VIDEHA — Issue 60 / अंक ६०

Publication: VIDEHA · Issue: 60
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167 'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जीवन संघर्ष--जगदीश प्रसाद मंडल २.२.नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज –रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’२.कुमार मनोज कश्यप-कथा-माता कुमाता न भवति २.३..-बीरेन्‍द्र कुमार यादव-महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य २. कथा- एकटा अधिकार-सुजीत कुमार झा २.४.मनोज मुक्ति१.अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र २. मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न २.कथा- पारस- दुर्गानन्‍द मंडल ३.कथा--नन्‍द वि‍लाश राय ३. पद्य ३.१.शिव कुमार झा- पद्य ३.२.. कामोद झा -केओ नई २.लालबाबु कर्ण-जन्मभूमि ३.मनोज झा मुक्ति-देखावटी छोडिदे ३.३.१.ज्योति सुनीत चौधरी  -जीतक परिभाषा२.सुमन झा "सृजन"-कैक्‍टस जेकॉं दि‍ल ३.४.१.उमेश मंडल--हँसैत लहास २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-पियक्कर ३विनीत ठाकुर-शान्ति दूत परवा ६. बालानां कृते-देवांशु वत्स- चित्र शृंखला ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_IX-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -1.The Knowledge Born In Kusumpur 2.From Bed No. 32 Ward No. 29 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय अरकान : अरकान सामिल पूर्णाक्षर: फ–ऊ–लुन U।। फा–इ–लुन।U। मफा–ई–लुन U।।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।। मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U सभ पूर्णाक्षरी घटक मारते रास प्रकार। १० पूर्णाक्षरी(सालिम) अराकानसँ १९ बहर आ से दू प्रकारक: मुफरद बहर माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोगसँ।सात सालिम(पूर्णाक्षरी)बहर, संगीत शब्दावलीमे एकरा शुद्ध कहि सकै छी।सभ पाँतीमे २-८ बेर दोहरा कऽ शेरमे ४-१६ रुक्नी बहर बनत। ४ रुक्नक बहर- मुरब्बा ६ रुक्नक बहर- मुसद्दस ८ रुक्नक बहर- मुसम्मन / मुफ़रद(विशुद्ध) आठ–रुक्न, छह रुक्न आ चारि–रुक्नक सालिम बहर हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – दू बेर रजज़ आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर/ छः–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – दू बेर/ रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– तीन बेर/ चारि–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– दू बेर वाफ़िर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर/ छः–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।)– दू बेर कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।)– चारि बेर/ छः–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – दू बेर मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर/ छः–रुक्न फा इ लुन (।U।) – तीन बेर/ चारि–रुक्न फा इ लुन (।U।) – दू बेर एहि सभक मारते रास अपूर्णाक्षरी रूप सेहो। मुरक्कब बहर: दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर,संगीतक भाषामे मिश्रित। तीन तरहक- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर १२ टा –तवील,मदीद,मुनसरेह,मुक्तज़ब,मज़ारे,मुजतस,ख़फीफ, बसीत,सरी–अ,जदीद, क़रीब, मुशाकिल मुक्तजब (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):फ ऊ लु U । U फै लुन U । फ ऊ लु U।U फै लुन। । मज़ारे (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U । U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । फा इ ला न। U । U मुजतस (अपूर्णाक्षरी आठ–रुक्न):म फा इ लुन U । U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । ख़फीफ़ (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । फ इ लुन U U । मुज़ाहिफ अरकान अपूर्णाक्षर :फ–इ–लुन UU। मफा–इ–लुन U।U। फ–इ–ला–लुन UU।। म–फा–ई–लु U।।U मुफ–त–इ–लुन ।UU। फ–ऊ–लु U।U मफ–ऊ–लु ।।U मफ–ऊ–लुन ।।। फै–लुन ।। फा । फ–अल् U। फ–उ–ल् U।U फा अ । U फा इ लुन । U । फ ऊ लुन U । । आब एक धक्का फेरसँ मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ। जेना कहल गेल रहए जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत। माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:- क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १ क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २

आब आउ किछु आर शब्दपर: जेना आएल, हएत, हैत आब हैतकेँ हएत लिखब बेशी वैज्ञानिक अछि कारण हैतकेँ ह + ऐ + त पढ़ल जएबाक खतरा अछि (दोषपूर्ण)। आ ताहि रूपमे आएल क उच्चारण होएत अ + ऐ + ल = १ + २ + १ तँ आएल = २ + १ + १ = ४

तहिना आओत क उच्चारण होएत अ +औ + त= १ + २ + १ तँ आओत = २ + १ + १ हएबाक= १+२+२+१ होएबाक= २+१+२+१ (ओ क बाद ए क मान ह्रस्व) हेबाक= २+२+१ नञि= १+१ नै= २ नहि=१+१ सएह= १+२+१ (ग्राह्य) सैह= २+१ (दोषपूर्ण उच्चारण) तखन निअम भेल: दीर्घक बाद “ए” वा “ओ” क गणना १ मात्रा होएत।

आब पाँती वा पाँति खण्डक अन्तिम वर्णपर आउ। एकरा लय मिलेबाक दृष्टिसँ हलन्तयुक्त रहलापर “एक” आ लघु रहलापर दीर्घ “दू” मात्रा लऽ सकै छी, मुदा से अपवादस्वरूप आ आवश्यकतानुसार, आपद् रूपमे। जेना मनोज- एकर उच्चारण होइत अछि- म+नो+ज् मुदा संबोधनमे म+नो+ज+अ+अ तखन निअम भेल: मैथिलीमे स्युक्ताक्षरमे हलन्तक अस्तित्वक अनुसार गणना होएत। मुदा जतए हलन्तयुक्त वर्णसँ पाँती वा पाँती खण्डक समापन होएत ततए हलन्तयुक्तकेँ एक मात्राक गणना लय मिलानी लेल कऽ सकै छी। संगहि लय मिलानी लेल पाँती वा पाँती खण्डक अन्तिम वर्ण ह्रस्व रहलापर ओकरा दीर्घ बुझि मात्रा गणना कऽ सकै छी।

क्ष= क् + ष= ०+१ त्र= त् + र= ०+१ ज्ञ= ज् + ञ= ०+१ श्र= श् + र= ०+१ स्र= स् +र= ०+१ शृ =श् +ऋ= ०+१ त्व= त् +व= ०+१ त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १ ह्रस्व + ऽ = १ + ० अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी। ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+० दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+० जेना हँसल= १+१+१ साँस= २+१ बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत। जा कऽ = २+१ क् =० क= क् +अ= ०+१ किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।

आब आउ बहरे मुतकारिबमे एकटा गजल कही:

बहरे मुतकारिब:- सभ पाँतिमे पाँच-पाँच वर्णक संगीत-शब्द चारि बेर एहि क्रममे: U । । अरकान सामिल पूर्णाक्षर

आब मैथिलीमे विभक्ति सटलासँ कनेक सुविधा अछि, तैयो शब्दक संख्या चारिसँ बेशी राखि सकै छी मुदा ह्रस्व दीर्घक क्रम वएह राखू। फ–ऊ–लुन U।। फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन फ–ऊ–लुन गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१. जीवन संघर्ष--जगदीश प्रसाद मंडल २.२.नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज –रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’२.कुमार मनोज कश्यप-कथा-माता कुमाता न भवति २.३..-बीरेन्‍द्र कुमार यादव-महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य २. कथा- एकटा अधिकार-सुजीत कुमार झा २.४.मनोज मुक्ति१.अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र २. मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न २.कथा- पारस- दुर्गानन्‍द मंडल ३.कथा--नन्‍द वि‍लाश राय कॉंपी राइट- लेखकक ज्‍येष्‍ठ पुत्र सुरेश मंडल उपन्‍यास जीवन संघर्ष जगदीश प्रसाद मंडल काति‍कक अनहरि‍या। रौदि‍याह समए भेने जेठेक रौद जेकॉं रौदो कड़गर होएत। तइ परसँ जनमारा उम्‍मस। जहि‍ना छींच स्‍नान माने ि‍छच्‍चासँ देह सि‍क्‍त करबामे देहपर पाि‍नक टघार होइत तहि‍ना पसीनासँ होइत। दस बजेक बाद बाध-बोन ि‍दस ऑंि‍ख नहि‍ उठाओल जाइत, तते झड़क। मुदा घरोमे चैन कहॉं? माथक पसेना नाकपर होइत टप-टप खसैत। देहक बस्‍त्रसँ गंध अबैत। औल-बौल करैत सभक मन। आठमे दि‍न दि‍यारी छी तहूमे काली-पूजा करैक वि‍चार सेहो सौँसे गौवाँ मि‍लि‍ कऽ कए लेलनि‍। दुनू अमबसि‍ये ि‍दन होएत। ओना अदौसँ दि‍वाली एक दि‍ने पावनि‍ होइत आएल अछि‍ मुदा, काली-पूजा धूम-धामसँ मनबैक वि‍चार भेने, पॉंचो दि‍न सभ अपन-अपन अंगनोमे दीप जरबैक वि‍चार कए लेलनि‍। आठमे दि‍न पावनि‍ तेँ सात-दि‍नक पेसतरे घर-अंगनाक टाट-फड़क सरिऔनाइ, छाउर-गोबरक ढेरी हटौनाइ, दुआर-दरवज्‍जासँ लऽ कऽ अपन-अपन घर लगक बाटकेँ छि‍लनाइ-बनौनाइ, कनि‍ये काज अछि‍। तइपर सँ आन-आन गामसँ अबैत सड़को सभकेँ तँ अपना सीमान धरि‍ मरम्‍मत करै पड़त की ने। मुदा गुण अछि‍ जे रौदी भेने खेत-पथारमे काज नहि‍ अि‍छ। जँ रहि‍तै तँ सभक लटैक जैतै। काली-पूजाक पैघ आयोजनक वि‍चार अछि‍ तेँ काजोक भरमार अछि‍ये। लोकक उत्‍साहे तेहन अछि‍ जे कोि‍ढ़लो बोझसँ हल्‍लुक बुि‍झ रहल अछि‍। मालो-जालक भार सभ स्‍त्रीगणेपर छोि‍ड़ देलनि‍। सभ ि‍कछु होइतहुँ आ रहि‍तहुँ मुँहक चुहचुहीमे सेब-तड़क छन्‍हि‍। कारण धानक खेतीमे गामक कि‍सान बँटा गेल छथि‍। ओना खेतक बुनाबटि‍ सेहो तेहन अछि‍ जे बँटाएब स्‍वाभावि‍के अछि‍। अधि‍क ऊँच, मध्‍यम ऊँच, नीच आ अधि‍क नीच रूपमे गामक खेत अछि‍। जहि‍सँ पानि‍ आ रौदक एक रंग असर नहि‍ होएत अछि‍। जेकर सद््य: प्रभाव उपजापर पड़ि‍ते अछि‍। गामक कि‍सानो बॅटा गेल छथि‍। जनि‍का मध्‍यम आ ऊँच खेत छन्‍हि‍ हुनका लेल गरमा धानक खेती उपयोगी छन्‍हि‍। मुदा जिनकर खेत नीच अधि‍क नीच छन्‍हि‍, जहि‍मे शुरू बर्खासँ अगहन-पूस धरि‍ पानि‍ जमल रहैत अछि‍ ओि‍ह खेतक लेल अगहनि‍ये धानक खेती उपयोगी अछि‍। ओना बैचारि‍क भेद सेहो अछि‍। अखनो गरमा धानकेँ अशुद्ध बुझल जाइत अछि‍। जहि‍सँ ि‍कछु गोटे वि‍रोध स्‍वरूप कम उपजा खुशीसँ पबैत छथि‍। आइ धरि‍ बँसपुरामे ने कहि‍यो कोनो होम-यज्ञ भेलि‍ आ ने कोनो तेहन दसगरदा उत्‍सवे। जहि‍सँ परोपट्टा लोक बँसपुराबलाकेँ अधरमी सेहो बुझैत अछि‍। ओना गाम मेहनती कि‍सान-बोनि‍हारक छी। गाममे एक्‍कोटा कम्‍पनीक एजेंट, चोर-डकैत, ठक-फुसि‍याह नहि‍ अछि‍। मुदा तेँ ि‍क बँसपुराबला धर्मक काज नहि‍ करैत छथि‍, बखूबी करैत छथि‍। साले-साले महावीरजी स्‍थानमे अष्‍टयामक संग रामनवमी मनवि‍तहि‍ छथि‍। समए नीक होउ ि‍क अधला मुदा उत्‍सवमे बाधा नहि‍ होइत, भलेहीं नहि‍ पान तँ पानक डंटि‍योसँ काज चलि‍तहि‍ अछि‍। तेकर अति‍रि‍क्‍तो बेकता-बेकती भनडारा, अगहनमे जनार, अासीनमे सलहेसक पूजा इत्‍यादि‍ होइतहि‍ अछि‍। रौदी सबहक मनकेँ हौड़ि‍ रहल छन्‍हि‍। मुदा तइओ मनमे नव उत्‍साह जगले छन्‍हि‍। भि‍नसरसँ लऽ कऽ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ सभ पूजेक माने कालि‍ये पूजाक कोनो नहि‍ कोनो काजो करैत, नहि‍ तँ पूजेक जुि‍त-भॉंति‍क वि‍चार करि‍तहि‍ छथि‍। डि‍हवारो स्‍थानक चलती आि‍ब गेल। स्‍थानक सौँसे आंगनकेँ चि‍क्‍कनि‍ माि‍टसँ दुनू सॉंझ नीपलो जाइत अछि‍ जे जनि‍जाि‍त माने गामक पुतोहू आ ढेरबा बेटी जाति‍ सभ कमसँ कम पॉंचटा उचि‍ती-वि‍नती सुनवि‍ति‍ह छन्‍हि‍। कुमारि‍ भोजन तँ पावनि‍ दि‍न हएत। मुदा अनेको तरहक सुगंध अगरबतीक माध्‍यमसँ लगि‍ति‍ह छन्‍हि‍। कोना नहि‍ लगतनि‍? पहि‍ले-पहि‍ल गाममे पॉंच दि‍नक मेला देलनि‍ अि‍छ। रंग-वि‍रंगक दोकानमे रंग-वि‍रंगक बस्‍तुक बि‍करी गाममे होएत। सभ अपन-अपन जि‍नगीक अनुरूप कीनबो करत। मेलाक प्रति‍ लोकक मन एते उड़ि‍ गेल अि‍छ जे ने आन काज आ ने आन गप करैत नीक लगैत। घरक सोलहन्‍नी भार स्‍त्रीगणेपर पड़ि‍ गेलनि‍। मुदा तरे-तर रोगक एकटा कीड़ी फड़ि‍ गेल। ओ कीड़ी ई जे खि‍स्‍सकरक चलती आबि‍ गेल। सुनि‍नि‍हारक कमि‍ये नहि‍। बूि‍ढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ धि‍या-पूजा धरि‍। खि‍स्‍सकरो रंग-वि‍रंगक, ि‍कयो कालीकेँ समएक गति‍ बुझि‍ बजैत तँ कि‍यो महादेवक छातीपर पएर देव कहैत। जहि‍ना अपन खेत छोि‍ड़ ि‍कसान वसंत पंचमी दि‍न एक्‍के परतीकेँ बेरा-बेरी जोतैत तहि‍ना कालि‍योक चर्च करैत। अदौसँ दि‍वाली एक दि‍ना पावनि‍ होइत आएल अि‍छ। मुदा एक लाटेमे गोधन पूजा, भरदुि‍तया दवातक पूजा सेहो होइत आएल अछि‍। तहि‍पर सँ पॉंच दि‍नक काली पूजाक मेला सेहो होएत। गाममे गहगट मचि‍ जाएत। बि‍ना ब्‍लीचि‍ंग पाउडर छि‍टने पेशावक गंध मेटाएत। दोहरी पूजा भेने जेहने सबहक मनमे खुशी होइत तेहने काजक तबाही सेहो। एक लखाइत दस-बारह ि‍दन खटब असान नहि‍। के बीमार पड़त, ककरा रद-दस्‍त हेतइ तकर कोन ठेकान। तहूमे धि‍या-पूजा अकड़-धकड़ खेबे करत। रोकने थोड़े मानत। तइपर सँ भरि‍ राति‍ नाचो-तमाशा देखवे करत। सोचि‍नि‍हार सभकेँ तरे-तर सोगो होइत। ततवे नहि‍ आरो सोग सभ एकाएकी मनमे अबैत जाइत। एक तँ ओहि‍ना दि‍ल्‍ली-कलकत्ता दुआरे भाए-बहीनि‍क पावनि‍ भरदुति‍या रोगा गेल अछि‍ तइपर सँ गामक मेला। जँ पूजाक हकारो देल जाएत तँ के ऐहन अभागल होएत जे लक्ष्‍मी पूजा छोि‍ड़ आओत। भलेहीं उक पुरूखे फेड़त मुदा, तम्‍मा तरमे दूि‍ब, पाइ ि‍सरा आगू तँ जनि‍जाति‍ये रखै छथि‍। ओ पुरूख कोना करताह। ऐहन पावनि‍ छोड़व कते उचि‍त होएत। मुदा गामक मेला सबहक मनकेँ ि‍बरड़ोक झोंक जेकॉं उड़बैत। तेँ नीक-अधलापर नजरि‍ ककरो टि‍कहि‍ नहि‍ दइत। काति‍कक जरैया बोखार आ पेट-झरी पर नजरि‍ ककरो जेबे नहि‍ करैत। सभ उन्‍मत। सभ बेहाल। जहि‍ना फगुआ दि‍न भॉंग पीबि‍ गाममे नचैत अछि‍ तहि‍ना सभ घरसँ गाम-धरि‍क काजक पाछू नचैत। जहि‍ना घरक ओलतीक पानि‍ टधरि‍ कऽ अंगनासँ नि‍कलैत-नि‍कलैत पानि‍क बेग बनि‍ पोखरि‍ पहुँच जाइत तहि‍ना व्‍यक्‍ति‍ ससरि‍ कऽ समाजमे मि‍लि‍ रहल अछि‍। गाममे काली-पूजा ि‍कऐक होएत? जे एते दि‍न नहि‍ भेल ओ एहि‍ सालसँ ि‍कऐक होएत? अनेरे खर्चाक उतड़ी गौँवा गरदनि‍मे पहि‍रए लेल ि‍कऐक तैयार भऽ गेल? तेकर कारण ई अछि‍ जे बँसपुरासँ कोसभरि‍ सटले सि‍सौनीमे पच्‍चीसो वर्ख उपरेसँ दुर्गा-पूजा होइत अबैत अछि‍। चरि‍ कोसीक लोक दुर्गा-पूजा देखए सि‍सौनी अबैत छथि‍। गामेक नहि‍ आनो-आनो गामक स्‍त्रीगण दुर्गा-स्‍थानमे सॉंझो ि‍दअए अबैत छथि‍। कुमारि‍ भोजन सेहो करबैत छथि‍। कबुलाक छागर सेहो चढ़बैत छथि‍। बलि‍-प्रदानमे सि‍सौनीक जोड़ा जि‍लामे नहि‍ अछि‍। दुर्गा-पूजा होइसँ एक महीना पहि‍नहि‍सँ बकरी पोसि‍नि‍हारक चलती आि‍ब जाइत। तहूमे एकरंगापर तँ डाक-डकौबलि‍ भऽ जाइत। ततबे नहि‍, पाठ केनि‍हार सभ सेहो अभ्‍यास करए लगैत। गाममे दुर्गा-पूजाक समए परीक्षाक समए बनि‍ जाइत। जे बेसीठाम सम्‍पूट पाठ केलनि‍ ओ ि‍डस्‍टि‍ंगसनक संग फस्‍ट डि‍वीजन घोषि‍त होइत छथि‍। आमदनि‍यो नीक आ डि‍पलोमो नमहर। कतवो ि‍कयो अभ्‍यास करति‍ मुदा, छन्‍ठे पंडीजी फस्‍ट करताह, ई सबहक मन बीस सालक अनुभवसँ मानैत आएल छन्‍हि‍। हद छथि‍ ओहो। एक तँ ओहि‍ना तेज वोली छन्‍हि‍ तइपर सँ तते स्‍पीडमे धड़ै छथि‍ जे चौपाइक पहि‍ल शब्‍द आ अंति‍मो शब्‍द सुनि‍ पएब ि‍क नहि‍? ओना ि‍कछु होउ मुदा, कीनुआ सर्टिफि‍केट नहि‍ रखने छथि‍। मेहनत कऽ कऽ अनने छथि‍। एि‍ह बेरि‍ सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे एकटा घटना घटल। घटना ई भेल जे बँसपुराक एकटा अठ्ठारह-बीस बर्खक लड़की, जेकर पैछले साल वि‍आह भेलि‍ छलै आ तीनि‍ये मास सासुर बसल छलि‍, केँ पूजा कमि‍टीक तीन गोटे फुसला कऽ भंडार घर लऽ गेल। मेला-गनगनाइत। नाच-तमाशाक लाउड-स्‍पीकर चरि‍ कोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोटे ओहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार केलक। बेबस भऽ ओ लड़की सभ ि‍कछु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोरमे ओकरा सभ छोि‍ड़ देलक। मेला भरि‍ ओ ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। मुँह-कान झॉंपि‍ मेलासँ नि‍कलि‍ सोझे गामक रास्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचतहि‍ छाती चहकि‍ गेलइ। छाती चहकि‍तहि‍ हबो-ढकार भऽ कानए लागलि‍। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्‍के-दुइये गामक लोक घर-आंगनसँ नि‍कलि‍ रास्‍तापर आि‍ब-आि‍ब देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍तहि‍ एका-एकी लोक पूछए लगलै। कानि‍-कानि‍ अपन बीतल घटना सुनबए लागलि‍‍। ि‍बना ि‍कछु पुछनहि‍ माए, बेटीकेँ कनैत देि‍ख, छाती पीि‍ट-पीि‍ट कनवो करै आ दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक- “की भेलौ, हम माए छि‍औ, हमरा नै कहमे ते केकरा कहवीही।” जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आि‍ग सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमकि‍ कऽ पति‍केँ कहलक- “जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लुटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुक्‍खक बलि‍ पड़त।” कहि‍ घरमे राखल झोलाएल फौरसा नि‍कालि‍, साड़ी समेटि‍ कऽ बान्‍हि‍ सि‍सौनीबला सभकेँ गरि‍अबैत वि‍दा भेलि‍। काली रूप पत्‍नीकेँ सि‍सौनी ि‍दस बढ़ैत देखि‍ पति‍ तौनीक मुरेठा बान्‍हि‍ हरोथि‍या लाठी नेने गारि‍ पढ़ैत सेहो बढ़ल। बताहि‍ जेकॉं माए ि‍चकड़ि‍-चि‍कड़ि‍ गरि‍ऐवो करै आ देवी-दुर्गा लगा-लगा सरापबो करए। जते डेग आगू मुँहे बढ़ै तते तामसो उपरे मुँहे चढ़ल जाइ। ऐम्‍हर भूमहुरक आि‍ग जेकॉं तरे-तर गौंओक करेजमे आि‍ग लहरि‍ गेल। सभसँ पहि‍ने सातो दि‍यादी परि‍वारक पुरूष, स्‍त्रीगण सहि‍त धि‍यो-पूतो, जेकरा जएह सोझमे भेटि‍लै, से सएह-सहए लऽ कऽ सि‍सौनीक रास्‍ता धेलक। दि‍याद-वादकेँ आगू बढ़ैत देखि‍ टोलोक आ जाति‍योक सभ वि‍दा भेल। गाम दलमलि‍त हुअए लगल। जेकरा जएह मनमे उठै से सएह जोर-जोरसँ बजैत सि‍सौनी दि‍सक रास्‍ता धेलक। बुद्धि‍यार लोक सभक मन दड़कए लगल जे दुनू गामक बीच खून-खराबी हेबे करत। एकरा ि‍कयो नहि‍ रोि‍क सकैत अछि‍। मुदा तइयो आगि‍मे जरैसँ रोकैक प्रयास करै दुआरे दाैि‍ड़-दौि‍ड़ आगू बढ़ि‍ रास्‍ता रोकलक। ि‍कयो बात मानैले तैयारे नहि‍। दुनू परानी कुसुमलालकेँ माने लड़की माए-बापकेँ चाि‍र-चारि‍ गोटे पकि‍ड़ कऽ रोकलक। कुसुमलाल तँ ठमकि‍ गेल मुदा, पवि‍त्री मानैले तैयारे नहि‍। चरि‍-चरि‍ हाथ कुदि‍ चारू गोटेक हाथ छोड़ा-छोड़ा आगू बढ़ि‍ बाजै- “सब दि‍नसँ पुरूख स्‍त्रीगणपर अति‍याचार करैत आएल अछि‍ आ अखनो करैत अछि‍। अइ अति‍याचारकेँ के रोकत? पुरूष-पुरूष स्‍ाभ एक छी। जहि‍ना गाएसँ गाए नै पाल खाइत तहि‍ना पुरूख बुते पपि‍याह पुरूखकेँ सि‍खौल नै हेतै।” जहि‍ना भादबक बादलमे ि‍बजलोको ि‍छटकैत आ चारू भर अवाजो होइत तहि‍ना हंसेरीक बीच रंग-वि‍रंगक बात अकासमे उड़ए लगल- “सि‍सौनीमे आि‍ग लगा लंका जेकॉं जरा देव।” “इज्‍जत-आबरू लुि‍ट, गाममे आि‍ग लगा देव।” “चौराहापर अपराधीकेँ आनि‍ मुँहपर थूक फेि‍क देहमे आि‍ग लगा देव।” “सि‍सौनीक बहू-बेटीकेँ पकड़ि‍ लऽ अाएव।” क्रोधक चि‍नगारी उि‍ड़-उड़ि‍ फुलझाड़ी जेकॉं अकासमे चमकए लगल। मुदा ई सभ ि‍वचार बेकता-बेकती होइत सामूहि‍क नहि‍। ने ि‍कयो ककरो बात सुनैले तैयार आ ने अपन मुँह रोकैक लेल। मुदा तइओ बुद्धि‍यार सभ रास्‍ता छोड़लनि‍ नहि‍। घरमे लागल आि‍ग ि‍मझबैमे हाथ-पाएर झड़कि‍तहि‍ छैक। गाममे सभसँ बेसी उमेरक मनधन बाबा। नब्‍बे माघक जाड़ कटने छथि‍। तहि‍ बीच अनेको झॉंट, पाथर, शीतलहरी, बि‍हाड़ि‍, भूमकम देखि‍-भोगि‍ चुकल छथि‍। गामक लोककेँ एकमुहरी देखि‍ बॉंसक फराठी नेने टुघरल-टुघरल सेहो पहुँचलाह। पाछुएसँ देखलखि‍न तँ मन मानि‍ गेलनि‍ जे सि‍सौनी आ बँसपुराक बीच मारि‍ हेबे करत। ब्रह्माक बापो नहि‍ बँचा सकैत छथि‍। केमहर के मरत, कतेक हॉंड़-पॉंजर टुटत तेकर कोनो ठेकान नहि‍ रहत। ि‍वचारैत-वि‍चारैत दुनू ऑंखि‍सँ नोरक टघार चलए लगलनि‍। छहोछीति‍ छाती भऽ गेलनि‍। बुकौर लागि‍ गेलनि‍। देहक हूबा टुि‍ट गेलनि‍। बोम फाि‍ड़ कनए लगलाह। गंगोत्रीक गंगा जेकॉं दुनू ऑंखि‍सँ अनघोल करैत अश्रु, अरड़ाहटि‍ मारैत मुँहक बोल आ थर-थर कँपैत छातीसँ बेकाबू मनधन बाबा भऽ गेलाह। जहि‍ना कोसीक धारक बीच मोइनमे पाछुक पानि‍क धारा आबि‍ घुमए लगैत तहि‍ना मनधनक वि‍चार घुमए लगलनि‍। हूबा कऽ कए उठि‍ आगू मुँहे ससरए लगलाह। आगू पहुँच रस्‍तापर फराठीसँ चेन्‍ह दैत पड़ि‍ रहला। मन थि‍रे नहि‍ होइत। कखनो ऑंखि‍क सोझमे दू गामकेँ नष्‍ट होइत देखति‍ तँ कखनो पुस्‍त-पुस्‍ताइनकेँ दुश्‍मनी होइत देखैत। मन पड़लनि‍ जूरशीतल पावनि‍क घटना। एकटा नढ़ि‍याक खातीर बेला आ मैनही गामक शि‍कार खेलि‍नि‍हारक बीच मारि‍ भेल। धमगज्‍जरि‍ मारि‍। परि‍स्‍थि‍ति‍यो अनुकूले पड़लैक। पावनि‍ मनबए सभ लाठी, सहत, तीर-धनुष लऽ लऽ शि‍कार खेलए गेले रहै। ने लोकक कमी आ ने मारि‍ करैक वस्‍तुक। मुद्दो तेहने भारी, एकटा मुइल नढ़ि‍या। मुदा प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न तँ गामक रहबे करै। अही प्रति‍ष्‍ठा लऽ कऽ कतेक लोकक कपार फुटल, कतेक हाथ-पएर टूटल आ दुनू दि‍स एक-एकटा खूनो भेल। केयो ककरो देखैबला नहि‍ रहल। जे जत्ते से तत्ते कुहरैत। केकरा के उठा कऽ लऽ जाइत आ इलाज करबैत। हो न हो तहि‍ना कहीं आइयो ने हुअए। मनमे उठलनि‍ जे सभकेँ मनाही करी, मुदा सुनत के। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍तमे मन ओनाए लगलनि‍। ऑंखि‍ उठबैत तँ देखथि‍न जे जे स्‍त्रीगण सभ दि‍न सोझ मूड़ी खसबैत अि‍छ अाइ ओहो सभ बताहि‍ जेकॉं साड़ीक भरकौंच बन्‍हने लाठी फड़का रहल अछि‍। सबहक मन मारि‍येपर टँगल अछि‍। कोना उतड़त? मुदा तरे-तर खुशि‍यो होइत रहनि‍ जे नीक वस्‍तुक कीमतो बेसी होइत अछि‍। गुन-धुनमे फँसल मनधन बाबाक मन अपन दायि‍त्‍वपर पड़लनि‍। मुदा, एहि‍ हंसेरीक बोनमे दायि‍त्‍वक मोजर के देत। मुदा, तइओ एक भाग फराठीकेँ पकड़ि‍ दोसर भाग उठा इशारासँ सभकेँ शान्‍त होइले कहलखि‍न। मुदा, सभ अपने ताले, बेताल। गामक जत्ते कुकूड़ जतए रहै ओ बान्‍हक नि‍च्‍चॉं खेते-खेत भूकैत आगू पहुॅच गेल। छह मसि‍या बच्‍चा सभ चाि‍र बेरि‍ भूकै आ कनी-काल सुसता ि‍लअए। मनधन बाबाक मनमे उठलनि‍ जे बँसपुराक लड़कीक संग जे दुर्व्‍यवहार ि‍ससौनीबला लुच्‍चा सभ केलक अो गामक इज्‍जतक संग जुड़ल सवाल अछि‍। इज्‍जतक लेल जान देब पुरूखक काज छी। एकरा अधलाह के कहत। सभकेँ अप्‍पन-अप्‍पन इज्‍जत-आबरू बनबैक लेल, बना कऽ नि‍माहैक लेल कटए-मरए पड़तैक। से जँ नहि‍ रहत तँ कखन केकर इज्‍जत के लुटि‍ लेत तेकर कोन ठेकान अछि‍। भदबरि‍या बेंङ जेकॉं साले-साल तत्ते लुच्‍चा-लम्‍पटक जन्‍म भऽ रहल अछि‍ जे गामे-गाम सोहरल जाइत अछि‍। मुदा, गामक भीतर तँ ऐहन-ऐहन ि‍करदानी सदति‍ काल होइते रहैत अछि‍। तहन कहॉं ि‍कयो कि‍छु बजैत अछि‍। तहि‍ काल साला सभ कहत जे धु: छौंड़ा-छौंड़ीक खेल छी। दुनू बात मनमे उठि‍तहि‍ मुँहसँ हँसी नि‍कलि‍लनि‍। मुदा, गामक लोकक रूखि‍ हँसी कऽ दाि‍ब देलकनि‍। सोचए लगलाह जे एक्‍के रंगक काज लेल एकठाम लोक कटए-मरए चाहैत अछि‍ आ दोसर ठाम धि‍या-पूताक माने छौड़ा-छौड़ीक खेल बना उड़वैत अछि‍। अजीव अछि‍ लोकोक बुद्धि‍-वि‍चार। जहि‍ना सदति‍ काल एक पुरूष दोसर महि‍लापर नजरि‍ उठवैत रहैत अछि‍ मुदा अपन पत्‍नीकेँ दोसरक संग बजैत देखि‍ आि‍ग-बबूला भऽ ि‍कछु सँ ि‍कछु करैक लेल तैयार भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने अखनो भऽ रहल अछि‍। जहि‍ घटनाकेँ सामूहि‍क रूपे इज्‍जत बुझल जाइत अछि‍ ओहि‍ इज्‍जति‍क रकछो तँ समूहेकेँ करए पड़तैक। जँ खेल बुझत तँ खेल जेकॉं वुझह नहि‍ जँ इज्‍जत बुझत तँ इज्‍जत जेकॉं सुरक्षि‍त राखह। नहि‍ जँ गुल-गुल बुि‍झ दुनू करत तँ इज्‍जत-आवरूक बात करब छोि‍ड़ ि‍दअ। मन सक्‍कत हुअए लगलनि‍। रस्‍तापर फराठी नोकसँ डॉंरि‍ दैत कहलखि‍न- “एहि‍ डाँरिसँ जँ ि‍कयो एक्‍को डेग पएर बढ़ेवह तँ एतै परान गमा देब। नहि‍ तँ अखन सभ शान्‍त भऽ जाह।‍ नहाइयो-खाइ बेरि‍ भेलि‍ जाइत अछि‍। भानसो-भात सबहक बन्‍ने छह। तेँ अखन जाइ जाह। खा-पी कऽ चारि‍ बजे ब्रह्मस्‍थानक आगूमे बैसि‍ आगूक रास्‍ता बना लि‍हह।” मनधन बाबाक ि‍वचार सभ मानि‍ घरमुँहा भेल। तत्खनात झंझट ठमकि‍ गेल। मुदा मनक धधड़ा नहि‍ ि‍मझाएल। जहि‍ना चेराक धधकैत आगि‍मे पानि‍ ढ़ारलासँ धधड़ा बुझा जाइत मुदा, ताव रहबे करैत अछि‍ तहि‍ना लोकोक मनक आि‍गमे भेल। छोट-छोट टुकड़ी बनि‍ सभ ि‍वदा भेल। मुदा रस्‍तामे सभ क्रोध बोकरि‍तहि‍ रहए। सभकेँ डोरि‍आइत घर दि‍स जाइत देखि‍ मनधन बाबाक मन थीर भेलनि‍। घर ि‍दस घुमि‍ते मनमे उठलनि‍ जे जखन गामक लोकमे एते आि‍ग लगल अछि‍ तखन दुनू परानी कुसुमलालकेँ कते लगल हेतइ। से नहि‍ तँ ओकरा ऐठाम जाए बोल-भरोस दऽ अबि‍ऐक। अपन अंगनाक रास्‍ता छोड़ि‍ मनधन बावा कुसुमलालक ऐठाम पहुँचलाह। दुनू परानी कुसुमलाल दुखक अथाह समुद्रमे उगि‍-डूबि‍ रहल अछि‍। दुनू ि‍नराश। आशाक कतौ दरस नहि‍। दुनूक चेहराक रंग फि‍क्‍का। मनमे बेरि‍-बेरि‍ उठैत जे ि‍बनु इज्‍जतक जि‍नगी जीवि‍ नहि‍ जीबि‍ दुनू बरावरि‍। दुनू बेकतीकेँ देखि‍ मनधन बाबा चुपचाप मेह जेकॉं डेढ़ि‍यापर ठाढ़। ने कुसुमलाल ि‍कछु बजैत आ ने मनधन। मनमे होनि‍ जे कुसुमलाल हमरे सोलहन्‍नी दोखी बुझैत रहए। जहि‍ना प्रेमक अंति‍म सीढ़ी वि‍आह छी तहि‍ना तँ क्रोधक खूनो छी। हो न हो कोनो उझट बात कहि‍ दि‍अए। फेरि‍ मनमे एलनि‍ जे आइले तँ छी बोले-भरोस दइले। जीबठ बान्‍हि‍ कहलखि‍न- “वौआ कुसुम, हमरा आगू तू बच्‍चा छह। तोरासँ बहुत बेसी एहि‍ दुनि‍यॉंकेँ चक्‍कर-भक्‍कर देखने छी। मनकेँ थीर करह। जे भऽ गेल ओ तँ नहि‍ घुमत। मुदा तइले की करी, कते करी, ई सभ बुझए पड़तह। ऐहन तँ नहि‍ ने जे सभ ि‍कयो ओही लागल परान गमा दाय। तू दुनू गोटे तँ बापे-माए छहुन। दुखी भेनाइ उचि‍ते छह। मुदा आइ की देखलहक? देखलहक ि‍क ने जे सगरे गामक लोककेँ असीम दुख भेलि‍ छैक। ई ि‍वचार मनसँ हटावह जे हम्‍मर इज्जत चलि‍ गेल। गरीब लोकक सभसँ पैघ दुश्‍मन ओकर गरीबी छि‍यै। गरीबी केबल अन्‍ने-पानि‍ धरि‍ नहि‍ होइत अछि‍। जि‍नगीक सभ पहलुक लेल होइत अछि‍। गरीबीक बान्‍ह ओि‍ह रूपे बन्‍हने अछि‍ जहि‍मे गारि‍-फज्‍झति‍सँ लऽ कऽ धन-सम्‍पत्ति‍, माए-बहीनि‍क इज्‍जत लुटै धरि‍ अछि‍। तहन जँ ि‍कयो हँसी-खुशीसँ जीवि‍ये लैत अछि‍ वएह एक लाख। गरीबीक ताला लोहोक तालासँ नमहर आ सक्‍कत अछि‍। लोहाक तालामे एक्‍केटा मुँह आ दॉंत होइ छै जहि‍मे कुन्‍जी घुमौलासँ भक दऽ खुजि‍ जाइत अछि‍। मुदा गरीबीक जे ताला अछि‍ ओहि‍मे अनेको मुँह आ दॉंत अछि‍। एकटा खोलबह दोसर लगि‍ जेतह। सोझे लगबे टा नहि‍ करतह, पहि‍लुकासँ कते गुना कस-कसा कऽ लगि‍ जेतह। तेँ, जहि‍ना कोनो आमक गाछ साले-साल रौद, बरखा, पानि‍-पाथर, ि‍बहाड़ि‍ जाड़ सहि‍ नमहर भऽ फड़ैत अछि‍ आ ओ फड़ मनुक्‍खसँ लऽ कऽ अनेको जीव-जन्‍तु धरि‍ बि‍लहैत अछि‍ तहि‍ना मनुक्‍खोक जि‍नगी छी। जखने गरीब घरमे जन्‍म लेलह तखने बुझि‍ जाहक जे ऑंखि‍ देखैले नहि‍ कनैले अछि‍। गारि‍ सुनैले कान अछि‍ आ मारि‍ खाइले देह अछि‍। गरीबक ऑंखि‍मे जते इजोत बढ़ैत अछि‍ तते नोरक समुद्र दि‍शि‍ जाइत अछि‍। जत्ते समुद्रक लग पहुँचैत अछि‍ ततै नोरक टघार अनवरताक रूपमे बदलैत अछि‍। जहि‍सँ अनवरत टघरैत रहैत अछि‍। तोहर दुख समाजक दुख बनि‍ गेल अछि‍। समाज ओहन कारखाना छी जहि‍मे देवतासँ लऽ कऽ छुतहर धरि‍ बनैत अछि‍। तेँ ने ककरो कहने ककरो इज्‍जत अबैत अछि‍ आ ने जाइत अछि‍। लोककेँ अपने केने होइत अछि‍ आ गमौने जाइत अछि‍।” मनधनबाबाक बात सुनैत-सुनैत पवि‍त्री बोम फाड़ि‍ कानए लगली हि‍चुि‍क-ि‍हचुि‍क बजली- “बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तेँ ि‍हनकर बात मानि‍ लेलि‍एनि‍। नै ते आइ सि‍सौनीमे आि‍ग लगौने ि‍बना नै छोड़ि‍ति‍यै। जखैनसँ बेटी आइलि‍ तखैनसँ एक्‍को बेरि‍ मुँह उठा नइ तकैए। कनैत-कनैत दुनू ऑंखि‍ डोका जेकॉं भऽ गेलै। सदि‍खन एक्‍केटा रट लगौने अछि‍ जे जीवि‍ये कऽ की हएत? जखन इज्‍जत चलि‍ये गेल तखैन कोन मुँह समाजकेँ देखाएव।” पवि‍त्रीक बात सुि‍न मनधन बाबाक हृदए छोहोछीत भऽ गेलनि‍। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलनि‍। दुनू हाथसँ ऑंखि‍ पोछि‍ बजलाह- “कनि‍यॉं, जकरा अहॉं इज्‍जत जाएव बुझै छि‍यै ओ जाएव नहि‍ छी। जोर-जबरदस्‍ती ि‍छयै। जोर-जबरदस्‍ती मुँहक कहलासँ नहि‍ मेटाएत छैक। ओकरा शक्‍ति‍सँ रोकल जाय पड़ैत छैक। गरीबक बीच ओहन शक्‍ति‍ अखन नहि‍ भेलि‍ अछि‍। जखन होएत स्‍वत: रूि‍क जाएत। अखन जोर-जबरदस्‍ती केि‍नहार बलगर अछि‍ तेँ सुझि‍-बुझिसँ चलए पड़त। इलाकामे कोन गाम ऐहन अछि‍ जहि‍ गाममे ऐहन-ऐहन ि‍करदानी नहि‍ होइत छैक। सभसँ पहि‍ने गरीबकेँ अपना पाएरपर ठाढ़ हुअए पड़तैक। जखन ओ ठाढ़ भऽ संगठि‍त होएत तखन शोषकक माने जबरदस्‍ती केनि‍हारक संग संघर्ष होएत। संघर्षोसँ समाज बदलैत अछि‍। समाज बदलने सभ ि‍कछु बदलि‍ जाइत अछि‍। तेँ कानू-खीजू नहि‍। समाजक संग पाएरमे पएर ि‍मला कऽ चलू।” कहि‍ ि‍वदा भऽ गेलाह। घर दि‍सक वाट तँ मनधन बाबा धए लेलनि‍ मुदा, डेग उठबे ने करनि‍। तइओ बलजोरी बढ़लाह। फराठी हाथे कहुना-कहुना कऽ आि‍ब गेलाह, मुदा देहमे आि‍ग लगल रहनि‍। जहि‍सँ ि‍वचार ओझरा गेलनि‍। धरती-पहाड़क दूरी देखि‍ सोचति‍ जे कोनो आंगुर कटने अपने घाव हएत। भलेहीं अखन ई घटना छौड़ा-छौड़ीक खेल बुझल जाइत छल आइ सही रास्‍तापर आबए चाहैत अछि‍। तेँ घटनाकेँ रोकब उचि‍त नहि‍ हएत। पुन: मनमे उठलनि‍ जे दू गामक बीचक घटना छी। एक गामक रहैत तँ कने हल्‍लुको रहैत मुदा, दू गामक बीच ऐहन घटनाकेँ कते नमहर मानल जाए। मुदा छोड़बो तँ उचि‍त नहि‍। अदौसँ पहाड़ी धार जेकॉं नि‍च्‍चॉं मुहे बहैत आएल अछि‍, जेकरा रोकबो जरूरी अछि‍। जँ से नहि‍ हएत तँ वैश्‍वीकरणक ि‍बरड़ोमे उड़ि‍ कऽ अकास ठेि‍क जाएत। मुदा जहि‍ रूपे घटनाक जबाव बढ़ए चाहैत अछि‍ ओ तँ आरो ि‍बनाशक अछि‍। जहि‍ना एहि‍ गामक लोक सामाजि‍क प्रति‍ष्‍ठा बना कटै-मरैले तैयार अछि‍ तहि‍ना जँ कहीं ओहो-ि‍ससौनीबला सभ गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझि‍ ठाढ़ भऽ जाए, तहन ि‍क होएत? ठाढ़ो होइक कते कारण भऽ सकैत अछि‍। ओना सार्वजनि‍क स्‍थानक घटना होइतहुँ गाम आि‍ब लड़की बाजल। जेकरा गौवाँ मानि‍ रहल अछि‍। मुदा सही घटना रहि‍तहुँ ओ ि‍ससौनीबला मानि‍ये लेत सेहो जरूरी नहि‍ अछि‍। एक गाम दोसर गामपर बलजोरी कते काल कऽ सकैत अछि‍? कोनो बाटे नहि‍ सुझनि‍। दू गामक बीच तँ ि‍वचारेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। मुदा जँ ऐहन घटना रोकल नहि‍ जाएत तँ सार्वजनि‍क स्‍थानक महत्‍वे कते दि‍न ि‍टकत। भुँइयेँमे दलानक ओसारपर कर बदलि‍तहि‍ मनमे एलनि‍ जे ऐहन घटना सामाजि‍क स्‍तरपर रोकब नीक हएत। मन असथि‍र भेलनि‍। बेरूका बैसारमे जाइ ि‍क नहि‍? मुदा, बाजल तँ हमहीं छी। फेरि‍ मनमे एलनि‍ जे चारि‍ बजे सौँसे गौवॉंकेँ बैसि‍ कऽ ि‍वचार करैले कहलि‍यै आि‍क ई कहलि‍यै जे तोरा सभकेँ ि‍वचार सुना देवह। दस ि‍मलि‍ करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज। पाकल आम भेलहुँ, कखन छी कखन नहि‍ छी। इहो कोनो जरूरी नहि‍ अछि‍ जे हम्‍मर ि‍वचार सभकेँ सोहेवे करै। जँ नहि‍ सोहेतै तहन तँ ओरो मनमे दुख हएत। तहूमे मूलत: ई घटना महि‍लाक छी। जे पुरूष हजारो बर्खसँ ऐहन अपराध करैत आएल अछि‍ ओ सुहरदे मुँहे मानि‍ लेत। आन गामक घटना कहीं गामे ि‍दशि‍ ने चलि‍ आवए। अखनो धरि‍ समाजमे ऐहन कि‍रदानीकेँ लोक हँसि‍ये-चौल बुझैत अछि‍। फेरि‍ मनमे उठलनि‍, अपनो तँ आब बलजोरि‍ये जीवि‍ रहल छी नहि‍ तँ अपन दातारी कैकटा गाममे अछि‍। तेँ ि‍क समाजसँ हटि‍ जाइ? हटब तँ मुइलाक बाद, डाहैले के आओत? से देखवो करैले तँ नहि‍ आएव। अपनो परि‍वारमे देखै छी जे सि‍नेमा कलाकार आ खेलाड़ी सबहक कुल-खुटक नाओ जनैत अछि‍ आ अपनाक कल-खुटक जनि‍तहि‍ नहि‍ अछि‍। ऐहन तँ गड़ि‍बहू गाम अछि‍। ककरा कहबै, स्‍त्रीगणो सभ तेहन-तेहन आि‍ब गेल अछि‍ जे पुरूख सभकेँ गाि‍र पढ़ि‍-पढ़ि‍ कहैत अछि‍ जेहने छुतहर कुल-खुट रहत‍ह तेहने ने चालि‍ रहतह। आब कहू जे कुल-खुटक कोना दोख छै। नान्‍हि‍-नान्‍हि‍टा छौँड़ा शि‍खर-पराग खाए लगल अछि‍, एि‍हमे ककर दोख। जीबैतमे ऐहन-ऐहन लीला देखै छी आ परोछ भेलापर हीरा सजाओल मंदि‍र बना देत। तहि‍ बीच पोती आि‍ब कऽ कहलकनि‍- “खाइले चलू ने बाबा? नहेबै नै?” केचुआइल सॉंप जेकॉं बाबा कहलखि‍न- “चलै-फीड़ैक होश नहि‍ अछि‍। अहीठाम नेने आबह। पहि‍ने एक लोटा पानि‍ नेने आबह। कने मुँह-हाथ धोइ लेव।” जहि‍ना गदगरल मन रहने खाइक इच्‍छा नहि‍ होइत तहि‍ना मनधनोकेँ वुझि‍ पड़नि‍। मुदा तइयो जी-जॉंति‍ कऽ खाए लगलाह। लाभर-जीभर चारि‍ कौर खाऽ लोटो भरि‍ पानि‍ पीबि‍ बजलाह- “अन्‍न नहि‍ धसैत अछि‍। लऽ जाह।” हाथ मुँह धाेइ चौकीपर ओंधरा गेला। मुदा जहि‍ना ज्‍वर-ऐलासँ कछमछी अबैत अछि‍ तहि‍ना चौकीपर एक करसँ दोसर कर घुमैत। बेर टगल देखि‍ उठि‍ कऽ फराठी हाथे ब्रहमस्‍थान दि‍शि‍ ि‍बदा भेलाह। तीनि‍ये बजेसँ एका-एकी लोक ब्रह्मस्‍थान पहुँचए लगल। चारि‍ बजेसँ पहि‍नहि‍ गामक लोक एकत्रि‍त भऽ गेल। मुदा एकटा नव घटना सेहो भेल। ओ ई भेलि‍ जे जहि‍ गाममे आइ धरि‍ कोनो पनचैती वा सार्वजनि‍क काजमे महि‍ला भाग नहि‍ लइत अबैत छलि‍ ओ घराघरी सभ पहुँच गेलीह। ओना आइ धरि‍ हुनका सभकेँ कहलो नहि‍ जाइत छलनि‍। मुदा जखन सबहक बीच माने पुरूष-महि‍लाक बीच समए नि‍र्धारि‍त भेल तखन हुनको माने महलो सभकेँ हौसला जगलनि‍। हौसला जगि‍तहि‍ टाट-फड़कक परदा तोड़ि‍ घरसँ नि‍कलि‍ तीत-मीठक सुआद लइले नि‍कललीह। अखन धरि‍ जे बुद्धि‍-वि‍चारक गाछ माटि‍क तर बीज रूपमे पड़ल छलनि‍ ओ एकाएक अकुर गेलनि‍। नजि‍र नचलनि‍ तँ देखलनि‍ जे अदौसँ आइ धरि‍ महि‍ला पुरूखक चारागाह छोड़ि‍ आरो ि‍कछु नहि‍ रहलीह। जबकि‍ बुद्धि‍-वि‍वेक आ हाथ-पाएर तँ सभकेँ छन्‍हि‍। केवल नीन तोि‍ड जगैक जरूरत अछि‍। चरैत-चरैत पुरूख महि‍लाक सम्‍पूर्ण ि‍जनगीकेँ, पाण्‍डु रोगी जेकॉं नि‍रस बना देने छथि‍। विवाहसँ पूर्ब ि‍शक्षा-वि‍हीन बच्‍चा जि‍नगी आ वि‍वाहक पॉंचे दि‍न उपरान्‍त समाजक कलंि‍कत वि‍धवाक जि‍नगी। जहि‍ना सामूहि‍क हत्‍याराकेँ जहलमे यातना भेटैत तहि‍ना महि‍लाक संग भेलि‍ अछि‍। मुदा आइ बँसपुरामे नव सूर्यक उदय भेल। बैसारमे पुरूख-नारी तँ पहुँचलीह मदुा, एक संग नहि‍ बैसि‍ फुट-फुट वैसलीह। एक भाग पुरूष आ दोसर भाग महि‍ला। ि‍बना अनुशासक बैसार तेँ दुनू बैसारमे सभ अपन-अपन पेटक बात बोकरए लगल जहि‍सँ दुनू ि‍दशि‍ अनधोल हुअए लगल। ि‍कयो ककरो बात सुनैले तैयार नहि‍। सभ अपने बजैमे बेहाल। मुदा पेटक बात सठि‍ते सभ पोखरि‍क पानि‍ जेकॉं शान्‍त भऽ गेल। कातमे बैसल मनधन बाबा समाजक रूखि‍ चुपचाप भऽ अकैत रहथि‍। सभकेँ चानि‍पर पसेना टघार देखथि‍‍। जहि‍सँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे भीतरक गरमी नि‍कलि‍ रहल छनि‍। समस्‍याकेँ दू ढंगसँ समाधान करब सोचि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत कहलखि‍न- “अनकर घेघ देखैसँ पहि‍ने अपन देखू। जँ से नहि‍ देखब तँ ओहन दशा होएत जेहन हँसि‍ कऽ बजलासँ गंभीर वि‍चारकेँ होएत। सभसँ जरूरी अछि‍ गामक बीच जे ऐहन-ऐहन कुचालि‍ सभ चलि‍ रहल अछि‍ ओकरा बन्‍न करए पड़त। जँ से नहि‍ करब तँ आइ ओहन लकड़ीमे आि‍ग धऽ लेलक जे एक गामक कोन बात जे सइयो गामकेँ जराओत। औझका सूमा जे देखि‍ रहल छी ओ पुरूखसँ कम महि‍लामे नहि‍ अछि‍। तेँ दू बैसारकेँ एक बनाउ।” एक बैसार सुनि‍ दुनू दि‍शि‍ गल्‍ल-गुल्‍ल शुरू भेल। दू तरहक ि‍वचार दुनू दि‍स टकराए लगल। टकराहट देखि‍ कते पुरूख उठि‍ कऽ वि‍दा हुअए लगलथि‍। मुदा बाबाक बात महि‍ला सभ मानि‍ अपन बैसार उसारि‍ पुरूखेक बैसारमे बैसि‍ चि‍कड़ि‍-चि‍कड़ि‍ बाजए लगलीह- “अहॉंक पीठि‍पर हम सभ तैयार छी बाबा, उठि‍ कऽ नर्णए दि‍औक।” महि‍लाक अावाज सुनि‍ बाबाकेँ भेलनि‍ जे ई आवाज शरीरक नहि‍ शरीरीक (आत्‍मा) छी। हृदयसँ एकरा सभ कल्‍याण चाहि‍ रहल छथि‍। एकरा रोकब तँ असंभव अछि‍ मुदा, मोड़ल जा सकैत अछि‍। एक तँ बुढा़ढी दोसर मनमे आि‍ग लगल, मनधन बाबा थर-थर कपैत फराठी बले उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत कहलखि‍न- “बाउ, हमरा आगू सभ बच्‍चे छह। जहन बच्‍चा बौआ आ बुच्‍ची बनैत तहि‍येसँ दूजा-भाव शुरू भऽ जाइत अछि‍। मुदा हम सभकेँ बच्‍चे बुझै छि‍यह तेँ कहै छि‍अह जे अपन कल्‍याणक बाट सभ पकड़ि‍ चलह। अखन जहि‍ घटना माने समस्‍या दुआरे सभ एकत्रि‍क भेल छी ओ दू गोटेक बीचक नहि‍ दू समाजक बीचक छी। दू गोटेक बीचक जँ रहैत तँ ओकरा छोट मानल जाइत मुदा, दू गामक समस्‍याकेँ छोट मानब गलत ऑंकव होएत। ई ओहन अछि‍ जे एकसँ अनेक रूपमे पसरि‍ जाएत। जहि‍ना तूँ सभ कहै छहक जे सि‍सौनीमे आि‍ग लगा देव, मारब बेइज्‍जत करब तहि‍ना तँ ओहो सभ करतह। तोहूँ सभ मारबहक ओहो सभ मारतह। तोहूँ कपार फोड़वहक ओहो सभ फोड़तह। अखन ने बुझि‍ पड़ै छह जे सोलहन्‍नी हमहीं सभ मारबै आ ओ सभ मारि‍ खाएत। मुदा से कतौ देखलहकहेँ। दुनू दि‍सक लोक मारबो करैए आ मारि‍यो खाइए।” मनधन बाबाक वि‍चार सुनि‍ सभ मूड़ी डोला-डोला सोचए लगल। एक दोसर दि‍स तकवो करैत। सबहक मनमे मारि‍क गंभीरता नचए लगल। मुदा तइओ मनक गरमी पूर्ण शान्‍त नहि‍ भेलैक। वि‍चार गजपटाए लगलै। कखनो शान्‍तीक रास्‍ता मनमे जोर पकड़ै तँ लगले उनटि‍ कऽ मारि‍-दंगाक रास्‍ता पकड़ि‍ लैत। जे चढ़ैत-उतड़ैत वि‍चार मुँहक रूखि‍सँ साफ बुझि‍ पड़ैत। लोकक रूखि‍ देखि‍ बाबा कहए लगलखि‍न- “गामेमे की देखै छहक? जे कने हुबगर अछि‍ ओ मुँहदुबराक संग केहन वेवहार करैए। भलेहीं अप्‍पन जाति‍ये, दि‍यादे ि‍कएक ने होय। भीतरसँ अप्‍पन गाम फोंक छह। देखते छहक जे सभ अपन-अपन नून-रोटीमे दि‍न-राति‍ लगल रहैत अछि‍। ने अपना पेटसँ छुट्टी होइ छै आ ने दोसराक आि‍क समाजक कोनो चि‍न्‍ता रहै छै। समाज की छि‍यै से लोक बुझवे ने करैत अछि‍। अपने पेटक खाति‍र बेइमानी-शैतानी, चोरी-डकैती सब करैत अछि‍। सभ ि‍मलि‍ समाजकेँ परि‍वार जेकॉं ठाढ़ कए काज करी, से ककरो मनमे छइहे नहि‍। ओना सि‍सौनि‍यो सएह अछि‍ मुदा, तइओ तँ अपना गामसँ कने नि‍स्‍सन अछि‍। कमसँ कम तँ सभ मि‍लि‍ दुर्गा-पूजा तँ कइये लैत अछि‍। जखने दस-पनरह दि‍न सभ एकठाम भऽ एक काजक पाछू लगैत अछि‍, तखने ने अपनामे गप-सप्‍प भेने साल भरि‍क छोट-छोट झगड़ा मेटाइत अछि‍। तेँ समाजकेँ आगू बढ़बैक लेल दसगरदा काज जरूरी अछि‍। जाधरि‍ लोकक मनमे दसनामा काजक प्रति‍ झुकाव नहि‍ हेतैक ताधरि‍ समाज आगू मुँहे कोना ससरत? एि‍ह नजरि‍सँ देखवहक तँ बुझि‍ पड़तह जे अपना गामसँ थोड़े आगू सि‍सौनी बढ़ल अछि‍। ि‍ससौनि‍योसँ आगू पछबारि‍ गाम बरहरबा अछि‍। देखते छहक जे ओहि‍ गाममे दुर्गो-पूजा होइत अछि‍ आ पढ़ै-लि‍खैले हाइयो स्‍कूल अछि‍। बरहरबोसँ अगुआइल दछि‍नवरि‍या गाम कटहरबा अछि‍। ओहि‍ गाममे हाइयो स्‍कूल अछि‍, अस्‍पतालो अछि‍ आ सालमे एक-बेरि‍ सभ ि‍मलि‍ चारि‍ दि‍नक मेला कालि‍यो-पूजामे लगा लैत अछि‍। जहि‍ गाममे जते सार्वजनि‍क काज हएत ओ गाम ओते तेजीसँ आगू बढ़त। गाम अगुआइक माने संस्‍थे बनि‍ जाएव आ पूजे होएव नहि‍ बल्‍कि‍ आचार-वि‍चार बेवहार, चालि‍-ढालि‍ सभ ि‍कछु बदलब होएत। जाधरि‍ कोनो गाम पछुआएल रहैत अछि‍ ताधरि‍ ओहि‍ गाममे सदि‍खन रॉंड़ी-बेटखौकी, मारि‍-मरौबलि‍, हल्‍ला-फसाद होइते रहैत अछि‍। जाधरि‍ लोक झूठ-फूसि‍, छोट-छीन बात लऽ कऽ लड़ैत-झगड़ैत रहत ताधरि‍ ओकरा समएक कोनो मोल नहि‍ होएत। जखने मूल्‍यहीन जि‍नगी चलैत रहत तखने श्रमक कोनो महत्‍व नहि‍ रहत। जे श्रम सार छी, मनुष्‍यक पूजी छी ओ धूरा जेकॉं उड़ैत रहत। भाग्‍य-तकदीर बनौनि‍हार चानी कटैत रहत। जहि‍सँ लाेकक कमाइ ऑंखि‍केँ सदति‍काल नोर दबने रहत अो दुनि‍यॉंकेँ कोना देख सकत?” मनधन बाबा बजि‍ते रहथि‍ ि‍क सुनि‍नि‍हारक बीच गल-गुल शुरू भेल। लोकक गल-गुलसँ मनधन बाबाकेँ दुख नहि‍ भेलनि‍, खुशि‍ये भेलनि‍। मनमे उठलनि‍ जे भरि‍सक लोकक परती बुद्धि‍मे जोत-कोर भऽ रहल छैक। नजरि‍ खि‍रा-खि‍रा मरदो दि‍शि‍ आ जनि‍जाति‍यो दि‍स देखए लगलथि‍। बैसले-बैसल जोगि‍नदर जोरसँ बाजल- “दुर्गा-पूजा तँ आब पौरूकॉं हएत, मुदा कालीपूजा तँ लगि‍चाएल अछि‍। तेँ हम सभ आइये संकल्‍प लऽ ली जे हमहूँ सभ काली-पूजा गाममे करब।” जोगि‍नदरक बातपर सभ थोपड़ी बजा समर्थन दऽ देलक। अही प्रति‍क्रि‍याक फल थि‍क गाममे काली-पूजा। ओना रौदि‍याह समए भेने गामक ि‍कसानो आ बोनि‍हारोक दशा दयनीय मुदा, सि‍सौनीक घटना तेना उत्‍साहि‍त कऽ देलक जे सभ ि‍बसरि‍ गेल। उत्‍साहि‍त भऽ बोनि‍हारो सभ एकावन-एकावन रूपैआ चंदाक घोषणा कऽ देलक। बोनि‍हारक उत्‍साह ि‍कसानकेँ झकझोड़ि‍ देलक। प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न सामनेमे उठि‍ गेलइ। तइपर सँ परदेशि‍या आरो रंग चढ़ा देलक। एक दुखकेँ दबैक लेल अनेको दवाइ आ पथ्‍य सामने आि‍ब गेलै। समाजक संग ि‍मलि‍ चलैक अछि‍ तेँ व्‍यक्‍ति‍गत दुखकेँ दबै पड़त। सार्वजनि‍क काजमे पाछुओ हटब उचि‍त नहि‍। गामक बहू-बेटी आन गाम मेला देखए जाइत ओि‍ह प्रति‍ष्‍ठाकेँ प्राप्‍त करब। सभसँ पैघ बात बदला लेबाक रास्‍ता बनि‍ रहल अछि‍। हमरा गामक लोककेँ जँ आन गामक लोक बेइज्‍जत करत तँ ओहू गामक लेाककेँ हमसभ करबै। जहि‍सँ आन गामक बरावरीमे अपनो गाम आओत। उत्‍साहि‍त भऽ प्रेमलाल उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जोर-जोरसँ बजए लगल- “भाय लोकनि‍, अपना गामक भाए-बहीि‍न आन गामक मेलामे जा बेइज्‍जत होइत अछि‍। एकर की कारण छैक? कारण छै जे अपना गाममे कोनो तेहेन सार्वजनि‍क काजे ने होइत अछि‍। जखने अपनो सभ तेहन काज करब तँ अनेरे आन गामबलाकेँ दहसैत हेतइ। वएह दहसति‍ गामकेँ उजागर करत, प्रति‍ष्‍ठि‍त बनाओत। गोसॉंइ जी रामाएणमे कहने छथि‍- “ि‍बनु भय होहि‍ न प्रीति‍।” प्रेमलालक मुँह तँ बन्‍न भऽ गेलै मुदा, बजैले मन लुसफुसाइते रहै। आगूक बात मनमे ऐबे नहि‍ करै आ बजले बात दोहरौनाइ उचि‍त नहि‍ बुझि‍, बैसि‍ रहल। प्रेमलालकेँ बैसि‍ते फेरि‍ गल-गुल हुअए लगल। गल-गुल एते बढ़ि‍ गेलै जे जहि‍ना सौजनि‍यॉं भोजमे होइत। गल-गुल देखि‍ अनुप उठि‍ कऽ हाथक इशारासँ शान्‍त करैत गरमा कऽ बाजल-”देखू, गल-गुल केने ि‍कछु ने हएत। सि‍सौनीबला सभकेँ एते गरमी ि‍कअए चढ़ल रहै छै से वुझै छि‍यै। अो सभ दस हजार रूपि‍या खर्च कऽ कऽ दुर्गा-पूजा कए लैत अछि‍, तेँ। ओकरा सबहक गरमी हेट करैक अि‍छ। तेँ हम सभ पचास हजार रूपि‍या काली-पूजामे खर्च करब। जँ सवैया-ड्यौढ़ा खर्च कऽ पूजा करब तँ अाे सभ मद्दि‍यो ने देत। तेँ समधानि‍ कऽ हरदा बजवैक अछि‍। अखने पूजा कमि‍टी बना लि‍अ। ओना अखन बीस-बाइस दि‍न काली-पूजाक अछि‍। मुदा अखनेसँ गामसँ आन गाम धरि‍ माहौल बनवैक अछि‍। पूजा समि‍ति‍मे सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य बनाउ। जँ सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य नहि‍ बनाएव तँ अनेरे अखनेसँ अनोन-वि‍सनोन शुरू भऽ जाएत। ततबे नहि‍ सभ जाति‍क सदस्‍य बनौने काजो असान हएत। सभ अपन-अपन लूरि‍-वुद्धि‍सँ सहयोग करत।” अनुपक वि‍चारसँ सभ सहमति‍ भेला। समि‍ति‍ बनए लगल। सभ ि‍मला एक्‍कैस गोटेक समि‍ति‍ बनल जहि‍मे पॉंच महि‍ला। एक्‍कैसो गोटे उठि‍ कऽ ठाढ़ भेलाह तँ एक दि‍व्‍य स्‍वरूप चमकल। सभ नौजवान। एक्‍कैसोक मनमे खुशी जे सामाजि‍क क्षेत्रमे आगू बढ़ि‍ रहल छी। समि‍ति‍क सदस्‍य एक भाग आ गौवॉं दोसर भागमे बैि‍स वि‍चार आगू बढ़ौलनि‍। समि‍ति‍क संचालनक लेल पदाधि‍कारीक जरूरत होइत। कमसँ कम अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष आ कोषाध्‍यक्षक जरूरत हेबे करैत। मुदा अध्‍यक्ष के बनथि‍? गंभीर प्रश्‍न। सभ सबहक मुँह देखए लगलाह। ककरो अनुभव नहि‍। ओना समि‍ति‍क अधि‍कांश सदस्‍यकेँ अध्‍यक्ष बनैक इच्‍छा मुदा, अनुभव नहि‍ रहने डरो होइत। सभकेँ चुप देखि‍ रघुनाथ अपन पि‍ति‍औत भाय देवनाथकेँ अध्‍यक्षक लेल प्रस्‍ताव केलक। देवनाथक परि‍वार जाति‍योक आ पूँजीयोमे गाममे सभसँ बीस। देवनाथक नाओ सुनि‍ अधि‍कांश सदस्‍य धकमकाए लगल। दोसर गोटेक नाओ नहि‍ सुनि‍ मंगल अपन नामक प्रस्‍ताव वि‍रोधमे अपने केलक। दू गोटेक नाओ अबि‍ते बैसारमे गुन-गुनी शुरू भेल। धनो आ जाति‍योमे मंगल देवनाथसँ पछुअाएल। मुदा जेहने बजैमे फड़कोर तेहने इमानदार। बी.ए. पास सेहो। जे सभ बुझैत। देवनाथ आ मंगल संगे-संग बी.ए. पास केने रहए। ओना पढ़ैमे मंगल चन्‍सगर मुदा, रि‍जल्‍ट देवनाथक नीक रहै। तेकर कारण रहै जे देवनाथ धुड़फन्‍दा शुरूहेसँ  रहए। मंगलक नाओ सुनि‍ देवनाथो आ रघुनाथो ऑंखि‍क इशारासँ गप-सप्‍प करए लगल। कनि‍येँ खानक पछाति‍ मंगलकेँ पलौसी दैत रघुनाथ बाजल- “भैया, हमरा ि‍लए जेहने आहॉं तेहने भैया छथि‍। अहूँ दुनू गोटे संगि‍ये छी। आग्रह करब जे देवनाथ भैयाकेँ अध्‍यक्ष आ अहॉं उपाध्‍यक्ष बनि‍ काज करू।” मंगलक मनमे केवल पूजे समि‍ति‍ चलाएव नहि‍ समाजकेँ आगू बढ़बैक वि‍चार सेहो। बच्‍चेसँ देवनाथक चालि‍-ढालि‍ मंगल देखैत आएल। मुदा समाज तँ पोखरि‍क पानि‍ सदृश्‍य होइत अछि‍। हवा-बि‍हाड़ि‍मे लहरि‍ सेहो उठैत मुदा, लगले असथि‍र भऽ शान्‍त सेहो भऽ जाइत अछि‍। मंगलक मनमे देवनाथक प्रति‍ एकटा आरो बात घुरि‍आइत। ओ ई जे एक दि‍न करीब चारि‍ साल पहि‍ने एकटा गामेक लड़कीक संग छेड़खानी करैत देवनाथकेँ मंगल पकड़ने रहए। हाटसँ अबैत मंगलकेँ देखि‍ ओ फफकि‍-फफकि‍ कानए लगलि‍। साइि‍कल ठाढ़ कऽ सभ बात सुनलक। तामसे बेकाबू भऽ गेल। देवनाथकेँ ि‍बनु ि‍कछु पुछनहि‍ चारि‍-पॉंच चाट मुँहमे लगा देलक। क्रोधो कमलै। मुदा डरसँ देवनाथ थर-थर कपैत रहै। मंगल दवनाथकेँ कहलक- “बच्‍चा, अखन धरि‍क संगी छलै तेँ छोड़ि‍ दैत छि‍यौ। नहि‍ तँ समाजक बेटीक संग ऐहन वेवहार करैबलाकेँ जि‍नगी भरि‍क पाठ पढ़ा दैति‍यै।” दुनू हाथ जोड़ि‍ देवनाथ, न्‍यायालयक अपराधी जेकॉं आगूमे ठाढ़ रहै। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍तमे मंगल उलझि‍ गेल। मनमे क्रोध आ दयाक बीच घि‍च्‍चम-घि‍च्‍च हुअए लगलैक। कखनो दया दि‍स मन ससरैत तँ लगले क्रोध दि‍स बढ़ि‍ जाय। मनकेँ असथि‍र करैत कहलक- “अखन धरि‍क संगी होइक नाते छोड़ि‍ रहल छि‍औ। नै.... तँ......। कान पकड़ि‍ कऽ बाज जे ऐहन गलती फेरि‍ ककरो संग नहि‍ करब? जाधरि‍ कोनो लड़कीकेँ वि‍आह-दुरागमन नहि‍ होइत ताधरि‍ माए-बापक सन्‍तान बुझल जाइत मुदा, सासुर जाइते गामवाली माने गामक बेटी बनि‍ जाइत अछि‍।” यएह बात मंगलक मनमे घुरि‍आइत रहै। रघुनाथक बात सुनि‍ मंगल जबाब देलक- “बौआ रघू, दसगरदा काजक शुरूआत गाममे भऽ रहल अछि‍। मुदा समाज तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छि‍ड़ि‍आइल अछि‍। तेँ जरूरत अछि‍ जे एक-एक टुकड़ीकेँ ओरि‍या-ओरि‍या पकड़ि‍ दोसरमे सटबैक अछि‍। से जाधरि‍ नहि‍ हएत ताधरि‍ कोनो सार्वजनि‍क काज सफल होएव संदि‍ग्‍ध बनल रहत। खंडि‍त भऽ जाएत। देखते छि‍यै जे कोनो भोज होइ छै तेँ दस कोस-पनरह कोससँ पंच आि‍ब-आबि‍ खाइत अछि‍ मुदा, भोजैतक घर लगहक परि‍वार भुखले रहैत अछि‍। ऐहन अन्‍यायी समाजमे न्‍याय कहि‍या आओत। के आनत? अखन जे सामाजि‍क ढॉंचा बनि‍ ठाढ़ अछि‍ ओ गॉंड़ि‍-मुड़ाह अछि‍। जहि‍ना कोनो बोझ गँडि‍़-मुराह भेने कखन माथपर सँ खसि‍ छि‍ड़ि‍या जाएत, तेकर कोनो ठेकान नहि‍, तहि‍ना समाजोक अछि‍। तेँ बोझे जेकॉं समतुल्‍यपर बान्‍ह पड़ैक चाही। जहि‍सँ कहि‍यो छि‍ड़ि‍ऐवाक शंका नहि‍ रहत। दसनामा काजमे समाजक बच्‍चा-बच्‍चाकेँ बरावरीक ि‍हस्‍सा भेटक चाहि‍यै। मुइल-टूटल क्‍यो ि‍कऐक ने हुअए मुदा, ओकरा मनसँ ई वि‍चार नि‍कलि‍ जेबाक चाहि‍यै जे ई काज हमर नहि‍ फल्‍लांक छि‍यै। हम सोझे करैबला छी करबैबला नहि‍। ककरो बाप-पुरखा हर जोतैत आएल अछि‍, अखनो जोतैत अछि‍ आ आगुओ जोतैत रहत। जँ से नहि‍ जोतत तँ खेती कोना होएत? मुदा, ओहो समाजक ओहने अंग छी जहि‍ना पढ़ि‍-लि‍खि‍ क्‍यो करैत अछि‍। अखन गामक सभ बैसल छी तेँ पूजा-प्रकरणक सभ नि‍र्णए सबहक बीच भऽ जाए। सि‍सौनीमे अखनो देखै छी जे दुर्गास्‍थानमे सबहक पहुँच नहि‍ अछि।‍” मंगलक बात सुनि‍ सभ स्‍तब्‍ध भऽ गेला। मनमे उठा-पटक हुअए लगलनि‍। ओना बहुतोक बुद्धि‍मे सभ बात अँटबो ने कएल मुदा, जतबे अँटल ओ आि‍गक लुत्ती जेकॉं चमकए लगल। व्‍यवहारि‍क जि‍नगी आ वास्‍तवि‍क जि‍नगीक दुरी बहुत बेसी भऽ गेल अछि‍। व्‍यवहाि‍रक जि‍नगीकेँ वास्‍तवि‍क जि‍नगी दि‍शि‍ झुकौने चलए पड़त। जँ से नहि‍ हएत तँ सदि‍खन चलैक रास्‍ता गजपट होइत रहत। परोछमे उचि‍त बात बजनि‍हारक कमी नहि‍ मुदा, सोझा-सोझी बजनि‍हार क्‍यो नहि‍। तेकरो कतेक कारण छैक। गुन-गुन, फुस-फुस होइत देखि‍ मंगल बुझि‍ गेल। मनमे उठलै बुद्धदेवक ओ बात जहि‍मे कहने छथि‍ जे वीणक तारकेँ ओते नहि‍ कड़ा कऽ दि‍यै जे टुटि‍ जाए। आ ने ओते ढील रहए ि‍दयै जे अबाजे नहि‍ नि‍कलै। मंगल बाजल- “अध्‍यक्ष पदसँ हम अपन ना आपस लइ छी। देवनाथे अध्‍यक्ष होथि‍। मुदा अखनसँ लऽ कऽ जाधरि‍ पूजाक प्रकरण चलैत रहत ताधरि‍ सभ काजक नि‍र्णए समि‍ति‍क बीच हुअए।‍” मंगलक बात सुनि‍ देवनाथ ठाढ़ भऽ बाजल- “जि‍नगीमे पहि‍ल-पहि‍ल दि‍न समाजक काज करैक मौका भेटि‍ रहल अछि‍ तेँ मनमे असीम खुशी अछि‍। सभ तँ अनाड़ि‍ये छी, जहि‍सँ ि‍बनु बुझलो कतेक गलती भऽ सकैत अछि‍। मुदा ओहि‍ सभकेँ भुल-चुक मानि‍ सम्‍हारैक उपाय हेवाक चाही। अखन सभ ि‍कयो छी तँ मुख्‍य-मुख्‍य काजक नि‍र्णए अखने भऽ जाए। ओना अखन दि‍नगर अछि‍ मुदा, सबहक नजरि‍मे रहब बढ़ि‍यॉं रहत।‍” देवनाथक ि‍वचार सुनि‍ सबहक मुँहसँ नि‍कलल- “बहुत बढ़ि‍यॉं, बहुत बढ़ि‍यॉं।” कहि‍ समर्थन देलक। नि‍र्णए भेल- (१)    गामेक कारीगर माने मुर्ति बनौनि‍हार मुरती बनावे। ओना एकपर एक कारीगर दुनि‍यॉंमे अछि‍ मुदा, पूजाक मुरतीमे कला       नहि‍ देवी-देवताक स्‍वरूप देखल जाइत अछि‍। दोसर जँ हम     अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधलाह कहब तँ गामक कलाकार      आगू कोना ससरत। तेँ जे गामक कला अछि‍ ओकरा सभ      ि‍मलि‍ प्रोत्‍साहि‍त करी। (२)    काली मंडप गामेक घरहटि‍या बनावथि‍। जि‍नका घर बनवैक     लूरि‍ छन्‍हि‍ ओ मंडप ि‍कऐक नहि‍ बना सकैत छथि‍। संगे इहो      हएत जे गामक अधि‍कसँ अधि‍क लोकक सहयोग सेहो होएत। (३)    मनोरंजनक लेल गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटनि‍। सेगे      बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहन एि‍ह परोपट्टामे      नहि‍ आएल हुअए। (४)     पूजाक लेल, परम्‍परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटनि‍   जे पूजाक प्रेमी छथि‍। (५)     गामक जते गोटे काज करथि‍ ओहि‍मे नीक केनि‍हारकेँ   पुरस्‍कृत आ अधला केनि‍हारकेँ आगू मौका नहि‍ देल जाइन। पॉंचो नि‍र्णए सर्वसम्‍मति‍सँ भऽ गेल। बैसार उसरि‍ गेल। खाए-पीबि‍ कऽ मंगल सुतै ले ि‍बछान ि‍बछवैक रहए। राति‍क एगारह बजैत। सतरंजी ि‍बछा दुनू हाथे जाजीम झाड़लक। तहि‍ बीच जोगि‍नदर मंगलसँ भेटि‍ करए आएल। जाजीमक अवाज सुनि‍ जोगि‍नदर घबड़ा गेल। मनमे भेलइ जे ि‍कम्‍हरौ थ्री-नट्टा ने तँ चलल। हि‍यासि‍-हि‍यासि‍ चारू कात ताकए लगल। मुदा ककरो सुनि‍-गुनि‍ नहि‍ पाबि‍ मन असथि‍र भेलइ। असथि‍र होइते मंगलकेँ सोर पाड़लक। कोठरि‍येसँ मंगल अवाज दैत बहराएल। वाहर अबि‍ते जोगि‍नदरकेँ देखि‍ बाजल- “आबह। आबह भाय। एती राति‍केँ ि‍कअए ऐलह?” दुनू गोटे ओसारक चौकीपर बैसि‍ गप-सप्‍प करए लगल। जोगि‍नदर कहलक- “भाय, आइ तक तोरा ऐना भऽ कऽ नै चि‍न्‍हने छेलि‍यह। मुदा तोहर औझुका वि‍चार सुनि‍ छाती बारह हाथक भऽ गेल। भॉंइमे ि‍कयो दादा हुअए।” जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगल बाजल- “भाय, बहुत राति‍ भऽ गेल अि‍छ भोरे उठैयोक अछि‍। ि‍कएक ऐलह से कहह।” “अखन अबैक खास कारण अछि‍। तेँ नि‍चेन बुझि‍ एलौं। तोहूँ तँ देखते छहक जे अखैन धरि‍ हम गाममे दहलाइते छी। ने रहैक बढ़ि‍यॉं ठौर अछि‍ आ ने जीवैक कोनो आशा। मुदा....।” “मुदा की?” “मुदा यएह जे करोड़पति‍ रहि‍तो कोनो मोजर गाममे नइ अछि‍।‍” करोड़पति‍ सुनि‍ मंगल चौंकैत पुछलक- “करोड़ कतेक होइ छै, से बुझै छहक?” “हँ। सौ लाख।” “एत्ते रूपैआ अनलह कतएसँ?” “अइ बातकेँ छोड़ह। जहि‍येसँ दि‍ल्‍ली नोकरी करए गेलौं तहि‍येसँ रूपैयाक ढेरी लग पहुँच गेलौं। शुरूमे जे बोरामे कसल रूपैया देखि‍यै तँ हुअए जे छपुआ कागज छि‍यै। मुदा कनी दि‍न रहलापर रूपैआ हथि‍यबैक लूरि‍ भऽ गेल। अखैन, दि‍न भरि‍मे लाख रूपैया हसोथब कोनो भारी कहॉं बुझै छि‍यै। मुदा ओइ काजसँ मन उचैट गेल। आब एक्‍केटा इच्‍छा अछि‍ जे मनुख बनि‍ गाममे रही।” “हमरा की कहए चाहै छह?” “अखैन तँ सभ पूजामे ओझराइल छी। पूजाक पछाति‍ मदति‍ कऽ दि‍हह। एक लाख रूपैया अनने छी। अपन जे आदमी अछि‍ जदी अाेकरा जरूरी होय तँ ि‍बना सुदि‍ऐक सम्‍हारि‍ देबै। मूड़क-मूड़ घुमा देत। संगे तोरो कहै छि‍अ जे रूपैया दुआरे पूजामे कोनो कमी नै होय।” जोगि‍नदर बात सुि‍न मंगलक मनमे ि‍बरड़ो उठि‍ गेल। एक मन कहै जे रूपैया दुआरे काज पछुआ जाइए। से आब नइ हएत। तँ फेरि‍ सोचए जे डकैत-तकैतक भॉंजमे ने तँ पड़ल जाइ छी। अखन धरि‍ एकटा साधारण आदमी बुझि‍ परदेशि‍या बुझै छलौं। परदेशमे की करै छलै से तँ नहि‍ बुझै छलौं। मुदा खतरनाक आदमी बुझि‍ पड़ैए। एसमगलर छी ि‍क हवालाक धंधा करैए। तत्-मत् करैत मंगल पुछलक- “एत्ते रूपैआ कोना भेलह?” मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍नदर चौकन्‍ना भऽ चारू दि‍शि‍ तकलक। ककरो नहि‍ देखि‍ घुन-घुना कऽ बाजल- “भाय, जइठि‍न नोकरी करै छलौं ओ बड़ भारी कारोवारी अछि‍। हजारो नोकर-चाकर छै। देखौआ कारोवारक संग चोरनुकवा कारोवार सेहो करैए। आन-आन देशक रूपैया भजबैए। कोन-कोन देशक लोक कोन-कोन रंगक रूपैया भजवैए से ि‍क सभकेँ ि‍चन्‍हवो करै छेलि‍यै। मुदा हमरापर सेठवाकेँ खूब वि‍सवास छै। हरदम अपने लग रखैत अछि‍। टहल-टि‍कोरासँ लऽ कऽ चाह-पान धरि‍ आनि‍-आनि‍ दैत छेलि‍यै। नि‍शि‍भाग राति‍मे एक आदमी गाड़ीपर अबैत छै आ भरि‍ ि‍दन जते बाहरी रूपैया भेल रहै छै ओ सभ लऽ जाइ छै। आपस ि‍कछु ने करै छै। खाली पास बुकपर रूपैया चढ़ा दइ छै। सेठवाकेँ जखैन जते रूपैयाक जरूरत होय, हमहीं बैंकसँ आनि‍-आन दैत छेलि‍यै।” जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगलक भक्‍क खुजल। पुछलक- “दि‍ल्‍ली सनक शहरमे सी.आइ.डी. आ पुलि‍स ि‍कछु ने कहै छै?” मुस्‍की दैत जोि‍गनदर उत्तर देलक- “सभकेँ महीना बान्‍हल छै।” जोगि‍नदरक बात सुि‍नतहि‍ मंगलक मनकेँ, नि‍राशाक कारी मेघ टोपर बान्‍हि‍ घेड़ि‍ देलक। हतोतसाह भऽ गेल। मनमे उठलै- “ककरापर करब सि‍ंगार पि‍या मोरा आन्‍हर रे। जहि‍ देशक शासन कमजोर रहत ओहि‍ देशक सुरक्षा भगवान छाेड़ि‍ के कऽ सकैत अछि‍। भीतरे-भीतर डरा गेल। मुदा मनकेँ असथि‍र करैत पुछलक- “तूँ ओही सेठक संग रहै छह ि‍क.......?” “दस बर्ख ओहि‍ सेठबा अइठीन रहि‍ सभ तरी-घटी देखि‍ लेलि‍यै। ओकरा अइठीनसँ हटैक मन भऽ गेल। मुदा नोकरी नै छोड़लौं। कहलि‍यै, माए अस्‍सक अछि‍ तेँ ि‍कछु अगुरवारो रूपैया दि‍अ जे इलाज कराएव। भरि‍ दि‍न दारूए पीवैत रहैत अछि‍। सारकेँ लगबो करै छै ि‍क नै। एते भारी कारोवार कोना सम्‍हारि‍ लैत अछि‍। मनमे उठल जे जहि‍ना ई सार दुनि‍यॉंकेँ ठकि‍ धन जमा केने अछि‍ तहि‍ना हमहूँ ि‍कअए ने एकरे ठकी। दवाइक दोकानसँ एकटा कड़गर नि‍शॉंबला दवाइ कीनि‍ आनि‍ दारूक बोतलमे फेंटि‍ देलि‍यै। आठ बजे सॉंझमे जखन दारू मंगलक तँ वएह बोतल दऽ देलि‍यै आ कहलि‍यै जे हमरा गाम दि‍सक गाड़ी चारि‍ बजे भोरमे अछि‍ तेँ राति‍येमे चलि‍ जाएव। कहलक- बड़बढ़ि‍याँ। दारू पीलक। हम ससरि‍ कऽ मलि‍काइन लग जाय कहलि‍यै जे गाम जाएव। फेरि‍ ओइठीनसँ थानापर चलि‍ गेलौं। सभकेँ कहि‍ देलि‍यै जे आइ गाम जाएव। सभ ि‍चन्‍हरबे रहै। धुरि‍ कऽ एलौं तँ देखलि‍यै जे सेठवा बेमत अछि‍। खाइले गेलौं। खेलौं। खा कऽ आबि‍ ि‍सरमा तरसँ कुन्‍जी नि‍कालि‍ रूपैयाबला कोठरी खोललौं। बाप रे सौंसे कोठरी रूपैयेसँ भरल। मझोलका बैगमे रूपैया भरि‍ कोठरी बन्‍न कऽ कुन्‍जी रखि‍ देलि‍यै। अपन जे नेपलि‍या रैक्‍सीनबला बैग रहै अोहि‍मे रूपैयोक बैग आ कपड़ो-लत्ता लेलौं। बारह बजे राति‍मे जखन रोड खाली भेल तखन एकटा टेम्‍पूसँ ममि‍औत भाय लग चलि‍ गेलौं। भैया बड़ होशगर छथि‍। कहलनि‍ जे जहन रूपैया हाथ आि‍ब गेल तहन चलि‍ कोना जाएत। वएह रूपि‍या छी।” जोगि‍नदरक बात सुनि‍ मंगल पुछलक- “अपन ि‍क अभि‍यंतर छह?” “मनमे अछि‍ जे दस कट्ठा घरारी जोकर जमीन भऽ जाए आ पॉंच बीघा घनहर। दसो कट्ठा घरारीकेँ छहरदेवालीसँ घेरि‍ ि‍दअए। बीचमे डेढ़ कट्ठामे चौबगली घर-अंगना बना लेब। दू कट्ठा खुनि‍ भरि‍यो लेब आ दुनू कट्ठामे माछो पोसब। दू कट्ठामे फल-फलहरीक गाछ लगा लेब। तीमन-तरकारीले चौमासो भइये जाएत। काजो-उदम आ खरि‍हानो लेल आगूमे खस्‍ते रखि‍ लेब।” जोगि‍नदरक ि‍वचार सुनि‍ मंगलक मनमे आशा जगल। बाजल- “देखते छहक जे बथनाहामे अवधि‍या सभ अछि‍। ओकरा सभकेँ बहुत जमीन छै। ओइमे सँ एकगोटे बैंकमे नोकरी करैए। समांगोक पातर अछि‍। असकरे नोकरी करत ि‍क खेती करत। सभ खेत बटाइ लगौने अछि‍। दस बीधा जमीन अपना गाममे ओकर छै। जँ इच्‍छा हुअ तँ दसो बीघा कीनि‍ लाए। अखन धरि‍ ओकर जमीन एहि‍ दुआरे बचल छै जे एक्‍के दामठाम बेचए चाहैए। नइ तँ कहि‍या ने ि‍बका गेल रहि‍तै। मुदा एकटा बात पूछै छि‍अह जे अखैन धरि‍क जे तोहर जि‍नगी रहलह ओ हमरासँ वि‍परीत रहलह। तोंही कहह जे दुनू गोटेक बीच कते दि‍न नि‍महत?” मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍नदर अबाक भऽ गेल। कनी खानक वाद बाजल- “मंगल भाय, तोहर शंका सोलहन्‍नी सही छह। दस गोटेक बीच बजैबला मुँह बनौने छह। मुदा शपत-ि‍करि‍या खा कऽ कहै छि‍अह जे अपनो अपना जि‍नगीसँ मन उचटि‍ गेल अछि‍। सदि‍खन होइत रहैए कखैन सड़कपर घूमै छी आ कखैन जहल चलि‍ जाएव। ओना रोडक सि‍पाहीसँ लऽ कऽ नीक-नीक पाइबला सभसँ चि‍न्‍हारे अछि‍ मुदा, ओ सभ पाइयक दोस छी। कहि‍यो काल जे सुतलमे सपनाइ छी तँ ओहि‍ना देखै छी जे आगू-पाछू बन्‍दूकक हाथे ि‍सपाही घेरने अछि‍ आ हाथमे कड़ी लगौने जहल नेने जाइए। कखनो सोचै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे जते अपनाकेँ आगू मुँहे जाइत देखै छी तँ लगले होइए जे पाछु मँुहे तेजीसँ खसल जाइ छी। कखनो चैन नै रहैए।” बजैत-बजैत जोगि‍नदरक ऑंखि‍मे नोर ढ़बढ़बा गेल। दुनि‍याँक आकर्षण देखि‍ मंगलोक मन पघि‍लए लगल। मनमे उठल मनुष्‍यमे ऐहन अद्भुत शक्‍ति‍ होइ अछि‍ जे एकाएक बदलि‍ जाइत अछि‍। डकैतसँ महात्‍मा बनि‍ जाइत अछि‍ आ महात्‍मासँ डकैत। तेँ मनुष्‍यक संबंधमे ि‍कछु नि‍श्‍चि‍त कहब असंभव अछि‍। अनुपमेय अछि‍। मुदा तइओ एकटा नमहर खाधि‍ बुझि‍ पड़ैए। हमरा तपमे ि‍वसवास अछि‍ जहन ि‍क ऐकर ि‍जनगी उनटा छै। उम्रमे भलेहीं बेसी अन्‍तर नहि‍ हुअए मुदा, ि‍जनगी तँ दू-दि‍शाह अछि‍। मात्रि‍कक एकटा बात मन पड़लै। मात्रि‍क कोशि‍कन्‍हामे। पूबसँ कोशी आ पछि‍मसँ कमला गामकेँ घेरने रहै। ि‍बचला सभ धार एक-दोसरमे ि‍मलल। ओहि‍ गाममे बॉंसक बोन। बॉंसक एकटा बीट गहीरगरमे। खूब सहजोर बॉंस रहै। चालीस-चालीस हाथक बॉंस ओहि‍मे। अगते धार फुला गेल। बाढ़ि‍ आि‍व गेल। गामक सभ माल-जालक संग गाम छोड़ि‍ कुटुमारे चलि‍ गेल। काि‍तकेमे घुि‍र कऽ आओत। ऐहन परि‍स्‍थि‍ति‍मे मातृभूमि‍ कोना स्‍वर्ग बनि‍ सकैत अछि‍। ओहि‍ वॉंसक बीटमे दस-बारह हाथ पानि‍ लगल रहै। ओहि‍ बीटमे दस-बारह हाथ उपरसँ सौँसे बीट कोपर दऽ देलक। जे मंगलो देखने रहै। वएह बात मंगलकेँ मन पड़ल। मन पड़ि‍तहि‍ सोचलक जे अगर जँ मनुक्‍ख संकल्‍पि‍त भऽ जि‍नगी मोड़ए चाहत तँ जरूर मोि‍ड़ सकैत अछि‍। अपन परि‍वारक पाछु लोक चाेरी-डकैती, वेइमानी, शैतानी सभ ि‍कछु करैत अछि‍। हम तँ एकटा ि‍गरल आदमीकेँ उठबए चाहै छी। मनमे खुशी उपकलै। मुस्‍क्‍ुराइत बाजल- “भाय, जहि‍ना तूँ दरबज्‍जापर आि‍ब कहलह तहि‍ना तँ हमरो मदति‍ करब फर्ज बनैत अछि‍। मुदा, आइधरि‍ अधलाह काज नहि‍ केलहुँ, तेकरो तँ नि‍माहैक अछि‍।” मंगलक बात मंगलक पि‍ता गणेशी सेहो सुनलनि‍। ओ पेशाव करए नि‍कलल रहति‍। हॉंइ-हॉंइ कऽ पेशाव कऽ लगमे दुनू गोटेक बीच आि‍व कहलखि‍न- “वौआ, तीस बर्ख पहि‍लुका एकटा ि‍खस्‍सा कहै छि‍अह। ओहि‍ समए जुआने रही। मोछ-दाढ़ीक पम्‍ह अवि‍ते रहै। माइओ-बावू जीवि‍ते रहथि‍। एहि‍ना काति‍क मास रहै। तीन बजे करीब वेरू-पहर माथपर मोटरी नेने नाना हहाएल-फुहाएल ऐलाह। अबि‍तहि‍ माएकेँ कहलखि‍न- “दाय, गंगा नहाइले जाइ छी। बहुत लोक गामक जाइत अछि‍। ओकरा सभकेँ कहने छि‍यै जे टीशनेपर भेटि‍ हेवह। तावे कनी हमहूँ सुसता लइ छी आ तोहूँ तैयार हुअ। खेवा-खरचा अछि‍ये तेँ कोनो ओरि‍यान करैक नहि‍ छह।” नन्‍नाक बात सुनि‍ माए ठर्रा गेलि‍। एक दि‍न पहि‍ने गाए ि‍वआइल रहै। अइ सभमे माए बड़ सुति‍हार रहै। माइयक मनमे दू तरहक बात टकरा गेलइ। ओमहर गंगा नहाइले जाएव आ ऐम्‍हर जँ गाएकेँ ि‍कछु भऽ जाए। तहन तँ नअ मासक मेहनत डुबि‍ जाएत। दोसर होइ जे गौवॉं-घरूआकेँ छोड़ि‍ बावू ऐलाह। गाड़ि‍ये-सवारीक भीड़-भड़क्‍काक बात छी, जँ कही क्‍यो भेंट नहि‍ होइन, तहन ि‍क हेतनि‍। तेँ गुम्‍म रहै। तहि‍ बीच बावूओ आि‍ब गेलाह। गोड़ लागि‍ ओहो कातमे ठाढ़ भऽ गेलाह। ने माए ि‍कछु बाजै आ ने बाबू। नाना अपन बात बाजि‍ चुकल रहथि‍ तेँ ने ि‍कछु बजैत। तीनू गोटेकेँ चुप देखि‍ कहलएनि‍- “नाना पएर धुअअ ने?” ओ कहलनि‍- “नै-नै, पएर-तएर नै धुअब। टेनक टेम भेल जाइए। सामंजस्‍य करैत माए बाजलि‍- “बौआ, छोड़ैबला कोनो ने छह। नन्‍ना संगे तोंही जाह।‍” मन अपनो रहए मुदा बीचमे बाजब उचि‍त नहि‍ बुझि‍ चुप्‍पे रही। ओना भागवत सुनैकाल एकटा ि‍खस्‍सा सुनने रही जे गंगा तेहेन भारी धार अछि‍ जहि‍मे सौँसे दुनि‍यॉंक मनुक्‍खसँ लऽ कऽ चुट्टी-पि‍परी धरि‍ अटि‍ जाएत। तइओ पेट खालि‍ये रहत। सएह देखैक ि‍जज्ञासा रहए। नाना संगे ि‍वदा भेलौं। जखन गंगामे पैसि‍ दुनू गोटे नहाए लगलौं ि‍क कहलनि‍- “नाति‍ मने-मन गंगाकेँ कहुन जे आइसँ झूठ-फूसि‍ नहि‍ बाजब।” सएह कहि‍ डूब लेलौं। दू सालक बाद बावू मरि‍ गेलाह। घरक गारजन बनलौं। बावू मुइलाक पछाि‍त माइओ रोगा गेलि‍। मुदा काज करैक सभ लूरि‍ रहए तेँ कहि‍यो कोनो काजक अबूह नहि‍ लागए। अपन राजकाजमे सदति‍काल लागल रहैत छलौं। कहि‍यो झूठ बजैक जरूरते ने हुअए। दछि‍नवारि‍ टोलमे सरूप रहै। दस बीघा खेतो ओकरा रहै। मुदा रहए फुर्र-फॉंइ बला आदमी। ललबबुआ। भरि‍ दि‍न ऐम्‍हरसँ ओम्‍हर घूमल घुरै। ताश जे खेलए लगे तँ बारह-दू बजे राति‍ धरि‍ खेलते रहै। गामक लोककेँ टि‍क ओझरवैमे माहि‍र रहए। पर-पनचैतीमे तेहन पेेंच लगा दइ जे मारि‍-पीटि‍ भइये जाए। कोट-कचहरीक दलाल रहए। जहि‍सँ होइ तँ दस बीघा खेत रहि‍तो दुइयो मास घरसँ नै खाए। ने अपने कोनो काज करै आ ने खूँटापर बड़द रखने रहै। जे सभ झड़-झंझटमे फँसल रहए ओकरे सबहक बड़दसँ खेति‍ओ करै आ ओकरे सभसँ ठकि‍-फुसि‍या कऽ गुजरो करै। जेकरासँ जे चीज लइ ओकरा घुमा कऽ दइक नामो ने लि‍अए। एक दि‍न अपना ऐठाम आि‍ब कहलक- “गणेश, सुनै छी तूँ चाउर बेचै छह?” “हँ।” “एक मन चाउरक काज अछि‍।” “भऽ जाएत। ककरो पठा देवइ। नै ते अपने नेने जाएव तँ नेने जाउ।” चाउर तौला कऽ छोड़ि‍ देलक आ कहलक- “तोरा तगेदा करैक जरूरत नहि‍ छह। जखने हाथमे रूपैया आओत तखने दऽ देवह।” कहलि‍यै- “बड़वढ़ि‍यॉं।” छह मास बीति‍ गेल। ने तगेदा करि‍यै आ ने ि‍दअए। साल बीति‍ गेल। दोसर साल फेरि‍ ओहि‍ना केलक। तेसरो साल केलक। झुठ कोना बजि‍तौ जे चाउर नइ अछि‍। पाइयक दुआरे अपन काज खगैत रहै। काजकेँ बि‍थुत होइत देखि‍ मनमे आएल जे कमाइ छी हम आ खाइए ललबवुआ। ई तँ सोझा-सोझी गरदनि‍ कट्टी भऽ रहल अछि‍। ओह से नइ तँ आब कहत तँ गछबे ने करब। कहबै जे नइए। मुदा फेरि‍ मनमे उठल जे बीच गंगामे पैसि‍ संकल्‍प केने छी, झूठ कोना बाजब। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ भऽ गेल। हारि‍ कऽ झूठ बजए लगलौं। मुदा एते जरूर करै छी जे जे झुठ्ठा अछि‍ ओकरा लग झूठ बजै छी आ जे झूठ बजनि‍हार नहि‍ अछि‍ ओकरा लग सत्‍य बजै छी। तेँ बौआ कहि‍ दइत छी जे अहॉं सभ जुआन-जहान छी सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ डेग उठाएव। जहि‍ना दुनि‍यॉं बड़ीटा छै, बड़ लोक छै, खेत-पथार धार-धुर, पहाड़-पठार, समुद्र इत्‍यादि‍ की कहॉं छै तहि‍ना मनुक्‍खो अछि‍। एक्‍के कुम्‍हारक बनाओल पनि‍पीवा घैल सेहो छी आ छुतहरो छी। मुदा देखैमे दुनू एक्‍के रंग होइए।” जीवन संघर्ष भाग- 2 अमावास्‍‍या दि‍न। आइये सॉंझमे ि‍दवाली आ ि‍नशांराति‍मे कालीपूजा हएत। अखन धरि‍क जे काजक उत्‍साह सभमे रहै ओ ठमकि‍ गेल। काजो आखि‍री रूपमे आि‍ब गेल। काजो ओरा गेल। जहि‍ना साल भरि‍क अध्‍ययनक आखि‍री दि‍न परीछा दि‍न होइत, तहि‍ना। काल्‍हि‍ धरि‍ काजक गति‍सँ चलैत रहल। जइ दि‍न जेहन काज तइ दि‍न तेहन रफ्तार। मुदा आइ तँ आखि‍री ि‍दन छी तेँ काजक उनटा ि‍गनती कऽ लेब जरूरी अछि‍। हो न हो ि‍कछु छुि‍ट गेल हुअए। जँ छुि‍ट गेल हएत तँ पूजामे ि‍बध्‍न-बाधा पड़त। तहि‍ दुआरे पूजा समि‍ति‍क बैसार सबेर साते बजे बजौल गेल। आठे दि‍नमे गामक चुहचुहि‍ये बदलि‍ गेल। जहि‍ना हरोथ बॉंसक जड़ि‍ अधि‍क मोट रहि‍तहुँ बीचमे भुर कम होइत मुदा आगू आेहि‍सँ पात- रहनहुँ भूर बेसी होइत तहि‍ना बँसपुरोमे बुि‍झ पड़ैत। जखन पूजाक दि‍न आगू छल तखन काज बेसी आ जखन लग आएल तँ कमि‍ गेल। काल्‍हि‍येसँ गामक धी-बहीनि‍ आबि‍ रहल अछि‍। ओना गामक सभ अपन-अपन कुटुमकेँ हकार देने, मुदा अबैमे दि‍वाली बाधक बनल छलै। दि‍वाली दि‍न घरमे नहि‍ रहने भूतक बसेराक डर सबहक मनमे नचैत। जहि‍सँ आगू आरो पहपटि‍ हएत। तेँ गामक जे धी-बहीनि‍ असकरूआ छलि‍ ओ भरदुति‍या ठेकना कऽ दि‍वालीक परात आओत। मुदा जेकरा घरमे दि‍यादनी वा सासु अछि‍ ओ ि‍कअए ने एक ि‍दन पहि‍ने आओत। नैहर छि‍यै ने। कते दि‍न माए-बाप, भाए-भौजाइ आ गामक सखी-सहेलीसँ भेंट भेना भऽ गेल छैक। तहूँमे जेकर नैहरक परि‍वार जेरगर छै ओ तँ साले-साल वा सालमे दुइओ-तीनि‍ बेरि‍ आि‍ब जाइत अछि‍ मुदा, जेकर परि‍वार छोट छै, जइमे कम काज होइ छै, ओ तँ दस-दस सालसँ नैहरक मुँह-ऑंखि‍ नै देखलक। गामक सौभाग्‍य जे काली-पूजा शुरू भेल। मुदा एकटा अजगुत बात भऽ गेलै। गामक धी-बहीनि‍सँ बेसी गामक सारि‍-सरहोजि‍ आबि‍ गेलै। गाममे बेसी साइर-सरहोजि‍ ऐलासँ गामक चकचकि‍ये बढ़ि‍ गेल। जइसँ छौड़ा-मारड़ि‍सँ लऽ कऽ बूढ़-पुरानक मुँहमे चौवन्‍नि‍यॉं मुस्‍की आि‍ब गेल। तहूँमे परदेशि‍या साइर-सरहोजि‍ आि‍ब कऽ तँ आरो रंग बदलि‍ देलक। दुखक दि‍न गौँआक कटि‍ गेल। सुखक दि‍न आि‍ब रहल अछि‍। ि‍कऐक तँ आठ दि‍न जे बीतल अो ओहन बीतल जे ने ककरो खाइक ठेकान रहै आ ने सुतैक। मुदा, आब तँ सभ पाहुन-परकक संग अपनो पहुनाइये करत। मरदक कोन बात जे जनि‍जाति‍यो खुशी जे भनसि‍या आि‍ब गेल। नीक-नि‍कुत खेनाइ, दि‍न-राति‍ तमाशा देखनाइ, अइसँ सुखक दि‍न केहेन हएत। तहूसँ बेसी खुशी ई जे भरि‍ मेला ने ककरो पैंइच-उधार करए पड़तै आ ने दोकान-दौरीक झंझट रहतै। ि‍कएक तँ दू ि‍दन पहि‍ने सभ अपन-अपन काज सम्‍हारि‍ नेने छल। महाजनोक बही-खाता बन्‍न रहत। मुदा, दि‍वालीक बोहनि‍क दुख महाजनक मनकेँ जरूर कचोटइ। कतबो रेड़गड़ मेला ि‍कअए ने होउ मुदा, दूध-दही, माछ-माउसक अभाव नै हएत। पॉंच दि‍न पहि‍नहि‍ सुधा दूधक एजेन्‍ट आ माछ-माउसक व्‍यापारीकेँ एडभांस दऽ देने अि‍छ। तहूमे काली-पूजा छी। ि‍बना बलि‍-प्रदाने पूजाे कोना हएत। बँसपुराक जनि‍जाति‍यो तँ ओते अनाड़ी नहि‍ये अि‍छ जे जोड़ा छागर कबुला नहि‍ केने होथि‍। पहि‍ल साल पूजाक छी। ि‍बना नव बस्‍त्र पहि‍रने पूजा कोना कएल जाएत आ धि‍या-पूजा मेला कना देखत? जँ से नइ हएत तँ ि‍क देवीक अपमान नहि‍ हेतनि‍। जइ जगहपर काली मंडप बनल ओइ ि‍ठमक आठे-दस कट्ठाक परती। सेहो आम जमीन। जइसँ एकपेरि‍यासँ लऽ कऽ खुरपेरि‍या लगा सौँसे परती रस्‍ते बनल। ओइ परतीक पछि‍म-उत्तर कोनमे लोक फुटल-फाटल माटि‍योक बरतन आ परसौतीक कपड़ो-लत्ता फेकैत। पूब-उत्तर कोनमे ि‍धया-पूजा झाड़ा फि‍रैत। दछि‍न-पछि‍म भागमे घसबाह सभ घास-घास खेलाइ दुआरे कतेको खाधि‍ खुनने आ दछि‍न-पूब कोनमे कबड्डी आ गुड़ी-गुड़ीक चेन्‍ह दऽ घर बनौने। काली-पूजाक आगमनसँ सौँसे परती छीलि‍-छालि‍ एक रंग बना देलक। जहि‍ तरहक मेलाक आयोजन भऽ रहल अछि‍ ओहि‍ ि‍हसावसँ जगहो छुछुन लगैत। मुदा रौदि‍याह समए भेने परतीक चारू भागक खेतक धान मरहन्‍ना भऽ गेलै, जेकरा काटि‍-काटि‍ सभ अगते माल-जालकेँ खुआ नेने छलै। तेँ मेलाक लेल जगहक कमी नै रहल। पनरह बि‍घासँ उपरे खेतक आि‍ड़-मेि‍ड़ तोि‍ड़ चट्टान बना देलक। अगर जँ से नइ बनौल जाइत तँ मुजफ्फरपुरक ओहन नाटकक अँटावेश कोना हएत? ि‍कएक तँ जइ पार्टीमे बाजा बजौनि‍हारसँ लऽ कऽ स्‍त्री पाट खेलेनि‍हारि‍ धरि‍ मौि‍गये संगीतकार आ कलाकार अछि‍। परोपट्टाक लोक उनटि‍ कऽ नाटक देखए लेल आउत। तेँ कमसँ कम पॉंच बीघाक फील्‍ड देखि‍नि‍हार लेल चाहबे करी। से तँ भइये गेल। तइपर सँ वृन्‍दावनक रास सेहो अछि‍। नाटकसँ कनि‍यो कम नै। एकपर एक कलाकार अछि‍। मोट-मोट, थुल-थुल देह, हाथ-हाथ भरि‍क दाढ़ी-केश लऽ लऽ पार्टो खेलत आ नचबो करत। तेँ देखि‍नि‍हारोक कमी नहि‍ये रहत। मेल-फि‍मेल कौव्‍वालीक संग महि‍सोथाक मलि‍नि‍यॉं नाच सेहो अछि‍। एकपर एक चारू। ि‍कअए ने धमगज्‍जर मेला लागत। पूजा-समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे खुशी होइत मुदा, एकटा शंका सबहक मनमे रहबे करै। ओ ई जे एत्ते भारी मेलाकेँ सम्‍हारल कोना जाए? कतबो गौँवा जी-जान लगौत तइओ लफुआ छौँड़ा सभ छअ-पॉंच करवे करत। पौकेटमारो हाथ ससारबे करत। मुदा, की हेतै, मेला-ठेलामे कनी-मनी ई सभ होइते छै। केकरा के देखत आ ककर के सुनत। तहूमे रौतुका मसीम रहत की ने? दोकानो-दौरीक आयोजन सेहो बेजाए नहि‍। दुनू ढंगक दोकान। पुरनो आ नवको। नवका समानक लेल न्‍यू मार्केट एक भाग आ दोसर भाग पुरना बजार बैसल। ओना अखन धरि‍ दोकान-दौरी नीक-नहॉंति‍ नहि‍ जमल अछि‍ मुदा बेर टगैत सभ बनि‍ जाएत। न्‍यू मार्केटक चाक्-चि‍क्‍य दोसरे ढंगक अछि‍ जइमे ि‍बनुदेखलेहे समान बेसी रहत। दोकानदारो सभ बहरबैये रहत। ऐहन-ऐहन सुन्‍नर चूड़ी एहि‍ इलाका लोक देखनौ हएत ि‍क नहि‍ तेहन-तेहन चूड़ीक दोकान सभ आि‍ब गेल अछि‍। देखि‍नि‍हारोकेँ ऑंखि‍ उठि‍ जाएत। ि‍कअए ने उठत? एते दि‍न देखैत छल जे चूड़ी स्‍त्रीगणे बेचै छलि‍ अइबेरि‍ देखत जे पुरूखो बेचैए। तइमे तेहन-तेहन फोटो सभ दोकानक भीतरो आ बाहरो लगौने अछि‍ जे अनेरे आगूमे भीड़ लागल रहत। असली मनुक्‍ख छी आि‍क नकली से सभ थोड़े बुझत। फोटोए टा नहि‍ गीतो गबैबला तेहन-तेहन साउण्‍ड-बक्‍स सभ सजौने अि‍छ जे सभ ि‍कछु ि‍बस‍रि‍ जाएत। चूड़ी बजारक बगलेमे चेस्‍टरक दोकान लगल अछि‍। चूड़ी बजारसँ कम थोड़े ओहो बेपारी सभ सजौने अछि‍। काल्‍हि‍येसँ ऐहन-ऐहन प्रचारक मशीन सभ लगौने अछि‍ जे ि‍कयो थोड़े परखि‍ लेत जे आदमीक मुँह बजै छै ि‍क मशीन। परचारो ि‍क हरही-सुरही छै। समानक संग-संग पहि‍रैक लूरि‍ सेहो ि‍सखबैत अछि‍। धन्‍यवाद ओि‍ह बनौनि‍हारकेँ दी जे हाथी सन-सन मोट देहसँ लऽ कऽ खि‍रकि‍ट्टी देह धरि‍मे एक्‍के रंगक चेस्‍टरसँ काज चलि‍ जाएत। तहूमे तेहन डि‍जेनगर सभ अछि‍ जे एकटा छोड़ि‍ दोसर पसन्‍दो करैक जरूरत नहि‍ पड़त। जेकरा पाइ छै ओकरा एकटासँ मन भरत ओ तँ गेटक गेट कीनत। ि‍बल्‍कुल औटोमेटि‍क। दामो कोनो बेसी नहि‍ये रखने अछि‍ जे समानक बि‍क्री कम होतै। मात्र एगारहे रूपैया। बेपारि‍यो सभ तेहन ओसताज अछि‍ जे पहि‍ने पता लगा समान डि‍क देने अछि‍। चेस्‍टरक दोकानक बगलेमे खेलौनाक बजार अछि‍। वाह रे खेलौना बनौनि‍हार आ पँूजी लगा व्‍यापार केनि‍हार। दस रूपैयासँ लऽ कऽ हजार धरि‍क। बन्‍दूक, तोप, रौकेट, हवाइ जहाजक संग बम साइजि‍क खेलौना सभसँ दोकान भरने अछि‍। देखैमे असलि‍ये बुि‍झ पड़त मुदा, अछि‍ नकली। अोना असलेहे जेकॉं गोलि‍यो छुटैत, अवाजो होइत आ उड़बो करैत अछि‍। तीनि‍टा दाढ़ी केश बनवैबला बम्‍बैया शैलून सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तीनूमे महि‍ले कारीगर। मरदे जेकॉं अपन रूप बनौने। मुदा, मरदोसँ बेसी फुरति‍गरो आ बजबोमे चंगला। दाढ़ी कटबैकाल बुझि‍ये ने पड़त जे उनटा हाथ पड़ैए आि‍क सुनटा। हाथो मरदे जेकॉं मुदा, कने गुलगुल बेसी। शैलूनक बगलेमे साड़ीक बाजार। साि‍ड़यो सभ अजबे टँगने अछि‍। पुरजीमे रेशमी लि‍खि‍-लि‍खि‍ सटने मुदा, पटुआ जेकॉं छल-छल करैत अछि‍। कतौ ओचि‍ला नहि‍, एकदम पलीन। तेहन-तेहन पटोर सभ रखने अछि‍ जे बुझबे ने करबै ई भगलपुरि‍या रेशम छी ि‍क पटुआक। प्‍लास्‍टि‍कक मनुक्‍ख बना तेहन सजौने अछि‍ जे बुझि‍ पड़त ऑंखि‍क इशारासँ दोकान अबैले कहैए। राम-हि‍लोरा, मौतक कुऑं, हेलि‍केप्‍टर, हवाइ-जहाज, रेलगाड़ी, ि‍दल्‍लीक चौकक चरि‍ पहि‍या, छह पहि‍या गाड़ीक दौि‍ड़-बरहा सभ अछि‍। मुदा, जखन न्‍यू मार्केट घुमि‍ये लेलौं तँ पुरनो बजार घुमि‍ये लि‍अ। क्‍यो छपड़ीक दोकान बनौने तँ ि‍कयो फट्ठाक खूँटापर बातीक कोरो बना प्‍लास्‍टि‍क दऽ घर बनौने अछि‍। ि‍कयो ि‍तरपाल टँगने अछि‍ तँ ि‍कयो ओहि‍ना घैला-डाबा इत्‍यादि‍ माटि‍क बरतन पसारने अछि‍। दोकानदारो सभ सुच्‍चा ग्रामीण। ऐँ ई तँ ि‍चन्‍हरबे दोकानदार सभ छी। पहि‍लुके दोकान झुनझुनाबला बुढ़बाक छी। चालि‍सो बर्ख उपरेसँ झुनझुना बेचैए। आब तँ बुढ़हा गेल। दुनू परानी दुनू दि‍शि‍ बैसि‍ ताड़क पत्ता झुनझुनाे बना रहल अछि‍ आ खजुरक पातक पटि‍या, बीअनि‍ सेहो सजौने अछि‍। तोरा तँ कनी कऽ चि‍न्‍है छि‍यह हौ झुनझुनाबला।” “बौआ चसमा लगौने छी तेँ धकचुकाए छह। पहि‍ने चसमा नै लगवै छलौं। ऑंखि‍यो नीक छलए। दू साल पहि‍ने ऑंखि‍ खराब भऽ गेल। तेँ अहीबेर लहानमे ऑंखि‍ बनेलौं।” मुदा, झुनझुनावाली परेखि‍ कऽ बाजलि‍- “बौआ सोनमा रौ। जहि‍यासँ परदेश खटै लगलेँ तहि‍यासे नै देखलि‍यौ। तूँ हमरा चि‍न्‍है छेँ?” “नै।” तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्‍केठीन अछि‍। अंगने-अंगने झुनझुनो आ बि‍अनि‍यो पटि‍या बेचै छी। अहीसे गुजर करै छी। आब तँ भगवान सब ि‍कछु दए देलनि‍। दूटा बेटा-पुतोहू अछि‍। सातटा पोता-पोती अछि‍। दुनू बेटा घर जोड़ैया (राज ि‍मस्‍त्री) करैए। खूब कमाइए आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा, दुनू परानी तँ ि‍जनगी भरि‍ यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना दुनू भॉंइ मनाहि‍यो करैए। मगर हाथपर हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लागत। तेँ जावे जीवै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्‍चेसँ बहि‍ना लागल अछि‍। जहि‍या तोरा घर दि‍स जाइ छी तहि‍या ि‍बना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि‍ दि‍हैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि‍। तोरा कइअ टा बच्‍चा छौ?” “एक्‍केटा अछि‍।” “एकटा झुनझुना बौआले नेने जाही।” “ओहि‍ना नै लेबौ मौसी। अखैन हमरो संगमे पाइ नै अछि‍ आ तोहूँ दोकान लगैब‍ते‍ छेँ। ि‍बकरी बट्टा थोड़े भेलि‍ हेतौ।” “रओ बोहनि‍क सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बि‍द करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइले बोहैनक काज अछि‍।” दोसर दोकान रमेसराक लोहोक समान आ लकड़ि‍योक समानक अछि‍। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्‍कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्‍चा सभक तीन पहि‍या गाड़ीक दोकान लगौने अछि‍। असकरे रमेसरा समान पसारि‍ खूँटामे ओङठि‍, टॉंग पसारि‍ बीड़ी पीवैत अछि‍। “रमेसरा रौ। सुनने रहि‍यौ जे तोहूँ दि‍ल्‍ली धए लेलेँ।” “धुड़ बूि‍ड़, दि‍ल्‍ली हौआ ि‍छयै। जहि‍ना लोक कहै छै ने जे ि‍दल्‍लीक लडू जेहो खाइए सेहो पचताइए आ जे नै खेलक सेहो पचताइए। ि‍दल्‍लीसेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेि‍डयो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछाही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलियै आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क -बरही- ऐठाम नोकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपैया महीना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटी तँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ ऐलौं। जहि‍या सुनलि‍यै जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पॉंच हजारक समान अछि‍। कोनो ि‍क सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझ पड़ै छौ जे ि‍दल्‍लीमे हुंडी गारल अछि‍। हम तँ एक्‍के मासमे बुझ गेलि‍यै। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछ तखन अनकर तबेदारी ि‍कअए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ ि‍कअए ने रहब। तू सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पत्ति‍ कऽ अपन बुझै छीही। मुदा, ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।” “ई तँ रौदि‍या भैयाक चाहक दोकान बुझि‍ पड़ैए। अपने दोकान खोललह भैया?” “हँ, बौआ। गामक मेला छी। एकर भीड़-कुभीड़ तँ गौँऐपर ने पड़त। ओहि‍ना जे टहलैत-बुलैत रहि‍तौं, तइसँ नीक ने जे दू पाइ कमाइयो लेब आ मेलाक ओगरबाहि‍यो करब।” “बेस केलह। बरतन-वासन अपने छेलह?” “नहि‍। रघुनाथ लग बजलौं तँ वएह अपन पुरना सभ समान देलक।” “रघुनाथक दोकान तँ बड़ स्‍टेनडर भऽ गेलै।” “चाहे दोकानक परसादे तीनि‍टा बेटि‍ओक ि‍वआह केलक आ ईंटाक घरो बना लेलक।” “वाह बड्ड सुन्‍दर, बर बेस।” कते छोटका दोकानदार छपड़ि‍यो ने बनौने। काति‍क मास रहने ने वेसी गरमी आ ने वेसी जाड़। तहन ि‍कअए अनेरे बॉंस-बत्ती कीनि‍ घर बनौत। दूटा बॉंसक खूँटा गाड़ि‍ उपर बल्‍ला दऽ देत। ओहि‍पर केराक घौर टॉंगि‍ बेचत। कचड़ी पापड़ फोफी लेल माटि‍येमे चुल्‍हि‍ खुनि‍ लोहि‍या चढ़ा बनौत। मुरही पथि‍येमे रखि‍ ि‍डब्‍बासँ नापि‍-नापि‍ बेचत। झि‍ल्‍ली बनवैक सॉंचा तँ सभकेँ रहि‍तो ने छै, जे बनौत। झंझारपुरक आ मधेपुरक दस-बारहटा दोकानदार आि‍ब कऽ मेलाक चुहचुहि‍ये बदलि‍ देलक। गहि‍ि‍कयो ि‍चन्‍हरवे आ दोकानदारो सएह। तेँ सभसँ नीक कमाइ ओकरे सभकेँ हएत। नगद-उधार सभ चलतै। एक पॉंतीसँ सभ दोकान बना रहल अछि‍। पि‍तोझि‍या गाछ लग के झगड़ा करैए। कनी ओकरो देखि‍ लि‍अए। अरे ई तँ दुनू परानी ढोलबा छी। “ऐना ि‍कअए ढोल भाय अि‍बते-अबि‍ते ढोल जेकॉं दुनू परानी ढवढ़बाइ छह?” अवाज दाबि‍ ढोलबा बाजल- “हौ भाय, देखहक ने अइ मौि‍गयाकेँ, मेलासे जेकरा जे हानि‍-लाभ होउ मुदा हमरा ते सीजि‍न पकड़ाएल अछि‍। आगूमे छठि‍ अछि‍। परोपट्टाक लोक ते कोनि‍यॉं, सूप, छि‍ट्टा, डगरी कीनबे करत। अोइ हि‍सावसे ने समान बनवैत। से कहैए जे तीसे गो छि‍ट्टा-पथि‍या ि‍मला कऽ अछि‍। अट्ठारह गो सूप आ गोर पचासे कोनि‍यॉं अछि‍। ऊँटक मुँहमे जीरक फोरनसे काज चलत?” “अइ ले झगड़ा ि‍कअए करै छह? फेरि‍ लऽ अनि‍हह।” ढोलबा कने गम खेलक मुदा, झपटि‍ कऽ तेतरी बाजलि‍- “अइ मरदावाकेँ एक्‍को ि‍मसि‍या बुइध छै। एतनो ने बुझैए जे आठे दि‍नमे कते बनवि‍तौ। दूटा ढेनमा-ढेनमी अछि‍ ओकरो सम्‍हारए पड़ैए। ई तँ भरि‍ दि‍न बॉंस, बत्ती, कैमचीक जोगारमे रहैए। कोनो ि‍क बजारक सौदा छि‍यै जे रूपि‍या नेने जाइतौं आ कीनि‍ अनि‍तौं।” ढोलबा- “तूँ नै देखै छीही जे महि‍नामे पनरह दि‍न, काजक दुआरे नहेबो ने करै छी। तोँही छातीपर हाथ राखि‍ बाज जे एक्‍को दि‍न टटका भात-तीमन खाइ छी। डेढ़ बजे दू बजे हकासल-पि‍यासल बॉंस आनै छी, तखन गोटे दि‍न नहाइ छी ने तँ नहि‍ये नहाइ छी। धड़-फड़ा कऽ खाइ छी आ काजेमे लगि‍ जाइ छी। नि‍चेनसँ बीड़ीयो-तमाकुल नइ खाए-पीबए लगै छी। खा कऽ अराम केकरा कहै छै से तँ दि‍नकेँ सि‍हि‍नते लागल रहैए। तूँ की बुझबीही जे बॉंस टोनै, फाड़ै, गादि‍ लइमे कते भीर होइ छै। बैसल-बैसल बानि‍ चलबै छै तँ बुझि‍ पड़ै छौ एहि‍ना होइ छै। ई थोड़े बुझै छीही जे उठ-बैठ करैत-करैत जॉंघ चढ़ि‍ जाइए। अइसे हल्‍लुक सए बेरि‍ डंड-बैठकी करब होइ छै। एते काज केला बाद जा कऽ बैसारी काज अबैए। बैसि‍यो कऽ कारा-कैमची बनैबते छी। गुन अछि‍ जे ताड़ी पीबै छी तेँ मन असथि‍र रहैए। मूड फरेस रहैए। तेँ ने कोनो काज उनटा-पुनटा होइए। ने तँ केकर मजाल छि‍यै जे एक्‍के दि‍नमे एते रंगक काज सरि‍या कऽ कए लेत। अच्‍छा हो, दोकान लगा। दोकान की लगेमे, कोनि‍यॉंकेँ तीनि‍ मेल बना ले। डगरी, सूप तँ एक्‍के रंग छौ आ छि‍ट्टाकेँ दू मेल बड़का एक भाग छोटका एक भाग कऽ के लगा ले। पॉंच गो रूपैया दे कनी ताड़ी पीने अबै छी।” “अखैन रौद चरहन्‍त छै। अखैन जे ताड़ी पीबैले पाइ देवह से ि‍क हमरा गारि‍ सुनैक मन अछि‍।” “ऑंइ गै मौगि‍या, तोरा बजैत एक्को पाइ लाज नै होइ छौ जे पुरूख रहि‍तो घरक भार सुमझा देने ि‍छयौ। संगीयो-साथी सदति‍ काल ि‍कचाड़ैए।” “अच्‍छा रूपैया दइ छि‍य, मुदा फेरि‍ बेरू पहर नै मंगि‍हह। जाइ छह ते जा मुदा झब दऽ अबि‍हह। मेला-ठेला ि‍छयै असकरे हम दोकान चलाएब ि‍क बेदरा-बुदरी सम्‍हारब।” “से ि‍क हम नै बुझै छि‍यै, मुदा दसटा दोस-महि‍म अछि‍। अगर भेंट-घॉंट भऽ जाएत ते ि‍क कुशलो-क्षेम नै करब।” बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेबहार सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे भेल ओहि‍ घटनाक समाचार तरे-तर चारू भरक गाममे पसरि‍ गेल छल। जेकर टीका-टीपनी गामे-गाम होइत छल। मुदा, एक रूपमे नहि‍। अधि‍कतर लोक एि‍ह घटनाकेँ ि‍नन्‍दा करैत तँ कमतर मनोरंजन कहैत। ि‍कछु गोटे फैशन बुझि‍ पाछुसँ अबैत बेबहार मानि‍ बजवे ने करैत। मगर सभ ि‍कछु होइतो ि‍ससौनीबला बँसपुराबलासँ सहमल। ऐहन घटना आगू नहि‍ हुअए तहि‍ लेल सि‍सौनीक बुद्धि‍जीवी सबहक मनमे खलबली मचि‍ गेल। ि‍ससौनि‍एक दयानन्‍द दरभंगा कओलेजमे प्रोफेसरी करैत छथि‍। गामक लोक तँ हुनका एकटा नोकरि‍हरा बुझैत छन्‍हि‍, मुदा, कओलेजमे छात्रोक बीच आ ि‍शक्षकोक बीच प्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍ बुझल जाइत छथि‍। अइबेर ओ दुर्गा-पूजामे गाम नहि‍ आि‍ब संगीक संग रामेश्‍वरम् चलि‍ गेल छलाह। मुदा, बालो-बच्‍चा आ पत्‍नि‍यो गाम आइल रहनि‍। वएह सभ रामेश्‍वरम् सँ एलापर घटनाक जानकारी देलकनि‍। घटना सुनि‍ प्रोफेसर दयानन्‍द मने-मन जरि‍ गेलाह। गुम्‍म-सुम्‍म भऽ सोचए लगलथि‍ जे ई कोन तमाशा भऽ गेल जे धरमक काजक दौर ऐहन अधर्म भऽ गेल। कोना लोकक मनमे धरमक प्रति‍ आदर रहत। धर्मस्‍थलमे जँ ऐहन-ऐहन वृत्ति‍ होयत तँ कैक दि‍न ओ स्‍थल जीवि‍त रहत? कोना ककरो माए-बहीनि‍ कोनो घरसँ नि‍कलि‍ देबस्‍थान पूजा करए वा सॉंझ दि‍अए आओत। जते घटनाकेँ टोब-टाब करति‍ तते पैघ-पैघ प्रश्‍न मनकेँ हौड़ए लगलनि‍। मुदा, जे समए ससरि‍ गेल ओ उनटि‍यो तँ नहि‍ सकैत अछि‍। कोन मुँहे ओहि‍ गाम पएर देब। लोक की कहत? ओहू गामक (बँसपुराक) तँ अनेको वि‍द्यार्थी पढ़बो करैत अछि‍ आ पढ़ि‍ कऽ नि‍कललो अछि‍। ओ सभ की कहैत हएत। मुदा, आगू ऐहन घटना नहि‍ हुअए तेकर तँ प्रति‍कार कएल जा सकैत अछि‍। पाप तँ प्राश्‍चि‍तेसँ कटैत अछि‍। तहूमे अगुरबारे बँसपुरासँ काली-पूजाक हकार-कार्ड सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तत्-मत् करैत मनमे एलनि‍ जे एकटा बेंग मरलासँ लोक इनारक पानि‍ पीि‍व तँ नहि‍ छोड़ि‍ दैत अछि‍। ओकरा नि‍कालि‍ गंधकेँ मेटबैक उपाइ करैत अछि‍। बँसपुराक काली-पूजाक आरंभ सेहो सि‍सौनि‍एक घटनाक प्रति‍क्रि‍या स्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। हो न हो ऐकरे जबावमे ओहो सभ ने घटना दोहरा दि‍अए? काली-पूजा शुरू होइसँ तीन ि‍दन पहि‍ने प्रो. दयानन्‍द गाम आि‍ब, बि‍ना कोनो मान-रोख केने गामक पढ़ल-लि‍खल उमरदार सभसँ सम्‍पर्क कए कहलखि‍न। ि‍कछु गोटे गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझबो करैत छलाह आ ि‍कछु गोटे बुझौलासँ बुझलनि‍। बुझला बाद एकमुँहरी सभ गाममे बैसार कए एकर नि‍राकरण करैक ि‍वचार व्‍यक्‍त केलकनि‍। दयानन्‍दक मनमे आगू डेग बढ़बैक साहस जगलनि‍। साहस जगि‍तहि‍ कओलेजक ि‍वद्यार्थी सभकेँ बैसार करैक भार देलखि‍न। दू ि‍दन समए बीति‍ गेल। जइ ि‍दन काली-पूजा शुरू होएत तहि‍ ि‍दन भोरे सात बजे बैसार भेल। सात बजेसँ पहि‍नहि‍ दुर्गेस्‍थानमे सभ एकत्रि‍त भेलाह। बैचारि‍क रूपमे गाम दू फॉंक जेकॉं भऽ गेल। तेँ अपन-अपन ि‍वचारकेँ मजबूत बनबैक ि‍वचार सभक मनमे। तीनू कार्यकर्ताक -जे सभ घटनामे शामि‍ल रहए- पि‍ता बैसारमे नहि‍ आएल। नहि‍ अबैक कारण ि‍वरोध नहि‍ लाज होय। तहूमे जखनसँ प्रो. दयानन्‍द दरभंगासँ आि‍ब घटनाक चर्चा चलौलनि‍ तखनेसँ मुँह नुकबए लगल। मुदा, मौलाइल घटना पुन: पोनगि‍ गेल। ओना गामक एक ग्रुप, जेकरा कुकर्मी ग्रुप कहि‍ सकै छि‍यै, बल प्रयोगक योजना तरे-तर बनौने रहै। जहि‍सँ कोनो रस्‍ते ने गाममे खुजतै। मुदा, गामक ि‍वशाल समूहक, जे अधला काजसँ घृणा करैत, एक रंगाह ि‍वचार। एक तरहक ि‍वचारक पाछु कते तरहक सोच अछि‍। ि‍कछु गोटेक सोच जे गाममे एकटा कुकर्मी समाज अछि‍ जे सदति‍काल ि‍कछु नहि‍ ि‍कछु करि‍ते रहैत अछि‍। परोछा-परोछी तँ एक-दोसरकेँ गाि‍र पढ़ैत अछि‍ मगर, बेर ऐलापर सभ एक मुहरी भऽ जाइत अछि‍। तेँ घटना ओहन अस्‍त्र छि‍यै जहि‍सँ ओि‍ह समाजकेँ काटि‍-काटि‍ लति‍औल जा सकैत अछि‍। ि‍कछु गोटेक वि‍चार जे जहि‍ना तीनू गोरे दसगरदा जगहपर जुल्‍म केलक तहि‍ना समाजक बीच लति‍औल जाए। ि‍कछु गोटेक ि‍वचार जे हम सभ मनुष्‍यक समाजमे रहै छी नहि‍ ि‍क जानवरक समाजमे। तेँ मनुष्‍यक समाज बने। भलेहीं मनुष्‍यक समाज बनबैक जे प्रक्रि‍या होइत अछि‍ ओि‍ह प्रक्रि‍याकेँ क्रि‍यान्‍वि‍त कएल जाए। ललबाक ि‍वचार सभसँ भि‍न्‍न। ि‍कएक तँ जहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार भेल छलै ओ ओकर ममि‍औत बहीन। ललबा कलकत्तामे ड्रइबरी करैत अछि‍। दुर्गापूजामे गाम आएल रहै। जहि‍ दि‍न घटना भेल ओइ दि‍न ओ बुझबे ने केलक। जखैनसँ बुझलक तखैनसँ देहमे आि‍ग लगि‍ गेलै। मनै-मन योजना बना नेने रहए जे धनि‍कक टेरही कोना झाड़ल जाइ छै से समाजकेँ देखा देब। नीक मौका हाथ लागल हेन। मुदा, मनमे इहो शंका होय जे दयानन्‍द कक्‍काक आयोजन छि‍यनि‍ जँ कहीं आगूमे आि‍ब जेताह तँ सभ वि‍चार चौपट भऽ जाएत। सोचैत-ि‍वचारैत तइँ केलक जे चाहे जे होय मुदा, ि‍बना जुत्ति‍यौने नहि‍ छोड़ब। भलेहीं जि‍नगी भरि‍ जहलेमे ि‍कअए ने रहै पड़ै। गामक सभ टोलक लोक, गोटि‍-पंगरा छोड़ि‍, बैसारमे आइल। प्रो. दयानन्‍द उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ कहए लगलखि‍न- “अइ बेरक दुर्गा-पूजामे जे घटना गाममे घटल ओ समाजक लेल बड़का कलंक छी। एहि‍ घटनाकेँ जत्ते ि‍नन्‍दा कएल जाए ओते कम होयत। कते गोटे बुझैत हेबइ जे अनगौँवा लड़की छल मुदा, ई बुझब हमरा सबहक पलायनवादी ि‍वचार हएत। जइसँ रंग-वि‍रंगक अधलासँ अधला घटना होइत रहत आ हम सभ मुँह तकैत रहब। तेँ ऐहन-ऐहन घटनाकेँ रोकए पड़त।” ि‍वचहि‍मे जे ग्रुप हंगामा करए चाहैत छल उठि‍-उठि‍ हल्‍ला करए लगल। हल्‍ला देखि‍ सभ उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ ि‍वरोध करए लगल। ललबा प्रो. दयानन्‍द दि‍शि‍ तकलक। दयानन्‍दक मुँहक रूखि‍ तँ नहि‍ बदलल मुदा, नोरसँ ऑंखि‍, करि‍या मेघ जेकॉं, लटकि‍ कऽ ि‍नच्‍चॉं मुँहे जरूर भऽ गेल छलनि‍। ि‍बजलोका जेकॉं ललबा चमकि‍ कऽ फॉंइट चलबए लगल। तीनूकेँ असकरे ललबा मारि‍ कऽ खसा देलक। जाबे सभ शान्‍त भेल ताबे तँ तीनूक गाल-मुँह फुइल गेल मुदा, तइयो ललबाक गरमी कमल नहि‍। जहि‍ना खून केनि‍हारकेँ आरो खून करैक गरमी खूनमे आि‍ब जाइत अछि‍ तहि‍ना ललबोकेँ भेल। मुदा, चारू दि‍ससँ सभ पकड़ि‍ ललबाकेँ घि‍चने-ि‍घचने कात लऽ गेल। दुनू हाथ पकड़ि‍ दयाबाबू फुसफुसा कऽ कहलखि‍न- “अगर समाजमे एक्‍कोटा बेटा अन्‍यायक ि‍खलाफ अपनाकेँ उत्‍सर्ग कऽ देत तँ सैकड़ो बेटा धरतीमाता गोदमे पैदा भऽ जाएत। मन थीर करह। ओना समाजक सभ तरहक समस्‍याक समाधान खाली मारि‍ये टा सँ नहि‍ होएत आ ने केवल पनचैति‍येसँ हएत। ि‍कएक तँ समस्‍या दू तरहक होइत अछि‍ पहि‍ल घटना वि‍शेष परि‍स्‍थि‍तिक‍ होइत जबकि‍ दोसर सत्ता-वि‍शेष वा व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक होइत अछि‍। अखुनका जे समस्‍या अछि‍ ओ व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक छी तेँ ऐहन समस्‍याकेँ बलेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। नहि‍ तँ कोनो नहि‍ कोनो रूपमे चलि‍ते रहत, मरत नहि‍।” प्रोफेसर दयानन्‍दक ि‍वचार सुि‍न ललबा बाजल- “कक्‍का, अहॉं लग ि‍कछु बजैत संकोच होइए मुदा, आइ तीनूक खून पीवि‍ ि‍लति‍ऐक। भलेहीं ि‍जनगी भरि‍ जहले कि‍अए ने कटि‍तौं। फॉंसि‍येपर ि‍कअए ने चढ़ि‍तौं। की लऽ कऽ एलौं आ ि‍क लऽ कऽ जाएब। जखन मरनाइ अि‍छये तँ लड़ि‍ कऽ ि‍कअए ने मरब जे सड़ि‍ कऽ मरब।” ललबाक बात सुनि‍ मुस्‍कुराइत प्रो. दयानन्‍द कहलखि‍न- “अल्‍होमे लोक गवैत अछि‍ ‘रनमे मरे दोख नहि‍ लागे।’ तहि‍ना महाभारतमे व्‍यासोबाबा कहने छथि‍न जे इन्‍द्रासनक अधि‍कारी वएह छी जे अन्‍यायक ि‍वरूद्ध रनक्षेत्रमे ठाढ़ भऽ अपन बलि‍ चढ़ौत। मुदा, जे भेल से उचि‍त भेल। एहि‍सँ आगू नहि‍ बढ़ह। अगर जँ एहि‍सँ सुधरि‍ जाएत तँ बड़बढ़ि‍यॉं नहि‍ तँ ओकर फल आन थोड़े भोगत। तूँ एतै रहह।” कहि‍ आगू बढ़ि‍ दयानन्‍द सोचए लगलाह जे समाजक अध्‍ययन नीक नहॉंति‍ नहि‍ भेल अछि‍। लोकक जे रूखि‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओ कखनो बेकाबू भऽ सकैत अछि‍। तेँ सभकेँ गामपर जाइले कहि‍ दि‍अए। कहि‍ तँ देलखि‍न मुदा ि‍कयो मैदान छोड़ैले तैयार नहि‍ भेल। सभ अड़ल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे अपनोहु पड़ि‍ गेलाह। मनमे नाचए लगलनि‍ जे सभसँ पहि‍ने हमहीं कोना मैदान छोड़ि‍ देब। मुदा, रहनहुँ तँ लोक मानि‍ नहि‍ रहल अछि‍। दोहरा कऽ कहलखि‍न- “सभ गोटेक परि‍वार आइयेसँ नहि‍ बहुत दि‍नसँ एकठाम रहैत एलहुँ आ आगुओ रहब। तेँ सभकेँ मि‍लि‍-जुलि‍ रहैक अछि‍। ककरो संग ि‍कयो अधला करबै तँ झंझट हेबे करत। एक परि‍वारक झगड़ा गामक माने समाजक झगड़ा बनि‍ जाइत अछि‍। तेँ झगड़ाकेँ रोकैक उपाए एक्‍केटा अछि‍ जे ओहन कारणे ने उठै जहि‍सँ झगड़ा हुअए।” कहि‍ घर दि‍सक रास्‍ता पकड़लनि‍। मुदा सभ मैदानमे डँटले रहल। प्रो. दयानन्‍दक ि‍वचारक असरि‍ तेनाहे सन लोकक मनपर पड़ल। ि‍कऐक तँ ऐहन-ऐहन घटना पूर्वमे अनेको भऽ चुकल छलैक‍। जे सबहक मनमे उपकए लगल। दयानन्‍द बाट धेने आगूओ बढ़ल जाइत आ पाछु घुरि‍-घुरि‍ सेहो देखथि‍। जे फेरि‍ ने कहीं पटका-पटकी शुरू हुअए। ओना ककरो हाथमे ने लाठी अछि‍ आ ने हथि‍यार मुदा, देह तँ छैक। पॉंच बीघा आगू बढ़लापर पेशाब करैक लाथे बैसि‍ हि‍या-हि‍या देखथि‍। जे ि‍कयो हाथ-पएर ने तँ फड़कबैए। मुदा, से नहि‍ देखथि‍। पहि‍ने मारि‍ खेलहा सभ मैदान छोड़लक। पाछुसँ सभ अपन-अपन रास्‍ता धेलक। ठंढ़ाएल रूखि‍ देखि‍ अपनो उठि‍ कऽ वि‍दा भेलाह। घरपर आि‍ब प्रो. दयानन्‍द पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- “बँसपुरा जाइक समए दसे बजेक बनौने छलहुँ मुदा, बैसारेमे बेसी समए लगि‍ गेल। तेँ आब नहाए नहि‍ लगब। झब दऽ खाइले ि‍दय। ताबे हाथ-पएर धोइ लइ छी।” पति‍क बात सुि‍न पत्‍नी ि‍कछु नहि‍ बजलीह। बुझल रहनि‍ जे ऐना कते दि‍न भेल अछि‍ जे काजक धड़फड़ीमे नहाइयो नहि‍ लगैत छथि‍। नउ बजे। बगुरबोनीक भगत कफलाक संग बँसपुरा काली-स्‍थान पहुँचल। भगतजीक हाथमे लोटा आ जगरनथि‍या बेंत। डलि‍बाह मनटुनक हाथमे सि‍क्‍कीक चौड़गर चंगेरी, जे मधुबनी बजारमे कीनने रहै। चंगेरीमे फूल-अछत, अगरबत्ती आ सलाइ रखने रहै। नि‍रधनक कन्‍हामे ि‍मरदंग लटकल। रवि‍या आ सैनि‍याक हाथमे झालि‍। सोमना हाथमे एकटा बसनी; सरही आमक पल्‍लो आ पान-सातटा सुखल कुश। बुधबाक कान्‍हपर एकटा मुँठवासी बॉंस, जेकरा छीपमे आल रंगक पताका आ तीन हाथ जड़ि‍सँ उपर ओहने रंगक कपड़ाक टुकड़ा बान्‍हल। सभ एक सूरे ‘काली महरानीक जय’ क नारा लगबैत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य बैसि‍ अपन काजक ि‍हसाब लगबैत रहै। छलगोरि‍या मुरतीक अंति‍म परीक्षण मंडपमे करैत रहए। भगतजीक ि‍क्रया-कलाप देखए लेल एक्‍के-दुइये लोक जमा हुअए लगल। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य अपन हि‍साब-वारी रोकि‍ भगतजी सभकेँ देखए लगल। काली मंडपक ओसारपर भगतजीक मेड़ि‍या सभ अपन-अपन समान रखि‍ हाथ-पएर धोय लेल बगलेक पोखरि‍ वि‍दा भेल। अछीजल भरै लेल सोनमा वसनी लऽ लेलक। भगतजीक हाथमे लोटा। हाथ-पएर धोय सभ ि‍कयो काली मंडपक आगू आि‍ब एकटंगा दऽ दऽ गोड़ लगलकनि‍। गोड़ लाि‍ग नि‍रधन मि‍रदंग चढ़बए लगल। सैनि‍यॉं, रवि‍या झालि‍ बजबए लगल। पोखरि‍सँ आि‍ब भगतजी हाथमे लोटा नेने ठोर पटपटबैत मंउपक आगू ठाढ़ भऽ ऑंखि‍ बन्‍न कऽ सुमि‍रन करए लगल। बुधवा मंडपक आगूमे थोड़े हटि‍ कऽ धुजा गाड़ए लगल। बरसपति‍या भगैत उठौलक- “हे काली मैया।” जना सभ काजक बँटबारा पहि‍ने कऽ नेने हुअए तहि‍ना। ठाढ़े-ठाढ़ भगतजी देह थरथरबए लगल। गोसाँइ आबि‍ गेलखि‍न। भगतजीक आगूमे डलि‍बाह दुनू हाथे डाली पकड़ने। थोड़े कालक बाद भगतजी चंगेरीमे सँ फूल-अछत लऽ उत्तर मुँहे खूब जुमा कऽ फेकलक। फेरि‍ फूल-अछत लऽ गंगाजीक नाओ लऽ दछि‍न मुँहे फेकलक। चाि‍र मुट्ठी चारू दि‍स फेि‍क पॉंचम मुट्ठी उपर फेकि‍ जोरसँ बाजल- “ओ..... ओ.....। कहि‍ अपन परि‍चए कालीक नाओसँ देलक। कालीक नाओ सुि‍न डलि‍बाह बाजल- “हे माए, ि‍कछु वाक् दि‍औ?” भगत- “अइ जगहक भाग्‍य चमकि‍‍ गेल। एकरा नि‍च्‍चॉंमे साक्षात् गंगाजी बहै छथि‍न। ई स्‍थान बनने, गाममे कोनो डाइन-जोगि‍नक ि‍कछु नहि‍ चलत। एते दि‍न गामक लोक बड़ कलहन्‍तमे रहै छलै मुदा, आब सभ खुशीसँ रहत। कोनो कुशक कलेप ककरो नै लगत।” गामक खुशहाली सुनि‍ पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे नव आनन्‍दक जन्‍म भेल। देवनाथ पूछलक- “हे माए, अहॉं की चाहै छी?” “ई स्‍थान हमर छी। अखन धुजा गारि‍ पीरी बनेलौं। सभ दि‍न पूजो करब आ बेरागने-बेरागन गोसाँइओ खेलब। जेकरा जे कोनो उपद्रव देहमे हेतै ओ डाली लगौत। फूल दइते छुरि‍ जेतइ।” धुजा गारि‍, पीरी बना बुधबा तुलसि‍योक गाछ रोपि‍ देलक। समि‍ति‍क सभ चुपचाप भऽ देखैत रहै। ककरो मनमे कोनो शंके नहि‍ उठल। ि‍कएक तँ अनेको स्‍थानमे गहवरो रहैत अछि‍। मुस्‍की दैत देवनाथ पूछलक- “हे मैया, अपन कोनो पहचान दि‍औ?” झपटि‍ कऽ भगत बाजल- “तू जे जानक बदला जान गछने रहह से देलह। जखैन जान गड़ूमे रहह तखैन के बचौने रहह। गड़ू मेटा गेलह तँ सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ गेलह। अखनो धरि‍ जे बचल छह से स्‍त्रीऐक धरमे। जेहने तोहर स्‍त्री धरमात्‍मा छथुन तेहने तू पापी छह। हुनके धरमे अखन धरि‍ बचल छह। नइ तँ कहि‍या ने तोहर नाश भऽ गेल रहि‍तह।” भगतक बात सुि‍न देवनाथक मनमे लड़कीबला घटना ठनकल। मुदा, ि‍कछु बाजल नहि‍। चुपचाप दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- “हे माए, ि‍बसरि‍ गेल छलौं भने मन पाड़ि‍ देलह।” देवनाथपर सँ नजरि‍ हटा भगत जोगि‍नदरकेँ कहलक- “तूँ जे कबुला केलह से देलह। जखैन जान उकड़ूमे फँसल रहह तखन कते बेर कहि‍ कऽ गछने रहह। ओना तोहर बारह आना ग्रह कटि‍ गेलह सि‍र्फ चारि‍ आना बँचल छह। तेँ दान-पुन कऽ कऽ जल्‍दी ओकरो मेटाबह।” जोगि‍नदरकेँ ओहि‍ राति‍क घटना मन पड़ल जहि‍ राति‍ रूपैया लऽ सेठक ऐठामसँ पड़ाएल रहै। दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- “हे मैया, ठीके बि‍सरि‍ गेल छलौं। जलदि‍ये तोहर कबुला पूरा करबह।” बीच-बचाव करैत डलि‍वाह बाजल- “आइ पहि‍ल दि‍न गोसॉंइ जगबे कएलाह अइसँ बेसी आब कोनो काज ने हएत।” डलि‍बाहक बात सुि‍न भगत उत्तर मुँहे ठाढ़ भऽ दुनू हाथ उठा ऑंखि‍ मूनि‍ लेलक। काली देहसँ नि‍कलि‍ गेलखि‍न। सामान्‍ये आदमी जेकॉं भगतो भऽ गेल। झालि‍-मि‍रदंग, भगैत सेहो बन्‍न भऽ गेल। ऑंखि‍क इशारासँ भगत डलि‍बाहकेँ कहलक- “काज सुढ़ि‍आइल अछि‍।” ऑंखि‍एक इशारासँ डलि‍वाह उत्तर देलक- “हँ।” समि‍ति‍क सदस्‍य भगत लगसँ हटि‍ पुन: बैसारमे आि‍ब गेल। मुदा, एकटा नव समस्‍या समि‍ति‍क सामने उपस्‍थि‍त भऽ गेल। समस्‍या ई जे ि‍क गहबरो बनौल जाए आि‍क धुजा उखारि‍ कऽ फेि‍क देल जाए। मुदा, दुनू तरहक वि‍चार उठि‍ गेल। ि‍कदु गोटे गहवरक समर्थनो केलक आ ि‍कछु गोटे ि‍वरोधो केलक। बीचमे मंगलकेँ ि‍कछु फुरबे ने करै। मने-मन सोचै जे ई तँ बेरि‍ परक भदबा आि‍ब गेल। जँ मनाही करव तँ शुभ काज अशुभेसँ शुरू हएत। जँ नहि‍ करब तँ सभ दि‍ना भदवा ठाढ़ भऽ जाएत। भगतकेँ मंगल ि‍चन्‍हतो नहि‍ रहए मुदा, बगुरबोनीक भगतक ि‍वषएमे बुझल रहै जे एकटा कोखि‍या गुहारि‍ केनि‍हार भगत जहल गेल रहए। वएह भगत छह मास जहल काटि‍ हालेमे नि‍कलल छलै। बगुरबोनीक गहबर कऽ बदनाम बुझि‍ दोसर गहबर जगबए चाहैत अछि‍। भगता जहल ि‍कअए गेल? बगुरबोनीक भगता मथ-दुखीसँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ धरि‍ करैत छलै। एक दि‍न एकटा नोकरि‍या अपन घरवालीकेँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ करबए बगुरबोनी गहबर आएल। शुक्र दि‍न रहै। तीनू वेरागनमे शुक्र सभसँ नीक बुझल जाइत अछि‍। खूब डील-डालसँ डाली सजा अनने रहै। आन-आन कोखि‍या गुहारि‍मे कहालीक संग बुढ़ि‍-वुढ़ानुस स्‍त्रीगण सभ अबैत छलि‍ तेँ कहि‍यो कोनो रक्‍का-टोकी नै हाेय। मुदा ओ बुड़ि‍चोन्‍ह नोकरि‍या अपन घरवालीक संग अपने आएल। बुि‍ड़चोन्‍ह ऐहन जे कलकत्तामे नोकरी करि‍तहुँ अस्‍पताल देखले ने रहै। पूजा ढ़ारि‍ भगत ओकरा कहलकै जे गहवरक सीमासँ हटि‍ जाह। सौझुका समए रहै। अन्‍हारो भइये गेल रहै। ओकरा मनमे शंका जगलै। ओ हटैले तैयारे ने भेल। दुनू गोरेक बीच रक्‍का-टोकी शुरू भेल। रक्‍का-टोकीक बाद ओ गहबरसँ नि‍कलि‍ बहराक जाफरी लग ठाढ़ भऽ गेल। मुदा, ऑंखि‍-कान ठाढ़ केने रहल। असकरे भगत आ ओ औरत गहबरक भीतर रहल। देह थरथरबैत भगत पहि‍ने ओकरा माने औरतक देहपर हाथ देलक। औरत गुहारि‍ बुि‍झ ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। जखन भगत ओकरा पीरीक आगुमे पड़ै लेल कहलक तखन ओ जोरसँ घरबलाकेँ सोर पाड़लक। घरवालीक अवाज सुि‍न दौि‍ड़ कऽ आबि‍ सोझे भगतपर हाथ छोड़ए लगल। भगतोक अपन घर छलै। कोना अपना घरमे माि‍र खा बरदास करैत। हल्‍ला सुनि‍ पान-सात आदमी पहुँच गेल। सभ भगतेक लाइग-भाइगक। भगतकेँ कहि‍ते ओ सभ ओकरा थोपड़ा देलक। दू-चारि‍ थापर मौि‍गयोकेँ लगलै। वएह आदमी थाना जा दोसर दि‍न केस कऽ देलक। तेसरे ि‍दन भगत जेल चलि‍ गेल। जखनसँ जोगि‍नदर सुनलक जे चारि‍ आना ग्रह बाि‍कये अछि‍, जे दान-पुन केलासँ कटत, तखनसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेलै। मनमे होय जे भगत ठीके कहलक। जखन रूपैया लऽ टेम्‍पूपर चढ़लौं तखन ठीके कबुलो केलौं आ भरि‍ रस्‍ता गुहरि‍वतहुँ  गेल रहि‍एनि‍। भरि‍ रस्‍ता काली माए, काली माए, सेहो जपैत गेल रही। एते बात जखन ि‍मलि‍ गेल तँ चाि‍र आना ग्रह कोना झूठ भऽ सकैत अछि‍। दाने-पुन केलासँ ने ग्रह कटैत अछि‍। मुदा, दान-पुन करैक तँ कतेको रास्‍ता अछि‍। तहूमे फुटा कऽ ि‍कछु नहि‍ कहलक। ि‍कयो भोज-भनडारा करैए तँ ि‍कयो तीर्थ-स्‍थानमे धर्मशाला बनबैत अछि‍। ि‍कयो-पोखरि‍-इनार खुनवैए तँ ि‍कयो स्‍कूल-कओलेज बनबैए। ि‍कयो अस्‍पताल बनवैए तँ ि‍कयो अन्‍न-वस्‍त्र दान करैत अछि‍। दान-पुन करैक तँ अनेको जगह अछि‍। मुदा, हम की करी? फेर मनमे एलै जे एते ि‍दन ककरोसँ दोस्‍ती नइ केने छलौं, तेँ अपने फुरने ि‍कछु करैत छलौं। मुदा, आब तँ मंगलसँ दोस्‍ती भऽ गेल अछि‍ तेँ पुछि‍ लेब जरूरी अछि‍। पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍य कालि‍ये स्‍थानमे छल, ि‍कएक तँ औझुका काज सभसँ झनझटि‍या अछि‍। कतौ दोकान बनवैक तँ कतौ चंदा माने बेहरीक। मुदा, जोगि‍नदर मंगलकेँ बैठकसँ उठा कात लऽ गेल। कातमे लऽ जाए कहलक-  “भाय, भगतजी ठीके कहलनि‍ जे तोरा चारि‍ आना ग्रह बाँि‍कये छह।” मंगल- “तोरा अपनो ि‍वसवास होइ छह?” “हँ। कन्‍ना नै ि‍वसवास हएत। कोनाे ि‍क झुठेसँ गोसाँइ खेलाइए।” जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगल मने-मन सोचए लगल जे एक िदस दोस्‍ती भेल आ दोसर दि‍स दुसमनीक रास्‍ता सेहो बनि‍ रहल अछि‍। अखन धरि‍ वएह ओझा-गुनी लोककेँ ओझरौने अछि‍, तइओ लोकक ि‍वसवास जमले छै। कोन जरूरी छलै जे ि‍बना कहनहि‍ सुननहि‍ अपने मने चलि‍ आएल। ठीके गोसॉंइ जी कहने छथि‍न जे “भइ गति‍ सॉंप छुछुन्‍दर केरी।” अगर भगतकेँ भगा देवइ तँ तेहन बवंडर करत जे पूजा पूजे रहि‍ जाएत। जँ नै भगेवै तँ गहबर बना बड़का तमाशा ठाढ़ करत। सोचैत-ि‍वचारैत मंगल पुछलक- “तोहर अप्‍पन की वि‍चार होइ छह?” “भाय, जँ अपना मने करैक रहि‍तए तँ तोरा ि‍कअए पुछि‍ति‍यह।” जोगि‍नदक वि‍चार सुनि‍ मंगलक मन आरो ओझरा गेल। कनी काल गुम्‍म रहि‍ पुछलक- “भाय, तू केते दान करए चाहै छह। दान-पुनक अनेको जगह अछि‍।” “जते दान-पुनक जगह देखै छि‍यै ओ लगले थोड़े हएत। जे लगले हएत वएह करब।” मंगलक मनमे फेरि‍ शंका उठल जे हो न हो, ई इ ने कहि‍ दि‍अए जे ईंटाक गहबर बना देवइ। जँ से कहत तँ ने वि‍रोध करैत बनत आ ने समर्थन। चपाड़ा दैत कहलक- “बड़ सुन्‍दर वि‍चार छह। हमहूँ यएह कहैले छेलि‍यह।” “मनमे होइए जे गाममे जते ि‍वधवा, नि‍:सहाय मसोमात अछि‍ ओकरा सभकेँ मदति‍ कऽ दि‍यै।” मसोमातक नाओ सुनि‍ मंगलक मनमे खुशीक लहरि दौड़ि‍ गेल। हँसैत बाजल- “बड़ ि‍चक्‍कन बात बजलह। मुदा, मसोमातक ि‍वषएमे कने वुझह पड़तह।” “की?” “अपना ऐठाम दू तरहक मसोमात अछि‍। एक तरहक सरकारी अछि‍ आ दोसर तरहक समाजक अछि‍।” “नइ बुझलौं?” “सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैत अछि‍। आ समाजि‍क ि‍वधवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैत अछि‍। ि‍कछु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सबहक लेल औत ओ ओकरे भेटि‍तै। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि‍। ओही पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रो आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बरखामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। ततबे नहि‍, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नामपर सबसीडी सेहो भेटतै। तेँ सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे ि‍नरीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीवैक उपाए भऽ जाय तँ उपाय केनि‍हारकेँ अइसँ बेसी दान-पुनक फल कतऽ भेटतै। धन्‍यवाद ओहि‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तरि‍-अस्‍सी बर्ख ि‍बतौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झॉंट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैत अछि‍। धन्‍यवाद ओहि‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकेँ दी जे माथपर धान, गहूम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हान अबैत छथि‍। तेँ, कहवह जे अखन तँ मेलाक धुमसाही अछि‍, मेलाक पछाि‍त सभकेँ अपन रोजगारक उपाय कऽ दि‍हक। काज करब अधलाह नहि‍ मुदा, ओ शरीरक शक्‍ति‍क अनुकूल काज होय। अखन तत्-खनात पॉंच दि‍नक मेला भरि‍क बुतात, मेला देखैक लेल ि‍कछु नगद, एक-एक जोड़ साड़ी आ आङी दऽ दहक। मुदा, बीचमे एकटा बात आराे छह। आ ओ हमर ि‍मथि‍लाक धरोहर सम्‍पत्ति‍ सेहो छी। ओ ई जे जे ि‍जनगीक चारू पायासँ हारि‍ चुकल अछि‍, दुखक पहाड़क तरमे पि‍चाइल अछि‍ मुदा, आत्‍मबल एत्ते सक्‍कत छैक जे दान लइसँ आना-कानी करतह। तेँ पहि‍ने जा कऽ ओहि‍ मैया सभकेँ गोड़ लाि‍ग कहि‍हक बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तेँ कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍ जे परि‍वारमे बृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसॅँ होय। हम अहॉंकेँ मदति‍ सेवाक रूपमे दऽ रहल छी। जरूर ओ वेचारी हँसि‍ कऽ लए असि‍रवाद देथुन।” मंगलक ि‍वचार सोझे जोि‍गनदरक करेजमे घुसल। करेजमे घुसि‍तहि‍ ि‍तलमि‍ला गेल। जना ओि‍ह मसोमात सबहक हृदय जोगि‍नदक हृदयमे धक्‍का मारि‍ प्रवेश करए चाहैत होय। मन पसीज गेलै। ओना जइ गाममे जोि‍गनदक जनम भेल छलै ओि‍ह गाममे अनेको मसोमात पहि‍नहुँ छलि‍ मुदा, जे रूप आइ देखलक ओ पहि‍ने नहि‍ देखने छल। कँपैत मनसँ जोि‍गनदर बाजल- “भाय, जे कहलह से अखने कऽ लइ छी। मुदा, अइसँ मन नै मानि‍ रहल अछि‍। मेलाक बाद नीक जेकॉं ि‍वचारि‍ ि‍कछु करब।” प्रोफेसर दयानन्‍द, साइि‍कलसँ सोझे बँसपुरा वि‍दा भेला। गामक सीमा टपि‍तहि‍ देखलनि‍ जे एकटा शि‍क्षक (जेकर बहाली शि‍क्षा ि‍मत्रमे हजार रूपैयापर भेल) बीचे रस्‍तापर साइि‍कल लगा मोबाइल कानमे सटौने रहै। मुदा, ि‍कछु बजलाह नहि‍। मनमे भेलनि‍ जे एक तँ वहि‍ना अबेर भेल अछि‍ तहि‍पर सँ ि‍कछु कहबै अा रक्‍का-टोकी शुरू करत तँ अनेरे आरो समए लागत। मुदा, मन असथि‍र नहि‍ रहलनि‍। सोचए लगलाह जे अखन ने दरभंगा कओलेजमे छी, डेरो लगेमे अछि‍। मगर जखन एम.ए. पास केने रही तखन अपना साइि‍कलो ने रहए। पाएरे डेढ़ कोस चलि‍ कओलेज पढ़बैले जाय। जहन ि‍क देखै छी गामक शि‍क्षक गामक स्‍कूलमे काज करैत अछि‍ आ मोटर साइि‍कलसँ जाइत अछि‍। हजार रूपैयाक नोकरी केनि‍हार तीन हजारक अपन ि‍जनगी बनौने अछि‍। की ओहि‍ ि‍शक्षकसँ पूछि‍ सकै छि‍अनि‍ जे अहॉं अपन जि‍नगीक सीमा बुझै छी? जँ नहि‍ बुझै छी तँ अहॉं पढ़ेबै की? बच्‍चा सभ अहॉंसँ की सि‍खत? ई सभ सवाल मनमे उठि‍तहि‍ दयानन्‍दक मन उलझि‍ गेलनि‍। फेरि‍ मनमे उठलनि‍ जे जहि‍ना खढ़होरि‍मे पैसैक लेल दुनू हाथसँ खढ़ हटबए पड़ैत छैक तहि‍ना सभ उलझनकेँ मनसँ हटबैत बँसपुराक संबंधमे सोचै लगलाह। ि‍ससौनी बैसारक समाचार ि‍बरड़ो जेकॉं लगले चारू भागक गाम सभमे पहुँच गेल। बँसपुराक काली-पूजा समि‍ति‍क बैसारमे सेहो ि‍ससौनि‍एक चर्च चलैत। प्रो. दयानन्‍दकेँ देखि‍तहि‍ मंगलो आ देवनाथो उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोि‍ड़ प्रणाम केलकनि‍। प्रणाम कऽ मंगल दयानन्‍दक हाथसँ साइि‍कल पकड़ि‍-मंडपक बगलमे लगा देलक। साइि‍कल ठाढ़ कऽ मंगल दयाबाबूक हाथ पकड़ि‍ बैसारमे लऽ गेलनि‍। समि‍ति‍क ि‍बचहि‍मे एक साए एक रूपैया चंदा दऽ पुछलखि‍न- “एकाएक अहॉं सबहक मनमे काली पूजा कोना आएल?” प्रोफेसर दयानन्‍दक प्रश्‍नमे रहस्‍य ि‍छपल छलनि‍। तेँ क्‍यो ि‍कछु उत्तर देबे ने केलकनि‍। सि‍सौनि‍एक दुर्गा-पूजाक घटनाक प्रति‍क्रि‍यास्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। जइ बातकेँ छि‍पबैत ि‍कयो ि‍कछु नहि‍ बाजल। मुदा, दयानन्‍दक प्रश्‍न एहि‍सँ अलग छलनि‍। हुनकर प्रश्‍न छलनि‍ जे दुर्गा-पूजा -शक्‍ति‍क पूजा, संगठनक होइत- जहन ि‍क काली-पूजा –कालक, समएक- होइत। प्रश्‍न उठैत जे शक्‍ति‍क संचयमे समएक की योगदान होइत। मुदा, अपन रहस्‍यमय ि‍वचारकेँ ि‍छपबैत दयानन्‍द कहलखि‍न- “बड़ सुन्‍दर काज अहॉं सभ केलौं। एहि‍सँ समाजमे नव चेतनाक उदय होइत छैक। जे सभ समाजक लेल जरूरि‍ये अछि‍।” प्रोफेसर दयानन्‍द आ बँसपुरा काली-पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच गप-सप्‍प चलि‍ते रहै ि‍क हुनका माने दयानन्‍दकेँ तकैत बरहरबाक प्रोफेसर कमलनाथ मोटर-साइि‍कलसँ पहुॅचलथि‍। प्रो. दयानन्‍दकेँ कनडेरि‍ये ऑंखि‍ये कमलनाथ नि‍च्‍चॉंसँ उपर माने पएरसँ माथ धरि‍ देखि‍ कहलखि‍न- “दयाबावू, हम तँ अहींकेँ भजि‍अबैत घरपर होइत एलहुँहेँ।” कमलनाथक बातक उत्तर नहि‍ दए दयानन्‍द मुस्‍की दैत कहलखि‍न- “भाय सहाएव, कनि‍ये काल एहि‍ठाम देखि‍ लइ छी, तहन दुनू भॉंइ संगे चलब। अपने पढ़ाओल शि‍ष्‍य सभ पूजाक आयोजन कऽ रहल अछि‍।” देवनाथो आ मंगलो, काओलेजमे दयानन्‍दसँ पढ़ने छल। तेँ दयानन्‍दकेँ ि‍वशेष ि‍सनेह रहनि‍। प्रोफेसर कमलनाथ सेहो ि‍वचहि‍मे बैसि‍ गप-सप्‍प सुनए लगलाह। पूजाक सभ व्‍यबस्‍था बुझि‍ दयानन्‍द मंगलकेँ कहलखि‍न- “अखन तँ ओहि‍ना बुझै दुआरे आएल छलौं मुदा, राति‍मे सभ–-परि‍वार सहि‍त- देखैले आएब। कनी काल आरो थम्‍हि‍तौं मुदा, भाय सहाएव कमलबावू आि‍ब गेल छथि‍। भाय सहाएबकेँ तोँ सभ नहि‍ चि‍न्‍हैत हेबहुन। हमर गुरू भाय छथि‍। चारि‍ बर्ख हि‍नकासँ पढ़ने छी। दस बर्ख पहि‍ने कओलेजसँ सेवा-नि‍वृत भेलि‍ छलाह। अपने परोसि‍या सेहो छथि‍। बरहरबे घर ि‍छअनि‍।” प्रोफेसर दयानन्‍दो आ प्रोफेसर कमलनाथोक आगमनसँ देवनाथोक आ मंगलोक मनमे चारि‍-बर उत्‍साह बढ़ि‍ गेल। दुनूक मनमे खुशी आ नव शक्‍ति‍क संचार शरीरमे भऽ गेल। प्रोफेसर कमलनाथ एक साए एक्‍कैस रूपैया चंदा देलखि‍न। दुनू गोटेकेँ आग्रह करैत मंगल कहलखि‍न- “गुरूदेव, आब अपने सभ कतए जाएव। रहि‍ये जाइऔ। केयो अओताह अहॉं सभ आएले छी।” मंगलक बात सुि‍न प्रो. कमलनाथ कहलखि‍न- “बौआ, अखन धरि‍ तू सभ नह ि‍चन्‍हैत छेलह। जहन ि‍क एक अरि‍या-पटि‍या छी। महि‍नामे कमसँ कम पॉंच बेरि‍ एि‍ह गाम होइत अबै-जाइ छी। औझुका संयोग नीक रहल जे सभसँ भेटि‍ भऽ गेल। ि‍सर्फ भेंटे नहि‍ चि‍न्‍हा-परि‍चए सेहो भऽ गेल। सभ एक्‍के अि‍रया-पटि‍या छी तेँ एकठाम बैि‍स सभ गामक उत्‍थानक लेल ि‍वचार-ि‍वमर्श कऽ आगू बढ़ैत रहब। ओना तँ हम बूढ़ भेलौं मुदा, तइओ दौनक मेहोता बड़द जेकॉं, जाधरि‍ जीबैत छी ताधरि‍ संग-साथ दैत रहबह। गामकेँ आगू बढ़बैक लेल दू तरहक काज करैक जरूरत अछि‍। पहि‍ल, मनुष्‍यकेँ जीबैक लेल मूल आवश्‍यकता की अछि‍ ओ बुि‍झ ओकर पूर्ति करैक आ दोसर पाछुसँ अबैत ि‍क्रया-कलापकेँ ढ़ंगसँ देखि‍ अधलाहकेँ छोि‍ड़ नीकक अनुशरण करैक। अखन तोहूँ सभ नमहर काजमे लागल छह ओकरा नीक-नहॉंति‍ सम्‍हारि‍ लाए तकर बाद बुझल जयतैक।” कहि‍ कमलनाथ दयानन्‍दक संग ि‍कछु दुर हटि‍ गप-सप्‍प करए लगलाह। कमलनाथकेँ दयानन्‍द पुछलखि‍न- “अपनेकेँ बड़ हलचल देखलौं। ि‍कछु खास बात छैक, की?” मुस्‍कुराइत कमलनाथ कहलखि‍न- “खास बात तँ अहीं कहब। करीब साढ़े नओ बजे भाति‍ज आबि‍ कऽ कहलक जे दयाबावूक गाममे बैसार छलनि‍ जहि‍मे ि‍कछु गोटे हुनका गरि‍ऐबो केलकनि‍ आ मारबो केलकनि‍। से कहॉं धरि‍ की बात छि‍यैक?” कमलबावूक बात सुि‍न दयानन्‍द अवाक् भऽ गेलाह। मने-मन सोचए लगलाह जे बैसारमे तँ ि‍कयो आन गामक नहि‍ छल, तहन कोना बात उड़ि‍याएल। फेरि‍ भेलनि‍ जे इलाकाक सभ गाम एक-दोसरसँ जुड़ल अछि‍। कर-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ आवाजाही, हाट-बजार धरि‍क संबंध रहैत अछि‍। परि‍वारक काज ने साधारण ढ़ंगसँ चलैत अछि‍ मुदा, सामाजि‍क काज तँ ि‍बरड़ो जेकॉं उड़ैत चलैत अछि‍। भरि‍सक सएह भेल। फेरि‍ मनमे उठलनि‍ जे जँ ि‍कछु अधलाह बात उड़बे कएल तँ ओहि‍ संग घटनो उड़ल हएत। जखने घटना उड़ल हएत तखने ि‍वरोध स्‍वरूप चर्चा भेल हएत। से तँ अधलाह नहि‍ भेल। ओ तँ नीके भेल। अन्‍यायक ि‍वरोध करब तँ धर्मक रक्षा करब थि‍क। जहि‍ना अन्‍यायक ि‍वरोध केलासँ रामायणि‍क बालि‍मे दोबर शक्‍ति‍क संचार भऽ जाइत छल तहि‍ना तँ भरि‍सक इहो भेल। अन्‍यायि‍क बीच जरूर दहसति‍ बढ़ल। ई तँ ि‍जनगीक लेल पैघ उपलब्‍धि‍ छी। मुस्‍की दैत दुर्गा-पूजाक घटल घटनाकेँ दोहरबैत कहलखि‍न- “सभ गाममे दस-बीसटा लुच्‍चा-लम्‍पट रहि‍ते अछि‍। जे सदति‍काल ि‍कछु ने ि‍कछु उकठ समाजमे करि‍ते रहैत अछि‍। ताड़ी-दारू पीि‍ब अनेरे ककरो गरि‍अबैत रहैत अि‍छ। माए-बहीनि‍केँ देखि‍ पीहकारी भरैत रहैत अछि‍। झूठ-फुसि‍ ि‍सखा लकठी लगबैत रहैत अछि‍। ओहन-ओहन बृत्ति‍ केनि‍हारक वृत्ति‍केँ रोकब समाजक दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍। हमहूँ सएह ने केलहुँ जँ दुर्गा-पूजामे रामेश्‍वरम् नहि‍ गेल रहि‍तौं तँ ऐहन घटना थोड़े गाममे होइत। जइ गाममे हजारो बर्खसँ अनेको पीढ़ी-खुशीसँ रहैत आइल अछि‍ ओहि‍ गाममे ऐहन-ऐहन घटना भेने समाजमे आि‍ग लागत आि‍क शान्‍ति‍ रहत। जाधरि‍ समाज शान्‍ति‍सँ नहि‍ रहत ताधरि‍ आगू मुँहे ससरि‍ कोना सकैत अछि‍? यएह सभ सोचि‍ गाममे बैसार केलौं। बैसारेमे ि‍कछु चक-चुक भऽ गेलै। समाजोकेँ धन्‍यवाद दी जे गलत काजक ि‍वरोधमे एकजुट भऽ ठाढ़ भेल। मुदा, गलति‍यो केनि‍हार तँ बेवस्‍थेक फूल-फड़ छी, तेँ ओहो कमजोर नहि‍ये अछि‍।” प्रो. दयानन्‍दक बात सुि‍न प्रो. कमलनाथ कहलखि‍न- “देखि‍यौ, कोनो स्‍थानर पहुँचैक लेल रस्‍तो अनेक आ सबारि‍यो अनेक तरहक होइत अछि‍ मुदा, चलनि‍हार जँ यएह सोचैत रहि‍ जाए जे ई नीक ि‍क ओ, तहन ओ पहुँच कोना सकैत अछि‍। अपना इलाकाक दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे ि‍वचारक क्षेत्रमे पैघ-पैघ ि‍वचार कऽ लइ छी मुदा, कर्मक बेरि‍मे शि‍थि‍ल भऽ जाइत छी। कोनो ि‍वचार ताधरि‍ महत्‍व नहि‍ बनौत जाधरि‍ कर्मरूपमे नहि‍ औत। कहैले तँ सभ ि‍कयो अपना बच्‍चाकेँ सि‍खबैत छथि‍ जे बौआ अधलाह काज नहि‍ करि‍हेँ मुदा, केला बाद गबदी मारि‍ दैत छथि‍। एहि‍सँ कोना अधलाह काज मेटाएत। खैर जे ि‍कछु, मुदा, अहॉं प्रसन्‍नतासँ हमहूँ प्रसन्‍न छी। आगूक बात हेतइ। चलू।” जीबन संर्घष-  3 नीन टुटि‍तहि‍ ओछाइनेपर दुखनीक मनमे उपकल आइये दीयोबाती छी आ काली-पूजाक मेलो गाममे हएत। ऐना कऽ बेटी श्‍यामाकेँ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍नहि‍ धीया-पूताकेँ नेने अवि‍हेँ, से कहॉं आइलि‍। ओहो बेचारी की करत? अन्‍न-पानि‍ घरमे हेतै मुदा, तीनू तूर जे मेला देखत तइले तँ दसो-बीच रूपैया खर्च हेबे करतै। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे नइ होइ तेकरो इन्‍जाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरि‍यान नइ भेल होय। हँ, हँ, भरि‍सक सएह भेल हेतै। ओना आइ भरि‍ अबैक समए छै, बेरो धरि‍ ऐवे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैया नेने औत मुदा, जरना तँ नै आनत। अखन धरि‍ हमहूँ तँ जरनाक कोनो ओरि‍यान नहि‍ये केलौंहेँ। आब कहि‍या करब? भने मन पड़ि‍ गेल। सोचने छेलौं जे श्‍याम आउत तँ घर-अंगनाक काज सम्‍हारि‍ देत सेहो नहि‍ये भेल। भरि‍ये ि‍दनमे की सभ करब। घरो छछाड़ैले अछि‍, ओलति‍यो ओहि‍ना पड़ल अछि‍। कन्‍ना असकरे एते काज सम्‍हरत? ओलतीमे माटि‍ भरब, ि‍क घर छछाड़ब आि‍क जरना आनव। काज देखि‍ अबूह लगि‍ गेलइ। असकताइत मने वि‍छानसँ उठि‍ ओलती देखलक। मुदा रौदि‍याह समए रहने माटि‍ देव जरूरी नहि‍ वुझि‍ पड़लै। काज हल्‍लुक होइत देखि‍ मनमे खुशी एलै। ओलति‍येमे ठाढ़ भऽ ओसार ि‍हयासलक। कतौ चुबाट नहि‍ देखि‍ सोचलक जे छछाड़वो जरूरी नहि‍ये अछि‍। बाढ़नि‍सँ झोल-झाड़ झाड़ि‍ देवै। आरो मन हल्‍लुक भेलै। मन हल्‍लुक होइते बाढ़नि‍ लऽ घरो-ओसारक झोल-झार झाड़ि‍, अंगनो बहारलक। बाढ़नि‍ रखि‍ घैला नेने कलपर गेल। छउरेसँ मुँह धाेइ-कुड़ड़्ा कऽ घैल भरने आंगन आइलि‍। पानि‍ पीबि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ सोचलक जे एक जूम खाइयो लेब आ दू जूम बान्‍हि‍ कऽ बाधो नेने जाएव। सएह केलक। ओना दुखनी पहि‍ने तमाकुल नहि‍ खाति‍ छलि‍, हुक्‍का पीबैत छलि‍। मुदा जहि‍यासँ लबहदक ि‍मल बन्‍न भेल तहि‍यासँ छुआ भेटवे बन्‍न भऽ गेल। जहि‍सँ पीनी महग भऽ गेल। घर बन्‍न कऽ कान्‍हपर लग्‍गी नेने मारन बाध वि‍दा भेलि‍। बाधक अधा भाग नि‍च्‍चॉं दि‍स खेती होइत बाँकी उपर दि‍स गाछि‍ये कलम अछि‍। बड़बड़ि‍या आमक गाछक नि‍च्‍चॉंमे ठाढ़ि‍ भऽ सुखल ठौहरी सभ ि‍हयासए लागलि‍। रौदि‍याह समए रहने मनसम्‍फे जारन देखलक। जारन देखि‍ मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूँट खोलि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेरि‍ बान्‍हि‍ लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे उक बनबैले खढ़ कहॉं अछि‍। आन साल लोक आसीन-काति‍कमे खढ़होरि‍ कटबै छलए ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि‍ लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि‍ बाढ़नि‍यो भऽ जाइ छलए आ उको बना लेइ छेलौं। मुदा जेहन बाढ़नि‍ चड़ि‍काटूक होइए तेहन राड़ीक थोड़े होइए। हारल नटुआ की करत? तते ने लोक बकरी पोसि‍ नेने अछि‍ जे कतौ एकोटा चड़ि‍कॉंटू रहए दैत अछि‍। तहूमे तेहन रौदि‍याह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि‍ खरहोरि‍यो उपटा देलक। कथीक उको बनाएव? उक नै हएत तँ पावनि‍ कोना हएत। गाम ि‍क कोनो शहर-बजार छि‍यै जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने उक फेड़ैए। सोझे छुड़छुड़ी-फटक्‍कासँ पावनि‍ करैए। नजरि‍ खि‍रा खढ़ भजि‍अवए लागलि‍। भजि‍अवैत गंगवापर नजरि‍ गेलइ। बुदवुदाइल- “त: अनेने एते मन औनाइ छलए। घरे लग पोखरि‍क महारपर खढ़क जाक लगौने अछि‍। ओहीमे सँ लऽ आनब। मुँहमे खैनी घुलि‍तहि‍ थूक फेकलक। खढ़क ओरि‍यान देखि‍ मन सनठीपर गेलइ। ि‍बना सनठि‍ये उक कन्‍ना बनाएव? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजए लागलि‍- “सभ खेतबला पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। आब अपनो उक बना लि‍अ। हमसब तँ सहजे गरीब छी अपना खेत-पथार नै अछि‍। मुदा खेतोबला उक फेड़ि‍ लि‍अ। माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लि‍अ। आनह आब बजारसँ कीनि‍ कऽ प्‍लास्‍टि‍कक डोरी। अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उपजेने केहन भेल।” बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। ि‍बनु सनठि‍ये जँ उक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएव। लछमी ि‍दन छी जँ सूप बजा दरि‍दराकेँ नै भगाएव तँ ओ ि‍कन्‍नहुँ भागत। अपने गप-सप्‍प करै लागलि‍- “कोनो की हमरेटा संठी नै हएत ि‍क गामेमे ककरो नै हेतै?” “अनका भेने हमरा की? ि‍कयो अपन दरि‍दरा भगौत आि‍क दोसराक?” “जँ कोनो जोगार कऽ सभ संठीक ओरि‍यान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि‍ जेतै आ हमरे रहि‍ जाएत।‍” दुनू हाथ माथपर लऽ संठीक चि‍न्‍तामे दुखनी डूबि‍ गेल। रसे-रसे हूबा टूटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहि‍ना कोनो भारी चीज अांगुरपर पड़ि‍ गेलासँ छटपटाइत तहि‍ना संठीक सोगसँ मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजरि‍ गाममे टहलबए लागलि‍। एक बेरि‍ टहला कऽ देखलक तँ कतौ नहि‍ संठी अभरलै। फेरि‍ दोहरा कऽ टहलबए लागलि‍। फेरि‍ नहि‍ कतौ अभरलै। मन कहै जे ि‍बनु संठि‍ये उक अशुद्ध हएत। अशुद्ध उक गोसॉंइक आगूमे कन्‍ना फेड़ब। ओहो की बुझताह। फेरि‍ मनमे भेलै गरीब लोककेँ एहि‍ना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा, कहुना तँ जीवि‍ये लइए। देवतो-पि‍तरकेँ बुत्ता नै छनि‍ जे अपनो पावनि‍-ति‍हारक ओि‍रयान करताह। संठी ताकब छोड़ि‍ डि‍हवार स्‍थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अवि‍तहि‍ महाभारतक कृष्‍णकेँ कुरूक्षेत्रमे शंख फूकैत देखलक। मुदा जखन व्‍यासजी अर्थ बुझवए लगलथि‍न ि‍क तहि‍ काल खैनी खाइक मन भेलइ। ऑंचरक खूँटसँ खैनी नि‍काि‍ल चुनवए लागलि‍। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्‍मे बात रहै मनसँ नि‍कलि‍ गेलै। फेरि‍ संठि‍येपर मन आि‍ब गेलइ। पटुआक संठीक बदला चन्‍नी आ सनैपर नजरि‍ पहुँचलै। सनै आ चन्‍नीपर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मने-मन अपसोच करै लगल जे अनेरे ि‍गरहत सभकेँ दुसलि‍यै। पटुआक खेती तँ बेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनतो आ लगतो लगा उपजबैत छलै आ बेपारी सभ गरदनि‍ कट्टी कऽ लैत छलै। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। अपना जते डोरी-पगहाक काज होइ छै अो तँ सनइयो आ चन्‍नि‍योसँ कइये लैत अछि‍। मुदा बेपारि‍यो सभकेँ भाभन्‍स कहॉं भेलै। जहि‍ना ि‍गरहतक गरदनि‍ काटि‍ धन ढेरि‍औलक तहि‍ना प्‍लास्‍टि‍क आि‍ब सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्‍ना सभ ओहि‍ना ढ़न-ढ़न करै छै। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूँटसँ तमाकुल नि‍कालि‍-मुँहमे लेलक। पटुओ संठीसँ मोट-मोट संठी चन्‍नीक होइ छै। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएव जे दोसरे ि‍दन दरि‍दरा पड़ा जाएत। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ घुरनापर नजरि‍ गेलइ। बान्‍हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्‍नी भेलि‍ छलै। सोनो सुन्‍दर मुदा, पटुआक सोन जेकॉं सक्‍कत नइ होइ छै। खैर जे हौ काज तँ सम्‍हैर जाइ छै। घुरनाक घरवाली अछि‍यो बड़ आवेशी। जखने कहवै तखने बेसि‍ये कए कऽ देत। जेललबा बौहू जेकॉं धौंछ थोड़े अछि‍ जे सोझोक वस्‍तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेरि‍मे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै जना मुँहसँ मौध चुवैत होय। भगवान करौ जे सभ चीज बि‍ला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि‍ तँ देलक मुदा, लगले अफसोच करए लागलि‍ जे अनेरे ि‍कअए सरापि‍ देलि‍यै। कहुना भेलौं तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेलौं ि‍क ने? माइये-बापक सराप ने धीया-पूताकेँ पड़ै छै। जेहेन चालि‍ रहतै तेहेन फल अपने हेतै। बीस बर्खसँ कहि‍यो थूको फेकए गेलि‍यै। अपना आि‍गये-पानि‍ये नि‍महै छी। आगि‍-पानि‍पर नजरि‍ अबि‍तहि‍ बेटी श्‍यामा मन पड़लै। ऐना कऽ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍ने चलि‍ अबि‍हें। अनका जेकॉं ि‍क तूँ असकरे छेँ। हाथी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चि‍न्‍ता छौ। फेरि‍ मनमे उठलै लछमी पावनि‍ छी की ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरि‍सक तही दुआरे नइ आइलि‍। तमाकुल खाइक मन भेलै। अँचराक खूँट खोलि‍ तमाकुल देखलक तँ एक्‍के जूम बुझि‍ पड़ल। एक्‍के जूम देखि‍ सोचलक जे एकरे दू जूम बना लेब। मुदा टूटल दॉंतक गहमे तँ हराइले रहत। एक्‍के जूम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटापर मन गेलै। बेटा मन पड़ि‍ते दुखनी सोचए लगलि‍ जे सालो भरि‍ परदेशमे नइ रहत तँ कमाएत कतए? अंदाजे मनमे एलै जे चारि‍-पॉंच मास गेना भेल हेतै। मुदा चारि‍-पॉंच मास झुझुआन बुझि‍ पड़लै। फेरि‍ मन पाड़ि‍ ि‍हसाव जोड़ए लागलि‍। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसीनमे गेल रहै। हँ, हँ आसि‍ने रहै। खानि‍-पीनि‍ चलैत रहै। हमहूँ पोखरि‍मे तेल-खैर चढ़ा कऽ आइल रही। अखैन काति‍क छी। ऐँ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेलै। ओह नै, पैछला आसीन नै छी ि‍कऐक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जनम भेल। ओहो छौँड़ा दौड़ैए। कहुना-कहुना दू बर्ख भेल हेतै। आंगुरपर ि‍हसाब जोड़ै लगल। दू बर्ख आ एक बर्ख तीन बर्ख ने भेल। तीन बर्ख मनमे अबि‍ते चौंि‍क गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल। मनमे खुशी उपकलै। छौँड़ा फुटि‍ कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो ि‍क खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चि‍न्‍हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोछ सेहो भऽ गेल हेतै। आओत तँ ि‍बआहो कइये देवइ। असकरे नीक नइ लगैए। ि‍बनु धि‍या-पूताक अंगना कोनो अंगना छी। लोके ने लछमी छी। मगन भऽ दुखनी ऑंखि‍ बन्‍न कऽ फड़ल-फुलाएल परि‍वार देखए लगलीह। जहि‍ना पोखरि‍मे नावपर चढ़ि‍ झि‍लहोि‍र खेला उतड़ि‍ कऽ महारपर अबैत तहि‍ना दुखनि‍योकेँ भेलि‍। तकि‍तहि‍ वि‍चार बदलि‍ गेलनि‍। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौँड़ा ओनै वि‍याह-ति‍याह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबै तखन की करब। गामोमे तँ कते गोरेकेँ देखबे केलि‍यैहेँ। अखन धरि‍क खुशीक मनमे एकाएक पानि‍ पड़ि‍ गेलै। ि‍नराश मने सोचए लगलि‍ जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब ककरो बेटा-बेटी थोड़े पॉंजमे रहै छै। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। छौँड़ा सभ जहॉं बौहू देखलक ि‍क माए-बाप ि‍बसरि‍ जाइए। मने उनटि‍ जाइ छै। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलै। ऑंचरसँ नोर पाेछलक। नोर पोछि‍तहि‍ मनमे उठलै जाबे पैरूख अछि‍ ताबे तक ने ककरो पमौजी केलि‍यै आ ने करबै। जइ दि‍न पैरूख घटि‍ जाएत तइ दि‍न बुझल जेतइ। जि‍नगि‍यो तँ तहि‍ना अछि‍। कोनो ि‍क ठीक अछि‍ जे पैरूख घटलेपर मरब। पहि‍नहुँ मरि‍ सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उड़हड़ि‍ये जाएत तँ उड़हरि‍ जौ। बेटापर सँ नजरि‍ हटि‍ बेटीपर गेलै। बेटीपर नजरि‍ परि‍तहि‍ मनमे आशाक उदय भेलै। आशा जगि‍तहि‍ मुँहमे हँसी एलै। सात घर दुश्‍मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लछमी छी। अपने फेरल नुआ ि‍कअए ने दि‍अए मुदा, कहि‍यो ओढ़ैसँ पहि‍रए धरि‍ वस्‍त्रक दुख अखैन तक भेलि‍हेँ। ओकरे परसादे तीनटा कम्‍मल घरोमे अछि‍। जमाइयो तेहने छथि‍ जे अपने माथपर उठाकेँ अन्‍नो-पानि‍ दइये जाइत छथि‍। आशा जगि‍तहि‍ दुखनी जारन तोड़ए उठल। ऑंखि‍ उठा गाछमे सुखल ठौहरी हि‍यासए लगलीह। रौदि‍याह समए भेने मनसम्‍फे सुखल ठौहरी गाछमे। जारन देि‍ख मन खुशीसँ नाचि‍ उठलै। मनमे गामक सुख नचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जरना कीनैत-कीनैत तबाह रहैए। मन पड़लै सि‍ंहेश्‍वर स्‍थानक मेला। एक्‍के सॉंझ भानस केलहुँ तहि‍मे दस रूपैया जरनेमे लगि‍ गेल। ई तँ गुन रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सवे रूपैया ि‍हस्‍सा लागल। नइ तँ सवा रूपैयाक जरना चुल्‍हि‍ये पजारैमे लगि‍ जाइत। एक सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्‍गीसँ ठौहरी तोड़लक। जारन देखि‍ अबूह लगि‍ गेलै जे कहुना-कहुना तँ पॉंच बोझसँ बेसि‍ये भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो ि‍क कोनो लगमे अछि‍। पॉंच बेरि‍ उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीड़ो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दि‍न नि‍चेनो रहब। फेरि‍ मनमे उठलै जे जँ कहीं अइ बीचमे श्‍यामा आि‍ब गेल हएत तँ अंगने-अंगने खोज-पुछाड़ि‍ करैत बौआइत हएत। मुदा छोड़ि‍यो कऽ कन्‍ना जाएव। सभटा लोक लइये जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्‍हि‍ लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएव। देखि‍यो सुनि‍ लेबइ। जँ नइ आइलि‍ हएत तँ सभटा उघि‍ये लेब। ओना जँ आइलि‍ हएत तँ ि‍क ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइये बेरि‍मे उघि‍ लेब। मन असथि‍र होइतहि‍ तमाकुल खाइक मन भेलै। ऑंचरक खूँटपर नजरि‍ पड़तहि‍ मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि‍ गेल। मुदा पथार लागल जारन देखि‍ मनमे एलै जे पावनि‍क दि‍न छी। वेसी अंहोस-मंहोस करब तँ सभ काज दुरि‍ भऽ जाएत। अंगनोमे मारि‍ते रास काज अछि‍। जारन बि‍छैले उठल। गाछक चारू भाग नजरि‍ देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ नि‍कलि‍-नि‍कलि‍ घोरन पसरि‍ गेल। पॉंखि‍बला धोरन देखि‍ दुखनी डरा गेल। बापरे ई तँ डकूबा घोरन छी दुइये टा काटत तँ पराने लऽ लेत। मुदा छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। से नइ तँ लग्‍गि‍येपर उठा कातमे फेि‍क जारन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौँसे पसरि‍ गेल अछि‍। छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। जीबठ बान्‍हि‍ छत्ताकेँ कातमे फेि‍क जारन बीछए लागलि‍। फेरि‍ मनमे एलै जे ठौहरि‍यो तँ दू रंगक अछि‍। मोटको अछि‍ आ पतरको अछि‍। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि‍ बोझ बान्‍हब। सएह करए लगल। ठौहरी बीछि‍ते रहै ि‍क मन पड़लै, हाय रे बा बान्‍हब कथीपर। जुना तँ अछि‍ये नहि‍। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल। पहि‍ने जे से मन पड़ैत तँ अंगनेसँ जुन्‍नो नेने अबि‍तौं मुदा, सेहो ने मन रहल। छोड़ि‍ देबइ तँ सभटा आने लऽ जाएत। एते बेरि‍ उठि‍ गेल ि‍कछु खेनौ ने छी। मुदा जारन देखि‍ मनमे खुशी होय जे कहुना-कहुना एक पनरहि‍या तँ चलबे करत। जँ दू-चारि‍ दि‍न आरो तोड़ि‍ लेब तँ भरि‍ जाड़क ओरि‍यान भऽ जाएत। ऑंखि‍ उठा घसबाहि‍नी सभ दि‍स तकलक जे कि‍यो भेटत तँ ओकरे हॉंसू लऽ कड़चि‍ये नइ तँ राड़ि‍ये काटि‍ जुन्‍ना बना लेब। मुदा सेहो नै ककरो देखै छि‍यै। ि‍हया कऽ करजान दि‍स ि‍वदा भेल। मुदा ओहो केराक सुखल डपोर तँ ि‍बना हँसुए काटल नहि‍ हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि‍ भालरि‍ आ थम्‍होकेँ काटि‍ छोड़ि‍ देने अछि‍। जुन्‍ना देखि‍ मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्‍ना लऽ आबि‍ बोझ बन्‍हलक। पॉंच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि‍ एकटा नेने आंगन आइलि‍। आंगन आबि‍ सोचए लगलि‍ जे ि‍कछु बना कऽ खा लइ छी। फेरि‍ मनमे भेले जे जखने आंगनक काजमे ओझड़ाएव तखने जारन बाधेमे रहि‍ जाएत। तत्-मत् करैत पानि‍ पीलक। घरसँ तमाकुल नि‍कालि‍ चुनबैत ि‍वदा भेल। पॉंचो बोझ उघि‍ लेलक। काठी जेकॉं डॉंड़ो आ गरदनि‍यो तानि‍ देलकै। देहो-हाथमे दर्द हुअए लगलै। हाथो-पएर नहि‍ धोय ओसारेपर भुँइयेमे ओंघरा गेलि‍। थाकल-ठहि‍आइल देह ओंघराइत नि‍न्‍न पड़ि‍ गेल। बेरि‍ टगि‍ गेल। घरक छाहरि‍ अंगनामे दू हाथ ससरि‍ गेल। डेढ़ि‍यापर सँ जोगि‍नदर सोर पाड़ए लगल- “काकी, काकी।” दुखनीक नि‍न्‍न नहि‍ टुटल। डेढ़ि‍यापर सँ ससरि‍ जोगि‍नदर आंगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेमे नि‍न्‍न भेरि‍ सुतल अछि‍। फेरि‍ बाजल- “काकी, काकी।” ठाढ़ भेलि‍ जोगि‍नदरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइयेबला अइठीन रहलौं मुदा, सभ सुख-सुवि‍धा रहि‍तो ओकरा सभकेँ ऐहन नि‍न्‍न कहॉं होइ छै। देखै छी जे पेट खपटा जेकॉं खलपट छै, भरि‍सक खेवो केने अछि‍ ि‍क नहि‍। तहूमे पाएरो धुराइले देखै छि‍यै भरि‍सक कतौसँ काज कए कऽ आइलि‍ अछि‍। अखन जे घरक सभ कुछ उठा ि‍कयो लऽ जाय तँ बुझवो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनि‍यॉं छै। जहि‍ना चीनीक कीड़ाकेँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि‍ जाएत। जे स्‍वभावि‍के छैक। मुदा ि‍क मि‍रचाइक कीड़ा चीनीमे जीबि‍ सकत। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍ति‍ जोगि‍नदरक मनमे उठि‍ गेल। मुदा काजक धुमसाही, वि‍चारक दुनि‍यॉंसँ खींचि‍, ओकरा हड़वड़ा देलक। फेरि‍ काकी, काकीक आवाज देलक। मुदा नि‍न्‍न नहि‍ टुटल देखि‍ कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि‍ दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दबि‍तहि‍ दुखनीक नि‍न्‍न टूटल। ऑंखि‍ मुननहि‍ बाजलि‍- “अयँ गे सामा (श्‍यामा) काल्‍हि‍ ि‍कअए ने ऐलै?” दुखनीक अवाज सुि‍न जोगि‍नदरक मनमे भेल जे भरि‍सक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ ि‍हलबैत बाजल- “काकी, काकी....।” ऑंखि‍ खोलि‍ दुखनी उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। हाफी कऽ जोगि‍नदर ि‍दस तकलक। मुदा ि‍कछु बाजलि‍ नहि‍। मोटरी खोलि‍ जोगि‍नदर जोड़ भरि‍ साड़ी, साया, एकटा आंगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि‍ बाजल- “अखैन धरि‍ काकी अहॉं नहेबो ने केलहुँहेँ।” जहि‍ना आम बीछि‍नि‍हार गाछक नि‍च्‍चॉंमे खसल आम देखि‍ उजगुजा जाइत तहि‍ना दुखनी उजगुजा गेलि‍। बाजलि‍- “बौआ, जारनि‍ नइ छलै वएह तोड़ए भि‍नसरे चलि‍ गेलौं। ओकरे सम्‍हारैत-सम्‍हारैत दुपहर भऽ गेल। ि‍कछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं ि‍क ऑंखि‍ लगि‍ गेल।” दुखनीक बात सुि‍न जोगि‍नदर बाजल- “काकी, अखैन अगुताइल छी तेँ नै अँटकब। पूजा उसरला बाद नि‍चेनसँ आि‍ब आरो गप्‍पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदति‍ सेहो कऽ देब। अखैन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैइयो देलौंहेँ। जाइ छी।” जोगि‍नदर उठि‍ कऽ ि‍वदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी ि‍हसाब जोड़ए लागलि‍ जे अधा रूपैया कऽ चाउर कीनि‍ लेब आ अधा हाथ-मुट्ठीमे रखि‍ लेब। मेला-ढेलाक समए छी कखैन कोन भूर फूटि‍ जाइत। फेरि‍ मनमे एलै जे श्‍यामो तँ अबि‍ते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। जखन अनदि‍नो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पाबैनि‍ये छी। दुनू नाइत-नाति‍न सेहो ऐबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि‍ रूपैया नइ देवइ से केहन हएत। हम कतबो गरीब ि‍कअए ने छी मुदा, नानी तँ छि‍यै। साड़ी खोलि‍ दुखनी देखए लागलि। साड़ी देखि‍ बुदबुदाइल- “ऐहेन साड़ीक कोन काज अछि‍। कोनो ि‍क नव-नौतारि‍ छी जे ऐहेन छपुआ पहि‍रब। अइसँ नीक तँ तीन काजू मरकीन दैत जे कतबो मारि‍-धुसि‍ कऽ पहि‍रतौं तइओ साल भरि‍ चलबे करैत। सायाक कोन काज अछि‍। आब तँ सहजहि‍ बुढ़ि‍ भेलौं। जहि‍या जुआन छलौं तहि‍यो तँ डेढ़ि‍ये पहि‍रैत छलौं। कोनो ि‍क मंगैले गेल छेेलि‍यै, मुदा जखैन घर पैसि‍ दऽ गेल तखैन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी ऐबे करत अोकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबै।” साड़ी-साया, आंगी समेटि‍ कऽ रखि‍ दुखनी रूपैया गनए लागलि‍। फेर बुदबुदाइल- “सभटा दस टकहि‍ये छी। दसटा अछि‍। दसटा दसटकही काए बीस भेल। दू-दू टा कऽ फुटा-फुटा रखि‍ गनलक। पॉंच बीस भेल। मनमे खुशी एलै। फेर लगले मनमे एलै जे आइ पावनि‍क दि‍न छी अखन धरि‍ खेलौंहेँ कहॉं। सभ दि‍न खैहह पाबनि‍ दि‍न ललैहह। मुदा भि‍नसरसँ तँ गाछि‍ये-ि‍बरछीमे रहलहुँ। सारा-गाड़ा नंघलौं। ि‍बना नहेने कोना भानस करब? सूर्य दि‍स तकलक। माथसँ ि‍नच्‍चॉं देखि‍ सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लगब ताबे तँ साँझे पड़ि‍ जाएत। सॉंझमे लछमी पूजा करब ि‍क अपने खाए-पीबए लगब। तहूमे अखन धरि‍ ने खढ़ अनलौं आ ने संठी। जाबे से नहि‍ आनब ताबे उक कन्‍ना बनाएव। ि‍दआरि‍यो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि‍ ओ अँइठ भऽ गेल अछि‍ कन्‍ना ि‍दयारीमे देवइ। काज देखि‍ दुखनीकेँ अबूह लागि‍ गेल। पावनि‍क सभ ि‍कछु ि‍बसरि‍ गेल। नजरि‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजरि‍ पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजलि‍- “ऐना कऽ समाद पठौलि‍यै से ि‍कअए ने आइलि‍।” असमंजसमे पड़ि‍ गेल। तहि‍ बीच नवानीवाली बान्‍हेपर सँ सोर पाड़ि‍ बाजलि‍- “काकी, काकी, दैया आगू अबैले कहलकनि‍हेँ। उत्तरवरि‍या पोखरि‍पर दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍यो लऽ बैसल छन्‍हि‍।” दैयाक नाओ माने श्‍यामा दऽ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि‍ घरमे कपड़ा रखि‍ ऑंचरमे रूपैया बान्‍हि‍ ि‍वदा भेलि‍। तीनि‍-चारि‍टा धि‍या-पूता सेहो संग लगि‍ गेलनि‍। बेटी लग पहुँचते श्‍यामा उठि‍ कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगि‍तहि‍ तरंगि‍ कऽ दुखनी बाजलि‍- “अँइ गे, तोरा जानक काज नइ छौ जे एते लदने ऐलेहेँ।” माइक बातकेँ अनसून करैत श्‍यामा दुनू बच्‍चाकेँ कहलक- “नानीकेँ गोड़ लाग।” बच्‍चाकेँ देखि‍ दुखनी हरा गेलि‍। सभ बात वि‍सरि‍ गेलि‍। ऑंचरक रूपैया नि‍कालि‍ एक-एक टा दस टकही दुनू बच्‍चाकेँ हाथमे दऽ बॉंकी अस्‍सि‍यो रूपैया श्‍यामा दि‍शि‍ बढ़ौलक। रूपैया देखि‍ श्‍यामाक मनमे उठल। भरि‍सक बौआ पठौलकेहेँ। मुस्‍की दैत माएकेँ पुछलक- “की सभ बौआ पठौलकौहेँ?” बौआक नाओ सुि‍न दुखनीक मन फेरि‍ औनाए गेल। नजरि‍ बेटापर गेलइ। बेटापर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मनमे तामस उठलै। बाजलि‍- “कतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि‍ तेकर कोन ठेकान अछि‍। अखन धरि‍ ने कहि‍यो चि‍ट्ठी-पुरजी पठौलक आ ने एक्कोटा छि‍द्दी। ओम्‍हरे कतौ कोनो मौगी सने उढ़ढ़ि‍ गेल ि‍क की। से ि‍क कोनो पता अछि‍।” माइक बात रोकैत श्‍यामा बाजलि‍- “ऐना ि‍कअए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमे से नै।” बेटीक बात सुि‍न मायक मन बेटासँ हटि‍ बेटीपर पुन: आबि‍ गेल। बाजलि‍- “दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍योकेँ कन्‍ना आनल भेलौ?” मुस्‍कुराइत श्‍यामा बाजलि‍- “अपने एतऽ तक पहुँुचा गेलखि‍न।” जमाए दऽ सुि‍न दुखनी बाजलि‍- “एक डेग आगू घर नै देखल छलनि‍ जे जइतथि‍।” “गाममे मेलो होइ छै आ पावनि‍यो छि‍यै तेँ कहलखि‍न जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि‍ थान माल असकरे माए बुते सम्‍हारल नै ने हेतै। परसू ऐथुन।” परसू सुि‍न दुखनीक मन थीर भेल। छोटका बच्‍चाकेँ कोरामे लऽ जेठकीकेँ आगू कऽ ि‍वदा भेलि‍। घरसँ कने पाछुऐ रहै ि‍क दछि‍नसँ एक गोटेकेँ हाथमे बैग, फुलपेंट-शर्ट पहीरि‍ने अवैत दुनू गोटे देखलक। मुदा ि‍कयो चि‍न्‍हलक नहि‍। बदलल चेहरा भुखनाक। भुखनो अंगने दि‍शि‍सँ अबैत आ दुनू गोटे दुखनि‍यो अंगने दि‍स बढ़ैत। घर लग आबि‍ भुखना दुखनीकेँ कहलक- “माए।” भुखनाक माए कहब दुखनी सुनलक मुदा, अनठि‍या बुझि‍ अनठा देलक। ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। मुदा श्‍यामा चीन्‍हि‍ गेली। बाजलि‍- “बौआ हौ।” बौआ सुि‍न दुखनि‍यो चौंकलीह। ताधरि‍ भुखना लग आबि‍ माएकेँ पएर छुबि‍ गोड़ लगलक। दुखनी अवाक् भऽ गेलि‍। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलनि‍। ि‍नच्‍चॉंसँ उपर धरि‍ भुखनाकेँ नि‍ग्‍हारए लगलीह। करेज दहलि‍ गेलनि‍।‍ वामा बॉंहि‍सँ नाति‍केँ दवने आ दहि‍ना तरहत्‍थीसँ ऑंखि‍ पोछि‍ ि‍वह्वल होइत बजलीह- “ऑंइ रौ बौआ तूँ तँ समरथ भऽ गेलेँ। चि‍न्‍हवे ने केलि‍यौ। आंङै-समांगे नीक रहै छलेँ की ने। एते दि‍नपर ि‍कअए एलेँ। ि‍क बुझि‍ पड़ै छेलौ जे घरमे ि‍कयो ने अछि‍। कोनो ि‍क हम मरि‍ गेलि‍यौ। रूपैया नै कमेलेँ तँ नै कमेलेँ मुदा, छुछो देहे तँ अबि‍तेँ। अखैन तँ हम अपने थेहगर छी।” श्‍यामक माथ परक मोटरी पकड़ैत भुखना बाजल- “दाय, तोहर माथ अगि‍या गेल हेतौ।” “नै-नै कथीले तूँ लेबह। आब ि‍क अंगना कोनो बड़ दूर अछि‍। मुदा बलजोरी भुखना श्‍यामक माथपर सँ मोटरी उताड़ि‍ अपना माथपर लेलक। आद्र स्‍वरे दुखनी बाजलि‍- “बौआ, रस्‍ता तँ भुखले आएल हेबह।” “नइ गै। खाइत-पीबैत एलौं ि‍क।” “बौआ, अंगनो गेल छेलहक ि‍क रस्‍तेसँ रस्‍ता छह?” “अंगनामे बेग रखि‍ देलि‍यै। घर बोन देखलि‍यै तँ तमोरि‍यावाली भौजीकेँ पुछलि‍यै। वएह कहलनि‍ जे दायकेँ आनै काकी आगू गेल छथि‍।” भुखनाक बात सुनि‍ दुखनीकेँ तामस उठल। बाजलि‍- “ऑंइ रौ छौँड़ा, अंगना गेलेँ तँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलेँ की नै?” “घर बोन देखलि‍यै तँ बेगकेँ अोसरेपर राखि‍ तोरा तकैले ि‍वदा भेलौं।” “हम कोनो ि‍बलेँत गेल छेलौं। ताबे तूँ हाथ-पाएर धो कऽ अंगनेसँ गोसॉंइकेँ गोड़ लागि‍ लइतेँ से तोरा बुते नै होइतौ। जाबे हमरा तकैले गेलेँ ताबे जे कोइ बेग चोरा लेतौ, तब की करबीही।” “हमरा देखि‍ते मारे धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ आबि‍ गेल। ओते लोकमे के बेग चोराओत।” फुसफुसा कऽ माए बेटीकेँ पूछलक- “दाय, कि‍छु खाइयोबला सनेस छौ। देखै छीही छौँडाक मुँह केहन सुखाइल छै।” “हँ। असकरे दुआरे कते अनि‍ति‍यौ। पॉंच गो दलि‍पूड़ी अछि‍।” “अच्‍छा, वड़बढ़ि‍यॉं। हम तँ अखैन धरि‍ नहेबो ने केलौंहेँ।” “ि‍कअए? पावनि‍क दि‍न छि‍यै तइयो ने नहेलेँ।” “छुट्टि‍यो ने भेल। भि‍नसरेसँ जारनि‍क अोरि‍यानमे लागल छलौं। बोझ उघैत-उघैत मन ठहि‍या गेल। असकता गेलौं। ने भानसे केलौं आ ने नहेबो केलौंहेँ। ओहि‍ना ओसारपर ओघड़ेलौं ि‍क नीन आि‍ब गेल। जोगि‍नदरा आि‍ब कऽ उठौलक। नइ तँ सुतले रहि‍तौं। देखही जे सॉंझ लगि‍चाइल जाइ छै ने अखैन तक उकक ओरि‍यान भेलहेँ आ ने सॉंझ-बतीक।” आंगन अबि‍ते दुखनी-भुखनाकेँ कहलक- “बौआ, पहि‍न पएर-हाथ धो कऽ सि‍रा आगूमे गोड़ लागह। तखन ि‍कछु करि‍हह।” भुखना सएह केलक। श्‍यामा सेहो घैलची लग जा घैला झुका एक चुरूक पानि‍ नि‍च्‍चॉं खसा ओहि‍मे दुनू पाएरक तरबा भीजा ओसारेपर सँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलक। सौँसे अंगना धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ कच-बच करैत। छोटका बच्‍चा सभ फुटे कॉंइ-ि‍कचीड़ करैत रहै। तहि‍ बीच जुगेसराक बेटा रवि‍याक बेटाकेँ पाछुसँ पोनमे ि‍बठुआ काटि‍ दोगे-दोग घुसुि‍क गेल। छि‍लमि‍ला कऽ रवि‍याक बेटा पाछु तकलक तँ शि‍बुआक बेटीकेँ देखलक। ओहि‍ छौँड़ाकेँ भेले जे यएह छौँड़ी ि‍बठुआ कटलक। हॉंइ-हॉंइ कऽ दू मुक्‍का लगा देलक। मुक्‍का लगि‍ते शि‍वुआक बेटी चि‍चि‍आ कऽ कानए लागलि‍। शि‍वुआक घरवाली सेहो पछवारि‍ कात ठाढ़ छलि‍। बेटीकेँ कनैत देखि‍ कोरामे उठबैत पुछलक। ओ छौँड़ी रवि‍याक बेटा नाओ कहलक। ओकरो हड़लै ने फुड़लै ओहि‍ छौँड़ाकेँ कान ऐँठि‍ एक थापर लगा देलक। तहि‍ समए रवि‍याक घरवाली सेहो अबैत छलि‍। बेटाकेँ देखि‍ पुछलक। ओंगरीक इशारासँ छौँड़ा शि‍वुआक घरवालीकेँ देखा देलक। शि‍वुआक घरवालीकेँ देखवि‍तहि‍ रवि‍याक घरवाली लगमे जा झोंट पकड़ि‍ मुँहपर थूक फेि‍क देलक। सौँसे आंगन हड़-वि‍रड़ो मचि‍ गेल। छोटका धि‍या-पूता डरे पड़ाए लगल। तँ दोसर ि‍दस हल्‍ला सुनि‍ आन-आन अबौ लगल। दुखनीक बकारे बन्‍न। जहि‍ना-जहि‍ना शि‍वुआक घरवाली गारि‍ पढ़ै तहि‍ना-तहि‍ना रवि‍याक घरवाली उनटबैत जाए। ि‍कएक तँ स्‍त्रीगणक झगड़ाक वि‍शेषता होइत जे जे पाछु धरि‍ गरि‍आओत ओकर जीत होइत। अंगनाक दृश्‍य देखि‍ भुखनो आ श्‍यामो दुनूक बॉंहि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ ठेल-ठालि‍ कऽ अपना-अपना अंगना दऽ आइल। भगलाहा धि‍या-पूता सभ पुन: आबए लगल। जनि‍जाति‍यो आ धि‍यो-पूतोमे पाटी बनि‍ गेल। ि‍कछु गोटे ि‍शवुआक घरवालीक पक्ष लऽ आ ि‍कछु गोटे रवि‍याक घरवालीक पक्ष लऽ झगड़ाकेँ पुन: ठाढ़ केलक। एक दोसराक दोख लगवैत अपना पक्षकेँ नि‍र्दोष साबि‍त करए लगल। मुदा जहि‍ना पोखरि‍मे गोला फेकलापर पानि‍मे हि‍लकोर उठैत जे धीरे-धीरे शान्‍त भऽ जाइत तहि‍ना शान्‍त भऽ गेल। तत्-खनात तँ दुखनीक आंगन शान्‍त भऽ गेल। अंगनासँ बाहर रस्‍तो आ आनो-आनो जगहपर गुद-गुद-फुस-फुस होइते रहल। जहि‍ना कोनो गाम वा घरमे आगि‍ लगलापर पानि‍ देने मि‍झा जाइत मुदा आगि‍क गरमी रहबे करैत तहि‍ना भेल। आन सभ तँ आंगनसँ ि‍नकलि‍ गेल मुदा, दुखनीक मनक आगि‍ पजरि‍ गेल। बेटी श्‍यामा दि‍स देख जोर-जोरसँ बजए लागलि‍- “हम ककरो बजबैले गेल छेलि‍यै जे आबि‍ पावनि‍क दि‍न अंगनामे झगड़ा केलक। पावनि‍ ि‍क कोनो एक दि‍नक होइत अछि‍ आि‍क सालो भरि‍ले होइए। सालो भरि‍ अंगनामे झगड़ा होइते रहत ि‍क ने। तहूमे जे ि‍कयो डोरी बॉंटि‍ घरक पछुऐत बान्‍हि‍ देत तखन तँ आरो सालो भरि‍ झगड़ा होइते रहत कि‍ ने?” माइयक बोली बन्‍न करै दुआरे थोम-थाम लगबैत श्‍यामा कहलक- “अनेरे तूँ ि‍कअए आफन तोड़ै छेँ। तोरा अंगनामे छेबे के करौ जे साल भरि‍ झगड़ा हेतौ।” बेटीक बात सुि‍न दुखनी दम कसलक। मुदा तइओ मनमे आगि‍ लगले रहै। घरसँ वि‍छान नि‍कालि‍ श्‍यामा अंगनामे ि‍वछौलक। बि‍छा अपन मोटरी खोललक। एक धारा चाउर, सेर तीनि‍ऐक खेसारीक दालि‍, पॉंचटा दलि‍पूड़ी आ अपनो आ बच्‍चो सभक कपड़ा नि‍कालि‍ रखलक। पॉंचो पूड़ीमे सँ दूटा भुखनाकेँ एकटा कऽ सरस-नि‍रस तोड़ि‍ दुनू बच्‍चाक हाथमे देलक। एकटा अपना लेल आ एकटा माए लेल फुटा कऽ रखलक। बैग खोलि‍ भुखना रूपैयाक गड्डी नि‍कालि‍ माएकेँ कहलक- “माए, यएह कमा कऽ अनलि‍यौ।” रूपैया देखि‍ माइयो आ बहीनो बाजलि‍- “झॉंपह, झब दऽ झॉंपह नै तँ लोक देखि‍ लेतह।” रूपैया झाँपि‍ भुखना दू जोड़ साड़ी आंङी आ सायाक कपड़ाक संग दुनू बच्‍चा लेल शर्ट-पेन्‍ट नि‍कालि‍ आगूमे रखलक। कपड़ा देखि‍ दुखनी ि‍वस्‍मि‍त भऽ गेलि‍। मने-मन सोचए लागलि‍। जे ढहलेलो अछि‍ तइओ तँ बेटे धन छी। मन पड़लै पति‍। भगवान ककरो अधला करै छथि‍न। मने-मन गोड़ लगलकनि‍। अही दुनू बेटा-बेटीक आशापर ने अपन वएस गमा कऽ रहलौं। संतोखे गाछमे ने मेवा फड़ै छै। माएकेँ वि‍स्‍मि‍त देखि‍ भुखना वि‍स्‍कुटक ि‍डब्‍बा नि‍कालि‍ माएक हाथमे दैत कहलक- “माए, ई मक्‍खनबला ि‍वस्‍कुट छी तोड़ेले अनलि‍यौहेँ।” हाथमे वि‍स्‍कुटक डब्‍बा लऽ उनटा-पुनटा कऽ देखए लगली। दुनू बच्‍चो आ श्‍यामोक नजरि‍ डि‍ब्‍बापर अँटकि‍ गेल। तहि‍ बीच देहमे लगबैबला दूटा गमकौआ साबुन, दूटा कपड़ाक साबुन पौवाही नारि‍यल तेलक डि‍ब्‍बा, नि‍कालि‍ दुखनीक आगूमे रखलक। चीज बौस देखि‍ दुखनी मन उधि‍या गेलै। मनमे हुअए लगलै जे अकासमे उड़ि‍ गेलहुँ आि‍क नरकसँ सरग (स्‍वर्ग) चलि‍ गेलहुँ आि‍क सपना देखै छी। अपनाकेँ संयत करैत बाजलि‍- “पावनि‍क दि‍न छी, पहि‍ने सभ ि‍कयो खा लइ जाइ जाह। हम अखैन नै खाएव। दि‍नो खटि‍आइये गेल अछि‍ कनी कालमे सॉंझ-बॉंती दइये कऽ खाएव।” फेर मनमे एलै जे गोसॉंइ डूबैपर अछि‍ अखन धरि‍ पावनि‍क तँ कोनो ओरि‍यान भेवे ने कएल अछि‍। ने उक बनबैले खढ़-संठी अनलौं आने दि‍आरी बनेलौंहेँ। ने दि‍यारीक टेमी बनवैले साफ सुती कपड़ा तकलौंहेँ आ ने दोकानसँ तेले अनलौंहेँ। तहूमे दुनू भाए-बहीन आइल अछि‍ दुइओटा तीमन-तरकारी नहि‍ करब से केहन हएत। एक तँ लछमी पावनि‍ तहूमे एते दि‍नपर छौँड़ा आएल अछि‍। पूड़ी खा पानि‍ पीबि‍ श्‍यामा माएकेँ कहलक- “चि‍कनी माटि‍ सानि‍ कऽ दि‍आरी बना लइ छी। तूँ दोकानक काज झब दऽ केने आ नै तँ ि‍करि‍ण डूबलापर दोकानोक काज नइ हेतौ। ओहो पूजा-पाठमे लगि‍ जाएत।” बेटीक बात सुि‍न दुखनी बाजलि‍- “ऑंइ गै दैया दोकान-दौड़ीक काजमे ओझरा जाएव तँ खढ़-संठी कखैन आनि‍ उक बनाएव?” काजक भरमार देखि‍ भुखना माएकेँ कहलक- “तोँ दोसरे काज कर हम दाेकानक काज कऽ लैत छी।” बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- “अनठि‍या बुझि‍ दोकानबला ठकि‍ लेतौ।” माइक बात सुि‍न भुखनाकेँ हँसी लागल। मने-मन सोचए लगल जे शहर-बजार घुमै छी हम आ गामक बनि‍यॉं ठकि‍ लेत हमरे। मुदा ि‍कछु बाजल नहि‍। माएकेँ रोकैत श्‍यामा कहलक- “आब जे ककरो अइठीन खढ़-संठी मांगए जेबही से देतौ। लछमी पूजाक बेरि‍ भऽ गेलै। काल्‍हि‍ये ि‍कअए ने मांगि‍ अनलेँ। नइ तँ आइये दुपहर से पहि‍ने मांगि‍ अनि‍ते। आब लेाक अपन-अपन चीज-बौस समेटि‍ घर आनत आि‍क तोरा खढ़-संठी देतौ।” बेटीक बात सुि‍न दुखनी नि‍राश भऽ गेलि‍। उकक आशा टुटि‍ गेलइ। बाजलि‍- “हम तँ बूढ़ि‍ भेलौं। आब ि‍क कोनो पावनि‍-ति‍हारक ठेकान रहैए।” माइक टूटल आशा देखि‍ श्‍यामा सम्‍हारैत बाजलि‍- “खढ़-संठी छोड़ि‍ देही। उक नै हएत तँ ि‍क हेतै। गोसॉंइ बाबाकेँ कहि‍ देबनि‍ जे एते ति‍रोट भऽ गेल। नै पान ते पानक डंटि‍ये से तँ पूजा करबे केलौं।” सामंजस्‍य करैत दुखनी- “अच्‍छा हो-अ। खढ़-संठी छोड़ि‍ दइ छि‍यै। तूँ चि‍कनी माटि‍क दि‍आरी बनाले। कनी रूखे कऽ माटि‍ सनि‍हेँ। नइ तँ आब नै सुखतौ। दि‍नो खटि‍आइये गेल। रौदो ठंढ़ा गेल। दोकानेक काज केने अबै छी।” तहि‍ बीच भुखना कहलक- “तूँ अंगनेक काज सम्‍हार। दोकानक काज केने अबै छी।” बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- “ऑंइ रौ, शुभ-शुभ कऽ तूँ गाम एलेहेँ, तोरा कन्‍ना दोकान जाए ि‍दऔ। लोक की कहत?” “लोक की कहतौ?” “एतबो ने बुझै छीही जे सभ खि‍धांस करए लगत जे फलनीक खापड़ि‍ केहेन तबधल छै जे अखने बेटा परदेशसँ एलै आ बेसाह अनैले दोकान पठौलक।” “कोइ ने ि‍कछु बाजत। कोनो अनकर काज छि‍यै जे ि‍कयो ि‍कछु बाजत। बाज कथी सबहक काज छौ?” “एक रूपैया कऽ नून, दू गो तीमनो-तरकारी करब तेँ पॉंच रूपैयाक करू तेल सेहो लऽ लि‍हेँ। आठ अन्‍नाक जीर-मरीच, आठ अन्‍नाक हरदी आ आठ आनाक मि‍रचाइ सेहो लऽ लि‍हेँ। अल्‍लुओ घरमे नहि‍ये अछि‍। तरैबला अल्‍लू सेहो लऽ लि‍हेँ। दूटा पापड़ो लऽ लि‍हेँ। आइ लछमी पूजा सेहो छी तेँ आठ अन्‍नाक मखान आ आठ अन्‍नाक चि‍न्‍नि‍यो लइये लि‍हेँ। भरि‍ राति‍ डि‍बि‍या जरत तइले मट्टि‍यो तेल कनी बेसि‍ये कऽ लऽ लि‍हेँ।” “आउरो ि‍कछु?” मन पाड़ि‍ दुखनी बाजल- “आब तँ लोक धुमनक धूपो देनाइ छोड़ि‍ये देलक तेँ एकटा धुपकाठीक डि‍ब्‍बा सेहो लइये लि‍हेँ।” श्‍यामा ि‍दआरी बनवैले ि‍चक्‍कनि‍ माटि लोढ़ीसँ फोड़ए लगलीह। भुखना दोकान वि‍दा भेल। दुखनीक मन असथि‍र भेल। मन असथि‍र होइते बेटीकेँ कहलक- “बुच्‍ची, हम नहाइले जाइ छी। ि‍करि‍णो लुकझुकाइये गेल।” श्‍यामा- “बौआ जे साड़ी अनलकौ सएह लऽ ले।” बेटीक बात सुि‍न दुखनी हरा गेलि‍। मनमे नचए लगलै बेटाक कीनल पहि‍ल साड़ी। जहि‍यासँ अपने मुइलाह तहि‍यासँ कहि‍यो नव साड़ीक नसीव नहि‍ भेलि‍। ओना बेटी अपन पहि‍रल साड़ी साले-साल दइते रहल तेँ कहि‍यो कपड़ाक दुख नहि‍ये भेलि‍। रोडे ि‍कनछरि‍मे गारल सरकारी कलपर दुखनी पहुँचल। कलपर पहुँचते मन पड़लै। साड़ी-लोटा कलेपर रखि‍ चोट्टे घुि‍र कऽ आंगन आबि‍ बेटीकेँ कहलक- “दाय, एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। ि‍बसरि‍ जाइतौं तेँ कहैले एलि‍यौ।” अकचकाइत श्‍यामा पुछलक- “कोन बात मन पड़लौ?” दुखनी- “बच्‍चा जे दोकानसँ औत तँ कहि‍ दि‍हैन जे अगि‍ला चौमास बि‍करी अछि‍। दुइये कट्ठा छइहो। से कीनि‍ लेत। हमरा ने एक्कोटा घरसँ काज चलैत अछि‍ मुदा, नइ अइ साल तँ अगि‍लाे साल ि‍वआह कइये देवइ। बाल-बच्‍चा हेतै। लघि‍यो करैले कतऽ जेतै। लोक बढ़ने मालो-जाल पोसबे करत। से कतऽ बान्‍हत।” श्‍यामा- “अच्‍छा जो, पहि‍ने नहाले। बौआ दोकानसँ औत तँ मन पाड़ि‍ देबौ।” जीवन संघर्ष- 4 आइ धरि‍क इति‍हासमे बँसपुराक ऐहन रूप कहि‍यो नहि‍ बनल छल जेहन आइ देखि‍ पड़ैछ। ओना ि‍कछु अनुभवी बूढ़-पुरान लोकनि‍क कहब छनि‍ जे आजुक बँसपुरा दोबरा कऽ बसल गाम छी। हुनका लोकनि‍क कथनानुसार करीब साठि‍-सत्तरि‍ बर्ख पहि‍ने एहि‍ गाममे कोसी प्रवेश केलक। तहि‍सँ पहि‍ने जे गाम छल ओकर रूप-रेखा दोसर तरहक छलैक। आजुक जे मुख्‍य बस्‍ती अछि‍ ओ पहि‍ने बाध छलै आ जे बस्‍ती रहै ओ अखन बाध बनि‍ गेल अछि‍। जेकर अनेको परमान अखनो भेटैत अछि‍। अखनो बाधमे कतौ-कतौ पि‍त्तरि‍ आ तामक बरतन भेटि‍ जाइत अछि‍। पहि‍लुका बस्‍तीमे गाछी-वि‍रछी भरपुर छलैक। मुदा अखुनका जेकॉं ने एते लोक छलैक आ ने एते परि‍वार। जखन पहि‍ल बेर कोसीक बाढ़ि‍ आइल तँ लोककेँ वि‍सवासे ने होय जे कोसीक पानि‍ छी। मुदा ि‍कछु अनुभवी लोक पानि‍क रंग देखि‍ परेखि‍ लेलनि‍। ि‍कऐक तँ कमला पानि‍ जेकॉं घोर-मट्ठा माने मटि‍आइल पानि‍ नहि‍ रहैक। पॉंकक कोनो दरसे नहि‍ रहैक। पहि‍ल साल एतबेपर रहि‍ गेलैक। एक तोड़ बाढ़ि‍ आएल आ दस-बारह दि‍नक उपरान्‍त सटकि‍ गेलै। दोहरा कऽ नहि‍ आएल। दोसर साल जे बाढ़ि‍ आएल ओ छोटकी धार -नासी- जेकॉं गामक बीचो-बीच बना देलक। ओहि‍ साल गामक लोककेँ ई आभास नहि‍ भेलैक जे ऐना धार गाममे बनि‍ जाएत। जहि‍सँ सभ गामेमे रहल। बाधक उँचका जमीनमे घर बना लेलक। कोना नहि‍ बनबैत? एक तँ पुस्‍तैनी गामक सि‍नेह आ अपन सम्‍पति‍यो तँ छलैक। छह मासक उपरान्‍त धार सुखि‍ गेल। मुदा उपजो-बाड़ी आ गाछो-ि‍बरीछ अधा-छि‍धा भऽ गेलैक। ि‍कछु गोटेक मालो-जाल नष्‍ट भेलैक। अनरनेबा, धात्री, लताम, कटहर इत्‍यादि‍क गाछ उपटि‍ गेलै। दूटा पोखरि‍ आ पॉंचटा इनार धारक पेटमे समा गेलै। जहि‍सँ लोकक मनमे डर पैइसए लगलैक। गामक माटि‍-पानि‍क सि‍नेह सेहो कम हुअए लगलैक। ि‍बसवासू जि‍नगी अनि‍ि‍श्‍चतता दि‍स बढ़ए लगलैक। ि‍कछु गोटे आन गाम जा बसैक बात सोचए लगल। मुदा जेकरा खेत-पथार रहै ओ करेजपर पाथर रखि‍ रहैले मजबूर भऽ गेल। तेसरा साल बाढ़ि‍ सभसँ भयंकर रूपमे आएल। जहि‍सँ गामक खेतो-पथारक रूप नष्‍ट भऽ गेलैक, गाछो-ि‍बरीछ नष्‍ट भऽ गेलैक आ लोकोक जान अबग्रहमे फँसि‍ गेलैक। छातीमे मुक्‍का मारि‍ सभ गाम छोड़ि‍ देलक। सन्‍मुख कोसी गाम होइत बहए लगल। तीस बर्ख, एक रफ्तारमे कोसी बँसपुरा होइत बहैत रहल। गामक सभ आन-आन गाम जा बोनि‍हार बनि‍ गेल। अधि‍कतर लोक नेपाल पकड़ि‍ लेलक। जेकरा-जत्तै जीवैक गर लगलै ओ ओत्तै रहए लगल। जाधरि‍ लोककेँ अपन पूँजी रहैत छैक ताधरि‍ ने ि‍कसान वा कारोबारी रहैत अछि‍। मुदा पूँजी नष्‍ट भेने तँ खाली-हाथ बँचि‍ जाइत छैक। बँसपुराक सभ बोनि‍हार बनि‍ गेल। गामक, कोसी ऐलासँ पूर्वक, सामाजि‍क संबंध रॉंइ-बॉंइ भऽ गेलैक। पहि‍लुका समाज नष्‍ट भऽ गेलैक। बँसपुराक सभ सुख लोक ि‍वसरि‍ गेल। मातृभूि‍म ककरा कहै छै से बँसपुराक लोकक लेल परि‍भाषे मेटा गेलैक। ि‍कएक तँ मातृभूमि‍ आ दुनि‍यॉंमे की अन्‍तर छैक? जँ जन्‍मभूमि‍केँ मातृभूमि‍ मानल जाए तँ मातृभूमि‍ये नष्‍ट भऽ गेलैक। जे सभ बँसपुरामे जन्‍म नेने छल ओ आन-आन गाममे रहि‍ रहल अछि‍। जँ कहि‍यो फेरि‍ बँसपुरा जगतै तँ ओ फेरि‍ आबि‍ देखत ि‍क नहि‍। तहि‍ना जे घुरि‍ कऽ आओत ओ सभ तँ आने-आने ठाम जन्‍म नेने अछि‍। तहन ओकर मातृभूि‍म कोन भेलै। जँ देशकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए तँ देशो वि‍भाजि‍त भऽ जाइ छैक। जे दू नाम धारण कऽ लइत अछि‍। तहन तँ देशोकेँ कोना मातृभूमि‍ मानल जाए। जँ से नहि‍, जहि‍ धरतीपर लोक जन्‍म लइत अछि‍ ओकरा मानल जाए तँ दुनि‍यॉंक जते देश अछि‍ सभ धरति‍येपर अछि‍। तहन ि‍कअए मातृभूि‍मकेँ छोट आकारमे मानैत छी। ि‍कऐक ने दुनि‍यॉंकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए? कोसीक धार हटलापर जहन बँसपुरा जागल तँ रूपे बदलि‍ गेल छलैक। मुलायम माटि‍ बालु भऽ गेलैक। गाछ-वि‍रीछक जगह काश-पटेर, झौआ लऽ लेलक। अपन पुस्‍तैनी गाम बुझि‍ पुन: लोक सभ आबए लगल। ने ककरो जमीनक सबूत, खति‍आन, दस्‍तावेज इत्‍यादि‍, रहलै आ ने जमीनक ठौर-ठेकान। मुदा गाम तँ हेतैक। जहि‍ना अदौमे माने साबि‍कमे जंगल-झाड़ तोड़ि‍ लोक वसो-वास आ उपजाउ भूि‍म बनौलक। रेन्‍ट-फि‍क्‍स कऽ सरकारो जमीनक अधि‍कार देलक। सएह गाम बँसपुरा छी। जहि‍ना कहि‍यो बँसपुरा पानि‍सँ दहा गेल छल तहि‍ना पानि‍क अभाव गाममे भऽ गेलैक। ने एकोटा पोखरि‍-इनार रहल आ ने बाढ़ि‍क पानि‍ अबैत। पोखरि‍-इनार खुनब छोड़ि‍ लोक कलसँ पानि‍क काज चलबए लगल। बरखा पानि‍सँ खेती हुअए लगलैक। चापी जमीनकेँ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ लोक पोखरि‍योक सेहन्‍ता मेटबए लगल। जहि‍मे माछ-मखान, सि‍ंगहार सेहो होइत अछि‍। ओहि‍ बँसपुरामे आइ दि‍वालि‍यो आ कालि‍यो पूजाक उत्‍साह लोकक रग-रगमे दौड़ि‍ रहल अछि‍। आन-आन गामसँ अबैबला देखि‍नि‍हार लेल चारू भागक रास्‍ताकेँ गौवॉं, अपन सीमा भरि‍, जते टूटल-टाटल छलै सभकेँ भरि‍-भरि‍ कऽ सहीट बना देलक। जतए कतौ बोन-झार छलै सभ काटि‍-खोंटि‍ साफ कऽ देलक। ओना सरकारो दि‍ससँ बान्‍ह-सड़कपर माटि‍ पड़ैत मुदा, दूधक डाढ़ी जेकॉं पड़ने बरसातमे भसि‍ये जाइत छलैक। जहि‍सँ जहि‍ना कऽ तहिना रहि‍ जाइत। मुदा एहि‍ बेरि‍ गौवॉं अपन सम्‍पत्ति‍ बुझि‍ नीक जेकॉं मरम्‍मत केलक। खाली बान्‍हे-सड़क टा धरि‍ नहि‍ गामक जते पानि‍ पीबैक साधन अछि‍ सबहक मरम्‍मत सेहो केलक। ओना बैसाख-जेठ जेकॉं देखि‍नि‍हार लोक थोड़े पानि‍ये पीति‍ मुदा, तइओ पानि‍ तँ पीवे करत गामक लेल सभसँ आश्‍चर्य ई भेल जे एकाएक सभ अपन जि‍म्‍मा कोना बुझलक। केवल पानि‍येक प्रबंध टा नहि‍ पाहुन-परकसँ लऽ कऽ हराएल-भौथि‍आइल देखि‍नि‍हारक लेल सेहो रहैक व्‍यवस्‍था केलक। जेकरा दुआर-दरबज्‍जा छै ओकर तँ कोनो बाते नहि‍, जेकरा नहि‍यो छैक ओहो सभ जोगार केलक। मोटका प्‍लास्‍टि‍क आनि‍-आनि‍ घरे जेकॉं बना लेलक। सबहक मनमे गद्गदी जे आबह कते पाहुन-परक अबैए। सुतैक लेल मोथीक ि‍बछान सेहो बेसि‍ये कऽ कीनि‍-कीनि‍ रखि‍ लेलक। अखन ने अनगौवॉंक लेल कीनलक मुदा, पूजाक पछाति‍ तँ अपने सुतबो करत आ अन्‍नो-पानि‍ सुखौत। ओना जे मेला देखए आओत ओ सुतत ि‍क मेला देखत। मुदा जे भरि‍ राति‍ मेला देखत ओ तँ दि‍नोमे सुतबे करत। रघुनाथोकेँ धन्‍यवाद दि‍यै जे खाइ-पीवैक समान- चाउर-दालि‍, तरकारीसँ लऽ कऽ जारनि‍-काठी धरि‍क तेहन कारोवार पसारि‍ देलक जे कतबो लोक कीनत-बेसाहत तइओ नहि‍ सठतै। एक्‍के मेलाक कमाइमे ओहो धनि‍क भऽ जाएत। हँ तँ पूँजि‍यो तँ वएह ने लगौने अछि‍। तेहेन ओकर बोहूक बोली मीठ छै जे एक्‍कोटा गहि‍कीकेँ थोड़े घूमए देत। सदि‍खन दोकानमे भीड़ लगले रहतै। कहबि‍यो छै ने जेकरा भगवान दइ छथि‍न छप्‍पर फॉंड़ि‍ कऽ दैत छथि‍न। भने दोकान घरेपर केने अछि‍। जँ मेलामे केने रहैत तँ गौवॉंकेँ घि‍नाष्‍ठे करैत, ि‍कएक तँ पाहुन-परकक सोझमे कोना लोक चाउर-दालि‍ कीनैत। मुदा, आश्‍चर्य भेल। बाप रे गाममे एते पाहुन-परक कोना उनटि‍ कऽ चलि‍ आएल। जना ककरो कोनो अपना काजे नहि‍ छैक। तहूमे मरदसँ तीन गुना स्‍त्रीगण आबि‍ गेल अछि‍। स्‍त्रीगणोमे वेसी ओहन अछि‍ जे पनरहसँ पच्‍चीस बर्खक अछि‍। सेहो एक मेलक माने चालि‍-ढालि‍क रहैत तब ने, चारि‍-पॉंच मेलक छै। कोना नै गामक हबामे खतरनाक कीड़ा फड़त। बम्‍वैइया सभ जे छै ओ सि‍र्फ‍ छौँड़े-माड़रि‍ टा केँ थोड़े धड़त, बुढ़ो-बुढ़ानुसकेँ धड़वे करत। जहि‍ना कोनाे अनठि‍या चि‍ड़ैकेँ गाममे अएलासँ गामक सभ देखए जाइत तहि‍ना ने बम्‍वैइयो चि‍ड़ैकेँ देखत। मुदा नहि‍यो देखत तँ अनुचि‍ते हएत ि‍क ने। आखि‍र ओहो ओहन रूप ि‍कअए बनौने अछि‍। लोके देखैले ि‍क ने। जँ से नहि‍ मनमे रहि‍तै तँ ऐहन पॉंखि‍ बनबैक काज कोन छलै। मनुक्‍ख तँ मनुक्‍ख छी की ने? तइले ऐहन हबा-ि‍मठाइ बनैक कोन जरूरत छैक। तहूमे जखन बनि‍ गेल आ लोक नहि‍ देखै तँ बनैक मोले ि‍क? मोल तँ तखने हेतै ि‍क ने जखन लोक ओकरा नि‍ङहारि‍-नि‍ङहाि‍र तर-उपर देखत। तेँ ि‍क ओकर चराओर गाम-देहातमे नै छै? जरूर छै। बम्‍वइये कलाकार सभ ने गामोक लेाककेँ ि‍सनेमाक माध्‍यमसँ सि‍खौलकैक हेँ। लोकक मनो अजीब छैक। जँ कनि‍यो उपर उड़त तँ बुझि‍ पड़ैत छैक जे जमीनक सभ ि‍कछु हम देखैत छी मुदा, हमरा ि‍कयो देखबे ने करैत अछि‍। तहि‍ना ने जमीनो परक केँ बुझि‍ पड़ै छैक। मुदा भ्रम तँ दुनूकेँ छैक। उपर उड़नि‍हार जँ जमीनक उपरका भाग देखैत अछि‍ तँ जमीनो परक ने ओकरा नि‍चला भाग देखैत अछि‍। चाि‍र बजैत-बजैत मेला देखि‍नाहारक भीड़ काली-स्‍थान उमड़ि‍ गेल। ओना बूढ़ि‍-बुढ़ानुस अपन-अपन घर-अंगनाक ओरि‍यानमे लागल। ि‍सरपर सूर्यास्‍त होइतहि‍ दीप जरौनाइसँ लऽ कऽ उक फेरि‍नाइ सबहक सि‍रपर छन्‍हि‍। मुदा आन गामसँ आएल लोककेँ कोन काज छन्‍हि‍ ओ तँ मेले देखैले आएल छथि‍। सभसँ खूबी तँ ई अछि‍ जे मेला देखि‍नि‍हारे मेला देखैक वस्‍तु बनि‍ गेल अछि‍। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक उपर जवावदेही-भार रहने सभ जी-जानसँ नि‍गरानीक संग-संग वेवस्‍थामे जुटल। सौँसे मेला पी-पाह होइत। ओना पूजाक प्रक्रि‍या नि‍शा राति‍मे शुरू हएत मुदा, ओरि‍यान तँ पहि‍नहि‍सँ करए पड़त। ऐहन नहि‍ ने जे एक दि‍स पूजा शुरू हएत दोसर दि‍स समान जुटले ने रहत। ऐहन नहि‍ ने जे पूजा काल जहि‍ वस्‍तुक जरूरत होय ओ अछि‍ये नहि‍। तेँ पुजेगरि‍यो आ पुरोहि‍तो अपन सभ वस्‍तु पुरजीसँ ि‍मला-मि‍ला सैंति‍-सैंति‍ रखैत। ओना मेलाक आनन्‍द तँ तखन होइत छैक जखन पूजा शुरू होइत अछि‍। नाचो-तमाशा तँ तखनेसँ ने शुरू होइत छैक। मुदा तइयो सोलहन्‍नी नहि‍ तँ अधो-छि‍धो मेलाक आकर्षण तँ बढ़ि‍ये गेल छैक। सभसँ अजीव तँ ई भऽ गेल अछि‍ जे दर्शक गजपट भऽ गेल अछि‍। तेहन ने बजारू रूप बनि गेल अछि‍ जे लड़का-लड़कीक भेदे मेटा गेल छै। चश्‍मा खोलि‍-खोलि‍ बूढ़-पुरान सभ ऑंखि‍ मलि‍-मलि‍ देखैत जे ई छौँड़ा छी ि‍क छौँड़ी। मुदा तइओ ऑंखि‍ ठीकसँ काजे नहि‍ कऽ रहल छन्‍हि‍। सभ अपन-अपन धुनि‍मे मस्‍त। तहि‍ बीच फटाक-फटाकक अवाज हुअए लगलै। फटाक-फटाकक अवाज सुनि‍ सबहक कान ठाढ़ भेल। जे जेतै रहै ओ ओतैसँ अवाज अकानए लगल। मुदा दोकान-दौड़ी तहि‍ ढंगसँ सजल रहै जे सोझा-सोझी अवाज नि‍कलबे नहि‍ करैत रहै। लगमे जे रहै ओ तँ अवाजो सुनै आ मारि‍यो होइत देखै। ि‍कछु लोक बाहरो दि‍शि‍ भगैत रहै आ ि‍कछु गोटे दौड़-दौड़ ऐबो करैत रहै। उत्तर दि‍ससँ देवन आ पछि‍मसँ मंगल दौड़ल आि‍व भीड़केँ चीड़ैत आगू पहुँचल। आगू पहुँचतहि‍ देखलक जे बीस-पच्‍चीस बर्खक दूटा छौँड़ा चेस्‍टरक दोकानक आगूमे मुक्‍का-मुक्‍की कऽ रहल छै। फांटि‍ देखि‍ दुनू देवनो आ मंगलो सहमि‍ गेल। मुदा तहि‍ बीच जोगि‍नदर दौड़ल आबि‍ दुनू हाथ धुमबैत दुनू छौँड़ाकेँ गट्टा पकड़ि‍ माि‍र छोड़ौलक। हल्‍लो शान्‍त भेलै। एकटा छौँड़ाकेँ देवन पुछलक- “बौआ, अखन पूजा-पाठक समए छै तखन तोँ ि‍कअए माि‍र केलह?” मुदा, जहि‍ छौँड़ाकेँ देवन पुछलक ओ ि‍कछु ि‍वशेष माि‍र खेने रहै। तेँ जाबत ि‍कछु बाजै-बाजै तहि‍सँ पहि‍नहि‍ दोसर बाजए लगल। ओहि‍ छौँड़ाकेँ चोहटैत जोगि‍नदर कहलक- “तूँ चुप रहह। पहि‍ने जेकरा पुछलि‍यै से बाजत।” मुदा जोगि‍नदरक बातक असि‍र एक्‍को पाइ ओहि‍ छौँड़ापर नहि‍ भेलैक। दुनू गामक पाहुन। तेँ ि‍वकट संकट समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच भऽ गेल। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे सभ पड़ि‍ गेल। अधि‍कतर लड़को आ लड़कि‍यो परदेशि‍या। तेँ मारि‍क डर ककरो हेबे ने करैत। लड़की सभ जोर दैत बाजलि‍- “ब्रेशि‍यरक दोकानपर लड़का सभकेँ अबैक कोन जरूरत छै। ई तँ स्‍त्रीगणक सौदा छी?” मुदा, लड़को सभ लड़कीक बात मानए लेल तैयार नहि‍। तेसर छौँड़ा बाजल- “लड़कीक उपयोगक वस्‍तु छी, एकर माने ई नै ने जे ऐकर जरूरत लड़का सभकेँ नहि‍ छैक।” “लड़काकेँ की जरूरत छै?” “अपनो परि‍वार छै आ ि‍हतो-अपेछि‍त तँ छइहे।” लड़का-लड़कीक बीचक गप्‍प गजपट होइत देखि‍ देवन कहलक- “अखन सभ शान्‍त होउ। मेलाक पछाति‍ एकर नि‍बटारा हएत। अखन सभ मेला देखू।” सूर्यास्‍तक समए। सूर्य तँ पूर्णरूपेण नहि‍ डूबल मुदा, नि‍च्‍चाँ उतड़ि‍ गेलासँ लोकक ऑंखि‍सँ ओझल भऽ गेल। गामक धि‍यो-पूतो आ चेतनो स्‍त्रीगण फुलडालीमे ि‍दआरी, सलाइ, अगरबत्ती आ खढ़क उक लऽ कऽ गामक जते देवस्‍थान अछि‍ सभ दि‍शि‍ धरोहि‍ लगि‍ गेल। ि‍कयो डि‍हवार स्‍थान दि‍स जाइत तँ ि‍कयो महादेव मंदि‍र दि‍स। ि‍कयो धर्मराजक गहबर दि‍स तँ ि‍कयो हनुमान जीक स्‍थान दि‍स। गाममे पॉंचेटा पुरना देवस्‍थान। छठम नबकामे काली स्‍थान बनल। ओना ठकुरवारी पहि‍ने व्‍यक्‍ति‍गत छल मुदा, महंथ जीक मुइलापर ओहो दसगरदे भऽ गेल। सभ स्‍थानमे दीप जरा, धुप दऽ सभ अपन-अपन आंगन आबि‍ घर-आंगनमे दीप जरबैत माल-जालक थैर, इनार, कलपर सेहो जरौलक। ि‍कछु गोटे कुम्‍हारक बनौल माटि‍क ि‍डबि‍या तँ ि‍कछु गोटे दवाइ पीलहा शीशी सबहक डि‍वि‍या बना सेहो जरौलक। सौँसे गाम इजोत जगमगा गेल। काली स्‍थानक चारू जेनरेटर चलए लगल। जहि‍सँ अन्‍हरि‍या रहि‍तहुँ इजोतसँ गाम दि‍ने जेकॉं भऽ गेल। ओना दि‍नमे मेघ जते उपर रहैत अछि‍ राति‍मे (अन्‍हार) नि‍च्‍चॉं उतड़ि‍ जाइत अछि‍। दि‍वाली पावनि‍सँ गाम नि‍चेन भऽ गेल। स्‍त्रीगण सभ भानस-भात करैमे लागि‍ गेलीह। समए पाबि‍ पुरूख सभ मेले दि‍ि‍श टहलि‍ गेलाह। मेलाक आकर्षण देखि‍ ि‍कनको घरपर अवैक मने नहि‍ होइत रहनि‍। मुदा भरि‍ राति‍ तँ नाच-तमाशा चलि‍ते रहत तेँ ि‍बना खेने-पीने रहबो कठि‍न बुझि‍ अपन-अपन घर-अंगनाक रास्‍ता धेलनि‍। काली-मंडपमे पुजेगरी पूजाक ओरि‍यानमे व्‍यस्‍त रहथि‍। मुजफ्फरपुरक जेहने नाटक तेहने मंचो बनल। ऐहन मंच, आइ धरि‍ एहि‍ इलाकाक लोक नहि‍ देखने रहथि‍। जेहने फइल स्‍टेज तेहने सुन्‍दर-सुन्‍दर रंगीन परदो लगौल गेल रहैक। तेहने ऊँचगरो। कतबो देखि‍नि‍हार रहत तइओ देखबे करत। अजीव ढंगसँ ि‍बजलीयो लगौल गेल रहैक। बजोक तेहने वेवसथा। मुजफ्फरपुरक मंचसँ कनि‍यो उन्‍नैस वृन्‍दावनक रासक नहि‍। मुदा दुनूमे अंतर साफ-साफ बुझि‍ पड़ैत रहैक। जेहने आधुनि‍कताक प्रदर्शन मुजफ्फरपुरक स्‍टेज करैत रहै तेहने प्राचीनताक वृन्‍दावनक मंच करैत रहै। कौव्‍वालीक मंच तँ ओते लहटगर नहि‍ बुझि‍ पड़ैत। मुदा मेल-फीमेलक दुनू स्‍टेज सटल रहने अपन आकर्षण बढ़ौने रहै। महि‍सोथाक मलि‍नि‍या नाचक मंच सभसँ दब। मात्र चारि‍-पॉंचटा चौकी नि‍च्‍चॉंमे जोड़ने आ चारि‍टा खूँटा गारि‍ उपरमे आल रंगक चनवा आ एकटा परदा मात्र लगल रहैक। मंच दब रहि‍तहुँ मलि‍नि‍या नाचक कलाकार सभक मनमे वि‍शेष उत्‍साह रहै जे सभकेँ उखाड़ि‍ देब। अोकरा सबहक मन गद्-गद् एहि‍ दुआरे रहै जे छुछे टीप-टापसँ सोझे काज चलै छै जे मौलि‍कता हमरा कलाकारमे अछि‍ से अनकामे नहि‍ छैक। संगहि‍ जते देखनि‍हार हमर अछि‍ ओते दोसराक नहि‍ छैक। जहि‍ना बजारमे अनेको दोकान रहि‍तहुँ सोना-चानी कीनि‍हार, सोने-चानीक दोकान पहुँचैैत, ि‍कताब कीनिनि‍हार ि‍कताबे दोकानपर पहुँचैत अछि‍ तहि‍ना ने नाचो-तमाशाक छैक। नअ बजैत-बजैत मंच सबहक आगू देखि‍नि‍हारक ठट्ठ पड़ए लगल। कोना नहि‍ पड़त? लगसँ देखब आ दूरसँ देखब मे सेहो अंतर होइ छै ि‍कने। मुदा समि‍ति‍क सदस्‍य सभ वि‍चारि‍ नेने रहै जे आगूमे अनगौवॉंकेँ बैसाइब। गौवॉं तँ ठाढ़ो-ठाढ़ पाछुओसँ देखि‍ सकैत अछि‍। तहूमे अनगौवॉंकेँ कोनो ठीके नहि‍ अछि‍ जे सभ दि‍न देखए ऐबे करत। मुदा गौवॉंक तँ अपन मेला छि‍यैक तेँ ऐबे करत। कलाकार सभ मेक-अप करबो नहि‍ केने रहै ि‍क देखि‍नि‍हार सभ पीकी मारब शुरू केलक। कोना नहि‍ मारत? लोक देखैले आएल ि‍क वैइसैले आइल अछि‍। कमसँ कम बजोबला सभ तँ मंचपर आबि‍ सम बान्‍हह। समो बन्‍हैमे एकाध घंटा लगवे ने करतै। पैसा लऽ कऽ आएल अछि‍ ि‍क कोनो मंगनी आएल अछि‍ जे समए ससरल जाइ छै आ अखन धरि‍ स्‍टेज खाली रखने अछि‍। जनसेवा दलक सदस्‍य सभ कखनो मंचपर जाए शान्‍त करैत तँ कखनो मर्द-स्‍त्रीगणक गजपट भीड़केँ सुढ़ि‍अबैत। चारू मंच बाजाक आवाजसँ गनगनाए लगल। देखि‍नि‍हारोक मन बाजाक धुनमे शरबत बनए लगल। ि‍कयो मने-मन गुनगुनाए लगल तँ ि‍कयो हाथक ओंगरीसँ पोनोपर आ ि‍कयो-ि‍कयो ठेहुनोपर ताल मि‍लबए लगल। पूबसँ एक चि‍ड़की मेघ–-बादल- पुरबा हवाकेँ संग केने उठल। हवाकेँ उठि‍ते देखि‍नि‍हारक औल-बौल मन शान्‍त हुअए लगल। धीरे-धीरे हवो तेज होइत गेल। करि‍या मेघ सेहो नमहर हुअए लगल। एकाएकी तरेगण डूबए लगल। जहि‍ना-जहि‍ना बादल पसरैत तहि‍ना-तहि‍ना हवो तेज हुअए लगल। काली-मंडपमे पुजेगरी घड़ी देखि‍-देखि‍ पूजाक प्रक्रि‍याकेँ आगू बढ़बए लगलाह। माए-बहीनि‍ गीति‍ शुरू केलनि‍। जोरसँ मेघ बोली देलक। हवो ि‍बहाड़ि‍क रूप पकड़ए लगल। बुन्‍दा-बुन्‍दी पानि‍ पड़ए लगल। मुदा पानि‍क शंका ककरो मनमे नहि‍। ि‍कऐक तँ रौदि‍याह समए रहने सभ नि‍श्‍चि‍न्‍त जे एहि‍बेर मेघमे पानि‍ये नहि‍ छैक जे बरि‍सत। तहूमे जँ शुभ काजमे बुन्‍दा-बुन्‍दी हुअए तँ ओ आरो शुभ छी। तेँ सबहक मन खुशी। मुदा पानि‍क बुन्‍नसँ मंचक आगूमे बैसल देखि‍नि‍हार एका-एकी उठए लगल। तड़तड़ा कऽ बड़खा शुरू भेल। ि‍बजलोका सेहो तड़ाक-तड़ाक छि‍टकए लगल। जते ि‍वजलोका छि‍टकै तते मेघो गरजए लगल। गामक लोक घर दि‍सक रास्‍ता धेलक। मुदा अनगौवॉं असमंजसमे पड़ि‍ गेल जे आब भीजबे करब। मुदा ि‍बहाड़ि‍ तँ जान नहि‍ छोड़त। हाि‍र कऽ अनगौवॉं स्‍टेजक उपरो आ तरोमे पहुँच पानि‍सँ बचैक गर अंटबए लगल। इंजन ि‍बगड़ै दुआरे जेनरेटरबला जेनरेटर बन्‍न कऽ देलक। सौँसे मेला अन्‍हार पसरि‍ गेल। जहि‍ना पानि‍ तहि‍ना ि‍बहाड़ि‍ अपन भीमकाय रूप बना नाचए लगल। सौँसे मेला ‘साहोर-साहोरक’ आवाज हुअए लगल। मुदा सुनैले ने ि‍बहाड़ि‍ तैयार आ ने बरखा। ि‍बहारि‍ तँ उड़ि‍ कऽ पड़ा गेल मुदा, मुसलाधार बरखा सवा घंटा धरि‍ होइते रहल। दोकान सबहक छप्‍पड़ उड़ने सभ समान तीति‍-भीजि‍ गेल। उड़बो कएल। ककराकेँ देखत। सभ अपने जान बँचवै पाछु लागल। तहि‍ काल एकटा स्‍टेज दि‍ससँ कनै-कुहरैक अवाज उठए लगल। तते लोक स्‍टेजक उपर चढ़ि‍ गेल जे बल्‍ले सभ टूटि‍ गेल जहि‍सँ खसि‍ पड़ल। स्‍टेजक नि‍च्‍चॉं जे लोक सभ बैसल रहै ओकरा उपरेमे उपरका खसल। ककरा की भेलै से तँ अन्‍हारमे देखि‍ नहि‍ पड़ैत मुदा, कानै-कुहड़ैक आवाज टा सुनि‍ पड़ै। छबेटा ि‍सपाही डयूटीमे रहै। वएह बेचारा की करत। ककरा दोख लगाएत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य आ ि‍सपाही ि‍मलि‍ गर लगौलक। देवन आ जोगि‍नदर राती-राती पड़ा गेल। खेला-पीलाक उपरान्‍त सजना ि‍पता दुनि‍यॉंलालकेँ कहलक- “बाउ, पॉंच ि‍दनक मेला छै। एक दि‍ना रहैत तखैन ने देखैक धड़कफड़ि‍यो रहैत। से तँ नै अछि‍। सोलहो आना घर-अांगन छोड़ि‍ जाएबो उचि‍त नै। ि‍कएक तँ जते लोक मेला देखए औत ओ सभ ि‍क कोनो मेलेटा देखए औत। ि‍कयो छौँड़ा-छौँड़ीक खेल करए औत, ि‍कयो चाेरी-चपाटी करए औत। के की करए औत से के कहलक। तेँ अखैन हम दुनू परानी जाइ छी आ अधरति‍यामे आबि‍ तोरा उठा देवह। तखन तूँ जइहह।” सजनाक बात दुनि‍यॉंलालकेँ जँचल। मने-मन मानि‍ लेलक। मुदा माए -तेतरी- बाजलि‍- “राति‍-बि‍राति‍केँ देखए हम नै जाएव। साँझू पहरकेँ जाएव। काली-महरानीकेँ सॉंझो दऽ देवनि‍ आ गोड़ो लागि‍ लेबनि‍।” माएक बात सुि‍न सजना ि‍कछु बाजल नहि‍। मेला देखए वि‍दा भेलि‍। ि‍कछु कालक बाद सजनाक पत्‍नी -सि‍ति‍या- सेहो स्‍त्रीगणक संग गेलि‍। पानि‍-बि‍हाड़ि‍ उठि‍तहि‍ सजना भागल। मुदा तइओ घर लग अबैत-अबैत नीक जेकॉं भीजि‍ गेल। अंगनाक पानि‍ जे नि‍कलैत रहैत तहि‍ठाम डेढ़ि‍या लग आबि‍ पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍ पड़ल। सौँसे देह थालो लगि‍ गेलै आ ठेहुनमे चोटो लगलै। मुदा हूवा कए कऽ उठि‍ ओहि‍ पानि‍मे थाल धाेय आंगन आएल। अखन धरि‍ ने दुनि‍यॉंलाल सुतल छलै आ ने तेतरी। ि‍कऐक तँ हवा देखि‍ तेतरी चुल्‍हि‍ आ मालक घरक घूरक आगि‍ ि‍मझा ओछाइनपर आइले छलि‍। हवाक रूखि‍ देखि‍ दुनि‍यॉंलाल पत्‍नीकेँ कहलक- “तेहन हवा अछि‍ जे भरि‍सक घरो ने ठाढ़ रहत। तहूमे एक्‍कोटा खूँटा लकड़ीक नै अछि‍। सभटा बॉंसक अछि‍। बड़ गलती भेलि‍ जे चारि‍ये टा खूँटा बदललौं। सभ खूँटाक जरि‍ सड़ि‍ गेल अछि‍।” तहि‍ बीच पछुऐतक तीनू पुरना खूँटा कड़कड़ा कऽ टुटि‍ गेलै। नवके खूँटा टा नहि‍ टुटलै। उत्तरबरि‍या-पूबरि‍या कोन लटैक गेलै। मुदा खसल नहि‍। जाड़सँ थरथराइत सजना ओसारपर आि‍ब माएकेँ कहलक- “माए, भीज गेलौं। जाड़ो होइए। कनी लूँगी आ चद्दैर नि‍कालि‍ दे?” घरेसँ माए कहलक- “भीजि‍लेहे धोतीक खूँटक पानि‍ गाड़ि‍ सौँसे देह पोछि‍ ले। लूँगी आ चद्दैर दइ छि‍औ।” हाथक ओंगरी सजनाक कठुआइल। मुदा तइओ कहुना-कहुना कऽ धोतीक पानि‍ गाड़ि‍, अंगा नि‍कालि‍ सौँसे देह पोछलक। तेतरी डि‍बि‍या लेसए लगली। मुदा सलाइ सि‍मसि‍ गेने बरबे ने कएल। अन्‍हारेमे हथोरि‍-हथोि‍र लूँगि‍यो आ चद्दैरि‍याे नि‍कालि‍ कऽ दैत बाजलि‍- “घूरो कऽ दैति‍यै से सलाइये ने बरैए। तोंही टा ऐलै आ कनि‍यॉं?” सजना- “कहॉं कतौ देखलि‍यै। पानि‍क दुआरे कतौ अटकि‍ गेल हेतौ।” दुनू गोटे गप-सप्‍प करि‍ते रहै ि‍क रूपलालक घर कड़कड़ा कऽ खसल। रूपलाल दुनि‍यॉंलालक छोट भाए। रूपलाल घरेमे रहै। दू-चारी घर। कोनि‍याबला नहि‍ रहै। घरक दुनू चारक ओलती माटि‍ पकड़ि‍ लेलक आ दुनूक मठौठ ठाढ़े रहलै। पँजराक दुनू टाट टुटि‍ कऽ लबि‍ दुनू भाग घेरने रहल। ओइ बीचमे रूपलाल दबकल ठाढ़ भेल। जान अबग्रहमे जीबन-मृत्‍युक बीच पड़ल रहै। खूब जोर-जोरसँ हल्‍ला करै मुदा, झॉंट-पानि‍क दुआरे ि‍कयो सुनवे ने करै। एक तँ झॉंट-पानि‍ दोसर बान्‍हल माने घेराएल आवाज। ि‍कछु कालक उपरान्‍त मुनेसरी, जे दोसर घरमे रहए, सुनलक। अवाज सुनि‍ते मुनेसरी केवार खोलि‍ अोसारपर आइलि‍ ि‍क ि‍बजलोकाक इजोतमे घर खसल देखलक। खसल घर देखि‍ते बेटोकेँ उठौलक। दुनू गोटे जोर-जोरसँ हल्‍ला करए लगल। मुनेसरीक अवाज सुि‍न दुनि‍यॉंलाल सजनाकेँ कहलक- “रौ सजना, रूपलालवाक घर खसि‍ पड़लै। दौड़ि‍ कऽ जो, देखही जे ि‍कयो दबेबो केलै?” जाड़सँ कठुआइल सजनाकेँ बरखामे नि‍कलैत अबूह लगै। मुदा की करत। मनमे द्वन्‍द्व सेहो उठि‍ गेलइ। एक ि‍दस पि‍त्तीक मोह तँ दोसर ि‍दस पि‍ति‍आइनि‍क बेवहारसँ कुपि‍त। मुदा ऐहन समएमे तँ जानक प्रश्‍न रहैक। दाेस्‍ती-दुसमनी तँ जीबैतमे रहै छैक। मन मसोसि‍ कऽ लुँगीक फॉंड़ बान्‍हि‍ नि‍कलल। हवो कमि‍ गेल रहै मुदा, बरखा होइते रहै। पाछुसँ दुनि‍यॉंलाल आ तेतरि‍यो गेल। रूपलालक दछि‍नबरि‍या घर खसल रहए। सजना पि‍ति‍आइनकेँ कहलक- “काकी, एकटा इजोत आ हँसुआ नेने आउ? जाबे नीक-नाहॉंति‍ देखि‍ नै लेब ताबे कन्‍ना ि‍कछु करबै।” हॉंसू नि‍कालि‍ कऽ दैत पि‍ति‍आइन बाजलि‍- “बौआ, चोरवत्ती तँ पि‍ति‍ये लग अछि‍।” हॉंसू लैत सजना जोरसँ बाजल- “कक्‍का हौ, कनी टार्चक इजोत दहक?” घरक तरसँ रूपलाल बाजल- “चोरबत्ती तँ सि‍रमे लग रखने छलौं। उ तँ ठाठक तरमे पड़ि‍ गेल अछि‍।” “चोटो-तोटो लगलहहेँ?” “नइ बौआ।” “अच्‍छा, तूँ चि‍न्‍ता नइ करह। हवो कम भेल आ बुन्‍नि‍यो पतड़ाएल जाइए।” सजनाकेँ बुझवैत दुनि‍यॉंलाल कहलक- “बौआ, घड़फड़ नै करह। (भावोसँ)- कनि‍यॉं डि‍बि‍या नेसू।” मुनेसरी डि‍बि‍या लेसि‍लक। इजोत होइते दुनि‍योलाल आ सजनो टाट हटबैक गर अँटबए लगल। ओलतीक खूँटा जे टुटि‍ कऽ कात भऽ गेल रहै आेकरा टाट देने घोसि‍यबैत कहलक- “कक्‍का, अइ दुनू टोनकेँ पकड़ि‍ दुनू ठाठमे सोंगर लगा दहक। जइसँ ठाठ ऐम्‍हर-ओम्‍हर नै डोलतह।” एकाएकी दुनू सोंगर दुनू ठाठमे रूपलाल लगौलक। सोंगर लगि‍ते सबहक मनमे खुशी एलै। सजनाकेँ दुनि‍यॉंलाल कहलक- “सौँसे टाट हटबैक जरूरत अखन नइ छौ। दोग जेकॉं बना पहि‍ने आदमीकेँ बचा, तखन बुझल जेतैक।” हॉंसूसँ तीनि‍-चारि‍टा टाटक बनहन काटि‍ सजना दोग जेकॉं बनौलक। दोग बनि‍ते रूपलाल बाजल- “बौआ, नि‍कलै जोकर भऽ गेल। तूँ दुनू हाथे दुनू ठाठकेँ पकड़ने रहह।” घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ दुनि‍यॉंलालक पएर पकड़ि‍ रूपलाल कनैत बजए लगल- “भैया, अपन सवांग दुनि‍यॉंमे सभसँ पैघ होइ छै। अखन जे तूँ दुनू बापूत नै रहि‍तह तँ घरेमे मरि‍ जैतौं।” शान्‍त्‍वना दैत दुनि‍यॉंलाल कहलक- “ऐना ढहलेल जेकॉं ि‍कअए बजै छेँ। अपन-वि‍रान लोक अपने बनबैए। तूँ तँ जानि‍ये कऽ छोट भाए छि‍येँ। समाज बड़ीटा होइ छै। गरीब लोक कोनो सुखे जीवैए। तखन तँ जाबे दुनि‍यॉंक दाना-पानी ि‍लखल रहै छै ताबे काहि‍यो काटि‍ कऽ जीवे करैए। मन थीर कर। जे होइ कऽ छलै से भेलै। थरथर ि‍कअए कपै छेँ।” मुदा दुनि‍यॉंलालक बातक असरि‍ दुनू परानी रूपलालपर नहि‍ये जेकॉं पड़ल। भीतरसँ करेज डोलैत। मनमे होय जे फेरि‍ ने घरक तरमे दवा कऽ मरि‍ जाय। आंगन डेरौन लगए लगलै। जना ि‍कछु झपटैत होय तहि‍ना बुझि‍ पड़ै। ि‍मरमि‍रा कऽ रूपलाल बाजल- “भैया, होइए जे सुति‍ रहब तँ फेरि‍ दोसरो घर खसि‍ पड़त।” दुनि‍यॉंलालक मनमे एलै जे भरि‍सक डरे ऐना होइ छै। मुदा तइओ बोल-भरोस दैत कहलकै- “घर तँ गि‍रमा-गि‍रि‍ए पड़लौ। आब ि‍क दोहरा कऽ खसतौ। जे घर बँचल छौ ओकर भीत केहेन मजगूत छै। उ थोड़े खसत। तहूमे झॉंटो-पानि‍ बन्ने भेल। नै तँ चल हमरे लग सुति‍हेँ। कनि‍यॉंकेँ पुछि‍ लहुन जे घरमे सुतब ि‍क अहूँकेँ डर होइए। जँ डर होइए तँ सजने माए लग सुति‍ रहब।” दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुि‍न रूपलाल बाजल- “भैया, सगरे देह झोल-झाल आ थाल-कादो लगि‍ गेल अछि‍। ओकरा पहि‍ने धुअए पड़त।” ओना सभकेँ थाल-कोदो लगल रहै। सभ ि‍कयो कलपर जा सगरे देह धोलक। कलपरसँ आबि‍ मुनेसरी घर बन्‍न केलक। दुनू माए-पूत तेतरीक संग आ रूपलाल दुनि‍यॉंलालक संग धेलक। पूबरि‍या घरमे दुनि‍यॉंलाल भुँइयेमे ओछाइन ओछौने रहए। चौकी नहि‍ रहैक। ओछाइनपर बैसि‍ सि‍रमा तरसँ चुनौटी नि‍कालि‍ रूपलालकेँ दैत कहलक- “पहि‍ने तमाकुल चुना।” सकरीकट तमाकुलक डॉंट ि‍बछैत रूपलाल बाजल- “भैया, आइ तँ मरि‍ गेल रहि‍तौं। जना हड़हड़ा कऽ घर खसल तना जँ ओछाइन छोड़ि‍ सतरकी नइ करि‍तौं तँ चाहे मरि‍ जइतौं नै तँ अंग-भंग भऽ गेल रहि‍तए। मुदा माए-बापक धर्मे कुशल कलेप नइ लागल। नइ तँ दुनि‍यॉं अन्‍हार भऽ जाइत।” रूपलालक वि‍चारकेँ अंकैत दुनि‍यॉंलाल उत्तर देलक- “ई देहे तँ कुम्‍हारक बनौल कॉंच बरतन जेकॉं अछि‍। जहि‍ना कँचका बरतन एक रत्ती धक्‍का लगने फुइट जाइत तहि‍ना ने देहो छी। मुदा से लोक वि‍सरि‍ दँति‍या कऽ पकड़ने रहैए। जँ ई बात सभ बुझि‍ जाए जे जि‍नगीक कोनो ठेकान नइ अछि‍ तखन अनेरे ि‍कअए झूठो-फूि‍स बजै छी आ अधलासँ अधला काजो करै छी। तेँ जतबे दि‍न जीवै छी ओतवे दि‍न इमानदारीसँ कमा कऽ पेटो भरी आ जहॉं धरि‍ भऽ सकै तहॉं धरि‍ अनको उपकार करि‍यै। यएह उपकार ने धर्मो छी आ मुइला बादोक जि‍नगी छी।” मुँह बॉंबि‍ रूपलाल पुछलक- “भैया, फेनोसँ एक बेर आरो कहक?” रूपलालक प्रश्‍न सुनि‍ दुनि‍यॉंलाल मने-मन सोचए लगल जे भरि‍सक एकरा ज्ञानक उदए भेल जा रहल छै। फेि‍र भेलै जे कोनो बेर पड़लापर एहि‍ना लोकक मनमे नीक वि‍चार जगै छै मुदा, लगले रूि‍क जाइ छै। बुझबैत बाजल- “बौआ, अगर जँ लोक ई बुझि‍ जाए जे अइ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। कखन छी कखन नै छी तइले ककरो बेजाए ि‍कअए करबै। जँ ई वि‍चार लोकक मनमे आि‍ब जाए आ ओइ हि‍साबसे अपन चालि सुधारि‍ लि‍अए ते ककरो अधला हेतइ। एक ते ओहि‍ना लोक‍ समस्‍या सभसे रेजानि‍स-रेजानि‍स रहैत अछि‍ तइपर से सदति‍काल लोको ि‍कछु नै ि‍कछु गड़बड़ करि‍ते रहै छै। कोना ि‍कयो कखनो चैनसे रहत। तोंही कह जे केहेन बढ़ि‍यॉं दुनू भॉंइ जखन जरमे छेलौं तखैन तोरा कोनो भार छेलौ। खाली संग मि‍लि‍ कमाइ छेलेँ। आि‍क नै? तखन भीने ि‍कअए भेलेँ। जखन भीन भेलेँ तखन जँ ि‍कछु कहि‍ति‍यौ ते कनि‍यॉं कहि‍तथुन जे भैया घर फुटबै छथि‍। तहूले झगड़ा होइतौ। तइसँ नीक ने जे भरमे-सरम मुँह बन्‍न केने रहलौं। तहूँ बात थोड़े सुनि‍तेँ। जे कनि‍यॉं कहि‍तथुन सएह मानि‍तेँ। ई की कोनो हमरे-तोरेमे होइये से ते नहि‍। सभकेँ यएह गति‍ छै।” पछबरि‍या घरमे तेतरी सुतैत। पूबरि‍या झटक भेने सौँसे ओसारो आ मुँह सोझे घरोमे पच-पच करैत। मुदा तइओ तेतरी चुल्‍हि‍क छौर छीटि‍ घरकेँ रूख बनौलक। जेठ रहि‍तो वेचारी मुँहसच्‍च मुदा, छोट रहि‍तो मुनेसरी मुँहजोर। सदि‍खन अपन बात दोसरपर चढ़ाइये कऽ रखैत। जहि‍सँ जखन कखनो दुनू दि‍यादि‍नीमे कोनो गप हाेय तँ मुनेसरी चोहटि‍ दइ। मुदा आइ बि‍लमे जाइत सॉंप जेकॉं मुनेसरीक मन सोझ भऽ गेल। जना सभ ताव मरि‍ गेल होय, तहि‍ना। हत्‍याराक खूनमे ताधरि‍ गरमी रहैत छैक जाधरि‍ फॉंसीपर नहि‍ लटकैत अछि‍। मुदा फॉंसीपर लटकि‍ते सवि‍तासँ सूर्यक उदए जेकॉं ज्ञानक उदए होइत अछि‍। तहि‍ना आइ मुनेसरि‍योकेँ भेलि‍। तेतरि‍येक ि‍वछानपर दुनू माए-पूत मुनेसरि‍यो सुतल। दुनि‍यॉंलालक बात सुि‍न रूपलाल गुम्‍म भऽ गेल। एक तँ दुनि‍यॉंलालक वि‍चार मनकेँ झकझोड़ि‍ देलकै तइपर सँ गि‍रल घरक सोग सेहो दबने रहए। कने काल गुम्‍म रहि‍ रूपलाल मूड़ी डोलबैत बाजल- “हँ, ई तँ सत्ते कहलह भैया।” अपन ि‍करदानीपर पचताइत देखि‍ दुनि‍यॉंलाल बाजल- “आब तोंही कह जे जखैन दुनू भॉंइ एकठाम छलौं तखन तोरा घरक कोनो भार छेलौ। जानि‍ये कऽ तँ गरीब घरमे जन्‍म भेल अछि‍। केहेन बढ़ि‍यॉं दुनू भॉंइ संगे बोनि‍-बुत्ता करै छलौं आ ि‍मलानसँ रहै छलौं। अपना कत्ते खेते अछि‍। लऽ दऽ कऽ सात-सात कट्ठा बाधमे आ घरारी छौ। जेकरा बीघा-बीघे छै ओकरो हजार टा भूर सदि‍काल फुटले रहै छै, जइसँ मन घोर-घोर भेल रहै छै। जेकरा नै छै ओ तँ सहजे भूरेमे घोसि‍आएल रहैत अछि‍।” दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुि‍न रूपलालक मन केरा भालरि‍ जेकॉं डोलए लगल। ढेरो प्रश्‍न मनमे उठए लगलै। बेबसीक स्‍वरमे बाजल- “की नीक की अधलाह से बुझवे ने करै छी। लोकक मुँहे जे सुनै छी से मानि‍ करै छी।” रूपलालक हारल मन देखि‍ दुनि‍यॉंलालक मन वि‍चारक रास्‍तापर अंटकि‍ गेल। मन हुअए लगलै जे कि‍ कहि‍अइ। एक दि‍स छोट भाइक ममता दबैत तँ दोसर दि‍स स्‍त्रीगणक झगड़ासँ मन अकच्‍छ रहए। ि‍बना ि‍कछु बजनहि‍ दयासँ भरल ऑंखि‍ रूपलालकेँ पढ़ए लगल। पछवरि‍या घरमे दुनू ि‍दयादि‍नी, एक वामा करे आ दोसर दहि‍ना करे पड़ल। बीचमे चीत गरे मुनेसरीक बेटा सुतल। दुनूक मनकेँ पानि‍-ि‍बहाड़ि‍क घटना दवने रहए। जइसँ नि‍न्‍न नि‍पत्ता रहए। अनायास मुनेसरीकेँ नैहरक एकटा घटना मन पड़लै। घटना मनमे अबि‍ते बाजलि‍- “तेसरॉं, हमरा नैहरमे एक गोरेक घर एहि‍ना ि‍बहाड़ि‍मे खसि‍ पड़लै। घरवारी घरेमे रहए। बेचाराकेँ चोटो खूब लगलै। डेनो टुटि‍ गेलै आ कपारो फुटि‍ गेलै। मुदा रहए कपारक जोरगर जे मरल नहि‍। कपारक घाव तँ छुटि‍ गेलै मुदा, डेन नै जुटलै। ओहि‍ना लर-लर करै छै। बड़ कष्‍ट बेचाराकेँ होइ छै। अपना खेत-पथार नै रहने बोनि‍ करै छलै। मुदा समांग खसने बोहुओ छोड़ि‍ कऽ पड़ा गेलै। हारि‍-थाि‍क कऽ बेचारा भीख मंगैए।” मुनेसरीक कथा सुनि‍ तेतरीक मनमे दया उपकलै। मुदा दुनूक मन आरो डरा गेल। जहिना‍ कठि‍आरीसँ घुमैत काल सभ ‘राम-राम सत है, सभको एही गति‍ है’। बजैत आंगन अबैत तहि‍ना तेतरि‍योकेँ नैहरक घटना मन पड़ल। बाजलि‍- “एक बेरि‍ हमरो नैहरमे बड़का बाढ़ि‍ आएल रहए। ऐहेन बाढ़ि‍ कहि‍यो ने देखि‍ने रहि‍यै। जलखै बेरि‍मे एक गोरे बजलै जे बाढ़ि‍ अबै छै। रोटी पकबैत रही। माए घास लऽ गेल रहए। रोटी पकाइलो ने भेलि‍ ि‍क घर लग पानि‍ चलि‍ आएल। चुल्‍हि‍ तरसँ उठि‍ बान्‍हपर गेलौं ि‍क देखलि‍यै जे चानी जेकॉं बाढ़ि‍ पीटने अबैए। धॉंइ-धॉंइ भीतघर सभ खसए लगलै। लुटना बाध गेल रहै। बाधेसँ दौगल आबि‍ घर पैसल। चाउरक कोठीमे लत्तामे बान्‍हि‍ कऽ रूपैया रखने रहए। कोठीसँ जहॉं रूपैया नि‍कालए लगल ि‍क देहेपर कोठी खसि‍ पड़लै। माटि‍क गोरा भीजि‍ कऽ ढील भऽ गेल रहए। कोठि‍ये तरमे लुटना पड़ि‍ गेल। तरेसँ हल्‍ला करए लगल। जाबे लोक सभ अबै-अबै ताबे घरो खसि‍ पड़लै। बेचारा तरेमे छटपटा कऽ मरि‍ गेल।” तेतरीक खि‍स्‍सा सुनि‍ मुनेसरी आरो डरा गेलि‍। दुनू दि‍यादि‍नीक देह थर-थर कपए लगलै। नीन आरो दूर चलि‍ गेलै। डरे दुनू ि‍बछानेपर एक करसँ दोसर कर लगले-लगले उनटए-पुनटए लगल। मुदा ि‍कछु बाजति‍ नहि‍। हारि‍ कऽ मुनेसरी बाजलि‍- “दीदी, हमरा डर होइए।” मुनेसरीक बात सुि‍न तेतरि‍यो समर्थन करैत बाजलि‍- “हँ, हए कनि‍यॉं, हमरो डर होइए। चलह पूबरि‍ये घर। जँ मरबो करब तँ सबतुर संगे मरब।” कहि‍ उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। मुनेसरि‍यो बेटाकेँ उठबए लगल। बेटो जगले। फुड़फुड़ा कऽ उठल। ि‍बछान समेटि‍ तेतरी पॉंजमे लेलक आ मुनेसरी बेटाकेँ कन्‍हा लगा पूबरि‍या ओसारपर पहुँचल। ओसारपर पहुँचते तेतरीक जोरसँ बाजलि‍- “कनी घर खोलू?” घरेसँ दुनि‍यॉंलाल पुछलक- “ि‍कअए? की भेल?” “ओइ घरमे डर होइए। अही घरमे सभ सुतब।” “अइ घरमे हम दुनू भॉंइ छी तखन अहॉं दुनू गोरे कन्‍ना सुतब?” “बेरि‍ बि‍पैत्ति‍मे ई सभ लोक नै बुझै छै। पहि‍ने घर खोलू।” फटक खोलि‍ रूपलाल अपन वि‍छान घुसकौलक। मोख लग डिबि‍या राखि‍ मुनेसरी ि‍वछान वि‍छौलक। तहि‍काल सि‍ताहल नढ़ि‍या जेकॉं सजनाक स्‍त्री सेहो अांगन पहुँचलि‍। एकटा बि‍छानपर दुनू भॉंइ दुनि‍यॉंलाल आ दोसर ि‍बछानपर दुनू ि‍दयादि‍नी तेतरी बच्‍चा संग सुतैक ओि‍रयान केलक। दुनि‍यॉंलाल ि‍सरमापर माथ रखि‍ पड़ि‍ रहल। आरो गोटे बैसि‍ले रहल। बच्‍चा सेहो सुति‍ रहल। दुनू परानी रूपलालक मनसँ डर हटबे ने करै। होइ जे फेि‍र ने देहेपर घर खसि‍ पड़ए। एक बेरि‍ बड़का भूमकम भेल। भूमकम तँ अढ़ाइये-तीन मि‍नट रहल, मुदा तेहि‍मे घर-द्वार गाछ-वि‍रीछकेँ तँ खसेबे केलक जे कते लोको दबा-दबा मरल। भूमकम तँ लगले समाप्‍त भऽ गेल मुदा, तीनि‍ दि‍न धरि‍ रहि‍-रहि‍ कते बेरि‍ धरती डोलल। तहि‍ना होइ जे बड़का झॉंट-ि‍बहाड़ि‍ ने चलि‍ गेल। मुदा कहीं छोटका सभ ने फेरि‍ घुि‍र-घुरि‍ अबै। तहूमे कोन ठेकान जँ छोटकेसँ बड़को चलि‍ आवए। तेँ दुनू गोटेक मन सशंकि‍त भेल रहए। तेतरीक मन सुतैक होय मुदा, सोचए जे पुरूख बैसल रहत आ हम कोना सुति‍ रहब। तहूमे ि‍डबि‍या जरि‍ते अछि‍। डि‍बि‍याे कन्‍ना मि‍झाएब? बेरि‍-वि‍पत्ति‍मे इजोते मदति‍गार होइत अछि‍। दुनि‍यॉंलालकेँ तमाकुल दैत रूपलाल कहलक- “भैया, आइ बुझि‍ पड़ल जे अपन सहोदर केहेन होइ छै?” ओछाइनपर सँ उठि‍ दुनि‍यॉंलाल आंगनमे थूक फेि‍क मुस्‍की दैत उत्तर देलक- “तखन भीन ि‍कअए भेलै? तोंही कह जे अपना दुनू गोरे सहोदर भॉंइ छी की ने। जखैन सहोदरमे ि‍मलान नै रहत तखन अान तँ आने छी। मनुक्‍खमे एते बुद्धि‍ होइ छै तखन ई गति‍ छै जे भाए-भाएमे दुसमनी भऽ जाइ छै। अगर जँ एहि‍ना सभ मनुक्‍खमे होय तखन ओहन मनुक्‍खसँ उपकारक कोन आशा। अइसँ नीक तँ गाइये-बड़द। जे दूधो दइए आ हरो बहैए।” दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुनि‍ रूपलाल उठि‍ कऽ आंगनमे थूक फेकि‍ कऽ आबि‍ बाजल- “भैया, धरमागती बात कहै छि‍अह। दुरागमनक पछाति‍ जे वि‍दागरी करबै पठौने रहह, ओइ दि‍नक बात कहै छि‍अह। अपनो सौस आ टोलोक मौगी सभ आबि‍ कऽ लगमे बैसलि‍। अपना बुझि‍ पड़ए जे जहि‍ना बि‍रदावनमे कृष्‍ण गोपी सबहक संग वैसि‍ कऽ गप-सप्‍प करैत छलाह तहि‍ना हमहूँ छी। एक मुहरी सभ स्‍त्रीगण कहए लागलि‍ जे अहॉंक भाए बड़ छनकट अछि‍। कतबो कमाएव तँ भाभन्‍स हुअए देत। अहॉं दुनू परानी कमाएव आ ओ कोशल करत। जखैन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखैन दुनू परानी जुआन छी कमाइ-खटाइ छी। अखैन नै ि‍कछु बना लेब तँ जखैन धि‍या-पूता हएत खरचा बढ़त तखैन कएल हएत। तेँ नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछु पचताएब।” रूपलालक बात सुि‍न दुनि‍यॉंलाल ठहाका मारि‍ हँसल। हँसैत ओछाइनपर सँ उठि‍ मुँहक तमाकुल आंगनमे फेि‍क कऽ आबि‍ बुझबैत बाजल- “कोइ जे तोरा ि‍कछु कहलकौ आ तू मानि‍ गेलेँ से अपन बुद्धि‍ कतए गेल छलौ। तू नै देखै छेलही जे दुनू भॉंइ संगे बोनि‍ करैले जाइ छलौं आ आंगनमे भौजाइ भरि‍ दि‍न अंगना-घरक काज सम्‍हारि‍ जरना-काठीक ओरि‍यान करै छेलखुन। तइपर एकटा नांगरि‍क घास-भूसा आ भानस-भात, खुऔनाइ-पि‍औनाइसँ लऽ कऽ बरतन-वासन धरि‍ मँजैत छेलखुन, से सभ अपना ऑंखि‍ये नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत बात की छलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही।” अपसोच कऽ मूड़ी डोलबैत रूपलाल मि‍रमि‍रा कऽ बाजल- “हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।” “अपने ऑंखि‍सँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि‍ पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत मानि‍ लेलही। एकरे कहै छै मौगि‍याही भॉंज। तोरे जेकॉं आनो-आन मौगि‍याही भॉंजमे पड़ि‍ कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि‍-कानि‍ बजैए से ि‍क कहै छै से बुझै छीही। ओ कहै छै जे जहि‍ना बाप-माइक घरारीपर हम कनै छी तहि‍ना बाप-दादाक घरारीपर घरबलाकेँ कनाएव। अरे एतबो ने बुझै छीही जे दुि‍नयॉंमे सभ कुछ मि‍लि‍ सकैए मुदा, सहोदर भाय नै मि‍लैत अछि‍। भाइयक खाति‍र लक्ष्‍मण स्‍त्री परि‍वार, समाज सभ छोड़ि‍ देलखि‍न मुदा, भाइयक संग अंति‍म समए धरि‍ रहलखि‍न। आइ तोरा के काज दइले ऐलौ। कनि‍यो जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरैले नइ छोड़ि‍ दैति‍यो। नै तँ झीकि‍-झॉंकि‍ कऽ ठाठ देहेपर खसा दैति‍यौ। नै मरि‍ते तँ हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।” नमहर सॉंस छोड़ैत रूपलाल ऑंखि‍ ि‍मड़ैत बाजल- “भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे सभ ठकि‍ लेलक।” “कान पाथि‍ कऽ सुनि‍ले। जहि‍ना मनुख सभसँ पैघ जीव अइ धरतीपर अछि‍, जे बड़का-बड़का चमत्‍कारी काजो करैत अछि‍ तहि‍ना छुतहरो अछि‍। देखबीही जे जेकरा कनी बुद्धि‍-अकील छै ओ सदति‍काल बुड़ि‍वक सभक कमाइ ठकि‍-ठकि‍ मौजसँ खाति‍ अछि‍। खेबे टा नै करैत अछि‍ ओकर बोहू-बेटीक संग कुत्ता-बि‍लाइ जेकॉं इज्‍जतो लुटैत अछि‍।” “भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीवि‍ते अछि‍।” पि‍ताक रूपमे अपनाकेँ पाबि‍ दुनि‍यॉंलालक हृदय पसीज गेल। बाजल- “बौआ, जे समए बीति‍ गेल ओ तँ बीति‍ गेल। ओ आब थोड़े घुमि‍ कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तहि‍ बीच जे समए अछि‍ ओ तँ बँचल अछि‍। हमरा तू मोजर देँ आकि‍ नै देँ मुदा, अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी ि‍क ने। अपन कमाइ खाइ छी अपने औरूदे जीवै छी। तइले दोसराक कोन आशा। अपन काज दुसैबला नइ करब। जँ ककरो नीक कएल नै हएत तँ अधले ि‍कअए करबै। तोरा प्रति‍ जे काज अछि‍ सएह ने करब।” “भैया, आब आेंघी पीपनीपर आबि‍ गेल। राति‍यो बेसी भऽ गेल। तोहूँ सुतह अा हमहूँ सुतै छी।” मुनेसरीक मन सेहो उनटैत-पुनटैत मुदा, थीर भइये ने पबैत। एक दि‍स अपन पैछला जि‍नगीक बाट टूटैत तँ दोसर दि‍स नव बाटक बोध नहि‍ रहने बोनाह बुझि‍ पड़ैत रहए। मुदा दुनि‍यॉंलालक वि‍चारसँ झलफलाएल बाट जरूर देखि‍ पड़ैत रहए। जहि‍सँ मनमे ि‍कछु बदलाव रहए। मनमे उठलै जे जँ नैहरक स्‍त्रीगणक नीक सि‍खौल रहैत तँ नीक होइत रहि‍ते। से तँ नहि‍ भेल। मोम जेकॉं मन पघि‍लए लगलै। मुदा कि‍छु बजैक साहसे ने होय। जहि‍ना मालती फुलक सुगंधसँ वि‍षधर सॉंप लत्तीमे लटपटा चेतना शून्‍य बनि‍ जाइत तहि‍ना मुनेसरि‍यो मन भऽ गेल। मने-मन गलती कबूल करैत तेतरीकेँ कहलक- “दीदी, ई सुतथु जॉंति‍ दइ छि‍यनि‍।” मुनेसरीक बातसँ तेतरीकेँ खौंझ उठल, बाजलि‍- “तोरा एक्‍को पाइ लाज-सरम नै छह जे जइ घरमे पुरूख-पात्र छथि‍ तइठाम तूँ जँतबह। एक तँ भगवान वि‍पत्ति‍ देलनि‍ जे सभ ि‍कयो एक घरमे सुतैले एलौं। डि‍बि‍या मि‍क्षा दहक जइसँ कने परदा भऽ जाएत आ तोहूँ सुति‍ रह-अ।” डि‍बि‍या मि‍झाएव सुनि‍ मुनेसरीक मन तत्-मत् करए लगल जे इजोतमे तँ देखबो करै छी अन्‍हारमे की हएत की नइ से देखबो ने करब। मुदा तइओ उठि‍ कऽ डि‍बि‍या मि‍झा कले-बल पड़ि‍ रहल। काल्‍हि‍ये -दि‍वालीसँ एक दि‍न- पूर्व ‍ओठर होइत देि‍ख‍ अनुप काली पूजाक हकार दि‍अए गेल। बहीनोक सासुर, अपनो सासुर आ मात्रि‍को एक्‍के डोि‍रमे। कने घुमौन रहि‍तो सोचलक जे पहि‍ने बहीन ऐठाम पहुँच हकारो दऽ देवै आ अवैयोले कहि‍ देबइ। मुदा ओइठीन अँटकब नहि‍। झलफल होइत-होइत सासुर चलि‍ जाएव। ओइठीन राति‍मे अटकि‍ जाएव। ि‍कऐक तँ अखनो बुढ़ि‍केँ छन्‍हि‍ जे कतबो धड़फड़ाएल रहब तइओ नहि‍ये आबए देतीह। काल्‍हि‍ भोर मात्रि‍क होइत चलि‍ आएव। छोड़ैबला एक्‍कोटा नइ अछि‍। एक तँ ओहुना बहीनक मनमे होइत हएत जे जाधरि‍ माए-बाप जीवैत छलाह ताधरि‍ ने नैहर छल मुदा, भाए-भौजाइ ककर होइ छै जे हम्‍मर हएत। मुदा हमर बात थोड़े बुझैत हएत जे दू थान महींस अछि‍ ओकरे पाछु भरि‍ दि‍न तबाह रहै छी। अोहुना तँ सालमे एक दू-बेरि‍ अनबे करै छि‍यै आ जेबो करते छि‍यै। मुदा तइयो मनमे होइते हेतै जे बि‍सरि‍ गेल। तेँ पहि‍ने ओकरे ऐठाँ जाएब। दोसर दि‍न दस-एगारह बजे घुमि‍ कऽ अबि‍ते अनुप देखलक जे महींस पाल खाइले बो-बॉं करैए। एक तँ रस्‍ताक थाकल तइपर सँ महींसकेँ डि‍रि‍आइत देख मन तमसा गेलै मुदा, लछमी पावनि‍ दि‍न लगले मनमे खुशी ऐलै। हॉंइ-हॉंइ कऽ खेलक आ महींस लऽ कऽ पारा लग वि‍दा भेल। गाममे पारा नहि‍ रहने बगलक गाम पहुँचल। गाम पहुँचते पता लगलै अखने एकटा महींसक संग दछि‍न मुँहे गेल। फेि‍र ओहि‍ गामसँ दाेसर गाम ि‍वदा भेल। दोसरो गाममे पता लगलै जे दछि‍न मुँहे गेल। जाति‍-जाि‍त चारि‍ बजेमे एकटा गाछीमे महींसमे पारा लगल देखलक। जेहने देखैमे पारा भारी तेहने नमहर-नमहर सि‍ंघो रहए। मरखाहक दुआरे महींसबला महींसकेँ गाछमे बान्‍हि‍ हटि‍ कऽ बैसल रहए। फरि‍क्‍केमे अनुपक महींसकेँ देखि‍ पारा दौगल। पाराकेँ अबैत देखि‍ अनुप हॉंइ-हॉंइ कऽ एकटा गाछमे महींसकेँ बान्‍हि‍ दोसर गाछपर चढ़ि‍ गेल। तहि‍ बीच पहि‍लुका महींसबला अपन महींसक डोरी खोलि‍ ससरि‍ गेल। अनुपक महींस लग आवि‍ पारा गछाड़ि‍ लेलक। लगले-लगले तीन-चारि‍ मूठ पारा देलक। मूठ सुतरैत देखि‍ अनुपक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुदा पारा डरे गाछपर सँ उतड़बे ने करए। महीसि‍ लग पारा बैसि‍ रहल। मुदा महीसि‍ ठाढ़े रहल। अनुपक मनमे हाय जे जँ महीसो बैसि‍ जाएत तँ ढरकि‍ जाएत। जइसँ पाल सुतरबे ने करत। सॉंझ पड़ि‍ गेल। अमवसि‍या दि‍न रहने दोसरि‍ सॉंझ होइत-होइत अन्‍हार भऽ गेल। अनुपो गाछपर सँ उतड़ि‍ हटि‍ कऽ बैसि‍ गेल। अन्‍हार देखि‍ अनुपक मनमे होय जे असकरे छी कोना गाम जाएव? तहूमे तेहेन पारा शेतान अछि‍ जे छोड़बो ने करैए। राति‍क दस बजि‍ गेल। हवो उठल आ बून्‍दा-बुन्‍दी पानि‍यो शुरू भेल। पानि‍ पड़ि‍ते पारा महींसकेँ छोड़ि‍ गाम दि‍स वि‍दा भेल। हवो आ पानि‍यो तेज हुअए लगल। एक तँ अन्‍हरि‍या राति‍ तइपर सँ पानि‍-हवा जोर पकड़ने जाइत। महींसक संग अनुप गाम दि‍स वि‍दा भेल। कनि‍ये आगू बढ़ल ि‍क झॉंट-पानि आरो‍ जोर पकड़ैत गेल। अधा रास्‍ता अबैत-अबैत मुसलाधार बरखो आ वि‍हाड़ि‍यो जोर पकड़ि‍ लेलक। अवग्रहमे अनुप पड़ि‍ गेल। अबग्रहमे पड़ल अनुप सोचए लगल जे आइ नइ वँचब। अपटी खेतमे महींसो आ अपनो मरि‍ जाएव। हाथ-हाथ नहि‍ सुझैत अछि‍। ने कतौ एकोटा लोक देखै छी आ ने अपना कोनो इजोत अछि‍। बीच पॉंतरमे कन्‍ना जाएब? तहूँमे अंगो ने पहि‍रने छी। देहमे जेहो कपड़ा अछि‍ सेहो भीजि‍ये गेल अछि‍। जाड़ो होइए। जि‍नगीक आशा अनुपकेँ टुटि‍ गेल। मन मानि‍ गेलइ जे आइ नइ बँचव। जखन अपने नइ बँचब तखन महींसे कोन काज देत। बुकौर लगि‍ गेलइ। मुदा कानबो के सुनत? ि‍बजलोका देखि‍ होइ जे देहेपर ने  खसि‍ पड़ए। हवा बन्‍न भेल। हवा बन्‍न होइते मनमे आशा जगलै मुदा घनघनाैआ बरखा होइते रहए। गाम पहुँचैत-पहुँचैत बरखो बन्‍न भेल। घरपर आबि‍ थरथराइत अवाजमे अनुप घरवालीकेँ कहलक- “हाथ-पएर कठुआ गेल अछि‍। कनी घूर करू।” बेटा, नसीवलाल महींस बन्‍हलक। भुलि‍या अनुकेँ कहलक- “जाबे अहॉं धोती फेड़व ताबे घूरक ओरि‍यान कऽ दइ छी।” घरवालीक बात तँ अनुप सुनलक मुदा, जाड़े-कठुआ कऽ खसि‍ पड़ल। जाड़सँ देह सर्द-सर्द भेल रहए। बोली बन्‍न भऽ गेलै। तइपर सँ भीजल कपड़ा सेहो रहै। हॉंइ-हॉंइ कऽ भुलि‍या फुटलाहा  लोहि‍यामे गोरहा-गोइठा तोड़ि‍-तोड़ि‍ दऽ मटि‍या तेल ढाि‍र सलाइ खरड़ि‍ कऽ लगौलक। घूर धधकल। बेटी सुनरीकेँ भूलि‍या कहलक- “बुच्‍ची, झब दऽ करौछमे चारि‍ ढेकरी थकुच कऽ लसुन आ करूतेल ला। अही घूरपर गरमा कऽ सौंसे देह मालि‍स कऽ देवनि‍।” माइक बात सुि‍न सुनरी चारमे टॉंगल लसुनक मुट्ठीमे सँ एकटा ढेंसर नि‍कालि‍, दाना छोड़ा सि‍लौटपर थकुचलक। शीशीसँ तेल ि‍नकालि‍ करौछ घूरपर गरमबए लगल। तीनू गोटे -पत्‍नी, बेटा, बेटी- केँ मनमे हाेय जे भरि‍सक कठुआ कऽ मरि‍ गेल। मुदा सॉंस चलैत देखि‍ आशा बनल रहए। लसुन-तेलासँ तीनू गोटे दुनू तरबो आ दुनू तरहत्‍थि‍योकेँ हाथसँ रगड़ए लगल। पान-सात मि‍नट रगड़लापर अनुप ऑंखि‍ खोलि‍ बाजल- “जाड़ कनी कम भेल।” अनुपक बात सुि‍न आरो हॉंइ-हाँइ तीनू गोटे रगड़ए लगल। तरहत्‍थी रगड़ब छोड़ि‍ नसीवलाल चानि‍ रगड़ए लगल। मन हल्‍लुक होइते अनुप बाजल- “जाड़े छाती दलकैए। कनी चाह बनाउ। जाबे भीतर नै गरमाएत ताबे जाड़ नै छुटत।” पति‍क बात सुि‍न भुि‍लया चाह बनबैक ओरि‍यान करए लागलि‍। चाह-पत्ती तँ घरमे रहए मुदा, चि‍न्‍नी घरमे रहवे ने करै। एत्ते राति‍ आ ऐहन समएमे दोकानसँ चीनी कोना अनैत। पति‍केँ भुलि‍या कहलक- “चाह पत्ती तँ घरमे अछि‍ मुदा, चि‍न्‍नी अछि‍ये नहि‍।” पत्‍नीक बात सुि‍न अनुप कहलक- “चीनी नइ अछि‍ तँ नूने दऽ कऽ बना लि‍अ। ऐहन समएमे कत्तए सँ आनब।” भुि‍लया चाह बनबए लगलीह। बेटाकेँ अनुप कहलक- “बौआ, कनी थमि‍ जा, धोती फेड़ि‍ लइ छी।” कहि‍ उठि‍ कऽ धोती बदलि‍ गंजी पहीरि‍लक। चाहो बनल। स्‍टीलि‍या गि‍लासमे भरि‍ गि‍लास करीव 250 एम.एल; छानि‍ भुि‍लया अनुपकेँ देलक। जेहने जड़ाएल देह तेहने मुँह रहने चाह गर्म बुझि‍ये ने पड़ै। पानि‍ये जेकॉं घोंटे-घोंट पीबए लगल। अधा ि‍गलास पीबैत-पीवैत देह गरमेले। देह गरमाइते हुहुआ कऽ बोखार अबए लगलै। चाह पीबैत-पीबैत बोखार आबि‍ गेलै। जाड़ हुअए लगलै। ओछाइनेपर पड़ि‍ बेटाकेँ कहलक- “बौआ, बड़ जाड़ होइए कनी कम्‍मल नि‍कालि‍ कऽ लाबह।” कम्‍मल ओढ़ि‍ पड़ि‍ रहल। मुदा जाड़ कमैक बदला बढ़ले जाय। पुन: अनुप बाजल- “एकटा कम्‍मलसँ जाड़ नै कमत। आरो अोढ़ावह।” घरक तीनू कम्‍मल ओढ़ि‍ते देह गरमाएल। देह गरमाइते बाजल- “बौआ, देहसँ खौंत फेकैए।” खौंत सुि‍न भुि‍लया बाजलि‍- “सरद-गरम भऽ गेल। एती राति‍मे डाकडरो ऐठीन कन्‍ना पठेबे। तइमे तेहेन दुरकाल समए अछि‍ जे ओहो औत ि‍क नै।” नि‍राश होइत अनुप बाजल- “जँ औरूदा हएत जीवे करब नै जे रसीद कटि‍ गेल हएत तँ डाक्‍टरो बुते थोड़बे बॉंचव।” भुलि‍या- “महींसक पाछु जे जान गमबै छी तइसँ नीक जे महींसे बेच लेब।” आशा भरल स्‍वरमे अनुप पत्‍नीकेँ उत्तर देलक- “अही महींसक बले तँ दूटा पाइयो देखै छी आ गुजरो करै छी। जँ एकरे बेचि‍ लेब तँ जीवि‍ कन्‍ना। जि‍नगीमे एहि‍ना नीक-अधला समए अबै-जाइ छै, तइले कि‍ काजे छोड़ि‍ देब। मरै कए कोनाे ठेकान छै। चलि‍तो काल लोक खसि‍ पड़ैए आ मरि‍ जाइए। तइले महीसि‍ कि‍अए उपटाएव।” अहि‍ अजकल पोरूसाल गाममे कि‍सान गोष्‍ठी भेल रहै। ओहि‍ गोष्‍ठीमे जि‍लोक कृषि‍-पदाधि‍कारी आ ब्‍लौकक पदाधि‍कारी सभ सेहो आइल रहथि‍। ओना गामक लेल पहि‍ल गोष्‍ठी छलए। जहि‍मे कि‍सानक दुख-दर्दकेँ लगसँ देखल गेल रहै। ओहि‍ दि‍न गामोक ि‍कसानकेँ सरकारमे अपन भागीदारी बुझि‍ पड़ल रहै। ि‍कऐक तँ अखन धरि‍ गामक लोक सरकारक माने कोटाक चीनी आ मटि‍यातेल धरि‍ बुझैत छलै। गोटे-गोटे साल खैरातक गहूमो आबि‍ जाइत छलै। मुदा तहि‍सँ बदलल रूप गोष्‍ठीमे रहए। ि‍कएक तँ ि‍कसानकेँ चाि‍र श्रेणी- लघु, सीमान्‍त, मध्‍यम और पैघ ि‍कसानक रूपमे ि‍वभाजि‍त कऽ सबहक लेल सरकारी सुवि‍धाक चर्चा भेलै। सीमान्‍त ि‍कसानकेँ एक-ति‍हाइ माने ३३ प्रति‍शत सरकारी सहायताक घोषणा भेलै। एक-ति‍हाइ मदति‍सँ लोकमे भरपुर उत्‍साह जगलै। खेतीक सभ वि‍धा पशुपालन, माछपालन तरकारीक खेती, फल-फलहरीक खेतीक संग-संग उन्‍नति‍शील धान, गहूम इत्‍यादि‍ अन्‍नक खेतीमे सेहो मदति‍क चर्चा भेलइ। ३३ प्रति‍शत माने एक ति‍हाइ सुवि‍धा पाबि‍ पैघ ि‍कसान आ मध्‍यम कि‍सानक लेल छोट-छोट कारोवार आ गाइयो-महीि‍स पोसैक बाट खुजलै। गोष्‍ठीक ि‍कछुए दि‍नक बाद पंजाब-हरि‍याणासँ ट्रकक माध्‍यमसँ बारह टा जर्सी गाए गाममे आएल। ओहि‍मे सँ एकटा कारी रंगक गाए राजेसर सेहो दस हजारमे कीनि‍लक। चारि‍ मास धरि‍ गाए नीक-जेकॉं आठ ि‍कलो दूध दैत रहल। बादमे चारि‍ मासक पछाति‍ एक संझू भऽ गेलइ। जाधरि‍ आठ ि‍कलो दूध गाएकेँ होइत रहल ताधरि‍ दुनू परानी राजेसर सेहो ही खोलि‍ मेहनतो करै। ओना दूधारू घासक खेती नहि‍ केने रहए। ने सुधादाना आ ने कोनो तरहक पौष्‍टि‍क आहारक दोकान इलाकामे रहए। मुदा तइओ राजेसर पुरने ढंगसँ मसुरी आ मकैक दर्रा थोड़-थाड़ गाएकेँ खुअबैत रहए। छह मास बीतैत-बीतैत गाए ि‍बसकि‍ गेलै। बच्‍छा तरे गाए रहै तेँ गाइयक संख्‍या तँ नहि‍ बढ़लै मुदा, जतवे दि‍न दूध भेलै ओहि‍सँ गाइयक प्रति‍ आकर्षण जरूर बढ़ि‍ गेल रहए। ि‍कएक तँ अखन धरि‍ गाममे एक्कोटा ओहन गाए नहि‍ भेल रहए जेकरा सेर भरि‍सँ बेसी दूध होइ। ओना गामक गाइयक वंश दि‍नानुदि‍न वि‍गड़ैत गेल। तेकर अनेको कारणमे एकटा कारण इहो रहए जे श्राद्धकर्ममे तेहेन दब बच्‍छाकेँ दागि‍ सॉंढ़ बनौल जाइत रहए जे गाइयक खाढ़े नष्‍ट होइत गेलै। ि‍बसकलाक बाद गाय उठवे ने कएल। आठ मास बीतैत-बीतैत राजेसर नि‍राश भऽ गेल। लोककेँ पुछै तँ ि‍कयो-करूतेल पि‍अबैले कहै तँ ि‍कयो मेनक पात खुअबैले कहै। मुदा गाए उठलै नहि‍। हारि‍-थाकि‍ कऽ मधेपुर मवेशी डॉंक्‍टरसँ सम्‍पर्क कऽ पुछलक। गर्भाशय साफ करबैक ि‍वचार डॉक्‍टर सहाएव देलखि‍न। दि‍वाली दि‍न राजेसर गाए नेने मधेपुर मवेशी अस्‍पताल पहुँचल। एकटा बीमार महीसि‍ देखैले डॉक्‍टर सहाएव भगवान गेल रहथि‍। गाएकेँ ढाठमे बान्‍हि‍ राजेसर अस्‍पतालक ओसार पर तौनी ि‍वछा सुति‍ रहल। सूर्यास्‍त भेलापर डॉक्‍टर भगवानपुर सँ ऐला। डेरा अबि‍ते पत्‍नी कहलकनि‍- “एक गोटे दुपहरेसँ भुखे-पि‍यासे गाइयक संग बैसल छथि‍ पहि‍ने ओ देखि‍ लि‍औ।” दुपहरक नाओ सुनि‍ते डॉक्‍टर चौंकि‍ गेलाह। साइकि‍ल रखि‍ पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- “तेहेन बीमारीक भॉंजमे पड़ि‍ गेलहुँ जे छोड़ि‍यो नहि‍ सकैत छलौं। मुदा जखन महींस पाउज धऽ खढ़ उठौलक तखन अपनो संतोष भेल आ महि‍सोबला कहलनि‍ जे आब महीसि‍ बँचि‍ गेल। तेँ एते अबेर भऽ गेल। मन गरमा गेल अछि‍ पहि‍ने एक लोटा पानि‍ पीआउ आ चाह बनाउ। ताबे कपड़ा खोलि‍ लइ छी।” चाह पीबि‍ डॉक्‍टर राजेसर लग पहुँच गाएकेँ देखि‍ कहलखि‍न- “जेँ एते काल बैसलौं तेँ आध घंटा आरो समए लागत।” आशा भरल स्‍वरमे राजेसर कहलकनि‍- “तइले नइ कोनो, मुदा गाममे तमाशा सेहो छी आ अन्‍हरि‍या राति‍ छी तेँ थोड़े.....।” ढाठीमे गाएकेँ बन्‍हवा डॉक्‍टर साफ केलनि‍। सावुनसँ हाथ धाेय एकटा इन्‍जेक्‍शन देलखि‍न। चारि‍ खोराक गोटी दऽ कहलखि‍न- “काज तँ भऽ गेल मुदा, आब गाम नइ जाउ। एतै रहि‍ जाउ, भोरे दि‍न-देखार चलि‍ जाएब।” फीस दैत राजेसर कहलकनि‍- “डॉक्‍टर सहाएव, अबेरो भेने तँ काज भइये गेल। गाममे मेलो-तमाशा छी तेँ चलि‍ये जाएब।” एक तँ करि‍या कम्‍मल जेकॉं अन्‍हार, दाेसर कारी खुट-खुट गाए, मने-मन राजेसर सोचलक जे हो न हो कहीं हाथसँ डोरी छुटि‍ जाएत तँ गाए हराइये जाएत। छोड़मे ससरफानी दऽ अपन गट्टामे बान्‍हि‍ आगू-आगू गाए आ पाछु-पाछु अपने ि‍वदा भेल। थोड़े दूर आगू बढ़ल ि‍क बुन्‍दा-वुन्‍दी पानि‍यो आ हवो रसे-रसे जोड़ पकड़ए लगल। हवाक संग-संग घनघनौआ बरखो हुअए लगल। घरपर अबैत-अबैत जहि‍ना अपने तहि‍ना गाइयो जाड़े कठुआ गेल। राति‍ ढहल। गाए टॉंग पटकए लगलै। लगले-लागल उठवो करै आ बैसवो करए। बो-बॉं सेहो करए। समए तेहन भऽ गेलै जे पुन: डॉक्‍टर ऐठाम जाइक साहसे ने भेलै। ने गाममे मवेशी डॉक्‍टर आ ने लग-पासक कोनो गाममे। हारि‍ कऽ करूतेल-मटि‍या तेल मि‍ला, सौँसे देह औंसि‍ बोराक नूरी बना दुनू परानी गाएकेँ ससारए लगल। थोड़े काल ससारि‍ मरीच पीसि‍ करूतेलमे ि‍मला कॉंड़ि‍सँ पि‍औलक। मुदा गाइयक रोग हटलै नहि‍। धीरे-धीरे बढ़ि‍ते गेलै। भोरहरवामे खूव जोरसँ डि‍रि‍या गाए मरि‍ गेलै। गाएकेँ मरि‍ते दुनू परानी राजेसर कानए लगल। भोरहरवाक कानव सुनि‍ दुनू परानी डोमन दौड़ि‍ कऽ आएल। अबि‍ते राजेसरकेँ डोमन पुछलक- “भैया, की भेलह?” डोमनक प्रश्‍नक उत्तर नहि‍ दऽ राजेसर कनि‍ते रहल। लगमे अबि‍ते डोमन देखलक जे चारू पएर छि‍ड़ि‍ऐने गाए मरल अछि‍। मुँहपर तरहत्‍थी दऽ डोमन बाजल- “भैया, चुप हुअअ। कमाइबला बेटा मरलापर लोक सवुर करि‍ते अछि‍, ई तँ सहजे नाङरि‍ छी।” डोमनक बात सुि‍न राजेसर बाजल- “गाए मरि‍ गेल तेकर दुख ओते ने अछि‍ जते बैंकक करजाक अछि‍। एक तँ सरकार लोककेँ मदति‍ करैए ि‍क गरदनि‍मे फॉंस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाकी दू हि‍स्‍सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देखि‍ लेलौं। बुझबे ने केलि‍यै जे गरदनि‍मे फँसरी लगबैए। छुट लेल बैंकबला कहलक जे मधमन्‍नीसँ कागज आनि‍ कऽ दि‍अ तखन ओइ रूपैयाक मि‍नहा लोनमे भऽ जाएत। जावे तक ओ कागज नै देब ताबे तक सोलहो आना रूपैयाक सुदि‍ चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि‍। कोटक मंसीकेँ जा कऽ जा सभ बात कहलि‍यै तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफि‍स गेल। ओइ ठीमन गेलौं तँ कहलक जे पान सए रूपैया लागत तखन कागज देव। एहि‍ना दौड़-बरहा करैमे हजारसँ उपरे खर्च भऽ गेल। रूपैयाक ि‍कस्‍त नै देने छेलि‍यै बैंकमे जखन ि‍हसाब करबै लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सुदि‍ मूड़मे जमा भऽ गेल आ ओकरो सुदि‍ लागत। तइ बीच गाइये मरि‍ गेल। आब की करब?” दि‍वालीकेँ शुभ दि‍न बुझि‍ सुरति‍या भोरेसँ दुनू परानी खपड़ाक भट्ठा लगबए लगल। बीस हजार खपड़ाक भट्ठाक मन मे खुशी रहए। बीचमे थोपुआ आ चारू कात नड़ि‍या खपड़ाक भट्ठा लगौलक। थापुआ मोटो होइ छै तेँ कातमे लगौलासँ नीक जेकॉं नहि‍ पाकत। आमदनीक खुशी मनकेँ तेना खुड़-खुड़ा देने रहए जे दुनू परानीकेँ काजक भीड़ बुझि‍ये ने पड़ए। दुनि‍यॉंक सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ मन आमदनी देखि‍ तरे-तर हँसए। जहि‍ना कोनो कनैत बच्‍चाकेँ गुदगुदी लगौलासँ हँसीक लाबा फुटैत तहि‍ना दुनू परानी सुरति‍योकेँ होय। भट्ठा लगि‍ गेल। एक तँ सुखार माने रौदि‍याह समए दोसर काति‍क मास। काति‍क मासमे चैत-बैशाख जेकॉं ने हवा-वि‍हाड़ि‍क शंका आ ने झॉंट-पानि‍क। तेँ ने भट्ठाक उपर छॉंही देलक आ ने कातमे टाट लगौलक। पहि‍ल सॉंझ उक-बाती फेरि‍ सुरति‍या भट्ठा लग बैसि‍ नि‍ङहारि‍-नि‍ङहारि‍ देखए लगल जे कतौ ि‍कछु छुटि‍ तँ ने गेल। फुलेसरी भानस करए गेलि‍। चुल्‍हि‍ पजाड़ि‍ अदहन दइते मनमे उठलै जे अधि‍क लटारम करैमे बेसी देरी लागत तइसँ नीक खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब। बैसारी लोक ने छनुआ-बगहरूआ बना जी माने जीभकेँ चसकी पुड़बैए। पावनि‍ये दि‍न छी तँ की छी। कोनो ि‍क पावनि‍येकेँ सीमा-नाङड़ि‍ छै, जेकरा रहए छै ओ सभ दि‍न खाइए। खाइये पाछु जे समए बीता लेब तँ खाइक ओरि‍यान कोना हएत। फेरि‍ मनमे भेलै जे अपने फुरने नै करब हुनको पुछि‍ लइ छि‍अनि‍। चुल्‍हि‍ तरसँ उठि‍ फुलेसरी पति‍ लग जाए पुछलक- “ओना आइ तँ लछमी दि‍न छी सभ तरूआ-बगहरूआ बनाओत, से की वि‍चार।” सुरति‍या मने-मन बीस हजार खपड़ाक दाम जोड़ैत रहए। बारह हजार थोपुआ अछि‍ जेकर दाम बारह हजार भेल। सौ-पचास फुटि‍यो जाएत तइओ नै बारह हजार तँ पौने बारहे हजार रहह। आठ हजार नड़ि‍या अछि‍ जे आठ सए रूपैये बीकत। ओहूमे पच्‍चीस-पचास अधपक्‍कू आ फुटि‍-भांगि‍ जाए तइओ नै चौसैंठ साए तँ छह हजार हेबे करत। कहुना-कहुना तँ सत्तरह-अठ्ठारह हजार हेबे करत। पत्‍नि‍क बात सुि‍न उत्तर देलक- “बूढ़ि‍ भऽ गेलौं आ नाक लगले अछि‍। एतवो नै बुझै छि‍यै जे भट्ठा लगौने छी आगि‍ देवइ तँ भरि‍ राति‍ ओगरि‍ कऽ रहए पड़त। जगरनामे अधपेटे खेनाइ नीक होइ छै ि‍क चढ़ा कऽ। जाउ खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब।” अपन ि‍वचारसँ पति‍क वि‍चार ि‍मलि‍ते फुलेसरीक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुस्‍की दैत दोहरौलक- “पावनि‍क दि‍न छी, तखन.....।” “जाउ-जाउ। जेकरा रहए छै अोकरा ि‍लये सभ दि‍न होलि‍ये आ दि‍वालि‍ये रहै छै आ जकरा नै रहए छै ओकरा लि‍ये सभ दि‍न एकादसि‍ये रहै छै।” खा-पी कऽ फुलेसरी बच्‍चा सभकेँ सुता देलक। राति‍क साढ़े नअ बजैत सुरति‍या भट्ठामे मसुरीक दालि‍ छि‍टैत- “जेहन मसुरीक दालि‍ लाल, तेहन भट्ठा लाले-लाल” कहि‍ आि‍ग देलक। सुखाड़ समए धुधुआ कऽ आगि‍ पजड़ि‍ गेल। आगि‍क पजड़व देखि‍ सुरति‍या पत्‍नीकेँ कहलक- “अइ बेरक खपड़ासँ पूँजी बढ़ा लेब। दू आदमीकेँ आरो राखि‍ लेब। कहुना-कहुना जँ दसो भट्ठा हाथ लागल तँ लाखक कमाइ भइये जाएत। पूँजी ने पूँजी बढ़बैत अछि‍। गाममे देखते छि‍यै जे जेकरा दस बीघा जमीन छै अो अपनो साल भरि‍ खाएत से नै होइ छै। हम तँ सहजहि‍ नंगा-फरोस छी। तहन तँ लुड़ि‍ये-वुद्धि‍ तेहन अछि‍ जे जनो कमवाएब।” फुलेसरीक बुद्धि‍मे पति‍क बात नहि‍ अँटल। छोट बुद्धि‍मे पैघ बात कोना अँटैत। मुदा पति‍-पत्‍नि‍क बीच ि‍क शास्‍त्रार्थ होइत अि‍छ। सुयोग कवि‍क कवि‍ता जेकॉं तुक ि‍मलौवलि‍ होइत अछि‍। ि‍वषय-वस्‍तु ि‍कछु रहौ वा नहि‍ रहौ मुदा, तुकवन्‍दी जँ नीक रहल तँ ओ श्रेष्‍ठ कवि‍ताक श्रेणीमे अवि‍ये जाइत अछि‍। पति‍क प्रश्‍नक उत्तर दैत फुलेसरी बाजलि‍- “अइ बेरि‍ अपनो घरपर खपड़ा दइये देबइ।” अपन घर सुि‍न सुरति‍याक मनमे उठल जहि‍ना घर बनौनि‍हारकेँ अपना रहैले घर नै रहै छै तहि‍ना तँ हमरो अछि‍। जाबे वि‍राटनगरमे नोकरी करै छलौं ताबे पेटो चलैमे कोताहि‍ये होइ छलए। मुदा आब जँ वेसी कमाइ हुअए लगल तँ घरो बनाइये लेब। बुन्‍दा-वुन्‍दी पानि‍यो आ संग-संग हवो उठल। मेघ दि‍स देखि‍ सुरति‍या बुदबुदाएल- “मेघो कहॉं देखै छि‍यै। एकटा छोटका टुकड़ी बुझि‍ पड़ैए। नै आओत बरखा। मुदा हवा ने एकभग्‍गू कऽ दि‍अए। जँ हवा जोर भेल तँ एक भाग कॉंचे रहत आ दोसर भाग झाम बना देत।” हवा तेज होइत गेल आ मेघो पसरैत गेल। पूबसँ बादल आि‍ब-आबि‍ सघन हुअए लगल। जहि‍ना-जहि‍ना बरखा बढ़ए लगल तहि‍ना-तहि‍ना हवो बढ़ए लगल। तड़तड़ा कऽ जोरगर बरखो आ ि‍वहाड़ि‍यो आबि‍ गेल। झॉंट-पानि‍ देखि‍ सुरति‍याक आशा राइ-छि‍त्ती भऽ गेल। मास दि‍नक मेहनतक संग-संग पूँजीयो–-माटि‍ उघैक गाड़ी भाड़ा, जनक वोइन, जरनाक दाम- नष्‍ट भऽ गेल। टूटल मने पत्‍नीकेँ कहलक- “सभ ि‍कछु दुइर भऽ गेल।” पति‍क बात सुि‍न फुलेसरी गौवॉंकेँ दोख लगबैत बाजलि‍- “ई सभ कि‍रदानी गौवॉं सबहक छि‍यै। जखन गाममे काली-पूजाक अड़धेना       -आराधना- केलक तँ पहि‍ने भगता बजा पूजा कऽ काली-महरानीसँ वाक लऽ लैत से करबे ने केलक आ अपने फुड़ने पूजा शुरू कऽ देलक। ओकरा सभकेँ की बि‍गड़लै। देत ि‍कयो हरजाना।” फुलेसरीक जोर-जोरसँ बाजब सुि‍न सुरति‍या डपटैत बाजल- “यएह सभटा बुझै छै। राजा-दैवक कोनो ठेकान छै। ककरो हाथमे छै जे ककरो दोख लगबै छि‍यै। कोनो ि‍क अपने टा नोकसान भेल। कते लोकक घर खसल हेतै, चीज-बौस दुइर भेल हेतै ि‍क अपने टा भेल?” पति‍क बात सुि‍न फुलेसरीक तामस गौवॉंपर सँ हटि‍ पड़ोसि‍नीपर पहुँचल। पड़ोि‍सनीकेँ गरि‍अबए लागलि‍- “तेहेन मरमी मौगी सभ अछि‍ जे अनकर नीक सोहाइ छै। बेटा दऽ दऽ डानि‍ सीखने अछि‍ आ अनकर गरदनि‍ कटैए। जहि‍ना हमर भट्ठा नोकसान भेलि‍ तहि‍ना ओकरो सातो पुरखाकेँ उड़ाहि‍ देवै।” सुरति‍याक घरक बगलेमे एकटा मसोमातक घर। जेकरा सभ स्‍त्रीगण डाइन बुझैत छै। ओकरे ठेकाना-ठेकना फुलेसरी गरि‍अबैत। गारि‍ तँ ओहो मसोमात सुनैत मुदा, नाओ नहि‍ सुि‍न कान ठाढ़ केने रहए जे जखने नाओ लेत तखने देखा देबइ। केहेन घनि‍कपन्‍ना होइ छै से सभ नि‍कालि‍ देवइ। पत्‍नी क्रोध देखि‍ सुरति‍या सोचलक जे एक तँ जे नोकसान भेल से भेवे कएल तइपर सँ अनेरे झगड़ा सेहो ठाढ़ हएत। हमरासँ ि‍क कमजोर ओ मसोमात अछि‍। दि‍यादि‍यो बेसी छै आ अपनो दुनू बेटा बुफगर छै। हो न हो कहीं आबि‍ कऽ माि‍र ठानि‍ दि‍अए। तखन तँ पूँजीयो गेल आ उपरसँ मारि‍यो खाएव। पत्‍नीकेँ पोल्‍हवैत कहलक- “की हेतइ, ि‍कयो कपार लऽ लेत। भगवान जे भोग-पारसमे देने हेता ओ हेबे करत। जे नै देने हेता से अपनो केने थोड़े हएत। तइले एते आगि‍-अङोरा होइक कोन काज छै। नोकसाने की भेल खपड़ा गलि‍ कऽ माटि‍ हएत ओकरा फेरि‍ खपड़ा पाथि‍ सुखा कऽ भट्ठा लगा लेब। जरनो भीजवे ने कएल ओकरो सुखा लेब। गि‍रहत सभकेँ देखै छि‍यै हर-जन लगा खेती करैए आ बाढ़ि‍मे दहा जाइ छै तेँ ि‍क ओ मरि‍ जाइए ि‍क खेती छोड़ि‍ दइए। तहि‍ना हमरो भेल। भगवान समांग देने रहथु। सभ कि‍छु फेरि‍ भऽ जाएत।” पति‍क बात सुि‍न फुलेसरीक मन थीर भेल। मुदा तइओ मनमे खौंझ उठि‍ते रहए। बाजलि‍- “भगवानो दुष्‍टे छथि‍। जानि‍-जानि‍ कऽ गरीबे लोककेँ सतबै छथि‍न। जहि‍ना ओ करै छथि‍न तहि‍ना ने हमहूँ सभ करै छि‍अनि‍। ने एकोटा उपास करै छी आ ने एको दि‍न पूजा करै छि‍अनि‍।” पत्‍नीक बात सुि‍न मुस्‍की दैत सुरति‍या बाजल- “अच्‍छा आब भऽ गेल। जहि‍ना ओ -भगवान- केलनि‍ तहि‍ना अहूँ करि‍ते छि‍अनि‍। सधम-बधम भऽ गेल।” मछुआ सोसाइटी बनने ि‍कछु गोटे उठि‍-वैसल आ ि‍कछु गोटे गोपाल खत्तामे चलि‍ चलि‍ गेल। ओना सोलहो आना पोखरि‍ सोसाइटीमे अखनो धरि‍ नहि‍ गेल अछि‍। मुदा जे गेल ओकर मुआवजा तँ पोखरि‍बलाकेँ नहि‍ भेटल। सोसाइटी बनने नव पानि‍दार मालि‍कक जन्‍म जरूर भऽ गेल। ि‍कऐक तँ एक गोटेक हाथमे अंचल भरि‍क पोखरि‍ आबि‍ गेल। जहि‍सँ पर्याप्‍त उत्‍पादि‍त पूँजी हाथ लगि‍ गेलै। संग-संग सरकारी खजानाक लूट सेहो शुरू भेल। मनमाना ढंगसँ सोसाइटीक सचि‍व आ सरकारी तंत्र मि‍लि‍ कऽ गामक अमूल्‍य पूँजी लुटब शुरू केलक। ओहि‍ सोसाइटीसँ एकटा पोखरि‍ आ एकटा खानगी पोखरि‍ डेढ़ हजार सलि‍याना ि‍कस्‍तपर फुदना माछ पोसैक लेल लेलक। सोसाइटीबला पोखरि‍क महार, बि‍नु देखरेख भेने, ढहि‍-ढुहि‍ कऽ सहीट भऽ गेल छलैक। मुदा रामधनबला पोखरि‍क मोहार नीक मुँह कान बना जीवि‍त छै। शुरूहे अखाढ़मे फुदना एकटा बेपारीसँ गंगाक जीरा  कीनि‍ सैरातबला पोखरि‍मे देलक। आ दोसर पोखरि‍मे तमुरि‍याक हेचरीसँ कीनि‍ कऽ आनि‍ देने रहए। गंगाक जीामे रोहू, नैन, भाकुर रहए आ तमुरि‍याक जीरा सि‍ल्‍वर काफ रहए। सि‍ल्‍बर काफ साले भरि‍मे दू-दू – तीनि‍-तीनि‍ कि‍लोक भऽ जाइत छैक जबकि‍ रोहू, नैन तँ कम बढ़ैत छै मुदा, भाकुरक बाढ़ि‍ अधि‍क होइ छै। तीनू जीरा ि‍मला कऽ दैत छैक। पानि‍क सतहक ि‍हसाबसँ तीनू माछ रहैत छै तेँ तीनू ि‍मला कऽ देल जाइ छैक। शुरू अखाढ़ेमे जे आद्रामे बरखा भेल रहए ओहि‍मे दुनू पोखरि‍ भरि‍ गेल रहए। पोखरि‍क पानि‍ आ जीराक सुतरब देखि‍ दुनू परानी फुदनाक मन चपचप करैत रहए जे भगवान दुख हेरलनि‍। कहुना-कहुना तँ बीस हजारसँ उपरेक आमदनी हएत। जहि‍ना खूब फड़ल आमक गाछी, खूब उपजल खेत आ खूब दुधगर गाए ि‍वयेलासँ खुशी ि‍कसानकेँ होइत तहि‍ना फुदनो दुनू परानीकेँ मनमे होय। जहि‍सँ दुनू परानी बेरा-बेरी तीनि‍-तीन बेरि‍ पोखरि‍क घाटपर घंटा-घंटा भरि‍ बैसि‍ माछक बच्‍चाकेँ ऐम्‍हरसँ ओम्‍हर हेलैत देखए। घरपर अबैक मने ने होय। माछक कारोवारसँ फुदनाक परि‍वार पहि‍लेसँ जुड़ल। मखान  खड़ड़ब, माछ मारि‍ बेचब परि‍वारक जीवि‍का रहए। तीन सलि‍या रौदी भेने फुदना कंठी लऽ लेलक। माछक रोजगार कोन जे माछ खेवो छोड़ि‍ देलक। जे माछक गंध पहि‍ने नीक लगै, आब जी ओकि‍याए लगै छै। गामक कीर्तन मंडलीमे शामि‍ल भऽ अष्‍टयाम, नवाहमे कीर्तन करए सेहो जाए लगल आ भनडारा सेहो पुरए लगल। लाट लगने एक हाथ हारमोनि‍यम, ढोलक बजौनाइ सेहो सीखि‍ लेलक। पाछु-पाछु कीरतन गबैत-गबैत गौनाइयो सीि‍ख लेलक। दाढ़ीयो-केश बढ़ा लेलक आ पतलखरीक चानन सेहो करए लगल। समेओ  संग देलकै। नव रोजगार ठाढ़ भेल। कीरतन मंडलीक सट्टा सेहो हुअए लगलै। काजो हल्‍लुक आ प्रति‍ष्‍ठाक संग-संग खेनाइयो नीक भेटै आ पाइयोक आमदनी नीक भऽ गेलै। मुदा घरवाली सीति‍या साकठे रहलि‍। जहि‍ना माछक ि‍वन्‍यास बनबैमे सि‍ति‍या लूरि‍गर तहि‍ना खाइयोमे जीबि‍लाि‍ह। गामक छौँड़ा सभ आ जनि‍जाति‍यो सभ ओकरा बगुला भगत कहै। घरमे एक्‍केटा थारी-लोटा रहए। जहीमे फुदनो खाए आ सि‍ति‍यो। एते बात जरूर रहए जे कहि‍यो फुदना घरवालीकेँ माछ खेवासँ मनाही नहि‍ केलक। फुदना देखवो करै जे नैहरसँ सनेसमे माछे अबै छै। नहि‍यो-नहि‍यो तँ तीनि‍-चाि‍र खेप मासमे अबि‍ए जाइ छै। सि‍ति‍याक पि‍ता माछक कारवारी रहए। पोखरि‍योबला सभसँ आ मधेपुरोक बेपारीसँ माछ कीनि‍ कीनि‍ आनए आ नफ्फा लगा कऽ गामे-गामे घुमि‍ कऽ बेचि‍ लि‍अए। जहि‍सँ नीक कमाइ होय। खेत-पथार तँ नहि‍ कीनि‍लक मुदा, नीक जेकॉं गुजरो करए आ घरो बनौने रहए। एक दि‍न फुदनाक सार टुनटुनमा दू ि‍कलोक अंडाएल रोहू नेने एलै। नमहर-नमहर कुट्टि‍या काटि सि‍ति‍या माछ तरए लगल। माछक सुगंधसँ फुदनाक मन मचकी जेकॉं डोलए लगल। जहि‍ना शरीरमे पुरना रोग समए पाबि‍ पुन: जगि‍ जाइत तहि‍ना फुदनोकेँ भेल। गरदनि‍सँ कंठी नि‍कालि‍ लाचारीक मुस्‍की दैत पत्‍नीकेँ कहलक- “दूटा कुट्टि‍या आ चूड़ा भूजि‍ कऽ नेने आउ?” पति‍क बात सुि‍न व्‍यंग करैत सि‍ति‍या बाजलि‍- “तीन सालमे कते घाटा भेल से बुझै छि‍यै। रोहू माछ खेनि‍हारकेँ कहि‍यो ऑंखि‍क ज्‍योति‍ कमै छै। बुढ़ाढ़ियो तक ओहि‍ना चक-चक देखैत रहैए। अखन चुल्‍हि‍ तरसँ कन्‍ना उठब। घरमे चूड़ा नै अछि‍। दाेकानसँ अधा ि‍कलो नेने आउ। ताबे हम अंडाकेँ तरै छी।‍” जहिना चोरकेँ गरपर रूपैया देखने देहमे तेजी आबि‍ जाइ छै तहि‍ना फुदनोकेँ आबि‍ गेल। जेबीसँ दसटकही नि‍कालि‍ दोकान गेल। सात रूपैयामे अधा कि‍लो चूड़ा कीनि‍ कऽ आबि‍ चुल्‍हि‍ये लग बैसि‍ पत्‍नीकेँ कहलक- “ताबे एकटा लाउ।” सि‍ति‍याक इच्‍छा रहबे करै। अनेरे दुनू परानी दू दि‍शाह भेल छी। जहि‍सँ अनेरे सदति‍काल रक्‍का-टोकी होइत रहैए। तरल अंडा आ चूड़ाक भूजा सि‍ति‍या पति‍केँ देलक। जहि‍ना कोनो वस्‍तु अधि‍क दि‍नक बाद भेटलासँ आनन्‍द अबैत तहि‍ना फुदनाकेँ खेवामे आनन्‍द आबए लगल। फुदना सासुर गेल। ससुरक घरमे धड़ैनपर एकटा छोटका घुमौआ जाल सैंति‍ कऽ राखल देखलक। जाल देखि‍ मनमे एलै जे अनेरे ई जाल रखले-रखले दुरि‍ भऽ जाएत तइसँ नीक जे नेने जाइ। छोटका सारकेँ जाल उताड़ि‍ देखबैले कहलक। जाल देखि‍ फुदना मांगि‍ गाम नेने आएल। गाममे ककरो बुझले नै रहए आ ने ककरो लग बजवे कएल। अोजार देखि‍ फुदना तरे-तर खुशी रहए। तेसरे-चारि‍मे दि‍नसँ ओ पोखरि‍ सभमे साझू पहरकेँ चोरा-चोरा माछ मारए लगल। अपनो खाए आ उगरै तँ बेचि‍यो लि‍अए। पोखरि‍बला सभ धपबए लगल। होइत-होइत एक दि‍न पकड़ा गेल। तत्‍काल तँ पोखरि‍बला ि‍कछु नहि‍ कहलकै मुदा, जाल छीनि‍ लेलकै। दोसर दि‍न भाेरे पोखरि‍बला पनचैती बैसौलक। पूर्बासायक जरूरते ने रहै ि‍कऐक तँ जाले गवाह रहए। पंच सभ पच्‍चीस बेरि‍ कान पकड़ि‍ कऽ उठै-बैठैले आ एक सए रूपैया दंड केलक। मुदा जाल घुमा देलकै। आंगन अबि‍ते पत्‍नी मुँहे काने खुब दुतकारलक। पत्‍नीक बातसँ फुदनाकेँ जानसँ उपर ग्‍लानि‍ भेल। कान पकड़ि‍ बाजल- “आइ दि‍नसँ कहि‍यो ऐहन काज नै करब।” पति‍क बात सुि‍न सि‍ति‍या अपन हँसुि‍ल दैत कहलक- “लि‍अ, एकरा बन्‍हकी लगा एक-दूटा पोखि‍र माछ पोसैले बनोवस कऽ लि‍अ। अपन कारोवार रहत जते मन हएत खेबो करब आ गुजरो करब।” दि‍वाली दि‍नक घनघोर बर्खासँ सैरातबला पोखरि‍क माछ दहा गेल। बाधक पानि‍क सलाढ़ पोखरि‍मे लगि‍ गेलै। बरखा छुटला बाद दुनू परानी फुदना टार्चक हाथे माछ देखए गेल। पोखरि‍क सलाढ़ देखि‍ फुदनाकेँ बघजर लगि‍ गेलै। बकार बन्‍न भऽ गेलै। दुनू हाथ माथपर लऽ महारपर बैसि‍ रहल। टार्च नेने सि‍ति‍या घाटपर जाए बारलक तँ एक्‍कोटा माछ नजरि‍पर पड़बे ने केलै। माछ नहि‍ देखि‍ सकदम भऽ गेलि‍। मने मन सोचए लगल जे सभ केलहा डूबि‍ गेल। मुदा गलती अपनो भेल जे महारकेँ बन्‍हलौं नहि‍। जँ मोटगर आड़ि‍यो जेकॉं मुँहकेँ बान्‍हि‍ देने रहि‍ति‍यै तँ ऐहन दि‍न नहि‍ देखि‍तौं। मुदा सके कोन। जे चलि‍ गेल ओ फेरि‍ घुरि‍ कऽ थोड़े औत। घुरि‍ कऽ पति‍ लग आबि‍ चुपचाप ठाढ़ भऽ गेलि‍। फुदना सोचै जे लोक कमा कऽ स्‍त्रीकेँ गहना-जेबर कीनि‍-कीनि‍ दैत अछि‍ आ हम ऐहन करमघटू छी जे जेहो गहना छलै सेहो पानि‍मे बोहा देलि‍यै। एक तँ माछ भासल तइपर सँ हँसुलि‍यो चलि‍ गेल। कि‍छु बजवे ने करै। पति‍केँ देखि‍ सि‍ति‍या बाजलि‍- “मत्‍थाहाथ देलासँ थोड़े माछ घुि‍र औत। तखन तँ आगू की करब से सोचू। चलू ओहू पोखरि‍केँ देखि‍यै जे ओहो भसि‍ गेल कि‍ बचल अछि‍।” मने-मन फुदना सोचए जे हमर बाजब उचि‍त नहि‍ हएत। कि‍ऐक तँ जनि‍-जात बेटोसँ पैघ गहनाकेँ बुझैत अछि‍। तेँ वएह कि‍ बजैए सएह सुनी। आगू-आगू टार्च नेने सि‍ति‍या आ पाछु-पाछु चुपचाप फुदना दोसर पोखरि‍ देखए ि‍वदा भेल। पोखरि‍क चारू महार घूमि‍ कऽ देखि‍ मुस्‍की दैत सि‍ति‍या बाजलि‍- “जीरा सँ जे कि‍छु आमदनी होइत से नै भेल। एक्को पोखरि‍ जँ बॉंचि‍ गेल तँ अहीसँ दुनू पोखरि‍ आबाद भऽ जाएत।” पत्‍नीक बात सुि‍न फुदना बाजल- “पहि‍ने तँ भेल जे जहि‍ना ओ पोखरि‍ दहा गेल तहि‍ना इहो दहा गेल हएत। मुदा भगवान रछ रखलनि‍ जे एकटा बँचल अछि‍। तते ने जीरा सुतरल अछि‍ जे एकटाकेँ के कहए जे एकटा आरो पोखरि‍ भऽ जाएत तेकरो अबादि‍ लेब। जते छेहर बच्‍चा रहै छै ओते बेसी बाढ़ि‍ होइ छै।” फुदनाक बात सुि‍न सि‍ति‍याक मनमे एकटा नव ि‍वचार जगलै। मने-मन सोचए लगल जे भने दहार भऽ गेलै। कोनो कि‍ हमरेटा पोखरि‍ दहाएल ऐहन-ऐहन कते गोटेक दहाएल हेतै। आब कि‍ कोनो सोसाइटि‍ए बला आकि‍ पोखरि‍एबला थोड़े अगधाएत। तेहन पूँजी (जीरा) अछि‍ जे चीजबला सभ माने पोखरि‍बला सभ खुशामद करए अौत। सस्‍तेमे दोसरो पोखरि‍ हाथ लगि‍ जाएत। भगवान जहन दइपर होइ छथि‍न तँ एहि‍ना ने छप्‍पर फॉंड़ि‍ कऽ दइ छथि‍न। बाजलि‍- “गलती अपनो सबहक भेल जे पोखरि‍क मुँह मजगूतसँ नहि‍ बान्‍हि‍ देलि‍यै। जँ से बान्‍हल रहैत तँ ऐहन दि‍न थोड़े देखि‍तौं। काल्‍हि‍ भोरे पॉंचटा टल्लाबला जन कऽ कऽ मजगूतसँ मुँह बान्‍हि‍ देबै। अखन काति‍के छी बहुत समए अछि‍। बैशाख जेठमे मछहरि‍ हएत। भने पोखरि‍ उपो-उप कऽ भरि‍ गेल।” पत्‍नीक बात सुि‍न फुदना बाजल- “जेँ एते पूँजी लगेलौं तेँ थोड़े आरो लगा देबै। दू मन खैर आनि‍ कऽ सेहो दइए देबै। ओना देखै छि‍यै जे कते गोरे खादो दइए। मुदा अपना तँ ओते ओकाइत नैए। अइ साल कहुना-कहुना कऽ लि‍अ। अगि‍ला सालसँ नीक जेकॉं करब। कोनो कि‍ अग्‍गह-बि‍ग्‍गह पोखरि‍ए जोतलासँ थोड़े होइ छै जतबे करब नीक जेकॉं करब।” कालीपूजा समि‍ति‍क सदस्‍य होइक नाते भोला भोरेसँ स्‍थानक काजमे जुटल रहए। कोना नहि‍ जुटैत? जे परि‍वारसँ उठि‍ माने आगू बढ़ि‍ समाजक काजकेँ अपन काज बुझैत अछि‍ ओ कोना ओकरा छोड़ि‍ सकैत अछि‍। जहि‍ना ब्रह्मक अंश जीव होइत तहि‍ना ने व्‍यक्‍ति‍ समाजक अंग छी। स्‍थानक काजक दुआरे जलखैयो करए भोला घरपर नहि‍ आएल। नहेबो नहि‍ केलक। हाथ-पएर धाेय खेलक आ पुन: वि‍दा होइत पत्‍नीकेँ कहलक- “हमर कोनो ठेकान नै अछि‍ तेँ मालो-जाल आ पाबनि‍योक सभ ओरि‍यान कऽ लेब।” पानि‍-बि‍हाड़ि‍ जखन आएल तखन भोला आ मंगल बृन्‍दावनक रासक आगूमे ठाढ़ भऽ हि‍यासि‍-हि‍यासि‍ देखै जे कतौ कोनो गड़बड़ी तँ नहि‍ भऽ रहल अछि‍। मुदा तेहेन भयंकर रूपमे पानि‍-बि‍हाड़ि‍ आएल जे मनक सभ वि‍चार सभकेँ मनेमे सड़ि‍ गेल। मंचक घटना सम्‍हारि‍ भोला घरपर आबि‍ बीआक वि‍रार जा देखलक तँ नि‍राश भऽ गेल। आमदनीक आशा टुटि‍ गेलै। जहि‍ना भोला छोट कि‍सान तहि‍ना छोट कारोबारि‍यो। पनरहे कट्ठा ऑंट-पेटक ि‍कसान भोला। मुदा दुनू परानी ऐहन मेहनती जे सात गोटेक परि‍वार हँसी-खुशीसँ चलबैत रहए। ओना चारि‍टा बच्‍चा लि‍धुरि‍या रहै मुदा, जेठका बारह बर्खक बेटा बलदेब मि‍ड्ल स्‍कूलमे पढ़वो करै आ घर-गि‍रहस्‍तीक काजमे संगो-साथ दैत रहै। स्‍कूलोक दशा तेनाहे सन। पॉंच सए वि‍द्यार्थीक स्‍कूलमे तीिनटा शि‍क्षक। तहूमे एक गोटे नेतागि‍रि‍ये करैत। पढ़बै-लि‍खबैसँ अोते मतलब नहि‍ जते ऑंफि‍सक दौड़ि‍-बरहा रहै। सि‍र्फ लोकेक काजे ऑफि‍स नहि‍ जाए, बलकि‍ स्‍टाफो (सरकारी पदाधि‍कारी) सबहक काज करै। जहि‍सँ आमदनि‍यो नीक आ पैघ लोकक बीच बैसि‍ समयो गुदस होय। स्‍कूलसँ ओतबे मतलब जे मासो दि‍नक हाजरी बना दरमाहा उठबै। समाजमे ककरो कि‍छु कहैक साहसे ने होय। थाना-बहानासँ लऽ कऽ कोट-कचहरी धरि‍क धुड़फन्‍दा लोक, तेँ क्‍यो ऑंखि‍ कोना उठा सकैत अछि‍। तहूमे सरकारी पाट्रीक नेतागि‍री करैत रहए। स्‍कूलक ढील-ढालसँ भोला खुशि‍ये रहए। कि‍ऐक तँ बलदेब माल-जालक पूरा भार उठा नेने रहए। कुट्टी काटब, खाइले देव, पानि‍ पि‍याएब, घर-बहार करब, थैर खर्ड़ब, गोबर उठाएव बलदेवक बान्‍हल डयूटि‍ रहए। एहि‍ लेल ने पिताकेँ अढ़बैक जरूरत आ ने कोनाे चि‍न्‍ता रहए। मुदा तेँ ि‍क बलदेव पढ़ै नहि‍। जरूर पढ़ै। भरि‍ दि‍न ने माल-जालक नेकरम करै मुदा, बारह घंटाक राति‍ तँ बचै। दोसरि‍ सॉंझ होइतहि‍ भोला मुस्‍तैज भऽ धि‍या-पूता लग बैि‍स नजरि‍ रखै। पढ़ैमे बलदेव ओते चन्‍सगर नहि‍, रहबो कोना करि‍तै? जखन स्‍कूलेकेँ केन्‍सर धेने तहन हाथ-पाएर कते क्रि‍याशील रहत। मुदा तेँ ि‍क बलदेव सोलहन्‍नी भुसकौले रहए, सेहो नै रहै। इमानदारीक छह घंटाक मेहनतसँ कि‍यो इंजीनि‍यर तँ कि‍यो डॉक्‍टर, कि‍यो वकील, तँ कि‍यो प्रोफेसर बनि‍ जाइत अछि‍ तँ तीनि‍ घंटाक मेहनतसँ बलदेव ि‍कअए ने पास करत। साले-साल क्‍लास टपि‍ते रहए। भोलो खुशी, ि‍कअए तँ बच्‍चेमे बाबाक मुँहे सुनने रहै जे- ‘उत्तम खेती’। नोकरी आ गुलामीमे कि अन्‍तर छैक। कमा कऽ जि‍नगी जीवैक लूरि‍ जँ भऽ जाए तँ एहि‍सँ बेसीक जरूरते कि‍। जहि‍ना राजतंत्रमे रजेक बेटा राजा होइत तहि‍ना ने प्रजातंत्रोमे मंत्रि‍ऐक बेटा मंत्री, हाकि‍मेक बेटा ने हाकि‍म बनत। तइले आनक सेहन्‍ता सेहन्‍ता नहि‍ तँ आरो कि‍ भऽ सकैत छै। पनरहे कट्ठा खेत रहि‍तो भोला गामक ि‍कसानक गि‍नतीमे अबैत। खेती करैक अपन ढंग रहै। खाली बरसातेक मौसममे धानक खेती करै बाकी समएमे तरकारीक खेती करै। ओना बरसातोक मौसममे पॉंचो कट्ठा चौमासमे  तरकारि‍ये उपजवै। बाकी दसो कट्ठामे कति‍का धान करै। पि‍ताक अमलदारीमे ओहि‍ दसो कट्ठामे रोहनि‍या मरूआ बीआ पाड़ि‍ मरूआ रोपे आ मरूआ काटि‍ अगहनी धान रोपे। मुदा वि‍श्‍वासु खेती नै रहै। गोटे साल पचता पानि‍ भेने मरूआ बीआ बुढ़हा जाय तँ लगतोमे डॉड़ लगि‍ जाय। गोटे साल बेसी बरखा होय तँ दहाइये जाय। कि‍एक तँ मरूआ पनि‍सहू नहि‍ होइत अछि‍। मुदा जहि‍ साल समगम समए होइत तहि‍ साल दसो कट्ठामे दस मन मरूआ भऽ जाय। मरूआकेँ ि‍कसान पवि‍त्र अन्‍न मानैत अछि‍ ि‍कएक तँ अोहि‍मे सूरा-फाड़ा नहि‍ लगैत अछि‍। ओनो आन-आन पावनि‍मे मरूआ अशुद्ध अन्‍न मानल जाइत अछि‍ मुदा, जि‍ति‍या पावनि‍मे शुद्ध भऽ जाइत अछि‍। जहि‍ना कुमारि‍ कन्‍या वि‍वाहमे पवि‍त्र मानल जाइत अछि‍ मुदा, चुमौनमे बालो-बच्‍चा वाली पवि‍त्र बनि‍ जाइत अछि‍। तहि‍ना अन्‍नमे मरूओ अछि‍। पावनि‍क जोड़ो मनुक्‍खे जेकॉं अछि‍। जहि‍ना कुमार वर-कन्‍याक वि‍आहक संग-संग दोती- वर-कन्‍या कन्‍याक वि‍आह सेहो होइते अछि‍, तहि‍ना मरूआक रोटी आ साग चाहे माछक मि‍लानसँ ि‍जति‍या पावनि‍ होइत अछि‍। ओनो आन-आन पावनि‍मे तीनू- मरूआ, साग आ माछ बर्जित अछि‍। धानोक वएह हालत होय। जइ साल रौदी होय तइ साल मरहन्‍ना भऽ जाइ आ जइ साल बेसी बर्खा होय तइ साल दहा जाय। समगम समए भेने दसो कट्ठामे दस मन धानो भऽ जाय। अन्‍नक खेतीकेँ भोलाक पि‍ता जुआ बुझि‍ खेति‍यो बदललक आ बीआक कारोबार बढ़ौलक। ओना रामझि‍मनी, झि‍मनी, भट्टा, मेरि‍चाइ, सजमनि‍, धेरा, कदीमा, सागक वीआ तँ अपने बना ि‍लअए मुदा, कोबीक वीआ बनौल नइ होय। हाटो-बजारमे कोवीक गोट्टा बीआ नइ वि‍काइत रहए। एक बेरि‍ हरि‍हर क्षेत्रक मेला गेल तँ हॉंजीपुरमे कोवीक गोट्टा वीआ ि‍वकाइत देखलक। दोकानदार लग बैसि‍ कोवी बीआक भॉंज बुझए लगल। गि‍रहस्‍त दोकानदार रघुनीकेँ माने भोलाक पि‍ताकेँ कोवी वीआ बनवैक लूि‍र बता देलक। नीक ि‍कस्‍म बुझि‍ रघुनी सभ कथूक बीआ कीनि‍ लेलक। बीआ कीनि‍लाक बाद दोकानदार “लक्ष्‍मी सीड” कम्‍पनीक नामसँ पॉंचटा पोस्‍ट-कार्ड दैत कहलक जे जइ चीजक बीआ कीनैक हुअए ओकर नाम आ वजन लि‍खि‍ कऽ पठा देव। ऐठामसँ हम पार्सल पठा देव। रघुनीक जि‍नगीमे नव मोड़ आएल। ओहि‍ सालसँ बीआक कारोवार करए लगल। ि‍पताक संग-संग भोलो सीखि‍ लेलक। अपनो तरकारी खेती आ बीओक कारोवार, करए लगल। कृषि‍ मंत्री आ प्रधानमंत्री शास्‍त्री जीक नेतृत्‍वमे खेतीमे हरि‍त क्रान्‍ति‍क कार्यक्रम बनल। कार्यक्रम बनैक कारण रहै देशक भुख मेटेवाक लेल अमेरि‍कासँ गहूम कर्ज लेब। आजुक जेकॉं ओहि‍ समए लोको माने जनसंख्‍यो नहि‍ रहए मुदा, तइओ पेट भरैक उपाए नहि‍ रहए। जहि‍ देखक माटि‍क जोड़ा दुनि‍यॉंक कोनो कोनमे नहि‍ छै, श्रमशक्‍ति‍ भरपुर छै, मौसम अनुकूल छै, कते लाजि‍मी बात थि‍क जे ओहि‍ देशक लोक अन्‍न बि‍ना मरै। जे बात शास्‍त्रीयो जी आ जगजीवनो बाबू बुझि‍ “जय-जवान, जय कि‍सानक” नारा देलनि‍। खाली नारे टा नहि‍ देलनि‍ खेतीक लेल योजना बना क्रि‍यान्‍वि‍त केलनि‍। अदौसँ अबैत खेतीमे नव जागरण भेल। हरक जगह ट्रेक्‍टर, करीनक जगह दमकल-बोरि‍ंगक संग-संग नव-नव औजार कि‍सान तक पहुँचल। नव-नव बीआक अनुसंधान भेल। कृषि‍क महत्‍व बढ़ने शि‍क्षाक वि‍कास भेल। उपजाक लेल रासायनि‍क खाद, कीट-नाशक इत्‍यादि‍क उपयोग शुरू भेल। जहि‍सँ खेतीक उत्‍पादनमे  आश्‍चर्यजनक वृद्धि‍ भेल। देशक कि‍सानमे नव चेतनाक सृजन भेल। भारत सनक देशमे जते आ जहि‍ गति‍ये वि‍कास हेवाक चाहि‍ऐक से नहि‍ भेल। ओना जहि‍ राज्‍यक सरकारोक नजरि‍ आ ि‍कसानोक नजरि‍ खेती दि‍स बढ़ल ओ जरूर वि‍कास प्रक्रि‍याकेँ पकड़ने रहल। मुदा जहि‍ राज्‍यमे से नहि‍ भेल ओहि‍ राज्‍यक कृषि‍ पुन: ठमकि‍ गेल। ओना मि‍थि‍लांचलक संग आरो-आरो संकट छै। जहि‍सँ वि‍कासक प्रक्रि‍या आगू बढ़ैक कोन बात, ठमकैक कोन बात जे पाछुए मुँहे ससरए लगल। जेकर कारण छलैक बाढ़ि‍क वि‍भीषि‍का। ऐहन-ऐहन पहाड़ि‍ धार सभ अछि‍ जे खाली पानि‍येसँ नाश नहि‍ करैत बलकि‍ खेतक माटि‍ काटि‍-काटि‍ नव-नव धारो बनवैत अछि‍ आ उपजाउ माटि‍केँ सेहो भसा-भसा बालुसँ भरैत अछि‍। जहि‍सँ खेतक उर्वराशक्‍ति‍ये चौपट कऽ दैत अछि‍। नव धार बनने गामो घर उजड़ि‍ जाइत अछि‍। खेत-पथार सेहो नष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। तेँ जरूरी अछि‍ धारक एहि‍ उपद्रवकेँ नि‍यंत्रि‍त करब। जाधरि‍ से नहि‍ हएत ताधरि‍ वि‍सबासु खेती मात्र कल्‍पना बनि‍ रहत। पचास-साठि‍ वर्ष पूर्व कोसीक पुलमे फाटक लगा दुनू ि‍दस माने पूवो आ पछि‍मो नहरक योजना बनल। मुदा अखनो धरि‍ जहि‍ रूपे ओकर उपयोग हेवाक चाहि‍ऐक से नहि‍ बनि‍ सकल अछि‍। तेकर अति‍रि‍क्‍तो सरकारीक उदासीनताक चलैत ऐहन व्‍यवस्‍था बनि‍ गेल अछि‍ जे कोसि‍यो इलाका दहाइत अछि‍। ओना कोसीक पूवरि‍यो आ पछवरि‍यो मुख्‍य नहर बनि‍ गेल। ओहि‍सँ सखो नहरि‍ सभ सोलहन्नी तँ नहि‍ मुदा, थोड़-थाड़ सेहो बनि‍ गेल। मुख्‍य नहरक भीतर सीमेंट ईंटाक सेहो जोड़ाइ भेल। मुदा बनौनि‍हारक माने ठीकेदारक बदनि‍यतीसँ तेहन काज भेल जे जहॉं-तहॉं ढहि‍-ढहि‍ नहरि‍केँ भरि‍ देने अछि‍। नहरक मुख्‍य बहाव बन्न भेने आ बाढ़ि‍क प्रकोपसँ मुख्‍य नहर जहॉं-तहॉं टूटि‍तो अछि‍। साले-साल मरम्‍मतो होइत अछि‍ आ टूि‍टतो अछि‍। मुदा तइओ थोड़-थाड़ लाभ कि‍सानकेँ होइते अछि‍। जतऽ जतऽ पानि‍क सुवि‍धा उपलब्‍ध अछि‍ ओहि‍-ओहि‍ इलाकाक कि‍सानक जि‍नगीमे क्रान्‍ति‍कारी बदलावक संभावना बनि‍ गेल अछि‍। मुदा सरकारी-तंत्रक चलैत जत्ते लाभ हेवाक चाहि‍यै से नहि‍ भऽ पबैत अछि‍। ओना साखा नहरि‍ पूर्णरूपेण तैयारो नहि‍ भेल अछि। तहूसँ दुर्भाग्‍य ई भेल जे पैछला साल कुसहामे पूबरि‍या बान्‍ह टूटने पूबरि‍या इलाका तँ नाश भइये गेल जे नहरक रूपे-रेखा चौपट भऽ गेल। जहि‍सँ पूर्वते स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल अछि‍। कोसि‍ये नहरि‍ जेकॉं बोरि‍ंग-दमकलक योजनाक दशा सेहो अछि‍। छोट कि‍सानक लेल नब्‍बे प्रति‍शत सवसि‍डीमे बोरि‍ंग आ ति‍हाइ सवसि‍डीमे दमकल देब शुरू भेल। मुदा सीमि‍त दायरामे योजना समटा गेल। जहि‍सँ गामक पॉंचसँ दस प्रति‍शत खेत धरि‍ पानि‍ पहुँचैक सुवि‍धा भेल। मुदा व्‍यापारीक चालि‍सँ घटि‍या बोि‍रंगक पाइप आ घटि‍या दमकल ि‍कसानक हाथ आएल। जे तीनि‍-साल बीतैत-बीतैत सभ बि‍गड़ि‍ गेल। ने एक्कोटा बोरि‍ंग काजक रहल आ ने दमकल। मुदा बैंकक कर्जक बोझ ि‍कसानपर लदले रहल। जे चक्रवृद्धि‍क दरसँ सहि‍त मूलधनक असुलीमे कि‍सानक सि‍र्फ गाइये-महीसि‍ नहि‍ खेतो-पथार बि‍कैत अछि‍। खेतीक उपजाक कोन बात जे लोकक खेतो हाथसँ नकलि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना कि‍सान पानि‍ले पहि‍ने लल छलै तहि‍ना फेरि‍ भऽ गेल। पानि‍क चलैक खेति‍यो पाछुए मुँहे ससरि‍ गेल। जे कि‍सान अपन पूँजी लगा बोरि‍ंग-दमकल कीि‍न खेती करै छथि‍ अो खादक बेपारी आ बीआ बेपारीक हाथक खेलौना बनि‍ गेल छथि‍। घटि‍या खाद आ घटि‍या बीआक चलैत खेतीक हालत आरो चौपट भऽ गेल। गोटे साल नीक खाद भेटल तँ बीआ लऽ कऽ डूबि‍ गेल नहि‍ जँ बीआ नीक भेटल तँ खाद लऽ कऽ डूबि‍ गेल। खेती चौपट भेने गामक लोक पड़ा कऽ पंजाब, दि‍ल्‍ली, बम्‍बई, कलकत्ता चलि‍ गेल जहि‍सँ गामक-गाम सून भऽ गेल अछि‍। ओना पाछु घुमि‍ कऽ देखलापर नहि‍ बुझि‍ पड़ैत जे मि‍थि‍लांचलमे पहि‍नेसँ कम जनसंख्‍या अखन अछि‍ मुदा, श्रमशक्‍ति‍क अभाव जरूर भऽ गेल अछि‍। तहि‍ना उपजाउ माटि‍क सेहो ह्रास भऽ गेल अछि‍। नीक माटि‍ बालुमे बदलि‍ गेल अछि‍। सोलहन्नी तँ नहि‍ मुदा, आधा नहि‍ तँ ति‍हाइक दशा जरूर बि‍गड़ि‍ गेल अछि‍। जे गाम कहि‍यो अन्नक बखारी छल ओ आइ राजस्‍थान सदृश्‍य मरूभूमि‍ बनि‍ गेल अछि‍। गाछ-वृक्षसँ सजल गाम वस्‍त्र वि‍हि‍न नारी सदृश्‍य बेनग्‍न भऽ गेल अछि‍। ओना जेहो बचल अछि‍ तहूमे पानि‍क अभाव, खाद बीआक गड़बड़ीसँ नरकंकाल जेकॉं गामक सक्‍ल बनि‍ गेल अछि‍। सभ कि‍छु होइतो भोला चैनसँ गृहस्‍ती करैत अछि‍ आ गृहस्‍तक गौरवसँ मंडि‍त अछि‍। ि‍कएक तँ जते खेतबला पलाएन केलक ओ अपन खेत-पथार तँ नहि‍ लऽ कऽ गेलाह। खेत तँ गामेमे रहल। भोला सन-सन खेति‍हरकेँ स्‍वर्ण-अवसर भेटल। अखन धरि‍ जे बटाइ प्रथा छल ओहि‍मे सुधार भेल। पहि‍ने बटेदारकेँ उपजाक आधा वँटबारा होइत छलै। जहि‍सँ बटेदार सदति‍ काल घाटामे रहैत छलाह। घाटाक खेती देखि‍ बटेदार बटेदारी छोड़ि‍ बोइने-बुत्ताकेँ नीक बुझए लगल। मुदा बटाइमे सुधार भेने मनखपक चलनि‍ भेल। धानक वँटबारा पनरह ि‍कलो प्रति‍ कट्ठा जमीन बलाक ि‍हस्‍सा आ बाकी बटेदारक। तहि‍ना गहूमोक उपजाक वँटबारा हुअए लगल अछि‍। तरकारीक खेती सेहो तहि‍ना हुअए लगल अछि‍। दुइये बेकती भोला, तेँ कते खेती करत। मुदा तइओ एक बीघा बटाइ खेतीक करैत अछि‍। ओना अपनो पनरह कट्ठा खेत छइहे। ओहि‍ एक बीघा खेतमे गरमा धान काटि‍ अगते गहूमक खेतीक कऽ लैत अछि‍। गहूमो अगते भऽ जाइ छै। गहूम काटि‍ खेत पटा “पूसा बैशाखी” खेरही कऽ लैत अछि‍। यएह ओकर फसल चक्र छै। सालो भरि‍ मारि‍-धुसि‍ खेवो करैत अछि‍ आ खेतबलाकेँ सेहो दैत अछि‍। तरकारीक खेतीमे सेहो सुधार केलक। आब ओ हॉंजीपुरक बीआ मंगाएव छोड़ि‍ हाइब्रि‍ड बीआ नामी-नामी कम्‍पनी सभसँ मंगा अपनो खेती करैत अछि‍ आ बीआ -बीहनि-‍ सेहो बेचैत अछि‍। जहि‍सँ सब दि‍ना काज सेहो रहैत छै आ आमदनि‍यो बढ़ि‍या होइ छै। गाममे काली पूजाक -मेलाक- अंदाजसँ पनरह घुरमे बीआ पाड़लक। कि‍ऐक तँ इलाकाक लोक भोलाक बीआकेँ जनैत अछि‍। सभ जनैत अछि‍ जे भोलाक बीआ सन कोनो बेपारीक बीआ नहि‍ होइत छैक। बीआ रहि‍तो आन बेपारीसँ सस्‍तेमे वेचवो करैत अछि‍। मुदा अइबेर वेचाराकेँ गरदनि‍ कट्टी भऽ गेल। तेहन वर्खा भेल जे चौमासमे दनार फोड़ि‍ देलकै जइसँ सौँसे बीरार माटि‍सँ भरि‍ गेलै। बीआक दशा देखि‍ भोलाकेँ ठकमूरी लगि‍ गेलै। मुदा नि‍राश नहि‍ भेल। एते आशा रहवे करै जे एक-बेरक ने नष्‍ट भेल। पुन: पाड़ि‍ लेब। दोकानक छि‍जानैत देखि‍ दुनू परानी ललि‍तक मन वि‍चलि‍त भऽ गेल। साल भरि‍क मेहनतकेँ नष्‍ट होइत देखि‍ सुरजी तुरूछि‍ कऽ पति‍केँ कहलक- “जेकर बनरी सएह नचाबे। कोन दुरमति‍या अहॉंकेँ कपारपर चढ़ि‍ गेल जे मि‍ठाइक दोकान केलौं। हलुआइक काज जे आन जाति‍ करत तँ एहि‍ना हेतै कि‍‍ ने।” एक तँ पूँजी नष्‍ट होइत ललि‍त देखए दोसर पत्‍नीक गनजन सुि‍न मन थरथर कँपए लगलै। कड़ुआइल मने उत्तर देलक- “कोनो काज कोनो जाति‍क बान्‍हल नै छै। जेकरा जे लुरि‍ रहतै से कि‍अए ने ओ काज करत कोनो कि‍ अपने टा बर्वाद भेल आि‍क सबहक भेलै।” “सबहक ि‍कअए ने हेतइ। गौवॉं  सभ ने अकड़रह केलक। ि‍बना काली महरानीकेँ बाक नेने गाममे पूजाक कि‍अए ठानि‍ देलक। पहि‍ने भगताकेँ बजा पूजा ढाड़ि‍ बाक लऽ लैत। से तँ केलक नै। देवीओ-दुर्गाकेँ हँसि‍ये-ठट्ठा बुझलक। तेँ ने ऐना भेलै।” पत्‍नीक बात सुि‍न ललि‍त मुँह बन्न कऽ चुप्‍पे रहल। चाि‍र साल पहि‍ने ललि‍त नोकरी करैले बि‍राटनगर गेल। हलुआइक दोकानमे नोकरी भेलै। पहि‍ने तँ कोनो मि‍ठाइ बनवैक लूरि‍ नहि‍ रहै मुदा, रहैत-रहैत सभ ि‍मठाइओ आ आनो-आनो चीज बनबैक लूरि‍ भऽ गेलै। दू सालक बाद मनमे एलै जे जखन सभ लूि‍र भऽ गेल तखन अनेरे ि‍कअए नोकरी करै छी। से नै तँ गामेमे जलखैयो आ मि‍ठाइयोक दोकान खोलब। गाम आवि‍ सोचलक तँ मनमे एलै जे ऐठाम मि‍ठाइ दोकान चलैबला नै अछि‍। कहि‍ओ-काल कि‍यो-कि‍यो मि‍ठाइ कीनैए। तइसँ दोकान थोड़े चलत। एकटा चाहक दोकान छै ओकरो देखै छि‍यै जे सभ दि‍न उधारीक दुआरे गहि‍की सभसँ झगड़े होइत रहै छै। फेरि‍ घुरि‍ कऽ वि‍राटेनगर जाइक मन भेलइ। मुदा नोकरी करैबला परि‍वार सबहक दशा देखि‍ मन नहि‍ मानलकैक। मासे-मास रूपैया पठबैत रहू मुदा, घरक कोनो ठौर-ठेकान नहि‍। ने ि‍धया-पूता स्‍कूल जाइए आ ने घरेवाली कोनो काज करैए। अपने गाममे रहब तँ सभ कुछ सुढ़ि‍या जाएत। गामोमे की काजक कमी छै। फेरि‍ मनमे उठलै जे आब तँ गामोमे तते भोज-काज होइए जे उठो काज करव तइओ परदेशसँ बेसि‍ये कमा लेब। पहि‍ने जेकॉं ि‍क आब लोक थोड़े भतभोज करैए। आब तँ हढ़ि‍यो-सुढ़ि‍यो बरयातीकेँ पूड़ी-मि‍ठाइ खुआवैए आ श्राद्धोक भोज मि‍ठाइऐक होइ छै। हजार-हजार, डेढ़-डेढ़ हजार रूपैया मि‍ठाइ बनौनि‍हार लइ छै। वि‍आह ने सि‍जीनल होइए। मुदा सराधक तँ कोनो सि‍जीन नै होइ छै। दोसरो काज ठाढ़ कऽ लेब आ जै दि‍न काज भेटत तै दि‍न काजो कऽ लेब। पच्‍चीसो-पचास काज सालमे पकड़ाएत तइओ पच्‍चीस-पचास हजारक कमाइ भइये जाएत। पावनि‍यो आ भारो-दौरमे लोक मि‍ठाइक चलैन केने जा रहल अछि‍। अखन शुरूआती समए अछि‍ तेँ अबूह बुझि‍ पड़ैत अछि‍। मुदा जखन काज शुरू करब तखन अनेरे काज बढ़ए लगत। पहि‍लुका जेकॉं तँ आब लोकक हालतो गड़बड़ नहि‍ये छैक। पहि‍ने लोककेँ भरि‍ पेट खेनाइयो ने होइ छलै मुदा, आब तँ से बात नहि‍ रहलै। जेना-जेना हालत सुधरतै तेना-तेना खेनाइयो-पीनाइ आ आनो-आन काज सुधरतै। तहूमे कि‍ सब गाममे थोड़े हलुवाइ अछि‍। जखने लोक बुझत कि‍ आनो-आनो गामबला सभ आबि‍-आबि‍ काज करैले कहत। सोचैत-वि‍चारैत ललि‍त, गामेमे रहि‍, अपन ‍ कारोवार करैक नि‍र्णए कऽ लेलक। नि‍र्णए करि‍तहि‍ मि‍ठाइ बनवैक सॉंचो आ बरतनो-जात कीनि‍ लेलक। पॉंचे दि‍नक उपरान्‍त फागुनक लगन पकड़ा गेलै। बाप रे ऐहन लगन कोनो साल नहि‍ भेल छलैक। पनरह-सोलहटा ि‍वआहक दि‍न। बूढ़-ठेंर सभ उठि‍ जाएत तहूमे कि‍ कोनो सरकारी नोकरी छी जे जते दरमाहा तइँ भेल ओतवे रहत। जखने काजक धुमसाही हेतइ तखने कारीगरक कमाइ बढ़तै। जहि‍ना कम वस्‍तु रहने दाम बढ़ैत अि‍छ आ बेसी वस्‍तु भेने दाम घटैत अछि‍ तहि‍ना ने कम काज रहने रेट कमत आ वेसी काज भेने रेट बढ़त। टोटल-नफा मि‍ला कऽ ने मासक हि‍साव हएत। सोलहो लगनमे ललि‍त चौबीस हजार कमाएल। तइपर सँ अपूछ खेनाइ-पीनाइ संग ि‍कछु-कि‍छु उगरहला समानो भेलइ। मासो दि‍न व्‍यस्‍त रहल। मुदा कमाइक संग एकटा रस्‍तो भेटि‍लै। ओ ई जे अंति‍म लगनक काज करए गेल तँ घरवारी घरपर नहि‍। बरि‍आतीक भोजन बनवै आ खुअबै-पि‍अवैक बरतन भाड़ापर आनए गेल रहए। गप-सप्‍प करैक समए ललि‍तकेँ भेटल। गप्‍प-सप्‍पक क्रममे बुझलक जे दू हजार रूपैया बरतन-वासनक भाड़ा लगत। बाजल तँ कि‍छु नहि‍ ललि‍त मुदा, मने-मन हि‍साव बैसौलक जे जते दू ि‍दनक मेहनतमे कमाएव ओते तँ वरतने-वासन कमाइत अछि‍। मनमे जँचि‍ गेलै। सभ बरतनक हि‍साव जोड़लक तँ बुझि‍ पड़लै जे जते पूँजी लगाएव ओते नमहर काजो माने कारोवार हएत। तत्‍काल तँ ओते पूँजि‍यो ने अछि‍ आ समान रखैक जगहो नहि‍ अछि‍। से नहि‍ तँ पहि‍ने एकटा घर बनाएव जरूरी अछि‍। जखन घर भऽ जाएत तखन बहुत नमहर नहि‍ एक बरि‍आती जोकर समान माने वरतन-वासन कीनि‍ लेब। फेरि‍ बुझल जेतैक, जेना-जेना पूँजी होइत जाएत तेना-तेना कारोवार बढ़वैत जाएव। नव कारोवार देखि‍ मनमे खुशी एलै। खुशी अबि‍ते नजरि‍ दौड़लै। तेसर इजोतक लेल जेनरेटर। मुदा टेन्‍ट आ जेनरेटरक लेल समांग सेहो लागत। असकरूआ बुते कोना हएत। अपने कारीगरी करब ि‍क ओहि‍मे बरदाएब। सेचैत-सोचैत मन घुरि‍याए लगलै। फेरि‍ मनमे एलै जे टेन्‍ट-जेनरेटरमे ने अपन रहब जरूरी अछि‍ मुदा, बरतनमे तँ से नहि‍ हएत। गि‍नती कऽ कऽ देवइ आ लेबइ। साल भरि‍क उत्तर ललि‍त दोसरो काज ठाढ़ कऽ लेलक। दोहरी कमाइ हुअए लगलै। ललि‍तक आमदनी आ काज देखि‍ गामक लोक कहए लगलै जे ललि‍तक कपार जगि‍ गेलै। कोना नहि‍ जगैत? सुतल कपार माने बुद्धि‍केँ जगौलासँ ने जगैत अछि‍। जँ से नहि‍ जगाएव तँ ओहि‍ना ने सुतल रहैत अछि‍। दोहरी कारोवर भेलाक उपरान्‍तो ललि‍तकेँ कि‍छु समए वैसारी बुझि‍ पड़लै। बैसारीक लेल सोचए लगल जे एकरा कोना काजमे आनव। अपना खेत-पथार नहि‍। मुदा संयोग नीक रहल। एक गोटेक माए दुखि‍त पड़ल। वेचाराकेँ लहेरि‍यासराय इलाज करबए जाइक रहैक। ललि‍तक आमदनी गामक सभ बुझए लगल। अपन लाचारी देखवैत मकशूदन ललि‍तकेँ कहलक- “भाय, वि‍पत्ति‍मे पड़ि‍ गेल छी। माएकेँ तेहेन बीमारी भऽ गेल अछि‍ जे लहेरि‍यासराय लऽ जाए पड़त। तमुरि‍या डॉक्‍टर सहाएवकेँ बीमारी जँचैक मशीने ने छन्‍हि‍। तेँ कहलनि‍ जे बि‍ना लहेरि‍यासराय गेने इलाज नहि‍ भऽ सकत।” मकशूदनक बात सुि‍न ललि‍त पुछलक- “हमरा की कहै छी। जँ देहक काज हुअए तँ अखने संगे चलब।” “नै, समांगक काज नहि‍ अछि‍। ललि‍त भाय, रूपैयाक जरूरत अछि‍।” फेरि‍ ओंगरीसँ देखवैत मकशूदन बाजल- “अहॉंक घरे लगहक दसो कट्ठा खेत भरना दऽ देव। पनरह हजार रूपैया सम्‍हारि‍ दि‍अ।” मकशूदनक मजवूरी देखि‍ ललि‍तक मनमे एलै जे बीमारी, आ बच्‍चा सभकेँ पढ़ैक लेल रि‍नो-पैइच कऽ कऽ मदति‍ करक चाही। ऐहन समएक मदति‍ सि‍र्फ लेने-देन नहि‍, घरमक काज सेहो छी। घरसँ पनरहो हजार रूपैया नि‍कालि‍ दऽ देलक। रूपैया लैत मकशूदन बाजल- “भाय, कागज बना लाए?” कागजक नाओ सुनि‍ ललि‍त अवाक् भऽ गेल। मने-मन सोचए लगल जे कोनो कि‍ केवाला लेलहुँहेँ जे लि‍खा-पढ़ी कराएव। भरनाक लेल लि‍खा-पढ़ीक कोन जरूरत छैक। समाजमे कतवो छल-प्रपंच ि‍कएक ने आवि‍ गेल होइ मुदा, समाज तँ समाजे छी। अखनो ऐहन-ऐहन लोक छथि‍ जे दोसराक बच्‍चाकेँ पढ़ैमे, इलाजमे, माए-वापक क्रि‍या-कर्ममे ओहुना मदति‍ कऽ दैत छथि‍ तहन कागज-पत्तर बनवैक कोन जरूरत अछि‍। जँ मनमे वेइमानी औतनि‍ तँ नहि‍ देताह। मुदा जमीन तँ हमरो कब्‍जामे रहत। समाज ि‍क एहि‍ बातकेँ नहि‍ बुझताह। मुदा अवि‍श्‍वासो कोना कएल जाए? जँ समाजमे बेइमानी-शैतानी बढ़ि‍ गेल अछि‍ तँ इहो बात तँ छि‍पल नहि‍ अछि‍ जे कतेको गोटे माइयो-बापकेँ खाइ-पीवैमे तकलीफ करैत अछि‍। भीन कऽ दैत अछि‍। ई वेइमानी-इमानदारी तँ आदमी-आदमीक बीचक वि‍चार अछि‍। एहि‍ नजरि‍सँ देखलापर मकशूदनकेँ वेइमान कहबनि‍। अपन मुँहक अहार काटि‍ कऽ माइक इलाज करबए जा रहल छथि‍। जहि‍ आदमीमे एते इमानदारी छनि‍ हुनकासँ कागज बनाएव जरूरी नहि‍ अछि‍। अखनो गाममे ढेरो भरना ऐहन अछि‍ जेकर लि‍खा-पढ़ी नहि‍ भेल अछि‍। जँ बेइमानि‍ये करताह तँ अपन माए-पि‍ति‍आइन वुझि‍ बुझव जे समाज सेवा केलहुँ। जँ रजि‍ष्‍ट्री कराएव तँ अधा खर्च हमरो हएत आ अधा हुनको हेतनि‍। बेर-बेगरतामे एक पाइक महत्‍व एक लाखक बराबरि‍ भऽ जाइत अछि‍। सोचि‍-वि‍चारि‍ ललि‍त बाजल- “भाय, अखन अहॉं माएकेँ इलाज करवि‍अनु। लि‍खा-पढ़ीक जरूरत नहि‍ अछि‍।” हाथमे रूपैया अवि‍ते मकशूदनक मनमे वि‍सवास आि‍ब गेल जे माइक इलाज हेबे करत। काजोक ऐहन संयोग होइत अछि‍ जे नीक हेवाक रहत तँ कोनो काजमे बाधा नहि‍ हएत। मुदा अधला हेवाक रहत तँ अनेरो काज सभमे ओझरी लगैत रहत। दस कट्ठा जमीन हाथमे ऐने ललि‍तक मन खुशीसँ गद्-गद् भऽ गेल। तहि‍ बीच सुरजी आबि‍ बाजलि‍- “जँ फेनो‍ रूपैया मांगथि‍ तँ फेनि‍ देबनि‍।” पत्‍नीक बात सुि‍न ललि‍तक मन आरो खुशी भऽ गेल। पुछलक- “कअए?” “अहॉं खेत-पथारक बात नै ने बुझै छि‍यै। कनि‍ये-कनि‍ये देने जखैन बेसी भऽ जाएत तखैन कबल्‍ले लि‍खा लेब।” पत्‍नीक बात सुि‍न एकाएक ललि‍तक मनमे अस्‍सीमन पानि‍ पड़ि‍ गेल। बुदबुदाएल- “देखू अइ दुि‍नयॉंक रीति‍। एक घर कानै एक घर गीत।” तुरूछि‍ कऽ बाजल- “जखैन ि‍कछु बुझैक हएत तखैन पुछि‍ लेब। जाउ, अंगना-घरक काज देखू गऽ।” सुरजी चलि‍ गेलि‍। ललि‍त सोचए लगल जे पहि‍ने अनका खेतमे काज करै छलौं। जे अढ़ा दैत छल से कऽ दैत छेलि‍यै। काजक ने लुि‍र अछि‍ मुदा, काजेक लुरि‍ भेने तँ लोक ि‍गरहस्‍त नहि‍ ने बनि‍ जाइत अछि‍। गि‍रहस्‍तीक लेल काजक लुरि‍क संग कोन समए कोन चीजक खेती हएत। ततबे नहि‍, केहेन समए भेने केहेन खेती कएल जाएत। कतेको प्रश्‍न अछि‍। फेरि‍ मनमे एलै जे खेत तँ बड़ सुन्‍दर अछि‍। घर लग अछि‍ आ बगलमे बोरि‍ंगो छैक। तेँ ऐहन खेती करब जे अधि‍कसँ अधि‍क उपजा हएत। बारह मासक साल होइ छै। साल भरि‍पर मौसम बदलैत अछि‍। जहि‍ना-जहि‍ना मौसम बदलत तहि‍ना-तहि‍ना खेति‍ओ माने फसलो बदलब। नीक हएत जे पहि‍ने गरमा धानक खेती कऽ लेब। जे चारि‍ मासमे भऽ जाएत। धान काटि‍ अल्लुक खेती कऽ लेब। जे तीन मासमे भऽ जाएत। अल्‍लु उखाड़ि‍ िपयौज कऽ लेब। जे वैशाख अबैत-अबैत भऽ जाएत। कमो खेत रहने बेसी उपजा हएत। संगे अपनो तँ कारोवारि‍ये छी तेँ वेसी समयो नहि‍ बँचैत अि‍छ। गाममे मेला भेने ललि‍त मि‍ठाइक बढ़ि‍यॉं दाेकान केलक। मुदा झॉंट-पानि‍क दुआरे बनौल मि‍ठाइयो आ सामानो सभ दुइर भऽ गेलै। मुदा सबहक क्षति‍ देखि‍ मन घवड़ाएल नहि‍। कोनो कि‍ कर्जा लऽ कऽ दोकान केने छी जे एक दि‍स सभ नोकसान भेल आ दोसर दि‍स महाजन कपारपर चढ़त। भरि‍ राति‍ दोकानेकक चीज-वौस सम्‍हारैमे दुनू परानीकेँ लगि‍ गेल। पॉंच दि‍न पहि‍ने ललि‍त दसो कट्ठामे कुफरी अलंकार अल्‍लु रोपने रहए। समस्‍तीपुरसँ अल्‍लूक बीआ अनने रहए। भोरमे जखैन खेत देखलक तँ ठहुन भरि‍ पानि‍ खेतमे देखि‍ नि‍राश भऽ गेल। एक तँ दोकानक पूँजी नष्‍ट भऽ गेल दोसर खेतीओ डूबि‍ गेल। सभ अल्‍लू माटि‍ये तरमे सड़ि‍ जाएत। तते पानि‍ लगल अछि‍ जे मास ि‍दन जोतैइयो जोकर नहि‍ हएत जे दोहराइयो कऽ रोपि‍ लेब। खेतसँ आि‍ब पेटकान लाधि‍ देलक। मनमे एलै, छह मासक कमाइ डूबि‍ गेल। मुदा फेरि‍ हूबा केलक जे अही सब संग ि‍क अपनो परान गमा लेब। जहि‍ना सभकेँ भेल तहि‍ना हमरो भेल। जहि‍ना सभ ि‍दन काटत तहि‍ना हमहूँ काटब। तइले अनेरे सोगा कऽ की हएत। जीवन संघर्ष- ५ भरि राति‍ जहि‍ना गामक लोक जगले रहि‍ गेल तहि‍ना मेलो देखि‍नि‍हार आ दोकानो-दौरी केनि‍हार। मुदा अपनापर सभकेँ अचरज लगै जे जाति‍ सुतैबला छी ओइमे कन्ना दि‍नोसँ बेसी काज केलहुँ। अन्‍हार गुप-गुप राति‍ ने इजोत ने चान, अमावसि‍यो ओहन जहि‍मे धनधाेर करि‍या बादल आि‍ब आरो अन्‍हार कऽ देने रहए। आध पहर राति‍येसँ दोकानोदार आ नाचो-तमाशाबला भगए लगल। ओना गाड़ी-सवारीक अभाव गाममे मुदा, मोबाइल जे ने करए। राति‍-राती कतएसँ ओते गाड़ी आबि‍ भोर होइत-होइत कदबा कएल खेत जेकॉं बना देलक। सभ -गौओं-अनगौओं- अपन-अपन जान बँचल देखि‍ खुशी रहए। अपन-अपन समांगक गि‍नती करैकाल कि‍यो-कि‍यो खुशि‍यो रहै आ कि‍यो-कि‍यो, समांगसँ आनो-आनचीज नोकसान देि‍ख, कनि‍येसँ बेसी धरि‍ दुखि‍यो रहए। मुदा दैवक डांगक देवाक शक्‍ति‍ नहि‍ बुझि‍ अपन-अपन भाग्‍यकेँ कोसि‍ कने-मने व्‍यथि‍तो रहए। चारू पार्टी -वृन्‍दावनक रास, मुजफ्फरपुरक नाट्क, मेल-फीमेल कौव्‍वाली आ महि‍सोथाक मलि‍नि‍या नाच- अधा-अधा रूपैया पहि‍ने सट्टे करबैकाल लऽ लेने रहए, तेँ कमि‍टि‍क भेंटि‍ करब जरूरी नहि‍ बुझि‍ अनरोखे डेरा तोड़ी लेलक। तेकर कारणो रहै, कारण रहै जे स्‍टेजबला घटना सभ देखनहि‍ रहै, जहि‍सँ सभकेँ थर-थरी पैसल। जखने घटना भेल तखने थाना-बाहानक‍ दौड़ शुरू हएत। जखने दौड़ शुरू हएत तखने जे फॉंटि‍पर पड़त, जहलक हवा खाएत। तइसँ नीक जे कने थाले-खि‍चार ने छै मुदा, जान बँचत तँ देहेक सावुनसँ कपड़ो खीचि‍ लेब। मुदा ऐठामसँ पड़ाएवे नीक हएत। तहि‍ना बनि‍यो-बेकाल सेचै जे एक तँ पूँजी गेल तइपर सँ अनेरे कोट-कचहरीमे जे बरदाएव तइसँ नीक जे बँचल रहब तँ कमा लेब। अनगौवॉंक तँ अनगौवॉं बुझए मुदा, गामक गि‍नतीमे देवनाथ आ जोगि‍नदर कमेत रहए। राति‍ये दुनू मरि‍ गेल आकि‍ पड़ा गेल, ई बात मंगलक मनकेँ झकझोड़ैत रहए। गाममे जते पाहुन-परक आएल रहथि‍ सबहक मनमे यएह होइत रहनि‍ जे कतए एलहुँ तँ कतहुँ नहि‍। तइपर सँ जहि‍ना झॉंट-पानि‍मे गाछपर रहैबला चि‍ड़ै-चुनमुनीक होइत तहि‍ना पहुनाइ करैबला पाहुन सबहक होइत रहनि‍। मुदा-कहथि‍न ककरा। लोक अंगना-घरक टाट-फड़क सोझराओत कि‍......। ओना जेठक रौदमे तपल धरतीपर बि‍हड़ि‍या हाल भेने जेहन सुगंध माटि‍सँ नकलैत तेहन नहि‍। कोन दोग देने जाड़ो चलि‍ आएल सेहो ने कि‍यो देखलक। जहि‍ना जवानीक आगमनसँ शरीर सभ अंगक सौन्‍दर्य दि‍टका अपना दि‍स आकर्षित करैत तहि‍ना धरतीयोक पि‍याससँ जरल मन छॉंक भरि‍ पानि‍ पीवि‍तहि‍ शक्‍ति‍ पावि‍ आलि‍ंगनक लेल दुनू बॉंहि‍ पसारि‍ अपन प्रि‍यतम -कि‍सान- केँ बारहमासा सुनए लगल। पि‍याससँ सुखाइत कि‍सानोक कंठ पानि‍ पीबि‍तहि‍ तृप्‍त भऽ प्रि‍यतम दि‍स ऑंखि उठा-उठा देखए लगल। देखए लगल जे अखन धरि‍ पि‍याससँ मरनासन्न भऽ गेल छलीह एकाएक कते शक्‍ति‍बान भऽ गेलीह। नव सृजनक शक्‍ति‍सँ लऽ कऽ सुखाएल-जरल जजात तकमे जान फूकि‍ देलनि‍। अखन धरि‍ गामक कि‍सान धानक खेतीमे बँटाएल छथि‍। बटेवाक अनेको कारणमे दू कारण प्रमुख अछि‍। पहि‍ल, खेतक बनावटि‍ आ मनक सोच। साबि‍कसँ अबैत खेती -उपजवैक ढंग- आ आधुनि‍क बैज्ञानि‍क ढंग। जहि‍ठाम अदौसँ अबैत खेती रासायनि‍क खाद, समुचि‍त पानि‍ -सि‍ंचाई-, उन्नत बीआक संग नव तकनीकक -लूरि‍क- अभावमे पाछुए मुँहे लुढ़कैत गेल अछि‍ ओकरा आगू मुँहे कोना बढ़ौल जाए, मूल प्रश्‍न सबहक सोझमे ठाढ़ अछि‍। देशक बढ़ैत जनसंख्‍या की खाएत? ई वि‍चार तँ खेतक मालि‍क कि‍सानेकेँ करए पड़तनि‍। मुदा कि‍सानो तँ खेतकेँ मात्र खति‍आने, दस्‍तावेज धरि‍ बुझैत छथि‍। ऐहना परि‍स्‍थि‍ति‍मे हमरा की ‍करए पड़त, ई ने बुझए पड़तनि‍। नहि‍ बुझैक अनेको कारणमे एकटा इहो कारण अछि‍ जे चाहे जे कोनो प्रचार माध्‍यम् हुअए वा प्रवचन देनि‍हार होथि‍, ओ अखन धरि‍ कि‍सानक स्‍वरूपकेँ झॉंपि‍ कऽ रखने छथि‍। जेकरा इमानदारीसँ कि‍सानक बीच रखए पड़त। जँ से नहि‍ तँ छह सए बर्ख पूर्व -जे लगभग पच्‍चीसो पीढ़ी होएत- तुलसीदास “वि‍नय पत्रि‍का” मे समाजक दशा देखलनि‍- “खेती न कि‍सान को।” जँ कि‍सानक खेती भरि‍ जाए, व्‍यापारीक व्‍यापर तँ भि‍खमंगोकेँ के भीख दऽ सकत। जँ भि‍खारीकेँ भीख नहि‍ भेटनि‍ तँ पार्वती महादेव सन भि‍खमंगाक संग काए दि‍न रहती। प्रश्‍न मात्र खेतीएक नहि‍ जीवनक छी। आजुक जेहन समए भऽ गेल अछि‍ ओहि‍ अनुकूल जाधरि‍ अपनाकेँ नहि‍ बना समएक संग नहि‍ चलि‍ सकब ताधरि‍ बच्‍चा जेकॉं लुढ़कि‍-लुढ़कि‍ खसि‍ते रहब। मुदा समएक संगो होएव धीया-पूताक खेल नहि‍। धरतीपर सभसँ श्रेष्‍ठ जीव मनुष्‍य होइतहुँ एक-दोसरसँ करोड़ो कोस हटल अछि‍। जहि‍ना वि‍शाल बनमे लाखो-करोड़ो प्रकारक गाछ-वि‍रीछसँ लऽ कऽ झाड़-झूड़ होइत माटि‍मे सटल घास धरि‍ रहैत अछि‍ तहि‍ना मनुक्‍खोक बोनमे अछि‍। एक दि‍स अज्ञानक अंति‍म छोड़पर रहनि‍हार तँ दोसर दि‍स चानपर वास करैबला। मुदा जहि‍ना बनमे छोटसँ छोट जन्‍तुसँ लऽ कऽ बाघ, सि‍ंह, हाथी धरि‍क भोजनो आ रहैओक व्‍यवस्‍था अछि‍ तहि‍ना ने मनुक्‍खोक बनमे अछि‍। अनेको तरहक बाट आ वि‍चार अदौसॅ अबैत रहल अछि‍। एक पुरूष-नारीक संबंधकेँ धरमक श्रेणीमे रखनि‍हार अपनहि‍ नि‍यम तोड़ि‍ नि‍यामक छथि‍। जि‍नकर देखा-देखी बढ़ि‍ते गेल अछि‍। जहि‍सँ सदति‍काल नव-नव वि‍चारक संग नव-नव बाट बनि‍ रहल अछि‍। मुदा जहि‍ना समुद्रमे अमूल्‍य रत्‍नसँ लऽ कऽ घोंघा-सि‍तुआ-धरि‍ आनन्‍दसँ रहैत अछि‍ तहि‍ना ने समाजोमे अछि‍। मुदा तेँ सघन खरहोि‍रमे चलनि‍हार नहि‍ छथि‍, जरूर छथि‍। भले जहि‍ खरहोरि‍मे एक इंच खाली जगह नहि‍ रहनहुँ खढ़क गाछकेँ दुनू हाथे बि‍हि‍या-बि‍हि‍या एक भागसँ दोसर भाग पाड़ करि‍तहि‍ छथि‍। आजुक सघन जि‍नगी ऐहने भऽ गेल अछि‍। मुदा प्रश्‍न उठैत जे सीना तानि‍ आगू मुँहे बढ़ल जाय वा पीठ देखा पाछु मँुहे ससरल जाय? जाधरि‍ सीना तानि‍ आगू मुँहे नहि‍ बढ़ब ताधरि‍ असीम शान्‍तक गाछ लग कोना पहुँचब? जँ से नहि‍ पहुँचब तँ अनेरे कि‍अए अन्न-पानि‍केँ दुि‍र करै छि‍यै। जि‍नगीक सफलताक सर्टिफि‍केट सि‍र्फ कठि‍न साधनासँ भेटैत छैक नहि‍ कि‍ कट-पीस रास्‍तासँ। जाधरि‍ असीम शान्‍ति‍ नहि‍ पएब ताधरि‍ जि‍नगीक सफलताक सर्टि‍फि‍केट कोना पाबि‍ सकब। मेघौन मेघ रहने सूर्य अबेर कऽ ओछानि‍ छोड़लनि‍। मुदा तेँ कि‍ अकासमे उड़ब चि‍ड़ै बि‍सरि‍ गेल। गोसाँइकेँ जगवैत ढोलि‍या गोवरधन पूजा करबए गाम दि‍स बि‍दा भेल। मनमे खुशी। कि‍ऐक नहि‍ खुशी रहतै खेतजोति‍नि‍हार कि‍सानसँ लऽ कऽ गाए पोसि‍नि‍हार कि‍सान धरि‍ एहि‍ठाम जेबाक छैक। आमदनि‍यो नमहर तँ मेहनतो कम नहि‍। गोवरधन पूजाक लेले कि‍यो करमी लत्ति‍क भॉंजमे तँ कि‍यो ठेका-गरदामीक ओरि‍यानमे जुटल। कि‍यो दोकानसँ रंग आनि‍ गरदामी रंगैत तँ कि‍यो रंग-ि‍वरंगक गाछ-पात-बुट्टीक ओि‍रयान सोनहाउनले करैत। स्‍त्रीगण सभ भि‍ने बताहि‍ भऽ गोधन महराजक संग-संग धान-मड़ूआक बखारी बनवैत। मुदा मनमे एकटा शंका रहवे करनि‍ जे ढोलि‍या ने पहि‍ने आबि‍ जाय। बेचाराकेँ सौँसे गाम घूमए पड़तै कि‍ कोनो हमरे ऐठाम भरि‍ दि‍न रहने पेट भरतै। कि‍यो खरि‍हान बनबै पाछु बेहाल तँ कि‍यो जन-बोनि‍हार मि‍लि‍ चाह-पान करैत। ओना समएक फेरि‍मे पड़ि‍ कि‍यो भोरमे सुप नहि‍ बजौलनि‍। हो न हो दरि‍दरा कहीं नि‍र्विरोध सालो भरि‍क लेल फेरि‍ ने रहि‍ जाय। मुदा साले साल भगौनौ -सुप बजा- तँ रहि‍ये जाइत अछि‍ तखन भगै कि‍ अछि‍। जहि‍ना परशुराम क्षत्रि‍यकेँ मेटबैक लेल दर्जनो बेरि‍ सामुहि‍क हत्‍या केलनि‍ मुदा, तइओ क्षत्रि‍य रहि‍ये गेलाह। हो न हो कहीं ऐहने जि‍वठगर दरि‍दरो ने तँ अछि‍। झॉंट-पानि‍क चलैत काली-पूजाक जे दशा भेल ओ तँ भेवे कएल जे, कतेको समस्‍या समाजक बीच आनि‍ कऽ रखि‍ देलक। जहि‍ना घर बन्‍हैकाल एक-एक वस्‍तुक ओि‍रयान करए पड़ैत अछि‍ तहि‍ना खसलो करै पड़ैत अछि‍। साइकि‍ल उठा मंगल काली-पूजा समि‍ति‍ बैसार करैले समि‍ति‍क सदस्‍य ऐठाम वि‍दा भेल। सभसँ पहि‍ने देवनाथ ऐठाम पहुँचल। देवनाथकेँ दरवज्‍जापर नहि‍ देखि‍ जोरसँ बाजल- “देवनाथ जी, यौ देवनाथ जी......।” मुदा कार-कौआ धरि‍क कुचरब नहि‍ सुनि‍ पुन: दोहरौलक- “देवनाथ जी, यौ देवनाथ जी.....।” देवनाथक नाओ सुनि‍ पत्‍नी आंगनसँ नि‍कलि‍, बजलीह- “काल्‍हि‍ बेरू पहर जे घरपर सँ नि‍कललाह ओ अखन धरि‍ कहॉं एेलाहेँ। कालि‍ये स्‍थानमे छथि‍।” काली स्‍थानक नाओ सुि‍न मंगल चौंकि‍ गेल। बाजल- “कालि‍ये स्‍थानमे वैसार छी, यएह कहैले आएल छलौं। जँ ओतै हेता तँ भेंटे भऽ जेता नइ जँ घरपर आि‍ब जाथि‍ तँ कहि‍ देवनि‍।” कहि‍ जोगि‍नदर ऐठाम वि‍दा भेल। ओकरो पता नहि‍ बीसो सदस्‍य ऐठाम पहुँच मंगल घरपर आबि‍ साइकि‍ल रखि‍ काली स्‍थान वि‍दा भेल। एका-एकी एगारह गोटे -सदस्‍य- काली स्‍थान पहुँचल। गप-सप्‍प शुरू भेल। जीबछ मंगलकेँ पुछलक- “सि‍ंहेसर भाय कि‍अए ने आएल?” जीवछक बात सुि‍न मंगल बाजल- “ओ तँ घरोपर नै रहए। घुरऽ लगलौं तँ माए भेटली। पुछलि‍एनि‍ तँ वएह कहलनि‍ जे आध पहर राति‍ये खाटपर टॉंगि‍ दुखाकेँ डाकडर अइठीन लऽ गेलै।” “की भेलै दुखा कक्काकेँ?” “वएह कहलनि‍ जे ओहो मेले देखए गेल रहए। जखैन पानि‍-वि‍हाड़ि‍ आएल तँ घरपर पड़ाएल। रास्‍तामे एकटा घुच्‍चीमे पएर पड़ि‍ गेलै कि‍ खसि‍ पड़ल। ठेहुने टुटि‍ गेलै।” ठेहुन टूटब सुि‍न अपसोच करैत जीबछ बाजल- “बाप रे जुलुम भऽ गेलै। वेचाराकेँ ने अपना बेटा छै, बेटि‍ओ सासुरेमे रहै छै। घरोवाली हफ्सीएक रोगी छनि‍। हे भगवान तोहूँ बड़ अन्‍यायी छह। जेकरा दुख दइ छहक ओकरा मुरदा जेकॉं एक-एकटा चेरा चढ़वि‍ते रहै छह। हम तँ बुझवे ने केलि‍यै नइ तँ इलाजक खर्च इलाजक खर्च मदैत कऽ दैति‍यै। नीक केलक सि‍ंहेसर। ऐहन-ऐहन बेरि‍पर जे बेटा समाजमे ठाढ़ हएत वएह ने भारत माताक सपूतक प्रथम श्रेणीमे आओत।” मंगल- “जीवछ भाय, हमहूँ तँ बहुत नहि‍ये पढ़ने छी, कि‍ऐक तँ स्‍कूल-कओलेजमे लोक परीक्षा पास करैले पढ़ैए। ज्ञानक पाठ तँ जि‍नगीमे उतड़ला बाद पढ़ैए। जे काज सि‍ंहेश्‍वर भाय करए गेल ओ आइक समाजक मांग छी। मुदा ऐहन-ऐहन काज करैबला बेटा अदौसँ जन्‍म लइत आएल अछि‍। समाजक मुख्‍य सेवा -समाज सेवाक मुख्‍य कर्तव्‍यमे- ऐहन-ऐहन काजकेँ राखल गेल अछि‍। जे सेवा अदौसँ चन्‍दनक गाछ जेकॉं जन्‍म लऽ बढ़ैत-बढ़ैत फुलाइत-फड़ैत रहल ओ ठमकि‍ कऽ सुखि‍ रहल अछि‍। सुखि‍ये नहि‍ रहल अछि‍ एहि‍ गति‍ए सुखि‍ रहल अछि‍ जे कि‍छु दि‍नक उत्तर कोकणि‍ कऽ उकैन जाएत।” मंगलक बात जीबछ दुनू कान ठाढ़ कऽ, ऑंखि‍ बि‍दारि‍, मुँह बावि‍ सुनैत। जहि‍ना मुँहसँ नीक वस्‍तु खेलापर मन खुशी होइत, कानसँ सुनलापर मुँहकेँ हँसेबो करैत आ हृदयकेँ गुदगुदेवो करैत तहि‍ना ऑंखि‍ वि‍वेकक ऑंखि‍केँ सेवा करए पहुँच जाइत। तहि‍ना जीबछोकेँ मंगल बातसँ भेल। बाजल- “भाँइमे कि‍यो दादा हुअए। बच्‍चा भलेहीं उमेरमे वेसी छि‍अह, मुदा भऽ गेलि‍यह बगुरक गाछ जेकॉं जे जहि‍येसँ जनमि‍लि‍यह तहि‍येसँ कॉंटो-कुशमे गना गेलि‍यह। गि‍नति‍येक हि‍सावसँ काजो भेल। मुदा आब समाजक एक खूँटाक रूपमे जि‍नगी ि‍बताएव। जइ स्‍थानकेँ भगवान -झॉंट-पानि‍- मारि‍ देलखि‍न ओइ स्‍थानपर बैसल छी। -श्‍मशान महादेवक साधना स्‍थल- अपना सबहक पुरना -पौराणि‍क राजा जनक- राजा केहेन छेलखि‍न।” मंगल बाजल- “ओ ओहन राजा छेलखि‍न जे एक-एक आदमीक जि‍नगीमे पेसल छेलखि‍न। एते सि‍पाही रखने छलाह जे समएक हि‍सावसँ कि‍यो आगू-पाछू नइ हुअए तइपर सदति‍काल ऑंखि‍ गड़ौने रहैत छलाह।” “हुनकर फुलवारी केहेन छलनि‍?” “हुनकर फुलवारीक जोड़ा दुनि‍यॉंक कोनो राजा नै लगा सकलाह। कि‍छु राजा जरूर अपन धन, बल, जन लगौने छथि‍।” “फुलवारीक गाछ सभ केहेन छै?” “फुलवारीक बीचमे वि‍वेकक गाछ छै। वि‍वेकक बगलेमे मन, बुद्धि‍क गाछ छै। तेकर काते-कात सेवाक गाछ छै जे सदति‍ काल हरीक हरि‍यरीपर नजरि‍ रखैत अछि‍।” मंगलक बात सुि‍न भुवन बाजल- “मंगल, काल्‍हि‍ धरि‍ समाजक जइ काजमे लागल छेलौं, नीक कि‍ बेजाए, सम्‍पन्न भऽ गेल। अखन जे गाम तहस-नहस भऽ गेल अछि‍, पहि‍ने ओकरा देखैक अछि‍। जखने झॉंट आएल तखने कि‍छु नहि‍ कि‍छु सभकेँ झटनै हएत। सतनाकेँ सेहो नहि‍ये देखै छि‍यै?” रस्‍ते कातमे ओकर जामुनक गाछ छलै सएह रस्‍तेपर खसि‍ पड़लै। रस्‍ते बन्न भऽ गेल छै, तेकरे काटै-खोंटैले गेल। “नि‍रधन कि‍अए ने आएल?” “ओकरा तँ आरो बड़का फेरा लागि‍ गेलै। चारि‍ये कट्ठा अपना खेत छै। जइमे कति‍का धान केने अदि‍। गहींरगर खेत छै धान सुतैर गेलै। कालि‍ये पूजा दुआरे पाकल धान खेति‍मे लगौने रहल। एक तँ बौना धान दोसर उपरका खेत सबहक पानि‍ ओलरि‍ कऽ चलि‍ गेल। नि‍पुआंग धान डूबि‍ गेलै। पानि‍यो बहैबला नहि‍ये छै। तहूमे अगहनी धान तँ कनी डँटगरो होइ छै गरमा तँ गरमे छी।” “झोलि‍या ि‍कअए ने आएल?” “एक्केटा घर छै सेहो खसि‍ पड़लै। घरक सभ कि‍छु भीज गेल छै। ओकरे सम्‍हारैमे लागल अछि‍।” एक्के बेरि‍ सभ बाजल- “जतवे गोरे आएल ओतवे गोरे वि‍चारि‍ लि‍अ। जे सभ नहि‍ आएल छथि‍ हुनका सभकेँ कहि‍ वि‍चार बुझि‍ लेब।” साठि‍क दशक। कि‍सानक बीच भारी भूमकम भेल। जहि‍ना अनुकूल वातावरण बनने भारी बर्खा, भूमकम आ अन्‍हर-तुफान अबैत तहि‍ना खेतपर ठाढ़ रहैबलाक बीच भेल। एक दि‍स आजादीक दि‍वाना गाम-गाम जन्‍म लऽ अंगेज भगौलक तँ दाेसर दि‍स समाज सेवा करए आगू सेहो आएल। देश भक्‍त सि‍पाही पर्याप्‍त देशक भीतर तैनात भऽ गेलाह। अंग्रेज भगौलहा फलक गाछ सोझमे छलनि‍। कोना नहि‍ दोसरो-तेसरो गाछ रोपैले तैयार होइतथि‍? दुनि‍यॉंक जते जीब-जन्‍तु अछि‍ सभ सुखसँ जि‍नगी ि‍वतबए चाहैत अछि‍। मनुष्‍य तँ सहजहि‍ मनुष्‍य छथि‍, सभ जीवसँ उपर। ओ ि‍क नहि‍ बुझैत छथि‍ जे प्रशान्‍त सुख पावि‍ लोक आध्‍यात्‍मि‍क पुरूष बनि‍ सकै छथि‍। के नहि‍ चाहताह जे मातृभूमि‍ स्‍वर्गोसँ सुन्‍दर बनै। एक दि‍स जमीन प्रति‍ष्‍ठाक मूल आधार बनि‍ चुकल अछि‍ तँ दोसर दि‍स राजा-रजबाड़क अंत भेने मालगुजारीक शासन समाप्‍त होइति‍क फल सोझमे आबि‍ गेल। राजशाही अन्‍त भेने रसीदक माध्‍यमसँ औना-पौना दाममे जमीन वि‍काए लगल। बकास्‍त जमीनक लड़ाइ गाम-गाम शुरू भेल। एक जवर्दस्‍त भूखण्‍डमे बटाइदारी आन्‍दोलन- “जे जमीनकेँ जोते-कोड़े, ओ जमीनक मालि‍क छी”क नारा आकाशमे उठल। धरती अपन जीवनक लेल बलि‍ मंगैत छथि‍, से भेल। सि‍कमी बटाइक कानून बनि‍ लागू भेल। जतऽ बटेदार तैयार भेल ओतऽ बटाइदारी हक भेटल। जतऽ तैयार नहि‍ भेल ओतऽ अखनो लटकले अछि‍। आम जमीन सभपर दसनामा संस्‍था सभ ठाढ़ हुअए लगल। स्‍कूल, अस्‍पताल बनए लगल। मनुष्‍यक मूल समस्‍या दि‍स जनमानसक नजरि‍ दौड़ल। जहि‍सँ ति‍याग भावनाक जन्‍म भेल। लोअर प्राइमरी स्‍कूलसँ लऽ कऽ मि‍ड्ल, हाइ स्‍कूल धरि‍ बनए लगल। गोटि‍ पङरा कओलेजो बनल। सरकारोक धि‍यान शि‍क्षा दि‍स बढ़ल जहि‍सँ पढ़ै-ि‍लखैक बातावरण बनए लगल। तहि‍ बीच भूदान आन्‍दोलन सेहो शुरू भेल। दानकेँ धर्म बुझि‍ जमीन दान हुअए लगल। गाम-गाम भूदान कमि‍टीक गठन भेल। जहि‍ गाममे कमि‍टी सक्रि‍य भऽ काज केलक ओहि‍ गामक जमीन भूमि‍हीनक बीच आएल मुदा, जहि‍ गाममे सक्रि‍य रूपमे काज नहि‍ भेल ओहि‍ठाम लड़ाइक अखड़ाहा बनल अछि‍। जहि‍ भूदान आन्‍दोलक उद्देश्‍य देशक छठम हि‍स्‍सा जमीन भूमि‍हीनक बीच आबए ओखनो सरकार चारि‍ डि‍समि‍ल वासभूमि‍ दैक शक्‍ति‍ नहि‍ रखने अछि‍। गामक लोक -कि‍सान वर्ग- केँ पलाएन भेने गाममे रहि‍ खेती केनि‍हारकेँ स्‍वर्ण-अवसर भेटल। जमीनोक रूप बदलल। प्रति‍ष्‍ठाक बस्‍तु बुझल जाइबला जमीन रूपैयामे बदलि‍ गेल। बैंकक सूदि‍क हि‍सावसँ जमीनक उपजा बुझल जाए लगल। उपजाक आधा बटाइदारी प्रथा ढील भेल। मनखप, पट्टा, मनहुन्‍डा इत्‍यादि‍क जन्‍म भेल। पनरह कि‍लो कट्ठा धानक उपजा आ दससँ पनरह कि‍लो कट्ठा गहूमक उपजा बटाए लगल। कोसी नहरि‍ आ नव-नव सड़क बनने चौक-चौराहाक संग-संग बोनि‍हारकेँ काजो बढ़ल। मुआवजाक रूपैया सेहो सहायक भेल। शि‍क्षा मि‍त्रक बहाली संग एन.एच.डब्‍लू. सेहो कि‍छु मदति‍ केलक। सड़क बनने गाड़ी-सवारीक धंधा सेहो जन्‍म लेलक अछि‍। मि‍थि‍लांचलमे एक नव वर्गक जन्‍म भेल कि‍सान वर्ग। मुदा एहि‍ वर्गक क्षेत्र छि‍ड़ि‍आइल अछि‍। हरि‍त क्रान्‍ति‍ ऐने जमीनक माने खेतक भाग्‍य चमकल। मुदा जहि‍ रूपमे चमकवा चाहि‍यै तहि‍ रूपमे नहि‍। जँ एक रूपमे चमकैत तँ जहि‍ना कहि‍यो मि‍थि‍ला दुनि‍यॉंक गुरू मानल जाइत छल तहि‍ना पुन: प्रति‍ष्‍ठि‍त भऽ जाइत। तहि‍मे कमी अछि‍। देशमे अखनहुँ कम क्षेत्र अछि‍ जहि‍मे मि‍थि‍लांचल एते इंजीनि‍यर, डॉक्‍टर, वैज्ञानि‍क, साहि‍त्‍यकार इत्‍यादि‍ अछि‍। दुर्भाग्‍य ई जे ओ लोकनि‍ मि‍थि‍ला छोड़ि‍ दुि‍नयॉं भरि‍मे छि‍ड़ि‍अाइल छथि‍। वाध्‍यतो छन्‍हि‍, ने कल-कारखाना अछि‍ जे इंजीनि‍यर ओहि‍मे काज करताह, ने स्‍वास्‍थ लेल समुचि‍त जगह अछि‍ जमि‍मे डॉक्‍टर अपन अँटावेश करताह। ने वि‍ज्ञानक शोध संस्‍था अछि‍ जहि‍मे वैज्ञानि‍क अपन चमत्‍कार देखौताह आ ने पढ़ै-लि‍खैक समुचि‍त व्‍यवस्‍था अछि‍ जहि‍मे साहि‍त्‍यकार अपन प्रति‍भाकेँ नि‍खारताह। गंगा ब्रह्मपुत्र मैदानी इलाका रहैत मि‍थि‍लांचल अनेको नदीसँ सकबेधल अछि‍। नदि‍यो ओहन-ओहन उपद्रवी अछि‍ जे इलाकाक इलाकाकेँ सदति‍काल रूप बि‍गाड़ि‍तहि‍ रहैत अछि‍। लोकक जि‍नगी ऐहन दुभर बनि‍ गेल अछि‍ जे जएह लोकनि‍ मि‍थि‍लांचलमे ठाढ़ छथि‍ ओ धन्‍यवादक पात्र छथि‍। कि‍सानवर्ग बनने जाति‍-वादक बंधन ढील भेल। कतेक ऐहन धंधा -खेतीसँ लऽ कऽ लघु उद्योग धरि‍- अछि‍ जे खास जाि‍तक सीमामे बान्‍हल छल ओ टूटि‍ कोनो धंधा -पेशा- कोनो जाइति‍ऐक बीच नहि‍ रहल। मुदा जहि‍ना कोसीमे डूबल इलाका पुन: कहि‍यो जागि‍ चहटी रूपमे जन्‍म लैत आ पुन: ओहि‍पर बसि‍ मनुष्‍य पुन: पूर्वत गाम बना लैत, तहि‍ना करैक जरूरत अछि‍। जाति‍ पेशा बदलि‍ जाति‍-वयवस्‍थाकेँ ढील जरूर केलक मुदा, राजनीति‍क कुचक्र समाजमे नव समस्‍याक रूपमे ठाढ़ भऽ वि‍कासकेँ बाधि‍त कऽ रहल अछि‍। अनेको तरहक नव-नव बाधा उपस्‍थि‍त भऽ रहल अछि‍। मुदा तेँ कि‍ मि‍थि‍ला मरूभूमि‍ भऽ गेल जे कर्मयोगी पैदा करब छोड़ि‍ देलक। कथमपि‍ नहि‍। सम्‍मि‍लि‍त रूपमे तँ नहि‍ मुदा, छि‍टफुट रूपमे ऐहनो-ऐहनो कि‍सान छथि‍ जे लाख आफत-आसमानीसँ मुकाबला करैत सोनाक स्‍तम्‍भ बनि‍ चमकि‍ रहला अछि‍। नि‍श्‍चि‍त क्षेत्र तँ नि‍र्धारि‍त नहि‍ कएल जा सकैत अछि‍, कि‍ऐक तँ सीमा-वीहीन अछि‍ मुदा, एहि‍ बातसँ नकारलो नहि‍ जा सकैत अछि‍ जे खेतमे ओते धान उपजा रहला अछि‍ जे जापानसँ मुकाबला करैक लेल ठाढ़ छथि‍। तहि‍ना गहूमो, दालि‍योक अछि‍। अखनो हजारो ट्रक आम बाहर जाइत अछि‍। एक इलाकाक तरकारी दोसर इलाका जाइत अछि‍। हजारो ट्रक मसाला आन-आन राज्‍य जाइत अछि‍। एक इलाकाक दूध दोसर-तेसर इलाका धरि‍ वि‍काइत अछि‍। अखन धरि‍क अनौपचारि‍क वैसक जे समाजमे होइत रहल अछि‍ ओ प्रो. दयाबावू आ पूर्व प्रो. कमल बावूकेँ एेलासँ औपचारि‍क रूपमे बदलए लगल। काली स्‍थान पहुँचते कमलबावू बजलाह- “अखन धरि‍क समाजक–-गाम-गामक- इति‍हास हराएल अछि‍ ओकरा पहि‍ने पकड़ू। तेँ जरूरी अछि‍ जे एकटा रजि‍ष्‍टर कीनि‍ लि‍खि‍त रूपमे काज करू।” कमलबावू बात सुि‍न मंगल सोचलक जे लगले रजि‍ष्‍टर कतएसँ आनव तँ आजुक बैठक कागजक पन्नेपर कऽ नि‍चेनसँ रजि‍ष्‍टर आनि‍ ओहि‍पर लि‍खि‍ देवइ। तेकर कारण मनमे नचैत रहै जे दुनू गोटे -दयोबावू आ कमलोबावू- बेसीखान अँटकताह नहि‍, जोरो कोना करबनि‍। जँ जोरो करबनि‍ तँ पटदे कहि‍ देताह जे गाम-समाज अहॉंक छी अपना ढंगसँ चलाउ। मुदा गामक लोक तेहन गड़ि‍मुराह अछि‍ जे धरमेक काज स्‍कूलो आ माइयो-बापक सेेवाकेँ कहताह आ अपने भरि‍ दि‍न बैसि‍ झूठ-फूसमे समए वर्वाद कऽ समाजकेँ तनो-भगन करैत रहताह। अन्‍यायक अखाड़ा समाज बनि‍ गेल अछि‍। ऐहन परि‍स्‍थि‍तमे खाली “सामाजि‍क न्‍यायि‍क” नारा देलासँ समाज सुधरि‍ जाएत। मुस्‍की दैत मंगल प्रो. दयाबावूकेँ कहलकनि‍- “श्री मान्, अपने तँ चारि‍ साल पढ़ौने छी तेँ अपनेपर अधि‍कार अछि‍ जे जे नहि‍ बुझै छी ओ अखनो पुछि‍ सकै छी। मुदा बाबा -प्रो. कमलनाथ- केँ कि‍छु पुछैक अधि‍कार तँ नहि‍ अछि‍। भलेहीं ओ अपने हमरा मनक सभ सवालक जबाव दऽ दथि‍।” मंगलक पेटक बात जना कमलबावू बुझि‍ते रहथि‍ तहि‍ना बड़बड़ाए लगलाह- “रौतुका घटना सुि‍न हृदय पाथरपर खसल ऐना जेकॉं चूर-चूर भऽ गेल अछि‍....। ऑंखि‍क नोर पोछैत पुन: बड़बड़ाए लगलाह- “मुदा दोख ककर लगौल जाएत। कि‍छु दोखी अहूँ सभ छी जे वादमे कहव। अखन ऐतबे कहव जे काल चक्रकेँ रोकब असान नहि‍। ई काल चक्र छल। तेँ प्राश्‍चि‍त कऽ लेब जरूरी अछि‍। दू मि‍नट सभ उठि‍ हुनका लोकनि‍क क्षति‍क स्‍मरण कऽ लि‍अ। रजि‍ष्‍टर पहि‍ल पॉंतीमे शोक प्रस्‍ताव लि‍खि‍ काजकेँ आगू बढ़ाउ।” शोक व्‍यक्‍त कऽ बैसि‍तहि‍ कमलबावू पुछलखि‍न- “समि‍ति‍ कते गोटेक बनौने छलहुँ?” “एक्कैस गोटेक?” “एक तरहक अछि‍। अखन कते गोटे छी?” “एगारह गोटे।” “आरो गोटे?” “दू गोटे हराइले छथि‍, एगारह गोटे हाजि‍रे छी, आठ गोटे दोसर-दोसर जरूरी काजमे लागल छथि‍।” “हूँ, रौतुका झॉंट तँ सभकेँ झँटनहि‍ हेतनि‍।” कहि‍ एकाएक कि‍छु सोचैत पुन: बजलाह- “बाउ मंगल आ अनुज दयाबावू जहि‍ना हम खुशीसँ जीवन-यापन कऽ रहल छी तहि‍ना चाहब जे अहँू सभ जीवि‍ ओहूसँ नीक जि‍नगीक बाट बना आगूक पीढ़ि‍क लेल दि‍यै।” कमल बावू बजि‍तहि‍ रहति‍ कि‍ नेंगरा आ बौनो एक्के बेर बाजल- “जहि‍ना दया कक्का पढ़ल छथि‍ तहि‍ना मंगलो कओलेजक सीढ़ि‍ होइत कोठरी तक पहुँचल छथि‍ मुदा, हम सभ तँ जि‍नगी भरि‍ कोदारि‍ये कि‍लासमे पढ़ैत रहलौं तेँ.....।” ठहाका मारि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत प्रोफेसर कमलनाथ समि‍ति‍केँ संवोधि‍त करैत बजलाह- “नेंगरा आ बौकूकेँ हमर बधाइ जे अपन सीमा देखलक। बाउ नेंगर आ बौकू, बधाइ एहि‍ दुअारे दुनू गोरेकेँ देलौं जे समाजक जवर्दस्‍त समस्‍याक जड़ि‍ पकलौं। अपना समाजमे ई भारी समस्‍या अछि‍ जे कि‍यो अपने सीमा-सरहद नहि‍ बुझए चाहैत छथि‍, ओ धारक रेत जेकॉं चलैत समएसँ कोना जुटि‍ सकताह। जहि‍ना पानि‍क रेतमे ठाढ़ भेने अपनो जान अवग्रहमे रहै छै जे रेतमे खसि‍, भसि‍या कऽ मरि‍ ने जाइ। तहि‍ठाम जँ कि‍यो दस-बीस सेरक मोटरी माथपर रखने हुए ओकर गति‍ कि‍ ओहि‍ रेतपर हेतै। तेँ जहि‍ना अट्टालि‍का बनवै काल सभसँ पहि‍ने ईंटाकेँ देख लेल जाइ छै, जँ से नहि‍ देखल जाएत तँ नकटेरहीपर जहि‍ना सभ लट्टू होइत तहि‍ना ने हएत।” कमल बावू बजि‍तहि‍ रहति‍ ि‍क दुनू गोटे नेंगरा आ बौका ऑंखि‍मे ऑंखि‍ मि‍ला हँसए लगल। ऑंखि‍ उठा सभापर नजरि‍ दौड़ौलनि‍। कि‍यो गंभीर तँ कि‍यो मुँह बॉंबि‍ बुझैक प्रयास करैत मुदा, दुनूक हँसी हँसा देलकनि‍। मन पड़लनि‍ हुगली नदी‍। अपना इलाकाक जते धार अछि‍ ओ उत्तरसँ दछि‍न मुँहे बहैत अछि‍ भलेहीं गंगाक ओइ कातक दछि‍नेसँ उत्तर मुँहे बहैत हुअए। मुदा हुगली, जे समुद्रसँ जुड़ल अछि‍, सोलह घंटा एक दि‍शासँ दोसर दिशामे बहैत अछि‍ आ आठ घंटा वि‍परीत दिशामे। तहि‍ना बावाक आत्‍मा आ कोदारि‍ कि‍लासमे पढ़नि‍हारक आत्‍मा मि‍लि‍ नव परमात्‍माक मंदि‍र बना रहला अछि‍। शि‍वलि‍ंग सदृश्‍य। नेंगरा आ बौकू मुस्‍कि‍आइत मूड़ी नि‍च्‍चाँ कऽ लेलक।दयाबावू आ मंगलोकेँ गंभीर देखि‍ प्रो. कमलनाथ कहए लगलखि‍न- “रौतुका घटना दुखद भेल। मुदा ओ तँ काल्‍हुक भेल। कालक तीनि‍ गति‍ छै, बीतल -भूत- चलैत -वर्तमान- अवैबला -भवि‍ष्‍य- जे समए बीति‍ गेल वएह समए वर्तमान आ भवि‍ष्‍यक रास्‍ता देखवैत अछि‍। एक हि‍सावे रौतुका घटना अहॉं सभकेँ एक सीमापर आनि‍ कऽ छोड़ि‍ देलक। ढंगसँ एकरा बुझैक जरूरत अछि‍।” ऑंखि‍ उठा मंगल पुछलखि‍न- “कने सोझरा कऽ कहि‍यौक?” “देखू अपन समाजमे कतेको पावनि‍-ति‍हार अछि‍। नीको आ अधलो अछि‍। नीककेँ पकड़ि‍ चलैक अछि‍। कोनो राति‍येटा धर्मक काजमे समए बाधा उपस्‍थि‍त केलक। ऐहन बात नहि‍ अछि‍। परि‍वारो सभमे देखैत छी जे पावनि‍क सब ओरि‍यान भेलाक उत्तर कोनो अप्रि‍य घटना घटलासँ पूजो-पाठ आ खाइयो-पीवैमे वाधा उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि‍। मुदा की देखै छि‍यै? यएह ने देखै छि‍यै जे पावनि‍क काजकेँ उसारि‍ आगूमे उपस्‍थि‍ति‍ घटनामे लोक लगि‍ जाइए। तहि‍ना पारि‍वारि‍क पावनि‍ नहि‍ बुझि‍ सामाजि‍क बुझि‍ सोग कम करू। ऐहन-ऐहन सामाजि‍क काज -कालीपूजा, दुर्गापूजा इत्‍यादि‍- सब गाममे होइते अछि‍ सेहो बात नहि‍ अछि‍। कोनो-कोनो गाममे होइतो अछि‍ कोनो-कोनोमे नहि‍यो होइत अछि‍। समाजक -गामक- लेल अनि‍वार्य नहि‍ अछि‍। मनक शान्‍ति‍क लेल होइत अछि‍। अखन अहॉं सभ ओहि‍ सीमापर ठाढ़ छी जहि‍ठामसँ दूटा रास्‍ता फुटैत अछि‍। पहि‍ल, अगि‍लो साल करब कि‍ नहि‍? समाजक वि‍चार देखए पड़त। एहि‍ प्रश्‍नपर समाज बँटा गेल छथि‍। अधि‍कांश लोकक मनमे ई हेतनि‍ जे गाममे पूजा नहि‍ धारलक। तेँ आगूओ नहि‍ हेवाक चाही। कि‍छु गोटे ऐहनो हेताह जे चाहि‍तो हेताह। प्रश्‍न उठैत अछि‍, जँ एहि‍ना अगि‍लो साल हुअए, तहन? फेरि‍ प्रश्‍न उठैत अछि‍ पूजा ओरि‍याने भरि‍ रहल संकल्‍पि‍त नहि‍ भेल। ओना एहि‍ठाम दूटा वि‍चार अवैत अछि‍, पहि‍ल समाजक संकल्‍प आ दोसर पूजा प्रक्रि‍या शुरू होइत समएक संकल्‍प। जे नहि‍ भेल। तेँ आगूक लेल वि‍चारक मुद्दा बनि‍ गेल अछि‍।” फेरि‍ प्रश्‍न उठैत जे व्‍यक्‍ति‍गत रूपमे सभ घरे-घर वा मने-मन करि‍तहि‍ छथि‍ मुदा, सामाजि‍को स्‍तरपर हएव जरूरी अछि‍। मुदा कोन रूपे हुअए ई वि‍चारणीय प्रश्‍न अछि‍। अखन धरि‍ जहि‍ तरहक सार्वजनि‍क मेलाक रूप रहल ओ आजुक माने वर्तमानक लेल कते नीक अछि‍, एहि‍पर वि‍चार करए पड़त। पहि‍ने कहि‍ देलौं जे गामक इति‍हास लि‍खल जाएत। जे अखन धरि‍ रजे-रजवारक सुरा-सुन्‍दरीसँ लऽ कऽ कहि‍यो कहि‍यो खेत-पथारले तँ कहि‍यो मनोरंजनक लेल होइत रहल। एक राजा-रानी राजगद्दीक सुख भोगथि‍ आ वाकी सभ सब सीढ़ीपर ठाढ़ भऽ-भऽ एक-दोसरकेँ रोकवो करैत आ पाछु मुँहे धकेलवो करैत। यएह इति‍हास अपना सबहक रहल अछि‍। तेँ अपन समाजकेँ जते नीक रास्‍तासँ आगू लऽ जाय चाहब ओ अहॉं सबहक काज छी। मुदा समाज जकरा बुझै छि‍यै ओ मनुष्‍यक समाज नहि‍ साबेक बोझ सदृश्‍य अछि‍। जहि‍ना सावेक जौरसँ घर तँ बान्‍हल जाइत मुदा, अपन नमहर बोझ बन्‍हैमे कते बदमासी करैत ओ तँ बन्‍हनि‍हारे सभ बुझैत हेताह। तहि‍ना लोकोक अछि‍। एक दि‍स समटब दोसर दि‍स छि‍ड़ि‍आएत आ दोसर दि‍स समटव तेसर दि‍स छि‍ड़ि‍आएत। अइमे ओहू बेचाराक दोख नहि‍ छै? कि‍यो पेटक पाछु बौआ रहल अछि‍ तँ कि‍यो मलि‍काना पाछू। मलि‍काना केहन तँ हम वि‍धाता बनि‍ बजै छी। अहॉंकेँ आदेश मानै पड़त? वाह-वाह भाय, वि‍धाता बनैसँ पहि‍ने अपन रजि‍ष्‍टर सार्वजनि‍क करू जे हमहूँ अपना समाजक इति‍हास रजि‍ष्‍टरमे लि‍खि‍ देखब जे कते गोटेक सवारी हवाइ जहाज छी, कते गोटेक ए.सी.कार आ कते गोटेकेँ चरण बावूक टेक्‍सी। तेँ जहि‍ना अदौमे कोनो गाम जे बसल ओहि‍मे पहि‍ले पहि‍ल-एक-दू-तीन चारि‍ परि‍वार आएल। जे अखन देखते छी केहन झमटगर भऽ गेल अछि‍ तहि‍ना असकरोक चि‍न्‍ता नहि‍ कऽ आगूक....। वि‍चहि‍मे बौकू बाजल- “बाबा, छौँड़ा सभ भोरे माछ पकड़ैले बाध दि‍स गेल से कनी ओकरा सभकेँ देखैक अछि‍ जे माछे पाछु अपनो डूबल आकि‍ बँचल आएल?” बौकाक बात सुि‍न ठहाका मारि‍ बाबा बजए लगलाह- “बौकू, जि‍नगीमे सभसँ पैघ, सुख प्राप्‍त करब होइत अछि‍। जेकरा सुख भेटि‍ गेलइ ओकरा भगवान भेटि‍ गेलखि‍न। मुदा सुख ककरा कहबै से अखैन नै कहवह। तोहूँ अगुताइल छह। ऐहन समएमे तोरा रोकब उचि‍त नइ बुझै छी। मुदा एतवे बुझि‍ लाए जे दुख भागब सुखक आएव वुझक।” ऑंखि‍ उठा मुस्‍की दैत दयानन्‍द पुछलखि‍न- “भाय सहाएव, इति‍हास लि‍खैक वि‍चार तँ देलखि‍न मुदा, पैछला इति‍हास वुझल छन्‍हि‍ कि‍ नहि‍, से कहॉं कहलि‍एनि‍?” “दयाबावू, हरि‍ अनंत हरि‍ कथा अनंता। अखन जहि‍ समएमे सभ बैसल छी ओ बैसैक नहि‍ करैक समए छी। कते लोकक घर खसल हेतइ, कतेकक माल-जाल नष्‍ट भेलि‍ हेतै, कतेकेँ हाथ-पएर टूटल हेतइ, ऐहन समएमे हाथपर हाथ दऽ वि‍चार करैक नहि‍ अछि‍। जतए जे नीक गर लगे ओतए ओहि‍ गरे दलमलि‍त भेल गामकेँ असथि‍र करू। सभ पड़ोसि‍ये छी समयो बदलत। समुद्रसँ उठल केहनो बादल रहैत अछि‍ मुदा, ओहो रसे-रसे बदलि‍ये जाइत अछि‍। तेँ अंति‍म बात यएह कहब जे आशाक संग जि‍नगीकेँ आगू मुँहे ठेलैत पहाड़पर चढ़ा अकासमे फेकि‍ दि‍औ।” ऽङ?“” १.नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज –रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’२.कुमार मनोज कश्यप-कथा- माता कुमाता न भवति १ नाटक-एकांकी भैया, अएलै अपन सोराज –रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’

आई सँ आठ सओ वर्ष पूर्वक कुनौली बजारक एकटा चौबटिया । घनगर गाछक तरमे माटि आ ईंटसँ बनल चबुतरा । (पुरुष–१ अशोथकित मुद्रामे चबुतरालग अबैत अछि । चारुकात नजरि खिरबैत अछि । कान्हपर अंगपोछा हाथमे लऽ मुहँपर चुहचुहाइत घामकेँ पोछैत चबुतरापर बैसि रहैत अछि ।) (पुरुष–२ कान्हपर हर, हातमे हरक पैनासँ दू गोट बयलकेँ रोमैत चबुतरालग अबैत अछि । पुरुष–१ केँ थकित देखि कनेक बिलमि जाइत अछि ।) पुरुष–२ ः भाई रविया ! अपन केहन हालत बना लेने छह । पुरुष–१ ः (दीर्घ निसास छोड़ि) से की ई आइए केँ हालति है । भाइ आब तऽ जीअब मुश्किल भऽ गेल । बेगारक एकटा हद होइ छै । पुरुष–२ ः माने तोरो....। पुरुष–१ ः साफे की । भोरेसँ बखारीमहक धान निकालि एसगरे तौलैत–तौलैत जानपर आफत आबि गेल । एक मुठ्ठी जलखईयो नै । चण्डलबा ! पुरुष–२ ः (बयलकेँ ठाड़ करैत) हौ रे हौ ! भाई, हमरो हालत कोनो नीक नहि । भोरेसँ पँचबीघबामे हर जोतैत–जोतैत जखन पार नै लागल तऽ बयल खोलि देलियै । तैयो बारहसँ उपरकेँ अमल भऽ गेलै भाई, कैला चण्डलबा सरबा एक टुकड़ि रोटियो पठाएत । पुरुष–१ ः ई हमरे तोहर दुःख नै हौ, सौसे गामकेँ पेरने है ई राक्षस । हमरासभकेँ अपना चास–बासमे बैसौलक इहे बेगारी खटबऽलए ने । आब तऽ हमरासभकेँ अपन कहलए रहिए की गेल है । पुरुष–२ ः (कनेक लग जा) भाइ, ठीके कहै छह । मंगलबा अपन बेटाकेँ गौना करा कऽ पाँच–साते दिन भेलै लैलकैए । सुनै छी काल्हि राति अपन पठ्ठा सँ उठबा लेल कै । भरि राति हबेलीमे रखलकै । पुरुष–१ ः परसूकेँ कथा नै बुझल हौ । सुनरपुरकेँ अजोधी घरबालीकेँ बिदागरी करा कऽ लऽ जाइत रहै, एहि बाटे । सरदारकेँ लठैतसभ पालकीए घेर लेलकै आ हबेली ढुका लेलकै । कतबो बेचारा चिचिआइत रहि गेलै, घरबालीकेँ नहि छोड़लकै । पुरुष–२ ः भाइ, ई चण्डलबा कतेक दिनधरि एना सतौतै, बेगारी खटेतै, लोककेँ बेटी, पुतहुकेँ इज्जति लुटतै । अन्हेर भऽ गेलै भाइ, अन्हेर ! पाश्र्वसँ गीतक सामूहिक स्वर सुनि पड़ैछ– सभ दिन आई खढ़ कटाबै छै सात सओ मुसहरबा से सभ दिन आई खढ़ कटाबै छै सात सओ मुसहरबा से न हय...। आ गे बड़ तऽ बेइज्जति आई करै छलै कुनौली बजरियामे आ बड़ तऽ बेइज्जति करै छलै कुनौली बजरियामे ने हौऽऽऽ । पुरुष–१ ः देखहक, सुनहक गामक हाहाकार । ई सामन्त, राजासभक अत्याचार आब बेसी दिन नै चलतै भाइ । हमरा–तोरा कान्हपर बेगारीकेँ गुलामीकेँ बोझ हटतै बुझाइए । जनता जागरुक भऽ रहल है । कुछ होतै हौ भाई ! पुरुष–२ ः (हरकेँ कान्ह पर धऽ चलबाक उपक्रम करैत) बयल कतहु भागि जएतै तऽ जुते–लाते एक कऽ देत । चल, आइ दिनकेँ आसमे किछु दिन और सहि ली । पुरुष–१ ः भाइ कोनो वीर पैदा नै भेलैए जे एहि चण्डाल सामन्त जोराबर सिंहकेँ मारतै । पुरुष–२ ः (चलैत–चलैत रुकैत) एकटा पताकेँ बात । सुनै छिऐ जे जोगियानगरमे कालू सरदारकेँ बेटा छै दीनाराम, भद्रीराम । आ ओ हमरेसभकेँ जाति छै कहाँदन । खुब चलतीकेँ वीर है । पुरुष–१ ः (उठैत) एह, बात तऽ बड़का बजला । एहि चण्डालकेँ मारि दितै तऽ पोसले खसी चढ़ा दितिऐ दीना–भद्रीकेँ । घर–घर एक–एकटा खसी पोसि देबै सभ सहाय भाई । लगैए हुनके गोहराबऽ पड़तै आब... । पुनः पाश्र्वसँ सस्वर गीतक बोल सुनि पड़ैछ– ताहि दिन ओकरा नाम से आई खसी चढ़ा देबै कुनौली बजरियामे करै छै अराधना सहोदरा अपना तऽ जतिया से करै छै अराधना भैया अपना तऽ जतिया से ने हेय । मञ्चसँ दुनू प्रस्थान । अन्हार । ........... मञ्चपर प्रकाश । पूर्ववत चौबटिया । गाछक चबुतरापर बैसल अछि पुरुष–१ । अंगपोछासँ मुहँपर हवा झोंकैत । पुरुष–२ क धरफराइत प्रवेश । ससरि कऽ पुरुष–१ क लगमे जाइत अछि । पुरुष–२ ः (चारुकात अकानैत । ककरो आगमन नहि बुझि ) भाइ, हमरासभकेँ पुकार सुनि लेलको दीनाभद्री महाराज । पुरुष–१ ः (प्रसन्नता सँ ) ठीके भाइ ! पुरुष–२ ः हँ, हौ ! बजै छलखिन्ह जे अपन जाति–भाइ पर अत्याचार आब नै होब देबै । मारबै जोराबरकेँ जेना हेतै तेना । लगैअ दिन घुरतो अपनोसभकेँ । पुरुष–१ ः लेकिन, जोराबर तऽ बड्ड भारी पहलमान है हौ । सात सओ पठ्ठा सँगे असगरे सर खेलै है फलकापर । सोलह गजकेँ फरुआ लंगोटा पहिरै है । सओ हाथीकेँ बल है हौ । पुरुष–२ ः हमरोसभकेँ दीनाभद्री महाराज कम नै हौ । जखन रूपमे अबै है तऽ केहन केहनकँे चित्त कऽ दै है । जोगियानगरमे कनक सिंह धामी रहै । नाम सुनने छलहो ? पुरुष–१ ः हँ, हौ ! ओइ राक्षसकेँ के नै नाम सुनने होतै । पुरुष–२ ः के मारलकै ओकरा, बुझने छहो ? पुरुष–१ ः कहँंदन दूटा शिकारी छलै । पुरुष–२ ः हौ ! ओहे दीनाभद्री महाराज रहै । बेगारी खटाबला हुनका दरबज्जापर जा कऽ माता निरसो भीलिनियाकेँ मारिपीट देलकै । की छलै–दीनाभद्री एतेक ने मारलकै जे ओ अपन घरबाली बुधनी बतरनी सँगे जंगलमे सोन्हि कोरि कऽ नुका कऽ रह लागल । पुरुष १ ः तब ? पुरुष २ ः तब की ? भद्री महाराज बीलाड़िकेँ रूपमे पत्ता लगा लेलकै आ कनक धामीकेँ मारि कऽ गामकेँ उद्धार कैलकै । पुरुष १ ः लगै है बड्ड भारी लड़ाकू है । पुरुष २ ः हँ, हौ ! वीर योद्धा है ! देखिह जरूर जोराबर मारल जाएत । सम्पूर्ण श्रमिक वर्गकेँ देवता रूपी है दुनू भाई । शोषण आ अत्याचारसँ उएह मुक्त कराओत । पुरुष १ ः सातो सओ मुसहरकेँ घरमे छागरे पोसल छै । हुनकँे नामपर । चौबटिया बाटे ताबत किछु व्यक्ति हतासल झटकारैत गामदिस भागल जाइत । दूनूकेँ देखि ओहिमहक एकगोट स्थिर होइत कहैत छैक–भागऽ मरदे । जोराबरकेँ लठैत लाठी भँजैत आबि रहल छै । बजै है–सरदारकेँ विरोधमे के लागल है, आई ओकर खैर नै होतै । दुनू साकांक्ष भऽ जाइछ । एक दोसरक मुह देखैत अछि । चेहरापर भयक छाप स्पष्ट देखि पड़ैछ । ओहो दुनू पएर झटकारैत गामदिस बढ़ि जाइत अछि । अन्हार । ......... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत् । दू गोट लठैत लाठी भजैत प्रवेश करैछ । मञ्चपर कनेककाल लाठीक करतब देखबैत अछि । फेर शान्त भऽ चबुतरापर बैसि जाइछ । लठैत १ ः आई तऽ मौजे–मौज है गोधिया । लठैत २ ः कथिक मौज रै । लठैत १ ः रे सरदार की कहलकैअ । गाममे घरे–घरे पैस । ई मुसहरबासभ हमरे जमीनपर बैसैअ । हमरे विरुद्धमे गुमीन्टि करैअ । सारसभकेँ पीठी दागि कऽ आ । लठैत २ ः हँ, से तऽ कहलकैअ । तऽ पीठी दागऽ कथिक मौज । ई तऽ रोजकेँ काम भऽ गेल है । लठैत १ ः रे सार । सब दिन तोँ चोन्हबे रहि गेले । घर– घरमे ढुकबैत घरकेँ मालो समान देखबे नै रै । लठैत २ ः तऽ । लठैत १ ः तऽ की । नया–नवेलीकेँ संँग मौजमस्ती नै करबे । लठैत २ ः अच्छा, तऽ तोँ से बात कहै छले । हम तऽ दोसर बात बुझै छलियौ । लठैत १ ः आई तऽ मौजेमौज है । लठैत २ ः कुछो करबही आ सरदारकेँ पता लगतै तऽ ? लठैत १ ः कतेको घरकेँ बेटी पुतहु सरदारकेँ हबेलीमे हमसभ नै पहुँचबै छिऐ ? लठैत २ ः से कतेको ! लठैत १ ः एतेक पहुँचबिते छिऐ तऽ आई दू–चारि हमहुँसभ हाथ लगा देबै तऽ कोन पहाड़ खसि पड़तै ? लठैत २ ः से तऽ है । एह, ठीके कहले । चल सार सदायसभकेँ मजा चखा दै छियै । दुनू उठैत अछि आ चलबाक हेतु उद्दत होइत अछि । फेर की फुराइ छै लठैत १ घुरि कऽ चबुतराकेँ देखैत अछि । किछु सोचैत अछि । लठैत १ ः (लठैत २ सँ) हे, गोधिया । हमसभ एहि चबुतराकेँ तोड़ि दी तऽ नीक । लठैत २ ः कैला ? लठैत १ ः सार मुसहरबासभ एहिपर बैसि कऽ बात लगबैअ । घरमे बैसऽकेँ जगहो नै है, सुगरकेँ खोर है । एतै बैसि कऽ सरदारकेँ खिलाफ साजिश रचैए । तहिसँ...। लठैत २ ः धूत मरदे ! हौ, एहि गाछ आ चबुतराकेँ की दोष । थाकल ठेहिआएल हमहुँसभ अबै छी तऽ एहिपर सुस्ताइ छी । एना नै सोच...। लठैत १ ः लगैए, तोँ ठीक कहै छह । चलऽ । दुनूक प्रस्थान । अन्हार । ....... मञ्चपर प्रकाश । स्थान पूर्ववत । दू गोट योगीक प्रवेश । कान्हसँ सारंगी टंगने । राजा भरथरीक गीत गबैत । गीत गबैत एक चक्कर लगेलाक बाद चबुतरापर बैसि रहैछ । योगी १ ः भैया दीना ! के चिन्हत गऽ हमरासभकेँ एहि ठाम । योगी २ ः हँ भाई ! हमसभ गुरु गोरखनाथक शिष्य लगैत छी । एहि भेषमे जोराबर सिंहकेँ खोजबामे सहुलियत हएत । ताबत ओहि बाटे एकटा बुढ़िया आंगनदिस जाइत देखि पड़ैछ । चबुतरापर गुदरिया बाबासभकेँ बैसल देखि पुछि दैत अछि । बुढ़िया ः गोर लगै छी बाबा ! दुनू योगी ः (एक्केसँग) कल्याण होऔं । बुढिया ः कत्तसँ आसन एलैए बाबा ? योगी १ ः हमसभ गुरु गोरखनाथकेँ शिष्य छियै । एकर नाम वृजमोहन छियै आ हमर नाम बैताली । बुढिया ः की सेवा करियै बाबाकेँ ? योगी २ ः हमसभ तीन दिनसँ भुखल छी । किछु खाएला भेटि जेतै तऽ भगवान गोरखनाथ तोरा कल्याण करितऽथुन । बुढ़िया गुनधुनमे पड़ि जाइत अछि । पृष्ठभूमिमे गीतक स्वर अभरैछ – से कथि लऽ कऽ आव महात्मा अहाँकेँ करबै कथि लऽ कऽ आव महात्मा अहाँकेँ करबै ने हय हौ बाबा ओहो जेहो छलै मरद आइ हमरा जोगिया तऽ नगरियामे चलै छै जोगिया जोगिया नगरियामे । योगी १ ः कथि लेल बुढ़ी सोचमे पड़ि गेल छी ? बुढिया ः की कहू योगी महाराज ! एहि गामक सामन्त जोराबर सिंह सौंसे गौैंआके बेगारेमे खटबैत छैक । एक्को सेर बोइन नै दै छै । घरमे किछु नै रहै छै खाएला । से हम तऽ मुश्किलमे पड़ि गेल छी...। दुनू योगी गम्भीर भऽ एक दोसराकेँ देखैत अछि । किछ सोचि माथ डोलबैत अछि । योगी १ ः बुढ़ी, अहाँक घरमे जतबे चाउर अछि से खाजू । तकरे चूल्हीपर अदहन चढ़ा कऽ ओहिमे राखिदिऔ । हमरासभकेँ ताहीसँ पेट भरि जाएत । बुढ़िया आश्चर्यसँ योगीदिस देखैत अछि । योगी २ ः ठीके कहै छथि बैतालीनाथ । अहाँ जाऊ, चाउर लगाऊ गऽ । बुढ़िआ अछताइत–पछताइत आंगनदिस जाइत अछि । योगी १ ः हे बघेसरी माता ! बुढ़ियाकेँ सहायता करिह । सभ दिन हम तोरा पूजा देलियह, आई तोँ सहाय हौइह ! कनेक कालमे बुढ़िया दू गोट छीपामे भात, दालि आ आलूक चोखा लऽ कऽ चबुतरापर अबैत अछि । दुनूकेँ श्रद्धा भावसँ देखैत आँगामे थारी राखि दैछ । बुढ़िया ः (हाथ जोड़ि) हे योगीसभ ! हमरा नै लगैया अहाँसभ साधारण लोक छी । एक पाव चाउर फटकि कऽ भेल छल, अदहनमे धरिते भरि तौला भात भऽ गेलै । ई चमत्कार मामूली नै छै । जरुर अपने पहुँचल लोक छियै । योगी १ ः बुढ़ी माता ! अहाँकँे अन्न हमरासभकेँ खाएकेँ छलै, से भेटल । आऊ भाई, भुख लागल है । जल्दी खाउ ! बुढ़िया अपन प्रश्नक उत्तर नहि पाबि आर आश्चर्यमे पड़ि गेल अछि । हाथ जोड़ने सोँंझामे ठाढ़ छैक । दुनू भाइ खाना खा कऽ प्रसन्न मुद्रामे आबि जाइछ । योगी २ ः बुढ़ी माता अपने धन्य छी । हमरासभकेँ जुड़ेलहुँ । आब कहू हमसभ की कऽ सकै छी ? बुढ़िया ः (भावविह्वल भऽ) हमरा लगैए हमरासभपर होइत अत्याचार आब अपनेसभकेँ कृपासँ खतम हेतै । योगी १ ः के करैछै अत्याचार ? बुढ़िया ः उएह, जोराबर सिंह । घर–दुआर, खेत, खरिहान, बहु–बेटी ककरो इज्जति नै रहे देलकै महाराज ! योगी २ ः कोइ नै किछु कहै छै ? बुढ़िया ः ककर मजाल छै, ओई सैतनमाकेँ देहोमे केओ भीर लेत । सात सओ पठ्ठाकेँ रोज खेलबै छै । कहाँदन जोगिया गाममे हमरेसभकेँ जाति दीनाभद्री है । ओकरे गोहरबै है भरि गामकेँ सदायसभ । घर–घर छागर पोसने है ओकरालेल । ऊ एतै कि नै पता नै, अपने योगीबाबा आएल छियै, किछु करियौ । योगी १ आ योगी २ चबुतरापरसँ उठि जाइत अछि । भावुक भऽ बुढ़ियाकेँ दुनू कातसँ पकड़ि भाव विह्वल मुद्रामे मञ्चक आगा भागदिस आबि जाइत अछि । प्रकाशक घेरा तीनूक अनुहार होइतपुरे शरीर पर पड़ैत अछि । योगी १ ः अहाँ चिन्ता नै करू मांँ । अहाँक बेटासभ अत्याचारी जोराबरकेँ निघटाबऽ लेल आबि गेल अछि । आब जोराबर मरतै मांँ, अहाँ निश्चित भऽ जाऊ । देखल जेतै उलङ्गी पहाड़क अखराहापर । बुढ़िआ अश्रुपुरित आँखिए दुनूक अनुहारपर देखैत अछि । आँखिमे आबिगेल चमकसँ लगै छै योगीक बातपर ओकरा पूर्ण विश्वास भऽ गेल छै । ....... प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । चबुतरापर एकटा नवकनियाँ बूढ़ीया साउसकेँ केसमहक ढील तकैत देखि पड़ैछ । सरदार जोराबर सिंह की जय । ई स्वर सामूहिकरूपेँ पाश्र्वसँ अबैत छैक । स्वर सूनि साउस–पुतहु चौंँकि उठैछ । पुतहु हात बारि साउसकेँ अपनासँगे चबुतरासँ उठा दैत छैक । पुतहु ः माए, चलथु ! चण्डलबा एम्हरे आबि रहल छै । साउस ः हँ, एक्को रत्ति चैनसँ रहऽ नै दै है बइमनमा । चल बहुरिया, एकर छाँंहो ने पड़ऽके चाही । दुनू साउस पुतहु झटकारि कऽ गामदिस बढ़ि जाइछ । जय–जयकार जारी अछि । मञ्चपर एकटा लठैत आगाँ–आगाँ, तकराबाद चारिगोट मुस्तण्ड पालकीसन सिंहासनकेँ कान्हपर लदने आ तकरा पाछा दू गोट लठैतक प्रवेश । पालकीपर खुब मोटसोट, चौड़गर छाती, पैघ–पैघ माँेंछ, ललाटपर टीका, धोती आ पएरमे पनही जुत्ता । रूप रंग आ मान–सम्मान स्पष्ट लगैछ ई जोराबर सिंह अछि । मञ्चपर अबिते चबुतराकेँ देखैत अछि । कहारकेँ रुकबाक ईशारा करैछ । जोराबर ः शमशेर सिंह ? अगिलका लठैत ः जी सरदार ! जोराबर ः कनिक रोक, चबुतरापर सुस्ताले सभ गोटे । अगिलका लठैत ः हेतै सरकार ! कहार पालकी धरतीपर रखैत अछि । जोराबर उतरैत अछि ओहिपरसँ । मोछपर ताव दैत चारुकात देखैत अछि । जोराबर ः रौ, केसर सिंह ! पूरा रस्ता सुन्न लगै छौ । गाममे लोक नै छौ की ? पछिलका लठैत ः सरकार, अपनेकेँ आगामे ठाढ़ रहे से ककर मजाल है हजूर । जोराबर चबुतरापर बैसऽ चाहैत अछि । शमशेर ः सरदार, ई चबुतरा तऽ अपन राजकेँ लेल खतरा भऽ गेल है । जोराबर ः (ठमकि) से केना रौ ? शमशेर ः अइ गामकेँ मुसहरबासभ अहिठाम गोलिया कऽ सह–मातुकेँ खेल खेलैत रहैअ, हजूर । जोराबर ः फरिछा कनि । शमशेर ः बजैत रहैअ जे आब बेगार नै करबै । हमरोसभकेँ मेहनतकेँ मोल छै किने । जोराबर ः अच्छा तऽ आब अपन मोल खोजैअ । केसर ः (लगमे जा) सरकार, कहाँदन जोगियाकेँ कोनो दीनाभद्री है । तकरा अपन गोलैसीमे सामिल करऽकेँ चक्रचालि चलारहल है भीलसभ । जोराबर ः हूँऽऽऽ । शमशेर ः गुप्तचर कहलक अछि जे काल्हि राति एतऽ दूटा योगी गुदरिया गोसाईं आसन देने रहै । ओकरा जीवछी भिलनी बड्ड आगत–स्वागत कऽ पाठ पढ़बैत रहै । जोराबर ः (तनि कऽ) अएँ, एतेक बात भऽ गेलौ आ हमरा खबरि नै । कत्त छौ भिलनी ? ला पकड़ि कऽ । एहि गाछपर लटका बुढ़ियाकेँ । लठैतसभ आदेश पालन करबाक लेल उद्यत होइत गामदिस जाए चाहैत अछि । ठहर ! अखनु तऽ अखाड़ापर जाएकेँ बेर है । पठ्ठासभ बाट तकैत होतै । घुमब तऽ देखबै ओई बुढ़ियाकेँ आ आरो मुसहरबासभकेँ । पाँखि जे निकललैअ । हम कतरि देबै आइए । पालकीदिस बढ़ैत–बढ़ैत रुकि जाइत अछि । रौ शमशेर ! शमशेर ः जी सरकार ! जोराबर ः रौ सब फसादकेँ जड़ि ईहे गाछ आ ई चबुतरा लगै हौ । एक बीत्ता जमिन नै है सार मुसहरबासभकेँ । अहिठाम जम्मा भऽ कऽ हमरे विरोधमे बतकटौअलि करैआ । हे, सभसँ पहिने एकरे उखाड़ । सभ लठैत तमतम करऽ लगैछ । इहो काज घुरलापर करिहे । देह कस–कस करैअ । लगै है, आइ हमरा हाथे ककरो परान गेल है । जोराबर पालकीमे बैसैत अछि । कहार उठबैत छै । पाश्र्वमे गीतक स्वर अभरैत अछि । सात सय पठ्ठाकेँ खेलबऽ चललै जोराबर अखड़ियामे सात सय पठ्ठाकेँ खेलबऽ चललै जोराबर अखड़ियामे ने यौ ! उलङ्गी पहाड़पर भैया घनघोर मल्ल युद्ध होतै आई उलुङ्गी पहाड़पर भैया घनघोर मल्ल युद्ध होतै आई ने हौ । अन्हार । ..... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । पृष्ठभूमिमे उज्जरका पर्दापर ध्वनि आ प्रकाशक माध्यमसँ मल्ल युद्धक छाया चित्र देखाओल जाइछ । मञ्चपर किछु महिला, पुरुष, बालक एम्हरसँ ओम्हर, ओम्हर सँ एम्हर करैत भगैत । पृष्ठभूमिमे गीतक स्वर सुनि पड़ैछ । आ खैंचकेँ दण्ड जोराबर उलङ्गीमे खिचै छै आ खैंचकेँ दण्ड जोराबर उलङ्गीमे खिचै छै ने हौ । पर्दापर दण्ड बैसकी करैत छाया देखि पड़ैछ । पछिये भर जा कऽ दुलरुआ बैसि गेलै फलकापर आ पछिये भर जा कऽ दुलरुआ बैठिये गेलै फलका उपरबामे ने हय । मल्ल युद्धक तैयारी । भीड़न्त देखाओल जाइछ । आ मैया तऽ बधेसरी नाम से मिट्टी तऽ चढ़ा देलकै आ मैयाक नाम से दादा मिट्टि चढ़ा देलकै ने हेय । घनघोर युद्धक दृश्य । दू गोट भीमकाय योद्धाक मल्ल युद्धक प्रसङ्ग । पड़ि गेलै युद्ध हौ दादा उलङ्गी पहाड़ पर आ पड़ि गेलै युद्ध हो दादा उलङ्गी पहाड़ पर ने हय । प्रेमी हो प्रेमी ओकरा जे डरने से ओहो ने डेराइ छै ककरो ने डरने कोइ नै डेराइ छै हौ । एकटा चित्कारक सँग एकटा योद्धाक हाथमे कटल मुड़ी लटकल छै । अट्टाहासक स्वर । जा के मुड़ी आब खसै छै जोराबर सिंहकेँ अंगनबामे आजाकेँ आई मुड़ी गिरलै जोराबर सिंहकेँ अंगनबामे ने हय । पृष्ठभूमिमे जयजयकार सुनि पड़ैछ । दीना–भद्री महाराजकी जय । मञ्चपरक भगैत सभ रुकि जाइछ आ जय जयकारमे साथ देबऽ लगैछ । .... मञ्चपर प्रकाश । दृश्य पूर्ववत । गामक किछु लोक अपन पारम्परिक भेषभुषामे मञ्चपर अबैत अछि । ककरो कान्हपर हर, कोदारि छै तऽ ककरो माथपर ढाकी । ककरो हातमे डोलमे पानि छैक तऽ ककरो हातमे जलखईक मोटरी । मञ्चपर प्रसन्नतापूर्वक कृषक परिवारक चहलकदमी । पृष्ठभूमिमे गीतक बोल प्रसारित भऽ रहल अछि । अप्पन घर, अप्पन खेत, अप्पन भेलै समैया अप्पन हर, अप्पन पसार, अप्पन भेलै गोसैंया भैया हो ऽ ऽ ऽ ऽ अत्याचारी जोराबरसँ मुक्त भेलै समाज एलै जनताकेँ सोराज, एलै जनताकेँ सोराज ।। हो भैया एलै अपन राज....। क्रमशः अन्हार पटाक्षेप ।

२. कुमार मनोज कश्यप- कथा माता कुमाता न भवति कक्काक तऽ एको मिसिया मोन नहिं रहनि जे स्वयं पटना  जा कऽ बेटाक हाल-चाल पता करी । 'ई तऽ संताने के चाही जे वृद्ध माता-पिताक खोज-खबरि लेमय । जखन बेटा लेल हमरा सभक मरब-जियब धन्न सन तखन हमरे कोन पड़ल जे बउआई लै जाऊ ।' मुदा कक्काक एको टा तर्क काकीक जिद्द के नहिं झुका सकलनि। ओ काकी के कतबो बुझेबाक चेष्टा केलनि ; ओ घटनो मोन पाड़ि देलखिन जखन काकी बड़जोर दुखित रहथि आ बँचबाक उम्मीद कम्मे रहनि । तखन एके टा  हकबाहि लागल रहनि जे बेटा के मुँह देखा दिय । तखनो बेटा नहिं आयल रहनि, छुट्‌टी नहिं भेटबाक लाथ कऽ कऽ । केयो पुछलकै तऽ खौंझा कऽ कहने रहय - ' हम कोनो डॉक्टर तऽ छी नहि जे देखि कऽ ईलाज करबैक । रुपैया पठाईये देलियै ईलाजक हेतु। आब हम किं करियौक?' कक्का के तऽ लागल रहनि जे आर अपनो दिस सँ रुपैया मिला कऽ बेटा के पठा देथि । मुदा फेर काकीक आँखिक भरल नोर हुनका विवश कऽ देने रहनि माहुर पीबि कऽ रहि जेबाक लेल । काकीक नेहोरा -पर-नेहोरा आ फेर सँ वैह नोर  हुनका विवश  कऽ देलकनि बेटाक हाल-चाल जानऽ पटना जेबाक लेल । कक्का जखन बेटाक सरकारी कोठी पर पहुँचल छलाह ओहि क्षण बेटा शहर सँ बाहर रहथिऩ़कोनो सरकारी काज सँ । नहियो चाहैत कक्का कें रुकऽ पड़ि गेलनि ओतऽ बिना बेटा कें भेंट केने, हाल-चाल पुछने कोना फीरि आबतथि ? नोकर जलखई-खेनाई पहुँचा जाईन । आर ककरो कोनो मतलब नहि़ पुतोहू, पोता, पोतीक लेल जेना कोनो अनचिन्हार व्यत्ति होथि अवांछित़़। आर-त-आर छोटका पोता आबि कऽ जखन पुछलकनि, 'आप पापा से कभी मिले नहीं हैं क्या जो उनके लिये रुके हैं?' तऽ कक्का माहुर पीबि कऽ रहि गेल छलाह । जाबत किंछु कहितथिन ओकरा , ताबत छौंड़ा दौड़ैत-दौड़ैत पड़ा गेल छल। जखन बेटा लौटलनि तखन कक्का बाहरे लॉन मे बैसल रहथि । कार सँ उतरिते लॉनक कोन मे कुर्सी पर बैसल कक्का पर नजरि पड़लै । अकचकायल ओ । पेᆬर कक्का दिस डेग बढ़बैत पुछलकनि, 'कखन एलहुँ ?' सहसा किंछु सोचि कऽ थमकिं गेल । क्षण भरि ओहिना ठाढ़ रहल । पेᆬर संगे आयल व्यत्ति दिस देखि कऽ बाजल, 'सरवेंट़़ फ्रॉम माई नेटिव प्लेस '। कक्काक मोनक  सुप्त ज्वालामुखी के जेना केयो उकाठी नेना आगि लेस देने होई तहिना एकाएक फाटि गेलनि । एक्के डेग मे फानि कऽ दुनू के बीच मे पहुँचि गेलाह आ ओहि व्यत्तिᆬ सँ मुखातिभ होईत बजलाह, ' मैं इसका नौकर तो नहीं, पर इसके माँ का नौकर जरूर हूं ? ' बमकल कक्का धपड़ैत घरक बाट धऽ लेने छलाह । आई ओ अंतिम फैसला कऽ लेलनि़ऩोर आ आत्म-सम्मान मे ओ ककरा चुनताह । १.-बीरेन्‍द्र कुमार यादव-महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य २. कथा- एकटा अधिकार-सुजीत कुमार झा १ बीरेन्‍द्र कुमार यादव ग्राम- घोघड़रि‍या, पोस्‍ट- मनोहपट्टी, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला सुपौल महावि‍ष्‍णु यज्ञ-मेलाक दृश्‍य- २८अप्रैलसँ १६मइ धरि‍ भक्‍ति‍मय वातावरणसँ अाच्‍छादि‍त इटहरी, नि‍रमली। जहि‍मे मुख्‍य वि‍चारणीय वि‍न्‍दु- करीब दस दर्जन माटि‍क मुरूत, जे ऐति‍हासि‍क संगहि‍ हि‍न्‍दू धर्म ग्रंथमे लि‍खल गेल धार्मिक घटना चि‍त्रक साक्षात् परि‍दृश्‍य छल। ई महायज्ञ मेलाक आयोजन कि‍छु साधुजन एवम् समाजक सहयोगसँ भेल। सभसँ पहि‍ने एगो खढ़ आ माि‍टक रंगल-टीपल सतयुगक कामधेनु गाए छल, जे गाए नि‍रंतर अठारह दि‍न धरि‍‍ दूध दैइते रहि‍ गेल आ श्रद्धालुजन ओहि‍ अमृतकेँ चाटि‍-चाटि‍ अपन जेबी ढील कएलक। एहि‍ कामधेनु गायक देहमे सेकड़ो देवताक छोट-छोट मुरूत छल। दोसर एकटा भगवान शंकरक पुत्र गणेशजी महाराजक मुरूत छल जे श्रद्धालुजनसँ ि‍बना दूगो टाका नेने लड्डू नहि‍ दैत छल। जे भक्‍तगण दूटा रूपैआ गणेश जीकेँ चढबति‍ तकरा गणेशजी अपन सूढ़सँ एकटा लड्डू दैत छल। आसे श्रद्धालुजन पूर्ण श्रद्धाक संग लड्डू लेबा ले तैनात छल। ओना भीड़मे हम पहि‍ने तँ हम पहि‍नेक चक्करमे कएक गोटे धाइलो भेलाह से अलग बात। दृश्‍य अद्भुत लागल। अद्भुत लगबाक कारण छल जे आइयो एहि‍ तरहक बहुतयात लोकसँ हमर समाज भरल अछि‍। एतने नहि‍ ई स्‍पष्‍ट बुझना जाइत छल जे वि‍कास माने मेडि‍कले आ इंजि‍नि‍यरि‍ंगटा क्षेत्रमे जे भेल से भेल आ फेरि‍ जे कि‍छु सड़क बान्‍ह बनबामे भेल मुदा गामक लोकक दशा दि‍शा ओहि‍नाक ओहि‍ना अछि‍। एहि‍ तरहेँ मुरूत बनबोनि‍हार आ बनेनि‍हार दुनू गोटेक दि‍माग श्रद्धालुजनसँ पाइ ऐंठबामे पुरा कामयाबी हॉंसि‍ल कएलक। यज्ञ स्‍थलपर समुद्र-मंथन, सीता-हरण, हरि‍श्‍चन्‍द्रक श्‍मशान घाटक भव्‍य दृश्‍य जहि‍ठाम रानी शेव्‍यासँ पुत्र रोहि‍तक दाह-संस्‍कार करबामे कर -चुंगी- लैत छथि‍न, सेतु बॉंध रामेश्‍वरम्, वि‍श्‍वमोहि‍नी, वीर हनुमान आदि‍-आदि‍ दृश्‍य छल। दोसर दृश्‍य यज्ञशालामे छ: सात सैकड़ माटि‍क बर्तन नारि‍केल फल एकरंगासँ लपेटल कलशाक रूपमे सजाओल गेल छल, आगि‍ लागल अगरबत्तीक मुट्ठा, जअ-तील आ घीक जराइन गंधसँ परोपट्टा मह्-मह् करैत रहए। ओहि‍ बीच पंडि‍त लोकनि‍ “ओम भू र्भूव: स्‍व: तत्‍स वि‍तुरवरेण्‍यं भर्गो देवस्‍य धीमहि‍ धि‍यो यो न: प्रोच्‍योदयात्”क उच्‍चारण करैत हवनमे स्‍वाहा करैत छलाह। एवम् प्रकारे करीब दर्जनभरि‍ एहन दृश्‍य बनाओल गेल छल जाहि‍ठाम पाइक वर्षा होइत छल। सभठाम श्रद्धालु-भक्‍त जनक माध्‍यमसँ वरसाओल गेल पाइ समेटबाक लेल नि‍युक्‍त लोकनि‍ अभावमे कतेको चतुर भलमानुष अपनहुँ गमछामे पाइ हसोथि‍ घर दि‍स वि‍दा होइत छलाह। यज्ञ स्‍थलपर एतेक लोकक भीड़ एहि‍ले भेल जे रेडि‍यो स्‍टेश्‍न भुरूकवा सँ करीब दर्जन भरि‍ मैथि‍ली भाषी कलाकार आबि‍ करीब तीनि‍ घंटा स्‍टेज प्रोग्राम केलनि‍। एहि‍ यज्ञमे भारी मेला लागल, सर्कस, झूला, मौतक कुइयॉं, रामलीला, थि‍येटर आदि लोक लुभावन कार्यक्रम होइत रहल। रंग-बि‍रंगक मनि‍हारा आ मि‍ठायक दोकान छल। बनि‍यॉं सभ नेहाल तँ भइये गेल मुदा परेसानि‍यो कम नहि‍ भेलनि‍। मि‍थि‍लांचलक ई इलाका कोसी आ बलानक मारल अछि‍। जतेक‍ गहुँम, तोरी, मसुरि‍, रैइची आ धनि‍यॉं खेतमे उपजल छल, सभ बनि‍यॉंक घर चलि‍ गेल। गाम-गामसँ हि‍तबोन, कर-कुटुम आसपासक लोकक घरमे चाउर लगि‍चा देलक। मुदा कोना परवाह नहि‍, आखि‍र धर्मक काज भऽ रहल अछि‍ कि‍ ने। कहबाक तात्‍पर्य अछि‍ जे आजुक आधुनि‍क आ वैज्ञानि‍क युगमे धोर धर्माधता आओर अशि‍क्षा हमरा सबहक पि‍छड़ापनक मुख्‍य कारण छी। धर्मक प्रति‍ एतेक आन्‍हर भेनाइ जे खढ़ आ माटि‍क कामधेनु अमृत चुबाबए, गणेशजी लड्डू दि‍अए आओर हमर समाजक सोझ लोक सभ अपन मेहनतक कमाएल पाइ दऽ दऽ अमृत चाटए, लड्डू खाए एकरा धर्मान्‍धता नहि‍ कहल जाय तखन की कही‍? ई हमरा अहॉंक लेल लाजक बात छी। धारतये इति‍ धर्म:। धारण करबाक जोग बढ़ि‍यॉं बात आ कर्म होइछ। सुन्‍दर कर्म धीया-पुताकेँ पढ़ाउ-लि‍खाउ, शि‍क्षि‍त बनाउ, जहि‍सँ अपन परि‍वारक संग समाजक लाेकक जीवन-स्‍तर बढ़ि‍यॉं होएत। परि‍वार, समाज आ देश समृद्ध होएत। श्री मद् भागवत गीतामे योगीराज श्रीकृष्‍ण कहैत छथि‍- “कर्म ही यज्ञ है और कर्म का स्रोत सवयं ब्रह्म है।” हम अध्यात्‍मि‍क वा पूजा-पाठक वि‍रोधी आकि‍ नास्‍ति‍क नहि‍ छी मुदा, धर्मक मौजुदा कर्मकाण्‍डी स्‍वरूप, आडंम्‍बर आदि‍मे वि‍श्‍वास नहि‍ करैत छी। हमर-अहॉंक जवावदेही बनैए जे समएकेँ अनुकूल समाजकेँ सही दि‍शा देवाक लेल प्रयास करी, जाहि‍सँ हमहुँ आ हमर देश रूस, अमेरि‍का, चीन, जापान जेकॉं वि‍कसि‍त देशक श्रेणीमे आबए। २ कथा- एकटा अधिकार सुजीत कुमार झा

बहुत भयंकर हृदय छल्ली करयबला हवाई दुर्घटना छल । विराटनगर सँ काठमाण्डू आवयवला हवाइ जहाजमे लैंड करय काल अचानक आगि लागि गेल आ जहाज रनवे शुरु होवय सँ पूर्व एकटा आगिक गोला बनि जमिन पर छिटा गेल छल । बारुण यन्त्रकेँ पहुँचय तक भीमकाय विमान जारि कऽ छाउर भऽ गेल छल । समाचार मिलिते बारुण यन्त्रक अतिरिक्त पुलिस, एयरलाइन्स आ एयरपोर्टक अधिकारीक सँग सँग अपन प्रियजनकेँ लेबय एयरपोर्ट आएल लोक सेहो दुर्घटनास्थल पहुँच गेल छल । जतय हवाइजहाज खसल छल ओतयके दृश्य तऽ बहुत बीभत्स छल । चारु दिस जरल जहाजक टुक्रा , मानवशरीरक अधजरु अंग, बैग लगायत ओहिना पडल छल । माउस आ रबरकेँ जरयके मिलल जुलल गँध सँ वातावरण पुरा भरल छल । नाक पर रुमाल बधने रेस्कयू टीमक लोक गरम ढेरमे तत्परता सँ लाश खोजि रहल छल । अहुसँ वेसी कठिन आ संवेशनशील काम ओ अधिकारीके छल जे यात्रीकेँ परिवारके पूछताछ जवाव दऽ रहल छल । नम्रता आ शालीनता वनावय राखयकेँ अथक प्रयासक बावजूद हुनक सभक व्यवहारमे खिसियाब झलकि रहल छल । विक्षिप्त सन लागि रहल एक युवककेँ लागातार हिचिकय सँ ओतयकेँ वातावरण आओर विह्वल भऽ रहल छल । आखिर युवककेँ पालो आएल तऽ कहलक हमरा जकर खोजी अछि ओ हरियर रङ्गक सारी पहिरने छल । एखनधरि जतेक शव भेटल अछि सभ क्षतविक्षत अछि । हरियर साडीवाला कोनो व्यक्ति नहि मिलल अछि । मृतक सभक गहना, पेन, मोबाइल, घडी लगायतके समान अलग कऽ कऽ राखल जा रहल छल । यात्रीकेँ निकाललाक बाद जे समान मिलत ओ यात्रीकेँ करकुटुम्बकँे देखायल जाएत । मुदा हम हुनकर सम्बन्धि नहि छी । युवक सिसकल, ‘ हम ओ साडीके माध्यम सँ मात्र हुनकर अन्तिम झलक देखय चाहैत छी । शायद ओहो हमर हिस्सामे नहि अछि .........’ ‘धैर्य राखु’ अधिकारी कोमल स्वरमे कहलक ‘जे शव निकलैत अछि ओकरा कीयो देख सकत । अपने जतय शव उठा कऽ राखल जाति अछि ओतय जाऽ कऽ आओर शव आवयकेँ प्रतिक्षा करु ।’ युवक थाकल जकाँ चलैत लाइन सँ बाहर निकलि गेल । दोसर युवक सेहो यात्री सूची देखलाक बाद आँखि पोछैत लाइन सँ बाहर आएल । पहिल युवकके असमंजसक स्थितिमे एक दिस ठाढ़ देख ओ हुनका लग गेल । हुनका नहि जानि किए ओ नितांत अपरिचित व्यक्ति सँ सहानुभूति भऽ रहल छल । ‘ एतय कखन धरि ठाड़ रहब ? ओम्हर चलु चबुतरा पर बैसि लाश आवयकेँ प्रतिक्षा करी ।’ ‘ककरो अपनकँ लाश कहव केहन लगैत अछि’ पहिल दोसरकेँ संग चलैत पुछलक । ‘प्राण लेवयवला, मुदा अओर की कहुँ ? हवाई जहाजके हालत देखैत ककरो बचयके उम्मीद नहि अछि । ओना हमर कनियाँ सुरक्षा जाँचमे जाय सँ पूर्व हमरा फोन कएने छल मुदा हम तइयो ई निर्मृूल आस सँ की भऽ सकैत अछि , अन्तिम समयमे ओ अपन निर्णय वदलि लेने हो, यात्री सूची देखय गेल छलौ । लिस्टमे दोसर नाम हुनके छल । आब त बस, हुनकर शवके प्रतिक्षा, अन्तिम संस्कार आ फेर जीवनभरि हुनका स्मरण करयकेँ अतिरिक्त किछु नहि बँचल हमर जीवनमे ।’ तइयो अन्तिम संस्कार त कऽ सकब । हम त शायद अन्तिम दर्शन सेहो नहि कऽ सकी ? ककरो अओरकँे देखय सँ पहिनहि हुनकर घरवला गिद्ध जकाँ लपकि कऽ शव लऽ जेता । ‘ ओ एतय आएल छथि ?’ ‘जे लोक सभ सँ आगु ठाढ़ छथि, अवश्य ओइमे सँ एक हेता ।’ हुनका चिन्हैत नहि छियै ? ‘ नहि ओना हुनकर पर्समे हरेक समय तस्वीर रहैत छल, मुदा हमरा देखयके कहियो इच्छा नहि भेल । ’ ‘किया ?’ ‘ हुनका सँ लगातार ई सुनि कऽ हुनको की पसिन छनि ओ आइ भोरमे की कहने छलाह कोन चुटकुल्ला सुनौलथि । वोर भऽ जाइत छलौ । तस्वीर देख लइतौ तऽ शायद ओ एलबमे लायब शुरु कऽ दैतैथ देखाबयकेँ लेल ।’ ‘जखन हुनकर घरवालासँ एतेक लगाव छलनि तऽ ओ अपने सँग केना अटकि गेली एकतरफा प्रेम छल अपने के ?’ ‘ सायद हम हुनका सँ एतेक नहि कऽ पबितौ छलौ जतेक प्रेम ओ हमरा सँ करैत छलि, बहुत वेसी ।’ ‘ आ अपन घरवला सँ ? ’ ‘पागलपनक हद तक । तखनने हमरासँ एतेक लगाब भेलाक वादो ओ हुनका छोडयकेँ लेल तयार नहि छली ।’ ‘ बच्चाक इच्छा छलैन हैत । ’ ‘बच्चा तऽ छलै नहि । हुनकर घरवला हुनका किनको सँग वाँटयकँे लेल तैयार नहि छल । ही वाज भेरी पजोसिव, टू द’ लिमिट अफ सफोकेशन पर हैप्स ।’ तखन ने शायद ओ अपने सँ प्रेम करय लागल छली । ‘ यदि वशमे होइत तऽ कहियोने कैरती । हुनका घरवलाके पोजेसिव होवयकेँ कोनो शिकायत नहि छल । मुदा प्रेम ओ चिज अछि विना इच्छोके भऽ जाइत अछि आ बहुत इच्छा भेलाक बादो नहि होइत अछि ।’ ‘ मुदा प्रेम भेल केना ? हमर मतलब अछि, भेटघाट वा प्रारम्भ केना भेल ? ’ ‘ हवाइ जहाजमे । वडा संयोग अछि ने जे प्रेम कहानी हवाई यात्रामे शुरु भेल छल आ हवाइ यात्रामे समाप्त भऽ गेल । जे हुए हम दूनु टुर पर पोखरा जा रहल छलौ । बराबरक सीट पर बैसल छलौ । अहि दुआरे बातचितक शुरुवात भऽ गेल । संयोग सँ हमरा दूनुके बराही होटलमे रुकयकेँ छल । अही दुआरे एके टैक्सीमे होटल गेलौ आ फेर साँझखन होटलक लौवीमे दोबारा भेट भऽ गेल । हम हुनका होटल मे डिनरक निमन्त्रण देलौ, ओ मानि गेली । खाना खाति पत्ता चलि गेल काल्हि भेने ओ रारा ताल देखय जेती फेर हमहु ओतय जायके कार्यक्रम बनेलौ । ओ तऽ प्रात भिने काठमाण्डू फिर्ता चलि एली मुदा हमरा काम छल ते एक दू दिन रुकय परल । नहि ओ अपन फोन नम्बर देली आ ने हमर लेली । मात्र एतेक वुझल छल काम कतय करैत छथि ।’ ‘ एतय फिर्ता भेलाक बाद एक दिन हुनक अफिस गेलौ । ओ बहुत खुशी भेलथि, लागल जेना हुनको हमर प्रतिक्षा छल । बस अही प्रकारे भेटक क्रम बढैत गेल आ सम्बन्ध सेहो ।’

‘ हुनक विवाह भ’ गेल छल ई कहिया पता चलल ?’ ‘पहिले भेटमे, अपन परिचय सँगहि ओ अपन घरबालाक जन्मपत्री सुना देली । हुनक चर्चा कएने विना तऽ कोनो गप्पे पुरा नहि होइत छल । ’ ‘आ फेर अहाँ हुनका सँ प्रेम करय लगलौं ?’ ‘कहलौं ने प्रेम कएल नहि जाइत अछि, भऽ जाइत अछि ।’ ‘मुदा रोकल तऽ जा सकैया ।’ ‘ रोकयके बहुत प्रयास कएलौ मित्र, ओ सेहो आ हम सेहो । अनेक वेर नहि भेटयकेँ प्रण कएलौ मुदा तइयो हम जेना कोनो बशीकरणमे बन्हल जकाँ स्थान पर चलि जाइत छलौ आ ओ सेहो प्रतिक्षा करैत रहैत भेट जाइत छलि । हारि कऽ हम नहि भेटयके व्यर्थ कोशिस करब छोडि देलौ । ’ ‘हुनक घरवलाके पता नहि चलैत छल कि अपने सँ भेटय अवैत छथि ?’ ओना तऽ ओ हुनका आवय सँ पहिने घर पहँुच जाइत छलि , कहियो अवेर भेला पर अफिसक पार्टी, बहुत कामक बहाना बना दैत छली ।’ ‘मुदा तइयो मुहक हाव भाव, उद्विग्नता सँ पत्ता चलिए जाति अछि । हमर कहयकेँ अर्थ प्रेम छिपाएब आसान नहि होइत अछि ।’ ‘ हँ मुदा ओ हुनकर प्रेममे अहि प्रकारे डुवल छलाह जे हुनक चिन्ता, हुनक अकुलाहट सभ अपने लेल सम्झैत छलाह ।’ ‘जखन हुनक घरबला हुनका सँ एतेक प्रेम करैत छल तखन कोनो अन्य सँ प्रेम करयकेँ की आवश्यकता छल ? ’ ‘ कोशिस कऽ कऽ या सोचि समझि कऽ प्रेम विवाहक वाद कएल जाइत अछि । सहीमे प्रेम तऽ वैह होइत अछि, जे अनजानमे नहि चाहैत भऽ जाइत अछि । लगैत अछि अपने कहियो किन्कोसँ प्रेम नहि केलौं अछि ?’ ‘केलौ तऽ अछि मुदा मात्र अपन कनिया सँ , विवाहक बाद, मुदा सोचिसमझि वा नापितौल कऽ नहि । विवाह सँ पहिने पढाइ आ फेर काममे एतेक व्यस्त छलौ कि केकरो देखयके फुरसत नहि छल आ, विवाहक बाद तऽ हुनक अतिरिक्त केकरो दिस ताकयके अवसरे नहि भेटल वा कही मने नहि भेल । पूर्ण सन्तुष्ट छलौं हुनक प्रेममे । भऽ सकैत अछि अपनेक प्रेमिका अपन घरवलाक प्रेमसँ सन्तुष्ट नहि हुए ।’ ‘एहन बात नहि छल । ओ हुनका सँ सर्वथा सन्तुष्ट छलथि । बहुत पसिन करैत छली ओ हुनका ।’ ‘ फेर एतेक प्रेम करयबला घरवलाकेँ एतेक धोका केना दैत छली ?’ ओ एकरा धोका नहि मानैत छली, किए कि जखन ओ हुनका सँग होइत छली तऽ पूर्णतया हुनका प्रति समर्पित होइत छली आ हुनका घर फिर्ता होवय सँ पूर्व घर पहुँच जाति छली । यानी हुनक समय ओ कहियो हमरा लेल नहि दैत छली । हुनक कहब छलनि कि अइसँ हमरा घरवलाक कोनो नोक्शान नहि होइत अछि । हँ, हमरा सँग न्याय नहि कऽ पवैत छली, अहिके लेल हरेक समय गलानि आ, पश्चातापक आगिमे सुलगैत रहैत छली वेचारी ।’ ‘ अपने के तरस नहि अवैत छल हुनका पर ?’ ‘ बहुत अबैत छल, मुदा की करितौ, दिलक हाथ मजबुर छलौ । छोडि नहि सकैत छलौ हुनका ।’ ‘अपनेके स्वयं पर यानी अपन पुरुषत्व पर तामस नहि अबैत छल । बहुत स्मार्ट छी, जिवनमे सेहो लगैत अछि, सुव्यवस्थित हैब, लडकीसभ सेहो अपने पर आवश्य मरैत हैत । फेर अपने किए एकटा विवाहित महिलाक सँग अटकल छलौ, जिनका सँग अपने इच्छा अनुसार समय सेहो नहि बिता सकैत छी ? ’ कनी काल इम्हर उम्हर तकैत ओ कहला प्रेम एकरे नाम छैक, मुदा.....’ ‘ हम तऽ कहब छुटि गेल दू नाव पर एकसँग सवार होवयकेँ यंत्रणा सँ ।’ मुदा ओ एकरा यन्त्रणा नहि, गुलावक सँग उगल काँट कहैत छली । गुलावक रङ्ग आ अकर्षण दूर सँ देखल जा’ सकैत छल मुदा गमक सुंघयके लेल तऽ ओकरा छुवहे परतै आ काँटक चुभन सेहो झेलहे परतै । ‘ यानी हुनका चुभन पसिन छल ? ’ ‘हुनका प्रेम पसिन छल आ ओइसँ जुड़ल हरेक चिज सेहो ।’ ‘ यानी ओ हालत सँ प्रसन्न छली ?’ ‘हमरा लग सँ जाय काल ओ दुखित भऽ जाइत छली मुदा हरेक समय प्रसन्न रहैत छली । हंसैत छली, गुनगुनगुनाइत छली ? ’ ताकि ओ हुनकर गममे वताह भऽ जाए ? नहि हुनक विना जी सकैत छली आ ने हमरा । हमर समस्या एहन छल, मित्र, जेकर कोनो समाधान नहि छल । हमरा हुनका सँग जीवयके छल आ जिवियो रहल छलौ । आव हुनका गेलासँ हमरा जिवनमे जे अभाव भऽ गेल अछि ओ कहियो नहि मरत । नहि जनैत छी , जीवियो सकैत छी वा नहि हुनका विना ?’ ‘आ हुनक घरवला ?’ ‘ हुनको लेल तऽ आसान नहिए हैत.... उम्हर देखु, ओइ गाडी सँ किछु अओर शव निकालल जा रहल छैक ।’ ‘चलु देखैत छी ।’ आ दूनु जतय शव आनि राखल जाइत छलैक ओतय चलि गेला । अहिवेर निकालल जायबला लाश शायद ओ व्यक्तिकँे छल जे ढेरमे दवि कऽ मरि गेल छल आ पुरे जकाँ जरय सँ बचल यानी पहचानल जा सकैत छल । एक स्ट्रेचर सँ राखल हरियर साडीकँे किछु भाग देहपर रहल व्यक्ति सेहो छल । ओना पुरे शरीर पुरे झुलसि गेल छल मुदा झुलसल मुहके पहचानल जा सकैत छल । पहिल युवक लाशकँे देख कऽ खसि पडल । दोसर हुनका उठेलैन । ओ तोक भरोष देलनि । ‘ अपने हुनकर अन्तिम संस्कार करय चाहैत छी ने, अपनेक घरक लोक करय देत ।’ ‘ घरक लोक एतय नहि अछि । हम असगरे रहैत छी, मुदा अइ सँ की फर्क पडतै ? हम कोन अधिकार सँ हुनकर बाँडी क्लेम कऽ सकैत छी । ’ प्रेमक अधिकार सँ । हुनका घर लऽ जा सकैत छी, हुनका मनभरि कऽ छू सकैत छी, हुनका जतेक चाही पकडि कऽ कानि सकैत छी ......’ ‘ एना हमरा के करय देत ? ’ ‘ हम करय देव.............’ ‘ अपने कोन अधिकार सँ ?’ ‘ हुनकर घरबला होवयकेँ अधिकार सँ ’ ‘ अए..........जेना कोनो करेन्ट लागि गेल हो । फेर अपनाकेँ संयमित करैत हुनकादिस तकलैथि आ फेर ओ तकैत रहि गेलथि ओ महापुरुषकेँ । Ú १.मनोज मुक्ति१.अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र २. मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न २.दुर्गानन्‍द मंडल ३.कथा--नन्‍द वि‍लाश राय ऐना १ मनोज मुक्ति १.अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र २. मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न अमर शहिद दुर्गानन्द जिनक सपना छल गणतन्त्र आई देश दोसर गणतन्त्र दिवस मनावि रहल अछि । गणतन्त्रक परिभाषाधरि नीक जका नई बुझने सरकारमे रहल एवं विपक्षीक भूमिका निर्वाह करैत आएल पार्टीसबक रवैया दुर्गानन्द झा सनक शहादतपर पानि फेरैत बुझारहल अछि । गणतन्त्रक मतलव मात्र मनमौजी बुझने नेतासब एहू गणतन्त्रक दिवसपर सुधरत कि ? दुर्गानन्द झा सबहक आत्मा सबहक हिसाब राखि रहल अछि । कि दुर्गानन्दक शहादत एहिलेल छल ? गणतन्त्र स्थापनाक धुनमे बीसोवर्ष पूरा नहि कएने दुर्गानन्द झा, राजा महेन्द्रके उपर २०१८ माघ ९ गते जनकपुरधामक जानकी चौकपर बम प्रहार कएने रहथि । हँसैत–हँसैत, बिनुकोनो लोभ लालचमे फँसने २०२० माघ १५ गते शहादत प्राप्त कएने दुर्गानन्द झाक बलिदान आई देशमे गणतन्त्र एलाकबादो गणतन्त्रके ताकि रहल अछि, जकरालेल ओ बलिदान देने रहथि । विद्यालयमे अध्ययन करितेकाल २०१५ सालक प्रथम आम निर्वाचनमे प्रजातन्त्रक पक्षमे अपनाके होमिदेने दुर्गानन्द, राजा महेन्द्रद्वारा २०१७ पुस १ गते संसद आ संसदीय सरकार विघटन कऽ प्रजातन्त्रवादी नेतासबके जेलमे राखिदेवाक सामाचार सुनिते मर्माहत आ क्षुब्ध भऽगेलथि । भारतीय स्वतन्त्रता संग्रामक वीर सेनानी भगतसिंह आ चन्द्रशेखर आजादक जीवनीसँ प्रभावित दुर्गानन्द, प्रजातन्त्रक हत्याराके नहि छोडवाक विचार कएलथि । आपन मायबाबुक एक मात्र सन्तान आ नवविवाहिता युवक भेलाकवादो दुर्गानन्द अपन लक्ष्यमे अडिग रहथि । २०१८ माघ ८ गते बम लऽ कऽ रातारात जनकपुरधाम पहुँचल दुर्गानन्द झा प्रातभिने अर्थात माघ ९ गते जानकी चौकपर साँझ पाँच बिजे दिस तानाशाह राजा महेन्द्रक गाडी रोकिते आपन प्रतिज्ञा पूरा कएलथि । राजा चढल लैण्डरोभर गाडीउपर फेकल बम भूर करैत नीचा जानकी मन्दिरक पूर्र्वी द्वारक दक्षिणवारी देवालपर पर्खालमा फुटेल छल । बम प्रहार कएलाकवादो क्रान्तिकारी दुर्गानन्दके पुलिस नहि पकड़ऽ सकल । हजारो सुरक्षाकर्मी तैनाथ रहलाक बावजुदो नईं पकराएल क्रान्तिकारी युवक ओहि राति जनकपुरधामक एकटा कुटी मे रहिरहल अपनलोक हेमचन्द्र चौधरी आ भोगेन्द्र चौधरी लग रहलथि एवं प्रातभिने उमगाव पहुँचि गेलथि । एम्हर, नेपालमे बम काण्डक अनुसन्धानक नाममे ५६ गोटेके पकरिड़कऽ नीतदिन मारिपिट कऽ बम प्रहार कएने कहिकऽ सकारबाक दुष्प्रयास भऽरहल छल । निर्र्दाषसबके यातना देल जाऽरहल सुनिकऽ एक दिन अनायास जयनगरसँ जनकपुर रेल्वेद्वारा नेपाल आविकऽ ओ अपन गिरफ्तारी देने रहथि ।

सरकारद्वारा ताहि बीचमे एकटा विशेष अदालत गठन भेल छल जे दुर्गानन्द झाके बिनु सफाइक मौका देनहिं २०१९ साल भादो १९ गते मृत्युदण्डक निर्णय सुनादेलक । ताहि समय नेपालमे ब्राहृमणके मृत्यु दण्ड नई देल जाइत छल, ताहीलेल मुलुकी ऐन २०२० भादो १ गतेके संशोधन काएलगेल । विशेष अदालतक फैसला सर्वोच्च अदालतसँ अनुमोदन करओलाकबाद २०२० माघ १५ गते महानक्रान्तिकारी दुर्गानन्दझाके सुन्धारा जेलमे मध्यरातिमे मृत्युदण्ड देवाक वास्ते जहन दरबज्जा खोललगेल त, मृत्युक लेल तैयार भऽ वैसल क्रान्तिकारीके देखिकऽ हत्यारासब चकित भऽगेल छल ।

प्राणदण्डक लेल लऽजाइत समयमे अपन अन्तिम इच्छा महान क्रान्तिकारीले एहि तरहें व्यक्त कएने रहथि –‘हमरा दीर्घ यात्रामे गेलाकबादो लोकतन्त्रके केओ नई रोकऽ सकत ।’ १९९७ साल माघ १० सँ १५ धरि शुक्रराज, धर्मभक्त, गङ्गालाल आ दशरथ चन्दके फाँसी (मृत्युदण्ड) देलगेल सवाएक वर्षकवाद १९९९ साल वैशाख १४ गते (वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि)में अमर सहिद दुर्गानन्द झाक जन्म धनुषाक जटही गाममे देवनारायण झा आ सुकुमारीदेवी झाक एक मात्र सन्तानक रूपमे भेल छल । पं. भोलानाथ झाक तीन भाइमें एक मात्र उत्तराधिकारी दुर्गानन्द झाक पीताक मृत्यु दुर्गानन्दक बाल्यकालमे भऽगेल छल । माइयक देखभालमे गामसँ ५ किलोमिटर दूर रहल क्षेत्रक उमगावस्थित दिनदयाल हाई स्कुलमे झाक शिक्षादीक्षा भेल छल । घरक एसगर सन्तान होएवाक कारणे मेट्रिकमे पढैतकाल २०१७ साल विवाह पञ्चमीक दिन काशीदेवीक सँग हूनक विवाह भेल छल । २०६० साल भादोमे वृद्ध मायक निधनकेबाद आब एसगर हूनक अर्घाड्ढनी काशीदेवी झा बाँचल छथि आ संविधानसभामा तमलोपापार्टीक सभासद् छथि । देशमे गणतन्त्र अएला दू साल भेलाकवादो, गणतान्त्रिक कहावऽबला सरकार आ देश दुर्गानन्द झाके लेल किछु नहि कऽसकल अछि । जाहि गणतन्त्रकलेल ओ हँसैत–हँसैत अपन जान दऽदेलथि ओ गणतन्त्रात्मक सरकार अखनधरि हूनका राष्ट्रीय शहिदधरि घोषणा नई करऽ सकल अछि । देशमे गणतन्त्र अएलाक दू वर्ष बितिगेलाकवादो दूर्गानन्द झा सन–सन जे देशक बेटा अपन जानके कनिको पर्वाह नई कएलथि, हूनका सभक शहादतपर सरकार आ पार्टीक नेतासब गणतन्त्रक गुलछर्रा उडावि रहल अछि । कि दुर्गानन्द झाक आत्माके दुःखीत कऽ हमसब शान्तिसँ जीवि सकव ? मैथिली दिवसमे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न जानकी नवमी अर्थात मैथिली दिवसक अवसरमे उपत्यकामे विभिन्न कार्यक्रम सम्पन्न भेल अछि । १९९६ सालसँ सांगठनिकरुपसँ काठमाण्डूक गुह्येश्वरीमे मैथिल ब्राह्मण समाजद्वारा आयोजना होइत आएल जानकी नवमी एहुवेर धुमधामसँ सम्पन्न भेल अछि । काठमाण्डू उपत्यकामे ३÷४ सय वर्ष पहिनेसँ रहनिहार मैथिल ब्राह्मण सबद्वारा होइत आएल जानकी नवमीमे एहिवेर उपराष्ट्रपति परमानन्द झा आ नेपाल पत्रकार महासँघक अध्यक्ष धर्मेन्दं्र झाके सम्मान कएलगेल छल । तहिना अपना स्थापनाकालसँ मैथिली दिवस मनवैत आएल ‘मैथिल यूवा क्लव’ शान्तिनगर एहिवेर मैथिली साहित्यिक गोष्ठीके आयोजना कऽ कऽ मनौलक अछि । मैथिली दिवसक अवसरमें क्लवद्वारा जगत जननी माता सीताक आदर्शपर नेपाली भाषामे ‘सीतायन’ ग्रन्थ लिखिरहल डा. रमेशचन्द्र अधिकारीके सम्मान काएल गेल छल । क्लवक अध्यक्ष विजयकुमार झाक अध्यक्षतामे सम्पन्न साहित्यिक गोष्ठीमे सचिन्द्र यादव, गोविन्द साह, मनोज क्रान्तिकारी, धनेश्वर राउत, श्याम कामत, महिनारायण झा आजुक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली दिवसक अपरिहार्यताक विषयमे अपन विचार रखने रहथि । आदर्श झाक उदघोषणमे शान्तिनगर स्थित ग्लोसियर एकेडमीमे सम्पन्न गोष्ठीमे लालबावु कर्ण आ मनोज झा मुक्ति अपन रचना पाठ कएने रहथि । २. कथा पारस दुर्गानन्‍द मंडल “शान्‍ति‍ यै शान्‍ति‍ कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्‍मरि‍?” शान्‍ति- “एलौं याए एलौं।” आंगनसँ शान्‍ति‍ हाक दैत लग आि‍ब सोझामे ठाढ़ि‍ होइत पुन: बाजि‍ उठैत छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?‍” हम- “ऐह, अहॉंकेँ तँ सदि‍खन मजाके सुझाइत अछि‍। खास बात की रहत। अहॉं छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ वि‍द्यालयक छुट्टी समाप्‍त भऽ गेल तेँ झब दऽ खाइले कि‍छु बनाउ। जे हम समएसँ वि‍द्यालय चल जाएव।” शान्‍ति‍ बजलीह- “ओ..., आब ने बुझलहुँ। अहॉं तँ सब दि‍न गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि‍ बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि‍ अनलहुँहेँ। तेँ आइ साग-भात आ आल्‍लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवि‍तहुँ से नि‍आरने रही। मुदा ताहि‍मे तँ देरी होएत। तावत अहॉं स्‍नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरि‍ओन कऽ दैत छी।” “बेस, बड्ड बढ़ि‍यॉं। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दि‍अ।” हम धोलूकेँ हाक दैत छी- “धोलू हौ धोलू। कतऽ छह हौ?” “ऐलौं, याए ऐलौं बावू जी, कने नदी फीरि‍ रहल छी।” “वेस, बड्ड बढ़ि‍यॉं। आ वौआ, है सुनै छह? आइ हमरा वि‍द्यालय जेवाक अछि‍। से जात हम स्‍नान करै छी। तात् तौं साइि‍कलकेँ बढ़ि‍यॉं जेकॉं झारि‍-पोछि‍ दाए।” ई कहैत हम स्‍नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि‍ जाइत छी। स्‍नानोपरान्‍त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीि‍र तैयार होइते छी तात् शान्‍ति‍क आग्रह- “सुनै छी, अहॉंले जलखै नि‍कालि‍ देने छी, कऽ लि‍अ।” ई कहैत आगॉंमे सि‍कीक चंगेरी, जे रंग-वि‍रंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, ताहि‍मे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे कॉंच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगॉं बढ़ौलनि‍। एक क्षणक लेल हम मि‍थि‍ला, मैथि‍ल आ मैथि‍लक संस्‍कार आ स्‍भयतासँ बहुत बेसी आनन्‍दि‍त भेलहुँ। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्‍ति‍क मधुर आवाज- “कतए हेरा गेलहुँ? एखन यएह खा, वि‍द्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएव तँ गरमा-गरम साग, भात, अल्‍लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि‍ मन खाएव। ओना जाड़ मास छै यदि‍ कि‍छु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नहि‍।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत एहि‍ मादक अदाक मादे सोचए लगलहुँ। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेरि‍ पुन: हाक देलि‍ऐनि‍- “शान्‍ति‍, यै शान्‍ति‍....।” नहि‍ जानि‍ जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि‍ रहल छलन्‍हि‍। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्‍मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा....।” आवि‍ वाणभटक नायि‍का जेकॉं लगमे सटि‍ कऽ ठाढ़ि‍ होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्‍मा लऽ छथि‍ आ मुस्‍की दैत घरसँ बहार भऽ जाइत छथि‍। हम लजा जाइत छी। करीब चालीस मि‍नटक उपरान्‍त वि‍द्यालय पहुँचैत छी। हाथ-पएर धोलाक वाद हाजरी बनवैत छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि‍ आ धि‍या-पूताक संग हमहुँ एक पाति‍मे ठाढ़ भऽ जाइत छी। उपरान्‍त ऐकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि‍। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करैत छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि‍, स्‍वागतार्थ सभ बच्‍चि‍या उठि‍ कऽ ठाढ़ि‍ भऽ जाइत अछि‍। वैसबाक आदेश पावि‍ यथास्‍थान सभ बैसि‍ जाइत अछि‍। सबहक हाजरी लेब सम्‍पन्‍न होइत अछि‍। तखन कि‍छु बच्‍चि‍या सभ बाजि‍ उठैत अछि‍- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बि‍यौ, क्‍यो कहति‍ अछि‍ जी नइ सर आइ ग्रेजुएत पुतोहू पढ़बि‍यौ। मुदा कि‍छु खास बच्‍चि‍या यथा- राखी, गीतांजली, खुसवू, बबि‍ता, रि‍ंकी आ पि‍ंकी कहि‍ उठैत अछि‍- “जी नै सर आइ अहॉं अपने ि‍लखल कोना कथा कहि‍यौ। आ हम ओहि‍ आग्रहकेँ नहि‍ टारि‍ पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लि‍खल ई कथा- .....पारस।” मॉं मि‍थि‍लाक गोद आ कमला महरानीक कछरि‍मे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जाहि‍मे छल एकटा चाहबला ओकर नाम छल पारस पि‍ता श्री सत्‍य नारायण जी नामक अनुरूप दुनू बापूत वि‍परीत छल। पि‍ता श्री सत्‍य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छलाह। एकटा प्राइवेट स्‍कूलमे अध्‍यापण कार्य करथि‍ आ कोनो तरहेँ बाल-बच्‍चाकेँ पोसथि‍-पालथि‍। हुनकेर बालकक नाम पारस। नामक अनुरूप एकदम ि‍वपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सुखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदि‍खन जेना मुँससँ लेर चुवि‍ते छलै। फाटले-चि‍टले कोनो जूता-चप्‍पल पहि‍र ओही प्राइवेट स्‍कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकि‍लगल कम नहि‍। सत्‍य नारायणजीक घर जरूर बान्‍हेँ कातक सौ फि‍ट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्‍कार कोनो सुसभ्‍य समाजक प्रति‍क छल। सत्‍य नारायण बावूकेँ हरलैन्‍हि‍‍ ने फुरलैन्‍हि‍‍ खेलवा देलखि‍न पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि‍ अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्‍टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटि‍क मटकुरी छाल्‍ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नि‍त्‍य समएसँ खुलैत आ बन्‍द होइत छल। क्रमश: महि‍सि‍क अगब दूधक चाह, एक्‍को ठोप पानि‍क छुति‍ नहि‍, बरतन-वासन खुब पवि‍त्र आ संस्‍कारी होएवाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचि‍त सम्‍मान भेटनि‍। चाहक दोकान खुब चलनि‍। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलैक। कि‍छु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि‍ लऽ लेलक पक्‍काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्‍टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सि‍ंहहारा आ गरमा-गरम जि‍लेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाम भऽ गेलै दोकान खूब चलए लागल। समए पाबि‍ 26 जनवरी आ 15 अगस्‍तमे प्रसादक लेल वि‍शेष आदर पावि‍ बनाबए लागल मनक मन बुनि‍यॉं आ भुजि‍या। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचि‍ंग चलौनि‍हार संचालक आ ि‍नदेशक महोदयक योगदान एहि‍ देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमि‍का रखलक। दि‍न दुना आ राति‍ चौगुना उन्‍नति‍ होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत होएवाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि‍ लेलक ओ तीन‍ बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्‍तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि‍ प्राइवेट स्‍कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्‍कृत वि‍द्यालयमे नाओ लि‍खा लेलक, आ मध्‍यमाक फारम भरि‍ फस्‍ट डि‍वि‍जनसँ पास केलक। आव तँ ओ कि‍छु बेसि‍ए खुश रहैत छल। मध्‍यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओ जनता काओलेजमे झंझारपुरमे लि‍खा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परि‍वर्तन नहि‍। काओलेजसँ ऐलाक वाद चाहक दोकानपर ओ जमि‍ जाए। यद्यपि‍ चाह बेचब एकटा तेहन काज मानल जएतैक ई वि‍वादक वि‍षए अछि‍। ओकरा एक्‍को पाइ लाज-संकोच नहि‍। कि‍एक तँ कर्म कोनो खराप नहि‍ होइत छैक। कमा कऽ खाइ एहि‍मे कोन लाज कोनो कि‍ ककरोसँ भि‍ख मंगबै जे लाज होएत। तेँ चाह बेचब अधलाह काज नहि‍ से मानि‍ ओ खुब जतनसँ अपन कतर्व्‍यक नि‍र्वहन करए। बुझि‍नि‍हार मैथि‍लमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखि‍ते-देखति‍ ओ मैथि‍ली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाम भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नहि‍ छोड़लक। बात पसरैत गेल। एकबेरि‍ एकटा कथा गोष्‍ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि‍ गोट मात्र कथाकार वि‍दा भेलथि‍ दि‍न अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभि‍शापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरि‍क बाट मात्र चारि‍ घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहि‍नहि‍ झल अन्‍हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तेँ चारू कथाकार चाह पि‍बाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि‍ कप चाह ि‍दहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दै छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल। क्रमश: ३ कथा नन्‍द वि‍लाश राय ऐना हम अपन सारक बेटाक वि‍आहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनि‍यर अछि‍। ओ अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालसँ इंजीनि‍यरि‍ंगक डि‍ग्री लेने अछि‍। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्‍नर अछि‍। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्‍नर अछि‍ तेहने ओ पढ़ैओ-लि‍खैओमे तेज छल। ललनक वि‍आह पॉंच लाख टाकामे बैरमा गामक वुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्‍चन ठाकुर मध्‍य वि‍द्यालकमे शि‍क्षक छथि‍न्‍ह। अपना बेटीकेँ इन्‍टर पास करौएने छथि‍न्‍ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्‍द भेल आ ओ ललनक वि‍आह बुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ पक्‍का कए लेलक। बुच्‍चन ठाकुरक चारि‍ लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि‍ गेल। बुच्‍चन ठाकुर कहलखि‍न- “जेतेक टाका वॉंकी अछि‍ वि‍आहक दू दि‍न पहि‍ने भेट जाएत” मुदा, वि‍आह दि‍न जखन टका नहि‍ पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि‍- “पाहुन टका तँ बुच्‍चन बावू अखन तक नहि‍ भेजलक हेँ। कि‍ कएल जाए?” हम कहलअनि‍- “आइ वि‍याह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि‍। वि‍आह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि‍ जे बुच्‍चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि‍। चलू शुभ-शुभ कऽ वि‍आह करेवाक लेल।” हमसब दुल्‍हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्‍चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्‍न्‍ा भेलाह। बुच्‍चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखि‍न- “हम समएपर टका नहि‍ भेज सकलहुँ ताहि‍ लेल अपने सभ लग लज्‍जि‍त छी। मुदा वादा करैत छी, कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने अहॉंक टका दऽ देव।” हमर सार कि‍छु नहि‍ बजलाह। हम कहलयनि‍- “ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ वि‍दागरीसँ पहि‍ने टका महेश बावूकेँ दए देवनि‍।” बुच्‍चन बावू बजलाह- “अवश्‍य-अवश्‍य।” अवश्‍य-अवश्‍य बजैत ओ आंगन चलि‍ गेलाह आ हमसब वासा पर आवि‍ बैसलौं। जलखै-नाश्‍ता, चाह-पान आदि‍ सभ चलए लगल। संगहि‍ ति‍लकक ओरि‍ओन हुअए लगलैक। बरातीक स्‍वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि‍ भेल। शुभ-शुभ कऽ वि‍आहो सम्‍पन्‍न भेल। मुदा बुच्‍चन बावू अपन वादाक मुतावि‍क कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने वकि‍यौताबला एक लाख नहि‍ दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ कि‍छु नहि‍ मुदा अवैतखान समधी मि‍लन नहि‍ केलक। हमरा ई गप्‍प नहि‍ पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्‍प नहि‍ मानि‍ फटफटि‍यापर बैसि‍ कऽ चल गेलाह। हम कनि‍यॉंकेँ वि‍दागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्‍जापर जाइते अपन संतुलन नहि‍ राखि‍ सकलौ आ महेशकेँ देखि‍ते कहलि‍यै- “......” क्रमश: ३. पद्य ३.१.शिव कुमार झा- पद्य ३.२.. कामोद झा -केओ नई २.लालबाबु कर्ण-जन्मभूमि ३.मनोज झा मुक्ति-देखावटी छोडिदे ३.३.१.ज्योति सुनीत चौधरी  -जीतक परिभाषा२.सुमन झा "सृजन"-कैक्‍टस जेकॉं दि‍ल ३.४.१.उमेश मंडल--हँसैत लहास २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-पियक्कर ३विनीत ठाकुर-शान्ति दूत परवा शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम : शिव कुमार झा,पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि : 11-12-1973,शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न !! आत्म उद्बोधन !!

अहॉ अपने पड़ल छी घोंटि धथुर कैलाश औ, टूटल हम्मर आश औ ना ।।

धरा पर अयलहुॅ प्रदोषक दिन, मातु - पितु अहॅक भक्ति मे लीन, बूझल सभ जन वम वम लेलनि हमर घर वासऔ । टूटल ................................. ।।

नेन कालहिं सॅ छी हर भक्त, सुखायल करम - धरम मे रक्त, शारदालीन संग मे शंकर पर विश्वास औ । टूटल ................................. ।।

देखिते वितल सुधामयी वर्ख, जीवन सॅ दूर भागि गेल हर्ख, जननी उठलि भूमि सॅ छोड़ि मोहक पाश औ । टूटल ................................. ।।

चहुॅ दिशि कालक भेल प्रहार, करम गति फॅसल वीचि मॅझधार, उदधि मरूस्थलि भेली हिय मे पसरल त्रास औ । टूटल ................................. ।।

‘आशु’ अछि मात्र अहीं सॅ मोह, होईछ अपन भाग पर छोह, हरू दुःख वा करू हम्मर निरस जीवनक नाश औ । टूटल ................................. ।। १. कामोद झा -केओ नई २.लालबाबु कर्ण-जन्मभूमि ३.मनोज झा मुक्ति-देखावटी छोडिदे १ कामोद झा केओ नई – केओ नई अछि केओ नई अछि बन्द आ हड़ताल समाप्त केनिहार केओ नई अछि भाई केओ नई अछि ।

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि भ्रष्टाक नीक पत्ता लगाकऽ कि करब ? कारवाही करऽबला केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि ।

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि कर्णालीक कल्याण करऽबला केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि पैघ हाइड्रोपावर चलाबिकऽ लोडसेडिङ्ग अन्त कएनिहार केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि मेलम्चीक पानीक सुविधा देनिहार केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि सभासद त ६०१ टा अछि, मुदा संविधान बनावऽबला केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि देश भाँडमे जाए, सम्हारऽबला केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि नेता त हजारक हजार अछि, मुदा देशक नेता केओ नहि अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि

केओ नई अछि भाई केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि सहमति आ सहकार्य करऽबला केओ नई अछि केओ नई अछि भाई केओ नई अछि २ लालबाबु कर्ण जन्मभूमि

पावनमय ई जन्मभूमिके सतसत कोटी प्रणाम करैत छी

माँकेर लाज राखऽलेल हम बेरबेर कवूल करैत छी

जानकी हमर सुपुत्री मिथिलाकेर त्राही–त्राही माम किया करैत छी ?

बाप–भाईके कर्तव्यपुरालेल सबके हम आह्वान करैत छी ।

उठू यौ मैथिल मिथिलावासी हाथ जाडि हम विनय करैत छी यूवा शक्ति एकवद्ध भऽ लाल खूनके लाज रखैत छी । ३ मनोज झा मुक्ति

देखावटी छोडिदे – लगबे त लागिजो भगबे त भागिजो

लगबे त सफल होएबे या त मरि जएबे । मरलापर तोहर मायके गर्व होएतै तोरा शहादतपर ओकर करेज जुरैतई ।

जौं शुरुएमे भगबे त भागि जो । जौं भगवे त, तोहर माय ओते दुःखीत नई होएतौ, तारा कमजोरीके सहर्ष स्विकार करतौ ।

जहन नामेकलेल लडैत छें देखावटी ढोंग करैत छें त, तों अपराधी छें अपन, अपना मायके ।

जहन तोहर माय ई बात बुझतौ त तोहरा वास्ते धारण कएने, नौ महिनाधरि सहेजिकऽ रखने अपना ‘गभर्’ प्रति ओ पछतेतौ ।

जे करबे से करैत जो, द्वैध चरित्रके छोडैत जो, सत्तसँ नाता जोडैत जो माएके अपना हँसवैत जो ताएँ, आब सांचहि पड़तौ, एकटा निर्णय करहि पड़तौ ।

करबे की ? लगबे त लागिजो भगबे त भागिजो । १.ज्योति सुनीत चौधरी  -जीतक परिभाषा२.सुमन झा "सृजन"- कैक्‍टस जेकॉं दि‍ल १ ज्योति सुनीत चौधरी जीतक परिभाषा जीतक परिभाषा ताकि रहल छी स्पर्धा स भरल जुग मे अर्थक संचयमे विजय अछि भौतिकता के पगमे आकि ज्ञानक प्राप्तिसँ जीतब भावुकताके ठगने बाहुबल सऽ बलवान घोषित हैब हाथ रांगि रक्तक रंगमे आध्यात्मक प्रपंच सीख धर्मगुरू बनब ढों.गक ओढ़ना ओढ़ने सत्ता पाबि कऽ देशके लूटब भ्रष्ट नेताके रूपमे सबहक महत्ता क्षणभंगुर अछि बितैत समयक संगमे सत्य आ विवेक सऽ जीवनयापन शान्ति अन्तर्मनमे २ सुमन झा "सृजन", कोसी कॉलनी, नि‍र्मली, सुपौल। कैक्‍टस जेकॉं दि‍ल अपन शहरक कात-करोटमे चलैत अहॉं बुझए लगलहुँ जि‍नगीक रस्‍ता अछि‍ एतवे असान झि‍स्‍सी-बुन्नीकेँ देखि‍ बि‍सरि‍ गेलहुँ अछारबला बरखाकेँ मुस्‍कुराइत लोककेँ देखि‍ ि‍बसरि‍ गेलहुँ प्राकृति‍क क्रूर मजाककेँ घरमे बसि‍ कवि‍ता लि‍खति‍ भेल अहॉंकेँ भ्रम गरीबकेँ चि‍न्‍हैक मुदा, नहि‍ चलि‍ सकलहुँ अहॉं कि‍छुओ डेग जि‍नगीक वि‍रानक रौदमे नहि‍ सुति‍ सकलौं अहॉं एक्‍को राति‍ गि‍रैत घरक डरसँ कोठरीमे नहि‍ दऽ सकलौं अहॉं संग भूखल आ सुखल मुँहक मुस्‍कीकेँ आ, छोड़ि‍ असकर चलि‍ गेलहुँ अहॉं ओहि‍ दि‍लकेँ जे अछि‍ कैक्‍ट्स जेकॉं जेकर कोमलता लऽ उगि आएल अछि‍ कॉंट जेकरा छूबए लेल सभ हाथ भऽ जाइत लहूलुहान आ हरेक बेरि‍ आनि‍ लैत अछि‍ दि‍ल अपन जलैत चेहरापर एकटा मुरझाएल मुस्‍कान। १.उमेश मंडल--हँसैत लहास २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-पियक्कर ३विनीत ठाकुर-शान्ति दूत परवा १ उमेश मंडल कवि‍ता- हँसैत लहास लहास माने मुइल मुइल माने लहास ई के नहि‍ बुझत हठात् गुम-सुम भेल छल जेँ ओ बुझाइत छल लहास तेँ ओ मुदा, आब ओ बाजत बजैत-बजैत हँसत अहॉंक कृति‍पर बनल संस्‍कृति‍पर। २ कृष्ण कुमार राय ‘किशन’

परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं। जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। वर्तमान पता:- खेल अनुभाग, कमरा न0-608 , आकाशवाणी दिल्ली संसद मार्ग, नई दिल्ली-110001 पियक्कर

सॉझ पड़ैत देरी,पीब क ओंघरा जाइत छी हम छी पीयक्कर। पढ़लाहा लिखलाहा के मूर्ख बूझैत, अपना के बुझैत छी लाल बुझक्कर। धिया-पूता पढ़ैत अछि किनैंहि,तेकर नैंहि करैत छी हम खोज मुदा पिबैत छी हम रोज। अपन काज छोड़ि कैं,व्यर्थ हम घूमैत रहैत छी केहेन छी हम घूमक्कर, हम छी पीयक्कर। पाई सधहेलौं दारू में ,भ गेलौंह हम फक्कर महाजनक कर्ज देखि क अबैत अछि हमरा चक्कर। लाधहल अछि हमरा माथ पर कर्जाक पहाड़ लगबैत छी कोर्ट कचहरीक चक्कर,क्याक त हम छी पियक्कर। सॉझ पड़ैत देरी,पीब क ओंघरा जाइत छी हम छी पीयक्कर। एखने हम शपत खाईत छी जे हम नैंहि आब पीयब कियाक कहत आब कियो हमरा पियक्कर। धिया पूता के निक स्कूल कॉलेज में पढ़ाएब एहि लेल त ,लगबैत छी मधुबनी दरभंगाक चक्कर। ३ विनीत ठाकुर मिथिलेश्वर मौवाही–६, धनुषा शान्ति दूत परवा ए शान्ति दूत परवा उड़िकऽ आ अपन देशमे फैलऽवै तोँ शान्ति हिमाल, पहाड़ आ मधेशमे सभ दिनसँ एतकेँ  नर–नारी शान्तिके पुजारी सहत कोना हिंसा पसरल अछि समस्या भारी हिमालक अमृत जलमे  मिलगेल  शोनित धारा भेल अछि अखन शसंकीत जनता नेपाली सारा परवा  छे  तोँ  सहासी  प्रिय सभक विश्वासी बुझै तोँ शभक समस्या रहे नहि केव वनबासी दू भाइ बीच अपन समस्या केँ जितत केँ हारत मायक  दुःखिया नयन नोर कतेक आब झारत हटादे रे  परवा  भाइ–भाइ  बीच  मोनक दूरी अनाहकमे नहि उजरै  सधवाके माङ्ग सिन्दुरी बालानां कृते देवांशु वत्स बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ तखनतँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए 29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद 32. इहो/ओहो 33. हँसए/हँसय हँस’ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान(युवा)/जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए 47. ल’/लऽ कय/कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/नै 59. करबा’/करबाय/करबाए 60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि 66. द’/द ऽ/दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका’ कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक खेलेबाक 92. खेलाएबाक 93. लगा’ 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ(in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो(willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबय/ डुमाबय 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेनाने घेरलन्हि 161. नञ 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही/तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा’ 201. देखाय देखा’ 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलो 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि 226.है/ हइ 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.बाली/ (बदलएबाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- संजोगने केँ- के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/  राम कऽ सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक। नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली 1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर,तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन,अखनि,एखेन,अखनी ठिमा,ठिना,ठमा जेकर, तेकर तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_IX-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -1.The Knowledge Born In Kusumpur 2.From Bed No. 32 Ward No. 29 DATE-LIST (year- 2009-10) (१४१७ साल) Marriage Days: Nov.2009- 19, 22, 23, 27 May 2010- 28, 30 June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30 July 2010- 1, 8, 9, 14 Upanayana Days: June 2010- 21,22 Dviragaman Din: November 2009- 18, 19, 23, 27, 29 December 2009- 2, 4, 6 Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25 March 2010- 1, 4, 5 Mundan Din: November 2009- 18, 19, 23 December 2009- 3 Jan 2010- 18, 22 Feb 2010- 3, 15, 25, 26 March 2010- 3, 5 June 2010- 2, 21 July 2010- 1 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-12 July Madhushravani-24 July Nag Panchami-26 Jul Raksha Bandhan-5 Aug Krishnastami-13-14 Aug Kushi Amavasya- 20 August Hartalika Teej- 23 Aug ChauthChandra-23 Aug Karma Dharma Ekadashi-31 August Indra Pooja Aarambh- 1 September Anant Caturdashi- 3 Sep Pitri Paksha begins- 5 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep Matri Navami- 13 Sep Vishwakarma Pooja-17Sep Kalashsthapan-19 Sep Belnauti- 24 September Mahastami- 26 Sep Maha Navami - 27 September Vijaya Dashami- 28 September Kojagara- 3 Oct Dhanteras- 15 Oct Chaturdashi-27 Oct Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct Chhathi- -24 Oct Akshyay Navami- 27 Oct Devotthan Ekadashi- 29 Oct Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov Somvari Amavasya Vrata-16 Nov Vivaha Panchami- 21 Nov Ravi vrat arambh-22 Nov Navanna Parvana-25 Nov Naraknivaran chaturdashi-13 Jan Makara/ Teela Sankranti-14 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan Mahashivaratri-12 Feb Fagua-28 Feb Holi-1 Mar Ram Navami-24 March Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Ravi Brat Ant-25 April Akshaya Tritiya-16 May Janaki Navami- 22 May Vat Savitri-barasait-12 June Ganga Dashhara-21 June Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul Guru Poornima-25 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS      IX Priya recalled – At Forbesgunj ,one day she felt giddiness and fell on the bed – when she became conscious she found doctor checking her pulse – Rahul and Richa stood near the bed. Doctor asked Priya – How do you feel now? Priya – I am fine but giddiness is still there. Doctor – I have the apprehension that you have spinal disorder. Rahul, please get her neck and back x-ray done tomorrow. Priya had continuous vomiting – she felt all alone. Harish was busy with his business in England. He was aware of the fact that Priya loved husband and children alike. She cannot live without seeing her children off and on. On several occasions Harish advised her to stay with him. Children have their own family, their own life. Life has its own certain rules. Why do not you understand this? Every year Harish visited India twice. Rest of the time Priya moved from one child to another. Harish gave Priya sufficient money which enabled her to spend on her own, not depending on the children. Rahul – Pranam Maaji. When did you come? Priya overheard Rahul’s voice which energized her. Mother-in-law – I have just arrived Pahun. You have just followed me. Rahul – Where is Babuji? Mother-in-law – Busy with his work as usual. Thought Richa must have come back from office, I should meet her. Rahul- You have done the right thing – we also feel happy to meet you – Richa is also overjoyed to see you. Otherwise this life is full of care and responsibilities. 2 Priya was disturbed as Rahul is yet to ask for her. Rahul – Richa, have you served any refreshment to Maaji? Mother-in-law – No.. no, please leave it. She is already overburdened with her office work. Moreover, guests are a regular feature. – Priya  felt the blow on her heart. Rahul – You are right. But you will have to take light refreshment. Priya was sill feeling giddiness – she desperately needed a glass of water to quench her thirst – she tried to stand but fell on the ground. The thud sound made everyone surprised and startled – Rahul became nervous seeing her mother fallen on ground. Priya was unconscious – her body was hot with high fever. Mother-in-law – Rahulji’s mother has fallen down. Now Richa, your bad days have arrived. Tears started flowing from Priya’s eyes – Who will understand the mystery of the tear drops? One needs mother’s heart to understand this mystery. Every child understands the sacrifices and expectations of the parents when he becomes parent himself. But this realization comes too late – by that time the parents are no more. Doctor arrived and asked – For how long is she unwell? Richa – She was perfectly alright. Rahul – No Doctor, some time back she had giddiness, her x-ray was done – spinal disorder was detected. She had medicines. After that she was fine. Doctor – Now I understand the problem – She needs rest – her health should be taken care of. 3 Rahul – Is there anything serious? Doctor  – Nothing serious. But keep a watch on her as she has become quite pale and weak. Perhaps she ignores her health. Is she troubled by something? Rahul thought - Why his mother is uneasy and anxious?- Father lives in England – I also remain busy throughout the day – Is Richa ignoring his mother? Richa became worried as Priya was managing the entire household. Priya – Dhara didi, we forget the incident but always remember the sting. If I am innocent then I must forget the sting of that incident. Didi , it was one chapter of my life. If I tell you about another incident you will lose trust in any relationship. Relationship is based on trust – if there is relationship there is family – family faces both the ups and downs, but didi thorn of sorrow resembles rose thorn, you tolerate rose thorn due to fragrance of rose. But even the god will not tolerate the sting of cactus or the sharp points of thistle. God creates flower and thorns for human being – even god is scared of thorns, himself living in beautiful gardens. Dhara laughed at Priya’s simile – she felt as if the ice of deep freezer started defrosting after several days – ice melted and got converted into running water. So was Priya’s heart  bleeding with emotions as if this night would never return – as if she will never get a friend like Dhara. Dhara became serious – She understood that somewhere motherhood was severely wounded. Dhara felt scared of the treatment Priya received from her children. Priya started crying . Reshmi was fast asleep. Priya –Akshat took me to his place. Rahul had informed him about my ill-health. Akshat and Akanksha were busy with their lives, my grandson Piyush was always busy with his school and home work. One day Akshat and Akanksha had heated arguments about their servant. Unknowingly Priya also got involved in it. 4 Akshat – Why are you angry at the servant, after all he is a small boy. Akanksha replied angrily – Why, I can also shout at him – he is also my servant. Akshat – I just want, we should not shout at him – if he is taking care of mother, let him do that – you will worsen your nature by shouting at him. Akanksha – Oh ..  will he only take care of mother? Priya was taken aback – how she has come between wife and husband? Akshat was also surprised – Why mother was dragged in it? And said -Yes, servant will only look after mother. Akanksha – I have never said that he has to serve me only – I am continuously working like a servant. I do all the household work. Priya interrupted and said – When you go to office who takes care of the household work? Akanksha – Before leaving for office I always prepare the food. Priya – Kaniya, there are many household works besides that. Akanksha – Who tells you to do the work . Please take rest. I will do the remaining works after coming back from the office – Do not I massage you? Sometimes I do not do – Do not I make your bed? Sometimes I do not make it. Priya wanted to say  –‘ Please make corrections – Sometimes I massage – sometimes I make bed’ – but kept mum. Priya started crying near Harish’s photo – You went to Foreign leaving me here to undergo torture – I can not live without you, please call me there. What happened to Akanksha? Why is she so short-tempered? Why is she so inhuman? Akshat asked for dinner. Priya advised him – tell kaniya to serve you dinner. But Akshat did not utter a single word. 5 Priya heard some sound from kitchen – She went there and found Akshat looking for food. Priya put the cooked food in microwave and after sometime served it to Akshat. Akshat – Maa, do not feel sad. She is childish – She is unable to understand that the elderly anger is blessing. Priya – Please do not be worried. Everything will be fine. Akshat – Maa, you also take dinner. Priya – No son – I will take dinner with Akanksha – you finish the dinner. After dinner Akshat became busy with his office work and Priya watched T.V. After sometime servant came in and said – Memsab is calling you for dinner. Priya felt bad – Why servant, Kaniya could have herself come. She replied – Go and bring one roti for me. Servant brought one roti with vegetable – Priya became upset to get food from servant, thought kaniya could have served her – what samskar parents have given her – She has no respect for elders – Akshat remains outside throughout the day – he does not witness what happens here. He is like Shrawan Kumar to his parents -- and his wife … Priya herself had selected her – If you praise her she feels delighted – but if you give advise, correct her ways – she retaliates with extreme anger – so much so that she even does not care for her father-in-law – If somebody hits you with hand that could be stopped but if it is sharp tongue, you can not hold the tongue. Sometimes Priya wanted to say – shut up kaniya – you are staying with us not the vice versa – Why so much aggression- but looking at Akshat’s face she always stopped herself – Why Akshat is to be blamed – It was Priya’s mistake who herself took Akshat’s consent for this marriage. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in 1.The Knowledge Born In Kusumpur 2.From Bed No. 32 Ward No. 29 1 The Knowledge Born In Kusumpur In the age of the spaceship to moon I recall the allegation of Aryabhatt We elucidated our knowledge in this Kusumpur Measured diameters of the earth, the sun and the moon The earth is not static This is moving The stars are illusions that are still The eclipse is not galloping of Rahu rather merely a shade Well, congratulations for the spaceship to the moon To the scientists of ISRO and Madhawan Nair Thou came fifteen hundreds years after the Aryabhatt Not too late for those countrymen Who couldn’t count the start even after reading Leelawati If not in Kusumpur then in Harikota The theory couldn’t be credited to Kusumpur At least send congratulations from Kusumpur Now we won’t put water in plate to touch the moon Thou the knowledge were initiated by Aryabhatt in the Kusumpur At least send wishes from the Kusumpur 2 From Bed No. 32 Ward No. 29 Hey Dear! What I saw today In the Safdarjang hospital Doctors so pride to patients For their free treatments Tax is levied on soap and oil For everyone For the complaint of dirty washroom Nurses show prices of Apollo and say Go to Apollo if Washrooms are dirty For taxes question The Finance Ministry . VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXVII संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- २७ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. सप्तविंशतितमः पाठः संस्कृतसंभाषणस्य अभ्यासं कुर्मः किम? आम् अभ्यासं कुर्मः पूर्वतन पाठे अंतः बहि इत्यनयोः अभ्यासं कृतवंतः। इदानीम् तस्यैव पुनः स्मरण कुर्मः। प्रकोष्ठः प्रकोष्ठस्य अंतः दीपः अस्ति। प्रकोष्ठात् बहिः पादरक्षा अस्ति। गृहष्य अंतः प्रकोष्ठः अस्ति। गृहात् बहिः मार्गः अस्ति। वाक्यानि वदंति वा। एकम् मन्दिरम् अस्ति। चिंतयतु। मन्दिरस्य अंतः किम् अस्ति। मन्दिरात् बहिः किम् अस्ति। इतोऽपि इदानीम् वाक्यानि वदंति वा। मन्दिरस्य अंतः भक्ताः संति। अहम् इदानीम् किञ्चित् चित्रम् लिखामि। भवान् इतोऽपि एकाम् रेखाम् लिखंतु। इतोऽपि दीर्घाम् लिखतु। सः इतोऽपि दीर्घाम् रेखाम् लिखितवान्। भवत्याः नाम् किम्? मम् नाम गौरी इतोऽपि उच्चैः वदति–मम नाम– इतोऽपि वृहत् लिखतुः इतोऽपि वृहत् कः लिखति अहम् किञ्चित् संगीतम् जानामि– अहम् इतोऽपि संगीतम् इच्छामि अहम् किञ्चित् संस्कृतम् अधीतवान अहम् इतोपि संस्कृतम् अध्येतुम इच्छामि अहम् बाबूलालः किञ्चित् खादति इति वदामि–भवंतः अहम् बाबूलालः इतोपि खादितुम् इच्छति अनीता विलंबेन निद्राम कृतवती अनीता इतोपि निद्राम कर्त्तुम इति राकेशः किञ्चित् श्रुतवान् राकेशः इतोपि श्रोतुम इच्छति मोहनः स्वल्पं वदति मोहनः इतोपि वक्तम् इच्छति इतोऽपि–अर्थम् अवगच्छति वाः 1- वत्से। इतोऽपि निद्रा न आगता वा। नेत्र निमील नम् करोतु–देवं स्मरतु तदा निद्रा आगच्छति किन भोः। इतोऽपि निद्रा न आगता वा। इतोऽपि निद्रां न करोतु चेत ताडयमि अस्तु–अहम एव शमयानि अष्टवादनम् अभवत्। मंजूनाथः इतोऽपि न आगतवान भोः। कस्य प्रतीक्षां अस्ति मंजूनाथस्य सः इतोऽपि न आगतवान इतोऽपि न आगतवान वा अत्र कः गीतम् सम्यक गायति वा। भवान गायति वा–अहम् न गायमि श्रीपादः गायति– अहम् बहुम् इच्छामि संगीतम् इत्युक्ते मम बहु आनदः अस्ति पायेसम् इत्युक्ते अहम् चलकद्वयम् अपि पीबामि कविः इत्युक्ते कालिदासः रमनीय काव्य लिखितवान तबलावादक इत्युक्ते जाकिर हुसैन आदि कविः इत्युक्ते वाल्मिकिः आदि काव्यम् इत्युक्ते किम–रामायणम् नाटकम् इत्युक्ते भारतीय संस्कृतिः लंबोदरः                  गणेशः दासरथीः                  श्रीरामः सौमित्रिः                  लक्ष्मणः गिरिजाः                  पार्वतीः वैनतैयः                  गरूड़ः पाकशासनः                देवेन्द्रः अच्युतः                  श्रीकृष्णः गांगेयः                   भीष्मः कौन्द्रेयः                  अर्जुनः वांग्देवीः                  सरस्वतीः नेताजीः                  सुभाषचन्द्र बोसः राजाजीः                  राजगोपालाचार्यः जे.पीः                    जय प्रकाश नारायणः चेन्नईः                   मद्रासः मुबंईः                    बाँम्बेः भातृवत्सलः               लक्ष्मणः शण्डुकः                   सुब्रह्मणयः कृष्णाः                   द्रौपदीः भगकद् गीतायाः आरंभे पार्थाय प्रतिबोधिताम–इति श्लोकः अस्ति भववद् गीतायाः अंतं–यत्र योगेश्वरः कृष्णः इति श्लोकः अस्ति। शिक्षकः कक्षयायाः आरंभे नमोनमः इतिवदति – कक्ष्यायाः अंते धन्यवादः इति वदति - कार्यक्रमस्य आरंभे दीपज्वालनम् कुर्वंति - कार्यक्रमस्य अंते वंदनार्पणम् कुर्वंति - कक्ष्यायाः आरंभे शिक्षकः वाक्यम् वदति - कक्ष्यायाः अंते अभ्यासम् करयति - पूजायाः आरंभे विनायक स्तोत्रम वदंति - पूजायाः अंत आञ्जनेयस्तोत्रम वदंति - कविः कावस्य आंरभे मंगलाचरणं करोति - कविः कावस्य अंते अपि मंगलाचरणं करोति इदानीम् वाक्यम् वदंति वा कः वदति– - अहम् भोजनस्य आरंभे अंते च हस्तप्रक्षालनं करोमि सुभाषितम् उपर्जितानां वित्तानां त्याग एकहि रक्षणम्। तडागोदरसंस्थानां परीवाद इताम्भसाम्॥ संपादितस्य धनस्य रक्षणं सतपात्रे विनियोगेन एत भवति स एव धनरक्षणस्य उत्तमः भार्गः–अत्र एकं उदाहरणं यता–तडागे विद्यमानं जलं अपेक्षायां सत्याम् यदा बहिर्गच्छति तदा एव तत्रत्यंम जलम् अपि शुद्धम् भवति तडागः अपि संरक्षितः भवति–अन्यथा तडागः मग्नः भवेत्–एवमेव संचितस्य धनस्य अपि त्यागेन एव रक्षणं भवति इति सुभाषितः तात्पर्यम् अस्ति। वयम् इदानीम् एकम् दृष्यम् पश्यामः यत्र एतस्य उपयोगः भवति 1. मोः कृष्णमंगलम् कुत्र अस्ति 2. अष्टम मुख्यमार्गस्य आरंभे अस्ति–पत्रालय नवम् मुख्य मार्गस्य अंते अस्ति–धन्यवादः–स्वागतमः कथा पूर्वम् भारते हर्षमहाराजस्य शासनम् आसीत्। तस्मिन् समये, चीनदेशस्य पर्यटकः ह्वेनस्वांग महोदयः भारतं आगतवान्। भारते सर्वत्र पर्यटनम् कृतवान्। भारतीय संस्कृतिम् अधीतवान् अत्रव्यानाम् जनानाम् विषये सम्यक परिशीलनं कृतवान्–अत्र ग्रंथानाम्–अमूल्यू वस्तुनां संग्रहणं कृतवानं–प्रस्थान समये ह्वेनस्वांग महोदयः हर्ष चक्रवतिनं दृष्टिवान्–स्व अनुभवम् उक्तवान्–महाराजाय धन्यवादसमर्पणम् अपि कृतवान्। महाराजः अपि अतीत संतुष्टः–ह्वेनस्वांग महोदयाय राज्यश्री नामकाम् नौकाम् क्षत्तवान। विंशति वीशन अपि ह्वेनस्वांग महोदयेन सह प्रेषितवान् प्रेषण समय हर्ष महाराजः वीरान उक्तवान्–भोः वीराः अस्याम् नौकायाम् अनेके धर्मग्रंथाः अनेकानि अनेकानि एतिहासिक वस्तूनि च संति एतनि च भारतीय संस्कृतैः प्रतीकानि अमूल्यानि च अतः एतेषाम् रक्षणम् भवताम् आद्यम् कर्त्तव्यम् इति हर्षमहाराजः समुद्रे यात्रा आरब्धः–अनेकदिन पर्यंतम् कोऽपि तिध्वेः न संजातः एकस्मिन् दिने समुद्रे चण्डमारूतः आरब्धः–नौका दोलायमाना संजाता नौका भग्ना भवेत् वा इति संशयः उत्पन्नः भीतः प्रधान नाविकः उक्तवान इदानीम् नौका भग्ना भवेत प्राणान् रक्षंतु अत्र विद्यामानानि पुस्तकानि एतिहासिक वस्तूनि च समुद्रे क्षिपंतु–इत्युक्तवान् तदा योधनानयकः उक्तवान्–भोः वीराः–एतेषाम् धर्मग्रंथानाम् अमूल्य वस्तुनाम् तद्द्वारा भारतीय संस्कृतैः रक्षणम् अस्माकम् आद्यम् कर्त्तव्यम् तदर्थम् सर्वे सिद्धाः भवंतु–प्राणादपि कर्त्तव्यम् परिपालनीयम् इति तदा वीराः सर्वे एकैक सह तृणमित ष्टशरीरम् समुद्रे क्षिप्तवंतः संस्कृति रक्षणार्थम् स्वप्राणोना अपि समर्पितवंतः संस्कृति रक्षणार्थम् भारतीयानाम् कर्त्तव्यतत्परता दृष्टवंतः ह्वेनस्वांग महोदस्य नेत्रतः अश्रुप्रवाहः संजातः संस्कृत अनुवाद       मैथिली अनुवाद        अंग्रेजी अनुवाद हरिः ओम्! हरि ओम! (नमस्कार) Hello! एतद् महेश–महोदयस्य गृहं किम्? एठाह महेशक घर कतै अछि। Is this Mr. Mahesh’s residence? एषा 341 7689 अस्ति किम्? एठा 2351 7689 की अछि। Is this 2351 7689? संस्कृत–भारत्याः कार्यालयः किम्? संस्कृत भारतीक कार्यालय कतै अछि? Is it Sanskrit Bharati’s office? कः सम्भाषणं करोति? कै बाजए छलौ? Who is speaking? अहम् अरूणः वदामि। हम अरूण बाजए छलौ। I am Arun speaking. केन सह वक्तुम् इच्छति? अहाँ ककरासँ बात करए चाहैत छलौ। With whom do you want to speak? लतया सह वक्तुम् इच्छामि। हम लतासँ बात करए लए चाहैत छलौ। I want to speak to Lata. कृष्णः गृहे अस्ति किम्? की कृष्ण घरमे अछि। Is Krishna at home? क्षम्यतां, सः गृहे नास्ति। क्षमा चाहे छलहुँ, उ घरमे नहि अछि। Sorry, he is not at home. कृपया एतं सन्देशं तं सूचयति किम्? कृप्या ओकरा लए कोनो सन्देश अछि तँ हमरा कहुँ। Would you give him this message please? आम् एकं क्षणं तिष्ठतु। हँ, हम एक क्षणक बाद करैत छलहुँ। Yes, please wait for a moment. तां दूरभाषां कर्तुं सूचयामि। हम अहाँक कतेक देरसँ फोन मिलाबे छलहुँ। I’ll tell her to ring you up. भवतः दूरभाषासङ्ख्या का? अहाँक दूरभाषक संख्या की अछि। What is your phone number? क्षम्यताम्, असम्यक् सङ्ख्या। क्षमा चाहैत छलहुँ, गलत नम्बर अछि। Sorry, Wrong number. तस्य दूरभाषा व्यस्ता अस्ति। ओकर फोन व्यस्त अछि। His phone is engaged. अस्माकं दूरभाषा निष्क्रिया अस्ति। हमर फोन निष्क्रिय भऽ गेल अछि। Our phone is dead. किञ्चित् उच्चैः वदतु। कृप्या, जोरसँ बाजू। Please speak a little louder. स्थापयामि किम्? की हमरा इंतजार करै पड़त। Shall I hang up? ह्यः बहुवारं दूरभाषां कृतवान्। कोऽपि न उन्नीतवान्। हम काल्हि बहुत समयसँ फोन करैत छलहुँ। कोइ उठेबै नहि करैत छलै। I called many times yesterday. Nobody picked up the receiver. वयं बहिः गतवंतः। We had gone out. कृपया मोहनम् आह्ययति किम्? कृप्या, मोहनकेर फोन करू। Will you please call Mohan? अस्तु, श्र्वः पुनः दूरभाषां करिष्यामि। ओके, हम दोबारा काल्हि आएब। Okey, I’ll again tomorrow. तस्याः समीपे मम दूरभाषासङ्ख्या नास्ति। ओकरा पास हमर फोन नम्बर नहि अछि। She does not have my phone number. दूरभाषा–सङ्ख्या कुत्र अस्ति? फोनक संख्या की अछि। Where is the telephone directory? दूरभाषाकेन्द्रस्य सङ्ख्या का? दूरभाषकेन्द्रक संख्या की अछि। What is the number of the Telephone exchange? १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित। विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१) सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com श्रुति प्रकाशनसँ १.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/- २.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि) खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर) खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ) खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण) खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ) खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु। ३. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-) ४/५. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/- Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/- ६. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. १५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु) ७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and  $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale. १०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad) ११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स १२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) 13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) नव मैथिली पोथी सभ कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक) खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना- गजेन्द्र ठाकुर रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-15-0]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-16-7]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-17-4]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-18-1]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-19-8]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )- गजेन्द्र ठाकुररु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-20-4]

कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (पेपरबैक)खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य रु.५०/-US$20 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-21-1] विभारानीक दूटा नाटक (भाग रौ आ बलचन्दा)रु.१००/- US$25 [Ist Paperback Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-01-3]

मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर रु.१००/-US$80 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-13-6]

मैथिली चित्रकथा-नीतू कुमारी रु.१००/-US$80 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-14-3]

नताशा (मैथिली चित्र शृंखला)- देवांशु वत्स रु.१५०/- US$60 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-04-4]

हम पुछैत छी- (कविता संग्रह)- विनीत उत्पल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-05-1]

अर्चिस्- (कविता/हाइकू संग्रह)- ज्योति सुनीत चौधरी रु.१५०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-06-8]

मौलाइल गाछक फूल-(उपन्यास)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.२५०/- US$40 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-02-0]

मिथिलाक बेटी-(नाटक)- जगदीश प्रसाद मंडल रु.१६०/- US$25 [Ist Edition 2009 ISBN NO.978-93-80538-03-7]

विदेह:सदेह:२ (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-09-9]

विदेह:सदेह:३ (मैथिली पद्य २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-08-2]

विदेह:सदेह:४ (मैथिली कथा २००९-१०) सम्पादक- गजेन्द्र ठाकुर, सहायक सम्पादक- रश्मिरेखा सिन्हा आ उमेश मंडल, भाषा सम्पादन- नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा रु.१००/- US$25 [Edition 2010 ISBN NO.978-93-80538-07-5]

(add courier charges Rs.20/-per copy for Delhi/NCR and Rs.40/- per copy for outside Delhi) COMING SOON: I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:- १.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक जलोदीप ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह बाङक बङौरा ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह अक्षरमुष्टिका II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल- कथा-संग्रह- गामक जिनगी नाटक- मिथिलाक बेटी उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि। IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन VII.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II) VIII. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature [After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.] Details of postage charges availaible on http://www.shruti-publication.com/ FOR SUPPLY OF BOOKS IN ASSAM, BIHAR, WEST BENGAL, JHARKHAND (INDIA) AND NEPAL CONTACT OUR DISTRIBUTORS: PALLAVI DISTRIBUTORS, C/o Dr. UMESH MANDAL, TULSI BHAWAN, DEEPAK CHITRALAYA MARG (CINEMA ROAD), WARD NO.6, NIRMALI, DISTRICT- SUPAUL - PIN-847452(BIHAR,INDIA) ph.09931654742 e-mail: shruti.publication@shruti-publication.com (विज्ञापन) (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com

(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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