142 'विदेह' ५६ म अंक १५ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५६) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.अनमोल झा-किछु लघु कथा २.-कामिनी कामायिनी-टूटल तारा २.२.१.बिपिन कुमार झा-शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा २.सुजीतकुमार झा-एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर २.३.जगदीश प्रसाद मंडल-कथा-प्रेमी २.४.१.खड़ानन्द यादव-गहूमक बोरा, २.-उमेश मंडल-जेहन मन तेहन जिनगी २.५.प्रेमशंकर सिंह: मायानन्दक रेडियो-रूपक-शिल्प २.६.धीरेन्द्र प्रेमर्षि-विचार टिप्पणी २.७.उमेश मंडल -निर्मलीसँ जनकपुर धाम २.८.गजेन्द्र ठाकुर-कथा-तस्कर ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी-मोनक गति ३.३.रूपेश कुमार झा त्योंथ- खायब की ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.गजेन्द्र ठाकुर-गीत-प्रबन्ध-नाराशंसी ३.६.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २२म खेप ३.७.श्यामल सुमन-कहू कि फूसि बजय छी? ३.८.१.-राजदेव मंडल-मिझाइत दीया २.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत३.मनोज कुमार मंडल-फैशनक धमाल ६. बालानां कृते-. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_VI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The story is outdated विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिली गजल शास्त्र-२ ६ सँ १० टा शेर मोटामोटी एकटा गजलक निर्माण करत। मुदा कोनो ६-७ टा शेरकेँ एकक बाद दोसर लिखि देबै तँ गजल नञि बनि जाएत। एहिमे दू-चारि टा गपपर ध्यान देमए पड़त। जेना वर्ड डोक्युमेन्टमे जस्टीफाइ कएलासँ पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता आबि जाइ छै तहिना यदि शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरमे बिनु जस्टीफाइ केने पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता रहए तँ कहल जाएत जे ओ एकहि बहरमे अछि आ एहि तरहक शेरक समुच्चय एकटा गजलक भाग होएबाक अधिकारी होएत (मैथिलीक सन्दर्भमे वार्णिक छन्दक गणना पद्धति जे भाग-१ मे देल गेल अछि माने हलंतयुक्त्त अक्षर-0 संयुक्त अक्षर-1 अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक। , से उपयोगमे कएल जाए आ ओहि आधारपर १९ बहरक बदला छोट-मझोला आ पैघ आकारक पाँतिक उपयोग कएल जाए- नामकरणक कोनो आवश्यकता नहि)) ; संगहि गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीक अन्त मे आ शेष शेरक दोसर पाँतीक अन्त मे एक वा एकसँ बेशी शब्दक समूह दोहराओल जाएत (रदीफ) सेहो आवश्यक ओना बिनु रदीफक सेहो गजल कहि सकै छी-एक्के भावपर सेहो जजल कहि सकै छी, बिनु मतलाक आ बिनु मकताक (लोक तँ मकतासँ सेहो गजलक प्रारम्भ करै छथि) सेहो गजल लिखि सकै छी- शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरक बहरमे एकरूपता सेहो नहि राखि सकै छी- मुदा ई सभ अपवादे स्वरूप, आ अपवाद तँ अपूर्ण रहिते अछि। मतला एकसँ बेशी सेहो भऽ सकैए। गजल कोन शेर हुस्न-ए-गजल (सभसँ नीक शेर) अछि ताहिमे ओहि गजलक विभिन्न समीक्षकक मध्य मतभिन्नता रहि सकैत अछि। फेर काफिया ओना तँ गजलक सभ शेरमे रहै छै (रदीफक पहिने) आ शब्द बदलै छै (एकाध बेर पुनः प्रयोग कऽ सकै छी) मुदा ध्यानसँ देखलापर लागत जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै। माने लय रहबाके चाही। आब आऊ किछु गजल सुनी: १ सबसबाइत गप्प छल तकैत हमरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया हमरापर) आबैत छलए खौंझाइत आ सेहो ओकरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया ओकरापर) होएत हँसारथि की रहि जाएत चुकड़िऔने ओ मोन मारि (२३ वार्णिक मात्रा ) बाजत नै मुँह फुलौने, रहत मुदा मोनपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया मोनपर) ईह कहलकै जे, मोने-मोन प्रसन्न अछि ओ मारने गबदी (२३ वार्णिक मात्रा ) बुझैए सभ हमहीं बुझै छी, नियारे-भासपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया नियारे-भासपर) माने तोहूँ आ तोहर बापो हमर सार सम्बन्ध फरिछा देबौ (२३ वार्णिक मात्रा ) गप्पी छथि ! मुँह घुमेने देखैए कोना मचानपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया मचानपर) बुझै सभटा छी से नै जे नै बुझै छी मुदा मोना कहैए साइत (२३ वार्णिक मात्रा ) बड़बड़ाइए बाइमे, माने अछि ओ स्वयम् पर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया स्वयम् पर) "ऐरावत" बुझैत बुझि गेल छी ई जे सृष्टिक पहिलुके राति (२३ वार्णिक मात्रा ) सभ चरित्र रहल देखैत, एक-दोसरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया एक-दोसरापर) संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ अप्रैल २०१०) ९६ देशक १,२५६ ठामसँ ४१,२६८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३५,३४२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.१.अनमोल झा-किछु लघु कथा २.-कामिनी कामायिनी-टूटल तारा २.२.१.बिपिन कुमार झा-शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा २.सुजीतकुमार झा-एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर २.३.जगदीश प्रसाद मंडल-कथा-प्रेमी २.४.१.खड़ानन्द यादव-गहूमक बोरा, २.-उमेश मंडल-जेहन मन तेहन जिनगी २.५.प्रेमशंकर सिंह: मायानन्दक रेडियो-रूपक-शिल्प २.६.धीरेन्द्र प्रेमर्षि-विचार टिप्पणी २.७.उमेश मंडल -निर्मलीसँ जनकपुर धाम २.८.गजेन्द्र ठाकुर-कथा-तस्कर १.अनमोल झा-किछु लघु कथा २.-कामिनी कामायिनी-टूटल तारा अनमोल झा रिलेशन-2 - गोर लगै छी पीसा जी। हम सुमन जी बजै छी, सुमन जी। - दनदनाइत रहू। माँ-पपा, दादी सभ नीके छथि ने? - सभ ठीक अछि पीसा जी। कहलउ जे हमर कएकटा परीक्षा अचि लखनउमे हप्ताह - दस दिन लगतै, से अपना डेरापर दिक्कत नै ने हैत। - दिक्कत? कथीक दिक्कत! अबै सँ पहिने फोन कऽ देब; हम गाड़ी पठबा देब टीसनपर। सोझे डेरेपर एबाक अछि। दीदी खेनाइ-पिनाइ बनेने रहतीह..........!! बढ़ैत चलू मधुबनी कथा-गोष्ठीमे जाए-अबैक दुनू टिकट कटा लेने रहए ओ। टिकट कटा लेने जाए-अबैक तिथिक निश्चिंतताक संग ऑफिसो समए सँ ज्वाइन कऽ लेब से आस्वस्त आ निश्चिंत भऽ गेल रहए। मुदा टिकट कटेलाक बाद हाथपर छः सए रूपैया मात्र रहि गेल छलै। महीना लगैमे एखनो पाँछ-छः दिन तँ छलैहे। दू-तीनटा बाल-बच्चा पत्नी डेराक खर्चा आदि लेल पाँच सए रूपैया डेरामे दऽ चल आएल रहए गोष्ठीमे, एक सए रूपैया हथ खर्चा लेने। ओ बुझैत रहै जे ई छः-सात सए किलोमीटर जाइ आ फेर छः सात सए किलोमीटर अबैक लेल ई सए टका कम अछि एकदम कम। मुदा ओ आर पैंच आ ऋण नै करऽ चाहैत छल। करेंट मंथक आधा दरमाहा पहिले उठि गेल छलै। अगिला महिना कोना चलतै सेहो सोचमे पड़ि जाइत छल कखनो कखनोक। मधुबनी जाएत आ गाम नै जाएत सेहो ओकरा खूनमे ई प्रवृत्ति नै छलै। गामो गेल रहए। माए-बाबूक मोन छलैन जे बौआ आएल तँ किछु पाइ-कौड़ी अवश्य दऽ कऽ जाएत। मुदा जखन जाए बेरमे ओ कहलकैन-बाबू दू सए रूपैया अछि तँ दिअ ने! माए तरपि उठल रहैए-कमाक धऽ गेल छै एतऽ जे पाइ देबउ। गन्जनक ढ़ेर लगा देने रहै माए। ओ बुझै छै-बेटाक कोनो पाइक कमी नै अछि, सभटा नाटक करैत अछि। रस्तामे बड़ दिक्कत भेल रहै। एक कप चाहो पीबैक मोन होइ तँ नै पीबए, कही बस भाड़ा सह डेरा जाइ कालमे कम नै पड़ि जाए। गाड़ीमे ओ निश्चय केलक-नै आब कतउ नै जाएब गोष्ठीमे। पक्का एकदम पक्का। ओ बैगसँ कागत - पेन निकालि एकटा लघुकथा लिखऽ लागल। ई ओकर अगिला कथा गोष्ठीक तैयारी रहै। दुःख - रामबाबू अहाँक एक हजारक मनीआडर कएक दिनसँ पड़ल अछि पोस्ट ऑफिसमे। कएक टा समादो देलउ कियै नै लऽ गेलियै। - के पठेने अछि। - के पठायत, दिल्लीसँ बड़का बचबा पठेने अछि अहाँक। - ओ पाइ आपस कऽ दियौ ओकरा। हमरा नै चाही ओकर पाइ। - आएल लक्ष्मीक कियो ठोकरबैय कका। छोड़ा ने लिअ पाइ। - नै हौ। जखन हम पन्द्रह दिन तक दरभंगामे डॉ. सी. एम. झा लग भर्त्ती छलउ, तखन ने ओ आएल ने पाइये पठेलक। आ आब जखन हम ठीक छी तखन हम ओकर पाइ छूब, राम......राम......। बेटा जन्माइयोक बुझबै बिन बेटेक छी। २.-कामिनी कामायिनी टूटल तारा एखन फरिछ हेबा में किछुए विलंब छल ।क्षितिज धाे माॅजि क’ अपन रतुका कारीख साफ करबा में लीन ।चैती बयार गाछ बिरीछक’ पात के हल्लुके सॅ छुबैत दुलराबैत सहलाबैत बहि रहल छल आ’ संगहिं बढि रहल छल़ जमुना नदी के पार्श्व वर्ती बिरीछ प’ रैन बसेरा करैत खग विहगक मधुर कलरव गान ।उम्हर रश्मि रथी के सुआगतक तैयारी चलि रहल छल इम्हर अंतःपुर में रत्नवजडित बङका पलंग प’ सूतल सुल्तानक आॅखि फूजि गेलै़ पार्श्व में सूतल चंपा के खिलल खिलल कली सन मृग नयनी अपन सुतवा नाक गुलाबक फूल सन लाल लाल ठाेर ललाट प’ कमानी सन सजल भाैं सॅ अलाैकिक आभा पसारने ।साैंदर्य के साक्षात प्रतिमूर्ति के देखि वजीरे आजम़ भाव विभाेर भ’ उठला़ ।आे हुनका अपन आगाेश में भरि लेलन्हि । सुन्नरी जागि रहल छलीह मुदा लाथ केने पडल़ सुल्तानके बलिष्ठ बाॅहि में कसमसाति सन पडल नहूॅ नहूॅ मनुहा़रि करैत किछु प्रेमक फकडा दाेहराबैत रहली़ काेन में आतिशदान जरैत रहल छल । खिडकी सॅ आकाशक कालिमा छॅटेत देखि रूपसी हडबडा क’ उठि बैसली’ “जहाॅ पनाह अन्नदाता बङ़ विलंब भ’ चुकल अछि आब हमरा यथाशीघ्र प्रस्थान के आज्ञा देल जाआे ।’ समा्रट क’ आॅखि में पीडा के लहरि स्पष्ट देखार भ’ गेल छलै मुदा तत्क्षलण हुनक हाथ फराक भ’ गेल छलैन्ह आ’ आे एकदम माैन खिडकी के बाहर नदी में दूर सॅ आबि रहल काेनाे कश्ती के देखबा में लागि गेल छलाह । सुन्दरिक’ विदाइर् के पछैत आेही रत्नेजडित महलक दराेदिवार जेना एकदम बेराैनक सून सून सन लागए लगलै़ सुल्तान एतेक उदास भ’ गेल छलथि जेना कियाे हुनक माथ स’ ताज छीन नेने हाेयन्हि बङ असहाय हारल जुआङी सन । मस्तिष्कक साेर गुल कम करबा लेल आे पलंग सॅ उतरि अपन पएर में बेस कीमती नागाेरी जुत्ती पहिर सुन्दर सुवासित बागीचा दिश टहलए जेबा लेल प्रस्तुत भेला मुदा नहिं जानि माेन में काेन तरंग हिलकाेर मारि रहल छलैन्ह पएर दीवाने खास क’ विपरीत संगमरमरक’ श्वेत धवल झराेखा दिस बढैत गेलन्हि जिम्हर जमुना के कारी कचाेर पानि बङ शांत भाव सॅ कश्ती वाला के मधुर रस सॅ भरल गीत सुनैत बहि रहल छल । कनि विलमैत नहूॅ नहूॅ आे वाटिका दिस अग्रसर भेला ।सुन्नर महल एखनाें आैंधायल अलसाति सन पङल छल ।जाैवन सॅ प्रफुल्लित पुष्पदल प’ मॅडराति भमरा सबहक गुॅजन आ’ नदी के धीर गंभीर हहराति स्वर ऊपर अकास में भाेरक रूहानी़ आध्यात्मिेक ताकत़ चिङै़ चुनमुनी के मधुर ताऩ मुदा सुल्तानक गमे इश्क प ‘किछु मरहमक काज नहिं करि सकल ।कत्ताे क्ष्ण मात्र नै बिलमति ।जेना छरपट्टी लागि गेल हाेयन्हि ।उद्विग्न ह्द य सॅ आे खुदा के इबादत करबा लेल माेती ंमस्जिद दिस बढि गेल छलाह । दूरस्थ मस्जिद सॅ आबैत अजानक स्वर हुनक ह्दयय के छूने बिन दशाे दिशा में झहैर झहैर क’ विलुप्त भेल चलल जाइत छल ।बङ कुमन सॅ कहुना करि अपन आसन बिछा ठेहुन माेङि नमाज पढलन्हि ।काॅच पाकल अपन नाम नाम दाढी प’ हाथ फेरैत अतीत में डूबल भसियाएल सन स्नान करबा लेल आे हमाम दिश मुङि गेलाह । चढैत सूरूजक संग दिवसक क्रिया कलाप प्रारंभ करए लेल दीवाने आम में दरबार सजए लागल ।आब नै आे गुल रहल आ’ नहिं आे’ गुलशऩ सुल्तानक आे बुलंद साख सेहाे नहिं बाॅचल छल मुदा तैयाे बङका नामक टेग त’ लागले छल लाल किला के संग ।राजकाज सीमिते मुदा छलै त’ अवस्स । बेसकीमती वस्त्राभूषण आे राजमुकुट पहिर राजसिंहासन प’ बैसि राजकीय माेहर लगबैत प्रशासक़ प्रबंधक आ’ न्यायाधीशक’ भूमिका निभाबैत निभाबैत आे’ जेना फेर सॅ नशा में मातल बहकल बहकलसन व्यवहार करए लागल छलाह़ । चतुर सुजान मं्रत्रि सबहक नजरि सॅ इर् नहिं बाॅचि सकल छल ।किंकर्त्तव्यविमूढ आे सब़ ।आखिर करितथि त’ की ।लाल़ टरेस़ उन्मत्त आॅखि आ’ नशा के आगाेश सॅ सुन्न हाेइर्त दिमाग क’ तंतु तंतु के सुरा आ’ सुन्नरि अपन हुश्न के
हुकुमत में बंधक बनाैने नचा रहल छल । हुस्ऩ जाम आ’ इर्श्कक’ भॅमर में घेरालि ऊबचुभ हाेइर्त माेहित नजरि सॅ आे अपन चारू कात देखल ।सम्पूर्ण दरबाऱ दरबारी़ प्रजा आ’ मंत्रि परिषद हुनका शत्रुसम दृष्टिगाेचर हाेमए लागल छल़ मस्तिष्कक खाेह में त’ मंडीलक घंटी आ’ मस्जिदक अजान सन एकेटा स्वर प्रतिध्वनित हाेमैत रहल छल इम्तियाज़ इम्तियाज़ इम्तियाज । हुनक वश चलितैन्ह त’ सम्पूर्ण संसारक मिल्कियत आेकरा नाम लिख आेकरा मल्लिकाए तरन्नुम बना विश्व मानचित्र प’ अमर बना दैतथि । शनैः शनैः बढैत प्रचंड धूप हुनक बेचैनी के अनमनस्कता के आआेर बेलगाम करय लागल छल ।तखने विशाल विशाल कारी चारी टा अश्व अपन वीर जाेद्वा संग आेत’ पधारल ।सहायक के घेाङा साैंपि सैनिक सब जहाॅपनाहक खिदमति में अपन आदाब अर्ज करैत बङका बङका डेग भरैत दीवाने खास के दिस मुङि चुकल छल । संर्पूण मंत्रिमंडल संग कनिकाल लेल सुल्तान सेहाे चिंता के अथाह सागरि में डूबि गेल छलथि गुप्तलचर सब काेन सनेस ल’ एहेन व्यग्र भ’ पहुॅचल अछि । आे सब यथाशीघ्र आेहिठामक कार्यवाही समाप्ता करि उठि चुकल छलाह । तीन साै बरक सॅ जे साम्राज्य जनमानस में घुसिक’ आेकर रग रग में अपन जङि जमा चुकल छल़ जेकर असीम सत्ता आ’ प्रचूर दाैलत साेऩ चानी हीरा जवाहरात लाेकक ह्दुय में भय वा इज्जतक कारण बनल छल जेकर विराट न्यायप्रियता़ वा क्रूरता के शासन प्रबंधक’ चारूकात पताका फहरा रहल छल़ आेहि विख्या़त साम्राज्यक हाथ सॅ एक के बाद एक करिक’ रियासत सब निकलल जा रहल छल ।चारूकात विद्राेहक अग्नि प्रज्ज्वलित हाेमए लागल ऊपर सॅ विदेसी आक्रमण घाघ आ’ शातिर खेलाङी इर्स्टइंडिया कंपनी त’ बङ चालाकी सॅ टामस राे के पठा जहाॅगीरे के शासनकाल में व्यापार करबा के अनुमति लइर्त शनैः शनैः अंगुरि पकैङ क’ पहुॅचा पकङनाय प्रारंभ करि देने छलै । मैत्री के नाम प’ एते पैघ छलावा आे पहिल अंगरेज के पछाति कत्तेक रास राज के अपन भ्रामक महाजाल में फॅसबैत चलल गेल़ ऐतिहासिक दस्तावेज अहि दुर्भाग्य पूर्ण गाथा के पत््ऱायक्ष प्रमाण अछि जे भारत भूमि के अनेकानेक राज रजवाङा के कूप मंडूकता आपसी इर्रखा़ द्वेष आ’ अदूरदर्शिता के लाभ उठबैत सबसॅ फराक फराक संध़ि करैत आेकर नाम देलके़ ट्रीट्री फाॅर फ्रेन्डशिप़ ट्रीट्री एडाेप्टे शन चलाकी सॅ कखनाे संधि कखनाे खेल में हार जीतक बहाने हथियाबैत रहल सबटा राज्य । उम्हर अंगरेज क सर्तक चुस्त दिमाग इम्हर अभाग्यक प्रतीक़ इर् सुस्त़ सूतल सुल्ताऩ ।लाेक चकाेर सन हिनका दिश ताकि रहल छल़ सल्तनतक पुरान कला़ रण नीति देखाबए लेल मुदा एतए त’ नजारे किछु आैऱ । दीवाने खास में गुप्तमचर सबसॅ वार्ता करि आपसी विचार विमर्श क’ पश्चात दरबार उठि चुकल सुल्तानक कार्य अकुशलता क़र्त्तव्यहीनता़ आ’ विलासिता सॅ उदास मंत्रिगण माथ झूकाैने अपन अपन घर दिस प्रस्थान त’ हाेमए लगला़ मुदा नाना विध दुश्चिन्ता सॅ आशंका सॅ भरल मस्तिष्क पएर में जेना भारी भारी पाथरि बाॅधि देने छल़ कहुना करि घिसिया घिसिया क’ आगाॅ बढैत रहला अकस्मात बङ हिम्मत करि क’ वृद्व वजीर हाजी मियाॅ अपन भारी भरकम कनि बझल बझल सन स्वर में बाजि उठल छलाह ‘दाैलते आजम विपत्ति के कारी कारी घनगर बादरि आब शाही आकास सॅ बेशी दूर नहिं छैक खुदा माफ करथि मुदा किछुए दिन में इर् लाल सुर्ख इमारत सुसज्जित वैभव पूर्ण किला अंधार श्मशान घाट बनैत कालक तीव्र प्रवाह में नहिं विलुप्ता भ’ जाए ।अपने किछु फरमान जारी करितियै अहि विपत्ति में आखिर कएल की जाए सेना सब के कत्तेकाे मास सॅ दरमाहा नहि भेटलै अेाकराे सबहक माेन में आका्रेशक’ लुत्ती प्रज्ज्वलित भ’ रहल छै तइयाे जहाॅपनाहक आदेश प’ आेकरा सब में नब स्फूर्ति नब ऊर्जा उत्पसन्न कएल जा सकैत अछि ।’नहिं जानि काेन गप प’ सुल्तान एकदम हत्थाव सॅ उखङि गेला खाैंझाइत बाजि उठला ‘खुदा के इबादत करू सब मिल जुल क’ पाक कुरान शरीफ पढू उपर वला के रहमाेंकरम सॅ सब विपत्ति टैल जेतै अहाॅ सब व्यर्थ भयाक्रांत भ’ क’ काफिर जकाॅ गप करि रहल छी ।’ हाजी मियाॅ के नजरि पहिने सॅ झूकल आब आआेर झुकि गेल छल ।आेहि वृद्व बुद्विमान पुरूख के संग देबए बला कत्तेकाे अमीर उमरा । कत्तेक षङयं्रंत्र भ’ रहल छलै़ सब तरि ।शाही सेना के जांबाज सेनापत़ि क़त्तेक बेर हाजी साहब दिस सक्षम नेतृत्व् के उम्मेद सॅ तकने रहै़ मुदा पुरान लाेक कृतज्ञता के चासनी में डूबल सुल्तान सॅ बगावत के गप साेचिआे नहि सकैत छल़ राजघराना में काेनाे सक्षम नेतृत्वा दूर दूर धरि नजरि नहिं आबि रहल छल । गुप्तन षडयंत्रक’ माध्यम सॅ आेहि सुन्नरि के जान सॅ मारब के कत्तेक प्रयास कएल गेल आेहि निशाबद्व सुतली राति में आेकर घर के आगि लगा सुपुर्दे खाक करि देल गेल रहै़ मुदा किस्मत आेकर आे त’ आेहि राति अपन भवन में नै भ’ क’ हवेली के नर्म नाजुक अलंकृत पलंग प’ शाेभायमान छल ।अहि अग्नि कांड सॅ सुल्तानक शरीर में अपन पूर्वजक वीर खून प्रवाहित हाेमए लगलै । तामसे मूॅह सॅ झाग फेन बहराए लगलै चाराें कात गुप्त चर सतर्क भेल आखिर इ काेन आदम जातक करिस्तानी अछि । कएक दिन धरि आेहाे राज काज ठप्पा रहलै ।चारू कात मचल भयानक ड’र आशंका आ’ अस्थिरता के बीच फरियादि सब छाती पिटैत कानैत कल्पैत आपस जायत रहलै । इ‘ त’ आआेर विकट माहाैल ।आखिर कूटनीतिक चालि चलि आेही नर्तकी के समझा बूझा क’ सुल्तान सॅ कहाआेल गेल जे आगि आर कियाे नहिं आेकर अपने असावधानी सॅ जरैत मशाल सॅ लागि गेल छलै हवा तेज रहै खिङकी खुजल । इएह सब साेचैत हाजी मियाॅ आसमान में रूहानी ताकत के दिस आस सॅ तकने छलथि । सूरूज के भीषण ताप सॅ बचवा लेल त’ आेहि संगमरमरक वृहदाकार भवन के जमुना के पानि झींक क’ भीतरे भीतर शीतल बनेबाक साधन त’ वर्त्तमाने छलै़ मुदा तैयाे खस़ चाननक लेप आ’ विविध ठंढा सरबत के मध्य आेहि सहस्त्र जीव्हा बला धाह के राेकबा के भरिसक प्रयास कएल जा रहल छल । उम्हर प्रचंड भास्कर नहूॅ नहूॅ करिक’ अस्तगामी हाेबाक फेराक में छलथि इम्हर सांझ में सुल्तानक मनाेरंजनक लेल रंगमहलके फर्श के झाङ फानूसके राेशनदानके़ दराे दीवार के धाे पाेछिक’ चमका चमका क’ सुसज्जित कएल जा रहल छल ।रंग शालाके देवार में चुनैल बेशकीमती पाथरि हीरा माेती़ पन्ना जवाहरात़ कंदीलक राेशनी में स्वर्गक सुषमा बखानि रहल छल ।जमुना दिस सॅ अबैत शीतल मद्विम बयार इत्र फुलैल केवङा़ रातरानी़ के गंध सॅ मॅह मॅह करैत सुखमय वातावरण़ । मशालची़ तबलची़ ढाेलकिया तानपूरा़ सितार सराेद़ पखावाज जलतरंग़ सारंगी़ अपन अपन वाद्य यंत्र नेने विशेषज्ञ सब अपन निर्धारित स्थान ध’ नेने रहथि ।हारमाेनियम प’ राग छेङल जा चुकल छल ।अपन ख्वाेबगाह सॅ निकसि रात्रिपरिधान में सुल्ताऩ बङका भव्य फाैवारा सॅ कनि मध्य राखल गावतकिया प’ स्थान ग्रहण करि चुकल छलाह कि तखने म्ुानहरि सांझ में संध्या सुन्नरि जकाॅ छम छम पाज्ेाब खनकाबैत़ अवगुंठन सॅ म्ुॅाह झॅपने नर्तकी के प्रवेश़ भेलै ।कनि झुकि क’ माेहिनी अदा सॅ सुल्तान के सलाम पेश करैत घाेघ उठा क’ फेंकलक़ भरिदिन आैंधायल चिन्तातुर मुखमंडल प’ जेठ में जेना सावनक हरियरि आबि गेलै़ ।आे मुस्कैला महफिल धन्य धन्य भ’ गेल नामी गिरामी मुॅह लगुआ अमीर उमरा़ झराेखा सॅ झकैत़ गुलाम किन्नर दास दासीगण । माैध सॅ सनल स्वर लहरी हवा में तूर जकाॅ दूर दूर धरि छितरै लागल छल़ ‘एै माेहब्बत तेरे अंजाम पे राेना्््््ऽ््ऽऽ््््््््ऽऽऽ््््््् आयाऽ्ऽ््््ऽऽ््।’बनल ठनल दू टा सुन्नरि अंगङाउर् र्लइत सुल्तान लग’ नमगर बङदीव नक्कानसी बला सुराहीदार स्वर्ण पात्र सॅ सुवर्णक गिलास में भरि भरि क’ शराब पराेसि रहल छल ।गजल़ ठुमरि कजरी नृत्यवगान सॅ भरल माहाैल में जाम प’ जाम पीबैत सुल्तान आ’ अमीऱ । जखने सुरू कयल ‘आज जानेऽऽऽ्् की जिद नाऽऽ््ऽ्ऽ्ऽ्कराे यूॅ ही पहलू ऽऽऽऽ्ऽ््में बैठे रहाेऽ्ऽ्ऽऽ’आ’ सुल्तान गिलास हाथ में नेने ठाढ भ’ झूमै लगला ।रूपकुवॅरिक’ के स्वर रंगशाला सॅ उछैल उछेल जमुना के विस्तृत पाट प’ विलिन हाेमैत रहलै । किछु शायर लाेकनि सेहाे अपन शेर सॅ आेहि रंग में आआेर रंग मिलाबैत रहला ।कनि काल में सुन्नरीक साेझाॅ ताेहफा के ढेर लागि गेल रहै । भीतर बैसल बाहर सॅ झॅकैत अमला सबहक राेम राेम सिसकि रहल छल महलक बाहर चाराें कात विद्राेह स्वर सुनाइ दैत छलै राजकर्मचारी के पकङि पकङि लाेक मारै़ ।आकुल व्याकुल जनानी सब महल सॅ पङेबाक ब्याेंत में लागल कत्तेकाे नाह़ कश्ती किला के सुरंग में तैयार केहनाे आपद स्थितिमें जमुना बाटे पङेबा लेल ।अन्तःपुर सॅ नित्यकप्रति कन्ना राेहट के आवाज़ आे असहाय स्त्रीगण दास दासी के मुॅह सॅ बाहरक गप सुनि मृत्युंभय सॅ काॅपैत जाेर जाेर सॅ घाना पसारबा आ’ इबादत तजि आैर की क’ सकैत छलीह । मनाेरंजऩ खेनाय पिनायके बाद गहराति राति में अपन आराम गाह में पसरल़ रूप सुंदरि के रंग में मातल सुल्तान आय आेकरा अपन घर नहिं जाए द’ रहल छल । “आब आैर नहिं क्षणभरिक अलगाव हमरा पागल करि दैत अछ़ि कहूॅ त’ इ लाल किला इर् संपूर्ण सम्पत्ति अहाॅ के नाम लिख क’ आहि प’ शाही माेहर लगा दैत छी।’ ‘आलमपनाह़ हम अपने संग अहि वैभव विलास में त’ अपार आनंद आ’ हर्षक संग रहि सकैत छी़ इ त’ हमर अहाे भाग्य हाेयत मुदा आे दुर्दिनक हमर सखी जे महलक बाहर खरभुजा बेचैत अछ़ि हम आ’ आे दू शरीर एक प्राण आे काेना जीतै़ बिलैट जेतै आे ।’सुंनरि के अपन आगाेस में नेने मत्तवाला उन्मत्त प्रेमी सुल्तान आॅखि कनी खाेलने खाेलने बाजल छलाह ‘हम अहाॅ के संगी के अहाॅ के दासी मुर्करर करि रहल छी आब त’ खुशऽ्ऽ्ऽ्।’सुल्तान अपन छाति सॅ आेकर मुॅह उठा क’ पुछने छल़ कारी कजरारी बङका बङका पिपनी फङफङाबैत आे इत्मी्नान सॅ मुस्कैल छल जेना आेकर बङ पाकल गुरक’ इलाज भ’ गेल हाेए । आरामगाहक काेन में जरैत मशाल सल्तनत के अहि दुर्भाग्य प’ फफैक फफैक क’ कानला के बाद मीझा गेल छलै ।दूर कत्तेकाे नढिया गीदङ कूकूरक कननाय प्रारंभ भ’ चुकल रहै । चाराें दिशा भीषण अंधकार में विलिन ऊपर आकास में आय चाॅन सेहाे नै़ भयंकर अंधेरिया़ अपन आधिपत्य कायम करि चुकल छलै़ तखने दच्छिन दिसक आकास सॅ एक गाेट लहकैत टूटल तारा महलक’ प्रांगण में खसि पङल छलै । १.बिपिन कुमार झा-शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा २.सुजीतकुमार झा-एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर 1 बिपिन कुमार झा शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्त्ता आ बौद्धिक व्यक्ति नक्सलवाद कऽ विभिन्नरूप मे महिमामण्डित करैत छथिन, हुनक दान्तेवाराकाण्ड कऽ वाद आश्चर्यजनक चुप्पी सँ देश स्तब्ध अछि। आतंकधारा नक्सलवाद कँ आर्थिक असमानता कऽ एकमात्र समाधान कहनिआर, स्वघोषित शोषित वर्गकऽ हमदर्द बुद्धिजीवी सभ सदैव नक्सलक्षेत्र मे तैनात सुरक्षा जवान सभ के शोषक, अन्यायी, बलात्कारी रूप मे घृणित एवं झूठ प्रचारित करैत छलकिन्ह मुदा नक्सली सभक पाश्विक अन्यायपूर्ण हिंसा सँ हिनका कोनो आपत्ति नहि छलैन जाहि स आदिवासीवर्ग सबसँ अधिक प्रताड़ित आछि। दान्तेवाड़ा मे 76 जवानकऽ आत्मोत्सर्ग इ सभ पतित विचारक सभ लेल कोनो महत्वकऽ घटना नहि छीक मुदा पूरा समाज एहि विषय पर उदासीन रवैया अपनेने अछि जे अत्यन्त दुर्भाग्य कऽ विषय छीक। हर रूप मे अभावग्रस्त आ चुनौतीपूर्ण जीवन जीवैत सुरक्षाबल के जवान राष्ट्रकऽ अखण्डता हेतु सदा तत्पर रहैत अछि मुदा इ राष्ट्र ओकरा, उत्साह, सम्मान देबाक के स्थान पर घृणित आरोप लगवैत अछि। आशा अछि जे शहीद जवान कऽ चिता सँ उठल धूँआ से कलुषित मानसिकता कऽ बुद्धिजीवी सभक मूँह कारी भ जतैह आ इ राष्ट्र अपन वीर सपूत के सम्मान पर दुबारा कोनो तरहक अपमान जनक टिप्पणी वर्दाश्त नहि करत इ दान्तेवाड़ा मे शहीद सभ कऽ हेतु सभ सँ पैघ श्रद्धाँजलि होयत। आ इहै शहीदकऽ चिताक धुँआ क अभिलाषा सेहो छैक। 2. सुजीतकुमार झा एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर बुध दिन भोरमे पूजाक लेल घरे लग रहल कल पर सँ मदन ठाकुर पानि आइन रहल छलथि की पाछु सँ तीन चारि गोटे पुलिस हिनका सँ पुछि बैसलनि अहि तऽ मदन ठाकुर नहि छियैक । पाछु घुमि कऽ ओ हँ हु मे किछ उत्तर दितैथ ओहि सँ पूर्वे ओ सभ कहय लगलन्हि अपने तऽ बेजोड अभिनय करैत छी । मिथिलाञ्चलक सुपर स्टार मदन संग दर्जनो एहन घटना भेल अछि जे हुनका बिना कहने लोक चिन्ह गेल छलन्हि । आ एक दम आदर सम्मान करैन । एक बेर तऽ सीमाबर्ती मधुवनी जिल्लामे मदनक प्रसंशकसभ जबरदस्ती हुनका घेर कऽ जलपान सेहो करौने रहैन । शिक्षा सँ एसएलसी सेहो नहि कएने मदनक प्रसंशक मे बहुत पढल लिखल विद्वानसभक लम्बा सुची अछि । मिथिला नाट्य कला परिषदक पूर्व अध्यक्ष सुनिल मिश्र कहैत छथि –‘विद्यालयीय शिक्षामे भलेहि मदन कम हुए मुदा अपना क्षेत्रमे केहन केहन मास्टर डिग्री बलाकेँ हराबयकेँ क्षमता रखैत छथि ।’ एक बेर बरिष्ठ नाटक कार महेन्द्र मलंगिया सँ पुछल गेल छल मिथिलाञ्चलक सफल कलाकार के सभ छथि ताहि पर ओ बाजल रहथि –‘ सफलकेँ मापदण्ड की अछि हमरा नहि बुझल अछि , मुदा जनकपुरक पाँच टा कलाकार एहन छथि जिनकर प्रतिभाक जबाब नहि अछि ।’ पाँच टा कलाकारक नाम जोडाबय काल सभ सँ पहिने ओ कोनो कलाकारक नाम लेने रहथि तऽ ओ छलथि मदन ठाकुर । मदन सहीमे लाजवाव कलाकार छथि । सहकर्मी सभक अनुसार जखन ओ अभिनय करय लगैत छथि ओ ओहिमे डुबि जाइत छथि । यैह हुनक प्रमुख विशेषता अछि । २०३३ साल सँ अभिनय सुरु कएने मदन एखनो निरन्तर अहि क्षेत्रमे लागल छथि । जखन मञ्च पर चढैत छथि तऽ १६/१७ वर्षक कलाकार सभ सँ कम चमक हुनकामे नहि रहैत छन्हि । फेर अभिनयकेँ तऽ ओ बादशाहे छथि । मिनापक संस्थापक योगेन्द्र साह नेपालीक प्रेरणा सँ अभिनय क्षेत्रमे आएल मदन मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली सिनेमामे सेहो अभिनय कएने छथि । नेपाली सिनेमा सीता , सिमाना आ बीर गणेशमान मे हुनक कम दृश्य अछि मुदा अपन अभिनयकेँ बल पर दर्शक पर अलग छाप छोडय सफल भेल छथि । ओना मैथिली टेलि सिरियल काठक लोक , हंसा चलल परदेश , मिथिलाक व्यथा, कनियाँ, चमेली, परिणाम सहितमे तऽ बहुत महत्वपूर्ण पात्रमे छथि । रंङ्ग मञ्चमे तऽ ओ ककरो सँ पछे नहि छथि । फेर मिथिलाञ्चलक मात्र नहि नेपाल भारतक बहुत रास रङ्ग मञ्च पर अभिनय सेहो कएने छथि । मुदा जे मज्जा काठक लोकक कम्पनीक रोलमे आएल ओतेक कहियो नहि । ओ कहैत छथि –‘ मलंगिया सर सम्भवतः कम्पनीक रोल हमरे लेल लिखने रहथि की ?’ दर्जनो पुरस्कार अपन नाम कऽ चुकल मदन कहैत छथि–‘ओहिना अभिनय करी आ उद्देश्य लऽ कऽ कएनाइमे सम्मान अलग होइत छैक ।’ कला क्षेत्रक स्थिति सेहो आब बढिया भऽ रहल ओ स्वीकारैत छथि । अपने घर सँ आटा गील करय पडैत छल मुदा आव से स्थिति नहि अछि हुनक कथन छन्हि । ओना जनकपुरमे एकटा नाट्य शाला भऽ जाइक तऽ आओर किछ होइतै एकरा विषयमे सभक चिन्तन अपरिहार्य अछि ओ आगा कहैत छथि । कहियो काल देखा सिकीमे कविताक सेहो रचना करएबला मदन कहियो काल मञ्च पर गीत सेहो गबैत छथि । साथी कलाकार राम नारायण ठाकुर संग मरुआक रोटी खेसारीक दालि ..... गाएल गीत एक समयमे एतेक लोकप्रिय भेल छल की गाम गाममे नटुवा सभ सेहो मञ्च पर , राम नारायण आ मदन अपनाकेँ बना कऽ हिनकर गीत गाबय लागल छल । जनकपुरक शिव चौक पर चर्चित कलाकार राम अशिष ठाकुर संग मदन हेयर ड्रेसर सञ्चालन करैत आएल मदनकेँ हजामी पेशामे सेहो जवाव नहि अछि । एक बेर मदन संग केश आ दाढी मोछ जे कियो बना लेलन्हि दोबारा ओ व्यक्ति दोसर ठाम बनाबयकेँ सोचयो नहि सकैत छथि । अन्य क्षेत्रक सुपर स्टारकेँ चौक चौराहापर नहि देखल जा सकैत अछि मुदा मिथिलाञ्चलक सुपर स्टार एखनो अपन परम्परागत पेशा नहि छोडने छथि । जखन नाटक नहि रहल तखन शिव चौक पर लोक सँ हमरा भेट भऽ जाइत अछि मदन कहैत छथि । जगदीश प्रसाद मंडल कथा-प्रेमी फगुआक दिन। मुरगाक बाङ सुनितहि ओछाइन छोड़ि पक्षधर बाबा परिवारक सभकेँ उठबैत टोलक रास्ता धेने गौँआकेँ हकार दिअए विदा भेलाह। मनो गद्गद्। भीतरसँ खुशी समुद्रक लहरि जेकाँ उफनैत रहनि। गौँवाकेँ फगुआक भाँग पीवैक हकार दए दरबज्जाक ओसारपर बैसि गर अटबए लगलथि जे दस किलो चीनी, मसल्ला आ भाँगक पत्तीक ओरियान तँ कइये नेने छी। आब खाली बाजा-गाजा संग लोककेँ अवैक अछि। एते बात मनमे अवितहि उठि कऽ भाँगक पत्ती आ मसल्ला -मरीच, सोंफ, सनतोलाक खोंइचा, गुलाव फूलक पत्ती, काबुलि बदाम- लऽ आँगन जाए पुतोहूँकेँ कहलखिन- ‘‘कनियाँ, बुरहीकेँ पुआ-मलपुआक ओरियान करए दिअनु आ अहाँ भाँग पीसू। खूब अमैनियासँ पत्ती धुअब। तीनि सलिया पत्ती छी, जल्ला-तल्ला लगल अछि।’’ कहि ओसारपर सभ सामान सूपमे रखि दरबज्जा दिशि घुरि गेलाह। हँ-हूँ केने बिना गांधारी मसल्लाक पुड़िया निच्चाँमे रखि पत्तीकेँ सूपमे पसारि आँखि गड़ा-गड़ा जल्ला तकए लगलीह। मनमे उठलनि जे आइ बूढ़ा सनकि-तनकि तँ ने गेलाहेँ। एत्ते भाँग लऽ कऽ की करताह। मुदा किछु बजलीह नहि। आँखि उठा कऽ देखि विहुँसि नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। ओना मिथिलाक नारी आँखिमे गांधारी जेकाँ पट्टी बान्हि घरती सदृश्य सभ किछु सहैत ऐलीह। दरबज्जापर बैसि पक्षधर सोचए लगलाह- जिनगीक एकटा दुर्गम स्थान दुर्गा टपा देलनि। मने-मन दुनू हाथ जोड़ि हृदयसँ सटा गोड़ लगलनि। अपना विचारसँ सुकन्या जिनगीक प्रेमी चुनलक। कोना नहि आनन्दसँ जीवैक असिरवाद दितिऐक। जहि फुलवारीकेँ लगबैमे अस्सी सालक श्रम लागल अछि ओहि श्रमकेँ, जहिना छोट-छोट बेदरा-बुदरी टिकुली पकड़ि पुनः उड़ा दैत अछि तहिना हमहूँ उड़ा देव। कथमपि नहि। रुपनगर हाइ स्कूलक बोर्ड परीक्षाक सेन्टर प्रेमनगरक हाइ स्कूल भेल। देहाती स्कूल रहितहुँ परीक्षार्थीकेँ डेराक कोनो चिन्ता मनमे नहि। सभक मनमे एते खुशी जे डेरापर धियाने ने जाइत। सभ निश्चििन्त जे गाम-घरमे अखनो विद्याकेँ देवी स्वरुप बुझि सभ मदति करए चाहैत छथि। जँ मधुबनी सेन्टर होइतै तहन ने डर होइतए जे मेहता लौजमे सभ सामान चोरिये भऽ जाएत, तेँ असुरक्षित अछि आ प्रोफेसर कोलनीक भड़े तते अछि जे ओतेमे तँ विद्यार्थी परीक्षाक सभ खर्च पुरा लेत। ओना प्रेमनगरक सइयोसँ उपर कुटुमैती रुपनगरमे अछि, तेँ किऐक ककरो मनमे रहैक चिन्ता हएत। तहूमे प्रेमनगर हाइ स्कूलक हेड मास्टर तेहन छथि जे स्कूलक समएमे स्कूलक काज करै छथि बाकी बारह बजे राति धरि विद्यार्थीक खोज-पुछाड़िमे लगल रहैत छथि जे ककरो कोनो तरहक असुविधा तँ ने भऽ रहल छैक। तहूमे तेहन दरबज्जा अनन्दी बाबाक छन्हि जे इलाकाक लोक अपन रहैक ठौर बुझैत अछि। घर्मशल्ले जेकाँ। धन्यवाद यशोदिया दादीकेँ दिअनि जे बुढ़ाढ़ियोमे अभ्यागत सबहक ऐँठ-काँठ बारह बजे राति धरि उठबितहि रहै छथि। परीक्षासँ एकदिन पहिने लोचन सभ समान शुटकेशमे लए साइकिलसँ प्रेमनगर पहुँचल। लोचनक परिवारकेँ पक्षधरक परिवारसँ साठियो बर्ख उपरसँ दोस्ती अवैत रहनि। आजादीक हुड़-बड़ेड़ाक समए रहै। जहिना गामक धियापूता गुल्ली-डंटासँ क्रिकेटक मनोरंजन करैत तँ शहरक धिया-पूता जगहक अभावमे खेलक स्कूलमे नाओ लिखा मनोरंजन करैत अछि। तहिना पक्षधरो आ ज्ञानचन्दो आजादीक लड़ाइमे पढ़ाइ छोड़ि समाजक बीच आवि हुड़-बरेड़ामे शामिल भऽ गेला। समाजक काजमे हाथ बँटबए लगलाह। समाजमे ककरो ऐठाम बेटीक विआह होइत आ बरिआती अबैत तँ अपन बहीनि बुझि, बिनु कहनहुँ पाँच दिन निश्चित समए दिअए लगलखिन। तहिना आरो-आरो काज सभमे हाथ बँटबए लगलाह। मुदा अस्सी बर्खक उपरान्तो पक्षधर पक्षधरे आ ज्ञानचन्द ज्ञानचन्दे रहि गेलाह। कहियो कियो नेता नहि कहलकनि। हँ एत्ते जरुर भेलनि जे भाय-भैयारी भेने गाममे तते भौजाइ भऽ गेलनि जे बसन्त छोड़ि ग्रीष्मक रस्ते घेरि देलकनि। आब तँ सहजहि बुढ़ाढ़ीमे धियापूताक संग रंगो-रंग खेलै छथि आ जोगिड़ो गबै छथि। गाम स्वर्ग जेकाँ लागि रहलनि अछि। किऐक नहि मन लगतनि जहि गाममे कालीदास सन विद्वान, जे जही डारिपर बैसब ओहि डारिकेँ काटब, मुदा ने कुड़हरिक धमक लागत, ने डारि डोलत, ने दुनू हाथे कुड़हड़ि भाँजब तँ देह डोलत आ ने दुनू पाएरक वैलेंस गड़बड़ाएत। निश्चििन्तसँ जखन डारि खसए लगतै तखन ओहिपर बैसिले-बैसल धरतीपर चलि आएव, ऐहन विद्वान् सभसँ तँ गामे भरल अछि। एते दिन, अपराधीक कम संख्या रहने नजरि निच्चाँ रहैत छलैक मुदा आब ककरा कहबै अपनो घरवाली धमकी देती जे माए-बाप आ भाइ-भौजाइक पाछू लगल रहै छी आ अपना धिया-पूता लऽ किछु करबे ने करै छी। एहि जिनगीसँ जहर-माहूर खाए मरब नीक। हौ बाबू, हमरा ऐहन भ्रममे नहि दाए। एहि दुनियाँमे ने कियो अप्पन छी आ ने बिरान। सीता जेकाँ लक्ष्मणक रेखाक भीतर रहह। नहि तँ रावण औतह आ लऽ कऽ चलि जेतह। अपन-अपन पाएरपर ठाढ़ भऽ गंगोत्रीसँ निकलैत गंगाक पानि जेकाँ, जे साथीक संग उपर-निच्चाँ होइत प्रसांत महासागरमे मिलैत अछि तहिना समएक संग चलैत रहह। देखले पक्षधर बाबाक घर-दुआर लोचनकेँ। ककरो पूछैक जरुरते किऐक होइतैक। साइकिल हड़हड़ौने दरबज्जापर पहुँच साइकिलसँ उतड़ि घरक देवालक पँजरामे साइकिल ठाढ़ कए दुनू हाथे बाबाक पाएर छूबि गोड़ लगलकनि। बाबाकेँ बुझले रहनि, कहलखिन- ‘‘भने अखने चलि ऐलह। सभ सामान सरिया सेन्टरपर जा कऽ देखि-सुनि अविहह।’’ कहि पोती सुकन्याकेँ सोर पाड़लखिन। मुदा लोचनो तँ अंगना-घर जाइते अबैत रहए। सुकन्याकेँ लोचन आंगनसँ बजा अनलक। भाए-बहीनि जेकाँ दुनूकेँ देखि पक्षधर सुकन्याक कहैक बात विसरि दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, आब तँ हम चलचलौ भेलियह। तोरे सबहक पार एहि दुनियाँमे ऐहलहेँ। दुनियाँमे जते मनुष्य अछि ओ अपना समएक जिम्मा लऽ जीबैत अछि। अखन तू सभ सुकुमार कोमल किसलय सदृश्य छह। मनुष्य बनि जिनगी जीविहह। हम दुनू संगी -पक्षधर आ ज्ञानचन्द- दू जातिक रहितहुँ संगे-संग जिनगी बितेलहुँ। जे समाजोक लोक बुझैत छथि। मुदा हुनको धन्यवाद दैत छिअनि जे संगीक महत्व अदौसँ बुझैत आएल छथि। जेकरे फल छी जाति-कुटुम्बसँ कनियो कम दोस्तीकेँ नहि बुझल जाइत अछि। संगे-संग जहलो कटलौं आ एक ओछाइनपर सुतबो करैत छी। मिथिलांचलक कोनो राजनीतिक वा सामाजिक संगठनक बात होइ, मुदा कि एहि संस्कृतिकेँ आँखिक सोझमे नष्ट होइत देखियैक।’’ मन पड़लनि गाड़ीक ओ दिन जहि दिन जहल जाइत काल दुनू गोटेकेँ पैखाना लागल। हाथमे हथकड़ी। ट्रेनक पैखाना-कोठरीमे पानि नहि। की कएल जाए? जेबीसँ रुमाल निकालि दू टुकड़ी फाड़ि दुनू गोटे शुद्ध भेलहुँ। आँखि ढबढ़बा गेलनि। भरल आँखिसँ पोतीकेँ कहलखिन- ‘‘बुच्ची, दरबज्जापर रहने बौआकेँ पढ़ि नहि हेतइ। एक तँ पढ़वह कि खाक। बहुत लीलसा छल जे परिवारमे इंजीनियर डॉक्टर देखियैक मुदा हमरा सन-सन परिवारक लेल सपना नहि तँ आरो की अछि। एक दिशि पनरह-बीस लाखक पढ़ाइ आ दोसर दुइयो हजार महिनाक आमदनीक परिवार नहि। मुदा अखन बच्चा छह, आशासँ जीवैक उत्साह मनमे जगबैक छह।’’ जहिना जनकजीक फुलवारीमे राम आ सीताक प्रथम मिलन भेलनि तहिना सुकन्या आ लोचनक बदलल रुपक बीच भेल। अखन धरि जे बच्चा खेलौना सदृश्य परिवारमे छल ओकरा कानमे एकाएक जिनगीक बात पड़लै। जिनगीक लेल प्रेम भरल संगीक जरुरत होइत अछि। जिनगीक बात सुनि दुनूक देह सिहरि गेलइ। सिहरैत देह देखि पक्षधर कहलखिन- ‘‘बुच्ची, लोचन तोहर पाहुन भेलखुन। अंगनेक ओसारक कोठरी दऽ दहुन। सभ देखभाल तोरे उपर। कोनो तरहक असुविधा पढ़ैमे नहि होइन।’’ पक्षधरक बात सुनि सुकन्या शुटकेस माथपर उठा लोचनक पाछू-पाछू विदा भेल। कोठरी खुजले रहै अँटकैक कतौ जरुरते नहि पड़लैक। एक जनिया चौकी, कपड़ाक लेल अलगनी, एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी। कुरसीपर शुटकेश खोलि लोचन कपड़ा निकालि चौकीपर रखलक। चौकीपर रखितहि सुकन्या ओहि अलगनीपर रखलक जहिपर पहिनेसँ ओकर कपड़ा छलैक। साओनक झूला जेकाँ दुनूक कपड़ा झुलए लगल। किताब, काँपी, कलम निकालि टेबुलपर रखलक। एक्के कोर्सक किताव दुनूक। लोचन मैट्रिकक सेन-टप केंडीडेट आ सुकन्या मैट्रिकक विद्यार्थी। टेबुलक बगलमे लोचन लग ठाढ़ि भऽ सुकन्या किताव फुटा कऽ नहि राखि, सभकेँ जोड़ा लगा-लगा रखलक। दुनूक नजरि दुनू किताब-कापी-पेनक जोड़ापर अँटकि गेल। पहिनेसँ दोबर कितावक थाक भऽ गेल। अएना जेकाँ एक दोसरक हृदयमे अपन-अपन रुप देखए लगल। किताबक लिखावट प्रेसक होइत। तहूमे एक्के प्रेसक किताव। मुदा काँपी तँ अपन-अपन हाथक लिखल होइत। एक दोसराक काँपी उलटा-उलटा देखए लगल। देवनागरी लिखावट लोचनक सुन्दर मुदा अंग्रेजी लिखावट सुकन्याक सुन्दर। ऐना किअए भेल? एक्के हाथक लिखावट दब-तेज कोना भऽ गेल। मुदा उत्तर ककरो मनमे नहि अबैत। अनायास सुकन्याक मन नाँचल। एते काल भऽ गेल अखन धरि पानियो नहि अनलौं। धड़फड़ा कऽ कोठरीसँ निकलि छिपलीमे जलखै आ लोटामे पानि नेने आबि चौकीपर छिपली रखि हाथ शुद्ध करै लऽ लोटा बढ़ा, चौकीक गोड़थारी दिशि पलथा मारि बाबाक पाहुनकेँ खुआवए बैसि गेली। खेबाकाल पुरुख चुप रहैत, नोन-अनोनक प्रश्न किअए उठतै। समदर्शी मिथिला छियै कि ने? एक बजेसँ लऽ कऽ चारि बजे धरि परीक्षाक कार्यक्रम रहैक। पहिल दिन लोचनो दुर्ग टपै लऽ जाएत तेँ सुकन्याक मन मृगा जेकाँ नचैत। भिनसरेसँ सुकन्या लोचनपर नजरि अटकौने....... समएपर अपन काज पुरबैक अछि। हमरा चलैत जँ शुभ काजमे बाधा होयत तँ भगवानक ऐठाम दोखी हएब। मास्टर साहेबक सिखौल बात सुकन्याकेँ मन पड़ल। काजक भार तँ लोचनक उपरमे छन्हि हम तँ हुनकर मदतिगार मात्र छिअनि। तेँ नीक हएत जे हुनकेसँ पूछि लिअनि। चंचल मनमे उठलै-पूजाक तैयारीमे सभ किछु फुलडालीमे सजबैत होएत बीचमे बाधा देब उचित नहि। हो न हो फूल-पत्तीक जगहे बदलि जाइन। अनायास मनमे उठल-हाय रे बा घड़ी तँ देखबे ने केलहुँ। अगर बारह बजि गेल हेतइ तँ खुअबैक दोखी के हएत? मन व्याकुल, अव्यवस्थित वस्त्र, केश छिड़िआएल, कर्मक भारसँ भादबक अन्हरिया जेकाँ अन्हार आँखिक आगू सुकन्याकेँ पसरि गेल। कतऽ जाउ ककरा पुछियै। गाछो-बिरीछ नहि अछि जे पुछि लैतियै। अस्त-व्यस्त अवस्थामे सुकन्या माए लग पहुँच बाजलि- ‘‘भानस भेलौ?’’ ‘‘अखने। अखन तँ आठो नै बाजल हएत। ‘‘जलखै भेलौ?’’ ‘‘बच्चा कहलक एक्के बेर खा कऽ सबेरे जाएब।’’ जहिना केचुआ छोड़ैत समए साँपकेँ होइत, भले ही नव जीवन किऐक ने प्राप्त करै मुदा दर्द तँ हेबे करैत छैक। मीरा जेकाँ सुकन्या राजस्थानक तँ नहि। मिथिलाक वाला। परिवार आ समाजक सुकन्या अदौसँ समर्पित। बम्बईक धुन (गीतक धुन) बहुत मधुर होइत अछि तँ समवेत स्वरमे माए-वहिनक चैतावर, बारहमासा आ समदाउनक तँ मधु सदृश्य अछि। जहिना मधुमाछी उड़ि-उड़ि कखनो आमक गाछपर चढ़ि सोझे अपन प्रेमी मंजर लग पहुँच जाइत तँ लगले माटिपर ओंघराएल चमेलीक रसकेँ आमक रसमे महा मिश्रणक घोल बनबैत, तहिना ने छी। कोठरीसँ निकलितहि लोचनक आँखि सुकन्यापर पड़ल। हजारो रश्मि रुपी तीर दुनूक बीच टकराए लगल। मुदा दू रंग। जहिना लड़ाइक मैदानमे वीर असीम विसवासक संग मरै लऽ नहि बलिदान होइ लऽ बढ़ैत अछि, तहिना लोचनोक हृदयमे होइत। कलीक खिलैत फूल जेकाँ मुँह। मुदा सुकन्या मने-मन भगवानसँ आराधना करैत जे ‘‘कुरुक्षेत्रसँ लोचन हँसैत आबए।’’ उचंगल मन फेरि उचङि गेल। ओसारसँ निच्चाँ उतड़ितहि सुकन्याक हृदय लोचनकेँ पाछूसँ ठेलए लगल। जहिना बच्चा सभ माटिक पहीया, कड़चीक गाड़ी बना धनखेतीक माटि उघि-उघि अंगनाक ओलतीमे दऽ खुशी होइत जे हमर अंगना चिक्कन भऽ गेल, तहिना आगू-बढ़ैत लोचनकेँ देखि सुकन्याकेँ खुशी होएत। मुदा खुशी अंटकल नहि। लगले चारि बाजि गेल। मनमे उठलै भुखल भायकेँ जलखै कहाँ खुएलहुँ। जहिना किसानक खेत दहा गेलासँ व्यापारमे मंदी आबि गेलासँ, बेरोजगार भेलासँ कि भीख मंगोकेँ कियो भीख देनिहार नहि रहत तहिना जे धरती करोड़ो पतिव्रता नारी पैदा केलक वहए धरती पतिहत्यारा भऽ जहल कटबैत अछि। साढ़े चारि बजे बेरि-बेरि देखलोपरान्त सुकन्याक नजरि मौकनी हाथीपर चढ़ल गणेश जी जेकाँ लोचनकेँ अबैत देखि लोटामे पानि-थारीमे जलखै परोसि आंगनक ओलतीमे ठाढ़ भऽ देखय लगल। अखन धरिक लोचनक साइयो मनोहर रुप मनमे नाचए लगलै। कोठरी आबि लोचन गरमाएल देहक कपड़ा बदलि जलखै करए लगल। विस्मित भेल सुकन्याक मुँह बाजि उठल- ‘‘केहन परीछा भेल भाय?’’ ‘‘बहुत बढ़ियाँ। जरुर पास करब।’’ जरुर पास सुनि सुकन्याक हृदय हनुमानक राम जेकाँ देखलक। मनमे आशाक सिहकी उठलैक। संगिये तँ जिनगीक जीत दिअबैत अछि। अपन सुखद जिनगीक मनोहर रुप लोचनमे देखि सुकन्या मोहित होइत बाजलि- ‘‘औझुका पेपर तँ नीक भेल मुदा आन दिनक जँ अधला हुअए, तहन?’’ ‘‘ओ ओहि दिनक मेहनतपर निर्भर अछि। ऐकर जबाव हँ-नहिमे नहि देल जा सकैत अछि।’’ सातम दिन परीक्षाक अंत भेल। स्कूलसँ आबि पक्षधरकेँ गोड़ लागि लोचन बाजल- ‘‘बाबा परीछा समाप्त भऽ गेल। गाम जाइ छी।’’ असिरवाद दइसँ पहिनहि बाबाक मनमे उठलनि, जहन एहिठाम काज सम्पन्न भऽ गेलैक तहन रोकब उचित नहि। सबेर-अबेर भेनहुँ अपन घर तँ पहुँच जाएत। बात बदलैत बाबा पुछलखिन- ‘‘केहन परीछा भेलह?’’ मुस्की दैत लोचन- ‘‘पास करब बाबा।’’ लोचनक मुस्की पक्षधरक हृदयकेँ, सलाइक काठी जेकाँ, आनन्दक कोठरीकेँ रगड़ि देलकनि। मन पड़लनि जनकपुरक धनुष यज्ञ। ठहाका मारि कहलखिन- ‘‘भाग्य ककरो लिखल नहि होइ छैक, बनाओल जाइ छै बौआ।’’ आंगनक ओलती लग ठाढ़ि सुकन्याक मन मृगा जेकाँ व्याकुल भऽ नचैत। जहिना अपने नाभिक सुगंधसँ मृगा नचैत तहिना सुकन्याक मन परीक्षाक समाचार सुनै लऽ नचैत। मुदा दरबज्जो तँ दोसराक नहिये छी, सोचि आगू बढ़ल। दुनू गोटेकेँ माने सुकन्या आ लोचनकेँ देखि पक्षधर बाबा कहलखिन- ‘‘आइ तोँ विद्याध्ययनसँ गृहस्ताश्रममे प्रवेश कऽ रहल छह। तेँ बाबाक लगाओल फुलवारीक सुखल-मौलाएल डारिकेँ कमठौन कऽ खाद-पानिसँ सेवा करिहह। ओहिमे नव-नव कलश चलतै। जहिसँ हँसैत-खेलाइत जिनगी चलतह।’’ मूड़ी गोंतने लोचन आंगन आबि पानि पीबि किताव सरियवैक विचार केलक। कितावपर किताब गेटल देखि हाथ काँपए लगलै। सुकन्याक मन कानि उठल। जहिना कोनो धारक दुनू मोहारपर बैसल यात्रीकेँ होइत अछि तहिना सुकन्याक मनमे उठए लगल। लोचन सफलताक जिनगीमे पहुँच गेल आ हम? आशा-निराशाक क्षितिजपर लसकि गेल सुकन्या। सीमाधरि लोचनकेँ अरिआतए सुकन्या विदा भेलि। गामक सीमा बिला गेल। ने लोचन सीमा देखैत जे घुमैक आग्रह करितैक आ ने सुकन्या देखैत जे अंतिम विदाइ दइतैक। अजीव गामोक सीमा अछि। एक्को परिवारकेँ गाम मानल जाइत अछि -जेना भोजमे- तहिना दसोगाम माला बनि गाम बनि जाइत (दस गम्मा जाति) अछि। अरिआतने-अरिआतने सुकन्या लोचनक घर धरि पहुँच गेली। पनरह दिन बीतैत-बीतैत अनेको मौगिआही कचहरीमे फैसला लिखा गेल जे ‘सुकन्या पक्षधरक घरसँ निकलि अजाति भऽ गेलि।’ कचहरीक फैसला सुनि-सुनि दुनू गोटेक सुकन्याक माए-बापक करेज दड़कए लगलैक गेलइ। कनैत मन बाजए लगलैक, मनो ने अछि जे कहियासँ दुनू परिवारमे दोस्ती अछि। सभ तुर हमहूूँ जाइ छी आ ओहो सभ आबि रहैत छथि। मुदा आइ की देखि रहल छी। जाधरि पिता जीबैत छथि ता धरि एहि परिवारक हम सभ के होइ छी? समाजक लोकक जबाव ओ देथिन। पिताकेँ गामक लोकक बात कहलखिन। बेटा-पुतोहूक बात सुनि गरजि कऽ पक्षधर कहलखिन- ‘‘जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महीसि, खेत-पथार जेकाँ होइए कि ओहि समाजकेँ पँच तत्वक बनल मनुष्य कहल जा सकैत अछि। जँ से नहि त हमर कियो मालिक नहि छी। कियो ओंगरी देखाओत त ओकर ओंगरी काटि लेबइ। आइये दोस्तक ऐठाम जाइ छी आ देखि-सुनि अबै छी। जहन भाँग पानिमे अलगि गेल तहन पुतोहू बुझलनि जे भाँग पीसा गेल। पोछि-पाछि सिलौटकेँ धोय बाटीमे रखलनि। दरबज्जापर बैसल पक्षधरक मनमे उठलनि जे नअ बाजि गेल, अखन धरि किअए ने कियो आएल। फेरि मन उनटि कऽ भाँगपर गेलनि। भाँगपर नजरि पहुँचतहि मनमे उठलनि जे बिनु भाँग पीनहि तँ ने सभ निसा गेल अछि। तहन भाँगक जरुरते की? किछु दिन पहिने धरि सभ गाममे एकदिना फगुआ होइत छलै, मुदा आब तीन दिना भऽ गेल। ओना तीनि रंगक पतरो आबि गेल अछि। मुदा अपना गाममे तँ एकदिने अखनो धरि होइत आएल अछि आ जाधरि जीबि ताधरि होइत रहत। कीर्तन मंडलीक संग-संग आनो-आन पक्षधर ऐठाम पहुँचलाह। अनगिनित थोपरी बजौनिहार आ अनगिनत गबैयाक समारोह। चीनीमे धोड़ल भाँग। सभसँ उमरदार रहितहुँ पक्षधर भाँग परसिनिहारकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने नवतुरिया सभकेँ पिआबह। वहए सभ ने बेसी काल गेबो करतह आ नचवो करतह।’’ मुदा एक्कोटा नवतुरिया बाबाक बात नहि सुनलक। सबहक यएह कहब रहै जे बाबा सभसँ श्रेष्ठ गाममे छथि, अनुभवी सेहो छथि। तेँ जँ ओ गोबर खत्तेमे खसताह तइओ हम सभ नहि छोड़बनि। नवतुरियाक बात सुनि पक्षधरक मनमे उठलनि अखन आंगनमे कहाँ छी दरबज्जापर छी। दस गोटेक बीच छी। तहन के छोट के पैघ कोना हएत? सभ तँ ब्रह्मेक अंश छी। तहूमे एते टुकड़ी एकठाम एकत्रित छी। दू गिलास भाँग पीबि पक्षधर उठि कऽ ठाढ़ होइत फगुआ शुरु केलनि- ‘‘सदा आनन्द रहे एहि दुआरे, मोहन खेले होरी हो।’’ ढोलक, झालि, कठझालि, हरिमुनिया, मजीरा, खजुरी, डम्फा, गुमगुमाक संग सइयो जोड़ थोपड़ीक महामिश्रणक धुनक संग कोइली सन मधुर अवाजसँ लऽ कऽ टिटहीक टाँहि धरिक बोल अकासमे पसरि गेल। ओना जमीनो खाली नहि रहल। इंगलिश डान्ससँ लऽ कऽ जानी धरिक नाच आ मेल-फीमेलक जोगीड़ा जोर पकड़िनहि रहै। बजनियो सभ अपन-अपन बाजो बजबैत आ कुदि-कुदि नचबो करैत। गोसाँइ डूबै बेरि फेरि पक्षधर भाँग बनबौलनि। अपन शक्तिकेँ कमजोर होइत देखि दोबरा-दोबरा सभ पीलक। उत्साहो दोबरेलै। पुरनिमाक राति। हँसैत चान। फागुन मास रहने अकासमे कतौ बादल नहि। मुदा तरेगण मलिन भऽ अपन जान लऽ झखैत। किऐक नहि तरेगण अपना जान लऽ झखत? आखिर बसन्त-बसन्तीक समागमक दिन छी की ने। गामक दछिनवरिया सीमापर समन जरए लगल। समनक धधड़ाकेँ पक्षधर उत्तरसँ दछिन मुँहे कुदलाह। बाबाकेँ देखितहि सभ एका-एकी कूदए लगल। धधड़ा मिझा गेल। मुदा जरनाक आगि चकचक करितहि रहल। समदाउन गबैत सभ घरमुँहा भेलाह। 1.खड़ानन्द यादव-गहूमक बोरा, 2.-उमेश मंडल-जेहन मन तेहन जिनगी १ खड़ानन्द यादव ग्राम- बेलही (कचनवा) लोकही जिला- मधुबनी गहूमक बोरा चारि इस्वीक बाढ़िक विभीषिका। कोसी-कमलाक बीचक एगारहो धारक पानि एकबट भऽ संगे-संग समुद्र बना दछिन मुँहे दौड़ैत। लोकसँ लऽ कऽ मालो जालक जान अवग्रहमे पड़ि गेल। जरल पेट एकत्रित भऽ सरकारीक गहूमक गोदाम अपन बुझि लुटि लेलक। अन्नागांहिस मुद्दालहक नामसँ केस भऽ गेल। जे पकड़ाएत सएह मुद्दालह। भलेहीं ओ लुटने हुअए वा नहि। लुटनिहार बाढ़िक कबचक उपयोग कऽ लेलनि। मुदा, जे नहि गेल रहथि ओ निचेन जे हमरा िक हएत? सरकारी गोदाम लूटि। जहिठाम कुरसीपर बैसि करोड़ाे लुटैत अो थोड़े पकराइत। आिक ओकरा चरित्रमे थोड़े कोनो दोष लगतै जे घुस लैत पकड़ा जहलो जाइत आ घुस दऽ कोर्टसँ िनर्दोषो साबित होइत। ई तँ युगक धरम छी। ओहनो तँ युग होइत जहिमे घुसो एक तरहक कारोबार छी। लोहाक टोपी माने हेलमेट बला सिपाहीकेँ दौड़ शुरू भेल। सभ अपन गर धऽ लेलक। थाना-पुलिसक काज ढोलबा बुझैत नहि। बम्बइयोमे कोठिऐक काज करैत रहै। संयोगसँ गाम आएल रहै। लोकक सुन-गुन पाबि ढोलबाक घर घेरि लेलक। ओ बुझि गेल जे पकड़ा जाएब। िकएक तँ ऐहन-ऐहन घटना बम्बईमे संगी-साथीक मुँहे सुनने रहए। पत्नीकेँ कहलक- ‘‘हम बोरामे पैसि जाइ छी अहॉं बोराक मुँह बाहरसँ बान्हि देबइ।’’ सएह केलक। ऑंखिक सोझे देखै दुआरे बोरामे कने भूर कऽ देलक। एकटा सिपाही घरक बोरा देखि ढोलबाक पत्नीकेँ पुछलक- ‘‘इसमे क्या है?’’ - ‘‘गहूम।’’ लोकक संग-संग गहूमो पकड़ैक रहैक। गहूम सुनि संगीकेँ सोर पाड़ि सिपाही बाजल- ‘‘पकड़ मे आ गया। जल्दी आओ?’’ तीनि-चारिटा सिपाही दौड़ कऽ पहुँच गेल। बीचे घरमे बोरा देखि अपन सफलताक ऐहसास भेलै। बोराक भीतर ढोलबा संच-मच भेलि पड़ल सभ िकछु देखैत-सुनैत रहै। दूटा सिपाही बोराक एक भागक दुनू कोन पकड़ि आ तेसर बोरा मुँहक बान्ह पकड़लक। बान्ह ढील रहै उठैबतहि ससरि गेल। डोरीकेँ ससरितहि ढोलबाक दुनू पाएर निकलि गेल। बोरा निकालि, ढोलबाकेँ पकड़ि, जीपमे चढ़ा सिपाही िवदा भऽ गेल। २ उमेश मंडल जेहन मन तेहन जिनगी सभ दिनेक समयानुसार एकटा साधु सबेरे स्नान करए लेल नदीक पानिमे पैसलाह। डॉंड़ भरि पानिमे पहुँच पूब मुँहे सूर्य दिस तकलनि। जहिना माटिक तरक बीजक अंकुर बीजसँ निकलि धरतीक उपर अबैत रहैत तहिना सूर्यो अन्हारक गर्भसँ निकलि अकास दिशि चढ़ैत रहथि। जहिना धरतीक उपरका परत अंकुरक पाग सदृश्य बनि जाइत तहिना सूर्यक िकरिण अन्हारक पाग पहीिर लेलक। तहि काल ओ साधु एकटा मुसरी माने चुहियाकेँ पानिक बेगमे भसैत अबैत देखलनि। अवग्रहमे पड़ल मुसरीकेँ साधु हाथसँ उठा उपर आिब राखि पुन: स्नान करए पानिमे पैसलाह। स्नानक उपरान्त ओकरा अपना संगे कुट्टीमे अनलनि। कुट्टीमे मुसरी रहए लागलि। साधुक क्रिया-कलाप देखैत िकछु मासक उपरान्त मुसरी नमहर भेलि। ओकरो साधुक बरदान पबैक मन भेलइ। अबसर पाबि मुसरी साधुकेँ कहलकनि- ‘‘आब हम जुआन भेलौं। जुआनक पछाति बूढ़ि हएब। बूढ़ि भऽ मरि जाएब। मुइलाक पछाति तँ वंश समाप्त भऽ जाएत। तेँ विआह करा दिअ?’’ सूर्यकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘एकरासँ िवआह करब?’’ आिग जेकॉं धधकैत सूर्यकेँ देखि मुसरी बाजलि- ‘‘ओ तँ आिगक गोला छयैक। हमरा शान्त स्वभावक चाही।’’ बादलकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ ठंढ़ो अछि आ सूर्यसँ नम्हरो अछि। देखैते छहक जे सूर्योकेँ झॉंपि दैत छन्हि?’’ मुसरीक मनमे नहि जँचल िकऐक तँ ओहूसँ नम्हर पति जाचैत छलि। बाजलि- ‘‘नहि, ओहूसँ नमहरसँ करा दिअ।’’ पवनकेँ देखबैत साधु कहलखिन- ‘‘ओ तँ बादलोसँ नमहर अछि। िकएक तँ बादलोकेँ ऐम्हरसँ ओम्हर उड़बैत अछि।’’ मुसरीकेँ ओहो पसिन्न नहि भेल। अपन नापसन्दगी साधुकेँ जनौलक। तखन मुस्कुराइत साधु पहारकेँ देखबैत कहलखिन- ‘‘ओ तँ पवनोकेँ रोकि दैत अछि।’’ फेरि अपन नापसन्दगी मुसरी व्यक्त केलक। तखन पहाड़मे िबल खुनैत मूसकेँ देखबैत साधु पुछलखिन। मुसरीकेँ पसिन्न भऽ गेल। चौवन्नियॉं मुस्की दैत बाजलि- ‘‘विल्कुल पसिन्न अछि। कदो एकरंगाहे अछि। छोट कद रहितहुँ। पहाड़केँ खुनि खोखला बनाओत। जखने पहाड़ खोखला बनत तखने जेमहर गुड़कबैक मन हेतइ तेमहर गुड़कौत।’’ मूसकेँ बजा मुसरीसँ विआह करबैत बरिआती सभकेँ साधु कहलखिन- ‘‘जिनगीमे सभकेँ एहिना रंग-विरंगक अवसर अबैत अछि। मुदा, ओ अपन मनेक अनुरूप अपन पति चुनि जिनगी िवतबैत अछि।’’ प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार। मायानन्दक रेडियो-रूपक-शिल्प समय परिवर्त्तनशील अछि, जकर प्रभाव अभिव्यक्तिक माघ्यम पर पड़ैछ आ साहित्यक स्वरूप विधान सेहो परिवर्त्तित भ’ गेल। अभिव्यक्तिक परिवर्त्तनक फलस्वरूप नाट्यक रूप-विधान पूर्णत: परिवर्त्तित भ’ गेल अछि। रेडियो रूपक औहने सुंदर पाठ्य सामग्री भ’ सकैछ जेना संस्कृतक अमर कवि अपन नाटकक सभमे देलनि। रेडियोक आविष्कारक फलस्वरूप रेडियो-रूपककेँ जकरा दृश्य काव्यक अन्तर्गत गणना कयल जाइत छल ओ आब श्रव्य-काव्यक श्रेणीमे परिवर्त्तित भ’ गेल अछि। रेडियो-रूपक एक नवरूपमे हमरा समक्ष आयल अछि। जाहि कला कृतिकेँ रंगमंचपर प्रेक्षकक समक्ष प्रस्तुत कयल जाइत छल ओ आब स्टूडियोमे अभिनीत भ’ कए श्रोताक कान धरि पहुँचि गेल अछि। पूर्वमे नाट्य-प्रेमी नाटकक समक्ष प्रस्तुत होइत छलाह, किन्तु आब नाटकक हुनका समक्ष प्रस्तुत होमय लागल अछि। आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे प्रेक्षक मात्र श्रोता रहि गेल अछि आ रेडियो सम्पन्न आ विभिन्न घरक प्रेक्षागृह बनि गेल अछि। वस्तुत: रेडियो रूपक रंगमंचीय नाटकक दृश्य-पक्ष हैबाक कारणेँ शुद्ध शब्दमे निहित भावना पक्षमे कतहु-कतहु अवरोध्ा आबि सकैछ ओतय रेडिया-रूपकमे भावना पक्ष निर्वाध गतिशील रहैछ। रेडियो-रूपक पूर्णत: श्रव्य काव्यथिक।ध्वनि एकर मूलभूत अपार थिक ध्वनि भावाव्यक्तिक सशक्त साधन थिक। जे कार्य चित्रकारमे रंगक माघ्यमे करैछ रेडियो रूपककार आ प्रस्तुतकर्ता घ्वनिक माघ्यमे करैछ। एडवर्ड सेकविल वेस्टक कथान छनि जे आत्यन्तिक नमनीयता आ काल्चनात्मक सांकेतिकताक शक्तिक कारणेँ ई रंगमंच आ चित्रपटसँ अधिक नाटकीयताक सृष्टि करैत अछि। अभिव्यक्तिक माघ्यमक परिवर्त्तनक प्रभाव मैथिली साहित्य चिन्तक मनीषी लोकनिपर सेहो पड़लनि कारण समयक जे मॉंग छलैक ओहिसँ साहित्य मनीषी लोकनि कोनो निरपेक्ष रहि सकैत छथि। एकर परिणाम भेल जे मैथिली साहित्यमे रेडियो-रूपकक रचनाक शुभारम्भ भेल तथा बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्धमे ई विधा पूर्ण विकसित भ’ गेल जकर प्रभाव रचनाकार लोकनिपर पड़लनि। स्वातंत्र्योत्तर काल मैथिली भाषा आ साहित्यक हेतु उत्थान कालक रूपमे जानल जाइत अछि, कारण कतिपय साहित्य-चिन्तक प्रादुर्भाव भेल जे मनसा-वाचा-कर्मणा अपन मातृभाषाक उन्नयनार्थ साहित्यिक गतिविधिमे सहयोग देलनि ताहि परिप्रेक्ष्यमे वर्त्तमान शताब्दी पल्लवित-पुष्पित भ’ रहल अछि। मैथिली भाषा आ साहित्यिक क्षेत्रमे गत शताब्दीमे क्रान्तिक बीज वपन भेल जे साहित्यिक गतिविधिकेँ दिश्ा संकेत करबामे सहायक सिद्ध भेल। कतिपय साहित्य सेवी तपः सपूत नव स्फूर्ति आ नव स्पन्दनक संग साहित्य ओ भाषाक सम्वर्द्धनमे अपन अभूतपूर्व साहित्यिक अवदानक संग प्रवेश कयलनि जे साहित्यक स्रोत एक नव स्पन्दनसँ भरय लागल तथा ओहिमे जे अभाव छल तकर पूत्यर्थ रचनाधर्मी साहित्य चिन्तक अत्यंत लगनशीलता आ तन्मयताक संग एकर सम्वर्द्धनार्थत्पर भेलाह जकर परिणाम भेल जे मातृभाषाक विशाल भण्डार केँ भरबाक निमित्त ओ सब कृत संकल्प भेलाह। गत शताब्दीक चतुर्थ दशकमे मातृभाषाक उन्नयनार्थ एक नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा सम्पन्न साहित्य चिन्तकक प्रादुर्भाव भेल जे उपन्यासकारक रूपमे कथाकारक रूपमे, गीतकारक रूपमे आ समीक्षकक रूपमे सम्पोषित कयलनि ओ छथि मायानन्द मिश्र (1934) जनिक अक्षय कृतिसँ मैथिली पाठक नीक जकाँ परिचित छथि; किंतु ओ एक विशिष्ट रेडियो-रूपककार सेहो छथि तकर परिचय अद्यापि नहि भेटि पौलनि अछि तकर दोषी मैथिलीक इतिहासकार आ आलोचक छथि। एहि प्रसंगमे इतिहासकार आ आलोचक सर्वथा मौन छथि। ने जानि किएक ई एक अनुत्तरित प्रश्न अछि। रेडियोमे जीविकापन्न करबाक कारणेँ ओ समय-समयपर भवानन्दक नामे रेडियो-रूपकक रचना कयलनि। हिनक पॉंच रेडियो-रूपक अद्यापि हमरा दृष्टिपथपर आयल अछि ओ थिक, एके बापक बेटा, नवलोकः नवगप्प, गुड़-चाउर, अपन आन आ इतिहासक विसरल (अभियान-2) शेष चारू अद्यापि अप्रकाशित अछि, किन्तु सभक प्रसारण आकाशवाणी पटनासँ भेल अछि। जीवकोपार्जनार्थ मायानन्द आकाशवाणी पटनाक चौपाल कार्यक्रमसँ विगत अनेक वर्ष धरि सम्वद्ध रहलाह तेँ हुनका समय-समयपर रेडियो रूपकक रचनाक प्रतिवद्धता रहलनि। ओ रेडियो-रूपकक शिल्पक सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षक सूक्ष्मताक संग अघ्ययन कयलनि। हिनक उपलब्ध रेडियो रूपकमे हमर पारिवारिक, सामाजिक आ ऐतिहासिक पहलूक चित्रण भेल अछि। कलाकार युग-जीवनक प्रति अधिक जागरूक रहैछ तथा ओकर प्रयास रहैछ जे संसारकेँ खुजल ऑंखिए देखय। मायानन्द सजग मानवतावादी कलाकार छथि तेँ ओ युगीन समस्याक प्रति अपन जागरूकता देखौलनि। आधुनिक आर्थिक वैषम्यसँ उत्पन्न रिक्तताक स्थिति, समाजक मघ्यवर्गीय लोकक वेरोजगारी, ओकर दुर्दशा, सामाजिक यथार्थ आदिकेँ ओ अपन रेडियो रूपकमे चित्रित क’ कए ओहिपर तीक्ष्ण व्यंग्य सेहो कयलनि। यथार्थक पृष्ठभूमिपर आधारित आदर्श-स्वर हिनक रेडियो-रूपकमे मुख्य स्वर थिक। कथानक : मायानन्दक रेडियो-रूपकमे युगीन समस्याक प्रति अधिक जागरूकता देखबामे अबैछ। आधुनिक आर्थिक वैषम्यसँ उत्पन्न स्थिति समाजक मघ्यवर्गीय लोकक वेरोजगारी, ओकर दुर्दशा, संघर्ष आदिकेँ ओ अपन रेडियो रूपमे उपस्थापित कयलनि। एहि परिप्रेक्ष्यामे हमर समाजक पारिवारिक यथार्थकेँ अंंकित करबाक उपक्रम कयलनि जाहिसँ कथाक विकास सरल गतिसँ भेल अछि। कथाकार हैबाक कारणेँ ओ रेडियो-रूपकक कथानकक निर्माणमे अपन कुशलताक परिचय देलनि। ई अपन रेडियो रूपकक कथानक निर्माणमे जिज्ञासा तत्वपर विशेष बल देलनि। हिनक प्राय: सब रेडियो-रूपक कोनो-ने-कोनो रहस्यपर आधारित अछि जकरा उद्घाटित कयल गेल अछि जाहिसँ रूपक चमत्कारिक बनि गेल अछि। हिनक कथानक संघर्षपर आधारित अछि। कथानक निर्माणमे विशेष कौशल परिलक्षित होइत अछि। ओहिमे संघर्ष अछि, गति अछि। एक्के बापक बेटाक कथानक एक आदर्श भातृप्रेमक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। हरि आ मदन दूनू भय छथि। हरि एक आफिसमे अल्प वेतन भोगी मुलाजिम अछि। अपन छोट भाय मदनकेँ शिक्षित-दीक्षित करबामे ओ कोन-कोन ने बेलना बेललनि, किन्तु यथासमय नाेकरी-चाकरीक व्यवस्था नहि भ’ पौलनि तँ एक ट्यूशनक व्यवस्था कयलनि जाहिमे अपन वेतनक टाका मिला क’ ओकर अहाँक तुष्टि कयलनि। अन्तत: एहि रहस्यक उद्घाटन तखन होइछ जखन मदनक डिप्टी कलक्टरक परिणाम अबैत अछि। पारिवारिक परिवेशमे अल्प आयक कारणेँ कर्जक भारसँ आयल रिक्तताक एक सुखद सोहान वातावरणमे परिवर्त्तित भ’ जाइछ। अध्ाुुनातन संदर्भमे एहन भ्रातृ प्रेम कतहु नहि देखबामे अबैछ। रेडियो रूपककार एक एहन वातावरणक निर्माण करबामे सफल भ’ पौलनि अछि जे भ्रातृ प्रेमक अद्भूत उदाहरण प्रस्तुत करैछ। पारिवारिक पृष्ठभूमिपर केन्द्रित अछि नव लोकः नवगप्पक कथानक। किसुन एवं विसुन दूनू भैयारी नोन-पानि जकॉं सम्मिलत रहैत छलाह, किन्तु जिलेबी साहूक कर्जक तगादाक कारणेँ पारस्परिक प्रेम एहन तिक्त वातावरणक निर्माण करबामे सक्षम होइछ जे एक दोसराक जानी दुशमन मानि संयुक्त परिवारके खण्डित करबाक हेतु डेग उठयबाक उपक्रम करैत छथि। मधुकान्तक सत्प्रयासेँ सब समस्याक समाधानोपरान्त तिक्तता मधुरिमामे परिवर्त्तित भ’ जाइछ तथा संयुक्त परिवार यथावत रहि जाइत अछि। रेडियो-रूपककार समाजिक परिवेशमे परिवर्त्तित विचारधाराक धरातलपर नव दिशा समाजकेँ एहिमे देबाक उपक्रम कयलनि अछि जे नवतावादी सर्वथा नव आयामक सृजन करबामे सहायक होहत छथि जे टूटैत परिवार पुन: संगठित भ’ जाइत अछि। अन्यथा विखण्डित भ’ जाइत। पति-पत्नीक हास-परिहासपर केन्द्रित अछि गुड़ चाउर कथानक। पारिवारिक पृष्ठक भूमिमे कलहक जड़ि होइत अछि गहना-गुरिया जकरा लेल पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष्ा उत्पन्न भ’ कए प्रेमक पवित्र बंधनकेँ तोड़ि दैत अछि। द्वारिका अपन पत्नी लक्ष्मीकेँ आध्ा सेरक सूति गढ़बा दैत छथि जकर फलस्वरूप संयुक्त-परिवारमे विघ्नक बीजारोपण होइछ तथा माधव पत्नी जयाकेँ ई घटना सर्वथा अनसोहॉंत लगैत छनि। जया माधवकेँ सतत प्रेरित करैत छथि जे साझी आश्रममे रहबाक अब कोनो अर्थ नहि रहि गेल अछि। शनै:-शनै: समस्या एतेक गम्भीर भ’ जाइछ जे एहि घटनाकेँ ल’ कए द्वाारिका आ माधव संयुक्त परिवारक परम्पराकेँ खण्डित क’ कए भीन-बखरा करबाक हेतु उताहुल भ’ जाइत छथि। किन्तु लक्ष्मीकेँ ई स्वीकार नहि होइत छनि जे हुनका पसिन नहि। अन्तत: भीन-बखराक बात खटाईमे पड़ि जाइत अछि तथा दुनू भाय संयुक्त परिवारमे रहबाक अभिलाषी बनि जाइत छथि। अपन आन रेडियो रूपकमे सामाजिक वातावरणक विशिष्ट संदर्भकेँ रेखांकित करैत अछि जे हमर समाजमे एहन-एहन महनुभाव एखनो वर्त्तमान छथि जनिक सतत इएह प्रयास रहैछ जे एहन विषम वातावरणक निर्माण करी से भाय-भायक बीच जे आपसी प्रेम, स्नेह, आ सद्भावना अछि ओ तिक्ततामे परिवर्त्तित भ’ जाय। शीतल झा एक एहने पात्र छथि जे मुखियाक चुनावक अवसरपर शिवान्त आ विष्णुकान्तकेँ चुनावमे एक दोसराक विरोधी रूपमे वर्णित क’ कए अपन उल्लू सोझ करबाक प्रयासमे लागि झूठ-फूस, प्रपंचक ताना वाना बुनि क’ दुनू भायकेँ चुनाव लड़बाक हेतु सतत उत्प्रेरित करैत रहैत छथि तथा दुनू पक्षसँ पर्याप्त टाका-पैसा ऐठि क’ अपन स्वार्थ सिद्धि करबामे कनियो कुंठित नहि होइत छथि। किन्तु वास्तविकताक रहस्योद्घाटन तखन जा क’ होइत अछि जखन कि पिताक वर्खीक अवसरपर दुनू भायकेँ एहि प्रसंगमे विस्तारसँ विवेचन करबाक अवसर भेटैत छनि तथा शीतल झाक वास्तविकतासँ अवगत होइत छथि। सामाजिक कथानकक अतिरिक्त हिनक एक रेडियो रूपक थिक इतिहासक विसरल जाहिमे रूपककार इतिहासक एक आवृत अघ्यायकेँ अनावृत करबाक उपक्रम कयलनि अछि। एहिमे मल्ल जनपदक भट्टारक सूर्यकूलभूषण सम्राटक ओहि कथांश दिस संकेत कयलनि अछि जे भारतक प्राचीनतम विश्व विद्यालय वैदिक साहित्य आ परित्तनीक सूत्र अघ्ययनार्थ गेल रहथि, किंतु पितृत्यक देहावसानोपरांत सुखद जीवनक परित्याग क’ कए सम्राट पदकेँ सुशोभित कयलनि। आचार्य नागभद्रक पट्ट शिष्य श्रेष्ठ आर्य शिल्पीके पारखी सम्राट तत्क्षण हुनक शिल्प कलासँ परिचित भ’ जाइत छथि जनिक शिल्प-ज्ञान समग्र आर्यावर्त्तमे प्रख्यात तथा यशोध्वज दिग-दिगन्तमे व्याप्त छल। सम्राटक आदेशानुरूप शिल्पीकेँ दुर्गाक भव्य प्रतिमा निर्माण आज्ञा भेटैछ, किन्तु दुर्योगसँ एहन नहि भ’ पौलक आ मूर्ति निर्माण भ’ गेलैक राजकुमारी मारूतिका जे साम्राज्ञी छलीह। सम्राट क्रोधान्ध भ’ सूर्योदयसँ पूर्व ओकरा राज्य निष्कासनक आज्ञा देल गेलैक। कतोक दिनक पश्चात् आर्य शिल्पी विक्षिप्तता अवस्थामे मल्ल सम्राट रूद्र सिंहक समक्ष प्रस्तुत कयल जाइछ। सम्राट एहि विषयसँ अवगत रहथि जे नागभद्रक अथवा हुनक शिष्यक द्वारा बनाओल निर्मित प्रतिमामे प्राण प्रतिष्ठा स्वयं भ’ जाइत छैक। सम्राट इच्छा व्यक्त कयलनि जे एक एहन काल्पनिक अलौकिक नारीक कामना अछि जकर छवि इन्द्रधनुषोसँ अधिक आकर्षक, जकर कान्ति सघन जलदमे छिटकैत विद्युतलतोसँ अधिक प्रखर, जकर मादकता सोमरस पर्यन्तकेँ नीरस तथा कोमलता नवीनताकेँ कठोर बना दैत छैक। सम्राट इच्छा छलनि जे मल्ल जनपद विदैश्वकेँ पराकाष्ठाक काव्य-निर्माणक आधार दैक तथा सौन्दर्य स्नेहीकेँ महान् पवित्र मंदाकिनीक नीक स्नानक फल दैक। राजाक आज्ञा शिरोधार्य क’ कए मूर्ति निर्माणार्थ छओ पक्षक कलावधि देल जाइछ। आर्य शिल्पीक अपूर्ण सौन्दर्य आ ओकार शिल्प ज्ञानपर आकर्षित भ’ कए राजकुमारी तुँगभद्रा शनै:-शनै: ओकार सामीप्य सुखक लाभक आकाकांक्षिणी बनि जाइछ तथा अपन अगाध स्नेह जलसँ ओकरा अभिसिक्त करबाक उपक्रम करैछ, किन्तु आर्य शिल्पीक समक्ष हुनक अरण्य रोदन निष्फल भ’ जाइछ। मूर्ति निर्माणमे शिल्पी ततेक ने तन्मय भ’ जाइछ जे मूर्तिक सौन्दर्य रेखा आर्य महारानी मारुति तथा नासिका आ भौं तुंगभद्रा सदृश स्वयंमेव बनि जाइछ। सम्राट आर्य शिल्पीक मूर्ति कलापर आकर्षित भ’ महामात्यक समक्ष विचार व्यक्त कयलनि जे तुँगभद्रा आ आर्य शिल्पी एकत्रित भ’ कए नूतन-शिल्पकलाक सृष्टि करथि, कारण राजकुमारी संगीत कलामे निपुण छलीह। एकर सुखद परिणाम हैत जे मल्ल जनपद सौन्दर्य सम्पदाक लेल पुन: विश्वभंरमे अपन ज्योति जगाओल। आर्य िशल्पीक मूर्त्तिकला क्षमता सर्वदा राजकुमारी तुंगभद्राक अनुरूप अछि। सम्राट व्यक्तिक मूल्य वैयक्तिक योग्यताक आधारपर अंकित करबाक आकांक्षी छथि। आर्य शिल्पी एवं तुंगभद्राक समाचारसँ मल्ल साम्राज्ञी उज्जैनक राजकुमारी मारुति जे मल्ल सम्राट रूद्रपतिक अर्धांगिणी छथि ओ अतीव विह्रलता, मंद, कल्पन आ स्पन्दनक अनुभव क’ रहल छथि, कारण कोनो समयमे मारुति स्वयं आर्य शिल्पीक छलीह, किन्तु परिस्थितिक विपरीतताक फलस्वरूप ओ आर्य शिल्पीकेँ अपन बनयबासे असमर्थ भ’ गेल छलीह तथा पिताक आज्ञानुरूप महामहिम मल्ल सम्राटक रूद्रपतिक अर्धांगिणी बनबा लेल विवश भ’ गेल छलीह। एक नारीक जे विवशता होइछ जकर फलस्वरूप ओ आर्य शिल्पीकेँ अपनयबामे असक्षम भ’ गेलीह। परिवर्त्तित परिवेशमे वास्तविकताक रहस्योद्घाटन तखन होइछ जखन सम्राट रूद्रपति अपन कन्याक हेतु ओही आर्य शिल्पीक चयन करबाक अभिलाषी भेलाह जे पूर्वमे राजमाताक प्रेमी छल। राजमाता अर्थात् मारुति स्वयं आर्य शिल्पीक समक्ष प्रस्तुत भ’ कए वास्तविकताकेँ उद्घाटन करैत छथि। यथास्थितिसँ परिचित भ’ कए आर्य शिल्पी सम्राटकेँ बिनु कोनो सूचना देने अदृश्य भ’ जाइत छथि। हिनक समग्र रेडियो-रूपक पारिवारिक परिवेशपर केन्द्रित अछि। स्वतंत्रताक पश्चात् पारिवारिक स्वरूपपर एतेक शीघ्रतासँ परिवर्त्तन भेल अछि जे संयुक्त परिवारक मान्यता शनै:-शनै: खंण्डित होमय लागल आ एकांगी परिवारक उदय होमय लगलैक ताहि परिप्रेक्ष्यमे संयुक्त परिवारक पारम्परिक ढॉंचाकेँ सुरक्षित रखबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भ’ ओ अपन समग्र रेडियो-रूपकमे ओकर मान्यताकेँ पुनस्थापित करबाक कल्पना कयलनि। ओ इतिहासक ओहि अघ्यायपर दृक्पात कयलनि जाहि दिस साहित्यकारक घ्यान नहि आकर्षित भेल छलनि। इतिहासक बिसरलक कथानकमे पर्याप्त नाटकीय तत्व अछि आ ई एक प्रभावशाली रेडियो-रूपक थिक। पात्र : मायानन्दक रेडियो रूपकक वैशिष्ट्य थिक ओ कथा-विन्यासमे अत्यल्प पात्रक प्रयोग कयलनि अछि। पात्रक चुनावमे ओ अपन कल्पना शक्तिक प्रयोग क’ कए अत्यंत कुशलताक संग पात्रक चयन कयलनि। हिनक रेडियो-रूपकमे प्रयुक्त पात्रक मन-मे कोनो-ने-कोनो द्वन्द्व अवश्य अछि। हुनक प्रत्येक पात्रक मानसिक द्वन्द्वक सूक्ष्मसँ सूक्ष्म परतकेँ उदघाटित करबामे सफलता प्राप्त कयलनि अछि। हिनक पात्रक मनोभाव आ द्वन्द्वकेँ अत्यंत कुशलताक संग उद्घाटित करबामे सक्षम भेलाह अछि। मनुष्य जेहन देखबामे लगैछ भीतरसँ ओ ओहन नहि रहैछ। मनुष्यक वाह्य व्यवहार कोनो स्थितिमे ओकर वास्तविक चरित्रक परिचायक भइये ने सकैछ। मायानन्द एक मनोवैज्ञानी सदृश पात्रक अन्त: स्थलमे प्रवेश क’ कए मानवक कृत्रिम आवरणकेँ हटा क’ वास्तविक रूपकेँ स्पष्ट करबाक प्रयास अपन प्रत्येक रेडियो-रूपकमे कयलनि अछि। मनुष्यक आन्तरिक रूप अत्यंत संवेदनशील, भाव-प्रवण आ कोमल होइत अछि। ओ एहने पात्रक चयन कयलनि वा पात्रक जीवन क्षण्ाकेँ उद्घाटित कयलनि जाहिमे द्वन्द्वक तीव्रता अछि। मनोवैज्ञानिक पात्रक प्रभाव हुनक नाटकीय शिल्पपर प्रचुर परिमाणमे पड़ल अछि। हुनक विशिष्टता थिक जे ओ हरेक पात्रक भावनाक सधनता आ तीव्रताकेँ सरलतासँ पाठकक समक्ष प्रस्तुत कयलनि। हिनक रेडियो रूपकक धरातल मुख्यत: भावनात्मक अछि। हिनक रेडियो रूपकमे पात्रक शील-निरूपणक विनियोगमे रूपककारक सफलता एहिमे अछि जे अत्यल्प पात्रक प्रयोग द्वारा घटनाकेँ मार्मिकताक संग उपस्थ्ति करबामे सक्षम भ’ पौलनि। अपन: आनमे तीन पुरुष पात्र आ दू महिला पात्री, गुड़ चाउरमे दू पुरुष एवं दू स्त्री पात्र, नवलोकः नवगप्पमे पॉंच पुरुष आ दू स्त्री पात्र तथा इतिहासक बिसरलमे चारि पुरुष आ तीन स्त्री पात्रक प्रयोग रेडियो रूपककार कयलनि अछि जे हुनक विलक्षण शिल्पक प्रमाण थिक। इतिहासक बिसरल एक मनोवैज्ञानिक रेडियो रूपक थिक जकरा अर्न्तगत प्रत्येक पात्रक मानसिक यातनाक प्रसंगमे विस्तार पूर्वक विश्लेषण रूपककार कयलनि अछि। आर्य शिल्प, तुंगभद्रा, मारुति एवं महाराज रुद्रसिंह सभ मानसिक द्वन्द्वसँ गुजरि रहल अछि। महाराजक उत्कट अभिलाषा छलनि जे आर्य शिल्पी आ तुंगभद्राक सम्मिलित प्रयाससँ एक नूतन सौन्दर्य कलाक निर्माण संभव अछि, किन्तु साम्राज्ञी मारुति जे यथार्थ वस्तुस्थितिसँ अवगत छथि। ओ नहि चाहैत छथि जे एहन कार्य महाराज द्वारा कयल जाय तदर्थ ओ प्रयत्नशील भ’ आर्य शिल्पीकेँ ओतयसँ विदा भ’ जयबाक अनुरोध करैत छथि। प्रतिपाद्य रेडियो रूपकक पात्रक मानसिक अंतर्द्वन्द्व अपन पराकाष्ठासँ गुजरि रहल अछि। दू भायक बीच अनार्द्वन्द्वक रूप भेटैछ अपन आन, गुड़ चाउर, नवलोक नवगप्प एवं एक्के बापक बेटामे। प्रत्येक पात्र अपना अनुसारेँ प्रत्येक कार्यकेँ क्रिया रूप देबापर उताहुल अछि, किन्तु स्थितिक यर्थाथतासँ अवगत भेलापर सभ एकहि भ’ जाइत अछि। रेडियो रूपकमे मनोवैज्ञानिक चित्रणक अनेक सुविधा प्राप्त अछि जकर प्रयोग रूपककार पात्रक मानसिक ओझरौंठकेँ अत्यंत सरलासँ अंकित करैत छथि। एहिमे सामाजिक जीवनक विविध्ा रूपिणी यथार्थताकेँ अंकित कयल जा सकैछ जे अन्तरकेँ उद्वेलित कयनिहार द्वन्द्वक चित्रण भेल अछि। समाजमे भेटनिहार किछु विशेष प्रकारक व्यक्तिकेँ घ्यानमे राखि क’ एहि रेडियो रूपक सभक रचना भेल अछि। संवाद : संवाद लेखनमे मायानन्द अत्यंत निपुण छथि। वातावरण आ प्रसंगक अनुरूप छाेट-पैघ सब प्रकारक संलाप हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्ध होइछ। रेडियोपर हिनक नाटकक सफलताक रहस्य ई अछि जे रेडियोक लेल जाहि संसिलष्ट कथानकक एकाग्रता निश्चित दिशा आ सशक्त संलापक अपेक्षा हाेइत अछि तकर निर्वाह हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्ध होइछ। हिनक रेडियो रूपकमे वाचिक तीव्रताक प्रचुरता अछि। अति संक्षिप्त संलाप द्वारा कोना घटना विकास आ भाव व्यंजनाक काज भ’ सकैछ तकर उदाहरण हिनक रेडियो रूपकमे उपलब्ध होइछ। ई रेडियो रूपकमे संलाप सहज बोलचालक भाषामे लिखलनि अछि। ओहिमे वाकपटुता देखयबाक हेतु भेटैछ जे हास्य-व्यंग्यक सृजनक हेतु उपयुक्त अछि। संलापमे गति अछि। बातसँ बात क्रमिक रूपेँ बहराइत अछि जे हिनक रेडियो रूपकक वैशष्ट्य अछि। संलाप लेखनमे हिनका कुशलता छनि जे रेडियो रूपककेँ नीरस नहि होमय दैछ। संलापमे पात्र, प्रसंग एवं भावक अनुरूप परिवर्त्तित होइत रहैछ जाहिसँ रोचकता आबि जाइछ। भाषा : रेडियो रूपकक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय थिक भाषा आ ई भाषा लिखलनि नहि, प्रत्युत भाषित होइछ। अतएव एहन भाषाक प्रयोग हो सर्वसाधारणकेँ बोधगम्य होइक। मायानन्दक रेडियो रूपकमेँ अप्रचलित शब्द जे साधारण जनमानससँ उठि जकॉं गेल अछि तकर प्रयोग अपन नाटकीय भाषान्तर्गत कयलनि। ओ भाषाकेँ व्यावहारिक रूपकेँ रेडियो रूपकमे स्थान देलनि। इएह कारण अछि जे हुनक भाषा कतहु अव्यवस्थित नहि भ’ पौलक। ओ शब्दकेँ तोड़ि- मड़ोड़ि क’ कहु विकृत नहि कयलनि। हुनक भाषाक रसधार सर्वथा स्वच्छन्द आ स्वाभाविक रुपेँ प्रकाशित भेल। ओ सब प्रकारक भावक प्रकाशनक क्षमता हुनक भाषामे अछि। परिस्थितिक अनुकूल ओ शब्दक चयन कयलनि। लोकोक्ति आ मुहावराक सफल प्रयोग हुनक भाषाक सौन्दर्यमे अपूर्व अभिवृद्धि कयलक अछि। हिनक भाषा-नैसर्गिक रसाद्र आ भावपूर्ण अछि। ओहिमे तन्मयता, सार्थकता आ स्वाभाविकताक सहज समावेश अछि। मायानन्दक रेडियो रूपकक विशेषता थिक जे स्थल-स्थलपर ओ एहन मार्मिक लोकोक्ति आ मुहावराक प्रयोग कयलनि जकर फलस्वरूप हुनक रूपकक संवाद अत्यंत प्राणवन्त बनि गेल अछि। डा. नागेन्द्र आलोचक की आस्थामे हालीक काव्यमे एहि विषयकेँ स्पष्ट कयलनि अछि जे गद्य हाे अथवा पद्य दुनूमे रोजमर्राक घ्यान राखब आवश्यक अछि। भावनाक सटीक अभिव्यक्ति लोकोक्ति आ मुहावरा द्वारा सम्भव अछि। भावनाक सहजताक कारणेँ ओकार अभिव्यक्तिकेँ लेल सहज, स्वाभाविक भाषा ओ एकरे माघ्यमे सम्भव अछि। मानवक अत्यधिक जीवन्त, भाव-प्रवण आ ऐन्द्रिय अनु- अनिवार्यता ओहि भाषासँ सम्वद्ध होइत अछि जे यथार्थमे बजैत अछि। हिनक एकांकी सभ चौपालसँ प्रसारित भेल जकर जनसाधारणसँ सम्पर्क हैबाक कारणेँ अलंकृत अर्थात् सजह स्वाभाविक आ सरल अछि, कारण एहन भाषामे कोनो प्रकारक आडम्बरक स्थान नहि रहैत अछि। इएह कारण अछि जे हिनक भाषा सर्वसाधारणक हेतु बोधगम्य अछि। भाषापर हिनका अधिकार छनि। हिनक भाषा मुहावरेदार अंलकृत आ काव्यात्मक अछि। हिनक भाषा व्यावहारिक जीवनक भाषा थिक। एहि तथ्यकेँ उद्घाटित करबाक उद्देश्यसँ हिनक प्रत्येक रेडियो रूपकमे प्रयुक्त लोकोक्ति आ मुहावरापर विचार करब आवश्यक प्रतीत भ’ रहल अछि। लोक भाषाक यथार्थ रूपकेँ ओ अपन रेडियो रूपकमे उपस्थित कयलनि जकरा पाछॉं हुनक उद्देश्य छलनि जे श्रोतापर एकर प्रभाव पड़य। अपनः आन रेडियो रूपकमे ई निम्नस्थ लोकोक्ति एवं मुहावराक प्रयोग कयलनि अछि यथा: चिकरब-भोकरब, नङव्टे नाचने, घोडा पर चढल, कुर्सी-फुर्सी, मजिस्टर दरोगा, मन हनछिनआएब, चिकचाक, चुटट्ाक लोह तँ सोझे रहैछ, एक्केटा प्राण दू ठॉं बाटल, बसुलाक धार वस्तुकेँ अपना दिस झीकब, जकरे पात खोइ तकरे पात भूर करब, ऑंखिक देखल-कानक सुनल, अनका घरमे आगि लगा क’ तपनिहारक कमी नहि, जकरे खयबैक तकरे गयबैक, ताल लागब, पॉंच हाथ तड़पब, आँखि लाल पीयर करब, अनटोटल गप्प, मुँह ने कान बीचमे दोकान, सोंसे नगर घिनाएब, लारब-चारब, अपने मने पैघ, आगि झायब, बाभनक गाममे राड़ पजिआड़, इनारमे, अतह करब, अनटोटल गप्प, भेङा महिसक कानि, कटांउझि करब, दू टा आत्मा एक्के, मुँह पुरुख बनब, नाङटे नाचब, रसातलमे पहुँचाएब, उजाहि उठब, मतिभ्रष्ट, नाक कटाय, अदगोइ-बदगोइ, पोल खुजब, कपार फारब, धोखा देब इत्यादि। एकके बापक बेटामे काबुलमे गदहा होइछ, गदैस-मदौस, किचकिच-किचकिच करब, आँखि गड़रब, भटकल भौंह, बेलसक गप्प पेट पोसब, भनभनायब, ललबबुआ बनब, रमा डोलबेनब, छिहइआछत रहब, बताह बनायब, बौआइत-ढ़हनाइत, ओलसन बोल, कान बरही, चूल्हिमे झोंकब, तम्मा ल’ कए माङव्ब, आगि लगाएव, गुड चाउरमे विधवा हैत सात घरक मुद्दइ, ठीकपर माङु हँसी करब, हुथनूड़, निसा देब बनब, हक्कन कानब, अकान बनब, कोसलिया करब, बकलेल सन, मनोरथ पुरब, झुकादेब, फरिछौट करब, रङताल बजरब, खोंताक चोंचा जकॉं मुँह लटकायब, किकहारि काटब, अकच्छ करब. सूइघाक नोक बरोबरि, नवलोकः नवगप्पमे मार बारहैनि, बिठुआ काटब, सुगरक गवाही हरिन देल दुनू पड़ा क’ जंगल गेल, देह ढ़ाहब, देहमे अागि लगायब, विसपिपरी, हाथीपर चढल एलाह आघोड़ापर तैयार, घर उजारब, कडरीक थम्मपर सितुआ चोख, कपार फूटब, गलहथ्या देब, तथड़ाड़ामे गारब, भाकसी झोंकब, कौआक रापे बेङ नैासरै, पार लागब, अन्हेड़ करब, नन्नो थान-बिहन्नबान, अपने कचियासँ घेंट ततारब, भुकायब, चौहाठी हिलायब, अपन बड़द कुड़हरिए नाथब, मुहपर जाभी लगाएब, चौहाठी हिलायब, अपन बड़द कुड़हरिए नाथब, मुहपर जाभी लगाएब, कोसिकाक दोखरा बालु फॉंकब, उकटा पैंची, खाधिमे खसायब, आगि उगलब, लथगोबर एवं इतिहासक बिसरलमे टकटकी लागब, संकल्प विकल्पमे ओझायब, छल करब आदि-आदि। वातावरण : मायानन्द घ्वनि आ शब्दक माघ्यमे वातावरणक निर्माण कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपकक विशिष्टता अछि जे हमर ग्रामीण परिवेशक मघ्यवित्त परिवारक यथार्थ स्थितिकेँ उद्घाटित करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे वर्त्तमान परिवेशमे खण्डित भेल जा रहल अछि तकरा कोना बचाओल जाय ताहि दिस संकेत कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपकमे परिवारकेँ तोड़बाक जे प्रयास सामाजिक परिवेशमे ज्वलन्त भ’ गेल तकरा ओ जोड़बाक प्रयास कयलनि अछि अपन आन, गुड़ चाउर, नवलोक नवगप्प आ एक्के बापक बेटामे। परिवारिक परिवेशमे रहि क’ लोक कोना एक दोसरापर टीका-टिप्पणी करैत अछि, किन्तु वास्तविकताक धरातलपर ओ कतेक सटीक उतरैत अछि तकरा स्पष्ट करब रूपककारक अभीष्ट परिलक्षित भ’ रहल अछि। इतिहासक बिसरलमे काल्पनिकताक विलक्षण प्रयोग क’ कए रूपककार एहन वातावरण सृजन कयलनि अछि जे कथानकक विकासमे कतहु व्यवधान नहि भ’ पबैत अछि। ई अपन रेडियो रूपकमे श्रव्य-माघ्यमे घ्यानमे रखलनि। शब्द आ घ्वनि द्वारा यथोचित वातावरणक निर्माण कयलनि वातावरणक अनुरूप छोट-छोट सब प्रकारक संपादक रचना कयलनि। घ्वनि-प्रभाव आ संगीतक माघ्यमे रेडियो रूपककार वातावरण-निर्माण प्रभावशील ढंगसँ प्रस्तुत करबाक प्रयत्न कयलनि अछि। उद्देश्य : मायानन्द उद्देश्यक एकतापर घ्यान केन्द्रित कयलनि अछि। ओ सभ स्थितिकेँ एकहि दिशा दिस प्रेरित कयलनि। हिनक रेडियो रूपकक उद्देश्य मनोरंजन रहल अछि। किछु रेडियो रूपकमे ओ सामाजिक असंगतिपर तीक्ष्ण व्यंग्य कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपकमे उद्देश्य अपन कथ्यकेँ रोचक एवं आकर्षक रूपमे प्रस्तुत करबाक प्रयास थिक जाहिमे रुपककारकेँ पर्याप्त सफलता भेटलनि अछि। रंग-शिल्य : हिनक रेडियो-रूपकमे रंग-संकेत आ दृश्य-विधानक अन्तर्गत प्रथम श्राव्य, द्वितीय श्राव्य तदनुरूप अछि। ओ मघ्यवर्गीय सामाजिक जीवनक पृष्ठभूमिमे रेडियो-रूपकक रचना कयलनि। हिनक सभ रेडियो-रूपकमे पारिवारिक समस्याक उद्घाटन कयलनि जे सामाजिक यथार्थपर आधारित अछि। समाजिक यथार्थपर आधारित रेडियो रूपकमे ओ वर्त्तमान आर्थिक वैषभ्य आ ओहिसँ उत्पन्न समस्या दिस संकेत कयलनि अछि। ओ रेडियोकेँ घ्यानमे राखि क’ एकर रचना कयलनि आ ओ ओहि मे सफल भेलाह। ई सभ सामाजिक समस्याकेँ अपन प्रतिपाद्य बनौलनि। ओ एकरा प्रभावोत्पादक बनयबाक हेतु घ्वनि-प्रभावक उचित प्रयोगपर घ्यानकेँ केन्द्रित कयलनि। श्रव्य-संकेत आ घ्वनि-प्रभावक व्यवहारक प्रयोग कुशलतापूर्वक ओ अपन रेडियो रूपकमे कयलनि। बिनु कोनो नैरटरक सहायता नेने प्रसंगकेँ नाटकीय रूपमे, प्रस्तुत करबामे सफलता ओ प्राप्त कयलनि। दृश्य परिवर्तनमे नवीनता अनबाक ई प्रयास कयलनि। जिज्ञासा आ कोतूहलताकेँ प्रतिष्ठित करबाक उपक्रम कयलनि। मायानन्दक प्रत्येक रेडियो रूपक रेडियोपर ब्राडकास्ट भेल। रेडियोक माघ्यम थिक घ्वनि। आँखिक अपेक्षा ओ कानक लेल अधिक रहैत अछि। अतएव ओहिमे एक्शनक अभाव रहैत अछि। ई अपन रेडियो रूपकमे घ्वन्यात्मक मूल्यपर अधिक घ्यान देलनि अछि। ई अपन रेडियो रूपकमे कार्य-व्यापारक एकाग्रता आ पात्रक चरित्राकंनपर अधिक बल देलनि अछि। हिनक प्रत्येक रेडियो रूपकक अन्त प्रभावशाली रूपमे भेल अछि। दृश्य-परिवर्तनक कलात्मक प्रयोग देखबामे अबैछ। विषय प्रधानात्मक प्रभाव हिनक रचना शिल्पपर पड़ल अछि। विषय प्रधानाताक प्रभाव हिनक रंग शिल्पर पड़ल अछि। ई हास्य-व्यंग्य प्रधान, गम्भीर, रोमांचक, दुखान्त आदि रेडियो रूपक लिखलनि। ओ श्रव्य-शिल्पपर विशेष घ्यान रखलनि अछि। नि:सारण : रेडियो रूपक संक्षिप्त नाट्य रूप थिक। रेडियो रूपक मैथिली एकांकी एक शाखाक रूपमे स्वतत्र रूपसँ विकसित भेल अछि। मायानन्द अपन रेडियो रूपकमे नैरेशनक प्रयोग कतहु नहि कयलनि अछि। ओ श्रव्य-शिल्प सम्बन्धी कुशलताक परिचय एहि विधामे देलनि अछि। सर्वत्र श्रोताक द़ृष्टिसँ एकरा आकर्षक बनयबाक प्रयत्न कयलनि अछि। हिनक एहि कृतिमे घ्वनि-प्रभाव आ संगीतक व्यवहार कलात्मक रूपमे भेल अछि। भाषाशैली सब रूपकक अपन-अपन अछि। वातावरणक प्रसंग पात्रक अनुरूप अछि जहिसँ नाटकीय दृष्टिसँ प्रभावशाली बनि गेल अछि। जतेक दूर धरि मायानन्दक रेडियो-रूपकक अछि ओ रेडियो रूपक-नाट्य-शिल्पक कसौटीपर अक्षरस: सटीक उतरैत अछि। हिनक रेडियो-रूपकमे कथानक-निर्माण, चरित्र-चित्रण,संवाद, उद्देश्य, वातावरण, भाषा-शैली, रंग-शिल्प, घ्वनि-प्रयोग आदि दृष्टिएँ, कुशलतासँ निर्वाह कयलनि अछि। हिनक रेडियो रूपक भावी-विकासक दिशा-निर्देशक क’ सकैछ। रेडियो-रूपक मैथिली एकांकी शाखा रूपमे स्वतंत्र विधाक रूपमे विकसित भ’ रहल अछि। मैथिलीमे विभिन्न प्रकारक रेडियो रूपकक रचना निरन्तर भ’ रहल अछि। मायानन्द पाश्चात्य नाट्य-शिल्प आ नाट्य कृतिसँ धनिष्ठ रूपेँ सम्पर्कित भेलाह। रेडियो रूपक एक पैघ सशक्त माघ्यम, एक जीवित रंगमंच प्रदान कयलक अछि। रेडियोक प्रचार-प्रसार अधिक भेलासँ अनेक व्यक्तिकेँ एहि रूपक रचना करबाक हेतु प्रेरित कयलक। मैथिली रेडियो-रूपक लिखनिहारकेँ भारतीय अन्य भाषा सदृश अद्यापि सौविघ्य नहि उपलब्ध छनि तथापि जे एहन रचना उपलब्ध भ’ रहल अछि ओहि आधारपर रेडियो नाट्य-शिल्पकेँ जतेक विकसित हैबाक चाही ओ नहि भ’ सकल अछि। रेडियो, नाट्य-लेखनक लेल रेडियोकेँ निकटसँ देखबाक-समझबाक प्रयोजन अछि। प्रतिभा आ माघ्यमक धनिष्ट परिचय रेडियो-नाट्य-लेखन हेतु अनिवार्य अछि। आकाशवाणी सरकारी नियंत्रणमे अछि आ प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार ओतय पहुँचि क’ अपन प्रतिभाक। समुचित उपयोग नहि क’ पबैत छथि, कारण ओहि ठामक यान्त्रिकतासँ बन्हा जाइत छथि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि विचार टिप्पणी वर्ष २०६७ क शुभागमन तथा जुडशीतलक मुहथरिपर हमसभ पहुँचल छी। मुदा चैनसँ बैसबाक आ निश्चिन्त रहबाक कोनो दऽर नहि देखा रहल अछि। मिथिलाक सन्दर्भमे जँ गप्प करी तँ नेपालदिस राज्य आमिल पीनहि अछि, अपन समाङसभ सेहो जडि नहि धऽकऽ उपरे उपरे कूदतिसन प्रतीत होइत छथि। एक तरहक समाङ मिथिलारूपी दूधकेँ सौँसे मधेशरूपी पानिमे मिलाकऽ एकर धवलता आ पौष्टिकता नष्ट करबापर तुलल छथि तँ दोसर तरहक समाङ दूधकेँ खालि अपने लोहियामे औँटैत मुट्ठीभरि लोकक लेल खोआ परसऽ चाहैत छथि। जनकपुरमे हालहिँ सम्पन्न मिथिला महोत्सव देखाओल जा चुकल बाटकेँ पर्यन्त ध्यान नहि दऽ मात्र जनकपुरमे केन्द्रित कऽ मनाओल गेल। नेपालहिक विराटनगर, राजविराज, लहान, सर्लाही, वीरगञ्ज आदि जगहक लोककेँ सहभागिताक कोन कथा सूचना तक नहि देल गेलैक। एहि तरहेँ सरकारी खर्चामे जनकपुर उत्सवक रूपमे भेल कोनो कार्यक्रमकेँ मिथिला महोत्सव कहनाइ मिथिलाक व्यापकतापर दोसर रूपेँ आघात पहुँचौनाइ छियैक। पहिने मिथिला खास जातिक कोँचामे लेपटाएल छल। बहुत मुश्किलसँ हमसभ ओहिठामसँ मिथिलाकेँ मुक्त करबामे किछु सफल भेलहुँ तँ आब किछु खास जगहक लोक एकरा जेबीमे राखऽ पर तुलल छथि। दुश्मनसँ लडबामे आसान होइत छैक मुदा अप्पन लोक जँ बैमानी वा नादानीपर उतरि जाए तँ बड मुश्किल भऽ जाइत छैक। तथापि ई नव वर्ष हमरासभकेँ सद्बुद्धि दिअए जे हमसभ मिथिलाकेँ घरमे सैँतिकऽ रखबाक लोभसँ मुक्त होइ आ जँ क्यो बैमानीक भावसँ एहन कृत्य करैत अछि तँ तकरा यथासमय सबक सिखा सकी। जुडशीतलमे हमसभ हरियरीक लेल पानि तँ जरूर पटबैत छियैक मुदा गन्दगी फेकबाक काज सर्वप्रथम करैत छियैक। ई नव वर्ष हमरासभकेँ सएह मार्गदर्शन करएऽ ताहि शुभकामना संग एकटा एहि परिवेशपर लिखाएल गजलक जलथपकी- गजल —धीरेन्द्र प्रेमर्षि जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार! एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै सबदिनमा जखन अन्हरिया पसरल होइक, मशाले लगए पिअरगर यौ खालि शब्दक जाल बुनल नहि चाही आब जवाब कोनो नगर–डगरमे गुञ्जैत सबल सबाले लगए पिअरगर यौ जुड़शीतलकेर भोरहरियामे धह–धह जरए कपार जखन जलथपकी नहि, तखन जाँघपर ताले लगए पिअरगर यौ माथा बन्हबैत कफन, उड़ाबए लाल गुलाल अकाशे जँ हमरा तँ ओहि समय–सुन्दरीक गाले लगए पिअरगर यौ साल–सालपर अबैत रहैए, सगरो दुनिया नवका साल नवयुगक मुहथरि खोलैत नव साले लगए पिअरगर यौ उमेश मंडल निर्मलीसँ जनकपुर धाम प्राय: बच्चेसँ जनकपुर धाम जेबाक जिज्ञासा छल जे आयोजित कथा गोष्ठी ‘‘सगर राति दीप जरय’’ क 69म खेपमे शामिल भऽ 3 अप्रैल 2010 केँ पूरा भेल। जहिसँ दोहरी खुशी भेटल। चारिए बजे भोरमे निर्मली टीशनपर पहुँचलहुँ। करीब पॉंच बजे गाड़ी खुजल आ समएसँ सकड़ी टीशनपर उतरलहुँ। सकड़ीसँ जयनगरक मेल नहि रहने मेक्सी पकड़ि मधुबनी गेलहुँ। मधुबनीसँ पुन: मेक्सी पकड़ि कलवाही, नगर कोठी होइत जयनगर गेलौं। तखन ढाइ बजैत रहै। जयनगरसँ जनकपुर लेल नेपाली ट्रेन तीन बजेमे खुलत से जानकरी भेल। तहि बीच हमसभ भोजन केलौं आ समएसँ अबिब ट्रेनमे बैसि रहलौं। मैक्सीमे जखन भीड़ आ गुमारसँ परेशान रही तँ मनमे हुअए जे कोनो तरहेँ जयनगर तक पहुँचक अछि। ओइठॉंसँ तँ ट्रेनक यात्रा रहत। मुदा, ट्रेनक नमती आ भीड़ देखि हुअए जे बसे जेकॉं हाल हएत। सएह भेल। मुदा, तइयो मनमे खुशी रहए िकएक तँ दस-बारह गोटाक संगवे रहए जहिसँ यात्रामे कोनो कठिनाइ नहि बुझना गेल, भरि रस्ता गप-सप्प चलैत रहल। नव कथाकारक संग-संग श्री जगदीश प्रसाद मंडल आ श्री राजदेव मंडल सेहो संगमे रहथि, जे हमरा सबहक लेल सौभाग्य छल। गोसॉंइ लुक-झुक करिते छल तावत् गाड़ी जनकपुर धाम पहुँचि गेल। ट्रेनसँ उतरि हमसभ रामानन्द युवा क्लब जेबाक लेल आगॉं बढ़लौं। िमथिला महोत्सवसँ जनकपुर भरि बाजारमे रमणीय वातावरण छल। जहिसँ चाह-जलपान केनाइ आकि रिक्सासँ गेनाइ सभ कियो िबसरि गेलाह। पएरे सभ बिदा भेलौं। देखैत-सुनैत समए रामानन्द युवा क्लबमे प्रवेश केलौं। दोसर मंजिलपर पएर दइते रही आकि श्री राजाराम सिंह राठौरजी भेंट भऽ गेला। हमरा सभकेँ देखते हाथ पकड़ि बड़ी अहलाद्सँ यथोचित स्थानपर लऽ गेलथि। उपस्थित साहित्यकार लोकनिकेँ देखि हर्ष भेल। दीप जरा गोष्ठिक शुभारम्भ भेल। संयोजक महोदय श्री राजाराम सिंह राठौर सभ व्यवस्था बड़ नीक जेकॉं कएने रहथि। कथा जानकीक नामसँ एकटा बैनर टांगल रहै। आदरणीय रमानन्द झा “रमण”जी पहिनहिसँ उपस्थित रहथि। गोष्ठीक संचालन आदरणीय फूलचन्द्र िमश्रजीकेँ देल गेलनि। गोष्ठिक शुरूहेँमे दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण कएल गेल, जहिमे मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) आ िमथिलाक बेटी (नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल। भाग रौ आ बलचन्द्रा (नाटक)- िवभा रानी। हम पुछैत छी (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल। नताशा (कॉंिमक्स)- देवांशु वत्स। अर्चिस (कविता संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी। नेपथ्य (नाटक संग्रह) आ नैमिकानन (कथा संग्रह)- सम्पादक- रेबती रमण लाल। िमथिला सृजन (पत्रिका) सम्पादक ऋृषि बशिष्ठ। विदेह- कथा 2009-10, प्रबन्ध समालोचना 2009-10 आ विदेह पद्य 2009-10 सम्पादक गजेन्द ठाकुर जीक रहनि। एहि तरहेँ बारह गोट पोथीक लोर्कापणक शिलशिला करीब घंटा भरिक रहल। फोटोग्राफर सभ फोटो खिचलनि। तहिबीच चाह-जलपान सेहो चलल। रजिस्टरपर सभ कथाकार अपन-अपन उपस्थिति आ कथाक नाम दर्ज केलनि। पहिल कथा श्री सुरेन्द्र नाथ, दोसर श्रीमती िवजेता चौधरी, तेसर िवभूति आनन्द फेर िजज्ञासु जी, जगदीश प्रसाद मंडल, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, ऋृषि बशिष्ठ, उमेश मंडल, रघुनाथ मुखिया, महाकान्त ठाकुर, चौधरी जयंत तुलसी, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, मनोज कुमार मंडल, खड़ा नन्द यादव, राजदेव मंडल, दुर्गानन्द मंडल इत्यादि तीस गोट कथाकार कथा पाठ केलनि। तीन-तीन कथाक पाली होइत छल। एक पालीक पठित कथापर समीक्षा होइत रहए। प्रखर समीक्षक डॉ. रामावतार यादव, डॉ राजेन्द्र िवमल, रौशन जनकपुरी, डॉ रमानन्द झा रमण, श्री हीरेन्द्र कुमार झा, श्री योगानन्द झा, श्री अजीत आजाद आदि अपन दृष्टिकोण दैत समीक्षा रखलखिन। ई शिलशिला राति भरि चलैत रहल। लागि रहल छल जे ई नव कथाकारक लेल ट्रेनिंग काॅलेज सदृश्य अछि। भिनसर छह बजे गोष्ठिक समापन भेल। अगिला कथा गोष्ठी 70म सगर राति दीप जरय केँ प्रस्ताव श्री योगानन्द झाजी रखलनि। आदरणीय रमानन्द झा रमण जीक संग-संग सभ साहित्यकार लोकनि सहर्ष एकरा स्वीकार केलनि। रजिस्टर आ दीप श्री राजाराम सिंह राठौर जी अगिला कथा उत्पल हेतु श्री योगानन्द झा जीकेँ देलनि। एकबेर सभ खुशी-खुशी थोपड़ी बजेलनि। अगिला कथा गोष्ठीक स्थान- कविलपुर लहेरियासरय (दरभंगा) तिथि- 12 जून 2010 संयोजक- श्री योगानन्द झा कबिलपुर (दरभंगा) रामानन्द युवा कल्व जनकपुर धाममे ३ अप्रैल २०१० 69म सगर राित दीप जरय- कथा गोष्ठीकेँ उद्दघाटन- डॉ रामावतार यादवकेँ द्वारा कएल गेल। संयोजक श्री राजाराम सिंह राठौर आ रामानन्द युवा कल्व रहथि। 12टा पोथीक विमोचनक कएल भेल 1 मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) जगदीश प्रसाद मंडल -- डॉ राजेन्द विमल -- -- श्री रामनन्द झा ‘‘रमण’’ 2 िमथिलाक बेटी (नाटक) जगदीश प्रसाद मंडल -- डॉ राजेन्द्र विमल -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ -- 3 विदेह पद्द 2009-10 -- श्री हीरेन्द्र कुमार झा -- -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ 4 िवदेह प्रवन्ध-समालोचना 2009-10 -- डॉ विभूति आनन्द -- -- 5 विदेह कथा 2009-10 -- डॉ विभूति आनन्द -- श्री अजीत आजाद -- 6 हम पुछैत छी (कविता संग्रह) विनीत उत्पल -- राम भरोस कापड़ि ‘‘भ्रमर’’ -- -- 7 भाग रौ आ बलचन्द्रा (नाटक) विभा रानी -- श्री अरविन्द ठाकुर -- -- 8 अिर्चस (कविता संग्रह) ज्योति सुनीत चाैधरी -- डॉ विभूति आनन्द -- -- श्री रामानन्द झा ‘‘रमण’’ 9 नताशा पहिल चित्र श्रंृखला देवांशु वत्स -- श्री प्रफूल कुमार मौन -- -- 10 नेपथ्य (नाटक) -- डॉ रेबती रमण लाल -- डाॅ रामावतार यादव -- -- -- 11 नैमिकानन (कथा संग्रह) -- श्री फूलचन्द्र िमश्र -- -- -- -- 12 िमथिला सृजन पत्रिका सम्पादक- ऋृषि बशिष्ठ -- डॉ राजेन्द्र विमल -- -- -- -- एहि तरहेँ दर्जन भरि पोथीक लोकार्पण भेल। आ एहि कथा गोष्ठीमे 30 टा कथाक पाठ भेल जाहिमे सभसँ खुशीक बात ई जे दजनोसँ बेसी नव कथा कारक उपस्थिति रहय। कथाकार आ कथाक नाम एहि तरहेँ छल- श्री सुरेन्द्र नाथ सुमन- संस्कृति श्रीमती विजेता चौधरी- भ्रूण िवभूति आनन्द- अरे जिज्ञासू जी- विवस्ता जगदीश प्रसाद मंडल- प्रेमी रौशन जनक पुरी- ऋृषि बशिष्ठ- जौवॉं उमेश मंडल- जेहन मन तेहन जिनगी रघुनाथ मुखिया- वंश महाकान्त ठाकुर- दियादी चौधरी ज्यंत तुलसी- के वुरि बेचन ठाकुर- पत्तावाली कपिलेश्वर राउत- सलाह मनोज कुमार मंडल- घासवाहिनी खड़ानन्द यादव- गहुमक बोड़ा दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी राजदेव मंडल- गजेन्द्र ठाकुर- कथा-तस्कर १ शालिग्राममे छिद्र होइत अछि, कारी पाथर मात्र नर्मदामे भेटैत अछि। जमसम गाममे सभ किछु बदलल अछि, ग्रामदेवताक डिहबार स्थानसँ लऽ कऽ सभ ठाम मुदा किछु ने किछु लाक्षणिक वस्तु देखिये रहल छी। मुदा हमर गाथाक कोनो लक्षण एतए नहि अछि। गाछी आ बाध बोन सभटा पतरा गेल अछि। सए बर्ख। बिज्झू आमक ओ गाछी। बीहरि सभसँ भरल। भाँति-भाँतिक चिड़ै-चुनमुनी आ छोट पैघ जीव-जन्तु। नेना रही। जेठसँ अगहन खुरचनिञा लत्ती लग गप करैत हम आ मालती। कहियो फागुन-चैतमे जाइ तँ लवङलताक लत्ती लग गप करी। मलकोका, कुमुद, भेंट, कमलगट्टा कन्द, रक्ताभ बिसाँढ़क ताकिमे कादो-पानिमे घुमैत हम आ ओ। खुल्ले पएर, काँट-कूसक बीच तड़पान-तड़पि कऽ कुदैत। आमक कलममे सतघरिया खेलाइत। हम आ मालती। करबीरसँ बेढैत अपन काल्पनिक-घर। एकहरा, दोहारा, जटाधारीक बीआ भरि साल जोगबैत मालती। मालती सेहो होएत हमरे बएसक। माए कहैत छल जे मालती छह मासक जेठ छल हमरासँ मुदा पिता कहैत छला जे छह मासक छोट अछि मालती हमरासँ। आ पिता से किएक कहै छलाह से बादमे जा कऽ ने बुझलिऐ। भरि आमक मास आमक गाछीक दिनुका ओगरबाहीक भार हमरे दुनू गोटेपर छल। मुदा साँझ होएबासँ पहिने हमर मामा बछरू आ मालतीक बाबू खगनाथजी कलम आबि जाइत छलाह, रातिक ओगरबाहीक लेल। मुदा हमर सभक गाथाक कोनो लक्षण एतए सेहो नहि अछि। हमर सभक माने केशव आ मालतीक। मुदा ओहि पक्काक डिहबार स्थान लग कारी रंगक शालिग्राम हम ताकि रहल छी। छिद्रयुक्त शालिग्राम। एकटा नुका कऽ रखने छलहुँ एत्तै कतहु। गौँआ सभ धरि खूब खर्चा कएने अछि एहि डिहबारक स्थानक मंडप बनएबामे। पहिने तँ किछुओ नञि रहै। राजा जे बनेलक पोखरिक घाट आ तकर कातमे पक्काक मन्दिर सएह। मुदा बेचारो पूजा कैयो नञि सकलाह। लाजक द्वारे हमर एहि गाममे आबियो नञि सकलाह। २ हम केशव, गाम मंगरौनी, नरौने सुल्हनी, पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र। मालती- माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा, गाम जमसमक पुत्री मालती। खगनाथजी आ हमर मामा बछरूमे भजार लागल। जमसममे हमर मामा गाम। मामागाम धरि सुखितगर, हम सभ तँ दरिद्रे। से हम एक मास गरमी तातिल आ पन्द्रह दिन दुर्गापूजासँ छठि धरि मामेगाममे रहैत रही। गरमी तातिलमे सपेता पकबासँ लऽ कऽ कलकतिया आम पकबा धरि गाछी ओगरी। आ दुर्गापूजामे खष्ठीसँ लऽ कऽ भसान धरि दुर्गापूजा देखी। फेर दीयाबातीमे कनसुपती जराबी आ छठिमे गाम घुरि जाइ। आ बीच-बीचमे तँ जाइत रहबे करी। मालती संगे खूब झगड़ा सेहो होइ छल। चौथामे रही प्रायः। गरमी तातिलमे मामा गामक आमक गाछी गेल रही। कोनो गपपर मालतीसँ रूसा-फुल्ली भऽ गेल। धरि बौसलक मालतीये। आ बौसबो कोना केलक। -हम अहाँसँ घट्टी मानै छी ओहि गपक लेल। -कोन गप। -जइ गपपर अहाँसँ झगड़ा भेल। आ ओ गप नञि हमरा मोन पड़ल आ ने मालतीकेँ। मुदा फेर मालतीसँ कहियो कोनो गपपर हम झगड़ा नञि केलहुँ। वएह मुँह फुलाबए तँ हमही पुछिऐ जे कोन गपपर मुँह फुलेलहुँ से तँ मोन नहिये हएत तखन अनेरे ने झगड़ा करै छी। गरमी तातिलक बाद दुर्गापूजा आ दुर्गापूजाक छुट्टीक बाद गरमी तातिलक बाट जोहै लगलहुँ। से कहियासँ से की मोन अछि ? ३ पिता गाममे बटाइ करथि। मिडिल स्कूलक बाद कोनो स्कूल नहिये रहै आस-पड़ोसमे। संस्कृत पाठशाला सभ बन्ने भऽ गेल रहै। से तातिल बला कोनो बात आब रहबे नञि करए। भरि साल बुझू काजे आकि तातिले। नाना-नानी जिबिते रहथि। माएक लियौन कराबए लेल कियो ने कियो आबिये जाइ छल। हमहुँ दू चारि मासमे मामा गाम कोनो लाथे भइये अबैत छलहुँ। गामपर कएक टा समस्या। नञि जानि कोन भाँज रहै जे पाँजिक रक्षाक गप पिताक मुँहे सुनैत रहैत छलहुँ। आ से हमर बियाह मालती संगे भेने टा सँ सम्भव, सेहो हुनका मुँहे उचरैत छलन्हि। मालती हमर संगी मुदा एहि गप-शपसँ ओकर हमर दूरी बढ़ि जेकाँ गेल। जे सहजता हमरा आ ओकरा मध्य छल से खतम होअए लागल। जेना ओकरा देखिते हमर मोनमे पत्नीक छवि नजरि आबै लागल छल, तहिना तँ ओकरो मोनमे ने अबैत होएतैक। ४ हमर गाम आएल रहथि बछरू मामा। मधुरापति- “बछरू आब अहींक हाथमे हमर सभटा इज्जत अछि। खगनाथक पुत्री केशवक लेल सर्वथा उपयुक्त। सुन्दरि सुशील अछि तँ केशव सेहो जबर्दस्त अछि। एक्के बतारीक अछि मुदा किछु दिनुका छोटे अछि मालती। हे। अहाँकेँ तँ ई बुझले अछि जे ७०० टाका लड़कीबलाकेँ दए हमर विवाह करा हमर पिता पाँजि बनाओल। मुदा आब जमीन जत्था नहि अछि। काल्हि घोड़ीकेँ चिलम पियाए ओहिपर चढ़ि आएल छलाह पञ्जीकार। साफे कहि देलन्हि जे मात्र खगनाथेक पुत्रीसँ अधिकारमाला बनैत अछि। आ से नहि भेने पुबारिपार श्रोत्रियक श्रेणीसँ चुत भऽ जाएब हम”। बछरू- “हम पुछै छियन्हि खगनाथसँ। संगी तँ छथि मुदा हुनकर मोनमे की छन्हि से वएह ने कहताह”। आ ने जानि किएक प्रेमसँ भरि गेल छल हमर मोन। बिदा भऽ गेल रही हुनका संगे। ५ मालती- “केशव। तोहर कत्तौ दोसर ठाम बियाह भऽ जएतौक तखन हमरासँ भेँट कोना होएतौक”। केशव- “आ तोहर ककरो दोसरासँ बियाह भऽ जएतौक तँ एहन अनर्गल प्रश्न सभ ककरासँ करमे”? मालती- “मुदा एकटा गप बुझलहीं। काल्हि तोहर मामा हमर पितासँ हम्मर-तोहर बियाहक चरचा कऽ रहल छलाह”। केशव- “तखन”। मालती- “नञि, सभटा तँ ठीके मुदा तखने दरभंगा राजाक दूत बनि एक गोटे आबि गेलाह आ कहए लगलाह जे राजाक समाद अछि”। केशव- “राजाक कोन समाद”। मालती- “कियेने गेलिऐ। मुदा हमर पिताकेँ ओ दूत कहलन्हि जे बेटीक बियाहक चर्च किछु दिन रुकि कऽ करबाक लेल”। केशव- “तोहर सुन्दरताइ तँ छौहे तेहने। राजोक नजरिमे तोरा लेल कोनो लड़का अभरल छै की”? मालती- “कियेने गेलिऐ”। ६ राजाक मन्त्रीक सवारी खगनाथक दरबज्जापर! दुइये दिनमे कीसँ की भऽ गेल। ओ दूत जा कऽ किछु कहि तँ नञि अएलै जे खगनाथ अपन बेटीक बियाह लेल धरफरायल छथि। से सतर्की देखियौ। लोक सभ गर्दमगोल करैत। सभ स्वागतमे जुटल। आ हमहुँ सभ चीजक जाएजा लैत रही। साँझ होइत-होइत हमर पिता सेहो आबि गेल छलाह। ओम्हर राजाक मन्त्रीक स्वारी गेल आ एम्हर हमर पिता माथपर हाथ रखने गुम्म रहि गेलाह। खगनाथ सेहो मौन। राजा अपन बियाह मालतीसँ करबाक प्रस्ताव खगनाथ लग पठेने छलाह। महाराज बीरेश्वर सिंह। कहू तँ। अपने चालीससँ उपरे होएत आ एहि तेरह-चौदह बरखक बचियासँ बियाहक प्रस्ताव। खगनाथक की ओकाति जे ओकरा मना करितथिन्ह। हमर पिता चिन्तित जे आब पाँजि नहि बाँचत। ओहि दिन साँझमे कोनटा लग मालतीसँ हमर भेँट भेल। करजनी सन-सन आँखि फुलल, जेना हबोढ़कार भऽ कानल होअए। की सभ गप केलहुँ मोनो नञि अछि। हँ आखिरीमे हम कहने धरि रहिऐ जे सभ ठीक भऽ जाएत। ७ जमसममे बीरेश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल! जमसम गाममे पोखरि खुनाओल गेल। ओतए मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह। मुदा हमहुँ रही मधुरापति कविक पुत्र केशव। बियाहक दिन लगीचे रहै आ दोसर कोनो दिन सेहो नञि रहै। आ ओहि दिन मालतीसँ सभ गप भइये गेल छल। कटही गाड़ीमे आगूक चाप आ पाछूक उलाड़, आगाँक चाप नीक कारण पाछाँ उलाड़ भेलापर गाड़ी उनटि जाएत। मुदा हम ओहिना गाड़ीकेँ उलाड़ केने बँसबिट्टी लग मालतीक इन्तजारीमे रही। ओ आयलि आ गाड़ीपर बैसि गेलि। जे कियो रस्तामे देखए से डरे नञि टोकए जे गाड़ी ने उनटि जाइ एकर। एकटा पतरंगी चिड़ै देखि उल्लसित होअए लागलि मालती तँ आँगुरसँ हम ओकर ठोढ़ बन्न कऽ देलिऐ। मालतीकेँ लऽ कऽ गाम आबि गेलहुँ, धोती रंगाइत छल। फेर जे मालतीक पता करबाक लेल आएल रहए तकरा पकड़ि राखल। आ ’कन्यादान के करत’क अनघोल भेलापर ओकरा सोझाँ अनलहुँ जे कन्यादान यएह करबाओत। सलमशाही चमरउ जुत्ता उतारि धोती पहीरि हम विवाह लेल विध सभ पूर्ण केलहुँ। मालतीक सीथमे सिनुर हमरे हाथसँ देब लिखल जे रहै। ८ तकर बाद राजा बीरेशवर सिंह की करताह? पञ्जीकारकेँ बजा कऽ हमर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। मुदा मधुरापति अपन पुत्रक प्रति गर्वोन्नत्त। बाघक बेटा बाघ। पाञ्जि आ पानि अधोगामी मुदा खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशवक श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहतन्हि। आ सए बर्खक बाद आइ एहि गाममे कोनो नाटक होएतैक। सुल्ताना डाकू। आ हम तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र, कवि मधुरापतिक पुत्र अपन गाथाक कोनो एकटा लक्षण एतए जमसम गाममे ताकि रहल छी। मुदा राजा बीरेश्वर सिंहक वएह पोखरि आ आब ढ़नमनाएल मन्डिल देखै छी, बेचारो घुरि कऽ लाजे एहि गाममे एबो नहि केलाह। यएह पोखरि आ ढ़नमनाएल मन्दिर हमर प्रेमक अछि अवशेष। ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी-मोनक गति ३.३.रूपेश कुमार झा त्योंथ- खायब की ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.गजेन्द्र ठाकुर-गीत-प्रबन्ध-नाराशंसी ३.६.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २२म खेप ३.७.श्यामल सुमन-कहू कि फूसि बजय छी? ३.८.१.-राजदेव मंडल-मिझाइत दीया २.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत३.मनोज कुमार मंडल-फैशनक धमाल स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! देसिल वयना क अस्तित्व!!
भुवनक सभ सॅ मिठगर वयना, वेन जकॉ अहॉ वॉटि देलहुॅ । औ भलमानुष मिथिला नंदन, मातृक देहक कुरी लगयलहुॅ । केओ दछिनाहा केओ तिरहुतिया, केओ वज्जि - सरैसा केओ कोशिकन्हा । एक्के नादि मे सभ मधुर चखै छी, तखन विलग अछि छान ओ पग्घा । कत‘ छी हम सभ कत‘ हमर मिथिला, कत‘ विदेह नोर खसवै छथि? कत‘ वैरागी वनि विद्यापति वैसल छथि, कत‘ सिया वेटी कुहरै छथि ? अहॉ छी भलमानुष त‘ रहू, हम अधम मुदा छी मिथिला भाषी । अहॉ पढ़ू अंगरेजी, फ्रेंच, जपानी, आन वयना वाजू घुमैत काशी । नहि अछि हमरा द्वेष अहॉ सॅ, छोड़ू नहि अपन उत्थानक अवसरि । मुदा! द्रविड़, वंग गुजराती केॅ देखू, हुनक वयना गेलनि आर्यावर्त मे पसरि । ओ नहि अपन भाखा केॅ छोड़लनि, स्वभूमि हो वा हो प्रवास । नेना भुटका संग देसिल वयना वाजू, जगाउ अगिला पिरही मे विश्वास । चन्दा सुमन यात्री मधुपक, जुनि करू भावना पर अघात । दिवस निकट ओ आवि रहल अछि, हेती मैथिली सभ सॅ कात । जौं अपन वयना सॅ सिनेह नहि राखव, ’मॉ‘ भ’ जेती अस्तित्व विहीन । ततक अस्तित्वक गप्प नहि पुछू, जननी बिनु ओ स्वतः विलीन । ज्योति सुनीत चौधरी मोनक गति असगर बैसल एक कोठलीमे दृष्टि कैद छल चारू देवारमे मुदा मोन जा चुकल छलद ूर अपन चालि सऽ मजबूर विचरि रहल छल बीतल काल सोचैत अनके आनक हाल एकएक प्राणि जकरा स भेंटल सबहक चिन्ता अपने मे समेटल जॅं जे भेलै से नहिं भेल होयतै तऽ आहिके की हाल होयतै सत्य के संग प्रयोगक साहस कल्पनामे आन्हर भऽ केने बास समय के मोल सऽ अपरिचित कतेको दिन राति रहल छल बीत एक एहेन उज्ज्वल भाेर चाहीछल जे असत्यके नींदमें जे सूतल छल ताहि मोनके झकझाेरिकऽ जगाबै वास्तविकताक सुन्दरता बुझाबै सत्यके संग कराबैत साक्षात्कार काल्पनिक जीवन के प्रतिकार आशावादिता जकर मूल धारणा आगाँ बढ़क एक अद्भुत प्रेरणा रूपेश कुमार झा त्योंथ खायब की
नहि फुराइए लए कतय नुकाउ संकट मे पड़ल निज जान ओ जी। डार तोडि आब प्राण मंगैयए धय ठोंठ ठिठियाए महगी।
आध पेट खा दिनराति ढ़ेकरै छी भरि लोटा जल पी। सुखा गेल बिनु बतिये चार परक सजमनि लत्ती।
हार कांपय जाइत हाट हमर साधंश नहि लेब तरकारी। महगीक ई विकट धाह ढनढना देलक भोजनक थारी।
लोक करत की अछि कानि रहल मुदा सरकार नचैछ बजा पिपही। परिवार बनल हो जेना पहाड़ टेकब कोना हम बनि टिटही।
चिंतित छी जे कोना जुरत पोथीक टाका सेनूर टिकुली। एहना मे की छोड़ा सकब सोनरा सं हुनक हार हंसुली।
महगी बना देलक अछि हमरा अयोग्य निरीह ओ अपराधी। भेल अवस्था एहन हमर अपने सं अपना कें दुत्कारी।
घर अबिते ताकय हमरा दिस बैसल विवश बेटाबहुधी। लागय जेना ओ पूछि रहल हो खायब की खायब क़ी शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न
!! अहॅक ऑचर (बाल साहित्य) !!
आव विसरव कोना सुनू जननी अहॉ, कतेक निर्मल सेहंतित अहॅक ऑचर । हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन नोर पोछलहुॅ लपेटि हम अहॅक ऑचर ।। कोना अयलहुॅ खलक ? मोन नहि अछि कथा, पवित्र पट सॅ सटल देह भागल व्यथा । सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुॅ मातृबोल, मोह ममताक आन के‘ करत परतर ?
आव.................................................................. ।।
दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सॅ वहल, देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल । जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस, मुॅह मे लऽ चिवयलहुॅ अहॅक ऑचर ।
आव.................................................................. ।।
नेना वयसक अवसान ताक‘ चललहुॅ हम ज्ञान, कएलहुॅ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान । सिलेट वाट पर पटकि मॉक कोर मे सटकि, तीतल कमलाक धार सॅ अहॅक ऑचर ।
आव.................................................................. ।।
देखि पॉचमक फल मातृदीक्षा सफल, भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल । गेलहुॅ कत‘ हे अम्बे कत‘ गेल ऑचर, ताकि रहलहुॅ हम ऑगन सॅ पिपरक तर ।
आव.................................................................. ।। गजेन्द्र ठाकुर गीत-प्रबन्ध- नाराशंसी १ कोड़वाह ठाढ़ टिक्करक नीचाँमे हलमहल कऽ कूटि माटि सिलोहक बनल मुरुत ई मनुक्ख छोलगढ़ियाक गुलाबीपाक एहि बेर नहि जानि किएक रहल कचकुआह आ बीतल कएक दिन, छठिहारी छठम दिन कविक कविताक छन्दक रससँ उगडुम करैत आ डराएल विश्वदेव जे पद्यक रस जे झझाएत तँ पसरि जाएत सगर विश्वमे गायत्री नाराशंसीक संग से ओ कविक कविताकेँ छन्दक रसमे राखि दैत छथि बलि दऽ दैत छथि कविक कविताक छन्दक रसक बलि आ गबैत छथि नाराशंसी। आ आकांक्षाक अग्नि पृथ्वीसँ द्युलोक दिस जाइत माता पृथ्वीक हृदएक आगि द्यौ पिताश्री पृथ्वीक पुत्र वा भाए आलोकदीप्त ई नीलवर्णक आकास अरणिमन्थनसँ प्रकाशित ई पृथ्वी २ कर्कश बजरी सूगाक स्वर ओतए धारक पलार लग आ दूटा धारक हहाइत मोनियारक भँसिआएल खेबाह कहुना निकलि गेल मुदा आगाँ बढ़िते जक, बढ़ब आकि धँसब झाँखीक झझिया करत सुरक्षित हमर गाम दाह-बोह आएल, किएक ई एकार्णवा, दह, जलामय, कनबहकेँ झाँपि खेधा-पौटी नाहक माङीपर बैसि खसबैत बसेर जाल आ हम दोसर माङीपर बैसि खेबैत छी ओहि जालकेँ, दिशा निर्दिष्ट भऽ कन्हेर करैत जालक चारूकात ठकठकिया करैत अनैत माँछकेँ जाल दिस टुस्सा, सारिलबला काठक तँ गाछी विलुप्त बबुरबन्ना बनल ओहि पारक खेत, कमलाक रेत बदहा पहिरने लोक, आ ई गाछ बृच्छ ठाढ़ मुदा हरियरी, जेना दुःखी पीड़ित टुस्साक निकलब, जेना आगमन कोनो अभागक चारू कात पसरल कमलाक रेत, आ ताहि बीच टुस्सा निकलब मुदा संकेत प्रायः कोनो आसक। आ तखने ध्वनि मधुर स्वर बला करार सूगाक कंठ लग लाल दागी बला अमृत भेला सूगाक स्वर अबैत बनि नाराशंसी। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा २२म खेप जखन-जखन पृथ्वी पर पसरैये अनर्थ-अन्यायक वातावरण, लोक प्राणिमात्र होअ लगैत अछि--अपमानित प्रताड़ित आ अपमृत! सबजन हाहाकार मे तिरोहित भ' जाइत अछि स'भ नैसर्गिक मृदु- मधुर वाणी,स्वर ,शब्द, भाषा तथा अंग भंग होअ' लागि जाइत अछि जीवन-छन्दक, प्रकाश इजोत आगि दितहुँ बनि जाइत अछि-क्रान्तिहीन व्यर्थ क्रिया आ अन्हार भ' जाइत अछि काल प्रमुख मुखिया, जनजीवनक बसात बनि जाइत अछि दास, मात्र किछु आ किछुए सत्ताक खास बाट सबजनियाँ बनि जाइत अछि सदाक बास्ते राजा कंसक कारागार, कारागार स्वयं बिन सेवा-सुश्रूषा, औषद-परिचर्याक प्राण लैत रोगीक अस्पताल, डाक्टर-वैद्य चलि जाइत अछि अपन कोनो सुभीता-सुरक्षाक पाछाँ दौड़ि क' नुकाय, लागि जाइछ करबा मे अपनहि प्राण रक्षाक उपाय.. .रोगी समुदाय-कष्टक गगन भेदी आर्त्तनाद पर्यन्त जखन अन्हर-बिहाड़ि मे उड़ैत धूरा् जकाँ अकारथ प्रभावहीन बनि जाइत अछि, दुर्घटना ग्रस्त माए-बाप जकाँ लोक कें अपन सकल स'र सम्बन्धी आप्त समाज क्यो नहि पूछैत छैक, एत' धरि जे-' पीयब ज'ल? कंठ सुखाइत हएत कैलौंहें बड़ी काल पीड़ा सहबा लेल चीत्कार...' नहि पूछ' औतैक कोय, नहि देखतैक आबि ओकर हालति, ओकर बाँचल खुचल देह-स्वास्थ्य| सौंसे स सौंसे होअ' लगतैक-टूट फूट, बाँचि ने जएतैक किछुओक कथूक मूल स्वरूप मनुक्ख सँ ल' क' वनस्पति पर्यन्त, आम भ' जेतैक नीमक गाछ, नीम बेल, बेल आक-धथूर आ आक धथूर भ' जयतैक-तिटपर्री, तिटपर्री स्वयं बनि जयतै सिक्कठिक बन-झाँखुर, बैर जामुन-लताम भ' जयतै झरकल दूभि, साबे-खड़ही,कमल पुरइन भ' जयतै करमी लत्ती सेमार, माछ सर्प, सर्प चुट्टी चुट्टी बताह हाथीक समूह, हाथी अपनो सँ पैघ दैत्याकारक नव बाघ-सिंहक बिकराल पतियानी... मयूर भ' जायत विलुप्त, आश्चर्य की ? कनैत-कनैत कोइली कौआ| कौआ उड़ैत-उड़ैत अहर्निश सुनइत अपनहि काँव-काँव क' बनि जायत टर्र टर्र करैत व्यर्थक अप्रिय स्वर। सूगा-मैना-बगड़ा कचबचिया- नीलकंठ नहि रहत अपन अपन स्वरूप भ' जाइ जायत गिद्ध-चिल्हो। बगुलो होइत तँ रच्छ, नहि भ' जायत कए प्रजातिक सुन्दर रूपाकृति मे-बाज ! किछु आओर हिंसक अपन चांगुर कएने-तीख आँखि के केने आओर खुंखार। पड़बा भ' जायत धरगर चक्कूक बर्छी वला चाँगुर महाकाल। मनुक्खक यैह राक्षसी रूपान्तरण आ सृष्टिक अधिकांश तत्व, पदार्थ प्राणिक विरुद्ध अस्वाभाविक अवतारणा- जीवन विरुद्ध कार्यकलापक मचि जायत त्राहि-त्राहि। सबटा बनि जाय लागत सहज स्वाभाविक। परिस्थितिक दासता मे मनुखक दबल कंठ अपन बौक होयबाक नियति के स्वीकारि लैत| आम-नीम भ' क' सिहकैत रहत आ मयूर-बाज बनि नोचैत रहत निरीह पड़बा सबकें चिबबैत रहत सपरिवार । नीलकंठ अपने नुकाएल फिरताह गाछ बृक्षक दोगे दोग। कतहु नहि भेटतनि सुरक्षा आ आश्रय। सब किछु भ' जाय लागत अपन-अपन अर्थ संकोच आ व्यवहार मे स्वाहा, समाप्त ।आ एहि प्रक्रिया मे आरंभ रहत कलियुगी पल-क्षण अति गतिक प्रवाह मे नव अपसृष्टिक होइत जाएत सत्ता-प्रतिष्ठा आओर तदनुरूप सम्राज्य.. ई सबटा प्रक्रिया समान्तर सृष्टिक ई समस्त गरल-प्रवाह मे जे झरकत, भ' जायत खकसियाह से मूलतः मनुखेक मन-प्राण। देह तँ बाद मे हएत मृतक स्वयं शिव सेहो गरल तं मने प्राण सँ कएलनि पान ! कोनो कि हुनकर देह ? भने भ' गेलनि गाढ़ नील वर्ण । घटित तं होइत छैक सबटा मने प्राण पर ने। एतहि होइत छैक विस्फोट, एतहि बजैत छैक-बाँसुरी।आ एतहि फुलाइत छैक कमल, कुहुकैत छैक कोइली, एतहि जन्मैत छैक विचार, एतहि सँ बनब प्रारम्भ होइत छैक-संसार। मोन प्राणक जेहन जाति गोत्र तेहने तं संसारक निर्माण आ स्वरूप| मनुखक मोनप्राण तं रचय मनुक्खेक संसार| से मन प्राण से सौंस मनुक्ख कें डाहि क' कएल जाइत मानव विहीन भूमिक भ' जाय लगैत छैक सर्वनाश- उपस्थित रहैत छैक सम्मुख संसारक महाकाल,तं सबटा भ' जाइत छैक अस्थिर, आतंकित आ असुरक्षा सँ बेहाल। मात्र आर्तश्वरें चिकरब, चतुर्दिक आर्तनाद भरि सृष्टि पूर्वाभ्यास परिपक्व कलाकार जकाँ जेना एकहि बेर कर' लगैत अछि अपन-अपन इष्ट अपेक्षित आ अपना देवताक पुकार| एक संग तँ तकरहि ब्रह्माण्ड भरिक एकत्र एक बेरक एहि वाणी-स्वरक ध्वनि प्रतिध्वनि सँ फूटि जाइत अछि टुकड़ी-टुकड़ी आकाश आ छिरिया जाइत अछि टूटि क' भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँ एहि कालक साक्षात्कार प्रायः मनुष्य- जीवन-यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम ! से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि राधेहिक देह-प्राण- चित्त ? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?' जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !... श्यामल सुमन कहू कि फूसि बजय छी? गप्पे टा हम नीक करय छी सबटा उनटा काज। एहि कारण सँ टूटि रहल अछि मैथिल सकल समाज। कहू कि फूसि बजय छी? टाका देलहूँ बेटी देलहुँ केलहुँ कन्यादान। ओहि टाका सँ फुटल फटाका मन मे भरल गुमान। दाता बनल भिखारी देखियौ केहेन बनल अछि रीत, कोना अयाची के बेटा सब माँगि देखाबथि शान। कहू कि फूसि बजय छी? माछ मांस केर मैथिल प्रेमी मचल जगत मे शोर। सम्हरि सम्हरि केँ घर मे खेता सानि सानिकय झोर। बरियाती मे झोर किनारा काली मांसक बुट्टी, मिथिला केर व्यवहार कोना कय बनल एहेन कमजोर। कहू कि फूसि बजय छी? नहि सम्हरब तऽ सच मानू जे भेटत कष्ट अथाह। जाति-पाति केँ छोड़िकय बेटी करती कतहु बियाह। तखन सुमन केर गोत्र मूल सब करब कोना पहचान, बचा सकी तऽ बचाऊ मिथिला बनिकय अपन गवाह। कहू कि फूसि बजय छी १ .-राजदेव मंडल-मिझाइत दीया २.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत३.मनोज कुमार मंडल-फैशनक धमाल १ राजदेव मंडल मिझाइत दीया भुक-भुकाइत दीपक सम्पूर्ण शक्तिसँ संघर्षरत पराभूत करबा लेल सघनतमकेँ लगा रहल देहक बाती जीनगीक तेल िकन्तु, अथक प्रयास भऽ रहल फेल एक रत्तीक बाती दूइ बून तेल कतेक कऽ सकत खेल भऽ रहल अवसानक इजोत पड़ि गेल जेना अन्हारकेँ नोत फेर फक्क दऽ मुझा गेल अन्तिम सन्देश सुझा गेल प्रभुत्व सम्पन्न पओलक राज घुप्प अन्हार पहिरिलक ताज चोर उचक्काक अत्याचार नहि रोिक सकताह अन्हार सरकार हे प्रकाश, जुनि खसाउ नोर आिब रहल अछि नूतन भोर। २. जगदीश प्रसाद मंडल गीत चलु उचितपुर देस, यौ-भैया चलु.... नहि अछि भेदभाव ओतए िकछु, नहि अछि चोर-बइमान। नहि अछि छोट-पैघक अंतर, सबहक एक्के बेस, यौ भैया..... सबहक चालि-ढालि एक्के अछि, सबहक मान-सम्मान। आिग-पानिक भेद कोनो नहि, सबहक एक्के देस। यौ भैया..... पढ़ै-लिखैक एक्के रस्ता अछि, सबहक एक्के उदेस। जिनगीक तँ एक्के विचार अछि नहि अछि देस-िबदेस। यौ भैया....... माए-बहिनि सबहक एक्के थिक, बाल-बच्चा सभ एक। एक्के खहिस सभकेँ होइ छै नहि कम नहि िबसेस। यौ भैया.... ३ मनोज कुमार मंडल फैशनक धमाल बाबू सैदख कहैत छलाह पहिने बड़ तखलीफ रहैत छल जाड़ कप्प-कप्पबैत रहैत छल, दॉंत कटकटैत रहैत छल हमर कहब तू नहि पतिएबए, एक्केटा धोती पहिरव-ओढ़व छल। हमरा सुनवामे निमन्न लगैत छल, ओना आब ओ कष्ट नहि छल, दिल्ली-बम्बइक बाट खुजल, सबहक हाथ पाइसँ भरल। गरीबी तँ एखनो अछि। िकन्तु आब ओ तखलीफ नहि रहल। जाधरि बाबू सबल कपड़ा लौलन्हि, इंचो तन उधार नहि रहए। एकर सतत ध्यान रखलैन। हरदम कहैत छलाह जँ तोरा सबहक तन उधार रहतह लोक हमरा की कहत? बाबू बाटपर हम चलि, ई हुनकर सम्मान छल। फैशनक आब दौड़ चलल, िबनु पाइबलाकेँ तन झॉंपल छल। दीनताक कारण उधारो छल। पाइ बलाक आव नहि पूछ, देहपर कपड़ा छटल छल, सगर देह उघारे छल। हम अचम्भामे पड़लौं, बाबूक कथा आब पाछू भेल, फेशनक धमाल रंग चढ़ेलक तनपर कपड़ा खाली भेल बुचकट शष्दक शोभा बढ़ि गेल, कहु बाबूक उक्ति याद राखब? बालानां कृते- जगदीश प्रसाद मंडल किछु प्रेरक कथा 91 सत्य (विद्या) विद्याध्ययन साधना छी। जहि स अन्तः क्षेत्र शुद्ध आ पुरुषार्थक जन्म होइत। जकरा संपादित केने बिना मानव जीवनक सब उपलब्धि व्यर्थ। जिनगी भरि भरद्वाज मुनि तपस्या करैत रहलाह। जखन मरैक बेरि एलनि त देबदूत लेमए एलनि। देवदूत कऽ भारद्वाज मुनि कहलखिन- हमरा अही लोक मे फेरि जनमै देल जाउ। स्वर्ग जा कऽ की करब? मुनिक बात सुनि आश्चर्जित होइत देवदूत पूछलकनि- तपक लक्ष्य त स्वर्ग प्राप्त करब होइत अछि जे अहाँ कऽ भेटिये रहल अछि तखन? भारद्वाज कहलखिन- ज्ञान संचय आ पूर्ण सत्य तक पहुँचैक लेल। अखन हमर ज्ञान संपदा बहुत कम अछि। तेँ ओते जन्म धरि तपस्या करै चाहै छी जाधरि सत्य कऽ लग स नहि देखि सकियै। स्वर्ग स ज्ञान बहुत पैघ होइत अछि। स्वर्ग स सुविधा भेटैत जबकि ज्ञान स आनंद। 92 समता गुरुकुल मे जे विद्याध्ययन होइत ओ अमृत सदृष्य होइत। किऐक त ओ साधनाक नहि उच्च स्तरीय आदर्शक निर्माण करैत। एहि हेतु गुरुकुलक छात्र उपभोग कऽ नहि उपयोगक महत्व सत्-प्रयोजनक लेल अपन अगिला (भावी) दिशाधारा कऽ निर्धारित करैत अछि। एक दिन सम्पन्न घर स आयल छात्र गुरुकुल संचालक आत्रेय स पूछल- भगवन! जे कियो अपना घर स नीक भोजन आ नीक वस्त्र मंगा सकै छथि ओ ओकर उपयोग किअए ने कऽ सकै छथि? ओहो किअए निर्धने परिवारक छात्र जेँका जीवन-यापन करथि? गंभीर मुद्रा मे आत्रेय कहलखिन- छात्रो श्रेष्ठ (उत्तम) मनुष्य जहि समाज मे रहैत छथि ओ ओहि समाजक अनुकूल जीवन-यापन करैत छथि। अइह (यैह) समता अपनो आ दोसरोक लेल सौजन्य उत्पन्न करैत अछि। सम्पन्नता प्रदर्शन ईष्र्या आ अहंकार कऽ उत्पन्न करैत अछि। जहि स विग्रहक जन्म होइत अछि। जे सहयोगक नींव कऽ डोला दइत अछि। विषमते स समाज मे कतेको (अनेको) विग्रह ठाढ़ होइत अछि। अपराध बढ़ैत अछि जहि स अनाचारक जन्म सेहो होइत अछि। एहिठाम (गुरुकुल) समान जीवन जीवैक रास्ता सिखाओल जाइत अछि। धनिक अपन धन गरीब कऽ उठबै मे लगावह। नइ कि निजी सुविधा-संवद्धन मे। समताक दूरगामी सत्-परिणाम कऽ छात्र बुझि अधिक उपयोगक विचार कऽ बदलि लिअए। 93 जते चोट तते सक्कत कोशाम्बीक राजा शूरसेन स मंत्री भद्रक पुछलकनि- राजन् अपने श्रीमंत थिक। राकुमारक शिक्षाक लेल एक सय एक विद्वावन् रखि सकै छियै। तहन अपने एहि पुष्प सन बच्चा कऽ बन्य प्रदेश मे बनल गुरुकुल मे किऐक पठबैत छिअनि? जहि ठाम सुबिधाक घोर अभाव छैक। ऐहन कष्टमय जीबनचार्या मे बच्चा कऽ पठाएव उचित नहि? मंत्रीक विचार सुनि मुस्कुराइत शूरसेन उत्तर देलखिन- हे भद्रक जहिना आगि मे तपौला स सोना चमकैत तहिना कष्टपूर्ण जीवन चर्या स मनुष्य बनैत अछि। कष्टे मनुष्य कऽ धैर्य साहस आ अनुभव दैत अछि। वातावरणक प्रभाव सबसँ बेसी नव उमेरक बच्चे पर अधिक पडै़त अछि। ऋृषि सम्पर्क आ कष्टमय जिनगी राजमहल मे थोड़े भेटि सकैत अछि। ऐठाम त हम ओकरा भोगिये-बिलासी बना सकै छी। जँ क्षणिक मोह मे पड़ब त ओकर भविष्ये चैपट्ट भऽ जेतइ। तेँ ओकर उज्जवल भविष्यक लेल गुरुकुल पठाएव उचित अछि। 94 परिष्कार गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति सब वर्ण आ सब समुदायक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैत्रिके व्यवशाय करैक होइन तिनको पैघ उपलब्धिक लेल संस्कारक शिक्षा देब अत्यन्त जरुरी अछि। एक गाम मे क्षत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे यैह जे हम योद्धा बनब त हम वणिक। अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएव। मुदा जखन कने असथिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे खुट-खुटी उठल। मने-मन सोचलक जे से नहि त कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलक। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन- ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्विमद्याक प्रयोजन गुण कर्म स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि। प्राचिनकाल मे गुरुकुल मे कठिन स कठिन कार्यक भर छात्र केँ दइत जायत छल। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास छल। कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू (क्षत्रिय और वैश्य) अपन-अपन बालक कऽ गुरुकुल भेजब शुरु केलक। गुरुकुल स अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ बिनु अध्ययन केलहा स अधिक सफल भेल। 95 कथनी नहि करनी एकटा लोहार वाण (तीर) बनबैक विद्या मे निपुन छल। वाणो अद्भुत बनवैत छल। वाण बनबैक कला कऽ सीखैक लेल दोसर लोहार अबि पुछलक- भाइ! तों कोना वाण बनबै छह। से हमरो कहह। पहिल लोहार जबाब देलक- भाइ! कहले टा स सब लूड़ि नै होइ छै। तेँ हम वाण बनवै छी तू ध्यान स देखह। सुनि दोसर लोहार लग मे बैसि देखै लगल। तहि काल एकटा बरिआती बगलक रस्ता स गुजरै लगल। बरिआतियो खूब झमटगर। दर्जनो गाड़ी रंग-बिरंगक बजो सजाबटो सुन्दर। दोसर लोहार बाण बनौनाइ देखब छोड़ि बरिआती देखै लगल। जखन बरिआती आखिक अढ़ भऽ गेल तखन ओ लोहार बाजल- बड़ सुन्दर बरिआती छलै। वाण बनबैवला लोहार कहलक- भाइ ने तखन देखैक फुरसत छल आ ने अखन तोहर बात सुनैक अछि। जाधरि कोनो काज कऽ तत्परता स नहि कयल जायत ताधरि काजक सफलताक कोन आशा। तेँ जे काज तत्परता आ एकाग्रता स कयल जायत ओइह काज सफल होएत। अफसोस करैत दोसर लोहार सोचै लगल जे एकाग्रताक अभ्यास करब सबसँ जरुरी अछि। जँ से नहि करब त जीवन मे कहियो कोनो काज मे सफल नहि होएब। ज्ञानक सूत्र कतौ स भेटए ओकर जरुर अंगीकार करक चाही। 96 शालीनता विद्या व्यक्ति कऽ विनम्र बनबैत। ओकर अन्तरंगक स्तर कऽ उपर उठबैत। शिक्षा कतौ भेटि सकैत अछि मुदा विद्याक सूत्र कतौ-कतौ भेटैत अछि। जहि व्यक्ति कऽ विद्याक सूत्र भेटि जाइत ओहि व्यक्तिक काया-कल्प भऽ जायत। छान्दोग्य उपनिषदक छठम प्रपाठ मे उद्दालक आ श्वेतकेतुक संवाद अछि। विद्यालयक परीक्षा पास कऽ श्वेतकेतु आयल। मुदा ने ओकर आत्म परिष्कृत भेल आ ने उदंडता कमल। जहि स पिता (उद्दालक) केँ दुख भेलनि। खिसिया कऽ कहलखिन- अगर व्यक्तित्व मे शालीनताक समावेश नहि भेलि त अनेरे कियो किऐक पढ़ै मे समय नष्ट करत? महसूस करैत श्वेतकेतु कहलकनि- अगर इ रहस्य जँ हमर शिक्षक जनितथि त जिनगी भरि शिक्षके किऐक रहितथि वा तऽ ऋृषि बनितथि वा द्रष्टा। श्वेतकेतुक विचार सुनि पिता मने-मन सोचै लगलथि जे पुत्रक प्रति पितोक दायित्व होइत। एकटा गुलरीक फड़ आनि उद्दालक फोड़लनि। गुलरीक तर (भीतर) मे छोट-छोट अनेको बीआ छलैक। ओहि बीआ कऽ देखबैत कहलखिन- एहि नान्हि-नान्हि टा वीआक भीतर विशाल वृक्ष छिपल अछि। तहिना जेकरा आत्म-ज्ञान भऽ जाइत छैक ओ वृक्षे सदृश्य विकासो करैत आ फड़बो-फुलेबो करैत। तोहूँ ओहि तत्व कऽ चिन्हह। 97 मजूरी एक दिन गाड़ीक प्रतीक्षा मे लियो टाल्सटाय स्टेशन पर ठाढ़ रहथि। एकटा अमीर परिवारक महिला साधारण आदमी बुझि हुनका कहलकनि- हमर पति सामनेवला होटल मे छथि। अहाँ जा क हुनका ई चिट्ठी द अबिअनु। एहि काजक लेल दू आना पाइ देब। चिट्ठी नेने टाल्सटाय होटल जा दऽ देलखिन। घुरि क आबि अपन कमेलहा दू आना पाइयो ल लेलनि। कने कालक बाद एकटा अमीर आदमी आबि प्रणाम कऽ टाल्सटाय स गप-सप करै लगल। ओ आदमी हुनका स नम्रतापूर्वक गप्प करैत। गप-सपक क्रम मे ओ आदमी टाल्सटाय कऽ आदरसूचक शब्द काउंट स सम्बोधित करति। बगल मे बैसलि ओ महिला सब कुछ देखैत-सुनैत। ओ महिला एक गोटे क पूछलक- ई के छथि? ओ आदमी लियो टाल्सटायक नाम कहलखिन। टाल्सटाईक नाम सुनि ओ महिला टाल्सटाय लग आबि क्षमा मांगि अपन दुनू आना पाइ घुमा दइ ले कहलकनि। हँसैत टाल्सटाय उत्तर देल- बहिन जी! ई हमर मजूरीक पाइ छी। एकरा हम किन्नहु नहि घुमाएव। 98 जीवन यात्रा गंगोत्री स गंगाजल धरती स बाहर निकलि चलि पड़ल। पहाड़ स नीचा आरो निच्चा होइत मैदान मे पहुँचल। एक गोटे एहि प्रक्रिया कऽ गंभीरता सऽ देखि रहल छल। आगू मुहे जल बढ़ैत गेल बढ़ैत गेल। जहि मे अनेको जल-नद आबि-बाबि मिलैत गेल। जहि स एक विशाल नदी बनि गेल। ओ नदी जाइत-जाइत समुद्र मे मिलि गेल। जे व्यक्ति देखि रहल छल। ओहि व्यक्तिक मन मे भेल जे जलक इ मुरुखपना छी। किऐक त जे हिमालयक उच्च शिखर छोड़ि अनेक प्रकारक दुख उठा नोनगर पानि मे मिलल। एकरा मुरुखपना नै कहबै त की कहबै? ओहि व्यक्तिक मनः स्थिति कऽ नदी बुझिगेल। कहलक- अहाँ हमर यात्राक मर्म नहि बुझि सकलहुँ। कतबो ऊँच हिमालय किअए ने हुअए मुदा ओ अपूर्ण अछि। पूर्णता त गहराई मे होइत छैक जहि ठाम पहुँचला पर मनक सब कामना समाप्त भऽ जाइत छैक। हम हिमालय सन महान ऊँचाइक आत्मा छी जे पूर्णता पबैक लेल निरन्तर चलैत समुद्रक गहराइ मे पहुँचलहुँ। तेँ हमरा बेहद खुशी अछि जे अप्पन लक्ष्य धरि पहुँच गेलहुँ। 99 ज्योति (प्रकाश) जनक आओर याज्ञवल्क्यक बीच ज्ञानक चरचा चलैत छल। जनक पुछलखिन- सुर्यास्त भेला पर (सुर्य डुबला पर) अन्हारक सघन बन मे रास्ता कोना ढ़ूढ़ल जाय? जनकक प्रश्न सुनि मुस्कुराइत याज्ञवल्क्य उत्तर देलखिन- तरेगण रास्ता बता सकैत। याज्ञवल्क्यक उत्तर स असन्तुष्ठ होइत जनक पुछलखिन- अगर मेघौन होय? संगे दीपकक प्रकाश सेहो नहि उपलब्धि होय तखन? जनकक प्रश्नक गंभीरता कऽ बुझैत याज्ञवल्क्य कहलखिन- अपना सुझि-बुझिक सहारा लेबाक चाही। विवेकक प्रकाश हर मनुष्य मे होइत। जे कहियो नहि बुझाइत। हे राजन ओहि सुतल विवेक कऽ जगाइबे (जगायब) ऋृषि समुदायिक पवित्र कर्तव्य छी। 100 पवनक विवेक चन्द्रमा केँ दू सन्तान-एक बेटा आ एक बेटी। बेटाक नाओ पवन आ बेटी आँधी (अन्हर)। एक दिन बेटीक (आँधीक) मन मे उपकल जे पिता सांसरिक पिता जेँका हमरो दुनू भाइ-बहीनि मे भेदि करैत छथि। आँधीक व्यथा कऽ चन्द्रमा बुझि गेलखिन। बेटीक आत्मनिरीक्षणक लेल चन्द्रमा एकटा अवसर देवाक विचार केलनि। दुनू भाइ-बहीनि क बजा कहलखिन- बाउ अहाँ सभ स्वर्गक इन्द्रक काननक परिजात नामक देववृक्ष केँ देखने छी? दुनू भाइ-बहीनि- हँ। पिता- अहाँ दुनू ओतए जाउ आ सात खेपि ओकर परिक्रमा कऽ कऽ आउ। पिताक आज्ञा मानि दुनू गोटे चलि देलक। आँधी हू-हू-आ कऽ दौड़ल। जहि स गरदा (धूल) खढ़-पात आ कूड़ा-कड़ कट उड़बैत लगले पहुँच सात बेरि परिक्रमा क चोट्टे घुरि क आबि गेल। मने-मन आँधी सोचैत जे हम्मर काज देखि पिता प्रशंसा करताह। पवन पाछु घुरि कऽ आयल। ओकरा संग सौंधी-सुगंध सेहो आयल। जहि स सौंसे घर गमकि उठल। मुस्कुराइत चन्द्रमा बेटी कऽ कहलखिन- बेटी अहाँ नीक जेँका बुझि गेल हेबइ जे जे अधिक तेज गति स चलत (दौड़िकेऽ) ओ खाली झोरा लऽ कऽ आओत मुदा जे स्वाभाविक गति स चलत ओ मन कऽ मुग्ध करै वला सुगंध सेहो लाओत। जहि स सौंसे वातावरण सुगंधित होएत। वानप्रस्थक यात्रा पवन देवक सदृश्य उद्देश्यपूर्ण होइत। 101 आत्मबल जहि समय डाॅक्टर राधाकृष्णन कओलेज मे पढ़ति रहथि घटना ओहि समयक छी। काॅलेज मे पादरी शिक्षक (प्रोफेसर) अधिक। एक दिन एकटा प्रोफेसर क्लासे मे हिन्दू धर्मक निन्दा खुलायाम केलनि। बालक राधाकृष्णन सेहो क्लास मे रहथि। प्रोफेसरक बात स हुनका एते क्रोध भेलनि जे सम्हारि नहि सकलाह। उठि कऽ ठाढ़ होइत पुछलखिन- महाशय की ईसाई धर्म आन धर्मक निन्दा केनाइ सिखबैत अछि? राधाकृष्णन प्रश्न सुनि ओ तमसा कऽ बाजल- आओर की हिन्दुधर्म दोसराक प्रशंसा करैत अछि? राधाकृष्णन जबाव देलखिन- हँ हम्मर धर्म ककरो (कोनो धर्मक) अधलाह नहि करैत अछि। गीता मे कृष्ण कहने छथिन कोनो देवता कऽ उपासना कयला स हमरे उपासना होइत अछि। आब अहीं कहू जे हम्मर धर्म ककर निन्दा करैत अछि। प्रोफेसर निरुत्तर भऽ गेल। 102 खुदीराम बोस स्वतंत्रता संग्रामक प्रखर सिपाही खुदीराम बोस केँ मुजफ्फरपुर जेल मे फाँसी भेलनि। जहि समय फाँसी भेलि रहनि ओहि समय खुदीरामक उम्र (वयस) मात्र अट्ठारह बर्ख आठ मासक छलनि। ओना हुनकर जन्म बंगाल मे भेलि छलनि मुदा ओ अपना कऽ भारत माताक बेटा बुझैत छलाह। हुनका पर अंग्रेज किंग फोर्डक हत्याक आरोप लगौल (लगाओल) गेल छलनि। ओ जेहने कर्मठ तेहने हँसमुख छलाह। फाँसी स किछु समय पूर्व (पहिने) जेलर उदार पूर्वक आम आनि खाइ ले दैत (दइत) कहलकनि- चुपचाप खा लिअ। कियो बुझए नहि। खुदीराम आम रखि लेलनि। साँझू पहर जखन दोहरा क जेलर आबि पुछलकनि तऽ ओ जबाव देलखिन- जखन आइ फाँसिये होइवला अछि त डर स किछु खाइ-पीबैक मन नै होइ अए। अहाँक आम ओहिना कोन मे राखल अछि। आमक गुद्दा खा कऽ बोस खोंइचा (छिलका) मे मुह स हवा भरि ओहिना रखि देने। कोन मे पहुँच जखन जेलर आम उठौलक त पचकि गेलइ। जहि पर जेलर भभा कऽ हँसल। जेलरक हँसी देखि खुदीरामो खूब जोर स ठहाका मारि हँसल। मृत्युक एक्को पाइ डर हुनका नहि छलनि। खुदीरामक फाँसीक चरचा लोकमान्य तिलक अपन पत्रिका केशरी मे देशक दुर्भाग्य शीर्षक नाम स लेख लिखलनि। जहि पर हुनका (तिलक) छह मासक कारावास भेलनि। 103 गुरुकुल की? गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति सब वर्ण आ सब समुदाइक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैतृक व्यवसाय दिशि बढ़ेवाक होइन तिनको लेल पैघ उपलब्धिक (श्रेष्ठ) लेल संस्कारक शिक्षण देव अत्यन्त अनिवार्य अछि। एकटा गाम मे क्षत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे जे हम योद्धा बनब त हम वणिक अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएब। मुदा जखन कने स्थिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे कने खुट-खुटी एलै। सोचलक जे कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलकनि। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन- ब्रहमविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीखे मांगव नहि होइत छैक। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्ति द्वारा ग्रहण कयल जाइत छैक। ब्रह्मविद्याक प्रयोजन-गुण कर्म स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि। क्षत्रिय आ बैश्य जँ ओहि विद्या केँ ग्रहण करत त अपन-अपन जिनगीक कार्यक्षेत्र मे अधिक सफल आ सुन्दर ढ़ंग स सम्पादन करत। प्राचीनकाल मे गुरुकुल मे कठिन काज स छात्र केँ टकरायल जाइत छलै। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास बनि जाइत छलैक। कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू अपन-अपन बालक कऽ गुरुकुल भेजब शुरु केलक। गुरुकुल स पढ़ि अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ बिनु पढ़लक अपेक्षा अधिक सफल भेल। यैह कारण छल जे प्राचीनकाल मे समाजक सब समुदायक व्यक्ति अपना बच्चा कऽ गुरुकुल मे पढ़बैत छल। 104 शिष्य कऽ शिक्षे टा नहि परीक्षो। गुरुकुल मे इ अनिवार्य नहि जे नीक (आलीशान) मकानक बन्द कोठरिये टा मे शिक्षा देल जाय। अनिवार्य इ जे छात्रक मनः स्थितिक अनुरुप प्रकृतिक पाठशाला मे व्यवहारिक शिक्षा भेटइ। जहि स व्यक्तित्व मे प्रखरताक समावेश संवर्धन भऽ सकए। महर्षि जरत्कारुक गुरुकुल मे छात्र विद्रुध प्रवेश पौलक (पाऔलक)। किछुए दिनक उपरान्त विद्रुधक प्रतिभा स गुरु जरत्कारु प्रभावित होइत कहलखिन- बाउ पौरुषक (पुरुषत्वक) परीक्षा मे उतीर्ण भेले पर कियो बरिष्ठ (महान) बनि सकैत अछि। अहाँ पराक्रमक संग-संग पोथियो पढ़ू। महर्षिक परामर्श स सहमत होइत विद्रुध कहलकनि- अपनेक जे आदेश होय तैयार छी। विद्रुध कऽ एक सय गाय प्रभुदारण्य मे चरबैक आदेश दइत कहलखिन- जखन हजार गाय भऽ जाय तखन घुरि कऽ आयब। पोथी सब सेहो लऽ लेलक। सय गाय कऽ हजार गाय बनवै मे विद्रुध कऽ बारह वर्ख लगल। बच्चो सब पुष्ट। किऐक त कोनो बच्चा कऽ दूध पीबै मे कोताही नै करैत। एहि बारह वर्खक बीच विद्रुध अनेको साधक विद्वान सॅ सम्पर्क बना सीखवो केलक आ रास्ताक बाधा स सेहो निपटल। जहि स ओकर प्रतिभा मे आरो चारि चान लगि गेलइ। घुरि कऽ ऐला पर चेहरा स ब्रहमतेज टपकैत। किऐक त अपन बुइधिक प्रयोग स पढ़बो केलक आ बुझवो (सीखवो) केलक। विद्रुधक मेहनक आ साहस देखि जरत्कारु हृदय स आनन्दित होइत अपन आश्रमक भार दऽ नमहर काज करए अपने चलि गेलाह। 105 लौह पुरुष इ घटना उन्नैस सय छियालिसिक छी। बम्बई बंदरगाह मे नौ-सैनिक विद्रोह केलक। अंग्रेज शासक ओकरा (नौ-सैनिक) गोलि स भुजि देवाक धमकी देलक। जेकरा जबाव मे भारतक नौ-सेना माटि मे मिला देब कहलक। स्थिति भयानक बनि गेल। पाछु हटै ले कियो तैयार नहि। ओहि समय सरदार वल्लभ भाइ पटेलक हाथ मे बम्बईक नेतृत्व छलनि। जनिका पर सब टकटकी लगौने। मुदा सरदार पटेलक मन मे एक्को मिसिया घबड़ाहट नहि। बम्बईक गवर्नर बजा कऽ मारे अन्ट-सन्ट कहलकनि। गवर्नरक बात सुनि शेरक बोली सदृश्य गरजि कऽ सरदार पटेल उत्तर देलकनि- ओ (गवर्नर) अपना सरकार स पुइछ लिअ जे अंग्रेज भारत स मित्र जेँका विदा होएत कि लाश बनि। अंगे्रज गवर्नर सरदार पटेलक जबाव स ठर्रा गेल। आखिर कार ओकरा समझौता करए पड़ल। ओइह सरदार पटेल स्वतंत्र भारतक पहिल गृहमंत्री बनलाह। कोनो आदमी मे साहस ओहिना नहि अबैत (बनैत)। पुरुषार्थक बल पर विकसित होइत। 106 जंग लागल एक बेरि भगवान वुद्धक समक्ष श्रेष्ठि पुत्र सुमंत आ श्रमिक पुत्र तरुण संगे प्रब्रज्या लेलक। दुनू गोटे भावनापूर्वक संघारामक अनुशासनक पालन करै लगल। किछु मासक (मासोपरान्त) प्रगतिक जानकारी दइत प्रधान भिक्षु (संघाराम) कहलकनि- तरुणक अपेक्षा सुमंत अघिक स्वस्थ आ पढ़ल-लिखल अछि। भावनो प्रवल छैक। मुदा सौंपल गेल काज आ साधनोक (साधन) उपलब्धि तरुण मे सुमंतक अपेक्षा अधिक अछि। जेकर कारण वुझि मे नइ अबैत अछि। संधारामक विचार सुनि तथागत (बुद्ध) कहलखिन- अखन सुमंत जंग लागल लोहाक औजार सदृश्य अछि। जंग छुटै मे किछु समय लागत। तथागतक बात संघाराम नीक-नाहाँति नहि बुझि सकल। तेँ प्रश्न वाचक नजरि स नजरि मिला बकर-बकर मुह दिशि तकैत रहलनि। स्पष्ट करैत बुद्ध कहलखिन- ओकर (सुमंतक नमहर) अधिक समय आलस्य आ प्रमाद मे बीतल अछि। जहि स व्यक्तित्व जंग लागल औजार सदृश्य भऽ गेल अछि। जबकि तरुण ऐहन उपकरण अछि जकरा मे जंग छूबो ने केलक अछि। तेँ लगले फल पाबि रहल अछि। सुमंतक जंग छोड़बै मे पर्याप्त समय आ साधना लागत। तखन जा कऽ अभीष्ट फल निकलत। 107 जीवकक परीक्षा आदर्श शिक्षक सिर्फ अध्ययने नहि छात्र कऽ ओहि विद्या मे ऐहन पारंगत बना दइत जहि स ओ स्वर्ण (सोन) बनि चमकि उठैत। तक्षशिला विश्वविद्यालय मे सात वर्ख आयुर्वेदक शिक्षा पाबि आचार्य वृहस्पति जीवकक परीक्षा लऽ कऽ विदा करैक समय निकाललनि। समय निकालि गुरु (वृहस्पति) जीवक कऽ हाथ मे खुरपी दइत कहलखिन- एक योजनक बीच एकटा ऐहन पौघा (बनस्पतिक) उपाड़ि (उखाड़ि) कऽ नेने आउ जेकर औषधि नहि बनैत होय। खुरपी लऽ जीवक विदा भेल। मास दिन घुमैत रहल मुदा एक्को टा ऐहन गाछ नहि भेटिलइ (भेटिलै) जेकर औषधि नहि बनैत होय। मास दिनक उपरान्त जीवक घुमि कऽ आबि कहलकनि- गुरुदेव! हमरा एक्कोटा ऐहेन गाछ नहि भेटल जेकर औषधि नहि बनैत होय। जीवक केँ गरदनि लगबैत वृहस्पति कहलखिन- वत्स! अहाँ सफल भेलहुँ। आब अहाँ जाउ आयुर्वेदक प्रचार करु। 108 तप (साधना) श्रमे (मेहनत) ओ देवता छी जे सब सिद्धिक स्वामी छी। आयुष्य कऽ पूर्वाद्धे (पुवार्धे) मे एकर सम्पादनक लेल विधाता मनुष्य केँ शक्ति सम्पन्न बना दइत छथिन। जखने एकर (श्रमक) उपेक्षा होइत तखने समाज अव्यवस्थित हुअए लगैत। राजा विड़ाल मुनि वैवस्वत कऽ प्रणाम कऽ चुपचाप बैसि गेलाह। सूक्ष्मदर्शी गुरु (वैवस्वत) बुझि गेलखिन जे कोनो गंभीर चिन्ता मे विड़ाल पड़़ल छथि। पुछलखिन- विड़ाल आइ अहाँ अशान्त जेँका बुझि पड़ै छी। कथीक चिन्ता अछि से हमरो कहू? अपन अन्तर्वेदना कऽ प्रगट करैत विड़ाल कहलखिन- देव नहि जानि किऐक प्रजाजन अशान्त छथि। सब कियो धर्म आ शान्ति स विमुख भेल जा रहल छथि। जहि स धन-धान्यक अभाव आ प्रेम-भाव टुटि रहल अछि। अपराध वृत्ति बढ़ि रहल अछि। विड़ालक विचार ध्यान स सुनि वैवस्वत कहलखिन- जहि देश मे लोक मेहनत स जी (देह) चोराओत श्रम कऽ सम्मान जनक स्थान नहि देत ओहि ठाम कोना समृद्धि भऽ सकैत अछि। श्रम ओहन तप छी जहि स समाजक सब दोष मेटा जाइत अछि। तेँ श्रम कऽ साधना बुझि सभकेँ एहि मे लगि जेवाक चाही। जहि परिवार समाज आ देश मे श्रम कऽ जते महत्व देल जायत ओ ओते उन्नति करत। 109 उल्टा अर्थ शिक्षा केहेन देल जाय की देल जाय-इ गंभीर प्रश्न छी। एक गोटे कऽ इ संतान। एक बेटा दोसर बेटी। सम्पन्न परिवार। दुनू संतान कऽ बच्चे स सुख-सुविधा भेटैत रहल। जहि स वयस्क होइत-होइत अनेको व्यसनक आदति लगि गेलइ। अपन दुनू बच्चा कऽ बिगड़ल देखि पिताक मन मे चिन्त5ा भेलइ। भीतरे-भीतर सोगाय लगल। जहि स रोगी जेँका खिन्न हुअए लगल। एक दिन एकटा मित्र पुछलक- मित्र अहाँ दिनानुदिन खिन्न किऐक भेलि जा रहल छी? मित्रक बात सुनि ओ उत्तर देलक- मित्र सब कुछ अछैतो दुनू बच्चा बिगड़ि गेल अछि। ओइह चिन्ता मन कऽ पकड़ने अछि। दुनू गोटे विचारि तय केलक जे दुनू बच्चा कऽ एक मास महाभारतक कथा जहि मे धर्म आ सदाचारक सब तत्व मौजूद अछि सुनाओल जाय। सैह केलक। मास दिन महाभारतक कथा सुनलाक बाद दुनू आरो बिगड़ि गेल। बेटा अपना दोस्त कऽ कहलक- भगवान श्री कृष्ण कऽ सोलह हजार रानी छलनि त दस-बीस स संबंध राखब कोना अधलाह होएत (हैत) तहिना बेटियो अपन बहिना कऽ कहलक- कुन्ती कऽ कुमारिये मे बेटा भेलइ जे श्रेष्ठ नारीक श्रेणी मे छथि तखन हम कोन अधला काज करै छी। आब प्रश्न उठैत जे ऐना किऐक भेल? अखन धरि जे कथा श्रवणक व्यवहार अछि ओ अपूर्ण अछि। दृष्टिकोण बदलैक लेल ऐहन प्रभावी वातावरण बनवै पड़त जहि मे कथा चर्च आ क्रिया मे समुचित समन्वय हेवाक चाहियै। तखने दृष्टिकोण बदलत आ समुचित उपयोगी बनत। 110 जाति नहि पानि बुद्धदेवक प्रमुख शिष्य आनंद श्रावस्ती मे भिक्षाटन करति रहथि। गरमी मास तेँ रउदो तीख। हुनका (आनंद) प्यास लगलनि। लग मे पाइनिक कोनो जोगार नहि देखि किछु आगू बढ़लाह। एकटा युवती कऽ इनार पर पानि भरैत देखलखिन। पानि देखि मन मे सवुर भेलनि। इनार लग पहुँच ओहि युवती कऽ आनंद कहलखिन- दाय बड़ जोर प्यास लगल अछि कने पानि पिआउ? पानि नहि दऽ ओ युवती कहलकनि- साधुबाबा हम चंडालक बेटी छी हम्मर छुबल पानि कना पीवि? कने काल गुम्म रहि आनंद कहलखिन- बुच्ची हम तोरा त जाति नहि पुछलिअह। पानि मंगलियह। पियास स तरसैत आनंद कऽ देखि ओहि युवती कऽ दया लगल। मुदा मन मे विचित्र द्वन्द्व उपैक गेलइ। अंत मे ओ पानि भरि आनंद कऽ देलकनि पानि पीबि आन्नद तृप्त भऽ गेलाह। महात्मा नारायण स्वामी कहने छथि जे जाति-पाति आ अस्पृश्यताक बंधन हिन्दू जातिक लेल कलंक छी। अइह (यैह) बंधन सब जाति कऽ छिन्न-भिन्न केने अछि। एकरे चलैत सब जाइतिक बीच घृणा आ द्वेष पसरल अछि। 111 ऊँच-नीच एक राति जखन पुजेगरी मंदिरक केबाड़ बन्न कऽ चलि गेल स्तम्भक (खूँटाक) पाथर देवमूर्ति बनल पाथर स पुछलक- की भाइ हम सब त एक्के पहाड़क पाथर छी। फेरि अहाँक पूजा होइ अए आ हम जे मकानक (मंदिरक) भार उठैने छी से हम्मर कोनो मोजरे नहि? देवताक आसन पर बैसल पाथर मने मन विचार करै लगल। मुदा प्रश्नक जबाव नहि बुझि कहलक- भाइ हम एहि रहस्य कऽ नहि जनैत छी। पुजेगरी विद्वान छथि हुनका स बुझि काल्हि कहबह। प्रातःकाल पुजेगरी आबि पूजा करै लगल। फूल-पात चढ़ा दुनू हाथ जोड़ि पुजेगरी ध्यान केलनि कि देव पाथर पुछलखिन- मंदिर मे जते पाथर अछि सब त गुण-जाति स एक्के अछि। फेरि हम किऐक पूजनीय छी? पुजेगरी- हे देव! अपने बड़ पैघ बात पुछलहुँ। एक गुण घर्म आ जाइतिक सब वस्तुक उपयोग एक्के पदक लेल होय इ सर्वथा असंभव अछि। प्रकृति ककरो एक रंग नहि रहए दइत अछि। जे मनुष्यो मे अछि। बहुतो मनुष्य मे एक तरहक प्रतिभा आ गुण-घर्म होइत। मुदा ओहू मे अपन श्रेष्ठ कर्मक कारणे कियो सबसँ आगू बढ़ि जायत आ कियो पाछू पड़ि जायत। तेँ एकर अर्थ इ नहि जे ओ (पाछु पड़ल) अपना कऽ हेय बुझए। किऐक त परिवर्तन सृष्टिक नियम छिअए। आइ जे ऊपर अछि ओ काल्हियो ऊपरे रहत एकर कोनो गारंटी नहि छैक। तहिना जे निच्चा अछि ओ सब दिन निच्चे रहत सेहो बात नहि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_VI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The story is outdated DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –VI Ma .. Ma – Dhara open her eyes after listening to Kadamba’s voice. She felt exhausted reliving her past throughout the night – but still she remembered that they have to visit London today. Dhara and Newla sat in Kadambas’ car and Reshmi and Earl in Andrews’ . Dhara was most impressed by the Service center in England located on Motorways after every 15 or 20 miles. For a brief rest and light snacks … these service centers rival any five star hotel in India. The car was racing with almost 100 miles speed – it crossed many rivers such as Soar, Swift -- many places like Northampton, Daventry – road flanked by the vast green fields – at some places herds of cows were seen grazing – on both side of road there were some trees resembling Babul with green leaves vying with one another to come out. Other fascinating trees were those of Bluebell flower, Oak tree, Chestnut tree and Pine tree. Really, countryside has stunning scenic natural beauty. Kadamba told Dhara about the cities of Northampton and Daventry. Kadamba -- Northampton is a large market town and contains many beautiful places such as Abington Park Museum, Northampton Museum and Art Gallery, Sywell Aviation Museum, National Waterways Museum etc. The Holdenby House and Gardens was built by Sir Christopher Hatton to entertain Elizabeth I. It became the palace of king James I and the prison of his son king Charles I. Dhara – I have read that both James I and Charles I belonged to the Stuart dynasty. Charles I was involved in the civil war and was hanged by the Parliament. Now tell me about Daventry. Kadamba- Daventry is also a market town in Northampton shire consisting of modern houses and some small industries. 2 Nature with all its beautiful colours and shades was ruffling like ornamental saree over the earth. Stunning natural beauty in Lake- District up to Dove cottage. Dove Cottage is a house, best known as the home of William Wordsworth and his sister Dorothy. At this place Wordsworth wrote some of his finest memorable poems namely Ode: Intimations of Immortality, Ode to Duty, My Heart Leaps up and I wandered Lonely as a cloud. Snow- clad mountains, dense forest consisting of tall trees, birds chirping on trees – it seemed, Wordsworth came alive here – Dhara yearned to settle here – free from the maddening crowd and the shackles of life – if nobody wants me then why this wandering? Black cow is worshipped as goddess Lakshmi in India, but here they are common due to their large number—Indian cows appear very soft and innocent, but British cows appear to be ferocious – in England there is beef culture – so perhaps in vengeance the cows metamorphosed as the ferocious Rudrani. It was 1 pm in the day – raining in the morning – a bit cold also but after 10 am the sun came out, the sunshine was pleasing – the roof top of car was open but covered with net. Sunlight on windscreen was shining like crystal. Kadamba – Ma, in Britain we are blessed with an amazing system of Motorways which has the highest design standards for speed, safety and fuel efficiency. Dhara – What about the speed limit? Kadamba -- Motorways originally had no speed limit and were designed for traveling up to 100 mph. Although the original speed of 100 mph remains, the majority of motorways are now subject to a national speed limit of 70 mph. Dhara – Why lanes are numbered? Kadamba - The lanes in a given direction are numbered sequentially from nearside as lane 1, lane 2, lane 3 etc. The inner lane is generally intended for normal steady driving, while the other lanes are intended for overtaking or passing slower moving vehicles. The Highway Code states that vehicle must pass on the right. Dhara – What about road signs? Kadamba – Most road signs and pavement marking materials are retro-reflective, incorporating small glass spheres or prisms to more efficiently reflect light from vehicle headlights back to the driver’s eyes. Dhara – What about Driving licence? 3 Kadamba – Ma, in England you may easily qualify all the examinations except driving test . People get the licence only when they become experts. Everybody is leading a disciplined life. Kadamba parked the car near a service center -- Gateway of London – Welcome break – it was a big center surrounded by grass field , beautiful Tulip, Daffodil flowers. Transparent hall inside which people were seen taking snacks and drink. It is London’s welcome break. Dhara thought Simant could have easily brought her to this place as he was a regular foreign traveler. Kadamba – Ma, service center is a public facility, located next to motorways at which passengers can rest, eat, or refuel. Reshmi and Andrews also followed them. Reshmi – Are you tired didi? Dhara- No Reshmi. I never get tired. Moreover, whenever I visit a service center I feel delighted – Surrounded by the stunning natural beauty and the fresh flowers, the center always invigorates me. Andrew – Didi, let us go inside to have light refreshments. They entered the service center. The transparent floor seemed slippery. Dhara was surprised to see the well-maintained clean toilets. She tried to recollect the memory of dirty and ill-maintained toilets in India. Here everybody is aware of his/her duties – everybody is committed to cleanliness. The British subordinated us due to our weaknesses. But once we realized our strength and became united, they were forced to leave India. Nevertheless many problems still remain. Reshmi – Didi, we have ordered chicken nugget pastry, potato finger chips and cold drinks for everybody. After a brief sojourn at service center, They left for Swami Narayan temple. Andrews – Didi, is there any similarity between Taj Mahal and this temple? Dhara – Yes. Taj Mahal is considered as one of the wonders and a fine example of Indo-Mughal style of architecture. 4 Kadamba – But Taj Mahal is mosque where as it is a temple. Dhara – Taj Mahal is not merely a mosque – it is a great symbol of love – it provides peace to soul – each and every particle of Taj Mahal is imbued with love. Kadamba – Ma, those, not able to build it are devoid of love? Dhara – Love is everywhere. But Shahjahan had the capability to build it and as a result of beautiful craftsmanship, it has emerged as the 7th wonder of the world. Kadamba, have you noticed this fact in India – why husbands build houses after the name of their wives – it is token of love. Kadamba – Very true Ma. In school days one of my friends had told me the same. Dhara- Look Kadamba, at the time of marriage both bride and bridegroom take the oath of assisting each other in happy and difficult times. To provide all kinds of amenities, safety and security to wife is certainly the symbol of love. Reshmi – Kadamba, you have lost -- you cannot defeat didi in debate, she is a Professor. Dhara – Reshmi, it involves heart, so in it my being Professor is of no significance. Kadamba – Ma, you are correct. Reshmi children can never defeat their parents. Now let us enter the temple. Dhara – Kadamba, please tell me about the significance of Swami Narayan temple. Kadamba - Ma, Swami Narayan Temple is Europe’s first traditional Hindu temple and an international socio- spiritual Hindu organization. Dhara – Who is Swami Narayan ? Kadamba – Bhagwan Swami Narayan is a spiritual leader. This temple is a masterpiece example of Indian stonework and craftsmanship with towering white pinnacles, smooth domes and intricate marble pillars. Kadamba further said – Ma, this temple is made of 2,828 tons of Bulgarian limestone and 2,000 tons of Italian marble. The temple was constructed at a total cost of $ 12 million. Dhara visited the entire temple complex including the exhibition entitled Understanding Hinduism. The entry ticket to the exhibition was $2 per person. 5 She also visited the cultural centre Haveli constructed in Gujarati haveli architecture. She saw main hall consisting of nine pillars. Each pillar contained fine sculptures of God Vishnu, Shiva, Surya, Ram and Krishna. The main door of the garbhagriha was closed. Dhara sat near a pillar thinking about her purposeless movements from one place to another like a leaf separated from the tree. God please give me shelter – I can not bear my painful existence any more. Her eyes became wet. She remembered line from Bhagwad Gita – ‘ Kaon upai karab hum aali, Krishna bhayo kubja bus jayi. How is Simant?- I am also responsible for the present situation – I was never serious about our life – our house collapsed like a pack of cards – my decision to join a job and the resulting separation from Simant really ruined my life . Wife- husband should always live together. Dhara was never ready to join any job but Simant persuaded her – She herself wanted to become worlds’ most intelligent and dashing woman – a firm believer in vasudhaiva kutumbakam – but in real life people in the guise of snake is biting her all over as suffocating as Naagphaans. She had read somewhere, pita ko diya gaya wah shrap, Nahush ke ye putra kabhi khush nahin rahenge – Dhara thought my father was also cursed by someone – your daughter will never remain happy. To Be Continued. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary The story is outdated The bomb blast in Sarojini Nagar market The hidden bomb in the dust bin Men cars and things thrown in the sky The fresh red blood flowing Days past the incident became old The blood is dried to black And here the breaking news- The Delhi city is back to normal track Delhi is a city of courageous people! But the people who lost their earning hand How would they recover? Not in one or two days But for life long Will their lives will ever come back to the normal track! १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट http://videha.ning.com/ २२.http://groups.google.com/group/videha २३.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २४.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २६. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ अंतिम चारू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि। एहि लिंक सभ पर जा कय प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा संग्रह)- जगदीश प्रसाद मंडल): मूल्य भा.रु. १५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) नव मैथिली पोथी सभ कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक) खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना- गजेन्द्र ठाकुर रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-15-0]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-16-7]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-17-4]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-18-1]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-19-8]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-20-4]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-21-1] विभारानीक दूटा नाटक (भाग रौ आ बलचन्दा)रु.१००/- US$25 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-01-3]
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नताशा (मैथिली चित्र शृंखला)- देवांशु वत्स रु.१५०/- US$60 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-04-4]
हम पुछैत छी- (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-05-1]
अर्चिस्- (कविता/हाइकू संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी रु.१५०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-06-8]
मौलाइल गाछक फूल-(उपन्यास)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.२५०/- US$40 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-02-0]
मिथिलाक बेटी-(नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-03-7]
विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-09-9]
विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-08-2]
विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-07-5]
(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.40/- per copy for outside Delhi) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) VIII. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ FOR SUPPLY OF BOOKS IN ASSAM, BIHAR, WEST BENGAL, JHARKHAND (INDIA) AND NEPAL CONTACT OUR DISTRIBUTORS: PALLAVI DISTRIBUTORS, C/o Dr. UMESH MANDAL, TULSI BHAWAN, DEEPAK CHITRALAYA MARG (CINEMA ROAD), WARD NO.6, NIRMALI, DISTRICT- SUPAUL - PIN-847452(BIHAR,INDIA) ph.09931654742 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५६ म अंक १५ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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