168 'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.१.दुर्गानन्द मंडल-पारस २.उमेश मंडल-अमैआ भार ३.संजय कुमार-अनट्रेन्ड घुसखाेर ४.-जगदीश प्रसाद मंडल-एकांकी-कल्याणी २.२.रमानन्द झा "रमण"-मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर २.३.1.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान 2.उमेश मंडल-कबिलपुरक कथा गाेष्ठी 3.रामप्रवेश मंडल- लघुकथा-झगड़ा खतम २.४.१. मैथिली कथा-गोलबा- बृषेश चन्द्र लाल २.निबन्ध-बिपिन झा-गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता २.५.डा. शंकरदेवझा- मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली २.६.जितेन्द्र झा- 1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा 2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि २.७.१.बीरेन्द्र कुमार यादव- कथा- हमर समाज २.जीवकान्त-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ३.धीरेन्द्र कुमार-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ४.राजदेव मंडल- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र २.८.१.डॉ. शेफालिका वर्मा- एकटा लघुकथा २.कथा-नन्द विलाश राय-ऐना ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २५म खेप ३.३.1.राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता 2.मनोज कुमार मंडलक चारिटा कविता ३.४.चन्द्रशेखर कामति-गीत ३.५.शिव कुमार झा- पद्य ३.६.सत्येन्द्र कुमार झा- पांच लघु-कविता ३.७.१.ज्योति सुनीत चौधरी -दूबिक भाग २.सुमन झा "सृजन"-बलि ३. मनीष झा "बौआभाई"-फहराइयै पताका ३.८.१.शिवकुमार िमश्र २.राजेश मोहन झा- गरम जमाना ३.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-दहेज, देशऽक चिन्ता ४. बालानां कृते-मुन्नी वर्मा, १.कविता-समाजक विडम्बना २.लघुकथा-1.हमर संस्कार 2. करैलाक मीठ गुण ५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_X-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The Directors विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय कथा-लघुकथा अंग्रेजीक शॉर्ट स्टोरी आ मैथिलीमे अन्तर। एतए एक पन्नासँ छोट कथा भेल लघु कथा आ ओहिसँ पैघ आ ४-५ पन्नासँ १५-२० पन्ना धरि कथा आ दीर्घ कथा। फेर ५०-६० पन्नासँ उपन्यास शुरू। १९४२-४३ क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे एहि अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइलाह (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओहिमे नहि भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाओल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा एहिपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ एहि विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, ताहि कारणसँ अमर्त्य सेन जेकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओहि महाविभीषिकासँ ओतेक प्रभावित नहि भेल होएताह। आ एतए जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह होएबासँ बचा लैत अछि। एहि संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, रिक्त स्थानक पूर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्पी छथि, कथ्यकेँ तेना समेटि लैत छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओहि स्थानपर स्थापित करैत अछि, जतएसँ मैथिली साहित्यक इतिहास “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व” आ “जगदीश प्रसाद मण्डलसँ” एहि दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नहि वरन् अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर अएबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे कतहु अभाव-भाषण नहि भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखैत छथि से अद्भुत। हिनकर कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरुद्ध पारम्परिक आजीविकाक गौरव महिमामंडित भेटैत अछि, आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टिकोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचैत छी, जे करैत छी सएह लिखैत छी- ताहि कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओही भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखाओल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक सामाजिक क्षेत्र टा मे नहि वरन् आर्थिक क्षेत्रमे सेहो क्रान्ति आनत। विदेह मे हिनकर पाँचटा उपन्यास, एकटा नाटक आ दू दर्जनसँ बेशी कथा, नेना-भुटका-किशोर लेल सएसँ ऊपर प्रेरक कथा ई-प्रकाशित भऽ विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीकेँ दलमलित करैत मैथिली साहित्यक एकटा रिक्त स्थानक पूर्ति कऽ देने अछि। मैथिली भाषा साहित्य : बीसम शताब्दी - प्रेमशंकर सिंहजीक एहि निबन्ध-प्रबन्ध-समालोचना संग्रहमे मैथिली साहित्यक २०म शताब्दी आ एक्कैसम शताब्दीक पहिल दशकक विभिन्न प्रिय-अप्रिय पक्षपर चर्चा भेल अछि। अप्रिय पक्ष अबैत अछि एहि द्वारे जे राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया कखनो काल परस्पर विरोधी होइत अछि। मैथिली साहित्यक पुरान सन्दर्भ मैथिली भाषा आ साहित्यमे वर्णित अछि। लोकगाथा मे मणिपद्मक लोकगाथाक क्षेत्रमे अवदानकेँ रेखांकित करैत लोकगाथाक चर्चा भेल अछि । लोकनाट्य मे मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत उल्लेख अछि। बीसम शताब्दी- स्वर्ण युगमे मैथिली साहित्यक सए बर्खक सर्वेक्षण अछि। पारंपरिक नाटक मे मैथिलीक आ मैथिलीमे अनूदित पारम्परिक नाटकक चर्चा अछि।सामाजिक विवर्तक जीवन झा मैथिली नाट्य साहित्यमे हुनका द्वारा आनल नूतन कथ्य-शिल्पकेँ रेखांकित करैत अछि। हरिमोहन झाक परवर्त्ती रचनाकारपर प्रभाव हरिमोहन झा पर समीक्षा अछि। मैथिली आन्दोलनक सजग प्रहरी जयकान्त मिश्रक अवदानक आधारित अछि। संस्मरण साहित्य मे मणिपद्मक हुनकासँ भेँट भेल छल क सन्दर्भमे संस्मरण साहित्यपर चर्चा भेल अछि। अमरक एकांकी: सामाजिक यथार्थ मे अमरजीक एहि विधा सभक तँ मायानन्दिक रेडियो शिल्पु मे मायानन्द मिश्रक एहि विधाक सर्वेक्षण अछि। चेतना समिति ओ नाट्यमंच मे चेतना समिति द्वारा कएल रचनात्मक कार्यक विवरण अछि। एहि सभ आलेखमे सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, संस्था सभक निर्माण वा वर्तमानमे संपूर्ण समुदायक धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित सुधारक आवश्यकता, महिला-लेखन आ बाल-साहित्यक स्थान-स्थापर चर्चा, यथासंभव मेडियोक्रिटी चिन्हित करबाक प्रयास, मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा नहि राखब- ई सभटा समीक्षाक आवश्यक तत्वक ध्यान राखल गेल अछि। एक पाँतिक वक्तव्य कतहु नहि भेटत, पूर्ण विवेचन भेटत। गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them.- Chitra Mishra पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण, ( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी आ प्राच्य आ पाश्चात्य रचनाक / कविता सभक निर्ल्ज्जतासँ पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि। ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, हरेकृष्ण झाक कविताकेँ हिन्दीमे, बिना अनुमतिक, छपबै छथि ,डॉक्टर हुनका तनावसँ दूर रहबा लेल कहने छन्हि। ई गप आर पुष्ट होइत अचि कारण विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर एकटा हिन्दी पत्रिकामे बिना अनुमतिक छपबओलक, माने ई आदत हिनकर पुरान छन्हि। सम्पादक) Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) . There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh Srikant Verma and others.ई संग्रह इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, गजेन्द्र ठाकुर, राजकमल चौधरी आदि कविक पंकज पराशर द्वारा चोराएल रचनाक कारण बैन कए देल गेल। "रचना"पत्रिकाक कथित अतिथि सम्पादकक रूपमे पंकज पराशर द्वारा कवि-कहानीकार सभसँ रचना सेहो मँगबाओल गेल आ तकरा अपना नामसँ छपबाओल गेल। ई छद्म साहित्यकार पराशर गोत्रक (!!)पंकज कुमार झा उर्फ पंकज पराशर बहुतो लेखकक अप्रकाशित रचना अनुवाद करबा लेल सेहो लेलक आ अपना नामेँ छपबा लेलक। पाठकक आग्रहपर आर्काइवमे ई तथ्य राखल जा रहल अछि।- सम्पादक We deplore the selling of these prizes to a person who has brought respect of Maithili to a lower level.
तारानन्द वियोगी: (मिथिला सृजन: जून-जुलाई २०१०, वर्ष-१, अंक-२): हुनक (पंकज पराशरक) अनेक रचना एहनो छनि जकर जन्म दोसरक काव्य रचना पढ़लाक अनन्तर भेलनि अछि। कविता ओ परिपूर्णतः हुनके थिकनि मुदा किछु गोटेकेँ ई कहबाक अवसर भेटि गेलनि जे ओ पंकज चोर-कवि थिकाह। हम देखैत छी जे चोर समीक्षक भने ओ होथु, चोर-कवि ओ कदापि नहि छथि। मुदा एना किएक भेल? एहि दुआरे भेल जे आनक रचना पढ़ि कऽ अपन अनुभूतिमे उतरैत काल ओ आनक आभामंडलसँ तेना आक्रान्त छलाह जे तकर छाप कविताक दृश्यमे देखार पड़ि गेल। ई वस्तुतः सिद्धताक कमी थिक, जकरा क्यो रचनाकार रचिते-रचिते सिद्ध कऽ सकैत अछि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ २. गद्य २.१.१.दुर्गानन्द मंडल-पारस २.उमेश मंडल-अमैआ भार ३.संजय कुमार-अनट्रेन्ड घुसखाेर ४.-जगदीश प्रसाद मंडल-एकांकी-कल्याणी २.२.रमानन्द झा "रमण"-मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर २.३.1.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान 2.उमेश मंडल-कबिलपुरक कथा गाेष्ठी 3.रामप्रवेश मंडल- लघुकथा-झगड़ा खतम २.४.१. मैथिली कथा-गोलबा- बृषेश चन्द्र लाल २.निबन्ध-बिपिन झा-गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता २.५.डा. शंकरदेवझा- मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली २.६.जितेन्द्र झा- 1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा 2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि २.७.१.बीरेन्द्र कुमार यादव- कथा- हमर समाज २.जीवकान्त-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ३.धीरेन्द्र कुमार-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ४.राजदेव मंडल- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र २.८.१.डॉ. शेफालिका वर्मा- एकटा लघुकथा २.कथा-नन्द विलाश राय-ऐना १.दुर्गानन्द मंडल-पारस २.उमेश मंडल-अमैआ भार ३.संजय कुमार-अनट्रेन्ड घुसखाेर ४.-जगदीश प्रसाद मंडल-एकांकी-कल्याणी १ दुर्गानन्द मंडल पारस “शान्ति यै शान्ति कतए नुकाएल छी यै फूलकुम्मरि?” शान्ति- “एलौं याए एलौं।” आंगनसँ शान्ति हाक दैत लग आिब सोझामे ठाढ़ि होइत पुन: बाजि उठैत छथि- “कथीले एतै जोर-जोरसँ हाक दैत छलौं? कोनो खास बात छै की?” हम- “ऐह, अहॉंकेँ तँ सदिखन मजाके सुझाइत अछि। खास बात की रहत, अहॉं छी तँ सब खासे बात बूझु। ओना आइ विद्यालयक छुट्टी समाप्त भऽ गेल तेँ झब दऽ खाइले किछु बनाउ। जे हम समएसँ विद्यालय चल जाएव।” शान्ति बजलीह- “ओ..., आब ने बुझलहुँ। अहॉं तँ सब दिन गोलहे गीतकेँ गबै छी। ओना हे, आइ बड्ड सखसँ अपनहि बाड़ीसँ सुआ आ लौफक साग काटि अनलहुँहेँ। तेँ आइ साग-भात आ आल्लुक सानाक संग भाटा-अदौरीक तीमन बनवितहुँ से निआरने रही। मुदा ताहिमे तँ देरी होएत। तावत अहॉं स्नान-पूजा करू आ हम जलखैक ओरिओन कऽ दैत छी।” “बेस, बड्ड बढ़ियॉं। कने अंग-पोछा आ धोती-कुरता बहार कऽ दिअ।” हम धोलूकेँ हाक दैत छी- “धोलू हौ धोलू। कतऽ छह हौ?” “ऐलौं, याए ऐलौं बावू जी, कने नदी फीरि रहल छी।” “वेस, बड्ड बढ़ियॉं। आ वौआ, है सुनै छह? आइ हमरा विद्यालय जेवाक अछि। से जात हम स्नान करै छी। तात् तौं साइिकलकेँ बढ़ियॉं जेकॉं झारि-पोछि दाए।” ई कहैत हम स्नान करबाक लेल डोल-लोटा लऽ कलपर चलि जाइत छी। स्नानोपरान्त पूजा-पाठ कऽ धोती पहीिर तैयार होइते छी तात् शान्तिक आग्रह- “सुनै छी, अहॉंले जलखै निकालि देने छी, कऽ लिअ।” ई कहैत आगॉंमे सिकीक चंगेरी, जे रंग-विरंगक रंगसँ रंगल मुजसँ बनौल गेल रहए, ताहिमे मुरही-चूड़ा, दूटा चूड़लाइ आ गोर पाँचेक तीलक लाइ संगमे कॉंच मेरचाइ आ नोन परसल छल, आगॉं बढ़ौलनि। एक क्षणक लेल हम मिथिला, मैथिल, मैथिलक संस्कार आ स्भयतासँ बहुत बेसी आनन्दित भेलहुँ। मन गद्-गद् भऽ गेल। तात् शान्तिक मधुर आवाज- “कतए हेरा गेलहुँ? एखन यएह खा, विद्यालयसँ भऽ आउ, जखन आएव तँ गरमे-गरम साग, भात, अल्लुक साना अा भाँटा-अदौरीक तीमन भरि मन खाएव। ओना जाड़ मास छै यदि किछु आरो मनमे हुअए तँ कोनो हर्ज नहि।” कहैत, हँसैत सोझासँ अढ़ भऽ गेलीह। आ हम जलखै करैत एहि मादक अदाक मादे सोचए लगलहुँ। हमरो मनमे गुदगुदी लागए लागल। जलखै करैत एक बेरि पुन: हाक देलिऐनि- “शान्ति, यै शान्ति....।” नहि जानि जे हुनको मनमे कोनो बात उमरि रहल छलन्हि। ओ गुनगुनाइत ई गीत- “एगो चुम्मा दे दऽ राजा जी, बन जाइ जतरा....।” आवि वाणभटक नायिका जेकॉं लगमे सटि कऽ ठाढ़ि होइत प्रेमानुरूप एकटा चुम्मा लऽ छथि आ मुस्की दैत घरसँ बहार भऽ जाइत छथि। हम लजा जाइत छी। करीब चालीस मिनटक उपरान्त विद्यालय पहुँचैत छी। हाथ-पएर धोलाक वाद हाजरी बनवैत छी। प्राथनाक घंटी बजैत अछि आ धिया-पूताक संग हमहुँ एक पातिमे ठाढ़ भऽ जाइत छी। उपरान्त ऐकर नवम्-बी मे हमर वर्ग रहैत अछि। हाजरी बही लऽ वर्गमे प्रवेश करैत छी। वर्ग नवम बी जे एकछाहा लड़कीएक वर्ग रहैत अछि, स्वागतार्थ सभ बच्चिया उठि कऽ ठाढ़ि भऽ जाइत अछि। वैसबाक आदेश पावि यथास्थान सभ बैसि जाइत अछि। सबहक हाजरी लेब सम्पन्न होइत अछि। तखन किछु बच्चिया सभ बाजि उठैत अछि- “मा-साएब, आइ ललका पाग पढ़बियौ, क्यो कहति अछि जी नइ सर आइ ग्रेजुएत पुतोहू पढ़बियौ। मुदा किछु खास बच्चिया यथा- राखी, गीतांजली, खुसवू, बबिता, रिंकी आ पिंकी कहि उठैत अछि- “जी नै सर आइ अहॉं अपने िलखल कोना कथा कहियौ। आ हम ओहि आग्रहकेँ नहि टारि पबैत छी। शुरू कऽ दैत छी अपन लिखल ई कथा- .....पारस।” मॉं मिथिलाक गोद आ कमला महरानीक कछरिमे बसल एकटा गाम दीप-गोधनपुर। जाहिमे छल एकटा चाहबला ओकर नाम छल पारस पिता श्री सत्य नारायण जी। नामक अनुरूप दुनू बापूत विपरीत छल। पिता श्री सत्य नारायण जरूर मुदा, सब चीजले खगले रहैत छलाह। एकटा प्राइवेट स्कूलमे अध्यापण कार्य करथि आ कोनो तरहेँ बाल-बच्चाकेँ पोसथि-पालथि। हुनकेर बालकक नाम पारस। नामक अनुरूप एकदम िवपरीत, मझौले कदक जवान देहो-हाथ सुखले-टटाएल कारी-झामर हाथ-पाएर एकदम सुखल-साखल मुदा, पेट जरूर कदीमा सन अलगल। देहो-वगेह ओहने, सदिखन जेना मुँससँ लेर चुविते छलै। फाटले-चिटले कोनो जूता-चप्पल पहिर ओही प्राइवेट स्कूलमे पढ़ैत छल। मुदा अकिलगल कम नहि। सत्य नारायणजीक घर जरूर बान्हेँ कातक सौ फिट्टा अर्थात् सरकारी जमीनमे छल, मुदा संस्कार कोनो सुसभ्य समाजक प्रतिक छल। सत्य नारायण बावूकेँ हरलैन्हि ने फुरलैन्हि खेलवा देलखिन पारसकेँ एकटा एकचारी देल चाहक दोकान। अर्थाभावक कारणे पारस उधार-पैंच लऽ कीनि अनलक चाहक दोकानक लेल बरतन-वासन यथा केटली, ससपेन, चाहछन्नी, स्टोव, दूध राखक लेल दूटा टोकना आ दूआ माटिक मटकुरी छाल्ही राखक लेल। चाहक दोकान जे नित्य समएसँ खुलैत आ बन्द होइत छल। क्रमश: महिसिक अगब दूधक चाह, एक्को ठोप पानिक छुति नहि, बरतन-वासन खुब पवित्र आ संस्कारी होएवाक कारणे ग्राहककेँ सेहो उचित सम्मान भेटनि। चाहक दोकान खुब चलनि। क्रमश: पॉंच सेर दूधक बदला आध-आध मन दूध खपत होमए लागल। आमदनी नीक होमए लगलैक। किछु पुंजी जमा केलाक बाद ओ एकचारी छोड़ि लऽ लेलक पक्काबला एकटा घर दोकान खोलए लेल। बना लेलक एकटा काउन्टर आ बढ़ा लेलक दोकानक मेल। साझु पहरकेँ बनाबए लागल सिंहहारा आ गरमा-गरम जिलेबी बात एककानसँ दूकान होइत गेलै एकर दोकानक नाम भऽ गेलै दोकान खूब चलए लागल। समए पाबि 26 जनवरी आ 15 अगस्तमे प्रसादक लेल विशेष आदर पावि बनाबए लागल मनक मन बुनियॉं आ भुजिया। अगल-बगलमे प्राइवेट कोचिंग चलौनिहार संचालक आ िनदेशक महोदयक योगदान एहि देाकनकेँ चलाबएमे अहम भूमिका रखलक। दिन दुना आ राति चौगुना उन्नति होमए लगलैक। मनक-मन दूध खपत होएवाक कारणे घी सेहो बनबाए आ नीक दाममे बेचाए। देखैत-देखैत चाहक देाकानक अामदनीसँ कीनि लेलक ओ तीन बीघा जमीन। मुदा एकर उपरान्तो ओ चाहो बेचाए आ पढ़बो करए। समए पाबि प्राइवेट स्कूलसँ सातमा पास कऽ ओ एकटा संस्कृत विद्यालयमे नाओ लिखा लेलक, आ मध्यमाक फारम भरि फस्ट डिविजनसँ पास केलक। आव तँ ओ किछु बेसिए खुश रहैत छल। मध्यमा पास केलाक बाद ओ अपन नाओ जनता काओलेजमे झंझारपुरमे लिखा लेलक। तखनो ओ वेचारा चाहो बेचए आ पढ़बो करए। आइ.ए. पास केलाक बादो ओकरामे कोनो परिवर्तन नहि। काओलेजसँ ऐलाक वाद चाहक दोकानपर ओ जमि जाए। यद्यपि चाह बेचब एकटा केहन काज मानल जएतैक ई विवादक विषए अछि। ओकरा एक्को पाइ लाज-संकोच नहि। किएक तँ कर्म कोनो खराप नहि होइत छैक। कमा कऽ खाइ एहिमे कोन लाज कोनो कि ककरोसँ भिख मंगबै जे लाज होएत। तेँ चाह बेचब अधलाह काज नहि से मानि ओ खुब जतनसँ अपन कतर्व्यक निर्वहन करए। बुझिनिहार मैथिलमे एकर चर्च होमए लागल, जे देखू पारस चाहो बेचैए आ पढ़बो करैए। देखिते-देखति ओ मैथिली औनर्ससँ बी.ए. पास केलक। परोपट्टामे नाम भऽ गेलैक जे एकटा चाहबला चाह बेचैत बी.ए. पास केलकहेँ। तखनो ओ चाह बेचब नहि छोड़लक। बात पसरैत गेल। एकबेरि एकटा कथा गोष्ठीक मादे सुपौल जेबाक छल। चारि गोट मात्र कथाकार विदा भेलथि दिन अछैते मुदा, कोशी महरानीक अभिशापे नावसँ यात्रा करए पड़ल आ घंटा भरिक बाट मात्र चारि घंटामे तय भेल। सुपौलसँ पहिनहि झल अन्हार भऽ जरा सेहो गेल रही। तेँ चारू कथाकार चाह पिबाक लाथे बैसलौं एकटा चाहक दोकानपर। दोकानदारसँ- “हौ, चारि कप चाह िदहह।” ओ बाजल- “जी, श्रीमान् दै छी।” कहैत ओ चाहक जोगार लगबए लगल। तात् ओतए गप्प कियो तेसरे आदमी चलौलन्हि। जे गोधनपुर गाममे एकटा चाहबला अछि पारस बी.ए. पास। बी.ए. पास केलाक बादो ओ चाह बेचब अधला नहि बुझैत अछि। चाहो ततवेक सुन्दर आ व्यवहारो ओकर ततवेक सुन्दर छै। वाह। हर्ष भेल जे समाजकेँ एहि वातक नजरि जरूर छैन्हिह जे एकटा पढ़ल-लिखल लोक चाह बेचैत अछि। ओकर नजरिमे कोनो काज करबामे हर्ज नहि। एम्हर देखु जे वर्तमान सरकारमे नगर-पंचायत, जिला परिषद, टेन पलस टू विद्यालयमे नियोजनक भेकेन्सी भेल। तात पारस मैथिलीसँ एम.ए. सेहो कऽ लेलक। भैकेन्सीक अनुसार विभिन्न जिलामे आवेदन केलक। समए तँ जरूर लागल। मधुबनी जिलाक मेघा सुचीक प्रकाशित भेल उपरहिमे ओकर नाम छलै। नियोजनक निमित्त सभ आवश्यक कागजात, मूल प्रमाण पत्र एवं शपथ पत्र देलाक वाद ओकर चयन इच्छानुकूल परियोजना विद्यालय मनसापुरमे मैथिलीक लेल भेल। समाजक सभ वर्गकेँ एहि बातसँ हर्ष भेल जे सत्यनारायण जीक बालक पारस आइ टेन पलस टू विद्यालयमे मैथिली पद्पर नियोजित भेलाह। साझखन सभ ओही चाहक दोकानपर उपस्थित भऽ पारस आ हुनक पिता सत्य नारायणजीकेँ सभ शुभकामना आ बधाइ दैत कहलकनि- “सत्य नारायण आव ओना काज नहि चतल, आव भोज-भातक आयोजन कएल जाउ। भोज लागत।” सत्य नारायण आरो अह्लादित होइत बजलाह- “सभ एहि समाजक आशीर्वाद थिक। अहीं सबहक अशीर्वाद थिक जे आइ पारस चाह बेचैत-बेचैत एकटा टेन-पलस टू विद्यालयक शिक्षक भेल। हम एहि समाजक ऋृणी थिकहूँ। आइ जे समाज नहि तँ हमर कोनो अस्तित्व नहि। आइ हमहूँ गौरवान्वित भऽ रहल छी जे हमर बेटा हमरे बेटा नहि एहि समाजोक बेटा। जे एहि समाजमे सिर उठा कऽ जिवक, एकटा अलग स्वाभिमान देलक। एकटा आदर्श देलक। तेँ हम भोज देवेटा करब। भोज जरूर करब।” समए सुअवसर पावि सत्यनारायण बावू केलनि बड़का भोजक आयोजन। लगुआ-भगुआ हित अपेक्षित मित्र-बन्धु आदि एहि भोजमे नहि छुटथि आ हुनकर उचित सम्मान हुअए एहि बातक सदिखन खियाल रखलनि। दुनू तरहक आयोजन छल, शाकाहारी आ मांसाहारी। निमंत्रित व्यक्ति सभ समएसँ उपस्थित भऽ आ स्वरूचि भोजन केलनि। शाकाहारीक लेल आयोजन छल। पुरान तीन-सलिया बासमती चाउरक भात, राहरीक दालि आमिल देल, पालक पूड़ी, पालक पनीर, आमक चटनी, सलाद, तरल मिरचाइ, मटर-आलू-परोर देल डलना, बड़ी अदौड़ी, सकरौड़ी ताहिपर डब्बूक डब्बूक घी। महीसीक अगव दूधक तौलाक-तौला दही, तरहत्थी सन मोट छाल्ही बुझु तँ खेनिहार तर आ भोजेतक व्यवस्था उपर। दहीक तँ कथा नहि पुछू खेनिहार कम आ तौले बेशी। सभ क्यो गद्-गद् भऽ गेलाह। एम्हर मांसाहरी लोकनिकेँ लेल अरवा चाउरक भात आ आध-आध मनक जुआएल खस्सीक लद-वद करैत मांस। किसिम-किसिमक मश्साला देल गम-गम करैत एकहक टा पीस बुझू जे सए-डेढ़ सए ग्रामक। ऐह अजोध खस्सी, माउस। बनलौ ततवेक सनगर। सभ भरि मन खएलाह। आ उपरसँ सेरक सेर दही फी आदमीपर। तर-बत्तर छलाह, भोज तँ जस-जस भऽ भेल। सभ कियो भोजनो करथि आ पारसक चर्चो करथि। जे पारस तँ पारसे अछि। वस्तुत: पारस आब ओ पारस नहि रहल जे चाह मात्र बेचै छल। चाहे बेचेत ओ पारस तँ आव समाजक लेल ओ पारस भऽ गेल। जेकर गुणसँ कतेको नेना-भूटका आव चाहेटा नहि बेच समाजक बीच शिक्षाक ज्योति जगाओता। जाहिसँ अपना समाजमे पारस, पारस मणि गुणसँ प्रभावित होएत आ पारसक गुणसँ अपना समाजक कतेको बच्चा पारस बनताह। अन्तत: बाउ लोकनि अहीं सभ कहू जे अहॉं सभ घर आंगनाक काज करैत पढ़ि लिखि की बनए चाहैत छी?” एक स्वरमे उत्तर भेटैत अछि मास्सैव हमहूँ पारस बनवै पारस। कहैत सभ बच्चियाक संग राखी, गीतांजली, खुशवू, बवीता, रिंकू, पिकूक नोरसँ भरल ऑंखिमे एकटा विशेष आत्म विश्वास हमरा वुझना जाइत अछि। जेना ओ प्रखर ज्योति बहराएल हुअए अनमोल मोती पारससँ। २ उमेश मंडल अमैआ भार क लपर सँ कुड़ुड़-आचमन कऽ पक्षधर बाबा दरवज्जाक सीढ़ीपर पहिल पएर दैइते रहथि कि चाहक गिलास नेने लालकाकीकेँ आंगनसँ निकलि कोनचर लग अबैत देखलखिन। काजक संयोग देखि मन फुदकि गेलनि। जाधरि लालकाकी ओसारक सीढ़ी लग अबैत-अबैत तहिसँ पहिनहि बाबा ओसारक चौकीपर पसरल मोथीक बिछानक ओठ पकड़ि दुइ बेरि झाड़ि-बीछा, देवालसँ ओंगठि चौकिपर बैसि गेलाह। बैसितहि लालकाकी चौअन्नियॉं मुस्की दैत हाथमे चाहक गिलास पकड़ा देलकनि। भफाइत हार्ड-लीकर चाह आ लालकाकीक मुस्की बाबाक मनकेँ, जहिना बच्चाक फेकल गेन गुड़कैत तहिना गुड़का देलकनि। मुँहमे चाह लइसँ पहिनहि टुसि देलखिन- “मन बड़ छिटकल बुझि पड़ैए। कतौ किछु पेलहुँहेँ की?” पति बातक उत्तर दइसँ लालकाकी अनसुन करए चाहलनि, कारण जाधरि चाह मुँहमे नहि लऽ लैत छथि ताधरि घरक कोनो बात कहब उचित नहि। हो न हो जँ कहीं अधले लगनि। हम तँ कोनो हाकिमक घरवाली नहि छी जे आमद-खर्चक फाइल खाइऐ-पीवै काल उल्टा देबनि। आब भगवान दिन बदललनि तेँ ने बीअनि डोलबैक दुख भागल नइ तँ केहन भारी दुखक तरमे रहै छलौं। पत्नी तँ पतिक ओहन खेलक संगी छिअनि जे दिन-राति खेलैत रहैत। चाहक चुस्की लइतहि लालकाकीक मुँहसँ खसलनि- “एगारह सए रूपैया समैध पठा देलनिहेँ।” रूपैयाक नाअो सुनितहि बाबा चौंकि गेलाह। मनमे उठलनि, किअए रूपैया पठौलनि? अखन रूपियाक काज कोन अछि? तहूमे कहने तँ नहि छेलिएनि। पतिक टहलैत मनकेँ देखि लालकाकी दोहरा देलखिन- “रूपैयाे आ चिट्ठियो बौआकेँ भोरे डाक-पीन दऽ गेलनि। नवका समैध पठौने छथि।” नवका समधिक नाओ सुनितहि पक्षधरक मनमे धक्का लगलनि। मुदा तइओ संयमित होइत पुछलखिन- “िचट्ठीमे की सब लिखल छलैक?” “यएह जे, काजक धुमशाही एत्ते बढ़ि गेल अछि जे अमैया भारक लेल पाइऐ पठा रहल छी। गाम आएब मोसकिल अछि।” अमैया भारक नाओ सुनितहि बावाकेँ तेलिया सॉंपक बीख जकॉं सन्न दऽ ऑंखिये पर बीख पहुँच गेलनि। बीखसँ कारी होइत पतिक देह देखि लालकाकी बुझि गेलीह। सोझासँ ससरैक गर अँटबए लगलीह। जना कियो अंगनासँ सोर पाड़ने होनि तहिना अंगना दिस देखि बजलीह- “अबै छी कनियॉं।” कहैत चुपचाप ससरि गेलीह। मुदा देह थरथराइते रहनि। पति-पत्नी रहितहुँ दुनूक बीच बैचारिक मन-भेद रहिते रहनि। लालकाकीक विचार जे सबहक संगे मिलि-जुलि चली जहन कि बाबाक विचार छन्हि जे जहिना जंगलमे अनेको िकस्मक गाछ कोनो-कोनो कोइढ़ला जकॉं तन्नुक अछि तँ कोनो-कोनो लोहा जकॉं सक्कत। जँ दुनूकेँ एक रंग बुझि किछु बनौल जाय तँ कते दिन चलत। जे तन्नुक अछि ओ लगले नष्ट भऽ जाएत जहन कि जे सक्कत अछि ओ ओहिना तना-उताड़ रहत। तहिना तँ मनुक्खोक बीच अछि। चाह सठबो नहि कएल रहनि कि तहिक बीच क्रोध नाकपर आबि गेलनि। क्रोधे मन उनटए-पुनटए लगलनि मुदा, किछु बाजति नहि। शुरूहेसँ परिवारो आ टोलोक लोक शान्तीकेँ लालकाकी कहैत रहनि जे अखनो धरि कहिते छन्हि। क्रोधसँ बाबा अधे-छिधे चाह पीबि, चौकी तर मे गिलास रखि दलानक भीतुरका चौकीपर पड़ि सोचए लगलाह। अमैया भार कि आइऐक छी आकि साबिकेसँ अबैत अछि। कोनो कि अपने नै पुरने छी जे नइँ बुझल रहत। जूरेशीतल पावनिसँ शुरू कऽ आद्रा धरि पूरैत छलौं। चटनी खेवासँ लऽ कऽ कसौनी-अँचार होइत बरिसाइतसँ पाकल आमक भार पुरने छी। शुरूमे रोहनिया सरही आ बमै, गुलाबखास जरदालूसँ शुरू करैत छलौं, कृष्णभोग, लड़ूबा, मालदह होइत कलकत्तियापर पहुँचै छलौं। बरखो खसैत छलए आ आमो लगिजाइत छल। अन्तमे मोहर ठाकुर, राइर, फैजली, सिक्कूलक भार पूरि समाप्त करैत छलौं। ई कि भेलि जे आमक भारक तरे रूपैया पठा देलौं? हम कि रूपैया नइ देखने छी आकि कर्जा मंगलिएनि? अइसँ नीक जे नहि पठबितथि। तइले केकरा के डॉड़-बान्ह करैए जे करितिएनि। ई कि बुद्धि-बधिया केलनि। भारपर आएल वस्तु समाजमे बेन स्वरूप बिलहल जाइत अछि, से कि विलहब? केहन समए चिल आएल केहन नहि, देखै छी जे जेकरा खूँटापर चरि-चरि थान महीसिक रहैत छल सेहो सभ आब बजरूए दूधक दही पौड़ि चौरचनक हाथ उठबैए। ऐहन पावनि केनहि कि? तरे-तर मियादि अगिया गेलनि। अांगन आबि शान्ती माने लालकाकी पुतोहूँ लग बजलीह- “बुढ़ा बिगड़ि गेल छथि।” अंगनाक सभ सुनलनि, तेँ सभ दरवज्जा दिशि जाएवे छोड़ि देलक। तहि काल बाबासँ भेंटि करए सुशील आएल। दरबज्जापर नहि देखि सुशील आंगन िदस तकलक। ऑंखिक इशारासँ लालकाकी सुशीलकेँ बजा कहलखिन- “भाय सहाएव, बगदल छथि।” अचंभित होइत सुशील पुछलकनि- “किअए?” “समधियाैरसँ अमैआ भारक रूपइऐ समैध पठा देलखिनहेँ, तेँ....।” मुस्कुराइत सुशील आंगनसँ निकलि जोर-जोरसँ दरवज्जाक आगूमे बजए लगल- “भाय सहाएव, यौ भाय-सहाएव।” ककरो उत्तर नहि सुनि घरेसँ पक्षधर बजलाह- “के, सुशील।” “हँ भैया, मन-तन गड़बड़ अछि कि?” ओसारपर आबि पक्षधर बजलाह- “मन कि गड़बड़ हएत, तेहन-तेहन काज दखै छी जे नीको मन अधलाह भऽ जाइए।” “से कि?” “किछु नै।” चौकीपर बैसैत सुशील बाजल- “कि कहब भाय सहाएव, बे-ठेकानक गाम सभ भए गेल अछि। फागुनक लगनमे बरिआती गेल रही बरकेँ दुअार लगबए दाइ-माइ सभ चंगेरामे दूभि-धान, चरि मुखी दीप जरौने पहुँचलीह। ले बलैया, तहि काल बरिआतीक अंग्रेजी बाजा फिल्मी धुन शुरू केलक। कि कहू भाय, बूढ़ि-बुढ़ानुस सभ तँ पूर्वते गीत गवैत रहलीह मुदा, जते नव-तुरिया सभ रहए, ओ सभ डान्स करए लगल।” सुशील बजिते रहै कि बिचहिमे ठहाका मारि पक्षधर बजलाह- “ई तँ आन गामक बात भेल। दुनियॉं बड़ीटा अछि। सौंसे दुिनयॉंमे ने एक रंग लोक अछि आ ने चालि-ढ़ालि। अपन कल्याणक लेल सभकेँ अपन-अपन जिनगी बुझए पड़तैक।” बाबाक विचार सुनि सुशील अपन विचार मोड़ैत बाजल- “भाय चाह नै पीलौंहेँ, मूड भंगठल बुझि पड़ैए।” दरवज्जाक अढ़सँ लालकाकी सभ बात सुनैत रहथि। पतिक ठहाका सुनि मन असथिर भेलनि। आंगन िदस देखि पक्षधर जाेरसँ बजलाह- “कने चाह बनौने आउ?” पानि पीबि हाथमे चाहक गिलास लैत पक्षधर बजलाह- “तेहन मनुक्ख सभ बनि रहल अछि जे एको-दिन जीवैक मन नहि होइत अछि।” पक्षधरक बातकेँ मोड़ैत सुशील बाजल- “ऐह भाय, अगुता जाइ छी। दुिनयॉं सबहक सझिया छियै कि ककरो खानगी। कियो अपन जिनगीक मालिक अछि आकि दोसराक। जाबे अइ धरतीक सुख-भोग आ अन्न-पानिक हिस्सा बचल अछि ताबे मरबो नीक हएत।” “हँ, से तँ ठीके कहलह।” पक्षधरक समर्थन देखि सुशील बाजल- “अपने गामक घटना कहै छी मटकन भाइयक बेटाक कोजगरा रहनि। बम्बैऐसँ समैध भातिज दियए रूपैया पठा देलकनि। सेहो चौबीसमॉं घड़ीमे। कोजगरे दिन। बेर झुकैत मटकन भाय आिब कऽ कहलनि जे सुशील तों बड़ जोगारी छह। कने सम्हारि दाए। भाइक बात सुिन कोनो गरे ने सुझाए किऐक तँ अनका ऐठाम पूछि-पूछि खाजा-लड्डू आ दही पबैत छथिन। मनमे आएल जे समाजक लेल पान-मखानक तँ जोगार भइयो सकैए। मुदा जिनकर-जिनकर भोज खेने छथिन तिनका-तिनका कि खाइले देथिन। कोना दही पौरल जाएत आ खाजा-लड्डू बनत। ऐहन स्थितिमे अनेरे पड़ि दोखक मोटरी कपारपर लेब। मुदा एकटा बात मनमे उपकल।” “की?” “जखन माए-बावूक भारसँ लऽ कऽ बाल-बच्चा धरिक उतड़िये गेल अछि तखन अनेरे जंजालमे पड़ब नाक-कान कटाएब छोड़ि आरो कि भऽ सकैए। तइसँ नीक जे कियो अपने केलहाक फल ने पाओत।” सुशीलक बात सुिन पक्षधर बाबा गुम्म भऽ विचार करए लगलाह। ३ संजय कुमार ग्राम- गोधनपुर जिला- मधुबनी(बिहार) अनट्रेन्ड घुसखाेर पॉंच मिनटक भीतरे गामसँ लऽ कऽ बम्बै दिल्ली धरि समाचार पसरि गेल जे बड़ा बाबूकेँ घुसखोरीमे सी.आइ.डी. पकड़ि लेलकनि। सॉंझ-भोरक नढ़िया जकॉं गाममे जेम्हर-तेम्हर अवाज उठए लगल- “दुश्मनीसँ फँसाओल गेलनि।” “सी.आइ.डी. की कोनो हाड़-गोबर गीजैए जे बिनु देखिनहि पकड़ि जहल पठा देलकनि।” “सुनै छी जे एकटा मंत्रीक भागिनक काजमे टाल-मटोल केलखिन, वएह धरा देलकनि” “लाखक-लाख जे बेटीक िवआहमे खर्च केलनि से कि दरमहेक पाइ छलनि।” “बेटाकेँ जे पॉंच लाख रूपैया डोनेशन दऽ बंगलोरमे नाओ लिखौलनि से कि खेत बेचि कऽ केलनि।” “देखले दिन अछि जे बाप दिन खाइ छलनि तँ रातिले झकै छलनि आ राति खाइ छलनि तँ दिनले झकै छलनि। तेकर बेटा गामक महाजन भऽ गेल।” “पसीनेक पाइ जकॉं सूदि कड़गड़ छनि।” ऑंफिसमे गदमिशान हुअए लागल। “बड़ाबाबू बननहि कि हेतनि, बुद्धियो ने चाही। बुद्धि रहि गेलनि नवका किरानी जकॉं आ बनि गेलाह बड़ाबाबू।” “जिनगी भरि तँ बान्ह-सड़कक नक्शा पास करैत रहलाह आ लुरि भऽ जेतनि पाइ कमाइक।” “जखन कोट-कचहरीक चक्कर लगौताह तखन ने ट्रेन्ड हेताह।” “मुदा जाबे सीखिताह-सीखिताह ताबे तँ रिटायरे कऽ जेताह। तीनिये मास नोकरी बँचल छन्हि तहि बीच जहलोसँ निकलताह कि नहि।” “जखन लूड़िक काज छलनि तखन लूड़िये ने भेलनि आ जखन लूड़ि हेतनि तखन काजे ने रहतनि।” ४ जगदीश प्रसाद मंडल एकांकी- कल्याणी पहिल अंक पहिल दृश्य- (जहलक दृश्य। जेलक भीतरसँ जेलर, कल्याणी, प्रतिज्ञा आ दूटा सिपाही निकलैत। फाटकक बाहर आबि कल्याणीयो आ प्रतिज्ञो पाछु घुिर जहलकेँ निङहारि-निङहारि देखैत अछि।) जेलर- अखन धरि हम जेलर आ अहॉं दुनू गोटे कैदी छलौं। मुदा आब जहिना अहॉं दुनू गोटे छी तहिना हमहूँ एकटा अदना मनुक्ख छी। जेलक जिम्मेदार होइक नाते कहै छी जे जँ किछु अभाव भेलि हुअए ओ बिसरि जाएब। संगे इहो कहै छी जे पुन: कैदी बनि जहल नहि देखी। कल्याणी- (मुस्कुराइत) कहलौं तँ बड़ सुन्नर बात, मुदा जहिठाम एक्को इंच जमीन नारीक लेल सुरक्षित नहि अछि तहिठाम......? जेलर- कि सुरक्षित? कल्याणी- सुरक्षित यएह जे नारीक लेल स्वतंत्र जिनगी कल्पनाक सिवा आरो कि अछि। जाधरि नारी अपन शक्तिकेँ जगा संघर्ष नहि करत ताधरि मनुष्यक जिनगीसँ उतड़ि पशुक जिनगी जीबैक लेल बाध्य रहबे करत। तेँ जरूरत अछि अपन शक्ति नारी जगतक लेल उपयोग करए। जखने आजादीक लेल डेग उठौत तखने अहॉंक जेल आगू ऐबे करत। प्रतिज्ञा- कते दिन जहलक डरे नारी अपन स्वतंत्र जिनगीकेँ बान्हि कऽ राखि सकैए। जेम्हर देखू तेम्हर नारीपर अत्याचारे-अत्याचार जहिना घरक भीतर तहिना घरक बाहर। सगतरि एक्के रामा-कठोला भऽ रहल छै। घरसँ निकलितहि कतौ अपहरण तँ कतौ छेड़खानी सदतिकाल होइते रहैत अछि। एहेन स्थितिमे इज्जत-आबरूक संग जीवि कहॉं धरि संभव अछि। जेलर- (मूड़ी डोलबैत) किछु अंशमे अहॉं कहब मानल जा सकैत अछि। कल्याणी- (झपटि कऽ) किछु अंशमे किअए कहै छिऐ हँ, ई बात जरूर जे जहिना सभ मनुष्यक जिनगी समान नहि अछि तहिना अत्याचारोक अछि। मुदा जेहन माहौल बनल अछि ओहिसँ कि आभास भेटि रहल अछि। जेलर- (नम्हर सॉंस छोड़ैत) खैर, हमर ओकातिये कते अछि जे अहॉंक सब प्रश्नक उत्तर दऽ सकै छी। मुदा एते जरूर आग्रह करब जे पुन: जहलक ऑंखि नहि देखी। कल्याणी- जँ जहलक डर करब तँ जिनगी कोना भेटत। हँ, ई बात जरूर जे छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ सैकड़ो घेराक बीच जहलो एकटा घेरा छी। मुदा ओकरा टपैक तँ दुइये टा उपाए अछि। या तँ कूदि कऽ टपि जाय वा तोड़ि दिअए। जेलर- (मूड़ी डोलबैत) धिया-पूताक खेल नहि छी। कल्याणी- मानै छी जे धिया-पूताक खेल नहि छी, मुदा अहूँ सुनि लिअ जे जाहि पौरूष पाबि नर पुरूष कहबैक अधिकारी बनल अछि ओ िसर्फ पुरूषेक नहि नारियोक धरोहर सम्पदा छी। अखन धरि नारी जगतक नजरि ओहि दिशा दिशि नहि बढ़ल अछि तैं ऑंखि मूनि सभ अत्याचार झेलि रहल अछि। जखने ओहि दिशा दिशि देखि आगू डेग उठौत तखने......। जेलर- (मुस्कुराइत) हमर शुभकामना अहॉं सभक संग अछि। (कल्याणी आ प्रतिज्ञा आगू बढ़ैत। दुनू सिपाही फाटकक भीतर प्रवेश करैत। बीचमे जेलर ठाढ़ भऽ कल्याणी दिस देखैत। दू डेग आगू बढ़ि कल्याणी पाछु घुरि कऽ तकैत। दुनूक–- जेलर आ कल्याणी- ऑंखिपर पर ऑंखि पड़ितहि कल्याणी मुस्कुरा दैत। जेलर ऑंखि निच्चॉं कऽ लैत। पुन: कल्याणी आगू डेग उठबैत। जेलरो भीतर दिस प्रवेश करैत। एकटा पएर भीतर आ एकटा पएर बाहर रहिते पुन: कल्याणी दिस देखैत। तहि काल कल्याणियो दुनू गोटे पाछु घुिर तकैत तँ जेलरपर नजरि पड़ैत।) जेलर- (दुनू हाथ जोड़ि) अंतिम विदाइ। कल्याणी- (मुस्की दैत) अंतिम विदाइ नहि पहिल विदाइ। जाधरि अहॉंक जहल रहत ताधरि एक नहि हजरो बेरि आएब। (फाटक बन्न कऽ जेलर भीतर जाइत अछि। कल्याणी आ प्रतिज्ञा दू डेग आगू बढ़ि) कल्याणी- अखन धरि जहिना अहॉं कओलेजक एकटा छात्रा छी तहिना हमहूँ छी। मुदा आब तँ पढ़ाइक अंतिमे समए छी। परीक्षो भइये गेल। रिजल्ट निकलत जिनगीक लीला शुरू हएत। प्रतिज्ञा- जिनगिऐक लीला किअए कहै छी नावालिकक सीमा सेहो टपि गेलहुँ। जहिया जेल एलौं तहिया ने नावालिक छलौं। जहिसँ देश आ समाजक प्रति ने कोनो अधिकार छलए आ ने कोनो कर्तव्य। मुदा से तँ आब नहि रहल। ओना बालबोधे जे किछु केलहुँ ओहो कोनो अधला थोड़े केलहुँ। कल्याणी- अखन धरि जे किछु भेल ओ बाल-बोधक खेल भेल। मुदा जहलक भीतर नावालिकक सीमा टपि वालिक भेलहुँ। १८वर्ष पूरा भेल। जिनगीक लेल आइ संकल्प ली जे जाधरि नरीक अन्याए होइत रहत ताधरि चैनक सॉंस नहि लेब। प्रतिज्ञा- अखन धरि ने अहॉंकेँ एहि रूपे हम चिन्हैत छलौं आ ने अहॉं हमरा चिन्है छलौं। तैं दुनू गोटे संकल्पक संग शपथ ली जे जाधरि सॉंस रहत ताधरि संग-संग रहब। कल्याणी- निश्चित। जे कियो एहि धरतीपर जन्म नेने अछि सभकेँ स्वतंत्र रूपे जीवैक अधिकार छे (किछु काल चुप भऽ) सृष्टिक शुरूहेसँ देखैत छी जे जहिना ऋृषि भेलाह तहिना ऋृषिका सेहो भेलीह। (पुन: रूकि) संग-संग िजनगी बितबितहुँ पुरूष नारीक संग भीतरघात करैत-करैत सकपंज कऽ देलनि। जेकर परिणाम भेल जे ओकर पहाड़ सदृश्य रूप बनि गेल अछि। प्रतिज्ञा- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ बनि गेल अछि। मुदा जहिना रसे-रसे बंधन सक्कत होइत गेल तहिना रसे-रसे तोड़हुँ पड़त। एक्के बेरि जँ सब बंधनकेँ तोड़ए चाहब से संभव नहि अछि। कल्याणी- (मूड़ी डोलबैत) ई तँ अछि। मुदा दुनियॉंमे एहेन कोनो काज नहि अछि जेकरा मनुष्य नहि कऽ सकैत अछि। तहन ई बात जरूर अछि जे जे जेहन काज रहत ओहिक लेल ओहि तरहक शक्तिक जरूरत पड़ैत। तेँ जरूरी अछि जे जहिना अखन हम दुनू गोटे मिलि संकल्प लेलहुँ तहिना आरोकेँ जोड़ि शक्तिक अनुकूल डेग उठाएव। प्रतिज्ञा- हँ, से तँ कहलो गेल अछि जे “जमात करए करामात।” जेना-जेना दुर्ग टपैत जाएब तेना-तेना शक्तियो बढ़ैत जाएत। जहिना बुन-बुन पानि मिलि धरतीपर ससरि धारा बनि धारक आकार बना समुद्रक रूप ग्रहन करैत तहिना ने मनुष्योक होएत। प्रस्थान, पटाक्षेप दोसर दृश्य- (जहलक बाहरी छहरदेवाली टपि कल्याणी आ प्रतिज्ञा। दोसर िदससँ कल्याणीक भाए चन्द्रनाथ आ माए शान्तीकेँ देखैत तँ दोसर दिससँ शान्ती कल्याणीपर नजरि अटकौने। जना शान्तीकेँ बघजर लगि गेल दुनू ऑंखिसँ नोट टघरैत। मुदा कल्याणी आ प्रतिज्ञाक मुँहसँ खिलैत माने फुलाइत फूल जकॉं हँसी निकलैत।) कल्याणी- (आगू बढ़ि) माए, अहॉं कनै किअए छी? बेटी कोनो अधला काज कऽ जहल नहि आइलि छलि। (कहैत दुनू हाथे दुनू पाएर पकड़ि) अहॉं असिरवाद दिअ। जहिना समाजक आन माएसँ हटि अहॉं पढ़ैक छूट देलहुॅं तहिना हमरो दायित्व होइत अछि जे समाजक कल्याणक दिशामे आगू बढ़ी। जाधरि परिवारक डेग आगू दिशि नहि बढ़त ताधरि समाज कोनो बनत? (दुनू बॉंहि पकड़ि शान्ती कल्याणीकेँ उठबैत। कल्याणी उठि कऽ माइक दुनू ऑंखिक नोर दुनू हाथसँ पोछि ऑंखिपर ऑंखि गरा आगूमे ठाढ़ि। शान्तीक ऑंखिसँ धरती, पहाड़, समुद्रक रूप छिटकैत तँ कल्याणीक ऑंखिसँ सिंहक रूप छिटकैत) चन्द्रनाथ- अहॉं सभ ताबे एतै अँटकू। एकटा सवारी नेने अबै छी। (कहि भीतर जाइत) प्रतिज्ञा- चाची, आइ धरि नारी जगत, कमला-कोसीक धारक संग कारी मेघक बरखा सदृश्य अदौसँ नोर बहबैत आइल अछि मुदा जाधरि ओहि नोरकेँ बहैक कारणकेँ नहि रोकल जाएत ताधरि बहब कोना बन्न हएत? जहिना बेटी कल्याणी छी तहिना प्रतिज्ञो छी। असिरवाद दिअ। शान्ती- (माइक नजरिसँ नजरि मिला) तू सभ जहल किअए ऐहल? कल्याणी- परीक्षाक आखिरी दिन एक्केटा विषएक परीक्षा रहै। जे दोसर खेपमे माने दोसर सत्रमे रहै। चारि बजे समाप्त भेल। ओना प्रश्न हल्लुके बुझि पड़ल। जहॉं सवाल पढ़लौं कि मन हल्लुक भऽ गेल। नीक जकॉं लिखलौं। डेरा अबैत रही कि रस्तामे देखलियै.....। शान्ती- की देखहलक? कल्याणी- आगू-पाछू विद्यार्थी (संगी) सभ डेरा अबैत रहै। हम दुनू गोरे (कल्याणी आ प्रतिज्ञा) पाछु रही। हमरासँ करीब चारि लग्गी आगू रूपा असकरे अबैत रहै। मोटर साइकिलपर एकटा युवक पाछूसँ जाइत रहै। रूपा लग आबि पहुँचते साइकिलेपर सँ देह परक ओढ़नी खींचि लेलक। (ओढ़नी खिंचैक सुनि शान्ती चौंकि गेलि। जना बॉंसक दू टुकड़ी रगड़सँ आगिक लुत्ती छिटकैत तहिना शान्तीक ऑंखिसँ लुत्ती छिटकल) शान्ती- ऐँ, एते अन्याए? प्रतिज्ञा- चाची, अहॉं गाम-घरमे रहै छी तैं नइ दखै छिऐ। एहेन-एहेन अन्याए हजारक हजार रोज होइए। शान्ती- राही-बटोही किछु ने कहै छै? प्रतिज्ञा- की कहतै। निर्लज पुरूख नारीक लाज (इज्जत) थोड़े बुझैए। उ सभ तँ नारीकेँ खेलौना बनौने अछि। एक्के पुरूख अपन बहू-बेटीकेँ इज्जतक नजरिऐ देखैत अछि मुदा दोसराकेँ रण्डी-बेश्या बुझैत अछि। (क्रोधसँ शान्ती थर-थर कँपए लगल। दुनू ऑंखि लाल भऽ गेलै) शान्ती- तब की भेलै? प्रतिज्ञा- बेचारी रूपा, आगू-पाछू ताकि, मूड़ी गोति आगू बढ़ैत गेल। मुदा हमरा दुनू गोरेकेँ नै देखल गेल। सड़कक कातेमे पीचक पजेबा उखड़ल रहै। दुनू गोटे पजेवा हाथमे लऽ दौड़ि कऽ ओकरापर फेकलौं। एकटा तँ हूसि गेलै। मुदा दोसरक कपारमे लगलै। शान्ती- वाह-वाह, भगवान हमरो औरूदा तोरे सभकेँ देथुन। भॉंइमे कियो दादा हुअए। नारी- जातिक सान बचेलहुँ। तेकर उत्तर की भेल? प्रतिज्ञा- ओ साइकिलपर सँ खसि पड़ल। कपारसँ खून गड़-गड़ चुबए लगलै। हल्ला भेलै। तखने ट्रैफिक पुलिस आबि कऽ दुनू गोटेकेँ पकड़ि पहिने थाना लऽ गेल। थानासँ जहल पठा देलक। शान्ती- मुदा हम तँ दोसरे-तेसरे बात सुनलौं। प्रतिज्ञा- की? शान्ती- कते बाजब कोइ किछो तँ कोइ किछो बाजैए। एक गोरे कहलक जे दुनू गोटे परीक्षामे चोइर करैत पकड़ल गेल। प्रतिज्ञा- चाची, झूठकेँ सत्य बनाएव आ सत्यकेँ झूठ बनाएव छुद्दर पुरूख सभक गुण छी। जहिना बहीनि कल्याणीक माए छियै तहिना हमरो छी अहॉं लग झूठ बाजब। शान्ती- (किछु मन पाड़ैत) बेटी प्रतिज्ञा, तू जे कहलह ओ अपनो मनमे अबैए। मुदा बिना पुरूखक मदतिऐ नारी जीवि कोना सकैए? कल्याणी- (उत्साहित भऽ) माए बिना पुरूखक नारी जनकपुरमे। अखन धरि नारीकेँ पुरूख अन्हारमे रखलक। जइसँ ओकरा अपन सभ गुन हरा गेलइ। घरक भीतर रखि ओकरा दुनियॉंक बात बुझै नहि देलक। जइसँ ओ परती खेत नहाति सब किछु रहितो पानि-बिहाड़ि, जा़ड़, रौद, भुमकमक चोटसँ निष्क्रिय भऽ गेल। शान्ती- अइ बातकेँ नारी किअए ने अखैन धरि बुझि रहल अछि? कल्याणी- एकरो कारण छै। सृष्टिक निर्माण पुरूष नारीक संयोगसँ होइत अछि। जहिना गाड़ी, दू पहियासँ चलैत अछि, तहिना। मुदा नारीक पेटमे नअ मास रहि बच्चाक जन्म होइत अछि। एहि दौरमे नारीकेँ कठिन कष्टक सामना करए पड़ैत अिछ। जेकर लाभ पुरूख उठौलक। शान्ती- (मूड़ी डोलबैत) हूँ...। कल्याणी- बच्चाक पालन खाली पेटे धरि नहि जन्म लेलाक पछातियो होइत अछि। जइमे घेरा जाइत अछि। घेराइत-घेराइत एते घेरा जाइत जे जिनगी बदलि गुलाम बनि जाइत अछि। शान्ती- (मूड़ी डोलबैत) एहेन स्थितिमे नारी पुरूखक बराबरी कोना कऽ सकैत अछि? प्रतिज्ञा- (उत्तेजित भऽ) कए सकैए, चाची। (सवारी लऽ कऽ चन्द्रनाथक प्रवेश) चन्द्रनाथ- चलै चलू। सवारी आबि गेल। प्रस्थान, पटाक्षेप। तेसर दृश्य- (अनन्त कुमारक घर। दरबज्जापर एकटा चौकी राखल आ बगलमे कुरसीपर अनन्त कुमार बैसि, ऑंखि बन्न केने) अनन्तकुमार- (स्वयं) दिनो-दिन जिनगी जपाल भेल जा रहल अछि। जे दिन जे क्षण बीति रहल अछि ओ नरकक वास भऽ रहल अछि। मुदा मऽरबो तँ हाथमे नहिऐ अछि अपने हाथे आत्महत्यो कोना कए लेब? (चाह नेने शान्तीक प्रवेश। पतिक हाथमे कप पकड़बैत शान्ती चौकी बगलमे ठाढ़। एक घोट चाह पीबि अनन्त कुमार शान्ती दिस देखि।) अनन्तकुमार- जिनगी भार भऽ गेल। अकाजक अन्न सन देबकेँ हत्या करैत छी। नीरस बिना रसक जिनगी कोकनल गाछ सदृश्य होइत अछि। जे पिल्लू, गराड़क घर बनि जाइत अछि तहिना जिनगी बुझि पड़ैए। शान्ती- सोग केलासँ सोग थोड़े मेटाएत। सोग तँ समस्याकेँ जनम दैए। जे बिना केने थोड़े मेटाएत? अनन्तकुमार- जखने घरसँ निकलै छी तखने रंग-विरंगक अड़कच-बथुआ काचर-कुचर सुनए लगै छी। केकरा कि कहिऔ। कते लोकसँ माथ चटाउ। ककरो मुँहमे जाबी लगौनाइ असान छी। शान्ती- कते दिन मूड़ी गोित समाजमे जीवि? अनन्तकुमार- नीक हएत जे झब दए कल्याणीक विआह करा दियै। आन गाम गेलापर तँ लोकक बात नै सुनब। जहिना पोखरिक पािनक िहलकोर जे दू-चारि दिनमे शान्त भऽ जाइत छै तहिना असथिर भऽ जाएत। (चन्द्रनाथक प्रवेश) शान्ती- भने बउऔ आबिऐ गेल। दुनू बापूत छीहे विचारि कऽ रास्ता नकालि लिअ। चन्द्रनाथ- (अकचकाइत) कथीक रास्ता माए? कोन एहेन दुर्ग टूटि कऽ खसि पड़ल जे बाबूकेँ हम विचार देवनि। अनन्तकुमार- बौआ, नीक की बेजाए, अपना परिवारमे नै बाजव तँ कतए बाजब। जखने गाम दिशि टहलै छी, सोझा-सोझी तँ नहि मुदा, अढ़ दाबि-दाबि मौगियो आ मरदो की बजैए तेकर कोनो ठेकान नहि। चन्द्रनाथ- की बजैए? अनन्तकुमार- कियो बजैए जे कल्याणी जहल जा कुल-खनदानक नाक-कान कटौलक। तँ कियो बजैए जे केहन माए-बाप छै जे बेटीक वएस बीतल जाइ छै मुदा विआह करैले नीने ने टुटै छै। चन्द्रनाथ- बाबू, जहिना दिनक उनटा राति होइ-छै तहिना नीक अधलाक बीच सेहो होइ-छै ज्ञान-अज्ञानक बीच सेहो होइ छै। धरतीपर ओतै अधलो अछि। हमरा बुझने तँ अधले बेसी अछि। किऐक तँ नीक एक्के तरहक होइ छै जहन कि अधला अनेको रंगक- रावण, कौरबक सखा जकॉं। अनन्तकुमार- ततबे नै ने इहो बजैए जे पढ़ा-लिखा कऽ बेटी तेहन बना लेलक जे चौक-चौराहापर पुरूखे जकॉं मुँह-कान उधारि निधोख भाषणो करैए। चन्द्रनाथ- बाबूजी, हमर बहीन कुम्हरक बतिया नै ने छी जे ओंगरी बतौने सड़ि जाएत। जँ कियो ऑंखि उठाओत वा ओंगरी बतौत तँ ओकर ऑंखियो फोड़ि देबै आ ओंगरियो काटि लेबइ। अपन माए-बहीनि दिस देखह जे माटिक मुरूत बनौने अछि। शान्ती- बौआ, हम दुनू परानी तँ पाकल आम भेलौं जाबे जीबै छी, ताबे जीबै छी। कखनी खसि पड़ब तेकर कोन ठीक। मुदा तू दुनू भाए-बहीिन तँ से नइ छह। भगवान करथुन जे हँसैत-खेलैत शतायु हुअअ। (कल्याणीक प्रवेश) अनन्तकुमार- बेटी कल्याणी, तोरा सभले ओइ गीरहकेँ तोड़ि देलौं जइ बंधनक बीच कन्या अज्ञानक काल-कोठरीमे जीवैत अछि। कल्याणी- बाबूजी, जहिना अहॉं समाजमे पहिल डेग उठा नव फुलक गाछ रोपलौं तहिना अहॉंक आत्मा एक नहि अनेक फुलक फुलवाड़ी लगौत। शान्ती- बेटी, भगवान हमरो दुनू बेकतीक औरूदा तोरे दुनू भाए-बहीनिकेँ देथुन। जाबे बच्चा छेलह ताबे जतए धरि भऽ सकल सेवा केलियह। आब तँ तोरे सबहक दिन-दुनियॉं भेलह, हम सभ तँ अस्ताबल भेलौं। कल्याणी- माए, नारीक संग अत्याचार करैत-करैत पुरूख एहेन अभियस्त भए गेल अछि जे उचित-अनुचितक सीमे समाप्त भऽ गेल छै। जहिसँ नारी खसैत-खसैत एते निच्चॉं खसि पड़ल अछि जे स्वरूपे समाप्त भऽ गेल अछि। अनन्तकुमार- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ भऽ गेल अछि। कल्याणी- बावू, ई दुिनयॉं कर्मभूमि छी “वीर भोग्या बसुंधरा” जे जेहन कर्म करत ओ ओहन फल पाओत। जहिना डोरीक एक भत्ता अहॉं तोड़ि हमरा अन्हारसँ इजोतक रस्ता खोललौं। तहिना एक-एक भत्ता तोड़ि नारी जगतक बन्धन तोड़ि देवइ। अनन्तकुमार- बंधन तँ सक्कत अछि, मुदा ओकरा तोड़नहुँ बिना तँ कल्याण नहिऐ अछि। मुदा एहि लेल ज्ञान, साहस आ धैर्यक जरूरत अछि। कल्याणी- (मुस्की दैत) पौरूष सिर्फ पुरूखे लेल नहि नारियोक लेल विधाता देने छथिन। जरूरत अछि ओकरा पकड़ेक। हमहूँ आब नावालिक नहि बालिक भेलहुँ ततबे नहि किरिणक डोरसँ सुनि सेहो देखि लेलहुँ। जहिना सृष्टिक िवकासमे पुरूष-नारी समान अछि तहिना जाधरि दुनूक बीच समानता नहि आाअेत ताधरि चैनक सॉंस नहि लेब अनन्तकुमार- बहुत कष्ट हएत? कल्याणी- (हँसैत) “जीबन नया मिलेगा, अंतिम चिता मे जलके”। जहिना भिनसुरका सूर्ज देखने दिनक अनुमान होइत अछि तहिना तँ नवालिकक आड़ि हमहूँ जहलेमे टपलौं कि ने। प्रस्थान, पटाक्षेप। चारिम दृश्य- (दरबज्जाक चौकीपर चद्दरि ओढ़ि, मुँह उधारने अनन्त कुमार पड़ल। पँजरामे शान्ती बैसल) शान्ती- (देह छुवि) बोखारसँ देह जरैए आ अहॉं जिद्द बन्हने छी जे रदबज्जापर सँ अंगना नइ जाएब। अनन्तकुमार- आइ धरि परिवार अंगने भरि रहल मुदा कल्याणी सन बेटी कुलमे जन्म लेलक। जे आंगनसँ निकलि समाज रूपी परिवारमे रहए चाहैए, बाप होइक नाते हम दरबज्जो धरि नइ अरिआति देवइ। शान्ती- कहलौं तँ ठीके मुदा माए-बाप, बेटा-बेटीकेँ जनमे ने दइ छे करम तँ अपने काज करै छै। अनन्तकुमार- हमरा अइ परिवारक कोनो भार नै अछि जहिना बाबू दरबज्जा बना कए गेला तहिना अंतिम सॉंस धरि दरबज्जाक रक्षा माने मान-सम्मान करैत रहब। (चन्द्रनाथक प्रवेश) चन्द्रनाथ- (अवितहि) बाबू किअए, चद्दरि ओढ़ने छिऐ? शान्ती- बोखारसँ आगि फेकै छनि। कतबो कहै छिअनि जे पुरबा लहकै छी, चलू आंगन, से कहै छथि जे अंतिम समएमे दरवज्जापर प्राण छोड़ब। पुरबा-पछबाक काज छिऐ। बहनाइ, बह-अ। चन्द्रनाथ- बाबू, जे बात अहॉं आइ बजलौं से पहिने कहॉं कहियो बाजल छलौं। अनन्तकुमार- तोहर प्रश्नसँ हृदय जुरा गेल बौआ। माए छथुन तँ फुटल ढोल। भरि दिन पनचैती केने घुरतीह जे सभ शान्तीसँ मिलि-जुलि कऽ रहू। मूदा जहिना शक्ति बढ़ल जाइत अछि तहिना हिनकर पनचैतियो बढ़ल जाइ छनि। चन्द्रनाथ- (ठहाका मारि) हूँ-हूँ.....। शान्ती- बुरहा तँ नीक-अधला सभ दिन कहलनि। जखन-जुआन रही तखन बरदास भेल आ आब तामस उठत। दुनियॉंमे जँ कियो संग पुरलनि तँ सभसँ बेसी यएह ने पुरलनि। मुदा आब भगवान अन्याए केलनि जे पहिने हमरा नइ ओछाइन छड़ौलनि। अनन्तकुमार- नीक हेतह जे कल्याणियो केँ सोर पाड़ि लहक। (चन्द्रनाथ भीतर प्रवेश। कल्याणीक संग मंचपर प्रवेश।) कल्याणी- बाबू, किछु होइए? अनन्तकुमार- नहि। शान्ती- कि कहथुन। बोखारसँ दह जड़कै छनि। कल्याणी- कोनो दवाइ नहि देलहुनहेँ? अनन्तकुमार- दवाइ खाइबला रोग नहि छी बेटी। मनमे एते खुसी आबि गेल अछि जे सौंसे देह हँसैए। कल्याणी- (मने-मन सोचैत। मुँहक पोज सुख-दुखक यएह अवस्था छी) माए किछु कहै छथि अहॉं किछु कहै छी? (आवेशमे अबैत) किअए बजेलौं? अनन्तकुमार- कतए गेल छेलह? कल्याणी- महिलाक एकटा बैसारक आयोजन करए चाहै छी जहिमे विधवा समस्याक संबंधमे विचार करब। अनन्तकुमार- ई तँ छोट समस्या छह। अखन नव उत्साह छह पैघ समस्याकेँ नजरिमे रखि डेग उठाबह। कल्याणी- (विस्मित होइत) कोना एहि समस्याकेँ छोट समस्या कहै छियै। अनन्तकुमार- भने तँ समाज दिस डेग उठेबे केलह, बुझवे करबहक। मुदा पहिने समाजकेँ पढ़ए पड़तह। (उठि कऽ बैसैत) चद्दरि उताड़ि सिरमापर रखि दुनू पाएर मोड़ि कए बैसैत सभ कियो एकठाम बैसह। (चारू गोटे चौकीपर बैस जाइत अछि।) अनन्तकुमार- सभकेँ अपन परिवारमे, एक सीमा धरि लाज-विचार करक चाही माइये छथुन पहिने हिनका विषएमे सुनि लाए। (पतिक बात सुिन शान्ती देह-हाथ समेटि सांकांक्ष होइत बैइसैत। चन्द्रनाथ मूड़ी गोति लेलक। कल्याणी पिताक ऑंखिपर ऑंखि गड़ा लेलक।) अनन्तकुमार- जहियासँ माए एलखुन तहियासँ जिनगीक अंतिम पड़ाव धरि संगे छी। गुण-अवगुण मनुष्यमे होइते अछि। मुदा सदतिकाल दुनूपर नजरि रखि गुणकेँ बढ़बैक आ अवगुणकेँ कम करैक कोशिस करैक चाही। जहिसँ नीक रास्ता पकड़ि आगू बढ़ब। कल्याणी- ई तँ बड़ कठिन काज छी, बाबू। अनन्तकुमार- (मुस्की दैत) हँ, ई विवेकक काज छी। अही दुआरे मनुष्य सभ जीबिसँ उपर भेल। ओना उपर होइक दोसरो कारण ई अछि जे धरतीपर जते जीवि-जन्तु अछि तहिमे मनुष्य अंतिम रूप छी। कल्याणी- माइक चरचा करए लगलिऐ? अनन्त कुमार- हँ। देखहक, अइ धरतीपर अनेको लोक अछि। जेकर सीमा निर्धारित कर्म आ ज्ञान केने अछि। एहि अर्थमे माए बहुत दूर छथुन। मुदा अहूँ अवस्थामे आत्मा माने विवेक सएह कहैए जे अखनो धरि दोसराक पैतपाल करैक शक्ति छनि। चन्द्रनाथ- (मूड़ी उठा) एते दिन किअए......? अनन्त कुमार- हँ, ठीके तू पूछए चाहै छह। जहिना माली, बिना फूलक बीआ देखनहुँ पात देखि, बुझि जाइत अछि जे ई अमुक फूलक गाछ छी। तहिना कल्याणीकेँ देखि विवेक जगि गेल। चन्द्रनाथ- एते दिन विवेक सुतल छलै? अनन्त कुमार- नइ बौआ, जहिना आमक गाछक जड़िमे जनमल तुलसी गाछक बाढ़ि ठमकि जाइत अछि तहिना ठमकि गेल छलै। मुदा कल्याणीक ऑंखिक ज्योति जहिना सुनयनाक बेटी सीताक छलनि तहिना बुझि पड़ैए। तेँ अनायास विवेक पोनगि गेल। कल्याणी- माए, बावूक संग अहूँ असिरवाद दिअ। शान्ती- अखन धरि जे डीह, पुरखाक कएल काजक इतिहास छी ओकरा जीवित दुनू भाए- वहीनि मिलि राखब। कल्याणी- झॉंपल-तोपल बात अहॉंक नहि बुझि सकलौं। शान्ती- हम तँ बेसी-बिसरिये गेलौं। बावूए कहथुन। अनन्तकुमार- बेटी कल्याणी, पहिने परिवार बुझि लहक। तू दुनू भाए-बहीनि छह। जहिना तू घरसँ निकलि दोसर घर जेवह तहिना दोसरा घरसँ अपनो घर औतीह। एहिसँ मनुष्यक स्थानान्तर (ट्रान्जेक्शन) शुरू भेल। ओना अपनो परिवारमे लड़का-लड़की होइत (जन्म) अछि, किअए दोसर परिवारसँ संबंध जोड़ल जाइत अछि? (चन्द्रनाथ बहीिन दिस हाथ बढ़ौलक, कल्याणी भाइक हाथमे हाथ रखलक। माटिक मूर्ति जकॉं अनन्तकुमार देखैत। अपने मने शान्ती बरबराए लगलीह) शान्ती- सासु-ससुरक बनौल परिवारकेँ अखन धरि निमाहि रहल छी। जहिना बूढ़ा दुआरपर आएल अभ्यागतकेँ बिना हँसौने नहि जाइ दइ छेलखिन तहिना अखन धरि निमाहल। कल्याणी- ई तँ काजक भार भेल, माए। मुदा असिरवादो ने चाही? शान्ती- बेटी, सामाक माए-बाप जकॉं, तोहर माए-बाप नहि छथुन। जहिना सामाक लेल चकेबा सभ किछु त्यागि संग पुरलक तहिना तोरो भाए करथुन। (चन्द्रनाथकेँ भारसँ दबैत देखि अनन्त कुमार) अनन्तकुमार- हँ, कहै छेलियह। जहिना कम्पोजिट (शंकर) बीज उन्नतिशील होइत तहिना मनुष्योक प्रक्रिया अछि। (बात बदलैत) सदतिकाल माए माथ खोड़ैत रहै छथुन जे किअए बेटीक (कल्याणीक) विआह अनठौने छी। मुदा हम अनठौने कहॉं छी। कल्याणी- (ऑंखि लाल केने) बाबू......। अनन्तकुमार- (मुस्कुराइत) बेटी हुनको विचार अधला नहिये छन्हि। बेटीक प्रति माएक ममता वेसी होइ छै। मुदा पिरवारमे विवाह साधारण काज नहि छी। तहूमे अखन, सभ तरहक संक्रमणक प्रक्रिया चलि रहल अछि। चन्द्रनाथ- की संक्रमण? अनन्तकुमार- पहिने अपन इतिहास बुझि लाए। अदौमे स्वयंवर प्रथाक चलनि छल। जहिक माध्यमसँ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ भार दऽ देलकनि। मुदा आइ की देखैत छहक जे तते ओझरी लगि गेल जे जते सोझरबैक रस्ता अपनौल जाइत अछि ओते ओझरी बेसिआइये जाइ छै। कल्याणी- बाबू, हमहूँ अबोध बच्चा नहि छी बालिग भेलहुँ। तेँ......। अनन्तकुमार- बिल्कुल ठीक सोचै छह। जखन महिलामे पेंइतालीस-पचास बर्ख धरि सन्तान उत्पन्न करैक शक्ति रहैत अछि तखन कम उम्रमे विवाह तँ बड़ जरूरी नहिये भेल? कल्याणी- असिरवाद िदअ। समाजक बीच किछु करैक िजज्ञासा भऽ गेल अछि। अनन्तकुमार- बेटी, हृदएसँ असिरवाद दइ छिअह। जहिना अदौमे कोनो अछुत जाति जखन कोनो गाममे प्रवेश करैत छल तखैन कोनो ऐहन बाजा बजबैत छल जे लोक बुझि जाइत छलै। कल्याणी- (चकोना होइत) कि कहि देलियै? अनन्तकुमार- पुरना गप कहलियह। आब तँ गीताक युग एलै। तेँ जहिना कृष्ण कुरूक्षेत्रमे शंखक अवाजसँ अपन जानकारी दैत छलथिन। तहिना......। कल्याणी- (ऑंखि-कान चकोना करैत चारू भाग देखि) कने बुझा कऽ कहियौ? अनन्तकुमार- समाजमे किछु करए चाहै छह तँ काल्हिये बेरू पहर दुर्गास्थानमे बैसार करह। कल्याणी- काल्हिसँ नीक जे रवि दिन बैसार करब नीक रहत। ओहिमे नोकरियो चाकरियो सभ रहताह। अनन्तकुमार- नोकरी-चाकरी कए कऽ जे गामक नास केलक ओकरा बुते गाम बनौल हएत। जहिना भिनसुरकेे सूर्य देखलासँ दिन भरिक अनुमान लोक कऽ लैत अछि तहिना मनुक्खक किरदानिये देखि कऽ मनुक्खकेँ िचन्हए पड़तह। कल्याणी- हुनका बुते कोना गामक विचार कएल हेतनि। अनन्तकुमार- (खिसिया कऽ) दिल्ली सरकारमे सभसँ बेसी बिहारक रेलमंत्री भेलाह। मुदा कि देखै छहक? जकरा तू अबोध कहै छहक ओकर जिनगियो छोट छै। जिनगीक समस्यो कम होइत अछि। कल्याणी- अखने जा कऽ ढोलियाकेँ ढोलहो दइले कहि अबैत छिअनि। सॉंझू पहर ढोलहो दऽ देब। प्रस्थान, पटाक्षेप। पॉंचम दृश्य- (दुर्गास्थानक आगूमे एक भाग पुरूष एक भाग महिला बैसल। एकटा डायरी, पेन नेने महिला दिससँ आगूमे कल्याणी-प्रतिज्ञा। पुरूष दिससँ सूर्यदेव, क्षितिजदेव, निसकान्त बैसल।) सूर्यदेव- आजुक बैसारक लेल कल्याणी आ प्रतिज्ञाकेँ हृदएसँ शुभकामना दैत छिअनि जे एकटा नव परम्पराक शुभारंभ केलनि। आशा संग आगू बढ़ति सएह शुभकामना। कल्याणी- भाय सहाएव, अहॉं सभ तरहेँ अगुआइल छी तेँ आगूक बाटक जते ज्ञान अहॉंकेँ अछि ओते हम थोड़े बुझै छी। (बिचहिमे निसकान्त) निसकान्त- सुरजू भाय, हमरो बात सुिन लिअ। काल्हिये दुनू परानीक झगड़ाक पनिचैतीमे गेल छलौं। बेचारा विसनाथकेँ देखते छियै जे डेढ़ सौ रूपैयाक कमाइ घर जोड़ैयामे करैए। सभ दिन कमा कऽ अबैए आ घरवालीक हाथमे दऽ दैत छै। घरवाली केहेन जे टी.भी. कीनैले पाइ जमा करैत जाइए। रौद-बसातमे काज करैबलाकेँ एकटा गंजीसँ थोड़े पाड़ लगतै। तइले घरवाली पाइये ने दैत अछि। कल्याणी- (मूड़ी डोलबैत) की पनचैती केलियै? निसकान्त- सैंए-बहूक झगड़ा पंच लबरा। हम नै बुझै छिऐ जे पावरक लड़ाइ छी। दुनू गोटेकेँ थोड़-थाम लगा देलियै। दू विचारक लड़ाइ हमरे बाप बुते फड़िआएल हएत। सूर्यदेव- अच्छा एकटा कहऽ जे दुनू गोटेमे घरक गारजन के छी? निसकान्त- उँ-हूँ सौंसे गामेमे सबहक घरमे मौगिऐक जुति अछि। ऐहन जे लोकक दशा भेलि छै से किअए? कमाइ छै कोइ, हुकुम ककरो। कोनो घर कि कोनो गाम, जाबे मरदक जुतिमे नइ चलत ताबे ओहिना गाम आगू मुँहे ससरि जाएत। कल्याणी- कविलाहाक खेल देखबै। दिन पनरहम गुरूकाका कानि कानि कहैत रहथि जे सभ दिन परदा-पौसकेँ मानलौं। पुतोहू जनीकेँ बेटा नोकरी लगा देलकनि। दस कोसपर स्कूल छनि। दुनू परानी भिनसरसँ खाइ-पीबै राति धरि घुमि कऽ अबै छथि। बेटा तँ बेटा भेल मुदा पुतोहूक सेवा सासु कहनि, ई हमरा पसन्द नहि अछि? सूर्यदेव- ई नइ पुछलहुन जे समए ऐना किअए भेल? निसकान्त- आठ घंटा खटनीक बाद जे समए बचैए- ततबे ने समाजमे समए लगाएव ओते जे पुच्छा-पुच्छी करैए लगब, से ओते निचेन रहै छी। कल्याणी- भैया, नारीकेँ बराबर अधिकारक हवा चलि रहल अछि से की? सूर्यदेव- मदारी सबहक खेल छी। नारी, पुरूषसँ हीन कोना बनैत गेल? जाधरि एहि इतिहासकेँ नहि देखब ताधरि कारण कोना पएव। ककरोसँ अधिकार मंगबै? एहि लेल विकासक प्रक्रियाकेँ नीक जकॉं बुझए पड़त कल्याणी- काज कोना शुरू कएल जाए, भाय। सूर्यदेव- बहुत बातक जरूरत अखन नहि अछि। मुदा किछु बात कहि दैत छी। पहिल- नारीकेँ चिन्हए लेल नजरि ओतऽ दिअए पड़त जहिठाम हवाइ जहाजमे उड़ैत, इलाइची फोड़ि-फोड़ि मुँहमे दैत जिनगी अछि तँ दोसर दिशि भरि-भरि छाती पानि टपि (खच्चा, धार) भीजल कपड़ा पहीरि गोबर बिछैक जिनगी अछि। कल्याणी- (नम्हर सॉंस छोड़ैत) अद्भुत बात भाय अहॉं कहलौं। सूर्यदेव- कल्याणी, अहॉं अखन फुलाइत फुलक कली छी। तैं जरूरत अछि शुद्ध माटि- पानिक। प्रत्येक साल समाजमे माने गाममे साएसँ उपर आन गामक बेटी अबैत छथि। गामक बेटी जेबो करैत छथि। प्रश्न उठैत सिर्फ देहेटा अबैत-जाइत आकि लूरि-बुद्धि सेहो अबैत जाइत अछि। कल्याणी- अखन तँ आरो विकट भऽ गेल अछि जे देशक एक कोनसँ दोसर कोनमे रहनिहारक (पालल-पोसल) बीच संबंध स्थापित रहल। जहिसँ खान-पान, बात-विचार लूरि-ढंग सभ टकरा रहल अछि। सूर्यदेव- एहिना खाइ-पीवैमे देखियौ। एक आदमीक (परिवारक) एक दिनक खर्च जते होइत अछि दोसर दिस ओहन परिवारक भरमार अछि जहि परिवारमे दसो-बर्खक आमदनी ओते नइ छै। ककरो असली नोर चुबै तब ने से तँ पिऔजक झॉंसक नोर चुबबैए। कल्याणी- खेती-बाड़ीक की स्थिति अछि? सूर्यदेव- सरकार मेला लागल। गाममे चारिटा ट्रेक्टर चलि आएल। एक तँ बाढ़िमे बारह आना बड़द गाममे मरि गेल, दोसर जे चारि आना बचल ओहो सभ गोवर उठबै दुआरे बेचि लेलनि। अखन गाममे एकोटा बड़द नै अछि। ले बलैया ट्रेक्टर कदबामे सकबे ने करै छै। खेती कोनो हएत? कल्याणी- अजीव-अजीव बात सभ कहै छी, भैया? सूर्यदेव- कते कहब बहीनि। जते खर्चमे पहिने लोक प्रोफेसर बनै छलाह तते अखन बच्चाक स्कूलमे खर्च हुअए लगल अछि। ककर बेटा पढ़त। शिक्षा केहन भऽ गेल अछि धोती-कुरताबला अा पेन्ट-कोटबला अपनामे रगड़ केने छथि जे हम नीक तँ हम नीक। के फड़िऔत? जहन कि प्रश्न नान्हिटा अछि जे जहिसँ जिनगी नीक-नहॉंति आगू मुँहे समएक संग ससरै। प्रस्थान, पटाक्षेप। समाप्त। रमानन्द झा "रमण" मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान एवं रामानन्द युवा क्लव, जनकपुरधामक संयुक्त तत्त्वावधानमे मैथिली लोक संस्कृतिपर जनकपुरधाममे आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी - जेठ 9, 10 गते, तदनुसार 23-24 मई, 2010 मैथिली लोकगीतक अवस्था डा.रमानन्द झा ‘रमण’ उपस्थित लोकज्ञ एवं शास्त्रज्ञ महोदय! डा.महेन्द्रनारायण रामक उपर्युक्त विषयक कार्यपत्र परिश्रमपूर्वक तैआर कएल गेल अछि। डा. राम मैथिली लोक साहित्यक क्षेत्रमे किछु मौलिक काज कएलनि अछि। किन्तु एहि स्तरक संगोष्ठीमे कार्यपत्र प्रस्तुत करबाक समय किछु बिन्दुके ँ ध्यानमे राखब आवश्यक होइत छैक। से एहि हेतु जे संगोष्ठीक श्रोता ओहन नहि रहैत छथि जनिका ककहरा पढ़ाओल जाए। श्रोतावर्गमे सामान्यतः बहुपठित एवं अपन-अपन क्षेत्रक विशेषज्ञ उपस्थित रहैत छथि। उपस्थित छथिओ। ते ँ ई मानि कार्यपत्र प्रस्तुत कएल जएबाक चाहैत छलनि जे हमर कार्यपत्रक श्रोता असामान्य ज्ञान आ’ प्रतिभाक लोक रहताह। प्रस्तुत कार्यपत्र विशिष्ट श्रोताके ँ समक्ष राखि नहि लिखल गेल अछि। कार्यपत्र परिचयात्मक आ’ इतिवृत्तात्मक अछि। विश्लेषणात्मक होएबाक चाहैत छलैक। एहन विश्लेषणात्मक जे श्रोता/पाठकके ँ वैचारिक स्तरपर उद्वेलित करबाक क्षमता रखैत हो। उदाहरण लेल विशेष अवसर आ’ भासक गीत लगनीक नाम लेब। लगनी कोन संस्कृतिक उपज थिक। जाँत चलओला पर जे थकनी होइत छैक, तकरा गीत गाबि कोना बिसरल जाइत छल। ओहि माध्यमे ननदि-भाउजक हास-परिहाससँ वातावरण कोना महमहा उठैत छलैक। सम्प्रति जखन जाँतक स्थान मिक्सी लेने जाइत अछि आ’ ढ़ेकीक स्थान मील, तखन एहि तरहक श्रम-गीतक विलुप्तिक सम्भावना कोना बढ़ि रहल अछि, आदि। कहबाक तात्पर्य जे लोकगीत संस्कृतिक संवाहक थिक। लोकगीतमे सम्बन्धित क्षेत्रक संस्कृति झलकैत रहैत छैक। एहन स्फीत विश्लेषणात्मक दृष्टिक अभाव डा.रामक कार्यपत्रमे खटकैत अछि। कार्यपत्रक विषय अछि, लोक गीतक अवस्था। एहिमे तीन टा पद अछि - लोक, गीत आ’ अवस्था। गीतक महत्त्व सर्वकालिक छैक। जहिआसँ मानवक अस्तित्व छैक, कोनो ने कोनो प्रकारक गीत ओकर कंठसँ स्वतः निःसृत होइत रहल अछि। अपन परिवेश वा सजातीय किंवा मानव जातिक प्रति रागात्मक होएब लोकक स्वभावगत विशेषता थिकैक। ते ँ सभ भौगोलिक वा सांस्कृतिक क्षेत्रक लोकक जीवनमे गीतक महत्त्व छैक आ’ सदा रहतैक। एतेक धरि जे हमरालोकनिक देवी देवता सेहो संगीत प्रेमी छथि। केओ डमरू बजा के ँ ताण्डब करैत छथि तँ केओ वीणावादिनी कहबैत छथि। दोसर पद अछि लोक। लोक तँ सभ दिनसँ अछि। लोक अछि, ते ँ राग अछि, विराग अछि। ते ँ गीत अछि। मैथिल संस्कृतिमे जेना वेदक अर्थात् शास्त्रक महत्त्व अछि ओहिना लोकक अर्थात् शास्त्रीयतासँ मुक्त आचार-व्यवहारक महत्त्व अछि। लोक आ’ वेद समानान्तर मानल गेल अछि। ‘लोके च वेदे च’। व्यावहारिको जीवनमे लोकवेदक पुछारी करब सामान्य शिष्टाचार भए गेल अछि। समाजमे दूनू वर्गक लोक रहैत आएल अछि। जे शास्त्रीय शब्दावलीमे आभिजात्य वर्ग आ’ सामान्य वर्ग थिक। एही आधार पर साहित्योक वर्गीकरण - शिष्ट साहित्य एवं लोक साहित्य अछि। सिद्धाचार्य लोकनि तथाकथित शिष्टवर्गक लोक नहि छलाह। किन्तु मैथिलीमे जे प्राचीनतम गीत साहित्य उपलब्ध अछि, से सिद्धाचार्य लोकनिक रचना थिक। ओ जीवनक रागात्मक अनुभूतिक स्थानपर अपन अनुभव आ’ दर्शनक अभिव्यक्तिक माध्यम लोकभाषाके ँ बनाए गीतक रचना कएल। कविकोकिल विद्यापति लोकक महत्त्व आ’ लोकक भाषाक महत्त्व बूझलनि। ते ँ सर्वत्र पूज्य आ’ मान्य छथि। लोक हुनक रचनामे अपन राग-विरागके ँ अभिव्यक्त भेल अनुभव करैत अछि। लोकक महत्त्वके ँ देखैत महाकवि भवभूति रामके ँ आदर्श शासकक रूपमे चित्रित करैत हुनकासँ कहबाओल अछि - राज्य, सुख आ’ देशके ँ - एतेक धरि जे सीता के ँ लोकक आराधनाक हेतु छोड़बामे व्यथा नहि होएत - राज्यं, दयां च सौख्यं च, यदि वा जानकीमपि। आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्तिमेकथा।। लोक की कहत? से सोचि राजा राम सीताक निर्वासन कए देलनि। किन्तु हुनकामे लोकतन्त्रीय जीवन-मूल्यक अभाव छल। एकर विपरीत सीता लोकतन्त्रीय शासन-व्यवस्थामे जनमल छलीह। लोकतन्त्रमे अपन विचार व्यक्त करबाक स्वतन्त्रता होइत छैक, से हृदयंगम छलनि। ओ जनैत छलीह जे मिथिलामे लोकशक्तिक महत्त्व अछि आ’ राजा जनक लोकहिक प्रतिनिधि थिकाह। लोकतन्त्रक भूमिमे जनमलि सीता अश्वमेध यज्ञक प्रसंगमे राजा रामक समक्ष मिथिलाक ‘मिथिलाक लोक नहि थिकनि राजाक दास स्वाधीनमना लोकक प्रतिनिधि थिकाह मिथिलेश अहाँ करबैक आक्रमण। मिथिला भ’ जैत पुरुषहीन, तखने ने अहाँक जीत? पति-पुत्र विहीना नारीक नोरसँ मिथिलाक भूमि हैत पाँक हेंक। फोड़ल लहठीक लागत ढे़र-पहाड़, माङक सिन्दूरसँ पोखरि झाँखडि हैत लाल, कन्ना-रोहटसँ भरत मिथिलाक भू, नभ, दिगन्त, सोहर, कोबर, बटगबनी, लगनी, मलार, रास, संगीतक सब राग-भास मरि लुप्त हैत।’1 राजतन्त्रमे वैचारिक मतभिन्नताक अवकाश नहि छैक। राजतन्त्रीय शासन-व्यवस्थामे प्रशिक्षित राजा रामक लेल वैचारिक मतभिन्नताक महत्त्व नहि छल। सीता द्वारा मिथिलाक प्रसंग स्थिति कथन राजद्रोह भए गेल। राजद्रोहक दण्ड होइत अछि - मृत्यु दण्ड वा देश निष्कासन। देश निष्कासनक दण्ड सीताके ँ भेटलनि। मिथिलाक संस्कृतिमे लोकतन्त्रात्मक मूल्य कतेक प्रगाढ़ अछि तकर साक्ष्य नेपाल तराइक घुमन्तू गायकक मुहे ँ सुनि लिपिबद्ध भेल जार्ज अब्राहम ग्रिअर्सन संकलित गीत दीनाभद्रीसँ सेहो प्रमाणित होइत अछि। मुसाहु बनियँा जखन अकारण दीनाभद्रीके ँ अपन दोकान परसँ ठोंठिआ दैत अछि तँ ओ तकर प्रतिकार अपन शारीरिक बलसँ नहि कए, निसाफक हेतु पंचक ओतए जाए नालिस करैत अछि - पंच मे ँ भद्री देलन्हि नालिस कराय। छोट पंच बड़ पंच सिरक मटुक। बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलक मुसाहु, करू मोर निसाफ। किअ कहौ, हे मुसाहु, बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलह।। तोहर दोकान मना परि जाएत।2 हमर देश अर्थात् भारत विदेशी आक्रमण, राजतन्त्र आ’ उपनिवेशवादक पीड़ा कतेको शताब्दी धरि भोगि स्वतन्त्र भेल एवं लोकतन्त्रक स्थापना भेलैक अछि। भारतक नागरिक अपन भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल स्वतन्त्र अछि। ओहि लेल पूर्ण अवसर छनि। अपने लोकनि (नेपालवासी) कतेको शताब्दी धरि राजतन्त्रके ँ भोगैत ओहिसँ मुक्तिक लेल अनवरत संषर्घ करैत अएलहुँ अछि। ओहि संघर्षसँ लोकतन्त्रक उदय भेल अछि। सुन्दर विहान समक्ष अछि। एहि लोकतन्त्रक युगमे जाहि कोनो शक्तिक सबसँ बेसी महत्त्व छैक से थिक लोकसत्ता आ’ लोकक राग-विराग एवं लोक जीवनके ँ प्रतिनिधित्व करएबाला लोक साहित्यक। एहि सन्दर्भमे ‘मैथिली लोक संस्कृति’ पर संगोष्ठी आयोजित करब, लोकशक्तिक प्रतिष्ठापनक दिशामे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण डेग थिक। अपने लोकनि लोकतन्त्रक स्थापना लेल कतेक लालायित छलहुँ आ’ कतेक आशान्वित छी,, तकरा ई संगोष्ठी प्रतिध्वनित करैत अछि। तेसर पद अछि अवस्था। अवस्था कालक द्योतक थिक - भूत, वर्तमान आ’ भविष्य। अर्थात् मैथिली लोकगीतक अवस्था की छलैक, वर्तमान कालमे कोन अवस्थामे अछि तथा भविष्यमे मैथिली लोकगीत कोन अवस्थामे रहत। ई सभ केओ एक स्वरे ँ एवं मुक्त कण्ठसँ स्वीकारैत छी जे मैथिलीक लोकगीत हमर महान संस्कृतिक वाहिका थिक। एहि लोकगीतमे हमर राग-विराग, आशा-आकांक्षा, सुख-दुख, ज्ञान-विज्ञान, हमर जातीय इतिहास, हमर भौगोलिक स्थिति एवं प्राकृतिक सुषमा, जीवन-शैली तथा सांस्कृतिक वैविध्य अनादि कालसँ संवाहित होइत आबि रहल अछि। ई सांस्कृतिक सम्पदा अनेक रूपमे अछि - दृश्य आ’ अदृश्य दूनू। रागात्मकतासँ लबालब भरल अछि। जीवनक एहन कोनो पक्ष नहि छैक जकर रागात्मक अभिव्यक्ति लोकगीतमे नहि हो। तुलसी, कुश, आम, महु, नीम, बाँस, काछु, पुरैनिक पात, तिलकोरक पातसँ लए के ँ भोजन-विन्यास धरि लोकगीतमे भेटत। गर्भ धारणसँ मृत्यु धरिक समस्त संस्कार लोकगीतमे अपन पृथक राग-भास एवं विषय-वस्तुक संग अनुस्यूत अछि। लोकगीतमे युग-युगक अनुभव सुरक्षित रहैत अछि। ई अनुभव सम्प्रति पारम्परिक लोक ज्ञान ;ज्तंकपजपवदंस विसा ादवूसमकहमद्धक स्रोतक रूपमे मान्यता पाबि गेल अछि। एहि प्रसंग एक दू टा उदाहरण प्रस्तुत अछि। विवाह पूर्व वा अन्यो अवसर पर उवटन लगेबाक प्रथा अदौकालसँ प्रचलित अछि। उबटनमे मेथीक प्रयोग होइत अछि। ओहिना हरदि लगेबाक प्रथा अछि। एहि दूनूमे औषधीय गुण छैक जे विज्ञान द्वारा प्रमाणित अछि। घर-घरमे तुलसीक गाछ अछि। धी-सुआसिन ओकर जड़िमे जल ढ़ारैत छथि। सांझमे दीप लेसैत छथि। बेलक पात शिवजीके ँ चढ़बैत छथि। मैथिली लोकगीतमे एहि वनस्पतिक सभक महत्त्व अकारण नहि अछि। समय-शीला पर परीक्षित एवं अनुभवसिद्ध अछि। ई वनस्पति सभ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्त्वक बस्तुक थिक जकर उपयोग होइत आएल अछि। लोकगीतमे आ’ व्यवहारमे रहलाक कारणे ँ ई पारम्परिक ज्ञानक स्रोत भए गेल अछि। एहि पारम्परिक लोकज्ञानक स्रोतसँ मानवजाति लाभान्वित भेल अछि। लोकगीतमे वैज्ञानिक तत्त्वक रहबाक ई स्पष्ट उदाहरण थिक। उबटनक गीतमे मेथी पीसबाक चर्च बेर-बेर अबैत अछि। कओन नाना मेथिया बेसाहल? कओने नानी पीसल? अपन नाना मेथिया बेसाहल, सूहब नानी पीसल। कनि बिलमि एहि गीत पर विचार कएल जाए। बेसाहब, अपन खेत-पथारसँं आवश्यकताक पूर्ति नहि होएब थिक। बेसाह लगैत छनि, अर्थात् अन्न-पानिक अभाव छनि। ई लोकगीत परिवारक आर्थिक स्थितिके ँ सेहो देखबैत अछि। तथापि मातामह द्वारा दौहित्रीक उबटन हेतु मेथी बेसाहल जाइत अछि। बेसाहल मेथी मातामही नातिन लेल पीसैत छथि। आनो केओ पीसि सकैत छलीह। मुदा रागात्मकताक महत्त्व छैक। ते ँ नानीक पीसल मेथी लगाओल जएबाक चर्च अछि। रागात्मकताक रंगमे व्यावहारिकता एवं लाभप्रदताके ँ बोरि जीवनमे अंगीकृत कए लेब मैथिल संस्कृतिक अनुपम विशेषता थिकैक। ई विशेषता उबटनक एहि गीतमे वर्तमान अछि। एहिना हरदिक प्रसंग लोकगीतमे पर्याप्त चर्च अछि: - हरदीके बड़ा सजाबट जनक जी, हरदीमे बड़ा सजाबट। पहिल हरदी दादा चढ़ावे पाछू सँ दादी सोहागिन, जनक जी। हरदी बड़ा सजाबट। लोक जीवनमे उपयोगिता, रागात्मकता, सौन्दर्यप्रियता एवं सामाजिकताक अत्यन्त महत्त्व अछि। सामाजिकता रागात्मकतासँ कोना मंडित रहैत अछि तकर उदाहरण निम्नलिखित गीतक पांतीमे द्रष्टव्य अछि। ‘सेन्टो गमकदार’ प्राचीन प्रयोग नहि थिक। ई लोकगीतक लोचकताके ँ प्रदर्शित करैत अछि। जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।.... चाचीक हाथमे तेल फुलेल, मामीक हाथ कसाइ अछि मौसीक हाथमे अत्तर सुगन्धित, सेन्टो गमकदार अछि। जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि। विवाहक अवसर पर सोहाग देबाक प्रथा अछि। सोहाग थिक सौभाग्य-कामना, मंगलमय दाम्पत्य जीवनक हेतु आशीर्वचन। मैथिल संस्कृतिमे सामाजिक समरसताक तत्त्व प्रगाढ़ अछि। एहि तत्त्वक गीतात्मक अभिव्यक्ति हास्य-विनोदक सृष्टिक संग कोना कएल जाइत अछि से प्रस्तुत सोहाग गीतक ‘लट छिलकी धोबिनयाँ’क प्रयोगमे वर्तमान अछि। धोबिनियाँ सामान्य नहि अछि, सौन्दर्य चेतना छैक। कपोल पर लट लटकौने अछि। एहि लटक कतेको कवि ‘कारी सियाह नाग’सँ तुलना कएने छथि। एहिठाम आनो केओ भए सकैत छलि, धोबिनियाँ किएक? एकरहु एक पौराणिक कारण छैक। शिवजीक मानस पुत्रीक विवाहक अवसर पर समाजक अनेकहु महिला लोकनि सोहाग लेल उपस्थित भेल छलीह। किन्तु ओहिमे सभसँ आगू छलि एक धोबिन। गणेशजीसँ ओकरा अखण्ड सौभाग्यक वरदान भेटलैक। एहि हेतु सभसँ पहिने अखण्ड सौभाग्यक वरदान प्राप्त धोबिनसँ सोहागक परिपाटी अछि। एहि एक शब्दमे एक संस्कृति अछि। एक कथा गुम्फित अछि। सियाजी के दही ने सोहाग गे, लट छिलकी धोबिनियाँ हमरो सियाजी कें पिअरे पिताम्बर सेहो तों लिहे फेराए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ। हमरो सियाजीकें सोना अशर्फी। सेहो तों लए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ। समाजमे कन्याके ँ पुत्रवत् सुविधा, विकासक अवसर आ’ अधिकार प्राप्त नहि छैक। ई विभेद जन्मकालहिसँ आरम्भ भए जाइत अछि। एकोटा एहन सोहर नहि भेटत जाहिमे सीता, पार्वती, राधा, लक्ष्मी वा सरस्वतीक जन्मक उल्लास हो। सभटा राम वा कृष्णक जन्मसँ सम्बन्धित अछि। पुत्रक जन्मक अवसर पर बहिंगा फेंकबाक कतेको ठाम प्रथा अछि। ई प्रसन्नताक संग शौर्यक अभिव्यक्ति थिक। बेटीक जन्मसँ उल्लासक स्थान पर परिवारमे अवसाद पसरि जाइत छैक। धरतीक झझकब, नार-पुरैनि काटबा लेल हाँसू तकबाक क्रममे चक्कूओ नहि भेटब आ’ अन्ततः खुरचनसँ नार काटब, सासु एवं ननदिक व्यवहारमे रुच्छता तथा पतिक मुखाकृतिमे अप्रसन्नताक चेन्ह आदिक अभिव्यक्ति लोकगीतमे पर्याप्त भेल अछि। ‘जाहि दिन आगे बेटी तोहरो विवाह भेल, तारा गिरल आधी रात’ बेटीक विवाहक लेल माइक चिन्ताके ँ स्वर दैत अछि। जाहि दिन आगे बेटी तोहरो जनम भेल, धरती उठल झझकाइ हे। हंसुआ खोजइते गे बेटी छुरियो न भेटल, सितुआसँ नार कटाओल हे। सासु ननदी गे बेटी मुखहुँ न बोलए, स्वामी जीके ँ जियरा उदास हे। जाहि दिन आगे बेटी तोहरो विवाह भेल तारा गिरल आधी रात हे। भ्रूण-परीक्षण आधुनिक विज्ञानक देन थिक। एहि परीक्षणसँ अनिच्छित संतानके ँ सूर्यक प्रथम रश्मि देखबाक अवसर नहि भेटैत छैक। पहिने ई सुविधा नहि छलैक। किन्तु बेटीक जन्मसँ माइके ँ जे पारिवारिक आ’ सामाजिक प्रतारण एवं उपेक्षा होइत छलैक, लोकगीतमे तकर चित्रण अत्यन्त कारुणिक अछि। नारीक प्रति ई उपेक्षा भाव वर्तमान समय धरि व्याप्त अछि। एहि मानसिकतासँ स्त्री-पुरुषक जनसंख्यामे भेल असंतुलनके ँ समाज वैज्ञानिक सामाजिक संकटक रूपमे देखय लगलाह अछि। परिवारमे पुत्रीक जन्मसँ होइत अवसादक लोकगीतमे भेल अभिव्यक्ति मानवीय संवेदनाक तारके ँ झनझना दैत अछि। पहिले जे जनितउँ धिया रे जनम लेत, खएतउँ मरिच पचास हे। मरिचक झाँस धिया दुरि जाइत, छुटितइ धियाक संताप हे। पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुष मानसिकताक दोसर उदाहरण थिक पत्नी के ँ सेविका मानबाक मानसिकता। एहि मानसिकतामे विवेकक अभाव तँ अछिए अर्थलोलुपता सेहो अछि। निम्नलिखित लोकगीतमे ‘रुनझुन-रुनझुन’ शब्द नव विवाहिताक पति-मिलनक उत्कंठा, पूर्ण रागात्मक संवेदनाक संग अभिव्यक्ति भेल अछि। प्रतीत होइछ नव कनियाँक पएरक नुपूर नहि बजैत हो, ओकर हृदय एवं शरीरक अंग-अंग पुलकित एवं झंकृत भए निनाद कए रहल हो। किन्तु स्वामीक आदेशपर ओ भरि राति बिअनि हौंकैत रहि जाइत अछि -‘आध राति हौंकल, पहर राति हौंकल’- रुनझुन-रुनझुन, इहो नबि कोहबर हे। आहे माइ, ताहि कोहवर सुतलनि कओन दुलहा, बेनिया डोलए मांगे हे।। आध राति हौंकल, पहर राति हौंकल हे। होत भिनसर बेनिया टूटि गेल, बंनिया ला रूसि गेला हे।। ककरा भेजब बाबा घर, ककरा भेजब भइया घर हे। परभुजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसि गेल हे।। हजमा भेजऽ बाबा घर, ब्राह्मन भेजऽ भइया घर हे। आगे माइ, हरिजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसल छथि हे।। हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे हे। बीचहिं बेनिया झलकैत आबे, आब हम नैहर जएबै।। उपर्युक्त उदाहरणमे प्रभु जीक अर्थात् पतिक अरजल बिअनि प्रभु जीके ँ अनवरत हौंकैत रहलासँ पत्नीक हाथमे टूटि जाइत अछि। एहिमे ओकर कोन दोष छलैक? किन्तु त्रासद पक्ष अछि जे पतिक आचरणसँ पत्नीमे असामान्य ग्लानिक बोध होइत छैक। कोनो आन उपाय नहि देखि, नैहर समाद पठाए तकर प्रतिपूर्ति करबाक निर्णय करैत अछि। एक प्रकारे ँ ओ जुर्माना भरैत अछि। तकर बादे नैहर जएबाक अनुमति भेटैत छैक। अर्थात् पतिक अरजल बिअनि टूटि गेलासँ जुर्माना भरबा धरि ओ सासुरमे बन्धक बनल छलि। ‘हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे हे’, बीचहिं बेनिया झलकैत आबे’ आ’ आब हम नैहर जएबै’ नारी जातिक एही त्रासदीक अभिव्यक्ति थिक। ई सामाजिक विकृति एवं अर्थलोलुपता कमल नहि अछि। दहेज लोभी लोकक आखेट नव विवाहिता निरन्तर भए रहल छथि। लोकगीतमे पुरुष मानसिकता आ’ नारी उत्पीड़नक पर्याप्त चित्रण अछि। ई चित्रण सभ वस्तुतः सामाजिक मनोवृत्तिक एक करुण इतिहास थिक। कृषि संस्कृतिक देन लगनी, विशेष भास एवं अवसरक गीत थिक। एहि कोटिक गीतमे सेहो बधू उत्पीड़नक चित्रण अछि - घर पछुअरबा लौंग केर गछिया, लौंग फूलेल आधि रतिया रे दइबा। लौंगवाके चुनी चुनी संजिया ओछइली, सुती रहलइ सासुजीके बेटबा हो दइया। घुरि सुतु फिरि सुतु सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया। तोहर घामसँ भीजल सभ चोलिया हे दइया। उपर्युक्त गीतक पाँतीमे प्रयुक्त ‘सासुजी के बेटबा’ एवं ‘ननदी जीके भैया’ पर विचार कएल जाए। ओ पति, स्वामी आदि कहि सम्बोधित नहि करैत अछि। स्पष्ट अछि जे पति अपन पत्नीक निकट नहि छथि। ओ माइ-बहिनिक कहलमे छथि। सासु एवं ननदि सुनियोजित रूपसँ अत्यधिक परिश्रम करबैत छैक जाहिसँ पुतहुक स्वेदसिक्त अंगबस्त्र पतिक विकर्षणक कारण बनल रहए। ‘घुरि सुतु फिरि सुतु सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया’- एही स्थिति दिस संकेत करैत अछि। प्रस्तुत गीतमे मिलनोत्कंठित नायिकाक मनोदशाक सूक्ष्म एवं सुन्दर वर्णन अछि। ओ अपन तुलना लवंगक फूलसँ करैत अछि। जे पूर्णतः प्रस्फुटित होएबासँ पहिने अधरतियेमे तोड़ि लेल गेल हो। ई नायिकाक अर्ध विकसित रहबाक द्योतक थिक। किन्तु प्रस्फुटनक उष्मासँ अवश्य ओ मातलि अछि। जे ‘लौंगवाके चुनी चुनी संजिया ओछइली’ सँ स्पष्ट अछि। एहि गीतमे अप्रस्तुत एवं प्रस्तुत विधानक अद्भुत नियोजन भेल छैक। एक बेर नायिका लेल, जे प्रस्तुत अछि, प्रस्तुत लवंगक फूल आ’ दोसर बेर अप्रस्तुत मनक उल्लास लेल प्रस्तुत लवंगक फूलक प्रयोग भेल अछि। बेली चमेली वा केओलाक प्रयोग मैथिली लोकगीतमे ठाम-ठाम भेटैत अछि। किन्तु औषधीय गुणसँ युक्त एवं मिथिलासँ भिन्न प्राकृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रमे सुलभ लवंगक फूलक संग नायिकाक मनोदशाक वर्णन दुर्लभ अछि। एही लगनीक अगिला पांतीमे अछि - घर पछुअरबामे बसे एक मलहा, मलहा रे जमुनामे फेंकू महजाल रे दइबा। तोहरेा के देबौ मलहा दही-चूड़ा भेाजन रे, जमुनामे फेकू महजाल रे दइबा। एक जाल फेंकले मलहा, दुइ जाल फेंकले,तेसर जाल घोंघटा संए मारलए रे दइबा। एक जाल फेंकले मलहा दुइ जाल फेंकले, तेसर जाल धनीके लहरबा रे दइबा। कृषि संस्कृतिक नायिकाक कृषि संस्कृतिक नायकक (घर पछुअरबामे बसे एक मलहा) प्रति आर्कषण सहज अछि। किन्तु नायिका द्वारा जमुनामे जाल फेंकबा लेल कहब कम महत्त्वपूर्ण नहि अछि। गंगा शान्त छथि तँ जमुना तीव्र प्रवाहिनी। एहि हेतु जमुनामे पार होएब लेल अपेक्षाकृत बेसी साहस, धैर्य आ’ परिश्रम चाही। स्पष्ट अछि जे नायिका तेसर बेर जाल फेंकला पर आकर्षित होइत अछि। अपन तुलना ओ जमुनासँ करैत अछि। एहि आकर्षणक नाटकीय अभिव्यक्ति प्रस्तुत लोकगीतमे भेल अछि। लोक गीतक विशेषता गीतक विशेषताके ँ मोटामोटी निम्नलिखित रूपमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि - 1. सामूहिकता - लोकगीत सामूहिक रूपसँ गाओल जाइत अछि। ओ लगनी, बटगमनी हो वा मांगलिक अवसर पर गाओल जाइत गीत। एकल गायन कुशल गायक/गायिका टा श्रोताक ध्यान आकर्षित करैत अछि। ई लोकात्मक होएबाक सेहो प्रमाण थिक। 2. सहभोगिता आ’ व्यापकता - संग-संग भोगब भेल सहभोगिता। लोक गीतमे समाज वा सांस्कृतिक समूहक राग-विराग, विजय-पराजयक आदिक रागात्मक अभिव्यक्ति रहैत अछि। 3. परिस्थिति एवं मनःस्थितक अनुरूप अनुकूलन - लोक गीत एक दिनमे नहि सहस्रो वर्ष धरि अनुभवक उपरान्त वर्तमान स्वरूपमे आएल अछि। जे युगक घात सहि नहि सकल छिटकैत गेल। लोकक नव-नव अनुभव जोड़ाइत गेलैक। लोक गीतक ई लोचकता ओकरा टटका आ’ सुस्वादु बनौने रहैत अछि। 4. नृत्यक संग प्रगाढ़ एवं सुदृढ़ सम्बन्ध - लोकगीतक नृत्यक संग प्रगाढ़ सम्बन्ध सामूहिक गायनक समय अकस्मात दर्शन भए जाइत अछि। वर्तमान परिवेश बदलैत अछि। लोकक आवश्यकता आ’ रुचि बदलैत अछि। सम्बन्ध आ’ सरोकार बदलैत अछि। एहिसँ सामाजिक जीवनमे परिवर्तन अबैत अछि। एहि परिवर्तनक प्रभाव लोकक जीवन-यापन पर पड़ैत छैक। उद्योगीकरण आ’ शहरीकरणसँ श्रमक पलायन आरम्भ भेल। गाम-घर, खेत पथार पोखरि -झांखरि, वन-पर्वतक स्थान पर लोकके ँ गोठुल्लामे रहबाक बाध्यता भए गेलैक। ओ भिन्न भाषा-भाषी एवं संस्कृतिक लोकक बीच जीबैत रहबा लेल विवश होइत रहल। पहिने देशहिक एक कोणसँ दोसर कोन लोक जाइत छल। आब विश्वक एक कोणसँ दोसर कोण धरि उड़ि जाइत अछि। जाहिठाम सभ किछु अनचिन्हार रहैत छैक। अपरिचित रहैत छैक। बाजारबाद अपन अकादारुण मुह बाबि सभ किछु गीरि अपन रंग पसारबा लेल दु्रत वेगसँ चतुर्दिक पसरि रहल अछि। जॉँत पीसब वा ढ़ेकी कूटब अनावश्यक भए गेलैक अछि। तखन लगनीक कोन प्रयोजन रहि जाएत। पहिनहिसँ वर कनियाँ ‘हाय! हेलो!’ करैत रहैत छथि, तखन मुहबज्जी वा कोवरक गीतक की होएतैक? बाजारमे रंग-विरंगक क्रीम आ’ लोशन उपलब्ध छैक, नानी मेथी कथी लेल पीसतीह। गोदना आब गोदौल नहि जाइत अछि। खोदपारनि आओत कतए सँ जे अवसरोचित गीत द्वारा हास-परिहास होएत। टेटूक फाहामे लहरिया कतयसँ आओत, जकर तुलना पति वियोगक लहरिसँ कएल जा सकैछ। (हमरो लहरिया गे सुन्दरी सहलो ने जाइ छउ रे जान! जान सूइया के लहरिया कोना सहबे रे जान! सूइया के लहरिया हे पिअबे घड़ी रे दंइ घड़िए रे जान! जान तोहरो लहरिया हो पिअबे सगर रतिया रे जान! )। नवजातक वा नेनाक स्स्वास्थ्य रक्षा लेल विभिन्न प्रकारक औधषि एवं सूर्इ्र आदिक निर्माण भेल अछि। तखन पाच आ’ ओहि अवसर पर गबै जाए बाला पाच गीतक कोन प्रयोजन रहि जएतैक। पसरैत यान्त्रिकता, सांस्कृतिक परिवेशसँ दूर जीवन-यापन, प्रदर्शन-प्रभाव एवं बाजारबाद तथा संचार माध्यमक माध्यमे अहर्निश प्रहारसँ लोक संस्कृति प्रभावित एवं विकृत भए रहल अछि। ओकर कतेको वैशिष्ठ्य लुप्त हेाएबाक कनगी पर छैक। संरक्षणक उपाय पारम्परिक ज्ञानक स्रोत एवं मानव जातिक विकासक भावात्मक अभिलेखक संरक्षण दिस विश्व समुदाय (यूनेस्को)क ध्यान हालहिमे गेल अछि। पहिने विश्व समुदाय इंटा-पाथरहिके ँसांस्कृतिक सम्पदा मानि विश्वस्तर पर ओकर संरक्षणक हेतु नीति-निर्धारण करैत छल। ओहि लेल सुविधा दैत छलैक। किन्तु भूमण्डलीकरणक चपेटमे विश्वक सम्पन्न सांस्कृतिक वैविध्य पर बढ़ल संकट एवं कतेको राष्ट्र तथा एवं नृवर्गक ;(ethnic group)सांस्कृतिक परिचितिके ँ संकटापन्न स्थितिमे अनुभव कए यूनेस्कोक ध्यान अस्पृश्य, अभौतिक एवं निराकार ;( Intangible) सांस्कृतिक सम्पदाक संरक्षणक महत्त्व दिस गेलैक अछि। आ’ ई विश्वास बलवती भए गेलैक अछि जे अभौतिक एवं निराकार सांस्कृतिक सम्पदा कोनहुँ प्रकारसँ साकार भौतिक;(tangible) सांस्कृतिक सम्पदासँ दऽब नहि अछि। इहो ओहिना संरक्षणीय अछि जेना साकार भौतिक सम्पदा। एहि निमित्त आहूत बैसारमे अभौतिक एवं निराकार सांस्कृतिक सम्पदाके ँ परिभाषित करैत विश्वक सभ देशसँ संरक्षण हेतु आवश्यक उपाय करबाक हेतु कहल गेल अछि।3 यूनेस्कोक वैविध्य सांस्कृतिक सम्पदाक सार्वभौम घोषणक ; ( UNESCO Universal Declaration on Cultural Diversity) अनुसार सांस्कृतिक विविधता मानवजातिक सामूहिक सम्पदा थिक एवं वर्तमान तथा भविष्यक संततिक लाभक हेतु एकरा स्वीकृत आ’ सम्पुष्ट कएल जएबाक चाही। सांस्कृतिक सम्पदाक संरक्षण हेतु यूनेस्कोक द्वारा दू टा बाटक अनुशंसा कएल गेल अछि - क. चिन्हित करब एवं ख. संरक्षण। क. चिन्हित करब ;(Identification) निम्नलिखित मार्ग निर्देशनक आधार लोकगीत के ँ चिन्हित कएल जा सकैत अछि: - पद्ध लोक गीतक सार्वत्रिक (ग्लोबल) उपयोग हेतु सामान्य मार्ग निर्देश पपद्ध लोक गीतक एक व्यपाक रजिस्टर तैआर करब, तथा पपपद्ध लोकगीतक क्षेत्रीय वर्गीकरण ख. लोकगीतक संरक्षण ;(Conservation of folklore) एक राष्ट्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जतय लोकगीत नीक जकाँ संकलित रहए तथा जिज्ञासुके ँ उपलब्ध भए सकए। पपद्ध एक केन्द्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जे सेवा कार्यक हेतु काज करए। * एक संग्रहालय स्थापित कएल जाए अथवा स्थापित संग्रहालयमे पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृति एवं कलाकृति प्रदर्शित रहए। * पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृतिके ँ प्रस्तुतिमे प्राथमिकता देल जाए तथा यथासम्भव ओही परिवेश/पृष्ठभूमिक जीवन-यापन, कौशल तकनीकी आदिक सृजन रहए। * लोकगीतक संकलन एवं अभिलेखनके ँ सुमेलित कएल जाए। * संकलनकर्ता, अभिलेखकर्ता, एवं अन्य विशेषज्ञके ँ लोकगीतक भौतिकसँ विश्लेषणात्मक संरक्षण लेल प्रशिक्षित करब, तथा * संकलित सांस्कृतिक सम्पदाक सुरक्षाक हेतु लोकगीतक प्रतिलिपि सांस्कृतिक समुदाय एवं क्षेत्रीय संस्थाके ँ उपलब्ध कराएब जाहिसँ ओ सब सक्रिय बनल रहथि। नृविज्ञानक मत अछि जे मानवताक विकासक क्रममे सर्वप्रथम समष्टि चेतना ; ( Tribal consciousness) तदुपरान्त, हम-चेतना ;(we - consciousness) आ’ ‘अहं चेतना ; ( I - consciousness) विकसित भेल। मानवक विकासक वास्तविक यात्रा एतहिसँ प्रारम्भ होइत छैक। ओना हम के छी ? से बूझबा लेल कहि सकैत छी जे एक प्राणी छी, मनुष्य छी, नेपाली छी, भारतीय छी, उच्चवर्गमे जनमल छी, निम्नवर्गमे जनमल छी, आरक्षित वर्गमे छी, अनारक्षित वर्गमे छी आदि। मुदा, व्यष्टि चेतनाक सोड़ समष्टि चेतनामे ततेक गहींर धरि छैक जे चाहिओ के ँ समष्टि चेतनासँ विलग नहि भए सकैत अछि आ’ अपन परिचितिक अभिव्यक्ति वा प्रदर्शन समष्टि चेतनामे एकाकार भए करैत अछि। विभिन्न सांस्कृतिक अनुष्ठान, विद्यापति स्मृतिपर्व अथवा मिथिला महोत्सव आदि आयोजित कएल जाएब व्यष्टि-चेतनाक समष्टि चेतनामे एकाकार होएबे थिक। एहिसँ स्पष्ट अछि जे विकासक उत्कर्षक परिचयक हेतु भूतमे जाएब आवश्यक भए जाइछ। बिना भूतके ँ देखने, बूझने आ’ गमने वर्तमानमे ने प्रासंगिक रहि सकैत छी आ’ ने नीक भविष्यक कल्पना कए सकैत छी। लोक गीतमे इएह समिष्ट चेतना, हमर राग-विराग, उल्लास, अवसाद पराजय आदि, गीतक माध्यमसँ अभिव्यंजित अछि। आ’ जखन वा जतए कतहु पारम्परिक भासक गीत, जाहिमे हमर अतीकक समस्त अनुभूति अपन सन्दर्भ आ’ परिवेशक संग साकार भेल रहैत अछि, कानमे पड़ैत अछि, हमर सुषुप्त आत्मीय रागात्मक तन्तु अकस्मात झनझना उठैत अछि। एही हेतु लोकगीतके ँ संस्कृतिक सर्वाधिक बलिष्ठ आ’ सुरक्षित तत्त्व मानल गेल अछि। संस्कृतिक उपयोगिताक प्रसंग एक अमेरिकन समाजशास्त्रीक मत4 सर्वथा समीचीन अछि जे द्रुत सामाजिक विकास एवं नवोन्मेष लेल सांस्कृतिक तत्त्वक वैविध्य महत्त्वपूर्ण अछि। अर्थात् जतेक सांस्कृतिक वैविध्य एवं चेतना प्रखर, ततेक विकासक गति द्रुततर होएत। मैथिल, सीमाक एहि पारक होथि वा ओहि पारक, अपेक्षित विकासक अवसर लेल अवश्य लालायित रहलाह छथि। एहना स्थितिमे द्रुत सामाजिक आ’ आर्थिक विकासक लेल एक मात्र समाधान सांस्कृतिक चेतनाक जागृति एवं सबलता थिक। एहि अभियानमे मैथिली लोकगीतक संरक्षण प्रयोजनीये नहि, अनिवार्य सेहो अछि। सन्दर्भ - 1. पराशर, कांचीनाथ ‘किरण’ 2. गीत दीनाभद्रीक ओ नेबारक,2010, सम्पादक डा.रमानन्द झा ‘रमण’, पृ.सं. 68
3."Convention for the safeguarding of the intangible cultural heritage" Article 2 : The 'intangible cultural heriage" means the practices, representation, expressions, knowledge, skill as well as the instruments, objects, artifacts and cultural space associated therewith - that communities, groups and in some cases, individual recognize as part of cultural heritage. At his intangible cultural heritage, transmitted from generation to generation, is constantly recreated by communities and groups in response to their environment, their interaction with nature and their history, and provides them with a sense of identity and continuity, thus promoting respect for cultural diversity and human creativity. For the purpose of this Convention, consideration will be given solely to such intangible cultural heritage as in compitible with existing international human rights instruments, as well as with the requirement of mutual respect among communities, groups and individuals and sustainable develpoment. The " intangible cultural heritage" as defined in paragraph 1 above, is manifested inter alia in the followed domains : a) Oral traditions and expressions, including language 13 14 as a vehicle of the intangible cultural heritage; b) Performing arts. 4-ओगबर्न & The large number of cultural elements, the greater number of inventions and faster the rate of social change. 1.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान 2.उमेश मंडल-कबिलपुरक कथा गाेष्ठी 3.रामप्रवेश मंडल- लघुकथा-झगड़ा खतम बेचन ठाकुर बेटीक अपमान दृश्य- तेसर- (स्थान- दीपक चौधरीक आवास। वार्ड सदस्य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीकेँ सान्त्वना दैत छथि।) प्रदीप- दीपक बावू, जूलूम भए गेल। घोर अनर्थ भेल। अहा बेचारी बड नीक जनानी छलीह। एहेन जनानी गाममे कियो नहि छलीह। एहेन परिश्रमी आ सहनशील जनानी कियो नहि छलीह। (दीपकक आखिमे नोर आबि जाइत अछि।) दीपक बावू, अहॉं कानि किएक रहल छी? जुनि कानू। आब कानला खिजलासँ कोन फेदा? होनी तँ हाथ धराए कऽ होइत अछि। जे हेबाक छल से भेल। जहन भगवानक यएह मर्जी छेलनि तहन कियो की कए सकैत अछि? दीपक- सर, हमरा किछु फुरए नहि रहल अछि। हम तँ किंकर्त्तव्य विमूढ़ छी। हरदम चिन्तित रहैत छी। प्रदीप- चिन्ता-तिन्ता छोड़ू। चिन्तासँ चतुराइ घटए, शोकसँ घटए शरीर। पापसँ लक्ष्मी घटए, कहलनि दास कबीर। आगू परबस्ती कोना चलत, ओकर जोगारमे लागू। दीपक- सर, हमरा तीनिटा बेटे अछि। एक्कोटा बेटी रहितए, तँ भनसो भात तँ करितए। घरमे कियो केनिहारि नहि अछि। घरमे एगो केनिहारिकेँ बड आवश्यकता महसूस होइत अछि। प्रदीप- मोन होय यऽ जे दाेसर बिआह करी? दीपक- सर, मोन तँ सोलहो आना होय यए मुदा करी की, से किछु नहि फुराइत अछि। प्रदीप- सुनू दीपक बावू, अहॉंकेँ तीनिटा लाल भगवान देने छथि। हुनके सभकेँ पढ़ाउ-लिखाउ आ मनुक्ख बनाउ। बड़का बेटाक िबआह कने जल्दीए कए लेब। घरमे केनिहारि आबि जेतीह। किछु त्याग करू। दू-चारि बरख कष्टे सही। मुदा दोसर बिआहक चक्करमे नहि पड़ू। दीपक- सर, हम अहॉंक बात सभ दिन मानैत रहलहुँ आओर मानैत रहब। प्रदीप- जदि हमर बात मानी तँ दोसर बिआह भूलोसँ नहि करी। दोसर बियाहसँ बाप पीितयो भऽ जाइत अछि। अऍं यौ, सतौत तँ भगवानोकेँ नहि भेलनि। तहन मनुक्ख कोन मालमे माल। जदि हमर बात नहि मानब तहन जीवन भरि पछताएब दीपक बावू। एक बेर की कुकर्म कएलहुँ से ई फल भेटल आओर छोसर कुकर्म फेर करब तहन की फल भेटत की नहि। दीपक- हँ सर, ई कोनो कुकर्महिक फल भोगे रहल छी। आब दोसर कुकर्म नहि करब दोसर बिआह नहि करब। प्रदीप- ई हम ओना नहि बुझब, दीपक बावू। सत्त करू आइ सरस्वती माताक समक्ष। दीपक- एक तत्त दू सत्त, ब्रह्मा बिष्णु सत्त। जे अहॉंक कहल नहि करए, से अस्सी कोस नरकमे खस।। हम दोसर बियाह नहि करब, नहि करब नहि करब। प्रदीप- जौं कएलहुँ तँ पछताएब, पछताएब, पछताएब। दीपक बावू, आब हम जए रहल छी। आइ ब्लौकमे आपातकालीन बैठक अछि। बेस तँ जय राम जी। दीपक- जय राम जी। (ठाढ़ भऽ कऽ) (प्रदीपक प्रस्थान) प्रदीप बावू हमरा समाजक बड अनुभवी लोक छथि। हुनक बातक खंडन नहि कए सकैत छी। तखन हुनक बेटाक बियाह जल्दीए कऽ लेब आ कमो पढ़ल-लिखलमे कऽ लेब। की करव किछु अपए तँ चाही। पटाक्षेप दृश्य- चारिम (स्थान- दीपक चौधरीक दलान। चारू बापुत आपसमे गप-सप्प कए रहल छथि।) दीपक- बौआ सभ, अपना सबहक दिन दुर्दिन अछि। बिना पढ़ने काज चलए बला नहि अछि। केहेन केहेन पढ़लाहा तँ बौआइत अछि। आ अहॉं सभ मुर्ख रहब तहन कुकुरो नहि पूछत। मोहन- बाबू जी, आइ काल्हि पढ़नाइ बड महग अछि। बिना टीशन वा कोचिंगकेँ पढ़नाइ असंभव अछि। दीपक- तैयो पढ़ए बला बिना टीश्न कोचिंगकेँ पढ़ि लैत अछि। मोहन- से एक सएमे एगो आधगो। दीपक- खाइर अहॉं सभ कहैत छी तँ कतहु नीक सर लग कोचिंग पकड़ि लिअ। मोहन- बाबू जी, सुनैत छी जे नीक कोचिंग जे.एम.एस. कोचिंग सेन्टर, चनौरागंज अछि जे श्री बेचन ठाकुर चलबैत छथि। हमरा सभकेँ ओहि कोचिंगमे धराए दिय। सोहन- मुदा ओहि कोचिंगमे सभ नहि पढ़ि सकैत अछि। दीपक- से किएक? सोहन- एकर कारण ई अछि जे ओहि कोचिंगक फीस बड करगर अछि आ सेहो अगुरबारे। जहियासँ पढ़ाइ शुरू करू तहिये फीस जमा कए दियौन। नहि तँ जय राम जी। दीपक- ई तँ हुनक कोनो नीक नियम नहि भेलनि। पढ़लक नहिए, महीना लागल नहिए, पहिने फीसे चाही। अच्छा, हम एहि संबंधमे सोचि रहल छी। गोपाल- बाबू यौ, एगो छौंरा हमरा कहलक की जे हम हुनका लग पढ़ि रहल छी। तोरा पढ़ल होएतौक की नहि। कारण, बेचन सर बड मारैत छथिन्ह आ बड बुरबक बनबैत छथिन्ह। छड़ी जे देखबिहीन तँ बाइ गुरूम भए जएतौक। बाप रओ बाप, यएह मोटके छड़ी। दीपक- आ पढ़ाइ केहेन होइत अछि? मोहन- पढ़ाइमे कोनो शिकाइत नहि। हुनक चेला सभ डाक्टर, इंजिनियर, मास्टर इत्यादि इत्यादि छन्हि। हमरा मोन होइत अछि बाबू जे हमरा सभकेँ श्री बेचन सर लग कोचिंग धराए दिअ। दीपक- बौआ, हम असगरे की करबौक। घर करबौक की बाहर करबौक? मए एहि दुनियॉंसँ चलि गेलथुन्ह। भनसा भातमे बड दिक्कत होइत अछि। एगो करू, अहॉं पढ़ाइ-लिखाइ छोड़ू अहॉं मोहन एहि चक्करमे नहि पड़ू। कारण एक दिनका वा एक महीना वा एक सालक बात तँ पढ़ाइ नहि छी। पढ़ाइमे सालक साल लगैत अछि आ तैयो नोकरीक कोनो गाइरेन्टी नहि। मोहन- बाबू, एक बेर अहॉं कहलहुँ जे बिन पढ़ने काज चलए बला नहि अछि। एक बेर कहैत छी जे पढ़ाइ छोड़ि दहिन। खाइर पढ़ाइ छोड़ि कऽ हम की करब? दीपक- की करब? गाममे रहलासँ पेट भरत मोहन बौआ। मोहन बौआ, अहॉं मामाक संग काल्हि दिल्ली चलि जाउ। एक सालक अन्दर अहॉंक बियाह सेहो केनाइ अछि। भनसा भातमे बड दिक्कत होइत अछि। मोहन- बाबू, हम एखन बियाह नहि करब। हमरा सबहक उमर एखन बियाह करए बला अछि? दीपक- अच्छा देखू, की होइत अछि? अहॉं काल्हि दिल्ली चलि जाउ। एम्हर सोहन आ गोपालकेँ पढ़ाइक कोनो व्यवस्था देखैत छी। पढ़ाइ तँ बड आवश्यक अछि। सोहन- बाबू, हम भरि दिन बकरीए चरबैत रहब की? कतहु हमर पढ़ाइक जोगार कए िदअ। गोपाल- बाबू, हमहुँ पढ़ब यौ, हमहुँ पढ़ब यौ। गोली गोली नहि खेलब यौ, गुल्ली डन्टा नहि खेलब यौ।। दीपक- अच्छा, काल्हि अहॉं दुनू भॉंइकेँ गंज मिडिल स्कूलमे नाओ लिखाए दैत छी। सुनैत छी जे गंज मिडिल स्कूलक पढ़ाइ बढ़ियॉं छैक। संग-संग खिचड़ी, किताब, पाइ, डरेस, टाइ बैच, बेल्ट इत्यादि सेहो भेटत। ओहि स्कूलमे पढ़लासँ बड नफ्फा? सबटा घट्टे-घट्टा बौआ सभ, हम पढ़ल छी कम्मे। मुदा बुझैत बड छी। केहेन-केहेन पढ़ुआकेँ कान काटि लैत छी। गोपाल- बाबू तहन काल्हि हमरा सभकेँ गंज स्कूलमे नाओ लिखाए दिब ने? दीपक- आब काल्हि होएत तहन ने। *पटाक्षेप* दृश्य पाचिम- क्रमश: 2 उमेश मंडल कबिलपुरक कथा गाेष्ठी मैथिली भाषा विकासक एक सशक्त माध्यम्- “सगर राति दीप जरय”क ७०म कथा गोष्ठि गत १२जून २०१०केँ डॉं योगा नन्द झाक संयोजकत्वमे रमा िनवास -कबिलपुर- मे सम्पन्न भेल। पं चन्दकान्त मिश्र “अमर” दीप प्रज्वलित कए संघ्या ७ बजे सुभारम्भ केलनि। कार्यक्रम आगॉं बढ़ौल गेल उद्घाटन सत्रसँ जेकर अध्यक्षता डॉं रामदेव झा आ मंच संचालन डाॅ मुरलीधर झा केलनि। मुख्य अतिथि डॉ सुरेश्वर झा मैथिली भाषाक भविष्य आ आवश्यकतापर प्रकाश देलनि। लोकार्पण सत्रक संचालन डॉ विभूति आनन्द केलनि। डेढ़ दर्जन पोथीक लोकार्पण क्रमश: भारती (उपन्यास), विधकरी (उपन्यास), उचाट (बाल उपन्यास), उत्थान-पतन (उपन्यास), जिनगीक जीत (उपन्यास), गामक जिनगी (कथा संग्रह), मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा (चित्रकथा संग्रह), पक्षधर (पत्रिका), हमरो लेने चलू- (कथा संग्रह), पिलपिलहा गाछ- (बाल कथा), अमर जीक साहित्यमे हास्य-व्यंग (समालोचना), समाचार कथा (कथा संग्रह), कथा-लोककथा (कथा संग्रह), खिस्सा (कथा संग्रह), मिथिलाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदिक डिजिटल इमेजिंग, डी.भी.डी), मैथिली भाषा साहित्य: बीसम शताब्दी (अलोचनात्मक निबंध संग्रह) आ जमीनेमे फुटे छै अंकुर (कविता संग्रह), भेल। डॉ रामदेव झा, डॉ सुरेश्वर झा, पं. चन्द्रनाथ िमश्र “अमर”, डॉ भीमनाथ झा, डॉ रामानन्द झा “रमण”, मैथिली पुत्र प्रदीप, डॉ. मोहन मिश्र, डॉ वीणा ठाकुर, डॉ कमला चौधरी, डॉ आशा मिश्र आ ज्योत्स्ना चंद्रम द्वारा लोकार्पण कराओल गेल। सभ रचनाकार/लेखक/लेखिका स्वयं सेहो उपस्थित रहथि। कथा सत्रक अध्यक्षता डॉ श्रीशंकर झा आ संचालन अजीत आजाद जी केलनि। कथाकार- चण्डेश्वर खॉं, मुन्ना जी, उमेश नारायण कर्ण, रमाकान्त राय “रमा”, ऋृषि बशिष्ठ, राजाराम सिंह “राठौड़”, ज्योत्स्ना चन्द्रम, कमला चौधरी, विनय विश्व बंधु, चन्द्र मोहन झा “पड़वा”, नन्द विलास राय, बिरेन्द्र कुमार मिश्र, जगदीश प्रसाद मंडल, कपिलेश्वर राउत, उमेश मंडल, दुर्गा नन्द मंडल, संजय कुमार मंडल, मनोज कुमार मंडल, निखिल कुमार झा, बेचन ठाकुर, देवकान्त मिश्र, महेन्द्र नारायण राम, मैथिली पुत्र प्रदीप, गजेन्द्र ठाकुर, लालपरी देवी, राजाराम प्रसाद, आनन्द कुमार झा, सतेन्द्र कुमार झा, उषा चौधरी आ नीता झा अपन-अपन नूतन कथा पाठ कए गोष्ठिक गरिमाकेँ बढ़ौलनि। संगहि अनेको साहित्य प्रेमी सबहक उपस्थिति सेहो गोष्ठिक महत्व बनल रहलाह। पठित एहि कथा सभपर समिक्षा केलनि- हिरेन्द्र कुमार झा, कमल मोहन चुन्नू, रमानन्द झा रमण, गजेन्द्र ठाकुर, कमलेश झा, जगदीश प्रसाद मंडल, अमलेन्दु शेखर पाठक, देवकान्त मिश्र, फूलचन्द्र मिझ आ नीता झा। भरि राति कथापर कथा, चारि कथाक एक पाली तेकर समिक्षा होइत रहल। ई सिलसिला कोनो एक-आध-दू घंटाक मात्र नहि रहल वरण् भिनसर छह बजे धरिक। बारह घंटाक एहि अल्प समएमे उपस्थित ४५सो कथाकारक कथापाठ नहि भऽ सकलनि। ३० गोट कथाक पाठ भेल। बॉचल १५ गोट कथाकारकेँ (जिनकर कथा पाठ नहि भऽ सकलनि) अगिला गोष्ठीमे शुरूहेमे अवसर देल जेतनि से निर्णए भेल। अग्रिम ७१म आयोजन २ अक्टूवर २०१०केँ संध्या ६:३० बजेसँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल, बेरमा, मधुबनी (बिहार)क आयोजकत्वमे बुढ़िया गाछी दुर्गा स्थान स्थित मध्य विद्यालय परिसारमे सम्पन्न होएवाक संकल्प लेल गेल अछि जाहिमे समस्त “सगर राति दीप जरय”क प्रेमी आ कथाकार लोकनि आमंत्रित छथि। स्थानपर पहुँचवाक लेल ट्रेनसँ तमुरिया आ बससँ चनौरागंज आबि बेरमाक लेल मात्र तीन किलोमीटर दूरी तँइ कएल जाए। टेम्पू,रिक्सा,टमटम इत्यादिक सुविधा दुनूठाम (तमुरिया आ चनौरागंज) प्राय: उपलब्ध रहैत अछि। 3. रामप्रवेश मंडल लघुकथा- झगड़ा खतम भूखसँ बच्चा किनैर मारैत अछि। पगली प्रसव पीड़ाक वाद अद्धचेतन अवस्थामे पड़ल अछि। भाग दौड़क जीनगीमे ककरो केयो देखनिहार सुननिहार नहि। दूटा शरावी लड़खराइत आवि रहल अछि। बच्चाक कननाइ सुनि पहील पूछलक- “मीता, एतेक अन्हार आ सुनमसानमे बच्चा कतए कनैत अछि?” दोसर बाजल- “चलू, चलि कए देखैत छी।” दुनू मीता पहुँचल। पहुॅंचतहि बच्चा चुप भऽ गेल। दुनू मिता विचार कएलक- बच्चा उठा कए अपना घर लए चलू भनए बच्चाक माए सुतल अछि। बच्चाकेँ लैत दुनू गोटेमे झगड़ा उठल। फेर समझौता भेल- पहिने एकर नाम राखल जाए। पहील मीता बाजल- “राम।” दोसर बाजल- “रहीम।” दुनू गोटेक आवाजमे ताइस रहए। मारि पीटक स्थिति भऽ गेल। तावत् रतुका गस्ती पुलिस पहुँचल। दुनू गोटेक बात बुझैत आओर झगड़ा देखैत पुलिस बाजल- “एकर नाम न राम, आ न रहीम, एकर नाम मनुक्ख।” हँ रौ मीता बढ़िया बात ई तँ सोचनहि नहि छलहुँ। ले झगड़ा खतम। १. मैथिली कथा-गोलबा- बृषेश चन्द्र लाल २.निबन्ध-बिपिन झा-गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता १ — बृषेश चन्द्र लाल मैथिली कथा-गोलबा
जहिया ओ जनमल, बड़कीमाइ धरतीपर खसहु नहि देलकैकि π कहा“दोन माटि लागि जइतैक ππ कहैत छैक जे पशु जाति गन्धेस“ चिन्हऐत छैक आ प्रायः तैं गोलबा सभस“ पहिने बड़कीमाइक गन्ध थाह पओलकैक आ लगले तखनहिं सोनी, मोनी आ बब्बूक । अपन माइ चितकबरीक गन्ध त“ ओ पेटहिंस“ पओने रहए । ओकरा कहियो नहि बुझएलैक जे ओ पशु अछि । ओ अपनाके“ सोनी, मोनी आ बब्बूये जका“ बड़कीमाइक सन्तान बुझैत रहल । बड़कीमाइ कहैतिरहैति छलैकि जे गोलबा जनमल त“ ओकरा जखने पोछिपाछि कए ठाढ कएल गेलैक, चभकि–चभकि कए चितकबरीक थनस“ दूध पिबए लगलैक आ जखने पेट भरि गेलैक त“ दौडि कए ओकरि दुनू पएरक बीचमे साड़ीक कोंचामे गरदनि नुका लेलकैक । आ तहियास“ ई क्रम चलिते रहलैक । कुदि–फानि क’ आएल आ बड़कीमाइक साड़ीक कोंचामे गरदनि पैसाकए उपर–नीचा करए लागल । बड़कीमाइ ओकरा कोरामे उठाकए ताबरतोड चुम्मा लेबए लगैकि आ गोलबा बड़कीमाइक स्नेहस“ मुग्ध भ’ जाइक । संसारमे एहिस“ बेशी सुख ओकरा आओर कतहु कखनो नहि बुझएलैक । ओकरा बड़कीमाइ सभ दिन ममताक समुद्र लगैत रहलैक । कहा“दोन, सन्तानस“ प्रेम करएबलाकप्रति सन्तानक माय मुग्ध भ’ जाइत छैक । ओकर माइ चितकबरी बड़कीमाइक सभ दिन आदर करैति रहलैकि । जखने बड़कीमाइ कहैकि — “चितकबरी आह ..आह ।” कि ओकर माइ चितकबरी चाहे कतबो दूर किएक ने रहौक, कानमे आवाज झरिते“ चट बड़कीमाइ लग दौड़ि जाइक । आ बड़कीमाइ जेना–जेना इशारा करैकि चितकबरी चुप्पे मुड़ी गोंतने आदेशक पालन करैति जाइक । करौक कोना नहि ?† भोरे–भोरे चितकबरीलेल घास, कोराइ आ कहियो काल दालिक कुन्नीक ओरिआओन त“ वएह करैकि ने । रौद उगैक त“ बड़का रस्सीमे खुट्टीमे बान्हि ओकरा चरएलेल छोडि दैकि आ फेर दुपहरियामे चौरीमे ल’ जाइकि । आरिक दुबि खाएमे कतेक आनन्द अबैत छैक से जे खाए सएह ने जानए † तहिना करैक गोलबा । ओहो कहियो बड़कीमाइक आदेशक अवज्ञा नहि कएलक । ह“, चितकबरी स्थिरस“ अबैकि त“ ओ दौडैत–कुदैत–फानैत π कहियो काल जखन बड़कीमाइ कोनो काज –धन्धामे लागलि रहैति छलि अथवा ककरोस“ बतिआइतिरहैति छलि त“ गोलबाके“ दुलारस“ धकेलि दैति छलैकि । मुदा, गोलबा ताधरि जान नहि छोड़ैत छलैक जाधरि बड़कीमाइ ओकरा उठाकए चुमि नहि लैति छलैकि । ... चितकबरी बड़कीमाइ आ गोलबाक सिनेह देखि मुग्ध रहैति छलि । ओ सभ दिन गोलबाके“ सिखबैतिरहलि जे जननाहरिस“ पोसनाहरि बड़की होइत छैक । आ ओ तै“ सभ दिन बड़कीमाइके“ अपन माइ चितकबरीस“ उपरे देखलकैक । सोनी आ मोनी त“ गोलबालेल अपन जाने न्योछारि देने छलि । नामो त“ ओकरेसभक देल रहैक ने । गोलबा जनमलैक त“ गोल, गुटमुटाएल आ लेपटाएल रहैक कहा“दोन † आ तै“ ओकरा सोनी–मोनी ‘गोलबा’ कहि देलकैकि । ओकर नामाकरण अहिना भेल रहैक । पहिल बेरस“ ल’ क’ बहुत दिनधरि सा“झु पहर, रातिमे आ सुति–उठिकए ओसभ ओकरा ओकर माइ चितकबरी लग ल’ जाइक आ मुह“ पकड़िकए थन छुअबैकि । गोलबा मस्त“ दूध पिबए लागए । दिनोमे ओकरा मोनस“ कुद–फान कहा“ करए दैकि ओसभ । भरि दिन कोरामे लदने छी, लदने छी † तहिया गोलबाके“ नीक नहि लगैक । मोन होइक जे छोड़ितए त“ कुद–फान करितए । मुदा, बादमे जखन ओ नम्हर भ’ गेल त“ रहि–रहि कए मोन होइक जे कने सोनी–मोनी ओकरा कोरमे उठैबितैकि । सोनी–मोनी ओकरालेल सुतएलेल ओछाओन आ पहिरएलेल मिरजइक व्यवस्था कएने रहैक । ओ मुति दैक त“ ओसभ बड्ड पिताइक । रातिमे उठा–उठा कए पेसाप कराबए ल’ जाइक । गोलबाके“ तामस होइक । ओ की जानए गेलैक जे ओकरा मुतक छैक । पेसाप लागल रहैक त“ ने † जखन पेसाप लगैक ओ उठिकए गड़गड़ा दैक । ... सोनी–मोनी ओकरा अपने कोठरीमे सुतबैकि । बड़कीमाइ कए दिन कहलकैकि जे ओकरा चितकबरी लग पथियास“ झ“ापि दौक । मुदा सोनी कहैकि जे कहु“ हुराड ल’ जएतैक तखन † आ ओसभ एक बरखधरि गोलबाके“ अपने कोठरीमे सुतबिते रहि गेलैकि । ओ नम्हर भेलैक त“ चट्टीमे गहु“मक भूस्सा भरि कए ओसभ ओछाओन बना देने रहैकि । आमक पात, दुबि, रामझिमनी आदि गोलबाक प्रिय भोजन रहैक । सोनी–मोनी चाऊर भुजि ओहिमे करुतेल सानि क’ खुअबैति छलैकि । गोलबा मस्तस“ खाए । कहैकि जे एहिस“ देह मोटाइत छैक । गोलबाके“ लोक मोट आ कसगर कहकि त“ बड्ड आनन्द अबैक । आ तैँ ओ चपर–चपर क’ खाइक । गेरुका मेला लगलैक त“ सोनी–मोनी मेलास“ फुदना अनने रहैकि आ लाल, हरियर, कारी फुदना ओकरा गरमे बान्हि देने रहैकि । कहैकि जे लालस“ शक्ति बढतैक, हरियरस“ तन्दुरुस्ती आ कारी रहलापर ककरो नजरि नहि लगतैक । जेना–जेना ओ बढ़ैत गेल बब्बू ओकर दोस बनैत गेलैक । शुरु–शुरुमे ओ अपन दीदीसभक संगे“ आगा“–पाछा“ करैक । मुदा बादमे बब्बू ओकरापर बेशी ध्यान देबए लगलैक । जखन–तखन ओकर देह सेहारैक । कतहु, कनेको, कोनो दाग नहि लगबाक चाही । कनेको किछु लागि जाइक त“ ओ तुरत साफ करैक, देह मलैक आ पोछ–पाछ करैक । .... एकदिन पेठियास“ चारिगोट घुंघरुबला पट्टा किनि बब्बू ओकर गरमे सोनी–मोनीक फुदना संगहिं बान्हि देने रहैक । गोलबाकेँ अपन गर कनेक भारी जका“ लगलैक आ कुद–फानमे सेहो असहज भ’ गेलैक । घुंघरुक आवाज कानमे झर दैक । कर्कश लगैक । गोलबा मुड़ी हिलाकए पट्टा निकालक प्रयत्न कएलक मुदा ओ निकलएबला थोडेÞ रहैक † उन्टे कान फाड़ए लगलैक । आब त“ दौड़एमे, पछिलका पएरपर ठाढ़ भ’ क’ गरदनि आ आ“खि टेढ़ कए धाही मारएमे सेहो असोकर्य होमए लगलैक । मुदा करो की ? अपने निकालि सकैत नहि अछि † भगवान बोली त“ देने छथिन्ह मुदा सहज भाषा नहि जे ओ बब्बूके“ सम्झाबए सकओ । अन्ततः मन मसोसही पड़लैक । गोलबाक सिंघ जनमए लगलैक त“ माथपर कुरिऐनी ध’ लेलकैक । ओ दाबा, खम्हा, आड़ि जहा“ पाबए माथ रगड़ए आ धाही मारए । । बब्बू आब ओकर माथके“ पकड़िकए ठेलए लगलैक । ओकरा नीक लगैक । ओ छड़पिकए पछिला टांगपर ठाढ भ’ बब्बूक हाथपर धाही मारए लागल । बब्बू आ गोलबाक नित्य कर्ममे इहो एकगोट अभ्यास जुड़ि गेलैक आ तकर बाद त“ ओ लड़ाका बनि गेल । दुपहरियामे बब्बू ओकरा गाछीमे टहलाबए ल’ जाइक आ ओतए ओकरा कएटास“ भिड़ए पड़ैक । बेशीके“ ओ लगले भगा दैक मुदा एक दिन ओ हारही लागल छल । ओ त“ बब्बू जे चलाकीस“ ओकरा जीता देलकैक । ततेक जोड़स“ ने जोश बढ़ओलकैक जे विपक्षी डरे भागि पड़ा गेलैक । मुदा, तीन दिनधरि ओकर सिंघलग माथ दुखाइते रहलैक ।
नहि जानि किएक एकाएक घरमे भीड़–भाड़ बढ़ि गेल रहैक । बड़कीमाइ एकदिन बुढ़िया दाईक“े बजओने रहैकि आ तकर लगले दोसर दिन सभ दर–देआदसभक जमघट भेल रहैक । गोलबाके“ घरक गतिविधि किछु विशेष त“ बुझएलैक मुदा ओ किछु बुझि नहि सकल । ओ देखि सकैत अछि । प्राकृतिक रुपस“ ओकरा अपनालेल आवश्यक विषयमे भगवान बुझक जतबे सामथ्र्य देने छथिन्ह ओ ततबे ने बुझत π ओ अपन दिनचर्या क’ सकैत अछि, अपनप्रतिक स्नेह आ बजारल चोटके“ छू सकैत अछि, मुदा दोसरक छुपल भाव वा मनुखक भाषायी अभिव्यक्ति ओकर प्रकृति प्रदत्त सामथ्र्यस“ फाजिलक विषय छैक । तै“ घरमे की चलिरहल रहैक ओ बुझि नहि सकल । ह“, गोलबाप्रति स्नेह किछु बेशीये बढ़ि गेल रहैक । ओना गोलबाके“ केओ ऐंठ–का“ठ खाए नहि देलकैक । शुरुअेस“ कोनो घाओ–घौस नहि होउक, कतहु कटाउक नहि तकर ख्याल सभ केओ रखैत अएलैक अछि । मुदा, एखन ओकर खान–पानपर पहिनेस“ किछु आओर विशेष ध्यान राखल जारहल छलैक । ... एक दिन पुरहित अएलखिन्ह । बड़ीकालधरि पतरा उनटअबैत रहलखिन्ह । जाएकाल बड़Þकीमाइ बहुते रास चाउर दालि , अल्लू आ नूनक संगहिं किछु टका सेहो देने रहैकि । आ तकरबाद घरक नीप–पोत, हाट–बजारक गतिविधि बढ़ि गेल रहैक । दसे दिनक बाद घरमे ढ़ोल–पिपही बाजए लगलैक । सा“झखन क’ गोसांउनि–घरमे कनिया“–मनिया“ आ बुढ़ियादाइ सभक जमघट तथा गीतनाद होमए लगलैक । बब्बूक“े आगा“ राखि नहि जानि कतेक विधवाध कएल गेलैक । ढ़ोल–पिपही आ गीतनादस“ ओकर कान भारी भ’ गेल छलैक । मुदा तैयो सभ किछु रमनगर लगैक । बब्बू हर्षित रहैक तै“ । ओहि दिन भोरेस“ भीड़–भाड़ रहैक । गोसाउनि–घरमे पूजा–पाठ भेलैक । ओही क्रममे गोलबाके“ दू गोट छौंड़ा पकड़िकए पोखरि ल’ गेलैक आ नहा देललैक । बड्ड जाढ़ भेलैक गोलबाके“ । माघ महीनाक जाढ़ आ ठढ़ल पोखरिक पानि † छौंडासभ सोझे पोखरिमे बुड़का देने रहैक । बेचारा गोलबा मेमिआए लागल, पैखाना–पेसाप सभ भ’ गेलैक । डरे परान निकलए लगलैक । विवश गोलबाक गर लागि गेलैक । ओ बब्बूक स्मरण कएलक । एखन बब्बू रहितैक त“ एना होइतैक ? .... छौंड़ासभ ओकरा कोरमे उठओने गोसाउनि–घरमे ल’ गेलैक आ बब्बू लग ठाढ़ क’ देलकैक । तखन जा क’ ओकर परान पलटलैक । बुझएलैक, ओकरो एहि समारोहमे सहभागी बनाओल जारहल छैक । ओ चारु भर देखए लागल । जाढ़े देह थरथराइक मुदा तैयो ओ अपनाके“ स्थिर करक पूरा प्रयत्नमे लागि गेल । ओ अपनाके“ स्थिर करएमे लागले रहए कि पण्डितजी जोड़–जोड़स“ मन्त्र पढलखिन्ह आ बब्बू ओकर माथपर अक्षत, फूल आ पानि ढ़ाड़ि देलकैक । माथ सर्द भ’ गेलैक आ केशमे अक्षत फूल घुसिआ गेलाक कारणे“ ओकरा कुरिअइनी लागि गेलैक । ओ जोड़स“ अपन माथ झटकए लागल । पण्डितजी ‘ जय भगवती † जय माते †† ’ चिचिआए लगलखिन्ह । बब्बू पाछाँ हटि गेलैक । एक गोटे पाछा“स“ ओकर दुनू पएर पकड़ि लेलकैक । दोसर ओकर गर्दनपर हाथ फेरए लगलैक । .... आ .... छपाक †
आहिरो † ई की भेलैक ?† ओ त“ अपन धरस“ अलग भ’ गेल अछि ††† आब ने ओ धरस“ अलगे फेकाएल माथमे अछि ने धरेमे । ओ अपन अलग भेल मुड़ीक मुआयना करैत अछि । असह्य पीड़ाक प्रतिविम्व छैक – उनटल आ“खि आ दा“त तर दने निकलक जीभ । दा“तक दबाब एतेक जे आधा जीभ कटाइये गेल छैक । धरोक हालत ठीक नहि छैक । छिड़िआएल चारु टांग आ तानल धर एकदम कड़ा भ’ गेल छैक । ओ अपनाके“ एकदम हल्लुक पाबिरहल अछि । अनन्त अन्तरिक्षक यात्राक हड़बड़ी भ’ गेल छैक एहि अनन्त यात्राक कतहु कोनो पड़ावपर ओकरा दोसर शरीर धारण करक छैक । नहि जानि ओ पड़ाव कतए हएतैक ? तखने ओ पुनः दुःःख–सुख आ भावनाक संवेगके“ भोगि सकत । स्वाद आ श्रंगारक रस पिबि सकत । अथवा अन्य कोनो अनुभूति ल’ सकत । .... गोलबा पुनः एकबेर स्थितिक जायजा लैत अछि । सोनी–मोनी पानि गरमारहलि छैकि । छौंड़ासभ ओकर धर छोलएलेल केराक पात आ औजारसभ ठीक क’ रहल अछि । भन्सीआसभ बडका कराह आ भट्ठीक प्रबन्ध मिलारहल अछि । बड़कीमाइ कनिया“–मनिया“सभके“ मर–मसल्ला, तेल, पिआउज आदिक वन्दोवस्तमे लगओने छैकि । पिअर, धोती, कुत्र्ता आ गमछामे मुण्डित माथ नेने बब्बू अपन दोससभक संग ह“सि–ह“सि क’ बतिआरहल अछि । दरबज्जापर दरदेआदसभ मस्त खैनी चुनबैत गप्प–सप्पमे लागल छैक । चितकबरी नोराएल आ“खिस“ अपन पहिल बेटाक धरदिसि टुकुर–टुकुर ताकिरहलि अछि । .... ओ कोनो झोंका जका“ अन्तरिक्षदिसि उधिया जाइत अछि । एकदम निस्पृह भावे“ † ई सभ स्वाभाविक छैक । ओहो स्वाभाविक रुपे“ प्रकृतिक स्वाभाविक प्रक्रियामे आगा“ बढि जाइत अछि । आब ओ गोलबा कहा“ अछि † २.
बिपिन झा गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता भारतीय संस्कृतिक आधारभूत तत्त्व मे सँ एकटा अनन्यतम तत्त्व रहल गुरुशिष्य परम्परा प्राचीन काल सँ आधुनिक काल तक परिवर्तनशील विशिष्टताक संग विद्यमान रहल अछि। गुरुशिष्यपरम्परा सँ तात्पर्य ओहि व्यवस्था सँ अछि जेकर अन्तर्गत शिष्य बाल्यकाल सँ ब्रह्मचर्यजीवन केर समाप्ति तक गुरुक सान्निध्य मे रहि विद्यार्जन कयल करैत छल। एहि परंपरा के अन्तर्गत ओ अपन परिवार सँ दीर्घावधि तक अलग रहि कें गुरुकुल मे निःशुल्क रहि भिक्षाटनक द्वारा अपना संग संग गुरुक भोजन क प्रबन्ध करैत छल। ई परंपरा जीवनक आधार के निर्मित करवा मे, आ विद्यार्जन एवं चरित्र निर्माण मे सहायक होइत मानल गेल प्राचीन काल सँ क्रमशः मध्यकाल एवं आधुनिक काल अबैत अबैत गुरुशिष्यपरम्परा जीवित रहितो ह्रासमती प्रवृत्ति सँ युक्त रहल। जतय प्राचीन काल मे ई परम्परा विद्यार्जन आ चरित्रनिर्माण केर एकमात्र निर्माणशाला छल ओतय वर्तमान काल मे कालेजकल्चर एवं कोचिंगकल्चर एकरा औपचारिकता मात्र बना देलक। ई एकर असफलता नहिं अपितु समय केर संग होयबला बदलाव अछि। निष्कर्षतः ई कहब समीचीन होयत जे अन्ध आधुनिकता क भागदौडो मे गुरु शिष्यपरम्परा केर गौरवमयी तत्त्वक समावेश आधुनिक शैक्षणिक संस्थान मेम कयल जाय ताकि त्याग, तपस्या व निःस्वार्थ केर प्रतीक गुरुपदक गरिमा अक्षुण्ण रहय। बिपिन झा CISTS, IIT, Bombay डा. शंकरदेवझा मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली मध्यकालमे मिथिलामे बहुतो नगरक स्थापना भेल तँ बहुतो नगर विभिन्न कारणसँ उजड़ैत चल गेल । तथापि एहि नगर सभक ध्वंशावशेष आइयो मिथिलाक ताहि दिनुक समृ(कि गौरव-गाथाक गान क रहल अछि । ओइनिवार राजवंशक शासन कालमे एहि वंशक राजा लोकनि अपन अन्य कतोक महत्त्वपूर्ण कार्य ओ उपलब्ध्कि संग-संग कतेको नगरहुक स्थापना कयलनि । प्रशासनिक दृष्टिकोण ओ सुरक्षाके ँ ध्यानमे राखि क एहि वंशक राजा लोकनिक बसाओल अनेकशः नगर आइयो अवशिष्ट रूपमे वर्त्तमान अछि । एही कोटिक एकटा प्राचीन नगर अछिµ देकुली । ई देकुली दरभंगा जिला मुखयालय लहेरियासरायसँ मुश्किलसँ तीन-चारि किलोमीटर दच्छिन-पूब दिसामे लहेरियासराय-हथौड़ी सड़कक पूबमे स्थित अछि । ¯कवदन्ती ओ पुरातात्त्विक महत्त्वक वस्तुसँ युक्त ई गाम कहियो मिथिलाक राजधनी छल जकर स्थापना ओइनिवार वंशीय नरेश देवसिंह तेरहम-चौदहम शताब्दीक संगम कालमे कयने छलाह । ओइनिवार राजवंशक पूर्व राजधनी ओइनीमे छल । मुदा ओइनिवार वंशमे अपनामे मिथिला राज्यक बँटवारा दू भागमे भेलाक कारणे राजधनी ओइनीमे दूनू शाखाक एके संगे रहब सम्भव नहि रहि गेल ते ँ ओइनिवार वंशक संस्थापक कामेश्वरठाकुरक जेठ पुत्रा भोगीश्वरक राजधनी ओइनियेमे रहलनि । मुदा दोसर पुत्रा भवेश्वर प्रसि( भवसिंह अपन राजधानी दरभंगासँ दच्छिन बागमती नदीक तटपर स्थिर कयलनि ।१ भवसिंहक पुत्रा ओ हुनक उत्तराधिकारी देवसिंह जखन राजा भेलाह तखन ओ अपन राजधानी एहि ठामसँ किछु पूब हटि क बसौलनि जकर नामकरण ओ देवकुली कयलनि ।२ देवसिंहके ँ अपन पितासँ उत्तराध्किारमे समस्त मिथिला राज्य प्राप्त भेलनि । किएक तँ ओइनी स्थित भोगीश्वरक पौत्रा राजा कीर्त्तिसिंह निःसन्तान भेलथिन । अतः हुनको हिंस्साक राज्य भवसिंहके ँ भेटलनि । अतएव देवसिंहके ँ समग्र मिथिलाक शासनसूत्रा सम्हारबाक सौभाग्य प्राप्त भेलनि । देवसिंहक विरुद 'गरुड़नारायण' छलनि ।३ देवसिंह सम्भवतः देवकुली राजधनीक अतिरिक्तो अपना नामपर तीन गोट औरो देवकुली नामसँ उपनगरी बसौलनि । बिरौल प्रखंड अन्तर्गत बहेड़ी-सिंघिया मुखयपथपर एकटा हाँसी देकुली अछि जे 'धम' नामसँ प्रसि( अछि ।४ ध्यातव्य अछि जे देवसिंहक पत्नीक नाम हाँसिनी वा हंसिनी छलनि । हाँसी विशेषण वस्तुतः हुनके नामक कारणे अछि । दोसर, दरभंगा-बहेड़ा मुखयपथमे दच्छिन दिस कमला नदीक पश्चिमी तटपर अवस्थित अछि से सम्प्रति देकुली चट्टी नामसँ खयात अछि ।५ तेसर देकुली सीतामढ़ी जिलामे अवस्थित अछि जत भुवनेश्वरनाथ महादेवक प्राचीन मन्दिर छनि । एकर अतिरिक्त एत एकटा प्राचीन गढ़ीक अवशेष अछि जकरा सम्बन्ध्मे किंवदन्ती छैक जे ई महाभारतकालीन राजा द्रुपदक गढ़ थिकनि ।६ अस्तु मिथिलामे देकुली नामक एखन ध्रि जे कोनो स्थान दृष्टिपथपर आयल अछि ताहिठाम प्राचीन नगर, भवन, मन्दिर आदिक प्रचुर अवशेष विद्यमान अछि । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्(मे लिखित आइना-ए-तिरहुतमे सेहो तीन गोट देकुलीक उल्लेख भेल अछि जकर प्रसि(ि शिवतीर्थस्थानक रूपमे कहल गेलैक अछि । एहि पोथीक अनुसार एकटा देकुली, विवरा परगनामे अछि जाहिठाम एकटा महादेवक मन्दिर अछि । दोसर देकुली, परगना जखलपुरक अन्तर्गत अछि जाहिठाम द्रव्येश्वरनाथ महादेवक मन्दिर छलनि जे ध्वस्त भ गेल छल । तथापि मन्दिरक खंडहर विद्यमाने छलैक । लेखकक अनुसारे ँ एहि मन्दिरक चौखटिमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण छल जाहिमे एकर निर्माताक नाम सुखदेव साहु अंकित छल संगहि एकर निर्माता द्वारा तेरह बीघा जमीन शिवोत्तरक रूपमे मौजा पिपरामे देल जयबाक सूचना सेहो अंकित छल । आइना-ए-तिरहुतक अनुसार तेसर देकुलीक अवस्थिति परगना-बसारामे छैक जाहि ठाम वृ( वाणेश्वर महादेवक मन्दिर छनि । लेखकक अनुसार वाचस्पतिमिश्र नामक एकटा मैथिल ब्राह्मणक भाय भालिवाणमिश्र एहि महादेवक स्थापना कयने रहथि । हुनका अनुसारे ँ मन्दिर चारि सय वर्ष पुरान अछि । संक्रान्तिक अवसरपर एत बड़ पैघ मेला लगैत छैक ।७ आइना-ए-तिरहुतमे देल गेल उपर्युक्त तीनू देकुलीमे दूटा देकुली कोन अछि से अनुसन्धनक विषय थिक, मुदा तेसर देकुली जाहिठाम वृ( वाणेश्वर महादेव स्थान होयबाक उल्लेख भेल अछि से सम्भवतः आलोच्य देकुलीसँ सन्दर्भित लगैत अछि । यद्यपि एकर लेखकके ँ महादेवक नाम ओ परगना आदिक सम्बन्ध्मे पूर्ण सूचना नहि भेटि सकलनि ते ँ भ्रमवश एकर परिचय देबामे गलती भेलनि । किएक तँ एहू देकुलीक प्रसि(ि एकटा शिवतीर्थक रूपमे अछि । एहि ठाम अभिनव वर्(मान उपाध्याय द्वारा स्थापित एकटा शिवलिंग अछि जे हुनकहि नामपर वर्(मानेश्वर स्थानक नामसँ खयात अछि । सम्भवतः एकरे आइना-ए-तिरहुतमे वृ( वाणेश्वर कहि देल गेल अछि । दरभंगा जिलामे परगना पूरब भीगोक अन्तर्गत मौजा ओ गाम दुहू नामसँ देकुली अछि जकर रकबा ५२५ बीघाक कहल जाइत छैक । ब्राह्मण सहित विभिन्न जातिक लगभग छओ हजार आबादीवला ई गाम कतेक प्राचीन अछि से देखलहिसँ ज्ञात होइत अछि । लहेरियासराय-बहेड़ी सड़कक पूब दिस अवस्थित एहि गाममे प्रवेश करितहिँ प्रतीत होअ लगैत अछि जे कोनो प्राचीन नगरमे प्रवेश क रहल होइ । सम्पूर्ण गाम कोनो पुरान डीहपर अवस्थित बुझाइत अछि । गाममे देकुलीक प्राचीनता ओ ओइनिवार राजवंशकालीन घटनासँ सम्ब( कतोक ¯कवदन्ती सब प्रचलित अछि जकर सम्पुष्टि गाममे यत्रा-तत्रा छिड़िआयल प्राचीन राजचिर् ओ पुरावशेष सबसँ होइत अछि । देकुली ओइनिवार वंशक राजधनी छल जकरा देवसिंह बसौने रहथि एहि बातक समर्थन मिथिला इतिहासक आद्य संग्राहक चन्दाझा ;१८३१-१९०७द्ध८, म.म. परमेश्वरझा ;१८५६-१९२४द्ध९, म.म. मुकुन्दझा बखशी ;१८६९-१९०७द्ध१०, रायबहादुर श्यामनारायणसिंह११, पी.सी. रायचौध्ुरी१२, डा. उपेन्द्रठाकुर१३ प्रभृति इतिहासकारलोकनि कयलनि अछि । स्वभावतः ई जिज्ञासा भ सकैत अछि जे राजधनीक हेतु देवसिंह एहि परिसरक चुनाव किएक कयलनि । एहि जिज्ञासाक उत्तर एहि परिसरक भौगोलिक बनाबट दैत अछि । पूर्वमे एहि गामक उत्तर, पच्छिम ओ दच्छिन होइत एकटा नदी बहैत छल जकरा सम्प्रतिमे कृष्णमंगला कहल जाइत छैक । एहि नामक नदीक सम्भवतः एखन ध्रि कतहु उल्लेख नहि भेटैत अछि । नदी आब मृत भ चुकल अछि, मुदा एकर सिरखार एखनहुँ विद्यमाने छैक । ई नदी एहि परिसरके ँ तीन दिससँ प्रायद्वीप जकाँ घेरने छैक । सम्भवतः ई नदी बागमतीक पुरान धर छल जकर चिर् लहेरियासराय शहरमे एखनहुँ छैके जे कबिलपुर ओ डरहार होइत आगाँ जा क दच्छिन मुहे ँ घुमि गेल आ ओहिठामसँ देकुलीक सीमामे पहूँचि पुनः पच्छिम दिस घुमैत आगू जाय दच्छिन-पूब मुँहे घुमैत कमलामे जा क मिलि जाइत अछि । देवकुली नगरक सुरक्षाक लेल एहि नदीक उपयोगिता ओ नदी तटवर्त्ती परिसर देखिए क देवसिंह एकरा राजधनी बनौने होयताह । ओना देकुलीसँ पूब एकटा प्राचीन स्थान अछि जे सकरी डीहक नामसँ जानल जाइत अछि । झिटुका, ईंट आदिसँ भरल एहि डीहक सम्बन्ध्मे कहल जाइछ जे ई ओइनिवारसँ पूर्व मिथिलापर शासन कयनिहार कर्णाटवंशीय राजा शक्तिसिंह ¯कबा शक्रसिंहक डीह छलनि । तात्पर्य यैह जे देकुली परिसर पूर्वहिसँ निवास स्थानक योग्य बुझल जाइत रहल अछि । देकुलीक उत्तरमे कृष्णमंगला नदीक कछेड़पर एकटा ऊँचगर डीह सन जमीन अछि जकरा स्थानीय लोक नरेना बाध् कहैत छैक । ई नरेना शब्द कदाचित् ओइनिवारवंशीय राजा लोकनिक विरुद नारायणक विकृत रूप हो तँ कोनो आश्चर्य नहि । नरेना पर सघन खड़होरि अछि । गामक लोकक कहब छनि जे देकुलीमे जे मुखय डीह अछि ताहिमेसँ अनेक बेर पाथरक जाँत, उक्खरि आदि बहरायल । पुरान ईंटक देवालक अवशेष सभ छल जकरा लोक नष्ट क देलक । डीहक एकटा अंशके ँ हथिसार कहल जाइत अछि । गाममे कतोक प्रस्तर स्तम्भ खण्ड सब यत्रा-तत्रा पड़ल अछि । सम्भवतः एकर उपयोग भवन निर्माणमे कयल गेल होयत । गामक उत्तरपूर्व अर्थात् ईशान कोणमे जे प्राचीन वर्(मानेश्वर स्थान अछि ताहिमे दूटा कारी रंगक शिल्पित खण्डित प्रस्तर स्तम्भ पड़ल अछि । एकटा एहने तरासल, खत बनायल प्रस्तर खण्ड रामललाझा अधिवक्ताक बारीमे आ दोसर पूर्व मुखिया राजाबलीझाक घरमे बन्द राखल अछि । गाममे कमसँ कम सातटा पोखरि अछि जाहिमे सबसँ पुरान ओ गहींर पोखरि गामक दच्छिनमे अछि जकरा पतोरिया पोखरि कहल जाइत छैक । गामक लोकक अनुसार एहि पोखरिमे एक बेर पानि कम भेला उत्तर एकटा विशाल शिलाखंड देखल गेल छलैक जकरा कतबो प्रयास कयलोपर बहार नहि कयल जा सकल । पहिने एहि पोखरिक मोहार ततेक ऊँच छलैक जे नीचाँसँ पोखरि नहि देखाइत छलैक । वर्त्तमानमे मोहारक माटि काटि क हटा देल गेलैक अछि । ¯कवदन्ती अछि जे देकुली डीह नामसँ बीच गाममे जे स्थान खयात अछि ओत पहिने राजभवन छलैक आ राजभवनसँ पतोरिया पोखरि ध्रि एकटा सुरंग बनल छल । राजपरिवारक महिला लोकनि ओही सुरंग होइत पोखरिमे स्नान करबाक हेतु अबैत छलीह । निश्चित रूपसँ देकुलीमे प्राचीनताक बहुतो चिर् विद्यमान अछि । देवसिंहक राजधनी होयबाक कारणे ई मानल जयबाक चाही जे एही नगरमे ओ स्वर्णतुला महादान ओ गजरथ महादान सन प्रसि( अनुष्ठानक आयोजन कयने होयताह ।१४ ईहो मानल जयबाक चाही जे शिवसिंहक राज्यारोहण एही नगरीमे भेल होयतनि । संगहि ईहो कहबामे तारतम्य नहि जे महाकवि विद्यापतिक चरण एहि नगरीमे पड़ले होयतनि । एहि नगरीमे रहि विद्यापति अपन कोमलकान्त पदावलीक बहुतो अंशक रचना कयने होयताह । शिवसिंहसँ पहिने देवसिंहक आश्रयमे रहल विद्यापति अपन कतोक पदमे देवसिंहहुक नाम लेने छथि । प्रमाणस्वरूप देखल जा सकैत अछि विद्यापतिक किछु पदक भनिता अंशµ भने कवि विद्यापति, अरे वर जउवति मध्ुकरे ँ पाउलि मालति पुफलली । हासिनि देवि पति देवसिंह नरपति गरुड नरा×ोन रघर्ैें भुलली ॥१५ विद्यापति भूपरिक्रमा नामक ग्रन्थ देवसिंहहिक आगासँ लिखने छलाह ।१६ देवसिंहक राजत्वकालक समयमे तिरहुतपर दिल्ली ओ बंगालक मुसलमान शासक द्वारा संयुक्त रूपसँ हमला कयल गेल छल । एहि यु(क नेतृत्व शिवसिंह कयने रहथि, से विवरण विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ प्राप्त होएत अछि । एहि आकमर्णसँ देकुली राजधनी पर कोन तरहक प्रभाव पड़ल ¯कवा ई यु( कत लड़ल गेल से सूचना नहि भेटैत अछि । मुदा ओ यु( कतेक भीषण छथि ओ देवसिंहक सैन्य शक्ति कतेक सबल ओ संगठित छलनि तकर विस्तृत वर्णन कीर्त्तिपताकामे भेल अछि ।१७ कीर्त्तिपताकामे पक्ष-विपक्षक कुल एकासी गोट ऐतिहासिक व्यक्तिक नामोल्लेख भेल अछि । जाहिसँ समकालीन राजनीतिमे ओइनिवार राजवंशक पराक्रम ओ ओकर राजनधनी देवकुलीक गरिमापर प्रकाश पड़ैत अछि । संगहि ओहि यु(मे तिरहुतक विजय भेल छल । ओ दिल्ली तथा बंगालक सेना अपन समस्त शक्ति गमा पीठ देखा मैदानसँ भागि गेल छल । अपना समयमे अपराजेय बूझल जायवला दिल्लीक सुल्तान ओ ओकर सहयोगी बंगालक शासक अपमानजनक पराजय एकटा आश्चर्यजनक घटनाक रूपमे इतिहासक पृष्ठमे अंकित भ गेल । विद्वालपतिक पुरुष परीक्षाक अन्तमे तथा विद्यापतिके ँ देल गेल विस्पफी ताम्रपत्रामे गजनी ओ गौड़ ;बंगालद्धक शासकके ँ परास्त कयनिहार विजेताक रूपमे शिवसिंहक प्रशस्ति कयल गेल अछि ।१८ निश्चित रूपसँ एहि ऐतिहासिक तथ्य सबसँ जानल जा सकैछ जे अपना समयमे मिथिलाक राजधनी देवकुली कतेक उतार-चढ़ावके ँ देखलक, कतेक घटनाक ओ साक्षी बनल । देकुलीक ऐतिहासिक महत्त्व तँ अछिहे संगहि एकर महत्त्व धर्मिक दृष्टिएँ सेहो अछि । तकर कारण अछि एहि गामक उत्तर-पूर्वमे अवस्थित प्रसि( वर्(मानेश्वर स्थान । गामक लोकमे ¯कवदन्ती प्रचलित अछि जे ई वर्(मानेश्वर महादेव अंकुरित शिवलिंग थिकाह । ओइनिवार राजवंशक आश्रित एकटा वर्(मान नामक राजपंडितके ँ एहि शिवलिंगक दर्शन भेलनि । ते ँ हुनके नामपर एकर वर्(मानेश्वर नामकरण भेल । के छलाह ई वर्(मान ? ई जिज्ञासा स्वाभाविक रूपसँ होइत अछि । मिथिलामे दूटा वर्(मान भेल छथि । पहिल जनिका वृ( वर्(मान कहल जाइत छनि से सरिसबे छाजन मूलक गंगेश उपाध्यायक पुत्रा ओ प्रसि( नैयायिक रहथि । हिनक स्थिति काल तेरहम शताब्दी मानल जाइत छनि ।१९ दोसर वर्(मान उपाध्याय छलाह बेलौ ँचय मूलक ब्राह्मण जनिक पिताक नाम भवेश ओ माताक नाम गौरी छलनि । र्ध्मशास्त्राक पंडित एहि वर्(मानक विशेषण अभिनव छनि ।२० अभिनव वर्(मान र्ध्मशास्त्रा विषयक अनेक ग्रन्थक रचना कयलनि जाहिमे गंगाकृत्य विवेक, गया प(ति, दण्ड विवेक, द्वैत विवेक, परिभाषा विवेक, श्रा( प्रदीप, स्मृति तत्वामृत अथवा स्मृति तत्त्व विवेक, स्मृति तत्त्वामृत सारो(ार, स्मृति परिभाषा, जलाशयादि वस्तुविध्ि इत्यादि प्रसि( छनि ।२१ अभिनव वर्(मान विद्यापतिये जकाँ दीर्घजीवी भेलाह । ओइनिवार वंशक राजादेवसिंहसँ लक भैरवसिंह पर्यन्त ध्रि ई र्ध्माध्किरणिक ;न्यायाध्किारीद्ध पदके ँ सुशोभित कयलनि ।२२ यैह अभिनव वर्(मान उपाध्याय राजधानीक रूपमे देवकुली नगरी बसलाक बाद वर्(मानेश्वर महादेवक स्थापना कयलनि । सम्भव थिक जे वर्(मान एही देवकुली राजधनीमे रहि अपन धर्मशास्त्रा विषयक कतोक ग्रन्थक रचना कयने होथि । एहि वर्(मानक खुनाओल एकटा पोखरि नारी-भदौन गाममे एखनहुँ विद्यमान अछि । मठियाही नामसँ प्रसि( एहि पोखरिक पनिझाओ तेरह बीघामे छल । पोखरिक संग वर्(मान एकटा विष्णुक मन्दिर सेहो बनबौलनि जे कालान्तरमे ध्वस्त भ गेल ।२३ ओहि मन्दिरक एकटा प्रस्तर स्तम्भ पूर्वमे हाटी कोठीमे राखल छल जकरा पछाति उठा क लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगामे आनि क राखल गेलैक । एहि स्तम्भमे तिरहुतामे दू पाँतीमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण अछिµ जातो वंशे विल्वप×चाभिधने धर्म्माध्यक्षो वर्(मानो भवेशात् । देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रारूढ़ं कृत्या स्थापयद्वैनतेयम् ॥ पन्द्रहम शताब्दीमे मिथिलाक राजधनी देवकुलीमे स्थापित वर्(मानेश्वर महादेवक मन्दिर कोन रूपक बनल छल होयतनि तकर कोनो प्रमाण नहि अछि । मुदा उनैसम-बीसम शताब्दीक सन्ध्किालमे देकुली ओ वर्(मानेश्वर स्थानक स्थिति कोन तरहक छल तकर विवरण म.म. परमेश्वरझा निम्नरूपक देने छथिµ देवसिंह अपना समयमे...दड़िभंगा कोटसँ दक्षिण एक कोशसँ किच्छु उपर देवकुली ;देकुलीद्ध नामक राजधनी बसौलन्हि ओहिठाम एखन पर्यन्त अत्यन्त उच्च डीह अछि जाहिपर साध्रण बस्ती सम्प्रति बसल अछि । ओह बस्तीक ईशानकोण स्थानमे स्मार्त्त निबन्ध्कर्त्ता र्ध्माध्किारी अभिनव वर्(मान उपाध्यायक स्थापित महादेव 'वर्(मानेश्वर' नामक छथि हुनक मन्दिरमे प्राचीन समयक जे एक-दुइटा पाथरक खण्ड पड़ल अछि से देखैक योग्य अछि यद्यपि प्राचीन मन्दिर तँ भग्न भय गेल परन्तु अपरपर केओ धर्मिक ओकर जीर्णो(ार करौलन्हि अछि । एहि स्थानमे मकर ओ शिवरात्रिामे मेला होइत अछि ।२४ परमेश्वरझा मन्दिरक जे विवरण देलनि अछि से मन्दिर आब नहि अछि । तिरहुत स्थापत्य शैलीमे गुम्बदाकार गर्भगृह ओ गजपीठाकार बरामदावला मन्दिर १९८८क भूकम्पमे क्षतिग्रस्त भ गेल । पश्चात् ओहि मन्दिरके ँ तोड़ि ओहि स्थानपर वर्त्तमानमे नवीन मन्दिर बनाओल गेल अछि जे १२८ पफीट ऊँच अछि तथापि ओहिमे स्थापत्यक ने तँ कोनो चमत्कारे अछि आ ने देशज शिल्प आ सौन्दर्ये । जेना परमेश्वरझा अपन विवरणमे एहि मन्दिरमे एक-दूटा पाथरक खण्ड राखल होयब लिखलनि अछि से औखन पर्यन्त मन्दिरमे विद्यमान अछि । एकटा शिल्पित पाथर खण्ड मन्दिरक भीतरमे अछि जकर पूजा कयल जाइत अछि । दोसर एकटा नमहर स्तम्भ खण्ड मन्दिरक पूब दिस परिक्रमामे राखल अछि । मन्दिरमे मध्यमे जलढरी सहित कारी पाथरक एकटा शिवलिंग स्थापित अछि जे पफर्शसँ लगभग डेढ़ पफीट नीचाँ कुण्डमे अछि । शिवलिंगक शीर्ष भाग खण्डित अछि । बुझना जाइत अछि जे एहिपर कहियो कोनो धरदार अश्त्रासँ प्रहार क एकरा विकृत क देल गेल हो । मन्दिरमे दू गोट औरो शिवलिंग बिना जलढरीक स्थपित अछि जे रंग ओ आकार-प्रकारमे प्रधन शिवलिंगक सदृशहि अछि । मन्दिरक भीतर पुबरिया देबालसँ सटा क पाथरक नन्दी समेत कतोक टूटल-भाघल मूर्त्ति सभ पतियानीसँ राखल अछि । मन्दिरक उतरवरिया देवालमे तीनटा खाना बनल अछि आ तीनूमे तीनटा प्रस्तर मूर्त्ति जड़ल अछि । कारी पाथरसँ बनल एहि तीनू मूर्त्तिक अवलोकन कयला उत्तर देखल जाइछ जे पहिल मूर्त्ति गणेशक थिकनि जकर आकार तीन ग डेढ़ पफीट अछि । प्रतिमा अलंकृत ओ समानुपतिक अछि । गणेशक आयुध् ओ वाहन इत्यादि स्पष्ट छनि । मूर्त्तिक सूँढ़ खण्डित अछि । दोसर मूर्त्ति भगवतीक थिकनि जकर आकार अढ़ाइ ग डेढ़ पफीट छैक । इहो मूर्त्ति आकर्षक अछि, तथापि एकरहु अंग-भंग भेल छैक । तेसर मूर्त्ति सूर्यक थिकनि जकर आकार दू ग सवा पफीट छैक । ई मूर्त्ति अभग्न अछि । सात घोड़ासँ युक्त रथपर ठाढ़ सूर्य, पैरमे बूटदार जूता, माथपर ईरानी टाइपक टोपनुमा मुकुट, सारथी अरुण, उषा ओ प्रत्युषा आदि अपन समस्त सहयोगी, आयुध् ओ उपकरणसँ सुसज्जित । एहि तीनू मूर्त्तिक गढ़नि ओ शिल्प पाल ओ कर्णाट शैलीसँ किछु भिन्न देखना जाइछ जकरा ओइनिवार शैलीक नाम देल जाय तँ कोनो अनुचित नहि होयत । उपरिवर्णित तीनू मूर्त्ति एहि शिव मन्दिरमे कोना आ कतसँ आयल तँ एहि सम्बन्ध्मे देकुली ग्रामवासीक कहब छनि जे एक बेरक बड़का रौदीमे गामक सबटा पोखरि सुखा गेल रहैक । ताही क्रममे गामसँ दच्छिन स्थित पतरिया पोखरिक उड़ाहीक क्रममे गणेश, भगवती, सूर्यक प्रतिमाक संग-संग बहुतो टूटल-भाँगल मूर्त्ति सब बहरायल छल जकरा सबके ँ आनि क वर्(मानेश्वर स्थानमे राखि देल गेलैक । विभिन्न देवी-देवताक एहि मूर्त्ति सबके ँ देखलासँ मिथिलाक पऋचदेवोपासनाक परम्पराक स्मरण होइत अछि । मिथिलामे कोनो यज्ञकर्मक आरम्भमे पऋचदेवताक पूजा कयल जाइत छनि । ई पऋचदेवता छथिμ गणेश, सूर्य, भगवती, विष्णु ओ महादेव । दिनमे जँ पूजा भेल तँ सूर्यादि पऋचदेवता कहि सूर्यक प्रतिमा भगवतीक प्रतिमा गणेशक प्रतिमा वऋक आ रातिमे गणपत्यादि प×चदेवता कहि क । मिथिलाक अपन एही समन्वयवादी परम्पराक अनुसार एहि क्षेत्रामे प×चायतन मन्दिरक प्रचलन रहलैक अछि । अर्थात् उपर्युक्त पाँचो देवताक मूर्त्तिक स्थापना कयल जाइत रहलैक अछि । निश्चित रूपसँ देवकुली राजधनीमे कहियो प×चायतन मन्दिर रहल होयत जाहिमेसँ चारिटाक मूर्त्ति तँ भेटैत अछि, पाँचम देवता विष्णुक मूर्त्ति सेहो रहले होयत । वर्(मानेश्वर मन्दिरक पूब भागमे परिक्रमामे राखल पाथरक ढेरमे तकला पर विष्णु मूर्त्तिक पाद खण्ड भेटैत अछि, जाहिसँ एहू समस्याक समाधन भ जाइत अछि । विष्णु मूर्त्तिक ध्ड़ ¯कवा शिरोभाग एखनहुँ पतरिया पोखरिमे वा कतहु अन्यत्रो दबल पड़ल होयत । ग्रामीण लोकक कथन छनि जे जँ एहि अथाह पोखरिमे नीक जकाँ ताकल जाय तँ ओहि समयक औरो बहुमूल्य सामग्री सभ प्राप्त भ सकैत अछि । निश्चित रूपसँ एहि गाममे जत-तत शिल्पित प्रस्तर खण्ड सभ जे पड़ल अछि ताहिसँ अनुमान कयल जा सकैत अछि जे पूर्वमे एहि गाममे उपर्युक्त प×चदेवतालोकनिक भव्य मन्दिर रहल होयतनि । मन्दिरसँ सम्ब( कोनो अभिलेख होयबाक सम्भावनाके ँ सेहो नकारल नहि जा सकैत अछि । ओ मन्दिर सब कोना ध्वस्त भ गेल, वर्(मानेश्वर समेत अन्य देवमूर्त्ति सभके ँ के खण्डित कयलक, ओकरा सबके ँ पोखरिमे के पफेकलक- एहि सब प्रश्नक उत्तर इतिहासहिमे तकलासँ भेटि जा सकैत अछि । देवसिंह अपन राजधनी देवकुलीमे स्थिर कयलनि । देकुलीसँ दक्षिण ओ चन्दनपट्टीसँ पूब एकटा महदइ नामक विशाल सरोवर अछि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार ई देवसिंहक बहिन महादेवीक खुनाओल थिकनि ।२५ देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह जखन स्वयं राजा भेलाह तँ देवकुलीके ँ विस्तारित करैत एहिसँ औरो दच्छिन हटि गजरथपुर नामक नगर बसौलनि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार वर्त्तमान समयमे जत लक्ष्मीपुर-आनन्दपुर डेउढ़ी अछि ततहि पूर्वमे गजरथपुर छल । यद्यपि ई शिवसिंहपुर नामसँ सेहो जानल जाइत छल, किन्तु शिवसिंह द्वारा अपन पराक्रमके ँ वृ(ि करैत जखन एहि स्थानके ँ सैन्य छावनीक रूप देल गेल, गजरथक स्थान एतहि नियत कयल गेल ते ँ ई नगर शिवसिंहपुरक संग-संग गजरथपुर नामसँ सेहो प्रसि( भेल ।२६ प्रत्युत् एहि गजरथपुरक उल्लेख कतिपय तत्कालीन ग्रन्थक पाण्डुलिपि सबमे भेल अछि । लक्ष्मण संवत् २९१मे विद्यापतिक आज्ञासँ खौआल मूलक देवशर्मा ओ बलिआसय मूलक प्रभाकर श्रीध्र रचित काव्यप्रकाश विवेक नामक पोथीक टीका ओ प्रतिलिपि एहि गजरथपुर नगरमे रहि क कयने छलाह । एहि पोथीक पुष्पिका वाक्य निम्न प्रकारक अछिµ समस्त विरुदावली विराजमान महाराजाध्रिाज श्रीमत् शिवसिंहदेवसंभुज्यमान तीरभूक्तौ श्रीगजरथपुरनगरे सत्प्रक्रियसदुपाध्याय श्रीविद्यापतीनामज्ञया खौआलसं, श्रीदेवशर्म बलियास सं. श्रीप्रभाकराभ्यां लिखितैषा पुस्तो ल.स. २९१ कार्त्तिक वदि १० ।२७ एहि गजरथपुरसँ ल.स. २९३मे महाराजाध्रिाज शिवसिंह द्वारा अपन प्रिय सखा विद्यापतिक नामसँ विस्पफी ताम्रपत्रा जारी कयल गेल छल । एहि ताम्रपत्रामे बागमती नदीक तटपर गजरथ आखयासँ प्रसि( पुरीक अवस्थितिक उल्लेख भेल अछिµ वागवत्याः सरितस्टते गजरथेत्याखयाप्रसि(ेपुरे दित्सोत्साह विबृ(वाहुपुलकः सभ्याय मध्येसभम् ।२८ निश्चित रूपसँ उपर्युक्त अभिलेख ई साबित करैत अछि जे शिवसिंहक समयमे देवकुली राजधानीक विस्तार औरो दक्षिण ध्रि भेल । डा. रामदेवझाक मत छनि जे पश्चिममे बागमती नदीक पश्चिमी तटपर स्थित थलवार गामसँ लक पूबमे रामभद्रपुर ध्रि तथा उत्तरमे सिनुआरसँ लक दच्छिनमे सिधौली-सुरहाचट्टी ध्रिक परिसर शिवसिंहक समयमे राजधानी छल । एहि परिसरमे यद्यपि अनेक गाम अछि जकरा समेकित रूपसँ एकटा गजरथपुरक अभिधन देल गेल ।२९ वस्तुतः ई सम्पूर्ण परिसर पुरातात्त्विक सामग्री, प्राचीन मूर्त्ति, सरोवर, इनार आदि सबसँ परिपूर्ण अछि । एहि गजरथपुर राजधानीसँ शिवसिंह मिथिलाक स्वतन्त्राताक घोषणा कयलनि अपितु अपन मुद्रा सेहो चलौलनि ।३० दिल्लीक सुल्तान भारी पफौजक संग गजरथपुर राजधनीपर हमला कयलक । ओही हमलामे गजरथपुर उजड़ि गेल, ओकर ऐश्वर्य विलुप्त भ गेलैक । कालक प्रवाहमे गजरथपुर नाम सेहो विलुप्त भ गेल । पछाति केवल एहि राजधनीक अन्तर्गत बसल गाम सब अपन पूर्व नामक संग शेष रहि गेल । एही मुसलमानी आक्रमणक आघात देवकुलीके ँ सेहो सह पड़ल होयतैक । वर्(मानेश्वर समेत सब देव मन्दिर ध्वस्त कयल गेल होयत जकर प्रमाण अछि देकुलीक भग्न मूर्त्ति ओ प्रस्तर खण्ड सभ । शिवसिंहक तिरोधनक बाद हुनक उत्तराध्किारी लोकनि हुनक उजड़ल राजधनीके ँ पफेरसँ बसयबाक प्रयास नहि कयलनि । सम्भवतः सुल्तानक संग आयल मुस्लिम सैनिक सब एतहि बसि गेल । एखनहुँ चन्दनपट्टी, बाँकीपुर, जीवर आदिमे मुसलमानक सघन आबादी अछि । विर्ध्मी शत्राु सेनाक निवास भेलाक कारणे शिवसिंहक बादक ओइनिवार राजा लोकनि गजरथपुर छोड़ि अपन राजधानी मिथिलाक उत्तर भागमे स्थिर करैत रहलाह ।३१ सम्भवतः देवकुली गाम बहुतो दिन ध्रि उजड़ले-उपटल रहल । एहि गामक वर्(मानेश्वर महादेव जनविहीन परिसरमे एकाकी रहबाक हेतु विवश भेलाह । पुनः ई गाम कहिया आबाद भेल से तँ निश्चित रूपसँ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा कोना आबाद भेल से मौखिक स्रोतसँ बूझल होइत अछि । गामक एकटा वृ( पुरुष तृप्तिनारायणझा जे विवरण देलनि तदनुसार उजड़लाक बहुतो दिन बाद देकुली गाम एहिसँ उत्तर स्थित डरहारक कलिगामे-कलिगाम मूलक चौध्री उपनामधरी ब्राह्मण लोकनिक अध्ीन भ गेलनि । देकुली डरहारक संग जुड़ि गेल आ एहि मौजाक नवीन नाम पड़ल विसनपुर-महादेव । एहि नामकरणक पाछाँ कारण भेल देकुलीक प्रसि( वर्(मानेश्वर महादेव स्थान तँ दोसर दिस डरहार गामे एहने प्राचीन विष्णु मन्दिरक अवस्थिति । ई विष्णु मन्दिर एखनहुँ डरहारक पूर्वमे अछि । प्रायः एही कारणे ँ गामक नाम सेहो विष्णुपुर वा विसनपुर पड़ल । मुदा विसनपुर नाम अभिलेखे सबमे भेटैत अछि । एकर प्रचलित नाम डरहार छैक । एहि डरहार शब्दक की व्युत्पत्ति ओ एकर पाछाँ की इतिहास से अनुसन्ध्ेय अछि, मुदा डरहार एकटा मूलग्राम सेहो अछि । प×जीमे एकहरे डरहार नामक एकटा मूलक उल्लेख अछि ।३२ अस्तु, पुनः अपन विषयपर आबी । विद्यापतिक जन्मभूमि बिस्पफी लग उसौत नामक कोनो गाम अछि । ओहि गाममे वत्स गोत्राीय, परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवास छलनि । ओही गामक एकटा पंडित युवक रहथि कामदेवझा । हुनक विद्वत्तासँ प्रभावित भ क डरहारक एकटा चौध्री जमिन्दार अपन कन्यासँ हुनक विवाह करौलथिन । तथाकथित अपनासँ छोट कुलक कन्यासँ विवाह करबाक कारणे ँ कामदेवझाके ँ अपन परिवारसँ बहिष्कृत क देल गेलनि । तखन कामदेवझाक ससुर अपन बेटी-जमायके ँ ५२५ बीघाक रकबावला सौंसे देकुली मौजा दक एही गाममे हुनका लोकनिके ँ बसौलथिन । अपितु बेटी-जमायक राजपाट सम्हारबाक हेतु आवश्यक जन-वरजन्ना, पौनी-पसारीक रूपमे पन्द्रहटा आनो-आन जातिक परिवारके ँ बजाय क बसौलथिन । वर्(मानेश्वर महादेवक सेवा-पूजा हेतु महिसी ;सहरसाद्धसँ पंडा ब्राह्मणके ँ बजाय ओकरो बसौलथिन । एतावता देकुली मैथिल ब्राह्मणक बिकौआ ओ कन्यादानी व्यवस्थाक अन्तर्गत पफेरसँ बसल । ओही परिवारे उसौत मूलक कामदेवझाक वंशज लोकनि आब एक-सँ एकैस भ चुकल छथि । देकुली गाममे परिवार ;पल्लिवारद्ध मूलक ब्राह्मणक आगमन ओ निवासक सम्बन्ध्मे मौखिक स्रोत भने जे कहैत हो, विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ सेहो एहि सन्दर्भमे एकटा महत्त्वपूर्ण सूचना भेटैत अछि । देवसिंहक समयमे गजनी ओ गौड़क जे संयुक्त आक्रमण मिथिलापर भेल छल । तकर सामना देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह अपन सैन्यबलक संग कयने छलाह । देवसिंहक सेनामे ब्राह्मण ओ क्षत्रिाय दुहू जातिक यो(ा छलनि ताही क्रममे पल्लिवार वंशक सेनाक सेहो उल्लेख भेल अछिµ तह पल्लिवार धेरनि गरिट्ठ । सरजाले मारि कर समरध्टि्ठ ॥३३ अर्थात् पल्लिवारक वंशक सूरवीर लोकनि यु(भूमिमे डटल छथि । दृढ़तापूर्वक यु( करैत ओ लोकनि वाणक जालसँ समरभूमिके ँ आच्छादिक क देने छथि । वस्तुतः देवसिंहक सेनाक पल्ल्विार वंशीय सैनिक ओ हुनक राजधानी देवकुलीमे वसल परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवासक बीच कोनो ऐतिहासिक सम्बन्ध् तँ ने अछि, एहू दिशामे अनुसन्धानक प्रयोजन अछि । मौखिक स्रोतक अनुसार १८९६मे जखन दरभंगा जिलाक कैडेस्ट्रल सर्वे सुरू भेल ताहिमे देकुलीके ँ बिसनपुर-महादेव मौजासँ पफराक क पुनः एकटा स्वतन्त्रा मौजाक रूप देल गेलैक । पुरना सर्वे-खतियान ओ नक्शामे एहि मौजाक नाम देवकली लिखल भेटैत अछि । नक्शामे वर्(मानेश्वर स्थानक जगह काटल अछि जाहिपर मन्दिरक रेखाचित्रा अंकित क शिवाला लिखल अछि । यैह वर्(मानेश्वर शिवालय एहि गामक प्राचीन गौरव-गाथाके ँ अक्षुण्ण रखने अछि । ¯कवदन्तीक अनुसार पहिने ई महादेव खढ़क खोपड़ीमे छलाह । प्रति वर्ष गाममे आगि लगैत छलैक । पछाति ईंटाक पक्का मन्दिर बनाओल गेलैक । वर्(मानेश्वर परिसरक अवलोकनसँ प्रतीत होइछ जेना एकर निर्माण ओ स्थापना कोनो तन्त्रा प(तिसँ भेल होइक । परिसरक आकार त्रिाभुज जकाँ छैक । परिसरक पूब ओ पच्छिम भुजामे दूटा सरोवर एखनहु विद्यमान छैक । सम्भवतः परिसरक दच्छिनवला भुजा दिससँ सेहो पूर्वमे कोनो सरोवर छल जे भथि गेल । किए तँ मन्दिरक सामने दच्छिनमे सड़कक कातवला जमीन एखनहुँ डोभी सन लगैत अछि । वर्(मानेश्वर महादेवक खयाति जागन्त शिव-स्थानक रूपमे रहल अछि । अदौसँ माघी कमरथुआ लोकनिक विश्राम स्थलक रूपमे ई मान्य रहल अछि । पफागुन मासक मकर ओ शिवरात्रिाके ँ एत बड़ पैघ मेला लगैत अछि से आइयो चलि रहल अछि । वर्त्तमानमे एहि मन्दिरके ँ औरो बेसी जागृत करबाक प्रयासमे ग्रामीण लोकनि लागल छथि । नवीन मन्दिरक निर्माण कयल गेल अछि । शिवरात्रिाक अवसरपर पछिला किछु वर्षसँ भव्य आयोजन कयल जाय लागल अछि । तथापि आइ आवश्यकता अछि जे मिथिलाक एहि विस्मृत राजधनी देकुलीक ऐतिहासिक ओ पुरातात्त्विक गरिमाक रक्षा करैत एहि दिस अध्येता लोकनिक ध्यान आकृष्ट कयल जाय । एहि गामक गर्भमे दबल पड़ल इतिहासके ँ वैज्ञानिक ढंगसँ उत्खनन क सामने आनल जाय । यदा-कदा जे पुरातात्त्विक सामग्री सब भेटैत रहल अछि तकरा एकटा संग्रहालय बना क संरक्षित कयल जाय । महाकवि विद्यापतिक कर्मभूमिक रूपमे एहि गामके ँ चिन्हित कयल जाय । संगहि एहि गामक पुरातत्त्वक तुलना मिथिलाक अन्यान्य देकुली नामधरी गामक संग करैत नामक समरूपताक इतिहासक अन्वेषण कयल जाय । वर्(मानेश्वर स्थानक खयाति ओ प्राचीनताके ँ इतिहास ओ आध्यात्मिकताक मानचित्रापर स्थापित कयल जाय । ई दायित्व देकुली ग्रामवासी लोकनिक संग-संग मिथिला निवासी समस्त प्रबु( जनक थिकनि । सन्दर्भ एवं टिप्पणीµ १. परमेश्वरझा, मिथिला तत्त्व विमर्श ;पूर्वार्(द्ध, तरौनी, दरभंगा, १९४९, पृ.- १५२ २. चन्दाझा, पुरुष परीक्षा ;अनुवादद्ध, राज दरभंगा यन्त्राालय, शाके १८१०, पृ.- २५९ ३. उपेन्द्रठाकुर, मिथिलाक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना, १९८०, पृ.- १९० ४. रामदेवझा, विद्यापतिसँ सम्ब( स्थान आ गजरथपुरक सन्धन, मंजुषा-२, विद्यापति सेवा संस्थान, आनन्दपुर, दरभंगा, २००९, पृ.- १४ ५. एस.एन. सत्यार्थी, दर्शनीय मिथिला-९, विस्मृत मिथिला प्रकाशन, दरभंगा- २००३, पृ.- ४१३-४२० ६. रामप्रकाशशर्मा, मिथिला का इतिहास, के.एस.डी.एस.यू., दरभंगा, १९७९, पृ.- ४६३-४६४ ७. बिहारीलाल पिफतरत, आईना-ए-तिरहुत ;द्वि.सं.द्ध, महाराजाध्रिाज कामेश्वरसिंह कल्याणी पफांउडेशन, दरभंगा, २००१, पृ.- १२५-१२७ ८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ ९. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५२ १०. मुकुन्दझा बखशी, मिथिला भाषामय इतिहास, विद्याविलास प्रेस, बनारस सीटी, पृ.- ५१६ ११. श्यामनारायणसिंह, हिस्ट्री ऑपफ तिरहुत, बैप्टिस्ट मिशन प्रेस, कलकत्ता, १९२२, पृ.- ७२ १२. पी.सी. रायचौध्री, बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर दरभंगा, सेक्रेटेरियट प्रेस, पटना, १९६४, पृ.- ३४ १३. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९१ १४. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५५ १५. विद्यापति गीत संचय, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, १९९९, ;भूमिका- रामदेवझाद्ध, पृ. २१, पद सं.- ४३ १६. विद्यापति पदावली ;प्रथम भागद्ध, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, १९६१, भूमिका, पृ.- ७७ भूपरिक्रमाक आरम्भमे निम्न श्लोक अछिµ नत्वां गणपतिं साम्बं श्रीविष्णुं रविमम्बिकाम् । भूपरिक्रमणग्रन्थं लिखयते भुवि नैमिषे ॥ देवसिंहनिदेशाच्च नैमिषारण्यवासिनिः । शिवसिंहस्य च पितुः सूनपीठनिवासिनः ॥ १७. कीर्त्तिपताका, शशिनाथझा ;अनु.द्ध नाग प्रकाशक, दिल्ली, १९९२, पृ.- २८-७१ १८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५१ एवं २५३ १९. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५१-१५२ २०. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ २१. श्यामनारायणसिंह ;पूर्वोक्त-११द्ध, पृ.- १७७-१७८ २२. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९२ ओ २०७ २३. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९ २४. परमेश्वरझा ;पूर्वोक्स-१द्ध, पृ.- १५२-१५३ २५. उपर्युक्त, पृ.- १५४ २६. उपर्युक्त, पृ.- १५८ २७. उपर्युक्त, पृ.- १५८ २८. चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५३ २९. रामदेवझा ;पूर्वोक्त-४द्ध, पृ.- १३-१४ ३०. उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९७ ३१. विद्यापति पदावली ;पूर्वोक्त-१६द्ध, पृ.- २७ ३२. रमानाथझा, मैथिल ब्राह्मणों की पंजी व्यवस्था, दरभंगा- पृ.- ११ ३३. कीर्त्तिपताका ;पूर्वोक्त-१७द्ध, पृ.- ४७ सम्पर्क : कबिलपुर, लहेरियासराय दरभंगा- ८४६००१ जितेन्द्र झा 1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा 2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि 1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा केवाडमेँ स्वागतम् । घरके भितमे वर कनिञाक चित्र, हाथीपर चढिकऽ गौर पुजैत नवविवाहिता, डोली कहार सेहो । कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके एकटा अनुपम नमुना, गवाह नव दाम्पत्यक । वर कनिञाक मिलनके साक्षी सेहो । ई कोहबर घर कोनो बर कनिञालेल नहि अछि, ई अछि मिथिलासँस्कृतिक जीवैत नमुना । मैथिलीक समृद्ध परम्परा आ संस्कारके चिनारी बनल अछि ई कोहबर घर । काठमाण्डूक कुपण्डोलस्थित महागुठी आर्ट ग्यालरीमेँ सजाओल कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके बखान करैत अछि । एहि कोहबरमेँ रहल पाग, डोपटा, वियनि, डोला कहार, गुआ—माला जेहन चीजसभ आओर आकर्षक बना देने अछि । तहिना वियाहक विध सिन्दुरदान, मुँहदेखाइ, विदाइ के पेन्टिंगसभ सेहो कोहबर घर देखनिहारके अपना दिस खिचैत अछि । हस्तकलाक समान उपलब्ध होबऽबला ई दोकान मेँ कोहबर घरके मिथिला पेन्टिंगके उजागर करबाक प्रयास कएल गेल अछि । विवाहमेँ विधके क्रममे काज लागऽबला आ मैथिली घरके प्रतीक उखरि—समाठ, कोठी जेहन वस्तु सेहो गमैया लुक दैत अछि एहि कोहबर घरके । एत्तऽ एलासँ लगैत अछि जे कोनो मिथिलासंग्रहालयमेँ चलि एलहँु । मैथिली सँस्कृतिके संरक्षणक नामपर बडका बडका भाषण केनिहारसभके एहि कोहबर घरसँ किछु ज्ञान भेटि सकैत अछि । मिथिला पेन्टिंगके लोकप्रियता आ मैथिली सँस्कृतिके मौलिकता कारण ई कृत्रिम कोहबर घर देश विदेशक कला प्रेमीके मोन मोहि लैत अछि । मिथिला पेन्टिंगके वाहक मात्र नहि समग्र संस्कृतिके परिचायक ई नमुना कोहबर घर काठमाण्डूसँ देश विदेशक लोकके मैथिली संस्कृति दिस आकर्षित करैत अछि । 2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि गामसँ कोशोदूर रहितोअपन परम्परा आ सँस्कारके बचाकऽ राखऽमें मैथिल महिलाक बडका योगदान अछि । ग्रामीण परिवेशमेँ सहज रुपेँ पाबनि तिहार केनिहारि महिलाक अपेक्षा शहर आ दूर देशमेँ रहल मैथिल महिलाके पाबनिक ओरिआओनपातीमेँ दिक्कति त होइते छन्हि मुदा पाबनिपर एकर कोनो प्रभाव नहि परैत अछि । काठमाण्डूमेँ बरसाइत पाबनि केनिहारि अर्चना झाक कहब मानी त काठमाण्डूमेँ रहियोकऽ कोनो दिक्कति नहि होइछन्हि एहि पाबनिमेँ । गाममेँ सभ महिला बडका बरक गाछ तर जम्मा भऽ बरक पुजा करैत छथि त शहरमेँ गमलामेँ बरक गाछ राखिकऽ बेगरता पुरा कएल जाइत अछि । बटसावित्री अर्थात बरसाइतमेँ अहिवात महिला अपन पतिक लम्बा आयुक कामना करैत छथि, नव कनियाँकलेल इ पाबनि बेशी महत्व रखैत अछि । नवकनियाँ सभकेँ प्रोढ महिला वरसाइतक विध विधान सिखाकऽ पुजामेँ सहयोग कएल करैत छथिन्ह । काठमाण्डूमेँ महिला सभ सामुहिक रुपेँ एहन पाबनि पुजल करैत छथि । सामाजिक सदभाव आ एकदोसराके बुझबालेल सेहो शहरवासी मैथिल महिलाक लेल एहन पाबनि निक अवसर भऽ गेल अछि । शरिर कतउ रहए मोनमें अपन परम्परा आ सँस्कारप्रति श्रद्धा होएबाक चाही, अपन सँस्कृति आ परम्पराके निरन्तरता देबामेँ प्रवास बाधक नहि होइत अछि । १.बीरेन्द्र कुमार यादव- कथा- हमर समाज २.जीवकान्त-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ३.धीरेन्द्र कुमार-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ४.राजदेव मंडल- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र १ बीरेन्द्र कुमार यादव ग्राम- घोघड़रिया, पोस्ट- मनोहपट्टी, भाया- निर्मली, जिला सुपौल ग्राम- घोघड़रिया पोस्ट- मनोहपट्टी भाया- निर्मली जिला सुपौल कथा हमर समाज विरेन्द्र कुमार यादव बिन्नू आ बीरू बालसंगी छलाह। दुनू गोटे कोशीक कछेर गाम घोघड़रियामे मरूआक रोटी आ पोठी माछक चटनी जलखै खाइत छल। रेडियो बाजि रहल छल जे “लिंक रोड निरमलीमे विष्णु महायज्ञ शुरू अछि, जहिमे गणेशजी महाराज लोक सभकेँ लड्डू दैत छथिन्ह।” ई सुनितहि बिन्नू अपन भजार बीरूकेँ कहलखिन- “यार, घोर कलियुगमे गणेशजी लड्डू बटैत छथि। एक दिन चलु आ अपनो सभ प्रसाद लए आबि।” दुनू भजार आश्चर्य करितहुँ यज्ञ मेला देखवाक िनश्चए कएलक। ओहि बीच गामक ठकनी काकी मुँहमे पान गलठैत हाथमे बजैत रेडियो नेने लगमे आबि बजलीह- “यौ बिन्नू बौआ, एहि रेडीमे कहलक जे लिंक रोड ईटहरीमे गणेश भगवान लड्डू बँटैत छथिन्ह, अपनो सभ चलेचलु गणेशक लडू लए आबि।” बीरू बजलाह- “गै काकी धैरज धर हम रेलगाड़ीक भॉंज करै छियौ, गामक सभ गोटे रेलपर चढ़ि गणेशजीक प्रसाद लेबाक लेल अवश्य जाएव।” ठकनी काकी कने ठमकि कऽ बजलीह- “रौ बकलेलहा, एहि गाममे बस, मोटर चलबाक तँ रस्ते नहि अछि, तोँ रेल मंगबैत छैँ।” बीरू हँसैत बजलाह- “गै काकी जहन माटिक मुरूत गणेशजी लड्डू बॉंटि सकैत छथि। तखन बिनु पटरीक रेल किएक नहि आओत?” बीरूक बात सुिन बिचहिमे बिन्नू कहलखिन- “अहॉं सभ बकझक जुनि करू, धर्मक काज देखबा, सुनवा आ कएलासँ स्वर्ग होइछ। हम सभ मिलि देवी पूजा पाठ आ दर्शन करए एक दिन अवश्य जाएव।” गामक पैघ आ देहोदशासँ भरिगर पंडित कमलशेखर बावूसँ भेटि कए दुनू भजार शुभ दिन तकौलक आ भाड़ाक बदलामे तेलपर परमाबावूक ट्रेक्टर भॉंज कएलक। जेठ मासक रौदमे ठकनी काकी, बीन्नू, बीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरसँ यज्ञमेला देखबाक लेल प्रस्थान कएलक। उबड़-खाबड़मे ट्रेक्टरक झोलामे झुलैत, रंग-विरगक गप-सप्प करैत रज्ञ स्थल माने मेला पहुँच गेल। रज्ञ स्थलपर अनगिनित लाउडस्पीकरक आवाजसँ भारी शोर-शराबा होइत छल। एहि बीच साइकिल स्टेंडसँ एगो चीकन युवती समतोला रंगक समीज सलवार पहिरने, ऑंखिपर रंगीन गोगुल्स धरौने, हाथक मोवाइलसँ फोटोग्राफी करैत ठकनी काकीपर नजरि पड़ितहि बजलीह- “मौसी अहॉं आबि गेलहुँ, बढ़ियॉं भेल, भेंट-मुलाकात भऽ गेल। हम तँ प्रचारे सुनि अएलहुँ। एतेक लोकक भीड़ तँ एहिठाम कॉंलेज परिसरमे देशक प्रधानमंत्री बाजपेयीजी आएल छलाह ओहूमे नहि भेल छल।” ई सोलह बरिसक बाला प्रेमलता जे हालहिमे पत्रकारितासँ जुड़लीहेँ सएह छथि। एहि यज्ञ मेलामे अनेको लोक-लुभावन कार्यक्रममे भोरूकवा रेडियो स्टेशन एफ.एम ९२.८, राजविराज (नेपाल)सँ आएल मैथिली भाषी कलाकार सभ मैथिली भाषाक विकासक लेल आ समाजकेँ प्रगतिमूलक शिक्षाक हेतू बढ़िया कार्यक्रम देखौलक। ठकनी काकीक संगे प्रेमलता आ गामक लोक कार्यक्रमक आनंद लैत मुरूतक दर्शन करए आगू बाढ़लाह। सभसँ पहिने धोर कलियुगमे सतयुगक कामधेनू गाए देखितहि प्रेमलता बजलीह- “मौसी, कामधेनूक थनसँ चुबैत दूधक पान करू आ जिबतहि स्वर्गक बदलामे माक्ष प्राप्त करू।” प्रेमलताक एतेक सुिन बीरू बाजि उठल- “काकी कामधेनूक चारू दिस ऑंखि खोलि कऽ ताकू। ई बुद्धिक कमाल आ व्यवसायक धार्मिक तरीका छी। जाहिपर कोनो तरहेँ ऑंगुर नहि उठए आ शांतिसँ पाइक संचय हुअए। ई सभटा पाइ िहन्दु धर्मक ठीकेदार बाबा आ पंडितजीकेँ पाकिटमे जाएत, जाहिसँ बाबा आ पंडितक जिनगी शान-शौकत आ भोगविलासमे बीतत।” ठकनी काकी लोकक एतेक भीड़ रहितहुँ ठेलि-ठालि कऽ अमृत पान कएलक आ लोको सभकेँ करौलक। बीनू कहलखिन- “ओहिठाम लाेकक बड्ड भीड़ छैक ओतए चलि देखू कोन देवता की बॉंटैत छथिन्ह। सभ गोटे ओहि भीड़क लग गेल। श्रद्धालू भक्रगण गणेश भगवानसँ टाका दए प्रसाद माने लड्डू लेबाक मुड़ कटबैत छल।” प्रेमलता मुरूतक सजाओल दृश्यक फोटो खींचैत यज्ञशालाक बगलमे ठाढ़ दलीह आ मोनमे रहनि जे किछु श्रद्धालूजनसँ साक्षात्कार करी आ संवाद प्रेषित करी। तावत काल माथपर भाेगारसँ उजरका आ सिनुरिया चानन घसल गेहुमा रंगक मोटगर लोक उजरका धोती पहिरने प्रेमलताक सोझाा आएल। प्रेमलता पूछि देलखिन- “पंडितजी ई की भए रहल अछि।” जोरसँ ठहाका दैत पंडित जी बजलाह- “ई धोर कलियुग बीत रहल अछि। मनुक्खक गप्प छोड़ू आब तँ देवता लोकनि सेहो पाइक लेल दोकान खोलि देलक। िहन्दु धर्मक चादरि ओढ़ि अधार्मिक, अनैतिक काज करबा लेल हमरा समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति सभ कतेक तत्पर अछि से सभ ऑंखि खोलि देखबाक लेल आएल छी। दुनियाँक लोक सभ चॉंदपर बसवाक लेल प्रयासरत अछि, आ हमरा समाजक लोकसभ साहुकार गणेशक लड्डू पाइ दए कऽ पबैत अछि।” ठकनी काकी प्रेमलताक लग आबि बजलीह- “गै छौड़ी, केकरासँ गप्प करै छेँ चल एहिठामसँ आब गामो जाएव।” मौसीकेँ विदा होइसँ पहिनहि प्रेमलता वीरू दिस मुस्की दैत बजलीह- “अपने किछु कहब?” वरू झटसँ कहलखिन- “किएक नहि? सभ लोककेँ धार्मिक होएवाक चाही, मुदा एहिठाम जतेक आडम्बर कएल गेल अछि से उचित नहि। आजुक वैज्ञानिक युगमे ढ़ाइ-तीन लाख रूपैया खर्च कए एहि तमाशासँ वातरवरणक शुद्धि, भक्तिमय माहौल आओर गामक नाम उँच केलक एकर अलावा की प्राप्त होएत? समाजक एतेक रास रकमक खर्च आधुनिक सोचसँ गरीबक बच्चाकेँ पढ़वा-लिखबामे, बिमारीसँ पिड़ित लोकक इलाज करएवामे, गामक विकासमे होएवाक चाही। जाहिसँ हमरो समाजक धीया-पुताकेँ नोबेल पुरस्कार प्राप्त करबाक अवसर भेटय। धार्मिक कार्यक्रमक उद्देश्य बदलि गेल अछि। सभटा खेला पाइ हँसोथबाक लेल भऽ रहल अछि। एना कएलासँ हमर समाज आगू नहि बढ़ि पएत। अपितु पाछुए रहत। ई हमरा सभक लेल हास्यास्पद बात छी।” प्रेमलता मुस्कुराइत हाथ आगू बढ़बैत बीरूसँ हाथ मिलाए मौसीसँ विदा लेलनि। वीरू प्रेमलता दिस आ प्रेमलता वीरू दिस धुिर-धुिर तकैत चलि गेल। विन्नु भाय, अपन भजार वीरूक मुस्कुराइत चेहरा टुकुर-टुकुर तकिते रहि गेल। तत्पश्चात् ठकनी काकी विन्नु, वीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरपर चढ़ि गाम दिस विदा भेल। 2. जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल” जीवकान्त ज गदीश प्रसाद मण्डलक पोथी “मौलाइल गाछक फूल” पढ़ि गेलहुँ। एकटा नव लेखक। एकटा नव भाव-भूमि। उपन्यास थिक। प्रमुख बात थिक गामक गरीबी, अशिक्षा आ खेतक विषम वितरण। आरंभसँ अन्त धरि समाजवादक धारणा गनगनाइत अछि। तेँ पात्र सभ गौण भऽ जाइत अछि। पात्र सभ गरीबी लए कऽ उपस्थित होइत अछि, अपन दीनता, अपन संघर्ष अपन विजय अभियानक दिशा देखबैत अस्त भऽ जाइत अछि। गाम बदलतैक जखन बोनिहारकेँ भूस्वामी बना देल जएतैक, शिक्षा लेल स्कूल फुजतैक, दवाइ लेल डाक्टर आ दवाइ सुलभ हाेएतैक। से सभ एहि “मौलाइल गाछ” (मिथिला आ भारतक अविकसित आ कृषि-प्रधान गाम) मे भऽ जाइत छैक। भूमिक वितरण भऽ जाइत छैक। स्कूल फुजैत छैक। दूटा किशोर-किशोरी मद्रास जा कए चिकित्साक आरंभिक ज्ञान लए गाम आिब जाइत छैक। गाममे पिरवर्तन होइत छैक। गामक स्वर्ण भूस्वामी डोमक नोत मानि सोत्साह भोजमे सम्मिलित हाेइत अछि। बोनिहारक बेटा गामक पैघ जोतदार (आब भूत पूर्व) लेल जर्मनीमे बनल रेडिओ उपहार देवा लेल अनैत अछि। नव जागरण छैक। नया समाजवाद छैक। कतहु मारि-मोकदमा नहि। कतहु भोट-भॉंट नहि। सभ वस्तु आरामसँ स्वत: होइत गेल अछि। एकठाम लाठी चललैक अछि। िसतिया आ ललबाबला प्रसंगमे। दू वर्गक लोक अछि। दुनूक वर्ग चरित्र झलकैत छैक। पोथीमे उल्का जकॉं ई घटना अबैत अछि आ मिझाइत अछि। वर्ग घृणा एकठाम छैक। सुबुध मास्टर नोकरी छोड़बा लेल त्यागपत्र फेकि अबैत अछि। ओकर स्त्री घौना करैत अछि। घसवाहिनी सभ आेकर दुख ओकर जीवन-शैलीक चर्चा कए अपन घृणा प्रकट करैत अछि। गाममे एहेन परिवर्तन होएवाक चाही। से बात उपन्यासकार कहैत छथि। कथानकमे कोनो पार्टीक उपस्थिति नहि छैक। मुदा पार्टीक एजेण्डा जकॉं सभ काज भए जाइत छैक। गाममे एन.जी.ओ. नहि छैक, मुदा एन.जी.ओ.क उपस्थिति अभड़ैत छैक। मार्क्स, गॉंधी, लोहिया, विनोवा इत्यादिक आहट सुनाइत छैक। एहेन परिवर्तन होएव तत्काल संभव नहि छैक। शिक्षा प्रचारसँ आ समाजसेवी सभक सेवा आ श्रमसँ एना भए जाए तँ आश्चर्यक बात नहि। रमाकान्त जखन मद्राससँ घुरैत छथि, तखनसँ अन्त धरि उपन्यास शिथिल भए जाइत अछि। तकर वाद सभ घटनाक अन्दाज पाठककेँ भए जाइत छैक। उपन्यासमे अन्त-अन्त धरि मोड़ अएवाक चाही, घटना सभमे आकस्मिता होएवाक चाही, से नहि छैक। पोथीक भाषा खाँटी लोकक भाषा थिक, किताबी भाषा नहि थिक। सेहो एकटा विशिष्ट आ महत्वपूर्ण बनबैत छैक। साहित्यमे एहेन घर-ऑंगनक पात्र नहि आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि। भारतमे गरीबी विशाल अछि। एकर नियति बदलतैक, मंद गतिसँ बदलतैक। एकर उनटा एहिमे अछि। पोथी पढ़ि गेलहुँ। से एकर सफलताक सूचक थिक। डयोढ़ १० ०६ २०१० 3 धीरेन्द्र कुमार (हिंदी विभाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेवढ़, मधुबनी) निर्मली, सुपौल। जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर मैथिली साहित्यमे यथेष्ट सामग्री लऽ प्रवेश केनिहार उपन्यासकार/कथाकारमे यशस्वी एक लेखक छथि। २००२मे प्रवेश केनिहार मंडल जीक सामग्री सभकेँ आश्चर्यचकित कऽ दैत छथि। एहन लगैत अछि जे जीवनक चिंतक, समाजक चिंतन आ आस-पासक होइत घटनाक्रमपर सृजन-दृष्टि हिनकर पहिनेसँ कार्यरत रहनि आ शब्द-बद्ध करैत रहलाह आ अनुकूल समए भेटैत अंकुरित भेलाह आ शीघ्रे एकटा गाछक पैघ स्वरूप धऽ लेलनि। प्रस्तुत कृति ग्राम्य-परिवेशक ससक्त अभिव्यक्तिमे सफल अछि। ग्राम्य-जीवनक चित्रणक कमी नै अछि मुदा हिनकर चित्रण आर सभसँ अलग अछि। गामक छोट-छिन मुद्दाकेँ पकड़ैमे यथास्थान प्रस्तुतिकरण, चित्रणक सघनतामे मंडल जी सिद्धस्त छथि। मंडलजी हिन्दी साहित्यसँ एम.ए. केने छथि। हिनका हिंदी साहित्यक कतेको उपन्यास-कथा पढ़बाक अवसर भेटल हेतनि। हिनक “मौलाइल गाछक फूल” उपन्यास पढ़लापर स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे प्रेमचन्दसँ बेसी प्रभावित छथि। गाम-घरमे रहिकए अनुखन समाजक कल्याणक भावना हिनकामे छनि। जाहि कारणें रमाकांत उदारवादी पात्रक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। व्यक्तिगत रूपसँ परिपूर्ण छथि। केओ एकटा परिवारक पात्र एहन नहि अछि जे आदर्शवादी रमाकांतक व्यवहारक विरोध केने होथि। गाम-घरसँ पढ़ि-लिखि शहरमे नीक पदपर स्थापित भऽ बेटा-कनियॉं गामक संस्कारसँ परिपूर्ण अछि। आजुक व्यस्तता, पाइक महत्ता आ छद्म-मुखौटाधारी एकोटा पात्र रमाकांतक परिवारमे नै भेटत। उपन्यासकारक विचार-दृष्टि समाजमे मूल्य स्थापित करब अछि तेँ ओइ दृष्टिसँ उपन्यासकेँ देखक चाही। जे अछि जे होइत अछि ताहि माध्यमसँ अबैत भविष्यकेँ सचेत नहि कऽ मानवीय-दृष्टिसँ आदर्श समाजक स्थापनापर हिनकर विस्वास छन्हि। भाषा हिनकर विकासशील अछि। विशेष वर्गमे स्थापित भाषासँ अलग व्यवहारक शब्द आ भाषा हिनक उपन्यासमे छनि ताहि कारणे पाठककेँ अपन समाजक बोध होइत छनि। मंडल जीक उपन्यास और “सेवासदन”क आदर्श एक्के अछि। अपन जीवनकालमे मंडल जी मार्क्सवादसँ प्रभावित छथि। एकर स्पस्ट दर्शन अपनेकेँ जमीन वितरण प्रणालीमे अवस्से देखबामे आओत। किछु लेखक जमीन छिनए लेल ठाढ़ समाजक चित्रण केनिहार भेटताह मुदा, मंडल जीक पात्र रमाकांत अपन मोने प्रसन्न्ा मोने वितरण करैत अछि। श्रृति प्रकाशनसँ प्रकाशित पोथि सुन्दर आ छपाइक आकर्षक आवरणसँ युक्त अछि। पोथिक नाम- मौलाइल गाछक फूल उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति प्रकाशन, दिल्ली मूल्य- २५० टाका १९. ०६. २०१० 4. राजदेव मंडल कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र- प्रिय बन्धु, अहॉंक दीर्धकाय ग्रंथ “कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पढ़बाक सुयोग प्राप्त भेल। कतेको साहित्यिक कृति (उपन्यास, कविता, कथा-गल्प संग्रह, नाटक, महाकाव्य, बाल नाटक, बाल कथा, बाल कविता, प्रबन्ध-निबन्ध समालोचना आदि)केँ एकहिं पुस्तकमे संग्रहित कए अहॉं पाठकक लेल एकटा तेहेन पुष्पमाला बना देलिएक जाहिमे लगैत अछि जे विभिन्न रंगक पुष्प एकहिं जगह गॉंथल हो। आ पाठक वृन्द साहित्यक कोनहु स्वाद एहि दीर्घ पोथीसँ प्राप्त कए सकैत छथि। निश्चय अपनेक ई प्रयास साहित्यक लेल नवीन अछि संगहि कर्मठताक साक्ष्य....। हम कोनहु पैघ समीक्षक नहि छी तेँ समीक्षा करबाक दायित्वपूर्ण कार्यक लेल अक्षम छी। तथापि अहॉंक पुस्तक पढ़लाक उपरान्त मनमे जे विचारक उद्भव होएत ताहिसँ अवगत करा देब एकटा दायित्व सन बुझैत छी। तेँ किछु अपन विचार पठा रहल छी। बन्धु, प्रथमत: ई कहबामे हमरा कनियो संकोच नहि होएत अछि जे मैथिली साहित्यक लेल जे अपने साहित्य आन्दोलनक कार्य कऽ रहल छी से साहित्यक लेल तँ एतिहासिक अछिए। संगहि मैथिली प्रेमी, मिथिलावासी सेहो अहॉंक एहि सुकार्यकेँ कहियो नहि भूलत-बिसरत। बालकथा- अहॉं मिथिलांचलमे पसरल छोट-पैघ कथा सभकेँ नवीन रूपेँ संग्रहित कएने छी। अहाँक एहि प्रयाससँ विलुप्त होइत कथा सभ पुन: जीवन्त भऽ उठल अछि। बगियाक गाछ बचपनावस्थामे दादीक मुँहसँ सुनने रही। आइ पुन: पढ़बाक अवसर भेटल। राजा सलहेस, महुआ घटवारिन, नैका-बनिजारा, जट-जटिन इत्यादि कथ्ाा सभ पढ़लासँ लगैत अछि जे एतिहासिक बहुत गूढ़, तथ्यपूर्ण बात सभ सोझा अाएल अछि। क्षिप्रताक साथ अग्रसर होइतो सब बातक संकेत धरि आबि गेल अछि आ ओहि प्राचीण समएक दशा आ दिशाक ज्ञान सहजहिं परिलक्षित भऽ रहल अछि। सामाजिक जिनगीक क्रिया-कलापक वर्णन करैत अहॉं जे चित्र उपस्थित कएने छी। ताहिमे ओहि काल विशेषक प्रेम-घृणा, संयोग-वियोग, उन्नति-अवनति, बैर-प्रीत, शांित-अशांति, वीरता-कायरता, मुर्खता-विद्वता सबटा भिन्न-भिन्न रूपेँ प्रगट भेल अछि। पढ़ैत काल लगैत अछि जे हम दोसर संसारमे प्रवेश कएने छी। ओहि समएकेँ जँ एखुनका समएसँ तुलना करैत छी तँ बुझि पड़ैत अछि जे विकास कते तीब्र गतिसँ भऽ रहल अछि। आ एहि पुरान भेल जिनगीक कथापर कलम चलौनाइ कोनो साधारण गप्प नहि अछि। विषए-वस्तु सभपर जे अहॉं संतुलन बनौने छी से समए आ परिस्थितिक अनुकूल अछि। संकर्षण-नाटक- अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची अपाला आत्रेयी आर दानवीर दधीची-एहि दुनू बाल नाटकमे आहॉं कथा किछु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रकेँ अनुरूपे अछि। कथोप-कथनमे प्रवाह अछि आर छोट-छोट वाक्यक प्रयोग अछि। जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। जेना दानवीर दधीचिक एकटा कथोपकथन : “दधीची- इन्द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि जकर नाम अछि, शर्यणा। अहॉं ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि.....। ओहिसँ नाना प्रकारक शस्त्र बनाउ।” बाल नाटक- बालकेँ ज्ञान बृद्धिक लेल सेहो उपयोगी अछि। संकर्षण- नाटक एकटा नवीन चरित्रसँ परिचित करबैत अछि। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि। एिह अवगुणकेँ प्रतिभा बुझैत रहैत अछि। अवगुणक प्रतिफलपर कनेको विचार नहि करैत अछि। वएह बेकती जखन दिल्ली सन महानगर जाइत अछि तँ रास्तामे स्वगं ठका जाइत अछि। लालकिलामे जूता किनबा काल ओकरा पता चलि जाइत अछि जे ओ ठक विद्यामे कतेक पाछू अछि, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : “गोनर- अहॉंकेँ ठकि लेलक। अहॉंक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि। संकर्षण- मित्र की कहू?......। एहि लालकिलाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि।” छोट छीन कथोपकथन द्वारा व्यंग्य, हंसी आ गम्भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि देब अहॉं लेखनीक विशेषता थीक। नाटककेँ आकार लघु अछि जे नवीनताक सूचक अछि। तथा मिथिलामे पसरल बहुत रास बातकेँ समटबाक प्रयास निश्चय सराहनीय अछि। मंचित करबाक लेल दिशा निर्देश नीक ढँगे कएल गेल अछि। नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परिपूर्ण अछि। आर संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि।। शेषांश आगू देल जाएत- १.डॉ. शेफालिका वर्मा- एकटा लघुकथा २.कथा-नन्द विलाश राय-ऐना १ डॉ. शेफालिका वर्मा एकटा लघुकथा शैतान वृध्ह भ गेल छल , अपन उत्तराधिकारी लेल सर्व्गुन्सम्पन्न शैतान खोजी रहल छल बेकल भय ; सभा बजाओल गेल. शैतान सभ से पुछलक 'के के कोन कोन काज आय धरि केने छी ? दरबार में से केओ बजाक..हुजुर हम एतेक गोटे के खून केने छी जाकर हिसाब नहि ऐछ, केओ हम एतेक बच्चाक खून, केओ हम एतेक स्त्रीक संग बलात्कार केने छी , हम जते जते डकैती करय गेलों ,ओहिठाम केकरो जीवित नै छोढ़लों, हम गाम क गाम उजारी देने छी , हम कतेक अपहरण केने छी से कही नै सकैत छी.; जतेक मुंह ओतेक बात . मुदा , शैतानक माथ लाज से झुकि गेल , बाजल ===छिः छिः ,अहाँ सबहक काज देखि हमरा लाज भ रहल कोनो जोकरक अहाँ सब नहि छी. --परेसान जका चारू क़ात दरबार में ताकलक....... आर केओ छैक ? एकटा प्रौढ़ , सभ्य ,शालीन व्यक्ति उठि के ठाढ़ भेल ,माथ झुकोने विनम्रता से बाजल ----- हमरा ते लहास गिनवाक फुर्सत नहि भेटल , मुदा ,हम जेकर जेकर खून केलों ओ अंत अंत धरि हमरा अपन दोस्त बूझैत रहल.. शैतान ख़ुशी से गद गद भ गेल ..ई थीक हमर राज्यक असली वारिस ....... २. कथा नन्द विलाश राय ऐना हम अपन सारक बेटाक विआहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनियर अछि। ओ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालसँ इंजीनियरिंगक डिग्री लेने अछि। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्नर अछि। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्नर अछि तेहने ओ पढ़ैओ-लिखैओमे तेज छल। ललनक विआह पॉंच लाख टाकामे बैरमा गामक वुच्चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्चन ठाकुर मध्य विद्यालकमे शिक्षक छथिन्ह। अपना बेटीकेँ इन्टर पास करौएने छथिन्ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्द भेल आ ओ ललनक विआह बुच्चन ठाकुरक बेटीसँ पक्का कए लेलक। बुच्चन ठाकुरक चारि लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि गेल। बुच्चन ठाकुर कहलखिन- “जेतेक टाका वॉंकी अछि विआहक दू दिन पहिने भेट जाएत” मुदा, विआह दिन जखन टका नहि पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि- “पाहुन टका तँ बुच्चन बावू अखन तक नहि भेजलक हेँ। कि कएल जाए?” हम कहलअनि- “आइ वियाह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि। विआह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि जे बुच्चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि। चलू शुभ-शुभ कऽ विआह करेवाक लेल।” हमसब दुल्हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्न्ा भेलाह। बुच्चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखिन- “हम समएपर टका नहि भेज सकलहुँ ताहि लेल अपने सभ लग लज्जित छी। मुदा वादा करैत छी, कनियॉं विदागरीसँ पहिने अहॉंक टका दऽ देव।” हमर सार किछु नहि बजलाह। हम कहलयनि- “ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ विदागरीसँ पहिने टका महेश बावूकेँ दए देवनि।” बुच्चन बावू बजलाह- “अवश्य-अवश्य।” अवश्य-अवश्य बजैत ओ आंगन चलि गेलाह आ हमसब वासा पर आवि बैसलौं। जलखै-नाश्ता, चाह-पान आदि सभ चलए लगल। संगहि तिलकक ओरिओन हुअए लगलैक। बरातीक स्वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि भेल। शुभ-शुभ कऽ विआहो सम्पन्न भेल। मुदा बुच्चन बावू अपन वादाक मुताविक कनियॉं विदागरीसँ पहिने वकियौताबला एक लाख नहि दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ किछु नहि मुदा अवैतखान समधी मिलन नहि केलक। हमरा ई गप्प नहि पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्प नहि मानि फटफटियापर बैसि कऽ चल गेलाह। हम कनियॉंकेँ विदागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्जापर जाइते अपन संतुलन नहि राखि सकलौ आ महेशकेँ देखिते कहलियै- “......” क्रमश: ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २५म खेप ३.३.1.राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता 2.मनोज कुमार मंडलक चारिटा कविता ३.४.चन्द्रशेखर कामति-गीत ३.५.शिव कुमार झा- पद्य ३.६.सत्येन्द्र कुमार झा- पांच लघु-कविता ३.७.१.ज्योति सुनीत चौधरी -दूबिक भाग २.सुमन झा "सृजन"-बलि ३. मनीष झा "बौआभाई"-फहराइयै पताका ३.८.१.शिवकुमार िमश्र २.राजेश मोहन झा- गरम जमाना ३.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-दहेज, देशऽक चिन्ता श्री कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! उदासी !!
चानक मुख देखु मलान भेल, भ‘ गेल आव रक्तभ क्षितिज, दुरदिन मानक अनुमान भेल ।।
मुस्की मे हाड़क संदर्शन, आनन पर रूपक भ्रम विशेष, कहवैत रहल जे गालक तिल, से सॉपक विल वनि रहल शेष, ऑखिक तीरक विख पानि नोर वनि, झहड़ल हृदय झमान भेल ........................ ।।
बुझलहुॅ जकरा हम सुधा कोष, ओ पानिक फूटल घैल बनल, कुहरैत अजर केॅ जड़ल देखि, सभ ज्योति स्वयम् मटमैल वनल, रवसि रहल मनोरथ स्फुतनिक, लूना अनेर हैरान भेल........................... ।।
ककरा पर रूपसि करी आश, ई कल्पो विटप बबूर भेल, रोपल अमिसिंचित वर प्रवाल, बढ़ि जेठक ठुट्ठ खजूर भेल, जकरा छाया मे छलहुॅ आइ ओ - पुरना चार पलान भेल.......................... ।।
!! परिचय पात !!
जुनि पुछू परिचय पात सरवे, वरू रहल संग किछु रातुक विच, उठि चलव कि हएत परात सरवे ।।
दू क्षणक लेल वट-विटप वास, जुनि लगबू पथ संपर्क सेज ओम्हर देखी हासे विलास एम्हर कॉपय रहि रहि करेज कानय विषाद लग परवशता आजुक ई अमानत गात सरवे ।।
हम जएव अपना पतिक गाम, अछि पएर पड़ल कर्तव्य वंध ऑखिक आगॉ झलफल अन्हार पुनि बधिर वनल दुहू कर्ण रन्घ्र धुरि जाउ अहॉ अनचिन्ह जकॉ, अछि सजग कहरिया सात सखे ।।
ओम्हर लागल मोनक पियास एम्हर उमड़ल अछि नयन नोर, टपनेक तालु ग्रीष्मक अकाश, पावसक धरातल हमर ठोर अछि अहॅक दृष्टि मे दाह मुदा ई लोचन द्वय स्नात सखे ।।
वासना पिशाचक युगल वाहु, वढ़ि चलल वनाब‘ प्रवल पाश जएतनि शुचिताक कंठ दवा, भ‘ जएत प्रेमक सर्वनाश व्हि गेली देवसरि विचोवीच हम दुनू छी दू कात सखे ।। गंगेश गुंजन: जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । अपन-अपन राधा राधा-२५म खेप पछिला अंक मे अपने पढ़ने रही एते धरि-- ... बूझि नहि सकैये जे किएक भ' रहलैक ओकर मोन बेचैन? किएक भ' रहलैक ओकर परिवार मे अशान्ति ? किएक होअ' लगलैये-अपन स्त्री सँ बेशी काल बिवाद आ किएक रह' लगलैये ओकर जवान होइत धियापुता एतेक असंतुष्ट ? बुझहि मे ने आबि रहल छैक। लोक अबोध अछि। .................................... बयसें परिपक्व परन्तु अज्ञान आब पढ़ू -- दोसर दिसि अनेक तरहक परिस्थिति सभक भ' रहल अछि नित्यहु जन्म विकास। धीरे-धीरे घटि रहल अछि मनुष्यक प्रति मनुष्यक विश्वास । बेशी लोक बेशी काल बुझाएत उदास। चुप्प। हँसी ठहक्का गायब। भरि वातावरण मे दिनक कोनो असमय थकनी जकाँ पसरल जाइत।लगभग लुप्त भेल जा रहलए गामकगाम वासीक स्वाभाविक उल्लास। जखनि कि नित्य बड़ले जा रहलए दोकानक संख्या। दोकान मे चीज बस्तु आ गहिँक आबाजाही। हाटक संख्या। खिन्न खिलखिल क' रहलए जेना शान्त लयक बसात मे सन्ध्या कालक यमुना धार ! बाँचल खुचल बूढ़ पुरान कें ठकमूड़ी लागल अछि, अनमन ठुठ्ठ- ठुठ्ठ गाछ जकाँ। युगक मुखाकृति एक तरहें अछि उल्लसितआ कए तरहे बिखिन्न माथक सुख सं ल' तरबा धरिक सुभीताक अनेकानेक वस्तु जात दनादन बनि क' भर' लागल अछि हाट। सब टा तं सुन्दरे। सबटा तं काजेक बुझाइत। तं आवश्यके बुझाइत। यावत् धरि कोनोटा नहि भेटैत छैक लोक के पाइ-कैंचाक उपाय, ताबते धरि बड़ जी जाँति क' एहि नव सुभिताक सुन्दर बस्तु सभक करैये परहेज। जे कि ड्यौढ़ो-अढ़ैयो लगानी पर भेटि जाइ छैक कोनो गुन्जाइश चट सँ दौड़ रहलए बजार। कीन रहलए पसिन्नक बस्तुजात। भ' रहलय तृप्त सपरिवार ।जहिया जेना घुरब' पड़तै ऋण, तहिया देखल जएतैक। एखनि तँ नहि रहल गेलैक। नहियें रोकल गेलै इच्छा । एहन-एहन वस्त्र आ गहना, ... मामूली तनुकाक जनिजाति सौख सँ पहिरय आ हम जे छी चारि बिगहा भूमिक स्वामी से मोन मारि क' अपना धियापुता, स्त्रीक मनोरथ कें जाँति क' राखी? जोः त्तोरि के । किएक नहि हो हमरो परिवार के ओ से नीक बस्तु हमरो । जे भ' चुकल रहरहाँ भरि गाँव? एतबे दिन मे कए गोटय कए भाषा मे क' गेलय काकु..। -कहू तं जकरा धरिया पहिरक लूरि नहि, से औकाति वला लोक से सब क' रहलए एहि सब बस्तुक बेबहार..आ अहाँ अपना के पुरना मनें आ विचार-व्यवहार सँ जँतने छी। की त इच्छा अनन्त होइत छैक, कतेकक पूर्ति कएल जा सकैये ? तें विवेकी लोक नहि दौड़ऽ लगैये तकरा पाछाँ-पाछाँ। कहियो नै दौड़ल। आवश्यकता कें तें कएने रही सीमित। कम सँ कम।सैह कहि गेल छथि बाप-पितामह। तें ओही बाट के धेने छी। भनें से बाट आब चलितो नहि अछि समाजक बेशी लोक।तै बाट पर काँट कुश, जंगल झाड़, भङेरिक बोन जनमि गेलैये। कए ठाम खाधि-खूद...। पड़ल रहैये एकान्त। आब गौआँ सब कनी दूर भने पड़ै छै मुदा आबा-जाही लेल बना लेलकए एकटा दोसरे बाट। आब वैह व्यवहार मे छै। ध्वस्त आ उपेक्षित पड़ल छैक पुरना बाट। बेशी काल आवागमनक कारणें स्वाभाविके जे जीवन्त रहैत छैक। चहल पहल भरल। तहिना व्यवहार कम भ' गेला पर प्रयोग कम भ' गेला पर, व्यवहार आओर कम होइत गेला पर पुरनना बाट भेल जा रहल छैक सुन्न, एकान्त। बुद्धि ई छैक जे पुरना बाट पर कएटा भ'चुकलैये सर्पदंशक घटना आ राति-बिराति बटोहीक लोटा कम्मलक भ' गेलैये छिना छिनी। चोर उचक्काक आश्रय...। तैं नहि रहि गेलैकए आब ओ पुरना बाट पर चलब कनिको नै निरापद आ सुरक्षित । आब तें ई नबका बाट ! एकरो एकटा खिस्सा अछि- अइ नबका बाट चालू हेबाक खिस्सा... । असल मे जखन होअ' लगलैक बजार-हाटक खूब नफा वला प्रसार आ बनिया-व्यवसायी कें अपन माल ऊघि क' एत' सँ ओत' ओत' सँ एत' अनबा- ल' जयबा मे होअ' लगलै पुरना बाट घट्टीक सौदा, माने अनुपयुक्त--उत्पादन केन्द्र कारखाना ल, जएबा-अनबा मे अनुपयुक्त । यातायात मे असुविधा जनक , तें व्यवसायी समुदाय अपन मालक जल्दी आ किफायतीक संगहि सुरक्षित उघाइक इन्तिजाम मे रचलकए नब मार्गक ई व्यवस्था । गामक आ किचु लग-पास गामक किछु अबंड-लंठ छौंड़ा सब ठेकनाओल गेल एहि व्यवसायी-संगठन द्वारा । ओकरा सबकें कए तरहक लोभ-लाभ देखाओल गेलैक आ तैयार कएल गेल जे सब पढ़ल-अनपढ़ बेकार युवके सब छल। खेलाइत रहैत छल अपन-अपन रुचिक खेल बयसक मोताबिक। अनसमैया कबडी सँ ल'क' शतरंज धरि...।तेहन किछु के दाम द' क' कराओल गेल ओकरा सब सँ एकटा बनोत्री घटना...। जे फलाँ गामक बटोही कें डंसि लेलकै विषधर सर्प। अपना गाम पहुँचैत-पहुँचैत ओकर प्राण छुटि गेलै...। कोन गामक बटोही रहय, की नाम कोन समय से सबटा अज्ञात। तें जाहि व्यक्ति के सर्पदंश भेलैक से तेहन मूर्ख आ अपना जान सं तेहन बे-परवाह तं नहि रहल हएत जे ताकाहेरी नहि करितय। अपनो एही गाम मे जाहि बाटे जा रहल छल? एक सं एक सिद्ध ओझा-गुनी सं तं भरल अछि ई गाम। प्राण पर पड़ने तं मूर्खो कें फुराय लगैत छैक। आबि जाइ छै बुद्धि। ई एकदम मिथ्या समाचार थिक। एकटा बुढ़ा संदेह करैत कहलखिन। बात मे तर्क तं रहनि। मुदा समक्षे ठाढ़ एक युवक तमसा उठल। बुढ़ा के चेतब' लगलनि- ' जेना कि बीचे गाम द' क' छे ई रस्ता जे बटोही दौड़ि जैतै एम्हरे। औ बुढ़ा अपन मूर्ख ज्ञान नहि झाड़ू। ई बात सत्त छैक, हमहूँ जनैत छियै। हमरा आँखिक सोझाँक घटना थिक।' युवक तैश मे कहलखिन । ताहि पर बुढ़ा आओर संदेह ठाढ़ क' देलखिन । -‘ तखन तँ आर मोश्किल बात । कहलखिन- एँ हौ, एहन धोआ-काया रखने छ' आ लज्जा नहि भेल'? तोरा तँ बूझल रह' जे अपना गाम मे कएटा चाटी चलौनहार गुनी अछि। लादि क' कान्ह पर आनि नहि सकैत छलहक?... दोसर जे बटोहीक नामो गाम नहि पूछि भेल'? बिच बाट पर अपटी खेत मे प्राण जयबा लेल छोड़ि क' चल अयलहक?' बुढ़ा फेर तर्क कएलखिन कि युवक तड़ंगि उठलनि - -' जाबत धरि ई बुढ़बा सब याबत् काल धरि जीबैत रहत ताबत्काल गामक बिकास नहि होम' देत। सबटा प्रगति छेकने घिनाइत रहत। बाते ने बुझै छैत। बेर-बेर कहि रहल छियै जे हमरा सोझाँक बार छियै,तैयो बिस्वासे करय लेल तैयार नहि। बड़ अक्किल बला छी, जाउ ओम्हरे बाटे मरऽ। हमरा सब तँ ओइ दिनक बाद पकड़लौं कान। नहि हएब गाम सँ बाहर ओइ पुरना बाट द' क' ।' बाजल । बजिते-बजिते युवक ओत' सँ ससरि गेल। मुदा ओहि अभद्र भाखा मे बुढ़ा संगे बजितो गेला पर कोनो गोटे के साहस नहि भेलनि ओकरा टोकबाक। एहि घटनाक सौंसे गाम प्रचार भ' गेलै। जरूरियो रहैक। ई तं रचने सैह छलैक। एवं क्रमे पुरान बाट आ नव बाटक-बूढ़ पुरान नबका खाढ़ी आ बीच मे ई नव व्यवसायी वर्गक संगठनक प्रबन्धन प्रति दिन फुलाय-फर' आ बिकाय लगलै । एक सं एक अपरिचित नव रूप-शैली मे गामक जीवन बदल' लगलै। से ई बदलाव आ परिवर्तन तेहन उग्र छलैक जे बहुत जल्दीये लोक, संबंधी आ गामक जे किछु संस्थागत रचना छलैक ताहि सब मे खूब तेजी सं प्रकट होअ' लगलै। एकदम देखार। बेशी लोक तँ जेना विचित्र तरहक कछमछी मे पड़ल देखाइ देब' लागल। पुरना पीढ़ी तँ विशेष चिन्तित आ बेशी बेचैन ! एहि वर्गक लोक कें बुझा रहल छलनिहें जे दिन प्रतिदिन आश्रमक सामान्य व्यवस्था मे बड़ बेशी परिवर्तन भ' रहल अछि अप्रिय परिवर्तन। सौदा-सुलुफ कीनब-बेसाहब सँ ल' क' भोजनक विन्यास धरि मे तेहन परिवर्तन जे बुढ़ा लोकनि कें बड़ बेशी अखड़ऽ लगलनि। साफ-साफ आब ई परिस्थिति छल जे आब आश्रम, आमदनी सँ बहुत बेशी खर्चा पर चलि रहलए। से बे-सम्हार रूप मे। आश्रमी खर्च मे मामूली बृद्धि नहि, बहुत अधिक -ड्योढ़ाक लकधक बढ़ि चुकलए।जखन कि आमदनी घटबे कएलय। घटब स्वभाविको। जखन साधने कम हो तँ उपजो-बारी कम हेबे करत। अन्नक उपजा तँ बरखा पर निर्भर। आब नबका ऋतु-प्रकृतिक चलते मौसिमक नियम मे जेना अपने ढील ढाल हिसाब चलिरहल छैक । अधिक काल तँ बर्खा घोर अनिश्चित। विस्मय तं ई जे आब ऋतु अपने अहदी भ' गेल जकाँ बुझाइछ तं । नबका छौंड़ा-छौंड़ी सब जकाँ ऋतुओ अगरजित्त भ; गेलय । कथा के सुनय। जकर जे काज आ ताहि पर परिवार-समाज निर्भर, से आब सबटा काज बिसरि कतहु जीवन जगताक नव लहरि पर गपाष्टक क, रहलय। गरजम गरजा क' रहलय। से गाम आ जीवन मे भ' रहल परिवर्तनक पक्ष आ विपक्ष मे कंठ फाड़ि क' शास्त्रार्थ करबा मे भोर सँ दुपहरिया, दुपहरिया सँ साँझ कएल जा रहलए। मुदा बाड़ीक भाँटा आ मिरचाइ गाछ मे दू लोटा पानि नहि पटाओल जा रहलय, जे कि बेरा बेरी सुखा गेल। बाड़ीक एतबो तरकारी सँ आश्रमक बड़ मदति भ' जाइत रहय। से आब लोक के बेकार बुझाइ छै। लोक बाड़ी-झाड़ीक परिचर्या निठ्ठाहे छोड़ि देलक बुझाइए। कि तँ एतबा तरकारी तँ हाटो पर टटका भेटिए जाइए, तुरन्त। बिना कोनो तरद्दुतक। गाछ सँ तोड़ल तरकारी सब । सेहो भाँति भाँतिक। तरकारिक ई सुभीता कहियो देखल ने सुनल। काँचे तरकारी सब देखि क' जीह मे पानि आब' लागय, तेहन देखनुक ! ताहू पर अपना गाम मे? बनितो केहन सुअदगर-चहटगर छैक। घुरिते फिरते कीनू...आब तँ गाम पर सँ कोनो झोरा-गमछा ल' जयबाक सेहो झंझट नहि । बिसरि गेला पर अगत्या धोतीक ढट्ठा मे तरकारी बान्ह' पड़य, तकरो कोनो समस्या नहि। तरकारिये वला नब-नब रंग-रंगक प्लास्टिकक अत्यन्त हल्लुक-फुल्लुक झोरी मे साँठि क' ध' देत। कोनो बिशेख तरकारी कीन क' ल' जा रहल छी. जे एखनि ततेक महग जे साधारण लोकक वास्ते सपना, से झोरी मे झक-झक देखाइत जायत भरि बाट, लोको सिहाइत रहत! श्रेष्ठ आ सक्षम होयबाक ई मजा अलगे भेटत ।...एखन कोबी तँ फल्लाँ बाबू कत' सेहो नहि रन्हेलनिहें। आ अहाँ अगुआ गेलौं...। चूल्हि पर चढ़ल ने कि भरि टोल सुगन्धि पसरि क' बाज' लागत- जे लिअ' हम रन्हा रहल छी । कोनो काजो मे व्यस्त रहब तँ जीह चटपटाइत रहत। के करैये सविधि स्नानो-ध्यान ओइ दिन !...अपना बाड़ी सँ त भाँटा-ओल-खम्हारु खाइत-खाइत मुँह टुटि गेल। किछु टा स्वाद जेना लगबे बन्द भ' गेल रहय । शहर वला सबकें त बेश सुभिता तकर। मुदा साधन अछैतो हमरा लोकनि कहाँ सँ जाइ चारि कोस तरकारी कीनऽ? के जाय। तें जीहे सैंतने रही।...आब ई गामक हाट । बाह ! मुदा बुढ़ा वर्ग मे एहि विषय मे घोर आपत्ति छनि-ई जिह्वा कें बहसा क' राखि देत। भोगवादी प्रवृत्तिक प्रसार हएत समाज मे । जकरा नहि जुड़तै से कर्ज लेत। स्वादक कोनो एत्ता छैक। नियंत्रण राख' पड़ैत छैक ऐ खएबा-पीबाक प्रवृत्ति पर। देखल छैक गौआँ के जे प्रियदर्शन बाबू जीहेक पाछाँ साकिन भ' गेलाह-साकिन । मुदा नै चेतैये...आपत्ति पर बुढ़ा लोकनि कें चुप क' देल जापत छनि । परिवार मे बुढ़ा-बुढ़ी लोकनिक किछु जूति नहि चलैत छनि आब । द्रव्यक इंतिजाम करबाक टा मुदा एखनहुं बुढ़ेक कर्तव्य छनि। जिम्मेदारी । ताहि द्रव्यक कोन उपयोग आ की ब्यबहार कएल जाय तेकर नियंत्रणक अधिकार नहि हुनका । तैं ओ सब बेशी गोटय क्षुब्ध आ चिन्तित रहैत छथि। ई एहन आमदनी दू पाइ आ खर्चा पाँच पाइक नबका जीवन-शैली सँ बहुत दबाब आ दुःख मे छथि। कहल कोइ मानैत नहि छनि । आ उचितक त्याग कएल नहि होइत छनि । जे बात-ब्यबहार नहि अर्घै छनि, आ तकर आपत्ति करैत छथिन, किछु सुझाव देबाक चेष्टा करैत छथिन तँ कि तं ठाइं पठाइं जबाब द' दैत छनि बा अनठा क' तेना ससरि जाइत छनि जेना मेघ दिस मुँह क' क' टर्र-टर्र करैत रहू । एहि उपेक्षा सँ बुढ़ाक अंतरर्रात्मा थरथरा जाइत छनि । बेशी सँ बेशी अपन ई दुःख आ चिन्ता, बूढ़ही कें कहथिन। मन हल्लुक करबा लेल। बुढ़ी अपने तटस्थ। उन्टे हुनके बुझब' लगैत छथिन- -' जुनि अगुताउ। युगे सैह भ' गेलैये, की करबै? सब घरक तँ एक्के ढाठी देखैत छियै । आनो गाम आ सर-संबंधी द' जे सुनैत छियै तँ दाँती लगैये। मुदा उपाय ? नबकी बहुआसिन नैहरक खिस्सा तँ सुनितहि आदंक ल' लेत। छिया-छिया । आब तँ हुनका गाम मे भक्ष्य-अभक्ष्यक विचार पर्यन्त नहि बँचलनि । जेकरा जे मन, खाइत अछि । बुझले अछि एकहि ठाम कतेक धनिकक बास अछि ओ गाम । से जे इच्छा भ' गेल से हाटक कृपा सँ लक्ष्मी आ तिनकहि बलें नोकर-चाकरक सेवा सँ, तुरन्त उपस्थित भ' गेल। आब बहुआसिनो त एलीहय ओही संस्कार आ रहन सहनक वातावरण सँ , ने। अपना संगे सैह संस्कार ल' क' । हुनको चाहियनि यैह नबके मर-मसल्ला बला रान्हल अनदेसी तीमन-तरकारी। नहि तँ उठाओल नहि होइ छनि होइत कऽर । नब कनियाँ छै, भरि पेट खायको नहि देबैक त... कतेक निन्दा हएत-गाम गाम। तें ध्यान ने दियै। कर' दियौ नेना के जेना जे करैत जाइए आश्रमी इन्तिजाम कनी दिन। आँखि-कान मूनिये लेबा मे सुभीता। नहि सुनै जाइत अछि क्यो कथा बात। उपाय? सौंसे गामे यैह बसात बहि रहल छै। से बसात अपनो परिवार कें तव लगबे करत। तें बुझू जे कोनो अपने टा समस्या आ चिन्ता तँ नहि । भरि समाजेक चिन्ता। होअ' दियौ जे होइ छै ।‘ बुढ़ीक एहि विस्तृत परामर्श सँ बुढ़ा एकटा नवे प्रकारक अनुभव सँ आक्रान्त भ' जाइत छथि। कहू, कहाँ तँ आशा छलनि जे बुढ़ी हुनकर चिन्ताक परवाहि करथिन, कोनो प्रभावकारी समाधान सुझौथिन। मुदा ई तँ उनटे हिनके आजुक युग धर्म बुझाबऽ लगलखिन -जीवनक मर्म आ स्वरूप। ओ तँ हतप्रभ जकाँ भ' गेलाह। यद्यपि कि बुढ़ीक एकहु टा सुझाव अनर्गल बा अनुपयुक्त नहि रहनि। परन्तु बुढ़ा कें कतेक आघात । तमसा गेलखिन । कहलखिन- -' से तँ बड़ दिब । परन्तु हुनका लोकनिक एहि इलबासि लेल बित्त कत' सँ आबय- बित्त ? से के करत ब्यौंत ? हम? भरि जन्म हम ?' बुढ़ा आइ बड़ विचलित छथि। कोनो युगो तँ अंततः, भने अनादि-अनन्त मुदा थिक एकटा अँगने ! जेना पुरबा-पछबा बसात तहिना मनुक्खक जीवन-परिस्थिति मे सेहो समय-समय पर परिवर्तन घटित होइतहि आयल अछि। आगाँ सेहो परिवर्तनक ई प्रक्रिया चलिते रहतै। मनुष्य के अपन स्वभाव आ दिनचर्याक अभ्यासक चलते, परिवर्तनक एहन कोनो बसात तुरन्त स्वीकार करबा मे बहुत समस्या होइत छैक-बड़ तारतम्य। नबताक सहज स्वीकार मे असौकर्जे-असौकर्ज बुझाइत छैक। परन्तु बुद्धि आ चित्त पर जीवन मे गतिमान परिवर्तनक निरन्तर प्रभाव पड़ैत रहैत छैक। प्रत्यक्ष बा परोक्ष। मनुष्य तकर अनुभव करओ कि नहि करओ। बड़ मेंही प्रक्रिया मे चेतना मे प्रवेश करैत चल जाइ छैक। परिवर्तनक स्वरूप जतेक देखार रहैत छैक-प्रत्यक्ष, ताहि सँ बहुत बेसी अप्रत्यक्ष अर्थात् अदृशय । तें जेना बाट चलबा काल भूमिका मात्र दुनू पएर आँखिक होइत छैक मुदा थकनी सौंसे शरीर कें । कोनो बसात जखन बह' लगैत छै तं खास कोनो एकहि टा घर, आँगन-दलान धरि नहि रहिजाइत छैक। भरि टोल आ गाम भरि पर तकर प्रभाव पड़ैत छैक। कोनो एकहि गोटेक पसेना छूटैत देह के नहि, ओहन घर-आँगन-दलान मे रहैत सब लोक कें स्पर्श करैत छैक। हँ, बसातक प्रभाव आ तकर मात्रा मे भेद अबस्स भ' सकैत छैक। जेना बहि रहल पुरुबाक पहिल आ बेसी सघन अनुभव सीमान परक बासडीह के बेशी होइत होइ, संभव। मुदा ई नहि होइत छैक जे बसात ओतहि सँ घुरि क' चलि जाइत होय...। शरीर एहि प्रक्रिया मे मात्र संग रहैत छैक। चलैत तँ छैक पएरे दुनूटा तहिना देखैत छैक आँखि। अइ दुनू अवयब पर देह तँ गाड़ीक कठकी जकाँ ! से ई परिवर्तन सेहो युगक बह' लागल एकदम नवे बसात । से अपना-अपना बुद्धियें जन जीवन के प्रभावित क' रहल छैक। एकर सबसँ उग्र बा देखार प्रवृत्ति बा लक्षण बुझाइत छैक से छैक जे अकस्माते समजक बेसी लोक बित्तक संकट मे पड़ि गेलय। अपना स्वभावक गति व्यवस्था मे केहन दिब चलि रहल परिवार देखिते देखिते ढनमना रहलय। लोक बेसी मानसिक दबाब मे पड़ि गेलय। पहिने जतबा धन सँ गुजर क' लैत छल, ततबे मे आब इन्तजाम नहि भ' पबैत छैक जतबा मे घर चलि जाइत रहै से आब नहि भ' पबैत छैक। अर्थात् भनसा घर जतेक काल खुजल रहैत छलैक से ताहि सँ बहुत बेसी- बेसी काल ब्यबहार मे खुजल रहैत छैक। माने जे भोजनक विन्यास बे हिसाब बढ़ऽ लगलैये। लोकक जीह बेसी पातर भ' गेलैये जेना। जाड़नि बेसी जर' लगलैये। धुआँ बेसी उठ' लगलैये । सभ आँगन सँ। सीसी बोतलसँ भनसा घरक ताख कए क्षण टूटि क' खस' लगलैये आब। बस्तु भूमि पर बेसी हेराय लगलैये। जियान होम' लगलैये। भूमि पर खसला सँ ब्यर्थ होअ' लगलैये। तेल-घीउक टाड़ीक स्थान बेदखल भ' रहलैये। साधारण व्यबहारक मटकूड़ीक स्थान कनिक बेसी तिलिया-फुलिया वला मटकूड़ी ल' रहलैये। कुम्हार लोकनि बिनम्र बोली मे गृहस्थ कें चेता रहलनिहें- -‘अगिला अगहन मे बेसी खोरिस देब' पड़त गिरहत। सब बस्तुक दाम अकास ठेकि रहलैये । सब टा परिवारी सौदा जान सँ बेसी महग भेट' लागलए । सबहक दाम रोजे बढ़ि जाइ मने। जखन कि नब काटक बर्तन बनयबा मे बस्तु, समय आ माथा सबकिछु बेसी लगब' पड़ैये हमरा यौर के। से अगहन मे एकबैक नहि भ' जाइ जाएब अस्तव्यस्त- देबा मे बढ़ा क' सलियाना खोरिस। तें पहिनहीं कहि देब जरूरी बुझाएल । कहि देली।‘ अपना जीविकाक हेतु कुम्हारक ई सावधानी बहुत आवस्यक छैक। नबका-नबका फरमाइश सब तँ ओकरे ने पूरा कर' पड़ैत छैक। से दीपावलीक अवसरक शहरी काटक आकाशदीपक ढबक आपूर्ति हो बा विवाहक पुरहर-पातिल। ओहो दबाब मे अछि। दिन-राति चाक पर बैसल रहैये तैयो नहि भ' पाबि रहल छैक-नबका नबका फरमाइस सब । परन्तु जेना कि संसारक विचित्रता अछि परिवर्तनक एही दबाब मे कुम्हार-कर्म मे सेहो प्रवेश क' रहल छैक नब नब ढब केर माटिक कारीगरी। पुरना तं एक आधे टा, बेसी नबका पीढ़ीक कुम्हार कर' लागलय काज। गृहस्थ कें नीक लगनिहें ओ फरमाइश पर फरमाइश क' रहल छथिन-ओकरे, अनमन ओही काटक मटकूर बना देबा लेल जाहि मे गृहस्थक समधिआओन भार पठौताह । लोको तंबुझतैक जे बौआ सासुरक कुम्हार केहन सुन्दर बर्तन-बासन बना रहलए । दोसर स्तर पर गाम मे आयलि नब कनियाँ सब मे कएटा अछि जे अपना नैहरक बसात । रुचि, बस्तु आ ब्यबहारक बसात। एत' सासुर मे सेहो प्रयोग क' रहल अछि। कउखन तँ सुझाव दैत,मुदा बेसी काल सासुरक आलोचना करैत जे- एखनहुँ ई गाम कतेक पिछड़ल छैक! हमर गामक रहन-सहन कत' पहुँचि गेल, आ अइ गामक चलनि तँ वैह दू सए साल पुरना...।कोनो नबकी भौजी अपना नैहरक गौरव गान करतीह। देओर-ननदि अपना गामक निन्दा पर आपत्ति करतनि-' सर तँ ठीक भौजी !बड़ धनिक आ कुशल कलाकर कुम्हार-कमारक गाम अछि अहाँक गाम। परन्तु एकहुटा नामी पण्डित-विद्वानक नाम भेटत ? एकहुटा नाम जकरा गामक बाहरो चीन्हल जाइत हो? दस-बीस तँ छोड़ू, दुइयो टा तेहन प्रतिष्ठित लोक?' -'जाउ-जाउ, बड़ विद्वान अहाँक गाम। एहन विद्वान गाम भइए क' कोन काजक? दरिद्र छिम्मड़ि तँ अछि सब ।आ स्वयं पण्डित विद्वान। एहेन विद्याक कोन मतलबक? जे बित्त नइ बना सकय, जीवनकें सुख सुभीता नहि उपलब्ध कराबय? पंडिताइ कि लोक धो-धो क' चाटत ? स्वाभाविक जे अल्पबयसी ननदि-दरओर, भाउजिक एहि धिक्कार सँ चुप रहि गेलैक। मुदा ऐकटा नब कनियाँ कहैत रहथिन जखन समयक अपन ई उच्च विचार, सुनि गेलखिन बुढ़ीसासु। एँड़ी सँ मुड़ी धरि लेसि देलकनि हुनका ई बात। कि चोट्टहि ललकि क' बाज' लगलखिन- -'एं ऐ कनियाँ,की बजलौं ? की बजलौं अहाँ? एको मिसिया तकर बोध अछि? अहाँक बुद्धियें तँ, अहाँक ससुरक पण्डित हएब बेकुफिए भेल? धिक्कार ! केहन कुसंnस्कार ल' क' आयलि छी। केहन अछि अहाँक परिवार आ केहन संस्कार द' क' माय-बाप सासुर बिदा कएलनिहें , कहू त। हम तँ पुछबनि बौआ कें-केहन ठाम बेटा बियाहलौं ? मना करैत रहिअनि बेटा मे रुपैया नहि गनाउ। नीक कुलशील मे ई बड़ निषिद्ध बात बूझल जाइए एखनो। आब भोगू भरि जन्म। ससुरे के मूर्ख कहि रहलय, एकहु रती विचार नहि जे ककरा कहि रहल छियैक आ की? कहू तँ, जाहि कनियाँक भरफोड़ी पर्यन्त ने भेलय तकर बुद्धि आ भाखा एहन? दुर्गा दुर्गा।' नबकनियाँ कें एकर आशा नहि छलनि। जहबो करितनि ओ बजबे करितथिन अपन ई विचार तथापि।तखन तँ ओ एक रती माथ पर साड़ी राखि लेलनि, बैसलि रहली। बुढ़ी कहिते रहलखिन ठाढ़ि भ', बेग मे-' तथापि हमरा लोकनि तं विचारि क केने रही अपन सोन सन बौआक ई कथा जे परिवार जे आन तरहेंनहियों मुदा प्रतिष्टित- व्यवस्थित परिवार आ संस्कार वला घर छैक। से ताहि घरक बेटीक ई चर्या ? बिद्याक बिषय एहन बुद्धि? बौआ त हमर पढ़ुआ विद्वान छथि। एही बयस मे जेहन यश-प्रतिष्ठा अर्जित क' लेलनिहें ताहि पर नीक-नीक लोक के ईर्ष्या होइत छैक। जाहि विद्ये बलें एहि कुलक अदौ सँ जगत मे प्रतिष्ठा-मर्यादा, तकरे अहाँ क' रहल छी ई इज्जति ? एना खिधांस? एताबता जे अपनो स्वामी अहाँक मूर्ख ? धिक्कार कनियाँ, धिक्कार ! एहि घटना कें मामूली नहि बूझल-मानल गेल। बहुत दूर धरि उठलैक एकर ज्वारि...।बड़ी दूर तक पसरलै- पहुँचलै एकर समाद जे समाज मे विद्या कें आब डेगे डेग पर कएल जा रहलए बेदखल वृत्त। विद्वान भ' रहल छथि आब अस्तित्व मलिन। धनिकक बढ़ि रहलए प्रचण्ड रूपें प्रतिष्ठा प्रति दिन। ताहि अनुरूप अंकुरा रहल अछि, नबे एकटा फसिल। मनुष्य-मनक खेत मे उपज' लागल अछि एकटा नवे वनस्पति-लत्ती जे कि बेसि समाजक लेल छैक अपरिचित। परन्तु देखाउँस मे भ' रहल अछि बेश लोकप्रिय। एहिसं होइत नहि अछि उपज कोनो खास किछु, मुदा संवर्धित कएल जा रहल अछि, अपना अपनी । गतप्राय खढ़ी कें अनसोहाँत अप्रिय असह्य लगैत छैक, परन्तु करहि पड़ि रहल छैक सहन आ स्वीकार। एहि बेशी पुरान आ उग्र नवताक रुचि विचार प्रायः मुँहाँ ठुठी सँ आगाँ संघर्ष धरि पहुँचि चुकल छैक। बेशी परिवार भ' रहल अछि बेचैन आ क्रमेण स्वभाव सँ आक्रामक । काँट आब फराको सँ सौंदर्यबोधक, सुन्दर हतः स्पृहणीय आ काम्य भ' रहल।तें दलान- ड्राइंग रूमे नहि,आँगन-असोरो पर समवर्धित सुशोभित कएल जा रहल अछि। जाहि कैक्टस कोटि बनस्पति मे संवेदनशीन त्वचा मे गड़ि, बिसबिसयबा, कष्ट देबाक छोड़ि आओर किछु टा गुण नहि,से भ' गेल मनुक्खक नबका सौन्दर्य बोधक आग्रह-अनुराग। से समय आ विचार निठ्ठाहे बदलि रहलए जाहि मे सेहो काँट छल स्वीकृत जेना गुलाब सन फूल, फूलसंग काँटक प्राकृतिक देन- काँट गड़ब अपन धर्म संगे छल लोक कें स्वीकार, गुलाब सुन्दरताक रक्षार्थ सुन्दर, सुन्दर श्रेष्ठ नीकक रक्षा करबाक अपना कर्म गुणकारी स्वभावक कारणें छल काँट स्वीकार। कउखन नेना-सियान, ककरो देह-पएर मे पैघ फोंका घाव पाकि गेला पर असह पीड़ा यन्त्रणा द, रहल शरीर, अंगक फोंका बहा देबा मे छल लोकोपयोगी। तखनहुँ कएल जाइत छल स्मरण से गुलाबक काँट! घाव बहा क' करैत छल मनुक्ख कें कष्टमुक्त, पहुँचबैत छल आराम। मुदा ई नबका-नबका थोका वला सब विशाल विशाल काँट ? जेना काँटेक फूल ।अपन काँटक अपने बनल मालिक। गुण, गन्धहीन घमंडी ! 1.राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता 2.मनोज कुमार मंडलक चारिटा कविता 1. राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता- रूसल धीया- कथीले एलौं सासुरसँ रूसि भऽ गेलौं हल्लुक, गप्प छलै फूिस सासुर बास जीनगीक बास नैहरक बास चासे मास असगरे एलौं आब की रहल बॉंकी ऑंखि उनटबैत बजली लालकाकी- नहि बाजू ढाकीक ढाकी नहि सोहाइत अछि चुप रहू काकी फाटि गेल आब हिया कनैत बजली धीया टूटलाहा घर आ तोतराहा बर थप्पर चलबैमे सभ तुर चरफर सासु चलाबै ठुनका पति भॉंजैत अछि डॉंग केकरा कहबै मोनक बात ससुर पीबैत अछि भॉंग पहिने बचत जान तबने राखब कुलक मान कतबो नीकसँ करैत छी काज तइयो वएह उलहन-उपराग ई नहि छी हमरा भागक खेल जानि बुझि पठेलहुँ ओहि जेल राखि लेलहुँ छातीपर पथ्थल नहि रखने छी डर चाहे किछो बितइ आब नहि जाएब ओहि घर। बसातक धुजिनी सदैव ई मकड़ा सभ बढ़बैते रहैत अछि जालकेँ आ फँसबैते रहैत अछि कीड़ा-फतिंगाकेँ तैयो, भिन-भिनाइते रहैत अछि निडर भऽ कऽ दू-चारि गोट आ तेँ फँसैते रहैत अछि छद्म-चालिमे ओना ई आवृत रहैत अछि निर्बल किन्तु, नहि कएलक कहियो तोड़बाक प्रयास ओ डेरबुक सभ परन्तु- आइ उठल अछि पुरबा बसात आ जोरगर मेघो अछि ओहि कात आबि रहल गड़-गड़ाइत तोड़ैत ताल टूटि जाएत आब ई प्रपंची जाल। अदृश्य आगि- एहि भीतरिया धधरामे जरि रहल अछि हमर ओ आकांक्षाक गाछ कतेक पैघ भऽ गेल छल एकर डारि-पात कतेक झमटगर आ विस्तृत बुझि पड़ैत छल एकर शीर्ष भऽ गेल हो गगनचुम्बी असंख्य लोग बिश्राम पौने हेता एकरा छॉंहमे किन्तु ई अदृश्य आगिक धधरा केहेन निर्मम अछि जे भष्म कएने जा रहल अछि सौंसे गाछकेँ नहि अछि अग्निशामक यंत्र हमरा लगमे आ जँ रहबो करैत तैओ नहि मिझा सकितहुँ जँ मिझायो जाएत तँ कि भेटैत छाउरक अितरिक्त। राजदवे मंडलक दूटा कविता- तीन मित्रक गपशप बहुत दिनक बाद मित्र मिलल तीनूकेँ मनक फूल खिलल पहिल पूछलक दोसरसँ- कहू मित्र सुखी छी वा दुखी उत्तर देलक भऽ कऽ दुखी- सभ कुछसँ छी भरल-पूरल सुरा-सुन्नरी रहैत अछि बगलमे पड़ल तइयो नहि छी सुखी हरक्षण रहैत छी दुखी उत्तरदाता प्रश्नकर्ताकेँ दैत गारि खाली गिलासमे दारू देलक ढारि हेओ मित्ता हमरेटा नहि सताउ किछ अहूँ बताउ- जीनगीक टूटलाहा नाहमे हरदम रहै छी अभावमे तैं ने माथ अछि झुकल ठोर अछि सुखल दुनू तेसरपर ऑंखि गड़ा देलक हाथमे लाल बोतल धरा देलक- अहूँ किछ बाेलू दिलक बात खोलू- हम छी मस्त फकीर नहि अछि कोनो फिकिर देह आ माेनसँ छी स्वतंत्र नहि करै छी केकरो बनगी जी रहल छी अपन जीनगी नहि छी दुखी मनसँ छी पूर्ण सुखी दुनू भेल चकित मुँहसँ निकलल वाणी- अहॉं नहि छी सॉंच या बजैमे करै छी बेमानी पशु छी या देव नहि तँ दानव एहि धरती परक नहि छी मानव। नव बिहार- बनाएव हम नव िबहार छूबि लेब सफलताक दुआर प्राचीण ध्वंसावशेषपर पूर्व मिलल संदेशपर रचबाक अछि मजगूत िदवार सचेत भऽ रखबाक छै ईंटा बारम्बार कर्मरत हो बाल-अबाल उन्नत होएत सबहक भाल सफलता कए रहल पुकार बनाएव हम नव िबहार बिच्छिन्न गेहमे तम छिपल अछि सभकेँ दिलमे गम छिपल अछि एकरा निकालबाक हेतु भऽ जाउ तैयार बनाएव हम नव बिहार पुरान रंग आर संग सजेबाक अछि हरितिमाक रंग नव सृजित सज्जित महल भऽ जाएत तैयार बनाएव हम नव बिहार सुविचार जन-जन करू आइ अपना सभ प्रण करू मिलि कऽ कदम बढ़ेबाक लेल भऽ जाउ तैयार बनाएव हम नव बिहार। 2 मनोज कुमार मंडलक चारिटा कविता- (1) अखन बिहार- समए बदलल बिहारक विकासक गति किछु सम्भरल किछु आगू बढ़ल संगे शिक्षक-शिक्षिका बढ़ल, बिहारक स्थिति बदलए लागल भारतक अर्थनीति बदलल बिहारक असपतालमे डाक्टर बढ़ल शनै-शनै रोगी बढ़ल ई अलग जे रोग-व्याधि सेहो बढ़ल जेना विकास होमए लागल सड़कक नामपर बुढ़िया-फूइस अखरल गिट्टी गड्ढा छल गड्ढ़ा भरए लागल सड़कपर रोड़ा-पथ्थल गिरए लागल लोकक नजरि सड़कपर पड़ल बिहार आब बदलए लागल एतबामे सरकारक मन डोलल एन.एच.57 केँ घोसना भेल सड़कक नाप-जोख होमए लागल घरमे चेन्ह-चाक लागए लागल पेराकातक घर रहने लोक आब पछताए लागल जमीनक टाका भेटए लागल चमचा आर चौबनियॉं नेता जिलाक दफ्तर दौड़ए लागल दफ्तर भ्रष्टाचारीक मंदीर बनल आर चोर उचक्का पूजारी बनए लागल झोड़े-झोरा टाका भेटए लागल घर-द्वार लटकौने रहल जेना मोन जे आब नइ टूटल एकाएक बुलडोजर आबए लागल लोकक भीड़ होमए लागल लोकसँ बेसी पुलिश भरल सबहक घर टूटल लागल लोक बेघर हुअए लागल बाटपर माटि पड़ए लागल चौड़गर बाट बनए लागल बिहारक दशा बएलए लागल। (2) विश्वास- विश्वाससँ चलत जिनगी ककरापर िवश्वास करी अप्पन लगाओल गाछ पतझड़ लेलक बेरानक गाछतर छॉंह पावि कोन कसौटीपर परखब विश्वासेसँ विश्वासी पाएव शोनितक संबंधकेँ सभ मानैत की ओ वेरान नइ अछि बनैत दोसर वंश गलत भऽ सकैत अपनेपर कोना विश्वास करी कुल कोनो बापेक होइत माएक वंश तँ दोसरे होइत कोन पैमानापर नापी मधुर मिलन तँ संयोगे होइत। (3) बेटी बेटी धनक सिंगार अछि मान, प्रतिष्ठा, इज्जत, आवरू सजल सरक ताज अछि भेटल मिथिलाक मैथिली बेटी रूप मुस्कान अछि। कतबो सताबैत बेटीक सुध गाए बनि सुनैत रहैत सुख-दुखमे सम बनि माए-बापक मान रखैत अछि बुझितो पराया बनब अप्पन बनल रहैत अछि। पुरखक समाज अवला कहलन्हि बनि अवला ओ रहैत अछि गुलाबक पंखुरी जकॉं टन-दिन भखरैत अछि स्वाभिमान, इज्जतक प्रश्नपर नागीन बनि उभरैत अछि। बेटा-बेटीक अंतर रहितो अपन अधिकार समटैत अछि माए-बाप मनक बुझितो भायसँ प्रेम करैत अछि बापोक ठोह फाटए लगैत जखन हृदएसँ टुकड़ा अलग होइत अछि। (4) नारी चरित्र शक्तिक प्रतिक नारी रहल धनसँ भड़ल बखारी विद्याक सागर बनल दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी कहाइत पूजा होएत रहल। माए-बहीन, भौजाइ-ननदि काकी, दादी, नानी, बनल बेटी बनि माए-बापक हृदए जुराबति रहल आर जगमे ओ पूजाइत रहल। श्रद्धाक प्रतीक इज्जतक मान रखने रहल नारीक कर्मसँ पुरूष सदासँ अपन मूछ फरकबैत रहल अपन छाती तनने रहल। पुरूखक भीड़मे नित अवला-अबला सुनैत रहल लता बनि हरदम अबलम्ब खोजैत रहल ऑंखि अपन सिकुरैत रहल। जैधी मौसी, मामी एक्के नारी सास बनल केकरो चरण छुएलक केकरो गारि सुनैत रहल केकरो लेल देवी बनल केकरो जॉंघतर पड़ल रहल। सजल सँबरल बनैत मरूत रूप-अलंकारसँ देवी नाम पड़ल दया, ममता, सिनेह, प्यारक जीवन भरि सुमन िबखैरति रहल। धिरज हेरा डुबाबति अधर पुरूखक मन ललचाबए लगल खुट्टा तोड़ि जखन बौराएल देवीसँ कुल्टा बनल समाज नीचताक प्रकाष्ठापर अपन टॉंग गरौने रहल। धन जीवन अनिवार्य टाका नइ जीवन बनत जहि टाकासँ मान रहत टक्के लेल मान घटबैत रहल। कुल स्वाभिमानी बनैत पुरूखक ओ पाग बनैत कोन दुरकाल मनमे उठल जे कुल कलंकक भार बनल नारी ममताकेँ सागर ओ कोना नर काल बनल। चन्द्रशेखर कामति पिता श्री योगेन्द्र कामति, ग्राम+पो.-करियन, जिला- समस्तीपुर, जन्म-तिथि-०३-०१-१९५९, शिक्षा- एम.ए. गीत टिकली करय चमचम मुँह छै महिसक चाम सन देखि कऽ पड़ेलौं कनियाँ लागय कारी झाम सन कारी-कारी मुँह बड़-बड़ आँखि टुकुर-टुकुर अन्हरियाक कीड़ी जकाँ बड़य भुकुर-भुकुर ठोरो लागय जरल-जरल चिनिया बदाम सन...॥ नीपल-पोतल नाक तैपर खुट्टा सन-सन बुट्टा हब्बर-हब्बर बाजब मुँहमे पानक गुलुट्ठा पेटोक कटनि लागय टिनही डराम सन...॥ मधमोंगर सन देह लगैए डम्फा सन-सन डाँर नाकोसँ चुबैए जेना पसबय केओ माँड़ हाथो पएर लगै छनि जेना टिटहीक टांग सन...॥ शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम : शिव कुमार झा,पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि : 11-12-1973,शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न
!! कोना क‘ अंतिम नमन करव !! (कन्या भ्रूण हत्या पर एक छोट रचना)
कोना क‘ अंतिम नमन करव, ऑचर केॅ अहॉ कलंकित कएलहुॅ पुत्र जन्म सेहंतित सपना मे करूणाधारिणी निर्दयी भेलहुॅ ।। नहि देखलहुॅ आदित्य नहि शशिक शिखा, नहि नभ देखलहुॅ नहि देखलहुॅ वसुधा नहि भेटल छोह नहि मृदुल क्षेम, नहि मोती माणिक्य रजत हेम, पॉच मास अहॅक गर्भ मे रहलहुॅ जनपरिजनक तिरस्कार सहलहुॅ अपैत बूझि कएलहुॅ अहॉ गर्भपात भेल अपूर्ण नेना पर वज्रपात अछि कोन ओ शक्ति मनुसुत मे जे बेटी मे नहि दर्शित भेल मणिकर्णिका क शंखनाद सुनिते वृद्ध कुंवरक यौवन झट धुरि गेल दुःख एक्के वातक तातप्रिया सृष्टि देलनि संतति केॅ गरल पिया पावन आर्यभूमिक सुनयना वैदेही केॅ देलीह माटि मिला भववंधनक ई केहेन दर्शन नीर क्षीर विनु वीतल जीवन तजि गेल प्राण त‘ अनल अर्पण अमिय मधु सॅ पुत्र कएलनि तर्पण एक वेरि हमरो जौ कहितहुॅ अहॉ जीवन मे सुधा वोरि देतहुॅ मॉ देतहुॅ सतरंगी परिधान पुत्र सॅ वढ़ि क‘ करितहुॅ सम्मान दिअ आशीष हमर जननी फेरि वेटी वनि नहि आवी अवनी नहि सूखय पुनि नव किसलय दल नहि जल सॅ पहिने भेटय अनल सत्येन्द्र कुमार झा पांच लघु-कविता 1. अकासमे मेघ पसरल जा रहल छै धरा धरि कारी-कारी मेघक परछांहि एखने बरसतै मूसलाधार बरखा बाहर पसारल गोट-गोट कपड़ा समेट अयलहूं, दलान पर सूतल बाबूटा मात्र छूटि गेला ।
2. केस बढ़ल, कटा लेलहूं नह बढ़ल, काटि लेलहूं कतौ देहमे भरि रहल छै एकटा विषकुम्भ, अमाषयक नीचां सभ कहैछ- जुनि हटाब’ एहि कुम्भके प्राणो जा सकैछ’ अदौकालसं जीबिये रहल छै मनुक्ख- एहि विषकंुम्भक संग । 3.
छोटका लत्तीमे भरिपोख जल ढारैत छी लत्ती क्रमषः बढ़ल जा रहल छै । एकटा बांसक फट्ठी लगा देने छियै लत्ती ओहिमे लपटा रहल छै । बगलमे ठाढ़ एकटा पुरान पीपरक गाछ समयसं पहिने उपेक्षित भेल ‘ठाढ़’ अछि । 4.
कविता स्नेह अछि, भूख अछि सत्कार अछि, व्यवहार अछि । मुदा- नहि अछि कविता रोटी, कपड़ा, मकान आ नचैत/नचबैत बजार ।
5. भूख सभके लगै’ छै भूख सबहक लेल छै भूख सबहक मेटाइत छै मुदा मायक भूख- नहि खत्म होइत छै कखनो बेटाक थारीमे अपन हाथक बनल तिलकोरक तरूआ दैत बेटाक भूख माइयेमे सन्हिया जाइ छै । १.ज्योति सुनीत चौधरी -दूबिक भाग २.सुमन झा "सृजन"-बलि ३. मनीष झा "बौआभाई"-फहराइयै पताका १ ज्योति सुनीत चौधरी दूबिक भाग घासक फुन्गी पर बैसल दूबि सोचैत अपन भाग केहेन गति हैत की जानि अन्त लीखल ककर हाथ जँ पुजारी के हाथ लागत खोंटत सब सम्हारि कऽ श्रद्धा सऽ अर्पित करत पूजामे ईश्वरक नाम लऽ दुर्गति नहिं कोनो आन एहन पड़त लोकक बाटमे जॅ पिसाएत अन्त हैत तखन बाट बटोहिक पैर सऽ चरवाहा के ध्यान पड़लापर लऽ जायत घर उखाड़िकऽ नहिं तऽ अपन माल जाल चरायत ओतय आनिकऽ। २ सुमन झा "सृजन", कोसी कॉलनी, निर्मली, सुपौल। बलि- चुपचाप ठाढ़ भऽ देखने छल ओ जखन ओकरा शहरमे भेल छल पहिलुक बेरि दू जातिक बीच तकरार। खामोश छल ओ तखनहुँ जखन अाबि गेल छल हाथमे तलवार रूकले रहल ओ तखनहुँ भोरे-भोर आ सभ भिनसर हत्याक खबरिसँ सजए लगल छल अखवार। ३ मनीष झा "बौआभाई" फहराइयै पताका देखू मिथिला नगर के फहराइयै पताका जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा जतक नारी जानकी श्रीराम केर भामिनी जतक सभ्य संस्कृति के गाबै छथि रागिनी ई नगरी अपन छोट नगरी जुनि बुझू अछि सगरो जगत में मचौने धमाका जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा हल्ली-मदन-वाचस्पति के ख्याति छन्हि विद्यापतिक गीत सब गुनगुनाइत छन्हि परमज्ञानी सत्यदेव ज्योतिष के ज्ञाता मिथिला कहल जाईछ संपन्न गुणवाला जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा कोइली कुहुकि स्वर पंचम में गाबय झमझम बरसि मेघ कजरी सुनाबय भोरे पराती गाबैइयै सुग्गा परवा स' सजय रोज मंदिर-शिवाला जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा नीपल जाईछ पीढ़ी गोसाऊनिक नित रोजे पूजा के शंखनाद कोश-कोश गूजे घर-घर में शालिग्राम, तुलसी के चौरा घोघ तर में नारी लागय सीता आ राधा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा तुलसिक पनिसल्ला में कूश आ डाबा नाग पूजल जाइछ ल' क' दूध संग लाबा पातैर में भोग लागय आम-खीर-पूरी जगदम्बाक कृपा स' हटल रहय विघ्न बाधा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा यश-कीर्ति-वैभव स' परिपूर्ण मिथिलांचल जनक जीक न्याय के देवतो सब मानल "मनीषक" अछि कामना जे बढ़ू सब आँगाँ मैथिलक विचार उच्च, जीवन होइछ सादा जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा १.शिवकुमार िमश्र २. २.राजेश मोहन झा- गरम जमाना ३.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-दहेज, देशऽक चिन्ता १ शिवकुमार िमश्र बेरमा, तमुरिया, मधुबनी] बिहार कविता- भलमानुस समाज- व्यवहारिक लोककेँ घाटा होइत छैक मरनोपरान्त ओकर नाअो लैत छैक सोनमा हमरा गामक सबहक काज करैत छैक तकरेपर सभ खुब गड़जैत छैक व्यवहारिक लोककेँ घाटा होइत छैक कॉमरशियल लोककेँ घाटा सुझैत छैक सामाजिक लोक घाटा नै बुझैत छैक समाज आओर सामाजिकताक परिभाषा लोक दैत छैक मुदा, ओ लोक किएक नै समाजसँ जुडै़त छैक व्यवहारिक लोककेँ घाटा होइत छैक शिवजी अपन भावनापर नोर पोछैत छैक ककरो किएक नै अपन बुझैत छैक जाति-पातिक ढिढ़ोरा सेहो पिटैत छैक तेकरा सरकारमे किएक स्थान दैत छैक व्यवहारिक लोककेँ घाटा होइत छैक। २ राजेश मोहन झा राजेश मोहन झा ''गुंजन'', पिताः- स्व० काली कान्त झा ''बूच'', माता :- स्व० चन्द्रकला देवी, जन्म तिथिः- ०५/०९/१९८१ जन्म स्थानः- ग्राम० - करियन जिला - समस्तीपुर पिन - ८४८११७ सम्प्रतिः- स्टेशन मास्टर, दक्षिण पूर्व रेलवे, खड़गपुर मंडल !! गरम जमाना !!
औ बाबू ई गरम जमाना । नगर सिनेमा आर चौवाट, अधिकारक झंडा नेने हाथ, ठोकथि ताल नेत्री गण मिलिक‘ पुरूष जाति सभ बनल बेगाना ।। प्रतिशत तैंतीस जल्दी चाही नेना भूखे वरू काटथि काही, खसावथि वज्र लगावथि अॅगराही, अप्पन जन भ‘ गेल बेगाना ।। ममता रखैत छथि कोठीक कान्ह पर, सम्मेलन करती‘ पुनमा वान्ह पर सगर नियोजन हिनके चाही, मर्द वनल फाटल पैजामा ।। साड़ी मे नहि हिनका देखवै, वेल‘ पड़त सोहारी तखने बुझवै जौ वैसलहुॅ वेदी वर कहियो, जीवन भरि भरवै हर्जाना ।। २ कृष्ण कुमार राय ‘किशन’
परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं। जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। दहेज दहेजक नाम सुनि कऽ कांइपि उठैत अछि ,माए-बापऽक करेज कतबो छटपटायब तऽ लड़कवला कम नहि करताह अपन दहेज। ओ कहताह, जे बियाह करबाक अछि तऽ हमरा देबैह परत दहेज पाई नहि अछि तऽ बेच लिय अपना जमीनऽक दस्तावेज। दहेज बिना कोना कऽ करब हम अपना बेटाक मैरेज दहेज नहि लेला सऽंॅ खराब होयत समाज में हमर इमेज। एहि मॉडर्न जुग मे तऽ एहेन होइत अछि मैरेज आयल बरियाति घूरीकऽ जाइत छथि जऽंॅ कनियो कम होइत अछि दहेज। मादा-भूर्ण आओर नव कनियाक जान लऽ लैत अछि इ दहेज ई सभ देखि सूनि कऽ काइपि उठैत अछि ‘किशन’ के करेज। समाज के बरबाद केने जा रहल अछि ई दहेज बचेबाक अछि समाज के तऽ हटा दियौ ई मुद्रारूपी दहेज। खाउ एखने सपत ,करू प्रतिज्ञा जे आब नहि मॅंागब दहेज बिन दहेजक हेतै आब सभ ठाम सभहक बेटीक मैरेज। देशऽक चिन्ता
किनको छनि स्वार्थक चिन्ता किनको छनि घूस लेबाक चिन्ता नेता सभ के अछि कुर्सीक चिन्ता मुदा किनको नहि अछि, देशऽक चिन्ता। चुनाव जीतलाक बाद, कुर्सी भेटलैन्ह नेताजी के भऽ गेलाह निःफिकीर मुदा भाषणेटा मे खिचैत छथि आर्थिक विकासऽक लकीर । भूखे मरैत अछि गरीब जनता एहि बातक हुनका नहि छनि कोनो चिन्ता शहीद होइत छथि देशऽक सीमा पर जुआन कानब तऽ दूरक गप, श्रद्धांजलियो दैए लेल नहिं औता। नेता सभ मंत्रालय लेल छथि परेशान कियो स्वार्थसिद्धिक लेल अछि हरान कियो भूखे मरि जाए, कियो दहा जाएय बाढ़ि मे मुदा हुनका नहि, जेतैन मरल लोक पर धियान। घूस खाईत-खाईत भऽ गेलाह भ्रष्ट मुदा खादिक अंगा पहिर, अपना के बुझैेत छथि श्रेष्ट कोना कऽ हेतै आर्थिक विकास नहिं सोचैत छथि, नहि छनि चिन्ता। सभ पार्टी के तऽ अछि कुर्सीक चिन्ता मुदा किनको नहिं अछि देशऽक चिन्ता। बालानां कृते मुन्नी वर्मा, १.कविता-समाजक विडम्बना २.लघुकथा-1.हमर संस्कार 2. करैलाक मीठ गुण मुन्नी वर्मा, निर्मली, सुपौल कविता- समाजक विडम्बना देख कऽ ई समाजक विडम्बना विआहब आब हम धिया कोना चारपर खढ़ नहि पेटमे अन्न नहि नै अछि संगमे एक्को अना मांग भेल ड्राइवरकेँ लाख मास्टर आ डाक्टरक नै पुछूँ बात दिनक उजयारि भेल कारी, भेल घनघर राति ई हमरेटा नहि जन-जनक दुखरा अछि बेटिबलाकेँ मलिछ बेटाबलाकेँ खिलल मुखरा अछि नन्हिटा धिया हमर भेल आब सयानी तिलकक एहि युगमे बिआहव कोना बिटिया रानी बहि रहल यऽ अरमान सभ, जेना मुट्ठीमे पानि लघुकथा- 1.हमर संस्कार आंगनमे बैसि बिट्टू कखैनसँ ने चारू भर चौकन्ना भऽ सभ घरकेँ निग्हारैत छलाह। पता नहि कतैक सबालसँ अपन माथकेँ ओझरौने छलाह। ओ सदिखन सोचैत छलाह- किएक होइत भीनसर घरमे बगड़ा फुदकए लगैत अछि। आखिर ओकर प्राण हमरे घरमे किएक लटकल रहैत अछि। किएक नहि ओहो आन चिड़ै जकॉं गाछ-बिरीछपर रहैत अछि? एक दिन बाबासँ बिट्टू पुछलक- “बगड़ाकेँ हमरा सभसँ िकएक नै डर होइत छै? हम तँ ओकरा कखनो नोकसान पहुँचा सकै छी।” बाबा बिट्टूक बात सुिन मुस्कुराइत बजलाह- “बौआ, हमर उँच संस्कारक पहचान यएह बगड़ा छी, जे नीकसँ बुझैत अछि जे हमर संस्कार एकरा नोकसान नहि पहुँचा सकैत अछि। मिथिलाक समर्पणक खिस्सा विश्व भरिमे पसरल अछि। जहिना बच्चाकेँ जकरासँ दुलार भेटैत अछि ओ ओकरे अपना बुझए लगैत अछि। एहिना ई बगड़ा मिथिलाक घर-घरमे दुलार पबैत अपन घर बसबैत अछि।” 2.लघुकथा- करैलाक मीठ गुण- सासु-पुतौहक नाता तँ खटगर-मीठगर होइत अछि। रगर-झगरक बीच पीसाइत ई संबंध हमरा समाजमे एक प्रतिष्ठित उँचाइ पबैत अछि। एहि ठकराउक मुख्य कारण ई होइत अछि- ने सासु पुतौहकेँ बेटी जकॉं दुलार करैत अछि आ ने पुतौह सासुकेँ माए जकॉं सम्मान। प्रियांसी बी.ए. पास नव विचारक महिला अछि। जे सासुरमे पएर रखैत सासु-पुतौहक उँच-निचक दीवारकेँ खदेर देलक। ओकरा नैहरसँ ई बात मनमे गड़ि गेल छल जे सासु माने हुनकर माए कहैक मतलब ई जे ओकरा नजरिमे सासु आ सतौत माए दुनू एक्के सिक्काक दू परत छी। एहिसँ प्रियांसी सोचलक जे सासुर जाइत ई बुढ़िया अपन सासु गिरि करैत एहिसँ पहिले हम एकर लगाम तनने रहब। तखने हमरा ई सासुर बसए देति। कोहवरसँ निकलैत प्रियांसी डाढ़मे ऑंचरक खुट खोंसैत तइपर दुनू हाथ धऽ सासुकेँ कहलक- “सुनि लौथु हम जेना नैहर रहैत छलौं तहिना रहबनि, हम सासुरक जहलमे नहि खटबनि, मंजूर छन्हि तँ कहौत नहि तँ हमरा दुनू परानीकेँ अखने अलग कए दोथू।” घोघ तरसँ बाजि उठल कनियॉंकेँ ई बोली सुनि सासु तिलमिला गेलीह। मुदा मर्यादाक सम्मान आ कुटुमक ख्याल करैत बजलीह- “आब ई राज-पाट अहींकेँ छी। एकरा अहॉं जेना राखी आइसँ एहि परिवारक मान-सम्मान हम अहॉंकेँ सोपैत छी।” प्रियांसी अपन व्यवहारसँ सासुरक लोककेँ नाकोदम कए देलक। जएह गरम मिजाज नैहरमे छल सएह तेबर सासुरोमे काइम करैत ओ उधियाइ छेलीह। ने भैंसुरक लेहाज आने ससुरक इज्जत ओकरा लेल सभ ओकर दिअर जकॉं छल। घरबलाकेँ तँ गणेशीए बुझैत छलि। ओ अपना आगॉं सभकेँ हीन बुझि हँसि दैत छलि। एकर एहि व्यवहारकेँ लाेक ओकर मतिछीन्नू बुिझ चुप रहि जाइत छल। कोइ ओकरासँ मतलब नहि रखैत छल। ओकरा घरबला सेहो ओकरासँ हरिदम रूझाइल-रूझाइल रहैत छल। किछु मासक बाद प्रियांसीकेँ अपन व्यवहार आ परिवारमे अपन स्थितिक नीक जकॉं ज्ञान भऽ गेल ओ बुझि गेलि जे लड़कीकेँ हरदम बेटीए नहि पुतोहुओ बनि कऽ रहबाक चाही। एगो नीक मनुक्खक निर्माण बदलैत परिस्थिति आ समऐ करैत अछि। अगर नदीमे बाढ़ि नहि आबै तँ तलाबक पानि समुद्रक गहराइकेँ कोना जानि सकैत अछि। तहिना बेटीकेँ उछलैत पैरमे मान-मर्यादा, परिवार, समाज आ देशक दायित्वकेँ बेड़ी बान्हि ओकरा अपन कर्तव्यक ज्ञान कराओल जाइत अछि। सासु बेटीसँ बनल पुतौहकेँ फुलक पगरी सोपैत अछि। जहिमे ओ अपन ई काज कुमहार जकॉं करैत अछि। जेना कुमहार माटिक बर्तनकेँ पीट-पीट आ भट्ठीमे पका कऽ दुनियॉं योग बनबैत अछि। ओहिना सासु कखनो मीठगर तँ कखनो तीतगर बोलीसँ मक्खनसँ पालल बेटीकेँ दुनियॉंक अनुरूप बना कऽ ओकर व्यक्तित्वक निर्माण करैत अछि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list) 6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 6.1.NAAGPHAANS-PART_X-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The Directors DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS X Akshat – Do you know Akanksha, everybody gets overshadowed by Ma’s personality. Her personality illuminates the entire family. You have time and again observed that Babuji reads each and every single line on Ma’s face – What Ma is thinking – Why she is thinking – Akshat had also studied the emotional heart of Ma – He had himself experienced that – but he had failed to convince Akanksha of the same, but his efforts were on. Why do you interfere into the lives of children. Both son are well-settled, they have their own family – Now they should be left to take their own decisions – they should understand their responsibilities otherwise they will always look to you in the moment of crisis – Harish always used to advise Priya. Priya understood this fact – she never wanted to interfere. Harish also advised her – if someone asked for your opinion, do not give – and if nobody asked for your opinion then never give it. Yes I should never interfere – they have their own family- they are aware of their duties and responsibilities. Moreover, even I also have no time to spare. Akanksha was beautiful, blessed with all the qualities, but when something happened to her disliking, it enraged her and she appeared as volcano with anger. Sometimes Priya felt strong love for her – touching her chin she used to say – you are a very good kaniya – please always remain loving and kind-hearted. 2 One day when guests left, kitchen was completely disorganized and unclean – all the utensils were unclean and scattered – the remaining food items and dishes were also lying on the dining table. Akanksha – Ma, please empty the utensils – I will clean them. Priya emptied all the utensils including cookers and dongas and adjusted everything in the fridge – only Priya could do this adjustment. Akanksha started cleaning the vessels – She also kept on murmuring – How much could I do – everyday is a test for me. From tomorrow I will only prepare daliya, everyone will have to eat the same. Priya silently continued with emptying the vessels – it was 11 o’clock in the night – Akanksha was annoyed – Priya was upset and thought – Why on some particular day maximum guests arrived? Atithi Devo Bhava – with this feeling all the guests were welcomed – she inherited this sanskar from her parents – but she was worried about kaniya. Priya told her – You please leave it, I will clean the utensils. Akanksha – No .. No I will do it. Priya then silently decided to do the entire household chores from tomorrow onwards. Priya recalled her naiher [ parents’ home] and life over there – she had three sisters, father was very strict in their education – throughout the day all the four sisters remained busy with household works, at the same time they were always at the service of their parents – after 11 pm they got the opportunity to study for their B.A., M.A. – they had to battle against coal, wood and goyatha [cow-dung cake] – now replaced by gas stove, cooker, vim powder and many other facilities – Dhara, do you know - human beings are now enslaved by these comforts leading to physical disorder and many unwarranted diseases. Dhara remained calm and mute. Priya went on and on – Akanksha cleansed all the utensils and retired to her bedroom. Then Priya rearranged the utensils such as plates, bowls, tureen, spoons, forks, ladle, spatulas, knives, whisks, glasses, frying pans, sauce pan, jugs, cup and saucer etc – cleansed the gas stove, collected entire trash in dust-bin. She was told from the very childhood that kachra or debris was never thrown in the night otherwise goddess Lakshmi would desert the house. 3 Priya became overtired and felt exhausted– moreover, servant had already left for his village. Even when servant was around, Priya used to manage the entire household work. It is easy to construct a house, but its finishing i.e. wood work, grill fitting, distemper etc. is a gigantic and huge task. Similarly both cooking and cleansing are easy, but not the rearranging and dusting. Besides at this advanced age of 55 it is difficult to manage the household work – She thought – initially you are expected to do your duty to please the in-laws, then to husband, then to children and now to satisfy bahu so that she remains happy – is this the life-cycle of every woman? Akshat – Ma, what is the matter? – I see you brooding all day. Priya – Nothing son. Akshat – Ma, no doubt I am always a child for you but why this beguilement? Priya – Oh my god. You always pester me. My only concern is how to make Akanksha happy. Akshat – This is too much Ma. Rather it is her duty to make you happy. Do you know on occasions something happens to her when she starts behaving awkwardly – she behaves like a child. Priya got disturbed – Akanksha should have respected her sentiments, cared for her knowing fully that her father-in-law is away from India. Right since her birth, daughter showers love and affection everywhere – daughter is like water which adjusts according to the shape of the vessel whether it is glass or jug or lota – it is neither her exploitation nor cowardice, but the high watermark of her magnanimous personality – she lives for everyone, she sacrifices her happiness for others and in turn gets happiness through sacrifices. No efforts should be made to convert daughter-in-law to daughter. Daughter remains daughter and daughter-in-law remains daughter-in-law. Son is aware of each and every gesture or movement of mother. Daughter-in-law comes from a different family, a different background. She is not able to understand the inner sentiments and emotions of mother-in-law. 4 But there are many examples where the girl from a cultured family becomes closer to mother-in-law than a son. At many other places, son starts looking at his parents, brothers, sisters through the eyes of his wife. Dhara consoled Priya, saying – give up the hope for converting daughter-in-law to daughter. If she is able to perform her duties as daughter-in-law, it is sufficient. Every mother-in-law initiates her life as daughter-in-law and more or less undergoes the similar experience. Priya – But didi, the house rests on daughter-in-law. Daughter has to leave her parents’ house. Women’s life has two parts – father’s house and husband’s house. At father’s house, she gets parental love and care and at husband’s house she enriches the entire environment showering the flowers of love, care, kindness and generosity. Didi, there is also another dimension. These day parents unnecessarily interfere into the life of their daughter which ultimately destabilizes their daughters’ happily married life. If mother-in-law exploits the daughter-in-law, there are many vice-versa cases. Dhara – Priya, there were certain good things in our earlier tradition – it was always considered good to marry the daughter to a boy residing at far away places. Parents were not aware of her condition on daily basis. Daughters used to build their home bravely and gained self confidence by facing both the periods of happiness and sorrow alike Do you know Priya, in our Mithila area when daughter comes to parents’ home from in-law’s she is welcomed with stale cooked rice i.e. Bhat and Bari so that she should not stay there for a longer period. Priya reacted laughingly – What a curious tradition. Dhara – Priya, why to quarrel with a person whom you can not change. You should not argue with a person who is quarrelsome and obstinate. If you brood over your mistake, your failure, it will lower down your confidence, your self-esteem and finally your mental balance. Priya – Then what should I do? How can I convince myself? 5 Dhara – What is under your control – your nature, your loving and caring attitude. IntellectuallyYou are an enlightened person. You can not help those who fail to understand you, unable to reach to your mental heights. If You can not control their behavior, their approach towards life, their mental faculty, their thoughts and thinking – then why to worry, why to lead a stressful life? If you are happy, Harish will be a happier person. If today children commit mistakes, tomorrow they will mend their behavior. Mistakes are mainly the by-products of the existing time and situation – afterwards they become matter of past – once there is change in situation, there will be change in attitude – only one thing remains permanent i.e. love and affection. Conditions are temporary but love is forever. Priya – Didi, life is like a river but bounded with shores on the both sides – it is like a rose encircled with thorns – it is like candle light but braving the fierce wind for survival. No Didi, it is impossible to bear the bite and sting. Dhara – Do you know Priya, - the river shores do not prevent the flow but protect it, whenever river wants free flow, it cut loose, breaks all shackles – Thorns protect rose from being plucked by unwanted fingers – fierce winds do not blow out the candle light but inspire and prepare it to face the hostile conditions and the challenges of life. Priya – I can not compete with you intellectually – you are the source of knowledge. Dhara – No Priya, each action has its own causation – do you not feel – Simant has settled down in England, now Kadamba has also joined a job here – if some event takes place in present time, it will be comprehended and understood only in future – You should look at the positive side of life which is full of happiness and satisfaction. Life is unknown like vast sky and unfathomable like vast sea and this is the beauty of life. One experiences the life through ones’ own eyes and heart. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The Directors The theory of Economics makes a company survive And a survival (human) depressed Relish of the hatred and relishing the hatred The world of prostitution Is not limited to the dancers’ house Has entered into The politics, the economy and The tourism industry! Amrapali drives the vehicles wearing glasses The character of Mrichchakatik is in the hotel business The scholar of the new caste system- Aamrapali became Shakuntala in the new degrading society Conversation ended, diversity raised Hence the village-life is the same Widows, depressed classes, poverty – all the same The amber and red Flashing lights at junctions Rushing towards, cleaning window screens Selling newspapers and magazines The depressed class of the new caste system The queue of children The destitute eyes A young beggar holding a baby in her arms With broken legs Forwarding with broken legs But in the junction The children begging in groups with attitude Alms for blessing If money is donated then fine Maligning otherwise In the field of other industries too The black smoke from the coal furnace Labourers turned to black ghosts They are also in depressed class Of the new caste system The houses of the owners of the cottage industries As luxurious as the king’s palace Drunk and insane But the government is determined To support the small industries Supporting the small industries or their directors? Establish company with the federal loan Wound up the company He is the director not the owner If the company occurs loss Workers suffer No harm to the directors The company dies The theory of Economics makes a company survive And a survival (human) depressed In the market of Delhi and Mumbai In the fish market and the vegetable market Cook in the hotel Caste is ignored in son’s and daughter’s marriages The widow marriage is acceptable But when they visit native villages By whitening the thoughts with blue of conservativeness The scheduled caste of the new caste system Resumes the old system of castes The green grocers become jaybars (lower Brahmins) And the black figures of industrial area After applying soaps Become the bhalmanush (the good Brahmins) of the village The cooks of the hotels turn into soit (the best Brahmins) The sardars turn into kayastha And Paswanji chooses depressed caste In the journey to return to cities They will mix the old and the new caste systems The trains witness the game of the castes The dark circles of eyes of the victims of the system The sting of white sari of a young widow The Amrapali and the characters of Mrichchakatik- Charudatta and Vasantsena Relish of the hatred and relishing the hatred The world of prostitution Is not limited to the dancers’ house Has entered into The politics, the economy and The tourism industry! १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, उमेश मंडल भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:
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(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.com पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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