व क’ सकैछ जे ओहि अंचल, ओहि क्षेत्रक, ओहि समाजक सर्वांगीन विकास आ उन्नतिक हेतु सतत सक्रिय रहथि। किन्‍तु असीम पीड़ा हुनका एहि बातक छलनि जे मिथिलाञ्चल अपन विकासक लेल आन्दोलनक प्रति सतत उदासीन रहल अछि। मैथिली आन्‍दोलनमे तीव्रता अनबाक हेतु जाधरि सांसद विधायक आ ग्राम पंचायत प्रतिनिधिक सहयोग नहि भेटत ताधरि ई धारदार नहि भ’ सकैछ। ओ एहि बातसँ अत्यधिक दु:खी रहथि जे मिथिलाञ्चलसँ निर्वाचित प्रतिनिधि लोकनिमे मातृभाषाक प्रति जनजागरणक अभाव परिलक्षित भेलनि। जयकान्‍त मिश्र मैथिली आन्‍दोलनकेँ नव आयाग प्रदान करबाक प्रयास कयलनि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि एकरा राष्‍ट्रीय रूप नहि प्रदान कयल जायत ताधरि मै‍थिली भाषाआ साहित्‍यक विकासक सम्‍मावना नहि। जहिना ओड़िया भाषी, असमिया भाषी आ नेपाली भाषीकेँ अपन भाषा आ साहित्‍यक प्रति अगाध श्रद्धा आ सम्‍मान छैक जे अपन चिर स्‍नेही अपार भाषा जननीक नारा बुलन्‍द करैत अछि तहिना मैथिली भाषीकेँ सेहो अपन भाषा आ साहित्‍यक प्रति स्‍नेह आ श्रद्धा उत्‍पन्‍न करबाक लेल आन्‍दोलनक प्रयोजनक ओ अनुभव कयलनि। जाहि-जाहि भाषा आ साहित्‍यकेँ साहित्‍य अकादेमी मान्‍यता देने अछि ओहि सब भाषा-समूहकेँ भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूचीमे नहि सम्मिलित कयल जायत तकरा लेल एकरात्‍मकता सूत्रमे आबद्ध भ’ राष्‍ट्रीय स्‍तरपर आन्‍दोलनक प्रयोजन अछि। एहि आन्‍दोलनकेँ तीव्रतर रूप देबाक हेतु अनेक गामक ओ पद-यात्रा कयलनि आ जिला-जिलामे जन आन्‍दोलनक करबाक आह्वान कयलनि। हुनक दृढ़ धारण्‍त छलनि ज मैथिली आन्‍दोलन तँ पत्र-पत्रिका, पत्रकार, साहित्‍यकार आ सहृदय मैथिली प्रेमी धरि सीमित अछि तकरा व्‍यापक परिधिमे अनबाक प्रयोजन अछि। हुनक धारणा छलनि जे जाधरि एकरा राष्‍ट्रीय स्‍वरूप नहि देल जायत ताधरि एहि भाषाक विकास आ कल्‍याणक सम्भावना हुनका दृष्टिगत नहि होइत छलनि। एहि प्रसंगमे हुनक धारणा छलनि, जहिना पौल रोवसन रचित गीतकेँ लूथर किंग नामक निग्रो नेता निग्रो आन्‍दोलनमे उपयोग कयलनि तहिना हमरा लोकनिकेँ अपन भाषाक संग्राम गीत घोषित करबाक आवश्‍यकता अछि: we shall over come, we shall over come we shall over came some day, o! deep in my heart I do Leo live, we shall over come some day we will hare in peace, we will ho hand in hand हुनक मान्‍यता छलनि जे जाधरि मिथिलाञ्चल वासी उपर्युक्‍त काव्‍यांशसँ नहि अनु प्राणित हैता ताधरि हमर आन्‍दोलनकारी स्‍वरूपक यथार्थ परिचय नहि आ उपलब्धि नहि भ’ सकैछ। मै‍थिली आन्‍दोलन जकर ओ सूत्रधार रह‍थि अनेक धरि ओकरा चलौलनि तकरा ओ टिमटिमाइत दीप मानैत रहथि। मैथिलीक नामपर जतेक आन्‍दोलन चलाओल जा रहल अछि ओ साधारणत: हमर आन्‍दोलनकेँ उजागर करैत अछि। छोट-छोट बातकेँ ल, कए आन्‍दोलन करब तकरा ओ कथमपि आन्‍दोलनक संज्ञासँ नहि अलंकृत करैत रहथि। मैथिली आन्‍दोलनकेँ संचालित करबाक लेल ओ विराट शक्तिक ओ अनुभव कयलनि। मैथिली भाषी द्वारा संचालित आन्‍दोलनकेँ ओ तकरा विकास नहि, प्रत्‍युत विनाश मानैत रहथि। मैथिली आनदोलनक असफलताक कारणक उल्‍लेख करैत हुनक कथन छलनि जे पंजाबी आ उर्दू सदृश हमर भाषाक कोनो धर्मसँ सम्वद्ध नहि अछि। मैथिली बजनिहारक संख्‍या भारतमे सातम अछि। हमर भाषाकेँ स्‍वतन्‍त्र लिपि छैक। एकर अतीत अत्‍यन्‍त समज्‍जवल अछि। हमर महान सांस्‍कृतिक परम्‍परा विश्‍वकेँ दिशा विदेशी करैत रहल अछि। सांस्‍कृतिक अस्मिताक रक्षाक लेल आन्‍दोलन आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे धर्म थिक। अपन जीवनक परिणत वयमे मिथिलाकेँ स्‍वतन्‍त्र राज्‍यक रूपमे स्‍थापनार्थ आन्‍दोलनमे सहभागी भेलाह तथा एहि अभियानकेँ सफल बनयबाक दिशामे संघर्षरत भेलाह। अपन स्‍वाभिमानक रक्षार्थ ओ आन्‍दोलनक अग्निकेँ प्रज्‍वलित कयलनि जे अद्यापि जनमानस संघर्षशील अछि। हुनक आकांक्षा छलनि जे राष्‍ट्रक अखण्‍डता आ एकता रहओ, किन्‍तु अपना घरमे, अपना जिला, अपना प्रान्‍तमे अपन भाषा आ संस्‍कृति अक्षुण्‍ण राखि अग्रसर हैबाक प्रयोजन अछि। लोक भरिपोख, भरिमन जीवित रहि देशक उन्‍नतिमे सहभागी हैत। कुण्ठित, कलुषित, हीन व्‍यक्तित्‍वक विकास कहियो नहि सम्‍भव अछि। ओ मातृभाषाकेँ जीवित रखबाक आकांक्षी रहथि, कारण मातृभाषाक मरण जीवनक प्रश्‍नक हेतु हमरा लोकनिकेँ कोनो सक्रिय डेग उठयबाक प्रयोजन अछि। एहि प्रसंगमे ओ एक महत्त्वपूर्ण बातक बरोबरि चर्चा करैत रहथि जे द्धितीय विश्‍वयुद्ध चलैत छल। फ्रांसकेँ चारुकातसँ जर्मन सेना घेरि नने छल। फ्रेंच अकादमीक पेरिस नगरमे सभा छल। एहि सभामे अधिकाधिक साहित्‍यकार ओ विद्वान् सम्मिलित भ’ नियमानुसार विचार-विमर्श कयलनि। हुनका सभक इएह दावी छलनि जे केहनो विकट आ संकटकालीन स्थितिमे भाषा आ साहित्‍यक कार्यक परित्‍याग करब समुचित नहि। ओ एहिसँ प्रेरणा देलनि जे मातृभाषाक माध्‍यमे प्राथमिक शिक्षाक प्रयोजनीयतापर प्रकाश देलनि। एहि विकट समस्‍याक समाधानक हेतु ओ विचार विमर्श क’ एकर समाधान तकबाक प्रेरणा देलनि। जँ मातृभाषाक रूपमे मै‍थिली सिखबाक, लिखबाक, पढ़बाक हिस्‍सक नहि लागत तँ आगाँ कखनो कहियो कोनो स्थितिमे आगाँ नहि बढ़ि सकब। एहि विडम्बनाकेँ हमरा सभकेँ बुझबाक थिक। अपन मातृभाषाकेँ जीवित रखबाक ओ मूलमन्‍त्र देलनि। एहि लेल समाजक दृष्टि सम्पन्‍न आ सामर्थ्‍यवान लोकक सहभागिता मैथिली आन्‍दोलनक लेल प्रयोजनीय अछि। जे यथार्थमे जुड़ल चेतनाक संग सामाजिक विकासकेँ दृष्टिमे राखि आन्‍दोलनक नेतृत्‍व करथि। ओ एहि बातकेँ स्‍वीकार करैत रहथि जे मैथिली आन्‍दोलनक लेल सशक्‍त नेतृत्त्वक आवश्‍यकता, दृढ़ इच्‍छा शक्ति, एकात्‍मकता आ समर्पण भावनासँ आन्‍दोलन कयलेपर अपन अधिकार प्राप्‍त करबामे कामयाबी भेटि सकैछ। केन्‍द्र हो वा राज्‍य सरकार ओ आन्‍दोलनक भाषा बुझैत अछि। एहि लेल जनजागरण क प्रयोजन अछि, विनु भय होहि न प्रीति। भाषा आ संस्‍कृतिक विकासक लेल संघर्ष करबाक ओ प्रेरणा देलनि। उपलब्धि : मै‍थिलीक वास्‍तविक विकासार्थ जयकान्‍त मिश्र द्वारा चलाओल आन्‍दोलनक कतिपय नव उपलब्धि थिक। हुनक आन्‍दोलनकारी स्‍वरूपक पहिल परिचय भेटैछ जे भारतक प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरूकेँ मैथिली भाषा आ साहित्‍यक गौरवशाली प्राचीन पराम्‍परासँ अवगत करौलनि तथा एकर विकासक लेल पथ प्रशस्‍त करबाक निवेदन कयलनि। मैथिली भाषा आ साहित्‍यक समृद्धशाली परम्‍परासँ जनमानसक ध्‍यान आकर्षित करबा लेल सन् 1961ई. आ सन् 1963ई. मे क्रमश: इलाहाबाद आ दिल्‍लीमे पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि। साहित्‍य अकादेमीक दिल्‍लीमे पुस्‍तक प्रदर्शनीक आयोजन कयलनि। साहित्‍य अकादेमीक सामान्‍य परिषद्क सदस्‍यक मनोनयनक पश्‍चात् अपन मातृभाषाक साहित्यिक पुरातन परम्‍परासँ अन्यान्‍य भारतीय भाषाभाषीकेँ एकर महत्त्वसँ अवगत करबाक निमित्त संघर्षशील भ’ कए आन्‍दोलन कयलनि जकर परिणाम सकरात्‍मक रहल आ मैथिलीकेँ मान्‍यता भेटल साहित्‍य अकादेमी द्वारा आ भारतीय संविधानक अष्‍टम अनुसूचीमे। मैथिली आन्‍दोलन सतल गतिशील तकर परिणाम अछि जे ओ शनै:शनै: नीचाँसँ ऊपर ससरल अछि। ई आन्‍दोलनक परिणाम थिक जे भारतीय संविधानक अष्‍टम अनुसूचीमे अपन स्‍थान स्‍वीकृत करौलक। मैथिलीक वास्‍तविक विकास हेतु अद्यापि आन्‍दोलन अपेक्षित अछि। आवश्‍यकता अछि जे हमरा लोकनि आन्‍दोलनोन्मुख भ’ प्रयास करबाक चाही जे राजभाषाक रूपमे एकरा स्‍वीकृति भटैक। हुनक एहि सकारात्‍मक आन्‍दोलनकेँ मूर्त्त रूप प्रदान करबामे मिथिलाञ्चल आ प्रवासी मातृभाषानुरागी संस्‍थादि अपरिमित सहयोग भेटलनि जकर पुनराख्‍यानक प्रयोजन नहि। जयकान्‍त मिश्र द्वारा चलाओल मैथिली आन्‍दोलन जे उपलब्धि प्राप्‍तकयलक अछि ओ सर्ववर्ग व्‍यापी भेल अछि आ बहुत अ‍ंशमे सफलता प्राप्‍त कयलक अछि। प्राथमिक शिक्षाक विषयमे मैथिलीकेँ कण्ठ मोकबाक जे सरकार प्रयास कयजक अछि ओहि दिस ओ ध्‍यानाकर्षित कयलनि। मैथिली आन्‍दोलनक इतिहास साक्षी अछि जे हमर विविध माङ क्रमश: स्‍वीकृति भेटैत गेल अछि आ राजनैतिक स्‍वीकृत भेटि पश्‍चात् ओहिसँ लाभान्वित होयबाक भरिगर दायित्त्व मातृभाषानुरागी लोकनिपर आबि गेल अछि लकर निर्वाह प्रत्‍येक मैथिल सपूतक पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। नि:सारण : मैथिली साहित्‍यक प्राचीन परम्‍पराकेँ इतिहास-लेखन द्वारा करबाक दिशामे, निखिल विश्‍वमे एकरा महत्त्व निरुपित करबाक दिशामे, जनजागरणक जे अभियान चलौलनि, एकर मान्‍यतार्थ सतत संघर्षशील रहला, मातृभाषाक समुचित विकासक लेल दधीचिक समान हड्डी गलौलनि तनिक अक्षय अवदानकेँ अग्रगाति आ अक्षुष्‍ण रखबाक दिशामे प्रत्‍येक मातृभाषानुरागी जनमानसक पुनीत कर्त्तवय थिक। ई श्रेय आ प्रेय हिनके छनि जे ओ अपन सत्‍प्रयाससँ मैथिली साहित्‍यक समृद्ध आव्‍यापक स्‍वरूप प्रदान कयलनि जे मैथिलीक अस्तित्त्व सुरक्षित रहि सकल। यद्यपि हुनका समक्ष कोनो आदर्श आ मार्ग प्रशस्त कयनिहार नहि छल तथापि मातृभाषाक सम्वर्द्धनार्थ ओ जे काज कयलनि तकर प्रभाव परवर्त्ती पीढ़ीपर पड़ल। एहि दृष्टिसँ ओ आदर्श पुरुष रहथि। ओ मार्ग निर्देशक बनि मातृभाषानुरागक बीजक वपन कयलनि आ ओकर उन्‍नयनार्थ अति महत्त्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलनि। हुनक तप, त्‍याग, तपस्‍या, कर्मशीलता, वैचारिक स्‍तर सतत अटल-अडिग रहनिहार मातृभाषानुरागी जनमानसकेँ चिरन्‍तन प्रेरणा-पुन्‍ज बनल रहला। ओ अपन अद्वितीय वैदुव्य आ मै‍थिली आन्‍दोलनक अग्रदूत बनि जे आदर्श छोड़ि गेलाह ओ मातृभाषानुरागी लोकनिक लेल सतत प्रेरणा स्रोत बनल रहला ओ परवर्त्ती पीढ़ीकेँ अनुसंधानक प्रेरणा देलनि जे अद्यापि मातृभाषाक विकासार्थ अनेक कार्य अवशेष अछि तकरा पूर्ति करबाक संकेत देलनि। हिनक मातृभाषाक अपरिमित बहुमूल्‍य साहित्यिक आ आन्‍दोलनकारी अवदानसँ अतिशय प्रभावित भ’ विश्रुत भाषा शास्‍त्री प्रोफेसर सुनीति कुमार चटर्जी मैथिली शब्‍द कोशक प्रथम खण्‍डे फॉरवार्ड लिखलनि ले डा. सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन (।850-।94।)क पश्‍चात भारतमे मै‍थिलीक सर्व श्रैष्‍ठहित चिन्‍तक रूपमे अजर अमर आ अक्षुण्‍ण रहता: His name will lee handed down to posterity in India as the greatest benefactor of Maithili at present day after that of illustrious George Abraham Gieryeson, and will earn for him gratitude of sixteen millions of Maithili speakers in the first instance and of the scholarly world of India, in the second वस्‍तुत: हिनक ई सौभाग्‍य रहलनि जे अपन जीवन काल ओ मैथिलीक विकास विस्‍तारकेँ देखि पौलनि। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍यमे हुनक आलेखादि यत्र-तत्र विविध संग्रहादिमे आ पत्रिकादिमे प्रकाशित अछि जे वर्त्तमानमे धूल-धूसरित भ’ रहल अछि तकरा एकत्रित क’ कए प्रकाशमे आनब प्रत्‍येक मै‍थिली भाषाभाषी मातृभाषानुरागीक पुनीत कर्त्तव्‍य थिक। इएह एहि युगपुरुषक प्रति वास्‍तविक श्रद्धाञ्जलि हैत जे हुनक मातृभाषानुरागक लेल व्‍य‍क्‍त विचारादि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्‍यमे प्रकाशित क’ कए परवर्त्ती भावी पीढ़ीक दिशा-बोध, मार्ग निर्देशनक पथ प्रशस्‍त करयबामे सक्षम भ’ पाओत अन्‍यथा ओ अक्षय कृति कालक प्रवाहमे गिरि-गह्वरमे विलीन भ’ जायत। १.     प्रकाश चन्द्र -नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा -विश्व रंगमंच दिवस : 27 मार्च २.बिपिन झा-भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल १. प्रकाश चन्द्र नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा विश्व रंगमंच दिवस : 27 मार्च सभ साल 27 मार्च क’ विश्व रंगमंच दिवस मनाओल जाइत अछि । वर्ष 1961 मे इंटरनेशनल थिएटर इस्टीट्यूट (आई. टी. आई.), यूनेस्को एहि दिवसक घोषणा केलक । ई गप्प 1959क अछि - हेलसिंकी शहर मे 27 मार्चक दिन पहिल बेर विश्वक रंगकर्मीक जमाबरा भेल छल । एहि आयोजनक नाम थिएटर कांग्रेस राखल गेल छल । आगू आबि क’ अही दिन के विश्व रंगमंच दिवस घोषित कयल गेल ।  इंटरनेशनल थिएटर इस्टीट्यूट वर्ष 1962 स’ लगातार 27 मार्च क’ अपन सभ केन्द्र पर आयोजन के रूप मे मनाबैत आबि रहल अछि । 1962 स’ एहन प्रावधान बनाओल गेल जे एहि दिनक लेल कोनो अंतरराष्ट्रीय रंग व्यक्तित्व के मनोनीत कयल जेतनि जे अपन संदेश देताह । एहि संदेश के  समूचा विश्व मे प्रसारित कयल जाएत ।  27 मार्च क’  सभ रंगकर्मी क बीच एकर पाठ कयल जाइत अछि । वर्ष 1962 मे सबस’ पहिल रंग संदेश ज्याँ कॉक्तो देने छलाह आ एहि बेर 2010 मे  ई सौभाग्य ब्रिटेनक रंगकर्मी डेम जूडी डेंच के भेटनहि अछि । एकटा सूचना  इहो जे एखन तक मात्र एक्के टा भारतीय के ई सौभाग्य प्राप्त भेलन्हि अछि । ओ छथि भारतक कन्नड भाषी सुप्रसिद्ध नाटककार गिरीश कारनाड - हिनका वर्ष 2002 मे विश्व रंग संदेश देबाक लेल आमंत्रित कयल गेल रहनि ।  एहि दिन विश्वक सभ केन्द्र  कोनो ने कोनो रूपे आयोजन करैत अछि । नेपालक केन्द्र एहि दिनक उपलक्ष्य मे कोनो एकटा वरीष्ठ रंगकर्मी केँ विश्व रंग दिवस सम्मान स’ सम्मानित करैत अछि । एहन सम्मान एखन तक मैथिली रंगमंचक मात्र एक गोटे महेन्द्र मलंगिया केँ प्राप्त भेलन्हि अछि ।  एहि साल 2010 के संदेश मे डेम जूडी डेंच कहलनि अछि जे : “ रंगमंच मनोरंजन आ प्रेरणाक माध्यम त’ अछिये संगहि एक दोसर सभ्यता आ लोकक बीच संबंध स्थापित करबाक क्षमता सेहो एहि मे  निहित अछि । एतबे नहि रंगमंच सर्व साधारण के शिक्षित करैत अछि आ नव नव सूचना, नव नव प्रयोगक जानकारी देबाक काज सेहो करैत अछि । समूचा दुनिया मे रंगमंच कयल जाइत अछि मुदा ई ज़रूरी नहि  जे एहि लेल कोनो बनल बनाओल प्रेक्षागृहे टा मात्र मे कयल जाय । एकर मंचन अफ्रीकाक कोनो छोट स’ छोट गाम मे सेहो कयल जा सकैत अछि आ एकरा प्रशांत महासागरक बीच कोनो छोटका द्वीप पर सेहो कयल जा सकैत अछि । हॉ ! जरूरत मात्र एतबे, एकरा लेल कनीटा जगह होइ आ देखबा लेल दर्शक । रंगमंच मे हमरा सभ केँ कनेबाक क्षमता त’ अछिये मुदा हमरा सभ के किछु सोचबा लेल आ विमर्श करबाक लेल सेहो सामर्थ्य एकरा मे होबाक चाही । रंगमंच एकटा टीम वर्क अछि । एहि टीम मे अभिनेता छथि, जिनका हम सभ देखैत छियनि मुदा बहुतो एहन लोक सभ जुटल रहैत छथि,  जिनका लोक कहियो नहि देख पबैत छनि । मुदा, ओ लोकनि सेहो ओतबे महत्वपूर्ण होइत छथि जतेक कि अभिनेता । एहि लोकक कतेको तरहक विशेषता आ कार्य कुशलताक कारणे कोनो प्रस्तुति संभव भ’  पबैत अछि । तेँ कोनो  प्रस्तुतिक सफलताक श्रेय हुनको लोकनि के ओतबे देबाक चाहियनि । ई सत्य अछि जे 27 मार्च क’ सभ  साल रंगमंच दिवस मनाओल जाइत अछि मुदा सालक सभ दिन के रंगमंच दिवसक रूप मे मनेबाक चाही । किएक त’ स ’ दर्शक केँ मनोरंजन प्रदान कयल जाइत छनि , हुनका शिक्षित करबाक आ हुनका मे बुद्धिक बिस्तार लयबाक जिम्मेदारी हमरे लोकनि के अछि । दर्शकक बिना हमरा लोकनिक अस्तित्वक कोनो अर्थ नहि अछि ।” डेम जूडी डेंच के बिचार पढ़ि क’ लगैत अछि जे चाहे मिथिला हो वा सम्पूर्ण भारत, एशिया हो वा यूरोप सभ ठाम रंगकर्मीक सोच आ हुनकर लक्ष्य एक्के तरहक छनि । समाज के मानसिक संबल प्रदान करबाक लेल हमरा सभ के बेसी स’ बेसी रंगकर्म दिस अग्रसर होयबाक चही । २. बिपिन झा बिपिन झा भारत-नेपाल आओर मिथिलांचल नेपाल और भारतक सम्बन्धक सीधा प्रभाव मिथिलांचल पर पडनाई स्वाभाविक अछि। भारत आ नेपालक वैदेशिक सम्बन्ध सदिखन मधुर रहल अछि। एकर गवाह राजा जनक केर कालक इतिहास आ सुगौली सन्धि अछि। नवंबर १९५५ मऽ नेपाल महाराजक भारत यात्रा आ अक्टूबर १९५६ मे भारतक राष्ट्रपतिक  नेपाल यात्रा सम्बन्ध कें औरो मधुर बनेलक। चीनी आक्रमण के बाद लालबहादुर शास्त्रीक नेपाल यात्रा, अक्टूबर १९६६ में इन्दिरा गान्धीक नेपाल यात्रा १९७५ में नेपालक महाराज वीरेन्द्रक भारत यात्रा सम्बन्ध कें मधुर बनेबाक अन्य आयाम रहल अछि। एहि लेख में हम किछु महत्वपूर्ण बिन्दु पर चर्चा करबाक हेतु प्रस्तुत छी जे स्पष्ट करत जे भारत आ नेपाल केर मध्य जे वैदेशिक सम्बन्ध अछि ओहि सं मिथिलांचल के साक्षात लाभ की अछि। ओ एहि बिन्दु पर चर्चित अछि- ·         अतीतकालीन विवादित मुद्दा- अतीतकालीन प्रमुख विवादित मुद्दा अछि- कालापानी क्षेत्र (महत्वपूर्ण गाम- कुटी, गुंजी आओर नांबे) ई क्षेत्र नेपाल भारत आ चीनक त्रिकोण पर स्थित अछि। नेपाल कहैत अछि जे भारत १९६२ में ई अधिगृहीत कय लेलक। दोसर विवादित मुद्दा अछि- १८१६ कें सुगौली सन्धि। १९९७ में ई विवाद बढि गेल छल। ·         वर्तमान  समस्या- वर्तमान समस्या में प्रमुखतः अछि- §  माओवादी द्वारा भारत भूमिक उपयोग §  पकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा  नेपाल भूमिक उपयोग §  नेपाल आ चीनक मधुर सम्बन्ध, जे भारतक विदेश नीतिक उल्लंघनो कय जाइत अछि। §  असम आ बंगाल में नेपाली क जनसंख्या आधिक्य समस्या §  नेपाल में भारतीय नागरिकक संग भेदपूर्ण व्यवहार। ·         वर्तमान व्यापारिक स्थिति- भारत आ नेपालक मध्य व्यापारिक स्थिति सन्तोषप्रद अछि। वर्ष १९९६ सँ २००९  धरि नेपाल द्वारा भारत कऽ कयल गेल निर्यात ३.७ अरब रुपया सँ बढि के ४०.९ अरब भय गेल ओतहि भारत द्वारा नेपाल कऽ कयल गेल निर्यात २.४ अरब सँ १६३.९ अरब भय गेल। ·         नेपाल के देल जारहल सहयोग- भारत नेपाल कें सतत सहयोग करैत रहल अछि। वर्तमान परिदृश्य कें गणना अधोलिखित रूप में कय सकैत छी- §  नेपालक राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भवन निर्माणार्थ भारत ३२० करोड कें मदद करबाक हेतु तयार अछि। §  भारत २२ करोड लागत सं पोलीटेक्निक कालेज निर्माण हेतु मदद करत। §  बीरगंज-रक्सौल, बिराटनगर-जोगबनी  में २०० करोडक आर्थिक मदद  ICP  हेतु देत। §  घेघा नियन्त्रण कार्यक्रम में सहायता दय रहल अछि। §  मनमोहन-माधवकुमार केर वर्ताक दौरान ५६०० मेगावाट बला पंचेश्वर पनबिजली परियोजना में गति आनब आ नेपाल में बागमती क सफाई सम्बध में चर्चा भेल अछि। ·         सम्बन्धक भविष्य- उक्त चर्चाक अनन्तर कहल जा सकैत अछि जे नेपाल भारत सम्बन्ध मधुर रहल अछि आ भविष्यों में मधुर रहत कितु एहि बात सँ मूँह नहि फेरल जा सकैत अछि जे जतेक बात चीत हो ओहि काल में भारतीय विदेश नीतिक उपेक्षा नहि हो। भारत नेपाल क मधुर सम्बन्ध मिथिलांचलक उत्कर्षक स्रोत रहत एहि में कतहु सन्देह नहिं। डॉ. शेफालिका  वर्मा प्रतिवादक  स्वर

हँ  हम खून केने छी  हम सासु बनय नही  चाहैत छी.  हम माय बनय नही चाहैत छी. ..तैं हम ई खून केलों . तीन तीन टा खून   हम नारी छी  नारी ग्लानि भ रहल ऐछ  हम नारी किएक भेलों ?नारी के किएक महान मानल गेल ? नारी प्रकृति के निकृष्टतम कृति छी तैं हम अपन नारी जीवन जीवा लेल नहि चाहलों.  हम माय बनि जीवा लेल चाहैत छलों सासु बनि जीवा लेल नहि चाहैत छी जज साहेब ------सासु ससुर ननदी हम तीन तीन टा खून केलों . जज साहेब हम चाहितों ते भागि के जान बचा सकैत छलों अपन ..दहेजक कारन हिनकर सबहक बनाओल षडयंत्रक  हमरा लग कोनो सबूत नहि ऐछ --कोनो पुतोह लग कोनो सबूत नहि रहैत ऐछ..कानून सबूत चाहैत छैक  साँच हो व फूसी हो . हमर सासु ससुर हमरा मारवाक षड्यंत्र केलनि एकर सबूत मात्र हम छी अओर हमर भगवान् ...सबुतक  आधार पर चलयवाला आन्हर कानून टका पर सबूत अनैत ऐछ.आ ओही किन्लाहा सबूत पर अहाँ न्याय करैत छी जज साहेब --हमरा प्रतिकार लेवाक छल समाजक ठेकेदार सब स .  हमरा फांसी दिय जज साहेब फांसी----- सौनसे कोर्ट स्तब्ध . सब वकील पाथरक मुरुत  जनताक अपार भीढ़ के काठ मारि गेल छलैक . जज साहेब  जेना हिमशिला सन श्वेत  सर्द -लहास ---आंखि में अपन बेटाक ब्याहक मोल भाव नाचि गेल हो ...मुदिता हफैसी रहल छलीह . समस्त केशराशि  कारी राति सन छिरिआयल छल . दुनू आंखि में घनघोर बरखा . दिनकरक ईजोत कृष्ण-पक्षक रंग ल लेलक. कारी कारी विषधर सांप सौनसे कोर्ट में कतेक काल धरि ससरैत रहल ...... मुदिता जीवनक मात्र बीस बसंत देखने छलीह  आ ओ एहेन वीभत्स  काज क बैस्तीह ई अकल्पनीय छल.आ मुदिता..?पलक बंद केने..बाबूजी  बाबूजी .अहाँ कते छी अहांक बेटी अहांक नाम पर कलंक लगा देलक . हत्यारिन नहि मुदा अहांक आदर्शक रक्षा केलक . बाबूजी हम नारी जीवन नहि जीवी सक्लों . आ आंखि से जेना व्यतीत छलछला गेल..... बेटा  आब अहांक ब्याह भ रहल ऐछ . आब पतिक घर अहांक मान मर्यादा जीवन मरण  सब किछ अछि .हम सब ते अहाँ लेल पाहून रहब पाहून..---मुदिताक पिता बेटीक माथ पर हाथ फेरैत बजलाह ---- मुदिताक मोने अपन ब्याहक प्रति विरोध भाव उठहल--जमीन जाल बेचि हमर ब्याह नहि करू बाबूजी / मुदिता बड भावुक छलीह सदिखन चिंतन में डूबल खाली अभावे टा ओकर पूंजी छल अभाव क्रांतिक कारन भ सकैत छै मुदा शर्त रही जायत छै विवेकक...पिताक गरीबी समाज में अभिशाप छल आदर्शवादी कीरानिक जीवने की छै --तेज जलधार में कम्पित जलकुम्भी सन. बी ए पास क मुदिता बैसल छलीह जता देखू ओत टका ..एतेक मूल्य वृद्धि वरक भ गेल छल जे वरक बाप के मृत्युक अतरिक्त कोनो बाट नहि देखा परैत छल ..मुदी रातुक भानस में की ऐछ आटा लेल मदना के पठोने छी बाबूजी ओह कतेक महगी आबी गेल छै ---नमहर साँस लैत शिविर बाबु बजलाह

बाबु जी  एकटा बात ते अहाँ छोडिये  देलों ........मुदिता अधर पर मैलछांह हंसी लय बजलीह ---ओही जमाना में बेटीक ब्याह ले लड़का मंगनी में भेटैत छल आब मोलभाव  कर पढ़ैत छै--मुदिक गप सुनी शिविर बाबु चौंकी  गेल छलाह ---बाबूजी एकटा बात पूछी ? लोग अपन बेटा के किएक बेचैत छैक कोना बेचैत छै..-----शिविर बाबुक  आंखि में रेतकण  झिलमिला गेल..बाबूजी माय कोना अपन बेटा के बेचैत ऐछ बेटाक दाम लग्वैत ऐछ ..अपन पेट में नाओ मास जीवन दान दैत ऐछ पालैत पोसैत ऐछ ओ माय कोना बेटा बेचवा लेल सहमत भ जायत ऐछ. बाबूजी सौरभ ते छोट ऐछ की ओकरा केओ दस हजार टका देत ते बेचि देवैक अहाँ ? मुदु---भरि स्वर में बजलाह  बताही भ गेल छी अहाँ अंट शंट बजने जा रहल छी   की भ गेल अहांके ...........नहि बाबूजी हम किनल बर से ब्याह नहि करब शिविर बाबु बेटीक पागल प्रलाप सुनी ओहिठाम से उठी गेल छलाह .....ओही राति ओ अपन माँ बबुजिक गप सुनने छलीह ------------मुदितक ब्याह ओहें घर में करब जे आदर्श हो  ओ बड भावुक ऐछ विद्रोही प्रकृति के----आ बाप बेटीक गप सुनी माई दांत कासी लेने छलीह..एही बेटीक भविष्य की ऐछ ईश्वर !  माय आशंकित सब दिन बेटा जकां पोसने छी  आदर्श आ सिधांतक शिक्षा देने छी  माथ पर गृहस्थिक भार पढ़तैक अपने शान्त भ जेतीह.. आतिश बाबुक बेटा सप्तक अहाँ के केहेन लागैत ऐछ .......बाबूजिक स्वर सुनी मुदी चोंकि गेलीह ---------आतिश बाबु छोट मोट रोजगार करैत छथि  बेटा सेहो ओही रोजगार में लागल ऐछ...निक खैत पिबैत घर . सिधान्त्वादी लोक                  ....मुदा ओ बड टका माँगता मायक आशंका टका....हँसैत शिविर बजलाह .....'दहेज़ विरोधी संघक ' अध्यक्ष  छैथ. दहेज़ प्रथा हन्तेवा लेल जी जान से लागल छैथ .. ओ तखन ते बड निक . अपनो विवाह एकटा गरीब घरक लड़की से केने रहैथ आतिश  बाबु के के नहि जनित ऐछ ..... हँ से ते ठीके हमहूँ जनैतछी. ....मायक स्वर मुदिताक कान में जायत रहल..हुनकर ससुरक घर दुआरी  जगह जमीन सब बिका गेल रहनि  हँ  दहेज़ नहि नेने छलाह  एही में कोनो शंका नए.हँ सप्तक मायबापक परम आज्ञाकारी आ सुशिल ऐछ .. मुदिताक आंखि में सप्तकक रूप नाच  लागल आदर्श आ सिधांतक गप सुनी ओकर ह्रदय सप्तके लेल नहि सम्पूर्ण परिवार लेल पूजा पुष्प सन समर्पित होयत रहल ...... आ एक दिन पालकी पर बैसी कनिया बनि मुदिता अपन सासुर आबी गेलीह .................खाली कनिए टा ? सर सामान  दान दहेज़ ....आही रोऊ बा ....सासुक प्रथम स्वर सुनतही मुदिता घोघ तर से देख चाहली....माँ भौजी के गहनों नैहरक  तेहन सन नै ऐछ .......मुदिताक अंग परिक्षण करैत छोटकी ननदी बाजी उठलीह ......बाबूजी हद्द क देलखिन माँ .......मुदिताक समस्त तन तिक्त गंध से आवेष्टित भ गेलैक ..सासुरक प्रथम स्वागत गान ! मोटा जकां कोन में बैसल मुदिता माँ फ्रिज नहि टी वी नहि  पलंग सोफा किछ ते नहि ..कतेक उछाह छल भैयाक ब्याह में ई सब आओत सीपी एखन तोहर बाबूजी के पुछैत छी . दहेज़ विरोधिक सभापति छैथ समाज में की घर में ?अपने घर डाहि हम आइग नहि तापब... एकटा बेटा आ .....पुनः मुदिता डीसी तकैत आग्नेय सवारे बजलीह .....बैसल की टुकुर टुकुर तकैत छी हम भाढ़फोरही ताढ़फोर्ही नै बूझैत छी ..जाऊ भानस भात बनाबू  काज धाज  करू ..आ की माय एहो सब नै सिखेलक..... अपरिचित घर अनचिन्हार परिवेश में मुदिता निस्सहाय जकां सप्तक के ताकि रहल छलीह  मात्र चारि दिनक जकरा से परिचय छल.   ओ ते माय बहिनिक उक्ति सुनी कखन घसकि गेलैक कियो नहि बुझलक . मुदिता चुपचाप भनसा घर दिसि चली गेली ........हे   पटोर पहिरी भनसा में नहि जाओ  आंखि से देखने छलिये  पटोर .......सीपी एकटा नुआ असगनी पर से दय दहीक फेरी लेतैक............एकटा मैलछांह नुआ हाथ में नेने मुदिता कांपी रहल छलीह छोलनी करछुलक मध्य ....साँझक कजरायल आंखि नोरा गेल  आकास में त्रितियाक चान विधवाक  टूटल चुढ़ी सन लटकल छल .....मुदिता सोचैत रहलीह .......कतेक सपना लोक देखैत ऐछ ..सपना  कतेक विचित्र शब्द थ्हिक सपना आंखि खुलल आ टूटी गेल..नहि नहि सपना के पक्ढ़वाक चेष्टा नै करवाक चाही ...परछाही कतहु पकरहल जाय .........बाप रे एतेक देर से भंसा घर में की अपन देह डाहि रहल छी ----सासुक कर्कश स्वर ----माय बाप भिखमंगा जकां बेटी के सांठी देलक आ बेटीक मलार कतेक!... एही परिवेश में दिनक पंछी उढ़ैत रहल विद्रोही मुदिताक सब स्वर शांत भ गेल. सब उत्ताप पर हिमपात भ गेल ...सप्तक राति के अवैत छल आ भिनसर होयताही निकलि जायत छल.  मुदिताक मोन से ओकर सुखदुख से ओकरा कोनो मतलब नहि छल . ओ सरिपो  माता पिता क  आज्ञाकारी छल.    आतिश बाबु बड पैघ समाज सुधारक छलाह  हुनकर नाम प्रतिष्ठा छल दीया तर अन्हार.-----अहाँ शिविर बाबु से की कही विवाह थ्हिक केने छलों?कोनो सर सामान घर में नहि आयल .समाज सुधारवाक चक्कर में अपनाही घर में आगि लगा देलों. हम कहने छलों सिपिक माय इशारा में कतेक बात कहने रही ....हम टका पैसा नहि लेब एकेटा बेटा ऐछ ओकर माय के कतेक सुख सेहनता छै  ----------भाढ़ह में जाय अहांक कहब सीपीक माय अगुता गेलीह अहाँ टका नहि लेलों ते अहांके किछ नहि भेटल अहाँ स्थिर राहु टका ते नाहीये भेल  टीवी फ्रिज किछ ते नहि भेल...... आतिश बाबु सोच लगलाह कहू ते एकेटा बेटा  आब ते हमरा घर में कहियो ई सब नहि आयत .....मुदिताक सासु दुःख आ वेदना से कानय लगलीह.......स्थिर रहु हम उपाय सोचैत छी. घरक एहेन वातावरण में मुदिता देरायल हिरनी जकां राति दिन चौन्कल रहैत छलीह डेरायल सन  जंगली भेढ़िया सबहक मध्य एकटा मृग शावक  माय बापक अल्हढ़ चंचल विद्रोहिणी मुदिता  घरक कण कण में ओकरा षडयंत्रक आभास होइत छले. ..डेरायल चौन्कल भयभीत......... ओही राति सप्तकक बाहीं पर सुतल मुदिताक आंखि में नीन नहि छल. राति दिन खुजल आंखि से ओ भयंकर सपना देखैत छलीह ......की भ जायत ऐछ अहांके नहि ते अपने सुतैत छी नहि ते हमरा सूत  दैत छी. मुदिताक चोंकब से अर्धनिद्रा में पडल सप्तक खौन्झा उठैत छल. ..........नीन नहि अबैत ऐछ -जेना अपना आप से बजलीह  धन्य छी महाराज  निन्न नहि अबैत ऐछ ते चुपचाप पडल रहु  चोंकि चोंकि तिरिया चरित्त नहि देखाऊ . मुदी दिसि पीठ कय सप्तक बढ़बढ़हैत रहल--------मुदिता लहुलाहान भ गेलीह . तिरिया चरित्त? भावुक मोन कछोटी उठल तिरिया चरित्त  केकरा कहैत छैक के बनोलक एही शब्द के ? पुरुष चरित्त केओ किएक नहि बजैत छैक सबटा  वेद-पुराण  रामायण गीता सब टा पुरुखक लिखल ऐछ तैं ई पक्षपात ! कतेक असहाय हम सब छी लंका से सीता के आनि राम अग्निपरीक्षा सीता क लेलानी  मुदा एको बेर सीता प्रतिवाद नहि केलीहपत्नी से अलग रामो ते छलाह  ओ किएक ने परीक्षा देलनि रामायण पुरुषक लिखल छल.  ---------निस्तब्ध्ह राति  कतो कोनो मर्मर नै  मुदिता चुपचाप पडल  एही आँखिक नोर  बही ओही आंखी में जाय सागर बना रहल छल..सब देशक लोक कहने ऐछ  frelty thy name is woman कियो स्त्री के चीन्ही नै सकल. स्वयं स्त्री माय बनि बेटा बेचैत ऐछ पुतोह बनि जरैत ऐछ आ बची जायत ऐछ ते सासु बनि जरावैत ऐछ. बेटा क माय बनि की भ जायत छै स्त्री के ?ई स्त्री स्वातंत्र्य  नारी विमर्श ई सब हथिक दांत छी पहिने स्वयं स्त्री के बदल पडत  अपन अधिकार अपन शक्ति के चिन्ह पडत.........असहाय मुदिता आक्रोश से भरल छलीह . नाना प्रकारक विचारधारा ओकर मानस मंथन क रहल छल. पतिक प्रेमिल स्वरों से वंचित  कोनो माय बाप अपन बेटीक ई स्थितिक कल्पना क सकैत ऐछ कतेक बेटी अपन सासुर में एहिना राति बित्वैत हेती. एकटा माय दोसरक बेटी गंजन करैत ऐछ मुदा स्वयं ओकर बेटीक भविष्य ? ...नींद नहि छल ओकर आंखि में ...राति तितल भिजल नीरवता एहेन जे खिड़की से अवैत हवाक स्वरों वाचाल छल. मुदितक ह्रदय में एकटा आशंका ..एकटा संशायक मेघ  जेना कोनो प्रलयंकर झंझा आबे वाला हो  समस्त क्षितिज अंधकार से आच्छादित .......अचक्के किछ स्वर जेना ओकर कान में आब लागल...एकटाअनजान भय से ओकर छाती कांपे लागल  .ओकर समस्त इन्द्रिय  सजग सचेतन भ गेल ओ ओही शब्द सब के आत्मसात करवाक प्रयास कर लागल ...................हमहूँ एयैह सोचैत छी ..सासुक स्वर कान में पडल ..ओ आर सजग भ गेलीह ...शिविर बाबु ते सब सुख मनोरथ डाहि देलनि ..विनिश बाबुक बेटी से बात चलाबी...विनिश बाबु  नगरपालिकाक चेयरमेन  देब लेब ते खूब करताह मुदा हुनका बेटी के आंखि  चमकैत रहैत छैक...दुनू टा आंखि झिप झिप करत ऐछ जेना कनखी मारैत होई... .......सीपीक माय बजली निक आंखि वाली आन्लों ते की भेटल ....ई ते सांचे  मुदा एही कनियाक  की करब  ई ते हल्ला गुल्ला मचाय सबटा प्रतिष्ठा माटी में मिला देत ........एकरो उपाय छैक मुदिताक सर्वांग कांपी रहल छलैक  सांस जोर जोर से चली रहल छल .स्वर  अस्पष्ट भेल जा रहल छल.  पारामार ऐछ  हँ पारामार ते दोकाने में अपन पडल रहैत ऐछ. लोक के की कहवैक..लोक के की..कही देवैक ..आत्महत्या क लेलीह..दोसर गोटे से फंसल छलीह  आय पकड़ा गेलीह. ........वह.. ई  ते उत्तम ..हम ततेक जोर से चिकरी बाजब  जे सब केओ हमर कथन के साँच बुझी जायत   मुदितक सासुक स्वर में ख़ुशी छल दोसर गोटे से फंसल ...पारामार ..मरणोपरांत चरित्र पर दोषारोपण .... आवेश आ उत्तेजना से कांपी रहल छल मुदिता . आतिश बाबुक ऑफिस घर में तेबुलक दराज में रखल  लोडेड  रेवाल्वारक ध्यान आबी गेलैक -----माय्बापक  आज्ञाकारी पुत्र एही सब से अनभिज्ञ निचिं सुतल छल -------एकटा आवेश  एकटा उत्तेजना एकटा एकटा मूर्च्छना में मुदिता ऑफिस घर से रिवाल्वर निकलि  यंत्रचलित जकां सासु ससुरक समक्ष ठाढ़ह भ गेलीह ............बहुत भेल बाबूजी  अहाँ एहेन समाज सुधारक के प्रतिष्ठाक संग ज्जेनाई  एही दुनिया से जेने निक छै  आ एक गोली ससुरक छाती पर माय अहाँ माँ शब्द पर कलंक छी  नारी रूप पर कलंक छी नारी भ नारी के प्रतिष्ठा नहि द सकैत छी.......दोसर गोली माय के छाती पर  सीपी !..पैघ भ अंहु माय बनब  सासु बनि पुतोहके पारामार खुआयब तैं ई अहांक लेल... तिनु लहाश ताढ़फर्हा रहल छल   सप्तक केराक भालेरी जकां कंपित कखन दरवज्जा पर आबी ठाढ़ह भ गेल छल.....नहि  अहांके  किछ नहि कहब अहाँ माता पिताक आज्ञाकारी  छी अवश्य  मुदा हमर सोहाग छी  एही सोहागक कारन सीता अपन सासु ससुर  महल दोमहला सब के त्यागी के रामक संग वन चली गेल छलीह .....बस अहाँ अपन कलंकक  संग जीवु............ सत्यानंदपाठक कथा- स्वान विमर्श आइ बारहम दिन बीतय पर अछि, मुदा ओइ बेल्ट वलाक कोनो अता-पता नहि अछि। परचून कें दुकानक आगा राति १० बजे धरि चलय वला चौपाल पर ओ आइयो नहि आयल आ' सभ ओकरहि लेल चिंतित छलथि। ककरो नीक नहि लगैत छलन्हि। ने बतियाय मे आ' ने खेलाय-धूपय मे। गोरकी मौसी आ' भुल्ला काका एक संग जरूर बैसल छलाह, मुदा बतिया नहि रहल छलाह। ओम्हर छोटकन सेहो उदास छल। ओ बेल्टे वलाक संग बेसी रहैत छल। दुनूक उम्र मे बड्ड कम फर्क छलैक। आब ओकरा संग खेलय वला कियो नहि छल। हं, मोती ओकरा बगल मे जरूर बैसल छल। मुदा एहि चितकबराक मन सेहो उदास छल। मिनी दीदी नांगरि डोला रहल छलीह आ' बाट कें निहारि रहल छलीह। दहिना कात कुनो आहट भेला पऽर ओ बगलक गली में सेहो झांकि लैत छलीह। हुनका लगैत छलैन्ह जेना मैक्सी एम्हर सँ तऽ नहि आबि रहल अछि। ओहि बेल्ट वला नटखट कें लोक सभ प्यार सँ मैक्सी कहैत छथि। ओकरा पर सभ जान लुटबैत छलाह। ओ कहां जनमल, ओकर माय-बाप कें छथि ककरो पता नहि। जखन सँ ओ राति कऽ चौपाल पर आबय लागल सभकें पसिन्ह पडि गेल। ओ सिर्फ भुल्ले काका सँ डेराइत अछि। ओ कहियो काल डांटि-डपटि दैत छथिन्ह। मैक्सी भुल्ला काकाक बाहर निकलल दांत सँ डेराइत अछि। मैक्सी कहैत रहैत अछि जे अगर गलतियो सँ भुल्ला काकाक दांत कतहु फंसि गेल तऽ असाध्य घाउ भऽ सकैत अछि। ओना भुल्ला काकाक कोर पर लाल बनल भुल्ल आंखि कम खतरनाक नहि लगैत अछि। हुनकर आंखि सँ तऽ तैयो बचि सकैत अछि। ओना इ अलग बात छल कि भुल्ला काका सेहो ओकरा कम स्नेह नहि करैत छथि। अनुशासन अलग बात अछि। परचूनक दुकानक मालिक गंजू महाजन दुकान समेटब शुरू कऽ देने छलाह। हुनकर तीनू बेटा अपन-अपन दायित्व मे लागि गेल छलाह। नन्हकू खाली पडल कार्टून कें कबाड में फेंकि रहल छल। बडका बेटा दुकान मे घटल समानक चिट्‌ठा बनबय में अपस्यांत छल। मझिला दुकानक बाहर पसरल समान कें भीतर ठेलि रहल छल आ' गंजू महाजन रोकड मिला रहल छलाह। इ सभ देखि गोरकी मौसीक आंखिक कोर भीजि गेल। नोर टपकहि वला छल। चितकबरा उसांस भरैत बाजल-ङङ्गआइयो नहि फिरल।' गंजू महाजनक दुकानक आगाक खुलल स्थान दिनभरि कतेको तरहक जमघटिक केंद्र अछि। भोर आठ बजे सँ ओतय लगक इस्कूल मे अपना धीया-पूता कें पहुंचावय वला अभिभावक आपस मे बतिया लैत छथि। हिनका लोकनिक गप्प-सप्पक शाश्वत विषय इस्कूलक हेडमास्टरनीक धीया-पूताक प्रति क्रूरता आ' इस्कूल मे अजब-गजब कें नियम होइत अछि। हिनका लोकनिक गेलाक बाद ऑफिस जाय वला सभक हुजूम ओतय अबैत-जाइत रहैत अछि। बैग लटकौने नवका-नवका छौडा सभ बस पकडक लेल ओतय ठाढ भऽ जाइत अछि आओर बस अबैत मांतर इ सभ लपकि कऽ लटकि जाइत अछि। दुपहर एक बजे सँ तीन बजे धरि गार्जियन लोकनि फेर ओतय मंडराय लगैत छथि। हुनकर निशाना इस्कूल गेट होइत अछि। गेट सँ भारी-भरकम बस्ता लटकौने नेना-भुटका निकलैत छथि जिनका हुनकर गार्जियन लपकि लैत छथि। नेना सभ अपना अभिभावक कें ओतय आइसक्रीम, जलपुरी, गोलगप्पाक ठेला दिस खींचय लगैत अछि आओर अभिभावक डांटि-डपटि-चुचकारक अस्त्र सँ हुनका बुझावक कोशिश करैत छथि। सांझ होइत मांतर ओतय थाकल-ठेहियायल लोकसभ, नवतुरिया छौंडा सभक जमघट लगैत अछि। परचून दुकान लगक शराबक दुकान टिमटिमाय लगैत अछि आ' फेर रंगीन सांझक नजारा उपस्थित भऽ जाइत अछि। राति ढहलाक संगहि प्लास्टिकक गिलास आ' छोट-पैघ बोतलक खन-खन सँ ओ स्थान गूंजय लगैत अछि। अलग-अलग झुंड मे लोकसभ सडक पर पासिखानाक आनंद मे डूबि जाइत छथि। इ नवीन संस्कृति किछुए वर्ष सँ पनपल अछि। शराबक प्रचलन आओर ओकर उपलब्धता दुनू समान रूप सँ बढल अछि। पछिला किछु वर्ष मे एहि शहर मे शराब दुकानक बाढिसन आबि गेल अछि। हर पांच मे एक दुकान विदेशी शराबक अछि। शहर मे दूधक अभाव अछि। शराब दुकानक कोनो अभाव नहि। एहि बातक परवाह बिना कएने कि इ दुकान कहां होमय चाही। इस्कूल, मंदिर, व्यायामशाला बगल मे अछि तैयो कोनो परवाह नहि। शराबक दुकान बढलाक कारणहि शहर मे शराब सेवनक ढेरो तरीका इजाद भेल अछि। एहि क्रम मे ङङ्गफोर व्हील बार'क प्रचलन तेजी सँ बढल अछि। आफिस, दुकान आ' अपन प्रतिष्ठान सँ फुर्सत भेटल आओर चारिटा दोस्त तय कएल। बस फेर बोतल, सोडा, नमकीन और जलक बंदोबस्त भेल आओर बाटक कात लागल कारहि मे बार खुजि गेल। आब स्टेंडिंग बार सेहो आबि गेल अछि। शराब दुकानक सामनहि एकटा मोटरसाइकिल कें घेरि कऽ चारिटा दोस्त ठाढ भेटि जाथि तऽ बुझू ओतय ङङ्गस्टेंडिंग बार' चालू अछि। गंजू महाजनक परचूनक दुकानक सामने वला जगह पर भोर छः बजे सँ राति बारह बजे धरि गतिविधि चलैत रहैत अछि। राति साढे नौ बजे सँ ओतय श्वान समाज जुटैत अछि। एहि समाजक लेल हऽम संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोग कएल अछि। ओना चालू भाषा मे कतेक शब्द अछि, मुदा एतय जाहि समाजक चरचा कएल जा रहल अछि ओ वास्तव मे साधारण नहि अछि। ओकर संवेदना, चिंतन प्रक्रिया आ' व्यवहार कतहु सँ आम आदमीक स्तर सँ कम नहि अछि। इ समाज जखन जुटैत अछि तऽ समाज, जनजीवन सहित कतेको मुद्दा पर गंभीर चरचा होइत अछि। समाजक लोक दिनभरि छितरायल रहैत अछि। भुल्ला काका आइयो ओहि पुरना दरबारक सामने दिनभरि जुटल रहैत छथि आओर कोनो अनचिन्हार आदमी कें देखैत मांतर भूकय लगैत छथि। गोरकी मौसी ओहि बैंक वला दंपति कें खूब स्नेहिल छथि। आब एहि उम्र मे गोरकी मौसीक लऽग कोनो गंभीर जिम्मेदारी नहि छन्हि। ओ दिनभरि दंपतिक घरक छहरदिवारी मे रहैत छथि आओर सांझ कऽ दंपतिक घर फिरते मांतर हुनकर काज समाप्त भऽ जाइत अछि। राति अन्हार होइत मांतर ओ घर सँ निकलि कऽ एहि चौपाल पर आबि जाइत छथि। मिनी दीदी कतहु बान्हल नहि छथि। ओ जन्महि सँ एहि दुआरि-ओहि दुआरि दौडैत रहली अछि। चितकबरा कें कियो कलकत्ता सँ लायल छल। कीनि कऽ। एक दिन बीमार पडि गेल तऽ ओकर मालिक ओकरा सडक पर छोडि गेल छल। छोटकन तऽ नया अछि। ओकर माय ओकरा एहि इलाका मे छोडि गेल। एहि बीच मैक्सीक एहि समाज मे आगमन भेल। ओ एकटा समृद्ध परिवारक दुलरुआ अछि। राति मे किछु समयक लेल ओ खुलल बसात मे छोडि देल जाइत अछि आओर ओ ओकर फायदा उठाकऽ समाजक चौपाल मे शामिल भऽ जाइत अछि। परंच एहन पहिले कहियो नहि भेल। जखन सँ मैक्सी समाज मे शामिल भेल अछि ओ नियमित रूप सँ चौपाल पर हाजिर होइत रहल अछि। हं, कोनो दिन अपन मालिकक संग कतहु जाइछ तऽ ओ ओहि दिन नहि अबैत छल, मुदा दोसर दिन ओ फेर मौजूद भऽ जाइत छल। इ पहिल मौका छल जे बारह दिन सँ गायब छल। एहिलेल समाजक लोक मे खूब चिंता पसरल छल। गोरकी मौसी कहलनि-ङङ्गमैक्सी के बिना चौपाल सुन्न लगैत अछि।' भुल्ला काका मौसीक तरफ देखैत सहमति मे मुडी हिलौलनि। मौसी फेर बजली-ङङ्गहमरा चिंता एहि बातक भऽ रहल अछि कि ओहि अभिशप्त ३० अक्टूबरहि सँ मैक्सी गायब अछि। ओहि दिन शहर मे कतेको ठाम पैघ-पैघ बम विस्फोट भेल छल। कतहु मैक्सियो तऽ ओकर चपेटि मे नहि आबि गेल?' - ङङ्गअ-रे की बात करै छी मौसी। तीस अक्टूबर कऽ मैक्सीक मालिकक छुट्टी नहि छल। एहिलेल ओहि दिन ओ बाहर नहि निकलल होयत।' चितकबरा कहलक। - ङङ्गआब इ तू कोना कहि सकैत छह? भऽ सकैत अछि ओहि दिन मैक्सीक मालिक छुट्टी लऽ लेने होथि आ' ओ मैक्सी कें लऽ कऽ गणेशगुडी तरकारी कीनऽ गेल होथि, जेना कि कतेक बेर होइत अछि।' - ङङ्गहं, एना भऽ सकैत अछि। मुदा सवाल अछि कि हमसभ एना कियाक सोचू।' मिनी दीदी कहलनि। भुल्ला काका हाफी केलथि आओर कहलथि-ङङ्गएना सोचऽ कें कतेको कारण अछि। कियाक तऽ मैक्सीक कोनो अता-पता नहि अछि। ओकर मालिकक घरक दरबज्जा सभ दिन खुलैत अछि। हम स्वयं देखलहुं अछि। अगर मालिक एतहि छथि तऽ मैक्सी कें सेहो एतहि होमक चाही आओर अगर मैक्सी एतहि अछि तऽ ओकरा चौपाल पर जरूर आबक चाही।' चितकबरा- ङङ्गभऽ सकैत अछि बम विस्फोट वला दिन ओ मालिकक संग नहि निकलल हो।' गोरकी मौसी-ङङ्गभऽ सकैत अछि। मुदा संकट सिर्फ ओही दिनक तऽ नहि अछि। बम विस्फोटक बाद सँ तऽ समाज पर संकटक बादल छारलहि अछि।' चितकबरा-ङङ्गकोना?' गोरकी मौसी-ङङ्गतू एकदम भोला छह चितकबरा। कि तोरा बुझना नहि जाइत छह? जाहि दिन बम फाटल ओहि दिन लागल जेना जलजला आबि गेल अछि। हम ओहि राति चौपाल पर आयल जरूर रही, मुदा दस मिनटक लेल। महाजनक दुकान बंद छल आओर हमरा रातुक भोजन नहि भेल। किछुए काल मे सटका पटकैत किछु वर्दीधारी आयल आओर हमरा सभ कें पडाय पडल। तहिया सँ लऽ कऽ आइधरि माहौल शांतहि नहि भऽ रहल अछि। दिनभरि सायरनक अवाज गूंजैत अछि आओर वर्दीधारी लोकनिक आयब-जायब लागल अछि। बाट पर भीड निट्ठाह घटि गेल अछि आओर सून-मशान बाट हमरा समाजक दोसर मुहल्लाक कतेको गोटेक जान लऽ लेलक अछि।' चितबकरा-ङङ्गअहां ठीक कहैत छी मौसी। हम ओहि दिन गणेशगुडी गेल छलहुं। ओतय कें नजारा देखि कऽ करेज कांपि गेल। गाडीक कबाड, जरल दुकान। कोन मे किछु पूजाक समान आ' जरैत मोमबत्ती।' मिनू-ङङ्गहं, तीस अक्टूबरक ओहि दर्दनाक मंजरक बाद सँ तऽ माहौल बिलकुल अलग भऽ गेल अछि। कतय ओ हलचल आ' कतय इ सन्नाटा। एकदम मरघटसन। किछु लोक भोकासी पाडि कऽ कानि रहल छलथि, तऽ किछु लोक फफकि-फफकि कऽ करेजा गला रहल छलाह। जरल वस्तुक ढेर पर हम देखलहुं इस्कूलक बैग। जूता-चप्पलक अंबार लागल छल। एहि घटनाक बाद शायद पडेबाक क्रम मे लोकक पैर पिछरल हेतनि। लोकसभ बतिया रहल छलाह। ओहि दिन की भेल छल। एकटा बुढवा बाबा फफकि-फफकि कऽ बाजि रहल छलाह-ङङ्गओ अपन नातिन कें लऽ कऽ बजार आयल छलथि। नातिने जिद्द कएने छलन्हि कि हमरा बजार जयबाक अछि। ओ नातिन कें जूता कीनि देलन्हि आओर सोचलन्हि जे किछु तरकारी कीनि ली। इएह सोचब काल साबित भेल। ओ अखन तरकारीक दुकान  लग पहुंचल छलाह कि कान सुन्न भऽ गेलन्हि। ओ खसि पडलाह। आओर फेर जखन होश आयल तऽ ........।' बुढवा बाबाक बात सुनि कऽ तऽ हम सन्न रहि गेलहुं। हम हुनकर आओर बात सुनय चाहैत छलहुं। जेना कि हुनकर नातिन कें की भेलनि, मगर सायरनक अवाज गूंजि उठल आओर एकटा वर्दीधारी सटका मारि कऽ हमरा भगा देलक।' गोरकी मौसी-ङङ्गअरे, सभसँ अधलाह बात तऽ हमरा समाजक लेल भेल। बम विस्फोटक घटनाक दिन सँ तऽ हमरालोकनिक जिनाइ हराम भऽ गेल अछि। सडक सुन्न भेल तऽ हमर लोक सडक पर मटरगश्ती करक लेल निकलि पडल। हुनका की पता छलन्हि कि एहन स्थिति मे दु-चारि टा गाडी चलैत अछि ओ काफी लापरवाह होइत अछि। कतेक लोक एहि लापरवाह गाडीक चपेटि मे आबि गेलाह। जहां-तहां खद्दरधारी आओर वर्दीधारी लोक प्रकट भऽ जाइत छथि आ' हमरालोकनिक खैर नहि। सिर्फ यैह लोकनि नहि, बल्कि किछु घडियाल सेहो उभरि कऽ आबि गेल छथि ओ जगह-जगह मजमा लगा रहल छथि आओर मोमबत्ती जरा कऽ घडियाली नोर टपका रहल छथि। ओना घटनास्थल आओर प्रतिष्ठान आ' सरकारी संस्थान मे श्रद्धासुमन अर्पित कए आ' रैली निकालि कऽ अपन एकजुटता प्रदर्शित करय वला लोक सराहनीय काज कऽ रहल छथि। मुदा दुखक बात इ अछि जे घडियाल सभ सेहो एहि मे अपन फायदा बटोरक प्रयास करब शुरू कऽ देलनि अछि। बजार नहि लागि रहल अछि तऽ हमरा लेल लोक की छोडताह। से पेट पर आफत आबि गेल अछि।' भुल्ला काका-ङङ्गतू ठीक कहैत छह। हमरो अंदेशा भऽ रहल अछि। या तऽ मैक्सी ओहि दिन बम विस्फोटक चपेटि मे आबि गेल होयत अथवा ओकर बाद जे हंगामा भऽ रहल अछि ओहि मे कतहु दबि गेल होयत।' गप-सप्प जारी छल। तखने चितकबरा किछु सूंघि लेलक। ओकर चेहराक भाव बदलि गेल। ओ चिकरल। -ङङ्गअरे, देखू.... मैक्सी आबि रहल अछि।' सभ सतर्क भऽ गेल। सचमुच नारंगीक दिश सँ झुमैत मैक्सी आबि रहल छल। ओकर स्वागत मे सभ लोक ठाढ भऽ गेलाह। सभ भाव विह्वल छलथि। ककरो मुंह सँ कोनो अवाज नहि निकलि रहल छल। अबैत मांतर मौसी सँ लेपटा गेल। सभ फफकि पडल। मौसी ममता सानल डांटैत पुछलथि-ङङ्गकतय छलह एतय दिन?' चितकबरा बचल रोटी ओकरा पकडबैत गर्दनि सँ लगा लेलक। छोटकन तऽ कूदि पडल। सभ इ बुझवाक लेल उत्सुक छल जे आखिर एतेक दिन कहां छल? मैक्सी सभक जिज्ञासा शांत करैत कहलक-ङङ्गहमर मालकिन हमरा गणेशगुडी लऽ गेल छलीह। ओ गणेशगुडी फ्लाईओवरक नीचा गाडी पार्क कय आओर हमरा लऽ कऽ दोसर तरफ मिठाइयक दुकान दिश गेलीह। एतबे मे भीषण धमाका भेल आ' हमर मालकिन खसि पडलीह। हम कूं-कूं करय लगलहुं। हम अपन मालकिन के बचबय चाहैत छलहुं। एतबे मे भयभीत लोकक एकटा हुजूम आयल आओर हमरा मालकिन सँ बिछुडा देलक।' - ङङ्गफेर....।' सभगोटे एक संग बाजि उठलाह। - ङङ्गहम भीडक धक्का खाइत फटकी चलल जा रहल छलहुं, मुदा हमर नजरि मालकिनहि पर छल। हम देखलहुं जे मालकिन कोनो तरहें उठली आओर किछु लोक हुनका दुकानक भीतर लऽ गेलाह। ओकरा बाद तऽ हम बस भटकैत रहलहुं। एम्हर आबक रास्ता खोजैत रहलहुं। एहि बीच हम वर्दीवलाक कतेक सटका खएलहुं कहि नहि सकैत छी। एकटा तऽ हमरा पकडि लेने छल आओर रस्सी सँ बान्हि देने छल। शायद ओ हमरा अपन घर लऽ जाय चाहैत छल। मुदा हम कोनो तरहें ओकर चंगुल सँ आजाद भऽ गेलहुं आओर भागि पडेलहुं। एहि बीच हम सिर्फ भागितहि रहलहुं अछि। ओ लोकनि आओर अपना लोकनि सँ सेहो। अपन लोक सभ तऽ हमरा संग अपन इलाका मे घुसपैठीक जकां देखलक आओर कतेक लोक हमरा पर टूटि पडलाह। हम कोनो तरहे बचैत आइ नारंगी तिनाली पहुंचलहुं तऽ ओ अपन इलाकाक पहचान भेल। हम बचि गेलहुं।' एतेक कहि कऽ मैक्सी सांसहि लऽ रहल छल कि सायरन बाजि उठल। सब बुझि गेल कि आब वर्दी वला आबि धमकताह। एहिलेल सभ अपन-अपन बाट पकडलन्हि। ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.सत्येन्द्र कुमार झा-पॉंच लघु कविता ३.३.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.४.जय प्रकाश मंडल ३.५.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २१म खेप ३.६.राजदेव मंडल दूटा कविता स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! भैयाक विआह!!

जहिना धरफर्री वियाह, तहिना कनपट्टी सिनूर, ओहिना कऽ लिऔ भैया अनिल रूकसद्दियो जरूर ।। वल्व जड़ै छल भीतर वाहर, केहेन अनूप अहॉ केर ठाहर, लालपुरक तोड़ण लागल छल, सोनापूरक कलश साजल छल, माथा पर मुसहरी गर मे माला मोतीपूर ।।

अतुकांत मंत्र सॅ पं0 विद्याधर, करौलनि परिणय वॉचि धराधर, सार श्याम आ नवल नन्द सन, चन्द्र विकल स्वागत धुनि तनमन, भीम पघारी सॅ दतमनि लेल काटल ठॉढ़ि वबूर ।।

गदगद देखि अंजु सन सारि, परिछन कालक विसरि लहुॅ गारि, समना आ भिरहा केर संगम दू-दू सासु सॅ सासुर गमगम, उषा सन सुकन्याक हाथ मे वियनि पंख मयूर ।।

चललहुॅ जहिना अहॉ सहरसा, वरसावैत वसन्ती वरसा, भुक्खे गाड़ी मे अधीर औ मोन पड़ल कोवरक खीर औ, एकसरि किएक गेलहुॅ रंगशाला टूटल भौजीक गुरूर ।।

!! नारि सुनू !!

हे नारि सुनू सुकुमारि सुनू कहि रहलहुॅ हम किछुआन वात, तकरो अहॉ कानि पसारि सुनू ।।

सतयुग मे हम नेना भुटका, त्रेता मे ब्रह्मक आचारी, द्वापर मे ज्ञानक अहंकार, कलि मे छल भक्तिक लाचारी, सभ झूठ मूठ केर दंभ देवि, जौं अहीं अनचिन्हारि सुनू ।।

श्याम रैनि वाट नहि सूझय, सृजन देवि! अहॅक ऑचर अन्हार, धरा अनलहुॅ अवोध राघव केॅ, तखन कोना पसरल व्याभिचार ? रौद्र नायिके भुवन वचाबू अयलहुॅ अहॅक दुआरि सुनू ।।

!! गीत !!

वंशीवट वेकार गय, यमुना तट अन्हार गय ।

एक श्याम विनु सगरो, वृन्दावन भरि हाहाकार गय ।।

सून - सान घर द्वार गय, यौवन भेल असार गय ।

मन मोहन मुरलीक संग, चलि गेल नदी केर पार गय ।।

उपटल खेत पथार गय, मिलनक वन्न वजार गय ।

आव राधिका सॅ के करतनि , हॅसि हॅसि मधुर दुलार गय ।।

सखि पैसलि जलधार गय, होइतथि कोना वहार गय ।

सभक चीर चुनरी पजिऔने, श्याम ठाढ़ि पर ठार गय ।। सत्येन्द्र कुमार झा पॉंच लघु कविता 1 शहरमे पैघ लोक छोट आस्थाक संग जीबै छथि । गाममे छोट लोक पैघ आस्थाक संग जीबै छथि । जीबै दुनू छथि मुदा जीबामे अंतर छै । लोक आ आस्थाक छोट-पैघ भेने जीवनमे फर्क अयबे करतै ने । 2 श्मसानोमे आब कहॉं छै खाली परती धरती सब पर कैक बेर कैकटा लाष जरल छै- आब त’ आबयवला प्रत्येक शव अपना संग अपन पूर्वोजोके एक बेर फेर जरा दैत अछि । 3 अहॉं लिखै छी ढ़ाकीक ढ़ाकी मुदा किऐक नहि पढ़ै छै समय तकरा एकसर अन्हार कोठरीमे अहॉंक सभ पॉंति ‘सफोकेषन’क षिकार भ’ पड़ले रहि जाईत अछि अहॉं छोड़ू लिखनाई आ- पहिने मिला दियौ इन्द्रधनुषकेॅं संगीतक सारेगामाक संग । 4 सूरजक स्थान पर यदि मनुक्ख ठाढ़ रहितै’ एको किरण रोषनीक धरती पर नहि पड़’ दैते । सूरज सेहो अपन रोषनीक संग बिन बतौने मनुक्खकेॅं दिन राति जरिते रहितेै आ- मनुक्ख अपन रोषनीकेॅं पीबि सूरजक रोषनीमे आधा हिस्सा मांगितै । 5 नारी यदि भोग्या छै त’ ठीक छै कोनो हर्ज नहि/ भोगैत रहू मुदा एतबात’ सत्य अछि जे अहॉंके एखनधरि नहि भेटल अछि अपन मायक देहक गंध । शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

!! अनाचार !! विहुंसल विजुकल दुष्यन्तक मन तनय गड़ल अछि थाल मे । न्याय - धर्म भू हिन्द घेरायल अनाचार केर जाल मे ।।

परदारा आ परक द्रव्य दिशि, अधम कुलोचन हुलकि रहल । राजकोष केर वात की कहू ? श्वेत वस्त्र वीचि फुदकि रहल । जनतंत्रक आंचर वसुधा पर मुस्की कौरव भाल मे । न्याय .......................................................................... ।।

उदयन दर्शन आव अलौकिक, भेल विदेहक कथा विलुप्त, सभजन लागल भौतिकता मे बुद्ध अयाची पुंज शुशुप्त, खर खवास सॅ मालिक धरि नाचय कैंचा केर ताल मे । न्याय .......................................................................... ।।

काटर लऽ कऽ गृहस्थ धर्म केॅ, पालन कऽ रहलनि मनुसंतान । जानकी माता पातरि सजावथि, मधुशाला पैसलनि हनुमान । गर्भक कन्या भ्रूण हत्या सॅ समायलि कालक गाल मे । न्याय .......................................................................... ।।

जाति, पंथ, भाषा विभेद ई, प्रजातंत्र केॅ साड़ि रहल । कुटिल राजर्षिक चक्रव्यूह, अपने अपना केॅ जाड़ि रहल देवभूमि केॅ दियौ मुक्ति फॅसि गेल दलालक चाल मे । न्याय .......................................................................... ।। !! अंजलि (बाल साहित्य) !!

कक्का ः सूति रहू अय बुच्ची ओल, पाकल परोर सन लागय लोल । उल्लू मुख भदैया खिखिरक वोल, नाम ‘अंजलि’ कतेक अनमोल ।

अंजलि ः मॉ !! टिल्लू कक्का वड़का शैतान, थापर मारि ठोकै छथि कान । अहॉ सॅ नुका कऽ चिववथि पान, फोड़वनि माथ वा तोड़वनि टॉग ।

कक्का ः भौजी ! छोटकी फूसि वजै छथि, रीतू संग भरि दिन विन-विन करै छथि । दावि रहल छी हिनक देह हम, उत्छृंखल नेना करै छथि तम-तम ।

अंजलि ः कक्का जुनि घोरू मिथ्याक भंग, आव नहि सूतव हम अहॉक संग । मॉ लग हमरा सॅ सिनेह देखवैत छी, एकात पावि हमर घेंटी दवैत छी ।

कक्का ः पठा देव काल्हि अहॉ केॅ हॉस्टल, नेनपन ओहि ठॉ भऽ जएत शीतल । ओतय भेटत नहि खीरक थारी, नहि रसमलाइ नहि पनीरक तरकारी ।

अंजलि ः काकू बनव हम बुधियारि नेना, सदिखन वाजव सुमधुर वयना । ककरो संग नहि मुॅह लगाएव, अहीं लग रहव हॉस्टल नहि जाएव ।। जय प्रकाश मंडल एम.ए. एल.एल.वी मझौरा निर्मली जिला- मधुबनी बिहार जय प्रकाश मंडल अधिवक्ता निर्मली अनुमण्डल कोर्ट बिहार एम.ए. एल.एल.वी ग्राम- मझौरा निर्मली जिला- मधुबनी मोवाइल- 9801180392

(1)मैथिली लोक गीत- उपराग

हम दैइ छी उपराग हे यौ समाजक लोक- 2 जाति धरम अहाँ किए बनौलियै जन-जन मे अहाँ लड़ौलियै केलियै केहन ई खोज, हे यौ समाजक लोक। हम दैइ छी उपराग.....

दहेज प्रथा अहाँ कियै चलेलियै नारीकेँ अहाँ पाइये जोखलियै देलियै केहन ई नोर हे यौ समाजक लोग। हम दैय छी उपराग........

हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इशाई अपनामे सभ भाइ-भाइ मंदिर मस्जिद लेल झगड़ि गेलियै यौ हे यौ समाजक लोक। हम दै छी उपराग.....

(2) मैथिली लोक गीत- भूल कतए भेल

बड़ नीक गप कहलौं ई बुझलौं यौ अपन देश ई महान सेहो मानलौं यौ मुदा घोटालामे देश भेल दिवाला कहु भूल कतए भेल। सौ मे नब्बे बेइमान फेर देश ई महान हम रटै छी गाँधी गौतम केर नाम हम बेचै छी, असमाने जँ फाटत तँ दरजी कि सीयत जतए मंत्री बइमान ओतए प्रजा कि करत यौ भूल कतए भेल कहु सुधि कतए भेल। खेलो मे आब धोखेबाजी चलैए क्रिकेट मे आब सट्ेबाजी चलैए एशिया ओलोपिंक मे नामो धीनेलौं धनि ई मलेशरी जे काँच एगो पइलौं भूल कतए भेल यौ, सुधि कतए गेल। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा २१म खेप किछु ने देखाइ पड़ैत किछु सुनाइ नहि पड़ैत किछु चलैत-फिरैत नहि भरि पृथ्वी भ' गेल अछि निःशब्द अनालोड़ित सात समुद्रक नील नील ! नीलेक अनन्त भीजल विस्तार। कतहु सँ कतहु किछु ने सुझाइत अछि वस्तुक कोनो आकार जल जेना बहि गेल हो महाब्रह्माण्डक अकथनीय अस्पर्शनीय,निष्क्रिय-निष्पन्द विस्तार एही क्षण पृथ्वी पएर धरैत एही क्षण जल | हाथ-पएर चलबिते ऊँच अदृश्य दुर्गम पहाड़- मन कें, चित्त कें चेतना केम कठोर पएर पंजा सँ ओंघड़बैत, गेन जकाँ गुड़कबैत । स्वयं गेन, स्वयं अनन्त विस्तार-महाकाल । तँ की भेल अछि एहि पल राधा स्वयं सेहो महाकाली शक्ति! नेनपनहि सँ सुनल वर्णन जकाँ ? हमर समय की थिक ? राधा राधा कें पूछैत छथि-हमर समय ? हम कोन समय मे छी? कोन रूप मे कतेक आ कथी लेल ? अर्थात् समयक निरन्तरता मे हमर ई एतेक दिन-राति,भोर-दुपहरिया-साँझक अबाध अनुपस्थिति कोन ठाम अछि ? एकर की स्थान छैक । हमर अस्तित्वक एहन नहि हएब, आधा हएब ,आधा नहि हएबब।होयबो करब आ नहियों हएब। एकर की हो आकलन ,के करय एकर हिसाब ? हिसाब कएलो उतर एकर की हो फलितार्थ ?

अर्थ तं चाही सभक अस्तित्वक, कीड़ा-मकोड़ा सँ ल' क' चुट्टी-पिपरी, घास-पात लत्ती-बृक्ष सभक अस्तित्वक विहित अर्थे होइछ ओकर अस्तित्व, वैह ओकर औचित्य सौंसे पृथ्वीक सभटा सहजभूत पदार्थ आ तत्व अपन अर्थ ल'क' आएल अछि। अर्थे तं ओकर आयु बनैत छैक, देह अथवा काया नहि।' से कृष्ण कहैत छथि। एहि समस्तक मनुष्य कें होम' पड़ैत छैक-विज्ञ आ कर' पड़ैत छैक विवेक सँ एहि सभटाक मनुखोचित व्यवहार। विवेक-व्यवहारे थिकैक मुष्यक स्रैष्टिक अर्थ प्रसंग ! संवेदना बाटे अर्थक पुनर्जन्म आ पुनर्रचने होइछ मनुक्खक अर्थ निष्पत्ति ।

माने मानव-अस्तित्व मे सृष्टिक गूढ़ -जटिल जीवनक अग्रसर होइत क्रमक छैक ज्ञान , ज्ञानक अर्थवान सृजन तथा प्रयोगक उत्तरदायित्व | मनुक्खे कें राख' पडैत छैक एक-एक टा हिसाब - जीवनक जोड़-घटाव - गुणा-भाग...सबटाक राख' पड़ैत छैक बही-खाता, जबाबदेही | एखनो अल्प परिभाषित सृष्टिक जटिल कारबारक बहीखाता कें निष्पाप -राफ साफ |बिना डंडी मारने मनुखे कें तौल' पडैत छैक मनुक्खे कें समयक तराजू पर समाज आ संसार | मनुष्य अपने तें, अछि अपने तराजू अपने बस्तु आ तौलल जाइत विराट बजार -वस्तु -व्यापार | ई सब मनुष्ये, सबकिछु...

' हमर कोटि की ? हम की छी ?' राधा पूछैत छथि स्वयं कें ,अपन निष्क्रिय एकांत मे , एहन गंभीरता सं, एतेक दिनक बाद | -' हम की छी ? मनुक्खे तं स्त्री ? ब्रजबासिनी स्त्री ? कोन ब्रजक ? की ?' -' तों मात्र राधा छें | राधा ! तें हमर सबकिछु छें | तोहर उत्तर हमहूँ नहिं | ई तँ अछि बूझल जे राधा माने-जे निवारण करय कृष्णक बाधा ।' -'अहाँ सब बेर एहिना ठट्ठा मे उड़ा दैत छी कृष्ण हमर बात ।' खिसिया गेलखिन राधा- -ई नीक बात? कहू थिक नीक लोकक काज?' -तोरा के कहलकौ जे हम छी नीक लोक, तमसाहि छौंड़ी ?' बिहुँसैत कहैत कृष्ण लगब' लगलखिन राधा कें गुदगुद्दी । तकरे बरजैत काल घुरि अएलनि चेतना, जेना....

ई केहन दुविधा , मोनक ई की दशा ? एखन एहि पल दिन अछि कि राति तेकरो बोध नहि बांचल । अन्हार छी बैसलि कि इजोत मे तकरो अंदाज नहि। बैसलि छी बा ठाढ़ि, बुझाइओ नहि पड़ैछ। प्रगाढ़ निन्न मे छी देखि रहल कोनो स्वप्न बा पड़लि निःश्चेष्ट भूमि पर सद्यः ! भरि गाम भ' गेलए निःशब्द, निर्बसात, आ कि निसभेर किंबा साँठल भार जकाँ राखल भरि आँगन, से अंगने साँठि क' पठा देल गेलय कोनो गाम, भार समेत ?

देह बड़ जरैए। जेठ-बैसाख मे आगि ताप' बैसि गेल होइ जेना । शरीर । मुदा ध्यान आएल यदि बुझा रहल अछि धाह आ ज्वाला तँ यथार्थे छी। देहक बोध बाँचल अछि।अर्थात् देह बाँचल अछि। देह, कतहु अछि।कोहनो स्थिति मे देह अछि। देह बुझा रहल अछि। भ' रहलए किछु संचार -बुझबाक, किछु करबाक उचाबच । देह अछि, बैसल, ठाढ़, सूतल-पड़ल जेना हो, अछि। तकबाक चाही। कोन स्थिति मे अछि केबल ताप-धाहक बोध देहक अनुभव नहि होइत अछि। हँ मुदा, धाहक-दुःखक माध्यमे देह-अनुभव मनुष्य-मन कें बेशी प्रत्यक्ष आ तें यथार्थ क' बुझा दैत छैक आ ओकर आयु सेहो होइत छैक अपेक्षाकृत बेशी । सुख बिलाई छैक, बिला जाइ छैक। दुख जीवन में रहि जाएत छैक। चुपचाप अपन कोनो कोन में उपेक्षा-सैंतल अपना के रूपांतरित करबाक मनोव्यनहार में भऽ जाइत छैक, मनुक्ख के आत्मसात...दुखऽक रूप में ओकर विलय चेतना में ताहि अनुपात औऱ शैली में होयत छैक जो स्वयं ओ शरीर अर्थात मन-मस्तिष्क-चेतना के पर्यंत नहि होइत छैक तेकर अनुमान , अनुभव, बा ठेकान...। सुख जेंका विला के नहि स्वय के मनुक्ख जोग्य. बना कऽ, दुख बनैत अछि उपयोगी, सृष्टा और अक्शुण्ण प्रेम मार्गक बटखर्चा । सदा संबल। दुख स्वयं संग लोकके बदलैत अछि तैं अपन अस्वीकार्यता-अग्राह्यता में पर्यंत वैह होइत अछि श्रेयस्कर, मनुक्ख बाट के लक्श्य धरि लो जेबाह में ओकरे दिशा निर्देश होइत अछि, बेशी उपयुक्त । चैन छीनब सतत चैन छिनबे नहिं थिक। चैन छीनब बैचेन करबाक एकटा प्राकृतिक उपाय थीक, ई उपाय तुच्छता सऽ विशेष संऽ संजोग आर मुक्तिक सीढी बनिकऽ अपन काज करति अछि । अपन काज करति रहैत अछि। दुख के माहुर जेकां केला से उपयोग दुख हेय भ जायत अछि। हेयता मनुक्ख स्वभावक अंहार पक्ष होयत अछि। उच्चता आ उत्थाने होयत अछि ओकर स्वाभाविक उत्कर्ष। मनुक्ख भौतिकता सऽ लऽ कऽ अध्यात्म पर्यंत करैत चलैये अपना -अपना रुचि, सुख आर कर्तव्य सं अपन पथक निर्धारण - निर्माण...एहि में सऽ कतहु प्रकट होयत अछि रचना ….अपन संपूर्ण शरीर मोनक स्पंदन लेने, भीजल-तीतल सर्वांग उल्लसित मुख मंडल लऽ...को खन अतिचिंतित विश्वबोध सऽ जेना कालिया दह में प्राण लेबाक चिंता आर क्लेश में छोड़ि जानि नहि कतेक काल डूबल रहि गेला, जमुना में श्रीकृष्ण।कतेक काल....!जेना कै जुग-आ जमुना तर सऽ नथने नाग जखेन ऊपर भेला उल्लसित मुखमंडल आर भीजल शरीर संग, तखन ते नहल-भीजल छल डांढ़ में खोंसल बंसुली सेहो हुनकर... शरीर। तं की हमर अपनो कोनो अछि कालिया, नितांत कोनो अप्पन ?

मुदा ध्यान आयल यदि बुझा रहल अछि धाह आ ज्वाला तं यथार्थे छी। देहक बोध बाँचल अछि।अर्थात् देह बाँचल अछि। देह, कतहु अछि।कोहनोस्थिति मे देह अछि। देह बुझा रहल अछि। भ' रहलए किछु संचार -बुझबाक, किछु करबाक उचाबच । देह अछि, बैसल, ठाढ़, सूतल-पड़ल जेना हो, अछि। तकबाक चाही। कोन स्थिति मे अछि केबल ताप-धाहक बोध देहक अनुभव नहि होइत अछि। हँ मुदा, धाहक-दुःखक माध्यमे देह-अनुभव मनुष्य-मन कें बेशी प्रत्यक्ष आ तें यथार्थ क' बुझा दैत छैक आ ओकर आयु सेहो होइत छैक अपेक्षाकृत बेशी । सुख बिलाई छैक, बिला जाइ छैक। दुख जीवन में रहि जाएत छैक। चुपचाप अपन कोनो कोन में उपेक्शा सैंतल अपना के रूपांतरित करबाक मनोव्यनहार में भऽ जाइत छैक, मनुक्ख के आत्मसात...दुखऽक रूप में ओकर विलय चेतना में ताहि अनिपात औऱ शैली में होयत छैक जो स्वयं ओ शरीर अर्थात मन-मस्तिष्क-चेतना के पर्यंत नहि होइत छैक तेकर अनुमान , अनुभव, बा ठेकान...। सुख जेंका विला के नहि स्वय के मनुक्ख जोग्य. बना कऽ, दुख बनैत अछि उपयोगी, सृष्टा और अक्शुण्ण प्रेम मार्गक बटखर्चा । सदा संबल। दुख स्वयं संग लोकके बदलैत अछि तैं अपन अस्वीकार्यता-अग्राह्यता में पर्यंत वैह होइत अछि श्रेयस्कर, मनुक्ख बाट के लक्श्य धरि लो जेबाह में ओकरे दिशा निर्देश होइत अछि, बेशी उपयुक्त । चैन छीनब सतत चैन छिनबे नहिं थिक। चैन छीनब बैचेन करबाक एकटा प्राकृतिक उपाय थीक, ई उपाय तुच्छता सऽ विशेष संऽ संजोग आर मुक्तिक सीढी बनिकऽ अपन काज करति अछि । अपन काज करति रहैत अछि। दुख के माहुर जेकां केला से उपयोग दुख हेय भ जायत अछि। हेयता मनुक्ख स्वभावक अंहार पक्ष होयत अछि। उच्चता आ उत्थाने होयत अछि ओकर स्वाभाविक उत्कर्ष। मनुक्ख भौतिकता सऽ लऽ कऽ अध्यात्म पर्यंत करैत चलैये अपना -अपना रुचि, सुख आर कर्तव्य सं अपन पथक निर्धारण - निर्माण... एहि में सऽ कतहु प्रकट होयत अछि रचना अपन संपूर्ण शरीर मोनक स्पंदन लेने, भीजल-तीतल सर्वांग उल्लसित मुख मंडल लऽ...को खन अतिचिंतित विश्वबोध सऽ जेना कालिया दह में प्राण लेबाक चिंता आर क्लेश में छोड़ि जानि नहि कतेक काल डूबल रहि गेला, जमुना में श्रीकृष्ण। कतेक काल....! जेना कै जुग-आ जमुना तर सऽ नथने नाग जखेन ऊपर भेला उल्लसित मुखमंडल आर भीजल शरीर संग, तखन ते नहल-भीजल छल डांढ़ में खोंसल बंसुली सेहो हुनकर... राधा देहक पसेना अनेरे भ' गेलनि बर्फक बनल सरिसो दाना,मेंही-मेंही कण चकचक सटल ऊर्ध्वांग ।बनबैत देह-मन शीतल, दैत दुर्लभ चैन, शान्ति आ सहन करबा योग्य सम्पूर्ण अपार वर्तमान, जे एखनि किछए पल पहिने धरि छलनि अस्तित्व कें अनाथ छोड़ने, जानि ने कत'? घुरि क' आबि अंकबारने छनि गसिया क' परम प्रिय सखि गंगा सन प्रगाढ़। कनफुसकीए पूछि रहल छनि-श्रीकृष्णक विषय। राधाक सम्पूर्ण अस्तित्व मे ध्वनित, अनुध्वनित-प्रतिध्वनित छथि आब-वैह नाग नाथि एखनहि यमुना सँ बहार भेल-श्रीकृष्ण ।.... -' ई एना नोर किएक बहए लागल असोधार? ककर थिक ई दिव्य आँगुरक हाथ ? के पोछि रहलए हमर नोर ? कहाँ सँ ध्वनित भ' रहल लगातार- किएक कनैत छें राधा, किएक करैत छें एतेक दुःख ? नोर सेहो ओतेक निरर्थक नहि राधा। तोरा-कम सं कम तोरा तं बूझल छौक । तोहूं भ' जएबें तेहन साधारण-बुद्धि ? नहि कान राधा। शान्त हो, स्थिर । -' केऽऽऽ केऽऽऽऽऽ?' राजदेव मंडल दूटा कविता रेत परक माछ तप्‍त रेतपर फड़फड़ाइत माछ कानि‍-कानि‍ कऽ रहल नाच रेतापर फाड़ैत चीस उड़बाक लेल आसमान ि‍दश‍ ओ उछलि‍ पड़ल अभागल देहसँ झड़ए लागल चॉंदीकेँ कण झूमि‍ उठल कतेको ऑंखि‍क मन जरि‍ रहल अछि‍ माछक तन सुना रहल ओ दर्द भरल जीनगीक इति‍हास डूबल हम आनन्‍द लोकमे कऽ रहल छी परि‍हास कहि‍यो छल नाचैत ओ स्‍वजन-परि‍जनक बीच जालमे फसा कऽ मछेरा लओलक तटपर खींच ओ कानल ि‍गड़गि‍ड़ाएल ि‍कन्‍तु, बचाबए लेल ि‍कयो नहि‍ आएल आब जतए जाएत नोचत अोकर मॉंस छीन लेत चलैत सॉंस तइयो नहि‍ अछि‍ नि‍राश घेरासँ छुटबाक कऽ रहल प्रयास छुि‍ट कऽ जतए ि‍गरल बाउलसँ चारूभर ि‍घरल आओर ओ जे छल जीनगी-जल सपना भऽ गेल गरम रेत अपना भऽ गेल। कांध परक मुरदा हमरा कान्‍ह परक मुरदा बाजैत अछि‍ पुरना गप्‍प नव अन्‍दाजे साजैत अछि‍ कहि‍यो दोस जेकॉं बति‍याबैत अछि‍ कहि‍यो दुसमन जेकॉं लति‍याबैत अछि‍ हम भागए चाहैत छी दूर ि‍कन्‍तु बेबस, असोथकि‍त देह भऽ गेल अछि‍ चूर-चूर कान्‍हपर सँ एकरा हटाबए चाहैत छी भार ि‍कछु घटाबए चाहैत छी तीनठाम नहि‍ तँ एकेठाम पहि‍ले करए चाहैत छी इएह काम फेकए चाहैत छी कंधासँ बचए लेल गुलामीक धंधासँ पि‍बैत अछि‍ ओ हमर रकत तइयो बनल छी हम भगत हमरा चारूभर पसरि‍ रहल बीख भरल दुर्गन्‍ध फाटि‍ रहल नाक केहेन अछि‍ भयावह गन्‍ध ि‍कन्‍तु ओ हमरा कान्‍हपर अड़ल अछि‍ हमरा मॉंस आर खूनमे गड़ल अछि‍ मृत आओर जीवन्‍त लहू ि‍मलैत रहल फूल कम आ बेसी कॉंटे खि‍लैत रहल सर, नहि‍ सहब आब आत्‍मघाती प्रहार हमर कान्‍ह आर बॉंहि‍ तनि‍ कऽ अछि‍ तैयार चाहे, टूटि‍ जाए सॉंस बहि‍ जाए खून उखड़ि‍ जाए माँस अछि‍ एहन ि‍वश्‍वास हटत लहास फैलत उजास। बालानां कृते- जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक कथा 81    सद्गृहस्त एकटा गृहस्त छला। संयम स जीवन-यापन करैत छला। परिवार कऽ सुसंस्कारी बनबै मे सदिखन लागल रहैत। नीतिपूर्वक आजीविका स जिनगी बितबैत। परिवारक काज आ खर्च स जे समय आ धन बँचैत छलनि ओ परमार्थ मे लगबैत। ओ गृहस्त कहियो तपोभूमि नहि गेलाह मुदा घरे मे तपोवन बना नेने छलाह। देवतो खुशी रहैत छलथिन। एक दिन गृहस्तक क्रिया सऽ खुशी भऽ इन्द्र आबि बर मांगैक लेल कहलखिन। गृहस्त असमंजस मे पड़ि गेला जे की मंगबनि। जखन असंतोषे नहि तखन अभावे कथीक? स्वाभिमानी गमौलाक उपरान्ते क्यो ककरो स किछु पबैत अछि। ई बात सोचि गृहस्त मने-मन विचारै लगलाह जे जहि स ऋृणो-भार नहि हुअए आ देवतो अपमान नहि बुझति। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत गृहस्त मंगलकनि- हमर छाया जतै पड़ै ओतए कल्याणक बरखा होय। इन्द्र वरदान तऽ दऽ देलखिन मुदा अचंभित भऽ गृहस्त स पूछलखिन- हाथ  रखला पर कल्याणों होइत आ आनंदो प्रशंसो आ प्रत्युपकारक संभवनो होइत। मुदा छाया स कल्याण भेलो पर लाभ स बंचित रहै पड़ैत। तखन ऐहन विचित्र वर किऐक मंगलहुँ? मुस्कुराइत गृहस्त कहलखिन- देव! सोझावलाक कल्याण भेने अपना मे अहंकार पनपैत अछि। जहि स साधना मे बाधा उपस्थिति होइत। छाया ककरा पर पड़ल के कत्ते लाभन्वित भेल ई पता नइ लगब जीवनक लेल श्रेयस्कर थिक। साधनाक यैह रुप पैघ होइत। यैह क्रम प्रगतिक रास्ता पर चलैत-चलैत व्यक्ति महामानव बनैत अछि। 82   सद्भाव अपन शिष्यक संग महात्मा ईसा कतौ जाइत रहथि। साँझ पड़ि गेलै। राति बितवैक लेल एकठाम ठहरि गेला। संग मे पाँचे टा रोटी खाइ ले छलनि। रोटीक हिसाबे खेनिहार अधिक तेँ सभकेँ पेट भरब कठिन। अपना मे शिष्य सब यैह गप-सप करैत। ईसो सुनलखिन। मुस्कुराइत ईसा कहलखिन- सब रोटी कऽ टुकड़ी-टुकड़ी तोड़ि एकठाम कऽ लिअ आ चारु भाग स सभ बैसि खाउ। जहि स सभकेँ एक रंग भोजन भेटि जायत। महात्मा ईसाक विचार मानि सभ सैह केलक। संतोषक जन्म सभक हृदय मे भऽ गेलैक। सभ केयो खायब शुरु केलक। रोटी सठैत-सठैत सभक पेटो भरि गेलैक। तखन एकटा शिष्य बाजल- ई गुरुदेवक चमत्कार छिअनि। शिष्यक बात सुनि ईसा कहलखिन- ई अहाँ लोकनिक सद्भावक सहकार थिक नहि की चमत्कार। अगर अहाँ सभ अपना मे छीना-झपटी करितहुँ त ई संभव नहि होइत। जहिठाम सद्भाव स परिवारक संबंध होइत तहिठाम एहिना प्रभुक अयाचित सहयोग भेटैत अछि। 83   आलस्य वनाम पिशाच वन विहार करैक लेल वासुदेव बलदेव आ सात्यकि घोड़ा पर चढ़ि निकललाह। घनघोर जंगल रहने तीनू गोटे रास्ता मे भटकि गेला जाइत-जाइत ऐहन सघन बन मे पहुँच गेलथि जहिठाम सऽ ने पाछू होएब बननि आ ने आगू बढ़ब। मुन्हारि साँझ भ गेलै। अन्हार मे चलब आरो कठिन भऽ गेलनि। अचताइत-पचताइत तीनू गोटे अटकि गेला। एकटा  झमटगर गाछ छलैक जहिक तर (निच्चा) मे घोड़ा बान्हि तीनू गोटे राति बितबैक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीबै ले किछु रहबे ने करनि तेँ गाछेक निच्चा मे दूबि पर सुतैक ओरियान केलनि। मुदा मन मे शंका होइत रहनि जे जँ तीनू गोटे सुति रहब आ घोड़ा कियो खोलि कऽ ल जाय? तीनू गोटे बिचारलनि जे एक-एक पहर जागि अपनो आ घोड़ोक ओगरवाही कऽ लेब आ सुतियो लेब। पहरा करैक पहिल पारी सात्यकिक भेल। वासुदेव आ बलदेव सुति रहला। सात्यकि जगल रहल। थोड़े खानक बाद गाछ पर स पिशाच उतड़ि सात्यकिक संग मल्लयुद्ध करैक लेल ललकारलक। ओहने उत्तर सात्यकियो देलक। दुनूक बीच घुस्सा-घुस्सी हुअए लगल। सैाँसे पहर दुनूक बीच मल्लयुद्ध होइते रहल। कते ठाम सात्यकिक देह मे चोटो लगलैक। छालो ओदरलै। पहर बीति गेल। दोसर पारी बलदेवक आयल। सात्यकि सुति रहल। बलदेव पहरा करै लगल। थोड़े कालक बाद पिशाच पुुनः आबि चुनौती देलकनि। बलदेवो ओहने उत्तर देलखिन। पिशाचक आकार सेहो नमहर भ गेल छलै। दुनूक बीच मल्लयुद्ध शुरु भेल। बलदेवो केँ पिशाच दुरगति क देलकनि। दोसरो पहर बीतल। तेसर पहरक पारी वासुदेवक छलनि। पुनः पिशाच आबि हुनको चुनौती देलकनि। मुदा वासुदेव हँसवो करति आ कहबो करथिन- बड़ मजगर अहाँ छी। निन्न आ आलस स बँचैक लेल मित्र जेँका मखौल करै छी। पिशाचक बल घटै लगलै। आकारो छोट होइत गेलै। भिनसर भेल। नित्यकर्म स तीनू गोटे निवृत्ति भ चलैक तैयारी करै लगलथि। तखन सात्यकि आ बलदेव अपन रौतुका चरचा करैत जतऽ-जतऽ चोट लगल रहनि सेहो देखोलखिन। हँसैत वासुदेव कहलखिन- ई पिशाच आरो किछु नहि थिक। ई मात्र कुसंस्कार रुपी क्रोध छी। ओकरो ओहने प्रत्युत्तर भेटिलै तेँ बढ़ैत गेल। मुदा जखन ओकरा उपेक्षाक रुप मे देखलिऐक तखन ओ छोट आ दुर्बल भ गेल। 84   स्वर्ग आ नर्क विद्यालयक ओसार पर बैसि गुरु आ शिष्य गप-सप करति रहथि। एकटा शिष्य गुरु स स्वर्ग आ नर्कक संबंध मे पूछलकनि। शिष्य कऽ बुझबैत गुरु कहै लगलखिन- स्वर्ग आ नर्क अही धरती पर अछि। जे कर्मक अनुसार अही जिनगी मे भेटैत छैक। गुरुक उत्तर स शिष्य संतुष्ट नहि भेल। शंका बनले रहलै। पुनः गुरु स अपन शंका व्यक्त केलक। गुरु बुझलनि जे बिना व्यवहारिक जिनगी देखौने शिष्य संतुष्ट नइ हैत। ओ (गुरु) उठि शिष्य सभ कऽ संग केने गाम दिशि विदा भेला। गाम मे एकटा बहेलियाक घर छलै।। ओहिठाम पहुँचते सभ देखलक जे पेट-पोसैक लेल बहेलिया जीव-हत्या कऽ रहल अछि। ततबे नहि जीब हत्यो केने ने देह पर वस्त्र छैक आ ने भरि पेट भोजन। धीयो-पुतोक देह पर माछी भिनकै छै। एको क्षण ओतै रहैक इच्छा ककरो नहि होय। चुपचाप गुरुजी शिष्यक संग ओतै स विदा भ गेला। दोसर ठाम पहुँचला। ओ वेश्याक घर छलै। युवावस्था मे ओ (बेश्या) खूब पाइयो कमेने छलि आ भोगो केने छलि। मुदा बुढ़ाढ़ी मे आबि अनेको रोगो स ग्रसित भ गेलि आ परिवारो-समाजो स तिरस्कृत भ गेलि। पेटक दुआरे भीख मंगैत छलि। सभ केयो (गुरु-शिष्य) देखि ओतै स विदा भ गेला। तेसर परिवार गृहस्तक छल। जहिठाम जा सभ देखलखिन जे गृहस्त जेहने संयमी छथि तेहने परिश्रमी। स्वभाव स उदार आ सद्गुणी सेहो छथि। जहि स परिवार सुख-समृद्धि स भरल-पूरल छलैक। गृहस्तक परिवार देखि गुरुजी शिष्यक संग आगू बढ़ि चारिम परिवार मे पहुँचल। पोखरिक मोहार पर एकटा संत कुटी बनौने रहथि। शिक्षा आ प्रेरणा पवैक लेल दिन-राति समाजक लोक अबैत-जाइत रहैत छल। संतजी मस्त-मौला जेँका जिनगी बितवैत। ने मन मे एक्को मिसिया क्रोध आ ने कोनो तरहक चिन्ता। चारु परिवार देखि शिष्यक संग गुरुजी विद्यालय दिशि चललाह। रास्ता मे शिष्य केँ कहलखिन- पहिल जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ नरकक रुप मे छल आ बादक जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ स्वर्गक रुप मे। 85  यथार्थक बोध शिखिध्वज ब्रह्मज्ञानी बनै चाहति रहथि। ओ सुनने छलथि जे तियाग आ वैराग्य स मनुष्य ब्रह्मज्ञानी बनैत अछि। तेँ शिखिध्वज घर-परिवार छोड़ि जंगल मे कुटी बना रहै लगलथि। ओहि बन मे तपस्वी शतमन्यु सेहो रहैतछलथिन। शतमन्यु कऽ पता लगलनि जे एकटा नवांगतुक घर-परिवार छोड़ि कुटी बना रहैत अछि। शतमन्यु आबि शिखिध्वज केँ कहलखिन- गामक घर-गिरहस्ती  उजाड़ि बन मे वैह सब सरंजाम (रहैक व्यबस्था) जुटबै मे लागि गेलहुँ ताहि स की लाभ? बैराग्य त अहंता आ लिप्सा स हेबाक चाही। जँ भऽ सकै तऽ घरे मे तपोवन बना सकै छी। शतमन्युक विचार सुनि शिखिध्वज केँ वास्तविकताक बोध भऽ गेलनि। ओ घुरि कऽ घर आबि परिवारक बीच रहि सेवा-साधना मे जुटि गेला। शिखिघ्वज एकांकी मुक्तिक जगह सामूहिक मुक्तिक मार्ग अपनौलनि। हुनके वंश मे बाल्यखिल्य ऋृषि भेलखिन जे सैाँसे जम्बूद्वीप कऽ देवभूमि बना देलखिन। 86    विद्वताक मद एक दिन महाकवि माघ राजा भोजक संग वन-विहार कऽ घुमल अवैत रहथि। रास्ता मे एकटा झोपड़ी देखलखिन। ओहि झोपड़ी मे एकटा वृद्धा टोकरी (तकली) कटैत रहथि। ओहि वृद्धा स माघ पूछलखिन- ई रास्ता कत्ते जाइत अछि? बृद्धा माघ कऽ चीन्हि गेलीह। ओ हँसैत उत्तर देलखिन- वत्स! रास्ता त कतौ नहि जाइत अछि। जाइत अछि ओहि पर चलैवला राही। अहाँ सभ के छी? माघ- हम सभ यात्री छी। मुस्कुराइत वृद्धा बाजलि- तात्! यात्री त सुरुज आ चान दुइये टा छथि। जे दिन-राति चलैत रहति छथि।  सच-सच कहू जे अहाँ के छी? थोड़े चिन्तित होइत माघ कहलखिन- माँ! हम क्षणभंगुर आदमी छी। थोड़े गंभीर होइत पुनः वृद्धा कहलकनि- बेटा! यौवन आ धने टा क्षणभंगुर होइत। पुराण कहैत अछि जे एहि दुनूक बिसवास नहि करी। माघक चिन्ता आरो बढ़लनि। रोष मे कहलखिन- हम राजा छी। हुनका मन मे एलनि जे राजाक नाम लेला स ओ सहमि जयतीह। मुदा ओ वृद्धा निर्भीक भऽ उत्तर देलकनि- नई भाई अहाँ राजा कोना भऽ सकै छी? शास्त्र त दुइये टा राजा- यम आ इन्द्र मानने अछि। 87    श्रद्धा बच्चा मे स्वामी रामतीर्थ गामेक एकटा मौलवी सहाएव स पढ़ने रहथि। प्रारंभिक पढ़ाई पुरला उपरान्त पाठशाला मे नाम लिखौलनि। पाठशाला मे नाओ लिखबै स पहिने पिताक (रामतीर्थक) मन मे प्रश्न उठलनि जे मौलवी एहाएव केँ की देल जाइन। प्रश्न दू तरहक। पहिल जे उचित महीना (मजदूरी) आ दोसर ज्ञानक पुरस्कार। काजो दोसर जिनगी भरिक। पिताक चिन्तित मुद्रा देखि रातीर्थ पुछलखिन। पिता कहलखिन। पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन। पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन- पिता जी जहिना ओ (मौलवी सहाएव) हमरा ज्ञानक दूध पीबैक लेल देलनि तहिना हिनको दूध दइवाली बढ़िया गाय दऽ दिअनु। पिता सैह केलनि। 88    अनंत हरि अनंत हरि कथा अनंता - तुलसी एक दिन भगवान बुद्ध आनंदक संग एकटा सघन बन स गुजरैत रहथि। रास्ता मे दुनू गोटेक बीच ज्ञानक चर्चा चलैत रहनि। आनंद पूछलखिन- देव अपने तऽ ज्ञानक भंडार छिअए। अपने जे जनैत छी ओ हमरा बुझा देलहुँ? आनंदक बात सुनि उलटि कऽ बुद्धदेव पूछलखिन- एहि जंगलक जमीन पर कते सुखल पत्ता पड़ल छै? हम जइ गाछक निच्चा मे ठाढ़ छी ओइ गाछ मे कते सुखल पात लागल छै? आ अपना सभक पाएरक निच्चा कते पड़ल छैक। सब मिला कते होएत? बुद्धदेवक प्रश्न स आनंद निरुत्तर भऽ गेलाह। आनंद कऽ उत्तर नहि दइत देखि तथागत कहलखिन- ज्ञानक विस्तार ओते अछि जते एहि वन प्रदेश मे सुखल पातक परिवार। अखन धरि हमहूँ एतबे बुझलौ हेँ जे जते वृक्षक उपर सुखल पात अछि। मुदा पाएरक निच्चा जे अछि ओ हमहूँ ने बुझै। 89    हँसैत लहास (मुरदा) जिनगी कऽ जिनगी बुझि मनुष्य कऽ जीबाक चाहिऐक। जँ से नहि भेलि त जिनगीक कोनो महत्व नहि जायत। जे कियो जिनगी कऽ कमेनाइ-खेनाइ धरि रखैत ओकर संस्कार मरलो पर ओहिना रहि जायत। एक दिन दू टा शव एक्के बेरि श्मशान पहुँचल। कठिआरीक लोक डाहैक ओरियान करै लगल। एकटा शव दोसर कऽ देखि ठहाका मारि हँसै लगल। हँसैत शव कऽ देखि दोसर शव पुछलक- बंधु ऐहन कोन बात भऽ गेल जे अहाँ हँसि रहल छी। जबकि दुनू गोटे एक्के स्थिति मे छी? हँसैत शव उत्तर देलक- बंधु अहाँ कऽ मन अछि की नाहि मुदा हमरा त मन अछि। दुनू गोटे संगे गामक स्कूल मे पढ़ने रही। पढ़लाक वाद अहाँ वणिक वृत्ति मे लगि दिन-राति पाइयेक हिसाबो आ भोग-बिलास मे लगि गेलहुँ। आब अहाँक ओहन स्थिति भऽ गेलि अछि जे श्मशानो घाट पर पाइयेक हिसाब आ भोगे-बिलासक गर लगबै छी। आओर अहाँ - दोसर पूछलक। पहिल- जाधरि जीवैत छलौ मस्त सऽ रहलौ। ने कहियो बेसी पाइक जरुरत भेलि आ ने तइ ले मन मे चिन्ता। जहिना चिन्ता मुक्त पहिने छलहुँ तहिना अखन छी। अच्छा आब ओहूँ जाउ आ हमहूँ जाइ छी। अछिया तैयार भऽ गेल। नमस्कार। कहि पहिल शव चिता दिशि बढ़ि गेल आ दोसर कनगुरिया ओंगरी पर हिसाब जोड़ै लगल। 90    अनगढ़ चेतना ज्ञान (विद्या) अनगढ़ चित्त कऽ सुगढ़ बनबैत। जहि स सोचै आ चलैक दिशा निर्धारित होइत। ओना मनुष्यक अनगढ़ता क प्राप्ति जन्मजात होइत। जहिना शरीरक रक्षाक लेल भोजनक प्रयोजन होइत तहिना मनुष्यता प्राप्त करैक लेल विद्याक। वशिष्ठ जी राम केँ भयंकर वन मे विचरण करैवला उनमत्तक आखिक देखल कथा सुनवैत कहलखिन- ओ (उनमत्त) देखै मे त निरोग (स्वस्थ) बुझि पड़ैत मुदा ओकर जे क्रिया-कलाप होइत ओ विल्कुल पागलक सद्श्य होइत। सदिखन रास्ताक व्यतिक्रम करैत। जहाँ-तहाँ बौआइलो घुमैत आ अन्ट-सन्ट रास्ता सेहो बनबैत। जहि स अपनो देह-हाथक नोकसान करैत आ काँट-कुश मे ओझराइलो रहैत। मुदा तइओ अपना कऽ बुद्धियार बुझि दोसराक नीको विचार कऽ मोजरो ने दइत। जहि स सदिखन भय चिन्ता स मन त्रस्त रहैत। मुदा तइयो ने अधलाह रस्ता छोडै़त आ ने ककरो नीक करैत। वशिष्ठक विचार सुनि राम पूछलखिन- भगवन! ओ उन्मादी कते रहैत अछि? ओकर नाओ की थिकैक आ ओकर कोनो उपचार छैक की नहि? वशिष्ठ- वत्स ओ कियो आन नहि मनुष्यक अनगढ़ चेतना छी। जे जाल मे फँसल ओहि चिड़ैक सदृश्य अछि जे मरैक रास्ता देखि फड़फड़ाइत त अछि मुदा निकलैक रस्ते ने देखैत। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/  राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_V-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-Leaning towards the truth with own knowledge DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –V NAAGPHAANS                        PART  V Dhara received phone call from Akash. Akash – I have got a happy piece of news for you. Tarang has arrived from village. Dhara – I am really happy. May I join you on break-fast. Akash – Why not? It is my pleasure. I also wanted to invite you. You understand           my inner feelings. After break-fast you will also have to take lunch with us. That day Dhara was really happy. Tarang didi’s modest personality charmed her. This meeting has changed Dhara’s life. Tarang treated Dhara as her loving younger sister. Dhara became a regular visitor to Tarang’s house. One day when they were busy talking, a voice interrupted them – May I come in? Simant entered and after embracing Akash, said – What a pleasure! You people are having a real blast. Akash – What a surprise? When did you arrive? Simant – I wanted to give  surprise to Dhara. But I never thought to surprise all of you. Looking at Dhara Simant asked , how are you? Dhara shaking her head said- I am fine. Dhara was overjoyed to see Simant. Simant staring at Tarang said – May I know your introduction? Akash – She is my better half. Simant said interrupting- No, no …. Not better half but best half – because without them we do not exist. Tarangji, please make tea so that we can enjoy the tarang of good tea. Tarang -  I will prepare tea. But you will have to stay back for dinner. 2 Simant and Dhara remained wide awake throughout the night busy in endless talk—Dhara, you do not worry for anything. We have to shape the life of our children, Kadamba and Manjul. Both are in boarding school. We require money for that. I am earning  only for you,. for our children. What is the matter Dhara? Dhara – Nothing serious. But without you life is miserable here. People make comments, fabricate stories about me --- Dhara told Simant everything – her own ordeal and Vanya’s story. Simant patiently heard everything and laughingly said – Have you gone mad? Had I known singing I would have sung – kuchch reet jagat ki aisi hai harek subah ki sham hui – tu kaun hai tera naam hai kya Sita bhi yahan badnam hui ….  Dhara, I believe you more than myself. Should we follow our own mind and soul or be guided by people’s opinion? Dhara, I know that Akash is a very good person – both of you live on literature – you  derive satisfaction talking to each other- I understand everything. Tarang once asked Dhara – why do you feel lonely? Dhara – didi, women are  as mysterious as nature is. Tarang - Dhara , women are not mysterious. This universe is made of five elements – nature was thus created – human body is also made of these five elements- earth, water, vayu, agni and akash – this earthly body ultimately gets dissolved in earth. There are lots of resemblance between nature and human being. How does moon rise?- how sun rises and sets? – why waterfall is continuously flowing. – every particle of nature is mysterious. How many examples should I cite – Why famine occurs?- why flood recurs?- even scientific discoveries are not able to unravel nature’s mystery- then how can we unravel the mysterious human mind?- can you totally read anybody’s mind and thoughts? – Tarang was speaking intensely and continuously. Dhara – didi, why it appears to me that each and every particle of nature is suffering? Once I had accompanied Simant to Kosi barrage – massive dam on frenzied and hysterical Kosi river –  52 iron gates to tame the river- but like wounded lioness, the river was trying to cut loose with furious sound- I felt terribly frightened  and my heart bled to unwind the river. Didi, I am not able to withstand anybody’s pain and grief. Tarang – please calm down Dhara. You are very emotional – your inner core is imbued with pain and sorrow. You have child like innocence which takes you close to god. Dhara – didi, you live in village. How did you attain the highest level of maturity even by staying there? Tarang – maturity does not come only in a city. Whether literate or illiterate, everybody is blessed with heart full of emotions and desires. Everybody is blessed with some hidden treasure. 3 Dhara was shocked and surprised—wife of Akash Babu- such a scholarly and emotional lady. –Didi, please tell me about yourself. Tarang – What should I tell? I do not have time to dwell on these things. I am overburdened with my responsibility ….. But Dhara was able to comprehend something unusual from Tarang’s gesture. Reality was something different. Each person has his/her own inner world unregulated by any law, rule, custom , tradition, culture and sacrament. That inner world consists of the most dear thing,a person or a feeling with which the human being comfortably and smilingly travels the life’s difficult journey. As the furious river Kosi was tamed, the human beings also have  to control the floodgates  of emotion. But those who live with the inner world do not need any fetters or shackles to control. Dhara remembered the cataclysm caused by Kosi. Before the Dam was constructed over Kosi, the parents of the newly wed daughters prayed to Kosi for their safe passage with the promise of ‘ chhagar-pathi- sinnur’ offerings to mother Kosi. Dhara enquired from Akash about Tarang’s  behaviour. Akash replied – when I was about 19 years old I got attracted to my bhauji. Bhauji compelled me for intimate relationship . One day my elder brother caught us red handed. After that incident I never met them. I started hating bhauji. Later on I met a beautiful girl Lata who was daughter of my fathers’ friend. We deeply fell in love. But she got married to a rich boy. I had the satisfaction that she is happily married. One day when I visited her place, she totally ignored me. I was shattered. Till date I am not able to realize my mistake. Since that day onwards I have started hating women. I got married and my wife became victim of this hatred. But she is very tolerant. I used to study till late hours and she cared for me with sleepless nights. Ultimately as a result of her patience, tolerance and silence I started loving her and our son was born whom we named Sneha. Now I am totally devoted to Tarang and Sneha. Dhara  realized the noble heart of Simant --  Simant completely understands me. Why do not people understand me? Dhara started crying. Simant – Dhara, in order to understand an emotional woman we also need to have a large emotional heart. Please do not cry. It is already late. Let us now sleep. Simant was peacefully asleep – Dhara’s mind was traveling in the sky like a weightless ‘semer’ flower – Simant has great faith in me – I need to live up to his faith. I lack faith in myself but I have faith in Simant’s faith—Dhara’s mind was building sand palaces, sometimes dismantling the same. In that palace, faces kept on moving – sometimes beautiful and pious Tarang – sometimes serious, stable and intellectual Akash – sometimes unfettered, committed  and jovial Simant. 4. One day Tarang asked – Simantji, have you noticed one thing ? Simant – What is the matter Tarangji? Tarang pointing her fingers towards Dhara  and Akash, said --  please realize the implication of their names . Simant --  Yes .. yes, the name suggests that they should be together. Akash – You said that we should be together ….but in reality Dhara and Akash can never be together --- yes, they might meet but only at frontier i.e. Simant,  and that is also at a hypothetical point – and that is the only proper place. Simant – Proper or improper, now only the togetherness of Akash and Dhara is proper. Both Simant and Tarang laughed. Simant – Dhara, you are not speaking anything. Are you serious? Dhara- What should I speak? You people are making fun of me. Simant – Dhara, do not be serious – you are always mine. Now please give us a smile. Simant and Tarang again laughed looking deeply into each other’s eyes. For a moment Dhara was taken aback. One day Dhara was unwell. She was weak and bed-ridden. She also became suspicious of the gestures of Tarang and Simant. But at the same time she felt pity on herself for this suspicion. She thought - I always want to meet Akash Babu. And  was never prevented by both Simant and Tarang. Then why  should I  doubt their relationship? Dhara had once asked Akash  about the nature of their own relationship. Akash – relationship of soul, of feelings – it can not be limited to any boundary – there can be no Lakshamana-rekha. Dhara – Then what is it ? Akash – Brotherly --,  no..no..,  but the same emotional feeling. I will always pray for your happiness. Husband  --- no..no.., but I will always protect you. Lover – I am not sure, but I am your real friend , your real well-wisher. Dhara was able to recollect the words of Akash and her Naagphaans like suspicion about Tarang and Simant got eliminated. She desperately wanted to meet Tarang. She hurriedly 5 got dressed-up and went to Tarang’s house. Main door was ajar. Dhara entered the drawing-room. She heard some whispering voice – I can not live without you Tarang – I have spent  sleepless nights… Simant, I am also impatient for you. Peeping through the curtains, Dhara saw Simant  embracing and kissing Tarang. Dhara was dazed. She felt Naagphaans all around her body. In front of Dhara,  Tarang and Simant felt lifeless and guilty. Dhara never discussed this episode with Akash. Tarang departed for village. Simant continuously pleaded for pardon. Women always forgive the men and particularly the husband. She surrenders to her husband – not as a loser but always as a winner. BUT WHETHER DHARA WAS ABLE TO PARDON AKASH FOR HIS CRIME ? To Be Continued. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York. Leaning towards the truth with own knowledge Father had faith in avoiding lie Everyone should prosper with honesty The desire of sacrificing life for the country Cannot see people Following him They don’t understand value of truth and sense of prosperity Independence and nation Weightless against selfishness Then what to change? Gist of my education! Change the way to the same destiny Accept the way of toughness But shouting is in vain Just keep on rendering your job Let them know who can understand Let them know and misjudge Let them judge us powerful They will be defeated Before they will know the real truth When I saw truth of my father decaying With eyes of my knowledge Then only I realised I cannot Give up the way of toughness १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ अंतिम चारू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि। एहि लिंक सभ पर जा कय प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. १५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) नव मैथिली पोथी सभ कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक) खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना- गजेन्द्र ठाकुर रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-15-0]

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हम पुछैत छी- (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-05-1]

अर्चिस्- (कविता/हाइकू संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी रु.१५०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-06-8]

मौलाइल गाछक फूल-(उपन्यास)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.२५०/- US$40 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-02-0]

मिथिलाक बेटी-(नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-03-7]

विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-09-9]

विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-08-2]

विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-07-5]

(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.40/- per copy for outside Delhi) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) VIII. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ FOR SUPPLY OF BOOKS IN ASSAM, BIHAR, WEST BENGAL, JHARKHAND (INDIA) AND NEPAL CONTACT OUR DISTRIBUTORS: PALLAVI DISTRIBUTORS, C/o Dr. UMESH MANDAL, TULSI BHAWAN, DEEPAK CHITRALAYA MARG (CINEMA ROAD), WARD NO.6, NIRMALI, DISTRICT- SUPAUL - PIN-847452(BIHAR,INDIA) ph.09931654742 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस प‍ंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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