142 'विदेह' ५८ म अंक १५ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५८) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल-अवतारवाद २.२.सरोज खिलाडी-बोतल राम ( मैथिली एकल नाटक ) २.३.बेचन ठाकुर-“बेटीक अपमान”(नाटक) २.४.१.बिपिन झा-बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि, २.बीरेन्द्र कुमार यादव-राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर २.५.प्रेमशंकर सिंह-संस्मरण साहित्य २.६.रामप्रवेश मंडल-लघुकथा-पछतावा २.७.जगदीश प्रसाद मंडल-जीवन संर्घष-४ २.८.राजेश्वर नेपाली- कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २३म खेप ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-आसमानी आकाश ३.४.१.रामभरोस कापड़ि भ्रमर-गजल २. नन्द विलास राय-गीत ३.५.शिव कुमार झा- पद्य ३.६.१.राजदेव मंडल-तीन टा कविता २.सतीश चन्द्र झा-दूटा कविता ३.७.कामिनी कामायनी-बंजारा मोन ३.८.डॉ. शेफालिका वर्मा-दूटा कविता ४. गद्य-पद्य भारती: कोंकणी कथा-मर्णताळणी-मूल कथाकार-वसंत भगवंत सावंत-हिन्दी अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री सेबी फर्नांडीस-मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह-मृत्युकेँ टारब ५. बालानां कृते-ब्यूटी कुमारी-कैदी ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_VIII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -Shelter In The Rainy Days 8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मैथिलीक नामपर गानल-गूथल संस्था अछि। हँ मुदा दुर्गा पूजा समिति आ काली-पूजा समिति सभ नृत्य-नाटक (हिन्दी नाटक!) करबैत अछि, छागरक शिरा लॉटरी लगा कऽ बेचैत अछि आ मैथिल ब्राह्मण साहित्यकारकेँ पुरस्कृत सेहो करैत अछि। हाथ उठा कऽ जिन्दाबाद करू, मैथिलीपर उपकार करैले एहन संस्था सभक वार्षिक भक्क टुटबाक कार्यक्रमपर। एम्हर जनकपुरमे विदेह आर्काइवक आधारपर छपल ९ टा पोथीक लोकार्पण नेपालमे भेल। राधाकृष्ण चौधरीजीक मिथिलाक इतिहासक पाण्डुलिपिक सेहो पहिल प्रूफक बाद पी.डी.एफ. वर्सन डाउनलोड लेल रिलीज भेल। ई सभटा पोथी आ मारते रास चित्रकथा/ कॉमिक्सक पोथी https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ एहि लिंकपर पी.डी.एफ. डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। प्रीति ठाकुरक गोनू झा आ आन चित्रकथा सेहो आब नीचाँक लिंकपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि: http://www.box.net/shared/x0zs7ueiml आ विश्वनाथन आनन्द विश्व शतरंज प्रतियोगिता चारिम बेर जीति लेलन्हि। संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ मई २०१०) ९८ देशक १,३१६ ठामसँ ४२,६५२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,४०,९२२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 ..उर्फ..नोम चोम्स्की..उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...इलारानी सिंह...उर्फ...कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ-अनलकान्तक एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- विशेष विवरण http://aaum.blogspot.com/ पर। We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them. पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण, ( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी आ प्राच्य आ पाश्चात्य रचनाक / कविता सभक निर्ल्ज्जतासँ पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि। हरेकृष्ण झा:ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, लोक सभ हमरा कहने रहए जे ई हमर कविताकेँ हिन्दीमे पाइ लऽ कऽ छपबै छथि, मुदा हमरा डॉक्टर तनावसँ दूर रहबा लेल कहने अछि। (विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर पाइ लऽ कऽ एकटा हिन्दी कवितामे छपबओलक। सम्पादक) प्रणव बिहारी (मैथिली कथाकार प्रदीप बिहारी जीक पुत्र): (सम्पादक द्वारा ई पुछलापर जे हुनकासँ नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचनाक अनुवाद जाहि तरहेँ धोखासँ ई पंकज झा पराशर करबओलक आ अपना नामे निर्लज्जतासँ करबओलक तकरा विषयमे की कहब अछि, एहिसँ मैथिली साहित्यकारक प्रति अहाँक विचारमे कोनो परिवर्तन आएल अछि)-ओकरा एक्सपोज कएल गेल ताहिसँ खुशी छी। जीवकान्त: ई पंकज झा पराशर तँ बड़का चोर अछि, एकरा विषयमे बड्ड दिन अनभिज्ञता रहल। विभूति आनन्द: ई पंकज झा पराशर तँ चोर अछिये। अग्निपुष्प: हम तँ आब एकर रचना नहिये छापबै। ई दोसरक रचना चोरबै अछि सेहो दोसरासँ अनुवाद करबा कऽ। तारानन्द वियोगी: ई पंकज झा पराशर हमरासँ कहलक जे प्रकाशकसँ विवाद अछि, आब सभ गप बुझलहुँ। अहाँ जे कएलहुँ से नीक कएलहुँ। मणिकान्त दास: ई पंकज पराशरकेँ अहाँ जे उघार केलहुँ से देखि मैथिलीक भविष्यक प्रति आशा बढ़ल, जीवकान्तजीसँ गप कएलहुँ,ओहो कहलन्हि जे पराशर बड़का चोर अछि। कहू तँ एकटा बच्चासँ अनुवाद करेनाइ आ तकरा अपना नामे छपेनाइ। एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) at Rahika. There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh Srikant Verma and others. We deplore the selling of these prizes to a person who has brought respect of Maithili to a lower level.
गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ २. गद्य २.१.जगदीश प्रसाद मंडल-अवतारवाद २.२.सरोज खिलाडी-बोतल राम ( मैथिली एकल नाटक ) २.३.बेचन ठाकुर-“बेटीक अपमान”(नाटक) २.४.१.बिपिन झा-बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि, २.बीरेन्द्र कुमार यादव-राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर २.५.प्रेमशंकर सिंह-संस्मरण साहित्य २.६.रामप्रवेश मंडल-लघुकथा-पछतावा २.७.जगदीश प्रसाद मंडल-जीवन संर्घष-४ २.८.राजेश्वर नेपाली- कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि जगदीश प्रसाद मंडल अवतारवाद जीव आ ईश्वर- जे केयो शरीर धारण करैत आ छोड़ैत, जन्मलैत आ मरैत, ओ संसारी जीव होइत अछि। मुदा जे सर्वत्र व्याप्त, सर्वशक्तिमान, सर्वरक्षक गुणसँ मंडित होइत ओ ईश्वर होइत। शास्त्रमे जे लक्षण ईश्वरक देल गेल अछि ओहि अनुसार ओ सबहक प्रतिपालक सेहो होइत छथि। हुनक स्वभाव क्रुर भइये ने सकैत छन्हि। िकऐक तँ ओ महादयालु होइत छथि। संगहि ओ सर्वत्र प्याप्त छथि तेँ कतौ अबै-जाइक जरूरते कोना हेतनि। प्रश्न उठैत अछि जे ओ माछ आ काछुक रूप िकअए धारण केलनि? एहि रूपमे ऐवाक िक प्रयोजन भेलनि। मत्स्यावतार लऽ कऽ िकअए शंखासुरक हत्या केलनि? जे स्वयं सर्वपालक सर्वव्यापी आ महादयालु छथि। हुनका िकअए ककरोसँ द्वेष भेलनि? िकअए ओ सुअर बनि िहरण्याक्षसँ पृथ्वी छीनि अपना मुँहमे रखि लेलनि। िक पृथवी धीया-पूता खेलैक गेन्द सदृश्य अछि जे ओ मुँहमे रखि इतर पृथवीपर ठाढ़ भऽ हुनकासँ लड़ैत रहलाह आ अंतमे हत्या कऽ देलखिन। एतबे नहि, नरसिंह अवतार लऽ लोहाक खंभा फाड़ि हिरण्यकश्यपुकेँ पेट फाड़ि हत्या केलनि। की ईश्वर सभसँ पैघ हत्यारा छथि? वामन रूप धारण कऽ राजा बलिसँ तीनि डेग जमीन मांगि सौँसे राज्य हड़ैप लेलनि, िक दुनियॉंमे सभसँ पैघ धोखावाज वएह छलाह? ऐहन धोखावाजक आराधना कएलासँ केहन फल भेटत अपनो विचारि सकै छी। भीख मांगव मायावी, असमर्थ जीबक (मनुष्यक) काज छी नहि िक कर्मठ, ऐश्वर्यवान पुरूषक। एहि रूपे देखलापर बुझि पड़ैत जे मनक माया, कल्पना आओर अज्ञानता सभकेँ भरमा देने अछि। ततबे नहि, परशुराम बनि हैहय-वंशीय क्षत्रिएकेँ एक्कैस बेरि सामूहिक हत्या केलनि। जहन एक बेरि वंश नाश कऽ देलखिन तहन दोहरा कऽ कतएसँ फेरि क्षत्रिए आबि गेलाह जे दोहरबैत, तेहरबैत एक्कैस बेरि पहुँच गेलाह। अनन्त विश्व-ब्रहम्ाण्डक रचैता ईश्वर दशरथक बेटा राम बनि सीतासँ विआहो कऽ लेलनि आ हरण भेलापर गाछो-वृक्षसँ कानि-कानि पता पुछलथिन। बिना ओर-छोड़क समुद्रमे पाथरक पुलो बनबा देलखिन। इत्यादि-इत्यादि, अनेको प्रश्न विचारणीय अछि। हम सभ एक्कैसवी शताब्दीक समर्थ चेतना छी नहि कि सोलहवी शताब्दीक बाल चेतना। जड़-चेतनात्मक विश्वसन्ताक वास्तविक बोध नहि रहने पहिने िकछु गोटे जगतकर्त्ता ईश्वरक जाल ठाढ़ केलनि आ पछाति अपन स्वार्थ सिद्ध करैक लेल नाना अवतारक कल्पना केलनि। छल करब, जोर-जबरदस्ती करब, यती-सतीक चरित्र भ्रष्ट करब, िक ईश्वरक काज थिक। ई सभ जाल-फरेबी मनुक्खक छी। एतबे नहि ईश्वरक नाओपर मनुष्यक खून सेहो बहाओल गेल अछि। सेहो खून सिर्फ मानवेत्तर जीवेक नहि बल्कि मूक, मासूम मनुष्यक सेहो। धनबल, शरीरबल, विद्याबलादिसँ सेहो सदैव गरीब आदमी अत्याचारीक शिकार बनैत रहल अछि। जे अखनो ऑंखिक सोझमे दिन राति भऽ रहल अछि। श्रीमद्भागवतक स्कन्ध १ अध्याय ३ श्लोक ५ सँ लऽ कऽ २५म श्लोक धरि अवतारवादक व्याख्या अछि। जहिमे निम्न प्रकारक चर्चा अछि- (१) सनक, सन्नदन, सनातन, सनत्कुमार-ब्रह्मचर्य पालनक लेल, (२) सुअर-पृथ्वीकेँ रसातलसँ आनवाक लेल, (३) नारद-उपदेशकक लेल, (४) नर-नारायण-तपक लेल, (५) कपिल-सांख्य शास्त्रक उपदेश देबा लेल, (६) दत्तात्रेय-उपदेश देबा लेल, (७) यज्ञ रूचिप्रजापतिक पत्नी आकूतिसँ उत्पन्न भेल स्वायम्भुक मन्वन्तरक रक्षाक लेल, (८) ऋृषभदेव-परमहंसक आदर्श देखेबा लेल, (९) पृथु-पृथ्वीसँ औषधि दोहनक लेल, (१०) मत्स्य-डूबल पृथ्वीकेँ निकालबाक लेल जे शंखासुर वेदकेँ चोरा नेने रहए। जेकरा मारि कऽ मत्स्य वेदक उद्धार केलक, (११) कच्छप-समुद्र मथैमे सहयोगक लेल, (१२) धन्वन्तरि-समुद्रसँ अमृतक घैल लऽ प्रकट भेला, (१३) मोहिनी-देवता-दानवक झगड़ा फड़िछबैक लेल, (१४) नृसिंह-हिरण्यकश्यपुकेँ मारैक लेल, (१५) वामन-बलिकेँ ठकैक लेल, (१६) परशुराम-क्षत्रिएकेँ सामूिहक हत्याक लेल, (१७) व्यास-वेदक िवभाजन करैक लेल, (१८) श्रीराम-रावणकेँ मारैक लेल, (१९-२०) बलराम-कृष्ण- पृथ्वीक भार उताड़ैक लेल, (२१) कल्कि-पृथ्वीक भार उताड़ैक लेल। उपर वर्णित बाइस अवतार संग-संग आन-आन शास्त्रमे हंस आ हयग्रीवक चर्चा सेहो अछि। सनकादिकेँ उत्तर देवा लेल हंस आ मधुकैटभक हत्याक लेल हयग्रीवक चर्च अछि। सभसँ पहिने अवतारवादक भावना ‘शतपथ ब्राह्मण’ मे भेटैत अछि। जेना िक एच. याकोवी- ‘इनकारनेशन, इन्साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन एण्ड इथिक्स’ भाग ७१मे लिखने छथि। संग-संग एम. माेनिएर विलियम्स-‘ ड. विजडम पृष्ट ३८१मे सेहो लिखने छथि। एच. राय चौधरी- अर्लि हिस्ट्री ऑफ बैष्णव सेक्ट’ मे पृष्ट ९६मे सेहो लिखने छथि। शुरूमे विष्णुक अपेक्षा प्रजापतिकेँ िवशेष महत्व छलनि। ‘शतपथ ब्राह्मणक अनुसार प्रजापतिए मत्स्य (१/८/१/१) कूर्म (कौछु) (७/५/१/५) आओर वराहक (१४/१/२/११) अवतार लेलनि। प्रजापतिकेँ बराह रूपक कथाक चर्च ‘तैत्तीरीय संहिता’ (७/१/५/१) तैत्तरीय ब्राह्मण (१/१/३/६) तैत्तरीय आरण्यक (१०/१/८) आओर काठक संहिता (८/१)मे प्रारंभिक रूपमे विद्यमान अछि। जेकर चर्च डॉ. कामिल बुल्के ‘रामकथा’ अनुच्छेद १४०मे केने छथि। एहि रूपे देखैत छी जे मत्स्य, कूर्म वराहक अवतार शुरूमे प्रजापतिसँ छलनि। िकन्तु पछाति आबि िवष्णुक महत्व बढ़लापर तीनूक संबंध िवष्णुसँ भऽ गेलनि। महाभारतक नारायणी उपाख्यान (१२/३२६/७२) आ (१२/३३७) आ हरिवंश पुराण (४/४१)मे बराह आ विष्णुक संबंध मानि लेल गेल। आगू आबि तीनूक नाओसँ एक एकटा महापुराण सेहो लिखल गेल। जाहिमे तीनूक संबंध विष्णुसँ कए देल गेल अछि। वामनावतार आ नृसिंह अवतार शुरूहेसँ िवष्णुसँ संबंधित अछि। वामनावतारक चर्चा ‘तैत्तीरीय संहिता’ (२/२/३/१) शतपथ ब्राह्मण (१/२/५/५) तैत्तीरीय ब्राह्मण (१/७/१७) आओर ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ (६/३/७) मे भेल अछि। नारायणी उपाख्यान (१२/३२६/७३) आओर हरिवंशपुराण (१/४१)मे सेहो उल्लेख अछि। िवष्णु पुराणमे (१/१६) ‘नृसिं’हक कथाक वर्णन सेहो अछि। शुरूमे परशुरामक अवतार विषएक कथाक चर्च नहि भेटल अछि। मुदा नारायणी उपाख्यान (१२/३२६/७७) हरिवंश पुराण (१/४१/११२/१२०) आ विष्णु पुराण (१/९/१४३)मे विष्णुक अवतार मानल गेल अछि। एहि रूपे प्राचीन साहित्यमे अवतारवादक चर्चा होइतहुँ विशेष पूजाक चलनि नहि भेल आ ने विष्णुक प्रधानते भेल रहए। कृष्णावतारक संग-अवतारवादक िवकासमे महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रारंभ भेल। ओहि समएसँ अवतारवाद भक्तिभावसँ जुड़ि फुलैत-फड़ैत आजुक रूप धेने अछि। वासुदेव कृष्ण भागवतक इष्टदेव छलाह। शुरूमे िवष्णुक संग हुनक संबंध नहि छलनि। हेमचन्द राय चौधरीक अनुसार तेसर शताब्दी ई. पू. वासुदेव कृष्ण आ विष्णुक अभिन्नताक भावना उत्पन्न भेल। अवतारवादक प्रक्रियामे बौद्धधर्म जुड़ि गेल। बौद्धधर्म आ भागवत सम्प्रयाइक भक्तिमार्ग समान रूपसँ ब्राह्मण साहित्यक कर्मकांड आ यज्ञ प्रधान धर्मक प्रतिक्रियाक रूपमे उत्पन्न भेल आ विकास केलक। जाहि कारणे धर्मक क्षेत्रमे ब्राह्मणक एकाधिकार ढील भेल। बौद्धधर्मक अधिकाधिक प्रचार-प्रसार देखि भागवत समर्थक अपना दिशि आकर्षित करैक लेल भागवतक इष्टदेव वासुदेव कृष्णकेँ िवष्णु-नारायणक अवतार मानि लेलनि। ‘तैत्तीरीय आरण्यक’ (१०/१/६)मे वासुदेव आ िवष्णुक अभिन्नताक चर्च सभसँ पहिने भेल अछि। एहिसँ अवतारवादककेँ भरपुर बल भेटल। संग-संग िवष्णुक महत्व सेहो बढ़ए लगल। जहिसँ अवतारवादक पूर्ण भावना रसे-रसे िवष्णु-नारायणमे केन्द्रित हुअए लगल। आ वैदिक साहित्यक आन-आन अवतारक क्रिया-कलाप विष्णुमे आरोपित भऽ गेल। एक दिस अवतारवाद बढ़ि रहल छल तँ दोसर दिस रामक आदर्श चरित्र जनमानसक बीच प्रबल भऽ रहल छल। रामायणिक संग-संग रामक महत्व सेहो तेजीसँ बढ़ि रहल छल। रामक बीरताक वर्णनमे अलौकिकताक मात्रा सोहो बढ़ए लगल। एक दिस रावण पाप आ दुष्टताक प्रतीक बनि जनमानसक बीच आएल तँ दोसर दिस पुण्य आ सदाचारक प्रतीक राम बनलाह। जेकर फल भेल जे कृष्णे जेकॉं रामो िवष्णुक अवतारक श्रेणीमे आिब गेलाह। भरिसक पहिल शताब्दी ई. पूर्बेसँ राम िवष्णुक अवतार मानै जाय लगलाह। महाभारतक संग-संग वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश इत्यादि पुराणमे अवतारक तालिकामे राम सेहो छथि। अवतारवादक पहिल कल्पना ‘शतपथ ब्राह्मण’मे अछि। जे ईसासँ एक हजार वर्ष पूर्वक रचना मानल जाइत अछि। शतपथ ब्राह्मणमे कहल गेल अछि जे प्रजापतिये माछ, कछुआ आ सूअरक अवतार धारण केलनि। जे शुद्ध कल्पनाश्रित बुझि पड़ैत अछि। वामन अवतारक कल्पना ‘तैत्तीरीय संहित’मे अछि। हजार वर्ष पूर्व एकरो रचना मानल जाइत अछि। ओना वामन अवतारक कल्पना ऋृग्वेदक प्रथम मंडलक बाइसम सूक्तक अंतिम (१६/२१) छह मंत्रसँ सेहो उद्भुत मानल जाइत अछि। इदं विष्णुविचिक्रमे त्रेधा िनदधे पदम। समूलमस्य पांसुरे। त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्य: अतो धर्माणि धारयन्। (ऋृग्वेद- १/१२/१७-१८) टीका रामगोविन्द ित्रबेदी। विष्णु सूर्यक प्रतीक छथि। हुनक िकरण पाएर िछअनि। पृथ्वी, अंतरिक्ष आ दयुलोकमे किरण माने रोशनी पड़ब तीन पाएर पड़ब छिअनि। जे प्राय: सभ वैदिक जनै छथि। मुदा पाछु आबि एहि सूत्रकेँ कथा गढ़ि िवष्णु वामनक कथा बनि गेल अछि। कथा अछि िवष्णु वामन बनि राजा बलिकेँ ठकि कऽ तीन डेग भूमि मांगि सौँसे राज्ये नापि लेलनि। प्रश्न उठैत जे ऐहन-ऐहन ठककेँ जनमानस कोना ईश्वर मानि लेलक? पुराणक अनुसार िवष्णुु इन्द्रक छोट भाए कहल गेल छथि। जे अपन जेठ भाय इन्द्रक गद्दी स्थापित करैक लेल बलिकेँ धोखा देलनि। मत्स्य, कच्छम, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम इत्यादि जे कियो अवतारक श्रेणीमे अएलाह, िकयो पूजनीय नहि भऽ सकलाह। अवतारक अंतिम छोरपर उदित रामे आ कृष्णेटा पूजनीय भेलाह। वस्तुत: श्रमणक (बौद्ध-जैन) उत्तारवादक प्रतिक्रियामे अवतारवादक कल्पना भेल। महावीर आ बुद्धदेव महापुरूष छलाह। (उत्तारक अर्थ-सामान्य जीवकेँ दोसरसँ उपर उठब होइत अछि जखन कि अवतारक अर्थ महान सत्ताकेँ उपरसँ निच्चाँ उतड़व होइत अछि)। अवतारवादक परम्पराक अनुसार परमात्मा उतड़ि कऽ साधारण मनुष्य बनि गेलाह। पहिने कृष्णकेँ अवतार मानल गेलनि। जनिकर पूर्ण विकास गीताक कृष्णवतारमे भेलनि। ताधरि राम अवतारक श्रेणीमे नहि आएल छलाह। केवल धनुर्धारी वीर मानल जाइत छलाह। गीताकार कृष्णक मुँहसँ रामक संबंधमे कहबौलनि- ‘राम: शस्त्रभृतामहम।’ इसाक सौ वर्ष पूर्व धरि चारू भॉंइ रामकेँ बिष्णुक अंशावतारे मानल जाइत छलिन। रामकेँ पूर्ण परब्रह्म ईसाक बाद अध्यात्म रामायणसँ शुरू भेल। एहि रूपे अवतारवादक गुन्जाइस माने अँटावेश वेदमे नहि पछाति भेल। प्रश्न उठैत जे अवतारवाद की थिक? विश्व अनंत देश आ काल-व्यापी अछि। विश्वक मुख्य दू घटक-जड़ आ चेतन अछि। ओहिमे अपन-अपन गुण-धर्म निहित अछि। जहिसँ जगतक व्यवस्था अनादिकालसँ अवाधगतिए चलि रहल अछि। एहिसँ हटि दोसर ईश्वरक कल्पना तथ्यसँ अलग होएव अछि। कहल गेल अछि जे शंखासुर नामक राक्षस छलाह। ओ ब्रह्मा एहिठाम पहुँच वेद चोरा कऽ समुुद्रमे नुका कऽ रखि लेलक। जेकरा पुन: प्राप्त करबा लेल विष्णु मत्स्यावतार धारण कए समुद्रमे शंखासुरकेँ मारि वेद लऽ अनलनि। प्रश्न उठैत- कि ईश्वरक काज हत्या करब थिक? जे सर्वज्ञ, दयालु छथि हुनकर ऐहने किरदानी हेतनि। ओ तँ अपना सत्प्रेरणासँ ककरो बदलैत छथि। एहिना हिरण्याक्षक संबंधमे सेहो अछि। हिरण्याक्ष पृथ्वीकेँ चोरा कऽ टट्टीमे नुका रखलक। जेकरा विष्णु सुअरक अवतार लऽ थुथुनसँ पृथ्वीकेँ टट्टीसँ निकालि, िहरण्याक्षकेँ मािर उपर अनलनि। जहिसँ पृथ्वीक उद्धार भेल। प्रश्न उठैत- जखन पृथवीऐक चोरी भऽ गेल तँ ओकरा राखल कत्तऽ गेल। अपन गुरूत्वा शक्तिसँ पृथवी स्वयं धारित अछि। ऐहने कथा हिरण्यकश्यपु आ प्रह्लादक सेहो अछि। प्रह्लाद विष्णुक भक्त रहथि जे हिरण्यकश्यपुकेँ पसन्द नहि रहनि। जहिसँ बान्हि देलखिन। प्रह्लादक दुख देखि ईश्वर (विष्णु) नर आ नारायणक िमश्रित रूप बना खूँटा फाड़ि कऽ नकलि हिरण्यकश्यपुकेँ मारलनि। प्रश्न उठैत- एक प्रह्लादक लेल ईश्वर खूँटा फाड़ि निकललाह मुदा, चंगेज खॉं, नादिरशाह, िमलावटखोर, जमाखोर, धूसखोर शोषकक लेल निन्न नहि टुटैत छन्हि। वामन रूप बनि बलिसँ भीख मंगलनि। भीख मांगव, छल करब मायावी मनुक्खक काज छी नहि कि ईश्वरक। जखन परशुराम हैहय क्षत्रिए वंशकेँ सामूहिक हत्या केलनि तँ फेिर दोहरा-तेहरा, एते तक िक एक्कैस बेरि, कऽ केकर हत्या केलनि। जँ ऐहन-ऐहन हत्यारा ईश्वर होथि तँ अपराधी ककरा कहवै। अनंत विश्व-व्यापी जगत स्रष्टा ईश्वर (राम) दशरथक बेटा बनि सीतासँ विवाह करए औताह। ततबे नहि हरण भेलापर कानि-कानि गाछ-वृक्ष सभकेँ पता पुछथिन। गाए-चरबए लेल कृष्ण वृन्दावन आबि नारी संग रास करए औताह। की यएह लक्षण ईश्वरक वेद कहैत अछि। विश्वमे मुख्य दू तत्व-जड़ आ चेतन अछि। जेकरा पुराकालसँ सांख्य दर्शन प्रकृति आ पुरूष कहैत आएल अछि। जड़ प्रकृतिमे अनेक तत्व अछि। जे सभ अनादि-अनंत अछि। ओहिमे अपन-अपन स्वभाव सिद्ध गुण-धर्मक क्रिया, ओकर सम्पत्ति छियै। जहिसँ सृष्टि निरंतर विद्यामान रहैत अछि। जँ से नहि तँ पूरबा आिक पछवा हवा जे बहैत अछि, ओकरा िकयो पूव आकि पछिम जा कऽ ठेलैत अछि आिक अपन दवावक नियमक अनुसार हवा स्वयं चलैत अछि। तहिना बरखो होइत अछि। पानि बरिसैक जे प्राकृतिक नियम छै, अनुकूल भेलापर बरखा होइत अछि। प्रकृति जड़ छी। ओ ई नइ बुझैए जे रौदी, कम बरखा आकि बेसी बरखा ककरो नोकसान करत आिक लाभ पहुँचाओत। एक दिस १९८७ ईस्वीक पानि (बरखा) मिथिलांचलकेँ दहा देलक तँ दोसर दिस राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा इत्यादि राज्यमे रौदी भऽ गेल। कि ऐहने काज सर्वज्ञ, दयालु आ सर्वशक्तिमान ईश्वरक छियनि? झरनासँ पानि निकलब, धार बहब कि ईश्वरेक प्रेरणासँ होइत अछि। चान, सुरूज, तरेगण हुनके माने ईश्वरेक कृपासँ चमकैत अछि। फूल वएह फुलबैत छथि। अजीव-अजीव अंधविश्वासू कल्पना ठाढ़ कऽ अज्ञानी मनुष्यकेँ अदौसँ चालबाज सभ लुटैत आएल अछि। जे मनुष्य ज्ञान अर्जन कऽ पवित्र आचरण बना स्वरूप स्थिति प्राप्त कऽ लैत वएह एहि जीवनकेँ सार्थक बना मुक्तिक अधिकारी बनैत छथि। जनिका लेल अलगसँ कोना कल्पित ईश्वरक प्रयोजन नहि छन्हि। बीजकमे कबीर कहै छथि- “ज्ञान हीन कर्ताकेँ भरमें, माये जग भरमाया।” छल करब, बलपूर्वक ककरो धन-इज्जत लुटब, ई सभ संसारी मनुष्यक काज छी नहि कि ईश्वरक। यती, सती-पतिब्रता एवं सत्य बजनिहार आ सत्य मार्गपर चलनिहारकेँ पथ-भ्रष्ट करब, पतित बनाएव, कि ई सभ विवेकवान मनुष्यक काज छी। अवतारक संबंधमे कबीर कहने छथि- दश अवतार ईश्वरी माया, कर्ता कै जिन पूजा। कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, उपजै खपै सो दूजा। अथात् दस या चौबीस अवतारक कल्पना ईश्वरीए माया छी। ओहि कल्पित अवतारक पूजा करब, सत्यज्ञानसँ रहित मनुष्यक काज छी। जहिना अवतार तहिना अबतारी माने ईश्वर, दुनू लोकक मनक कल्पना छी। िकएक तँ जन्म आ मृत्य जगतक कर्ताकेँ कोना भऽ सकैत अछि। चौबीस अवतारमे श्रीराम, कृष्ण, महात्मा बुद्ध इत्यादि ऐतिहासिक महापुरूष छथि। बाकी सभ काल्पनिक थिक। ओना अवतार तँ उतड़व आ जन्म लेबकेँ कहल जाइत अछि, जे प्राय: कर्मी जीवकेँ होइत अछि। अवतारवाद मनुष्यमे हीनभावनाक जन्म दैत अछि। जँ से नहि तँ देश आ धर्मपर संकट ऐलापर अवतारी िकएक ने निवारण करैत अछि। जखन विधर्मी सोमनाथक मंदिर लुटि लेलक तखन पुजेगरी सभ िकएक मुँह तकैत रहि गेल। िकएक ने ईश्वरकेँ पुकारि बचौलक। ताधरि मनुष्य उन्नति नहि कऽ सकैत अछि जाधरि ओ ई नहि बुझत जे धरतीपर मनुष्य सभसँ बलशाली अछि। ईश्वर, देवी-देवता, अवतारक कल्पना मनुष्यक ओहि अंधकार मस्तिष्कमे जन्म लैत अछि जहिमे ओ अपन दुर्बलताकेँ संयोगि अवकाशक सांस लैत अछि। वस्तुत: आत्मा जखन महात्माक रूपमे विकसित होइत तखन परमात्मा स्वयं बनि जाइत अछि। काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्यादि दुर्गुणपर जखन मनुष्य विजए पाबि जाइत अछि तखन अपने-आपमे ईश्वर, परमात्मा, दैव आ ब्रह्मक रूप देखए लगैत अछि। श्रीमद्भागवत- दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्ट: कृपणो योऽ जितेन्द्रिय:। गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसंगे विपर्यय: /११/१९/४४ जेकरा चित्तमे असन्तोष अछि वएह दरिद्र छी। जे िजतेन्द्रिय नहि अछि वएह कृपण छी। समर्थ, स्वतंत्र आर ईश्वर वएह छथि जिनकर चित्त-वृत्ति िवषए-भोगमे आसक्त नहि छन्हि। अहीक विपरीत जे विषएमे आसक्त अछि वएह सोलहन्नी पापी छी। सरोज खिलाड़ी सरोज खिलाडी (नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक) बोतल राम ( मैथिली एकल नाटक )
स्टेज एकटा सड्क अछि । जाहि सड्कपर कोनो व्यक्ति गरिबके संकेतमे कपडा पहिरने सुतल अछि । कनीका देरतक सुतलाके बाद भोर होबके संकेत भेटते ओ व्यक्ति उठैत अछि । उठलाके बाद अपना झोरा सँ एकटा दारुके बोतल निकाली कक कुल्ला आजा करैत अछि । कुल्ला– आजाके पश्चात अपना आगामे एकटा दारुके बोतल राखी कऽ अपना झोरा सँ दुऽटा अगरबती,फुल चानन निकाली कक पुजा–आजा करैत अछि । जाहि पुजामे आरती बन्दना नेपथ्य सँ शुरु होइत अछि ।
नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय कोरस– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय नेपथ्य सँ– हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय कोरस– हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय कोरस– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय नेपथ्य सँ–जुरैय दुधिया त नै चाहि भरजीन कोरस– जुरैय दुधिया त नै चाहि भरजीन नेपथ्य सँ– दोसर जका नै चाहि मैगडल जीन कोरस– दोसर जका नै चाहि मैगडल जीन नेपथ्य सँ– हमरा जीवनके रक्षा करवला कोरस– हमरा जीवनके रक्षा करवला नेपथ्य सँ– हमरा दुधिएके बोतल भगवान लगैय कोरस– जय होकककककक नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय
आरतीकऽ पश्चात पूजा कएने दारुके बोतलके प्रसाद माइनकक ग्रहण करैत अछि । पिलेलाके बाद व्यक्ति ः– (सिसी फेकैत) साले दइए घोटमे खतम भगेलै । नेपथ्य स“ ः– (हसैत) चालैन दुस्लक सुपके जकरा ७२ गो देद । व्यक्ति ः–(मुंह दुसिकक हसैत) बाप जन्ममे नै छे कहियो हस्ने,वै कुता हैस ले कि बाइजले, (डेराइत) वै तो के छे रे ? नें. स.ः– (गंभिर स्वरमे) हम छि दारु महराज । व्यक्ति ः– ( सोचैत) दारु महराज,कोन देशके राजा ? ने. स. – राजा नै रे मूर्ख । तोहर दुस्मन । व्यक्ति – हमर दुस्मन, हमर दुस्मन त केउ भइए नै सकैय । ने. स. – संसारमे एहन कोनो व्यक्ति नै थिक, जकर दुश्मन नै छै । व्यक्ति – मुद्दा हमर दुश्मन, असम्भव । ने.स. – हम छियौ नै । व्यक्तिः– (डेराइत) तो के छे ? ने. स. – हम वाहँ छि जे तोरा सन–सनके खोजैत रहैछै । व्यक्ति – (भगैत) पु–पु–पु–पु– पुलिस–पुलिस–पुलिस । ने. स. –रुक, पुलिस नई, दारुऽऽ । व्यक्ति – (हसैत) दाऽऽ रु । तखन त ताें हमर दोस भेले दोस । ने. स.– (जोर स“) किन्हु नई । दोस्त रहितियौ त हमरा पिलाके बाद हमरा सिसीके गारि पैढकऽ नै फेकते ।
व्यक्ति – दु तोरीके, वोटबा टा के बातला । ने. स.– बात कहु छोट भेलैय । बिना इखके मनुष्य कि, बिना बिखके साप कि ? व्यक्ति – वै, त तो हमरा पर पिताइएकऽ कथि क लेबे ? ने.स. – कलेबौ नै कदेलीयौ । व्यक्ति – (सोचैत) कलेबौ नै कदेलीयौ, वै कुता कथि रे रु ने.स. – भिखमंगा (हसैत) भिखमंगा, भिखमंगा । व्यक्ति – (कटहसी सँ) भिखमंगा वहु मे हमरा, तों पागल छे बुइझगेलिऔ नामलोली । ने.स. – सोच, कनीका गंभीर सँ सोच । व्यक्ति – हटा सोच फोच हमरा स बेशी काविल के छै ऐत रु ने.स. – काबिल नै तो मुर्ख छे, माहामुर्ख । व्यक्ति– (गंभीर सँ दारु पिवैतं) हम मुर्ख नै थिक । ने.स. – मुर्खकऽ लक्षण त ताें अखनो देखा देल्ही जे कनीका टाके सोचऽ बलाबातमे ताें हमरा पिबक लगले, रे बुद्घिके मारल, हमरा पिला स“ हम ककरो समस्याके सामाधान नै कदेइ छियै । व्यक्ति– टेढबात नै बाज, जे कहके छौ सोझ स“ बाज । तोरा सन– सनके अखनो दुटाके देखबउ बुझलिही कि ? (छाती ठोकैत मुहेभरे खसैत) ने.स.– (हसैत)देखतै हमरा सन सनके आ गीरलैय मुहेभरे । व्यक्ति – (गंभीर स“) गीरलियैय नै , डान्स कैलीयैय, बुझलही कि ? ने.स.– डान्स कि करबे दैवके कपार, भिखमंगा कहीके । व्यŒिाm—(गंभिर भ क) हम भिखमंगा कोना क छि रु ने.स.–कोना नै छे, रे रहवला घर–घरारी सब बिकादेलीयौ । तोहर खनदानके उकटा देलीयौ,प्रतिष्ठाके नास कदेलीयौ, छोट–छोट भाई सब स“ पिटबौलियौ तोरा हम सड्क पर आइन देलियौ (हसैत) सड्क छाप
नेपथ्य स“ गीत– आब हम जीनगीमेऽऽऽऽ दारुके कहियो हाऽऽत नई लगायव–२ घर बिकागेल घरारी बिकागेल, समाजमे प्रतिष्ठा सर कुटुम दोस्त महिम स“ खतमभेल घनिष्ठा आब हम जीनगीमे दारुके कहियो .............. नई लगायव –४
व्यक्ति – (गंभिर भ क) हम भिखमंगा, मुर्ख, चपाट छलीय मुद्दा आब नई । ठिक कहलेहं तों, तोरे कारण हमर घर–घरारीसव तहस नहस भगेल । तोरा सन– सन नुकाकक रहल समाजके बरबादीके आब हम चिन्ह लेलौ । तोरा नई पिबऽके लेल हमरा के नई समझौलक, सर–कुटुम, माय–बाप, भाई–बहिन, समाज सबके सब हमरा समझबैत–समझबैत थाइकगेल मुद्दा हम अपन युथरइ नई छोरलौ । तोहर बात स“ आइ हमर आखि खुइल गेल । किया,किया तो समाजमे रहैछे ? (चिच्याइत छाति ठोकिकक कनैत) कतेकके विधवा आ कतेकके विलटुवा बनादेल्ही तों । मुद्दा आब नई । आई तोरा हम खोइजकऽ समाजे स“ हटादेबौ । ने.स.–(खुब हसैत) हम तोरा नई भेटबउ । व्यक्ति – हम तोरा खोजी क रहबौ । ने.स.– (व्यंग स“) हम तोरा नई भेटबउ । व्यक्ति – देखै छियौ ताें कोना नई भेटैछे । ने.स.– (व्यंग स“) बच्चा, हम तोरा नई नई भेटबउ ।
(व्यक्ति चारुदिस खोजैछथि, खोजलाके बाद अपन कमिज फारै छथि । वै व्यक्तिके पुरा देहमे रंग बिरंगके दारु बान्हल रहैछै । जनौहमे सेहो २ — ४टा दारु बान्हल रहैछै फेर त फटलका फुल पेन्ट से हो निकालैछथि । हुन्का जाङघ आ छाबामे से हो दारुके बोतलसब बान्हल रहैछै । ओ सबटा दारुके सिसीके वहिठाम फोरैछथि । तखन ने.स.खुब कानके चिच्यायके आ छटपटायके अवाज अबैछै । व्यक्ति सिसी फोरैत फ्रिज)
( समाप्त ) बेचन ठाकुर “बेटीक अपमान” क संबंधमे अपन दू शब्द- श्रीमान् अखन संसारक गति-विधिमे दिनानुदिन आशातीत पिरवर्तन भऽ रहल अछि जहिमे लोक अपन सभ्यता-संस्कृति आओर कर्त्तव्य परायणताकेँ िबसरि सांसारिक सुखकेँ अपनाए रहल छथि। लोभ चरम सीमापर अछि। जबकि दहेज देनाइ व लेनाइ कानूनी अपराध छी। एहि अपराधकेँ अपराध नहि बुझि आमदनीक स्त्रोत लोक बुझैत छथि। वर पक्ष मोछ पिजबैत छथि जे हमरा लाखक लाख दहेज भेटत। मुदा कनियॉं पक्ष माथा होंसतैत छथि जे हम लाखक दहेज कतएसँ आनब। एहि संदर्भमे लोक बेटीसँ घृणा करैत छथि आओर बेटीक अपमान करैत छथि तथा बेटा लेल जान-प्राण लगौने रहैत छथि। अल्ट्रासाउण्ड उचित इलाजक एकटा महत्वपूर्ण आविष्कार छी। सामान्यतया एकर प्रयोग गलत ढंगसँ कएल जाइत अछि। अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ लोक बेटीकेँ नष्ट करबा लैत छथि आ बेटाकेँ सुरक्षित राखैत छथि एहि क्रममे बेटीक संख्या काफी घटि रहल अछि आओर बेटाक संख्या काफी बढ़ि रहल एहिसँ संसारक संतुलन बिगरि रहल अछि आओर भविष्यमे काफी बिगरि जाएत। संगहि अल्ट्रासाउण्ड करौनिहारिकेँ स्वास्थ्यपर प्रतिकुल प्रभाव पड़ैत अछि आ पड़त। अल्ट्रासाउण्डहि नहि कोनहु विधिसँ गर्भ जॉंच आओर नाश केनाइ बड्ड पैघ पापीक काज छी स्वभाविक अहितकर सिद्ध होएत। प्रस्तुत नाटक “बेटीक अपमान” मे ई दर्शाएल गेल अछि जे गर्भपात नहि हाएवाक चाही आओर बेटा-बेटीमे समानता रहक चाही। बेटा-बेटीमे क्यो ककरोसँ कम नहि अछि। दुनू एहि संसारक आधार छी। मनमौजी वा हुण्डपनी कएलासँ इज्जत नहि बॉंचत। विवेकी आदमी इज्जतहि लेल हरान रहैत छथि। विवेक वा इज्जत बजारू वस्तु नहि थिकैक। ई अपन क्रिया-कलाप व सत्संगहिसँ अबैत अछि। इत्यादि यएह सभ विषए-वस्तु रखैक प्रयास कएलहुँ हेन। अपन त्रुटिक लेल क्षमाप्रार्थी होएवामे हमरा कोनो दुख नहि। अपन त्रुटिमे सुधार हेतु अपने सभसँ उचित मार्गदर्शनक आशा रखैत छी। बेचन ठाकुर बेटीक अपमान पुरूष पात्र- दीपक चौधरी- एकटा साधारण पढ़ल-लिखल िकसान मोहन चौधरी- दीपक चौधीरीक बड़का बेटा सोहन चाधरी- मझिला बेटा गाेपाल चौधरी- छोटका बेटा प्रदीप कुमार ठाकुर- एकटा वार्ड सदस्य (दीपकक) बलवीर चौधरी- पंचायत शिक्षक हरिश्चन्द्र चौधरी- पंचायत शिक्षक हरिचन्द्र चौधरी- गरीब िकसान महेन्द्र पंडित- दीपक चौधरीक लंगोटिया संगी सुरेश कामत- दीपक चौधरीक मामा सेानू- दीपक चौधरी- मामिऔत भाए गंगाराम चौधरी- बलवीर चौधरीक छोट भाए चन्देश्वर चौधरी- बलवीर चौधरीक पैघ भाय हरेराम सिंह- बलवीर चौधरीक गामक एकटा वुजुर्ग बौआ क्षा- एकटा अनपढ़ पुरहित झमालाल महतो- दीपक चौधरीक पड़ोसी सुरेन्द्र चौधरी- हरिश्चन्द्र चौधरीक भाए प्रेमनाथ मेहता- एकटा प्रसिद्ध डाक्टर टुनटुन- बलवीर चौधरीक भातीज रमन कुमार- हरिश्चन्द्र चौधरी पंचायतक मुखिया स्त्री पात्र- वीणा देवी- दीपक चौधरीक पत्नी सुनीता देवी- बलवीर चौधरीक दोसर पत्नी मंजू- बड़की बेटा संजू- छोटकी बेटी राधा देवी- हरिश्चन्द्र चौधरीक पत्नी शालिनी- हरिश्चन्द्र चौधरीक बेटी अंक पहिल- दृश्य पहिल- (दीपक चौधरी एकटा साधारण पढ़ल-लिखल किसान छथि। हिनक घरनी वीणा देवी छथिन्ह। मोहन चौधरी, सोहन चौधरी आ गोपाल चौधरी हिनक तीनिटा पुत्र छथिन्ह। दीपक चौधरी अपन दुआरिपर दुनू परानी बैसि िकछु गप-सप्प करैत छथि।) दीपक- मोहन माए, एगो गप कहु। वीणा- कहुने, एक्केटा िकएक। जत्ते मोन तत्ते। दीपक- एक गोट बेटीक इच्छा होइत अछि। बेटा तँ भगवान तीनि गोट देलनि। वीणा- आब इच्छे कएने की भेटत? ई इच्छा जे पहिने होइताए तहन ने। पहिने बेटे लऽ जान जाइत छल। मोहनो बेरमे अहॉं कहलहुँ जे अल्ट्रासाउण्ड कराए लिअ। जदी बेटी होएत तँ ओकरा हटा देब। दीपक- से तँ हम ठीके कहने रही। समए महगीक अछि। बेटीमे अग्गहसँ बिग्गह खरच अछि। आमदनी कोनो नहि। वीणा- अहॉं तँ सभ दिन आमदनीए बुझलिऐक की टक्के। दीपक- मोहन माए, एकटा कहबी अछि- “टाका हि धर्म:, कटा हि कर्म:, हे टाक तू सर्वोपरि” वीणा- धूर जाउ, अहॉं खाली फकरे सुनबैत रहैत छी सुनु मोहन बाउ, दुनियॉंमे टक्केटा सभ किछु नहि अछि। ओकर सिंगारो ने होएवाक चाही। बेटा- बेटीए ने एहि दुनियॉंका सिंगार छी। दीपक- लगैत अछि जे अहॉं हमर गुरू रही। वीणा- हँ-हँ, कहब नीक तँ लागत दिक। आब हम कहि देब। दीपक- हे हे चुप रहु, पोल नहि खोलु एहि भरल सभामे। वीणा- नहि यौ, हमरा आब बर्दास नहि होएत। आब हम पोल खोलए देब। दीपक- हे हे मोहन माए, अहॉं बड्ड नीक लोक थिकहुँ। हमरा बेज्जती जुनि करू। हे हे पएर पकड़ै छी। वीणा- अहॉं तँ तेना खेखनियॉं करए लागलहुँ से कहि नहि। खाइर आइ छोड़ि दैत छी। दीपक- हे मोएन माए, आब गप-सप्प छोड़ु। हमरा जेबाक अछि जन ताकए लेल। देखै नहि छियैक जन सभकेँ किकेदारीए चाही हफकौरे चाही। वीणा- बरनी आउ। हमरो भनसाक ओरीयान करबाक अछि। दीपक- बेस तहन हम जाइत छी। पस्थान पटाक्षेप दोसर दृश्य- क्रमश: १.बिपिन झा-बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि, २.बीरेन्द्र कुमार यादव-राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर १ बिपिन झा बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि एहि अंक मे हमर लेखिनी क दृष्टि ओहि बाबू भैया पर अछि जे संवैधानिक आओर सामाजिक नियम के ताख पर राखि के बच्चा के नोकर राखब विशेष नीक बुझैत छथि । एहि मे ओ दूइटा लाभ देखैत छथि- पहिल कम खर्च मे टहलुआ भेटब आ दोसर एकरा रखनाई सहज होयब। ई गप्प केवल गामे घरक नहिं अपितु नीक नीक शैक्षणिक संस्थान तक के अछि। हम एतय एकटा एहने उदाहरण प्रस्तुत कय रहल छी। एकटा एहेन बच्चा जेकर हार्दिक इच्छा पढवाक छलैक ओ अपन शिक्षा सँ कोशो दूर भारतवर्षक एकटा उच्च शिक्षण संस्था क ढाबा मे काज करय हेतु मजबूर छल। ओकर पढबाक इच्छा देखि हमर एकटा मित्र प्रारंभिक रूप सँ पढेनाई शुरू केलखीन्ह| बात ओ बच्चा मात्र के नहिं अछि एहि तरह असंख्य बच्चा अछि जे अपन बाल्यावस्था लोकक टहल टिकोरा मे बिता दैत अछि। स्वतन्त्रता सँ पूर्व १८८१ केर कारखाना अधिनियम, संगहि १९११, १९२२, १९३४, १९४६ केर संशोधित अधिनियम बालमजदूरी के हतोत्साहित करैत रहल अछि। संगहि स्वातंत्रोत्तर भारत मे सेहो संवैधानिक दृष्टि सँऽ यद्यपि अनेकनेक नियम सं संरक्षण प्राप्त छैक ई बच्चा कें मुदा व्यबहार मे कतेक ई अनुपालित होइत अछि ई सर्वविदित अछि। अस्तु, एहि लेखक माध्यम सँ मात्र एतेक अभिव्यक्ति बुझलजाय जे बालमजदूरी के यथासाध्य निवारित करबाक व्यावहारिक स्तर पर प्रयास हो । बालमजदूरी संवैधानिक दृष्टि मात्र सँ अनुचित नहि मानल जाय अपितु एकर सामाजिक बहिष्कार सेहो अपेक्षित। आशा अछि जे ई अभिव्यक्ति जनमानसक सुतल चेतना के जगेबाक यत्न मे सफल रहत आ एहि भारतवर्षक एक एक टा बच्चा "बालोऽहं जगदानन्द" दिस अर्थात ज्ञानपरम्परा कें श्रीवृद्धि करबाक दिशा मे कदम बढा सकत। २. बीरेन्द्र कुमार यादव ग्राम- घोघड़रिया, पोस्ट- मनोहपट्टी, भाया- निर्मली, जिला सुपौल राजदेव मंडलक बाढ़िक चित्रपर- मैथिली साहित्यक उत्कृष्ट संकलन विदेह पद्द २००९-१० पढ़ि खूब खुशी भेल। अनेको रचनाकारक संग मैथिली साहित्य जगतमे आधुनिकतासँ ओत प्रोत कवि राजदेव मंडलजीक रचना वर्ष २००९मे कोशीक विभिषिका जे कुसहा त्रासदीक नामसँ जानल जाइत अछि। अपन देश धरि नहि किन्तु समूचा विश्वक लोकक रोइयॉं-रोइयॉं ठाढ़ कएलक, संचार साधनक विभिन्न माध्यमसँ कोशीक मध्य बसनिहारक व्यथा-कथा जतेक भोगलहुँ-सुनलहुँ ओहिसँ बेसी मंडल जीक रचनामे कोशी बीच रहनिहारक दर्द मात्र छ: दृश्यमे दृष्टिगोचर भेल अछि। मंडलजीक रचना रूचिकर लागल। एतेक दिन हिनकर रचना हिन्दी साहित्यमे पढ़ैत छलहुँ, आब मैथिलीमे हिनक रचना मिथिलाक माटि-पािन आ मिथिलामे रहनिहार लोकक लेल होमए लगल। एहि लेल मंडलजी धन्यवादक पात्र छथि। आशा करब जे मैथिली साहित्यमे िहनक रचना बराबरि आबए, हमरा सभकेँ पढ़बाक अवसर भेटए आ हमर मैथिली साहित्य समृद्ध हुअए। प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार। संस्मरण साहित्य विगत अनेक शताब्दीसँ मैथिली भाषा ओ साहित्यक सुदीर्घ एवं समृद्धशाली साहित्यिक परम्परा अविछिन्न-अक्षुण्ण रूपेँ चलि आबि रहल अछि; किन्तु बीसम शताब्दीकेँ जँ एकर साहित्यिक विकास-यात्राकेँ स्वर्णयुगक संज्ञासँ अभिहित कयल जाय तँ एहिमे एक नव मोड़ आयल जे पत्र-पत्रिकाक उदय भेलैक तथा ओकर प्रकाशनक शुभारम्भ भेलैक जकर फलस्वरूप गद्यक विकासमे एक नव गति आयल। गद्यक विभिन्न रूप-विधानक प्रादुर्भाव पत्र-पत्रिकाक प्रकाशनसँ शुभारम्भ भेलैक। विगत शताब्दी प्रधानत: गद्य रूपमे ख्याति अर्जित कयलक आ ओकर प्रयोगक विविध रूप-विधानक रूपमे पाठकक समक्ष प्रस्तुत भेल। संघर्षमय युगक जीवनमे गद्यक मर्यादा एहि रुपेँ रूपायित क’ देलक जे ओ अभिव्यक्तिक असाधारण साधन बनि गेल। आधुनिक मैथिली गद्य गंगाकेँ सम्पोषित करबाक उद्देश्यसँ साहित्य-पुरोधा लोकनिक सत्प्रयाससँ ओकर परिष्कार आ परिमार्जन भेलैक। गत शताब्दीमे आत्म-कथा, आलोचना, उपन्यास, कथा, गल्प, जीवनी, डायरी, निबन्ध, संस्मरण, साक्षात्कार आदि अनेक साहित्यिक विधाक जन्म देलक आ साहित्यमे एक नव-स्पन्दन भरबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलक। ई श्रेय वस्तुत: पत्रिकादिकेँ छैक जे आधुनिक गद्यक आविर्भाव एवं विकास-यात्राकेँ गतिशील करबामे तथा साहित्यक श्रीवृद्धिक सहयोगमे अपेक्षित घ्यान देलक) एहि निमित्त साहित्य-सृजननिहार लोकनि नव-नव प्रवृत्तिक रचनाक दायित्वक भार वहन कयलनि आ सम्पादक लोकनि ओकरा यत्न पुरस्सर प्रकाशित कयलनि जकर फलस्वरूप मैथिली गद्यक प्रवर्द्धन भेलैक आ ओकरा विविध रूप-विधानमे विन्यस्त कयल जाय लागल। पत्रिकादिक माघ्यमे सेहो नव-नव रचनाकारकेँ प्रोत्साहन भेटलनि तथा हुनका सभक घ्यान ओहि विधा दिस आकर्षित भेलनि जकर एहि साहित्यान्तर्गत सर्वथा अभाव छलैक। एहिसँ अतिरिक्त विगत शताब्दीमे साहित्यक विकास यात्रामे अनेक उल्लेख योग्य काज भेल जकर ऐतिहासिक महत्व छैक। रचनाकारक भाव-प्रवणता, हार्दिकता, कल्पनाशीलता एवं स्वच्छनंद प्रवृत्तिक परिणाम स्वरूप मैथिली गद्य अपनाकेँ नव पल्लवसँ पल्लवित कयलक। विगत शताब्दीमे एकर सर्वतोमुखी विकास भेलैक जाहि आधारपर एकरा गद्ययुग कहबा समीचीन होयत, कारण मैथिली गद्य-गंगा शत-शत धारामे प्रवाहित होइत एकर साहित्य सागरकेँ भरलक आ पूर्ण कयलक। उपर्युक्त पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे विगत शताब्दीमे एक अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न तप: सपूत रचनाकारक प्रादुर्भाव भेल आ अप्रतिम प्रतिभाक बलपर साहित्यक अनेक विधाकेँ संस्करित कयलिन आ ओकरा मिथिलाञ्चलक अभिज्ञान द’ कए भारतीय साहित्यक समकक्ष स्थापित कयलनि जे रचनाक प्रत्येक क्षेत्रमे, सर्जनाक यावतो प्रस्थानमे ओ अपन कृतिमे ने केवल परवर्त्ती पीढ़ीक हेतु; प्रत्युत्ा समकालीन रचनाकार लोकनिक हेतु सेहो शिखर पुरुष आ प्रेरक स्तम्भ बनि गेलाह ओ रहथि डा. व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म (1918-1986)। हुनक प्रकाशित साहित्य वैविघ्य-पूर्ण अछि, कारण साहित्यिक अभिव्यक्तिक कोनो विधा नहि बॉंचल रहल जकर सहज प्रयोगमे ओ उल्लेख्य योग्य सफलता नहि प्राप्त कयलनि। हुनका द्वारा रचित साहित्यक प्रचूरता आ विचित्रता अछि, किन्तु ओहिमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य थिक जे एहि परिमाण-प्राचूर्य्यमे हुनक अधिकांश साहित्यिक कृति अत्यंत उच्च कोटिक थिक। जाहिना हिनक रचनाक विशदता पाठककेँ चकित आ विस्मित क’ रहल अछि तहिना हुनक व्यक्तिक आघ्यात्मिक रहस्मयता सेहो अधिक जोड़ पकड़लक। हुनक आभ्यन्तरिक शक्ति हुनका निरन्तर चिर-नूतन रचनाक हेतु उत्प्रेरित करैत रहलनि तथा विश्राम करबाक लेल पलखति नहि देलकनि। ओ जीवनक विविध पथक पथिक रहथि तथा विषाद आ करुणाक बीच सौन्दर्यक अंवेषण करब हुनक लक्ष्य छलनि। हुनक मन आ मस्तिष्कक क्षितिज जागृत छलनि। ओ जीवन आ प्रकृतिक पक्षधर रहिथ। ओ एक दूरदर्शी साहित्य-मनीषी रहथि जे मैथिलीमे जाहि विधाक अभाव हुनका परिलक्षित भेलनि तकर पूत्यर्थ मनसा-वाचा-कर्मणा ओहिमे लागि गेलाह। हिनका द्वारा प्रयुक्त विधाहि साहित्यिक विधे नहि रहल, प्रत्युत आकर्षक विधाक रूपमे ख्याति अर्जित कयलक। चिर नूतनताक अन्वेषी मणिपद्म मैथिली साहित्यमे संस्मरण साहित्यान्तर्गत चारि नव-विधाक प्रवर्त्तन कयलनि जकर सम्बन्ध अतीतसँ अछि, यद्यपि संस्मरणक संसार विषयक दृष्टिएँ व्यापक नहि, तथापि संवेदनाक गाम्भीर्य आ आत्मीय-स्पर्शक दृष्टिएँ अत्यंत श्रेष्ठ कोटिक साहित्य-विधाक अन्तर्गत अबैछ। भारतीय भाषा आ साहित्यमे एहि विधाक जन्म पाश्चात्य साहित्यिक संग सम्पर्क फलस्वरूप प्रारम्भ भेल जे अधुनातन सन्दर्भमे एक चर्चित विधाक रूपमे प्रचलित भेल अछि। एहि विधामे ओ विपुल परिमाणमे साहित्य-सृजन कयलनि किन्तु अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति अछि जे मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनिक ध्यान एहि दिस नहि गेलनि आ ओकर चर्चा पर्यन्त नहि कयलनि। भारतीय साहित्य निर्माता सिरीजक अन्तर्गत साहित्य अकादेमीसँ हिनकापर मणिपद्म (1996) नामे एक मोनोग्राफ प्रकाशित भेल अछि जे अत्यंत उपहासात्मक अछि। ओकर लेखक एहि सीरिजक रचनाकेँ बिनु पढ़नहि उपेन्द्र महारथीक संस्मरणकेँ रामलोचनशरणक नामोल्लेख कयलनि अछि। इएह तँ मैथिलीक मोनोग्राफ लेखकक स्थिति अछि। भारतीय स्वतंत्रता-संग्रामक इतिहासमे सन् उन्नीस सय बियालिसक अगस्त क्रान्तिक ऐतिहासिक दृष्टिएँ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान अछि। एहि महाक्रान्तिमे बूढ़-बूढ़ानुस नेतासँ ल’ कए जुआन-जहानक रक्त बेसी गर्म छलैक आ अंग्रेजी शासन-व्यवस्थाक विरूद्ध ओकारा सभक स्वर अधिक मुखर भेल छलैक। उत्तर बिहार आ मिथिलाञ्चलक नवयुवक लोकनि एहि महायज्ञमे अपन प्राणक आहूति देलनि आ रक्तसँ तर्पण कयलनि। मणिपद्म स्वयं सजग, सचेष्ट आ निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी रहथि। एहि परिप्रेक्ष्यमे ओ मैथिली-संस्मरण प्रथमे-प्रथम डायरी शैलीक प्रवर्त्तन कयलनि अवश्य, किन्तु एकरा अतंर्गत ओ प्रचुर परिमाणमे रचना नहि क’ पौलनि वा कयनहु होयताह तँ ओ ने तँ प्रकाशित अछि आ आब अनुपलब्ध अछि। जँ कदाचित एहि विधामे प्रचुर परिमाणमे डायरी लिखने रहितथि तँ ओ निश्चये मैथिली साहित्यक अभूतपूर्व कृति होइत। एहि सिरीजक अन्तर्गत हुनक बियालसीक फरारी सात दिन (मिथिला मिहिर, 5 दिसम्बर 1953) एवं फरारीक पॉंच दिन (मिथिला मिहिर 31 दिसम्बर 1961) प्रकाशित अछि जाहिसँ स्वतंत्रता आंदोलनक क्रममे ओ डायरी लिखलनि तकर दारूण पीड़ादायक वर्णन कयलनि। एहिमे रचनाकार सद्य: स्फुटन भाव वा विचारकेँ अभिव्यक्ति देलनि वा अपन अनुभवक रेखाकंन वा विगत अनुभवक पुनर्मूल्यांकन कयलनि। एहिमे बियालसीक महाक्रान्तिमे फरारीक स्थितिमे जाहि परिस्थितिक चित्रण कयलनि जे नेपाल तराइक जन जीवनपर प्रकाश देलनि। अपन दीर्घ सार्वजनिक जीवनमे ओ देशक राजनैतिक, साहित्यिक, सामाजिक आ सरकारी तंत्रमे कार्यरत व्यक्तिक सम्पर्कमे अयलाह, ओहि स्मृति कणकेँ जोड़ि क’ हुनकासँ भेट भेल छल सन् 1953 ई. सँ लिखब प्रारम्भ् कयलनि जकर समापन 1986 ई. धरि अनवरत चलैत रहलनि जकरा एहि सिरीजक अन्तर्गत अभिव्यक्ति देलनि। हिनक उपर्युक्त संस्मरण मात्र लेखकीय मनीषापर नहि आधृत अछि, प्रत्युत प्रकृति-प्रेम, ईश्वर प्रेम, स्वजाति प्रेम, महतक प्रति श्रद्धा, विनोद प्रियता आदिक समस्त वैशिष्ट्यक झलक एहिमे भेटैछ। ओ अपन दीर्घ साहित्यिक जीवनान्तर्गत जाहि-जाहि मातृभाषानुरागी आ साहित्यानुरागी साधक लोकनिक सम्पर्कमे अयलाह ओकरा संगहि अन्यान्य भाषानुरागी विद्वत् वर्गसँ अभिभूत भेलाह, जाहि रूपेँ हृदयंगम कयलनि, जाहि रूपेँ प्रभावित भेलाह, तनिके ओ श्रंृखलाक कडी़क आधार बनौलनि। हिनक संस्मरणात्मक आलेख यद्यपि विवरणात्मक अछि तथ्ािप ओ सत्य घटनापर आधृत अछि संगहि वर्णित व्यक्तिक मातृभाषानुराग आ साहित्यिक आन्दोलन परिचायक सेहो अछि। एहि सिरीजक अन्तर्गत प्रकाशित संस्मरण जीवनक एक पक्षकेँ उद्घाटित करैत अछि जे व्यक्ति अपन क्रियाकलापसँ आकर्षित कयलथिन तनिकेपर ओ लिखलनि। एकरा अन्तर्गत वर्णित व्यक्तिक व्यक्तित्व ओही वैशिष्ट्य तथा स्थितिकेँ जनमानसक समक्ष प्रस्तुत कयलनि जाहिसँ हिनक संस्मरण वास्तविक घटित घटनाक सन्निकट आ सम्भव भ’ सकल। ओ स्पष्ट रूपेँ अपन यथार्थ प्रतिक्रिया वर्णित व्यक्तिपर व्यक्त कयलनि जकर वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे ऐतिहासिक महत्व भ’ गेल अछि। एहि श्रंृखलाक अन्तर्गत मैथिला भाषा आ साहित्यक निम्नस्थ व्यक्तित्वक संग हुनका साक्षात्कार भेलनि तथा अमिट छाप छोड़लथिन यथा सीताराम झा (1891-1975) (मिथिला मिहिर, 12 दिसम्बर 1953), वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998) (मिथिला मिहिर, 26 दिसम्बर 1953), काञ्चीनाथ झा किरण (1906-1989) (मिथिला मिहिर, 23 जनवरी 1954), चन्द्रनाथ मिश्र अमर (1925) (मिथिला मिहिर, 30 जनवरी 1954), हरिमोहन झा (1908-1984), (मिथिला मिहिर, 13 मार्च 1954), कुलानन्द नन्दन (1908-1980) (मिथिला मिहिर, 27 मार्च 1954), सुधांशु शेखर चौधरी (1920-1990) (मिथिला मिहिर, 30 अपैल 1954), सोमदेव (1934) (10 अप्रैल 1954), सुरेन्द्र झा सुमन (1910-2002) (मिथिला मिहिर, 17 अप्रैल 1954), नरेन्द्रनाथ दास (1904-1993) (मिथिला मिहिर 1 मई 1954), मायानन्द मिश्र (1934) (मिथिला मिहिर, 8 मई 1951), भोलालाल दास (1894-1977) (मिथिला मिहिर, 15 मई 1954), लक्ष्मण झा (1916-2002) (मिथिला मिहिर, 22 मई 1954), गिरीन्द्रमोहन मिश्र (1890-1983) (मिथिला मिहिर, 14 अगस्त 1954), जगदीश्वरी प्रसाद ओझा (?) (मिथिला मिहिर, 28 अगस्त, 1954) उमेश मिश्र (1895-1967) मिथिला मिहिर, 4 सितम्बर, 1954) अमरनाथ झा (1897-1955) (मिथिला मिहिर, 11 सितम्बर, 1954), सोमनसदाइ (?) (मिथिला मिहिर, 25 सितम्बर, 1954), नइँ बिसरब (मिथिला दर्शन, जनवरी 1954), नंग्टू सॉंढ़ (मिथिला दर्शन, अगस्त 1960), कमला, यमुना आ गंगा (मिथिला दर्शन, जुलाई 1961), तीन गोट संस्मरण (वैदेही, जुलाई-अगस्त 1961), सामा चकेबा (वैदेही, सितम्बर 1961), गोदपाड़िनी नट्टिन (मिथिला मिहिर, 21 अप्रैल 1963), थानेदार (मिथिला मिहिर, 17 नवम्बर, 1963), राजकमल चौधरी (1929-1967) (मिथिला मिहिर, 30 जुलाई 1967), मिहिरोदय (मिथिला मिहिर, 1 मार्च 1970), रामकृष्ण झा किसुन (1923-1970), (मिथिला मिहिर, 2 अगस्त 1970), रमानाथ झा (1906-1971) (मिथिला मिहिर, 16 जनवरी, 1972), हजारीप्रसाद द्विवेदी (1907-1979) (मिथिला मिहिर, 27 मार्च 1973), बदरीनाथ झा (1893-1974) (मिथिला मिहिर, 30 सितम्बर 1973), ललितानारायण मिश्र (1922-1975) (मिथिला मिहिर, 19 जनवरी 1975), बलदेव मिश्र (1880-1979) (मिथिला मिहिर, 3 फरवरी 1975), विशालकाय महिला (?) (मिथिला मिहिर 2 नवम्बर 1975) राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह (1908-1976) (मिथिला मिहिर, 25 अप्रैल 1976), पिताश्री चल गेलाह (मिथिला मिहिर, 3 अक्तूबर, 1976), राजेश्वर झा (1922-1977) (मिथिला मिहिर 15 मई 1977), सुनीतिकुमार चटर्जी (मिथिला मिहिर 3 जुलाई, 1977), लक्ष्मीपति सिंह (1907-1979) (मिथिला मिहिर, 25 मार्च 1979), जयप्रकाश नारायण (1902-1979) (मिथिला मिहिर 14 अक्तूबर 1979) उपेन्द्र ठाकुर मोहन (1916-1980) (मिथिला मिहिर, 8 जून, 1980), चिरवत्सले (मिथिला मिहिर, 7 दिसम्बर 1980), उपेन्द्र महारथी (मृत्यु 1981) (मिथिला मिहिर, 1 मार्च, 1981), योगेन्द्र मल्लिक (?), (कर्णामृत, सितम्बर 1981), धर्मलाल सिंह (?) (मिथिला मिहिर, 29 नवम्बर 1981) सुभद्रा झा (1911-1982) (मिथिला मिहिर, 24 अक्तूबर 1982), राधाकृष्ण चौधरी (1924-1984) इत्यादि। कविवर सीताराम झा, बाबू भोलालाल दास एवं राधाकृष्ण चौधरी पर दुइ संस्मरण उपलब्ध होइछ जे एक तँ जीवितावस्था थिक आ दोसर मृत्यूपरान्त जे क्रमश: मिथिला मिहिर, 20 जुलाई 1975, मिथिला मिहिर, 19 जून 1977 एवं कर्णामृत, जनवरी-मार्च 1986 मे प्रकाशित भेल। उपर्युक्त संस्मणान्तर्गत ओ हुनक जीवन वृत्तक इतिहासे नहि, प्रस्तुत कयलनि, प्रत्युत हुनक साहित्यिक अभिरुचि एवं अवदानक संगहि-संग संगठनात्मक प्रवृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तुत कयलनि अछि जे मातृभाषाक विकासमे उल्लेख्य योग्य अवदानक कारणेँ चर्चित अछि। हुनकासँ भेट भेल छलक परिधि मात्र मैथिली साहित्य मनीषी लोकनि धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युत ओकर फलक विस्तृत छल तकर प्रारूप भेटछै जे विश्वक प्रख्यात भाषा शास्त्री विद्वत् वरेण्य सुनीतिकुमार चटर्जी, हिन्दीक प्रख्यात मनीषी आचार्य हजारी प्रसाद् द्विवेदी, महान राजनेता जयप्रकाश नारायण, मिथिलाक प्रख्यात चित्रकार उपेन्द्र महारथी, मिथिलाक यशस्वी राजनेता ललितनारायण मिश्र एवं महान् लक्षमीवान राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह इत्यादि व्यक्तिक प्रसंगमे अपन निजी धारणाकेँ रूपायित कयलनि। एहिसँ अतिरिक्त अपन पूज्य पिताश्री आ पूज्या माताश्रीपर सेहो संस्मरणक रचना कयलनि। एहि सिरीजक अन्तर्गत समाजक उपेक्षित आ तिरस्कृत वर्गक प्रति हुनकर हृदयमे असीम श्रद्धा, अगाध प्रेम आ अपार सहानुभूति छलनि तकर यथार्थताक प्रति रूप भेटैछ सोमनसदाय, गोदपाड़ि़नी नट्टिन एवं नंग्टू सॉंढ़मे जाहिमे ओकर वास्तविक पृष्ठभूमिक रेखाकंन कयलनि। सरकारी तन्त्रक परिवेशमे भ्रष्टाचारी थानेदारक संग कोन स्थितिमे साक्षात्कार भेलनि तकर यथार्थ क्रिया-कलाप दिस हुनक घ्यान केन्द्रित भेलनि तकरो एहि सिरीजमे समाहित कयलनि। व्यवसायसँ ओ होमियोपैथ रहथि। ओ एक विशालकाय पहाड़ी रोगिणीक प्रसंगमे सेहो लिखलनि जे हुनकासँ इलाज कराबय आयल छलीह। हुनकासँ भेट भेल छलक अन्तर्गत ओ स्मृतिकण आ साहित्यिक रिक्तताक जीवन परिचय, विचार-धारा, साहित्यिक प्रवृत्ति आ सामाजिक गतिविधिक परिचय प्रस्तुत कयलनि। एहि संस्मरणात्मक निबन्धमे ओ ने केवल प्राचीन परिपाटीक परित्याग कयलनि, प्रत्युत नवजीवन दृष्टि आ नव पद्धतिक श्रीगणेश कयलनि। एहन अनुभूति परक कृति सभमे ओ अपन अतीतक ओहि प्रसंगक उद्भावना कयलनि जे हुनक साहित्यिक व्यक्तित्वक नियामक सिद्ध भेल। एहि सिरीजमे जतबे संस्मरण उपलब्ध अछि ततबे ओ तद्युगीन साहित्यिक गतिविधिक दस्तावेज थिक जे मैथिली साहित्येतिहासमे अहं भूमिकाक निर्वाह करैछ। भावनात्मक आ वैयक्तिकताक संगहि-संग वैचारिकताक अद्भूत समन्वय एहिमे भेल अछि। सैद्धाान्तिक दृष्टिएँ, हुनक संस्मरण-साहित्य साहित्यिक संस्मरणक विशिष्ट गुणसँ अलंकृत आ महत्वपूर्ण अछि। एहिमे कथात्मकताक दृष्टिएँ कथा, वैचारिकताक दृष्टिएँ निबन्ध आ भावनात्मकताक दृष्टिएँ कविता, एहि तीनू विधाक त्रिवेणीक अभूत पूर्व संगम भेल अछि। हिनक संस्मरणमे अनुभूति, वर्णन, विवरण, विचार, भाव, यथार्थ आ कल्पनाक अद्भूत समन्वय भेल अछि। हिनक संस्मरणात्मक निबंधक मूलाधार थिक भावना जे काव्यात्मकताक गुणसँ अंलकृत अछि। एहि सिरीजक संस्मरणक अनुशीलनसँ अवबोध होइछ जे हिनका भारतीय साहित्यक संगहि-संग पाश्चात्य साहित्यक सेहो गहन अघ्ययन छलनि। एहि वास्तविकताक परिचय हुनक उपर्युक्त संस्मरणान्तर्गत डेग-डेगपर उपलब्ध होइछ। ओ अपन एहि रचनान्तर्गत एहन वातावरणक निर्माण कयलनि जाहिसँ पाश्चात्य साहित्य चिन्तक लोकनिक विश्व प्रसिद्ध रचना सभक सेहो विवरण प्रस्तुत करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह जे ओहि अवसरक हेतु उपयुक्त छल। एहिमे गांधीवादक संगहि-संग मार्क्सवादक छौंक स्थल-स्थलपर भेटैछ। हुनकासँ भेट भेल छलमे तीव्र मानवीय संवेदना, व्यापक सहानुभूति, सजल करुणा, ममता आ आत्मीयता अछि जे अन्यत्र दुर्लभ अछि। एहिमे नोर आ तीव्र आवेगक गम्भीर चित्र तथा सामाजिक, राजनीतिक विचार-धाराक स्पष्ट छाप फराकहिसँ चिन्हल जा सकैछ। एहिमे साहित्यकार, शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ, मातृभाषानुरागी, उन्नायक, समाजसेवी, कलाकार आ विद्वत वर्गसँ सम्बन्धित व्यक्तिक संग साक्षात्कार अछि जे वर्त्तमान परिवेशमे अतिशय ज्ञानवर्द्धक आ ऐतिहासिक पृष्ठभूमिक निर्माण करैछ। मणिपद्म एक पैघ यायावर रहथि। साहित्यिक यायावरकेँ एक अद्भूत आकर्षण अपना दिस आकर्षित करैछ, ओ मन्त्र मुग्ध भ’ कए ओहि दिस आकर्षित भ’ जाइछ। एहन साहित्य सर्जनमे ओ संवेदनशील भ’ कए निरपेक्ष रहथि। यायावरीक क्रममे हुनका रस्तामे पड़निहार मन्दिर, मस्जिद, मीनार, विजय स्तम्भ, खण्डहर, स्मारक, किला, कब्रिस्तान आ प्राचीन महलक संस्कृति, कला आ इतिहासकेँ एकत्रित क’ कए अपन यात्राक पृष्ठभूमि तैयार कयलनि। हिनक उपलब्ध यात्रा-साहित्य संस्मणात्मक थिक जाहिमे ओ एक सामान्य यात्री जकॉं अपन प्रभाव, प्रतिक्रिया आ संवेदनाकेँ महत्व देलनि। एहि सभकेँ ओ ओहिठाम गेल छलहुँ नामे यात्रा वृतान्त प्रस्तुत कयलनि जकरा अन्तर्गत कोरहॉंस गढ़क सॉंझ (मिथिला-मिहिर, 2 अप्रैल 1962), ई आषाढ़क प्रथम दिन (मिथिला मिहिर, 16 जून, 1963) पुण्यभूमि सरिसवपाही (मिथिला मिहिर, 14 मार्च, 1968), कुलदेवी विश्वेश्वरी (मिथिला मिहिर, 11 अगस्त, 1968), त्रिशूलातट प्रवास (मिथिला मिहिर, 12 जनवरी, 1969), एकटा पावन प्रतिष्ठान (मिथिला मिहिर, 10 अक्तूबर, 1971), प्रसंग एकटा स्मारकक (मिथिला मिहिर, 10 अप्रैल, 1975), महिषीक साधना केन्द्र (मिथिला मिहिर, 29 जून, 1975) एवं विसफीसँ वनगाम धरि (मिथिला मिहिर, 25 दिसम्बर 1983) आदि उल्लेखनीय अछि। ओहिठाम गेल छलहुँमे ओ साहित्यक समग्र जीवनक अभिव्यक्ति रूपमे ग्रहण कयलनि। हिनका लेल प्रकृति सजीव अछि, यात्रामे जे पात्र भेटलथिन ओ हुनक आत्मीय आ स्वजन बनि गेलथिन। हिनक यात्रा साहित्य महाकाव्य आ उपन्यासक विराटत्व, कलाक आकर्षण, गीतिकाव्यक मोहक भावशीलता, संस्मरणक आत्मीयता, निबन्धक मुक्ति सभ किछु आनायासहि एहि मे भेटि जाइत अछि। ओ जे देखलनि, अनुभव कयलनि तकर यथार्थ चित्र एहिमे प्रस्तुत कयलनि। एकर सर्वोपरि वैशिष्ट थिक-औत्सुक्य जे पाठक एकबेर पढ़ब प्रारम्भ करैछ तँ ओकर समाप्ति जा धरि नहि भ’ जाइछ ता धरि हुनका चैन नहि होइत छनि। हुनका भूगोलक विशद ज्ञान छलनि तेँ कोनो स्थानक भौगोलिक वर्णन करबामे ओ निपुणता देखौलनि जकर यथार्थ परिचय एहिमे उपलब्ध करौलनि। एहि श्रृंखलान्तर्गत जे रचनादि उपलब्ध अछि ओकर चिन्तन-मननसँ स्पष्ट प्रतिभाषित होइत अछि जे वर्णित विषयक फिल्माकंन क’ कए पाठकक समक्ष प्रस्तुत कयलनि जे पाठकक समक्ष वर्णित विषय-वस्तुक समग्र चित्र सोझाँ आबि जाइछ। हिनक यात्रा-वृतान्त शैलीपर औपन्यासिक शैलीक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि जे ओहिमे स्थान विशेषक विस्तृत-चित्रण कयलनि जहिना ओ देखलनि तहिना तकर यथार्थ चित्रण पाठकक समक्ष प्रस्तुत कयलनि। पाठककेँ सहसा बोध होमय लगैत छनि जेना ओहो ओहि यात्रााक सहयात्री होथि। हिनक वर्णन-कौशल चित्रात्मक होइत छलनि। एहन चित्रात्मक वर्णन निश्चये अप्रतिम प्रतिभाक परिचायक थिक जे सामान्य रचनाकार द्वारा सम्भव नहि। ओ जाहि वस्तुक वर्णन कयलनि तकर रनिंग कमेन्ट्री ओहिना प्रस्तुत कयलनि जेना आइ काल्हि क्रिकेट खेलक मैदानसँ रेडियो वा टेलिभीजनपर देल जाइछ। यात्रा-विवरणमे रोचकता अपरिहार्य गुण मानल जाइछ, तकर सम्यक निर्वाह हिनक ओहिठाम गेल छलहुँमे भेल अछि। ओ अत्यन्त भावुक हृदयक व्यक्ति रहथि तेँ बिनु कोनो राग-द्वेषक ओकर यथार्थ वर्णन कयलनि। अपनाकेँ सत्य आ ज्ञानक भण्डार नहि बुझि क’ तथा पाठककेँ शिक्षित करबाक मनसा हुनकर कदापि नहि छलनि, जेना ओ पञ्चभूतसँ भिन्न-भिन्न चरितक सहायतासँ, भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण उपस्थित कयलनि जाहि प्रकारेँ ओहिठाम गेल छलहुँमे जेना ओ अपनहि संग तर्क करैत यात्राक समापन कयलनि। एहि श्रृंखलान्तर्गतक रचनामे ओ जे किछु मैथिली पाठककेँ द’ पौलनि. ओ सभ हुनक आत्म परीक्षणक स्वगत कथन थिक। मैथिलीक प्राचीन पत्रिकादिक अनुशीलनसँ ज्ञात होइछ जे हुनकर प्रबल इच्छा शक्ति छलनि जे ओ अपन व्यक्तिगत एवं साहित्यिक जीवनक आधारपर आत्मकथाक एक विस्तृत पुस्तकक रचना करथि तकर प्रतिमान उपलब्ध होइछ सांस्कृतिक समिति मधेपुर, मधुबनी द्वारा प्रकाशित स्मृति नामक स्मारिका तथा मैथिली प्रकाशमे प्रकाशित बाटे-घाटे (1983) एवं अनजान क्षितिज (1983) मे। बाटे-घाटे पहिने प्रकाशित भेल स्मृतिमे जे पश्चात् जा क’ मैथिली प्रकाशमे पुन: प्रकाशित भेल। एहि दुनू आलेखसँ ई विषय स्पष्ट होइछ। वस्तुत: ओ आत्मकथा लिखलनि वा नहि से अनुसन्धेय अछि। मणिपद्यकेँ भाषापर जबरदस्त अधिकार छलनि। हुनक भाषाक चमक कहियो फिक्का नहि पड़लनि। अपन विलक्षण भाषाक कारणेँ ओ मैथिलीमे अनुपम उदाहरण रहथि। मैथिलीमे ओ अपन भाषा आ वर्णन-कौशल कारणेँ प्रख्यात रहथि। चाहे ओ प्रकृतिक दृश्य हो वा महानगरक कोलाहल पूर्ण वातावरण हो, ओ ओकर अत्यंत मनोहारी वर्णन अपन भाषाक बलपर कयलनि। हुनक डायरी, हुनकासँ भेट भेल छल, ओहिठाम गेल छलहुँ एवं आत्मकथा सभक भाषा-शैली अलंकृत अछि जाहिमे कतहुँ अस्वाभाविकताक आभास नहि भेटैछ। विम्ब-धार्मियता हुनक भाषाक सर्वाधिक वैशिष्ट्य थिक। एहन भाषामे संगीतात्मकताक लय आ धारा-प्रवाह अछि। भाषाक धनी मणिपद्य अपन विचार-वल्लरीक प्रत्याख्यानमे शब्दक एहन अनुपम विन्यास कयलनि जे हुनक भाषामे छन्द रूप आ सुस्वादता अछि जे पाठकक संग हुनक व्यवहार, सौजन्य, आसक्ति आ हास्य-व्यंग्यक बोध होइछ आ जगक संग ओकर व्यवहारमे राग ओ दूरदर्शी काल्पनिकताक पुट भेटैछ। ओ तथ्यपूर्ण भाषाक प्रयोग कयलनि। उपर्युक्त रचनादिमे भाषा-काव्यमयी अछि जे स्थल-स्थलपर ओ अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा आ रूपकक झड़ी लगा देलनि जे हिनक एहि साहित्यक अनुपम उपलब्धि थिक। हिनक भाषा मिथिलाञ्चलक लोक माटिक भाषा थिक। हिनक भाषापर हिनक व्यक्तित्वक एतेक गम्भीर छाप छलनि जे सुगमतापूर्वक चिन्हल जा सकैछ। हिनक भाषामे एहन अद्भूत शक्ति सम्पन्न आ वैभव पूर्ण अछि जाहि कारणेँ हिनक रचना सभकेँ बारम्बार पढ़बाक उत्सुकता पाठकक मनमे सतत जागृत होइत रहैछ चाहे उपन्यास हो, कथा हो, नाटकक हो, एकांकी हो, संस्मरण हो, यात्रा-वृतान्त हो, डायरी हो वा आत्म-कथा हो। एहिमे साधु भाषाक संगहि-संग ठेंठ चलन्त भाषाक स्रोतस्विनी प्रवाहित कयलनि। लोकप्रचलित शब्दावलीकेँ ओ मने-मन स्वीकार क’ लेने रहथि जकर यथार्थ प्रतिरूप हुनक समग्र साहित्यान्तर्गत प्रतिध्वनित होइत अछि। शास्त्रीय-भाषाक संगहि-संग ओ आंचलिक भाषाक अनुच्छिष्ट उपमाक प्रयोग प्रचुर परिमाणमे कयलनि। जनिका मिथिलांचलक ग्राम्य-शब्दाब्लीक उपमानक रसास्वादन करबाक होइन ओ मणिपद्य-साहित्यक अवगाहण करथु जाहिमे हुनका एहन-एहन शब्दावलीक संग साक्षात्कार होयतनि तकर यथार्थ अर्थ-बोधमे अवश्य कठिनता होयतनि। अन्यान्य भारतीय भाषामे हिनक रचनादिक अनुवाद करबा काल कतिपय समस्या उत्पन्न होइछ जे ओकर समानार्थी शब्द सुगमतापूर्वक नहि उपलब्ध होइछ जाहि सन्दर्भमे ओ प्रयोग कयलनि। विषयगत विविधताक अनुरूप हिनक भाषा-शैली विविध रूप थिक। संस्कृत गार्भित मिश्रित भाषा, काव्यात्मक आ भाव बहुल भाषा, सामान्य लोकक भाषाक संगहि-संग ओ आलंकारिक भाषाक सेहो प्रयोग कयलनि। एहि श्रृंखलान्तर्गत रचनादिमे मिथिलाञ्चलक माटिपानिक अपूर्व सौष्ठव अछि। ई अत्यन्त छोट-छोट वाक्यक प्रयोग कयलनि जाहिसँ भाषासँ चमत्कार आबि गेल अछि। एहि रचना-समूहमे संलाप-शैलीक प्रयोग ओ कयलनि। काव्यक समानहि हिनक गद्यक भाषा-शैली सेहो अत्यन्त सरल, प्रवाह पूर्ण आ माघुर्य युक्त अछि। भाव, भाषा आ संगीतक त्रिवेणीक संगम बना क’ ओ गद्यक निर्माण कयलनि। हुनक शब्द-चयन अत्यन्त शिष्ट, भावानुकूल तथा सरल वाक्य-विन्यास अत्यन्त सुदृढ़ अछि। हुनक गद्य-भाषामे सर्वत्र कविताक सरसता, तल्लीनता, तन्मयता आ तीव्रता अछि। फलत: पाठक कखनो कोनो स्थलपर अरुचिकर नहि अनुभव नहि करैछ, प्रत्युत कलाकारक भावक संग बहैत चल जाइत अछि। ओ भाव-प्रवण रचनाकार रहथि। अतएव जाहि स्थलपर मार्मिक अनुभूति आ विलक्षण काल्पनिकताक समन्वय अछि ओतय भाषाक सौन्दर्य प्रेक्षणीय अछि। अपन भावुक अभिव्यक्तिमे ओ अत्यंत आलंकारिक एवं व्यंजनापूर्ण शैलीक प्रयोग कयलनि। हुनक शैलीमे कल्पनाक प्रौढ़ता, भावुकता, सजीवता आ भाषाक चमत्कार दर्शनीय अछि। हुनक भाषा-शैलीमे स्पनन्दन अछि, दृश्यकेँ मथबाक शक्ति अछि, सुकुमारता आ तरलता अछि जे मैथिलीमे अन्यत्र दुर्लभ अछि। मणिपद्य गद्यक उदात्त रूप उपलब्ध होइछ हुनक डायरी, हुनकासँ भेट भेल छल, ओहि ठाम गेल छलहुँ आ आत्मकथामे। ओ गद्य रचना कयलनि कविक समान, हुनक गद्यक गुण कविताक गुण थिक। एहि सिरीजक गद्य तकर प्रतिमान प्रस्तुत करैछ जे ओहिमे शब्दालंकारक संगहि अर्थालंकारक अपूर्व चमत्कार भेटैछ। हुनक गद्य-साहित्य वा पद्य-साहित्य हुनक व्यक्तित्वक अखण्डताकेँ प्रमाणित करैछ। जहिना स्मितफान मलार्गेक पोलरीक गद्यक समानहि सांकेतिक होइत छलनि तहिना हिनक गद्य-साहित्य विषयोविशुद्ध आ भार रहित अछि। ओ अपन डायरी, संस्मरण, यात्रा वृतान्त आ आत्मकथामे एकरे आधार बनौलनि आ अपन भावनाक, अपन कल्पनाक, अपन मूल्यबोध आ मत पक्षक विस्तार कयलनि एहि सिरीजक गद्य-रचना एक रम्य रचनाक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली गद्य-साहित्यमे हिनक प्रवेश एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थिक जे ओ स्वातन्त्र्योत्तर गद्य-साहित्यक स्रष्टाक रूपमे ख्याति अर्जित कयलनि। गद्यक स्वरूप जाहि रूपेँ विवर्त्तित आ रूपान्तरित भेल जा रहल अछि तथा आधुनिक गद्य कहबासँ जकर बोध होइत अछि तकर साक्ष्य, प्रमाण आ उदाहरणक भण्डार थिक हिनक गद्य-साहित्य। हिनक गद्यमे साधु-भाषा ओ चलन्त-भाषा, धरौआ, गोष्ठी ओ दरबारी रीतिक प्राचीन, आधुनिक आ आधुनातन शैली हुनक अक्षय गद्य-साहित्य एकर साक्ष्य थिक जकरा हम गद्यक अणु-विश्व कही तँ कोनो अत्युक्ति नहि हैत। हिनक गद्यमे सब किछु अछि भारी, हल्लुक, गम्भीर, चपल, तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज, समतल, उबड़-खाबड़, अत्युक्ति, वक्रोक्ति, स्वाभावोक्ति तथा ओहिसँ मिलल-जुलल राग-रागिणी अछि। सात्विक मिताचारक सन्निकट, ऐश्वर्यक आत्मविकिरण हिनक गद्यक सर्वोपरि उपलब्धि थिक। जीवन स्मृति, परिमित, यथोचित ओ स्वतन्त्र थिक हिनक गद्य। हिनक गद्यक अघ्ययनसँ मैथिली गद्य-धाराकेँ जानल जा सकैछ, जे ऐतिहासिक वा अन्यान्य कारणेँ अन्य कोनो मैथिली गद्यकारक प्रसंगमे नहि कहल जा सकैछ। हिनक गद्यमे पद्य-छन्दक वाणी अनगुञ्जित भ’ रहल अछि। हिनक वाक्य ऋजु अछि, शिक्षित सैन्य-दलक समान ओ कालवद्ध चरण मिला क’ चलैछ, आेकर श्रृंखला आ धारावाहिकता युक्ति निर्भर अछि जे एक अभिप्रायक क्षमतासँ सम्वद्ध अछि। हिनक गद्यक कल्प वा यूनिट वाक्य नहि अनुच्छेद थिक। यद्यपि हिनक गद्य महाकविक गद्य थिक तथापि ओ पद्य-गन्धी नहि। हिनक गद्य साहित्य अप्रतिम प्रतिभाक हस्ताक्षर थिक जे वेगवान आ दीप्तिपूर्ण अछि। जे क्यो पाठक हुनक समग्र गद्य-साहित्यकेँ घ्यानसँ पढ़ने होयताह हुनक निश्चित धारणा होयतनि जे गद्य-शिल्पमे ओ मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ-पुरुष रहथि तथा हुनक समकालीन गद्य-साहित्य अत्युच्च अछि। विशेषत: हुनक संस्मरणक गद्य तीव्र आ गम्भीर अछि। गद्य-शिल्पक एहन ऐश्वर्य, एहन वैभव अन्य कोनो गद्यकारक रचनामे प्रकट भेल अछि, ताहिमे सन्देह अछि। हुनकासँ भेट भेल छल, डायरी, ओहिठाम गेल छलहुँ एवं आत्मकथाकेँ प्रकाशन तिथिक अनुरूपहि एकहि संग विश्लेषण कयल अछि। चारू सिरीजक रचना समूहकेँ समवेत रूपसँ हुनकासँ भेट भेल छल नाम देल अछि तकर दुइ कारण अछि। प्रथमत: हुनकासँ भेट भेल छलक संख्या अधिक अछि आ द्वितीय जे साहित्यिक दृष्टिएँ सभ तँ संस्मरणेक श्रेणीमे अबैत अछि। रामप्रवेश मंडल गाम- रतनसारा पोस्ट- रतनसारा वाया- निर्मली जिला- मधुवनी लघुकथा पछतावा- महाजन गैर-खड़ रहए। ककरोसँ गप करैत काल पहिने गारि पढ़ि दैत छल। जंगला आ मंगला दुनू गोटे एक्के गाम बैरमाक वासी छलए। अन्नक खरीद विक्री करैत छल। दुनू िमलि विचार कएलक जे महाजनसँ एहि गारिक बदला केना सठाएल जाए? बड़ी काल धरि एहि विषएपर िवचार करैत रहल। निर्णए भऽ गेल। अगिला दिन दुनू गोटे महाजन लग पहुँचल। महाजन गारि पढ़नाइ शुरू करैत तहिसँ पहिने जंगल आ मंगल आपसमे थप्पर-मुक्का चलबैत गारि पढ़ैत महाजनक देहपर खसि पड़ल। हाॅ-हॉ करैत महाजन उठल। दुनूक बीच-बचाव करए लगल। बात तँ विचारे छल। जंगल मारै मंगलकेँ आ मंगल मारै जंगलकेँ। सभटा चोट खसए महाजनपर। तरगूमका घूस्सासँ महाजन चितंगे खसल आ बेहोश भऽ गेल। महाजनक चाकर सभ ओकरा अस्पताल लऽ गेल दवाइ-विड़ो चलए लगल। िकछु खानक बाद जंगल मंगल पहुँचल। महाजनकेँ लगसँ देखलाक वाद अस्पतालक ओसारपर आिब फुसराहैट करैत आ हँसैत-हँसैत बाजल- “सारकेँ गारि पढ़वाक आदति आइसँ छूटि जाएत।” तावत महाजनकेँ वेहोशी दूर भऽ गेल छल ओ जंगल आ मंगलकेँ सभटा गप्प सुनि लैलक। िकछु पलक वाद दुनू- जंगल आ मंगल महाजनकेँ लग आवि पूछलक- “कहू महाजन आव नीके छी ने?” महाजन बाजल- “आव हम गारि ककरो नहि पढ़वैक मुदा, तहूँ सभ एहि करमकेँ नहि दोहरविहक।” तीनूक चेहरापर हँसी आवि गेल। जगदीश प्रसाद मंडल जगदीश प्रसाद मंडल जीवन संघर्ष- 4 आइ धरिक इतिहासमे बँसपुराक ऐहन रूप कहियो नहि बनल छल जेहन आइ देखि पड़ैछ। ओना िकछु अनुभवी बूढ़-पुरान लोकनिक कहब छनि जे आजुक बँसपुरा दोहरा कऽ बसल गाम छी। हुनका लोकनिक कथनानुसार करीब साठि-सत्तरि बर्ख पहिने एहि गाममे कोसी प्रवेश केलक। तहिसँ पहिने जे गाम छल ओकर रूप-रेखा दोसर तरहक छलैक। आजुक जे मुख्य बस्ती अछि ओ पहिने बाध छलै आ जे बस्ती रहै ओ अखन बाध बनि गेल अछि। जेकर अनेको परमान अखनो भेटैत अछि। अखनो बाधमे कतौ-कतौ पित्तरि आ तामक बरतन भेटि जाइत अछि। पहिलुका बस्तीमे गाछी-विरछी भरपुर छलैक। मुदा अखुनका जेकॉं ने एते लोक छलैक आ ने एते परिवार। जखन पहिल बेर कोसीक बाढ़ि आइल तँ लोककेँ विसवासे ने होय कोसीक पानि छी। मुदा िकछु अनुभवी लोक पानिक रंग देखि परेखि लेलनि। िकऐक तँ कमला पानि जेकॉं घोर-मट्ठा माने पटिआइल पानि नहि रहैक। पॉंकक कोनो दरसे नहि रहैक। पहिल साल एतबेपर रहि गेलैक। एक तोड़ बाढ़ि आएल आ दस-बारह दिनक उपरान्त सटकि गेलै। दोहरा कऽ नहि आएल। दोसर साल जे बाढ़ि आएल ओ छोटकी धार -नासी- जेकॉं गामक बीचो-बीच बना देलक। ओहि साल गामक लोककेँ ई आभास नहि भेलैक जे ऐना धार गाममे बनि जाएत। जहिसँ सभ गामेमे रहल। बाधक उँचका जमीनमे घर बना लेलक। कोना नहि बनबैत? एक तँ पुस्तैनी गामक सिनेह आ अपन सम्पतियो तँ छलैक। छह मासक उपरान्त धार सुखि गेल। मुदा उपजो-बाड़ी आ गाछो-िबरीछ अधा-छिधा भऽ गेलैक। िकछु गोटेक मालो-जाल नष्ट भेलैक। अनरनेबा, धात्री, लताम, कटहर इत्यादिक गाछ उपटि गेलै। दूटा पोखरि आ पॉंचटा इनार धारक पेटमे समा गेलै। जहिसँ लोकक मनमे डर पैइसए लगलैक। गामक माटि-पानिक सिनेह सेहो कम हुअए लगलैक। िबसवासू जिनगी अनििश्चतता दिस बढ़ए लगलैक। िकछु गोटे आन गाम जा बसैक बात सोचए लगल। मुदा जेकरा खेत-पथार रहै ओ करेजपर पाथर रखि रहै लऽ मजबूर भऽ गेल। तेसर साल बाढ़ि सभसँ भयंकर रूपमे आएल। जहिसँ गामक खेतो-पथारक रूप नष्ट भऽ गेलैक, गाछो-िबरीछ नष्ट भऽ गेलैक आ लोकोक जान अबग्रहमे फँसि गेलैक। छातीमे मुक्का मारि सभ गाम छोड़ि देलक। सन्मुख कोसी गाम होइत बहए लगल। तीस बर्ख, एक रफ्तारमे कोसी बँसपुरा होइत बहैत रहल। गामक सभ आन-आन गाम जा बोनिहार बनि गेल। अधिकतर लोक नेपाल पकड़ि लेलक। जेकरा-जत्तै जीवैक गर लगलै ओ ओत्तै रहए लगल। जाधरि लोककेँ अपन पूँजी रहैत छैक ताधरि ने िकसान वा कारोबारी रहैत अछि। मुदा पूँजी नष्ट भेने तँ खाली-पएर बँचि जाइत छैक। बँसपुराक सभ बोनिहार बनि गेल। गामक, कोसी ऐलासँ पूर्वक, सामाजिक संबंध रॉंइ-बॉंइ भऽ गेलैक। पहिलुका समाज नष्ट भऽ गेलैक। बँसपुराक सभ सुख लोक िवसरि गेल। मातृभूिम ककरा कहै छै से बँसपुराक लोकक लेल परिभाषे मेटा गेलैक। िकएक तँ मातृभूमि आ दुनियॉंमे की अन्तर छैक? जँ जन्मभूमिकेँ मातृभूमि मानल जाए तँ मातृभूमिये नष्ट भऽ गेलैक। जे सभ बँसपुरामे जन्म नेने छल ओ आन-आन गाममे रहि रहल अछि। जँ कहियो फेरि बँसपुरा जगतै तँ ओ फेरि आबि देखत िक नहि। तहिना जे घुरि कऽ आओत ओ सभ तँ आने-आने ठाम जन्म नेने अछि। तहन ओकर मातृभूिम कोन भेलै। जँ देशकेँ मातृभूमि मानल जाए तँ देशो विभाजित भऽ जाइ छैक। जे दू नाम धारण कऽ लइत अछि। तहन तँ देशोकेँ कोना मातृभूमि मानल जाए। जँ से नहि, जहि धरतीपर लोक जन्म लइत अछि ओकरा मानल जाए तँ दुनियॉंक जते देश अछि सभ धरतियेपर अछि। तहन िकअए मातृभूिमकेँ छोट आकारमे मानैत छी। िकऐक ने दुनियॉंकेँ मातृभूमि मानल जाए? कोसीक धार हटलापर जहन बँसपुरा जागल तँ रूपे बदलि गेल छलैक। मुलायम माटि बालु भऽ गेलैक। गाछ-विरीछक जगह काश-पटेर, झौआ लऽ लेलक। अपन पुस्तैनी गाम बुझि पुन: लोक सभ आबए लगल। ने ककरो जमीनक सबूत, खतिआन, दस्तावेज इत्यादि, रहलै आ ने जमीनक ठौर-ठेकान। मुदा गाम तँ हेतैक। जहिना अदौमे माने साबिकमे जंगल-झाड़ तोड़ि लोक वसो-वास आ उपजाउ भूिम बनौलक। रेन्ट-फिक्स कऽ सरकारो जमीनक अधिकार देलक। सएह गाम बँसपुरा छी। जहिना कहियो बँसपुरा पानिसँ दहा गेल छल तहिना पानिक अभाव गाममे भऽ गेलैक। ने एकोटा पोखरि-इनार रहल आ ने बाढ़िक पानि अबैत। पोखरि-इनार खुनब छोड़ि लोक कलसँ पानिक काज चलबए लगल। बरखा पानिसँ खेती हुअए लगलैक। चापी जमीनकेँ बान्हि-बान्हि लोक पोखरियोक सेहन्ता मेटबए लगल। जहिमे माछ-मखान, सिंगहार सेहो होइत अछि। ओहि बँसपुरामे आइ दिवालियो आ कालियो पूजाक उत्साह लोकक रग-रगमे दौड़ि रहल अछि। आन-आन गामसँ अबैबला देखिनिहार लेल चारू भागक रास्ताकेँ गौवॉं, अपन सीमा भरि, जते टूटल-टाटल छलै सभकेँ भरि-भरि कऽ सहीट बना देलक। जतए कतौ बोन-झार छलै सभ काटि-खोंटि साफ कऽ देलक। ओना सरकारो दिससँ बान्ह-सड़कपर माटि पड़ैत मुदा, दूधक डाढ़ी जेकॉं पड़ने बरसातमे भसिये जाइत छलैक। जहिसँ जहिना कऽ तहिना रहि जाइत। मुदा एहि बेरि गौवॉं अपन सम्पत्ति बुझि नीक जेकॉं मरम्मत केलक। खाली बान्हे-सड़क टा धरि नहि गामक जते पानि पीबैक साधन अछि सबहक मरम्मत सेहो केलक। ओना बैसाख-जेठ जेकॉं देखिनिहार लोक थोड़े पानिये पीति मुदा, तइओ पानि तँ पीवे करत गामक लेल सभसँ आश्चर्य ई भेल जे एकाएक सभ अपन जिम्मा कोना बुझलक। केवल पानियेक प्रबंध टा नहि पाहुन-परकसँ लऽ कऽ हराएल-भौथिआइल देखिनिहारक लेल सेहो रहैक व्यवस्था केलक। जेकरा दुआर-दरबज्जा छै ओकर तँ कोनो बाते नहि, जेकरा नहियो छैक ओहो सभ जोगार केलक। मोटका प्लास्टिक आनि-आनि घरे जेकॉं बना लेलक। सबहक मनमे गद्गदी जे आबह कते पाहुन-परक अबैए। सुतैक लेल मोथीक िबछान सेहो बेसिये कऽ कीनि-कीनि रखि लेलक। अखन ने अनगौवॉंक लेल कीनलक मुदा, पूजाक पछाति तँ अपने सुतबो करत आ अन्नो-पानि सुखौत। ओना जे मेला देखए आओत ओ सुतत िक मेला देखत। मुदा अइओ जे भरि राति मेला देखत ओ तँ दिनोमे सुतबे करत। रघुनाथोकेँ धन्यवाद दियै जे खाइ-पीवैक समान- चाउर-दालि, तरकारीसँ लऽ कऽ जारनि-काठी धरिक तेहन कारोवार पसारि देलक जे कतबो लोक कीनत-बेसाहत तइओ नहि सठतै। एक्के मेलाक कमाइमे ओहो धनिक भऽ जाएत। हँ तँ पूँजियो तँ वएह ने लगौने अछि। तेहेन ओकर बोहूक बोली मीठ छै जे एक्कोटा गहिकीकेँ थोड़े घूमए देत। सदिखन दोकानमे भीड़ लगले रहतै। कहबियो छै ने जेकरा भगवान दइ छथिन छप्पर फॉंड़ि कऽ दैत छथिन। भने दोकान घरेपर केने अछि। जँ मेलामे केने रहैत तँ गौवॉंकेँ घिनाष्ठे करैत, िकएक तँ पाहुन-परकक सोझमे कोना लोक चाउर-दालि कीनैत। मुदा, आश्चर्य भेल। बाप रे गाममे एते पाहुन-परक कोना उनटि कऽ चलि आएल। जना ककरो कोनो अपना काज नहि छैक। तहूमे मरदसँ तीन गुना स्त्रीगण आबि गेल अछि। स्त्रीगणोमे वेसी ओहन अछि जे पनरहसँ पच्चीस बर्खक अछि। सेहो एक मेलक माने चालि-ढालिक रहैत तब ने, चारि-पॉंच मेलक छै। कोना नै गामक हबामे खतरनाक कीड़ा फड़त। बम्वैइया सभ जे छै ओ सिर्फ छौँड़े-माड़रि टा केँ थोड़े धड़त, बुढ़ो-बुढ़ानुसकेँ धड़वे करत। जहिना कोनाे अनठिया चिड़ैकेँ गाममे अएलासँ गामक सभ देखए जाइत तहिना ने बम्वैइयो चिड़ैकेँ देखत। मुदा नहियो देखत तँ अनुचिते हएत िक ने। आखिर ओहो ओहन रूप िकअए बनौने अछि। लोके देखैले िक ने। जँ से नहि मनमे रहितै तँ ऐहन पॉंखि बनबैक काज कोन छलै। मनुक्ख तँ मनुक्ख छी की ने? तइले ऐहन हबा-िमठाइ बनैक कोन जरूरत छैक। तहूमे जखन बनि गेल आ लोक नहि देखै तँ बनैक मोले िक? मोल तँ तखने हेतै िक ने जखन लोक ओकरा निङहारि-निङहािर तर-उपर देखत। तेँ िक ओकर चराओर गाम-देहातमे नै छै? जरूर छै। बम्वइये कलाकार सभ ने गामोक लेाककेँ िसनेमाक माध्यमसँ सिखौलकैक हेँ। लोकक मनो अजीब छैक। जँ कनियो उपर उड़त तँ बुझि पड़ैत छैक जे जमीनक सभ िकछु हम देखैत छी मुदा, हमरा िकयो देखबे ने करैत अछि। तहिना ने जमीनो परक केँ बुझि पड़ै छैक। मुदा भ्रम तँ दुनूकेँ छैक। उपर उड़निहार जँ जमीनक उपरका भाग देखैत अछि तँ जमीनो परक ने ओकरा निचला भाग देखैत अछि। चािर बजैत-बजैत मेला देखिनाहारक भीड़ काली-स्थान उमड़ि गेल। ओना बूढ़ि-बुढ़ानुस अपन-अपन घर-अंगनाक ओरियानमे लागल। िसरपर सूर्यास्त होइतहि दीप जरौनाइसँ लऽ कऽ उक फेरिनाइ सबहक सिरपर छन्हि। मुदा आन गामसँ आएल लोककेँ कोन काज छन्हि ओ तँ मेले देखैले आएल छथि। सभसँ खूबी तँ ई अछि जे मेला देखिनिहारे मेला देखैक वस्तु बनि गेल अछि। पूजा समितिक सदस्यक उपर जवावदेही-भार रहने सभ जी-जानसँ निगरानीक संग-संग वेवस्थामे जुटल। सौँसे मेला पी-पाह होइत। ओना पूजाक प्रक्रिया निशा रातिमे शुरू हएत मुदा, ओरियान तँ पहिनहिसँ करए पड़त। ऐहन नहि ने जे एक दिस पूजा शुरू हएत दोसर दिस समान जुटले ने रहत। ऐहन नहि ने जे पूजा काल जहि वस्तुक जरूरत होय ओ अछिये नहि। तेँ पुजेगरियो आ पुरोहितो अपन सभ वस्तु पुरजीसँ िमला-मिला सैंति-सैंति रखैत। ओना मेलाक आनन्द तँ तखन होइत छैक जखन पूजा शुरू होइत अछि। नाचो-तमाशा तँ तखनेसँ ने शुरू होइत छैक। मुदा तइयो सोलहन्नी नहि तँ अधो-छिधो मेलाक आकर्षण तँ बढ़िये गेल छैक। सभसँ अजीव तँ ई भऽ गेल अछि दर्शककेँ गजपट भऽ गेल अछि। तेहन ने बजारू रूप बनि गेल अछि जे लड़का-लड़कीक भेदे मेटा गेल छै। चश्मा खोलि-खोलि बूढ़-पुरान सभ ऑंखि मलि-मलि देखैत जे ई छौँड़ा छी िक छौँड़ी। मुदा तइओ ऑंखि ठीकसँ काजे नहि कऽ रहल। सभ अपन-अपन धुनिमे मस्त। तहि बीच फटाक-फटाकक अवाज हुअए लगलै। फटाक-फटाकक अवाज सुनि सबहक कान ठाढ़ भेल। जे जेतै रहै ओ ओतैसँ अवाज अकानए लगल। मुदा दोकान-दौड़ी तहि ढंगसँ सजल रहै जे सोझा-सोझी अवाज निकलबे नहि करैत रहै। लगमे जे रहै ओ तँ अवाजो सुनै आ मारियो होइत देखै। िकछु लोक बाहरो दिशि भगैत रहै आ िकछु गोटे दौड़ी-दौड़ी ऐबो करैत रहै। उत्तर दिससँ देवन आ पछिमसँ मंगल दौड़ल आिव भीड़केँ चीड़ैत आगू पहुँचल। आगू पहुँचतहि देखलक जे बीस-पच्चीस बर्खक दूटा छौँड़ा चेस्टरक दोकानक आगूमे मुक्का-मुक्की कऽ रहल छै। फांटि देखि दुनू देवनो आ मंगलो सहमि गेल। मुदा तहि बीच जोगिनदर दौड़ल आबि दुनू हाथ धुमबैत दुनू छौँड़ाकेँ गट्टा पकड़ि मािर छोड़ौलक। हल्लो शान्त भेलै। एकटा छौँड़ाकेँ देवन पुछलक- “बौआ, अखन पूजा-पाठक समए छै तखन तोँ िकअए मािर केलक?” मुदा, जहि छौँड़ाकेँ देवन पुछलक ओ िकछु िवशेष मािर खेने रहै। तेँ जाबत िकछु बाजै-बाजै तहिसँ पहिनहि दोसर बाजए लगल। ओहि छौँड़ाकेँ चोहटैत जोगिनदर कहलक- “तूँ चुप रहह। पहिने जेकरा पुछलियै से बाजत।” मुदा जोगिनदरक बातक असिर एक्को पाइ ओहि छौँड़ापर नहि भेलैक। दुनू गामक पाहुन। तेँ िवकट संकट समितिक सदस्यक बीच भऽ गेल। िवचित्र स्थितमे सभ पड़ि गेल। अधिकतर लड़को आ लड़कियो परदेशिया। तेँ मारिक डर ककरो हेबे ने करैत। लड़की सभ जोर दैत बाजलि- “ब्रेशियरक दोकानपर लड़का सभकेँ अबैक कोन जरूरत छै। ई तँ स्त्रीगणक सौदा छी?” मुदा, लड़को सभ लड़कीक बात मानए लेल तैयार नहि। तेसर छौँड़ा बाजल- “लड़कीक उपयोगक वस्तु छी, एकर माने ई नै ने जे ऐकर जरूरत लड़का सभकेँ नहि छैक।” “लड़काकेँ की जरूरत छै?” “अपनो परिवार छै आ िहतो-अपेछित तँ छइहे।” लड़का-लड़कीक बीचक गप्प गजपट होइत देखि देवन कहलक- “अखन सभ शान्त होउ। मेलाक पछाति एकर निबटारा हएत। अखन सभ मेला देखू।” सूर्यास्तक समए। सूर्य तँ पूर्णरूपेण नहि डूबल मुदा, निच्चाँ उतड़ि गेलासँ लोकक ऑंखिसँ ओझल भऽ गेल। गामक धियो-पूतो आ चेतनो स्त्रीगण फुलडालीमे िदआरी, सलाइ, अगरबत्ती आ खढ़क उक लऽ कऽ गामक जते देवस्थान अछि सभ दिशि धरोहि लगि गेल। िकयो डिहवार स्थान दिस जाइत तँ िकयो महादेव मंदिर। िकयो धर्मराजक गहबर दिस तँ िकयो हनुमान जीक स्थान दिस। गाममे पॉंचेटा पुरना देवस्थान। छठम नबकामे काली स्थान बनल। ओना ठकुरवारी पहिने व्यक्तिगत छल मुदा, महंथ जीक मुइलापर ओहो दसगरदे भऽ गेल। सभ स्थानमे दीप जरा, धुप दऽ सभ अपन-अपन आंगन आबि घर-आंगनमे दीप जरबैत माल-जालक थैर, इनार, कलपर सेहो जरौलक। िकछु गोटे कुम्हारक बनौल माटिक िडबिया तँ िकछु गोटे दवाइ पीलहा शीशी सबहक डिविया बना सेहो जरौलक। सौँसे गाम इजोत जगमगा गेल। काली स्थानक चारू जेनरेटर चलए लगल। जहिसँ अन्हरिया रहितहुँ इजोतसँ गाम दिने जेकॉं भऽ गेल। ओना दिनमे मेघ जते उपर रहैत अछि रातिमे (अन्हार) निच्चॉं उतड़ि जाइत अछि। जाइत अछि। दिवाली पावनिसँ गाम निचेन भऽ गेल। स्त्रीगण सभ भानस-भात करैमे लागि गेलीह। समए पाबि पुरूख सभ मेले दििश टहलि गेलाह। मेलाक आकर्षण देखि िकनको घरपर अवैक मने नहि होइत रहनि। मुदा भरि राति तँ नाच-तमाशा चलिते रहत तेँ िबना खेने-पीने रहबो कठिन बुझ अपन-अपन घर-अंगनाक रास्ता धेलनि। काली-मंडपमे पुजेगरी पूजाक ओरियानमे व्यस्त रहथि। मुजफ्फरपुरक जेहने नाटक तेहने मंचो बनल। ऐहन मंच, आइ धरि एहि इलाकाक लोक नहि देखने रहथि। जेहने फइल स्टेज तेहने सुन्दर-सुन्दर रंगीन परदो लगौल गेल रहैक। तेहने उँचगरो। कतबो देखिनिहार रहत तइओ देखबे करत। अजीव ढंगसँ िबजलीयो लगौल गेल रहैक। बजोक तेहने वेवसथा। मुजफ्फरपुरक मंचसँ कनियो उन्नैस वृन्दावनक रासक नहि। मुदा दुनूमे अंतर साफ-साफ बुझि पड़ैत रहैक। जेहने आधुनिकताक प्रदर्शन मुजफ्फरपुरक स्टेज करैत रहै तेहने प्राचीनताक वृन्दावनक मंच करैत रहै। कौव्वालीक मंच तँ ओते लहटगर नहि बुझि पड़ैत। मुदा मेल-फीमेलक दुनू स्टेज सटले रहने अपन आकर्षण बढ़ौने रहै। महिसोथाक मलिनिया नाचक मंच सभसँ दब। मात्र चारि-पॉंचटा चौकी निच्चॉंमे जोड़ने आ चारिटा खूँटा गारि उपरमे आल रंगक चनवा आ एकटा परदा मात्र लगल रहैक। मंच दब रहितहुँ मलिनिया नाचक कलाकार सभक मनमे विशेष उत्साह रहै जे सभकेँ उखाड़ि देब। अोकरा सबहक मन गद्-गद् एहि दुआरे रहै जे छुछे टीप-टापसँ सोझे काज चलै छै जे मौलिकता हमरा कलाकारमे अछि से अनकामे नहि छैक। संगहि जते देखनिहार हमर अछि ओते दोसराक नहि छैक। जहिना बजारमे अनेको दोकान रहितहुँ सोना-चानी कीनिहार सोने-चानीक दोकान पहुँचैैत, िकताब कीनिनिहार िकताबे दोकानपर पहुँचैत अछि तहिना ने नाचो-तमाशाक छैक। नअ बजैत-बजैत मंच सबहक आगू देखिनिहारक ठट्ठा पड़ए लगल। कोना नहि पड़त? लगसँ देखब आ दूरसँ देखब मे सेहो अंतर होइ छै िकने। मुदा समितिक सदस्य सभ विचारि नेने रहै जे आगूमे अनगौवॉंकेँ बैसाइब। गौवॉं तँ ठाढ़ो-ठाढ़ पाछुओसँ देखि सकैत अछि। तहूमे अनगौवॉंकेँ कोनो ठीके नहि अछि जे सभ दिन देखए ऐबे करत। मुदा गौवॉंक तँ अपन मेला छियैक तेँ ऐबे करत। कलाकार सभ मेक-अप करबो नहि केने रहै िक देखिनिहार सभ पीकी मारब शुरू केलक। कोना नहि मारत? लोक देखए लाइलि िक वैइसैले आइल अछि। कमसँ कम बजोबला सभ तँ मंचपर आबि सम बान्हह। समो बन्हैमे एकाध घंटा लगवे ने करतै। पैसा लऽ कऽ आएल अछि िक कोनो मंगनी आएल अछि जे समए ससरल जाइ छै आ अखन धरि स्टेज खाली रखने अछि। जनसेवा दलक सदस्य सभ कखनो मंचपर जाए शान्त करैत तँ कखनो मर्द-स्त्रीगणक गजपट भीड़केँ सुढ़िअबैत। चारू मंच बाजाक आवाजसँ गनगनाए लगल। देखिनिहारोक मन बाजाक धुनमे शरबत बनए लगल। िकयो मने-मन गुनगुनाए लगल तँ िकयो हाथक ओंगरीसँ पोनोपर आ िकयो-िकयो ठेहुनोपर ताल मिलबए लगल। पूबसँ एक चिड़की मेघ–-बादल- पुरबा हवाकेँ संग केने उठल। हवाकेँ उठिते देखिनिहारक औल-बौल मन शान्त हुअए लगल। धीरे-धीरे हवो तेज होइत गेल। करिया मेघ सेहो नमहर हुअए लगल। एकाएकी तरेगण डूबए लगल। जहिना-जहिना बादल पसरैत तहिना-तहिना हवो तेज हुअए लगल। काली-मंडपमे पुजेगरी घड़ी देखि-देखि पूजाक प्रक्रियाकेँ आगू बढ़बए लगलाह। माए-बहीनि गीति शुरू केलनि। जोरसँ मेघ बोली देलक। हवो िबहाड़िक रूप पकड़ए लगल। बुन्दा-बुन्दी पानि पड़ए लगल। मुदा पानिक शंका ककरो मनमे नहि। िकऐक तँ रौदियाह समए रहने सभ निश्चिन्त जे एहिबेर मेघमे पानिये नहि छैक जे बरिसत। तहूमे जँ शुभ काजमे बुन्दा-बुन्दी हुअए तँ ओ आरो शुभ छी। तेँ सबहक मन खुशी। मुदा पानिक बुन्नसँ मंचक आगूमे बैसल देखिनिहार एका-एकी उठए लगल। तड़तड़ा बड़खा शुरू भेल। िबजलोका सेहो तड़ाक-तड़ाक छिटकए लगल। जते िवजलोका छिटकै तते मेघो गरजए लगल। गामक लोक घर दिसक रास्ता धेलक। मुदा अनगौवॉं असमंजसमे पड़ि गेल जे आब भीजबे करब। मुदा िबहाड़ि तँ जान छोड़त। हािर कऽ अनगौवॉं स्टेजक उपरो आ तरोमे पहुँच पानिसँ बचैक गर अंटबए लगल। इंजन िबगड़ै दुआरे जेनरेटरबला जेनरेटर बन्न कऽ देलक। सौँसे मेला अन्हार पसरि गेल। जहिना पानि तहिना िबहाड़ि अपन भीमकाय रूप बना नाचए लगल। सौँसे मेला ‘साहोर-साहोरक’ आवाज हुअए लगल। मुदा सुनै लए ने िबहाड़ि तैयार आ ने बरखा। िबहारि तँ उड़ि कऽ पड़ा गेल मुदा, मुसलाधार बरखा सवा घंटा धरि होइते रहल। दोकान सबहक छप्पड़ उड़ने सभ समान तीति-भीजि गेल। उड़बो कएल। ककराकेँ देखत। सभ अपने जान बँचवै पाछु लागल। तहि काल एकटा स्टेज दिससँ कनै-कुहरैक अवाज उठए लगल। तते लोक स्टेजक उपर चढ़ि गेल जे बल्ले सभ टूटि गेल जहिसँ खसि पड़ल। स्टेजक निच्चॉं जे लोक सभ बैसल रहै ओकरा उपरेमे उपरका खसल। ककरा की भेलै से तँ अन्हारमे देखि नहि पड़ैत मुदा, कानै-कुहड़ैक आवाज टा सुनि पड़ै। छबेटा िसपाही डयूटीमे रहै। वएह बेचारा की करत। ककरा दोख लगाएत। पूजा समितिक सदस्य आ िसपाही िमलि गर लगौलक। देवन आ जोगिनदर राती-राती पड़ा गेल। खेला-पीलाक उपरान्त सजना िपता दुनियॉंलालकेँ कहलक- “बाउ, पॉंच िदनक मेला छै। एक दिना रहैत तखैन ने देखैक धड़कफड़ियो रहैत। से तँ नै अछि। सोलहो आना घर-अांगन छोड़ि जाएबो उचित नै। िकएक तँ जते लोक मेला देखए औत ओ सभ िक कोनो मेलेटा देखए औत। िकयो छौँड़ा-छौँड़ीक खेल करए औत, िकयो चाेरी-चपाटी करए औत। के की करए औत से के कहलक। तेँ अखैन हम दुनू परानी जाइ छी आ अधरतियामे आबि तोरा उठा देवह। तखन तूँ जइहह।” सजनाक बात दुनियॉंलालकेँ जँचल। मने-मन मानि लेलक। मुदा माए -तेतरी- बाजलि- “राति-बिरातिकेँ देखए हम नै जाएव। साँझू पहरकेँ जाएव। काली-महरानीकेँ सॉंझो दऽ देवनि आ गोड़ो लागि लेबनि।” माएक बात सुिन सजना िकछु बाजल नहि। मेला देखए विदा भेलि। िकछु कालक बाद सजनाक पत्नी -सितिया- सेहो स्त्रीगणक संग गेलि। पानि-बिहाड़ि उठितहि सजना भागल। मुदा तइओ घर लग अबैत-अबैत नीक जेकॉं भीजि गेल। अंगनाक पानि जे निकलैत रहैत तहिठाम डेढ़िया लग आबि पिछड़ि कऽ खसि पड़ल। सौँसे देह थालो लगि गेलै आ ठेहुनमे चोटो लगलै। मुदा हूवा कए कऽ उठि ओहि पानिमे थाल धाेय आंगन आएल। अखन धरि ने दुनियॉंलाल सुतल छलै आ ने तेतरी। िकऐक तँ हवा देखि तेतरी चुल्हि आ मालक घरक घूरक आगि िमझा ओछाइनपर आइले छलि। हवाक रूखि देखि दुनियॉंलाल पत्नीकेँ कहलक- “तेहन हवा अछि जे भरिसक घरो ने ठाढ़ रहत। तहूमे एक्कोटा खूँटा लकड़ीक नै अछि। सभटा बॉंसक अछि। बड़ गलती भेलि जे चारिये टा खूँटा बदललौं। सभ खूँटाक जरि सड़ि गेल अछि।” तहि बीच पछुऐतक तीनू पुरना खूँटा कड़कड़ा कऽ टुटि गेलै। नवके खूँटा टा नहि टुटलै। उत्तरबरिया-पूबरिया कोन लटैक गेलै। मुदा खसल नहि। जाड़सँ थरथराइत सजना ओसारपर आिब माएकेँ कहलक- “माए, भीज गेलौं। जाड़ो होइए। कनी लूँगी आ चद्दैर निकालि दे?” घरेसँ माए कहलक- “भीजिलेहे धोतीक खूँटक पानि गाड़ि सौँसे देह पोछि ले। लूँगी आ चद्दैर दइ छिऔ।” हाथक ओंगरी सजनाक कठुआइल। मुदा तइओ कहुना-कहुना कऽ धोतीक पानि गाड़ि, अंगा निकालि सौँसे देह पोदलक। तेतरी डिबिया लेसए लगली। मुदा सलाइ सिमसि गेने बरबे ने कएल। अन्हारेमे हथोरि-हथोिर लूँगियो आ चद्दैरयाे निकालि कऽ दैत बाजलि- “घूरो कऽ दैतियै से सलाइये ने बरैए। तोंही टा ऐलै आ कनियॉं?” सजना- “कहॉं कतौ देखलियै। पानिक दुआरे कतौ अटकि गेल हेतौ।” दुनू गोटे गप-सप्प करिते रहै िक रूपलालक घर कड़कड़ा कऽ खसल। रूपलाल दुनियॉंलालक छोट भाए। रूपलाल घरेमे रहै। दू-चारी घर। कोनियाबला नहि रहै। घरक दुनू चारक ओलती माटि पकड़ि लेलक आ दुनूक मठौठ ठाढ़े रहलै। पँजराक दुनू टाट टुटि कऽ लबि दुनू भाग घेरने रहला। ओइ बीचमे रूपलाल दबकल ठाढ़ भेल। जान अबग्रहमे जीबन-मृत्युक बीच पड़ल रहै। खूब जोर-जोरसँ हल्ला करै मुदा, झॉंट-पानिक दुआरे िकयो सुनवे ने करै। एक तँ झॉंट-पानि दोसर बान्हल माने घेराएल आवाज। िकछु कालक उपरान्त मुनेसरी, जे दोसर घरमे रहए, सुनलक। अवाज सुनिते मुनेसरी केवार खोलि अोसारपर आइलि िक िबजलोकाक इजोतमे घर खसल देखलक। खसल घर देखिते बेटोकेँ उठौलक। दुनू गोटे जोर-जोरसँ हल्ला करए लगल। मुनेसरीक अवाज सुिन दुनियॉंलाल सजनाकेँ कहलक- “रौ सजना, रूपलालवाक घर खसि पड़लै। दौड़ि कऽ जो, देखही जे िकयो दबेबो केलै?” जाड़सँ कठुआइल सजनाकेँ बरखामे निकलैत अबूह लगै। मुदा की करत। मनमे द्वन्द्व सेहो उठि गेलइ। एक िदस पित्तीक मोह तँ दोसर िदस पितिआइनिक बेवहारसँ कुपित। मुदा ऐहन समएमे तँ जानक प्रश्न रहैक। दाेस्ती-दुसमनी तँ जीबैतमे रहै छैक। मन मसोसि कऽ लुँगीक फॉंड़ बान्हि निकलल। हवो कमि गेल रहै मुदा, बरखा होइते रहै। पाछुसँ दुनियॉंलाल आ तेतरियो गेल। रूपलालक दछिनबरिया घर खसल रहए। सजना पितिआइनकेँ कहलक- “काकी, एकटा इजोत आ हँसुआ नेने आउ? जाबे नीक-नाहॉंति देखि नै लेब ताबे कन्ना िकछु करबै।” हॉंसू निकालि कऽ दैत पितिआइन बाजलि- “बौआ, चोरवत्ती तँ पितिये लग अछि।” हॉंसू लैत सजना जोरसँ बाजल- “कक्का हौ, कनी टार्चक इजोत दहक?” घरक तरसँ रूपलाल बाजल- “चोरबत्ती तँ सिरमे लग रखने छलौं। उ तँ ठाठक तरमे पड़ि गेल अछि।” “चोटो-तोटो लगलहहेँ?” “नइ बौआ।” “अच्छा, तूँ चिन्ता नइ करह। हवो कम भेल आ बुन्नियो पतड़ाएल जाइए।” सजनाकेँ बुझवैत दुनियॉंलाल कहलक- “बौआ, घड़फड़ नै करह। (भावोसँ)- कनियॉं डिबिया नेसू।” मुनेसरी डिबिया लेसिलक। इजोत होइते दुनियोलाल आ सजनो टाट हटबैक गर अँटबए लगल। ओलतीक खूँटा जे टुटि कऽ कात भऽ गेल रहै आेकरा टाट देने घोसियबैत कहलक- “कक्का, अइ दुनू टोनकेँ पकड़ि दुनू ठाठमे सोंगर लगा दहक। जइसँ ठाठ ऐम्हर-ओम्हर नै डोलतह।” एकाएकी दुनू सोंगर दुनू ठाठमे रूपलाल लगौलक। सोंगर लगिते सबहक मनमे खुशी एलै। सजनाकेँ दुनियॉंलाल कहलक- “सौँसे टाट हटबैक जरूरत अखन नइ छौ। दोग जेकॉं बना पहिने आदमीकेँ बचा, तखन बुझल जेतैक।” हॉंसूसँ तीनि-चारिटा टाटक बनहन काटि सजना दोग जेकॉं बनौलक। दोग बनिते रूपलाल बाजल- “बौआ, निकलै जोकर भऽ गेल। तूँ दुनू हाथे दुनू ठाठकेँ पकड़ने रहह।” घरसँ निकलितहि दुनियॉंलाल पएर पकड़ि कनैत बजए लगल- “भैया, अपन सवांग दुनियॉंमे सभसँ पैघ होइ छै। अखन जे तूँ दुनू बापूत नै रहितह तँ घरेमे मरि जैतौं।” शान्त्वना दैत दुनियॉंलाल कहलक- “ऐना ढहलेल जेकॉं िकअए बजै छेँ। अपन-विरान लोक अपने बनबैए। तूँ तँ जानिये कऽ छोट भाए छियेँ। समाज बड़ीटा होइ छै। गरीब लोक कोनो सुखे जीवैए। तखन तँ जाबे दुनियॉंक दाना-पानी िलखल रहै छै ताबे काहियो काटि कऽ जीवे करैए। मन थीर कर। जे होइ कऽ छलै से भेलै। थरथर िकअए कपै छेँ।” मुदा दुनियॉंलालक बातक असरि दुनू परानी रूपलालपर नहिये जेकॉं पड़ल। भीतरसँ करेज डोलैत। मनमे होय जे फेरि ने घरक तरमे दवा कऽ मरि जाय। आंगन डेरौन लगए लगलै। जना िकछु झपटैत होय तहिना बुझि पड़ै। िमरमिरा कऽ रूपलाल बाजल- “भैया, होइए जे सुति रहब तँ फेरि दोसरो घर खसि पड़त।” दुनियॉंलालक मनमे एलै जे भरिसक डरे ऐना होइ छै। मुदा तइओ बोल-भरोस दैत कहलकै- “घर तँ गिरमा-गिरिए पड़लौ। आब िक दोहरा कऽ खसतौ। जे घर बँचल छौ ओकर भीत केहेन मजगूत छै। उ थोड़े खसत। तहूमे झॉंटे-पानि बन्न भेल। नै तँ चल हमरे लग सुतिहेँ। कनियॉंकेँ पुछि लहुन जे घरमे सुतब िक अहूँकेँ डर होइए। जँ डर होइए तँ सजने माए लग सुति रहब।” दुनियॉंलालक विचार सुिन रूपलाल बाजल- “भैया, सगरे देह झोल-झाल आ थाल-कादो लगि गेल अछि। ओकरा पहिने धुअए पड़त।” ओना सभकेँ थाल-कोदो लगल रहै। सभ िकयो कलपर जा सगरे देह धोलक। कलपरसँ आबि मुनेसरी घर बन्न केलक। दुनू माए-पूत तेतरीक संग आ रूपलाल दुनियॉंलालक संग धेलक। पूबरिया घरमे दुनियॉंलाल भुँइयेमे ओछाइन ओछौने रहए। चौकी नहि रहैक। ओछाइनपर बैसि सिरमा तरसँ चुनौटी निकालि रूपलालकेँ दैत कहलक- “पहिने तमाकुल चुना।” सकरीकट तमाकुलक डॉंट िबछैत रूपलाल बाजल- “भैया, आइ तँ मरि गेल रहितौं। जना हड़हड़ा कऽ घर खसल तना जँ ओछाइन छोड़ि सतरकी नइ करितौं तँ चाहे मरि जइतौं नै तँ अंग-भंग भऽ गेल रहितए। मुदा माए-बापक धर्मे कुशल कलेप नइ लागल। नइ तँ दुनियॉं अन्हार भऽ जाइत।” रूपलालक विचारकेँ अंकैत दुनियॉंलाल उत्तर देलक- “ई देहे तँ कुम्हारक बनौल कॉंच बरतन जेकॉं अछि। जहिना कँचका बरतन एक रत्ती धक्का लगने फुइट जाइत तहिना ने देहो छी। मुदा से लोक विसरि दँतिया कऽ पकड़ने रहैए। जँ ई बात सभ बुझि जाए ते जिनगीक कोनो ठेकान नइ अछि तखन अनेरे िकअए झूठो-फूिस बजै छी आ अधलासँ अधला काजो करै छी। तेँ जतबे दिन जीवै छी ओतवे दिन इमानदारीसँ कमा कऽ पेटो भरी आ जहॉं धरि भऽ सकै तहॉं धरि अनको उपकार करियै। यएह उपकार ने धर्मो छी आ मुइला बादोक जिनगी छी।” मुँह बॉंबि रूपलाल पुछलक- “भैया, फेनोसँ एक बेर आरो कहक?” रूपलालक प्रश्न सुनि दुनियॉंलाल मने-मन सोचए लगल जे भरिसक एकरा ज्ञानक उदए भेल जा रहल छै। फेिर भेलै जे कोनो बेर पड़लापर एहिना लोकक मनमे नीक विचार जगै छै मुदा, लगले रूिक जाइ छै। बुझबैत बाजल- “बौआ, अगर जँ लोक ई बुझि जाए जे अइ देहक कोनो ठेकान नै अछि। कखन छी कखन नै छी तइले ककरो बेजाए िकअए करबै। जँ ई विचार लोकक मनमे आिब जाए आ ओइ हिसाबसँ अपन चालि सुधारि लिअए तँ ककरो अधला हेतइ। एक तँ ओहिना लोक समस्या सभसँ रेजानिस-रेजानिस रहैत अछि तइपर सँ एदतिकाल लोको िकछु नै िकछु गड़बड़ करिते रहै छै। कोना िकयो कखनो चैनसँ रहत। तोंही कह जे केहेन बढ़ियॉं दुनू भॉंइ जखन जरमे छेलौं तखैन तोरा कोनो भार छेलौ। खाली संग मिलि कमाइ छेलेँ। आिक नै? तखन भीने िकअए भेलेँ। जखन भीन भेलेँ तखन जँ िकछु कहितियौ तँ कनियॉं कहितथुन जे भैया घर फुटबै छथि। तहूले झगड़ा होइतौ। तइसँ नीक ने जे भरमे-सरम मुँह बन्न केने रहलौं। तहूँ बात थोड़े सुनितेँ। जे कनियॉं कहितथुन सएह मानितेँ। ई की कोनो हमरे-तोरेमे होइते से तँ नहि। सभकेँ यएह गति छै।” पछबरिया घरमे तेतरी सुतैत। पूबरिया झटक भेने सौँसे ओसारे आ मुँह सोझे घरोमे पच-पच करैत। मुदा तइओ तेतरी चुल्हिक छौर छीटि घरकेँ रूख बनौलक। जेठ रहितो वेचारी मुँहसच्च मुदा, छोट रहितो मुनेसरी मुँहजोर। सदिखन अपन बात दोसरपर चढ़ाइये कऽ रखैत। जहिसँ जखन कखनो दुनू दियादिनीमे कोनो गप हाेय तँ मुनेसरी चोहटि दइ। मुदा आइ बिलमे जाइत सॉंप जेकॉं मुनेसरीक मन सोझ भऽ गेल। जना सभ ताव मरि गेल होय, तहिना। हत्याराक खूनमे ताधरि गरमी रहैत छैक जाधरि फॉंसीपर नहि लटकैत अछि। मुदा फॉंसीपर लटकिते सवितासँ सूर्यक उदए जेकॉं ज्ञानक उदए होइत अछि। तहिना आइ मुनेसरियोकेँ भेलि। तेतरियेक िवछानपर दुनू माए-पूत मुनेसरियो सुतल। दुनियॉंलालक बात सुिन रूपलाल गुम्म भऽ गेल। एक तँ दुनियॉंलालक विचार मनकेँ झकझोड़ि देलकै तइपर सँ गिरल घरक सोग सेहो दबने रहए। कने काल गुम्म रहि रूपलाल मूड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, ई तँ सत्ते कहलह भैया।” अपन िकरदानीपर पचताइत देखि दुनियॉंलाल बाजल- “आब तोंही कह जे जखैन दुनू भॉंइ एकठाम छलौं तखन तोरा घरक कोनो भार छेलौ। जानिये कऽ तँ गरीब घरमे जन्म भेल अछि। केहेन बढ़ियॉं दुनू भॉंइ संगे बोनि-बुत्ता करै छलौं आ िमलानसँ रहै छलौं। अपना कत्ते खेते अछि। लऽ दऽ कऽ सात-सात कट्ठा बाधमे आ घरारी छौ। जेकरा बीघा-बीघे छै ओकरो हजार टा भूर सदिकाल फुटले रहै छै, जइसँ मन घोर-घोर भेल रहै छै। जेकरा नै छै ओ तँ सहजे भूरेमे घोसिआएल रहैत अछि।” दुनियॉंलालक विचार सुिन रूपलालक मन केरा भालरि जेकॉं डोलए लगल। ढेरो प्रश्न मनमे उठए लगलै। बेबसीक स्वरमे बाजल- “की नीक की अधलाह से बुझवे ने करै छी। लोकक मुँहे जे सुनै छी से मानि करै छी।” रूपलालक हारल मन देखि दुनियॉंलालक मन विचारक रास्तापर अंटकि गेल। मन हुअए लगलै जे कि कहिअइ। एक दिस छोट भाइक ममता दबैत तँ दोसर दिस स्त्रीगणक झगड़ासँ मन अकच्छ रहए। िबना िकछु बजनहि दयासँ भरल ऑंखि रूपलालकेँ पढ़ए लगल। पछवरिया घरमे दुनू िदयादिनी, एक वामा करे आ दोसर दहिना करे पड़ल। बीचमे चीत गरे मुनेसरीक बेटा सुतल। दुनूक मनकेँ पानि-िबहाड़िक घटना दवने रहए। जइसँ निन्न निपत्ता रहए। अनायास मुनेसरीकेँ नैहरक एकटा घटना मन पड़लै। घटना मनमे अबिते बाजलि- “तेसरॉं, हमरा नैहरमे एक गोरेक घर एहिना िबहाड़िमे खसि पड़लै। घरवारी घरेमे रहए। बेचाराकेँ चोटो खूब लगलै। डेनो टुटि गेलै आ कपारो फुटि गेलै। मुदा रहए कपराक जोरगर जे मरल नहि। कपारक घाव तँ छुटि गेलै मुदा, डेन नै जुटलै। ओहिना लर-लर करै छै। बड़ कष्ट बेचाराकेँ होइ छै। अपना खेत-पथार नै रहने बोनि करै छलै। मुदा समांग खसने बोहुओ छोड़ि कऽ पड़ा गेलै। हारि-थािक कऽ पड़ा गेलै। हारि-थािक कऽ बेचारा भीख मंगैए।” मुनेसरीक कथा सुनि तेतरीक मनमे दया उपकलै। मुदा दुनूक मन आरो डरा गेल। जहि कठिआरीसँ घुमैत काल सभ ‘राम-राम सत है, सभको एही गति है’। बजैत आंगन अबैत तहिना तेतरियोकेँ नैहरक घटना मन पड़ल। बाजलि- “एक बेरि हमरो नैहरमे बड़का बाढ़ि आएल रहए। ऐहेन बाढ़ि कहियो ने देखिने रहियै। जलखै बेरिमे एक गोरे बजलै जे बाढ़ि अबै छै। रोटी पकबैत रही। माए घास लऽ गेल रहए। रोटी पकाइलो ने भेलि िक घर लग पानि चलि आएल। चुल्हि तरसँ उठि बान्हपर गेलौं िक देखलियै जे चानी जेकॉं बाढ़ि पीटने अबैए। धॉंइ-धॉंइ भीतघर सभ खसए लगलै। लुटना बाध गेल रहै। बाधेसँ दौगल आबि घर पैसल। चाउरक कोठीमे लत्तामे बान्हि कऽ रूपैया रखने रहए। कोठीसँ जहॉं रूपैया निकालए लगल िक देहेपर खसि पड़लै। माटिक गोरा भीजि कऽ ढील भऽ गेलै। कोठिये तरमे लुटना पड़ि गेल। कोठिये तरसँ हल्ला करए लगल। जाबे लोक सभ अबै-अबै ताबे घरो खसि पड़लै। बेचारा तरेमे छटपटा कऽ मरि गेल।” तेतरीक खिस्सा सुनि मुनेसरी आरो डरा गेलि। दुनू दियादिनीक देह थर-थर कपए लगलै। नीन आरो दूर चलि गेलै। डरे दुनू िबछानेपर एक करसँ दोसर कर लगले-लगले उनटए-पुनटए लगल। मुदा िकछु बाजति नहि। हारि कऽ मुनेसरी बाजलि- “दीदी, हमरा डर होइए।” मुनेसरीक बात सुिन तेतरियो समर्थन करैत बाजलि- “हँ, हए कनियॉं, हमरो डर होइए। चलह पूबरिये घर। जँ मरबो करब तँ सबतुर संगे मरब।” कहि उठि कऽ बैसि गेल। मुनेसरियो बेटाकेँ उठबए लगल। बेटो जगले। फुड़फुड़ा कऽ उठल। िबछान समेटि तेतरी पॉंचमे लेलक आ मुनेसरी बेटाकेँ कन्हा लगा पूबरिया ओसारपर पहुँचल। ओसारपर पहुँचते तेतरीक जोरसँ बाजलि- “कनी घर खोलू?” घरेसँ दुनियॉंलाल पुछलक- “िकअए? की भेल?” “ओइ घरमे डर होइए। अही घरमे सभ सुतब।” “अइ घरमे हम दुनू भॉंइ छी तखन अहॉं दुनू गोरे कन्ना सुतब?” “बेरि बिपैत्तिमे ई सभ लोक नै बुझै छै। पहिने घर खोलू।” फटक खोलि रूपलाल अपन विछान घुसकौलक। मोख लग डिबिया राखि मुनेसरी िवछान विछौलक। तहिकाल सिताहल नढ़िया जेकॉं सजनाक स्त्री सेहो अांगन पहुँचलि। एकटा बिछानपर दुनू भॉंइ दुनियॉंलाल आ दोसर िबछानपर दुनू िदयादिनी तेतरी बच्चा संग सुतैक ओिरयान केलक। दुनियॉंलाल िसरमापर माथ रखि पड़ि रहल। आरो गोटे बैसिले रहल। बच्चा सेहो सुति रहल। दुनू परानी रूपलालक मनसँ डर हटबे ने करै। होइ जे फेिर ने देहेपर घर खसि पड़ए। एक बेरि बड़का भूमकम भेल। भूमकम तँ अढ़ाइये-तीन मिनट रहल, मुदा तेहिमे घर-द्वार गाछ-विरीछ तँ खसेबे केलक जे कते लोको दबा-दबा मरल। भूमकम तँ लगले समाप्त भऽ गेल मुदा, तीनि दिन धरि रहि-रहि कते बेरि धरती डोलल। तहिना होइ जे बड़का झॉंट-िबहाड़ि ने चलि गेल। मुदा कहीं छोटका सभ ने फेरि घुिर-घुरि अबै। तहूमे कोन ठेकान जँ छोटकेसँ बड़को चलि आवए। तेँ दुनू गोटेक मन सशंकित भेल रहए। तेतरीक मन सुतैक होय मुदा, सोचए जे पुरूख बैसल रहत आ हम कोना सुति रहब। तहूमे िडबिया जरिते अछि। डिबियाे कन्ना मिझाएब? बेरि-विपत्तिमे इजोते मदतिगार होइत अछि। दुनियॉंलालकेँ तमाकुल दैत रूपलाल कहलक- “भैया, आइ बुझि पड़ल जे अपन सहोदर केहेन होइ छै?” ओछाइनपर सँ उठि दुनियॉंलाल आंगनमे थूक फेिक मुस्की दैत उत्तर देलक- “तखन भीन िकअए भेलै? तोंही कह जे अपना दुनू गोरे सहोदर भॉंइ छी की ने। जखैन सहोदरमे िमलान नै रहत तखन अान तँ आने छी। मनुक्खमे एते बुद्धि होइ छै तखन ई गति छै जे भाए-भाएमे दुसमनी भऽ जाइ छै। अगर जँ एहिना सभ मनुक्खमे होय तखन ओहन मनुक्खसँ उपकारक कोन आशा। अइसँ नीक तँ गाइये-बड़द। जे दूधो दइए आ हरो बहैए।” दुनियॉंलालक विचार सुनि रूपलाल उठि कऽ आंगनमे थूक फेकि कऽ आबि बाजल- “भैया, धरमागती बात कहै छिअह। दुरागमनक पछाति जे विदागरी करबै पठौने रहह, ओइ दिनक बात कहै छिअह। अपनो सौस आ टोलोक मौगी सभ आबि कऽ लगमे बैसलि। अपना बुझि पड़ए जे जहिना बिरदावनमे कृष्ण गोपी सबहक संग वैसि कऽ गप-सप्प करैत छलाह तहिना हमहूँ छी। एक मुहरी सभ स्त्रीगण कहए लागलि जे अहॉंक भाए बड़ छनकट अछि। कतबो कमाएव तँ भाभन्स हुअए देत। अहॉं दुनू परानी कमाएव आ ओ कोशल करत। जखैन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखैन दुनू परानी जुआन छी कमाइ-खटाइ छी। अखैन नै िकछु बना लेब तँ जखैन धिया-पूता हएत खरचा बढ़त तखैन कएल हएत। तेँ नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछु पचताएब।” रूपलालक बात सुिन दुनियॉंलाल ठहाका मारि हँसल। हँसैत ओछाइनपर सँ उठि मुँहक तमाकुल आंगनमे फेिक कऽ आबि बुझबैत बाजल- “कोइ जे तोरा िकछु कहलकौ आ तू मानि गेलेँ से अपन बुद्धि कतए गेल छलौ। तू नै देखै छेलही जे दुनू भॉंइ संगे बोनि करैले जाइ छलौं आ आंगनमे भौजाइ भरि दिन अंगना-घरक काज सम्हारि जरना-काठीक ओरियान करै छेलखुन। तइपर एकटा नांगरिक घास-भूसा आ भानस-भात, खुऔनाइ-पिऔनाइसँ लऽ कऽ बरतन-वासन धरि मँजैत छेलखुन, से सभ अपना ऑंखिये नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत बात की छलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही।” अपसोच कऽ मूड़ी डोलबैत रूपलाल मिरमिरा कऽ बाजल- “हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।” “अपने ऑंखिसँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत मानि लेलही। एकरे कहै छै मौगियाही भॉंज। तोरे जेकॉं आनो-आन मौगियाही भॉंजमे पड़ि कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि-कानि बजैए से िक कहै छै से बुझै छीही। ओ कहै छै जे जहिना बाप-माइक घरारीपर हम कनै छी तहिना बाप-दादाक घरारीपर घरबलाकेँ कनाएव। अरे एतबो ने बुझै छीही जे दुिनयॉंमे सभ कुछ मिलि सकैए मुदा, सहोदर भाय नै मिलैत अछि। भाइयक खातिर लक्ष्मण स्त्री परिवार, समाज सभ छोड़ि देलखिन मुदा, भाइयक अंतिम समए धरि रहलखिन। आइ तोरा के काज दइले ऐलौ। कनियो जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरै लए नइ छोड़ि दैतियो। नै तँ झीकि-झॉंकि कऽ ठाठ देहेपर खसा दैतियौ। नै मरिते तँ हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।” नमहर सॉंस छोड़ैत रूपलाल ऑंखि िमड़ैत बाजल- “भैया, आइ बुझि पड़ैए जे सभ ठकि लेलक।” “कान पाथि कऽ सुनिले। जहिना मनुख सभसँ पैघ जीव अइ धरतीपर अछि, जे बड़का-बड़का चमत्कारी काजो करैत अछि तहिना छुतहरो अछि। देखबीही जे जेकरा कनी बुद्धि-अकील छै ओ सदतिकाल बुड़िवक सभक कमाइ ठकि-ठकि मौजसँ खाति अछि। खेबे टा नै करैत अछि ओकर बोहू-बेटीक संग कुत्ता-बिलाइ जेकॉं इज्जतो लुटैत अछि।” “भैया, आइ बुझि पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीविते अछि।” पिताक रूपमे अपनाकेँ पाबि दुनियॉंलालक हृदय पसीज गेल। बाजल- “बौआ, जे समए बीति गेल ओ तँ बीति गेल। ओ आब थोड़े घुमि कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तहि बीच जे समए अछि ओ तँ बँचल अछि। हमरा तू मोजर देँ आकि नै देँ मुदा, अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी िक ने। अपन कमाइ खाइ छी अपने औरूदे जीवै छी। तइले दोसराक कोन आशा। अपना जे काज दुसैबला नइ करब। जँ ककरो नीक कएल नै हएत तँ अधले िकअए करबै। तोरा प्रति जे काज अछि सएह ने करब।” “भैया, आब आेंघी पीपनीपर आबि गेल। रातियो बेसी भऽ गेल। तोहूँ सुतह अा हमहूँ सुतै छी।” मुनेसरीक मन सेहो उनटैत-पुनटैत मुदा, थीर भइये ने पबैत। एक दिस अपन पैछला जिनगीक बाट टूटैत तँ दोसर दिस नव बाटक बोध नहि रहने बोनाह बुझि पड़ैत रहए। मुदा दुनियॉंलालक विचारसँ झलफलाएल बाट जरूर देखि पड़ैत रहए। जहिसँ मनमे िकछु बदलाव रहए। मनमे उठलै जे जँ नैहरक स्त्रीगणक नीक सिखौल रहैत तँ नीक होइत रहिते। से तँ नहि भेल। मोम जेकॉं मन पघिलए लगलै। मुदा किदु बजैक साहसे ने होय। जहिना मालती फुलक सुगंधसँ विषधर लत्तीमे लटपटा चेतना शून्य बनि जाइत तहिना मुनेसरियो मन भऽ गेल। मने-मन गलती कबूल करैत तेतरीकेँ कहलक- “दीदी, ई सुतथु जॉंति दइ छियनि।” मुनेसरीक बातसँ तेतरीकेँ खौंझ उठल, बाजलि- “तोरा एक्को पाइ लाज-सरम नै छह जे जइ घरमे पुरूख-पात्र छथि तइठाम तूँ जँतबह। जानिये कऽ तँ भगवान विपत्ति देलनि जे सभ िकयो एक घरमे सुतैले एलौं। डिबिया मिण दहक जइसँ कने परदा भऽ जाएत आ तोहूँ सुति रह-अ।” डिबिया मिझाएव सुनि मुनेसरीक मन तत्-मत् करए लगल जे इजोतमे तँ देखबो करै छी अन्हारमे की हएत की नइ से देखबो ने करब। मुदा तइओ उठि कऽ डिबिया मिझा कले-बल पड़ि रहल। काल्हिये ओठर होइत देखि अनुप काली पूजाक हकार दिअए गेल। बहीनोक सासुर, अपनो सासुर आ मात्रिको एक्के डोिरमे। कने घुमौन रहितो सोचलक जे पहिने बहीन ऐठाम पहुँच हकारो दऽ देवै आ अबैले कहि देबइ। मुदा ओइठीन अँटकब नहि। झलफल होइत-होइत सासुर चलि जाएव। ओइठीन रातिमे अटकि जाएव। िकऐक तँ अखनो बुढ़िकेँ के छन्हि जे कतबो धड़फड़ाएल रहब तइओ नहिये आबए देतीह। काल्हि भोर मात्रिक होइत चलि आएव। छोड़ैबला एक्कोटा नइ अछि। एक तँ ओहुना बहीनक मनमे होइत हएत जे जाधरि माए-बाप जीवैत छलाह ताधरि ने नैहर छल मुदा, भाए-भौजाइ ककर होइ छै जे हम्मर हएत। मुदा हमर बात थोड़े बुझैत हएत जे दू थान महींस अछि ओकरे पाछु भरि दिन तबाह रहै छी। अोहुना तँ सालमे एक बेरि-दू बेरि अनबे करै छियै आ जेबो करते छियै। मदुा तइयो मनमे होइते हेतै जे बिसरि गेल। तेँ पहिने ओकरे ऐठा जाएब। दोसर दिन दस-एगारह बजे घुमि कऽ अबिते अनुप देखलक जे महींस पाल खाइले बो-बॉं करैए। एक तँ रस्ताक थाकल तइपर सँ महींसक डिरिआइत देख मन तमसा गेलै मुदा, लछमी पावनि दिन लगले मनमे खुशी ऐलै। हॉंइ-हॉंइ कऽ खेलक आ महींस लऽ कऽ पारा लग विदा भेल। गाममे पारा नहि रहने बगलक गाम पहुँचल। गाम पहुँचते पता लगलै अखने एकटा महींसक संग दछिन मुँहे गेल। फेिर ओहि गामसँ दासर गाम िवदा भेल। दोसरो गाममे पता लगलै जे दछिन मुँहे गेल। जाति-जाित चारि बजेमे एकटा गाछीमे महींसमे पारा लगल रहए। जेहने देखैमे पारा भारी तेहने नमहर-नमहर सिंघो रहए। मरखाहक दुआरे महींसबला अपना अपना महींसकेँ गाछमे बान्हि हटि कऽ बैसल रहए। फरिक्केमे अनुपक महींसकेँ देखि पारा दौगल। पाराकेँ अबैत देखि अनुप हॉंइ-हॉंइ कऽ एकटा गाछमे महींसकेँ बान्हि दोसर गाछपर चढ़ि गेल। तहि बीच पहिलुका महींसबला अपन महींसक डोरी खोलि ससरि गेल। अनुपक महींस लग आवि पारा गछाड़ि लेलक। लगले-लगले तीन-चारि मूठ पारा देलक। मूठ सुतरैत देखि अनुपक मन खुशीसँ नाचि उठल। मुदा पारा डरे गाछपर सँ उतड़बे ने करए। महीसि लग पारा बैसि रहल। मुदा महीसि ठाढ़े रहल। अनुपक मनमे हाय जे जँ महीसो बैसि जाएत तँ ढरकि जाएत। जइसँ पाल सुतरबे ने करत। सॉंझ पड़ि गेल। अमवसिया दिन रहने दोसरि सॉंझ होइत-होइत अन्हार भऽ गेल। अनुपो गाछपर सँ उतड़ि हटि कऽ बैसि गेल। अन्हार देखि अनुपक मनमे जे असकरे छी कोना गाम जाएव? तहूमे तेहेन पारा शेतान अछि जे छोड़बो ने करैए। रातिक दस बजि गेल। हवो उठल आ बून्दा-बुन्दी पानियो शुरू भेल। पानि पड़ते पारा महींसकेँ छोड़ि गाम दिस विदा भेल। हवो आ पानियो तेज हुअए लगल। एक तँ अन्हरिया राति तइपर सँ पानि-हवा जोर पकड़ने जाति। महींसक संग अनुप गाम दिस विदा भेल। कनिये आगू बढ़ला िक झॉंट-पानि जोर भेल। अधा रास्ता अबैत-अबैत घनघाेर बरखो आ विहाड़ियो उठि गेल। अवग्रहमे अनुप पड़ि गेल। अबग्रहमे पड़ल अनुप सोचए लगल जे आइ नइ वँचब। अपटी खेतमे महींसो आ अपनो मरि जाएव। हाथ-हाथ नहि सुझैत अछि। ने कतौ एकोटा लोक देखै छी आ ने अपना कोनो इजोत अछि। बीच पॉंतरमे कन्ना जाएब? तहूँमे अंगो ने पहिरने छी। देहमे जेहो कपड़ा अछि सेहो भीजिये गेल अछि। हवा दुआरे जाड़ो होइए। जिनगीक आशा अनुपकेँ टुटि गेल। मन मानि गेलइ जे आइ नइ बँचव। जखन अपने नइ बँचब तखन महींसे कोन काज देत। बुकौर लगि गेलइ। मुदा कानबो के सुनत? िबजलोका देखि होइ जे देहेपर खसि पड़ल। हवा बन्न भेल। हवा बन्न होइते मनमे आशा जगलै मुदा घनघनाआ बरखा होइते रहए। गाम पहुँचैत-पहुँचैत बरखो बन्न भेल। घरपर आबि थरथराइत अवाजमे अनुप घरवालीकेँ कहलक- “हाथ-पएर कठुआ गेल अछि। कनी घूर करू।” बेटा, नसीवलाल महींस बन्हलक। भुलिया अनुकेँ कहलक- “जाबे अहॉं धोती फेड़व ताबे घूरक ओरियान कऽ दइ छी।” घरवालीक बात तँ अनुप सुनलक मुदा, जाड़े-कठुआ कऽ खसि पड़ल। जाड़सँ देह सर्द-सर्द भेल रहए। बोली बन्न भऽ गेलै। तइपर सँ भीजल कपड़ा सेहो रहै। हॉंइ-हॉंइ कऽ भुलिया लोहियामे गोरहा-गोइठा तोड़ि-तोड़ि दऽ मटिया तेल ढािर सलाइ खरड़ि कऽ लगौलक। घूर धधकल। बेटी सुनरीकेँ भूलिया कहलक- “बुच्ची, झब दऽ करौछमे चारि ढेकरी थकुच कऽ लसुन आ करूतेल ला। अही घूरपर गरमा कऽ सौंसे देह मालिस करव।” माइक बात सुिन सुनरी चारमे टॉंगल लसुनक मुट्ठीमे सँ एकटा ढेंसर निकालि, दाना छोड़ा सिलौटपर थकुचलक। शीशीसँ तेल िनकालि करौछ घूरपर गरमबए लगल। तीनू गोटे -पत्नी, बेटा, बटी- केँ मनमे हाेय जे भरिसक कठुआ कऽ मरि गेल। मुदा सॉंस चलैत देखि आशा बनल रहए। लसुन-तेलासँ तीनू गोटे दुनू तरबो आ दुनू तरहत्थियोकेँ हाथसँ रगड़ए लगल। पान-सात मिनट रगड़लापर अनुप ऑंखि खोलि बाजल- “जाड़ कनी कम भेल।” अनुपक बात सुिन आरो हॉंइ-हाँइ तीनू गोटे रगड़ए लगल। तरहत्थी रगड़ब छोड़ि नसीवलाल चानि रगड़ए लगल। मन हल्लुक होइते अनुप बाजल- “जाड़े छाती दलकैए। कनी चाह बनाउ। जाबे भीतर नै गरमाएत ताबे जाड़ नै छुटत।” पतिक बात सुिन भुिलया चाह बनबैक ओरियान करए लागलि। चाह-पत्ती तँ घरमे रहए मुदा, चिन्नी घरमे रहवे ने करै। एत्ते राति आ ऐहन समएमे दोकानसँ चीनी कोनो अनैत। पतिकेँ भुलिया कहलक- “चाह पत्ती तँ घरमे अछि मुदा, चिन्नी अछिये नहि।” पत्नीक बात सुिन अनुप कहलक- “चीनी नइ अछि तँ नूने दऽ कऽ बना लिअ। ऐहन समएमे कत्तए सँ आनब।” भुिलया चाह बनबए लगलीह। बेटाकेँ अनुप कहलक- “बौआ, कनी थमि जा, धोती फेड़ि लइ छी।” कहि उठि कऽ धोती बदलि गंजी पहीरिलक। चाहो बनल। स्टीलिया गिलासमे भरि गिलास करीव 250 एम.एल; छानि भुिलया अनुपकेँ देलक। जेहने जड़ाएल देह तेहने मुँह रहने चाह गर्म बुझिये ने पड़ै। पानिये जेकॉं घोंटे-घोंट पीबए लगल। अधा िगलास पीबैत-पीवैत देह गरमेले। देह गरमाइते हुहुआ कऽ बोखार अबए लगलै। चाह पीबैत-पीबैत बोखार आबि गेलै। जाड़ हुअए लगलै। ओछाइनेपर पड़ि बेटाकेँ कहलक- “बौआ, बड़ जाड़ होइए कनी कम्मल निकालि कऽ लाबह।” कम्मल ओढ़ि पड़ि रहल। मुदा जाड़ कमैक बदला बढ़ले जाय। पुन: अनुप बाजल- “एकटा कम्मलसँ जाड़ नै कमत। आरो अोढ़ावह।” घरक तीनू कम्मल ओढ़िते देह गरमाएल। देह गरमाइते बाजल- “बौआ, देहसँ खौंत फेकैए।” खौंत सुिन भुिलया बाजलि- “सरद-गरम भऽ गेल। एती रातिमे डाकडरो ऐठीन कन्ना पठेबे। तइमे तेहेन दुरकाल समए अछि जे ओहो औत िक नै।” निराश होइत अनुप बाजल- “जँ औरूदा हएत जीवे करब नै जे रसीद कटि गेल हएत तँ डाक्टरो बुते थोड़े बॉंचव।” भुलिया- “महींसक पाछु जे जान गमबै छी तइसँ नीक जे महींसे बेच लेब।” आशा भरल स्वरमे अनुप पत्नीकेँ उत्तर देलक- “अही महींसक बले तँ दूटा पाइयो देखै छी आ गुजरो करै छी। जँ एकरे बेचि लेब तँ जीवि कन्ना। जिनगीमे एहिना नीक-अधला समए अबै-जाइ छै, तइले कि काजे छोड़ि देब। मरै कए कोनाे ठेकान छै। चलितो काल लोक खसि पड़ैए आ मरि जाइए। तइले महीसि किअए उपटाएव।” अइ अजकल पोरूसाल गाममे किसान गोष्ठी भेल रहै। ओहि गोष्ठीमे जिलोक कृषि-पदाधिकारी आ ब्लौकक पदाधिकारी सभ सेहो आइल रहथि। ओना गामक लेल पहिल गोष्ठी छलए। जहिमे किसानक दुख-दर्दकेँ लगसँ देखल गेल रहै। ओहि दिन गामोक िकसानकेँ सरकारमे अपन भागीदारी बुझि पड़ल रहै। िकऐक तँ अखन धरि गामक लोक सरकारक माने कोटाक चीनी आ मटियातेल धरि बुझैत छलै। गोटे-गोटे साल खैरातक गहूमो आबि जाइत छलै। मुदा तहिसँ बदलल रूप गोष्ठीमे रहए। िकएक तँ िकसानकेँ चािर श्रेणी- लघु, सीमान्त, मध्यम और पैघ िकसानक रूपमे िवभाजित कऽ सबहक लेल सरकारी सुविधाक चर्चा भेलै। सीमान्त िकसानकेँ एक-तिहाइ माने ३३ प्रतिशत सरकारी सहायताक घोषणा भेलै। एक-तिहाइ मदतिसँ लोकमे भरपुर उत्साह जगलै। खेतीक सभ विधा पशुपालन, माछपालन तरकारीक खेती, फल-फलहरीक खेतीक संग-संग उन्नतिशील धान, गहूम इत्यादि अन्नक खेतीमे सेहो मदतिक चर्चा भेलइ। ३३ प्रतिशत माने एक तिहाइ सुविधा पाबि पैघ िकसान आ मध्यम किसानक लेल छोट-छोट कारोवार आ गाइयो-महीिस पोसैक बाट खुजलै। गोष्ठीक िकछुए दिनक बाद पंजाब-हरियाणासँ ट्रकक माध्यमसँ बारह टा जर्सी गाए गाममे आएल। ओहिमे सँ एकटा कारी रंगक गाए राजेसर सेहो दस हजारमे कीनिलक। चारि मास धरि गाए नीक-जेकॉं आठ िकलो दूध दैत रहल। बादमे चारि मासक पछाति एक संझू भऽ गेलइ। जाधरि आठ िकलो दूध गाएकेँ होइत रहल ताधरि दुनू परानी राजेसर सेहो ही खोलि मेहनतो करै। ओना दूधारू घासक खेती नहि केने रहए। ने सुधादाना आ ने कोनो तरहक पौष्टिक आहारक दोकान इलाकामे खुजल। मुदा तइओ राजेसर पुरने ढंगसँ मुसरी आ मकैक दर्रा थोड़-थाड़ गाएकेँ खुअबैत रहए। छह मास बीतैत-बीतैत गाए िबसकि गेलै। बच्छा तरे गाए रहै तेँ गाइयक संख्या तँ नहि बढ़ले मुदा, जतवे दिन दूध भेलै ओहिसँ गाइयक प्रति आकर्षण जरूर बढ़ि गेल रहए। िकएक तँ अखन धरि गाममे एक्कोटा ओहन गाए नहि भेल रहए जेकरा सेर भरिसँ बेसी दूध होइ। ओना गामक गाइयक वंश दिनानुदिन विगड़ैत गेल। तेकर अनेको कारणमे एकटा कारण इहो रहए जे श्राद्धकर्ममे तेेहेन दब बच्छाकेँ दागि सॉंढ़ बनौल जाइत रहए जे गाइयक खाढ़े नष्ट होइत गेलै। िबसकलाक बाद गाय उठवे ने कएल। आठ मास बीतैत-बीतैत राजेसर निराश भऽ गेल। लोककेँ पुछै तँ िकयो-करूतेल पिअबै लए कहै तँ िकयो मेनक पात खुअबै लए कहै। मुदा गाए उठलै नहि। हारि-थाकि कऽ मधेपुर मवेशी डॉंक्टरसँ सम्पर्क कऽ पुछलक। गर्भाशय साफ करबैक िवचार डॉक्टर सहाएव देलखिन। दिवाली दिन राजेसर गाए नेने मधेपुर मवेशी अस्पताल पहुँचल। एकटा बीमार महीसि देखैले डॉक्टर सहाएव भगवान गेल रहथि। गाएकेँ ढाठमे बान्हि राजेसर अस्पतालक ओसार पर तौनी िवछा सुति रहल। सूर्यास्त भेलापर डॉक्टर भगवानपुर सँ ऐला। डेरा अबिते पत्नी कहलकनि- “एक गोटे दुपहरेसँ भुखे-पियासे गाइयक संग बैसल छथि पहिने ओ देखि लिऔ।” दुपहरक नाओ सुनिते डॉक्टर चौंकि गेलाह। साइकिल रखि पत्नीकेँ कहलखिन- “तेहेन बीमारीक भॉंजमे पड़ि गेलहुँ जे छोड़ियो नहि सकैत छलौं। मुदा जखन महींस पाउज धऽ खढ़ उठौलक तखन अपनो संतोष भेल आ महिसोबला कहलनि जे आब महीसि बँचि गेल। तेँ एते अबेर भऽ गेल। मन गरमा गेल अछि पहिने एक लोटा पानि पीआउ आ चाह बनाउ। ताबे कपड़ा खोलि लइ छी।” चाह पीबि डॉक्टर राजेसर लग पहुँच गाएकेँ देखि कहलखिन- “जेँ एते काल बैसलौं तेँ आध घंटा आरो समए लागत।” आशा भरल स्वरमे राजेसर कहलकनि- “तइले नइ कोनो, मुदा गाममे तमाशा सेहो छी आ अन्हरिया राति छी तेँ थोड़े.....।” ढाठीमे गाएकेँ बन्हवा डॉक्टर साफ केलनि। सावुनसँ हाथ धाय एकटा इन्जेक्शन देलखिन। चारि खोराक गोटी दऽ कहलखिन- “काज तँ भऽ गेल मुदा, आब गाम नइ जाउ। एतै रहि जाउ, भोरे दिन-देखार चलि जाएब।” फीस दैत राजेसर कहलकनि- “डॉक्टर सहाएव, अबेरो भेने तँ काज भइये गेल। गाममे मेलो-तमाशा छी तेँ चलिये जाएब।” एक तँ करिया कम्मल जेकॉं अन्हार, दासर कारी खुट-खुट गाए, मने-मन राजेसर सोचलक जे हो न हो कहीं हाथसँ डोरी छुटि जाएत तँ गाए हराइये जाएत। छोड़मे ससरफानी दऽ अपन गट्टामे बान्हि आगू-आगू गाए आ पाछु-पाछु अपने िवदा भेल। थोड़े दूर आगू बढ़ल िक बुन्दा-वुन्दी पानियो आ हवो रसे-रसे जोड़ पकड़ए लगल। हवाक संग-संग घनघनौआ बरखो हुअए लगल। घरपर अबैत-अबैत जहिना अपने तहिना गाइयो जाड़े कठुआ गेल। राति ढहल। गाए टॉंग पटकए लगलै। लगले-लागल उठवो करै आ बैसवो करए। बो-बॉं सेहो करए। समए तेहन भऽ गेलै जे पुन: डॉक्टर ऐठाम जाइक साहसे ने भेलै। ने गाममे मवेशी डॉक्टर आ ने लग-पासक कोनो गाममे। हारि कऽ करूतेल-मटिया तेल मिला, सौँसे देह औंसि बोराक नूरी बना दुनू परानी गाएकेँ ससारए लगल। थोड़े काल ससारि मरीच पीसि करूतेलमे िमला कॉंड़िसँ पिऔलक। मुदा गाइयक रोग हटलै नहि। धीरे-धीरे बढ़िते गेलै। भोरहरवामे खूव जोरसँ डिरिया गाए मरि गेलै। गाएकेँ मरिते दुनू परानी राजेसर कानए लगल। भोरहरवाक कानव सुनि दुनू परानी डोमन दौड़ि कऽ आएल। अबिते राजेसरकेँ डोमन पुछलक- “भैया, की भेलह?” डोमनक प्रश्नक उत्तर नहि दऽ राजेसर कनिते रहल। लगमे अबिते डोमन देखलक जे चारू पाएर छिड़िऐने गाए मरल अछि। मुँहपर तरहत्थी दऽ डोमन बाजल- “भैया, चुप हुअअ। कमाइबला बेटा मरलापर लोक सवुर करिते अछि, ई तँ सहजे नाङरि छी।” डोमनक बात सुिन राजेसर बाजल- “गाए मरि गेल तेकर दुख ओते ने अछि जते बैंकक करजाक अछि। एक तँ सरकार लोककेँ मदति करैए िक गरदनिमे फॉंस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाकी दू हिस्सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देखि लेलौं। बुझबे ने केलियै जे गरदनिमे फँसरी लगबैए। छुट लेल बैंकबला कहलक जे मधमन्नीसँ कागज आनि कऽ दिअ तखन ओइ रूपैयाक मिनहा लोनमे भऽ जाएत। जावे तक ओ कागज नै देब ताबे तक सोलहो आना रूपैयाक सुदि चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि। कोटक मंसीकेँ जा कऽ जा सभ बात कहलियै तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफिस गेल। ओइ ठीमन गेलौं तँ कहलक जे पान सए रूपैया लागत तखन कागज देव। एहिना दौड़-बरहा करैमे हजारसँ उपरे खर्च भऽ गेल। रूपैयाक िकस्त नै देने छेलियै बैंकमे जखन िहसाब करबै लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सुदि मूड़मे जमा भऽ गेल आ ओकरो सुदि लागत। तइ बीच गाइये मरि गेल। आब की करब?” दिवालीकेँ शुभ दिन बुझि सुरतिया भोरेसँ दुनू परानी खपड़ाक भट्ठा लगबए लगल। बीस हजार खपड़ाक भट्ठाक मन मे खशी रहए। बीचमे थोपुआ आ चारू कात नरिया खपड़ाक आवा लगौलक। थापुआ मोटो होइ छै तेँ कातमे लगौलासँ नीक जेकॉं नहि पाकत। आमदनीक खुशी मनकेँ तेन खुड़-खुड़ा देने रहए जे दुनू परानीकेँ काजक भीड़ बुझिये ने पड़ए। दुनियॉंक सभ िकछु बिसरि मन आमदनी देखि तरे-तर हँसए। जहिना कोनो कनैत बच्चाकेँ गुदगुदी लगौलासँ हँसीक लाबा फुटैत तहिना दुनू परानी सुरतियोकेँ होय। भट्ठा लगि गेल। एक तँ सुखार माने रौदियाह समए दोसर कातिक मास। कातिक मासमे चैत-बैशाख जेकॉं ने हवा-विहाड़िक शंका आ ने झॉंट-पानिक। तेँ ने भट्ठाक उपर छॉंही देलक आ ने कातमे टाट लगौलक। पहिल सॉंझ उक-बाती फेरि सुरतिया भट्ठा लग बैसि निङहारि-निङहारि देखए लगल जे कतौ िकदु छुटि तँ ने गेल। फुलेसरी भानस करए गेलि। चुल्हि पजाड़ि अदहन दइते मनमे उठलै जे अधिक लटारम करैमे बेसी देरी लागत तइसँ नीक खिचड़ी आ अल्लू चोखा बना लेब। बैसारी लोक ने छनुआ-बगहरूआ बना जी माने जीभकेँ चसकी पुड़बैए। पावनिये दिन छी तँ की छी। कोनो िक वावनियेकेँ सीमा-नाङड़ि छै, जेकरा रहए छै ओ सभ दिन खाइए। खाइये पाछु जे समए बीता लेब तँ खाइक ओरियान कोना हएत। फेरि मनमे भेलै जे अपने फुरने नै करब हुनको पुछि लइ छिअनि। चुल्हि तरसँ उठि फुलेसरी पति लग जाए पुछलक- “ओना आइ तँ लछमी दिन छी सभ तरूआ-बगहरूआ बनाओत, से की विचार।” सुरतिया मने-मन बीस हजार खपड़ाक दाम जोड़ैत रहए। बारह हजार थोपुआ अछि जेकर दाम बारह हजार भेल। सौ-पचास फुटियो जाएत तइओ नै बारह हजार तँ पौने बारहे हजार रहह। आठ हजार नड़िया अछि जे आठ सए रूपैये बीकत। ओहूमे पच्चीस-पचास अधपक्कू आ फुटि-भांगि जाए तइओ नै चौसैंठ साए तँ छह हजार हेबे करत। कहुना-कहुना तँ सत्तरह-अठ्ठारह हजार हेबे करत। पत्निक बात सुिन उत्तर देलक- “बूढ़ि भऽ गेलौं आ नाक लगले अछि। एतवो नै बुझै छियै जे भट्ठा लगौने छी आगि देवइ तँ भरि राति ओगरि कऽ रहए पड़त। जगरनामे अधपेटे खेनाइ नीक होइ छै िक चढ़ा कऽ। जाउ खिचड़ी आ अल्लू चोखा बना लेब।” अपन िवचारसँ पतिक विचार िमलिते फुलेसरीक मन खुशीसँ नाचि उठल। मुस्की दैत दोहरौलक- “पावनिक दिन छी, तखन.....।” “जाउ-जाउ। जेकरा रहए छै अोकरा िलये सभ दिन होलिये आ दिवालिये रहै छै आ जकरा नै रहए छै ओकरा लिये सभ दिन एकादसिये रहै छै।” खा-पी कऽ फुलेसरी बच्चा सभकेँ सुता देलक। रातिक साढ़े नअ बजैत सुरतिया भट्ठामे मसुरीक दालि छिटैत- “जेहन मसुरीक दालि लाल, तेहन भट्ठा लाले-लाल” कहि आिग देलक। सुखाड़ समए धुधुआ कऽ आगि पजड़ि गेल। आगिक पजड़व देखि सुरतिया पत्नीकेँ कहलक- “अइ बेरक खपड़ासँ पूँजी बढ़ा लेब। दू आदमीकेँ आरो राखि लेब। कहुना-कहुना जँ दसो भट्ठा हाथ लागल तँ लाखक कमाइ भइये जाएत। पूँजी ने पूँजी बढ़बैत अछि। गाममे देखते छियै जे जेकरा दस बीघा जमीन छै अो अपनो साल भरि खाएत से नै होइ छै। हम तँ सहजहि नंगा-फरोस छी। तहन तँ लुड़िये-वुद्धि तेहन अछि जे जनो कमवाएब।” फुलेसरीक बुद्धिमे पतिक बात नहि अँटल। छोट बुद्धिमे पैघ बात कोना अँटत। मुदा पति-पत्निक बीच िक शास्त्रार्थ होइत अिछ। सुयोग कविक कविता जेकॉं तुक िमलौवलि होइत अछि। िवषय-वस्तु िकछु रहौ वा नहि रहौ मुदा, तुकवन्दी जँ नीक रहल तँ ओ श्रेष्ठ कविताक श्रेणीमे अविये जाइत अछि। पतिक प्रश्नक उत्तर फुलिया दैत बाजलि- “अइ बेरि अपनो घरपर खपड़ा दइये देबइ।” अपन घर सुिन सुरतियाक मनमे उठल जहिना घर बनौनिहारकेँ अपना रहैले घर नै रहै छै तहिना तँ हमरो अछि। जाबे विराटनगरमे नोकरी करै छलौं ताबे पेटो चलैमे कोताहिये होइ छलए। मुदा आब जँ वेसी कमाइ हुअए लगल तँ घरो बनाइये लेब। बुन्दा-वुन्दी पानियो आ संग-संग हवो उठल। मेघ दिस देखि सुरतिया बुदबुदाएल- “मेघो कहॉं देखै छियै। एकटा छोटका टुकड़ी बुझि पड़ैए। नै आओत बरखा। मुदा हवा ने एकभग्गू कऽ दिअए। जँ हवा जोर भेल तँ एक भाग कॉंचे रहत आ दोसर भाग झाम बना देत।” हवा तेज होइत गेल आ मेघो पसरैत गेल। पूबसँ बादल आिब-आबि सघन हुअए लगल। जहिना-जहिना बरखा बढ़ए लगल तहिना-तहिना हवो बढ़ए लगल। तड़तड़ा कऽ जोरगर बरखो आ िवहाड़ियो आबि गेल। झॉंट-पानि देखि सुरतियाक आशा राइ-छित्ती भऽ गेल। मास दिनक मेहनतक संग-संग पूँजीयो–-माटि उघैक गाड़ी भाड़ा, जनक वोइन, जरनाक दाम- नष्ट भऽ गेल। टूटल मने पत्नीकेँ कहलक- “सभ िकछु दुइर भऽ गेल।” पतिक बात सुिन फुलेसरी गौवॉंकेँ दोख लगबैत बाजलि- “ई सभ किरदानी गौवॉं सबहक छियै। जखन गाममे काली-पूजाक अड़धेना -आराधना- केलक तँ पहिने भगता बजा पूजा कऽ काली-महरानीसँ वाक लऽ लैत से करबे ने केलक आ अपने फुड़ने पूजा शुरू कऽ देलक। ओकरा सभकेँ की बिगड़लै। देत िकयो हरजाना।” फुलेसरीक जोर-जोरसँ बाजब सुिन सुरतिया डपटैत बाजल- “ऐँह सभटा बुझै छै। राजा-दैवक कोनो ठेकान छै। ककरो हाथमे छै जे ककरो दोख लगबै छियै। कोनो िक अपने टा नोकसान भेल। कते लोकक घर खसल हेतै, चीज-बौस दुइर भेल हेतै िक अपने टा भेल?” पतिक बात सुिन फुलेसरीक तामस गौवॉंपर सँ हटि पड़ोसिनीपर पहुँचल। पड़ोिसनीकेँ गरिअबए लागलि- “तेहेन मरमी मौगी सभ अछि जे अनकर नीक सोहाइ छै। बेटा दऽ दऽ डानि सीखने अछि आ अनकर गरदनि कटैए। जहिना हमर भट्ठा नोकसान भेलि तहिना ओकरो सातो पुरखाकेँ उड़ाहि देवै।” सुरतियाक घरक बगलेमे एकटा मसोमातक घर। जेकरा सभ स्त्रीगण डाइन बुझैत छै। ओकरे ठेकाना-ठेकना फुलेसरी गरिअबैत। गारि तँ ओहो मसोमात सुनैत मुदा, नाओ नहि सुिन कान ठाढ़ केने रहए जे जखने नाओ लेत तखने देखा देबइ। केहेन घनिकपन्ना होइ छै से सभ निकालि देवइ। पत्नी क्रोध देखि सुरतिया सोचलक जे एक तँ जे नोकसान भेल से भेवे कएल तइपर सँ अनेरे झगड़ा सेहो ठाढ़ हएत। हमरासँ िक कमजोर ओ मसोमात अछि। दियादियो बेसी छै आ अपनो दुनू बेटा बुफगर छै। हो न हो कहीं आबि कऽ मािर ठानि दिअए। तखन तँ पूँजीयो गेल आ उपरसँ मारियो खाएव। पत्नीकेँ पोल्हवैत कहलक- “की हेतइ, िकयो कपार लऽ लेत। भगवान जे भोग-पारसमे देने हेता ओ हेबे करत। जे नै देने हेता से अपनो केने थोड़े हएत। तइले एते आगि-अङोरा होइक कोन काज छै। नोकसाने की भेल खपड़ा गलि कऽ माटि हएत ओकरा फेरि खपड़ा पाथि सुखा कऽ भट्ठा लगा लेब। जरनो भीजवे ने कएल ओकरो सुखा लेब। गिरहत सभकेँ देखै छियै हर-जन लगा खेती करैए आ बाढ़िमे दहा जाइ छै तेँ िक ओ मरि जाइए िक खेती छोड़ि दइए। तहिना हमरो भेल। भगवान समांग देने रहथु। सभ किछु फेरि भऽ जाएत।” पतिक बात सुिन फुलेसरीक मन थीर भेल। मुदा तइओ मनमे खौंझ उठिते रहए। बाजलि- “भगवानो दुष्टे छथि। जानि-जानि कऽ गरीबे लोककेँ सतबै छथिन। जहिना ओ करै छथिन तहिना ने हमहूँ सभ करै छिअनि। ने एकोटा उपास करै छी आ ने एको दिन पूजा करै छिअनि।” पत्नीक बात सुिन मुस्की दैत सुरतिया बाजल- “अच्छा आब भऽ गेल। जहिना ओ -भगवान- केलनि तहिना अहूँ करिते छिअनि। सधम-बधम भऽ गेल।” मछुआ सोसाइटी बनने िकछु गोटे उठि-वैसल आ िकछु गोटे गोपाल खत्तामे चलि चलि गेल। ओना सोलहो आना पोखरि सोसाइटीमे अखनो धरि नहि गेल अछि। मुदा जे गेल ओकर मुआवजा तँ पोखरिबलाकेँ नहि भेटल। सोसाइटी बनने नव पानिदार मालिकक जन्म जरूर भऽ गेल। िकऐक तँ एक गोटेक हाथमे अंचल भरिक पोखरि आबि गेल। जहिसँ पर्याप्त उत्पादित पूँजी हाथ लगि गेलै। संग-संग सरकारी खजानाक लूट सेहो शुरू भेल। मनमाना ढंगसँ सोसाइटीक सचिव आ सरकारी तंत्र मिलि कऽ गामक अमूल्य पूँजी लुटब शुरू केलक। ओहि सोसाइटीसँ एकटा पोखरि आ एकटा खानगी पोखरि डेढ़ हजार सलियाना िकस्तपर फुदना माछ पोसैक लेल लेलक। सोसाइटीबला पोखरिक महार, बिनु देखरेख भेने, ढहि-ढुहि कऽ सहीट भऽ गेल छलैक। मुदा रामधनबला पोखरिक मोहार नीक मुँह कान बना जीवित छै। शुरूहे अखाढ़मे फुदना एकटा बेपारीसँ गंगाक जीा कीनि सैरातबला पोखरिमे देलक। आ दोसर पोखरिमे तमुरियाक हेचरीसँ कीनि कऽ आनि देने रहए। गंगाक जीामे रोहू, नैन, भाकुर रहए आ तमुरियाक जीरा सिल्वर काफ रहए। सिल्बर काफ साले भरिमे दू-दू – तीनि-तीनि किलोक भऽ जाइत छैक जबकि रोहू, नैन तँ कम बढ़ैत छै मुदा, भाकुरक बाढ़ि अधिक होइ छै। तीनू जीरा िमला कऽ दैत छैक। पानिक सतहक िहसाबसँ तीनू माछ रहैत छै तेँ तीनू िमला कऽ देल जाइ छैक। शुरू अखाढ़ेमे जे आद्रामे बरखा भेल रहए ओहिमे दुनू पोखरि भरि गेल रहए। पोखरिक पानि आ जीराक सुतरब देखि दुनू परानी फुदनाक मन चपचप करैत रहए जे भगवान दुख हेरलनि। कहुना-कहुना तँ बीस हजारसँ उपरेक आमदनी हएत। जहिना खूब फइल आमक गाछी, खूब उपजल खेत आ खूब दुधगर गाए िवयेलासँ खुशी िकसानकेँ होइत तहिना फुदनो दुनू परानीकेँ मनमे होय। जहिसँ दुनू परानी बेरा-बेरी तीनि-तीन बेरि पोखरिक घाटपर घंटा-घंटा भरि बैसि माछक बच्चाकेँ ऐम्हरसँ ओम्हर हेलैत देखए। घरपर अबैक मने ने होय। माछक कारोवारसँ फुदनाक परिवार पहलेसँ जुड़ल। खड़ड़ब, माछ मारि बेचब परिवारक जीविका रहए। तीन सलिया रौदी भेने फुदना कंठी लऽ लेलक। माछक रोजगार कोन जे माछ खेवो छोड़ि देलक। जे माछक गंध पहिने नीक लगै, आब जी ओकियाए लगै छै। गामक कीर्तन मंडलीमे शामिल भऽ अष्टयाम, नवाहमे कीर्तन करए सेहो जाए लगल आ भनडारा सेहो पुरए लगल। लाट लगने एक हाथ हरिमुनियॉं बजौनाइ, ढोलक बजौनाइ सेहो सीखि लेलक। पाछु-पाछु कीरतन गबैत-गबैत गौनाइयो सीख लेलक। दाढ़ीयो-केश बढ़ा लेलक आ पतलखरीक चानन सेहो करए लगल। समेओ संग देलकै। कीरतन मंडलीक सट्टा सेहो हुअए लगलै। काजो हल्लुक आ प्रतिष्ठाक संग-संग खेनाइयो नीक भेटै आ पाइयोक आमदनी नी भऽ गेलै। मुदा घरवाली सीतिया साकठे रहलि। जहिना माछक वन्यास बनबैमे सितिया लूरिगर तहिना खाइयोमे जीबिलाह। गामक छौँड़ा सभ आ जनिजातियो सभ बगुला भगत कहै। घरमे एक्केटा थारी-लोटा रहए। जहीमे फुदनो खाए आ सितियो। एते बात जरूर रहए जे कहियो फुदना घरवालीकेँ माछ खेवासँ मनाही नहि केलक। फुदना देखवो करै जे नैहरसँ सनेसमे माछे अबै छै। नहियो-नहियो तँ तीनि-चािर खेप मासमे अबिए जाइ छै। सितियाक पिता माछक कारवारी रहए। पोखरियोबला सभसँ आ मधेपुरोक बेपारीसँ माछ कीनि कीनि आनए आ नफ्फा लगा कऽ गामे-गामे घुमि कऽ बेचि लिअए। जहिसँ नीक कमाइ होय। खेत-पथार तँ नहि कीनिलक मुदा, नीक जेकॉं गुजरो करए आ घरो बनौने रहए। एक दिन फुदनाक सार टुनटुनमा दू िकलोक अंडाएल रोहू नेने एलै। नमहर-नमहर कुट्टिया काटि माछ तरए लगल। माछक सुगंधसँ फुदनाक मन मचकी जेकॉं डोलए लगल। जहिना शरीरमे पुरना रोग समए पाबि पुन: जगि जाइत तहिना फुदनोकेँ भेल। गरदनिसँ कंठी निकालि लाचारीक मुस्की दैत पत्नीकेँ कहलक- “दूटा कुट्टिया आ चूड़ा भूजि कऽ नेने आउ?” पतिक बात सुिन व्यंग करैत सितिया बाजलि- “तीन सालमे कते घाटा भेल से बुझै छियै। रोहू माछ खेनिहारकेँ कहियो ऑंखिमे अबै छै। बुढ़ाढ़ियो तक ओहिना चक-चक देखैत रहैए। अखन चुल्हि तरसँ कन्ना उठब। घरमे चूड़ा नै अछि। दाेकानसँ अधा िकलो नेने आउ। ताबे हम अंडाकेँ तरै छी।” जहिना चोरकेँ गरपर रूपैया देखने देहमे तेजी आबि जाइ छै तहिना फुदनोकेँ आबि गेल। जेबीसँ दसटकही निकालि दोकान गेल। सात रूपैयामे अधा किलो कीनि कऽ आबि चुल्हिये लग बैसि पत्नीकेँ कहलक- “ताबे एकटा लाउ।” सितियाक इच्छा रहबे करै। अनेरे दुनू परानी दू दिशाह भेल छी। जहिसँ अनेने सदतिकाल रक्का-टोकी होइत रहैए। तरल अंडा आ चूड़ाक भूजा सितिया पतिकेँ देलक। जहिना कोनो वस्तु अधिक दिनक बाद भेटलासँ आनन्द अबैत तहिना फुदनाकेँ खेवामे आनन्द आबए लगल। फुदना सासुर गेल। ससुरक घरमे धड़ैनपर एकटा छोटका घुमौआ जाल सैंति कऽ राखल देखलक। जाल देखि मनमे एलै जे अनेरे ई जाल रखले-रखले दुरि भऽ जाएत तइसँ नीक जे नेने जाइ। छोटका सारकेँ जाल उताड़ि देखबै लए कहलक। जाल देखि फुदना मांगि गाम नेने आएल। गाममे ककरो बुझले नै रहए आ ने ककरो लग बजवे कएल। अोजार देखि फुदना तरे-तर खुशी रहए। तेसरे-चारिमे दिनसँ ओ पोखरि सभमे साझू पहरकेँ चोरा-चोरा माछ मारए लगल। अपनो खाए आ उगरै तँ बेचियो लिअए। पोखरिबला सभ धपबए लगल। होइत-होइत एक दिन पकड़ा गेल। तत्काल तँ पोखरिबला िकछु नहि कहलकै मुदा, जाल छीनि लेलकै। दोसर दिन भाेरे पोखरिबला पनचैती बैसौलक। पूर्बासायक जरूरते ने रहै िकऐक तँ जाले गवाह रहए। पंच सभ पच्चीस बेरि कान पकड़ि कऽ उठै-बैठै क्रमश: राजेश्वर नेपाली कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि
पं. प्रताप नारायण झा एकटा उच्च कोटिक साहित्यकार रहथि । मूलतः अध्यापन पेशा मे जीवनक महत्वपूर्ण समय व्यतितकए चुकल ज्योतिषीजी के नाम सँ सुपरिचित ओ लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्वर तथा सुकन्या च्यवन दूटा खण्ड काव्यक रचना संगहि अनेक कविता लिखलनि । साहित्यिक प्रतिभावान कवि प्रताप नारायण झा के कवित्वक परिचय हुनक कत्र्तव्य की अछि के जनैछी ? शीर्षक कविता सँ भेटैत अछि । २०५० साल जेष्ठ २८ गते जनकपुरधाम मे नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान के उपकुलपतिक मदनमणि दीक्षितक प्रमुख आतिथ्य मे भेल वृहत कवि सम्मेलन मे पठित कविताक संग्रह लावाक धान मे ओहि कविता संदर्भ मे डा. रमानन्द झा रमण नेपाल मे मैथिली कविताक धार मे टिप्पणी करैत छथि ः– महेन्द्र विद्याभूषण पं. प्रताप नारायण झाक कविता मे विचारक गाम्भीर्यता आ दर्शक उच्चता स्पष्टतः भाषित होइत अछि ः– केहन ई संसार अछि की हम जनैछी ? के जनैछी ? मात्र स्वार्थे एक दोसर सँ जुटल अछि, सब जनैछी । किन्तु जैखन स्वार्थ मे धक्का लगै अछि खसि पडैछी तदपि बंचवाक आगा बंचना करिते रहैछी । टुटि परैछी लडि उठैछी, अपन आनकी नै बुझैछी तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ? कविताक अंत मे कवि लिखै छथि ः– सब देखैछी सब करैछी बेस ततवे सब जनैछी फलक आशा त्याग कय संलग्न मे छी से जनैछी आर की चाही तकर चिन्ता कहां अछि से जनैछी मैथिली संसार अछि कत्र्तव्य की अछि के जनैछी तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ? हुनक प्रथम खण्डकाव्य लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्बर ऐतिहासिक खण्ड काव्य अछि । सात सर्गक एहिखण्ड काव्यक भूमिका मे त्रिभुवन विश्व विद्यालय केन्द्रीय मैथिली विभागक तत्कालिन अध्यक्ष डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र लिखने छथि ः– ज्योतिषाचार्य पं. प्रताप नारायण झा जीक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्यक अध्ययनक सौभाग्य हमरा प्राप्त भेल । मातृभाषा मैथिली मे रचित ई खण्ड काव्य हुनक प्रथम रचना रहितहुँ अपन प्रौढताक कारणे अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत भेल । एकरा हम नेपाल खण्डक मैथिली साहित्याकाशर्क एक गोट दिव्य नक्षत्र मानैत छी । पण्डितजीक वर्णन तन्मयता तथा अभिव्यक्तिक प्रवाह सर्वज्ञा श्याघनीय अछि । प्रथम सर्ग मे ओ मिथिला वर्णन मे लिखै छथि हिम पहाड सँ दक्षिण भागक अड्ड कलिड्ड बंग सँ पर गंगा हरिहर क्षेत्र सँ उत्तर सदानिरा (नारायणी) सँ पूर्व सगर तँ सिमान्तर्गत क्षेत्रक अछि मिथिला नाम परल सुुन्दर शस्य श्यामला धरा जनकर छै उत्तर नगपति छै भूधर दोसर सर्ग मे राजर्षि जनकक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः– मिथिक मनोहर मिथिला मे पृथ्वी पति श्री राजर्षि जनक देश सुधारल प्रजा खुशाहल सुखमय जीवन छल सभहक त्रेता मे भेल भयंकर अनिकाल आ ओकर समाधान क हेतु यज्ञ करबाक निर्णय पर ओ लिखै छथि – अन्न पानि बिनु बांचि सकत के ऋषि मुनि श्रुति सम्मत वाणी जँ जल्दी वर्षा नहि होयत बांचि सकत नहि केओ प्राणी सभासदक सम्मति सँ पारित भेल यज्ञ होबक चाही लाड्डल यज्ञ करथु राजा, तैखन मेटल रौदिक धाही । तेसर सर्ग मे सीता स्वयक पूर्वक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः– मिथिला ग्न जनक अति प्रभुदित रानी के मन मे नहि चैन । सीता कोना खुशीभय रहती ताहि लेल सदिखन बेचैन ।। ओ आगु शिव धनुषक आसपाल निपल गेल संदर्भ मे लिखै छथिः– एक दिन माय सुनयना कहलिन पूजा घरक ठाँव कयलेव । शिवपिनाक घयल छै तकरो आस पास मे निपिओ देव ।। राजा जनक जखन पूजा ला ऐला देखलनि सकभारी । आई ठाँव के कैलक ऐ ठाँ ऐ तरहे अभिनव कारी ।। सुुनतहि आवि सुनयना बजली देखलनि काज चमत्कारी । जे धनु टस मस होय न कनिको कोना उठा सकली भारी ।। कारण तर मे निपल भूमि छै उपर सँ शिव धनु राखल । सीता केलनि ठाँव कहल हम हुनके ऐ ठाँ ठावक लेल ।। चारिम सर्ग मे धनुषयज्ञ क तयारी आ देश देशान्तरक राजकुमार सब आएल लिखै छथि ः– धनुष यज्ञक हेतु जिनका जाहि काजक भार छल । काज झन पट पूर्ण करवा लय सदा तैयार छल ।। ओहि मे स्वागत सत्कारक क्रममे आगू लिखै छथि ः– चहुदिस सँ लोक सब आ राज रजवारक कुंमर । अपन अपना ढंग के रथ तुरग गज बाहन सुधर ।। आवि रहला आवि गेल छथि वैसला स्वविवेक सँ । जनक सब ठाँ स्वागतारथ सेवको एक एक सँ ।। कथुक किनको त्रुटि नहि हो वस्तु नै छल कहथि के ओ । सब सतत् तैयार रहि घुमितो रहथु केओ कतहु केओ ।। पांचम सर्ग मे धनुष भंगक प्रसंग लिखैछथि ः– परशुराम आ लखन मे किछु काल अटपटभय रहल । तखन श्री रघुवंशमणि मुनि रुप देखैतई कहल ।। वीर हीना हो न बसुधा सत्य शिव सुन्दर सबला । गुरुक आज्ञा पावि शिव धनु सहज भावे कर गहल । भूमि सँ उपर उठवितँह टुटि कय धनु खसि परल ।। ओ आगू स्वयम्बरक क्रम मे लिखै छथि ः– तेहि समय सीता माला लय सखि संग ऐली झट तहाँ । श्री धनुषधारी नृपति मणि श्री राम डाढ तथि जहाँ ।। फूल वर्षा भेल नभ एँ मांगलिक बाजा बजल । दिग दिगन्तो धरि प्रवल जयकार ध्वनि गुन्जिते रहला ।। छठम सर्ग मे राम सीताक विवाहक प्रसंग लिखै छथि ः– हर्षमय वातावरण तेहि काल सँ सबठाँ रहला जनक विश्वमित्र सँ शुभ लग्न हेतुक जा पुछला ।। गाधि सुत तेहि काल से राजा जनक सँ कहि देला । अवधपति के नौत पोताक लिखि दिअनु वरियात ला ।। मास अगहन पंचमी तिथि शुक्ल पक्षक नीक छै । अवधपति के चारु पुत कें परिणयन होयवाक छै ।। ओ सर्गक अंत मे तैयारी के संदर्भ मे लिखै छथि ः– अपन काजक सब रखने छलै अपने उपर । देल काजक भार कब कत्त पूर्ण होवय बिना डर ।। ऐ प्रकारे जनकपुर नगरक सजायल वेश छल । प्रजा राजा सब जुटल सुरनर नाम किन्नर यक्ष सब । मैथिलीक परिणयन बुझि प्राकृतिक सौन्दयो कहबा ।। अंतिम सातम सर्ग मे कन्या दलक संदर्भ में लिखै छथि ः– गुरु बशिष्ठक कथन अनुकूले सकल पूर्वाड्ड सब । सदानन्द पुरोहितक आसन पकरि विधि करथि सब ।। कोनो वस्तुत कभी ककरो मैथिलीक दिस सँ ने भेल । समय जखनुक छलै तैखन सिन्दुरक शुभदान भेला गगन सँ सुरवालिका सब पुष्प वर्षा कय रहला मांगलिक सुरतान लय सँ गीत मंगल गा रहला ।। एहि तरहे सात सर्गक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्य कविक मौलिक कृति छैन्हि । २०५२ साल मे कवि द्वारा प्रकाशित एहि खण्ड काव्यक लगले २०५३ साल वैशाख मे सुकन्या च्यपन दोसर खण्ड काव्य हुनक प्रकाशित भेल । सात सर्गक एहो खण्ड काव्य बहुत सुन्दर अछि महोत्तरी जिलाक सकरी ग्राम मे १९८० साल मार्ग शुक्ल दशमी १८ गते हुनक जन्म भेलनि आ ज्योतिष गणिताचार्य एवं फलित शास्त्री ज्योतिषी जी २००७ साल मे प्रजातन्त्र से पूर्वहि सप्तरी के एकटा संस्कृत विद्यालयक शिक्षक के रुप मे अध्यापन सेवा आरंभ कएलनि आ मटिहानीक श्रीराम माविक प्रधानाध्यापक पद स २०४३ साल मे सेवा निवृत भेल रहथि आ ओकर बाद २०६० साल पुस १५ गते निधन पर्यन्त जनकपुरधाम मे विश्वकर्मा चौक सँ दक्षिण मे अपन छोटछिन घर मे रहैत ज्योतिष कार्य तथा साहित्य साधना मे लागल रहलथि । अपन छत्तीस वर्षक अध्यापन सेवा मे रहैत ओ २०२३ साल मे जनसेवा पदक २०२५ मे महेन्द्र विद्याभूषण, २०३६ के शिक्षा दिवस पर पुरस्कृत भेल रहथि आ २०३७ मे दीर्घ सेवा पदक तथा २०३७ सँ २०४० धरि जिला शिक्षा समितिक सदस्य रहथि । पंडित जी मातृभाषा मैथिलीक संगहि हिन्दी मे दर्जनो भजन आ कविता लिखने छथि । उनकर छठम पुण्य तिथिक अवसर पर हुनक स्वर्गीय आत्मा के चिरशान्ति हेतु हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पण करैत छियन्हि । ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २३म खेप ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-आसमानी आकाश ३.४.१.रामभरोस कापड़ि भ्रमर-गजल २. नन्द विलास राय-गीत ३.५.शिव कुमार झा- पद्य ३.६.१.राजदेव मंडल-तीन टा कविता २.सतीश चन्द्र झा-दूटा कविता ३.७.कामिनी कामायनी-बंजारा मोन ३.८.डॉ. शेफालिका वर्मा-दूटा कविता स्व.कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! जागू मॉ आद्या !!
सूतलि वतहिया मैया लागल केवाड़ अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।
मधुकैटभ महिषासुर घातिनि, धूम्रनयन चण्डादि निपातिनि, बीजक शोणित सुरा पायिनी, शुम्भ मारि कऽ शांति दायिनी पसरल फेरो अघलहिया असुरी अन्हार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।
सौम्ये नंदिनी अति भयंकरे, रक्त दंतिके मॉ अयोनिजे, ताकू मॉ अपन संतति केॅ, शाकम्भरि हरि लियऽ दुर्गति केॅ, अहीं सॅ भेलै ताहिया दुर्गम संहार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।
भीमे क्षुधिते असुर भक्षिके, अरूण नाशिनी साधु रक्षिके, अत्याचार कही जॅ हेतै, रक्षाभार अहीं पर एतै, लऽ तिरसूल सुदर्शन पहिया लियौ अवतार अय। जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।
महिमा अहॅक महान भवानी, करू कतेक गुणगान भाविनी भोग मोक्ष दुहू पवै अभव्या, जे अहॅक धुरखुरू भाव्या, हमहॅू संतति नहि वहिया हमरो अधिकार अय । जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय । गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा राधा-२३म खेप (पछिला-२२ म खेप मे अपने पढ़ने रही-)
.... भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँएहि कालक साक्षात्कार मनुष्य जीवन यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम ! से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि राधेहिक देह-प्राण- चित्त ? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?'
जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !...
आब राधा-२३म खेप
क्रमश: कोना शिथिल भेल चलि गेलय शरीरक सब अंग ? परलो मे करोट फेरैत पर्यंत होअ' लगैत अछि आलस,
उठि क' बैसबा काल तं एड़ी सं ल' गरदनि पर्यंत होअ' लगैत अछि उद्वेलित | आ जँ कहुना उठि क' बैसि गेलहुं किछु काल , तं उठि क' ठाढ़ होयबा क्षण तं सद्य: बुझायित रहैत अछि जे ई देह मथुरा ककाक खोपड़ी भ' गेलय| कनिक एक रती बसातो बहि जाय तं डोल' लगैत अछि |खसबा-खसबा पर बिर्त जेना कोनो क्षण -मथुरा ककाक खोपड़ी ! संभव दू टा बांस, दू बोझ खरही-खढ़क तैयार कएल गेल अपने हाथें -खोपड़ी,खुट्टा समेत छारल पर्यंत एतबै सामग्रीक खोपड़ी, कोनो क्षण खसि पड़बाक हालत में टगल ठाड़ ! हमर शरीर सैह भ' गेलए...अनमन । की करी कतय जाय, कोना जाय या जाय किएक ?
एत्तैक असल प्रश्न त यैह कि जयबै कियै करी केकरो समीप ? मुदा देहक तं अछि प्रतिपल एहि इच्छा कष्ट भरल दिन राति हमरे पर भार यैह भार त बनि गेलए आब जेना आनक धनक क' रहल होइ रक्षा आनक अमानतक रक्षा में ई संपूर्ण चेतना, अपने शरीर हाथ पैर आंगुरक शक्ति धरिक क' रहल अछि दिन दिन हरण। बनौने जा रहल अछि सब प्रात किछु आर दुर्बल आर बेसंभार| केहेन पालकी में बीच बाट कनिया के राखि चलिए गेलए सब कहार? ई देह-ठठरी देहक ओहार लागल सबारी राखल रहि गेलए। आब भ' गेलए कतेक दिन, एहिना, एकहि ठाम!
बाट बटोही एक कात स निकलैत बढि जाइत अछि अपन अपन ठाम पहिने कौतुहल तखन करूणा, एक रती चिंता, आ अंतत: समाज के गारि पढ़ैत बढि जाइत अछि अपन गंतव्य| हम लज्जा में कुंठित असुरक्षित, बिदागरीक कनिया बीच बाट के पालकी में राखल पालकी|
किछु करबाक स्पृहा नहि बांचल अछि, किछुटा करबाक नहि होइत अछि मोन | मोन-देह तेना असोथकित लगैत रहैये... जेना कै कट्ठा खेत जोति क' आयल हरबाह होइ | बिना स्नान केने गमछा सं घाम सुखबैत बैसल कोनो गाछ तर। एक रती आर सुस्ता ली, एके रती आर...|तखनि उठि धार, करवा लेल स्नान जे मोन हो थीर ताहि एक रती एक रती में बैसल बैसल निन्न स..झूक' लागल होय आ गाछे में लागि ओठंगि क' भ' गेल हो निन्न।
माथ पर सुस्ताइत चिडै़-चुनमुन्नीक मृदुल कलरवक हरियर पात स झरैत होय जेना देह पर,
आकि बुन्न | मुदा लागि गेल होय अनायास प्रिय |आंखि लागि गेल होय, आंखि लागि गेल होय आ कियो ताकहु नै आयल होय, बड़ी काल! एत धर जे भ' गेल हो मुन्हाइर सांझ | जखनि आंखि खुजल त बुझाय लागल भोर...एकदम स भोर एकर अर्थ जे आई भोर स दुपहरिया त भेल, तकर बाद सांझ,..आ राति नहि भेल । से कोना धरफरैलए दतिमन कर गेलौं...त हंस' लागल ठहाका मारि क' मनोरथा ! - ई की भेलैक, ई त बताह भ' गेलौ रौ, भरलो सांझ क' रहल छहु दतिमन| तेकर त मतलब जे लदतऊ कनी काल में हर आ बड़द हंकैत बिदा हेतऊ बाध! ई त बताह भ' गेलौ..हा हा हा!' लजा क' ओ फेकैत नहि अछि दतमनि| करिते रहि जाइत अछि | ई बुझैत कि भोरक ज़बर्दस्त भ्रम भैले छैक ओकरा | मुदा अखेन सांझे कहलकै- कि हैतै, कियैक बर्बाद करबै नीमक ई ठाड़ि, जेकर क रहल छी दातमिन दांते-मुंह साफ करवा लेल त, कैल जाइत छैक दतिमनि ज लोक कै दिन दू बेर नहा लियै त कोनो दोख नहि, त दू बेर दतमनि क लेबाक लेल एतेक कियैक हंसी जखन कियो नहि छै ल’ग पास, नितांत असकर अछि राधा त के हंसलै ये ओकरा पर, भोर भ जेबाक भ्रम में दतमनि कर लगवा पर के हंसलै ए ! कंठ त अवश्ये कोनो सखी अर्थात सखी बहिनपा के नहि छल, तखन हंसल के ई पुरूख चारू कात आंखि के किछु आर पसारत, तकबाक चिन्हबाक प्रयास करैत भ गेली नब व्याकुल बड़ी काल धैर माथ में छहक्का बजरैत रहलेन, मोन खिन्न, खौंजाईत रहलेन, आ होयत की अपन मुंह अपने नोचि ली, अपन झौंटा अपने उपारि ली। कहुना क' करैत कुल्ला स दांत, सांझक दात्मैन संपन्न, मैल कुचैल आंचर स पोछ लगली मुंह कि अपने हाथ पर बुझैलें दोसर एकटा परम शीतल अपनत्वक हाथ अपने आंगुरि भ गेलेन अचानक अनचिन्हार- हम पोछि दिय मुंह राधा ! बड सुस्त छओ तोहर शरीर...' स्नेह कोमल स्पर्श स पोछि रहल छथि हमर भीजल मुंह | ओह त सैह हाथ थिक ई ??? -छोडू छोड़ू बड आयल छी दया देखबय लेल । राखू अपन नाटकक ई स्नेह अपने लग| आन ठाम देत काज, अहां के कोन प्रयोजन राधाक ?अहां के एकर कोन चिंता!' .... मुदा झटकल कहां भ' रहल अछि तथापि हुनकर हाथ ? हमरे आंचर स पोछैत हमर मुख ?
हाथक सामर्थ्य कियैक भ' गेल अछि सुन्न ! -बड चलाकी के दुलार माधब, नहि हमरे संगे ?' ..से की...से की राधा !..
-मुंहों पोछ' बेसलहुं त हमरे आंचर स...अपन पीतांबरी की दूरि भ' जैत ?
नहि कैलहुं तेकरा एकोरती हमर मुंह स्पर्श स मलिन, बेस !'
-बात से नहिं राधा, हमर पीतांबरी सं तोहर कोमल मुंह खोखरा जेतउ |हमरा तेकर ने चिंता भेल|
देखैत नहि छहीं किदन कहां-दन टांकल छैक एहिमें सोना-रूपाक तार पन्नी सब- माता जसोदाजीक कृपा सं..केहेन छैक खौंचाह-खरखर ?' की त सुंदर लगैत छैन...मुदा तोहीं कह जकरा स हम तोहर मुंहौं नहिं पोछि सकी तेहन वस्त्रक कोन का़ज ? अकार्जक...'
-छोड़ू-छोड़ू बूझल अछि अहांक लीला| हमरा जुनि सिखाउ |
देखू एक रती, केहन खरखर अछि अहांक पीतांबरी, जाहि स चछां जायत हमर मुख ?' स्न्देहें राधा यत्नपूर्वक छूबैत घीचलखिन कृष्णक वस्त्र | त से बात झलफल अन्हारक प्राय: करामाति !
-ओ त से ने कहू। क' क' तं आयल छी कै पहर जमुना विहार !
सौंसे तीतल त अछि वस्त्र अहांक...'
-नहिं राधा से बात नहिं, से नहिं, करै हमर विश्वास...'
-त कोना अछि भीजल वस्त्र, खाउ त हमर सप्पत!'
-कोना भीजल बस्त्र, जदि नहिं चुभकलउं हैं जमुना में भरि सांझ त ?' राधा पुछलखिन
-तोहर सप्पत। ते नहिं। कारण किछु आन छैक राधा।'
-की से त बूझी...'
कृष्ण कठिन असमंजस में पड़ि गेलाह|
की कहथिन्ह, कहथिन्ह बा नहिं...
-कहैत नै कियैक छी ? सोचि रहल हएब कोनो बहाना, झुठ्ठे खेलहुं हैं हमर सप्पत, बुझलहुं
हम| छूबिक कहू त हमर माथ, आर के रहै संग ?' -झूठ नहिं। सुनै। एकटा नेरू चरैत-चरैत जमुना में ओंघड़ा गेल रहैक| एखनि नहिं अबैत छैक हेल' ओकरा | कनिक काल आर होयतै त रघुनी काकाक ओ नेरू डूमिए जेतैक जमुना मे|... तैं जमुना में पैस' पड़ल राधा, अपनी कोरा में उठा क' ऊपर कैलिए.\.अवश्ये ओकर माय फकरैत छल हेते असहाय। बुझहिं मै पर्यंत, भ' जाइत अछि- एहि सृष्टि में कखनो काल केहन असमर्थ, अपन संतान लेल पर्यंत ओकरो कल्याणक नहि कैल भ' पबैत छैक कै बेर जरूरी स जरूरी उपाय। ताहू मै ओ भ' जाइत अछि केहेन निरुपाय। एत' धरि जे संतानो लेल, संतानक दु:खे मायक फकरब होयत अछि बड असह्य काल। बात ई छैक राधा, तैं भीजल अछि हमर देह आर वस्त्र।'
आब भेलौ विश्वास बुद्धू !'
राधा मातृ-व्याकुलता मे हुनकर देह-वस्त्र हँसोथ' लगलीह होइत रहलीह बिकल। कतेक काल सँ छी भिजल देहें अहाँ ? सर्दी नहि भ' जायत हएत नहि ज्वर ? हम कोन उपाय करी आब। अछयो तव नहि कोनो पुरुष-वस्त्र।बेचैन भ गेलीह। कहाँ छनि पुरुखक कोनो वस्त्र घर मे। बजलीह, बल्कि पुछलखिन-' की करू, की पहिराउ अहाँ कें एखनि, बाजू ने।'
-से तं जानयँ तों, तोहर उपाय। हम की कहियौ ? बस्त्र तँ ठिके जहि छौक हमरा योग तोरा लग मे। किंचित करैत अभिनय एक रती भ' क' गंभीर एक रती हास कएलखिन-' एकटा उपाय छौक, करबें से ?'
-'बाजू जल्दी, की ? कहू।' राधा व्यग्र भेलीह। प्रत्याशा मे ताक' लगलीह कृष्ण दिस।
-अपने नूआ द' दे' खोलि क', हम सएह पहिरि ली...'
ओहन झलफल अन्हार मे पर्यन्त स्पष्ट देखार देखलनि- श्रीकृष्णक ठोढ़क दुर्लभ कुटिल बिहुँसी, राधा। सर्वांग संगीत-सुन्न भ' गेलनि चेतना । एक्के क्षण लेल मात्र मुनएलैन राधाक दुनू आँखि। बजलीह-
-'हर्जे की माधव ! लिय' अहाँ कें ने लागय बोखार, हो नहि एको मिसिया कष्ट...लिय',...
सत्ते उतार' लगलीह राधा अपना देह पर सँ आँचर खोल' लगली-साड़ी...। देखितहि कृष्ण भेलाह राधहु सँ बेशी व्याकुल।
-' ई की करै छें राधा ! बताहि ! पकड़ि लेलखिन राधाक हाथ। -' जुनि हो एना उद्विग्न। कह’ लगलखिन हमरा ज्वर नहि हएत।मोन खराप नहि हएत। कनियें काल मे तँ चलि जायब आँगन| बदलि लेब भिजलाहा ई वस्त्र । नहि कर तों चिन्ता ।' राधाक कोमल कृश हाथ कें स्नेह सँ दबैत कर' लगलखिन कृष्ण हँसी-'...मुदा एकटा क'ह, तोरो ई कोन चलाकी? देह परक साड़ी खोलि क' देबाक बदला राखल कोनो नइं द' सकैत छलेहें ? कि तं चिन्तो देखा देलौं आ कनियों हेतनि कृष्ण के लज्जा बाँचल तँ देह परहक साड़ी तं नहिये करता हरण। बूझल छौ । की सैह बुधियारी ने ? बाज..'. -' नहि माधव,एना नहि किचकिचाउ हमरा। नै करू ठठ्ठा। अहाँ कहाँ कहलौं राखल साड़ी देब' हमरा? से तँ कहलौं पहिरलहे दे। एको क्षण तखन किएक हो देरी ? एको क्षण किएक रह' पड़य भीजल अहाँ कें। आ जखन अहींक इच्छा से, तँ हमरा हेतु कोन बाट ? अहाँ जे मंगलौं सएह हम देलौं। हम द' रहल छी।' कहैत राधा शान्त,प्रकृतिस्थ। एको रती ने विचलित। बल्कि तकैत सम्मुख कृष्ण कें पीबैत...आंखि असोधार... -'मानि ले तोहर ई साड़ी पहिरने हम निकलितौं ..लोक देखितय..लोक की तोरे सखि-बहिनपा- तखन की होइतौक ? होइतौ नइं तोरा लाज? लोकक ?' ओ बिहुँसि रहल छलाह प्रेम कुटिल बिहुँसी । -‘से पक्ष अहाँक। हमर कोन मर्यादा आ लोक लज्जा। बनल रहय भरि समाज, से पक्ष आ दायित्व अहाँक कृष्ण, मात्र अहीक।‘ कृष्ण अपन हाथ कान्ह पर पुनः केश पर फेरैत राधा कें ललाट पर लैत अलौकिक चुम्बन, बाँहि कें करैत किछु आओर प्रगाढ़, अनचोखे हिचुक' लगलाह।हिचुक' लगलीह राधा हुनके संग-बड़ी काल बड़ी काल, आर बड़ी काल...
एहिना चलैत बितैत रहल कएटा ने युग... ज्योति सुनीत चौधरी आसमानी आकाश ऋतुक बदलैत रूप संग धरैत भिन्न भिन्न रंग बीति रहल मानवक जीवन सभ दिन देखैत नव परिवर्तन समस्याक आगमन बिन सूचना अवधि सेहो अज्ञाते जेना स्वयमकेँ कालानुसार रमौने ध्येयपर मुदा आँखि टिकौने विपरीत काल समाधान ताकैत बाधाकेँ एक-एक कऽ छाँटैत धैर्य आ परिश्रमकेँ हाथ धऽ असंभवोकेँ बनाओल सम्भव अनेक दिनुका अनवरत प्रयास स्वच्छ विशाल आसमानी आकाश १.रामभरोस कापड़ि भ्रमर-गजल २. नन्द विलास राय-गीत १ रामभरोस कापडि भ्रमर गजल
समुद्रक गहिंरइ अपना भितर नुकौने कतेको आश इच्छाके भरिसक दबौने मुस्कीक इजोतमे फतिंगाके फंसबैत, भ्रम दीपक देखा मुंह सुरसाक बनौने । हा,प्रकृति किए मुरुत गढलौं एहन, छुरी भोंकितो सदैब जे छातीस लगौने । रुप भिनसर हो कि बेछप सांझ करिया, राजमार्गोके अनेरे एकपेरिया बनौने । सक्क छै जकरा निमाहत ग प्रीत नेह, आमंत्रण बटैत रही छिटकिल्ली लगौने । मायाजाल फंदामे बेरबेर घुरिआइछ भ्रमर, बुझी आगा छै कुण्ड तैयो चली डेग बढौने । २ नन्द विलास राय ग्राम,पोस्ट- भपटियाही, टोला- सखुआ, वाया- नरहिया, जिला- मधुबनी, िबहार। गीत कतेक दिनसँ हम, चिट्ठी लिखै छी, कथी ले रूसर छी पिया, िकएक ने अबै छी बीत गेलै दुर्गापुजा, िबतलै दियारी, िबरहा सतबैए हमरा राति कारी-कारी, एक दिन िजबै छी पिया, एक दिन मरै छी, कथी ले रूसल छी पिया, किएक ने अबै छी। जहियासँ परदेश गेलौं अहॉं, दिलकेँ नहि अछि चैन यौ, कनेको नहि दैत छी अहॉं हमरा गप्पक मािन यौ, निनो नहि अबै रातिकेँ तारा गिनै छी, कथी ले रूसल छी राजा िकएक नहि अबै छी। गाछ सभमे लटकल अछि एमकी रंग-बिरंगक आम यौ आम खाइ ले पिया हमर, आबि जाएव गाम यौ, भाेरसँ हम सॉंझ धरि अहॉंक रास्ता तकै छी, कथी ले रूसल छी पिया, किएक नहि अबै छी। अपन शरीरपर पिया देबै अहॉं धियान यौ, दुिनयॉंमे नहि अछि हमरा, अहॉं छोड़ि आन यौ, अहॉंकेँ दीर्घायु खातिर पूजा करै छी, कथी ले रूसल छी पिया, किएक नहि अबै छी बुच्चीकेँ ओझा आनलक लँहगा-पटोर यौ, ऑंखिसँ झहरै हमरा दिन-राति नोर यौ, बुच्चीकेँ दुल्हा देखि-देखि हम जरै छी, कथी ले रूसल छी पिया, किएक नहि अबै छी। हमरा नहि चाही राजा लँहगा-पटोर यौ, आम खाइ ले आएव मुदा, अहॉं श्योर यौ, चिट्ठीसँ नहि अएलौ अहॉं, फोन करै छी, कथी ले रूसल छी पिया, िकएक नहि अबै छी। शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम : शिव कुमार झा,पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि : 11-12-1973,शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! हे तात !!
विलखि रहल छी अन्हर जाल मे, छोड़ि कत चलि गेलहुॅ तात । कॉपि रहल छथि सूर्यमुखी आ, कुहरथि वृद्ध कनैलक पात ।। टोलक सभटा नेना भुटका, आश लगौने घूमथि वथान । के देत उदयन धामक पेड़ा, के देत मिठगर मगही पान ।। पंडित बाबा खाट पकड़लनि, ककरा मुख सॅ सुनता गान । श्यामजी अश्रु इनार मे पैसलनि, आव के कहतनि पैघ अकान ।। आर्या मॉक दुआरि सुन्न अछि, सत्संगी सभ ओलती मे ठाढ़ । भक्ति सागरक धार विलोकित, लुप्त गगन मे अहॅक कहार ।। अनसोहॉत ई दैवक लीला, कोना वनौलनि मर्त्य भुवन ? विज्ञानक ऑगन सॅ बाहर, जन्म मरण जीवन दर्शन ।। करतीह कोना श्रृंगार मेनका, करतनि के रूपक वर्णन । देवराज छथि कोप भवन मे जल विनु करव कोना तर्पण? मुख मलीन कहियो नहि देखलहुॅ, सुख दुख सॅ अहॉ विलग विदेह । अंतिम भीख मॅगै छी बाबू, दर्शन दिऔ एक वेरि सदेह ।। १. राजदेव मंडल-तीन टा कविता २. सतीश चन्द्र झा-दूटा कविता
१ राजदेव मंडल
1 कठुआएल-रूप
एहि मुरूतकेँ पूजैत
आ गबैत मंगल गान
हम भेलहुँ जवान
मनमे छल पूर्ण आस
भरल आत्मविश्वास
विपत्तिमे होएत सहाइ
दैत रहलहुँ दोहाइ
करैत रहलहुँ जय-जय
किन्तु हिनका सोझेमे
सभ कुछ हेरा गेल
हमरा सँगे भेल अन्याय
ओ देखैत रहल निरूपाय
नहि भेटल मेवा
किएक करब सेवा
थुड़ि कऽ देबै फेक
नहि रहए देबै रेख
क्रोधसँ कँपैत हम
चला देलिएक लट्ठ
िहनका माथपर
आ गातपर
टूटि कऽ भऽ गेल छहोछित हम भेलहुँ आश्चर्य चकित
पर आशाक बीपरित
मुरूतक भीतरसँ
निकलल भयावह रूप
टुकुर-टुकुर तकैत
भेल अछि चुप्प
हमरा दिश देखतहि
ओ लटुआ गेल
लाजसँ कठुआ गेल।
2 सुनगैत चिनगी
छाउरक ढेरीपर
मिझाइत चिनगी
सोचि रहल अछि
अपना शक्तिक विषएमे
“डाहि सकैत छलहुँ
सम्पूर्ण विश्वकेँ
किन्तु पड़ल छी आइ
उपेक्षित सन
जीबि रहल छी
एहि आशापर
जे उठत जोरगर बसात
करत हमरा साथ
पहुँच जाएव भुस्साक ढेरीपर
आ पुन: लहलहा उठब हम
तखन डाहि देव ओहि महलकेँ
जे रँगल अछि शोणितसँ
खाक कऽ देव ओहि जंगलकेँ
जाहिमे नुकाएल रहैत अछि
कुमंत्रणा करैत हिशंक जन्तु
आ हम अपना धधरासँ लिखब
नभपर नव इतिहास।”
3 अहॉंक आगवानी मे
हम सोचलहुँ-भेल अिछ
शुभागमन
िकन्तु बसात बनौलक
पदचापक भ्रम
के रोकि सकैत अछि
उड़ैत मनकेँ
फड़कैत तनकेँ
तेँ विवशताबश
बन्न दरबज्जाक-रन्घ्र
बनि गेल-चक्षु
निहारबाक हेतु
चानकेँ
किन्तु डर छल
उमड़त धनकेँ
तइयौ-आसमे डूबल
दिलकेँ थामि
एकटक तत्पर छी
आगवानीमे
परन्तु, भूत बनल जा रहल
वर्तमान
कि पथ अछि कंटकमय
वा दिल पाषाणमय
भविष्यक अागिमे
जरैत मन
नीरीह तन।
२. सतीश चन्द्र झा
भूखल पेट
सड़कक काते गली -गली सँ पन्नी कागत बीछ - बीछ क’। जीबि रहल अछि एखनो मानव दृश्य ठाढ़ अछि केहन विकासक।
रद्दी-फद्दी, डिब्बा- डुब्बी जे भेटल ल’ गेल समटि क’। गंदा-गुन्दी किछु नहि बूझत ल’ जायत सभ ताकि हेरि क’।
जड़तै तखने ओकरो चुल्हा भरतै पेट राति मे कहुना। शिक्षा के अधिकार करत की छै एखनो जे रोटी सपना।
फाटल साटल वस्त्र देह पर लाज अबोधक कहुना छाँपल। जएत कोना इस्कूल पीठ पर शीशी बोतल दै किछु बान्हल।
छोट छोट नेन्ना उठि भोरे दौड़ जाइत अछि रौद बसाते। भरतै पेट कोना परिवारक अछि गरीब अक्षर सँ काते।
मासक मास अभाव सुअन्नक एक साँ किछु खा क’ जीबय। अछि धिक्कार समाज राज्य कें जौं आबो किछु भूखल सूतय। सतीश चन्द्र झा, मधुबनी
पाँच साल
छल भेल प्रफुल्लित गाम गाम जहिया जड़ शासन अंत भेल। स्वागत मे जन जन छलै ठाढ़ सुन्दर भविष्य कें स्वप्न लेल।
बदलल प्रदेश के किछु बसात सुख शांति फेर सँ उतरि गेल। चलि पड़ल विकासक विवध चक्र जीवन कें जड़ता लुप्त भेल।
ल’ सकल मुदा नहि चित्र अपन संपूर्ण सुभग सुन्दर स्वरूप। भ सकल नष्ट नहि एखनो धरि भ्रष्टाचारक दानव स्वरूप।
बनि रहल योजना नित नव नव घुरि रहल जिला सँ देल पाइ। ऑफीसर लागू करत कोना नहि छै जइ मे एकरा कमाइ।
प्रतिपक्ष अगिलका सरकारक गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल। वातानुकुलित घ’रक जीवन नहि किछु बुझतै रौदी अकाल।
छै आबि गेल ओ समय फेर धन बल सँ सभ जीतत चुनाव। सामर्थ्यवान के संग लेत भूखल सँ एकरा की लगाव।
सभ दोष एक दोसर कें द’ छीनत फुसला क’ पाँच साल। सुख दुख ओहिना जीवन ओहिना जहिना छल बीतल पाँच साल। कामिनी कामायनी बंजारा मोन मन मस्त मतंग फकीर बनल । मन सोर करैत अछि बेर बेर मन पड़ा रहल अछि फेर फेर डोलैत जाइए मन इम्हर उम्हर ई दंड भेदसँ बाहर अछि । मन झूठ फूइस गढि रहल सदा मन दौड़ भाग करि रहल सदा मन केँ परतारय लै प्राणी केहेन केहेन इतिहास गढल मन ककरो बसमे आयल नै मन जोगी भऽ रमि रहल इम्हर मन भोगी भऽ पड़ि रहल उम्हर मन केँ लाज लिहाज नै छै मन हेहर छै़ मन थेथ्थर छै ई चंचल पथ के राही छै । मन भागि रहल अछि चानक लेल मन सूरूज देखि उधिया लागल मन धरती पर छिछियाय रहल मन अनंतमे सन्हियालि रहल़़ मन कखनो शांत प्रशांत नहि । कखनो उकटा पैंचीमे कखनो बाकसमे अटैचीमे कखनो नरमे नारीमे कखनो धोतीमे साड़ीमे कखनो दादा परदादामे कखनो मान मर्जादामे हुलकी दैत अछि बेर बेर । गहनामे कखनो गुरियामे कखनो भाँगक पुरियामे कखनो तीमन तरकारीमे कखनो कोठीमे अटारीमे मायामे उनटै बेर बेर । बिरहा पर मन अछि डूबि रहल मल्हार पर अतिशय फूलि रहल मन करै छै कखनो साम गान कखनो कखनो फूसही बखान कखनो कानैत अछि नोर झोर कखनो हुलसति अछि जोर जोर । मन सज्जन छै मन हरीफ छै़ मन तुलसी छै मन कबीर छै़ मन के किछुओ अलभ्य नहि ई चारू लोकक मालिक छै़ । मन राह बाट के राहगीर लमहर चौरस वा बानवीर नृत्यरत अछि राति दिवस मन के कखनो विराम नहि मनक पाथेय छै बस चिन्तन । मन भ्रमण करै छै जुग जुगसँ ई सभ तर बूलै जुग जुगसँ मन रास विलास करैत सदा मन सन कोनो बंजारा नहि मन जोगी छै नागा जोगी । डॉ. शेफालिका वर्मा 1.इजोरियाक भाषा चलु, परछाहीं क पार हम घुइम आबी.. लिखल जे सांसक गाथा मौनक भाषा में ओकरे हम गुनगुनाबी........................ दर्द प्राण में अहाँक स्मृति केर बिलखि बिलखि छटपटा रहल आहत गीत उमढ़ी उमढ़ी बैसि अधर पर कुहरि रहल ! साँझुक दम तोढ़ैत बेला चैती बयारक कम्पन चांदनी बैसि हमर अहांक लिखि रहल ओ भाषा जे नै कहि सकलों हम अहांके नहि कहि सकलों अहाँ हमरा चलु, तखन इजोरिया से पुछि आबी अपन अहांक मूक गाथा मौनक भाषा में ओकरे हम गुनगुनाबी........... +++ 2.उपेक्षित अपन सोचक बेडिंग दिमागक कम्पार्टमेंट में रिजर्व बर्थ पर दैत छी पसारि कल्पनाक रंग विरंगी बिछोना बेडिंग में से गेल बहिराय! आ हृदयक नयन टुक टुक तकैत ऐछ के आवि एहि भाविक बेडिंग के अपनाओत ??? मुठ्ठी से रेत जकां समय ससरी जायछ आ सोचक बेडिंग ओहिना पडल रही जायछ उपेक्षित अनछुअल........... कोंकणी कथा : मर्णताळणी मूल कथाकार : वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री सेबी फर्नांडीस मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह मृत्युकेँ टारब “कनिष्ठ अभियंताक जीप आबि रहल अछि.....सभ केओ काज पर लागि जाउ।” गाछ पर चढ़ि मौध निकालबाक प्रयास क’ रहल फ्रांसिस पहाड़ीक बाटे हपसैत अबैत जीपकेँ देखि सभ मजदूरकेँ चेतएबाक स्वरमे चिकरल आ स्वयं सेहो शीघ्रहिं नीचाँ उतरि गेल। बीड़ी पीबाक बहन्ना सँ काम बन्न क’ कए गप्प कर’ वला आ लगपासमे बैसल सभटा मजदूर हाँइ–हाँइ उठि हाथमे दबिया ल’ क’ गाछ–बिरीछ काटए लागल। आइ भोरहि सँ मजदूर सभ मोन लगा कए काज नहि केने छल। हमरा सभकेँ दाणे पहाड़ दए चढ़िकए अबैत–अबैत साढ़े नओ बजि गेल रहय । आइ हम स्वयं ओकरा सभक समक्ष ठाढ़ भ’ कए काज नहि ल’ रहल छलहुँ एहिलेल ओहो सभ नहुएँ–नहुएँ काज क’ रहल छल। बिना काजक दिन खेपैत देखियो कए हम ओकरा सभ पर गोस्सा नहि क’ सकलहुँ। आइ हमर मोन नीक नहि रहय। भोरहिं सँ हम पहाड़क टिल्हा पर सातनक गाछक नीचाँ बैसल रही। हम जतए बैसल रही ओतए सँ नीचाँ सलावली नहरक काज चलैत रहैक, जे साफ झलकैत रहैक। बहुतो रास मशीनक हल्ला होइत रहैक। नहरक काज आधासँ बेसी भ’ चुकल छलैक। आगूक पाँच–छओ बरखक भीतरहिं काज पूर्ण भ’ जएबाक उमेद रहैक आर ओहि नहरक पानि पीबा आर आन प्रयोगक लेल एहि दाणे पहाड़ पर ट्रिटमेंन्ट प्लान्ट बन’ वला रहैक। हमरा एतुका कार्यभार भेटबासँ पूर्वहिं निरीक्षण भ’ गेल रहैक। यैह किछु दिनमे काजक ठीका (निविदा) निकालि ठिकेदारकेँ काज संपन्न करएबाक आदेश द’ देल गेल रहैक। अगिले सप्ताह मुख्यमंत्रीक हाथेँ शिलान्यास हेबाक रहैक। एहिलेल ओहि जमीनकेँ चिह्नित करबाक लेल कार्यपालक अभियंता साहेब एतेक मजदूरकेँ लगा कए एहि महत्वपूर्ण जमीनकेँ साफ करबाक लेल कहने छलैक। काल्हि आ परसू तँ मजदूर सभकेँ लड़ा–चड़ा कए हम नीक जकाँ काज करा लेने रही मुदा आइ हमर मोन काजमे नहि लागि रहल छल। कनिष्ठ अभियंताक जीप पहाड़ीक बाटे एम्हरे आबि रहल छलैक आ ओहिसँ आबए बला आवाजसँ हमर बेचैनी बढ़ल जा रहल छल। सभ मजदूर दौड़ि कए काज करबाक नाटकमे लागि गेल, मुदा हमरा उठि कए ठाढ़ होएबाक साधंस नहि भेल। हमरा बुझाइत छल जेना हमरा देहसँ प्राण निकलल जा रहल हो। काल्हि भोरहिंतँ कनिष्ठ अभियंता द्वारा कार्यस्थल केर निरीक्षण क’ लेल गेल छलैक तखन एखन दिनक बारह बजे ओ किएक आबि रहल छलैक? निश्चित रूपेँ ओ हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आबि रहल हेताह, हमरा लागल। “आइ काज पर नहि जाउ” भोरहिसँ हमर घरक लोक सभ कहैत छलाह। बाबूजी कखन अपन अंतिम साँस लेताह भरोस नहि। ओछाओन पर पड़ल बाबूजीक हालति एकदम खराप भ’ गेल छलनि। मुदा दाणे पहाड़केँ साफ करएबाक काज हमरा भेटल रहय। जँ एहिकालमे कोनहुँ प्रकारक व्यवधान भेलैक तँ हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी कार्यपालक अभियंता पहिनहिं द’ देने रहय। हम कनिष्ठ अभियंताक व्यवहारसँ नीक जकाँ अवगत रही एहिलेल हम घरक लोकसभक कथनी नहि मानि डिब्बामे दूटा रोटी राखि काज पर चलि देलहुँ। हमरा दाणे जंक्शन धरि पहुँचतहि आठ बजि गेल छल। सभ मजदूर अपन–अपन दबिया आ डिब्बा ल’ कए हमर बाट देखैत छल। दाणे पहाड़ दिस जाएबला ट्रक सभक बाट नहि देखि हमसभ पयरे चलब आरंभ क’ देलहुँ जे जँ बाटमे कतहुँ ट्रक भेटि गेल तँ ओकरा हाथ द’ देबैक। मुदा कुर्डे पहुँच’ धरि हमरा सभकेँ एक्को टा गाड़ी नहि भेटल। ओतए सँ एकपेरिया बाटे अएबाक कारणेँ हमरा सभकेँ बड्ड विलम्ब भ’ गेल। मरणशय्या पर पड़ल हमर बाबूजीक चिन्ता आर पैदल चलिकए अएबाक थकानक कारणेँ हमर प्राण कंठ धरि आबि गेल छल। आ एखन हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आब’ वला जीपकेँ देखिकए हमरा आँखिक सोझाँ तारा नाचए लागल। गाड़ी ऊपर आबि रहल छल। केहनो हृदयविदारक समाद हो हम ओकरा सुनबाक लेल अपना मोनकेँ एकाग्रचित्त केलहुँ आ आँखि मुनि लेलहुँ। हमरा आँखिक समक्ष चित्र सभ नाचय लागल – ‘आब ओ जीप ठहरत.....कनिष्ठ अभियंता जीपसँ उतरि जेताह.....काज करएवला मजदूर सभसँ “पर्यवेक्षक कतए छथि ?” पूछताह.....ओ लोकनि गाछ दिस आँगूर देखेतनि, अभियंता घुमिकए हमरा दिस उपर अओताह.....हमरा कान्ह पर हाथ राखि बजताह.....मिस्टर नायक......हमसभ एखन सांगे केर कार्यालय जाएब।’ हम चुप रहब। अहाँक लेल एकटा खबरि अछि....इट इज नॉट मच सिरियस.....(ओतेक चिंताजन नहि अछि.....) मुदा अहाँकेँ शीघ्रहिं घर बजाओल गेल अछि। हम जीप ल’ कए ओम्हरे जाएबला छी.....ओतहिसँ अहूँकेँ छोड़ि देब। कनिष्ठ अभियंता जानि-बूझिकए हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि नुका रहल अछि, ई हमरा पता लागत.....हमर करेज फाटि जाएत, हमरा आँखिमे नोर आबि जाएत। यू इडियट (बदमाश).....,एमहर आउ ! राजा जकाँ बैसल छथि....नॉनसेन्स (बेकूफ)। अहाँकेँ देल गेल काजक कोनो परवाहि नहि अछि? आब अहाँकेँ घरहिं पठा देब.....। सोचलहुँ की आ क्षणहिंमे भ’ गेल की, हमरो पता नहि चलि सकल। आँखि खोलिकए देखलहुँ तँ कनिष्ठ अभियंताक जीप ल’ कए आएल कार्यपालक अभियंता हमरा पर डाँट–फटकारक बरखा केने जा रहल छल। अपना समक्ष राक्षस सदृश ठाढ़ कार्यपालक अभियंताकेँ देखि हमर तँ हड्डी काँपि गेल। हे भगवान, एहि ब्रह्म बबाक चाँगुरसँ हमरा मुक्ति दिया दिअ। मोनहि–मोन भगवानसँ प्रार्थना करैत हम कार्यपालक अभियंताक समक्ष ठाढ़ रहलहुँ। अहाँक ओकादि एतेक बढ़ि गेल? मजदूर सभपर ध्यान नहि राखि, हमरा अबैत देखियहुकेँ ओतए साहूकार जकाँ बैसल रहलहुँ? ई सभटा काज चारि दिनक भीतरहिने संपन्न करएबाक लेल कहने रही , कमीना नहितन? एना तँ अहाँ हमरहु संकटमे द’ देब....ठहरू ! एखनहि हम अहाँकेँ सबक सिखबैत छी....हम एखनहि कार्यालय जा कए, अहाँक ‘टर्मिनेशन ऑर्डर’ निकालि दैत छी...। क्षण भरिक लेल हमरा एहन बुझाएल जेना एकटा अल्सेशियन कुकुर हमरा पर भूकैत एम्हरे आबि रहल अछि। हमरा मुँहसँ एक्कहुटा शब्द नहि नकलि सकल। साहेब, हिनक बाबूजी बहुत बेराम छनि....एहिलेल ओ कनेक कालक लेल बैसि गेल छलाह, एकटा मजदूर हमर पक्ष लैत कार्यपालक अभियंताकेँ समझएबाक प्रयास कएलक मुदा साहेब पर हुनक बातक कोनहुँ असरि नहि भेलनि। बेराम छथि तँ होमए दिऔक, जीवैत तँ छथि ने? एहि तरहक बहन्ना बना कए अहाँ काज परसँ बेसी नागा नहि रहल करू, नहि तँ सभदिनक लेल घरहिं बैसा देब। कार्यपालक अभियंता हमरा पर आओर भड़कि गेलाह। ओहि भरल दुपहरियामे हमरा आँखिक समक्ष तरेगन झिलमिलबए लागल। यूजलेस सुपरवाइजर....(बेकाम पर्यवेक्षक....) एतए आउ.....देखू ई सभटा गाछ–बिरीछ कटवा लेब। परसू धरि ई सभटा साफ भ’ जएबाक चाही। मंगल दिन सी.एम. (मुख्यमंत्री) अओताह, ओहिसँ पहिने कनिष्ठ अभियंताकेँ चिन्हित करबाक लेल ई जगह साफ–सुथरा भेटबाक चाही। जँ ठीक समय पर ई काज नहि भेल तँ हम अहाँकेँ देखि लेब। अहूँ सभ केओ सुनि लेलहुँ की नहि? सभ मजदूरकेँ सुनएबाक लेल ओ ओकरा दिस देखलक आ जा कए जीपमे बैसि गेल। पल भरिक लेल हमरा एहन लागल जेना ढ़लानसँ उतर’ वला ओहि जीपक पाछू हमरा डोरिसँ बान्हि घिसियाओल जा रहल अछि। हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। नोकरीसँ निकालि देबाक धमकीसँ हमर सौंसे देह सुन्न भेल जा रहल अछि, हमरा एहन बुझाएल। एहि नोकरीसँ हाथ धो लेब हमरा बसक गप्प नहि छल। बी.कॉम. कएलाक बाद लगभग दू वर्ष धरि हम बेरोजगार रही। पछिले साल बाबूजीकेँ लकवाक प्रकोप भेल छलनि ओ तहिएसँ ओछाओन पकड़ि नेने छथि। बाबूजीक दवाइ, कॉलेजमे पढ़ए वला अपन छोट भाय आर मैट्रिकमे पढ़यवाली अपन छोटकी बहिनक सभटा दायित्व हमरहिं कन्हा पर छल। कतेकोक पयर पकड़लाक पश्चात् हमरा हिसाब-किताबक काज भेटल छल, मुदा डेढ़ दूइ सय टकासँ बेसी हमरा कहियो नहि भेटि सकल। कतेको पैरवीक केलाक पश्चात् हमरा बारह टकाक दैनिक मजदूरी पर सुपरवाइजर (पर्यवेक्षक)क ई काज भेटल छल। हमर दुब्बर-पातर कद-काठी देखि कनिष्ठ अभियंता हमरा सुपरवाइजरक नोकरी देबाक लेल किन्नहुँ राजी नहि छल, मुदा ओकरा लग ल’ जाएबला हमर शुभचिन्तक हमर विषम परिस्थिति आ लचारीक तेना ने बखान कएलनि जे नहियों चाहैत ओ हमरा ई नोकरी द’ देलक। हमर छोटो छिन गलती केँ ल’ कए ओ हमरा सदिखन उँच-नीच कहैत रहैत छल। पछिला तीन माससँ तीन-सवा तीन सय टकाक महिनवारी दरमाहासँ हम साधारण रूपेँ अपन जिनगी चला रहल छलहुँ। एहि सप्ताह बाबूजीक तबीयत बिगड़ि जेबाक कारणेँ हमरा लग जतेको पाइ छल, सभटा हुनक दबाइ आ डागदरक पाछू खर्च भ’ गेल। जँ बाबूजीक संग किछु भ’ गेलनि तँ हम कोना की करब, से सोचबाक साहस आब हमरामे नहि रहि गेल छल। हम अंतर्द्वन्द्व मे फँसि गेल रही। कार्यपालक अभियंता हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी द’ कए गेल छल। हमरा बुझाइत छल जेना हमर हड्डीक मज्झा जमल जा रहल अछि। कोनो मजदूर दौड़ि कए हमरा थाम्हि लेलक आ गैलन मे भरल पानिसँ हमरा आँखि पर छिट्टा देलक नहि तँ हम ओतहिं अचेत भ’ कए गिर जेतहुँ। खएलाक पश्चात् हम भारी मनसँ ओतए आबि ठाढ़ भ’ गेलहुँ जतए आन मजदूर सभ काज करैत रहथि। हमर नजरि घूमि-फिरि ओहि बाटक दिस जा रहल छल। बाबूजीक मरबाक खबरि ल’ कए जीप आब आएल तब आएल, यैह सोचैत-सोचैत हम आधा दिन बिता देलहुँ। हमर एहि स्थिति पर दया करैत मजदूर सभसँ जतेक संभव भ’ सकलैक ततेक काज क’ देलक। जँ मजदूर सभ एहने लगनसँ काज करैत रहल तँ ई काज काल्हि धरि पूरा भ’ जेतैक, हमरा बुझाएल। साँझुक पहर हम जल्दीए निकलि कए पहाड़ीक बाटे उतरैत नीचाँ आबि गेलहुँ। लकड़ी ल’ जाएबला ट्रक भेटि गेलाक कारणेँ हम राति हेबासँ पहिनहिं बजार पहुँचि गेलहुँ। झटकि कए चलि हम घरक बाट पकड़लहुँ। पिचरोड खतम भेलाक बाद गली वला माटिक सड़क पर हमर चालि कने मद्धिम भ’ गेल। एहि गलीक ओहि छज्जाकेँ पार कएलाक बाद हम अपन वार्डमे पहुँचि जेतहुँ। हम सोचए लागलहुँ जे हमरा आँगनमे हमर किछु पड़ोसी लोकनि हाथ पर हाथ ध’ ठाढ़ छथि। हमरा देखतहिं ओ लोकनि अपनामे गप्प करए लगलाह। हम जेना-जेना घरक दिस बढ़ैत रही तहिना-तहिना कानबाक शोर बढ़ैत जा रहल छल। जहिना हम अँगना पहुँचब, एकटा पड़ोसी आबि हमरा गल-बाँही द’ घर ल’ जैताह। घरमे बाबूजीक प्राणहीन लहास पड़ल रहतनि। एकटा कोनमे कानि-कानि कए बेदम भेल हमर माय आ बहिनकेँ सम्हारबाक लेल पड़ोसक औरत लोकनि बैसल हेतीह। हुनका सोझाँ सोडाक बोतल आ काटल पेयाजु राखल रहतनि। बाबूजीक लहासक समक्ष एकटा दीप राखल हेतनि। एक दिस तश्तरीमे अगरबत्ती राखल रहत। लगहिमे एकटा पात्रमे चीनी राखल रहत। ओहिमे लोक सभ द्वारा चुट्टासँ उठाओल गेल चीनीक चेन्ह होएत। हमहूँ ओहिमेसँ एक चुट्टा चीनी उठाएब आ बाबूजीक फूजलका मुँहमे ध’ देबनि आ “बाबा” कहि जोरसँ कानए लागब। जखन हम आँगन पहुँचलहुँ तँ हमरा केओ नहि देखना मे आएल। घरसँ ककरहुँ बाजबाक आवाज आबि रहल छलैक। हम जूता खोललहुँ आ नहुएँ-नहुएँ पयर राखैत भीतर चलि गेलहुँ। आउ बाउ! शायद अहींक खातिर हिनकर प्राण कंठ धरि आबिकए अटकि गेल छनि। आब हिनका एहि कष्टसँ मुक्तिए भटि जेबाक चाहियनि, हमरा भीतर अबैत देखि हमरा माय लग बैसलि एकटा औरत बाजलि। हम बाबूजीक ओछाओन दिस देखलहुँ। जाहि गतिएँ हुनक छाती उपर-नीचाँ होइत छलनि, हमरासँ देखल नहि जा रहल छल। मुँह सँ निकल’ वला शब्द सुन’ मे नहि आबि रहल छल। आँखि खुजले छलनि। बाबूजीक ई स्थिति देखि हमरा बुझा पड़ल जेना ओ सरिपहुँ हमरहिं बाट जोहि रहल छलाह। हमर छोटकी बहिन हमरा चाह देलनि। चाह पीबि हम अँगपोछासँ अपन मुँह झाँपि बाबूजीए लग बैसि गेलहुँ। देखा पर चाही, जँ आजुक राति ई काटि लैत छथि तँ..... नहि जँ आइ रातिए किछु भ’ गेलनि तँ एहना स्थितिमे एमहर-ओमहर दौड़ब नहि, काल्हि भोरहिं उठिकए संबंधी लोकनिकेँ समाद पठा देबनि, की ठीक ने? हमरा भरोस देबाक लेल एकटा पड़ोसिन कहलथि। अँगपोछासँ झाँपल अपन माथ डोला हम हँ कहलियनि। राति बढ़ल जा रहल छलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हम ओतहि बैसल रहलहुँ। रातिक बारह बाजि गेल रहैक मुदा बाबूजीक घर्र-घर्र केर आवाज एखनहुँ नहि कम भेल रहनि। घरक आन सभ सदस्य एमहर-ओमहर कोनमे सूति रहल छलाह। राति तीन बजे धरि बाबूजीक हालतिमे कोनहुँ सुधार नहि भेलनि। मुदा भोर होइतहिं हम द्वन्द्वक स्थितिमे आबि गेलहुँ। आब की करी? नोकरी पर जाइ, वा नहि? काज एकदम अनिवार्य रहैक आ जँ हम नहि गेलहुँ तँ कार्यपालक अभियंता हमरा छोड़त नहि। जँ कार्यपालक अभियंताक डरे नोकरी पर चलियो गेलहुँ आ एमहर बाबूजीक संग किछु खराप भ’ गेलनि तखन की हैत? माए.... हम नोकरी पर चलि जाउ? हम साहस क’ कए माए सँ पूछलहुँ। माए तँ किछु नहि बाजलीह मुदा एखनहि हमरा घर आयल हमर किछु पड़ोसी सभ हमरा पर अपन गोस्सा निकालए लगलाह। साँचे अहाँक दिमाग ठौर पर अछि कि नहि? एतए अहाँक बाबूजी मरण-शय्या पर पड़ल छथि आ अहाँकेँ नोकरी सूझैत अछि? नहि, नहि हमर कार्यपालक अभियंता बड्ड खरूस छथि। ओ शैतान छथि की? नीक-बेजाए केर ओकरा ज्ञान नहि छनि? हम चुप भ’ गेलहुँ। दुपहर होइत-होइत घर्राहटि आर बढ़िते गेलनि। चलू नीके छैक.... आइ बृहस्पति दिन छैक, प्राण छोड़बाक लेल आजुक दिन उत्तम अछि। हमर बूढ़ पड़ोसिन बाजलथि। एतबा सुनतहि हमर माए आर जोर-जोर सँ कानए लगलीह। साँझ होइत-होइत हमरा मोनमे आर डर समा गेल। जँ आइयो बाबूजी प्राण नहि निकललनि आ हुनक मृत्यु नहि भेलनि तँ ‘काल्हि काज पर किएक नहि आएल छलहुँ?’ एकर स्पष्टीकरण हम कनिष्ठ अभियंता केँ कोना देबनि? बाबूजी मरि गेलाह तकर पहिलुक दिन अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ? एहि तरहक प्रश्न सभ पूछि-पूछि ओ हमर पिंड नहि छोड़ताह.....जँ हम नोकरी पर नहि गेलहुँ आ मजदूर लोकनि काजकेँ आर बेसी घिच लैक तखन.......? आ एहि गोस्साक कारणेँ जँ ओ हमर ‘टर्मिनेशन आर्डर’ निकालि देलक तखन.....? कार्यपालक अभियंताक काल्हुक पल-पल केर दृश्य हमरा आँखिक सोझाँ नाचय लागल। दू बजेक पश्चात् खराप नक्षत्र आरंभ होइ बला रहैक, ओहिसँ पहिनहि हुनका मुक्ति भेटि जयबाक चाहियनि.....! केओ एहन बाजलथि। मुदा हमरा बुझाएल दू बजे नहि बारह बज’ सँ पहिनहि हुनक प्राण जयबाक चाहियनि, ताकि बाबूजीक मृत्यु बृहस्पतिए दिन भ’ गेल छलनि, कार्यपालक अभियंताकेँ बतएबामे हमरा सुविधा होएत। राति आठ बजे हम एक बाटी मरगिल्ला खा बाबूजी लग बैसि गेलहुँ। काल्हि राति भरिक जगरनाक कारणेँ हमरहुँ आँखि निन्नक बाट जोहि रहल छल। एखन हमर आँखि लागलहि छल कि केओ हमरा हाथ लगा उठा देलक। घरमे सात-आठ पड़ोसी लोकनि ठाढ़ छलाह। हुनका सभक आँखि बाबूजी पर स्थिर भ’ गेल छलनि। बाबूजीक मुँहसँ होमए वला घर्र-घर्र केर आवाज आर बेसी भ’ रहल छलनि। हम जल्दीसँ उठिकए बैसि गेलहुँ। बाबूजीक आवाज आर बढ़ि गेलनि। क्षण भरिक लेल हुनक सौंसे देह हिललनि आ अचानक सभ किछु शांत भ’ गेल। कतेक बाजि रहल छैक, कने ध्यानसँ देखियौक केओ? केओ बजलाह। केओ आगू बढ़ि पलंग सँ लटकल बाबूजीक हाथ सीधा क’ कए हुनक फुजल आँखि बन्न क’ देलकनि। हमर माए आ बहिन एक्कहि सँग जोर सँ चिकरैत बाबूजीक लहास पर हाथ राखि कानब शुरू क’ देलथि। एखन धरि ठाढ़ भए हमरा बाबूजीकेँ देख’वला हमर भाए झुकिकए गिरहि वला छल कि तखनहि केओ हुनका पकड़ि लेलकनि आर ओकरा मुँह पर पानिक छिट्टा देलकनि। मुदा हमरा तँ नीक लागल। हम एकटा दीर्घ निसाँस लेलहुँ आर देखलहुँ.....हमर बाबूजी.....हमर खून, हमरहि सोझाँ मरल पड़ल छथि.....,हमर साक्षात् बाबूजी हमरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेल छलाह। हम ई देखतहिं रहि गेलहुँ। ने जानि कोन-सन अनुभूति हमरा करेज सँ बाहर आबि गेल, बाबूजीकक लहास पकड़ि हम फूटि-फूटि कए कानब शुरू क’ देलहुँ..... हम्मर बाबूजी.........। बालानां कृते ब्यूटी कुमारी, मधेपुरा स्नातक धरि पटना आ मधेपुरामे शिक्षा लऽ कऽ लेखिका बी.एड. जम्मू विश्वविद्यालयसँ आ एम.ए. मिराण्डा हाउससँ केलन्हि। संगहि कम्प्यूरमे डी.सी.ए. केने छथि। पी.एच.डी. डिग्री लेल थीसिस सेहो “इशावश्योपनिषद की भौतिकवादी व्याख्या: जन्मना जातीय समाज के परिपेक्ष्य में” विषयपर जमा केने छथि। कैदी जीवनक सुखक आ दुखक छाया तँ मनुषक मुँहपर सदिखन हेलैत रहैत अछि तखन ओकर अन्वेषण करबाक क्षमता किछुए प्रतिभाशाली लोकमे होइत अछि। ओ एक चित्रकार छलाह। भावना आ वास्तविकताक सामंजस्य हुनक चित्रक वैशिष्ट्य अछि। एक बेर हिनका मनमे ईसामसीहक चित्र बनेबाक बात उठल। सोचैत-सोचैत ओ एहि निष्कर्षपर अएलाह जे चित्रमे ईसामसीहक चित्रण एकटा अबोध बालकक रुपमे रहबाक चाही जिनका शैतान हण्टर सँ मारैत रहै। मुदा चित्र बनिये नै रहल छल। हुनक मस्तिष्कमे जे ईसामसीहक रुप बनैत छल ओकर तँ मानव रुपमे दर्शने दुर्लभ छल। बहुत दिन धरि खोज-पुछारि भेल मुदा मनक मुताबिक ओहेन तेजस्वी मुखड़ा ने भेटाएल। एक दिन भ्रमण करैत अनाथालयक आठ वर्षक बालकपर हुनकर दृष्टि पड़ल। बालकक मुरुत भोला-सुन्दर-नि’छल-निर्मल आ निष्पापयुक्त छल जेहेन ईसामसीहक चित्र खातिर हुनका मनमे चेहरा बसैत रहै। ओ ओहि बालककेँ कोरामे उठाय शिक्षकसँ अनुमति लए अपन चित्रघर आनलथि। चित्रकार अपूर्व उत्साहसँ कनिये कालमे ईसामसीहक चित्र पूरा कए बालककेँ पुनः अनाथालयमे दऽ अएलखिन्ह। ईसामसीहक चित्र बनेबाक बाद आब शैतानक चित्र बनबैक लेल फेरसँ हुनकर मन शून्य भऽ गेल, किएक तँ शैतानक चित्रो खातिर एक छायांकन भेल रहैत हुनक मनपर जे क्रूर आ ‘शक्तिशालीयो होएबाक चाही। दिन के कहै महिनापर महिना बीतै लागल। ‘शराबक घर, वै’याक मोहल्ला, मवालीक अड्डा सगरे खाक छान्हि अएलथि मुदा शैतानक छाप कतौह नै भेटल। चौदह बरखसँ फोटो आधेपर पड़ल रहै। एक दिन जेलक आँगासँ चित्रकार जी जाइत रहथि आकि एगो कैदीपर हुनक नजर पड़ल जे जेलसँ छूटि कऽ निकलैत रहै। साँवला रंग बढ़ल केश-दाढ़ी विचित्र हँसी। चित्रकारकेँ हुनका देखि अपार प्रसन्नता भेल। हुनकर आकृति एहन रहै जे चित्रकारक चित्र पूरा भऽ जैतिऐ। आखिर मनक अनुरुप शैतानक मूर्ति हुनका भेट गेल रहनि। कैदीकेँ मनाए चित्र बनबै खातिर रोकि लेलेन्हि चित्रकार जी। चौदह साल बाद हुनक चित्र पूरा भऽ गेल। चित्र पूरा होएबाक बाद कैदी कहलखिन्ह- कनी हमहूँ देखिऐक अहाँक चित्रकेँ। चित्र देखि कऽ हुनका पसीना आबै लागलन्हि। हकलाबै लागलाह कैदीकेँ कहलखिन- अहाँ चौदह साल पहिने हमरे अनाथालयसँ उठा कऽ अनने रही ईसामसीहक फोटो बनेबाक लेल । अहाँ हमरा नहि चिनहलिऐ, लगैत अछि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_VIII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -Shelter In The Rainy Days DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS PART –VIII After one and half hour drive they reached Basildon. This town is located in the county of Essex, 26 miles east of London. In 1946, it was officially designated as a new town and was created to relieve the overpopulated areas of East London. Throughout the night Harish and Andrews tried to chalk out the next course of action – Easter vacation is on – office will remain closed till Monday. Tomorrow, it is just Sunday. They already had their dinner at Southall. Priya served them coffee and mathari. Andrews – I am delighted to see the coffee, but how did you realize that I am very much fond of black coffee. Priya replied laughingly – it is experience and nothing else. What about tomorrow’s programme. Harish – Tomorrow? – please prepare Gujarati Dhokla and Ghujia for the breakfast, only after that we will move out – wherever the car takes us – Priya happily left for Dhara and Reshmi’s room. Harish – Kadamba, I have a friend who is really jack of all trades – he is leading life at various levels – he is a man with many standards. Andrews – What do you mean by standard? Harish – Standard, that means he is respected everywhere whether it is bar or pub, casino or so called high society. Kadamba – Such type of persons also exist in the society Harish – Yes Kadamba. Peter is really like that – he has mastered many languages such as Hindi, English, Russian , French and his friends are from diverse background. What is the time now? Andrews – it is almost 12 pm. Harish – He must be at home but drunk. We will contact him in morning. They kept on chatting and finally fell asleep. But in Priya’s bedroom, Priya, Dhara and Reshmi remained awake. Dhara – Priya, you have not visited India in the last seven years. Priya replied abstractly- Yes. Dhara – You are endowed with wealth. Here I find Indians visiting their native place after every two years. why do not you want to go? Priya pressing her face against the pillow – Dhara, do you think all wishes are always fulfilled? Dhara – You are blessed with everything – husband like Harish Bhai – gentle as well as millionaire. Priya – Very true Dhara. Harish is my husband as well as my friend. He understands me completely – I think, more than my parents. I have two sons and one daughter. Dhara – Where are they? Priya – All of them are in India – elder son is in Forbesgunj, younger son in Kerala and daughter is in Bombay. Dhara – Your empire is from east to west. Reshma – Didi, Gujarat is your native place. Priya – Yes. But Forbesgunj is in north Bihar at Nepal border. Dhara became emotional and sentimental to hear about Forbesgunj. She herself is from Mithilanchal. Priya – At Forbesgunj, he has his own business. My daughter-in-law is also a Development Officer in Life Insurance Corporation of India. Dhara – Great. But from Gujarat to Forbesgunj – why? It does not sound convincing. Priya- Richas’ parents live there. Her father is a powerful person. His influence helped Rahul in his business. Now Rahul is also under his influence. Younger son Akshata is in Government service posted in Kerala. His wife Akanksha is also a teacher in a Government school. Surbhi and her husband are Director and Managing Director in a Firm in Bombay. Dhara – You are fortunate to have such a well-settled and wonderful family. Priya – Yes Dhara, we live in our children- thinking about them always. Reshmi – But even then you do not visit India. Priya – It is already late in night. Let us go to sleep – Dhara understood that Priya do not want further discussion as she was hiding something- she was not prepared to unravel the rock edicts rooted in her heart. But Dhara herself was disturbed- Reshmi instantly fell asleep. Dhara – Priya. Priya – Yes didi. Dhara realized that tears were oozing out of Priyas’ eyes – entering into pillow. Dhara – What is the matter Priya? You are hiding something. Dhara kept her hand on Priyas’ head. Priya became emotional with her touch and said – Dhara, why people are blessed with children? People sacrifice their happiness to settle their children – but in return what they receive – after the marriage of their children the parents’ existence becomes aimless and purposeless. Children settle at their own home, have their own life – there the parents exist only like tatters on the Banarasi saree. Dhara – Kadamba is still unmarried. My daughter is married. But my husband has forgotten us in his strive for fulfilling only materialistic ambitions. Both of them were sad – the difference being of son and of husband. Priya – I always used to visit my elder son at Forbesgunj. For parents all children are equal, but elder child enjoyed the special position being the first flower of the love between wife and husband – initially they used to warmly welcome us – we showered love on their children. Interest is always dear. But Dhara, gradually we felt ignored. Dhara – Why Priya? Priya – One night daughter-in-law’s voice reached my ear as a gliding snake – Richa to Rahul – I am overburdened, how will I manage? Rahul – Why overburdened? Why you are depressed? Let me know. I am always with you. You leave your anxiety with me. Your smiling face propels me to work more. Richa – It is my office time now. I have also to cook for mother – I am really overburdened. Rahul – Why to worry for her? She can cook for herself. She has always prepared the food for us. Richa – But I do not want her to cook for herself. Why do not you tell Akshata to keep her for a few days . Rahul – Why not? If I tell him he can call Maa at his place – Why do you worry for petty things? Priya – Dhara, I used to help them in household chores. I never gave them any reason to think about me. But they had developed a habit of leading a nuclear life. Dhara – Priya, it is not wise to think about changing their life-style. We should never interfere in their life pattern. Priya – No, Dhara. I never tried to intrude in their life. But out of love and affection, sometimes I gave them valuable suggestions. But you are right – we should never interfere into their life. I always thought that son grew up with parents, brothers and sisters but after marriage he sees them through the eyes of his wife. He forgets their love and affection. One day I was not well- due to eastern wind, bones were full of pain. I heard some voice from Richas’ room. Richas’ mother – Where is your mother-in-law? Richa – She is sleeping. Mother – Sleeping at this odd time. You are alone doing household chores. Richa – Maa, please do not speak loudly. If she hears it will cause unnecessary tension. Priya felt heaven falling on her. Unnecessary tension – she has never caused any tension anywhere. She always co-operated with them. Mother – Why she keeps on visiting you? I think, she is not on good terms with younger son and his wife. Richa – What can I say Maa? I am already overburdened. After hard work in office, welcoming and serving many acquaintances in the evening – it is a tough life for me. Dhara sympathised with Richas’life which is so stressfull. It has become a common problem among younger generation that they are easily misunderstood by elders. To Dhara , this generation is intelligent,more focused and motivated but at the same time equally responsible and sensitive to the human relations as well as their social surroundings.The only problem is that they need some time and space for themselves which is mistaken for them as being individualistic . Dhara recollects her thoughts . Her student Soma’s life flashes before.How her condition was so pitiable. Soma was a tender girl emotional too. After six or seven years suddenly she saw a girl, touching her feet in the market……..mam do you know me…dhara tried to recognize her..are u Soma…? If I am not wrong Yes mam. Now I am a lecturer in a private collage… Dhara was very happy to see her favourite student. But was soma happy.?. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Shelter In The Rainy Days Janak, Yagyavalkya, Vidath, Mathav Malla, Jagatprakash-Jagatjyotir, Mangan Khabas, Ramrang, Yatri, Harimohan, Sundar Jha, picture of Shastriji in jail Having tied his feet with chain Seerdhwaj, Vedvati, Maithili, Maitreyi Jaymangala, Asur, Alauli, Keechak, Varijan, Benu, All of Naulagarh And Garhs of Balirajpur The shelter of Buddha and Mahavir in rainydays The field of artistry of farmers Mongooses, hedgehogs, and Nilgais (antelopes) Used to roam in this land All bewitched to be vanished The land provided livelihood for thousands of years Now turned to a land of evacuation What prompted people in the last fifty years That was not known in past thousands of years The Bhatkhande says about Raagtarangini of Lochan Bhatkhande is mentioned in Ramrang How can the logics of Gangesh Vachaspati Became illogical Sacrifice of master’s lesson by Yagyavalka The reform of Shukla Yajurveda But caste influenced knowledge later on Expected exoneration from the history Then why is it delayed Creation of a new history . VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXVI संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- २६ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. षडविंशतितमः पाठः इतः परम्, इतः पूर्वम्, अनयोः अर्थम् ज्ञातवतः तस्य अधिकम् अम्पाषम् इदानीम् कुर्मः। यथा–अहम् इतः पूर्वम् अध्यापकः आसम्, इतः परम् मंत्री भविष्यामि। गोविन्दः इतः पूर्वम् निरूद्योगी आसीत् इतः परम उद्योगी भविश्यति। इदानीम् भवंतः इतः पूर्वम् इतः परम अनयोः आधारेन वाक्यानि स्वयंतु। पूर्वतन पाठे वयम ‘रिक्तम’, ‘पूर्णम’ एतयोः अर्थम् ज्ञातवंतः–इदानीम तष्य अधिकम अभ्यासं कुर्मः यथा चलकः रिक्तः अस्ति। कूपी पूर्णा अस्ति। पुनः पूरणी रिक्ता अस्ति। कागदम रिक्तम अस्ति। अत्र एकः अभ्यासः अस्ति। एतेषाम शब्दानाम आधारेण वयम् एकम अभ्यासं कुर्मः। यथा–कागदम रिक्तम अस्ति। भवती तदतु गर्तः रिक्ता अस्ति। कपाटिका पूर्णा अस्ति। स्थालिका रिक्ता अस्ति। नदी पूर्णा अस्ति। स्यूतः पूर्णः अस्ति। मन्दिरम् पूर्णम् अस्ति। स्यूतः पूर्णः अस्ति। मन्दिरम् पूर्णम् अस्ति। कोषस्य अंतः लेखनी अस्ति। कोषात् बहिः लेखनीम् स्वीकरोमि। पेटिकायाः अंतः गंधवर्तिका अस्ति। गन्धवर्त्तिकाम बहिः स्थापयमि। पेटिकायाः अंतः किम अस्ति–इति पश्यामः वा। पेटिकायाः अंतः पुस्तकम/धनम्/आभरणम्/अस्ति–किमपि नास्ति। वायुः अस्ति। पश्यामः। अहमेव पेटिकायाः अंतः किम अस्ति–इति पश्यामि। जागरूकाः भवंतः भवंतु। ओ–पेटिकायाः अंतः अन्या काचित् पेटिका अस्ति। सुन्दरी पेटिका। अष्याः अंतः किम अस्ति। पश्यामः वा। धीरेन पश्याम– पेटिकायाः अंतः किञ्चिका अस्ति। बहिः कोपि शब्दम् करोतु। विशाल–कः आगतवान–पश्यंतु–आचार्य–बहिः कोपि नास्ति–अस्तु–आगच्छतु– इदानीम् बहिः अंतः अनयोः एकं अभ्यासं कुर्मः अत्र एकष्य गृहष्य चित्रम् अस्ति–गृहष्य अंतः किम् अस्ति–गृहात् बहिः किम अस्ति इति क्रमशः एकैकः एकैकम वाक्यम् वदतु– भवती वदतु–गृहष्यं अंतः महिला। चित्रम अस्ति। गृहात् बहिः नारिकेलवृक्षः। कुक्कुरः अस्ति। सोपानम् भवंतः इदानीम् भवताम् गृहष्य अंतः किम अस्ति–बहिः किम अस्ति–इति वाक्यानि वदंति वा। मम गृहात् बहिः आम्रवृक्षः अस्ति। समीरः वाक्यम् वदतु। मम गृहष्य अंतः स्नानगृहम् अस्ति। अघुना एकम् अभ्यासम् कुर्मः– लालकृष्णस्य गृहम् अस्ति–तस्य गृहष्य अंतः किम अस्ति–बहिः किम अस्ति इति अत्र लिखितम अस्ति– एतष्य आधारेन वयम् वाक्यानि वदामः– गृहष्य अंतः उत्पीटिका अस्ति– गृहात् बहिः आम्रवृक्षः/उद्यानम् अस्ति। अंतः–पूजास्थानम्/स्नानगृहम्/शयनप्रकोष्ठः आसन्दः/कपाटिका/दूरदर्शनम/मित्तिघटी बहि– शुअकः/शौचालयः/नारिकेलवृक्षः/क्रीडांगनं/गोशाला षष्ठी–गृहष्य अंतः प्रकोष्ठः/संगणकम्/महिला अस्ति। पञ्चमी–गृहात् बहिः उद्यानम् दूरदर्शनम् अस्ति।-तृणानि संति मम गृहात् बहिः/क्रीडांगणं/आम्रवृक्षः/मृगालयः/मार्गः अस्ति – अंतः कः अस्ति–अंतः कोऽपि अस्ति वा–अहो सर्वे बहि गतवंतः इति चिंतयामि। अस्तु आवाम् गच्छावः– 1 – हरिओम संपादक महोदय अस्ति वा 2 – नास्ति–सः बहिः गतवान अस्ति। 3 – एवमवा/भवतु/अदमः पुनः दूरवाणीम् करोमि। 4 – धन्यवाद। 1 – विजय कुमार सिंहः अस्ति वा 2 – आम् अंतः अस्ति। 3 – धन्यवादः 1 – आचार्य–अंतः आगच्छामि वा– 2 – आगच्छतु–यदि पनः विलंबेन आगच्छति तर्हि अंतः न प्रवेशयामि। सुभाषितम् पुस्तकष्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्दनम्। सुभाषितष्य अर्थः एवम् अस्ति। विद्याः पुस्तकेषु भवन्ति एव वयम् जानीमेः। परंतु विद्या सर्वदा बुद्धौ भवेत यथा विद्या बुद्धौ भवेत तथैव धनम् अपि–स्वसमीपे तिष्ठेत भवेत– अन्यस्य अपयस्य समीपे भवती तर्हि किम् प्रयोजनम्–कार्यकालः यदा आगच्छति–आवश्यकतायाम वयम् विद्या धनम् उभयम अपि अस्माकम् उपयोगाम भवेत–या विद्या यत् धनम् समये उपयोगाय न भवति तत् द्वयम् अपि अस्ति येदपि निस्प्रयोजनमेव महाभारते दानसूरः कर्णः सर्वाः अपि विद्याः जानाहि स्म–यदा युद्धकालः समुत्पन्नः रणरङ्गे कापि विद्या तस्य सहायकरी न जाता– कथा अहम् इदानीम् एकाम् कथाम् श्रावयामि। पुटा भारद्वाजः इति कश्चन् महर्षिः आसीत्। तस्य आश्रमे भारतवर्षस्य अनेकेभ्यः स्थानेभ्यः आगताः छात्राः पठंति स्म। सः सर्वान् समान् रीत्या पश्यति स्म। प्रीत्या प्रेमना विद्यायाः दानम् करोति स्म। भारद्वाजः वृद्धः संजातः। एकदा ब्रह्मा भारद्वाजस्य आश्रमस्य प्रति आगतवान्। ब्रह्मा प्राप्तवान् भोः महर्षे–भवान् अस्मिन वयसिअपि छत्रान् पाथयन् अस्ति–भवतः क्रियाशीलताम् दृष्टवा तुष्तोस्मिऽ अहम्–भवते पुनः शततर्षानाम् आयुः यौवनंञ्च भवते ददामि। ब्राह्मणः वचनं श्रुत्वा आश्रमवासिनः सर्वेऽपिसंतुस्टाः–अनेकेभ्यः प्रदेशेभ्यः छात्राः पुनः भारद्वाजस्य आश्रमं प्रति आगताः–सर्वान् छात्रान् भारद्वाजः श्रद्धया पाठितवान्–आश्रमे उपनिषदविषये शास्त्रादिविषये चर्चा समुत्पन्ना–एवमेव शतमवर्षाणि अतीतानि पुनः कदाचित् ब्रह्मा आश्रम् आगतवान्। तेजस्वी भारद्वाजः तम नमस्कृतवान्। ब्रह्मा पृष्टवान–भोः महर्षे–भवान् तस्य सदुपय्तोगम् कथम् कृतवान् तदा भारद्वाजः वदति–अध्यनम् अध्यापनम् च भया कृतम–बहतः शिष्या मया पाठिताः–ब्रह्मा तस्य वाक्यम् श्रुत्वा पुनः पृच्छति–भवते पुनः शत वर्षानाम् आयुः ददामि चेत् भवान् किम करिष्यति–तदा भारद्वाजः वदति– पुनः अध्ययनम अध्यापनम च करिष्यामि–इति–ब्रह्मा पृच्छति–किम् भवते पत्नी पुत्रादयः न आवश्यकाः–किम् भवान् सुखम् न अभिलषति–तदा भारद्वाजः वदति मोः भगवन्–शिष्याः एव अम पुत्राः वेदपरम्परा एत मम सुखम्। वेदपरम्परायाः संरक्षणणाय पुनः अपि अहम शतवर्षाणि जापयापि तत्रैव मम सुख मन आनंदः मम संतोषः अस्ति। तदा ब्रह्मा–महात्मन् कीर्त्तिमान् भवतु–इति आशीसा अनुव्रतृक्ष्य प्रतिगति वान्। अहो भारद्वाजस्य अनुकरणीया निस्पृहता। आरोग्यम् (Health) संस्कृत अनुवाद मैथिली अनुवाद अंग्रेजी अनुवाद कथम् अस्ति भवतः/ भवत्याः स्वास्थ्यम् । अहाँक स्वास्थय केहैन अछि। How is your health? इदानीं सम्यक् अस्ति। हम आब ठीक छलहुँ। It’s all right now. मम महती पादवेदना अस्ति। हमर पैर आब ठीक महसूस करैत अछि। My legs are aching very much. वैद्यः रक्तपरीक्षां कारयितुम् उक्तवान्। डॉ. सेहाब हमर खून जाँचकेर ठीक कहलक। The doctor has told me to get a blood–test done. श्र्वः उदरस्य क्षकिरणपरीक्षा करणीया भवष्यति। काल्हि हमर पेटक एक्सरे हैत। Tomorrow I’ve to get an X–ray of my stomach. रक्तपरीक्षायाः परिणामपत्रं कदा प्राप्यते? खून जाँचक प्रमाण कखेन दैत। When can I get the result of the blood–test? अस्थिभङ्गः कथम् अभवत्? हड्डी टूटल कतै छलै। How did this fracture happen? सोपानतः पादः स्खलितः अतः पतितवान्। हम सीढ़ीसँ फिसलि गेलौ आ गिर गेलौ। I slipped from the staircase and fell. औषधबन्धं कदा निष्कासयंति हड्डीक प्लास्टर कहिया हटाएत। When will the plaster be removed? ह्यः बहुवारं वमनम् अभवत्। हमरा बहुत दिनसँ उल्टी होइत छलै। I vomited many times yesterday. मम वमनशङ्का अस्ति। हमरा उल्टीक शंका होइत छलै। I feel like vomiting. वैद्यं दष्टवान् किम्? डॉ. सेहाब कहिया देखलक। Did you see the doctor? किमर्थं तावत् क्षुवति? एतना दिनतक किए छुपैलो। Why do you sneeze so much? मम धूलि–प्रत्यूर्जता अस्ति। हमरा गरदाक एलर्जी छल। I have dust allergy. अहम् अतीव–श्रांतिम् अनुभवामि। हम अत्यंत शक्तिहीन भऽ गेलौ। I feel extremely tired. मुखस्य किम् अभवत्? अहाँक मुँहमे की अछि। What happened to your face? पलाण्डु–प्रत्यूर्जता कारणतः विस्फोटम् अभवत्। हमरा प्याजक एलर्जी अछि। Eruptions due to onion allergy. मम शिरः भ्रमति। हमर मथा घुमैत अछि। I feel giddy. ज्वरः अस्ति किम्? अहाँक बुखार अछि की? Do you have fever? बहु कृशा अभवत् भवती। अहाँ बहुत कमजोरि भऽ गेलौ। You have become very thin. मम स्वास्थ्यं सम्यक् न आसीत्। हम अपनाकेँ ठीक नहि बुझैत छलौ। I was not well. प्रतिदिनं सूच्यौषधद्वयं स्वीकरणीयम् अस्ति। हमरा दूइटा सूइया रोज लगैत अछि। I’ve to take two injections every day. लवणं न्यूनं खादितुम् उक्तवती वैद्या। हमरा स्त्रीक डॉ. नमक कम खाएक लेल कहलक अछि। The lady–doctor has told me to eat less salt. सः चिकित्सालयं प्रवेशितः। हमरा अस्पतालमे भर्ती होएबाक लेल कहल गेल अछि। He has been admitted to the hospital. तस्याः कृते कूपीत्रयं रक्तम् आवश्यकम्। ओकरा तीनटा बोतल खूनक लागत। She needs three bottles of blood. समये रोगस्य निदानम् अबवत् अतः सा रक्षिता। तब ओकरा रोगसँ निवारण भेटत। She is saved as the disease was diagnosed in time. मम मधुमेहः अस्ति इति वैद्यः उक्तवान्। डॉ. सेहाब कहलक अहाँक मधुमेह अछि। The doctor said that I have diabetes. अहं होमियोपथी औषधानि एव स्वीकरोमि। हम खाली होमियोपेथिकक दवा लैत छलौ। I take only homeopathic medicines. एक–सप्ताहस्य औषधं दक्तवान् वैद्यः। डॉ. सेहाब एक सप्ताहक दवा देलक अछि। The doctor has given medicine for a week. मम यकृते काऽपि समस्या अस्ति। हमर लीवरक संग समस्या अछि। There is some problem with my liver. तस्याः हृदयाघातः अभवत्। ओकरा हृदयाघात आएल छलै। She had a heart attack. मम प्रातः आरभ्य स्वल्पा शिरोवेदना। हमरा काल्हि सुबहसँ माथ दर्द करैत अछि। I’ve slight headache since morning. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर संस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा संग्रह)- जगदीश प्रसाद मंडल): मूल्य भा.रु. १५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) नव मैथिली पोथी सभ कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक) खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना- गजेन्द्र ठाकुर रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-15-0]
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मौलाइल गाछक फूल-(उपन्यास)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.२५०/- US$40 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-02-0]
मिथिलाक बेटी-(नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-03-7]
विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-09-9]
विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-08-2]
विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-07-5]
(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.40/- per copy for outside Delhi) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) VIII. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ FOR SUPPLY OF BOOKS IN ASSAM, BIHAR, WEST BENGAL, JHARKHAND (INDIA) AND NEPAL CONTACT OUR DISTRIBUTORS: PALLAVI DISTRIBUTORS, C/o Dr. UMESH MANDAL, TULSI BHAWAN, DEEPAK CHITRALAYA MARG (CINEMA ROAD), WARD NO.6, NIRMALI, DISTRICT- SUPAUL - PIN-847452(BIHAR,INDIA) ph.09931654742 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ 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विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ५८ म अंक १५ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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