164 'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-कथा निबंध: भाय-बहिनक व्यथा कथा २.२.१.-गजेन्द्र ठाकुर- यू.पी.एस.सी.-२- मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)- यू.पी.एस.सी.१- भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान २.३.जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- ठकहरबा २.४.१. शिव कुमार झा “टिल्लू”- समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा २.तारानन्द वियोगी- सुभाष चन्द्र यादवक कथा–संवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथा–संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’३.बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ २.५.१.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’-जट–जटिन २. बेचन ठाकुर- नाटक बेटीक अपमान-(दृश्य छठम) २.६.१.धीरेन्द्र कुमार- जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- ‘गामक जिनगी’पर धीरेन्द्र कुमारक दू शब्द २.अनमोल झा- ४ टा लघुकथा २.७. १.शिव कुमार झा “टिल्लू”- किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा)२.डॉ. बचेश्वर झा-समीक्षा- (मौलाइल गाछक फूल) २.८. १.राम प्रवेश मंडलक लघुकथा-मूल-मंत्र २.कुमार मनोज कंश्यप- फरीछ ३.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- अर्द्धागिनी ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक किछु कविता २.इन्द्रभूषण कुमार- सफलता हमर रानी ३.३.१.विवेकानंद झा-नॊर मे अछि बेस संभावना २.मुन्नी वर्माक कविता ३.४.-डॉ. बचेश्वर झा- दूटा कविता ३.५.१.चन्द्रशेखर कामति- दुनू परानी फूकि-फूकि पी २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष- हमरो जीबऽ दिअ ३.६.१.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता ३.७.१.धीरेन्द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना ३.८.१.ज्योति- कविता-भ्रष्टाचार २.नन्द विलास राय- कविता-जनसंख्या ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- पावस ४. मिथिला कला-संगीत-श्वेता झा चौधरीक चित्रकला- राधाकृष्ण ५. बालानां कृते- अर्चना कुमर- बेटा- १ ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_XII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -In the form of Surya Namaskaar 8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय मैथिलीक दन्द-फन्द बला सभक प्रवेश अन्तर्जालपर शुरू भऽ गेल अछि। ई लोकनि पहिने पत्र आ एस.एम.एस. द्वारा ब्लैकमेलमे लागल छलाह। आब ई-पत्रक प्रयोग साधारण संगणक ज्ञानबला सेहो कऽ सकै छथि, से एहि प्रवृत्तिमे वृद्धि आएल अछि। अन्तर्जाल अपराधक प्रकार गारि आ हतोत्साहित करैबला ई-मेल: एहिसँ नाम बदलि कऽ ई-मेल आ टिप्पणी देल जाइत अछि। एहिसँ अपराधी अपन शिकारकेँ मानसिक रूपसँ कष्ट दैत छै। कतेको बेर शिकार व्यक्ति अन्तर्जाल छोड़ि दैत छथि आ हुनकर दैनिक रचनात्मक क्रिया प्रभावित होइत छन्हि। कतेक गोटे मैथिलीकेँ गुड-बाइ सेहो कहि दै छथि। कखनो काल अहाँ जालवृत्त वा जालस्थलपर पोर्न साइटक लिंक कियो राखि देत, तँ कखनो गारि पढ़ि कऽ भागि जाएत, माने ई-पत्र, ऑनलाइन वार्तालाप, कमेन्ट बॉक्समे। कखनो अहाँक सालक आ मासक मेहनति सेकेन्डमे कॉपी पेस्ट कऽ अपना नामसँ छपा लेत। बहुत गोटे हमरा सालक मेहनति ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध करेबा लेल टोकबो कएलन्हि। मुदा हमरा एहि सम्बन्धमे बिल गेट्सक वक्तव्य मोन पड़ि जाइत अछि। हुनकासँ एक बेर पूछल गेलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक उत्पाद “एक्स बॉक्स” भारतमे पाइरेसीक डरसँ विलम्बसँ उतारल गेल, तँ ओ कहने छलाह जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो पाइरेसीक डरसँ कोनो उत्पाद बजारमे अनबासँ विलम्ब नहि केने अछि। विदेह आर्काइव सेहो दिनानुदिन समृद्ध भेल जा राहल अछि, साइबर अपराधक द्वारे एहिमे कोनो कमी नहि आएल अछि। डराबैबला ई-मेल: ब्लैकमेलर एहिसँ शिकारकेँ धमकाबैत रहैत अछि। नामक खुलासा नहि भेने प्राप्तकर्ता बेचारा कतेको लोकपर शंका करऽ लगैए। ब्लैकमेलर सेहो अपन खण्डित व्यक्तित्वक प्रदर्शन करैत तुष्ट होइत रहैए। वायरस प्रसार करैबला ई-मेल: ई-पत्र द्वारा कोनो लिंक पठाओल जाइत छै, कोनो अटैचमेन्ट पठाओल जैत छैक, जकरा क्लिक केलहुँ नहि वा खोललहुँ नहि आकि अहाँक कम्प्यूटर बैसि गेल। एहि तरहक मैसेज ब्लूटूथ ऑन रहलासँ अहाँक मोबाइलमे सेहो आबि जाइत अछि। फेकमेल: एक ठामसँ आबैबला ई-मेल छद्म रूपसँ फेकमेलसँ दोसराक ई-मेलसँ आएल बुझि पड़ैए। एहिसँ ब्लैकमेलर अहाँक झगड़ा दोसरसँ करेबाक प्रयास करैए। मुदा एहि तरहक मेलकेँ डिलीट नहि करू आ नहिये एहि तरहक मेलक कोनो उतारा दियौक। अगिला चरण- वित्तीय हानि: रचनात्मक क्रियाक बन्न भेने भने सद्यः वित्तीय हानि नहि होइत छैक मुदा ब्लैकमेलर अगिला चरणमे अहाँक क्रेडिट कार्ड संख्या, पासवर्ड, बैंक एकाउन्ट नम्बर पुछि सकैए। लागत जेना ओ ई-पत्र इनकम टैक्स रिफन्ड लेल अछि, वा सूडानक कोनो अकाल पीड़ितक आर्द्र पुकार अछि। अहाँ एहि तरहक मेलक जवाब किन्नहुँ नहि दिअ आ ई-पत्रकेँ स्पैममे धऽ दियौ आ किछु प्रति सुरक्षित राखि लिअ। ओहि अपराधीकेँ पकड़बाक सामान्य प्रक्रिया आगाँक बिन्दुमे अछि। अपराधीकेँ पकड़ब कोना: अपन साइटपर हिट काउन्टर लगाऊ, एहिसँ ई फाएदा होएत जे अहाँक साइटपर टाइम-स्टैम्प आबि जाएत। टिप्पणीक टाइम स्टैम्पसँ एकरा मिलाऊ आ चोरकेँ पकड़ू। कम्प्यूटरकेँ कमान्ड दऽ कऽ ई-मेलक हेडर आ ओहिसँ समय आ स्थानक जनतब लिअ। फेर ओहि फेक व्यक्तिक पता आ फोन नम्बर (एक्स्टेन्शन सहित) एहिसँ ज्ञात भऽ सकैए। एहन कोनो तरहक ई-पत्रकेँ नहि तँ नष्ट करू आ नहिये सम्पादित करू। अन्तर्जालक उपयोगसँ सम्भावित हानिपर नियन्त्रण: एहि प्रकारक ई-पत्र उपयोगकर्ता लेल संकट उत्पन्न करैत छैक। लोक दुखी रहए लगैत अछि, किछु गोटे इन्टरनेटक कनेक्शन कटबा लै छथि। मुदा अभद्र मेल अएलापर अपनापर नियन्त्रण राखू आ डिप्रेशनमे नहि जाऊ। अन्तर्जालक नीक पक्षक उपयोग करैत रहू। कोनो साइटपर लॉग ऑन केने छी तँ तत्काल लॉग आउट भऽ जाउ।
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०४ देशक १,४४२ ठामसँ ४५,८३० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,५१,६७० बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा ) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-कथा निबंध: भाय-बहिनक व्यथा कथा २.२.१.-गजेन्द्र ठाकुर- यू.पी.एस.सी.-२- मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)- यू.पी.एस.सी.१- भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान २.३.जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- ठकहरबा २.४.१. शिव कुमार झा “टिल्लू”- समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा २.तारानन्द वियोगी- सुभाष चन्द्र यादवक कथा–संवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथा–संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’३.बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ २.५.१.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’-जट–जटिन २. बेचन ठाकुर- नाटक बेटीक अपमान-(दृश्य छठम) २.६.१.धीरेन्द्र कुमार- जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- ‘गामक जिनगी’पर धीरेन्द्र कुमारक दू शब्द २.अनमोल झा- ४ टा लघुकथा २.७. १.शिव कुमार झा “टिल्लू”- किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा)२.डॉ. बचेश्वर झा-समीक्षा- (मौलाइल गाछक फूल) २.८. १.राम प्रवेश मंडलक लघुकथा-मूल-मंत्र २.कुमार मनोज कंश्यप- फरीछ ३.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- अर्द्धागिनी शम्भु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।—सम्पादक कथा निबंध: भाय-बहिनक व्यथा कथा कथाकार: डॉ. शंभु कुमार सिंह भाय-बहिनक व्यथा कथा हुनका दुनूकेँ एकटा थाकल-हारल बटोही मानि सकैत छी। दुनूक चेहरा झमारल। आँखि सूजल। एकदम श्रीविहीन। हुनका दुनूमे की संबंध रहनि वा संबंधक निर्धारण कोना भेल हेतैक से कहब कने कठिन मुदा संबोधन सँ बुझाइत छल जे दुनू गोटे भाय-बहिन जकाँ रहथि। बैसतहि मैथिली बरसँ पूछलथि- “कहू भाय की हाल-चाल! एहन बगए किएक बनौने छी?” बर: बीज रूपमे हम कहिया एहि धरतीक गर्भमे पड़लहुँ, कोना हमर अंकुरण भेल से सभ हमरा एकदम स्मरण नहि अछि। हँ, हमरा अपन नेनपनक किछु बात सभ स्मरण अवश्य अछि। ताहि दिन हमर उमिर यैह कोनो छओ मासक लगधक रहल हैत। तखन हम एकदम छोट रही एहि लेल हमरा माल-जालसँ बचएबाक लेल यैह जगरनाथ मिसर (शिव मंदिरक प्रमुख पुजेगरी) चारू दिससँ जाफरीसँ घेर देने छलाह। ताहि दिन मंदिरमे शिव आराधनाक लेल जतेको लोक-बेद अबैत छलाह, लोटाक बाँचल जल हमरा जड़िमे उझलि दैत छलाह। शिव-प्रांगणमे रहबाक परताप बुझू वा हमर अपन भाग्य, किछु महिला लोकनितँ हमरहुँ जड़िमे जल-फूल-अच्छत केर चढौआ चढ़ब’ लागलीह। देखतहिं-देखतहिं हम अपन पूर्ण यौवनकेँ कहिया प्राप्त क’ लेलहुँ से हमरो पता नहि चलि सकल। भीमकाय हमर देह। हरियर-हरियर पातसँ आच्छादित दूर-दूर धरि पसरल हमर डारि। जखन मंदिरमे शिव नचारी गाओल जाइक तँ पूरा वातावरण संगीतमय भ’ जाइक। बसात उन्मत्त भ’ कए हमरा पात सभकेँ एक्कहि संग झंकृत क’ दिअए आ ओहिसँ निकसल मेहीं सुर जेना नचारीक सुरसँ मिलिजुलि एकटा मनोहर दृश्य उत्पन्न क’ दैक। हमरा डारि-पातक छाहरिमे जेठक दुपहरिमे भरि गामक बूढ़-बुजुर्ग ओहि मचान पर बैसि शीतलताक अनुभव करैत छलाह। नेना सभ कतहुँ खो-खो तँ कतहुँ बुढ़िया कबड्डी खेलाइत रहैत छल। हे ओहि कातमे भरि गामक माल-जाल सभक लेल विश्रामस्थल छलैक। सालमे एकबेर बरसाइत (बटसावित्री) दिन हमर नव रूपेँ श्रृंगार कएल जाए। ओहि दिन हमर सौंसे धरे बुझू जे लाल-पीयर जनौ सँ लदि जाइत छल। हम गर्वोन्मत्त रही। हमरा बुझाइत छल जे सभदिन एहिना हमर जिनगी कटि जाएत। (एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ैत) ....मुदा हमरा सुन्दरताकेँ ककरहुँ नजरि लागि गेल। हमरा घमंडकेँ घून लागि गेल। एकबेर अही गामक लत्तर खाँक छोटका बेटाकेँ सौंसे देह खौजली भ’ गेल रहैक। भरि सहरसाक डागदर-बैदसँ देखेलाक पश्चातो ओकरा कोनो लाभ नहि भेलैक। किओ हुनका कहलकनि जे ‘पाँज भरि अमरलत्तीके जँ तीन-चारि दिन धरि हुनका पयरसँ मोलबा दिऔक तँ खौजली जड़िसँ उपटि जाएत।’ लत्तर खाँ कतए-कहाँसँ भरि पाँज अमरलत्ती आनलनि आ बेटासँ पयर तरेँ मोलबौलथि। खौजली उपटलनि कि नहि, से नहि जानि मुदा हम ओहि अमरलत्ती सँ अवश्य पाटि गेलहुँ। भेलैक ई जे ओहि अमरलत्तीक एकटा टुकड़ी लत्तर खाँ हमरा गाछक उपर फेकि देलथि। आ ओ अमरलत्ती जे ओहुना परजीवी होइत अछि हमरा सन हरियर गाछ पाबि धन्य भ’ गेल। आइ तँ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि राज छैक। ओहि आयातित सौंदर्यक नीचाँ हमर नैसर्गिक सौंदर्य फड़फड़ा रहल अछि। हमर तँ दम निकलल जा रहल अछि। बूढ़-बुजुर्ग लोकनि एखनो अबैत छथि, नेना-भुटका सभ एखनहुँ बुढ़िया कबड्डी आ खो-खो खेलाइत अछि मुदा हमर अस्तित्वविहीन भ’ जयबाक परबाहि किनकहुँ नहि छनि। अहाँ त’ देखितहि छी जे हमर विशालकाय गाछ गामक प्रवेश द्वार पर अछि तैँ भरि गाममे बियाह-द्विरागमन, जनौ, मूड़न सन जतेको आयोजन होएत अछि सभमे लोक एत्तहिसँ तोरणद्वार बना अपन-अपन घर धरि भुकभुकिया बल्ब लगा कए बाट केँ झकझबैत अछि। एहन सभ अवसर पर हमरा कतेक कष्ट होइत अछि से हम नहि कहि सकैत छी। हमरा डारि-पात पर गत्तर-गत्तर भुकभुकिया बल्ब सभ लगा देल जाइत अछि जे भरि राति छिनार छौंड़ा-छौंड़ी जकाँ कनखी मारैत रहैत अछि..भुक...भुक...भुक...भुक। हमर तँ गत्तर-गत्तर झरकि जाइ ऐ। एकदिन भोगल पहलमान गामक लोक सभकेँ हमरहि गाछतर बजाकए प्रार्थना केने छलाह जे- “एहि बरक गाछ परसँ सभटा अमरलत्तीकेँ उजाड़ि-उपारि देल जाए नहि तँ ओ दिन दूर नहि जखन ई परजीवी एहि बर गाछकेँ नेस्तनाबूद क’ देतैक” मुदा गामक अधिकांश लोकक कहब रहैक जे- “ई कि कोनो लतामक गाछ छिऐक जे सूखि जेतैक! बर छिऐक बर....” बर तँ हम सरिपहुँ छी, मुदा जँ एहिना ई अमरलत्ती सभ हमरा डारि-पातक खून चोसैत रहत तखन कतेक दिन धरि हम जीबि सकब से भगवतीए जानथि.....। एतबा कहि बर फेर उदास भ’ गेलाह। मैथिली: हमरो दशा तँ किछु एहने अछि भाय! हमरहुँ जनम कहिया भेल, कहिया हम लोक सभक जीभसँ उच्चरित भेलहुँ से सभ हमरहुँ स्मरण नहि अछि। हमरा तँ अहाँ जकाँ अपन नेनपनो स्मरण नहि अछि। असलमे नेनपन मे हमरा समस्त मैथिल समाजसँ ततेक ने दुलार-मलार भेटैत रहल जे हमर नेनपन अल्हड़पनहिमे बीत गेल। हमरा तँ जे किछु स्मरण अछि से अपन जुआनिएक। जेना अहाँ अपन पूर्णयौवनावस्थामे भीमकाय देह आ अपन विस्तीर्ण डारि-पात पर गर्व करैत छलहुँ तहिना हमहुँ अपन जुआनीमे मिथिलाकेँ के कहए अपन पड़ोसक राज आसाम, बंगाल सँ ल’ कए नेपाल (विदेश) धरि अपन श्रुतिमाधुर्य गुणक बलेँ पसरल छलहुँ। साहित्यक कोनो एहन विधा नहि जाहिसँ हमर श्रृंगार नहि भेल हो। ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, उमापति, चन्दा, मनबोध। हरिमोहन, यात्री, मधुप, ईशनाथ, राजकमल, प्रबोध।। प्रभृति सहस्त्रों कवि-लेखक लोकनिक द्वारा हमर साहित्य-संसारक श्रृंगार कएल गेल छल। ई संभवतः 19म शताब्दीक उत्तरार्ध रहल हेतैक जखन मिथिलो पर अंग्रेजी शासन आ शिक्षाक प्रभाव पड़य लागलैक। नाम कथी लेल कहब (भ’ सकैछ ताहि दिन ओ हमरा लेल शुभे सोचने हेताह) अंग्रेजी साहित्य सँ प्रतिस्पर्धा करबाक कारणेँ सबसँ पहिने ओ हमर अपन लिपि तिरहुता, जे हमर अस्तित्वक प्रतीक चिह्न छल तकरा उतारि कए फेकि देलथि आ हमरा पर देवनागरी थोपि देल गेल। तहिया के जनैत छलैक जे ई देवनागरी हमरा एकदिन साँस लेब कठिन क’ देत? आइ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि प्रभाव अछि। ओकरा तरमे हम फरफरा रहल छी। एकर एकटा उदाहरण हम अहाँकेँ द’ सकैत छी-अहाँ भारतक कोनहुँ कोनमे चलि जाउ आ लोकक समक्ष बंगलाक कोनहुँ पाठ्य सामग्री प्रस्तुत क’ कए पुछियौनि जे “ ई कोन भाषा थिक? तँ ओ कहता जे बंगला” आ जँ से नहि तँ बेसी सँ बेसी कहताह- असमियाँ वा उड़िया, मुदा हुनकहि समक्ष कोनहुँ मैथिलीक पाठ्य सामग्री राखि दिऔक तँ ओ फट्ट द’ कहता जे ‘हिन्दी’। आब अहाँ कल्पना क’ सकैत छी जे तखन हमर मनोदशा केहन भ’ जाइत छल होएत। आर तँ आर जखन कखनो हम अपन आन सखी-बहिनपा (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क संग कहियो काल बैसैत छी तँ ओ लोकनि हमरा तेना ने फजीहति करैत छथि से नहि कहि सकै छी। हुनकासभ (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क कहब छनि जे- “देखू हमर धिया-पुता सभ विश्वक कोनहुँ कोनमे किएक नहि होथि, कोनहुँ भाषाक जानएबला किएक नहि होथि मुदा आपसी संवाद ओ लोकनि अपनहि भाषामे करैत छथि आ एकटा अहाँक धिया-पुता सभ छथि.......” साँच पुछू तँ ई सभ उपालम्भ सूनि करेज कटि जाइत अछि। जो रे दैब! जो रे हमर कपार! हमरा (मैथिली) के कहए ओ लोकनि अपन मैथिल संस्कृतिओ केँ तँ तहिना ताक पर रखने जा रहल छथि- धोती, तौनी, पाग, जनौ..., सोहर, समदाउन, बटगमनी, लगनी...., तिलौरी, अदौरी, तिसिऔरी, तिलकोर..., सभटा हेरायल जा रहल अछि...। अपन एहि सभ दुर्दशाक चर्चा जखन कहियो काल आन-आन भाषा लग करैत छी तँ जनैत छी ओ लोकनि हमरा की कहैत अछि? ओ सभ कहैत अछि- तोँ ईष्यालु छेँ, तैँ तोरा आन-आन भाषा सभसँ ईर्ष्या होइत छौक, तोँ आन-आन सभ्यता आ संस्कृतिसँ डाह करैत छैँ, समयक संग जँ नहि चलबेँ तँ एहिना पिछड़ल रहि जेबेँ आदि-आदि। आब अहीं कहू भाय! ई सभ तँ व्यर्थेक दोषारोपण छैक ने? दुनियाँक कोन एहन माए हेतैक जकरा अपन धिया-पुताक सुख नहि सोहाइत हेतैक। अहाँ तँ हमर भाय थिकहुँ, अहाँ सँ हम जे किछु कहब से साँच आ हृदयसँ। हमर धिया-पुता सभ जे आइ विश्वक अनेको कोन मे पसरल छथि, ओ सभ जखन सूट-बूट-टाई पहिरि निकलैत छथि आ फर्र-फर्र अंग्रेजी, जापानी, स्पैनिश, जर्मन, फ्रैंच आदि भाषा बौलैत छथि, फिल्मी गाना गबैत छथि, नीक-नीक होटल मे जा कए काँटा-छूरी सँ खाइत छथि तँ ई सभ देखि सरिपहुँ हमर करेज जुड़ा जाइत अछि। भगवतीसँ गोहारि करैत रहैत छियनि जे “हमर धिया-पुता सभ एहिना अखिल विश्वमे कला, संगीत, साहित्य, राजनीति सभ क्षेत्रमे अपन-अपन नाम आ जस करथु”। यैह परसूका गप्प थिक, फ्रैंकफर्टमे विज्ञानक क्षेत्रमे कएल गेल कोनो पैघ उपलब्धिक लेल हमरहि एकटा ‘सपूत’ केँ पुरस्कृत कएल जाइत रहैक, सौंसे दुनियाँक मीडिया वलासभ ओहि समारोहक कवरेज करैत रहैक, अपन सपूतक उपलब्धि पर गर्व करबाक लेल हमहु कोहुना ओत्त’ पहुँच गेल रही, जहिना-जहिना हुनका सम्मानमे किछुओ बाजल जाइक, तहिना-तहिना हमर करेज गर्वसँ पसरल जा रहल छल, मोन मे होइत छल जे ओत्तहि मंच पर जा कए हम चिकड़ि-चिकड़ि केँ लोक सभकेँ कहि दिऐक जे- देखू हम ईर्ष्यालू नहि छी, हमरा विश्वक कोनहुँ विषय, भाषा, समुदाय, सभ्यता, संस्कृतिसँ कोनहुँ प्रकारक परहेज नहि......मुदा कार्यक्रमक अंतमे जखन हमर ओहि सपूतसँ पूछल गेलनि जे- अहाँक मातृभाषा की थिक? तँ हुनका मुँहसँ बहरेलनि अंग्रेजी!!! सरिपहुँ कहैत छी भाय! ई सुनितहि हमर करेज...., एतबे नहि घर अयला पर हुनकासँ हुनक पचमा किलासमे पढ़यबला बेटा पुछलकनि- “बाबूजी! बाबा तँ कहैत छथि जे हमरा सभक मातृभाषा मैथिली थिक, तखन अहाँ अंग्रेजीक नाम किएक लेलहुँ? जँ अहाँ सन-सन लोक सभ अपन मातृभाषाकेँ एना अछूत बूझैत रहताह तखन तँ मैथिलीक भविष्य.....।” बाप कहलकनि- चुप रह बुड़ि, ई कोनो आन भाषा थिकैक? मैथिली थिकैक मैथिली, एकर जड़ि पताल धरि पसरल छैक……। आब की कही भाय! हम अपन एहि सपूतक अटूट विश्वास पर विश्वास करी वा हुनक छोट बालक द्वारा कएल गेल हमर भविष्यक चिंताक प्रति आशा...! एतबा कहैत-कहैत मैथिलीक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसय लागलनि। बर, मैथिली केँ सांत्वना दैत रहलथि, हुनका मैथिलीसँ आर किछु सुनबाक अपेक्षा रहनि मुदा मैथिलीक मुँहसँ जेना बकारे नहि बहराइत रहनि, ओ कपसि-कपसि कए कानि रहल छलीह....। -गजेन्द्र ठाकुर यू.पी.एस.सी.-२ मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली) मैथिली वा कोनो भाषाक उत्पत्तिक मूलमे मनुक्खक मुँहसँ बहराएल ध्वनि आ ओहि ध्वनिक अर्थ कोनो वस्तु, व्यक्ति वा विचारसँ होएब सिद्ध होएत। ध्वनि तँ चिड़ै, चुनमुनी, माल-जाल आ बौक व्यक्ति द्वार सेहो उत्पन्न होइत अछि मुदा से अर्थपूर्ण नहि भऽ पबैए आ भाषाक निर्माण नहि कऽ पबैए। १८६६ ई. मे पेरिसमे “ला सोसिएते द लिंग्विस्टीक” नाम्ना संस्था भाषाक उत्पत्ति आ विश्वक भाषा सभक निर्माण” एहि विषयकेँ अपन कार्यकारिणीसँ हटा देलक कारण एहि विषयक विवेचन अनुमानपर अधारित होएबाक कारणसँ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ दूर रहैत अछि। वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत आ ओहिसँ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिलीक क्रम ताकल जा सकैत अछि। मुदा वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ ओ भाषा अस्तित्वमे रहल होएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल होएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक संस्कृतक उत्पत्ति दैवी रूपमे भेल वा आंगिक-वाक संकेतक संप्रेषणीयता बढ़ेबाक लेल से मात्र अनुमानेक विषय भऽ सकैत अछि। भाषामे ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य आ अर्थक परिवर्तन भेलासँ वैदिकसँ लौकिक संस्कृत बहराएल आ फेर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिली। पाणिनी द्वारा भारतक विभिन्न क्षेत्रसँ लेल शब्दावली लौकिक संस्कृतकेँ ततेक समृद्ध कएलक जे ओहिसँ आन सभ भाषाक कतेको तरहक रूप बहार भेल। कतेक तरहक क्षेत्रीय प्राकृत आ अपभ्रंश ओहि भौगोलिक क्षेत्रक विस्तारकेँ लैत बहार भेल आ ओहिसँ आजुक आधुनिक भारतीय आर्य भाषा सभक उत्पत्ति भेल। मैथिली भारोपीय भाषा परिवारसँ सम्बन्धित अछि। भारोपीय भाषा परिवारक भीतर विश्वक लगभग चालीस प्रतिशत जनसंख्या अबैत अछि। ई सभसँ पैघ भाषा परिवार अछि, सभसँ समृद्ध सेहो। मोटा-मोटी एकर दू विभाग छैक, पहिल यूरोपक आर्य भाषा आ दोसर भारत-ईरानी शाखा। भारत-ईरानी आर्यभाषाक भीतर ईरानी, दरद आ भारतीय आर्यभाषा अबैत अछि। दरद भाषामे कश्मीरी आ पामीर पठारक पूर्व दक्षिणक भाषा सभ अछि। मैथिली भाषाक उद्गम आ विकास भारतीय आर्यभाषाक भीतर ताकल जाइत अछि। भाषाक उद्गम तँ अनुमानक विषय थिक। भाषाक उद्गमक आ तकर प्रयोगक कतेक वर्षक पश्चात् ओहिमे साहित्य रचना होइत अछि। तखन जा कऽ ओकर रूप स्थिर होइत अछि। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेद, लौककिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण, पालि भाषाक प्राचीनतम ग्रन्थ बुद्ध त्रिपिटक, प्राकृतक प्राचीनतम ग्रन्थ विमल सूरिक पउमचरिउ, अपभ्रंशक प्राचीनतम ग्रन्थ यूगीन्द्रक परमात्म प्रकाश अछि। आदि मैथिलीक प्राचीन साहित्य सिद्ध साहित्य, बौद्धगान आ ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर अछि। सिद्ध सरहपाद 700-780 सरहपाद-“सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ ,मण्ड पिबन्तोँ बिसरउ एमइउ”।मिथिलामे अक्षरारम्भ सिद्धिरस्तु (गणेशजीक अंकुश आँजी) सँ होइत अछि। मिथिलामे ई धारणा अछि जे माँड़ पीलासँ स्मरण शक्ति क्षीण होइत अछि। दोसर उदाहरण- बलद बियायल गबैया बाँझे- बड़द बिया गेल आ गाए बाँझे अछि। मध्यकालीन मैथिलीक ग्रन्थ विद्यापतिक मैथिली साहित्य आ तकर बाद चतुर चतुर्भुज, शंकरदेव, विभिन्न मल्ल नरेश द्वारा रचित साहित्य, कीर्तनिया आ अंकिया नाटसँ मनबोध धरि अबैत अछि। आधुनिक मैथिली साहित्य चन्दा झासँ प्रारम्भ होइत अछि। प्राचीन भारतक आर्यभाषाक क्षेत्र वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदमे वर्णित धार सभक आधारपर निर्धारित कएल जा सकैत अछि आ एकर प्रसार कोना आन क्षेत्रमे भेल सेहो एहिसँ निर्धारित होइत अछि। ऋगवैदिक आर्य “सप्त सन्धव” माने सात धारक क्षेत्रमे रहैत छलाह- ई सात धार छल वितस्ता, अश्किनी, परुष्णी, शतुद्रु, विपाशा, क्रुमु आ गोमती। एहिमे पहिल पाँचटा धार पंजाबक आ शेष दूटा अफगानिस्तानमे बहैत छल। ई सातो धार ऋगवेद कालक सभसँ उपयोगी धार सिन्धुक सहायक छल। ऋगवेदमे सरस्वती धारक वर्णन “धार सभ माय”क रूपमे भेल अछि। ऋगवेदमे यमुनाक दू बेर आ गंगाक एक बेर वर्णन अछि। ऋगवेदक दसम मण्डलमे “धारक स्तुति” मे सिन्धु आ सप्तसैन्धवक स्तुति भेल अछि। ओहि कालमे पुरु, अनु, द्रुह्य, यदु आ तुर्वस नाम्ना पंचजन बसैत छलाह। क्रिवि, त्रित्सु, सेहो ओहि कालमे छलाह। पुरु आ सभसँ शक्तिवान भरत कबीला मिलि बादमे कुरु कबीला बनल। भरत कबीला दाशराज्ञ युद्धमे पाँच आर्य आ पाँच अनार्य कबीलाक संगठनकेँ हरेलक, जाहिमे भरतक पुरहित वशिष्ठ रहथि आ पाँच आर्य आ पाँच अनार्य (दस्यु) कबीलाक संगठनक पुरहित रहथि विश्वामित्र। बोगजकोई एशिया माइनरमे हित्ती शासकक १४म शती ई.पू.क उत्कीर्णित अभिलेखमे इन्द्र, दशरथ, अर्त्ततम आदि राजाक, इन्द्र, वरुण, नासत्य, आदि देवताक उल्लेख अछि। यजुर्वेदक प्रचलित संहिता वाजसनेयी आ सामवेदक संहिता कौथुम, सामवेदक आरण्यक आ उपनिषद छान्दोग्यक आधारपर मिथिलामे ब्राह्मणक वाजसनेयी आ छान्दोग्यमे उर्ध्वाधर विभाजन एखन धरि अछि। यजुर्वेदमे विदेहक वर्णन अछि तँ ऋगवेदमे वैदिक जनकक (सीताक पिता सीरध्वज जनक पछाति भेलाह।) 'वैदेह राजा' ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह, ऋगवेदमे वर्णन अछि। ओ इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध आ ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि।शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त आ मिथि -जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। निमीक जयन्तपुर वर्तमान जनकपुरमे छल, मिथीक मिथिलानगरीक स्थान एखन धरि निर्धारित नहि भए सकल अछि, अनुमानित अछि जनकपुरक लग । ’सीरध्वज जनक’ सीताक पिता छथि आ एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि। ’कृति जनक’ सीरध्वजक बादक 18म पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह आ जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल आ जनक राजवंश समाप्त भए गेल (संदर्भ अश्वघोष-बुद्धचरित आ कौटिल्य-अर्थशास्त्र)।अर्थशास्त्रमे(१.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनकक पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...। वैदिक संस्कृतक कालमे आर्य सप्तसन्धवसँ विदेह धरि आबि गेल छलाह। अनार्य (दस्यु)सँ ओही कालमे हुनकर सम्पर्क भऽ गेल छल आ शाब्दिक आदान-प्रदान सेहो भऽ गेल छल। यजुर्वेदमे बादमे अथर्ववेदमे ई आदान-प्रदान दृष्टिगोचर होइत अछि। अनार्य (दस्यु) आ व्रात्य (अनार्यसँ आर्य बनल जाति) दुनुक भाषा सप्तसैन्धव आर्यक भाषासँ मिलि गेल आ पुबरिया आ आन क्षेत्रीय बसात लगलासँ वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल। निरुक्तक समयमे सेहो वैदिक शब्दावली कठिन भऽ गेल छल, ओकर उत्पत्तिपर विवेचन शुरू भऽ गेल छल। पाणिनीक भाषा पुबरिया, दछिनबरिया, पछबरिया आ उत्तरबरिया सभ क्षेत्रक दस्यु आ व्रात्य भाषाक शब्दावलीकेँ समाहित कऽ बनल छल। ई संस्कारित भाषा बादक लोक मध्य संस्कृतक रूपमे विख्यात भेल। पाणिनी लौकिक संस्कृतकेँ जेना “भाषा” कहलन्हि, तहिना यास्क आ पाणिनी वैदिक संस्कृतकेँ “छन्दस्”। यैह छन्दस् अवेस्ता भाषाक भाष्य लेल जेन्द (छन्द) कहल गेल। संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली १. संस्कृत देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तर भारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणक (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, श, स, ह क वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्चारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) क प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ क बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार क बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि। जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि। वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि। स्वरक वर्णन एहि प्रकारेँ अछि- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर। स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजैमे एक मात्राक समय लागए से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।
मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह। दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि। अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कऽ १२ वर्ण भेल। लृ क ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३), तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।
एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि। नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित। स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ। दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तटपर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलोपर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह। स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्र स्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि। आब व्यञ्जन पर आऊ। व्यञ्जन ४२ टा अछि। क् ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ञ् ट् ठ् ड् ढ् ण् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् श् ष् स् ह् य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो। एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग। ई दुनूटा, स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि। विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् क विकार अछि। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व। अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि। उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि। कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति) पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल। यम सेहो अयोगवाह होइत अछि। अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय क उच्चारण कण्ठमे होइत अछि। इ ई चवर्ग य श क उच्चारण तालुमे होइत अछि। ऋ ॠ टवर्ग र ष क उच्चारण मूर्धामे होइत अछि। लृ तवर्ग ल स क उच्चारण दाँतसँ होइत अछि। उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय क उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि। व क उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठक सहायतासँ होइत अछि। ए ऐ क उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि। ओ औ क उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि। य र ल व अन्य व्यञ्जन जकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि। क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कऽ छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल। सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि। अनुस्वार आ यम क उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् क उच्चारण नहि होएबाक चाही। जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भऽ पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्। श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल “अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल “घोषवान्”। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि “अल्पप्राण” आ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल “महाप्राण”। कचटतप क पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप क पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित। छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः। आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व “इ” एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि। छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द । वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि । वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू- १. हलंतयुक्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक। आब पहिल उदाहरण देखू- ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७ आब दोसर उदाहरण देखू पश्चात्=२ आब तेसर उदाहरण देखू आब=२ आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मुख्य वैदिक छन्द सात अछि- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम् स्वः= सुवः गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी। ए = अ + इ ओ = अ + उ ऐ = अ/आ + ए औ = अ/आ + ओ छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू। तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि। ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि। क्+अ= क, क्+आ=का । एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा । १. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि। २. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -। ३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि। ४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि। ५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)। १. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि। १. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण क’ उत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,३, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ। उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल। हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल। ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९ सात टा स्वर सा,रे,ग,म,प,ध,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान। ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय। वेदपाठ- १. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ। अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्। २. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि। ३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि। ४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि। साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे ‘यति’। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि। मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि। १. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर। २. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद। ३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद। ४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद। ५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि। ६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद। ७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ। यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि। (अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः। (आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि। ए= अ + इ ओ= अ + उ ऐ= अ/आ + ए औ= अ/आ + ओ अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि। यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)। ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि। वैदिक (छन्दस् ) आ लौकिक संस्कृत (भाषा) क व्याकरण : वैदिक आ लौकिक दुनू संस्कृतमे संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, तीन वचन- एक, दू आ बहुवचन रहल, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग लिंगक द्योतक नहि अछि, दारा- पुल्लिंग, कलत्र- नपुंसक लिंग आ भार्या- स्त्रीलिंग; मुदा तीनू पत्नीक पर्यायवाची अछि। तहिना ईश्वरः (पुल्लिंग), ब्रह्म (नपुंसक लिंग) आ चितिः (स्त्री लिंग) होइत अछि। संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक आठटा कारक (विभक्ति) सेहो होइत अछि। दस गणक धातुक रूप परस्मैपदी (फल दोसराकेँ), आत्मनेपदी (फल अपनाकेँ) आ उभयपदी ई तीन तरहक होइत अछि। कर्तृ, कर्म आ भव ई तीन वाच्य आ बारह लकार (लट्, लिट्, लङ्, लुङ्, लुट्, लृट्, लोट्, विधिलिंङ्, आर्शीलिंङ्, लृङ्, लेट् आ लेङ् ) होइत अछि। लेट् आ लेङ् लकार लौकिक संस्कृत (भाषा) मे नहि होइत अछि। संस्कृतमे तीनटा पुरुष- प्रथम (आन भाषाक अन्य पुरुष) , मध्यम आ उत्तम होइत अछि।उद्देश्य आ विधेय; कर्ता आ क्रिया; विशेष्य आ विशेषण आ संज्ञा आ सर्वनामक परस्पर गुण-समानता रहैत छै। वैदिक संस्कृतमे गीतात्मक आ बलात्मक स्वराघात रहए मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली बलात्मक स्वराघात रहि गेल। वैदिक उच्चारण उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (संगीतशास्त्रक आरोह, अवरोह आ सम सँ तुलना द्रष्टव्य) लौकिक उच्चारणमे खतम भऽ गेल। वैदिक छन्दमे एक चरण, जकरा पाद कहैत छिऐ ओहि पादमे वर्णक गनती होइत अछि। छन्दमे गति (लय) आ यति (विराम) सेहो होइत अछि। ह्रस्व स्वर लघु होइत अछि, ह्रस्वक बाद संयुक्त वर्ण अएलासँ लघु स्वर गुरु स्वर भऽ जाइत अछि। उपसर्ग: लौकिक संस्कृतमे उपसर्ग क्रियासँ पहिने अबैत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे पहिने, बादमे, अलगसँ आ कतहु अन्तरालक बाद सेहो अबैत अछि। संगहि वैदिक संस्कृतमे जे एक बेर उपसर्ग क्रियाक संग आबि गेल तँ तकरा बाद ओहि मंत्रमे मात्र उपसर्गक प्रयोग होएत आ वैह उपसर्गयुक्त क्रियाक द्योतक होएत। समास: वैदिक संस्कृतमे समासमे सेहो कखनो काल भिन्नता छै, जेना अष्टक बाद कोनो शब्द होइ तँ ओ अष्टा भऽ जाइ छै- अष्टापदी। पितृ आ मातृक द्वन्द्व समास भेलापर दुनूमे आ लगै छै आ गुण होइ छै- पितरामातरा। लेट लकार: लौकिक संस्कृतमे लेट लकारक प्रयोग नहि होइत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे होइत अछि जेना भवाति, पताति लौकिकमे मात्र भवति, पततिसँ निदृष्ट होइत अछि। वैदिक आ लौकिक संस्कृत कोनो दू भाषा नहि अछि वरन् लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृतिक सरल रूप अछि। वैदिक संस्कृतमे लौकिक संस्कृतसँ सभ किछु बेशी अछि (अपवाद- लुट् आ लृट् लकारक वैदिक संस्कृतमे कम उपयोग।) संहिता, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक आ उपनिषदक भाषा वैदिक संस्कृत कहल जाइत अछि आ तकर बादक संस्कृत लौकिक संस्कृत कहल जाइत अछि। दुनू संस्कृतमे धातु, शब्द आ अर्थ प्रायः एक्के अछि। दुनूमे तीन लिंग, तीन वचन आ तीन पुरुष होइत अछि। दुनूमे सभ शब्द प्रायः धातु अछि; रूढ़ शब्द बड्ड कम अछि। समास दुनूमे अछि, हँ लौकिक संस्कृतमे एकर बेशी प्रयोग देखबामे अबैत अछि। छन्द सेहो दुनूमे मोटा-मोटी एक्के रङक भेटत। धातुक गण मध्य विभाजन सेहो दुनूमे एक्के रङ भेटत। णिच्, सन् प्रत्यय दुनूमे एक्के रङ भेटत। पदक निर्माण दुनूमे एक्के तरीकासँ होइत अछि। सुप्-तिङ-कृत्-तद्धित दुनूमे एक्के रङ भेटत। दुनूमे शब्दक क्रम आगाँ पाछाँ भेने अर्थक परिवर्तन नहि होइत अछि। दुनूमे सन्धि, कारक आ विभक्ति होइत अछि। मुदा:- लौकिक संस्कृतमे उपध्मानीय आ जिह्वामूलीय ध्वनिक प्रयोग नहि होइत अछि आ तकर स्थानमे विसर्गसँ काज चलैत अछि। वैदिक संस्कृतमे ळ, ळह होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे दू स्वर मध्य “ड” ळ भऽ जाइत अछि आ “ढ” ळह भऽ जाइत अछि। लौकिक संस्कृतमे से नहि अछि। ग्वाङ (ह्रस्व आ दीर्घ) लौकिक संस्कृतमे नहि अछि। यजुर्वेदमे ह, श, ष, स, र एहि सभसँ पूर्व अनुस्वार ग्वाङ भऽ जाइत अछि। उदात्त, अनुदात्त आ स्वरितक उच्चारण लौकिक संस्कृतमे स्पष्ट रूपसँ नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे लेट् लकारक प्रयोग होइत अछि, लौकिक संस्कृतमे नहि। वैदिक संस्कृतमे उपसर्ग धातुसँ पृथक् मुदा लौकिक संस्कृतमे संगमे प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे कृत् प्रत्ययक तुमुन् से, सेन्, असे, अध्यै इत्यादि १५ टा प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली “तुम्” प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतक सन्धि निअम शिथिल होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतक दृढ़ होइत अछि। वैदिक कतेको शब्दक अर्थ लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल अछि। जेना असुर वैदिक संस्कृतमे शक्तिवानकेँ कहल जाइत छल मुदा लौकिक संस्कृतमे राक्षसकेँ कहल जाइत अछि। धातुरूप सेहो वैदिक संस्कृतमे भिन्न अछि, अन्तिम स्वर दीर्घ सेहो होइत अछि। जेना चक्र- चक्रा: द्वित्वक अभाव होइत अछि जेना “ददाति”क स्थानमे “दाति”; कखनो काल परस्मैपदिक स्थानमे आत्म्नेपद आ आत्मनेपदिक स्थानमे परस्मैपद धातुक प्रयोग होइत अछि; शप् स्थानपर कखनो काल दोसर गणक विकरणक प्रयोग होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे शब्द रूप, धातु रूप, प्रत्ययक विविधता बेशी अछि। वैदिक संस्कृतक काल-पुरुष-वचन-लिंगक ऐच्छिक परिवर्तन लौकिक संस्कृतमे मोटामोटी खतम भऽ गेल अछि। वैदिक संस्कृतक अच्, अम्, जिन्व्, पिन्व् आदि धातु लौकिक संस्कृतमेप्रयोग नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे तर-तम प्रत्यय संज्ञा शब्द सन आ लौकिक संस्कृतमे विशेषण सन प्रयुक्त होइत अछि। छन्दक हिसाबसँ वैदिक संस्कृतमे स्वर्-सुवर् आ दर्शत, दरशत लिखि लेल जाइत अछि। मुदा लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे “आन्” पदक अन्तमे रहलापर आ तकर बाद अ, इ, उ स्वर अएलापर न् लुप्त भऽ जाइत अछि आ आकारक बाद अनुस्वार भऽ जाइत अछि। जेना महान् इन्द्रः= महा इन्द्रः। लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि। वैदिक संस्कृत:-धातुरूप:- लट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन परस्मैपदि धातु थ, त, थन, तन ई चारू प्रत्यय लगैत अछि। जेना वद्- वदथ, वदथन, वदत, वदतन। लट् लकार उत्तमपुरुष-बहुवचन परस्मैपदि धातु मस् (मः), मसि ई दूटा प्रत्यय प्रयोग होइत अछि। जेना नाशयामः- नाशयामसि। इमः –इमसि। स्मः- स्मसि। लोट् लकारक मध्यमपुरुष एकवचन परस्मैपदि धातुमे हि, धि ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना श्रुणुहि, श्रुणुधि। लोट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन आत्मनेपद धातुमे ध्वम् आ ध्वात् ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना वारयध्वम्, वारयध्वात्। (छन्दसि लुङ् लङ् लिटः):- वैदिक संस्कृतमे लुङ्, लङ् आ लिट् लकारक प्रयोग लोट्, लट् लकारक अर्थमे प्रयोग होइत अछि। जेना आगमत् (वैदिक लुङ्)= आगच्छतु (लोट)। अवृणीत (वैदिक लङ्)= वृणीते (लट्)। ममार (वैदिक लिट्)= म्रियते (लट्)। वैदिक संस्कृत:-शब्दरूप:- [संस्कृत (सं= स्+म- ई ठीक अछि; एकर उच्चारण सं= स्+न गलत अछि।)] वैदिक संस्कृतमे शब्दरूपक भिन्नता लौकिकसँ बेशी होइत अछि। जेना अकारान्त पुल्लिंग देवः प्रथमा-स्वितीया-सम्बोधन-द्विवचन वैदिकमे देवा, देवौ दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवौ होइत अछि। प्रथमा-सम्बोधन-बहुवचन वैदिकमे देवासः, देवाः मुदा लौकिकमे मात्र देवाः होइत अछि। तृतीया-एकवचन वैदिकमे देवा, देवेन दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवेन होइत अछि। तृतीया-बहुवचन वैदिकमे देवेभिः, देवैः मुदा लौकिकमे देवैः होइत अछि। तहिना वैदिक संस्कृतमे ऋकारान्त शब्दक रूप पुल्लिंग-स्त्रीलिंगमे लौकिक संस्कृत जेकाँ होइत अछि, खाली प्रथमा-द्वितीया-सम्बोधन-द्विवचनमे दू रूप होइत अछि। जेना दातृ- दातारा, दातारौ। पितृ- पितरा, पितरौ। मातृ- मातरा, मातरौ। अस्मद्:- प्रथमा-द्विवचन वैदिक- वाम्, आवम्; लौकिक आवाम्। चतुर्थी-एकवच वैदिक- मह्य, मह्यम्; लौकिक- मह्यम्। पञ्चमी-द्विवचन वैदिक आवत्, आवाभ्याम्; लौकिक- आवाभ्याम्। सप्तमी-बहुवचन वैदिक-अस्मे, अस्मासु; लौकिक- अस्मासु। छन्द:- पिङ्गल मुनिक छन्द शास्त्रक आठमे सँ पहिल चारिम अध्यायक सातम सूत्र धरि वैदिक छन्दक आ तकरा बाद लौकिक छन्दक वर्णन अछि। वैदिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। ओतए लघु आ गुरुक विचार नहि होइत अछि। ऋगवेदमे सभसँ बेशी त्रिष्टुप्, फेर गायत्री आ तखन जगती छन्दक प्रयोग भेल अछि। त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर- ११ अक्षरक ४ पाद; गायत्री- २४ अक्षरक (ई २,३,४,५ पदक होइत अछि), सभसँ बेशी लोकप्रिय ८ अक्षरक तीन पादक गायत्री जाहिमे दोसर पादक बाद विराम होइत अछि। २३ अक्षरक गायत्री निचृद् गायत्री, २२ अक्षरक गायत्री विराड् गायत्री, २५ अक्षरक गायत्री भुरिग् गायत्री, २६ अक्षरक गायत्री स्वराड् गायत्री कहल जाइत अछि। सभ पादमे एक अक्षर कम भेलासँ “पादनिचृद् गायत्री” कहल जाइत अछि। जगती- ४८ अक्षर- १२ अक्षरक चारि पाद। पाठ:- वैदिक संस्कृतकेँ स्मरण रखबाक कएकटा विधि अछि। संहिता पाठ- मूलमंत्र सन्धि सहित सस्वर पढ़ल जाइत अछि। पदपाठ- मन्त्रक पदक पृथक पाठ होइत अछि। क्रमपाठ- क्रमसँ दू पदक पाठ होइत अछि। जटापाठ- अनुलोम १-२, विलोम २-१, अनुलोम १-२ शिखापाठ- जटापाठमे परिवर्तित उत्तरपदक योगसँ शिखापाठ होइत अछि। घनपाठ- शिखामुक्त विपर्यक पदक पुनः पाठ होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे यज्ञ आ अध्यात्मिक विषयक चर्च होइत अछि। लौकिक संस्कृतमे इहलौकिक विषयवस्तु सेहो अबैत अछि। २.प्राकृत संस्कृतसँ पहिने प्राकृत रहए वा बादमे ई विवादक विषय भऽ सकैत अछि कारण ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जाहि प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल। पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर एहि प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर एहि प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि। अशोकक अभिलेखमे शाहबाजगढ़ी आ मानसेराक अभिलेख उत्तर-पच्छिम, कलसी, मध्य, धौली, जौगड़ पूर्व आ गिरनार दक्षिण पच्छिमक जनभाषाक क्षेत्रीय प्रकारक दर्शन करबैत अछि। राजशेखर प्राकृतकेँ मिट्ठ आ संस्कृतकेँ कठोर कहै छथि (विद्यापति पछाति कहै छथि देसिल बयना सभ जन मिट्ठा)। प्राचीन प्राकृत पालीकेँ कहल जाइत अछि जाहिमे अशोकक अभिलेख, महवंश आ जातक लिखल गेल। मध्य प्राकृतमे साहित्यिक प्राकृत अबैत अछि। बादक प्राकृतमे अपभ्रंश आ अवहट्ठ अबैत अछि। मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे मुदा पद्य कहथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह। प्राकृतमे सुप् तिङ् धातुक संग मिज्झर भऽ जाइत अछि। प्राकृतमे धातुरूप १-२ प्रकारक (भ्वादिगण जेकाँ) आ शब्दरूप ३-४ (अकारान्त जेकाँ) प्रकारक रहि गेल, माने दुनू रूप कम भऽ गेल। मुदा एहिसँ अर्थमे अस्पष्टता आएल जकर निवारण कारकक चेन्ह कएलक। चतुर्थी, द्विवचन, लङ् लिट् लुङ् आत्म्नेपद आदिक अभाव भऽ गेल प्रथमा आ द्वितीयाक बहुवचन एक भऽ गेल। ध्वनि परिवर्तन भेल। ऋ, ऐ, औ, य, श, ष आ विसर्गक अभाव भेल (अपवाद मागधीमे य आ श अछि मुदा स नहि)। अन्तमे आएल व्यंजन लुप्त भेल (ह्रस्व स्वरक बाद दू आ दीर्घ स्वरक बाद एकसँ बेशी व्यंजन नहि रहि सकैत अछि।) (शेष अगिला अंकमे) जगदीश प्रसाद मंडल 1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। कथा ठकहरबा भोरहरबेमे दादीक नीन उचटि गेलनि। लाख कोशिश केलनि मुदा दोहरा कऽ नीन नहि घुरलनि। ओना भोरूका समए बसन्ते जकॉं मधुआइल रहैत मुदा, ओहो कि सबहक लेल एक्के रंग थोड़े रहैए। दिन-राति काजक पाछु नचनिहारकेँ थोड़े बसन्त आ ग्रीष्मक भेद बुझि पड़ैत। दादीक मनमे एलनि जे अखने ललितक ऐठाम जा कऽ कहिऐ जे अखुनके माने भिनसुरके उखड़ाहामे चिमनीपरसँ पजेबा आ बेरूका उखड़ाहामे बजारसँ एस्वेस्टस आनि दिहह। भोरूका अन्हारक दुआरे रतिगर बुझि पड़लनि। मनमे एलनि जे जँ कहीं बिछानपर जाय आ निन्न आबि जाए तहन तँ पहपटि हएत। मुदा एत्ती रातिकेँ जेबो कतऽ करब? गुन-धुन करैत सोचलनि जे से नइ तँ घरसँ ओछाइन निकालि अंगनेमे बिछा कऽ पड़ब नहि, बैसि कऽ काजक गर लगाएब। सएह केलनि। काजपर नजरि दइते पजेबापर मन गेलनि। एक नम्बर रॉंट ईंटा तँ तते महग अछि जे कीनब थोड़े पाड़ लागत। मन मन्हुआ गेलनि। जहिना दू-बट्टी, तीन-बट्टीपर पहुँचते यात्री अपन अगिला बाट हियाबए लगैत अछि तहिना दादियो हियाबए लगलीह। कते दिन जीबे करब जे एक नम्बर ईंटाक जरूरत अछि। लऽ दऽ कऽ बीस-पच्चीस बर्ख आरो जीबि तइले तँ तीनियो नम्बर ईंटा नीके हएत। फेरि मनमे एलनि जे कियो कि अपने टा लए घर बनबैए आकि बालो-बच्चाले बनबैए। मन ठमकि गेलनि। किछु फुड़बे ने करनि। फेरि मनमे उठलनि जे लोक कॉंच-ईंटाक घर कोना बनबैए। ओहो तँ तीस-चालीस बर्ख चलिये जाइ छै। ओइसँ नीक ने तीन नम्बर। कमसँ कम पकलो तँ रहैए। जतबे नुआ रहए ततबे टॉंग पसारी। तीनियो नम्बर तँ ईंटे छी कीने? हँ, हँ, तीनिये नम्बर ईंटा लेब। मन आगू बढ़ि चदरापर माने एस्वेस्टसपर गेलनि। चदरापर नजरि पड़िते मन झुझुआ गेलनि। सिमटीक तेहन चदरा बनए लगल अछि जे सालो भरि चलत कि नहि? जँ कहीं गोलगर पाथर खसल तँ चूरम-चूर भऽ जाएत। पहिने केहेन बढ़िया टीनक चदरा अबै छलै जे एक बेरि घरपर दए दिऔ कत्ते दिन ओहिना रहत। मुदा ओहो बैशाख-जेठक रौदमे रहै-बला नइ होइए। ओना जँ गतगर कऽ खरही छाड़क उपरमे दऽ दियौ तँ कोठे जकॉं भऽ जाइए। मुदा तेहेन-तेहेन ठकहरबा बनियॉं सभ भऽ गेल अछि जे लेबालकेँ जे होउ अपन धड़ि तिजोड़ी भरै। खएर जे होउ, जे सबहक गति से हमरो हएत। तइले कते मगज चटाएब। पौहु फटिते सूर्यक लाली देखि दादी ओछाइन समेटि घरमे रखि ललितक ऐठाम बिदा भेलीह। मन पड़लनि, आठमे दिन अदरा नक्षत्र चढ़त। आठे दिनक पेसतर घर बनबैक अछि। जँ से नइ भेलि तँ गिलेबापर जोड़ल देवाल ढहत-ढनमनाएत कि की हएत? सेहो ने कहि। जे घर अखन अछि ओहो उजड़िये जाएत। तइ बीच जँ बरखा झहड़ल तँ जानो बँचब कठिन भऽ जाएत। ललितकेँ दरबज्जा नहि। भनसे घरमे सुतबो करैत। ठोकले दादी आंगन पहुँच ओलती लगसँ कहलखिन- “गोसाइ उगैपर भेलखिन आ तों सुतले छह?” दादीक अवाज सुनि ललितक पत्नी सुपती उठि केबाड़क अधा पट्टा खोलि चुपचाप बाड़ी दिस विदा भेलि। ओसार टपि केबाड़क दुनू पट्टा खोलि ललितक देह डोलबैत दादी कहलखिन- “ललित, ललित। उठह, कते सुतै छह?” सुतले-सुतल अँाखि मुननहि ललित बाजल- “की कहै छी?” “अखैन धरि सुतले किअए छह?” ओछाइनपर सँ उठि दादीकेँ बैसबैत अपनो बैसि बाजल- “बड़ी रातिमे पुलिसक गाड़ी खोइर-बन्हामे लसैक गेलै। भरि गाड़ी पुलिस रहए। कतबो बाप-बाप केलक मुदा, गाड़ी नइ निकललै। जना जानि कऽ अनठा देलकै।” बिनु दॉंतक चौड़गर मुँह, गालक मसुहरिपर दूटा इंच-इंच भरिक पाकल केश, सोन सन उज्जर धप-धप केश, गरदनिक चमड़ा घोकचल दादीक। ठहाका मारि बजलीह- “तोरा सन-सन आदमी से कि बेसी बुत्ता ओकरा सबकेँ होइ छै। गांजा पीबि-पीबि छाती फोंक कऽ नेने रहैए।” मुँह चटपटबैत ललित- “बड़ मोटगर-सोटगर सभ रहए?” “धु: बतहा कहीं कऽ एतबो नइ बुझै छहक जे तखैन थालमे से जीप किअए ने उखड़लै।” मुँह डेढ़बड़ा कऽ ललित बाजल- “उ सभ हाकिम रहै कि ने।” “अच्छा, ई सब छोड़ह। पाइ कते देलकह?” “पहिने वएह पुछलकै जे कते दिअ? ओना हमहूँ सभ सात-आठ गोरे रही मुदा, हमरा छोड़ि सबकेँ होइ जे कहुना जान छोड़ए। सबकेँ सुक-पाक करैत देखिऐ। एक गोरे बाजि देलकै जे हुजूर सरकारिये पाइ छियै कि ने? एतबे सुनैत मातर तड़ंगि कऽ एक गोटे बाजल ‘रौ बहिं, तुम पहचानता नहीं है।’ कहि पाइ आगूमे फेकि विदा भऽ गेल।” “सुआइत तोरा ओंघी दबने छह। हमहूँ काजे एलौंहेँ। अखन ते तू भकुआइल छह। मुँह-हाथ धुअह। काजक गप छी तेँ कने असथिर से विचार करब। ओना अपनो मुँह-कानमे पानि नहिये नेने छी।” “ऍंह, ते कि हेतइ दादी। एक दिन टुटलहो-फटलाहा घरक चाह पीबि कऽ देखिऔ।” सुपतीकेँ कानमे फुसफुसा दादी चौमास दिशि विदा भेलीह। जाबे दादी मुँह-कान धोए तैयार होथि तहिसँ पहिने ललित सुपतीकेँ चाह बनबैले कहि ओसारक बीचला खूँटा लग पीढ़ी रखि दादीक बाट देखए लगल। अबिते दादी बजलीह- “कलक पानि बड़ सुन्नर छह।” कहि खूँटामे ओंगठि पीढ़ीपर बैसि गेलीह। सुपती चाह नेने आगूमे रखि देलकनि। चाहक रंग देखि दादीक मन खुशी भऽ गेलनि। एक घोंट पीबि बजलीह- “तेहेन चाह छह जे एक्के उपे जलखै बेरि तक रहब।” ललित- “आइ काज अनठिया दिऔ दादी।” मुस्की दैत दादी- “किअए, घरमे सिदहाक ओरियान छेबे करह...। (मुदा लगले बात बदलि) कोन ऐहन हलतलबी काज आगूमे छह जे आइ मनाही करै छह?” मुँह दाबि सुपती बाजलि- “हिनका नै बुझल छनि जे आइ इलेसन (इलेक्शन) छिऐ।” सुपतीक बात जना दादीक अँतरीमे छुबि देलकनि। जहिना आम तोड़िनिहार सरं-गोलिया गोला आमपर फेकैत तहिना दादी फेकब शुरू केलनि- “कोन फेरिमे पड़ए चाहै छह, अपन दुख धंधामे लागल रहह। सभटा ठकहरबा छी। एते दिन अपनो सएह बुझै छलौं, मुदा आब बुझै छी जे ठकाइत-ठकाइत जिनगिये ठका गेल। (मूड़ी निच्चा कऽ) जहिया समाज खादी साड़ी पहिरा ‘माए जी’ कहलक तहिया बुझि पड़ल जे समाज की छी। स्वर्गोसँ उपर। मुदा तेहेन-तेहेन ठकहरबा सभ भऽ गेल अछि जे बाजत ढेरी करत किछु नहि।” ललित- “अहॉंकेँ किअए समाज खादी पहिरौलनि दादी?” ललितक प्रश्न सुनि दादी विस्मित भऽ गेलीह। जहिना बोनमे जानबरक छोट-छोट बच्चा बौआ कऽ हरा जाइत तहिना आजादी समयक बोनमे दादी हरा गेली। दादीकेँ विस्मित देखि ललितकेँ बुझि-पड़लै जे दादी फेरि कतौ औना गेलीह। तेँ दोहरा कऽ नहि पुछि जबाबक प्रतीक्षा ओहि रूपे करए लगल जहि रूपे माए बच्चाकेँ विद्यालयसँ अबैक पतिक्षा करैत रहैत छथि। चौअन्निया मुस्की दैत दादी बजए लगलीह- “दुरागमन कए कऽ आइले रही। बूढ़ा-बूढी माने सासु-ससुर जीबिते रहथि। बेटा मात्रिक गेलनि। ओइ ठीनक लोक सभ झंडा उठा खूब हूड़-बरेड़ा करैत रहए। अपनहुँ (पति) हुनके सभ संगे बौउर गेलाह। तीनि मास बीता कऽ गाम एलाह।” ललित- “बाबा बिगड़बो केलखिन?” दादी- (अपसोच करैत) “ओ सभ स्वर्ग गेला हम नर्कमे छी। आगि नइ उठेबनि। हँ, ई भेलै जे बुढ़हो जोगारी रहथिन। तरे-तर सरहोजिसँ सभ भॉंज लगा लेने रहथि। जाबे गाम घुरि कऽ एलाह ताबे ते इम्हरो लोक झंडा उठा हड़बिरड़ो करए लगल रहए। आजादीक किछुए दिनक पछाति गाममे मलेरिया आएल। चारि अन्नासँ बेसिये लोक मरल। अपनो घरहंज भऽ गेल। तीनू गोटे (सासु-ससुर आ पति) मरि गेलाह। मात्र अपने आ छह मासक बच्चा बचलौं। ओही बेटाकेँ पोसि-पालि जुआन बनाएब अपन देशसेवा बुझलियै। खादी साड़ी पहिरैक यएह कारण रहए।” मुस्की दैत सुपती पुछलकनि- “नेता सभ जकॉं भाषणो करथिन?” “बेसी ते नइ बाजल हुअए मुदा, मंचपर दुनू हाथ जोड़ि एत्ते जरूर कहियै जे ‘हे ब्रह्मबाबा गामक रक्छा करिहह। ‘मुदा सभ झूठ भऽ गेल। ने ब्रह्मबाबा सुनलनि आ ने ककरो रक्छा भेलइ।” सुपती- “खादीबला सभ भरि दिन झूठे बजैए?” सुपतीक बातसँ दादीकेँ दुख नहि भेलनि। मुस्की दैत कहलखिन- “ओहिना कनी कऽ मन अछि। शुरूक तीनि भोटमे बहरबैया नेता सभ संग कऽ कऽ गाम घुरलथि। जते काल संगमे रहिएनि तते काल गामेक गप-सप्प करथि। गाममे ने नीक सड़क अछि आ ने बच्चा सभकेँ पढ़ैले स्कूल। ने पानि पीवैक समुचित बेवस्था अछि आ ने दवाइ-दारूक। गाड़ी-सवारीक नाओपर बैलगाड़ी अछि। एहेन समस्या सिर्फ अपने गाम टाक नहि इलक्केक अछि। सरकारक अपने बेवस्था लटपटाएल अछि। हरितक्रान्तिक पूर्व धरि पेटक दुआरे आन-आन देश से जनेर-गहूम मंगबए पड़ैत छलए। (कने चुप भऽ मन पाड़ि) तही बीच भूदानी आन्दोलन जगल। नारा देलक- ‘जमीनक छबम हिस्सा दान दिअ’ जहिसँ गरीब लोककेँ बासक संग जोतो जमीन भेटितै। गामक-गाम दान हुअए लगल। मुदा अखन कि देखै छहक जे जोतक कोन बात जे घरारियो सभकेँ नइ छै। (ठहाका मारि) सबटा मदारी नाच केलक।” पटरीपर सँ दादीक बातकेँ उतड़ैत देखि ललित पत्नीकेँ कहलक- “बूढ़ि दादी छथिन थकबो करै छथिन कि ने। शिखरक पुड़िया खोलियापर से नेने आउ?” शिखरक नाओ सुनि दादीक मनमे भेलनि जे शिखर केहेन होइ छै। आइ धरि नामो नइ सुनने छलियै। मुदा बजलीह नहि। चकोना होइत ललित बुझि गेल जे भरिसक दादी शिखर नहि खेने छथि। मुस्कुराइत कहलकनि- “जहिना चाह पीलापर देहमे फुनफुनी आबि जाइ छै तहिना दादी शिखरो खेने होइ छै। इस्कुलिया विद्यार्थी सभ ते भरि-भरि जेबी रखने रहैए।” सुपती हाथसँ एकटा पुड़िया लए ललित दादी दिशि बढ़ौलक। जहिना खच्चा-खुच्चीमे पानि देखि बकरी पाछु हटैत रहैत अछि तहिना शिखरक पुड़िया देखि दादीक मन पाछु हटलनि। मुदा नव चीज रहने सेहन्तो भेलनि। एक चुटकी मुँहमे दइते बुझि पड़लनि जे सरसरा कऽ निच्चा उतड़ल जाइए। तखने ललित पुछलक- “अपनो गामक लोक जमीन दान केलक?” ललितक बात सुनि खौंझा कऽ दादी बजलीह- “कहबे ते केलियह जे सबटा बानरक नाच केलक। एक गोटे समस्तीपुर दिसक भूदानी नेता खोज करैत अपने ऐठाम एलाह। (मने-मन मुस्कुराइत) कि कहिहह हुनकर हाल। सॉंझू पहर जखन गप-सप्प करए लगथि तँ बुझि पड़ए जे जहिना त्रेता युगमे रामराज रहै तहिना फेरि कलयुगोमे भऽ जाएत। ने ककरो पेटक चिन्ता रहतै आ ने रोग-व्याधिक। मुदा, ले सुथनी, भिनसर से दुपहर धरि ओकरा सावुन रगड़ि-रगड़ि नहाइये आ कपड़े साफ करैमे लगि जाय। बेरू पहर सभ कपड़ा सुखा, पहीरि कऽ दिन लहसैन निकले आ खाइ-पीबै राति धरि भाषण करै। एक पनरहिया से बेसिये रहल। तहि बीच अकच्छ-अकच्छ भऽ गेलौं। खादी भंडारक मंगनी कपड़ा पबै, सदतिकाल बगुला जकॉं उज्जर धप-धप चेहरा बनौने रहए।” ललित- “खादी भंडरमे मंगनिये कपड़ा बटबारा होय?” “मंगनी कतौ होइ। गाम-गामक उद्योगकेँ उला-पका कऽ खा-पी कऽ चौपट कऽ देलक। गामक गाम लोकक रोजगार मरि गेल। एक तँ कोसी-कमलाक उपद्रव तइपर सँ जेहो छोट-छीन रोजगार गाममे चलैत छल सभ चलि गेल। जखन लोककेँ गाममे पेटे ने भरत तखन कते दिन पेटमे जुन्ना बान्हि कऽ रहत। गामक-गामकेँ पड़ाइन लगि गेल। ने बच्चा सभकेँ पढ़ैक स्कूल अछि आ ने रोग-व्याधिक लेल डखाना (अस्पताल)।” बजैत-बजैत दादी विस्मित भऽ गेलीह। अँाखि बन्न भऽ गेलनि। गुम-सुम देखि ललित पुछलकनि- “पहिलुका बात तँ छुट्टिये गेल?” ललितक प्रश्न सुनि दादी मन पाड़ि बजलीह- “चारिम भोट अबै से किछु पिहने मारिते-रास पाटी फड़ि गेल। कखनो कोनो रंगक झंडा लऽ कऽ जुलूसो निकले आ सभो होय तँ कखनो कोनो रंगक। जहिना आखिरी लगनमे छुटल-बढ़ल, बूढ़-पुरान, लुल्ह-नांगर सभ पालकीपर चढ़ि लैत तहिना भदबरिया बेंग जकॉं गामे-गाम नेता फड़ि गेल। ओना हम लिखा-पढ़ी कऽ कऽ कोनो पाटीक मेम्बर नइ भेल रही मुदा लोको बुझे आ अपनो मानैत रही। तेँ मनमे अरोपने रही जे जेकरा जे मन फुड़ौ से करह मुदा जहिना शुरू से रहलौं तहिना रहब। भोट होइ से पहिनहि कताक गाममे मारि भेल। अपना गाममे भोट दिन तक ते मारि नहि भेल मुदा भोट दिन एहन मारि भेल जे लोककेँ पड़ाइन लगि गेलै।” सुपती- “हिनको कियो मारलकनि?” “नइ कनियाँ, हाथ तँ नइ उठौलक। मुदा भोट खसबै नहि दिअए। हमर भोट केदैन खसा नेने रहए। कते कहा-सुनी भेलापर अनके नामपर भोट खसेलौं। भोट खसा कऽ जखन घुरलौं ते मनमे आएल जे आब भोट खसबै लए नइ आएब।” ललित- “पाटीबला सबकेँ नइ कहलिऐ?” दादी- “कि कहितियै। संयोगो नीके बुझहक। अगिला भोटमे पार्टीक उम्मीदवारे ने ठाढ़ भेल। जान हल्लुक भेल। आन पाटी ते मारिते रहै मुदा ककरा भोट दीतिऐ आ ककरा नइ दीतिऐ। तइ से नीक जे बूथपर जाएबे छोड़ देलिऐ।” ललित- “ककरो नफ्फा-नोकसान होउ, अहॉं ते बचलौं कि ने?” ललितक बात सुनि दादीक अँाखि नोरा गेलनि। मुँहसँ बकारे नहि फुटनि। थोड़े-खान चुप रहि बजलीह- “बौआ, पटना दिल्ली ते कहियो मनोमे ने आएल मुदा गामोमे जहुना छलौं तहुना नइ रहलौं। जइ समाजक लोक ‘माए जी’ कहैत छलए आेइ समाजमे लोक ड़ाॅड़ी कहए लगल। अइ बातक दुख सदिखन मनकेँ व्यथित केने रहैए।” कहि अँाखि बन्न कऽ सोचमे डुबि गेलीह। किछु समए गुम्म रहि पुन: बजए लगलीह- “गामे-गाम तेहेन अगराही लगि गेल छै जे शान्त हएव कठिन अछि। पूबारि गाममे खेतक झगड़ामे मारि भेल। से खूब मारि भेल। दुनू दिस कते गोटेकेँ कान-कपार झड़लै। एकटा खूनो भेलै। मुदा अचरज ई भेलि जे एहेन सना-सनी रहितौ गौऑंमे सुबुद्धि जगलै। कियो कोट-कचहरी नहि गेल। गामेमे फड़िया गेल। अखन जँ ओना होइत तँ गाम उजरि जाएत। तेहेन-तेहेन मनुक्ख सभ बनि गेल अछि जे सदतिकाल फोसरिये तकने घुरैए।” ललित- “भोटो दिन छी दादी। भोटो खसबैक अछि। मुदा जखन अहॉं आबि गेलौं तखन पहिने अहॉंक काज सम्हारि देब।” दादी- “भोट खसबैले थोड़े मनाही करबह। भिनसर से सॉंझ धरि भोट खसैए। पॉंच बजेमे भोट खसा लिहह।” “ताबे तक भोट बचले रहत?” “जे लड़ैए, ओकरा एतबो बुत्ता नइ छै जे बूथ सम्हारि कऽ राखत। ओना भोटे खसौने कि हेतह। देखते छहक जे कियो बक्से हेरा-फेरी कऽ लैत अछि तँ कियो रिजल्टे बदलि लैत अछि।” “बेस कहलौं दादी। काका (दादीक बेटा) कतऽ रहै छथि?” बेटाक नाओ सुनते दादीक मनमे खुशी एलनि। मुस्की दैत बजलीह- “बौआ, पनरह-बीस बर्ख से बौआइते-ढहनाइते छलए। पहिने दिल्ली गेल। ओइठीन काज नै भेलै तब बमै गेल। ओतौ नोकरी नै भेलै। तखन हाड़ि-थाकि कऽ पॉंच बर्ख पहिने कलकत्ता गेल। मुदा जहिना बमै पाइ बलाक छी तहिना कलकत्ता गरीब लोकक छी। ओइठीन एकटा साइकिल मिस्त्रीक दोकानमे नोकरी भऽ गेलै। दरमाहा ते बेसी नइ दइ मुदा साइकिल बनबैक सभ लूरि भऽ गेलै। अपने दिगारिक मिस्त्री छी। अपने बहीनि से विआहो कऽ देलकै। सुनै छी जे पुतोहूओ मिसतिरिआइ करैए। दुनू बेकती एते कमा लइए जे अपनो गुजर करैए आ घर बनबैले रूपैइयो पठा देलकहेँ। सएह रूपैआ छी।” “असकर लए तँ अहॉंकेँ एक्कोटा घर से काज चलि जाएत?” “हँ, से ते चलि जाएत। मुदा पुरजीमे लिखने अछि जे आब गामेमे रहब। पुरना जते मिसतिरी अछि ओ सभ मोटर साइकिलक मिसतिरी भऽ गेल। जहन कि गामे-गाम साइकिलक पथार लगि गेल हेन। तहूमे तेहेन साइकिल अछि जे छह मासक उपरान्ते मिसतिरीक काज पड़तै।” ललित पत्नीकेँ कहलक- “एक बेरि आरो चाह बनाउ। दादीक संगे जाएब।” सुपती- “घरमे दूध कहॉं अछि। नेबोओ सबटा चोराइये के तोड़ि लइ गेल।” दादी- “कनियॉं अहॉंकेँ नहि बुझल हएत, नइ नेबो अछि ते नेबोक दूटा पाते दऽ दिऔ।” चाह बनल। एक घोट चाह पीबि ललित दादीकेँ पुछलक- “दादी केहेन घर बनेबै?” “बौआ, गिलेबापर जोड़ि तीन नंबर ईंटाक देवालपर सँ एसवेस्टसक छत देबै। कहुना-कहुना ते बीस-पच्चीस बर्ख चलबे करत।” “से ते बेसिओ चलि सकैए आ सालो भरि नइ चलि सकैए।” “से की?” “तेहेन सिमटीक घटिया एसवेस्टस बनैए जे पाथरक चोट बरदास करत।” मूड़ी डोलबैत दादी- “हँ, से ते ठीके कहलक।” कहि गुम्म भऽ गेलीह। दादीकेँ गुम्म देखि ललित बाजल- “दादी, जेँ अस्सी तेँ निनानबे। चदरा तरमे खूब गतगर कऽ खरहीक छॉंड़ दऽ देबइ। जँ पथरो खसत ते चदरे ने फुटत, जान तँ बँचत कि ने। बेसी से बेसी देहपर पानि चुबत। सएह ने।” शिव कुमार झा “टिल्लू” समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा २.तारानन्द वियोगी- सुभाष चन्द्र यादवक कथा–संवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथा–संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’३.बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ १. शिव कुमार झा “टिल्लू” समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्दा श्रीमती विभा रानी मैथिली साहित्यक चर्चित लेखिका छथि। श्रुति प्रकाशनसँ प्रकाशित हुनक नाटक द्वय भाग रौ आ बलचन्दा पढ़लहुँ। भाग रौ बड़ नीक लागल, परंच बलचन्दा पढ़िते हृदयमे नव वेदना पसरि गेल आ समीक्षा लिखवाक दु:साहस कऽ देलहुँ। वास्तवमे वलचन्दा नाट्क नहि, छोट पोथीमे मात्र 20 पृष्ठक एकांकी थिक। सभसँ पैघ गप्प जे विभा जी वर्तमान सामाजिक जीवनक सभसँ पैघ समस्याकेँ अपन लेखनीक विषय बनौलन्हि। कन्या भ्रुण हत्या बर्तमान समाजमे विकट रूप लऽ रहल अछि। प्राय: नाटकमे पुरूष प्रधान पात्रकेँ नायक कहल जाइत अछि परंच एहि ठॉ रोहितक भूमिका खलनायकक अछि। विजातीय समाजक एक शिक्षितसँ क्षणक आवेगमे प्रेम कएलनि। विवाह सेहो भऽ गेल। मुदा ओहि स्त्रीकेँ की भेटल? अभियन्ताक शिक्षा ग्रहण कएलाक पश्चात् गृहिणी वनि कऽ रहि गेली। पुरूष प्रधान समाज तैयो पाछॉं नहि छोड़लक। प्रथम संतान बालक होएवाक चाही। आश्चर्यक गप्प ई जे एहि प्रकारक आदेश सासु द्वारा देल गेल। एक नारी द्वारा दोसर नारीसँ आबएबला नारीक नाश करबाक कुटिल आज्ञा एहि एकांकीक मूल विषए-वस्तु अछि। खलनायक चुप्प छथि, किएक तँ ओ मातृभक्त। तखन दोसर माएकेँ संतति हंता किए बनाबए चाहैत छथि। जीवन भरि संग देवाक शपथकेँ की भेल? जखन निर्वाह करबाक सामर्थ्य नहि छल तँ आन जातिक कन्याकेँ संगिनी किए बनौलन्हि। रोहितक प्रेम-सिनेह नहि वरन् वासना मात्र छल। स्त्रीकेँ भोग्या बना कऽ राखब ओहि परिवारक मूल संकल्प। ओहि लोकनिकेँ सोचवाक चाही जे आव ओ दिन बीति गेल, नारी लक्ष्मी तँ चंडी सेहो छथि। रोहितक स्त्री गर्भपातक प्रवल विरोध कएलनि। प्रतिज्ञा कए लेली जे अबैबला तनयाक पतिपाल स्वयं करब। एहि एकांकीक भाषा सरल आ सुन्दर अछि। विषए-वस्तुक सम्पादन सुन्दर आ आकर्षक। मैथिल संस्कृतिक व्यापक प्रदर्शन। जय-जय भैरविसँ प्रारंभ आ समदाओनसँ इति श्री। नारी व्यथाक मर्मस्पर्शी चित्रणक संग जाति व्यवस्थापर मैथिली साहित्यक लेल ई नाट्क नहि एकटा आन्दोलन कहल जा सकैत अछि। संस्कृतिक रक्षाक लेल आ सामाजिक संतुलन हेतु साहित्यिक आन्दोलन विभा जीकेँ नमन........ धन्यवाद। पोथिक नाम- भाग रौ आ बलचन्दा लेखिका- विभा रानी दाम- १००रू. प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, दिल्ली पोथी प्राप्तिक स्थान: Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul) २. तारानन्द वियोगी सुभाष चन्द्र यादवक कथा–संवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथा–संग्रह ‘बनैत बिगड़ैत’ कोनो संग्रहकेँ, चाहे ओ कथा–संग्रह हो आ कविता आ निबन्ध–संग्रह, एक नीक अथवा अधलाह संग्रह कोन आधारपर मानल जाए? अंग्रेजीसँ लऽ कए मैथिली धरिक संग्रहकेँ देखैत हमर एक सामान्य मान्यता बनल अछि जे जाहिमे पाठककेँ साठि प्रतिशत रचना, अपन पसन्दक, अपन काजक भेटैत हो, तकरा एक नीक संग्रह मानल जेबाक चाही। एहिसँ बेसी प्रतिशतक निर्वाह कठिन छै आ ताहिमे प्रधान कारण अछि पाठकक रूचिभिन्नता। जे से। हम तँ जखन पढ़लहुँ तँ बुझाएल जे कोनो कारण नहि छै जे सुभाषक एहि संग्रहकेँ अधलाह संग्रह मानल जाए। चालीस बरखसँ ऊपर भेल जे सुभाष मैथिलीमे कथा–लेखन शुरू केने छलाह। ओ सुरूहेसँ कने ‘दोसर तरहें’ लिखै छलाह। तकर तात्विक कारण छलै जे जीवनकेँ आ जगतकेँ कने दोसर तरहें देखै छलाह। ‘दोसर तरहें’ माने मैथिलीमे जाहि तरहें देखबाक रेबाज रहलए, ताहिसँ भिन्न तरहेँ। कोनो लेखक यदि जीनियस हएत आ ओरीजिनल लिखत तँ ई चीज हेबे करतै। से कैक गोटेमे भेलैए। सुभाषोमे भेलनि अछि। तँ हमरा लोकनि देखैत छी जे मैथिलीमे जे गंभीर लोक सभ छलखिन, से सुभाषकेँ बहुत मान देलखिन। सुभाषमे, मैथिली साहित्यकेँ अपना लेल नैतिक समर्थन देखार पड़लैक। प्रख्यात आलोचक कुलानन्द मिश्र कहलनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरम्भ भेल। कुलानन्द कुलानन्दमिश्र ‘बुधिआरकेँ इशारा काफी’ बला अंदाजमे अपन बात कहलखिन आ एहि बातकेँ नहि साफ केलखिन जे मैथिली ‘एकटा निश्चित सीमा’ की छलै आ सुभाष कोन तरहें ओकर अतिक्रमण केलखिन। मुदा, हमारा पुछै छी जे मैथिली साहित्य अंततः थिक की? जीवन–जगतकेँ देखबाक एकटा ब्राह्मण–दृष्टि। अपना संतोषक लेल हमरा लोकनि कहि सकै छी जे एहि दृष्टिमे बहुत विविधता छै–अनेक वाद अछि, अनेक पीढ़ी अछि। आदि–आदि। से बड़ बेस। मुदा तैयो, ई तँ एकर बड़ पैघ सीमा भेलै कि नहि! मानै लेल तँ संसारक अधिकांश लोक आइयो इएह मानैत अछि जे मैथिली साहित्य भाजपाक एकटा सांस्कृतिक उपनिवेश थिक, मुदा ई लोकनि दयनीय छथि कारण मैथिलीक सार्थक लेखनक यथार्थ हिनका लोकनिकेँ नहि बूझल छनि। दोसर दिस हमरा लोकनि देखैत छी जे दृष्टिवान सम्पादक अशोक जखन समकालीन कथापर ‘संधान’क विशेषांक प्रकाशित करैत छथि तँ आयासपूर्वक सुभाषक कथासँ आरंभ करैत आगामी विकासक आकलन करैत छथि कुलानन्द मिश्रक मान्यताक सर्वजनीजीकरणक ई एक दृष्टांत थिक। सुभाष कने दोसर तरहें जीवनकेँ देखैत छथि। कोन तरहें? हुनक एक कथा ‘एकटा अंत’मे आएल एकटा चित्रण हमरा एहि ठाम मोन पड़ैत अछि। कथावाचक अपन बीमार ससुरक जिज्ञासामे सासुर गेल अछि। ओतए ससुरक संग ओकर देखा–देखीकेँ चित्रण कथाकार करैत छथि–‘जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तँ हुनकर आँखिमे ताकने छलिअनि। ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह। आ हमरा दुनूकेँ बुझाएल रहए जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होएत’। देखल जाए। दुनू दुनूक आँखिमे ताकैए। दुनू दुनूक आँखिक भाषा बुझैए। एक दोसरक भावनाक आदान–प्रदान बहुत प्रामाणिकताक संग भऽ रहल अछि। अलगसँ एहि दुनूकेँ कोनो भाषाक प्रयोजन नहि छै। कने अखियास कएल जाए जे एहि तरहक कम्यूनिकेशनमे संवेदनशीलताक कोन तल वांछित अछि, जीवनक मर्मक भीतर कतेक गहराई धरि पैसब जरूरी अछि! ई सुभाष छथि! हुनकर सीमा छनि जे कलावादी ओ भऽ नहि सकै छथि, बहुत कलाकारी कऽ नहि सकै छी। ज्ञान छनि दुनिया भरिक। मुदा जखन रचबाक बेर अबै छनि तँ ततेक प्रकृत भऽ जाइत छथि तें ‘प्राइवेशी’केँ सर्वस्वीकृत मानक धरि टुटि जाइत अछि। अहाँ देखि सकै छी जे ई चित्रण मात्र एक चित्रण नहि थिक; सुभाष दुनियाकेँ कोना देखै छथि तकर स्पष्टीकरण थिक। ई अपन पाठकसँ डिमांड सेहो थिक जे हुनका देखू तँ एहि ठामसँ देखू एतबा संवेदन–क्षमता राखि कऽ, जीवन–मर्ममे एतबा डूबि कऽ। देखबाक प्रचलित रेवाज की अछि? ककरो आ कथूकेँ देखू तँ विचारक संग देखू जे की देखै छी, कते देखै छी, कोन ठामसँ देखै छी! आदि–आदि। आ जखन विचारक संग देखबै तँ चयन–बुद्धि सक्रिय रहबे करत। देखलमे कांट–छांट करब। जे प्रयोजनीय नहीं बुझाएत तकरा छाँटि देबैक। ततबेकेँ राखब जाहिसँ अहाँक अभिप्राय स्फुट भऽ जाए। साहित्यमे आम तौरपर इएह रेवाज छै। परम्परित साहित्य–शास्त्र सेहो एकरे कवि–प्रक्रिया कहैत छै। सुभाष कने दोसर तरहें देखैत छथि। देखबाक संकल्प टा खाली हुनकर होइ छनि, माने जे ककरा आ कथीकेँ देखबाक अछि। तकरा बाद, कोनो चयन–बुद्धि नहि, कोनो विश्लेषण नहि, कोनो सिंगार–पेटार नहि–बस, ओ खाली देखै छथि, जेना हुनकर कथावाचक अपन ससुरक आँखिमे देखने छल। जीवनकेँ देखबाक दृष्टि आनिवार्य रूपसँ कथाक भाषाकेँ आ शैलीकेँ आ रचना–विधानकेँ नियंत्रित करैत अछि। जेहन अहाँक दृष्टि अछि तदनुरूप अहाँक शिल्प हएत। सुभाषक कथामे हमरा लोकनि देखै छी जे व्यापक पसरल जीवनक कोनो एकटा क्षणसँ कथा शुरू होइ छै। आ जतएसँ शुरू होइ छै, तकर बाद एक–एक प्रक्रमक विवरण दैत आगू बढ़ै छै, बस विवरण दैत–बिना कोनो विश्लेषणक–आ तखन देखै छी जे कथाक ई क्रम आगू बढ़ैत–बढ़ैत कोनो एक ठाम आबि कऽ समाप्त भऽ जाइ छै। कोनो पैघ कालखण्ड हुनका कथामे कमोबेस भेटैत अछि। तहिना, घटनावलिक अथवा विचार–सरणिक विश्लेषणो हुनका कथामे नहि भेटत, जेना हुनके समकालीन सुकांतक कथामे भेटैत अछि। हम सभ तँ देखै छी जे अपन जाहि कथामे सुभाष अपन प्रकृतिक विरूद्ध विश्लेषण करबाक प्रयास केलनि अछि से कथा हुनकर अधलाह कथाक रूपमे चीन्हल गेल अछि। माने जे जे चीज ओ छथि, सएह बनल रहथु तँ ओ सुन्दर लगैत अछि। हुनकर एक कथा छनि–‘अपन अपन दुःख’। एक परिवारक माने पति–पत्नीक सात–आठ घंटा रातुक समय कोना बितलै, तकर विवरण एहि कथामे देल गेल छै। पत्नीक मोन सांझेसँ किछु खराब छै जे कि परिवारक लेल एक रेहल–खेहल बात थिक। ओ बिनु भानस–भात केने खाटपर सूतलि अछि। पेशंट देरीसँ घर घुरैत अछि। बच्चा सभक सहायतासँ कहुना भानस करैत अछि। खाइ लेल पत्नीकेँ उठबैत अछि। ओ नहि उठैत अछि। ओकर भोजन सुरक्षित राखि देल जाइछ। बाँकी सभ लोक खा कए सूति रहैत अछि। पति कोनो आन कोठलीमे सूतल अछि। रातिमे तीन बेर आबि कऽ पत्नी पतिकेँ उठबैत अछि। पत्नी कर्कशा अछि। ओकरा मुँहसँ कुबोले बहराइत छै। पतिकेँ उठबैत अछि जे ‘एना पाड़ा जकाँ डिकरय’ नहि। पति ठरर पाड़ैत अछि, मुदा चिंतित अछि जे कण्ठमे कफ फसने ओकरा घरघरी शुरू भऽ गेल छै। भोरमे पता लागैत अछि जे पत्नी रातिमे भोजन नहि केलक। पति जँ उठौलापर उठि गेल रहितय, माने अपन बिछौनासँ बाहर, माने अपन सीमासँ, अपन घेराबंदीसँ तँ पत्नी भोजनो करितय, ओकर मोनो नीक होइतै आ ‘ठरर आ घरघरी’क जाहि दुष्चक्रमे ई दुनू पड़ल अछि, सेहो टुटितय। ई सुखाड़केँ कथा थिक। एहि ठाम सभ कथू सूखि गेल छै–पति–पत्नीक सम्बन्ध, एक–दोसराक लेल राग, एक–दोसराक अस्तित्वकेँ स्वीकारबाक लेल एकटा नमनीयता, एकटा ‘स्पेस’–किछुओ बचल नहि देखाइछ। जेहने एकर विषय छै, ठीक तेहने शिल्प आ तेहने कथा–भाषाक प्रयोग कएल गेल छै। दाम्पत्य–जीवनक जे आधारशिला छिएक–प्रेम, से एहि ठाम कतहु नहि अछि। आ, सुभाष एहि संग्रहक भूमिकामे कहैत छथि जे ‘हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभसँ प्रेम करए’। ध्यान देल जाए। ओ दुनू पति–पत्नी तँ एक–दोसरसँ प्रेम नहीं कऽ पाबैए, कारण प्रेमक लेल एकटा शर्त्त छै, सेहो सुभाष भूमिकेमे कहने छथि तँ ‘प्रेम वएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत’। आ, अपन अपन अहंकारक कारण, जकरा सुभाष ‘अपन अपन दुःख’ कहैत छथि, आ व्यक्तित्वगत आन–आन मलिनताक कारण ई दुनू एक दोसरसँ प्रेम नहि कऽ पबैए। मुदा, जाहि तरहें सुभाष एहि विवरणकेँ प्रस्तुत केने छथि, से पाठकमे प्रेमकेँ जरूरत, प्रेम करबाक बेगरताकेँ निशान छोड़ैए।(मोन पड़ैए हिन्दी–कवि अज्ञेयक एकटा कविता–पंक्ति–‘दुःख सबको मांजता है/और, सबको मुक्त करना वह न जाने/किंतु, जिनको मांजता है/उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रक्खे’।) तँ, सएह। एहना स्थितिमे जखन सुभाष कहै छथि जे प्रेम केनिहार मनुक्ख ओ गढ़ऽ चाहै छथि–कथामे आ कि पाठकक स्मृति–संस्कारमे? निश्चिते पाठकक स्मृतिमे, ओकर संस्कारमे। प्रेम हुनक कथा–विषय नहि थिक, कथा–विषयक प्रतिफलन थिक, से हमरा लगैत अछि। मुदा, औपचारिक रूपसँ जकरा प्रेमक बारेमे लिखब कहल जाइ, ताहू तरहक कथा सुभाष लिखलनि अछि आ हमरा खुशी अछि ई कहैत जे एहन कथा मैथिली कथा–क्षेत्रक सीमाक सुनिश्चित अतिक्रमण करैत अछि। हुनक एक कथा थिक–‘एकटा प्रेम कथा’। एहि कथामे एकटा लड़की छै जे एकटा लड़काकेँ बरोबरि फोन करैत अछि। फोनक मालिक कथावाचक थिकाह, जकरा लड़की ‘अंकल’ कहैत छैक। आ, लड़का, जे कि कथावाचकक पड़ोसी थिक, के तँ ओ ‘अंकल’ छथिहे। एहि त्रिकोणक तेसर कोण–अंकलक–नजरियासँ एहि कथाक रचना भेल छैक। किछु पाँती सभ देखी।-‘आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सभ तरहक गप करैत हएत। भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो’। आ, इहो देखी–‘फोन राखि देलाक बादो हमारा ओत्तहि ठाढ़ रही गेल रही, जेना किछु आर कहबाक हो, किछु आर कहबाक हो, किछु आर सुनबाक हो। हमरा छगुंता भेल, ओहि लड़की लेल हमारा किए उदास भऽ रहल छी’? आ, एकटा परिस्थिति एहि तरहक–‘साझकेँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि। पहिने ओत्तहि देखबै। नहि भेटल तँ ओकर घर जाए पड़त। मुदा घरपर तँ ओकर माए–बाप छै। माए–बापकेँ लड़कीक फोन दिअ कहब ठीक नहीं हेतै’। आ अंततः निष्पत्ति किछु एहि तरहक–‘अपन छांहे जकाँ ओ लड़की हमर संग–संग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत’। आब कहल जाऊँ जे एहि तरहक सम्बन्धकेँ कोन सम्बन्ध कहल जेतै? सुभाष कहै छथि–‘प्रेम कथा’–मानो ई अंकल महाशय सेहो प्रेममे पड़ल छथि। एहि प्रेममे जे ई दुनू लड़का–लड़की खूब जतनसँ एक दोसरसँ प्रेम करए, तकरा निमाहए। ‘प्रेम’ जँ ई थिक तँ कहए पड़त जे भौतिक प्रेमकेँ सब्लिमेशन (उदात्रीकरण) थिक। सोचि कऽ देखी तँ ई कथा, मात्र एकटा कथा नहि थिक, मिथिलाक सामाजिक परिवेशमे आ मैथिली कथामे एकटा नवीन पीढ़ीक आगमनक कथा थिक–एहन पीढ़ीक जे मानैत अछि जे धिया–पुतामे एक–दोसरसँ प्रेम करबाक चाही, तकरा निमाहबाक जतन करबाक चाही कारण ई दुनिया निर्बाध रहए ताहि लेल प्रेम जरूरी छै आ जीवन अपन लयमे आगू बढ़य, ताहि लेल प्रेम जरूरी छै। ई कथा तखन किछु आर पैघ देखार पड़त जँ हमरा लोकनि मैथिलीक सम्बन्ध–कथा सभक परिप्रेक्ष्यमे एकरा देखी। हमरा तँ मोन पड़ैत अछि–दू दशक पहिने मान्य साहित्यकार लोकनिक बीच ‘मिथिला–मिहिर’मे भेल तुमुल ‘सम्मति–विमति’ जाहिमे बात आएल रहै जे मैथिली कथाकेँ सन्दर्भ लैत बात करी तँ मिथिलाक लोक प्रेम कैए नहीं सकैत अछि, जे ओ कऽ सकैए से थिक छिनरपन। जकरा प्रेमकथा कहल जाइछ से वस्तुतः छिनरपनक कथा थिक। प्रश्न अछि जे सुभाषक एहि कथाकेँ कोन छिनरपनक कोन कोटिमे राखल जाए। अस्तु, हमारा सुभाष चन्द्र यादवक कथाक स्वभावपर बात करैत रही। हुनकर कथाक स्वभाव एहन छैक जे केन्द्र बिन्दुकेँ थाह पेबामे अक्सरहा मतांतरकेँ गुंजाइश भऽ सकै छै। एक मोड़पर सँ कथा आरंभ भेल आ अगिला मोड़ अबैत–अबैत समाप्त भऽ गेल। आब पाठक निर्णय करथु जे एतबा दूरक विवरणक निरंतरतामे केन्द्र बिन्दु कोन छल? एहिमे पाठकक लेल ‘बुढ़ारीक लाठी’ बनै छै–सुभाषक देल शीर्षक। हुनकर कथा, एहि प्रकारक कथा सभ थिक जाहिमे शीर्षकक निर्णायक महत्व होइत छैक। आ, शीर्षक अंततः भेल की? केन्द्र बिन्दुक ठीक–ठीक संकेत नहि दऽ सकल आ संकेत अति दुरूह भऽ गेल (केनरी आइलैण्ड)क (नारेल जकाँ) तँ सम्यक सम्प्रेषण कठिन भऽ जाइ छै। एकटा दृष्टांत ली। कथाक शीर्षक थिक–‘एकटा अंत’। एहि कथामे एकटा बुद्धिवादी जुवक अछि जे कर्मकाण्डक विरोधमे ठाढ़ भेल अछि। अपन पक्षक स्थापनाक लेल ओ बहुत संघर्ष करैत अछि, मुदा ओकर बहुत दुर्गंजन होइत छैक आ ओ अपनहुकेँ अपना विचलित आ थाकल अनुभव करैत अछि। तकर डिटेल्स कथामे आएल छै। शीर्षक देल गेल छै–‘एकटा अंत’ प्रश्न अछि–कथीक अंत? जँ उत्तर हएत–कर्मकाण्डक अंत, तँ मानऽ पड़त जे ई कथा नितांत अधलाह आ असफल कथा थिक, कारण कथ्यक निर्वाह ने कथा–विवरण कए पाएल अछि आ ने कथा समय। मुदा, जँ एकर उत्तर होइक–‘कर्मकाण्डक विरोध परम्पराक अंत’ तँ लगले देखब जे ई कथा खूब सुन्दर कथाक रूपमे मोन राखऽ जोग देखार पड़त, जे बहुत करूणासँ भरल अछि आ एकटा संकल्प (संकल्प ई जे एहि जुबककेँ संरक्षण भेटबाक चाही) केँ संग समाप्त होइत अछि। फेर वएह बात। संकल्प कथामे कथित नहीं भेल छैक, ओ कथाक प्रतिफलनक रूपमे पाठकक मोनमे उचरैत छैक। ओना, गौर कएल जाए तँ सुभाषक कथामे एकटा आर समस्या देखार पड़त। एकरा संतुलनकेँ चूक कहल जा सकैए। जेना अहाँ कोनो फिल्म देखैत होइ आ पाबी जे कोनो एकटा दृश्यकेँ जरूरतसँ बेसी काल धरि देखाएल जा रहल हो, जकर कि डिमांड कथाकेँ नहि छै। कहब आवश्यक नहिजे एना एहि दुआरे होइ छै जे दर्शक (आ पाठक)क डिमांड आ फिल्मकार (आ कथाकार)क डिमांड भिन्न–भिन्न भऽ जाइत छैक। से, हमरा लोकनि कैक कथामे देखै छी जे विवरणक अनुपात औचित्य टुटलैक अछि आ किछु एहनो बात आबि गेल छैक जकर आवश्यकता कथामे नहि छैक। एक हद धरि सुभाष कथाक शीर्षक चयन सेहो, जे कि एक खास फ्रेममे राखि कऽ कथाकेँ देखबाक आग्रह रखैत छैक मुदा स्वयं कथे एहि आग्रहक रक्षा नहि कऽ पबैत अछि। किछु ठाम तँ एहनो देखैत छी ज्र विवरण देबाक लेल जाहि शब्दावलीक प्रयोग सुभाष केलनि अछि से उकड़ू बुझा पड़ैत छैक आ सम्पूर्ण कथाक ताना–बानामे पीयन जकाँ देखाइत छैक। हुनकर एक बहुत सुन्दर कथा छनि–‘हमर गाम’। कोसी–परिसरमे बसल लोकक जीवन–संघर्षकेँ ई अप्रतिम दस्तावेज थिक। एहि कथामे बस एकठाम, सेहो प्रसंगात्, एकटा स्त्री परमिलिया अबैत छै। एहि कथामे पुरूखक जीवन–संघर्षकेँ ओ बहुत जीवंत आ प्रामाणिकिअ विवरण देलनि अछि, ताहिमे कतहु पुरूख–देहक अलगसँ कोनो वर्णन नहि भेल छै। मुदा, जखन स्त्री अबैत अछि, आ सेहो श्रम करैत स्त्री, गहूमक बोझ उठा–उठा कऽ थ्रेसर लग पहुँचाबैत स्त्री, तँ कथाकारक नजरि ओकर श्रमपर नहि, ओकर देहपर पड़ैत छनि आ हुनकर शब्दावली देखी–‘कर जोबनक उभार पुरूष–सम्पर्कक साक्षी छै’। लगेगी हाथ ओ इहो बता जाइत छथि जे ई परमिलिया सूर्यास्तक बाद घास छीलए जाइत अछि कारण सन्ध्या–अभिसारकेँ ओकरा खगता छै। किए? एतेक ‘सेंसेनल’ ओ किएक होइत छथि जखन कि कथाकेँ एहन कोनो मांग नहि छैक, उनटे कथाक समेकित प्रभावकेँ ओ खंडित करैत छैक। ‘कनिया पुतरा’ कथामे ‘नेबो सन कोनो कड़गर चीज’ कथावाचकक बाहिसँ टकराइत छैक जे कि ‘लड़कीक छाती’ छिएक जकरा कथाकार ‘फुटैत जोबन’ कहलनि अछि। हमारा नोटिस केलहुँ अछि जे कथाकारक सुभाषक शब्दावलीमे आएल ई नवीन प्रभाव थिकियनि। आनो–आन अनेक शब्द, मोहावरा, कथन–भंगिमा नव तरहें हुनका कथामे आएल अछि। से सभ अधिकतर प्रामाणिक प्रभाव छोड़ैत अछि। मुदा गौरतलब थिक जे ओ ‘भिजुअलाइजेशन’मे हायपर सेंसेबल भेलाह अछि। एहि सभ बातक अछैत, कैक कारणसँ सुभाषक ई कथा–संग्रह सदैव स्मरन कएल जाएत। एक तँ एहि कारणेँ जे मैथिलीक ई अप्रतिम कथाकार बीस बरख धरि लगातार चुप्प रहलाक बाद फेर कलम पकड़लक आ तकर परिणाम एहि संग्रहमे संगृहित भेल अछि। एहि बीचक अवधिमे मैथिली कथा–साहित्यक परिदृश्यमे बहुत बदला आबि गेल अछि। कथा आइ ठीक ओत्तहि नहि अछि जतए सुभाषक युगमे छल। बहुतो नव–नव चीज कथामे आएल अछि। एक संवेदनशील सर्जकक रूपमे सुभाष एहि सभ कथूक प्रति ग्रहणशील सेहो छथि। ओ स्वयं कहने छथि जे हुनक एहि दोसर दौरकेँ कथा सभमे अपेक्षाकृत बेसी सावधानी आ सजगता छनि। हमारा पबैत छी जे नितांत सजग रूपसँ सुभाषक साहित्य किछु एहन तथ्य लऽ कए आएल अछि जे अक्सरहाँ समकालीन लेखनमे अनुपस्थित पाओल गेल अछि। जेना, एक यथार्थवादी कथा–भाषाक वितान, जकर मास्टर सुभाष छथि। जेना, कथामे जीवनकेँ देखबाक एक दार्शनिक दृष्टिकोण, जाहिमे ततबा गहराई छै जे देखल जाए वला वस्तुकेँ अधिकिअ पारदर्शी बना दैत छैक। आ सभसँ जबरदस्त मोन राखल जाए वला चीज तँ छै–कोशी–प्रांगणक जीवन–संघर्षपर केन्द्रित हुनकर तीनटा कथा एहि संग्रहमे संगृहित छनि। सुभाष कहियो कहने छला–‘जीवनक लेल जे नीक आ सुन्दर अछि, हमर कथा तकरे आग्रही अछि। हमर कथाक प्रेरणा जीवन–प्रेम अछि। जे कोनो चीज जीवन–विरोधी अछि, हमर कथा तकरा प्रति वितृष्णा उत्पन्न करैत अछि’। से ठीके। कम करए, बेसी करए; भाषामे करए आ प्रतिफलनमे करए, सुभाषक कथा काज तँ जरूर सएह करैत अछि। ३. बिपिन झा श्रीः ॥ हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥ गतांक सँऽ आगू... जहिना उरस्थ हृदय के दू भाग होइत अछि- · लघुमस्तिष्क · महामस्तिष्क। लघुमस्तिष्क शरीर सन्तुलन-गतिनियन्त्रण आदि कार्य करैत अछि ओतहि महामस्तिष्क मन, बुद्धि, चित्त आदि रूप में प्रथित होइत अछि। चरकसंहिता उक्त तथ्यक पुष्टि करैत अछि[1]। अस्तु हृदयेश्वरी पद में विद्यमान ’हृदय’ स्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ स्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ हृदय आत्मा के आश्रयस्थान, चेतना क केन्द्र, पंचेन्द्रिय के आधार, बुद्धि के संग्रहस्थान, स्मृति केर संचालय, चित्तक आधार, जीवात्माक आश्रयभूमि, स्नायु केर केन्द्र होइत अछि। चिन्तन प्रेरणा आदि शिरस्थ हृदये सँऽ संभव छैक[2]। एहि बातक प्रमाण सुश्रुत सेहो दैत अछि[3]। एहि शिरस्थ हृदय के स्वाशयानुकूल प्रेरित करबाक सामर्थ्य हृदय केर ईश्वरी अर्थात कान्तामात्र कय सकैत अछि। कदाचित एहि आशय के ध्यान में रखैत कहल गेल अछि काव्यप्रकाश[4] में जे काव्य अर्थात साहित्य केर बात कान्ता द्वारा कहल गेल वचनतुल्य होइत अछि जेकरा कखनहुँ उपेक्षित नहि कयल जा सकैत अछि। कियाक तऽ कान्ता में शिरस्थ हृदय के स्वामिगतगुण विद्यमान रहैत अछि जे प्रकृतिप्रदत्त अछि। एतय समीक्षात्मक रूप सँऽ एतेकमात्र कहल जा सकैत अछि जे यदि ओ हृदयेश्वरी प्रकृति प्रदत्त स्वामिगतगुण क प्रयोग स्वाशयानुकूल करबाक अपेक्षा श्रेय-प्रेय एवं योग-क्षेम कें ध्यान में यदि रखैत करैत छथि तऽ ओ हृदय धन्य होयत। अस्तु प्रकारान्तरें हृदयेश्वरी पद आत्मसमर्पणतुल्य अछि जे पूर्णतः शिरस्थ हृदय सँ सम्बद्ध अछि नकि उरोभागस्थ हृदय सँऽ। {लेख सन्दर्भित टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर आमन्त्रित अछि।} लेखक केर सामान्य परिचय- बिपिन कुमार झा (स्नातक- ECC. Allahabad University, परास्नातक- Jawaharlal Nehru University, दर्शननिष्णात- Jawaharlal Nehru University, सम्प्रति Cell for Indian Science & Technology in Sanskrit, HSS, IIT Bombay में शोधरत। विस्तृत विवरण bipinjha.webs.com पर सुलभ।) [1] षडंगमंगं विज्ञानमिन्द्रियाण्यार्थपंचकम। आत्मा च सगुणश्चेतः चिन्त्यं च हृदिस्थितम॥ सूत्रस्थान ३०.४५ [2] चिन्तादि जुष्टं हृदयं प्रदूष्य....। चरक० चिकित्सास्थान उन्मादाध्याय [3] हृदयं चेतना स्थानं...। सुश्रुत० शरीरस्थान ४.३४ [4] काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये। सद्यः परिनिवर्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे। काव्यप्रकाश, प्रथमोल्लास १.राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’-जट–जटिन २. बेचन ठाकुर- नाटक बेटीक अपमान-(दृश्य छठम) राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’ जट–जटिन लोकनाट्य रुपान्तर - राम भरोस कापडि ‘भ्रमर’
मंच पर प्रकाशक एउटा गोल घेरा डांरमे नगाडा बन्हने नट पर पडैत छैक । ओ नगाडा के सुरताल मे बजबैत रहैत अछि । दोसर प्रकाशक घेरा दहिन कात प्रवेश करैत नटी पर पडैत अछि । ओकरा संग घेरा नट लग धरि अवैत अछि । आव दुनू के उपर प्रकाशक धेरा छै । नट— (नटी के देखि प्रशन्न होइत) अहा,केहन सयंोग अछि ई,प्रिय अहांके देखल, नटिन—(नृत्याभिमूख मुद्रा प्रदर्शित करैत) जट जटाधर व्यग्र बनल हो, पार्वती कोना बैसल । नट— धन्य प्रिय अहां संग पुरै छी सदिखन हमर छी अंग नटिन— जनम—जनम धरि एहिना प्रियतम छोडब अहां के ने संग ।
नगाडा पर फेरस चोट पाडैत नटक हाथ चलैत अछि । रुकलाक वाद ।
नटिन— रंगमंच पर किए उपस्थित मनमे की फुरल अछि, आइ ककर उद्घाटन करबै, दर्शक खूब जूटल अछि । नट— मध्यकाल के प्रेमी युगल के खिस्सा कहब महान । जकरा नामे पानि बरसै इन्द्रहुक झुकै कमान । ।नटिन—(आश्चर्यक भाव व्यक्त करैत) नाम की थिक प्रेमी युगल के जनिक कीत्र्ति एहन अपार, नट— जटा जटिनकेर गाथा स प्रिय होइछ जगत उद्धार । नटिन— ई त महिला मात्र करै छै,नाचि नाचिकऽबेंग कुटै छै, नंगटिनी आंगन घैल फैकै छै,गारि सुनै छै,पानि मगै छै । नट— एह,अहां त ज्ञानी छीहे, साज बाज ओरिआउ नटिन, कुटु बेंग उखरि मे ध,आ शुभारंभ करु जट जटिन ।
उखरिमे बेंग कुटबाक उपक्रम ।तकराबाद महिलासभ दू दलमे बंटि जाइछ ।जट बला समूहक महिला सभ माथमे आ डांरमे गमछा बन्हने रहैछ ।दुनू दल परम्परगत शैलीमे एक दोसरके गरामे बांहि धएने आगा पाछा झुकैत चलैत गीतक पहिल मुखरा गबैत अछि । तकराबाद नव शैलीमे जाइत अछि ।
गीत १ महिला समूह
हाली–हाली बरिसू इन्नर देवता । पानी बिनू पडल अकाल हो राम । चौर सुखले, चांचर सुखलै खेती बारी झारी सुखलै सूखि गेलै बाबाके जिराते हो राम । सूखि गेलै भइया के जिराते हो राम ।।
धोबियाके अंगनामे छापर छुपर पनियाँ चमराके आंगनमे छापर–छुपर पनियाँ ओहिमे नहाइ पुजारी बभने हो राम । धोतियो ने भीजलै जनौओ ने भीजलै –२ रचि रचि तिलक लगावै हो राम –२ भीजले तीतले हवेलिया ढुकलै –२ बहुअो लेलक लुलुआइये हो राम –२ रांडी मौगिया हरवा जोतै छै –२ पानी विनू पड़लै अकाले हो राम –२
दयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक मयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक पानी विनू पड़ल अकाले हो राम ।
हाली–हाली बरिसू इन्नर देवता –२ पानी विनु पडल अकाले हो राम –२ निरसू के धीया–पूता मांड ले कनइ छै खुद्दी ले कनइ छै, अन्न ले कनइ छै पानी बिनू पड़ल अकाले हो राम ।
गीत १ समाप्त भेलाक बाद मंच पर अन्हार । प्रकाश अएला पर महिला सभ समूह मे नचैत गबैत ।
गीत २ महिला समूह
एगो छलै जट, एगो जटिनियाँ। दुनूमे हो गेलइ परेमे हो राम । दुनूके विआह केना रचैवै बसेबै हो गेलै माइ बापके विरोधे हो राम ।
नगाडा बजबैत एक दिशसं नटक प्रवेश । दोसर दिशस नचैत नटिनक प्रवेश । वीच मे आबि ठमकि जाइछ । नगाडा पर जोरस लकडी बजारि नट गबैत अछि । नट— एक्कै देश, एक्कै परगन्ना जट आ जटिन, जट गामक सुधुआ मनसा दोसर तेहने नटीन । नटी— (नृत्य रोकैत) की बजलहुं अहां फेरसं बाजु चुगली परोक्षे पीठ, अहां पुरुष के इएह ऐब अछि सदिखन नारी पर दीठ । रुसि जएबाक अभिनय नट—(मनबैत) जटक हयत विआह, प्रशन्न छी, हमर ने अहित मनसाय, आयल वरियाती साज वाज देखि जटिनक माय पछताय ।
गीत ३ समूह
जटक पक्ष – हम अनलियै आजन–बाजन, आब करु वियाह, –२ सांवरि गेरुली, कऽ दियौ जटाके बियाह –२
जटिन पक्ष – आगि लागो आजन–बाजन, नहि करबौ वियाह, –२ साँवरि गेरुली, मोर गौरी रहि जइती कुमारि –२
जटक पक्ष – बज्जर खसौ हाथी घोडा, बज्जर खसौ बाजार –२ सांवरी गेरुली नहि करवौ जटिनसँ वियाह सांवरी गेरुली रहि जयतौ गौरी कुमारि ।
जटिनक पक्ष – कहाँ रे पयबै, कहाँ रे पयबै, डलवाके साज –२ सांवरी गेरुली मोर जटिन रहतै कुमारि –२
अन्हारक वाद प्रकाश । प्रकाशक धेरा नट पर । नट— भेल विआह जटिन सासुर चललीह,सभ कें आंखि नोरायल, बाबा देहरीक शान ने भेटलै लगले जटिन अकुलायल ।
गीत ४
जट – लबिकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे । जइसे लबे काँच करचिया वइसे लविकऽ चलिहेँ गे ।।
जटिन नहिये लबबौ रे जटा, नहिये लबवौ रे । हम तऽ बाबाके दुलारि धिया ऐंठिके चलबौ रे ।
जट लविकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे । जइसे लबइ बेंतके छड़िया, वइसे लविकऽ चलिहें गे ।।
जटिन ऐंठिकेँ चलबै रे जटा एंठिक चलबौ रे । हम त बाबाके दुलारि धीया, तनिकऽ चलबौ रे ।।
जट डइनियाँ देखतौ, गुनमा फेकतौ, मारिये देतौ गे । आगे बाबाके समपतिया जटिन, के भोगतौ गे ।।
अन्हार÷प्रकाश । खाट पर जट जटिन सुतल ।
गीत ५
रामा रहे लागलै जटवा–जटिनियाँ हो ना । रामा कहियो काल होबे खन खनियाँ हो ना ।। रामा एक दिन भोरुका कहनियाँ हो ना । रामा लड़इ लगलै जटवा–जटिनियाँ हो ना ।।
पुनः अहार । प्रकाश । खाट पर जट सुतल । जटिन उठल मुदा आंचर जटवाक हाथ मे । गीत ५ (दोसर भाग)
जटिन भोर भेलइ रे जटा भिनसरवा भेलइ रे कोइली बोललै रे जटा कोइली बोललै रे जटवा छाड़ि देही अंचरवा हम त अँगना बहारबै रे ।।
जट मैया वहारतै गे जटिनियाँ, बहिनियाँ बोहारतै गे । जटिनी आजुके रोहिनियाँ हम तऽ पलंगवे गमैबे गे ।।...... जट हमे तोरा पुछियौ गे जटिनीक दिल से गे, जटिन परेम से गे । झुमका कहाँ हेरइले गे ?
जटिन सारी राति रे जटवा, तोहरे बिछौनमा रे जटवा तोहरे लगीचवा रे ! जटवा भिनुसरवामे तोहरे मैया चौरौलकौ रे ।.....
जटिन टिकवा जब–जब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। जट – टिकवा जब–जब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे । तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।। जटिन – हँसुली जब–जब मंगलियौ रे जटा, हँसुली काहे ने लौलें रे । हमर वाली समैया रे जटबा, हँसुली काहे न लौले रे । जट हँसुली जब–जब अनलियौ गे जटिन, तक्खापरकऽ धएले गे तोहर वाली समैया गे जटिन, हँसुली काहे न पेन्हले गे ।
अन्हार । प्रकाश नट पर । नट — जट जटिन के वीच मे भैया खटपट बझल बेजोड बाबा के दुलारी धीआ, मनबय जट पुरजोड ।
गीत ६
जटिन – धनमा कुटइते जटवा, मारलक मुसरवेके मार । सेहो विरोगवे रामा जाइ छियै नैहरवा जट – निम्मन–निम्मन टिकवा जे लैलिये जटिन ले सेहो जटिनिया छोड़ि नैहरबा तों जाइ छे । जट – चीनमा छिटलियौ गे जटिनियां चीनमा छिटलियौ । तू जाइ छै नैहरवा चीनमा के कटतै गे ? जटिन मैयो कटतौ रे जटवा बहिनियां कटतौ रे । अबरी रे समइया हम त नैहरे गमैबै रे ।। जट – घिउरा फड़लौ गे जटिन, झिगुनी फड़लौ गे, तू चल जेबही नैहरवा, घिउरा के बेचतौ गे ? जटिन मैयो बेचतौ रे जटवा, बहिनियां बेचतौ रे । अबरी रे समइया सखी संग झूमर खेलबै रे ।।
अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत ।
नट— लाख मनौलक जिद्दी जटिन, नैहर डेग बढौलक, नदीक धारमे पारक चिन्ता मलहवा के गोहरौलक ।
गीत ७
जटिन भैया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार थारी देबै एवा–खेवा लोटा देबौ इनाम भैया मलहवा रे उतारि दही झिमनापुरके घाट मलाह नहि हम लेबौ एवा–खेवा, नहि लेबौ इनाम । बहिनी बटोहिनी गे, खोजिले गे दोसर घटवार ।
जटिन खसी देबौ एवा–खेवा, पाठी देबौ इनाम । भइया मलहवा रे, उतारि दही झिमनापुरके घाट ।
मलाह नहि लेबौ हम एवा–खेवा, नहि लेबौ इनाम । बहिनी बटोहनी गे, खोजि लेही दोसर घटवार ।
जटिन बड़ दुखछल छी, नैहरा जाइ छी जटा से खाइके मार । कल जोडैÞछी, गोर पडैÞछी, हमरा करि दिए पार । भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार ।
मलाह – तोरा देखि कऽ माया लगै, जिया फाटइ हमार । जे कइलें से नकि नइ कइलें, चलें करि दियौ पार । जटिन – भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार । बहिनी बटोहनी गे, चलें करि दियौ पार ।
अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत ।
नट— नटिन वियोगे छटपट जटवा, सभ किछु सुन्न लगैछै, अपने घर छै काट छुटल, पल पल मन पडै छै ।
गीत ८
जट– हाथी पर के हौदा बिकाय गेल गे जटिन, तोरे विनु तोरे बिनु हमहुँ वेकल भेलौं गे जटिन, तोरे बिनु तोरे बिनु महल उदास भेल गे जटिन, तोरे बिनु तोरे बिनु अंगना मे दुभिया जनमि गेल, गे जटिन, सेजिया पर मकड़ा बिआय गेल गे जटिन, तोरे बिनु
अन्हार÷पुनः प्रकाश । नट पर पडैत ।
नट—रुसि क भागलि जटिन प्रिय,जट वेकल बहुरायल, एम्हर खोजए, ओम्हर खोजए, नाना भेष बनाएल । नटी—इहे होइछै मनसाके बानी,अपने करम पछताबे । घरबाली पर हुकुम चलाबे,लक्ष्मीके ठोकराबे । नट—ठीक कहै छी नटी हमर,अहां सदृश कत्त पाएब, जटबा छै अबोध प्रिय,अहां घर छोडि नै जाएब ।
गीत ९
जट – सुन मोर जोगिया, सुन मोर भाइ इहो नगरमे जटिन मोर आइल ? सुनमोर भइया, सुन गे दाइ, यही नगरमे जटिन मोर आइल ?
मोसाफिर – सुनमोर जटवा, सुन मोर भाइ, इहे नगरमे जटिन नहि आइल ।
अन्हार । प्रकाश
गीत १०
जट – दही लेब ? दही लेब ? मिठगर दही लेब ?
गामक स्त्री तोर केकर औंटल दूधवा ? तोर केकर पौरल दहिया, तोहर सड़ल गन्हाय छौ दहिया तोहर खट्टा महकौ दहिया ।
जट – सास–ससुरकें औंटल दूधवा माय, सांची दूधके दहिया माय, बड मीठ लागै दहिया,
ग्रामीण स्त्री अगे नहि लेबौ, नहि लेबौ तोहर कोय ने पुछै छौ दहिया । सिपाही हमहूँ त छियै गुवालिन, मालिकके सिपाही मारि डण्टा, फोड़ि के कोहा, खाय लेव दहि–दूधवा । जट – इहो मत जानिहे सिपाही असगर गुवालिन मारि कोहा तोड़व थुथना, राति रहौं कुंजवन, दिन बेचौं दहिया, घेघा सिपाहीके नइ देब दहिया कोय ले गे गहिकी बेची दहिया ।
अन्हार प्रकाश
गीत ११
जट – ससुरे भैसुरे मोर जाल बुनै ना अकसर बलमुआ मोरा माछ मरैना । माछ ले हे, माछ ले हे, गहिकी बेटी, माछ ले हे, माछ ले हे ।।
ग्रामीण स्त्री आहे कौने मछरिया केर गोढिन हे ? जट – आहे रेहुआ मछरिया केर गोढिन हे । ग्रामीण स्त्री आहे गहुम के कै खूटे माछ देवय हे ? जट – आहे, गेहुमा के तीन खूटे माछ देवय हे । ग्रामीण स्त्री – तोर मछरी बनबै नइ जानियौ धुए नइ जानियौ, खबैयाके खियावै नइ जानियौ धियापुता परबौधै नइ जानियौ गोढिनियां गे ।
अन्हार । पुनः प्रकाश नटपर ।
नट— खोजि खोजिकऽ थाकल जटवा जटिन विनु मुरझायल, तखने नजरि पर अएलै जटिनिया, असली रुप मे आयल । नटी— की बुझलिएै जटिन ओकरा हपसि क धरतै ना । मनमे गरल दरद छै नटबा, दुर दुर करतै ना ।
गीत १२
जटिन दूर दूर रे जटा । दूर रहिहें रे जटा सड़ल चाउर रे जटा । राख छाउर रे जटा । सड़ल तीमन रे जटा । दूर रहिहें रे जटा । दूर रहिहें रे जटा ।
जट– दूर दूर गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन । सड़ल चाउर गे जटिन । राख छाउर गे जटिन । बसिया रोटी गे जटिन । सड़ल तीमन गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन । चोटिया गुहइते चलि अबिहें गे जटिन । सेजिया सजैबते चलि अबिहें गे जटिन
जटिन जुलफी सम्हारैत चल अविहें रे जटा । धोतिया पेन्हैत चल अबिहें रे जटा ।
अन्हार । पुनः प्रकाश नट नटी पर नगाडाक धुन पर कनेक काल दुनू नचैत नट— कहैछै जे एहिना होइछै सांइ बौह के झगडा बीच मे पडि कऽ गामक लोक अनेरे बनैए लवडा । नटी— अपनो घर त सएह हाल अछि,अनका कोन उपदेश जटिनके दुलरुवा जटबा,आब चलल परदेश ।
गीत १३
जट – मोरंग मोरंग सुनियै गे जटिन, मोरंग हमरा जाये दही गे जटिन । मोरंग से हँसुली लऽ अयवौ गे जटिन तोहरे पहिराए हम देखब गे जटिन ।
जटिन मोरंग मोरंग सुनियौ हो जटा मोरंग देस जनु जाहु हो जटा मोरंग के पनियां कुपनियां छै हो जटा लागि जयतौ कोढ करेज हो जटा । उलटियो ने आवे देतौ हो जटा पलटियो ने आबे देतौ हो जटा रहि जाही रे जटा नैना के हजूर ।
जट– तोहरे ले लेवौ जटिन मोरंग से टिकवा ओही मे झमकाइ तोरा देखव से जटिन मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन । मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन ।
जटिन अते जे कमैले जटा की भेलौ ना सुनु मोर जटवा, जटिनके मंगवा उदास लागे ना
जट – टिकवा जब जब लौलियौ गे जटिन टिकवा काहे ने पेन्हले गे जटनी गे सभामे ललचौले गे टिकवा विनु ।
जटिन जाहो ते जाहो रे जटवा, देस रे विदेस, मोरंग क टिकवा लेने आवहु हो रा
अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर । नट— मान मनौबल कऽ कऽ जटवा गेलै मोरंग कमाय, एम्हर बेटा भेलै वेमार,जटिनियां वैद्यसं पुछए उपाय ।
गीत १४
जटिन रघुदासके अँगा–टोपी, रघुदासकेँ अंगा–टोपी तोहरे देवौ रे बैदा, तोहरे देवौ रे वैदा रघुदास के दियौ न जिआय ।
वैद – रघुदासके अंगा–टोपी, रघुदासके अंगा–टोपी हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया रघुदास तँ सडले गेन्हाय ।
जटिन रघुदास के हाथके बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया तोहरे देवौ रे वैदा, तोहरे देवौ रे वैदा रघुदास के दियौ ने जिआय ।
वैद – रघुदास के हाथ के बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया, हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया रघुदास त सड़ले गेन्हाय ।
अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर । नट— बेटवा भेलै चंगा, मनमे जटवा बसलै ना, जटवा के वियोगे जटिनियां अहुरिया काटै ना । नटी— चललै पिया उदेश जटिनियां,दर दर भटकै ना,हो रामा,दर..... कोने पापे पिअबा बिछुडलै कि दुनियां बिजुबन लागै ना,हो रामा,दर....। गीत १४ क( थपल गेल) जटिन हे रे सोनरबा भाय, कही दही जटबाके उदेश जहिया से गेलै निरदैया, नै कोनो संदेश पल पल काटे राति अन्हरिया,दिनो लगे भयाओन नै चाही मंगटीका कंगना,पिअबा अपन सोहाओन । हे रे..........। सोनार हे गे जटिनियां दाय,छोड जटके आस, गरबा जोखि जोखि हंसुली पेन्हैबौ,चल हमरे साथ । जटिन हे रे सोनरबा भाय,रे अगिया लगैबौ तोरे हंसुलिया बजर खसैबौ तोरे साथ । रे मोर पटा पुरबे नोकरिया रहबै पटे के आस । बरह बरस हम आंचर बान्हि रहबै रहबै जटे के आस । रे तोरास सुन्नर हमरो जटबा ब्टिया चलैत लचि जाय रे तोरास सुन्नर हमरो बलमुआ चन सुरुज छपि जाए ।
थाकि हारि क जटिन अपन घर आबि जाइत अछि ।ओसारा पर ओगठि जटक स्मरण करैत हिंचुकि हिंचुकि कानए लगैछ ।
गीत १५
जटिन जाहि बाटे पियवा गेलै, दुभिया जनमि गेलै बटिया जोहइते वीजूवन लागल रे की । आहे मइया । पियवा मोरंग गेलै, हमरा से कही गेलै, आहे दिदिया । फूल लागल कंगना लेने अइथिन हो राम । मांगे के टिकबा लेने अइथिन हो राम । रचि रचि जटिनके पेन्हयथिन हो राम । जट बिनु लागे दुनियाँ अन्हारे हो राम
बेटा सेहो घरस बाहर आबि माय संगे हिंचुक लगैछ । तखने दहिन कातस माथपर मोटरी लेने जटक प्रबेश । लगमे आबि घरबाली आ बेटाके एकटक देख लगैछ ।प्रकाशक घेरा दुनू पर फूट फूट पडैत छैक ।दुनू चरित्र स्थीर भ जाइछ । प्रकाशक घेराक संग नट नटिनक प्रबेश ।
(नट नगाडा के सुर तालमे बजबैछ । नटिन सुरताल पर नाच लगैछ । नट के चारु कात गोल घेरामे नटिनक नृत्य )। नटी वारह बरिस पर पिअबा अएलै दुअरिया हे जटिन के खातिर । त्यागी देलकै मोंरंग नगरिया हे । जटिन के खातिर । नट चलियौ ने आब नटिन अपन एकचरिया हे । जटिन के खातिर । चमक दियौ मिलन के इजोरिया हे जटिन के खातिर । दुनु नचैत नचैत मंचस बाहर चलि जाइछ ।आब स्थीर चरित्र चलायमान भ उठैछ । ओम्हर प्रकाशक घेरामे जटिन अकानैत जटक लग अबैछ । खुशी सं आंखि छल छला जाइछ । पयर पर झूकि प्रणाम करैछ । माथ परक मोटरी, छाता लऽ घर दिश बढि जाइछ । जट बेटा के छातीस सटा लैछ । जटिन पानि लऽ अवैत अछि, जट पयर पखारैछ । दुनू एक दोसराके आगां ठाढ भऽ नोरायल आंखिए एक दोसराके देखैत अछि । गीत नं.५ क एक टुकडीक पुनरावृति होइछ ।
गीत ५के पुनरावृति
जटिन टिकवा जब–जब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।। जट – टिकवा जब–जब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे । तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।।
जट जेवीसं लाल डिव्वा निकालैत अछि । ओकरा खोलि मंगटिका बहार कऽ जटिन कें पहिरा दैछ । दुनू नृत्य मुद्रा मे आवि जाइछ ।
गीत १६
आरे बाली उमेरिया रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे टिकबा हम पहिरलौं रे रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे आरे बाली उमेरिया रे जटबा टिकबा हम पहिरलौं रे
नचैत नचैत जटिन,जटक बांहिमे आबि जाइत अछि । दुनू प्रिज भऽ जाइछ । अन्हार
२ बेचन ठाकुर बेटीक अपमान बेचन ठाकुर नाटक बेटीक अपमान- (दृश्य छठम) (स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी एकटा गरीब किसान छथि। हुनक पत्नी राधा देवी छथि। हुनका दर-दुनियामे एक्के गोट बेटी शालिनी अछि। हरिश्चन्द्र चौधरी निपुत्र छथि।) हरिश्चन्द्र- यै शालिनी माए, हमरा लोकनि भगवानकेँ की बिगारलियन्हि जे ओ अपना सभकेँ एगो आ सिरीफ एगो बेटीएटा दए भाभट समटि लेलनि। राधा- एहि बातक हमरो बड़ छगुन्ता लागि रहल अछि। भगवानक महिमा अगम अथाह अछि। केकरो बोरे-बोरे नून, केकरो रोटियोपर नहि नून। हरिश्चन्द्र- खाइर छोड़ू, माथा पेच्चीबला गप-सप्प। भगवान जएह देलनि सएह बहुत। ओनो हम बड़ गरीब सेहो छी। जदि भगवान हमरा बेसी धिया-पुता दइतथि तँ हमरा ओकर पतिपाल नहि कएल होएतए। मात्र तीनि परानीक पेट तँ पहाड़ बुझाइत रहैत अछि। राधा- यै शालिनी बाप, जे भगवान मुँह चीरैत छथिन्ह ओ आहारक जुगार अवस्स करैत छथिन्ह। शालिनीकेँ पनरह सोलह बरख भए गेल। मुदा दोसर संतानक कोनो उम्मीद नहि देखए पड़ैत अछि। जबकि कतेकोकेँ देखैत आ सुनैत छी जे अल्ट्रासाउण्डसँ जॉंच करए बेटीकेँ गिरबौलनि, सुइया-दवाइसँ गर्भ नाश करौलनि इत्यादि। मुदा हमरा भगवान। हरिश्चंद्र- यै शालिनी माए, गर्भपात बड घिनौना काज थिक, बड पैघ पापीक काज थिक। ओहि जनानीकेँ धौजनि-धौजनि भए जाइत अछि कोनो करम बॉंकी नहि रहैत अछि जे गर्भ नाश कराबेत अछि। कतेको जनानी एहि बेत्थे सुरधामो चलि जाइत अछि। राधा- रामक नाम लिअ, छोड़ू ई कुकर्मक गप-सप्प यौ, अपन शालिनीकेँ गरीबीक कारणे पढ़एल-लिखाएल तँ नहि होएत। मुदा घर-गृहस्थी तँ जरूर सीखए देबैक। हरिश्चंद्र- यै शालिनी माए, अहॉं बुच्चीकेँ पढ़ाबए लेल हिम्मत किएक हारैत छी? कोशिश नहि छोड़ू शालिनी दाइक पढ़ाइ बास्ते हम यथासंभव पूर्ण कोशिश करब। आगू सरस्वती माताक किरपा। अपन करम करी फलक चिन्ता जुनि करी। पटाक्षेप दृश्य सातम- (स्थान- दीपक चौधरीक घर। वार्ड सदस्य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीक घर घुमैत- घुमैत पहुँचैत छथि। दुआरिपर कियो नहि छथिन्ह।) प्रदीप- दीपक बाबू! दीपक बाबू! दीपक बाबू। दीपक- (अन्दरहिसँ) हँ हँ के थिकहुँ? आबि रहल छी। कने बैसु श्रीमान् भात परसाबैत छी। हइए शीघ्र आबि रहल छी। दीपक- परणाम सर। प्रदीप- परणाम् परणाम। कहु दीपक बाबू की हाल चाल? दीपक- सर, हाल-चाल करीब-करीब ठीके जकॉं अछि मुदा। प्रदीप- मुदा की। दीपक- बड़का बेटाक बिआह कने जल्दीए क’ लिअ सुनलहुँ, अहॉंक बड़का बेटा दिल्लीसँ बढ़िया पाइ-कौड़ी पठाबैत छथि। प्रदीप- दीपक बाबू, अहॉंक परिस्थिति देखि हम सलाह दैत छी जे अहॉं बड़का बेटाक बिआह कए लिअ। दीपक बाबू! ई चानन फटक्का कहियासँ यौ। ई तँ हम ध्याने नहि देने रही। दीपक- सर, यएह हालहिसँ। पत्नीक मृत्युक पश्चात् हमर मोन बदलि गेल। पियोर बाबाजी तँ नहि, गृहस्थौआ बाबजी बनि जेबाक निर्णए कएलहुँ, की अहॉंकेँ खराबो लागि रहल अछि? प्रदीप- नहि यौ। हमरा तँ बड नीक लागि रहल अछि बाबाजी बननाइ कोनो खराब बात अछि, बड़ नीक बात अछि। सिरिफ एकटा हमर विनती अछि जे बाबाजी धर्मक पूर्ण पालन करब आओर मरितहु दम धरि भ्रष्ट नहि होएब। दीपक- सर, अपने बड अनुभवी व्यक्ति थिकहुँ। एहेन अनुभवी व्यक्ति ओ वार्ड सदस्य आइ काल्हि भेटब कठिन। सर, हम अपनेक प्रत्येक सलाहकेँ पूर्ण करबाक हार्दिक प्रयास करब। प्रदीप- दीपक बाबू, आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। जय राम जी की। (उठि कऽ प्रस्थान) दीपक- जय राम जी की। (उठि कऽ) हम चाहैत छी जे शुरूए लगनमे मोहनक बिआह कऽ ली। कने कम्मो सम्मो दहेज भेटत तँ कोनो बात नहि। मुदा कुल कन्या नीक होएबाक चाही। पटाक्षेप- अंक दोसर दृश्य पहिल अगिला अंकमे देल जाएत- सम्पादक १.धीरेन्द्र कुमार- जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- ‘गामक जिनगी’पर धीरेन्द्र कुमारक दू शब्द २.अनमोल झा- ४ टा लघुकथा १ धीरेन्द्र कुमार जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- ‘गामक जिनगी’पर धीरेन्द्र कुमारक दू शब्द- ‘गामक जिनगी’ संपूर्ण रूपसँ गामक समस्यापर आधारित आ ओकर समाधानक दिशापर रचित जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा संग्रह अछि। समस्त कथा संग्रहमे उन्नैसटा कथा अछि। वर्तमान कथा प्रवाहसँ भिन्न कथा-प्रवाह अछि। वर्तमानमे समस्याक प्रवाह अछि। कथाकार समस्याकेँ सोझा राखि पाठक माने समाजकेँ बोध करबैत अछि। समाधान ताकक दायित्व पाठकपर होइत अछि। यर्थाथक नाङटि चित्रण मानवीय कुरूपता, असंवेदनशीलता आ साहित्यक नामपर अश्लीलता पसरल जाइत अछि ओतहि प्रस्तुत कथा संग्रह गाममे पसरल छोट-छोट वस्तुक उपयोगितासँ समाजक समस्याक समाधान प्रस्तुत करैत अछि- भैँटक लावा, विसॉंढ़, पीरारक फड़। हिनकर कथा मोनमे कचोट नहिं वरन् उन्मुक्त आ आशात्मक सनेस दैत अछि। आजुक कथा जकॉं दमघोटू वातावरण तैयारि नहिं करैत अछि वरन् भोरूका स्वच्छ हवा प्रदान करैत अछि- बोनिहारिन मरनी, ठेलाबला, रिक्शाबला, घरदेखिया। वर्णनात्मक शैलीमे समस्त कथा अछि। कथाकार समस्याकेँ पकड़ब, उठाएव आ समाधान दिश लऽ जेवामे सिद्धस्त छथि। कथामे अविछिन्न प्रवाह अछि कतहुँ कथा संयोजन ठमकल नै भेटत। कथाक उद्गम होइत अछि ओ बढ़ि जाइत अछि। कथाक आवश्यक तत्वमे जे आवश्यक तत्व होइत अछि से अवस्से भेटत। शीर्षक कतहुँ असम्बद्ध नहि भेटत। उल्लेखनीय कथा अछि- ‘घरदेखिया। लुखियाक जिज्ञासा आ भलमनसाहत प्रसंसनीय अछि कथाक प्रवाह अविचल अछि आओर संपूर्ण कथामे आगॉं की हेतै से सदिखन लागल रहैत अछि। कथामे एहि तत्वक आवश्यकता मानल जाइत अछि। घरक एक-एकटा ओरिआओन, घरक हालति आ लुखियाक प्रयास सहज अछि। कतहुँ नाटकीयता नहिं झलकैत अछि। मिथिलाक हसी-मजाक कथाकेँ मिथिलाक माटि-पानिसँ सम्वद्ध कऽ दैत अछि। लुखिया समैधसँ पाइ लऽ कनियॉं आनक पक्षमे नहिं अछि तेँ ओ बजैत अछि- “ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब।” नागेसर अइ पक्षमे नहि छथि मुदा भौजीक कहल काटब ओकरासँ संभव नहि अछि। कथाक समापन अहि उक्तिसँ अछि। समापन नागेसरकेँ झकझोड़ि दैत अछि। कथाकार ई स्पष्ट करैत अछि जे नागेसर की करताह? मुदा लुखियाक कथन आजुक समाजक लेल सोचनीय उक्तिक रूपमे प्रश्नवाचक अछि। कथाक ई उत्कर्ष अछि आ पाठककेँ आकर्षणमे बान्हि लैत अछि। कथाकार ग्राम्य जिनगीक चित्रणमे माहिर छथि आ हुनका ग्राम्य-जीवनक अनुभवक बखाड़ी छन्हि। कुम्हारक सामग्रीक विवेचन देखल जाए- ‘कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पांडव, गणेश, लछमी, मटकूर, छांछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहिवात, कोहा, फुच्ची, सीसी, सरबा, सीसी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पात्तिल, तौला, मलसी....।’ ओहिना बावी कथा मिथिलाक पर्व त्योहारक विस्तृत आख्यान अछि। कखन कोन पर्व होएत ओकर विधि-विधान बावीक माध्यमसँ व्यक्त होइत अछि। सभसँ आश्चर्यक गप्प जे सजीव चित्रण कथाकार केने छथि। कथाक अंतमे ई नै बुझना जाइए जे हम छठि पावनिक घाटपर उपस्थित नहि छी। छठिक मर्यादा आ शुद्धतापर सभसँ बेसी धियान देल जाइत छैक तेँ ओहु घटनाकेँ कथाकार पकड़ि नेने छथि।- “बाबी देखथुन जे ई छौँड़ा तेहन अगिलह अछि जे हाथीकेँ पटकि देलकै। ई तँ गुण भेल जे एकेटा टांग टुटलै नै तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत।” प्रस्तुत कथा संग्रहमे सभ कथा अपन-अपन विशेषता रखैत अछि आ सभ कथाक समस्या भिन्न अछि। सबहक समाधान अछि। कथ्य भिन्न आ वस्तु विशेष नव-नव। कथाक शीर्षक कथासँ संबंधित आ भाषा जन- जनभाषा अछि। अधिसंख्य लोक जे भाषा बजैत अछि टीसनपर, हाटपर, यात्रामे, गाममे आ घरमे, से भाषाक प्रयोग अछि। विषय-बस्तु आ भाषा बीचक संबंध ई स्पष्ट करैत अछि जे कथाकार जमीनी हकीकतकेँ उपस्थित केलनिहेँ। मैथिली साहित्य लेल ई एकटा सौभाग्यक बात थिक। हँ बूझि पड़ैत अछि जे कथाकारकेँ पुस्तक प्रकाशनक धड़फड़ी रहै वा प्रुफरीडरक हड़बड़ी जाहि कारणे किछु शब्द अनगढ़ अछि। कथामे सूक्रि वाक्य, सैद्धांतिक वाक्यक संरचनासँ प्रेमचंद अवस्य स्मरण होइत अछि मुदा, मुहावरा आ लोकोक्तिक अभाव सेहो भेटैत अछि। कथामे वर्णनात्मक शैली रहितहुँ कतओ कतओ कथाकार कथोपकथनक प्रयोग सेहो केने छथि। कथाक विश्वसनीयता आ साधारणीकरण प्रक्रियामे आवश्यक तत्व एकटा एकरो अहमियत होइत अछि मुदा कथाकारकेँ हम सचेष्ट करए चाहब जे पात्रक भाषा पात्रक शैक्षिक स्तरसँ सम्बद्ध रहने, ओकर मानसिकता, परिवेशसँ मेल खाइत होमक चाही। कथाकारकेँ हम धन्यवाद देवनि जे हिनकर कथा रातिक बाद अकासमे चमकैत भोरूकबा अछि। जयशंकर प्रसादक शब्दमे- “तुमुल कोलाहल कलह मे, मैं मलय की बात रे मन।” अछि। २ अनमोल झा ४ टा लघुकथा समाज ओ अपने बेचारा गृहस्थ आदमी छला। बेटा सभ बाहर कमाइत छलनि मुदा तेहन स्थिति ठीक नहि छलनि। तथापि भगवानक दयासँ सभटा ठीके–ठाक चलि जाइत छलनि। कखन ककर कोन गति हैत से भगवाने जनैत छथि। आ से बेचारा जाहियासँ पुतहु फाँसी लगा मरि गेलनि, आ बेटी बला हिनका सभो गोटापर केश ठोकि देलक, तहियासँ कोट; कचहरी आ दरभंगा–पटना करैत–करैत पायरक एँड़ीक सङ हाथक स्थिति सेहो खराप भऽ गेलनि। समाज बड़ पैघ होइत छैक, हम सभ पढ़नेहो छी जे मनुष्य एक सामाजिक प्राणी थिक, ओकरा यदि जंगलमे सभ सुख सुविधा दऽ देतै आ समाज सँ सम्पर्क नहि रहए देतै तँ ओ नहि टीक सकत। तै समाजक एकटा अपन अलग महत्व आ मर्यादा छैक। बेर–कुबेर सभमे समाजे–समाजक काज दैत छैक। आ से हिनको हठात किछु पाइक काज पड़लनि। अपन डॉड़ मुट्ठी तँ पहिने खाली भऽ गेल छलनि। गेलाह घरक सटले, दू–चारि घरक बाद इंजिनियर साहेब ओतए। दस हजारक याचना केलनि आ ओ कहलखिन हमरा हाथपर नहि अछि, बहुत दिन रहि गेलउ गामपर, हमारा काल्हि जाइत छी काजपर ओतएसँ पठा दैत छी। आ ओ गेलापर ठीके पाइ आएल रहै इंजिनियर साहेबक बाबू नामे। जखन ई आनए गेलाह तँ हुनकर बाबू गाछ तरक खेतक कागत बना ओहिपर औठा देमए कहलखिन! बेचारा ओ कजरौटी आ सादा कागत देखि आर एकटा चिंतामे फँसि गेल छलाह..........!! रिटर्न - कहलउ ने बाबू, एहिसँ बेसी पाइ हमरा बुते नञि देल पार लागत। बाहरक खर्चा, धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ आ ताहिपर ई महंगी, कतएसँ आनब हम। - महंगीयेक द्वारे कहैत छियौ ने जे तू जे पठबै छै पाइ ताहिमे गामपर घर नञि चलै छउ। - चलत किए नञि। कोनो की गामपर धीया-पुता पढ़ै बला अछि जे ओहोमे खर्चा लागत। हमरा तँ सेहो नञि करए पड़ैत अछि। - जे तोरा आइ करए पड़ैत छउ से हमरा बहुत पहिने करए पड़ल रहए तोरा पढ़ाबैमे। ओ पाइ जे हमारा तखन राखि देने रहितउ तँ निश्चय तोरा सँ नीक रिटर्न भेटितै हमरा। हँ तखन ई जरूर होइतै जे तू मनुक्ख नञि बनितै......! फर्ज - आब तँ ई–मनीआडर सँ तुरंते पाइ फुँचि जाए छैक। एके–आध दिनमे। - हँ, से की। - से बाबू कहाँ फोन-तोन केलनि जे पाइ पहुँचलनि की नहि। - से की करताह ओ फोन, हुनका तँ पाइसँ मतलब छलनि से भेटि गेलनि, बात खतम। - मुदा हुनका सूचना तँ देमक चाही जे समयसँ पाइ देलकनि डाकपीन की नहि! अहीँ फोन कके पुछि ने लिऔन। - नहि, एकदम नहि। ई दायित्व हमर नहि छी। हमर दायित्व छल पाइ पठेबाक से हम पठा देलियनि। आब हुनकर दायित्व छनि हमरा सूचना देमक जे पहुँचल की नहि। - हे, बाप संगे लोक एना अरारि नहि करए अछि। - अरारि कहाँ, ई तँ हुनकर फर्जक बोध ने करा रहल छियनि। आबो नहि सिखतातँ कहिया सिखता........! तेल ओकरा बॉसक बाँहिपर एकटा छोट सन सादा स्पॉटछलै। ओ अपन असिस्टेंटक फाँक समयमे बजेलक आ कहलकै–देखहिन तँ ई की छियै। असिस्टेन्ट ओकर हाथ पकड़ि कऽ घुमाक–फिराक, छू कऽ आदि–आदि भावे देखलक। आ कहलकै किछु नहीं सर, ई ओहिना किछु छी, दू–चारि दिनमे ठीक भऽ जाएत। बॉस जोरसँ कहलकै–हम एकरा दस सालसँ एहिना देखि रहलियैहे आ तू कहै छै जे दू–चारि दिनमे ठीक भऽ जाएत? असिस्टेन्ट आर विश्वाससँ कहलक–तखन सर किछु नहि छी, ओहिना किछु भऽ गेल अछि। कोनो चिंताक बात नहि। से सभ रहितए तँ एखन पसरि ने गेल रहितए ई। बॉसकेँ लगलै जे असिस्टेन्ट तेल लगा कए चलि गेल ........! १.शिव कुमार झा “टिल्लू”- किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा)२.डॉ. बचेश्वर झा-समीक्षा- (मौलाइल गाछक फूल) १ शिव कुमार झा “टिल्लू”- किस्त-किस्त जीवन-शेफालिका वर्मा-(समीक्षा) साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि आ साहित्यकार ओहि दर्पणक शिल्पी। शिल्प जतेक विलक्षण हएत छाया ततेक साफ। कोनो साहित्यक अध्ययनसँ रचनाकारक मनोवृत्ति स्पष्ट होइत अछि। मैथिली साहित्यक संग ई विडंवना रहल जे एहिमे वाल साहित्य, अर्थनीति आ आत्मकथाक विरल लेखन भेल। मात्र किछु साहित्यकार एहि विधामे अपन लेखनीक प्रयोग कएलनि। ओहि विरल साहित्यकारक गुच्छमे एकटा नाम अछि- डॉ. शेफालिका वर्मा। शेफालिका जीक रचना सभमे पारदर्शिता रहल ओ जे हृदएसँ सोचैत छथि ओकरा अपन कृति उतारि दैत छथि। हुनक रचनामे अर्न्तमनक ध्वनि स्पष्ट सुनल जा सकैत अछि। कतहु अर्न्तद्वन्द्व नहि, कतहु पूर्वाग्रह नहि। हुनक किछु कृति- विप्रलब्धा, अर्थयुग स्मृति रेखा, यायावरी आ भावांजलि पढ़लाक वाद हुनक जीवनक वास्तविक रूपक दर्शन कएल जा सकैत अछि। अपन रचना सभकेँ एकसूत्रमे सहेजि कऽ अपन आत्मकथा लिखलन्हि “किस्त-किस्त जीवन” अप्रत्याशित मुदा, प्रासंगिक नाम। जीवनक कतेक रूप होइत अछि, बाल, वयस्क, प्रौढ़.... सुख-दुख, काम निष्काम यएह थिक एहि रचनाक सार। अपन करूणामयी जीवनक बून-बूनकेँ ऑंजुरमे एकत्रित कऽ आत्मकथा लिखलन्हि। आमुखसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ नित डायरी लिखैत छथि तेँ अपन किस्त-किस्तक अनुभवकेँ वटोरि लेलनि। वाल-कालक गणित विषयक समस्या हो वा संगीत शिक्षक पंडित वाजपेयी जीक व्यवहारक मूक विश्लेषण सभ विन्दुपर पोथिक फुजल पन्ना जकॉं स्पष्ट प्रस्तुति। युवती वएसमे प्रवेश करैत काल कोनो अनचिनहार युवकक नजरि देखि कऽ अपन ब्रह्मास्त्रक (थूक फेकवाक) प्रयोग करैत छलीह। ओना एहि अस्त्रक शिकार विवाहसँ पूर्व ललन बावू सेहो भेल छलाह, जिनका संग ओ दाम्पत्य सूत्रमे बान्हल गेलीह। नव प्रकारक रक्षा सूत्रक विषए मे पढ़ि अकचका गेलहुँ, नीक नहि लागल मुदा, एहिसँ रचनाक प्रासंगिकतापर प्रश्नचिन्ह नहि लगाओल जा सकैत अछि। प्रवेशिका उत्तीर्ण कएलाक पश्चात शेफालिका जी पढ़ए नहि चाहैत छलीह। ललन बावूक विशेष प्रेरणासँ जहिना- तहिना स्नातक धरि शिक्षा ग्रहण कएलनि। तत्पश्चात् घर-गृहस्थी आ साहित्य साधनामे लीन भऽ गेली। साहित्यमे विशेष योगदानक लेल दरभंगामे डॉ. दिनराजी शाण्डिल्य द्वारा “विद्या वारिधी” सम्मानसँ सम्मानित कएल गेली। एहि सम्मानकेँ पावि भाव-विभोर भऽ मिथिला मिहिरकेँ अपन मनोदशा पठौलन्हि। मिथिला मिहिर द्वारा हुनक हस्त-लिपिकेँ यथावत् प्रकाशित कए देल गेल। मिथिला मिहिरक “होली विशेषांक”मे हिनक रचनाक रचनाकारक नाम देल गेल “दिन राजी डॉ शेफालिका वर्मा।” एहि मजाकसँ शेफालिका जी कॉपि गेली आ 18 वर्खक मौनव्रतकेँ तोड़ि पुन: शिक्षा ग्रहण करवाक लेल आतुर भऽ गेली। परिणाम सोझाँ अछि- एम.ए., पी.एच.डी प्राध्यापक डॉ. शेफालिका वर्मा। अपन सम्पूर्ण जीवनमे प्रेमकेँ जीवाक आधार मानि जीवि रहल छथि- रजनी जी। आरसी बावूक शेफालिका- कोना रजनीसँ शेफाली वनि गेली एहि रचनामे झॉंपल अछि। प्रेमक सभ रूपकेँ अर्न्तमनसँ स्वीकार करव हिनक जीवन दर्शन अछि। राजनीतिसँ दूर रहलीह, जखन की किछु प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ हिनका लग नतमस्तक रहैत छलाह। डार्विनवार “उपार्जित लक्षणक वंशावलि”क आधारपर एना संभव भेल। पिता स्व. मल्लिक साहित्कार आ सरल व्यक्तित्व छलाह। हिनक पति ललन बावू साहित्यकार तँ नहि छलाह परंच शेफालिका जीक साहित्यक सभसँ पैघ पाठक। अपन पति द्वारा निरंतर पग-पगपर संग देवाक कारण हिनका जीवनसँ कोनो शिकाइत नहि अछि। “जीवनक डोरि फूजि उड़ल व्योममे कातर प्राण मुदा जीवै छी।” आव प्रश्न उठैत अछि जे हुनक आत्मकथासँ समाजकेँ की भेटत वा की भेटल? कोनो व्यक्ति ओ महान हो वा नहि हो ओकर जीवनसँ शिक्षा लेल जा सकैत अछि। शेफालिका जी तँ मर्मज्ञ छथि जीवनक मर्मज्ञ, साहित्यक मर्मज्ञ आ सिनेहक मर्मज्ञ। पुरूष प्रधान समाजमे नारीक एहेन दृढ़ता देखि वर्तमान कालक बालाकेँ अवश्य नव दिशा भेटत। हुनक जीवन दर्शनकेँ कण-कणमे समा लेलहुँ, भाषा मनोरम आ प्रवाहमयी अछि। एतेक अविराम कृति रहलाक पश्चात् एहिमे किछु त्रुटिक दर्शन सेहो भेल। शेफालिका जी अपन जीवनक कचोटकेँ नुका लेली। ओ फूजल मानसिक प्रवृतिक महिला छथि, चरित्र उत्तम मुदा, पारदर्शी। सहज अछि जे एहिसँ हुनका किछु सामाजिक उपहासक अनुभव अवश्य भेल हेतनि। साहित्यकारक रूपमे उपेक्षाक शिकार अवश्य भेल हेती तकर मौन व्याख्या तँ कएल जा सकैत छल मुदा, नहि कएल गेल। भऽ सकैत अछि ओ मैथिल समाजक मध्य कोनो अनुत्तरित प्रश्न नहि उठवए चाहैत छथि। सम्पूर्ण सार अछि जे रचना सारगर्भित ओ सोहनगर लागल। शेष.....अशेष.......। पोथीक नाम- किस्त-किस्त जीबन रचनाकार- डॉ. शेफालिका वर्मा प्रकाशक- शेखर प्रकाशन, इन्द्रपुरी पटना-14 मूल्य- 300टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- 2008 कुल पृष्ठ- 320 शमीक्षक- शिव कुमार झा “टिल्लू” जमशेदपुर २ डॉ. बचेश्वर झा जन्म- १५ मार्च १९४७ईं एम.ए.-पी.एच.डी. पूर्व प्रधानाचार्य, निर्मली महाविद्यालय निर्मली। समीक्षा (मौलाइल गाछक फूल) ‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम साधुवाद दैत छियन्हि जे हिन्दी आ राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति अटूट सिनेह राखि मैथिलीमे लेखन करबाक भगिरथी प्रयास कएल अछि। ओना तँ मैथिलीमे अनेकानेक साहिन्यकार लोकनि चेष्टा कएल अछि। हुनका लोकनिक भाषामे फेंट-फॉंट भेटल अछि, किन्तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगॉं घुटना टेक दैत अछि, जन साधारण अल्पो शिक्षितकेँ गुद-गुदीक संग विषय अन्तस्थलीकेँ छुवि लैत अछि। वैचारिक दृढ़ता एवं हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीश जीमे विरल अस्तित्वक परिचए दैछ। उपन्यासक प्रत्येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि दैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्यक्षदर्शी भऽ विषयक निरूपण कएल अछि। ओना तँ शिक्षाक सीढ़ीकेँ पार कए लेखक कलाक बलवती इच्छा राखि मैथिलीक वाटिकाकेँ पल्लवित-पुष्पित करक भरपूर प्रयास कएलन्हि अछि। गाम ठामक बिलक्षण चित्रण हिनक लेखनीक विशेषता एहि पोथीमे देखल जाइछ। हिनका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सिनेही कही तँ सर्वथा उपयुक्त होएत। एहिमे सामाजक ओहि वर्गक समीक्षा कएल अछि जकरापर आइधरि केओ सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथिलीमे समाहित कएने छथि। हमरा तँ लगैत अछि माए मैथिली लेखकक माथपर चढ़ि कऽ एहन चमत्कारी उपन्यास लिखक हेतु प्रेरित कएल अछि। फणिश्वर नाथ रेणु आ यात्री जीक उपन्यासमे सामाजिक रहन-सहन वैचारिक भिन्नता अर्थाभावक कारणे स्वाभिमानक हनन जौं देववामे अबैत अछि तँ सम्प्रति उपन्यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्यक्ष दिग्दर्शन अति मार्मिक अन्तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्प्रेरित करैछ। मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे जन्म नेनिहार लेखक एतेक सुन्दर, सुवोध आ सुगम्य ढंगसँ विषएकेँ निरूपित कए पाठकक जिज्ञासाकेँ अन्त धरि बढ़बैत गेल छथि जे चिक्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्य करैत अछि। मैथिली साहित्याकाशक ई ज्योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृध्द्ता अनवामे योगदान कएल अछि। ओना तँ औपन्यासिक विचारानुसार एहि उपन्यासमे त्रुटि अछि। एकरा उपन्यास कहल जाए वा सामजिक निबंध ताहि परिप्रेक्ष्यमे विद्वान पाठके निर्णए कऽ सकैत छथि। मुदा हमरा तँ लेखकक एहि उपन्यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चित्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि जेना- एकओर अनुप वोनिहारक बेटा बौएलाल भूख-पियाससँ आकुल अछि इनारक पानि भरवामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दिशि रमाकान्त आ हीरालालकेँ आधुनिक कालमे शराब चुस्कीक चर्चा होइत अछि तेँ उपन्यासक विषए-वस्तु समए बद्ध नहि रहलासँ औपन्यासिक दोष लक्षित होइत अछि। स्वीकार करए पड़ैत अछि जे हिनक ई उपन्यास विषय-वस्तुकेँ ताहि रूपेँ समेटने अछि जेना सितुआमे समुद्र समाएल हो। लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्हि। हम मॉं मैथिलीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्फूरना बनल रहन्हि जाहिसँ मैथिली साहित्यक सम्वर्ध्दन होइत रहए। पोथिक नाम- मौलाइल गाछक फूल उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशन- श्रृति प्रकाशन, दिल्ली पोथी-प्राप्तिक स्थान- Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul) मूल्य- २५० टाका १.राम प्रवेश मंडलक लघुकथा-मूल-मंत्र २.कुमार मनोज कंश्यप- फरीछ ३.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- अर्द्धागिनी १ राम प्रवेश मंडलक लघुकथा मूल-मंत्र तीन दिनसँ ऑफिसक चक्कर काटि रहल छी मुदा, एखनो धरि प्रमाण पत्र बनैक आशा नहि बुझना जाइत अछि। चाकरी निमित आवेदन करब समए बड़ कम अछि। ककरो पूछैत छी काज कोना होएत तँ कहैत अछि- “कखनो हाकिम नहि तँ कखनो किरानी नहि।” काज कोना होएत? तखन बीरू भाय आबि पूछलक- “अहॉं किएक उदास भऽ बैसल छी?” बीरू भायकेँ अपन व्यथा कथा कहि सुनौलहुँ। हुनक गंजीपर लिखल रहए- ‘होएवाक चाही ई मूलमंत्र भ्रष्टाचारक हुअए अंत‘ बीरू भाय बाजल- “हँ! काज भए जाएत मुदा, चाह-पानक खचर लगत? हाकीम नहि अछि तँ कोनो बात नहि। अहॉंक काज भऽ जाएत।” चाह-पानक खरच कतेक पॉंच नहि दस टका आओर की सोचेत हम बजलहुँ- “काज करा दिअ। समए बड़ कम अछि।” बीरू भाय सभटा कागज लऽ कऽ ऑफिस जाइत बजलाह- “चाह-पान कऽ किछु कालक वाद अहॉं आपस आवि प्रमाण पत्र लऽ जाउ।” किछु खानक वाद पहुँचलहुँ। बीरू भाय प्रमाण पत्र दैत बाजल- “लावह चाह पानक खर्चा?” एकटा दस टकही सिक्का निकाली बीरू भाय दिशि बढ़ेलहुँ। बीरू भायकेँ क्रोध आसमान पड़ चढ़ि गेल ओ बाजल- “एक सए चाहक, एक सए पानक दूइ सए टाका निकालह नहि तँ एहि कागजकेँ खण्ड-खण्ड कऽ फेंक देबह।” कोनो उपाए नहि देखैत लाचार भऽ बीरू भायकेँ दुइ सए टाका दिअ पड़ल आ तखन हमरा समझमे आएल की होइत अछि एहि मूलमंत्रक मतलव! २ कुमार मनोज कंश्यप फरीछ 'परौलवाली ! किंछु हई घर मे पानि पीबई लै तऽ लाबौ ? भूखे -पियासे आहुर भऽ गेल म'न चौंहुँ अबै है । ' असोथकिंत गणेशी लाठी कंात मे रखैत थुस्स सँ ओसारा पर भुँईयें मे बैसि गेल आ कंान्ह पर सँ फाटल गमछा उतारि अपना मुँह पर हावा कंरय लागल । 'कंाल्हि जे मँगरौनीवाली के राहड़ि फटकिं-झाड़ि देले रहियै से वैह बदला मे खेसारी देले रहई । ओकंरे ऊसना रन्हलियै । आर कुछो कंहाँ हई घर मे । ' - डराईते-डराईते कंहने रहई परौलवाली । ओकंरा बुझल छलै जे गणेशी के खेसारीये के नाम सँ झड़कंी उठैत छई ; ताहु मे ऊसना ! गणेशी के चुप्प देखि कंने साहस बढ़लै - 'कंी कंरतई ? साँस तऽ कंहुना बचबई के हईये । ' गणेशी चुप्पे रहल । ओकंर साहस आओर बढ़लै - ' ई हाथ-मुँह धो आबऊ ईनरा पर सँ ; ताले हम ऊसना कंाढ़ि दैत छियै । ' परौलवाली के बुझा गेल छलै जे गणेशी पेᆬर खालिये हाथ घर घुरि आयल छै । गणेशी मुड़ि गारने ऊसना सुड़कंने जा रहल छल । आई बड़ तृप्ति भेट रहल छलै ओकंरा ओहि खेसारी के ऊसना मे । यैह गणेशी छल जे अपन जुआनी मे कंहैत छलै - ' खेसारी सार बेमारीये के घर ! ई मनुक्ख के खाई ले थोड़े हई । ई घोड़ा-दाना हई । ' आई गणेशी थारी के कंान्ह मे लागल झोर के औंठा सँ कंाछि-कंाछि कंऽ ताधरि चटैत रहल जाधरि ओहि मे कंोनो अवशेष बँचल रहलै । ओकंर एना कंऽ थारी चटनाई परौलवाली के नहिं नीकं लगलै - 'पेट नईं भरलै कंी ? हाँड़ी मे आर कंनी हई ; लऽ लौकं । ' 'तों किं भुखले रहबैं ? पेट भरई के कंी ! ई तऽ अकंादारण हई । ' 'जनी-जाति के कंोन हई, एकं लोटा पानियो पी कंऽ टेम कंाटि लेत । मरद के तऽ पूरा खोराकं चाही । ' 'नईं-नईं भुख सबके बरोबरे होई हई --मरद होई कंी जनी-जाति । अन्न बेरबाद नईं होई, तैं चाटि लेलियै । पेट तऽ भरि गेल । ' - बामा हाथ सँ पेट के हँसोथति बलो सँ ढ़क़ंडैत बाजल गणेशी । गणेशी कंतबो कंहउ, परौलवाली के बुझा गेल छलै जे ओ अधपेटे रहि गेलै । जुआनि मौगति नीकं, अधपेटा भोजन नहिं नीकं । मुदा ओकंरा बुझल छैकं जे ओ कंतबो कंहतै , गणेशी सभटा खा लई ई कंहियो नहिं भेलैयै । परौलवाली के मोन पड़लै जे गणेशी शुरुहे सँ कंतेकं मानैत छलै ओकंरा । ओ जखन साँझ कंऽ बोनिहारी कंऽ कंऽ घुमै तऽ ओम्हर सँ रजबा दोकंान सँ किंछु ने किंछु ओकंरा लेल लेनहिं अबैै फाँढ़ मे नुकंा कंऽ - कंहियो कंचड़ी, कंहियो झिल्ली, कंहियो गुलगुल्ला तऽ कंहियो जिलेबी । ताड़ी पी कंऽ बेमत्त रहितो सभ सँ चोरा कंऽ अपने हाथे खुअबैत छलैकं ओकंरा । लाजे मुँह लाल भऽ गेलै परौलवाली के । झट सँ ओ आँचर सँ अपन मुँह झाँपि लेलकं । सिनेमा जकंाँ ओकंरा आगू मे नाचऽ लगलै ओ बितलाहा दिन --- गणेशी ओकंरा कंहियो तामसे मे सही, दुरभाखा कंहने होई , से नहिं मोन छई । कंतेकं मानैत छई ओकंरा ? रंग-विरंगकं साया-साड़ी, टुकंली-चोटी आनि-आनि कंऽ दैत छलै । कंहै छोटकंा के बहु हई तई सऽ कंी, पहीरना-ओढ़ना मे कंोनो धनीकंहा के बहु सँ कंी कंम्म हई ? बुढ़िया सासु तऽ एक्के ताले नाचै जे ई मौगीयाा हमर बेटा के नून पढ़ा कंऽ खुआ देने आछ । कंहबो कंोना ने कंरितै ? गणेशी सभ लाज-धाख उठा कंऽ हरदम परौलवाली-परौलवाली के रटनी जे लगेने रहैत छलै । कंनिके परौलवाली आँखिकं ओट भेल कंी बेचैन भऽ जाईत छलै ओ । कंतबो लोकं कंहैत रहलै जे एहन कंमासुत छैं दू-दू जऽन के कंाज एकंसरे कंरैत छैं देह मे बुत्ता छौ निकंलि जो कंतहु देश-विदेश़़क़ंमा कंऽ बुर्ज कंऽ लेबैं । गामकं दू सेर बोनि मे आब कंी राखल छै ? मुदा गणेशी कंहिया अनकंर बात मानलकै जे आई मानितै । लगलै सभ दिन एहने दिन-दुनियाँ रहतै । से रहलै कंहाँ ? विपत्तिकं जखन पहाड़ खसैत छैकं तऽ केयो माथ पर हाथ देब' बला नहिं रहैत छैकं । कंहैलै तऽ भेलै पाँच टा धिया -पुता , मुदा जीलै कंहाँ एकंोटा । बच्चा भेला के दसे दिन के बाद परौलवाली के छातिये सुखा जाई़़ निमुह बच्चा पोसैतै कंथि पर ? से जहिना बच्चा होईत गेलै तहिना मुईलो गेलै । लोकंकं कंहला पर कंी कंी ने केलकै़क़ंतेकं कंबुला-पाति केलकं, कंतेकं ओझा बजेलकं, कंतेकं भगता खेलबेलकं, कंतेकं डाली उठेलकंमुदा, ओहि सभ सँ किंछु नहिं भेलै? बुढ़ारीकं संग समाँगो खसैत गेलैकं । उपर सँ दम्मा से परेशान कंरऽ लगलै । बातरस तऽ छलैहे । जखन देह मे सक्के नहिं रहलै तखन ज'न लेल के अढ़बितै ? कंोनो चारा नहिं देखि लोकंकं खुसामद कंऽ कंऽ आधयो बोनि पर कंाज कंरै लेल तैयार भेलै । मुदा तैयो केयो अढ़ेबा लेल तैयार नहिं भेलई । नरेगा मे कंाज लेल मुखिया के पैर-दाढ़ि पक़ंडलकंई , मुदा केयो सुननाहर नहिं । साँझकं-साँझ बीतय लगलै । पैंचो-उधार कंी आब कंकंरो कंोई दैत छै ? पेᆬर ओ सधेतई कंतऽ सँ ? एक्कंो बीत खेतो नहिं छलैकं जे जैह किंछु फसिल भऽ जयतैकं प््रााण रक्षा लेल । जयकंता तऽ कंहैत छै जे गणेशीकं बाप घरारियो ओकंरा बापकं हाथे भरना राखि चुकंल छै । सबुत मे कंागतो देखबैत छै ओ । ओ तऽ परौलेवाली कंहुना कुटाउन-पिसाउन कंऽ कंऽ दुनू परानी के जान बचेने छै अखन धरि । अपना जुआनि के दिन मे तऽ गणेशी परौलवाली के पयरो ने कंकंरो देखऽ देने हेतई ; कंाज कंरेबाकं तऽ बाते नहिं । समय जे ने कंराबय ! कुटाउनो-पिसाउनो कंी रोज भेटैत छै ? ताहु पर नीकं जकंाँ ओकंरा आब सुझितो तऽ ने छई । गामे मे स्वूᆬल पर शिविर मे परूकंाँ साल देखेने रहै तऽ डाक्टर साहेब कंहने रहथिन - 'मोतियाबिंद है , ऑपरेशन कंरबाना पड़ेगा । ' ऑपरेशनो कंोना कंराबओ़़एकंटा समाँग तऽ चाही संग मे़से के भेटतै ओकंरा ? गणेशी बुते कंोना पार लगतै ? ओ तऽ अपने असक्कं भेल आछ । 'निट्ठाह आन्हर भऽ जैब तऽ कंहियो जहर-माहुर खा कंऽ परान हति लेब । '- निराश भऽ गेल छल परौलवाली । गणेशी के केयो कंहलकंई - 'गरीबी रेखा मे नाम हेतौ तऽ सरकंार दिस सँ चाऊर-गहुँम आ रहलै लै घरो भेटि जेतौ । गाम-गाम मे लोकं के सरकंार पक्कंा मोकंाम बना कंऽ दऽ रहल छै , राशन-पानी दऽ रहल छै, बीरधा-पेलसुम (वृद्धावस्था पेंशन) दऽ रहल छै । तोरा सन निपुतर लोकं के सरकंारी मदति नहिं भेटतै तऽ कंकंरा भेटतै ? ' गणेशी के मिझायल आँखि मे पेᆬर सँ जेना आशा के एकंटा किंरण जगलै । गामकं मुखिया-सरपंच के पैर-दाढ़ी पक़ंडैत-पक़ंडैत आ दौड़-बड़हा कंरैत-कंरैत तऽ आब कैकं मास बीति गेलै। आश बन्हने कंहुना कंऽ उठ-बैस कंरैत ब्लौकंो के कैकं चक्कंर लगेलकं । ब्लौके सँ घुमल छल आई जेठकं क़ंडक़ंडौआ रौदा मे़भुखे-पियासे बेहाल । उसना खा कंऽ कंारी भेल पचकंलहा टिनही लोटा सँ एकं लोटा पानि पीबि गेल मुदा त्रास लगले रहलै। कंतेकं पानि पीयत़़आब तऽ पेटे फाटि जेतै । एकंटा जोर के ढ़ेकंार लेलकं ओ आ तमाकुल चुनबैत देबाल सँ ओगठि कंऽ पैर पसारि कंऽ बैसि गेल । परौलवाली लऽग मे ठाढ़ भऽ कंऽ पढ़िया नुआँकं आँचर सँ भीजल हाथ पोछैत पुछलकै - 'आईयो कंाज भेलै किं ओनाहिते घुरि आयल?' 'परौलवाली ! अपन गामकं गरीब लोकं मे भुबनबाबू, जग्गू पांड़े, सोभन जादो सन बड़कंा-बड़कंा कंोठी-कंोठा बला सभ के नाम एलै यै । सरकंारकं खाता मे तऽ अपना आऊर धनीकं छी । बड़कंा-बड़कंा धोईधे बला सब के सरकंारी सहायता लेबऽ दही़अपना आऊर भुखलो पेट छी तऽ अमीर छी ।' गर्व सँ सीना तानि लेने छल गणेशी । परौलवाली ठकुआयल ठाढ़े रहि गेल छल । **** ३. जगदीश प्रसाद मंडल 1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि। कथा अर्द्धागिनी आने दिन जकॉं लालकाकी घर-आंगन बहाड़ि बाढ़निकेँ कलपर धोए पछवरिया ओसार लगा ठाढ़ केलनि। हाथ-पएर धोअल बुझि नजरि फूल तोड़ैपर गेलनि। ओना ऐहन नियमित लालकाकी छलीह जे जहिना खर लगा पेटीमे कपड़ा लगौने छथि तहिना दिन भरिक काजोक छन्हि। मुदा मन पाड़ैक जरूरत एहि लेल रहि जाइत छन्हि जे पढ़ुआ काका (पति) गाममे छथि आकि नहि? गाममे रहने किछु काज बढ़ि जाइत छन्हि आ नहि रहने कमि जाइ छनि। गामेमे रहने फूल तोड़ब बुझलनि। ओसारक खुट्टीसँ फुलडाली उताड़ि कल दिस बढ़लीह। कलक बगलेमे रंजनी गंधापर हाथ दइते छलीह कि नजरि अपराजित दिस बढ़लनि। मेल-पॉंच करैक विचार सोचैत रजनीगंधासँ अपराजित दिस बढ़लीह। अपराजित तोड़ि चम्पापर हाथ बढ़ौलनि। ऑंखि पड़लनि फुलडालीक फूलपर। फुलडालीक फूल देखि विचारलनि जे पॉंचटा बेलामे सँ निकालि लेब। चम्पासँ आगू बढ़ते छलीह कि नजरि पतिपर गेलनि। पतिपर नजरि पड़ितहि मन दुखाए लगलनि। ककरा नइ इच्छा होइ छै जे पतिक संग एयर कंडीशन गाड़ीमे बैसि सराफा बाजार जाए हीरा-मोतीसॅं सजल सेनाक हाड़ गरदनिमे लटकवितहुँ। मुदा तेहेन भेलाह जे जखन सरकारी दरमाहा भेटए लगलनि आ कहलिएनि जे साइकिल कीनि लिअ। सुभितगर हएत तँ कहलनि जे चालीस-पैंइतालिसक भऽ गेलौं, हड्डी जुआ गेल जँ खसि-तसि पड़ब आ टूटत तँ केतबो पलस्तर करब तइओ ने जुटत। तइसँ नीक पएरे। कहलनि एक मानेमे नीक। मुदा तइओ ढोढ़क बीख जकॉं हड़हड़ा कऽ बीख नइ उतड़लनि। मन गेलनि दोसर दिस। सभटा किताब बरखामे भीजि-भीजि सड़ि गेलनि, जखन घर चुबै छलनि तखन जँ सड़िये गेलनि तँ अइमे अपन साध नइ। मुदा जखन घर बनौलनि तखन किअए ने फेड़ि कीनिलनि। जइ घरमे किताब नइ रहत ओ घर केहेन हेतइ। क्रोध कमलनि। क्रोध कमैक कारण भेलनि अपन काज मन पड़लनि। पॉंच बजे भोरसँ ओछाइनपर जाइ काल धरि ककराले करै छी, परिवारे लए ने। फेड़ि तामस मुड़ि गेलनि कहैले आठ घंटा डयूटी करै छथि चारि घंटा बाटेमे लगै छनि, अधा काज जे सम्हारि कऽ नइ रखबनि तँ पारो ने लगतनि। एहेन पुरूखे की जे अपन जिनगी अपनो हाथमे रखि नै चलैत? फुलडाली रखितहि मनमे एलनि, एक विहीत काज भऽ गेल। चुल्हि लग बइसैमे अखनो बहुत बाकी अछि। हड़वड़ा कऽ घर-निप्पा उठा ओसारपर पूजा ठॉंउ कए चुल्हि-चिनमार दिशि बढ़लीह। घर-निप्पा राखि अर्घा-सरायसँ लऽ कऽ थारी-लोटा लेने कलपर पहुँचली। कलपर सँ आबि लालकाकी घड़ी दिस देखलनि। अखन तक समए आ काजमे तल-वितल नहि देखि मनमे खुशी भेलनि। नजरि पतिपर गेलनि। कीड़ी ऑंखिमे पड़ने जहिना कड़ुआ जाइत तहिना मन कड़ुआ गेलनि। बुदबुदेलीह- “एकटा काजपर तवक्कल रहने घर आगू मुँहे ससरत?” फेरि मनमे एलनि आन दिन जकॉं जारन सुखाएल नहि अछि भानसमे देरी लागत, से नइ तँ पानि चढ़ा चुल्हि पजारि लइ छी। चुल्हि पजड़ल रहत तँ कनी देरियो लगने समएपर भऽ जाएत। बाड़ी पहुँच पतरका जरना सभ बीछि कऽ चुल्हि लग रखलनि। चुल्हि पजारि बरतन चढ़ा तरकारीक मुजेला आ कत्ता नेने चुल्हि लग आवि काटि-काटि थारीमे रखए लगलीह। साढ़े आठ बजे सॉंस छोड़लनि। आगिमे सेकल देहो हल्लुक बुझि पड़लनि। मनमे एलनि- एहिसँ बेसी सेवा की भऽ सकै छै। फेरि मन पतिपर गेलनि। उमकि कऽ मन कहलकनि- आरो जे हुअए मुदा भगवान जिद्दीयाह पुरूखक संग जोड़ा लगौलनि। हृदए विहुँसि गेलनि। ‘जइ मर्दकेँ आनि नै आ जइ बड़दकेँ पानि नै’ ओ अनेरे गाम धिनबै लए किअए जीबैए। मन पड़लनि दुरगमिनया पीढ़ी। जहिना बाबू सत्पुरनि खोधाएल कटहरक पीढ़ी देलनि आइ धरि ओहिपर बैसि भोजन करै छथि। थारी साठि लाल-काकी पंखा नेने छोटकी पीढ़ीपर बैसि बनौल विन्यासक सुआद बुझैक लेल पढ़ुआ काका दिशि देखए लगलीह। मगन भऽ पढ़ुआ काका भोजन करए लगलाह। शरीरांगक (देहांगक) सिरखार देखि लालकाकी सिकुड़ गेली। मुदा भोजन काल जे बजवे ने करताह हुनका कहलो की जाए। चुप्पे रहलीह। कपड़ा पहीरि पढ़ुआ काका घरसँ निकलितहि रहथि कि आंगनमे पनबट्टी नेने पत्नीकेँ ठाढ़ देखलनि। पत्नीक काज देखि मन मानि गेलनि जे सिपाही जकॉं छथि। मनमे खुशी एलनि। पान खा आगू-आगू पढ़ुआ काका आ पाछु-पाछु लालकाकी आंगनसँ निकलि डेढ़ियासँ आगू सड़क धरि एली। सड़कपर आबि पढ़ुआ काका पत्नीकेँ पुछलखिन- “किछु कहवो अछि?” लालकाकी- “अपन तनदेही राखू।” दुनू गोटे दुनू दिशि विदा भेला। मुसकुराइत पढ़ुआ काका एक डेग आगू बढ़ि पाछु घुरि कऽ देखि डेग तेज करैत आगू बढ़लाह। मुदा तनमे सुरसुरी लगलनि। भेलनि जे छीक्का हएत। मुदा वामा हाथसँ नाककेँ सहलबए लगलाह। मुदा सुरसुरियो अपन चालि छोड़ैले तैयार नहि। हाथ निच्चॉं करितहि धियान पत्नीक शब्द ‘तनदेही’पर गेलनि। पत्नीक मुँहसँ निकलल शब्द विशारद पास पढ़ुआ काका फेरि घुरि पत्नी दिस तकलनि तँ देखलनि जे सड़कसँ आंगनक घुमौर भौकपर पहुँच गेल छलीह तेँ पढ़ुआ काकाक ऑंखिसँ अढ़ भऽ गेल छलीह। कोकिलक कंठसँ निकलल शब्दक तरंग पढ़ुआ काकाकेँ ठेलने-ठेलने, तन आ देहीपर लऽ गेलनि। तन-देह। शरीर आ शरीरी। देह आ देही। मुदा एहेन चंदन जकॉं झलकैत शब्द हुनका एलनि कतएसँ। हम तँ कहियो अपन सीमाक अल्लंघन नहि केलहुँ। अपन ज्ञान घरक सीमासँ बाहर बँटलहुँ। हुनका अखन धरि किछु देलिएनि कहॉं। मुदा शब्द तँ शब्द जकॉं अछि। किअए ने बजनिहारियेसँ पूछि लिअनि। ओहो तँ आन नहि अर्द्धागिनी। घरसँ बहार धरि बनैक लेल दुनू सहयोग तँ बराबरे अछि। एक सीमाक भीतर ओ एक सीमाक भीतर अपने। हम तँ कमा कऽ विनु गनले रूपैआ हाथमे दऽ दइ छिअनि। मुदा ओहि रूपैआकेँ नचबै तँ वएह छथि। पिताक देल पॉंचो बीघा जमीनकेँ तँ सेहो वएह नचबै छथि। मुदा जते दुनू गोटेक भीतर झकैत छलाह तते हटल-हटल बुझि पड़नि। मन बौआ गेलनि जे पति-पत्नीक, पुरूष-नारी आ स्त्री-स्वामीक बीच केहन बंधन होएवाक चाही। मुदा विचारमे समझौता भऽ गेलनि। किअए ने दुनू गोटे विचारि कऽ परिवारकेँ ससारी। मनमे खुशी एलनि। गामक सीमो टपि गेलाह। विद्यालयाक मुरेड़ापर नजरि गेलनि। सबुर भेलनि जे पहुँच गेलौं। तीस-पैंइतीस सालक अभ्याससँ तँ थकान नहि बुझि पड़नि मुदा.......। क्रमश:। ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक किछु कविता २.इन्द्रभूषण कुमार- सफलता हमर रानी ३.३.१.विवेकानंद झा-नॊर मे अछि बेस संभावना २.मुन्नी वर्माक कविता ३.४.-डॉ. बचेश्वर झा- दूटा कविता ३.५.१.चन्द्रशेखर कामति- दुनू परानी फूकि-फूकि पी २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष- हमरो जीबऽ दिअ ३.६.१.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता ३.७.१.धीरेन्द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना ३.८.१.ज्योति- कविता-भ्रष्टाचार २.नन्द विलास राय- कविता-जनसंख्या ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- पावस श्री कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! करूण गीत !!
सुनि - सुनि कोकिलक करूण गीत, कुसुमित कानन केॅ देखि रहल अछि, आइ श्रवित लोचन समीत ।
अछि आवि गेल श्रृंगार सेज पर ज्वलित मसानक रौद्र रूप वर दंत दलक हासक विलास मे - वनल विभत्सक अंधकूप भ‘ गेल सुवर्णक शौर्य शिखर पर - शांति सागरक सुलभ जीत ।।
हमरा भावक सुकुमार पाश मे आयल प्रेमक रम्य फूल कयलहॅु जहिना किछु आलिंगन चुभि गेल अनेको वक्रशुल उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध झड़ि गेल धरा मकरंद पीत ।।
सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल, रमणीय देवसरि सुखा गेलि आयलि सुषमा इ छनक लेल हमरो जीवन केॅ दुखा गेलि संचित दुःखक रंजित सभटा, प्रेमकमधु देखू भेल तीत ।।
कटि रहल किए ई कला इन्दु घटि रहल किए जीवन प्रकाश, रजनीक रूदन विगालित प्रभात क‘ रहल किए अतिशय उदाश भ‘ रहल ज्ञान जन्मक मकान व्नि रहत मसानक सात वीत ।। . १.राजदेव मंडलक किछु कविता २.इन्द्रभूषण कुमार- सफलता हमर रानी राजदेव मंडलक किछु कविता- १ अढ़ाइ हाथक सांगि कतेक दुख भेल हेतै बाबूकेँ ओहिदिन भाइ हम जानि रहल छी याद पाड़ैत तरे-तर कानि रहल छी हमर बाबू छोड़ि काम एहिठामसँ कनेक बाम एकचारि तरमे रहै ठाढ़ ओहिदिन जहिया हम दुनू भॉंइ होइत रही भिन्न दुखसँ भेल खिन्न। बजल रही हम- एगो बेटा तीत आ एगो बेटा मीठ चुप रहू अहॉं बाजि नहि सकैत छी अपन गोटी भॉंजि नहि सकैत छी गप्पक खेती खूब करै छी चुप्प रहू हरदम बीख बजैत छी भेलो काजकेँ फेर गिजैत छी। कहने रहथि बाबू- हेओ बउआ नहि होअ भिन्न नहि भेटतह पलखति राति और दिन कपारपर लादल छह कइएक हजार श्रृण फुटा कऽ बदला लेतह सभ गिन-गिन। देने रही हम जवाब- एतेक दिनसँ कि केलहुँ विकास सभ चीज-वित्तकेँ केलहुँ नास बेचि बिकैन खेलहुँ सभ चास-बास देखैत छिऐ लाठीक हूर कऽ देब अखने पेटमे भूर। आइ हमरो दुनू बेटा भऽ रहल अछि भिन्न बॉंट-बखरा कऽ रहल गिन-गिन हम कछमछाइत ठाढ़ छी ओहिना बरिसों पूर्व हमर बाप करैत रहथि तहिना। बेटा कहैत अछि- शटअप मंदिरमे जा कऽ करू जप केहेन छी अहाँ गार्जियन कि कएलहुँ उपार्जन गप्प हँकैत खेलैत रहलहुँ ताश सभटा पुश्तैनी सम्पतिकेँ कएलहुँ विनास। ओना आब बजै छी कम तइओ नोर पोछैत बजलहुँ हम- कतेकसँ दुसमनी कतेकसँ मेल कइएक बेर खेललहुँ हुड़दंग खेल आगू बढ़बाक लेल कतेक कएलहुँ प्रयास तइओ रहि गेलहुँ पाछू आगॉं पड़ाइत रहल विकास हओ बउआ कतेक हमरापर बान्हैत छह झॉंगि सभपर छै अढ़ाइ हाथ सॉंगि। २ कानैत अधिकार- अनुशासनक सीमापर कतेक कालसँ बैधानिक अधिकार रहल अछि कानि झॉंपि रहल अछि सबकुछ जानि स्वर दबल सन देने अछि मानि भीतरसँ विरोधक चिनगी निकलि रहल फानि फानि। ३ आबद्ध हमर शरीर बान्हल अछि कड़ीसँ कनेको हिलबैत देरी झन-झना उठैत अछि ओहि शब्दसँ मन सिहरि उठैत अछि केहेन नचार भेल छी-हम टुकुर-टुकुर तकैत देखि सकै छी मात्र एकटा सपना स्वतंत्रताकेँ कतेक अन्तर अछि कल्पना आ यथार्थमे लगा रहल छी जोरपर जोर-तोड़बाक नहा गेल छी-घामसँ नि:सृत केहेन विचित्र गन्ध निसॉंस लेबामे बुझि पड़ैत अछि कठिनाह वस्त्र भऽ गेल अछि गोंत भिज्जू जकॉं असोथकित भऽ सोचि रहल छी निर्माणकर्ता एहि कड़ीकेँ छी हम स्वयं तइओ छी असमर्थ-तोड़बामे बौआ रहल अछि-मन स्मरणक गहन वनमे सतत् सचेष्ट भऽ ताकि रहल छी कड़ीक कमजोर भागकेँ। ४ हम पुन: उठब एकबेर हम पड़ल छी मृत्यु शय्यापर चिर रोगाह छूत व्याधिसँ ग्रसित मैल वस्त्र फाटल, सड़ल नीच कुलक चिर उपेक्षित देखैत छी जे धर्मराजक आज्ञासँ आबि रहल अछि यम हमरे दिश हमर प्राण निकलिकेँ ठाढ़ अछि कातमे थर-थर कॉंपैत हम बनि गेलहुँ लहाश किन्तु यम सब ठमकि गेलाह हुनका मुखमण्डलपर घृणा मिश्रित भय छनि डर किएक से नहि जानि नाक मुँह सिकोड़ैत ओ घुरि गेलाह आ चुपचाप ई खेला देखि रहल अछि हमर प्राण निरूपाय भ’ पुन: ओ ढुकि गेलाह हमरा शरीरमे आ हम टन-टना क’ ठाढ़ भ’ गेलहुँ आब पड़ेबाक प्रयत्न क’ रहल अछि सब हमरा डरे घृणाकेँ पछाड़ि देलक भय कॉंपि रहल छथि थर-थर डरसँ धर्मराज बिदा भेल छी आब हम हुनके सिंहासनकेँ ओंघरेबाक हेतु किन्तु कमजोरी सन बुझि पड़ैत अछि हमरो तेँ किछु काल ठाढ़ भेल छी शक्ति संचय करबाक हेतु। ५ दरपनक स्थिति जर्जर खूँटी आइ टूटि गेल ओहिपर लटकल शीशा धॉंहि द’ खसि पड़ल भ’ गेल छहोछित्त चित्रित दीवार मध्य कतेक घमण्डसँ छल स्थित जाहिमे देखि आननकेँ अपनाकेँ धन्य बुझैत छल-रूपधनी से भ’ गेल आब उपेक्षित पाएर बचा क’ चल’ पड़त ओहिठाम किन्तु एकरा प्रत्येक खण्डमे बनि रहल प्रतिबिम्ब कोनहुँमे मात्र ऑंखि कोनहुमे मात्र कपार विचित्र वीभत्स ओ कहियो नहि सोचने छल- एहन अवसान होएत हमर। ६ मिलन बाध नील गगनमे भेल मगन उड़ैत पॉंखि संगहि ऑंखि जोड़िक सँग नव उमंग मिलन हेतु आकुल जेना पियाससँ भेल व्याकुल अछि पूर्ण आस मिटत संचित पियास करैत बात उतरल साथ बनल घर पल्ल्व तर तरूक डारिपर दूइ हृदय मिलत नव फूल खिलत किन्तु व्याधाकेँ कनहा ऑंखि रहल अछि ताकि क्षुधाक पहिरिने खोल नाचैत नेत्र गोल-गोल भ’ रहल तैयार-प्रपंची हथियार आर चलाएत तेज तीर देत देहमे पीर तइसँ ओ नहि डरत परेम कहियो नहि मरत। २ इन्द्रभूषण कुमार सफलता हमर रानी
हम छी मेहनतक राजा, होएत सफलता हमर रानी।
कोना होएत, किऐक होएत, होएत कखन, पैघ नहि, अछि बेस छोट ई कहानी।
पहिलुक बेर जखन सुनलौं हम, किनको लैत नाम एकर, ऐना बुझि परल जेना यएह अछि हमर स्वपनक रानी।
भऽक बेचैन चललौं जौहबाक लेल हुनका, पर भैटल नहि कतहु हुनकर निशानी।
सोचैत रही एमहरे कतौ अगल-बगल होएत, देब आवाज, बुझिक हमरा अपन दीवाना, आइब जाएत हमरा बाँहिमे हमर दीवानी।
मुदा जखन वो भेटल नै कतहुँ, गेल हमर उत्साह ओहिना, जेना गायब रहैत अछि मरूभुमि सँ पानी।
जँ रहए लगलौं उदास तँ, देख कऽ हमर उदासी, बड़-बुजूर्ग सभ बुझौलक, एतबे टा गपपर अहाँ छी उदास, हमरा सभकें होएत अछि हैरानी।
अहाँ केवल चाहलौं हुनका, हुनकर चाहतक नहि सोचलौं, हौऽ वो हुर तं अछि परिश्रमक दीवानी।
आब की अहाँसँ छुपाउँ, किएक नहि एक-एकटा गप बताउँ, लगलौं करए हम मेहनत जाहि दिनसँ, आबए लगल नजर वो ताहि दिनसँ, बाँहिमे नहि अबैत अछि, मुदा रहैत अछि अगल-बगल, बढ़ाक उत्साह हमर कहैत अछि हमरासँ, करैत रहू प्रयास।
जइ दिन अहाँक परिश्रम होएत, अहाँक चाहत ओहन, दौड़क लगब अहाँक अंक, भऽ अहाँक दीवानी।
हम छी मेहनतक राजा, होएत सफलता हमर रानी। १.विवेकानंद झा- नॊर मे अछि बेस संभावना २. मुन्नी वर्माक कविता बेटी १ विवेकानंद झा नॊर मे अछि बेस संभावना
ओ हमर जीवनक ठिठकल वर्ष सब छल जखन समय मुदा कैलेंडरे टा मे बदलैत रहै बिना उपद्रव बिना हॊ-हल्ला आ कही कि कम-सँ-कम हमरा एकर सूचना नहि छल मुदा एहनॊ नहि रहै जे नेना-भुटका सब पैघ नहि हॊइत छल जै केओ आबि गेल छल ओ विकसितॊ हॊइते रहै चाहे दिशा जे रहल हॊ ओकर आ चलू ईहॊ मानि लैत छी कि जे नहि आयल रहथि हुनका मे आबि जयबाक छटपटाहटि हेतैह्न फेर एहनॊ नहि छल जे बेटाक बेरॊजगारी पर पिता लॊकनि क्रॊध वा खौंझ नहि देखेबाक मॊन बनेने छलथि राग-विराग ओहिना पूर्ववत चलैत छल बिना उपद्रव बिना हॊ-हल्ला नॊर चुपचाप ढबढबा अबैत रहै आँखि सँऽ हर एकांत क्षण सँऽ गठजॊर करबा लय आतुर
आ ई हमर जीवनक कलकल बहैत वर्ष अछि आ हमरा चाहला सँऽ की हॊइत छैक वा ककरॊ चाहला सँऽ समय वा नदीक प्रवाह तऽ नहि थमैत छैक मुदा चाहना तऽ रहैत अछि जे एना धड़-धड़ा कऽ जुनि बितौ ई समय मुदा सुखद क्षणक तीव्र प्रवाह मे कैलेंडरे फर्र-फर्र उड़ि रहल अछि आ कही कि हमरा पहिने नहि बूझल छल जे ककरॊ जन्मदिन एकहि साल मे कएक बेर आबि जाइत छैक कम-सँ-कम हमरा तऽ एहिना बुझना जाइत अछि हम मृत्यु दिश गत्वरता सँऽ धकिओल जा रहल छी कखनॊ काल एहन लगैत अछि जखन खूब आसमर्द उठल रहैत छैक कतहु जेना मेट्रॊ रेल मे ऑफिस सँऽ घर घुमैत काल मुदा आश्चर्य ! नेना-भुटका सब पहिनहि सन शनैःशनैः पैघ भऽ रहल अछि हाँ, बेटिक मादे हम ई नहि कहि पायब काल्हि भॊर जखन ओ स्कूल जाइत छल तऽ रहरहाँ गुलजार जीक एकटा पांति आँखिक नॊर बनि कऽ उतरि गेल - 'बाजरे के सिक्कॊं जैसे बेटी हॊ जवां'
फेर एम्हर जे केओ आबि गेल छै से विकसित भऽ नहि रहल छै कएल जा रहल छै तेँ सबहिक दिशा एकहि छैक सब बजार लेल आ बजार दिश धकिऔल जा रहल छथि आ ईहॊ सत्य कि जे नहि आयल छथि हुनका मे आबि जयबाक छटपटाहटि सँऽ बेसी डॉक्टर केँ माइक गर्भ परीक्षण करबाक वा ओकरा चीर देबाक धड़फड़ी छैन्हि सुयॊग समय मे बच्चा जनबाक कामना मे जननी सेहॊ कैक बेर सहमतिए मे रहैत छथि बेटाक कुपात्र हॊयबाक भय माता सब मे बढ़ल अछि फेर एहनॊ नहि जे बेटाक बेरॊजगारी पर पिता लॊकनि क्रॊध वा खौंझ नहि देखेबाक मॊन बनेनै छथि आब हुनका मे पहिने सन सामर्थ नहि छॊड़लह्नि बेटा सब राग-विराग ओहिना चलि रहल छै पूर्ववत हाँ आब विज्ञापन सेहॊ जरूरी भऽ गेल छै तेँ हँसी आ नॊर समय देख के निकालब लॊक सीखि रहल छथि तेजी सँऽ बदलि रहल छै समय मुदा एखनॊ चुपचाप ढबढबा अबैत अछि आँखि सँऽ नॊर प्रत्येक एकांत क्षण से गठजॊर करबा लय आतुर एक गॊट बेस संभावना बनि कऽ ! २ मुन्नी वर्माक कविता बेटी जनम भेल तँ कहलक दाइ भेल दू हाथ धरती तर कोइ नहि सोचलक हमहुँ जान छी कहलक दही नून तरे-तर। बावू कपार पीटलनि माय भेल बेहोश जँ हम जनितौं तँ नहि अबितौं एहि लोक ऑंखि अखन खुलल नहि कान अखन सुनलक नहि आ बना देलक हमरा आन कहलक कोनो अट्ठारह बरख रखबिहि एकर मान ने केकरो किछु लेलौं हम ने केकरो किछु देलौं हम जे माय हमरा जनम देलक ओकरो मुँह नहि देखि पबलौं हम अजब दुनियॉं अछि ई अछि गजबक लोक किएक करैत अछि एना किएक भेजैत अछि बेटीकेँ परलोक अबैत एहि धरतीपर इजोतसँ पहिल भेल अन्हार हमहुँ डुबि गेलौं आ डुबि गेल संसार समाज बनल हत्यारा बाप बनल जल्लाद बसैसँ पहिने उजारि देलनि बेटीक संसार। डॉ. बचेश्वर झा, जन्म- १५ मार्च १९४७ईं एम.ए.-पी.एच.डी. पूर्व प्रधानाचार्य, निर्मली महाविद्यालय निर्मली। डॉ. बचेश्वर झाक दूटा कविता- 1 भेँट की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट, उम्र सियानी मधुरी वाणी, तिनकर थिक ई किरदानी, लारि चुगली काटि रहल छथि, सबहक घेंट की कहू केहन लोकसँ भेल भेंट। कार्य कलापसँ पकिया नारद, अपन हित छन्हि अनका मारब, उजर केश, दया-धर्मक नहि लेश, छथि कंजूश व्यवहारमे ठेंढ़ाश की कहू केहन लोकसँ भेल भेंट। विद्या बल नहि प्रखड़, तरक भरकमे छथि अग्रसर रंग विरंगी परिधान वान भए रखने छथि ई समएक टेक पीवि उम्रकेँ बनल युवक छथि, गामक पीपरहुँसँ जेठ की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। अपन प्रशंसा अपने करबामे नहि छथि ककरोसँ झूस आदर पएवा लए बजैत सदिखन सूच्चा झूठ की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट। भगवान ने करथि एहन लोकसँ हो पुन: भेँट। 2 भावान्जली चिर प्रतीक्षित मैथिलक छल सतत् मांग, जकरा हेतु कतेको गमओलक जान। राजनेता सभ मिथिलाक नहि देलनि घियान, माय मैथिलीक ऑचल सतत् रहल म्लान। निज मातृभाषाक सभ तरहेँ भेल अपमान, तथापि मैथिलीक स्तित्वक नहि भेल अवसान। धन्य! धन्य! वाजपेयी जे मैथिलीक कएल सम्मान, आइ मैथिली पओलक अष्टम् सूचीमे स्थान। समए तुलाइल अछि सभ मिलि करू मैथिलीक उत्थान, कवि, लेखक ओ साहित्यकार वन्धु करू योगदान कोटि मैथिल निज मातृभाषाक बढ़ाउ सान! सबहक जिह्वापर बसथि मैथिली ई हो अरमान, पूब-पछिम बँटल मिथिलाक जोड़ल नीतिश देल अवदान, तेँ विकास पुरूष कहबैत ओ छथि महान् हुनक अमर कीर्ति सतत् रहए दुनू एहिठाम पुलकित कहल धरा धाम जय मिथिला! जय मैथिल! स्वीकार करी बचेश्वरक सत्-सत् प्रणाम। १.चन्द्रशेखर कामति- दुनू परानी फूकि-फूकि पी २.कृष्ण कुमार राय ‘किशन’-कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष- हमरो जीबऽ दिअ १ चन्द्रशेखर कामति दुनू परानी फूकि-फूकि पी सारि नाम लड्डू सरहोजि नाम घी सासु ससुरकेँ कहबनि की बकरीक दूधमे चाहो बनैत छैक दुनू परानी फूकि-फूकि पी॥ सूति उठि लिअ श्रीमतीजीक नाम छोड़ू कहनाइ बाबिइ जय सियाराम छुच्छे फुटानी इजोरियामे टॉर्च सठि गेल अन्हरियामे सभ बैटरी॥ मोट-मोट रोटी खेसारीक दालि जलखैमे तोड़ै छलहुँ मकइक बालि घिवही कचौड़ीपर चोटे करै छी मौगीक बड़द बेकार बनै छी॥ भऽ गेल दुरागमन की ठेही भेल दूर देखू गृहस्थी आ फाँकू चनाचूर राति दिन तेरहो तरेगन गनै छी कनै अछि मौगी मेटाएलि सिनूर देखू ने चेहरापर तेरह बजै अय रोटीपर नीमक अचार गनै छी॥ २ कृष्ण कुमार राय ‘किशन’
परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं। जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। ।कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष।
हमरो जीबऽ दिअ
कोइखे मे छटपटा रहल छी हम ई दुनियॉं हमरो देखऽ दिअ बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नही बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ।
डाक्टरक आला कहि रहल अछि नहि बचतहु आब तोहर प्राण अल्ट्रªासाउण्डक रिपोट, किछूएक काल मे आब लए लेतहु तोहर जान।
करेलहुॅं अल्ट्रªासाउण्ड यौ बाबू मुहॅ भेल अहॉक मलीन डाक्टर संगे केलहुॅ ई प्लान कोइखे में एहि बेटी के, कए दिहक क्लीन।
हम बूझैत छी, हमरा जनमलाक बाद नहि बॉंटब अहॉं जिलेबी बुनियॉं दुखित भेल अछि मोन अहॉक, नहि आनब हमरा माए लेल, नाक केर नथुनियॉं।
जॅ होइतहॅंू हम बेटा करितहुॅं अहॉ सगरे अनघोल अरोसी-पड़ोसी शुभकामना दितैथि रसगुल्ला बॅटितहुॅ अहॉ टोले-टोल।
बेटीक जनम भेला पर,एहेन बेईमानी किएक? आई किछू हमरो कहऽ दिअ बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नहि बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ। १.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता १. मृदुला प्रधान ओहि दिन ......... ओहि दिन .. सभा सँ अबैत काल ओझा भेटलाह, कहऽ लगलाह - मैथिली बजैत छी तँ मैथिलीमे किये ने लिखैत छी ? एतवा सुनितहि कलम जे सुगबुगाएल से रुकबाक नामे नञि लैत अछि, किन्तु बचपनमे सुनल, दू -चारिटा शब्दक प्रयोगसँ की कविता लिखल संभव थिक ? सैह भाव जुटाबऽ लगलौं डायरीमे , नाना प्रकारक बात , कुसियारक खेत इजोरिया राति , भानस-घर तँ भगजोगनीक बात । नेना -भुटकाक धम -गज्जड़मे कोइलीक बोली सुनै लगलौं , भिनसरे उठि कऽ एम्हर -ओम्हर टहलय लगलौं . बटुआमे राखि कऽ सरोता -सुपारी , हातामे बैसि कऽ तकैत छी फुलबारी। सेनुरिया आमक रंग सतपुतिया बैगनक बारी, चिनिया केरा क घौड़ गोबरक पथारी। पाकल छै कटहर, सोहिजन जुआएल छै , अड़हुल -कनैल बीच नेबो गमगमाएल छै। कविताक बीचमे एहि सभक की प्रयोजन ? अनर्गल बातसँ ओझा बिगड़ियो जैताह, थोड़-बहुत जे इज्जत अछि, सेहो उतारि देताह . गाय, गोरु, कुकुर, बिलाड़ सभक बोलियोक बारेमे लिखल जा सकैत छै किन्तु से सभ, पढ़यबला चाही, सौराठक मेलाक प्रसंग लिखू तँ बुझयबला चाही। कखनो हरिमोहन झाक 'बुच्ची दाइ' आ 'खट्टर कका' क बारेमे सोचैत छी तँ कखनों 'प्रणम्य-देवता' क चारू 'विकट-पाहुन' केँ ठाढ़ पबै छी। कखनों लहेरियासरायक दोकानमे , ससुर -जमाय-सारक बीच कोट लऽ कऽ तकरार , तँ कखनों होलीक तरंगमे , 'अंगरेजिया बाबु' क सिंगार। सभटा दृश्य , आंखिक सोझाँ एखन पर्यन्त नाचि रहल अछि। 'कन्यादान 'सँ लऽ कऽ 'द्विरागमन' तक, खोजैत चलै छी कविताक सामग्री, अंगना, ओसारा, इंडा, पोखरी चुनैत चलै छी, कविताक सामग्री . शनैः शनैः शब्दक पेटारी, नापि-तोली कऽ भरि रहल छी, जोड़ैत-जोड़ैत एहिठाम -ओहिठाम , हेर -फेर करि रहल छी . जाहि दिन , अहाँ लोकनिक समक्ष, परसै जकाँ किछु फुइज जाएत , इंजुरीमे लऽ कऽ , उपस्थित भऽ जाएब , यदि कोनो भांगठ रहि जाए तँ हे मैथिल कवि-गण, पहिनहि छमा दऽ दै जाएब। २ मुन्ना जी मुन्नाजी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल लघुकथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो लघुकथा, कथा, क्षणिका आ लघुकथा सम्बन्धी किछु आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली लघुकथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत। बोनिहार चेन्नैयोमे आब जखन आओत यौवना, मानू इहो दिल्लीये जकाँ खास भऽ जेतै। सभ भइया जहिया घुरि जएत स्वराज्य, बुझू लुधियाना, मुम्बइ मसोमात भऽ जेतै। “राज”क राज कहिया धरि टिकतै मराठामे, श्रमशक्तिमे पुरे हमर धाख भऽ जेतै। हम बनि कऽ राजा रहब, राजस्थानक, श्रमशक्तिमे जखन ठाठ भऽ जेतै। उल्फाक सुल्फा हेतै भीतर, असमोकेँ हमरा हटने पक्षाघात भऽ जेतै। सगरो घुमि-घुमि देखल, छै ओतै के रीति, मुदा सौँसे देशमे कहियो मिथिलेक रेवाज भऽ जेतै॥ माटिक ललकार रहै खुटेसल, जेना छलैहेँ नहि तँ जाबीसँ मुँह जाबि देबौ। सभ मिलि कानि रहल छेँ भोरेसँ, तँ मिथिला राज्यक झुनझुना आनि देबौ। मुदा तोँ तँ छेँ नै खढ़-पातक बीछबला, बाढ़िक प्रकोप छौ शनि जेकाँ ठाढ़। तिलक-चानन लगा, पिछलगुआ जुटबै दु-चारि, जन्तर-मन्तरपर माइकक बोले, छौ नै कोनो फरक पड़ैबला॥ जोर-जोर तोँ माटिक लोककेँ। तखन निजगुत हेतौ स्वर। माँग-विकास, माध्यम मैथिली, शिक्षाक बढ़ा धरैती संसाधन, दहीं एतै सभकेँ रोजगार तखने बुझिजेँ जे। राज्यक माँग भऽ सकतौ स्वीकार। १.धीरेन्द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना १ धीरेन्द्र कुमार, वार्ड न: 08 , निर्मली, सुपौल। हमर गाम हमर गामक बीचोबीच अछि- एकटा इनार ओहिमे शोभायमान अछि विराजमान अछि गामक परंपरा आ विधानसँ पदासीन छथि- कांकोड़, पेटफुल्ला माछ चौबटि मारने-अजगर, करकरैत, गेहुअन जे किओ खसबैत अछि डोल चूबि जाइत अछि-पानि हाथ लग अबैत-अबैत जकर जरूरति अछि गामकेँ गाममे बसए बला लोककेँ चूबि जाइत अछि पानि हाथ लऽग अबैत-अबैत जकर जरूरति अछि गामकेँ गाममे बसए बला लोककेँ चूबि जाइत अछि पानि हाथ लऽग अबैत-अबैत ठोरसँ नै सटैत अछि पानि ऑंजुर रहि जाइत अछि छुछै पानिक उपरि आनक प्रयास भऽ जाइत अछि- व्यर्थ गाममे अन्हार ककरो किछु नै सुझैत छैक सभटा अछि नपुंसक तखन करैत अछि प्रयास- बेरि, बेरि घोषणा होइत अछि बेरि-बेरि “सभकेँ रोटी सभकेँ काज” गाम सुनैत अछि, अकास सुनैत अछि आ सुनैत अछि चौबटी परक पीपर आ हंसि पड़ैत अछि- गामक घूरना आ नाचए लगैत अछि- कठघोरबानाच गाबए लगैत अछि- “सभकेँ रोटी सभकेँ काज” इनारमे होइत अछि-ब्रेक डांस जश्न, कैबेर खुशहाल आ बेफिक्र प्रतीक अछि हमर गामक। कि- हमर गाम अछि- एहने मस्त आ खुशहाल राखल अछि इनारपर खलिया डोल आ ठोर अछि- सुखाएल। २. राजेश मोहन झा
!! चाहक महिमा!!
जखन चाह कंठ तर गेल सरस तामरस हृदय उर भेल फुलायलि वनलता गमकल उपवन केना कहू‘ कते प्रफ्फुलित मन सॉझ - विहनसर चाहे चाही नहि भेटत त‘ काटव काही चीनक अम्यागत भारतक श्रृंगार अछि अंगरेजिया अवरूप उपहार वौकू वावू अरू जुगेसर राधाजी संग निकालथि आह वड़का कक्का काटैत सुपारी चाहक महिमा सुनैत छलाह वएस जखन होऊ चालीस पार चाह करथि वड़ तन उपकार एकरा छोडव नहि सोचू वाबू हएत जीवनक पैघ गुनाह अपन गरिमा सुनि चाह भफाय राखल - राखल गेल सेराय वेश त‘ ठंढो चाह केॅ पीयव दौड़व नहि वरू किछु त‘ जीयव ३ सुबोध कुमार ठाकुर, गाम- हंठी-बाली, जिला मधुबनी। पेशा- सी.ए.। विडम्बना के सुनत विचार मोनक, केकरा कहबै उद्गार मनक सभ जेना बनल करकरैत छै, सभ आपसे दंशमे अचेत छै, मनमे चलैत छै रस्सा-कस्सी, छोड़ि जाउ आब हम कोन बस्ती, सगरे एकै रंगक रेगिस्तान आर बहैत रेत छै, सभ जेना बनल करकरैत छै कतए गेल वसुन्धराक हरियरी, जतए होइत छल प्रकृतिक विवाह बिन विधकरी नहि जानि किएक नहि भेटए आब रसिक सावनक सनेस छै, सगरे एके रंगक रेगिस्तान आर रेत छै जीबैक आब धंग बदलि गेल, जीबैक आब रंग बदलि गेल, उद्देश्य आर उमंग बदलि गेल, नहि जानि कंटिरबा आ कंटिरबीमे एखनो किएक भेद छै सभ बनल जेना अचेत छै नहि भेटै अछि केकरो आब शान्ति मनक, जीबि रहल सभ कलाहन्त मनसँ, कैंचा लेल सभकेँ लागल रहैत सदिखन उद्वेग छै सभ अपनेमे अचेत छै। महगाइक सत्ता अछि, गरीबक पेट निपत्ता अछि चाउरमे आँकर की आँकरमे चाउर नहि जानि केना फेटम फेट छै तैयो केहन विडम्बना छै सरकार बनल करकरैत छै, सुनू हे शिष्टिक सृजनहार, कवि सुबोधक हृदयक चीत्कार करू अनुकम्पा एहेन जाहिसँ सभ लोक जाइ चेत छै जे बनबै कुनू देशकेँ श्रेष्ठ छै... १.ज्योति- कविता-भ्रष्टाचार २.नन्द विलास राय- कविता-जनसंख्या ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- पावस १ ज्योति www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन। ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। --सम्पादक भ्रष्टाचार भ््राष्टाचार पर आरोपक ईच्छा छल लेखनी पकड़लहुँ ताहि कारणे कतय सऽ प््राारम्भ करू से समस्या अकर समावेश लागल सब क्षेत्रमे खेती बारी सऽ जोगाकऽ अपन पेट काटिकऽ एक गरीब किसानक पूँजी निपटल बेटाक पढ़ाईमे ने प््रायासमे कमी आ ने बुद्धी कम विलक्षण पैघ लोलक पैरवी चाही महाविद्यालयमे नामांकन में पढ़ाई तक कहुना पार लागल तऽ अतिरिक्त मुद्रा आवश्यक नौकरी के बहालीमे अतेक तरहदूतक बाद जऽ नौकरी लागल माता पिता भिड़ला नगद वसूलीमे एक संस्कारी पुतहु के प््रातीक्षा करैत बस हेराफेरी संस्काारक परिभाषामे एहेन संस्कारजे घर बदलि दियै सब प््रागति रूकल दहेजक आशामे २ नन्द विलास राय कविता- जनसंख्या बढ़ल जनसंख्यासँ स्थिति भेल विकराल, सभ क्षेत्रमे पड़ि गेल भयंकर आकाल पैघ-पैघ घर सबहक हाल भेल बेहाल जे खाइत छलाह तीनसला चाउर आब लगैत छन्हि नै पूरा साल। लोक बढ़ैत गेल जोत कमैत गेल जे छल गोरहा खेत उ भेल घरारी जे करैत छलाह लगानी, भिरानी आ खाइत छथि बेसाह उधारी बढ़ल जनसंख्यासँ बढ़ि गेल बेकारी। तेँ परिवार नियोजनक साधन अपनाउ आ परिवारकेँ छोट बनाउ महिला बन्ध्याकरण आ पुरूष नसवदी कराउ से नै करब तँ पुरूष निरोध अपनाउ आ महिला कॉंपर टी लगाउ। छोट परिवार सुखक आधार नहि खाएव बेसाह नै लेव उधार। परिवारकेँ छोट बनाउ धिया-पुताकेँ पढ़ाउ-लिखाउ आ स्वच्छ नागरिक बनाउ समाजकेँ बचाउ देशकेँ बढाउ। ३ शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। !! पावस !!
लगिते आतप अनल ज्वाल सॅ, पसरल सगरो हाहाकार तरूण - वरूणक अग्निवेश सॅ जीव - अजीव मे अशंातिक ज्वार मोन विरंजित हृदय सशंकित वनल सरोवर कलुष मसान सूखल किसलयक कोमल कांति धधकि रहल नव लता वितान नष्ट करब एहि प्रलय भयंकर प्रकट भेलन्हि अपने देवेश घन घन घटाक संग आगमन शीतल पावस बूनक वेश नव रंग नव धुन नव मुस्कान घुरल सृष्टि मे नवल जान पुष्प खिायलि कांचन उपवन फूरल भ्रमर केॅ मधुर गान मंातलि सरोवर कलकल सरिता नूतन नीरक खहखह धारा आयल कृषक मे दिव्य चेतना भागल वेदनाक पुरा अॅधियारा पंकज प्रस्फुटित भेल सरोवर वकः काक चित शांत सोहनगर भरल घटा मे मोर मजूरक नाच मधुर वड़ लागय रूचिगर गोधूलिक पवन वेग मे चहकि उठल भगजोगिनी वयः ताप मे उमड़ि गेलि मिलनक वियोग मे तरूणी उन्मत्त घटा संग मधुर प्रेम मे नर-नारी भ‘ गेल विभोर दुई मासक ई रूचिगर पावस उमड़ाओल नव सृष्टिक जोर ........ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। जखन कखनो प्रेमक गप अबैत अछि तखन सभसँ पहिने मोनमे राधाकृष्णक ध्यान आबि जाइत अछि। ई चित्र ओहि प्रेमकेँ देखेबाक एकटा प्रयास..। बालानां कृते अर्चना कुमर पिताक नाम : हरिश्चन्द्र मिश्र पतिक नाम : रविन्द्र कुमर गाम : चैनपुर ससुराल : सिहौल जिला : सहरसा शिक्षा : दशवी पास (आर. डी. टाटा उच्च विद्यालय, जमशेदपुर) वर्त्तमान पता : रजोकरी, दिल्ली बेटा – I एकटा सोनू नामक लड़का रहैथ। जिनकर पिताजी बैंकक रजिस्टार रहथिन आ घरक जमीन्दार सेहो रहथिन, मुदा जखन सोनू छोट रहथिन तखन हुनकर छोट बहिनकेँ साँप काटि लेलनि। पहिल जमानामे जखन लोक सभकेँ साँप काटै छलै तखन झाड़ फूकपर बैस ध्यान देल जाइत छलै, इएह द्वारे हुनकर पिताजी आ सोनू दुनू गोटे बहुत जगह देखैलक, मुदा हुनका बचेबामे सोनूक समस्त परिवार विफल रहल जकर परिणाम भेल जे सोनूक बहिन मुइत भऽ गेलैन। सोनूक बहिनक मुइत भऽ जाइक समाचार सुनि हुनकर पिताजीक दिमागी हालत खराब भऽ गेलैक। सोनूक चार भैयारि आ दूटा बहिन छलै जे मे सँ एकटा बहिन मुइत भऽ गेलैन। सोनूक पिताजीक नौकरी सेहो छुटि गेलैन। मुदा खेती गृहस्थीसँ जीवन यापन चलै लागल, मुदा हिनकर दियाद बाद आ पड़ौसी सभ चाहे छलै जे हिनकर सभटा सम्पत्ति हड़ैप लेल जाए, इएह लेल हिनकर दियाद बाद सभ ताना बाना बुनैत रहैत छल, मुदा हिनकर माए हिनका सभकेँ आ सभटा सम्पत्तिकेँ बचाके राखलन्हि। सोनू जखन इंटरक अंतिम सत्रमे छलैन तखन गामसँ भागि दिल्ली पाइ कमेबा लेल आबि गेलैन्ह। मुदा दिल्ली आबि कए सोनू ठाम ठाम भटकए लागल। मुदा अपन पता गाममे ककरो नहि देलखिन्ह। गाममे माए, भाए, पिताजी आ छोट बहिन सभ बड्ड चिंता करए छलै। मुदा सोनूकेँ बहुत दिनक बाद एक जगह मालीकेँ काम भेटल आ धीरे धीरे पैसा इकट्ठा करए लागल आ पैसा जखन इकट्ठा भऽ गेलै तखन सोनू अपन पता गाम पठौलक आ फेर कुछ दिनक बाद गाम गेल आ अपन संग अपन भाएक उपनयन संस्कार कएलक आ इएह बेर हुनक दादी सेहो मुइत भऽ गेलैक फेर हुनक श्राद्ध कर्म कए फेर सोनू दिल्ली आबि गेल आ फेर नित्य क्रियामे लागि गेल मुदा सोनूकेँ रहैन जे हम अपन बहिनक बियाह दान अपने हाथसँ करू इएह बात लऽ कऽ सोनू ढ़ेर रास पाइ कमाए कए अपन गाम गेल आ ओतए अपन बहिनक बियाह दान केलक आ ओकर बाद अपन शादी अपने जिलाक सैतपुर गामक भवेश चन्द्र मिश्रक लड़की जिनकर नाम उषा छथि तिनकासँ बियाह केलक आ खूब नीक जकाँ रहै रहल। मुदा दुखक बात तँ इ अछि जे बियाहक आठ सालक बादो हिनका दुनूक गोदमे एकोटा किलकारी नहि आएल। ई बात लऽ कऽ दुनू गोटे बड्ड परेशान रहैत छलै। मुदा डॉक्टर साहेब कहलखिन्ह जे अहाँ दुनू गोटे चिंता नहि करू अहाँ गोद जरूर भरत आर इलाज शुरू कऽ देलकै। जे इलाजमे बड्ड रास पाइ खर्च सेहो होइत छलै। मुदा दुनू गोटे इ बातसँ तनिक विचलित नहि भेल आ नीक जकाँ दिल्ली एहन शहरमे रहए लागल। आगाँ कहानी बादमे बेटा पार्ट-2 मे आएत। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_XII-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary -In the form of Surya Namaskaar DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS XII Love has many facets – but has the same pain, same anguish and affliction – that is why mother-son, father- daughter, brother- sister, brother- brother, Laila- Majnu – everyone’s heart feels the same love-wave. Men either overcome the challenges of life or succumb to the same. Dhara understands that man himself has to carry out his own burden and responsibilities. No doubt, he gets support as the vegetable vendor’s basket is kept on vendor’s head by others, but ultimately vendor himself has to move around with the heavy basket on his head. Father, husband, son – they provide support – however Dhara never considered it as total support. But at times women completely leave herself on her son treating him as a strong tree. Dhara recalled the story of her friend Riya. Riya left for village accompanied by her son Sailesh. Riya always considered herself as the protector of her son. But throughout the night- in that bus journey she slept keeping her head on the shoulder of Sailesh. Ma, it is too cold, please wrap yourself with blanket – and Sailesh covered her with blanket – Riya remembered his father behaved in the same manner. 2 Beta, you also properly cover yourself, otherwise you will catch cold – you have to go back to Kanpur. Ma, do not worr y for me. I am fine. All of a sudden the bus stopped – perhaps it is Zero mile – passengers started getting down from the bus. Ma, you stay back here. I get some tea for you. It will refresh you. No beta, do not bother. I also accompany you. We will take tea there. Please Ma , it is my duty, do not get down in this biting cold. Riya left herself on him thinking – she is blessed with such a caring and loving son. Sailesh is engineer in Kanpur – his wife Arya is also an engineer. During vacations they always come to Patna to spend time with parents. Riya has two daughters – Osha and Priyesha. Osha is married and Priyesha is continuing with her studies. Riya was happy to see love among them, she was particularly pleased with Arya as she showers her love on all of them. Arya cared and loved her sister-in-laws. She never thought of herself but sacrificed for others – she treated her brother-in-law, sister-in-law as her own brother and sister. Arya belonged to a royal family – she was large hearted. Riya recalled the story of her childhood friend Sheela – Riya, I cannot live any more, I want to die. What is the matter Sheela? Riya was shocked and surprised. Sheela had four sons – all of them were holding good posts but none of them had time for retired parents. How parents sacrificed everything in order to make all their children happily settled but the 3 same children were not ready to look after them when parents needed them most- it is world’s most shocking reality. You cannot understand my grief and anguish Riya – we work throughout the day but remain burden for them – Sheela started crying. When Sheela was young she was devoted to her in-laws and treated them as god. She had heard somewhere that those who look after their in-laws get the same care and protection from their off-springs. Riya I was married at a tender age and since then I have been working hard like a machine, looking after everybody’s smallest needs. Now I cannot tolerate anymore – I have been dying to listen to some sweet voice from my son and daughter-in-law. What about Sudesh? Does he care for you? No no, Sudesh always works according to the whims and fancies of kaniya. He keeps on praising his sasural. Sheela, it is not abnormal to praise one’s sasural – it is a matter of pride that his sasural .. Sheela interrupted and said – no Riya, he tells us, we do not know how to lead a descent and cultured life. Riya laughed and replied – is it so? Sheela, why do not you tell him that you do not know how to lead a descent life but you know how to endure and suffer. It was almost dawn. The morning sunrays had engulfed the Basildon. Dhara and Priya had entered into a new bond – a new relationship as if the two separated sisters have met again. They became one. They visited Basildon tunnel which was well lit and considered as the second largest tunnel of the world. It was inundated by tourists from different parts of the world. 4 Tunnel appeared both dark as well as well lit to Dhara. Without Simant her life was dark but others had illuminated her life. They also visited Lakeside shopping centre. Dhara felt cold even when she was fully clothed. They entered into an American Restaurant and ordered different varieties of burgers. Dhara just had some pizza. She was astonished to observe that in England people prefer cold drinks, juices to water. Time was fleeting – Dhara was wandering in different English Counties. It was Easter vacation. For her it was the most appropriate time to look for Simant. Kadamba – Ma, Easter is a very popular festival. As part of the Easter tradition, the British eat hams, lambs which are symbol of innocence. They gift Simnel cake to their mothers on Mothering Sunday. Chocolate Easter eggs also became popular as they symbolize new life. Harish – It also involves Morris dance performance, Pancake race on Tuesday and special Easter parade. Wordsworth had written somewhere – London appeared to be jungle of people. Dhara thought Kolkata was a bigger jungle of people. They walked through Piccadilly, Trafalgar Square, Buckingham Palace, James Park, Big Ben, St. Paul’s Cathedral, Shakespeare’s Globe Theatre and finally reached Westminster Abbey Bridge on river Thames. They saw the changing of guards at Buckingham Palace and the Horse guards parade. But everybody was looking for just one face i.e. Simant. At Tower of London, Earl and Neula asked about the historical tales. Kadamba also told them about the crown jewels. 5 They had a grand view of London from the Tower Bridge. Due to Earl’s insistence, they also went for Thames River cruise and it was fascinating to see London from there. Kadamba – do you know Ma? – if Seine river is the soul of Paris, river Valtava of Prague, so river Thames the heart and soul of England. Andrew – Dhara didi, Thames represents the history and culture of England. Nobody knows – Dhara’s heart is also a treasure trove of hidden history- she tried to smile. Nothing lasts. Easter vacation also ended. Dhara also returned back to Leicester. People cannot comprehend the magnitude of darkness. Sometimes even the goal is not visible. After so much of wandering, Dhara felt exhausted and disappointed. Whatever I want, never get and what I get, that never makes me happy. Man is a puppet in the hands of fate. Man dances according to fate. Everybody is sad and unhappy from within but appears to be happy to the world. Is there any end to Dharas’ suffering? TO BE CONTINUED Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London. Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in In the form of Surya Namaskaar I pray the lord Sun! The eye will recognise the redness, Which, is also a colour of the rising and the setting sun The eclipse is not the devouring by Rahu The other myth of swallowing by the Hanuman But for any eclipse Rahu is not important The moon obscures the light of the sun by intervention There are scientific reasons for these facts Says the genius Kuldip The scientific calculations are present all over The fool priests made it impurity of time Mixing Ganges into Godavari, talking about the pilgrims of Prayag The lucky Kaushalya, got Ram as her son The part of mantra enchanted after bath Will it open the way of national integrity and progress In the spiritual game of priests The country left behind At least now open your eyes to look forward Give me the power! Oh lord of Sun! I pray the Lord Sun! Strengthening the back bone The process of Surya-namaskaar is very effective The destiny of suryavanis And what about the Karna’s sacrifice The society accepted the system of castism But couldn’t accept the Rahu’s existence I pray the Lord Sun! The colours of seven horses depicting the seven colours of a rainbow The pair of the charioteer Ajatshatru and the Mahashilakantak The kingdom of Magadh had put good effort To establish the unity like between Germany and Italy Two centuries back They had understood the mystery of seven horses of the sun Leaving the theme accepting merely the meaning The Bharatputra did a squalid work Fill me with vigour I pray you lord Sun! I practiced the breathing and suddenly recalled the Kunti Meeting with Sun was victorious But the proof shell was taken by Indra Eklavya was already failed by Dronacharya Arjuna got victory, diminishing the competing talents by cheating Are you still ready to endure? I pray you Lord Sun! The sun enters ashvin , again a fight awaited The master Jupiter will bless everyone Master is still supreme Emphasising in appending, I am obliged He will empower me by saving his supremacy In the name of warmth of his gravity I pray you the lord Sun! From whose wholeness the Earth came out The life line of the Earth You made fun of the term gravity Sometimes a tortoise Else the cobra And many more The mystery became harder The missing of son of Bharat Keeping him in mind oh spherical body I pray you the lord Sun! The sunrays spread Many mysteries vanished The fog of darkness are weakened But what a strange thing is this! I saw the seven stars at night Everything is gone in daylight But not all the stars The truth starts hiding like a game Like a base of faith Your appearance Oh understated master! I pray you the lord Sun! In your shine The ocean of sky is sunk The theory of solar energy Had not given any different hope In the month of Megha Your power diminishes Then what’s the competence of a human Learned the facts about the Universe Many celestial bodies are beyond this star The mightier clusters than the Sun How can we bare their heat? I pray you the lord Sun! I recall my father’s words Gayatri’s prayer is worthless without praying Savitri Some combinations are good but Some are bad on at the same time After finishing jackfruit one ate betel leaves The stomach ache made him thinking the reaction Filled with fast motion I pray you the lord Sun! The Earth rotates from west to east The Sun rotates from east to west But tell me why north-east in summer And south north-west in winter Doesn’t it rotate on its axis? The solar eclipse mentioned in Jaydrath’s story too The effect of night in day time was called solar eclipse The presence of Rahu Ketu was still missing Repeating push ups again and again Meditating with closed eyes Concentrate and say I pray you the lord Sun! Understanding the language and analysing its fact The grammatical confusion and among these Following the process of Surya Namaskar Please accept it oh lord Sun! Oh merciful God destroy my sin I complete my Surya Namskar The deceptive concept of the science In the discipline of yoga I pray you the lord Sun! . VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXIX संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- २९ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. नवविंशतितमः पाठः पूर्वतन पाठे वयम् चेत् नो चेत् इति विषयम् ज्ञातवंतः। इदानीम् तस्मित्रेव विषये किञ्चित् इत अभ्यासं कुर्मः अहम् शब्दयम वदामि–भवन्तः चेत् भोजयित्वा वदंतु अहम् पिपासा जलम् इति वदामि भवंतः पिपासा अस्ति चेत् जलम् पिबामि इति वदन्तु। वदंति वा बुभुक्षा अस्ति चेत् भोजनं करोमि विद्युत अस्ति चेत् दूरदर्शनम् पश्यामि–जलम् अस्ति चेत् वस्त्रम् प्रक्षालयामि। वृष्टि अस्ति चेत् छत्रम् नयामि। निर्वाचनम् अस्ति चेत् मतदानम् करोमि। भवान शीघ्रम् गच्छतु नो चेत् पिता तर्जयति औलायम स्वीकरोतु नोचेत् ज्वरः वर्धते, सम्यक पठतु नो चेत् उत्तीर्ण न भवति, वृक्षारोपणम् करोतु नोचेत् वृष्टिः न भवति, अध्यायनम् करोतु नो चेत् मूर्खः भवति - महोदयः मम रामायणम् पुस्तकम् आवश्यकम् कृप्या ददातु वा - एतत् मम स्वकीयम् पुस्तकम् अद्य एकवार मेव ददामि एकवारम् ददामि–पुनः न ददामि–स्वीकरोतु। अहम् द्विवारम् दंत धावनम् करोमि अहम् द्विवारम् शब्दम् कृतवान् अहम् त्रिवारम् आहारम स्वीकरोमि अहम् वदामि भवंतः वदंतु एकवारम्/ द्विवारम्/ त्रिवारम्/ चतुर्तारम्/ पञ्चवारम्/ षडवारम्/ सप्तवारम्/ अष्टवारम्/ नववारम्/ दशवारम् अहम् एकम् वादामि नावंतः वारम् योजयित्वा वदंति वा एकम्/ द्वे/ त्रीणि/ चव्वारि/ पञ्च/ षड/ सप्त/ अष्ट/ नव/ दश/ - इदानीम् एकम् नूतनम् अभ्यासं कुर्मः–अहम् कः–किम् कृतवान् इति वाक्यम् वदामि वाक्यस्य अनंतरम संख्याम अपि वदामि भवंतः वाक्यम् सम्पर्क कुर्वंतु–वरम् इति योजयित्वा–कर्वंति वा–उदाहरणार्थम्–कालकः शालम् गच्छति एकम्–बालकः एकवारम् रालाम् गच्छति। सः भोजनम् करोति–एकम् सः एकवारम् भोजनम् करोति अहम् एकम् विनोदकणिकाम् वदामि–एकः विद्यालयः विद्यालये एकः छात्रः उक्तवान्–अस्माकम् अध्यायकस्य वर्षे द्विवारमेव कोपः आगच्छति–इति–अन्यः छात्रः उक्तवान् एवम् वा–आम्–प्रथमः उक्तवान्–एकवारम् कोपः आगच्छति चेत् सण्मासपर्यंतम् तिष्ठति–अस्तु। इदानीम् अहम् उत्तरम् वदामि–उत्तरस्य प्रशनम् पृच्छंति वा। त्रयोदशवारम् सूर्यनमस्कारम् करोति– भवान सप्ताहे कतिवारम् मंदिरम् गच्छति सज्जनाः कतिवारम् वदति एकवारम् सम्भाषणसंदेशः मासे कतिवारम् एकवारम् प्रकाशितः भवति माता दशवारम् पठतु इति वदति दिने द्विवारम् वार्त्ताम खुनोमि– - बाबर बहुवारम् भारतस्य उपरि आक्रमणस्य कृतवान् - भवान् कतिवारम् स्नानम् करोति -अहम् द्विवारम स्नानम् करोमि -इदानीम् किञ्चित् अभ्यासं कृतवंतः–भवंतः वाक्यम् वदंति वा–भवंती वदतु– वयम् इदानीम् एकैकम् शब्दम योजयित्वा दीर्घम् वाक्यम् रचयितुम शक्नुमः–तादृशम एकम् अभ्यासम् वयम् इदानीम् कुर्मः–अहम् एकम् शब्दम् वदामि–अन्यएक शब्दम् योजयंति वा– खादितवान्–कः खादितवान् भीमः खादितवान्–घटोत्कचः खादितवान् रामः खदितवान् – किम् रामः फलानि खादितवान् तम्बूलम् खादितवान् इदानि एतानि त्रीणि पदानि न परिवर्त्तनीयानि अन्यद् एकम् पदम् योजयितुम् रामः ह्यः फलम् खादितवान् अनंतरम् रामः ह्यः हस्तेन फलम् खादितवान् रामः ह्यः हस्तेन गृहे फलम् खादितवान् रामः ह्यः हस्तेन पठनंतरम गृहे फलम् खादितवान् सुभाषितम् आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन को न जीवति मानवः। परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥ सुभाषितस्य अर्थः एवम् अस्ति। एवस्य निमित्तम् सर्वे मानवाः जीवंति। अत्र आश्चर्यम् किमपि नास्ति किंतु यः अन्येसाम् उपकाराय सेवायै – संतोपाय–हिताय जीवति–सः एव वास्तविक तथा जीवति–तस्य जीवनमेव धन्यम्–इति– वयम् इदानीम् एकम् दृश्यम् पश्यामः–यत्र वारम् दूत्यस्य बहुवारम् प्रयोगः भवति 1.रञ्जनी–रञ्जनी–रञ्जनी 1.कतिवारम् आह्वयामि 2.किम अम्बा 1.पूर्वपाठः अस्ति खलु–पुस्तकम् उद्घाटयतु 1.एतम् पाठम् एकवारम् पठतु 2.अद्य गणितः पाठः द्विवारम् लेखनीयः अस्ति अहम् गणित सूत्रम् न स्मरामि एत 1.तत्र किमस्ति। दशवारं तदेत पठतु–तदा स्मरतुत शक्नोति 2.अस्तु। कथा इदानीम् एकाम् कथाम् वदामि कश्चन् महाराजः–सः बहुपरिश्रमेण राज्यम् परिपालयति स्म प्रजानाम् हितार्यम् बहुधा प्रयत्नम् करोति स्म तथापि सर्वदा महाराजस्य समस्याः–समस्यानाम् परिहारार्थम् महाराजः प्रयत्नं करोति–तथापि नूतनाः नूतनाः समस्याः आगच्छंति स्म–महाराजः श्रांतः सः स्व गुरोः समीपम् गतवान्–गुरूः एकस्मिन् अरण्ये वासम् करोति स्म–महाराजः गुरूसमीपम् गत्वा स्वकष्टानि निवेदितवान्–गुरूः उक्तवान्–एवम् चेत् राज्यम् त्यजतु–महाराजः उक्तवान् कथम् राज्यम् व्यजामि–राज्ये इतोऽपि अराजकता अधिका भवति–सर्वम् विपर्यस्तम् भवति एवम् वा तर्हि भवतः पुत्राय राज्यम् ददातु इति गुरूः उक्तवान् महाराजः वदति मम पुत्रः बालकः सः राज्यपरिपालने असमंर्थः–इति एवम् चेत् एकम् कार्यम् करोतु– संपूर्णम् राज्यम् महाम ददातु–अहम् परिपालयामि–महाराजस्य बहुसंतोषः–निश्चयेन ददामि–भवते राज्यम् ददामि–तर्हि जलम् आनयति–भवते राज्यम् दत्तवान् अस्मि–इदम् न मम इत्युक्तवा महाराजः दानम् कृतवान्–गुरूः पृच्छति–भवान् इदानीम् कुत्र गच्छति–महाराजः उक्तवान् अहम् राज्यं गच्छामि–धनकोलतः किञ्चित् धनम् स्वीकरोमि–अन्यदेशम् गत्वा वाणिज्यम् करिष्यामि–गुरूः उक्तवान् धनकोषः मम–राज्यम् अपि मम एव भवान् कथम् धनम् स्वीकर्त्तुम शक्नोति–क्षम्यताम् अहम् किम् करोमि–तर्हि एकम् कार्यम् करोतु–अहमतु संन्यासी–राज्यपालनस्य व्यवस्थायाम् कर्त्तुम् अहम् अशक्तः–मम एकः उत्तमः सदायकः आवश्यकः भवान् मम सहायकः भवतु–राज्यम् गच्छतु–राज्यपरिपालनम् करोति अहम् वैतनम् दास्यामि–इति गुरूः उक्तवान् महाराजः अंगीकृतवान्–राज्यम् गत्वा राज्य परिपालनम् आरब्धवान–मासद्वयम् अतीतम्–गुरूः राज्यम् गतवान् महाराजम् दृष्टवा कुशल प्रश्नं कृतवान् कथम् चलति–स्वस्थं चलति वा–कस्टम अस्ति वा महाराजः उक्तवान मम किमपि कस्टम नास्ति–अहम् तु सेवकः–अहोरात्रम् अश्रांतम् परिश्रमम् करोमि–किंतु कष्टम्/ सुखम्/ दुखम्/ दानिम् मम् न बांधते। गुरूः हसन् उक्तवान् सहोदर। अयमेव कर्मयोगः–इदमन् मम अति भावेन कार्यम् कुर्मः चेत् कष्टशतानि अपि सोठुम सामर्थ्यम् आगच्छति। संस्कृत अनुवाद मैथिली अनुवाद अंग्रेजी अनुवाद वायुः एव न वाति। हवा एतऽ नहि बहैत छलै। There’s no breeze at all. किम् एषा उष्णता! कि, गर्मीक मौसम अछि? What sultry weather it is! किं भोः भवान् स्वेदेन क्लिन्नः अस्ति। Hey, you are soaked with perspiration. घर्मो घर्मः। Very hot indeed! आरात्रि वृष्टिः आसीत्। भरि राति पानि पड़ैत रहल। It rained the whole night. प्रातः आरभ्य एवमेव वृष्टिः। अखन जे पानि पड़ रहल अछि इ तँ भोर खन जे पानि पड़ैत छलै तहने लागे छलै। It has been raining like this since morning. महती वृष्टिः। बड्ड जोरसँ पानि पड़ैत छलै। Heavy rains. यद्वा तद्वा वृष्टिः। मुसलाधार वर्षा भऽ रहल अछि। It rains cats & dogs. अत्र वायुः सुष्ठु वाति। ऐतऽ हवा शनैः–शनैः बहैत छलै। Pleasant breeze here. शैत्यम् अहो शैत्यम्। It is extremely cold. अद्य किञ्चित् शैत्यम् अधिकम्। It is a bit colder today. ह्यः तत्र हिमपातः अभवत् इति श्रुतवान्। I heard they had a snowfall yesterday. भवतः वृष्टिप्रावारकं मा विस्मरतु। अहाँ अपन रेनकोट नहि बिसरब। Don’t forget your raincoat. समुद्रतटप्रदेशे झंझावातः अस्ति। समुद्रतटक प्रदेशमे मानसून आबिते रहैत छलै। There is a cyclone in the coastal region. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, उमेश मंडल भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ रश्मि रेखा सिन्हा। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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