VIDEHA — Issue 62 / अंक ६२

Publication: VIDEHA · Issue: 62
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129 'विदेह' ६२ म अंक १५ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६२) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.प्रेमशंकर सिंह- सामाजिक विवर्त्तक जीवन झा २.२.१.-गजेन्द्र ठाकुर- यू.पी.एस.सी.१- भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान २.-सुभाष चन्द्र यादव २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- संगी २.४.निबन्ध-बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन २.५.१.मुन्ना जी- अधिकार २.बेचन ठाकुर-बेटीक अपमान- दृश्‍य पाचि‍म २.६.जितेन्द्र झा- विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी २.७.कुसुम ठाकुर- अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक !! २.८.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- बपौती संप्पति ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक दूटा कवि‍ता २.इन्द्रभूषण कुमार- दहेज ३.३.- कुसुम ठाकुर- हाइकू ३.४.रमा कान्त झा सौराठ -गीत ३.५.१.मृदुला प्रधान-एकटा आपबीती२.मनोज कुमार मंडल- कि‍सान ३.बेचन ठाकुर- घरनी-बीसा ३.६.इन्द्रकान्त झा- गीत ३.७.नन्‍द वि‍लास रायक आठटा कवि‍ता ३.८.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-हाकिम भऽ गेलाह ४. मिथिला कला-संगीत-श्वेता झा चौधरीक चित्रकला ५. बालानां कृते-शिव कुमार झा-     खोंइछक लेल साड़ी ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_XI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The  Death  Of  Own  Choice 8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। http://www.videha.co.in/videhablog.html "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय मिथिलामे बाहरी लोकक आगमन आ मिथिलासँ दूर देशमे पलायन, ई दुनू घटना निरंतर होइत रहल अछि। मुदा आइ कालिक पलायन एहि अर्थें विकट रूप लऽ लेने अछि कारण विगत तीस सालक अवधिमे भेल पलायन मिथिला गामकेँ खाली कऽ देलक। 1981 ई. मे पटनापर बनल महात्मा गाँधी सेतु आ पटना दरभंगा डीलक्स कोच सभक पाँती मिथिलावासीक हेँजक–हेँज बाहर बहरएवामे योगदान केलक। तत्कालीन सरकार सभक राजनैतिक आर्थिक शैक्षिक सामाजिक आ सांस्कृतिक एहि सभ क्षेत्रमे विफलता एकटा आधार तँ बनबे कएल, स्वतंत्रताक बादक तीस साल बिहार स्थित मिथिला आ नेपाल स्थित मैथिली भाषी क्षेत्रक बीचमे एकटा विभाजक रेखा सेहो खींचि देलका। 1960 ई. मे बनल कमला बान्ह आ एखन धरि अपूर्ण कोसी परोयोजना मिथिलाक ग्रामीण आर्थिक आधारकेँ तोड़ि कऽ राखि देलक। प्राचीन कालक पलायन आ आइ काल्हिक पलायन मध्य एकटा मूल अंतर सेहो अछि। मिथिलाक मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण काएस्थ अपन विद्वत्ताक प्रदर्शन, पठन पाठन आ दोसर राजाक दरबारमे जीविकोपार्जन निमित्त प्राचीन कालहि सँ जाइत छलाह, तँ गएर मैथिल ब्राह्मण–कर्ण कायस्थ जाति वाणिज्य, अंगरक्षक आदिक कार्य लेल दूर देशक यात्रा करैत छ्लाह। प्राचीन कालमे मोरंग आ पछाति भदोही मिथिलाक बोनिहारक श्रम किनबाक केन्द्र बनल, मुदा एहिमे मोरंग नेपालक मिथिलाञ्चलमे पड़ैत अछि मुदा एकरा प्रवास एहि लेल कहल जाए लागल कारण ओतुक्का शासक गएर मैथिल गोरखा भऽ गेल छलाह।

पलायनक विभिन्न स्वरूपः- पलायन एकटा ऐतिहासिक प्रक्रियाक अंग अछि। अहाँक क्षेत्रक भौगोलिक स्थिति कोन देशमे अहाँकेँ पटकि देने अछि ताहिपर सेहो। से मोरंग लग रहलोसँ भारतक मिथिलाञ्चलक वासीक लेल पछाति कम लोकप्रिय भेल कारण ओ दोसर देशमे अवस्थित भेलाक कारण विभिन्न कारणसँ पलायनक लेल अनुपयुक्त भऽ गेल। कोलकाता स्वतंत्रताक बाद निकटवर्त्ती मेट्रो नगर रहए से लोक ओहि नगरमे खूब पलायन केलन्हि मुदा जखन विभिन्न राजनैतिक–आर्थिक नीतिक संकीर्णताक कारणसँ बंगालक उद्योग–धंधा चौपट भऽ गेल, शैक्षिक केन्द्रक रूपमे ओकर महत्व कम भेल तखन पलायनक केन्द्र मुम्बइ आ दिल्ली भऽ गेल। बोनिहार आब भदोही आ मोरंग नञि वरन पंजाब–हरियाणा आ पश्चिमी उत्तरप्रदेश जाइत छथि आ बनिजार बाहरसँ मिथिलामे भरि गेल छथि। दरभंगा राजक गलत आर्थिक नीतिक कारण आरा छपराक लोक सभ भूमि आ कामतक अधिपति कोना भऽ गेलाह से जगदीश प्रसाद मण्डल जीक साहित्यमे पूर्ण रूपसँ देखार भेल अछि। 1936-37मे बर्मासँ सेहो भोजपुर बक्सरक लोक पूर्णियाँ, अररियामे भागि कऽ एलाह, डुमराँवक हरि बाबू हिनका सभकेँ बर्मामे बसेने छलाह आ बर्माक भारतसँ अलग भेलाक बाद ई लोकनि शरणार्थी बनि एहि क्षेत्रमे आबि गेलाह। कतेको बर्मा टोल एहि क्षेत्र सभमे अहाँकेँ भेटि जाएत। एहि क्षेत्रमे कृषि–वाणिज्यपर हिनको सभक दखल भेलन्हि। मिथिलामे भेल पलायनमे 1971 ई. मे बांग्लादेशक निर्माणक लगाति ओतुक्का हिन्दूक किशनगंजमे आ बादमे ओतुक्का मुस्लिमक पूर्णियाँ किशनगंजमे आगमन भेल। बाहर भेल पलायनक विरूद्ध भीतर आएल ई पलायन मिथिलाक बोली–वाणी सभ वस्तुकेँ प्रभावित कएलक। जाति–धर्म आधारित विवाह मुस्लिम, राजपूत आ भूमिहार मध्य मिथिलाक भौगोलिक परिधिसँ बाहर हुअए लागल ताहिसँ सेहो बोली–वाणीक अंतर दृष्टिगोचर भेल।   पलायन नीक आकि अधलाहः- पलायन जे बाहर जाइ वला आ भीतर आबै वला दुनू तरहक अछि केँ अहाँ कोनो तरहेँ नहि रोकि सकै छी। मुदा एक खादी मध्य भेल ई विकट पलायन मूल मैथिल बोली–वाणीक पलायन विकट समस्याकेँ जन्म देलक। भुखमरी जे वादि-अकाल आनलक, तकरासँ तँ मुक्ति भेटल मुदा सांस्कृतिक अकाल सेहो ई आनलक। गामपर बोझ घटल, लोककेँ बटाइ लेल जमीन नै भेटै छलै, आब से बै छै, मुदा तकर विपरीत मिथिलाक भीतर शैक्षिक केन्द्रक पूर्ण समापन भऽ गेल, बाहरी बनिजार एतुक्का आर्थिक बाजारपर कब्जा कऽ लेलन्हि। विशालकाय सड़क परियोजना, आ सूचना प्रौद्योगिकी, टेलीविजन, अखबार, पत्रिका आदि ततेक पूँजी केन्द्रित भऽ गेल जे ई स्थानीय वणिकक औकातिक बाहरक वस्तु भऽ गेल। क्षेत्रक राज्य–सभा आ विधान परिषदमे जखन बाहरी पूँजीपति प्रवेश कऽ गेल छथि तखन आर कथूक चर्च की करी?   पलायनक निदानः- हा पलायन केने काज नै चलत। जेना इस्रायलक प्रवासी ओकर शक्ति–सिद्ध भेल छथि तहिना मैथिल प्रवासी सेहो मिथिलाक लेल ओतुक्का भाषा–संस्कृति–साहित्य आ अर्थनीतिक लेल सहायक सिद्ध हेताह मिथिला राज्यक मांगमे बीचक स्थिति जेना बिहारक अंतर्गत मैथिली भाषी क्षेत्रमे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिली हो, मैथिलीक रेडियो स्टेशन, टी.वी, चैनल लेल कम लाइसेंस फीस राखल जाए, इ मैथिली पत्र–पत्रिकाकेँ सरकारी विज्ञापन भेटए आदि मांग–आदि सेहो धोंसियेबाक चाही। राज्य जहिया भेटत तहिया भेटत उपरका 2-3 बिन्दु जे भेटि जाएत तँ एकटा उपलब्धि होएत आ लोकमे तखने जागृति आएत तखने ओ मिथिला राज्य एकर आर्थिक–शैक्षिक राजनैतिक स्थितिपर ओ विचार कऽ सकताह आ आंदोलनक भाग बनि सकताह।

(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०४ देशक १,४१४ ठामसँ ४५,०४० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,४८,५७५ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com तारानन्द वियोगी: (मिथिला सृजन: जून-जुलाई २०१०, वर्ष-१, अंक-२): हुनक (पंकज पराशरक) अनेक रचना एहनो छनि जकर जन्म दोसरक काव्य रचना पढ़लाक अनन्तर भेलनि अछि। कविता ओ परिपूर्णतः हुनके थिकनि मुदा किछु गोटेकेँ ई कहबाक अवसर भेटि गेलनि जे ओ पंकज चोर-कवि थिकाह। हम देखैत छी जे चोर समीक्षक भने ओ होथु, चोर-कवि ओ कदापि नहि छथि। मुदा एना किएक भेल? एहि दुआरे भेल जे आनक रचना पढ़ि कऽ अपन अनुभूतिमे उतरैत काल ओ आनक आभामंडलसँ तेना आक्रान्त छलाह जे तकर छाप कविताक दृश्यमे देखार पड़ि गेल। ई वस्तुतः सिद्धताक कमी थिक, जकरा क्यो रचनाकार रचिते-रचिते सिद्ध कऽ सकैत अछि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। We should be greatful to Pankaj Parashar that he did not lay claim on the magnum opus of Kavi Vidyapati. I know him very well and his group as well. They have no love for Maithili in fact they are the moles planted by vested Hindi writers to damage maithili. Parashar and likes are the distructive lots and they are the culprits for agonising senior writers of Maithili those who dedicated their life for Maithili language and literature. I have no sympathy for him. I cant say, even, God bless them.- Chitra Mishra पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण, ( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी आ प्राच्य आ पाश्चात्य रचनाक / कविता सभक निर्ल्ज्जतासँ पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि।  ई पंकज झा पराशर पहिनहियेसँ एहि सभमे संलग्न अछि, हरेकृष्ण झाक कविताकेँ हिन्दीमे, बिना अनुमतिक, छपबै छथि ,डॉक्टर हुनका तनावसँ दूर रहबा लेल कहने छन्हि। ई गप आर पुष्ट होइत अचि कारण विद्यानन्द झा जीक कविता सेहो ई पंकज झा पराशर एकटा हिन्दी पत्रिकामे बिना अनुमतिक छपबओलक, माने ई आदत हिनकर पुरान छन्हि। सम्पादक) Recently Some Maithil Brahmin Samaj Organisation has started selling prizes in the name of Yatri (Vaidyanath Mishra, Nagarjun) and Kiran (Kanchinath Jha) . There has been trend recently to grant these prizes to those intellectual thiefs who are basically opposed to the ideology's of Kiran and Yatri (Nagarjun). The caste based organisations are killing the spirit of Yatriji and Kiranji, recently the fraud Pankaj Jha alias Pankaj Kumar Jha alias Pankaj Parashar alias Dr. Pankaj Parashar) was stage managed to get this casteist award, The lecturer of Hindi at Aligarh Muslim University, just appointed as adhoc staff, will teach now how to lift verbatim articles of Noam Chomsky and Douglas Kellner and poems of Illarani Singh and Arun Kamal to his students. His Samay ke akanait (समय केँ अकानैत) is lifted from Magadh of Srikant Verma (श्रीकान्त वर्मा- मगध) and his Vilambit Kaik Yug me Nibaddha (विलम्बित कइक युग मे निबद्ध) is collection of pirated poems of Illarani Singh Srikant Verma and others.ई संग्रह इलारानी सिंह, श्रीकान्त वर्मा, गजेन्द्र ठाकुर, राजकमल चौधरी आदि कविक पंकज पराशर द्वारा चोराएल रचनाक कारण बैन कए देल गेल। "रचना"पत्रिकाक कथित अतिथि सम्पादकक रूपमे पंकज पराशर द्वारा कवि-कहानीकार सभसँ रचना सेहो मँगबाओल गेल आ तकरा अपना नामसँ छपबाओल गेल। ई छद्म साहित्यकार पराशर गोत्रक (!!)पंकज  कुमार झा उर्फ पंकज पराशर बहुतो लेखकक अप्रकाशित रचना अनुवाद करबा लेल सेहो लेलक आ अपना नामेँ छपबा लेलक। पाठकक आग्रहपर आर्काइवमे ई तथ्य राखल जा रहल अछि।- सम्पादक We deplore the selling of these prizes to a person who has brought respect of Maithili to a lower level.

तारानन्द वियोगी: (मिथिला सृजन: जून-जुलाई २०१०, वर्ष-१, अंक-२): हुनक (पंकज पराशरक) अनेक रचना एहनो छनि जकर जन्म दोसरक काव्य रचना पढ़लाक अनन्तर भेलनि अछि। कविता ओ परिपूर्णतः हुनके थिकनि मुदा किछु गोटेकेँ ई कहबाक अवसर भेटि गेलनि जे ओ पंकज चोर-कवि थिकाह। हम देखैत छी जे चोर समीक्षक भने ओ होथु, चोर-कवि ओ कदापि नहि छथि। मुदा एना किएक भेल? एहि दुआरे भेल जे आनक रचना पढ़ि कऽ अपन अनुभूतिमे उतरैत काल ओ आनक आभामंडलसँ तेना आक्रान्त छलाह जे तकर छाप कविताक दृश्यमे देखार पड़ि गेल। ई वस्तुतः सिद्धताक कमी थिक, जकरा क्यो रचनाकार रचिते-रचिते सिद्ध कऽ सकैत अछि। गौरीनाथ (अनलकान्त))- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे- हँ, दंद-फंद करैवला किछु लोक सब ठाम पहुँचि जाइ छै आ तेहन लोक एतहुँ अपन धूर्तता आ चोरि कला देखबै छथि। मुदा तकरो असलियत उजागर करब असंभव नइँ रहल। "विदेह"क गजेन्द्र ठाकुर एहन एक "युवा" (पंकज झा उर्फ पंकज पराशर) क असली चेहरा हाले मे देखोलनि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr  and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html  बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि। पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) “बही-खाता”क एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा “हिसाब” नामसँ छपबाओल गेल- देखू राजकमल चौधरी बही-खाता एहि खातापर हम घसैत छी संसारक सभटा हिसाब ... ... हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल अछि एक्कर सभटा पाता ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता जीवन-खाता पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ... द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल हिसाब हिसाब कहिते देरी ठोर पर उताहुल भेल रहैत अछि किताब जे भरि जिनगी लगबैत छथि राइ-राइ के हिसाब- दुनिया-जहान सँ फराक बनल अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि हिसाबक किताब। २००६ एहि लेखकक खौँझा कऽ अपशब्दक प्रयोग बन्न नहि भेल अछि आ ई नाम बदलि-बदलि एखनो एहि सभ कार्यमे लिप्त अछि, आब ई अपन धंधा-चाकरी सेहो बदलि लेने अछि। स्पष्ट अछि जे एकरा विरुद्ध कड़गर डेग उठाओल जएबाक आवश्यकता अछि। उपरका समस्त जानकारी अहाँ गूगल, चिट्ठा जगतकेँ दी से आग्रह आ तकरा नीचाँ ई-पत्रपर सेहो अग्रसारित करी सेहो अनुरोध। vc.appointments@amu.ac.in, bisaria.ajay@gmail.com, vedprakas_s@yahoo.co.in, tasneem.Suhail@gmail.com, rajivshukla_hindi@yahoo.co.in, merajhindi@gmail.com, ashutosh_1966@yahoo.co.in, ashiqbalaut@yahoo.in, abdulalim_dr@rediffmail.com, zubairifarah@gmail.com, RameshHindi@gmail.com एहि लेखकक दिमागी हालतिक असली रूप एहि जालवृत्तपर सेहो भेटत जतए ओ न्जाम बदलि-बदलि अपन पुरना मालिकक कम्प्यूटरसँ घृणित पोस्ट करै छल। http://tirhutam.blogspot.com/ २. गद्य २.१.प्रेमशंकर सिंह- सामाजिक विवर्त्तक जीवन झा २.२.१.-गजेन्द्र ठाकुर- यू.पी.एस.सी.१- भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान २.-सुभाष चन्द्र यादव २.३.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- संगी २.४.निबन्ध-बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन २.५.१.मुन्ना जी- अधिकार २.बेचन ठाकुर-बेटीक अपमान- दृश्‍य पाचि‍म २.६.जितेन्द्र झा- विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी २.७.कुसुम ठाकुर- अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक !! २.८.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- बपौती संप्पति प्रेमशंकर सिंह 1942- ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार। सामाजिक विवर्त्तक जीवन झा उनैसम शताब्दीक पंचम दशकमे आधुनिक मैथिली साहित्यक क्षितिजपर एक प्रतिभा सम्पन्न साहित्य मनीषीक आविर्भाव भेल जे अपन नवोन्मेषशालिनी प्रतिभाक प्रसादात परिप्रदीत्पि प्रकाश पुञ्जसँ बीसम शताब्दीक प्रथम दशक धरि अबैत-अबैत मैथिली नाट्य-साहित्यक पूर्ववर्त्ती परम्परामे क्रान्तिकारी परिवर्त्तन आनि, परवर्त्ती युगक नाट्यकार लोकनिक हेतु एक उन्मेष, नमोन्मेषक नेतृत्व नवीन नाट्य गद्यक जनक, प्रगतिशील विचारक, संवेदनशील मनोवृत्ति, कल्पनाशील मस्तिष्क, सरस रोमांचक अनुभूति एवं मैथिल समाजमे परिव्याप्त समस्याक प्रति अतिसाकांक्ष भ’ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक स्तुत्य प्रयास कयलनि, ओ रहथि शलाका पुरुष कविवर जीवन झा (1848-1912) राजदरवारसँ सम्पोषित रहितहुँ ओ जन-जनमे चेतनाक दीप जरौलनि, कण-कणमे उत्साह पसारलनि आ क्षण-क्षणमे सर्जनाक दिशा निर्दिष्ट कयलनि। युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक समाज आ साहित्य बौद्धिक उत्तेजनाक लहरिसँ गुजरि रहल छल। राजनीति, समाजनीति, अर्थनीति, धर्मनीति, संस्कृति, संगीत, नाटकक एवं चित्रकारीपर वैज्ञानिक प्रभावक फलस्वरूप परिवर्द्धन, परिवर्त्तन, परिमार्जन प्रारम्भ भ’ गेल छलैक। शिक्षाक नवज्योतिक फलस्वरूप सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक चेतनाक उदय भेल, जकर स्वाभाविक अभिव्यक्ति हिनक नाटकादिक प्रमुख केन्द्र विन्दु थिक। ओ एक दूरदर्शी साहित्य चिन्तक सदृश आशा-निराशाक मिलन-विन्दुपर जनमानसकेँ देखलनि। ओ नैराश्यक अन्धकारमे आशाक दीप जरौलनि। युगीन परम्पराकेँ नीक जकाँ चिन्हलनि तथा युगानुभूति एवं कालक सत्यताक कोनो स्थितिकेँ अभिव्यक्त करबाक शक्तिकेँ दमित नहि क’ पौलनि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामाजिक विषमताक हुँकार, तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक उपस्थापनमे अक्षर पुरुष प्रमाणित भेलाह। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टिसँ जखन हम हिनक नाटकादिक परीक्षण-निरीक्षण करैत छी, तखन हम ओकरा समसामयिक सामाजिक स्थितिक दर्पण, सांस्कृतिक वैभवक धरोहरि आ आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त समाजक यथार्थ एलबम कहि सकैत छी। ई सर्वविदित सत्य थिक जे ओहि कृतिकारक कृतित्व अक्षय रहैछ, जे सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवनक वास्तविक प्रतिनिधित्व करैछ, जनिका हृदयमे उपर्युक्तक प्रतिपूर्ण आस्था रहैछ तथा ओकर अधःपतनकेँ जन मानसक समक्ष रेखांकित क’ सचेष्ट हैबाक प्रेरणा दैछ, कारण साहित्य तँ हमर जीवनानुभूतिकेँ प्रतिविम्बित करैछ। युगपुरुष जीवन झाक नाटकादिक प्रेरणास्रोत थिक नवीन जागरणक ज्योति। अपन सजग आँखिएँ ओ देश-देशान्तरक विकासोन्मुख गतिविधिपर दृष्टि निक्षेप कयलनि, एहि विषयक अनुभव कयलनि जे मैथिल समाजमे नवजागरणक अभाव अछि। ई अपन नाटकक कथानकक चयनक निमित्त मिथिलाक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थिति दिस दृक्‍पात कयलनि तथा अपन युगक वास्तविक समसामयिक स्थितिक रूपायन ओहिमे कयलनि। संस्कृत पण्डित रहितहुँ जीवन झा आधुनिकताक पूर्णपक्षपाती अपन कृतित्वमे दृष्टिगत होइत छथि। मिथिलांचलमे परिव्याप्त वैवाहिक समस्या छल तकरा केन्द्र-विन्दु बनाय सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे देशन्नितिक निमित्त नाटकक माध्यमे जन-आन्दोलनक प्रेरणा देलनि, कारण मिथिलामोद ओ मैथिल महासभाक आविर्भावसँ पूर्वहि ई अपन नाट्य कृतिमे ओकर समाधानार्थ विचार प्रस्तुत कयलनि। मैथिल समाजमे तिलक-दहेज, जाति-पाँजिक नामपर कन्यापर होइत अत्याचार एवं अन्याय एवं अन्य सामाजिक कुप्रथापर प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ अपन आलोचनात्मक दृष्टिकोण जनसामान्यक समक्ष प्रस्तुत कयलनि। सामाजिक पृष्ठभूमिकेँ आधार बनाय ई मैथिलीमे नाट्य-लेखनक शुभारम्भ कयलनि। हिनक तीन सम्पूर्ण नाटकक सुन्दर संयोग (1904), सामवती पुनर्जन्म, नर्मदा सागर सट्टक एवं खण्डित मैथिली सट्टक समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिक उद्देश्य निर्धारणमे सहायक होइछ। वस्तुतः हिनक नाटकादिमे मैथिल समाजक विश्वास एवं संस्कारक प्रतिविम्ब भेटैछ, जकरा माध्यमे ओ उच्च जीवनक प्रतिष्ठाक आकांक्षी भेलाह। हिनक सम्पूर्ण नाट्य-साहित्यमे व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तरक सन्निवेशक कारणेँ मिथिलांचलक वातावरणमे परिव्याप्त अछि। विवाहक चौमुखी समस्यापर आधारित वासना, प्रेम, मिलन आ विछोह यद्यपि हिनक नाटकक केन्द्र-विन्दु थिक, जकर समाजशास्त्रीय एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन अपेक्षणीय अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे मैथिल सामाजिक जीवनक अधिकाधिक प्रामाणिक रूप सुन्दर संयोग एवं नर्मदा सागर सट्टकमे प्रस्तुत करबामे ओ सफलता प्राप्त कयलनि। हिनक नाटकादि मात्र मनोरंजनक हेतु नहि, प्रत्युत जीवनक गम्भीर समस्याक समाधान करबाक उद्देश्यसँ उत्प्रेरित भ’ रचना कयलनि। एकर नायक-नायिका मिथिलांचलक परम्परागत कुलीन प्रथाक रूप प्रदर्शित करैछ। यद्यपि सामवती पुनर्जन्मक कथानक पौराणिक पृष्ठभूमिपर आधारित अछि, तथापि ओकर प्रत्येक पात्र समसामयिक समाज, संस्कृति एवं आर्थिक पृष्ठभूमिमे उतारल गेल अछि। सुन्दर संयोगमे नाट्यकार समाजक ओहि मानसिक स्थितिक विश्लेषण कयलनि अछि, जे जाति-पाँजि, कुलीनता, बिकौआ प्रथापर प्रचलित बहु-विवाह आ पत्नी-परित्यागक सन विकृतिसँ उत्पन्न होइत छल। तथाकथित कुलीनजन अनेक बियाह करैत रहथि आ पत्नीकेँ नैहरमे छोड़ि दैत रहथि। भलमानुसक पत्नीक जीवन गति इएह छलैक। विवाह क’ कए जाथि आ जीवन भरि वापस नहि आबथि। दाम्पत्य सुख एहन कन्याक निमित्त जीवन भरि अननभूत सत्य बनल रहि जाइत छलैक। ओ ने तँ कुमारिए रहैत छल आ वास्तवमे सधवे। सधवा रहितो वैधव्य-वेदना सहैत रहैत छल। एहन स्थितिक चित्रण निम्नस्थ पंक्तिमे व्यि‍ञ्जत भेल अछि: सीमन्तक सिन्दूरक रेखासँ छी हम धन मन्ती। हाथक दू लहठीसँ होइछ सधवामे नित गनती। मिथिलांचलमे कुलीनताक बलपर प्रतिवर्ष विवाह करब सामान्य बात छल। समाजमे एहन परम्परा प्रचलित छलैक जे एक ठाम विवाह आ चतुर्थी सम्पन्न क’ कए दोसर ठाम पुनः विवाह करैत छलाह। कुलीन व्यक्ति विवाहोपरान्त पलटि क’ जयबाक प्रयोजन नहि बुझैत रहथि। समयक क्रममे अपन पत्नीक आकृति आ सासुरक लोककेँ बिसरि जाथि। अत्यल्प परिचयक कारणेँ सर-कुटुम्बकेँ नहि चिन्हब तँ सर्वथा स्वाभाविक। एहन विषम स्थितिमे कन्याक माता-पिता, समाज आ कन्याकेँ केहन मानसिक यातना होइत छलैक, निराशा आ विषादसँ आछन्न मनःस्थितिमे कोना जीवन यापन करैत छल मे स्वतः कल्पनातीत छल। कोनो सौभाग्यशालिनी कन्याकेँ पुनः दाम्पत्य जीवन प्राप्त होयतैक, कतेक उल्लास होयतैक, केहन हर्ष होयतैक, ओहो काल्पनिक अछि।मिथिलांचलमे प्रचलित कन्यादानी शब्द ओही परिणीता, किन्तु परित्यक्ता नारीक यातनामय इतिहासकेँ अपनामे समेटने अछि। युगपुरुष जीवन झाक समसामयिक सामाजिक वातावरणमे ई परम्परा परिव्याप्त छल। सामाजिक जीवनमे ई प्रतिष्ठाक विषय छल। नाटकककार एहि सामाजिक परिस्थितिसँ पूर्ण अवगत रहथि। एकर दुष्प्रभावकेँ ओ अनुभव कयने रहथि। समाजक ओहि परिवेशमे कन्यापक्षक मानसिक अन्तर्द्वन्द्वकेँ ओ सुन्दर संयोगमे अभिव्यक्त कयलनि। समाजक समक्ष ओ सुन्दर मिश्र सदृश आदर्श पुरुषक रूपमे प्रस्तुत कयलनि। सुन्दर मिश्र अपन सासुरक प्रत्येक व्यक्ति, अपन पत्नीकेँ तखने चिन्ह जाइत छथि, जखन हरदत्त पण्डा हुनक ससुरक पूर्व पुरखाक नाम गाम बाँचैत छथि। ओ चतुर्थी दिन पत्नीक अस्वस्थताक कारणेँ सासुर छोड़ि देने रहथि। ओ अपन पत्नी पर्यन्तकेँ नहि चिन्ह पौने रहथि। इएह स्थिति तँ सरलाक ओकर माय, ओकर परिवार, ओकर सखी-बहिनया ओ समाजक छलैक। किन्तु सभक मनमे आशाक किरण छलैक जे भलमानुस सुन्दर मिश्र विवाह क’ कए चल गेलाह तँ आ ने बिकौआ वर जकाँ नहि जे आबथि। एहि मानसिकताक अभिव्यक्ति सरस्वतीक कथनमे अभिव्यक्त भेल अछि। जखन ओ वैद्यनाथकेँ प्रार्थना करैत छथि; हे वैद्यनाथ! जे जे कबुला कैल सभ मनोरथ पुरल, आब जमाइकेँ कुशल पूर्वक देखी से वरदान दिअ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ 12)। सरस्वतीक मनोभाव अत्यधिक पल्लवित भेल अछि, जखन ओ अनचीन्हेमे (अपन जमाय) सुन्दर मिश्रकेँ कहैत छथिन, हेँ बाबू! बड़ पुण्य रहैत तँ एकर ई वयस भेलैक जमाय चुतुर्थिअहिक दिन एकरा दुखित छोड़िकेँ जे गेलाह से आइ धरि उदेशो ने पबै छिऐन्ह! (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-14)। जखन पण्डाइन संकेत करैत छथिन जे पण्डित बाबू सरलाक वर थिकथिन तखन हुनक निराशा व्यक्त होइत छनि, एहन भाग हमर कहाँ जे जमायकेँ देखब परन्तु वैद्यनाथ बड़ गोट थिकाह।(सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-19) सरलाक मनोव्यथा तावत धरि अव्यक्त रहैछ जावत धरि ओकरा संकेत नहि भेटैछ जे पण्डित बाबू सम्भवतः ओकरे वर थिकथिन। तत्पश्चात् ओकर विरह व्यथाक अभिव्यक्ति भेल अछि। मुदा ओ सामान्य विरह नहि थिक। सरलाक कथन गद्य आ गीतमे सामाजिक परिवेश-जन्य विषाद बजैत अछि, हे वैद्यनाथ! ऐ तरहेँ दुखिनीकेँ किए सतबैत छहक। (सुन्दर-संयोग, पृष्ठ-20) मे दुखिनी शब्दक मार्मिकताक अनुभूति तखने भ’ सकैछ, जखन ओहि समयक सामाजिक परिवेशक अनुभव हो। ओहि सामाजिक कुप्रथाक पृष्ठभूमिमे सरलाक कथन विशेषार्थ बोध भ’ जाइछ; एतदिन शिवपद सेवल, केवल एतबहि काज। से प्रसन्न वर भाषल राखल मोर कुल लाज॥ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-18) बुझा देमक चाही कौखना अनजानकेँ कनिएँ। जे ई अपराध छौ तोहर किए हमरासँ रुसल छी॥ (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-19) सरलाक विरह समाजशास्त्रीय विषय थिक जे समाजक परिस्थितिसँ उत्पन्न भेल अछि। एहि तथ्यकेँ नाट्यकार अन्तमे स्पष्ट करैत छथि। सुन्दर सासुरसँ गाम जयबाक जखन प्रस्ताव करैत छथि, तखन उद्विग्न भ’ जाइछ, हमरा बुझि परैए जे एहि लोकक मन फेरि अन्तऽ गेलैक। (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-33)। ओ सुन्दरकेँ कहैत छथिन, और नहि किछु, जे फेरि ओएह बरहमासा सबने गाबक पड़ै (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-34)। सुन्दर जखन ओहि बारहमासा गीतक जिज्ञासा करैत छथिन तँ सरलाक उत्तर थिक, छओ मासक प्राप्त खन लोक बाजै जे आब नहि औथीन तखन सँ कादम्बरी बहिनक संग इएह गीत सब गबै छलहुँ। (सुन्दर संयोग, पृष्ठ-34) सुन्दर संयोग नाटकक कथानक सामान्य प्रेम-कथाक परिधिमे नहि राखल जा सकैछ। ओ थिक मैथिल समाजमे प्रचलित नारी-यातनाक मानस-इतिकथा। प्रकारान्तरेँ नाट्यकार ओहि प्रथाक प्रति अरुचि प्रदर्शित करैत समाधान रूपमे सुन्दर सदृश आदर्श पुरुषक प्रयोजनीयता देखौलनि। सुन्दरमे आदर्श पतिक प्राण प्रतिष्ठा क’ कए नाट्यकार समाजकेँ कान्ता सम्मति उपदेश देलनि। हिनक नाटककमे मिथिलाक सामाजिक जीवनमे व्याप्त विवाह सम्बन्धी कुप्रथादिक प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रतिफलित भेल अछि, तकर विश्लेषणसँ प्रतिभाषित होइछ जे नाटकककार सामाजिक सुधारक प्रति पूर्णतः साकांक्ष रहथि। विवाह सदृश अतिमहत्वपूर्ण संयोजनमे निरीह पात्री होइछ कन्या। सामवती पुनर्जन्मक प्रस्तावनामे नटीक कथन थिक: कन्या कुल मर्यादामे बान्हलि फूजय मुँह न बकार। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-3) समाजमे कन्याकेँ पुत्रक अपेक्षा न्यून मानल जाइत अछि जे सर्वथा अनुचित। तेँ तँ गौतमीक कथन थिक; तखन पुत्र वा कन्या दु टा संसारमे ह्वै छैक। हम तँ बड़ि प्रसन्न छी। (सामवती पुनर्जन्म पृष्ठ-23) जीवन झा कालीन मिथिलांचलक समाज दुइ वर्ग-सम्पन्न एवं विपन्न वर्गमे विभाजित छल। ताहि कारणेँ स्वजातिमे जाति-पाँजि, कुलीन-अकुलीन, सोति-जोग, भलमानुष, जयवार, पठियार इत्यादिक विचार समाजमे घून जकाँ लागल छलैक। एकरे फलस्वरूप कन्या-विक्रय, बिकौआप्रथा, बहुविवाहप्रथा आ अनेक अमानुषिक समस्याकेँ जन्म दैत छल। ई श्रेय युगपुरुष जीवन झाकेँ छनि जे अपन नाटकक माध्यमे एकर साक्षात विरोध करबाक साहस कयलनि। नर्मदा सागर सट्टक क सुन्दर मिश्र तकर ज्वलन्त प्रमाण छथि। मोदन मिश्र सुन्दर मिश्रकेँ नीक जाति-पाँजिक वर त्रिविक्रम ठाकुरक संग नर्मदाक विवाह करयबाक विचार दैत अपन मतक समर्थनमे कहैत छथि: कुलहीन जमाय अधीन कुलीन सुता अनुताप सदा सहती। बसि नीच मनुष्यक बीच यथोचित नीच कथा कहती सुनती।। पठियार अगार अाचार-विचार विचारि विचारि व्यथा सहती। परिवार समान जहाँ न तहाँ भरिजन्म कोना सुख सँ रहती॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-107) उपर्युक्त पंक्तिमे कन्याक पिताक मानसिक व्यथाक तथा सामाजिक व्यवस्था, ओकर परिवेश आ परिस्थितिक रेखांकन नाटकककार अत्यन्त सूक्ष्मताक संग क’ कए समाजकेँ दिशा-निर्देश करबाक उपक्रम कयलनि। एहिपर सुन्दर मिश्रक कथन छनि : उत्तम जाति जमाय असङ्गत कष्ट सुता सभ काल जनाउति। सासु दयादिन आदि अनादर वाद कथेँ कुल छोट गनाउति।। जीउति जौ सहि गारि कदाचित् मातु-पिता हित बन्धु कनाउति। ई असमञ्जस हैत निरर्थक ऊँचक सङ्ग जे नीच बनाउति॥ (कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-107) नाटकककार सामाजिक वातावरणमे परिव्याप्त वैवाहिक प्रथाक प्रसंगमे अपन विचार व्यक्त करैत ओकर मात्र आलोचने नहि कयलनि, प्रत्युत एहन वैवाहिक सम्बन्धक प्रसंगपर तीक्ष्ण व्यंग्य सेहो कयलनि तथा समाजकेँ सुधरबाक संकेत देलनि। सामवती पुनर्जन्ममे बन्धुजीवक विकौआ मनोवृत्ति आ पुनर्विवाह करबाक चेष्टाक प्रति सारस्वत ओ वेदमित्रक तिरस्कार भावसँ नाटकककारक व्यक्तिगत विचार धाराक परिचय भेटैत अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन छनि : जे हमरा ठुनकाबथि से लय पहिरथु राङ। हम पुनि कतहु विकायब पोसब अपन समाङ। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्‍ठ.39) उपर्युक्त कथनमे विकौआ प्रथाक निन्दाक स्पष्ट झलक भेटैत अछि। सामवती पुनर्जन्ममे घटक द्वारा सारस्वतकेँ वर पक्षसँ टाका गनयबाक प्रस्तावपर सरस्वतक उत्तरक अवलोकन करू, छी ! छी ! टाकाक चर्चा कोन हमरा तेहन मैत्री अछि आ ओ ततेटा व्यक्ति छथि जे एहन कथा सुि‍न टाका तँ गनि देताह। परन्तु असन्तोष हयतैन्हि। ई कथा पुनि जनि बाजी। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-46) नर्मदा सागर सट्टकमे त्रिविक्रम ठाकुर दिससँ नर्मदाक प्रति टाका गनयबाक घटकक प्रस्तावपर सुन्दर मिश्रक विपरीत प्रतिक्रियाक संग देल गेल उत्तर : पिता आनि वर कन्या का वसन-विभूषण-युक्त। सादर अर्पय मन्त्रवत मे विवाह विधि युक्त॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-109) मिथिलांचलक समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्क स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन एक आवश्यक उपादान थिक। युगपुरुष जीवन झाक चाहे सामाजिक नाटकक हो वा पौराणिक ओ अपन प्रत्येक नाटककमे एकर नियोजन कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सेहो घटक पजिआड़क नियोजन कयल गेल अछि। जखन सारस्वत आ वेद मित्रक बीच अपन सन्तानक विवाहार्थ स्वीकृति भेटैछ तखन वेदमित्रक कथन छनि, यद्यपि ब्राह्मणक विवाहमे अपद व्यय कोना ने हैइ छैक तथापि घटक-पजिआड़ जे कहताह ततबा टाका त अवश्य ओरिआ लेबऽ पड़त। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-4) अक्षरपुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनसँ निरपेक्ष नहि भ’ सकलाह तेँ हिनक नाटकादिमे सबठाम सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भक संगहि-संग सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक अति यथार्थ प्रतिनिधित्व करैछ। हिनक समस्त नाटकक जनसामान्यक निकषपर अक्षरसः सत्यताक आवरणसँ आच्छादित अछि जाहिमे आशा-आकांक्षा, आचार-विचार, आमोद-प्रमोद, स्त्री-पुरुषक सुख-दुःख, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, भाव-भाषा, राजनीति आदिक यथार्थ परिचय भेटैत अछि। ओ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक प्रबल समर्थक रहथि जकर प्रतिरूप हिनक नाटकादिमे स्थल-स्थलपर उपलब्ध होइछ। मैथिल संस्कृतिक अनुरूप विवाह पूर्व घटक-पजिआड़क नियोजन हमर सांस्कृतिक परम्पराक अनुरूप समाजमे प्रचलित नियमानुकूल वैवाहिक सम्पर्कक स्थापत्यर्थ घटक-पजिआड़क नियोजन आवश्यक अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे जे घटक-पजिआड़क चर्चा भेल अछि ओ सर्वथा मैथिल संस्कृतिक अनुकूलहि अछि। जतेक दूर धरि वेशभूषाक प्रश्‍न अछि हिनक नाटकान्तर्गत विशुद्ध रूपेँ मैथिल संस्कृतिक अनुरूपहि पात्रक वेशभूषाक संग साक्षात्कार होइछ। नर्मदा सागर सट्टकक घटकराजक स्वरूपक तँ अवलोकन करू : जैखन देखल लटपर पाग। धोती तौनी नोसिक दाग॥ कयलक लोक गाम घर त्याग। हमरा हृदय भेल अनुराग॥ (कविवर जीवन झा रचनावली पृष्ठ-95) हाथमे फराठी छनि, अवस्था विशेषक कारणेँ हुनक डाँर पर्यन्त झुकि गेल छनि, पाग लटपर छनि। एहन वेश-भूषाकेँ देखि लोककेँ घटककेँ चिन्हब कनेको भाङठ नहि होइत छनि : ओ जेना छल केहन उकाठी। उचकि पड़ायल हमर फराठी॥ बीतल वयस वर्ष थिक साठी। पैर न सोझ पड़य बिनु लाठी॥ जौं जनितहुँ एहि गामक ढाठी। तौंस् न आबि भसिअइतहुँ भाठी॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-95) एहिमे नाटकककार मिथिलामे वैवाहिक अवसरपर घटकक कर्तव्यपरायणता तथा ओकर वेश-भूषाक यथार्थ स्थितिक चित्रण अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि अछि। सांस्कृतिक परिदृश्यमे मिथिलामे पर्दा प्रथाक पालन सामाजिक रीति-नीतिक अनुकूलहि हिनक नाटकादिमे वर्णित अछि। एहि प्रथाक अनुसारेँ ससुर-भैंसुर वा परिवारक श्रेष्ठ व्यक्तिक समक्ष वा अपरिचित व्यक्तिक समक्ष मिथिलांचलक महिला नहि जाइत छथि। एहि प्रथाक अनुरूपहि कादम्बरी एवं अभिरानी एहि रहस्यसँ अवगत रहितहुँ जे सुन्दर निश्चित रूपेँ सरलाक पति थिकथिन तथापि ओ सभ आत्मीयता नहि प्रदर्शित करैत छथि। सुन्दरकेँ सेहो अनुभव होमय लगैत छनि जे सरला हुनक पत्‍नी छथिन, किन्तु मर्यादाक पालनार्थ ओ अपन वास्तविक परिचय नहि उद्घाटित करैत छथि। सांस्कृतिक परिवेशक नियोजनक दृष्टिएँ जखन हिनक नाट्य साहित्यक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट प्रतिभाषित होइछ, जे युगपुरुष जीवन झा मिथिलाक संस्कृतिक अनुरूपहि फगुआक हुड़दंगक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। विदर्भराज सपरिवार बैसल छथि आ मृदंग वाद्य सहित हुनक राज्य वेश्या कलावती नचैत अछि आ गीत गबैत अछि : रङ्ग रस होरी हो। गाबह सब मिलि रङ्ग॥ रहसि-रहसि सब फागु सुहागिन गाबय मनक उमङ्ग। पहु परदेश बिताओल हमरा (सरिखहे) भेल मनोरथ भङ्ग॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-14) एहि नाटकक होलिकोत्सवक दृश्य अत्यन्त मनोरम अछि। रंग अबीरक प्रयोग सँ होरीक हुड़दंग मचल अछि। ओहि अवसरपर राजसभाक प्रत्येक पात्र रंग अबीरसँ बोरल अछि। लोक होरीक हुड़दंग मचयबा आ उधम मचयबामे अस्त-व्यस्त अछि। राज्यादेश अछि जे एहि अवसरपर जे अनच्छुक होथि तनिका एहिसँ फराके राखल जाय अन्यथा रंग-अबीरक सराबोर राज्याधिकारी लोकनि राजभवनमे उपस्थित छथि। राजभवन दिस जाइत नगरक शोभा ओ होलिकोत्सवक विकृत रूप दृष्टिगत होइछ। सभ एक दोसराक संग हँसी-मजाकमे व्यस्त देखल जाइछ। एहि अवसरपर बसन्तक राजाकेँ आशीर्वाद दैछ : महाराजक मन हरलक नटी, कहो लोक अपवाद। सय वर्ष सँ जनि जीवी घटी हम दै छी आशिर्वाद। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-14) शलाकापुरुष जीवन झाकेँ मिथिलाक सांस्कृतिक परम्पराक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ अपन नाटककमे एकर पालनार्थ उपयुक्त अवसर बहार क’ लेलनि। कीर्तिपुरुष जीवन झा अपन नाटकादिमे धार्मिक भावनाक चित्रण सेहो अत्यन्त मार्मिकताक संग कयलनि जे हुनक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिक पृष्ठपोषक हैबाक प्रमाण दैछ। सामवती पुनर्जन्ममे अर्थोपार्जनार्थ सामवान आ सुमेधा विदर्भराजक ओतय दम्पत्ति-रूपमे पूजनार्थ नियुक्त होइत छथि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे सुन्दर-संयोगक कथानकक श्रीगणेश वैद्यनाथधामक प्रांगणसँ आम्भ होइछ तथा ओकर अन्त सेहो ओतहि भ’ जाइछ। नर्मदासागर सट्टकमे नाटकककार कपिलेश्वरमे शिवार्चनाक चर्चा कयलनि अछि। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर लोक स्नानार्थ गंगा-कमला जाइत अछि जे हमर सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवनक अविभाज्य अंगक रूपमे चित्रित अछि। सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टिएँ जखन हिनक नाटकादिक विश्लेषण करैत छी तँ स्पष्ट भ’ जाइछ जे ई परम शिवभक्त परायण रहथि जे हिनक नाटकादिमे प्रयुक्त नचारी आ महेशवाणीसँ भ’ जाइत अछि। मिथिलांचलक सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि ठामक निवासीक वैशिष्ट्य रहल अछि जे सात्विक भोजनक पक्षपाती रहलाह अछि। एतय तामसी भोजन सर्वथा वर्जित मानल जाइछ। एहि परम्पराक पालन नाटकककार स्थल-स्थलपर अपन नाटकक मे कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे नाटकककार समाजमे प्रचलित नवलोकक बीच मदिरापानक परम्परासँ क्षुब्ध भ’ एकर बहिष्कार करबाक उद्घोषणा कयलनि। एहि प्रसंगमे सुमेधाक कथन छनि, एहि सभ कारण सँ राज्य निषिद्ध थिक। देखू तँ मदिरापान कयनेँ केहन लाल लाल आँखि छलैकय। छी! छी! आब मन प्रसन्न भेल अछि महा अवग्रहमे पड़ल छलहुँ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-19)। मिथिलांचल निवासीक प्रमुख भोज्य वस्तुमे रहल अछि रेडीमेड चूड़ा आ दही जकर चर्चा पौराणिक साहित्यमे सेहो यत्र-तत्र उपलब्ध होइछ। नर्मदासागर सट्टकमे एहि भोज्य-सामग्रीक विश्लेषण नाटकककारक प्रमुख प्रतिपाद्य अछि जखन घटकराज भोजन करैत छथि : केव नथबै अछि नाकक पूड़ा। ककरहु केव आगाँ बैसौलेँ थकड़ि बन्है अछि जूड़ा॥ झट झट गट गट घटक गिड़ै छथि राव दही संग चूड़ा। दुइ एक बेर पानि दै मलि मलि कात पसौलन्हि गूड़ा। धड़ि एक विछलन्हि पुनि अगुतैला सह-सह करइछ सूड़ा॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-99) कीर्तिपुरुष जीवन झाक नाटकादिक वैशिष्ट्य एहि विषयकेँ ल’ कए अछि जे मिथिलांचलक सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवनक चित्रणक क्रममे वैवाहिक अवसरपर होम आदिक व्यवस्थाक निमित्त लावा, जारनि, धान, घी, जल, कुश, आगि आदिक चित्रण सामवती पुनर्जन्ममे कयलनि अछि। जटिलकेँ सारस्वत आज्ञा दैत छथिन : लावा जारनि धान धिउ जल कुश विष्टर आगि। माङव पर सञ्चित करह सब पुरहित सङ्ग लागि॥ (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-47) वैवाहिक विधिमे लौकिक एवं वैदिक दुनू रीतिक परिपालन कयल गेल अछि एहि नाटकान्तर्गत। चतुर्थीक विधि सम्पन्न होइछ संगहि-संग भार-दोरक चर्चा सेहो नाटकककार कयलनि अछि। अक्षरपुरुष जीवन झा मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक कतिपय चित्रण अत्यन्त कुशलताक संग कयलनि अछि। सामवती पुनर्जन्म एवं नर्मदा सागर सट्टकमे सामाजिक रीति नीतिक चर्चा करैत नाट्यकार जाहि वैवाहिक प्रथाक उल्लेख कयलनि अछि से अत्यन्त प्राचीन परम्परा अछि। मिथिलांचलमे एहि प्रकारक प्रथा एवं परम्परा प्रचलित अछि जे वैवाहिक अवसरपर वर एवं कन्या पक्षक घटक पजिआड़क मिलान होइछ, जाहिमे पर्याप्त टाकाक प्रयोजन पड़ैछ जाहिसँ विवाहक उचित प्रबन्ध कयल जा सकय। सामवती पुनर्जन्ममे एहि प्रसंगक विश्लेषण पूर्वमे कयल गेल अछि। नर्मदा सागर सट्टकमे सेहो एहि स्थितिक चित्रण भेल अछि। घटकराज नर्मदाक विवाहार्थ ओ सागरक ओतय प्रस्तुत होइत छथि तँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमिमे एहि परम्पराक निर्वाह कोना करैत छथि तकर अवलोकन तँ करू, औजी! एहना ठाम घटक जे हयत मे लगले कोना विचार देत? पजिआड़केँ जे इच्छा होइन्हमे बूझि लै जाउ। (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-97)। सामाजिक व्यवस्थाकेँ सुदृढ़ बनयबामे आर्थिक स्थितिक दृढ़ता अत्यन्त प्रयोजनीय बुझना जाइछ। वित्त विहीन व्यक्तिक सामाजिक जीवनमे कोनो मूल्य नहि रहि जाइछ। अतएव जाहि समाजक आर्थिक जीवन जतेक सबल रहत ओ उन्नतिक पथपर अग्रसर भ’ समाजकेँ दिशा-निर्देश करबामे सक्षम भ’ सकैछ। जतेक दूर धरि मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक आर्थिक स्थितिक प्रश्न अछि ओ सदा सर्वदा आर्थिक विपन्नतासँ संत्रस्त रहल जकर फलस्वरूप कन्या-विक्रय सदृश कुप्रथाक जन्म भेलैक। जीवन झा अपन नाटकादिमे आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन अनेक स्थलपर करौलनि अछि। सामवती पुनर्जन्ममे सामवान एवं सुमेधाक वैवाहिक प्रसंगमे सामाजिक आर्थिक विपन्नताक दिग्दर्शन होइत अछि जे विवाहक नियोजनार्थ प्रचुर टाकाक प्रयोजनार्थ समाजक विपन्नताक दिग्दर्शन करौलनि अछि। एहि प्रसंगमे बन्धुजीवक कथन समसामयिक समाजक विपन्नताक चित्र दर्शबैत अछि जखन ओ कहैछ, घरमे तैखन सुख जौं पर्याप्त धन हो। हमरा तँ सतत सभ वस्तुक व्ययता लगले रहैए। (सामवती पुनर्जन्म, पृष्ठ-20)। आर्थिक विपन्नताक कारणेँ समसामयिक समाजान्तर्गत भीख मङनी प्रथाक जन्म भेल। नाटकककार सामवती पुनर्जन्ममे एहि प्रथाक यथार्थताक संग चित्रण कयलनि अछि। भिक्षुक ब्राह्मणक ओतय भीखक हेतु प्रार्थित होइत छथि, किन्तु परिस्थिति वसात हुनका भीख नहि भेटैत छनि। शलाकापुरुष जीवन झाकेँ सामाजिक जीवनक गम्भीर अनुभव छलनि तेँ ओ स्थल-स्थलपर नारी दोष दिस समाजकेँ साकांक्ष करैत देखल जाइत छथि। सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक पृष्ठभूमिमे नारीकेँ सामाजिक मर्यादाक पालनार्थ मद्यपान, निरर्थक भ्रमणशील बनब, तन्त्राक आह्वान, पतिपर निष्प्रयोजन रोष, दुर्जन व्यक्तिक संग प्रवास गमन आदिकेँ ओ कुल ललनाक निमित्त वर्जित कयलनि। एहि प्रसंगमे ओ नर्मदा सागर सट्टकमे अपन अभिमत प्रगट कयलनि : मद्यपान पर्य्यटन पुनि तन्द्रा पतिपर रोष। दुर्जन सङ्ग प्रवास यैह छवटा नारिक दोष॥ (कविवर जीवन झा रचनावली, पृष्ठ-112) बीसम शताब्दीक प्रथम दशकक मैथिली नाट्य सहित्यक जनक अक्षर पुरुष जीवन झा अपन समयक प्रकाश स्तम्भ रहथि जनिक नाटकादिमे मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक जीवनक जाहि स्वरूपक प्रदर्शन करैछ तकर सार्थकता एहिमे अछि जे नाटकककार ओकर समुचित समाधान ओही समस्यान्तर्गत कयलनि। युग विधायक जीवन झा एहि विचारधाराक अत्यन्त व्यापक प्रभाव हुनक समसामयिक साहित्यकार लोकनिपर पड़लनि जे परवर्त्ती युगक नाटकककार लोकनिक हेतु एक प्रकाश-पुञ्ज प्रमाणित भेल। एकर श्रेय आ प्रेय कविवर जीवन झाकेँ छनि जे मिथिलांचलक तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितिकेँ नीक जकाँ जानि बूझि क’ युगक आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि क’ अपना सम्मुख जनसाधारणक दृष्टिकोणकेँ समन्वित क’ कए मौलिक नाट्य-रचनाक सूत्रपात कयलनि तथा नाट्य-प्रणालीक सन्दर्भमे नवीन दृष्टिकोण अपनौलनि। हुनका नाट्य-रचनाक ज्ञान निश्चये विस्तृत छलनि। ओ समसामयिक समाजमे घटित होइत घटनाकेँ अपन अनुभवक आधारपर विश्लेषण कयलनि। आधुनिक मैथिली नाट्य साहित्यान्तर्गत अक्षर पुरुष जीवन झा नाटकक क्षेत्रमे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थितिक प्रसंगमे एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे एहि साहित्यक निमित्त एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक जे अधुनातन सन्दर्भमे मैथिल समाजक हेतु दिशाबोधक प्रमाणित भेल। १.-गजेन्द्र ठाकुर- यू.पी.एस.सी.१- भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान २.-सुभाष चन्द्र यादव १. -गजेन्द्र ठाकुर यू.पी.एस.सी.१ भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान भाषाक पारिवारिक वर्गीकरण ऐतिहासिक आधारपर होइत अछि, जाहिमे भाषाक इतिहास, एक भाषाक दोसर भाषासँ उत्पत्ति, भाषाक आकृति-प्रकृति माने रचनात्मकताक संग अर्थ-तत्त्वपर सेहो ध्यान देल जाइत अछि। जेना कोनो व्यक्ति वा समूह बीजीपुरुषक संकल्पना करैत अछि आ ओतएसँ अपना धरि एकटा वंशवृक्षक निर्माण करैत अछि, तहिना भाषाक इतिहासक लेखक सेहो आदि, मध्य आ आधुनिक कालक आधारपर भाषाक पूर्ववर्ती आ बीज भाषाक संकल्पना सोझाँ अनैत छथि। मुदा भाषाक इतिहासमे पुत्री आ बहिन भाषाक संकल्पना सेहो एहि तरहेँ सोझाँ अबैत अछि। मैथिलीक भारोपीय भाषा परिवारमे स्थान स्थान, शब्द, व्याकरण आ ध्वनिक आधारपर भाषा एक-दोसरासँ लग होइत अछि। मुदा एहि मध्य किछु अपवाद सेहो अछि। अवेस्ता, अंग्रेजी आ जर्मन भाषा मैथिलीसँ भौगोलिक रूपसँ दूर रहलोपर एक्के परिवारक अछि, मुदा अरबी, तमिल आदि सापेक्ष रूपेँ भौगोलिक निकटता अछैत दोसर परिवारक अछि। फेर भाषा स्थित आयातित विदेशज शब्दावलीक आधारपर हम एक भाषाकेँ दोसर भाषाक परिवारक सिद्ध नहि कऽ सकै छी। तहिना ध्वनिमूलक आ शब्दमूलक अर्थक साम्य सेहो दू भाषा परिवारकेँ एक वर्गमे नहि आनि सकैत अछि, जेना संस्कृतक जाल्म आ अरबीक जालिम -शब्दमूलक साम्य वा मैथिलीक मियाऊँ आ चीनी मन्दारिन भाषाक म्याऊँ (बिलाड़ि)- ध्वनिमूलक साम्य। ध्वनिक साम्यमे सेहो कखनो काल गड़बड़ी होइत अछि, जेना मैथिलीमे ड़, ढ़ आ चन्द्रबिन्दुक खूब प्रयोग होइत अछि मुदा ई तीनू ध्वनि संस्कृतमे नहि अछि। भौगोलिक आधारपर सेहो “भारोपीय भाषा” ई नामकरण पूर्ण रूपसँ समीचीन नहि अछि, कारण सम्पूर्ण भारतमे भारोपीय भाषा परिवारक उपस्थिति नहि अछि आ भारतमे भारोपीय भाषाक अतिरिक्त आनो भाषा परिवारक उपस्थिति अछि। यूरोपमे सेहो काकेशियन आदि भाषा परिवार भारोपीय भाषा परिवारमे नहि अबैत अछि। व्याकरण साम्यक आधार दू भाषाकेँ एक परिवारमे रखबाक सभसँ सुदृढ़ आधार अछि। मूल रूपसँ भारोपीय परिवारक भाषामे प्रत्ययक प्रयोग खूब होइत अछि आ धातुमे प्रत्यय जोड़ि शब्द बनैत अछि। पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, ई तीन तरहक लिंग अछि तँ एकवचन, द्विवचन आ बहुवचन एहि तीन तरहक वचन। मुदा आब अधिकांश भाषामे एकवचन आ बहुवचन यैह दूटा वचन होइत अछि। जाहि क्रियाक फल स्वयं प्राप्त हो से आत्मनेपदी आ जकर फल दोसरकेँ भेटए से परस्मैपदी, ई दू तरहक क्रिया भारोपीय भाषमे रहैत अछि। समासक प्रयोग सेहो मोटा-मोटी भारोपीय भाषाक विशेषता अछि। भारोपीय परिवारक दू भेद अछि। सए (१००) लेल प्रयुक्त मूल भारोपीय शब्द “क्मतोम” दू तरहेँ बाजल जाइत अछि। संस्कृतमे “शतम्” आ लैटिनमे “केन्टुम्”। एहि आधारपर संस्कृतसँ लग भाषा समूह अवेस्ता (भाषा आ ग्रंथ दुनूक नाम, जेन्द-अवेस्ता- ओहिपर भाष्य), फारसी, मैथिली, रूसी आदि अबैत अछि। केन्टुम् वर्गमे लैटिनसँ लग भाषा जेना ग्रीक, जर्मन, फ्रेंच, इटालियन आदि अबैत अछि। शतम् वर्गमे भारत-इरानी (वा इन्डो आर्यन), बाल्टो-स्लाविक, आर्मीनी आ इलीरी भाषा समूह अबैत अछि। इन्डो आर्यन वा भारतीय-ईरानी भाषा समूहमे ऋगवेद सभसँ प्राचीन अछि। जोराष्ट्रियन धर्मक अवेस्ता ग्रन्थ जे वैदिक कालक अछि ओ अवेस्ता भाषाक ग्रन्थ अछि। ईरानी भाषा समूहमे अवेस्ता, प्राचीन फारसी, पहलवी, पश्तो, बलूची आ कुर्द भाषा प्रमुख अछि। भारतीय आर्यभाषा समूहमे वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पाली (प्राचीन प्राकृत ५००. ई.पू.सँ १०० ई.पू. धरि), प्राकृत (मध्य प्राकृत १०० ई.पू. सँ ५०० ई. धरि), अपभ्रंश (५०० ई. सँ ९०० ई. धरि) आ अवहट्ट (९०० ई. सँ ११०० ई. धरि) आ तकर बाद मागधी प्राकृतसँ मैथिली, बंगला, ओड़िया, असमी आदि भाषा (११०० ई. सँ) अबैत अछि। विश्वक भाषाक पारिवारिक वर्ग (अ)      यूरेशिया, (आ)अफ्रीका, (इ)प्रशान्त महासागरक क्षेत्र (पैसिफिक), (ई)अमेरिका (अ)      यूरेशिया- (क)भारोपीय, (ख)द्राविड़, (ग)बुरुशस्की, (घ)काकेशी, (ङ)यूराल-अल्ताई, (च)चीनी, (छ)जापानी-कोरियाई, (ज)हाइपरबोरी, (झ)बास्क, (ञ)सेमीटिक-हेमिटिक- अफ्रीकामे (क)भारोपीय- (i) इन्डो आर्यन, (ii)बाल्टो-स्लाविक, (iii)आर्मीनियन, (iv) इलीरी, (v)ग्रीक, (vi)केल्टिक, (vii)जर्मानिक, (viii)इटालिक, (ix)हित्ती, (x)तोखारी (i) इन्डो आर्यन- (a)भारतीय आर्यभाषा, (b)ईरानी (a)भारतीय आर्यभाषा (A)प्राचीन भारतीय आर्यभाषा (२५०० ई.पू.सँ ५०० ई. पू.) (B)मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा (५०० ई.पू.सँ १००० ई.) (C)आधुनिक भारतीय आर्यभाषा(१००० ई. सँ आइ धरि) (A)प्राचीन भारतीय आर्यभाषा (२५०० ई.पू.सँ ५०० ई. पू.)- वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत (बाल्मीकि - “मानुषिमिह संस्कृताम्”- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषा।) (B)मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा (५०० ई.पू.सँ १००० ई.)- पहिल प्राकृत (पाली), दोसर प्राकृत (साहित्यिक प्राकृत- शौरसेनी, महाराष्ट्री, मागधी, अर्द्धमागधी, पैशाची, ब्राचड, खस), तेसर प्राकृत (अपभ्रंश- प्रथमे-प्रथम व्याडि आ पतंजलि द्वारा उल्लेख।) (C)आधुनिक भारतीय आर्यभाषा(१००० ई. सँ आइ धरि) (अ) शौरसेनीसँ खड़ी बोली, व्रजभाषा, बाँगरू, कन्नौजी, बुन्देली, मारवाड़ी, जयपुरी, मालवी, मेवाती, गुजराती (आ)महाराष्ट्रीसँ मराठी, कोंकणी, नागपुरी, बरारी (इ) मागधीसँ भोजपुरी, मगही, बांगला, ओड़िया, असमी, मैथिली (ई) अर्धमागधीसँ अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी (उ) पैशाचीसँ लहँदी (ऊ) ब्राचडसँ सिन्धी, पंजाबी (ए) खससँ पहाड़ी भाषाक विकास रेखांकित होइत अछि। बाल्मीकि द्वारा सुन्दरकाण्डमे मानुषिमिह संस्कृताम्- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषाक ज्ञान हनुमानजीसँ कहबाओल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अवहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ” संगहि ज्योतिरीश्वर द्वारा सात “उपभाषक” चर्च भेल अछि। प्राकृतक कैकटा प्रकार छल। ओहिमे मागधी प्राकृत मैथिली आ अन्य पूर्वी भारतक भाषाक विकासमे योगदान देलक। अर्धमागधीमे जैन धर्मग्रन्थ आ पालीमे बौद्ध धर्मग्रन्थ लिखल गेल। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा दोसर प्राकृतसँ विकसित भेल सेहो देखि पड़ैत अछि।  अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्टक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारूपक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्टमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल।  ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ट (अवहट्ठ) केँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि।  दामोदर पंडितक “उक्ति व्यक्ति प्रकरण”  सेहो कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती अछि मुदा पुरान अवधी आ पुरान कोशलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि आ अवहट्ठसँ लग अछि। भारोपीय भाषा परिवारमे मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। (९२३ शब्द) २ सुभाष चन्द्र यादव, 1948- जन्म ०५ मार्च १९४८, मातृक दीवानगंज, सुपौलमे। पैतृक स्थान: बलबा-मेनाही, सुपौल। घरदेखिया (मैथिली कथा-संग्रह), मैथिली अकादमी, पटना, १९८३, हाली (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९८८, बीछल कथा (हरिमोहन झाक कथाक चयन एवं भूमिका), साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, १९९९, बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद), किसुन संकल्प लोक, सुपौल, १९९५, भारत-विभाजन और हिन्दी उपन्यास (हिन्दी आलोचना), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, २००१, राजकमल चौधरी का सफर (हिन्दी जीवनी) सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, २००१, बनैत-बिगड़ैत (मैथिली कथा-संग्रह २००९), मैथिलीमे करीब सत्तरि टा कथा, तीस टा समीक्षा आ हिन्दी, बंगला तथा अंग्रेजी मे अनेक अनुवाद प्रकाशित। रचनाक पाठ आ लेखक कोनो लेखक सँ ई अपेक्षा केनाइ जे ओ अपन रचनाक स्पष्टीकरण आ व्याख्या करए–एकटा अनुचित अपेक्षा होएत। ई काज लेखकक नहीं थिकैक। रचना चाहे कतबो दुर्बौध्य आ विवादास्पद हो, लेखक ओहि लेल जिम्मेदार तऽ होइत अछि, मुदा ओकर भाष्यकार हेबाक लेल बाध्य नहि। लेखक ककरा–ककरा अपन रचना बुझेने फिरत आ किएक? की ई सम्भव छैक? लेखक जँ चाहए तऽ अपन जीवन–काल मे रचनाक संदर्भमे किछु सम्वाद स्थापित कऽ सकैत अछि, मुदा मृत्योपरांत? होक पाठक अपन बोध आ विवेकक अनुसार रचनाक पाठ करैत अछि। हरेक युगक सेहो अपन भिन्न बोध होइत छैक। तँ ई पाथ भिन्नता आ परिवर्त्तनशीलता हरेक समर्थ रचनाक आनिवार्य गुण होइत अछि। समय के संग–संग रचनाक संवेदनात्मक अभिप्राय बदलैत रहैत छैक। तँ इ युग बदलला पर रचनाक व्याख्या सेहो बदलि हाइत छैक। एहि तरहेँ कोनो एकटा रचना के एक्के टा आ समान पाठ नहीं होइत अछि; मूल्यवान रचनाक पाठ अनंत होइत अछि। पाठ पर लेखकक नियंत्रण नहीं होइत छैक। तँ इ पाठ–भिन्नताक लेल ओकरा सफाइ आ स्पष्टीकरण देबाक कोनो बेगरता नहि हेबाक चाही। हमर अपन अनुभव तऽ इ अछि जे जाधरि कोनो घटना कलात्मक विजनसँ दीप्त नहि होएत ताधरि ओ रचनामे रूपांतरित नहि भऽ सकत। ओहि आरंभिक विजनकेँ पाठक भिन्न–भिन्न रूपेँ पकड़ैत अछि आ अलग–अलग व्याख्या करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे कोनो रचनाक विजन आ दर्शनकेँ पाठक भले नहि बुझि पबैत हो, ओकर मर्मकेँ जरूर पकड़ि लैत अछि; ओकर संवेदनात्मक तत्वकेँ हृदयंगम कऽ लैत अछि। लोक–कथा सँ उदाहरण ली तऽ बात बेशी स्पष्ट होएत। एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया तइ ले पकड़ने जाइ–ए’- एहि उक्तिमे न्याय आ समानताकेँ जे विमर्श आ दर्शन छैक, तकरा पाठक भले नहि बूझि पबैत हो, मुदा स्वतंत्रताक लेल जे फुद्दीक आर्तनाद छैक तकर अनुभव पाठक अवश्य कऽ लैत अछि। तहिना हमर कथा ‘नदी’ आ ‘कनियाँ–पुतरा’मे जीवनदायिनी शक्तिक रूपमे प्रेमकेँ जे विजन (दर्शन) छैक तकरा बूझब ओतेक आसान जँ नहियो होइ, तैयो नेहक अनुभूति तऽ पाठक करिते अछि। साहित्यमे असली चीज इएह संवेदना या मर्म होइत छैक। कोनो विचार (या दर्शन) संवेदनेक माध्यमसँ पाठक धरि पहुँचबाक चाही; कोनो नीरस विमर्श या नाराबाजीक रूपमे नहि। हमरा बुझने धर्म आ संस्कृतिक भित्ति प्रेमे थिक। प्रेमसँ बढ़ि कऽ एहि संसारमे कोनो दोसर भाव नहि अछि। हमर कथा सभ कोनो विचारधारात्मक या आचारशास्त्रीय आग्रह लऽ कऽ नहि चलैत अछि। ओ अपन समयकेँ आचार–विचारकेँ व्यक्त तऽ करैत अछि, मुदा ओहि सँ बद्ध नहि अछि। हमर धारणा अछि जे कलाकृति कोनो क्रांति नहि अनैत अछि। ओ मनुक्खक भावात्मक अभिवृत्ति आ दृष्टिकेँ बहुत सूक्ष्म ढ़ंगसँ बदलैत अछि आ दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्त्तनक घटक होइत अछि। एकर अतिरिक्त आ किछु नहि। जे आलोचक एहिसँ इतर कोनो अपेक्षा आ आग्रह (जेना मैथिलीक चेतनावादी हठ) लऽ कऽ साहित्य लग जाएत, से अपनोकेँ ठकत आ दोसरोकेँ धोखा देत। (मैथिली लेखक संघ द्वारा पटनामे आयोजित परिचर्चामे सुभाष चन्द्र यादवक वक्तव्य) जगदीश प्रसाद मंडल 1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। कथा संगी वयस्क अवयस्कक सीमापर पहुँचल सुशील सत्तरह बर्ख सात मास पाड़ कए चुकल। पाँच मासक उपरान्त वयस्क भऽ जाएत। शुक्र दिन रहने चारि क्लासक आशासँ समएपर कओलेज विदा भेल। संयोगो नीक, कओलेजक कम्पाउण्डमे पहुँचते घंटी बजल। वर्गमे बैसल बहुतो संगीक बीच सुशीलो। पहिल घंटी फोंक गेल। दोसरो-तेसरो-चारिमो तहिना। एक्को घंटी पढ़ाइ नहि देखि कियो खुशीसँ समए बितबैत तँ कियो बन्द कोठरीमे जेठक दुपहरिया बिनु पंखे बितबैत रहए। ओहिमे सँ एक सुशीलो रहए। सुशीलक कनैत मन क्लासक कोठरीसँ निकलि डेरा दिशि विदा भेल। कि हमरा सबहक जिनगी, पोखरिक पानि जेकाँ चारु भरसँ घेराएल अछि वा पहाड़सँ निकलैत नदी जेकाँ समुद्र दिशि बढ़ैत अछि। डेरा ऐलाक उपरान्तो सुशीलक मनमे बेचैनी बढ़िते गेल। उन्मत् सुशील किताब-काँपी रैकपर फेकैत बिनु देहक कपड़ा आ पाएरक चप्पल खोलनहि चौकीपर ओंधरा गेल। जेना मन काबूएमे ने होइ तहिना बेसुधि। पहिल घंटीक पढ़ाइ किअए ने भेल? नजरि दौड़ौलक तँ देखलक जे ओहि विषयक तँ शिक्षके नहि छथि तँ पढ़वितथि के? मनमे हँसी उपकल। मुदा फेरि मन घुमल। बिनु शिक्षकक शिक्षण संस्था कोना चलि सकैत अछि। कि एकरा प्राइवेट संस्थाक बाट खोलब नहि कहबैक? कि सार्वजनिक शिक्षण संस्था बाघक खाल ओढ़ल संस्था ने तँ छी। मन घुसुकि दोसर घंटीक विषयपर पहुँचल। एगारह सए विद्यार्थीक बीच एकटा प्रोफेसर छथि। तहूँमे जहियासँ इन्चार्य भेलाह तहियासँ क्लासक कोन बात जे विभागक स्टाफो रुम छोड़ि प्रिंसिपलेक कुरसीपर बैइसए लगलाह। जहिना ईंटाक देवाल लेटरीन आ कीचेनक दूरी बनबैत तहिना छात्रक पढ़ाइ आ नब वेतनक हिसाव दूरी बनौने। अध खिलल फुल जेकाँ, जेकरा ने कोंढ़ी कहबै आ ने फूल तहिना सुशीलक मन बीचमे पड़ि गेल। मनमे उठलै मधु दइबला माछीकेँ विधाता ओहन डंक किऐक देलखिन। मुदा मन तेसर घंटीक विषयपर गेलइ। तीनि शिक्षक। तहन किअए ने पढ़ाइ भेल। ई तँ ओहन विषय छी जे बिनु पढ़ौने विद्यार्थीकेँ बहुत अधिक कठिनाइ हेतइ। डेरापर नजरि पड़ितहि देखलक जे के ऐहन व्यापारी होएत जे समए पाबि अपन सौदाकेँ महग कऽ नहि बेचत। ऐहन काज तँ वएह बेपारी कऽ सकैत अछि जेकर बेरागी मन होय। मुदा मन ठमकलै। ने आगू बढ़ै आ ने पाछू हटैले तैयार होय। जहिना जीरो डिग्री अंक्षांससँ सूर्ज मकर रेखा दिशि बढ़ैत तँ कर्क रेखा दिशि विपरीत समए हुअए लगैत तहिना तँ ने भऽ रहल छैक। एक दिशि घर-घर शिक्षा आ दोसर दिस सोनो-चानीसँ महग। जहिना गरीबक घरसँ सोनाकेँ दुश्मनी छैक तहिना कि शिक्षोक भेलि जा रहल छैक। मन आगू बढ़ि चारिम घंटीपर पहुँचलै। तीनि शिक्षक तँ अहू विषयक छथि। तहन किऐक ने पढ़ाइ भेल? एक गोटे सीनेटक चुनावक तिकड़ममे लागल छथि मुदा तइओ तँ दू गोटे छथिये। एक गोटे तेरहम दिन रिटायर करताह। मनमे खुशी उपकलै। जहिना मरै समए किछु दिन लोक दुनियाँसँ कारोबार समेटि घरक ओछाइन धड़ैत अछि तहिना तँ हुनको धड़ैक चाहिएनि। सोगेसँ रोग होइत अछि। तेरहे दिनक उत्तर दरमाहा आधा भऽ जेतनि। समए तँ एहिना, जहिना बिनु पढ़ौने, कौलेज नहि अएने बीतितनि छन्हि। तेँ सोग होएव अनिवार्य आ काज नहि करब आवश्यक छन्हिये। मुदा तेसर तँ एहि सभसँ अलग छथि। ओ किअए ने ऐलाह। नजरि दौड़बितहि देखलक जे ओ तँ सप्ताहमे एक दिन आवि छबो दिनक हाजरी बनबै छथि। शनि तँ काल्हि छियै आइ कोना अबितथि? एते मनमे अबिते सुशीलक आँखि झलफलाए लगलै। मन खलिआएल बुझि पड़लै। उठि कऽ चप्पलो आ पेंटो-शर्ट खोललक। लूँगी बदलितहि पानि पीवैक मन भेलइ। कोठरीसँ निकलि कलपर हाथ-पाएर-मुँह धोअए गेल। पानि पीवितहि मन हल्लुक बुझि पड़लै। मुदा जहिना खढ़हाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरिगर बुझि पड़ैत तहिना सुशीलक मन समस्याक बोनाइल रुप देखलक। भगवान रामे जेकाँ कैकेइक मन फेरि सघन जंगल देखैक भेलइ। कओलेजक बीचमे देखि सीमा दिस बढ़ौलक। एक सीमा सर्वोच्च शिक्षण दिस पड़लै तँ दोसर गामक टटघर स्कूलपर। जहिना पहाड़सँ निकलि अनवरत गतिसँ चलि नदी समुद्रमे जाए मिलैत अछि तहिना ने टटघरेक ज्ञान उड़ि कऽ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत। एते विचार अवितहि गाछसँ गाछ टकराइत आगिक लुत्तीकेँ छिटकैत देखलक। ई लुत्तीक आगि तँ कोसक-कोस सुखल लकड़ीक संग-संग लहलहाइत फुलल-फड़ल गाछकेँ सेहो जरा दैत अछि। जहिना सघन बनमे रस्ताक ठेकान नहि रहैत तहिना सुशील कोनो रस्ते ने देखए। मन अपन उमेरपर गेलइ। सत्तरह बर्खसँ उपर। अठारहमक बीच। अठारह बर्ख पुरलापर चेतन भऽ जाएव। मुदा हमर चेतना कहिया जागत जे बाहरी दुनियाँकेँ अंगीकार करब। आकि देखि कऽ छोड़ि देब। स्कूल-कओलेजक पढ़ाइक तँ वएह गति अछि। जहिना एक-एक ईंटा जोड़ि बिशाल अट्टालिका बनैत तहिना ने कने-कने सीखि बाल चेतनाकेँ पैघ बना सकै छी। ई के करत? ई तँ अपनहि केने होएत। मन शान्त भेलइ। नजरि देलक गामक ओहि बच्चापर जे माएक मुँहसँ लुखी सीखैत अछि मुदा स्कूलमे प्रवेश करितहि गिलहरीसँ भेंट भऽ जाइ छैक। कि हमर मातृभाषा गामो धरि नहि अछि। कि हिमालय पहाड़सँ गंगा कूदि-कूदि रास्ता टपि समुद्रमे पहुँचैत अछि आकि नीच-उपरक रास्ता टपैत समुद्रमे पहुँचैत अछि। ज्ञान-कर्मक बीच भक्ति होएत। कि बच्चा कर्मरुपी माएसँ सीखि ज्ञान रुपी गुरुसँ मिलि पवैत अछि। जँ से नहि तँ माए-बाप गुरु कोना? गामक स्कूलसँ नजरि हटि मिड्ल स्कूल आ हाइ स्कूलपर पहुँचलै। कतौ हाइ स्कूलसँ क्लास काटि मिड्ल स्कूलमे जोड़ाइत अछि तँ कतौ कओलेजक क्लास हाइ स्कूलमे। जहिना क्लास तँ कटि कऽ चलि अबैत तहिना शिक्षको अबैत। पढ़निहार तँ विद्यालय पैदा कऽ दैत मुदा पढ़ौनिहार कोना........। आगू बढ़ैत सुशीलक मन कओलेजमे नहि अँटकि विश्वविद्यालय पहुँच गेल। मनमे उठल जिनगीक पाँचम (भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्साक उपरान्त) आवश्यक शिक्षा छी। ओना शिक्षक संस्था अनन्त अछि। मुदा एक सीमाक भीतर सेहो अछि। कियो अपना डेरापर किताब उलटा प्रश्नक जबाब अपन परीक्षाक कॉपीमे लिखैत अछि तँ कियो पढ़ाइक अभावमे प्रश्न पत्रो ठीकिसँ नहि बुझि पबैत अछि। कि एहि दौड़मे के आगू बढ़त? कियो मार्कसीटे कीनि लैत अछि। कि शिक्षा सन समस्याकेँ बेदरा-बुदरीक खेतमे बनाओल गरदा-गुदरीक घर-आंगन छी? चिन्तासँ मातल सुशील निराश भऽ ओछाइनपर ओंघरा गेल। चिन्ताक बनमे चिन्तनक गाछ कतौ देखवे ने करए जहिसँ आशाक फल देखैत। सुतल शरीर आरो सुति रहल। अकलबेराक समए। कओलेजसँ आबि बसन्ती कोठरीमे किताव-कापी रखि सोझे माए लग पहुँचल। जलखैक छिपली बसन्तीक आगूमे बढ़बैत बाजलि- ‘‘बुच्ची, उदास किअए छह?’’ अपनाकेँ छिपबैत बसन्ती बाजलि- ‘‘नहि, नहि। उदास कहाँ छी?’’ बसन्ती अपन वसन्ती बहारकेँ छिपबैक कोशिश करैत मुदा जहिना शरीरक रोग तरे-तर बिसविसाइत रहैत अछि तहिना मनक रोग बसन्तीकेँ। मनमे नचैत कओलेजक पढ़ाइ आ अपन जिनगी। सुशील आ बसन्ती संगे पढ़ैत। पढ़ाइ नहि हेवाक सोगसँ सोगाएल बसन्ती माएसँ आगू गप्प नहि बढ़ा विस्कुट खा चाह पीवि चुपचाप अपन कोठरीमे आबि उतान भऽ ओंघरा गेल। सिरमापर माथ देने दुनू बाँहि समेटि कऽ मोड़ि छातीपर रखि अपन जिनगी दिस ताकए लगल। आजुक शिक्षा लऽ कऽ की करब? माए-बापक संग जे अन्याय भऽ रहल अछि कि ओ एक इमानदार बेटीक दायित्व नहि बनैत जे आगूमे आबि ठाढ़ हुअए। आजुक शिक्षाक रुप ऐहन बनि गेल अछि जे सरकारी स्कूल-कओलेजमे पढ़ाइ नहि भऽ रहल अछि। तहिपर एते महग शिक्षा भऽ गेल अछि जे अपन बेटा-बेटीक शिक्षा लेल अपन जिनगी तोड़ि, खूनक घूँट पीवि कऽ जीवन-बसर करैत छथि। जेकर परिणाम कि भेटैत छन्हि तँ जेहो अपन बनाओल वा पूर्वजक देल जे सम्पत्ति रहैत छन्हि बेटी विआह करबैमे देमए पड़ैत छन्हि। देख रहल छी जे बीस लाख रुपैया खर्च कए डाक्टरीक शिक्षा पबैत छथि। हुनकर विवाहक लेल सेहो बीस लाख चाही। हम ओहि डॉक्टर सभसँ पूछै छिअनि जे देशक प्रथम श्रेणीक नागरिक होइतहुँ अपन अन्याय नहि रोकि सकैत छी तँ कि अहाँसँ आशा कएल जा सकैत अछि जे माघक शीतलहरीमे जाड़-भूखसँ ठिठुरल बच्चाकेँ जीबैक उपाए कऽ सकबैक। मन आगू बढ़ि अपनापर एलै। बी.ए. पास कऽ शिक्षिका बनब। पति या तँ किसान, व्यापारी वा नोकरिहरे किऐक ने होथि महिलाक संग जे असुरक्षा बढ़ि रहल अछि एहिमे कते गोटे अपनाकेँ सुरक्षित बुझि रहल छथि। कि काओलेज हाइ स्कूलक विद्यार्थी अपन गुरु अध्यापिकाक संग ओहने नजरिसँ देखैत अछि जहि नजरिसँ अध्यापककेँ। कि अदौसँ अबैत हमर धरोहर (संयुक्त परिवार सामाजिक ढ़ाँचा)  गाछसँ खसल पाकल कटहर जेकाँ आँठी उड़ि कतौ, कोवा उड़ि कतौ, कमड़ी खोइचा थौआ भेलि एकठाम आ नेरहा ओंघराइत कतौ, तहिना आँखिक सोझमे नष्ट भऽ जाएत। एहि दुखद घटनाक जबावदेह के? गामक बच्चाकेँ स्कूलसँ लऽ कऽ स्कूल कओलेज धरि एते तरहक गाड़ीक अवाज सऽ लऽ कऽ लाउडस्पीकरक अवाज धरि गनगनाइत अछि जहिठाम गप-सप्प करब कठिन भऽ गेल अछि तहिठाम पढ़ाइक की दशा होएत। एत्ते बात मनमे उठैत-उठैत परा-अपराक क्षितिजपर बसन्ती अँटकि गेल। जहिना शिशिर-ग्रिष्मक बीच बसन्तक सुआगत गाछपर बैसि कोइली अपन जुआनीसँ इठलाइत राग-तानसँ करैत अछि तहिना बसन्तीक सुआगतक लेल होरी खेलाइत राधा-कृष्ण सेहो वृन्दावनमे प्रतीक्षा कए रहल छन्हि। अबीर उड़बैत राधा अपन पौरुस देखबैत अखाड़ाक माटि लऽ हाथ मिलबए चाहैत छथि तँ कृष्ण पाछु घुसकैत पिचकारीक निशान साधि कखनो गुलाबी रंग फैकए चाहैत तँ कखनो हरियरका। आँखिपर नजरि पड़ितहि तँ कारी रंग मनमे अबनि। मुदा निशाने साधै-साधैक बीच राधा सतरंगा अबीर मुँहपर फेकि देलकनि। मुँहपर अबीर पड़ितहि दुनू हाथे कृष्ण मुँह-कान पोछए लगलथि। आकि हाथसँ पिचकारी खसितहि राधा आगू बढ़ि दुनू बाँहि पसारि हृदयसँ लगवैत विहृल भऽ निराकार-साकारक बीच दुनू हँसए लगलथि। नमहर साँस छोड़ैत बसन्तीक मनमे उठल एहि धरतीपर किछु करैक लेल संगीक जरुरत अछि। जाधरि पुरुष-नारी मिलि अपन समस्याक लेल अपन पौरुषकेँ नहि जगाओत ताधरि सपना साकार कोना भऽ पवैत अछि। ओछाइनसँ उठितहि सुशील सूर्यक किरिणकेँ देखए लगल। देवालक एक छोट भूर देने रोशनी कोठरीमे प्रवेश करैत। सूर्यक ओ रुप नहि जहिठाम आँखि नहि टिकैत। मुदा कोठरीक रोशनी ओहन नहि। पातर-कोमल। गनलो जा सकैत। बिजलोका जेकाँ सुशीलक मनमे उठल पुरुष-नारीक बीच सृष्टि निर्माण करैक शक्ति अछि तहन जँ ओ नान्हि-नान्हिटा समस्यामे ओझरा जाए, कतेक लाजिमी छियैक। कोठरीसँ निकलि सुशील बसन्ती ऐठाम विदा भेल। अपन कोठरीमे बैसल बसन्ती एक कोनपर किताबक अछि आकि पढ़निहार, पढ़ौनिहारक वा मशीन चलौनिहारक मन भङठि गेल अछि। एते बात मनमे उठिते सुशीलक आँखिक आगू अन्हार पसरि गेल। मुदा इजोतसँ अन्हारमे गेलापर जत्ते अन्हार बुझि पड़ैत ओहिसँ कम अन्हार अन्हारमे रहनिहारकेँ लगैत। ततबे नहि अन्हारोमे झलफली इजोत बुझि पड़ैत अछि। सुशीलोक अन्हार मनसँ छँटल अपन छात्रावाससँ आगू बढ़ैक विचार उठल। प्रात भने क्लासक संगी बसन्ती ऐठाम पहुँचल। टेबुलक एक कोणपर किताब गेटि कऽ राखल। एकटा किताब आ कापी आगूमे पसड़ल आ पेन सेहो खेलि कऽ राखल मुदा कुरसीपर ओंगठि आँखि बन्न केने बसन्ती अपन बसन्ती बहारपर नजरि अँटकौने रहए। जहिना बसन्त साले-साल अबैत आ जाएत अछि तहिना कि मनुष्योक जिनगीमे बसन्त अबैत आ जाएत अछि? कथमपि नहि। मनुष्यक जिनगी तँ ओहन होएत अछि जहिमे बसन्त ऐलापर पुनः जाइत नहि। दिनानुदिन बढ़ैत-बढ़ैत समुद्र जेकाँ महा बसन्त बनि जाइत अछि। एते बात मनमे अवितहि देह चौंकि गेलनि। हृदय सिहरए लगलनि। मुदा अपनाकेँ संयत करैत धियान बसन्त ऋृतुपर देलनि। ऋृतुपर नजरि पड़ितहि देखलनि जे एकठाम फसल लगल चौरस खेत, सुन्दर-सुन्दर गाछसँ सजल बगीचा जहिपर खोंता लगा रंग-बिरंगक चिड़ै अपन मधुर स्वरसँ बसन्तक सुआगत करैत अछि। तँ दोसर कोसीक बाढ़िसँ नष्ट भेल ओ इलाका जहिमे बालुसँ भरल ढ़िमका-ढ़िमकी बनल खेत, गाछ विरीछक अभाव देखि कनैत चिड़ै रहैक ठौरक दुआरे छोड़ि पड़ा गेल कि ओहिठाम चैत-वैशाखकेँ बसन्त ऋृतु नहि कहल जाइत अछि? अथाह समुद्रमे बसन्ती कखनो उगए तँ कखनो डूबैत रहए। अनायास नोरसँ आँखि ढबढ़बा गेलनि। नोर केहन? दुखक आकि क्रोधक। आँचरसँ बसन्ती नोर पोछितहि रहति कि सुशील कोठरीक दरबज्जापर सँ बाजल- ‘‘बसन्ती।’’ बसन्ती कानमे पड़ितहि धड़फड़ा कऽ कुरसीसँ उठि दुनू हाथ आगू बढ़बैत बसन्तीक मुँहसँ निकलल- ‘‘सुशील।’’ कहि कहि अपन कुरसीपर बैसाए अपने बगलक कुरसीपर बैसि पूछलि- ‘‘पढ़ाइ-लिखाइक की हाल-चाल?’’ सुशील- ‘‘कॉलेज छोड़ैक विचार भऽ रहल अछि।’’ सुशीलक बात सुनि अकचका कऽ बसन्ती पूछलक- ‘‘किअए?’’ - ‘‘कओलेज सहित शिक्षाक जे दुरगति देखि रहल छी ओहिसँ मन दुखी भऽ रहल अछि। उपरी ढाँचा किछु देखि रहल छी आ भीतरी किछु आर छैक।’’ सुशीलक बात सुनि बसन्ती बाजलि- ‘‘सिर्फ अहींटा दुखि छी आकि आरो गोटे छथि।’’ बसन्तीक बात सुनि सुशीलक विचार ठमकल। मुँहसँ निकलल- ‘‘अखन धरि जे देखलहुँ ओहिमे नगण्य दुखी भेटलाह आ अधिकांशकेँ कोनो गम नहि।’’ ‘‘किछु तँ भेटलाह?’’ ‘‘मुदा ओ कहिया तक संग रहताह ऐकर कोन ठीक। जँ रस्तेसँ घुरि जाथि वा हलवाइक कुकुड़ जेकाँ रसगुल्ला-जिलेवीक रस चाटए लगथि।’’ ‘‘अहाँ जे कहलौं ओकरो हम नहि कटै छी मुदा एकर अतिरिक्तो किछु छैक?’’ ‘‘से की?’’ ‘‘जँ पुरुष नारी मिलि सृष्टिक निर्माण कऽ सकैत अछि तँ कि कोनो व्यवस्थाकेँ नहि बदलि सकैत अछि।’’ ‘‘बदलि सकैत अछि मुदा ओकरा लेल.....।’’ ‘‘हँ। ओकरामे पौरुष चाही। पौरुष सिर्फ पुरुखेक धरोहर नहि मनुष्य मात्रक छी। गललसँ गलल आ सड़लसँ सड़ल व्यवस्थाकेँ हमहीं-अहाँ ने संग मिलि बदलि सकै छी। वसन्तीक बात सुनि, नमहर साँस छोड़ैत सुशील बाजल- ‘‘ओहन संगी कत्तऽ भेटत?’’ ‘‘संकल्प स्थलपर।’’ बसन्ती बाजलि। ‘‘ओ स्थल कतए अछि?’’ ‘‘दुनियाँक एक-एक इंच जमीनपर।’’ ‘‘संकल्पक विधान की?’’ ‘‘आत्माक मिलन।’’ कहि दुनू गोटे दहिना हाथ मिला संग-संग जीवन जीवाक बचन एक-दोसरकेँ देलक। निबन्ध-बिपिन झा श्रीः ॥ हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ यौवनान्माद वशीभूत जनसामान्य केर वचन हो अथवा धीर-गभीर जनक मृदुवचन, प्रियतमा हेतु ’हे हृदयेश्वरी’ एहि पदक प्रयोग सुनि सर्वथा एहि पद केर चिन्तन स्वाभाविक छल। सामान्यरूपें तऽ ’हृदय’ पदक आशय उरोभागस्थ रक्ताभिसरण आदि कार्य करय बला शरीरावयवविशेष मात्र होइत अछि मुदा प्रश्न ई उठैत अछि जे हृदयेश्वरी पदक सन्दर्भ में  की ई आशय स्वीकार कयल जा सकैत अछि? कदाचित नहिं । कियाक तऽ कोनो प्राणी दोसर प्राणीक शरीरावयव विशेषक ’ईश्वरी’ अर्थात नियामिका, संचालिका, प्रेरिका अथवा निर्देशिका कोना भय सकैत छैक? एतय प्रश्न स्वाभाविक रहत जे शिरोभागस्थ हृदय सेहो तऽ शरीरावयव विशेषे अछि..? एकर उत्तर ई देल जा सकैत अछि जे दुनू क स्वभाव एवं कार्यप्रणाली पृथकशः छैक। शिरोभागस्थ मूलतः स्नायु सँ सम्बद्ध छैक; जेकर चर्चा आगू कयल जा रहल अछि। अस्तु, चिरकाल चिन्तन एहि लेख केर रूप लेलक आओर एहि बिन्दु पर पहुंचल जे ’हृदयेश्वरी’ पद में हृदय केर आशय जनसामान्य द्वारा स्वीकृत आशय सँऽ भिन्न होइत छैक । एहि प्रश्नक केर उत्तर भेट गेला पर कि हृदय शब्द सँ उरोभागस्थ एक अंगविशेषमात्र केर बोध नहि होइत अछि; हमर दृष्टि अमरकोष आओर मेदिनीकोष दिस गेल अमरकोषानुसार ’चित्त’ हृदय केर पर्याय रूप मे स्वीकरणीय अछि[1]। ओतहि मेदिनीकार सेहो एहि तथ्य के स्वीकार करैत छथि[2]। एहि तरहें दुनू  कोषकार मस्तिष्क रूप अर्थ स्वीकार करैत छथि। वैदिकग्रन्थ सेहो एहि तथ्य के समर्थन दैत अछि। शिवसंकल्प सूक्त में मन के हृदयस्थ कहल गेल अछि[3]। योगसूत्र सेहो हृदय केर आशय चित्त सँ लैत अछि[4]। मस्तिष्क सेहो हृदयवत कार्य करैत अछि; अस्तु ओकर अभिधान हृदय देल जा सकैत अछि। शतपथब्राह्मण[5] आओर बृहदारण्यक[6] उपनिषद त्र्यक्षर (हृ, द, य एहि तीन अक्षर) केर एकैकशः व्याख्या करैत अछि। मुण्डकोपनिषद[7] एकरा और स्पष्ट करैत कहैत अछि। caraचरकसंहिता सेहो हृदय केर वर्णन मस्तिष्क केर आशय सँ करैत अछि।[8] महाभारतक वनपर्व तऽ एकरा पूर्णतः स्पष्ट कय दैतब अछि जतय युधिष्ठिरसँ कहल जाइत छन्हि जे ’जीवात्मा’ हृदय में रहैत उत्तम अधम बुद्धि के विभिन्न द्रव्य सँ जोरैत अछि[9]। एवं प्रकारें देखैत छी जे हृदय पद सँ ’उरस्थ हृदय’ शिरस्थ हृदय’ आओर नाभी[10] आशय लेल जाइत अछि। एतय आवश्यक अछि जे उरोभागस्थ हृदय एवं शिरस्थ हृदय में अन्तर स्पष्ट कयल जाए। उरोभागस्थ हृदयक कार्य अछि- ·        प्रत्येक अंग सँ अशुद्ध रक्त केर आहरण ·        धमनी द्वारा शुद्धरक्तक प्रदान करब ·        मस्तिष्क के सदा क्रियाशील राखब शिरस्थ हृदयक कार्य अछि- ·        संवेदक ज्ञानतन्तु द्वारा ज्ञानक आहरण ·        कार्यतन्तु द्वारा कर्मेन्द्रिय के कार्यप्रदान करब ·        सतत गतिशीलता कायम राखब अर्थात नियन्त्रण राखब Contin… Bipin Jha www. bipinjha.webs.com  IIT, Bombay Post your comment on kumarvipin.jha@gmail.com [1] चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः। अमरकोष [2] हृदयं मानसे वुक्करसोरपि नपुंसकं...। मेदिनीकोष [3] हृत्प्रतिष्ठं यदजिरंजविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजु० ३४.६ [4] हृदये चित्संवित...। योग० ३.३४ [5] शतपथब्राह्मण १४.८.४.१ [6]  बृहदा० १४.८.४.१ [7] भिद्यते हृदयग्रन्थिः ...। मुण्डकोपनिषद, २.८ [8] आत्मनः श्रेष्ठमायतनं हृदय...। चरक० निदान० ८.३ [9] स आत्मा पुरुषव्याघ्र भ्रुवोरन्तरमाश्रितः। बुद्धिं द्रव्येषु सृजति  विविधेषु परावराम॥ महा० वन० १८१.२२ [10][10] उपयुक्तस्याहारस्य सम्यक...। सुश्रुत० सूत्रस्थान १४ ............. १.मुन्ना जी- अधिकार २.बेचन ठाकुर-बेटीक अपमान- दृश्‍य पाचि‍म १ मुन्ना जी मुन्नाजी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल लघुकथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो लघुकथा, कथा, क्षणिका आ लघुकथा सम्बन्धी किछु आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली लघुकथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत। अधिकार रूक.....। ऊँक नै लगा सकै छै तोँ। रामरीत पासवानक मुइला पछाति, भरि गामक लोक ओकर अंगनासँ दुरा धरि सोहरल छल। विधवाकेँ सांत्वना देवाक लेल। मुदा, ओकर दियाद वादकेँ लगलै कठाइन। दरअसल, मालिक मुक्तारक ई भीड़ तऽ जुटल रहै बजरंगीक सहयोगमे। बजरंगी, रामरीतक छोट भाए, मालिक–मुक्तारक पाछु चटुआ आ अखनुक वार्ड सदस्य। ओ भैयारी निभेवाक नै, घरारी हड़पवाक फेरमे छल, किएक तऽ रामरीतकेँ बेटा नै छलै। ओकर नजरि रहै रामरीतक छः कट्ठा घरारीपर तेँ सभकेँ जुटा लेने छल, गवाहक रूपमे, भविष्यक लेल। आ लहास उठेवासँ पहिने फरमान सुना देने छल– आगि जे देतै आ श्राद्ध जे करतै, घरारीक अधिकारी तऽ उएह ने हेतै। समवेत स्वीकृतिये मुड़ी डोलल छल–हँ.....। चलु–चलु लहास उठवै जाऊ, बेशी विलम्ब नीक नै। बजरंगी, कोहा उठावऽ। नै, किन्नहुँ नै। विधवाक आक्रोशक स्वरकेँ सुनि सभ शांत भऽ गेल। मंजुला, कोहा उठा आ आगि ले। अपन पिताक हृदयक एक मात्र टुकड़ी अछि ओ। आगि उएह देत। ठीक छै, चलु.....। मुखाग्नि हमही देब पिता हमर छथि, हुनक अंश हम छी, बजरंगी कक्का तऽ हुनक सम्बन्धी मात्र छथिन। ईह....., जेना रामरीतक बेटा रहथिन, अधिकार जताबऽ एलीहे। दबल स्वर भीड़क बीचमे सँ सुनएल। बेटा नै छी तेँ कि, हम तऽ हुनके रक्तबीचक पदार्पण छी। ओ निपुत्र छथि, मुदा निःसंतान नै। आइ सँ अही रेवाजक शुरूआत बुझू। आ संग के देतौ? निपुतराहा सभ। २ बेचन ठाकुर बेटीक अपमान दृश्‍य पाचि‍म- (स्‍थान- बलवीर चौधरीक घर। बलवीर चौधरी एकटा पंचायत शि‍क्षक छथि‍। हि‍नक पत्‍नी सुनीता देवी छथि‍न्‍ह। मंजू आ संजू हुनक सुपुत्री। बलवीर आओर सुनीता रवि‍केँ आपसी गप-सप्‍प कए रहल छथि‍।) सुनीता-     स्‍वामी, एगो बेटा अपनो सभकेँ रहि‍तए। बलवीर-     एहेन बात कि‍एक बाजलहुँ अहॉं? कि‍ हमरा लोकनि‍ नि‍:सन्‍तान छी? की          बेटी बेटासँ कम होइछ? अपना अपना जगहपर कि‍यो ककरोसँ कम नहि‍        होइछ। सुनीता-     स्‍वामी, मोन होय अए जे एगो बेटा होएताए। मुदा आब कोन उपाए? बलवीर-     यै, अहॉं मोनकेँ कि‍एक बौआबैत छी एतेक? जहन बुझैत छी जे                    ऑपरेशन कराए लेने छी, तखन बेकार मोनकेँ भरमेनाइ। सुनीता-     से तँ ठीके कहैत छी मुदा। बलवीर-     मुदा की? मुदा तुदा छोड़ू। यै, बेटा बेटी जनमेलासँ नहि‍ होइत अछि‍।               ओकर प्रतीक्षा चाही प्रतीक्षा अऍं यै, अपन मंजू आ संजूक आगू कि‍नक               बेटा कोनो कलामे टीक सकैत छथि‍। रूप आ गुणमे ओ सभ कि‍नकोसँ       कम अछि‍? एना अपने आपपर घमंड नहि‍ करबाक चाही। अपना सभ            दुनू परानीमे गप करैत छी। सुनीता-     यौ, संतोषम परम सुखम्। अपन दुनू बेटीकेँ खूब मोनसँ पढ़ाए-लि‍खाए           कऽ डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, एस.पी. कलक्‍टर बनाउ आ समाजमे खूब प्रतीक्षा        पाउ। बहुते जनमा कए कुक्‍कुर-बि‍लारि‍ जकॉं रोडपर ढहना कऽ कोन              प्रतीक्षा, कोन फेदा? बलवीर-     थैंक्स यू वेरी मच, सुनीता। आब अहॉं लाइनपर अएलहुँ। एहि‍ना              सदि‍खन बुद्धि‍ वि‍वेकसँ काज करी। पटाक्षेप- छठम दृश्‍य क्रमश: जितेन्द्र झा विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी जितेन्द्र झा काठमाण्डू पढबालेल विदेश गेनिहार नेपाली विद्यार्थीक सँख्या बढिरहल अछि । पश्चिमी जीवनशैली स्वतन्त्रता आ विलासिता भोगऽलेल सेहो नपाली विद्यार्थी विदेश दिन आकर्षित भऽ रहल अछि । आइटी होटल म्यानेजमेन्ट व्यबस्थापन इन्जिनियरिंग विज्ञान सहित विषयदिस रुचि रहल विद्यार्थी विदेश जएबाक लेल बाध्य सेहो अछि कियाक त नेपालमे एहन विषयक उत्कृष्ट अध्ययन सँस्थानक कमी अछि । विज्ञान आ व्यवस्थापन संकायमें रुचि रहल विद्यार्थी खास कऽ विदेश जाइत अछि ।  दोसर दिस नेपालमेँ लोडसेडिंग आ पाबनि तिहार जकँ होबऽ बला बन्द हडतालक कारण सेहो विद्यार्थीसभ विदेशमेँ अपन सुरक्षित भविष्य देखैत अछि । एहि वर्ष मात्रे नेपालमें एगारह घण्टाधरि लोडसेडिंग भेल छल तहिना राजनीतिक दल आ सशस्त्र निशस्त्र समूह बन्द हडताल आहवान करिते रहैत अछि । विदेश गेनिहार विद्यार्थीमेँ  निजी विद्यालय तथा कलेजमेँ अध्ययनरत विद्यार्थी सभ बेशी अछि । सरकारी क्याम्पस पढाइसँ बेशी राजनीतिके केन्द्र बनल अछि तेँ लगनशील आ मेहनती विद्यार्थी ओम्हर ताकहो नहि चाहैत अछि । नेपालक कन्सल्टयान्सीसभ विद्यार्थीके निजी खर्चमेँ विदेश पढऽ जाएलेल सहज बाट बना देने अछि । शैक्षिक परामर्शदातासभ विद्यार्थीके विदेशमेँ पढाईके जानकारीक सँगहि विदेश जएबालेल विद्यार्थीके प्रेरित सेहोे करैत अछि । शैक्षिक परामर्शदाता ममता उपाध्यायके अनुसार नेपालमें प्रयोगात्मक शिक्षा नहि अछि तें एत्त गुणस्तरीय पढाई सम्भव नहि अछि । तें नेपालमें एम. ए. आ पिच एच डी कएल विद्यार्थीसेहो गुणस्तरहीन होइत अछि ममताक कहब छन्हि । नेपालमें पढलाक बाद नोकरीक अवसर कम अछि ताहिलेल सेहो विद्यार्थी विदेश दिस आकर्षित भऽ रहल अछि । नेपालक आम विद्यार्थीक लेल विदेशक पढाइ सपना सेहो अछि कम आय भेल अभिभावकके धीयापुतासभके त नेपालेमे चित्त बुझएबाक स्थिति छै । विदेशमेँ उच्च शिक्षा अध्ययन करबाक लेल परामर्श लेबऽ आएल विद्यार्थी नेपालोमेँ अध्ययनकऽ कऽ भविष्य बनाओल जा सकैत अछि ताहिमेँ विश्वस्त अछि । सरकार पढबालेल विदेश पलायनकेँ रोकबालेल कोनो खास पहल एखनधरि नइ कएलक अछि नेपाली विद्यार्थी सँगहि प्रतिभा आ देशक पाइसेहो विदेश जाइत अछि से बुझब आबश्यक अछि । शिक्षामन्त्रालय एहिप्रति गम्भीर रहल दाबी शिक्षामन्त्री सर्र्वेन्द्रनाथ शुक्लके छन्हि । नेपालक विद्यालयके गुणस्तरीय बनाओल जाए तऽ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या कम भ सकैया शुक्लके कहब छन्हि । विज्ञान आ व्यवस्थापन अध्ययन होबऽ बला ९० विद्यालयकें सरकार गुणस्तरीय बनाएबालेल सहयोग कऽ रहल शुक्ल जनतब देलनि । विद्यालयके क्षमता पाठयक्रम शिक्षक शैक्षिक सामग्री जेहन विषयवस्तु दिस सुधारके आवश्यकता अछि । नेपालमेँ एक तथ्यांकअनुसार ४० हजार विद्यार्थी प्रतिवर्ष स्नातक उत्तीर्ण करैत अछि जाहिमेँसँ नेपालमेँ मात्र दू हजारके रोजगारी भेटैत छैक । राजनीतिक अबस्था बन्द हडताल जेहन कारणसँ वार्षिक २० हजारसँ बेशी विद्यार्थी उच्च शिक्षा बास्ते विदेश जाइत अछि । ई त सरकारी तथ्यांक अछि । विदेश जाएलेल शिक्षा मन्त्रालयसँ सिफारिस लेनिहार विद्यार्थीक सँख्या मात्र ई अपना निजी खर्चमेँ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या आओर बेशी अछि । विदेशमेँ मात्रे उत्कृष्ट शिक्षा भेटैत छैक से भ्रम चिरबादिस सम्बन्धित सभ पक्षके लागक चाही । राजनीतिक दलके सेहो शिक्षा क्षेत्रके बन्द हडताल मुक्त बनएबामेँ सहयोग करबाक चाही । विद्यार्थी देशक भविष्य होइत अछि भविष्यके अन्धकारमेँ धकेलबाक काज ककरोसँ नहि हुअए । कुसुम ठाकुर अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक !! ओना तs हमर स्वभाव अछि हम नहि लोक के उपदेश दैत छियैक आ नहि अपन मोनक भावना लोकक सोझां मे प्रकट होमय दैत छियैक । हम सुनय सबकेर छियैक मुदा हमरा मोन मे जे ठीक बुझाइत अछि ओतबा धरि करैत छियैक। एकर परिणाम इ होइत अछि जे हमरा सलाह देबय वाला केर कमी नहि छैक। सब के होइत छैन्ह जे ओ जे कहताह कहतिह से हम अवश्य मानि लेबैन्ह।अपन अपन भावना केर हमरा पर थोपय के कोशिश बहुत लोक करय छथि। परोपदेश देनाइयो आसान होइत छैक । मुदा हमर भलाई केर विषय मे के सोचि रहल छथि इ ज्ञान तs हमरा अछि ।  मुदा दोसराक विचार सुनालाक किछु फायदा सेहो छैक। लोकक विचार सुनि अपन विचार व्यक्त करय मे आसानी होइत छैक आ आत्म विशवास सेहो बढैत छैक।  

एकटा कहबी छैक "कोठा चढ़ी चढ़ी देखा सब घर एकहि लेखा " सब ठाम कमो बेसी एके स्थिति छैक, मुदा दोसरा केर विषय मे कम बुझय मे, आ देरी सs बुझय मे आबैत छैक, अपन तs लोक के सबटा बुझल रहैत छैक। पारिवारिक हो सामाजिक हो वा देशक, सब ठाम आपस मे विचार मे मतान्तर होइत रहैत छैक जे कि मनुष्य मात्र के लेल स्वाभाविक छैक आ हेबाक सेहो चाहि । जखैन्ह दस लोकक विचार होइत छैक तs ओहि मे किछु नीक किछु अधलाह सेहो विचार सोंझा मे आबैत छैक। मुदा आजु काल्हि सब ठाम स्वार्थ सर्वोपरि भs जाइत छैक । लोक के लेल देश समाज सs ऊपर अपन स्वार्थ भs गेल छैक। 

संस्था व न्यास केर स्थापना होइत छैक समाज आ संस्कृति केर उत्थानक लेल । मुदा संस्थाक स्थापना भेलैक नहि कि ओहि संस्थाक मुखिया पद आ कार्यकारणी मे सम्मिलित होयबाक लेल राजनीति शुरू भs जाइत छैक । एकटा संस्था मे कैयैक टा गुट बनि जाइत छैक । आ ओहि मे सदस्य ततेक नहि व्यस्त भs जाइत छथि कि हुनका लोकनि के सामाजिक कार्य आ संस्कृति के विषय मे सोचबाक फुर्सते कहाँ रहैत छैन्ह । आ ताहू सs जौं बेसी भेलैक आ बुझि जाय छथि जे आब हुनक ओहि ठाम चलय वाला नहि छैन्ह तs एक टा नव संस्था केर स्थापना कs लैत छथि। सामाजिक कार्य केर नाम पर  साल मे एकटा वा दू टा सांस्कृतिक कार्यक्रम कs लैत छथि आ बुझैत छथि समाज केर उद्धार कs रहल छथि । ओहि कार्यक्रम मे पैघ पैघ हस्ती , नेता के बजा अपन डंका बजा लैत छथि।बाकि साल भरि गुट बाजी आ साबित करय मे बिता दैत छथि जे हुनक कार्यकाल मे कार्यक्रम बेसी नीक भेलैक। हम मानय छियैक जे कार्यक्रम अपन संस्कृति केर आइना होइत छैक, मुदा ओ तs स्थानीय कलाकार के मौक़ा दs कs सेहो करवायल जा सकैत छैक। इ कोन समाजक उत्थान भेलैक जे लोक सs मांगि कs कोष जमा कैल जाय आ मात्र कार्यक्रम मे खर्च कs देल जाय। बहुतो एहेन बच्चा शहर वा गाम मे छथि जे मेधावी रहितो पाई के अभाव मे आगू नहि पढि पाबय छथि। दवाई केर अभाव मे कतेक लोकक जान नहि बचा पाबय वाला परिवारक मददि केनाई समाजक उद्धार नहि भेलैक? आय काल्हि तs लाखक लाख खर्च करि कs एकटा कार्यक्रम कैल जाइत छैक। कहय लेल हम ओहि महान हस्ती केर पर्व मना रहल छी। कार्यक्रम करू मुदा कि अपन गाम शहर के भूखल के खाना खुआ तृप्त कs ओहि महान हस्ती के श्रद्धाँजलि नहि देल जा सकैत छैक। इ तs मात्र एक दू टा समाज के सहायतार्थ काज भेलैक ओहेन कैयैक टा सामाजिक काज छैक जे कैल जा सकय छैक । यदि सच मे लोक के अपन समाज आ संस्कृति सs लगाव छैन्ह तs जतेक कम संस्था रहतैक ततेक नीक काज आ समाजक उत्थान होयतैक। ओहि लेल मोन मे भावनाक काज छैक नहि कि दस टा संस्थाक ।

देश मे नित्य नव नव राज्यक माँग भs रहल अछि। ओहि मे मिथिलांचलक माँग सेहो छैक। हमरा सँ सेहो बहुत लोक पूछय छथि "अहाँ मिथिला राज्य अलग हेबाक के पक्ष मे छी कि नहि "? हम एकहि टा सवाल हुनका लोकनि सँ पूछय छियैंह "कि राज्य अलग भेला सँ मिथिलाक उत्थान भs जेतैक "? इ सुनतहि सब के होइत छैन्ह हम मैथिल आ मिथिलाक शुभ चिन्तक नहीं छी। बुझाई छैन्ह जे अलग राज्य बनि गेला सँ मिथिलांचलक काया पलट भs जेतैक । एक गोटे जे अपना के मिथिला के लेल समर्पित कहय छथि, साफ़ कहलाह "मैथिल के मोन मे मिथिला के लेल जे प्रेम हेतैक से दोसरा के  नहि" । हमर हुनका सँ एकटा प्रश्न छल "कि पहिने बिहार मे मैथिल मुख्य मंत्री, मंत्री नहि भेल छथि "? जवाब भेंटल " ओ सब मैथिल छलथि मिथिलाक नहि"। अलग राज्य भेलाक बाद जे कीयो मुख्य मंत्री होयताह ओ मिथिलाक होयताह आ मात्र मिथिला के लेल सोचताह । 

हमरा इ बुझय मे नहि आबैत अछि जे लोकक  मानसिकता के कोना बदलल जा सकैत छैक ? एखैंह ओ दरभंगा के छथि , ओ सहरसा के .....ओ मुंगेर के छथि ....कि  अलग राज्य भेला सँ आदमी केर मानसिकता बदलि जेतैक .....कि दरभंगा , सहरसा आ कि मुंगेर वाला भेद भाव मोन मे नहि औतेक ? आ जौं इ भेद भावना रहतैक तs सम्पूर्ण राज्यक विकास कोनाक भs सकैत छैक  ? कि मिथिलाक होइतो ओ सम्पूर्ण मिथिला केर विषय मे सोचताह ?

छोट  छोट राज्य नीक होइत छैक , ओकर पक्ष मे हमहू छी मुदा बिना राज्यक बंटवारा केने सेहो बहुत काज कैयल जा सकैत छैक, जौं करय चाहि तs । ओना सब अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागल रहय छथि इ अलग गप्प छैक। कि नीक स्कूल कॉलेज कारखाना के लेल बिना राज्य अलग बनने प्रयास नहि कैयल जा सकैत छैक? कि मात्र मिथिला राज्य बनि गेला सँ मिथिलाक उद्धार भs जयतैक ? मिथिला राज्यक अलग हो ताहि आन्दोलन मे अनेको लोक सक्रीय छथि , मुदा हुनका लोकनि सs एकटा प्रश्न .......ओ सब आत्मा सs पुछथि कि ओ सब मात्र राज्य आ समाज के लेल सोचय छथि कि हुनका लोकनि के मोन मे लेस मात्र स्वार्थक भावना नहि छैन्ह ?

कैयैक टा राज्य अलग भेलैक अछि मुदा बेसी केर स्थिति पहिने सs बेसी खराब भs गेल छैक, झारखण्ड ओकर उदाहरण अछि । खनिज संपदा सँ संपन्न राज्यक स्थिति बिहार सs अलग भेलाक बाद आओर खराब भs गेल छैक। एहि राज्य मे नौ साल के भीतर सात टा मुख्यमंत्री बनि चुकल छथि । लोक के उम्मीद छलैक जे १० साल के भीतर एहि राज्य केर उन्नति भs जयतैक। उन्नति भेलैक अछि, मुदा राज्य केर नहि नेता सब केर । चोर उचक्का खूनि  सब नेता भs गेल छथि आ पैघ सs पैघ गाड़ी मे घुमि रहल छथि , देश आ जनता केर संपत्ति केर उपभोग कs रहल छथि इ कि उन्नति नहि छैक ? जगदीश प्रसाद मंडल 1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। कथा बपौती संप्पति

आसीन अन्हरिया चौठ। गोटि-पङरा खाऐन पीनि शुरु भऽ गेल। मातृनवमी-पितृपक्ष साझिये चलि रहल अछि। क्यो-क्यो बापो, दादा, परदादा नामसँ तँ कियो-कियो माइओ, दादी, परदादी इत्यादिक निमित्ते नति-नहि खुअबैत। जल-तर्पण सेहो परीबे दिनसँ शुरु भऽ गेल। मुदा इहो गोटि पङरे। किछु गोटे ठकिओने जे एकादशीकेँ जल-तपर्ण कऽ लेब। तहिना मातृपक्षक लेल नवमी आ पितृपक्षक लेल एकादशीकेँ न्योतहारी नति खुआ लेब। मुदा, गामक किछु जातिक बीच तेसरो तरहक होइत। ओ ई होति जे बेरा-बेरी सभ सौँसे टोलकेँ एक-एक दिन कऽ खुअबैत अछि। जेकरा ढढ़क कहैत अछि। किछु गोटे मातृपक्षक लेल महिलाकेँ आ पुरुष पक्षक लेल पुरुषकेँ न्योत दऽ सेहो खुअबैत अछि। पखक मातृपक्ष भिनौज भऽ गेल अछि। एकपक्ष मातृनवमी आ दोसर पितृपक्ष। जहिसँ नवमी मातृपक्षक हिस्सा आ एकादशी पितृपक्षक हिस्सा भऽ गेल दुनू टेंगारीकेँ घरसँ निकालि गुलटेन पच्चार दए सिलौटपर पिजबैक विचार केलक कि तमाकुल खाइक मन भेलै। चुनौटीसँ सकरी कट तमाकुल निकालि तरहत्थीपर डाँट बीछिते रहै कि पत्नी मुनिया आबि कहलक- ‘‘घरमे एक्को चुटकी नून नै अछि। भानसाक बेर भऽ गेल, कखैन आनब?’’ ‘‘अच्छा होउ, जाबे अहाँ सजमनि बनाएब ताबे हम दौड़ले नून नेने अबै छी। टेंगारी नेने जाउ कोठीक गोरा तरमे रखि देबै। हाँइ-हाँइ तमाकुल चुबए लगल। ठोरमे तमाकुल लइतै, मरचूनक दुआरे, कोनादन लगलै कि थूकड़ि कऽ फेकैत दोकान दिशि विदा भेल। एक तँ तमाकुल मनकेँ हौड़ि देलक दोसर काज टेंगारी पीजेनाइ पछुआइत देखि आरो मन घोर भऽ गेलैक। मनमे उठलै पुरने कपड़ा जेकाँ परिवारो होइए। जहिना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटब सीने दोसर ठाम मसकि जाइत तहिना परिवारोक काजक अछि। एकटा पुराउ दोसर आबि जाएत। मुदा चिन्ता आगू मुँहेे नहि ससरि रुकि गेलै। चिन्ताकेँ अटकितहि मनमे खुशी एलै। अपनापर ग्लानि भेलइ जे जहि धरतीपर बसल परिवारमे जन्म लैक सिहन्ता देवियो-देवताकेँ होइत छन्हि ओकरा हम माया-जाल किअए बुझै छी। ई दुनियाँ केकरा लेल छैक? ककरो कहने दुनियाँ असत्य भऽ जाएत। ई दुनियाँ उपयोग करैक छी नहि कि उपभोग करैक। गुलटेनकेँ देखि आमक गाछक छाँहमे बैसल भुखना कहलक- ‘‘तमाकुल खा लाए कक्का, तखन जइहह।’’ ठाढ़ भऽ गुलटेन भुखनाकेँ कहलक- ‘‘बौआ, अगुताइल छी, जल्दी दू धूस्सा दहक आ लाबह। बेसी काल नै अँटकब।’’ ऐँह कक्का, तोहूँ सदिखन अगुताएले रहै छह। तमाकुलो खाइक छुट्टी नै रहै छह।’’ कहि भुखना चून झाड़ि चुटकीसँ तमाकुल बढ़ौलक। मुँहमे तमाकुल दइते रसगर लगलै। सुआद पाबि बाजल- ‘‘बड़ टिपगर खैनी खुऔलेँ भुखन। ऐहन टिपगर माल कोन दोकानक छिऔ?’’ ‘‘काका की कहबह; दिन आठम एकटा समस्तीपुरक बेपारी साइकिलपर एक बोझ तमाकुल लऽ बेचए आएल रहै। रातिमे अपने ऐठीन रहल। ऐँह काका भरि राति हिसाबे जगौनहि रहल। जेहने खिस्सकर तेहने महरैया रहए। खाइसँ पहिने महराइ गौलक आ खेला बाद एक्के टा तेहन खिस्सा, रजनी-सजनीक, उठौलक जे ओरेबे ने करै जखन डंडी-तराजू पछिम चलि गेल तखन हमहीं कहलियै जे आब छोड़ि दिऔ। बड़ राति भऽ गेल। तखन जा कऽ छोड़लक। भिनसर भने पोखरि-झाँखरि दिशिसँ आएल तँ चाह पीआ देलियै। दलानसँ साइकिल निकालि तमाकुल सरिअबए लगल। हमहूँ गिलास धोय चक्कापर रखि एलौं कि जेबीसँ दस टकही निकालि दिअए लगल कि कहलियै- ‘‘ई की दइ छी।’’ ओ कहलक हम बेपारी छी कोनो अभ्यागत नहि, तेँ खेनाइक पाइ दइ छी। आब तोंही कहह कक्का ओकरासँ पाइ लेब उचित होएत। कि हम सभ अपन बाप-दादाक बनौल प्रतिष्ठाकेँ भँसा देब? ई तँ बपौती सम्पति छी की ने एकरा कोना आँखिक सोझमे मेटाइत देखब।’’ थूक फेकि गुलटेन कहलक- ‘‘ऐहनो कियो बूड़िबक्की करै। पा भरि खेने हएत कि नै खेने हएत, तइ ले लोक अपन खानदानक नाक कटा लेत। नीक केलह जे पाइ नै छुलै।’’ अपन बड़प्पन देखि मुस्की दैत भुखना बाजल- ‘‘ऐँह कि कहिह काका, ओहो बड़ रगड़ी, कहए लगल जे से कोना हएत। हम कि कोनो भुखल-दुखल छी, आ कि व्यापारी छी। मुदा हमहूँ पाइ नै छुलिऐक तखन ओ दस-बारह टा पात निकालि कऽ दैत कहलक, जहिना अहाँक अन्न खेलौं तहिना हमहूँ तमाकुल खाइये लऽ दइ छी। सएह छी।’’ आगू बढ़ैत गुलटेन- ‘‘बौआ अखैन औगताइल छी। नूनक दुआरे तीमन अनोन रहि जाएत।’’ थोड़बे अटि कऽ घोघन साहुक दोकान। गुलटेनकेँ देखितहि झिंगुर काका कहलखिन- ‘‘अखन धरि माथमे केश लगले देखै छिअह।’’ माथ हसोथि कऽ देखैत गुलटेन बाजल- ‘‘अखन कटबै जोकर कहाँ भेल हेन। जखन कानपर केश लटकऽ लगत तखन ने कटाएव।’’ ‘‘बिसरि गेलह। काल्हिये ने बावूक बरखी छिअह। हमरो चच्चा सहाएवकेँ छिअनि। दुनू गोटे एक्के दिन ने मरल रहथुन।’’ झिंगुर काकाक बात सुनि गुलटेनकेँ धक् दऽ मन पड़ल। बाजल- ‘‘हँ, ठीके कहलौं काका। आइ ज अहाँ भेंटि नै होइतौं तँ बरखी छुटिये जाइत।’’ ‘‘अखनो किछु नहि भेल हेन। जा कऽ कटा आवह। हमर तँ तेहन झमटगर दियाद अछि जे भोरेसँ चारि गोटे लागल अछि मुदा अखनो धरि पार नहि लागल हेन।’’ ‘‘अखन तँ हमहीं टा घरपर छी। दियादिक तँ सभ कियो अपन-अपन हाल-रोजगारमे चलि गेल। कियो झंझारपुर वेपारीक संग गछकटियामे तँ कियो सुखेतक चिमनीपर ईंटा बनवैए। अपने केश कटाएब, ओरियान बात करब आ कि ओकरा सभकेँ बजवै लऽ जाएब।’’ ‘‘असली कर्ता तँ तोहीं ने छिअह। तोहर कटाएव जरुरी छह। हमरा सभमे तँ पाँच बर्षी धरि सभ दियाद-वाद केशो कटबैट अछि आ कमसँ कम एगारह गोटेकेँ खाइयो लऽ दैत अछि। तोरा सेहो एकटा आरो हेतह। खाएन-पीनि माने मातृनवमी-पितृपक्ष चलिते अछि। चाचाजीकेँ तीर्थेपर वर्षी पड़ि गेलनि, तेँ दोहरा कऽ खुअबैक झंझट नहि रहलनि। मुदा तूँ सभ ते एकादशीकेँ खुअबै छह तेँ तोरा दोहरा कऽ सेहो करै पड़तह। ओना ई सभ मन मानैक बात छी। मुदा, चलनियो तँ कोनो अपन महत्व रखैत अछि की ने। झिंगुर काकाक बात सुनि दोकानदारकेँ गुलटेन कहलक- ‘‘हओ घोघन साहु, झब दे एक टका के नून दाए।’’ गमछामे नोन बान्हि गुलटेन लफड़ल घर दिशि चलल। मनमे पिता नाचए लगलनि। हृदय पसीज गेलनि। स्मरण भेलनि, अनका जेकाँ बाबू नहि छलाह। आगू-पाछुक बात जनैत छलाह। जँ से नहि जनितथि तँ किऐक ने अनके जेकाँ हमरो खेत-पथार कीनि देने रहितथि। कोनो कि कमाइ खटाइ नहि छलाह। जँ से नहि छलाह तँ कातिक मासमे ओते खरचा कऽ कऽ भागवत कोना करबै छलाह। तहिपर सँ भोजो-भनडारा करिते छलाह। हमरे ले कि कम केलनि। घर-गिरहस्तीक सभ लूरि सिखा देलनि। बारहो मासक काज। हम कि कोनो नोकरी करै छी जे सालो भरि कहियो बैसारी नहि होइत अछि। कमाइ छी खाइ छी ठाठसँ जिनगी बीतबै छी। जँ खेते रहैत आ खेतीक करैक लूरिये नहि रहैत तँ छुछे खेते लऽ कऽ की होइतै। गाममे देखबे करै छी खेतबला सभहक दशा। रौदी हुअअ कि दाही अछैते खेते हाट-बजारसँ मोटा उघैत छथि। हमरा तँ एक्को धुर घरारी छोड़ि नहि अछि। तेँ कि ककरोसँ अधला जीबै छी। अपन खुशहाल जिनगीपर नजरि अवितहि आनन्दसँ हृदय ओलड़ि गेलनि। मरहन्ना धान जेकाँ लटुआइल नहि अपन चढ़ल जुआनी जेकाँ खेतसँ आँड़िपर ओलड़ल। कोना लोक बजैत अछि जे जकरा अ आ नहि लिखल अबैत अछि ओ मुरुख अछि। बावू तँ औंठे-निशान दऽ मट्टियो तेल आ चिन्नयो कोटासँ अनैत छलाह। बड़का-बड़का सर्टियोफिकेटबला सभकेँ देखैत छिअनि जे दारु पीवि लेताह आ बीच सड़कपर ठाढ़ भऽ अंग्रेजीमे भाषण करैत लोकक रस्ता रोकने रहैत छथि। तहिसँ हजार गुना नीक ने बावू छलाह। खाइ बेरिमे अंगनामे नहि रहैत छलहुँ तँ शोर पाड़ि संगे खुअवैत छलाह। जहिया कहियो नीक-निकुत अनै छलाह आ थारीमे अन्दाजसँ वेसी बुझि पड़ैत छलनि तँ थारीसँ निकालि माएकेँ दैत छेलखिन नहि तँ ओते छोड़ि कऽ उठैत छलाह। आ हा-हा ऐहन बाप होएव कि अधला छी। जखन काज करऽ जाइत छलाह तँ संगे नेने जाय छलाह आ काजक लूरि सिखवै छलाह। जहन काजक लूरि भेल तहन ने बोइन करऽ लगलहुँ। केहन हुनकर सालो भरिक हिसाव छलनि। आसीन-कातिक गछपंगियाँ आ खढ़ कटिया हुनकेसँ सीखिलहुँ। तहिना अगहन-पूस धन कटिया, नार बन्हिया, दौन केनाइ, टाल लगौनाइ सीखने छी। किअए एक्को दिन बैसारी रहत। अखनुका छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे कहत काजे ने अछि। कि रस्तापर बालू उड़ाएव आकि पानि डेंगाएव। मुर्खो रहैत बावूए ने सिखौलनि जे फागुनसँ जेठ धरि घरहटक समए होइ छै। जेकरा घरहट करैक लूरि रहत वएह ने अपनो घर आ अनको घर बन्हैमे मदति कऽ सकैत अछि। जेकरा लूरिये ने रहतै ओकरा इन्दिरा आवासमे मुखिया, चिमनीबला, सिमटीबला नै ठकत तँ कि जेकरा अपन घर बनबैक लूरि रहत, ओकरा ठकत। अपनापर गुलटेनकेँ भरोष होइतहि मनमे खुशी उपकल। मुँहसँ हँसी निकलल। ओगरवाहीक गाछीक मचकीपर नजरि गेलै। कि हमरा सबहक दुनियाँ अछि। बड़क गाछपर सँ बड़्ड़् काटि बरहा बनबै छी। मूठबाँसीक बल्ला, पीढ़ियाँ आ कील बना गाछक डारिमे लटका झुलबो करै छी आ गेबो करैत छी। जे चौमासा, छहमासा, बारहमासा मचकीक स्टेटपर होइत अछि ओ बाजा-बूजी आ वैसि कऽ गबैमे कोना होएत? असकरे कृष्ण राधाक संग कदमक झूलापर चढ़ि नचबो करैत छलाह, बाँसुरियो बजवैत छलाह आ आसो लगबैत छलाह। मुदा, अखन तँ देखैत छी जे बाजा कियो बजवैत, नाच कियो करैत आ गीति कियो गवैत अछि। तेहने ने देखिनिहारो छथि। कियो कैसियोबलाकेँ देखैत तँ कियो ठेकैताकेँ, कियो नचनिहारक नाच देखैत तँ कियो ओकर कानक झुमकाकेँ। गौनिहारक आबाज सुनैत, नहि कि ओकर मुँह देखैत अछि। नोनक मोटरी पत्नीकेँ दैत गुलटेन कहलक- ‘‘बाबूक बरखी काल्हिये छी। बिसरि गेल छलौं। केश कटौने अबै छी। ताबे अहाँ बरखी लऽ जे चाउर रखने छी ओकरा निकालि रौदमे पसारि दिऔ। राहड़ि सेहो उलबए पड़त। बेरु पहर तीमन-तरकारी आ मसल्ला हाटसँ लँ आनब। दूध तँ आइये पौरल जाइत। ओना अमहौरपर सौझुको दूध जनमि जाएत।’’ पतिक बात सुनि मुनिया बजलीह- ‘‘ऐहेन जे अहाँ बिसराह छी, सब काज चौबीसमा घड़ीमे सम्हरत। ने कुटुमकेँ नोत देलौं आ ने बेटी-जमाइकेँ खबरि देलिएनि।’’ ‘‘अच्छा सभ हेतै। अनजान-सुनजान महाकल्याण। बाबू कोनो अधरमी रहथि जे कोनो बाधा हएत। उगलाहा सभ देखबो करै छथि आ पारो लगौताह।’’ कहि गुलटेन केश कटबए विदा भेल। केश कट करखीक जानकारी सबजना न्योत दऽ चोटे घुरि गेल। काजमे गुलटेन जेहने होशगर माने लुरिगर तेहने बिसराह। जे सभ बुझैत। उजड़ल गाम कोनो बसत। दरिद्र गाम कोनो सुभ्यस्त बनत, एहि कलाक प्रदर्शन गुलटेनक काज देखबैत। अनाड़ीकेँ काजक लूरि सिखाएब, हनपटाह गाए-महीसि दुहब, डरबूकसँ डरबूक गाएकेँ बहाएब माने साँढ़ लग लऽ जा पाल खुआएब, घोरनोबला आ चुट्टियाहो गाछपर चढ़ि आम तोड़ब, झोंझगर बाँसमे पत्ता तोरव, सुरुंगवा शीशो पाङब, सुआगर घर छाड़ब, सक्कत खेत जोतब, पनिगर खेतमे धान रोपब, सांङिपर ढेंग उठाएव, दुखताहकेँ खाटपर उठा डॉक्टर ऐठाम लऽ जाएब, फड़काह बच्छाकेँ पटकि नाथव, हर लागएव इत्यादि काज समाजमे ककरो कऽ दैत। कोना नहि करैत? एकरे तँ अपन बपौती सम्पति बुझैत अछि। वर्षी भोजक चर्चा जनिजातिक माध्यमसँ सगरे गाम पसरि गेल। अपन दायित्व बुझि एका-एकी मरदो आ स्त्रीगणो गुलटेन ऐठाम आबए लागल। जहिना अनका ऐठाम काज भेने गुलटेनो बिनु कहनहुँ पहुँच जाइत तहिना समाजोक लोक आवए लगलाह। रवियापर नजरि पड़ितहि गुलटेन कहलक- ‘‘रबी, तोरा ऐठाम तँ जाइये ले छलौं। भने आबिये गेलह। बहुत दिन जीबह।’’ रवि- ‘‘किअए भैया? अखने फोकचाहावाली काकी अंगनामे बजलीह; तब बुझलौं।’’ ‘‘ठीके सुनलक। बिसरि गेल छलौं। दोकानपर झिंगुर काका मन पाड़ि देलनि। मुदा काज तँ कौल्हुका बदला परसू नै हएत।’’ ‘‘हमरा बुते जे हेतह तइमे पाछू थोड़े हेबह।’’ ‘‘चाउर-दालि तँ घरेमे अछि। तेल-मसल्ला, तरकारी हाटेपर सँ लऽ आनब मुदा पंचकेँ दुइओ कौर दही नै खुऐबनि से नीक हएत?’’ ‘‘सौझका दूध अपनो रहत आ किसुनोसँ लऽ लेब। कत्ते दूध पौरबहक?’’ ‘‘दू मन चाउर रान्हब। अधोमन तँ दही चाही।’’ ‘‘अधा मन सँ हेतह?’’ ‘‘अपना सभमे दहिये कते परसल जाइत अछि। गरीब लोक अन्ने बेसी खाइत अछि। दूध-दही आ कि फल-फलहरी जे खाइयो चाहत से आनत कतऽ सँ।’’ ‘‘हँ, ई तँ ठीके कहलह। हम तँ कहबह जे तरकारियो किअए हाटपर सँ अनबह। अखन तँ सबहक चारपर सजमनि कदीमा आ बाड़ीमे भट्टा अछिये तइ ले पाइ किअए खर्च करवह। धड़फड़मे अदौरी बनौल नै हेतह। बैगन आ अदौरी नै बनेबह से केहन हएत?’’ ‘‘मन होइए जे बर-बरीक ओरियान करी।’’ ‘‘तों सनकि गेलह हेन। बड़-बड़ीक घाटि कते मेठनियाँ होइत अछि से नै बुझै छहक।’’ ‘‘हँ, से तँ ठीके कहलक।’’ ‘‘अखन जाइ छिअह। दहीसँ तू निचेन भऽ जाह। काल्हि दुपहरमे ने काज हेतह। आ कि पुजौनिहारो औथुन।’’ ‘‘अपना सभमे कत्ते पुजौनिहारकेँ देखै छहक। जतिया आगू कोनो पतिया लगै छै।’’ भगिन पुतोहू दालि दड़ड़ै लऽ अबैत छलि। डेढ़ियापर अवितहि गुलटेनपर नजरि पड़ितहि मुँह बीजकबैत बाजलि- ‘‘बुढ़हा अपनो मरताह आ दोसरोकेँ जान मारथिन काल्हि-परसू ई सब काज नै होइतै। कहि दालिक मुजेला लऽ जाँत दिशि बढ़लि। गोसांइ डुबिते भाय भजनाक संग सिंहेसरी पहुँचलि। अपना माथपर अपन पहिरएबला कपड़ा आ अल्लूक मोटरी आ भजनाक माथपर चाउर-दालिक। बिनु छँटले चाउर आ गोट्टे दलि। आंगन पहुँच सिंहेसरी कानल नहि। माए-बाप लग बेटीक कानव तँ सिनेहक होइत। मुदा सिंहेसरीक मन तखनेसँ लहकल जखने भजना बरखीक चर्चा केलक। मनमे उठै जे अपना खूँटापर लघैर महीसि अछि, बरखी सन काजमे जँ एक्को कराही दही नहि लऽ जाएब से केहन हएत? ओसारपर मोटरी रखि माएसँ झगड़ा शुरु करैत बाजलि- ‘‘ऐँ गे बुढ़िया, हमरा कोनो आए-उपाए नै यऽ जे, काल्हि बाबाक बरखी छिअनि आ आइ तू अबै ले कहलेँ?’’ तहि बीच गुलटेन सेहो हाटसँ आबि गेला। माथपर मोटरी रहबे करनि कि मुनिया बाजलि- ‘‘दाय, हमर कोन दोख अछि मासे-मास जे छाया करैत एलौं तेकर ठेकाने ने रहल। बापो तेहन विसराह छेथुन जे बिसरि गेलखुन। आइये बुझलौं।’’ माएक जबाव सुनि सिंहेसरीक तामस पिता दिस बढ़ए लगल। मुदा मुँह-झाड़ि बाजब उचित नहि बुझि माएकेँ अगुअबैत बाजलि- ‘‘जाबे बाबा जीवैत छलाह ताबे कत्ते मानै छलाह। आब जखन ओ नहि छथि तखन हुनकर किरिया-करम छोड़ि देबनि। एगारहो गोटेक तँ ओरियान कऽ कऽ अबितौं।’’ बेटी आ पत्नीक बात गुलटेन चुपचाप सुनैत। कखनो मनमे उठै जे गलती हमरे भेल। फेरि होइ जे कोनो काज करै काल ने उनटा-पुनटा भेने गल्ती होइत अछि। मुदा, हम तँ बिसरि गेल छलौं। सामंजस्य करैत गुलटेन बाजल- ‘‘पाहुन किअए ने ऐलखुन?’’ सिंहेसरी- ‘‘से तू नै बुझै छहक जे नोकरिया-चकरियाक घर छी जे ताला लगा देवै आ विदा भऽ जाएब। दुनू परानी लगल रहै छी तखन ते एक्को क्षणक छुट्टी नै होइए। ढेनुआर महीसिकेँ छोड़ि कऽ दुनू गोरे कना अबितौं।’’ बेटीक बात सुनि मुनिया बाजलि- ‘‘अइ घर ओइ घरमे कोन अन्तर अछि। तोरा लिये जेहने ई तेहने उ। अहूठीन ते दहीक ओरियान भइये रहल हेन। तइ ले तोरा किअए मनमे दुख होइ छौ। हम तोहर माए नइ छियौ। कोनो आइऐक छियै कि सभ दिनेक बिसराह छथुन। तइ ले तामस किअए होइ छह। मोटरी सभकेँ खोलि-खोलि चीज-बौस ओरिया कऽ राखह। पहिने पएर धोय गोसाँइकेँ गोड़ लगहुन।’’ पत्नी आ बेटीकेँ शान्ति होइत देखि गुलटेन मुस्की दैत बाजल- ‘‘गाममे जेकर काज हम केने छी ओ कि हम्मर नै करत। कते भारी काजे अछि।’’ घरक गोसाँइकेँ गोड़ लागि सिंहेसरी पिताकेँ गोड़ लगैले बढ़ल कि गुलटेनक आँखि सिमसिमा गेल। सिमसिमाएल मने पुछलक- ‘‘बुच्ची, कोनो चीजक दुख-तकलीफ ने ते होइ छह?’’ हँसैत सिंहेसरी कहलक- ‘‘बाबाक बात कान धेने छी। हाथ-पएर लड़बै छी सुखसँ दिन कटैए।’’ भोजमे खूब जस गुलटेनकेँ भेल। भरि-दिन ऐम्हर-दौड़ तँ ओम्हर-ताकमे दुनू परानीकेँ रहल। मुनियाक छाती केराक भालरि जेकाँ कपैत। बिना अन्ने-पानिक भरि दिन खटैत रहलीह। जेना भुख-पियास कतौ पड़ा गेलनि। मुदा भोजनक जस दुनू परानी गुलटेनकेँ, जहिना ऊसर खेतमे कुश लहलहाइत, तहिना लहलहा देलक। पिताकेँ सिंहेसरी कहलक- ‘‘सभ काज सम्पन्न भऽ गेल। आब अपनो सभ खा लाए।’’ खेला-पीला उपरान्त गुलटेनक मनमे, सिनेमाक रील जेकाँ, नाचए लगल- ठीके ने लोक कहैत छथि जे जेहन करत से तेहन पाओत। जहिना बाबूक मन शुद्ध छलनि तहिना ने क्रियो-कर्म हेतनि। आ-हा-हा ओंगरी पकड़ि-पकड़ि घर बन्हैक लूरि सिखौलनि। बारहो मासक काज जीवैक लेल सिखौलनि। मने-मन पिताकेँ गोड़ लगलक। ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक दूटा कवि‍ता २.इन्द्रभूषण कुमार- दहेज ३.३.- कुसुम ठाकुर- हाइकू ३.४.रमा कान्त झा सौराठ -गीत ३.५.१.मृदुला प्रधान-एकटा आपबीती२.मनोज कुमार मंडल- कि‍सान ३.बेचन ठाकुर- घरनी-बीसा ३.६.इन्द्रकान्त झा- गीत ३.७.नन्‍द वि‍लास रायक आठटा कवि‍ता ३.८.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-हाकिम भऽ गेलाह श्री कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | वेदना बैसलि छी सिनेहक पथार लऽ कऽ पिया चलि गेलहुँ कतऽ पहाड़ दऽ कऽ दरिसनक आश बनल कलुष सपना पूजाक दीप भेल नोरक नपना अहाँ आबू सजल चन्द्रहार लऽ कऽ पिया... उदरि महक चुलि बुलि तात बिनु शान्त निशबद भुवनमे छोड़ि कतऽ गेलहुँ कान्त? सेहन्तित छी लोढ़ि सिङगरहार लऽ कऽ पिया... सासुक मधुर गप्प झड़काबै गात कएलक अकच्छ तरुण पुरबा बसात स्वाती अएलनि रसवन्ती धार लऽ कऽ पिया... सिहकल सरस पूस देह ठिठुरल परिमल सिनेहक आश माघो बीतल आबि गेल फागुन फुहार लऽ कऽ पिया... १.राजदेव मंडलक दूटा कवि‍ता २.इन्द्रभूषण कुमार- दहेज राजदेव मंडलक दूटा कवि‍ता- मुँहझप्‍पा एहि‍ मेलामे कतए हेरा गेलौं मि‍त्र! खेजैत-खोजैत भेल छी-अपस्‍यॉंत परन्‍तु अहॉं तँ ओढ़ि‍ नेने छी-मुखौटा अहॉंक चीन्‍हब भऽ गेल कठि‍नाह एहि‍ सम्‍पूर्ण भीड़मे मुखौटेधारी छथि‍-सभगोटे कऽ रहल अछि‍ काज मुखैटेक भीतरसँ आदति‍ पड़ल छन्‍हि‍ सभकेँ पहि‍रबाक आहि‍, आब नहि‍ भेटत-हमर ि‍मत्र आननपर ब्‍याध्रानन लगाकए ढुकि‍ गेलाह एहि‍ युगक मुखौटाबला जाति‍मे नि‍कलि‍ रहल अछि‍ नोर टप-टप ऑंखि‍ भऽ गेल-झलफलाह बढे़लहुँ हाथ नोर पोछबाक हेतु फट्ट दऽ ठेकल मुखौटा अहि‍ रौ तोरी ई कोन बात भेल संताप लटकल अछि‍ केहेन खप्‍पा हमरो मुँहपर मुँहझप्‍पा। टूटल बन्‍हन ई भूखल भेड़ि‍या लेर चुबबैत एकटक प्रपंची ऑंखि‍सँ ताकि‍ रहल अछि‍-आहार आ कऽ रहल अछि‍-स्‍मरण सरस स्‍वादक पूर्व प्राइज़ शि‍कारक सँग घटि‍त घटनाक चि‍त्र आबि‍ रहल दृष्‍टि‍क सोझा आ दोगमे छपकल शि‍कारी अछि‍ सन्‍नद्ध बुद्धि‍क तीक्ष्‍ण तीर लऽ कऽ कि‍न्‍तु चंचल भेड़ि‍या कखन मारत हबक्का तकर अपनहुँ नहि‍ छन्‍हि‍ पता जठराग्‍नि‍ तेज भेलापर बि‍सरि‍ जाय छथि‍ स्‍वजन-परि‍जनकेँ मनक बन्‍हन टूटि‍ सकैत अछि‍ कखनहुँ आ कए सकैत अछि‍- आधात चि‍र संचि‍त पवि‍त्र अंगपर आ कऽ सकैत अछि‍ वि‍कृत मनकेँ तैं तेज तीर चलादेब आवश्‍यक वा नहि‍ तँ कऽ दि‍यौक नव आहारक व्‍यवस्‍था। २ इन्द्रभूषण कुमार दहेज

होएत् जनम बेटीक, धइस जाइत अछि जमीन, फाटि जाइत अछि आसमान, मुरझा जाइत अछि किछु पहिले तक, लहलहाति बारी-फुलवारी।

हां किछु अहिना होइत अछि, नहिं तऽ किएक ! उभरि जाति अछि, चिंताक रेहा सब, बाबुजीक अखन तक चमकति लालाटपर, उदास भऽ जाइत अछि दादा-दादी, ओ मासुमक एक एक गोट मुस्कानपर।

लऽ कऽ कोरामे सोचति अछि माए, लालन-पालन करब, जाहि धरि सकब, पढ़ेबो-लिखेबो करब, सिखाइब सास-ससुरक सेवा केनाई, समझायव सब शिल-गुण, एक पतिव्रता नारीक।

पर जुटाव कोना! अंतहीन मांग-चांगक पूर्ति करबाक लेल....................दहेज?

इन्द्रतभूषण कुमार गाम. लक्षमनि‍यॉं पोस्टर. छजना भाया. नरहि‍या जि‍ला. मधुबनी बि‍हार कुसुम ठाकुर हाइकू हाइकु छैक विधा सरल तैयो रचि ज्यों पाबि हमरा लेल गर्वक गप्प बस हमहू  जानि नहि बुझल इ विधाक लिखब कोन आखर सलिल जीक इ मार्ग प्रदर्शन भेटल जानी मोन प्रसन्न भेटल नव विधा छी तैयो शिष्या डेग बढ़ल सोचि नहि छोरब ज्यों दी आशीष "अहिंक धीया " आस बनल अछि अहाँक अम्बे हम टूगर ध्यान धरब हम कोना आ नहि सूझे तइयो पाप बहुत हम कयने छी हे अहिंक धीया जायब कत आब नहि सूझय करू उद्धार रमा कान्त झा सौराठ मिथिलाक विकासक बात अछि जे मिथिलाक विकास कोना होएत। मिथिलाक विकासक लेल विषय-वस्तुक बारेमे एकजुट हेबेक चाही , एक दोसरकेँ साथ चलबाक विषय हो, जे विकास नेतागण अपन राजनीतिक रोटी नहि सेकथि आर मुद्दा सिर्फ विकासक होबक चाही ! आइ बिहारमे मिथिलाक भूमि विकाससँ वंचित आछि ! आइ हम सभ अपन रोजी रोटीक तलासमे दिल्लीमे छी, कियो पंजाब आ कियो मुम्बयमे कोपक शिकार होइत अछि ! यदि मिथिलामे रोजगार होइत तखन दिल्ली तँ दूर होइत। लोकमे दम होइत, कोशी कमलाक जल संसाधनकेँ मजबूत तटबन्ध रहितै आ गाम आइ जीवित होइत। सरकारक नीति जे बिहारक नामपर घोषना तँ होइत अछि लेकिन पैसा आँखिक नोर सुखलाक बाद जाइत अछि ! फेर जर्जर के जर्जर।  एकताक जरूरत आछि आर नितिश जी के नीति सही अछि जे पुनः बिहार बचेबाक नीति विकासक नीति रोजगारक नीति मिथिलाक चौतरफा विकासक नीति ! हम की हमर पहचान की मिथिलाक पहचान माछ, पान ओ मखान , धोती कुर्ता ओ डोप्टा  ओ मुँहमे पान , धैर्यय ओ बलबान सभसँ भेटय सम्मान , आह नहि किनको हरदम मुहपर मुस्कान ! ई हमर मिथिलाक पहचान !! सभसँ पछुआयल छी ओ जग नाम , खान पान हो सबकेँ देता समान , नहि कियो अपन नहि कियो आन , सभकेँ सुआगत एक समान ! ई हमर मिथिलाक  पहचान !!, गंगा कोसी जीबछ धार , सभकेँ लगबथि बेर पार , धन समानक कुबेर के अवतार, सगरुओ मिथिलाक महिमा अपरम पार, ई मिथिलाक पहचान !! घर ने पथार अछि टुटल मरैया, भैया  नेने अएला सुन्दर बहुरिया , बुढ़ो जवान भेल देखी कऽ  बहुरिया , नेनाक चालि चले नवकी  कनियाँ , दिन हो राति बैसल सदिखन लाबैत  रहत  बात , निकलथि जखन बजार तखन सिटी बाजे हजार , घर ने पथारी अछि  टुटल मरैया , सभ मिल ताना मारय ,  ई जुल्मी  नजरिया , रातिकेँ सिटी बजबैए , पीबि तारी ओर दारू , माता के चरण कमलमे आरती प्रस्तुत जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे नूतन सघन सजल नीरद छवि शंकर नाम लेबैया , योगनी कोटि आंगन डाकनी नाचत  ता ता थैया जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! मुंडमाल उर बियाल बिराजित बसन बाघम्बर राजे , कर खप्पर अरु  कोसल सित अति कति किंकिन अति बाजे, जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! संसार पयोनिधि पार उतारिन सभ आसन सुख देया ! डीमिक डीमिक कर डमरू बाजे नाचत ता ता थैया , जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! शिव  सनकादि आदि मुनि सेवक शुम्भ निशुम्भ बेधैया , रमा कान्त करू बिनती  आरती जय जय तारिणी मैया , जय अम्बे जय अम्बे जय जय अम्बे जय अम्बे !! जय श्यामा माताक आरती जय श्यामा  जय श्यामा जय जय श्यामा जय श्यामा , पनाचान्न वाहन महिष बिनासिनी नीरद छवि अभिरामा , चंड मुंड महिषासुर मर्दनी त्रिभुवन सुन्दर नामा . जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! शंभु धरनी समसान निवासिनी जग जननी  अभिरामा , सुम्भ निसुम्भ रक्क्त भव मर्दनी श्री गंगाधर बामा ,, जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! नारायण  नरसिंह  बिनोदिनी  बिन्ध्य शिखर बिश्रामा  , चमुंडा चंडासुर घातिनी पूर्ण निज मन कामा  , जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! तुअ गुण वेद पुराण बखानत को नहि जानत नामा , सेवक अधम रमा कान्त  पुकारत पुरहु सकल मन कामा जय जय जय श्यामा जय जय श्यामा .......................!! की गलती हमरासँ भेल ओकर सजा किए बेटाकेँ बजा लेलहुँ , हमरासँ दूर किए केलहुँ , आप्रद यदि हमरासँ भेल , तँ हमर किए नहि कष्ट देल, छ्ल आसरा एकटा तकरो , अहाँ राखमे समा लेलहुँ , सभटा अहाँ जानै छी, एना किए नुठुर अहाँ भेलहुँ , पूजा हम करै छी पाठ हम करै छी , नाम अहाँक लय सभ दिन उठी , आँखि खोलू हे माता आन्हर किए , हमर जीबनकेँ साकार करु , बेटाक संग , हमरो ओधर करु जीबन , ककरा मुँह देखि बितायब हम जिन्दगी , आब तँ पहर बनि जाएत जिन्दगी , एकटा कृपा करु माता सभ दुःख  हरू , माया जंजालक फंदासँ पार आब करू चल चल रे हवा ,पूब दिसा मिथिला राज्य बनाबी , जतए  सीताक नगरी , ओतहि खिलए सबरंग फुल , चाहु दिस हरियर होयत खेत , नहि तूँ करिहऽ ककरोसँ भेँट , चल चल रे हवा मिथिला देस , गंगा कोसी कमला बलान , नहि करती ककरो कलेस , सभक कमाना पूरा करती, मिथिलाक नरेस , सभ दिन पूजब अहाँक  भेस , चल चल हवा मिथिला देस! बिबाह ने भेल एकटा सोगातक संग भेटल बिबाहकेँ एखन धरि झेल रहल छी , जेना बछड़ू बिना महिस बेकार तहिना खेल , भए रहल अछि, सास तँ बुझु जे राँचीक काँके रिटायर आर ससुर बुझू जे सगरु भारतसँ अवकाश प्राप्त , कहैले महिस स्कूलसँ बी.ए. पास , सास इंटर पास कनिया भेटली एम.ए. पास सारकेँ पठेला देसे पार , छोटकी सारि सदिखन मुँहे फइर, देखका दुनियाँ होए बेहाल, कनिक जेंगी होयत पहर . बेटा हमर देखए तँ होय बेहाल , डरे भागए गाछी कात , मिथिला अछि नगरी , सौराठ अछि हमर गाम देखू सभ दुनिया सहभा लगे अहि ठाम , सूरतसँ चलि कऽ सोमनाथ बसलाह बिच गाम , जखन चलला राम बिबाह करए , बाट पड़ैत अछि ई धाम , सोमनाथ आ राम संगहि बिबाह हेतु पहुँचला जनकपुर , सीता सभ सुकमारि कन्या ,पूजए चलली सती माताकेँ , सामने दुल्हा राम आ तीनू लोकोक नाथ , मिथिला अछि नगरी, सौराठ अछि हमर गाम , गोतम ओ तपो ऋषिगन सभ जान आबथि , सुन सुन धाम सब आबए , ई थिक मिथिला गाम . नाम सुनीता रूप आब्निता अछि सगरो गाम घूमी लाज नहि आबैत अछि चुनरी फहराबै गीत गाबै ,  छौड़ाकेँ लुभबैत, बुढ़बा हो आ जबान सभ सीटी बजबै, कमर लचका कऽ सभ  बहकबै छिऐ, तिरछी नजरियासँ सभकेँ जान मारै छी, किनको मुस्कुरा कऽ चाहपर बजबै छी, किए अहाँ सभकेँ घर उजारै छी, चुनरी फहरा कऽ रसीला गीत गाबै छी नचारी कहाँ बैसल छी सोमनाथ यौ , सभ भए अहाँ बनू हम अनाथ , दोगू दौगू बाबा सोमनाथ , फँसलहुँ बिच मजधार , रस्ता देखि नहि ओहि पार , केबल अहाँ खेबन हार , बाबा दरस दिखा करी बेरपर , हमहूँ आयब सिबरातिकेँ सभ साल , लाएब आक धथूर ओ बेल पात , करब बाबाक सिंगार , कहाँ  बैसल छी सोमनाथ यौ , हम सभ भेलहुँ  अनाथ यौ, खिले रे बदन आयल बसंत नव नव खिले  रे बदन , पुरनका पात खसै जमीनपर, हरस मन देखै दिगंत , थिक आली बसंत , हरु जुनि हे मन आहुके , एक दिन आएत बसंत , रूप सिंगारकेँ सजत तन , गाछ जनका फेर जायत तन, अहुँकेँ आबत  बसंत , बिसू जायत जखन मन , अहुँकेँ आंगन खेलता , परम पीरिए के संग , अहुँकेँ आबत बसंत , बसन्त आबि  गेल नव कालिया सगरो गाछ छा गेल ! पुरबा पछवा बसात बहैए, जवानीक ओमद  भरैए , दुख ने दर्दक थिक रहैए, आम मंजरमे मधु  लगैए , देस दुनियाक हाथ चेला बनैए, बाबाक भाषन सुनैए, कियो रमा देव , कियो कामदेव, सभ दौगी चोला पहिरे , नारी संग नाच नचैए, कियो चिकोटी कियो नागी पेची . आनंद की भोगी बनैए, मदिराकेँ अमृत बुझा , झुट्ठे भगवानक नाम जपैए, अपना अपनीकेँ आबतर बुझैए? कचड़ेमे परला बाबू सांचे , पीबि दारू तारी , भोर साँझ चिकड़ैत रही चित्त मर्म बुझले बानर घूमी फिर कार्य्य ठेक हठात् गप्प पहुँचिकेँ, सुनितु बहावे घरकेँ आबथि  , बान्हल महीस  डेंगाबथि ! जे किओ सामने आबथि मुँहसँ गारि निकालथि परल साँझ मुनिसिमाक मायक , गारि दैत बजाबथि, की काज कएल भरिदिन , एम्हर आम्हर झगरा लगबथि, चढ़ल नासा माथा ऊपर , सभटा नाम भुलाय!! १.मृदुला प्रधान- एकटा आपबीती २.मनोज कुमार मंडल- कि‍सान ३.बेचन ठाकुर- घरनी-बीसा १. मृदुला प्रधान एकटा आपबीती इलाई -बिलाई खूब खैलक गंभीर श्रोता बैसले रहलाह , अनचिन्हार           लोकक भेड़िया -धसान         मे, मुख्य               अतिथि बिनु      खैने        गेलाह. २. मनोज कुमार मंडल कि‍सान मुरगाक बॉंग सुि‍न चि‍ड़ैएक कि‍लोल खुजल ऑंखि‍ आर नि‍कलल बोल कट, कट, कट, कट कुट्टि‍ कटबाक आवाज खुआ-पीआ कए मस्‍त कऽ देल बैलक कान्‍ह तानि‍ खड़ा भऽ गेल गलाक घुमरल घंटी टन-टन-टन-टन कान्‍हपर हल आ हाथमे पेना आगू बैल लऽ चलल कि‍सान। जाधरि‍ लोक कमलासँ गंडक नाधंत ताधरि‍ खुजल पएर आउ, आउ करैत खेतक ढेपा गरदा-गरदा भऽ जाएत खेत देखि‍ थकान मेटाएल घर चलल आब कि‍सान। करमेक धरम बनाउ पूजा बुझलैन्‍ह खेत-खलि‍हान अन्न प्रसाद थि‍क अहि‍ प्रसादक के ति‍रस्‍कार करत? सहक तन मोटैलएन्‍ह अपन देह सुखाबैत कि‍सान। ि‍ना अन्न जीन नइ की हुनके जीनगी सबसँ नि‍म्‍न? कोउन नइ धाराक नि‍यम उल्‍टा अछि‍? सबहक मो-फो जि‍नकासँ ति‍नके लोक अधलाह कहैत नइ अछि‍ हुनका तेकर चि‍ंता। गाछ बनि‍ छॉंह दैत कि‍सान। अहि‍ दीनकेँ नहि‍ छथि‍ कोइ देखएबला हुनका जे बुरबक बुझैत की हुनक वि‍वेक हेरा गेल? आकि‍ बुइधि‍क हरण भए गेल? अहि‍ अन्नदाताक देखि‍ जतेक हँसि‍ली नइ होएत वि‍कास बि‍न कि‍सान। ३. बेचन ठाकुर- घरनी-बीसा दोहा- श्रीमती घरनी पि‍रयै, अपन मन करए काज। सौस ससुर भैंसुर केर, छथि‍ नहि‍ राखै लाज।। लाज धाक सभ छोड़ि‍केँ, चलए ओ घोघ उधारि‍। बुढ़ पुरान डॉंटए तहन, हुनका देलनि‍ गारि‍।। चौपाइ- जै घरनी परम अवगुण आगार। कनि‍या तीनू लोक उजागर।। घरबलाक मलि‍काइन बलगर। नाम ससुरक घि‍नाबए नैहर।। महा गलगर ढि‍ठगर बहुरंगी। हरदम रहए कुमतक केर संगी।। गोर देह गौरब से आनहर। करै ओ सदि‍खन खटखट हर हर।। कन फुसकी करबामे कमाल। झगड़ा लगाबैमे बहाल।। कनेको खर खुटखुटए तैयो। धर परान लादि‍ मैयो मैयो।। सदा पसीन करए बैसारी। टि‍बी सि‍लेमामे तैयारी।। रूइयॉं रूइयॉं तामस भाबए। दर-दीयादमे आगि‍ लगाबए।। अहॉंक गप घरबला मानए। घरबलाक गप दूर भगाबए।। तील गाछकेँ ताड़ बनाबए। सोझराइल काज ओझराबए।। कनि‍यो डॉंटू लोचन नोर। मटि‍या तेल डरे लागू गोर।। चप कचौड़ी चटपटी चाही। माछ-मौस लेल ढुकए हाही।। नैहर लेल मुलकि‍त धि‍यान। सोसरा लेल बड कम गि‍यान।। पायन चेन खेत बेचाबए। सखक चीज तुरन्‍त कीनाबए।। काजक डरसँ भूत लगाबए। आस-पड़ोसकेँ खुब देबाबए।। अपन धि‍या-पुता अछि‍ महाराज। अनकर बुरबक बकलेल राज।। जे कि‍यो पढ़ए घरनी बीसा। दीयादीमे हरदम नीसा।। जय जय जय टोल-टापर माइ। सौस ससुर घरबलाक साइ।। जे जन सए बेर करए ई पाठ। हरखि‍त मने आशीष दुनू हाथ।। बेचनदास घरनीक चेला। अवगुण छोड़ि‍ करू गुणक खेला।। दोहा- आजूक बौह बड हेहर, परि‍वार काल रूप। आइ धरि‍ कि‍यो नहि‍ बचलनि‍, छोट पैघ नर भूप।। प्रेमसँ बाजू पति‍वर गृहस्‍वामी की- जय। ननदि‍क कट्टर दुश्‍मन की- जय। सौसक सौस की- जय। परि‍वार कलहदायि‍नी की- जय। खापैरपाणि‍ की- जय। बारहैनधारि‍णी की- जय। इति‍ शुभम् इन्द्रकान्त झा (१९४३- ) गीत १ बेइमान जकरा कहब गारिए पढ़त। बलगर होएत मारबो करत। थाना दौड़ाओत इज्जत उतारत। जेबी खाली करत जेबी भरत। मुदा जेलक खिचड़ी खोआओत। इमानदार ककरा कहब जकरा कहब स्वागत करत। अनका बेइमानक बखारी कहत भ्रष्टाचारक अखारा बुझत अपनाकेँ गंगा, यमुना आ त्रिवेणीक संगम कहत॥ २ चल चल गुजरिनी मिथिलाक धाम गै जतय कौशिकी मैयाकेँ खल खल बहैत देखिहें अनकर विनाशपर हँसैत देखिहें माछ काछु घड़ियालकेँ उछलैत देखिहें जलजन्तुकेँ लड़ैत देखिहें मुदा सभकेँ संस्कृत बजैत सुनिहें तूँ रुकि जहिहें गै देखिहें तूँ कोशीक पेटमे बहैत गाम घरकेँ घरोमे मुर्दा बाहरोमे मुर्दा मुर्दा मुर्दाकेँ झगड़ैत देखिहें खेरातक अन्नपर कुत्ताकेँ भूकैत सुनिहें मुसोकेँ देखिहें बोरा कुतरैत गै मुदा नेताकेँ देखिहेँ घरकेँ भरैत गै मुदा नेताकेँ देखिहेँ घरकेँ भरैत गै सम्बन्धीकेँ पढ़बैत गै कफनक कपड़ा चोरबैत गै चल जहिहें सरकार दरवार गै कहि दिहैन नेताक हाल-चाल गै घूमि जहिहें मिथिलाक गाम गै चल चल गुजरिनी मिथिलाक धाम गै। नन्‍द वि‍लास रायक आठटा कवि‍ता- 1. जल छी जीवन हवा छी प्राण एहि‍ दुनू बि‍ना बॉंचत नहि‍ प्राण। 2. आउ सभ मि‍लि‍ कऽ जलकेँ प्रदूषनसँ बचाउ। 3. हवाकेँ प्रदूषनसँ बचेवाक खाति‍र गाछी-वि‍रछी लगाउ। 4. घर-घरमे शौचालय बनाउ आ खुलामे शौच करए नहि‍ जाउ। 5. नदी-पोखैरमे कचरा नहि‍ गि‍राउ आ जलमे रहएबला जीब-जन्‍तुकेँ बचाउ। 6. सौर उर्जा लगाउ साइकिल चलाउ पेट्रोल-डीजल नहि‍ जराउ प्रदूषनसँ हवाकेँ बचाउ। 7. जोर-जोरसँ रेडी नहि‍ बजाउ हवाकेँ ध्‍वनि‍ प्रदूषनसँ बचाउ। 8. जँ एहि‍ सभपर देबै धि‍यान तँ बचत सभक प्राण आ हएत सबहक कल्‍याण कि‍यो ने पड़व बेमार भेटत सभकेँ आराम। ........ कृष्ण कुमार राय ‘किशन’

परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं। जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हाकिम भऽ गेलाह

किएक चिन्हता आब कका ओ तऽ हाकिम भऽ गेलाह अबैत रहैत छथि कहियो कऽ गाम मुदा अपने लोक सॅं अनचिन्हार भऽ गेलाह।

जूनि पूछू यौ बाबू ,हाकिम होइते ओ कि सभ केलाह बूढ़ माए-बाप के छोड़ि कऽ एसगर अपने शहरी बाबू भऽ गेलाह।

आस लगेने माए हुनकर,गाम आबि बौआ करताह कनेक टहल-टिकोरा नहि परैत छनि माए-बाप कहियो मोन मुदा खाई मे मगन छथि पनीरक पकौड़ा।

झर-झर बहए माएक ऑंखि सॅं नोर किएक नहि अबै छथि हमर बौआ गाम? मरि जाएब तऽ आबिए के कि करबहक हाकिम होइते, किएक भेलह तांे एहेन कठोर?

ई सुनतैंह भेल मोन प्रसन्न जे अबैत छथि कका गाम भेंट होइते कहलियैनि कका यौ प्रणाम नहि चिनहलिअ तोरा, बाजह अपन नाम।

ऑंखि आनहर भेल, कि देखैत छियै कम एना किएक बजैत छह बाजह कनेक तूंॅ कम आई कनेक बेसिए बाजब हम अहूॅं तऽ होएब बूढ़, औरदा अछि कनेक कम।

कि थीक उचित, कि थीक अनुचित मोन मे कनेक अहांॅ विचार करू ‘किशन’ करत एतेबाक नेहोरा जिबैत जिनगी माए-बापक सतकार करू।

नहि तऽ टुकूर-टुकूर ताकब एसगर अहिंक धिया पूता अहॉं के देख परेता बरू जल्दी मरि जाए ई बूढ़बा मोने-मोन ओ एतबाक कहता। श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। ई चित्र धानक कटनी कालक मिथिलाक गामक चित्रण करैत अछि। पुरुख-पात खेतसँ फसिल घर अनैत छथि तँ महिला ओहि फसिलकेँ तैयार कऽ चाउर बनबैत छथि। अपन दैनिक जीवनसँ हटि कऽ एहि अवधिमे महिला एकट्ठा होइ छथि आ गप-सरक्का करै छथि। बालानां कृते शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। खोंइछक लेल साड़ी आसिनक नवरात्रक महाष्टमीक दिन। दशोदिशि जगत जननीक गुणगान। भगवती स्थानमे यस्या प्रभाव मतुलं...क जयघोषसँ मातृभक्तिक परम अनुभूति भऽ रहल अछि। बाहर आनंदक हुलि मालि। मुदा ! आंगन अबैत देरी देखलहुँ जे हमर माँ ओलतीमे शांत चित्त बैसलि छलीह। की भेल माँ, किए एकातमे बैसलि छी? महाष्टमीक खोंइछ भरऽ लेल कखन जाएब? निशा पूजाक बाद खोंइछ भरव ने। माँ गुम्म, मुदा हम बडबड़ा रहल छलहुँ। हम तँ आठ बजे चलि जाएब। आई ‘विद्यापति नाटक’ अछि। हम बाल विद्यापतिक रोल नेने छी। कनेक हमर अभिनय देखि लेब तँ हमरा नीक लागत। माँ अकच्छ भऽ कऽ बजलीह,- “हम आइ खोंइछ नहि भरब”। चैती दुर्गामे देखल जाएत। हम पुछलिअनि किएक एना बजैत छी? चैती रानीपरती जाए पड़त। माँ तमसा गेलि, अहाँकेँ सभटा गप्प बूझब आवश्यक नहि। नेना छी, नेना बनि कऽ रहू। वुटिया माएसँ जा कऽ पुछलहुँ तँ बुझना गेल जे माँकेँ संगमे नव वस्त्र नहीं अछि। भगवतीक खोंइछ अख्खर साड़ीमे भरल जाइत अछि। हम असमंजसमे पड़ि गेलहुँ। की करब, किछु नहि फुरि रहल? एकाएक मोन पड़ल जे गामक पांजड़िमे वाधोपुर बजार अछि। दू – एक बेरि बाबू जीक संग ओहि ठा देबू महाजनक कपड़ा दोकानमे गेल छलहुँ। ओ हमरा चिन्हैत छथि। किनसाइत उधार दऽ देताह तँ माँक खोंछ भरव सम्भव भऽ जाएत। चुपचाप विदा भऽ गेलहुँ। दोकानमे पैसैत देरी देखलहुँ जे महाजन गद्दीपर बैसल छलाह। हमरा दिशि तकैत पुछलनि अकसरे अयलहुँ। बाबूजी एहि वेर कपड़ा नहि लेलनि। हम लग जा कऽ अपन व्यथासँ अवगत करएलहुँ। महाजन आश्चर्यमे पड़ि गेलाह। अपन पुत्र दिनेश जीसँ कहलनि, बौआ, आइ तँ उधार देबाक नहि अछि, मुदा एहि बालकक मातृ प्रेम.....। ओना ई केओ आन नहीं, कवि जीक पुत्र छथि। निराश करव उचित नहि। एकटा नीक सूती साड़ी पैक कऽ कए अपन मुंशी जनार्दन जीक हाथमे दैत बजलनि, जनार्दन हिनका करियन धरि छोड़ि आबू। साँझ पड़ि गेल, अन्हारमे एकसरि हिनका मुरदैयामे डर लगतनि। जनार्दन बाबू हमरा साइकिलपर वैसा कऽ हमर दलानपर उताड़ैत बजलनि, जाऊ साड़ी माँकेँ दऽ दिऔन, हम कनेक ढ़ल्लू मिसिरसँ भेंट कऽ लैत छी, तखन वाधोपुर चलि जाएब। हम अतिशय प्रसन्न दौड़ल आँगन गेलहुँ। माँ चिनुआर लग वैसलि पूजाक दीपमे तेल भरैत छलीह। माँ!! अहाँ लेल साड़ी अनलहुँ माँ। साड़ीक पन्नी माँक हाथमे थमा देलिअनि। माँ पन्नीसँ साड़ी निकालैत बजलीह, कैंया, कतऽ सँ अनलेँ? ककर जेबी कटलेँ? हमरा बड़ विश्वास छल एहि छौड़ापर। धत..... बापक नाम माटिमे मिला देलक। माँ काँपऽ लगलीह। थापर, मुक्का, लातिक ताबरतोड़ बरखा होमए लागल। हाथक चूड़ी झन्न-झन्न टूटि कऽ माटिपर खसए लागल। किछु काँचक कण माँक हाथमे गड़ि गेल। टप-टप शोणितक अपादान। एखन धरि मात्र ‘माँ’क रूप देखने छलहुँ। पहिल खेप बेगूसरायक बेटीक रूप देखलहुँ। सुनैत छलहुँ आइ पल्ला पड़ि गेल। बुढ़िया माए झटकल आबि माँक हाथ पकड़ैत बाजलि, नेनाक प्राण लऽ लेब की? कनिया एतेक तामस नीक नहि। कोन गलती कएलक? की कहवनि, माँ, ई चोर भऽ गेल। नहि जानि ककरा घरमे सान्हि काटि कए हमरा लेल साड़ी अनलक? भगवान एहेन कुपुत्रसँ निपुत्र नीक। हम गुम्म। की बाजब? सोचैत की छलहुँ आ की भऽ गेल। बहुत उधेड़बुन्नक बाद मुँह खोललहुँ माँ हम चोरि नहि कएलहुँ। सभटा कथा सुना देलिअनि। माँकेँ विश्वास नहि भेलन्हि बाबाक सेवक सोहनकेँ ढ़ल्लू कक्काक दलानपर पठौलन्हि। संजोगसँ जनार्दन बैसले छलाह। सोहन आबि कहलथिन्ह, बहुआसिन, टिल्लू मिथ्या नहि बाजलन्हि। हा! हम ई की कएलहुँ? भरल पावनिमे चिलकापर अत्याचार। आइ तँ माँ गौरीक दिन थिक, मुदा हमरासँ कतेक पैघ गलती भऽ गेल। अपन दुनू हाथक मुट्ठीसँ देवालमे मारए लगलीह। अश्रु उच्छवाससँ हमर कंठ भरि गेल। माँक चरण पकड़ैत बजलहुँ, नहि नहि जुनि अपराध बोधक अनुभव करू। अहाँक शंका स्वाभाविक छल। मातृ धर्मक वास्तविक रूप इएह थिक। अपन संतानपर अंध विश्वास नहि करबाक चाही। मुदा! हमरा जे बुझना गेल सएह कएलहुँ। झट दऽ माँ बैसि कऽ हमरा कोरमे लऽ कऽ सिनेह सागरक अविरल भगवती शिव सन पूत सभकेँ देथु। जेहन नाम तेहेन काज। अपन आँचरसँ हमर आँखि पोछैत बाजलि, बौआ एकटा खुशीक गप्प कहैत छी जे जखन अहाँ वाधोपुर गेल छलहुँ तखने अहाँक बाबूजी आबि गेलाह। सभक लेल वस्त्र अनने छथि। अहुँ लेल खूब सुन्दर अंगा आएल अछि। हमरा लेल तँ लाल रंगक सिफनक सोहनगर साड़ी.....। मुदा हमारा खोंइछ भरव तँ अहींक आनल साड़ीसँ। पूत प्रेमक एहि पराकाष्ठाकेँ नहि बिसरए चाहैत छी। ओ तँ सभ पावनिमे अनैत छथि। हम माँक हाथ पकड़ि जोरसँ कानए लगलहुँ। माताक कतेक रूप होइत अछि। धर्म, सिनेह, मोह, अनुशासन, दुत्कार.....। संततिक नव निर्माणक लेल आवश्यक। गर्वित छी, आर्यावर्त्तक नारीक संतान भऽ कऽ। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_XI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -The  Death  Of  Own  Choice DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS      X I Dhara – Priya, I have seen my aunt – different varieties of mother-in-law exist in the society. They always blame their daughter-in-law. I feel ashamed whenever I remember my aunts’ comments. My cousin Sukant had brought her kaniya through duragman. People thronged to see her – all the goods accompanying kaniya were spread on the floor -    aunt was sitting besides the luggage and baggage, dala-dali. Someone asked if these goods came from kaniya’s maika – aunt shouted – yes, yes and despised the goods sent by kaniyas’ father. Aunt started throwing the sarees from the trunks with continuous murmuring – who will wear them? – your father has cheated us – my dreams have been shattered. Dhara felt upset and emotion overwhelmed her sense of moral outrage. Hatred welled up inside of her. Only with great difficulty did she hold herself back with the thought – parents have given their dearest and precious gift, as such their heart i.e. their daughter – but here she is sitting in a corner as a neglected waste piece fully covered under saree. Womenfolk made several comments – they have been fooled by girls’ family. Otherwise boys’ family easily gets rupees 5 to 10 lac besides car and other household goods.- If you do not ask for tilak or dahej, the girls’ family will not oblige you on their own – they cheat the boys’ family – everyone knows that in marriage boy comes for the bride, barat comes for food and merry making and boys’ father comes for dowry. Everyone forgot that they came here to bless kaniya. A sad feeling of resignation settled over Dhara like smothering blanket. She took a deep breath and thought about dahej – she remembered once her father had told about it – 2 ‘Dahej is the payment in cash or kind by the bride’s family to the groom’s family at the time of marriage. It is associated with kanyadana where kanya means daughter and dana means gift. In ancient times, the dowry was considered a woman’s wealth. However, over time, it has taken the form of goods and cash payment to groom’s family.’ Dhara was never convinced by the logic behind dahej system. Fortunately she was married to Simant without any dahej. Simant was no doubt fond of good things in life but he was also opposed to dahej. After she joined as lecturer in the college, Dhara emerged as champion of anti-dowry campaign. She associated it with deep rooted prejudices against woman and her consequent subordination and subjection. She herself wrote many articles in which the economic dependence of the woman was considered as the most important reason behind this system. Coming back to Sukants’ wife, Dhara thought - if the girl undergoes this kind of welcome in sasural, naturally she will not be able to pay due respect to her in-laws. Where bride is devalued in comparison to property, the in-laws can not expect a better deal for them. Dhara recollected the following sentences – Baba kaun nagariya juaba kheli ayalaun he Baba kekara duaria hamra hayari ayalaun he. Dhara – Priya, it is almost dawn – please take a nap. Always remember Priya, mothers’ love is divine love. But when the son grows, difference with mother surfaces – it is difference between old and new, between male and female, between emotions, between ideas, between mundane affairs –  differences alone undermine the love. There are few mother- son between whom the love/soul relationship remains intact. Otherwise son forgets mother’s tears, taste of her milk – and mother is also not able to comprehend sons’ heart beat, but her love for son remains the same. Priya – Dhara, for the first time in my life I have revealed my inner feelings before a genuine friend like you – I do not know you, you also do not know me, but this bond appears to be eternal – why and how I reposed my faith in you – Priya slowly and gradually went into deep sleep. 3 But Dhara was disturbed – she went on thinking and thinking – yes Priya, everyone needs friends in life. She tried to recollect her own mistakes which resulted into her separation from Simant. She always tried to fly like a pipal leaf and never made any attempt to discover the truth. She lost Simant. Now she has to find him out at any cost. She felt desperation and moments appeared as era or epoch for her. Weather was cool – Dhara went out in lawn with a shawl on her body and in the milky moonlight sat on a chair – she felt calm and relieved. Place was surrounded by small hills – Dhara heard scream of some bird   –  she wondered why this scream – human is chained by passport and visa not the birds – Perhaps bird is also separated from its partner. Priyas’ life is also pathetic – her son and daughter-in-law’s behavior also shattered Dhara – I am also desperate to see Kadamba married – will he also change after  marriage – Dhara felt scared – pain is pain whether it comes from husband or son – relationship with husband is based on equality but with son – it is always unequal as mother is placed on a higher pedestal – son is the part of mother’s own body – how can he be disrespectful to her – if it is – it will lead to her immense suffering. One day Dhara told Kadamba – I have been receiving very good proposals for you – please select some girl. Kadamba replied – Ma, your daughter-in-law should be as simple, as good hearted as you are. Dhara –Simplicity itself is not enough. She should know the proper art of living – she should look beautiful through good samskar not through artificial make-up. Your father always used to scold me – you lack sense of proper life style – you do not know where to speak and what to speak. You always believe others. Everybody plays with your emotions and your faith. 4 Kadamba – Ma, Papa must be aware of your true feelings. Dhara – Yes and that is my strength – you are also not different from your father. Kadamba – Ma, we know you – we respect your feelings – why you feel shattered and lonely. When you laugh, we all laugh – entire home smiles. Then in a serious tone he said – your daughter-in-law should also understand your inner feelings. Dhara laughed and told – I have faith in myself. Daughter-in-law will become daughter through my affection. You remain happy and do not take tension. Kadamba – Ma, everybody advised me to take IAS examination after engineering – but I was not convinced – collector/ commissioners are not able to maintain honour, dignity and decorum. There was a time when they were considered as the cream of society – but today they lack work culture. Dhara – This is the most arrogant class. They reach the climax of arrogance just before retirement. Kadamba – No Ma, those days have gone. Now they have to run after leaders and ministers, toe their line – this is the age of rag darbari. I am imbued with honesty which you have inculcated in me. Dhara – Kadamba, do not be sad. You become a complete human being through Ira’s great heart and Shraddha’s great mind. If man becomes a complete man – it will be a great achievement. Wherever you are you will be the best. Everyone lives for himself but great are those who live for others. Kadamba – You sacrificed your life for others – you forgot yourself in your attempt to unite everyone from naiher to sasural – you sacrificed yourself in order to build the career of your husband and children – why do you invite pain – what you have achieved? Dhara almost trembled to hear this kind of explanation from her adult and matured son. She always tried to present a brave front before him – not as a vulnerable woman. She never converted her weakness and softness into powerlessness. TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The  Death  Of  Own  Choice Oh Bhishma! The story of your hard life is heard while eating Pan and Makhan But couldn’t understand why you asked for the death of your own choice The scary stories are limitless, the hunger, and the injustice; Your soldiers fought between power and money in the boundary of wrestling The Brahmins were the same, the education system remained unchanged Then leaving the kingdom to one Yudhishthir How you bereaved yourself from your life! We have now five hundred and forty Yudhisthirs Wearing Khadi and Silk dresses The problems sustained, the border of wresling redetermined The citizens choose death for their emotions and desires All duties are bound to the Yudhisthir of republican system Now I got you Yudhisthir, you are freed through the death of your choice. . VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXVIII संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- २८ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. अष्टाविंशतितमः पाठः पूर्वतन् पाठे वयम् इत्योपि इत्यस्य प्रयोगं ज्ञातवंतः। इदानीम् तस्यैत पुनः स्मरणम् कुर्मः मम पुत्रः भोजनं कृतवान् अहम् इतोऽपि न कृतवती अहम् भगवद् गीतायाः श्लोकम् ज्ञातवती इतोऽपि तस्य अर्थम् न ज्ञातवती अहम् काशीनगरम् दृष्टवती इतोऽपि कन्याकुमारीम् न दृष्टवती ज्ञातम् वा इदानीम् भवंतः अपि एतादृश वाक्यानि वदंतु इतोऽपि अति उपयुज्य इदानीम् आरंभे अंते इत्यमेव अभ्यासं कुर्मः समायाः आरम्भे स्वागतयीतम् भवति समाया अंते वंदनार्पण भवति पुस्तकस्य आरंभे प्रस्तावनां इति भवति, पुस्तकस्य अंते समाप्रतं इति भवति इदानीम् भवतः अपि आरंभे अंते, इत्यअनयोः उपयोगम् कृत्वा वाक्यानि वदंतु, इदानीम् नूतनमेकम् अंशम् जानीमः, मम समीपेद्यनम् अस्ति चेत् आपणं गच्छामि नो चेत् न गच्छामि, विद्युत अस्ति चेत् दीपः ज्वलति नोचेत् न ज्वलति अहम् उपनेत्रम् धरामि चेत् पठितुम् शक्नोमि नोचेत् न शक्नोमिः - इदानीम् चेत् नोचे इति शब्दस्य कृत्वा भवंतः अपि वाक्यं वदंतु- इदानीम् अन्यम् एकम् अभ्यासं कुर्मः–अहम् वाक्यद्वयम वदामि, भवंतः योज्यित्ता वाक्यम् वदंतु पुस्तकम् अस्ति चेत् पठतु फलम् अस्ति चेत् खादतु भवान श्रांतः अस्ति चेत् निद्रां करोतु सा आगच्छति चेत् एतत् ददातु कन्याकुमारीम् गच्छति चेत् सूर्यास्तम् पश्यतु काशी गच्छति चेत् गंगास्नानम् करोतु शिशुः रोदनं करोति चेत् अंबा आगच्छति चेत् नो चेत् उपयुज्य तत्र वाक्यानि तदंतु I. एकं शब्दं उच्चारयति चेत् भारयामि–सर्वम् धनम् ददातु नो चेत्- I. अस्य मूल्यम् किम् भोः–पञ्चदशरूप्यकाणि 1. पञ्चदश? मूल्यं बहुअधिकम भोः नैव श्रीमन् अल्पमेव 2.अहम् दशरूप्यकाणि ददामि। ददाति चेत् ददातु नो चेत् मास्तु 3.नैव भोः त्रयोदश रूप्यकाणि ददाति चेत् ददामि नो चेत् नास्ति 4.तथा चेत् मास्तु भोः 5.अस्तु भोः–दशरूप्यकाणि एत ददातु 6.ददातु 7.सर्वे एवमेव वदंति चेत् वयम् कथम् जीवामः 1. पाकः सिद्धः वा 2. पाकाशालायाम् किमपि नास्ति भवानं वस्तूनि आनयति चेत् अद्य पाकं करोमि नो चेत् अद्य उपवासः 3.अस्तु–आनयामि नन्दिनी–भोः नन्दिनी+किमर्थम् तावद् उच्चैः आह्वयति पश्यतु–किमपि आनीतवान् अस्मि–किम् आनीतवान् - भवती एव पश्यंतु– - अहो मुद् गदान्यं–गुरूः एतापि अस्ति एतत् सर्वम् कथम् आनीतवान् - बहुकालात् आवयोः इच्छा किल आसीत् किला पायसम् कृत्वा खादनीयम् इति–अंतः एव अद्यं बहुपरिश्रमेण पञ्चदश रूप्यकाणि संगृहत्र एत आनीतवान्–इदानीम् भवती समीचीनम् पायसम् करोतु–आनंदेन खादावः अहम् पाकस्य आरंभमं करोमि–करोतु पायसम् सञ्जम भोः अत्रैव आनयतु–अत्रैव उपविश्य–सम्यक् स्वीकुर्मः - पायसम् बहुउष्णम् अस्ति - केला याः सुगंधः कथम् अस्ति बहुरूचिकरम् अस्ति इति भन्ये - कोऽपि आगतवान् इति भन्ये - किम् - पायसम् चलकद्वयम् परिभित एव अभवत - तत्र अपि तस्मै भवतं द्यातव्यः भवति - मावानेव द्वान न कोलितवान एव - भोः महाशयः - भोः दुष्टे, मुर्खे मम मूर्खा इति वदति वा भवाम अपि एत दुष्टा - न केवलम् दुष्टा भवती राक्षसी डाकिनी - यदि एवमेव वदति पश्यतु किम् करोमि इति मम राक्षसी इति वदति - किम् करोति भोः ताऽयतु यदि द्यैर्यम अस्ति - ताड्यामि किमर्थम् न - मारयति - अहो असमये स्थानम आगंतम् भया - गच्छामि - अहो कथमपि–अतिथिः गतवान - कथम अस्ति मम उपायः - अहम सम्यक ताडितवान इव अभिनयं कृतवान - अहम् किम् अपि न्यूनावा - अहम् किम् रोदनं कृतवती एव अभिनयं कृतवती - भवान् ताडितवान् इव अभिनयं कृतवान् - भवती ताडितवान् इव अभिनयं कृतवान् - अहम अपि धावितवान् इव अभिनयं कृतवान् - अहम् अत्रैव अस्मि सुभाषितम् तृणानि भूमिरूदकं वाक् चतुर्थी च सूंतता। एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यंते कदाचन॥ सत्पुषाणां गृहं कीदृशं भवति इति अस्मिम् श्लोके वणितं अस्ति - तृणानि इत्युक्ते उपवेषन करः भूमिः नामा उपवेस्तुम् स्थलम् उदकम् इत्युक्ते पातु जलाम् सूंतता वा इत्युक्ते मधुरं वचनं एतानि चव्वारि सत्पुरूषाणाम् गृहे सर्वदा भवंति इति कथा रामायणस्य कालः रामः रावणः हतवान् अनंतरम् अयोध्याम् प्रति आगतवान्–इदानीम् तत्र राज्याभिषेकः प्रचलति–श्रीरामः सर्वेषाम् कृते पारितोषिकम् दत्तवान् एकैकः अपि यतकिञ्चित् उपायनं प्राप्तवान एव इदानीम् आ ञ्जनेयस्य पर्यायः आगतः श्रीरामस्य पार्श्वे सीता आसीत् किला सा आञ्जेनाय मणिधर दंतवती आञ्जनेय मणिहारं स्वीकृतवान्–बहिर्गतवान् आञ्जनेयः बहिर्जत्वा एकं वृक्षं आरोहय उपविष्टवान्–एवमेव एकैकम् अपि मणि दृष्टवा परीक्ष्य अद्यः क्षिप्तवान्–इदानीम् एतत् सर्वम् एकः नागरिकः मार्गे गच्छन्–दृष्टवान् सः आञ्जनेयम् पृस्टवान् भो। आञ्जनेयः किम इदमभवान करोति नागरिकः पुनः पृच्छति–किम् इदम् मणीहारं स्वीकृत्य एकैकं मणिं दशति अनंतरम् अद्यः क्षिपति–किमर्थम् एवं करोति इति तदानीम् आञ्जनेयः वदति–अहम् मणि परीक्षां करोमि एवं किमर्थम्–इति नागरिकः पृष्टवान् आञ्जनेयः वदति–यत्र श्रीरामः न भवति तेन मणिणां मम किम् प्रयोजनम् सर्वे मणयः परीक्षिताः कुत्र अपि श्रीरामः नास्ति अतः अहम् क्षिपामि–इति सः आञ्जनेयः उक्तवान्। सर्वत्र श्रीरामस्य अनवेषणं करोति किम् भवान्। किम् भवतः शरीरे श्रीरामः अस्ति इति नागरिकः पृष्टवान तदा आञ्जनेयः वदति– आम् किमर्थम् नास्ति–पश्यतु इति स्वस्य दासः भेदनं कृतवान् तत्र श्रीरामः सीताया सह हलन् आसीत् तदा श्रीरामः तत्र आविर्भूतः भोः आञ्जनेय भवतः अभिभानेन अहम् तुष्टः अस्मि इति आशीषा तम् अनु गृहीतवान्। वाणिज्यम् (Commerce) संस्कृत अनुवाद        मैथिली अनुवाद        अंग्रेजी अनुवाद पलाण्डुमूल्यं किम्? प्याजक दाम की अछि। What is the price of onion? षट् रूप्यकाणि प्रति पादम्। छः टका 250 ग्रामक दाम अछि। Six rupees for 250 grams. नारङ्गफलानि संति किम्? अहाँक लग नारंगी अछि। Do you have oranges? आम्, संति। हँ, हमरा लग अछि। Yes, I have. द्वादशकस्य किं मूल्यम्? एक दर्जनक की दाम अछि। What is the price of dozen. द्वादशकस्य विंशतिः रूप्यकाणि। 20 टका एक दर्जनक दाम अछि। Twenty rupees a dozen. मह्यं द्वादशकद्वयं ददातु। कृप्या, हमरा दूइ दर्जन दऽ दिअ। Give me two dozens please. 1किलो मुद्गदालं ददातु। एक किलो मूंगक दाल सेहो दिअ। Give me 1 kg green grams. तण्डुलाः सम्यक् न सन्ति। चावल अच्छा स्वादक नहि अछि। The rice is not of good quality. एतत् बहु महार्हम् अस्ति। ई तँ बड्ड महग अछि। This is very costly. ‘नीम’ दंतफेनः अस्ति किम्? अहाँक नीप टूथ–पेस्ट चाही। Do you have ‘Neem’ tooth- paste. एतत् फेनकं मास्तु। हमरा साबुन नहि चाही। I don’t want this soap. शर्करा कियत् ददामि? अहाँ हमरा कतना चीनी दऽ रहल छी। How much sugar shall I give? किलोद्वयं ददातु। हमरा दूइ किलो दिअ। Give two kilos. एतत् वस्त्रं कुत्र क्रीतवती? अहाँ इ कपड़ा कतेक लेलिए। Where did you buy this cloth? तस्मिन् आपणे वस्त्रवैविध्यं भवति। अहाँ उ दुकानपर कपड़ाक कतेक प्रकार रहै। You get variety of cloth in that shop. भवान् बहु मूल्यं वदति। उ अहाँसँ बड्ड ज्यादा टका लऽ लेलक। You tell a very high price. एतत् पुस्तकम् अस्ति किम्? अहाँक इ किताब चाही। Do you have this book? क्षम्यतां, सद्यः नास्ति। क्षमा चाहे छलहुँ, आब हमरा एकर जरूरत नहि अछि। Sorry, we don’t have now. कदा लभ्येत? इ कतै उपलब्ध अछि। When will it be available? प्रायः दिनद्वयांतरम्। दूइ दिनक बाद आबू। May be after two days. एतावता न्यूनमूल्येन अन्यत्र कुत्राऽपि न लभ्यते। एतेक कम दामपर कोनो समान कतै मिलति अछि। You won’t get it at such a low price anywhere else. पञ्चाशत् रूप्यकाणि स्वीकरोतु। पचास टका लऽ लिअ। Take fifty rupees. न,न,तत्र विवादः नास्ति। मूल्यं निश्चितम्। नहि, बेइमानी नहि करब कृप्या, एकर दाम निश्चित् अछि। No, no bargaining please. The price is fixed. कृपया प्राप्तिपत्रं ददातु। कृप्या, हमरा रसीद दिअ। Please give me a receipt. भवत्याः किम् आवश्यकम्? अहाँ की चाहे छ्लौ। What do you want? निमेषद्वयं तिष्ठतु, ददामि। अहाँ दूइ मिनटकेर लेल रूकू हम दै छलौ। Wait for two minutes, I’ll give. पार्श्वापणे पृच्छतु। कृप्या दोसर दुकानपर पुछु। Please ask in the next shop. मम गणनां समापयतु भोः शीघ्रम्। कृप्या हमर गणना जल्दी करू। Please settle my account quickly. उत्तमं नास्ति चेत् प्रत्यर्पयिष्यामि। इ अच्छा समान नहि अछि। हम एकरा वापस करैत छलौ। If it’s not good, I’ll return it. गणनायां दोषं कृतवान्, एकरूप्यकं न्यूनम् अस्ति। हमरासँ गलती भऽ गेल गणना करैमे एकरामे एक टका कम हैत। There’s a mistake in the calculation, one rupee is less. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, उमेश मंडल भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com (कार्यालय प्रयोग लेल) विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान। ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत। नीचाँक फॉर्म भरू:- विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):- एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25) दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50) तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75) पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125) आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750) हमर नाम: हमर पता:

हमर ई-मेल: हमर फोन/मोबाइल नं.: हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी। वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi, Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी। अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com

(ग्राहकक हस्ताक्षर) २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: रश्मि रेखा सिन्हा, उमेश मंडल। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.co.in केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६२ म अंक १५ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६२)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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