143 'विदेह' ५७ म अंक ०१ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५७) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१. रोशन जनकपुरी-अग्निपुष्पके गुच्छासब २.कपिलेश्वर राउत-सलाह ३.कुमार मनोज कश्यप-ईमानदार २.२.डॉ. शंभु कुमार सिंह- कथा- जेठ आ पूस २.सौदागर ३.गरमी २.३.कामिनी कामायिनी-अप्पन राज्य २.४.१.प्रकाश चन्द्र- पोथी-समीक्षा २.बिपिन झा-मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस २.५.प्रेमशंकर सिंह: अमरक एकांकी-प्रहसनक सामाजिक यथार्थ २.६.सुजीत कुमार झा-थाल माटिक पावनि २.७.जगदीश प्रसाद मंडल-जीवन संर्घष- 3 २.८.गजेन्द्र ठाकुर-कथा-संघर्ष ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रवासी पक्षी ३.३.-नन्द विलास राय-सभसँ पावन िमथिला धाम यौ ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.गजेन्द्र ठाकुर-गीत-बँसकरमक विश्वकर्मा ३.६.काली नाथ ठाकुर-दहेज़ विरोधी रचना ३.७.-राजदेव मंडल-हित-अहित, प्रयास, ऑफिसक भूत ४. बालानां कृते-.गजेन्द्र ठाकुर-नाटक-किछु दिअ ५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_VII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -Dear Satanand Purhit विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
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आब मैथिली गजलक किछु कठिनाह विषएपर आबी। कठिनाह विषए किछु विविधता आनत आ मैथिलीक परिप्रेक्ष्यमे नूतनता सेहो, मुदा ततेक कठिनाह सेहो नहि।
वैदिक आ मैथिली छन्दक गणना अक्षरसँ होइत अछि से तँ कहिये गेल छी, गुरु-लघुक विचार ओतए नहि भेटत। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ लौकिक संस्कृत आ हिन्दीसँ प्रभावित छथि मुदा गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक शब्दावलीमे ढेर रास शब्द भेटत जे वैदिक संस्कृतमे अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि, तेँ कम दूषित आ खाँटी मैथिली भाषा हुनके लोकनिक अछि आ तेँ छन्दक गणना अक्षरसँ करबाक आर बेशी आवश्यकता। गायत्री-२४ अक्षर उष्णिक्- २८ अक्षर अनुष्टुप् – ३२ अक्षर बृहती- ३६ अक्षर पङ्क्ति- ४० अक्षर त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर जगती- ४८ अक्षर
शूद्र कवि ऐलुष आ आन गोटे द्वारा रचित ऋक् वेद मे गायत्री, त्रिष्टुप् आ जगतीक छन्द सर्वाधिक परिमाणमे भेटैत अछि से एहि तीनूपर विचारी।
गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार।
त्रिष्टुप्: चारि पद, ११-११ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक त्रिष्टुप् शेर तैयार।
जगती: चारि पद १२-१२ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक जगती शेर तैयार।
आब जेना पहिने कहल गेल अछि जे गायत्रीमे एक-दू अक्षर कम वा बेशी सेहो भए सकैत अछि माने २२ सँ २६ अक्षर धरि गायत्रीक प्रकार भेल- विराड् गायत्री भेल- २२ निचृद् गायत्री भेल- २३ भुरिग् गायत्री भेल- २५ आ स्वराड् गायत्री भेल २६ अक्षरक। तँ निअमक अन्तर्गत भेटि गेल ने छूट आ स्वतंत्र भऽ गेल ने मैथिली गजल।
पूर्ण विराम छोड़ियो सकै छी।
आउ आब गजल कही:
गायत्री गजल त्रिष्टुप् गजल जगती गजल
आउ आब गजल कही: गायत्री गजल छै सुनि देखि रहल , छै ककरासँ ककर कोन गपक सहल, छै ककरासँ ककर हे अछि देखि सहल, अछि की टीस उठल रे चिन्हलकेँ चीन्हल, छै ककरासँ ककर ई सभ सत्यक संगी , सभ छै भेष बदलि के अछि मुँह फेरल, छै ककरासँ ककर हे बिजुलौका देखियौ, छै उकापतङ्ग जेकाँ की माथ सुन्न कएल, छै ककरासँ ककर अगिनवान मैथिली, की सुखि जाएत धार कहै किदनि कहल, छै ककरासँ ककर करू कोन समझौता, करू कोन निपटारा के ललकारि रहल, छै ककरासँ ककर के अछि उठा रहल, अछि के झुका रहल के अछि बाजि रहल, छै ककरासँ ककर ऐरावत छै चकित, अछि की सोचि रहल ई कर्णधार बँचल, छै ककरासँ ककर त्रिष्टुप् गजल अछि चोरबा संग देखू ठाढ़, देखैत रहलि डकलिलामी नहि होएत आब बरदाश्त, डाक- डकौअलि डकलिलामी ई सुरकि रहल छल आब, नै भेटत आब फेर की खाद्य अछि कोना भेल ई असम्हार, डघरब चलि डकलिलामी कोना तड़फड़िया सभ अछि, डगहर थस लेने की बात नञि निचेन भेल अछि बाप, ओ मुहानी आनि डकलिलामी औ बुझारति होएत फेरसँ, भेल की ई ढिंढमदरा आब ई ढाबुस बेंगक अछि ठाढ़, ई ककर चालि डकलिलामी पुक्की पाड़ि के रहल पुकारि, बहीर बनि भने अछि ठाढ़ नहि ककरो सुनब पुकार, ई हथौड़ा मारि डकलिलामी कहू यौ किएक छी हूस ठाढ़, ऐरावतक फोंफक अबाज नहि किए बनल बौक ठाढ़ , चिपैले सुआदि डकलिलामी जगती गजल भगवानक बनाओल ई गाम, जखन अछि हो भोर बकटेंट नहि तँ भेटत की कोनो विराम, अछि भेल कोना भेर बकटेंट औ की नहि भेटत आबहु त्राण, छी सुनल सएह सरनरिया कोना मिरदङिया देलक थाप, ई मिरहन्नी शेर बकटेंट जाए रहल पछताए रहल, नहि बाट कोनो सुझाए रहल अछि गोलहत्थी खाइत ई छौड़ा, पँचागि ई बिहटार बकटेंट मोचण्ड बूड़ि रौदमुँहा होइत, साँझक लकधक बैसि रहल धमधूसर सभ बेर लगौरी, आनि रहल गनौर बकटेंट गदा रे गुइँ गुइँ मार गदा रे, गदा रे पुइँ पुइँ, मुक्का मारल गताखोरक छै ई हेँज चलल, गतात संग पथार बकटेंट बेराम पड़ब नै आउ सकल, बेपर्द करब बेदरंग भेल ऐरावत चीन्हि बेपारी सभकेँ, करू भाषाक व्यापार बकटेंट
पोस्ट स्क्रिप्ट:एखन धरिक गजलशास्त्रक प्रस्तुतिपर किछु टिप्पणी एतए प्रस्तुत अछि:
१
गंगेश गुंजन
ग़ज़ल पर संपादकीय मे स्थान देब एकटा गंभीर संपादन-बोधक व्यवहार बुझायल। तें एकर स्वागत आ बधाइ ।
ग़ज़लक बुनियादी अर्थ-शृंखला मे स्त्री, सुन्दर स्त्री एक खूब प्रशस्त अर्थ भेलैक। स्त्री अर्थात सौन्दर्य, शक्ति, प्रेम, आनन्द, सृष्टिक सब सं मधुर गीत।
ग़ज़ल तें कविता-विधाक सर्वोत्तम 'विधा' सेहो ( यद्यपि ई विवादहीन मान्यता नहिं तथापि...)
एक समय हिन्दी मे (प्रायः) शाइर इक़बालक कहल छनि-.....शाइरी इल्म से नहीं आती ' (पहिल पांती बिसरै छी)
अपन ग़ज़ल-कोटिक रचना कें, मैथिली हो बा हिन्दी, हम "ग़ज़ल नुमा" कहैत रहलियैक। तकरो आशय यैह। मैथिलीक अत्यल्पे ग़ज़ल हएत जे ग़ज़लक एहि बुनियादी लक्षणक ल'ग मे देखाय। ओना हमर पाठकीयताक सीमा अछि। तें अप्रिय मुदा यथार्थ थिक जे मैथिलीक एहि २०१० ई. मे लिखल जा रहल ग़ज़ल-अधिकांश ग़ज़ल हिन्दी-कविताक ' गुप्तकालीन कविता मात्र बुझाइछ। तुकबन्दी । प्रिय साकेतानन्दक शब्द मे- अहा ! ग्राम जीवन भी क्या है...कहीं लौकियां लटक रही हैं ..।( आदरणीय मैथिली शरण गुप्तजीक कविताक ई अनविकल उद्धरण थिक)। हिन्दीक दुष्यन्त कुमारक ग़ज़ल मात्र अपन आधुनिकताक कारणें बा छुच्छ प्रगतिशीलताक कारणें नहि, युग-जीवनक जन-युग-जीवनक ईमानदार अभिव्यक्ति सहज तासीरक कारण सेहो एतेक प्रख्यात-प्रशस्त भेलनि। भरिसके कोइ कहि सकैछ जे कोनो ने कोनो रूपें दुष्यन्तजी कें नहि पढ़ने होथि। नहियों होति तं पढ़ि लेब उपकारके हेतनि। हृदय चाही, आत्मदान । '
शुद्ध सौंदर्ये बनैत अछि आनन्द । मनुष्यक महान आनन्द दुःखेक चरम निरानन्दताक चिर वांछित दुर्लभ चित्तावस्था होइछ। जकरा कविता मे "ब्रह्मानन्द सहोदर" सेहो कहल गेल। से सौन्दर्य ब्रह्मान्ड मे "कविते"टा रचि सकैये ।
हमर उक्ति के रूढ़,निंघेस तथाकथित धर्ममार्गी अध्यात्मक रंगे मे नहि देखल-मानल जाय, से विनती ।
इल्म सेहो तखने पाठककें स्पन्दित करैत छैक।
" कहिये कुछ आसान ग़ज़ल
हर एक दिल की जान ग़ज़ल
जन-मन को दिखलाये राह
भटके मत सुनसान ग़ज़ल
एहि प्रकरण मे अपन "ग़ज़लनुमा"क किछु शेर मोन पड़ि जयबाक कवि-भावुकता कें माफी भेटओ।
गंगेश गुंजन
२
तारानन्द वियोगी
बहुत सुन्दर आ सम्पन्न विवेचन।गायनक सम्बन्ध मे बेस मेंही विवेचन अछि।दोसर भागक प्रतीक्षा रहत।
फेर:
वेद मे सब किछु छै।ओहि मे रसायन विज्ञान छै। कम्प्यूटर आ इन्टरनेट छै।ओहि मे एड्स के इलाज छै।ओहि मे परमाणु विज्ञानो छै।वेद जिन्दाबाद छै। गजल के बापक दिन छियै जे ओ वेद मे नहि रहतै?लेकिन बन्धु, हमर विचार जे फारसीक काव्यशास्त्र के हिन्दुत्वीकरण के बदला मौलिक गजल-रचना मे हिन्दुत्व आनल जाय तं से बेसी श्रेयस्कर।की करबै? दिल पर पाथर राखि लिय" जे ओहि विधर्मी सभक लग मे सेहो काव्य छलै, काव्यशास्त्र छलै।
उत्तर:१.गजलक बापक दिन छिऐ वा नै से तँ नञि बुझल अछि, मुदा वेदमे आन चीज जे होइ मुदा गजल नञि छै आ ओ काव्यशास्त्र फारसक फेर अरबक अछि से जगतख्यात अछि, आ एहिमे हमरा वा ककरो कोनो संदेह नञि होएबाक चाही।
२. फारसीक काव्यशास्त्रक हिन्दुत्वीकरणक संबंधमे हमरा नञि बुझल अछि आ मौलिक गजल रचनामे कोना हिन्दुत्व आनल जाए सेहो हमरा नञि बुझल अछि। काव्यकेँ "हिन्दु" आ "विधर्मी" शब्दावलीसँ दूर राखल जाए सएह नीक, हँ "मैथिली गजल" शब्दक प्रयोगमे हमरा कोनो आपत्ति नञि, आ तकरा हिन्दुत्वीकरण मानल जाए तँ हमर कोनो दोख नहि।
३.ओहि "विधर्मी"(अहाँक शब्दमे) लग सेहो काव्यशास्त्र रहै- ई विश्वास करबामे ककरो करेजपर पाथर नञि राखए पड़तै कारण जतेक सौँसे विश्वमे मिला कऽ कवि/ काव्यशास्त्री भेल होएताह ओहिसँ बेशी कवि/ काव्यशास्त्री अरबी-फारसीमे भेल छथि।
४.प्रायः मैथिली भाषामे गजल जे हम लिखी तँ छन्दशास्त्रक अनुसार लिखी, आ से छन्दशास्त्र हम अरबी-फारसीक प्रयुक्त करी, प्रायः अहाँक मंतव्य से अछि। मुदा ओ ट्राइ कऽ कए हम नञि आनो भाषाबला सभ (जेना अंग्रेजी गजलक शास्त्रकार लोकनि)थाकि गेल छथि, ओहिमे ने लय बनि पबै छै आ ने सरलता आबि पबै छै। ऋगवैदिक छन्दशास्त्र टगण-मगण सँ बेशी वैज्ञानिक आ सरल छै आ मैथिली गजल लिखबा-पढ़बा-गुनगुनएबामे लोककेँ सुविधा होएतैक से हमर विश्वास अछि- वेदक समएमे हिन्दू शब्दक जन्मो नहि भेल रहै से वैदिक छन्दशास्त्रक प्रयोग मात्र मैथिली गजलकेँ हिन्दू बना देतै से हमरा नञि लगैए।
५.तहिना जखन हम "मैथिली हाइकूशास्त्र" लिखने रही तहिया सेहो हमरा लग "वार्णिक" आ "मात्रिक"मे एकटा चयन करबाक छल, आ तहियो हम "वार्णिक"क अक्षर गणना पद्धतिक चयन कएलहुँ। "शिन्टो" धर्मावलम्बी जापानी (किछु बौद्ध सेहो) सभक लिपि आ तकर छन्दशास्त्र जे प्रयोग करी तँ मैथिलीमे हाइकू कहियो नञि लिखल जा सकत; कारण ओकर काव्यशास्त्र जापानी भाषा आ ओकर कएक तरहक लिपिक सापेक्ष छै आ ओहिमे धर्म अबितो छलै (टनका/ वाका- ईश्वरक आह्वाण)। अरबी-फारसी गजल मुदा धर्म निरपेक्ष छै, मुदा ओकर काव्यशास्त्र ओकर अपन भाषा-लिपि लेल छै। से भाषा-निरपेक्ष ने जापानी काव्यशास्त्र भऽ सकै छै आ ने अरबी-फारसी काव्यशास्त्र।
सादर
गजेन्द्र
३
गौतम राजरिशी
पिछला तीन-चार दिन स पढि रहल छि इ आलेख....हिंदी आ उर्दू के ग़ज़ल-शास्त्र स त भलि भांति परिचित रहि, मैथिली के लेल जानकारी बड निक लागल। बहुत मेहनत आ लगन स लिखल आलेख- सेव कs लेलौं घोटै खातिर। मुदा आलेख के आखिर पंक्ति "मैथिली गजलकेँ सेहो ई छूट भेटबाक चाही" स सहमत नै छि। कविता के अ-कविता होय लs दियो, मुदा ग़ज़ल के सर्वदा ग़ज़ल ही रहैक चाहि...अ-ग़ज़ल नै। हमर उस्ताद कहित छथिन कि रचना करि काल सुविधा नै खोजबाक चाहि।
अपनेक फोन नंबर चाहि गजेन्द्र जी...मैथिली शब्द के उच्चारन हेतु किछु शंका निदान करबाक अछि। ग़ज़ल त सब टा खेल अछि उच्चारणक...
उत्तर:राजर्षिजी
मैथिलीमे उच्चारण निर्देश, मैथिली गजल-शास्त्र- भाग-२ मे देल गेल अछि।
हमर मो.नं. ९९११३८२०७८ अछि।
सादर
४
आशीष अनचिन्हार
काफिया केखनो शब्दक नहि , वर्ण आ मात्राक होइत छैक। जेना हमरापर आ ओकरापर दूनू शब्द मे र काफिया छैक। तेनाहिते आरे आ माँड़े(हमर गजलक) मे ए मात्रा कफिया छैक।
एकै भाव बला गजल दूषित मानल जाइत अछि।
उत्तर:मैथिली आ संस्कृतमे मात्र तुकान्त (अन्तक तुक) लयक निर्माण नहि करै छै, मुदा करितो छै।
से ई गप जे-
जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै।
सायास लिखल गेल अछि।
वेद-ए-मुकद्दस मे वेदक विषएमे अली सरदार जाफरी लिखै छथि- शुऊरे-इन्साँ के आफताबे-अजीम की अव्वलीं शुआएँ- मनुष्यक चेतनाक पहिल किरिण।
जेना तमिलमे संस्कृत शब्दक आ तुर्कीमे अरबी शब्दक बहिष्कारक आन्दोलन चलल तहिना फारसीमे (फारसक प्राचीन ग्रन्थ अवेस्ता आ वैदिक-संस्कृतक मध्य समानता द्रष्टव्य) सेहो अरबी शब्दक बहिष्कार आ तकरा स्थानपर आर्य भाषा-समूहक शब्दक ग्रहणक आन्दोलन चलल अछि। मैथिलीमे सेहो हिन्दी-उर्दू शब्दक बहुलतासँ प्रयोग भाषाक अस्तित्वपर संकट जेकाँ अछि, खास कऽ मिथिलाक्षरक मैथिल ब्राह्मण संप्रदाय द्वारा दाह-संस्कार कएलाक बाद।
आब उर्दू गजलपर आबी। १८९३ ई.मे हाली मुकद्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी लिखलन्हि जे हुनकर काव्य-संग्रहक भूमिका छल। ओहि समए धरि उर्दू गजलक विषय आ रूप दुनू मृतप्राय छल से हाली विषय-परिवर्तनक आह्वान तँ केबे कएलन्हि संगहि काफिया आ रदीफक सरल स्वरूपक ओकालति कएलन्हि। ओ लिखै छथि जे एकाधे टा शेर आइ-काल्हि नीक रहैए आ शेष गजल फारसीक शब्द सभसँ भरि देल गेल शेरक संकलन भऽ जाइए जाहिसँ ओकर स्तरहीनतापर लोकक ध्यान नञि जाए। से उर्दू गजल धार्मिक कट्टरतापर व्यंग्यक क्षेत्रमे फारसी गजलसँ आगाँ बढ़ि गेल।
संगीत आ गजल गायन
ठाठ कल्याणक अन्तर्गत राग यमनमे त्रिताल १६ मात्रा (दू पाँतिक अनुष्टुप् – ३२ अक्षर) क एतए प्रयोग भऽ सकैए। ठाठ बिलावलक अन्तर्गत राग बिलावल एकताल १२ मात्राक होइत अछि, एतए गायत्री-२४ अक्षरक गजलक प्रयोग भऽ सकैए। कारण वार्णिक गणनाक उपरान्त रेघा कऽ गायककेँ कम गाबए पड़तन्हि आ शब्द/ अक्षरक अकाल नहि बुझना जाएत।
ई मात्र उदाहरण अछि आ से गायकक लेल मैथिली गजल लिखनिहारक लेल नहि।
मैथिलीमे एखन धरि जे गजल लिखल गेल अछि ओहिमे बहरक एकरूपताक कोनो विचार नहि राखल गेल अछि। ने से बहर-विचार फारसी काव्यशास्त्रक हिसाबसँ राखल गेल छै आ ने भारतीय काव्यशास्त्रक हिसाबसँ। आ ताहि कारणसँ मैथिली गजल सभकेँ “गजल सन कविता” मात्र कहि सकै छिऐ। ओना बहरक एकरूपता गजलकार लोकनि द्वारा गजल लिखलाक बाद एक गजलपर आध घण्टा लगेला मात्रसँ कएल जा सकैए।
गजल सहस्राब्दीक हारि हमर आ जीत ओकर, नै जातिवादीक सोझाँ होएब लरताङर भेष बदलि जातिपंथी जीति रहल कवि, ऐलुष नै फेर हम हएब लरताङर
एहि भू मार्गक अछि तँ गप्पे विचित्र सन, प्रकाश आएल अछि भेल अन्हार निवृत्त मयूरपंखी पनिसोखा उगल छै एखने, इन्द्रक मेघकेँ सोंखि करब लरताङर
बनि बाल बुद्धि हम पुछने आइ छलहुँ, ई सत्य अहिंसाक पथ ई विजयक पथ जीतल जाइए असत्यक रथ हुनकर, टनकाएब नै फेर होएब लरताङर
रस्ता चलैत छलहुँ दिन राति सदिखन, से भेल जाइत छारन नव रस्ता बनल छी देखि रहल रस्ताक केंचुली भरिगर, गऽ जाइत आगाँ नहि होएब लरताङर
अबैए ओ सत्यक क्षण कोन विपदा बनि, अछि आएल दौगल ओ सुनझाएल अछि पोखरिक जाइठपर भेल ठाढ़ छी हम, छछड़बाएब घर नै हैब लरताङर
छनगा पीबि शिव देखि रहल चारूकात, विषहन्त ओ घूमि रहल बनल बसात तांडव ई अहाँक बुद्धि कहैए से त्रिकटु, तगबाए तकरा नै होएब लरताङर
हे भाइ ऐरावत अछि आइ झूमि रहल, कदैमे करैत ओ कदमताल विकराल चरखा कत्तिनक टकुआ काटब देखल, नहि कदरियाएब खोभब लरताङर
गजल
बरसातिक ई राति बनल सुखराति हे कालि
करब षोडशोपचार आर दए बलि हे कालि
बाल बसन्त भैया बढ़थु बहिनक अछि आस
आस्तीक करैत भैया लेल सुधियो नहि हे कालि
लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अड़हुल फूल
ताहूसँ लाल देखल ई दृश्य-देश मिथि हे कालि
स्वप्नक सोझाँ सत्यक नै अछि आब कोनो मोल
पोखड़ि झाँखड़ि सगरि घूमि ई देखलि हे कालि
अमुआ फड़ए लदा लदी डारि लीबि-लीबि जाए
ओकर नम्रतामे कोनो अगुताइ सुनलि हे कालि
ऐरावत गजल सन कविता देखू देलनि ई
मैथिलीक गरिमा एहिठाँ देखू सदति हे कालि
गजल
जाइत-जाइत देखल ओ ठाढ़ आर मेघडम्बर सन छाती
भैयाक पीठ धोबिया पाट हुनकर मेघडम्बर सन छाती
पड़ल फेर अकाल करैत हाक्रोस छथि ओ ठाढ़ भेल कात
छाती धकधक उन्नत्त ठाढ़ि दुआर मेघडम्बर सन छाती
देखल ई चित्कार हम भऽ सोझाँ ठाढ़ देबै ओकरा हुतकारी
संकट प्रहारमे धैर्य अपरम्पार मेघडम्बर सन छाती
देखल हुनका आइ छन्हि मुँह क्लान्त मुदा नहि कोनो बात
कर्तव्यक बिच कोनो विश्राम डगर मेघडम्बर सन छाती
सुनू सुनू भाइ गप भेल असम्हार करू पुकार समधानि
भेल मानवक ई हाल करू दुत्कार मेघडम्बर सन छाती
ऐरावत देखल घुरचालि बनल हथियार ओ लेने जाल
छी तैयो ठाढ़ की हम क्षितिजक पार मेघडम्बर सन छाती संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० अप्रैल २०१०) ९६ देशक १,२८१ ठामसँ ४१,९७४ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३७,८५३ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 ..उर्फ..नोम चोम्स्की..उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...इलारानी सिंह...उर्फ...कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ-अनलकान्तक एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- विशेष विवरण http://aaum.blogspot.com/ पर। We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them. पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण, ( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी आ प्राच्य आ पाश्चात्य रचनाक / कविता सभक निर्ल्ज्जतासँ पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि। हरेकृष्ण झा:ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, लोक सभ हमरा कहने रहए जे ई हमर कविताकेँ हिन्दीमे पाइ लऽ कऽ छपबै छथि, मुदा हमरा डॉक्टर तनावसँ दूर रहबा लेल कहने अछि। (विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर पाइ लऽ कऽ एकटा हिन्दी कवितामे छपबओलक। सम्पादक) प्रणव बिहारी (मैथिली कथाकार प्रदीप बिहारी जीक पुत्र): (सम्पादक द्वारा ई पुछलापर जे हुनकासँ नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचनाक अनुवाद जाहि तरहेँ धोखासँ ई पंकज झा पराशर करबओलक आ अपना नामे निर्लज्जतासँ करबओलक तकरा विषयमे की कहब अछि, एहिसँ मैथिली साहित्यकारक प्रति अहाँक विचारमे कोनो परिवर्तन आएल अछि)-ओकरा एक्सपोज कएल गेल ताहिसँ खुशी छी। जीवकान्त: ई पंकज झा पराशर तँ बड़का चोर अछि, एकरा विषयमे बड्ड दिन अनभिज्ञता रहल। विभूति आनन्द: ई पंकज झा पराशर तँ चोर अछिये। अग्निपुष्प: हम तँ आब एकर रचना नहिये छापबै। ई दोसरक रचना चोरबै अछि सेहो दोसरासँ अनुवाद करबा कऽ। तारानन्द वियोगी: ई पंकज झा पराशर हमरासँ कहलक जे प्रकाशकसँ विवाद अछि, आब सभ गप बुझलहुँ। अहाँ जे कएलहुँ से नीक कएलहुँ। मणिकान्त दास: ई पंकज पराशरकेँ अहाँ जे उघार केलहुँ से देखि मैथिलीक भविष्यक प्रति आशा बढ़ल, जीवकान्तजीसँ गप कएलहुँ,ओहो कहलन्हि जे पराशर बड़का चोर अछि। कहू तँ एकटा बच्चासँ अनुवाद करेनाइ आ तकरा अपना नामे छपेनाइ। एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) at Rahika. There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh Srikant Verma and others. We deplore the selling of these prizes to a person who has brought respect of Maithili to a lower level.
गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ २. गद्य २.१.१. रोशन जनकपुरी-अग्निपुष्पके गुच्छासब २.कपिलेश्वर राउत-सलाह ३.कुमार मनोज कश्यप-ईमानदार २.२.डॉ. शंभु कुमार सिंह- कथा- जेठ आ पूस २.सौदागर ३.गरमी २.३.कामिनी कामायिनी-अप्पन राज्य २.४.१.प्रकाश चन्द्र- पोथी-समीक्षा २.बिपिन झा-मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस २.५.प्रेमशंकर सिंह: अमरक एकांकी-प्रहसनक सामाजिक यथार्थ २.६.सुजीत कुमार झा-थाल माटिक पावनि २.७.जगदीश प्रसाद मंडल-जीवन संर्घष- 3 २.८.गजेन्द्र ठाकुर-कथा-संघर्ष १. रोशन जनकपुरी-अग्निपुष्पके गुच्छासब २.कपिलेश्वर राउत- सलाह ३.कुमार मनोज कश्यप-ईमानदार रोशन जनकपुरी अग्निपुष्पके गुच्छासब दुश्मनके नाइट भिजन हेलिकप्टर सँ राइत भइर बमबारी के बादो जनसेनाद्वारा कएल गेल घेराबन्दी नइ टुटल रहइ । जेना सिनेमा मे होइछै, चहुदिस पसरल अन्हारमे एम्हर बम खइस रहल अइ, ओम्हर बम खइस रहल अइ आ लोकसब दौड रहल अइ चइल रहल अइ , तहिना शाही सेना के घेराबन्दी कएने जनसेना मुख्य मोर्चा पर लइड रहल छल । युद्ध मोर्चामे एकटा खपरैल स्कूल के एकटा कोठरी के प्राथमिक अस्पताल बना क घायल जनसैनिकसबके प्रारम्भिक उपचार क क युद्धक्षेत्र सँ बाहर पठाओल जा रहल छल । ई काजरो सँ कारी अमवस्या के राइतबला अन्हरिया राइत के बम के विस्फोट आ स्वचालित हथियारसब स कखनो निरन्तर कखनो रूइक रूइक क फुलझडी जकाँ निकलल गोली सब के लाल पियर बैगनी इजोत मात्र प्रकाशित करैत छल। नइ त लम्बा मीलो पसरल सुखलका नदी के ओ क्षेत्र अन्हारे मे युद्धक साक्षी बइन रहल छल । युद्धक मुख्य मोर्चा बनल चूरे पर्वत श्रेणी के ओहि टिला स आइब रहल बम मसिनगन आ विविध आग्नेयास्त्रक समवेत भयावह आवाज एना बुझाइत छल जेना अअनेको ज्वालामुखी एक साथ फूइट रहल हो । आअ ोतह उइठ रहल आर्त चित्कार , क्रन्दन, नरकक आभास दइत छल ।... ठीके युद्ध नरके होइत अइछ ।–एकटा घायल जनसैनिकके स्ट्रेचर पर सुताक दू गोटेके कन्हा पर रखैत हम बजलहुँ । अहाँ ठीक कहलहुँ , मुदा एहि नरकके समाप्तिक हेतु ई बाध्यात्मक युद्ध अछि । हमरा सहयोग क रहल प्रारम्भिक अस्पतालक रेखदेखक लेल नियुक्त कयल गेल कमाण्डर बाजल ।बगल स निर्देशनात्मक आवाज आएल–ठाढे ठाढे नइ, बेन्ड भ क डाँड मोइडक । अन्हारमे आँइख चियाइर क देखलियै, स्थानीयबासीसब आबाल वृद्ध युद्धक्षेत्र स बाहर भाइग रहल छल आ जनसैनिक आ युद्ध सहयोगी सब ओकरा सबके सुरक्षित पलायन मे सहयोग क रहल छल । करिब आधा किलोमीटर चौडाइबला एहि सुख्खल नदीके पछियारी किनारा सुरक्षित छल । ओकरा ओइकात एकटा छोट गाम छल जतह शरण लेल जा सकैत छल । फायर के गर्जनयुक्त आदेश सँगे शुरु भेल लडाइ भोर के करिब साढे तीन बजे तक चलल । भोरका इजोत शाही सेना के अतिरिक्त बल मगाब मे सहयोगी भ सकैत छल आ शायद अहि दुआरे रिट्रीट (लौटबाक) आदेश आएल ।युद्ध क मुख्य मोर्चा पर निरन्तर विस्फोट आ फायरिंगक लयबद्धता टुइट रहल छल । स्वास्थ्य मोर्चा पर नियुक्त आ सहयोगी व्यक्तिसब लौटैट जनसैनिक सबके अन्हारमे ठिकियाक चिन्हबाक कोशिस क रहल छल । ओकर चिन्हल लौट रहल अइछ कि नइ ? ई प्रश्न आ उत्सुकता सबहक चेहरा पर नाइच रहल छल ।युद्ध मोर्चा क समाचार आब चारुदिस पसैर रहल छल । जनसेनाक तीन तरफा मजबूत घेराबन्दी मे परल शाही सेना के एक सय अठारह जवानबला जत्था मे स कम स कम चौंसठ गोटे मारल गेल छल । ओ त करिब एक्के डेढ बजे दुश्मन निःसहाय भ क आत्मसमर्पण के मुद्रा मे एकटा कोना मे दुबैक गेल छल । हम सब त दू घण्टा स अन्हारे मे अपने मे फायरिंग क रहल छलहुा । जाँघ मे छर्रा लाइग क घायल एकटा सैनिक बाजल– नइ त जीत निश्चित छल । युद्ध के अधूरा छोरबाक चिरचिराहट प्रायः सब के चेहरा पर छल , जे लौटैत आ घायल सैनिकके स्थलगत देखरेखमे भेल तिल मात्र कोताही के बाद क्रोध पूर्ण व्यवहार मे प्रकट भ रहल छल । एहि भीषण युद्ध मे जनसेना दिस चालीस स बेसी घायल भेल छल आ पचीस गोट शहादत प्राप्त कयलक । ।जनसेना के ई सिपाही सब जनता के ओह वर्गक धियापुता सब अइछ जे शासन आ अभिजात्य तथा सम्पन्न वर्गक पकडबला समाजद्वारा युग युग स कछेर पर ठाढ क देल गेल अइछ । एकरा सबके नइ कोनो दरमााक मोह नइ कोनो नीजी सुख सुविधाके मोह । बस एक्केटा आस जे जनयुद्ध सफल होएत त घूरत । सुखके दिन टुटली मरैया तक पहुँचत । लूट आ शोषण बला शासन अन्त होएत । लाल सलाम, जनताके सर्वोत्तम धीया पुता सब ।लाल सलाम , महान शहदि सब ।।–अपने आप हमर कसल मुठी सलामीक मुद्रामे अकाश दिस उइठ गेल । भोरका इजोत होब लागल छल । नदीके पछियारी काते काते दक्षिण दिस जाइत हम सब युद्ध मोर्चा स क्रमशः दूर होइट जा रहल छलहुँ । दुश्मनके अतिरिक्त बल हेलिकप्टर स पहुँच चुकल छल । मुदा शायद जनसेनाके वीरता स संत्रस्त दुश्मनके फाइटर हेलिकप्टर आकाशमे घुइम घुइमक एखनो तक बम खसाइए रहल छल । हमरा संगे चइल रहल एकटा कम्पनी कमाण्डर पाछु स हमर पिठ्ठी थपथपएलक ।आकाश दिस उठैत हमर कसल मुठ्ठी ओ देखि नेने छल ।उनैटक हम तकलहुँ । शायद ओ हमरा मन मे उठैत भावके पइढ लेने छल । राइत भइरके युद्धक थकान संगहि ओकरा आँइखमे उदासी सेहो छल । शायद ओकरो मनमे हमरे जकाँ भावसब उमइर घुमइर रहल छल । ओ कमाण्डर छल युद्ध मोर्चाक । ओकरो नेतृत्वमे युद्ध भेल छल जाहिमे सेहो शहीद आ घायल भेल छल कइएकटा जनसैनिक । के सब शहीद भेल? क ीओ जनैत अइछ? ....निश्चय ओ जनैत अइछ । ओकर आँइखक उदासी सैह कहैत अइछ । के सब भ सकैत अइछ? –मन भेल पुइछतिअइ, मुदा पुछलहुँ नइ, आ चलैत रहलहुँ चुपचाप । एहि सुखलाहा नदी के पछयारी कातक जंगलमे युद्धक तैयारी आ प्रशिक्षणक अनितम क्षणमे जनसेनाके जवान सबके एकटा बटालियनके सलामी स्वीकार करैत आ जवान सबस गर्मजोशी पूर्ण कडगर हाथ मिलाक बिदा करैत काल मनमे उठल भाव याद परल –एहिमे स के लौटत के नइ लौटत ? चिन्हल चेहरा सब एक एक क आँइखक आगू घूमए लागल । महोत्तरीके बुधनी , जकर पार्टी नाम छल कमरेड उष । तीन वर्ष पहिने पार्टी प्रवेश करैत कालके अन्तरमुखी विधवा आ सम्पत्तिक कारण अपन सासुर स प्रताडित बुधनी युद्ध प्रशिक्षणक क्रममे एक दिन हमरा कहने छलिह– कमरेड, सुबोध कमरेड हमरा प्रेम प्रस्ताव कएने अइछ कमाण्डरके हम सब संयुक्त आवेदन सेहो देने छी । जौं सब ठीक रहल त तीन महिनाके बाद हम सब विवाह करब । अहाँ जतह रही , अहाँके आब परत । गोर, हसमुख रेशबहादुर मगर याद परल , धनुषामे जकर पत्थर कूटएबाली विधवा बुढिया माय कनैत कहने रहइ–बौआ, तों त पहाडमे लड चइल जाइछे, मुदा हमरा के ओ देख बला नइ रहि जाइए ।बोखार लगला पर दबाइयो देब बला के ओ नइ रहि जाइए । मुदा ओ युद्ध स नइ लौटल । एकटा कवितामे ओ लिखने रहए– माय , हम नइ चाहैछी कोनो माय पत्थर कूटो, तय हम युद्ध मे छी । हमरा याद परल ओ नेवार्नी करिकबी दुबर पातर कमरेड कामिनी , जकरा मजदूर पतिके शाही सेना सब माओवादी होबके शंका मे निर्ममतापूर्वक पिटिपिटिक माइर देलकै । आ ओ अपन दू टा अबोध बच्चाके नाना नानी ग ध के जनसेनामे सामिल भ गेली ।हमर अनेको चिन्हल जानल सबमे स ई करिकबी नेवार्नी अत्यन्त प्रिय छलिह । ओ हमरे नइ सबहक प्रिय छलिह । कम मुदा मृदुभाषी, प्रत्येक मोर्चा पर सबस आगू बइढक लडनिहार । तैं सब कमाण्डर सब हुनका अपने समूहमे राख चाहैत छल । एक बेर हम बिमार भेल छलहुँ, बेहोश रहलहुा कए दिन । एहन अवस्थामे ओ हमर सब तरहक सेवा कएने रहथि । दोसर हुनक वर्गीय प्रेम आ बौद्धिकता हमरा हुनका संगे भावनात्मक सम्बन्ध बना देने छल । हम दाई (भैया) छलहुँ आ ओ छलिह बहिनी( बहिन) । दाई , आई हमरे क्याम्पमे खाउने ।–युद्धस एक दिन पहिने ओ हमरा नेओत देने छलिह । हम हँसिक आगू बइढ गेलहुँ, मुदा ओ दौडक हमरा मूँहमे माँउस एकटा टुकडा राइख देलनि आ हँस लगलिह ।.....एहन बहुतराश चिन्हल चेहरा आँइखक आगू नाच लागल । ककरो चिनहलियै की ? के सब शहीद भेल ? –रहल नइ गेल, आ सँगे चलैत कम्पनी कमाण्डरस हम पुछिए लेलियै । ओ किछु बाजए ओहिस पहिने हम दोसरो प्रश्न कयलियै जाहिमे हमर चिन्हल जानल कतेको नाम छल । भावना जेना हमरा गरसि रहल छल । राइतक युद्ध मोर्चाक कमरेड हम एकटा सामान्य मानवमे बदइल रहल छलहुँ । ओ किछु नइ बाजल । ओकर आँइखक उदासी ओहिना गँहीर छल । ठोर जेना कइसक बन्द छल । ओ निःशब्द चलैत रहल । दोसर दिन । किछु शहीद सबके लाश प्राप्त भेल छल । हमरा जानकारी भ चुकल छल– रेश बहादुर आ कमरेड कामिनी शहीद भ चुकल छलिह । कमरेड कामिनी बायच सकैत छलिह मुदा एकटा घायल जनसैनिकके सहारा द क लबैत काल हुनका गोली लागल छल । हमर मन भावना स भइर गेल छल । कमरेड कामिनीके स्मृति हमरा विचलित क रहल छल । निर्मम युद्धके भावना स कोनो मतलब नइ होइछै सब शहीद सबके लाश सबके हसुवा हथौडी बला झण्डा ओढाओल गेल, सलामी देल गेल आ शहीदक चिता धुधुवा उठल । थाकल पैर आ भारी मन स हम सब सेल्टर दिस लौटलहुँ । मन नइ लाइग रहल छल । ओ कम्पनी कमाण्डर हमरा सँगे छल । ओ अखनो उदास आँइख नेने चुप छल । भावना स द्रवित मन एन भरल छल जेना सब किछु रुइक जाएत । अपन क्याम्पमे प्रवेश कयलहुँ त किछु पुरुष आ दू टा युवती प्रतिक्षा क रहल छलिह । हमर सहायक जानकारी करौलक जे ई सब जनसेनामे सामिल भेल नव कार्यकर्ता अइछ । मूँडी उठाक एकटा युवती के पुछलियै–की नाम अइछ? रुपकुमारी दोसरके सेहो पुछलियै –आ अहाँ के की अइछ ? कामिनी हम ओकर मूँह तकैत रहलहुँ , किछु काल निर्निमेष । फेर फूर्तिस क्याम्प स बाहार निकललहुँ आ ओहि कम्पनी कमाण्डरके जोडस बजैलियइ आ कहलियै–आउ कमरेड, देखियौ , कामिनी जीविते अइछ । हँ , कमरेड। शहीद सब अमर होइत अइछ ।–ओ बाजल । गोर मूहँबाली मैथिलानी कामिनी क्याम्पकद्वार पर स हमरा देखि रहल छलिह । आ हम देखि रहल छलहुँ क्याम्पक आगू मे फर्फराइत ललका झण्डाके मैथिलानी कामिनीके आ एम्हर ओम्हर गतिशील आ पुनः लयबद्ध होइत जनसेनाके पंक्ति सबके । हमर सहायक धीरे स बाजल–शाही सेना मे मरबलामे एकटा हमर सबहक कम्पनी कमाण्डरक जेठ भाय से हो छल । आब हमर दृष्टि ओहि कमाण्डर पर स्थिर छल । ओकर आँइखक गँहीर उदासीक अर्थ आब हमरा लाइग रहल छल । ललका झण्डा अकाशमे र्फफराइए रहल छल, आस्था मन मे आर गँहीर भेल जा रहल छल । आ विश्वास पर एकटा आओर ईट रखा गेल –टुटली मरैया सके जीत निश्चित अइछ । २ कपिलेश्वर राउत कथा- सलाह फागुन बीत रहल छल आ चैतक आगमन भऽ रहल छल। समए तेहन ने बीकट जे बातरस बलाक लेल बर उकरू छल। फागुन चैतमे जेहने गर्मी तेहने हार तक डोलवेबला जार। तेँ ने एकटा कहावत छै जे एकटा ब्रह्मण गाए बेचि कऽ चैतमे कम्बल खरीदने रहथि। तेहने समए अहू बरि छल। बातरसोकेँ जन्म एहने समएमे होइत छै। िकसुनकेँ बातरस जागि गेल छले जहिसँ बेचारा अफसियांत छल गाम घरक डाक्टरसँ लए कऽ दरभंगा तकक डाक्टरसँ देखौलक मुदा, बीमारी ठीक नहि भेलैक। बातरस आव गठियाक रूप धऽ लेलकै। उठवैसँ लए कऽ खेनाइ-पिनाइ तकमे असोकर्य होमए लगलेए। एक दिन परोसी-वालगोविन्द कहलकै- “हौ िकसुन, तोरा देख कऽ हमरा बर दया उबैत अछि जे ऐहेन धुआ-कायामे ई की भऽ गेलए। हमर विचार अछि जे बेटा दिल्लीमे छहे ओतइ जा कऽ एक बेरि देखा आबह।” िकसुन बजला- “ठीके कहै छह भाय, दू-चारि दिनमे चलि जाएव।” दिल्ली जा कऽ एम्स असपतालमे जॉंच करा कऽ एक महीना दवाइ खेलक िकछु असान भेल। गाम चल आएल। गाम आवि कऽ जखन दवाइ खाए तँ दवाइ जखन तक असर रहे ताबे तक ठीक रहै आ जखन दवाइक असर खतम भऽ जाइ तँ वीमारी बढ़ि जाइ। बेचारा असोथकित भऽ, असमंजसमे दलानपर बैसल छल िक सुमन जी जे गामे स्कूलमे मास्टरी करैत छला। ओही टोल दऽ कऽ अबैत छला आिक नजरि किसुन दिस गेलनि। कुशल पुछलखिन बेचारा झमानसँ खसल। धूर हम िक अपन कुशल कहब। हम तँ वातरससँ हरान छी। सुमन जी बोल भरोस दैत कहलखिन- “अहॉंक बेमारी ठीक भऽ जएत। हम जना कहैत छी तना-तना करू आ आयुर्वेदिक दवाइ बता दैत छी से करैत रहू बीमारी ठीक भऽ जाएत।” बेचारेकेँ कतोसँ प्राण एले। कहलके- “एतेक केलौं तँ एकबेर इहो अजमएव।” सुमनजी बजला- “हम जना-जना कहै छी तना-तना करू। सीधा भऽ कऽ बैसू एक नम्बर पएर पसारू आ अंगुरीकेँ मोरू आ सोझ करू। दोसर पाएरक पंजाकेँ अंगुरीकेँ मोरू आ सोझ करू। दोसरक पंजाकेँ आगॉं झूकाउ आ सोझ करू। आब दुनू पाएरकेँ सटा कऽ गोल कए कऽ घुमा, पॉंच बेरि एक मुँहेँ तँ पॉंच बेरि दोसर मुँहे।” चारीम- जॉंघमे हाथसँ गहुआ लगा कऽ छावाकेँ जना साइिकल चलबैत छी तना चलाउ उपरसँ नीचॉं मुँहे आ नीचॉंसँ उपर मुँहे इहो पॉंच बेरि। आ हे याद राखब रीढ़क हड्डी सीधा रहक चाही।” पॉंचम- क्रमश: ३ कुमार मनोज कश्यप ईमानदार ओ मंत्रालय मे संयुत्तᆬ सचिव आछ । जतबे ओ कंर्तव्यनिष्ठ, स्वप्नदर्शी, अनुशासनप््रिाय आ सहयोगी मानल जाईछ ओहि सँ एकंो मिसिया कंम ईमानदार नहिं। सिविल सोसाईटी मे ओकंर गुणकं दोहाई देल जाईत छैकं ़़़़ पोलिटीकंल सर्किल मे ओकंर कंार्यक्षमताकं चर्चा भेल कंरैछ । अपन मंत्री के तऽ ओ मुँहलगुआ बनि गेल आछ़़़क़ंोनो कंटिन सँ कंठिन कंाज हो ओकंरा लेल सामान्य़़़़क़ेहनो जटिल समस्या हा े; ओ ओकंरा लग ओकंर समाधान चुटकंी मे तैयार ़़़क़ंोनो बातकं नकंारात्मकं जवाब तऽ ओकंरा लग छलहिये नहिं । कंाज मे तऽ आगया-बेताल आछ ओ़़़़ऑफीस मे कंाज़़़़घर पऱ़़़हरदम कंाजे-कंाज । मंत्री लग बात उठलै जे विभाग द्वारा नियंत्रित केंद्रीय योजना अपेक्षित परिणाम देबा मे समर्थ किंयैकं नहिं भऽ रहल छै ? समस्या समाधान हेतु स्वभाविके सचिव आ मंत्री के ध्यान ओकंरे दिस गेलैकं । ओकंरा भार देल गेलैकं - ' समस्या के अध्ययन कंऽ कंऽ एकं महिना मे योजना के दुरूस्त कंरकं उपाय सुझाऊ ।' ओ अपन मिशन पर लागि गेल़़़़रिपोर्ट बनेलकं, प््रोजेंटेशन केलकं । सार तत्व ई जे योजना के ठीकं सँ लागू नहिं हेबाकं कंारण छैकं ब्लॉकं आ जिला स्तरकं आधकंारी-कंर्मचारी के योजना के बारे मे अल्प किंवा अग़्यानता । ओकंर सुझाव छलैकं जे जौं जमीनी-स्तरकं कंार्मिकं सभकं क्षमता-निर्माण कंयल जाय तऽ एहि योजनाकं कंी ; सभ केंद्रीय आ राज्य योजना के सफलता सुनिश्िचत बुझु । सुझाव नीकं छलैकं़़़़मंत्रीजी तऽ एतेकं भावविह्वल भऽ गेलाह जे ओकंर पीठ ठोकिं कंऽ शावासी देलखिन । तत्कंाल आदेश भेलैकं जे ओ अपन कंार्य-योजना पर आगू बढ़य । एहि हेतु साधनकं कंोनो कंमी नहिं होमय देबाकं आश्वासन मंत्रीजी देलखिन । ओ आगू बढ़ल । सभ सँ पहिने अपन प््रिाय आधकंारी आ कंर्मचारीकं एकंटा टीम बनेलकं । तकंरा बाद एकंटा गाईड-लाईन मंत्रीजी सँ अनुमोदित कंरेलकं जाहि मे पाँच लाख तकं के राशि स्वीकृत कंरबाकं आधकंर संयुत्तᆬ-सचिव स्तर के आधकंारी के छलैकं । पेᆬर ओ देशकं चारू क्षेत्र मे चारि टा संसाधन-केन्द्र बनेलकं जाहि मे ओकंर परिचित यूनिवर्सिटी-प््राोपेᆬसर, रिसर्चर आदि सभ शामिल कंयल गेलैकं । संसाधन-केन्द्र सरकंार सँ प््रााप्त अनुदानकं दस प््रातिशत अपन स्थापना पर खर्च कंऽ सकैत छल जाहि मे वेतन, यातायात, कंम्प्यूटर सहित अन्य खर्च शामिल छलैकं । प््राति क्षेत्रिय सेमीनार तीन लाख रूपया आ राष्ट्रीय हेतु सामान्य खर्च सीमा पाँच लाख छलैकं जे परिस्थितिवश बढ़ाओल सेहो जा सकैत छलैकं । एहि सभ लेल संसाधन-केन्द्र सभ के सालकं शुरूहे मे दू-दू कंरोड़ रूपया बाँटि देल गेलैकं । ई रूपया खर्च भेला पर ओ सभ उपयोगिता-प््रामाणपत्र दऽ कंऽ आओर रूपया माँगि सकैत छल । ओकंर सर-वुᆬटुम्बकं आनो आन लोकं सभ जोगाड़ लगा कंऽ संसाधन-केन्द्र मे अपन नोकंरी पक्कंा केलकं । अपन लोकं के कृतग़्य कंरबाकं यैह तऽ मौकंा छलैकं ओकंरा । संसाधन-केन्द्र सभ के कंार्यशाला, सेमीनार, सम्मेलन आदि आयोजित कंऽ कंऽ ब्लॉकं, जिला, राज्य स्तर के कंार्मिकं सभ के प््राशिक्षण आ जागरूकं कंरकं छलैकं । केन्द्र सभ के एहि तरहें अपन कंार्य-व्रᆬम कंरकं छलैकं जे सभ शनि आ रवि कंऽ कंतहु ने कंतहु कंार्यशाला वा सेमीनार वा सम्मेलन होईतैकं । एहि हेतु ओकंरा सभ के अपन वार्षिकं-कंार्यव्रᆬम पहिनहिं अनुमोदित कंरेबाकं व्यवस्था छलैकं । संसाधन-केन्द्र सभकं बीच मे नीकं ताल-मेल बनेबाकं लेल व्यवस्था छलैकं जे ओ व्याख्यान, प््रास्तुतिकंरण आदि हेतु दोसर संसाधन-केन्द्र सँ साधन-सेवी सभ के आमंत्रित कंरय । ओ (संयुत्तᆬ सचिव) तऽ अपने बड़ पैघ साधन-सेवी छल ़़़़ ओकंरा अतेकं योजना के बारे मे कंकंरा बुझल छलैकं । तैं ओ सभ कंार्यशाला, सेमीनार आदि मे आमंत्रित होईत आछ । नियमनुसार प््राति व्याख्यान ओकंरा दस हजार रूपया सेहो भेटैत छैकं । ओहदा अनुसार एबा-जेबा एवं रहबाकं व्यवस्था अलग सँ । गरीबी दूर कंरबाकं योजना पर विचार-विमर्श पाँच-सितारा होटल सभ मे होईत छैकं - एहि पर किंछु मीडीया मे चर्चो होईत रहलैकं । ओ संसाधन-केन्द्र के प््राधान सभ के एकंटा मिटींग बजेलकं आ सुझाव देलकै जे कंार्यशाला सभ मे स्थानीय पत्रकंार सभ के सेहो बजाओल जाय । आखिर एहि मे कंोन दिक्कंत- ओ सभ लंच कंरत आ एकं-एकं टा बैग लेत - सैह ने ? मुदा फायदा तऽ देखू - ओ सभ हमर कंार्यव्रᆬम के प््राशंसा कंरत आ नीकं मीडीया कंवरेज भेटत । आब सभ खुश आछ । डॉ. शंभु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। जेठ आ पूस जेठ 10 हजार टका जमा केनाय रामदीनक लेल पहाड़ तोड़’ सन कठिन काज छलैक मुदा ओ बेचारा कओ की सकैत छल? जँ ओहो बुचकुन माँझी जकाँ अपन बेटीकेँ जनम लेतहिं खैनी चटा कए मारि दितै तँ आर गप्प रहितैक। ओ तँ बड़ जतनसँ ओकरा पालि-पोसि पैघ केने रहए से आब ओकर बियाह करबाक लेल दहेज-दानवक क्रूर सपना तँ ओकरा पूरा करहि पड़तैक। ओहो धून केर पक्का लोक निकलल, गामक बीचोबीच बनएवला नव सड़कक लेल ओ हथौड़ा सँ दनादन-दनादन पाथर तोड़ि गिट्टीक ढ़ेर लगौने जा रहल छल। ओ भरि दिनमे तीन-चारि बेर अपन धोतीक गेंठ सँ टका निकालए आ गनए— एक, दू, तीन.....। बस कोनहुँ तरहेँ 3x15 केर एकटा आर ढेरी भ’ जाइक तखन तँ.....। लोग सभ कहैक जे रामदीन पागल भ’ गेल छैक तखनहि तँ जेठक एहन दुपहरिमे ओ अपना-आपकेँ जरा रहल अछि! मुदा रामदीन ककरहुँ बातक कोनहुँ जबाब नहि दैक, बस मोनहि मोन कहैक—‘औ लोकनि! एहि समाजमे जिनका किनकहुँ हमरा सन कुमारि कन्या छनि तिनकासँ पुछऔन्हि जे बेटीक बियाहक लेल जेठक ई दूपहरि केहन शीतलता दैत छैक?’ पूस हौ दैब, हौ दैब! एकटा बाछीक कारणेँ ओ सभ हमरा बेटीक हत्या क’ देलक। रामदीनक घरवाली जोर-जोरसँ अपन छाती पीटैत छलीह। बगलमे ठाढ़ रामदीनक 10 बर्खक बेटा हक्का-बक्का भ’ कए ठाढ़ छल। अपन बहिनक हत्यारा सभकेँ सबक सिखएबाक लेल पूसक ओहि सर्द रातिमे ओकर खून खौलैत रहैक। सौदागर सभदिन साँझकेँ ओ अपन दिनभरिक कमाइ केर हिसाब-किताब करैत छल आ भोजन-भातक पश्चात् जखन ओ अपन ओछओन पर जाइत छल तँ एकबेर ई अवश्ये सोचैत छल जे ओकर ई धन्धा अनैतिक छैक, मुदा सभदिन एहि प्रश्नक जवाबो ओकरा एक्कहि रंगक भेटैक— पाइ कमेबाक लेल सभकिछु उचित अछि। ने जानि ओकरा सन प्रतिभावान ओ मेधावी लोक एहन धन्धामे कोना आबि गेल। ओ सुन्नर-सुन्नर युवती लोकनिकेँ टकाक लोभ देखा फँसबैत छल आ शहरक नामी-गिरामी होटलक मालदार ग्राहक धरि पहुँचबैत छल। सभक लेन-देन केलाक पश्चात् ओकर जे कमीशन बनैक ओ राशि लगभग 3,000 सँ 3,500 धरि प्रतिदिन भ’ जाइत छलैक। संक्षेपमे ओकर महिनवारी आमदनी लगभग 1 लाखक लगधक पहुँच जाइत छलैक जकर उदाहरणों ओ प्रस्तुत केने छल। पछिले साल ओ अपन एकलौती बहिनकेँ अपन शहर सँ बहुत दूर एकटा महानगरक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजमे जथगर डोनेशन द’ कए नाम लिखवा देने छलैक। आइ साल भरिक पश्चात् ओ अपन बहिन सँ भेंट करबाक लेल ओहि शहर पहुँचल छल। अपना-आपकेँ ओ एकटा बिजनेसमैन बुझैत छल से एहु शहरमे अपन धन्धाक संभावना ताकबाक हेतु ओ निकलि पड़ल। बेस छानबीन केलाक उपरान्त ओकरा एहि शहरक एकटा उच्चस्तरीय वेश्यालय केर पता लागलैक। सौदा तय करबाक क्रममे ओकरा ओतुका दलालसँ कहासुनी भ’ गेलैक। दलाल कहैत रहैक— औ जी! अहाँकेँ अपन देहक लेल एकटा देह सैह चाही ने! तखन फेर ओकर चेहरा आ बोलीसँ अहाँकेँ कोन मतलब? जँ मंजूर होअए तँ.....। ओ एक-एक क’ कए सभक गदराओल देहक तजबीज करैत छल। ओहिमे सँ एकटा देह पर ओकर नजरि ठहरिए नहि रहल छलैक.....ओ इशारा केलक.....हे ई.....। युवतीक चेहरा पर नकाब रहैक। एतबो धरि स्पष्टे छल जे ओ सेहो अपना समक्षक लोककेँ नहि देखि सकैत छलीह आ मुँह तँ किओ खोलिए नहि सकैत छल। कहबाक तात्पर्य जे दुनूक बीच केवल स्पर्शक एहसास हेबाक रहैक। .....सी.....सी..... अलबत्ते ई आबाज दुनूक मूँहसँ एक्कहि सँग बहरेलैक। दुनूक देह आब निष्क्रिय भ’ गेल रहैक मुदा दिमागमे बिजुरी चमकैत रहैक। दुनूकेँ एक दोसराक आबाज जानल-पहिचानल लागलैक। अन्तर्द्वन्द्व एतेक बढ़ि गेलैक जे ओ युवती उनटा मुँहें ठाठ भ’ कए अपन नकाब उठा एनाक परछाँहमे अपन सौदागरक चेहरा देखिए लेलकैक। क्षणहि भरिमे सौदागर सेहो अपन बहिनकेँ चीन्हि गेल। ने जानि दुनूमे सँ के अपना-आपकेँ पाथरक सदृश कठोर होइत अनुभव केलक! गरमी -बाबूजी, अहाँ हमरा कॉन्वेन्टमे किएक पढ़ा रहल छी? -किएक तँ हमरा मुन्नाकेँ पढ़ि-लिखि पैघ लोक बनबाक अछि तेँ। -मुदा सौम्या तँ कहैत छलीह जे ई स्कूल खाली पैघ बापक धिया-पूताक लेल छैक? -नहि बेटा, हुनका बात पर अहाँ ध्यान नहि दिअ, जँ एहन रहतैक तँ अहाँक नाम फादर लिखतथि? बाजू! -अपन घरक सोझाँ उतरैत प्रतीक बाजलाह—बाबूजी, बाबूजी, आइ बहुत जोरक शीतलहरी छैक, चलू घरहिमे आराम करब। एहनमे सवारियो तँ नहिए भेटत। -नहि बेटा, एखन हाट-बजारक समय छैक, दूइयो चारिटा सवारी तँ भेटिए जाएत, अहाँ घर जाउ। हम जँ काज नहि करब तखन हमरा मुन्ना राजाक लेल किताब-कॉपी ओ महग ड्रेस सभ कोना आओत? आ हमरा जाड़ लगितो कहाँ अछि? हम जखन उचकि-उचकि कए रिक्सा चलबैत छी तखन अपनहि देहमे गरमी आबि जाइत अछि। -अहाँ फूसि बाजि रहल छी बाबूजी, उचकि-उचकि कए रिक्सा चलएलासँ गरमी नहि अबैत छैक, घूस लेलासँ गरमी अबैत छैक। आइ भोरमे सौम्याक माय सेहो बी.डी.ओ. अंकलकेँ ऑफिस जेबासँ मना केने छलीह मुदा ओ कहलनि जे— आइ पच्चीसटा लोककेँ इंदिरा आवासक पाइ भेटबाक छैक, सभसँ हमरा 500 सय टकाक दरसँ घूस भेटएवला अछि, तखन ने मुट्ठी गरम रहत? -एहिबेर रामदीन बिन किछु बजनहि अपन रिक्सा आगू बढ़ा लेलथि आ मोनहि मोन सोचय लगलाह— हँ बेटा, गरमीएक परिभाषाकेँ बूझबाक लेल तँ हम अहाँ केँ पढ़ा रहल छी। कामिनी कामायिनी अप्पन राज्य खल्वाट माथ व्यथित चित्त राज सिंहासन सॅ उठि बेचैन भाव सॅ इम्हर आेम्हर बूलैत़ दूनू हाथ पाॅछा बन्हने ककाजी के फिरीशानी सॅ आेत्तय उपस्थित सब कियाे फिरीशान सब हक आॅखि हुनके मुॅह प’ गङल ।कएक घंटा सॅ चलि रहल छल इ घमरथन मगजमारी़ ।काेनाे प्रस्ताव प’ कखनाे कियाे बिदकि जाए त’ कखनाे किनकाे आॅखि भाैं चमकए लागै ।किछु लाेक त’ विशेष गरमागरमी देखाक’ तमैक क’ पङाइयाे गेल छलाह । क़ि छु के हॅकार प’ हकाॅर पठाआेल जा रहल छलैन्ह तैयाे नै टघरलाह । प्रजातंत्रक जादुइर् शक्ति सॅ लैस आेही प्रकांड विद्वान लाेकनिक मध्य पैसिक’ अपन ग्रामीण के ननिहरक पा्रेफेसर साहिब उर्फ ककाजी के समस्या किछु सरल करबाक काेरसीस करै लेल नहुॅ नहुॅ बजलहुॅ ‘शिक्षा लेल फुद्दी बाबू सवाेर्त्तम बङका कआेलेजक माननीय प्राेफेसऱ कत्तेक रास पाेथी सेहाे लिख चुकल छथि आ’ जनता जनार्दन सॅ स्वस्ति सेहाे लै आयल छथ़ि तखन ।’आे बूलैत रहला एकदम गुम्म ।हम हुनक पाॅछा पाॅछा ।किछु काल में कनि झटकि क’ आे बाम कात क’ रेशमी परदा बला द्वार खाेलि काेठरी में पैसि दरवज्जा बन्न करि लेला “इ त ताैं उचित कहि रहल छ मुदा अहि चुनाव में त’ सात सात टा परफेसर जीत क’ एलाहैं सबहक अपन अपन डाेली खाेबी सब क़त्तेकाे पाेथी छपाैने छथि आ’ सबके इयह विभाग चाही ।तखन ।’ ‘तखन की ।’ “राम खेलाैनक नाम प’ ककराे आपत्ति नहिं बूझि पङि रहल छै ।’ “रमखेलाैन ’हम अकचकैलियै ‘आे कत्त के प्राेफेसर ।हमरा जनितब त’ बी ए कहुना चीट पुरजा सॅ पास केने आेहाे थर्ड डिविजन स्त्री पत्रिका सरिता गृहशाेभा़ आदि पैढ पैढक’ राजनीति के ककहरा जानबाक काेरसिस कएल ।’ ‘हॅ हाै से सब त’ शत प्रतिशत सत्य छैक मुदा आयकाल्हि आेकरे सबहक राज्य छै देखहक़ केहेन पैघ बहुमत सॅ जीत क’ आयल अछि ।दाेसऱ बङका जाति जकाॅ घमंड सेहाे नहिं सबहक मूॅह ठाेर पकङने रहैत अछि ।’ ‘फरिछा क’ कहु नै जे दशद्वारी छै बराे के माए कनियाे के माए़ जत्तए काेउ नृप हाेहूॅ हमें का हानी़ बला खिस्सा छै़ आेहिठाम आे घरे घर जा क’ सबहक माेन जीत चुकल अछि ।आेना इहाे सूचना अछि जे चाेरी चपाटी में सेहाे आे विशेष पारंगत कआेलेज में पढनाय सॅ बेसी आेकर धियान काॅमन रूमक सामान चाेरेनाय में छल़ आे हाे टेनिसक टेबुल एत्ते पैघ समान से धरि गायब करि देने छल ।’ ‘इ सब गप बाजय बला नहि छै़ ताैं बेवकूफी नै करहक आे अहि पार्टी के एकटा मजगूत हाथ छै काेनाे दलके पूर्ण बहुमत त’ छै नै तखन सबके मिला क’ गाङी हाॅकबा के छै’।” “आ’ आे जे सभा मध्य में रूपकुमरि आसन ग्रहण केने बैसल छथि हुनका काेन इन्द्रासन प’ बैसेबा के माेन बनाैने छियै ।” हमर इसारा ब्ूाझि ककाजी कनी बिहुॅसला ।हुनक थाकल झमारल मुख मंडल प’ प्रथम बेर सलज्ज भाव सॅ ऊर्जा के प्रवेश भेल छल आ’ आे कनी ताेतराति कनी हकलाति बजला ‘आेत आे त स्त्री कल्याण विभाग़ ।’ जखन सब किछु निर्णय लइये चुकल छी त’ घाेषणा करय में विलंब कियेक़ ।शीघ्र एकटा समस्या त’ घटत।’ “हेऽऽ्ऽऽ् एना उधियेला सॅ बाैआ काज नै चलै छै ।कनि थमि जा ऽऽ ।देखहक राजनीति के शतरंजी चालि ।’ हुनक मुॅहक काेमल भाव द्रुत गति सॅ बदलि गेल रहैन्ह आ’ काेच सॅ उठि पुठि क’ काेठरी सॅ बहराइत फेर सॅ अपन सिंहासैन प’ आबि बैसला । “अपने सब की अथ उथ में पडल छी बजियाै किछु आखिर नब राज्यक गठन भ’ रहल छै।” ककाजीक कठाेर अध्यादेश सुनि कंटीर बाबू साेझाॅ टेबुल प’ राखल बङका टाके कटाेरा सॅ रसगुल्ला निकालि चम्मसे सॅ मुॅह में रखला आ’ मिचङा मिचङा क’ लगला बाजै ‘एतेक शीघ्र काेना भ’ जेतै इ समाधाऩ कत्तेक सूझबूझ देखबए पङतै जाहि सॅ जन प्रतिनिधि असंतुष्ट सेहाे नहिं हाेबैथ आ’ एकटा सबल मंत्रि परिषदक गठन सेहाे भ’ जाए ।’ उपस्थित जन अहि प्रस्ताव के बङ प्रशंसा करैत एगारहम बेर रसगुल्ला प’ झपटल रहैथ । विवादित शिक्षा के एक दिस टरका क’ दाेसर विषय प’ विचार विमर्श प्रारंभ भेल ।दाेसर सबसॅ जटिल प्रश्न छल स्वास्थ ।इहाे शिक्षे जकाॅ विवादक शिकार हाेमए लगलै़ करीब करीब आठ टा डाक्टऱ एक टा नैचराेपैथ चुनि क’ आयल छलाह आ’ सब के सब स्वास्थ विभागक लेल कच्छा पहिर मल्ल जुद्व में भिरल । आ’ राति भरियाति देखि सभा’ दाेसर दिनक बैसारी के आसरा में अनिर्णित समाप्त करि देल गेल छल । सब गेाटे के स्वस्थान प्रस्थानक पश्चात हम ककाजी सॅ निवेदन करैत कहलयिन्ह ‘इ छाेट राज्य बना क’ भारत सरकार अपन फिरीशानी सुरसा के मुॅह जकाॅ बढा रहल अछि ।कि अहि सॅ राज्यक विकास संभव छैक ।आ’ भ्रष्टाचार जङ समूल नष्ट भ’ जेतैक ।’ ककाजी टेबुल प’राखल साेनक पनबट्टा उठा आेहि सॅ मगही पान क’ डबल खिल्ली निकालि कल्ला तर राखैत कनि लटपटाइत स्वर में बजला ‘आजुक समय छाेट राज्यक डिमांड करै छैक ।’ ‘ स्वतंत्रता सॅ पूर्व त’ भारत में छाेटे राज्यक चलन छलै़ पाॅच साै पैंसठ राज्य़ तखन किएक सरदार पटेल के सुदृढ केन्द्र बनब’ लेल एकीकरणक मार्ग अख्तियार करए पडलै ।’ हमर अहि प्रश्न पर कुरसी के कात में राखल पिकदानी में पीक फेकैत बजला ‘सेऽऽ््््ऽ्ऽऽ्त आेकरा पाछाॅ दाेसर कएक तरहक तर्क छलै़ आ’ आेही समय वएह परम आवश्यकता रहल हेतैक ।’ ककाजी के’ राजनीति के बङ गहीङ अनुभव सत्त कही त’ आे चाणक्य छथि ।मुदा समयक निर्दय हाथे थकुचायल कहियाैन्ह समय आ’ परिस्थिति कहियाे संग नहिं देलकैन्ह त’ अपन प्रकांड विद्वता आ’ सर्जनात्मक क्षमता समाजक समक्ष रखबा में बङ देर लागि गेलैन्ह़ मुदा प्रजातंत्र में देर अबेर त’ हाेइते रहै छै़ ।कत्तेकाे चुनाव निर्दलिए भ’ लङल ।पाटी में आबि इ पहिल विजय छलैन्ह । तखन शनैः शनैः उमिर सेहाे बढैत रहलैन्ह आ’ अजाेध नेता सबहक पाॅति में आे अग्रगण्य ग्रह नक्षत्र सबटा अनुकूल़ अहि चुनावक’ जीत हुनके नेतृत्वक नाम प’ भेल छलैन्ह़ आने की पहिने सॅ मुख्य मंत्री के कुरसी रिजर्व । गप्पे गप में राज्यक राजधानी के विषय में चर्च भेलै़ त’ कहलैन्ह जे दङिभंगा के छाेङि आर काेन शहरि के डाढ में एतेक दम छै जे राजधानी कहाति ।’ ‘मुदा शहर त’ बङ गंदा छै़ चारूकात उभचुभ करैत नाला के गंधाति पानि प’ जखन सूरूजक कीरन पङै छै त’ लगै छै फराक सॅ जेना ग्रेनाइट वा मार्बल्सक’ टाइल्स लागल हाेए टावरक चारूकात गंदगी़ अनकंट्राेल्ड टै्रफिक़ जतए ततए थूकैत़ नरगैाना पैलेस के देवार धरि नहि छाेङने पानक प्रेमीसब़ ।आ’ टीसन देखलियै दरिभंगा के रतुका गाङी सॅ जखन आबै छी पटाेपट नीचा सॅ ऊपर बेंच धरि गुदङी चेथरी चिक्कट आेढने पङल मनुक्ख ।इ सूतनिहार सब के । जेकरा गाङी पकङबा के रहतै़ से एना निफिकिर भ’ क’ सूततै एकर समाधान त’ हेबाक चाही नै किछु़ ।’ ककाजी अकाश में चमकैत पूर्ण चान दिस तकैत कनि चिंतित स्वर में बजला ‘हाैऽ््ऽऽ सबटा समस्या के समाधान हेतैक़ शहरक सबटा राह बाटक साैंदर्यीकरण कएल जेतै़ ।नाला नाली झाॅपि झूपि क’आेकर काते कात फूल पाैध लगाएल जेतै ।महाराजक सबटा महल के सेहाे काया कल्प कएल जेतै ।टीसन के कात में ‘गरीब नमाज सबके लेल फराक सॅ माेसाफिर खाना बनाआेल जेतै अनाथालय वृद्वाश्रम सबटा बनतै ।’ ‘हॅ ककाजी अहि संग आेहिठाम लंगरक सेहाे व्यवस्था करबा देबै ।मुदा नियम बना देबै चारि दिन लगातार खेनिहार के जाैं आे अत्यंत वृद्व बीमार वा एकदम अपंग नहिं छथि त’ प्रतिदिन दू घंटा श्रमदान अवस्स करए पङतैन्ह ।आ’ अहि श्रमदानक तहत स्टेशनक आगू पाछू दूर दूर धरि सफाइर् कराआेल जेतै़ आेहिना अस्पताल सब में भाेजनक व्यवस्था करि चारू कात सफाइर् राखल जा सकैत अछि ।इ खेनाय के याेजना एकटा सक्षम आ’ ठाेस कदम हेतै़ जे काेनाे राज्य अपन गरीब जनता लेल निञ्ंा प्रारंभ कएने हाेयत ।’ ककाजी कनि मुॅह टेढ करि क’ हमर मूर्खता प’ मुस्कैत बजला ‘हाै ताेहर इ यूटाेपियन स्कीम लागू करबा में बङ दीक्कत हेतै़ दरिद्र राज्य छै़ जहाॅ सुनतै लाेक कि फाेकट में खेनाए भेटैंत छै़ हजारक स्थान प’ पाॅच हजार पहुॅच जेतै मुदा काज करबा काल त’ एकाे साै भेट जाए त बङका भाग्य कहबाक चाही ।पाछाॅ सॅ विराेधी पार्टी टीक पकङने ‘ वेलफेयर गवर्नमेंट के मतलब की फंड अहाॅ जन लुभावन काज में खरीच देबै़ ।उपर सॅ बेगार खटनाए के विराेध करबा लेल़ हजार टा नेता पेट भरिते मातर जनमए लगतै’ ।’ ‘मुदा अहि दिशा में प्रयास त’ कएले जा सकैत अछि ।’ “आब देखहक पहिने मंत्रि परिषदक गठन त’ माॅ जगदंबा के कृपा सॅ शुभ शुभ संपन्न भ’ जाए ।’ ‘से त’ भइये जेतै़ मुदा चाेर बनाेर के मंत्री नै बनेबै चाहे जे किछु भ’ जाए़ ।अपन राज्य बनि रहल छै राजा विदेहक किछु आदर्श त’ अवस्से स्थापित करबा के हेतै ।’ ‘मर्रऽऽ्््ऽ््् जीत क’ एलै हैं चाेर बनाेऱ आ’ मंत्री लेल घरे घरे जाकए ताकू इर्मानदार सत्यवादी राजा हरिश्चन्द ।जखन लाेक पंच बनै छै़ परमेश्वरक गुण आपरूपी आबि जाए छै़ ।’ ‘बेस़ तखन पडाेसिया काेडा में किएक नहिं परमेश्वरत्व एलै मूॅह में बकार नै़ लाेक त’ कहै छै एत्तेक शुद्व जेना गाय दिमाग में सेहाे टनक टन भूस्से भरल ।मुदा चारि हजार कराेङक गबन करि केहेन ध्वजा फहरा देलकै ।’ ‘आे अविकसित़ अशिक्षित पिछङल राज्य छै़ मुदा एत्तय लाेक बङ शातिर छाेटका माेटका गबन भले क’ लाैथ़ बङका डकारब बङ माेसकिल ।’ ‘माेसकील काेना़ ।’ बिनु राज्य बनने स्था नीय स्वशासनक नामप’ जेकरा जे फुरेलै कइये रहल अछि ।केन्द्र सरकारक याेजना सब देख लियाै हम आेहि गाम सबहक नाम नहिं लेब मुदा आंगनबाङी कार्यक्रमक कत्तेक मखाैल उङैल जा रहल अछ़ि सएह हाल नरेगा के छै ।’ ‘शहरि सिखाबे काेतवाली। हाै जखन अंगरेज भारत सॅ विदा हाेमय लगलै तखन आेकराे एहनेसन अंदेशा हाेइत छलै गंमार हिन्दुस्तानी बत्तै कत्ताे राजकाज हाेय ।मुदा भेलै की नहिं आब इहाे देखिह जे मिथिला के लाेक कत्तेक नीक सॅ विदेह राज्यक स्थापना करैत अछि ।’ अहि बेर गहींङ साॅस लेबाके बारी हमर छल ‘एक टा आदर्श राज्य बनेबा लेल अहाॅके समक्ष की ठाेसगर प्लान अछि ।’ “ढेर रास प्लेन अछि प्लेनक’ काेन कंम्मी़ पहिल त’ राजधानिए के विश्व स्तरक हेरिटेज सिटी जकाॅ बनाैल जेत्ते ।समस्त़़ गामक पाेखरिक उत्थान के संग भसियायल पाेखरिक निर्माण महाङ सब पक्का कैल जेत्ते़ लग पासम्ेंा इस्कूल़ जत्त’सॅ लाेक वेद पाेखरि प’ नजरि रखता अंत्याेदय कार्यक्रमक तहत बी पी एल बला सबके घरे घर शाैचालय बनाैल जायत जाहि सॅ आे सब चारूकात गंदा नै करै सस्ती राेटी के दाेकान फेर सॅ खाेलल जेतै ।धिया पुत्ता के अनिवार्य शिक्षा अनिवार्य हेतै भाेट देनाय़ संतति उत्पादन प’ कंट्राेल खेल कूद सेहाे अनिवार्य माेबाइल काेर्ट दरवज्जा प’ अदालत़ । माछ के राजकीय चेन्ह त’ नहिं बना सकैत छी मुदा माछ आ मखान के उत्पादन में त’ पुरकस जाेर लगैल जा सकैत अछ़ि पहिने पुरूखक उत्थान आे आलस तजि कर्मठ बनाैथ संगही संग स्त्री शिक्षा के कारगर बनैाल जेतै़ बेराेजगारी हटेबा लेल उद्याेग धंधा के बढैल जेतै ।’ ककाजी अहाॅक प्लेन त’ सर्वथा सार्थक़ वाह़ मन गदगदि करि देलहूॅ ‘आन्हर की चाही़ बस दू टा आॅख़ि ।हमरा त’ इर् बूझना पङि रहल अछ़ि सरिपहुॅ राजा जनकक राज्य कायम हाेमए जा रहल अछि ।फिलाेसाेफर किंग के चर्च सेहाे विश्व इतिहास में भेल अछ़ि अहाॅ के इर् पाकल उमीऱ पाेपल मुॅह आ’ जर्जर शरीर त’ अवस्से सदाचरणक पाठ पढबैत़ सत्यम वद़ धर्मम चर वा तेन त्यक्तेन भून्जीथा़ के शिक्षा दैत परमात्मा आ’ पराेपकार में मन वचन सॅ लागल रहए बला साबित हेतै़ ।’ अहि प’ नै जानि की साेचि क’ कनि रसिक भाव सॅ मुस्कैत बजला ‘से नै कह’ आब जाैबन के लाेक ययाति जकाॅ येन केन प्रकारेण जीत क’ ऋण पैंच लक’ जीवनक आनंद अंतिम क्षण धरि भाेगय लेल बेकल रहैत छै़ जुग वैराग्य शतक के नहिं श्रृंगार शतकक आबि गेल छै़ अखन आेहि स्वनाम धन्य उपराज्यपाल महाेदयक नाम की लेल जाए़ जे गुलगुल सङल पिचकल आम बनल छियासी बरीखक उमीर में राजभवन में मेनका रंभा ऊर्वशी सब संगे परम आध्यात्मिक सुख भाेगैत रंगल हाथे पकङल गेला़ ताहि सॅ उमीर प’ नहिं जा कदाचरणक काेनाे बयस नहिं हाेय छै ।’ हम चुप्प हाथ सॅ जेना ताेता उङि गेल ।कका अपन श्रीमुख सॅ जखन अहि संभावित पक्ष के उघारि क’ हमरा साेझाॅ राखि देला तखन फेर बाॅचल की़ आब़ । आेना एखन हुनक उमीर त’ सत्तरिए बरख छेन्ह़ ।हम अपन गप के एना बीच्चे में बजारिक पराजय स्वीकार करि ली से त’ सुभाव आ’ संभव नहिं ।अपन दिश सॅ मक्खन लगबैत हुनक चारित्रिक गाैरवक गुणगान करैत आगाॅ बढलहुॅ । ‘जे नन्हू से गर्भहिं नन्हूॅ अंगरेजाे सब कहै छै’ मानिंर्ग शाेज द’ डे’ अपनेक त’ चरित्र के इर्मानदारी के ध्वज एखन धरि फहरा रहल अछ़ि पाइर् पाइर् के लेल तरसैत गिरहस्थी सॅ आखीर तंग आबि मटिया तेल सॅ अपन शरीर सिक्त करैत एक टा लुत्ती के बल प’ काकी अहाॅक’ संग की दुनिए सॅ विदा भ’ गेलथ़ि त’ आब अहाॅ की पथ भ्रष्ट हाेयब ।’ ‘पहिने इर् बताब जे ताैं हमर प्रशंसा करैत छ वा हीनताय ।’ “केहेन गप करैत छी इर् त’ अहाॅक चारित्रिक बलक प्रशंसा अछि ।संसार में लाेक जतेक प्रकारक पाप छल प्रपंच दुष्कर्म करैत अछ़ि आे सब गिरहस्थिए के आङ में ।आ’ ताहू काल अहाॅ नै डिगलियै़ भीष्म पितामह जकाॅ अडिग रहलियै़ एकरे कहल जाए छै न’ चारित्रिक बल ।’ “ताहि समय हम छलियै की़ भाखा के एक टा प्राेफेसर आेहाे एफिलिएट काॅलेज में दरमाहा छाै छाै मास धरि बन्ऩ डिगतियै त’ आखिर कथि प’ कि कआेलेजक संस्थापकक घेंट काटि लेतियैक़ कि विद्यार्थी सबहक घर में डाका पाङितियैक़ लिखेत रहलहूॅ किस्सा पिहानी जीबनक़़ तपैत राैद में बसि क’ मधुर रसक’ ।मुदा तकराे पाय घरे सॅ लागै़ क्षेत्रिय भाखा के लेखक के वाहवाही आ लाेकक करतल ध्वनि तॅ भेट जायछै मुदा द्रव्यक प्रश्न प’ सब कियाे ठगि लैत छै़ केकर केकर नाम गिनबिय़ आेहि दारूण दुखक वर्णन करैत़ । आब भगवति के कीरपा सॅ पाॅवर एलै है त’ देखहक़ कहबी छै जे पाॅवर करप्ट एवरी बडी़ ।’आ’ बङका टा के रहस्यमय चुप्पी । हमरा आब अपना आप प’ बङ ग्लानि हाेमय लागल छल ।राजनीति में आबि बुढापे में इर्हाे अपन मटकूङी आगि प’ साेनहा क’ रखने छथि ।आने आय धरि जे लाेक हिनका इर्मानदार बूझल़ सब परम भ्रम में जीबि रहल छल । रहल नै गेल आगाॅ बढि क’ अपन चुप्पी ताेङैत बजलहूॅ ‘सत्तरि बरखक अवस्था में सुकरात अपन सिद्वांत लेल सत्ता सॅ भीङ गेलै विषपान करि लेलक मुदा अपन संगी हित चिंतक सभक देश छाेङबा के़ जेहल सॅ पङेबा के आग्रह हार्दिक अनुनय विनय के़ ठाेकर मारि देलकै़ ।आेहाे त ‘एकटा एहेन उदाहरण प्रस्तुत क’ देलक जे आए धरि लाेकक ह्दय प्रदेश में बसि क’ असीम श्रद्वा सॅ आेकरा अमर रखने छै़ ।’ ‘ हे़ सुनि लिए कान खाेलिक’ हम नै सुकरात छी़ आ’ नै बनब चाहै छी ताैं बनिह़ ।’आे पीत्ते आन्हर हाेमए लगला । गप के आन दिस जाइत देखि हम अविलंब चारू कात सॅ घेर घारि क’ लक्ष्य दिस बढेलहुॅ “खैर आे सब त’ बादक गप छै़ मुदा ‘ “अपन राज्यक” रूपरेखा लेल अहाॅक’ आलेख त’ बङ दमदाऱ बङ तथ्य पूर्ण छल़ आ’ सुनबा में आयल जे प्रधान मंत्री सेहाे अहि सकारात्मक प्रस्ताव’ के बङ सराहलन्हि । ‘ आब आे कनि तनाव रहित नजरि आैलाह़ ‘हाै जखन राम राज्यक परिकल्पने करबा के छै़ त’ लिखनम की दरिद्रता आ’ कवि आ’ लेखक सॅ बेसी कल्पना शील प्राणी आर के हाेइत अछि ।’ * * * * श्रीमान भेारका एक’बार हाथ में नेने भभा क’ हॅसि उठला । हुनका हॅसैत देखि हमराे हॅसि निकलि गेल छल ।कनी चाैंकैत़ एक’बार सॅ मुॅह निकालिक’ प्रस्नवाचक दृष्टि सॅ हमरा हेरैत बजला ‘ताैं किएक हॅसलऽ’।हम बङ विनम्र भ’ कहलियैन्ह ‘अपने के हॅसैत देखि हमराे हॅसी बहरा गेल ।’ ‘मुदा हम त’ अपन रतुका स्वप्न प’ हॅसी रहल छी ।’ हुनक आॅखिक प्रश्न आब शंका में बदैल गेल छल । ‘हमहूॅ वएह साेचि क’ हॅसि रहल छी ।’हमत’ अपने मगर मच्छी खाल के । ‘हॅ तहॅु आेहि स्वप्न में उपस्थित छलऽ मुदा ताेराे काेना आे सपना अयलह ।’ “ नहिं नहिं हमरा त’ अहाॅक संग चलल विस्तार पूर्ण रतुका वार्तालाप माेन पङि गेल अपन राज्यक गठन करबा के त’ भेल जे आेहने साेहनगर स्वप्न देखने हैब ।’ अहि प’ आे’ खूब जाेर सॅ ठहाक्का लगाैलथ़ि आ’ हमहूॅ संग दैत साेझा टेबुल प’ राखल भफैत चाह पीबऽ लगलहुॅ । “जाैं आबए बला चुनाव में हम जीत गेलहूॅ त’ ताेरा अवस्स अपन स्ेाक्रेटरी बनैब। ‘आे विनाेदक मूड में आबि गेल छलाह। ‘एहेन काज जूनि करब़ विगत में एकटा चचा अपन स्ेाक्रेटरी बनल भातीजके’ लंका में विभिषन कहि पद प्रहार करैत अपन घर सॅ निष्कासित क’ चुकल अछि ।’ आ’ अहि हॅसी ठठा में अपन राज्यक गप बुढिया के फुइस जकाॅ हवा बसात में उङि विलुप्त भ’ गेल छल । १.प्रकाश चन्द्र- पोथी-समीक्षा २.बिपिन झा-मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस १ प्रकाश चन्द्र नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, - भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01 पोथी-समीक्षा जहिना विद्यापतिक बिना मिथिलाक परिकल्पना केनाई असभंव भ’ गेल अछि ओहिना विद्यापतिक रचना संसार हुनक श्रेष्ठ गद्य रचना पुरुष परीक्षा क बिना हुनकर अधूरा अछि । एहि सँ पहिने एक बेर हम मलंगिया जीक संग मैथिली अकादेमी, पटना गेल रही आ ओही ठाम पुरुष परीक्षा किनलहु । मुदा, ओहि समय भाषाक जटिलता आ एकर गद्य रूप बेसी आकर्षित नए केलक । बाद मे पढल जायत ई सोचि किताबक रैक मे सजि गेल । लगभग पाँच साल बाद एहि बेर फेर मधुबनी भ्रमणक समय मलंगिया सर संग योगानंद सुधीर स’ भेंट होबाक मौका भेटल । परिचय पात भेलाक तुरत बाद योगानंद जी पुरुष परीक्षा हाथ मे थमौलनि । ई पोथी विद्यापति लिखल पुरुष परीक्षाक नाट्य रूप अछि । एक त’ ई दोसर मौका छल जे पुरुष परीक्षा हमरा हाथ मे आयल आ ओहो नाट्य रूप मे । अति प्रसन्नता भेल । दिल्लीक लेल गरीब रथ मे बैसल रही । गाड़ी नौ घंटा लेट । फाइदा ई जे एहि पार स’ ओहि पार पुरुष परीक्षा समाप्त । घर अयला बाद, फेर स’ निकाललहु राखल किताब ( विद्यापति कृत पुरुष परीक्षा; सम्पादक : श्री सुरेन्द्र झा ‘सुमन’) ओकरो समाप्त केलहु एक्के दिन मे । सुमन जीक संपादकत्व मे प्रकाशित पुस्तकक भूमिका अति सारगर्भित अछि । एहि मे सुमन जी लिखैत छथि – “विद्यापतिक धारणा छनि जे पुरुषक आकार धारण कयनिहार तँ बहुतो भेटताह किंतु वास्तव मे ओ पुरुष नहि पुरुषाभासे थिकाह । पुरुष तँ ओ थिकथि जनिकामे पुरुष लक्षण होनि । अर्थात जनिका मे वीरता, बुद्धि ओ विद्या होनि जे धर्म, अर्थ, काम ओ मोक्ष ई चारू पुरुषार्थ केँ सिद्ध कयनिहार होथि । एहि सँ आन जे छथि से पुरुष रूपमे जेना पुच्छहीन पशुए ।” विद्यापतिक पुरुष परीक्षा चारि परिच्छेद मे विभाजित अछि । पुरुष लक्षणक अनुसार प्रथम मे – वीरक, दोसर मे सुवुद्धिक, तेसर मे सविधक ओ चारिम परिच्छेद मे चारू पुरुषार्थक प्रतिपादक कथा अछि । सुरेन्द्र झा सुमन जीक भूमिका सँ बहुत रास तथ्य ओहिना एहि नाट्य रुपांतरण मे राखल गेल अछि । एहि नाट्य रूपक प्रकाशकीय मे लिखने छथि जगदीश मिश्र : पुरुष परीक्षाक सबस’ पहिने बँगला अनुवाद 1815 ई. मे पं. हर प्रसाद राय द्वारा कयल गेल । वर्ष 1830 मे एकर अंग्रेज़ी अनुवाद राजा कालीकृष्ण बहादुर द्वारा कयल गेल । आगू जाक’ एक बेर फेर अँग्रेज़ी मे जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन पुरुष परीक्षाक अनुवाद अँग्रेज़ी मे केलनि । संस्कृत मे लिखल पुरुष परीक्षाक मैथिली भाषा मे पहिल अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा 1888 ई. मे केलनि । एकर बाद त’ कतेको बेर एकर संस्करण आ मैथिली करण होइत रहल अछि । एहि पुस्तक में प्रकाशकीय, अवतरणिका, पुरोवाक चरिटा परिच्छेद अछि । चरिटा परिच्छेद में बाँटल गेल अछि । एहि अनुक्रमणिकाक प्रथम परिच्छेद मे नौ, द्वितीय परिच्छेद में सात, तृतीय परिच्छेद में चौदह तथा पन्द्रहटा पाठ अछि । कुल मिला क’ पैंतालीस । अपन पुरोवाक में योगानंद जी सूचना दैत छथि जे ई रूपांतरण वर्ष 1990-95 के बीच कयल गेल आ 2005 ई. क अप्रैल स’ सप्ताहिक प्रसारण प्रसार भारती, पटना सँ भ’ चुकल अछि । एहि पुस्तक लेल ई महत्वपूर्ण अछि जे एकर नाट्य रूपांतरण रेडियो विधा में अति सुन्दर तरीका सँ प्रस्तुत होयत कारण एकर प्राय: सभ कथाक नाट्य मंचन 20-30 मिनटक होयत आ संगहि सभ कथा अपना आम में सम्पूर्णता लेने अछि । रेडियो नाटकक लेल जतेक तत्वक आवश्यकता होइछ से सब रूपांतरण में विद्यमान अछि । एहि ठाम हम विद्यापति लिखल पुरुष-परीक्षा का सन्दर्भक विशेष चर्चा नहि क’ क’ योगानंद सुधीर द्वारा कयल गेल एकर नाट्य रूपांतरणक चर्चा करब । ई निश्चित जे एहि तरहक काज करबा स’ विद्वतजन प्राय: कतराइत रहैत छथि । तकर कतेको कारण अछि – पहिल त’ एहन काज करबा लेल एक संग मूल पाठ आ नाट्य विधाक सेहो पूर्व जानकारी होयब जरूर होइछ । जकर प्राय: अभाव छै । दोसर ई जे एहन काज करबा लेल असीम धैर्यक आवश्यकता होइछ तकरो अभाव अछि । एहि संग आरो कतेको कारण अछि । पुरुष परीक्षाक सभ कथा के अध्ययन क’ओकर नाट्य रूपातरण करब अति कठिन काज छल । मूल पुस्तक मे प्राय: सभ कथा एक दोसर स’ जुड़ल अछि । एहि ठाम योगानन्द जी अत्यंत गंभीरता संग दुनू बातक ध्यान रखलनि अछि । पहिल त’ जे सभ नाट्यरूप एक दोसर स’ जूड़ल होयबाक चाही दोसर इहो जे सभ अपना आप मे स्वतंत्रो ओतबे होइ आ एहि दुनू सीमा पर योगानंद जी नीक जेना ठाढ़ भेलैत छथि । एहन ऎतिहासिक पुस्तक के नाट्यरुप मे सुगम संवादक संग प्रस्तुत करबा स’ मैथिली संसार समृद्ध भेल अछि । कोनो साहित्य नाट्यरूप मे संवाद प्रति संवाद मे पाठक के बेसी आकर्षित करैत छै तेँ एहि पुस्तकक इहो महत्वपूर्ण विशेषता भेल । कथाक नाट्यरूप बनेबाक लेल लेखक कतेको ठाम अपना दिस स’ पात्र गढ़लनि अछि से आरो कठिन काज छल । हँ ! कतौ कतौ पात्रक बीच संवादक बटबारा मे असंतुलन भ’ गेल अछि । कोनो कोनो पात्र के संवाद अत्यधिक लम्बा भ’ गेल अछि जेना – दयावीर-2 मे अल्लावद्दीन आ हम्मीरदेवक संवाद, चोर-5 मे विक्रमक संवाद, सुबुद्धि-॥ मे गणेश्वर आ वामदेवक संवाद आदि । कोनो नाट्यरूप बहुत छोट भ’ गेल अछि जेना तमोगुणी धार्मिक-31 । अंत मे हम ई त’ नहि कहि सकब जे एहि पुस्तकक कतेक नाट्य रूपक मंचन कयल जायत मुदा ई त’ निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य के योगानंद सुधीर जी अति महत्वपूर्न पुस्तक प्रदान केलैथ अछि । एहि लेल हमरा सभकेँ हुनकर आभारी होमक चाही । ई पुरुष परीक्षाक नाट्य रूपांतरण साहित्यिकी प्रकाशन, सरिसब पाही, मधुबनी सँ प्रकाशित कयल गेल अछि । पुस्तकक मूल्य 200 टाका आ कुल पृष्ठ सं. 318 अछि । पुस्तक प्राप्ति स्थान – प्रो. योगानन्द सिंह झा, वार्ड नं.- 06, विनोदानंद झा कॉलोनी, मधुबनी- 847211 (बिहार) । २ बिपिन झा मजदूर सँ दूर मजदूर दिवस मजदूर दिवस पर किछु लिखै लय सोचलहुँ त विभिन्न लेबर चौराहा पर भौरे-भोर एकत्रित भेल मजदूर सभक छबि सामने आबि जाइत अछि। दीन हीन दशा कमजोर स्वास्थ्य, चेहरा पर काज भेटैकऽ आशा धारण करने, अवैवला व्याqक्त (मालिक) के तरफ दौगैइक सिलसिला आ कते दिन १२-१ बजे तक काज नै भेटला पर आशा समाप्त भेला पर निस्तेज चेहरा लेने घर वापस जाइक प्रक्रम इ सभटा उपनिषद्वाक्य `श्रमेव जयते' कऽ असली आयना देखवै छैक। इ सभटा मजदूर मुल्कराज आनन्द कऽ उपन्यास `कुली' के कुली कऽ भूमिका में एकदम फिट वैसैत छै। आखिर इ प्रश्न बार-बार दिमाग में कौध जाइत अछि जे आइ कऽ श्रम प्रधान विश्व में, श्रमकऽ पूजा करैवला भारत वर्ष में मजदूर वर्ग कऽ विशेषकर असंगठित क्षेत्रकऽ मजदूरकऽ इ कारुणिक दुर्दशा किया छैक। ओकर की अपराध? गरीब भेनै, शोषित भेनै, मजबूर भेनै अथवा विधाता कऽ जगत् प्रपंच कऽ हिस्सा भेनै? र्आिथक असुरक्षा - सामाजिक असुरक्षा - उद्योगपति मालिक वर्ग के शोषण - तथाकथित उच्च वर्ग के अपमानपूर्ण दृष्टिकोण - सरकारी उपेक्षा - भयंकर निम्न जीवन स्तर के अपन नियति माननिहार श्रमिक वर्ग कऽ इ दशा कोनो प्रगतिशील उद्यमशील समाज पर कलंक थीक। यद्यपि श्रमिक वर्ग कऽ कल्याण - न्याय के हेतु कते तरह कऽ नाटक साम्यवाद माक्र्सवाद समाजवाद, Nउध्, ट्रेडयूनियनवाद के रूप में कियान भेलै इ सभ श्रमिक वर्ग कऽ दशा कऽ इंटलेक्चुअल मार्वेâिंटग कय अपन दुकान चले लथि आ परिणाम कऽ के रूप में वार्तानाम केवलम्। ग्रामीण क्षेत्र में चलैत नरेगा कऽ नाम पर सरकार भले कते किया। अपन पीठ ठोकटि वास्तविकता त इ थीक जे इ सभटा कार्यक्रम अपन उद्देश्य सँ कोसो दूर अछि। वास्तव में इ समाज सरकार के प्राथमिक कर्तव्य हेवाक चाही कि ओ समाज क इ मजबूत हाथ के मजबूती प्रदान करैथि अन्यथा राष्ट्र अपन आत्मा कऽ हनन कय किन्हऊ आगा नहि बढ़ि सवैâत अछि। आशा अछि जे इ मजदूर दिवस किछु विशेष रहत जे श्रमिक वर्ग के जीवन में किछु प्रकाश अवश्य आनत ताकि हम सब श्रमेव जयते कऽ सार्थक कय सकी। प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार। अमरक एकांकी-प्रहसनक सामाजिक यथार्थ नाटकक प्रकृत्या सामाजिक कला थिक। एकर आयोजनसँ ल’ कए अवलोकन धरि समस्त क्रिया समाजे द्वारा सम्पादित होइत अछि। अन्तत: एकर प्रदर्शन समाज द्वारा सामाजिक लेल कयल जाइत अछि। अतएव एकर सर्वस्वर समाज द्वारा सामाजिकतासँ सम्पुष्ट अछि। एकर संरचनाक मूल प्रेरणाक स्थल सामाजिक थिक। लेखक समाजगत प्रेरणासँ अनुप्राणित भ’ कए नाट्य रचना दिस प्रवृत्त होइत छथि। समाजिक जीवनमे घटित भेेनिहार विभिन्न क्रिया कलाप, वेष-भूषा, भाषा आदिक आधारपर नाटकककार अपन नाट्य क्रिया कृतिमे कथानक, पात्र, रस, संवाद आदि विभिन्न नाटकीय तत्वक समावेश करैत छथि। नाट्यकर्त्ताक मानस पटलपर समाजक जे स्वरूप अंकित होइत छनि ओकरा ओ पुन: सामाजिकक समक्ष प्रदर्शित करैत छथि। कोनो देशक समामाजिक विकास तथा नाट्य-साहित्येतिहासिक तुलनात्मक विश्लेषणसँ स्पष्ट भ’ जाइछ नाटकक संरचनामे सामाजिकक प्रेरणा सर्वदा प्रमुख स्वरूप रहल अछि। मैथिली नाट्य परम्पराक अवलोकनसँ सामाजिक प्रेरणाक स्वरूप पूर्ण रूपेण स्पष्ट भ’ जाइछ। एहिमे समाजक यर्थाथ स्थितिक चित्रण नाटकककार अत्यन्त सूक्ष्मतासँ क’ कए वास्तविकताक परिचय देलनि अछि। प्रत्येक महत्वपूर्ण नाटकककार एवं एकांकीकार ओ अपन कृतिक माध्यमे जीवनक कोनो-ने-कोनो मूल्यकेँ अपन अन्तदृष्टिकेँ अपन सामाजिक, दार्शनिक, नैतिक, माननीय उपलब्धिकेँ अभिव्यक्ति करैत छथि। प्रत्येक साहित्यकारक सामाजिक दायित्व होइत छनि, किन्तु दृश्य साहित्य लिखबाक कारणेँ नाटकककार अन्यक अपेक्षा अधिक उत्तरदायी होइत छथि। नाट्यकर्ता अपन सार्थकता तखने सिद्ध क’ सकैत छथि जखन ओ सामाजिक चेतनाकेँ कर्त्ता अपन संस्पर्श करैत छथि। इएह कारण अछि जे नाटकक वा एकांकी वा प्रहसन सामयिक होइत अछि। जीवनक जटिलता ओ गूढ़ रहस्यकेँ खोलि क’ देखबाक कारणेँ आधुनिक सन्दर्भमे जाहि द्रुत गतिएँ एकरा माध्यम जतेक सुगमतासँ भ’ सकैछ ततेक साहित्यक अन्य कोनो विघासँ नहि। जन समाजमे सामयिक स्थितिक ओ समाज प्रति चेतना उत्पन्न करब नाटकककारक प्रमुख दायित्व होइत छनि। राष्ट्र ओ समाजमे व्याप्त निर्जीवता एवं यांत्रिकतासँ पृथक् रिह क’ उद्बुद्ध करब नाटकककारक घर्म हाेइत छनि। एहन पैघ उत्तरदायित्वक सफल निर्वार्थ परमावश्यक अछि जे ओ वर्ग विशेष वा सिद्धान्त विशेष वा दल विशेष धरि अपनाकेँ सीमित नहि राखि, समाजक समग्रताकेँ प्रत्येक दृष्टिएँ सामाजिकक सम्मुख प्रस्तुत करथि। एहि लेल नाटकककारकेँ अपन कृतिमे परिस्थितिक व्याघातक विरूद्ध संघर्षरत होमय पड़ैत छनि। क्षणिक ख्यातिक हेतु ओछपनमे नहि पड़ि़ नाटकककार सामाजिक शक्तिक गम्भीर अध्ययनक हेतु केन्द्रित होइत छथि। सामाजिक विवर्त्तनक फलस्वरूप नाटकककारक दायित्व अधिक भ’ गेलनि अछि। ओ सब ओकर विरोध करैत छथि। आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारक फलस्वरूप समाजिक परिवेशमे तीव्र गतिएँ परिवर्त्तन भ’ रहल अछि। परम्परागत घारणादि, प्रथादि, व्यवस्थादि, आदर्शादिसँ लोकक धारणा शनै:-शनै समाप्त होमय लागल अछि। अतीतक व्यवस्था आदि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे जीवनयापनक लेल पर्याप्त नहि, रहि गेल अछि। समाजमे एक विचित्र स्थिति उत्पन्न भ’ गेलैक अछि। एहन अवस्थामे समाजसँ बनब तथा समाजकेँ बनायब नाट्य प्रक्रियाक आधार भूत हेतु बनि गेल अछि। तेँ नाटकककारकेँ सामाजिकक रुचिसँ प्रभावित हैबाक होइत छनि। संगहि हुनका समाजकेँ सुरुचि सम्पन्न बनयबाक प्रयत्न करय पड़ैत छनि। नाटककमे नाटकककारक मानसिकताक विम्ब रहैत अछि ई प्रतिविम्ब आत्मनिष्ठ एवं स्वयं पूर्ण होइछ। नाटकककारक मानसिकता हुनक गृहीत संस्कार तथा समाजमे घटित घटनादिक परिणाम होइत अछि। यद्यपि मैथिली साहित्यमे समस्त पूर्वांचालक भाषाक अपेक्षा नाट्य-साहित्य समृद्धशाली परम्पराक दिग्दर्शन एकर प्रारम्भिकावस्थहिसँ दृष्टिगत होइत अछि तथापि एकांकी साहित्यपर दृष्टिपात करैत छी तँ एकर उदय ओ विकास बीसम शताब्दीक चतुर्थ दशाब्दसँ प्रारम्भ होइत अछि। वर्त्तमान युगमे जीवनक व्यस्तता, अशांति, कार्याधिक्यक कारणेँ अवकाशाभाव तथा जीवनक बढ़ैत द्वन्द्व एकर विकासक मूलमे अछि। शिक्षा प्रचारिक फलस्वरूप विद्यालय, महाविद्यालय ओ विश्वविद्यालयमे अभिनयोपयोगी एकांकीक निरन्तर माँग तथा रेडियो-टेलीभिजनक प्रचार-प्रसारक फलस्वरूप एकांकीक लोकप्रियता बढ़ैत गेल अछि। द्वितीय विश्व युद्धक अवसरपर गद्य-साहित्यक प्रचारात्मक साधनक आवश्यकता भेलैक। फलत; एकांकीक अनेक रूपक विकास भेलैक जाहिमे रेडियो प्ले फीचर फेंटेसी आदि प्रमुख अछि। किन्तु मैथिली एकांकीक विकास ओ प्रचार-प्रसार स्वातंत्र्योत्तर युगमे भेल अछि। बीसम शताब्दीक विगत पाँच दशकसँ मैथिली साहित्यक गतिविधिपर दृष्टिनिक्षेप कयनिहार सर्वाधिक चर्चित साहित्य-मनीषीमे जनिक गणना जाइत छनि ओ छथि अग्रगण्य साहित्य-चिन्तक, सशक्त कवि, उपन्यासकार, कथाकार, एकांकीकार, प्रहसनकार, इतिहासकार अनुवादक, सम्पादक, ओ आलोचकक रूपमे विशिष्ट स्थान रखनिहार चन्द्रनाथ मिश्र अमर (1925)। हिनक वास्तविक प्रतिभाक प्रस्फुटन भेल हास्य-व्यंग्यसँ संयुक्त काव्य-सृजनसँ। एही कारणेँ मैथिली पाठकक सर्वाधिक चर्चित व्यक्ति रूपमे ख्याति अर्जित कयलनि। तथापि हुनक जतबहि एकांकी ओ प्रहसन अद्यापि उपलब्ध भ’ रहल अछि ओहि आधारपर हुनका श्रेष्ट एकंाकीकार ओ प्रहसनकारक रूपमे गणना कयल जाय तँ एहिमे कोनो अत्युक्ति नहि। हिनक वैशिष्ट्य एहि विषयकेँ ल’ कए अछि जे ओ एकांकी ओ प्रहसनमे जँ गंगा-यमुनाक धारा प्रवाहित कयलनि अछि तँ ओहिमे हास्य-व्यंग्यक लुप्त सरस्वती सेहो दृष्टिगत होइत अछि जे हिनक रचना धार्मियताक वैशिष्टय थिक।चन्द्रनाथ मिश्र अमर स्वयं एक कशुल अभिनेता, कुशल निर्देशकक रूपमे अपन यथार्थ प्रतिभाक परिचय अपन कार्य-कालमे देलनि, जकर फलस्वरूप समाजमे ओ प्रतिष्ठा अर्जित कयलनि। एम. एल. एकेडमी लहेरियासरायमे अध्यापनक प्रारम्भिक कालहिसँ सेवा निवृति काल धरि भिन्न-भिन्न उत्सवपर नाटकक, एकंाकी प्रहसनक मंचनमे निर्देशकक रूपमे सम्वद्ध रहलाह जकर प्रतिफल हमरा लोकनि देखि चुकल छी जे मैथिली फिल्मक अभ्युत्थानार्थ कन्यादानमे लालकाकामे अभिनय क’ कए मैथिली रंगमंचक विकासार्थ अभियानक अवदान देलनि जकर फलस्वरूप ओ समस्त मिथिलांचलमे लोकप्रियता अर्जित कयलनि। इएह कारण अछि जे हिनकामे रंगमंचोपयोगिता अद्यापि अक्षुण्ण छनि, जकर प्रतिफल ई भेल जे कतिपय नाटकक एकांकी ओ प्रहसनक मंचन हिनक कुशल निर्देशनमे भेल। ओ समाजकेँ अत्यन्त समीपसँ देखलनि तथा ओकर सजीव चित्र अपन एकांकी ओ प्रहसनमे सामाजिक यथार्थक वास्तविक मूल्यांकनमे भेल अछि। ई अपन एकांकी ओ प्रहसनमे मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक यथार्थवादी स्वरूपक उपस्थापन कयलनि। ओ नव समाजक कल्पना कयलनि तथा आधुनिक जीवनसँ आयल विकृतिकेँ केन्द्र-विन्दु बनौलनि जे सामाजिक परिप्रक्ष्यकेँ जनबामे सहायक सिद्ध भेल।मैथिलीक विभिन्न पत्रिकादिक अन्वेषण अनुसंधान ओ सर्वेक्षणोपरान्त अद्यापि हिनक जे एकांकी ओ दृष्टि पथपर आयल अछि ओ थिक टोपी (वैदेही 1950) समाधान (1955)मे संग्रहीत प्रहसन आधुनिक पाठ्य प्रणाली दुइ एकांकी निरक्षरता निवारक पाठशाला एवं श्रमदान, घरैया लूरि (वैदेही नवम्बर-दिसम्बर 1958), मलरवि (मिथिला दर्शन 1965) बाइचान्स (मिथिला मिहिर 14मार्च1965) ब्रह्मस्थान (पटना रेडियोसँ प्रसारित) हाकिमक हाकिम वा ननदिओक ननदि, दिशा बोध (मिथिला मिहिर 16 जुलाइ 1978) पत्रिकादि एवं विभिन्न संग्रहमे संगृहीत अछि। एम्हर आबि क’ ओ समग्र एकाकी एवं प्रहसनक संग्रह प्रकाशित कयलनि अछि खजवा टोपी (2005)क नामे जाहिमे कौआ ल’ गेल कान (1998) एक नव एकांकी दृष्टिगत भेल अछि। एहि ट्टष्टिसँ हुनक कुल मिला क’ एगारह एकांकी प्रकाशित अछि जाहि दुइ प्रहसन अा शेष एकांकीक परिप्रेक्ष्यमे हिनक मूल्यांकन करबाक उपक्रम कयल जा रहल अछि। ओ मैथिलीक एहि विधान्तर्गत एक नव प्रतिमान उपस्थित करबामे सहायक भेलाह।हिनक, एकांकी ओ प्रहसनमे पाठक एवं दर्शककेँ मिथिलांचलक समाजक प्रतिविम्ब भेटैछ। ओ अपन एकांकी एवं प्रहसनमे समाजमे प्रचलित समस्यादिक स्पष्ट अंकन, सूक्ष्म निरीक्षण एवं विषय उपस्थापन अत्यन्त प्रभाव पूर्ण शैलीमे कयलनि। ओ जाहि समस्याकेँ उपस्थित कयलनि अछि, ओ ओहि कालक सापेक्ष धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युत भविष्य कालीन परिणामक स्पष्ट अंकन करबामे सहायक भेल। हमर धारण अछि जे भविष्यमे सेहो हिनक एकाकी एंव प्रहसन ओहिना प्रभाव अनुभूत हैत। कतिपय समस्या एहन अछि जे कोनो स्थितिमे कहियो नष्ट नहि हैत - जेना दलितपर भेनिहार अन्याय, अत्याचार, शोषण, पीड़न शिक्षाक परिवर्त्तित स्वरूप, भ्रष्टाचार, राजनीतिक भ्रष्टता, सामाजिक असमानता इत्यादिकेँ ओ एकांकी एवं प्रहसनमे युगीन सन्दर्भकेँ महत्व देलनि। ओ जीवन पर्यन्त अध्ययन-अध्यापनसँ सम्वद्ध रहलाह आ समाजक विभिन्न स्तरक विद्यार्थीकेँ अत्यन्त समीपसँ दैखलनि। अोकर कतिपय समस्यादि जे हुनक मनमे गड़लनि तकर ओ एकांकी एवं प्रहसनमे सजीव रूपेँ प्रस्तुत करबाक उपक्रम कयलनि। जेना कोनो कानून बनैत अछि सर्वसाधारणकेँ न्याय दियबाक हेतु, किन्तु कखनो-कखनो न्यायमे एतेक बेसी जड़ता आबि जाइत छैक जे ओहिसँ न्याय नहि भेटि पबैछ। अतएव परिवर्त्तनशील समाजक लेल आवश्यकता अछि जे कानूनमे सेहो समय-समयपर परिवर्त्तन हो। कैंसर अत्यन्त पीड़ादायक बिमारी छैक जकर औषधि नहि छैक। एकमात्र मृत्युक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि छैक। तखन दोसर यथार्थ दया मरणक कानून हैबाक चाही। मैथिली दृश्य काव्यमे ई दस्तक देलनि प्रहसनकारक रूपमे। हिनक पहिल प्रहसन प्रकशित भेल टोपी। एहि प्रहसन अनुशीलनसे अवबोध होइछ जे एहिपर व्यंग्यसम्राट हरिमोहन झा (1908-1984) क प्रसिद्ध प्रहसन बौआक दाम (1946)क स्पष्ट प्रभाव अछि। फ्रेंच नाटकककार मौलियर (1622-1673) जहिना अपन नाटककमे हास्यक आयोजनक हेतु कतिपय साधनकेँ अपनौलनि तहिना ई अपन टोपी प्रहसनमे सेहो एकर आयोजन कयलनि, किन्तु स्थल-स्थलपर एहि जार्ज बनार्ड शाँ (1856-1950)क समान गम्भीर व्यंग्यक रूप परिलक्षित होइत अछि।अाधुनिक पाठ्य-प्रणाली (1955)मे प्रहसनकार सरकारक आधुनिक शिक्षा नीतिक परिप्रेक्ष्यमे एक शिक्षकक हैसियतसँ जे अनुभव कयलनि तकरे पृष्ठभूमिमे एकरा परिवर्त्तित सामाजिक परिवेशमे प्रस्तुत कयलनि अछि। मैथिलीक इतिहासकार एकर गणना एकांकीक श्रेणीमे कयलनि अछि, किन्तु ई विशुद्ध रूपेँ प्रहसन थिक, जाहिमे हास्य-व्यंग्यक धारा प्रवाहित भेल अछि। प्राचीन ओ नवीन शिक्षा प्रणालीक परिप्रेक्ष्यमे प्रहसनकार एकर कथा भित्तिक निर्माण कयलनि अछि जे पाठक एवं दर्शककेँ मनोरंजन करबाक हेतु प्रचुर अवसर प्रदान करैत अछि। प्रचीन परम्परानुसार जतय साले साल धौत परीक्षोतीर्ण पंडित लोकनि दरभंगा महाराजक ओतय गौरवान्विक होइत छलाह ततहि आधुनिक पाठ्य-प्रणालीक परिप्रेक्ष्यमे परीक्षा तँ सत्यनाराण पूजाक समान संकरातिञेँ-संकरातिञेँ भ’ रहल अछि। एतय प्रहसनकार समसामयिक समाजमे प्रचलित सरकारक आधुनिक पाठ्य-प्रणालीमे प्रचलित शिक्षा नीतिपर व्यंग्य करैत छथि जखन देश स्वतन्त्र भेल छल, नव-नव योजना कार्यान्वित भेल जाहिसँ शिक्षा जगत सेहो बाँचल नहि रहि सकल। परिवर्त्तित परिवेशमे प्रहसनकारक व्यंग्य कतेक मर्मस्पर्शी थिक तकर अवलोकन तँ करूबचकानी :बापरे! से धरि सत्ते, छोट-छोट नेना सब हक्कर पेलैत चढ़ले भानसमे सँ काँचे कोचिल खा क’ तीन-तीन कोस दौड़ल जाइत अछि आ’ सुनैत छिऐक जे स्कूलपर एकरा सबसँ टकुरी- चर्खा कटबैत जाइत छैक। (समाधान, निर्माण प्रकाशन, लहेरियासराय, 1955, पृष्ठ-15) स्वातन्त्र्योत्तर भारतमे नवीन शिक्षा-नीतिक तहत स्कूलपर बुनिआदी शिक्षाकेँ प्रश्रय देल गेलक तथा एकरा क्रियान्वित करबाक हेतु पाठ्यक्रममे अावश्यक परिवर्त्तन कयल गेल, जकरा समकालीन सामाजिक परिवेशमे स्वीकार करबाक स्थितिमे समाज एकदम नहि छल। समाजक एहन मानसिकतापर प्रहसनकार हस्य-व्यंग्यसँ युक्त धारा प्रवाहित कयलनि अछि: बुद्वन : हौ तौं मौसम्मातक बेटा बेटा थिकाह जे चर्खा लेबह ओ तँ गाँधी बाबा एकटा रास्ता देखा गेलथिन्ह जे राडँ, मसोम्मात अपन गुजर करत, जकर जीवन पहाड़ छैक आ’ तोरा कथीक चिन्ता छह? कोन वस्तुक कम्मी छह ? (समाधान पृष्ठ-19) आधुनिक पाठ्यप्रणाली प्रहसनक वैशिष्ट्य अछि जे प्रहसनकार सामाजिक परिवेशक यथार्थ मानसिकताक घटना चक्रक आधारपर हास्य-व्यंग्यक आयोजन क’ कए जतहि एक भाग समाजकेँ हँसौलनि अछि ततहि दोसर भाग ओकरा माध्यमे मानसिक स्थितिकेँ परिवर्त्तित करबाक प्रयास कयलनि अछि। उपर्युक्त प्रहसनक मंचन एम. एल. एकेडमी, लहेरियासरायक वार्षिकोत्सवक अवसरपर भेल जतय तत्कालीन बिहार सरकारक शिक्षा मंत्री हरिनाथ मिश्र उपस्थित रहथि। एकर निर्देशन प्रहसनकार स्वयं कयने रहथि। एकांकी : देशक पुननिर्माणक आवश्यकता एवं सामाजिक चेतनाकेँ ल’ कए मैथिलीमे एकांकी लिखनिहारमे एक सजग एकांकीकारक रूपमे मैथिली एकांकी द्वारपर दस्तक देलनि। एहि दृष्टिएँ हिनक निरक्षरता निवारक पाठ्शाला, श्रमदान, घरैया लूरि, ब्रह्मस्थान, हाकिमक हाकिम वा ननदिओक ननदि, मलरवि, दिशा बोध एवं कौआ ल’ गेल कान, इत्यादि मैथिलीमे उल्लेखनीय एकांकीक रूपमे चर्चित अछि जाहि आधारपर हिनका मैथिलीक सफल एकांकीक रूपमे परिगणित कयल गेल छनि। हिनक उपलब्ध एकांकीक विश्लेषण नाटकीय तत्वक आधारपर करब समीचीन होयत। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी थिक तेँ ओकर मूल्यांकन सामाजिक दृष्टिएँ अपेक्षित अछि। वस्तु : नाट्य तत्वक अन्तर्गत वस्तुक सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान अछि। वस्तु द्वारा एकांकीक गतिशील होइत अछि। रस-निष्पत्ति, चरित्रक सजीवता एवं गतिशीलताक लेल वस्तुक निर्माण कयल जाइत अछि। एहि दृष्टिएँ वस्तु एकांकीक प्रमुख तत्वक रूपमे स्वीकारल गेल अछि। एकरा अन्तर्गत कार्यावस्था वा व्यापार तत्व एकांकीकेँ सफल ओ सप्राण बनबाक उद्देश्यसँ कयल जाइत अछि। कार्यक गाति द्रुतगतिएँ बढ़यबाक दिशामे वस्तु-विन्यास श्रेष्ठ माध्यम थिक, कार्य एकांकीक प्रमुख साध्य थिक। नाटकीय सौष्ठवकेँ वस्तु-संगठन एवं व्यापक समुचित योजनाक रूपमे देखल जाइत अछि। एहि प्रसंगमे पाश्चात्य आलोचक ई.एम. फार्स्टरक कथन छनि जे कथानक घटनाक ओ कालक्रमानुसार वर्णन थिक जाहिमे कार्य-कारण-सम्बंधपर विशेष बल रहैत अछि। नाटकक वा एंकाकीमे संघर्ष वा द्वन्द्वक महत्ता सर्वोपरि अछि। तेँ वस्तु विन्यासक वा एकांकीमे संधर्ष वा द्वन्द्वक महत्ता सर्वोपरि अछि। तेँ वस्तु विन्यासक अन्तर्गत कथानकपर दबाब ओकर प्रतिक्रियाक अंकन कयल जाइछ। वस्तु-विन्यास लेखकक उद्देश्यक अनुरूप क्रमवद्धता एवं विस्तार ग्रहण करैछ। अतएव एकांकीकार वस्तु-विन्यास करबा काल जीवनमे घटित भेनिहार समसामयिक जीवनसँ सम्वद्ध रहैत छथि, कारण मानव जीवनसँ विच्छिन्न कोनो साहित्य उत्कृष्ट नहि भ’ सकैछ। निरक्षता निवारक पाठशाला (1955)मे एकांकीकार जाहि समसामयिक समस्याक उपस्थापन एहिमे कयलनि अछि तकर संकेत ओ पचास वर्ष पूर्वहि कयने रहथि तकर प्रतिरूप बीसम शताब्दीक नवम दशकमे सरकारक माध्यमे निरक्षरकेँ साक्षार बनयबाक दिशामे प्रयास भेल अछि। सरकार वयस्क शिक्षा योजनापर करोड़क करोड़ रूपैया खर्च करैत जा रहल अछि जकर मूल उद्देश्य छैक जे कोहुना प्रत्येक भारतीयकेँ साक्षर बनाओल जाय। साहित्य-चिन्तक कतेक दूरदर्शी होइत छथि तकर वास्तविकताक परिचय एहि एकांकीक प्रणयनसँ पाठक वा दर्शककेँ उपलब्ध होइत छनि। समसामियक परिवेशमे सरकार वयस्क शिक्षा नीतिकेँ क्रियान्वित करबाक हेतु नुक्कड़ नाटकक आयोजन करैत अछि। जनसामान्यकेँ एहि दिशामे आकर्षित करबाक कतिपय प्रलोभन दैत अछि। तथापि ओकर कतेक परिणाम ओकरा भेटि रहल छैक तकरा स्पष्ट करबाक प्रयोजन नहि, प्रत्युत्त अनुभव करबाक योग्य थिक। किन्तु एकांकीकार समाजक एहि ज्वलन्त समस्याक सम्बन्धमे कतेक पूर्व ध्यानाकर्षित कयने छलाह तकर स्पष्टीकरण उक्त एकांकीक मननसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि। नेना बाबू ने तेना सोने झाकेँ शिक्षित करबाक निमित्त प्रयासरत भेलाह जकर फलस्वरूप ओ शिक्षित भ’ गेलाह। एकरा माध्यमे एकांकीकार एहि विषयकेँ उद्घाटित करबाक उपक्रम कयलनि अछि जे देशक उन्नति तखने सम्भव अछि जखन प्रत्येक भारतीय शिक्षित क’ कए ज्ञानक ज्योति प्रज्वलित क’ कए एकर वास्तविक महत्व बुझथि। तखने मातृभूमिक स्वतन्त्रताक वास्तविक अर्थ बुझबामे तथा अपन अधिकार ओ कर्त्तव्यक पालनमे सक्षम भ’ सकताह अन्यथा सब प्रयास निरर्थक अछि। एहि निमित्त आवश्यक अछि जे जनसामान्यकेँ शिक्षित कयल जाय। एहि प्रसंगमे चतुर्भुजक कथन छनि: जतेक पढ़ल लिखल लोक छी से यदि प्रतिज्ञा करी आ’ कम-सँ कम दस व्यक्तिकेँ शिक्षित बनाबी। एक सँ दस, दस सँ सै, सै सँ हजार तुरन्त भ’ जैत। तैं हेतु साँझखन जे समय घूड़लग बितबैत अछि से एही काजमे लगाबी तँ कोन क्षति। (समाधान, पृष्ठ-7) उपर्युक्त वातावरणक पृष्ठभूमिमे एकांकीकार समाजक समक्ष एक प्रतिमान उपस्थित कयलनि अछि जे शिक्षित समाज भ’ कए अपन सामाजिक दायित्वक संगहि-संग राष्ट्रीय दायित्वकेँ बुझि देशक प्रति अपन त्याग कर्तव्यकेँ बुझथि। ई तखने सम्भव भ’ सकैछ जे लोक अपन अधिकार ओ कर्त्तव्यक प्रतिपूर्ण साकांक्ष भ’ पौताह अन्यथा ई संभव नहि। एहि दृष्टिएँ एकर कथानक समाजकेँ अपन अधिकार ओ कर्तव्यक प्रति दिशा-बोध करबैत अछि। आधुनिक परिवेशमे दिन प्रतिदिन समसामयिक समाजक व्यक्ति आराम तलब बनल जा रहल अछि। ओ जेना श्रमक महत्वसँ अपरिचित भ’ गेल अछि। व्यक्ति-व्यक्तिमेे एतेक वेसी ऊर्जा छैक जे ओ सम्भव कार्य सेहो सम्भव क’ सकल अछि। तेँ मानव जीवनमे श्रम सर्वोपरि साधन थिक। एकांकीकार श्रमदान (1955) एकांकीमे समाजकेँ श्रमोन्मुख बनयबाक उद्देश्यसँ, शैशवावस्थहिसँ श्रमक महत्वकेँ बुझयबाक हेतु एहि एकांकीक रचना कयलनि। स्वातन्त्र्योत्तर भारतक सर्वतोमुखी विकासक शिक्षाक नव नीतिमे एकर उपयोगिताकेँ उद्घाटित करबाक उद्देश्यसँ अाधुनिक पाठान्तर्गत बुनियादी शिक्षाकेँ महत्व देबाक उद्देश्यसँ श्रमदान करबाक प्रवृत्ति जगेबाक लेल एहि एकांकीक ओ रचना कयलनि। एकरा माध्यमे आर्थिक स्वतन्त्रता तँ आसानीसँ भेिट जा सकैछ। अतएव तन-मन, धनसँ अपन मातृभूमिक सेवामे तत्पर भ’ जयबाक प्रयोजन अछि। व्यक्ति-व्यक्तिमे एहि भावनाकेँ जगयबाक हेतु जे प्रयास भेल ओ तँ अपन स्थानपर रहल, किन्तु विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तरपर ए.सी.सी., एन.सी.सी., एन.एस.एस., सदृश योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक लेल स्थापना कयल गेलैक जकर मूल उद्देश्य छलैक श्रमदान करबाक प्रवृत्ति जगेबाक तथा भावी संतनिकेँ शेशवास्थाहिसँ अनुशासनक सूत्रमे बान्हल जाय जे भविष्यक हेतु लाभ प्रद भ’ सकैछ तेँ तँ ज्ञान-धन कहैछ: देशक एक-एक गोटेसँ निवेदन अछि जे निर्माण कार्यमे तन-मन-धनसँ सहायता करू। श्रमदानक भुखलि भारत माता अहाँक आह्वान कै रहल अछि।(सामाधन, पृष्ठ -27)। एहि प्रवृत्तिक उदय भेलासँ देशक नव-निर्माण निश्चित रूपेँ हैबाक सम्भावना अछि। सरकार एहि शिक्षा नीतिक सराहना करैत छनि आ जे स्कूल एवं कालेजमे पढ़निहारपर दबाव वा जनमानस उत्साहित भ’ कए एहि दिशामे कार्यरत हैताह। तखन सुन्दर लालक कथन छनि: जे सोचलक ई बात बड़ बुधियार छल। देखहक आब पढ़ैत छैक बारहोवर्णक धियापूता, सबकेँ नोकरी गेटतैक नहि, तखन सब बेकार भेल गामेपर एहि खोन्हीसँ ओहि खोन्ही ढ़हनाइत फिरैत छल से तँ नहि ने हैत। (समाधान, पुष्ठ-32)। अनादि कालहिसँ समाज दुह वर्गमे विभाजित रहल अछि जकरा धनीक-गरीब वा शोषक-शोषित वा सम्पन्न-विपन्न आदि विविध संज्ञासँ विभिन्न समयमे सम्बोधित कयल जाइत रहल अछि। सामाजिक विषमता सबसेँ ज्वलन्त समस्या थिक जकर फलस्वरूप समाजक विभाजन भ’ गेलैक नया समाजन्क वर्त्तमान स्वरूप विलुपित भ’ गेल। आर्थिक परिस्थिित वा हित-सम्बन्धक आधारपर समाज मुख्यत: तीन श्रेणीमे विभाजित अछि। उच्च वर्ग, मध्य वर्ग ओ निम्न वर्ग। उपर्युक्त आधारपर समाजक अन्तर्गत वर्ग वैषम्यक आगमन भेलैक। सामाजिक वातावरणक उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे हिनक ब्रह्मस्थान एक उल्लेखनीय एकांकी थिक, जाहिमे एकांकीकार शोषित वा गरीब वा विपन्न वर्गपर होइत अत्याचारक वास्तविकतासँ अवगत करौलनि अछि। ग्रामीण परिवेशमे एहन परम्परा रहल अछि जे गामक डिहबाक अर्थात ब्रह्मस्थान गामक न्यायालय प्रतीक मानल जाइत छल, जतय नीक अधलाहक विश्लेषण क’ कए दोषीकेँ दण्ड देल जाइत छलैक, जकर ओ साक्षी होइत छलाह। समाजक आचार संहिताक ओ प्रतीक होइत छलाह। ब्रह्मस्थान जतय गाममे रहनिहारक सुख-दुःखक समान रूपेण सहभागी हाेइत छथि। समाज कल्याण जनिक सर्वप्रमुख वैशिष्ट्य छनि तथा सामाजिक कल्याणमे अपन कल्याण मानैत छथि। एहन न्यायालयमे बैसि क’ लोक दूधक दूध आ पानिक पानि न्याय करबामे वस्तुतः सक्षम होइत छथि। वैह डिहबार समाजमे सतत पूजित होइत रहल छथि तथा समाज हुनक सम्मान करैत आयल अछि। बदलैत समाजिक परिवेशमे एहन मान्यतामे परिवर्त्तन भेल जकर परिणाम भेल अछि जे स्वातंत्र्योत्तर भारतमे राम राज्यक स्थापनाक उद्देश्यसँ ग्राम पंचायतक स्थापना कयल गेलैक तथा ओकर प्रधान मुखियाक हाथमे गामक न्याय करबाक उत्तरदायित्व देल गेलनि। मुदा मुखिया न्याय की करैत छथि ओ तँ अन्यायक प्रतीक बनि क’ अपन राक्षसी प्रवृत्तिसँ समाजपर अत्याचार करैत छथि। एही यर्थाथताक पृष्ठभूिममे एकांकीकार ब्रह्मस्थान एकांकीक कथाभित्तिक निर्माण कयलनि अछि। गामक मुखिया हरिवंश बाबूकेँ युग-युगान्तरसँ दीन-हीन जनमानसकेँ शोषित करबाक अभ्यास छनि। सुगियाक बेटा मखना विगत अठारह दिनसँ ज्वराक्रान्त छैक जे हुनक शोषण नीतिक फलस्वरूप अकस्मात् काल-क्वलित भ’ जाइत अछि। सुगियाक मात्र एतबे अपराध छैक जे समयपर हुनका ओतय पानि भरबाक हेतु नहि जाइत अछि, जकर इनाम ओकरा भेटैत छैक मारि-गारि सुनबैत निर्ममतापूर्वक पीटब ओ अपमानित करब। सुगियाक अन्घभक्त पति पचकौड़ी अपन पुत्रक मृत्युसँ आहत भ’ परम्परागत न्यायालयक प्रतीक ब्रह्मस्थानक अस्तित्वकेँ मेटैयबाक लेल कटिबद्ध अछि, किन्तु ठकाइक बात मानि अपन विचारकेँ बदलि दैछ। अन्ततः ओही ब्रह्मस्थानमे गामक सब क्यो उपस्थित भ’ वर्त्तमान मुखिया हरिवंश बाबूकेँ पदच्युत क’ कए एक नव मुखियाक चुनावक नारा दैत अछि। एकांकीकार शोषित वर्गक बीच युगयुगान्तरसँ चल आबि रहल आक्रोशसँ कथानकक निर्माण कयलनि अछि। प्रतिपाद्य एकांकीमे मूलत: दुइ विचारधारासँ संघर्षरत अछि। एक तँ परम्परासँ चल अाबि रहल बहियाक प्रति शोषक वर्गक नृशंस हत्या दोसर भाग समसामयिक सामाजिक परिवेशमे प्रचलित चुनाव-पद्धति तथा आधुनिक मुखियाक क्रियाकलापक वास्तविकतापर जे अन्हरजाली छल तकरा हटयबाक उपक्रम कयल गेल अछि। परिवर्त्तित परिवेशमे समाजमे विद्रोहक स्वर अत्यन्त तीव्र भ’ गेल अछि तेँ सामाजिक परिवेशकेँ परिवर्त्तित करबाक प्रयोजन अछि। एकंाकीकार इएह प्रवृत्ति छनि। कतोक शताब्दीक गुलामीक पश्चात् भारतकेँ स्वतन्त्रता प्राप्त भेलैक। देशक नव-निर्माणक हेतु कतिपय योजनादि क्रियान्वित करबाक दिशामे सरकार प्रयासोन्मुख भेल। सरकारक दिससँ सेहो कतिपय योजनाकेँ कार्यरूप देबाक हेतु प्रयास कयल गेल। एकर एक मात्र उद्देश्य छलैक कोहुना व्यक्ति-व्यक्ति जे गरीबीक मारिसँ कुहरि रहल अछि ताहिसँ मुक्ति दियबाक दिशामे प्रयास कयल जाय। अधिकांश ग्रामीण गामक परित्याग क’ शहरोन्मुख हैबाक दिशामे प्रयास करय लागल। तकर भीषण दुष्परिणाम भेलैक जे गामक गाम जनशून्यताक कगारपर पहुँचय लागल। समाजक समक्ष एक विषम स्थिति उत्पन्न होमय लगलैक। एहना स्थितिमे ग्रामीण परिवेशकेँ बचयबाक लेल जनमानसमे एहन वातावरणक निर्माण कयल गेल जे ओ ओही परिवेशमे रहि अपन जीवकोपार्जनार्थ अपन कौलिक धन्धाकेँ पुनः स्वीकार करय। एकर दूटा प्रभाव पड़ितैक। एक तँ लोक अपन गृह-उद्योग दिस उन्मुख होइत आ दोसर शहरी परिवेशपर अनावश्यक दबाब नहि पड़ितैक। एहि परिप्रेक्ष्यमे हिनक एकांकी घरैया लूरि (1958) एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थिक। विसुनदेव ग्रामीण परिवेशक परित्याग क’ विसेस्सरक संग कलकत्ता सदृश महानगरीय परिवेशमे रोजगारक तलाशमे जयबाक आकांक्षी अछि। मुदा विसेस्सर शहरी परिवेशसँ परिचित रहलाक कारणेँ ओकर वास्तविक कठिनाइसँ अपन बाल संगी मित्र विसुनदेवकेँ एहन निर्णय करबासँ सर्वथा मना करैत अछि : हम सौचैत छिऔक जे तोरा की करक चाहिअउ तोहूँ नीक जकाँ सोचि ले। (वैदही, नवम्बर-दिसम्बर 1958, पृष्ठ -407) विसेस्सर, अपन नेक सलाह दैत छैक जे अपन पुश्तैनी अथार्त् करघा चला क’ अपन परिवारक संग, सुखी सम्पन्न रहि सकैत अछि। एकर ओ समुचित प्रबन्ध सेहो क’ दैत छैक, जकर परिणाम होइछ जे विसुनदेव गामहिमे रहि अपन रोजगार क’ कए सुखी-सम्पन्न भ’ जाइत अछि। विसुनदेवक देखा-देखी गोविन्द मिस्त्री, सैनी ठठेेरी एवं झिंगुर चमार द्वारा निर्मित पलंग, झालि ओ ढ़ोलक बाजारमे छुहुक्का उड़ि जाइत अछि। एकांकीकारक मान्यता छनि, जे आधुनिक शिक्षा प्रणाली व्यक्ति - व्यक्तिकेँ रोजगार मुहैया नहि करा सकैछ। जा धरि व्यक्ति पुश्तैनी धन्धाकेँ नहि अपनाओत ता धरि ओकर सामाजिक परिवेश कोनो तरहक सुधारक सम्भावना नहि दृष्टिगत होइछ। अतएव एकांकीक मूलस्वर छैक अपन कौलिक धन्धाक अनुरूपहि प्रशिक्षित भ’ कए काज करब। तखने हमर सामािजक परिवेश परिवर्त्तित भ’ सकैछ तथा व्यक्ति-व्यक्ति सुखी सम्पन्न बनबाक कामनाक पूर्ति भ’ सकैछ। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक रामराज्यक सपना एकरे फलस्वरूप साकार भ’ सकैछ। हमर प्रचीन सामाजिक व्यवस्थामे प्रत्येक जातिक कार्य ओकर सामाजिक परिवेशानुसारेँ विभाजित छलैक, तेँ वेरोजगारीक समस्या नहि उत्पन्न होइत छलैक। वर्णाश्रमक जे व्यवस्था हमर समाजमे कयल गेल छलैक तकर मूल परिकल्पना इएह छलैक। किन्तु परिवर्त्तित परिवेशमे लोक ओहिसँ विमुख भ’ अछि तेँ वेरोजगारीक समस्या समाज ओ सरकारक समक्ष्ा उपस्थित भ’ गेल गेल अछि। प्रतिपाद्य एकांकीमे एकांकीकार मूल रूपेँ कुटीर-उद्योग एवं गृह-उद्योग दिस जन सामान्यक ध्यानाकर्षण कयलनि अछि। अत्याधुनिक परिवेशमे समाजमे, देशमे, पुननिर्माण तथा सामाजिक चेतनाक आवश्यकता अछि। एकांकीकार अपन व्यक्तिगत जीवनक व्यावहारिक अनुभवक आधारपर समाज ओ देशमे प्रचलित योजनान्तर्गत घरैया लूरिक केन्द्र-विन्दुमे निरूपित कयलनि अछि। ओ समाजक ओहि पक्ष दिस संकेत कयलनि अछि जे अत्याधुनिकताक चक्रवातमे पड़ि़ कौलिक क्रिया-कलापके तिलांजलि द’ कए शहरोन्मुख हैबाक आकांक्षी भ’ गेल अछि। किन्तु प्रयोजन अछि जनमानसमे दिशा-निर्देशनक जकर फलस्वरूप ओकर कायाकल्प कयल जा सकैछ। उचित दिशा बोधक फलस्वरूप विसुनदेव, गोविन्द मिस्त्री, सैनी ठठेरी ओ झिंगुर चमार समािजक परिवेशमे रहि क’ अपन आर्थिक स्थितिकेँ सुधारबामे सक्षम भ’ सकलाह आ उन्नतिक शिखरपर चढ़ि समाजक अन्य व्यक्तिकेँ अपन कौलिक व्यवसाय दिस उन्मुख कयलनि। मलरविमे एकांकीकार हास्य-व्यंग्यक अद्भूत धारा प्रवाहित कयलनि अछि। जहिना काव्यक क्षेत्रमे एहि प्रवृत्तिक प्रस्फुटन भेल अछि तहिना ओकर वास्तविक स्वरूप एहि एकांकीमे स्पष्ट अछि जे पण्डित लोकनि झूठक प्रपंच रहि सर्वसाधारणक शोषण करैत आयल छथि। एहिमे राउत लोकनिक तथा पंडित लोकनिक घूर्त्तताकेँ अत्यन्त मनोरंजक ढ़ंगे एकांकीकार प्रस्तुत कयलनि अछि। स्वातन्त्र्योत्तर भारतक प्रमुख प्रवृत्ति जनसामान्यक समक्ष्ा आयल अछि भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति हमर जीवनमे एहि प्रकारेँ प्रवेश क’ गेल अछि जे ओहिसँ मुक्तिक मार्ग नहि भेटि रहल अछि। जीवनमे डेग-डेगपर एकर नग्न रूप स्पष्ट अछि तथा समाजकेँ मुक्तिक मार्ग नहि भेटि रहल छैक। जँ परिचमी-एवसर्ड नाटकक लक्ष्य द्वितीय महायुद्वोत्तर विसंगतिक चित्रण करब छल तँ स्वातन्त्र्योत्तर भारतमे उपजल करब चरित्रहीनता, भ्रष्टाचार एवं नूतन अन्ध धार्मिकतापर तीक्ष्ण-व्यंग्यक प्रहार करब मैथिली एकांकीकारक लक्ष्य बनि गेल छनि। अतएव स्वातंत्र्योत्तर भारतमे उपजल चरित्र हीनता एवं भ्रष्टाचारक केन्द्र-विन्दुपर तीक्ष्ण-व्यंग्यक प्रहार कयल गेल अछि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे हिनक हाकिमक हाकिम वा ननदिओक नानदिमे स्पष्ट झाँकी भेटैत अछि। एहिमे एक निर्धन संस्कृत पाठशालाक शिक्षक चित्रक माध्यमे एकांकी ओहि भ्रष्टाचारी डिप्टीक चरित्रकेँ उपस्थित कयल गेल अछि जे आकंठ भ्रष्टाचारमे डूबल अछि। डिप्टी साहेब भ्रष्टाचारक प्रतीक छथि जनिक निर्दयतासँ शिक्षक समुदाय बेचैन रहैछ, किन्तु ओ एहि विषयकेँ सर्वथा बिसरि जाइत अछि जे ओकरो ऊपर कोनो अधिकारी छैक। संस्कृत पाठशालाक शिक्षक विद्यालयसँ अनुपस्थित रहलाक कारणेँ पाँच टाका घूस डिप्टीकेँ गछैत छथि, किन्तु टाकाक अभावक कारणेँ शीघ्रहि अदा करबासँ वंचित रहैत छथि। स्कूलक वार्षिकोत्सवमे पण्डित जी चेयरमेन साहेबक सोझॉं रूपैया दैत छथि। एहि घटनासँ डिप्टी साहेब आहत भ’ जाइत छथि, कारण ओ हुनक हाकिम छथिन। जहिना पारिवारिक जीवनमे ननदिक छैक, ओ अत्याचार करबामे कनेको कुंठित नहि होइछ। अतएव एकांकीकार अत्यन्त नियोजित ढ़ंगे सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे घटित भेनिहार घटनाक चित्रांकन कयलनि अछि एहि एकांकीमे। निर्धनता सामाजिक जीवनक अभिशाप थिक। जतय प्राचीन समयमे समाजवादी समाज छल ततय आधुनिक परिप्रेक्ष्यमे व्यक्तिवादी समाजक स्थापना शनै:-शनै भ’ रहल अछि। एकर श्रेय छैक पश्चिमी संस्कृति ओ सम्यताकेँ। वर्त्तमान शताब्दीक उत्तरार्द्धमे सामाजिक परिवेशमे एतेक शीध्रतासँ परिवर्त्तन भ’ रहल अछि जे सामाजिक स्वरूप परिवर्तित भ’ गेल अछि। व्यक्ति आब एतेक बेसी आत्म केन्द्रित भ’ गेल अछि जे एकैसम शताब्दीक प्रवेश करैत-करैत अपन प्राचीन परिवेशक परित्याग करबाक हेतु विवश भ’ गेल अछि। हमर सामाजिक परिवेश कतेक दूषित भ’ गेल अछि तकर वास्तविकताक चित्रण एकांकीकार कयलनि अछि दिशाबोध एकांकीमे। सुन्दर युवावस्थाक प्रचण्ड बिहाड़िमे सामाजिक परिवेश परिवर्त्तित भ’ जयबाक कारणेँ एहन दिग्भ्रमित भ’ गेलाह जे अपन वृद्ध माता-पिता पर्यन्तकेँ अपन सुख-सुविधाक जिनगीमे बाधक मानैत छथि। किन्तु हुनक पत्नीपर परम्पराक छाप एतेक वेसी छनि जे आधुनिक परिवेशमे रहितहुँ ओ अपन मर्यादाक पृष्ठ पोषिकाक रूपमे जन सामान्यक समक्ष्ा प्रस्तुत होइत छथि। इएह कारण अछि जे हुनका अपन ससुर एवं सासुक प्रति असीम श्रद्धा ओ सद्भावना छनि। एकर पालन करबाक हेतु ओ अपन पतिक विरोध करैत छथि : हम अहाँक गार्जियन किएक रहब, मुदा जे माय - बाप एतेक सिद्धति सहि क’ पोसलनि - पाललनि, लिखौलनि - पढ़ौलनि, ताहि मायक वास्ते दवाइ लय अहॉं कहैत छिएेक बूढ़ा झीटय चाहैत छथि आ सिनेमामे पाइ फेकय जाइत छी से उचित थिकैक। (मिथिला मिहिर 16 जुलाई, 1978) सुन्दर पत्नीक मानसिक दशाक विश्लेषण करबामे सर्वथा असमर्थ छथि, कारण आधुनिकताक अन्हरजाली हुनका लागल छनि। तेँ पत्नीकेँ एकाकी छोड़िकेँ’ सिनेमाक लाथेँ घरसँ पड़ा जाइत छथि। एकांकीकार पति-पत्नीक वैचारिक भिन्नताकेँ यथार्थक घरातलपर आनि सामाजिक परिवेशमे बदलैत मानसिकताक विश्लेषण करबामे सफल भ’ पौलनि अछि। एतय ओ सामान्य पाठककेँ सोचबाक हेतु बाध्य करैत छथि जे अल्प वेतन भोगी कर्मचारीक मानसिकता आधुनिक सामाजिक परिवेशमे केहन भेल जा रहल अछि। ई मानसिकता मात्र किरानीक नहि, प्रत्युत समपूर्ण समाजक भ’ गेल अछि। सुन्दरकेँ परिस्थितिक वास्तविकताक ज्ञान तखन होइत छनि जखन ओ अपन बालसंगीकेँ नूनूकेँ अपन वृद्ध माता-पिताक प्रति अगाध आत्मीयता ओ श्रद्धा देखैत छथि जे वस्तुतः अनुकरणीय एवं सराहनीय अछि। पत्नीकेँ प्रताडि़़त क’ कए ओ नूनूक ओतय उपस्थित होइत छथि। नूनू एम्.ए. इन फिलॉसिपी छथि तथापि ओ नौकरीकेँ परामुखापेक्षी मानैत छथि, की इएह आधुनिक सभ्यता वा सामाजिक परिवेशक उपज थिक। सामाजिक परिवेशमे एहन लोकक अभाव नहि जे वस्तुस्थितिक यथार्थतासँ बिनु अवगत भेनहि ओकर सत्यापनक पाछाँ अपस्याँत भ’ जाइत अछि। एकांकीकार कौआ ल’ गेल कान मे एहने एक घटनाक नियोजन करबाक उपक्रम कयलनि अछि। डाक्टरक पुत्र मनोज तथा धन्नूक पुत्र मोहनक विवाह अपहरण क’ कए करबाक अपवाहसँ दुनू मित्र किंकर्त्तव्यविमूढ़ भ’ जाइत छथि, किन्तु वास्तविकताक रहस्योद्घाटन होइत समग्र चिन्ता प्रसन्नतामे परिवर्त्तित भ’ जाइछ। हास्य-व्यंग्यसँ उब-डूब करैत हिनक एक एकांकी थिक वाइचान्स। शिक्षा प्रकाशसँ कोसो दुर रहलाक कारणेँ बिजलीकान्त कोना अपन पिताकँ ठकलनि तकर यथार्थतासँ परिचय करौलनि अछि एकांकीकार। मधुकांत पुत्रक परीक्षोत्तीर्ण भेलाक कारणेँ सुनता सत्यनाराण पूजाक धूमधामसँ आयोजन कयलनि, किन्तु यथार्थ वस्तु स्थितिसँ अवगत भेलापर हुनक मानसिक स्थिति कोन तरहक भ’ जाइत छनि तकरे एहिमे उद्घाटित कयल गेल अछि। पात्र : पात्र एकांकी प्रणेताक मानसिक सन्तान होइछ। ओकरामे रक्त बीज संचरण करैछ। ओहिमे संकल्प-विश्वासक गोत्रता तथा जीवन दर्शनमे वंशजता रहैछ। ओकर समस्त अभिजात्य कौलिक रहैछ जकर सम्पूर्ण वर्ण शुद्व सेहो रहैछ। समग्रत: अपन प्रणेताक जीवन्त रंग-साक्षत्कारक जीवन्त रचना थिक। ओहिमे रागात्मकता, आसंग सृजन-संकल्पना, नाट्यानुभव, रंग- संस्कार तथा रंग-राशिक तात्विक संधातसँ उद्भूत रंगपुत्र अछि। एकांकी प्रणेताक आन्तरिक रंगयज्ञक रंग कुण्डसँ उत्पन्न तथा वरदान रूपमे प्राप्त रंग सिद्धि रंगवंशी रंगकुमार अछि। एकांकी प्रणेताक रंग प्रक्रियामे रचनामे पात्र केहन होइछ? ओ रंग-प्रक्रियामे कतयसँ अबैत अछि? एहि प्रश्नसँ बँचि क’ आगाँ जायब युक्ति संगत नहि होयत। एखन धरि बहुधा पात्रक गुण-प्रकार वर्ग तथा ओकरा संगक बात होइत अबैत हो, अधिकांशतः पृष्ठपेषण होइत अछि। पात्रक रंग प्रक्रियापर बड़ कम विचार भेल अछि। पात्र तँ रचनाकारक मानसिक सन्तान होइछ। रचनाकारक जीवनगत प्रतिवद्धतामे पात्रक मर्यादा थिक। ओ सेहो जीवनक प्रति ओहिना प्रतिवद्ध होथि। हिनक पात्र योजनापर दृष्टिपात करैत छी तँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे ओ मध्य एवं निम्नवर्गीय सामाजिक परिवेशक प्रतिनिधित्व करैत देखल जाइत अछि जकरा समक्ष रोजी-रोटीक संगहि-संग अपन जीवको्पार्जनार्थ विविध समस्या सुरसा सदृश मुह बौने ठाढ़ छैक। एहि दृष्टिएँ ब्रह्मस्थान एवं घरैयालूरिक अधिकांश पात्र निम्न गमैया सामाजिक परिवेशक प्रतिनिधत्व करैत अछि। ननदिओकेँ ननदि, मलरवि, दिशाबोध, वाइचान्स, कौआ ल’ गेल कानक अधिकांश पात्र सेहो ओही श्रेणीमे अबैत छथि। मध्यम वर्गीय श्रेणीमे घरैयालूरिक महेन्द्र बाबू ब्रह्मस्थानक हरिवंश बाबू एवं ननदिओकेँ ननदकि चेयरमैन प्रतिनिधित्व करैत छथि। उच्च वर्गक पात्रक अभाव हिनक एकांकीमे अछि। वस्तुत: हिनक पात्रक संघर्षमे सामाजिक समायोजन (सोसल एडजस्टमेण्ट)क भावना सन्निहित अछि। हिनक आत्मसम्मानी पात्र अपन प्रकृतिक विरोधी नकारात्मक प्रवृत्तिक सामाजिक प्रवत्तिसँ अपन मेल नहि बैसा पबैत अछि। अतएव समायोजनक स्थितिमे ओ मानसिक आशांतिक अनुभव करैत अछि जे कोहुना ओहि मानसिक तनावसँ मुक्ति भेटय एकरा हेतु ओ अपन समायोजनक कारण भूत विरोधी प्रवृत्तिकेँ परास्त करय चाहैछ। एहि प्रयासमे ओकर समाज-विरोधी प्रवृत्तिसँ संघर्ष करय पड़ैत छैक। एहि प्रकारेँ आत्मसम्मानी पात्रक संघर्ष सामाजिक समायोजनक दिशामे कयल गेल एक प्रयास थिक। इएह हुनक अन्त:स्थ सामाजिक प्रेरणाकेँ व्यावहारिक क्षेत्रमे आनि क’ उपस्थित क’ दैत अछि। एहन संघर्षमय प्रयासक फलस्वरूप आत्मसमानी पात्रक व्यक्तित्व निर्मित्त भेल अछि जे हिनक मिथिलांचलक समाजक एकांकीक अनुपम देन थिक। ब्रह्मस्थानक पचकौड़ी एही श्रेणीक पात्र अछि जे अपन आत्म-सम्मानक रक्षार्थ ब्रह्मस्थानकेँ कोड़ि क’ हुनक अस्तित्वकेँ मेटैबाक लेल तैयार अछि। सत्ता आँखिक सोझॉं नव-दर्शनक निर्माण करैत अछि जहिमे एकमात्र स्व रहैत अछि। स्वार्थान्ध सत्ताकेँ जीवित रखबाक हेतु मदति कयनिहार व्यक्ति आत्मकेन्द्रित बनि जाइत अछि। किन्तु ओकरा संधर्ष ओ करैत अछि जकरा लोकतन्त्रमे विश्वास एवं निष्ठा छैक। जे व्यक्ति सत्ताक विरोधमे नारा लगबैत अछि तकरापर विपत्तिक पहाड़ टूटि पड़ैत छैक। तथापि नैतिकता आ सत्ताक बलपर व्यक्तिक मनोबल बढ़ैत छैक आ असत् वृत्तिक संरक्षक कालजयी सेहो सद्वृत्तिसँ डेराय लगैत अछि। एहि प्रकारक जन-जागृतिक कार्य एकमात्र साहित्ये द्वारा संभावित अछि। हरिवंश बाबू गामक मुखिया छथि तेँ हुनक आज्ञाक बिना गामक एक पात पर्यन्त नहि हिल पबैत अछि। ओ एतेक वेसी स्वार्थान्ध छथि जे ओ अपन स्व क पूर्तिक निमित्त निरीह सुगियापर प्रहार करबामे कनेको कुठित नहि होइत छथि, कारण ओ हुनकर बेटा नूनू बचबाक आज्ञाक उल्लंघन कयलक अछि, जाहिसँ हुनका चोट पहुँचैत छनि। यद्यपि ओकर बेटा मखना अठारह दिनसँ ज्वराक्रान्त छैक माया, मोह, तथा ममता नामक कोनो वस्तु हुनक अन्तरात्मामे नहि छनि। तेँ निर्दयता पूर्वक व्यवहार करैत छथि जकर परिणाम अत्यन्त भयावह हाेइछ। जाहि ग्रामांचलमे अशिक्षा एवं अन्ध श्रद्धाक प्रभाव रहत ओतय निर्धनता तथा शोषणक परम्परा निश्चित रूपेँ रहतैक। अधंश्रद्धाक प्रतीक छथि पंचकौड़ी तथा हुनक पत्नी सुगिया जे ब्रह्मस्थानपर कबुला पाती क’ कए मखनाक नीके होयबाक कामना करैत अछि। शोषित वर्गमे एकता अवश्य अछि तथापि ओ अन्यायसँ डेरायल रहैत अछि, किन्तु ओहिसँ मुक्त होयबाक इच्छा अवश्य रखैत अछि। मुदा सामाजिक परिवर्त्तित परिवेशमे से सम्भव नहि भ’ पबैत अछि। वर्त्तमान परिवेशमे एक दोसराक उपयोग करबाक पाछॉं बेहाल अछि। एहि लेल कोनो तरहक योग्यता अपेक्षित नहि, प्रत्युत एक हथकण्डाक प्रयोजन अछि। मुदा एतबा निश्चित अछि जे लोक अपन लाभक लेल आेकर उपयोग दोसरापर करैत अछि। ई परम्परा समाजमे सतत चलैत रहैत अछि। एक बेर आक्टोपसक शिंकजामे पड़ि़ गेलापर वापसीक मार्ग अवरूद्व भ’ जाइत छैक। घरैयालूरिक महेन्द्र बाबू आ ब्रह्मस्थानक हरिवंश बाबू एही श्रेणीक पात्र छथि। जतय महेन्द्र बाबू अहि श्रेणीक प्रतिनिधि छथि जे शोषित वर्गक शोषण सूदिपर रूपैया लगा क’ करैत छथि, आ समाजक साइलॉक सदृश छथि जे खदुकाक कोंढ़-करेज पर्यन्त खोरैैबामे कनियो कुठित नहि होइत छथि ततहि हरिवंशबाबू एक अहंकारी व्यक्ति छथि, जे शोक वर्गपर अत्याचार करैत छथि। यद्यपि शोषित समाज हुनका सभक गतिविधिसँ पूर्णरूपेण परिचित अछि तथापि बेर-घड़ीपर वैह काज अबैत छथिन तेँ विरोध करबाक प्रश्ने ने उठैछ। अत्यल्य पात्रक प्रयोग क’ कए दिशाबोध एकांकीक रचना एकांकीकार कयलनि। एहिमे कुल चारि पात्र अछि। नूनू, हुनक वृद्ध पिता, सुन्दर तथा हुनक युवती पत्नी। हमर सामाजिक परिवेशक उक्त चारू पात्र मानसिक विश्लेषण करबामे सक्षम भेलाह अछि। आधुनिक सामजिक परिवेशक प्रतीक छथि सुन्दर जे भौतिकवादी युगमे अपन जीवनकेँ सुखी-सम्पन्न सानन्दित बनयाबामे निम्नसँ निम्न स्तरपर जा सकैत छथि। किन्तु युवती पत्नीक विद्रोही तेवर एतेक बेसी प्रखर अछि जे हुनका सोझाँमे ओ अँटकि नहि पबैत छथि। किन्तु नूनू कर्तव्यनिष्ठ पात्र छथि जे एम.ए. इन फिलॉसफी रहितहुँ अपन कर्त्तव्यपरायणता संगहि संग पितृ एवं मातृभक्तिकेँ अपन पुनीत कर्त्तव्य बुझैत छथि। ओ दिग्भ्रमित सुन्दरकेँ आदर्श जीवन एवं कर्त्तव्यपरायणता पाठ अपन व्यवहारसँ पढ़ा क’ दिशाबोध करबैत छथि। नूनूक चरित्रसँ शिक्षित भ’ कए सुन्दर अपन संग मायक इलाजक लेल तत्परता देखायब अपन पुनीत कर्तव्य बुझैत छथि। एकांकीकार दिग्भ्रमित सामाजिक परिवेशक जे वास्तविक मानसिकता भेल जा रहल अछि तकर यथार्थतासँ जन सामान्यकेँ परिचित करयबाक प्रयास कयलनि अछि जे आध्ाुनिक परिवेशमे उपेक्षणीय नहि प्रत्युत ग्रहणीय अछि। संवाद : रंग रचना चाक्षुष यज्ञ थिक तथा रङ्गानुष्ठान ओकर कर्मकाण्ड। संवादक ऋचा स्तवनसँ युग पुरुषकेँ साक्षात् कयल जाइत अछि। रंगानुभव यज्ञ पुरुषक एहि गायित्री गायनसँ अवगाहन पबैत अछि आ सम्पूर्ण रंगकर्ममे प्रत्यक्ष होइत अछि। अतएव संवादक मन्त्रोचारसँ रंग कर्मक साक्षात्कार होइत अछि। एहि ऋचा गायनक निश्चित व्याकरण अछि। एहि प्रकारेँ संवादक प्रस्तुतीकरणक सेहो एक संहिता अछि जे ओहिमे निहित अछि। संवाद रंगानुभवक आत्मज थिक। संवाद रंग कर्मक व्यवहार ओ आचारण थिक निर्देशक, सूत्रधार ओ रंगकर्मीक संवादमे रंगकर्म, मंचन आ अभिनयक दिशाक अन्वेषण करैत छथि। कारण संवादक प्रत्येक शब्द, वाक्य रंगसिद्धिमे रहैत अछि। अतएव पूर्ण संवाद रचनामे एक तँ प्रत्येक शब्दसँ रंगकर्मक किरण फुटैत अछि, दोसर सम्पूर्ण संवाद एहन रंगसिद्ध शब्दक अनुशासित समन्वयसँ एक एहन आलोक विम्ब प्रस्तुत करैत अछि जे रंगकर्मक दिशा संकेत करैत अछि। संवाद पात्रक बहुविधि व्यक्तित्वक दर्पण थिक, ओकर विधायिका चारिित्रकताक समानुपातिक विकासक मानदण्ड थिक। संवाद रचनामे नाटकक प्रणेताक अत्यन्त कठिन भूमिका रहैत छनि। हुनका एकहि संग विविध पात्रक भूमिकामे उतरि क’ ओकर मनःस्थितिक अनुरूप संवाद रचना करय पड़ैत छनि। कतहु संवाद आरोपित नहि लागय, पात्रक प्रकृति ओ रंगवेदनाक प्रतिकूल नहि हो जकरा सतत ध्यानमे राखय पड़ैत छनि। उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे हिनक संवाद योजनापर दृक्पात कयलापर स्पष्ट प्रतीत हाेइत अछि जे ओ प्रत्येक पात्रक संवाद-योजना ओकर परिस्थितिक अनुकूलहि निरूपण कयलनि अछि। प्रहसनमे जतय हास्य-व्यंग्यक प्रमुखता रहैत अछि ततय ओ तदनुरूपहि संवाद-योजना कयलनि अछि। हिनक प्रत्येक संवाद एहन बुझना जाइछ जेना ओ स्वयं पात्रक रूपमे उपस्थित भ’ कए अपन बात ओकरा मुहे कहयबाक प्रयास कयलनि अछि। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक एक विशेषता अछि जे एकांकीकार ओहिमे पात्रोचित भाषाक संगहि-संग ग्राम्य भाषाक प्रयोग एतेक सहजताक संग कयलनि अछि जकर परिणाम भेल अछि जे हिनक भाषा-शैली अत्यन्त मर्मस्पर्शी बनि गेल अछि। यद्यपि ई संस्कृतक पण्डित छथि जनिका तत्सम शब्दक प्रयोग करबामे विशेष आभिरुचि रहबाक चाही, किन्तु ई भाषा प्रयोगमे एतेक, उदारचेता छिथ जे हिनक चाहे काव्य भाषा हो चाहे गद्यभाषा हो ओहिमे ठेंठसँ ठेंठ शब्दावलीक एतेक प्रचुर परिमाणमे प्रयोग करैत छथि जे पाठकक मर्मकेँ स्पर्श करबामे सहायक होइत अछि। जतेक दूर धरि एकांकी ओ प्रहसनमे भाषा प्रयोगक प्रश्न अछि ओहि परिप्रेक्ष्यमे निर्विवाद रूपेँ जा सकैछ जे लोकोक्तिक प्रयोग करबामे ई महारथ हासिल कयने छथि जे पाठकक ध्यानाकर्षित करैत अछि। प्रहसन ओ एकांकीक भाषाशैली वा संवाद योजना प्रस्तुत करबाक शैली एतेक सक्षम अछि जे नेपथ्यमे कोनो प्रकारक आडम्बर करबाकक प्रयोजन नहि पड़ैछ। रंगमंचक व्यवस्थाक एहन संकेत पात्रक माध्यमे देलनि अछि जे ओकर भूमिकाक नहि निर्माण करैछ। पात्र जखन परस्पर वार्तालाप करैछ तखन अपन मौन, आवेग, स्थिर दृष्टिएँ, कखनो-कखनो हँसि क’ कखनो- कखनो बीचमे रूकि क’ नाटकीय प्रभाव गम्भीर बना दैत अछि। एहि प्रकारेँ मंचीय सम्भावनासँ परिपूर्ण हिनक प्रहसन ओ एकांकी सामाजिक जीवनक विभिन्न समस्याकेँ जहिना-तहिना प्रस्तुत कयलक अछि। मिथिलांचलमे प्रचलित मुहावरा ओ लोकोक्तिक प्रयोगमे हिनक काव्य भाषाक संगहि-संग गद्यभाषाक वैशिष्ट्य अछि। हिनक एहि प्रवृत्तिक प्रतिफल प्रहसन ओ एकंाकीमे सेहो उपलब्ध होइत अछि जकर किछु बानगीक अवलोकन कयल जा सकैछ यथा पेट काटि क’ पोसल पूत सैह कहै फलनामा भूत, परिलागब, दाँत निचोड़ब, हक्कर पेलब, जीक पातर, नङो-चङो करब, मनक मनोरथ मनहि बिलटल, आन करैत आन भेल हो रामा, गाल लगायब, अमार लगायब, बहिरा नाचे अपने तालेँ, कुकुर माछी काटब, रनरनायब फिरब, बङौर लगाएब, भोथहा कलम, सनक सवार, मन लोहछब, गुमाने फाटब, पाँतरमे पड़ब, काछर काटब वंश कुड़हरि, नुड़िऐल फिरब, कन्ही गायकेँ भिन्ने बथान, कटहरमे नेढ़ा लगाएब, भोँडो छुड़ल ओ पेटो नहि भरल, सोनक दोस की सोनारक दोस, पहाड़ ढ़ाहब, छौड़ी सिखाबय बूढ़, दादीकेँ बुड़िसटही, खोप सहित कबुतराय नमः, रड़ धुम्मस करब, दम्म ने दुस्सर खाली बात पकठोस, गप्पीक खरिहान, दूरक ढ़ोल साहओन, पेट छूटल गोनू झाक ढ़ाकी, कनहा नछत्तर, नाक दम ठेकब, यमराजक पित्ती, आँखि गुड़रब, कमला कातक दड़ारि जकाँ मुँह बायब, जीवइ छी ने मरइ छी हुकुर-हुकुर करइ छी, भोकना बिलाड़, सुखि क’ टिटही, फिफिआइत रहब, छुहुक्का उड़ब, खगल लोक, डाँर पीठ एक्कठा होयब, हकलिलो भेल फिरब, खगले लोक की ने करय, पेट पहाड़, सुरता लागब, घूड़ घूऑं करब, टटी लागब, लते पत्त दौड़ब, जोगार धरायब, छप्पन छूरी चमकायब, कबुला करब, जिन्न पोसब, आँखि फुटब, एक बजा बय सतरह आबे, अकाश ठेकब, साटिधट राखब, लटारहम करब, खेखनियाँ करब, कुर्रकाई करब, ऑंटागील करब, उत्तम खेती मध्यम वान, अधम चाकरी भीख निदान, हाथ पकड़ब, सेवा सँ मेवा पायब, कौआ ल’ गेल कान, इयादि। एहिसँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे हिनका भाषापर अद्भूत अधिकार छनि तथा पात्रक मुहे सुनैत देरी दर्शककेँ स्वयं आत्मबोध भ’ जाइत छैक। एकांकी एवं प्रहसनक भाषा अन्य साहित्यिक विधादिक तुलनामे एक पृथक संस्कारसँ संयुक्त अछि। यथार्थक आग्रह कारणेँ ओकरा सामान्य जीवनक बोली वर्णक भाषासँ निकट होयब अनिवार्य अछि। हिनक एकांकी ओ प्रहसन सामान्य भाषाक भीतरहिसँ संचरित संस्कारित भेल अछि। एहि रूपमे एकांकीक वस्तुक लेल तथ्ये नहि करैछ, प्रत्युत सम्पूर्ण रचनातन्त्रक निर्माण सेहो करैछ। वस्तुत: हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषा सम्पूर्ण सम्प्रेषणक भाषा थिक जाहिमे एक-एक शब्द कहल गेल अछि ओ महत्वपूर्ण नहि महत्वपूर्ण अछि एक समग्र प्रभाव आ ओ जे नहि कहल गेल अछि, जे, ध्वनित-व्यंजित मात्र कयल जाइत अछि। भाषा हिनक व्यक्तित्वमे रचल-बचल छनि जे सामजिक परिवेश, मानसिक चेतना सब मिलि क’ हिनक भाषिक प्रतिभाक निर्माण करबयमे सहायक भेल अछि। हिनक सर्जनात्मक बोध, चयन ओ संयोजनक सायास आग्रह सामान्यसँ विशिष्ट बना देलनि अछि। गीत : अमर मूल रूपेँ कवि छथि तेँ एकांकीमे सेहाे स्थल-स्थलपर हिनक काव्य प्रतिभाक प्रस्फुटन भेल छनि जकर प्रतिफल घरैयालूरि, हाकिमक हाकिम एवं श्रमदानमे सेहो हिनक काव्य-प्रतिभासँ पाठक एवं दर्शक परिचित होइत अछि घरैयालूरिमे ढ़ोलक झालिपर गबैत एक मण्डली प्रवेश करैत अछि जकर विषय-वस्तु थिक राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा देखाओल गेल गृह-उद्योग एवं कुटीर-उद्योग, तकर महत्तापर प्रकाश देल गेल अछि। एहि एकांकीमे प्रयुक्त गीतक महत्व मूलस्वर थिक जनसामान्यकेँ एहि दिस आकर्षित करब। हाकिमक हाकिम वा ननदिओक ननदिमे सहो उक्त परम्पराक पालन कयल गेल अछि, जखन मिडिल स्कूलक प्रागंणमे चेयर मैन साहेब उपस्थित भ’ छात्र लोकनिकेँ वार्षिकोत्सवक अवसरपर पारितोषिक देबाक लेल जाइत छथि तखन हुनक स्वागतार्थ स्वागतगानक आयोजन कयल जाइत अछि। श्रमदान एकांकीमे सेहो एहि परम्पराक निर्वाह कयल गेल अछि। स्वयं सेवकक दल कान्हपर कोदारि आ हाथमे छिट्टा ल’ कए श्रमक महत्ताकेँ प्रतिदिन करैत मातृभूमि भारत माताक आह्वान करैत छथि जे मानवतापर दानवताक स्पष्ट झाँकी भेटि रहल अछि। एहन विषम स्थितिमे दलितक उद्धारक हेतु एहिसँ उत्तम साधन आ की भ’ सकैछ ? श्रमक माध्यमे हमरा सभक उद्धार संभावित अछि। एहिसँ प्रेरित भ’ कए गबैया सब मिलि क’ देशक निर्माण, अपन भाग्यक निर्माण तथा भावी संतानक भविष्य निर्माणक हेतु कोसीक वन्दना करैत देखल जाइत छथि जाहिमे मातृभमिक कल्याणार्थ क्रान्तिकारी डेग उठबैत विश्व बन्धुत्वक भावनासँ प्रेिरत भ’ कए अबला-वृद्ध वनिता देशक नव-निर्माणक हेतु सन्नद्ध भ’ जाइत छथि जे त्याग तस्पया, आलस्य, भय, आदिक परित्याग क’ देशक निर्माणमे लागि जाथि। उपर्युक्त तीनू एकांकी गीतक शब्द-विन्यास संगीत परम्परानुरूप अछि। उद्देश्य : चन्द्रनाथ मिश्र अमरक जतबे एकांकी ओ प्रहसन प्रकाशमे आलय अछि ओहिमे एकांकीकार मिथिलांचलक परिप्रेक्ष्यमे जाहि सामाजिक समस्यादिकेँ प्रस्तुत कयलनि अछि ओ मात्र मिथिलांचलेक समस्या धरि सीमित नहि अछि, प्रत्युत सम्पूर्ण भारतवर्षक ओहि सामाजिक परिवेशक समस्या थिक जाहि परिवेश मे भारतीय निम्न एवं मध्यवित परिवार गुजर बसर करैत अछि। हमरा जनैत एकांकी ओ प्रहसनक रचनाक पाछाँ एकांकीकारक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहलनि अछि जे एकरा माध्यमे मिथिलांचक सामाजिक परिवेश पुननिर्माणक संगहि-संग समाजमे एक एहन चेतना अानब जाहिसँ जर्जरित समाजक कायाकल्प कैल जा सकइयै। एक सफल शिक्षक होयबाक कारणेँ व्यावहािरक जीवनक अनुभवक आधारपर एक युगद्रष्टा साहित्कार सदृश ओ इएह सन्देश देबाक उपक्रम कयलनि जे शिक्षा जगतमे आमूल परिवर्त्तन, परिवर्द्धन ओ परिमार्जनक प्रयाेजन अछि। एहि पृष्ठभूिममे ओ अपन एकांकी ओ प्रहसनक विषयवस्तुक चयन कयलनि जे व्यावहारिक जीवनमे जनसामान्यक हेतु लाभप्रद सिद्ध भ’ सकय। प्रत्येक व्यक्तिक जीवनक एक सुनिश्चित उद्देश्य होइछ। ओहि ध्येयक प्रािप्तक हेतु व्यक्ति सब किछु तन-मन-धन समर्पित क’ दैत अछि। पुस्तक मनुष्यक गुरु एवं मित्रक संगहि सब किछु अछि। ओहिसँ फराक रहि क’ मनुष्यकेँ सुखक अनुभूति नहि भ’ सकैछ। मृगतृष्णाक पाछाँ-पाछाँ दौड़लासँ मनुष्यकेँ मात्र थकाने होइत छैक। किन्तु पुस्तकमे व्यस्त रहलापर मानसिक समाधान ओ ज्ञानक संगहि सम्मान भेटैछ। अतएव समाजसँ किछु माँगबाक लालसासँ नीक थिक जे अध्ययन- अध्यापनक सत्य दुनिया अपनायब राजमार्ग थिक। चन्द्रनाथ मिश्र अमरक विफुल साहित्य साधनाकेँ देखि प्रतिभाषित होइत अछि जे हिनक साहित्य साधना निशिचत रूपेँ हिनक राजमार्ग छनि जकरा अनुसरण क’ कए एतेक अवदान मैथिली साहित्यकेँ श्रीवृद्वि बनयबामे द’ पौलनि ओ जाहि सामाजिक परिवेशक प्रश्न एकांकी ओ प्रहसनमे उठौलनि ओ निश्चित रूपेँ मिशिलाक पृष्ठभूमिमे एक अभिशाप थिक। ब्रहास्थान एक उल्लेखनीय एकांकीक रूपमे पाठकक समक्ष अबैत अछि जाहिमे एकांकीकार निम्नवर्गीय गमैया समाजक प्रतीक रूपमे सुगिया ओ पंचकौड़ीकेँ प्रस्तुत क’ कए ई जनयबाक उपक्रम कयलनि अछि जे युग-युगसँ सीदित अछि, पीड़ित अछि, जकरापर अत्याचार तँ अवश्य होइत छैक, किन्तु अपन आक्रोशकेँ गामक मुखिया हरिवंश बाबूपर नहि प्रकट क’ कए ब्रह्मस्थानपर प्रकट करैत अछि जे भगवान सेहो शोषक वर्गक संग मिलि क’ अत्याचार करबामे सहयोग देबामे कनेको कुंठित नहि होइत छथि। जाहि समाजमे अशिक्षा ओ अन्धश्रद्धाक प्रभाव छैक ओतय गरीब तथा मजदूरक शोषणक परम्परा बनि क’ रहि जाइत अछि। ओकर मानसिकता एहन छैक जे ओ ने तँ भगवानक विरोध क’ सकैत अछि आ ने शोषक वर्गक प्रतिनिधि बनि क’ मूक रहि सकैछ। ओ अन्यायसँ डेरायल अछि तथा ओहिसँ मुक्ति पयबाक आकांक्षी सेहो अछि। एतय संघर्ष दोसर पक्ष सेहो अछि जे मुखिया एहि अन्यायक एक पुर्जा मात्र अछि। सामाजिक यथार्थ विषयक चयन करबाक पाछाँ चन्द्रनाथ मिश्र अमरक मुख्य उद्देश्य छनि समाज-सुधार तथा जनसामान्यकेँ एहि दिस आकार्षित करब। एकांकीकार समाजक अन्यायपर प्रकाश द' कए जनसामान्यमे चैतन्य उत्पन्न कयलनि अछि। ओना तँ सभ देशक नाटकककार सामाजिक विषयकेँ आधार बना क’ कतिपय एकांकी ओ प्रहसनकार रचना कयलनि अछि जे पाठक वा दर्शकक आकर्षणक केन्द्र बनल अछि। भारतीय एकांकीकार ओ प्रहसनकार सामाजिक यथार्थक पूर्ण उपयोग कयलनि। प्रस्तुत एकांकीकार सामाजिक विषयक आधार बना क’ सुधार करबाक दिशामे प्रयास कयलनि। ओ मिथिलांचलक सामाजिक जीवनमे विस्तृत कुरीतिकेँ देखलनि तथा ओहिपर व्यंग्यात्मकताक शैलीमे प्रहार कयलनि। एकांकीकारक सुधारक वृत्तिक परिणाम स्वरूप समाजक जीवैत-जैत चित्र जनसाधारणक सोझाँ प्रस्तुत भेल तथा नवीन भावनाक विकासक लेल मार्ग प्रशस्त भेल। समाजक परिष्कार भावनासँ प्रेरित भ’ कए ओ एकांकी एवं प्रहसनक रचना कयलनि तथा सामाजिक परिवेशक अन्तर्गत वर्गगत बिडम्बनाकेँ नष्ट करबाक अद्देश्यसँ ओ हास्य-व्यंगयकेँ प्रमुख साधन बनौलनि। संभवतः एहि वास्तविकतासँ अवगत नहि रहलाक कारणेँ डाॅ. दुर्गानाथ झा श्रीश (1929-2000) मैथिली साहित्यक इतिहास (1991)मे हिनकापर जे आरोप लगौलनि जे हिनक एकांकी जाहि प्रचार-प्रसारक स्वर अत्यन्त प्रमुख भेलासँ प्रत्येक एकांकी, सरकारी प्रचार साहित्य जकाँ लगैत अछि (पृष्ठ-301)। हमारा दृष्टिएँ दुर्गानाथ झा श्रीशक ई कथन सर्वथा दिग्भ्रमित विचार थिक, कारण साहित्यक प्रमुख उद्देश्य होइछ जे समाजमे घटित भेनिहार घटनाक यथार्थ पाठक ओ दर्शककेँ अवगत करायब, समाजक अभावमे साहित्य महत्वहीन भ’ जाइछ। एकांकीकार समाजक यथार्थक चित्रण क’ वास्तविकतासँ अवगत करयबाक प्रयास कयलनि जे सर्वथा ग्रहणीय अछि, अनुकरणीय अछि, कारण हुनक एकांकी ओ प्रहसनक विषय-वस्तु समाजोन्मुखी तथा समयक जे माँग छल तकरा परिप्रेक्ष्यमे लिखल गेल अछि। नि:सारण : चन्द्रनाथ मिश्र अमर अपन प्रहसन ओ एकांकीमे हास्य-व्यंग्यक अवतारणाक लेल विविध पात्र एवं परिस्थिति कथा-वस्तुमे नियोजित कयलनि अछि, कारण हुनक समसायिक सामाजिक परिवेशक अन्तर्गत एही प्रकारक ज्वलन्त समस्या छल जकर ओ अत्यन्त सूक्ष्मताक संग विश्लेषण कयलनि। प्रहसनक कथा अतिरंजित होइत अछि आ प्रहसनक पात्रक विविध क्रियाकलाप सेहो दर्शककेँ हँसबैत अछि। यद्यपि प्रहसन उहपासाम्क होइत अछि तथापि ओहिमे सुधारक भावना सन्निहित रहैत अछि जे हिनक प्रहसनक केन्द्र-विन्दु थिक। एकांकीमे सामाजिक समस्याक विभिन्न पहलूकेँ ओ प्रभावोत्यादक शैलीमे प्रभावशाली ढंगसँ प्रस्तुत कयलनि अछि।एकांकीकार यथास्थान सहज स्फूर्तिसँ मार्मिक विचारकेँ अभिव्यक्त कयनिहार ग्राम्य भाषाक माध्यमे प्रस्तुत कयलनि। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषा तथा ओकरा प्रस्तुत करबाक शैली एतेक सक्षम अछि जे नेपथ्यमे कोनो प्रकारक आयोजनक प्रयोजने नहि पड़ैछ। ई एकांकी ओ प्रहसनमे रंग-व्यवस्थाक एहन संकेत पात्रक माध्यमे देलनि अछि जाहिसँ एकर भूमिका निर्माण स्वयं भ’ जाइछ। एक पात्र दोसरा संग वार्तालाप करैत अपन अावेग, मौन एवं स्थिर दृष्टिएँ बीच-बीचमे रूकि क’ नाटकीय प्रभावकेँ गम्भीर बना देलनि अछि। एहि प्रकारेँ मंचीय सम्भावनासँ परिपूर्ण हिनक ओ प्रहसनक सामाजिक जीवनक यथार्थताक विभिन्न समस्याकेँ एहि प्रकारेँ रू-ब-रू प्रस्तुत कयलनि अछि जाहिसँ ओ लोकनि बिनु भेने नहि रहि सकैछ। हिनक एकांकी ओ प्रहसनक भाषामे सूक्ष्मता एवं प्रत्यक्षता अछि। चन्द्रनाथ मिश्र अमर अपन समसामयिक जीवनक दैनिक, आर्थिक सामाजिक समस्याकेँ विचार प्रधान ढंगसँ सोझरयबाक प्रयास कयलनि। ओ काल्पनिक जीवनसँ हरि क’ यथार्थक सहरजमीनपर अयलाह। कथानक, पात्र, चरित्र चित्रण, भाषा, वेशभूषा, सभमे यथार्थताक प्रति अभिरुचि हिनक एकांकी ओ प्रहसनक विशिष्टता अछि। यथार्थवादी प्रगतिशील समस्याकेँ ओ एकांकी एवं प्रहसनमे स्थान देलनि। ई नाटकीय भाषाक संस्कार कयलनि, नव भावक संजीविनी ओकरा देलनि एवं कलाक विभिन्न रूपमे सार्थक प्रयोग कयलनि तथा वर्त्तमान मैथिली गद्यकेँ दिशा देलनि। हिनक एकांकी ओ प्रहसनमे रस-निष्पत्ति स्वयं होइत अछि। विशेषत: हास्य-व्यँग्यक ई मैथिलीमे सिद्धस्त लेखक छथि जकर प्रतिरूप हिनक समग्र साहित्यमे उपलब्ध होइत अछि। हिनक एकांकी ओ प्रहसन आभिनयोपयोगी अछि जकरा प्रस्तुत करबाक हेतु कोनो तामझामक आयोजनक प्रयोजन नहि पड़ैछ। हिनक एकांकी-प्रहसन जहिना पठनीय अछि तहिना अभिनीय सेहो। एहि प्रकारेँ हिनक एकांकी-प्रहसनक माध्यमे मिथिलांचलक सामाजक समस्त सामाजिक जीवनक झलक भटैत अछि जे विविध रूपमे प्रत्यक्षीकरण भ’ जाइत अछि। सुजीत कुमार झा थाल माटिक पावनि मिथिलाञ्चल पावनि तिहारक हिसाव सँ धनी क्षेत्र मानल जाइत अछि । कोनो महिना एहन नहि होइत अछि जइमे प्रमुख पावनि सभ नहि हुए । फेर लोक ओतवे उत्साहकेँ संग मनबैत अछि । अहिक्रममे थाल माटिक पावनि किछुए दिन पूर्व मिथिलाञ्चलमे सम्पन्न भेल अछि । जुडशीतल पावनिकेँ रुपमे मनाओल जायबला पावनिमे एक दोसरकेँ थाल माटि लगाओल गेल । होरी पावनिमे जेना एक दोसरके रङ्गअविर लगाओल जाइत अछि , तहिना जुडशीतलमे थालमाटि लगाओल जाइत अछि । जनकपुरमे विशेष आकर्षण थाल माटिक पावनि मिथिलाञ्चलक हरेक स्थान पर ओतवे उत्साह के सँग मनाओल जाइत अछि । मुदा मिथिलाक राजधानी जनकपुरमे किछ विशेषे देखल गेल । जनकपुरक समाजिक क्षेत्रमे लम्बा समयसँ काज करैत आएल राम युवा कमिटी आ रामजानकी युवा कमिटी अलग अलग स्थान पर थाल माटिक उत्सव मनौलक । ओ उत्सवमे सैयकडो व्यक्तिक सहभागिता छल । राम युवा कमिटी जनकपुरक अध्यक्ष सोहन ठाकुर कहलन्हि — जुडशीतल जाहि उत्साहके सँग पहिले मनाओल जाइत छल ओहिमे किछ वर्ष सँ कमी बुझा रहल छल । ओ कमी दुर करबाक लेल उत्वसके रुपमे जुडशीतल मनेलौ । उत्सवक बाद पुरे जनकपुर थाल माटि सँ भरि गेल छल । संचारकर्मी रामअशीष यादव कहलन्हि ‘बहुत दिनक बाद जुडशीतलक अनुभव अहिवेर भेल ।’ गाममे सेहो गाममे कोनो उत्सव हुए वा सत्यनारायण भगवानक पूजा एकटा अलग होइत अछि । लोकके कसि कऽ सहभागिता रहैत अछि । फेर थाल माटिक बात करी तऽ गाममे अहिरुप सँ थालमाटि खेलल जाइत अछि की कतेको दिन तक गाममे थाले माटि नहि रहैत अछि । धनुषा जिल्लाक गंगुलीक गुड्डु गंगुली कहैत छथि — ‘गंगुली गाममे थालमाटि खेलबाक लेल बाहर कमायबला युवासभ जुमि जाइत छी । पावनि सेहो मनालैत छी आ युवा सभ बीच भेटघाट सेहो भऽ जाइत अछि ।’ मैथिली रङ्गमञ्चक कलाकार सेहो रहल गंगुली होरी सँ कम मज्जा जुडशीतलमे सेहो नहि होइत अछि दावी कएलन्हि । किछ विकृती सेहो होरीमे जहिना जिनका पेलौ रङ्ग अविर लगा देलौ तहिना अहु पावनिमे कतौ कतौ देखल गेल । सडक पर चलयबला बाट बटोही सभके सेहो थालमाटि सँ भिजा देल जाइत अछि । जनकपुर मे सेहो कतेको ठाम लोकके थाल माटि सँ पोतल गेल छल । साहित्यकार डा. रेवती रमण लाल कहैत छथि ‘पावनिके बढिया बनाबयकेँ लेल विकृती सभकेँ समाप्त करय परत । ओ अहिमे युवा सभकेँ आगा आगबयकेँ सल्लाह दैत छथि । जनकपुर अञ्चल अस्पतालक स्कीन विभागक चिकित्सक डा. रामचरित्र साहक अनुसार चिकनी माटि स्वास्थ्यक लेल खराब नहि होइत अछि मुदा नालाक पानि राखि देल जाइत अछि ओ लोकके लम्बा समयधरि परेशान कऽ सकैत अछि । अहिके लेल बचब आवश्यक अछि । जगदीश प्रसाद मंडल जीवन संर्घष- 3 नीन टुटितहि ओछाइनेपर दुखनीक मनमे उपकल आइये दीयोबाती छी आ काली-पूजाक मेलो गाममे हएत। ऐना कऽ बेटी श्यामाकेँ समाद देने छेलियै जे एक दिन पहिनहि धीया-पूताकेँ नेने अविहेँ, से कहॉं आइलि। ओहो बेचारी की करत? अन्न-पानि घरमे हेतै मुदा, तीनू तूर जे मेला देखत तइ लए तँ दसो-बीच रूपैया खर्च हेबे करतै। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे नइ होइ तेकरो इन्जाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरियान नइ भेल होय। हँ, हँ, भरिसक सएह भेल हेतै। ओना आइ भरि अबैक समए छै, बेरो धरि ऐवे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैया नेने औत मुदा, जरना तँ नै आनत। अखन धरि हमहूँ तँ जरनाक कोनो ओरियान नहिये केलौंहेँ। आब कहिया करब? भने मन पड़ि गेल। सोचने छेलौं जे श्याम आउत तँ घर-अंगनाक काज सम्हारि देत सेहो नहिये भेल। भरिये िदनमे की सभ करब। घरो छछाड़ै लए अछि, ओलतियो ओहिना पड़ल अछि। कन्ना असकरे एते काज सम्हरत? ओलतीमे माटि भरब, िक घर छछाड़ब आिक जरना आनव। काज देखि अबूह लगि गेलइ। असकताइत मने विछानसँ उठि ओलती देखलक। मुदा रौदियाह समए रहने माटि देव जरूरी नहि वुझि पड़लै। काज हल्लुक होइत देखि मनमे खुशी एलै। ओलतियेमे ठाढ़ भऽ ओसार िहयासलक। कतौ चुबाट नहि देखि सोचलक जे छछाड़वो जरूरी नहिये अछि। बाढ़निसँ झोल-झाड़ झाड़ि देवै। आरो मन हल्लुक भेलै। मन हल्लुक होइते बाढ़नि लऽ घरो-ओसारक झोल-झार झाड़ि, अंगनो बहारलक। बाढ़नि रखि घैला नेने कलपर गेल। छउरेसँ मुँह धाेइ-कुड़ड़्ा कऽ घैल भरने आंगन आइलि। पानि पीबि तमाकुल निकालि सोचलक जे एक जूम खाइयो लेब आ दू जूम बान्हि कऽ बाधो नेने जाएव। सएह केलक। ओनो दुखनी पहिने तमाकुल नहि खाति छलि, हुक्का पीबैत छलि। मुदा जहियासँ लबहदक िमल बन्न भेल तहियासँ छुआ भेटवे बन्न भऽ गेल। जहिसँ पीनी महग भऽ गेल। घर बन्न कऽ कान्हपर लग्गी नेने मारन बाध विदा भेलि। बाधक अधा भाग निच्चॉं दिस खेती होइत बाँकी उपर दिस गाछिये कलम अछि। बड़बढ़िया आमक गाछक निच्चॉंमे ठाढ़ि भऽ सुखल ठौहरी सभ िहयासए लागलि। रौदियाह समए रहने मनसम्फे जारन देखलक। जारन देखि मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूँट खोलि तमाकुल निकालि एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेरि बान्हि लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे उक बनबै लए खढ़ कहॉं अछि। आन साल लोक आसीन-कातिकमे खढ़होरि कटबै छलए ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि बाढ़नियो भऽ जाइ छलए आ उको बना लेइ छेलौं। मुदा जेहन बाढ़नि चड़िकाटूक होइए तेहन राड़ीक थोड़े होइए। हारल नटुआ की करत? तते ने लोक बकरी पोसि नेने अछि जे कतौ एकोटा चड़िकॉंटू रहए दैत अछि। तहूमे तेहन रौदियाह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि खरहोरियो उपटा देलक। कथीक उको बनाएव? उक नै हएत तँ पावनि कोना हएत। गाम िक कोनो शहर-बजार छियै जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने उक फेड़ैए। सोझे छुड़छुड़ी-फटक्कासँ पावनि करैए। नजरि खिरा खढ़ भजिअवए लागलि। भजिअवैत गंगवापर नजरि गेलइ। बुदवुदाइल- ‘‘त: अनेने एते मन औनाइ छलए। घरे लग पोखरिक महारपर खढ़क जाक लगौने अछि। ओहीमे सँ लऽ आनब। मुँहमे खैनी घुलितहि थूक फेकलक। खढ़क ओरियान देखि मन सनठीपर गेलइ। िबना सनठिये उक कन्ना बनाएव? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजए लागलि- ‘‘सभ खेतबला पटुआ उपजौनाइ छोड़ि देलक। आब अपनो उक बना लिअ। हमसब तँ सहजे गरीब छी अपना खेत-पथार नै अछि। मुदा खेतोबला उक फेड़ि लिअ। माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लिअ। आनह आब बजारसँ कीनि कऽ प्लास्टिकक डोरी। अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उपजेने केहन भेल।’’ बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। िबनु सनठिये जँ उक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएव। लछमी िदन छी जँ सूप बजा दरिदराकेँ नै भगाएव तँ ओ िकन्नहुँ भागत। अपने गप-सप्प करै लागलि- ‘‘कोनो की हमरेटा सेठी नै हएत िक गामेमे ककरो नै हेतै?’’ ‘‘अनका भेने हमरा की? िकयो अपन दरिदरा भगौत आिक दोसराक?’’ ‘‘जँ कोनो जोगार कऽ सभ संठीक ओरियान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि जेतै आ हमरे रहि जाएत।’’ दुनू हाथ माथपर लऽ संठीक चिन्तामे दुखनी डूबि गेल। रसे-रसे हूब टूटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहिना कोनो भारी चीज अांगुरपर पड़ि गेलासँ छटपटाइत तहिना संठीक सोगसँ मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजरि गाममे टहलबए लागलि। एक बेरि टहला कऽ देखलक तँ कतौ नहि संठी अभरलै। फेरि दोहरा कऽ टहलबए लागलि। फेरि नहि कतौ अभरलै। मन कहै जे िबनु संठिये उक अशुद्ध हएत। अशुद्ध उक गोसॉंइक आगूमे कन्ना फेड़ब। ओहो की बुझताह। फेरि मनमे भेलै गरीब लोककेँ एहिना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा, कहुना तँ जीविये लइए। देवतो-पितरकेँ बुत्ता नै छनि जे अपनो पावनि-तिहारक ओिरयान करताह। संठी ताकब छोड़ि डिहवार स्थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अवितहि महाभारतक कृष्णकेँ कुरूक्षेत्रमे शंख फूकैत देखलक। मुदा जखन व्यासजी अर्थ बुझवए लगलथिन िक तहि काल खैनी खाइक मन भेलइ। ऑंचरक खूँटसँ खैनी निकािल चुनवए लागलि। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्मे बात रहै मनसँ निकलि गेलै। फेरि संठियेपर मन आिब गेलइ। पटुआक संठीक बदला चन्नी आ सनैपर नजरि पहुँचलै। सनै आ चन्नीपर नजरि पहुँचतहि मने-मन अपसोच करै लगल जे अनेरे िगरहत सभकेँ दुसलियै। पटुआक खेती तँ बेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनतो आ लगतो लगा उपजबैत छलै आ बेपारी सभ गरदनि कट्टी कऽ लैत छलै। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि देलक। अपना जते डोरी-पगहाक काज होइ छै अो तँ सनइयो आ चन्नियोसँ कइये लैत अछि। मुदा बेपारियो सभकेँ भाभन्स कहॉं भेलै। जहिना िगरहतक गरदनि काटि धन ढेरिऔलक तहिना प्लास्टिक आिब सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्ना सभ ओहिना ढ़न-ढ़न करै छै। चन्नी मन पड़ितहि दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूँटसँ तमाकुल निकालि-मुँहमे लेलक। पटुओ संठीसँ मोट-मोट संठी चन्नीक होइ छै। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएव जे दोसरे िदन दिरदरा पड़ा जाएत। चन्नी मन पड़ितहि घुरनापर नजरि गेलइ। बान्हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्नी भेलि छलै। सोनो सुन्दर मुदा, पटुआक सोन जेकॉं सक्कत नइ होइ छै। खैर जे हौ काज तँ सम्हैर जाइ छै। घुरनाक घरवाली अछियो बड़ आवेशी। जखने कहवै तखने बेसिये कए कऽ देत। जेललबा बौहू धौंछ थोड़े अछि जे सोझोक वस्तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेरिमे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै जना मुँहसँ मौध चुवैत होय। भगवान करौ जे सभ चीज बिला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि तँ देलक मुदा, लगले अफसोच करए लागलि जे अनेरे िकअए सरापि देलियै। कहुना भेलौं तँ माइये-पितिआइन भेलौं िक ने? माइये-बापक सराप ने धीया-पूताकेँ पड़ै छै। जेहेन चालि रहतै तेहेन फल अपने हेतै। बीस बर्खसँ कहियो थूको फेकए गेलियै। अपना आिगये-पानिये निमहै छी। आगि-पानिपर नजरि अबितहि बेटी श्यामा मन पड़लै। ऐना कऽ समाद देने छेलियै जे एक दिन पहिने चलि अबिहें। अनका जेकॉं िक तूँ असकरे छेँ। हाथी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चिन्ता छौ। फेरि मनमे उठलै लछमी पावनि छी की ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरिसक तही दुआरे नइ आइलि। तमाकुल खाइक मन भेलै। अँचराक खूँट खोलि तमाकुल देखलक तँ एक्के जूम बुझि पड़ल। एक्के जूम देखि सोचलक जे एकरे दू जूम बना लेब। मुदा टूटल दॉंतक गहमे तँ हराइले रहत। एक्के जूम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटपर मन गेलै। बेटा मन पड़ते दुखनी सोचए लगलि जे सालो भरि परदेशमे नइ रहत तँ कमाएत कतए? अंदाजे मनमे एलै जे चारि-पॉंच मास गेना भेल हेतै। मुदा चारि-पॉंच मास झुझुआन बुझि पड़लै। फेरि मन पाड़ि िहसाव जोड़ए लागलि। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसीनमे गेल रहै। हँ, हँ आसिने रहै। खानि-पीनि चलैत रहै। हमहूँ पोखरिमे तेल-खैर चढ़ा कऽ आइल रही। अखैन कातिक छी। ऐँ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेलै। ओह नै, पैछला आसीन नै छी िकऐक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जनम भेल। ओहो छौँड़ा दौड़ैए। कहुना-कहुना दू बर्ख भेल हेतै। आंगुरपर िहसाब जोड़ै लगल। दू बर्ख आ एक बर्ख तीन बर्ख ने भेल। तीन बर्ख मनमे अबिते चौंिक गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल। मनमे खुशी उपकलै। छौँड़ा फुटि कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो िक खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चिन्हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोछ सेहो भऽ गेल हेतै। आओत तँ िबआहो कइये देवइ। असकरे नीक नइ लगैए। िबनु धिया-पूताक अंगना कोनो अंगना छी। लोके ने लछमी छी। मगन भऽ दुखनी ऑंखि बन्न कऽ फड़ल-फुलाएल परिवार देखए लगलीह। जहिना पोखरिमे नावपर चढ़ि झिलहोिर खेला उतड़ि कऽ महारपर अबैत तहिना दुखनियोकेँ भेलि। तकितहि विचार बदलि गेलनि। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौँड़ा ओनै वियाह-तियाह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबै तखन की करब। गामोमे तँ कते गोरेकेँ देखबे केलियैहेँ। अखन धरिक खुशीक मनमे एकाएक पानि पड़ि गेलै। िनराश मने सोचए लगलि जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब ककरो बेटा-बेटी थोड़े पॉंजमे रहै छै। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। छौँड़ा सभ जहॉं बौहू देखलक िक माए-बाप िबसरि जाइए। मने उनटि जाइ छै। ऑंखिमे नोर ढबढ़बा गेलै। ऑंचरसँ नोर पाछलक। नोर पोछितहि मनमे उठलै जाबे पैरूख अछि ताबे तक ने ककरो पमौजी केलियै आ ने करबै। जइ दिन पैरूख घटि जाएत तइ दिन बुझल जेतइ। जिनगियो तँ तहिना अछि। कोनो िक ठीक अछि जे पैरूख घटलेपर मरब। पहिनहुँ मरि सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उड़हड़िये जाएत तँ उड़हरि जौ। बेटापर सँ नजरि हटि बेटीपर गेलै। बेटीपर नजरि परितहि मनमे आशाक उदय भेलै। आशा जगितहि मुँहमे हँसी एलै। सात घर दुश्मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लछमी छी। अपने फेरल नुआ िकअए ने दिअए मुदा, कहियो ओढ़ैसँ पहिरए धरि वस्त्रक दुख अखैन तक भेलिहेँ। ओकरे परसादे तीनटा कम्मल घरोमे अछि। जमाइयो तेहने छथि जे अपने माथपर उठाकेँ अन्नो-पानि दइये जाइत छथि। आशा जगितहि दुखनी जारन तोड़ए उठल। ऑंखि उठा गाछमे सुखल ठौहरी हियासए लगलीह। रौदियाह समए भेने मनसम्फे सुखल ठौहरी गाछमे। जारन देिख मन खुशीसँ नाचि उठलै। मनमे गामक सुख नचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जरना कीनैत-कीनैत तबाह रहैए। मन पड़लै सिंहेश्वर स्थानक मेला। एक्के सॉंझ भानस केलहुँ तहिमे दस रूपैया जरनेमे लगि गेल। ई तँ गुन रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सवे रूपैया िहस्सा लागल। नइ तँ सवा रूपैयाक जरना चुल्हिये पजारैमे लगि जाइत। एक सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्गीसँ ठौहरी तोड़लक। जारन देखि अबूह लगि गेलै जे कहुना-कहुना तँ पॉंच बोझसँ बेसिये भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो िक कोनो लगमे अछि। पॉंच बेरि उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीड़ो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दिन निचेनो रहब। फेरि मनमे उठलै जे जँ कीहीं अइ बीचमे श्यामा आिब गेल हएत तँ अंगने-अंगने खोज-पुछाड़ि करैत बौआइत हएत। मुदा छोड़ियो कऽ कन्ना जाएव। सभटा लोक लइये जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्हि लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएव। देखियो सुनि लेबइ। जँ नइ आइलि हएत तँ सभटा उघिये लेब। ओना जँ आइलि हएत तँ िक ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइये बेरिमे उघि लेब। मन असथिर होइतहि तमाकुल खाइक मन भेलै। ऑंचरक खूँटपर नजरि पड़तहि मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि गेल। मुदा पथार लागल जारन देखि मनमे एलै जे पावनिक दिन छी। वेसी अंहोस-मंहोस करब तँ सभ काज दुरि भऽ जाएत। अंगनोमे मारिते रास काज अछि। जारन बिछैले उठल। गाछक चारू भाग नजरि देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ निकलि-निकलि घोरन पसरि गेल। पॉंखिबला धोरन देखि दुखनी डरा गेल। बापरे ई तँ डकूबा घोरन छी दुइयेटा काटत तँ पराने लऽ लेत। मुदा छोड़ियो कन्ना देवइ। से नइ तँ लग्गियेपर उठा कातमे फेिक जारन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौँसे पसरि गेल अछि। छोड़ियो कन्ना देवइ। जीबठ बान्हि छत्ताकेँ कातमे फेिक जारन बीछए लगलि। फेरि मनमे एलै जे ठौहरियो तँ दू रंगक अछि। मोटको अछि आ पतरको अछि। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि बोझ बान्हब। सएह करए लगल। ठौहरी बीछिते रहै िक मन पड़लै, हाय रे बा बान्हब कथीपर। जुना तँ अछिये नहि। अगदिगमे पड़ि गेल। पहिने जे से मन पड़ैत तँ अंगनेसँ जुन्नो नेने अबितौं मुदा, सेहो ने मन रहल। छोड़ि देबइ तँ सभटा आने लऽ जाएत। एते बेरि उठि गेल िकछु खेनौ ने छी। मुदा जारन देखि मनमे खुशी होय जे कहुना-कहुना एक पनरहिया तँ चलबे करत। जँ दू-चारि दिन आरो तोड़ि लेब तँ भरि जाड़क ओरियान भऽ जाएत। ऑंखि उठा घसबाहिनी सभ दिस तकलक जे कियो भेटत तँ ओकरे हॉंसू लऽ कड़चिये नइ तँ राड़िये काटि जुन्ना बना लेब। मुदा सेहो नै ककरो देखै छियै। िहया-हिया करजान दिस िवदा भेल। मुदा ओहो केराक सुखल डपोर तँ िबना हँसुए काटल नहि हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि भालरि आ थम्होकेँ काटि छोड़ि देने अछि। जुन्ना देखि मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्ना लऽ आबि बोझ बन्हलक। पॉंच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि एकटा नेने आंगन आइलि। आंगन आबि सोचए लगलि जे िकछु बना कऽ खा लइ छी। फेरि मनमे भेले जे जखने आंगनक काजमे ओझड़ाएव तखने जारन बाधेमे रहि जाएत। तत्-मत् करैत पानि पीलक। घरसँ तमाकुल निकालि चुनबैत िवदा भेल। पॉंचो बोझ उघि लेलक। काठी जेकॉं डॉंड़ो आ गरदनियो तानि देलकै। देहो-हाथमे दर्द हुअए लगलै। हाथो-पएर नहि धोय ओसारेपर भुँइयेमे ओंघरा गेलि। थाकल-ठहिआइल देह ओंघराइत निन्न पड़ि गेल। बेरि टगि गेल। घरक छाहरि अंगनामे दू हाथ ससरि गेल। डेड़ियापर सँ जोगिनदर सोर पाड़ए लगल- ‘‘काकी, काकी।’’ दुखनीक निन्न टुटल। डेढ़ियापर सँ ससरि जोगिनदर आंगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेमे निन्न भेरि सुतल अछि। फेरि बाजल- ‘‘काकी, काकी।’’ ठाढ़ भेलि जोगिनदरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइयेबला अइठीन रहलौं मुदा, सभ सुख-सुविधा रहितो ओकरा सभकेँ ऐहन निन्न कहॉं होइ छै। देखै छी जे पेट खपटा जेकॉं खलपट छै, भरिसक खेवो केने अछि िक नहि। तहूमे पाएरो धुराइले देखै छियै भरिसक कतौसँ काज कए कऽ आइलि अछि। अखन जे घरक सभ कुछ उठा िकयो लऽ जाय तँ बुझवो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनियॉं छै। जहिना चीनीक कीड़ाकेँ मिरचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि जाएत। जे स्वभाविके छैक। मुदा िक मिरचाइक कीड़ा चीनीमे जीबि सकत। िवचित्र स्थिति जोगिनदरक मनमे उठि गेल। मुदा काजक धुमसाही, विचारक दुनियॉंसँ खींचि, ओकरा हड़वड़ा देलक। फेरि काकी, काकीक आवाज देलक। मुदा निन्न नहि टुटल देखि कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दबितहि दुखनीक निन्न टूटल। ऑंखि मुननहि बाजलि- ‘‘अयँ गे सामा (श्यामा) काल्हि िकअए ने ऐलै?’’ दुखनीक अवाज सुिन जोगिनदरक मनमे भेल जे भरिसक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ िहलबैत बाजल- ‘‘काकी, काकी....।’’ ऑंखि खोलि दुखनी उठि कऽ बैसि गेल। हाफी कऽ जोगिनदर िदस तकलक। मुदा िकछु बाजलि नहि। मोटरी खोलि जोगिनदर जोड़ भरि साड़ी, साया, एकटा आंगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि बाजल- ‘‘अखैन धरि काकी अहॉं नहेबो ने केलहुँहेँ।’’ जहिना आम बीछिनिहार गाछक निच्चॉंमे खसल आम देखि उजगुजा जाइत तहिना दुखनी उजगुजा गेलि। बाजलि- ‘‘बौआ, जारनि नइ छलै वएह तोड़ए भिनसरे चलि गेलौं। ओकरे सम्हारैत-सम्हारैत दुपहर भऽ गेल। िकछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं िक ऑंख लगि गेल।’’ दुखनीक बात सुिन जोगेनदर बाजल- ‘‘काकी, अखैन अगुताइल छी तेँ नै अँटकब। पूजा उसरला बाद निचेनसँ आिब आरो गप्पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदति सेहो कऽ देब। अखैन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैइयो देलौंहेँ। जाइ छी।’’ जोगिनदर उठि कऽ िवदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी िहसाब जोड़ए लागलि जे अधा रूपैया कऽ चाउर कीनि लेब आ अधा हाथ-मुट्ठीमे रखि लेब। मेला-ढेलाक समए छी कखैन कोना भूर फूटि जाइत। फेरि मनमे एलै जे श्यामो तँ अबिते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। जखन अनदिनो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पाबैनिये छी। दुनू नाइत-नातिन सेहो ऐबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि रूपैया नइ देवइ से केहन हएत। हम कतबो गरीब िकअए ने छी मुदा, नानी तँ छियै। साड़ी खोलि दुखनी देखए लागलि। साड़ी देखि बुदबुदाइल- ‘‘ऐहेन साड़ीक कोन काज अछि। कोनो िक नव-नौतारि छी जे ऐहेन छपुआ पहिरब। अइसँ नीक तँ तीन काजू मरकीन दैत जे कतबो मारि-धुसि कऽ पहिरतौं तइओ साल भरि चलबे करैत। सायाक कोन अछि। सायाक कोन काज अछि। आब तँ सहजहि बुढ़ि भेलौं। जहिया जुआन छलौं तहियो तँ डेढ़िये पहिरैत छलौं। कोनो िक मंगै लए गेल छेेलियै, मुदा जखैन घर पैसि दऽ गेल तखैन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी ऐबे करत अोकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबै।’’ साड़ी-साया, आंगी समेटि कऽ रखि दुखनी रूपैया गनए लागलि। फेर बुदबुदाइल- ‘‘सभटा दस टकहिये छी। दसटा अछि। दसटा दसटकही काए बीस भेल। दू-दू टा कऽ फुटा-फुटा रखि गनलक। पॉंच बीस भेल। मनमे खुशी एलै। फेर लगले मनमे एलै जे आइ पावनिक दिन छी अखन धरि खेलौंहेँ कहॉं। सभ दिन खैहह पाबनि दिन ललैहह। मुदा भिनसरसँ तँ गाछिये-िबरछीमे रहलहुँ। सारा-गाड़ा नंघलौं। िबना नहेने कोना भानस करब? सूर्य दिस तकलक। माथसँ िनच्चॉं देखि सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लगब ताबे तँ साँझे पड़ि जाएत। सॉंझमे लछमी पूजा करब िक अपने खाए-पीबए लगब। तहूमे अखन धरि ने खढ़ अनलौं आ ने संठी। जाबे से नहि आनब ताबे उक कन्ना बनाएव। िदआरियो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि ओ अँइठ भऽ गेल अछि कन्ना िदयारीमे देवइ। काज देखि दुखनीकेँ अबूह लागि गेल। पावनिक सभ िकछु िबसरि गेल। नजरि बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजरि पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजलि- ‘‘ऐना कऽ समाद पठौलियै से िकअए ने आइलि।’’ असमंजसमे पड़ि गेल। तहि बीच नवानीवाली बान्हेपर सँ सोर पाड़ि बाजलि- ‘‘काकी, काकी, दैया आगू अबैले कहलकनिहेँ। उत्तरवरिया पोखरिपर दुनू बच्चो आ मोटरियो लऽ बैसल छन्हि।’’ दैयाक नाओ माने श्यामा दऽ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि घरमे कपड़ा रखि ऑंचरमे रूपैया बान्हि िवदा भेलि। तीनि-चारिटा धिया-पूता सेहो संग लगि गेलनि। बेटी लग पहुँचते श्यामा उठि कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगितहि तरंगि कऽ दुखनी बाजलि- ‘‘अँइ गे, तोरा जानक काज नइ छौ जे एते लदने ऐलेहेँ।’’ माइक बातकेँ अनसून करैत श्यामा दुनू बच्चाकेँ कहलक- ‘‘नानीकेँ गोड़ लाग।’’ बच्चाकेँ देखि दुखनी हरा गेलि। सभ बात विसरि गेलि। ऑंचरक रूपैया निकालि एक-एक टा दस टकही दुनू बच्चाकेँ हाथमे दऽ बॉंिक अस्सियो रूपैया श्यामा दिशि बढ़ौलक। रूपैया देखि श्यामाक मनमे उठल। भरिसक बौआ पठौलकेहेँ। मुस्की दैत माएकेँ पुछलक- ‘‘की सभ बौआ पठौलकौहेँ?’’ बौआक नाओ सुिन दुखनीक मन फेरि औनाए गेल। नजरि बेटापर गेलइ। बेटापर नजरि पहुँचतहि मनमे तामस उठलै। बाजलि- ‘‘कतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि तेकर कोन ठेकान अछि। अखन धरि ने कहियो चिट्ठी-पुरजी पठौलक आ ने एक्कोटा छिद्दी। ओम्हरे कतौ कोनो मौगी सने उढ़ढ़ि गेल िक की। से िक कोनो पता अछि।’’ माइक बात रोकैत श्यामा बाजलि- ‘‘ऐना िकअए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमे से नै।’’ बेटीक बात सुिन माएक बेटासँ हटि बेटीपर पुन: आबि गेल। बाजलि- ‘‘दुनू बच्चो आ मोटरियोकेँ कन्ना आनल भेलौ?’’ मुस्कुराइत श्यामा बाजलि- ‘‘अपने एतऽ तक पहुँुचा गेलखिन।’’ जमाए दऽ सुिन दुखनी बाजलि- ‘‘एक डेग आगू घर नै देखल छलनि जे जइतथि।’’ ‘‘गाममे मेलो होइ छै आ पावनियो छियै तेँ कहलखिन जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि थान माल अएकरे माए बुते सम्हारल नै ने हेतै। परसू ऐथुन।’’ परसू सुिन दुखनीक मन थीर भेल। छोटका बच्चाकेँ केरामे लऽ जेठकीकेँ आगू कऽ िवदा भेलि। घरसँ कने पाछुऐ रहै िक दछिनसँ एक गोटेकेँ हाथमे बैग, फुलपेंट-शर्ट पहीरिने अवैत दुनू गोटे देखलक। मुदा िकयो चिन्हलक नहि। बदलल चेहरा भुखनाक। भुखनो अंगने दिशिसँ अबैत आ दुनू गोटे दुखनियो अंगने दिस बढ़ैत। घर लग आबि भुखना दुखनीकेँ कहलक- ‘‘माए।’’ भुखनाक माए कहब दुखनी सुनलक मुदा, अनठिया बुझि अनठा देलक। िकछु नहि बाजलि। मुदा श्यामा चीन्हि गेली। बाजलि- ‘‘बौआ हौ।’’ बौआ सुिन दुखनियो चौंकलीह। ताधरि भुखना लग आबि माएकेँ पएर छुबि गोड़ लगलक। दुखनी अवाक् भऽ गेलि। ऑंखिमे नोर ढबढ़बा गेलनि। िनच्चॉंसँ उपर धरि भुखनाकेँ निग्हारए लगलीह। करेज दहलि गेलनि। वामा बॉंहिसँ नातिकेँ दवने आ दहिना तरहत्थीसँ ऑंखि पोछि िवह्वल होइत बजलीह- “ऑंइ रौ बौआ तूँ तँ समरथ भऽ गेलेँ। चिन्हवे ने केलियौ। आंङै-समांगे नीक रहै छलेँ की ने। एते दिनपर िकअए एलेँ। िक बुझि पड़ै छेलौ जे घरमे िकयो ने अछि। कोनो िक हम मरि गेलियौ। रूपैया नै कमेलेँ तँ नै कमेलेँ मुदा, छुछो देहे तँ अबितेँ। अखैन तँ हम अपने थेहगर छी।” श्यामक माथ परक मोटरी पकड़ैत भुखना बाजल- “दाय, तोहर माथ अगिया गेल हेतौ।” “नै-नै कथी लए तूँ लेबह। आब िक अंगना कोनो बड़ दूर अछि। मुदा बलजोरी भुखना श्यामक माथपर सँ मोटरी उताड़ि अपना माथपर लेलक। आद्र स्वरे दुखनी बाजलि- “बौआ, रस्ता तँ भुखले आएल हेबह।” “नइ गै। खाइत-पीबैत एलौं िक।” “बौआ, अंगनो गेल छेलहक िक रस्तेसँ रस्ता छह?” “अंगनामे बेग रखि देलियै। घर बोन दे देखलियै तँ तमोरियावाली भौजीकेँ पुछलियै। वएह कहलनि जे दायकेँ आनै काकी आगू गेल छथि।” भुखनाक बात सुनि दुखनीकेँ तामस उठल। बाजलि- “ऑंइ रौ छौँड़ा, अंगना गेलेँ तँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलेँ की नै?” “घर बोन देखलियै तँ बेगकेँ अोसरेपर राखि तोरा तकैले िवदा भेलौं।” “हम कोनो िबलेँत गेल छेलौं। ताबे तूँ हाथ-पाएर धो कऽ अंगनेसँ गोसॉंइकेँ गोड़ लागि लइतेँ से तोरा बुते नै होइतौ। जाबे हमरा तकै लए गेलेँ ताबे जे कोइ बेग चोरा लेतौ, तब की करबीही।” “हमरा देखिते मारे धियो-पूतो आ जनिजातियो सभ आबि गेल। ओते लोकमे के बेग चोराओत।” फुसफुसा कऽ माए बेटीकेँ पूछलक- “दाय, किछु खाइयोबला सनेस छौ। देखै छीही छौँडाक मुँह केहन सुखाइल छै।” “हँ। असकरे दुआरे कते अनितियौ। पॉंच गो दलिपूड़ी अछि।” “अच्छा, वड़बढ़ियॉं। हम तँ अखैन धरि नहेबो ने केलौंहेँ।” “िकअए? पावनिक दिन छियै तइयो ने नहेलेँ।” “छुट्टियो ने भेल। भिनसरेसँ जारनिक अोरियानमे लागल छलौं। बोझ उघैत-उघैत मन ठहिया गेल। असकता गेलौं। ने भानसे केलौं आ ने नहेबो केलौंहेँ। ओहिना ओसारपर ओघड़ेलौं िक नीन आिब गेल। जोगिनदरा आिब कऽ उठौलक। नइ तँ सुतले रहितौं। देखही जे सॉंझ लगिचाइल जाइ छै ने अखैन तक उकक ओरियान भेलहेँ आ ने सॉंझ-बतीक।” आंगन अबिते दुखनी-भुखनाकेँ कहलक- “बौआ, पहिन पएर-हाथ धो कऽ सिरा आगूमे गोड़ लागह। तखन िकछु करिहह।” भुखना सएह केलक। श्यामा सेहो घैलची लग जा घैला झुका एक चुरूक पानि निच्चॉं खसा ओहिमे दुनू पाएरक तरबा भीजा ओसारेपर सँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलक। सौँसे अंगना धियो-पूतो आ जनिजातियो सभ कच-बच करैत। छोटका बच्चा सभ फुटे कॉंइ-िकचीड़ करैत रहै। तहि बीच जुगेसराक बेटा रवियाक बेटाकेँ पाछुसँ पोनमे िबठुआ काटि दोगे-दोग घुसुिक गेल। छिलमिला कऽ रवियाक बेटा पाछु तकलक तँ शिबुआक बेटीकेँ देखलक। ओहि छौँड़ाकेँ भेले जे यएह छौँड़ी िबठुआ कटलक। हॉंइ-हॉंइ कऽ दू मुक्का लगा देलक। मुक्का लगिते शिवुआक बेटी चिचिआ कऽ कानए लागलि। शिवुआक घरवाली सेहो पछवारि कात ठाढ़ छलि। बेटीकेँ कनैत देखि कोरामे उठबैत पुछलक। ओ छौँड़ी रवियाक बेटा नाओ कहलक। ओकरो हड़लै ने फुड़लै ओहि छौँड़ाकेँ कान ऐँठि एक थापर लगा देलक। तहि समए रवियाक घरवाली सेहो अबैत छलि। बेटाकेँ देखि पुछलक। ओंगरीक इशारासँ छौँड़ा शिवुआक घरवालीकेँ देखा देलक। शिवुआक घरवालीकेँ देखवितहि रवियाक घरवाली लगमे जा झोंट पकड़ि मुँहपर थूक फेिक देलक। सौँसे आंगन हड़-विरड़ो मचि गेल। छोटका धिया-पूता डरे पड़ाए लगल। तँ दोसर िदस हल्ला सुनि आन-आन अबौ लगल। दुखनीक बकारे बन्न। जहिना-जहिना शिवुआक घरवाली गारि पढ़ै तहिना-तहिना रवियाक घरवाली उनटबैत जाए। िकएक तँ स्त्रीगणक झगड़ाक विशेषता होइत जे जे पाछु धरि गरिआओत ओकर जीत होइत। अंगनाक दृश्य देखि भुखनो आ श्यामो दुनूक बॉंहि पकड़ि-पकड़ि ठेल-ठालि कऽ अपना-अपना अंगना दऽ आइल। भगलाहा धिया-पूता सभ पुन: आबए लगल। जनिजातियो आ धियो-पूतोमे पाटी बनि गेल। िकछु गोटे िशवुआक घरवालीक पक्ष लऽ आ िकछु गोटे रवियाक घरवालीक पक्ष लऽ झगड़ाकेँ पुन: ठाढ़ केलक। एक दोसराक दोख लगवैत अपना पक्षकेँ निर्दोष साबित करए लगल। मुदा जहिना पोखरिमे गोला फेकलापर पानिमे हिलकोर उठैत जे धीरे-धीरे शान्त भऽ जाइत तहिना शान्त भऽ गेल। तत्-खनात तँ दुखनीक आंगन शान्त भऽ गेल। अंगनासँ बाहर रस्तो आ आनो-आनो जगहपर गुद-गुद-फुस-फुस होइते रहल। जहिना कोनो गाम वा घरमे आगि लगलापर पानि देने मिझा जाइत मुदा आगिक गरमी रहबे करैत तहिना भेल। आन सभ तँ आंगनसँ िनकलि गेल मुदा, दुखनीक मनक आगि पजरि गेल। बेटी श्यामा दिस देख जोर-जोरसँ बजए लागलि- “हम ककरो बजबैले गेल छेलियै जे आबि पावनिक दिन अंगनामे झगड़ा केलक। पावनि िक कोनो एक दिनक होइत अछि आिक सालो भरिले होइए। सालो भरि अंगनामे झगड़ा होइते रहत िक ने। तहूमे जे िकयो डोरी बॉंटि घरक पछुऐत बान्हि देत तखन तँ आरो सालो भरि झगड़ा होइते रहत कि ने?” माइयक बोली बन्न करै दुआरे थोम-थाम लगबैत श्यामा कहलक- “अनेरे तूँ िकअए आफन तोड़ै छेँ। तोरा अंगनामे छेबे के करौ जे साल भरि झगड़ा हेतौ।” बेटीक बात सुिन दुखनी दम कसलक। मुदा तइओ मनमे आगि लगले रहै। घरसँ विछान निकालि श्यामा अंगनामे िवछौलक। बिछा अपन मोटरी खोललक। एक धारा चाउर, सेर तीनिऐक खेसारीक दालि, पॉंचटा दलिपूड़ी आ अपनो आ बच्चो सभक कपड़ा निकालि रखलक। पॉंचो पूड़ीमे सँ दूटा भुखनाकेँ एकटा कऽ सरस-निरस तोड़ि दुनू बच्चाक हाथमे देलक। एकटा अपना लेल आ एकटा माए लेल फुटा कऽ रखलक। बैग खोलि भुखना रूपैयाक गड्डी निकालि माएकेँ कहलक- “माए, यएह कमा कऽ अनलियौ।” रूपैया देखि माइयो आ बहीनो बाजलि- “झॉंपह, झब दऽ झॉंपह नै तँ लोक देखि लेतह।” रूपैया झाँपि भुखना दू जोड़ साड़ी आंङी आ सायाक कपड़ाक संग दुनू बच्चा लेल शर्ट-पेन्ट निकालि आगूमे रखलक। कपड़ा देखि दुखनी िवस्मित भऽ गेलि। मने-मन सोचए लगलि। जे ढहलेलो अछि तइओ तँ बेटे धन छी। मन पड़लै पति। भगवान ककरो अधला करै छथिन। मन-मन गोड़ लगलकनि। अही दुनू बेटा-बेटीक आशापर ने अपन वएस गमा कऽ रहलौं। संतोखे गाछमे ने मेवा फड़ै छै। माएकेँ विस्मित देखि भुखना विस्कुटक िडब्बा निकालि माएक हाथमे दैत कहलक- “माए, ई मक्खनबला िवस्कुट छी तोड़े लए अनलियौहेँ।” हाथमे विस्कुटक डब्बा लऽ उनटा-पुनटा कऽ देखए लगली। दुनू बच्चो आ श्यामोक नजरि डिब्बापर अँटकि गेल। तहि बीच देहमे लगबैबला दूटा गमकौआ साबुन, दूटा कपड़ाक साबुन पौवाही नारियल तेलक डिब्बा, निकालि दुखनीक आगूमे रखलक। चीज बौस देखि दुखनी मन उधिया गेलै। मनमे हुअए लगलै जे अकासमे उड़ि गेलहुँ आिक नरकसँ सरग (स्वर्ग) चलि गेलहुँ आिक सपना देखै छी। अपनाकेँ संयत करैत बाजलि- “पावनिक दिन छी, पहिने सभ िकयो खा लइ जाइ जाह। हम अखैन नै खाएव। दिनो खटिआइये गेल अछि कनी कालमे सॉंझ-बॉंती दइये कऽ खाएव।” फेर मनमे एलै जे गोसॉंइ डूबैपर अछि अखन धरि पावनिक तँ कोनो ओरियान भेवे ने कएल अछि। ने उक बनबै लए खढ़-संठी अनलौं आने दिआरी बनेलौंहेँ। ने दियारीक टेमी बनवै लए साफ सुती कपड़ा तकलौंहेँ आ ने दोकानसँ तेले अनलौंहेँ। तहूमे दुनू भाए-बहीन आइल अछि दुइओटा तीन-तरकारी नहि करब से केहन हएत। एक तँ लछमी पावनि तहूमे एते दिनपर छौँड़ा आएल अछि। पूड़ी खा पानि पीबि श्यामा माएकेँ कहलक- “चिकनी माटि सानि कऽ दिआरी बना लइ छी। तूँ दोकानक काज झब दऽ केने आ नै तँ िकरिण डूबलापर दोकानोक काज नइ हेतौ। ओहो पूजा-पाठमे लगि जाएत।” बेटीक बात सुिन दुखनी बाजलि- “ऑंइ गै दैया दोकान-दौड़ीक काजमे ओझरा जाएव तँ खढ़-संठी कखैन आनि उक बनाएव?” काजक भरमार देखि भुखना माएकेँ कहलक- “तोँ दोसरे काज कर हम दाेकानक काज कऽ लैत छी।” बेटाक बात सुिन दुखनी कहलक- “अनठिया बुझि दोकानबला ठकि लेतौ।” माइक बात सुिन भुखनाकेँ हँसी लागल। मने-मन सोचए लगल जे शहर-बजार घुमै छी हम आ गामक बनियॉं ठकि लेत हमरे। मुदा िकछु बाजल नहि। माएकेँ रोकैत श्यामा कहलक- “आब जे ककरो अइठीन खढ़-संठी मांगए जेबही से देतौ। लछमी पूजाक बेरि भऽ गेलै। काल्हिये िकअए ने मांगि अनलेँ। नइ तँ आइये दुपहर से पहिने मांगि अनिते। आब लेाक अपन-अपन चीज-बौस समेटि घर आनत आिक तोरा खढ़-संठी देतौ।” बेटीक बात सुिन दुखनी निराश भऽ गेलि। उकक आशा टुटि गेलइ। बाजलि- “हम तँ बूढ़ि भेलौं। आब िक कोनो पावनि-तिहारक ठेकान रहैए।” माइक टूटल आशा देखि श्यामा सम्हारैत बाजलि- “खढ़-संठी छोड़ि देही। उक नै हएत तँ िक हेतै। गोसॉंइ बाबाकेँ कहि देबनि जे एते तिरोट भऽ गेल। नै पान तँ पानक डंटिये सँ तँ पूजा करबे केलौं।” सामंजस्य करैत दुखनी- “अच्छा हो-अ। खढ़-संठी छोड़ि दइ छियै। तूँ चिकनी माटिक दिआरी बनाले। कनी रूखे कऽ माटि सनिहेँ। नइ तँ आब नै सुखतौ। दिनो खटिआइये गेल। रौदो ठंढ़ा गेल। दोकानेक काज केने अबै छी।” तहि बीच भुखना कहलक- “तूँ अंगनेक काज सम्हार। दोकानक काज केने अबै छी।” बेटाक बात सुिन दुखनी कहलक- “ऑंइ रौ, शुभ-शुभ कऽ तूँ गाम एलेहेँ, तोरा कन्ना दोकान जाए िदऔ। लोक की कहत?” “लोक की कहतौ?” “एतबो ने बुझै छीही जे सभ खिधांस करए लगत जे फलनीक खापड़ि केहेन तबधल छै जे अखने बेटा परदेशसँ एलै आ बेसाह अनैले दोकान पठौलक।” “कोइ ने िकछु बाजत। कोनो अनकर काज छियै जे िकयो िकछु बाजत। बाज कथी सबहक काज छौ?” “एक रूपैया कऽ नून, दू गो तीमनो-तरकारी करब तेँ पॉंच रूपैयाक करू तेल सेहो लऽ लिहेँ। आठ अन्नाक जीर-मरीच, आठ अन्नाक हरदी आ आठ आनाक मिरचाइ सेहो लऽ लिहेँ। अल्लुओ घरमे नहिये अछि। तरैबला अल्लू सेहो लऽ लिहेँ। दूटा पापड़ो लऽ लिहेँ। आइ लछमी पूजा सेहो छी तेँ आठ अन्नाक मखान आ आठ अन्नाक चिन्नियो लइये लिहेँ। भरि राति डिबिया जरत तइले मट्टियो तेल कनी बेसिये कऽ लऽ लिहेँ।” “आउरो िकछु?” मन पाड़ दुखनी बाजल- “आब तँ लोक धुमनक धूपो देनाइ छोड़िये देलक तेँ एकटा अगरवत्तीक डिब्बा सेहो लइये लिहेँ।” श्यामा िदआरी बनवै लए िचक्कनि माटि लोढ़ीसँ फोड़ए लगलीह। भुखना दोकान विदा भेल। दुखनीक मन असथिर भेल। मन असथिर होइते बेटीकेँ कहलक- “बुच्ची, हम नहाइ लए जाइ छी। िकरिणो लुकझुकाइये गेल।” श्यामा- “बौआ जे साड़ी अनलकौ सएह लऽ ले।” बेटीक बात सुिन दुखनी हरा गेलि। मनमे नचए लगलै बेटाक कीनल पहिल साड़ी। जहियासँ अपने मुइलाह तहियासँ कहियो नव साड़ीक नसीव नहि भेलि। ओना बेटी अपन पहिरल साड़ी साले-साल दइते रहल तेँ कहियो कपड़ाक दुख नहिये भेलि। रोडे िकनछरिमे गारल सरकारी कलपर दुखनी पहुँचल। कलपर पहुँचते मन पड़लै। साड़ी-लोटा कलेपर रखि चोट्टे घुिर कऽ आंगन आबि बेटीकेँ कहलक- “दाय, एकटा बात मन पड़ि गेल। िबसरि जाइतौं तेँ कहै लए एलियौ।” अकचकाइत श्यामा पुछलक- “कोन बात मन पड़लौ?” दुखनी- “बच्चा जे दोकानसँ औत तँ कहि दिहैन जे अगिला चौमास बिकरी अछि। दुइये कट्ठा छइहो। से कीनि लेत। हमरा ने एक्कोटा घरसँ काज चलैत अछि मुदा, नइ अइ साल तँ अगिलाे साल िवआह कइये देवइ। बाल-बच्चा हेतै। लघियो करै लऽ कतऽ जतै। लोक बढ़ने मालो-जाल पोसबे करत। से कतऽ बान्हत।” श्यामा- “अच्छा जो, पहिने नहाले। बौआ दोकानसँ औत तँ मन पाड़ि देबौ।” गजेन्द्र ठाकुर- कथा- संघर्ष १ फाइलक गेँट, गरदासँ सनल। ओहिमे सँ एक-एकटा कागत निकालि मुँहपर रुमाल राखि झारि रहल छी। ओहिमे सँ किछु काजक वस्तु निकलैत अछि, किछु बेकाजक। विधवा सोहागोक केस-मुकदमाक फाइल। मान-अपमानक खाता-खेसरा। आरोप-प्रत्यारोपक प्रकरणक क्रम। बूढ़ महिलाक युवावस्थाक खिस्सा, किछु सत्य, किछु मिथ्यारोप। पति आ पुत्रक जीवन। बेनग्न होइत हमर सभक सभ्यताक छाप। किएक चानन घसने रहैत अछि ई बूढ़ी। भगवान पर एतेक भरोस? एहि उमरिमे बेटाक स्मारक बनेबाक जिद्द? हारि आ जीतक तारतम्यक बीच, एखन फेर एकटा दोसरे पेटीशन? जितबाक कोन अद्भुत लगन लागल छैक ओकरा। हारिते रहल अछि भरि जिनगी, तैयो! पहिने तँ कुमोनसँ मंडल सरक कहलापर ई काज हाथमे लेने रही। मुदा आब हमरो इच्छा भऽ गेल अछि, इच्छा ओकर पेटीशनकेँ यथाशीघ्र दाखिल करबाक। इच्छा ओकरा जितेबाक। ई फाइलक गरदा, गरदासँ सानल कागत-पत्तर सभ। डस्टसँ एलर्जी अछैत हम एहिमे घोसिया गेल छी। एहि बुढ़ियाक हारिक नमगर फेहरिस्ट, तकर सोझाँ हमर अपन हारि सभक कोनो लेखा नहि। एकरा जितएबाक जिद्दक आगाँ अपन अप्रत्यक्ष विजय लखैत अछि। सोझाँ-सोझी विजय नहि तँ एहि बुढ़ियाक माध्यमसँ सम्भावित विजयक पेटीशन। हारत तँ ई बुढ़िया आ जे ई बुढ़िया जीतत तँ जीतब हम। ई बुढ़िया धरि अछि अगरजित। ऑफिसमे सभसँ झगड़ा केने अछि। कार्यालयक क्यो गोटे एकर पेटीशन आगाँ बढ़ेबाक लेल तैयार नहि। मंडल सर मुदा एकर सभटा नखड़ा बरदास्त करैत छथि। एकर बेटा हुनकर बैचमेट छलन्हि। नीक लोक छथि, सज्जन। कार्यालयक कनीय सदस्य सभसँ हमरा कहियो कोनो प्रतियोगिता नहि होइत अछि। मुदा उच्च पदाधिकारी सभसँ फाइलोपर आ ओहिनो किछु ने किछु होइते रहैत अछि। मुदा मंडल सर नीक लोक। सज्जन। आ एहि पेटीशनकेँ देबाक भार ओ हमरेपर छोड़ने छथि। बुझल छन्हि जे अधिकारी सभ ओहि पेटीशनमे नेङरी मारत। आ तखन दोसर सभ बीचेमे पेटीशन छोड़ि भागि जएत। मुदा हम तँ से भेलापर पाछू पड़ि जाएब आ तखन पेटीशन दाखिल भऽ सकत हमरे बुते। ई विश्वास छन्हि मंडल सरकेँ। “अहाँपर सँ हमर विश्वास उठि गेल अछि । एक महिनासँ झुट्ठे घुमा रहल छी। एखन धरि पेटीशन नहि भेल दाखिल कएल”- बुढ़िया आइ लगा कऽ तेसर बेर ई सभ गप सुनेलक अछि आ चलि गेल अछि। पहिल बेर तँ हम मंडल सरकेँ कहबो केलियन्हि जे कोन फेरमे हमरा सभ पड़ल छी। एहि बुढ़िया लेल जान-प्राण लगेने छी। मुदा देखू, दस टा गप सुना कऽ चलि गेल। मुदा मंडल सर कहलन्हि जे- “नञि यौ। समएक मारल अछि ई । जेहन लोक सभसँ आइ धरि एकरा भेँट छै, तेहने ने बुझत ई अपना सभकेँ”। ई गरदा सानल फाइल सभकेँ मुदा आब घोंटि गेल छी हम, बुझू सोंखि गेल छी। आइ फेर बुढ़िया ई सभ गप कहि बहार भऽ गेल। हम आ मंडल सर एक दोसराकेँ देखि रहल छी। बिनु हँसने। पराजयक छाह दुनू गोटेक मुँहपर अछि। “भऽ गेल अछि सर। एहि शुक्र धरि पेटीशन दाखिल भऽ जाएत”। “मुदा अहाँक स्थानान्तरण भऽ गेल अछि, शुक्र दिन धरि अहाँकेँ जएबाक अछि”। “कहलहुँ ने हम। भऽ जाएत शुक्र दिन धरि। जएबासँ पहिने दाखिल कइये कऽ जाएब। परिणाम तँ बादमे पता लागिये जाएत”। बिनु हँसने, बिनु तमसाएल मुखाकृति लेने बहराइत छी। कऽ दैत छिऐक दाखिल एकर पेटीशन। हारत तँ ई हारत। जीतत जे ई, तँ जीतब हम। २ सोहागो। गढ़ बलिराजपुरक बसिन्दा एकर परिवार। खेती-बाड़ी नीक, तरकारी बेचि नीक जमीन-जत्था बनेने। छह भाँएपर भेल छलीह सोहागो। पिताक दुलारि। माताक दुलारि। सभ भाएँक दुलारि। मुदा मात्र दस बरख। फेर विवाह भऽ गेलन्हि। पतिसँ प्रेम छलन्हि वा नहि छलन्हि, ई गप गरदा लागल कोर्ट फाइलमे नहि लिखल अछि। हुनकर नैहरक चर्च मात्र एक पैराग्राफमे खतम अछि। मात्र ई विवरण अछि जे पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि जखन हिनकर उमरि अठारह बरखक छलन्हि। मुदा एकटा बेटा भगवानक कृपासँ मृत्युक पूर्व पति हुनका दऽ गेल छलखिन्ह। अठारह बरखक उमरि। एकटा बच्चा। मुदा गरदाबला फाइलमे नहिये सासुरक कोनो लोकक आ नहिये नैहरक कोनो भाए-बन्धुक कोनो गबाही वा किछुओ भेटल। ताहिसँ ई लागल जे भाए सभ अपन-अपन परिवारमे व्यस्त भऽ जाइ गेल होएताह। तखन सोहागोक ई बयान जे ओ नैहरक दुलारि छलीह! माए-बापक आ छह भाँएक। माए-बाप तँ चलू बूढ़ भऽ मरि गेल होएताह, मुदा भाए सभ? कष्ट काटि अफेलकेँ पढ़ेलन्हि-लिखेलन्हि सोहागो। बीस बरखक बेटा भेलन्हि तँ ओहो मृत्युकेँ प्राप्त कएलक। नीक सरकारी नोकरी भेटले छलैक। घटक सभ घुरियाइये रहल छलैक। आठ बरखक वैवाहिक जीवनक बाद बीस बर्खक वैधव्य। आब पुतोहु अबितैक आ नैत-नातिन संगे ओ खेलाइतए। मुदा तखने ई वज्रपात। मुदा हमर तँ तहिया जन्मो नहि भेल छल होएत। नञि, सत्ते। बुझू जाहि बरख एहि बुढ़ियाक बेटाक मृत्यु भेल छलै, ताहि बरख हमर जन्म भेल रहए। आ तकरो बाइस बरख बीति गेल। बूढ़ी आब हमरा समक्ष अछि। ओकर बेटाक बैचमेट हमर मंडल सर। आ हम ओही पदपर छी जाहि पदपर ओकर बेटा आइसँ बाइस बर्ख पहिने नोकरी शुरूह कएने रहए। छह मास मात्र नोकरी कएने रहए आकि...। शुक्र दिन धरि समय बाँचल अछि हमरा लग। की करू? ई बुढ़िया हहाएल-फुफुआएल अबैत अछि। सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक आग्रह लोक सभसँ करैए, कैक बरखसँ। मुदा एकर झनकाहि बला स्वभावसँ, व्यवहारसँ लोक एकरापर तमसा उठैत अछि। एकरा अर्द्ध-बताह घोषित कऽ देल गेल अछि। मुदा एहि बेर तँ एकर काज किछु दोसरे तरहक छैक। अही सप्ताह किछु करए पड़त। देखै छी। ३ “अफेलकेँ मरबाक रहितै तँ अहाँक रिवाल्वरसँ अपन माथपर किऐ मारितए। ओकरा लग तँ अपन सर्विस रिवाल्वर रहए”। “श्रीमान्। हमर बेटाक हत्या कएने अछि जटाशंकर। हमर जीवन नर्क बना देलक। बीस सालक हमर तपस्या समाप्त कऽ देलक। एकरा सजाए देल जाए”। “मुदा जज साहेब। जटाशंकर आ अफेलक अलाबे ओहि घरमे क्यो नहि छल। हमर कानून कहैए जे दस दोषी बहरा जाए मुदा एकटा निर्दोषकेँ सजा नहि भेटए। के गबाही देत जखन तेसर क्यो रहबे नहि करए”? “मुदा जज साहेब अपने कहि रहल छथि जे अफेल दोसराक रिवाल्वरसँ अपनापर गोली किएक चलाओत। आ अपनापर गोली चलेबाक अर्थ भेल आत्महत्या। हमर बेटा हमरा असगर छोड़ि आत्महत्या कऽ लेत? किएक करत ओ आत्महत्या”? “जटाशंकरकेँ हिरासतमे लेल जाए...अगिला सुनवाई....”। फाइल पढ़िते रही आकि बूढ़ी बिहाड़ि जेकाँ आएलि। “अहाँक चेलाक तँ ट्रांसफर भऽ गेल मंडल सर! सभ एक्के रंगक छी। हमर बेटाक मूर्ति कॉलोनीक गेटपर लागि जाइत तँ कोन अनर्थ भऽ जइतैक। मुदा सभ अपन-अपन घर परिवारमे लागल अछि! जे गेल से गेल। अनका की कहू, हमर भाइये सभकेँ देखू। कहै लेल तँ छह टा....”। हनहन-पटपट करैत ओ बहार भऽ गेलि। मंडल सर ओकरा-“सुनू। हिनकर ट्रांसफर भेल छन्हि मुदा एखन शुक्र दिन धरि रहताह”- ई सभ कहिये रहल छलाह मुदा ओ भङ्गतराहि नहि सुनलक। किएक सुनत? “की भेल? जाए दियौक। शुक्र दिन पेटीशन फाइल भऽ जएतैक तँ ओकर गोस्सा अपने ठंढ़ा भऽ जएतैक”। ४ “कहू जटाशंकर। हमरा तँ अफेलक आत्महत्याक कोनो कारण नहि बुझना जाइत अछि। ई सत्य जे ओहि मृत्युक गबाह नहि अछि। मुदा ओहि कोठलीमे मात्र दू गोटे रहथि। अफेल आ जटाशंकर। आ अहाँक रिवाल्वरक गोली अफेलक माथमे गेलैक।” “मुदा जज साहेब। हमरा किछु सूचना भेटल अछि जाहिसँ हमर दिमाग घूमि गेल अछि। ओना हम ई सूचना सार्वजनिक करबाक पक्षमे नहि छलहुँ कारण एहिसँ एकटा भूचाल आओत। मुदा जखन हमर क्लाइन्टपर फाँसीक सजाक खतरा घुरमि रहल अछि, हमरा लग एकरा सार्वजनिक करबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नहि अछि।” “ई कारी कोट पहीर फेर कोनो बहन्ना अनने अछि। हम गरीब लोक छी सरकार। हमरा कोर्टक तारीखपर आबएमे ढेर खरचा उठबए पड़ैत अछि। एकरा सजा देनेसँ हमर बेटा घुरि कऽ तँ नहि आओत मुदा ई फेर एहन काज नहि करए से टा हम चाहै छी।” “मुदा सोहागो देवीजी। ई केस कतेक माससँ चलि रहल अछि मुदा नहिये अहाँक परिवारक आ नहिये अहाँक सासुरक क्यो गोटे आएल”। आगाँक आरोप प्रत्यारोपमे सोहागोपर चरित्रहीनताक आरोप लगाओल गेल रहै आ सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल रहै जे हुनकर पुत्र अपन माएक प्रेमी सभसँ आजिज आबि कऽ आत्महत्या कएने छल। जटाशंकर बचि गेल रहए। आब तँ ओ रिटायर भऽ सरकारी पेंशन उठा रहल अछि। ५ बिहारशरीफ घुरि हम बूढ़ीक पेटीशन दाखिल कऽ दै छी। पतिक मृत्युक बाद ऑफिस बला सभ सर्टिफिकेटक अभावमे ओकर जन्म तिथिपाँच साल घटा देने रहै, कोनो जानि बूझि कऽ से नहि। मुदा बुढ़िया तै जमानामे मैट्रिक छल। मैट्रिकक सर्टिफिकेटक जन्म तिथिक हिसाबसँ पाँच साल आर नोकरी छै। चलू, जे भेलै एकरा संग, देखी आब। अगिला साल रिटायरमेन्ट छै, जे पाँच साल बढ़ि जएतैक तँ आर नीक। हमर ट्रांसफर तँ भइये गेल रहए से हम अपन झोर-झपटा आ समान चीज-बौस्तु लऽ कऽ अपन नव गन्तव्य स्थलपर बिदा भऽ जाइत छी। कार्यालयसँ जाइत काल बुढ़िया भेटैत अछि, कल जोड़ने ठाढ़, जेना कहि रहल होए- धन्यवाद। हम ओहि काल्पनिक धन्यवादक उत्तर दै छी- काज भऽ जाए तखन ने। ६ कएक साल बीति गेल। किछु व्यस्तताक कारणसँ आ किछु पेटीशन अस्वीकृत भऽ जएबाक सम्भावित सम्भावनासँ परिणामक प्रति उत्सुक नञि रहै छी। मुदा मंडल सर एक दिन भेटि जाइ छथि। “ओकर पेटीशन स्वीकृत कऽ लेलकै विभाग। रिटायरमेंटक दिनसँ पहिनहिये आदेश आबि गेल रहै। आब ओ पाँच साल आर संघर्ष करत, सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक लेल वा आन कोनो संघर्ष। ३. पद्य ३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ ३.२.ज्योति सुनीत चौधरी-प्रवासी पक्षी ३.३.-नन्द विलास राय-सभसँ पावन िमथिला धाम यौ ३.४.शिव कुमार झा-किछु पद्य ३.५.गजेन्द्र ठाकुर-गीत-बँसकरमक विश्वकर्मा ३.६.काली नाथ ठाकुर-दहेज़ विरोधी रचना ३.७.-राजदेव मंडल-हित-अहित, प्रयास, ऑफिसक भूत स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! मातृगीत - 1 !!
सेवा करियौ ने मुंजूर, अचलहुॅ बुलिते बहुतो दूर । ऑजुर भरल अढ़ूलक फूल एड़ी गरल बबूरक शूल ।।
हमहूॅ पूत अहींक एक मॉ अपने तॅं जगतक अम्बा छी, उघ पड़त भार हमरो मॉ अपने सवहक अवलंबा छी, हे पाथरक मूरूत मोम भ’ पिघल’ पड़त जरूर । सेवा............................................ ।।
भुवनेश्वरि मणिद्विपक रानी, वेटा भुखल मॉटि लोटैए, मॉ अपने लग सुधा सरोवर प्यासल पूत नोर घोंटैए, अहॅक हाथ नवरचना हम्मर जीवन चकनाचूर । सेवा............................................ ।।
ब्रहमरमणि थाकलि ठेहियायलि पकड़व जखन अपन जप आसन, ठाढ़ रहव श्रद्धा सुरसरि ल’ राखव भगति भोग केर वासन, चमकाबू चानक टिकूली मॉ उषा किरण सिनूर सेवा............................................ ।।
!! मातृगीत - 2 !!
सिन्धु शैल - भूमि सुते सीते, पुत्र हम मलीन मॉ पुनीते । ऑचर सॅ झाड़ि दिय । कर सॅ पुचुकारि दिय, अधर पर उतारि अमर प्रीते । पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।। सुःखक थपथपी दैत, शांतिक निनियॉ गवैत, सुना दिय अपन मधुर गीते । पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।। पसरल विपत्ति घटा, छिटकाबू त्राण छटा, कहिया धरि रहवै भयभीते । पूत हम मलीन मॉ पुनीते ।
!! काटरक महिमा !!
महिमा ई काटर प्रथाक वड़ भारी ।। बाबा दलाल बाप वरदक व्यापारी, बेटा बछौड़ बीकि गेलै हजारी । शील सौन्दर्यक नहि कोनो सुमारी, हंसक घर एलै वगुलवा कुमारी । मरूआक रोटी पर तरूआ तरकारी, रेशमक सिक्का पर कनफुट्टा टारी । वलकुचही गोरा पर भरल वखारी, हुवघट्टू ड्राइवर लग मरसल्ली गाड़ी । ऑटी भरि धोती तर वोझ वनल साड़ी, दुव्वर कुमार मुदा दोवरि कुमारी । उल्लू लग मयना हरिण लग पारी, बनराक हाथ पर पद्मिनिया नारी । लकलक चतरिया तर चतरल खेसारी, वाउ सुलहनामा त’ दाइ फौजदारी । आंगनक वाटे नहि कट्ठा भरि वारी, ऊॅचे जोतॉस मुदा लेया घरारी । वऽर प्राइवेटे छथि कनियॉ सरकारी, वाऊ ब्रहमपुत्र दाई वंगोप खाड़ी । एक लोकमाया त’ एक ब्रहमचारी, भौजी छतौनी त’ भैया खरारी । ज्योति सुनीत चौधरी प्रवासी पक्षी प्रवासी पक्षी अफ्रीकासँ आयल कएक मील उड़ि कऽ गर्मीमे जीवनयापन लेल नम्हर दिवस पाबि कऽ भोजन ताकत बेसी समए भोजनो बेसी उपलब्ध रहए भागल अपन देश छोड़ि भीषण गर्मीसँ निदान भेटय अपन जन्मस्थानसँ भिन्न ककरो लागल दुइ तीन दिन थम्हि थम्हि कऽ आबैमे कियो लेलक महिना दिन रंग बिरंगक आकार प्रकार प्रकृतिक अतिथि ग्रीष्मकाल साल भरिसँ प्रतीक्षा कएल भीड़ लगेने सभ देखनिहार नन्द विलास राय ग्राम,पोस्ट- भपटियाही, टोला- सखुआ, वाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, िबहार। सभसँ पावन िमथिला धाम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ जाहि ठाम बहै कोशी, कमला और वागमती बलान यौ, पावन िमथिला धाम यौ, िमथिलासन नहि आन यौ। जहिठाम सीतासन भेलीह नारी, राजा जनक सन सदाचारी, मानव सेवा करब वड़का काम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। छथिन्ह सखड़ामे माए सखेश्वरी, और ठाढ़ीमे माए परमेश्वरी, जहिठाम बरहम बाबा गामेगाम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। जहिठाम आद्रा, चौथचन्द्र, जितिया भाए-बहिनिक स्नेह पावनि अछि भातृ-द्वितीया। जहिठाम कोजगराकेँ बड़ नाम यौ, वॉंटथि पान-मखान यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। जहिठाम क्यो ने भेटत लफंगा, सभसँ नीक शहर दरभंगा। ओहिठाम पैघ-पैघ दोकान यौ, भेटत सभ समान यौ, मिथिला सन नहि आन यौ। नेहरा, सरिसव ओ पोखरौनी, कोयलख, पिलखवाड़, मंगरौनी। आेहिठाम पैघ-पैघ भेल विद्वान यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। जहिठाम नामी माछ-मखान, आओर अछि फलक राजा आम। जहिठाम जमाए छथिन्ह भगवान यौ, आओर पहुनाकेँ भेटए सम्मान यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। भेलाह ललित बावूसन नेता, िमथिलाकेँ सच्चा बेटा। िवकासक खातिर देलथिन्ह अपन प्राण यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। िमथिला विभूति सूरजबावू सन पैघ-पैघ भेल नेता, आजादीकेँ लड़ाइ लड़बामे रसिक, अनन्त, गुरमैता, देशकेँ अजाद करबामे एहि घरतीकेँ बड्ड योगदान यौ, पावन िमथिला धाम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। िमथिला पेन्टींग मधुबनीकेँ दुनियॉंमे बड्ड नाम छै, खादी भंडार मधुबनीकेँ भॉंति-भॉंतिक काम छै, जहिठाम सुग्गा बजैत सीताराम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। िमथिलाक कला, िमथिलाक साहित्य, िमथिलाकेँ संस्कृति नीक, फूसि नै बाजब दान करब ई मैथिलकेँ प्रवृति छी। अन्न-वस्त्र, वर्तनक संगहि करैए लाेक गोदान यौ, पावन िमथिला धाम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। बड्ड मधुर अछि, सुनब-बाजवमे िमथिलाक मैथिली-भाषा, िमथिलाकेँ विकास हुअए खूब, हमरो अछि अभिलाषा। िमथिलाक विकासक खातिर हमहूँ देव योगदान यौ, पावन िमथिला धाम यौ, िमथिला सन नहि आन यौ। शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! अभिनव मिथिला धाम !!
‘‘मॉ मिथिले अभिनव मिथिला धाम ।। अहॅक कोर केॅ छोड़ि आव हम, नहि जएव दोसर ठााम । मॉ मिथिले ................................ ।।
वौरयलहुॅ सगरो आर्य भुवन मे, कतहु न भेटल चैन । अकवक विकल दिवस दुःख भोगलहुॅ, तमस कटै छल रैन । मॉ मिथिले ................................ ।।
नवटोल नववोल देखलहुॅ नवल चालि, भाउज भावहुक नहि भान । तात पूत एक्के संग वैसल, करथि सुरारस पान । मॉ मिथिले ................................ ।।
मैथिल दीन जनेर फॅकै छथि, मुदा देव पितरक मान । छोट पैघ वीचि लक्षिमन रेखा, नहि ककरो अपमान । मॉ मिथिले ................................ ।।
उदयन सॅ दर्शन सीखि वॉटव, अयाची सॅ, आत्म सम्मान । भारती मंडन सॅ ब्रहम ज्ञान लेव, आरसी यात्री सॅ स्वाभिमान । मॉ मिथिले ................................ ।।
उर्मि धिआक त्याग देखिक, कण-कण भाव विभोर, वैदेहीक सती धर्म सॅ उमड़ल, कमला मे हिलकोर । मॉ मिथिले ................................ ।।
गोविन्द मधुपक सुनव पराती, खोलि क दुनू कान । शिव शक्ति केॅ श्रद्धा सॅ पूजव, सुनवैत विद्यापति गान । मॉ मिथिले ................................ ।।
खोरा चाउर संग भाटा अदौरी, वथुआ तिलकोर मखान । आचमनि श्वेत वलानक जल सॅ, गलौंठी पतैलीक पान । मॉ मिथिले ................................ ।।
आन धाम सॅ रास सोहनगर, कुलदेवी क गहवर । पच्छिमक त्वरित गीत सॅ रूचिगर अपन वैन सोहर । मॉ मिथिले ................................ ।। गजेन्द्र ठाकुर बँसकरमक विश्वकर्मा भीखूक फारब आ ओदारि कऽ निकालब उजरा औषधि वंशलोचन कोनिञा सूप हकरा पथिया मुदा खजुरिया बान्हमे बान्हल हमर आ ओकर वर्तमान आ भविष्य बकछुछरु खेलाइत हम आ भीखू डोमासीक कातबला पोखरिक महारपर थुथुन घोसियेने माँटिमे सुगरक झुण्ड भीखूक भाए छथि आब सरकारी अधिकारी दोसर भाए हॉस्पीटलक वार्डबॉय आ भीखू एखनो डोमासीमे जिबैत वर्तमानक संग भविष्यक ताकिमे स्थिर ओहिठाम ठाढ़, मुन्हारि साँझमे लीलीडाली हाथमे लेने बजैत जे भाए बनल अछि अधिकारी मुदा गाम छुटले छै बुझू बियाहो पैघ घरमे ओकर भेल छै दोसर भाए तँ गाम अबिते अछि ओढ़ना पहिरना नीक मुदा काज वएह हमरे नहि फुराइए करू की? भविष्य तँ वएह बुझाइत अछि। आगाँ अहाँ अएलहुँ, कोन काज कहू ? मुँह झलकि गेलै भीखूक ओहि मुन्हारि साँझमे हम चुप्पे रही तावत् ओहि झण्डी ठाढ़ गाछ लग ठाढ़ गाछ कुकाठ लग बाजि उठल भीखू मुदा काज तँ काज तँ हमर ओ हाकिम भाए नहिए करत मुदा अहाँले कहबै धरि अबस्से। आ हम कहैत छी, नहि भीखू हाकिम तँ काज कइये देत मुदा काज अछि हॉस्पीटलक पिता छथि भरती जतए भाए अहाँक छथि काज करैत। कताक दिन भेलन्हि भरती भेना मुदा नहि आइ काल्हि होइत ऑपरेशनक तिथि अछि बढ़ेने जाइत आ भीखूक मुँह झलकि उठल मुन्हारि साँझमे। हँ कहबामे जे होइत छै संतुष्टि मदति देबामे जे होइत छै आत्मतृप्ति ताहिसँ। बँसकरमक विश्वकर्मा भीखूक वंशलोचनसँ तृप्त होइत हम सेहो। काली नाथ ठाकुर ग्राम सर्वसीमा द्वारा सन १९६८ मे रचित दहेज़ विरोधी रचना पण्डितजी दण्डित भेलाह जखनहि कन्या पाँच पूर्व जन्म के कर्म फल, वा विधिक कोनो ई जाँच।
विधिक कोनो ई जाच, यैह चर्चा भरि गामक लाबथु नोट निकालि जत्ते सम्पत्ति छन्हि मामक। पनही गेलन्हि खियाय, कतौ नहि बसिलनि गोरा धन्यवाद क पात्र छथि ”कलियुग” के घोडा।
सत, रज, तम, सभ व्यर्थ थीक शिक्षा शील स्वभाव गुण एकहि अछि अर्थ गुण अवगुण अर्थाभाव अवगुण अर्थाभाव भाव नहि अछि गुण रूपक कन्या कारी , गोर , मूर्ख वा दिव्यस्वरूपक। मायक दूध क दाम जोडि गनबओता टाका पुत्र हुनक गामक गौरब से कहलथि काका
बीतल शुद्ध आषाढ के अगहन वैशाख। पहिल कुलच्छन बुझलनि, जखनहि घुरि अयला सौराठ॥ घुरि अयला सौराठ हाट करथु बेचारे विधिक लिखल के मेटल आब रहि जेता कुमारे॥ छोरलनि बीस हजार , लोभ मे तीस हजारक। कए रहला गणना जोतखी, एहि साल बजारक
सुनलनि जखनि सुषेण सँ , दहेज निरोधी न्यूज तखनहि जेना दिमाग केर ढिबरी भय गेल फ्यूज ढिबरी भय गेल फ्यूज बराति कन्यागत दुनू घटकैती के करत घटक केर हाल न सूनू बर क हाथ कनिया बरियातीक हाथ हथकड, सरियाी सभ करथु दौडबडहा कचहरी।
लूटन झा त लुटि गेला कए दूई कन्या दान मोछ पिजौनहि रहि गेलाह करता की बरदान? करता की बरदान चोट छन्हि नगदी नोटक उजरल बरदक हाट प्रथम ई बात कचोटक घटक राज केर संग करथु बरु तीर्थयात्रा करथु मन्त्रणा गुप्त मुक्त भय सफल सुयात्रा
जाति जनौ बाँचत कोना? कुल मर्यादा मान अन्तर्जाति ववाह में घोषित नकद ईनाम घोषित नकद ईनाम संग सर्विस सरकारी कहय शास्त्र ओ वेद मात्र द्विज छथि अधिकारी करथु ग्रहण ककरो कन्या हो डोम चमारक मन डोललनि पण्डित जी के जे उच्च विचारक
भेल मनन मन्थन बहुत, ई समाज केर पाप!! की दहेज बन्ले रहत समाजक अभिशाप!! समाजक अभिशाप ब्याज ई पूँजीवादक। बेचि आत्मसम्मान स्वांग धरि कुल मर्यादक सिद्धान्त नहि व्यवहारहु केर करू प्रदर्शन तखनहि त भय सकत रोग उन्मूलन॥ १ .-राजदेव मंडल- राजदेव मंडल 1) िहत-अहित गप्प एकटा गूढ़ कहने रहथि गामक बूढ़ ‘‘अपन धीया-पुत्ता जानि लिअ हमर बात मानि, सॉंपक मन्तर आ खाटक बानि अनकर जीवन अपन हानि’’ ‘‘सुनू यौ बाबा हमरो अछि दावा अनकर हित तँ अपनो हित दोसराक करब अहित अपनहुँ भऽ जाएब कहियो चित पड़ोसिया घरमे जँ लागि जाए आिग तँ िक हम ओहिठामसँ जाएब भागि लगत पसाही उड़त कुकवाहा हमरो घर भऽ जाएत स्वाहा’’ उनटा घुमए लागल माथक चाक भऽ गेलाह ओ अवाक्। 2) प्रयास बॉंिहक लगौने चुट्टा उखाड़ि रहल छी खुट्टा िकन्तु नहि अछि ई खुट्टा भऽ रहल भान ई अछि बरिसों पुरान सुखाएल गाछ रोपल बाउल माटिसँ धोपल केहेन जाल िखरा देने छी रोपल गाछमे भिड़ा देने छी जे अहॉं बूते नहि होएत गारल से हमरा बूते कोना हएत उखारल तद्यपि लगा रहल छी जोरपर जोर िहलबे करते थोड़बो-थोड़ कतेको जोड़ी ऑंखि हँसैत अछि हँसले घर कते बेर बसैत अछि। 3) ऑफिसक भूत सभ कुरसीपर भूत नाचैत अछि ऑंखि आ अँगुरीसँ दाम बॉंचैत अछि कुरसी अछि वएह बदलैत अछि ओकर मुख िकन्तु नहि बदलैत अछि हमर दुख सभ मुखपर अछि ओकरहिं राज मुँह नहि खुलत तँ होएत कोना काज कुरसी हो पैघ आिक छोट कऽ रहल चोट कऽ रहल-चोट ओ नचबैत अछि ओकरा मनकेँ शोणित पिबैत अछि साधारण जनकेँ हेओ समाज कोना होएत हमर अटकल काज अछि विश्वास लगौने छी आस आएत कोनो गुणी आर सच्चा दूत जेकरा देखतहिं भागत भूत वएह करत सबहक उपकार भऽ जाएत हमरो उद्धार। हे प्रकाश, जुनि खसाउ नोर आिब रहल अछि नूतन भोर। बालानां कृते गजेन्द्र ठाकुर नाटक किछु दिअ सूत्रधार: आइ एकटा संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध कथापर आधारित नाटक देखा रहल छी। चोटगर कथा अछि। बच्चा आ पैघ सभक लेल। देखू ई भिखमंगा कतऽ सँ आबि रहल अछि। दृश्य १ (गाममे घुमैत) भिखमंगा: गरीबकेँ किछु दिअ। पुरान कपड़ा, रुपैआ, पैसा। किछुओ दिअ। बूढ़ी: लिअ ई कपड़ा। पुरान छै मुदा जाड़मे बड्ड गरम रहै छै। ई अन्न सेहो। नबका कमौआ: लिअ ई पैसा। किछु कीनि लेब। (भिखमंगा सूत्रधारक बगलसँ होइत कपड़ाक धोधरिमे अन्न रखैत अछि। पाइ गनैत अछि। फेर दोसर दिस अपन घरक खाटपर बैसैत अछि। एकटा चुकड़ीमे पाइ रखैत अछि, फेर गनैत अछि।) भिखमंगा: (मोने-मोन) आब तँ ढेर रास पाइ भऽ गेल। मोन अछि जे कमलाक भगता बनि जनकपुर जाइ। भगवान से दिन देखेलन्हि। दृश्य २ भिखमंगा: (बोगलीमे पाइक चुकड़ी लेने आगाँ जाइत- भोरुका समए) चलू चलू यौ जनकपुरमे कमलाक भगता करू करू यै कमला माइ करू हमर उद्धार चलू चलू यौ जनकपुर भगता बनि कमलाक (सोझाँ बालुसँभरल कमलाक तट। भिखमंगा सोचैत अछि।) -अहा। की विस्तार अछि कमलाक। मुदा एतेक भोरमे कियो एतए नहि अछि। चलू पाइक चुकड़ी कातमे राखि डूम दऽ आबी। (पाइक चुकड़ी नीचाँ रखैत अछि आ नहाइ लेल बिदा होइत अछि।) (मोने-मोन सोचैत)- मुदा कियो जे देखि जाएत आ ई पाइ लऽ लेत तखन? एकरा बालुमे नुका दैत छिऐक। (बालु कोड़ि कऽ चुकड़ी नुकबैत अछि।) (फेर मोने-मोन सोचैत) मुदा जे कियो ई देखि जाएत तखन? मुदा देखत कोना आब। तेना कऽ नुका देने छिऐक जे आब हमरो नै भेटत। (फेर सोचैत घुरि अबैत अछि।) मुदा हम जे नहा कऽ आएब तँ कतऽ ई पाइ गाड़ल अछि से हमरो कोना बूझऽ मे आएत। ठीक छै। (कोड़लाहा स्थानपर अबैत अछि।) एतऽ शिवलिंग बना दै छिऐ। ( कोड़लाहा स्थलपर पएर रखैत अछि आ पएरक चारू कात बालु राखए लगैत अछि। चारू कातसँ बालु भरि गेलाक बाद आस्तेसँ पएर हटा लैत अछि आ नीक-नहाँति शिवलिंग बना दैत अछि। फेर निश्चिन्त मोनसँ कमला-स्नानक लेल बिदा भऽ जाइत अछि। एम्हर ओ धार दिस बिदा होइत छथि आ ओम्हर दूरसँ किछु आर स्नानार्थी, पुरुष हाथमे धोती आ महिला हाथमे नुआ लेने, अबैत दृष्टिगोचर होइत छथि।) (मोने-मोन सोचैत) नीके भेल जे फुरा गेल। कएक सालक कमाइक छी ई पैसा। ई लोक सभ आब स्नान करबा लेल आबि रहल अछि। ने जानि ककर मोनमे खोट हेतै आ ककर मोनमे नै। (नहाइ लेल मंचसँ नीचाँ धारमे फाँगि जाइत अछि।) पुरुष स्नानार्थी - (अपन कपड़ा लत्ता राखै अए) चली कमलामे डूम दऽ आबी। स्त्री स्नानार्थी- (भिखमंगा द्वारा बनाओल शिवलिंग दिस इशारा करैत) हे देखियौ ओ शिवलिंग। लागैए एतऽ स्नान करबाक पहिने शिवलिंग बनेबाक विधान छै। पुरुष स्नानार्थी- अपना सभ दिस, गंगा कातमे तँ एहेन कोनो परम्परा नै छै। स्त्री स्नानार्थी- एत्तऽ मुदा छै। आ भोलाबाबाक स्थापना कऽ डूम लै मे हर्जे की। पुरुष स्नानार्थी- हँ से तँ ठीके। ( दुनू गोटे एक-एकटा शिवलिंगक स्थापनामे लागि जाइत छथि। पएरक चारूकात बालु चढ़बऽ लगै छथि। तावत् आनो लोक सभ आबि कऽ किछु पूछऽ लगै छथि आ अच्छा-अच्छा कहि ओहो सभ एक-एकटा शिव लिंगक स्थापनामे अपन-अपन पएरक चारू कात बालु चढ़बए लगै छथि। कनिये कालमे मंचपर शिवलिंगे-शिवलिंगे भरि जाइत अछि। मंचपर हर-हर महादेवक स्वरसँ अनघोल भऽ जाइए। ) भिखमंगा: (नहा कऽ निकलैत) देखू, जखन आएल रही तँ एकोटा लोक नहि छल आ आब देखू कतेक भीड़ भऽ गेल। हमरा की। जोगी छी, बहैत पानि सन। ई अंगवस्त्र रस्तेमे सुखा जाएत। जए माँ कमलेश्वरी। कमलाक भगता बनि चली आब जनकपुर। मुदा ओ चुकड़ी तँ लऽ ली। (अपन बनाओल शिवलिंग ताकऽ लगैत अछि। मुदा चारू कात शिवलिंगे-शिवलिंग। एक दूटा शिवलिंगकेँ भखराबैत अछि मुदा ओहि नीचाँसँ किछु नहि बहराइत अछि।) (भिखमंगा माथपर हाथ राखि मंचपर बैसि जाइत अछि आ आस्ते-आस्ते मंचपरसँ प्रकाश विलीन भऽ जाइत अछि।) (पटाक्षेप) बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_VII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -Dear Satanand Purhit DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –VII Dhara felt sick and bewildered – what she achieved in life – she neither remained with her husband nor was able to get her daughter settled. At least God was kind enough to have blessed her with a wonderful son Kadamba. He was the only solace in her otherwise dark life. But has anyone understood the movement of time? It appears to be slow – by the time one realizes it, finds himself engulfed by Naagphaans. Dhara remembered her last meeting with Akash Babu. That meeting completely shattered Dhara – she always considered Akash as a godly person, but reality was otherwise. After that incident Dhara lost faith in mankind. The entire scene appeared before Dhara’s eyes like a movie reel … one day Dhara visited the house of Akash Babu. Akash was happy to see her. Akash – Dhara, please be seated, I will make some tea for you. Seating alone in the room she started looking here and there, finding a blue colour diary. Dhara started turning over the pages, on one page she found the following- “ the spring night is on wane but I keep on writing to you. Shaking, shivering, trembling – I am really thrilled. All of a sudden my heart started longing for you Dhara. I still remember my first meeting with you – I was totally mesmerized. I got attracted towards you, knowing fully the ultimate result. I wanted to tell you everything, but lacked courage to do so. I always tried to look into your eyes in search of love. Just a mere accidental touch of your fingers used to make me wild. In my imagination, I grasp you, kiss and caress you. Yes Dhara ..yes .. yes, I express my desire for you through these words of George Moore : Let me lie, Let me die on thy snow-covered bosom I would eat of thy flesh as a delicate fruit I drunk of its smell, and the scent Of the tresses Is a flame that devours. 2 One day while observing my palm you asked me about your place in it and my reply was ‘in the centre’. But I have no idea about my place in your palm, in your life -- perhaps I am there or nowhere – I may be in delusion or illusion, may be in deception, may be in faith, may be in affection or predilection, may be in love or warmth – where I am .. I am? The diary pages were fluttering in Dharas’ trembling fingers – as if each breath of Akash began forming lines – each and every word of diary appeared as snake- bite. Akash Babu’s passionate craving for me, his ecstasy, his sadness or heart wrenching emotion ..Is it the reflection of his deceptive and distorted personality? She felt Akash had a demon like longing for her. She felt her entire emotional world as NAAGPHHANS. That day onwards she started hating Akash. Due to Dharas’ indifference and disregard, Akash also distanced himself from her. Somebody asked Dhara – When the door of the temple will open? Kadamba replied – Only five minutes are left. A Gujarati woman greeted Dhara with folded hand – namaste bahinji. Dhara – Do you live here? Woman – No, I have come from Basildon. Dhara – For how long you are there? Woman – Now it is more than ten years. What about you? Dhara – I have come from India for a short visit. My son is working as an engineer. Woman – From India. I have not been able to visit India for the last seven years. Dhara – Have you come from Gujarat? Woman – Yes..yes. How did you realize? Dhara – Don’t you know that personality is a reflection of one’s own culture and life-style that becomes its identity. 3 Woman – Are you a Professor? Dhara -- How did you realize? Both of them laughed at this question. Woman – I have got a large factory in London. Bought a house at Basildon – I am Priya. Dhara - I am Dhara. Meet my son Kadamba. Why home at Basildon? Priya - London is overcrowded. Many people work in London but stay in surrounding County. The main door of the temple was now open. Everybody stood in queue for darshan. Main temple belongs to Purushottam Bhagwan Swami Narayan who is considered as one of the incarnations of Lord Vishnu. Large and gorgeous statues of Gunatatanand, Mulakshabrahma, Gopalanand Swami, Mahamukta, Ghanshyam Mahaswami were also installed in the temple. On both sides of the temple, statues of Radha-Krishna and Hanumanji presented a marvelous scene. Large number of Indians had thronged the temple. Some British women were also in the queue. Andrews – Didi, this temple provides solace to our heart. The peace and the calmness of this place seem like heaven. Dhara – Yes Andrews, the peace and calmness of the Lotus Temple in Delhi give us the same feeling. In Lotus Temple there are no statues, chairs are kept inside and people sit there for ten to fifteen minutes for meditation. Priya -- Have you had darshan? Meet my husband Harish Khemaniji. Harishji, she is Dhara. Dhara - Please meet Andrews, his wife Reshmi and my son Kadamba. Andrews – Harishji. What about your profession? 4 Harish – I have got my own export-import business. Andrews – Export-import of what? Harish – Motor parts etc. Dhara was startled – Kadamba was also surprised to hear motor parts but kept mum. Andrews – It seems you keep on visiting India. Harish – Yes, why not .. whenever need arises. Kadamba – Are you in touch with everyone who comes here from India for business? Harish – No, no .. it is not possible. But in Southall we have our Association office where the name and addresses of everybody is maintained and recorded. Kadamba – It is almost like Indian Embassy. Harish – Yes, it is like that. After performing puja, they came out. Dhara was holding Earl, being followed by Newla. Andrews and Harish were chatting. Reshmi and Priya were also interacting. Kadamba was silent – everyone was immersed in thoughts or chats. All of a sudden Andrews spoke – Why not visit Southall. Let us go there for Indian food. Priya replied – Yes ..yes. Let us go to some Indian Restaurant. Southall in London was heavily populated mainly by the Indians, whether Hindus or Muslims, it was dominated by them. Southall resembled Delhi’s Kamlanagar and Karolbagh markets, Patna’s Sabjibagh , New market and Hathua market – all the items were being sold on pavements. Southall Broadway is the only place where one can see everything Asian, from food, spices, clothes, restaurants, take-away. Southall has the largest Asian community. It is like little India. Andrews – What are you thinking Didi? Here the market timing is from 9 am to 5 pm. People are not overworked. There are many British whose bank balance is not more than $50, but no one can beat their will to live an energetic life. They also receive financial assistance from the Government. After 18 years everyone is employed. Even aged people live their lives to the fullest. Even the patients are treated at Government expense. They hardly care for money or bank deposits. 5 Dhara – Yes, I am surprised to see everyone going for shopping – how do they manage shopping on such a large scale- is it a part of their hobby? Andrews – Yes, shopping is their hobby. Even unemployed gets bonus from the Government. Indians also get loan worth $2000 for starting some business. Some of them disappear with that money. Dhara became upset when Andrews referred to business. She started looking here and there lest she gets some information about Simant. In London, Simant had been involved in the export business of Madhubani painting, Mithila’s Mauni, Pauni, Kaniya, Putra etc…etc. In lieu he used to import motor parts to India. He also exported Madhubani paintings to USA, Japan. Dhara went inside an Indian Restaurant, Reshmi and Priya followed her. They ordered chhole-bhature and lassi. Andrews, Kadamba and Harish were still standing outside. Andrews– Harish, we are looking for a person in England. Harish – Who is that person? Kadamba – My father Sri Simant. In India, he had a flourishing business. He was always involved in it and developed addiction for it. Harish – Kadamba, England is a big place. If he was involved in business, we can get details about him from our Association. Please have faith in god. Kadamba – But till what period? Harish – It is already 5 pm. Office must be closed by now. Do you have his photograph? I shall enquire about him. Where are you putting on? Kadamba – We have come from Leicester. It is almost two hours journey. We will be back there. Harish – You do one thing. Please accompany us to Basildon, stay there at our place, we will also feel delighted. We will also chalk out our future programme. 6 Dhara was astonished to see the overcrowded Southall. People were speaking different languages, but full of love and cooperation. Commentator on Mahabharat had observed – in this world no one is superior to man. Chandi Das had also commented –‘ sabhi upar manus tahi upar nahi – this spirit was truly exhibited at this place. Hindu, Muslim, Sikh, Ishai … apas mein sab bhai, bhai. Priya – What are you thinking Didi? Dhara – At this place there is love and cooperation among all the communities. Why lack of love and cooperation among them in India? Why can’t they co-exist there? Priya – Didi, leave this topic. These things are linked to politics of vote in India. Here Politicians do not ask for vote on these considerations. I have called you Didi. Hope, you have not taken it otherwise. Dhara – Priya, you could have called me Dhara, but you used Didi – it is now an emotional bond. British say good morning, weather is fine with smiling faces but devoid of emotions. But your heart is hungry for love, relationship, emotional bonding. Yes I am your Didi. In an emotional upsurge, Priya started weeping and embraced Dhara. They were overjoyed with this new found relationship and with the Basildon programme as well. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Dear Satanand Purhit Dear Satanand Purhit The day of Agahan Shukla Vivah Panchami The best day for marriage Satanand Purhit Ram and Sita got married on that day Aunty from Kharadak also Got married on the vivah panchami The preist was also someone very famous How much the goddess Sita had suffered ! The marba was painted with Mithila painting Parichan, Naina-jogin all rituals were performed Just like the marriage of the goddess Sita The marriage of the aunty was bal-vivah The day was also very auspicious Naina jogin and song of jog Nothing could save her from widowhood She was widowed My friend tells me When he takes his sister-in-law To the Danapur Cant for pension He cries at heart By seeing his widow sister-in-law He favoured the system of Re-marriage of widow In front of his father Got reply with full anger The ancestor of the famous family Of Babusaheb from Neura’s Rajputs How could he dare! But he knows that His father is also not happy But bound to bear the system of society He didn’t have any other option Dear Shatanand Purhit Please explain me The speciality of that auspicious day. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा संग्रह)- जगदीश प्रसाद मंडल): मूल्य भा.रु. १५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) नव मैथिली पोथी सभ कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक) खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना- गजेन्द्र ठाकुर रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-15-0]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-16-7]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-17-4]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-18-1]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-19-8]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-20-4]
कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-21-1] विभारानीक दूटा नाटक (भाग रौ आ बलचन्दा)रु.१००/- US$25 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-01-3]
मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर रु.१००/-US$80 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-13-6]
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नताशा (मैथिली चित्र शृंखला)- देवांशु वत्स रु.१५०/- US$60 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-04-4]
हम पुछैत छी- (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-05-1]
अर्चिस्- (कविता/हाइकू संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी रु.१५०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-06-8]
मौलाइल गाछक फूल-(उपन्यास)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.२५०/- US$40 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-02-0]
मिथिलाक बेटी-(नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-03-7]
विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-09-9]
विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-08-2]
विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-07-5]
(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.40/- per copy for outside Delhi) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) VIII. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ FOR SUPPLY OF BOOKS IN ASSAM, BIHAR, WEST BENGAL, JHARKHAND (INDIA) AND NEPAL CONTACT OUR DISTRIBUTORS: PALLAVI DISTRIBUTORS, C/o Dr. UMESH MANDAL, TULSI BHAWAN, DEEPAK CHITRALAYA MARG (CINEMA ROAD), WARD NO.6, NIRMALI, DISTRICT- SUPAUL - PIN-847452(BIHAR,INDIA) ph.09931654742 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com
(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ 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विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५७ म अंक ०१ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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