VIDEHA — Issue 65 / अंक ६५

Publication: VIDEHA · Issue: 65
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235 'विदेह' ६५ म अंक ०१ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६५) वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण” यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी २.२.-गजेन्द्र ठाकुर-यू.पी.एस.सी.-४- मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली) २.३.१.धीरेन्‍द्र कुमार- कथा- अहींक लेल २.नन्‍द वि‍लास राय- चौठचन्‍द्रक दही कथाक ३.सतीश चन्द्र झा, हमहूँ कहाँ बुझलियै ४.बचेश्‍वर झा-कथा-संगति‍ ५.जगदीश प्रसाद मंडल-अतहतह कथा शेषांश- २.४.१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) २.दुर्गानन्‍द मंडल-समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-३.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर २.५.१.प्रो.वीणा ठाकुर- महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍ २.किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी ३.कपि‍लेश्‍वर राउत- मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा २.६.१.उषाकिरण खान- अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया२.अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी- सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, यू.पी.एस.सी. लेल-चि‍त्राक सनेस २.७.१.-राज नाथ मिश्र- कथा- मस्ती २.कुमार मनोज कश्यप- कथा-नोरक दू ठोप २.८.१.अरविन्द ठाकुर १. लोकदेव भीम केवट २.लोकदेव लोरिक २. बिपिन कुमार झा- विषवेलक सिञ्चन ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक ४ टा कविता २. विद्यानन्द झा (विदू) - हमर मिथिला ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-पोखरिक कमल ३.४.१.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता २.डॉ. शेफालिका वर्मा- विधाता ३.५.१.सतीश चन्द्र झा-चुनाव/ भाषा आ राजनीति २. नन्‍द वि‍लास राय-अकाल ३.६.१.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता ३.७.१.इन्द्र भूषण २. राजेश मोहन झा ३.८. १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘-कक्का औ २.किशन कारीग़र- किडनी चोर ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी 5. बालानां कृते-डॉ. शेफालिका वर्मा- बच्चा आ व्यवस्था/ देश-प्रेम 6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_XIV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.1.TWO Original Poem in Maithili by Kalikant Jha Buch Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2. ALL THINGS POSSIBLE- (TRANSLATED FROM  HER MAITHILI POEM BY AUTHOR HERSELF ) 3. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक

विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय किछु गप-सरक्का: कोना मुँपर हँसी राखी आ व्यक्तित्वक विकास करी (संगी-साथी, खास कऽ जे सभ विपणन क्षेत्रमे चाकरी करै छथि हुनकासँ होइत वार्तालापक आधारपर): क्षणमे क्षणाक.. अहाँ कोनो एहन काज नै करू जे दोसराकेँ कैक बरख धरि प्रतारित करैत रहए। सदिखन प्रतिभाक ताकिमे रहू। एहिमे जाति-धर्मकेँ स्थान नै दियौ।से अपन धंधामे होअए वा साहित्यमे।आ ओ प्रतिभाशाली व्यक्ति कतेक प्रतिभाशालीकेँ ताकि कऽ देत। जे जाति धर्मक आधारपर निम्न कोटिक प्रतिभाकेँ अहाँ आश्रय देबै तँ मोन राखू जे ओ अपने सन प्रतिभा अहाँकेँ ताकि कऽ देत। आ एहन हारल व्यक्तित्व अपन हारिक लेल सर्वदा अनका दोष देताह। सदिखन अभाव-भाषण, सदिखन गंभीर समस्यापर वितर्क अहाँक उत्साहकेँ मारत। एहिसँ समस्या बढ़बे करत। गंभीर समस्यापर वितर्क नीक गप छै, मुदा सदिखन नै। क्रोध मनुक्खक सभसँ पैघ शत्रु थिक। क्रोधावस्थामे कोनो निर्णय नै लिअ, जे लेब तँ ओ निर्णय अहाँ लेल गेल खराप निर्णयमे सँ एक होएत। अपन समस्या अपन माए, बेटी, सखा, महिला-सहकर्मी आकि पत्नीसँ अवश्य साझी करू। कारण खराप परिस्थितिमे महिला द्वारा उचित निर्णय लेबाक आ नीक सलाह देबाक अधिक सम्भावना रहैत अछि। कतबो झगड़ हुअए, वा कतबो समस्यामे रही, पत्नीक कोठलीसँ दोसर कोठलीमे सुतैले नै जाउ। दोसर केहन छै तकर विवेचन छोड़ू, एहिपर ककरोसँ बहस नै करू। ई अहाँकेँ फुसियाहीक भ्रममे राखत। नीक काज करबा काल कोनो तरहक एहन विचार नै आनू जे लोक की कहत। खराप काजक विरोध करबामे निर्दय बनू- खराप काजक प्रति “जीरो टोलेरेन्स” राखू। कोनो बौस्तु अहाँकेँ सुविधा दैए तँ सएह आनन्द प्रदान कर..नै एहि भ्रममे नै रहू। असुविधाजनक आ कएक बरख धरि कएल कठिन काजक बाद जे आनन्द भेटै छै से सुविधापूर्वक कएल काजसँ भेटल आनन्दसँ कएक गुणा होइ छै। दोसराक प्रति ईर्ष्या अहाँक आनन्दक क्षणकेँ घटाओत। सभकेँ प्रशंसा सुनब नीक लगै छै आ ताहि लेल ओहि व्यक्तिक कएल नीक काज सभक विषयमे जानकारी राखू आ तखन प्रशंसा करू, मिथ्या प्रशंसा नै करू। सर्वदा परिवर्तनक संग आगाँ बढ़बा लेल तत्पर रहू, मुदा सावधान! कोनो एहन परिवर्तन जे नैतिक होअए आ अहाँक विचारसँ मेल नै काए, तकर विरोध करू। अपन समालोचकक संग कहियो नै छोड़ू, वएह अहाँक कठिन बाटक असल संगी सिद्ध होएताह। अपनापर सर्वदा नियंत्रण राखू। नकारात्मक विचार अहाँकेँ दुखी करत। पाइकेँ सफलताक आधार मानैबलाक संख्या कम छै, आ से नै छै तँ होएबाक्ल चाही। कोनो काज करै काल सर्वदा ओकरा सर्वोत्कृष्ट बनेबाक प्रयास करू, अधिकांश कार्यमे मुदा एकर उनटा भेटत। लोक काजकेँ उत्कृष्ट बनेबाक बदला संपूर्ण बनेबाक प्रयास करै छथि, जेना- ईहो रहबाक चाही, ई छुटि गेल। काज सर्वोत्कृष्ट बनेबाक माने भेल ओ काज जे कल्याणकारी होअए। कोनो व्यक्ति आकि काजक लेल भारी आशा राखू, काजसँ- विभिन्न नव-नव काजसँ लोककेँ लादि दियौ; काजमे नव मेथोडोलोजी जोड़ू, वएह काज उत्कृष्ट भऽ जाएत। कोनो समस्या आबए तँ घबड़ाउ नै, गहिंकी नजरि ओहि समस्यापर दौगाबू जे कोन नव काज ई अहाँकेँ देमएबला अछि। सत्य बाजू, एहिसँ अहाँक मस्तिष्कपर कम भार रहत। कोन गप ककरासँ बाजल रही से मोन नै राखऽ पड़त। सृजनक सुख:कला, साहित्य, कृषि-औद्योगिक उत्पादन आकि नव शिशुक जन्म, एहि सभमे सृजनक सुख भेटै छै। कृषक बीआ बाउग करै छथि आ बीआकेँ उचित समएपर रोपै छथि। फसिलक सेवा करै छथि आ फल पबै छथि।साहित्य, संगीत आ कलामे सेहो लोक कतेको अद्भुत वस्त् बनबै छथि, रचै छथि।संगीत सीखि कऽ ओकरा गेबाक/ बजेबाक आनन्द टेप रेकॉर्डरमे सुनबाक आनन्दसँ फराक होइत अछि। साहित्यक कोनो कृतिक सृजनक बाद सृजनात्मक सुखक अनुभव साहित्यकार करै छथि आ ई ओहेन होइत अछि, जेना बच्चाक जन्मक बाद माताक मुँहपर देखबामे अबैत अछि। मुदा आइ-काल्हि एहनो साहित्यकार सभक प्रवेश साहित्यमे भऽ गेल अछि जे अनकर रचना, से गद्य हुअए वा पद्य, तकर पुनर्लेखन (गद्यक गद्यमे वा कखनो काल पद्यमे सेहो) अपना नामसँ कऽ लैत छथि। गलौसीसँ आ मारि तरहक केफा कऽ, दुर्व्यवहार कऽ पाठकविहीन मैथिली साहित्य जगतमे निर्लज्जतासँ अपन एहि कृत्यसँ दोसर साहित्यकारकेँ हतोत्साहित करै छथि। हिनका सभक द्वारे किछु गोटे मैथिली साहित्य छोड़ि कऽ चलियो जाइत छथि, जकर छद्म-चोर साहित्यकार द्वारा पतनुकान दिअएबाक संज्ञा देल जाइत अछि। मैथिलीसँ ककरो जोड़ब नीक आकि पतनुकान दिआएब नीक? “रचना” पत्रिकाक एहने एकटा “अतिथि सम्पादक”बहुत रास रचना साहित्यकार सभसँ मँगबा कऽ गीड़ि गेलाह। हमरो लग हुनकर चिट्ठी आएल आ हम रचना पठा देलियन्हि, मैथिलीक नामपर। मुदा आब हुनकर किरदानी देखू। फुकियामाक इतिहासक अन्तक हमर व्याख्या ओ की बुझलन्हि आ तकरा अपन कवितामे चोरा लेलन्हि। फुकियामा रूसक कम्यूनिज्मक अन्तक विषएमे कहने छथि जे सभ्यताक इतिहास दू विचारक द्वन्द्वक इतिहास अछि। अमेरिकाक कैपिटलिज्म आ रूसक कम्यूनिज्मक बीचक द्वन्द्व रूसक कम्यूनिज्मक अन्तक बाद खतम भऽ गेल से एकमात्र सत्ता अमेरिका बचल- यूनीपोलर वर्ल्ड। आ ताहि सन्दर्भमे इतिहास खतम भऽ गेल। मुदा बादमे फुकियामा देखलन्हि जे एक्के विचारधाराक भीतर सेहो कएक तरहक विषमता जन्म लेने अछि- हैव आ हैव नॉट्सक बीचक द्वन्द्व अछिये, से ओ फेर अपन गपमे सुधार करैत कहलन्हि जे इतिहास जारी रहत।तहिना भगवानक मृत्युक सम्बन्धमे स्टीफन हॉकिन्सक विचार पूर्ण वैज्ञानिक आ मौलिक छन्हि। हुनकर कहब छन्हि जे कंट्रैक्शन आ एक्सपैनशन दुनू सिद्धान्त एहि विश्वक निर्माणक अलग-अलग सिद्धान्त अछि। मुदा जँ एकरापर एकर कोनो भगवान रूपी आरम्भकर्ताक नियन्त्रण नै छै तखन ओकर आयु भने बेसी होअए मुदा ओकरो मृत्यु एहि सिद्धान्तक अन्तर्गत होएत। मुदा “अतिथि सम्पादक” दोसराक रचना जे चोरेताह तँ काँट-छाँट करताह आ तखन अर्थक अनर्थ तँ होएबे करत- इतिहासक अन्तसँ सभ्यताक अन्त बुझताह आ भगवानक मृत्युसँ नहि जानि की? बिना अध्ययनक, दोसराक मेहनति अपन नाम करबाक प्रवृत्तिसँ स्वास्थ्यक दुष्परिणाम सेहो सोझाँ अबै छै। लोक डराएल सन रहैत अछि जे चोरि ने पकड़ा जाए। आ ताहि डरसँ निन्नमे कमी अबै छै- ओना ई निन्नक कमीक कैकटा मे सँ एक कारण अछि- आ कम्मे उमेरमे निन्नक गोलीक सेवन बिना डाक्टरी सलाह लेबाले बाध्य होमए पड़ै छै।अंग्रेजी आ आन भाषासँ अनुवाद कऽ अपना नामे मैथिलीमे रचना छपबाबैक क्रममे अंग्रेजी-हिन्दी कोषसँ निकालल शब्द कखनो काल हास्यास्पद परिणाम सेहो दैत अछि- कोल्;ड ब्लडक एनिमल लेल नृशंस जानवरक अनुवाद तखन तँ भेटबे करत! गद्यक पद्य बनल रूप देखार भऽ जाइत अछि।पोएट्री डॉट कॉम, अमेरिकन पोएट्री डॉट कॉम पद्य आ ढेर रास अन्त साइट व्गद्य उपलब्ध करबैत अछि। मुदा धन्य अछि गूगलक शक्तिशाली सर्च इंजिन जे एहन चोर सभ पकड़ा जाइत छथि। मेहनतिक कोनो विकल्प नै। अहाँ दू घंटा प्रतिदिन वा प्रति सप्ताह मैथिली लेल समए निकालू, नै तँ सुच्चा साहित्य सेवी सभकेँ गरियाबू, नै अपने काज करू आ ने करए दियौ, आ नाम कमाउ! विकल्प सभक सोझाँ अछि। मेहनतिक कोनो विकल्प नै। मुदा आब मैथिलीसँ हिन्दीमे चोरि होएत आ तकरा लेल की करब? मैथिली प्रेमी जे हिन्दी साहित्यमे पेशागत वा अन्य कारणवश रुचि रखै छथि, सँ सादर अनुरोध जे एहि तरहक कोनो घटना हुनका नजरिमे अबन्हि तँ ggajendra@videha.com पर सूचित करथि। विदेहक लघुकथा विशेषांक: विदेहक हाइकू आ गजल विशेषांक प्रकाशित भेल छल आ तकर बाद आब विदेहक ६७म अंक ०१ अक्टूबर २०१० लघुकथा विशेषांक होएत। विदेहक लघुकथा विशेषांकक अतिथि सम्पादक छथि मुन्नाजी। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित लघुकथा सम्बन्धी आलेख आ लघुकथा सभ (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे २९ सितम्बर धरि पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। साहित्य अकादेमीक फेलोशिप अमरजी केँ: २४ भाषाक साहित्य/ विद्वता/ दर्शनक “अमर साहित्य” लेल देल जाइत अछि। देशक एहि सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कारक स्थापना १९६८ मे कएल गेल छल आ ओहि वर्ष ई सर्वपल्ली राधाकृष्णन, दार्शनिककेँ देल गेल छल। साहित्य अकादेमीक मानद फेलोशिप गएर भारतीयकेँ भारतीय साहित्यमे उल्लेखनीय योगदान लेल सेहो देल जाइत अछि। एक समएमे २१ सँ बेशी गोटे लग ई फेलोशिप नै रहैत अछि। २०१० मे मैथिली साहित्य लेल ई फेलोशिप चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”केँ देल गेल छन्हि। पहिने यात्रीजीकेँ ई फेलोशिप १९९४ ई. मे भेटल छन्हि। चन्द्रनाथ मिश्र अमर 1925- जन्म: खोजपुर, मधुबनी । वरिष्ठ कवि, कथाकार-उपन्यासकार । हास्य-व्यंग्यक कवितामे बेजोड़। मैथिलीक लेल समर्पित व्यक्तित्व । पांच दर्जनसं बेसी कथा आ विदागरी, वीरकन्या (उपन्यास) जल समाधि (कथा संग्रह) प्रकाशित ।१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित। एम. एल. एकेडमी, लहेरिरियासरायसं शिक्षकक रूपमे अवकाश प्राप्त। आशा दिशा, गुदगुदी, युगचक्र, उनटा पाल आदि कविता संग्रह प्रकाशित। १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) लेल साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार। नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” ) १९११-१९९८, हिन्दी आ मैथिली कवि। १९९४ ई.मे हिनका साहित्य अकादमीक फेलो नियुक्त कएल गेल। साहित्य अकादेमीक भाषा सम्मान डॉ. शशिनाथ झा 1954-केँ साहित्य अकादमीक भाषा सम्मान 2007 मे क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल देल गेल छलन्हि। साहित्य अकादमीक भाषा सम्मान क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्यक अतिरिक्त गएर मान्यताप्राप्त भाषा सभ लेल सेहो देल जाइत अछि। डॉ. शशिनाथ झा 1954- , गाम-दीप, जिला- मधुबनी। मैथिली, बांग्ला, नेवारी आ देवनागरी पांडुलिपिक विशेषज्ञ। साहित्य अकादेमीक बाल साहित्य पुरस्कार २०१० तारानन्द वियोगीकेँ "मैथिली बाल साहित्य लेल पहिल साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१०",  "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल देल जा रहल अछि। "ई भेटल तँ की भेटल"  मैथिली लोक रंग (मैलोरंग), दिल्ली द्वारा २००८ ई. मे प्रकाशित कएल गेल अछि।  ई पुरस्कार १४ नवम्बर २०१० केँ बाल दिवसक अवसरपर देल जाएत। एहिमे ५१ हजार टाका देल जाएत। तारानन्द वियोगीजीकेँ बधाइ।

पोथी- "ई भेटल तँ की भेटल" पृष्ठ संख्या: ३२ दाम: पन्द्रह टाका मात्र ISBN NO.978-81-904941-2-0 पहिल संस्करण: २००८ ई. प्रकाशक- मैलोरंग, दिल्ली।

तारानन्द वियोगी 1966-

जन्म १५ जनवरी १९६६, बदरिकाश्रम, महिषी, सहरसामे ।पहिल पोथी अपन युद्धक साक्ष्य (गजल संग्रह) १९९१ मे प्रकाशित। अन्य पुस्तक हस्तक्षेप (कविता-संग्रह), अतिक्रमण (कथा-संग्रह), शिलालेख(लघुकथा संग्रह), कर्मधारय, ई भेटल तँ की भेटल। राजकमल चौधरीक कथाकृति एकटा चंपाकली एकटा विषधर संकलन-संपादन। साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली) १९९४- नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि। २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )- मैथिली साहित्य लेल। साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल )

२००७- डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)

  साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली १९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन) १९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य) १९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास) १९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य) १९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य) १९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास) १९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण) १९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य) १९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना) १९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य) १९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य) १९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास) १९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य) १९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास) १९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) १९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य) १९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा) १९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध) १९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा) १९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास) १९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य) १९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा) १९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी) १९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध) १९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा) १९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा) १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) १९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह) १९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य) १९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य) १९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा) २०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य) २००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य) २००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) २००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा) २००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य) २००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य) २००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा) २००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा २००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा) २००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह) साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार १९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) १९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) १९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) १९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) १९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) १९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) १९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) १९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) २०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) २००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) २००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) २००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) २००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) २००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) २००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) २००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) २००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) २००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार २०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल प्रबोध सम्मान प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- ) प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- ) प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- ) प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- ) प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- ) प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- ) प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- ) यात्री-चेतना पुरस्कार २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा; २००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा; २००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया; २००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा; २००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना; २००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी; २००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी; २००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी; २००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान २००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह “एना त नहि जे” २००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”केँ नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश विशेष: विदेह आर्काइवक आधारपर बाल चित्रकथा आ कॉमिक्स महिला वर्गमे विशेष लोकप्रिय भेल अछि। महिलावर्ग द्वारा कीनब ओहि पोथीक बच्चा सभक हाथमे जएबाक सूचक अछि। हमरा सभक सफलता अहीमे अछि जे ई बाल-साहित्य “टारगेट ऑडियेन्स” लग पहुँचल अछि। ई सभ पोथी आ विदेह आर्काइवक आधारपर प्रकाशित आन मैथिली पोथी एहि सभ ठाम उपलब्ध अछि: पटना: १.श्री शिव कुमार ठाकुर: ०९३३४३११४५६ २.श्री शरदिन्दु चौधरी: ०९३३४१०२३०५ राँची: श्री सियाराम झा सरस: ०९९३१३४६३३४ भागलपुर: श्री केष्कर ठाकुर: ०९४३०४५७२०४ जमशेदपुर: १.श्री शिव कुमार झा: ०९२०४०५८४०३ २.श्री अशोक अविचल: ०९००६०५६३२४ कोलकाता: श्री रामलोचन ठाकुर: ०९४३३३०३७१६ सहरसा: श्री आशीष झा: ०९८३५४७८८५८ दरभंगा: श्री भीमनाथ झा: ०९४३०८२७९३६ समस्तीपुर: श्री रमाकान्त राय रमा: ०९४३०४४१७०६ सुपौल:श्री आशीष चमन:०७६५४३४४२२७ झंझारपुर: श्री आनन्द कुमार झा: ०९९३९०४१८८१ निर्मली: श्री उमेश मंडल: ०९९३१६५४७४२ जनकपुर: श्री राजेन्द्र कुशवाहा: ००९७७४१५२१७३७ जयनगर: श्री कमलकान्त झा: ०९९३४०९८८४४ दिल्ली: १.श्रीमती प्रीति ठाकुर: ०९९११३८२०७८ २.श्री मुकेश कर्ण: ०९०१५४५३६३७ मधुबनी: १.श्री सतीश चन्द्र झा:०९७०८७१५५३० २.मिश्रा मैगजीन सेन्टर (प्रो. श्री अमरेन्द्र कुमार मिश्र), शंकर चौक, मधुबनी ०९७०९४०३१८८ किछु आर स्थल शीघ्र... (विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०५ देशक १,४८६ ठामसँ ४७,८४८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,५९,८५६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण” यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी २.२.-गजेन्द्र ठाकुर-यू.पी.एस.सी.-४- मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली) २.३.१.धीरेन्‍द्र कुमार- कथा- अहींक लेल २.नन्‍द वि‍लास राय- चौठचन्‍द्रक दही कथाक ३.सतीश चन्द्र झा, हमहूँ कहाँ बुझलियै ४.बचेश्‍वर झा-कथा-संगति‍ ५.जगदीश प्रसाद मंडल-अतहतह कथा शेषांश- २.४.१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) २.दुर्गानन्‍द मंडल-समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-३.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर २.५.१.प्रो.वीणा ठाकुर- महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍ २.किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी ३.कपि‍लेश्‍वर राउत- मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा २.६.१.उषाकिरण खान- अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया२.अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी- सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, यू.पी.एस.सी. लेल-चि‍त्राक सनेस २.७.१.-राज नाथ मिश्र- कथा- मस्ती २.कुमार मनोज कश्यप- कथा-नोरक दू ठोप २.८.१.अरविन्द ठाकुर १. लोकदेव भीम केवट २.लोकदेव लोरिक २. बिपिन कुमार झा- विषवेलक सिञ्चन शम्भु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।—सम्‍पादक निबंध : “मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण” (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) निबंधकार :   डॉ. शंभु कुमार सिंह मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण ज्ञान राशिक संचित कोष थिक साहित्य। शब्द आ अर्थक यथावत सद्भाव, जाहिमे मनुष्यक भावना आ बेधन चेष्टा समाविष्ट हो सैह थिक साहित्य। जनताक चित्रवृतिक परम्पराक संग ओकर सामञ्जस्य देखाएबे साहित्यक इतिहास थिक। व्यापक, गहन आ अध्ययनक सुविधाक लेल साहित्यकेँ समयक विभिन्न परिधिमे बाँटब काल-विभाजन थिक। मुदा काल विभाजनक ई तात्पर्य कथमपि नहि अछि जे एक कालक समाप्त भेलाक लागले पश्चात् दोसरहि दिन साहित्यक धारा दोसर दिशामे प्रवाहित होमए लगैत अछि। काल-विभाजन कोनो सुनिश्चित  मापदण्ड अथवा कसौटी नहि अछि,  एहि लेल काल विशेषक नामकरण, कखनहुँ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आ धार्मिक परिस्थितिक परिपेक्ष्यमे होइछ तैँ कखनहुँ रचना विशेषक प्रवृति प्रावल्यक आधार पर। साहित्य अनन्त अछि। कोनो साहित्यक वैज्ञानिक ओ विधिवत ज्ञान ओहि साहित्यक अध्ययन सँ संभव होइत अछि। साहित्यक सम्यक अध्ययनक लेल युग विभाजन वा काल-विभाजन आवश्यक अछि। एकर स्पष्टीकरण ‘मिश्रबन्धु’क निम्न पंक्तिसँ भ’ जाइत अछि: “काल-विभाजन इतिहास के प्रासाद की दीवारें हैं। काल-विभाजन द्वारा यह माना जा सकता है कि, कब, कैसे और किधर लोगों की मनोवृत्ति और विचारधारा प्रवर्तित हुई। किन्तु काल निर्णय कोई सुकर कार्य नहीं। काल की कड़ी के दोनो छोड़ों को पकड़ना बहुत सूक्ष्मदर्शिता और गहरी विवेचना से हो पाता है।  विचारों और उसके प्रकाशन में जब कोई नयी क्रान्ति आ उपस्थित होती है, तभी काल श्रृंखला की नई कड़ी आरंभ होती है।” कोनो निर्जन प्रदेशक शैवलनी सदृश एकर धारा अबाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहल अछि। अतः ओकर सम्यक विचारक परिचय पएबाक हेतु काल-विभाजन प्रयोजनीय अछि, उपयोगी अछि। मैथिली साहित्यक काल-विभाजन पर जखन विचार करैत छी तँ ई एक गोट विचारणीय विषय बनि जाइत अछि। विभिन्न विद्वानक एहि संबंध मे मत अछि एवं प्रसिद्ध इतिहासकार लोकनि एहि प्रसंगे, विभाजन पृथकृ-पृथक कएल अछि। ओना तँ  साहित्य प्रवाहमान धाराक सदृश्य अछि, जिकर विभाजन दुःसाध्य नहि प्रत्युत असंभव भ’ जाइत अछि; किन्तु अध्ययनक सुविधाकेँ दृष्टिमे राखि विभिन्न प्रवृतिक प्रधानता आर अप्रधानताक आधार पर विभाजन क’ लेल जाइछ। ई विभाजन दू प्रकारेँ कएल जा सकैछ: (I)                 देशकृत (II)               कालकृत साहित्य तँ सार्वभौमिक ओ सर्वकालिक अछि। यदि देशकृत विभाजन कएल जाए तँ साहित्य पृथक-पृथक  स्थान पर भिन्न-भिन्न नाम सँ संबोधित कएल जाएत। कालकृत विभाजन किछु विशेष प्रवृतिक आधार पर कएल जाइछ। परिवर्तन मनुष्यक संग अवांछनीय रूपसँ अछि। सामाजिक, धार्मिक ओ राजनीतिक परिवर्तन भेल करैछ। कोनो युगमे कोनो खास तरहक प्रवृतिक प्रधानता पाओल जाइत अछि। ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’। अतः प्रवृतिक अनुरूप ओहि कालक नामकरण कएल जाइछ; जाहिसँ ई कथमपि नहि बुझबाक चाही जे आन-आन प्रवृतिक अवशेष भए जाइछ, अपितु ओ गौण रूपसँ सदिखन वर्तमान रहैछ। जाहिकालमे कोनो विशेष प्रवृतिक रचनाक प्रचुरता भेटैछ तँ ओ स्वतंत्र भ’ ओकर फराक नामकरण कएल जाइछ। एहि प्रकारेँ कालकृत विभाजनक एकगोट आर विशेषता पाओल जाइत अछि ओ थिक ग्रंथकेँ विशेष प्रसिद्धि भेलासँ कोनो कालक भीतर जाहि प्रकारक अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ चलि आबि रहल अछि तेँ ओहि प्रकारक रचनाकेँ ओहिकालक अंतर्गत मानब उचित होएत। यद्यपि आनो-आन पुस्तक सभ ओहि कालक मध्य असाधारण कोटिक किएक नहि प्राप्त हो। अतः मैथिली साहित्यक युग विभाजन एहि रचना प्रवृतिक आधार पर तीन युगमे भेल अछि—पहिल अछि गीतिकाव्य युग, दोसर—नाटक युग, आ तेसरके—गद्य युगक संज्ञा देब उचित होएत। दोसर शब्दमे पहिलकेँ ‘श्रृंगार युग’ दोसरकेँ  ‘भक्ति युग’ आ तेसरकेँ  ‘आधुनिक युग’ कहल जा सकैछ। प्रारंभिक युगमे मिथिलामे गीतिकाव्यक विशेष प्रचार-प्रसार रहलाक कारणेँ प्रायः गीति-युगक संज्ञा देल गेल। एहि युगक प्रवर्तक छलाह अभिनव जयदेव महाकवि विद्यापति ठाकुर। हिनकासँ ल’ कए कवीश्वर चन्दा झा धरि एकर पूर्ण प्रचार-प्रसार रहल। कवीश्वरक मृत्युक पश्चात् एहि युगक अवसान भ’ गेल। मध्य युगमे आबि कए गीति काव्यक मधुर-मधुर गीत संयोगसँ नाटकक रचना दिस लोकक प्रवृति झुकल। अतः एहि युगकेँ ‘नाटक युग’क संज्ञा  देब उचित प्रतीत होइत अछि। एहि युगमे हमरा लोकनिकेँ उमापति उपाध्याय कृत ‘पारिजातहरण’ म.म. रामदास झाक ‘आनंदविजयाभिधान’ काशीनाथकृत ‘विद्याविलाप’ कृष्णदेवकृत ‘महाभारत’ आ धनपतिकृत ‘माधवानल काम कण्डला’ सँ साक्षात्कार होइत अछि। एवं प्रकारेँ नाट्य कलाक विशेष प्रदर्शन भेलासँ लोकक रूचि ओहिसँ बदलैत गेल एवं वर्तमान युग मे लेखकक प्रवृति गद्य लिखबा दिस विशेष झुकल। एहि युगमे लेखक वृन्द गद्य साहित्यमे अपन मौलिक रचनामे उपन्यास, गल्प, कहानी, निबंध, लिख’ दिस विशेष रूचि देखौलन्हि। आब प्रश्न उठैत अछि जे एखन धरि जतेक काल-विभाजन मैथिली साहित्य मध्य कएल गेल अछि ओकर तिथि निर्धारण करबामे विद्वान लोकनिमे मतैक्य किएक नहि अछि? मैथिली साहित्यक प्रथम काल-विभाजन करबाक प्रयास (I) म. म. डॉ. उमेश मिश्र, मनबोध रचित कृष्णजन्मक अपन भूमिकामे कएलन्हि अछि। हिनका मतानुसारेँ: (I)                 आदिकाल        1100 सँ     1300 ई. धरि (II)               मध्यकाल       1300 सँ     1800 ई. धरि (III)              आधुनिक काल  1800 सँ     अद्यतन। उपर्युक्त विभाजन एकतँ  मैथिलीकेँ ध्यानमे राखने अछि आ भाषाक विभिन्न रूपकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल  काल-विभाजन साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन नहि कहाओत। साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन मे भाषाक अतिरिक्त कृत्ति, कर्ता पद्धति ओ विषय पर ध्यान देब आवश्यक अछि। म. म. डॉ. उमेश मिश्र, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्क वार्षिक अधिवेशन, मार्च 1953 मे अध्यक्ष पदसँ “मैथिली भाषा ओ साहित्य” पर भाषण दैत, राजनीति, सामाजिक ओ भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ समस्त साहित्यकेँ निम्न भागमे प्रस्तुत कएने छथि: (I)                 आदिकाल        1000 सँ     1600 ई. धरि (II)               मध्यकाल       1600 सँ     1860 ई. धरि (III)              आधुनिक काल  1860 सँ     1950 ई. धरि। ओ मिथिला भाषा तथा इतिहासकेँ एहि प्रकारक उपादेयता पर विचार करैत तीनू युगमे नामकरण करैत छथि। आदियुगकेँ गीतियुग, मध्ययुगकेँ नाटकयुग एवं आधुनिक युगकेँ गद्ययुगक संज्ञासँ संबोधित कएल अछि। काल विभाजनक प्रसंगमे अपन विचारक परिवर्तनक कोनो युक्तिसंगत कारण म. म. मिश्रजी नहि देने छथि। परन्तु हिनक पूर्वक काल-विभाजन एवं नवीन काल विभाजनक बीच डॉ. जयकान्त मिश्रक प्रबंध प्रकाशित भ’ चुकल छल। डॉ. मिश्रक काल-विभाजन ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे सर्वमान्य अछि तँ आश्चर्य नहि जे म.म. जी अपन मतमे संशोधन कएने होथि। हिनक एहि प्रकारक विभाजनमे कए प्रकारक दोष आबि गेल अछि जे, सम्प्रति 1950 ई. मे आबि कए आधुनिक युगक समाप्ति मानैत छथि। मिथिला वा कोनो देशक जनताक चित्रवृत्त बहुल किछु राजनीतिक, सामाजिक साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितिक होइत अछि, मुदा जखन 1950 पर दृष्टिपात करैत छी तँ सर्वथा असंगत बुझि पड़ैत अछि, एहि कालमे कोनो राजनीतिक वा सामाजिक परिवर्तन नहि पाबि रहल छी जकर आधार मानि म. म. मिश्रजी अपन विभाजन मध्य आधुनिक कालक समाप्ति कएल अछि। जँ हिनक धारणा छनि जे काल-विभाजन राजनीति, सामाजिक एवं भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ कएल जाय तँ राजनीतिक परिस्थितिकेँ ध्यानमे राखि सम्प्रति 1947 मानि सकैत छलाह। एहि प्रकारेँ विवेचना कएला उत्तर जखन हिनक विभाजनक साहित्यिक समीक्षा करैत छी, तँ हिनक परिभाषा अमान्य सिद्ध होइत अछि। (2) डॉ. जयकान्त मिश्र साहित्य अकादमी सँ प्रकाशित अपन शोध-प्रबंध, ‘The history of Maithili Literature, Volume-I’ मे राजनीतिक घटनाक साहित्य परंपरा पर प्रभावक आधार पर काल विभाजनक प्रसंगे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि— (I)   प्राक् मैथिली काल                          8म शताब्दीसँ 12हम शताब्दी धरि (II)  प्रारंभिक मैथिली साहित्य                     1300 ई.सँ 1600 ई. (III) मध्यकालीन मैथिली साहित्य                        1600 ई. सँ 1860 ई. (IV)             आधुनिक मैथिली साहित्य                   1860 ई. सँ अद्यतन। डॉ. मिश्रक उपर्युक्त कथन बहुतो अंशमे तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक कहल जाएत। यद्यपि अपन काल विभाजनक आधार ओ राजनैतिक घटनाक साहित्य परम्परा पर प्रभावे केँ राखलन्हि अछि। हिनका अनुसारेँ भाषा-वैज्ञानिक आ व्याकरणक दृष्टिएँ ई विभाजन समीचीन अछि। मुदा एहिमे सेहो किछु त्रुटि रहि गेल अछि। प्रारंभिक कालक समय जे 1300 ई. स्थिर कएल गेल अछि तकर आरंभ मानबाक कोनो कारण नहि देल गेल अछि। 1300 ई. मानलाक कारणेँ ओहिसँ पूर्वक बहुत रास रचना एहि परिधिमे नहि आबि सकल। मुदा विद्यापतिक पूर्वक साहित्यकेँ प्राक् विद्यापति साहित्यक संगे विस्तारसँ चर्चा कएने छथि। एहि साहित्यमे ‘वर्णरत्नाकर’ तँ हिनक युग आरंभिक रचना थिके, चर्यापदहुक चर्चा ओ बड़ परिश्रमपूर्वक केने छथि। तखन हिनक उपर्युक्त मत स्वतः संदेहात्मक भ’ जाइत अछि। 1300 ई. मे मिश्रजी मुसलमानक आगमनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। मिथिला सर्वदासँ कट्टर धर्मावलम्बी रहल ताहिसँ मिथिलापर मुसलमानक आगमनक कोनो प्रभाव नहि पड़य देल। एकर दोसर हेतु इहो भ’ सकैत अछि जे, जयकान्त बाबूक ध्यान ज्योतिरीश्वरक गद्य ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’ पर होइन्ह एवं एकर समय 1324 ई. लगभग कहने छथि। 1400 ई. क’ अभ्यन्तर विद्यापतिक प्रभाव साहित्य पर मुख्य रहल। एहि समयमे अपभ्रंशक पतनक अनन्तर पूर्वीय भारतमे मैथिलीक प्रयोग भेटैत अछि। श्री जयकात बाबू एहि काल-विभाजन अवसानक कारण प्रस्तुत करैत ओइनवार वंशक पतनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। एहि प्रकारेँ 1600 ई. सँ मध्यकालक प्रारंभ मानल गेल अछि ताहि हेतु विशेष उल्लेख नहि कएल गेल अछि। एहि युगमे मिथिलामे नाट्य साहित्यक पूर्ण प्रचार-प्रसार छल। जकरा ओ कीर्तनिञा नाटक कहल अछि। हिनका अनुसारेँ विद्यापति पदावलीक जे सशक्त धारा प्रवाहित भेलसे उमापतिसँ नाट्य रचनाक प्राचुर्य द्वारा एक महत्वपूर्ण ओ प्रौढ़ दिशान्तरकेँ प्राप्त कए नवयुग प्रवेश कएल परन्तु हिनक ई धारणा पूर्वाग्रहसँ अनुप्राणित अछि। वस्तुतः जकरा ओ मैथिलीक नाट्य परंपरा कहैत छथि ओ ओहिसँ पूर्व विद्यापति एवं ओहूसँ पूर्व ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्तसमागम’ सँ प्रारंभ भेल। एहि समयक उल्लेख करैत मिश्रजी नेपालक जगतप्रकाशमल्ल, उमापति उपाध्याय एवं शंकरदेवक नाम लैत छथि, जे ओ मैथिली नाट्यकलाक प्रवर्तक क’ रूपमे अबैत छथि। एहि कालक अवसान सेहो खण्डवला कुलक अवसानसँ भेल। डॉ. जयकान्त बाबू आधुनिक युगक आरंभ 1860 ई. सँ मानलन्हि अछि, जखन कि दरभंगा राज कोट ऑफ वार्डस (Courts of Wards)क संरक्षण मे चलि गेल आर दरभंगा शहरमे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल। परन्तु जखन हम मिथिलाक सीमा मैथिलीक क्षेत्रकेँ दरभंगा सँ बाहरो मानैत छिऐक तँ खाली दरभंगेक स्थिति पर साहित्यक निर्धारण करब कतए धरि तर्कसंगत होएत? (3) एहि प्रकारेँ प्रो. श्रीकान्त मिश्र सेहो अपन इतिहासमे उपर्युक्त  तथ्यक समर्थन कएल अछि। एवं क्रममे अनेक गतिरोधक मुख्य कारण प्रस्तुत करैत मिश्रजीक कथन अछि जे शिक्षा-पद्धतिमे बरोबरि मैथिलीक अवहेलना होइत रहल। समय पाबि साहित्यक आनहु अंग सभ गद्य, पद्य आदिक विशेष प्रगति होइछ। (4) तेसर काल-विभाजन कुमार श्री गंगानंद सिंहक द्वारा कएल गेल अछि। तथा जकर उल्लेख अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलनक चौदहम अधिवेशनमे ‘मैथिली साहित्यक प्रगति’ शीर्षक निबंध पर भाषण दैत अपन मतक पूर्ण विवेचना कएल अछि: (I)              प्रारंभिक काल             800 सँ      1300 ई. धरि (II)      मध्यकाल                1300 सँ     1800 धरि (III)      आधुनिक काल                  1800 सँ 19म, 20म शताब्दी धरि प्रारंभिक कालमे ओ चर्यापदक आचार्य लोकनिक रचनाकेँ मानैत छथि, आ वाचस्पति मिश्रक ‘भामति टीका’ आ सर्वानन्दक ‘अमरकोष टीका’मे संस्कृत पर्यायवाची अनेक मैथिली शब्दक उल्लेख कएल अछि। परन्तु चर्यापदक भाषा मैथिलीक पूर्व रूप भनहि भ’ सकैछ मुदा ओकरा मैथिली नहि कहि सकैत छी। भाषाविज्ञानक अनुसारेँ ई बुझि पडैत अछि जे लिपिबद्ध नहि भेलाक कारणेँ ओकरा भाषामे बहुत परिवर्तन भेल ताहिसँ ओ बहुत किछु आधुनिक मैथिलीक रूप धारण कए लेने अछि। प्रारंभिक कालकेँ 800 ई. ल’ जएबाक कोनो तेहन युक्ति नहि भेटैत अछि। एहि प्रकारेँ सम्प्रति मध्यकालमे जयकान्त बाबूक प्रारंभिक मैथिली साहित्य ओ मध्यकालीन मैथिली साहित्य दुनूकेँ सन्निहित क’ देल गेल अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’ केँ मैथिलीक सभसँ प्राचीन उपलब्ध गद्य ग्रंथक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। एहि भाषामे प्रोत्साहन एवं विकास तत्कालीन नृपतिगणक सहयोगक फलस्वरूप भेल। एहिमे अनेक कवि एवं लेखक लोकनिक प्रादुर्भाव भेलासँ साहित्यक अभिवृद्धिमे सहायक सिद्ध भेल। वस्तुतः साहित्यक प्रारंभ ओ विकास एहिठाम केन्द्रित भ’ जाइत अछि। ताहिसँ 1800 ई. सँ वर्तमान काल मानवामे समुचित कारणक आभाव भेटैत अछि। ओ आधुनिक कालकेँ दू भागमे विभाजित करैत छथि। 19म शताब्दी धरि मैथिलीमे जतेक ग्रंथ सभक चर्चा भेटैत अछि ओहि पर भाषा एवं वाक्यविन्यासक दृष्टिएँ 18म शताब्दीक छाप बुझि पड़ैत अछि। परन्तु 20म शताब्दीमे आबि कए क्रमशः एकर प्रयास भेलैक जे जतए जे छटा भेटलैक ओकरा ग्रहण कए मैथिलीक कायाकल्प कएल जाए। एहि विभिन्नताक मुख्य कारण राजनीतिक थिकैक। (5) एहि काल विभाजनसँ मिलैत-जुलैत विभाजन श्री भोलालालदास ‘मिथिला मिहिर’क मिथिलांक मे सेहो कएलन्हि अछि जकर समानता एहि विभाजनसँ अछि। (6) मैथिली साहित्यक मूर्द्धन्य विद्वान आ प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुभद्र झा अपन शोध प्रबंध ‘Formation of Maithili Language’ मे सेहो काल-विभाजन करबाक प्रयास कएल अछि। हिनक विभाजनमे सेहो कोनो मतसँ साम्य नहि भेटैत अछि, अतएव एकरा स्वतंत्र विभाजन कहल जा सकैछ। हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि: (I)        प्रारंभिक कालक मैथिली                      A.D 1000        सँ     A.D 1300 (II)       मध्यकालीन मैथिली                A.D 1300         सँ     A.D 1800 (III)                          आधुनिक मैथिली                    A.D 1800         सँ     अद्यतन। आलोचक क अनुसारेँ डॉ. झा मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास 1000 ई. पश्चाते मानैत छथि। संभव ई मानि जे ‘वर्णरत्नाकर’ मे प्रयुक्त भाषा ओकर रचनाकाल 300 ई. पूर्व विकसित भेल छल। परन्तु की मिथिला-भाषा विकासक प्रक्रियाकेँ बुझबाक हेतु ‘चर्यापद’ क भाषा सहायक सिद्ध नहि भ’ सकैछ? एहि प्रकारेँ डॉ. झा 1000 ई. पूर्वक रचना पर ध्यान नहि रखलन्हि अछि। 1800 ई. धरि मध्यकाल मानबाक हुनक आधार की अछि तकरा स्पष्ट सेहो नहि केने छथि। डॉ. झा काल विभाजनक क्रममे साहित्य परंपरा पर ध्यान नहि दए भाषाक विकासक दृष्टिएँ देखबाक प्रयास कएलन्हि। मैथिलीक प्रारंभिक काल विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ एवं ‘कीर्तिपताका’ सँ  मानैत छथि। एहि प्रकारेँ ओ अपन निबंधमे लिखने छथि—“Hence as the display the genius of the language they are termed pro to Maithili or Maithili at the earliest stage of its development.” वर्णरत्नाकरसँ कृष्णजन्म धरि मध्यकालीन मैथिलीकेँ उदारहणस्वरूप उपस्थित करैत छथि। ‘कृष्णजन्म’ जकर भाषावलोकन कएलासँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे मनबोधक शैली 18म शताब्दीक प्रतिनिधित्व करैत अछि। जखन कि प्रारंभिक मैथिली एवं मध्यकालीन मैथिलीभाषामे सभ्यता आबि गेल तखन आधुनिक मैथिलीक रूप धारण क’ लेलक। एहि प्रकारेँ एकर उद्भव एवं विकास 19म शताब्दीकेँ मानि सकैत छी। ई कहबामे कठिनता अछि जे कोन युगमे एहि साहित्यक कोन रूप छल एवं कोन स्थितिमे छल मुदा एतबा धरि अवश्य जे प्रत्येक युग अपन युगक छाप लैत अछि। मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध समालोचक स्व. प्रो. रमानाथ झा मैथिली साहित्यक काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मनतव्य डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ रचित ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’क भूमिकामे उपस्थित करैत छथि जे— “काल विभाजनक समस्यापर कोनहुँ आचार्यक मतसँ हमरा संतोष नहि अछि।” हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि: (क)             विद्यापति युग- कृष्ण काव्य युग अथवा प्राचीन युग (ख)             चन्दा झा युग – कृष्ण काव्य युग अथवा नवीन युग। समालोचक लोकनिक मतेँ निश्चित रूपेँ उपर्युक्त काल-विभाजन रचना पद्धतिक आधार पर समीचीन होइतहुँ सर्वांगपूर्ण नहि कहल जाएत, कारण मैथिली साहित्यक बहुत रास रचना एहि काल विभाजने नहि आबि सकत जेना ‘चर्यापद’, ‘वर्णरत्नाकर’ आदि। चन्दा झाक युगसँ पूर्वक समस्त मैथिली साहित्यकेँ प्राचीन युग मानब उचित नहि बुझना जाइत अछि। (8) डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’ मे काल विभाजनक प्रसंगमे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि: (1) आदिकाल, प्राक् ज्योतिरीश्वर काल अथवा अपभ्रंश युग—ई. पू. प्रथम शतकसँ 1300 ई. धरि (2) विद्यापति युग—1300 सँ 1860 (क) विद्यापति युग—1700 (ख) उत्तर विद्यापति युग—1700 सँ 1860 (3) आधुनिक काल—1860 सँ अद्यःपर्यन्त (क) वातावरण निर्माण—1860 सँ 1880 (ख) चन्दा झा युग—1880 सँ 1930 (ग) नव-नव विकासक युग—1930 सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचक लोकनिक अनुसारेँ हिनक मत बहुत अंश धरि समीचीन एवं तर्कपूर्ण बुझना जाइत अछि। (9) डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’ एवं मेघातिथिक छद्म नामसँ “मैथिली साहित्यक प्रमुख कविक मैथिली कविताक विकास” शीर्षकमे निम्न तर्क प्रस्तुत कएने छथि: (I)     आदिकाल     1100  सँ 1556 ई. धरि (II)    मध्यकाल    1556 सँ 1857 धरि (III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचकक अनुसारेँ हिनक दृष्टि शुद्ध  साहित्यैतिहासिक होएबाक चाही मुदा से नहि अछि। हिनक विभाजनसँ ‘चर्यापद’ मैथिलीक विवेच्य वस्तु नहि रहि जाइत अछि, आ 1100 ई. धरि तँ एहन कोनो कृत्ति नहि अछि जकरा आधार मानि 1100 ई. सँ आरंभिक  काल मानल जायत.....। डॉ. झा काल सीमाक विभाजनमे डॉ. जयकान्त मिश्रसँ प्रभावित बुझि पड़ैत अछि; यद्यपि समग्र रूपेँ ओहो साहित्यिक विकासक मर्म  केँ अनुभव करैत अवश्य प्रतीत होइत छथि। प्रो. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’ मे उपरोक्त विभाजनक संशोधन करैत निम्नरूपेँ प्रस्तुत कएने छथि: (I)     आदिकाल     1300  सँ 1555 ई. धरि (II)    मध्यकाल    1555 सँ 1857 धरि (III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त। (10) स्वर्गीय डॉ. राधाकृष्ण चौधरी अपन पुस्तक ‘A Survey of Maithili Literature’ मे निम्न रूपेँ काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मत व्यक्त कएने छथि: (I) Early Maithili Literature   900-1350 A.D (II) Middle Maithili Literature            1350-1830 A.D (III) Early Maithili Literature  1830- till dated। समालोचकक अनुसारेँ प्रो. चौधरी, अपन काल विभाजनक हेतु सेहो प्रस्तुत कएने छथि मुदा तकर विश्लेषण कएलासँ ओ सभ समीचीन नहि बुझना जाइत अछि। 1830 ई. सँ आधुनिक युगक आरंभ मानबामे कोनो ठोस कारण नहि भेटैत अछि। ने तँ तत्कालीन कोनो साहित्य उपलब्ध अछि आ ने मिथिलामे एहन कोनो राजनीतिक अथवा सामाजिक घटनाक सूत्र प्राप्त होइत अछि, जकर मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे प्रभाव पड़ल हो। (11) डॉ. दिनेश कुमार झा ‘मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास’ नामक अपन पुस्तक मे काल विभाजनक प्रसंगमे अपन निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि: (I) आदिकाल/आधारकाल 800 सँ 1350 ई. धरि (II) मध्यकाल 1350 सँ 1857 धरि (III) आधुनिक काल- (क)             ब्रिटिश काल 1857 सँ 1947 धरि (ख)             स्वतंत्रता काल 1947 सँ अद्यःपर्यन्त। डॉ. झा आदिकालक आरंभ सिद्ध साहित्यसँ, मध्यकालक आरंभ विद्यापतिक रचनासँ आ आधुनिक कालक आरंभ अंग्रेज सभक द्वारा राज्य स्थापना एवं नवीन शिक्षाक फलस्वरूप जीवनक नव परिस्थिति उत्पन्न भेला तथा साहित्यक ‘स्पिरिट’ बदलि गेलासँ एवं अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय साहित्यक मैथिली साहित्यपर प्रचुर प्रभावसँ मानैत छथि। हिनक मत समालोचकक अनुसारेँ बहुत अंश धरि तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक एवं समीचीन अछि। ई शुद्ध राजनैतिक दृष्टिसँ काल-विभाजन कएने छथि, मुदा आदिकालमे हुनक ओ दृष्टिकोण काज नहि कएलन्हि तहिना आधुनिक कालकेँ ब्रिटिश काल आ स्वतंत्रताकालकेँ भागमे विभक्त करब, उचित नहि बुझाइत अछि। 1947मे भारत अवश्य स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ ऐतिहासिक दिशान्तर भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि। (12) डॉ. बालगोविन्द झा ‘व्यथित’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’मे मैथिली भाषा ओ मैथिली साहित्यक सुदीर्घ परंपरा कए देखि इतिहासमे काल-विभाजन एकर समस्त उपलब्ध कृत्ति, कर्ता, पद्धति ओ विषयकेँ ध्यानमे राखि निम्न रूपेँ कएल अछि: (I) प्राचीन काल 700 सँ 1325 ई. धरि (II) मध्यकाल 1325 सँ 1860 धरि (III) आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त। (13) डॉ. नित्यानंद झा ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे अपन मत एहि प्रकारेँ व्यक्त कएने छथि: (I) पूर्व विद्यापति काल           800 ई. सँ 1350 ई. धरि (II) विद्यापति काल                1350 सँ 1700 ई.धरि (III) उत्तर विद्यापति काल         1700 सँ 1900 ई.धरि (IV)आधुनिक काल                  1900 सँ अद्यःपर्यन्त। प्रो. सोमदेव ‘मैथिली भाषा ओ साहित्य’ शीर्षक निबंधमे एहि रूपेँ कहलनि जे मैथिली साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन जँ उपलब्ध सामग्री, प्रवृत्ति, एवं मोड़क दृष्टिएँ कएल जाय तँ एहि प्रकारेँ होएबाक चाही: (I)प्राचीनकाल        8म शताब्दीसँ 1870 ई.धरि (II) मध्यकाल        1870 ई.सँ 1936 ई. धरि (III)नव जागरणकाल— (क)             स्वतंत्रतापूर्व         1936 सँ 1947 ई. धरि (ख)             स्वतंत्रता उपरान्त    1947 सँ 1986 ई. धरि (ग)              जनचेतना युग       1986 सँ प्रारंभ। प्रो. धीरेन्द्र ‘मैथिली प्रकाश’ नवम्बर 1986मे काल विभाजनक प्रसंगे कहैत छथि: (I)आदिकाल 800 सँ 1324 ई. (II) ज्योतिरीश्वर युग 1324 सँ 1412 ई. (III)विद्यापति युग 1412 सँ 1527 ई. (IV)उत्तर विद्यापति युग 1527 सँ 1860 (V)आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त। (क) पुनर्जागरण युग 1890 सँ 1925 (ख) नवयुग 1950 सँ अद्यःपर्यन्त। समालोचक प्रो. झाक विद्यापति युग ओ उत्तर विद्यापति युगक मतसँ सहमत छथि, परन्तु ज्योतिरीश्वर नामसँ एक एक पृथक युगक कल्पनाकेँ उचित नहि मानैत छथि। कारण ‘वर्णरत्नाकर’ सन अमूल्य ग्रंथकारक रचना करितहुँ ओ कोनो विशेष परंपराक स्थापना नहि क’ सकलाह। 1956 सँ नवयुग मानव सेहो अनुचित कहैत छथि, किएक तँ 1950 मे भारत अवश्य पूर्ण रूपेँ स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ विशेष उल्लेखनीय ऐतिहासिक दिशान्तर उपस्थित भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि। (15) प्रो. प्रेमशंकर सिंह ‘वैदेही’क 1963 ई., जनवरी-मार्च अंकमे ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे नवीन दृष्टिकोणसँ काल-विभाजन प्रस्तुत कएने छथि: (I)अपभ्रंश काल 1000 ई. सँ पूर्व (II)प्रारंभिक युग 1100 ई. सँ 1556 ई. (III)मध्य युग 1556 ई. सँ 1857 ई. (IV)आधुनिक युग 1857 ई. सँ अद्यःपर्यन्त। अपभ्रंश युगकेँ मैथिलीक पूर्व पीठिका मानि सकैत छी। अपभ्रंशकालक अनेक रचनासँ  हमरा लोकनिक साक्षात्कार होइत अछि। अतः भाषाक आधार पर ओकर नामकरण प्रारंभिक कालक पूर्वमे राखल गेल। तथापि एकर अपभ्रंश साहित्य सर्वदासँ समृद्धशाली रहल अछि। एहि युगक ‘प्राकृत पैंगलम’ सदृश अपूर्व ग्रंथ प्राप्त होइत अछि। ‘चर्यापद’ एवं सिद्ध लोकनिक सेहो अनेक रचना सभकेँ एहि कोटिमे राखल जा सकैत अछि। दिल्लीक बादशाह अकबर जखन सिंहासन पर बैसलाह तँ भारतक राजनैतिक स्थितिमे महान परिवर्तन भेल। एहि समयमे मिथिलाक शासनक भार पं. महेश ठाकुर केँ भेटलन्हि, तथा दिल्ली केन्द्रसँ मिथिलाक साहित्यक सेहो महान परिवर्तन भेल। गीति युगक अवसान भेलाक फलस्वरूप मैथिल विद्वानक ध्यान कीर्तनिञा नाटक लिखबा दिस विशेष भेल, परन्तु एहि नाटक सभमे गीत सभक समावेश भेल ओ पाण्डित्यपूर्ण ओ वर्गीय होमए लागल। म. म. उमापति सँ लए कए वर्तमान युगमे कवीश्वर हर्षनाथ धरि मैथिली नाटकक इएह रूप देखल जाइत अछि। 1854  ई. सँ मैथिली साहित्य मध्य नवीन युगक प्रादुर्भाव होइत अछि। 1857 क पश्चात् देशमे एक नव-जागरणक संचार भेल। सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण सँ एहि सालक नाम इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। एकर नेतृत्व नवीन शिक्षित बुद्धिजीवी वर्गक हाथमे रहल। एहि सालमे भारतमे राजक्रांति भेल जकर फलस्वरूप एकर प्रत्येक क्षेत्रमे परिवर्तन भेल। अतएव भाषा एवं साहित्यक क्षेत्रमे परिवर्तन अवांछनीय नहि कहल जा सकैछ। अतएव नवीन दृष्टिकोणकेँ ध्यानमे राखि मैथिली साहित्यक आधुनिक  कालक प्रारंभ 1857 सँ मानबा मे आपत्ति नहि होमक चाही। मुदा प्रस्तुत विभाजन केँ ल’ कए मैथिली साहित्य मध्य एकगोट आविष्कारक विषय बनि गेल अछि। म. म. जी एवं जयकान्त बाबू आधुनिक कालक प्रारंभ 1860 सँ मानैत छथि, एवं कुमार श्री गंगानंद सिंह तथा भोलालालदासक मतानुसारेँ 1800 ई. मानल गेल अछि। डॉ. जयकान्त बाबू अपन तर्क प्रस्तुत करैत कहैत छथि जे , 1860 मे मिथिलाक शासक ‘कोर्ट ऑफ वर्डस’क अधीन चलि गेल  तकर फलस्वरूप भाषा-साहित्य नवरूप धारण कए लेलक, एहिमे हिन्दीक साक्षात् प्रभाव देखना जाइत अछि, जे रवीन्द्रक कवितासँ प्रभावित भए श्री सुमनजी कविता लिखल। एकर अवलोकनसँ साक्षात् ज्ञात होहत अछि जे देशी एवं विदेशी दुनू दृष्टिएँ एकर प्रभाव मिथिलाक आध्यात्मिक जीवन पर पड़ल। मुदा 1857 सँ आधुनिक युगक प्रारंभ मानबाक सबल प्रमाण भेटैत अछि। अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोणसँ सेहो पर्याप्त छैक। एहि क्रांतिक प्रधान कारण छल जे एहि सँ व्यक्तिक स्वतंत्रताक अभ्युदय हो। एक दिस तँ  ई लोकनि अपन प्राचीन सांस्कृतिक सुरक्षा लेल उत्सुकता देखौलन्हि तँ दोसर दिस ओहि सांस्कृतिक परंपराक सुरक्षा एवं विकासक हेतु सचेष्ट रहलाह। समग्र रूपेँ विचार कएला उत्तर निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ, जे मैथिली साहित्यक मध्य आधुनिक कालक बड़ पैघ महत्व छैक, एतेक दिन धरि भाषा-साहित्य अन्हारमे टापर-टोइया दैत छल मुदा आधुनिक कालमे आबिकए ई नवीन रूप धारण कए लेलक। आधुनिक काव्यक प्रारंभमे चन्दा झाक नाम लेल जाइत अछि। चन्दा झा मैथिलीमे नवयुगक प्रवर्त्तक छलाह। वर्तमानमे मैथिली कवितामे शैली एवं भावधाराक दृष्टिएँ महान परिवर्त्तन भेल। नवीन युगक पदार्पण भेलासँ कविता कामिनी अपन नैसर्गिक सुषमाक भारकेँ वहन करबा मे असमर्थ भेलीह एवं ओकरा संग अग्रलेखक एवं पाठकक अभिरूचि एवं  मनोरंजनक हेतु उपन्यास साहित्य पर विशेष जोर देल गेल। एहि सभ दृष्टिकेँ ध्यानमे राखि 1857 सँ आधुनिक कालक प्रारंभ मानब उचित हैत। -गजेन्द्र ठाकुर यू.पी.एस.सी.-४ मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली) ३. अवहट्ठ अपभ्रंश जखन समापनपर छल तखन मोटामोटी एगारहमसँ चौदहम शताब्दी धरि “अवहट्ठ” साहित्यिक भाषाक रूपमे उपस्थित रहल। मैथिलीसँ एकर निकटताक कारण एकरा “मैथिल अपभ्रंश” सेहो कहल गेल आ ई अपभ्रंशक प्रकारक रूपमे सेहो मर्यादित रहल। विद्यापतिक स्वयं कीर्तिलता आ कीर्तिपताकाक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि मुदा ताहूसँ पूर्व एहि शब्दक प्रयोग भाषाक सन्दर्भमे पहराज केने छथि “पाउअकोस”मे। अद्दहमाण अपन कृति संदेशरासकमे आ वंशीधर प्राकृत पंगलम् क टीकामे अवहट्ठक भाषाक रूपमे उलीख कएने छथि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ”। अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारोपाक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। खास कऽ विद्यापतिक अवहट्ठमे मैथिली वर्तनीक इकार, ओकार, आ अनुनासिकक बदलामे “कचटतप”वर्गक पाँचम अनुनासिक वर्णक प्रयोग देखबामे अबैत अछि मुदा हुनकर अवहट्ठ भाषामे  कखनो काल बुझाइत अछि जे ई भाषा खाँटी मैथिली अछि तँ कखनो एहिमे प्राकृत, फारसी, गुजराती-सौराष्ट्री अवधी आ कोशली भाषाक शब्दावलीक बेशी प्रयोग भेटैत अछि। आ सैह कारण रहल होएत जे हुनकर अवहट्ठ सर्वदेशीय (राजशेखर कहै छथि “विश्व-कुतुहली”) बनि सकल। एकर दूटा देवनागरी पाण्डुलिपि दू ठामसँ- गुजरातक स्तम्भतीर्थमे आ उत्तर प्रदेशक फतेहपुर जिलाक असनी गाममे भेटल आ एकटा मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि नेपालसँ भेटल।  ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठ (अवहट्ठ) केँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि।  दामोदर पंडितक “उक्ति व्यक्ति प्रकरण”  सेहो कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती अछि मुदा पुरान अवधी आ पुरान कोशलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि आ अवहट्ठसँ लग अछि। संगे ईहो सत्य जे कीर्तिलता आ कीर्तिपताकामे विद्यापति अवहट्ठक कतेको प्रकारसँ प्रयोग करै छथि। पहिने तँ ई अपभ्रंशक पर्यायक रूपमे प्रयुक्त होइत छल मुदा जेना जेना अपभ्रंशक विशेषताकेँ ई छोड़ैत गेल आ आधुनिक भारतीय भाषाक व्याकरणिक विशेषताक, खास कऽ मैथिलीक व्याकरणिक विशेषताक आधार बनऽ लागल तखन ई अपभ्रंशसँ पृथक् अवहट्ठक रूप लेलक। एकर प्रमुख व्याकरणिक विशेषता अछि- स्वर संयोग, क्षतिपूर्तिक लेल दीर्घीकरण, व्यंजनक अपन खास विशेषता, रूपक विचार ( लिंग-वचन), निर्विभक्तिक प्रयोग, कारक-परसर्ग, कारक विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण, सार्वनामिक विशेषण, क्रिया, कृदन्त, आज्ञार्थक, पूर्वकालिक, संयुक्त क्रिया, क्रिया विशेषण, शब्दावलीक विशेषता, पूर्व स्वरपर स्वराघात, स्वर सानुनासिकतामे परिवर्तन, अकारण सानुनासिकताक प्रवृत्ति, एक संग अनेक स्वरक प्रयोग, अक्षर लोप, परसर्गक स्थानपर मूल शब्द, सर्वनामक प्रचुरता, क्रियापदक विकास आ वाक्य रचना। अवहट्ठ भाषामे जैन धर्मसँ सम्बन्धित रचना ढेर रास अछि आ ओहिमे शौरसेनीक प्रभाव अछि।अवहट्ठक मुख्य क्षेत्र छल मान्यखेत, गुजरात, बंगाल आ मिथिला। जैन धर्मसँ सम्बन्धित लोक मुख्य रूपसँ मान्यखेतमे रहथि। “वज्जालग्ग” श्वेताम्बर मुनि जयवल्लभ द्वारा संकलित सुभाषितक संग्रह छथिजाहिमे अवहट्ठक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि।शालिभद्र सूरीक “भरतेश्वर बाहुवली रास”, एकटा दोसर शालिभद्र सूरीक “पंच पाण्डव चरित”, स्थूलिभद्र रास, जयशेखर सूरीक “नेमिनाथ फागु”, सकलकीर्तिक “सोलह कारण रास”क अतिरिक्त मौखिक काव्य जेना बैद्ध सिद्ध साहित्य, डाक, धर्ममंगल काव्य, शून्यपुराण, माणिकचन्द्र राजार गान, लोरिकाइन जनक मध्य आएल। अवहट्ठक बाद ब्रजबुली द्वारा राय रमानन्द, शंकरदेव आ चैतन्यदव लोकभाषाक माध्यमसँ जन धरि पहुँचलाह। अवहट्ठक प्रभाव ब्रजबुली आ मैथिलीपर पड़ल। द्वारा  बारहम शताब्दीक डाकार्णव नेपालमे रचित अछि जकर लिपि मिथिलाक्षर आ भाषा अवहट्ठ अछि। मिथिलामे कर्णाट आ ओइनवार राजवंशक कालमे अवहट्ठमे रचना कएल गेल।सिद्ध साहित्य, बौद्धक दोहाकोश-चर्यागीत आ ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे अवहट्ठक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल छल। मुनिराम सिंहक पाहुड दोहा आ बौद्ध धर्मक वज्रयानक ग्रन्थमे सेहो अवहट्ठक रूप देखबामे अबैत अछि। दामोदर पंडितक उक्तिव्यक्तिप्रकरण अवहट्ठमे रचित अछि, ई संस्कृत सिखेबाक ग्रन्थ अछि। बारहम शताब्दीक पूर्वार्धमे उद्दहभाण “संदेश रासय”क रचना कएलन्हि, रचयिता स्वयं एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि। प्राकृत् पैंगलम् -जे छन्दशास्त्रक संकलन अछि आ जकर संकलनकर्ताक नाम अज्ञात अछि- क टीकाकार सेहो एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहि सम्बोधित कएने छथि। विद्यापतिक कीर्तिलता आ कीर्तिपताका सेहो अवहट्ठमे रचित भेल। अवहट्ठक अपभ्रंशसँ व्याकरणिक भिन्नता आ मैथिलीसँ सन्निकटता: दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ; पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। संस्कृतक ऐ, औ क्रमसँ अइ, अउ ध्वनि बनि गेल आ ओहिसँ किछु आर स्वर बहार भेल। संस्कृतक बादबला भाषा खास कऽ मध्यकालिक भाषामे लगातार दू वा तीन स्वरक प्रयोगसँ ध्वनि आ लेखन दुनूमे विचित्रता आएल। आधुनिक भाषाक लेल आवश्यक छल जे पुनः व्यंजनक बेशी प्रयोग कऽ, तत्समक बेशी प्रयोग कऽ पूर्वस्थिति आनल जाए, जाहिसँ उच्चारण आ लेखन सरल भऽ सकए। क्रियाक अन्तमे आ आन पदक सभ स्थानमे स्वरकेँ संयुक्त करब प्रारम्भ भेल। एहिमे “ऐ” आ “औ” अवहट्ठक विशेषाता रूपमे परिगणित भेल। जेना टुट्टै=टूटै, गुण्णइ=गुणै, पइ=पै, रहइ=रहै, करउ=करौ, चअउर=चौरा, दुण्णउ=दूणौ, तउ=तौ, आअउ=आऔ। ऋ एहि तीन रूपमे ध्वनित होमए लागल। र्+अ, र्+इ , र्+उ आ मध्य रूप माने रि (र्+इ) एहि रूपमे स्थिर होमए लागल। जेना अमृत= अमिअ एहिमे मृ=मि भऽ गेल अछि। स्वरमे किछु आर परिवर्तन भेल। शब्द प्रारम्भक स्वरक दीर्घ होएब स्वाभाविक लगैत अछि, जेना आँचल=आँचर। स्त्रीलिंगमे अन्तिम आ लुप्त होमए लागल जेना भिक्षा=भीख। स्वरक बहुलताबला शब्दमे सन्धि आ लुप्तीकरण बढ़ल, जेना धरित्री=धरती, उपआस=उपास। अपभ्रंशक अंधआर=अंधार (संधि) बनि गेल। कज्ज=काज बनि गेल (दीर्घ) अंचल=आँचर (अनुनासिक) व्यंजन ओहिना रहल मुदा ण कम आ ञ बेशी प्रयोगमे आबए लागल आ ड़, ढ़ ई दुनू नव व्यंजन आएल। क्ष=क्+ष बदलि कऽ ष्ख होमए लागल। न आ ल मे सेहो पर्याय बनल जेना नहिअ=लहिअ आइ काल्हि सेहो मैथिलीमे लोर आ नोर दुनू बाजल जाइत अछि। उ सँ अन्त होमएबला संज्ञा रहल मुदा अ, आ, इ, ई, ऊ, ऐ ,ओ सेहो संज्ञाक अन्तमे आबए लागल। न्हि अन्तिममे लगा कऽ बहुवचन बनेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, जेना युवराजन्हि। द्विवचन खतम भऽ गेल आ तकर बदला बहुवचनक प्रयोग भेल आ ताहि लेल सव्वउं (सभ)क प्रयोग प्रारम्भ भेल। लिंगसँ विशेषणक रूप परिवर्तन आ लुप्तविभक्ति-निर्विभक्तिक प्रयोग बेशी होमए लागल। विशेषणक रूप परिवर्तित भेल। जेना अइस, एत्ते, कतहु, पहिल, चारु। कारकक विभक्तिक संग सन, सउं, क, माझ, केर, लागि आदिक प्रयोग होमए लागल। पश्चिमी अवहट्ठमे विभक्तिक प्रयोग घटल मुदा पूर्वी अवहट्ठमे ए, हि विभक्तिसँ ढेर रास काज लेल गेल। सर्वनाम कर्ता लेल हौ, तोञ, सो आ संबंध लेल मोञ, तुम्ह, तिसु प्रयुक्त होमए लागल। क्रियामे करउँ, करसि, करथि प्रयुक्त होमए लागल। कृदन्त रूपमे पढ़न्ता, चलु, उपजु, गेल, भेल, कहल, मारल, चलल, करहुं, कहसि, जाहि, पावथि  प्रयुक्त होमए लागल। संयुक्त काल जेना आवत्त हुअ प्रयुक्त होमए लागल। भविष्यत् कालक पूर्वी रूपमे व लगैत छल आ पछबरिया रूपमे ह लगैत छल। क्रियाविशेषणमे जनु, नहु,बिनु अबस प्रयुक्त होमए लागल। पूर्व स्वरपर स्वराघात, जेना: अक्खर= आखर। सर्वनामक संख्यामे वृद्धि भेल। क्रियापदमे विकासक फलस्वरूप कृदन्तक प्रयोग वर्तमानकालमे बेशी होमए लागल। आब वाक्यमे शब्दक स्थानक निर्धारण आवश्यक भऽ गेल। मोटामोटी कर्ता, कर्म आ आखिरीमे क्रिया राखल जाए लागल। संयुक्त कालक प्रयोग सेहो आरम्भ भेल। शब्दक पहिल अक्षरक स्वरक दीर्घ होएबाक प्रवृत्ति अवहट्ठमे बेशी अछि, स्त्रीलिंग शब्दमे शब्दक अन्तिम अक्षरक आ लुप्त होमए लागल। अनुनासिक शब्दक संख्यामे वृद्धि भेल। संज्ञाक लंग आ वचन तँ दुइयेटा रहल मुदा एकवचनक प्रयोग बहुवचनमे होमए लागल।प्रातिपदिक अधिकांशतः स्वरान्त अछि आ अकारान्त सेहो।विभक्तिक बदलामे परसर्गक प्रयोग होमए लागल। अपादान लेल हुंते, सउँ प्रयोगमे आबए लागल आ अधिकरण लेल माँझ, उप्परि आ एहि दुनू (अपादान आ अधिकरण) लेल कखनो काल चन्द्रबिन्दु टासँ काज चलि गेल, “हिं” विभक्ति सेहो कतेको कारकक लेल प्रयुक्त भेल आ “ए” विभक्ति सँ कर्म, करण, अधिकरण सभटाक भान होमए लागल। संज्ञाक एहि तरहक सरलीकरण सर्वनाममे सेहो देखबामे अबैत अछि। क्रियाक निर्माणमे सरलता आएल आ से भेल कृदन्तक बेशी प्रयोगसँ आ संयुक्त क्रियाक बढ़ोत्तरीसँ। भूतकाल “ल” लगा कऽ सेहो बनए लागल, आ भविष्यत् काल “व” लगा कऽ सेहो, जेना थाकल, पढ़ब जे बादमे मैथिलीमे सेहो आएल। पूर्व स्वरपर स्वराघात आ स्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरण अवहट्ठक मुख्य विशेषता अछि। अपभ्रंशक अक्खर, ठक्कुर आ नच्चइ क्रमसँ आखर, ठाकुर आ नाचइ भऽ गेल। स्वरक सानुनासिकतामे परिवर्तन भेल जाहिसँ पुरान निअममे परिवर्तन भेल। पहिने स्पर्श व्यंजनमे अनुस्वारक अभाव छल आ कचटतप क पाँचम वर्ण तकर बदलामे संयुक्त भऽ प्रयुक्त होइत छल। अपवादमे य सँ ह धरिक वर्णक उपस्थितिअहिमे अनुस्वार लगैत छल। पूर्व स्वरपर स्वराघात आ क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त युक्ताक्षरक पूर्वस्वरपर स्वराघातक संग अनुस्वार आबए लागल, जेना- ऊसास/ आंग/ आँकुस/ आँचर/ काँट/ लाँघि/ पाँच/ चाँद/ आँगन/ क्रमसँ उस्सास/ अंग/ अंकुस/ अंचल/ कण्टक/ लघ्/ पंच/ चन्द्र/ अंगण/ क बदलामे आबि गेल। स्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त अनुस्वारकेँ ह्रस्व कएल जाए लागल आ आधुनिक मैथिलीक अकारण आनुनासिकताक प्रवृत्तिक आरम्भ भेल, जेना- कज्ज=काँज, कच्चुः=काँच, भग्ग=भाँग, ओष्ठ=ओंदिम। अक्षर लोप: संकोच वा अक्षर लोपक कारणसँ अन्धकार=अन्हार, देवकुल= देउर, देवगृह=देवहा, कोट्टशीर्ष=कोसीस, उपवास=उपास, उत्तिष्ठ=उँट, सहकार=सहार, स्वर्णकार=सोनार, सुन्नाअर=सुन्नार, सहयार=साहार भऽ गेल। परसर्गक प्रयोगमे वृद्धि: अपभ्रंशक परसर्गक प्रयोगमे अवहट्ठ कालमे आर वृद्धि भेल। जेना- कर्ता- एन्ने करण-सन, सउं सम्प्रदान-लागि, लग्गि, लागे, प्रति, कारण अपादान-सओ, हुत, हुते, हुंति, सिउ संबंध- केर, कर, के, करेउ, कइ, क अधिकरण- माझ, ऊपर, माँझ, भीतर, माहि सर्वनामक आधिक्य: कीर्तिलतामे जेन्ने, आ आन ठाम मोर, मेरहु, तोरा, तोहार, तोहर, तोरा आदि सर्वनामक प्रयोग प्रारम्भ भेल। संबधवाचक सर्वनाम- जञोन, जेन्ने, जस, जसु, जे; प्रश्न वाचक- केहु, कोए; अनिश्चयवाचक- कोइ, केहु; निजवाचक- अपन, अपनेहु, निअ आदिक प्रयोग होमए लागल। कृदन्तक प्रयोग क्रियापदक विकसित रूप: आब कृदन्तक प्रयोगमे वृद्धि भेल जेना भूतकालक कृदन्तक प्रयोग वर्तमान जेकाँ होएब आ कखनो काल अपन पूर्ण रूपमे सेहो होएब। वर्तमान लेल कृन्तक प्रयोग पढ़न्ता, कहन्ता, आवन्ता; भविष्यत् काल लेल करहुं, करिहि आ भूतकाल लेल कृदन्तक प्रयोग जेना चलु, लागु क प्रयोग भेल। “अन्त” सँ आधुनिक “ता” निकलल अछि आ “अन्त” क प्रयोग बढ़ि गेल। संयुक्त क्रियाक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल- जेना “ले” जोड़ि कऽ क्रिया बनाएब “खाइले”; सामर्थ्यसूचक पार आ आरम्भसूचक चाह/ लागु क प्रयोग आरम्भ भेल। ४.मैथिली ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठकेँ “मैथिल अपभ्रंश” ताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक “कीर्तिलता” अवहट्ठमे अछि, मुदा “चर्या गीत” आ “वर्ण रत्नाकर” कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि। भारोपीय भाषा परिवारमे मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। ध्वनि: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। पानि-पाइन-पैन अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च तखन प्रश्न उठैत अछि जे “छथि” केँ छैथ लिखबामे की हर्ज? हर्ज अछि, कारण मिथिलाक बहुतो क्षेत्रमे छथि, छथी, पानि, पानी, पहुँचि, पहुँची सेहो बाजल जाइत अछि। से पानि, रहथि, पहुँचि लिखलासँ सभ क्षेत्रक प्रतिनिधित्व होइत अछि। आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै अ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मन=मोन, वन=बोन (वर्तुल) अ कखनो काल आ भऽ जाइत अछि, जेना- फंदा=फान, चन्द्र=चान (स्वराघात) घर=घऽर (उच्चारण) (स्वराघात) बुद्ध=बुद्धऽ (उच्चारण) (स्वराघात) घमसान=घमऽसान (दीर्घक पहिनेक ह्रस्व स्पश्ट उच्चरित- स्वराघात) “इ” क पहिने “आ” रहलापर “ऐ” उच्चरित होइत अछि- जेना पानि=पैन, मुदा विभिन्न क्षेत्रमे पानी, पानि बाजल जाइत अछि तेँ वर्तनीमे पानि, आगि लिखब उचिते अछि। आ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि, जेना काका=कक्का। इ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना रिवाज=रेबाज। ऋ कखनो काल इ/ ई/ ऊ भऽ जाइत अछि जेना कृष्ण=किसुन, पृष्ठ=पीठ, वृद्ध=बूढ़। अन्तमे “ई” क बदलामे इ लिखल जाइत अछि। ऋ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि जेना- वृषभ=बसहा, अहृदी=अहदी। उ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना दुकान=दोकान ऊ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मूल्य=मोल। अए कखनो काल ए भऽ जाइत अछि जेना कएलनि=केलनि। ऐ कखनो काल अइ/ अए भऽ जाइत अछि जेना भैया=भइया, पैर=पएर। आ+ओ कखनो काल औ भऽ जाइत अछि जेना गमाओल=गमौल। क कखनो काल ख/ ग भऽ जाइत अछि जेना पुष्करि=पोखरि, भक्त=भगत। ष कखनो काल शब्दक प्रारम्भ वा अन्तमे रहलापर ख भऽ जाइत अछि जेना षष्ठी=खष्ठी, भेष-भूषा=भेख-भूखा। क्ष कखनो काल ख भऽ जाइत अछि जेना क्षीर=खीर। ज्ञ कखनो काल ग भऽ जाइत अछि जेना यज्ञ=जाग। ग कखनो काल घ भऽ जाइत अछि जेना गर्ग=घाघ। त्य कखनो काल च भऽ जाइत अछि जेना सत्य=साँच। त्स्य कखनो काल छ भऽ जाइत अछि जेना मत्स्य=माँछ। य कखनो काल शब्दक प्रारम्भमे रहलापर ज भऽ जाइत अछि जेना यम=जम। द्य कखनो काल ज भऽ जाइत अछि जेना विद्युत=बिजुली। ध्य कखनो काल झ भऽ जाइत अछि जेना वंध्या=बाँझ। त कखनो काल ट भऽ जाइत अछि जेना कर्तन=काटब। न्थ कखनो काल ठ भऽ जाइत अछि जेना ग्रन्थि=गेंठ। द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दण्ड=डाँट। त कखनो काल लुप्त भऽ जाइत अछि जेना जाइत=जाइ। स्त कखनो काल थ भऽ जाइत अछि जेनाप्रस्तर=पाथर। द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दाह=डाह। ध कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर दह भऽ जाइत अछि जेना गधा=गदहा। ल कखनो काल न भऽ जाइत अछि आ न कखनो काल ल भऽ जाइत अछि जेना नोर=लोर। प कखनो काल फ भऽ जाइत अछि जेना पाश=फाँस। फ कखनो काल “प” आ “ह” भऽ जाइत अछि जेना बेवकूफ=बेकूफ। ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना शैबाल=सेमार। म्भ कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना खम्भा=खमहा। म्ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना कम्बल=कम्मल। ल कखनो काल र भऽ जाइत अछि जेना हल=हर। व कखनो काल भ भऽ जाइत अछि जेना वाष्प=भाप। ह कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर लुप्त भऽ जाइत अछि जेना गेलाह=गेला। त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारी (ऽ -संस्कृतमे एकरा अवग्रह आ बांग्लामे जफला कहल जाइत अछि) क बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। मैथिलीक मात्रात्मक आघातमे ह्रस्व स्वरपर आघात पड़लापर ओ दीर्घ भऽ जाइत अछि।शब्दमे जौँ दीर्घ स्वर रहत तँ आघात ओहिपर, दीर्घ नहि रहत तँ उपान्त्य स्वरपर आ जतए दूटा दीर्घ लगातार अछि ओतए सेहो उपान्त्य दीर्घपर आघात पड़ैत अछि।पा’नि, ओसा’रा। बलात्मक आघात सेहो गपपर जोर देबा काल प्रयुक्त होइत अछि जेना- अपन=अप्पन। जाहि स्वरपर आघात पड़त तकर पूर्वक सभ स्वर ह्रस्व भऽ जाइत अछि। मैथिलीक उच्चारण आ लेखनक विशेषता: १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, कऽ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। ११. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाइत अछि- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

१२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाइत अछि: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

१३. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाइत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

१४. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाइत अछि जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

१५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

१६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

१७. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाइत अछि, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाइत अछि। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

१८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाइत अछि। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

१९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाइत अछि वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

२०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘कऽ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

२१. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

२२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाइत अछि।

२३. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाइत अछि, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

२४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाइत अछि, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाइत अछि। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

२५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा कऽ लिखल जाइत अछि, हटा कऽ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाइत अछि, यथा घर परक।

२६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाइत अछि। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

२७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाइत अछि।

२८. समस्त पद सटा कऽ लिखल जाइत अछि, वा हाइफेनसँ जोड़ि कऽ ,  हटा कऽ नहि।

२९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी -संस्कृतमे एकरा अवग्रह आ बांग्लामे जफला कहल जाइत अछि- (ऽ) नहि लगाओल जाइत अछि।

३०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाइत अछि।

३१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जएबाक चाही। जा ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाइत अछि। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाइत अछि। मैथिली व्याकरणक विशेषता: मैथिलीक विकास बौद्ध सिद्ध आचार्य, फेर कर्णाट आ ओइनवार राजवंश, मल्ल राजवंश आ मध्यकालक मैथिली आ आधुनिक मैथिलीक तथाकथित मानक आ पूब, पच्छिम, उत्तर, दक्षिण भिन्नताक अनुसार परिवर्तित होइत रहल अछि आ मैथिली व्याकरण एहि सभ विशेषताकेँ संग लऽ कऽ चलैत अछि। मैथिलीमे सभ शब्द स्वरांत, अ वृत्ताकार, ए, य, ऐ, यै, ओ, औ ई सभ स्पष्ट उच्चरित होइत अछि। सम्बन्ध कारक लेल सँ, क, केर (बेशी पद्यमे प्रयुक्त) प्रयुक्त होइत अछि। संज्ञा रूप कम-सरल (एकवचनसँ बहुवचन करबा लेल सभ आदि जोड़ि दियौ) मुदा क्रिया-धातुरूप बेशी होइत अछि। आदर आ अनादरपूर्ण प्रयोगमे क्रियापदमे परिवर्तन होइत अछि। मैथिलीमे क्रियाक रूप कर्ता आ वाक्यक दोसर संज्ञा, सर्वनाम (कर्तासँ सम्बद्ध) द्वारा निर्धारित होइत अछि। मैथिलीमे क्रिया पुरुष-भेदक अनुरूप बदलैत अछि। मैथिलीमे ब द्वारा भविष्यत् कालक अलाबे क्रियार्थी संज्ञा सेहो बनाओल जाइत अछि। ल प्रयुक्त कए कृदन्त कहल, गेल मे परिवर्तन मैथिलीक विशिष्टता अछि। मैथिलीमे शब्दक भिन्न-भिन्न वर्णपर बलाघात होइत अछि। मैथिलीमे कारक विभक्तिसँ ओना तँ तिर्यक रूप नहि देखबामे अबैत अछि, जेना गामक, मुदा सम्बन्ध कारकमे ई अपवाद अछि, जेना साँझ-साँझुक। क्रियार्थ संज्ञा रूपमे सेहो तिर्यक रूप होइत अछि। संज्ञा:कोनो वस्तुक नाममे लघु, गुरु आ गुरुतर ई तीन रूप होइत अछि- मनोज्, मनोज, मनोजबा। लिंग:लिंगरूप सरल अछि। निर्जीवक लिंग पुल्लिंग भऽ गेल अछि। संज्ञामे लिंगसँ शब्दक रूप परिवर्तन नहि होइत अछि मुदा विशेषण आ क्रियामे होइत अछि। वचन:संज्ञामे वचनक भिन्नतासँ परिवर्तन नहि होइत अछि। लोकनि, रास आदि शब्द जोड़ि कऽ तकर बोध कराओल जाइत अछि। “हम” एकवचन अछि आ “हमसभ” बहुवचन। विभक्ति:करण -ए- जेना काजे। अधिकरण- आँ-हि- जेना परुकाँ, चोट्टहि । कारक: कर्ता- रिक्त, कर्म- केँ, करण- सँ, संप्रदान- लए, अपादान- सँ, संबंध-क, केर(पद्यमे), अधिकरण—मे। सर्वनाम:उत्तम पुरुष- हम, हमे मध्यम पुरुष- तूँ, तोँ, अहाँ, अपने, ई अन्य पुरुष-ताहि, तकरा, तकर, हुनका, हुनि, ओकरा, हुनकर, ओकर, हिनका, एकर, हिनकर, जाहि, जकरा, जकर, के, की, ककरा, अपन, कोन, किछु, केदन, केहनदन, कोनादन, एतबा, कतबा, ततबा, ततेक। क्रियाविशेषण: एतए, कहाँ, कखन, जखन, जाबे, ताबे, आबे, आब, जहिआ, तहिआ, कहिआ, जेना, तेना, एम्हर, ओम्हर, जेम्हर, तेम्हर, भर(दक्षिणभर)। कालबोधक-आइ, काल्हि, परसू, लगले, परुकाँ; स्थानबोधक- जेना आगाँ, पाछाँ; प्रकारबोधक- जेना भने, कने-मने; संयोजक जेना मुदा, आर; सम्बोधन जेना रौ, हौ; समुच्चयबोधक जेना ईह, छी; बलद्योतक जेना –ए ; नहि, भरिसक आदि विविध क्रियाविशेषण होइत अछि। उपसर्ग: अ, अन, अध, अब, दु, नि, भरि, कम, ब, बद, बे, सर। प्रत्यय: अक्कड़, अंत, इल, आइन, आइ,आउ, आकू, आन, आना, आप, आयत, आर, इन, बाह, आरि, आरी, आहु, औन, इअल, इआ, ई, गर, ऐत, ओड़, ओला, औटी, औती, ओना, औबिल, क, त, औत, आइ, बान, म, बला, हार, हा, ई, कार, बाह, आनी, खाना, खोर, गरी, ची, बाज। विशेषण:एहिमे आदर आ लिंगक अनुसार परिवर्तन होइत अछि।सिलेबी, गोल, चर्की ई गाए-बड़द लेल प्रयुक्त होइत अछि आ विशेषणसँ प्राणिक बोध भऽ जाइत अछि। पढ़ल (पुल्लिंग) आ पढ़लि (स्त्रीलिंग), मझिला छौड़ा-माँझिल भाइ(आदर)। क्रिया: वचन भेद मैथिली क्रियामे नहि होइत अछि।पुरुषक अनुसार क्रियामे भेद अबैत अछि। आदर प्रदर्शनमे सेहो क्रियारूप बदलैत अछि।तिङन्त मे लिंगभेद नहि होइत अछि मुदा कृदन्तमे लिंगक अनुसार क्रियापद बदलि जाइत अछि। क्रिया कारकक अनुसार बदलैत अछि। एहि प्रकारसँ क्रिया देखि कऽ मात्र ई पता लागत जे कर्ता आदरणीय अछि वा नहि, क्रियाक कर्म कोन पुरुषमे अछि आ आदरणीय अछि वा नहि। क्रियाग चारि रूप जेना स्वयं मरब (मरैत अछि), मारब (मारैत अछि), दोसरासँ मरबाएब (मरबैत अछि) आ कर्मवाचानुसार ककरो कहि कऽ मरबाएब (मरबबैत अछि)- होइत अछि। धातुरूप- मैथिलीमे लगभग १२२५ धातुरूप दीनबन्धु झा संकलित कएने छथि जे पाणिनीक २००० धातुसँ कनिये कम अछि। आ यैह १२२५ टा धातु मैथिली भाषाक स्वतंत्र अस्तित्वकेँ असगरे बनओने रखबा लेल पर्याप्त अछि। किछु उदाहरण: छक- अविरोधपूर्वक अन्‍यक्रियासँ दबब अर्थमे- रूपलाल फुल तोड़बामे सोनेलालसँ छकलाह-जीतल गेलाह। ठक- परतारब, वञ्चना- ठक बुड़िबककेँ ठकैत अछि- ओकर वस्‍तु लए लेबाक हेतु भ्रम उत्‍पन्न करबैत अछि। डक- अपन उत्‍कट गन्‍धक प्रसारण- हीँगु डकैत अछि-अपन तीव्र गन्धक प्रसार करैत अछि। ढक- मिथ्‍या अपन अतिप्रशंसा करब- जयलाल ढकैत छथि-अपन मिथ्‍या अति प्रशंसा बजैत छथि। बक- अश्रव्‍य बहुत बाजब- जयलाल बकैत छथि- नहि सुनबाक योग्‍य कथा बहुत बजैत छथि। मक- हर्षसँ मालक धावनक्रीड़ा- बाछा मकैत अछि, लीलसँ एम्हर ओम्हर दौगि रहल अछि। बाल्मीकि द्वारा सुन्दरकाण्डमे मानुषिमिह संस्कृताम्- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषाक ज्ञान हनुमानजीसँ कहबाओल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- “पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ” संगहि ज्योतिरीश्वर द्वारा सात “उपभाषक” चर्च भेल अछि। प्राकृतक कैकटा प्रकार छल। ओहिमे मागधी प्राकृत मैथिली आ अन्य पूर्वी भारतक भाषाक विकासमे योगदान देलक। अर्धमागधीमे जैन धर्मग्रन्थ आ पालीमे बौद्ध धर्मग्रन्थ लिखल गेल। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा दोसर प्राकृतसँ विकसित भेल सेहो देखि पड़ैत अछि।  अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारूपक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। १.धीरेन्‍द्र कुमार- कथा- अहींक लेल २.नन्‍द वि‍लास राय- चौठचन्‍द्रक दही कथाक ३.सतीश चन्द्र झा, हमहूँ कहाँ बुझलियै ४.बचेश्‍वर झा-कथा-संगति‍ ५.जगदीश प्रसाद मंडल-अतहतह कथा शेषांश- १. श्री धीरेन्‍द्र कुमार, नि‍र्मली कथा अहींक लेल- “धीरेन्‍द्र जी, अपनेक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍?‍”- रि‍तु बाजि‍ चुकल छलीह। हम सहज भावे मुसकाइत छी। हमरा अहाँक शि‍काइत नीक जकाँ बुझल अछि‍ हम जनैत छी जे अहाँ कहब यएह ने, मि‍ठाइ नै खुऔलहुँ। हम अहाँक ई शि‍काइत बहुत दि‍न पहि‍नेसँ सुनैत आएल छी आ हम इहो जनैत छी जे बतक्कर बेसी छी। यएह एकटा पैघ कारण अछि‍ जहि‍ कारणे हमहुँ बोल्‍ड होइत बजैत छी- “शि‍काइत कएक ढकि‍या एक वा चारि‍?‍” “नै हमरा सभकेँ शि‍काइत अछि‍‍” “शि‍काइत की अछि‍ बाजू?‍” “एतऽ नहि‍ डेरापर कहब।‍” “एतए कहैमे कोन अचरज अछि‍?‍” “नै, कोनो ‍खास नै, तैयो डेरेपर कहब।” हम स्‍वभावि‍क रूपे एहि‍ पश्‍नकेँ टारैत छी। “कोर्सेज आॅफ स्‍टडी भेटत।‍” “नै तँ।‍” “हे, यौ अम्‍बि‍का बावू कतए रखने छि‍ऐक कोर्सेज आॅफ स्‍टडी?‍” “अहींक कोठलीमे तँ रखने छी।‍” अम्‍बि‍का अहाँसँ बाजल छल। हमर प्रश्‍न छल- “‍आइ हम अहींसँ भेँट करए जाइत रही। कतए जा रहल छी अहाँ?” “झंझारपुर।‍” “कहि‍या अाएव?‍” “सोम-मंगलकेँ।‍” “ठीके छै बहुत रास गप करबाक अछि‍। आउ अहाँ तखनहि‍ गप होएत।‍” ई गप्‍प बाजि‍ हम वि‍दा भेल रही आ अनि‍ल अहाँ सेगे गप्‍प कए रहल छल। अहाँक ई गप्‍प मोन होएत आ हमर आग्रह अछि‍ जे अहाँ ई गप अबस्‍स मोन राखब। एकतीस मार्च उनैस सए सतहत्तरि‍। दि‍नके दस बाजि‍ कऽ बीस मि‍नट भऽ रहल अछि‍। हम अहाँक डेरासँ बहरा कऽ सड़कपर आबि‍ चुकल छी आ अनि‍र्णीत स्‍थि‍तमे अपनामे मर्मान्‍ति‍क टीसकेँ भोगैत सोचैत छी कोम्‍हर जाउ। मन होइछ जे सि‍करेट धूकी, खूब धूकी आ एकांतमे जा कऽ घूमी। हमर सौंसे देह जरि‍ रहल अछि‍। सड़कपर ठाढ़ भेल एहि‍ ठामक सड़कक संगे जुटल आत्‍मीयताकेँ खंडि‍त होइत देखि‍ रहल छी। हमरा मन भऽ अबैत अछि‍ बरखाक ओ राति‍ जहि‍या मास्‍टर सहाएव अपन कोठलीसँ बहरा गेल छलाह आ फाटक बन्न करैत काल हमरासँ अहाँ पूछि‍ रहलि‍ रही- “आइ तँ हाथ मारि‍ लेलहुँ?‍” अहाँक प्रश्‍न छल। मन होएत ओहि‍ साँझ नीक अछार भेल रहैक! “कामन एररमे, प्रीपोजि‍शनमे नहि‍।‍” हम कहने रही आ अहाँसँ वि‍दा लेने रही। ओहो सड़कपर हम ठाढ़ छी। आ ओहि‍ फाटककेँ ताकि‍ रहल छी। ओहि‍ दि‍न पहि‍ल बेर हम अपनाकेँ नहि‍ चि‍न्‍ह सकल रही आ हमरा अपन मूहेँठ टेढ़ लागि‍ रहल छी। लगैत छल, हमरा आगाँ धीरेन्‍द्र नहि‍, क्‍यो आन व्‍यक्‍ति‍ आबि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। ओहि‍ काल हमरा स्‍थि‍ति‍क आभास भेल छल हमरा दू-चारि‍ व्‍यक्‍ति‍ हमर एहि‍ अन्‍यमनस्‍कतापर कि‍छु सोचि‍ रहल अछि‍ तेँ बि‍ना कि‍छु सोचने टीशन दि‍स वि‍दा भऽ गेल छी। हम नहि‍ चाहैत छी जे हमरा एखन क्‍यो टोकए। हमरा अहाँ सभ एकसर जाए दि‍यऽ। आइ हमर आस्‍था खंडि‍त भऽ गेल अछि‍। हम अहाँसँ पूर्ण परि‍चि‍त छी। अहाँकेँ मन होएत जे हम अहाँ संगे तीन मास बि‍ता चुकल छी। अहाँकेँ इहो मन होएत जे समस्‍तीपुरमे एहि‍ तरहक गप उठल छल। अहाँ उद्वि‍ग्‍न रही आ हमहूँ। ओहि‍ दि‍न हम ओतेक संत्रस्‍त नहि‍ रही, जतेक आइ ओहि‍ दि‍न हम आरोपि‍त रही दोसरासँ, मुदा आइ हम अपन भीतर उठैत धाहकेँ शांत करए लेल ‘छोटी सी बात’ फि‍ल्‍म देखए गेल रही। ओहि‍ आरोपक प्रति‍ आक्रोशमे हम दुनू गोटे संग रही, मुदा आइ हम एकसर छी। एक जोड़ा ताड़क गाछ रहैक। एक दि‍न दुनू अपना अपनामे मग्‍न छल। नर ताड़केँ कि‍छु नि‍न्न सन लागि‍ गेल रहैक ओ अपना आँखि‍ क्षपकबैत छल आ मुदा ताड़ रानी सरंगाक गीत गाबि‍ सुनाओ रहलि‍ छलीह। आगाँमे एकटा कनही ताड़ रहैक। अकस्‍मात ओ कनही ताड़ भभा कऽ हँसि‍ पड़लि‍। मादा ताड़केँ नर ताड़पर क्रोध अएलै आ ओ ओकरे आगाँ गरि‍याबए लागलि‍। बेचारा नरताड़ चुपचाप सभ कि‍छु सुनैत रहल। ओकर बोली अँटकि‍ गेल रहैक। ओकरा मुँहेँठपर आन्‍हीसँ पहि‍ने रहएबला तटस्‍थता रहैक। ओहि‍ राति‍ दुनूमे कि‍छु कहा-सुनी नहि‍ भेलैक। ओ नर-ताड़केँ खीस लहरैक जे अपन मादा ताड़क मादे बहुत कि‍छु सनैत आएल छल मुदा आइ आँखि‍ क्ष्‍पकयबाक अर्थ कनखी बूझि‍ क्रोधक पुट देखि‍ ओ भीतरसँ काँपि‍ उठल छल। ओहि‍ दि‍नसँ ओ नर ताड़ सुखए लागल नदीक कातमे रहि‍तो हमहूँ सएह पीड़ा भोगि‍ रहल छी। हम जनैत छी, अहाँकेँ ई खि‍स्‍सा मन नहि‍ लागत मुदा अर्थ बुझबैक, कहक तात्‍पर्य अबस्‍स बुझबैक, से हमर वि‍श्‍वास अछि‍ ओना आउ, हम एकटा आर उदाहरण अहाँकेँ दैत छी- ‍राजा अकबरक नाम बुझल होएत। बुझल अि‍छ ने?.... ओ एकटा डाँरि‍ पाड़ि‍ देलखि‍न आ बि‍रवलसँ कहखि‍न- “बि‍रवल, इसे छोटा बनाओ?‍” बि‍रवल ओकरे आगाँ एकटा पैघ ओकरासँ डाँरि‍ खींचि‍ देलखि‍न। अकबरक प्रयोजनक पूर्ति भऽ गेलैक। ओ डाँरि‍ अपने छोट भऽ गेलैक। आ, ओहि‍ना अहाँ हमर नजरि‍मे भऽ चुकलि‍ छी आ अहाँमे हम। मुदा, ओहि‍ दि‍न अहाँ पैघ भऽ गेल छलहुँ। लोकसँ आरोपि‍त भेनो अहाँ अडि‍ग रही। एकर यएह कारण छल जे हम-अहाँ ‘फ्रेक’ रही। मुदा आइ की भेल? एहि‍ गपमे कोनो कमी नहि‍ जे हम अहाँक आभारी नहि‍ छी। एहि‍ बीच हम अहाँक हाथे कमसँ कम सए गि‍लास चाह पीने हएव। अहीं रही हम ओतेक पढ़ैत रही अन्‍यथा ओ पढ़ाइ हमर बसक बाहरक गप्‍प छल। समस्‍तीपुर रीतू, नीतू, मीतू संगे कएक बेर चाह पीबि‍ चुकल छी। अहाँ जनैत होएव जे एतेक भेलापर की हम कृतघ्‍न भऽ सकैत छी? अहाँ मोने यएह ने भऽ सकैत छी तेँ अहाँ हमरासँ ओ गप्‍प कहलहुँ आ हम पीबि‍ कऽ रहि‍ गेलहुँ। बेस, हम अहाँक गप्‍प मानि‍ गेलहुँ तखैन अहाँ एहि‍ वि‍न्‍दुपर आउ की जँ हम वएह रहि‍तहुँ तँ कि‍ अहाँक ई उत्तर- “धीरेन्‍द्र जी, अहाँक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍।‍” हम भेँट करए जैतहुँ? अनि‍लेकेँ शि‍काइत छल तँ ताहि‍खन टीशनपर अहाँ सोझाँ कि‍एक ने ओ बाजल? आब जाहि‍ खन हमरा ई सभ बात मन अबैत अछि‍, हम छटपटाए लगैत छी। हमर मोनमे रहि‍-रहि‍ कऽ यएह गप्‍प अबैत जाइत रहैत अछि‍। ई गप्‍प जाए बेर अबैत-जाइत अछि‍ हम अपनाकेँ दर्शकक बीच अखाढ़मे चि‍त्त भेल पहलमान जकाँ लगैत छी। आ, नीतूक मुहेँठ हमरा आगाँ आबि‍ जाइत अछथ्‍। “अनि‍ल मुँह जबानी कहनो रहए आ चारि‍ पेजमे पत्रो लि‍खने छल। हम कहने रहि‍ऐक जे हमरासँ हुनाक गप्‍प नहि‍ होइत अछि‍? मीतूसँ कहबनि‍, गप्‍प करए लेल।‍” निीतूक ई वाक्‍य हमर मर्मपर छेनीक चोच करैत अछि‍। जाए बेर चौट करैत अछि‍ ताए बेर हमर रूप वि‍कृत होइ चल जाइत अछि‍। ओहि‍ दि‍न टीशन दि‍स अबैत काल अशोकसँ भेँट कएने रही। हमरा अशोकोपर खीस छल। ओकरा कि‍शोररि‍या आ शंकरि‍या आगाँ कहने रहि‍ऐक- “सार, तोँ अाइदोकानसँ बहरा! हम तोरा की कहने रहि‍यौ जे तोँ अनि‍लसँ कहने रही?‍” ओ बेचारा हतप्रभ छल। हम अपन ‘टेम्‍पर’मे अंट-संट बजैत रही। ओ हमरा संगे कि‍रि‍या खएने छल जे अनि‍ल जहि‍या आओत, हम ओकरासँ पुछबैक आ जहि‍या उनटि‍ जाएत ओकरा पि‍टबै धरि‍ अबस्‍स। अहाँकेँ पता होएतजे एम्‍हर की भेलैक। पता अछि‍ ने? आर तँ आर, दस तारि‍ख धरि‍ जँ अनि‍ल भेटि‍ जाएत हम ओकरा पकड़ब आ नहि‍ तँ लोहना जाएब। ओकर घर। अाब हम की कहू? हम तँ ताकमे छी। मुदा आगाँ जे होइक हम अपन सफाइ नहि‍ देब। आब आस्‍था-अनास्‍थाक प्रश्‍न अहाँपर पूरा नि‍र्भर अि‍छ। अहाँकेँ जे मोन हुअए से करू। हमरा आन्‍तरि‍क पीड़ा जे भोगक अछि‍, भोगब। हँ, पहि‍ने अहाँकेँ हमरा प्रति‍ शि‍काइत छल, मुदा आब हमरा अहाँक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍, शि‍काइत अछि‍ यएह जे अहाँ वि‍श्‍वास कोना कएलहुँ। जँ यएह गप होइतैक। हम वएह समस्‍त पुरवला गप्‍प चन्‍दरदेव बाबूक मादे कहि‍तहुँ नहि‍। तैयो अहाँकेँ हमरापर अवि‍श्‍वास भेल तेँ हजार बेर धन्‍यवाद। हम ई अबस्‍स कहब- “कानसँ सुनल गप्‍पसँ जखन आस्‍थासँ अहाँ हटए लागू अहाँ अपन भीतर ओही अएनामे ताकू अहाँकेँ फोटो नहि‍ भेटत जे अहाँ आगाँ बनल छल नहि‍ चि‍न्‍हि‍ सकब तँ अहाँक आन्‍दर हृदयक ओहि घावसँ ठेकि‍ जाइत जे तखने फोँका सन उठल होएत अहाँ भरि‍सक कानि‍ उठब एकर उनटा जँ अनास्‍थामे अएनामे ओहि‍ मुँहेँठकेँ ताकब जे बहुत पहि‍नेसँ बनल अछि‍ तखन घृणास्‍पद अबस्‍स बूझि‍ पड़त मुदा आँखि‍मे डोलबैत भावकेँ देखि‍ भीतरक दाह समाप्‍त भऽ जाएत।‍” अहाँ भले एकरा उपदेश मानी मुदा, तथ्‍य यएह अछि‍। कि‍न्‍तु- “‍अहाँसँ बेसी हम झरकल छी एहि‍ आगि‍मे नीतूक मूहेँठ जखन आएल अछि‍-मूर्त्त भेल अछि‍ जाहखन हम अपन भीतर गुरि‍ल्‍ला-संघर्ष करैत रहैत छी तर्क-वि‍तर्कक घेरामे अपन धाह दैत देहपर मर्यादाक खेल ओढ़ि‍ बीच सड़कपर आएल छी चुप छी ओढ़ने छी अपनेसँ छक्‍कारैत अहाँक नास्‍थाक प्रश्‍नपर अपनाहि‍मे मर्माहत मर्यादाक खोलमे हमर आक्रोशसँ उठल हाथ अर्थहीन-सन नपुंसक सन डोलि‍ गेल एहि‍ अन्‍हार गलीमे जतए जे सोचैत छी जे बजैत छी ओहि‍मे अहाँक अनास्‍थाक प्रति‍घ्‍वनि‍ होइत अछि‍ जे एकटा पैघ भीड़क हल्‍लामे परि‍णत भऽ जाइत अछि‍।” हमर दाहकेँ अहाँ अहाँ नहि‍ बूझि‍ सकैत छी। ई एकरे पि‍णति‍ अछि‍ जे हम एक बजे राति‍ धरि‍ लीखि‍ रहल छी। हमरा अहाँ सबहक मुहेँठ मोन पड़ैत अछि‍ आ र्नि‍दोष होइतो मोन पड़ैत अछि‍ आ नि‍र्दोष होइतो मन नहि‍ होइत अछि‍ जे अहाँ आगू जाइ। अहाँ की सोचैत होएब? ओ की सोचैत होएतीह एहीमे हम फँसल मर्माहतक पीड़ा भोगि‍ रहल छी। आब हम कन्नहुँ ने अहाँ लग जाएब। अहाँसब हमरा गारि‍ पढ़ू आ भऽ सकए तँ आगाँ पड़ने हमर मुँह नोचू। यएह अहाँ लेल सार्थक होएत। पहि‍ने, एकतीस मार्च उन्नैस सए सतहत्तरि‍सँ पहि‍ने नीतू, मीतू सीतू ‘तों’ रही, आत्‍मीय स्‍तर छल मुदा आब, कि‍एक तँ अहाँक शि‍काइत हमरा बड़ मोन पड़ैत अछि‍- “धीरेन्‍द्र जी, अहाँसँ एक शि‍काइत अछि‍?‍” “की?‍” “अहाँ हमरा आ अनि‍ल मादे की कहने रहि‍ऐक अशोकसँ?‍” “अशोक? कोन अशोक?‍” “बजारक क्‍यो छैक?‍” “अशोक साहु, नहि‍ तँ....‍” “हमरा अहाँसँ ई उम्‍मीद नहि‍ छल।‍” अहाँक ई वाक्‍य हमरा मर्माहि‍त कऽ उठल छल, हम व्‍यथि‍त भऽ कहने रही- “अशोककेँ बजाबी?‍” “नहि‍....‍” अहाँक उत्तर छल। हम बूझि‍ चुकल छलहुँ जे कोनो अहाँ सभक अनि‍ल संगे नाजाएज धंधाक गप्‍प छल। हम कहने रही- “दस धरि‍ जँ अनि‍ल आएल हम अशोक लग अबस्‍स लऽ जाएब‍” आ हम सड़कपर आबि‍ गेल रही। हमर अहाँक आत्‍मीय आ पारि‍वारि‍क सम्‍बन्‍ध टूटि‍ गेल। अहाँ वि‍श्‍वास करू वा नहि‍ ई अहींपर नि‍र्भर अछि‍। अहाँ लेल। अहाँकेँ ई कथा भेटल तेँ हम सन्‍तुष्‍ट छी, मुदा कतेक.....? साभार- मि‍थि‍ला मि‍हि‍र वर्ष १७ द्वि‍तीय आषाढ़ कृषणपक्ष १० शाके १८९९, पटना, रवि, १० जुलाइ, १९७७मे प्रकाशि‍त कथा अहींक लेल। २ नन्‍द वि‍लास राय शेषांश चौठचन्‍द्रक दही कथाक राति‍ नअ बजे दि‍ल्‍लीसँ मंगलक फोन आएल। घरेक बगलमे एक गोटे मोवाइल रखने अछि‍। ओकरे मोवाइलपर सोमनीकेँ फोन अाएल। सोमनी फोनमे मंगलसँ गप केलक। कुशल-समाचारक वाद मंगलवार कहलक- “आइ चौठचन्‍द्र पावनि‍ छी, अहाँसब भरि‍ मोन खीर, पुरी, दही खेने हएब।‍” सोमनी उदास होइत बजलीह- “की भरि‍ मन खएब, दही पौरैले क्‍यो एक्को फुच्‍ची दूध नहि‍ देलक। पोडरक दही लए कऽ पावनि‍ केलौं गऽ मररक खीर रान्‍हैले भजैत एक्के फुच्‍ची दूध देलक। एक फुच्‍ची दूधसँ केहेन खीर हएत।‍” मंगल कहलक- “‍अहाँ मोन जुनि‍ छोट करू, हम फगुआमे गाम अबै छी तँ एकटा नीक लगहरि‍ गाए कीनि‍ कऽ आनि‍ देव। दूध खेबो करब आ बेचवो करब। दूटा पाइ हएत तँ नूनो-तेल चलत। बेटी सभ घास काटि‍-काटि‍ आनि‍ देत।” सोमनीक मन खुश भऽ गेल। फगुआमे मंगल गाम आएल तँ सोमनीकेँ गाए कीनि‍ देलक। गाए अधकि‍लौआ बार्ली डि‍ब्‍बासँ छह डि‍ब्‍बा भोर आ चारि‍ डि‍ब्‍बा दुपहर लगैत छल। जाबे धरि‍ मंगल गाम रहल ताबे ओ अपने गाए दुहाए। जखन मंगल दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल तँ सोमनीए गाए दुहए लगलीह। भोरका दूध बेचि‍ लै आ दुपहरका दूध परि‍वारेमे खाए। बेटी फुलि‍या आ गुलबीया घास आनि‍-आनि‍ कऽ खुअबै। एक दि‍न फुलि‍या लगमावाली खेतक आरि‍पर कनी घास काटि‍ लेलक। तै लऽ लगमावाली फुलि‍या आ ओकर माए सोमनीकेँ बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ कऽ गडि‍़औलक। सोमनी फुलि‍याकेँ मारबो केलक आ लगमावालीसँ गलतीओ मानलक। समए बीतैत देरी नै लगैत छै। आइ कुशी अमवश्‍या छी। पाँचम दीन चौठचन्‍द्र पावनि‍ हएत। कल्‍हि‍सँ दही पौरल जाएत। सोमनी दरबज्‍जापर एम्‍की लगहैर गाए चौठीचान्‍द्र महराज देने छथि‍न। सोमनी सोचलक जे एम्‍की सभ बासनमे नीक जहॉंति‍ दही पौरब। ओकरा पौर सालक सभ गप्‍प मन रहए जे क्‍यो एक्‍को ि‍गलास दूध नइ देलक तँ पोडरक दही लए कऽ पावनि‍ केलौं। मने-मन वि‍चारलक जे हमहुँ ककरो दूध नै देबइ। आइसँ चौठचन्‍द्रक दही पौरल जाएत। भोरे मुसबा लोटा नेने सोमनी एहि‍ठाम दूध लै लए आएल। राधे कहलक- “‍माए गै, पौर साल अपना क्‍यो एक्‍को गि‍लास दूध नै देने रहौ तँइ ककरो दूध नै दे।” सोमनी सोचलक जँ सि‍ग्‍हेसर बाबा लगहरि‍ गाए देने छथि‍। तँ पावनि‍ नामपर सभकेँ कि‍छु ने कि‍छु दूध देबे करब। जत्ते गोटे सोमनी एहि‍ठाम दूध ले आएल सोमनी सभकेँ दूध दऽ वि‍दा केलक। ओकर अपन छवोटा वासन लए मात्र दू गि‍लास दूध बँचल। ओहो काल्‍हि‍ पावनि‍ छि‍ऐ तँ आइ दूपहरक। सोमनी ओही दू गि‍लास दूधकेँ छवो वासनमे दही पौरलक। आइ चौठचन्‍द्र छी भोरेसँ लोक सभ लोटा लए लए सोमनी एहि‍ठाम दूध ले पहुँचल। लगमावालीक बेटी दूखनी सेहो अएल। फूलि‍या सोमनीकेँ कहलक- “माए गै, दूखनीकेँ दूध नै दही। ओकर माए कनि‍ए घासले गि‍रि‍औने रहौ।‍” सोमनी बाजलि‍- “पावनि‍ले सभकेँ दूध देबै। गारि‍ देलक तँ कि‍ भेल एकठाम रहलासँ तँ आहि‍ना लड़ाइ-झगर होइत छै तँ कि‍ ओइ बातकेँ जीनगी भरि‍ रखने रखने रहब ओइसँ कि‍ हएत।‍ अनेरे टेंसन रहत।” सेामनी भोरका समूचा दूध लोककेँ दऽ देलक। ओइ दूधक ककरोसँ पाइओ नै लेलक। दुपहरका दूध दूहि‍ कऽ एक गि‍लास दूध भजैत वि‍तबाकेँ आ एक गि‍लास मालि‍क नूनू बाबू ओहि‍ठाम पठौलक एक गि‍लास अपने रखलक। सॉंझमे जखन ममर लए सोमनी खीर रान्‍हैले बैसलीह तखने बेरमावाली आबि‍ गेलि‍। ओ कहऽ लगलीह- “यै दाइ, हमरा तँ खीर रान्‍हैले दूधे ने भेल। जि‍तबा अखुन्‍का नाओ कहने रहए। मुदा जखन बेटाकेँ दूधले पठौलि‍ऐ तँ नै देलक। आब कथी लऽ कऽ ममरक खीर रान्‍हब?” सोमनी अपनाले जे दूध रखने रहए ओहि‍मेसँ अधा दूध बेरमावालीकेँ देलक। साँझमे सोमनी चौठीचाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलीह- “हे चौठीचाँद महराज, हमरा दरबज्‍जापर एहि‍ना देने रहु तँ हम सभकेँ पावनि‍ लए दूध दैत रहब।‍” ३ सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर, मधुबनी हमहूँ कहाँ बुझलियै- चान! चान! हे यै चान ! सुतले रहब। केबार खोलू ने । हम कुसुम छी। हर्ष खुशी मे डूबल स्वर कान मे पड़िते निन्न खुजि गेल। भोरक किछु हेरायल सपना फेर सँ हेरा गेल..आ हम उठि क’ बैसि गेलहुँ। आँखि मलि क’ दुनू हाथ कें जोरि दर्शन करिते केवार खोलय दौड़ि गेलहुँ। की बात छौ ? एते भोरे ..? प्रश्न पूरा नहि भेल मुदा ओ बाजल दीदी ..आइ हमर वियाह अछि।राति मे बाबू कतौ सँ ठीक कएने अयलै। पाँचमा पास छैक आ दिल्ली मे कोनो काज सेहो करैत छैक। आँहा अवश्य आयब। नहि जानि ओ की की बाजि रहल छल,मुदा हम त ओकर पहिल शब्द ’वियाह’ सुनि ततेक ओझरा गेलहुँ जे किछु आओर नहि पूछि सकलियै आ ओ दौड़ल चलि गेल। .. हँसैत ..एकटा अबोध हँसी . निर्विकार चेहरा ..। मुदा हम! हमर चेहरा तनावपूर्ण। लागल जेना हृदय मे किछु गरम चीज सन्हिया गेल हो आ हमर संपूर्ण रक्त मे एकटा अपरिचित झुनझुन्नी बनि क’ दौड़ि रहल हो .सरपट.. अति तिव्र गति सँ। अचानक शरीरक बोझ उठाबय मे पैर असमर्थ भ’ गेल आ हम धम्म सँ धरती पर बैसि गेल रही।. सुन्न भेल.. मुदा भीतर लट्टू जेकाँ किछु नचैत रहल .. नचैत रहल .. अविराम । नहि जानि कखनो क’ एकटा आश्चर्य एतेक भयभीत कियै क’ दैत छैक .एकर उतर ने तहिया भेटल ने आइ धरि बुझबा मे आयल। मोनक किछु बात कें अभिव्यक्तिक माध्यम एखनो नहि छैक। शब्द त’ किन्नहँु नहि। हँ आँखिक नोर कखनो क’ हृदय मे चुभैत कोनो भावना कें बुझि जाइत छैक। गाम घरक जीवन। छल-प्रपंच सँ बंचित समतल धरती जेंकाँ समटल आचरण जतय छोट-छोट सपना देखि ओकरे परिपूर्ण करबा लेल छटपटाइत आत्मा। ओही श्वच्छ परिवेश मे हम आ हमर कुसुम संगी बनि क’ एखन धरि रहैत छलहुँ। ओ हमर हरबाहक बेटी छल। छोट लोकक बेटी, मुदा तखन ई बात नहि बुझलियै जखन पहिल बेर ओकरा अपन आँगन मे देखि हाथ पकड़ने दौड़ि गेल छलहुँ दलान पर। नेनपन कहाँ बुझि पबै छै जाति पाति आ उच्च निचक बात। ई त’ उमर बढ़ला सँ समाजक व्यवस्था आ मोनक अहं मे लोक भसिया जाइत अछि। मुदा दोस्ती त’ मोनक एक्टा मिठ्ठ संबंध छै एकरा समाज आ परिवार सँ की मतलब। एक बएस के कतौ दू टा अबोध एक दोसर के अँाखि के पढ़ि लेलक आ बन्हि गेल एकटा शब्दहीन संबंध मे। आई फेर नहि जानि कियैक जीवन कें बीतल संपूर्ण हवा बसात मोन मे प्रचंड बिरर्रो उठा देने छल आ हम ओइ मे एकटा छोट फतिंगा जेकाँ उड़ियाइत अपन अस्तित्व कें बचावय मे संघर्षरत छी। यैह त’ जीवन छै- सतत संघर्ष आ अपन अस्तित्वक रक्षा। मुदा कहाँ भेल अस्तित्वक रक्षा। आलोक सँ वियाह भेलाक बाद लागल जेना जीवनक संपूर्ण सपना मुर्त रूप ल’ लेत। स्नेहक संबंध प्राण मे एकटा नव स्फूर्तिक संचार करैत छैक। विचारक धरातल पर पति-पत्नी एक दोसर के सम्मान दैत छैक। मुदा वियाहक दू मासक बादे सभकिछु उल्टा लागय लागल। प्रेमक निर्वाध गति सँ बहैत शीतल जल मे दुर्गंध आबि गेलैक। आलोकक अहं मे अपन अस्तित्व कत’ हेरायल जे एखनो धरि नहि भेटल। पिताक एक मात्र संतान छलहुँ हम। स्नेहक कतौ कमी नहि अनुभव भेल।शिक्षाक मर्यादा सदैव जीवन कें बान्हि क’ रखलक। घरक संस्कार जाति समाज के कठोर बंधन कहियो स्वतंत्रता नहि द’ सकल जे अपन पती सँ विद्रोह क’ सकी आ अपन जीवनक ठमकल दुर्गंधित पानि कें समुद्र मे बहा क’ निर्मल क’ली। आइ बुझाइत अछि जे शिक्षा आरो कमजोरे करैत छैक। लोक की कहत? सम्मान कें रक्षा कोना हैत? समाज मे लोक की की बाजत? सभटा बिचार मोन मे उठिते हम अपना कें बहुत कमजोर अनुभव करय लगैत छी और अपन संपूर्ण व्यथा कें सहर्ष स्वीकार करैत आकाश मे नुकायल देवता सँ मृत्युक वरदान मंगैत प्रतिदिन अपन बान्हल दिनचर्या मे लागि जाइत छी। कमजोर नारिक कमजोर विचार। शिक्षित नारी आ एते कमजोर आत्मविश्वास। जखन क’ ई विचार अबैत अछि त’ मोनक कारी वेदना स्वेत मुखमंडल पर ततेक ने अपन रेखा चित्र खिंचि दैत अछि जे ओकरा भरब असंभव भ’ जाइत अछि। मोनक आँखि सँ फेर किछु देखैत छी त’ लगैत अछि जे  हमर कुशुम कहाँ कमजोर छल। दशमी मे पढ़ैत-पढ़ैत वियाह भेल रहैक। वियाहक बाद एक दू बेर सासुर सेहो गेल। ओकर घरवाला दारू पीबि क’ ओकरा संग बहुत मारि पीट करैत छलैक। एक दिन ओकर सूतल स्वाभिमान जागि गेलैक आ ओकरा छोड़ि देलक। ओ अपन विगत के संपूर्ण पसरल स्याही पर उज्जर पिठार सँ फेर कोबर लीखि लेलक। जीवनक निर्णय लेबा मे ओ कतौ कमजोर  नहि पड़ल। फेर सँ ओ अपन दोसर पतिक संग प्रेम करैत दुनियाँक टेढ़ मेढ़ बाट पर चलि पड़ल। एक दिन हमरो कहलक दीदी अहाँ एतेक कष्ट उठा क’ कोना अपन पतिक संग निर्वाह क’ लैत छी। ओना त’ अहाँ हमरा सँ बेसी पढ़ल लीखल छी। नीक संस्कार अछि। स्वयं कमा क’ खा सकैत छी। तखन कियै?’’ तू नहि बुझबिही’’! ओ चुप भ गेल। मुदा हमहूँ कहाँ बुझलियै ? ओ त कम पढ़ल छल। छोट जाति .. ताहू पर गरीब ..। मुदा हम त पढ़ल लिखल उच्च जाति ..पैघ लोक ..नीक संस्कार! लेकिन कहाँ बुझि सकलियै एकर कारण ? की एकर कारण संस्कार छैक? अथवा सुशिक्षा? पता नहि कोना बुझबै एकर रहस्य । हम एम0ए0 पास क’ क’ नौकरी करबा लेल पिता जी सँ अनुमति चाहैत छलहुँ लेकिन ओ कहलथि जे हम अहाँक विवाह लेल चिन्तित छी। एकटा पिता के सबसँ पैघ बोझ पुत्रीक कन्यादान होइत छैक तैं ओ एहि सँ मुक्त होयबा लेल जतय ततय प्रयत्नशील रहैथ। हमर सहमति त’ एकटा मात्र हुनका लेल स्नेहक अभिव्यक्ति छल जाहि मे कर्तव्यक एकटा निर्वहन सेहो छलैक। हम अपन सहमति स्नेहक प्रतिदान स्वरूप द देलियन्हि। गाम सँ किछु दूर एकटा धनाढ्य पढ़ल लिखल परिवारक एकलौता पुत्र आलोक संग हमर वियाह भ गेल। दान दहेजक मांग नहि सुनि हमर पिता कें लगलन्हि जे आजुक युग मे निश्चय ओ लोकनि भगवान छथि मुदा किछु दिनक बाद ज्ञात भेल जे ओहि भगवानक संपूर्ण आत्मा कलुषित छल। धनाढ्य आ सुशिक्षित नींव मे सौसे दिबार लागि गेल छल आ ओही दिबारक मजबूती लेल हमरा वलिदान देबाक छल। आलोक कें एकटा आओर वियाह भ’ चुकल छलन्हि। संभवतः पाच छः साल पूर्वहिं मुदा संतान नहि होयबाक कारणे अपन वंश आ अहंकारक गाछ के आगाँ बढ़ाबय लेल एकटा सुशिला कन्याक खोज रहन्हि। तखन हमरे संग प्रपंच भेल। जीवनक एक एकटा नुका क’ पौती मे राखल हमर सुन्दर कल्पना हेरा गेल। आ हेरा गेल हमर संपूर्ण अस्तित्व जकर रक्षा करब हमर बसक बात नहि रहल। एकटा हारल मनुक्ख। मात्र बच्चा पैदा करबा लेल आनल गेन छल । इच्छा वा अनिच्छा  किछु कतौ नहि । अपन घर नहि । अपन किछु सपना नहि। विद्रोह करबा लेल हिम्मति नहि एकदम कमजोर ..हम ..चान। मुदा हमर संगी कुसुम .. अपन जीवनक उतार चढ़ाव मे अपन अस्तित्व एखनो धरि बचौने ..खुब होसगर आ ठोस कुशुम। ४ बचेश्‍वर झा- नि‍र्मली, सुपौल। कथा संगति‍ प्राय: जीवनक आरंभसँ आइ धरि‍ अनेक प्रकारक लोकक संगति‍ पाप्‍त भेल अछि‍। संगति‍क कारणे कटु-मुधु दुनू तरहक अनुभव भेल, मुदा एहनो अनुभव भेल जे जीवन पर्यन्‍त मोन रहत। हम जाहि‍ मोहल्‍लामे रहैत छलहुँ ओहि‍ बगलमे कोशीक सरकारी काँलोनी छल। सरकारी सेवक लोकनि‍ ओहि‍मे रहैत छलाह। पड़ोसि‍याक कारणे हेम-क्षेम नीके छल। खास कऽ अमीन सहाएवसँ वेशी आपकता रहए कि‍एक तँ ओ एकान्‍तवासी जीवन वि‍तौनि‍हार रहथि‍। आन्‍तरि‍क खीचाव बुझू अमीन सहाएबक संगति‍ सायं प्रात: लागू छल। अमीन सहाएव कंजूशक शि‍रोमणि‍ रहथि‍। सोलह आना दरमाहा बचएबाक चेष्‍टा करथि‍। एक साँझ कि‍छु बना एक पाबि‍ लथि‍ अन्‍यथा अधि‍कांश राति‍ चूड़-फक्की करथि‍ कहबाक तात्‍पर्य एक-आध मुट्ठी चूड़ा फाँकि‍ कए रहि‍ जाथि‍। ई रहस्‍य बड़ थोड़ लोक जनैत छलन्‍हि‍। अपन एहि‍ कमजोरीकेँ ओ गप्‍पक आवरणसँ अनभि‍ज्ञ लोककेँ लखे नहि‍ देथि‍। यएह कारण छल जे सम्‍पूर्ण क्वाटरमे एकसरे रहैत छलाह दोसरकेँ संग राखव वा रहए देब मान्‍य नहि‍ छलन्‍हि‍। कार्यरतलोक अमीन सहाएवसँ फराक रहबाक प्रयास करथि‍ कि‍एक तँ केहनो अगुताएल लोक अमीन सहाएवक गपौढ़ामे लटपटा जाइत छलाह। हमहूँ जखन उदास आ कार्य रहि‍त अपनाकेँ पबैत छलहुँ तखने हुनका अह्लादपूर्ण आबाजमे टोकैत रहि‍यन्‍हि‍ आ ओहो भाव बूझि‍ मनलग्‍गू गप कहए लागथि‍। टेंसगर चाह हुनके मुँहसँ सूनल अछि‍। सायं-प्रात: चाह एक कप हुनका पि‍आयब आ चाह चलि‍साक पाठ हमरा सभकेँ अभ्‍यास बनि‍ गेल छल। संयोगवश! एक मास्‍टर सहाएव कतहुसँ ओहि‍ मोहल्लामे एलाह। हुनका डेराक प्रयोजन भेलन्‍हि‍। बगएवानि‍ तँ खटाशे सन रहनि‍, मुदा वि‍द्या वि‍भूषण रहथि‍। मोहल्‍लाक लोक नेनाक हेतु उपयुक्‍त बूझि‍ मास्‍टर सहाएव हेतु डेराक ताकमे घुमथि‍। मास्‍टरो सहाएव एकसरे रहथि‍ तेँ आपकताक आकर्षक तँ नहि‍, मुदा वि‍वशताक बन्‍धनमे आवि‍ संग रहए पड़लनि‍। कि‍छु दि‍नक पश्‍चात् एक दोसरकेँ रूमेट कहए लगलाह। जखन दुनूमे सहबासक सि‍नेह बढ़लनि‍ तँ मास्‍टर सहाएव स्‍वयं पाकी होएबाक प्रस्‍ताव रखलनि‍। अमीन सहाएव भवि‍ष्‍यक लाभ सोचि‍ कऽ तैयार भऽ गेलाह। शुरूमे तँ पाक काज दुनू मि‍लि‍ कऽ करथि‍। बादमे मास्‍टर सहाएव भानस बनाएब अमीने सहाएवपर छोड़ देलखि‍न। मास्‍टर सहाएव ठीक भानसक समए पूजाक आसन पकड़ि‍ लथि‍। एहि‍ बीच ज्‍याै अमीन सहाएव कि‍छु पूछथि‍ तँ मास्‍टर सहाबक हूँ!, हूँक शब्‍द अमीन सहाएबक लेल अंकूशक काज करनि‍। मोने मोन गुम्‍हरि‍ कऽ अमीन सहाएव रहि‍ जाथि‍। एहि‍ बीचमे जौं केओ अपरि‍चि‍त लोक आबि‍ जाथि‍ तँ मास्‍टर सहाएवक पूजका अवधि‍ बढ़ि‍ जाइत रहनि‍ संगहि‍ मन्‍त्रोचार जोड़-जोड़सँ करए लागथि‍। आगाँक परसल अन्न गर्गट भऽ जाइन्‍ह अमीन सहाएवकेँ पि‍त्त लहरि‍ जाइन। तखन ओ अर्दर बाजए लागथि‍। आडम्‍वरी पूजाक अन्‍त कऽ मास्‍टर सहाएव हे! हे! मे अमीन सहाएवक क्रोधकेँ पीवि‍ जाथि‍। मास्‍टर सहाएवमे अमोध सहन शक्‍ति‍ सेहो छलनि‍। अमीन सहाएवक गन्जन आ मोहल्लाक लोकक वाककेँ अँगेज नेने छलाह। मास्‍टर सहाएवमे और तँ जे गुण दोष रहनि‍, मुदा कि‍छु एहनो गुण छलनि‍ जे पैध दुगुर्ण कहल जा सकैछ। मास्‍टर सहाएव डेरामे दि‍नो कऽ अर्ध्‍द दि‍गम्‍वर रहैत छलाह आ राति‍ कऽ पूर्ण दि‍गम्‍वरे। नवमे तँ अमीन सहाएव सकोच करथि‍न, जखन ई गति‍ वि‍धि‍ मास्‍टर सहाएवक नहि‍ बदललनि‍ तँ अमीन सहाएव रूमेट ई ठीक नहि‍ कहि‍ चेतबैत रहथि‍न। अमीन सहाएव चूल्‍हि‍ फूकैत आ भानस करैत अपन स्‍वछन्‍द जीवनमे परतंत्रक अनुभव करए लगलाह। आब ओहो पाक काजसँ उचहि‍ गेलाह। रूमेटक आलोचना-प्रत्‍यालोचना हुनक मुख्‍य वि‍षए भऽ गेलनि‍। मोहल्‍ला लोकक प्रति‍ आक्रोश रहबे करनि‍। एक दि‍न वि‍क्षि‍प्‍त मुद्रा देखि‍ हम हुनकासँ सि‍नेह पूर्वक कहलि‍एनि‍- “हम एकसरे रहैत छलहुँ सएह ठीक, संगति‍क प्रभावसँ संतप्‍त भऽ गेल छी।‍” एक दि‍न मास्‍टर सहाएव देह उजागर करबाक हेतु टाँनि‍क अनलनि‍ जाहि‍मे चारि‍ अना अलकोहल लि‍खल छलैक। हम कहलि‍एनि‍ अमीन एहि‍मे सँ आध कप जौं मास्‍टर दि‍तथि‍ तँ मोन बुलन्‍द भऽ जाइत। कहैत-कहैत हम शीशीसँ चारि‍ चम्‍मच करीब ढारि‍ मुँहमे दऽ देलि‍एनि‍, एहि‍पर मास्‍टर सहाएव गि‍द्ध जकाँ झपट्टा मारि‍ टाँनि‍कक शीशी लऽ क्रोधाभि‍भूत भऽ गेलाह। दू बर्षक अन्‍तरालमे प्रथम बेर एहन तामस देखल। मास्‍टर सहाएव सम्‍पूर्ण शीशी पीवि‍ गेलाह। मध्‍य राति‍मे जखन खौंत फेकि‍ दलकनि‍ तखन ओ चेतना हीन भऽ फर्शपर ओंघरनि‍या देमए लगलाह। अमीन सहाएव पूर्ण चि‍न्‍ति‍त भऽ हमरा लग दौड़ल एलाह। हमहूँ ओतए गेलहुँ। नतीजा भेल जे चारि‍ बजे भोरमे जाऽ कए मास्‍टरकेँ चैन भेलनि‍ तखने हमरो लोकनि‍ चैन भेलहुँ। बादमे मास्‍टरकेँ पूछलोत्तर जबाब भेटल जे अपने सभ चखैत-चखैत पीबि‍ लि‍तहुँ तेँ हम सभटा एके बेरमे पीवि‍ लेल। अस्‍तु! आगाँ पूछबाक साहस नहि‍ भेल। एक दि‍न मास्‍टर सहाएवक दि‍गम्‍बर अवस्‍थाक नि‍वार्णाथ हम हुनका पलंगक तरमे जाऽ कऽ बैसि‍ गेलहुँ। अमीन सहाएव हमर सहयोगी रहथि‍। लालटेमक प्रकाश मन्‍द कऽ जखन मास्‍टर सहाएव ओछाइनपर लम्‍वायमान भेलाह। नि‍न्‍न आएले छलनि‍ तखन हम पलंगक भीतरसँ खट्-खट् अावाज कएल आ ममीन सहाएव कागज सभकेँ फर-फरा देलथि‍न। हम सभ चूपे रही कि‍ मास्‍टर सहाएव चोर-चोर बजलाह। हमहूँ सभ संग दऽ देलि‍एनि‍। ओ फानि‍ कऽ बाहर भेलाह जोर-जोरसँ चारक हल्‍ला कएलनि‍, मोहल्‍लाक नर नारी चाेर शब्‍द सुि‍न अमीन सहाएवक डेरा दि‍शि‍ दौड़ गेल। मास्‍टर सहाएव ताबत कालधरि‍ वेसुधि‍ये रहथि‍ जखन अनेको हथबत्तीक इजोत हुनाकपर एक संग पड़ल तखन मास्‍टर सहाएव संकोचसँ गर्हित भऽ बैसि‍ गेलाह। सभ हुनका लू-लू थू-थू करए लगलनि‍। अन्‍तमे अपन तोलि‍या फेकि‍ हुनका दि‍गम्‍बर रूपकेँ श्‍वेताम्‍वरमे परि‍णत कएल। ओहि‍ राति‍क घटनाक बाद मास्‍टर सहाएव पुन: नहि‍ मोहल्‍लाक भीतर देखल गेलाह। मुदा हुनक चर्चा सबतरि‍ अनेको दि‍न तक होइत रहल। अमीन सहाएव एहि‍ संगति‍सँ मुक्‍त भऽ फेर पुरना बाटक बटोही भऽ गेलाह। हमरा प्रति‍ हुनक नि‍ष्‍ठा भऽ गेलनि‍ कि‍एक तँ हम आश्‍वासनकेँ पूरा कऽ देलि‍एनि‍। संगति‍क संकटसँ मुक्त भऽ गेलाह। ५ जगदीश प्रसाद मंडल- अतहतह कथा शेषांश- गाँजा मंचसँ जोड़ि‍रा शुरू भेल- “एक दि‍स खेले कृष्‍ण कन्‍हैया, एक दि‍स राधा जोड़ी हो।‍” तँ दोसर ताड़ीक मंचसँ महराइ धुन- “कि‍सकी मैया बाधि‍न जनमे जो रूदल पर फेरे हाथ।‍” तेसर मंचसँ बोल डान्‍स (ट्युष्‍टि‍) स्‍टेज मचमचबैत। सात बजेक समए। चौकपर गदमि‍शान हुअए लगल। रवि‍शंकर चाह पीबैले अबैत रहथि‍ कि‍ दस लग्‍गी पाछुएसँ चौकक मस्‍ती देखलनि‍। गाछक नि‍च्‍चाँमे ठाढ़ भ? गेलइ जे सौंसे गाम नाचि‍-गाबि‍ रहल अछि‍। मुदा लगले जना पवन सुत ि‍कछु कहि‍ देलकनि‍। मुस्‍की दैत भुटुकि‍ लालक चाहक दोकान सोझे पहुँचलाह। रवि‍शंकर भुटुकि‍ लालकेँ पुछलखि‍न- “भुटुकि‍ भाय, बड़ देखै छि‍यह कि‍ बात छि‍ऐ?‍” “पहि‍ने चाह पीवू ने। गप कतौ पड़ाएल जाइ छै। नि‍चेनसँ चाहो पीवू आ गप्‍पो सुनू।‍” “कनि‍यो तँ‍ इशारोमे कहह।” “एतबे बुझि‍ लि‍अ जे खच्‍चरपुर बलाकेँ मुता-मुता भरेलौं।‍” भुटुकि‍ लालक बात सुनि‍ रवि‍शंकर अचंभि‍त भऽ गेलाह जे आखि‍र बात कि‍ छि‍ऐ? तहि‍ बीच झामलाल कहए लगलनि‍- “भाय, मास दि‍नक कमाइक फल छी। जड़ि‍येसँ कहि‍ दइ छी। तेंइतीसम दि‍नक गप छी। एक लाल रूपैयाक पार्टीक काज कऽ कए आइले रही। बारहसँ उपर दि‍न चढ़ि‍ गेल रहए। कपड़ा खोलि‍ कलपर बाल्‍टी-लोटा रखि‍ लताम गाछक नि‍च्‍चाँ ठाढ़ भऽ उपर ि‍हयासैत रही। तहि‍काल हि‍रदे काका दछि‍नवरि‍या बाधसँ अवैत रहथि‍। नजरि‍ पड़ि‍ते कहलि‍एन- ‘काका, गोड़ लगै छी। बड़ रौद छै कनी ठंढ़ा लि‍अ।’ जहि‍ना कहलि‍एनि‍ तहि‍ना ओहो लतामेक गाछ लग आबि‍ गेलाह। लताम देखलाहा आँखि‍ हि‍रदे काका मुँहक सुरखी देखि‍ मुँहसँ नि‍कलल- ‘काका, एना हकोपरास कि‍अए छी।’ सुखल मुँहक मुस्‍की दैत बजलाह- ‘नै बौआ, नै कोनो। रौदमे सँ एलौंहेँ ने।‍” “दूटा लताम खाउ?‍” “नै बौआ, नै खाएव।‍” “दूटा अंगने नेने जाउ।‍” अंगनाक नाओ सुनि‍ औटोमेटि‍क बम जकाँ कखन छाती फाँटि‍ गेलनि‍, से नइ बुझलौं। मुदा आँखि‍सँ टघरैत नोर गालपर चमकए लगलनि‍। मन गरमाएले रहए। कहलि‍एनि‍- “काका, जहि‍ना परि‍वारमे भैया, काका, बाबा, होइए तहि‍ना ने समाजोमे होइए। वि‍रान कि‍अए बुझै छी। अहाँ सबहक असि‍रवादसँ कमाइयोक आ दस गोटेकेँ चि‍न्‍हैइयोक लुरि‍ भऽ गेल। बाजू अहाँ कि‍अए एते पीड़ि‍त छी जँ उठैबला हएत तँ जरूर....।‍” नोर पोछैत काका बजलाह- “बौआ, देखैइयेटा लेल बुझि‍ पड़ै छि‍अह जे मनुक्‍ख छि‍अह। मुदा से नइ, मुइल मनुक्‍ख छी। अपनो परि‍वारक रक्‍छा करै जोकर नइ छी। तहन तँ देखा-देखी आँखि‍ तकै छी।‍” “‍खुलि‍ कऽ बाजू, काका?” “‍बौआ, अइ जुगमे हमसब महापापी छी, ि‍कएक तँ भगवान पाँचटा बेटी दऽ देलनि‍। चारि‍टाक तँ कोनो धरानी खेत बेचि‍-बेचि‍ पार लगेलौं। सात बीघाक कि‍सान मात्र पनरह कट्ठापर आबि‍ गेल छी। तेहेन हवा-पानि‍ देखै छी जे ओहूसँ पाँचमक पार लागत कि‍ नै।‍” हृदए काकाक बात सुि‍न अवाक भऽ गेलौं। जना बकार बन्न भऽ गेल। छाती असथि‍र करैत पुछलि‍एनि‍- “कक्का कते खर्च हएत?‍” “‍बौआ, गरथाह बात कन्ना बाजब।” आँखि‍क नोर पौछैत पुन: बजलाह- “बौआ, ई पाँचम बेटी तत्ते दुलारू अछि‍ जे हृदएमे सटल अछि‍। एक तँ कोड़ि‍-पच्‍छू बेटी तइपर सँ माइयक तते सि‍नेही जे सुग्‍गा जकाँ कि‍छु बाजत। जेठकीकेँ दादि‍ये पोसलकै। कहि‍यो ओकरा कोरा कऽ नै लेलि‍ऐ। जखन टेल्‍हुक भेल तखनसँ संगे मेला-तेला लऽ जाए लगलि‍ऐ। छोटकी बेटी माइयक तेहेन दुलारू बेटी अछि‍ जे साइयोसँ उपरे नाओ रखने छथि‍न।‍” “कक्का, छोड़ू ई सब। अपन बहीन बुझि‍ वि‍आह पार लगा देब। जेहने जेठकी बेटीक परि‍वार अछि‍ तेहने परि‍वार भजि‍आउ। खर्चक चि‍न्‍ता जुनि‍ करब। ई पहि‍ल दि‍नक गप छी।‍” ओना तँ गामे-गाम अतहतह होइते अछि‍ मुदा खच्‍चरपुर बलाकेँ तँ कोनो सीमे-नाङरि‍ नै छै। अइ साल पाँचटा ि‍वआहमे अभरल। तते दोस-महीम भऽ गेल अछि‍ जे एकटा वि‍आहक खर्च नौत पुराइमे होइए। तइले नइ कोनो। दस सेरे नइ नि‍तराइ दस सगे नि‍तराइ। पाँचो वि‍आहमे ओकरा सबहक खच्‍चरपनी देखि‍लि‍ऐ से एँड़ि‍सँ टि‍कासन तक लेसि‍ देने अछि‍। मुदा कोनो वि‍आहमे कोनो समाज (बरि‍आती-घरवारी) तँ नइ छलौं तेँ आँत-मसोसि‍ कऽ रहि‍ गेलौं। गर चढ़ा खच्‍चरपुरेमे कथा ठीक केलहुँ। कक्कोकेँ पसि‍न भेलनि‍। लेन-देन तँइ भऽ गेल। समए बना ओहू गामक समाज आ अपनो समाजक बैसार केलौं। बैसारेमे बजलौं- “‍अखन धरि‍क काज दुनू घरबारीक छलनि‍ मुदा, आब समाजक भऽ गेल। चाहै छी जे आन गाम जकाँ थूका-थूकी वि‍याहमे नइ हुअए। तेँ कि‍छु समस्‍या अछि‍ जहि‍पर अखने वि‍चार वि‍मर्श भऽ जाए। (1) वियाह पद्धति‍क अनुकूल हुअए आकि‍ जयमाला कऽ हुअए। (2) पलाउक चलनि‍ भऽ गेल से मखानक खीर खाएव कि‍ पलाउ? (3) खेला-पीला उत्तर लगले वि‍दा भऽ जाएव आकि‍ आराम कऽ कए?” प्रश्‍न सुि‍न चुप्‍पी पसरल। जहि‍ना चुल्‍हि‍मे खोरनासँ जारन घुसकाएल जाइ छै तहि‍ना घुसकौलौं- “कन्‍यागत समाजक कन्‍हापर भार देने छथि‍न तेँ समाज चाहै छथि‍ जे आन-आन गाम जकाँ बरि‍याती घरवारीकेँ। नि‍च्‍चाँ देखबए चाहैत आ घरवारी बरियातीकेँ। जहि‍सँ जहि‍ना खेतमे कोनो चीजक बीआ छीटल जाइत अछि‍ तहि‍ना हम सभ झगड़ाक बीआ समाजमे छीटि‍ देने छी। जे दुखद बात छी। नै चाहब जे समाजमे एना हुअए। वि‍याह सृष्‍टि‍क सृजनक प्रक्रि‍याक अंग छी तेँ एहि‍ संग छेड़-छाड़ अनुचि‍त। अपने लोकनि‍ जे कहि‍ देब ओहि‍ अनुकूल वि‍याह हएत। घमरथन शुरू भेल। घमरथनक कारण भेल कि‍छु देखौआ काज आ कि‍छु चोरौआ। मुदा सुमति‍ एलनि‍, कहलनि‍, जे लड़का-लड़कीक वि‍आह सामाजि‍क पद्धति‍क अनुकूल हुअए। ई भार अहाँपर रहल। जहि‍ना कोनो काजक प्रक्रि‍या होइ छै तहि‍ना भोजनक प्रक्रि‍याक अंग अरामो छी। जानल बाज अछि‍ जे नि‍यमि‍त भोजनसँ भि‍न्न भोजन बरि‍यातीमे होइ छै, तेँ आराम आरो जरूरी अछि। प्रात: काल नअ बजेमे चाह-पान खा असि‍रवाद दैत आपस हएब। बरि‍याति‍ये जकाँ गाड़ि‍यो सवारीक ओरि‍यान चाही, मुदा मि‍सति‍रि‍आइ बरि‍यातीक रहतनि‍। पलाउ आ खीर खेनि‍हार दुनू रहताह। बाजा-बूजीक बेवसथा घरवारीक। नै चाहब जे रस्‍ता-बातमे अनगौआँ सभसँ झंझट हुअए। मोटा-मोटी यएह बुझू जे सएक धतपत बरि‍याती रहताह। जि‍नका लेल अहाँ दू-ठाम बेबसथा करब। अहुँ सभ बुझि‍ते छि‍ऐ आ हमहुँ सभ बुझि‍ते छि‍ऐ। एक भागक जे बरि‍याती रहताह हुनका लेल जहि‍ना भाेजनक वृहत् बेबस्‍था रहत तहि‍ना अरामोक हेबाक चाही। ई नइ जे मधमन्नी जहल जकाँ मूड़ी-पाएर दुनूक पति‍यानी लगि‍ जाए। पुछलि‍एनि‍- ‘जखन दरबाजापर पहुँचबै तखन कोन रूपे शुरू करबै?’ कहलनि‍- ‘जे सभ भाँग खेनि‍हार छथि‍ ओ सभ घरेपर भाँग खेता आ रस्‍ते-बाटमे कतौ झाड़ा-झपटा करताह। पानि‍ परसबसँ शुरू करब एम्‍हर बरि‍यातीक सनो-मान शुरू हएत आ ओम्‍हर आंगनमे वि‍याहक प्रक्रि‍या शुरू हएत। आठ बजे दरबज्‍जापर पहुँच जाएव। दस बजेमे खुआ-पीआ कऽ आराम करए छोड़ देब।’ हँसैत सभ नि‍र्णए कऽ लेलनि‍। वि‍दा भेलौं।‍” रस्‍तामे झगड़ाक जड़ि‍ ताकए लगलौं। एते तँ वि‍सवास रहबे करए जे जहि‍ना चोर फँसबैले सि‍पाही घेराबंदी करैत अछि‍ तहि‍ना जाल तँ लगबै पड़त। मन पड़ल दोसक गप। दोस कहने रहथि‍ जे अपना सभ कारोवारी छी तेँ कोट-कचहरीसँ सदति‍ काल बचैक रहैक चाही। नहि‍ तँ अनेरे ओझरा जाएव कारोवार कारोवारे रहि‍ जाएत। मुदा उखरि‍मे मूड़ी देलौं तँ मुसराक डर केने काज चलत। तहन तँ जहाँ धरि‍ संभव हएत तहाँ धरि‍ बँचब। अखनो समाजमे कहाँ कि‍यो खुलि‍ कऽ ताड़ी-दारू करै छथि‍। चोरनुकबा जरूर करै छथि‍। मुदा कि‍ हुनका सभकेँ अपना आँखि‍मे लाज नहि‍ छन्‍हि‍? जरूर छन्‍हि‍। मुदा जे होउ, जि‍नगी भरि‍ जहलेमे कि‍अए नै रहए पड़ै मुदा खच्‍चरपुर बला सभकेँ सि‍खाएब जरूर। तेहेन कऽ नाङरि‍ सुररबै जे इलाकामे मुँह उठाएब मुसकि‍ल भऽ जेतनि‍। दसटा बदमास बेसीसँ बेसी गाममे हएत पचासटा आनि‍ कऽ रखि‍ देवइ। मुदा सि‍खेबै जरूर। आठ बजे गामक सीमामे बरि‍याती प्रवेश कऽ गेल हमहूँ सभ साकांच रही। दरबज्‍जापर पहुँचते स्‍वागतक संग बैसारक कार्यक्रम शुरू भेल। दाय-माय वरकेँ अरि‍आति‍ आंगन लऽ गेलीह। बरि‍यातीक बीच प्‍लेटमे फ्राइ कएल मखान पहुँच गेलनि‍। दुनू समाजक (बरि‍आती-घरवारी) बीच मखानक मि‍ठासक संग गप-सप्‍प शुरू भेल। गाममे कते सार्वजनि‍क स्‍थल...., कोन-कोन शि‍क्षण-संस्‍थान...., अस्‍पतालक की स्‍थि‍ति‍...., गाममे कते कि‍सान परि‍वार....., कते नोकरि‍हारा....., जोतसीम जमीन कत्ते...., बोरि‍ंगक संख्‍या कत्ते....., खेतीसँ अलग कारोवारी परि‍वार कत्ते....., कते  परि‍वार गामसँ पलायन कऽ रहला अछि‍ कते दोखतरीपर आबि‍-आबि‍ बैसि रहला अछि‍....। बड़ी जुमा कऽ महावीर जी लंकासँ आम फेकने रहथि‍ से ने तँ खास भेलि‍ अछि‍। मुदा कि‍छु गोटेक मन लगलनि‍। भाँगक मातल मनमे उठए लगलनि‍ जे मखानोक लाबा पानि‍ये पीवि‍ भेल। ओ तँ अपने जि‍नगी भरि‍ पानि‍येमे रहल अछि‍ तँ तइसँ नीक जे दू घोंट बेसि‍ये कऽ पानि‍ पीवि‍ लेब। बि‍ना मुंगबे मन थोड़े मानत। पेटेटा भरने नै ने होइ छै, मनो ने भरक चाही। मुदा फेरि‍ मनमे उठनि‍ जे अखन कोनो उसरि‍ गेल। अंगनाक ओसारपर बैसि‍ हि‍रदय काका आँखि‍ खि‍रा-खि‍रा तकैत तँ देखैत पाँचो बेटीक सि‍नेह। जेठकी बहीन माइयक पीठि‍पर अंगनाक चीज-बौसकेँ घर रखैत तँ घरसँ नि‍कालि‍ आंगनमे रखैत। मझि‍ली तँ चारू बहीनि‍क लेधे-गोधक आइ-पाइमे भि‍नसरसँ अखैन धरि‍ लागल अछि‍। सझि‍लि‍येकेँ की कहबै, बेचारीकेँ अखैन धरि‍ लागल अछि‍। सझि‍लि‍येकेँ की कहबै, बेचारीकेँ लगले हाथमे नीपौन देखै छी तँ लगले सि‍नुर-पि‍ठार। चारि‍मकेँ तँ गीति‍हारि‍येक आगू-पाछू करैत-करैत नाको-दम भेल छै। घुमैत नजरि‍ हि‍रदय कक्काक बेटी-जमाएपर गेलनि‍। ओना देखि‍ये कऽ केने रहथि‍ ते देखैक ओ रूप नहि‍ देखैक रूप रहनि‍ मौलाइल गाछक पोनगल ससारि‍मे खि‍लैत फूल देखि‍। हारल मनुष्‍यक जीत। जे कहि‍यो कन्‍यादानकेँ उच्‍च कोटि‍क श्रेणीमे गनल जाइत छल ओ आइ समाजमे बेटि‍याह वंश बुझि‍ वि‍याहसँ वंचि‍त भऽ रहला अछि‍। वाह रे हमर समाज। हम अपना काजक पाछू तबाह। पच्‍चीसो काजकर्तापर मलेटरीक नजरि‍। तीन कदम आगू तँ एक कदम पाछु भऽ सावधान। ओना अगुआएल-पछुआएल बरि‍याती समयेपर प्रवेश कऽ गेल छलाह मुदा, समाज दरबज्‍जापर जहाँ-तहाँ छि‍ड़ि‍आएल। दू-चारि‍ मि‍लि‍-मि‍लि‍ अड्डा जमौने। जहि‍ पाछु एक-एक काजकर्ता लागल। ताड़ी जकाँ तँ इंग्‍लीसक गोष्‍ठी नमहर नहि‍ होइत। रंग-वि‍रंगक पीनि‍हार रंग-वि‍रंगक वस्‍तु। साढ़े नअ बजे बरि‍याती भोजन कऽ ओछाइन पकड़ि‍ लेखा-जोखा करए लगलाह। हराएल-बरि‍यातीक खोज शुरू भेल। साढ़े दस बजे घरवारी बरयाती बीच समझौता भेल जे जते समए आगू बढ़ि‍ ओहि‍सँ पैछलाकेँ छोड़ि‍ भोजने हुअए। सएह भेल। मुदा कमाल भऽ गेल। भोजन शुरू भेल पेशाव करैले उठब शुरू भेल। पेशाब खोलैबला दवाइ पानि‍मे मि‍ला टीपि‍-टापि‍ कऽ दस गोटेकेँ पीया देल गेल। एक गोटेकेँ देखि‍ छोड़ि देलौं, दोसरोकेँ छोड़ि‍ देलौं। मुदा जहि‍ना चुट्टीक धारी चलैत तहि‍ना जखन शुरू भेल कि‍ बुढ़हा झामलाल सबहक बीच जा कहलि‍एनि‍ जे अखन धरि‍ घरबैया समाजसँ कोनो ति‍रोट भेल हुअए से कहूँ? एक्के-दुइये पान-सात गोटे उपदेश दैत बजलाह- “अखन जे हवा-बि‍हाड़ि‍ उठि‍ गेल अछि‍ तहि‍मे अहाँ लोकनि‍केँ धन्‍यवाद दैत छी। हमहूँ सभ यएह गप करै छलौं गणेश जीक भक्‍त सभने छेनाक मि‍ठाइ खाए मुदा ओ तँ अखने लड़ूए खाइ छथि‍। जुग बढ़ि‍ गेने लोको उधि‍या जाएत। जे सुआद खाजा-मूंगवाक अछि‍ ओ डि‍ब्‍बाबला रसगुल्‍लाक हएत। ओ तँ भाँज पुराएव छी। कहलि‍एनि‍- ‘जाधरि‍ अपने लोकनि‍ ऐठाम छी ताधरि‍क नीक-अधलाहक जबावदेह घरवारी हेताह मुदा, अहाँ सभ जे उकठ करब, तहन.....।’ की भेल, की भेल? दोसर वरियातीक सबहक छि‍छा-बीछा चलि‍ कऽ देखि‍यनु? वामा करे जे पड़ि‍ जे जाँघ कुड़ि‍यबैत रहथि‍ से उठले ने होइन। मुदा कासपरक दहीक ढकार फुर्ती आनि‍ देलकनि सभ कि‍यो उठि‍ दोसर पंडलमे पहुँचलाह तँ देखलनि‍ जे एना कि‍अए रेलवे स्‍टेशनक टि‍कट खि‍रकी जकाँ दुनू दि‍सक पाँती लागल अछि‍। मुदा से दसे-बारहे गोरेकेँ देखै छी। खेवा-पीबामे जँ कि‍छु गड़वड़ी रहि‍तए तँ होइतै। सेहो ने देखै छी। एक-दोसरसँ आँखि‍ मि‍ला प्रश्‍न पुछैत तँ मूड़ी डोला जबाव भेटनि‍। मुदा कि‍छुओ दोस जाबे ककरो नै अछि‍ ताबे एना भऽ कि‍अए रहल अछि‍। अान ठाम कहाँ भेल। मुदा सोझे माने बि‍ना आधारे कोनो बात मानि‍यो लेब तँ उचि‍त-नहि‍ये। आमपर फेकल गोला जकाँ जे लागि‍यो सकैए आ हुसि‍यो सकैए। इम्‍हर आराम करैले सेहो मन कछमछाइन। दोहरौि‍लएनि‍- ‘जँ अपने लोकनि‍ समाजक सीमा रेखा तोड़ि‍ घि‍नबए चाहब तँ समाजोकेँ ई अधि‍कार बनै छै जे सीमाक सि‍पाही जकाँ अपन मातृ भूमि‍क रक्‍छा करए। कबछुआ जकाँ भकभका कऽ तँ लगलनि‍ मुदा, घि‍नबैक कारण बुझबे ने करथि‍। खि‍सि‍या कऽ एकगोटे बजलाह- ‘कोन-कहाँ बोतल पीवि‍-पीवि‍ बरयाती औताह आ सभ कि‍छु (समाजि‍क गुण)केँ खेने-पीने चलि‍ जेताह। एको क्षण ई सभ जीबै नै देताह।’ कहि‍ छोटका भाएकेँ कहलखि‍न- “बौआ, जि‍नका जे मन फुड़तन से करताह। अपन इज्‍जत-आबरू अपना हाथमे लऽ चलह। एक्के-दुइये ससरि‍-ससरि‍ घरमुँहा हुअए लगलाह।‍‍ १. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) २.दुर्गानन्‍द मंडल-समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-३.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर १. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)(क्रमसँ दोसर खेप) जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। प्रस्तुत अछि पहिल खेप।- सम्पादक आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) हमरा आब अचरज होइत अछि-ओहि समय दिल्ली स्थायी रूप सँ बसवाक एक रत्ती नहि तँ आस छल आ नहि तँ सोचने छलौं। किन्तु एखन पंचानन जीकें पढ़ैत छी तँ लगैत अछि शब्द ब्रह्म थीक।पंचानन जीक आग्रह आ विचार सँ एकर प्रकाशनक भार शेखर प्रकाशन पर देल गेल शरदिन्दु चौधरी स्वयं डेरा पर आबि 700 पन्नाक पांडुलिपि ल गेलाह। शरदिन्दुक उत्साह देखि हम बुझलौं जे कोनो काज हेवाक रहैत छैक तँ कोना अनुकूल बसात बह लगैत छैक- कोना विधि दहिन भ जाइत छथि। हमरो उत्साह बढ़ि गेल- तखन पांडुलिपिक संग ई पत्र- आदरणीया आत्मकथा पढ़लहुँ। नीके नहि कतहु अत्यन्त मार्मिक हृदयस्पर्शी आ कतहु-कतहु तँ अन्यत्र नहि भेटल शब्दावलीक विलक्षण प्रयोग। बहुत मोन लागल। प्रसंग सभ रोचक एक दोसराक संग जोड़ैत अगाँ अविरल बढ़ैत। मात्र खटकैत अछि भाषा जे अहाँ स्वयं स्वीकार करैत छी जे मैथिली हम बहुत प्रयत्न सँ सिखलहुँ किछु शब्द केँ बदलबाक आवश्यकता छैक आ किछु अशुद्धिकें दूर करबाक छैक। आ कोनो कठिन नहि छैक। हमरासँ कोनो प्रसंग नहि हटाओल गेल। कारण कतहु ई नहि बुझना गेल जे लिखबाक बहन्ने पाठक पर धौंस झाड़ि रहल होइऐक। अहाँक भोगल यथार्थक अभिव्यक्ति कें कपचबाक धृष्टता करबामे असमर्थ पाबि रहल छी से एहि कारणे जे पापाक बतहिया बेटी क असाधारण सम्प्रेषणीयता केँ बाधित-खंडित करबा योग्य हम असाधारण कलमक पुजारी नहि छी तेँ। ओतँ निवेदन जे जेना ब्रह्मा बनि अपने एकर सृजन कयलिऐक अछि तहिना विश्वकर्मा बनि एकरा सुन्दर बनयबा लेल अपने स्वयं हाथ चलबियौ। हँ शुद्धताक दृष्टिसँ हम एहि पर काज करबा लेल सतत् तत्पर भेटब। शरदिन्दु चौधरी शेखर प्रकाशन एहि पोथीक प्रकाशनक क्रम मे शरदिन्दु हमर परिवारक अभिन्न अंग बनि गेल छलाह। हम दूनू गोटे कखनो काल पारिवारिक दुख सुखक गप करैत रहैत छलौं। विमोचन समारोह मे ओ कतेक स्नेह उत्साह सँ मंच पर हमर परिवारक बखान करैत रहलाह संगे हमरा कहलनि-अहाँ एतेक भीड़ कोनो समारोह मे देखने छलियैक आ ताहि मे विमोचन समारोह मे आब अहाँ उदास नहि रहियौक-हँसैत रहु- हमर उदासी सँ शरदिन्दु उदास भ जाइत छलाह ई अनुभूत हम केने छलौं। जखन नचिकेताक विचार किस्त किस्त पर आयल हम अभिभूत भ उठलौं-सरिपों कोनो रचना कें बुझवा लेल सहसंवेद्य हृदय चाही माननीया शेफालिका जी नमस्ते! तेरी हर चाप से जलते हैं खयालों मे चिराग जब भी तू आए जागता हुआ जादू छाए तूझको छू लूँ तो ऐ जाने तमन्ना मुझको देर तक अपनी बदन से तेरी खूशबू आए- ई ओहि शायरीक अन्तिम अंश थीक जकर प्रशंसा सँ अहाँ किस्त किस्त जीवन प्रारंभ केने छी। सरिपहुँ अहाँक प्रत्येक कृतिक आहट सँ पाठकगण भाव-विभोर भ जाइत अछि आ जखन ओहि कृतिके पढ़ि लैत अछि तँ बहुत देर धरि ओ चिन्तन मनन करवा लेल बाध्य भ जाइत अछि सत्य-सरल-सुबोध भाषा मे लिखल गेल अपनेक एहि आत्मकथा किस्त किस्त जीवनक इएह विशेषता थीक। उदय नारायण सिंह नाचिकेता निदेशक केंद्रीय भाषा संस्थान भारत सरकार

तखन मोन पड़ि गेल ओहि गीतक प्रथमांश-जाहि सँ हम किस्त किस्त प्रारम्भ केने छी- ज़िन्दगी मे तो सभी प्यार किया करते हैं मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा। आ पत्रक हुजूम सँ साहित्यकार शंकर दयाल जीक पत्र मुस्कुरा उठैत अछि- प्रिय शेफालिका वर्मा जी आपने जिस प्रेम और अपनापन के साथ वर्ष की शुभकामनाएँ भेजी हैं उनका जबाब शब्दों मे दे पाना कठिन है। मैं ऐसे कार्डों को संभालकर साल भर अपने सामने रखता हूँ और इसी रूप मे अपनों को याद करता हूँ। आपके साथ मेरा जो अनौपचारिक संबंध है उसका निर्वाह इसी भांति हो यही मेरी कामना है। आपकी कविताओं के दौर से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो अक्षरों के भी हाथ पाँव होते हैं- वे कभी छटपटाते कभी दौड़ते हैं कभी भाग खड़े होते पर पीछा नहीं छोड़ते। आपकी कविताओं से गुजरते मुझे आँसू ग्रंथि तथा मैं नीर भरी दुख की बदरी की याद आ जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य की परिभाषा साधारणीकरण के रूप मे की है यानी पाठक रचना के साथ-साथ अपने को भी सहभागी बना ले-तब किसी रचना की सफलता होती है। शेफालिका जी आपकी कविताओं को पढ़ते हुए मेरी भी स्थिति कई बार ऐसी ही हुई है। निश्चय ही नया साल आपके लिए नई अनुभूतियाँ और विश्वास लेकर आए-यही मेरी संकल्पना है। आपका शंकर दयाल सिंह एम पी कामता सदन बोरिंग रोड पटना दिनांक 17 जुलाई 89 भीम भाईक फोन आयल आँखि नोरा गेल छल। एक समय छल कतेक अंतरंगता हमरा सभमे छल-हम सभ एक दोसर कें हृदय सँ चीन्हैत छलहुँ-आ पत्र केँ पढ़ितहि टेप मे गाओल तरुणाक संग हिनकर गीत मोन पड़ि गेल- हर पल तुझे मैं याद किया करता हूँ तुझे भूला कर मैं एक पल कभी जीया तो नहीं। विमोचनक बाद लगले चन्द्रेशक फोन आयल-हम किस्त किस्त पढ़लौं। एतेक अपूर्व-एतेक भावना एतेक दर्द अहाँ मे कत सँ आयल हमरा अहाँ सँ ईर्ष्या होइत अछि। हम किएक नहि ओना लिख पबैत छी।बजैत-बजैत भावावेश सँ हुनकर गर बाझि गेल छलैक-आ झट द फोन राखि देलनि-हमरा जेना सौंसे संसारक सम्पदा भेटि गेल-हुनक आँखिक नोर जेना हमर आँखिमे आबि गेल। एहिना हमर गुरुदेव डॉ अनंत लाल चौधरी अवकाश प्राप्त प्रोफसर पटना वि वि क फोन आयल- शेफालिका! अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं। कतेक व्यथा अहाँक पाती-पाती मे भरल अछि। विद्यार्थी जीवन मे अहाँ एतवे संवेदनशील छलौं जेना हमरा मोन पड़ैत अछि- अहाँक व्यक्तित्व आ कृतित्व मे हमरा कोनो अन्तर नहि देखा पड़ैत अछि-कतेक एकरूपता! पति पत्नीक प्रेम विश्वास आपसी सामंजस्य एकर अभूतपूर्व चित्राण केने छी। स्त्रीक प्रत्येक रूपक वर्णन-कोनो एकटा लड़की परिस्थितिक अनुसार अपना कें समखपत क दैत छैक कोना सभकें खुश राखवाक प्रयास करैत एहि ऊँचाई पर पहुँचल- आजुक पीढ़ी लेल प्रेरणादायी अछि प्रत्येक परिवार मे रामायण-गीता जकाँ एहि पुस्तक कें राखवाक चाही- जाहि सँ नव पीढ़ी केँ आलोक भेटय-कतेक ठाम हमर आँखि भरि आयल-अहाँकेँ फेर बधाई अनेको आशीर्वाद। दिल्ली मे मंजर आलमक फोन दरभंगा सँ आयल हम एकदम चिहुँकि उठलौं- विहुँसि उठलौं- अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं- मैडम एतेक नीक लागल जे रहल नहि गेल। अपने केँ बधाई देवा लेल लगले फोन कय देलौं- विमोचन उपरांत इंगलैंड जेवा काल दिल्ली मे राजीव लग छलौं कि भीम भाईक पत्र राजीवक पता सँ आयल। आ दरभंगाक शुभ्रता शुचिता मोन पड़ि गेल- बान्धवी शेफालिका जी सोझाँमे किस्त-किस्त जीवन अछि। एहन सुन्दर पोथी लेल हार्दिक बधाइ लिअ। मुदा शेफालिकाजी किस्त-किस्त जीवन हमरा अहाँक आत्मकथा कहाँ लागल हमरा तँ अहाँक आत्माक कथा बुझि पड़ल। सोझे आत्मासँ बहरायल उद्गार। आत्मा जेना निर्बन्ध निर्लेप निस्सीम होइछ आ ओकर तार सोझे परमात्मासँ जुड़ल रहैछ तहिना अहाँक ई आत्माक कथा हमरा उन्मुक्त निश्छल निर्मल लागल अछि आ एकरो तार सोझे परमात्मा ललन बाबू सँ जुड़ल लगैत अछि। आत्माक अदृश्य अनुराग-तागसँ जुड़ल अहाँक जीबट भरल जीवनक ई सम्मोहक सतरंगी गुड्डी मैथिली साहित्याकाशमे अगराइत-उधिआइत अपन अपरुप छटा छिड़या रहल अछि छिड़यबैत रहत। अहाँ भनहिँ अपन जीवनकेँ किस्त-किस्तमे क क तकर विस्तृत फिरिस्त तैयार कयलहुँ अछि मुदा अहाँक समस्त व्यस्त जीवन हमरा जनैत ओहि अलमस्त प्रशस्त स्वर्गस्थ जीवनधन ललन बाबूक तिल-तिल नूतन पुण्यस्मृतिमे विगलित भेल चल गेल अछि। भवदीय भीमनाथ झा 30 05 08

देख रहा हूँ इस दुनिया को आपकी मुहब्बत है आज मेरी दोनों आँखें आपकी इनायत है आपकी इनायत है। ललन 17 04 92

मोन पड़ि जाइत अछि दिनेश्वर लाल आनन्दक उद्गार- मिलनक मधुरतम क्षण मे विरह वेदनाक अनुभव करैवाली प्रेमक चरम सफलताक समय मे असफल प्रेमक भावना मे जीवैवाली अनवरत मिलयामिनीक अनुभूतिमे डुबल विप्रलब्धाक सर्जन करैवाली कवयित्री श्रीमती शेफालिका वर्मा स्वयं अपनहि मे विरोधाभासक प्रतिमूर्ति छथि। हिनक प्रेमी आ पति श्री ललन कुमार वर्मा सहरसाक प्रमुख सुविख्यात अधिवक्ता आ हमरपत्नीक भ्राता। हिनक समस्त काव्यक प्रेरणा श्रोत आ हिनका लेल साक्षात् काव्य स्वरूप छथि। तैं प्रेमक चरम सौभाग्यपूर्ण परिणति विवाहक बाद जखन अधिकांश कविक कवित्व नूल तेल लकड़ीए मे समाप्त भए जाइत अछि ताहिठाम हिनक काव्य सर्जनाक प्रारम्भे चिरइप्सित विवाहक पश्चात भेलन्हि अछि तैं महाकवि आरसी बाबू कें भनहि आश्चर्य लागैन्ह जे गृहस्थीक जाहि मरूभूमिमे कतेक कवि कवयित्रीक रस स्रोत सूखि गेल ताहि प्रपंच मे हिनक कवि हृदय कोना मात्रा जीविते नहि सरसता एवं वचन विदग्धताक प्रचार प्रसार क रहल अछि । मुदा यथार्थ मे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थीक। ओना सुविख्यात एवं सिद्धहस्त प्रौढ़ लेखक स्व ललितेश्वर मल्लिकक भतीजी एवं विहारक सुप्रसिद्द अधिवक्ता एवं मैथिली तथा हिन्दीक प्रौढ़ लेखक श्री ब्रजेश्वर मल्लिक क पुत्री एहि कवयित्रीकेँ लेखन कला उत्तराधिकारे मे भेटल छन्हि। दैनिक जीवन मे कवयित्री अपना पति संग तन मन प्राणसँ तेहन एकाकार छथि जे हिनक काव्यक मर्म हिनक सफल दाम्पत्य जीवनेमे समाहित छन्हि। भाषाक संबंध मे ई ज्ञापित कए देब आवश्यक जे कवयित्री जानि बुझि कए एहन कतेक शब्दक प्रयोग कएने छथि जे एहि क्षेत्रमे बाजब प्रचलित छैक मुदा मैथिली साहित्य मे जकर प्रयोग आइ धरि नहि होइत छैक जेना यादि हारि प्यार किछ गोटा केँ कठाइन भने लगनि मुदा ई एहि क्षेत्रक भाषाक अपन रंग थीक। दिनेश्वर लाल आनंद साहित्यकार पटना (क्रमसँ तेसर खेप अगिला अंकमे) ३ दुर्गानन्‍द मंडल गोधनपुर (नि‍रमली) , दुर्गानन्‍द मंडलक समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना- ओना तँ अपन देश सभ दि‍नेसँ पावनि‍ये ति‍हारक देश रहल अछि‍। जतए सभ दि‍न कोनो ने कोनो पावनि‍-ति‍हार मनाओल जाइत अछि‍। आइ होली, तँ काल्‍हि‍ दीवाली, परसू दुर्गापुजा, तँ तरसू कालीपूजा। आइ अनन्‍त चतुरदशी तँ काल्‍हि‍ नरक-नरावन चतुरदशी। आइ भ्रातृ द्वि‍ति‍या तँ काल्‍हि‍ जि‍ति‍या, आइ शनि‍याही घड़ी, तँ काल्‍हि‍ बुधवारि‍ घड़ी। कहि‍यो सि‍र पंचमी, कहि‍यो वसन्‍त पंचमी। तातपर्य सालो भरि‍ सभ दि‍न पावनि‍ए-पावनि‍। जहि‍मे सभ पावनि‍केँ एकटा अलग महत्‍व होइत अछि‍। कोनो पावनि‍ रंग-अबीरसँ जुड़ल होइत अछि‍ तँ कोनो अटूट भक्‍ति‍सँ। कोनो पावनि‍ साँए-बेटासँ जुड़ल अछि‍ तँ कोनो भाए-भतीजासँ, ओहि‍ पावनि‍मे अपना देशमे रक्षा बन्‍धनक एकटा खास लौकि‍क तथा अलौकि‍क दुनू तरहक महत्‍व होइत अछि‍। तँ भारतक पावन पावनि‍मे रक्षा बन्‍धन अति‍ पावन मानल गेल अछि‍। जहि‍ पावनि‍मे कलाइपर धागा बान्‍हव भृकूटि‍क बीचमे टीका लगाएव आ मुँह मीठ कराएव देखल जाइत अछि‍। औझके दि‍न बहीन अपन भायक गट्टापर राखीक धागा बान्‍हि‍ अपन रक्षाक दान लैत अछि‍। एकटा समए छलै जे युद्धक समएमे एकटा बहीन मुसलमान भाइक गट्टापर राखी बान्‍हि‍ अपनाकेँ सुरक्षि‍त बुझैत छल। कि‍एक तँ एक भाय अपन बहीनक सतीत्‍वक ओकर मान-मर्यादाक रक्षा जरूर करत। परन्‍च मनुक्‍ख तँ पूर्ण समर्थ छथि‍ नहि‍। नहि‍ जानि‍ जे एकर बादो कतेको माए-बहीनक लाज लुटल गेल हएत। आ लुटल जाइए। वास्‍तवमे एहि‍ अपवि‍त्र वृति‍, दृष्‍टि‍ आ कृति‍केँ पवि‍त्र बनाबए पड़त। आर मन, वचन, कर्मसँ पवि‍त्र रहि‍ सभसँ अपन बहीनक समान बर्ताव करए पड़त। रक्षा बन्‍धनक रहस्‍यकेँ जानए पड़त, मानए पड़त। आजूक तारीखमे एहि‍ बातक खगता अछि‍ जे बहीनो आइक तारीखमे अपन भायसँ कोन प्रकारक रक्षा चाहैत छथि‍? तनक रक्षा, धर्मक रक्षा, सतीत्‍वक रक्षा आदि‍‍ महत्‍वपूर्ण तत्‍व अछि‍। आइ एकपेरि‍या धेने, चूप-चाप चलैत एसगरूआ बहीनकेँ एहि‍ बातक सदि‍खन आशंका बनल रहैत छैक जे क्‍यो आसूरी प्रवृति‍बला लोक रावण बनि‍ ओकर लोक-लाजकेँ समाप्‍त ने कऽ दै। एहि‍ लेल सभ बहीनक तरफसँ हम राखीक शुभ अवसरपर सभ भाइसँ दान स्‍वरूप ई लेबए चाहैत छी जे ओ अपन आसूरी प्रवृति‍, क्रोध, लोभ, मोह आदि‍ दान कऽ दथि‍। जाहि‍सँ हम अवला बहीनकेँ ई बुझना जाएत जे हमर पवि‍त्रता, हमर सतीत्‍व, हमर मान-मर्यादा सदि‍खन सुरक्षि‍त अछि‍। आ हमरा एक-आधटा नहि‍ अपि‍तु संसारक सभ पुरूष भाय बनि‍ हमर रक्षकक रूपमे सभठाम ठाढ़ छथि‍। ओना परम-पि‍ता परमात्‍मा सभ आत्‍माक पि‍ता छथि‍। सबहक रक्षक पालक वएह छथि‍। हुनका समक्ष स्‍त्री-पुरूषक देहकेँ कोनो भेद नहि‍ छै। एहि‍ हेतु हम समस्‍त मैथि‍ल आ मैथि‍ली प्रेमीसँ हमर रक्षा-सि‍नेह रूपी बन्‍धन स्‍वीकार करू। परमात्‍मा अहाँक जीवनमे, शांति‍, शुभभावना, सि‍नेह, सहानुभूति‍, मधुरता पवि‍त्रता आदि‍ गुणसँ भरने रहथि‍। ई हमर शुभभावना अछि‍। आऊ एहि‍ अमुल्‍य पावनि‍मे आत्‍मीक राखी अपन-अपन गट्टापर बान्‍हि‍, आत्‍म चेतनाक टीका लगा आ मीठ-मीठ बोलक मधुरसँ अपन मन आ आत्‍माकेँ मीठ राखी। ३ नाटक- बेटीक अपमान नाटककार- बेचन ठाकुरजी चनौरागंज (मधुबनी) अंक-2 दृश्‍य- तेसर (स्‍थान- बलवीर चौधरीक घर। सुरेश चौधरी बि‍आह-दानक संबंधमे गप करए पहुँचि‍ रहल छथि‍। बलवीर दलानपर कुर्सीपर बैसल छथि‍। तखनहि‍ सुरेशक प्रवेश) सुरेश- नमस्‍कार, बलवीर बावू। बलवीर- नमस्‍कार, नमस्‍कार। आउ पधारल जाउ। (सुरेश कुर्सीपर बैसल छथि‍।) बौआ टुनटुन, बौआ टुनटुन, एक लोटा जल लेने आउ। एकटा अभ्‍यागत पधारलाह अछि‍। (टुनटुनकेँ एक लोटा जल लए कए प्रवेश) सुरेश बावू, चरण पखारल जाउ। सुरेश- आगू-पाछूबला कोन बात करैत छी। मि‍थि‍लाक जे रि‍वाज अछि‍ से नि‍भाबहि‍ पड़त। पहि‍ने चरण पखारू तहन कोनो बातचीत होएत। सुरेश- बलवीर बावू, यद्यपि‍ हम वर पक्षसँ आएल छी। मुदा कि‍छु बात बनत तहन ने चरण पखारब। हमर बात-ददाक कहब छलनि‍। ओहि‍ परम्‍पराकेँ हम कोनो बि‍सरि‍ सकैत छी? होउ, गप कि‍छु आगू बढ़ाउ। बलवीर- बाजू तखन, केम्‍हर-केम्‍हर अएलहुँ अछि‍? सुरेश- कि‍छु दि‍न पूर्व अपने हमरा लग बाजल रही जे हमरा एहि‍ बेर एक गोट कन्‍यादान केनाय अछि‍। ओ कुटमैती अपने कएलहुँ वा नहि‍। बलवीर- कहाँ कएलहुँ। नहि‍ ओतेक सम्‍पत्ति‍, अछि‍ आ ने कन्‍यादन कए पाबैत छी। घर तँ वर नहि‍, वर तँ घर नहि‍। की अहाँक नजरि‍मे कोनो लड़ि‍का अछ? सुरेश- हँ अछि‍ हमरे भागि‍न। बलवीर- केहेन घर-वर अछि‍? सुरेश- अपना चशमासँ अपने देखब, से बि‍ल्‍कुल ठीक होएत। ओना हमरा समक्षसँ, नहि‍ बढ़ि‍या तँ खरावो कि‍यो नहि‍ कहि‍ सकैत छथि‍। बलवीर- अहाँक वि‍चारसँ ई कुटमैती करैबला अछि‍? सुरेश- हमरा वि‍चारसँ ई कुटमैती आँखि‍ मुनि‍ कऽ कए लि‍अ। लड़ि‍का-लड़ि‍की एकदम जोगम-जोग अछि‍। बलवीर- सुरेश बावू, जदि‍ हम ई कुटमैतीमे ठकेलहुँ तहन हमर गृहणी कोरमे जीवन भरि‍ चटक करैत रहतीह। से यादि‍ राखि‍ लि‍अ। सुरेश बावू, हम हुनकामे सकबैन की नहि‍। सुरेश- नहि‍ सकबैन तँ हम सकए देब। हम छी ने। आदर्श कुटमैती होएत। बलवीर- जहन अपने ई डि‍ट्टो पावर लगाबैत छी, तहन हम नहि‍ देखब-तेखब। एक्के बेर काल्‍हि‍ छेके कए लेब। ई कुटुमैती पक्के बुझु। आबहु चरण पखारब की नहि‍? सुरेश- आब चरणहि‍टा पखारब! जे नहि‍ से करब। पान, बीड़ी, सुपारी, सीगरेट, नश्‍ता, भोजन सबटा करब। पाछू काल कने समधीनो लग जाएव, फुसुर-फुसुर बति‍याएब। तहन गाम वापस जाएब। (पाएर धोलनि‍) बलवीर- बौआ टुनटुन, अन्‍दरसँ नश्‍ता पानि‍ लाउ। (टुनटुन अन्‍दरसँ नश्‍ता। पान, बीड़ी, सलाइ, सुपारी आनैत छथि‍। सुरेश ओ बलवीर नश्‍ता कए पान, सुपारी, बीड़ीक उपयोग करैत छथि‍।) सुरेश बाबू, हम ठहरलहुँ एकटा साधारण वा गरीब लोक। हम की नश्‍ता कराएब, की व्‍यवस्‍था करब? सुरेश- बाप रे बा..., एहेन नश्‍ता तँ हम बापो जनम नहि‍ खेने रही। मोन तँ गदगद भए गेल। आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। कने भागि‍नो एहि‍ठाम जेबाक अछि‍ एखनहि‍। तहन ने काल्‍हि‍ ओ सभ छेका-छुकीक व्‍यवस्‍था करताह। बेस, जाय राम जी की। बलवीर- जय राम जी की। कहल सुनल माफ करबैक सरकार। (सुरेशक प्रस्‍थान) पटाक्षेप दृश्‍य चारि‍म- (स्‍थान- दीपक चौधरीक घर। मोहनक छेकाक पूर्ण तैयारी। दलानपर एकटा डोलमे पानि‍ ओ लोटा राखल अछि‍। कुर्सीपर बैसि‍ कऽ प्रदीप कुमार ठाकुर पेपर पढ़ि‍ रहल छथि‍। कि‍छुए देर पश्‍चात सुरेश कामत, बलवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्‍देश्‍वर चौधरी ओ हरे राम सि‍ंहक छेकाक सामग्रीक संग प्रवेश। गंगाराम आ चन्‍देश्‍वर बलवीरक क्रमश: छोट भाए आ पैघ भाए छथि‍न्‍ह। हरे राम सि‍ंह बलवीरक बुजुर्ग पड़ोसी छथि‍। गंगा रामक हाथमे छेकाक श्रमजान अछि‍। दुआरि‍पर दस गोट कुर्सी लागल अछि‍।) प्रदीप- (ठाढ़ भऽ कऽ) नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भए होइत।) आउ, आउ, पधारल जाउ, पधारल जाउ। पहि‍ने सभ कि‍यो चरण पखारू। (सभ कि‍यो चरण पखारि‍ रहल छथि‍। आ बारी-बारीसँ कुर्सीपर बैसैत छथि‍।) सुरेश बावू, कने हम अन्‍दरसँ आि‍ब रहल छी। सुरेश- बेस जाउ। (प्रदीप अन्‍दर जा कऽ दीपकक संग आबैत छथि‍।) दीपक- नमस्‍कार समधि‍, नमस्‍कार कुटुम, प्रणाम मामाश्री। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भेलनि‍।) कहु समधि‍, अपने सभ कि‍यो आबि‍ गेलि‍ऐक। बलवीर- हँ, हँ, हमरा लोकनि‍ सभ ि‍कयो आबि‍ गेलहुँ। दीपक- धन्‍यवाद। बौआ, गोपाल, गोपाल। (अन्‍दरसँ गोपाल कहलनि‍- जी बाबूजी) कने एम्‍हरौ धि‍यान देब बौआ। (गोपाल नश्‍ता लऽ कए प्रवेश ट्रे मे संगमे सोहन सेहो छथि‍। सोहन सभकेँ नश्‍ता दैत छथि‍। सभ कि‍यो नश्‍ता कए हाथ मुँह धोइ कऽ बैसैत छथि‍।) प्रदीप- गोपाल बौआ, कने चाह-पान, बीड़ी-सुपारी, सि‍करेट-सलाइ सेहो देखहक। गोपाल- जी चच्‍चा, जाइत छी। (गोपाल अन्‍दर जा कए ट्रे मे सभ कि‍छु आनैत छथि‍। सोहन सभकेँ पहि‍ने चाह दैत छथि‍ पीवलाक पश्‍चात पान-बीड़ी-सि‍करेट दैत छथि‍। जनि‍का जे मोन होएत छनि‍ से लैत छथि‍। नश्‍ता-पानि‍सँ सभ नि‍वृत छथि‍। सोहन ओ गोपाल ठाढ़ छथि‍।) सुरेश- भागि‍न, बौआकेँ बजाउ। गामपर कि‍यो नहि‍ छथि‍ भैंस हमरे हाथपर लगैत अछि‍। दीपक- हँ, हँ, आबि‍ रहल छथि‍। तैयार भए रहल छथि‍। प्रदीप- सुरेश बाबू, अहाँक भैंस अहीं हाथपर लगैत अछि‍। भैंस बड़ दुलारि‍ छथि‍। सुरेश बाबू छेका-छुकी तँ होइबहि‍ करत। पहि‍ने दस आदमीक बीचमे लेन-देन फाइनल भऽ जाए। बादमे तू-तू-मै-मै कइलासँ प्रति‍ष्‍ठे जाइत अछि‍। हरेराम- सुरेश बाबू, प्रदीप बाबूक गप्‍प हमरा बड्ड नीक लागल। हदमद्दीसँ नीक उल्‍टीए। बाजू, प्रदीप बाबू अहीं, कोना की लेन-देन? प्रदीप- हम नहि‍ बाजब। बजताह सुरेश बाबू। कुटुमकेँ वएह आनलथि‍। कोना की गप करथि‍न्‍ह, से तँ वएह ने कहताह। हरेराम- बाजू सुरेश बाबू, केना की गप्‍प? सुरेश- कोनो गप्‍प-सप्‍प नहि‍। हम बलवीर बाबूकेँ यएह कहलि‍यन्‍हि‍ जे ई कुटमैती करैबला अछि‍ आ ओ भऽ कऽ रहत। एहि‍मे हम पड़ल छी। गंगाराम- तहन छेकामे वि‍लंब ि‍कएक सुरेश बाबू? एत्ते टाइल गुल्‍ली खेलाबाक कोन प्रयोजन? एत्ते कि‍यो छि‍रहारा खेलए। चन्‍देश्‍वर- यौ सुरेश बाबू, सभटा अहींक चक्कर चालि‍ छी। कहलहुँ आदर्श कुटमैती आ देखि‍ रहल छी बटुआ भरू कुटमैती अऍं यौ, एखुनका युग माने अल्‍ट्रासाउडक युगमे लड़ि‍कोक अभाव अछि‍। ओहि‍ हि‍साबे लड़ि‍कीएक बड़ अभाव अछि‍। हमरा ई कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍। हरेराम- हरबराउ नहि‍ बौआ। नवका कुटमैतीमे एहि‍ना तोड़-जोर हेाइत अछि‍। अहाँ शांत रहु। देखि‍यौक की होइत छैक? मॉं सरस्‍वतीक कि‍रपा हेतैन तँ भऽ जाएत। कोनो काज हरबराए कऽ नहि‍ करी। प्रदीप- हरेराम बाबू, चन्‍देश्‍वर बाबू एतेक गैसमे कि‍एक आबि‍ गेलाह। कोनो कुटमैती कएने छथि‍ की नहि‍। गंगाराम- हँ, हँ, अहींटा कुटमैती कएने छी। आ देखने छी। हमरा एहेन दलालबला कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍। लड़ि‍काक लेल दुनि‍या, बड़ीटा अछि‍। प्रदीप- गंगाराम बाबू, अहूँ बड़ भासि‍ रहल छी। कने होशमे बात करू। हरेराम- ओम शांति‍, ओम शांति‍, ओम शांति‍। कृपया सभ कि‍यो शान्‍त होउ। हल्‍ला गुल्‍ला नहि‍ होएवाक चाही। प्रदीप बाबू, कने दीपक बाबूसँ एक बेर अंदर जा कऽ वि‍चार करि‍औक। ओना आधुनि‍क युगमे बेटीक बड़ अभाव अछि‍ आओर बेटा भरमार अछि‍। प्रदीप- ठीक कहलहुँ हरेराम बाबू, कने हम आ दीपक बाबू अंदरसँ आबि‍ रहल छी। (दीपक ओ प्रदीप अन्‍दर गेलाह। कुटुम लोकनि‍ दुआरि‍पर बैसल छथि‍। फेर सुरेश सेहो अन्‍दर जाइत छथि‍। तीनू अंदरमे गप्‍प करैत छथि‍।) सुरेश- भागि‍न प्रदीप, हमर प्रति‍ष्‍ठा बचाउ। हम हि‍नका सभकेँ कहि‍ देने छि‍यन्‍हि‍ जे बि‍आह आदर्श होएत। दीपक- से बि‍ना बुझने अहाँ कि‍एक कहि‍ देलि‍ऐक। सुरेश- से हम बड़ पैघ गलती कएलहुँ। दीपक- अहाँकेँ कम-सँ-कम पाँचो लाख टाका नगद आ अलावे सब समान कहबाक चाही की ने। बुढ़ पुरान भऽ कऽ भसि‍या जाइत छी मामा। सुरेश- तोहर जे मोन छह, ताहि‍पर कुटमैती नहि‍ हेतह भागि‍न। जाह, दोसरे कए लि‍ह। हमरा एतेक मोलाइमे सम्‍हारल नहि‍ होएत। (अन्‍दरसँ खि‍सि‍या कऽ आबि‍ दुआरि‍पर बैसैत छथि‍।) प्रदीप- आब ई कुटमैती लागि‍ रहल अछि‍ जे नहि‍ सम्‍हरत। दीपक बाबू, छोड़ू लोभ-लालच। कहबी अछि‍- लोभ: पापस्‍य कारणम्। अहाँ मामाश्रीकेँ कसि‍ कऽ पकड़ू। कुटमैती तँ केनाइ अछि‍। आदर्शे रहए दि‍यौक। अन्‍यथा अहुँक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत आओर ममोक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत। दुआरि‍पर सँ एहेन सम्‍हरल कुटुमकेँ नहि‍ घुमैबाक चाही। दीपक- तहन की कएल जाए, सर? प्रदीप- कने मामाश्रीकेँ बजाबि‍औन आ हुनकेपर सभटा छोड़ि‍ दियौन्‍ह। दीपक- बेस सर, मामाश्रीकेँ बजाबैत छि‍यन्‍हि‍। (बाहर आबि‍ मामाश्रीकेँ कहैत छथि‍। मामाश्री, यौ मामाश्री, मामाश्री यौ) सुरेश- कने प्रदीप बाबू भीतर बजाबैत छथि‍। (सुरेश अन्‍दर जाइत छथि‍। प्रदीप दीपक ओ सुरेश अन्‍दरमे गप-सप्‍प करैत छथि‍।) प्रदीप- अहीं जे-जेना करबै सुरेश बाबू, सएह होएत। एतय प्रति‍ष्‍ठाक सवाल अछि‍। खाली एना करबाक प्रयास करबैन जाहि‍सँ साँपो मरि‍ जाए आ लाठीयो नहि‍ टूटए। सुरेश- चलै‍-चहल दुआरि‍पर। कुटुम्‍बो की कहैत होएताह। की नहि‍। हम एक्के बेर बाजबह। ओहि‍मे गुंजाइश होएतह तँ करि‍हह, नहि‍ तँ तोहूँ घर, उहो घर। (सभ दुआरि‍पर आबैत छथि‍।) बलवीर- हरेराम बाबू, कने पुछि‍यौन्‍ह, की केना वि‍चार भेलन्‍हि‍? हरेराम- सुरेश बाबू, की केना वि‍चार भेल? हमरा सभकेँ जल्‍दी कहु। बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍। सुरेश- हम ि‍हनका सभकेँ कहलि‍एनि‍ जे बलवीर बाबू नवका टीचर छथि‍। ई बेचारा गरीबे छथि‍। ई आदर्श वि‍आह करताह। ताहुमे ओ कोनो अन्न-छेरू नहि‍ छथि‍, मुर्ख-गमार नहि‍ छथि‍ जे ठकि‍ लेताह। बेचार लड़ि‍कीबला अपना मुँहसँ कहलाह जे हम जे कि‍छु देबैन से अपन बेटी-जमाएकेँ देबैन ने, कि‍नको आनकेँ देबैन फेर ओ बजलन्‍हि‍ जे हम ओतेक जरूर देबैन जाहि‍सँ कोनहुँ पक्षकेँ प्रति‍ष्‍ठापर नहि‍ पड़ए। प्रदीप- बस करू। लेन-देनक गप्‍प खतम करू आओर छेका-छुकीक कार्यक्रम शुरू करू। की यौ दीपक बाबू, गप्‍प मंजूर अछि‍ की नहि‍? दीपक- जाउ, अपने सभ जे जेना करि‍औक। मंजूर अछि‍। हरेराम- तहन दीपक बाबू, पुरहि‍तकेँ खबर कएने छी? दीपक- आइ भि‍नसरे खबर केलि‍एन्‍हि‍। ओ अएलो छथि‍। कखनो देखने रहि‍यन्‍हि‍। कोनाे जजमान ओहि‍ठाम गेल होएताह। हरेराम- कने जल्‍दी, पुरहि‍तोकेँ देखि‍यौन्‍ह आ लड़ि‍कोकेँ बजाउ। प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू (सोहन अंदर जाइत अछि‍) प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू। (सोहन अंदर जाइत अछि‍।) बौआ गाेपाल, भैयाकेँ बजाउ। (गोपाल सेहो अंदर जाइत अछि‍। पहि‍ने पुरहि‍तक संग सेाहनक प्रवेश। पुरहि‍तकेँ सभ कि‍यो साग्रह बैसाबैत छथि‍। तहन गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ पएर छुबि‍ प्रणाम करैत छथि‍ आ सभ कि‍यो आशीर्वाद दैत छथि‍न्‍ह।) हरेराम- बैसु बौआ। (मोहन बैसि‍ जाइत छथि‍) की नाम छी? मोहन- मोहन कुमार चौधरी। (ठाढ़ भऽ कऽ) हरेराम- पि‍ता जीक की नाम छी? मोहन- श्री प्रदीप चौधरी। हरेराम- परदादाक नाम की छी। मोहन- (असमंजशमे पड़ि‍) नहि‍ बुझल अछि‍। हरेराम- खाइर छोड़ू, कोनो बात नहि‍। अहाँ करैत की छी? मोहन- दि‍ल्‍लीमे एक्‍स-पोर्ट छी। हरेराम- अच्‍छा, बैस जाउ। (मोहन बैस जाइत) पुरहि‍त, आब अपन कार्यक्रम शुरू कएल जाए। बड़ वि‍लंब भए गेल। बौआ- हँ हँ, हमहुँ दुपहरि‍यामे अएलहुँ। एम्‍हर-ओम्‍हर घुमि‍ रहल छलहुँ वि‍लंब देखि‍। आउ बौआ पीढ़ि‍या बैसू। (मोहन पीढ़ि‍यापर आ पुरहि‍त कंबलपर बैसैत छि‍थि‍ कलशमे पानि‍ छन्‍हि‍। बौआ झा दीपकसँ कुश मंगबैत छथि‍।) सुनू कुटुम सभ, हम वि‍धेटा पुराएव। कारण छेकाकेँ बड़ लेट भए रहल अछि‍। समए सेहो ठंढ़ी अछि‍। सुरेश- पंडीजी, अहाँकेँ जे नीक लगए से करू। बौआ- पढ़ु बौआ, ओम श्री गणेशाय नम: -5 मोहन- ओम, श्री गणेशय नम: -5 बौआ- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5 मोहन- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5 बौआ- ओम, श्री बराय नम: -5 मोहन- ओम, श्री बराय नम: -5 बौआ- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5 माेहन- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5 बौआ- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5 मोहन- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5 (अन्‍दरमे छेकाक गीत भए रहल अछि‍ छेकाक डाली मोहनक दुनू हाथमे गंगाराम देलखि‍न।) बौआ- बौआ जाउ, डाली गोसाइ लग राखि‍ आउ। (मोहन सभकेँ पाएर छुबि‍ गोर लगैत छथि‍ कुटुम सभ हुनका गोर लगाइ दैत छथि‍।) दीपक बाबू, हमरा दक्षि‍णा दि‍अ। हमरा बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍। दीपक- भोजन-साजन कए लि‍अ आ राति‍मे एतै वि‍श्राम करू। बौआ- भोजन-साजन कए लेब, से संभव अछि‍। मुदा रात्रि‍ वि‍श्राम असंभव अछि‍। यौ बाबू हमर कन्‍या बड़ डरबुक छथि‍। बि‍ना हमरा रहने हुनका नीने नहि‍ होइत छनि‍। प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँ वि‍आह कहि‍या करए चाहैत छी? बलवीर- अहाँ जहि‍या करू। प्रदीप- पंडीजी, कने बि‍आहक दि‍न देखि‍यौक। (पंडि‍जी पतरा देखैत छथि‍।) बौआ- काल्‍हुक दि‍न अछि‍। परसुओक दि‍न अछि‍। चारम-पाँचम-छठम दि‍न नहि‍ अछि‍। फेर सातम दि‍न अछि‍। (एक सए टका लऽ कऽ प्रस्‍थान) प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँकेँ कोन दि‍न पसीन अछि‍? बलवीर- हम बेटीबला छी। हमरा बड ओरि‍यान करए पड़त। हम सातम दि‍नका वि‍आहक दि‍न मंजूर करैत छी। प्रदीप- बेस, बि‍आहक दि‍न फैनल भए गेल, सातम दि‍नका। गोपाल कने भोजनक जुगार देखहक। गोपाल- (गोपाल अन्‍दर जा कऽ आबि‍) चाचा भोजन तँ तैयार अछि‍। भोजन सराए रहल अछि‍। प्रदीप- हरेराम बाबू, चलै-चलू भोजन करए। सोहन बौआ, लोटा आ बाल्‍टीनमे पानि‍ नेने आउ। (सोहन अन्‍दरसँ बाल्‍टीनमे पानि‍ आनैत छथि‍।) कुर्रा- उर्रा करै जाइ-जाउ सरकार। (सभ कि‍यो कुर्रा कए तैयार छथि‍।) चलै चलू भोजनमे। (सबहक प्रस्‍थान) पटाक्षेप दृश्‍य पाँचम क्रमस: आगाँ- १.प्रो. वीणा ठाकुर-महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍ २. किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी ३.कपि‍लेश्‍वर राउत-मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा १ प्रो. वीणा ठाकुर अध्‍यक्ष, मैथि‍ली वि‍भाग, ल.ना.मि‍. वि‍श्‍व ि‍वद्यालय, दरभंगा महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍- राजसी स्‍वभाव, सौम्‍य मुख-मुद्रा, शि‍ष्‍ट व्‍यवहार शालीनताक प्रति‍मूर्ति प्रवासी जीक जीवन सन् संवतसँ बान्‍हल समए नहि‍ थि‍क, अपि‍तु ओहि‍ रचनाकार कलाकारक जीवन थि‍क जे वर वृक्ष सदृश्‍य होइत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी कवि‍-महाकवि‍, नि‍वंधकार, पत्रकार, साहि‍त्‍यकार-उपन्‍यासकार, कथाकार-व्‍यंग्‍यकार छलाह। जखन हम प्रवासी जीक वि‍षएमे कल्‍पना करैत छी तँ मोनमे एकहि‍टा बात अबैत अछि‍ जे प्रवासी जी काव्‍यक स्‍तरपर, साहि‍त्‍यक स्‍तरपर वि‍चार आैर जीवनक स्‍तरपर समस्‍त संकीर्णताकेँ तोड़ैत आधुनि‍क सांस्‍कृति‍ चेतनाक संवाहक छलाह। प्रवासी जी समएक तालकेँ चि‍न्‍हलनि‍, समस्‍त प्रभावकेँ ग्रहन केलनि‍, और अव्‍यानात कएलनि‍ और ताहि‍ करण्‍ो हि‍नक जीवनक समएक सीमा -सीमा हीन- भऽ गेल अछि‍। प्रवासी जीकेँ बुझवा लेल दू स्‍तरपर वि‍चार करव आवश्‍यक भऽ जाइत अछि‍- पत्रकारक रूपमे तथ्‍यात्‍मक समएक प्रतीति‍ और सृजनशील रचनाकारक रूपमे हुनक शाश्‍वत काल बोध। पत्रकारक समए ठोस तथ्‍यक समए होइत अछि‍ और जाहि‍ ठाम सामयि‍क घटना ओकर चेतनाकेँ नि‍रन्‍तर मथैत रहैत अछि‍। तात्‍कालीन समस्‍त वि‍भत्‍स घटनासँ हि‍नका प्रत्‍यक्षीकरण भेल और समयक एहि‍ धारकेँ हि‍नक पत्रकार उजागर कएलक, और ई प्रगट भेल आर्यावर्तक सम्‍पादकक रूपमे अक्षर जगतक सम्‍पादक रूपमे मि‍थि‍ला मि‍हि‍रमे झामलालक झामा, माटि‍-पानि‍मे कहलनि‍। गोनू झा ‘व्‍यग्‍य-स्‍तम्‍भ रूपमे प्रवासी जीक पत्रकारक और समयक वि‍षम प्ररि‍स्‍थि‍ति‍ ओकरा सामाजि‍क चेतनासँ युक्‍त नव यर्थाथ परक दृष्‍टि‍ प्रदान कएलक और जाहि‍मे हि‍नक पत्रकार देशक राजनीति‍क आर्थिक एवं सामाजि‍क वि‍संगति‍सँ उत्‍पन्न संकटसँ समंजनक प्रयास कएलक। दोसर दि‍श हि‍नक रचनाकार शाश्‍वत समयक धारासँ जुड़ल रहल। शाश्‍वत समयसँ जुड़वाक भाव हि‍नका अन्‍तर्दृष्‍टि‍ प्रदान कएलक और कवि‍ प्रवासी जी आत्‍योलष्‍जि‍क प्रक्रि‍यासँ स्‍थापि‍त भऽ शाश्‍वत मूल्‍यक प्रति‍ष्‍ठा करए लगलाह, संगहि‍ अपन रचना द्वारा ओहि‍ मूल्‍यकेँ सार्थकता प्रदान करए लगलाह। प्रवासी जी मानव वघटनक ओहि‍ कालमे मानव जि‍जीवि‍षाकेँ स्‍थापि‍त करए लगलाह। प्रवासी जी आइ हमरा लोकनि‍क बीच नहि‍ छथि‍, आव एकटा दूरी बना कऽ हुनक रचना और जीवनकेँ देखल जा सकैत अछि‍। तथापि‍ एतेक धरि‍ सत्‍य जे ओ काव्‍यसँ मात्र प्रेमेटा नहि‍ करैत छलाह अपि‍तु जीवनसँ थाकि‍ कऽ काव्‍येमे शांति‍ प्राप्‍त करैत छलाह। काव्‍यहुँमे गीत काव्‍यसँ प्रेम हि‍नक सभठाम उजागर होइत रहल। कि‍एक तँ आदि‍म मानव-मनक आदि‍म उद्गार थि‍क गीत काव्‍य। आदि‍म आर्यन्‍मक प्रथम चेतना, सौर्न्‍दय बोधक प्रथम उन्‍मेष तथा आदि‍म हृदयक प्रथम स्‍पन्‍दन थि‍क गीत काव्‍य, और ई सुरक्षि‍त अछि‍ उषा गीतक रूपमे, उर्वशी-पुस्‍रंबाक सम्‍वेदना-सम्‍वादमे तथा इन्‍द्र-वरूरणक वन्‍दना-अर्चनामे और एहि‍ प्राचीन परम्‍पराक प्रथम लि‍िप-बन्‍धन थि‍क वेद, वि‍शेषत: सामवेद। काव्‍य जौं गीतकेँ भि‍न्न अस्‍ति‍त्‍व प्रदान कएनि‍हार प्रधान तत्‍व थि‍क स्‍वानुभूति‍, जाहि‍सँ ई वि‍षयी प्रधान (subjective) भऽ जाइत अछि‍ और एकरहि‍ अभावमे काव्‍य वि‍षय (objective) भऽ जाइत अछि‍। तथापि‍ गीत काव्‍य लेल स्‍वानुभूति‍योसँ महत्‍वपूर्ण भऽ जाइत अछि‍ रागात्‍मक वृति‍। रागक संबध रति‍सँ अछि‍ और रति‍ स्‍थायी भाव थि‍क, जे भक्ति‍ एवं श्रृंगार दुनूमे पाओल जाइत अछि‍। यएह कारण थि‍क जे आदि‍म उषागीत आधुनि‍क काल धरि‍क गीत काव्‍यक वि‍षय श्रृंगारि‍क रहल आएल अथवा भक्ति‍। दुनू प्रकारक भाव वोधमे प्रधान भऽ जाइत अछि‍ स्‍वानुभूि‍त। उषाक चि‍त्रणमे वैदि‍क ऋृषि‍क एहने स्‍वानुभूति‍ अछि‍ एवं ऋृग्‍वैदि‍क वरूणक स्‍तुति‍मे एकान्‍त तन्‍मयता। वस्‍तुत: रागात्‍मक भावाधारि‍त (रति‍भाव) चाहे श्रृंगारि‍क भावना हो अथवा भक्‍ति‍ भावना दुनूमे द्रष्‍टाक स्‍वानुभूति‍क अहम भूि‍मका रहैत अछि‍। और यएह स्‍वानुभूति‍ भेटैत अछि‍ प्रवासी जीक गीतमे। हुनकासँ भेल वार्ताकेँ जौं स्‍मरण कएल जाए तँ यएह स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे गीतक प्रतीक्षा हुनका राग वि‍लक्षण छल। इहो सत्‍य अछि‍ जे अपन काव्‍यपर चर्चासँ ओ सदैव अपनाकेँ बचबैत रहलाह। एकटा संवादमे संकोचक संग कहने छलाह- “अपन काजक मर्यादाक भीतर और ओहि‍मे उपलब्‍ध अवकाशक कारण, हमरा कि‍छु कहवाक अवसर जौं अन्‍यत्र नहि‍ भेटैत अछि‍ तँ आपद धर्म कारण काव्‍ये, वि‍शेष कऽ गीते हमरा माध्‍यम भेटैत अछि‍, जतय हम अपन बात वि‍ना कोनहुँ लाग-लपेटक कहि‍ सकैत छी। कहि‍ सकैत छी जे काव्‍ये हमरा लेल सभसँ नीक माध्‍यम रहल अछि‍।‍” एहि‍ छोट-छीन आलेखमे प्रवासी जी रचि‍त समस्‍त रचनाक मूल्‍यांकन असंभव, तेँ हम मात्र ि‍हनक काव्‍य संकल्‍न ‘हे हम भेटव’क आधारपर, हि‍नक सान्नि‍ध्‍यकेँ पुन: पुन: स्‍मरण करैत, हि‍नक व्‍यक्‍ति‍त्‍व मूल्‍यांकन जे हमरा लेल असंभव थि‍क, अपन व्‍यक्‍ति‍गत अनुभवकेँ पाठकक संग वाँटए चाहैत छी। यद्यपि‍ सान्नि‍ध्‍यक व्‍यक्‍ति‍गत सुखकेँ शब्‍द द्वारा व्‍यक्‍त करब असंभव होइत अछि‍, शब्‍दक सार्मथ्‍यक एकटा सीमा होइत अछि‍। तथापि‍ कि‍छु शब्‍दमे व्‍यक्‍त करवाक संभवत: प्रयास तँ कएले जा सकैत अछि‍। प्रवासी जीक प्रथम कवि‍ता ‘हम भेटव’ भवि‍ष्‍यक संकेत मात्र नहि‍ थि‍क अपि‍तु अपन सहज और वि‍वेकशील भाषाक माध्‍यमसँ प्रवासी जी ई प्रमाणि‍त कऽ देलनि‍ जे एहि‍ ‘स्‍वान्‍त: सुखाय’ वि‍धाक माध्‍यमसँ नहि‍ मात्र अपन अर्न्‍तपरि‍ष्‍करण सम्‍भव अछि‍ अपि‍तु प्रकारान्‍तरसँ मानवीय दायि‍त्‍वक नि‍र्वाहण सेहो। ‘हम भेटव’ काव्‍य संग्रहक बेशी कवि‍ता छोट-छोट अछि‍ जाहि‍मे छोट-छोट मुद्दा सजीव और मार्मिक क्षणकेँ संयोगी कऽ राखल गेल अछि‍। एतए कवि‍क नि‍जी इच्‍छा अछि‍, समयक दवाब अछि‍, भाषाक गम्‍भीरता अछि‍, आस्‍था अछि‍ और नव बाट ताकवाक बेचैनी सेहो अि‍छ। कहवाक तात्‍पर्य जे एहि‍ छोट-छोट काव्‍यसँ प्रवासी जी काव्‍यस्‍वादक एकटा वि‍शाल परि‍धि‍क नि‍र्माण कएने छथि‍। अपन सामाजि‍क सरोकार और प्रकारान्‍तरसँ अपन मानवीय दायि‍त्‍वपर भरोसा करैत प्रवासी जी कहि‍ उठैत छथि‍- “जहि‍या-जहि‍या दृदएहीनता खटकत मोनक वाटपर। हम भेटव-इति‍हास-नदीक चि‍क्‍कन चुनमुन धाटपर। जहि‍या-जहि‍या मैथि‍लत्‍व हारल थकि‍याएल सन लागत। हम भेटव-ति‍लकोर जकाँ-चतरल साहि‍त्‍यक वाटपर।” कवि‍ कर्मक यएह दायि‍त्‍व प्रवासी जी लेल भवि‍ष्‍यक महात्‍वाकांक्षा थि‍क। तखनहि‍ तँ शब्‍दक खि‍लाड़ी शब्‍दक शक्‍ति‍ और सीमाक पड़ताल करैत कहैत छथि‍- ‍“आइ अर्थ वि‍हीन भाषाण मात्र कवि‍ता अछि‍। आइ मोनक बात कहवामे असुवि‍धा अछि‍।” मुदा कवि‍ नि‍राश नहि‍ छथि‍, कहैत छथि‍- “प्रवासी केर गजलमे कनैए मि‍थि‍लाचलक महि‍मा।” सुवासि‍त साधना अछि‍ नष्‍ट भऽ रहले, तुरन्‍त सम्‍हारू। जीवनक समस्‍त वि‍डम्‍बनाकेँ चि‍त्रि‍त करैत प्रवासी जी कहि‍ उठैत छथि‍- “अपने घरमे आव प्रवासक- अछि‍ वि‍डम्‍बना प्रवासी अपने दाँत अपन अघरक मुद्रि‍त कि‍ताबकेँ कुतरैए।‍” पुन: कवि‍ आशावादी होइत कामना करैत छथि‍- “चलह प्रवासी: अषाढ़क आह्वान करी, शीतल जलक कामना मनमे शेष अछि‍।‍” काव्‍यक क्राफ्टक अपेक्षा कथ्‍यक गम्‍भीरता और सादगीपर हि‍नक वि‍शेष ध्‍यान छन्‍हि‍, तखनहि‍ तँ शब्‍दक चयनमे तत्‍सम, तदभव अथवा अन्‍य देशज शब्‍दक प्रयोग कवि‍ सायास नहि‍ करैत छथि‍ अपि‍तु कथ्‍यकेँ यांत्रि‍क होएवाक आयास पाठककेँ नहि‍ होमए दैत छथि‍। जखन कवि‍ कहैत छथि‍- ई मैथि‍लीक नमस्‍कार छथि‍ : प्रवासी, ई एन-मेन लगै छथि‍। तत्‍सम प्रणाम- सन। अथवा सुशब्‍दमे, सुगंधमे, सुवुद्धि‍मे बसह प्रवासी, सत्‍यपर शि‍व जकाँ ढरि‍ जाइछ सुन्‍दरता। वस्‍तुत: हि‍नक प्रत्‍येक शब्‍द प्रत्‍येक पंक्‍ति‍, प्रत्‍येक रचना पाठकक स्‍मृति‍मे संयोगि‍ कऽ राखल कवि‍ता थि‍क। हि‍नक राजनैति‍क, सामाजि‍क एवं सांस्‍कृतिक सोच स्‍पष्‍ट अछि‍, मुदा हि‍नक काव्‍य राजनैति‍क सामाजि‍क दस्‍तावेज नहि‍ थि‍क। अपन अर्जित सत्‍य हि‍नक प्रत्‍येक काव्‍यमे मुखर भेल अछि‍। अनन्‍त रूपात्‍मक, अनन्‍त भावात्‍मक संसारक सूक्ष्‍म मुदा ठोस पहचान हि‍नक काव्‍यमे चि‍त्रि‍त अछि‍। समए मनुष्‍यक अनुभूति‍केँ जाहि‍ मूलवर्ती सम्‍वन्‍धसँ दूर कऽ देने अछि‍ हि‍नक काव्‍य तकरा जोड़वाक उपक्रम करैत पाठककेँ अपनहि‍ जि‍ज्ञासा मध्‍य ठाढ़ कऽ दैत अछि‍। प्रवासी जी अपन काव्‍यक बीज तत्‍व समाजक ओहि‍ वर्गसँ लऽ कऽ आएल छथि‍, जकरा प्रति‍ हि‍नक प्रति‍बद्धता छन्‍हि‍। हि‍नक प्रत्‍येक कवि‍ता एहि‍ वैवि‍ध्‍यमय जीवन जगतक भि‍न्‍न-भि‍न्‍न धरातल-आएल आशय- उदेश्‍यक अनुगूँज लेने अछि‍ तथा पाठककेँ अपन समए-संसारमे जोड़वामे सक्षम अछि‍। पाठक अपन सुख-दुख, त्रास-ताप, ओकर खालीपन भरल हवाइ अनुभूति‍ हि‍नक काव्‍य मध्‍य आकि‍ लैत अछि‍। हि‍नक काव्‍यमे नि‍हि‍त व्‍यंग्‍य हि‍नक सम्‍प्रेषण क्षमताकेँ सहज बना दैत अछि‍। और यएह व्‍यंग्‍य हि‍नक काव्‍यमे, हि‍नक हृदएमे सुलगैत आि‍गकेँ अभि‍व्‍यक्‍त कऽ दैत अछि‍। प्रवासी जी कोनो ‘वाद’क कवि‍ नहि‍ छथि‍ तथापि‍ एकटा मौन क्रान्‍ति‍, एकटा शालीन असहमति‍, एकटा दृढ़ अस्‍वीकार भाव हि‍नक रचनामे सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइ अछि‍। उपरसँ चुप मुदा भीतरसँ क्रन्‍दन हि‍नक रचनामे नुकाएल रहैत अछि‍। यद्यपि‍ उपरका मौन हि‍नक कमजोरी नहि‍ छन्‍हि‍, अपि‍तु यस्‍व’क नि‍षेध करैत स्‍वाभावि‍कताक नि‍कट आबि‍ जाइत अछि‍। दोसर शब्‍दमे मानवताकेँ बचाएब और भवि‍ष्‍यक नि‍र्माणक बेचैनी, तड़प और संघर्षक अछि‍। वस्‍तुत: हि‍नक संघर्ष दू धरातलपर मुखर होइत अछि‍- एक दि‍श जौं जीवन एवं मानवताकेँ बचाएवा लेल अछि‍ तँ दोसर दि‍श रचनात्‍मकताक संघर्ष सेहो दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। प्रवासी जीक रचना जौं एकहि‍ संग जटि‍ल और कठि‍न अछि‍ तँ दोसर दि‍श सहज और सरल। एहि‍ दू वैपरि‍त्‍यक मध्‍य ई अपनाकेँ साधि‍ लेने छथि‍। जेना मानवताकेँ अपन शब्‍द-वाहन दऽ हम जगवै छी कोनो सत्‍यक पहि‍ल कल्‍पना- कऽ हम कवि‍ कहवै छी। वर्तमानकेँ जे भवि‍ष्‍य’दर्पणमे देखि‍ रहल छी। तेँ अनन्‍त दि‍श काव्‍याध्‍यात्‍मि‍क स्‍वरकेँ साधि‍ बढ़ल छी। प्रवासी जीक काव्‍यमे अनुभव जगत अत्‍यन्‍त व्‍यापक अछि‍। साहि‍त्‍यक प्रत्‍येक दि‍व्‍यामे हि‍नक रूचि‍ अन्‍त धरि‍ बनल रहलनि‍। संस्‍कृति‍, वेद-पुराणसँ लऽ कऽ संस्‍कृति‍ कलासि‍क्‍स अछि‍ कतेको वेद अछि‍ जाहि‍मे प्रवासी जी डुवल रहैत छलाह। ताहि‍ कारणें हि‍नक रचना संसार वैवि‍ध्‍यपूर्ण सम्‍पन्नतासँ परि‍पूर्ण अछि‍। एहि‍ दृष्‍टि‍ए प्रवासी जीकेँ स्‍मरण करैत छी तँ जे कवि‍ता आँखि‍क सोझा आबि‍ जाइत अछि‍ ओ थि‍क- आब चुप रहने चलत नहि‍ काज, लाचार युद्धि‍ष्‍ठि‍र छी, बाजू अछि‍ जनतन्‍त्र कतए। हमरे पि‍रवेशक रंगीन झूठ, कहवामे असुवि‍धा अछि‍, परशुराम चाही, मोनक वैशालीमे इत्‍यादि‍। समयक शाश्‍वतमे प्रवासी जी मृत्‍युकेँ जीवनक वि‍कास मानलनि‍, मृत्‍यु बोध हि‍नका जीवनक प्रति‍ आशावादी बनौने रहलनि‍, मृत्‍युकेँ सृष्‍टि‍मे जीवनक सतत् प्रक्रि‍या और ओकर क्रमगत वि‍कासक रूपमे स्‍वीकार करैत, शाश्‍वत सत्‍यक उद्धाटन करैत कहलनि‍- ‘हमर कैलास हमरेसँ पुछैए जे हम के छी, हमर जि‍हवका शय्याकपर- हमर शब्‍दो सुतैए नहि‍। प्रवासी गीत बन्‍हकी राखि‍ कऽ ई गजल अनने छी, परीक्षा अछथ्‍ की एकरो- क्‍यो पढ़ैए वा सुनैए नहि‍। मुदा हि‍नक मृत्‍यु वोध जीवनक प्रेरक वोध थि‍क, जीवन और समयक शाश्‍वत श्रृंखलासँ एक होएवाक वि‍जय उद्घोष थि‍क। अत्‍यन्‍त समृद्ध शि‍ल्‍पक स्‍वामी प्रवासी जीक भाषा साधल और तापसँ युक्‍त छन्‍हि‍। ओ भाषाकेँ बहुत सचेत होइत सहज मुदा अनुभव-गम्‍यएटा प्रदान कएने छथि‍। भाषाक उपमान एतेक टटका और प्रभावी छन्‍हि‍ जे पाठककेँ सहजहि‍ बान्‍हि‍ लैत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी बोल-चालमे भाषाक श्‍लेषात्‍मक शक्‍ति‍क प्रयोग करैत भाषाक सर्वथा एकटा नव मि‍जाज देलनि‍ अछि‍ और शि‍ल्‍पमे हि‍नक प्राकृति‍क वातावरणकेँ पूर्त करवाक वि‍शि‍ष्‍टता सर्वथा अनुपम छन्‍हि‍। वस्‍तुत: एकटा इमानदार रचनाकारक नि‍यति‍ यएह होइत अछि‍ जे ओ सम्‍पूर्ण वि‍श्‍वक काल-कट वि‍ष अपन हृदएमे धारण करैत, जीवन मंथनसँ नि‍कलल अमृत रचनाक माध्‍यमसँ समाजकेँ प्रदान करैत अछि‍। यएह रचनाकारक आत्‍मदान होइत अछि‍। वस्‍तुत: कलाकार नि‍रन्‍तर अपन व्‍यक्‍ति‍गत मोनकेँ एक महानतर मोनमे, और अपन क्षणि‍क अस्‍ति‍त्‍वकेँ एक वि‍शालतर अस्‍ति‍त्‍वक उपर ि‍नछावर करैत रहैत अछि‍। अपन नि‍जी व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ एक वृहत्तर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक नि‍र्माण मि‍टवैत रहैत अछि‍। यएह मि‍टनाइ साहि‍त्‍यक अमरताक मूलाधार होइत अछि‍, कि‍एक तँ भवि‍ष्‍यक उज्‍ज्‍वल वाट एतहि‍सँ नि‍कलैत अछि‍। मानव मूल्‍यक नि‍र्माण एतहि होइत अछि‍। सपनाक नीव सेहो अछि‍ धरातलपर राखल जाइत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी अपन सम्‍पूर्ण रचनामे एहने मानवीय आस्‍था और जि‍जीवि‍षाक इवारत रचि‍ अमर भऽ गेल छथि‍। २. किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी चलनमे जे आबि जाए वैह परम्परा बनि जाइ छै। आ लोक द्वारा ओतैसँ ओकरा उघबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। आ आगू पीढ़ी दर पीढ़ी ओ स्वयं हस्तान्तरित होइत आगाँ बढ़ल चलि जाइत अछि। मुदा जे अपन परम्परा ठाढ़ करबा लेल पुरना परम्पराकेँ तोड़ि वा धकेल कऽ अपन अलग रस्ता बनबैत अछि ओकर सर्वग्राही हएब कठिनाहे नै वरन् असम्भव होइत छैक। एहिना मैथिली लघुकथा मैथिलीक आने विधा जकाँ हिन्दी वा अन्यान्य भाषाक देखाउँसे लिखाए तँ लागल मुदा लगभग तीन दशकक स्वतंत्र यात्राक पछातियो अपन स्वतंत्र विधा वास्ते अपने दुरापर अछोप नहाइत ठाढ़ बुझना जाइत अछि। अपन शैशवावस्थामे सभ भाषाक लघुकथा कथाक छेँट वा आकार मात्रे लघु भऽ सोझाँ आएल। जेना मैथिलियोमे सैह भेल। प्रारम्भिक अवस्थामे कियो लघुकथाक प्रकृति बुझबासँ बेसी एकरा लिखि अपन नामकेँ एकटा आर विधासँ जोड़बाक लौल केलनि। लौल शब्दक प्रयोह ऐ द्वारे जे ओइ विधाक रचनासँ तारतम्यता वा नियमितता नै राखि अपन पारम्परिक विधाक संग सटल रहि गेला। जँ ओ सभ प्रारम्भेसँ ऐ पर ध्यान देने रहितथि तँ शाइत इहो मोकाम पौने रहैत। मैथिलीयो लघुकथा आन भाषाक लघुकथासँ नव नै अछि। मुदा आइ हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीयो भाषाक लघुकथा अपन मोकाम बना लेवामे सक्षम भऽ गेल अछि। यथा ओड़िया, असमिया, मलयालम। मुदा मैथिली लघुकथा आइयो देहरिये-दुरुखे अछोप नहाँइत बौआइत देखाइत अछि। प्रारम्भमे कथाकार आ कवि सबहक समवेत उद्वेगक परिणामे जनमल मैथिली लघुकथाकेँ अपन शैशव कालक सुखद परिणाम कहल जा सकैछ जे लघुकथाक बीया मैथिलीयोमे बागि देल गेल। समयान्तरे ई जेना-जेना आन विधासँ विलगल गेल तेना-तेना ऐ रचना प्रक्रियाक घनिष्ठता गद्य रचनाकार संग भेल गेल। मुदा ओहि समयक स्थापित सभ कथाकारक ई उत्कंठा नै छलनि आ नै रहलनि जे कथे जेकाँ लघुकथोपर अपन छाप रखितथि। ओना ई सत्य अछि जे कथाकार जँ लघुकथाक स्वरूप (प्रकृति) वा शिल्प नै पकड़ि सकलाह तँ ओ नीक कथाकार भलहिं होथु मुदा नीक लघु कथाकार किन्नहुँ नै भऽ सकैत छलाह। प्रायः तहू डरे शुरुआतीमे लघु कथा लेखनक पछाति ओ सभ एहि विधासँ अपन हाथ पएर समेटिये लै मे अपन कबिलताइ बुझलनि, जे मैथिली लघुकथाक लेल अशुभ संकेत दैए। कथाकारक उदासीनताक कारणे सेहो एकरा अछोप सन रहबाक लेल ग्रसित केलकै। पूर्वार्द्धमे जे कथाकार सभ एकरा लिखलनि ओहिमे सँ किछु गीनल, बीछल कथाकार एकरा लिखैत रहि गेलाह जाहिमे शैलेन्द्र आनन्द, तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन, परमेश्वर कापड़ि, सुस्मिता पाठक, चण्डेश्वर खाँ, नवीनचन्द्र कर्ण सदृश कथाकारक नाम उल्लेखनीय अछि। समयान्तरे उपरोक्त अधिकांश रचनाकार ऐ सँ विमुख होइत गेलाह। सम्प्रति तीन गोट रचनाकार यथा तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी आ चण्डेश्वर खाँ अपन निरन्तरता बनौने छथि, जाहिमे वियोगीजीक ऐ विधाक प्रति कएल काज ऐतिहासिक वा अविस्मरणीय कहल जा सकैत अछि। ऐ पीढ़ीक सशक्त कथाकार श्री विभूति आनन्दक ठाम ठीम लघुकथा देखबा-पढ़बामे आएल। हुनकर लघुकथाक प्रति उदासीनता वा कथाक प्रति आदर्शता की कहि सकैत छी? एकर प्रामाणिकता हुनकासँ भेल दूरभाषिक सामान्य वार्तालापेँ एना सोझाँ आएल। ओ कहलनि- शुरुआतमे किछु लघुकथा लिखलौं, मुदा बादमे जे लघुकथा सभ लिखै छी ओ जहाँ चारि-पाँच गोट लघुकथा होइत छैक तँ एकटा कथा बनि जाइत अछि। एकदम अनसोहाँत लागल। हमरा विचलित केलक हुनक ई वाक्य। मुदा अगिले क्षण ध्यान ओतऽ टिकल- ओ कथा विधाक निस्सन हस्ताक्षर छथि। हुनक सोच कथाक प्रति गम्भीर छनि। तेँ हुनक कोनो छोट-पैघ सोच कथाक प्रतिरूप होइछ। कारण जे किछु रहौ, हुनका सनक आनो कथाकारक एहि सोचसँ लघुकथाक प्रति उदासीनता स्पष्ट झलकैए। हम बड्ड आह्लादित भेलौं विदेह ई-पाक्षिकक अंक ६१मे अग्रणी पीढ़ीक कथाकारक रूपेँ फराक अस्तित्व राखऽवाली “शेफालिका वर्मा” जीक लघुकथा देखि। जे शिल्पक आ कथानकक दुनू दृष्टियेँ आ संपूर्ण रूपेँ प्रतिनिधि लघुकथाक श्रेणीमे राखऽबला छल। मैथिली रचनाकार द्वारा प्रारम्भमे एकरा नव चीज बुझि लघुकथा लेखनमे अपन उपस्थिति तँ दर्ज कराओल गेल मुदा समयान्तरे हुनका सभकेँ एहि विधाक रचनाक संग उत्सुकता वा जुड़ाव नै बनल रहबाक प्रमुख कारण रहल जे हुनका सभकेँ एहि विधा मादेँ आगाँ कोनो आर्थिक वा साहित्यिक लाभ दूर-दूर धरि नै देखा पड़ल हेतैन। तकरो ऐ सँ विमुखताक प्रमुख बिन्दु मानि सकैत छी। आर्थिक लाभसँ तात्पर्य जे लघुकथाक माध्यमेँ ओ कोनो मंचपर नै बजाओल जा सकैत छलाह, कारण जे सरकारी तँ दूर निजी रूपेँ सेहो एकर कोनो मंच आइ धरि स्थापित नै भेल अछि। जेना आन विधामे किछु तथाकथित रचनाकार वरु अस्तित्व नै बना पाओल होथु, मुदा कतौ सरकारी वा गएर सरकारी लाभक बेर अबै यथा रचना प्रकाशन वा रचना पाठ्ज- जतऽ पारिश्रमिक वा किराया भत्ता भेटौ तँ ओतऽ धरि भाइ-भैयारिये वा जी हुजुरिये, पछिलगुआ संस्कृतिक संचरण करैत स्थापितो रचनाकारकेँ धकिया, कात कऽ अपन खुट्टा गारि लैत छथि। ओहोन कोनो प्रकारक लाभक आशा हुनका सभकेँ दूर-दूर धरि दृष्टिगोचर नै भेलनि वा नै भेल हेतैन तेँ अपनाकेँ ऐ विधासँ कात केने रहलाह। ऐ विधासँ साहित्यिक लाभ सेहो भेटैबला नहि। साहित्यिक लाभक अर्थ जे- जे किछु रचनाकार ऐ विधामे निःस्वार्थ भावे लिखैत रहि गेलाह, तिनकर एखन धरि लघुकथाकारक रूपेँ पहिचानक कोनो आशा नै आ ने मैथिली लघुकथा विधाक फराक कोनो जग्गह भेटि सकल। हँ, दू गोट रचनाकार अप्पन करनीये मैथिली लघुकथाकारक रूपमे देखार तँ भेलाह। श्री तारानन्द वियोगी, जिनकर शिलालेख लघुकथा संग्रह आ कर्मधारय लघुकथाक समीक्षात्मक पोथी एवं प्रदीप बिहारी जिनक खण्ड-खण्ड जिनगी लघुकथाक संग्रह प्रकाशित अछि। मुदा मैथिलीक मठाधीश सभ द्वारा “नै उठलौ तँ भारी तँ लगलौ” बला कहावतकेँ चरितार्थ करैत कहल गेल- दुनू गोटे पाइबला लोक छथि तँ अपन संकलन प्रकाशित कऽ लैत छथि तै सँ की लघुकथाकार कहेता? मुदा हिनक श्रमक महत्व वा संग्रहक महत्वकेँ बुझबाक प्रयास नै कएल गेल। महत्व नै देबाक ऐतिहासिक कारण रहल। उपरोक्त दुनू व्यक्तिक गएर ब्राह्मण हेबाक। “मैथिलीमे बभनौटी (बाभनवाद) अदौसँ चलि आबि रहल अछि। जखनकि प्रारम्भ सँ ई लिखतममे पूर्णतः कायस्थक द्वारा संचालित भाषा छल (जकरा कि बाभान आकि रार ककरोसँ कोनो रागद्वेष नै छलै)। भाभनक भाषा तँ संस्कृत छल (बोली-चालीमे सभ कियो मैथिलीये बजै छल) जकरा ओ पंडिताइक माध्यमे भजबैत छलाह। मुदा जखन मैथिली स्थापित होमऽ लगलै, जखन ऐ मे कमाइक जोगार देखेलै तखन सभ ठाम कुण्डली मारि बैसि गेला ब्राह्मण बभनौटी देखाबऽ लगला। ओइमे ठठल रहल एकमात्र कर्ण कायस्थ। रारकेँ ई सभ ऐ तरहक कोनो गतिविधिमे टपऽ नै देबाक संकल्प लेलनि आ जकर मूल वैचारिक भाषा मैथिली छलै ओएह सभ ऐ सँ दूर कऽ देल गेलाह” (रमानन्द रेणु, मिथिलांगन, अप्रैल-जून २०१०)- सएह दुराग्रह। पक्षपात मैथिली लघुकथाक संग सेहो भेल। ओना आब ई मिथक टूटि गेल अछि। मैथिलीक भाषा सहित्यिक विकासक मादेँ बहुत रास सरकारी, गएर सरकारी संस्थान काज कऽ रहल अछि। यथा- साहित्य अकादेमी, दिल्ली; मैथिली अकादमी, पटना; भोजपुरी-मैथिली अकादमी, दिल्ली; पूर्व क्षेत्रीय भाषा केन्द्र, भुवनेश्वर; भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)मैसूरक अतिरिक्त किछु निजी संस्था सभ जे प्रकाशन सेहो करैत अछि। एकर जेकियो प्रतिनिधि बनाओल गेलाह ओ सभपारम्परिक विधा यानी कविता, कथा किछु हद तक निबन्धक वास्ते विभिन्न तरहक कार्य/ गोष्ठी केलनि। हँ ठाम-ठीम नाटकक वास्ते सेहो काज भेल। मुदा लघुकथा मादेँ हिनका सबहक स्वतंत्र सोचब तँ दूर कथा संग्रह प्रकाशनक समय कथा संग्रहमे सतौत या पितियौत भाय नहाँइत संग लगा सकैत छलाह। आ ओहि माध्यमे ई थोड़े आओर जगजियार होइत।जेना कि तमिष वा मलयालम साहित्यिक संस्थाक प्रतिनिधि सभ कऽ रहल छथि आ ई दुनू भाषाक लघुकथा अपना बलेँ देखार भेल अछि। मैथिलीमे तँ दूर-दूर धरि एहेन सोच या काज देखार भऽ सोझाँ नै आबि सकल अछि। ताहिमे प्रमुख दूटा कारण हमरा जनतबेँ प्रमुख अछि- पहिल ओहि प्रतिनिधि सभक लघुकथाक प्रति अज्ञानता, दोसर ओइ प्रतिनिधि सबहक नजरीये लघुकथाक उसराहा खेत। मध्यम पीढ़ीक रचनाकार सभमे सँ किछु लोक अप्पन सर्जनात्मक ऊर्जा स्रोतेँ ऐ विधाक अलग जमीन तैयार करबाक अथक प्रयास केलनि। सत्य कही तँ वैह सभ ऊसर खेतकेँ कोड़ि-पटा कऽ एकर आधार रखबामे सक्षम भेलाह। हँ, ओ आधारकेँ मजगुत करैत एहि जमीनकेँ तीन फसिला सन बनेबाक वा हरल-भरल बनेबाक पूर्ण श्रेय नवका पीढ़ीकेँ जाइत अछि। सत्य! नवका पीढ़ीक किछु रचनाकार सक्रिय आ स्वतंत्र रूपेँ लघुकथाकेँ मोकाम धरि लऽ जेबाक लेल अपन रचना स्रोतक सर्वस्व ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि, जाहिमे सभसँ ऊपर नाम अबैत अछि श्री अनमोल झा जीक, जे लगभग डेढ़ दशक पहिने (११९४-९५ क करीब) अपन लघुकथा लेखन, कथा गोष्ठीक माध्यमे शुरू कऽ लघुकथा माध्यमे अप्पन पहिचान बना पौलाह अछि। ओ एखन धरि लगभग तीन सए लघुकथा रचना कऽ गेल छथि, जाहिमे सँ सए सँ ऊपर लघुकथा विभिन्न पत्र-पत्रिका/ स्मारिकामे बहार भऽ देखार भेल अछि। ओना एखन धरि कोनो संकलन नै बहार भऽ पौलनि अछि। तकर पछाति नवका पीढ़ीक ऊर्जावान आ प्रयोगवादी रचनाकार “अहीं केँ कहै छी” संग्रह लऽ जोरदार उपस्थिति दर्ज करौलनि अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झाजी, जे मूलतः लघुकथाक धुरझार लेखन करैत अपन दोसर लघुकथा संग्रहक शीघ्र प्रकाशनक प्रतीक्षारत छथि। अही पीढ़ीक तेजस्वी पत्रकार बहुविधानुरागी श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन बहुविधाक संगोर- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” मे किछु बीछल लघुकथा लऽ जोरगर उपस्थिति देखौलनि अछि।एहने प्रमुख रचनाकारमे नाम अबैछ मुन्नाजीक जे वर्ष १९९४ मे कथागोष्ठीक माध्यमे अपन पहिल रचना “नामरद” जाहिपर सहयात्री मंच, लोहना (मधुबनी) द्वारा “बहस”क आयोजन कएल गेल छल, आ पहिल प्रकाशित रचना लघुकथा- काँद भारती मण्डनक माध्यमे शुरू कऽ एखन धरि मूलतः अही विधाक रचना आ आलेखमे ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि। एकर अतिरिक्त मधुकर भारद्वाज, रघुनाथ मुखिया जीक सेहो रचनात्मक रूपेँ समृद्ध रचना सभ देखएल। गोटा-गोटी कऽ ठाम ठीम आर कतेको गोटे आब अय विधामे सहयोगी छथि। उपरोक्त नामसँ अलग एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्री चण्डेश्वर खाँ जीक जे मध्यम पीढ़ीसँ नवका पीढ़ीक बीच लघुकथा रचनाक निरन्तरताक बलेँ एकटा सेतु (पुल)क काज कऽ रहल छथि। ई सत्य अछि जे किछु गीनल वा बीछल रचनाकारक समूहे एकर स्वतंत्र विधामे स्थापित हेबामे अखन किछु भांगठ बुझना जाइत अछि। कोनो एहेन विधा जकर गोटेक दर्जन सक्रिय रचनाकार नै हुअए तँ ओकर स्वतंत्रता आन्दोलन भारतक स्वतंत्रता आन्दोलन १९४२ आ १९४७ क नै वरन् १८५७ क संग्राम सन भऽ कऽ रहि जाएत। नवका पीढ़ीकेँ एकरा छटपटाहटसँ तँ बाहर आनि लेलक अछि आ आब एकर उग्रास होइत बुझैए। मुदा ऐ नवका पीढ़ीक एहेन रचनाकार सबहक कथालोचक वा समीक्षक द्वारा कोनो नोटिस नै लेल गेल अछि। ओना ई पीढ़ी पक्षपात/ गुटबाजी वा राग-द्वएषसँ दूर निःस्वार्थ भावेँ परिश्रम करैत सीढ़ी दर सीढ़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। मुदा कखनो कऽ ई सभ उपरका पीढ़ीक असहयोगक चलते वा कुटिलचालिये निरुत्साहित (मुदा अनाथ नै) सन अनुभव करैत अछि। एकर अतिरिक्त किछु लोक (रचनाकार) जे मैथिली भाषासँ इतर (यथा हिन्दी, बांग्ला एवं असमिया इत्यादि) पत्र-पत्रिकामे मैथिली कथा साहित्यक मादेँ लिखलनि, ओहो सभ ऐ मे लघुकथाक चर्चासँ अपनाकेँ एगदम दूर रखलनि। एकर दूटा प्रमुख कारण सोझाँ अबैत अछि-१.जे ओहि लेखक/ रचनाकारकेँ लघुकथाक ज्ञाने नहि हेतैन २.लघुकथाकेँ अखन अस्तित्वहीन मानि कऽ अछोप सन विलगा कऽ रखबाक साजिश भऽ सकैए। ३ कपि‍लेश्‍वर राउत मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा- मुख्‍य रूपसँ मि‍थि‍लाक जे क्षेत्र अछि‍ से उत्तरमे नेपाल, दक्षि‍णमे गंगा, पूवमे बंगाल, पश्‍चि‍ममे उत्तर प्रदेश। जकर जीबक पूख्‍य आधार कृर्षि अछि‍। मुदा अपना अहि‍ठाम जाति‍ व्‍यवस्‍था, धर्म व्‍यवस्‍था, लि‍ंग व्‍यवस्‍था तेना ने समाजकेँ जकरने अछि‍ जे एहि‍ क्षेत्रक वि‍काशमे मूख्‍य रूपसँ बाधक अछि‍। एतेक परि‍वर्तन भेलाक वादो समाजमे रूठि‍वादि‍ता, सामंतसोच हर व्‍यक्‍ति‍केँ जकरने अछि‍। सराध, वि‍याह, उपनएनमे जरूरतसँ बेसी खर्च कऽ देव कि‍एक तँ अपन रूआवकेँ प्रर्दशि‍त करबाक लेल। हर काजकेँ धर्म आधारि‍त मानव, ई सोलकन अछि‍, हम उच्‍च वर्ग छी, स्‍वर्ग, नरकक फेरा इत्‍यादि‍ समाजकेँ जकरने अछि‍। मन गढ़ंत राजा-रजवारक खि‍स्‍सा-पि‍हानी कहि‍ समाजकेँ बरगलेने रहब ई सभ मि‍थि‍ला वि‍कास आ मि‍थि‍लावासीक लेल अभि‍शाप भऽ गेल अछि‍। जावत धरि‍ एहि‍ सभसँ उपर उठि‍ सभकेँ अप्‍पन भाय-बन्‍धु बूझि‍ उन्‍नत वैज्ञानि‍क आधारि‍त कृर्षि, बाढ़ि‍ रोदीसँ नि‍जातक लेल व्‍यवस्‍था, जाति‍ व्‍यवस्‍थाक लोप, दान-दहेजक समाप्‍ति‍, सामन्‍ति‍ सोचकेँ नइ बदलव तावत धरि‍ मि‍थि‍ला वासीकेँ ि‍वकासक कल्‍पना केनाइये बेकार अछि‍। मि‍थि‍ला क्षेत्रक माटि‍ तँ एहेन अछि‍ जे सौंसे संसारमे एहन माटि‍ कतो नै छै। अपना अहि‍ठाम तँ जे फसल, जे तरकारी, जे फल उपजबए चाहब से उपजत आइ जे मि‍थि‍लाक मजदूर पंजाव-हरि‍याना पलायन कए रहल अछि‍ से तुरन्‍त रूकि‍ जएत। कि‍सानकेँ जे आइ मजदूर नै भेटि‍ रहल छन्‍हि‍ आ दोसर दि‍स एहि‍ठामसँ मजदूर दोसर राज्‍यमे काम करैले जाइत अछि‍ से रूकि‍ जेतै। समाजमे समरसता एते। सबहक दूख अपन दूख, सबहक सूखकेँ अपन सुख बुझए लागत तँ समाज स्‍वत: बदलि‍ जेतै। एखन जे गौर मौगी गौरबे आन्‍हर बनल छी। से स्‍वत: मेटा जएत। जहि‍ना अपना एहि‍ठाम राजा जनक कृषि‍केँ अपनाए कऽ राज चलौलनि‍ आ अष्‍ट्रावककेँ गुरूवार बनौलनि‍ तहि‍ना हमरो सभकेँ करए पड़त। हार-चामक फेरासँ उपर उठए परत। आ तखने सर्वे भवन्‍ति‍ सुखि‍ना सर्वे सन्‍तु नि‍रामया भऽ सकैत अछि‍। अपन मि‍थि‍ला कोनो राज्‍यसँ वि‍कसि‍त बनि‍ सकैत अछि‍। एकटा भाखरानांगल डेमसँ जँ पंजाब-हरि‍याणा भारतक सि‍रताज भऽ सकैत अछि‍ तँ हमर मि‍थि‍ला कि‍सान ने भऽ सकैत अछि‍। कोशीमे ब्राहक्षेत्र आ कमलामे शीशा पानी आ वागमतीमे नूनथरमे डेम बना देलासँ मि‍थि‍ला तँ स्‍वर्ग बनि‍ए टा जाएत आ हम सभ आनो-आनो राज्‍यकेँ वि‍जली दऽ सकैत छी। जहि‍सँ आनो राज्‍य वि‍कसि‍त हएत। हर खेतकेँ पानि‍ आ हर हाथकेँ काज भेट जएत। तँ जँ मूइलाक वाद जे स्‍वर्ग जाइत छी से जि‍वतेमे स्‍वर्गक भोग करए लागव। एकटा कल्‍पना सुनैत छि‍ऐ जे मि‍थि‍लाकेँ मण्‍डन मि‍श्रक सुग्‍गा आ पानि‍ भरनि‍यो संस्‍कृतेमे गप्‍प करैत छल से आइ मि‍थि‍लामे ८० प्रति‍शत मूर्ख कोना भऽ गेल। जखनि‍ कि‍ आओर आगाँ मुहेँ हेबाक चाही। हमरा समझमे एकटा मूल बात अबैत अछि‍ जे कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेषमे अहंगक भावना। जहि‍ना संस्‍कृत भाषा कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष अपन खानगी बूझि‍ कोठी कन्‍हेपर राखल रहि‍ गेल आ आम जनतामे प्रचार-प्रसार नहि‍ भऽ सकल तहि‍ना मि‍ि‍थलाक मैथि‍लीयो भाषाकेँ ई रूप नै देखए परए। १.उषाकिरण खान- अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया२.अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी- सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, यू.पी.एस.सी. लेल-चि‍त्राक सनेस उषाकिरण खान अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया जखन पन्ना जी लिखल कथा संग्रह ‘अनुभूति’ हमरा हाथमे आएल तखन अतिशय प्रसन्नता भेल। किएक तँ पन्ना जीक संगे हम कएक बेर अस्सीक दशक मे संगहि कथा पाथ कएने छलहुँ। हुनका कथाक मानसिक धरातल आ लेखकीय सावधानी बूझल छल। कथाकारक अनुभूतिक परिचय छल स्थिरचित्तक बुझनुक लेखिका सहजहि श्रोता एवं पाठक सँ सोझा सोझी गप्प करैत छथि। अनुभूतिक वेष्टन मोनक आगाँ पाछाँ रहैत छन्हि, तैं कथाक विकास एकटा सुष्पष्ट विचार यात्रा जकाँ छन्हि। पन्ना जी अनेक परिवेशक कथा लिखैत छथि। ठोस धरातल पर चलय बाली आइ काल्हिक स्त्रीक कथा ओ संवेदना संग नहि पएरक धमक संगे लिखने छथि। जेना ‘सेवानिवृत्ति’। सेवानिवृत्तिक पश्चात् संतान आ स्वजन परिजन मुँह बओने रहैत छथि, जीवन चरित कमाई आ बचत के कोना आलसात कए लेल जाए तकर ब्योंत मे लागल रहैत छथि मुदा वृद्ध माता पिताक चिंता नहिये टा करैत छथि। पन्ना झा जीक कथाकार स्वानुभूति केँ सोझाँ धए टा देलन्हि अछि ओकरा विवछओलन्हि अछि नहि। इएह हिनक विशेषता छन्हि। अपन दृढ़ पद चाप छोड़ब। सेवानिवृत्ति कथाक चर्च हम बारंबार करए चाहैत छी, ओ कथा बूँद मे समुद्र तँ थिके, एकटा पइघ संदेश दैत अछि। मनहि ओ स्वयं दुलारपुर सन नगरक कात बला गामक बेटी छथि तरौनी सन बुद्धिजीवी गामक पुतहु परंच मिथिलाक असूर्यम्पश्या ग्राम ललनाक ज्ञान छलन्हि, कलकत्ता जाए आ ओतए शिक्षा प्राप्त कए, ओतुक्का सामाजिक जीवन के अनुभव लए जे किछु अपना क्षेत्रक विकासक कामना कएलन्हि तकर सत्व ओ ‘सेवानिवृत्ति’ कथामे देने छथिन्ह, एकटा गाम जे आदर्श अछि, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि छैक महाविद्यालय नहि छैक। महिला महाविद्यालय फोलब ‘हाइ-रिस्क’ काज छैक, छात्रा जुटतैक कि नहि? मुदा कल्पना शील लेखिका आधुनिक शिक्षाक आवश्यकता बलें महाविद्यालय फोललनि आ सफल भेलीह। कथामे स्वयं कथानायिका श्राद्धा केर विकास क्रमशः भेल छन्हि ओहिना जेना हुनक महिला शिक्षाक प्रयोजनक। आइ काल्हि शिक्षा सभक जन्मसिद्ध अधिकार छैक तकर कानूनी व्याख्या खूब प्रचारित भऽ रहल छैक। गुल्ली-डंटा खेलए बला बालकसँ लए गइचरवाही मे खैनी ठोकए बला नेन्ना सभ केँ धऽ कऽ स्कूल आनल जाइत छैक। भनहि ओ लोकनि मिड डे लंच लऽ कऽ पड़ा जाइत छथि। लेखिका कमौशा कथामे एकटा निरसय परसनक बालक निरसू केँ अपना संगे आनि गृहकार्यमे लगौलनि आ ओकरा शिक्षा देमए लागलीह। मुदा जखन ओ स्वस्थ सबल बला भऽ गेल। हिनकर सभटा शिक्षा बिसरि पुनः परिवारक अंतहीन जालमे ओझरा। कथामे कचोटक मात्रा स्वल्प छैक आ कमजोर वर्गक दारूण स्थितिक मात्रा अधिक छैक प्रायः सभकेँ बूझल छैक जे व्यक्तिगत आ सामाजिक प्रयाससँ गामे टा नहि घर सेहो खुशहाल आ चिंताहीन हेतैक मुदा से नहि होइत छैक। दूरदृष्टिक अभाव मे ग्रामीण अपन हर्ज करैत अछि, ओकरा अनकर दृष्टि केर लाभ लेबाक क्षमता नहि छैक। क्रमशः आधुनिक होइत समाजक एकटा सटीक कथा अछि-‘पुनरावृत्ति’ चारूकात लौह कवार लागल हो कतहुँ सँ हवाक सिहकी नहि प्रवेश करैक, सूर्यदेवक किरण नहि प्रवेश करैक तैं कि भोअ-साँझक अस्तित्व मेटा जाएत? नहि ने? न मिथिला मे प्रकाश आएल। पति सँ अकारणे प्रताड़ित स्त्री पिताक आशीर्वाद सँ स्वाबलम्बी भऽ जाइत छथि। पुत्रीक शिक्षाक प्रति सजग तँ छथि मुदा हुनकर भाग्य अपने सन होएतैन्ह से नहि बिचारने छलीह। मुदा अधिक आगाँ ससरल समय मे बेटी सुधा मान्यता केँचुल उतारि फेकलक आ स्पष्ट विचार संगे आगाँ पएर बढ़ओलक, मनहि ओ परिस्थिति जन्य पुनरावृत्तिक शिकार भेलीह मुदा सिनुर चुड़ी आ मिथ्या संस्कार केँ निषेध कएलन्हि। ओ उहापोहक अन्हारसँ उबरि एकटा सेविका सँ उद्गार व्यक्त करैत छथि जे माथ हल्लुक करक लेल- ‘एक कप चाय बना दे’ पन्ना जीक लेखिका मनोविज्ञानविद् छथिन्ह से- ‘असमान्य केँ सनक सामान्य केस हिस्ट्री बला कथा पढ़ि परिलक्षित होइत अछि। अही वजनकेँ कथा छैक सरोकार। पति-पत्नी संगे रहथि, दुनू एके शिक्षा प्राप्त करैथ आ एके जीविका मे संलग्न रहथि तथापि स्त्रीपर परिवार, समाज आ आजीविका तेहराएल बोझ रहैत छैक आ पति निश्चिंत; ई अजुका त्रासदी छैक जकरा सँ प्रत्येक शिक्षिताजूझैत अछि तँ मूल्यांकनक’ नायिका किएक ने जूझती? ’नीति प्रकरण’ कथामे ‘बिचमाइनक’ भूमिका महत्वपूर्ण छैक? जकर अप्पन घर बिगड़ल रहैत छैक ओ अनकर सुखी घर उजाड़य पर तुलल रहैत अछि। समय रहितहि यदि पति-पत्नी ई बूझि लेथि तखन कएक टा परिवार विघटित होअऽ सँ बाँचि जाएत। सघन संवेदनाक कथा छैक- ‘बऽर घुरिए गेल’। कतेको गीत कवित्त लिखलनि कवि विद्यापति, पं. हरिमोहन झा, यात्रीजी तथापि एकटा आडम्बर पूर्ण समाज नायक अविश्वस्तरीय, तरल प्रकारक वस्तुक अस्तित्व आइयो अछि। मिथ्या अहंकार, घोर लिप्साक प्रतीक मिथिलाक सर्वाध्जिक सोचबा पर विवश करैत छैक। पन्ना जीक प्रत्येक कथा किछुने कि अनुभव करबापर विवश करैत छैक आ तैं कथा-संग्रहक नामकरण अनुभूति बहुत नीक। एकटा नयनाभिराम आ बीछल पौथी मैथिली मे आबए से स्वागत योग्य अछि। प्रत्येक छोट कथा जे या तँ आकाशवाणीक लेल लिखल गेल आ कथा गोष्ठी मे पढ़बाक लेल लिखल गेल अछि महत्वपूर्ण। एकदम बूंदमे समुद्र। कथा, कथा सूत्र जकाँ बुझाइत अछि। पन्ना जी केँ हम आग्रह करबनि जे पलखति पाबि आब कथा सूत्रक विस्तार करथु आ पूर्ण कथा लिखथु जाहिसँ पाठकक छाँक पुस्तै। कथा संग्रह फ्लैपपर वांछित अवांछित शब्द संचयन छैक जाहिसँ बचल जा सकैत छलैक। ‘दू आखर’ लेखिकाक दृष्टिक निर्विविवाद टिप्पणी अछि आ हुनक स्वयं केर विकासक एकटा संक्षिप्त सूचना। पन्ना झा जी जन नन कन्त्ये वर्सियल व्यक्तित्वक जे अनुभूति सबकम हाथमे अछि से उत्तर आधुनिक मिथिलाक निर्माणक अनुभूति छैक जाहिमे बालक-बालिका युवजन आ वृद्ध-वृद्धा, दादा-दादी सब छथि। अर्थात् उत्तर आधुनिक विचार एसकरूआ नहि अछि, सभाराज बला परिवारक कामना करैत अछि समाज निर्वीथ नहि अछि, मदतिक हाथ चारू भागसँ बढ़ैत अछि। पन्ना जीक लेल शुभकामना। २. अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी-सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह बनैत बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह थिक। पहिल कथा संग्रह ‘घरदेखिया’ करीब छब्बीस वर्ष पूर्व आयल रहए। एतेक अंतराल पर आयल संग्रह स्वाभाविक रूपें लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि। से अहू दुआरे जे सुभाष चन्द्र यादव मैथिलीक जानल-मानल कथाकार छथि। मैथिली कथा साहित्यमे सुभाषक अपन विशिष्ट योगदान अछि। आलोचक कुलानन्द मिश्रक कहब छनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक वादे आरम्भ भेल। जे अखनुक नव्यतम कथाकार लोकनिक प्रियतम आस्था आ पवित्रतम विश्वास बनि गेल अछि। अपन कथा-संग्रह ‘घरदेखिया’क शीर्षक कथा घरदेखिया सुभाषकेँ मैथिली कथामे स्थापित कऽ देने छल। ई कथा मिथिला मिहिरक 15सितम्बर1974क अंकमे पहिल बेर छपल रहए। ई कथा 1977मे मैथिली अकादमीक कथा संग्रहमे अपन स्थान बनौलक। कथाक संग देल सम्पादकीय टिप्पणीमे कहल गेल जे ‘बीसम शताब्दीक एहि उन्नत युदमे समाजक एकटा वर्गक यथार्थ सँ ई कथा जे अंतरंग साक्षात्कार करबैत अछि, से एके संग मोनमे अनिवर्चनीय आह्लाद आ भीतर धरि पैसि जाए बला अवसाद सँ भरि दैत अछि। कथामे भाषा कोना फोटोग्राफी करैत चलैत छैक, तकर बड़ सुन्दर उदाहरण ई कथा अछि’। वस्तुतः ‘घरदेखिया’ सुभाषक अनेको प्रसिद्ध कथामे सँ एक थिक। ओ कथा अभावग्रस्त लोकक घरक परिस्थिति केँ बहुत सुन्यस्त रूपें देखबाक संवेदित करैत अछि। उपेनक संग पाठक सेहो ‘काका’क आर्थिक अभाव केँ देखि चिंतित भऽ उठैत अछि। आब बेटीक बियाह लेल टाकाक जोगाड़ कोना हेतैक? पाठक सोचबा लेल विवश होइत अछि। निश्चित रूपसँ सुभाष मैथिली कथाकेँ अपना तरहक किछु उत्तम कथा सभ देलनि अछि। घरदेखियाक संग काठक बनल लोक, फँसरी आ झालि बहुतो पाठक आलोचक द्वारा प्रशंसित भेल अछि। ई कथा सभ सुभाषेक नहि मैथिलीक नीक कथाक रूपमे मानल जाइत अछि। सुभाषक नीक कथा आरो अछि। हम एतऽ किछु आर कथाक नाम लऽ सकैत छी। एकटा दुखांत कथा, उतर मेघ, जासूस कुकुर आ चोर, हीर्थ, परिचय, बेर-बेर, लिफ्ट आ फुकना। ई सभ कथा अपन शिल्प ओ कथ्यक संतुलनसँ अभीष्ट प्रभाव छोड़बामे सफल भेल अछि। कमसँ कम शब्द मे कोनो व्यक्ति, घटना अथवा भावक राजीव ओ भावपूर्ण अंकन एहि कथा सभमे भेल अछि। एकटा कलाकारक रूपमे सुभाष वर्णनसँ बेशी चित्रणमे अपन निपुणता देखबैत रहला अछि। से बिना कोनो ताम-झाम, रंग-रोगन के। तैं सुभाषक कथा सभ कखनो कऽ एकटा देखा-चित्र, शब्द चित्र सन लगैत अछि। साहित्यमे जेकरा रेखाचित्र कहल जाइत अछि, ओहि मे कमसँ कम शब्द मे कलात्मक ढ़ंग सँ कोनो वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यक अंकन कएल जाइत अछि। एहिमे साधन शब्द होइत अचि, रेखा नहि। तैं एकरा शब्दचित्र सेहो कहल जा सकैत अछि। एकर अंग्रेजी नाम स्केच, फोटो नहि थिक। रेखाचित्र मे कथाक गहीरताक अभाव रहैत अछि, परंतु रेखाचित्रमे नहि। ई सभ बातक होइतो कथा आ रेखा चित्रमे बहुधा भेद करब मुश्किल होइत छैक। सुभाष चन्द्र यादवक ‘घरदेखिया’ संग्रह मे पैतीसटा कथा रहए। बनैत-बिगड़ैतमे एक्कैसटा कथा अछि। एहि एक्कैसटा कथामे एकटा कथा अछि ओ लड़की। ई कथा ‘असंगति’ नाम सँ ‘घरदेखिया’ संग्रहमे सेहो अछि। दुनू कथामे घटना एक्के थिक। मुदा उपस्थापन आ निस्पत्तिमे अंतर अछि। एहि प्रकारे एक्के घटना सँ निर्मित्त कथाक दूटा पाठ, दू शीर्षकसँ हमरा सभकेँ भेटैत अछि। घटना महानगरक होस्टल लगक थिक। मोटरमे बैसि कऽ एकटा लड़का आ लड़की चाह पीलक। चाह पीबि कऽ दुनू कप लड़की हाथमे रखने रहए। नवीन, जे ओकरासँ अपरिचित रहए, तकरा जाइत देखलक तँ पुछलकै जे की अहाँ ओहि दिस (चाहक दोकान दिस) ज रहल छी? सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि कऽ ओकर हाथक कपपर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओहि दुनूक अइंठ कप लऽ जाएत? लड़कीक नेत बुझिते ओ जबाब देलकै नहि। असंगति मे नवीन अंत धरि तिलमिलाइत रहैये आ सोचैये जे ओ किएक नहि कहि सकलै, ‘हाउ डिड यू डेयर?’ कथा एहि ठाम खतम होइत अछि। मुदा ओ लड़की मे एकरबादो कथाकेँ विस्तार देल गेल छै। नवीनक मानसिक अंतर्द्वन्द्व छैक। ओ सोचैत अछि जे दुनू मे क्यो दोषी रहल हेतै आ दुनू दोषी हेतै आ दुनूमे क्यो नहि। कारण आरो भऽ सकैत छल। अंततः एतबे सत्य रहि गेलै जे लड़की उदास भऽ गेल छलै आ नवीन दुखी। ई सभ बात ओ सोचने चल जा रहल छल। दुनू कथामे घटना कनियेंटा अछि। आर जे किछु अचि से मानसिके स्तर पर अछि। पहिलमे अपमानक बोध अंत धरि बनल छैक। एहि बातक पछताबा छै जे लड़की (असंगतिमे लड़कीक नाम कूकी थिक) के झाड़ि कऽ बदला किएक नहि लेलक? ओकरा औकात किएक नहि देखा सकलै! तोहर ई मजाल जे हमरा अइंठ कप उठा कऽ लऽ जाइ लेल कहबें? मुदा ओ लड़की मे ई अपमान बोध अंततः समझौता मे बदलि जाइत अछि। थोसथाम भऽ जाइत छैक। लड़कियो उदास जे अनेरे कहलकै आ नवीनो दुःखी जे अइंठ कप लऽ जइते तँ की भऽ जइतैक। मुदा ई सभटा मन कथे। मनेक भीतरमे चलैत। पजरैत आ मिझाइत। कथाक एहि दुनू पाठक विस्तारसँ तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक भऽ सकैत अछि। बनैत बिगड़ैतमे संग्रहीत कथा सभसँ पूर्व कथाकार ‘अपन गप्प’ मे कहैत छथि जे ‘हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार तत्वकेँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभ सँ प्रेम करए। आ प्रेम बएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत’। कथाकारक इच्छा आ कथा सभकेँ जँ देखी तँ लागत जे कथाकार अपन अभीष्ट केँ बहुत अंश धरि प्राप्त कऽ लेने छथि। जतऽ कतहु अभीष्टक प्राप्ति नहि भऽ सकलनि अछि तँ से अभीष्टक अस्पष्टता आ ताहि कारणे उत्पन्न शिल्पक कमजोरी थिक। प्रथम पुरूष कथावाचक वला अर्थात् कथा कहनिहार ओ कथा जननिहार जतऽ एक छथि से एगारह टा कथा अछि। एहि सभ कथा केँ आत्मानुभूतिक निकट मानल कथा अछि। एहन कथा सभ अछि, अपन-अपन दुःख, आतंक, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, कनिया पुतरा, कारबार, कुश्ती, तृष्णा, दृष्टि, बात, रम्भा, हमर गाम। एहि एगारहो कथामे सँ दस टा कथा मे हम सोझे-सोझ पात्रक रूपमे कथामे सम्मिलित छथि। मुदा एकट्य़ा कथा ‘तृष्णा’ मे ओ दोसर पात्र अखिलनक खिस्सा कहैत छथि। एहि कथा सभक माध्यमे देश-कालक प्रति जे प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि से यथार्थ लगैत अछि। से वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थितिमे राग-भावक होइत अभावकेँ देखबैत अछि। सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध-अनुबन्ध बदलि रहल अछि। अनकर दुख तकलीफक प्रति एक मारूक उदासीनता पसरि रहल छैक। कारोबारी सम्बन्ध अश्लीलता हदकेँ छूबि रहल अछि। शासन-व्यवस्था असंवेदनशील आ भ्रष्ट भऽ गेल छैक। लोक कमजोर आ असहायकेँ दबब चाहैत अछि। गाम-घरमे जमीन-जाल, सम्पत्तिक छीना-झपटी बढ़ल छैक। कथा-कार चाहैत छथि जे प्रेम कयनिहारक बीच सम्वादहीनता नहि उपजय। सम्वादहीनता सँ ओ बैचेन होइत छथि (एकटा प्रेम कथा) ओ मानैत छथि जे पति-पत्नीक बीचोमे सभ किछु साझी नहि होइत छैक (अपन-अपन दुख), शासन-व्यवस्थाक अंग भेलापर मित्र-परिचितोक बात-व्यवहार बदलि जाइत छैक। ई बात-व्यवहार आतंकित कऽ सकैत अछि (आतंक)। श्रद्धा आ स्नेह देखाबऽ लेल कर्मकाण्ड जरूरी नहि छैक (एकटा अंत), निश्छल आ निर्विकार यौवनकेँ छली आ विकारग्रस्त मानसिकतासँ बचाएब कठिन भेल जा रहल छैक (कनियाँ पुतरा)। एहि कारोबारी युगमे असहाय आ निर्बलकेँ आर्थिक-शारीरिक शोषणसँ बाँचब मुश्किल भऽ गेलैक अछि। मानवीयताक ह्रास भऽ रहल छैक (कारोबार), जीवनक आपा-धापी लोककेँ जहिना-तहिना रहबापर विवश करैत छैक (कुश्ती), कोनो सुन्दर-दृष्टि-भंगिमावाली स्त्रीक प्रति सहज खिंचाओ आ लगाओ सम्भव छैक। लोकमे ई इच्छा जनमि सकैत छैक जे ओकर संग हर्तदम बनल रहय। संग नहियो भेटतैक तँ स्मृति आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक (तृष्णा), मनुक्खकेँ जीबाक लेल सार्थक ओ व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक छैक (दृष्टि), जीवनमे बहुतो घटना घटैत रहैत छैक। जीवन कथा चलैत रहैत छैक। दुख-सुख भोगैत रहैत अछि लोक। परन्तु बात कखनो-कखनो बनि पबैत छैक (बात), रम्भा सन रूपवती स्त्री ककरो कोनो अवस्थामे विचलित कऽ सकैत अछि। एहि विचलनमे मोनकेँ नुका कऽ राखब सम्भव नहि छैक। मोन पारदर्शी भऽ जाइत छैक। मोनक सुन्दरता आ कुरुपता देखार भऽ सकैत छैक (रम्भा), अनुपस्थित जमीन्दारक लेल गाम आब स्मृतिमे जा रहल छैक। गामक जीवन विकट भऽ गेल छैक। वस्तुतः गाम आब अपन नहि रहि गेलैक अछि (अपन गाम)। एहि सभ कथामे जे भाव-विचार व्यक्त भेल अछि से बहुलांशमे कथामे अनुस्यूत भऽ कऽ आएल अछि। मुदा जतऽ-ततऽ कथामे फूटसँ टिप्पणी, चिन्तन, दर्शन वा मन्तव्यक सोङर सेहो दिअ पड़लनि अछि कथाकारकेँ। कथा-संग्रहमे संगृहीत किछि कथा सभमे ई सोंगर कखनोकेँ कने खीचल-तीरल सेहो लागि सकैत अछि। लागि सकैत अछि ब्जे कथावाचक जेना किछु आगू बढ़ि गेल अछि आ कथा कतहु पाछूए छूटि गेल अछि। हमरा जनैत एकर कारण कथाक रूप-विधान थिक। ले आउट थिक। कथात्मकताक अभाव थिक। जेँकि सुभाष अपन कथा लेल वातावरण आ पृष्ठभूमिक निर्माण नहिएँ जकाँ करैत छथि तैँ हुनका अभीष्ट प्राप्ति लेल कखनहुँ कऽ फूटसँ उपक्रम करऽ पड़ैत छनि। किछु कथामे कोसीक बाढ़ि आ कोसी कातक गामक चित्रण बहुत प्रामाणिक रूपसँ भेल अछि। किछु कथामे असगर हेबाक कष्ट-भोग दारुण भऽ गेल अछि। एहि कथा सभक चित्रण भयाओन अछि। जाहि कथामे कोसी आ कोसी कातक गाम अछि से कथा केनरी आइलैंडक लारेल, परलय आ हमर गाम थिक। कोसीक बाढ़िसँ तबाही, कोसी कातक गामक रस्ता-पेंड़ाक दुरुहता कहैत अछि जे ई एकटा दोसरे संसार थिक। विकाससँ दूर, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धक बदलैत आयाम आ ओहि भीतरसँ राग-विरागक झिलमिलाइत मनोभाव, बनैत बिगड़ैत जातीय-वर्गीय सम्बन्ध कथा सभकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। “परलय” आ “हमर गाम” शीर्षक तँ कथाक अनुकूल लगैत अछि, ओकर संगति छैक मुदा केनरी आइलैंडक लारेलक कोनो संगति कथामे नहि भेटि पबैत अछि। कैनरी आइलैंड स्पेनक आइलैंड थिक, जे मेडीटरेनियन समुद्रमे अछि। एहि आइलैंडपर लारेल नामक गाछ खूब होइत छैक। एहि झमटगर गाछक छोट-छोट पातक उपयोग मुकुट, टोपी बना कऽ लोककेँ सम्मानित करबामे होइत रहल अछि। इन्गलैंडमे राजाक मुकुटमे लारेल लगाओल गेल रहैक। मुदा कथामे ई लारेल के थिक, से स्पष्ट नहि होइत अछि। कथाक संग शीर्षकक संगतिक समस्या किछु आनो कथाक संग अछि। “असुरक्षित” आ “एकाकी” बाहर आ भीतरसँ असगर भेल लोकक व्यक्तिचित्र थिक। ई दुनू कथा बहिरंग आ अंतरंगक बीच होइत आवाजाहीक कथा थिक। कखनो बहिरंग हावी भऽ जाइत छैक तँ कखनो अंतरंग। ई स्थिति व्यक्तिवादी मानसिकताक देन कहल जा सकैत अछि। एहन लोकमे असुरक्षा-बोध बढ़ि जाइत छैक। ओ अपन वर्तमान वातावरणक संग ताल-मेल नहि बैसा पबैत अछि। दाना, नदी आ कबाछु एहन कथा थिक जेकरामे कोनो पैघ बात कहबाक तागति छैक मुदा अन्ततः से बात उभरि नहि सकल अछि। एक ओझरायल अनुभूति आ संकोच, कहि सकैत छी जे एहि कथा सभकेँ पुष्पित हेबामे बाधक भेलैक अछि। तथापि “नदी” प्रवहमान धारक रूपमे तँ नहि मुदा रुकैत-चलैत वात्सल्यक अनुभूति जगबैत छैक। “दाना” एहि कारोबारी समयमे मनुक्खकेँ हरेक दाना लेल चिड़ै-चुनमुनी सन बनैत देखबैत अछि। “कबाछु”क अनुभूति जुगुप्सा जगबैत छैक जखनि कि एहि कथामे गहींर सत्यक बीज अछि। सत्य ई थिक जे जखन व्यक्तिक वर्ग बदलि जाइत छैक तँ ओकरा अपन पूर्ववर्ती व्यवहार, चालि-चलन, श्रम वा आराम सभक प्रति एक हीनता-बोध, लाज-संकोच उपजि जाइत छैक। कथा-संग्रहक नाम बनैत बिगड़ैत, एहि नामसँ प्रकाशित कथाक आधारपर राखल गेल अछि। एहि कथामे माय-बाप लगसँ परदेश चल गेल सन्तानक कुशलता लेल व्याकुल अनिष्टक आशंकासँ डेरायल, संतानसँ भेटल अवहेलनाक संताप भोगैत पति-पत्नीक खिस्सा कहल गेल अछि। पत्नीकेँ एहि मानसिकतामे कौआक टाहि आ कुकुरक कानब अशुभ लगैत छै। ओ परेशान होइत अछि। पति विभिन्न तर्कसँ पत्नीक ध्यान एहि अशुभ कल्पनासँ हटाबऽ चाहैत अछि। मुदा पत्नी खिसिया जाइत छै। कटाह बात कहि दैत छै। ओहि कटाह बातसँ पति आर पीड़ित होइत अछि। एहि क्रममे ओ विभिन्न बात सोचैत अछि। कौआक कुचरबाक मादे अशुभ कल्पनाकेँ कौआक विलायल जेबासँ जोड़ि दैत अछि। कौआ संग अपनो (दादाक) विला जेबाक कल्पना करैत अछि।एहि प्रकारेँ जेना सन्तानक विछोहसँ उपजल क्षोभ आ दुखमे अपनाकेँ कौआ सन कुरुप मानि, अशुभ मानि, विला जेबाक, मरि जएबाक, स्मृतिमे चल जेबाक उपालम्भ देल गेल अछि। सुइभाष चन्द्र यादवक एहि कथा-संग्रहक अनेक कथामे गामक, दादाक, स्नेह-भावक स्मृतिमे चल जेबाक बात कहल गेल अछि। जेना ई सभ आब स्मृतिएटामे जीवित रहत। वस्तुतः वर्तमान समएपर ई सभ कथाकारक प्रतिक्रिया थिक। ई प्रतिक्रिया समयकेँ बनैत कम आ बिगड़ैत बेसी देखि कऽ, पाबि कऽ व्यक्त भेल अछि। जेना ई समय बनि कम रहल अछि, बिगड़ि बेसी रहल अछि। वर्तमान समएपर कथाकारक ई प्रतिक्रिया यथार्थ भले ही हो, मुदा ई यथार्थ उदास आ निष्क्रिय करैत अछि। एहिसँ ने हृदएमे प्रेरणा होइत अछि आ ने आत्मबल भेटैत अछि। तैँ सुभाषजी सँ ई आशा करब अनर्गल नहि होएत जे ओ अगिला समएमे समकालीन यथार्थक एहन पक्ष सेहो प्रस्तुत करता जे प्रेरित आ सक्रिय करत। जाहिसँ आत्मबल भेटत। एहन कथा वस्तुतः कम बिगड़ैत आ बेसी बनैत कथा होएत। ३. चि‍त्राक सनेस शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। यू.पी.एस.सी. लेल चि‍त्राक सनेस मि‍थि‍लाक भूमि‍ पुरातन कालहि‍ंसँ आर्यावर्तक संस्‍कृति‍क आकर्षण केन्‍द्र रहल अछि‍। सभ दर्शनक संग-संग साहि‍त्‍य सरि‍ताक वैभव-वि‍कासमे मि‍थि‍लाक योगदान अवि‍स्‍मरणीय। एहि‍ भूमि‍क जनभाषामे ज्‍योति‍रीश्‍वरसँ लऽ कऽ अद्यतन काल धरि‍ साहि‍त्‍यकारक भरमारि‍ लागल अछि‍। ओहि‍ साहि‍त्‍यकारक ढेरीमे एकटा एहेन साहि‍त्‍यकार भेल छथि‍, जनि‍क नाम सुनि‍ते हमरा सबहक वास्‍तवि‍क रूप उपटि‍ कऽ आि‍व जाइत अछि‍। ओ छथि‍- बैधनाथ मि‍श्र। तरौनी गामक लाल बैधनाथ मि‍श्र मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ‘यात्री’ नामसँ प्रसि‍द्ध भेलाह। बौद्ध दर्शनसँ प्रभावि‍त रहवाक कारण हि‍न्‍दीमे ‘नागार्जुन’ नामसँ रचना करैत छलाह। प्रांरभि‍क रचना संस्‍कृतमे कएलनि‍, मुदा चौगमा गाम वासी आ मैथि‍लीक चर्चित महाकाव्‍य अम्‍बचरि‍तक सृजनहार पं. सीता राम झाक प्रेरणासँ मैथि‍लीमे सेहो लि‍खए लगलाह। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक हुनक प्रमुख कृति‍ -पारो- मानल जाइत अछि‍, परंच एक छोट मुदा प्रासंगि‍क कवि‍ता संग्रह ‘ि‍चत्रा’ हुनका कवि‍क रूपेँ हमरा सबहक भाषाक ध्रुवतारा बना देलक। चि‍त्राक रचना कोनो योजना बना कऽ नहि‍ कएलन्‍हि‍। सन् १९३१सँ लए कऽ सन् १९४९ई. धरि‍क लि‍खल कि‍छु कवि‍ताक संकलन एहि‍ पोथीमे कएल गेल अछि‍। एक दि‍शि‍ मातृभूमि‍ प्रेम तँ दोसर दि‍शि‍ मैथि‍लीक दशापर क्षोभ। जीवनक समग्र मूल्‍यक तात्‍वि‍क वि‍वेचन। अनि‍योजि‍त रचना सबहक संकलन बड़ कष्‍टदायी होइत अछि‍, मुदा एहि‍मे भाव प्रवाहक अभाव नहि‍ वुझना जाइत अछि‍। माॅ मि‍थि‍ले शीर्षक कवि‍तामे अपन ठाम, अपन गाम, अपन बुद्धि‍ आ अपन दर्शनक सरल रूपमे प्रदर्शन कएल गेल। गौतम यज्ञवल्‍यकसँ लऽ कऽ रमेश्‍वर महाराजक महि‍माक गुनगान। एहि‍ गुनगानक मूल अछि‍- अपन संस्‍कृति‍क वि‍श्‍लेषण। भारती आ मंडन ि‍मश्रक लेल कीर दंपति‍क उदवोधनमे अपन पहि‍चान झलकैत अछि‍। उदयनाचार्य जग्रन्नाथपुरीमे सनातनक पुनरूद्वारक प्रमाणि‍त भेलाह, ई मि‍थि‍लाक वि‍जय थि‍क। वि‍द्यापति‍क कवि‍ता हमर धरोहरि‍ अछि‍। अयाची मि‍श्रक सादा जीवन सेहंति‍त अछि‍, तँ शंकरक वालोहं जगदानंद.... वाल साहि‍त्‍यक आ वाल कौशलक मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्‍लेषण। एक दि‍शि‍ ‘मॉ मि‍थि‍ले’ कवि‍तामे अपन माटि‍पर स्‍वाभि‍मानक दर्शन तँ दोसर दि‍शि‍ ‘अंति‍म प्रणाम’ कवि‍तामे अपन जन्‍म-आ कर्मपर क्षोभ। अर्न्‍तद्वन्‍द्वक एहेना दशा वा वेदना कवि‍मे ि‍कएक उत्‍पन्न भेल? एहि‍ कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ जागरण करवाक लेल पलाएन करए चाहैत छथि‍। अपन संस्‍कारमे नि‍हि‍त वि‍षमतासँ अकच्‍छ कवि‍ झाँपल व्‍यथाकेँ नि‍:शब्‍द उघारए चाहैत छथि‍। जेना अवोध अपन माएसँ घरसँ भागि‍ जएवाक धमकी उपरे‍ मोने दैत अछि‍, ओहि‍ना कवि‍क वेदनामे हृदएगत पलाएन नहि‍ अछि‍। ‘कवि‍क स्‍वप्‍न’ कवि‍तामे कवि‍ समाजक वि‍गलि‍त अर्थहीन व्‍यक्‍ति‍गणक कचोटक मार्मिक चि‍त्रण कएलन्‍हि‍ अछि‍ मि‍थि‍लाक भूमि‍मे सम्‍यक अर्थनीति‍क अभाव अछि‍ तेँ समाजक परि‍दृश्‍यमे भारी अन्‍तर देखए मे अवैछ। एहि‍ भूमि‍पर एकसँ वढ़ि‍ कऽ एक महामानव भेलाह, परंच साधन आ शि‍क्षाक अभावमे कतेक प्रति‍भा मोनइसँ बाहर नहि‍ नि‍कलि‍ पबैत अछि‍- ‘तानसेन कतेक रवि‍वर्मा कते घास छीलथि‍ वाग्‍मतीक कछेड़मे कालि‍दास कतेक वि‍द्यापति‍ कते छथि‍ हेड़ाएल महि‍म वारक हेड़मे’ जौं पेट-पांजड़ि‍ अन्न जलक त्रासमे आकुल हो तँ शि‍क्षाक कल्‍पना नि‍र्मूल प्रमाणि‍त भऽ जाएत, परंच स्‍वपनोमे आशक दर्शन। कवि‍केँ समाजमे नव जोश उत्‍पन्न करवाक प्रेरणा भेटल तेँ प्रवासकेँ छोड़ि‍ अपन मि‍थि‍ला धुरि‍ अएवाक नि‍श्‍चय कएलन्‍हि‍। एहि‍ कवि‍ताक रचना काशीमे कएलनि‍, मुदा मोन तरौनीमे घुि‍रया रहल छल। नि‍श्‍चय जन्‍मभूमि‍क दशापर वेदनासँ कवि‍क मोन तपि‍ रहल होइतनि‍। ‘बूढ़ वर’ कवि‍ताक दर्शन कएलापर हास्‍यपर व्‍यथाक वि‍जय दर्शित होइत अछि‍। शीर्षकसँ स्‍पस्‍ट होइत अछि‍ जे वि‍वाहमे कनि‍या-वरक वएसमे अन्‍तर अवश्‍य हएत। कवि‍ताक मूलमे जएवाक वाद तँ स्‍पष्‍ट भऽ गेल जे वरकेँ वरांठ वा खोरनांठ कि‍छु कहल जाए अनसोहांत नहि‍ लागत। जीवनक अंति‍म अवस्‍थाक वर काँच-कुमारि‍क वरण कहलन्‍हि‍। वि‍वाहि‍ता नि‍:संतान रहि‍ गेली। माएक वि‍रोध नि‍:सफल भऽ गेल। स्‍त्रीगणक व्‍यथाकेँ के बूझत? वाप कैंचाक लोभमे बेटीकेँ बेचि‍ लेलन्‍हि‍। मि‍थि‍लामे एहि‍ प्रकारक पाप होइत रहल अछि‍। समाजक तथाकथि‍त आगाँक पाँति‍मे बैसल जाति‍क दीन आ कर्तव्‍यहीन जनमे ई व्‍यवस्‍था पलेगक रूप धारण कएने छल। अंतमे वेटी धरती माएसँ फटवाक लेल आग्रह करैत छथि‍। ‘वि‍लाप’ कवि‍ताक वि‍षएमे लि‍खब कठि‍न अछि‍ जे एकरा वाल-वि‍याहक कुकृत्‍य वा वि‍धवाक वि‍लापमे सँ की मानल जाए? वाल कालक वि‍याह संस्‍कारमे आनंदक कोन रूप होइत अछि? दुरागमनमे कनि‍या सि‍खेलासँ कनैत छथि‍, मुदा नोरक अभि‍प्राय नहि‍ बूझैत छथि‍। जखन नोरक अर्थ बुझवाक वएस भऽ गेलनि‍ तँ वज्रपात? वैद्यव्‍य जीवनक मार्मिक छंद......। श्रंृगारसँ पहि‍ने नीति‍ आ वैराग्‍य, एहि‍ जीवनक उदेश्‍यपर वि‍चार करवाक आवश्‍यकता अछि‍। वैद्यव्‍य जीवन पति‍क स्‍मृति‍क संग जीबए चाहैत छथि‍। वि‍हंुसलि‍ नायि‍का, मुदा समाजक कुदृष्‍टि‍क डर। एहि‍ कवि‍तामे सेहो उच्‍च जाति‍क व्‍यवस्‍थापर कटाक्ष कएल गेल। वि‍धवा वि‍याह मि‍थि‍ला समाजक सवर्ण वर्गमे पूर्णत: वंचि‍त छल, एखनो आंगुरेपर गनल-गुथल होइत अछि‍। जाहि‍ वर्गक लोक शांति‍सँ दु:खो नहि‍ सहए दैवए चाहैत छथि‍, ओहि‍मे जन्‍मपर कोना गर्व करू? कवि‍केँ कति‍पय व्‍यथा छन्‍हि‍ एि‍ह व्‍यवस्‍थासँ, खि‍न्न छथि‍ उच्‍च जाति‍क अलच्‍द सदृश सोचसँ। पुरूषसूक्‍तमे कर्मक आधारपर जकरा चण्‍डाल आ छुद्र सन संज्ञा देल गेल, हुनक सोच एखन पारदर्शी अछि‍। ओहि‍ वर्गक कांताकेँ ई अधि‍कार छन्‍हि‍ जे कुकर्मी स्‍वामीसँ कखनो जान छोड़ा कऽ आन मनुक्‍खक वरण कऽ सकैत छथि‍ मुदा आगाँक पाँति‍मे बैसल प्रवुद्ध वर्गक वि‍धवा अवला बनि‍ उज्‍जर साड़ीमे दुवकलि‍ छथि‍, मुदा तैयो वागमती कातक बगुला हुनक चरि‍त्र हनन करवाक लेल सदि‍खन उद्धत छथि‍। एहि‍ दशाकेँ देखि‍ कोनो कवि‍क ई उक्‍ति‍ प्रासंगि‍क अछि‍- आगि‍ भेल शीतल, पानि‍ अदहन भऽ उधि‍एलै काँट बनल कोमल आ फूले गड़ि‍-गड़ि‍ गेलै ककरासँ करतै तकरार हम जि‍नगी धि‍क-धि‍क जुआनी धि‍क्कार हमर जि‍नगी। कौशि‍कीक धार कवि‍तामे कोशी माएक पसारल वि‍नाश लीलासँ भेटल परि‍णामक पीड़ा मड़ोरि‍ दैत अछि‍। मुदा ई थि‍क मि‍थि‍लाक शोक। ‘प्रेयसी’ कवि‍ता श्रृंगारसँ भरल अछि‍। प्रेमी द्वारा प्रेमि‍काक प्रति‍ समर्पित संवाोधन नीक लागल। एहि‍ सि‍नेहमे प्रेमी प्रेमि‍काकेँ अपन शक्‍ति‍ मानैत छथि‍। सि‍नेहक मूल रूपक वर्णन, कतहु रूपक चर्च नहि‍। प्रेमी अपन प्रेमीकाकेँ तपवति‍ छथि‍ मुदा ओ अपन नि‍र्णएसँ नहि‍ वि‍लग भेली। एहि‍ समर्पणसँ प्रेमी ि‍सनेहक जुआरि‍ पानि‍ फुटि‍ गेल- अपन इच्‍छापर तोहर आशाक कैलि‍यहु होम तों वनलि‍ रहलि‍ सदए सखि‍ मोम ‘फेकनी’ कवि‍ताक नायि‍का फेकनी कंजूस महि‍ला छथि। कैंचा वचा-वचा कऽ अपन संतति‍क लेल राखव छनि‍ हुनक इच्‍छा। दूध बेचि‍ कऽ टका जमा करैत छथि‍, ओहो दूधमे पानि‍ मि‍ला कऽ तेँ पानि‍ जकाँ दि‍वस वि‍तैत छन्‍हि‍। कोनो धर्म-कर्म नहि‍, कवि‍ एहि‍सँ छुब्‍ध छथि‍। एहि‍ प्रकारक घटना हमरा सबहक गाम-घर होइत अछि‍। पेट काटि‍ कऽ जकरा लेल संयोजन करैत छथि‍, ओ ओहि‍ धनकेँ की करताह? सहज अछि‍- पूत कपूत तँ कि‍एक धन जोहव पूत सपूत तँ कि‍ए धन जोहव। ‘लखि‍मा’ कवि‍ता मि‍थि‍ला नरेश राजा शि‍व सि‍ंहक अर्द्धागि‍नी लखि‍मा रानीक प्रति‍ समर्पित अछि‍। महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क श्रंृगार रसक सि‍द्धि‍मे लखि‍मा जीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ सुन्‍दरताक पैघ भूमि‍का छल। ओना वि‍द्यापति‍क चरि‍त्रपर संदेह करव कवि‍क ना दृष्‍टि‍कोण नहि‍ अछि‍, मुदा हुनक श्रंृगारक नायि‍का लखि‍मा रानी छलीह। महाकवि‍क रचनासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे लखि‍माक सौन्‍दर्य ततेक वि‍लक्षण छल जे हुनक रचनाकेँ अमरत्‍व प्रदान कऽ देलक। वि‍द्यापति‍क नयनमे लखि‍मा अवश्‍य छलीह, परंच ओ कर्तव्‍यवंधसँ बान्‍हल छलाह। हुनक मनमे वि‍रति‍ छलन्‍हि‍। ‘उड़ान’ शीर्षक कवि‍ता कल्‍पनापर आधारि‍त अछि‍। सहज अछि‍ जे कल्‍पनाशील व्‍यक्‍ति‍केँ कर्मसँ वेसी एहि‍पर वि‍श्‍वास होइत छैक। वास्‍तवि‍क जीवनमे कर्मक जतेक महत्‍व हो मुदा कल्‍पनाक उड़ान वि‍लगि‍त मानवकेँ आनंदक शि‍खरपर पहुँचा दैत अछि‍। कल्‍पना कहि‍यो धोखा नहि‍ दैत अछि‍, एहि‍मे ककरोसँ आश नहि‍ होइत अछि‍। स्‍वप्‍नक भारकेँ केओ नहि‍ डि‍गा सकैत छैक। ‘गामक चट्ठी’ कवि‍ता प्रवासमे रहनि‍हार एकटा गरीवक नाओ लि‍खल हुनक कनि‍या व्‍यथाक कि‍छु पाँती थि‍क। गाममे अपन नेनाक संग रहैत दीनक दाराकेँ की-की सहए पड़ैत अछि‍, एकर मार्मि‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। जौं हाथमे कि‍छु कैंचा नहि‍ हुअए तैयो गाम अएवाक नि‍वेदन व्‍यथि‍त कनि‍याँक हृदएगत कचोट बुझना गेल। चारू कातसँ समस्‍यासँ घेरल नारी अपन पति‍सँ खाली हाथ गाम धुरि‍ अएवाक लेल कहैत छथि‍। जीवन डोरि‍केँ पकड़ि‍ कऽ राखव कठि‍न भऽ गेलनि‍। सम्‍यक अर्थनीति‍क उद्धोषण यात्री जीक एहि‍ कवि‍तामे देखएमे आएल। अपन सनेशकेँ कखनो उधारि‍, कखनो झाँपि‍ यात्री जी असमान समाजक अस्‍ति‍त्‍वकेँ ललकारि‍ रहल छथि‍। दीनक नेना पि‍तृक दर्शनक लेल आकुल छथि‍, ओ तँ नेना छथि‍ मुदा माए कि‍ए बजावए चाहैत छथि‍ अपन स्‍वामीकेँ। कवि‍क एहि‍ भावकेँ स्‍पष्‍ट करव आजुक लोकसँ संभव नहि‍ बुझना जाइत अछि‍। ठीठर मामा कवि‍ता गाममे सभ दि‍न रहएबला ठीठर पाठकक पटना प्रवासक ि‍स्‍थति‍पर लि‍खल गेल अछि‍। भगजोगि‍नीक दर्शन करएबला लोककेँ हजार वोल्‍टक इजोतमे उजगुजाहटक अनुभव होइत एहि‍। एहि‍ कवि‍ताक प्रसंग साधारण अछि‍ आ भाषामे प्रवाहक अभाव बुझना गेल। ‘परमि‍टक साड़ी’ चारि‍ अना वेहरी दऽ कऽ तीन टकामे परमि‍टसँ कनि‍या काकीक लेल आनल साड़ीपर आधारि‍त अछि‍। गाम-घरमे बेहरी दऽ कऽ समान खरीदवाक परम्‍परा प्राचीन अछि‍। एहि‍ कथाकेँ यात्री जी कोन उद्धेश्‍यसँ लि‍खलन्‍हि‍ नहि‍ स्‍पष्‍ट भेल। देश कालक दशापर सामान्‍य प्रस्‍तुति‍। कृति‍का नक्षत्रमे, हि‍मगि‍रि‍क उत्‍संगमे, भए गेल प्रभात आ ताड़क गाछ शीर्षक कवि‍ता सभ प्रकृति‍ वर्णनक छोट छाया प्रस्‍तुति‍ करैत अछि‍। ई चारूटा कवि‍तामे कवि‍क उदेश्‍य हुनक शब्‍दसँ नहि‍ प्रकट भऽ सकल। छंद समायोजन नीक लागल मुदा दोसर, कवि‍ता सभसँ तारतम्‍य नहि‍ बुझना जाइत अछि‍। ‘द्वन्‍द्व’ कवि‍ताक शब्‍द-शब्‍दमे परि‍ताप दर्शित भेल। कि‍ंकर्तव्‍य वि‍मूढ़ छथि‍ कवि‍, गाममे रहथि‍ की प्रवासमे? गाममे वि‍पन्नता, मुदा सि‍नेहक आवरण अछि‍। मोरंग वा आन ठामक प्रवासमे कैंचा-कौड़ी तँ अछि‍, मुदा परि‍वार समाजक ि‍सनेह नहि‍। पावनि‍ ति‍हारक जे आनंद गाममे भेटैत अछि‍, ओ शहरमे संभव नहि‍। एक ठाँ गामक जीवनसँ कवि‍क मोन गुजगुजा गेलनि‍। गामक छोट लोक (साधन वि‍हि‍न) पलाएन कऽ रहल अछि‍, तेँ सामाजि‍क व्‍यवस्‍थामे अन्‍तर आि‍व गेल। यात्री जीक अर्न्‍तमन समाजक बदलैत स्‍वरूपसँ संतुष्‍ट अछि‍, कि‍एक तँ हुनक साम्‍यवादमे समाजवादक ज्‍योति‍ प्रखर भेल अछि‍। ‘ऋृतु संधि‍’ शीर्षक प्रकृति‍ वर्णनसँ जोड़ल अछि‍, मुदा एहि‍मे अर्थनीति‍क मर्म झाँपल अछि‍। ग्रीष्‍मक तात्‍पर्य दीन मुदा उद्वेलि‍त दीन, वर्षाक अर्थ नव जीवनक वि‍श्‍वास। दीनमे साधनक अभाव परंच हुनक श्रद्धा उद्वेलि‍त अछि‍। एहि‍ कवि‍तामे महाकवि‍ पंतक छाया वादक झलकि‍ देखएमे अबैत अछि‍। जौं यात्री जीक पद्य सागरक सुवासि‍त सरि‍ता चि‍त्राकेँ मानल जाए तँ एहि‍मे सभसँ पैघ योगदान ‘वंदना’ कवि‍ताक देल जाएत। ‘वंदना’ कवि‍ताक शीर्षक मात्र माध्‍यम थि‍क हुनक जन जनक व्‍यथाकेँ नग्‍न करवाक लेल। मि‍थि‍लाक समग्र जीवन दर्शनकेँ एहि‍ कवि‍तामे कवि‍ मंचस्‍थ कऽ देलनि‍। नेपथ्‍यमे ि‍कछु नहि‍ रहि‍ गेल। अनुलोम-वि‍लोम, आशक्‍त-घृणा सभटा उपटि‍ कऽ बाहर कऽ देलनि‍। मि‍थि‍ला वर्णनपर बहुत रास कवि‍ताक रचना भेल अछि‍। परंच वेसी कि‍छु वि‍शेष वर्गकेँ महि‍मामंडि‍त कएलक। उपेक्षि‍तकेँ सम्‍मान देवाक ि‍हनक शैली आवएबला वास्‍तवि‍क मैथि‍ल संस्‍कृति‍क रक्षकक लेल कोसक पाथर प्रमाणि‍त हएत। मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍मे रहनि‍हार, संस्‍कृति‍केँ आत्‍पसात केनि‍हार सभटा मैथि‍ल छथि‍। मैथि‍लीमे एतेक सम्‍यक सोच रखएबला कतेक लोक छथि‍? मैथि‍ली भाषीक चर्च होइते मैथि‍ल ब्रह्मण आ मैथि‍ल कर्ण कायस्‍थक नाओ उमरि‍ जाइत अछि‍, मुदा अन्‍य वर्ग की मैथि‍ल नहि‍? जौं दोसर भाषाक लोक उपर्युक्‍त दुनू जाति‍क लेल एहि‍ भाषाक वाचकक प्रयोग करैत छथि‍, तँ दुनू कि‍एक नहि‍ ि‍वरोध करैत छथि‍? ओना एहि‍ वर्गक कि‍छु लोक वि‍स्‍तृत सोचक छथि‍, मुदा ओ सेहो एहि‍ प्रश्‍नपर चुप भऽ जाइत छथि‍न्‍ह? यात्री जीक आत्‍मा नि‍श्‍चि‍त रूपसँ एहि‍ कवि‍ता रचना करए काल काँपि‍ गेल हेतनि‍। एहि‍ सनेशकेँ जौं सभ गोटे आत्‍मसात कऽ ली तँ मैथि‍लीक परि‍दृश्‍य अवश्‍य बदलि‍ जाएत। आर्य, द्रवि‍ड़, आंग्‍ल, इस्‍लाम आ पारसी सभ परि‍वारक सभटा भाषामे मात्र मैथि‍लीपर जाति‍वादी स्‍वरूपक कलंक लागल अछि‍। ‘चि‍त्रा’ संग्रहक वि‍शेष पक्ष अछि‍- एकर सम्‍पूर्णता। आंचलि‍क रचनाकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे प्राथमि‍कता देल गेल अछि‍। एहि‍ भ्रमकेँ यात्री जी ‘गाॅधी’ शीर्षक कवि‍ता लि‍खि‍ कऽ तोड़ि‍ देलनि‍। गाँधी मात्र एक व्‍यक्‍ति‍क नाअो नहि‍ ‘भारतीय दर्शन’ थि‍क। एहि‍ दर्शनमे कोनो वि‍भेद नहि‍, सबहक लेल स्‍थान एहि‍ दर्शनक मूल संस्‍कार थि‍क। वि‍डंम्‍बना अछि‍ जे समाजमे ि‍दव्‍य ज्‍योति‍ जगावएबलाक अंत नि‍र्मम होइत छन्‍हि‍। इसा-मसीह आ सुकराते जकाँ गाँधी मर्म स्‍पर्शी रूपेँ वि‍लोकि‍त भेलाह। राजा भर्तृहरि‍क ‘वैराग्‍य शतक’ जकाँ यात्री जीक रचनामे क्षोभक अवलोकन कएल जा सकैत अछि‍। ‘आसि‍न मासक राति‍ इजोरि‍या कहैमे तँ ज्‍योति‍क प्रतीक थि‍क, मुदा बुढ़वा पीपरक ठुट्ठपर बैसल नील कंठक त्राससँ भरल जीवनमे एहि‍ ज्‍योति‍क कोन अर्थ? फागुनक इजोरि‍या टहाटही हो वा युग धर्म सभ ठाम वि‍गलि‍त असार जीवन रसकेँ छंदसँ यात्री जी पसारि‍ देलनि‍। जेठक दुपहरि‍यामे कालक प्रहारकेँ देखएबाक सार्थक प्रयास कएल गेल। देश दशाष्‍टक भ्रष्‍टाचारपर लि‍खल यात्री जीक अश्रुकण थि‍क। यात्री जीक यौवन परतंत्र भारतमे बीतल, मुदा स्‍वतंत्रताक दू बरख वाद एहि‍ कवि‍ताक रचना कएलन्‍हि‍। जे आश अप्‍पन लोकसँ कहल गेल ओहि‍ आशक पूर्णतामे संदेह देखएबाक यात्री जी प्रयास कएलनि‍। परम सत्‍यकेँ चि‍त्राक सतोगुण कहल जा सकैत अछि‍। स्‍वामी वि‍वेकानंदक शून्‍यवादी सोच सदृश यात्री जी जहानक अस्‍ति‍त्‍वपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह लगएवाक प्रयास कएलनि‍। प्रारंभमे वैराग्‍यक अनुभूति‍, मुदा शनै: शनै वि‍श्‍वासक सोतीमे डुवकी लगावए लगलनि‍। यएह थि‍क गृहस्‍थ धर्म। मनुष्‍य वि‍पत्ति‍मे संसारकेँ मायागृह बूझैत अछि‍, परंच मोहक तांडवसँ केओ नहि‍ बचि‍ सकैछ। अंतमे वि‍श्‍वासक संग एहि‍ कवि‍ताक दुरागमन कएल गेल। अंति‍म पद्य एकटा पाछाँक पछाति‍मे वि‍चरण करएवाली नारीक कर्मगाथा थि‍क- ‘गोट-वि‍छनी’। नारी पुनरूत्‍थानपर भाषण खूव देल जाइत अछि‍ मुदा अज्ञ, दीन, साधन वि‍हीन, शोषि‍त आ समाजक धारसँ बाढ़ि‍क खाधि‍ जकाँ कटलि‍ नारीक व्‍यथा लग केओ नहि‍ जा सकल। ‘चि‍त्रा’ कवि‍ता संग्रह चि‍त्रा नक्षत्रक तीत पानि‍ जकाँ चि‍न्‍तन करवाक योग्‍य अछि‍। रचनाकारक जीवन चरि‍त्र जौं सम्‍यक हो तँ रचनाक वि‍षए-वस्‍तु समाजक लेल दर्शन भऽ जाइत अछि‍। समग्र जीवन संघर्षक पांजड़ि‍मे वि‍तएवाक कारण यात्री जी कर्म आ धर्मक हृदएमे घुसि‍ गेल छथि‍। चि‍त्रासँ स्‍पष्‍ट दर्शन भेल जे यात्री जी मानव धर्मी छथि‍। छनहि‍मे कचोट आ क्षणहि‍मे क्रान्‍ति‍क जुआरि‍, आवेग आ अतृप्‍ति‍क छोभ रहि‍तहुँ वि‍हानक वि‍श्‍वास तृण-तृणकेँ ि‍सहरा दैत अछि‍। एहि‍ रचनाकेँ जौं आत्‍मसात कऽ लेल जाए तँ वैदेहीक मि‍थि‍लामे पुर्नस्‍ति‍त्‍व सुधारससँ ओत प्रोत भऽ सकैत अछि‍। शेष- अशेष............ पोथीक नाओ- चि‍त्रा रचनाकार- श्री यात्री प्रकाशक- अखि‍ल भारतीय मैथि‍ली साहि‍त्‍य परि‍षद प्रयाग रचना वर्ष- १९४९ १.-राज नाथ मिश्र- कथा- मस्ती २.कुमार मनोज कश्यप- कथा-नोरक दू ठोप १ राज नाथ मिश्र कथा- मस्ती रातिक पहिल पहर बीत गेल छल। अलसाएल मदमातलि राजकुमारी रौशनआरा मसनद पर लुढ़कलि पड़ल छलि।  चिन्ताग्रस्त प्रतीत होइत छलि। मुदा कामोत्तेजित  वासनाक तीब्र चमकसँ ओकर आँखिमे एक विशिष्ट रंगत स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल छल। उत्तेजनाक पराकाष्ठाक कारणे ओकर गौर-वर्णीय चेहरा असाधारण ढंग सँ रक्ताभ भऽ उठल  छल । केराक बीर सनक धानी रंगक मलमलक पोषाकमे ओकर मांसलता झिलमिला रहल छल, जना कि शीषाक स्वच्छ आ पारदर्शी बोतलमे मदिरा देखि पड़ैछ । ई पोशाक ओकर यौवनक मनोरम छटाकेँ बहुगुणित कए किछु अधिके कमनीय बना रहल छल । कामसुन्दरि रौशनआरा अप्रतीम यौवनक मलकानि छलि । ओकर रूपसागरमे किछु एहन माधुर्य छल जे देखए बलाक मन अनायासे उन्मत्त भऽ उठैत छल । अंग-प्रत्यंग साँचमे ढलल-कोमलताक पराकाष्ठा  कमनीयताक   उत्तुंगता। मुख-माधुर्य  विलाससँ परिपूर्ण कारी कारी केश, मदमातलि रतनार नयन। गौरवर्ण चेहराक रंग जना दूधमे सिन्दूर घोरल । ठोर लालटेस, डाँर पातरि, उन्नत उरोज, पुष्ट नितम्ब, कामाग्नि दहकाबएबला । ओकर सुषमा ओ लावण्य ककरहु मुर्छित करबा हेतुए पर्याप्त ।    धानी वस्त्र पर सोनहुला जरी बड्ड फबि रहल छल ।  केश-पाश बड़ सुरूचिपूर्ण रूपेँ गाँथल छल, जाहिमे सँ निकलैत फुलेलक मधुर सुगंधि वातावरणकेँ मादक बना रहल छल आ ताहिमे चोटीमे गाँथल सुविकसित बेला फूलक माला सँ निकलैत सुवास ताहि मादकताकेँ अभिवृद्धि कए रहल छल । माथ पर कनेक लापरवाहीसँ राखल फिरोजी रंगक जरीयुक्त मलमलक ओढ़नी । गरामे लालरंगक मणिमालाक संगहि श्वेत मोतीमाल आपसमे ओझराकक उन्नत उरोजसं टकरा-टकराकक खेल कए रहल छल । दुहू कानमे बेस भरिगर सोनाक कर्णफूल आ ताहिमे जड़ल हरित पन्ना । छाती पर चित्रमय विचित्र हार ताहिमे अनेक हीरा जड़ल छल । नीलम जड़ल पहुँची हाथक शोभा बढ़ा रहल छल । अँगुठा छोड़ि सभ आँगुरमे  अँगुठी जाहिमे  रंग-बिरंगा जवाहरात चमकि रहल छल । डाँरामे तीन आँगुर चाकर सोनाक डरकस । कोमल पएरमे चानीक पाजेब जाहिमे लटकल छोट-छोट घुंघरूक संग श्वेत मोतीक लड़ी । संपूर्ण पोषाक अतरसँ सराबोर । सल्तनते मुगलियाक शाही मुगल खानदानक दू गोट विशेषता खानदानक स्त्रीगणक दृष्टिएँ अति विशिष्ट रहल अछि । प्रथम ई जे शाही खानदानक स्त्रीगण लोकनि परदाक अभ्यन्तर रहैत छलि । मुदा सात परदाक तरमे रहितो राजनीति ओ कूटनीति सतरंजक माहिर खेलाड़िन सभ छलि । आ एहि खेलमे पूर्ण दक्षता ओ चातुरीसँ हिस्सा लैत छलि । आ द्वितीयतः मुगल राजकुमारी--शाहजादी--- लोकनिक विवाह नहि होइत छल । यद्यपि शाहजादी लोकनिक  अभिसार आ अनुचित गुप्त प्रेम प्रसंगक कथा कतेको बेर चर्चित होइत रहल छल मुदा मुगल बादशाह कहियेा ककरहु अपन जमाए नहि बनबथि । ई नियम शहंसाह अकबर बनौलनि आ एकर अनुपालन सभ केओ परवर्ती मुगल बादशाह लोकनि कएलनि । ... कामवासनामे दहकैत रौशनआरा किछुकाल मसनद पर ओङठल   रहलि । फेर थपड़ी बजाए नौरिनिकेँ बजौलनि । राजकुमारीक इशारा पाबि नौड़िनि मदिराक सुराही ओ स्वर्ण प्याली प्रस्तुत कएलक । कामरसक पांच-सात प्याली जखन कंठक नीचा उतरबाक छल कि राजकुमारी मदमस्त भए उठलि आ नौड़िनिकेँ गीत गौनिहारि के बजएबाक आदेश देलनि । किछुए कालक पछाति स्वर लहरीक पंचम चतुर्दिक अपन साम्राज्य पसारि लेलक । मुदा मनक अशान्ति बढ़ैत गेल । उष्ण होइत शरीरकेँ शीतलता प्रदान करबामे मदिराक मादकता ओ संगीतक सरगम दुहू निष्फल रहल ।  उनटे उद्दीपन ओ उताप्ततामे आओरो जुआरि आबि गेल । कामाग्निक बाढ़ि जखन हदक बान्ह तोड़बा हेतु आतुर भ गेल तखन ओ हाथक इशारासँ  गीतगाइन लोकनिकें  जएबाक आदेश देलनि । कामत्तेजनासँ मुखाकृति आओरो अधिक रक्ताभ भए उठल छल । श्वास-प्रश्वास तीब्र सँ तीब्रतर होइत होइत बिड़ड़ो जना आबि गेल रहय । खासमखास नौड़िनि नसीमबानूक बजौहटि भेल । ओ उपस्थित भए चुपचाप मूड़ी झुकौने आदर भावें ठाढ़ि छलि । -------बादशाह सलामत अखन की कऽ रहल छथि। --------हुजूर  !  अखन ओ दरबार-ए-खासमे आबि गेल छथि। --------की वाकयानबीस अपन रोजनामचा  सुना देलक। ---------अखन नहि । अखन बादशाह सलामत बड़ी बेगम साहिबाक संग किछु अंतरंग बिचार-विमर्शमे लागल छथि। --------सुन तों जो । आ सुनने अबै । वाकयानवीस किछु नब  खबरि सुनबैत छथि कि नहि। --------बेस  सरकार, जे हुकुम। खास नौड़िनि नसीमाबानूक गेलाक उपरान्त राजकुमारी अपनहि हाथें मदिरा ढारि ओहिमे गुलाबजल फेंटि पीबए लागलि । किछु क्षण टकटकी लगौने जरैत मोमबत्ती देखलनि आ फेर नौड़िनि बजएबाक हेतुए थपड़ी बजौलनि । पहरेदारिन नौड़िनि उपस्थित भेल । --------रज़िया कतए अछि। -------सरकारक आज्ञाक प्रतीक्षामे बैसल छथि । ------ओकरा पठा दही आ देख एहि बीचमे केओ भीतर नहि आबए। -------- आदेश। माथ झुकबैत पहरेदारिन बाहर भेल। रज़िया  आबि सलामी देलक। अलसाएल नजरिए ओकरा दिस तकैत राजकुमारी पूछलनि- ---------काज भेलौ । ---------जी सरकार । ---------ज्योतिषीजी भेटलखुन। -------जी, जी हं। --------सभ बात हुनका नीक जकां बुझा देलहुन। -------जी सरकार, आज्ञाक अपुरूपें सभ ठीक ठाक भऽ गेल। ----------तोरा बुझेलाक अनुरूपें  दारा शिकोह कें भ्रमित करबामे की ओ सफल रहलाह। ---------जी सरकार। सोलहो आना  राजकुमारीजीक इच्छानुसारें सभ किछु रहल । राजकुमारी देह परसँ ओढ़नी उतारि फेकैत पुनः मसनद पर ओलरि गेलि । किछु क्षण सोचलनि । पुनः मदिराक प्याली उठबैत चुस्की लेलनि । ----------आ दोसर काजक की भेलौ। -----------ओ हो भऽ गेल सरकार। ----------सुभीता सँ। ----------जी हुजूर। ----------के छौ। -----------एकटा अफीमची अछि हुजूर । बहुत   दिनस जनैत छियैक ओकरा। ----------काज संवेदनशील छौक से बुझै छही। -----------सरकार हुजूर अपने बेफिकिर रहियौ ने। सभटा नीक जकां हेतै । ---------बेस त ठीक छौ। बनो एक प्याली । आज्ञा पाबि रज़िया प्यालामे मदिरा ढारलक ताहिमे गुलाबजल फेंटलक आ सेवामे प्रस्तुत कएलक । मातलि राजकुमारी किछु विहुंसैत --------- बेस आ तेसर काज। --------सेहो भऽगेल हुजूर। ------कतए छौक। ----------सरकारक खास कोठरीमे । मुगल शाहजादी राजकुमारी रौशनआरा अपन गरास मोतीमाल उतारि रज़िया पर फेंकलनि । आ मुस्कीदैत मदिरा दिस इशारा कएलनि । रज़िया देमए लागलि । ताबतहि नसीमबानू उपस्थित भेलि । झुकि-झुकि कोर्निस करैत आदाब बजौलनि । राजकुमारी आँखिक इशारासँ रज़ियाके बाहर जएबाक आदेश देलनि । मातलि रौशनआरा नसीमा दिस तकलनि । ---------बादशाह सलामत ख्वाबगाह गेलाह। --------जी नहि सरकार। अखन धरि त नहि । --------खबरनबीस रोजनामचा सुनौलनि। --------जी हुजूर । --------कोनो खास विन्दु । --------जी राजकुमार दारा शिकोह ओहि चालीस कैदीक हाथ कटबा देलनि अछि जे शहजादा शुज़ाक संग लड़ाईमे बन्दी बनाओल गेल छल । --------आओर। --------पछाति सरकारे औलिया आ शाहजादा दारा मे  खूब थुक्कम फजीहत भेल । --------कोन बात पर। --------बादशाह सलामतक कथनी छलनि जे तुरत सुलेमानके आपस बजबालेबाक चाही मुदा दारा एहि बात पर अड़ल रहथि जे सुलेमान  शहजादा शुजा के बंगाल धरि खिहारथि । रौशनआरा बिहुंसि उठलि --------दिव्य, बड़ सुन्दर। नसीमा तों बादशाह सलामतकेँ ख्वाबगाह जेबाकाल धरि ओतहि उपस्थित रहि सब देख सुन । --------बड़ बेस सरकार । कहैत नसीमबानू चलि गेलि । थपड़ी पड़ल, रज़िया आएलि । -------अच्छा त तों ई बतो जे ज्योतषी शाहजादा दाराकेँ की कहलकैक। --------सरकार, शाहजादा दाराकेँ ज्योतिषी नीक जकाँ बुझा देलनि अछि जे सुलेमान शिकोह एहि अभियानमे विजयी भए लौटताह । अखनुक ग्रह-गोचर स्थिति पूर्णतया अनुकूल अछि ।तहि अखनहि बंगाल, बिहार, उड़ीसा पर दखल क लेल जाए । --------वाह, वाह बेजोड़। -------जी सरकार। सभ त हुजूरेक उर्वरा मस्तिष्कक उपजा थिक। --------रज़िया । -------सरकार । --------तों कहलें जे ओ बहुत मनभावन अछि । --------जी सरकार, खनदानी थिक हुजूर । --------अच्छा एक प्याली पिओ । रज़िया प्याली भरलक । शाहजादी रौशनआरा ओकरा एकहि साँसमे गटकि गेलि । प्याली ओंघरा देलनि । उठलि । ऊपरसँ नीचा धरि ऐंचैत, देह तोडै़त उठलि । बाजलि-- श्चल लऽ चल खास कोठरीमे, देखी आजुक रातिक शिकार केहन चुनलंे अछि । नौड़िन रज़िया सहारा दैत उठौलक शाहजादी रौशनआरा डगमगाइत खास कोठरीमे चलि गेलि............... २ कुमार मनोज कश्यप कथा-नोरक दू ठोप कोट के उतारि कऽ सोफा पर पेᆬक जकाँ देलियै आ पैर टेबुल पर राखि कऽ हम आँखि बन्न कऽ लेने रही । थाकल-ठेहियायल कतहु सँ आबि कऽ टेबुल पर पैर राखि कऽ बैसनाई हमर प््रिाय आदति रहल अछि शुरूहे सँ । एहन उमस मे दिन भरिक भाग-दौड़़़क़ंोर्टक एहि रूम-सँ-ओहि रूम, कखनो पुस्तकालय तऽ कखनो मुवक्किंल सभ सँ किंछु बुझैत वा ओकरा सभ कें किंछु बुझबैत़़ भरि दिन यैह करैत-करैत मोन असोथकिंत भऽ जाईत अछि आ शरीर बेजान । एहने मे कखन आँखि लागि गेल से बुझबो ने केलियै। कनियाँ जगओलनि - 'जा निन्न पड़ि गेलियै ! चाह सेरा रहल अछि । ' हम हड़बड़ा कऽ उठलहुँ आ जल्दी-जल्दी चाह सुड़किं गेलहुँ । गरम-गरम चाह पीयब हमरा नीक लगैत अछि  जतबा काल केयो एक-दू घोंट चाह पिबैत अछि ततबा काल हमर कप खाली भऽ कऽ नीचा रखा गेल रहैत अछि । हम प्रेᆬश भऽ लॉन मे आबि गेल रही। कनियाँ पहिनहिं सँ ओतऽ हमर बाट जोहि रहल छलीह । एम्हर-ओम्हरक गप्पक बाद बात केस-मोकदमा के एलै । 'भने मोन पाड़लहुँआई एकटा बुढ़ी आहाँक ठेकान पुछैत-पुछैत आयल छल़़ बड़ अभागलि अछि ओ ! अपने जनमाओल बेटा  अपडेर देने छै बेचारी के ! हे हम नेहोरा करैत छी़ओकर केस लड़ियौ आहाँ देखला सँ तऽ ओ बड़ निर्धन बुझायल हमरा । फीस तऽ साईत नहियें दऽ सकत़़मुदा एकटा सामाजिक सरोकार बुझि मदति कऽ दियौ बेचारी के़। ' कनियाँ नेहोरा-पर-नेहोरा केने जा रहल छलीह । 'मुदा केस की छै से तऽ पहिने बुझियै? ' 'केस की छै, एकटा भावनात्मक अत्याचार छै ओहि अबला मसोम्माति पर । हे हमरा सद्यः विश्वास अछि आहाँ ई केस जीतबे करब ! खाली आहाँ  'हँ ' कहि दियौ़ज़ीवन भरि ओ आशीर्वाद दैत रहत बाल-बच्चा के । ' 'पहिने केस तऽ बताऊ़़ओहिना बुझौआल बुझेने जा रहल छी । ' हमर स्वर मे कनेक खौंझाहटि आबि गेल छल । 'केस तऽ मामूलिये छै़ओहि बुढ़ी के एक्के टा बेटा छै़ओकर बेटा जखन दूईये साल के रहै तखने ओकर घरवला मरि गेलै । कहुना-कहुना कऽ बुढ़ी ओहि बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ समर्थ बनेलकै़एखन बेटा बैंक मे कोनो नीक पद पर काज कऽ रहल छै । बेटा पुतोहु के कहल मे आबि कऽ बुढ़ माय के अपना संगे नहिं राखय चाहि रहल छै । बुढ़ी के कहब छै जे जाहि बेटा के लेल हम अपन सभ किंछु गमा लेलहुँ ओहि करेजा के टुक़ंडा सऽ हम मरबा काल कोना दूर रहि सकैत छी । ओना ओकर बेटा ओकरा अपना सँ दूर घर दऽ नीक-सँ-नीक  सुख-सुविधा देबाक हेतु तैयार छै । मुदा बुढ़ी अपन बेटा सँ दूर नहिं रहऽ चाहि रहल छै । ' 'केस मनलग्गू छैक भावनात्मक  छैक  ओकर 'मास अपील' छैक ओकर निर्णय के दूरगामी प््राभाव समाज पर पड़ि सकैत छैक  ।' हम मामला मे अपना के विभोर केने जाईत रही । कनियाँ हमरा सोच मे पड़ल देखि कहलनि -' काल्हि रविये छै, भोरके पहर मे ओकरा बजेने छियै । अपने सभटा पुछि लेबै। बेचारी के आँखिक नोर नहिं सुखाईत छलै । झाँट धरू एहन बेटा के जे माय ओकरा परवरिस कऽ कऽ एतेक टा बनेलकै़मनुक्ख बनेलकै़ओ अपन माय के नहिं डेब सकलै। हे हम पैर पक़ंडैत छी़आहाँ नामी ओकील छी़बुढ़ी के न्याय दिया दियौ । ' कनियाँ पेᆬर अनुनय-विनय पर उतरि गेल छलीह। केस हमरो रोचक लागल रहै । दोसर, कतेको मामला मे कोर्टक निर्णय आयल छै जे संतानक दायित्व बनैत छै जे ओ अपन माय-बाप के परवरिस करय, तैं केस साधारने छलै । साँच पुछी तऽ कोनो बुड़िबको ओकिंल ई केस जीत सकैत छल । छुट्‌टी के दिन हम अपन निन्नक सभटा बैकलॉग कोटा पूरा करैत छी । दिन माथक उपर आबि गेल छलैक । कनियाँ सिरमा मे बैसि कऽ हमर केस मे अपन आँगुर पेᆬरैत हमरा जगौलनि - 'ओ बुढ़ी आबि कऽ कखन सँ ने बैसलि अछि । आब उठि जाऊ । पेᆬर दिन मे सुति रहब । एहि प््राचंड रौद मे बुढ़ी के पैरे दू कोस गाम जाई के छै । ' चाय के चुस्कंी संग हम ओहि बुढ़ी के सभटा बात ध्यान सँ सुनैत रहलहुँ । अपन जुनियर सिन्हा के कहलियै - 'ड्रापत्ट अप्लीकेशन बना कऽ लऽ आऊ। काल्हि केस फाईल कऽ देबै । ' कनियाँ बुढ़ी के किंछु पानि पीबय देने रहथिन । हम आन केस सभ मे व्यस्त भऽ गेल रही । केस मे उम्मीद सँ बेसी जीरह चलि रहल छै । हमर कहब रहय जे एकमात्र संतान हेबाक कारणे बुढ़ीक बेटा के पूरा-पूरा जिम्मेदारी छै जे ओ अपन बुढ़ माय के देखभाल करय । हम अपन बात पर जोर दैत बजलहुँ - ' मी लॉर्ड ! मेंटीनेंस एंड वेलपेᆬयर ऑफ पीरेंट्‌स एंड सिनियर सीटीजन एक्ट, २००७ के पारित भेला सँ संतान अपन बुढ़ माय-बाप के पालन-पोषण के जिम्मेदारी सँ भागि नहिं सकैत अछि । एहि सम्बंध मे कतेको  न्यायाधिकरण आ न्यायालय के रूलिंग उपलब्ध अछि ।  हमर मुवक्किंल के ओकर एकमात्र बेटा जे ओकर जायदाद के एकमात्र वारिस सेहो छैक, के पूर्ण जिम्मेदारी बनैत छैक जे अपन बूढ़ माय के उचित देखभाल करय । अहू सभ सँ पैघ बात 'मी लॉर्ड' जे जे माय कोना-कोना अपन पेट काटि बेटा के पालि-पोसि आई लायक बनेलकै, ओहि माय के जँ बेटा पेट नहिं भरि सकय, ओकरा दू हाथ वस्त्र नहिं दऽ सकय, ओकर दवाई-विरो नहिं करा सकय तऽ ओ बेटा  बेटा कहेबाक कथमपि योग्य नहिं । ' 'ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड ! ई आरोप सरासर फुसि अछि जे हमर मुव्वकील  बुढ़ माय के परवरिश नहिं कऽ रहलाह अछि । सत्य तऽ ई अछि माई लॉर्ड जे ई अपन माय के नीक-सँ-नीक सुख-सुविधा दऽ रहल छथि आ भविष्यो मे दैत रहबाक वचन दैत छथि । हुनका कोनो तरहक असुविधा वा कष्ट नहिं होनि ताहि लेल एकटा फुल टाईम नोकरनी राखि देल गेल छनि़नियमित डॉक्टरी जँाच आ दवाई-विरो के व्यवस्था कयल गेल छनि़घर मे सभ सुख-सुविधा उपलब्ध कराओल गेल छनि । केवल हमर मुवक्कंील अपन माय के अपना संगे नहिं राखि रहल छथि तकर कारण छैक सासु-पुतोहु मे दिन-राति झगड़ा़दुनू सासु-पुतोहु एक दोसरा के फुटलियो आँखि नहिं देखऽ चाहैत छथि । एना मे घर के नर्क बनेबा सँ तऽ नीक जे बुढ़ी अलग रहथि । एहि सँ ओहो शाँति सँ रहतीह आ हुनकर बेटा - माने हमर मुवक्कंील सेहो । ' 'मी लॉर्ड ! जे माय बेटा के नान्ही टा सर्दी-बोखार भेला पर भरि-भरि राति जागि कऽ बीता देने होई, जाहि माय के लेल दुनियाँ के सभ सँ प््रिाय वस्तु ओकर करेजा के टुक़ंडा होई , जे माय अपन बेटा के खातिर अपन सर्वस्व लुटा देने होई, आई मरन-काल मे ओहि माय के कहल जाय जे ओ अपन बेटा सँ दूर रहय तऽ ई एकटा मायक ममता पर सरासर कुठाराघात नहिं तऽ आर की भऽ सकैत छैक ? तैं हमर ई हाथ जोड़ि कऽ निवेदन अछि जज साहेब जे हमर मुवक्कंील के मरन काल मे अपन बेटा के संग रहबाक अंतिम ईच्छा के पूरा कऽ दियौ । हमर क्लाईंट के सुख-सुविधा, नोकर-चाकर किंछु नहिं चाहियै़बस एकेटा अंतिम ईच्छा जे अपन करेजा के टुक़ंडा के देखैत प््रााण त्याग करी़। ' बजैत-बजैत हमर गला भरि गेल छल, आँखि मे नोर डबडबा गेल छल । चश्मा निकालि कऽ रूमाल सँ हम अपन आँखि पोछि पेᆬर सँ चश्मा पहिरी लैत छी । कोर्टक महौल भारी भऽ गेल छलैक । दुनू पक्ष-विपक्ष सँ तर्कक वाण चलैत रहलै़ज़ज साहेब किंछु-किंछु नोट करैत रहलाह़़लोक सभक ज़िग्याशा बढ़ले जाईत रहलै। आब पैᆬसला के घड़ी आबि गेल छलै़सभ साँस रोकने सुनि रहल छल । जज साहेब खखसि कऽ गला साफ केलनि आ पैᆬसला सुना देलनि -'घोड़ा के पानि पियेबाक लेल घाट पर तऽ लऽ कऽ जायल जा सकैत छैक, मुदा ओकरा पानि पीबाक लेल बाध्य नहिं कयल जा सकैत छै । तहिना यदि हम प््रातिवादी के आदेश कईयो दियै जे ओ वादी के अपने संगे अपने घर मे राखै तऽ परिणाम भऽ सकैछ जे वादी-प््रातिवादी दुनूक जीवन अशांत भऽ जाय । एहि स्थिति सँ नीक जे प््रातिवादी स्वयं निर्णय लेथि । तैं हम प््रातिवादीये पर ई मामला छोड़ैत छियनि़ज़न्म देनिहारि माय तऽ आखिर हिनके छियनि । ' कहि कऽ जज साहेब फुर्ती सँ अपन कुर्सी सँ उठि कऽ चलि गेलाह । कोर्ट-रूम मे लोकक बीच घोल-फचक्कंा शुरू भऽ गेलै़ज़तेक मुँह तते तरहक बात । ओ बुढ़ी हमरा निरिह आँखिये ताकैत कोर्ट-रूम सँ बहरा रहल छलीह । हमरा लागल़़हमर ओकालति के ई सभ सँ पैघ हारि अछि । हम झट्‌ट सँ बाहर निकलि कऽ कऽल जोड़ि कऽ बुढ़ी के आगू मे ठाढ़ भऽ गेलहुँ  -'माताजी ! आहाँ चिंता जुनि करू । हम काल्हिये केस फाईल बना कऽ हाई-कोर्ट मे अपील करैत छी़हमर जीत निश्िचते होयत़़। ' ओ बुढ़ी बामा हाथ सँ हमरा कात करैत बिना किंछु बजने आगू बढ़ि गेलीह । ओ अपन रस्ता पर जा रहल छलीह । हम अबाक भेल हुनकर रस्ता दिस तकैत रहि गेल छी़अपलक माटिक मूर्ति जकाँ स्थिर । नोरक दू ठोप टघरि कऽ गाल पर आबि गेल अछि । १.अरविन्द ठाकुर १. लोकदेव भीम केवट २.लोकदेव लोरिक २. बिपिन कुमार झा- विषवेलक सिञ्चन १.लोकदेव भीम केवट- अरविन्द ठाकुर आठम सदीक मध्य धरि गुप्त-वंशक शासन नरभराइत-नरभराइत चलल। हर्षवर्धनक बाद सम्पूर्ण शासन-क्षेत्रमे अराजकता आ अव्यवस्था पसरि गेल। मत्स्य-न्यायसँ त्रस्त प्रजा अपन रक्षाक लेल सर्वसम्मतिसँ शस्त्र, शास्त्र आ कृषिमे निष्णात अयाचक-ब्राह्मण गोपालकेँ अपन राजा चुनलक। हुनकेसँ पाल वंशक प्रारम्भ भेल। गोपाल बिहार आ बंगालकेँ एकसूत्रमे बान्हि जनसहयोगसँ शासनकेँ सुव्यवस्थित केलनि। गोपाल परम लोकप्रिय राजा भेलाह आ हुनकासँ प्रारम्भ पाल शासन कालमे शिक्षा-संस्कृतिक चतुर्दिक विकास भेल। एगारहम शताब्दी आएल। तखन पालवंशी राजा विग्रहपाल तृतीयक शासन छल। ओहो अपन पूर्वज सभ जकाँ प्रजापालक आ न्यायपरायण छलाह। मुदा हुनक ज्येष्ठ पुत्र महिपाल-द्वितीय सत्तालोलुप छल। पिताक मृत्युक उपरान्त ओ अपन दुनू छोट भाए शूरपाल आ रामपालकेँ बन्दी बनाए कारागारमे ढाठि देलक आ शासनक मनमाना संचालन करए लागल। गुप्तकालमे पूर्वी मिथिला आ पश्चिमी बंगालकेँ मिलाकए एकटा राज्य बनाओल गेल छल- पौन्ड्रवर्धन। एहि क्षेत्रान्तर्गत छल भेरियारीगढ़। ई अजुका अररिया जिला मुख्यालयसँ प्रायः १६ किलोमीटर दूर नेपाल सीमापर अवस्थित अछि। एहि भेरियारीगढ़मे दिब्बोक नामक पालशासकक एकटा प्रभावशाली सामन्त अपन भातिज भीम केवटक संग रहै छलाह। ओ अपन प्रजाक कल्याण लेल तँ तत्पर रहिते छलाह, हुनका अनेक सिद्धि सेहो प्राप्त छलनि। ओ भेरियारीगढ़सँ शासन आ पनार नदीक मनोरम तीरपर भागनगर गामस्थित एक गुफामे योग साधना करैत छलाह। मोरंगक राजा भीमदेवक संग हुनक प्रगाढ़ मैत्री छल। महिपाल द्वारा अपन भाए सभक संग कएल कुकृत्य आ अराजक  शासन पद्धतिसँ सामन्त दिब्बोक क्षुब्ध भए गेलाह। ओ अपन राजाक निन्दनीय कृत्यक विरोध करए लगलाह। ओ केवट सभक २२ (बाइस) उपजातिकेँ संगठित केलनि आ तकर नेतृत्व लेल अपन भातिज भीम केवटकेँ नियुक्त केलनि। संघर्षक योजना बनए लागल। क्षेत्रक अन्य अनेक छोट-बड़ सामन्त सभ भीम केवटक झंडाक नीचाँ एकजुट होबए लागल। महिपालकेँ एकर भनक लागल तँ ओ एक भाए शूरपालकेँ मुक्त कए शासनमे हिस्सेदार बला लेलक। मुदा एहिसँ स्थिति नञि सम्हरलै। जनाक्रोश अप्[अन चरमपर आबि गेल छलै। भीम केवटक नेतृत्वबला जन-सेना आक्रामक भए गेल। राजा महिपाल शक्तिशाली सेनाक संग-संग ग्राम्य रक्षादल वाहिनीसँ सम्पन्न छल मुदा प्रजाक विश्वास ओकरा संग नञि छलै। भयंकर युद्ध भेलै जाहिमे महिपाल हारि गेल आ क्रुद्ध प्रजा ओकर वध कए देलकै। शूरपाल आ रामपाल मुक्त कए देल गेलाह आ दुनू भाए बंगाल दिस चलि गेलाह। विजयोपरान्त दिब्बोकेँ राजा बनाएल गेल। हुनका कोनो पुत्र नञि छलनि तेँ हुनक मृत्युक उपरान्त भीम केवट राजा भेलाह। एक बेर मोरंग राजा भीमदेवक बहिन तिरफूल सुन्नरि एक सए नाहमे सनेस आ दहेजक  संग अपन सासुर जाइ छलीह। सिरीपुर चौरमे किराँत डकैत सभ सइयो नाह लूटि लेलक आ तिरफूल सुन्नरिक हरण कए व्पतालक एहिठाम राखि देलक। हाहाकार मचि गेलै। राजा भीमदेव अपन मित्र भीम केवटसँ गोहार कए मदति माँगलनि। भीम केवट भागनगर गुफामे भगवतीक ध्यान लगौलनि। भगवती परगट भए हुनका तिरफूल सुन्नरिक पता देलथिन। भीम केवट अपन बलशाली हाथमे अढ़ाय मोनक खण्डा लेने बनहौटा घोड़ापर सवार भए किरांत सभक उन्मूलन लेल अग्रसर भेलाह। किरांत सभक सभटा मंतरकेँ अपन साधनाक बलपर काटैत भीम केवट पताल-लोक धरि पहुँचि गेलाह। अपन खंडासँ किरात डकैत सभक वध कए ओ तिरफूल सुन्नरिकेँ मुक्त करैलनि। ताहि काल धरि बौद्ध धर्म कलुषित होअए लागल छल। वज्रयानी सभ विकृत गुह्य साधनामे लागि गेल छल। भीम केवट अपन शासन क्षेत्रमे एहि दुराचारकेँ प्रतिबन्धित केलनि। वज्रयानी बौद्ध मठ सभकेँ उजाड़ि ओकरा शिव मन्दिरक रूप देल गेल। अत्यन्त लोकोपकारी काज सभ करैत भीम केवट अपन शासनकालमे जननायक बनल रहलाह। आइयो भीम केवट लोकदेव रूपमे स्मरण कएल जाइत छथि आ हुनक वीर गाथा लोकगीत बनि लोक कंठमे बसल अछि। २.लोकदेव लोरिक-अरविन्द ठाकुर सौँसे इलाकामे उघरा पंवारक आतंक पसरल छल। ओ परम अत्याचारी आ दिश्चरित्र छल। ककतो धन-सम्पत्ति लूटि लेब आ मनपसिन्न युवतीक अपहरण कए लेब ओकर दिनचर्या बनल छल। उघरा गामक अपन गढ़सँ कज्जलगिरि हाथीपर चढ़ि एकसँ एक अड़िजंग पट्ठा आ पहलमान सभक संग जखन उघरा पंवार बहराबै तँ लोककेँ अदंक धए लए। युवती लोकनि पतनुकान लए लिअए आ संपन्नसँ संपन्न आ प्रभावशाली लोक ओकरा आगाँ नतमस्तक रहै। कमला नदीक कछेरपर गोठ गौरा गाम। एहि गामक मांजरि परम सुन्दरी छलीह। उघरा पंवार मांजरिकेँ अपन अंकशायिनी बनबय छाहैत छल। मांजरि हाबी पत्तनक भगवती मंदिरमे प्रतिदिन पूजा करथि आ अपन सतीत्व रक्षा लेल गोहारि करथि। मांजरिक पिता महरकेँ एक लाख गाय छलनि आ पत्नीक नाम छलनि पद्मा मौहरि। दुनू प्राणीकेँ उघरा पंवारक मोनक बात बूझल रहनि तेँ दुनू चिन्तामग्न भए मांजरिक माम सेवाचनकेँ बजयलनि। मांजरिक लेल निर्भीक आ प्रचण्ड योद्धा वर खोजबाक भार सेवाचनकेँ देल गेलनि। एहि क्रममे अगौरा गामक सिलहट अखाड़ाक ख्याति सेवाचनक कानमे सेहो पड़लनि। एहि अखाड़ाक प्रधान मल्ल छलाह लोरिक। लोरिक अपन अस्सी मोनक विशाल भारी खण्डाक प्रबल वेगसँ संचालन करथि तँ बिजली चमकै। हुनक छोट भाय सावर तेहने मस्त पहलमान। ओहि अखाड़ामे लोरिकक अन्य मल्ल-संगी छल- राजल धोबी, बारू दुसाध आ बंठा चमार। सेवाचन अगौरा एलाह तँ हुनका अगौराक राजा सहदेवक शतखंडा महल देखि पड़लनि। ओतए गेलाह तँ हुनक खूब आवभगत भेल आ ओ राजकुमार महादेवकेँ देखलनि। एहन सुकोमल युवक हुनका मांजरि लेल नञि जँचलनि। ओ महलसँ निराश भए घुरैत छलाह तँ डगरपर राजल धोबीक पत्नी फुलिया हुनका लोरिकक मादे बतैलकनि। सेवाचन कुब्बेक दलानपर एलाह। लोरिकक आ सावरक पिता कुब्बे राजा सहदेवक हरबाह छलाह आ हुनक पत्नीक नाम छलनि- खुलैन। सेवाचन खुब्बेक विपन्नतासँ व्यथित तँ भेलाह, मुदा सिलहट अखाड़ापर लोरिकक पौरुष देखि हुनका लगलनि जेना साक्षात भैरव वीर-वेशमे ठाढ़ छथि। हुनका भरोस भए गेलनि जे इएह तरुण अपन वीरतासँ मांजरिक सतीत्व-रक्षा कए सकैत अछि। ओ कुब्बेक एहिठाम भोजन कयलनि आ विवाह तय भए गेल। उघरा पंवारक प्रचण्ड शक्तिसँ आतंकित साअमान्य जनकेँ बरियात जयबाक साहस नञि भेलनि। बरियातमे मात्र निर्भीक परिजन आ चुनौटा वीर सभ चलल। रस्तामे एकटा नदीक कातमे सात सय धोबी कोनो राजाक कपड़ा धोइत रहए। राजल ओहि धोबी सभसँ आग्रह केलकनि जे सभ बरियातीकेँ कपड़ा दिअओ जे फिरती काल घुराए देल जाएत। धोबी प्रधान प्रत्युत्तरमे राजलक अपमान कए देलकनि। फेर की छल। बरियाती सभ सभटा वस्त्र लूटि लेलक आ पहिरिकेँ आगाँ बढ़ल। दोसर दिन ओ सभ बगड़ा-बजार पहुँचल। भुखायल बरियातीकेँ बजारबला सभ भोजन देब अस्वीकार कए देलक। बस पहर भरिमे बरियाती बगड़ा-बजारकेँ लूटि लेलक आ खा-पी कए आगाँ बढ़ल। गौरा गामक एकटा फैलगर गाछीमे बरियातीक डेरा खसलै। महर दिससँ भोजन सामग्रीक अमार लागि गेल। कुब्बे असगरे सत्ताइस मोन दूध पीबि गेलाह, सात सए तोला दही चाटि गेलाह, सत्तरि माठ सकरौरी चाभि देलथिन आ विशेष आग्रहपर सए हाँड़ी छाल्ही सेहो उदरस्थ कए गेलाह। आनो-आन बरियाती तहिना कएलक। उघरा पंवार विवाहकेँ बाधित करए लेल पहलमान सभकेँ स्त्री-वेशमे पठयलक। बूढ़ कुब्बे अपन ताड़क छौंकीसँ सभकेँ झँटिआबय लगलाह। बहुत मरल, बहुत पड़ायल। फेर पंवार अपन कज्जलगिरि हाथीकेँ पठैलक। सभ बरियाती मिलि ओकरो बेहाल कए देलकै। ओहो पड़ायल। कन्या पक्ष दिससँ एक गोटय पद्मा मौहरिक समाद लए कए आएल जे जाधरि किरण-छबि-मौर, माने चौकक आकाश-तारा-पटोर आ बिजुवनक माणिक चोली नञि देल जेतैक ताधरि कन्यादान संभव नञि। ई सभ अनबाक भार लैत राजल धोबी बाजल- “एतएसँ पचीसे कोसपर बिजुवन छै। ओहिठामक बड़का भारी योगिन कोसा मालिन ई तीनू चीज एक्के संग बेचैत अछि। ओकरासँ ई सभ उधार लए लेबै आ नञि देत तँ घरसुरक मैल छोड़ाए देबै।” सावर सेहो ओकर संग भेल। ओ सभ बाटमे किछु लताम तोड़ि कए आ किछु पोठी माछ पकड़ि कए राखि लेलक। गोंगा बानरकेँ लताममे आ कनही बिलाइकेँ पोठी माछमे ओझरा कए ओ दुनू कोसा मालिन लग पहुँचल जे मंडपमे बैसलि बारह बरषसँ खीर रान्हि रहल छलि। ओकर विभिन्न प्रलोभनसँ बचैत आ धमकीक संग ओकर वस्तुजातक मोल दए देबाक वचन दैत दुनू गोटय सभ वस्तु लए आनल। तखन जाकए सिनुरदान भेल। वर-वधु कोहबर प्रवेश कएलनि। रातिमे पंवारक पठाओल प्रसिद्ध चोर-मल्ल सोनिका आ मनिका चार अलगाकए तरुआरि लेने कोहबरमे घुसि गेल। लोरिक अपन खंडासँ दुनूक मूड़ी छोपि लेलनि। मांजरि तीनटा अनाथक पालन कएने छलीह। प्रथम छल बाजिल कौआ। दोसर छलीह परम बलशालिनी आ महाकाय लुरकी। तेसर छल नांगर छौड़ा नन्हुआँ, जे गाय सभक चरबाही करैत छल। सोनिका आ मनिका मारले गेल छल कि नन्हुआँ चिकरल- “पाहुन, दौगू। उघरा पंवार खरिका बथानक गोथरसँ महरक सभटा गाय हाँकने जाए रहल अछि।” एहि हाकपर लोरिक अपन हाथमे खंडा लेने कोहबरसँ निकलि दौगि गेलाह। ओम्हर खरिका बथान लग पंवार अपन सैनिक सभक संग तैयार छल। लोरिकपर अगिनियाँ बाण चलए लगलैक। ओहिसँ बचए लेल लोरिक धारक कछेरपर एकटा फाटमे धसिकए बैसि गेल। पंवार अपन कज्जलगिरी हाथीपर चढ़ल ओकरा दिस बढ़ल। ओ लग अलए कि लोरिक लपकि कए अपन खंडासँ हाथीक सूँढ़ छोपटि लेलक। हथी अरराकए खसल आ पंवार ओहिपरसँ कुदकिकए एक दिस भागल। लोरिक फाटसँ बहराएल आ सैनिक सभक मूड़ी छोपए लागल। पंवारलग एकटा तीर च्बचल छलै। ओ भूमिपर सूतिकए लोरिकक जांघमे तीर मारलक। जाँघसँ शोणित फुहार देबए लगलैक मुदा लोरिक कहाँ थम्हयबला। ओकर खंडा चलिते रहल आ सैनिक सभ मुंडविहीन होइत गेल। अंततः उघरा पंवार अपन बचल सैनिक संग भागि गेल। लोरिक घुरिकए कोहबर एलाह। बरियाती विदाइ बेर पंवार अपन बचल योद्धा सभक संग फेर जुमि गेल। भीषण युद्ध भेल। लुरकी अपन व्रज-समाठ लेने पंवारेसँ भीड़ि गेल। ओ समाठसँ पंवारक माथपर चोट करैत छलीह, मुदा पंवार अपन रत्न-जड़ित अभेद किरीटक कारणेँबचि-बचि जाइ। एहिपर लोरिकक दृष्टि पड़ल। ओ अपन खंडाक नोकसँ किरीटकेँ नीचाँ खसाए देलक। पंवार प्राण लए कए अपन गढ़ दिस भागल। खसल किरीट उठाकए लुरकी ओकरा लोरिकक माथपर राखि देलकै। किरीट पहिरने लोरिक पंवारक पछोर धेलनि। गढ़क फाटक तक अबैत-अबैत लोरिक पंवारक मूड़ी छोपि लेलनि। गढ़मे हाहाकार मचि गेल। गढ़मे घूसि लोरिक बाल-बच्चा आ रानीकेँ अभय-दान देलनि। रनिवासक काराक फाटक खोलबाए ओहिमे ढ़ाठलि सात तूर सुन्नरिकेँ कारामुक्त कए देल गेल। जन-जनमे जय-जयकार भए उठल। महा-अत्याचारी उघरा पंवारसँ लोककेँ मुक्ति भेटल। लोरिक सभ गोटयसँ विदा लेलनि आ बरियाती संग आगाँ बढ़लाह। आगू-आगू रक्तरंजित वज्र-समाठ लेने लुरकी, ओकर कन्हापर बैसल विशाल कौआ बाजिल आ तकरा पाछू छलै रतन ओहारबला पालकीमे मांजरि। तकरा पाछू चलैत छलाह हाथमे अस्सी मोनक खंडा लेने सिंह जकाँ झुमैत वीर लोरिक। हुनक खंडासँ तखनो पंवारक रक्त चुबिए रहल छल। २ बिपिन कुमार झा विषवेलक सिञ्चन कखनहुँ- कखनहुँ ई निराशाजनक अनुभूति होइत अछि जे भारत 28 राज्य के नहिं अपितु 6000 जातिक संघमात्र अछि। अपन सभक पहचान भारतीयता नहिं बल्कि जाति विशेषमात्र अछि। भारत में दुर्भाग्यक शाश्वत-कालरात्रि के आननिहार ई जातिप्रथा आई अपन वैधानिक स्वरूप सँऽ उपद्रवी भूमिका निभेबाक उद्योग कय रहल अछि। जाति जनगणना ओ विष-बेल अछि जकर जहर आगामी पीढी कें रग-रग में प्रवाहित भय राष्ट्रजीवन कें विषाक्त करत। आखिर स्वाधीनता केर 64 वर्ष बाद, जखनि एकमात्र पहचान राष्ट्रीयता हेबाक चाही , जखनि राष्ट्रजीवन सँ जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रजनित पहचान गौण भय जेबाक चाही, जखनि ई घृणित जातिगत विरासत समाप्त भय जेबाक चाही तखनि हम सब ई विनाशकारी संस्था (जातिगत पहचान) सँ नबका आशाक किरण ताकि रहल छी। इतिहास केर ई मोड पर सरकार द्वारा जाति जनगणना क लेल गेल ई निर्णय वर्तमान नेतृत्व कें कहियो भविष्य में जबाब देबाक हेतु बाध्य करतन्हि जे ई रक्तबीज केर पोषण कियाक कयल गेल छल। अतीत में जातिप्रथा कें कोनो उपयोग भेल हो अथवा वर्तमान में ई  एकटा वास्तविकता छी तथापि ई तर्क जातिप्रथा कें सम्पोषण कें न्यायसंगत नहिं ठहरा सकैत छियैक। यदि एक शब्द में कहल जाय त ई भारतवर्ष कें विद्यमान अनेंक दुष्प्रवृत्ति केर जनक छी। वोट बैंक केर भूखल नेतागण द्वारा जातिगणना कऽ अनेंकानेक लाभदायक पहलू व्यक्त कयल जा रहल छैक। सामाजिक न्याय केर पूर्तिक हेतु एकरा एकटा प्रमुख माध्य सिद्ध कयल जा रहल छै। वास्तविकता त ई अछि जे ई सब व्यक्ति समाज में जाति जनित संघर्ष उत्पन्न कय जनभावना कें उभारि पोलीटीकल इंश्योरेंश प्राप्त करय चाहि रहल छथि। एहि कारण देश में नितनूतन आरकक्षण केर मांग, अव्यवस्थाजनक आन्दोलन एवं सामाजिक कटुता जे उत्पन्न होयत ओकर नियन्त्रण अपन शासनतन्त्र सँऽ कदाचत् संभव नहि होयत ई स्वार्थी नेतागण द्वारा अपन मानस पिता अंग्रेजक विभाजनकारी ढर्रा अपनेनाई देश कें बड्ड महग पडत। ई समयक मांग आ युग के आह्वान अछि जे जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रविषयक पहचान स ऊपर एकात्मकता क आत्मसात कय जाय। आश्चर्य होइत अछि जे बुद्धजीवी आ युवा समाज केहि तरहक विभाजनकारी क्रिया कलाप पर प्रतिक्रिया शून्य च्थि एहि वर्गक चेतना हीनता केर मूल्य राष्ट्र के भविष्य में अवश्य चुकबय पडत। ई दायित्त्व अपन प्रबुद्ध समाज पर अछि जे ओ ई विनाशक जाति-प्रथा कें  पोषित करय  बला कोनों प्रयास पर अपन प्रभावी विरोध प्रकट करथि। अन्यथा भविष्यक भीषण दुष्परिणाम के प्रतीक्षा करथि। जय हिन्द                            जय भारत बिपिन कुमार झा ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बुच"1934-2009-आगाँ ३.२.१.राजदेव मंडलक ४ टा कविता २. विद्यानन्द झा (विदू) - हमर मिथिला ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-पोखरिक कमल ३.४.१.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता २.डॉ. शेफालिका वर्मा- विधाता ३.५.१.सतीश चन्द्र झा-चुनाव/ भाषा आ राजनीति २. नन्‍द वि‍लास राय-अकाल ३.६.१.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता ३.७.१.इन्द्र भूषण २. राजेश मोहन झा ३.८. १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘-कक्का औ २.किशन कारीग़र- किडनी चोर श्री कालीकान्त झा "बुच" कालीकांत झा "बुच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि । पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | गै खुशबू !! (बाल साहि‍त्‍य) बाबा मालबावू नाना छौ कमाल बाबू गै पप्‍पा रोकड़ि‍या लग नानी मारौ टाल बावू गै। बाबा खाति‍र चाहक गि‍लास लबलब लबनी नाना पास नानी चुक्‍का ढारौ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ रूमाल बाबू गै। बावा लेलनि‍ मॉछे कीन, नाना खेलनि‍ मुरगा तीन नानी भनसा घरमे लगा रहल छौ ताल बावू गै। बाबा वॉचथि‍ वेद पुरान नाना पढ़थि‍ नेवाज कुरान नानी मुल्‍ला जीसँ पूछि‍ रहल छौ हाल बावू गै। नाना भोरे भगला बाहर नानी सॉझे पहुँचलि‍ ठाहर ई सभ कहए आएल वि‍द्याधर आ लाल बावू गै। वंदना (बाल साहि‍त्‍य) अम्‍ब, अहाँक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी? समुचि‍त शब्‍द ने आबि‍ रहल अछि‍, सप्‍तक स्‍वरालाप नहि‍ पाबी।।१।। तोरेमे स्‍ति‍त्‍व बनल, तोँ रखलह जठरक उमड़ल सरमे रहल एहब हम कमल बनल, नि‍ष्‍चय रसभरल सुशील घरमे।। जन्‍मए काल ‘नाल’ लागल छल-तकर प्रणाम जनौलनि‍ बाबी।। अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुर गीत कोना हम वालक गाबी।।२।। टूटल गँट, पॉंक छूटल, दल गमकि‍ गेल महमह गहवरमे सुनल देवि‍, ताेँ सूँधि‍ लेलह, संतुष्‍ट भेलहुँ, छल हास अधरमे आइ अहॉंक नि‍रमाल बनल छी खसल, हमर चलि‍ गल नवावी। अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी? ।।३।। दुर्दिन बनि‍ बटबीज खसल, जनमल, बढ़ि‍ गेल, वि‍शाल बनल अछि‍ आलि‍ंगन-अपवर्ग, अंकक स्‍वर्ग, मर्त्‍यपद छोड़ा चलल अछि‍ कहह कहह देवि‍, कि‍ए, एहि‍ कुलकुठारसँ छह वेदावी? अम्‍व, अहॉंक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।४।। नव-मासक अवि‍राम भारकेँ, कएलह वहन मधुर मुस्‍कीसँ हमरा ठोरक तरल मैल लगलह प्रि‍यतर चाहक चुश्‍कीसँ फाड़ि‍ दैह वरू आइ जननि‍, हम तोरे देहक पत्र जवावी? अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुरवर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।५।। १.राजदेव मंडलक ४टा कविता२. विद्यानन्द झा (विदू)- हमर मिथिला राजदेव मंडलक चारि‍टा कवि‍ता- 1)बघनखा कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा जतए देखू ततए बघनखा पत्‍नीक आँखि‍मे नोर भरल ताहि‍मे सँ खसल बघनखा कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा रोटी तोड़ि‍ मुँहमे लेलहुँ पड़ल दाँत तर बघनखा कतउ कि‍छु बचल सुच्‍चा वस्‍त्र झाड़ि‍ कऽ पहि‍रैत काल भट्ट दऽ खसल बघनखा कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा सुतल छलहुँ घरमे आकि‍ चारसँ चमकैत झनाक दऽ खसल बघनखा कतउ नहि‍ कि‍छो बचल सुच्‍चा मि‍त्रक बड़का कुरतामे बटनक बदला बघनखा कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा वएह देखि‍ रहल छी सर्वत्र कि‍ हमर आँखि‍ए बनि‍ गेल बघनखा? 2)  रँगक खोज- फाटल वस्‍त्रकेँ सीबैत चौन्‍हि‍या गेल चक्षु धड़फड़ीमे गड़ि‍ जाइत अछि‍ सुइया अपनहि‍ हाथमे आ चाटि‍ लैत छी स्‍व रक्‍तकेँ जाहि‍सँ लगबैत छी- अनुमान दोसर शोणि‍तक स्‍वादकेँ बि‍सरि‍ ओहि‍ पीड़ाकेँ पुन: लगबैत छी चेफड़ीपर चेफड़ी बदलि‍ गेल वस्‍त्रक रँग भऽ गेल अनचि‍न्‍हार लगैत अछि‍ जेना कतेको रँगक झंडा टाँगल हो एकेठाम तइओ चला रहल छी काज मुदा भऽ जाइत अछि‍ लाज कहि‍योकाल- कतेको जोड़ी आँखि‍क व्‍यंग्‍यात्‍मक तीरसँ भऽ जाइत बि‍द्ध तैं घरे मध्‍य नुकाएल रहब हमरा लगैत अछि‍ नीक कि‍न्‍तु पेटक आगि‍ नहि‍ रहए दैत अछि‍- नि‍चेन अवश भऽ कऽ नि‍कलि‍ गेल छी लाल रँगक खोजमे जाहि‍मे रँगे देलासँ चि‍तकबरा खण्‍ड सभ भऽ जाइत एक्के रँग तबे टूटत हमर हीन भावनाक जाल। 3) कंटकमय नवनीत हमरा सम्‍पूर्ण शरीरमे जनमि‍ गेल अछि‍ पैघ-पैघ बि‍खाह काँट लोक सभ पड़ा जाइत अछि‍ हमरा देखतहि‍ कि‍नको नहि‍ छूबि‍ सकैत छी- सि‍नेहसँ स्‍पर्श करैत छी- जि‍नका एकोबेर ओ बोमि‍या उठैत अछि‍ प्रेमभाव बनि‍ जाइत अछि‍- बैरीभाव अपनहुँ एक अंग दोसरसँ होइत अछि‍ स्‍पर्श तँ मन सि‍हरि‍ उठैत अछि‍ कऽ लएतहुँ- आत्‍मघात कि‍न्‍तु सेहो नहि‍ कऽ पाबैत छी जि‍नगीक जहर घोरि‍-घोरि‍ पीबि‍ रहल छी बचल अछि‍ एक अंग नि‍ष्‍कंटक नवनीत सन धुकधुककाइत छातीमे तकरहि‍ देखैत जीवि‍ रहल छी आसहि‍पर। 4) लाज नि‍रलजकेँ ने लाज पेट भरलासँ काज देखि‍ रहल छी मि‍ताकेँ कि‍रदानी बदलि‍ गेल ओकर चालि‍ आर-वाणी बरदाइससँ बाहर कऽ रहल- मनमानी लगौलक एहेन फानी जे लड़ि‍ रहल छी दुनू परानी परेमक गाछ सुखा गेल मन पुरा दुखा गेल- अपन लाभ अनकर हानि‍ की करए चाहै छल से नहि‍ जानि‍ तइयो इमानदारीक पहि‍रने खोल बजैत अछि‍ नीक नीक बोल आइ हम एकर खोलि‍ देबै पोल दसगोटेमे कोना ठाढ़ अछि‍ लफंगा कऽ देबै एखने नंगा खि‍सि‍या कऽ बढ़लहुँ ओकरा दि‍श कऽ देबै नॉंगट- ऍंड़ीसँ देबै पीस हाय रौ तोरी ई कोन बात सभ भऽ गेलाह एके साथ ठि‍ठि‍या कऽ सभ हँसि‍ रहल अछि‍ हमरेपर व्‍यंग्‍य कसि‍ रहल अछि‍ सभ बुझौलक तब असली बातकेँ जानि‍ सोचि‍ वि‍चारि‍ लेलहुँ मानि‍ नहि‍ होइत अछि‍ नीक बेसी रि‍श सोचैत देखलहुँ अपना देह दि‍श गुदरी लटकल बनल छी भि‍खमंगा हम तँ अपनहि‍ छी पूरा नंगा भीतरसँ सभटा गप्‍प जानि‍ लाजे भऽ गेलहुँ पानि‍-पानि‍। २. विद्यानन्द झा (विदू) पिताक नाम- स्व. रामशंकर झा, जन्म तिथि-20/01/1966, शैक्षणिक योग्यता-एम. ए ग्राम-केवटा, पो.-शुभंकर पुर, जिला-मधुबनी(बिहार) हमर मिथिला उत्तरमे हिमराज विराजथि, दक्षिण सुरसरि गंगा पश्चिममे बहि-बहि गंडकी, पूर्व कौशिकी-बंगा बीच वसल छथि सुन्दर मिथिला, आउ हिनक गुणगाण करी मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥ घर-घरमे छथि एतए गोसाओन, तुलसी हर आँगनमे देवालय शिवालय अछि, हर गामक प्रांगनमे छथि धन्य हमर ई मातृभूमि, लय रज-कण हिनक प्रणाम करी मिथिलाक गरिमा हम बूझ, मैथिलक सम्मान करी॥ सीता उपजलि जाहि भूमिसँ, जनक जनिक सम्राट भेलाह शिव-धनु राखल जाहि भूमिपर, परशुराम प्रहरी भेलाह स्वर्गसँ सुन्दर मिथिला धाम, आउ हिनक हम मान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥ रचल स्वयंवर जाहि भूमिपर, विश्वामित्र संग शिष्य एलाह टूटल धनु टंकार जतय भेल, परशुराम लहड़ैत एलाह किन्तु सुनि मृदुलवाणी जंह मुनिवर, क्रोध त्यागि शीतल भेलाह रामवरण कएलन्हि जंह सीता, आउ तिनक हम ध्यान धरी मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥ विद्यापति के गाम ई मिथिला, शिव उगना बनि चाकर भेलाह जंह भगवतीक अनुकम्पा सँ कालिदास विद्वान भेलाह अछि मधुर प्रेम के सागर मिथिला, आउ एकर रस पान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥ अछि विविध विधा के गहवर मिथिला, किंतु उपेक्षित भए रहल अछि चूक अपन या शासन के, उत्थानक मार्ग अवरूद्ध रहल आउ एहि पर मनन करी आओर हिनकर उत्थान करी मिथिलाक गरिमा हम बूझी मैथिलीक सम्मान करी॥ ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। पोखरिक कमल सरकारी कर्मचारी कियैक निठल्लू जखन कखनो ई प्रश्न उठल एक व्यक्‍ति की करत नीक भऽ जतऽ सब भ्रष्ट अछि भरल सुनैत सुनैत अहि जवाब केँ रहैत छलहुँ मोने मोन कुहरल दलदल सन दूषित पानिमे कीट पतंग सँ मचल हलचल शीतल कोमल पल्लव समेटने मोना मुस्काइत अछि कमल ओ गुणे की जे अपन महत्ता सबमे प्रमाणित नहि कऽ सकल मोजर नहि ओहि सिद्धान्तक जे परीक्षाकाल नहि अविचलित रहल १.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता २.डॉ. शेफालिका वर्मा- विधाता १ जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता- 1) फुसि‍ एहनो फुसि‍ बजै छी जइ ढेरीपर बैसल छी ओ कहै छी, कि‍छु ने अछि‍ अकर्म-वि‍कर्मक बात ि‍बनु मुँह उघारि‍ बजै छी एहनो फुसि‍ बजै छी लेश मात्र जे अछि‍ नहि‍ तेकरा ढेरि‍ बुझै छी ब्रह्मलोक, शूरलोक, देवलोकक सदति‍ बात बजै छी एहनो फुसि‍ बजै छी। 2) कमलाधार कमल-नयनसँ उगैत अश्रुकण संग मि‍लि‍ धार बनल छी समरस भऽ रंग-रूप बि‍सरि‍ नयन-कमल बनल छी काटि‍-खोंटि‍ एकबट्ट केनि‍हारि‍ करत उकठपन काम सभ मि‍लि‍ सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ जपलौं कमला नाम। २. डॉ. शेफालिका वर्मा विधाता हम नारी छी , ई अपराध हमर ते नहि हँ हम नारी छी. अहांक लेखनी हमरा संस्कृतिक उत्कर्ष पर  पहुंचा देलक धरतीक प्राणी नहि देवी धरि बना देलक किन्तु, अहाँ बनाय देलों पातालक छाती विदीर्ण करय वाली एकटा चीत्कार प्रकृति-पटी पर उमढ़ैत कोसीक हाहाकार ! ठोर पर अबैत ऐछ कखनो शरद-प्रात, कखनो पूसक सर्द राति ; दर्पण में जखन जखन अपन चेहरा देखैत छी अचक्के सीताक व्यथित परछाही पलकक कोर पर थरथरा जैत अछि हमर आँचर चान तारा से नहि राहु-केतु से भरी जायत अछि. मुदा, आब नै , आब हवा छुवी नारी के मैल नै करत हाड मांसक एही देह में किछ नै जकरा से अहाँ बनल छी , हम बनल छी प्रकृति कुसुमार बनल अछि तखन दोषी हमही किएक ? अहाँ निक हमहू निक आब जमाना बदलि गेल , नारीक अंतर में उतरि गेल एकटा तीव्र ,प्रखर रौद पसरी गेल. घर-बाहर के जगमग करैत आकाश छुवाक परिकल्पना से सिहरैत परंपरा-अपरम्पारा के ध्वस्त करैत नव निर्माणक अकास में नवल सूर्योदयक रंग भरैत नारी आगू बैढ़ रहल अछि 'अहम् ब्रह्मास्मिक' भाव स ग्रसित हमर समर्पण अहाँ देखि नै पबैत छी सब किछ  सहैत जनम अहीं के देत छी . सृजन हम  करैत छी विधाता अहाँ बनैत छी , तैं आय पुरुष-विमर्श छोडि, नारी-विमर्श क गप करैत छी .... १.सतीश चन्द्र झा-चुनाव/ भाषा आ राजनीति २. नन्‍द वि‍लास राय-अकाल १ सतीश चन्द्र झा राम जानकी नगर मधुबनी चुनाव छल केहन हवा आयल उदंड। तृष्णाक आगि पसरल प्रचंड। सभ जाति धर्म केँ फेर बाँटि क’ देलक समाजक खंड- खंड।

सत्ता सुख,धन बल मान लेल। निज स्वार्थ धर्म सम्मान लेल। विष घृणा द्वेष सगरो द’ क’ सभ भोट समटि क ससरि गेल।

उन्मादक तेज हवा उठलै। उधियाक’ ककरा की भेटलै ? छुच्छे बातक जल बृष्टि छलै पोखरि इनार सौसे भरलै।

बड़का कें कहि क’ मधुर बोल। छोटका लोकक जड़ि गेल टोल। अछि कतेक तुच्छ मानव एखनहुँ जीवन कें नहि छै कतौ मोल।

कहियौ ओकरा की हेतै लाज। नहि भेल गाम मे कतौ काज। अछि बाट ताकि क’ थाकि गेल बासठि बरखक जीवित समाज।

अछि राजनीति मे के सुयोग्य। अस्सी प्रतिशत एखनहुँ अयोग्य। ओ कोना हमर उद्धार करत ओकरा लए छै ई देश भोग्य।

जड़ि गेल झड़कि क’ कतेक देह। मरि गेल हृदस सँ प्रेम स्नेह। देलक की हमरा प्रजातंत्रा ? दुख विपदा अछि ओहिना सदेह।

जनमत अधिकारक मोल भाव। घर घर छिड़ियायल बैर भाव। सभ बेर कतेक बलिदान लेत अछि रक्त पिपासू ई चुनाव। भाषा आ राजनीति

अछि घातक आतंकबाद सँ बढ़ि क‘ ई भाषा के झगड़ा। कखन कतय ई आगि लगायत कोना एकर पहिचानब चेहरा।

अछि रहस्यमय राजनीति के क्रिया कलाप कर्म मन वाणी। छापि रहल अछि पत्र पत्रिका प्रतिदिन एकरे एक कहानी।

कखनो बाँटत जाति जाति कें कखनो सीमा शरहद भारी। कखनो बात धर्म के कहि क’ लगा देत सौंसे चिनगारी।

कतेक होइत दै चेहरा एकरो जानि सकल नहि कियो एखन धरि। सपथ लैत अछि ’सेवा धर्मक’ समटि लेत धन आँजुर भरि भरि।

स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे कते आओर लज्जित क्षण आयत। हिन्दी पर लागल कलंक जे कोना एकर इतिहास मेटायत।

सीखि लेथु सभ भूखल जन- जन अलग अलग सभ प्रांतक भाषा। तखने भरतनि पेट आब नहि रहलै हिन्दी देशक भाषा।

सत्ता पक्ष विपक्ष कान मे कोना तूर छथि ध’ क’ सूतल। सीखि रहल अछि आइ मराठी टैक्सी चालक भय सँ कलबल।

जतय देश मे छै एखनो धरि लाखो लोकक रोटी सपना। सड़क कात छतहीन जिन्दगी कंकर पाथर घास बिझौना।

की मतलब छै ओकरा की छै ? भाषा,भेष कतय की बान्हल। बिना परिश्रम सँ औतै नहि भात दालि थारी मे सानल।

जनहित के कल्याण आब नहि राजनीति सँ रहलै आशा। छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ सत्ता सुख सबकें अभिलाषा।

भले लेथु ई शपथ मंच पर विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे। नहि बदलत तकदीर देश कें जन जन ठाढ़ रहत आशा मे। ............ २ नन्‍द वि‍लास राय- अकाल पानि‍ वि‍ना घास-पात सभ जरि‍ गेल धानक वीया सभ पीयर, भऽ भऽ मरि‍ गेल। गाछी-वि‍रछीक सबहक पात झरि‍ गेल बाजारमे जि‍नि‍स सबहक दाम चढ़ि‍ गेल। छोट-पैघ कि‍सान सभ पि‍टैत अछि‍ कपार ओकरा उपर टूटल दुखक पहाड़ लोक सभमे मचि‍ गेल बड़का हाहाकार। खेत सभमे फाटल नम्‍हर-नम्‍हर दरारि‍ धरतीकेँ रूपकेँ देलक वि‍गाड़ि‍। ताल-तलैया सुखले रहि‍ गेल, गोरहो खेत सभ परते पड़ि‍ गेल। गाममे नै इज्‍जत ककरो बचत आब, झुण्‍डक झुण्‍ड लोक सभ वि‍दा भेल दि‍ल्‍ली-पंजाव। बर्खा नहि‍ भेल समए भेल वि‍कराल सभ बजैत अछि‍ रवि‍-राइ बुनैले खेतमे नै अछि‍ हाल मालोजाल भऽ जएत जीक जंजाल पड़ि‍ गेल अकाल।। १.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता १ मृदुला प्रधान कविता मिथिलाक माटीमे, मधु -श्रावानिक, हास- परिहास एवं मिठास, घोरैत- घोरैत, कखन एही भाषा मे लिखै लगलों, बूझिये नईं पड़ल, बूझिये नईं पड़ल...... घर-गृहस्थिक मथ-भुक्की मे दही- चुड़ा-बैगनक भार सँ प्रभावित , जमबैत,कुटैत,तौलैत, कोन बेर कागज़-कलम, माथ पर सवार भऽ गेल . समदाउनिक गीत सुनि कऽ , विद्यापतिक कविता पढि कऽ, खवासक अनुपस्थिति मे चुल्हा पजाड़ी कऽ, अदौड़ी,तिलौडी,दनौड़ी, पाड़ि कऽ, कखन कविता पाड़य लगलों, बूझिए  नईं पड़ल......... सावन-भादोक झींसी सँ नुका कऽ, नेना- भुटका के कोर मे, बैसा कऽ, गोनू झाक गप्प सँ सभकेँ हंसा कऽ, पितारिया कजरौटा मे काजर, सेका कऽ , कखन कविता सेकय लगलों, बूझिए नईं पड़ल............ भिनसरहे भानस-भात पसाइ कऽ, तीमन-तरकारिक कठौती , सजाइ कऽ, अंगना-ओसारा-चबूतरा, बहारि कऽ, गमगम घीउ मे, सोहारी छानि कऽ, कखन कविता छानए लगलों, बूझिए नईं पड़ल.......... मूल बात ई जे एही भाषाक, विदुषि त नहिंए छी किन्तु घोर-मठ्ठा करैत-करैत, अनचोक्के, 'ई-विदेह' सँ परिचय, भऽ गेल, लोकक उद्गार चमत्कारिक साबित भेल, आ देखिते-देखिते, मिथिलाक पैघ समाजक कोन मे, हमरो प्रविष्टि भऽ गेल २ उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता- बाधा- वि‍दा भेल मंगला पूभर कान्‍हमे टँगने अछि‍ साइकि‍ल बाउलपर कहुना कऽ लगि‍चेलक लटपटाइत पहुँचल धारक कछेरमे बि‍नु पानि‍क अछि‍ धार चक-चक करैत अछि‍ बाउल चारूकात नाउ नहि‍ बाउल देखि‍ भेलै मंगलाकेँ थोड़े होश एलै अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै आब टपैमे कोनो नइ हएत बाधा पहुँचबे करब सरायगढ़क ओइपार मुदा, मंगला लटकि‍ गेल घाटपर नजरि‍ दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर अपन जेबीमे देने हाथ तकैए चारू कात आब की करबै हौ बाप ई तँ लेबे करतै घाटी जेना लगैए एकरा उठल छै आँति‍ सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ नै देबै तँ देत ई रबारि‍ सएह भेल मंगला घुरि‍ गेल पछि‍मे मुड़ि‍ गेल। भोगी नाँच करए बानर चाउर खाए बबाजी बीचमे तैं अछि‍ सरोकारी वि‍कासक नाओपर भऽ रहल अछि‍ नाँच मानसि‍कता, मानसि‍कता, मानसि‍कता पसरल अछि‍ चारूकात नीक बात कि‍एक नै हुअए वि‍कास बि‍क रहल अछि‍ चारूकात ब्‍लड प्रेशर आ डायबि‍टीजक गोली संगे-संग तैयो बबे बनल छथि‍ ति‍यागी भरि‍ जीवन भोजन केलनि‍ बैसारी ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि‍ बेपारी भोग करैत-करैत भेल छथि‍ अघोर तइपरसँ रटना लगेने छथि‍ ताबड़तोर स्‍वर्ग जाए चाहैत छथि‍ सोरफोर हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा हम सबदि‍न रहलौं मधुशाला बनलै तँ अछि‍ वि‍चारशाला जइमे लटकल अछि‍ बड़का ताला। कवि‍ता हम नइ बि‍सरब अपन सनातनकेँ नहि‍ बि‍सरक चाही अहुँकेँ दोस बनब आि‍क दि‍याद आि‍क करब खाली हाल-चाल सबाल भए गेल अछि‍ तैयार अहाँ नै बुझै छि‍ऐ बनि‍ जाउ दि‍याद पाँति‍ राखू चारि‍ याद नै यौ दि‍याद अहाँ करू कि‍छु रि‍याज यौ दोस आहाँ आनू अपन होश कए लि‍अ स्‍वीकार हे यौ दि‍याद हि‍या जूडि़ पड़ल दि‍याद सुनि‍ पड़ल फाँट बीचमे आबि‍ टूटि‍ पड़ल हट, हट, हट नै तँ घसक फाँट करए कि‍लोल दुनू अपन ठाम बेहोश मुदा, तैयार भेल दुनू सोर-फोर कल्‍याण-ले नहि‍ अपन-अपन फाँट-लए १.इन्द्र भूषण २.राजेश मोहन झा इन्द्र भूषण १.हमर नगरक दास्तान

चहुँ ओर खामोशी छल, पसरल रहै विराना। ताल-तलैया लागे ओछाउन सन, रहै कोसीक धार सिरहाना। सब राति होए बदमाश सबहक आगमन, गलि-कुची लागै बिया-बान सन। होरी खेलए पड़ए कादोमे, लागै दीवालियोक राति अन्हार सन।

मुदा हिम्मत नहि हारलक नगरक लोगसब, भरोसा रहए सबक अपन-अपन बाँहि पर। गमक बरियाति लऽ चलल खुशीक विवाह, किएक तँ रहै ओकरा सभक उजड़ल चमन बसाएब।

चारूकात तटबंध बनल, सलिका सँ शहर बसल, विद्यालय, महाविद्यालय, कारागार, न्यायालय, भंडारगृह, चिकित्सालय, संचार केन्द्र व चित्रालय सब निर्मित भेल।

ई शेष भारते नहि पुरा विश्व सँ जुटल, आब एतऽ भेटैत अछि सुख-सुविधाक हर समान, एकर अछि एक अपन पहचान।

जे क्यो राखत भरोसा अपना पर, जी-तोड़ करत मेहनत, कठिनाई सँ नहि डरत, भरत सफलताक पैघ उड़ान, बस यैह कहैत अछि, हमर नगरक दास्तान- २.“एना किएक होइत अछि?”

जखन करऽ चाहै छी काज कोनो ओहन जकरा उपमा भेटै आकाश सँ तारा तोरनाइ जैसन एक-एक टा डेग उठाबै छी सम्हारि कऽ उपर चढ़ि जाएत छी कतेको पायदान तक तखन आबैए एकटा झौंका बिहाड़िक उड़ा लऽ जाए नींव हमर अरमानक बाँचल अछि जे किछु आशाक तिनका सेहो बिखड़ले सन लगैत अछि एना किएक होइत अछि ?

कतेको बरख बित गेल हम सपना देखनाइ छोड़ि देलउँ जँ देखबो करब तँ, कथुक? हमर जिनगीमे एहन कोन हसीन पल बीतल मुदा तैयो जँ भूलोसँ कौखन कोनो ख्वाब आबी तँ ख्वाब शुरू भेल नहि कि नेत्र खुजि जाइत अछि एना किएक होइत अछि ?? सौचैत छी नव दिनक शुरूआत नव उत्साह सँ करब सदिखन नव आशाक संग चलब मुदा पुरनके दिनमे एक गोट नव निराशा सोझामे आबि जाइत अछि एना किएक होइत अछि ??? २.

राजेश मोहन झा पलायन प्रश्‍न- औ बावू अहाँ कतए रहैत छी? उत्तर- भरैए पोख जतए ओतए रहैत छी। प्रश्‍न- ओ कोन ठाम अछि‍, कोन देश अछि‍ की भाषा अछि‍ की भेष अछि‍? उत्तर- ने कोनो परि‍चए नहि‍ कि‍छु पहि‍चान आन देश थि‍क भाषा आन देशक नाम सौराष्‍ट्र जुनि‍ बूझव सौराठ कतेक राज लाठी नेने करैत छथि‍ अपन मोनक राज लोकक व्‍यथासँ हुनका नहि‍ मतलव मानवतासँ नहि‍ कि‍छु काज प्रश्‍न- कि‍ए गेलहुँ परदेशी भेलहुँ छोड़ि‍ कऽ अपन माटि‍- ई मि‍थि‍ला उत्तर- नहि‍ काज भेटैए नहि‍ पेट भरैए मि‍थि‍ला आव बनि‍ गेली शि‍थि‍ला प्रश्‍न- शस्‍य श्‍यामला धटा अछि‍ अपन खूब मेहनति‍ करू खूब उपजाऊ उत्तर- सभटा सुन्न कए देलनि‍ अछि‍ कोशी ककर सेवा करू की उपजाऊ? बेश तँ जाइत जाऊ छोड़ कऽ गाम नि‍र्णए- मुदा! नहि‍ वि‍सरव अपन भाखा अपन ठाम आ अपन गाम।।। १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘-कक्का औ २.किशन कारीग़र- किडनी चोर १ शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। कक्का औ (बाल साहित्य)-शिव कुमार झा टिल्लू सिबू मरसएब बड़ मरखाह छथि छक्का छोड़ौलनि कक्का औ दाँत कीचि दुनू भौं सिकुड़ाबथि हाथमे नरकटिक सटक्का औ... भूगोलक पहरि संस्कृत वचै छथि क्षणे-क्षण नोंइस लऽ हाँफी छिकै छथि पंचतंत्र पर करथि टिटम्भा विष्णुशर्मा सँ नमछर खम्भा बरहर गाछ तर गदहा बना कऽ पाँछासँ मारथि धक्का औ... जखन कोनो छन्दक अर्थ पुछै छी कहै छथि कुकुर पर लेख लिखें रौ कहू तँ कोना हम एक्के पहरिमे रंग-बिरंगक बयना सीखू हाथ मचोरि पीआठ पर देलनि बज्जर सन दू मुक्का औ... मुरुखे रहब आ महिस चराएब कहियो नहि ओहि इसकुल जाएब एहन राकस सँ जान छोड़ाउ भरि जिनगी अहँक गुण गाएब बजै छी किछु जौं नजरि झुका कऽ खिसियाबथि कहि भूतक्का औ... २.

किशन कारीग़र

परिचय:- जन्म- 1983ई0 कलकता में ,मूल नाम-कृष्ण कुमार राय ‘किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय ‘नन्दू’ , माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी-ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक, आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं लघु कथा,कविता,राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी।शिक्षाः-एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।

किडनी चोर।

देखू-देखू केहेन जमाना आबि गेल मनुखक हृदय भऽ गेल केहेन कठोर सभ सॅं मुॅंह नुकौने, चुपेचाप भागि रहल अछि एकटा किडनी चोर।

डॉक्टर भऽ के करैत अछि डकैति कोनो ग़रीबक बेच लैत अछि किडनी पुलिस तकैत अछि ओकरा इंडिया मे मुदा ओ परा जाइत अछि सिडनी।

कोनो ग़रीबक किडनी बेचि कऽ संपति अरजबाक, केहेन ई अमानवीय भूख केकरो मजबूरीक फायदा उठा कऽ डॉक्टर तकैत अछि, खाली अपने सूख।

केकरो जिनगी बॅंचौनिहार डॉक्टर, रूपयाक लोभ में बनि गेल आब किडनी चोर छटपटा रहल अछि एकटा गरीबक करेजा कनैत-कनैत सूखा गेलै, ओकर ऑंखिक नोर।

मनुख आब केहेन लोभी भऽ गेल आब ओ किडनी बेचब सेहो सीख गेल राता-राति अमीर बनबाक सपना देखैत अछि रूपया खातीर ओ किछू कऽ सकैत अछि।

मनुख भऽ के मनुखक घेंट काटब कोन नगर में सिखलहुॅं अहॉं आबो तऽ, बंद करू किडनी बेचबाक धंधा मानवताक नाम सगरे घिनेलहुॅं अहॉं।

कोनो गरीबक किडनी बेचि कऽ महल अटारी बनाएब उचित नहीं थीक एहेन डॉक्टरीक पेशा सॅं, कतहू मजूरी बोनिहारी करब बड्ड नीक।

हम अहिं के कहैत छी, यौ किडनी चोर एक बेर अपने करेजा पर, छूरी चला कऽ देखू कतेक छटपटाइत छैक करेजा एक बेर अपन किडनी बेचि कऽ तऽ देखू। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। डोली कहार सासुर जाइत काल नव कनियाँक मोनक दुविधा- नैहरक छुटैक दुख आ नव जीवनक उत्साह। ई सभसँ अनजान कहार सभ उमंगपूर्वक कनियाँकेँ सासुर पहुँचाबैत... २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित बालानां कृते १.डॉ. शेफालिका वर्मा- बच्चा आ व्यवस्था/ देश-प्रेम १ डॉ. शेफालिका वर्मा बच्चा आ व्यवस्था छोट छोट  नेना के देखू व्यवस्था  कतेक भारी  अछि झुकि रहल  कान्ह लचकि  रहल पीठ ई  बस्ता  कतेक भारी अछि  ! समस्त देश क ज्ञान  नुकायल विदेश क भंडार  भरल अछि अंग्रेजी हिसाब क गप नहि पुछू प्रकाशक   प्रेसक    धूम मचल अछि निरीह  आंखि  सँ  तकैत   नेना की पढ़ी की नहि पढ़ी में हेरायल नेना.... फुर्सत  नहि माय बाप कें समय नै हुनका लेल केकरो के सम्झाओत , कोना सम्झाओत घरो में त चैन नहि भारी भारी बस्ता देखू लंच , बोतल पानिक देखू प्राइवेट स्कूलक धूम मचल जन जन में होड़ मचल ककर बच्चा कतेक तेज ककरा कतेक आयल अंक आन क नेना आन के भायल बच्चा फंसल व्यवस्था क पंक किन्तु, एहि  शिक्षा क की अर्थ एत इंजीनियर करैत  ठेकेदारी डाक्टर खोलल  दोकान सड़क पर की हश्र एहि नौनिहाल के की भविष्य  देशक  कर्णधार के ...???? २.देश-प्रेम -डॉ. शेफालिका वर्मा ई कथा ओहि कालक थीक, जखन रूस आ जापान में युद्ध चलि रहल छलैक . एकटा किला पर रुसी सैनिक क अधिकार छल ,किलाक चारू क़ात बेस गहीर खादि  छल आ ओहि में पानि भरल . खादिक उपरका पुल रुसी सब तोड़ी देने छल . किला में रुसी सैनिकक संख्यां बड कम छल. खादिके पार केने बिना जापानी सैनिक  किला पर अधिकार नै कै सकैत छल. आ ओकरा लग पुल बनेवाक कोनो साधन नै छलैक .ओकरा सब के भय होयत छल जे अगिला दिन रुसी सेना ओहिठाम आबी जायत. सेनापति घबडाय गेल. कनिक काल सोचवाक उपरान्त ओ सैनिक सब स बाजल ----एहि खादिके मानव शरीर स पाटवाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नहि अछ .जापानक लेल जे प्रसन्नता से अपन जीवन उत्सर्ग करवा लेल चाहैत छी ओ दुई डेग आगू आबी जाऊ . समस्त सेना आगू बढ़ी गेल. एको सैनिक एहेन नै छल जे प्राण देवा से पाछू हटल होथि . सेनापति संख्या गिनती करवा लेल बाजल . तकर बाद ओ आज्ञा देलक जे प्रति पाँचम सैनिक अपन वस्त्र उतारि , हथियार फेकी खादि में कूदी  जायथ.... अपन देश-प्रेम में बताह भेल जापानी सैनिक सब एक के ऊपर एक कूद लागल .पानि स भरल  सउँसे खादि सैनिक सबहक शरीर से पाटि पुल बनि गेल . किला पर जापानक आधिपत्य भ गेल . सब नेना के एहि कथा से देशप्रेमक शिक्षा लेबक चाही. अपन राष्ट्र क रक्षा लेल अपन प्राण क  चिंता नै करवाक चाही .' जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ' माता आ मातृभूमि से बढ़ी किछ नहि। बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे

71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि  गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग  121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ  ऐछ छथि- छ इ थ  – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि

अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-PART_XIV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.1.TWO Original Poem in Maithili by Kalikant Jha Buch Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2. ALL THINGS POSSIBLE- (TRANSLATED FROM  HER MAITHILI POEM BY AUTHOR HERSELF ) 3. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS    XIV Ma, next day thought engulfed me if Shirish had not reached on time what would have been my condition in that dark rainy night – I felt shiver  all over the body. I had even failed to thank him. All of a sudden Shirish appeared before me from nowhere. Bhabhi, where is Vikalpji? I became overjoyed to see him – I was just thinking about you. He laughingly replied – I consider myself very fortunate for this. Please be seated – I get a cup of tea for you. Shirish started coming to home on a regular basis. One day I had a fight with Vikalp as he disliked Shirish and his regular visit. Right now I am unwell – Shirish visited just to know about my well being. I know you have developed a snake like misconception which continuously misguides you through its sting. Yesterday Vikalp came back from his office early. Shirish almost followed him. Vikalp was shocked to see him. It seemed as if he was bitten by a snake. He visualized – Manjul is unwell. Shirish must have touched her forehead followed by ……………. Shirish had just left and Vikalp screamed – I hate him – I hate you – you are a flying snake – a cobra in the guise of a woman. Ma, I retaliated and told Vikalp – you always discourage me but look at Shirish – Shirish   --  Shirish – characterless and flirt – you think I do not know his reality. Look, we are not concerned with his personal life. You must clear your mind of all doubts, suspicion and trash. You should not become a pond or a shallow river – be a large river or a vast ocean. 2 After this incident Vikalp started coming home late in night – sometimes he returned over drunk - I had no option except to lament on my misfortune. His drinking habit went on increasing followed by continuous vomit. I never told Ma-Babuji about this even when we lived together. I had never experienced this kind of situation before but tried to bear with it. Vikalp avoided me. Everyday after returning from office he used to confine himself to his room. He opened the doors of room only to receive breakfast, lunch and dinner. Ma and Babuji were surprised to see his changed behavior. What is this Vikalp? Why you remain confined to your room? You have stopped interacting with us. Ma, these days I am over-worked – and he again shut the door of his room. Ma-Babuji told me – Kaniya, why do not you persuade him? How can I win over him, Ma. Ma – do not you know - women are capable of beautifying even the deserts and shrubbery area. I did not utter a single word. For the first time in my life I tried to imbibe the suggestion made by my in-laws. Anticipation of a dark future really shook me up. I trembled to imagine a black snake slowly and gradually sliding and gliding down to my future life. Time went on – Vikalp started sleeping alone. Our relationship became formal – a relationship based on daily needs i.e. tea, breakfast, lunch and dinner. Initially I related his changed behavior to his busy work schedule – troubles at his office. I also came back in the evening as a tired person. I did not take cognizance of his behavior. In a metropolitan city like Bombay we were blessed with all the amenities of life such as a big bungalow, car, social status and what not. But in the midst of these amenities I had a continuous longing for four letters of love. What good is the bungalow, the cars or the social status if your husband does not love you. Material things are no replacement for human, emotional love. Otherwise Ma, in this materialistic world everybody is alone. Gone are the days when we had joint families – everybody shared both happiness and sorrow, plenty and paucity. 3 Participation in family activities by all the individual members was its quality. Every member was duty-bound to assume a direct role or responsibility in family. Family was a unit for all such purposes as socialization, social control, social order etc. Problems used to be solved through love and interaction. Once problem solved, people returned back to work as a light balloon. No doubt, still we come across some joint families, but now each and every member is guided by his/her own interest and problem. They remain together but only in name. Ma, I felt alone and secluded. Ma- Babuji also felt loneliness. We lived under the same roof but everybody was alone and secluded. Isolation is devastating to the human psyche. That is why solitary confinement is considered the cruelest of punishments. This is the bane of modern culture and civilization. One night almost at 12 O’ clock I stood near the window of my room waiting for Vikalp. A car stopped and two persons got down. I saw Vikalp being embraced by a beautiful woman. I trembled with anger and asked him about the woman. Vikalp replied – do not beat about the bush. You have no right to ask about her. Ma, I hold his hand and shouted – I am your wife -- I have the right to ask about her. If you are my wife then mind your own business silently. I do not like these interferences. Interference … I have always tolerated your sting – never retaliated. But I shall never tolerate other woman in your life. Vikalp slapped me – never retaliated – now tolerate this and he kept on beating me. I am surprised with the fact that how I tolerated this brutality – why I failed to retaliate? Vikalp developed the habit of beating me without any reason. My position in the house almost got reduced to a housemaid. It not only affected me mentally and physically but wounded my soul. I had never witnessed any husband inflicting injury on his wife. My soul was crying. You are my mother – who can understand me better than you? Ma- Babuji always sided with their son. Nobody supported me. You are already worried due to Papa. I never tried to add to your tensions by disclosing my pitiable condition. Moreover, why to disclose this in Naiher? 4 I suffered silently. The girl who was so intolerant, carefree, volatile and recalcitrant at parent’s home underwent this kind of transformation – how and why I became so tolerant – I am unable to understand. Gandhi, Dayanand, Vivekanand worked towards the empowerment of women, but my submission to brutality really puzzled me. My education, the knowledge I gained mocked at me. Sometimes I resolved to fight back but the thought dissipated due to lack of support. Who will back me? My soul was yearning like an encaged bird for sweet voice. I faced a perennial question – everybody says marriages are made in heaven. Ma, is this the perennial relationship spanning over several births? My dreams of living happily ever after had been dashed against the hard walls of reality. Our love is gone, our relationship is dead. He used to feel close, but not now. He no longer enjoys being with me. I never imagined wife-husband sharing this kind of relationship in a civilized society. When the time is adverse and hostile, everything becomes counter productive. Laughter appears to be blubber. For women every dream is preceded by deceit and deception. But everything is supposed to come to an end – so is the SIN. CONTINUED 1.TWO Original Poem in Maithili by Kalikant Jha Buch Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2. ALL THINGS POSSIBLE- (TRANSLATED FROM  HER MAITHILI POEM BY AUTHOR HERSELF ) 3. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary

1. TWO Original Poem in Maithili by Kalikant Jha Buch Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary

1.The Preamble

Don’t ask to know the rope about me

Our binding was only for a few nights

Will go away as soon as sun rises

The meeting is for a couple of moments

Don’t desire for journey together always

The other side is filled with mirth and cheer

This side is filled with fear

The sadness of helplessness

The only day is today to live

I will go to my husband’s place

Being bound to my duties

Darkness appeared in front of eyes

Ears have became deaf

Please return like an intruder

I am accompanied by seven kahars (men)

My heart wishes to see him

But eyes are filled with tears

My throat is dried like summer’s sky

The lips are like burning ground

Your vision has heat but

My eyes are wet here

The arms of demon of lust

Have forwarded to embrace

The purity will breathe last

The chaste love will be destroyed

A rift will appear in the middle

We will stand at the opposite ends.

2.Disappointment

The gleams of moon is weakened

How red the sky is turned

The day is declared in usual pattern

The smile filled with shine of pearl

The face replicating illusion of charm

The beauty mark of a mole in the cheek

Proved nothing more than dark shelter of snake

The venomous arrow of sharp vision

Flowed over in tears

Drenched heart with disappointment

I thought it was life giving nectar

But it was merely water

Bursting out from the broken pot

Watching the burnt destroyed indestructible

Hope diminished with it all

The falling failing wishes like Sputnik

Why to surprise needlessly luna?

Whom should I trust oh dear pretty lady

The boon of Kalp became spine of babool

The aquatic coral became a dry date tree

The shed of old roof

Doesn’t exist any more.

2. ALL THINGS POSSIBLE- (TRANSLATED FROM  HER MAITHILI POEM BY AUTHOR HERSELF )

DR. SHEFALIKA VERMA

IN MY DARK AND CLOUDY DAYS

I THOUGHT ALWAYS FOR SUNSHINE

SEASONS COMING SEASONS GOING

I SAW LOVINGLY

EACH IN ITS WAY

ENCHANTING FOR ME

I FELT EVERY SEASON IN MY HEART

IN THE LAP OF

TROUBLES AND WORRIES I WAS

THINKING FOR THE DAYS FINE

ALL THINGS

GOING ROUGHLY BADLY

YOU ON YOUR GRIEF .BED

FIGHTING WITH LIFE

TOUGHLY

BUT A FLAME OF ETERNAL LOVE

ALWAYS BURNT

IN MY HEART

THINGS WILL BE THE BEST

I TRAVELLED LONG AND LONG

ON THE HARD ROAD OF MY MIND

THAT TOOK ME TO YOU

AND THERE WAS THE END....

I WAS LOST

ALONE I WAS

IN THE JUNGLE OF THIS WORLD

WHEN THE RAIN DROPS FALL ON MY

EYE LIDS

I FEEL YOUR LOVE- KISS ON IT

WHEN THE COOL BREEZE

TOUCHES ME LOVINGLY

I FEEL YOU EMBRACE ME

TIGHTLY

.ITS MISTERIOUS FOR ME BUT, I KNOW

LOVE

MAKES ALL THINGS POSSIBLE.......

3. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary

Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in

A Dozen Of Haikus

(in 5-7-5 and 3-5- 3 syllable scheme)

a) Affect of season,

Trees are covered with flowers

The leaves are hidden

b) Nests of the red ants,

Shells rubbed to hollow centre

Chopped baby jack fruits

c) Cuckoos songs

Not eaten by fox

Monsters’ crowd

d) The mid day

In the ghostly groves

Holding breath

e) Juicy fruits

Orchard of Mangoes

Safeguarding

f) All are heaped to ripe

The high piles of husks for heat

Except matured ones

g) Plucked with the stick

Buried after worshipping

The grandfather’s grave

h) The game of titi

Playing Satghariya

With seeds of Asoka

i) Kansupti

Ball made up of mud

Juidshital (Festival)

j) The big feast

Fishing in the pond

Roasting corns

k) The mashed Kabai fish

Earth-warms burrowing the soil

The wood pecker bird

l) The meat of hedgehog

Spines are also used in

Various rituals

The Cow

Never delayed in beating you with stick

Neither unhappy when female calf is born

But you are adorable

Writing essay on you

Forgive me.

Shraaddh (Hindu Funeral Rites) Shouldn’t Be Skipped

The second death followed by one

His father’s and his uncle’s

People of uncle were dominating

The younger brother was worried

In the second death during the shraaddh

One shraaddh becomes adequate for both

Another Shraaddh would be skipped

Both brothers were worried

The priest too wouldn’t favour the weak

Whatever the Shastras (religious rules) say

Just inform the maternal uncle’s family

Father’s funeral shouldn’t be omitted. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज  :  http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ"  : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स  : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI  FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इ‍डेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक  निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)

For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)

The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT

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http://videha123.wordpress.com/  

Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर, सह-सम्पादक: उमेश मंडल, सहायक-सम्पादक: शिव कुमार झा आ रश्मि रेखा सिन्हा, भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा, कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili (Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com ) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ रश्मि रेखा सिन्हा। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६५ म अंक ०१ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६५)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्

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