222 'विदेह' ६६ म अंक १५ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६६) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता” यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी २.२.१.साकेतानन्द-कथा-आछे दिन पाछे गए २.प्रो. वीणा ठाकुर-कथा- परिणीता २.३.१.अनमोल झा-कथा- अबकी बेर फतंग २.नन्द विलास राय-कथा- बाबाधाम २.४.१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर २.५.१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- १.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक-(समीक्षा)१.२. समीक्षा (अर्चिस) २. डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा ३.राजदेव मंडल, कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक लेल पत्र-शेष अंश ४.धीरेन्द्र कुमार- प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि २.६.नवेन्दु कुमार झा १. राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद २. दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद २.७.१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू”- हास्य-कथा- कब्जियत दूर भगाउ २. गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर २.८.१.जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा-मइटुग्गर २. बिपिन कुमार झा- विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व ? ३.बसंत झा-उगना ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बूच"1934-2009-आगाँ ३.२.राजदेव मंडलक ४ टा कविता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-विचित्र श्रद्धा ३.४.१.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता २.चन्द्र शेखर कामति, भात छै नाम-नाम ३.५.१.मृदुला प्रधान- कतय गेल गणतंत्र -दिवस २.अरविन्द ठाकुर- चारिटा गजल ३.६.गजेन्द्र ठाकुर- घृणाक तरहरिमे बुढ़िया डाही संग अछि ३.७.१.इन्द्र भूषण-हम की करू? २.राजेश मोहन झा-“साओन कुमार” ३.८.किशन कारीग़र- नबकनियाँ ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी- करिया झुम्मरि ज्योति सुनीत चौधरी ५. गद्य-पद्य भारती: डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक दुइ गोट लघुकथा- लेखिकाक संस्कृत लघुकथा संग्रह “लघ्वी”सँ मैथिली रूपान्तर: डॉ. योगानन्द झा ६. बालानां कृते-१. ब्युटी कुमारी- राहुलजी एक नजरिमे २.अर्चना कुमर १.आस, २.विद्वान-१ (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) ३.डॉ. शेफालिका वर्मा- स्मृति-शेष ७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_XV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.1.Sweta Jha -History of Mithila Painting: An Introduction2. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय डॉ. जयमन्त मिश्रक निधन दरभंगामे ७ सितम्बर २०१०केँ भऽ गेलन्हि। डॉ. जयमन्त मिश्र १९२५-२०१० जन्म १५-१०-१९२५ मृत्यु ०७-०९-२०१०, गाम-ढंगा-हरिपुर-मजरही। १९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य) लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली।
सगर राति दीप जरय क ७१म आयोजन- दिनांक ०२-१०-२०१० केँ संध्या ६ बजेसँ मध्य विद्यालय, बुढ़ियागाछी, बेरमा (मधुबनी)मे श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक संयोजकत्वमे समस्त बेरमा ग्रामवासी द्वारा आयोजित अछि। एहि अवसरपर मौलिक मैथिली कथाकार आ कथाप्रेमी श्रोताक उपस्थिति प्रार्थित अछि। एहि स्थल पहुँचबाक लेल- ई स्थल तमुरिया (मधुबनी जिलान्तरगत) रेलवे स्टेशनसँ ३ कि.मी. उत्तर-पश्चिम आ चनौरागंज बस अड्डासँ ३ कि.मी. दक्षिण पूबमे स्थित अछि।
विशेष: विदेह आर्काइवक आधारपर बाल चित्रकथा आ कॉमिक्स महिला वर्गमे विशेष लोकप्रिय भेल अछि। महिलावर्ग द्वारा कीनब ओहि पोथीक बच्चा सभक हाथमे जएबाक सूचक अछि। हमरा सभक सफलता अहीमे अछि जे ई बाल-साहित्य “टारगेट ऑडियेन्स” लग पहुँचल अछि। यएह स्थिति आन पोथी सभक संग सेहो अछि।
विदेह आर्काइवक आधारपर प्रकाशित मैथिली पोथी एहि सभ ठाम उपलब्ध अछि:
पटना: १.श्री शिव कुमार ठाकुर: ०९३३४३११४५६
२.श्री शरदिन्दु चौधरी: ०९३३४१०२३०५
राँची: श्री सियाराम झा सरस: ०९९३१३४६३३४
भागलपुर: श्री केष्कर ठाकुर: ०९४३०४५७२०४
जमशेदपुर: १.श्री शिव कुमार झा: ०९२०४०५८४०३
२.श्री अशोक अविचल: ०९००६०५६३२४
कोलकाता: श्री रामलोचन ठाकुर: ०९४३३३०३७१६
सहरसा: श्री आशीष झा: ०९८३५४७८८५८
दरभंगा: श्री भीमनाथ झा: ०९४३०८२७९३६
समस्तीपुर: श्री रमाकान्त राय रमा: ०९४३०४४१७०६
सुपौल:श्री आशीष चमन:०७६५४३४४२२७
झंझारपुर: श्री आनन्द कुमार झा: ०९९३९०४१८८१
निर्मली: श्री उमेश मंडल: ०९९३१६५४७४२
जनकपुर: श्री राजेन्द्र कुशवाहा: ००९७७४१५२१७३७
जयनगर: श्री कमलकान्त झा: ०९९३४०९८८४४
दिल्ली: १.श्रीमती प्रीति ठाकुर: ०९९११३८२०७८
२.श्री मुकेश कर्ण: ०९०१५४५३६३७
मधुबनी: १.श्री सतीश चन्द्र झा:०९७०८७१५५३०
२.मिश्रा मैगजीन सेन्टर (प्रो. श्री अमरेन्द्र कुमार मिश्र), शंकर चौक, मधुबनी ०९७०९४०३१८८
किछु आर स्थल शीघ्र...
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०५ देशक १,५०५ ठामसँ ४८,६६० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,६३,०१८ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता” यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी २.२.१.साकेतानन्द-कथा-आछे दिन पाछे गए २.प्रो. वीणा ठाकुर-कथा- परिणीता २.३.१.अनमोल झा-कथा- अबकी बेर फतंग २.नन्द विलास राय-कथा- बाबाधाम २.४.१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर २.५.१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- १.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक-(समीक्षा)१.२. समीक्षा (अर्चिस) २. डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा ३.राजदेव मंडल, कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक लेल पत्र-शेष अंश ४.धीरेन्द्र कुमार- प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि २.६.नवेन्दु कुमार झा १. राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद २. दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद २.७.१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू”- हास्य-कथा- कब्जियत दूर भगाउ २. गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर २.८.१.जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा-मइटुग्गर २. बिपिन कुमार झा- विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व ? ३.बसंत झा-उगना शम्भु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।—सम्पादक निबंध : “मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता” (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) निबंधकार : डॉ. शंभु कुमार सिंह मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता मैथिली भारोपीय भाषा परिवारक, भारतीय आर्यभाषासँ उत्पन्न एक महत्वपूर्ण आर्यभाषा थिक। एहि भाषाक उद्भव ओ विकासक जेहन प्राचीन साहित्यिक मान्यता उपलब्ध अछि ओहन भारतक कोनो आधुनिक आर्य आ द्रविड़ भाषाक नहि अछि। कोनो सशक्त भाषाक अन्तर्गत ओकर अनेक बोली अथवा उपभाषाक निर्माण कालक्रमसँ क्षेत्रानुसार अवश्य होइत रहैत अछि। तकर कारण अनेक अछि। प्रत्येक भाषा अपन चारूकातक भाषा सँ प्रभावित होइत अछि। एहि क्रममे इहो कहल जाइत अछि जे प्रत्येक कोस पर बोली बदलैत अछि आ प्रत्येक जाति वा समाजक भाषा भिन्न होइत अछि। डॉ. सुभद्र झा एवं ग्रियर्सन सन विद्वान लोकनि ई पहिनहि स्पष्ट क’ देने छथि जे मैथिली एक स्वतंत्र का सशक्त भाषा थिक। एहि भाषाक चारूकात चारि गोट भाषा अछि। एकर पूबमे बंगला भाषा, पश्चिममे भोजपुरी, उत्तरमे नेपाली आ दक्षिणमे मगही भाषा अछि। इहो स्वतः सिद्ध अछि जे कोनो भाषा अपन निकटवर्ती भाषा सभसँ प्रभावित होइत रहैत अछि। उपर्युक्त कारणसँ मैथिली भाषामे अनेक बोली अथवा उपभाषाक जन्म भ’ गेल अछि। सर्वप्रथम मैथिली भाषाक विभिन्न उपभाषाक परिचय डॉ. ग्रियर्सन अपन “Linguistic Survey of India” क दोसर भागमे प्रस्तुत कएने छथि। हिनका अनुसारेँ मैथिलीक छः गोट उपभाषा अछि:- (1) मानक मैथिली (2) दक्षिणी मानक मैथिली (3) छिका-छिकी बोली (4) पूर्वी मैथिली (5) पश्चिमी मैथिली (6) जोलहा बोली। ग्रियर्सनक उपर्युक्त उपभाषा वा बोलीक वर्णनसँ पं. गोविन्द झा सहमत नहि छथि। हिनक कहब छनि जे मैथिलीक विभिन्न बोलीकेँ क्षेत्रानुसार पाँच उपभाषामे बाँटल जा सकैछ: (1) पूर्वी मैथिली (2) दक्षिणी मैथिली (3) पश्चिमी मैथिली (4) उत्तरी मैथिली (5) केन्द्रीय मैथिली वा उपभाषा। उपर्युक्त विवेचना सँ लगैत अछि जे गोविन्द झा सेहो ग्रियर्सनक मतानुसार मैथिलीक उपभाषाक वर्णन केने छथि। ओना ओ कतहु-कतहु विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आदिमे कनेक अन्तर क’ देने छथि, अस्तु मैथिलीक वर्तमान रूपकेँ देखल जाय तँ ज्ञात होइत अछि जे ग्रियर्सनक समयमे जे मैथिलीक विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आ रूप छल ओहिमे परिवर्तन भ’ गेल अछि। एकर अतिरिक्त नेपालक तराईमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि ओकरो एकटा फराक रूप छैक। एहना स्थितिमे मैथिलीक उपभाषाक वा बोलीक आठ गोट भेद कएल जा सकैत अछि: 1. मानक मैथिली:-- एकर क्षेत्र केन्द्रीय ओ उत्तरीय पुरना दरभंगा जिला (मधुबनी, दरभंगा आ समस्तीपुर) थिक। ओना तँ डॉ. ग्रियर्सनक अनुसारेँ मानक मैथिली दरभंगा आ भागलपुर जिलाक उत्तरी क्षेत्रक आ पुर्णियाँ जिलाक पश्चिमी क्षेत्रक ब्राह्मण लोकनि बजैत छथि। हिनका लोकनिक अपन साहित्य आ परंपरा छन्हि जे एहि भाषाक विकृत प्रवाहकेँ मन्द कएने अछि। वर्तमान मे ई स्पष्ट भ’ गेल अछि जे मानक मैथिली ब्राह्मणे टाक बोली नहि छन्हि, किएक तँ मैथिली भाषाक पठन-पाठनक प्रवृति ब्राह्मण सँ आनो जातिक मध्य पूर्ण रूपसँ जागल अछि। एहि हेतु मानक मैथिली मिथिलाक सभ जातिक बोली कहल जा सकैत अछि। 2. दक्षिणी मैथिली:-- डॉ. ग्रियर्सनत दक्षिणी मानक मैथिलीकेँ दक्षिणी मैथिलीमे राखल जा सकैत अछि। एकर क्षेत्र मुंगेर, मधेपुरा, सहरसा ओ समस्तीपुर धरि मानल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ दक्षिणी मैथिलीमे निम्न अन्तर अछि—(I) मानक मैथिली मे जतए धातु स्वर ह्रस्व रहैत अछि ओतए दक्षिणी मैथिलीमे दीर्घ भ’ जाइत अछि। जेना-मानक मैथिलीमे, ‘जनै छी’ होइत अछि आ दक्षिणी मैथिलीमे, ‘जानै छी’। (II) सर्वनामक रूपमे मानक मैथिलीमे हमर, तोहर, अहाँ, अपने, आदि प्रयुक्त होइत अछि। दक्षिणी मैथिलीमे मोर, तोर, तोहे सर्वनामक प्रयोग होइत अछि। (III) क्रियापदमे सेहो भिन्नता देखल जाइत अछि, उदाहरणस्वरूप मानक मैथिली ‘अछि’ दक्षिणी मैथिलीमे ‘अछ’ भ’ जाइत अछि। 3. पूर्वी मैथिली:-- ग्रियर्सन एकरा गँवारी मैथिलीक संज्ञा देने छथि। एकर क्षेत्र पूर्णियाँ जिलाक केन्द्रीय आ पश्चिमी भाग, संथाल परगनाक पूर्वी भाग, साहेबगंज आ देवघर धरि अछि। ग्रियर्सन कहैत छथि जे, ई भाषा अशिक्षित वर्ग द्वारा बाजल जाइत अछि। पूर्वी मैथिली, दक्षिणी मैथिली आ दक्षिणी मानक मैथिलीसँ साम्य रखैत अछि। ओना कनेक अन्तर सेहो देखना जाइत अछि—(I) दक्षिणी मैथिलीमे सम्बन्ध कारकमे ‘के’ प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ‘केर’ चिह्नक प्रयोग होइत अछि। (II) दक्षिणी मैथिलीमे ‘छिक’ क्रियाक प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ओकर बदलामे ‘छिकई’ क्रियाक प्रयोग होहत अछि। 4. छिका-छिकी बोली:-- ई गंगाक दक्षिणी मुंगेरक पुबारी भागमे, दक्षिणी भागलपुर ओ संथालपरगनाक उत्तरी ओ पश्चिमी भागमे बाजल जाइत अछि। ई दक्षिणी मानक मधेपुराक बोलीसँ अत्यधिक साम्य रखैत अछि। एहिमे शब्दक अन्तमे ‘की’ वा ‘हो’ क उच्चारण कएल जाइत अछि, जेना— अपनो, खएबहो, कहबहो, सुनलहो आदि। 5. पश्चिमी मैथिली:-- एकर क्षेत्र मुजफ्फरपुर ओ चम्पारण जिलाक पुबरिया भाग थिक जाहिपर भोजपुरीक व्यापक प्रभाव अछि। ग्रियर्सनक अनुसारेँ एहि क्षेत्रक कतिपय लोक जे बजैत छथि तकरा भोजपुरी कहल जाय अथवा मैथिली ई कहब कने कठिन। ओना मुजफ्फरपुरसँ अलग भेल वैशाली जिलाक क्षेत्रक भाषाक नाम ‘बज्जिका’ भाषा देल गेल अछि। एहि भाषाक नामकरण लिच्छवी वंशक इतिहासक आधार पर कएल गेल अछि। 6. उत्तरी बोली:-- एकर क्षेत्र नेपालक तराई आ वर्तमान सीतामढ़ी जिलाक उत्तरी भाग धरि मानल जा सकैत अछि। एहि भाषा पर नेपली भाषाक प्रभाव बुझना जाइत अछि। 7. जोलहा बोली:-- पुरना दरभंगा जिलाक मुसलमानक बोलीकेँ डॉ. ग्रियर्सन जोलहा बोली मानैत छथि। ओना हिनक कहब छनि जे मिथिलाक मुसलमान मैथिली नहि बजैत छथि। मुजफ्फरपुर आ चम्पारण जिलाक मुसलमान जे बोली बजैत छथि ओहि पर अवधि भाषाक प्रभाव अछि। एकर अतिरिक्त वर्तमान कालक मुसलमानक बोली पर उर्दू आ हिन्दीक प्रभाव सेहो परिलक्षित होइत अछि। 8. केन्द्रीय मैथिली:-- मध्य मिथिलाक (दरभंगा, मधुबनी, पंचकोशी) सम्पूर्ण क्षेत्रक भाषा जकर निकट कोनो आन भाषा नहि अछि, तकरा केन्द्रीय मैथिलीक नामसँ जानल जाइत अछि। केन्द्रीय मैथिली साहित्यक भाषाक अत्यन्त नजदीक कहल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ केन्द्रीय मैथिलीमे बहुत सामीप्य देखल जाइत अछि। वर्तमानमे मैथिलीक दू टा उपभाषाक नवीन नामकरण भेटैत अछि—अंगिका ओ बज्जिका। छिका-छिकी, अर्थात् पूर्वी बोलीकेँ अंगिका कहल जाइत अछि जकर केन्द्र स्थल थिक भागलपुर। प्रायः भागलपुर महाभारत कालीन अंग राज्यक राजधानी छल तैँ एहि क्षेत्रक भाषाकेँ अंगिका कहल जाइत अछि। बज्जिकाक सम्बन्धमे विवेचना कएल जा चुकल अछि। एतावता ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक क्षेत्रानुसार अनेक उपभाषा अछि। एखनहुँ धरि एकर पूर्णरूपेण सर्वेक्षण नहि कएल गेल अछि नहि तँ किछु आओर उपभाषाक सम्बन्धमे ज्ञात होइत, तैँ एहि बिन्दु पर भाषावैज्ञानिक दृष्टिएँ सर्वेक्षण होएब अत्यंत आवश्यक अछि। १.साकेतानन्द-कथा-आछे दिन पाछे गए २.प्रो. वीणा ठाकुर-कथा- परिणीता १ साकेतानन्द (1) लेखकीय नाम : साकेतानन्द. (2)पत्रकारिताक नाम : बृहस्पति. (2) असली नाम : साकेतानन्द सिंह (एस.एन.सिंह).(3) पिता : स्व. श्री विजयानन्द सिंह. माता: स्व.श्रीमती राधारमा जी. (4) जन्म : 27 फरवरी 1940 क’ कुमार गंगानन्द सिंहक तत्कालीन आवास “सचिव_सदन” 5, गिरीन्द्र मोहन रोड, दरभंगा. (प्रमाण पत्रमे_26 जनवरी 41 ). (5) शिक्षा: क्रमशः राज स्कूल दरभंगा/ बुनियादी स्कूल श्रीनगर, पूर्णियाँ/ विलियम्स मल्टीलेटरल स्कूल,सुपौल/ पश्चात पटना एवं मगध विश्वविद्यालय स’ अंग्रेजी औनर्स आ मैथिलीमे स्नात्कोत्तर । (6) व्यवसाय: आजीवन आकाशवाणीक चाकरी । आठ राज्यक नौ केन्द्रमे विभिन्न पद पर काज । लटे_पटे 40 वर्षक कार्यकाल । पटना, दरभंगा एवं भागलपुरमे बीसो साल तक मैथिली कार्यक्रमक आयोजन, प्रस्तुतिकरणमे लागल । ओतबे दिन क्रमशः आकाशवाणी पटनाक ग्रामीण कार्यक्रम ‘चौपाल’ आ दरभंगाक ‘गामघर’ कार्यक्रमके मुख्य स्वर”जीवछभाइ’क रूपमे ख्यात। आकाशवाणी दरभंगाक संस्थापक_स्टाफ । (7) साहित्यिक गतिविधि: मैथिली कथा साहित्यमे 1962 स’ सक्रिय । गोडेक चालिस_पचास टा कथा, रिपोर्ताज. संस्मरण, यात्रा_विवरण मैथिलीमे प्रकाशित अधिकांश पत्र_पत्रिकामे छपल । पहिल मैथिली कथा “ग्लेसियर” 1962मे ‘मिथिलामिहिर’मे प्रकाशित । हिन्दियोमे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । सन 99मे छपल पहिल कथा_संग्रह “गणनायक’ के ओही वर्ष ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार। पैघ बान्ध’ स’ अबैबला विपत्तिके रेखांकित करैत, पर्यावरण के कथा वस्तु बना क’ राजकमल प्रकाशन स’ प्रकाशित एवं अत्यंत चर्चित उपन्यास (‘डौकूमेंट्री फिक्शन’) “सर्वस्वांत” प्रकाशित। आकाशवाणीक विभिन्न केन्द्र लए लिखल आ प्रस्तुत कैल नाटक, डौकुमेंट्री संख्या बहुत रास। आकाशवाणीक राष्ट्रीय कार्यक्रममे प्रसारित दू टा उल्लेखनीय वृत्त रूपक_ ‘महानन्दा अभयारण्य’ पर आधारित “जंगल बोलता है” एवं झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रक ज्वलंत डाइनक समस्या पर आधारित वृत्तरूपक “ नैना जोगन “ चर्चित एवं प्रसिद्ध । मैथिली नाटकक कैकटा ‘लैंडमार्क’ यथा डा.रामदेव झा विरचित दू टा नाटक ‘विद्यापति’ आ ‘हरिशचन्द्र’ ; डा. मणिपद्मक ‘चुहड मल्लक मोछ’ । सल्हेस, दीनाभद्री, विदापत आदि लोक गाथा, लोक_नृत्य सब के लोक_गायकक मध्य जा क’, मूल वस्तुक ध्वन्यंकन एवं ओकर संपादन आ प्रसारण “गणनायक” कथासंग्रह के राजस्थानी अनुवाद, राजस्थानी साहित्यक जानल_चीन्हल नाम श्री शंकरसिंह राज पुरोहित एवं हिन्दी अनुवाद, मैथिलीक ख्यातनामा अनुवादिका श्रीमती प्रतिमा पांडॆ केलनि अछि; आ दुनू के साहित्य अकादमिये प्रकाशित केलक । (8) संप्रति: सन 2001मे आकाशवाणी हज़ारीबाग स’ केन्द्र_निदेशक के पद स’ अवकाश प्राप्त केलाक बाद पूर्ण रूपेण मिटः रूपेण मैथिली लेखन, मिथिला क्षेत्रक समस्या सब पर वृत्त__चित्र बनेबाक, मैथिलीक किछु नीक कथा सब के फिल्म रूपांतरणक गुनान__धुनानमे लागल । आछे दिन पाछे गए आइ दिने खराब छनि, भोर नंइ जानि ककर मुंह देखने रहथि मोन नंइ छनि। जे क्यो रहल हुए, अभगला के नीक नंइ हेतै । डेरा स’ निकलले छला कि बगलबला छौंडा तेना छिकने रहनि जे लगलै जेना नाके देने अंतडीं-भोंतडी निकलि जेतै । बडा अबंड सब छैक चारू भर... वैह मिड्ल-क्लास मानसिकता बला लोक। अनेरे एक दोसरा के जिनगी मे ताक-झांक करैत रहत । मिश्रा जीक छोटका बेटा सुनाइये क’ नंइ कहि देलकनि जे “ ई हमरा सीधे क्लास-वन नंइ बुझाइ छथि, क्लास-वन कत्तौ अहिना रहै छै...हौ खाली हिंदी अखबार पढैत देखलहक है कोनो एस.पी. कलक्टर के ?” हिनका हिंदिये स’ काज चलि जाइत रहनि। भरि दिन त’ टीभी देखिते छथि, सब त’ वैह खबरि रहै छैक, तखन गाम-घरक खबरि जेहन ई अखबार मे रहै छै….फेर अपन एकटा गौंआँ छनि अहि अखबारमे। आइ अठारहम दिन छियनि....रिटायर भ’ गेला अछि से दिन भरि मे कैक बेर की कही पग-पग पर मोन पडै छनि...एखन ओ बस कि टैक्सी- स्टैंड दिस लपकलो जाइ छथि आ सोचियो रहल छथि जे कथी स’ जाथि ? जं’ टेम्पो रिजर्व करता त’ एकटा नम्बरी त’ खाइये जेतनि...एह!औफिस के तीन टा गाडी रहै। जं’ कोनो खराब भेल त’ शहर मे टैक्सी छलै । सामने स’ एकटा औटो सर्र स’ निकलि गेलनि। ई जाबे हाथक इशारा कि जोर स’ चिकडि क’ ओकरा रोकितथिन---ओ गोली जेकां निकलि गेल रहै। ताबे सिटी बस बगल स’ पास केलकनि । नंइ जानि कोन रौ मे ओ लपकल रहथि आ पौ-दान पर पैर रोपिते जेना बस चलल छल, जे आइ नंइ मरितथि त’ घायल जरूरे होइतथि । हुनका एना लपकि क’ चढति देखि बस मे पहिने स’ ठाढ दू टा छौंडा हिनका दिस कनडेरिये देखैत किछु बाजल... की बाजल हैत ? चलैत बस मे ठाढे—ठाढ मचकी झूलैत ओ यैह सोचि रहला अछि जे आगां मे हिनके जेकाँ मचकी झूलैत दुनू कौलेजिया की गप्प केने हैत.. कहीं हुनका एना उचकि क’ चलती बस चढैत देखि ओकरा अपन क्षेत्र मे अतिक्रमण बुझायल होइ....जे से !आइ हुनका येन-केन-प्रकारेण अपन चेक--अप करेबाक छनि,बाइ-पास भेल छनि । तैं अइमे त’ कोनो आसकतिक बाते नंइ छैक; डा.मेहरोत्रा नामी हर्ट-स्पेशलिस्ट छथि...ई बुझिते जे हम पूनाक डिफेंस कारखानाक नामी हेड माने एम.डी छी...जकरा युनिट के अनेक बेर कमांडर-इन-चीफ माने माननीय राष्ट्रपति महोदय सम्मानित क’ चुकल छथिन; ओ अति प्रसन्न भेला। ओ सेल्फ-डिफेंस लेल हथियार खरीद’ चाहैत रहथि । तैं ओइ ठाम पंहुचैक देरी छै...डा.मेहरोत्रा स’ की एप्वायंटमेंट लेता....पांच मिनटक त’ काज ! बाबू , भले हिनका सनक लोक सब सीमा पर नंइ लडैत अछि, मुदा कि हिनका लोकनि सन लोक ज राति-दिन नंइ खटै, नंइ पसेना बहबे, त’ की सीमा पर फौज लडत...? किन्नहु ने। कारगिल युध्धक समय....कैक महीना तक कहां क्यो औफ लेलक...अहर्निश कारखाना चलैत रहलइ। समय-समय के बात...” बाबा ! कने आगाँ बढियौ । हमरा सब लए जगह छोडबैक कि नंइ ?” ओ धडफडा गेला । धडफडा क’ ओ दुनू छौंडा स’ कने बेसिये दूर चल गेल छला । यैह, अही सब ठाँ अपन सवारीक कमी खलै छै...की ओ सत्ते एहन भ’ गेला अछि जे ई दुनू छौंडा हुनका स’ काकु करनि ? माने एहन बूढ...नंइ-नंइ एखन त’ रिटायरे केलनि अछि….एखनो टी-शर्ट धारण करै छथिन त’ की कहै छैक...बाइसेप्स—ट्राइसेप्स बांहि मे उछलि जाइ छनि । अपन समयक नीक टेनिसक खेलाडी, एक समय मे हिनका संगे एक्को सेट खेलाइ लए क्लबक सब(पढल जाय सुंदरी सब)लालाइत रहैत छल। से धरि ठीके ; जे केलखिन ताहि मे हरदम औव्वलि...हरदम अलग...सब स’ नीक । से आइ ओ एना कियैक सोचि रहला अछि ? ओ ‘रिटायर्ड’ भेला अछि ‘टायर्ड’ नंइ ?आइकाल्हि साठि कोनो वयस भेलै ? मुदा एकटा बात ! ओ सेवा समाप्त भेला स’ पहिनंहे ई रिटायरमेंटक समय कोना कटता तकर सब बेवस्था क’ लेने रहथि । एत्ते तक जे बुढारी मे बेटा सबहक आगाँ हाथ ने पसार’ पडनि तकर नीक इन्त्जाम ओ बहुत पहिनहें क’ लेने रहथि...इहो सोचने रहथि जे ओ कोनो बेटाक आश्रम मे ताबे तक नंइ रहता,जाबे शरीर की समय सकपंज नंइ क’ दनि । ताबे कथी लए ककरो पर भार बनथिन......... “औ बुढा ! कत’ जैब ? आब त’ अंतिम स्टौप आब’ बला छै ?” मोन त’ पितेलनि। मोन भेलनि जे ठांइ-पठांइ किछु कहि दियनि तेहन, जे फेर अनटोटल बजबे बिसरि जाथि ई तेजस्वी नवयुवक ! मुदा बात बढेबा स’ की फैदा ? एखन काल्हि तक एहन-एहन मथदुक्खा सब स’ बांचल रहै छला...गाडी रहै छलनि । नंइ जानि कियैक, नौकरी जाइ स’ बेसी आहि-- हुनका सर -कारी गाडीक सुविधा खतम भ’ जेबाक अबै छलनि । डा. मेहरोत्रा हिनका चिन्हैत रहथिन, मुदा सब त’ नंइ चिन्हैत रहनि। बस स’ उतरि क’ अस्पताल पंहु- -चैत-पंहुचैत पसीना स’ भीज गेल रहथि। पैर पटकि क’ गर्दा झाडिते छला---‘एत्त’ एना जुत्ता झाडै छी,से कने बाहरे बढि क’ झाडितंहु से नंइ ?” बजै बला कंपाउंडर सनक लगलनि । सपरतीव केहन !हिनका शिक्षा द’ रहल छनि । “डा. साहेब कखन एथिन ?” ओ बात के नंइ सुनैत बजला । “समय भ’ गेलनि अछि, अबिते हेता । से कियैक देखेबै ?” “हं, हमरा पेसमेकर लागल अछि....” “से त’ बड बेस, मुदा नंबर लगेने छी ने ?” “डा. साहेब अपेक्षित छथि....तैं ! “तखन त’ नंइ देखायल भेल आइ “ “से कियैक ?” “केहनो अपेक्षित क्यो कियैक ने होथि---डाक्टर साहेब बिनु नंबरे नंइ देखै छथिन ।“ ताबे डा.साहेब के गाडी पोर्टिको मे आबि क’ लागल। ई लपकि क’ आगाँ बढला जे कहीं बाटहि मे काज बनि जानि । मुदा डाक्टर एको बेर नजरिओ उठा क’ हिनका दिस तकबो ने केलखिन त’ हिनका बड आश्चर्य लगलनि। मर, ओना घुठ्ठी-सोहार छलनि, क्लिनिक मे अबिते की भ’ गेलनि, एक बेर ताकियो लितथिन ने त’ कने सांत्वना भेटितनि । मुदा डाक्टर त’ घाड निहुरेने तेना गेलखिन जेना कि कहियो देखनंहु ने होथिन। बेस, हारि क’ ओ बडा याचनाक स्वर मे कंपाउंडर के कहलथिन जे ओ सेनाक कारखाना मे एम.डी.क पद पर स’ हाले रिटायर भेला अछि...बिच्चे मे ओ कंपाउंडरबा बात के लोकति कहकनि--“ अपने एम.डी. रहियै ने, आब नंइ ने छियै....अइ पुर्जा पर अपन नाम आ पता लिख दियौ बाबू साहेब ! चौथा दिन फोन करि क पूछि लेबै...लंबर आबि जायत।“ ….ताबे बाहर कोनो गाडी के रुकब आ चपरासी आ सिक्योरिटी के दौडति देख बुझबा मे भांगठ नंइ रहलनि जे बाहर कोनो भी.आइ.पी.क गाडी लगलै । भी.आइ.पी. के रहथि से ई की जान’ गेलथिं। ई त’ साढे चौबीसे वर्षक वयस मे पूना मे जे नौकरी धेलनि से आब यैह रिटायर भेलाक बाद घुरला अछि । अइ ठामक सब वस्तु तैं ने अनचिन्हार लगै छनि ।फेर भी.आइ,पी. आ हुनका संगे अनेकानेक चमचाज़ एन्ड लगुआ-भगुआ के सड-सडायल डाक्टरक चेम्बर मे ढुकति देखलखिन-- मोन खट्टा भ’ गेलनि । बगल मे ठाढ लोक स’ पुछलखिन त’ पता लगलनि जे ई अइ ठामक मेयर सैहेब छथि; आइ.ए.एस. ! हिनका पुर्जा कटेबाक कि लाइन मे लगबाक कोनो जरूरति नंइ ? कियैक त’ ई आइ.ए.एस. अहि ठामक मेयर साहेब छथि ।कियै; अपने जखन एम.डी. रहथि त’ अपने ई सुख नंइ भोगने रहथि की ? अपने प्रश्न पर सहमि गेला ओ ! चारू कात हियासलखिन....सबतरि निश्चिंतता पसरल छलै । ने हर्ष आ ने विस्मय । पेशेंट सब पैर मोडि क’ कुर्सी पर बैसल, गपियाति किछु गोटे हफियाति आ किछू झुकति । अजीब लगलनि हुनका। जेना समय रुकि गेल हुए । जेना एत्तुक्का सब गोटे मिलि क’ समय के ठुठुआ देखा रहल हुए । अपन-अपन दहिना हाथ सामने तनने, औँठा के बामा-दहिना घुमबति । डक्टरक चेम्बर स’ गल्ल—गुल्ल आ ठहाका । एत्ते लोक इम्हर मांछी मारैत अछि त’ मारौ । आगंतुक मेयर छियै, भ’ सकैत छै डाक्टरक दोस्त हुए । एतबा त’ सब दोस्त एक दोसरा लए करै छै। “की गुन-धुन मे लागल छी यौ बाबा ?” कंपाउंडर हिनका दिस आंखि गुडारि क’ देखलक---“ किछु करब ‘डाक सैहेब, बिनु नंबरे किन्न्हु नंइ देखता ।“ हुनका मोन मे एलनि कि आइ स’ किछुए दिन पहिने अइ तरहक लोक के अइ तरहे बजबाक साधंस होइतै ?से छोडूने ! डक्टरबेक ई हिम्मति होइते जे एना भावे ताच्छिल करैत...जेना हम त कहियो किछु रहबे ने करी...हमरा स’ त’ ओकरा कहियो भेंटो नंइ....आदि इत्यादि बात सोचैत ओ तय केलनि जे आब फेर कहियो एकरा क्लिनिक पर पैर ने देता । हुनका लगलनि जे डाक्टर मेह्रोत्रा स’ देखेबाक हुए त’ दुखित पडै स’ तीन मास पूर्वहिं नंबर लगा लिय’, नंइ त’ जाबे डाक्टरक नंबर आओत ओइ स’ पहिने भगवानक घरक नंबर आबि जेतै कारनीक । ई सब सोचैत, आजुक दिन आ आजुक जमाना के मोन भरि गरियबैत आ श्राप दैत ओ फैसला केलनि जे मौगी छैक त’ की हेतै ? अपन अस्पतालक डा.यास्मीन नीक डाक्टर छथि। हुनके स’ अपन रूटिन चेकप करेता । ओना ओ स्वस्थ छथि, मुदा शरीर त’ अबल भैये गेलनि। जखने देहके काट—खोंट भेल, कि फेर पहिने बला बात नंहि ने रहि जाइ छै ?से त’ पचपने मे सीवियर नंहि त’ माइल्ड धरि हर्ट एटैक रहबे करनि; तीन घंटा पर होश आयल रहनि। फेर मोन पडलनि आइ-काल्हुक रंग—ताल । आब कोनो डाक्टरक पुर्जा ल’ क’ कत्तौ दबाइ नंइ खरीदल जा सकैत अछि। जै मोहल्लाक डाक्टर ओही मुहल्लाक दबाइक दोकान मे हुनकर लिखल दबाइ भेटत । तैं सोचलनि जे दबाइ खरिदिये क’ जाथि । मुदा ओत्तुक्का भीड....बापरे! कत्ते लोक दुखीत पडैत छैक ? काल्हि तक ई फार्मेशियोक मुंह ने देखने रहथिन । आब लाइन मे लाग’ पडतनि। अइमे त’ सांझ भ’ जेतनि ? से जे भ’ जाउन ! आइ आब रत्तन सिंघ की रामगुलाम लाल “बाडाबाबू” नंइ छथिन-- जे सब काज ‘साम दाम दंड भेद” ,माने जे कोनो ने कोनो प्रकारे कैये या करवाइये लैत रहथि...आब ओ स्वंय छथि, सब मोर्चा पर पुनश्च असकर, नितांत एकसर । मुदा ई काज हुनका कर’ पडतनि । संभवतः तीस-चालिस वर्षक बाद फेर स’ हुनका लाइन मे लाग’ पड --तनि ? अत्यंत कटु सत्य यैह छियै---“ एना कछ-मछ कियै क’ रहल छी बुढा...कलमच रहब से नंइ ?”क्यो हिनका नसीहत देलकनि। पांच बाजि गेलै जखन हिनकर हाथ मे मास दिनुका दबाइ एलनि।रौद एखनंहु मुंह पर थापड जेकाँ लागि रहल रहै। घर मुंहा जैं भेला कि सामने स’ खाली औटो जाइत देखखिन । हाथ देलखिन, बैसला आ पांचो डेग ने औटो गेल हेत जे दू टा बलिष्ट कसरतिया जवान हिनका रौद दिस ठेलैत बैस’ लगलनि त’ ई ‘हां-हां’ कर’ लगला।मुदा हिनकर ;हाँ-हाँ’ के ओ दुनू पर कोनो प्रभाव नंइ पड्लै ।ओइ मे स’ जकरा गरा मे ताबीज रहै से हिनका कने आर रौद मे ठेलति बिहुंसलनि आ कहलकनि---“बहुत दिन छाहरिक सुख भोगलें बबा ! आबे हमरा सिनी जुआन-जहान के नम्मर छै ।“ आ दुनू ठठा क’ हंसि देलकनि। २. प्रो. वीणा ठाकुर 1954- कथा परिणीता आइ डोमेस्टिक एयर पोर्ट दिल्लीमे श्यामाक भेँट नीलसँ भेल छलन्हि। श्यामा थोड़ेक काल धरि हतप्रभ रहि गेल छलीह। नील-नील कहि मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि उठि गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील एखनहुँ ओहने छथि, कोनो परिवर्त्तन नहि भेल छन्हि। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरूष नील, उच्च पदस्थ नील, नील-नील। श्यामा कहियो नीलकेँ बिसरि नहि सकल छलीह। सभटा प्रयासश्यामाक विफल भऽ गेल छल। नील सदिखन छाया सदृश्य श्यामाक संग लागले रहलथि। नील कतेक दूर भऽ गेल छथि, श्यामा आब चाहियो कऽ नीलकेँ स्पर्श नहि कऽ सकैत छथि, ओहिना जेना छाया संग रहितहुँ स्पर्श नहि कएल जा सकैत अछि, मनुष्यक संग छायाक अस्तित्व तँ सदिखन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदिखन नहि रहैत छैक। श्यामाक जिनगी नील, श्यामाक सोच नील, श्यामाक सभ िकछु नील। श्यामाक तन्द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चिर परिचित हँसि सुनि, नील आश्चर्यचकित होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्यामा, माइ डियर फ्रेंड हमरा विश्वास होइत अछि, अहाँ फेर भेँट हएत। श्यामा अहाँ एखनहुँ ओहिना सुन्दर छी, यु आर टु मच ब्युटिफुल यार, आइ कैन नॉट विलिभ।” और पुन: ठहाका मारि हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्यामाक परिचए करबैत कहने छलाह- “श्यामा, मीट माइ वाइफ नीलिमा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्ट फ्रेंड श्यामा।” नीलू बहुत शालीनतासँ श्यामाक अभिवादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनिंग मैम।” और नील हँसेत बाजि गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्दक ब्लू पैंट शर्ट पहिरने छी।” किछु आॅपचारिक गप्प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्यामा पाछासँ नील और श्यामाक जोड़ी निहारैत रहि गेल छलीह। कतेक सुन्दर जोड़ी अछि- राधा-कृष्ण सदृश्य। नीलिमा कतेक सुन्दर छथि, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलिमाकेँ गढ़ने होएथिन्ह। सुन्दर, सुडॉल शरीर, श्वेत वर्ण, सुन्दर लम्बाइ, उमंग और उत्साहसँ पूर्ण नीलिमा। नीलिमाक प्रत्येक हाव-भाव सुसंस्कृत होएवाक परिचायक अछि। श्यामा अपलक देखैत रहि गेल छलीह। तावत धरि जावत दुनू श्यामाक आँखिसँ ओझल नहि भऽ गेल छलथि। घर अएलाक पश्चात् बिनु किछु सोचने आएना लग आबि अपनाकेँ देखय लागल छलीह। केशक एकटा लटमे किछु श्वेत केश देखि श्यामाकेँ आश्चर्य भेल छलन्हि जे एखन धरि हुनक नजरि एहिपर नहि पड़ल छल। फेर जेना श्यामाकेँ संकोच भेल छलन्हि जे अबैत देरी आखिर अएनामे की देख रहल छथि। भरिसक नीलक प्रशंसा एखनहुँ श्यामाकेँ ओहिना आह्लादित कऽ गेल छल। ई तँ किछु वर्ष पहिने होइत छल। आब तँ प्राय: श्यामा नीलकेँ, नीलक संग बितायल क्षणकेँ बिसरवाक प्रयास कऽ रहल छथि। आखिर नील एखन धरि श्यामाक मस्तिष्कपर ओहिना आच्छादित छथि। समएक अन्तराल किछु मिटा नहि सकल। मिटा देलक तँ श्यामाक जिनगी, श्यामाक खुशी। श्यामाक जिनगी भग्न खण्डहर बनि कऽ रहि गेल, जाहिमे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील एखन धरि श्यामाकेँ बिसरने नहि छथि? श्यामाक पसन्द एखनहुँ मोन छन्हि? श्यामाक महत्व एखनहुँ बॉंचल अछि? नहि तँ नील एना नहि बजितथि। चारू-कात देखलनि, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि किताब छिड़ियाएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलन्हि, एहन अस्त-व्यस्त घरक हालत देखि। तथापि किताब एक कात कऽ श्यामा अशोथकित भऽ ओछाओनपर पड़ि रहल छलीह। मोन एकदम थाकि गेल छल, मुदा दिमाग सोचनाइ नहि छोड़ि रहल छल। श्यामा अपन आदत अनुसार डायरी लिखैले बैसि गेल छलीह। आजुक पन्ना-नीलक नाम- नील, आजुक पन्ना अहाँक नाम अछि। हमरा बुझल अछि, आब नहि तँ हमर डायरी कहियो जबरदस्ती पढ़ब, नहि हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बिताएल अवधि हमर जीवनक संचित पूँजी थिक, एहि पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलहुँ। कतहु एहि अमूल्य निधिकेँ बॉटवाक इच्छा नहि छल, कागजक पन्नोपर नहि। मुदा आइ एतेक पैघ अन्तरालक पश्चात, अहाँकेँ देखि मोन अपना वशमे नहि रहल। मोन की हमरा वशमे अछि। अहाँक संग रहि हम तँ दिन-दुनियाँ बिसरि गेल छलहुँ, कहियो किछु कहबाक इच्छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नहि भेलहुँ। अहाँ सतत् कहैत रहलहुँ- “हमरा अहाँक मध्य नहि कहियो तेसर मनुष आएत और नहि कोनो व्यर्थक गप्प, बस मात्र हम और अहाँ, और किछु नहि।” हम मन्त्र मुग्ध भऽ अहाँक गप्प सुनैत सभ किछु बिसरि गेल छलहुँ। मुदा आइ सभ किछु बदलि गेल। आइ जँ सभ किछु लिख अहाँकेँ समर्पित नहि कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि आइ सभ किछु, जे नहि कहि सकल छलहुँ, हम डायरीमे लिख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलहुँ, तखन किछु बचा कऽ राखब उचित नहि। हमर पिता उच्च विद्यालयमे शिक्षक छलाह, नाम छलन्हि पं. दिवाकर झा। हम दु बहिन एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहिन श्वेता और भाए विकास। हमर वर्ण किछु कम छल, ताहि कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाम रखलन्हि श्यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नहि बेटा छथि, हमर जीवनक गौरव छथि श्यामा।” छोट बहिनक नाम श्वेता अछि, श्वेता गौर वर्णक छथि, तेँ माए श्वेता नाम राखने छलथिन्ह। मैट्रिकमे हमरा फर्स्ट डिविजन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्ला अपनहिसँ प्रसादक लड्डु बॉंटने छलाह। हमरा जिद्दसँ कॉलेजमे हमर नाम लिखओल गेल छल। माए तँ विरोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलहुँ, तँ हमर वियाहक चिन्ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलन्हि। एकठाम वियाह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहिन हमरा देखय लेल आएल छलथि, मुदा श्वेताकेँ पसिन्न करैत अपन निर्णए सुना देने छलथिन्ह जे अपन बेटाक विआह श्वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुविधामे पड़ि गेल छलाह। पैघ बहिनसँ पहिने छोटक विआह कोना संभव अछि। मुदा माए बाबूजीकेँ बुझाबैत कहने छलथिन्ह-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। विआह तँ लिखलाहा होइत छैक।” नील शास्त्रक कथन अछि-माए बापक असिरवाद फलित होइत छैक। जँ असिरवाद फलित होइत छैक तँ माए बापक निर्णए सन्तानक भाग्यक निर्धारण सेहो करैत हेतैक। भरिसक माएक निर्णए हमर भविष्य भऽ गेल। श्वेताक विआह ओहि वरसँ भऽ गेलनि। क्रमश: १.अनमोल झा-कथा- अबकी बेर फतंग २.नन्द विलास राय-कथा- बाबाधाम अनमोल झा 1970- गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित। अबकी बेर फतंग बात से नञि छलइ, बात छलइ जे कहियो गाम-घर छोड़ि बाहर नञि रहलइ, दू मास आ दस पाँच दिन। सभ दिन तँ सभहक बीचेमे रहिक पढ़ाइयो-लिखाइ गामेपर केलक, हाइ स्कूलमे गेल तँ झंझारपुर सेहो कतेक दूर साइकिल उठाउ तँ पन्द्रह मिनट आ पायरे जाऊँ बीच धके तँ पाउन घंटा नञि ओ छहरपर सँ नीचा खसि जाऊँ तँ ओहि बाधे-बाधे आधा घंटा आ राखू ओहूसँ कम समयमे चलि जाऊँ स्कूल आ कालेज आ चली आबू फेर गामपर। ओना अनिल सभ दिन गामेपर रहि पढ़लक से बात नञि छलै, ओकरा ओहिना मोन छलै जखन ओ आइ कॉम फस्ट इयरमे ललित नारायण जनता कॉलेज झंझारपुरमे रहए तँ पढ़ुआ कक्काक संगे कक्के टी.सी. लऽ कए गेल रहए आर.के.कॉलेज मधुबनीमे नाम लिखाबय आ नाम लिखा दुनू बेटा आ पिति घूमल रहए मधुबनीक लॉज सभमे एकटा डेरा लेल, डेरा ओहि दिन तँ झट दऽ नञि भेट गेल रहै, तथापि गामेपर आबी जोगार पाती बैसि गेल रहए, एकर गामक छोटका बौआसँ गामपर गप्प-सप्प भेलै आ ओ कहने रहै जे हमरा डेरामे एकटा सीट खाली छैक बिचार हो तँ रही सकैत छी, सत्तरि रूपया भाड़ा छैक महिना, सेफरेट रूम कए पैइतीस कके लागत, हँ एकटा चौकी लेमए पड़त, भानस-भात कए जेना जे बिचार हो अलग-अलग भानस करब तँ सभ बर्त्तन बासन सभ लेमए पड़त नै एके ठाम करी तँ मोटा-मोटी सभ समान अछिये, आ जे नै अछि से लऽ लेब तइयो चलत आ नै लेब तइयो चलत। अनिलकेँ लगलै जे कियो एकरा लेल पहिलेसँ व्यवस्था केने हो तहिना सन बुझेलै ओकरा। ओ झट दऽ कहलकै हँ हमरा विचार अछि, चलू मधुबनी आ एके ठाम रहब आ एके ठाम भानसो-भात करब, जे जेना खर्चा वर्चा होएत आधा-आधा सएह ने? आ गेल अनिल मधुबनी ओहि लाजमे जाके पहिले अपन पोथी-पतरा सथलक छोटका बौआ, अपने आ लहटन तिनु गोटा जा चौकी कीन आनल, ताही दिनमे बीरासी आ तिरासी टाकामे चौकी देने छलै, चौकी कोनो साउख, सीसमके जै छलै, आमेक पाइस पउआ आ आमेक तखता, उलूके-फलूक एकजनिये टाइप। आ रहए लागल मोन लगाक ओतए। मोन लगाक तँ रहए लागल अनिल मुदा मोन लागब एकरा कहबै की? जहियासँ मधुबनीमे रहनाइ शुरू केलक तहियासँ तीला सक्रांतिक सात दिन छलै, माने एक हप्ताह, मोनमे बिचारने रहए, गाम नै जाएत लोके की कहतै देखलक हौ पढ़ूआकेँ दस दिन नै भेलै आ हाजिर जबाब? आ अपनो नीक नै बुझेलै। ओना काल्हि हेतै तिलासंक्राति तँ संगी जे छोटका बौआ आ लहटन छलै पावनि करए गाम चल गेलै । एक दिन पहिने सेहो भोरे भोर, साँझ तक अनिलोक मोन कछमछा सन गेलै, मोन केनादनि रीब-रीब करए लागल रहै, असगर मे खुब कानय कऽ मोन होबए लगलै आ उठेलक एक आध टा पोथी आ एकटा झोड़ा आ साँझुका बसाँ गाम आबी गेल रहए पाबनि करए। माएक मोन जुड़ा गेल छै माए कहलकै-नीक केलै बौआ, चल एले, तोरा बिना हमारा सब कोना पाबनि करीतउ? अनिल किछु बाजल जै रहए कारण जखन मधुबनी जाए लागल रहए तऽ माए पाबनिमे आबए कहने रहै, मुदा अनिल कहने रहै माएक-माए मे एहनो एनाइ होइछै, मुदा आइ अपने अनिल आबी गेलासँ माएक छाती सूप सन भऽ गेलै। फेर पाबनि कऽ प्राते फेर मधुबनी आएल। पढ़ाइ लिखाइ कऽ क्रममे मधुबनी आ गाम अनिलक पायरे तरमे रहै। दुरे कतेक पच्चीस आ तीस किलोमीटर छलै गामसँ मधुबनी आ मधुबनीसँ गाम। अनिलक बाबूक तीन भाइक भैयारी छलाह सब सँ पैघ पिति पढ़ूआ कक्का गामेक स्कूलमे मास्टर साहेब छलाह, दोसर भाइ बिचला अनिलक बाबूजी छलखिन्ह जे गामेपर रही खेती बारी करैत छलाह आ सबसँ छोटका पिति कलकत्तामे कोनो पारभीट फार्ममे कोनो नौकरी करैत छलाह। गामपर तीनू भाइक साँझी आश्रम खुब हेम-छेमसँ चलैत छलाह। सभ भैयारीमे आ सभ दियादनी सभमे सेहो ककरो कतउ दियाद बादमे झगड़ा होइ तँ अनिलक बाप पितिक उपमा देल जाइ छलै गामपर लोककेँ, भाबे तेहन नीक जकाँ सभकेँ थथमारिक घर आश्रम चलै छलैसे। ओना पारिवारिक आर्थिक स्थिति नीक नै छलै, तथापि ओतेक खरापो नै कहक चाही, “लुटी आनए आ कुटी खाए वला बात छलै, तथापि ओहिमे बड़ दीब जकाँ दिन कटल जा रह;ल छलै। एखन तँ भगवानक दयासँ दू कर भोजन आ दू हाथ वस्त्र तँ भेटीते आ आ जखन अनिलक बाप-पिति बच्चा रहए तँ हुनका सभकेँ ओहुपर आफद भऽ जाइत छलनि। गप्पे-गप्पमे माए एक दिन कहने रहए अनिलकेँ बुझले बौआ की जखन तोहर बाप स्कूलसँ पढ़िकेँ आबथुन तँ तोहर भैया हमरा कहैथ बौआक खेनाइ दऽ अबियौ आ हमारा लाजे नै जाइये खेनाइ दबए, कारण खेसारीक रोटी आ मसुरीक उसना कतउ खेनाइ देल जाइ, हमरा लाज हुआ खेनाइ दैत तँ सैह परिस्थिति छलउ तोरा बाप-पितिक घरक। रातिक मसुरीक उसना खाके सभ सूति रहै छलउ, आइ भगवतीक दयासँ से बात तँ नै छउ। उसना आ फूटहा बाला बात। ई सभ सूनि अनिलक माथा सुनाओ जकाँ लागए लगैक, मुदा से केने कोनो लाभ छलै की, चिंता केने मोन आर खराप सन लागए लगै आ अपने मोने-मोन मोन कऽ सांतत्वना दैह-जे बीत गेल से बात गेल” खैर...................। अनिल मैट्रीक, आइ. कॉम आ बी. कॉम. कऽ परीक्षा जाहा की समाप्त होइ, टिकट कटा फटाकसँ कलकत्ता पहुँच जाए छल छोटका पिति लग, कलकत्ता घुमए। कलकत्ता ओकरा बड नीक लगलै आ कलकत्ताक लोक सभ आ ताहीमे मौगी आ छौड़ी सभकेँ देखिक ओकर आँखि फाटए लगलै, एहन उदण्ड आ एहन उघार आ निघार, ओ मोने-मोन सोचए लागल एकरा सभकेँ जतेक उघार ततेक फैसन लगै छैक की? अनिल जता बेर आबए परीक्षा दके गामसँ कलकत्तामे सभ ठाम जाए छल जतए गेलो छल ततयो-माने चिड़ियाखाना, विक्टोरिया मेमोरीयल, तारामण्डल, जादुघर, बिड़ला मन्दिर, बिड़ला म्यूज्यम, नेहरू चिल्ड्रेन म्यूज्यम कालीघाट, दक्षिणेश्वर काली, बेलूड़ मठ आ आर कतए कतए नै घुमए जाइत छल अनिल। आ लेख गार्डन आ एम्हर ओम्हरका पार्क आ मैदान सभ तँ धागल छलै ओकरा जाही बेर आबए खुब घूमए आ भरि दिन डेरापर असगर पड़ल राजा बनल रहै छल। पिति आफिस चल जाइत छलै आ डेराक आर लोक सभक ड्यूटी। एतुका लोककेँ एतेक ड्यूटीक प्रति सतर्कता देखि अनिल के आश्चर्य लगैत छलै, चारी बजे भोरे पिति उठी, शोचादिसँ निवृत भऽ नहा सोना भानस भात कके। छः बजे फीट, आठ बजैत-बजैत बासन खाली, माजल-धोल आ चकमक करैत रहैत छलै आ सभ लक लके पड़ाइत छलै ड्यूटी आ फेर मुन्हारी साँझमे अबैत छलै सभ फेर खेनाइ-पिनाइ बना सुति रहै छलै आ प्रातः भेने फेर ओहा रामा ओहा खटोलबा वाला बात होइत छलै। से एकरा आश्चर्य लगैत छलै बुढ़ पितिक ई फूर्त्ती देखि। अनिल के मोने-मोन होइ काश एहिना आ एतहे जकाँ फूर्त्ति आ काजक प्रति एतेक सजगता गाममे लोककेँ रहितै तँ निश्चय कोनो गाम गाम नै रहिते, सभ गाम अपन नाम शहरमे गनब लगिता। जे-से..............। अनिल तँ कोनो खुट्टा गाड़ी कऽ रहै लेल कलकत्ता नै जाइ छल, ओ तँ परीक्षा-तरीक्षा कोनो भऽ जाइ मधुबनीमे तँ दस दिन मास दिन घुमी आबए छल पिति लगसँ से बेचाराक मोनो खुब लगैत छलै कलकत्तामे। मुदा जखन गाम आबए कालमे पिति गाड़ीपर चढ़बए हावड़ा अबै छलखिन्ह तखन अनिलक बरदास्त सँ फाजिल भऽ जाइत छलै आ हिचकी-हिचकी कानए लगैत छल, धीया-पूता जकाँ। पिति बुझैत छलखिन्ह ई आए गाम जाइत अछि, एतए एकटा नीक लगैत छलै ताए कनैत अछि। मुदा पितिये की करितथिन्ह, छोट-छीन नोकरी, कलकत्ता देखू आ गामपर घर- आश्रम सेहो देखए पड़ैत छलैन आ नयहे देखए पड़ितैन तँ की सभ दिन अनिल अपन पढ़ाइये लिखाइ छोड़ीक एतए पड़ल रहितै सैह की नीक बात छीयै? आ बोल भरोस दके भातिजकेँ गाम बिदा करथि। ओना बेटा आ भातिजमे कोनो अंतर छैक? बेटे जकाँ मानितो छलैहे पिति आ देख-भाल सेहो करैत छलैन हे अनिलकेँ। एम्हर गाम आ मधुबनी एलापर एक राति मोन नै लगैत छलैन हे बाउ केँ। होइन जे किछु हरा गेल हो कलकत्तामे, आ हरेतैन की लगैन अपने या मोने हरा गेल हो। एक मोन इहो होइ नाम-ताम कटा ओतहे चलि जाइ पढ़ाइ-लिखाइ करए, से फेर मोन अछताए-पछताए सेहो लगैत छलै, मधुबनीक पढ़ाइ आ कलकत्ताक पढ़ाइ, आ मधुबनीक खर्चा-बर्चा आ कलकत्ताक खर्चा-बर्चामे आकाश पातालक अंतर छलै। सेहो दम सकरब बाला बात छलैनहे, आ अपन बाप किछु छलै तँ गामपर गृहस्थे छलै ने, पितियेपर कते कुदता, पितिक फेर अपनो बाल बच्चा छैक ने, कोनो इयाहटा नै छथिन जे चल बाबा या कोनो बड़का हाकिम मुखतारो नै छनि पिति, फेर तँ छोटे छीन कम्पनीमे काज करैत छैक ने। जे से बात धीरे-धीरे सरा जाइत छलैहे आ फेर अपने आप मोन लागए लगैत छलै मधुबनी आ गाममे। समय कऽ बितैत देरी होइ छै, ओ तँ हबाइ जहाजोसँ तेज गतिसँ चलैत छैक आ देखिते-देखिते कतएसँ कतए भागि जाइत छैक ई समय। मधुबनी कऽ पढ़ाइ समाप्त भेलै आ नौकरी-चाकरी लेल खूब प्रयास आ दौड़ बड़हा केलक अनिल, गाम घर, पटना, दरभंगा-मधुबनी आदि-आदि ठाम। एखुनका युगमे भगवानक भेटब आ नोकरी भेटब एके दर्जाक बात भेलै। औनाकऽ रहि गेला अनिल, कतौ गोटी नै बैसलनि। मोने-मोन अपने-आपपर खुँझाइत रहथि, एहि पढ़ाइक कोन काज? एहि मधुबनीक ओगरनाइक कोन काज? एहि पढ़ाइक पाछाँ पाइ बहाबैक कोन काज? जखन ईएह बेरोजगारीक जिनगी तखन एतेक तपस्ये कथीक? होइ अपन मूड़ी अपने पानिमे गोइत ली। आब आर किछु नै नीक लगैत छैक अनिलकेँ। मोन अनोन-बिसनोन सन लगैत छैक ओकरा, अपरतीब सन सेहो। पित्ती छोटका कोनो काज उद्यममे गाम आएल छलखिन्ह, अनिल कोनो काज ताजक बारेमे गप्प केलक पित्तीसँ। पित्ती आबै काल कलकत्ता लेने एलखिन्ह। अपना सेठकेँ कहलखिन्ह- हमर भातिज छी आ भातिज की हमर बेटे बुझि कोनो काज एकरा दहक। पित्तीक पैरबी काज केलकै आ भऽ गेलै कोनो क्लर्केक पोस्टपर अनिलकेँ पित्तिये ऑफिसमे काज। ट्रेनिंग भेलै आ तकरा बाद अप्वाइन्टमेन्ट आ कन्फरमेशन सेहो। आब लगभग चारि-पाँच बरखसँ काज करैत अछि कलकत्तामे अनिल। पित्ती भातिज एके नगरी आ एके डेरामे सेहो रहैत छथि। मोन नै लगबाक कोनो बाते नै। मुदा अनिलकेँ मोन नै लगैत छैक आब कलकत्तामे। बात कने भटमेराह सन सभकेँ जरूर लगैत छैक जे जाहि अनिलकेँ कलकत्ताक प्रति एतेक स्नेह आ उद्गार छलै जे हावड़ामे ट्रेन पकड़ै काल आ गाम जाइत काल कानय लगैत छल, छ मसिया चिल्का जकाँ तकरा आइ एतए नीक किएक नै लगैत छैक? ओकरा नोकरी छोड़ि देबाक इच्छा होइत छैक। मुदा पित्तीक मुँह आ गामक ओ नौकरी लेल बौऐनी आ छिछिऐनी मोन पड़ि जाइत छैक। पितीक मुँह एहि लऽ कऽ मोन पड़ैत छैक जे अनिलक सामनेमे दुनू हाथ जोड़ि थड़थर कपैत सेठसँ अनिलक लेल नोकरीक भीख मँगने छलै, से जँ आइ नोकरी छोड़ि देतै तँ पित्तीक कतेक मान रहतै। ओना आइ कतौ सरकारी काज आकि नीक पोस्टबला काज कतौ होइतै आ तखन जे छोड़िये देतै तँ पित्तीक अपमान नै छाती सूप सन होइतै आ कहैयो लेल होइतै ने सरकारी काम आकि उच्च पोस्टबला काम हुआ इसलिए छोड़ दिया, मुदा सेहो बात नै छलैहेँ। अनिल करत की तँए काज करैत छल, मुदा ओकर मोन मिसिया भरि नै लगैत छलै। ओकरा गामक लोकसभ गामक चौक-चौराहा, कोठीयर कलम, पुबारी बाड़ी, बढ़मोतर आ खोइटक खेत, कुमरी पोखरो, उसराहा आ बौअन झा पोखरि सभ मोन पड़ि जाइत छलै। ओकरा गाम, झंझारपुर आ मधुबनी सभ सभटा आँखिक समक्ष नाचए लगैत छलै। ओकरा ई बान्हल जिनगी एकदम नै नीक लगैत छलै। ई आठ-दस घण्टा ड्यूटी आ एतेक व्यस्तता सोफाइत नै छलै। ओकरा मोन होइत छलै गाम-घरमे रहबाक, कत्ता गोटा कहै, अहाँकेँ नोस्टालजिया भऽ गेलहेँ, बिछुड़ल लोक, बिछुड़ल समए आ बितल बात सभ जे एतेक मोन पड़ैत अछि से किछु नै नोस्टेलजियाक बात छी। ओकरा मोन पड़ैत छलैक गामक नांङट-उघार बच्चा सभ, गामक जुगेश्वर, बालेश्वर, फतुरिया, उत्तमा जे तीन सेर बोइन लेल सारा दिन ओही रौद आ पानिमे तितैत लोकक ओतए काज करैत छलै। ओकरा मोन पड़ैत छलैक गामक सभ वस्तुक दिक्कत, सड़लाहा राजनीति, लोकक कुचिष्टामे लोक लीन रहैत छैक। भरि पेट लोक भोजनो करतै तैयो हँसतै आ जँ भुखले रहतै तैयो हँसतै। मुदा एतेक बात बुझितो आ सुझितो आ गमितो अनिल अऑफिसमे रिजाइन दऽ दैत छैक आ चल अबैत अछि गाम। आ गाममे रहए लगैत छैक। पित्तीक सभ प्रतिष्ठा आ बातकेँ अनिल पएरक ठोकरसँ घैला जकाँ गुड़का देलकै। घैला गुड़कि कऽ फूटि गेल छलै आ पानि सौँसे बहि गेल छलै। अनिलक पित्ती मोने मोन सोचैत छैक, कलकत्ताक ओही डेरामे आखिर एना किएक भेलै, जकरा कलकत्तामे एतेक नीक लगैत छलै तकरा एक बैगएना किएक मोन भऽ गेलै। आ अनायास मोनमे आ आँखिक सोझाँ अनिलक पित्तीकेँ अपन भैयारीक ओ बच्चाबला समए मोन पड़ैत छैक आ देखाइत छैक खेसारीक रोटी, मसुरीक सन्ना आ पेटकटारी लागल पेट आ अभावे अभाव सगरे...! २. नन्द विलास राय- नन्द विलास राय-कथा बाबाधाम बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटव छोड़ि सड़क दिसि तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहिरिने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगवैत छल। बस तेजीसँ सड़क पर दौड़ रहल छल। कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरिपर घास काटि रहल छलि। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि मुदा हमर तँ भागे खराप अछि। कतेक दिनसँ विकलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि जे धियाने ने दैत अछि। कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा िवकला। विकला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बापक सत्तर अस्सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बिघा खेत। एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जइक लेल सोचए पड़ए। किएक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्सी बर्खक अथवल बापकेँ छोड़ि कतए जाएत। तइ परसँ एक जोड़ा बरद आ महीसोकेँ देख-रेख। पाँच बिघा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ कोना पार लागत। तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धियान नै दइत छल। लखन सोचए कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देव तँ भानस के करत? धास के आनत। असगरे हम की सभ करब। बेटा विकला पढ़ते अछि। ओकरा स्कूलसँ छुट्टी होइत अछि तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि जाइत अछि। बिना टीशन पढ़ने कोना परीक्षा पास करत। सरकारी स्कूलमे की आव पढ़ाइ होइत अछि। मास्टर सभ बैसि कऽ गप लड़बैत रहैत अछि। चटिया सभ कोठरीमे बैसि कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्टर सभक लेल धनि सन। लखन अपन खेती गृहस्थीक संगे माए-बापकेँ सेवा नीकसँ करैत अछि। माए तँ थोड़े थेहगरो छथिन मुदा बापकेँ उठवो-बैसवोमे दिक्कते छनि। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि। पौरकाँसाल फगुनमे लखनक पिताजीकेँ लकबा मारि देलकनि। मश्रा पॉली क्लिनीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि गेलनि मुदा अथवल भऽ गेलाह। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापकेँ सेवा करैत अछि। लखनक एकटा संगी अछि। नाम छी सुकन। सुकन लखनसँ वसी धनीक अछि। दूटा बेटा अछि सुकनकेँ। दुनू बेटा सातवाँ तक पढ़ि दिल्लीमे नौकरी करैत अछि। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा ढौआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि। सुकनोक माए-बाबू जीवते छथिन। सुकनक माए कम देखैत छथिन। हुनका रातिकेँ सुझवे नै करैत छनि। एक दिन सुकनक माए रातिकेँ ओसारपर सँ गिर गेलखिन हुनका पएरमे मोच पड़ि गेलन्हि। लखनकेँ पता चलल ते ओ सुकनक माएक जिज्ञासा करै लए गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जाहित मानैत छेलखिन। लखन सुकनक माएसँ पुछलक- “माए कोना कऽ ओसारपर सँ गिर गेले।” सुकनक माए बाजलि- “बौआ, आव हमरा सुझै नइ अछि। रातिकेँ तँ साफे नहि देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि ओ फगुआमे गाम आएल छल हुनाक कहलिऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि देखलक आ कहलक जे दुनू आँखिमे मोतियाविन भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति सुझए लगत।” क्रमश: १. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर १. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) तेसर खेप शेफालिका जी आपकी आत्मकथा मैंने पढ़ी। जिंदगी बीत गई-जीने की तैयारी में। आँचल मे> दूध आँखों मे पानी और जिह्वा पर बतरस का शहद लिए मिथिलांचल की यह स्त्री किश्तों मे जीवन जीती है और जो कथा कहते चलती है, जीवन की- वह भी किश्तों में ही पूरी होती है।भूमण्डलीकरण कहिए भू$मण्डी$करण के बाद के इन धड़फड़िया दिनों का बीज-शब्द है- किश्त! ऋणं कृत्वा धृतं पीवेत- चार्वाक का यह दर्शन घर घर मे चरितार्थ है। प्रेमचंद और यशपाल के समय की किश्तें शखमन्दगी और त्रासदी का उत्स थी। अब किश्तें फक्र का विषय है! लोग फक्र से कहते हैं-इतनी किश्तें गईं! .. किश्तों और पालियों में जिया जाने वाला मध्यवर्गीय स्त्री-जीवन इतना आसान नहीं होता! हँसी नए जमाने का घूँघट है- हर मुस्कान के पीछे लजाई बैठी इतनी ढेर-सी छोटी-बड़ी तकलीफ होती हैं कि उनका व्योरा लिखने मे धरती सब कागद कारौं/लेखनी सब बनराई की स्थिति घिर आती है! पूरी धरती को कागज बना लें समस्त वनों की लकड़ी से कलम गढ़ें तो भी हरि-गुन की तरह अगाध और अनंत स्त्राी जीवन अपनी पूरी माखमकता मे लिखा नहीं जा सकता। शेफालिकाजी को अपने कर्मठ प्रज्ञावान सहयोगी और हिन्दू कॉलेज के दिनों के अपने प्रिय साथी राजीव की मिष्टी मुखी माँ के रूप मे तो वर्षों से पहचानती थी किन्तु एक लेखिका के रूप मे उनकी भास्वर पहचान कराई मशहूर अमरीकी भाषाविद् और अनुवादक आर्लीन ज़ाइद ने। पेंग्विन सीरीज ऑपफ इंडियन विमेन्स पोएट्री के दूसरे खण्ड के अनुवाद के सिलसिले मे वे भारत आई थीं। मेरे घर अचानक ही आईं उस समय मेरे भण्डार मे उन्हें खिलाने-लायक कुछ और था नहीं मध्यवर्गीय गृहस्थी मे सहज संकोच से मैंने उनके लिए ताल-मखाना भूना जो पिछले हफ्ते ही माँ ने मुजफ्फरपुर से भेजे थे। मखाने देखते ही उनके मन मे शेफालिकाजी की याद ताजा हो गई। उन्होंने कहा- दिस इज़ वॉट फिगर्स इन शेफालिकाज़ पोएम। फिर उन्होंने उस कविता का अंग्रेज़ी अनुवाद सुनाया जो उन्हांने किया था और मेरे मन मे लड्डू और मखाने एक साथ ही लगे फूटने लगे कि इतनी बढ़िया कविता की इस रचयिता का नैतिक भूगोल मेरा अपना नैतिक भूगोल है मेरी प्रतिवेशिनी होगी यह मेरे घर मे पास ही कहीं इसका घर होगा! वर्षों बाद जब बम्बई ने स्पैरो के तत्वावधान मे विभिन भाषाओं के स्त्राी-लेखकों को बुम्बई बुलाया और काशिद के रिसोर्ट मे हम साथ ठहरे तब जाकर पता चला कि यह शेफालिकाजी तो और कोई नहीं अपने राजीव की माँ है। चकित रह गई! और अभी जब किस्त-किस्त जीवन पढ़कर ख़त्म किया-तब से यही सोचती बैठी हूँ कि यदि राजीव के पिता की तरह निश्छल धीरोदात्तता सब पुरुषों मे होती सब पुरुष इसी तरह के प्रेमी होते तब तो स्त्राीवाद का भट्ठा ही बैठ जाता! स्त्राी आंदोलन की ज़रूरत ही कहाँ होती। सबसे दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे ज्यादातर पुरुष अतिवादी अधिनायक प्रजातांत्रिक सम्यक् दृष्टि का उनमे विकास ही नहीं हो पाया। छोटी-छोटी मार्मिक घटनाओं और चुटीले संवादों से स्मृतियों का जो प्रतिसंसार शेफालिकाजी ने इस सहज-सरस आत्मकथा मे गढ़ा है- उससे गाँवों-कस्बों की नई औरत का तादात्म्य गहरा बना है। इसी तदात्म्य की ज़रूरत हमे है- बहनापे के विकास का सूत्रा यही है। रूसी क्रांति ने बराबरी स्वतंत्राता और भाईचारे की बात की थी। स्त्राी आंदोलन भाईचारे का विकास बहनापे में देखता है। स्त्राी- दृष्टि मोनालिसा नहीं। वर्ग-वर्ण-नस्ल-सम्प्रदाय-सापेक्ष कई समस्याएँ विशिष्ट है लेकिन कुछ समस्याएँ तो साझा हैं जिसके आधार पर विश्वभर की स्त्रियाँ बहने हैं और उनकी भाषा का छन्द ही अलग है। विषम परिस्थितियों मे भी अपनी राह बढ़े जाने की जो मलंग विनय स्त्राी-भाषा के साक्षी है उसका अद्भुत उदाहरण है-किस्त-किस्त जीवन! डॉ अनामिका अंग्रेज़ी विभाग सत्यवती महा. (सांध्य) दिल्ली विश्वविद्यालय बहन के नाम भाई का स्नेह-पत्र- बहन की एक प्रतीक्षा देख कादम्बिनी मे भाई का मन उल्लसित सा हुआ मन के कोने से एक गूंज सी उठी कोलाहल और कुछ शोर सा हुआ । व्ययित हृदय भोली सी बहन बनाने का भाई का मन आकुल और तरस सा हुआ इस अभाग्य का जीवन हो सफल तुझ जैसी बहन को पाकर मुझे सौभाग्य कहाँ हमजोली बहन का जो कुछ भी है बाँट लेंगे एक दूजे का प्यार सुख-दुःख तुझ जैसी बहन का पा मोती तो खूब चुनते हैं खरे वही पाते जो पारखी हैं। शोकाकुल तो मूक दीन ही होते बुद्धिजीवि तो शोकाकुल होने का समय ही कहाँ पाते उच्छवासी क्यों कोई हो गीत और कविता की ..।इस भाई का नाम तापस कुमार दास है जो बंगला भाषी है। हिन्दी साहित्य की एक झलक तक ही पहुँचा एक भाई तुल्य अजनबी बहन के जवाब की अपेक्षा मे There is a silver ship, there is a golden ship, there is no ship like Friend ship. I am Tapas Kumar Das of 20th student of B.Sc. (joining year) My hobbies are great hobbies in my own sens. These are as following :- Photography, Social reforming Reading Hindi, English and Bengali literature, Driving Car Motor cycle) fast, I am a Hindi departmental member of Radio Japan. So many programme has been broadcast through radio Japan. It's my best and with best compliments to you my sister. Cordial brother Tapas Kumar Das Das Estate Lakanpur, Bhagalpur. पूज्या दीदी इतने दिनों बाद जब थक गया प्रतीक्षा मे कि अब आयेगा पत्र आपका कि अब आयेगा तब लिखने लगा हूँ आपको तंग करने के बहाने वैसे एक छोटा भाई तंग क्या कर सकता है- हाँ अबोध स्नेह का स्पर्श ही दे सकता है। क्या कर रही हैं- क्या लिख रही हैं क्या सोच रही हैं- इन सब स्थितियों को जन्म दीजिये कम से कम हमारे बगल मे बैठे रविकांत नीरज को बताइये न! तभी न आपकी प्रेरणाओं पर चल सकूँगा अविराम लेखनीय दायित्व को लिए साहिय-भू पर। मुझे विश्वास है कि आप पत्र अवश्य देंगी। शुभकामनाओं के साथ- प्रसूनलतांत भागलपुर स्नेहमयी दीदी! सादर चरण-स्पर्श। अहाँक भगलपुर प्रवास जेना हमर सभक हृदय कें एकात्म कर लेल भेल छल। कतेक दिन धरि हम सभ विश्वविद्यालय परिसर मे मिलैत रहलौं- कतेक गोष्ठी मे एक दोसरा के बुझैत रहलौं। किन्तु दीदी हम नहि देखि सकैत छी अहाँक उदास चेहरा। अपन हँसीक पाछा नुका लैत छलौं अपन उदासी दीदी किन्तु हमर दृष्टि सँ नहि नुका पबैत छलौं। अहाँक अस्वस्थता सेहो नहि सहन क पबैत छी। दूनू चीज हमरा मोन पड़ैत अछि तँ हम व्याकुल भ जाइत छी कोना हमर दीदी फूल जकाँ सदिखन विहुँसैत रहतीह। कोनो बीमारी हमर दीदी के स्पर्श नहि करैक। सभ सँ पहिने दीदी अहाँ अपन स्वास्थ्यक ख्याल राखु। मैथिली साहित्य अहाँ दिसि टकटकी लगौने अछि अहींक भाई रविकान्त नीरज भागलपुर भागलपुर सँ एम ए क परीक्षा देवाक कारण हम रविकांत प्रसून ध्रुव नारायण इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी सभक हृदय मे निवास कर लागल छलौं। प्रसून लतांत आ रविकांत नीरजक कतेको पत्र हमरा भेटैत रहैत छल- आदरणीया मामी जी प्रणाम।पत्र और रचना मिली सम्पर्कांे को आपने बड़ी तेजी से रिश्ते का रूप दे दिया। साहित्यिकबंध्ुत्व के अलावा मामी का यह स्नेह मिल गया जो अबतक मुझे मामियों से मिलता रहा है।आपकी दोनों रचनायें स्तर की है प्रीति की कामायिनी और चश्मे के पानी पर उतर आयी बीमार ध्ूप का प्रयोग बड़ा अच्छा लगा। अच्छी रचनाओं के लिये पत्रिका के सम्पादक के हैसियत से धन्यवाद दे रहा हँू। हम रचनाओं के संकलन मे व्यस्त हैं तीन माह की सामग्री होते ही प्रकाशन प्रारंभ कर देंगे जैसे कि आपके पैड से मालूम हुआ इतना व्यस्त जीवन जीतें हुए भी आपने हमारे लिये समय निकाला इसके लिए हमारा विभव परिवार आभारी है। छपरे की एक और संस्था नवयुवक परिषद है जो अपने मे युवा शक्तियों को समाहित किये हुए समाजिक चेतना को जागरूक करने मे सक्रिय है। उसी के तत्वावधन मे हम एक विशाल आयोजन करने जा रहे है उसमंे एक कार्यक्रम कवि सम्मेलन का भी है यह संभवतः अक्टूबर मे आयोजित होगा। इसे आप पूर्व निमंत्रण समझे समय पर हम आपको सादर निमंत्रित करेंगे आशा है आप अवश्य आयेगी। आपका ओम प्रकाश, भगवान बाज़ार, छपरा जूड़ शीतल शेफालिका जी मिथिला नववर्षक शुभकामना मिथिला जन विकास परिषद नवेन्दु कु . झा पटना प्रशस्ति प्रमोद मैथिली महाकवयित्राी काव्य विनोदिनी डॉक्टर शेफालिका वर्मा जीक कोमल कर कमल मे सादर-कलित काव्य विनोदिनी डाक्टर सुदृढ़ शेपफालिके/ मैथिली सर महादेवी सुभद्रा सुमरालिके/मनोरम मुदमूखत मानसरोवरक मृदुभाषिके/करूण रस सँ सिक्त शीतल भावनाक प्रवाहिके/कवित कानन कोकिले ¯ककर कविक कलकण्ठिके/मधुरहास्य विलासिनी हृतहारिणी मनमोदिके। बलदेवलाल कुलकिंकर झझिहट जनकपुर रोड 22.1.79 हमर छोट भाई शरदक दोस्त छथि प्रदीप सिन्हा जे एखन आइपीएस आफीसर छथि। शरदक कारण ओ हमरा अपन सहोदर बहीन सँ बढ़ि कें मानैत छल। ओकर समस्त परिवार हमरा लेल बेहाल रहैत छल- प्रदीप अरुण नीलम आ हुनक माँ जिनका हम चाची कहैत छलौं- हृदयक अटूट रिस्ता बन्हि गेल छल ओहि परिवार सँ- तँ हुनकर सभक सिनेह-सिक्त पाती मेरी प्यारी रजनी तुम्हें असंख्य आशीर्वाद तथा मध्ुर स्नेह ! तुम्हारी कितनी ही चिटिृयाँ मिलती रही परन्तु मैं तुम्हें उत्तर नहीं दे सकी इसका मतलब तुम्हें भूल जाना कदापि नहीं हुआ। अपनी परिशानी भी मैं तुम्हें लिखकर बोर करना नहीं चाहती। फोन पर भी तुम से दो बातें नहीं कर पायी कि राजन ने झट फोन ले लिया। तुम्हारी तबीयत बहुत खराब हो गई थी यह जानकर हृदय कितना दुःखी और चिन्तित हो गया मैं तुम्हें शब्दों मे लिख कभी समझा नहीं सकती। अपना ख्याल करो रजनी अभी भी समय है वक्त है समय खो जाने पर तुम स्वयं को भी खो बैठोगी। तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है। नारी जीवन की गाथा कथा मैं तुमसे अध्कि जान सकँूगी नारी तेरी यही कहानी अंचल मे है दूध् आँखों मे पानी किसकी लिखी कविता है याद है न राजू शरत से मिलने गया था। उसने आकर बताया कि शरत की तबीयत बहुत खराब थी अब ठीक है। मैं भी उसे देखने जाऊँगी। राजू ने यह भी बताया कि रजनी दीदी 12 को आ रही है यह जानकर मुझे भी बड़ी खुशी हुई परन्तु फिर फोन पर बात करने के बाद पता चला कि तुम नहीं आ रही हो। रजनी मेरी अच्छी रजनी मेरी चिट्ठी तुम्हें कभी समय से शायद नही मिल सकेगी। तुम्हारी चाची बहुत पापी हैं बदकिस्मत है कभी उन्हें चैन की रोटी नहीं मिली पता नही कितनों का कर्ज मैंने ही उठाना पड़ा है। गर्मी सीमा पर है प्राण तो नहीं निकलता परन्तु सुबह से बारह बजे रात्रि इस घर मे रहना पड़ता है। मैं तुम्हें भूल न सकी रजनी तुम्हारा प्यार भरा हृदय मुझे बहुत भा गया न जाने क्यों जिसके हृदय मे प्यार नहीं है वह मनुष्य मनुष्य कहलाने योग्य नहीं- तुम्हारी चाची सिन्हा भवन एक्जीबीशन रोड पटना चाचीक मृत्यु असमय भ गेल मुदा हुनक पत्र सभ समय असमय हमरा झकझोरि जाइत अछि- पूज्यनीया दीदी प्रणाम। आपके जाने के दूसरे दिन सुबह मैं आपको ये पत्र भेज रहा हूँ। दीदी आपके जाने के बाद मेरी आँखों से भी दो बूंद आँसू निकल पड़े। मुझे बड़ा दुःख हुआ। मिथलेश को भी बड़ा दुःख हुआ।अपना एक फोटो भेज दिजीयेगा। भूलियेगा मत दीदी। आप अपनी तबीयत का ख्याल रखीयेगा। फोटो जल्द भेज दिजीयेगा। नीलम ठीक है। उसे भी आपके जाने का बड़ा दुख पहुँचा। बच्चे को प्यार तथा जीजा जी को मेरा प्रणाम कह दिजीएगा। पत्रोतर शीघ्र देंगी। आपका अरूण पटना 16 8 74 प्रिय दीदी प्रणाम आप उधर जा रही थी इधर हम ठगे से खड़े रह गए वह लौह उपकरण हमारी दीदी को हमसे दूर कर विजेता दैत्य की भाँति लेकर भाग रहा था और हम विवश आँखों मे आँसू लिए खड़े देखते रह गए दीदी क्या रक्त का संबंध ही सब कुछ होता है हमने तो अपनी दीदी को भगवान के वरदान की तरह अपनाया है आपका ही भाई प्रदीप 17 08 74 आदरणीया दीदी सादर चरण - स्पर्श। आपको तो न जाने सहरसा मे जाते ही क्या हो जाता है कि नीलम सिन्हा दिमाग से निकल जाती है। चिट्ठी लिखना और पफोटो भेजने की बात ही दूर है। जीजा जी कैसे हैं मैं समझती हूँ वो पहले से अच्छे ही होंगे। आप कैसी हैे आप अपने दिये गये वचन को निभाना सीखिए देवी जी हाँ! भेज देंगे - जरूर। सहरसा पहुँचते ही सारे वचन हवा हो गया है ना माँ को आपसे शिकायत है कि आप ना वहाँ हाल देती है और न यहाँ का लेती हैं। अतः आपसे निवेदन है महारानी जी कि अब चार लाइन भी खत लिखकर डाल दिया करें ले लिया करें। समझी फुर्सत यदि न हो तो फुर्सत निकाल कर आइयें। आपकी बहन नीलम एहिना बीरपुर डारमेट्री सँ हमरा बड़ प्रेम छल। जखन वर्माजी लोक अभियोजक सहरसा सुपौल मधेपुरा जिला छलैथ। तँ कोर्ट मे बराबर बीरपुर जाइत छलाह। ललित बाबूक बनाओल ओ डारमेट्री बड़ कलात्मक छल- हमरा ओहि डारमेट्री सँ प्यार भ गेल छल। ओकर आकर्षण मे हम हिनक संग लागि जाइत छलौं-तँ डारमेट्री ल क सभ हमरा किचारइत छल। तखनुक डिस्ट्रिक्ट जज- शरण साहबक बेटा अपन पत्रों मे एहि बातक चर्च करैत छल । हाँ तो चाची आपकी तबीयत कैसी है एक बार मन कर रहा है कि आपसे कहूँ कि बीरपुर बहुत ही थर्ड क्लास जगह है आपको चिढ़ाने मे भी परमानन्द की अनुभूति महसूस करती थी। क्यों चाची मेरे पत्र से आप बोर हो रही हैं क्या ठीक है मैं बन्द कर रहा हूँ। आपका अखिलेश शरण मुंगेर सुश्री वर्मा जी चमचे की स्टेनलैस स्टील भरा प्रणाम ।आशा है सपरिवार सानन्द सकुशल लडडू सी लुढ़क रहीं होगी ।आपकी एक रचना माह मई 78 कादम्बिनी के अंक मे प्रकाशित हुई । पढ़ने का अवसर मिला हार्दिक प्रसन्नता हुई । आपने जिस परिप्रेक्ष्य मे रचना लिखी है वास्तव मे ही सराहनीय है।भविष्य मे कोई अन्य रचनायें प्रकाशित हों तो अवश्य सूचित करें । लोकतंत्रा मे मँहगाई के कदम सदा आगे चलते।भ्रष्ट उल्लुओं के पट्ठे ही फूल रहे फलते-फूलते।।मरने को भी मिट्टी का अब तेल नहीं जिस शासन मे। तन के दीप जलाते लेकिन मन के दीप नहीं जलते।। वैसे मुझे नहीं लिखना चाहिये परन्तु मैं भी अवगत करा दूँ कि मैं भी अखिल भारतीय स्तर के हास्य-व्यंग कवि सम्मेलनों का मंचीय कवि हँू । दिल्ली बम्बई उ॰प्र॰ म॰प्र॰ राजस्थान बिहार पंजाब प्रान्तों के क्षेत्रों मे काव्य पाठ करके अबतक लोगों की चमचागीरी कर चुका हँू । आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से भी रचनायें प्रसारित होती रहती है। पत्र-पत्रिकाओं मे भी रचनायें प्रकाशित होती रहती है। शेष शुभ सदैव कृपा पत्र द्वारा सद्भाव बनाय रहें। आशा है आप भी लोकतंत्रा का बोझा ढो रहे होंगे। हमारी आत्मा को शान्ति प्रदान करने के लिए अपने हृदयोद्गार भरा एटमबम पत्र द्वारा हमारे पास तक अवश्य धमकायेंगे। चमचा हाथरसी विनोद सिपर्फ अपका ही हाथरस उ प्र 26 5 78 शेफालिका जी नमस्कार । आपका पत्र मिला कल ही । ध्न्यवाद मिथिल मिहिर मे प्रकाशित आपकी सभी कहानियाँ पढ़ चुका हँू । उपन्यास भी पढ़ चुका हँू । सोना माटि वैदेही आखर मिथिला दूत अग्नि पत्र एवं चांगुर मुझे कहीं नहीं उपलब्ध् हो रहा है।एक बात । मैं आपके पास कुछ प्रश्न भेज रहा हँू जो अलग कागज पर संलग्न है। कृप्या इसका उत्तर भेज दें । इसे एक भेट वार्त्ता ही समझ सकती हैं। इसका उल्लेख मुझे शोध् मे कहानी का परिचय के समय देना पड़ेंगा । हाँ! मैं भागलपुर जा रहा हँू .. पी॰एच॰डी॰ हेतु मैं भागलपुर वि॰वि॰ मे पंजीकृत हँू । गाईड भी वहीं रहते है और मेरे अग्रज भी अतः अग्रज के पास जा रहा हँू तो देरी तो लौटने मे होगी ही । अतः कृप्या मेरे प्रश्नों का उत्तर भागलपुर ही भेजें । शेखर प्रसाद डॉ सी एस लाल फोरेनसिक मेडीकल कॉलेज भागलपुर 20 9 74 ई पत्र हमरा एकटा मानसिक उलझन मे द देने छल। एहि पत्रक संग संलग्न प्रश्नपत्र मे एकटा प्रश्न छल- आपकी तुलना लोग महादेवी वर्मा से करते हैं। महादेवी वर्मा के जीवन से हम सभी परिचित हैं! पिफर आप क्या कहती हैं कहियो काल हम अपन बाल बच्चा परिवारक संग संगत नहि वैसा पाबैत छी। कहबा लेल चाहैत छी किछ कहि दैत छी किछ-हमर कथनक शल्य क्रिया होभ लगैत अछि। आ ई तँ कोनो अनचीन्हार शेखर प्रसाद छलाह। हमर आँखि नोरा गेल छल उत्तर सोचैत खोजैत। हमरा असहज देखि वर्मा जी सहज क देलनि- एकर उत्तर तँ स्पष्ट छैक- अहाँ लिखि दिऔक जे हम बुझैत छी लोग हमर रचनाक तुलना महादेवी सँ करैत छथि नहि कि हमर जीवनक सहरसा जिला मे जे पी आंदोलन मे हम बड़ सक्रिय छलौं। घर मे घुसल पर्दाशीन स्त्रिायों के हम बाहर जुलूस मे अनने रहीं- आदरणीया शेफालिका वर्मा जी सादर प्रणाम मैं सहरसा आया था । आप नहीं थी । दि॰ 05 नवम्बर की अ॰ भा॰ महिला संगठन की प्रांतीय संयोजक मंदाकिनी दानी सहरसा आ रही है। तीन तरह के कार्यक्रम अपेक्षित है। 1 महिला कार्यक्रम 2 कार्यकर्त्ता कार्यकर्ती बैठक 3 सार्वजनिक कार्यक्रम! इसी संबंध् मे विशेष विचार विमर्श के लिय प्रांतीय संयोजिका दि. 25 अक्टूबर रविवार प्रातः जानकी एक्सप्रेस से सहरसा आ रही है। उसी दिन रात को लौटेगी - कार्यकर्त्ता की बैठक हो । दिनांक 3 8 नवम्बर के बेगुसराय को कार्यकर्त्ता सम्मेलन मे आपकी प्रतीक्षा करूँगा। इस बीच नागपुर मे आयोजित एक बैठक को लेकर कुछ गलतफहमी सी हो गई ऐसा कुछ भी सुब्रह्मण्य भारती से और कार्यालय मंत्राी श्री पंचनदीकर से बातों से और कुछ आपके पत्र को पढ़ने से अनुभव हुआ। क्योंकि अभी किसी भी प्रदेश मे विधिवत महिला विभाग का स्वतंत्रा कार्य नहीं हुआ हुआ था केंद्र से महिलाओं के संबंध के पत्रक जो मंदाकिनीदाणी महिला कार्य की प्रमुख ने भेजा प्रदेश संगठन मंत्राी के नाम भेजा जो 1999 का लिखा था। क्योंकि उन्होंने कथा था कि कोई 5 महिलाएँ नागपूर पहुँच कर कार्य समझ लें हमने अपने विभाग संगठन मंत्रियों को 912 नाम पूछ कर उन्हें भेजने की दृष्टि से बातें करने को कहा था। श्री सुब्रह्मण्यम भारती जी ने हमे यह स्पष्ट बताया था कि सहरसा जिला का महिला संगठन का कार्य आप करेंगी और सहरसा नगर का कार्य श्रीमती निर्मला वर्मा करेंगी। क्योंंिक एक महिला से दो जाना वहाँ से ठीक रहेगा ऐसा भारती जी ने सोचा होगा और आप दोनों को जाने का आग्रह किया होगा। पत्र देकर उधर के क्षेत्रा की कार्य प्रगति का विवरण देती रहेंगी। मैथिली महासम्मेलन के महिला विभाग की अध्यक्षता आप सफलतापूर्वक कर लौटेंगी। आपके मैथिली लेखिका मे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने की बात तो हमे पत्र पढ़कर ही ज्ञात हुई। किस भाई को अपनी बहन के इस प्रकार के गौरव से अभिमान न होगा हम प्रदेश समिति की ओर से भी आपको इस उपलक्ष्य मे बधाई देते हैं। दिन पर दिन मेरी यह प्रतिभासम्पÂा बहन ऐसी ही प्रगति पथ पर अग्रसर हों यही भगवती से प्रार्थना है। नाना भागवत विश्व हिन्दु परिषद नाला रोड पटना (अगिला अंकमे.... विश्व हिन्दू परिषदक एहि लेटरपैड मे अध्यक्षक जगह पर पं जयकांत मिश्र पटना छल कोन जयकांत मिश्र छलथि कहियो जिज्ञासा नहि रहल-.....) २ नाटक- बेटीक अपमान नाटककार- बेचन ठाकुरजी चनौरागंज (मधुबनी) क्रमश: बेटीक अपमान- बेचन ठाकुर दृश्य पाँचिम- (स्थान बलवीर चौधरीक आवास। बियाहक तैयारी पूर्ण भए गेल अछि। जयमालाक मंच तैयार आ सजल अछि। मचक आगू बाल्टीनमे लोटा आ पानि अछि। कुर्सीपर गंगा राम चौधरी बैसि कऽ आेङहा रहल छथि।) गंगाराम- (नीनमे) हमहुँ बेटाक वियाह करब। दहेजमे एगो उजरा आ एगो करिया बत्तु लेब। ठाँठ बकरी लेब सेहो जरसी। कनिया लेल कानमे बुलकी लेब। अपना लेल एगो फाटलो-चिटलो कनिया लेब। बाआ लेले एगो गदहा लेब। अपना कनिया लेल ठोररंगा लेब। एगो मोचना लेब। ओहिसँ अपन कनियाकेँ सौंसे देहक केश उखारि देबैन। आओर नगद एगारह लाख एगारह सए टाका, डालीमे एक लाख मच्छर आ समधी मिलानमे एक हजार एक उड़ीश लेब। आओर पुतौह लेल.....। (चन्देश्वर चौधरीक प्रवेश) चन्देश्वर- गंगा राम, गंगा राम, रओ गंगा राम। (गंगाराम फुरफुरा कऽ उठि खसैत-पड़ैत) गंगाराम- जी भैया, जी भैया, केम्हर गेलीह भौजी? चन्देश्वर- सपनाइत छेँ की? गंगाराम- नहि भैया, अपन बेटाक छेकामे गेल रही। चन्देश्वर- नीन तोड़ू मुँह-हाथ धोउ। (अन्दरसँ दुइ-चारिटा बमक आवाज होइत अछि।) गंगाराम लगैत अछथ् बरयाती आबि रहल अछि। गंगाराम- आबए दियौन। कटहर-चूड़ा खेताह। एतेक अबेर आएल बरयातीकेँ की स्वागत होएत? अपन ठरल-ठरल खाएत आ सिरसिराइत भागत। (बरयातीक प्रवेश। दीपक चौधरी, मोहन चौधरी, सोहन चौधरी, गोपाल चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुरक आ चारि-पाँच हुनक समाजक लोक बरायातीमे आएल छथि। सभ कियो मंचपर विराजमान छथि। पाछू काल सुरेश कामत पहुँचलाह।) दीपक- गोर लगैत छी मामीश्री। सुरेश- नीके रहू भागिन। दीपक- बरयाती अएवाक मोन पड़ि गेल? सुरेश- की करबैक भागिन, असगरूआ छी। छेका दिन समएपर महीसकेँ नहि दुहलहुँ। तेकर फल यएह भेल, महीस निछए गेल। (सरयातीक प्रवेश। हरे राम सिंह, बरवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्देश्वर चौधरी आ हिनक अपन समाजक लोक छथि) हरेराम- (बरयातीसँ) सरकार सब, चरण पखारल जाउ। बड राति भए गेल। हमर समाजक कतेको लोक चलि गेलाह। नश्तो पानि हरेएतैक। जल्दी चरण पखारल जाउ, सरकार सभ। (सभ कियो चरण पखारि कऽ बैसैत छथि। अन्दरसँ गंगाराम शरबत, नश्ता, चाह, पान, बीड़ी सुपारी इत्यादि आनैत छथि। नश्ता-पानि आरामसँ भए रहल अछि। चाय-पानक बाद सरयाती सभ अंदर जाइत छथि। तहन जनानी सभ जयमाला करेवाक लेल अएलीह। ओ सभ पहिने परिछनिक गीत गाबि परिछन कए रहलीह फेर लड़िकाक परिक्रमा करए जयमाला कराबैत छथि। तहन लड़िकी लड़िकाक आरती उतारि आ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लय सभ जनानीक संग अंदर जाइत छथि। प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश) प्रदीप- (बरयातीसँ) सरकार सभ भोजनमे चलै चलू। हरेराम- चलै चलू,( बरयाती सभ। भोर होमए जा रहल अछि। चलू, चलै चलू। (सबहक प्रस्थान) पटाक्षैप १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- १.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक-(समीक्षा)१.२. समीक्षा (अर्चिस) २. डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा ३.राजदेव मंडल, कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक लेल पत्र-शेष अंश ४.धीरेन्द्र कुमार- प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि १. शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। १.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्तमनक- (समीक्षा) किछु लोकक ई प्रवृति होइत अछि जे सदिखन अपन चल जीवनमे नव-नव प्रकारक प्रयोग करैत रहैत अछि। एहि नव प्रयोगक कारण जहानमे अपवर्गक विहान देखएमे अबैत अछि। प्रयोग धर्मिता व्यक्तिक इच्छासँ नहि जन्म लऽ सकैछ, ई तँ नैसर्गिक प्रतिभाक परिणाम थिक। मैथिली साहित्यमे प्रयोग धर्मी सरस्वती पुत्रक अभाव नहि परंच वर्तमान कालमे एकटा एहेन प्रयोगधर्मी मिथिला पुत्रकेँ मॉ मिथिले अपन ऑचरमे सक्रिय कएलनि, जे तत्कालिक मैथिलीक दशा वदलवाक प्रयास कऽ रहल छथि। क्रांतिवादी आ सम्यक विचार धाराक सम्पोषक ओ व्यक्ति केओ अनचिन्हार नहि- मैथिली साहित्यक प्रथम अंतर्जाल पाक्षिक पत्रिका विदेहक सम्पादक- श्री गजेन्द्र ठाकुर छथि। भऽ सकैत अछि जे किछु लोक मैथिली साहित्यकेँ अन्तर्जालसँ जोड़वाक प्रयास कए रहल हएताह परंच एकटा मूर्त्त रूप दऽ 64 अंक धरि पहुँचेवाक कार्य गजेन्द्रे जी कएलन्हि। साहित्यक नव-नव विधा आ समाजक वेमात्र वर्गकेँ मैथिलीक आलिंगनमे आवद्ध कऽ साम्यवाद आ समाजवादकेँ वैदेहीक माटिपर आनि हमरा सबहक माथपर लागल अनसोहांत कलंककेँ धो देलनि। मात्र 64 अंकमे जे कार्य भेल अछि ओ कतऽ-कतऽ पहिने भेल छल, आत्म अवलोकन करवाक पश्चात् जानल जा सकैत अछि। समाजक फूजल, बेछप्प आ उदासीन वर्गकेँ अपन वयनाक मानस पटलपर आच्छादित करवाक लेल साहस सभ केओ नहि जुटा सकैत अछि। मात्र भॉज पुरयवाक लेल मानस पुत्र एहेन कार्य नहि कएलनि, ओहि उपेक्षित वर्गक रचना कारक रचनामे विषए-वस्तुक गतिशीलता आ तादात्म्य वोध ककरोसँ कम नहि अछि। प्रयोगधर्मी गजेन्द्र जीक कर्मक दोसर आमुख थिक हिनक लेखनीक धारसँ निकलल इन्द्रधनुषक सतरंगी गुलालसँ भरल भावक आत्मउदवोधन- “कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक” एहि पोथीकेँ की कहल जाए उपन्यास, गल्प, बाल साहित्य, समालोचना, प्रवंध वा काव्य? साहित्यक सभ विधाक अमिर रसकेँ घोरि वंगोपखाड़ी वना देलनि जतए ई कहव असंभव अछि जे गंगा, कोशी, यमुना वा हुगली ककर नीर कतए अछि? शीर्षक देखि अकचका गेल छलहुँ, ई महाभारत मचौता की! मुदा अपन हृदएसँ सोचल जाए प्रत्येक मानवक हृदएक दूटा रूप होइत अछि, मुदा अन्तर्मन सदिखन सत्य बजैत अछि ओहिठॉ मिथ्याक स्थान नहि। कुरूक्षेत्र रणभूमि अवश्य छल परंच ओहिठॉ सत्यक विजयक लेल युद्ध भेल। ओहिठॉ धर्मसंस्थापनार्थ विनाश लीला मचल छल। हमरा सभकेँ अपन अन्तर्आत्मामे कुरूक्षेत्रक दर्शन करएवाक लेल दिशा निर्देशन कऽ रहल छथि गजेन्द्र जी। मैथिली साहित्यक कोन असत्यकेँ त्याग करवाक चाही? किअए सुमधुर वयनाक एहेन दशा भेल? नव पथक निर्माण नवल दृष्टिकोणसँ हएत। हमरा बुझने एहि पोथीमे साहित्य समागमक लेल दृष्टिकोणकेँ प्राथमिकता देल गेल अछि। एहेन विलक्षण साहित्यपर आलेख लिखव हमरा लेल आसान नहि अछि- मुदा दु:साहस कऽ रहल छी- भऽ रहल वर्ण-वर्ण नि:शेष शब्दसँ प्रकटल नहि उधेश्य मोनमे रहल मनक सभ वात अछिंजलसँ सध: स्नात सात खण्डमे विभक्त एहि पोथीकेँ सम्पूर्ण परिवारक लेल सनेश कहि सकैत छी। प्रवंध-निवंध-समालोचना:- एहि खण्डक आदि लोकगाथापर आधारित कथा सीत-वसंतसँ कएल गेल अछि। उत्तर मध्यकालीन इतिहासमे अल्हा-ऊदल, शीत वसंत सन कतेक कथा प्रचलित छल, जकर मंचन पद्यक रूपमे वर्तमानकालमे विहारक गाम-गाममे भऽ रहल अछि। एक राज परिवारक विषय-वस्तुक चित्रण करैत लेखक सतमाएक िसनेहपर प्रश्न चिन्ह लगैवाक प्रयास कएलनि अछि? कथाक आरंभसँ इति धरि मर्मस्पर्शक अनुभव होइत अछि। कथाक अंतमे विमाताकेँ ओहि पुत्रक छाया भेटलनि जकर पराभव ओ कऽ देने छलीह। श्री मायानन्द मिश्र मैथिली साहित्यक सभ विधाक मांजल साहित्य कार मानल जाइत छथि। हुनक इतिहास वोधक चारू प्रमुख स्तंभ प्रथमं शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनपर सम्यक आलेख प्रस्तुत कऽ गजेन्द्र जी पूर्वमे लिखल गेल प्रबंधक दृष्टकोणकेँ चुनौती दऽ रहल छथि। ऋृग्वैदिक कालीन इतिहासपर आधारित मंत्रपुत्र मायानन्द जीक प्रमुख कृति मानल जाइत अछि। एहि पोथीक लेल माया जीकेँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटल अछि। मंत्रपुत्र पाश्चात्य इतिहाससँ प्रभावित अछि। मंत्रपुत्रक संग-संग पुरोहितमे सेहो पाश्चात्य संस्कृितक झलकि देखए अबैत अछि। अपन समालोचनाकेँ गजेन्द्र जी अक्षरश: प्रमाणित कऽ देने छथि, मुदा मायाबावूक रचना संसारपर कोनो तरह प्रश्न चिन्ह नहि ठाढ़ कएलनि। समीक्षाक रूप एहने होएवाक चाही। समीक्षककेँ प्ूर्वाग्रह रहित रहलासँ साहित्यिक कृतिक मर्यादा भंग नहि होइत अछि। केदारनाथ चौधरी जीक दू गोट उपन्यास ‘चमेली रानी’ आ ‘माहुर’पर गजेन्द्र जीक समीक्षा पूर्णत: सत्य मानल जा सकैत अछि। मैथिली साहित्यमे बहुत रास रचनाक विक्री सम्पूर्ण मैथिल समाजमे जतेक नहि भऽ सकल, ‘चमेली रानी’क ओतेक विक्री मात्र जनकपुरमे भेल। एहिसँ एहि साहित्यक प्रति पाठकक श्रद्धाकेँ देखल जा सकैत अछि। ‘माहुर’ मैथिली साहित्यक लेल क्रांतिकारी उपन्यास थिक। अरविन्द अडिगक कृतिक चरित्रसँ एहि उपन्यासक एक पात्रक तुलना लेखकक भाषायी समृद्धताकेँ प्रदर्शित करैत अिछ। विदेह-सदेहक सौजन्यसँ श्रुति प्रकाशन द्वारा नचिकेता जीक एकटा नाटक ‘नो एण्ट्री मा प्रविश’ प्रकाशित भेल अछि। एहि नाटकक लेखनपर नचिकेता जीकेँ कीर्ति नारायण मिश्र सम्मान देल गेल अछि। नाटकक चारू कल्लोलक तर्क पूर्ण विश्लेषण कऽ गजेन्द्र जी समीक्षाक रूप बदलवाक प्रयास कएलनि अछि। एहि नाटकमे तार्किकता आ आधुनिकताक विषय वस्तु निष्ठताकेँ ठाम-ठाम नकारल गेल अछि। रचना लिखवासँ पहिने अध्यायमे गजेन्द्र जी मैथिली साहित्यमे भाषा सम्पादनपर विशेष ध्यान देवाक प्रयास कएलनि। अपन साहित्यमे भाषायी त्रुटिपर पूर्णरूपसँ ध्यान नहि देल जा रहल अछि। कविशेखर ज्योतिरीश्वर, विद्यापति शब्दावली, रसमय कवि चर्तुभूज शब्दावली आ बद्रीनाथ शब्दावली द्वारा मिथिला-मैथिलीक सर्वकालीन शब्द विन्यासक आ शब्द भंडारक विस्तृत वर्णन कएल गेल अछि। एहिसँ निश्चय भाषा सम्पादनमे सहायता भेटल। कतेक रास एहेन शब्द अछि जकर विषयमे हम की साहित्यक पैघ-पैघ वेत्ता पहिने नहि जनैत होएताह। निश्चित रूपसँ ई अध्याय पाठकक संग-संग साहित्यकार आ असैनिक सेवाक ओहि प्रतियोगीक लेल उपयोगी हएत जे मैथिलीकेँ मुख्य विषयक रूपे प्रतियोगितामे सम्मिलित होएवाक लेल प्रयत्नशील छथि। समीक्षक हमरा सबहक मध्य एकटा नव पद्य विधाक चर्च कऽ रहल छथि- हाइकू। एहि विधापर मैथिलीमे पहिनहुँ रचना होइत छल जेना- “ई अरदराक मेघ नहि मानता रहत बरसिकेँ। मुदा एहि विधाकेँ क्षणिका नाअोसँ जानल जाइत छल। जापानी साहित्यक द्वारा सृजित एहि पद्य रूपक वास्तविक चित्रण मैथिली साहित्यमे गजेन्द्र जी आ ज्योति झा चौधरी कएलनि अछि। मिथिलाक लेल प्रलय कहल जाए वा विभीषिका- ‘बाढ़ि’ ई शब्द सुनितहि कोशी, कमला, बलान, गंडकी, बागमती आ करेहक आंतसँ ओझराएल लोक सभ कॉपि जाइत छथि। एहि समस्याक स्थिति, सरकारी प्रयासक गति आ दिशाक संग-संग बचवाक उपाएपर लेखकक दृष्टिकोण नीक बुझना जाइत अछि। कोनो ठाम आ कोनो आन धाममे जौं हमरा लोकनिक विषयमे पता चलए-की मैथिल छथि, लोकक दृष्टकोण स्पष्ट भऽ जाइत अछि- हम सभ मछगिद्धा छी। एकर कारण जे धारक कातमे रहनिहार जीवक जीवन जलचरे जकाँ होइत अछि। जलीय जीवक भक्षण अधिकांश व्यक्ति करैत छथि। तेँ ने हमरा सभकेँ मॉछ आ मखानक प्रेमी बुझल जाइत अछि, आ वास्तवमे हम सभ मॉछक प्रेमी छी। अधिकांश मैथिल ब्राह्मण परिवारमे सोइरीसँ श्राद्ध धरि माॅछक भक्षण अनिवार्य अछि। अान जातिमे अनिवार्य तँ नहि अछि, मुदा ओहु वर्गक अधिकांश लोक मॉछक प्रेमी छथि। लेखक एहि लोकक भक्षण धारकेँ ध्यान धरैत कृषि मत्स्य शब्दावली लिखलन्हि अछि। एहिमे सभ प्रकार मॉछक आकार, रंग, रूपक विश्लेषण कएल गेल अछि। कृषिकार्यक लेल जोड़ा वरदक संग हर पालो इत्यादिक ज्वलन्त व्यवस्थापर लेखकक विचार नीक मानल जा सकैत अछि। करैल, तारवूज आ खीराक विविध प्रकारक नाओ सुनि गामक जिनगी स्मरण आवि जाइत अछि। एहि खण्डक सभसँ नीक विषय जे हमरा अन्तर्मनकेँ हिलकोरि देलक ओ अिछ विस्मृति कवि- पंडित राम जी चौधरीक रचना संसारपर प्रवाहमय आ विस्तृत प्रस्तुति। हमरा सबहक भाखाक संग िकछु विषमता रहल जे एहिमे कतेक रास एहेन रचनाकार भेल छथि जे अपने संग अपन रचनाकेँ गेंठ बन्हने विदा भऽ गेलाह। एकर कारण एहिमे सँ किछु रचनाकारक रचनाक संकलन नहि भऽ सकल वा भेवो कएल तँ पाठक धरि नहि पहुँचल। एहि लेल ककरा दोष देल जाए रचनाकारकेँ आ हमरा सबहक भाषाक तत्कालीन रक्षक लोकनिकेँ? एहि भीड़मे राम जी चौधरीक नाओ सेहो अछि। मैथिली साहित्यमे रागपर लिखल रचनामे राम जी बावूक रचना सेहो अछि। भक्तिमय राग विनय विहाग, महेशवाणी, ठुमरी तिरहुता, ध्रुपद, चैती आ समदाओनक रूपमे हुनक लेखनीसँ निकलैत गीत सभ अलम्य अछि। शास्त्रीय शैलीक मैथिली गायनमे वर्तमान पिरहीक लेल अत्यन्त उपयोगी रचना सभकेँ प्रकाशमे आनि गजेन्द्र जी मिथिला, मैथिली आ मैथिलपर पैघ उपकार कएलनि अछि। सत्यकेँ स्वीकार करवाक सामर्थ्य मात्र किछुए लोकमे होइत अछि। गजेन्द्र जी ओहि लोकक पातरिमे ठाढ़ एक व्यक्ति छथि परिणामत: मैथिली साहित्य भोजपुरीसँ आगाँ मानल जाइत अछि मुदा गुणवताक दृष्टिए भोजपुरी रास परिमार्जित अछि। भोजपुरी साहित्यक काल पुरूष भिखारी ठाकुरक मर्म स्पर्शी विदेशिया एहि भाषाक अलग पहिचान भेटल। मैथिली भाषामे विदेशियाक कमीक मुख्य कारण रहल-प्रवासक प्रति उदासीनता। जौं लिखलो गेल तँ महाकाव्यक रूप दऽ देल गेल। विदेशिया पद्य आ विधापतिक लिखल? हमरो विश्वास नहि भेल छल। विद्यापतिकेँ मुख्यत: श्रैंगारिक कवि मानल जाइत अछि। ओना हुनक रचनाकेँ भक्ति रससँ सेहो जोड़ल जाइत अछि। कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक पोथी पढ़लासँ नव सोच मोनमे आवि गेल। जकरा भोजपुरी साहित्यमे विदेशिया कहल गेल वास्तवमे मैथिलीमे ओ अछि- पिया देशान्तर। विद्यापतिक नेपाल पदावलीमे एहि प्रकार रचना सभ संकलित अछि, मुदा कहियो एहि रूपे महिमा मंडित नहि कएल गेल। कारण स्पष्ट अछि पिया देशान्तरक नाटय रूप मिथिलाक पिछड़ल जातिक मध्य प्रदर्शित कएल जाइत अछि। तेँ अग्रसोची लोकनि एकरासँ दूरे रहव उचित बुझैत छथि। एहिसँ मैथिलीक दशा-दिशाकेँ नव गति कोना भेटि सकैत अछि। मैथिली लोकभाषा अछि, लोक संस्कृतिकेँ बढ़यवाक प्रयास करवाक चाही। गजेन्द्र जीक सोझ दृष्टिकोणकेँ विम्वित करवाक चाही। “एतहि जानिअ सखि प्रियतम व्यथा” –श्रैंगारिक-विरह व्यथाक वर्णन मुदा अछि तँ पिया देशान्तर। श्री सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा संग्रह ‘बनैत-विगड़ैत’पर गजेन्द्र जीक समीक्षा अपूर्व अछि। प्रवेशिकामे हुनक कथा ‘काठक बनल लोक’ पढ़ने छलहुँ। काठक बनल लोकक नायक वदरियाक मर्म देखि पाथरो पिघलि जा सकैत अछि। वास्तवमे सुभाष जी मैथिली साहित्यक फनीश्वर नाथ रेणु छथि। महिमा मंडनक कालमे मात्र भाँज पुरएवाक लेल हिनक कथा पाठ्यक्रममे दऽ देल जाइत अछि। आंचलिक रचनाकेँ कहिया धरि उपहासक पथियामे झाॅपि कऽ राखल जाएत? एक नहि एक दिन छीप उधिया जएत आ सत्यक सामना करए पड़त। लोक धर्मी साहित्यकार चाहे ओ धूमकेतु, कुमार पवन कमला चौधरी, सुभाष चन्द्र यादव, जगदीश प्रसाद मंडल वा कोनो आन होथु- हुनका सबहक रचनाक उपेक्षा नहि होएवाक चाही। सुभाष जीक कथा कनिया-पुतरा, बनैत-विगड़ैत आ दृष्टिक समीक्षा देखि समए-कालक दशाक अविरल द्वन्द्व उपस्थित भऽ जाइत अछि। ऋृणी छी जे गजेन्द्र बावू एहि पोथीपर समीक्षा लिखलन्हि। इंटरनेटक लेल अन्तर्जाल प्रयोग, नीक लागल। वेवसाइट बनएवाक तकनीकसँ गजेन्द्र जीक उद्वोधन आ नियमन नहि बुझि सकलहुँ। तीन वेरि पढ़लहुँ मुदा जेठक तेज विहारि जकाँ मॉथपरसँ उड़ि गेल। नव-नव नेना भुटका बुझि जएताह। तकनीकी युगक नेनाक स्मरण शक्तिक आॅगन पैघ होइत छथि तेँ हुनके सबहक लेल एहि अध्यायकेँ छोड़ि देलहुँ। लोरिक गाथा समाजक उपेक्षित वर्गक संस्कृतिपर आधारित अछि। सहरसा-सुपौलक वीर आदि पुरूष लोकिकक परिचए-पातमे पौराणिक मैथिल संस्कृतिक दर्शन होइत अछि। मिथिलाक खोजमे जनकपुर, सुग्गा धनुषा सन नेपालक स्थलसँ लऽ कऽ मधुबनी जिलाक कतेको उत्तर मैथिल गामसँ दक्षिणमे जयमंगलागढ़ (वेगूसराय)क चर्च कएल गेल अछि। पूवमे पूर्णिया किशन गंजक कतेक स्थलसँ लऽ पश्चिममे चामुण्डा (मुजफ्फरपुर)क मॉ दुर्गाक मंदिरक चर्च कएल गेल अछि। मिथिलाक िकछु स्थानक वर्णन एहि सुचीमे नहि भेटल जेना- सती स्थान (गाम-शासन प्रखंड-हसनपुर जिला- समस्तीपुर) आ उदयनाचार्यक जन्म स्थली (गाम-करियन जिला- समस्तीपुर)। एहि लेल लेखककेँ दोष नहि देल जा सकैत अछि, किएक तँ मिथिलाक खोज- विदेहसँ लेल गेल अछि, जाहिमे गजेन्द्र जी अवाहन कएने छथि, जे जिनका लग कोनो प्रसिद्ध स्थलक विषएमे जानकारी हुअए जे एहिमे सम्मिलित नहि अछि तँ ओकर सूचना देल जाए जाहिसँ ओतए जा कऽ छाया चित्रक संग सूचना सम्मिलित कएल जा सकए। किछु स्थल आर छूटल भऽ सकैत अछि, प्रवुद्ध पाठक एहि विषएपर कार्य कऽ सकैत छी। क्रमश: १.२. शिव कुमार झा ‘टिल्लू’, जमशेदपुर। समीक्षा (अर्चिस) वर्तमान मैथिलीक कविताकेँ तरूण कवि आ कवयित्रीक पदार्पणसँ नव गति भेटि रहल अछि। एहि नवतुरिया मुदा विषए-वस्तुक दृष्टिकोणसँ सजल रचना सबहक रचनाकारक वर्गमे एकटा प्रवासी मैथिलीक कवयित्री छथि- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी। “अर्चिस” ज्योति जीक प्रथम संकलित कविता संग्रह थिक। एहि पोथीमे ३७ गोट कविता संग्रहित अछि। ज्योति जी कतेक दिनसँ रचना करैत छथि, ई तँ नहि बुझल अछि मुदा विदेहक पदार्पणक किछुए अंकसँ हिनक रचना प्रकाशित हुअए लगल। अर्चिसक अर्थ तत्सममे अग्नि आ तद्भवमे आग, अनल आदि मानल जाइत अछि मुदा मैथिलीमे आगि, अंगोर आ लुत्ती सेहो कहल जा सकैछ। एहि पोथीक शीर्षक मात्र कवयित्रीक भावनापर आधारित अछि, कविताक भावसँ एहि शीर्षकक कोनो संबंध नहि। पहिल कविता “हाइकू” प्रकृति वर्णन, श्रृंगार, विचार मूल आ विरहक मिश्रित चित्रांकन करैछ। हाइकू पहिने मैथिलीमे क्षणिका नाओसँ लिखल जाइत छल, मुदा ज्योति जी एकर वास्तविक रूपक चित्रण कएलनि अछि। सम्पूर्ण कवितामे अर्न्तद्वन्द्व आ प्रसन्नताक भीड़क मध्य व्यथा-टीशक अंतरंग हृदयक प्रवाहमयी प्रस्तुति..... मनोरम लागल। एकटा हेराएल सखीमे कवयित्री कविताक नायिकाकेँ अपन सखी मािन ओकरा सिनेहीसँ भेटल पीड़ाक उद्वोधन कऽ रहल छथि। नारी मोनमे अश्रुउच्छवासक संग-संग समर्पण सेहो रहैत अछि। ओना तँ आर्य ग्रन्थमे “त्रिया चरित्र: पुरूषस्य भाग्यम् देवो न जानाति कुतो मनुष्य:” लिखल गेल अछि, मुदा एकरा हम उचित नहि मानैत छी। आर्यावर्तक नारीक मोन विह्वलआ भावुक होइत अछि तेँ भावनात्मक छलक शिकार शीघ्र भऽ जएवाक संभावना देखल जा सकैछ। पुरूष प्रधान समाजमे दोस नारीपर देल जाइत अछि मुदा पुरूषक चरित्रहीनताक नाओ की देल जाए? जीवन भरि एक पुरूषक प्रति समर्पणकेँ केन्द्र विन्दु बना कऽ कवयित्री दुखित छथि अपन सखीक निश्छल समर्पणसँ। ई कविता सदेह ३ मे कल्पना शरणक रचनाक रूपमे प्रकाशित भेल अछि। नहि जानि बेरि-बेिर नाओ बदलि कऽ लिखवाक परम्परा कहिया धरि चलत। छद्म नाअोक निर्णक एकवेरिमे कऽ लेवाक चाही, नहि तँ रचनाकारक विलगित मानसिकताक बोध होइत अछि। वर्तमान महिला वर्गमे नौकरी करवाक इच्छा शक्ति प्रवल भऽ रहल अछि। स्वभाविके अछि जीवनक दोसर पहिया तँ नारी छथि। सृजन आ सृष्टिक रूपमे पहिल पहिया सेहो कहि सकैत छी। परंच युवा महिला वर्गक प्रवृति चंचल होइत अछि। एहि अल्हड़पनमे अपन कर्मगतिकेँ सेहो चंचल बनएवाक प्रयास कऽ रहल छथि कवयित्री अपन कविता “एकरा नौकरी चाही”मे। कार्यालयक सभटा काज हिनके मोनक होएवाक चाही। काज कम मुदा कैंचा वेसी चाहैत छथि। बॉसकेँ आन्हर आ वहिर होएवाक कामनामे हास्यक दर्शन होइत अछि। भऽ सकैत अछि हिनक एहेन दृष्टिकोण मात्र कवितेटा मे हुअए। “पनिभरनी” कविता पढ़ि हमर मॉथ सुन्न भऽ गेल, अकचका गेलहुँ। जाहि नारीक बाल काल जमशेदपुरमे बीतल हुअए, आब लंदनमे रहैत छथि हुनकासँ एहेन शब्दक आश कोना कएल जा सकैत अछि? गामोमे आब घैल आ इनारक रूप मृतपाय भऽ गेल अिछ। एकटा गरीव अवला पनिभरनीक प्रति आसक्तिसँ कविता ओत प्रोत अछि। विषय वस्तु आ दृष्टिकोण समंजन खूब नीक लागल। अपन जातिक प्रति सिनेहक मर्मस्पर्शी चित्रण भऽ सकैत अिछ जे एहि प्रकारक व्यस्थाक वर्णन अपन परिवारक बूढ़-पुरानसँ ज्योति जी सुनने हेती। दीपमे ज्योति पसरवाक शक्ति होइत अछि मुदा तरमे तँ अन्हार रहैछ। स्वाभाविक अछि जे जहानमे आनंद देवामे सक्षम होइछ ओकर अपन जीवन व्यथित भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारक दर्शन भेल “शीतल बसात” कवितामे। वृक्ष दोसरकेँ शीतलता दैत अछि परंच ओकर पात भूखण्डपर खसिते अस्तित्व विहीन भऽ जाइत अछि। पतझड़िक बाद वसन्त, फेरि पतझड़ संगहि रौद क्षणहिमे छॉह ई तँ प्रकृतिक लीला अछि। मिथिलाक भूखण्डमे आमक गाछी बूढ़ पुरानक संग-संग बाल बोधक लेल गरमीक पिकनिक केन्द्र होइत अछि। भोज कोनो छप्पन प्रकारक भोज्य पदार्थक नहि, टिकुला आ झक्काक भोज। गरमी छुट्टीमे गामक प्रवासक ज्योति जीक अनुभव नीक बुझना जाइत अछि। “एकटा भीजल बगरा” कविता पढ़ि हिन्दी साहित्यक महान लेखिका महादेवी वर्मा जीक लिखल “गिल्लू” कथा मोन पड़ि गेल। ओहि कथामे वर्माजी एकटा लुक्खीक पीड़ाक वर्णन करैत ओकरा आत्मसात कऽ लैत छथि, तहिना ज्योति जी एकटा चिड़ैक प्रति सिनेहक जे भाव देखा रहल छथि ओ “सर्वे भवन्तु सुखित:” सिद्धान्तक द्योतक बुझना गेल। “हम एकटा मध्य वर्गक वालक” वाल साहित्यपर आधारित कविता अछि। वाल मनोविज्ञानक संग एकरा वाल गृहविज्ञान सेहो मानल जा सकैत अछि, मुदा एहि कवितामे प्रवाहक अभाव देखए मे आएल। शब्दकेँ तुकांत वनएवाक क्रममे मूल भावक प्रति अनाकर्षक देखए मे आबि रहल अछि। “टाइम मशीन” कवितामे आर्य भूमिक दृष्टिकोण आ पाश्चात्य देशक व्यवस्थासँ तुलना नीक लागल। विलासिताक प्रति हमरा सबहक समर्पण परतंत्रताक रूपमे परिणति भेल आ हम सभ सगरो क्षेत्रमे पंगु भऽ गेलहुँ। मिठगर रौद, पहिल फुहार आ वरसातक दृश्य कवितामे प्रकृति वर्णन सामान्य रूपसँ कएल गेल अछि। एहि प्रकारक कवितासँ हमर साहित्य ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे किछु नव नहि देखए मे अाएल। जीवन सोपानमे जीवनक क्रमिक गतिक छंदसँ भरल प्रस्तुति सेहंतित अछि। “प्रतीक्षासँ परिणाम धरि” जीवन-दर्शनपर आधारित ज्योति जीक सोहनगरक कविता अछि। हमरा बुझने ई कविता एहि पोथीक सभसँ विलक्षण अध्याय थिक। श्रीमद्भगवतगीता आ शेष महाभारतक आधारपर कृष्ण चरितक वर्णनसँ कवयित्रीकेँ सिद्धहस्त मानल जा सकैछ। द्वापरसँ कलिमे प्रवेश निश्चित रूपेँ कवयित्रीक विस्तृत अध्ययन आ अनुशीलनक छाया देखा रहल अछि। “इन्टर नेट स्वयंवर” वियाहक नव रूपक चित्रण कऽ रहल अछि। वैदिक कालमे आठ प्रकारक पाणिग्रहण व्यवस्था छल। वर्तमान समएमे इंटरनेट चैटिंगसँ वियाह करवाक प्रणालीमे ठक व्यवस्था अछि तेँ कवयित्री जकरा विनु देखने प्रेम करवाक नाटक कएलनि ओ पुरूष नहि स्त्री अछि। क्षितिजक साक्षात दर्शनमे प्रवाहक पयोधि गतिशील अछि मुदा रचनामे तारतम्यक अभाव देखि रहल छी। हिम आवरित आ मेघाच्छादित सन शब्द तँ नियोजित अछि मुदा जखन हमरा सबहक भाषामे शब्द विन्यासक अभाव नहि तखन एहेन तद्भवक चयन करव नीक नहि लागि रहल अछि। जौं एहि कवितामे देसिल वयनाक मूल शब्दक प्रयोग करितथि तँ कविताक रूप वेसी नीक जएवाक भऽ संभावना छल। महावतक हाथी, विद्या धन, वर्फ ओढ़ने वातावरण आ गामक सूर्यास्त कविता तँ नीक अछि मुदा एकर विम्व कोनो नव नहि सभटा वएह पुरना कविक रचना सबहक रूप देखए मे आएल मुदा दृष्टिकोण हिनक अपन अछि, ककरो रचनाक नकल नहि कएने छथि। विशाल समुद्रमे जलोधिक छोट मुदा प्रासंगिक प्रस्तुित नीक लागल। आधुनिक जीवन दर्शन कविताक विम्व तँ नीक लागल मुदा विवेचन पक्ष दुर्वल भुझना गेल। मनुष्य आ ओकर भावनामे जीवनक वर्तमान रूपक अन्वेषण उद्धेश्यपूर्ण अछि। हम्मर गाम कवितामे गामक जिनगीक जीत दर्शनीय अछि। विकासमे मूल प्रकृतिक रूपकेँ वैज्ञानिक दृष्टिसँ परिवर्तनक प्रयाससँ निकलैत परिणामक वर्णन कएल गेल अछि। वालश्रम वर्तमान समाजमे कुष्टक रूप लऽ लेने अछि। साधनक अभावमे हम सभ नेनाक शैशव कालकेँ विसरि अवोधपर मानसिक आ शारीरिक अत्याचार करैत छी। मिथिलामे बाढ़िक परिणाम आ प्रलयक रूप मेघक उत्पात आ वरखा तूँ कहिया जेवैं कवितामे देखि रहल छी। “ईशक अराधना” शीर्षक कवितामे कर्म शक्तिक अवाहन कएल गेल अछि। एहि कविताक विम्व नीक, प्रवाह कलकल आ भाषा सरल अछि। एहि प्रकारक शब्द विन्यासक मैथिलीमे आवश्यकता अछि। “खरहाक भोज” शीर्षक कवितामे आन जीवसँ मनुष्यक तुलना नीक लागल। वौद्धिक रूपसँ विकसित मानवकेँ कर्म आ धैर्यपर विश्वास रखवाक चाही, आन जीवक जीवन-उद्धेश्य भोजन मात्र होइत अछि। कल्पना तखने साकार भऽ सकैत अछि जखन शिक्षाक विकास हएत, एहि प्रकार दृष्टिकोण कल्पना लोककेँ समृद्धि दऽ सकैत अछि। कोशीक प्रकोप कविताक विम्व वर्तमान कालक एकटा पैघ समस्याकेँ उद्घृत कऽ रहल अछि। “असल राज आ पतझड़क आगमन” कविताक विषय वस्तु सामान्य मुदा नीक लागल। वृद्धक अभिलाषामे प्राकृतिक संतुलनकेँ ध्यानमे राखि नव पिरहीक लेल सृजनशीलताक क्रममे वृक्षारोपनपर वल देल गेल अछि। “टेम्स धारमे नौका विहार” कवयित्रीक वास्तविक जीवन रेखाक विन्दु लंदनसँ अपन ठामक तुलनापर आधारित अछि। टेम्सक धारमे नौका विहार करऽ वालीकेँ अपन चनहा कोना मोन पड़ि गेलनि, निश्चय आन ठामक नीक व्यवस्था देखि हमरा सभकेँ अपन पिछड़ल दशापर मर्म होइत अछि। कतहु-कतहु किछु दुर्वल विन्दु रहलाक वादो एहि संग्रहकेँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि। कवयित्री कखनो द्वापर युगमे चलि जाइत छथि तँ कखनो चैटिंग वियाहक अनुसंधानक आधुनिक युगमे। समग्र कविता संग्रहमे किछु स्थानकेँ छोड़ि विषय वस्तु चयन नीक लागल। वर्तमान युगक नवतुरिया पिरहीसँ एतेक आश नहि छल। निश्चय ज्योति जी धन्यवादक पात्र छथि। शेष...अशेष पोथीक नाम- अर्चिस रचयिता- श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी दाम- १५० टका प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन प्रकाशन वर्ष- २००९ २. डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा प्रत्येक भाषा में किछ एहेन रचनाकार होयत छथि, महिला वाकि पुरुष-वर्ग, अपन विलक्षण प्रतिभा के कारन सब से फराक बुझा पडैत छैथ . ई दोसर बात थीक की आलोचक वर्ग महिला लेखन के इतिहासक पन्ना के एकटा कोन द दैत छैथ . किछ भाग्यशाली लेखिका के किछ स्थानों भेटि जायत छैक ,मुदा ,समग्रता में नै. लेखन में महिला पुरुष नै होयत छैक, जे विषय पर लेखक लिखैत छैथ , ओहि पर लेखिका सेहो लिखैत छैथ, कखनो बेसी नीक,.बस, आब एकेटा प्रतीक्षा ऐछ जे कोनो सशक्त महिला आलोचक के देखी, जे महिला नै भै मात्र आलोचक रहैथ,पूर्वाग्रह से रहित नीक आलोचना के जन्म दैत. मैथिली साहित्यक इतिहास में चारि चान लगावैथ, हम जनैत छी एहेन विद्वान लेखिकाक कमी नै ऐछ...... आय प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा, गोनुझा पर पोथी देखी चमत्कृत भ गेलों . पहिने ते हम मैथिलीक नेना भुटका लेल कोमिक्स बुझ्लों, मुदा पढे लगलों ते एकरा में डूबी गेलों. गागर में सागर===अद्भुद ..मैथिली लोकगाथा क विपुल संसार के शिव क जटाजूट जकां कोना समेटी लेने छैथ,ई पढला उप्रानते बुझा पडत. कतेक कथा क खाली नाम सुनने छलों , ओ सब एहि पोथी में साकार छल. जहिना आजुक समाज अकबर बीरबल के बिसरि रहल अछ ,ओहिना गोनू झा के. प्रस्तुत पोथिक माध्यम स पाठक अपन समाज क सब वर्ग के आदर्श के चीन्ही सकैत छैथ प्रीति जी के अशेष शुभकामना एतेक सुन्दर पोथी लेल , प्रीति जी आ गजेन्द्र जी से हम एकटा आग्रह करवैक जे कोसी नदी लेल बड खिस्सा कथा समाज में पसरल छैक, ओकरो चित्रकला में समेटी लैथ. कोसी नदीक रहस्यमय चरित्र, सिंघेश्वर बाबा से विवाह आदि, आदि खिस्सा सब.....जहिना समाज क प्रत्येक क्षेत्र में नारी आय निरंतर आगू बढ़ी रहल छथि , ओहिना मैथिली मिथिलाक विकास में आजुक नारी अपन अपन स्तर से अमूल्य योगदान द रहल छथि. अशेष साधुवाद, प्रीति जी ,असंख्य शुभाशंसा ......... ३.राजदेव मंडल मुसहरनियाँ, मधुबनी। कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक लेल पत्र- शेष अंश कथा गुच्छ- (कथा संग्रह) कथा सभकेँ पढ़लहुँ जे गल्प गुच्छमे संग्रहित अछि। पढ़ैत काल स्मरण भेल- एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका किछु शब्द- कथा स्वतंत्र विधा अछि। एहिमे संक्षिप्ताक संगहि अत्यधिक संगठित तथा पूर्ण कथा रूप हेबाक चाही। ओना जिनगी कथा अछि आ कथा जीनगी अछि। आ जीनगी जे निरन्तर नवीनताकेँ प्राप्त कऽ रहल अछि। गप्ल गुच्छ पढ़ैत काल जे कथा वा पाँति बेसी प्रभावित कएलक ओहि सबहक विषयमे कहब आवश्यक बुझाइत अछि। नीक-अधलाह कहबाक अधिकार तँ पाठककेँ होइते अछि। नव सामन्त- आब सामन्तबादी युग नहि रहल। किन्तु सामन्ती प्रवृति एखनो जीअते अछि। हँ, ओकरा रूपमे परिर्वन भऽ गेल अछि। आ ओ भिन्न-भिन्न रूपे समाजमे आइयो दृष्टिगोचर भऽ गेल अछि। एहि कथामे एकटा नव सामन्तक नवीन रूप लक्षित भऽ रहल अछि। सर्वशिक्षा अभियान- कथाक माध्यमसँ दलित आ गरीबक धीया-पुताकेँ पढ़ेबाक लेल उदासीनताक भावना व्यक्त भेल अछि। सरकार द्वारा मुफ्तमे देल गेल पोथी अदहरमे बेचि लैत अछि। कथाक पाँति- “आ दुसाधटोली, चमरटोली आ धोवियाटोलीसँ सभटा किताव सहटि कऽ निकलि गेल।” थेथर मनुक्ख- एहि कथासँ स्पष्ट होइत अछि जे मनुक्खक पूर्ण अद्य:पतन भऽ गेल अछि। एतेक जे मनुक्ख चिड़ई-चुनमुनी, परबा पौरकी धरिसँ नीचा उतरि थेथर भऽ गेल अछि। स्त्री-बेटा- एहिमे समाजमे स्त्रीगणक महत्वहीनता आ संगहि करवट लैत सामाजिक स्थिति-परिस्थिति चित्रण भेल अछि। विआह आ गोरलागइ- झण-झणमे मनुक्खक बदलैत रँग गिरगिटा जकाँ...... आ दहेजक लोभी बेकती संतोषी सन बेवहार देखा कऽ स्वयं लज्जित होइत छथि। आइयो कोन कोन रूपेँ दहेज लोभी दबकल अछि समाजमे आ कोन-कोन प्रपंची चालि चलि रहल अछि। से एहि कथासँ बुझाइत अछि। नीक चित्रण भेल अछि। प्रतिभा- चालाकी आ प्रतिभा दुनू अलग-अलग बात छैक। प्राप्तिक लेल दुनूमे सँ कोन महत्वपूर्ण सएह देखेबाक यत्न भेल अछि। मिथिला उद्योग- किछु कथाक कोनो गप्प पाठककेँ दीर्घकाल तक झंकृत कएने रहैत अछि। एहि कथामे गदहापर लादल जे संदेश भेटि रहल अिछ से बहुत दिन धरि पाठककेँ स्मरणमे रहत। रकटल छलहुँ कोहबर लय- स्त्री-पुरूषक बीच बनैत-बिगड़ैत सम्बन्ध आ छल-प्रपंच अपने-आपकेँ ठकइ आ ठकाइबला गप्पक मार्मिक विश्लेषण एहि कथा द्वारा भेल। हम नहि जाएव विदेश- कोन बेकतीकेँ हृदयमे कतेक कष्ट-पीड़ा आ हँसी-खुशी भरल अछि। ओकरा पूर्णतया उत्खनन करनाइ सम्भवो नहि अछि तथापि कथाकार तँ प्रयास करबे करता। एहि कथामे द्विजेन्द्रक मोनक व्यथाकेँ कथा पूर्णरूपेण उजागर भेल अछि। एकटा पाँति- “कोन सरोकार माएसँ पैघ छल यौ लाल। जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि रखने छी।” राग बैदेही भेरवी- एहि कथामे एकटा कलाकारक जीनगीपर रोशनी देल गेल अछि। कोना एकटा साधारण गामक गबैया सुख-दुख, सफलता आ विफलतासँ लड़ैत उच्चताकेँ प्राप्त कएलक तकर विशद वर्णन भेटैत अछि। बाढ़ि भूख आ प्रवास- हास्य-व्यंग्यसँ पूर्ण कथा अछि। लघु आकारक रहितहुँ ई कथा बहुत रास गप्पकेँ समेटने अछि। भूख आ भूखक कारणे उठैत मनक तरंग आ ओहि कारणे बेकती कतऽ सँ कतए प्रवास करैले जाइत अछि। आ ओहो स्थानपर कोना आशापर तुषारपात होइत अछि। एहि पाँतिकेँ पढ़लासँ स्वत: हास्य उपस्थित भऽ जाइत अछि। “सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहिनहिसँ विराजमान छी।”- बैदिक जी अल्हुआसँ हाथ जोड़ि कहैत अछि। नूतन मिडिया- आधुनिक मिडिया कोन तरहेँ चलि रहल अिछ। से उजागर भेल अछि। जाति-पाति- एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद पाँति याद अबैत अछि- “देखनमे छोटन लागै जाति पातिक दंश” बहुपत्नी वियाह आ हिजड़ा- एहि कथामे एकसँ अधिक पत्नी कएलासँ जे समाजमे सड़ांध पैदा भऽ रहल अछि। कोन-कोन रूपेँ ओकर बिकार निकलैत अछि तकर वर्णन भेल अछि। किछु पाँति- “...भातिज सभकेँ नहि मानैत छिऐक तैं भगवान बच्चा नहि देलन्हि।” बाणवीर- एहि कथामे बाणवीरक मनोिवश्लेषण नीक जकाँ भेल अछि। समूहसँ कटल बाणवीर कतेक अथाह पीड़ामे संघर्ष करैत जीनगीक एक-एक पल कटैत रहैत अछि से कथासँ स्पष्ट भऽ जाइत अछि। बाणवीरक एहि कथनमे कतेक मर्म छिपल अछि- “माए बाबू! हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिए लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ। से ठीके अछि की?”....कन्नारोहट उठि गेल। अनुकप्पाक नोकरी- लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक। हुनका भाएक मरलापर भेटलन्हि। एहि कथाक सार अछि। मृत्युदंड- कथाक द्वारा देखाओल गेल अछि जे कोना बालिका आर्याकेँ मृत्युदंड मिल जाइत अछि जेकर कोनो दोष नहि छल। बेगुनाहकेँ दण्ड। सेहो मृत्युदंड। एहेन अछि एहिठामक समाज। जेकरा सहजताक संग स्वीकारो कऽ लेल जाइत अछि। एखनुक समाजक दरपन जकाँ कथा लगैत अछि। एहि तरहेँ गल्प गुच्छक कथा सभकेँ बाद बुझाइत अछि जे वर्तमान समस्याकेँ यर्थाथ रूप प्रगट भेल अछि। छोट-छोट दृश्य खंड काव्यात्मक रूपसँ सोझा आएल अछि। कथावस्तुमे मिथिलाक माट-पानिक गंध अछि। किछु कथा अत्यन्त लघु तथापि उदेश्य प्रकट भऽ गेल अछि जे सम्पूर्ण देशक यथार्थनाकेँ समेटने अछि। सहस्त्रबाढ़नि (उपन्यास)- प्राचीनकालहिसँ सहस्त्रबाढ़निक विषयमे उत्सुकताक संगहि अनुमान कएल जाइत रहल अछि। अनुमानित व्याख्या आ समीक्षा होइत रहल अछि। विज्ञान द्वारा अलग ढंगसँ आ साहित्य तथा अध्यात्म द्वारा अलग-अलग ढंगसँ। अहाँक उपन्यासक पात्र एहि सम्बन्धमे कहैत अछि- “खसैत लहास, कनैत हुनकर सबहक परिवार। सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्त्रबाढ़निक रूप बनि कए। हमरे सन कोनो शापित आत्मा अछि ओ सहस्त्रबाढ़नि जे अपन संघर्ष अधखिज्जू छोड़ि मरि गेल होएत आ आब ब्रहमाण्डमे घुरिया रहल अछि। आब देखू तीनू बच्चाक परीक्षा परिणाम सभदिन प्रथम करैत अबैत रहथि, आब की भऽ गेलन्हि। हम जे संघर्ष बीचमे छोड़लहुँ तकर छी ई परिणाम।” नन्द हबोढ़कार भऽ कानए लगलाह। एहि पाँतिकेँ जँ गम्भीरतासँ आत्मसात करए लगलहुँ तँ मात्र नामेटा नहि संगहि उपन्यासक सारतत्व एवं उदेश्यो प्रगट भऽ गेल। नन्दक चरित्र आर हुनका द्वारा कएल गेल संघर्षक रूप तथा मनक मनोविज्ञान स्पष्ट भऽ जाइत अछि। उपन्यासक भाषा शैली नवीन ढंगक अछि। वर्णात्मक शैलीमे आरम्भ भेल अछि। भाषामे चित्रात्मकताक एकटा उदाहरण- “एकदिन कलितकेँ देखलहुँ जे ठेहुनियाँ दैत आगू जा रहल छथि। आंगनसँ बाहर भेलापर जतए आँकर-पाथर देखलन्हि ततए ठेहुन उठा कऽ मात्र हाथ आ पाएरपर आगू बढ़ए लगलाह।” किछु एहि तरहक शब्दक प्रयोगसँ भाषामे आकर्षण आबि गेल अछि। जेना थाम्ह-थोम्ह, कानब-खीजब, काज-उद्यम, जान-पहचान, बूढ़-पुरान, घुमब-फिरब, टोका-टोकी, संगी-साथी, झगड़ा-झाँटी, तंत्र-मंत्र, पढ़ाइ-लिखाइ इत्यादि। उपन्यासक भाषा मैथिली पाठककेँ अनुकूल अछि जहिना लोक बजैत छथि तहिना सहज ढंगसँ वर्णित अछि। झिंगूर बाबू, नन्द आ नन्दक भैया, भातिज, बेटा, नवल जी झा, आरूणि आ हुनक माए-बाबू, बहिन, कलित आ हुनक पत्नी, शशांक, मणीन्द, भौजी, शौभा बाबू बुचिया इत्यादि पात्रक माध्यमसँ कथावस्तु संगहि चरित्रक विकास भेल अछि। जाहिमे मौलिकताक संगहि स्वाभाविकता अछि। नव दृष्टिकोणसँ सहजताक संग चरित्र सबहक विकास भेल अछि। जे उपन्यासक अनुकूल अछि। मिथिलाक नदी-कमला, कोशी, बलान अादिक वर्णन भेल अछि। संगहि एहिठामक गाम घर- झंझारपुर, मेहथ, गढ़िया, कनकुआर, कछवी आदि वर्णनसँ सहजहि कथामे मिथिलाक माटि-पानिक गंध आबि गेल अछि। कथोपकथनमे संक्षिप्ता आ सहजता अछि। उदाहरण स्वरूप किछु अंश देखल जा सकैत अछि। आरूणि दू-तीन कौर खा कऽ उठि गेलहा। हुनकर संगी करण पुछलखिन्ह- “पता नहि। घबराहटि भऽ रहल अछि।” “काल्हि ट्रेनिंगपर जएबाक अछि ने। ताहि द्वारे।” “पता नहि।” ताबत भीतरसँ अबाज आएल। सभ क्यो दौगलाह। कथोपकथन जीनगी आ पात्रानुकूल अछि। “की बजलहुँ बेटा”- माए पुछलखिन्ह। “नहि। ई कॉलोनी देखि कऽ किछु मोन पड़ि गेल।” “नहि देखू ई पपियाह कॉलोनीकेँ।” उपन्यास मनोविश्लेषणक संगहि दर्शनसँ सेहो पुष्ट अछि। “पृथ्वी विशाल अछि आ काल निस्सीम, अनंत। एहि हेतु विश्वास अछि जे आइ नहि तँ काल्हि क्यो न क्यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत।” आशाक संचार करएबला ई वाक्य बारम्वार मनमे उठैत अछि। जीनगीक संचालित करबाक लेल तँ आवश्यक अछि जीनगीक रस। वएह रस थिक- आशा। जँ जीनगीमे आशा, अभीप्सा नहि होइ तँ जीवन निरर्थक। “आरूणिकेँ लगलन्हि जे ओ झोंटाबला सहस्त्रबाढ़नि झमारि कए एहि विश्वमे फेक दैत छन्हि हुनक।” कथीले किछु किएक से प्रश्न उठैत अछि मनमे। यएह प्रश्न पाठककेँ बेर-बेर सोचैले मजबूर करैत अछि- बहुत रास गप्प। आ एक प्रश्नसँ जन्मैत अछि बहुत प्रश्न जे पाठककेँ एकटा अलग संसारमे लऽ जाइत अछि। मनुष्यक प्रवृतिकेँ सम्बन्धमे ई पाँति देखल जा सकैत अछि- “मनुष्यक प्रवृतिये होइछ, समानता आ तुलना करबाक साम्य आ वैषम्यक समालोचना आ विवेचनामे कतेक गोटे अपन जीनगी बिता दैत छथि। आरूणि आ नन्दक बीच सेहो अनायासहिं साम्य देखल जा सकैत अछि।” उपरसँ मानव भिन्न-भिन्न प्रवृतिकेँ होइत अछि। किन्तु मूलमे गहराइसँ अन्वेषण कएल जाए तँ किछु तलप सभ मनुष्य लगभग साम्य होइत अछि। अन्त:मे वएह रस नि:सृत होइत रहैत अछि। किन्तु ओतेक शान्त भाव आ ओतेक गम्भीरतासँ स्वंयकेँ देखनाइ सहज गप्प तँ नहि थिक। उपन्यासक आकार लघु रहितहुँ कथा वस्तुक पूर्ण विकास भेल अछि। कथाक अनुकूल अछि भाषाक संतुलित ढंगसँ प्रयोग भेल अछि। नव वस्तुक नवीन दृष्टिकोणसँ अभिव्यक्ति भेल अछि। मौलिकतासँ पूर्ण अछि। वर्तमानमे मैथिली साहित्यक प्रगतिक लेल अहाँ सन बेकतीकेँ आवश्यकता अछि। जे एकभगाह होइत मैथिलीकेँ संंतुलित करता आ संगहि स्वयं तँ अग्रसर होएबे करताह दोसरोकेँ आगू बढ़बाक सुअवसर देताह। एहि दृष्टिकोणसँ अहाँक प्रयास अवर्ण्य अछि। एकटा पाँति स्मरण भऽ गेल- अहीं सन मैिथली सेवकपर अछि हमरा सबहक आस भरब भण्डार मैथिलीक अछि पूर्ण विश्वास। ४. धीरेन्द्र कुमार प्रीति ठाकुरक दुनू चित्रकथापर धीरेन्द्र कुमार एक नजरि- मैथिली साहित्यमे पहिल बेर श्रुति प्रकाशन, नई दिल्लीसँ प्रकाशित िचत्रकथा उमेश जीक माध्यमसँ भेटल। साहित्य पूर्ण तखने होइत अछि जखन साहित्य सभ विधामे लिखल जाए आ रचना प्रौढ़ होइ। हमर दृष्टिमे चित्रकथामे प्रीति ठाकुरक रचना मैथिली लोक-कथा आ गोनु झा आन मैथिली िचत्रकथा, सफल रचना थीक। लेखिका धन्यवादक पात्र छथि, एहि कारणे जे मैथिली दिसि हुनक दृष्टि गेलनि। दोसर कारण ई जे मैथिलीक विरासतमे जे कथा लोकमुखमे सुरक्षित अछि तकरा ओ लेखनिक रूप प्रदान कऽ मैथिलीक चित्रकथा विधा जे नगण्य सन अिछ- ताहिकेँ समृद्ध करक प्रयास केलनि अछि। मैथिली चित्रकथामे ‘मोती दाइ, राजा सजहेस, बोधि-कायस्थ, बहुरा गोढ़िन नटुआ दयाल, अमता घरेन, दीना भदरी, जालिम सिंह, नैका बनिजारा, रघुनी मरड़, विद्यापतिक आयु अवसान आ गोनु झा आ आन मैथिली चित्रकथामे प्रकाशित अछि ‘गोनु झा आ माँ दुर्गा, गोनु आ स्वर्ग, गोनु आ स्वर्ण चोर, गोनु झा आ विलाड़ि, गोनु झाक दूटा बरद, गोनु झाक महीस, गोनु झाक अशर्फी, गोनु झा आ कर अधिकारीक दाढ़ी, गोनु झाक माए, रेशमा चूहड़मल, नैका बनिजारा, भगता ज्योति पजियार, महुआ घटबारिन, राजा सलहेस, छेछन महराज, राजा सलहेस आ कालिदास। सभटा कथा मिथिलाक धरतीसँ सम्बद्ध अछि आ एखन धरि लोक मुखमे सुरक्षित अछि। समैएक परिवर्तन संगे लोक रूचि आ लोक संस्कारमे परिवर्त्तन सेहो होइत अछि। अपन देशक गप्प लिअऽ। आइ पोथीमे सुरक्षित अछि आयुर्वेद विद्या, यूनानी विद्या, होमयोपैथी आ कतेक रास ज्ञानसँ समर्पित विद्या। जँ पोथीमे सुरक्षित नहि रहत तखन अगिला पीढ़ी एहि विद्यासँ अनभिज्ञ रहि जाएत। तेँ हमर मिथिलामे जे कथा पसरल अछि ओकरा पोथी स्वरूपमे प्रदान कऽ प्रीति ठाकुर जी प्रशंसनीय काज केलनि अछि। वीरवलक कथा भऽ सकै छल जे लोक विसरि जाइत मुदा पोथी स्वरूपमे रहलासँ आइ धरि ओ लोक-मानसक रंजनक माध्यम बनल अछि। चित्रकथाक अपन महत्व होइत अछि। वाह्य-सँप्रेषणसँ जे प्रभाव वंचित रहि जाइत अछि ओ सँप्रेषित होइत अछि चित्रसँ। नाटकमे अभिनयसँ जे सँप्रेषित नहि होइत अछि ओ सँप्रेषित अछि रंग, ध्वनि आ प्रकाशसँ तहिना चित्रकथामे सेहो होइत अछि। प्रसुत आलोच्य पोथीक चित्र सशकृ अछि। वाल साहित्य लेल ई काज प्रति जीक सराहनीय छन्हि। चारि वर्खक नेना जेकरा अक्षर बोध नहियो छै सेहो कथाकेँ परेख सकैए। चित्रक माध्यमसँ। वाल साहित्यक जे अभाव अपना मैथिलीमे अछि ताहिपर बड़का-बड़का विद्वानक अछैत थोड़ेकवो ध्यान नहि देल गेल छल आ खास कऽ एहि तरहक। पोथी आकर्षक, रूचिकर आ बालमनकेँ प्रभावित करैत अछि। एहि लेल हम फेर एक वेर श्रीमती प्रीति ठाकुरकेँ धन्यवाद दैत छिएनि। संगे आशा करब जे आगाँ सेहो एहि तरहक काज करथि। धीरेन्द्र कुमार निर्मली, सुपौल, विहार। नवेन्दु कुमार झा १. राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद २. दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद १. राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटीक महासचिव राहुल गाँधी मिथिलांचलसँ कांग्रेसक चुनावी अभियान प्रारम्भ कऽ सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धनक घटक भाजपा आ जद यू तथा विपक्षी राजद-लोजपा गठबंधनक बेचैनीकेँ बढ़ा देलनि अछि। पछिला दू दशकसँ प्रदेशक राजनीतिमे कतिआएल कांग्रेसक युवराज श्री गाँधी मिशन बिहारक अन्तर्गत पार्टीक नेता सभकेँ सक्रिय कएने छथि। एहिसँ पहिनहु श्री गाँधी बिहारक दौरापर आएल छलाह तँ मिथिलांचलक हृदयस्थली दरभंगाक दौराक बिहार राजनीतिक हबा-बयार नेने छलाह। हुनक ओहि दौराक बाद प्रदेशमे कांग्रेसक प्रति आकर्षण बढ़ल अछि। संगहि युवा कांग्रेसक पदाधिकारीक मनोनयनक जे परम्परा छल ओकरा समाप्त कऽ सीधा चुनाव जे करौलनि एहिसँ प्रखण्ड स्तरसँ प्रदेश स्तर धरि युवा नेताक नव समूह ठाढ़ भेल अछि आ ई कांग्रेसक भविष्यक रूपमे अछि। श्री गांधीक बिहार दौराक संगहि प्रदेशमे चुनाबी अभियान प्रारम्भ भऽ गेल। ओ अपन एक दिवसीय दौराक क्रममे कोसी क्षेत्रक सहरसा आ समस्तीपुरमे जनसभाकेँ संबोधित कएलनि। श्री गांधी एहि दरमियान पूरा तरहे युद्धक लेल तैयार बुझि पड़लाह। ओ एक दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आ हुनक सरकारपर हमला कएलनि तँ दोसर दिस एहि बेरक चुनावमे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह करबाक लेल तैयार युवा पीढ़ीकेँ संग जोड़बाक प्रयास सेहो कएलनि। ओ स्वीकार कएलनि जे बिहारमे एखन कांग्रेस कमजोर अछि। मुदा एहि लेल बेसी चिन्ता नहि करबाक अछि। ओ कहलनि जे उत्तरप्रदेशमे सेहो हम जखन प्रयास प्रारम्भ कएने छलहुँ तँ लोक हँसी उड़ौने छल। ओ जनताकेँ विश्वास देऔलनि जे किछु समए तँ जरूर लागत मुदा जमीनी स्तरक समस्या आ गाम घरक बात पटना धरि जरूर पहुँचत। ओ युवा दिस संकेत करैत कहलनि जे बिहारमे जे पछिला बीस वर्षसँ परिस्थिति बनल अछि ओकरा बदलबाक लेल आगाँ आबथि आ एकटा युवा सरकार बनाबथि। एहि लेल युवाकेँ आगाँ आनल जाएत आ थकल लोककेँ कतियाकऽ एकटा विकसित बिहार बनाओल जाएत। कांग्रेस महासचिव एहि दौराक बाद राजनीतिक बजार गर्म होएब स्वाभाविक अछि। दरअसल एहि बेर राजनीतिक गठजोड़ आर मजगूत भऽ रहल अछि। ओना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विकासक मुद्दापर चुनाव लड़बाक बात कहि रहल छथि मुदा ओ भीतरे-भीतर महादलित आ अति पिछड़ाक रूपमे एकटा नव वोट बैंक तैयार कऽ राजद आ लोजपा गठबंधनकेँ चुनौती दऽ रहल छथि तँ दोसर दिस राजद आ लोजपाक पी एम आर वाइ समीकरणक माध्यमसँ जद यू आ भाजपाक मोकाबला करबाक स्थितिमे अछि। एहि राजनीतिक समीकरणक मध्य जे सभसँ महत्वपूर्ण भऽ गेल अछि ओ अछि सवर्ण मतदाता, जाहिपर भाजपा-जद यू आ राजद-लोजपा दुनूक अछि आ कांग्रेसक एहि वर्गमे भऽ रहल घुसपैठ दुनू गठबंधनक लेल खतराक घंटी बनि गेल अछि। राहुल गाँधीक किछु मास पहिने भेल बिहार दौराक केन्द्रमे युवा शक्ति छल आ ओ सभ ठाम युवा सभसँ सीधा संवाद कएलनि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आएल अछि। बिहारमे पछिला बीस वर्षसँ घेराएल पंजा छापबला झण्डा एखन गामे-गाम देखल जा रहल अछि। एकर अर्थ ई नहि जे कांग्रेस सरकार बनेबाक स्थितिमे आबि गेल अछि। मुदा वर्तमान राजनीतिक हवा जे चलि रहल अछि आ ई चलैत रहल तँ अगिला विधान सभाक चुनावमे कांग्रेस सत्ता सन्तुलन करबाक स्थितिमे अवश्य रहत। पार्टीक सूत्रसँ जे जनतब भेटि रहल अछि ओ संकेत करैत अछि जे पार्टी आलाकमान एहि बेर गोटेक १३० सीटपर गम्भीर रूपसँ चुनाव लड़त आ बाकी बाँचल ११३ सीटपर ओ अपन शक्ति बढ़ेबाक लेल चुनाव लड़त। कांग्रेसक ई रणनीति राजग आ राजद-=लोजपाक लेल खतरा बनि सकैत अछि। ओना बेसी खतरा भाजपा आ जद यू गठबन्धनकेँ अछि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आबि गेल अछि। लोकसभा चुनावमे कांग्रेस कतिया गेल छल मुदा ओकर बाद भेल विधानसभाक उप चुनावमे अठारह सीटपर एसगर लड़ि दूटा सीटपर विजय प्राप्त कऽ भाजपा-जद यू केँ कतिया देलक जकर लाभ राजद आ लोजपाकेँ भेल। बिहार प्रदेश कांग्रेसक राहुल गाँधीपर भरोसा अछि तँ राहुलक नजरि बिहारक युवापर अछि। जातिक मजगूत राजनीतिबला एहि प्रदेशमे कांग्रेसक रणनीतिक अनुरूप जातीय हवा चलल तँ एहि बेरक विधान सभा चुनावमे बिहारक युवा राहुलक लेल आगाँक रस्ता तैयार कऽ सकैत छथि। २ दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद: दू वर्ष पहिने कोसी क्षेत्रमे कुसहाक टूटल तटबन्धसँ भेल प्रलयक बाद एहि क्षेत्रक दशा-दिशा बदलि गेल छल तँ एहि दुर्दशाक अबाज बनि कऽ देशक पहिल मैथिली दैनिक “मिथिला समाद” सोझाँ आएल। ३१ अगस्त २००८ केँ प्रवासी मिथिला समाजक प्रयासक बाद एहि दैनिकक प्रकाशन मैथिली पत्रकारिताक एकटा नव अध्याय प्रारम्भ कएलक। एहि दैनिककेँ मैथिलीभाषीक भेटल स्नेहक बदौलति निर्बाध रूपेँ प्रकाशित होइत दू वर्ष पूरा करएमे सफलता भेटल। मैथिली पत्रकारिताक शून्यताकेँ तोड़ि मिथिलांचल आ प्रवासी मिथिला समाजक जन समस्याकेँ सोझाँ अनबाक लेल सतत प्रयत्नशील अछि। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम सूचीमे सम्मिलित कऽ सम्मान देलनि तँ पत्रकारितासँ जुड़ल कोलकाताक राजेन्द्र नारायण वाजपेयी मैथिली भाषामे ताराकान्त झाक सम्पादकीय दायित्व मिथिला समादक प्रकाशन कऽ एहि भाषाक मान बढ़ौलनि अछि। मैथिलीमे दैनिक समाचार पत्रक प्रकाशन हो एहि लेल बिहारक राजधानी पटना आ मिथिलांचलमे कतेको बेर मंथन भेल मुदा ओकर कोनो सार्थक परिणाम एखन धरि सोझाँ नहि आएल अछि। आखिरकार प्रवासी मिथिला समाजक प्रयास सफल भेल आ मिथिला समाद डेगा-डेगी दैत दू वर्षक भऽ गेल। ओना कोनो भाषामे दैनिक पत्रक प्रकाशन कठिन काज अछि ओहूमे मैथिली भाषामे पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन कल्पना मात्र कएल जा सकैत अछि तथापि प्रवासी मैथिल हिम्मत देखौलनि अछि। प्रवासी मैथिलक प्रयाससँ कोलकातासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला समाद आ नव दिल्लीसँ गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादनमे उपलब्ध ई-पत्रिका “विदेह” मैथिली पत्रकारिताकेँ आक्सीजन दऽ जीवित रखने अछि। अल्प संसाधन आ सीमित पाठक वर्ग होएबाक बादो मैथिली भाषी प्रबुद्ध पाठकक बले ठाढ़ भेल अछि। मैथिल समाजक सुधि पाठकक स्नेहक परिणाम अछि जे एकटा गएर मैथिल एहि दैनिकक लेल संसाधन उपलब्ध करा मैथिली पत्रकारिताक भोथ भेल धारकेँ तेज कएलनि अछि आ ई मिथिलांचल आ प्रवासी मैथिल समाजक सशक्त अबाज बनबाक प्रयास कऽ रहल अछि। ज्योँ एहिना पाठकक स्नेह आ सहयोग भेटैत रहल तँ लोकतंत्रक चारिम खम्भा मजगूत होएत आ मिथिलांचलक चतुर्दिक विकासक रस्ता निकलत। संगहि मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे एकटा नव युग प्रारम्भ होएत। १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू”- हास्य-कथा- कब्जियत दूर भगाउ २. गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर १ शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न। कब्जियत दूर भगाउ (शीर्षक श्री उमेश मंडलजीक सौजन्यसँ) बड़की भौजी भोरेसँ आनंदक क्षीर-सागरमे गोता लगा रहल छलीह किएक नहि, हुनक बावा जे आबि रहल छथन्हि। दुरागमनक वाद पहिल बेर बावाक अवाहनक आशमे रंग-विरंगक पकमानक संग स्वागत करवाक लेल ओ आतुर....। हमरा समस्तीपुर जएवाक छल, मुदा बावूजी रोकि लेलाह। “परम प्रिय समधि आवि रहल छथि, चौरासी बर्खक भऽ गेलाह, नहि जानि फेरि आवि सकताह वा......। अहाँ काल्हि भरि रूकि जाऊ।” पितृ आदेश सिरोधार्य, आर्द्रा नक्षत्रक बरखासँ दलानक परिसर बज-बज कऽ रहल छल तेँ पुनीतकेँ सुरखी छिटवाक लेल कहल गेल। हम कोदारिसँ चिक्कन कऽ रहल छलहुँ। एतवामे गुंजन विहारि जकाँ दोड़ल आबि कऽ कहलक- “सरपंच सहाएब आवि गेलाह, निसहर भुइयाँ थान लग हम देखलहुँ।” “हम पहिने कहने छलहुँ समधि भोरूक बससँ औताह मुदा, हमर के सुनए, भोज कालमे कुम्हर रोपू आव बाट साफ करवाक कोनो प्रयोजन नहि, दौड़ कऽ जाउ आ हुनका लए अवियौ।” गुंजन खिसिआइत बाजल- “हुनका के आनत, बाए.... बाबा तँ आवि गेलाह।” समधि मिलान भेल, तत्पश्चात बावूजी हुनक चरण स्पर्श कएलनि। बावा अशोकर्ज देखएवाक प्रयास करए लगलाह मुदा, व्यर्थ। अपने हमर समधिक पिता छी तेँ हमरो लेल पितृतुल्य। बावू जीक तर्कक आगाँ सरपंच सहाएव मूक....। झट-झट सभ गोटे चरण स्पर्श करए लगलहुँ। असलानी चौकी, खराम, जल..... पूर्ण मिथिलाक संस्कृतिसँ अभिनंदन। बावा गदगद होइत बजलाह- “कादम्बिनीक एहि घर वियाह करबाक निर्णए हमर जीवनक सभसँ सोझ निर्णए प्रमाणित भेल अछि। मनुक्खकेँ अपन संस्कार नहि छोड़वाक चाही।” कुड़ा-अछमनिक पछाति जलपान, चाह.....ओकरा वाद प्रसिद्ध पतैलीक प्रसिद्ध पान चिबवैत गुंजनकेँ बजौलनि- “बौआ, कोन किलासमे पढ़ैत छी?” गुंजन बाजल- “छठामे.....।” गुंजनक जबाव पूर्ण भेल नहि की बिचहिमे हमरा मुँहसँ निकलल- “मुदा, विद्यासँ हिनक कोनो संबंध नहि, एखन धरि विचाराधीन होइत कक्षा पार कऽ रहल छथि।” ई बात सुनिते बावू जी हमरा दिशि आँखि गुरडि़ कऽ विद-विदेलाह- “देखि लेब चारू भाँइमे छोटका सभसँ आगाँ जएत।” सरपंच बावूक मूक समर्थन। हँसी-ठ्ठाकक बाद बावाक आंगन प्रवेश भाव आ मर्मक अनुभूतिक साक्षात दर्शन। भौजी बावाकेँ गोर लागि अश्रुधारसँ नहा गेली। हमरा मुँहपर मंद मुस्की मुदा गुंजन दहोवहो। भौजी अपन भावनापर अंकुश लगा कऽ गुंजनकेँ पुचकारए लगलीह। सभ व्यक्ति बूझि रहल छल, मुदा सबहक ठोर जग्रनाथकक फाटक जकाँ बंद......। मातृ सुखसँ वंचित नेेना ककरो आँखिपर नोर नहि देखि सकैछ। सरपंच सहाएव बजलाह- “नहि हहरू, भौजीकेँ माएक रूपमे देखू।” हम मोने-मन बजलहुँ- “कहव अासान मुदा, एना भऽ सकैत अछि। केओ कतवो मानए परंच मातृ प्रेमक आगाँ सभ अोछ।” भौजीक सिनेहमे कोनो कमी नहि, ई गप्प हम बूझव गुंजन अवोध, माएक संग पिठिया जकाँ लड़ैत छल ओहि क्षणकेँ विसरव असंभव तँ नहि, क्लिष्ट अवश्य अछि। मझिनीक पश्चात बावा दलानपर आबि दिवस विश्राम करए लगलाह। बावूजी शनि पेठिया माँछ किनवाक लेल िवदा भऽ गेलनि। एक मनुक्खक कतेक रूप भऽ सकैत अछि। अपने शाकाहारी परंच पाहुनक लेल मॉछ अपने आनव। पाहुन की? हमरो सबहक लेल ओ अपने मॉछ अनैत छथि। अपन संतति लेल लोक की की नहि करैत अछि, माटिक ढेपकेँ कुम्हार बनि कऽ घैलक रूप दैत अछि। सुधा कोष बनाएवाक लेल अपन सकल मनोरथकेँ झाँपि लैत अछि। सुधाकोष आगाँ कोन रूपक हएत ककरो वशमे नहि। ऑगन आबि हम भौजीसँ चाह बनएबाक आग्रह कएलहुँ- “आइ भरि हमरा छोड़ दिअ अपने स्टोप जड़ा कऽ बना लिअ।” हमरो खराव नहि लागल, अपन पितृक प्रति सिनेह स्वाभाविक अछि, मॉछ तड़ैत छलीह। मात्र बब्बेटा नहि खएताह, हमहुँ खाएव। ‘गह-गट्ट रौ, गहगट्ट रौ......सुनिते भागल दलान दिशि अएलहुँ। दलानपर दसौत गामक भाट क्यो टाटक कए रहल छलाह। भाटक नाओ मोन नहि मुदा सभ कियो हुनका मुकेश कहैत छथि। ओ नकिया कऽ गीत सुनावए लगलाह- “सिनेहिया विसरि बैसल अछि गाम....” बावूजी भाटक संग समधिक साक्षात्कार करौलनि। हमर बड़का बालकक अजिया ससुर छथि, अपन गामक निर्विरोध सरपंच छलाह। सरपंच सहाएवक विशुद्ध मैथिली सुनि भाट महाशय गावए लगलनि- “रैनी-भैनी ओ रौतिनिया दीप गोधनपुर कैथिनिया पाँच गाम पचही परगन्ना उत्तम गाम ननौर तेली-सूड़ी बसए मधेपुर लंठक ठट्ठ लखनौर” “सरपंच सहाएव, हम दस-दुआरि छी तेँ नीक अधलाह बूझैत छी। अपने अपन पोतीक वियाह करियन कएलहुँ.... इहो नीक गाम मुदा अछि तँ दक्खिन। लेकिन अपनेक समधि मूल रूपसँ कैथिनिया गामक वासी छथि.... झंझारपुर टीशनक सटल गाम- ‘कैथिनिया’। हिनका दछिनाहा नहि कहल जा सकैत अछि ई सुनिते सरपंच सहाएवकेँ जेना विरनी काटि लेलक....। क्षमा करू मुदा हम तँ शुद्ध दछिनाहा छी। हसनपुर चीनी मिलक पॉजरि लागल गाम शासन हमर जन्म आ कर्मभूमि।” दू क्षणक लेल मुकेश जी मूक भऽ गेलाह। मुदा छथि तँ सिद्धहस्त मैथिल, क्षणहिमे भरवा बदलि गेल। अहोभाग्य अपने सन महान व्यक्तिक दर्शन भेल। शासन गाम मिथिलाक चर्चित गाम अछि। ओहि ठॉक सती माताक महिमा के नहि जनैत अछि? बिड़ला परिवारक द्वारा अपने गाममे सती माताक समृति स्वरूप तोड़ण द्वारक निर्माण कएल गेल अछि। एकटा बात पूछवाक दु:साहस कऽ रहल छी दक्खिन भरक रहितहुँ अपने परिमार्जित मैथिली बजैत छी..... से कोना? अवश्य अपनेक मातृक पंचगामक परिधिमे हएत। “नहि मातृक दक्षिणे अछि आर सासुर तँ विशुद्ध दक्षिण मंझौल गाम, बेगूसरायमे अवस्थित अछि।” बाबाक व्यथा सुिन बावूजी अकचका गेलथि, मुकेश बावू दीर्धसूत्री जकाँ किएक धमगिज्जरि केने छी। जौं औतुका मैथिली सुनवै तँ बहुत भलमानुषकेँ विसरि जाएव। एहि सबहक लेल अहॉंक कोनो दोष नहि किछु लोक एहि प्रकारक भेद पैदा कऽ मातृभाषाकेँ हथियावए चाहैत छथि ई नहि चलऽ देव। यात्रीक गामसँ उतरो कोनो गाम अछि तँ हुनको दछिनाहा मानल जाए। प्रो. सुमन जी, प्रवासी जी, आरसी बावू, बुद्धिनाथ मिश्र, लाभ जी, हरिमोहन झा, हासमी जी, शेफालिका वर्मा इहो सभ दछिनाहा छथि तेँ हिनका सभकेँ बारि दियौ। जाहि महाकवि विद्यापतिक नाओपर कूदैत छी ओ अपन महापरि निर्माण दक्खिनेमे कएलनि। पाप करैत छी तिरहुतमे आ पतिया कटएवाक लेल गंगाकात सिमरिया दक्षिणे अबैत छी। जा.... मुकेश जी क्षमा करू, अपनेकेँ हम ई सभ किएक कहि रहल छी, अहूँ तँ दछिनाहे छी..... समस्तीपुर जिलाक दसौत ग्राम वासी।” सरपंच सहाएवकेँ संतोखक अनुभूति भेलनि, मुदा हम हुनक छोभक स्पष्ट दर्शन कऽ रहल छलहुँ। बावूजी सँ मुकेश जी क्षमा याचना करैत बजलाह- “हमर दोख नहि एहेन मानसिकताक मध्य पैघ भेलहुँ।” सरपंच सहाएव दीर्घ श्वास लैत बजलाह- “मैथिलीक मध्य एकटा विडंबना अछि अपनाकेँ श्रेष्ठ प्रमाणित करवाक लेल दोसरकेँ मरोड़ि देवाक। हमरा सबहक ब्रह्मण समाजमे पहिने बेसी छल, आव सुधरि रहल अछि। सुरगणेकेँ सुगरगणे कहल गेल अड़रियेक मॉथपर तँ पैघ कलंक-हुनका अनेड़िये कहल जाइत अछि। आन जाइतक कोन कथा हुनका सभकेँ मैथिल बुझले नहि गेल।” एहि दशापर कानी वा हँसी निर्णए नहि कऽ सकलहुँ। ऑगनसँ भोजनक निमंत्रण आएल। मुकेश जी भात नहि खएवाक इच्छा प्रकट कएलनि किएक तँ कब्जियतक शिकार छथि। बावू जी अपन कविता पॉती जकाँ चिकित्सा आयाम देखौलनि- “दस्त-दस्तावरं खातिर भक्क्षेत अमृतं फलं। (पेट साफ करबाक लेल लताम खाक)।” सरपंच सहाएव तत्क्षण बजलाह- “यदि अहूसँ नहि ठीक हो तँ ताहूसँ दस्त नहि होतं तँ कूथि-कूथि मरीयते।” दोसर दिन बाबा चलि गेलाह मुदा हुनक “दछिनाहा व्यथा” हमर मोनमे जीवित छल। आव ओ संसारमे नहि छथि परंच दिशा मोन पड़िते हुनक मर्मक अनुभूति प्रासंगिक अछि। २ गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।
लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।
मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।
मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।
उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।
कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।
अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका । सम्पादन: अन्तर्जालपर विदेह ई-पत्रिका “विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com २.१ शब्दशास्त्रम् सिंह राशिमे सूर्य, मोटा-मोटी सोलह अगस्त सँ सोलह सितम्बर धरि। किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। सिंह राशिमे मिलूक पिताक तालपत्र सभ पसरल रहैत छल, वार्षिक परिरक्षण योजना, जे एहि तालपत्र सभमे जान फुकैत छल। आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ करैत रहथि। कड़गर रौदमे तालपत्र पसारैत आनन्दा, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। मुदा एहि बरखक सिंहराशि अएलासँ पूर्वहि आनन्दा चलि गेलीह... आ आब जखन ओ नहि छथि तखन जीवनक परिरक्षण कोना होएत। मिलूक आ ओहि तालपत्र सभक जीवनक.. भ्रम। शब्दक भ्रम। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे कटबै चनन गाछ, बेढ़बै अँगनमा छुटि जेतऽ कोइली घऽमचान हे कानऽ लगली खीजऽ लागल, बोन के कोइलिया टूटि गेलऽ कोइली घऽमचान हे जानू कानू जानू की, जोबोन के कोइलिया अहि जेतऽ कोइली घऽमचान हे जहि बोन जेबऽ कोइली रहि जेत तऽ निशनमा जनू झरू नयना से लोर हे सोने से मेढ़ायेब कोइली तोरो दुनू पँखिया रूपे से मेरायेब दुनू ठोर हे जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे कोनो युवतीक अबाज चर्मकार टोलसँ अबैत बुझना गेल..आनन्दाक अबाज। मुदा आनन्दा तँ चलि गेली, कनिये काल पहिने ओकर लहाश देखि आएल छथि बचलू। मिलूकेँ समाचार कहि डोमासी घुरि गेल छथि। आ आनन्दा, ओ तँ बूढ़ भऽ मरलीहेँ। तखन ई अबाज, युवती आनन्दाक। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि मिलूक पिता श्रीधर मीमांसक मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। I शब्दशास्त्रम् गर्दम गोल भेल छल। अनघोल मचि गेल छलै। बलान धारमे कोनो लहाश बहल चलि जा रहल छल। धोबियाघाट लग कात लागल छल। कतेक दूरसँ आएल छल से नहि जानि। कोनो बएसगर महिलाक लहाश छल। धोबिन लहाशकेँ चीन्हि गेल रहथि। गौआँकेँ कहि दै छथि ओकर नाम आ पता। गौआँ के, वैह गामक डोमासीक बचलूकेँ। मृतकक घरमे खबरि भऽ गेल छलै। एसकरे एकटा बुढ़ा रहैए ओहि घरमे...मिलू। मिलूक टोलबैया गौँआ सभ लहाशकेँ डीहपर आनि लेने छल आ फेर मिलू ओकर दाह-संस्कार कऽ देने रहथि। गाममे अही गपक चर्चा रहै। बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि किछु आर गप। चिन्है छथि ओ ओहि लहाशक मनुक्खकेँ। नवका लोककेँ बहुत रास गप नै बुझल छै। आनन्दाक लहाश.. -आनन्दा बड्ड नीक रहै। बुझनुक। ओकर बचिया सभ सभटा सुखितगर घरमे छै..बेटा सेहो विद्वान। मिलू, आनन्दाक वर सेहो उद्भट..श्रीकर मीमांसकक पुत्र..। मुदा कहियो मिलू आकि आनन्दा कोनो खगतामे ककरो आगाँ हाथ नहि पसारने छथि। बचलू सेहो आब बूढ़ भऽ गेल छथि, झुनकुट बूढ़। हिनकासँ पैघ मात्र मिलू छथिन्ह। लोक सभ दुनू गोटेकेँ बुढ़ा कहि बजबै छन्हि। आ एहि बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि ढेर रास गप। ..... मिलू आ श्रीधरक वार्तालाप। किछु बुझिऐ आ किछु नहि। -मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे अविद्या जीवपर आश्रित अछि आ विषय बनि गेल अछि। आत्मसाक्षात्कार लेल कोन विधि स्वीकार करब? असत्य कथूक कारण कोना भऽ सकत? कोनो बौस्तुक सत्ता ओकरा सत्य कोना बना देत, त्रिकालमे ओकर उपस्थिति कोना सिद्ध कऽ सकत? जे बौस्तु नहि तँ सत्य अछि आ नहिये असत्य आ नहि अछि एहि दुनूक युग्मरूप; सैह अछि अनिर्वाच्य। बिना कोनो वस्तु आ ओकर ज्ञान रखनिहारक शून्यक अवधारणा कोना बूझऽमे आओत? -मिलू। कुमारिल कहै छथि आत्मा चैतन्य जड़ अछि, जागलमे बोध आ सूतलमे बोधरहित। -मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि। “आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।” ई गप मुदा सरिया कऽ बूझबामे आएल रहए हमरा। .... आमक मास रहै। बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि।” हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग आएल छलै। आमेक मास रहै। से मिलू ओगरबाहीमे लागत आब। आमक टिकुला पैघ भऽ रहल छै। मचान बान्हबाक रहै मिलूकेँ। हमहूँ संगमे रहियै। बाँस काटि कऽ अबैत रही। डबरा कात दऽ कऽ अबि रहल छलहुँ। भोरहरबा छल। अकास मध्य लाल रेख कनेक पिरौँछ भेल बुझना गेल छल। -लीख दऽ कऽ चलू बचलू। खेतक बीचमे लीख देने आगाँ बढ़ऽ लागलहुँ। तखने हम शोणित देखलहुँ। हमर देह शोनित देखि सर्द भऽ गेल। मुदा निशाँस छोड़लहुँ। बाँसक तीक्ष्ण पात एकटा बालिकाक हाथ आ मुँहकेँ नोछड़ैत गेल रहै। मिलूक बाँसक नोछाड़ ओकरा लागल रहै। मिलू हाथसँ बाँस फेकि कऽ ओहि बालिका लग चलि गेल छल। नोराएल आँखिक ओहि बालिकाक शोणित पोछि मिलू ओकर नोछारपर माटि रगड़ि देने रहै। -की कऽ रहल छी। -शोनित बन्न भऽ जाएत। बालिका लीखपर आगाँ दौगि गेल छलीह। -की नाम छी अहाँक। -आनन्दा। -कोन गामक छी। -अही गामक। -अही गामक? हम दुनू गोटे संगे बाजल रही। हँ, आनन्दा नाम रहै ओकर। आ मिलूक पहिल भेँट वैह रहै। ... मचानो बन्हा गेल रहए। मुदा आनन्दा फेर नहि भेटल रहए। मिलू पुछैत रहए। -कोन टोलक छी ओ। नहिये मिसरटोलीक अछि, नहिये पछिमाटोलीक आ नहिये ठकुरटोलीक। -डोमासीक रहितए तँ हम चिन्हिते रहितिऐ। -तखन कोना अछि ओ अपन गामक। आ अपन गामक अछि तँ आइ धरि भेँट किए नहि भेल रहए ओकरासँ। मुदा बिच्चेमे संयोग भेल छल। मिलूक टोलमे फुदे भाइक बेटाक उपनयन रहै। बँसकट्टी दिन पिपहीबलाकेँ बजबैले हम गामक बाहर चर्मकार टोल गेल रही। -हिरू भाइ, हिरुआ भाइ। -आबै छथि। कोनो बालिकाक अबाज आएल रहए। अबाज चिन्हल सन। -अहाँ के छी। -हम हिरूक बेटी। की काज अछि? -पिपही लऽ कऽ एखन धरि अहाँक बाबू नहि पहुँचल छथि। बजबैले आएल छियन्हि। -तही ओरियानमे लागल छथि। -अहाँक नाम की छी? तखने टाट परक लत्तीकेँ हँटबैत वैह बालिका सोझाँ आबि गेलि। -हम आनन्दा। हम अहाँकेँ चीन्हि गेल रही। अहाँक की नाम छी? हम तँ सर्द भेल जाइत रही। मुदा उत्तर देबाके छल। -बचलू। -आ अहाँक संगीक। -मिलू, पंडित श्रीधरक बेटा। मिलूक पिताक नाम सेहो हम आनन्दाकेँ बता देलिऐ। पुछने तँ नहि छलि ओ, मुदा नहि जानि किएक..कहि देलिऐ। तखने हिरुआ पिपही लेने आबि गेल रहथि। हुनका संगे हम अपन टोल आबि गेलहुँ। रस्तामे हिरुआकेँ पुछलियन्हि- आनन्दा अहाँक बेटी छथि। मुदा कहियो देखलियन्हि नहि। -मामागाममे बेशी दिन रहै छलै। मुदा आब चेतनगर भऽ गेल छै। से गाम लऽ अनने छिऐ। -फेर मामागाम कहिया जएतीह। -नञि, आब ओ चेतनगर भऽ गेल अछि। आब संगे रहत। पंडितजीक बेटा मिलू, हमर संगी मिलू, ई गप सुनि की होएतैक ओकरा मोनपर। कैक दिनसँ ओकर पुछारी कऽ रहल छल। हम सोचने रही जे भने मामागाम चलि जाए आनन्दा आ कनेक दिनमे मिलूक पुछारीसँ हम बाँचि जाएब। मुदा आब तँ आनन्दा गामेमे रहत आ पंडित श्रीधरक बेटा मिलू.. धुर..हमहीं उनटा-पुनटा सोचि लेने छी। ओहिना दू-चारि बेर मिलू आनन्दाक विषयमे पुछारी केने अछि। तकर माने ई थोड़बेक भेलै जे.. मुदा जे सैह भेलै तखन ?.. पंडितक बेटा आ चर्मकारक बेटी.. पंडित श्रीधर मानताह?..गौआँ घरुआ मानत? धुर। फेर हम उनटा-पुनटा सोचि रहल छी। पिपही बाजए लागल रहए आ लीखपर देने हम आ मिलू, भरि टोलक स्त्रीगण-पुरुषक संगे बँसबिट्टी पहुँचि गेल रही। रस्तामे ओहि स्थलकेँ अकानने रही। मिलू आ आनन्दाक पहिल मिलनक स्थलकेँ- कोनो अबाज लागल अबैत..मात्र संगीत..स्वर नहि। बरुआ बाँस सभपर थप्पा दऽ देने रहै आ सभ बाँस कटनाइ शुरू कऽ देने रहथि। मड़बठट्ठी आइये छै। घामे-पसीने भेने कनेक मोन तोषित भेल। कन्हापर बाँस लेने हम आ मिलू ओही रस्ते बिदा भेल रही..ओही लीख देने। … मुदा मिलू हमरा सदिखन टोकारा देमए लागल। कारण कोनो काज हम एतेक देरीसँ नञि केने रहिऐ। ओ हमर राम रहए आ हम ओकर हनुमान। मचानपर एहिना एक दिन हम मिलूकेँ कहि देलिऐ- -मिलू, बिसरि जो ओकरा। कथी लेल बदनामी करबिहीं ओकर। हिरुआक बेटी छिऐ आनन्दा। ओना तोहर नाम हमरासँ ओ पुछलक तँ हम तोहर नाम आ तोहर पिताजीक नाम सेहो कहि देलिऐ। -हमर पिताजीक नाम ओ पुछने रहौ? -नहि पुछने रहए। मुदा.. -तखन किए कहलहीं? -आइ ने काल्हि तँ पता लागबे करतै.. -जहिया लगितै तहिया लगितै..आब ओ हमरासँ कटत..हमर मेहनति तूँ बढ़ा देलेँ.. -कोन मेहनति। तूँ पंडित श्रीधरक बेटा आ ओ हिरुआ चर्मकारक बेटी। कथीले बदनामी करबिहीं ओकर। -बियाह करबै रौ। बदनामी किए करबै। -ककरा ठकै छिहीं ? -ककरो नै रौ। एहिना अनचोक्केमे निर्णय लैत छल मिलू। श्रीधर मीमांसकक बेटा मिलू नैय्यायिक। ओकरा घरमे तालपत्र सभ पसरल रहैत देखने छलिऐ। से भरोस नै भऽ रहल छल। -गाममे कहियो देखलिऐ नै ओकरा। -तूँ गाममे रहलेँ कहिया। गुरुजीक पाठशालासँ पौरुकेँ तँ आएल छेँ। -मुदा तूँहीं कोन देखने रहीं। -मामा गाम रहै छल ओ। -फेर मामा गाम घुरि कऽ तँ नहि चलि जाएत। -नै, से पुछि लेलिऐ। आब गामेमे रहत। पौरुकाँ गामेमे मिलूक माएक देहान्त भऽ गेल छलन्हि। श्रीधर मीमांसक सेहो खटबताह सन भऽ गेल छथि- ई गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। तालपत्र सभक परिरक्षण कोना हएत एहि सिंह राशिमे? यैह चिन्ता रहन्हि श्रीधरक, आ तेँ ओ खटबताह सन करए लागल रहथि.. ईहो गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। ... हिर्र..हिर्र…हिर्र.... डोमासीसँ सूगरक पाछू हम आ मिलू हिर्र-हिर्र करैत चर्मकार टोल पहुँचि जाइ छी। आनन्दा मुदा सोझाँमे भेटि गेलीह। सुग्गर संगे हम आगाँ बढ़ि जाइ छी। घुमै छी तँ आनन्दा आ मिलूक गप सुनैले कान पाथै छी। हिर्र..हिर्र एहि बेर आनन्दा हिर्र कहैत अछि आ हम मुस्की दैत सूगरक आगाँ बढ़ि जाइ छी। ई घटना कैक बेर भेल आ ई गप सगरे पसरि गेल। हिरू कताक बेर हमरा लग आएल रहथि। हीरू उद्वेलित रहए लागल रहथि। हीरूक पत्नी बेटीक भाग्यक लेल गोहारि करए लगलीह। कए कोस माँ मन्दिलबा कए कोस लुकेसरी मन्दिलबा कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कए कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ दुइ कोस मन्दिलबा चारि कोस लुकेसरी मन्दिलबा पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ पाँचे कोस पड़ल दोहाइ कोन फूल माँ मन्दिलबा कोन फूल बन्दी मन्दिलबा कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ कोन फूल पर पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ऐली फूल माँ मन्दिलबा बेली फूल लुकेसरी मन्दिलबा गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ कनी तकबै हे माइ ......... हिरू डोमासी आबए लागल रहथि। -की हेतै, कोना हेतै। -झुट्ठे.. हम गछलियन्हि जे हम हिरु संगे श्रीधर पंडित लग जाएब। आ हम हिरूकेँ श्रीधर मीमांसक लग लऽ गेल रहियन्हि। श्रीधरक पत्नीक मृत्यु गत बरखक सिंह राशिक बाद भऽ गेल छलन्हि। आ तकर बाद हिरू मीमांसक खटबताह भऽ गेल छथि- लोक कहैत छलन्हि। लोक के? वैह टोलबैय्या सभ। गामक लोक, परोपट्टाक विद्वान लोक सभ तँ बड्ड इज्जत दै छलन्हि हुनका। आँखिक देखल गप कहै छी.. “आउ बचलू। हिरू, आउ बैसू..। ”- गुम्म भऽ जाइत छथि श्रीधर। पत्नीक मृत्युक बाद एहिना, रहैत रहथि, रहैत रहथि आकि गुम्म भऽ जाइत रहथि। “कक्का, आँगन सुन्न रहैत अछि। कतेक दिन एना रहत। मिलूक बियाह किए नै करा दै छियन्हि”? “मिलू तँ बियाह ठीक कऽ लेने छथि”। “कत्तऽ?” -हम घबड़ाइत पुछै छियन्हि। हिरू हमरा दिस निश्चिन्त भावसँ देखै छथि। “आनन्दासँ, समधि हीरू तँ अहाँक संग आएल छथिये।” हाय रे श्रीधर पंडित। आ बाह रे मिलू। पहिनहिये बापकेँ पटिया लेने छल। मुदा बान्हपर जाइत कोनो टोलबैय्याक कान एहि गपकेँ अकानि लेने छल। हम सभ बैसले रही आकि ओ किछु आर गोटेकेँ लऽ कऽ दलानपर जुमि गेल छल। श्रीधर मीमांसकसँ हुनकर सभक शास्त्रार्थ शुरू भेल। शब्दक काट शब्दसँ। “श्रीधर, अहाँ कोन कोटिक अधम काज कऽ रहल छी”। “कोन अधम काज”। “छोट-पैघक कोनो विचार नहि रहल अहाँकेँ मीमांसक?” “विद्वान् जन। ई छोट-पैघ की छिऐ? मात्र शब्द। एहि शब्दकेँ सुनलाक पश्चात् ओकर शब्दार्थ अहाँक माथमे एक वा दोसर तरहेँ ढुकि गेल अछि। पद बना कऽ ओहिमे अपन स्वार्थ मिज्झर कऽ...”। “माने छोट-पैघ अछि शब्दार्थ मात्र। आ तकर विश्लेषण जे पद बना कऽ केलहुँ से भऽ गेल स्वार्थपरक”। “विश्वास नहि होए तँ ओहि पदमे सँ स्वार्थक समर्पण कऽ कए देखू। सभ भ्रम भागि जाएत”। “माने अहाँ मिलू आ आनन्दाक बियाह करेबाले अडिग छी”। “विद्वान् जन। रस्सीकेँ साँप हम अही द्वारे बुझै छी जे दुनूक पृथक अस्तित्व छै। आँखि घोकचा कऽ दूटा चन्द्रमा देखै छी तँ तखनो अकाशक दूटा वास्तविक भागमे चन्द्रमाकेँ प्रत्यारोपित करै छी। भ्रमक कारण विषय नहि संसर्ग छै, ओना उद्देश्य आ विधेय दुनू सत्य छै। आ एतए सभ विषयक ज्ञान सेहो आत्माक ज्ञान नहि दऽ सकैए। आत्माक विचारसँ अहंवृत्ति- अपन एहि तथ्यक बोध होइत अछि। आत्मा ज्ञानक कर्ता आ कर्म दुनू अछि। पदार्थक अर्थ संसर्गसँ भेटैत अछि। शब्द सुनलाक बाद ओकर अर्थ अनुमानसँ लग होइत अछि”। “अहाँ शब्दक भ्रम उत्पन्न कऽ रहल छी। हम सभ एहिमे मिलू आ आनन्दाक बियाहक अहाँक इच्छा देखै छी”। “संकल्प भेल इच्छा आ तकर पूर्ति नहि हो से भेल द्वेष”। “तँ ई हम सभ द्वेषवश कहि रहल छी। अहाँक नजरिमे जातिक कोनो महत्व नहि?” “देखू, आनन्दा सर्वगुणसम्पन्न छथि आ हुनकर आ हमर एक जाति अछि आ से अछि अनुवृत्त आ सर्वलोक प्रत्यक्ष। ओ हमर धरोहरक रक्षण कऽ सकतीह, से हमर विश्वास अछि। आ ई हमर निर्णय अछि”। “आ ई हमर निर्णय अछि।”- ई शब्द हमर आ हिरूक कानमे एक्के बेर नै पैसल रहए। हम तँ हिरु आ मिलूकेँ चिन्हैत रहियन्हि, एहिना अनचोक्के निर्णय सुनबाक अभ्यासी भऽ गेल रही। मुदा हिरु कनेक कालक बाद एहि शब्द सभक प्रतिध्वनि सुनलन्हि जेना। हुनकर अचम्भित नजरि हमरा दिस घुमि गेल छलन्हि। फेर श्रीधर मीमांसक ओहि शास्त्रार्थी सभमेसँ एक ज्योतिषी दिस आंगुर देखबै छथि- “ज्योतिषीजी, अहाँ एकटा नीक दिन ताकू। अही शुद्धमे ई पावन विवाह सम्पन्न भऽ जाए। सिंह राशि आबैबला छै, ओहिसँ पूर्व। किनको कोनो आपत्ति?” सभ माथ झुका ठाढ़ भऽ जाइ छथि। श्रीधर मीमांसकक विरोधमे के ठाढ़ होएत? “हम सभ तँ अहाँकेँ बुझबए लेल आएल छलहुँ। मुदा जखन अहाँ निर्णय लैये लेने छी तखन...।” मीमांसकजीक हाथ उठै छन्हि आ सभ फेर शान्त भऽ जाइ छथि। हम आ हीरू सेहो ओतएसँ बिदा भऽ जाइ छी। हीरू निसाँस लेने रहथि, से हम अनुभव केने रही। ... ई नहि जे कोनो आर बाधा नहि आएल। मुदा ओ खटबताह विद्वान तँ छले। से आनन्दा हुनकर पुतोहु बनि गेलीह। आ हुनक छुअल पानि हमर टोल की परोपट्टाक विद्वान् क बीचमे चलए लागल। ..... आनन्दाक नैहरमे विवाह सम्पन्न भेल छल। ओतुक्का गीतनाद हम सुनने रही, उल्लासपूर्ण, एखनो मोन अछि- पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे कोन फूल ओढ़ब लुकेसरि के कोन फूल पहिरन कोन फूल बान्धिके सिंगार हे उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे बेली फूल ओढ़ब बन्दी चमेली फूल पहिरन अरहुल फूल लुकेसरि के सिंगार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे .... श्रीधर मीमांसक आनन्दाकेँ तालपत्र सभक परिरक्षणक भार दऽ निश्चिन्त भऽ गेल रहथि। पत्नीक मृत्युक बाद बेचारे आशंकित रहथि। दैवीय हस्तक्षेप, आनन्दा जेना ओहि तालपत्र सभक परिरक्षण लेल आएल रहथि हुनकर घर। अनचोक्के.. मिलू कहि देलक हमरा जे कोना ओ श्रीधर पंडितकेँ पटिया लेने रहए। ब्राह्मणक बेटी सराइ कटोरा आ माटिक महादेव बनबैत रहत आ तालपत्र सभमे घून लागि जाएत.. नै घून लागए देथिन तालपत्र सभमे, आनन्दा आएत एहि घर। श्रीधर मीमांसक निर्णय कऽ लेने रहथि। मिलू तँ जेना जीवन भरि अपन लेल एहि निर्णयक प्रति कृतज्ञ छलाह। श्रीधरक आयु जेन बढ़ि गेल छलन्हि। श्रीधर आ आनन्दाक मध्य गप होइते रहै छल ओहि घरमे। आनन्दा बजिते रहै छलीह आ गबिते रहै छलीह। बारहे बरिस जब बीतल तेरहम चढ़ि गेल हे बारहे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनियाँ घरसे निकालब हे अंगना जे बाहर तोहि छलखिन रिनियाँ गे ललना गे आनि दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे ललना रे आनी दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे बारह हे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल रे ललना रे सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ बघिनिया घरसे निकालब रे सासु मोरा मारथिन अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे सासु मोरा मारथि अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे ललना रे गोटनो खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे ललना रे गोटनऽ खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे धनी हे करबै हे तुलसी के जाग, की धन सभ लुटा देबऽ हे ललना हे करबै मे पोखरि के जाग, की सभ धन लुटाएब हे श्रीधर मीमांसक हँसी करथिन- आनन्दा, अहाँकेँ तँ सासु अछि नहि, तखन ओ बेचारी अहाँकेँ बघिनियाँ कोना कहतीह? -तेँ ने गबै छी, सभ चीज तँ भरल-पूरल मुदा..। आँखि नोरा गेल छलन्हि आनन्दाक। हमरा अखनो मोन अछि। -हम अहाँकेँ दुःख देलहुँ ई गप कहि कऽ। -कोन दुःख? सासु नै छथि तँ ससुर तँ छथि। श्रीधरकेँ प्रसन्न देखि मिलूकेँ आत्मतोष होइन्ह। ....... आ श्रीधर मीमांसकक मृत्युक बादो आनन्दा तालपत्र सभमे जान फुकैत रहैत छलीह। फेर मिलूकेँ दूटा बेटी भेलन्हि वल्लभा आ मेधा। आनन्दाक खुशी हम देखने छी। नैहर गेल रहथि ओ। ओतहि दुनू जौँआ बेटी भेल छलन्हि- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी आ फेर भेलन्हि बेटा। पैघ भेलापर बेटा मेघकेँ पढ़बा लेल बनारस पठेने रहथि मिलू। आ दिन बितैत गेल, बेटी सभ पैघ भेलन्हि आ दुनू बेटी, मेधा आ वल्लभाक बियाह दान कऽ निश्चिन्त भऽ गेल छलाह मिलू। बेटाक परवरिश आ बियाह दान सेहो केलन्हि। मेघ बनारसमे पाठन करए लगलाह। मेघ, मेधा आ वल्लभा तीनू गोटे सालमे एक मास आबथि धरि अवश्य। लोक बिसरि गेल मारते रास गप सभ। II भामती प्रस्थानम् आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ कऽ रहल छथि। कड़गर रौद, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। आ आब जखन ओ नहि छथि तखन मिलूक जीवनक परिरक्षण कोना होएत।.. मिलू प्रवचनक बीचमे कतहु भँसिया जाइ छथि। प्रवचन चलि रहल अछि। मिलू गरुड़ पुराण नहि सुनताह। मिलू मंडनक ब्रह्मसिद्धि सुनताह, वाचस्पतिक भामती सुनताह, जे सुनबो करताह तँ। जँ बेटी सभक जिद्द छन्हिये तँ आत्मा विषयपर कुमारिलक दर्शन सुनताह। आ सैह प्रवचन चलि रहल अछि। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि श्रीधर मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। भामती प्रस्थानम् पर। शब्दक अर्थ हम गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि। -गुरुजी। हम पत्नीक मृत्युक बाद घोर निराशामे छी। की छिऐ ई जीवन। कतए होएत आनन्दा। - मिलू। धीरज राखू। ब्रह्मसिद्धिक हमर ई पाठ अहाँक सभ भ्रमक निवारण करत। ब्रह्मसिद्धिमे चारि काण्ड छै। ब्रह्म, तर्क, नियोग आ सिद्धि काण्ड। ब्रह्मकाण्डमे ब्रह्मक रूपपर, तर्ककाण्डमे प्रमाणपर, नियोगकाण्डमे जीवक मुक्तिपर आ सिद्धिकाण्डमे उपनिषदक वाक्यक प्रमाणपर विवेचन अछि। - मिलू। मुक्ति ज्ञानसँ पृथक् कोनो बौस्तु नहि अछि। मुक्ति स्वयं ज्ञान भेल। मानवक क्षुद्र बुद्धिक कतहु उपेक्षा मंडन नहि केने छथि। कर्मक महत्व ओ बुझैत छथि। मुदा ताहिटा सँ मुक्ति नहि भेटत। स्फोटकेँ ध्वनि-शब्दक रूपमे अर्थ दैत मंडन देखलन्हि। से शंकरसँ ओ एहि अर्थेँ भिन्न छथि जे एहि स्फोटक तादात्म्य ओ बनबैत छथि मुदा शंकर ब्रह्मसँ कम कोनो तादात्म्य नहि मानै छथि। से मंडन शंकरसँ बेशी शुद्ध अद्वैतवादी भेलाह। -मिलू। मंडन क्षमता आ अक्षमताक एक संग भेनाइकेँ विरोधी तत्व नहि मानैत छथि। ई कखनो अर्थक्रियाकृत भेद होइत अछि, मुदा ओ भेद मूल तत्व कोना भऽ गेल। से ई ब्रह्म सभ भेदमे रहलोपर सभ काज कऽ सकैए। -देखू। वाचस्पतिक भामती प्रस्थानक विचार मंडन मिश्रक विचारसँ मेल खाइत अछि। मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धिपर वाचस्पति तत्वसमीक्षा लिखने छथि। ओना तत्वसमीक्षा आब उपलब्ध नै छै। -तखन तत्व समीक्षाक चर्चा कोना आएल। -वाचस्पतिक भामतीमे एकर चर्चा छै। -मुदा मंडनक विचार जानबासँ पूर्व हमरा मोनमे आबि रहल अछि जे जखन ओ शंकराचार्यसँ हारि गेलाह तखन हुनकर हारल सिद्धान्तक पारायणसँ हमरा मोनकेँ कोना शान्ति भेटत। -देखियौ, मंडन हारि गेल छलाह तकर प्रमाण मंडनक लेखनीमे नहि अछि। मंडन स्फोटवादक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्य स्फोटवादक खण्डन करैत छथि। मंडन कुमारिल भट्टक विपरीत ख्यातिक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्यक जाहि शिष्य सुरेश्वराचार्यकेँ लोक मंडन मिश्र बुझै छथि ओ एकर खण्डन करै छथि। -से तँ ठीके। मंडन हारि गेल रहितथि तँ हुनकर दर्शन शंकराचार्यक अनुकरण करितन्हि। -आब कहू जे जाहि सुरेश्वराचार्यकेँ शंकराचार्य श्रृंगेरी मठक मठाधीश बनेलन्हि से अविद्याक दू तरहक हेबाक विरोधी छथि मुदा मंडन अपन ग्रन्थ ब्रह्मसिद्धिमे अग्रहण आ अन्यथाग्रहण नामसँ अविद्याक दूटा रूप कहने छथि। मंडन जीवकेँ अविद्याक आश्रय आ ब्रह्मकेँ अविद्याक विषय कहै छथि मुदा सुरेश्वराचार्य से नै मानै छथि। शंकराचार्यक विचारक मंडन विरोधी छथि मुदा सुरेश्वराचार्य हुनकर मतक समर्थनमे छथि। ....... बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। आब हमरा दुआरे गामक लोक महीस पोसनाइ तँ नहि छोड़ि देत। बानर आ बनगदहा बड्ड नोकसान कऽ रहल अछि। “चारिटा बानर कलममे अछि। धऽ कऽ आम सभकेँ दकड़ि देलक। हम गेल रही। साँझ भऽ गेलै तँ आब सभटा बानर गाछक छिप्पी धऽ लेने अछि। साँझ धरि दुनू बापुत कलम ओगरने रही, झठहा मारि भगेलहुँ, मुदा तखन अहाँक कलम दिस चलि गेल”।–- हम मिलूकेँ हम कहै छियन्हि। “सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि। करऽ दियौ जखन...”। “बनगदहा सभ तँ साफ कऽ उपटि गेल छलै। नहि जानि फेर कत्तऽ सँ आबि गेल छै। गजपटहा गाममे जाग भेल छलै, ओम्हरेसँ राता-राती धार टपा दै गेल छै”। “से नै छै। ई बनगदहा सभ धारमे भसिया कऽ नेपाल दिसनसँ आएल छै। आबऽ दियौ जखन...”। “हम बानर सभ दिया कहने रही”। “से हेतै”। “हेतै भाइज, तखन जाइ छी”। हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग निपत्ता भऽ गेल रहै जाहि बरख आनन्दा आ मिलूक भेँट भेल रहै। आ आनन्दाक गेलाक बाद बानर आ बनगदहा नहि जानि कत्तऽ सँ फेर आबि गेल छै, आनन्दाक मृत्युक पन्द्रहो दिन नै बीतल छै... ....... बचलू गेलाह आ मिलूक कपारपर चिन्ताक मोट कएकटा रेख ऊपर नीचाँ होमए लगलन्हि, हिलकोरक तरंग सन, एक दोसरापर आच्छादित होइत, पुरान तरंग नव बनैत आ बढ़ैत जाइत। अंगनामे सोर करै छथि। “बुच्ची, बुचिया। जयकर आ विश्वनाथ आइ गाछी गेल रहए। आबि गेल अछि ने दुनू गोड़े। सुनलिऐ नै जे बानर सभक उपद्रव भऽ गेल छै। काल्हिसँ नै जाइ जाएत गाछी, से कहि दियौ। आइ बानर सभ कलम आएल छल, से कहबो नै केलहुँ। कहिये कऽ की होएत जखन...”। “कहि तँ रहल छलहुँ बाबूजी मुदा अहाँ तँ अपने धुनमे रहै छी, बाजैत मुँह दुखा गेल तँ चुप रहि गेलहुँ”। हँ, धुनिमे तँ छथिये मिलू। ई आम सेहो आनन्दाक मृत्युक बाद पकनाइ शुरू भऽ गेल अछि। आ एतेक दिनुका बाद फेर ई बानर आ बनगदहा कोन गप मोन पारबा लेल फेरसँ जुमि आएल अछि। ... जयकरक माए वल्लभा आ विश्वनाथक माए मेधा। दुनू बहीन कतेक दिनपर आएल छथि नैहर। कतेक दिनपर भेँट भेल छन्हि एक दोसरासँ। आनन्दाक दुनू बेटी आ दुनू जमाए आएल छथि। वल्लभाक पति विशो आ मेधाक पति कान्ह। मेघ अपन पत्नी आ बच्चा सभक संगे आएल छथि। मिलू पत्नीकेँ आनन्दा कहि बजा रहल छथि। फेर मोन पड़ै छन्हि जे ओ आब कत्तऽ भेटतीह। फेर कत्तऽ छी वल्लभा, कत्तऽ छी मेधा, जयकर आ विश्वनाथ कतए छथि..सोर करए लागै छथि। वल्लभा आ मेधा अबै छथि आ मिलू गीत गबए लगै छथि। आनन्दाक गीत। आनन्दा जे गबै छलीह वल्लभा आ मेधा लेल- लाल परी हे गुलाब परी लाल परी हे गुलाब परी हे गगनपर नाचत इन्द्र परी हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी हे रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी माँ हे निरधनकेँ धन यै देने परी माँ हे निरधनकेँ धन जे देने परी लाल परी हे गुलाब परी माँ हे रकतमाला दुआरपर अन्धरा खड़ी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी बाप आ दुनू बेटी भोकार पाड़ए लगै छथि। ... -मिलू। आनन्दाक मृत्यु अहाँ लेल विपदा बनि आएल अछि। अहाँ ब्राह्मण जातिक आ आनन्दा चर्मकारिणी। मुदा दुनू गोटेक प्रेम अतुलनीय। हुनकर मृत्यु लेल दुःखी नहि होउ। ब्रह्म बिना दुखक छथि। ब्रह्मक भावरूप आनन्द छियन्हि। से आनन्दा लेल अहाँक दुःखी होएब अनुचित। ब्रह्म द्रष्टा छथि। दृश्य तँ परिवर्तित होइत रहैए, ओहिसँ द्रष्टाकेँ कोन सरोकार। ई जगत-प्रपंच मात्र भ्रम नहि अछि, एकर व्यावहारिक सत्ता तँ छै। मुदा ई व्यावहारिक सत्ता सत्य नहि अछि। -मिलू। चेतन आ अचेतनक बीच अन्तर छै मुदा से सत्य नै छै। जीवक कएकटा प्रकार छै, आ अविद्याक सेहो कएकटा प्रकार छै। अविद्या एकटा दोष भेल मुदा तकर आश्रय ब्रह्म कोना होएत, पूर्ण जीव कोना होएत। ओकर आश्रय होएत एकटा अपूर्ण जीव। अविद्या तखन सत्य नहि अछि मुदा खूब असत्य सेहो नहि अछि। -मिलू। एहि अविद्याकेँ दूर करू आ तकरे मोक्ष कहल जाइत अछि। वैह मोक्ष जे आनन्दा प्राप्त केने छथि। आ मिलूक मुखपर जेना शान्ति पसरि जाइ छन्हि। ........ मिलू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। -आनन्दा। अहाँसँ गप करैत-करैत हमरा कनीटा डर मोनमे आबि गेल अछि। पिताक सभसँ प्रधान कमजोरी छन्हि हुनकर तालपत्र सभक परिरक्षण। से ई सभ मोन राखू। पिता जे पुछताह जे ताल पत्रक परिरक्षण कोना होएत तँ कहबन्हि- पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आ स्थूल बन्धनसँ बचा कऽ। छाहरिमे सुखा कऽ। ५००-६०० पातक पोथी सभ। हम कोनो दिन देखा देब। एक पात एक हाथ नाम आ चारि आंगुर चाकर होइ छै। ऊपर आ नीचाँ काठक गत्ता लागल रहै छै। वाम भागमे छिद्र कऽ सुतरीसँ बान्हल रहै छै। -पिता मानताह। -नै मानताह किएक। ब्राह्मणक बेटीसँ बियाह कराबैक औकाति छन्हि? हम एक गोटेकेँ दू टाका बएना देने रहियै खेतिहर जमीन किनबा लेल। मुदा पिता जा कऽ बएना घुरा आनलन्हि। एक-एक दू-दू टाका जमा कऽ रहल छथि। ७०० टाका लड़कीबलाकेँ देताह तखन बेटाक विवाह हेतन्हि आ पाँजि बनतन्हि। आ से ब्राह्मणी अओतन्हि तँ तालपत्रक रक्षा करतन्हि? मिलूक माएक मृत्युक बाद श्रीधर खटबताह भऽ गेल छलाह। टोलबैय्या सभ कहै छथि। आ फेर बेमारी अएलै, प्लेग। गामक दूटा टोल उपटिये गेल, मिसरटोली आ पछिमाटोली। परोपट्टाक बहुत रास गाममे कतेक लोक मुइल से नै जानि। मिलू पिताकेँ आनन्दासँ भेँट करा देलखिन्ह। श्रीधर तालपत्र परिरक्षणक ज्ञानसँ परिपूर्ण आनन्दामे नै जानि की देखि लेलन्हि। मिलू जीति गेल। नैय्यायिक मिलू मीमांसक श्रीधरसँ जीति गेल आ मीमांसक श्रीधर अपन टोलबैय्या सभकेँ पराजित कऽ देलन्हि। आ आनन्दा आ मिलूक विवाह सम्पन्न भेल। मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। मिलू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। आनन्दाक मृत्यु भऽ गेल अछि। बलानमे पएर पिछड़ि गेलन्हि आनन्दाक। ओहिना पिछड़ैक चिन्हासी देखबामे आबि रहल अछि। मिलू ओहि चिन्हासीकेँ देखै छथि आ हुनकर मोन हुलसि जाइ छन्हि, पिछड़ि जाइ छथि भावनाक हिलकोरमे.. आनन्दा आ मिलूक एक दोसरासँ भेँट-घाँट बढ़ए लागल छल, खेत, कल्लम-गाछी, चौरी आ धारक कातक एहि एथलपर। आ दुनू गोटे पिछड़ैत छलाह, खेतमे, कल्लम-गाछीमे, चौरीमे आ धारक कातमे सेहो। धारमे फाँगैत नै छलाह मिलू। यएह ढलुआ पिच्छड़ स्थल जे आइ-काल्हिक छौड़ा सभ बनेने अछि, से मिलूक बनाओल अछि। एहिपर पोन रोपैत छलाह आ सुर्रसँ मिलू धारमे पानि कटैत आगाँ बढ़ि जाइत छलाह। “हे, कने नै पिछड़ि कऽ तँ देखा।” “से कोन बड़का गप भेलै।” “देखा तखन ने बुझबै।” आनन्दा अस्थिरसँ आगाँ बढ़बाक प्रयास करथि मुदा..हे.हे..हे.. नै रोकि सकलथि ओ अपनाकेँ, नहिये केतमे, नहिये कल्लम-गाछीमे, नहिये चौरीमे आ नहिये एहि धारक कातमे.. आ की करए आएल होएतीह आनन्दा एतए..जे पिछड़ि गेलीह आ डूमि गेलीह.. कोनो स्मृतिकेँ मोन पड़बा लेल आएल होएतीह.. - हँ आनन्दा आएल अछि बचलू। देखियौ ई गीत सुनू- घर पछुवरबामे अरहुल फूल गछिया हे फरे-फूले लुबुधल गाछ हे उतरे राजसए सुगा एक आओल बैसल सूगा अरहुल फूल गाछ हे फरबो ने खाइ छऽ सुगबा, फुलहो ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे फुलबो ने खाइ छऽ सुगबा, फरहु ने खाइ छऽ हे डाढ़ि-पाति केलक कचून हे घर पछुवरबामे बसै सर नढ़िआ हे बैसल सूगा दिअ ने बझाइ हे एकसर जोड़ल सोनरिया दुइसर जोड़ल हे तेसर सर सूगा उड़ि जाइ हे सुगबो ने छिऐ भगतिया तितिरो ने छिऐ येहो छिऐ गोरैय्या के बाहान हे -भाइ अहाँ ई गीत नहि सुनि पाबि रहल छी की? -भाइ सुनि रहल छी। देखियो रहल छी। आनन्दा भौजी छथि। जहिया ओ मुइल छलीह तहियो सुनने रही- वएह रहथि- गाबै रहथि- लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया तहि तर कोइली घऽमचान हे -शब्द भ्रम नहि छल ओ। माँछ-मौस आ सत्यनारायण पूजाक बाद अगिले दिनक गप अछि। ने चानन गाछ कटेने रहथि आ ने अँगना बेढ़ने रहथि आनन्दा। दोसर दिन ओहि चानन गाछक नीचाँ चर्मकारटोलमे गौआँ सभ दुनू गोटेक लहाश देखलन्हि। आ ईहो शब्द गगनमे पसरि गेल, सौँसे गौँआ सुनलक- आनन्दाक अबाजमे- जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे शब्द भ्रम नहि छल ओ। (ई कथा “शब्दशास्त्रम्” श्री उमेश मंडल गाम-बेरमा लेल।) २.२. सिद्ध महावीर १. बान्हक कातमे अनमना दीदीक घर। घर नहि झोपड़ी कहू। गामक मोटामोटी सभ अँगनामे एकटा विधवाक घर रहैत छै। मुदा जखने परिवार पैघ होइत अछि तँ क्यो अपन घरक मुँह घुमा लैत अछि तँ क्यो बेढ़ बना दैत अछि। आ कखनो काल ओहि राँड़-मसोमातक घरक स्थान परिवर्तन भऽ जाइत अछि, आ से तेहने सन स्थिति छल अनमना दीदीक घरक। मुदा अनमना दीदीक घर बान्हक कातमे छन्हि। सोझाँक मजकोठिया टोलक छथि मुदा घुसकि कऽ हमर घर लग आबि गेल छथि।समङगर लोक सभ। आस-पड़ोसक धी-बेटी दिनमे, दुपहरियामे जाइत छथि। ढील-लीख बिछबाक लेल। ककर ओ लगक छथि, से मरलाक बाद पता चलत। श्राद्धक समए जे लगक अछि से आगि देत आ तकरा घरारी भेटतैक। मुदा सेहो सम्भावना आब नहि। झंझारपुरमे सासुर छलन्हि अनमना दीदीक। ओतए अपन बहिनिक बेटाकेँ अपन बेटा बना राखि लेने छथि। मुदा नैहरक मोह नहि छूटल छन्हि। खोपड़ीमे अबैत छथि। मासमे एक बेर तँ अवश्ये। अपनेसँ खेनाइ-पिनाइ, भानस-भात। मुदा झंझारपुरमे बेस पैघ घर, आँगन। बेटा-पुतोहुकेँ कहियो मुदा एतए नहि आनलन्हि। सौँसे गाम विधवाकेँ दीदी कहैत अछि जे ओ नैहरमे रहैत छथि। आ फलना गाम बाली काकी जे ओ सासुरमे रहैत छथि। से सौँसे गाम हुनका अनमना दीदी कहैत छलन्हि। खोपड़ीक कातमे एकटा भगवानक मन्दिर बनेने छथि। महावीर बजरंगबलीक। शुरुहेसँ ई कोठाक रहै से नहि, मुदा बना देलन्हि ओकरा कोठाक। अन्न-पानि बेचि कऽ। पहिने तँ खोपड़िये रहै। जहिया अनमना दीदी झंझारपुर जाइत रहथि, अपन खोपड़ीक फड़की भिरका कऽ जाइत रहथि। बादमे ताला आ सिक्कड़िसँ बन्न सेहो करए लागल रहथि। मुदा बजरंगबलीक मन्दिर ओहिना खुजल रहैत छल। लोक सभक लेल..चौपहर। धी-बेटी गामक, साफ-सफाई, झाड़ू-बहारू करैत रहथि। पक्काक मुदा बादमे भेल, छात ढलाइ आर बादमे। पिटुआ रहए पहिने। जमीनक प्लास्टर करबए चाहैत रहथि, मुदा एस्टीमेट बेशी भऽ गेलन्हि। भगवानक घर चुबैत रहत? मुदा ढलाई आ प्लास्टर लेल पाइ कतएसँ आओत? आइ हमरा लगैए जे हम सभ खूब मेहनति करैत छी। ककरोसँ सरोकार नहि अछि। ओह, समैए नहि भेटैत अछि। मुदा अनमाना दीदीक दिनचर्या, भोरसँ साँझ भगवान लेल समर्पित। मुदा पोसपुत्र लेल सेहो समए निकालैत छथि। बीच-बीचमे झंझारपुर बजार लग स्थित अपन गाम जाइत छथि। ओतुक्को ब्योँत लगबैत छथि। फेर गाम अबैत छथि..नैहर। देखू..गीता पढ़ि स्थितप्रज्ञ बनबाक अहाँक प्रयास। मुदा अनमना दीदी। गोर लगै छी दीदी। निकेना रहू। नहिये खुशी, नहिये कोनो दुखे। ने कोनो आवभगतक लालसा आ ने कोनो तरहक सहयोग प्राप्तिक आकांक्षा। जोन ताकै लेल जाइत छथि धनुकटोली, दुसधटोली। ओतुक्का लोक इज्जतियो दै छन्हि, कोन हुनकर घरारी लेबाक छन्हि हिनका सभकेँ। ओतए हँसितो देखै छियन्हि। अपन टोलक लोकसँ हट्ठे कोनो काज लेल कहितो नहि छथि। एकटा काज करत आ कनियाँकेँ जा कऽ कहत। आ फेर दस साल धरि ओकर कनियाँ सुनबैत रहत। -दीदी, हनुमान जीक काज छै, सड़कक कातमे छथि। हमहूँ सभ तँ जाइत-अबैत माथ झुका कऽ पुजबे करबन्हि। से बिनु बोनि लेने हम ई काज करब। - नै यौ तीर्थ-बर्त आ भगवानक काज मँगनीमे नहि करबाक-करेबाक चाही। हम कोनो रानी-महरानी छी जे बेगारी खटा कऽ मन्दिर बनबाएब आ पोखरि खुनाएब। मुदा ढलैय्या आ प्लास्टर! २ सड़कक कातक भगवानक एहि मन्दिरक सटल एक बीघा खेत, सभटा अनमना दीदीक। ढलैय्या भऽ गेलाक बाद भगवानक नामसँ लिखि देतीह। जे अन्न-पानि होएतैक ओहिसँ भगवानक घरक चून-पोचारा आ सफाई होइत रहत। कतेक दिनसँ पड़ोसी पछोड़ धेने छन्हि। “दीदी। तोहर सभसँ लगक भातिज हमहीं छियौ। ई जमीन हमर घरसँ सटल अछि। पहिलुका लोक बान्ह-सड़कक कातमे छोट जाति आ मसोमातकेँ घर बना दैत रहै। मुदा आब जमाना बदलि गेल छै।आब तँ सड़कक कातक घर आ जमीनक मोल बढ़ि गेल छै। तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे। तखन ई जमीन हमरा सभ पटीदार लेल झगड़ाक कारण बनत। ” तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे- कहि कऽ देखियौक कोनो सधवाकेँ। मुदा मसोमातसँ कहि सकै छिऐ- भने ओकर पोसपुत्र- पुतोहु- नैत-नातिन होइ। ठीक छै बाबू। “भगवानक लेल निहुछल अछि ई जमीन। अहीसँ तँ हमर गुजर चलैए। जे किछु पेट काटि कऽ बचबैत छी से कोशिल्या- भगवानक घरक ढलैया आ प्लास्टर लेल। झंझारपुरक जमीन-जालक पाइ सभ बेटा पुतोहुक छन्हि। से हम कोना.. ” “फेर दीदी। तूँ गप बुझबे नहि कएलेँ। जा जिबै छेँ राख ने। कर ने गुजर। हम तँ कहै छियौ जे तोरा मरलाक बाद जे पटीदार सभ आपसमे लड़त से तोरा नीक लगतौ। आ हम तोहर सभसँ आप्त भातिज...।” देखियौ, कहै छै जे। भातिज बाहरमे नोकरी करै छथि। जे गाममे रहैए से तँ भेँट करएमे संकोच करैए जे किछु देमए नहि पड़ए। ई मुदा जहिया गाममे अबैए आ हम गाममे रहै छी तँ भेँट करबाक लेल अबिते अछि। आ एहि बेर तँ हम झंझारपुरमे रही तँ ओतहु आएल रहए। सैह तँ कहलियै जे ई कोना कऽ फुरेलै। से आब बुझलिऐ। मुदा ई ढलैय्या कोना कऽ होएत। प्लास्टर तँ बादोमे करबा देबै। ततेक चुबैए, एहि साल तँ आरो बेशी चुबए लागल अछि। पिटुआ छत, दुइयो साल नहि चलल। ओकरा ओदारि कऽ ढ़लैय्या करत करीम मियाँ आ लछमी मिस्त्री, तखने ठीक होएत। देखै छी। भातिजक आबाजाही बढ़ि गेल अछि आइ-काल्हि। “ठीक छै दीदी, अदहे जमीन दऽ दिअ। दस कट्ठामे अहाँक भातिजक बसोबासक संग भगवानक लेल सेहो जमीन बचि जाएत।” “मुदा बान्हपर अहाँक घरारीक लागि तँ नहिए होएत। तखन की फएदा होएत अहाँकेँ।” “छोड़ू ने। एखनो तँ टोल दऽ कऽ अबिते ने छी। चौक-चौबटिया आ बान्हक कातमे घर बनेबाक तँ आब ने चलन भेल अछि। आ आब चौबटिया आ बान्हक कातमे तँ भगवानेक घर ने शोभतन्हि। दस कट्ठाक दस हजार जहिया कहब हम दऽ देब। रजिस्ट्री बादेमे बरु होएत।” “ठीक छै। तखन हम सोचि कऽ कहब। एक बेर बेटा पुतोहुसँ पूछि लैत छी।” कोन उपाए। भगवानक घरक देबाल सभमे कजरी लागि गेल अछि। देबाल छोड़ू, बजरंगबलीक मूर्तिमे सेहो कजरी लागि गेल अछि। अनमना दीदी सोचिते रहि गेलथि। आ सोचिते-सोचिते भोर भऽ गेलन्हि। दऽ दै छिऐ जमीन। आर उपाय की। नञि। बेटा-पुतोहु कहलखिन्ह जे माए। ओतुक्का जमीन तँ भगवानक छन्हि। आ हम सभ से शुरुहे सँ बुझै छी। मुदा देखब। ओ कोनो चालि तँ नहि चलि रहल अछि। “कोन चालि। पाइ तँ किछु बेशीए दऽ रहल अछि।” भगवानक मन्दिरक लेल, दस कट्ठा कम थोड़बेक होइ छै। पाइ जुटबैत-जुटबैत मरि गेलहुँ। ई अधखरु मन्दिर ओहिने रहि जाएत ? गप करै छी लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ सँ। दस हजारमे ढलैय्या, प्लास्टरक संग चहरदिवारी सेहो बनि जाएत। एस्टीमेट बनि गेल। रजिस्ट्रीक अगिले दिनसँ काज आरम्भ। आ भादवक पहिने समापन। ३ चलू रजिस्ट्री भऽ गेल। दासजी कागज-पत्तरमे बड्ड माहिर लोक। पुछबाक काज छै! - धुर। पकिया कागज बनल हएत। “भगवानक लेल कागज बनेबाक पहिल अवसर भेटल अछि दीदी”- दासजीक गपसँ अनमना दीदी दासोदास भऽ गेलीह। लोक कहै छै झुट्ठे जे लोकक श्रद्धा भगवानपर सँ कम भेल जाइ छै। ई दासजी। कहियो ने भेँट आ ने जान पहिचान। दू टा रजिस्ट्रीक कागत- एकटा दसकठिया भातिजक नाम आ दोसर भगवानक नाम, मुदा एक्के फीसमे बना रहल छथि। साफे कहि देलखिन्ह- दीदी भगवानक जमीनक रजिस्ट्रीक पाइ हम एकदम्मे नहि लेब। जे बेर-बखतपर काज आबए सैह ने अप्पन लोक। ठीके बूढ़-पुरान कहि गेल छथि। यैह सभ देखि कऽ ने कहने छथि। अनमना दीदी बाइमे छथि। पएरे गाम अएलीह।सोहमे किछु नहि फुराइत छन्हि। मन्दिरकेँ अजबारू, काल्हिसँ काजक आरम्भ अछि। लछमी मिस्त्री अपन तेगारी, डोरी, करणी सभ राखि गेल अछि। डब्बुक सभ पानि भरबाक लेल अनमना दीदी जोगा कऽ राखनहिये छथि। पोखरि बगलेमे अछि। लीढ़सँ भरल, मुदा कातमे महीस सभकेँ पानि पिएबाक लेल लोक सभ कनेक साफ कइए देने अछि। मुदा भोरेमे घोल-फुचुक्का। करीम मिआँकेँ काज करबासँ रोकि देल गेल। के रोकलक? भातिजकेँ खबरि दियौक। मुदा ओ तँ काल्हि झंझारपुरसँ सोझे नोकरीपर चलि गेलाह। रजिस्ट्रीक कागत ओना तँ अनमाना दीदी लग सेहो छन्हि। भातिजक सार रोकने अछि काज। चहारदिबारी नहि बनबए देत। मुदा काल्हि रजिस्ट्री काल तँ रहए ईहो। तखन? कहैत अछि जे बान्हक कातबला जमीन मेहमानक छियन्हि, ऐँ यौ। तखन तँ ई मन्दिरो ओकरे हिस्सामे भऽ गेलै। कोनो बुझबामे गलती तँ नहि कऽ रहल अछि। भातिज मासक शुरुहेमे जा कऽ तँ अओताह, दरमाहा लैए कऽ ने। मास भरि अनमाना दीदी गाम आ झंझारपुर करैत रहलीह। बेटा पुतोहु कहन्हि जे ई भातिजेक चालि तँ नहि अछि। नञि, से नहि कहू। दासजी तँ नीक लोक रहए। देखू। ४ “दीदी। अहाँकेँ कोनो धोखा भऽ रहल अछि।” “तखन तँ ई मन्दिरो अहींक भेल ने।” “नञि दीदी। ई मन्दिर तँ भगवानक छियन्हि। हुनके रहतन्हि। आ पाछूक जमीनक मालिक सेहो भगवाने।” “आ तखन तँ हमर ई खोपड़ी सेहो अहींक भेल ने।” “नञि दीदी। अहाँ जहिया धरि जीब तहिया धरि रहू। के मना करत? ” “बौआ बड्ड उपकार अहाँक। आ पाछू दिसका जमीनक लागि तँ नञि बान्ह दिससँ अछि आ नहिये टोल दिससँ।” “दीदी। अहाँ हमरा जमीन बाटे जाऊ ने के मना करत? आ आरिपर बाटे खेतमे सभ जाइते अछि। जकर खेत बान्हक कातमे नहि छै से की अपन खेतपर नहि जा सकैए। अहाँ तँ नबका लोकक भिन्न-भिनाउज बला गप कऽ रहल छी।” “मुदा ई सभ अहाँ पहिने कहाँ कहने रही।” “दीदी, अहाँकेँ सभटा कहने रही। मुदा लगैत अछि जे अहाँकेँ धोखा भऽ रहल अछि। नहि विश्वास होइए तँ दासजीकेँ बजा दैत छी। ओ तँ तेहल्ला अछि।” “अच्छा तँ ओहो मिलल अछि।” “दू रजिस्ट्रीक कागत बना कऽ बेचारा एक रजिस्ट्रीक पाइ लेलक आ अहाँ कहि रहल छी जे मिलल अछि।”- भातिजक स्वर तीव्र भऽ गेलन्हि। हाँफए लगलाह आ जोर-जोरसँ बजैत बिदा भऽ गेलाह। ५ अनमाना दीदीक लेल नैहरक ई भोर सासुरक ओहि भोर जेकाँ रहन्हि जाहि दिन ओ विधवा भेल रहथि। आइ गामक धी-बेटी ढ़ील-लीख बिछबा लेल नहि अएलीह। अनमाना दीदीक राति भरिक वार्तालाप- बजरंग बलीक संग। एखने एहि भोरमे खतम भेल अछि। लोक सभ अँगनामे बच्चाकेँ ठोकि कऽ सुता रहल रहए। भोरमे किछु गोटे आबि पंचैती करेबाक सुझाव दए गेलन्हि। मुदा अनमाना दीदीक रोष तँ बजरंगबलीसँ छलन्हि। “भगवानक जमीन अदहा बेचि कऽ भगवानक घर बनबितहुँ, मुदा मन्दिरक सटल जमीन रजिस्ट्री करा लेलक आ जे जमीन बचल ओहिसँ मन्दिरक लागिये नहि रहल। लागि तँ छोड़ू ओहि पर जएबाक रस्ते बन्न कऽ देलक। आ ई बजरंगबली। महावीर। कोन शक्ति छैक एकरामे ? चालीस साल पेट काटि कऽ हिनका खोपड़ीसँ पक्काक घरमे अनलहुँ। ढलैय्या भऽ जइतए, चहरदिवारी बनि जइतए सैह टा मनोरथ रहए, आ सेहो हिनके लेल। हा... ” ६ एहि भोरमे भातिजक द्वारिपर ठाढ़ अनमाना दीदी। लोक सभक मोने जे आब आर बाझत झगड़ा। मुदा ई की भऽ रहल अछि। लछमियाँक भाए रिक्शा अनलक अछि। अनमाना दीदी भातिजक संग झंझारपुर जा रहल छथि। के कहलक? हुनकासँ तँ ककरो गपो नहि भेल रहै। हम कहनहियो रहियन्हि पंचैती कराऊ, मुदा मना जेकाँ कऽ देने रहथि। अच्छा, लछमीक भाए कहलक। हँ, रिक्शा बजबै लेल जे गेल रहए, से कहने हएत जे झंझारपुर जेबाक अछि। दासजीकेँ एकटा आर रजिस्ट्रीक कागत बनबए पड़लन्हि। अनमाना दीदीकेँ देखि ओ सर्द भऽ गेल रहथि जे जानि नहि बूढ़ी की सभ सुनओथिन्ह। मुदा अनमाना दीदी ततेक ने तामसमे छलीह जे किछु नहि बजलीह। तामस पीबि गेलीह। ओहो पाछू बला जमीन भातिजकेँ रजिस्ट्री कऽ देलन्हि। आ झंझारपुर-स्टेशनसँ घुरि कऽ झंझारपुर बजार दिस बेटा पुतोहु लग पएरे बिदा भेलीह। लछमीक भाए घुरि आएल। दू सवारीकेँ लऽ गेल रहए मुदा मात्र एक सवारी लऽ कऽ घुरि आएल। संगमे संदेश लेने गेल। लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ लेल संदेश। काल्हि भोरेसँ काज आरम्भ। फेरसँ? ७ चहरदेबाली बनल। भगवानक मन्दिर आ अनमाना दीदीक घरकेँ बारि कऽ। कहि देने छियन्हि दीदी केँ। हुनका जिबैत क्यो छूतन्हि नहि हुनकर घर। घर आकि खोपड़ी, एक साल कनेक टूटल। दोसर भदबरियामे खुट्टा सरि कऽ खसि पड़ल। मुदा अनमाना दीदी नहि अएलीह। समाद देने रहन्हि नैहरक एक गोटे। ढलैया नहिये भेलन्हि बजरंगबलीक। अनमना दीदी हरिद्वारसँ घुरि अएलीह। लोक पुछलकन्हि- की माँगलहुँ गंगा माएसँ। “यएह जे अंधविश्वास हमरा मोनसँ हटा दिअ”। “आ की देलियन्हि गंगा माएकेँ ?” “अपन तामस दऽ देलियन्हि”। अनमाना दीदी यएह कहथि- की करबन्हि। कोनो शक्तिये नहि छन्हि बजरंगबलीमे। खसए दियौक खोपड़ी। सोंगर लागल घर कतेक दिन काज देत। ८ कैक बरख बीतल। कैक बरख नहि पाँचमे साल तँ। भातिज गामपर आएल रहथि। दरमाहा उठा कऽ। पोखरि दिससँ चप्पाकलपर। लोटा लेने बैसलाह आकि छातीमे दर्द उठलन्हि। नहि बचि सकलाह। लोक सभ कहए, देखू अनमाना दीदीक श्राप, बड्ड कानल रहथि दीदी ओहि दिन। ओहिसँ पहिने बजरंगबलीक मूर्तिमे ठीके शक्ति नहि रहए। मुदा हृदयसँ देल श्राप लागै छै। ओही दिन जागृत भऽ गेल रहथि बजरंगबली। आ आइ शक्ति देखा देलखिन्ह। मुदा समदियाकेँ अनमाना दीदी कहलखिन्ह जे पाथरोमे जान होइ छै। हर्ट अटैक भेल होएतैक। परसू एतहि एकटा मारवाड़ीकेँ अटैक भेल रहै। चिन्ता-फिकिरसँ होइत छैक एकर अटैक। एतए डाकडर सभ रहै, मारवाड़ी बाँचि गेल। गाममे देरी भेने जान नहि बचै छै। तेँ ने हमहूँ एहि बुढ़ारीमे बेटे पुतोहु लग झंझारपुरमे रहि रहल छी। ९ गाम अछि महिसबार ब्राह्मणक गाम। सुखरातिक दिन हूड़ा-हूड़ीक खेल जे एहि महिसबाड़ ब्राह्मण सभक देखलहुँ तँ पोलोक खेलमे कोनो रुचि नहि रहल। समियाक डोमसँ कीनल सुग्गरकेँ भाँग पिआए मातल महीस द्वारा हूड़ा लेब। चरबाह जे महीसक पहुलाठ पकड़ि कलाकारीसँ बैसल छल सेहो अद्भुते। डोमक काज पाबनि-तिहारमे तँ होइते अछि। पेटार बनेबासँ सूप, बीअनि सभ किछु बनेबामे डोमक काज आ पाहुन परख लेल आ बरियाती लेल जे खस्सी काटल जाएत ताहि लेल मिआँटोलीक काज। खस्सीक मूड़ा दुर्गापूजाक बलिमे कमिटी लऽ लैत अछि। धुर कतए भाँसि गेलहुँ। से मिआँ जे खस्सी काटैत अछि से हलाल कऽ कऽ। गरदनि अदहा लटकले रहैत छै, मुदा माउस बना-सोना कऽ गरदनि लऽ जाइये आ खलरा सेहो। तखन महिसबार ब्राह्मणमे सँ जे हनुमानजी मन्दिरपर भजन आ अष्टजाम करैत छथि से ओही खलरासँ बनल ढोलक किनैत छथि। आ से कीर्तन भइयो रहल छल। सिद्ध महावीरजीक मन्दिरक आगाँ। रामनवमी दिन गाड़ल बड़का धुजा। टनटनाइत घड़ीघण्ट आकि आर किछु। हनुमानजीक धूजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। महिसबार सभक आगम भऽ गेल अछि। कोनो पाबनि हुअए, हूड़ाहूड़ी आकि रामनवमी सिद्ध हनुमानजीक आगाँ कीर्तन होइते अछि। से बाबू गौँआक श्रद्धाक गप छिऐ। से आइयो भऽ रहल अछि। घूरक धुँआ माल बिठौरीकेँ मालक देहसँ अलग करबाक प्रयासमे अछि। एक गोटेक संग दोसर गोटे अएल छथि, सप्पत खएबाक लेल। हनुमानजीक मन्दिर गौँआ सभ प्लास्टर करबा देने छथि। ढलैय्या सेहो भऽ गेल अछि। मन्दिरक बरण्डा छूबि कऽ ऋण पचेनहारक संख्या नगण्य, तैयो एकटा अपवाद तँ अछिये- ओ कहै छथि- सप्पत तँ तोड़बा लेल खाएल जाइ छै। हँ भाइ, एक बेर सप्पत खेने जे ऋणसँ विमुक्ति भेटि जाए तँ हर्जे कोन। मुदा एकेटा अपवाद। अनमाना दीदीकेँ आब सभ अनमाना बाबा सेहो कहैत छन्हि। कएक बरख भेल मुइना हुनकर। घुरि कऽ नहिये अएलीह। भातिजक घरारीक दोष निवारणार्थ कोनो पंडितक कहलापर खुट्टापर एकटा गाए बान्हि देल गेल छै, जकरा एनहार-गेनहार सदिखन घास खाइत देखैत छथि, तहिसँ घरारीकेँ नजरि-गुजरि नहि लगतैक। हनुमानजीक धुजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकक थापपर थाप लगा रहल छथि। अनमाना बाबाक गप आब किछु लोको सभ मानलक। ठीके। हनुमानजीक मूर्तिक आगाँ भक्त दूटा गोल बनि गेल अछि। एक गोलक विचार कनेक वैज्ञानिक छैक- अनमाना दीदी जे बाँचल दस कट्ठाक रजिस्ट्री कऽ देलखिन्ह सएह ने पैसा देलकै चिन्ता-फिकिर भातिजक छातीमे। नहि सम्हारि सकल अनमाना दीदीक ई आक्रमण ओ। ठीके पाथरमे कोनो शक्ति थोड़बेक होइ छै। मुदा दोसर गोल महावीर हनुमानजीक सिद्ध आ जागृत होएबामे विश्वास कऽ रहल अछि- यौ, चुट्टीकेँ माटि दऽ दियौ तँ ओहो मड़ि जाएत मुदा बिकुटि कऽ जे काटत से छोड़त नहि। आ ई माटि अनमना दीदी महावीरजी केँ देलखिन्ह तँ ओ कोना छोड़ि दितथिन्ह। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकपर थापपर थाप लगा रहल छथि, बुझू सिद्ध महाबीरजीकेँ मनाइये कऽ छोड़ताह, भाँगक गोला असरि कऽ रहल छन्हि, आँखि तँ चढ़ले छन्हि, हाथ सेहो रुकै कऽ नाम नै लऽ रहल छन्हि, आ हुनकर नजरिसँ देखी तँ सिद्ध महावीरक पाथरक मुरुत जागृत भऽ गेल देखा पड़त, जेना ओहिमे जान आबि गेल हो! १.जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा-मइटुग्गर २. बिपिन कुमार झा- विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व ? ३.बसंत झा-उगना १ जगदीश प्रसाद मंडल .जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा- मइटुग्गर जहिना सरयुग नदीमे नहा भक्त मंदिरमे प्रवेश करितहि भगवान रामक दर्शन करैत तहिना तपेसर काका अंगनाक मेहमे आेंगठि सामिल भोज समाजकेँ खुअबैक ओरियान देखि रहल छथि। पोखरिक पानि जकाँ शीतल, शान्त समतल मन अंगनाक सुगंधमे मस्त छनि। तहि बीच बेटी सुभद्रा चमकैत स्टीलक छिपलीमे पनरह-बीसटा सुखल बरी एकटा बर आ गिलासक पानि आगूमे रखि कहलकनि- “कनी चीख कऽ देखियौ जे नीक भेलि कि नहि?” मुस्कुराइत बेटी आ छिपलीमे सजल बर-बरी देखि तपेसर काका हेरा गेलाह। मन पड़लनि मइटुग्गर। मुदा चुल्हिपर चढ़ल लोहिया छोड़ि अँटकब उचित नहि बुझि सुभद्रा चुल्हि लग पहुँच गेली। कमलक फड़ सन एकटा बरी मुँहमे लइते मन पड़लनि परिवारमे अपन कएल काज। साओन मास। भोरहरबामे मेघ फटि बरखो भेल आ अधरतियेसँ जे पूर्वा उठल उठले रहि गेल। कखनो काल झकसियो अबिते रहल। जेना-जेना दिन उठैत गेल तेना-तेना पूरबाक लपेट सेहो बढ़िते गेल। प्रसवक दर्दक आगम सुशीलाकेँ कहलनि। पुतोहूक बात सुनि सुनयना बेटा तपेसरकेँ पलहनि बजबए कहलखिन। ओसारक ओछाइनपर आेंघराएल सुशीलाक मनमे लड़ाइ पसरि गेलनि। एक दिस प्रसवक पीड़ा अपन दल-बलक संग अंगक पोर-पोरपर चढ़ाइ करैत तँ दोसर दिस जिनगीक कठिन दुर्गमे फॅॅसल मन खुशीक लहड़िमे झिलहोरि खेलाइत। नारी जिनगीक श्रेष्ठतम काजक भार। जेहने भरिगर काज तेहने मुँहमंगा मातृत्वक उपहार। पूर्वाक लपेट देखि सुनयनाकेँ ठकमूड़ी लगल रहनि। आइ धरि प्रसव गढूलामे होइत रहल अछि। जहि घरक टाटा हवाक वेगकेँ नहि रोकैत। आश्रमक घर जकाँ टाटमे लेब नहि पड़ैत। मुदा बोनक बच्चाकेँ कोन घर रक्छा करैत अछि! गठुला छोड़ि मालक घरमे ओछाइन ओछा देलखिन। ओछाइन ओछा हियासए लगलीह जे अगियासी भइये गेल, फाट-पुरान लइये अनलौं। मालक घरसँ हुलकी मारि पुतोहू दिस देखलनि तँ चैन बुझि पड़लनि। मन असथिर भेलनि। पहलनि ऐठाम जाइत तपेसरक मनमे अपन काजक भार उठलनि। एहेन भारी काजमे पुरूखक काज की अछि? डेग भरि हटल पलहनिक घर अछि तेकर बाद? मचकीपर झुलैत झुलनिहार जकाँ तपेसर झुलैत पलहनि ऐठाम पहुँच जनतब देलखिन। अपन उगैत लछमीकेँ देखि मुस्की दैत पलहनि कहलकनि- “अहाँ आगू बढ़ू माइयक थैर खरड़ि पीठेपर दौड़ल अबै छी।” पाँचो मिनट पलहनिकेँ पहुँचला नहि भेलि कि बेटाक जन्म भेल। धरतीपर बेटाकेँ पदार्पण करितहि बिजलोका जकाँ परिवारमे खुशी पसरि गेल। देह पोछैत पलहनिक मन चालीस तम्मा निछौर, तइपरसँ निपनौन, लाढ़ि-पुरनि कटाइक संग उपहार, पसारी छी तेँ मंगवोक अधिकार अछिये जाइकाल एकटा सजमनियो मांगि लेब। सिदहा तँ देबे करतीह। हिसाबमे मन बौआ गेलनि। समाजमे भगवान ककरो सनतान दइ छथिन तइमे सझिया कऽ दैत छथि ने। बच्चाक जिनगी हमरा हाथमे अछि, तहिना ने अपनो जिनगी दोसराक हाथमे अछि। तरे-तर मन खुशी भऽ गेलनि। मुस्की दैत सुनयनाकेँ टोनलनि- “काकी, पहिल पोता छिअनि, रेशमी पटोर पहीरिबनि?” धारक बेगमे दहलाइत दादीक मन, मूड़ी डोलबैत बजलीह- “एकटाकेँ के कहै सातटा पहिरेबह।” पलहनि- “बच्चा मुँह, एन-मेन तपेसरे बौआ जकाँ छै।” पलहनिक बात सुनि ओछाइनपर पड़ल सुशीलाक दर्द भरल देहक मनमे अपन सतीत्वक आभास भेल। मुदा अवसरकेँ हाथसँ नहि जाए दिअए चाहि बुदबुदाएल- “केहेन सपरती जकाँ बजै-ए।” मुदा पलहनि सुनलक नहि। जहिसँ आगू किछु नहि बाजलि। पोखरिक पानि जकाँ तपेसरक मन असथिर। सामान्य परिस्थिति तेँ सामान्य मनक विचार। जहिना कठिनसँ कठिन, उकड़ूसँ उकड़ू काजपर लूरि डटल रहैत तहिना जिनगी काजपर नजरि दौड़ैत मन डटल। मन कहैत बीस-एक्कैस बर्खक उम्रो छेबे करनि, रोगो व्याधिक छुति देहमे नहिये छन्हि। बेटापर नजरि पहुँचते पुत्र सन सम्पत्तिक आगमनसँ मन फुला गेलनि। जहिना लगौल गाछमे पहिल फूल वा फड़ लगलापर बेरि-बेरि देखैक इच्छा होइत तहिना तपेसरक मनमे उठैत। बर्जित जगह बुझि परहेज केने रहथि। मुदा तइयो जहिना डॉट टुटल कमल हवाक संग पोखरिमे दहलाइत तहिना खुशीक हिलकोरमे तपेसरक मन तड़-ऊपर करैत। मनमे उठलनि, पुरूष-नारी बीचक संबंधमे बच्चो पैघ शर्त्त छी। परिवारमे (संबंधमे) विखंडनक संभावना बनल रहैत अछि। लगले मन अपनासँ आगू उड़ि माए-बापपर गेलनि। हृदए विहुँसि गेलनि। जहिना मातृत्व प्राप्त केलापर नारीक सौन्दर्य बढ़ि जाइत तहिना ने पितृत्व प्राप्त केलापर पुरूषोकेँ होइत। लगले सिनेमा रील जकाँ बेटाक जन्मसँ अंतिम समए धरिक जिनगी नाचि उठलनि। किछुए समए बाद सुशीलाकेँ पुन: दर्द शुरू भेलनि। समएक संग दर्दो बढ़ए लगलनि। दुखक संग छटपटाएव शुरू भेलनि। सुशीलाक छटपटाहटि देखि सुनयना पलनिकेँ कहलखिन- “कनियाँ, अहाँ देखिअनु ता बच्चा सम्हारि दइ छी।” पेटपर हाथ दइते पलहनि बुझि गेली जे दोसर बच्चा हेतनि। बजलीह- “काकी, एकटा बच्चा आरो हेतनि?” पलहनिक बात सुिन, जहिना मेघ तड़कैत तहिना सुनयनाकेँ भेलनि। जोरसँ तपेसरकेँ कहलखिन- “बौआ, बौआ।” अकचका कऽ तपेसर बाजल- “हँ, माए।” “हँ, अंगनेमे रहह।” करीब बीस मिनट पछाति बेटीक जन्म भेलनि। अखन धरि जहिना खुशीक सुगंध अंगनामे पसरल छल एकाएक ठमकि गेल। बच्चाक जन्म होइतहि सुशीलाक देह लर-तांगर भऽ गेलनि। पलहनि सुनयनाकेँ कहलनि- “काकी, पुरबा लपटै छै। अगियासी नीक-नहाँति जगा देथुन ओना तँ सभ भगवानक हाथमे छनि मुदा जहाँ तलिक पार लागत से तँ करबे करबनि। जानिये कऽ तँ भगवान दुख बढ़ा देलखिनहेँ। अइ (पहिल) बच्चापर इ नजिर राखथु अइपर हम रखै छी।” कहि बच्चाक पोछ-पाछ करए लगली। साँस मन्द देखि मुँहमे मुँह सटा फूकि साँसक गति ठीक केलनि। बच्चाक लक्षण देखि पलहनिक मन बाजि उठल। जरूर दुनू बच्चा ठहबे करत। नजरि पैछला काजपर पड़ल। एहेन कि पहिल-पहिल बेरि भेलि। कतेकोकेँ भेलनि। किदु गोटेक दुनू बँचलनि, किछु गोटेक एकटा बँचलनि आ किछु गोटेक जच्चा-बच्चाक संग चलि गेलीह। ओना काज तँ अनिश्चित अछि मुदा अपना भरि तँ तिया-पछा करवे करबनि। सुशीलाकेँ सुनयना पुछलखिन- “कनियाँ मन केहन लगै-ए?” अर्ध-चेत अवस्थामे सुशीला अपन टूटैत जिनगी हाथक इशारासँ कहलकनि। मुँहक सुरखी कहैत जे नइ बँचब। सुशीलाक इशारासँ सुनयना बुझलनि जे तपेसर भारी विपत्तिमे पड़ि गेल। भगवानपर खींझ उठलनि। बेचारा फट्टो-फनमे पड़ि जाएत। हम बूढ़े भेलौं, जएह कएल हएत ततवे ने सम्हारि देबइ। मुदा विपत्ति तँ ततबेटा नइ ने छै। खेती-पथारी, माल-जाल, दसटा कुटुम-परिवार छै तइपर सँ दू-दूटा चिल्का भेलइ। कना सम्हारि पाओत। ने स्त्री बँचतै आ ने एक्कोटा बच्चा। हमहूँ कते दिन जीिव। सभ िकछु बेचाराकेँ हरा जेतइ। हे भगवान, तोरा केहन दुरमतिया चढ़लह जे एहेन गनजन बेचाराकेँ केलहक। आंगनमे बैसल तपेसरक मनमे उठैत जे जतेटा मोटरी माथपर उठत ततबे ने उठाएव। नमहर मोटरी कते काल क्यो माथपर सम्हारि कऽ रखि सकैए। मुदा तेँ कि? जीत्ता जिनगी हारियो मानि लेब उचित नहि। करैत-करैत-लड़ैत-लड़ैत जे हेतइ से देखल जेतइ। जहिना रणभूमिमे दू दलक बीच लड़ाइ अंतिम दौड़मे अबितहि दुनू दलक मन मानि लैत जे के जीतत के हारत। मुदा हरलोहोक बीच रंग कते रंगक विचार उठैत। किछु गोटे रणभूमिसँ भागए चाहैत तँ किदु गोटे अढ़ भजिया नुकाए जाहैत। मुदा किछु एहनो होइत जे अपन बलि देखि स्वेच्छासँ अंतिम समए धरि हथियार उठौने रहैत अछि। कोना नहि उठाओत? अपन जिनगीक संगी, जे कौआ-कुकुड़क पेट भरि अपन मनोरथ पूरा करत, आ हम गुलाम बनि दुश्मनक जहलमे सड़ब। अपन अंतिम बात सुशीला पलहनियो, सासुओ आ पतियोकेँ कहलक- “हम नइ बँचव। दुनियाँक सभसँ पैघ पापी छी जे अपनो रक्छा नै कऽ सकलौं। दुनू बच्चाकेँ अहाँ सभ देखबै।” कहितहि आँखि बन्न भऽ गेलनि। प्राण तँ बँचल रहनि मुदा चेतन-शुन्य भऽ गेलीह। क्रमश: २ बिपिन कुमार झा विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व? अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। अपरे स्थातुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥ यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद मे कहल गेल अछि जे- प्रतिदिन जीव मृत्यु कॆं प्राप्त करैत अछि मुदा ओतहि अन्य लोक ई बुझितो एतहि रहबाक इच्छा करैत अछि। एहि सँऽ आश्चर्य की भय सकैत छैक? एहि भौतिक जगत मे कोनो वस्तु संस्था अथवा कोनो समाज शाश्वत नहिं कहल जा सकैत अछि। ओ डायनासोर हो अथवा हडप्पा, मेसोपोटामिया अथवा कोनो लुप्तप्राय सम्प्रदाय सभ एक न एक दिन कालक गाल मे विलीन भय जायत ई ध्रुव सत्य अछि। हमर संकेत मिथिलाक सिरमौर अपन श्रोत्रिय समाज दिस अछि। प्रश्न अछि श्रोत्रिय समाज के सदस्य होयवा मे गर्व कियाक अनुभूत होइत अछि? की ई समाज कोनो अन्य समाज सँ भिन्न नहिं? यदि भिन्न तऽ कोन आधार पर? रहन सहन-खानपान आकि बात व्यवहारक कारण एकरा पृथक देखल गेल अथवा कोनो अन्तर्निहित गुण अन्य समुदाय सँऽ एकरा पृथक कयल? एहि ठाम पृथकतावादी नीतिक अनुसरण नहिं कयल जा रहल अछि अपितु अपन श्रोत्रिय समाज के अभ्युत्थान दिस एकटा सामान्य दृष्टिपात कयल जारहल अछि जे एकरा अभिलिखित करबा मे मदद करत अन्यथा ई समाज काल केर गाल मे समा गेलाक बाद इतिहासो सँ कोशो दूर भय जायत। एहि समाजक आरम्भ के कयलथि? ई समाज कियाक अस्तित्व मे आयल? एकर संस्कृति की अछि? एकर विधि व्यवहार आदि शास्त्रसम्मत अछि अथवा मात्र परम्परा केर निर्वहण अभिप्राय रहि गेल? यदि शास्त्रसम्मत अछि तऽ कोन ग्रन्थ मे एकर चर्चा अछि? ओहि ग्रन्थ केर प्रामाणिकता निर्विवाद अछि अथवा नहिं? जाति, कुल, पाँजि, मूल, गोत्र की थीक? एकर की औचित्य छल? यदि औचित्य छल तऽ आब एकर अनौचित्य कोना निर्धारित भेल जा रहल अछि? श्रोत्रिय समाज सँ सन्दर्भित उक्त चर्चित किछु एहेन मूलभूत प्रश्न अछि जे आवश्यक अछि एहि समाजक Documentation हेतु। ई कार्य एतेक सहज नहिं। हम किछु ग्रन्थ देखल मुदा ओ एहि मे स किछु प्रश्नक चर्चा तऽ अवश्य करैत छथि मुदा मूल सन्दर्भ देबा मे असमर्थ छथि। ’सारस्वत-निकेतनम्’ जे कि संस्कृत आ अपन संस्कृतिक अभ्युत्थान हेतु सतत् समर्पित अछि, अपन श्रोत्रिय समाज सन्दर्भित मूल स्रोतक आ एकर अक्षुण्ण संस्कृति केर विविध पक्षक Documentation करय जा रहल अछि। एहि कार्य मे अपनें सभ सँऽ विशेषकर एहि समाजक इतिहासक ज्ञाता बुजुर्ग आ सक्रिय युवा कें सहयोगक सर्वथा अपेक्षा अछि। यदि उक्त सन्दर्भ मे कोनो जानकारी उपलब्ध करा (kumarvipin.jha@gmail.com) सकी तऽ एहि विशाल यज्ञ मे एकटा आहूति सदृश होयत। एहि सन्दर्भ मे सूचित करब उचित होयत जे एहि दिशा मे एकटा साइट बनि कें तैयार अछि जेकर URL केर औपचारिक घोषणा यथाशीघ्र कयल जायत। शुभमस्तु ३. बसंत झा उगना इ कहानी १३४८-१४५२ के बिचक अछि जाही मे महा कवी विद्यापति के जन्म बिस्फी गाम मे भेलानी और ओ मैथिलीक बहुत पैघ कवी भेला जिनका कबी कोकिल के उपाधि देल गेलनी और ओ महादेव के बहुत पैघ भक्त सेहो छला कवी विद्यापतिक रचना एतेक प्रभाबी होईत छलनी जे जखन ओ आपण रचना के गबैत छला त कैलाश पर बईसल भगबान महादेव प्रशन्न भ जाईत छला और हरदम हुनक रचना सुनबाक इच्छा राखैत छला, ई इच्छा एतेक बड़ी गेलनि जे ओ एक दिन माता पार्वती के कहलखिन " हे देवी सुनु, हम मृत्युलोक जा रहल छी कवी विद्यापतिक रचना हमरा बहुत नीक लागैत अछि और हमर मोन भ रहल अछि जे हम हुनका संगे रही क' हुनक रचना सुनी, त अहां अही ठाम कैलाश मे रहू और हम जा रहल छी मृत्युलो" और रचना सुनबाक लेल धरती पर आबी गेला, और विद्यापति के ओतै नौकर बनी क उगना के नाम स काज कर लागला ओ विद्यापतिक चाकरी मे लागी गेला ओ हुनकर सब काज करथिन हुनका पूजक लेल फूल और बेलपत्र तोरी क आनैथ बरद के चरबैथ सब चाकरी करैत और राइत मे सुत्बा काल मे हुनकर पैर सेहो दबबैथ (धन्य ओ विद्यापति जिनक पैर देवक देव महादेव दबबैथ) अहि प्रकारे जखन बहुत दीन बीत गेल, ओम्हर माता पार्बती बहुत चिंतित भ गेली हुनका लगलैन जे आब महादेब मृत्यु लोक स वापस नै एता, और ओ हुनका बापस अनबाक प्रयास मे लैग गेली, ओ क्रोध के आदेश देलखिन जे आहा जाऊ और विद्यापतिक पत्नी सुधीरा मे प्रवेश क जाऊ जाही स उगना द्वारा कोनो गलत काज भेला पर सुधीरा हुनका मारी क भगा देती, लेकिन माता पार्वती के इ प्रयाश सफल नै भेलैन तखन ओ दोसर प्रयाश केलि ओ प्याश के कबी विद्यापतिक ऊपर तखन सवार क देलखिन जखन ओ एकटा जंगल के रास्ता स उगना संगे राजा शिव शिंह के ओतै जारहल छला ओ घोर जंगल छलाई ओत दूर दूर तक ज'लक कोनो आस नै छलाई और ओही बिच मे कवी विद्यापति प्याश स तरपअ लागला "रे उगना जल्दी सँ पाइन ला रउ नै ता हम मइर जेबउ बर जोर स प्यास लागी गेलौ" कहैत जमीन पर ओन्घ्रे लगला, आब उगना की करता ओ परेशान भ गेला एम्हर उम्हर पाइन के तलाश मे भट्क' लगला हुनका पाइन नै भेटलैन, तखन ओ एकटा गाछक पाछू मे नुका गेला और अपण असली रूप धारण क' अपन जटा सँ गंगाजल निकालला' और फेर उगनाक रूप धारण क विद्यापति के ज'ल देलखिन, विद्यापति जल पिबैते देरी चौक गेला ओ उगना स पूछ' लागला " रे उगना इ त गंगाजल छऊ, बता एता गंगाजल कत स अन्लाए" आब उगना की करता ओ कतबो बहाना बनेला लेकिन हुनकर एको नै चलल, ओ कि करता हुनका विबश भ अपन रूप देखाब' परलानी और ओ अपन असली रूपक दर्शन कवी विद्यापति के देलखिन, विद्यापति महादेवक अशली रूपक दर्शन करिते देरी चकित रही गेला और हुनक चरण पर खसी क हुनका स छमाँ माँग' लागला "प्रभु हमरा छमाँ करू हम अहां के चिन्ह नै सकलौं हमरा स पहुत पैघ अपराध भ गेल" तखन हुनका उठाबैत महादेव कहलखिन "हम आहा संगे एखन और रहब, लेकिन हमर एकता शर्त अछि जे आहा इ बात केकरो स नै कहबनी और जखने आहा इ बात केकरो लंग बाजब ओही छन हम अहाँ लंग स चली जायब" विद्यापति शर्त के मंजूर करैत और दुनु गोटे राजदरबार के तरफ चली गेला, माता पार्बती के इहो प्रयाश सफल नै भेलैन. तखन एक दिन उगन के बेलपत्र लावय मे कनिक देरी भ गेलनि ताहि पर सुधीरा एतेक क्रोधित भ गेली कि ओ चुल्हा मे जरैत एकटा लकड़ी निकली क हुनका मारबाक लेल उठेल्खिन "सर'धुआ आय तोरा नै छोर्बाऊ तू बड शैतान भ गेला हन हमर बच्चा सब भूख स बिलाय्प रहल अछि और तू एतेक देर स बेलपत्र ल' क' एलै हन" कहैत हुनका दिश बढ़लखिन, तखन विद्यापति स देखल नै गेलन्हि और ओ बजला "हे हे इ की करैत छि इ त साक्छात महादेव छैथ" और एतबे कहिते महादेव गायब भ गेलखिन, फेर विद्यापति हुनका जंगले जंगले तक' लगला और "उगना रे मोर कतै गेला" गबैत रहला लेकिन उगना फेर हुनका नै भेटलखिन, और ओ अपन प्राण तियैग देलखिन I ओ स्थान जाहि ठाम देवक देव महादेव कवी-कोकिल विद्यापति के अपन अशली रूपक दर्शन देने छलखिन ओही ठाम "बाबा उगना" के मंदिर छैन और ओहिमे शिवलिंग जे छाई से अंकुरित छाई, जेकर कहानी किछु एहन, छाई जे एक बेर गामक एक बुजुर्ग ब्यक्ति के महादेव सपना देलखिन की "हम एकता गाछक जैर मे छी" और ओतै बहुत पैघ जंगल छलई तखन गामक लोक सब तैयार भ क ओय ठाम गेला और पहुँच क जखन खुदाई केला त देखलखिन की एकटा बहुत सुन्दर शिवलिंग छाई, सब गेटे बहुत खुश भेला और विचार भेलय की हिनका बस्ती पर ल चलू ओय ठाम मंदिर बना क हिनक स्थापना करब और हुनका उठेबाक लेल जखने हाथ लगेलखिन की ओ फेर स जमीन के भीतर चली गेला, फेर स कोरल गेल और हुनका निकलवाक प्रयाश कैल गेलई, इ प्रयाश दू तीन बेर कैल गेल मुदा सब बेर ओ जमीन के भीतर चली जायत छला, तखन सब गोटे के बुझबा मे एलईन जे इ अहि ठाम रहता और अय ठाम स नै जेता, तखन ओही ठाम साफ सफाए कैल गेल और तत्काल मंडप बनैल गेल और बाद मे मंदिरक निर्माण सुरु भेल जे १९३२ मे जा क तैयार भेल और अहि मंदिरक परिसर मे ओ अस्थान सेहो अछि जाहि ठाम महादेव अपना जटा स गंगाजल निकलने छला और आय ओ इनारक रूप मे अछि जेकरा "च्न्द्रकुप" के नाम स जानल जैत छाई और एखनो ओकर जल शुद्ध गंगाजल छाई, जे लैब टेस्टेड छाई ! दरभंगा के एकटा बहुत प्रशिद्ध डॉक्टर अपना मेडिकल लैब मे एकर टेस्ट केने छलखिन और ओ अय बात के सुचना ग्रामीण सब के देलखिन जे अय मे पूरा गंगाजल के तत्व बिद्यमान अछि, और इ दोसर रुपे सेहो टेस्टेड छाई, अय जल के यदि अहां बोतल मे राखि देबय ता इ ख़राब नै होइत छाई इ स्थान मधुबनी जिलाक भवानी पुर गाम मे स्थित अछि एत' सब गेटे एकबेर जरुर आबी, एही स्थानक कुनु तरहक जानकारिक लेल अहां हमरा स संपर्क क सकैत छि "जय बाबा उग्रनाथ" हमर इ सोभाग्य अछि कि हमर जन्म एही गाम मे भेल अछि और हमर बचपन अय स्थान पर बीतल अछि, ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बूच"1934-2009-आगाँ ३.२.राजदेव मंडलक ४ टा कविता ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-विचित्र श्रद्धा ३.४.१.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता २.चन्द्र शेखर कामति, भात छै नाम-नाम ३.५.१.मृदुला प्रधान- कतय गेल गणतंत्र -दिवस २.अरविन्द ठाकुर- चारिटा गजल ३.६.गजेन्द्र ठाकुर- घृणाक तरहरिमे बुढ़िया डाही संग अछि ३.७.१.इन्द्र भूषण-हम की करू? २.राजेश मोहन झा-“साओन कुमार” ३.८.किशन कारीग़र- नबकनियाँ श्री कालीकान्त झा "बूच" कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि। पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह।माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल। मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि-पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय-समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूचीमे डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि। मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल। श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि। डा. दुर्गानाथ झा "श्रीश" संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | 1) “आउ हमर हे राम प्रवासी” आउ हमर हे राम प्रवासी व्याकुल जनक, विह्वला जननी, पड़ल अवधपर अधिक उदासी आउ हमर हे राम प्रवासी? ।।1।। धिक् धिक् जीवन दीन, अहाँ बिनु बीतल बर्ख मुदा जीवै छी जीर्ण-शीर्ण मोनक गुदड़ीकेँ स्वार्थक सूइ भोँकि सीबै छी निष्ठुर पिता पड़ल छथि घरमे कोमल पुत्र विकल वनवासी आउ, हमर हे राम, प्रवासी।।2।। दुर्दिन कैकेयी बनि कऽ हे तात, अहाँकेँ विपिन पठौलनि जाहि चार तर ठार छलहुँ तकरापर दुर्वह भार खसौलनि गृह विहीन बनलहुँ अनाथ हा, हमर अभाग, मंथरा-दासी? आउ, आउ हे राम, प्रवासी? ।।3।। सोनक लंकापर विजयी भऽ सीता संग कखन घर अाएब? बीतल विपिनक अवधि, अपन अधिकार कहू कहिया धरि पएब? परिजन सकल भोग भोगथि आ- अहाँ बनल तपसी-सन्यासी।। आउ, आउ, हे राम, प्रवासी? ।।4।। भरत अहाँ विनु पर्णकुटीमे कुश आसनपर कानि रहल छथि अहँक पादुकाकेँ अवधक- ऐश्वर्योसँ अधि मानि रहल छथि थाकल चरण चापि रगड़ब- पदतल, बैसब पौथानक पासी।। आउ, आउ हे राम, प्रवासी?।।5।। 2) “गौरी रहथु कुमारी” हएत नहि ई वियाह हे, गौरी रहथु कुमारी? बर बूड़ल बौराह हे, धिया शुचि सुकुमारी।।१।। चामक सेज, कुगामक बासी खन कैलाश, खनेखन काशी लागथि बुत्त भुताह हे, गौरी रहथु कुमारी।।२।। मुण्डक माल, ब्याल तन मंडित हस्त कपाल, मसानक पंडित अनुखन बिक्खक चाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।३।। यध्यपि भाल सुधाकर, सुरसरि- बहथि बेहाल चरण धरि झरि-झरि तध्यपि धहधह धाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।४।। कोठी कोठी भाङ भकोसथि कामरि-कामरि पानि घटोसथि आनक की निरबाह हे, गौरी रहथु कुमारी।।५।। भागलि, सखिगण सुनू कामेश्वर, गिरिजा छथि रूसलि कोबर घर जुनि बनु एहेन बताह हे, गौरी रहथु कुमारी।।६।। सासुर धरि शिव भाभट समटू परिछए िदयऽ सुनू हे बङटू बनलहुँ वर उमताह हे, गौरी रहथु कुमारी ।।७।। १.राजदेव मंडलक ४टा कविता राजदेव मंडलक चारिटा कविता- 1) मिलन-बिछुड़न अहाँसँ होइत अछि जखन मिलन बहए लगैत अछि मलय पवन- सन-सन झड़ए लगैत अछि मेघसँ छोट-छोट बून फुला जाइत अछि मनक प्रसून गाबए लगैत अछि भ्रमर- गुन-गुन चिड़ैक चहक मादक-महक प्रसन्नताक- दमक मिलैत अछि पूर्ण शांति आर सुख पड़ा जाइत अछि दुख किन्तु होइत अछि जखन बिछुड़न दुखसँ भरि जाइत अछि तन-मन सूखि जाइत अछि मनक फूल जेना रहि रहि गड़ैत अछि शूल मनमे भरए लगैत रोष बेचैनी आओर असंतोष हे सखी- करू कोनो उपाय जे दुनूसँ ऊपर उठि जाय मिल जाए त्राण दुनू भऽ जाए समान। 2) परिवारक गाछ रौद रहै तीखर गाछ लने कपारपर घामसँ नहाएल स्त्री जा रहल छलीह सड़पपर कथीक गाछ छी ई केहेन फड़त एतेक रौदमे ई नइ मरत हम गाछक नाम पुछलौं बारम्बार ओ कहलक एकर नाम अछि परिवार एहिमे शिक्षाक फल फड़त खाएत बाल-बच्चा तँ ज्ञानक इजोत करत हमरे परिश्रमसँ ई हेतै विशाल एकरा नहि खा सकत कोनो काल पालि-पोसि कऽ बनाएब बलवान बढ़तै सबहक मान-सम्मान जेना कऽ पटेबै तेहने फड़त जँ कष्टमे रहबै तँ गिर पड़त हम मुँह दिश अकबका कऽ तकलहुँ पूछलिऐ-अहाँक बात नहि बुझि सकलहुँ सुनि हमर वाणी ओ बुझलक हमरा अज्ञानी। 3) त्रिशंकु आँखिपर लगल अछि निन्नक झँपना देखि रहल छी डेराओन सपना घुरि कऽ आबि गेल छी गाम लादने समान पत्नी अछि वाम सपनोमे यादे अछि ओ दिन एतेक दुख कोना कटलो गिन-गिन दस मास पूर्व भागल रहि प्रेमिकाक संग सामाजिक नियमकेँ कऽ देलिऐक भंग शहरमे मित्र करैत छल काम दुनू गोटे पहुँचलहुँ ओहिठाम एकान्तमे मित्र बैठौलक साथ समझाबए लागल सभ बात- “उपरसँ जातिक टंटा आर लगतह पुलिसक डंटा अनकर बेटी रखने सँग पकड़ि कऽ तोड़ि देतह अंग-अंग गाबले गीतकेँ आब नहि गाबह कोर्ट जा जल्दी वियाह कऽ आबह कएलहुँ अन्तर्जातीय वियाह किछु लोक कहलक वाह-वाह किछु कहलक बड्ड अधलाह छोटकामे कएलक वियाह खादिमे धसि गेलाह काटि दस मासक प्रवास पहुँचल छी घरक पास पत्नी संगे ठाढ़ छी गोसॉंइ दुआरिक आगा पछुआरक गाछपर काँए-काँए करैत अछि कागा हमरा बापक मुइला भऽ गेल साल दु साल फेर ई कतएसँ पहुँचि गेला तोड़ैत ताल देखैत छी गोसाउनिक अगाड़ीमे नीर भरल अछि थारीमे जाहिमे धड़ विहीन बाबूक सिर नाचि रहल अछि क्रोधमे गलगला कऽ बाँचि रहल अछि- “ओहिठाम ठाढ़ रहू एमहर आबि नहि सकैत छी कुलदेवतासँ असीरवाद पाबि नहि सकैत छी जखन क्रोधसँ देवता जेतह जागि धन-जन आ घरमे लगतह आगि मुँह लटकौने केकर तकैत छहक राह उनटे पाएर घुिर जाह गोहराबह देवता-पित्तरकेँ मांगह सभसँ माफी एतबेक नहि छह काफी जा करऽ सात बेर गंगा स्नान बचाबह कुलक मान एहि कुलच्छनीक छोड़ि आपस आउ यौ बउआ अपन प्राण बचाउ” एकटा पाएर बाहर एकटा अछि घर अस्सी मन भारसँ दवा रहल छी तरेतर बाप दिश तकबाक नहि अछि साहस पत्नीक आँखिमे झाँकि रहल छी डरे थर-थर काँपि रहल छी हेऔ एहिसँ नीक छूटि जाइत प्राण तर धरती नहि उपर आसमान मध्य भागमे अटकि गेल छी नहि कऽ सकैत छी प्रेम त्रिशंकु जकाँ लटकि गेल छी किछु नहि फुराइत अछि की करबै आब पत्नीकेँ की देबै जवाब नहि एहिपार नहि ओहिपार धऽ लेने अछि जड़ैया बोखार एखनहुँ नहि सपना छोड़ि रहल अछि कंठ पकड़ि कऽ तोड़ि रहल अछि। 4) अनमोल जीनगी “हारल जीनगी जीएब ताहिसँ नीक रणक्षेत्रमे मरि जाएब से अिछ ठीक” यौ मित्त अहाँक ई गप्प हमरा नहि लगल नीक जीनगीक संगे रहतैक हारि आर जीत कखनहुँ कानैत अछि लोग कखनहुँ गाबैत अछि गीत किछुकाल करैत अछि झगड़ा किछुकाल करैत अछि प्रीत जँ भऽ जाए जीनगीक युद्धमे हारि फेरसँ लिअ अपनाकेँ सम्हारि छोड़ि शोक मनकेँ राखि नीरोग मृत्युसँ नीक जीवनक सदुपयोग करबाक चाही समाज आ राष्ट्रक हित यएह तँ अछि जीवनक मूल्य यौ मित्त पकड़ि लिअ कोनो सुन्नर राह सभ कहत वाह-वाह बाजू हरपल मधुर बोल जीनगी अछि अनमोल बढ़ाउ संसारसँ मेलजोल बढ़ि जाएत जीवन मोल! .. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। विचित्र श्रद्धा एक दिस देश डूबल पानिमे बाढ़ि सऽ दहाइत घरद्वार दोसर ठाम लाखक लाख लागल मूर्तीपूजन आ पाबैन त्योहार केहेन विचित्र श्रद्धा अछि ई किएक बिसरि रहल छी परोपकार ईश्वर अहाँ जौँ भेटितौँ तँ पुछितहुँ नीक लागैत अछि की एहेन सत्कार पाइक जोर अहूँकेँ बदलने अछि कि अखनो सुनैत छी पावन पुकार एक सिद्धान्तवादी लेल धनार्जन कतेक दुर्लभ भेल से अछि देखार भ्रष्टाचारक लूटल पाइ सऽ भऽ रहल अछि अहाँक सिंगार दिनोदिन संघर्ष कऽ रहल अछि मात्र जीबै लेल कर्म करनिहार जौँ अहाँ सच्चे मोन मे बसै छी तऽ मोन नहि करैत अछि स्वीकार धूप जरा कऽ आडम्बर किएक कर्त्तव्य पूर्तिमे अहाँक जय जयकार सभमे सत्कर्मक शक्ति भरितहुँ तऽ होइतै वास्तविक चमत्कार । १.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता २.चन्द्र शेखर कामति, भात छै नाम-नाम १ जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कविता- 1) गंग स्नान उठि भोरे छोड़ि घर, चललौं नहाए गंग घर-परिवार समेटि, देह धरौल अंग अन्हरोखक राह हराएल, झल-फल करै आँखि दुनू डेन पसारि, लगौल माछक पाँखि दिन जगल रश्मि छिड़िआएल, देखल तक्खन गाम लटुआइल फुलवारी सुखैत, पहुँचल एक सुरधाम सभ पापक जननी अहाँ मैया जुनि बिलहू अपन सनेस दूध बुझि भक्तजन पीबै सनकि पड़ाए दूरदेश। 2) सरस्वती बंदना साले-साल किअए अबै छी झणे-झण अबैत रहू हर क्षण हर मनकेँ अमृतसँ भरैत रहू।- क्षणे-क्षण... नव शक्तिक नव उत्साह दऽ सृजन शक्ति भरैत रहू कर्म-ज्ञानकेँ घोड़ि-घोड़ि सिनेहसँ सिनेह सटैत रहू।- क्षणे-क्षन... जे हूसल से हम्मर हूसल तइले किअए छी कलहन्त सभ जागैए सभ सुतैए एक दिन हेतै सबहक अंत नजरि-उठा देखैत रहू।- क्षणे-क्षण... देवी अहाँ, मैया अहाँ भेदि कतौ अछि कहाँ जोड़ल आँखि उठा-उठा पले-पल देखैत रहू क्षणे-क्षण अबैत रहू। २. चन्द्र शेखर कामति, शिक्षा- एम.ए. (राजनीतिशास्त्र), पिता- स्व. योगेन्द्र कामति, गाम-पोस्ट- करियन, भाया- इलमास नगर, थाना- रोसड़ा, जिला- समस्तीपुर, बिहार। समप्रति- प्रखण्ड सहकारिता प्रसार पदाधिकारी (बेनीपट्टी) भात छै नाम-नाम (बाल साहित्य) भात छै नाम-नाम, दालि छै गोल तेहिपर चड़हल आलुक झोड़ कने दही दीयऽ कने बड़ी दीयऽ-2 छोटकी कनियाँ आबै छथि, ओ भानस खूब बनावै छथि, हुनका हाथक बनल तरूआ, तरकारी सभकेँ भावै छै, छैक नोन-तेल सभ ठीक-ठीक, लागै छन्हि सभकेँ बड़ नीक, कने दही दयऽ, कने बड़ी दीयऽ-2 भात छै नाम-नाम दालि...... छोटकी केर छोटका कनटिरबा सभ काँय-काँय किकियाबय छै तइयो बेचारी मोन मारि-मारि अप्पन संसार चलावय छै, केतवो केओ लाख सताबै छै दुब्बर दुलहा, दुलहिन मोट तै पर सँ दे लाठिक चोट- कने दही दीयऽ कने बड़ी दीयऽ-2 भात छै नाम-नाम, दालि छै गोल तेहि पर चड़हल आलुक झोड़ कने दही दीयऽ, कने बड़ी दीयऽ-2 १.मृदुला प्रधान- कतय गेल गणतंत्र -दिवस २.अरविन्द ठाकुर- चारिटा गजल १ मृदुला प्रधान कतय गेल गणतंत्र -दिवस कतय गेल गणतंत्र -दिवस , झंडा क गीत कतय सकुचायल , दृश्य सोहनगर ,देखवैया छथि, कतय नुकायल . लालकिला आर क़ुतुब मिनारक के नापो ऊंचाई , चिड़िया-घर जंतर -मंतर क छूटल आवा-जाही . पिकनिक क पूरी -भुजिया , निमकी ,दालमोट ,अचार, कलाकंद ,लडूक डिब्बा लय, मित्र ,सकल परिवार , कागज़ के छिपी-गिलास थर्मस मे भरि-भरि चाय, दुई-चारि ता शतरंजी वा चादर लिय, बिछाय. इ सबहक दिन बीति गेल, आब 'मॉल' आर 'मल्टीप्लेक्स', दही -चुड़ा छथि मुंह बिधुऔने, घर -घर बैसल 'कॉर्न-फ्लेक्स'. कम्प्यूटर पीठी पर लदने, मुठ्ठी मे मोबाइल, अपने मे छथि सब क्यो बाझल, यैह नवका 'स्टाइल'. २ अरविन्द ठाकुर गजल-१ छिछिआइछ उत्कंठा हमर खन आर लग, खन पार लग हमर लिखल उजास सभक मोल की संसार लग जाल मुँहमे बोल नञि, छपय बहेलिया के बयान चिड़ैक बोली बुझत से नञि लूरि छै अखबार लग रंगबिरही जिनीससँ ठाँसल रहै सभटा दोकान किन्तु जन-बेचैनी के औषधि नञि रहै बजार लग एक समझौता सँ शासन वामनक सरकस बनल नञि छलै पट्ठा कोनो दमगर बचल दरबार लग बुन्न मे सागर भरल, अणु मे भरल ऊर्जा अपार बिन्दु सरिपहुँ लम्बवत भए ठाढ़ होइछ आधार लग लोक-लादल नाह बाढ़िक पानि मे अब-तब मे छै ओ घिंचाबय छथि फोटो बान्ह पर पतवार लग नफा के वनतंत्र मे पग-पग बिचौलिया रक्तबीज अकिल गुम्म अछि, केकर मारफत अर्जी दी सरकार लग उपरचन्ती माल के चस्का चढ़ल “अरबिन” एतेक बनल छी लगुआ कि भिरुआ, जायब नञि अधिकार लग गजल-२ जनहित के एहि बजट मे एखन वित्तीय-क्षति अनुमाने पर अछि हमरा एना किऐ लगैछ जे संकट हमर प्राणे पर अछि अयोध्या मे रामलला लेल किऐ पड़ल बूइयाँ के संकट भू-अर्जन के अखिल भारतीय भार जखन हनुमाने पर अछि सगर देश के सभ इनार मे बैमानी के भांग घोरायल बनखांट मे बैमानी के जांच-भार बैमाने पर अछि लूटि-कूटिकए, भीख मांगिकए पेट भरैए लोक, तखन संविधान केँ आत्मघात सँ तोड़ैक दोष किसाने पर अछि मार्क्स आर एंजेल्स केँ पीयल, घंटल लाल-किताब मुदा मोनक कोनो अन्तर्तम मे बस भरोस भगवाने पर अछि गजल कहैत “अरबिन” जेना हम परकाया-प्रवेश केलहुँ ने निज के अछि बोध, ने अपन चित आ अकिल ठेकाने पर अछि गजल-३ तुरछल हमर सौभाग्य, हमर छाहरिक छाहरि सँ भागय जेना जड़काला मे सेरायल लोक पर सँ रौद भागय भाव के लतनर्दन करय, सटका बजारय बेर-बेर हीत-मीतक चोट सहितहुँ मोन सँ नञि मोह भागय निन्न के कोरा मे रहितहुँ किछु सजग भए कए रही चोर-दरब् आजा बहुत, देखब, कोनो सपना ने भागय रूप-रस लोभी भ्रमर सन छै पुरुष के जाति ई सम्बन्ध के सिक्कड़िसँ बान्हू, ऊबिकए छलिया ने भागय एना भागैछ कुकुर-मोन, कुतिया-विमुख, भोगक पछाति मारि डर सँ भूत आ कंगाल-घर सँ चोर भागय इजोतसँ सकपंज छथि काजर के घर मे रहनिहार शायर सदति चैतन्य “अरबिन”, कोन विधि अन्हार भागय गजल-४ मदन हमर आँखि पर रंगीन सन जाली लगाबय पात हुनकर देह आ टुस्सी हुनक कनफूल लागय नीलहा परिधान सँ छिटकैत हुनक देहक प्रभा शरद मासक व्योम मे ज्योँ पूर्णचन्द्र आभा जगाबय हुनक प्रतिमा हृदय मे बद्धमूल भेलछि एहन सन जेँकि अलगाबय छी बल सँ, हृदय के सभ तन्तु फाटय ई हँसी, ई अंगभंगी, ई कटाक्षक तनल वाण मन्मथ के कारावास मे बान्हल कोनो कैदी की भागय यक्ष छी “अरबिन”, धरा पर आयल छी हम शापवश मोन के परिताप सँ अंतःकरण झरकैत बुझाबय गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।
लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।
मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।
मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।
उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।
कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।
अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका । सम्पादन: अन्तर्जालपर विदेह ई-पत्रिका “विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com घृणाक तरहरिमे बुढ़िया डाही संग अछि १ घृणाक तरहरिमे प्रेम, मुस्कीसँ जीतब घृणा आ ईर्ष्याकेँ घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ ओहि तरहरिमे घृणाकेँ गारि देबै अपन प्रेमक शक्तिसँ हँसैत- मुस्कियाइत करबै आग्रह जे परिश्रम घृणाक तरहरि बनबऽमे लगौलक कहबै प्रेमक पोखरि काटऽ जाहिमे प्रेमक पानि बरखा मासमे भरि जाएत आ भरले रहत ततेक गहींर कऽ काटल रहत माटि ओहिमे हेलत प्रेम हेलैत रहत आ बहि जाएत, डूमि जाएत घृणा आ ईर्ष्या डूमि जाएत आ बझा कऽ लऽ जएतै पनिडुब्बी ओकरा जावत हम रहब नै छूबि सकत क्यो प्रेमक सत्यक पुत्रकेँ कारण शक्तिसँ, ऊर्जासँ भरल अछि सत्यक पुत्र ओकर चारूकात स्थूल-प्रेमक गिलेबासँ ठाढ़ कएल घेराबा रहत नै करू चिन्ता। आ जहिया हम नै रहब सीखि जाएब अहाँ सभ किछु हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर सत्यक विरोधीक लेल ओहि घेराबाकेँ तोड़बाक प्रयास अहाँक स्थूल-प्रेमी मित्र सभ नै हेमऽ देथिन्ह सफल से हम रही वा नै रही प्रयाण थम्हत नै बतहपना बढ़त नै मारि देब तँ मारि दिअ मुदा मोन राखू हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु मुदा रहबे करत स्थूल-प्रेमी साधक सभ आ करत पहिल नृत्य हस्त संचालनसँ चतुरहस्त आनन्दसँ भरल मोन सत्य, झूठ आ तकर निर्णयक लेल सनगोहिक चामसँ छारल डफ-खजुरी लए डोरीक कम्पनसँ ध्वनि निकालत गुमकी, ओहि खजुरीक ध्वनि आ गुमकी, गुम..गुम..गुमकी... आ तखन दोसर नृत्य होएत प्रारम्भ शिखरहस्त पर्वतशिखरसन युद्धक आवाहन-प्रदर्शनक लेल घृणाक तरहरि खूनऽ दियौ मारि देत तँ मारऽ दिऔ मोन राखू मुदा हमरा संगे मरत आर बहुत रास वस्तु मुदा हमर वियोग बना देत सक्कत, तीव्र आ कठोर रक्तबीजी सत्यपुत्र सभकेँ २ बुढ़िया डाही संग अछि कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत ओ नहि छथि बुढ़िया डाही खेत जे छलै सनगर यौ से बनल प्रेमक कमलदह घृणाक विरुद्ध अछि हमर ई बुढ़िया डाही फेर वएह गप आत्मरक्षार्थ सत्यक विरोधमे चोरबा बाजल फेर सर्जनक सुख भेटत चोरिमे? दोसराक कृति अपना नाम केलासँ आकि दोसराक मेहनतिकेँ अपन नाम देलासँ दोसराक प्रतिभाकेँ दबा कऽ कुटीचालि कऽ आर भाँग पीबि घूर तर कऽ गोलौसी कोनाकेँ आँगुर काटब जे लिखब बन्न करत तोड़ि दियौ डाँर, काटि दियौ पएर आँखि निकालि लिअ धऽ दियौ रॉलरक नीचाँमे पिसीमाल उठा दियौ बड़का एलाहेँ सर्जनक सुख पएबाले तँ की हारि जाइ तँ की छोड़ि दिऐ इच्छा जीतत आकि जीतत ईर्ष्या संकल्प हमर जे एहि धारकेँ मोड़ि देब मुदा किछु ईर्ष्या अछि सोझाँ अबैत ईर्ष्या जे हम धारकेँ नहि मोड़ि पाबी बहैत रहए ओ ओहिना ओहिना किए ओहूसँ भयंकर बनि संकल्प जे हम केने छी इच्छा जे अछि हमर/ से हारि जाए आ जीति जाए द्वेष/ जीति जाए ईर्ष्या हा हारबो करी तेना भऽ कऽ जे लोक देखए!/ जमाना देखए!! तेना कऽ हारए संकल्प हमर/ इच्छा हमर धारकेँ रोकि देबाक/ ठाढ़ भऽ जएबाक सोझाँ ओकर आ मोड़ि देबाक संकल्प ओहि भयंकर उदण्ड धारकेँ मुदा किछु आर ईर्ष्या अछि सोझाँ अबैत ओ द्वेष चाहैए जे हमर प्रयास/ धारकेँ मोड़बाक प्रयास मोड़लाक प्रयासक बाद भऽ जाए धार आर भयंकर पुरान लीखपर चलैत रहए भऽ आर अत्याचारी आ हम जाए हारि आ हारी तेना भऽ कऽ जे लोक राखए मोन मोन राखए जे कियो दुस्साहसी ठाढ़ भऽ गेल छल धारक सोझाँ तकर भेल ई भयंकर परिणाम जे लोक डरा कऽ नहि करए फेर दुस्साहस दुस्साहस ठाढ़ हेबाक उदण्ड-अत्याचारी धारक सोझाँमे लऽ ली हम पतनुकान/ आ से सुनि थरथरी पैसि जाए लोकक हृदयमे मुदा हम हँसै छी हारि तँ जाएब हम मुदा हमर साधनासँ जे रक्तबीज खसत से एक-एकटा ठोपक बीआ बनि जाएत सहस्रबाढ़नि झोँटाबला घृणाक विरुद्ध थाढ़ अछि हमर ई बुढ़िया डाही। कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़सँ भरल खेत बनत खेत जे छलै सनगर यौ, जाहिमे घृणाक तरहरि खुनेलौं यौ घृणाक तरहरि खूनल ओहि खेतमे कमलक मृणाल, पुरैनि, कमलगट्टा, बिसाँढ़ अछि भरि गेल प्रेमक कमल अछि फुला गेल। सहस्रबाढ़नि झोँटाबला बुढ़िया डाही केलक ई। आ तखन फैसला हेतै आब जखन उनटि जाइए लोक उनटि जाइ छै बोल छने-छन बदलि जाइए बिचकाबैए ठोर बोलक मधुर वाणी बोली-वाणी बदलि जाइ छै बनि जाइए बिखाह गोबरझार दऽ चमकाबै छी स्मृतिकेँ घृणाक विरुद्ध ठाढ़ छलि तहियो हमर ई बुढ़िया डाही। धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै आ ओ सभ तकर विरुद्ध ठोकि कऽ टाल भऽ जाएत ठाढ़ आ डरा जाएत द्वेष स्मरण कऽ जे फेर रक्तबीजसँ निकलल एहि सहस्रबाढ़नि सभक रक्तबीज एकर सभक बीआक सन्तान फेर आर बढ़ि जाएत आक्रमणसँ कारण संकल्प अछि, इच्छा अछि ई सभ धारकेँ रोकबाक हिस्सक जकरा लागि गेल छै घृणाक विरुद्ध अछि जे जकरा बुढ़िया डाही अहाँ कहै छिऐ। १.इन्द्र भूषण-हम की करू? २.राजेश मोहन झा-“साओन कुमार” इन्द्र भूषण हम की करू? जँ गाबी सभ कहैए कनै किएक छिऐ? जँ कानी सभ कहैए ई की गबै छिऐ? जँ चुप रहू सभ कहैए बाजै किएक नहि छिऐ? जँ बाजी सभ कहैए हल्ला किएक करै छिऐ? आखिर बाजू वा चुप रहू? हम की करू? केओ कहैत अछि अहाँ ई किएक नहि करै छिऐ केओ कहैत अछि अहाँ ओ किएक नहि करै छिऐ ई करू तँ ओ प्रसन्न होइत अछि ओ करू तँ ई रूसि जाइत अछि सबकेँ मनाऊ कोना हम की करू? बिना पुछने करू तँ कहैए पुछलौँ किएक नहि जँ पुछिऐ तँऽ कहैए अपने किएक नहि सोचै छिऐ अपना समझसँ करू तँ कहैए सदिखन एना मनमरजी किएक करै छिऐ अपन पक्ष सभकेँ बुझाऊ कोना हम की करू? २.
राजेश मोहन झा 1981- उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि। “साओन कुमार” (वाल साहित्य) उछलि-कूद करै छेँ वौआ एहि ऋृतुक तोरा भान कोना छौ टरटराइत छेँ कादो सानल जलमे स्वर सरगमक ज्ञान कोना छौ झर-झर झहरौ ऋृतु िनरझरनी सभा बजौलें डोबहा कातमे छोट-छोट जलकुमही पातक टिकुली सटने छेँ मुॅंह आ गातमे भेटथुन एहिठॉ प्रियतमा तोहर एहि सबहक अनुमान कोना छौ... आबेँ बैसेँ कनेक सुस्तावेँ... हेतै जे से देखल जएत मेघदूतक शान बढ़ल छै नहि पोखरिक पानि सुखएत औता भुजंग लप्प दऽ धरता एहि सभसँ अनजान कोना छेँ जनैत छी किछु जन तोरा कूप मंडूक कहि उपहास करै छथि नहि जनैत छथि तोहर महिमा मुदा गलती अनायास करै छथि चनहा सोती इनार वा सरिता सभठॉ जीवन आसान कोना छी.... एकटा अपराध तुहू करै छेँ जखन-तखन तों बाढ़ि अनै छेँ जानै छी मानै छी मुदा की करू नेना वियोगमे खूव कनै छेँ दलवल आवे गीत सुनावे मात्रा तालक वरदान कोना छौ....। किशन कारीग़र
परिचय:- जन्म- 1983ई0 कलकता में ,मूल नाम-कृष्ण कुमार राय ‘किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय ‘नन्दू’ , माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी-ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक, आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं लघु कथा,कविता,राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी।शिक्षाः-एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।
नबकनियाँ मोन रखियौ कनेक हमरो पिया सोलहो सिंगार कए बैसल छी हम एसगर भेंट होएब कहिया अहॉ मोन मे आस लगेने अहॉक बाट तकैत छी हम एसगर। कौआ कूचरल भोरे-भोर चुपेचाप हमरा केलक सोर कहलक जल्दीए औतहुन तोहर ओझा लिपिस्टीक लगा हम रंगलहुॅ अपन ठोर। परदेश जाइत-मातर यौ पिया किएक बिसैर जाइत छी नबकनियॉ के नहि बिसरब कहियो परदेश मे हमरा सपत खाउ हमरा पैरक पैजनीयॉं के। जूनि रूसू अहॉ सजनी नहि घबराउ यै मोन पड़ैत छी अहॉ तऽ लगैत अछि बुकोर यै मुदा कि करू नहि भेटल तनखा समय पर नहि किनलहुॅ अहॉंक लेल लहंगा पटोर यै। साड़ि पहिर हम गुजर कए लेब नहि चाहि हमरा राजा लहंगा पटोर यौ अहॉक सुख-दुख मे रहब सहभागी देखितहुॅं अहॉ के ऑखि सॅ झहरैत अछि नोर यौ। अहिंक बियोग मे दिन राति जरैत छी इजोरिया मे टुकूर-टुकूर अहिं के देखैत छी अहिंक संग एहि बेर घूमब चैतीक मेला मोने मोन हम एतबाक नियार करैत छी। बड्ड केलहुँ नियार अहॉ आबि कऽ देखू मुस्की माइर रहल छी हम चौअनियॉं जल्दी चलि आउ गाम यौ पिया चिªट्ठी लिख रहल अछि एकटा नबकनियॉं। विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। करिया झुम्मरि मिथिलाक लड़की सभमे करिया-झुम्मरि खेलक खूब चलनि अछि। छोट आ पैघ सभ एहि खेलक आनन्द लैत छथि... २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित गद्य-पद्य भारती डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्रक दुइ गोट लघुकथा -लेखिकाक संस्कृत लघुकथा संग्रह “लघ्वी”सँ मैथिली रूपान्तर:डॉ. योगानन्द झा १.वीरभोग्या वसुन्धरा दुर्भाग्यसँ गृहस्वामी देवदत्तक मृत्यु भऽ गेलनि। लगले हुनक दुनू पुत्र हुनक श्राद्धादिक कर्मक बाद आपसी बाँट-बखरा कऽ लेलनि। ज्येष्ठ रमेश स्वभावसँ किसान छल। ओ अपन काजक व्यवस्था स्वयं संचालित करऽ लागल। मुदा छोट पुत्र सुरेश परम आलसी छल। ओकर खेती-बाड़ी जन-मजूरपर आश्रित रहऽ लगलैक। तेँ ओकर उपजा-बाड़ी अत्यल्प भऽ गेलैक। क्रमशः ओ अत्यन्त दरिद्र होइत चल गेल। एक दिन ओ अपन भाइसँ पुछलक- भाइजी यौ, हमर खेत सभक उपजा-बाड़ी किएक कम होइत चल गेल? हमरासँ कोन त्रुटि भेल अछि? हमहूँ तँ अहींक संगे समयेपर रोपनी-पटौनी आदि करैत अएलहुँ अछि मुदा तैयो हमरा खेतमे पहिने जकाँ उपजा नहि भऽ पाबि रहल अछि। आखिर कोन ढंगक दोष हमरासँ भऽ रहल अछि? रमेश बाजल- सुरेश! तोँ किछु करऽ नहि चाहैत छेँ। तोहर खेती-बाड़ी जने-मजूरपर टिकल छौक। ई जानिले जे जाधरि तोँ स्वयं अपन खेतमे परिश्रम नहि करबेँ ताधरि पर्याप्त अन्न नहिञे उपजतौ। सनातनसँ ई नीतिवाक्य प्रचलित छैक- “वीरभोग्या वसुन्धरा”। २. अति सर्वत्र वर्जयेत् कोनो दुर्घटनामे महेशक अकालमृत्यु भऽ गेलनि। तखन हुनक युवती पत्नी माधुरी आ दुइ गोट छोट-छोट नेना अकस्मात् अनाथ भऽ गेलनि। पर-परिजन सभ हुनका सभकेँ सांत्वना दऽ अपन-अपन काजमे लागि गेल। केशव महेशक बालसंगी छलैक। ओ माधुरीक सहायताक हेतु कृतसंकल्पित भेल। ओ सरकारी कार्यालयमे वरीय लिपिक छल। ओ अपन माइक संग माधुरीयेक पड़ोसमे रहैत छल आ निराश्रिता माधुरीक ध्यान राखैत छल। ओ माधुरीक हेतु बजार जाय खाद्य सामग्री कीनि कऽ अनैत छल आ ओकर आनो आवश्यकताक पूर्तिक हेतु कटिबद्ध रहैत छल। ओकर एहि प्रकारक प्रयासक कारणे माधुरी कहियो कष्टक अनुभव नहि कऽ सकल। केशवक माय सेहो माधुरीक धिया-पुता सभक ताक-छेम कएल करथि। ई सभ देखि कऽ लोकापवाद प्रचलित होमऽ लगलैक- “ई सभ कोनो परोपकारक भावनासँ नहि कएल जा रहल अछि। माधुरीक युवावस्था ओ सौन्दर्य एकर मूल कारण अछि। केशव माधुरीपर आकर्षित भऽ गेल अछि आ ओकरासँ प्रेम करऽ लागल अछि”। एहि तरहक सन्देहक दृष्टि सर्वत्र व्यापक होइत चल गेल। से सभ देखि केशवक माय बजलीह- बेटा, आइसँ माधुरीक घर जाएब बन्न करू। कहलो गेल अछि- “अति सर्वत्र वर्जयेत्”। लोक निरंकुश होइत अछि। बालानां कृते १. ब्युटी कुमारी- राहुलजी एक नजरिमे २.अर्चना कुमर १.आस, २.विद्वान-१ (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) ३.डॉ. शेफालिका वर्मा- स्मृति-शेष १. ब्युटी कुमारी, सहायक शिक्षिका, संस्कृत मधुराम इंटर स्तरीय विद्यालय, ग्वालपाड़ा, मधेपुरा (बिहार)। राहुलजी एक नजरिमे दुनियाँमे प्रतिभाक धनिक लोकक कमी नै अछि तखन सर्वतोमुखी प्रतिभाक धनिक व्यक्ति तँ ओंगुरीपर गिनल जा सकैत अछि । राहुल सांकृत्यायन गिनल-चुनल ओहेन प्रतिभाक धनिक लोकमे छथिन जिनकर जोड़ ने अछि । हिनकर तुलना करै लऽ रुपकक कल्पना करनाय दुस्साध्य लागैत अछि। राहुलजी जीवनक सब अंगक सामाजिक विज्ञानक सब शाखाक केँ समृद्ध आ विकसित कऽ लिखने छथि। बौद्ध धर्मावलम्बी केँ तँ दावा अछि कि 20वीं सदी मे भगवान बुद्धक विचारकेँ सबसे बेसी प्रचार- प्रसार करैवाला लोक मे राहुलजी अग्रगण्य छथि। औपनिषदिक परम्परा सँ आधुनिक स्वरुपक कल्पना करैवाला ज्ञानक खोज मे तलवारक धार पर चलैवाला मनीषि राहुल सांकृत्यायन छथि। दर्षन साहित्य राजनीति आ इतिहासक पण्डितो स्वीकार करैत छथि कि राहुलजी श्रेष्ठ पण्डित छलाह। राहुलजी ओं महापण्डित रहथि जे अतीतक प्रमाणिक आ प्रसांगिक अनुभव सऽ लाभ लऽ नवज्ञानक मार्ग प्रशस्त कएलथि। राहुलजी कर्मठ कर्मयोगी जेकाँ अपन अनमोल समयक उपयोग कए वास्तविक स्वरुप केँ देखलखिन्ह आ बुझलखिन्ह। ओकर संगे-संग अपन देषक लोको केँ बुझबैक प्रयास कलथिन्ह । हुनका लए चुपचाप बैसनाए असंभव रहै। ओ अपन एक-एक क्षणक उपयोग सार्थक कार्य मे करैत रहैथ। चरैवेति -चरैवेतिक सिद्धान्तक अक्षरशः पालन करैत रहैथ। विश्लेषण आ संश्लेषण कलामे महारत हासिल रहै हुनका। ग्राह्य आ अग्राह्य वस्तु केँ परिखैत रहैथ राहुलजी। राहुलजीक व्यक्तिव्यक निर्माण कोना भेल एकर अध्ययन जेतै मजेदार अछि ओतबैक प्ररेणादायक। आजमगढ़ जिलाक मझोला किसान परिवारमे हिनकर जन्म भेल रहै। नाम छलैन्ह केदारनाथ पांडे। पाँच सालक उमरमे हिनकर शिक्षा आरम्भ भेल मुदा परिवारक वातावरण एहन नै रहै कि पढ़ाय-लिखाय ठीक -ठाक चलि सकै। इएह बीच मे हिनकर विवाह भऽ गेल परिवारक वातावरण सऽ केदारनाथक मन उचैट गेल, तखन घरसँ भागैक सिलसिला शुरु भऽ गेल- कलकता बनारस मद्रास अयोध्या लाहौरक चक्कर लगाबैं लगलाह। यही चक्कर मँ ओ एक मठक महन्तक शिष्यत्व ग्रहण कएलथिन जेकर बाद हुनकर नाम रामोदार साधु भऽ गेल। बाद मे मठक महन्ती मिलैत रहैन्ह मुदा अपना आप केँ बांहि केँ नै राखि सकलाह। तखनक मनोदषाक वर्णन आगू आबि केँ कएने छथि- भावी महन्त बनाबै लऽ महन्त लक्ष्मणदास हमरा बनारस सँ लाबलैथ। यदि हम मठ मे ठहैर केँ नै रहि सकलौं आ महन्त नै बनि सकलूँ तऽ एहि मे हमर अपन घुमक्कड़ी आ ज्ञानक तीव्र जिज्ञासा रहै। भागैक दौर मे कतौ किछ समय रुकि कऽ केदारनाथ संस्कृत अंग्रेजी हिन्दी अरबी सभक अध्ययन कैलथिन्ह। लाहौर मे अध्ययन करैत आर्यसमाजक अनुयायी भऽ गेलाह। बौद्ध साहित्यक संग बड़ लगाव भऽ गेल रहैन्ह । घुमक्कड़ प्रवृति तऽ रहबै करै आब बौद्धधर्मक प्रति झुकाव होएबाक कारणेँ लुंबिनी सारनाथ राजगृह नालन्दा आदि बौद्ध तीर्थस्थानक यात्रा कएलैन्ह। इहा बीच गाँधीक आँधीमे अर्थात् स्वाधीनता आन्दोलनोमे कुदि गलैथ। छह मासक जेलमे सजा भऽ गेल। संन्यासी रामोदार उर्फ केदारनाथ उर्फ राहुलजी केँ आजादी खातीर लड़ैत देखि लोक हुनकर चरण धूलि पाबै लऽ दौड़ेत रहैथ। ओ राजनीति मे त्याग आ समर्पणभावक विशेष महत्व दैत रहैथ। हुनकर कहब रहैन्ह - राजनीतिमे खूनक वएह स्थान अछि जे पूजा पाठ मे चन्दनक। राजनीतिमे रहैत हुनकर विद्यानुराग कम नै भेल। जेलयात्रा आ ज्ञानयात्रा दूनूक क्रम ने टूटल। ज्ञानक खोज मे कतै बेर श्रीलंका तिब्बत इंगलैण्ड रुस ईरान मंगोलिया चीन आदि देशक यात्रा कएलैन्ह। तिब्बत जाए केँ एहेन-एहेन दुर्लभ ग्रन्थक खोज कैलखिन्ह जेकर अभावमे भारतक इतिहासक अभिन्न अंग भऽ गेल । ज्ञानक साधना जारी रहल। किछ दिन बौद्धक चीवर धारण कए ओकरो सऽ मूँह मोड़ि ललैन। 1937 मे सोवियत संघ गेलैथ ओतहि एक रुसी महिला संग विवाह कएलन्हि जिनका सऽ पुत्र ईगोर क जन्म भेल।अखन धरि राहुल सांकृत्यायन प्रसिद्ध भारतीय विद्वानक रुपमे सभठाम प्रतिष्ठित भऽ गेल रहैथ। हुनकर ग्रन्थ आ लेख केँ धूम मचल रहै। आम लोकक मुक्ति लऽ राजनीतिक हथियार केँ ओ सही तरीका सँऽ उपयोग मे लाबै पर जोर देयि रहैथ। अपन अनुभवक आधार पर क्रान्तिकारी दृष्टिकोणक समर्थक भऽ गेल रहैथ राहुलजी। 1938-39 केँ जमाना रहै। देशपर अंग्रेजक शासन रहै। किछैक राज्यमे काँग्रेसक शासन रहै। राहुलजीक इच्छा रहै कि किसानकेँ जमीन्दारक आ भू- स्वामिक अन्याय सँ छूटकारा मिलवाक चाही-भला इहो कोनो निक बात भेल कि किसान जमीन जोते बुने फसल उपजाबै आ मिले भूस्वामी केँ राहुलजी एहेन अन्यायक घोर विरोधी छलाह। गरीब किसानक पक्ष मे बिहारक अमवारी गाम मे राहुलजी सत्याग्रहीक दलक संग उतैर गलाह सत्याग्रह करवाक लेल । हुनका सब केँ कुचलेक लेल जमीन्दारक हाथी गुण्डा पुलिस सिपाही सब रहै। राहुलजी हाथमे हसिया लए फसल काटै लागलाह। हुनकर ई रूप देखि जमीन्दारक इशारापर एगो महावत राहुलजीक माथ पर जोरदार लाठीक प्रहार कएलक माथ फाइट गेल। खूनक धारा बहि गेल। तैइयो राहुलजीकँ अन्य सत्याग्रही संग गिरफ्तार कए लेल गेल। तखन बिहारमे कांग्रेसक शासन रहै। राहुलजी केँ हथकड़ी पहिराए पुलिस जेल लइ गेल। लोकमे एहि धटनासँ क्षोभ आ रोष रहै। मुदा राहुलजीक मन मे प्रतिषोधक भावना नै रहै। सिद्धान्त पर चलैवाला निर्भीक योद्धा जेना शोषणमुक्त समाजक स्थापना खातिर संघर्षरत रहैथ राहुलजी। मुदा अमवारी मे जे हुनका माथ पर चोट लागल रहै ओ बड़ गहीर रहै जेकर परिणाम भेल कि 1961 मे माथक पक्षाघात सँ ओ पीड़ित भऽ गेलाहा इएह हुनकर मौतक कारणो बनल। दोसर विश्वयुद्धक जमानामे राहुलजी अमवारी सत्याग्रह वाला केसमे जेलक सजा काटि रहल रहैथ। ओहि समय मे महात्मा गाँधी, नेहरु, आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर सनक लोक हिटलरक नाजीवाद आ जापानक सैन्यवादक खिलाफ लोक केँ जागरुक करै मे लागल रहैथ। राहुलजी सेहो एकरा खातिर लोकभाषा मे नाटक लिखलैन्हि जेकर मंचन करि आमलोक केँ फासीवाद विरोधी आन्दोलन मे भाग लेबाक खातिर प्रेरित कैलथिन्ह। 1945 मे राहुलजी लेनिनग्राद विश्वविद्यालयक प्राच्यविभाग मे प्राध्यापकक पदकेँ सम्हारबाक लेल सेावियत संघ गेलैथ। ओतए अपन अर्धांगनी आ पुत्रसँ मिलके बड़ प्रसन्न भेलाह। अखन दोसर विश्वयुद्ध खतमे भेल रहै। स्तालिनग्रादमे सहस़्त्र टूटल-फूटल मोटर आ हवाई जहाजक ढ़ेर लागल रहै। आधासँ अधिक मकान धराशायी भऽ गेल रहै। मुदा लोकके जोश देखैत बनैत रहै। सब एकजुट भऽ निर्माण कार्यमे लागल रहैथ। आमजनक भागीदारी देखि सोवियत जन सोवियतक भूमि दूनुक प्रति हुनकर अनुराग आ सम्मान दुगुना भऽ गेल। एकर चर्चा करैत ओ लिखैत छथिं इतिहास मानैत अछि आ मनेत रहतै कि मानवताक प्रगतिमे सबसे बड़का बाधक शक्ति हिटलरक फासिज्मक रूपमे उपजल रहै जेकर नाश करैक श्रेय सोवियत रूस केँ जाइत अछि। एहिबेर राहुलजी पचीस मास तक सोवियत संघ मे रहला। ओतए अध्यापनक संगे मध्य एषियाक इतिहासक ढ़ेर सामग्री आ दुर्लभग्रन्थ जमा कएलैन्हा। अनके भाषा सिखलैखिन्ह आ अनेक किताबक हिन्दी अनुवादो कएलैन्ह। सावियत संघ सँ विदा काल पुत्र आ अर्धंगनी दूनू मे सँ कियों छोड़े लएँ तैयार नै रहथिन्ह ओ दूनू फूटि-फूटि कऽ कानैत रहथिन्ह मुदा जीवन कर्तव्य कोनो माया- मोह केँ माने लए तैयार नै रहैत अछि। द्रवित हृदय केँ कठोर कए राहुलजी विदा भेलाह। एहि यात्राक बाद राहुलजी हिन्दीक प्रचार -प्रसार, ग्रन्थक सम्पादन, लेखन मे अपन जीवन समर्पित कऽ देलथिन्ह। राहुलजी सामाजिक कुरीति, वर्ण -व्यवस्था, जातीय उन्माद, साम्प्रदायिक वैमन्स्यक सबदिन विरोध कैलथिन्हि। हुनकर समझ्ा रहै कि आर्थिक विषमता सब कुरीतिक जैड़ थिक। भाषाक सम्बन्धों मे हुनकर विचार साफ रहै कि अंग्रेजी के ँ भारतक लोक पर नै थोपबाक चाहि। एकर विकल्प खोजे मे जतैक अबेर भऽ रहल अछि राष्ट्रीय एकता ओतेक खतरा मे पड़ि रहल अछि। २. अर्चना कुमर १.आस, २.विद्वान-१ (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) २.१. आस- अर्चना कुमर आइ हम एकटा एहेन व्यक्तिक कथा लिखि रहल छी जे आजुक युगमे बहुत कम भेटैए। मुन्ना माने प्रकाश। ओ एकटा एहेन घरक बेटा रहथिन जकर बाप बैंकमे रजिस्टार रहनि, घरमे जमीन-जत्था खूब रहनि, पाइक कमी नै रहनि। मुदा जखन ओ छोटे रहथि तखने हुनकर एकटा बहिनकेँ साँप काटि लेलकनि। बहुत जगह हुनकर पापा देखेलखिन मुदा किछु नै भऽ सकलै, आर ओ मरि गेलखिन। मुन्ना अपना मिलाकऽ चारि भैयारी आर तीन बहिन रहथिन, एक आर बहिन रहथिन जे मरि गेलखिन। बेटीक शोकमे हुनकर पिताक दिमागी हालत खराब भऽ गेलनि आर पूरा परिवार शोकमे डूमि गेल। पापाक नोकरीयो छुटि गेल। घरमे जेना-तेना खेती गृहस्थीसँ गुजर जाए लागल। ई सभ एखन बच्चे रहथिन। दियाद-बाद सभ चाहे सभ लुटि लिऐ लेकिन हिनकर माताजी कहुनो सभ किछु बचा कऽ राखलथिन। फेर ई सभ कनी पैघ भेलाह। जखन मुन्ना इन्टर फाइनल पार्टमे गेलखिन तखन गामसँ भागि गेलखिन आर दिल्ली आबि गेलखिन। मुदा एतौ हुनका कम मेहनति नै करए पड़ल। पहिने मालीक काजसँ ई शुरुआत केलखिन। घरपर किछु पता नै रहनि जे ई कत्तऽ छथिन। आस्ते-आस्ते ई पाइ एकट्ठा कऽ अपन उपनेन आ दादीक श्राद्ध केलखिन, ओकर बाद फेर कमेलखिन तँ बड़की बहिनक बियाह केलखिन। ओकर बाद ओ अपन बियाह केलखिन। परिवारक सभकेँ सभ किछु देलखिन मुदा अपनाले एकटा कपड़ा तक नै किनलखिन, किएक तँ फेर हुनका दूटा बहिनक बियाह करबाक रहै। बहुत कष्ट सहित, एते तक कि अपन पत्नीक मधुश्रावनी ओ अपने लग दिल्लीमे करेलखिन ताहि किछु पैसा बचि जाएत। फेर अपन दोसर बहिनक बियाह केलखिन। हुनकर बियाहक बाद २ बर्खक बाद माताजी कहलखिन घर बनेबा लेल। दू रूम ढलैय्या केलखिन, तकर बाद सोचैत रहथिन तेसर बहिनक बियाह करैले तँ बीचबला बहनोइ खतम भऽ गेलखिन। ओहि ठमा जा कऽ बहिनक सभटा व्यवस्था कऽ कऽ एलखिन। ता कमाइत रहथिन ५ हजार टका। आइक जमानामे की होइ छै पाँच हजार टकासँ। कतेक दुःख सहि कऽ ओ पैसा राखैत रहथिन। मुदा अपनाले कहियो नै सोचलखिन। कनियाँ हुनका कतबो तानी देथिन किन्तु ओ अपन फर्जसँ कहियो नै चुकलखिन। आर माइ-पापाक सभ सपना पूर्ण केलखिन। छोटकी बहिनक बियाह ऐ साल खूब धूमधामसँ केलखिन। तेँ ईश्वरसँ कहै छी, भगवान सभकेँ एहेने बेटा देथिन, जे सभकेँ पार उतारि दै। बहिन सभकेँ एत्ते प्रेम करै छथिन जे पुछू नै। बहिन सभक मुँहसँ किछु खसैक काज तुरत्ते आबि जाइ छै। मुदा पत्नी किछु माँगि लैअए तँ बड़ भारी। आइ हम हुनकर पत्नी ई सभ लिखि रहल छी। किन्तु तैयो हमरासँ ओ बड्ड प्रेम करै छथिन। हमराले हुनका किछु नै रहै मुदा प्रेम तँ छै। हम ओहीमे हुनकासँ खुश छी। हुनकर प्रेमे हमरा चाहबो करे। हम जानै छी हुनकर हुनकर मजबूरी। एक इन्सान कत्ते तक कऽ सकैए। आर हम नै बुझबै तँ के बुझतै। अन्तिममे जखन छोटकी बहिनक बियाह दान कऽ लेलखिन तखन जखन बरियाती बिदा भऽ गेल ओहि रातिमे ओ खूब खुश भऽ गेलखिन आ आँखिसँ नोर खसऽ लगलनि। खूब कानलखिन आ बहिनसँ कहथिन, हुनकर नाम लऽ कऽ जे आइ हमर सभ टेंशन दूर भऽ गेल। आब हम ..अपना गाड़ी..लऽ..आर खुबो कानथिन आर कहथिन। बहिनकेँ पकड़ि कऽ कानथिन आ कहथिन, हम तोरा जाइले नै देबौ। तूँ अही ठामे रहबी। कतौ नै जेमी। तोरा हम कतौ जाइले नै देबै। ओहि राति घरमे जतेक लोक रहथिन सभ कानए लागल। कतबो हम सभ बुझाबी मुदा ओ खूब कानैत रहथिन, अपन कर्तव्य पूरा होइपर। लोक खुशियोमे कानैए, से हम ओही राति देखलौं। तकर बाद हम सभ दिल्ली आबि गेलौं। किन्तु आइयो हुनका गाड़ी लैके इच्छा पूरा नै भेल। बच्चा सभ, शाइत परिवारक सोचैबलाकेँ अपन इच्छाक अनादर करए पड़ै छै। २.२. अर्चना कुमर- विद्वान-१ (दादीसँ सुनल कथाक पुनर्लेखन) एक विद्वान पंडित रहथिन। मुदा ओ बड्ड गरीब रहथिन। ताहि कारण हुनका हुनकर पस्त्नी सदिखन कहथिन- कतहु जाउ कमाइले। किछु करू। बच्चा सभ भूखे मरैए। कृपा कऽ कऽ किछु तँ करू जे दू वक्तक भोजन नसीब हुअए। तँ ओ पत्नीकेँ कहथिन जे हम एतेक पैघ विद्वान छी जे विद्वता लेल पैसा कियो दैये नै सकत। तैयो अहाँ कहै छी तँ हम जाइ छी। आर ओ चारि पाँती लिखि लेलखिन आर बजार जाए ओहि चारि पाँतिक चारि लाख दाम लगा देलखिन। ओहि चारि पाँतिक चारि लाख टका दाम देखि सभ अचम्भित भऽ जाइत रहथिन। आर कियो नै किनथिन। एकटा व्यापारी रहथिन। ओ सोचलखिन जे किछु तँ बात एहि चारि पाँतीमे जरूर हएत जे एकर चारि लाख टाका दाम छै, से नै ई हम लऽ लै छी। आ ओ चारि लाख टाका दऽ कऽ ओ च्रि पाँती कीनि लेलखिन, आर अपन तलवारपर खोदबा लेलखिन। ओ शब्द सभ रहै। आसनम प्रभु चालन। पथ कन्या विर्जयते। पहिल राति निवारी। पहिल क्रोध निवारी। फेर ओ अपना व्यापार करैले निकललखिन। हुनका लग ढेरिक पैसा-कौड़ी सभ रहनि। एक जगह राति हुअए लागल तँ सोचलखिन, अपना दोस्त ओहिठाम रहि जाएब। दोस्त लग गेलखिन तँ बात-बातमे दोस्तकेँ पता लागि गेल जे हिनका जिमा ढेरिक पैसा छनि। भोर भेल, हिनकर दोस्त अपना पत्नीकेँ बतेलखिन जे दोस्त लग ढेरिक पैसा छै। फेर दुनू मिलिकऽ हुनका मारैके सोचलखिन आर अंगनामे बड़का तरहरा खुनि लेलखिन, आर बिना घोरल खाट, अइपर बिछा, नीकसँ ओछैन कऽ देलखिन, आर अपना दोस्तकेँ बजेलखिन जे चलू खाइले। आइ अंगनेमे भोजन लागल ऐ। ई गेलखिन खाइले अंगना, जहिना खटियापर बैसऽ लागलखिन तहिना हुनकर नजरि तलवारपर पड़लनि। ओइमे लिखल रहै- आसनम प्रभु चालन। माने कतौ बैसी तँ बिछौन कनी झाड़ि ली। ओ बिछौनकेँ जहिना झाड़लखिन तहिना अंदर देखि दंग रहि गेलखिन, आर सोचलखिन हमर मौक्षक पूरा इन्तजाम भेल रहै। जे आइ ई शब्द नै पढ़ने रहितहुँ तँ आइ हम ऊपर पहुँचि गेल रहितौं। से नै तँ पंडितकेँ एक लाख आर हम देब। आर ओत्तऽ सँ ई कहि कऽ भागि गेलखिन जे हम पैखानासँ आबै छी। बच्चा सभ आ दोसर कथा सुनू, हम थाकि गेल छी आ दोसर कथा पूरा मोनो नै पड़ि रहल अछि, तखन देखू... ओतएसँ जाइक बाद रस्तामे एकटा बहुत सुन्दर नारी जाइत रहए। आर किछु बदमाश हुनका तंग करैत रहए। हुनका देखि कऽ व्यापारीक मोन मचलि गेल आर ओ ओहि ठाम गेलखिन, तँ राजाक सिपाही आबि गेल आर सभकेँ पकड़ि कऽ लऽ गेल, हिनकोसँ..हिनकोसँ.. लिअ बिसरि गेलहुँ खिस्सा। फेर जखन मोन पड़त तखने... ३. डॉ. शेफालिका वर्मा स्मृति-शेष आय बटवृक्ष क मधुर छाहिर कत' दनुजता क लंका मे अंगदक अटल पैर कत' ? काल पंथ पर चलि गेलाह जे सिनेह हुनक सरसावैत अछि मोन प्रानक भ्रमित दिशा के बाट वैय्ह देखाबैत छैथ चिर मंगलमय छल लक्ष्य महान जीवन एक ,पग एक समान ! स्निग्ध अपन जीवन कय क्षार करैत रहलाह आलोक प्रसार श्रृष्टि क इ अमिट विधान मिटबा मे सय वरदान ... सुनी हुनक हुंकार नव यौवन बल पावैत छल माथ पर बाँधी कफ़न कर्मक्षेत्र मे आबि अत्याचार मेटाबैत छल हुनक सहस देखि देखि तरुण सिंह लजावैत छल ! आय मानवता क धवल आकास कत' मानव एक मानवता गुण , बतवै वाला धाम कत' अय विश्व ! अहीं बताबु भारतवर्ष सन गाम कत' ??? बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_XV-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.1.Sweta Jha -History of Mithila Painting: An Introduction2. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS XV Ma, I kept my fingers crossed waiting for divine justice. I kept mum but at the same time kept myself posted of the developments in Vikalp’s life. I was confident about lady’s janus- faced nature. She certainly resembled Jekyll-and-Hide, certainly a hydra- headed monster. I knew that for Vikalp, life seemed like ivory tower but in reality it was fool’s paradise – flash in the pan. However, in the twinkling of an eye, situation changed. One night a fully drunk Vikalp was thrown at the door of our home by the cunning woman who had abandoned him after making him a pauper. It was the real acid test for me. I found myself all at sea. I was able to face this hour of crisis through patience and toleration which you always tried to impart to me. It was the result of my changed behavior, as it has been rightly said a soft answer turns away anger. And Vikalp repented – Manjul, I am a sinner – I have humiliated you – the goddess of my home, my life. I have distrusted you – how can I forgive myself? Instantly I hugged him. I knew that in a time of crisis, more than anything, we need to be feel loved. His sense of self-worthiness was rekindled by the fact that I still loved him. Ma, I had read somewhere, “For love, we will climb mountains, cross sea, traverse desert sands, and endure untold hardships. Without love, mountains become unclimbable, Sea uncross able, deserts unbearable, and hardships our plight in life.” Vikalp repeatedly asked for forgiveness and assured me he would try to act differently in future. 2 Ma, I forgave him – I was convinced of the fact that forgiveness is the way of love and life. Otherwise, you know your daughter very well as an obstinate, intolerant, adamant egoist – a staunch believer in women emancipation movement – I can not believe that I forgave him – my reaction as a champion of gender equality should have been – Vikalp, you ought to be crawling on your knees, begging me for forgiveness. I do not know if I can ever forgive you. Ma, I just did the opposite as I realized that these were not the words of love but of bitterness and revenge. And for me now love was the most precious treasure and I must preserve it. Vikalp told me – I pray to god for our perennial love and we must share together hope and despair, joy and sorrow ……… Ma, we receive what we give --- I gave love and was reciprocated in the same way. What to talk of Vikalp, Ma- Babuji –everybody accepted me with open mind and heart. They understood that the past can not be erased, but one can move ahead free from the prejudices. Ma, today I am overjoyed – it seemed some divine love music has dawned over our family – everyone is imbued with the feeling of love. Ma, there is a happy piece of news for you – we are planning to visit London on the occasion of Rakshabandhan to seek your blessings for our long and happy married life. Ma, we also want blessings from Papa – we must find out Papa – I am indebted to you for my existence and to Papa for my ignited and enlightened mind. Ma, I must meet my Papa – my Papa. 3 Dhara was overwhelmed with emotions – tears continuously kept on rolling over her cheeks, all wet with tears. Tears of happiness – at last Manjul got the love and her family back– the ultimate bliss – moreover, she is also coming to meet her – to meet brother and to meet her father – and she was confident to meet her Papa. Kadamba was silently looking at her mother’s face. His face was also shining with happiness. He also recollected the fun, laughter, joys, fights; every single moment he had shared with Manjul while growing up. Dhara never made any comparisons between them. She always encouraged their differences, their personalities, their respective tastes, in short their individuality. She always made them feel that both of them were unique and each had its qualities and abilities of their own. Kadamba specially remembered the two festivals which always strengthened the beautiful relationship and bonding which he had shared with Manjul since their childhood. On Rakshabandhan, Manjul used to tie a rakhi on his wrist and in turn he promised to help and protect her. Rakhi certainly stood for the love between them. But alas, for the last so many years Manjul was not able to tie the frail thread of rakhi which is considered stronger than iron chains as it permanently binds this beautiful relationship. Now, Kadamba was overjoyed to know that Manjul was expected in London on the occasion of Rakshabandhan. Kadamba thought – if Manjul comes over to London and ties rakhi on my wrist , then I must promise her my visit to Mumbai on the occasion of Bhatri dutiya [ Bhardutia or Bhai dooj ]. He recollected the happiness which they had shared. On Bhardutia she always decorated the house with Alpana [ Rangoli] with materials such as colored rice, flour, vermilion, flower, petals etc. 4 She performed arti on him and put red tika on his forehead. She also applied rice laced with curd as tika .She then put 5 betel leaves and betel nuts in his palm and while washing his hands she kept on uttering, “ Jamuna [ Yamuna] naute Jaum [Yama] ke, hum naute chhi apan bhai ke, jaun – jaun Jamuna ke payan badhal jaye, taun – taun hamar bhaik orda badhal jaye.” In return, he not only gave her memorable gifts but also promised to stand by her side in all hardships of life. But due to constraints of time, space, distance and Manjul’s marital conditions, he was not able to keep up his promise. But from now onwards, Kadamba was determined not only to renew the tie but also to stand by his loving sister. Dhara looked at Kadamba – she thought whether Kadamba will be able to have same loving relationship with his sister Manjul once he gets married. Oh, what and why I am thinking – why this pessimism? Dhara came back from future to the present – why I am always worried for future? Who can be sure about future? Every future passes as present. Entire house was energized --- Andrew, Reshmi told Dhara to have faith in god – now the entire universe was desperate to meet Simant ------- yes Dhara’s Simant. Whether Dara met Simant ----------? Is it possible for Dhara and Simant to come together – Is it possible for earth and sky to join hands together? TO BE CONTINUED 1.Sweta Jha -History of Mithila Painting: An Introduction2. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary Sweta Jha – Sweta loves life and everything that it has to offer. She pursues her passion using brush-strokes and the myriad colours that get exhibited on her canvass. She is an avid nature lover who appreciates elements that sensitize contours of human emotions. She believes that her talent has the potential to touch numerous lives through her unique art. She dreams of communicating and connecting with human sensitivities around the globe. Sweta’s vivacious nature and youthfulness are seen in every piece of her work that brims with bright colours and sharp strokes. In her own words – “I represent the glorious ancient culture of Mithila, the land of Goddess Sita and Lord Buddha. My life mission is to take my legendary legacy and rich heritage to the world and enrich people's lives with its timeless wisdom by depicting them in the form of art.” Sweta holds Masters Degree in Geography from Ranchi University, India. She lives and works in Singapore since 2007. History of Mithila Painting: An Introduction The origins of Madhubani painting or Mithila Painting are shrouded in antiquity. Tradition states that this style of painting originated at the time of the Ramayana, when King Janak commissioned artists to do paintings at the time of marriage of his daughter Sita to Lord Rama. Madhubani painting has been done traditionally by the women of villages around the present town of Madhubani (the literal meaning of which is forests of honey) and other areas of Mithila. Located between the Himalayan foothills and the Ganges plains, the Mithila was the first Aryan Kingdom, 1500 B.C. It was there that the founder of the Jainism was born, and also where Lord Buddha found the enlightenment. The region situated between Nepal and Bihar/UP state in India today is collectively known as Mithila. The painting was traditionally done on freshly plastered mud wall of huts, but now it is also done on cloth, hand-made paper and canvas. This art is one of the traditional skills that are passed down from generation to generation. Originally they paint figures from nature and myth on household walls to mark the seasonal festivals and life cycle events like marriage and birth. Mithila Painting’s iconography is drawn from a rich cosmology, as well as a huge store of legends and folklore replete with symbols of fertility, good luck, and prosperity. It is observed that communities in the area have distinct paintings styles. Originally all these forms were ephemeral and done during special rituals, directly on the house walls and floors. In the 60's, with the help of the Indian government, the womenfolk from this region started to express themselves on paper or on canvas. These new media helped them to promote their art in India and many other countries. Today Madhubani Painting commands immense global respect and cultural significance due to many myths and folklore attached to it. The copious use of bright and vibrant natural colours for rustic depiction makes it both enigmatic and divine art form from ancient India. The Rich Cultural Heritage of Mithila Art Far away from Indian big cities and the modern world lies this beautiful region once known as Mithila. It was one of the first kingdoms to be established in eastern India. The region is a vast plain stretching north towards Nepal, south towards the Ganges and west towards Bengal. The women of Mithila from time immemorial have been involving themselves in the various forms of creativity. The best one can find in their creativity is the relationship between nature, culture and human psyche. Also they use only those raw materials, which are available easily in abundance in the locality they are surrounded with. Through folk paintings and other forms, these womenfolk express their desire, dreams and expectations. It is a parallel literacy by which they communicate their aesthetic expression. Their art of creativity itself can be treated as a style of writing by which their emotions, expectations, freedom of thoughts etc are expressed. Their background, gender, aspirations, hope, aesthetic sensibility and cultural knowledge – all of these find expression in all possible forms of this world renowned art. २. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in Recalling The Flood Of 1987 The Kamala had been crossed by walking Though the Balan river by boat But what a disaster was that day The water overflowing between boundaries Would submerge all surrounding for sure Startled with their treacherous characters Mocking the new theory of Science How could the nature levee the stream? It was turned super arduous Generating fear in heart Had witnessed in village Through the groves and orchards A stream used to flow Draining water was not knotty The new scientists closed All draining streams The gate to drain the overflow in dam Was blocked with sand Used to roam on one foot Seeking dry narrow paths Only the paths used to be dry Now dried out all around The Silli, Neelgai – all disappeared The spines of hedgehogs Not available for rituals The food kept in Judi Shital Left lying under the tree, A week passed No wild animal came to grab The ants’ queue was thou’ inevitable The interesting talks of the engineers Heard standing on the wall How could the stream turn so gigantic? That used to be crossed on feet The practicability of the new science Would be so much in vain, I never realised It was disgraced by the sugarcanes Standing lonely in the flood The water became tawny and trees pure green Downpour over the roofs Roofs being washed away Rugged in several places Water dripping inside Reservoir of rice and paddy The flow carried away all Helicopters dropped chuda and jiggery Where land was not submerged Dropping food in flood was a waste Crowd following helicopters Old and young with empty stomach That old man is eating chuda and jiggery Crying over death of son and daughter in law Would not fulfil the hunger Son of a BDO was my friend Called the government greedy His father was posted in Shunting A slyly demotion to Jhanjharpur from Giridih But their good luck turned the tide Posting was resettled because of flood I thought only my fate was bad Saturn was down and Saraswati was about to beg Reached village, Pappu Bhai was upset Planning development, diverting flow, draining The relief announced by the government Every now and then One bag of crop for victims of flood The block employees stole 15 kilo from each bag Pappu Bhai, you are a real fool Why to count teeth of a free bullock? (Why to mind quality of a free thing) You didn’t get even that last time Scene after a week or more Some went to Mumbai some to Delhi Women and children were left in village All took pledge to work Whether selling vegetables or lifting loads Mother wishes to have concrete roof Cottages of hays and tiles after fire Bakhari was made again when divided Thank God, in flood, houses disappeared Now I would make a firm house, oh dear The concrete houses were filled all over One could see everywhere, stack of bricks All old corners were lost Where we brothers used to play hide and seek And now see the government’s action I improved my financial condition in the Mehath only The government called the village A role model in the entire block You say that I earned in Delhi and Mumbai! Now listen to me If the government would be changing Neither Mumbai nor Delhi would exist The condition of Vijaynagaram Is well known to the historians Your good fate lies in making me win always Putting effort to progress is your work Just keep problems by me away Flood came in 1987 Saw the destruction but I say Just see the conveying people Lucky to get entertained by you The fair is not seen anywhere Hukkaloli is Diwali The mud of Judisheetal is Holi Then how can following you be faulty I am also in Delhi- Mumbai for earning You are good at least in Not leaving the village You entertain, earn and eat And also visit Delhi and Mumbai. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६६ म अंक १५ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६६)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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