245 'विदेह' ६७ म अंक ०१ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६७) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन” २.२.१.मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प २. देवशंकर नवीन- लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व ३. पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि २.३.अमरनाथ- पाँचटा लघुकथा, चण्डेश्वर खाँ- चारिटा लघुकथा, रघुनाथ मुखिया-पाँचटा लघुकथा, ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा, शिव कुमार झा “टिल्लू”- फूसि नै बाजू, मिथिलेश कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, सत्येन्द्र कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, नवनीत कुमार झा-गाम आबह,कौशल- कुमार- तीनटा लघुकथा, अनमोल झा-पाँचटा लघुकथा, मुन्नाजी-चारिटा लघुकथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- चारिटा लघुकथा, ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी, दुर्गानन्द मंडल- किसना मुट्ठी, कपिलेश्वर राउत- कलियुगक निर्णए, धीरेन्द्र कुमार- राम-कथाक समापन, राजदेव मंडल- दूटा लघुकथा, बेचन ठाकुर- दूटा लघुकथा, राम प्रवेश मंडल- बुरबक, भारत भुषण झा- प्रेम, मानेश्वर मनुज- पाँचटा लघुकथा, उमेश मंडलक दूटा लघुकथा, गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी, डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ, प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.,कुमार मनोज कश्यप- पाँचटा लघुकथा, विनीत उत्पल- श्री गुरूवै नम:, डॉ . धनाकर ठाकुर-हमरा एकर एक बायोडाटा चाही, आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा, सतीश चन्द्र झा-नोकरी, किशन कारीग़र- मूरही-कचरी, गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा २.५.रामाकान्त राय ‘रमा’- पोथी समीक्षा- प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल , डॉ. योगानन्द झा- आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल, शिव कुमार झा- समीक्षा-कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक/ मौलाइल गाछक फूल/ भफाइत चाहक जिनगी २.६.१.मानेश्वर मनुज-मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता, २.मुन्नाजी- सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा ३.गजेन्द्र ठाकुर-गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र २.७.पंकज कुमार प्रियांशु- जीवनक अनमोल क्षण, जगदीश प्रसाद मंडलक दीर्घ कथा ‘मइटूगर’क शेषांश २.८.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न, सुजीत कुमार झा- संस्मरण- मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बूच"1934-2009-कपीश वंदना ३.२.जगदीश प्रसाद मंडल-मोवाइल फोन ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-मिथिलांचलक रूपान्तरण ३.४.१.रामाकान्त राय “रमा”-।।बन्दना।।२.विद्यानन्द झा “विदु”-दहेज ३.५.१.मृदुला प्रधान- कहू वागमती २.- प्रवीण कश्यप- दूटा पद्य ३.६.१. रवि भूषण पाठक- कि भेलए एकरा ? २.इन्द्रभूषण कुमार- सहास ३.७.राजेश मोहन झा-केहेन खेल ३.८.सतीश चन्द्र झा-चुनाव ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-साधुबाबा २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) ५. बालानां कृते-डॉ. शेफालिका वर्मा- साबरमती आश्रम ६. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] ७.VIDEHA FOR NON RESIDENTS ७.1.NAAGPHAANS-PART_XVI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi ७.2.1.Original Poem in Maithili byKalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary ८. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.) विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। १. संपादकीय विदेहक लघुकथा विशेषांक (६७म अंकक मादेँ) ...अतिथि सम्पादक- मुन्नाजी कतेक दशकक उकस-पाकस एवं स्वतंत्र विधाक उहाफोहक बीच एक बेर फेरसँ “विहनि कथा”- जे लघुकथाक नामे चर्चित अछि- केँ मैथिलीमे स्वतंत्र विधा हेतु समेटि स्थिर करबाक अथक प्रयास कएल जा रहल अछि। अखन धरि भेल काजकेँ सेहो शिरोधार्य करै छी। ओहि डेगकेँ आगाँ बढ़बैत मोकाम धरि पहुँचबाक एकटा ठोस डेग हुअए अही आशामे कुल एक सए दू गोटेसँ दूरभाषिक सम्पर्क साधि विहनि कथाक मादेँ विभिन्न विषए-बौस्तु संकलित कऽ सोझाँ अनबाक एकटा प्रयास अछि। “विहनि कथा” विहनि अर्थात् बीआ। हम एकरा हिन्दीक “लघुकथा” शब्दसँ फराक मैथिलीक स्वतंत्र नामेँ आगू बढ़ेबाक प्रयास १९९५ ई. मे मैथिली मासिक “विचार” (सहयात्री प्रकाशन, लोहना, मधुबनी) द्वारा केने रही। ई अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरीसँ इतर एकटा बीज-कथा (विहनि कथा) अछि। जाहिमे कथाक छोट गातमे सम्पूर्णता पाओल जाइत अछि। लघुकथा हिन्दी शब्देँ प्रचलित अछि। गएर हिन्दी भाषाक सभ भाषाक लघुकथाकेँ ओहि भाषा नामेँ स्वतंत्र नाम देल गेल अछि, तँ मैथिलीमे किएक नै? यथा उड़ियामे क्षुद्रकथा (खुद्र कथा), पंजाबीमे “मिन्नी कथा”, बांग्लामे “एक मिनिटेर कथा”, मलयालममे “निमिषा”। तहिना मैथिलीमे “विहनि कथा” नामेँ लघुकथाकेँ आगाँ बढ़ाओल जाए। विहनि कथा मादेँ वरिष्ठ कथा/ लघुकथाकार श्री “राज”क मत छनि- जेना एकटा छोटछीन बीआमे गाछक सम्पूर्णता निहित अछि, तहिना लघुकथा अपने-आपमे कोनो कथाक सम्पूर्णताकेँ समेटने अछि।” विहनि कथा मादेँ मध्यम पीढ़ी (यानि सातम-आठम दशकमे प्रवेश करऽबला पीढ़ीक) काजे ई बेसी जगजियार भेल। मुदा मोकाम नै पाबि सकल। हमरा जनतबे ई सभ किछु लोकक एकटा समूहमे एकरा बान्हि आगू बढ़ेलनि आ ओतबे धरि समेटि कऽ राखि लेलनि। तँ एकर प्रारम्भिक सद्गतिक पछाति एकर दुर्गतियो ओही पीढ़ीक रचनाकारक मध्य देखाइए। ओ मध्यम पीढ़ी जे कथा साहित्यमे नवसंचार अनलक आब सुस्ता गेल अछि। लगैए ओ सभ आब अपन कएल परिश्रमक पारिश्रमिक यानी पुरस्कार ग्रहण मात्रक सोद्देश्ये सक्रिय भेल बुझाइत अछि। लघुकथाक दुर्गति अए पीढ़ीक द्वारा भेल तकर एकटा सुन्दर उदाहरण छथि श्री अमरनाथजी (सम्प्रति- सदस्य, परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादमी) जे लघुकथा लिखब छठम दशकमे शुरू केलनि आ सातम दशकमे अपन लघुकथा संग्रह- “क्षणिका” (१९७५ई.) लऽ उपस्थिति दर्ज करौलनि, जे हमरा जनतबे मैथिलीक पहिल लघुकथा संग्रह थिक। एखनो दूरभाषिक सम्पर्के ओ ओही दिनक ऊर्जावान रूपेँ विदेहकेँ अपन टटका पाँच गोट लघुकथा उपलब्ध करौलनि जखन कि मध्यम पीढ़ीक मोटा-मोटी अनुपस्थिति ई देखार करैए जे ओ सभ थाकि कऽ आब सुस्ता रहल छथि। तथैव नव-मध्यम-पुरान पीढ़ीक समन्वये ऐ अंकमे ढेर रास नव रचना आएल अछि, तँ पेटारमे किछु पहिनेसँ प्रकाशित रचना साभार देल गेल अछि। विहनि कथा मादेँ प्रारम्भेसँ हमर रुचि एकर विभिन्न क्रिया-कलापे यथा पहिल लघुकथा गोष्ठीक आयोजन (संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन) १९९५ एवं कएकटा लघुकथा विशेषांक (पत्रिका सभक)मे सहयोगी रहलौं। एहि निमित्त श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक सोझाँ प्रस्ताव राखलहुँ- प्रस्तावकेँ ओ सहृदए अनुमोदन तँ करबे केलनि जे हमरोसँ एक डेग आगाँ बढ़ि तन-मनसँ आ अपन विज्ञ मानसिकताकेँ प्रदर्शित करैत अहाँ सभक सोझाँ एहि अंककेँ अनलनि, ताहि हेतु हुनकर हार्दिक आभार। श्री अनमोल झा आ स्त्येन्द्र कुमार झाक सेहो भरपूर सहयोग भेटल, अइ द्वय सहयोगीकेँ हार्दिक धन्यवाद। ऐ यज्ञमे जे सहयोगी छथि सभसँ हमर आग्रह जे ऐ आहुतिक पछाति सुति नै रहथि। अपन विहनि कथा रचना माध्यमे निरन्तरता बनौने मैथिली विहनि कथा भंडारमे श्रीवृद्धि करैत रहथि। एहि समस्तस् आयोजनक नीक-बेजाएक प्रतिक्रियाक आशामे...। विशेष: स्थान-समयाभावक कारण एहि अंकमे सम्मिलित नै भेल लघुकथा सामग्री अगिला अंक (विदेहक ६८म अंक)मे देल जाएत। अहींक मुन्नाजी बाल-किशोर विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल आ लघुकथा अंकक बाद विदेहक १५ नवम्बर २०१० अंक बाल-किशोर विशेषांक रहत। एहि लेल लेखक गद्य-पद्य (टंकित रचना), जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, १३ नवम्बर २०१० धरि ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। विशेष: विदेह आर्काइवक आधारपर बाल चित्रकथा आ कॉमिक्स महिला वर्गमे विशेष लोकप्रिय भेल अछि। महिलावर्ग द्वारा कीनब ओहि पोथीक बच्चा सभक हाथमे जएबाक सूचक अछि। हमरा सभक सफलता अहीमे अछि जे ई बाल-साहित्य “टारगेट ऑडियेन्स” लग पहुँचल अछि। यएह स्थिति आन पोथी सभक संग सेहो अछि।
विदेह आर्काइवक आधारपर प्रकाशित मैथिली पोथी एहि सभ ठाम उपलब्ध अछि:
पटना: १.श्री शिव कुमार ठाकुर: ०९३३४३११४५६
२.श्री शरदिन्दु चौधरी: ०९३३४१०२३०५
राँची: श्री सियाराम झा सरस: ०९९३१३४६३३४
भागलपुर: श्री केष्कर ठाकुर: ०९४३०४५७२०४
जमशेदपुर: १.श्री शिव कुमार झा: ०९२०४०५८४०३
२.श्री अशोक अविचल: ०९००६०५६३२४
कोलकाता: श्री रामलोचन ठाकुर: ०९४३३३०३७१६
सहरसा: श्री आशीष झा: ०९८३५४७८८५८
दरभंगा: श्री भीमनाथ झा: ०९४३०८२७९३६
समस्तीपुर: श्री रमाकान्त राय रमा: ०९४३०४४१७०६
सुपौल:श्री आशीष चमन:०७६५४३४४२२७
झंझारपुर: श्री आनन्द कुमार झा: ०९९३९०४१८८१
निर्मली: श्री उमेश मंडल: ०९९३१६५४७४२
जनकपुर: श्री राजेन्द्र कुशवाहा: ००९७७४१५२१७३७
जयनगर: श्री कमलकान्त झा: ०९९३४०९८८४४
दिल्ली: १.श्री मुकेश कर्ण: ०९०१५४५३६३७
मधुबनी: १.श्री सतीश चन्द्र झा:०९७०८७१५५३०
२.मिश्रा मैगजीन सेन्टर (प्रो. श्री अमरेन्द्र कुमार मिश्र), शंकर चौक, मधुबनी ०९७०९४०३१८८
किछु आर स्थल शीघ्र...
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०५ देशक १,५३७ ठामसँ ४९,५५२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,६६,५०४ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com २. गद्य २. गद्य २.१.शम्भु कुमार सिंह-“यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन” २.२.१.मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प २. देवशंकर नवीन- लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व ३. पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि २.३.अमरनाथ- पाँचटा लघुकथा, चण्डेश्वर खाँ- चारिटा लघुकथा, रघुनाथ मुखिया-पाँचटा लघुकथा, ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा, शिव कुमार झा “टिल्लू”- फूसि नै बाजू, मिथिलेश कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, सत्येन्द्र कुमार झा- पाँचटा लघुकथा,नवनीत कुमार झा-गाम आबह,कौशल- कुमार- तीनटा लघुकथा, अनमोल झा-पाँचटा लघुकथा, मुन्नाजी-चारिटा लघुकथा २.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- चारिटा लघुकथा, ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी, दुर्गानन्द मंडल- किसना मुट्ठी, कपिलेश्वर राउत- कलियुगक निर्णए, धीरेन्द्र कुमार- राम-कथाक समापन, राजदेव मंडल- दूटा लघुकथा, बेचन ठाकुर- दूटा लघुकथा, राम प्रवेश मंडल- बुरबक, भारत भुषण झा- प्रेम, मानेश्वर मनुज- पाँचटा लघुकथा, उमेश मंडलक दूटा लघुकथा, गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी, डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ, प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.,कुमार मनोज कश्यप- पाँचटा लघुकथा, विनीत उत्पल- श्री गुरूवै नम:, डॉ . धनाकर ठाकुर-हमरा एकर एक बायोडाटा चाही, आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा, सतीश चन्द्र झा-नोकरी, किशन कारीग़र- मूरही-कचरी, गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा २.५.रामाकान्त राय ‘रमा’- पोथी समीक्षा- प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल , डॉ. योगानन्द झा- आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल, शिव कुमार झा- समीक्षा-कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक/ मौलाइल गाछक फूल/ भफाइत चाहक जिनगी २.६.१.मानेश्वर मनुज-मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता, २.मुन्नाजी- सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा ३.गजेन्द्र ठाकुर-गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र २.७.पंकज कुमार प्रियांशु- जीवनक अनमोल क्षण, जगदीश प्रसाद मंडलक दीर्घ कथा ‘मइटूगर’क शेषांश २.८.रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न, सुजीत कुमार झा- संस्मरण- मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल शम्भु कुमार सिंह जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।—सम्पादक “यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन” संकलनकर्ता: डॉ. शंभु कुमार सिंह मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराण (5म शताब्दी)क मिथिलामहात्म्य खंड मे वर्णित अछि जकर अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा एहि प्रकारेँ कएने छथि: “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा बागमती कृतसारा मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यासारा।” बृहदविष्णुपुराण मे मिथिलाक बारह गोट नामक उल्लेख भेटैत अछि: मिथिला तीरभुक्तिश्च वैदेहीनैमिकाननम। ज्ञानशीलं कृपापीठं स्वर्णलांगलपद्धतिः।। जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मषा। रामानन्दकरी विश्वभाविनी नित्यमंगला।। मिथिलाक आदि शासक विदेहक नामपर मिथिलाक नाम ‘विदेह’ पड़ल। ‘तिरहुत’ नामक उल्लेख सर्वप्रथम पुरूषोत्तमदेवक ‘त्रिकाण्डकोश’ (12म शताब्दी) मे भेल अछि। विदेह राज्यकुलक मिथिला पर शासनक समय 3000 ई.पू. सँ 600 ई.पू. धरि अनुमानित अछि। मिथिलामे पञ्जी व्यवस्थाक सम्पादन कर्णाटवंशीय नरपति हरिसिंहदेवक द्वारा प्रारंभ भेल। सप्तरत्नाकरक रचयिता छलाह चण्डेश्वर ठाकुर। मिथिलाक प्रथम कर्णाटवंशीय शासक छलाह ‘नान्यदेव’ (1097 ई.)। खण्डवला राजकुलक स्थापना म.म. महेश ठाकुर द्वारा 1557 मे भेल। मिथिला पर ओइनवार राज्यवंशक शासन चौदहम शताब्दीक मध्यमे आरंभ भेल। मिथिलामे भस्मसँ अंकित त्रिपुण्ड शिवभक्तिक,लम्बाकार श्रीखंडक टीका विष्णुभक्ति एवं सिन्दूरक ठोप शाक्त भावनाक प्रतीक मानल जाइत अछि। मिथिलाक्षरक विकास तान्त्रिक यन्त्रसँ मान्य अछि। ई मानल जाइत अछि जे तिरहुताक्षरक आरंभ जाहि मंगल चिह्न ‘आँजी’ सँ होइत अछि से तान्त्रिक कुण्डलनीक बोधक थिक। मिथिलामे विवाहक अवसर पर गाओल जायबला ‘जोग’ तन्त्रसँ सम्बद्ध मानल गेल अछि। मिथिलाक धार्मिक जीवनक मुख्यधारा शिव ओ शक्तिमूलक थिक। मैथिलीय रागरागिनीक प्राचीनतम उल्लेख सिद्ध लोकनिक ‘चर्यापद’ मे उपलब्ध होइत अछि। कर्णाटनरपति म. नान्यदेव (1097 ई.पू.) मिथिलामे अपन राज्य स्थापित करबाक पश्चात् ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नामक संगीतग्रंथ लिखल जाहिमे सर्वप्रथम ओ मैथिलीय रागरागिनीक उल्लेख क्रमबद्ध रीतिएँ कएल। मैथिलीय संगीतक सक्रिय गतिविधि ओ विकास-प्रसारक दृष्टिसँ म. हरिसिंहदेव (1296-1326)क राज्यकाल विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि। ‘तिरहुति’ श्रृंगाररसक मधुरगीत थिक, जाहिमे नायक-नायिकाक संयोग-वियोगक रागात्मक वर्णन होइत अछि। ‘बटगवनी’ मे सखी सभक संग समागम-गृहमे पतिसँ अभिसारक हेतु जाइत नायिकाक वर्णन होइत अछि। ‘गोआलरी’ क विषयवस्तु होइत अछि गोपी सभक संग कृष्णक नोंक-झोंक एवं केलिकौतुक। ‘रास’ मे गोपी सभक संग कृष्णक रासलीलाक वर्णन होइत अछि। रासक सर्वप्रथम रचयिता छथि ‘साहेबरामदास’। मिथिलाक लोकवाणी हेतु ‘मैथिली’ शब्दक प्रयोग सर्वप्रथम कोलब्रुक 1801 ई. मे कएल, परन्तु एहि नामकेँ प्रसिद्ध करबाक श्रेय मैथिली भाषासाहित्यक आदि उन्नायक ग्रियर्सन महोदयकेँ छन्हि। कालानुसारेँ मूल भारोपीय भाषाक समय 2500 ई.पू. मानल जाइत अछि। प्राचीन भारतीय आर्यभाषाक इतिहास 1200 ई.पू. सँ मानल जाइत अछि। बौद्धधर्मक सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ललितविस्तार’मे “वैदेहीलिपि”क उल्लेख अछि जकरा मैथिली लिपिक प्राचीनतम स्वरूप कहल जा सकैत अछि। कोनहुँ युगमे शिष्ट ओ परिनिष्ठित साहित्यसँ भिन्न जे रचना होहत अछि से ओहि युगक लोक-साहित्य कहबैत अछि। दीर्घ आख्यान पर आधारित गेयात्मक कथा ‘लोकगाथा’ कहल जाइत अछि। मैथिलीक किछु प्रमुख लोकगाथा काव्य थिक— लोरिकाइन, सलहेस, अनंगकुसुमा, दुलरादयाल, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, रईया रणपाल आदि। ‘वर्णरत्नाकर’ निर्विवाद रूपसँ मैथिली साहित्यक प्रथम उपलब्ध गद्य ग्रंथ थिक। विद्यापतिक ‘पुरूषपरीक्षा’, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि परंपराक संस्कृत नीतिकथा थिक। विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ अवहट्टक गद्यपद्यमय ग्रंथ थिक। ‘गोरक्षविजय’ विद्यापतिक संस्कृत नाटक थिक, जाहिमे मैथिली पद सेहो प्रयुक्त भेल अछि। ‘विशुद्ध विद्यापति पदावली’ विद्यापतिसँ कम सँ कम एक शताब्दीक पश्चातक संकलन थिक। 1879 ई.मे दरभंगा राज हाई स्कूलक स्थापना भेल छल। 1966 ई. मे मैथिली भारतक प्रमुख साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत भेल। मैथिली अकादमीक स्थापना 1976 ई. मे भेल। नाटकमे आंगिक, वाचिक, आहार्य, तथा सात्विक चारू प्रकारक अभिनय आवश्यक होइत छैक। ‘अंकियानाट’क आदि रचयिता छलाह शंकरदेव (1449-1569)। मिथिलामे ‘कीर्तनिञानाच’क परिपाटीक आरंभ नवद्वीपक कीर्तनमंडलीक प्रभावसँ भेल 17म शताब्दीक आदिमे। (स्रोत: मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’) १.मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प २. देवशंकर नवीन- लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व ३. पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि १ मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प मुन्नाजी:अपनेकेँ सर्वप्रथम बाल साहित्यपर अकादेमी पुरस्कारक लेल बधाइ। अहाँ जहिया लघुकथा लेखन प्रारम्भ केलहुँ मैथिली लघुकथा कतऽ छलै, अहाँक लघुकथा लेखन दिस कोना प्रवृत्ति जागल। तारानन्द वियोगी:हम जहिया लघुकथा लिखब शुरू केने रही, एक विधाक रूपमे मैथिली लघुकथाक कोनो मोजर नै रहैक। ई बात जरूर छल जे छोट-छोट कथा सभकेँ लघुकथा मानि कऽ “मिथिला मिहिर”क विशेषांक सेहो बहार भ गेल छल। अनियतकालीन पत्रिका सभमे छोट-छोट कथा सभ यदा-कदा प्रकाशित होइत रहैत छल। मुदा एकर सभक औकाति “बोझ परहक आँटी” सँ बेसी किछु नै छल। पत्रिका सभ, “मिथिला मिहिर” सेहो, एहि कोटिक रचनाकेँ खाली बचल जगहकेँ भरबाक लेल “फीलर”क रूपमे उपयोग करै छल। कथाकेँ अंग्रेजीमे शॉर्ट-स्टोरी कहल जाइ छै। तकर शब्दानुवाद “लघुकथा” मैथिलीक विद्वान लोकनि, आलोचक लोकनिमे प्रचलित छल। आचार्य रमानाथ झा शॉर्ट-स्टोरीकेँ लघुकथा की कहि देलनि जे मैथिलीमे भेड़ियाधसान परिपाटी चलि पड़ल। ओहुनो भारतीय कथा-साहित्यक तुलनामे मैथिली कथाकेँ जँ देखबै तँ पाएब जे आकारक दृष्टिमे मैथिलीक कथा छोट होइत अछि। आचार्य लोकनिक मतेँ यएह भेल लघुकथा। तखन आइ जाहि साहित्यकेँ अहाँ लघुकथा कहैत छिऐक तकरा लेल मैथिली लगमे कोनो स्पेस नै छलै। ने साहित्यमे, ने विद्वान लोकनिक मगजमे। विभिन्न देशी-विदेशी लघुकथा सभकेँ यत्र-तत्र पढ़ैत-गुनैत हमरा कथा आ लघुकथाक पार्थक्यक अवगति भेल। हम देखलौं जे एहि दुनू रचना विधामे ने मात्र आकारमे, अपितु उत्स, स्वभाव आ प्रभावमे सेहो एक दोसरासँ सर्वथा भिन्न अछि। मैथिलीक भंडार दिस ताकलहुँ तँ देखल जे अनेक वरेण्य साहित्यकार जानैत-अनजानैत एहि क्षेत्रमे किछु सर्जनात्मक काज कऽ गेल छथि। हमरा सभसँ पहिने ई जरूरी लागल जे लघुकथा विधाक संरचना, स्वरूप आ स्वभावपर किछु बात स्पष्ट करी। एहि सन्दर्भमे हम कएकटा लेख लिखलहुँ। स्वयं हम मूलतः एक सृजनात्मक लेखक छी, तेँ अपनहुँ लघुकथा लिखऽ लगलहुँ। ताहि समय (१९८३-८५) मे हम “कोसी-कुसुम” पत्रिकाक संग जुड़ल रही। बातकेँ स्पष्ट आ जगजिआर करबाक लेल हम “कुसुम”क एक विशेषांक लघुकथापर सम्पादित कएल। बादमे “हालचाल”क संग जुड़लहुँ, तँ ई क्रम आर आगू बढ़ल। मुन्नाजी:लघुकथाक स्वभाव की अछि? ओहि सन्दर्भमे मैथिली लघुकथा कतऽ देखाइए? कथाकार-कवि लोकनि लघुकथा रचना आन्दोलनक प्रारम्भमे जुड़लाह मुदा समयान्तरे हुनकर ऐ सँ दूर होइत गेनाइ की प्रदर्शित करैत अछि? तारानन्द वियोगी:लघुकथा आत्यन्तिक रूपमे एक “प्रो-एक्टिव” विधा थिक। ओहुनो अहाँ देखबै जे, जे रचना जतेक सरल आ संप्रेषणीय होइत अछि, ओकरा पाछू लेखककेँ ओतबे बेसी परिश्रम करऽ पड़ैत छैक। लघुकथाक तँ एतेक “सेन्सिटिव” मिजाज होइत छैक जे एक वाक्य जँ अहाँ फालतू लिखि गेलहुँ तँ ओ दूरि भऽ जाइत अछि। एतेक परिश्रम के करत, जँ करत तँ ताहिमे निरन्तरता कोना बनौने राखि सकत? एखनो अहाँ देखिते छिऐक जे एक सुव्यवस्थित विधाक रूपमे लघुकथाकेँ मैथिलीमे प्रतिष्ठा नै भेटि सकलैक अछि। फल अछि जे लोक दोसर-दोसर विधामे, जे प्रतिष्ठित अछि आ जाहिसँ ओकरा सहज रूपेँ स्वीकृति भेटि सकैक, ताहिमे कलम अजमबैत छथि। यएह मुख्य कारण भेल जे लेखक लोकनि लघुकथा-लेखनमे निरन्तरता नै बनौने राखि सकलाह। लघुकथापर केन्द्रित एक पत्रिका जँ मैथिलीमे हो तँ एहि स्थितिकेँ पार कएल जा सकैत अछि। हमर अप्पन स्थिति अछि जे चहुँ दिस हमरा काजे-काज देखा पड़ैत अछि, अपन सक्क भरि तकरा सभकेँ सम्हारबाक, स्थिति स्पष्ट करबाक, जतबा जे प्रतिभा अछि तदनुरूप एक मानदंड गढ़बाक काजमे लागल रहैत छी। अहाँ सभ आगू बढ़ब तँ निश्चिते हमरा संग लागल पाएब। ओहुनो, हमर सोच अछि जे “जो पीछी आ रहे उन्हीं का, मैं आगे का जय-जयकार”। मुन्नाजी:२०म सदीक अन्तमे अहाँ सभ (प्रदीप बिहारी सेहो) मैथिली लघुकथाक संग्रह आनि अपन निश्सन उपस्थिति दर्ज केलहुँ, मुदा कथा आलोचक द्वारा एकर निङ्गेश बुझि टारि देल गेल, एकर की प्रमुख कारण छल? तारानन्द वियोगी:देखू मुन्नाजी, हमरा सभक पीढ़ी बहुत संघर्ष कऽ कऽ आगू बढ़ल अछि। पुरातनपंथी लोकनि सेहो हमरा सभक विरुद्ध आ कम्यूनिस्टकेँ सेहो हमरा सभसँ दुश्मनी। साहित्यमे नवाचार दुनूकेँ समान रूपेँ नापसिन्द। एहना स्थितिमे किनकासँ हम मोजर मांगब आ के हमरा मोजर देताह? मैथिली आलोचना बहुतो तरहेँ अनेक सीमासँ घेराएल रहल अछि। एहि कारणेँ बहुतो लोक एकरा अविकसित धरि कहैत छथि। एहि सीमा सभक अतिक्रमण आब शुरू भेल अछि। हमहूँ ठोड़े काज “कर्मधारय”मे आ आनो ठाम केलहुँ अछि। हमरा पीढ़ीमे प्रदीप बिहारी लघुकथा लिखलनि, देवशंकर नवीन, विभूति आनन्द लिखलनि। शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, रमेश लिखलनि। हिनका सभक रचनाकेँ आइ पढ़ब तँ अहाँकेँ आक्रोश हएत जे ताहि दिनमे किएक ने एकरा बूझल-गुनल गेलै? खएर, जे भेल से भेल। आइ आरो सघनता-गम्भीरताक संग काज करबाक बेगरता छैक। अहाँ सभ आब उल्लेखनीय काज करब तँ अवश्ये मोजर हएत। बदलल परिस्थितिक अहसास अहूँ सभकेँ जरूरे होइत हएत। मुन्नाजी:२१म सदीक प्रारम्भमे मध्यम पीढ़ीक रचनाकार द्वारा ठाढ़ कएल आधारकेँ आगू करैत नव पीढ़ी एकरा जगजियार कऽ रहल छथि। अहाँ एकर वर्तमान दशा आ आगूक दिशा मादे की कहब? तारानन्द वियोगी:लघुकथाक क्षेत्रमे गम्भीरताक संग काज करएबला लोकक एखनहुँ अभाव छैक, से हमरा प्रतीत होइत अछि। किनकहुँ एक रचना जँ सुन्दर देखैत छियनि तँ लगले दोसर रचना औसतसँ नीचाँक देखा पड़ि जाइत अछि। एना किएक होइत छैक? स्पष्ट अछि जे बोध आ श्रमक मानक ओ लोकनि बनौने नै राखि पाबि रहल छथि। दोसर बात जे हमरा जरूरी लगैत अछि- भने बत्तीसे पेजक किएक ने हो- प्रत्येक रचनाकारक एक संग्रह जरूर एबाक चाही। कोनो उत्साही लोक एहि दिस सचेष्ट होथि तँ लघुकथापर एक लेखन-कार्यशालाक आयोजन कएल जाए। तात्पर्य जे सांस्थानिक उत्साहक संग एहि दिशामे काज करबाक बेगरता छैक। मुन्नाजी:मैथिलीये लघुकथाक समकालीन पंजाबीक “मिन्नी कथा”, ओड़ियाक “क्षुद्र कथा”, तमिलक “निमिषा”, मलयालमक “क्विन्तेर” राष्ट्रीय स्तरपर स्थापित होइत देखाइए मुदा मैथिली एहि पगपर अन्हराएल सन? एकर पाछाँ की कारण अछि, वा कमी अछि? तारानन्द वियोगी:मैथिलीमे मानक काजक अभाव नै छै, आ ने भाषामे वा भाषाकर्मी लोकनिमे क्षमताक अभाव छै। सांस्थानिक रूपसँ थोड़बे दिन काज कऽ कऽ देखियौ ने, भारतीय साहित्यक उपवनमे मैथिली लघुकथाक फूल सेहो तेहने भकरार लागत जेना पंजाबी, उड़िया वा मलयालमक। मुन्नाजी:जहिना अहाँ सभकेँ (अहाँ आ बिहाईजी केँ) उपेक्षित रखबाक प्रयास भेल, तहिना आइयो कथालोचक द्वारा नवका पीढ़ीक ऊर्जावान रचनाकार वा लघुकथाक प्रति समर्पित रचनाकारक कोनो नोटिस नै लेल जा रहल अछि। एहिमे कोनो कुटीचालि अछि वा आर किछु? तारानन्द वियोगी:एहि प्रश्नक उत्तरमे हम दूटा बात कहब। पहिल तँ ई कहब जे के लेत अहाँक नोटिस? ककरा मोजर देने अहाँ मोजरबला लोक हएब? एतेक विवेकी आ क्रान्तिदर्शी लोक अहाँकेँ के देखाइत छथि? हम तँ साँच-साँच कहै छी मुन्नाजी जे हमरा एहन लोक क्यो नै देखाइत छथि। पहिने गुलामीक समय रहै तँ महाराज दरभंगाक मोजर देने राताराती लोक मोजरबला भऽ जाइ छला। आब ई भिन्न बात छै जे एहि भ्रममे महाराजक विवेकसम्पन्नता जिम्मेवार होइ छल आकि कोनो आन स्वार्थ? साहित्य अपन स्वभावेसँ क्रान्तिकारी होइत अछि। जँ ओ वास्तवमे एक सही साहित्य हो। एहेन साहित्य किछु लेबाक लेल नहि अपितु सदैव देबाक लेल लिखल जाइत अछि। दोसर बात हम ई कहब जे अहाँ मोजर वा नोटिसक ख्याल केने बिना काज करू। कोनो सार्थक रचना जँ कलमसँ बहराए तकर संतोषकेँ सेलिब्रेट करू जे “जइ धरतीक अन्न-तीमन खेलिऐ तँ ओकरा लेल काजो केलियै”। ओना ईहो कहि दी जे हमरा सभक लेखनारम्भ कालमे जतेक कुहेस आ जाली पसरल रहै, ताहिमे आब बहुत परिवर्तन भेलैए। आलोचनोक परिदृश्य बदललैए आ पाठकक व्याप्ति सेहो बढ़लैए। इन्टरनेटक तँ एहिमे कमाल केने अछि। मुन्नाजी:वर्तमानमे रचनाकार सबहक मैथिली लघुकथाक प्रति रुझानक बादो मैथिलीक विभिन्न समिति-संस्थाक प्रतिनिधि सबहक एकरा प्रति विरोध की दर्शाबैए? मैथिली लघुकथाकेँ आर समृद्ध करबा लेल आर की सभ काज कएल जाए? मैथिली लघुकथाक भविष्य की देखैत छी? एकरा स्थापित करबा लेल कोनो विशेष रुखि? तारानन्द वियोगी:लघुकथाक भविष्य हम बहुत नीक देखै छी। मैथिली लघुकथाक सेहो। अहाँ पुछब जे तकर कारण? कारण ई नै जे लोक आब बड्ड व्यस्त भऽ गेलैए तेँ छोट रचना बेसी पठनीय साबित भऽ सकत। वास्तविकता तँ ई अछि जे एखनो दुनियाँ भरिमे सभसँ बेसी उपन्यासे विधाक रचना पढ़ल जा रहल अछि। लघुकथाक भविष्य वस्तुतः एकर स्वभावक कारणेँ उज्जवल छैक। एहिमे निहित व्यंग्य आ मार्मिकता आजुक सन्दर्भमे अति प्रासंगिक अछि। आजुक लोकक संवेदना क्षमता जाहि हिसाबे भोथ भेल अछि, एक सही लघुकथाक ओज ओकर ओंघी उतारि सकैत अछि। २ देवशंकर नवीन लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व लघुकथा साहित्य-पदार्थक एहन परमाणु अछि, जाहिमे ओकर सभटा भौतिक आ रासायनिक गुण उपस्थित रहैत छै, आ परमाण्विक स्थितिमे ओकर रासायनिक प्रभाव तीक्ष्णतर भऽ जाइत छै। लघुकथा जादूक एहन औँठी अछि जे पाठकक मानस-पटलसँ टक्कर लैत देरी ओकर निश्चेष्ट मानसिकताकेँ क्रियाशील कऽ दैत अछि, भोथर सम्वेदनाकेँ सक्रिय बना दैत अछि। लघुकथा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, कथानक सन पूर्णाहारक बदलामे विटामिनक गोली अछि, जे सम्पूर्ण ऊर्जासँ युक्त होइत अछि। वास्तविकतामे शब्द स्वयं महत्वपूर्ण नै होइत अछि, महत्वपूर्ण अछि ओकर प्रयोग-प्रक्रिया। प्रयोगक आधारपर शब्द अपन अर्थ-ग्रहण करैत अछि। लघुकथा मूल रूपसँ व्यंग्य ध्वनित करैत अछि। अस्तु एकर वाक्यमे शब्दक प्रतीकात्मक प्रयोग विशिष्ट अस्मिता रखैत अछि। एहि अर्थमे एहिमे शब्द-विधान अहम् भऽ जाइत अछि, मुदा तकर कोनो मानक सीमा नै छै। रचनाकारक शब्द-विधाने एकर मानक सीमा अछि। ताहि द्वारे हम कहि सकै छी जे लघुकथा, कथाक अपेक्षा कवितासँ बेसी लग अछि। आकारमे लघु भेलाक बादो एकर व्यंजना विराट होइत अछि। गानल-गूथल शब्दमे जीवनक सभटा विद्रूपताक एहन प्रस्तुति लघुकथा अछि जकर रंग शीसापर सेहो जमल बिना नै रहि सकैत अछि। व्याकरण जौँ भाषा आ साहित्यक आचार-संहिता अछि, तँ लघुकथाक आचार-संहिता खाली ‘शब्द’ अछि। शब्दक सहयोगसँ रचल जीवनक विद्रूपताक प्रतीक चित्र, सएह लघुकथा अछि। लघुकथामे मूल रूपसँ ‘कथ्य’ आ ‘शब्द’ क बड़ महत्ता होइत अछि। एकर संहितामे भाषा-विधान लेल कोनो विशेष स्थान सुरक्षित नै छै। शास्त्र-पुराणादिमे एकर उत्स स्पष्ट देखाइत अछि मुदा तकर बादो लघुकथाक वर्तमान तेवर, विशुद्ध रूपसँ आधुनिक सभ्यता-संस्कृति आ बदलैत साहित्यिक प्रतिमानक प्रतिफल अछि। ओना तँ स्रोत ताकी तँ विष्णु शर्मा विरचित पंचतन्त्र वा फेर गुणाढ्यक बड्डकहा आकि आर पाछू जाइ तँ वेदमे वर्णित उपदेशपरक उपकथामे एकर सूत्र बड्ड सरलतासँ भेटैत अछि। काव्य-विषयक प्राचीनतम विधानमे एकरा लेल अलगसँ कोनो स्थान नै राखल गेल छल। ताहि कारणसँ ओहि सभ पारम्पारिक काव्य निकषपर एकर परीक्षण नै भऽ सकैत अछि, एकरा लेल नव समीक्षा शास्त्रक निर्माण अपेक्षित अछि। लघुकथा-लेखन एकटा खतरनाक वृत्ति अछि। ‘सतर्कता गेल आ दुर्घटना भेल’ क फार्मूला एहिपर पूर्णतः लागू होइत अछि। दुर्घटना माने असफलता आकि उत्थरपना। एकर बाद संयोजनमे सेहो पर्याप्त कलात्मकताक आवश्यकता होइत अछि। एहि कलात्मकताक कमजोरीसँ एकर प्रभावोत्पादकता चल जाइत अछि आ फेर लघुकथा अपन मूल उद्देश्यसँ भटकि जाइत अछि। लघुकथा-लेखनकेँ बहुत रास लोक द्वारा सिनेमामे आओल फैशनक रूपमे अपनाओल गेल अछि। औकाति होअए वा नै, जे ई युगक फैशन भऽ गेल अछि से लोक हास्य-कणिका लिखि कऽ सेहो ओकरा लघुकथा कहि दै छथि। आ से एहि अत्याधुनिक मुदा खतरनापूर्ण विधा लेल बड्ड मोश्किलक गप अछि। एकरासँ बचबाक बड्ड जरूरति अछि। लिखबाक कला नै होअए तँ ई काज नै करबाक चाही। नकलची लेखकसँ लघुकथाकेँ भयंकर नोकसान ई भेल जे ढेर रास लोक आइ हास्य-कणिका आ लुघकथामे अन्तर नै कऽ पबैत छथि। एत्ते धरि जे बहुत रास पाठक सेहो एहने सन मनःस्थिति बना लेने छथि, से लघुकथाक स्वर किछु रूपमे भटकि-सन गेल अछि। तैयो बहुत-रास नीक-नीक लघुकथा आबि रहल अछि। साओनक बेंग सन टर्रा कऽ बिलाइत लोकक संख्या कोनो विधामे कखनो कम नै रहल, से जौँ लघुकथा-लेखनमे सेहो एहने भऽ रहल अछि तँ कोनो आश्चर्य नै। नीक लघुकथाक पाठकीयता आ सम्प्रेषणीयता समएक संग गहींर होइत जाएत। साहित्यक कोनो अंशक मान्यता आ स्थापना ओकर ‘प्रकाशन’ आ ‘समीक्षा’ पर निर्भर अछि। लघुकथाक प्रकाशन तँ क्रमसँ खूब भऽ रहल अछि, मुदा एहिपर आलोचनाक साहित्यक अत्यन्त अभाव अछि। ओना तँ किछु साहित्यिक ठेकेदार एहिपर आलोचनाक कऽ अत्याचार सेहो केने छथि। एहन आलोचना लघुकथाक विस्तार लेल स्वास्थ्यकर नै अछि। मिला-जुला कऽ लघुकथाक सम्भावना, स्वरूप आ विस्तारसँ आश्वस्त भेल जा सकैत अछि। ई विधा क्रमसँ जड़ि धेने जा रहल अछि। बेंग सभक आ शौकिया आलोचकक संग एकर उपेक्षा सेहो आस्ते-आस्ते मेटाइत जाएत। निश्चयेन एहिपर नीक-नीक आलोचना सेहो लिखल जाएत। लघुकथा लेखन बीजगणितक हिसाब नै अछि जे हल कएल एकटा उदाहरण देखि कऽ दोसर सवाल बनि जाएत। ३ पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि खलील जिब्रान गोल्डन बेल्ट (अनुवाद-मुन्नाजी) सालमिस नगर दिस जाइत दू गोटेक संग भऽ गेलौं।दुपहरिया धरि ओ धारक कछेरमे पहुँचि गेल जाहिपर कोनो पुल नै छलै। आब ओकरा लग दूटा विकल्प छल- हेलि कऽ धार टपि जाए वा दोसर कोनो रस्ता ताकि लिअए। “हेलिये कऽ पार भऽ जाइ छी।”, ओ एक दोसरासँ कहलक। “धारक पेट बेसी चौरगर तँ अछि नै।” ओइमे सँ एक गोटे जे नीक तैराक छल बीच धारमे जा भसियाइ लागल। दोसर गोटे जकरा हेलबाक पूर्ण अभ्यास नै छलै, ओ आरामसँ हेलैत दोसर कात पहुँचि गेल। ओतऽ पहुँचलाक पछाति ओ पुनः धारमे कूदि हाथ-पएर चलबैत अपन संगीकेँ पार आनि लेलक। “तोँ तँ कहै छलेँ जे तोरा हेलबाक अभ्यास नै छौ, तहन तोँ एतेक असानीसँ कोना धार पार कऽ गेलँ? ”, पहिल व्यक्ति पुछलक। “मित्र।”, दोसर व्यक्ति बाजल, “हमरा डाँरमे बान्हल ई बेल्ट बान्हल देखै छीही, ई सोनाक बनल छैक, जकरा हम साल भरि मिहनत कऽ अपन कनियाँ आ बच्चा लेल कमेने छलौं। तेँ ई पहिरने असानीसँ धार पार कऽ गेलौं। हेलबा काल अपन पत्नी आ बच्चाकेँ अपना मोनमे याद कऽ रहल छलौं।” राजमोहन झा चलह हम दुनू गोटे एके ठामसँ एके गन्तव्य लेल संगहि निकललहुँ। रिक्शापर दुनू गोटेक सामान लदायल आ दुनू गोटे दुनू दिससँ बैसि रहलहुँ। रिक्शावलाकेँ कहलिऐ- चलह। पानि खूब बरिसल रहै आ एखनो बुन्नाबुन्नी एकदम्मसँ बन्द नहि भेल रहै। आकाश कने फाटल रहै एक दिससँ, मुदा कखन फेर तड़तड़ा देत से कहल नहि जा सकैत छल, कारण जे कारी घटाटोप माथपर कयनहि छल। सैह भेल। आगाँमे प्लास्टिकक ओहार लगौने, सड़कपर लागल पानिकेँ दूर धरि चिरैत, हिचकोला खाइत रिक्शा बढ़ैत जा रहल छल कि बड़का-बड़का बुन्न पड़ऽ लागल। ता पाछाँसँ भड़भड़ करैत एक टा खाली टेम्पो समानान्तर आयल। ओ ओकरा रोकबौलनि, जल्दीसँ अपन एक-दू टा सामान हाथमे लेलनि; आ शेष अपन सामान रिक्शावलाकेँ आनऽ कहैत टेम्पोमे जा बैसलाह। रिक्शावला हुनक बाकी सामान दऽ अयलनि। ओ हुर्र भऽ गेलाह। हमर रिक्शावला घुरि कऽ आयल। कहलिऐ- चलह। सुभाष चन्द्र यादव पति-पत्नी सम्वाद (एहि कथामे पहिल सम्वाद पति आ दोसर पत्नीक अछि।) (एहि नाटकमे पहिल पात्र पति आ दोसर पात्र पत्नी अछि।)
यै, सुनै छिऐ? हमरा कान छै जे सुनबै?
कखैन सँ हाक दाइत रही! की छिऐ?
चाह बना रहल छी? बैठल लोग केँ एहिना चाह सुझै छै!
करै की छी? सुतल छिऐ!
तमसाएल छी की ? नै, हम किए तमसाएब!
तखन एना किए बजै छी? अहाँ बहीर छी की?
से किए? आबाज नै जाइए?
कोन आबाज? सिल्ला के?
अरे अहाँ किछु पीस रहल छी? तब ने बैठल-बैठल गीरब?
की पीस रहल छी? मसल्ला, अओर की पीसब? अपन कप्पार!
धुर, अहूँ कथी-कथीमे लागल रहै छी। चाह बनाएब से नै? अहीं कोन उनटन करै छी! हरदम कहब; चाह बनबै छी? चाह बनबै छी? हम एहिसँ अकच्छ भऽ गेल छी।
तखन छोड़ू। छोड़ू किए? बना दै छी। लेकिन पीसल होएत तब ने! बेस, जे अहाँक इच्छा! लिली रे वी.आइ.पी. “वृक्ष संरक्षण पुरस्कार”लेल मनीकुमारक नाम लिखल गेलै तँ ककरो आपत्ति नै भेलै। एतेक देरीसँ मान्यता भेटलै, तकरे खेद छलै सभकेँ। मनीकुमारक माए वन विभागमे अस्थाइ कर्मी छलि। मनीकुमार नेन्नेसँ निराइ-रोपाइमे माएक हाथ बँटबैत छल- निःशुल्क। माए अनेक गाछ-लत्तीसँ ओकरा भाए बहिनक सम्बन्ध जोड़ि दै। नियम-कानून बदललै तँ माएकेँ स्थाइ नोकरी देबाक प्रस्ताव भेलै। माए नोकरी नै लेलकै। बदलामे अपन बेटाकेँ नोकरी देबाक सिफारिश केलकै। सिफारिश मंजूर भऽ गेलै। काज नहियो रहै तँ माए जंगलमे आबि बेटाक हाथ बँटबै- निःशुल्क। बेटा अपन रोपल गाछ-लत्तीसँ पोता-पोतीक सम्बन्ध जोड़ि दै। लोककेँ बड़का अनमना होइ। वार्षिक समारोहमे पुरस्कार भेटबाक छलै। प्रतिवर्ष ई समारोह खूब धूमधामसँ मनाओल जाइ। नृत्य-संगीत-नाटक, जलपानसँ समारोह सम्पन्न होइ। बाहरसँ विशिष्ट व्यक्तिलोकनि आबथि। गाछ-पात चित्रित निमन्त्रण-पत्र पाबिकऽ। मनीकुमार इतः स्तुतः करैत साहेबक आफिसमे पहुँचल। नमस्कार कऽ विनम्र स्वरमे बाजल- “सर! एकटा कार्ड हमहूँ पठा सकैत छी? ” “अहाँ तँ विभागक लोक छी। अहाँक पूरा परिवार आएत। खाएत-पीएत। अहाँकेँ तँ बुझले अछि। ” “हुजूर! मुदा हम एकटा वी.आइ.पी. कार्ड चाहैत छी। ” “ककरालए? ” “एकटा किशोरकेँ वी.आइ.पी. कुर्सीपर बैसाकऽ देखबऽ चाहैत छी। नाम छिऐ- जीवन तामाङ्ग। गांधी स्कूलमे आठमी क्लासमे पढ़ैत अछि। ओकर बाप संतोष तामाङ्ग, पानदाङ्ग चाह-बगानमे काज करैत अछि। ” “की नाम कहलुं? ” “जीवन तामाङ्ग। क्लास एइट, गांधी स्कूल। ” “निश्चय, कोनो खास कारण अछि? ” “हुजूर! ई बच्चा आन्हर छल। पाँच कि छओ वर्षक छल जखन हमर माए मुइलि। माएक आँखि जीवनकेँ भेटलै।” रामलोचन ठाकुर गिरगिट बैशाखक ठहाठही दुपहरियामे अपन आ अपन गर्भवती स्त्रीक आहारक जोगार कए जखन श्रीमान गिरगिट अपन डेरा घुरलाह तँ देखैत छथि जे पत्नी घोघना लटकओने बैसल छथिन। बेर-बेर एकर कारण पुछला उत्तर पत्नीक मओन भंग नहि भेलनि तँ ओ खिसिया कऽ बजलाह- एहिना घोघना फुलओने रहब तँ लोक कि अगरजानी जनैए जे अहाँक मनक बात बूझि लेत। पत्नी ओहिना विधुआएल भनभनेलीह- लोक बुझिए कऽ की करत? जँ सरिपहुँ लोककेँ हमर कचोटक चिन्ता छै तँ सत्त करओ। -एक सत्त, दोसर सत्त, तेसर सत्त, अहाँक कहल जे नहि करए से असी कुंड नर्कमे पड़ए। आबो तँ बाजब? गिरगिट आत्मसमर्पण कऽ देलनि। पत्नी खखास करैत बजलथिन- चलू हमरा लोकनि अइखन एइ देशसँ चलि चली। गिरगिट छगुन्तामे पड़ि गेलाह। “आखिर कून एहन बात भेलैक जे हमरा लोकनिकेँ अपन जन्मभूमि छोड़ि चलि जेबाक चाही?” पत्नीक पारा गर्म भऽ गेलनि। “कनियो जे ज्ञानक छूति रहैत तँ ई पूछए नहि पड़ैत। आखिर कुनू जाति जन्तुक अपन परिचय रहैत छैक, विशेषता रहैत छैक। जँ सैह ने बचतै तँ लोककेँ लाजे मरि नहि जा हेतैक? -अहाँक कहबाक अर्थ हमरा नहि बुझैमे आएल। हमरा लोकनि अपन रंग बदलाक लेल विख्यात छी। परिवेशक अनुसार रंग बदलबाक पटुता हमरा लोकनिमे जन्मजात होइए... -मुदा ताहूमे हम सभ पाछू पड़ि गेलहुँ...पत्नी बीचेसँ लोकि लेलथिन। -अहाँ कि नेता लोकनिक बात कऽ रहल छी?- गिरगिटक प्रश्न भेल। -तँ आर ककर? आइ-कालिक नेता लोकनिक बराबरी करबाक दक्षता कि हमरा लोकनिमे रहि गेलए? गिरगिटकेँ बड़ जोरसँ हँसी लागि गेलनि। ओ ठहाका दैत बजलाह- तेँ ने कहैत छैक स्त्रीगणक बुद्धि। हमरा लोकनिकेँ तँ एहिमे प्रसन्नता हेबाक चाही। कहबीयो छैक जे दस टके नहि नितराइ, दस समाङे नितराइ। भारत रत्न शासय्यापर पड़ल-पड़ल भीष्म पितामह सोचि रहल छलाह जे अन्यायी कौरवक संग दय ओ नीक नहि केलनि। आगामी इतिहास हुनका कहियो क्षमा नहि करत। अन्तमे ओ फेर हथियार उठेबाक आ पाण्डव दिससँ लड़बाक घोषणा केलनि। ई गप्प जखन दुर्योधनक कान तक गेलै तँ पहिने तँ ओ घबड़ाएल किन्तु पश्चात् शकुनीक संग परामर्श कए दोसर दिन हस्तिनापुरमे विराट सभाक आयोजन केलक। एहि सभामे ओ भीष्म पितामहकेँ एगो पैघ प्रशस्तिक संग “भारत रत्न”क उपाधिसँ अलंकृत केलक। कहल जाइछ जे तकर बाद जे भीष्म पितामह मओन व्रत धारण केलनि से जा जीलाह मुँह नहि खोललनि। परमेश्वर कापड़ि सतबरती आभा आ मनुक प्रेम जगजाहिर छल। दहेज दुनुक विवाहमे भदवा बनि गेल। आभाक बाबू ओकर विवाह सुमनसँ कऽ निफिकिर भऽ गेलाह। -अनकोसँ प्रेम चलै छल तैयो सतवरतीए छी आभा? -तँ की। प्रेम लोक मनसँ करैछ। हम कोनो देह समर्पण केलिऐ। -आब जँ मौका भेटौ? आभा मौला जाइछ- धुर छोड़ बिसरल राग।...कहाँ के बात कहाँ बिला गेल। -तँ ठीके बिसरि गेलही? -ईस्स! शूल कहु बिसरइ।...ओहो हियाक कीयामे बन्द। अमरनाथ- पाँचटा लघुकथा, चण्डेश्वर खाँ- चारिटा लघुकथा, रघुनाथ मुखिया-पाँचटा लघुकथा, ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा, शिव कुमार झा “टिल्लू”- फूसि नै बाजू, मिथिलेश कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, सत्येन्द्र कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, नवनीत कुमार झा-गाम आबह,कौशल- कुमार- तीनटा लघुकथा, अनमोल झा-पाँचटा लघुकथा, मुन्नाजी-चारिटा लघुकथा अमरनाथ (अमरनाथजीक लघुकथा संग्रह “क्षणिका” नामसँ १९७५ ई.मे प्रकाशित छन्हि।) पाँचटा लघुकथा देह साँझक लुकझुकमे लाल भौजीकेँ घामसँ नहाएल धरफड़ाएल चल अबैत देखलियनि। रुकलहुँ। पुछलियनि- “भौजी अहाँ? ” “की पुछैत छी! मंगल छै से हनुमानजी मन्दिर गेल रही। बुझलिऐ नै, साँझ भऽ गेलै। ” हुनका डेराएल देखि कऽ कहलियनि- “से ठीके! सुनसान सड़कपर लुटपाट बढ़ि गेल छै। ” अपन शरीर दिस देखैत कहलनि- “से कोन गहना पहिरने छी? ..कोन रुपैय्या रहैए?... ” “तखन? ” “तखन? अहाँ की बुझबैक!...मौगीक लेल देहे जंजाल छै!” पियास “हे, कने एक ग्लास पानि दिअ। ” “घैलामे पानि ठरि गेल हेतै। चुपचाप सुति रहू। देखू तँ, पएर उघारे अछि। कम्बल ओढ़ा दैत छी। बाहरमे पाला खसै छै। मन मारिकऽ सुति रहू।” “पचासी वर्षक भेलहुँ। अहाँ एना कहियो उपदेश देने छलहुँ! वयस बढ़ल तँ पत्नीक धर्म बिसरि गेलहुँ। ” “आब लिअ, निशाभाग रातिमे धर्म बुझबऽ लगलाह। उकासी होइये। ठरल पानि पीयब तँ हफनी बढ़ि जाएत। सुति रहू।... कहू तँ, जाड़मे कतहु लोककेँ एते पियास लगलैए। ” “आब हिनका के बुझौतनि! एकटा पियासे तँ छै जे नै मेटाइ छै। ” स्वीच ऑफ मोबाइलमे इजोत भेलै। कने पहिने घनघनेलै। अथवा दुनू एके संगे भेलै। देखलनि तँ पत्नीक एस.एम.एस. छलनि- “मोबाइलक अदला-बदली भऽ गेल। अहाँक मोबाइल हमरा लगमे अछि। ओहिमे रंग-बिरंगी महिला सभक फोटो अछि।...अहाँ हमरा एते दिन अन्हारमे रखने छलहुँ। ओहिमे स्वीटी अग्रवालक सेहो फोटो छै, जकर आँखि नचैत रहै छै। हम बैसल रहैवाली महिला नै छी जे नेप चुबबैत सहि लेब। से बूझि लिअ! ” पहिने नस तनेलनि। क्रोधमे हिनकर नाक फड़कऽ लगलनि। मोबाइलक बटनकेँ दबलनि। जवाब टाइप करऽ लगलाह- “अहाँ तँ छोटसन बातपर धरती-आसमान एक कऽ देलिऐ। एहन सन क्रम जे अहाँक सिउँथमे सिनुर देलहुँ तँ सौंसे अहींक इच्छासँ ली।... जे जे मौगी नीक लगैत गेल, फोटो लैत गेलिऐ। तकर कैफियत की? ”..पठा देलथिन एस.एम.एस.। तत्काले पत्नीक जवाब अएलनि, “अहाँ तँ तिलकेँ ताड़ बना देलिऐक। मन सुगबुगएल तँ पुछबि नै करू। ओना वएह लड़ैए जकर पएरमे ताकति रहैत छै! से हमरामे जहिया होएत, जवाब देब। ” एस.एम.एस. दू बेर पढ़लनि आ मोबाइलक स्वीच ऑफ कऽ लेलनि। गिरगिट एसकरे रहथि। बाजार जाइले बरामदापर अएलाह तँ जेना लगलनि जे “भट” आबाज भेलैक। पहिने बाँहिपर गिरगिट खसलनि आ फेर नीचाँमे खसि पड़लैक। मरि गेलैक? नै, संचार भेलैक। ससरि कऽ देबालपर चल गेलैक। कटलकनि तँ ने! फेर भेलनि जे कटने रहितनि तँ बिसबिसाइत रहितनि। तथापि गिरगिट खसै छै तँ किछु होइ छै!...किछु होइ छैक? मरबाक पूर्व सूचना सेहो भऽ सकै छै। मन पाड़ऽ लगलाह, पंडित बाबा रटौने रहथिन- पतति यदि पल्ली...पतति यदि पल्ली...आगाँ मोन नै पड़लनि।...ओह, ई सभ पुरना बात भेलै। पएरपर कि कतहि खसै छै तँ धनक क्षति होइ छै। पीठपर कि माथपर तँ लोक मरि जाइये...ओह, फेर वएह पुरना बात! मोन पड़लनि गिरगिट खसै छलै तँ लोक गंगाजल छिटैत छल। आब लिअ, ई गंगाजल कतऽ सँ अनताह? देबालपर एक-दूटा गिरगिट रहै। ई चिन्हबाक प्रयास करऽ लगलाह जे कोन गिरगिट खसल रहनि। गिरगिटकेँ देखैत-देखैत लगलनि जे हिनकर मनमे गिरगिट ससरि रहल छनि। फोंफ “गै धोछिया खोल केबाड़ी! ...खोल, खोलै छैँ कि तोड़ि दियौ केबाड़ी।”, कहैत-कहैत लुढ़कि गेल। उठल। केबाड़ी खुजलैक। एकर मुँह भभकैत रहै। बाजल- “ला जे देबेँ दू मुट्ठी अन्न, से दे!...जल्दी कर, नै तँ ठोंठी दाबि देबै।” कतेक झाड़-फूक भेलैक, टोना-टोटका करौलकैक मुदा एकर पीनाइ नै छुटलै। घरवालीक मन अपरतिभ भऽ गेलै। कहलकैक- “जे कमाइ छैँ से उड़ा लै छैँ! रोटी कतऽ सँ जुटतैक? ” “गौ छुछनरिया, ला जएह छौह सएह ला। एक धारी माटिये ला, सएह भकसि लेबै।” भीतर गेलि। दालि गरम कएलक। छिपलीमे रोटी आ बाटीमे दालि लऽ कऽ आएलि। बाजलि- “जा, आब की करबै? मरदबा भुइयेँमे पड़ले-पड़ल फोंफ काटऽ लागल।” चण्डेश्वर खाँ चारिटा लघुकथा कोटा राजेशजी! अहाँ तँ दलित कोटामे अबैत छी, तेँ अहाँक सीट सुरक्षित अछि। मोहनजी, अहाँ तँ महादलितमे सँ अबैत छी तेँ अहाँक सीट महासुरक्षित अछि। अहाँकेँ के रोकत। विभाजी, पचास प्रतिशतमे अहाँ बाजी मारिए लेब मुदा हमर प्रथम श्रेणीबला डिगरीक की हेतैक? हम तँ ने डोनेशनमे सकबै आ ने रिजर्वेशनमे अएबै। चेकिङ बजार दिससँ आबि थाना चौक होइत, ट्रेजरी दिस जाइत रही। थाना चौकपर भीड़ देखि किछु कालक लेल हहमूँ ठमकि गेलहुँ। ओना थाना चौकपर बरोबरि भीड़ होइत रहैत छैक, कहियो काल कऽ किछु अपराधी पकड़ि कऽ आनल जाइत अछि तँ किछु कालक लेल भीड़ होइत अछि। कहियो काल कऽ हड़तालीक गिरफ्तारीक लेल भीड़ होइत अछि। मुदा आइ से सभ नै छल। बहुत रास मोटर साइकिल थाना परिसरमे पकड़ा कऽ राखल छलैक आ जकर सभ कागच-पता ठीक-ठाक तकरा छोड़ि देल जाइत रहैक। थानाक गेटपर दर्जनसँ बेसी सैपक जवान आ किछु बिहार पुलिस। ओहि बाट धऽ कऽ जतेक मोटर साइकिल चलैत छल, सभकेँ रोकैत छल आ कागच-पता देखल जाइत रहैक। कागज-पता देखबा लेल फराकसँ पुलिस हाकिम सभ छलाह। ओना किछु लोककेँ कागच-पता ठीक-ठाक रहला बादो किछु कालक लेल बिलमा लैत रहैक, बादमे ओकरा सभकेँ कोना छोड़ल जाइत रहैक से नै कहब। एकटा बीस-बाइस वर्षक जुआन छौँड़ाक मोटरसाइकिलक चेकिङ गेटपर भऽ गेल रहैक, ओकर सभ कागच-पत्तर ठीक-ठाक रहैक, तैयो ओकरा भीतर लऽ गेलैक। ओ छौँड़ा गरजऽ लागल, जखन हमर सभ कागच-पत्तर ठीक अछि तखन ई किएक। ओकरा जोरसँ बजलापर ओहिमेसँ एकटा हाकिम तरा-तरि पाँच थापर लगा देलकैक आ थानाक हाजतमे ठेलि देलकैक। ओ जहाँ-तहाँ फोन कएलक। ता हम ट्रेजरी दिस बिदा भऽ गेल रही। आधा घंटाक बाद घुरलापर देखल जे थाना चौकपर साफ सुन्न-साम भऽ गेल छल। कछमछी कर्मचारी सभक महासंघक आह्वानपर आइ पचास दिनसँ हड़ताल चलि रहल छल। समझौता होएबाक कोनो नामे नै रहैक। सभ दिन धरना-प्रदर्शन चलैत रहैक। बेसी दिन हड़ताल रहलासँ कर्मचारी सभ दुबरा गेल छल। बनिया-बेकाल मास दिन धरि तँ कहुना कऽ कऽ उधारी दऽ कऽ सम्हारने रहैक। मुदा आब ओहो सभ थस लऽ लेने रहैक। कर्मचारी सभ, सभ दिन अखबार आ रेडियो समाचार देखैत आ सुनैत अछि। मुदा कोनो नीक समाचार नै देखि कछमछा जाइत छल। मुदा की करत? जँ कियो बीचमे हड़ताल तोड़ि काजपर घुमत तँ ओ कर्मचारी, कर्मचारीक नजरिमे बेइमान कहाओत। मुदा ताहिसँ की, बइमानो कहओलापर तँ दरमाहा नै ने भेटतैक। से छोटका कर्मचारी सभ कछमछीमे पड़ल अछि। भोलाक पत्नी बेसी दिनसँ दुखिताहि छैक। दवाइ दोकानसँ दवाइ उठौना लैत अछि। मुदा दोकानदारक तीन मासक उधारीक चुकता नै कएने छल। तेँ टाकाक व्यवस्था कऽ कऽ दवाइ अनबा लेल गेल छल। दोकानदारकेँ पुरजा दऽ दवाइ देबा लेल कहलक। दोकानदार पुरजा उनटा-पुनटा कऽ देखि कहि देलकै- ई दवाइ सभ हमरा दोकानमे नै अछि। भोला बाजल- एखन हम नगदी लेब। ई सूनि दोकानदारकेँ कछमछी लागि गेलैक। बिसवास हमर पत्नी तीन बरखसँ दुखिताहि छथि, गैस्टीकक रोग छनि। एकपर एक डागदरक इलाज चलल अछि मुदा ठीक नै भऽ रहल छनि। मुदा एहि बेर एकटा पैघ डागदरसँ देखा रहल छियनि। जाँचे-पड़तालमे हजारसँ बेसी लागि गेल अछि। डागदरकेँ सभ बात पत्नी कानि-कानि कऽ कहने रहथि। डागदर साहेब कहलनि- एहि बेर निरकटेल भऽ कऽ ठीक भऽ जाएत। जेना-जेना हम कहलहुँ तहिना करब। डागदर साहेबक कहब रहनि- दिनमे कमसँ कम चारि-पाँच बेर थोर-थोर भोजन करब। दवाइ कहियो नै छोड़ब। डागदरक मोताबिक सभ बात चलि रहल छैक। मुदा काल्हि रवि छैक। से पत्नी रविक तैयारीमे लागल छलीह। हम पत्नीकेँ बुझबैत कहलियनि- डागदर साहेबक बात मोन अछि ने, ओ कहलनि- हँ हँ, डागदर साहेबक सभ बात मोने अछि, मुदा रवि कोना छोड़ि दी। बाल बच्चा आ अहाँ छी। डागदर तँ डागदरे होइत छैक। ओ कोनो भगवान नै छथि। रघुनाथ मुखिया पाँचटा लघुकथा इण्डियन ई अछि नेपालक जनकपुरधाम। विवाह मंडपक फुलवाड़ीमे युक्लिप्टसक गाछ देखि ऋषि वशिष्ठ बजलाह- ई तेजपातक गाछ अछि की? हम नजरि पड़िते चिन्ह गेलौं आ बजलहुँ- नै-नै भाय, ई तेजपात नै, युक्लिप्टस अछि। एकर पातकेँ मीरकेँ सुंघलासँ विक्स जकाँ गमकैत अछि। वशिष्ठजी पात तोड़बाक लेल अपन डेग उठौलनि कि नजरि पड़ि गेलनि विष्ठाक चोतपर आ बजलाह- “लगैए एत्तौ इण्डियन आबै छै। नै? ” जुलुम लोकसभा चुनावक प्रचार-प्रसार शुरू भऽ गेल रहै। स्पीकरक गर्दमिशान करैत अबाज “छौंड़ीकेँ देलकौ धक्का मारि”क अबाज सुनिते काजक सूरि टुटि गेलै। गेनमा आ चुल्हाय सदाक कोदारि रुकि गेलै। गेनमा आड़िपर जा कऽ डाँर सीधा करऽ लागल। चुल्हाय गमछासँ पसेना पोछि तमाकू चुनबैत पुछलकै- अँय रौ गेनमा! जीतै लऽ जौं एक्के थारीमे गाए आ सुगरक मासु खाए पड़ि जाए तँ ओ के सभ खेतै रौ? गेनमा तमाकूक लेल हाथ पसारैत बाजल- हौ कका! एत्तेटाक दुनियाँमे एहेन एक्केटा जाति होइ छै- “नेताजी।” आ ताहिमे जँ हिसाब करबहक जे ई नेता खेतै की ओ नेता, से तँ जुलुमे ने करबहक। नियति कॉमरेड गनेसर कामति भोरे-भोर बलहा बाजारपर एलाह। हुनका संगमे सिंहजी रहनि। दुनू गोटऽ बनारसी पासीक घर धरिक कएक फेरी लगेलक। फेर मन्दिरक आगाँमे ठाढ़ भेल। आब एकटा करिया चश्माबला भीमकाय कायाधारी मिसरजीकेँ इशारा करैत बाजए लागल- घरो तोरे, पिनसिलो तोरे, लौनो तोरे, बीपैलो तोरे। बढ़मोत्तर तोरे, शिवोत्तर तोरे। आएल-गेल सेहो सभटा तोरे। तब अहीं कहियौ ने। हम गरिबाहा सभ की लेबै- “बापक हुरिया”। मिसरजी अपन जीहकेँ दाँतसँ कुचैत मुसकिएलाह। अपन डाँड़सँ एकटा कागचक पुड़िया आ आंगुर भरिकऽ चीलम निकालि कॉमरेडक हाथमे थम्हा देलक। मुँहलगुआ अँय रौ गणेश! ई हड्डी भरि राति चौबट्टीपर एहिना राखल रहि गेलै। नढ़ियो-कुकुर नै छुलकै। ई कोना भेलै रौ। लागैए जे ई हड्डी कोनो शेरक ठमाएल छै। डरे नढ़िया-कुकूर नै छुलकै, नै? गणेश मौन भंग करैत बाजल- नै, नै। शेरक ऐंठाएल हड्डी-गुड्डी तँ सभ दिनेसँ नढ़िया-कुकूर चोभैत अइलैए, भाइ साहेब। हमरा बुझने इहो हड्डी कोनो ने कोनो नढ़ियेक राखल छिऐ। तेँ एखन धरि डरे किओ सुंघबो धरि नै केलकैए। कारण जे आब तँ साहेबसँ बेसी मुँहलगुएक डर होइ छै नै। ग्रानहाउसमे कुकूर दिसम्बरक अन्त। आइ ४८ डिग्री तापमान होएबाक सम्भावना अछि। कृपया अपन माथपर बरफ लपेटि लेल जाउ। किएक तँ भुस्सामे शीघ्रहि आगि पकड़बाक सम्भावना रहैत छैक। जेना माटिकेँ माटि खाइत अछि, लोहाकेँ लोहा कटैत अछि। माहुरकेँ माहुर, हीराकेँ हीरा आ सोनाकेँ सोना कटैत अछि। तेँ अहाँकेँ कुकूर कटैत अछि। ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा प्रमाण-पत्र बड्ड भारी समारोहक आयोजन कएल गेलै। जिलाक बड़का-बड़का पदाधिकारीक जुटान गाममे भेल छलै। जिलाधिकारी तँ जिलाक नेतागण। भाषण-भूषण खतम भेलै तँ जिला शिक्षा अधीक्षक गामक मुखिया दिस एकटा कागज बढ़बैत बजलाह-“ मुखियाजी अपने एहिपर दस्तखत कऽ दिऔ, अहाँक पंचायत पूर्ण साक्षर भऽ गेल, तकरा लेल ई प्रमाणपत्र अछि।” मुखियाजी सकुचाइत बजलाह- “मुदा हम तँ औंठा छाप देब, हमरा तँदस्तखत करऽ नहि अबैए? ” अधीक्षक एम्हर-ओम्हर तकलनि आ बाजि उठलाह- हौउ, औंठो चलतै! कनेक जल्दी करू।” मुखियाजी कजरौटामे औंठा रगड़ि कऽ निशान लगौलनि। ओ औंठाकेँ माथक केशमे पोछैत बजलाह- “अहोभाग्य हमर आ हमरा पंचायतक।” अधीक्षक मंचपर गरजैत घोषणा केलनि-“गर्वक संग घोषित कऽ रहल छी जे अहाँक पंचायत संपूर्ण साक्षर भऽ गेल।” मुखियाजी खन ओहि प्रमाणपत्र दिस तकैत छथि खन अपन करियाओल औंठा दिस। मनमौजी महादेव मंदिरक आगाँ कनैल फूलक गाछतर गँजेरी, भंगेरी आ तरिपिब्बा आपसमे बहस करैत छल। गँजेरीक कहब छलै जे- “शेर अंडा दैत छैक।” तरिपिब्बाक कहब छलै जे- “शेर बच्चा दैत छैक।” बात बढ़ैत गेलै आ बातसँ बतंगर भऽ गेलै। विवाद बढ़िकऽ हाथापाहीक नौबत आबि गेलै। जखन भंगेरीकेँ दुनूक कटाउझ असहाज भऽ गेलै तँ ओ बाजि उठल- “तोँ दुनू अनेरे लड़ै छह।..हौ एतबो नै बुझै छहक जे शेर जंगलक राजा होइछै, ओकरा लेल कोन छै? जखन मोन हेतै तँ अंडा देतै आ जखन मोन हेतै तँ बच्चा देतै। जखन मोन हेतै तँ शाकाहारी बनतै आ जखन मोन हेतै तँ काँचे माउस चिबेतै।” तरिपिब्बाकेँ जेना भक्क टुटलैक। ओ बाजि उठल- “जा, से कोना हेतै हौ! बच्चा तँ देतै शेरनी। शेर कोना बच्चा देतै?” भंगेरी बुहुँसैत बाजल- “धुर बतहा, एतबो नै बुझै छही जे ओ भेलै सरकार! आ सरकार कोन!..ओकर अपन मनमौजी छै, जे चाहतै से करतै।” शिव कुमार झा “टिल्लू” फूसि नै बाजू आंगनमे राखल चौकीपर शंकर शान्त बैसल छल। माए आबि कऽ पुछलनु- “की भेल, किए उदास छी”? शंकर कानए लागल- “कृष्णचन्द्र भैया जखन देखैत छथि तँ कहैत छथि जे फूसि नै बाजू”। एना किए कहै छथि? शंकर कथा सुनबए लागल। टोलक किछु नेना क्रिकेट खेलबाक लेल गाछी गेल छल। विकेट नै रहए तेँ कैलाश कक्काक राहड़िक खेतसँ रंजीत किछु राहड़िक मोटगर गाछकेँ उखाड़ि विकेट बनौलक। क्षणहिमे कैलाश कक्का गाछी दऽ कऽ जाइत छलाह। अपन खेतक दशा देखि सभसँ पुछलनि जे राहड़िकेँ के उखाड़लक? केओ नै बाजल। ओहि दिन साँझमे पंचैती बैसाओल गेल। रंजीतकेँ पता छल जे मास्टर साहेब मात्र हमरेटासँ पुछताह। तेँ हमरा धमकी देलक – जौँ हमर नाओं कहबेँ तँ मारबौ, ललवाकेँ फँसा दही। हमहूँ डरक मारे ललवाक नाओँ बकि देलहुँ। ओकर बड़का भाए कृष्णचन्द्र भैया ओकरा बड़ मारि मारलनि। जखन ओ सत्यकेँ बुझलन्हि, तखनसँ खिसिआएल रहथि। शंकरक व्यथा सुनि माए अवाक् रहि गेलीह – अहाँ बड़ पैघ गलती कएलहुँ। लाला अहाँक प्रिय मित्र छथि, जाउ आ हुनकासँ माफी माँगि लिअ। भविष्यमे एहेन गलती नै करब। जाहि व्यक्तिसँ डर होइत अछि ओकरा संग मित्रता किए करै छी? निर्दिषक आत्मापर चोट नै पहुँचेबाक चाही। प्रण करू जे सदिखन सत्य बाजब, जौँ कतहु समस्या हुअए तँ चुप्प रहि जाएब मुदा झूठ नै बाजब। माएक प्रेरणासँ शंकर सत्य हरिश्चन्द्र तँ नै भऽ सकल मुदा ओहेन झूठ नै बजैत अछि जाहिसँ ककरो आत्माकेँ दुःख पहुँचए वा सत्य कलंकित हुअए। मिथिलेश कुमार झा पाँचटा लघुकथा कानून चौबटियाक सिंगल पीअरसँ लाल होइत-होइत एकटा फटफटियाबला जोरसँ बिरेक मारलक आ थम्हैत-थम्हैत ओ रुकबाक निर्धारित उरजा चेन्हकेँ पार कऽ गेल। तखने एक गोट सिपाही अएलै आ जुरमानाक रसीदबला जिल्द बहार करैत ओकरासँ लाइसेंस मँगलकै। फटफटियाबला क्षमा याचना करैत कहलकै जे ओकर गाड़ी बड्ड तीव्र गतिमे छलै आ तैँ जोरसँ बिरेक मारलाक बादो चेन्हसँ आगाँ घुसुकि आयल। ओ फटफटियाकेँ चेन्हक पाछाँ घीचि अनलक। एम्हर ई सिपहिया ओकरासँ जुरमाना लेबऽपर बिर्त। कि ताबतेमे एकटा पुलिसक जीप सेहो ओहि चेन्हकेँ पार कऽ सिंगलपर अटकलै। आ एहि सिपाहीपर फटफटियाबलाक अनुनयक कोनो प्रभाव नै। एकाएक ओ फटफटियाबला ताओमे आबि गेल, बाजल जे पहिने एहि पुलिस-गाड़ीसँ जुरमाना असूलह, तखने हमहूँ देबह। कानून सभक लेल एक्के छै। एतबा सुनितहि ओहि सिपहियाक मूह अपने सनक भऽ गेल छलै। दर्शन देवकान्त बाबू दस बर्खपर गाम आयल छलाह बेटाक उपनयन करबाक लेल। ढोल-पिपही, आजन-बाजन आ आर्केस्ट्रा आदिसँ गाम गनगनाइत रहल। तीनू दिन बरबरना भोज, छेना-रसगुल्ला बहि गेल। एहन डील-डलसँ गाँ भरिमे केओ नै कएने छल उपनयन। वाह रे देवकान्त बाबू! रातिमक परात फूदन बाबा देवकान्त बाबूक प्रशंसा करैत कहलखिन- “हओ देबू! तोँ तँ सभक कीर्तिकेँ तोपि देलहुन। ...आब हे, कनी अपन भैयापर नजरि दितहुन। बेचारे बड़ लचरि गेल छथि। आखिर सहोदर छहुन।” “बाबा, हुनका आर कष्ट काटऽ दिअनु। कष्ट हेतनि तखने धियापुता उन्नति करतनि। होबऽ दिअनु कष्ट।” फूदन बाबा अवाक्, हुनका ई दर्शन कहाँ बुझल छलनि! झीक “अँए गे माए, पोखरिभीरावालीक मूह आइ भोरेसँ लटकल देखै छिऐ। की भेलैए? ” “गइ हेतै की! आइ कए दिनसँ साँएक फोन नै एलैए ने, तैँ।...गइ हम सुन्दरकान्तक माए छिऐ से किच्छु नै आ एकरा माइले फटै छै। ओ एकोरत्ती गुदानै छै नहिए।...एकटा बेटी भेला छः साल भऽ गेलै आ तकरा बाद जेना कोखिए जरि गेलै। कथीपर गुदान्ता करौ! गइ ओकर तँ वंशे बुरऽपर लागल छै।” माए बेटीक फदका कनिञा सुनलनि तँ कोंढ़ फाटि गेलनि। घरसँ बहरा सासु-ननदिक मूहमे झीक दैत बजली- “हे, एम्हर केओ बाँझ नै छै। बेटाकेँ थितगर नोकरी नै छनि तैँ भेल जे एकेटाकेँ यदि मनुक्ख बना सकी तँ सएह बहुत। आ वंश बुरऽक बात करै छथि, यदि मनुक्ख नै भेल तँ बेटोसँ वंश बुरि जाइ छै आ बेटी लछ्मी हुअय तँ आनो गाँमे वंशक ना चलै छै, बुझलखिन! ” कन्यादानक चिन्ता -गोड़ लगै छी पीसा! -खूब नीके रहऽ। की हालचाल छै हौ? -अहाँ सबहक आशीर्वादसँ सभ ठीक-ठाक छै पीसा। -धिया-पुता नीके छऽ ने? -हँ-हँ, सभ दन-दना रहल छै। -अँए हौ, तोरा चारिटा बेटी छऽ ने? -हँ पीसा। -ओह! एकटा कन्यादानमे तँ लोक नमरि जाइ अए आ चारि-चारिटा कन्यादान...! बड़का चिन्ताक विषय छह। -नै पीसा, हमरा एक्को रत्ती चिन्ता नै ऐ। -से किएक हौ? छह धयल-उसारल की? -नै, से तँ नै ऐ। -तखन चिन्ता कोना नै छह? -पीसा, चिन्ता तँ करए ओ जे अपना जानसँ फाजिल कथाक इच्छा रखैए। हमरा तँ जतबे ओकाइत अछि ताही हिसाबसँ लड़िका अनबै आ हाथ धरेने जेबै। महानगर-संस्कृति स्टेट बैंकक हाकिम राम सरूप यादवक बदली एकटा छोटका नगरसँ एहि महानगरमे भेल छलनि। यादवजी छोटका नगरमे रहि उबिया गेल छलाह- ने मनोरंजनक कोनो तेहन साधन, ने आबाजाहीक सुभितगर व्यवस्था, ने बिजलीक भरोसा, ने बच्चा सभक कैरियर बनेबाक कोनो तेहन सन बाट आदि। आ तैँ एहि महानगरमे बदली होइते यादवजी खूब प्रफुल्लित भेल छलाह। ऐ ठाम सस्तासँ महग धरि एक-पर-एक ततेक मनोरंजक स्थल जे सभटा देखएमे बरख बीत जाए, कत्तौ जेबाक हो तँ बससँ टैक्सी धरिक तेहन सुभितगर साधन जे पाँचो मिनट ठाढ़ नहि होबऽ पड़त, बिजली जेबाक तँ नामे नै, बच्चा सभक कैरियरक मारिते रास विकल्प...। यादवजी गदगद छलाह- महानगर आखिर महानगरे होइ छै! से, यादवजी एकटा नीक एरियामे आधुनिक सरंजामसँ युक्त अपार्टमेंटक एकटा बेस खुसफैल फ्लैट चारिम महलापर लेलनि किरायापर। तीनिये दिन पहिने डेरा-डंटा लऽ कऽ आएल छलाह। आइ शेष बाँचल वस्ति-जातकेँ घरमे सरिया-सरिया कऽ रखैत छलाह कि कॉलबेल गनगना उठलै। यादवजी अपनहि जा केबाड़ फोललनि तँ दूटा सिपाही ठाढ़। ओइमे सँ एक गोटे हिनकर परिचय पुछलकनि आ आगाँ पुछारीक क्रममे जखन बुझबामे अएलै जे ई तीनिये दिन पहिने एलाहेँ तँ ओ सभ हिनका मुहथरिपरसँ हँटि बगलबला फ्लैटक कॉलबेल टिपलक। यादवजीकेँ सिपाही सभक एबाक प्रयोजन बुझा गेल छलनि। से जिज्ञासावश ओहो ठाढ़े रहलाह। बगलक फ्लैटसँ केबाड़ फोलि एकटा अधवयसू पुरुष आ जनाना बहरेलै। सिपाहीक पुछला उत्तर ओ पुरुष अपन नाँ पी.जायसवाल कहलकै। सिपाही अपन क्रमकेँ आगू बढ़बैत पुछलकै- “...सामनेबला फ्लैटमे चारि दिन पहिने एकटा स्त्रीकेँ डाहि कऽ मारि देल गेल अछि। ताहि मादेँ अहाँ की जनै छी? की झगड़ा-दान होइ छलै? ” जायसवालजी किछु मोन पाड़ैत उतारा देलखिन- “अच्छा! हँऽऽऽ! ककरो जोरसँ चिचिएबाक स्वर तँ अकानने रहिऐ, मुदा हमरा सभकेँ भेल जे केबलपर कोनो हॉरर फिल्म भऽ रहल छै। ओकरा आगिमे डाहल जा रहल छलै!! ” सिपाही जायसवालसँ आर किछु पुछऽ लगलै आ यादवजी दुख ओ आश्चर्यक मुद्रा लेने अपन फ्लैटमे ढुकि गेलाह। महानगरक करिया रूप सोझाँमे नाचि उठल छलनि। झमान भेल सोफापर थस्स दऽ बैसि गेलाह। माथ जेना घुरऽ लगलनि...की महानगरक असली रूप एहने छै!...ऐ ठामक मनुक्खकेँ खाली अपनेटा सँ मतलब होइ छै!...एकटा पड़ोसीक घरमे एहन जघन्य घटना आ दोसरकेँ जन्तबो नै! ...की समाज आ टोल-पड़ोसक मतलब ऐ ठाँ बदलि जाइ छै! ...की इएह छै महानगरक संस्कृति!!! सत्येन्द्र कुमार झा पाँचटा लघुकथा लेटेस्ट एकटा इलेक्ट्रॉनिकक नव दोकान। मध्य आय वर्गक एकटा व्यक्ति दोकानमे प्रवेश करैत अछि। कतेक दिनसँ कनी-कनी पाइ जमा कऽ मोबाइल किनबाक हेतु आएल अछि। दोकानदारसँ सभसँ “लेटेस्ट” मोबाइल किनलक। पाइ दऽ कऽ मोबाइल लेने अति उत्साहक संग बिदा भइये रहल छल कि एकटा दोसर ग्राहक दोकानमे प्रवेश करैत अछि। ओ सेहो दोकानदारसँ “लेटेस्ट” मोबाइल देखएबाक फरमाइश करैत अछि। दोकानदार कार्टूनमे सँ एकटा मोबाइल निकालि सोझाँ राखि दैत अछि। पहिल व्यक्ति देखैत अछि- “ई तँ हमरबला मोबाइल नै अछि।” ओ दोकानदारसँ जिज्ञासा करैत अछि। दोकानदार कहैत अछि- “ई सेट एखनहि उतरल अछि...अहाँक किनलाक बाद...। ” ओ अपन मोबाइल दिस तकैत अछि। ओकरा अपन मोबाइल पुरान सन लगैत छैक। कोनमे राखल “लैण्ड फोन”क चोंगा भभाकऽ हँसऽ लागल छल। हिस्सक महानगरमे दू कोठरीक मकान। एकटा कम्पनीमे छोट पदपर कार्यरत। अल्प वेतन। पति-पत्नीक साझी विचार जे एकटा पेइंग गेस्ट राखि ली तँ आमदनी किछु बढ़त। एकटा महानगरीय बहुरुपियाक, जे अपनाकेँ मल्टीनेशनल कम्पनीक इंजीनियर कहए, पेइंग गेस्ट बनि रहए लागल। आस्ते-आस्ते पति-पत्नी अपन भावी जमाएक रूपमे ओहि बहुरुपियाकेँ देखए लगलाह। हुनक बेटी ओकर कोठरीमे आबए-जाए लगलीह। ईकदिन ओ बहुरुपिया कतौ बिला गेल। संगमे ओकर बेटीक सभ गहना-गुड़िया लऽ गेल आ छोड़ि देलक अपन मोचरल बासि ओछाओन। क्रोध, चिन्ता आ दुःखसँ झमारल पति-पत्नी किछु दिन धरि व्याकुल रहली, फेर अपनाकेँ संयमित करैत अपन नव बसल कॉलोनीमे घोषणा केलन्हि- “हम अपन बेटीक बियाह कोनो इन्जीनियरसँ करब।” भैयारी नेताजी केँ भरि पाँज पकड़लक। “भाइजी...भाइजी...। ” “हट...के भाइजी? ” “अहाँ भाइजी...हमर भाइजी...आर के? ” “हइ...तोरा डर नै होइ छौ हम्मर? ” “नै...भाइयोसँ कहूँ भाइ डेराइत छै? ” “हम तोहर भाइ?...कहिया के? ” “कोनो एक कोखिसँ जन्म नेनहे लोक भाइ बनै छै? एक्के धन्धा कएनिहार सेहो आपसमे भाइये होइ छै...। ” “चुप...। ” नेताजीक समक्ष एकटा भिखमंगा ठाढ़ छल। स्थानान्तरित दोष नौकरीमे अएलाक बाद विभागीय परीक्षाक तैयारीमे जुटल छला। मुदा परिणाम नीक नै भेलनि। असफल भऽ गेला। घरक सभ सदस्य असफलताक मादे जिज्ञासा कएल तँ कहलनि- “एम.डी.क खास छलै...ओकरा नै होइतै तँ ककरा होइतै? ” पुत्रक परीक्षा चलि रहल छल। प्रथम स्थान प्राप्त करबाक मारामारी। मुदा पिता जेना पुत्रोकेँ निराशे हस्तगत भेल- “प्रिन्सिपलक बेटा छै ओ...प्रथम स्थान तँ सुरक्षिते छै...। ” बाप-बेटा दुनू गेन्दकेँ दोसरक आंगनमे फेक निश्चिन्त भऽ गेल छला। गुण कतौ पछुआरमे ठाढ़ छल। अप्रासंगिक आंगनमे दू गोट बालक खेला रहल छल। दुनू माय-बाबू, ओतहि एक कोनमे कुर्सीपर बैसल चाह पीबि रहल छला। एक बालकक हाथमे खिलौनाक पेस्तौल छल। ओ दोसर बालकपर पेस्तौल तानैत अछि-“तोरा लग जे किछु छौ हमरा दऽ दे, नै तँ पेस्तौलक एक गोलीसँ तोहर खोपड़ि उड़ा देबौ।” दोसर बालक सहमि जाइत अछि। हड़बड़ाइत उठैछ- “तोरा की चाहियौ? हमरा लग तीन मोबाइल, एक लैपटॉप, एक कम्प्युटर, एक एल.सी.डी. टीवी, फ्रिज, बैंक लॉकरमे बहुते रास सोन आ रुपैआ अछि...आर हँ, हमरा लग हमर डैडी आ मम्मी सेहो अछि।” पहिल बालक एक्शन दैत पेस्तौल दोसर बालकक कनपट्टीमे सटा दैत अछि आ फेर जोरसँ बजैत अछि- “शटअप...तूँ अपन मम्मी-डैडीकेँ छोड़ि बांकी सभ किछु हम्मर हवाले कऽ दे, नै तँ...। ” कातमे बैसल पहिल बालकक माए-बाबूक मुखपर भएक रेख स्पष्ट होमए लगैत अछि। हुनका लगैत छन्हि जे ओ बेटाक नजरिमे अखनहिसँ अप्रासंगिक भऽ गेल छथि। नवनीत कुमार झा गाम आबह प्रमोद कोनो जरूरी काजमे लागल छलाह। मूड़ी गोतने लीखि रहल छलाह। भीतरसँ कनियाँ कहलखिन- सुनै छी, गामसँ बाबू फोन केने छलाह। कागज-पत्रकेँ समेटि ओहिपर पेपरवेट राखि देलनि आ कनियाँसँ पुछलनि- की सभ कहि रहल छलाह। कनियाँ ठोड़े नाक-भौंह चमकबैत कहलखिन- कहता की, कहलनि जे कनियाँ, बौआकेँ कने गाम एबाक लेल कहबनि। प्रमोद कने तमसाएल जकाँ होइत भनभनाए लगलाह- ईह, एकटा हमहीं भेटै छियनि बूढ़ाकेँ, चारि बेटामे आर ककरो किछु नै कहथिन। आब एखन तँ हमरा फुर्सति नै अछि जे हम गाम जाएब। कनियाँ प्रमोदकेँ तमसाएल देखि प्रसंग बदलि देबाक लेल पुछलखिन- अच्छा छोड़ू एहि प्रकरणकेँ, कॉफी पीब, बनाउ की? कनियाँ बड़ होशियारि छथिन। प्रमोदक उत्तर देबासँ पहिने ओ भनसाघर चलि गेलि आ कॉफी बनाबऽमे लागि गेलि। कॉफीकेँ चुस्कियबैत प्रमोदक केशमे आंगुर चलबैत कनियाँ कहै छथिन- एकटा बात कहू, नै होइए तँ चलि ने जाउ गाम। जहियासँ ई छौंड़ी काज छोड़ि देलकए तहियासँ असगरे सभटा काज करैत-करैत हम अपस्याँत भेल रहै छी। घुरनी जँ तैयार भऽ जाए अएबाक लेल तँ ओकरो लऽ आनब आ नवका मूँग भेल हेतै, सभटा खेती-बाड़ी बाबू देखै छथिन, तखन हमरा सभकेँ चुटकी भरि किछुओ नै भेटैत अछि आ सझिला बौआ- छोटका बौआ सभटा अपने बाँटि-चुटि लै जाइ छथि। -ऐखन अप्पन बच्चा सबहक कैरियर देखू कि हम ई दियादी-पटेदारी फरियबैत रहू। प्रमोद ई कहि पुनः अपन काजमे व्यस्त भऽ गेलाह। प्रमोद गाम नै गेलाह। दू-तीन सप्ताह बीति गेलै। अचानके मंगल दिन साँझमे जटाशंकर भाइ फोन केलखिन- -प्रमोद, तोहर बाबू नै रहलखुन! -ऐं! की भेलै, ऐना केना भेलै, अखन तँ थेहगरे छलाह। -तोरा किछु नै बूझल छउ, विनोद आ कामोद दुनू गोटे पन्द्रह-पन्द्रह दिनक पार बाँटि देने छलखिन। कक्का दुनू बेटा कोतऽ पन्द्रह-पन्द्रह दिन भोजन करै छलखिन। रवि दिन जखन ओ नहा कऽ एलखिन तँ हुनका ई मोन नै रहलनि जे आइ कामोद कोतऽ पार छन्हि। दुआरिपर बैसल कक्काकेँ विनोदक स्त्री कहलखिन जे बाबू आइ हिनकर पार कामोद बौआ ओहिठाम छन्हि, ओतहि जाथु। कक्का के की भेलन्हि की नै ओ कामोदक ओहिठाम नै गेलाह, माहुर खा कऽ हमेशाक लेल सूति रहला। खएर जे भेलै से भेलै, आब तोँ जल्दी गाम आबह, जेठ बेटा छहुन। कौशल कुमार तीनटा लघुकथा दूमुँहा आइ मिथिलाक लोकक छाती गर्वसँ चौड़ा भऽ रहल छल आ सिया बाबूक चर्चा सुनि कऽ आओर हुनका ऊपर विमर्श करैत अह्लादित छल लोकक हृदए। सिया बाबू चर्चित समाज सेवक आ लोकसेवक छथि, आइसँ दस बरख पहिने हुनका लग किछु नै रहनि मुदा आइ अपना जिला मुख्यालयक अनाबा पटना आ दिल्लीमे अपन कोठी छनि आ बेस जन समर्थन आओर राजनीतिक रुतबा सेहो। परसू रातिमे एकटा स्थानीय कागतक ठोंगा, झोरा आओर लिफाफ बनबऽबला इकाइसँ ओ सत्रहटा बन्धुआ बाल मजदूरकेँ मुक्त करौलनि, तै लेल मीडिया हुनकर डंका दू दिनसँ पीट रहल अछि। हमहूँ , हुनका अपन समाजसेवाक क्षेत्रमे आदर्श मानि कऽ काज करऽबला, एकटा समाजसेवी छी आओर नारी उत्थानपर एकटा कार्यक्रमक आयोजन कऽ रहल छी। कार्यक्रमक प्रधान अतिथि के बनता एकर विचार संगठनमे कऽकए सिया बाबूकेँ प्रधान अतिथि बनबाक हेतु हुनका कोठीपर आग्रह कऽ आएल छी। झक्क-झक्क झलकैत कोठीकेँ सुनियोजित सलीकासँ सजाओल अतिथि कक्षमे गहींर नक्काशीदार मूर्ति सभ जकर प्रत्येक गह-गह झलकैत सियाबाबूक धवल व्यक्तित्व जेना प्रदर्शन कऽ रहल हो। हमरा पता लागल, सिया बाबू घरक सफाइ अपने हाथे करै छथि। अइ सभमे हम ओझराएल रही कि सियाबाबू श्वेत दन्तराशिक मधुर मुखरित मुस्कानक संग पधारलनि। हम अपन कार्यक्रमक रूपरेखा बतबैत रहलियनि आ ओ शालीनतासँ सुनैत रहला। अही मध्य एकटा बच्चा जूसक दूटा गिलासक संग एकटा नक्काशीदार शीसाक जगमे पानि आ एकटा खाली गिलास सेहो एकटा ट्रेमे लऽ कऽ आएल। ओ हमरा सभकेँ जूस लै लेल कहलनि आ अपने पानि ढारि कऽ पीलनि। हम सभ गप्प करिते रही तावत फेर कने कालक बाद वएह बच्चा चुपचाप आएल आ सभ खाली गिलास आ जग ट्रेमे लऽ कऽ चलि गेल। कने कालक बाद झनाक दऽ एकटा अबाज भीतरसँ आओल, लागल जेना किछु शीसाक खसलै। सियाबाबू हमरा सभकेँ आश्वासन दऽ कऽ कने हड़बड़ीमे भीतर चलि गेला। हमहूँ अपना सेक्रेटरीकेँ, जे नेता चिपकू लोक छला, हुनका चलबाक लेल उद्यत केलौं। तावत एकटा जोरक चित्कार कानमे पड़ल जेना ककरो जिब्बह कएल जाइत हो। हमरा रहल नै गेल, बाहर जा कऽ जुत्ता पहिरैक बदला कने भीतर दिस हुल्की देलिऐ तँ सिया बाबूकेँ देखलौं जे ओही बच्चाक दुनू कान पकरने हवामे लटकौने जेना उखाड़ि लेथिन आओर आँखिमे बहशीपन जेना ओ हुनक सभसँ पैघ दुश्मन हो। ई दृश्य हमरा लेल असह्य छल, हम पाछाँ मुड़ि कऽ जल्दीसँ जुत्ता पहीर अतिथि कक्षक बाहर आबि किंकर्तव्यविमूढ़ ठाढ़ रही तावत सियाबाबू अपन ओही मुखरित मुस्कानक संग हाथमे स्मारिकाक लेल अपन पत्र लेने प्रकट भेला। हम सभ बिदा लऽ बिदा भेलहुँ। कोठीसँ बाहर निकलबाक समए वएह बच्चाकेँ देखलौं जे हाथमे झोड़ा लेने सम्भवतः बजार जा रहल छल। चुँकि हमर चालि तीव्र छल तेँ हम सभ ओकरासँ आगाँ निकलि गेलौं मुदा ओकरा दिस देखलौं तँ ओकरा गालपर छल पाँचो आंगुरक छाप आ गालपर नीपल नोर संगहि कान दुनू लगै छल जेना रक्तरंजित हो, ततेक लाल। हम क्षुब्ध रही, की ईएह दुमुँहा व्यक्तित्व हमर आदर्श अछि? प्रार्थना आ आस्था भगवतीक वंदनाचरण भऽ रहल छलनि, लोक सभ पूर्ण उत्साहसँ गाबि रहल छलथि, जिनका श्लोक मोन नै रहनि ओ गाबैक भाभट करैत मुँह चलबैत आ ठोर पटपटाबैत रहथि। अही भीड़मे एकटा चारि-पाँच वर्षक बच्चा सेहो आगाँमे ठाढ़ भेल कल जोड़ने पता नै कखन आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। जखन त्वमेव माता च पिता... हेबऽ लगलै तँ ओहो खूब जोर-जोरसँ संग देलकै फेर ओकर बाद बेचाराकेँ चुप भऽ जाए पड़लै। सभ गबैत वा गाबैक ढोंग करैत मुदा ओ सबहक मुँह तकैत ठाढ़ रहल। कने कालमे वन्दना खत्म भेलै तँ ओ आरती लऽ कऽ आ प्रसाद लऽ कऽ हाथमे रखने रहल आ जखन भीड़ कम होमऽ लगलै तँ भगवतीक मूर्तिक आओर लगमे जा कऽ अ आ सँ लऽ कऽ य र ल व ज्ञ धरि पढ़ि देलकै आ हाथ महक प्रसाद प्रणाम कऽ कऽ कने खा लेलक आ कने मुट्ठीमे रखने बिदा भेल। ई सभ देखि पूजा-आयोजक-परिवारकेँ एक गोट जे बढ़ि-चढ़ि कऽ स्तोत्र पाठ कऽ रहल छला, बच्चा सँ व्यंग्ये पुछलखिन- ऐं रौ, भुटका त्वमेव माता च पिता...तँ तोँ बड्ड टहंकारमे कहलहीं आ ओकर बाद एसगरमे ई अ आ किए भगवतीकेँ पढ़बऽ लगलहुन? बच्चा कने डेराइत तोतराइत बाजल- हमरा इस्कूलमे त्वमेव माता...पढ़बै छथिन मास्साब...आ अ आ किए पढ़लही? सज्जन फेर चुटकी लेलखिन। तावत छटैत भीड़ फेरसँ उत्सुकतामे संगठित होमऽ लागल। ओ तँ अइ लेल जे बच्चा साँस भरैत बाजल- भगवती अपने छ सभसँ नीक कविता बना लेतिन... लोक ठठा कऽ हँसल मुदा पुछनाहार झेप गेला आ ई प्रसाद ककरा लेल लऽ जाइ छहक?- सज्जनकेँ एखनो उत्सुकता छलनि! -ओ हमल पिल्लाक माय मलि गेलैए, ओकला खुआ देबै तँ ओ जीब जेतै।- बच्चा बाजल आ ओम्हर दौड़ गेल जेम्हर ओकर पिल्लाक माय पड़ल छलै। सभ अवाक् ओकरा देखैत रहल। अप्पन इज्जति भरल देहक पन्द्रह वर्षक नवयौवना कहियौ वा बच्चा? नवयौवना नीक लगै छै कहैयोमे आ सुनैयोमे, गाड़ी काकरघाटी स्टेशनपर रुकलै तँ हमरा बगलमे सीट खाली भेलै तँ रेलमपेल बोगीमे बैस गेल। जाड़क मास रहै मुदा शीतलहरीमे जैकेट-टोपीक बादो ठण्डा लगैत छल तेँ हाथ छातीपर बन्हने गुड़मुड़ायल बैसल रही। एकटा सीटपर सातगोटे बैसल रही तैयो कोनो असुविधा नै बुझा रहल छल कारण हाथ-पएर पसारैमे भले असुविधा रहै मुदा कने जाड़ तँ कम लगै छल। जखन ओ श्यामवर्ण नवयौवना गाँती बन्हने बगलमे बैसल तँ जेना करेँट लागल आ देहमे गर्मीक एकटा लहरि दौड़ि गेल। हम जे हाथ छातीपर बन्हने रही से ओकर कठीन उभारसँ सटि गेल। कने काल हम पूर्ववत रहलौं मुदा जखन लागल ओकरा कोनो आपत्ति नै छै तँ हम्मर हिम्मति बढ़ि गेल आ हम गाँतिक अढ़मे अपन हाथ ओकरा छातीपर फेरऽ लगलौं, तैयो ओ किछु नै बाजल आ पूर्ववत रहल तँ अप्पन हाथ ओकर ब्लाउजमे सन्हिया देलिऐ। समएक संगे हम्मर मोन आ हिम्मति बढ़ैत गेल मुदा अइसँ बेसी किछु सम्भव नै छल तेँ एतबे अति कऽ रहल छलौं तावत गाड़ी उगना हाल्टपर पहुँचि गेलै। एकटा प्रौढ़ जकाँ व्यक्ति तावत ओइ नवयौवनाक हाथ पकड़ि कऽ उठबऽ लगलखिन तँ ओ उठि गेल, तँ दोसर व्यक्ति जे शाइत कने हुनकर परिचित रहथिन, पुछलखिन- इहे बच्चा छिऐ लछुआक? ओ प्रौढ़ हँ मे मूड़ी डोला देलखिन आ गेट दिस नवयौवनाकेँ लऽ कऽ ससरऽ लगला भीड़मे। दोसर व्यक्ति रिक्त स्थानपर बैसैत हमरा चिन्हैत टोकलनि- की मास्टर साहेब? कतऽ सँ आबै छी? आब हमहुँ हुनका चिन्हलौं, ओ पण्डौलक रमेसर रहथि। उमेरक प्रभाव कने जल्दी हुनका लिबा देने रहनि। हम पुछलियनि- के रहै ओ बच्चा? आशय छल कहियो फेर मौका भेट सकए तँ! एखन हम पूर्ण आन्हर भेल छलौं। हमर पोस्टिंग लगेमे सलेमपुर स्कूलमे छल। ओ लक्ष्मणक बेटी छलै, अहींक नानी गामक पुरहितक पोती। ओकरा स्कूलक नवका मास्टर ओकरा संगे कोना ने कोना फुसला कऽ जबर्दस्ती केलकै। तहियासँ मथसुन्न आ बौक छै। किछु नै बुझै छै आ ने बाजै छै। अहाँ सभ सन लोक खानदानी आनक बेटी-पुतहु आ बच्चाकेँ अप्पन इज्जति बुझऽबला लोक आब थोड़े रहलै माटसाब...रमेसर बजैत रहल मुदा हम्मर दिमाग सुन्न भेल जा रहल छल...। एक्केटा शब्द अहाँ सभ आनक बेटी-पुतहुकेँ अप्पन इज्जति बुझै छिऐ...दिमागमे फेर-फेर घुमि रहल छल। अनमोल झा पाँचटा लघुकथा प्रश्न -सद्दाम हुसैनकेँ किअए मारि देलकै पापा। ओ तँ राष्ट्रपति छलै ने। लोक राष्ट्रपतियोकेँ मारि दै छै? -नै बेटा, लोक बाघकेँ मारि दै छै, गिद्दरकेँ नै। बाघसँ लोक डेराइये ने, तैँ। चेतना -गिरहत पाँच सए रुपैय्याक पाँच सए सूदि कोना भेलै। -रौ बहिं! जे तोरा बाप-पुरखाकऽ कहियो साहस नै भेलै पुछैक से तूँ पूछै छेँ? -ओ दिन बिसरि जइयौ गिरहत! छह मासमे एतेक सूदि नै होइत छै। अबै छै दलुआ हम्मर स्कूलसँ तँ करत हिसाब! पाप साधु बाबा लग लोकक भीड़ लागल छलै। सभ अपन नम्बरक हिसाबे जे जकरा बाद आएल ताहि क्रममे हुनका सामने जाइत छल। बाद बाकी लोक कातमे बैसल रहैत छल। जकरा जे दिक्कत, दुःख तकलीफ रहैत छलै से हुनका कहैत छलनि। ओ ककरो फूल, बिभूत, ककरो पढ़ल जल, ककरो यंत्र आदि दैत छलखिन। जकरा हबा-बसात वा तेहेन बात नै रहै छलै आ रोग रहैत छलै तकरा डॉक्टरसँ देखबैक सलाह दऽ बिदा करैत छलखिन। कोनो ठकै-फुसियबैबला बात नै। जकरा हाथ उठा जे दऽ देलखिन ओकर काज होइते टा छलै। खूब जस छलनि साधु बाबाक। जे कियो पूजा लेल फूल, मिठाइ वा सवा रुप्पैय्या, पाँच-दस देलकनि सेहो ठीक नै तँ नै देलकनि सेहो ठीक। कोनो जोर-जबरदस्ती नै छलै ओतए आ तैँ सभ तरहक लोक अपन काजसँ अबैत छल। ओहि दिन ओहि भीड़ लागल महिला वर्गमे सँ एकटा अपूर्व सुन्दरी महिला बाबाक आगाँमे आबि कल जोड़ि प्रणाम केलक आ कहलकनि- बाबा हमर धन्धा कम चलैए, से किछु कऽ दिअ। ओ वेश्या छलै। ओकरा फूल बिभूत दऽ बाबा कहलखिन- जो आब नीकसँ चलतौ। ओ चल गेल रहए हँसैत-हँसैत। ओकरा बादक जे लोक बाबा लग आएल से अपन बात कहैसँ पहिने बाबाकेँ पुछलक- बाबा। अहाँ ओकर पाप कार्यक लेल आशीर्वाद आ फूल-बिभूत देलिऐ। भगवती अहाँक तमसा नै जेती। बाबा कहने रहथिन- नै। कोनो पाप काज नै छलै ओ। ओकर व्यवसाये ओ छैक। ओहिसँ ओकर पेट चलैत छैक। तैँ ओ पाप नै भेलै। पाप ओ भेलै जे घा-संसारी भऽ अपन पति रहैत एहन काज करैत अछि...! माता न कुमाता भवति जखन ओ गाम गेल रहए तँ माए-बाबू नै टोकने रहथिन। ई लग जा कऽ गोर लगलकै। बाबू कहने रहथिन- नीके रहऽ। बस एतबे आर किछु नै। माए तँ पएरे छीपि लेलकै, तैयो ई आगाँ बढ़ि गोर लगलक। माए आशीर्वादक बदलामे मूह घुमा लेने रहै। दुइये दिन रहल ई गाममे। ऑफिसेक काजसँ कतौ पटना-दरभंगा आएल रहै तँ गाम चल आएल। परिवार बच्चा सभ बाहरे छलै। अपना दुःख भेल रहै। जे माय एक रत्ती इसकुलसँ ओकरा अबैमे देरी होइत छलै तँ अंगने-अंगने सभकेँ पूछि जाइ जे तोहर बौआ एलौ की नै। हमर बौआ एखन तक नै एलैहेँ बड़की दाइ आदि-आदि। हरदम मूहे देह निंहारैत रहै छलै, सट्ठका लगमे राखिक खुआबै छलै। नै खेने ओकरा भकौआ धराबै छलै। से माय आइ मूड़ी धुरा लेलकै। जरूर दुःख छैक मायकेँ अपन बेटासँ। निश्चय ओ एकर आशाक अनुरूप नै चललै। निश्चय जे माय-बाबू कहैत छैक से नै करैत छैक ओ। निश्चय ओ अपन बाल-बच्चा लऽ कऽ बाहरे रहैत अछि। सभटा सत्य आ सभटा ठीक। मुदा पुत्रो कुपुत्रो जायताम्, माता न कुमाता भवति...आब नै होइ छै की...!! आँखिक पानि डेरा पहुँचि चश्मा उतारैत देरी पाँच सालक हमर बुच्ची कहैत अछि, पापा अहाँ कनैत किए छी?, अहाँ आँखिमे नोर अछि।, ऑफिसमे मास्टर मारलकहेँ की?, आदि-आदि एके संगे कएकटा प्रश्न ओ कऽ देने रहए तखन। ओ बुझैत अछि जेना हम सभ इसकूल जाइत छी पढ़ए ओहिना पापा सेहो ऑफिस पढ़ए जाइत छथि। नै बेटा हम कनै कहाँ छी। ओ ओहिना नोरा गेल अछि आँखि। ओ कहैत अछि- नै पापा अहाँ झूठ बजै छी, निश्चय अहाँ टास्क नै बना कऽ लऽ गेल हेबै तैँ मारने हएत मैडम। हम तँ अपन टास्क बना लेलहुँ। अहूँ बना लिअ पपा ने। हम तखन सोचऽ लागल रही जे हमरा आँखिमे कनी नोरक रेख देखि एतेक चिन्तित भऽ गेल अछि बुच्ची। आ वएह हमरा सभ छी जे एतेकटा भइयो कऽ माय आ बाबूक झहरैत नोरक धार दिस नै जाइत अछि नजरि कहियो...!! मुन्नाजी चारिटा लघुकथा दरेग कारक पट्टा खुजिते चिल्काकेँ ओकर दादीमाँ आह्लादित होइत कोरामे लेलनि। अहा! देखियौ तँ कते फकसियारि काटि रहल अछि नेना। एगदमसँ लहालोट भऽ गेल अछि। “ऐँ यै कनियाँ, बौआकेँ दूध लगा लेबै से नै? ” -माँ, दुध कहाँ होइ छै, ओ तँ कहिया ने सुखा गेलै। -तँ डॉक्टरसँ नै पुछलिऐ दुध हेबाक उपाए? -ओ तँ बतौलक, मुदा...! जखन बजरुआ दुधसँ पलाइये जाएत तँ चिन्ता कोन? -ऐँ यै, कतेक निसोख छी अहाँ, कहू तँ अप्पन दुध कोना छोड़ा देलिऐ? -माँ, ई नै बुझथिन ने, दुध पियेलासँ फिगर खराब भऽ जाइत छै। -हँ यै, हम अंग्रेजिया शब्द तँ ठीके नै बुझबै। मुदा एतेक जरूर बुझबामे अबैए जे दुध नै सुखेलैए। ओ तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सभ ठाम भेटिये जाइ छै।...जँ सुखा गेलैए तँ माएक ममता। भूख सतबरतीक मोहर अपनापर लगेबाक लेल नै जानि कतेको साउस आ माएकेँ आरोपित कएलक। एतेक धरि जे कोनो कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरापर संदेह तँ भरि गौँआ करए मुदा ओकर छुटल मुँहक सोझाँ सभ अप्पन-अप्पन मुँह बन्न राखैमे बुधियारी बुझए। असलमे ओकर घरबलाक सेनाक नोकरीसँ छुट्टीक अभाव आ ओकर सुन्नरता गामे भरि नै, अनगौंओं छओँड़ा सबहक आकर्षणक केन्द्र बनि गेल छल। एक दिन गाम भरिक बुजुर्ग आ काबिल लोक सभ बैसारमे बजा ओकरा खुब ज्ञान देलक। ओ निश्चय कएलक जे हम अइ नरकसँ मुक्ति हेतु अइ गामकेँ छोड़ि देब। मुदा अपन कर्कश शब्दवाण छोड़ैत गौँआ सभकेँ सुनौलक- एँ, ऐ गामक कोन घरक बेटी, पुतौह हाट-बजार आकि मेला जा कऽ नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ आइ धरि अपन घरसँ दुरापर तक नै अबै छी। कहू तँ कियो पाहुन-परक वा भेंट केनिहार अबैए तँ कि ओकरा अपन घरसँ भगा दिऐ? -यै, ककरो घर अएबासँ नै रोकबै, मुदा ओकरा संग अपन रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकैत छी। मुखियैन दबले जीहे मुँह खोलने छलीह। फेर हँ, सबहक बेटी,पुतौह अपन साउस माएक संग कतौ जा घुमैए आ फेर घरमे इज्जतिक संग वास करैए। ककरो किछु नै भेलैए आइ धरि। -अहाँ तँ घरे भरिमे रहि पेट कऽ लेलौं। छीः छी, नै जानि जे कोन जाति धर्मक बीआ बागल हएत। अहाँक घरबला पछिला साल दियाबातीक छुट्टीमे आएल छल आ फेर अगिला मास दियेबातीमे आओत। की अहाँ ओकरा सोगाइतमे देबाक लेल रखने छी ई अनजनुआ चिल्का। -बुझा देथुन ने ईएह सभ। हम तँ तार पठा, फोन कऽ थाकि गेलौं जे नोकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जुआनी फेर घुमि कऽ किन्नौ नै एतै। हम पेट तँ मेटा लेब मुदा जखन देहक भूख लगतै तँ ओ फेर छोड़ि चल जेतै नोकरीपर। हमरा के सम्हारत? विजातीय पुरे पहाड़ीपर शुन्यता पसरि गेल छल। ऊपर मेघमे स्याहपन, हवाक साँए-साँए स्वर्त, जोड़ीकेँ आओर मजेदार समएक अनुभूति करा रहल छल। -यौ ठीके कहै छलिऐ, हम तँ एतेक दूर धरि कल्पनो नै करै छलौं जे पहाड़ आ जंगल जिनगीकेँ खुशनुमा बना सकैए। -आह! कतेक मजेदार क्षण। बिआह जिनगीकेँ नवदर्शन दैछ आ तकर पछातिक दिन-राति प्रकृतिक कोरामे जीवनक सम्पूर्णताक सुन्दर अनुभूति करा रहल अछि। -यै, अहाँकेँ ई बुझल अछि जे चोरा कऽ कएल प्रेम बिआह आनन्दक पछाति स्वर्गक रस्ता सेहो खोलि छोड़ैए। -हँ यौ, तँ किएक ने ऐ समाजक डांगसँ अपनाकेँ बचा, ऐ क्षणकेँ जीवनक अन्तिम क्षण बना ली। सोहाग तँ अचल रहत। राष्ट्रभक्ति सीमाक मानवीय कटु सम्बन्ध ओकरा आलोचनाक पात्र बना देने रहै। एकसर आ स्वतंत्र मुदा मस्त जीवन जीबामे प्रसन्न रहै छल। बिआहक पछाति एक बेर फेर ओ सामाजिक आलोचनाक शिकार भऽ गेल। किएक तँ ऐ नव दम्पतिक घर खुजैत सभ नै देखि पबै। आइ पतिक जेबाक छट्ठम मास बीति रहल छलै कि ओ सुन्दर पुत्रक जन्मसँ प्रसन्न भऽ पतिकेँ सूचनार्थ पत्र लिखैत मोनमे सोचि रहल छल- ऐ चिट्ठीकेँ डाकघर धरि पहुँचाओत के? किएक तँ ओकर एकाकी जीवन पति मात्रपर केन्द्रित हेबाक कारणे सभ ओकरा समाजक सुन्दर कार्टुन मात्र बुझै। “डाकिया...” शब्द सुनि ओ दुन्ना डेगे सोइरी घरसँ बहराएल। डाकियाक पत्र देबाक लेल बढ़ल हाथ ठमकिते ओ बिजलीक करेन्टक गतिये पत्र लऽ फाड़लक- “खेद अछि- अहाँक पतिक रणक्षेत्रमे शहीद भऽ गेलासँ हम सभ एकटा वीरपुत्र हेरा लेलौं अछि।” बाप रे! करुण चित्कार...!घरबैया, सर-समाजक सांत्वनाक बीच मीडियाकर्मीक प्रश्न...प्रतिक्रिया जनबाक लेल। पत्रकार सबहक प्रश्नक उतारा दैत- “नै, भारत माँ अपन रक्षार्थ एकटा आओर सैनिक ठाढ़ कऽ लेलक अछि।” जगदीश प्रसाद मण्डल- चारिटा लघुकथा, ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी, दुर्गानन्द मंडल- किसना मुट्ठी, कपिलेश्वर राउत- कलियुगक निर्णए, धीरेन्द्र कुमार- राम-कथाक समापन, राजदेव मंडल- दूटा लघुकथा, बेचन ठाकुर- दूटा लघुकथा, राम प्रवेश मंडल- बुरबक, भारत भुषण झा- प्रेम, मानेश्वर मनुज- पाँचटा लघुकथा, उमेश मंडलक दूटा लघुकथा, गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी, डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ, प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.,कुमार मनोज कश्यप- पाँचटा लघुकथा, विनीत उत्पल श्री गुरूवै नम:, डॉ . धनाकर ठाकुर-हमरा एकर एक बायोडाटा चाही, आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा, सतीश चन्द्र झा-नोकरी, किशन कारीग़र- मूरही-कचरी, गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा जगदीश प्रसाद मण्डल चारिटा लघुकथा १) थल-कमल जहिना अगुरबार दरमाहा उठा परदेशी घरक काज सम्हारैक लेल पत्नीकेँ पठबैत आ ओहि रूपैयासँ, टावरक किरदानीसँ अकछि तेसर मोबाइल कीनए जाइत तहिना झंझारपुरक हाटक चाउर-दालिक बजारमे ठकाइ देहरादून चाउरक दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ आँखि गरौने। थालमे जनमल कमलक भौंरा सदृश्य ठकाइक मनमे उठलै- ऽसात दिनसँ दुनू संझी नवका गहूमक रोटी खाइत एलौं, भूसीपर पाइ उठा चाउर कीनए एलौं, जे सस्त हएत सहए ने कीनब।ऽ मुदा लगले थल-कमलक बिढ़नी जकाँ मन घुनघुनाएल- ऽचाउर तँ चाउरे छी, तहन नीक किअए ने कीनब।ऽ ओझराएल मने ठकाइ सइओ रूपैआमे किलो भरि चाउर कीनि, गमछाक खूँटमे बान्हि, तमाकू चुनबैत घरमुँहा भेल। बीघा भरि बटाइ खेतक उपजासँ छह मासक बुतात निकलि जाएत। बैशाखक पूर्णिमाक दिन। गहूमक लरती-तरती आबि गेल आ धान-चाउरक चलि गेलै। बाड़ीक तरकारी निङहटि गेल छलैक, लऽ दऽ कऽ पटुआक साग टा छलैक। सेहो रोटी दुआरे छोड़िये देने। पटुआ सागसँ नीक नोन-मेरिचाइ। हाट जाइये काल परसुका ढोलहो ठकाइकेँ मन पड़ल। मन पड़िते मुँहसँ हँसी निकलल। मुदा हँसी रूकल नहि मोकरक पानि जकाँ बहिते रहि गेल। बाटो चलै आ असकरे हँसबो करै। तहि बीच एकटा अधवयसू स्त्रीगण माथपर छाउरक पथिया नेने देखलनि तँ मने-मन घुनघुनेलीह- “पुरूख छी की पुरूखक नांगड़ि। केदैन हँसला कीदैन देखि।” मुदा किछु बजलीह नहि। ठकाइक खुशीक कारण छलैक जे ढोलहो दऽ सोरहा केलक जे ईंटा-सिमटीक घर, पानि पीबैले कल, खाइक उपाए एक सए पच्चीस रूपैयाक प्रतिदिन काज, रोग-व्याधिक लेल खरतुआ दवाइ सभकेँ भेटत। जखन सब चीजक उपाए भइये गेल तखन किअए लोक अनेरे मनकेँ भरयौने रहत। तेँ मन खुशी। दरदे ने ककरो माथ टनकै छै जौं दर्द रहबे ने करतै तँ माथ किअए टनकतै। गामक सीमान टपिते ठकाइक मनमे उठल। देवियो-देवता हारि मानतीह। बड़ दइ छेलखिन ते एक दिआरी साँझमे समांग, विद्या, धन दइ छेलखिन। ईंटा-सिमटीक घर, पानि पीबैक कल आकि सवा सौक बोइन तँ नहि दइ छेलखिन। किलो भरि चाउरक मोटरी देखि आंगन बाहरैत बिलटी बाढ़ब छोड़ि, हाथमे बाढ़नि नेनहि तरंगि कऽ पतिकेँ पुछल- “हाटमे चाउर नइ छलै जे छुछे हाथे घुमि गेलहुँ?” मुस्की दैत ठकाइ बाजल- “आँखिमे रतौनी भेलि अछि जे चाउरक माटरी नइ देखै छीऐ।” आँत मसोसि बिलटी मने-मन सोचए लागलि जे जेहने पटुआ साग गलनमा होइए तेहने अरबा चाउर। तहूमे मोटका चाउर पाँच दिन चलबो करैत, ई तँ एक्को दिन नइ चलत। २) घरडीह आध पहर रातियेसँ, जहिना हथिया आ आन नक्षत्रक सतैहिया लधल रहैत तहिना मास दिनसँ सासु-पुतोहूक बीच झगड़ा लधल आबि रहल अछि। ने बाप उधो किछु बजैत आ ने बेटा फोकचा। फाँक चगह पाबि दुनू -सासु आ पुतोहू- भरि मन उखला-उखली करैत। डेढ़ियापर बैसल उधो सोचैत जे जहिना पत्नी तहिना पुतोहू। धधकल आगिमे आड़ि कना देव तेँ चुप। तहिना फोकचोक मनमे उठैत तेँ ओहो चुपचाप ओसारपर बैसल तमाकु चुना मुँहमे देने रहए। दस सालसँ दुनूक -सासु-पुतोहूक- मधुर संबंध रहने कहियो हर-हर-खटखट परिवारमे नहि भेल। अनायास हवा बदलि गेल। पाँच गोटेक परिवारमे- बाप-माए, बेटा-पुतोहू आ एकटा पोता। संबंध िबगड़ैक कारण भेलैक इन्दिरा आवास। जेहने टाँस बोली नवानीवाली सासुक तेहने रहुआवाली पुतोहूक। सौंसे गामक लोक सुनैत। अपना घरक मुँहथरिपर ठाढ़ भेल मेहथवाली कबिलपुरवालीकेँ कहलकनि- “पेट बोनिया लोककेँ सदिकाल किछु ने किछु खगले रहै छै। तेँ....।” मुँह बिजकबैत कबीलपुरवाली बजलीह- “गामक लेखे ओझा बताह आ ओझा लेखे गाम।” कलपर नवानीवाली रहुआवालीकेँ देखि चिकारी देलखिन- “भगवान पुतोहूओ देलखिन ते दीदीकेँ।” आँखि उनटबैत रहुआवाली- “अहिना निमूधनकेँ लोक दुसै छै क्यो अपन घेघ देखाए तब ने।” डेढ़ियापर बैसल उधोक हृदय कुही होइत। कखनो मुँहसँ हँसी निकलैत तँ लगलै बिधुआ जाइत। मनमे उठलै- घरारीक कागज-पत्तर तँ अछिये नहि आ ईंटा-सिमटीक घरले झगड़ा। ३) खाता-खेसरा ओना इन्दिरा आवासक अंतर्गत दू-चारि घर कतेक सालसँ बनैत अबै छै। मुदा एहिसाल हवा उड़िआएल जे सभकेँ बनतै। चरि-चरि रूपैये फार्मक बक्री ततै भेल जे प्रेसबला सभ तेहरा-तेहरा छपलक। गामसेवककेँ सभ फार्म भरा-भरा ब्लौक पहुँच गेल। हाथमे अपन-अपन फार्म नेने अगनैत परतीमे पतिआनी लगा ठाढ़ भऽ गेल। नम्बर अबिते घुसका फार्म बढ़ौलक। फार्म देखि बीडीयो बाजल- “खाता-खेसरा?” चुपचाप घुसका आगूमे ठाढ़। बगलमे फार्म रखि बीडीयो फेर बाजल- “पतिआनीसँ कात जाउ?” घुसका- “सबहक फारमपर लिखि देलिऐ आ हमर रखि देलिऐ?” बीडीओ- “बिना खेसरा नम्बर चढ़ौने पास नहि हएत।” घुसका- “पहिने खेसरेक ओरियान किएक ने केलिऐ?” ४) सबूत तीन दिनसँ गामक रोहनिये बदलि गेल। जहिना रोहनिमे आमक चिष्टा-चार, रंग-रूप, बसंत पाबि मनुष्यक तहिना दस पहिया ट्रकपर तीनि-तीनि आदमीक बोझ, ट्रेक्टरपर झुलैत कुर्सीक बावू कैल, चरक, सिलेव, गोल, गहुमन, चितकाबरसँ भरि गेल। गौआँ चौक छोड़ि गाम पकड़ि लेलक आ आनगौआँ आबि चौक पकड़ि लेलक। मुदा जे हउ, चाहक दोकानक ब्रेंच कखनो खाली नहि रहल। साढ़े छह बजैत-बजैत सभ हाटक दोकान जकाँ ठौर पकड़ि लेलक। कियो नव परिधानमे सजि तँ कियो सर्फमे साफ कएल वस्त्रसँ सजि भोंटक बुथपर नम्बरमे ठाढ़ भऽ गेल। भुटकुमरा सेहो पतिआनीमे ठाढ़ भेल। जेना-जेना आगूक इंजिन खिचै तेना-तेना अपन अधिकार देखि भुटकुमराक पेटमे गुदगुदी लगैत। जहिसँ मन तर-ऊपर करैत। ससरैत-ससरैत अगिला मुहरापर पहुँच पुरजी बढ़ौलक। पुरजी लैत प्रजाइडिंग अफसर बाजल- “फोटो पहचान पत्र?” किछु नहि बाजि भुटकुमरा खुशीसँ मुँह नहि खोलि वेबसीक दाँत िचआरि देलक। जेना फोटो खिचबै लए सावधान भऽ गेल हुअए। दोहरबैत प्रजाइडिंग अफसर बाजल- “ड्राइभरी लाइसैंस?” “सरकार हम हरबाह छी।” बकझक करैत देखि गेटक चितकबरा सिपाही आबि भुटकुमराक गट्टा पकड़ि घीचने-घीचने सीमासँ बाहर कऽ देलक। भुटकुमरा बुदबुदाएल- “कोन लपौरीमे पड़ि गेलौं।” ज्योति सुनीत चौधरी नबका पीढ़ी फेर पहिने जकां लीफ्टक केबाड़ खुजल की नहि दफ्तर आ विद्यालय जाय बला लोक सबहक भीड़ नीचा जाय लेल लीफ्ट दिस लुधैक गेल ।बच्चा तँ बच्चा़ वयस्कोमे सँ ककरो लग समय नहि रहै। ई दुनु वृद्ध पति-पत्नी सँ नमस्कार पाती करय लेल ।रहै तँ ई रोजक बात मुदा आइ बुढ़ी कनी बेसिये खिसियैल रहथि “ई अछि आजुक पीढ़ी़ कोनो संस्कार नहि ।” भोरे भोर भ्रमण पर निकलनाइ हिनकर सबहक बिगड़ल स्वास्थ्यक प्रति सचेत रहक प्रयास छलनि जे क़ि डॉक्टर बेटाक परामर्श छलनि। बड प्रयत्नसँ बेटाकेँ पढा़ लिखा चिकित्सक बनेलनि। भेलनि बेटा कोनो बड़का कम्पनीमे सिफ्ट ड्यूटी करत आ खूब कमाओत । मुदा बेटाकेँ आर पढ़ाइक भूत कहिया लगलै से बुझबे नहि केलखिन । विवाह भेलै़ बच्चो भेलै़ मुदा ओ हमेशा व्यस्ते रहल। पिछला तीन सालसँ माय बापक इच्छा रहनि जे ओ दुर्गा पूजामे किछु दिन अवकास लऽ कऽ हिनका सब संगे रहै किन्त़ु संयोग नहि मिलै छल। सभ बेर अन्तमे आबि कऽ कोनो जरूरी काजक बहन्नासँ कार्यक्रम रद्द भऽ जाइत छल। अहि बातपर ओ दुनु बुढ़ा-बुढ़ी वाद विवाद करैत छलथि जे ओ अहि बेर आएत की नहि । घूरिकऽ घर एलापर बुढ़ीक सीनामे दर्द उठलनि। प्रेसरक मरीज छली, तैं पतिदेव तुरन्त डॉक्टरकेँ फोन केलखिन। डॉक्टर सब जाँच केलकनि आ कहलकनि जे चिन्तासँ दूर रहू आ सब दवाइ समयपर खाऊ। हुनका सबकेँ तँ बहन्ना चाही छल बहस करै लेल। फेर दुनु गोटे एक दोसरपर आरोप-प्रत्यारोप करए लगलथि। विराम तखने लागल जखन फोनक घंटी बाजल। बेटाक फोन छलनि। मायक स्वास्थ्य बिगड़ल सुनि बेसी बात करए लागल। नहि तँ आन दिन कहाँ अतेक समए रहैत छल। प्रश्न ततेक जे बुझनाइ मुश्किल जे बेटाक फोन छल आ कि चिकित्सकक। बाप सभटा कहलखिन तँ इहो शुद्ध चिकित्सकक भाषामे समएपर दवाइ खाए कऽ उपदेश पियौलकनि। बुढ़ाकेँ एहि बातचीतमे ज्ञात भेलनि जे बेटा कोनो तेहेन शोध कार्यमे लागल अछि जे आब पूरा होइपर अछि आ अकर सफलतासँ सम्पूर्ण मानव समुदायकेँ बड़का कल्याण हेतैक। ओना अतेक डर तँ बुढ़ाकेँ जॉबक पहिल इंटरव्यूमे सेहो नहि भेल रहनि, जतेक पत्नीक तबियत गड़बड़ेलापर बेटासँ बात करैमे होइत छनि। खएर समय बीतल आ बुढ़ी फेर पहिने जकाँ बाजऽ लगली। घुमनाइक दिनचर्या फेर प्रारम्भ भेल। फेर बीस मिनट सड़कक काते-कात पार्क तक आ पार्कसँ फेर घर वापिस। बुढ़ी जखन बेमार होइत छली तँ बेटाक भावनात्मक सत्कार बड नीक लागैत छलनि। तखने तँ लागैत छलनि, बेटा अखनो हुनका सभकेँ नहि बिसरने छनि। तकर बाद जैने ई सभ ठीक की ओ फेर बिगड़ल। यैह सब सोचि दुनु खुश छलथि। लीफ्टमे चढ़लथि घर पहुँचय लेल। लीफ्ट रूकल की दुनु कात भऽ गेलैथ। मुदा ई की - ओ सब पुछैत छलनि जे अतेक दिन कतय छलथि- घूमए किए ने गेलथि आदि आदि। ओकर सबहक भागैत स्थितिक अनुसारे दुनु शीघ्रतासँ संक्षिप्त जवाब देलखिन। आइ बुझेलनि दुनुकेँ जे नवपीढ़ीकेँ प्रतिस्पर्द्धासँ भरल युगमे जीबै लेल अतेक भागादौड़ी करए पड़ि रहल छै जाहि कारणे औपचारिकताक समय नहि छै मुदा सभमे भावुकता अखनो जीवित छै। घूमिकऽ लौटलाक बाद बुढ़ी दुनु गोटे लेल कॉफी बनाबैत छली आकि फोन बाजल। बुढ़ा फोन उठेला आ कनिये देरक बाद फोन राखि देलथि। हुनकर मुँहक उदासी कनियो नाटकीय नहि बुझाइत छल। कप पकराबैत बुढ़ी बजली़ “की फेर कुनो काज लागि गेलै।” बुढ़ा हॅंसैत बजला़ “ओ तँ नहि आबि रहल अछि मुदा हमरा सभ लेल टिकट पठा रहल अछि । अहिबेर हम सभ पूजामे संगे रहब ।हम सभ बेटाक घर जाएब आ बेटा पुतहु सहित पोती संगे पाबनि मनाएब।” फेर की छल आब कॉफीक एक एक चुस्की आगाँक कार्यक्रम बनाबैमे बीतल। दुर्गानन्द मंडल लघुकथा- किसना मुट्ठी मरनी भिनसुरके पहर बेलाराही चौरीसँ एक गैलन काकोड़ बीछि अनने रहए। मेला-ठेलाक समए रहै तैं, काेठीसँ दू मुजेला काटू निकालि अंगनामे सुखैले देलकै। ओकर वाद नहा-सोनाह आ खाए कऽ सुतैले खेन्हरा लऽ डेढ़ियापर चल गेल। पुरबा हलफी दैत छले, निन्न टुटलै। आँखि मिड़ते उठल आ हाँइ-हाँइ कऽ काँटू डेंगाबऽ लागल। डेंगा-ठठा लेलाक बाद सुपसँ फटकि माएक तहवनमे बान्हि माएसँ नुका कऽ धऽ अाएल कोठिक दोगमे। झल अन्हार भेलै तँ भगबत्ता दोकानसँ बेच अनलक। तीन सेर भेलै। आठ अने दरसँ डेढ़ गो टाका भेलै। ओ भगवतेसँ कहि सुनि कऽ चारि गो चौवन्नी आ दू गो अठन्नी भजोखा लऽ चुपे-चाप आंगन चल गेली। विहान भेने मेला छलै ‘किसना मुट्ठी’। मरनी तरे-तर हिसाव लगोने जे चारि-चारि आना पाइ दुनू छोटकी बहीन अभेलिया आ सुगियाकेँ देवे। चारि आनामे बौआले एकटा कठपुतरी किन लेब आ एकटा फूका। चारि आनाक कचौरी आ चप कीनि लेब। ओकर तँ मने छलै चप-चप। आठ आनामे एकटा अलता आ फीता लऽ लेब। घुरती काल आठ आनाक जिलेवी कीनि लेब। भोरे विहान फेर ओ अपन गैलेन लऽ चलि गेल चौरि आ विछि लेलक एक गैलेन काँकोड़। आंगन आबि बकरी घरमे गैलेन राखि ओ नहाइ-सोनाइले चलि गेल आ नाहा-सोना, खा-पी कऽ सुति रहल। एम्हर नेहेवा काल ओकरा माएकेँ तहबन नहि भेटलै तँ औना कऽ एम्हर-ओम्हर तकलक तँ देखलक, ओ तँ कोठी दोगमे फेकल अछि- आ मड़ुआक किछु दाना लागल छलै। कोठी मुन्ना से फूटल। से देखि ओकरा आगि लेस देलकै। ओकरा हरलै ने फुरलै सुतलैमे मरनीकेँ गट्टा पकड़ि लात्ते-मुक्के धुनि देलकै। गाड़ि पढ़ि-पढ़ि पूछए लगलै- “बाज सौतीन बाज की केलही पाइ मरूआ बेच कऽ?” अबोध बच्चा कनैत बाजल- “माए गै माए मेला देखैले जेबै बलवा परतीपर मेला।” माए तामसे अघोड़ रहबे करै फेर बाजलि- “बाज सौतीन बाज कथीक मेला।” माए, गै माए, मेला देखैले जेबइ मेला- किसना मुट्ठीक मेला। कपिलेश्वर राउत लघुकथा- कलियुगक निर्णए सतयुग-त्रेता बीत गेल छल। द्वापरक समए पुरा भऽ गेल छलैक। कयुगक प्रवेश हुअए बला छलैक। कलियुग अपन राज-पाट चलैबा लेल सोचि रहल छल। बिचेमे तीनू युगक देवता सभ कलयुग लग आबि हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेला आ कलियुगो हाथ जोड़ि ठाढ़ भेल। जखन विचार-विमर्श शुरू भेलै तँ तीनु युगक देवता सभ कहलखिन- “हम सभ तँ कहुना तीन युगक राज-पाट चलेलौं आब अहाँक पारी अछि तेँ चिन्तामे छी जे अहाँ कोना कऽ राज-पाट चलाएव। किएक तँ हमसभ देवासुर संग्राम, वृतासुर संग्राम कोन-कोन ने केलौं। स्वर्ग-नरकक फेरा सभ केलौं। मुदा लोक सभ आर उडण्ड होइते गेल। अहि लेल अहाँ लग एलौं। अपने कोना चलाएव।” कलियुग बजलाह- “हे देवगण, हम अहाँ सभ जकाँ फाइल नहि राखब मुन्सी पेसकार नहि राखब हम फैसला तुरंते हेतै। जे जेहन काज करता तकर भोग हुनका तुरंते भेटतै। अगुआएल-पछुअाएल जनमक फेरा नहि राखब। स्वर्ग-नरकक फेरा नहि रहए देबै।” तीनू युगक देवता कलियुगक विचार सुनि गुम्म भऽ गेला। फेर कलियुग बजलाह- “हम कृष्णक किछु अंश लए कऽ चलब आ लोक सभकेँ कहबै जे ‘कर्म किए का फल की इच्छा मत करना इंसान, जेसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान।” ई सुनि तीनू युगक देवता अपन-अपन लोक विदा भऽ गेलाह। धीरेन्द्र कुमार लघुकथा- राम-कथाक समापन पूर्णिया जिलाक एकटा गाम-कन्हरिया। गाममे वकील, शिक्षकप्रोजेक्ट प्रोफेसर आ प्रबुद्ध किसान। गामक पूवारि दिस बान्ह आ बान्हक किनछरिमे महानंदा नदी। कोठा-सोफा नीक-निकुत घर। बड़का-बड़का बखारी आ दुआरिपर गाए-माल-जाल। गाममे मोटर-साइकिल, ट्रेकटर। जिलाक प्रसिद्ध गाम। गाममे आयोजन भेल- राम-कथाक। भखरी, कन्हरिया अबथि आ कथासँ लाभ उठा विदा होएत। औरतक संख्या बेसी। गामक कटुम-पाहुनक पदार्पणसँ गाममे उत्सवी माहौल भऽ गेल। हमरो नौत छल। हमहुँ कथासँ लाभ उठा रहल छी। प्रवचन कर्त्ता गेरूआ वस्त्र धारण केने, कन्हापर गेरूआ गमछा, वसणीमे मधुरता आ राम-कथाक वाचन। हमरो नीक लागए। नीक-निकुत दुनू साँझ भोजन आ कथाक लाभ। सात दिनक आयोजन समिति। सभ दिन गुलाब बागसँ फल-फलहरी आवए प्रवचन कर्त्ता महाराज सदासुख रामलाल जीकेँ भोजन होइक। भोरखन युवकमे होर आबि गेल- अाइ महाराजकेँ सेवाकेँ करत। धूमनक आहूतिसँ गाम मह-मह करए। वूझि पड़ए जे इलाकामे रामराज स्थापित भऽ गेल। गाम बाजए- “सतयुग आबि गेल।” हमर मोन साँझक पहरि अकछा गेल। चोरा कऽ गामक दोकानपर एकटा सिगरेट-सलाइ लेलहुँ आ बाध दिस विदा भेलहुँ। खेतक बीचसँ बैलगाड़ीक लीक। चारूकात धान आ ऊँचगर खेतमे भाटा। समए अन्हरा रहल अछि। सूर्य अस्ताचल िदस नुका गेल छथि। चिड़ै-चुनमुन्नी अपन-अपन खोंता दिस विदा भऽ गेल अछि। काल्हि सातम दिन अछि- अहिना शांति पसरि जाएत अौर लाैस्पीकर अवाज सेहो बन्न भऽ जाएत। जेवीसँ सिगरेट-सलाइ बहार कऽ सिगरेट सुनगबैत नदी दिस विदा होइत छी। कने-कालक पछाति सुनै छी- ‘हक्का-बक्का, हक्का बक्का बगिया खा हौ कक्का आउरो खेतोमे आऊर-बाऊर, आऊर-बाऊर हमरा खेतमे छुछै चाउर-छुछै चाउर हक्का-बक्का, हक्का-बक्का बगिया खा हौ कक्का’ खेत दिस देखैत छी- थारीमे बगिया आ अगरवत्ती नेने क्यो कक्काकेँ पूजि रहल अछि। हमर सिगरेट समाप्त भऽ रहल अछि आ हमरा बुझना जाइत अछि जे राम-कथाक समापन भऽ गेल अछि। राजदेव मंडल दूटा लघुकथा- 1) बढ़िया गप्प गोपी मड़र सभ बापूत दुआिरपर बैसल अछि। दिन ठेका गेल छै। चारि दिनक बाद बेटाक बियाह हेतै। नवका समधी दहेजक टका देवाक लेल आएल छै। गोपी मड़रक लबरा-भाए फोंकी लाल बाजल- “समधी जी, लेन-देनक गप्प पहिले फरिछाएल रहै छै से नीक। बियाहक कालमे जे दहेजक गप्प उखड़ै छै, से तँ बुझू जे थुकम फझैति। एहिठाम सभ समांग अपने छी। निकालल जाए टाका।” “हँ, हँ ओहिक सम्बन्धमे तँ कहबाक लेल आएल छी। कोनो तरहेँ कुहरैत।” फोकीलाल बाजल- “कतेक तँ बेटी बियाहमे मरि जाइत अछि। अहाँ तँ कुहरैत छी। बढ़िया गप्प। निकालल जाए।” समधी कहल- “बढ़िया गप्प ई जे काल्हि हमरा बेटीकेँ नौकरीक लेटर भेटि गेल।” “अहाँक बेटीकेँ नहि, हमरा पुतौहकेँ। हमरासँ सम्बन्ध भेलापर देखियो फैदा। बढ़िया गप्प।” “बढ़िया गप्प ई जे आब अहाँसँ बेसी सम्पतिबला आ नीक वर बिनु दहेजक बियाह करबाक लेल तैयार अछि।” “आ पहिले कियो नहि पुछैत छल।” “अहुँ ते नहिए पुछै छलहुँ। दहेजक लोभमे तैयार भेलहुँ। आब तँ हमरा बेटीक कमाइपर अहाँक बेटा पलत।” “अपन-अपन भाग्य। बढ़िया गप्प।” समधी बाजल- “आब जँ ई सम्बन्ध करबाक अछि तँ जतेक हमरा कहने रही ओतेक दहेज अहाँकेँ लगत काल्हि टका लऽ कऽ हमरा दुआरिपर आऊ।” “ई कोन गप्प।” विदा होइत समधी बाजल- “टका लऽ कऽ आबि तँ बढ़िया गप्प। नहि लऽ कऽ आबि तइयो बढ़िया गप्प।” 2) ठोकर चमकैत शहरकेँ भीड़ भरल सड़क। सहरैत गाड़ी-घोड़ा, लोक-बेद। आठ बजि गेल छलै। घर पहुँचबामे राति बेसी ने भऽ जाए तहि दुआरे सायकिलकेँ उड़ौने जा रहल अछि- घोरनमाँ। आकि एकटा मोटर सायकिल धड़ाक दऽ ठोकर मारलक। थकुचाएल सायकिल तँ सड़केपर रहि गेल किन्तु घोरनमाँ उछलि कऽ फुटपाथपर धड़ाम दऽ गिरल। बाप-माए करैत कुहरि रहल अछि। कलेजाक चोट प्राण घिचने जा रहल छै। परन्तु ओहिठाम के केकरा देखनिहार। ओहि बाटे जाइत एकटा पॉकिटमारकेँ दया लागि गेलै। ओ लग जा कऽ कुहरैत घोरनमॉंकेँ लहु पोछए लगल। फेर अपन काजक मोन पड़ल तँ घोरनमॉंक सभ जेबीक तलाशी लेलक। किन्तु किछु नहि भेटलै। फनकैत पॉकिटमार उठल आ बाजल- “रे बेकुफ, मारितोकाल दस टका जेबीमे रखितेँ से नहि। भिखमंगा कहीं के सगुण खराब कऽ देलक।” कुहरैत घोरनमॉं बाजल- “रे मुरख दस टका जँ जेबीमे रहितै तँ हमहुँ ने दोसराकेँ ठोकर मारितौं।” “इह, भेष देखहक आ उपदेश सुनहक।”- घुनघुनाइत पॉकिटमार बिदा भऽ गेल। बेचन ठाकुर दूटा लघुकथा आत्महत्या एहि संसारमे इर्ष्या-द्वेषक भावना अति व्याप्त। सद्भावनाक डिवियामे तेल सधल जकाँ अछि। लोक अपन दुखसँ ओतेक दुखी नहि अछि जतेक अनकर सुखसँ। कर्तव्य अपन गाम छोड़ि आनठाम बौआए रहल अछि। बेचाराकेँ कतौ जगह नै भेटै छै। बारह बर्खक बेटी पूनम आर नअ बर्खक बेटा सुमन बड्ड नीक ढंगसँ भाए-बहिनक भूमिका अदाए कए रहल अछि। पूनमक बाप मंगल अपन ताड़ीक धंधामे व्यस्त अछि। भिनसरसँ साँझ धरि तार वा खजूरसँ ताड़ी उतारैमे लागल रहैत अछि। कहियो-कहियो खैनाइयो पर आफत। विसराम तँ दिन भरि दिल्ली दूर। मुदा पूनमक माए हीरा ताड़ी बेचि फुटानीमे ओतैक मस्त अछि जे सामाजमे केकरो सोहाए नहि रहलि अछि। कारण ओ अपन पति आ संतानक पियारकेँ बिसरि अपन पसीनक सुखक लेल टिंकुक संग रहि रहलि अछि। मुदा पापक घैला एक ने एक दिन अवश्य फुटै छै। एक दिन दिनहिमे मंगल हीराकेँ टिंकुक संग रंगल हाथ पकड़ि लेलनि। बेचारे सोचलनि- “हम एहि दुनियामे बेकार लए छी। जखन हमरा कोनो मोजरे ने दैए।” क्रोधित भऽ ओ बाजि उठला- “सभसे बड़ो समाज। समाज हमरा जे जेना फैसला देथि।” साँझहि पंचैती भेल। पंचक फैसला भेल- “टिंकुकेँ एक हजार एक टाका जुर्माना लगतै आ आइदा ओ एहेन गलती नइ करतै, जँ केलकै तँ भरल सभामे ओकरा दू खण्ड काटि, गाड़ि देल जेतै।” फेर पंच हीराकेँ बजा सेहो पुछलनि- “अहाँ हीरा, एना किएक केलिऐ, इज्जत प्रतिष्ठा कोठिक कन्हापर राखि देलिऐ कि?” हीरा बाजलि- “इज्जत-प्रतिष्ठा हम की कोठी कन्हापर राखब, हमर बापे राखि देलनि। हम मुरूख आ कुरूप छी तेँ कि हमरा तँ स्मार्ट घरबला चाही ने।” पंचक मुड़ी निच्चॉं खसि पड़ल। फेर सामाजिक बंधनक खियालसँ ओ सभ चुप नहि रहि सकल- “अहाँक बाप गलती केलनि तेकर फल मांगलाकेँ हेते, हमर समाज िधनाए, अहाँ आइसँ चेत जाउ। नहि तँ समाजसँ पैध क्यो नहि अछि।” कहबी छै- “चालि, प्रकृति, बेमाए तीनू मुइनेहि जाए।” हीरा पिंकु अपन कुकर्म नहि छोड़लक। अपितु सहचेती बर्तलक मुदा छुपल कहाँ रहल। दुनू बेटा-बेटी पकड़िये लेलक। हल्ला केलक तँ दुनू दुनूसँ मारिओ खेलक। मुदा समाज एहिबेर मामलाकेँ गमभिर्ता पूर्वक लेबाक निर्णए केलक। टिंकु कहुनाकेँ गाम छोड़ि पड़ा गेल। पंच सोचलनि- “सजाएक भागी दुनू अछि। मुदा टिंकु पराएल अछि। तेँ अइ जनानीकेँ तारन देल जाए।” बिचार कल्हि साँझक भेलै तै बीच दिनेमे ओ फसरी लगा आत्महत्या कऽ लेलक। पुलिश खबड़ि पाबि घटना स्थलपर पहुँचल। बेचारीकेँ पोस्टमार्टम भऽ धौजन-धौजन भए गेल मामला भरिआ गेलै। निर्दोष परोसी विजय ओहि समए बाबा धाममे रहितहुँ केसमे चिक्कनसँ लटपटा गेल और पति मंगलकेँ तीस सालक जहलक सजाए भेटल। दुनू भाए-बहिन टौआ-बौआ रहल अछि। आगू नाथ ने पाछु पगहा छै ओकरा सभकेँ। 2) फुसिक फल संत कविर दासक पाँति आछि- “साँच बरावर तप नही, झुट बरावर पाप जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।” तातपर्य अछि- “सत्यमेव जयते।” एक गोट फुसिकेँ बचाबए हेतू सहस्त्र फुसि बाजए पड़ैत अछि। मुदा ओ स्थायी रूपसँ नहि पचि सकैत अछि कने देरे सही, फुसि फुसिए प्रमाणित होइत अछि। गीतामे कृष्ण कहने छथिन- “जेसा कर्म करैगा वैसा फल देगा भगवान।” मोहनक छोट भाए सोहन मैट्रीकक बोड परीक्षा दऽ कऽ मधुबनीसँ घर आबि रहल छलै। दुनू भाँइ संगे छल। रस्तामे बिना टिकट रेलगाड़ीसँ किछु दूरी तँइ केलक मुदा किछु दूरी तँइ करए हेतु ट्रेकर-मैक्सी पकड़वाक खगता भेलै आ दुनू भाँइ मैक्सीपर चढ़ि गेलै। सोहनक अभिभावक मोहन लग भाड़ाक पाइ नै छलै। ओ सोचलक- “जँ हम साँच बाजि दै छी तँ कन्टेक्टर मैक्सीसँ उताड़ि देत। हम घर कोना जा सकव। जँ झुट जोरसँ बाजि दैत छी तँ ओकरा हमरा लऽ जेनाइ मजबुरी भऽ जेतै।” कन्डक्टर भाड़ा ओसलैत-ओसलैत मोहन लग आबि कहलनि- “श्री मान् कतऽ जाएव।” मोहन जबाव देलक- “झंझारपुर।” कन्डक्टर- “भाड़ा दिऔ।” झट मोहन बाजि उठल- “भाड़ा देलौं से?” कन्डक्टर- “अहाँ भाड़ा नै देलिऐ, मन पारू।” मोहन- “मने-मन अछि। मन िक पारू। भाड़ा हम अहाँकेँ दऽ देलौं।” कन्डक्टर सोचलनि भऽ सकै छै, एकरा लग पाइयक मजबुरी होय। मुदा एकरा फुसि नै बजबाक चाही। बजलाह- “जौ अहाँ लग भाड़ा नै अछि तँ बाजू हम ओहिना लऽ जाएव। मुदा बेकूफ नै बनाऊ।” मोहन- “एहिमे बेकूफक कोन गप्प? हम अहाँकेँ भाड़ा देलौं, अहाँ मन पारू।” कन्डक्टर खिसिआ कऽ पुछि बैठलाह- “बाजू बेटा मरि जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।” मोहन- “बेटा मरि जाए, हम भाड़ा दऽ देलौं।” कन्डक्टर कहलनि- “बेस चलु, आब भाड़ा नहि मांगब।” सोहन अपन भैयाक फुसि गप्पपर बड्ड आश्चर्यमे पड़ल छल। मुदा बाजत तँ बाजत कि। गाम आबि मोहन किछुए दिनक बाद बोकारो गेलाह। कनियाक बड्ड जिद्द केलाक वाद हुनको संग लए गेलाह। संगमे दुगो बेटो छलनि। परिवारक संग पहिले खेपि बाहर गेल छलाह। ओना ओ बोकारो पॉंच साल पूर्वहिसँ रहैत छलाह। तीन महिनाक अंदर मोहनक छोटका बेटा रमन बेमार पड़ल। बोकारोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ चंगा नहि भेल। फेर ओ सपरिवार गाम आबि गेलाह। गामोमे बड्ड इलाज भेल मुदा ओ बचि नहि सकल, मृत्युक प्राप्त भेल। परिस्थिति वस सोहनकेँ ओकरा आगि दिअए पड़लै। आओर मोहनकेँ ओकर उचित कर्मो करए पड़लैक। एगो कहबी छै- “गज भरि नै हारी, थान भरि फारी।” राम प्रवेश मंडल लघुकथा बुरबक रेलगाड़ीसँ दिल्लीक यात्रा करैत रही। संध्याक सात बजैत छल। स्टेशनपर गाड़ी ठाढ़ भेल। एकटा युवक आबि हमरा सबहक बीच बैठला। हमरा हुनका देखतहि शंका भऽ गेल। ओ अपन झोरासँ विभिन्न प्रकारक पोथी निकालि सबहक दिस बढ़ौबैत बाजल- “पढ़े जाउ नीक पोथी अछि।” किछु खानक बाद झोरासँ देवी मैयाक प्रसाद निकालैत बाजल- “चारि चकाक ड्राइवरी लाइसेंस निकलल। मनोकामना पूर्ण भेल। ओहि लेल प्रसाद चढ़ेलहुँ। अहुँ सभ लिअ।” सभ केओ प्रसाद लेलक मुदा हम नहि लेलहुँ। तखन सबहक सोझामे नीकसँ बुरबक बनलहुँ। गाड़ी चलैत रहल। राति होएवाक कारणें बुरबक बनलहुँ। गाड़ी चलैत रहल। राति होएवाक निंदियादेवी अपन मायाकेँ पसारलक। सभ केयो सुति रहला। किछु लोककेँ नीन खुजलाक वाद हल्ला भेलैक- हमर समान नहि अछि। हमरो समान नहि अछि। प्रसाद वॉटैबला युवक बीचसँ पहिले निकलि गेल रहए। प्रसादमे नशा देल रहैक। सभ कियो उदास भऽ गेल। हम पुछलहुँ- “आव कहु हम बुरवक कि अहाँ सभ बुरबक?” भारत भुषण झा लघुकथा- प्रेम कदम गाछक छाहैरमे हम, ललन जी नरेन्द्र आ एक दू गोटे आओर वैसल गर्मीसँ परेशान भऽ आरामक अनुभूति करैत एक दोसरापर गप्पक नहलापर दहला मारैत आनन्दक अनुभव करैत रही तखने ओतए एकटा कुकुर आएल। ओकरा देखि हमर मन चिन्तित होमए लगल कारन जे ओतए वैसल बकरी आ ओकर बच्चाकेँ कहीं ओ काटि ने लै। कुकुर धीरे-धीरे बकरी बच्चाक लग जा ओकरा संग खेलऽ लागल जेना एक दोसराक जिगरी हुअए। एतवीमे ललन जी हमरा मुँह दिस देखि बजला- “औ जी अहाँ कोन दुनियाँमे छी हमरा सभ तखैनसँ अहाँपर कते गप्प कऽ रहल छी आ अहाँकेँ ते कोनो ध्याने नहि।” हुनक गप्प सुनि कहलिएनि- “यौ जी अपन सबहक गप्प तँ होइते रहत एतय देखियो कुकुर आ बकरीक प्रेम। हमरा अहाँ सँ तँ निक यएह सभ, जकरामे कोनो भेद-भाव नहि छैक। दुनू दू जातिक आ प्रेम अपनोसँ वेसी।” वास्तवमे जिनगी तँ एहने हेबक चाही जहिमे कोनो भेद-भाव नहि रहए। मानेश्वर मनुज पाँचटा लघुकथा ई रक्षा-बन्धन पर्वकेँ बितला तीन मास भऽ गेल छलैक। देवानजी एखनो राखीकेँ तावीज जकाँ बन्हले रखने छलथि। हम पुछलियन्हि, “देवानजी, एतेक दिनक बादो ई हाथमे रखने छी। किएक?” जावाब देवक बदला ओ हमरे पूछि देलन्हि, “ई की छैक।” हम कहलियन्हि, “राखी।” ओ कहलन्हि- “जखन एकर नामे छैक राखी तखन फेकी किएक। राखी मर्यादाक बन्धन अछि, तैँ राखी।” स्त्री-लिंग “हिन्दीक पचास प्रतिशत शब्द स्त्रीलिंग आ पचास प्रतिशत शब्द पुलिंग अछि।” “नहि, पचास प्रतिशतसँ किछु बेसी पुलिंग होइत अछि।” “नहि, उल्टे अहाँ बाजि गेलहुँ। पचाससँ किछु बेसी प्रतिशत शब्द स्त्रीलिंग होइत अछि।” “जाइ शब्दक बारेमे नहि बुझल रहैत छैक से पिलिंग भऽ जाइत व्छैक, फेर पुलिंगक प्रतिशत बेसी किएक ने हेतैक।” “आ जाहिमे सन्देह होबय ओकरा स्त्रीलिंग कहि दी, तँ स्त्रीलिंगक प्रतिशत बेसी किएक ने हेतैक।” “स्त्रीलिंगपर लोक बेसी साकांक्ष रहैत अछि तैँ स्त्रीलिंगक प्रतिशत बेसी छैक आ होबहोक चाही।” आप रत्नेश्वर स्कूल जाइत छल कि चूड़ीबला रोकि पुछलकैक, “कैसे हो रत्नेश्वर “तुम”? रत्नेश्वर ओकरा सम्बोधनपर खिसिया कऽ कहलकैक, “आप कहो”। चूड़ीबला सवाल जानि उत्तर देलकैक- “मैं तो ठीक हूँ, तुम कहो”। फेर रत्नेश्वर खिसियाइत बाजल, “तुम नहीं आप कहो, मैंने कहा न, तुमसे”। “तो ठीक है”। आ गुनधुन करैत ओ आगाँ बढ़ि गेल। ओकरा किछु समझि नहि अएलैक। लोरी रेल्वे-स्टेशनक बगलमे रेलक टुटल-फाटल क्वार्टर, झोपड़पट्टी सन रेल कॉलोनी। खाटघरसँ आएल श्यामानन्द कहलन्हि, “झाजी, खाटघर बड़ सुन्दर जगह अछि। साँझ खन कऽ ओतऽ एहन लगैत छैक जेना स्वर्ग पृथ्वीपर उतरि गेल होइक।” हम कहलियन्हि, “मुदा जाए आ आबक कतेक भारी समस्या छैक। एक तँ हार्वर लाइनक नहू चलऽवाली गाड़ी आ ताहिपर सँ दादरमे चेन्ज कऽ चर्चगेट जाएब।” “दादरसँ चेन्ज किएक। नरीमन प्वाइन्ट जेबाक लेल सोझे छत्रपति शिवाजी चलि जाइत छी।” ओ कहलन्हि। हम कहलियन्हि, “हमरा लेल तँ दहिसरक रेल क्वार्टरे सभसँ उत्तम।” “मुदा रेलक पटरीसँ सटल रेलक क्वार्टर। आवाज कतेक अबैत छैक। सदिखन निन्द हराम रहैत छैक।” हम कहलियन्हि, “नहि एहन बात नहि छैक। हमरा तँ रेलक आवाज संगीत लगैत अछि। जावत तक गाड़ी सभ चलैत रहैत अछि चैनक निन्द अबैत अछि। मुदा जखन कखनो गाड़ी रुकि जाइत अछि फटसँ निन्न टूटि जाइत अछि, जेना माँक लोरी बिच्चेमे बन्द भऽ गेल होए।” ओ कहलन्हि, “अहाँ रेल-कर्मचारी तऽ ने छी? ” भूख-भूख भाकुर मड़ुआक महीना छलैक मुदा खेतमे मड़ुआ नहि। धानक महीना एलैक मुदा खेतमे धान नहि। आँसुक महीना गेलैक मुदा खेतमे आँसु नहि। न्योतक महीना छलैक मुदा कतौसँ न्योँत नहि। खएबाक समए छलैक मुदा घरमे अन्न नहि। खेलबाक महीना छलैक मुदा घरमे उमंग नहि। ओ चितंग सुतल छल कि धरनिपर कतौ पाँच लिखल लगलैक। पाँच यानी पाँच फूल। पाँच यानी पाँच लोटा जल। पाँच यानी पाँच आँगुर। मुदा ओकर भूख खीचि कऽ ओकरा पाँच राखीपर लऽ गेलैक। ब्राह्मणक बेटा यानी पवित्र लोक। भोजनक समस्या मुदा स्वभाव सुन्दर। पढ़ाइमे कनियो आसकैत नहि। ब्रह्मचर्यक सभ गुणसँ परिपूर्ण मुदा पेटमे ज्वाला। तुर नहि, ताग नहि। कतऽसँ आनत राखी। लड्डू बाबाक फाटल सीरकमे सँ कनेक तुर आ थोड़ ताग घिचलक आ बना लेलक राखी। राखी सन नहि लगैक मुदा राखिये छलैक। रंग नहि छलैक घरमे तँ फूल तोड़ि फूलक रंग ओहि तुर आ तागपर लगौलक। मुदा राखी बनलै सर्फ चारि। पाँच नहि पुरलैक। राखी पुरान सन लगैक। भेलैक राखी लेबऽ सँ केयो मना ने कऽ दिए। एहन कतौ राखी भेलैक अछि। एक राखी वैद्यजी केँ पहिराबऽ लागल तँ वैद्यजी कहलथिन्ह, “ पहिने श्रीकृष्णजीक मूर्तिमे बान्हि आऊ।” श्रीकृष्णजीक लग जा थोड़ेक काल ठाढ़ भऽ वापस आबि गेल कारण राखी तँ छलैक सिर्फ चारि। श्रीकृष्णजी तीन दिनक भूखल पेटमे की अन्न देथिन। वापस आबि रक्षाबन्धन रक्षाक हेतु एकटा राखी सुमनजीकेँ, एकटा मदनजी केँ, एकटा रमणकेँ आ एकटा बैद्यजी कँ बन्हलक। बदलामे किछु अनाज भेट गेलैक। मोन उत्साहसँ भरि गेलैक। निराहारकेँ लगलैक जेना भूखक टाइपमे भाकुर आबि गेलैक। खेतमे फसिल नहि, घरमे अन्न नहि मुदा मोन उमंगसँ भरि गेलैक। उमेश मंडलक दूटा लघुकथा- 1) आधा भगवान परोपट्टामे श्रमपुराकेँ छोड़ि एक्कोटा गाम एहेन नहि अछि जै गाममे अइबेर धानक खेती भऽ सकल। एकर कारण भेल रौदी। कतेक गाममे तँ धानक बीआ बिरारेमे पानि दुआरे जरि गेल। श्रमपुरामे धानक खेतीक सुतरैक कारण अछि जे एहि गामक किसान मेहनती छथि, आशावान छथि। एहि गामक किसान आपसमे तालमेल कऽ कऽ लगभग चारि बीघापर एकटा बोड़िंग गरौने छथि। तइपर सँ जोताॅसक जमीन थोड़े निचरस सेहो छै। श्रमपुराक लोक साहसी आ मेहनती होइ छथि से परोपट्टाक लोककेँ बुझल छन्हि। विशेसर श्रमपुरेक एकटा किसान जे आइ अपन सासुर भिठपुर विदा भेल। भिठपुरक सीमानेपर एकटा बाबन बीघाक पोखरि। पोखरि महारेपर स्कूल सेहो अछि। ओहिठाम नवाह होइत देखि विशेसर सोचलक जे दर्शन करैत जाएब। जौं कहीं सार भेट जेताह तँ संगे निकलि जाएब। सएह केलक। मंडपक आगूमे विशेसर ठाढ़ भेल। तखने कीर्तन मंडलीसँ निकलि जीयालाल विशेसरकेँ पुछल- “पाहुन की हाल-चाल...। घरपर सँ एलिऐ आकि गामसँ आबिये रहल छीऐ?” अपन सार जीयालालकेँ चिन्हैत विशेसर बाजल- “गामेसँ अबै छी, अहीं ओहिठाम जाएव।” “अच्छा-अच्छा चलू।” कहैत जीयालाल परसाद बलाकेँ शोर पाड़ैत कहलक- “हे यौ, श्रीमोहन बाबू, कने परसाद देल जाउ पाहुन छथि।” परसाद बला चङेरा नेने श्रीमोहन आबि विशेसरक हाथमे दैत जीयालाल दिशि देखैत पुछलकनि- “कोन गाँ पाहुन रहै छथि?” जीयालालक बाजवसँ पहिनहि विशेसर कहि देलकनि- “श्रमपुरा रहै छी।” “अच्छा..ऽ, आब चिन्हि गेलौं, ऐ बेर अहुँ सभकेँ तँ रौदिये भऽ गेल किने। धान तँ नहिऐ भेल हएत?” श्रीमोहनक मुँह दिस देखैत विशेसर कहलकनि- “धान किएक ने हएत। हम सभ अपनो अदहा भगवान छी से नहि बुझल अछि।” विशेसरक जबाव सुनि श्रीमोहन किछु बजला नहि। बगलमे ठाढ़ पान-सात आदमीकेँ देख टहैल परसाद बाटए लगलाह। जीयालाल आ विशेसर दुनू सारे-बहनोइ घरपर विदा भेला। रास्तामे जखन लाउडस्पीकरक अाबाज कमलै तखन असथिरसँ जीयालाल विशेसरकेँ पुछल- “पाहुन, अहाँ जे कहलिऐ हम सभ अदहा भगवान अपने छी से कोना?” विशेसर- “बरनी, पहिने अहाँ ई कहू जे नवाह अहाँसभ किअए ठनने छिऐ।” जीयालाल जबाव सुनैक पतिक्षामे तुरत जबाव देलक- “देखै नै छिऐ पानिक चलैत एक्को अना धानक खेती नहि भेलैहेँ।” विशेसर मुस्कुराइत बाजल- “हमरा सबहक आठ अनासँ दस-बारह अना तक धानक खेती भेल अछि। अहीं कहू जे हम सभ अदहा भगवान भेलौं की नहि?।” 2) रूपैआक ढेरी फुदकैत फुलिया किताब-काँपीक बस्ता माटिक रैकपर राखि माएकेँ ताकए लगलीह। माए आंगनमे नहि छलीह। पछुआरमे गोरहा पाथैत छलीह। ओना गोरहा पाथैक समए नहि छल तेँ फुलियाक मनमे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि कएल छल। मुदा तकबो करैत आ शोरो पाड़ैत। आंगनसँ निकलि जखने फुलिया डेढ़िया लग आयलि की गोरहा मचान लगसँ माएक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलिया देखलनि जे माए गोरहा पाथि रहलीहेँ। मनमे तामस उठए लगलनि जे एक तँ कातिक मास तहूमे सूर्यास्तक समए, ई कोन समए भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि। मन खराब हेतनि। मुदा किछु बाजलि नहि। अप्पन बात बाजलि- “माए, परसू मधुबनी जाएब। लड़की सबहक बीच ऽमहिला सशक्तीकरणऽ विषयक प्रतियोगिता अछि। सौंसे जिलाक छात्रा सभ रहतीह। हमहूँ जाएब। तहिले कमसँ कम पच्चीस टा रूपैआक ओरियान कए दे।” मधुबनीक नाओ सुनि अपन सभ सुधि-बुद्धि बिसरि गेलीह। हाथ गोबरपर रहनि, आँखि बेटीक आँखिपर अा मन अकासमे कटल धागाक गुड्डी जकाँ उड़ए लगलनि। पँजरामे बैसि फुलिया कहए लगलनि- “माए, हमरा जरूर इनाम भेटत।” अकाससँ माएक मन धरतीपर खसि पड़ल, मने-मन सोचए लगलीह जे पच्चीस रूपैआ कतऽ सँ आनब? कहलखिन- “बुच्ची, ताबे ककरोसँ पैइच लऽ लेह किए तँ जुग-जमाना बदलि रहल अछि, बिनु पढ़ल-लिखल लोककेँ कोनो मोजर रहतै। तेँ कोनो धरानी रूपैआक ओरियान कऽ लेह। गाए बिआएत तँ दूध बेचि कऽ दऽ देबै।” माएक बात सुिन फुलिया मुस्कुराइत कहलकनि- “धुर बुढ़िया नहितन, तीनि रूपैये गोरहा बिकाइ छै, दसेटा बेचि लेब तहीमे तँ तीस रूपैआ भऽ जाएत। तइले ककरोसँ मुँह छोहनि किऐ करब। ई तँ रूपैआक ढेरी छिअौ। जखैन जत्ते रूपैआक काज हेतौ, तखैन तत्ते बेचि लिहेँ। तोरा कि कोनो हेलीकेप्टर कीनैक छओ?” गंगेश गुंजन लाट साहेबक किरानी एकटा राजधानी रहय। राजधनीक राजमार्ग एकटा विशाल पुलसँ बाँटल छलैक दू दिश। वेश उफंच, भव्य। साधरणतः पुल पर प्रजा केँ सेहो चलवाक अनुमति रहैक। खालीश जखन राजधानी वा बड़का राजधनीसँ सम्राट अबथिन आ हुनक गाड़ी राज्यक सुख समृद्धि देख, टहलऽ बूलऽ अबैत तँ ओहि बड़का पुलकेँ मरम्मति कएल जाइक, बाढ़निसँ बहारल जाइक आ मुरैठा बंदूकवला सिपाही सब लोक केँ बैला दैक। सौंसे पुल खाली करवा देल जाइक। पुल पर काते-काते भीख मांगनिहार सब बैसेत रहय। एकटा टंगटुट्टी बुढ़िया आगांमे कारी खोइंझा चैथड़ा पसारने, एकटा कोढ़ि फूटल गत्र-गत्रसँ पीज बहैत वर्ष पैंतीसक पुरुष, एकटा अन्हरी मौगी बामा हाथमे अलमुनियांक पिचकल छिपली लेने दहिना हाथे ढील कुरियबैत आ कएटा आओर भिखारि। क्यौ गलल आंगुर सबपर मैल कुचैल चेथड़ा बन्हने माछी भिनकैत तँ क्यो ठुठ्ठ पएर पसारने। एकटा नक्कट्टा बुढ़वा जे कए वर्षसँ पुलपर भीख मांगऽ बैसैत छल आ जकर मुंह-नाक मिलि कऽ बरौबरि छलैक वीभत्स खाधिजकां, से भरिसक मरि गेल। औरे जगह पर दू टा आन्हर भाय-बहीन हाथ पसारि कऽ भीख मांगऽ बैसऽ लागल रहय। मेही सुरमे राम नाम जपैत दाता धर्मी लोकनिक गुन गबैत। परोपट्टाक लोक सब बड़ दानी रहय। ऋण-पैंच लऽ कऽ दान देनिहार। रोज दिन घामे पसिने अपसियांत, दरबार पहुंचवाक लेल एक दोसराकेँ धकियबैत। हकमैत। तइयो मुदा, बगलीसँ कैंचा निकालि टुन टुन भीख दैत। मनहि मन खौंझाइतो मुदा यथा साध्य देनहुं जाइत। एकटा राजाक किरानी सब दिन अपन डिपटी बजय, ओही बाटे लाट साहेबक कार्यालय जाय। बड़का पुल चढ़ैत काल भिखमंगा सब पर पहिने दयार्द्र, फेर तमसाइत ककरो एकटा पाइ खसबैत चलि जाय। एक दिन ओ लाटक किरानी दुनू नेन्ना अन्हरा भय बहीन केँ देखि कऽ बड़ क्लेशित भेल। ओ सोचलक, सएह देखू सृष्टि। एहि दुनू नेनाकेँ रौद-बसात, जाड़-गरम सबमे दूटा पाइ लेल एहिना बैसऽ पड़तैक भरि जनम। ओहि दिन ओकरा पुल पर चढ़ले ने पार लगैक। दोसर दिन फेर ओ किरानी जाइत रहय। ऽमालिक दू गो पइसा...।ऽ ओ ठमकि गेल। ओहि कोढ़ि फूटल लोककेँ देखलक। पहिने तँ खूब घृणा भेलैक, ओकरासँ भिखारि फेर याचना कयलकैक। माथ पर प्रचण्ड रौद। कतहु सीकी ने डोलैत। अयनिहार गेनहार सब घामे नहायल आ भिखमंगा सब तँ आओर। पजरैत रौदमे बैसि कऽ भीख मंगैत देखि, लाटक किरानीकेँ बड़ क्रोध उठलैक। ऽतोरा एहि रौदमे भीख मांगऽ के कहैत छौ बैसि कऽ...?ऽ ऽकी करबै? ई पेट...? ओ पेट दिस देखबैत दांत बावि देलकै। किरानीकेँ आर तामस उठि गेलैक। ऽतखन मर...।ऽ ओ ओकरा पाइ नै देलकैक। आगां बढ़ि गेल। भिखारि दोसर दिन फेर टोकलकैक ऽमालिक आइ एक्को गो पाइ नै देलक कोनो दाता धर्मी ने...ऽ किरानी ओकरा गुम्हरि कऽ देखलकैक। तँ मारलैं किएक ने पकड़ि कऽ, दाता धर्मी सब केँ जे ऐ लूह रौदमे दांत बाबि कऽ किकियाइत बैसल छें?ऽ ओ क्रोधे माहुर होइत कहलकैक। हम कोढ़ियो लोक... बाबू भैयाकेँ मारबै... कोना कऽ मालिक?ऽ ओ दया ........ दांत चियाड़ि देलकैक। तखन लाटक किरानी गुन-धुनमे पड़ि गेल। ऽएकटा कर। मारि नहि सकैत छहक तँ बाबू भैय सबकेँ एहि पीजुआह हाथे छू तऽ सकैत छऽ? हाथ धऽ कऽ कहि तँ सकैत छहक?ऽ ओ किछु सोचैत कहलकैक आ चलि गेल। दोसरा दिन ओहि भिखारिकेँ फेर बैसल देखि लाटक किरानी केँ तामसे देह जरि गेलैक। मरियो ने जा होइत छऽ जे उसनाइत, कुकुर जकाँ दुर दुरायब सुनैत तरहत्थी औरेत रहैत छऽ?ऽ ओ ग्लानिसँ मूड़ी गोंति लेलक। तेसर दिन ओ फेर पुछलकैक भिखारि के ऽकी सोचलऽ?ऽ आ चलि गेल। चारिम दिन ओहि पुल पर वातावरणें दोसर रहैक। बहुत रास उजरा धेती कुरता वला लोक सब पएर झटकारि कऽ पड़ायल जा रहल छल आ कोढ़िया भिखारि सब हुनका सभक पाछां-पाछां खेहाड़ि रहल छलैन। जे गोटय घेरा गेल रहथि से सब जेबी सँ पाइ निकालि रहल छलाह। पड़ाहि जकां लागल छल। कोढ़िया, आन्हर, नांगर, सब भिखमंगा लोककेँ घेरि कऽ ठाढ़ भऽ जाय। लोककेँ पुल पर दऽ कऽ गेने बिना उपाय नहि छलैक। ओतऽ छोट छिन हड़-बिरड़ो मचल छलैक। राजधनीक ओहि बड़का विशाल पुल पर एकटा भयसँ आतंकित वातावरण चतरल जा रहल छलैक। ओ लाटक किरानी, किछु फराकेसँ डरायल-डरायल पुछलकैक ऽकी हौ?ऽ कोढ़ि लोक सोझ भऽ कऽ ठाढ़ रहैक। ओकर हकमैतहुं मुखाकृति पर खुशी पसरल छलैक। आ ओहि किरानीक प्रतियें कृतज्ञताक पवित्र आभास। ऽकम सँ कम एतवा तँ हमरा सब कइये सकै छी। अपना सड़लाह गन्हाइत हाथे बाबू बबुआन सबकेँ दौड़ि-दौड़ि कऽ छुबियो तँ सकै छी...।ऽ आ ओ किरानी, ओही दिन ओहि राजधनीसँ विदा भऽ गेल। डॉ. शेफालिका वर्मा आनक बड़ाइ भटकैत भूट्कैत एकटा बड पुरान शिष्य अपन गुरु लग पहुँचल . गुरु अपन शिष्य के देखि आह्लादित भ उठलाह ... की हाल छैक शिष्य सुन्दरम , जीवन कोना बीती रहल अछि अहांके ? हम ते बड अभागल छी महाराज... कलपैत शिष्य बाजल .. की भेल.. अहाँ ते ज्ञान क पोटरी ल क एहि ठाम से गेल छी.. हम जाहि वस्तु कामना करैत छी वैय्ह हमरा से दूर भ जायत ऐछ.नै ते हम अर्थोपार्जन केलों आ नै ते जीवन क कोनो सुख भोग्लों ..... स्नेह भरल स्वरे गुरु बजलाह ..अहाँ पहिने देवा लेल सिखु ,तखन लेवा क लेल सोचब.. हम की देब भगवन ! हमरा अछिए की ? नै ते धन दौलत , नै ते घर -गाड़ी , नहि कपडा लत्ता देब तं की देब ==निराश स्वर छल अहाँ लग बहुत किछ ऐछ . अहाँ चाही त लोग के बहुत किछ द सकैत छी चौंकी उठहल शिष्य --की ऐछ जे द सकैत छी हम ? अहांके भगवन सुन्दर बोली देने छैथ , अहाँ चाही तो ओकर उपयोग स लोग क तारीफ़ क सकैत छी . दोसर केर बड़ाई क ओकर ह्रदय मे ख़ुशी भरि सकैत छी, मुदा अहाँ ते एतेक दरिद्र छी जे जाहि मे एको पाई नै खर्च होयत अछि , उहो नै क सकैत छी. आदमी के कंजूस नै हेवाक चाही, भगवन जे देने छैथ ओकरा जतेक बंटब ओतेक बडत.. ककरो बड़ाई करब ते अहांक अपने सम्पन्नता क भान होयत , मोने उदारता क भाव रहत अहाँ लग वाणी क धन ऐछ, ह्रदय के विशाल बनाऊ एक बात जानि लिय ककरो बड़ाई केने से ओ पैघ नै होयत छैक वरन बड़ाई करय वाला लोग क दृष्टि मे पैघ भ जायत अछ . अहाँ खाली पयबा लेल जनैत छी तैं दुखी रहैत छी . जे दैत छैथ ओ देवता छैथ आ देवता कहियो अभावग्रस्त नै रहैत छैथ ............... शिष्य गुरु क पैर पर खसि पडल ............. प्रेमचन्द्र पंकज क्रमश:.... आइ दरमाहा बढ़ल रहनि। दरमाहा की बढ़तनि कप्पार। एक पाइ बढ़लनि दरमाहा, तीन पाइ बढ़लैक महगी। सब चीजक दाम अकास छूने छैक। तखन ? गुनधुन करैत ऑफिससँ डेरा अएलाह। कपड़ा फेरलनि। सोफापर धम्मसँ बैसि गेलाह। माथ भारी बुझेलनि। पंखा चला देलथिन। चाह पीबाक इच्छा भेलनि। चाह बनाबऽ कहलथिन। आँखि मूनि लेलनि। माथपर पंखा नाचि रहल छलनि। बेटी चाह लऽ कऽ पहुँचलनि। आँखि खुजलनि। बेटीकेँ देखलनि। बेटी बीस वर्षक भऽ गेलनि। अएँ, बीस वर्षक ! आँखि उनटि गेलनि। सोफापर ओंघरा गेलाह। पंखा नचिते छैक। नचिते रहतैक ? कुमार मनोज कश्यप पाँचटा लघुकथा १. मरिचिका 'हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल ' - भवानीबाबूक मुँह सँ निकलल एहि गीतक भावार्थ मुहल्ला के अबाल-वृद्ध प्रायः सभ के बुझल छलैक । एते तक किं नेनो-भुटको सभ बुझि जाईत छल जे भवानीबाबू आब भोजनक प्रतिक्षा कय रहलाह आछ । भवानीबाबू -- जिला परिषदक सेवा-निवृत बड़ा बाबू । सस्ती जमाना मे भवानीबाबू एक-एक टा रुपैया जमा कऽ कऽ शहर मे जमीन खरीद लेलनि। मुदा घर टा बनि सकलनि सेवा-निवृति के बादे । सेवा-निवृति पर भेटल सभ पाई के लगा कऽ बनलनि चारि कोठली के पक्कंा-पुख्ता मकान । जहिया मकान बनि कऽ पूरा तैयार भऽ गेलनि तहिया भवानीबाबू बाहर ठाढ़ भऽ कऽ बड़ी काल तक जोहैत रहलाह ओहि मकान के । जतबा खुशी शाहजहाँ के ताजमहल बनबा कऽ नहि भेल हेतैक; ओहि सँ कैक गुण आत्मिक खुशी भवानीबाबू के भेट रहल छलनि 'अपन' मकान के देखि कऽ । हाथक सभ पाई खतम भऽ जेबाक सेहो आई कोनो दुख नहिं बुझा रहल छलनि हुनका । दुख भेलनि तऽ बस एतबे जे कनियाँ एहि मकान के देखबा लेल नहिं रहि सकलखिन । चारु कोठली दुनू बेटा मे आपस मे बँटा गेल - दू टा कोठली दुनू बेटा-पुतोहू के आ दू टा पोता-पोती के लेल । पूजा , स्टोर, पाहुन-परख एहि सभ लेल घरक कमी रहिये गेल । आब भवानीबाबू कतऽ जाथु ? अंत मे दुनू बेटा-पुतोहू सर्व-सम्मति सँ निर्णय कऽ कऽ हुनका आश्रय देलकनि बालकनीक एकटा कोन मे । कनियाँ तऽ पहिनहिं स्वर्गवासी भऽ चुकल रहथिन । भवानीबाबू अपने बनाओल घर मे आन बनि बालकनी के एक कोन मे टुटलहवा चौकी पर समय काटऽ लगलाह । हद तऽ तखन भऽ गेल जखन एक दिन भवानीबाबू के पेट सेहो बँटा गेलनि एक महिना जेठका बेटाक घर सँ तऽ दोसर महिना छोटका बेटा घर सँ । आई भवानीबाबू बड़ी काल धरि नहा-धो कऽ बैसल गीत गबैत रहि गेलाह ---बीच-बीच मे नजरि याचक-भाव सँ दुनू भाईक भनसा घर दिस सेहो बेरा-बारी सँ जाईत रहल । गीत अंतरा धरि पहुँचि गेल । स्वर मद्धिम पड़ऽ लागल----उदास----थाकल---हारल---हे हर, हमरहु करहु प्रतिपाल़़। २ परजा बड़का भैयाक दलान ; दलान नहिं गामक चौक बुझू़देश-दुनियाँ, खेत-पथार, नीति-राजनीति सभ पर गर्मागरम बहस एतऽ सुनबा लेल भेटत । चुनावक समय मे कोनो आन टॉपिक पर बहस हुअय ; से कने अनसोहाँत होयत । सभ जुटल लोक चुनावक एक-एक मुद्दा पर तेना बिक्षा-बिक्षा कऽ खोईंछा छोरा रहल छलाह जे कोनो सेफोलोजिस्ट टी०वी० पर की करताह । बौवूबाबूक कहब रहनि जे एहि बेर सत्ता परिवर्तन हेबे टा करत़़सभ सत्तारूढ सरकार सँ नाखुश आछ । तकर औल ओ सभ एहि बेर चुकेबे करतनि । एहि पर नन्हवू बमकैत बाजल -- 'कक्कंा आहाँ कतऽ छी !लोकक आँखि नहि बट्टम छियै जे चहुँकात होईत विकास के नहि देखतै ।अपने गाम मे देखियौ ने जे कतेक के सरकार पक्कंा मकान बना देलकै़क़ंतेक कऽल गड़ा गेलै़ग़ामक लेल रोडो तऽ सैंक्शन भईये गेल आछ । बौवूबाबू प्रतिवाद केलनि--'कोन घर आ कऽलक बात करैत छह? जा कऽ ओकरा सभ सँ पुछहक गऽ ने जे कतेक जोड़ी पनही खीया कऽ आ कतेक घूस दऽ कऽ घर आ कऽल भेलैयै ?' पेर बजलाह--' हौ ई सरकार पाँच साल तक जनता के मुर्ख बना कऽ अपन धोधि बढ़बैत रहल । भल होअय लोक तऽ ई चोरबा सभ के जमानत जब्त करा दिअय एहि बेर । ' ई वाद-प्रतिवाद चलिये रहल छल किं मखना बिचहिं मे बाजल --'यौ मालिक ! आहाँ आउर कथि लै बेकारे मे बतकटाझु करैत जाईत छी । हमर मुर्खाहा बुद्धि तऽ एतबे बुझैत आछ जे केयो जीतऽ; केयो हारऽहम सभ तऽ परजा छी, परजे रहब । ' दलान पर कनी काल लै चुप्पी पसरि गेल छलै। ३ बदलैत समय आई सँ दस वर्ष पहिने जखन ऑफीस सँ घर घुमैत छलहुँ तऽ हमर नवका वुक्वुर भुकिं कऽ आ नवकी कनियाँ गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करैत छलीह । आब काल करोट पेरि चुकल आछ हमर पोसुआ वुक्वुर आ कनियाँ दुनु अपन आदति अदला-बदली कऽ लेलनि । आब घर आबते हमर कनियाँ हमरा पर भुकिं कऽ आ हमर पोसुआ वुक्वुर हमर गऽर लागि कऽ हमर स्वागत करैत आछ । समय एहिना बदलैत छै । ४ जरल पेट जेठक प्रचंड दुपहरियाक मे जखन छाँहों छाँह तकैत छैक घाम सँ लथपथ चिप्पी लागल मैल पढ़िया नुआँ, जे ओकर लाज के झँपबा मे मुश्किंल सँ समर्थ भऽ रहल छलैक, पहिरने एकटा स्त्री कोर मे एकटा दू-तीन बरखक नेना के लऽ कऽ हमरा सोझाँ ठाढ़ भऽ जाईत आछ । किंताब पर सँ हमर नजरि ओकरा दिस जाईत आछ । ओ स्त्री हमरा सँ याचना करैत आछ किंछु खेबा लेल देबाक। कहैत आछ जे काल्हि रातिये सँ ओकरा दुनू माय-बेटा के मुँह मे अन्नक एकोटा दाना नहिं गेलैक आछ । हमरा दया आबि जाईत आछ ओकरा पर । आँगन जा कऽ माय के कहैत छियैक । माय भनसा घर मे जा कऽ देखैत आछ - 'पोछि-पाछि कऽ दू मुट्ठी भात भेलै कनेके दालि बाँचल छई तरकारी तऽ बचबे ने केलै । कतऽ छई ओ ? कही बारी सँ केराक दू टुक पात काटि अनतै । अपना बासन मे तऽ नहिं देबई खाय लेल । ' ओ स्त्री केराक पात लऽ कऽ दुरूक्खा मे छाँह मे बैस गेल । माय भात आ दालि ओकरा आगू मे परसि देलकै । हमर आग्रह पर कनेक आमक वुच्चो दऽ देने छलै । ओ स्त्री अपन नेना के अपना हाथ सँ खुआईये रहल छलै तैयो ओ अनभरोस नेना अपने दुनू हाथ लगा कऽ भकोसऽ लागल रहै । तखने ओ स्त्री अपन बामा हाथ सँ नेना के दुनू हाथ पकड़ि कऽ कात कऽ देलकै आ अपने पैघ-पैघ कौर गीड़य लगलै । नेना भुईंयाँ मे ओंघरिया मरैत रहलै । ५ जीतक आगू छहरि मे कनेक तऽ कटारि भेलै किं देखिते - देखिते सौंसे गाम दहा गेलै छती सँ उपर पानि ठेकिं गेलै आर बढ़िते जा रहल छलै। लोक वस्तु-जात जे समेटि सकल से समेटलक नहिं तऽ जान बचा कऽ पड़ायल । दस-पाँच टा लोक जकरा कोठा छलै से तऽ छत पर जा कऽ प्राण बचेलक । भुखना के पड़ेबाक कोनो रस्ता नहिं सुझलै तऽ अपन भीत घरक चार पर चढ़ि गेल । पानिक ओहि मारूक लहरि मे भीतक घर कतेक काल ठठितै अड़्ड़ा कऽ खसि पड़लै । चार पर बैसल भुखना आब पानिक हिलकोर मे ऊब-डुब करैत भसियायल जा रहल छल । हाकरोस कऽ कऽ लोक सभ सँ नेहोरा व्कंरैत रहलै बचेबा लेल । सब के तऽ अपन जान के पड़ल छलै़ ओकरा के बचाबओ । जीवन-मरन के बीच झुलैत भुखना चार के कसिया कऽ पक़ंडने भासल जा रहल छल । ओ जीवन हारिये देने छल किं चार एकटा पैघ नीमक गाछ सँ टकरा कऽ कनेक काल लेल विलमलै़ओ पूर्ति सँ भरि पाँज गाछ कसिया कऽ गाछ के पकड़ि लेलक । चार पेर सँ ओहिना भसियाईत चलि जाईत रहलई । ओ अपना शरीर मे बल अनलक आ पीछड़ैत-चढ़ैत गाछ पर चढ़िये गेल । गाछक एक पेड़ पर पैर राखि कऽ दोसर सँ अड़किं कऽ उसास छोड़लक लगलै जेना पुनर्जन्म भेल होई ओकर । गाछ पर ठाढ़ ओ बाढ़िक लीला देखैत रहल । ओहिना ठाढ़े-ठाढ़ कखन ओकर आँखि लागि गेलै से अपनो नहिं बुझलक ओ । भोर मे जखन सुरूजक लाली छीटकलै आ फरीछ भेलै तऽ ओकर आँखि खुजलै । चारू कात तकलक ओ सगरो पानिये-पानि़क़ंतहु-कतहु दूर -दूर मे कोनो टा गाछ किंवा कोनो कोठाक घरक आधा भाग टा मात्र देखवा मे एलै । अँगैठी-मोर करैत ओ अपन माथक उपर तकलक । तकिंते घिघियाय लागला साक्षात यमराज के अपना माथक उपर देखलक ओ एकटा कारी-भुजुंग सुच्चा गहुमन सँाप उपरका डारि मे लपटायल । एक बेर मृत्यु के मुँह मे जेबा सँ बाँचल तऽ दोसर मृत्यु लग मे ठाढ़ । गहुमन के डँसल तऽ पानियो नहिं मँगैत छै़ओकरा आँखिक आगू अन्हार होमय लगलै़आब ओकर प्राण जेबा मे कोनो टा भाँगठ नहिं । आँखि मुनि लेलक ओ आ आसन्न मृत्यु के प्रतिक्षा करय लागल । किं एक बेर पेर कतहु सँ हिम्मत जगलै ओकरा मे़ऩहुँये-नहुँये ओ दोसर डरि पर आबि गेल़़ गाछक एकटा डारि तोरलक आ समधानि कऽ गहुमन के माथ पर दऽ मारलक । निशान सटीक रहलै़सँाप अचेत भऽ कऽ पानि मे खसि पड़लै आ धारक सँग बहि गेलै । भुखना विजयी भाव से चारू कात तकलक । ओकर वीरता देखय वला ओतय के छलै ? विनीत उत्पल श्री गुरूवै नम: गुरूर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णु, गुरूर्देवो महेश्वर:। गुरू साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरूवै नम:। नेनासँ ई श्लोक मास्टरजी लेल सुनैत रही। हमरो एहने मास्टर साहब भेटल जे कहैत छलाह, खूब पढ़ू। पढ़हि के संग अपन जीवनमे सेहो ईमानदार रहू। ईमानदार रहबै तँ शुरूमे दिक्कत होएत, मुदा बादमे एक गर्व महसूस करब। समाजमे इज्जत भेटत। झूठ नहि बाजू। अपन बातपर रहू। जुबानक पक्का रहू...। संगे-संग भगवान रामक कथा सेहो बतौलथिन जे ऽरघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाईऽ आआ॓र राजा हरिश्चंद्रक कथा सेहो क्लासक बाद सुनाबैत रहै। एते साल से ई सभ गप सुनैत आआ॓र पिता केँ एहि मार्ग पर देखैत हमरोमे ई सभ गुण आबि गेल। ईमानदार रहलौं तऽ क्लास मे फर्स्ट करैत रही। नीक स्कूल-कॉलेज मे एडिमिशन सेहो भऽ गेल। पढ़ाई खत्म केलाक बाद नीक सन नौकरियो भेट गेल। गामसँ दिल्ली आबि गेलहुं। दिल्ली बला भऽ गेलहुं मुदा बेइमान नहि भऽ सकलहुं। जकरा लेल दिल्ली जानल जाइत अछि। ताहि सं दिल्ली लेल लोक कहैत अछि, ऽबिन दिल के अछि दिल्लीऽ। संजोग सं मास्टर लड़कीसँ ब्याह भेल। गाममे रही। सोचहि लागलौं, की करी, कनिया केँ नौकरी कराबी कि नहि। एक दिन मचान पर गामक लोक लग बैसल रही। तखने इलाकामे प्रतििष्ठत 55 सालक मास्टरजी शंकरदेव एलाह। गप-ठहाक्काक बीच कनियाक नौकरीक गप आयल। आ॓ सलाह देलखिन, ऽअंयौ कनिया के किए नौकरी छोड़ाएब। देखैत नहि छिऐ मुखियाक पुतोहूकेँ। आ॓ कहां कहियो स्कूल जाइत छै। मुखिया अप्पन पुतोहूक बदलामे एकटा मौगी केँ राखि देने छै। आ॓ गरीब अछि। आ॓करा मुखिया दू हजार टका दैत अछि। अहि कलयुग मे कियो एकरा देखनियार अछि? ईमानदारीक जमाना नहि अछि आब। एकरा सं आ॓हि गरीबक कल्याण भऽ जाइत अछि आ काजो भऽ जाइत अछि। अहूँ किए नहि आ॓हिना कोनो गरीबक कल्याण कऽ दैत छी?ऽ ई गप सुनि कऽ लागल जना हमरा सौंसे देह काठि मारि देलक। हमरा अपना मास्टरजीक कहल आआ॓र पिताक आचार-विचार आंखिक आगू घूरय लागल। डॉ . धनाकर ठाकुर हमरा एकर एक बायोडाटा चाही यद्यपि बौआ झा व्यस्त छलथि ओ निर्णय लेने छलथि जे आई ओ प्रोफ़ेसर प्रसादक डेरा तकिये के रहताह। ओहुना सारि शारदा कहने छलथिन जे हुनक सखी उमा जे गोल्ड मेडलिस्ट छलखिन्ह पिताक विषय भौतिकीमे, से ने त नौकरी केल्खिंह ने बियाहे। बौआ झा हर साल रेडियो स्टेशन दिस हुनक पूर्ण डेरा ताकि आबथि आ हड़बड़ीमे वापस पटना चली जाइत छलाह। एहू साल गेला मुदा कोनो थाह पता नहि। ओ एक उमेरगर लोक लग गेलाह जे सड़क कात ठाढ़ छलाह। "यौ, अहाँ प्रोफ़ेसर प्रसादक डेरा बताएब?" "कोन प्रसाद, एतऽ तँ तीन- तीन प्रसाद छथि- गणितबला, दबाइबला की किताबबला?" "अहाँकेँ की कहू , ओ तँ पैघ विद्वान छ्लथि जिनक किताब हमर पिताजी छपैत छलखिन्ह।" "तँ अहाँक पिताजी छापाखाना बला।" "सैह बुझ।" "देखू , एक भलमानुष किताबबला प्रसादक खोजमे कियो कियो प्रोफ़ेसर अबैत रहैत अछि -बड़का-बड़का प्रोफ़ेसर।" "हाँ यौ वैह , हुनके तँ हम तकैत छी। " " अहाँ चलि जाऊ ओही बड़का पोखरी कात जतऽ कोणपर एक मकान होएत।" बौआ झा परेशान, पोखरिक हर कोन पर मकान। मुदा आइ ओ ताकिये कऽ रहताह। फेर एक आदमी- मकान नहि फ्लैट कहने होयत- चली जाऊ सीधा एक किलोमीटर ओतऽ सँ दहिनामे एक फ्लैटमे एक बूढ़ प्रोफ़ेसर जरुर अछि, जकर एक बिनबियाहल बेटी छैक, सेवा करैत छैक माय बापक, बेटा पुतोहु अमेरिकामे ।" बौआ झा जा कऽ निचला फ्लैटक घंटी बजेलाह। एक महिला निकललीह जे हुनका सारि जेकाँ बुझेलीह। "ककरासँ भेंट करक अछि?" "तोहर पिताजीसँ।" "अहाँक की नाम?" "नहि बताएब- हुनके बताएब।" "बताउ ने, हमहूँ पी एच डी छी। " "से जरुर होएब, पैघ प्रोफ़ेसरक बेटी। " "अहाँक की नाम?" ताबत हुनक माय निकललीह- ":देखू माँ, ई अपन नामो नै बतबैत छथि आ तुम-ताम करैत छथि। " " जरुर कियो लगके छथुन्ह। " "बताऊ अपन परिचय?" "प्रोफेसर अहिकेँ बतेबन्हि " "की बात- की होइत अछि?" प्रोफ़ेसर निकललाह "अहाँ के?" "चिन्हू" "नहि चिन्हलहुँ।" "चिन्हू, हम वैह जे १० बरख पहिने तक हर साल रेडियो स्टेशनबला डेरा अबैत छलहुँ, सालमे एक बेर। " "हम बूढ़ भेलहुँ, माफ़ करू नहि चिन्हलहुँ।" "मुदा हम नहि बताएब, नहि चिन्हब तँ हम एहिना चलि जाएब।" "बोली तँ सुनल लागैत अछि.. .. ओ अहाँ झाजीक बेटा।" "हँ।" उमाक माइ सेहो चिन्हलन्हि: "झाजीक बेटा , तूँ, तोहर पिताक उपकार हम सभ नहि बिसरबौ, ...तोरा नहि चिन्हलियऊ।" "कोन उपकार, ओ तँ कहियो किछु नहि कहलाह.. हुनक मरनो आब १२ साल भेल।" प्रोफ़ेसर- ' ओ बाजएबला नहि छलाह किछु।" उमाक माँ- "जखन प्रसादजी इंग्लैंड छलाह हमरा सभकेँ कियो देखनिहार नहि, चिट्ठी देलियन्हि तँ ओ झाजीकेँ लिखलन्हि आ झाजी आबि कऽ चालीस हजार रूपया दऽ गेलाह आ हमरा कहलाह जे हुनको नहि कहबन्हि, ई रूपया हुनक किताबक रोयाल्टीमे धीरे-धीरे चुकि जेतैक वा फेर ओ दोसरे किताब लिखि देताह। प्रोफ़ेसर- " यदि ओहिमे हमरा आर देबाक हो तँ कहू हम अपन बता कऽ लिखबैक वा पेंसन सिक्स्थ पे रिविजन भेला पर पठवा देब।" बौआ झा- " नहि यौ, हमरा तँ बाबूजी किछु नहि कहलाह कहियो। अहाँ तँ विद्वान छी, हमर पिता तँ अनेक समांगकेँ लेखक बनवा देलथि लिखबा लिखबाकऽ। हुनके नामपर तँ हमहूँ सभ जिबैत छी। हम तँ अहाँक दर्शन लेल आएल छलहुँ, ओना उमा जँ अहाँक पोथीकेँ रिवाइज कऽ देती तँ फेर हम छापि देब आ ओहो चलैत रहत। आ एक कातमे जा कऽ उमाक माँकेँ कहलखिन्ह - "हमरा एकर एक बायोडाटा चाही"। "किएक? "नहि बताएब" बुझि गेलहुँ। उमा एहि बीच घसकि गेल, जल्दी दोसर कमरामे अपन कएल शीऊथिकेँ शीसामे देखैत आ सोचैत हमर वृद्ध माता-पिताकेँ के देखतन्हि, जाहि लेल हम लक्ष्मीक कहलो उत्तर लेक्चररशिप छोडि देलहुँ? आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा लघुकथा
पत्नीभक्त
भोज खएबाक लेल बैसल छलहुँ। पात पर भात, दालि आ दू प्रकारक तीमन आबि गेल छल। बारिक सभ मनोयोग सँ परसि रहल छलाह । एही क्रम मे एक गोट बारिक बजलाह--
" एखन धरि फेकू बाबू नहि पहुँचलाह आछि"। गप्प सुनतहि रमेश बाबू फरिझौलखिन्ह-- "औताह कोना पत्नी-भक्त छथि ने।घरवालीक पएर जतैत हेताह"। सुधीर फेकू बाबूक समांग छलखिन्ह, तुरछि कए बजलाह--- पत्नी-भक्त भेनाइ खराप छैक की ? जबाब दैत रमेश कहलखिन्ह तखन बैसल छी किएक जाउ अहूँ। एहि बेर सुधीर गप्प के थोड़ेक मोड़ दैत बजलाह- " त की अहाँक सिद्धान्तक मोताबिक पुरुष पत्नी-भक्त नहि भए वेश्या-भक्त बनि जाए" आ हुनक वाक्य समाप्त होइतहि सपासपक ध्वनि शुरु भए गेल। निशान
हाथ मे माइक, गरा मे फूलक माला, आँखि मे तेज, वाणी मे जोश। नेता जी मंच पर ठाढ़ भए कए धूआँधार भाषण दए रहल छलाह----
खाली एक बेर हमरा जितएबाक कष्ट करु, हम समस्त जनताक कष्ट के अपन कष्ट बूझब । भ्रष्टाचार के मेटा देबैक। गुंडा-लफंगाक नामो-निशान खत्म कए देबैक-------
एहि अंतिम आश्वासन के खत्म होइतहिं श्रोता मे सँ केओ चिचिआ उठल-------
नेता जी जखन अहाँ गुंडा-लफंगाक नामो-निशान मेटा देबैक त अहाँक निशान कतए रहत।
आ नेता जी गप्प के जानि-बूझि अनठा कए ममच सँ उतरि विदा भए गेलाह। सतीश चन्द्र झा नोकरी पिताक आकस्मिक निधन रमेश कें मोन मे एकटा नव आशाक किरण जगा रहल छलैक। दुखी तऽ छल मुदा भविष्यक आशा मे एकटा पूर्णता के सेहो अनुभव भऽ रहल छलैक। एकटा बेरोजगार व्यक्ति थाकि हारि कऽबैसल पिताक नौकरी पर पूर्णतःआश्रित छल मुदा भगवानक इच्छा पिता सरकारी नोकरी मे रहिते प्रस्थान केलनि आ रमेश कें अनुकंपा पर नोकरी भेट गेलनि। हुनका बैसल मे सरकारी नोकरीक तगमा भेट गेलनि।दू बेकती अपने एकटा नेन्ना एकटा छोट भाय आ एकटा बहीन संगहि समय सँ पहिने बृद्ध होइत हुनक माता। मायक भीजल आँखि मे किछु संतोषक आभा प्रवेश कएलक। परिवार चलब आब फेर कठिन नहि रहत। पिताक बदला ज्येष्ठ पुत्र अपन कर्तव्यक परिवहन अवश्य करताह तकर पूर्ण विश्वास। मुदा आठ दश मास बितिते परिवारक संपूर्ण चित्र अस्पष्ट होमय लागल। जीवनक समटल गति मे व्यवधानक बसात प्रवेश करय लागल। घर खर्च, छोट बेटाक पढ़बाक खर्च, दोकान दौड़िक खगता सभटा अपूर्ण रहय लागल। क्षणिक आयल हर्ष मे एकटा फेर व्यवधान। एकदिन मायक सहनशक्ति टूटि गेलनि तऽ रमेश के कहलथि बौआ एना किअए भऽ रहल अछि, बाबू जा धरि छलाह सबहक आवश्यकता पुरौलथि मुदा अहाँ नोकरी करितो सभटा पाइ कौड़ी की करै छी से किछु नहि बुझि पबै छी। माय! तू की बुझबिही! आब पहिलका समय नहि छै। पाइ कौड़ीक कोनो मोल नहि छैक। झण दऽ खर्च भऽ जाइत छैक। ओना तोरो लग तऽ बाबूक भविष्यनिधि आ एल आइ सी आदिक पाइ तऽ छौहे किए नै खर्च करै छैह। तू की करबै पाइ लऽ कऽ। वहीनक वियाह तऽ जेना जे हेतै से हेबे करतै। माय तऽ सत्ते नहि बुझि सकलीह। साले भरि मे कोना एतेक परिवर्तन भऽ गेलैक। नहि जानि समय के दोष छैक अथवा संसारक देखा देखी बनि रहल नव परंपरा जाहि मे पुत्र अपन परिवार कें रूप मे मात्र अपन पत्नी आ बच्चा के बुझैत छथि। नहि जानि लोक पुत्रक अभिलाषा मे अतेक कियै विचलित रहैत अछि। सोचैत सोचैत अपन पतिक फोटो के समक्ष ठाढ़ भऽ ओ अपन बीतल समय के ताकय लगली । किशन कारीग़र मूरही-कचरी एकटा हास्य लघु कथा। दिल्ली संॅ दरभंगा होयत अपन गाम मंगरौना जायत रही। रस्ते मे एकटा नियार केलहुँ जे एहि बेर महादेव मंठ जेबेटा करब। एतबाक सोचैते-सोचैते कखन गाम पहुॅंच गेलहुँ सेहो नहिं बूझना गेल। चारि बजे भोरे अंधराठाढ़ी यानी वाचसपतिनगर रेलवे स्टेशन उतरलहुँ रिक्शावला सभ के हाक देलियै। भोला छह हौ भोला। ताबैत दोसर रिक्शावला बाजल जे आई भोला नहि एलै कियो बाजल जे जोगींदर आयल हेतै तकियौ ओकरा। भोला आ जोगींदर दूनू गोटे गामक रिक्शावला रहैए कोनो बेर गाम जाइ तऽ ओकरे रिक्शा पर बैसि क स्टेशन सॅं गाम जाइत छलहुँ। एतबाक मे जोगींदर ओंघायत हरबराएल आएल अनहार सेहो रहै। वो बाजल कतए जेबै अहॉं। हम मंगरौना जाएब कक्का हमरा नहि चिन्हलहुँ की। हॅं यौ बच्चा आवाज़ सॅं आब चिन्हलहुँ आउ-आउ बैसू रिक्शा पर। दूनू गोटे गप सप करैत बिदा भेलहुँ ताबैत जोगींदर सॅं हम पूछलियै कक्का ई कहू जे एहि बेर बाबाक दर्शन केलहूॅ किनहि। हॅं यौ बच्चा एहि बेर सजमैन खूम फरल छलै से हमहुँ चारि बेर बाबा के जल चढ़ा एलहॅू आओर हुनका लेल सजमैन सेहो नेने गेल रहियैन। एतबाक मे भगवति स्थान आबि गेल हम रिक्शा पर सॅं उतरि के भगवति केॅं प्रणाम करैत तकरा बाद अपना आंगन गेलहूॅ। हमरा गामक प्रारंभ मे भगवति स्थान अछि। गाम पर गेलहुँ सभ सॅं दिन भरि भेंट घांट होयत रहल। भिंसर भेलै संयोग सॅं ओहि दिन रवि दिन सेहो रहै। बाबा सॅं भेंट करबाक मोन आओर बेसी आतुर भऽ गेल नियार केलहुँ जे आई महादेव मंठ जाके बाबाक दर्शन कए आबि। हमरा गाम सॅ किछूएक दूर देवहार गाम मे मुक्तेश्वर नाथ महादेवक प्राचीन मंदिर अछि जकरा लोक बोलचाल मे महादेव मंठ कहैत छैक। ओना तऽ सभ दिन बाबाक पूजा होइत छलैक मूदा रवि दिन के भक्त लोकनीक बड् भीड़ होइत छलैक किएक तऽ ओहि दिन मेला सेहो लगैत छलै त दसो-दीस सॅ लोग अबैत छल।दरभंगा पढैत रही तऽ हमहुँ महिना मे एक आध बेर महादेव के जल चढा पूजा कए अबैत छलहॅू। गामे पर भिंसरे नहा के बिदा भेलहुँ माए हमर फूल बेल पात ओरियान कके देलिह। गाम पर सॅ मुक्तेश्वर स्थान बिदा भेलहॅू पैरे-पैरे जायत रही तऽ जहॉं गनौली गाछी टपलहॅू कि रस्ते मे एकटा पिपरक गाछ छलै। ओतए सॅं महादेव मंदिर लगे मे रहै। ओहि पिपर गाछ लक एकटा जटाधारी साधू भेटलाह हम कहलियैन बाबा यौ प्रणाम। एतबाक मे बाबा बजलाह जे कहबाक छह से जल्दी कहअ हमरा आई बड् जार भऽ रहल अछि। बाबाक ई गप सूनी कें हमरा कनेक हॅंसी लागि गेल। हम बजलहॅू आईं यौ बाबा अपने सन औधरदानी के कहॅू जार भेलैए। अपने तऽ एनाहियों सौंसे देह भभूत लेप के मगन रहैत छी। बाबा बजलाह हौ बच्चा आब लोक सभ ततेक जल चढ़बैत अछि जे हमरा कॅपकॅपि धअ लैति अछि। तूहिं कहए तऽ एहि उचित जे भक्त सभ हमर देह भिजा के निछोहे परा जाइत अछि। आब तऽ लोक सभ पूजा करै लेल नहि ओ त मूरही-कचरी खाई लेल अबैत अछि। हम बजलहुँ बाबा अपने किएक खिसियाएल छी आई तऽ हम अहॅाक लेल दूध सेहो नेने आइल छी चलू-चलू मंदिर चलू भक्त लोकनि ओहि ठाम अहॉं के तकैत हेताह। बाबा खिसियाअत बजलाह कियो ने तकैत होयत हमरा तू देख लिहक सभ मूरही कचरी खाए मे मगन होयत। तूॅं दरभंगा पढ़ैत छलह तऽ दूध सजमैन लए के अबैत छेलह मुदा जहिया सॅं पत्रकार भए दिल्ली चलि गेलह हमर कोनो खोजो पूछारी नहि केलह। देखैत छहक मंगरौना चैतीक मेला मे तोहर गामवला सभ लाखक लाख टका खर्च करैत अछि मूदा हमरा लेल भागेश्वर पंडा दिया छूछे विभूत टा पठा दैति अछि। मंगरौनाक चैती मेला बड्ड नामी छलैक ओतए कलकता सॅं मूर्ती बनौनिहार आबि के भगवतिक मूर्ती बनबैत छलैक एहि द्वारे दसो दिस सॅं लोक मेला देखबाक लेल अबैत छलाह। भागेश्वर झा महादेव मंदिरक पंडा रहैत हुनके दिया बाबाक पूजा लेल सभ किछू पठा देल जायत छलैक।बाबा फेर खिसियाअत बजलाह जे आइ हम मंदिर नहि जाएब। हम कहलियैन जे बाबा अपने चलू ने मंदिर अहॉ जे कहबै आई से हेतै आबौ अहॉंक कॅंपकॅंपि दूर भेल किनहि \ नहि हौ बच्चा आई त हमरा बूझना जाए रहल अछि जा धरि मूरही-कचरी नहि खाएब ताबैत हमर ई जार-बोखार नहि छूटत। कहू त बाबा अपने एतबाक गप जे पहिने कहने रहितहॅू त हम एतबाक देरी] बच्चा कतेक दिन मोन भेल जे तोरा कहिअ जे हमरो लेल किछू गरमा-गरम नेने अबिह मुदा नहि कहलियअ ।हम मंदिर सॅं बाहर निकैल देखैत छलहुँ जे लोग सभ हमरा जल ढ़ारी के निछोहे मूरही-कचरी वला लक परा जाइत छल एमहर हम एसगर थर-थर कॅपैत रहैत छलहुँ कियो पूछनिहार नहि। आब लोग हमर पूजा सॅं बेसी अपन पेट पूजा मे धियान लगबैत छथि। चलअ आब तहुँ देखे लिहक जे हम सत्ते कहैत छियअ कि झूठ। ओही पिपर गाछ लक सॅं हम आओर बाबा बिदा भेलहुँ रस्ता मे बाबा बजलाह जे हम किछू काल मंदिर मे रहब पूजा केलाक बाद हमरा बजा लिहअ। हम कहलियैन हे ठिक छै बाबा हम अपनेक लेल मूरही-कचरी किन लेब तकरा बाद अहॉ के बजाएब त चलि आएब। ओही ठाम सॅं बाबाक संग हम मंदिर पहुॅंचलहुँ। ओतए देखलिए जे लोग सभ बाबा के जल चढ़ा निछोहे परा जाइत छल। ओना त मिथिलांचल मे मूरही-कचरीक सुंगध सॅं केकर मोन ने लुपलुपा जाएत अछि। हमहुँ बाबाक पूजा पाठ केलाक बाद मेला घूमए गेलहॅू तऽ सभ सॅं पहिने पस्टनवला लक कचरी किनबाक लेल गेलहुँ। ओकर कचरी एहि परोपट्ा मे नामी छल। हमरा देखैते मातर ओ अहलाद बस बाजल आउ-आउ किशनऽ जी कहू कुशल समाचार। हम कहलियै जे बड्ड निक अपन सुनाबहअ। कचरीवला बाजल जे हमहूॅ ठिके छी दोकान अपना खर्चा जोकर चलि जाएत अछि। अच्छा आब हमरा दस रूपयाक मूरही-कचरी झिल्ली अल्लू चप दए दिहक। ओ हरबराइत बाजल हयिए लिए अखने गरमा-गरम कचरी अल्लू चप सबटा निकालबे केलिए अहिमे सॅं दए दैत छी। हम कहलियै जे दए दहक गरमा गरम एहि मे सॅं। ओकरा हम पाइ दैत मंदिर दिस बिदा भेलहॅू ओतए पहुॅचतैह हम बाबा के हाक देलियैन मुदा कोनो जवाब नहि भेटल। हम एक बेर फेर हाक लगेलहॅू जे बाबा छी यौ कतए छी \ जल्दी चलि आउ कचरी सेराए रहल अछि। मुदा बाबाक कोनो प्रत्युतर नहि भेटल। हमरा बुझना गेल जे बाबा फेर खिसियाकेॅे कतहूॅ अलोपित भए गेलाह। दुःखित मोन सॅं हम गाम पर बिदा भेलहुँ। पैरे-पैरे जाएत रही तऽ जहॉ पिपर गाछ लक एलहुँ कि ओ जटाधारी साधू फेर भेटलाह। हमरा देखैते ओ बजलाह आबह-आबह तोरे बाट तकैत छलहुँ जल्दी लाबअ मूरही-कचरी दूनू गोटे मिलि कए गरमा गरमा खाए लैत छी। तकरा बाद पोटरी खौलैत हम बजलहॅू हयिए लियअ बाबा खाएल जाउ। मुदा ई कि ओ फेर ऑखिक सोझहा सॅं कतहॅू अदृश्य भए गेलाह। बाबा सॅं भेंट तऽ भेल ओहि पिपर गाछ लक मुदा बाबाक लेल किनल मूरही-कचरी रखले रही गेल। गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा १.बाल गुरु ओम नाम रहै ओहि बच्चाक। मंशा नाम रहै ओहि बुच्चीक। दिल्लीक कोनो आवासीय परिसरमे दुनु गोटेक परिवार रहै छलै। बच्चा रहए मिथिलाक आ बुच्ची रहए पंजाबक। बच्चाक माए गृहणी आ पिता नोकरिहारा। बुच्चीक माए आ पिता दुनू नोकरिहारा। एह, ओकर पिताक मुरेठा देखैबला रहै छल। मंशाक माए अपन पतिकेँ सरदारजी कहै छलि। मंशाक घरमे ओड़ीसाक एकटा बचिया नोकरी करै छलि, महुआ। वैह मंशाक देख-रेख करै छलि। आवासीय परिसरक घासक पार्कमे मंशाकेँ महुआ आनै छलि। ओम ओहि पार्कमे अपन माएक संग अबै छल। मंशा आ ओम ओही पार्कमे खेलाइ-धुपाइ छल। ओमक जन्मदिनमे मंशा अबिते छली। माए ओकरा लेल उपहार कीनि कऽ राखि दैत छलीह। महुआ मंशाकेँ लऽ कऽ समएसँ ओमक जन्मदिनमे पहुँचि जाइ छलीह। ओम आ मंशा दुनूक चारिम बरख पूरल छलन्हि आ पाँचम चढ़ल छलन्हि। मुदा ओहि आवासीय परिसरमे एकटा बदमाश बच्चा आबि गेल। ओ सभ बच्चाकेँ तंग करए लागल। ओकर नाम रहै सुसेन। “गै मंशा, दुजुट्टी किए बन्हने छेँ?” “तोरा की?” “गै मंशा, मुँह किए फुलेने छेँ?” “मुँह किए फुलेने रहब?” “मंशा गै, तोहर दोस ओम किए एहन गन्दा छौ?” आब तँ मंशाकेँ ततेक तामस भेलै जकर कहब नहि। ओ जोर-जोरसँ बजए लागलि- “ओम हमर दोस छी। जे एकरा गन्दा कहैए से अपने गन्दा अछि।” मंशा ओमक हाथ पकड़ने आगाँ बढ़ि गेलि आ सभ गप ओमक माएकेँ कहलकै। “हम सुसेनपर तमसाइ छलहुँ आ ई चुपचाप ठाढ़ छल।” मंशा ओमक माएकेँ कहलक। “किए ओम। अहाँकेँ सुसेन गन्दा कहलक आ अहाँ चुपचाप ठाढ़ रहि गेलहुँ।”- ओमसँ ओकर माए पुछलखिन्ह। “माए, ओ हमरा नै चिन्हैए। नव आएल अछि। तेँ हमरा गन्दा कहलक। जखन ओ हमरा चीन्हि जाएत तँ थोड़बेक गन्दा कहत।” माए आँखिमे नोर आबि गेलन्हि। हुनको पहिने तामस आबि गेल छलन्हि जे हमर बेटा किए चुप रहि गेल। ओ सुसेनकेँ किछु कहलक किए नै। मुदा तखने हुनका मंशा देखाइ पड़लन्हि। देखियौ कतेक निश्छल अछि। आ दुनू बच्चाकेँ ओ चुम्मा लेमए लगलीह। २.शारदानगर दुर्गा पूजाक नाटकक दू दृश्यक बीच नर्तकीक नाच। “शारदानगरक ढोढ़ाँइ दस टाका तहे-तहे दिलसँ दै छथि”- नर्तकी रुखसाना बजै छथि। “बनारसक छै रौ।” “धुर, मुजफ्फरपुरसँ लऽ अनै छै आ झुट्ठो बनारसक..”। “हौ मुदा ई शारदानगर कोन गाम छै”। “बुझलही नहि। पट्टी टोलक जे पाइबला सभ रहै, से सड़कक ओहिपार टोल बना लेलकै आ लक्ष्मीपुर नाम राखि लेलकै- जे पट्टी टोलक हम सभ नहि छी। लक्ष्मी आ सरस्वतीक झगड़ा बुझल नहि छौह। से भगवानक झगड़ाकेँ सोझाँ अनने अछि। पट्टी टोल गाम गरिबहा सभक अछि, सभटा अछि महिसबार सभ। मुदा भगवानक झगड़ामे गामक नाम सरस्वतीक नामपर शारदानगर राखि लै गेल अछि।” “ चल नर्तकीकेँ तँ अही बहन्ने पाइ दै जाइ छै”। ३.एकटा पत्र शुभाशीष। हम एतय कुशल छी। अहाँ सबहक कुशलक हेतु सतत् भगवानसँ प्रार्थी रहैत छी। आगाँ समाचार ई जे अहाँ सभ हमर खोज खबरि लेनाइ बिल्कुले बिसरि गेल छी। फोनो तँ छोड़ू, चिट्ठीयोसँ गप्प केना महिनो बीति जाइत अछि। कमसँ कम सप्ताहमे नहि तँ महिनोमे एको बेर तँ मायक लेल गप्प करबाक समय निकालू। एतेक मोटका-मोटका किताब अहाँ लिखैत छी किन्तु मायसँ गप्प करबाक फुर्सति नहि अछि। अहाँक किताबक खिस्सा आ कविता सभ दीदी सुनेलक अछि। बहुत मार्मिक लगैत अछि। परन्तु अपन माँक प्रति कोनो जिज्ञासा नहि होइत अछि, जे कतय रहैत अछि आ कोना अछि। भाएसँ अहाँ अपने समय-समयपर गप्प करू जे हम कतऽ कतेक दिन रहब। गाममे आब हमरा नहि रहल होएत कारण एतए कोनो व्यवस्था नहि अछि आ कियो पुरुख नहि रहैत छथिन्ह। अहाँ सभ भाए-बहिनमे छोट छी किन्तु घरमे अहींकेँ घरक व्यवस्था आ इन्तजामक भार शुरुहेसँ अछि। किन्तु एम्हर अहाँ ध्यान नहि दैत छिऐक। फोनपर अहाँसँ गप्प करबाक बड्ड मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभसँ सेहो गप करबाक मोन होइत रहैत अछि। बच्चा सभकेँ दू-तीन दिनपर बासँ गप करबा लेल कहबै। जमाएकेँ देखैत रहै छियन्हि जे सभ दू-तीन दिनपर अपन माँसँ गप करैत रहैत छथिन्ह, से हमरो सौख लगैत रहैत अछि जे हमर बेटा सभ केहन अछि जे कहियो माँसँ गप्प करबाक मोन नहि होइत छैक। सभ कहैत अछि जे अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि, से हमरो चीजक कमी तँ नहि अछि मुदा धिया- पुताक हम प्रेमक भूखल छी। पुतोहु, अहाँकेँ एखन घरक सभटा काज करए पड़ैत होएत। बड्ड मेहनति होइय होएत, मुदा तैयो हमरोपर ध्यान राखब। हम बड्ड घबराएल रहै छी तेँ जे फुराएल से हम चिट्ठीमे लिखा देलहुँ। अहाँ सभक प्रेमक भूखल- अहींक माँ। ४. माए-बेटाक मनोविज्ञान बेटा, गाम आबैक मोन नै होइए। पुतोहुसँ आब झगड़ा नै होइए। महीस दूध दऽ रहल अछि... मुदा टोलबैय्या सभ एहि लेल जड़ि रहल अछि। ... ... अहाँक माए। “अएँ यै , अहाँक दूध होइये तँ टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक?” से बूढ़ीसँ पुछलकन्हि लिखिया। तँ कहलन्हि बूढ़ी- “जे ओ सभ मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।” चिट्ठी बेटा लग पहुँचि गेलन्हि। मुदा बेटाकेँ देखू- “अएँ यौ- हमरा दूध होइये तँ लोक सभ किएक जड़ैए? माए लिखलक अछि।” पढ़ुआ बजलाह- “टोलबैय्या सभ किएक जड़त? आ अहाँ से बुझै कोना छिऐक, माए ने लिखलन्हि अछि?” तँ कहलन्हि बेटा- “जे मोने-मोने जड़ैए, से हम सभटा बुझै छिऐ।” हजार कोस दूर रहि रहल निरक्षर दुनू माए-बेटाक बीचक विचार-तंतुक सादृश्यता! माएपर कतेक विश्वास छै? माएकेँ बेटापर आ बेटाकेँ माएपर विश्वास छै, दोसरकेँ विश्वास नै हौ तकर कोनो चिन्ता नै। माए-बेटाक मनोविज्ञान ! रामाकान्त राय ‘रमा’- पोथी समीक्षा- प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल , डॉ. योगानन्द झा- आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल, शिव कुमार झा- समीक्षा-कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक/ मौलाइल गाछक फूल/ भफाइत चाहक जिनगी रामाकान्त राय ‘रमा’ सम्पर्क- श्री रामा निवास, मानाराय टाल पोस्ट- नरहन जिला-समस्तीपुर ८४८२११ पोथी समीक्षा प्रगतिशील एवं सनातन विचारधाराक समन्वयात्मक उपन्यास ‘मौलाइल गाछक फूल’ श्री जगदीश प्रसाद मंडलक सघ: प्रकाशित उपन्यास थिकनि जकर विमोचन ०३ अप्रैल २०१०केँ जनकपुरधाम (नेपाल)मे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’ कथा गोष्ठीक अवसरपर भेल छल। एहिमे प्रगतिशील जनवादी आ पौराणिक सनातनी विचारधाराक समन्वयक परिपाक नीक जकाँ वर्णन भेल अछि। जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यक लेल नव नहि रहलाह १.७.८ वर्षक रचना धर्मिता आ मात्र दू-तीन बर्षक प्रकाशन प्रसारसँ ई मैथिली जगतमे अपन एकटा नीक स्थान बना लेलनि। आे अस्थान सेहो आन-आन लेखकसँ फराक आ बेछप अछि। ओना साहित्यमे हिनक प्रवेश राजनीति पटलसँ भेल अछि। “पैंतीस साल समाज सेवा कऽ हहरैत शरीर देखि किछु लिखै-पढैक विचार भेल।” (भूमिका।) ओ अपन पहिल कथा ‘सगर राति दीप जरय’ कथा गोष्ठीमे पढ़ि प्रशंसा प्राप्त कएलनि। लिखवाक लति बढ़लनि आ ओ अनवरत लिखय लगलाह- कथा, उपन्यास, नाटक। जे लिखवाक रूचि भेलनि-दिल खोलि कऽ लिखलाह। प्रकाशनक कोनो चिंता नहि। ओ मैथिली साहित्यक प्रकाशनक रूढ़ प्रक्रिया दिस कहियो नहि सोचलनि आ रचना धर्मितासँ विमुख नहि भेलाह हुनका अपन रचनापर पूर्ण आस्था आ विश्वास छलनि। मधुबनी कथा गोष्ठीमे पठित हिनक कथा ‘बिसांढ़’ घर बाहरमे आ दोसर कथा ‘चूनवाली’ सन् २००९ उतरार्द्धमे ‘मिथिला दर्शन’मे छपल। एहि दुनू रचनाक कथानक, लिखबाक शैली ओहिमे व्यक्त विचारधारासँ लोक वेश प्रभावित भेल। लेखनमे नव रहितहुँ अनुभूतिक अभिव्यक्ति कौशलसँ लबालब भरल हिनक रचना सभ मिथिलांचलक आम जीवनकेँ नीक जकाँ प्रतिविम्बित करैत अछि जे पाठककेँ चुम्बक जकाँ अपना दिस आकृष्ट कऽ लैत अछि। मैिथलीक युवा लेखक एवं विदेह पत्रिकाक संपादक श्री गजेन्द्र ठाकुर मानैत छथि जे ‘जगदीश प्रसाद मंडल शिल्पी छथि, कथ्यकेँ तेना समेट लैत छथि जे पाठक विस्मित रहि जाइत अछि। समाजक सभ वर्ग हिनक कथ्यमे भेटैत अछि आ से आ से आलकारिक रूपमे नहि वरण् अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर अएवाक समान अछि।’ यएह कारण अछि जे हिनक सात-आठटा पुस्तकक प्रकाशन दुइये कथा प्रकाशनक वाद दिल्लीक प्रतिष्ठत प्रकाशक ‘श्रुति प्रकाशन द्वारा वर्षाभ्यन्तरे भेल अछि। एहन मैथिली लेखक विरले छथि जे मात्र अपन लेखन क्षमताक बलपर कोनो प्रकाशककेँ एतेक अत्यल्प अवधिमे आकृष्ट कऽ अपन प्रारम्भिक रचनोक प्रकाशनक मार्ग प्रशस्त कएने होथि! ‘मौलाइल गाछक फूल’क कथानक तँ सोझ अछि। रमाकान्त गामक एकटा पैघ भूस्वामी प्राय: दू सए बीघाक भूमिक मािलक छथि। ओ कम पढ़ल-लिखल रहलाक वादो परोपकारक भावना, गाम-समाजक हितक चिंतासँ सदति चिंतित रहैत छलाह। घोर अकालमे अन्न बिन हकन्न कनैत लोक लेल ने केबल स्वयं अपन पोखरि उराहबाक काजसँ जन-गणक मन मोहि लैत छथि प्रत्युत, अड़ोसियो-पड़ोसियो गाममे श्री सम्पन सभकेँ एहन-काज करवा लेल उत्प्रेरितो करैत छथि। अपन विद्वान पिता द्वारा सम्पति आ हुनकेसँ प्राप्त ज्ञानक कारणे कालान्तरमे ओ अपन सभटा भूमि समाजक सभ वर्गक दीन-हीन लोकमे बॉटि कऽ स्वयं चैनक वंशी बजबैत छथि। हुनका अपन भरण पोषणक कनियो चिंता नहि छनि। किएक तँ हुनक दू-दूटा पुत्र मद्रासमे डाक्टरी पढ़ि ओहिठाम सरकारी सेवामे छनि। ओ दुनू अपन मनोनकूल मेहनतिसँ अर्जित कऽ नीक घर-द्वारि बना ओतहि रहैत छथि। ओ सभ यदा-कदा गाम आबि माता-पिता आ गामक लोकसँ भेँट-घाँट कऽ जाइत अछि। गाममे दूटा बस्तुक अभाव छैक- पहिल उच्च शिक्षा लेल विद्यालय आ दाेसर दुखित-पीड़ितक लेल चिकित्सालय। रमाकान्त सहयोगे पहिने एकटा पुरूष आ एकटा महिला प्राथमिक चिकित्साक ट्रेनिंग मद्राससँ कऽ अबैत छथि। पछाति जमीन्दारक डाक्टर पुत्र आ पुत्रवधू जखन गाम अबैत छथि तँ पिता आ समाजक समझौता बुझौला तथा परोपकार एवं जनसेवाक भावनासँ प्रेरित भऽ चारिम डाक्टरमे सँ एक एकटाकेँ क्रमश: गाममे रहि लोकक सेवा करबा लेल तैयार भऽ जाइत छथि आ गाममे चिकित्सा आरम्भ कऽ दैत छथि। एहिसँ मात्र ओहि गामक लोककेँ नहि प्रत्युत लग-पासक आनो-आन गामक मौलाइल गाछ, रोग व्याधि ग्रस्त लोक सभमे चिकित्सा सुविधा रूपी नव जीवनक फूल बिहँसि उठैत अछि। उपन्यास आ लघुकथाक कथानकमे अन्तर होइछ। कथा जीवनक कछु दिन, किछु क्षणक उतार-चढ़ाव, स्थिति-परिस्थितिक वर्णन होइत अछि, मुदा उपन्यासमे जीवनक प्राय: सम्पूर्ण नहि तँ अधिकसँ अधिक घटना, दुर्धटनाक आरोह-अवरोहक महत्वपूर्ण रोडपर रोकैत, विश्राम करैत, थाकैत, खसैत, पड़ैत, उठैत स्थिति निरपेक्ष लेखन अछि। कथाकेँ जलखैक भूजा किवां सातु मानल जाए तँ उपन्यासक विन्यास पूर्णत: भोजन अछि। ई उपन्यास आदर्श जनवादी धरातलपर ठाढ़ अछि। एहिठाम जनवादमे जे अादर्शक समन्वय भेल अछि, से प्रशस्त सनातन परम्परामे सेहो विधमान अछि। जेना एहि उपन्यासमे कएल गेल एकटा महत्वपूर्ण कार्य अछि परोपकार। महर्षि व्यास परोपकारकेँ पुण्यक एकमात्र कार्य मानैत छथि- “अष्ट्ादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।’ परोपकार: पुण्याय पापाय पर पीड़नम्।।” दोसर शब्दमे हम कहि सकैत छी जे उपन्यासकार मार्क्सवादसँ नीक जकाँ प्रभावित छथि मुदा अपन सनातन परम्परा, धर्म-कर्म आ आचार-विचारक प्रति सेहो विशेष सहानुभूति रखैत छथि। एकरा देश-काल आ परिवेश प्रभाव सेहो कहल जा सकैछ। उपन्यासक भाषा ठेठ ग्रामीण भाषा अछि जे मधुबनी जिलाक पूर्वाचलमे बाजल जाइत अछि। हमरा उपन्यासक ई आंचलिक भाषा प्रभावित अवश्य करैत अछि मुदा कतहु-कतहु आंचलिकता आकि बोल-चालक भाषा मानक मैथिली भाषाकेँ काटैत जकाँ लगैत अछि किएक तँ एहिमे हमरा क्रिया पदक आपूर्ण प्रयोग जकाँ बुझाइत अछि। जेना- किछु फुरबे ने करैत।(पृ.५), बखारिक धान आ मड़ुआक हिसाब मिलबैत।, मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे ने करैत। एहिठाम एहि तीनू वाक्यक क्रिया पद अपूर्ण लगैत अछि। हमरा जनैत मानक मैथिलीमे क्रमश: किछु फुरबे करैक/करैत छलैक।, हिसाब मिलबैत छलाह आ निलकबे ने करैक/करैत छलैक एहि प्रकारे होएत। एहन क्रियापदक प्रयोग प्राय: सभ पृष्टपर अछि जाहिसँ हमरा बुझि पड़ैछ जे ई ओहि ग्राम्यांचलक विशेष प्रयोग होइक जकरा अंगीकार करब, लेखककेँ समुिचत बुझयलनि। कारण कोसे-कोसे पानी आ पॉच कोसपर वाणी तँ सुप्रसिद्धे अछि। मूल कथामे अनेक छोट-छोट उपकथा, सह कथा कथानककेँ अत्यधिक रोचक बनबैत अछि। तहिना कतेको ठाम लेखक अपन विचारक वीथी विभिन्न पात्रक मुखसँ कहबौने छथि जे नीक सूक्ति की सदुक्ति बनि कऽ पुस्तकसँ फराको रहि लोककेँ प्रेरणा दैत रहत। जेना- (क) जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक कएल रस्ता पकड़ि कऽ चलक चाही। (ख) मनुखमे जन्म लेलापर क्यो माए-बापक सेवा नहि करै तँ ओ मनुखे की? (ग) मनुखकेँ कखनो निरास नहि हेबाक चािहएेक, जखने मनुखमे निराशा अबैत छैक तखने मृत्यु लग चल अबै छैक। तेँ सदिखन आशावान भऽ जिनगी वितेबाक चाहिएेक। कठिनसँ कठिन समए किएक ने आबए मुदा विवेकक सहारा लऽ आगु डेग बढ़ेबाक चाहिऐक। समग्रत: मौलाइल गाछक फूल ‘मार्क्सवादी विचारधारा आ भारतीय सनातन विचारधाराक समन्वयवादी एकटा एहन मौलिक कृति अछि जकरा मैथिली भाषाक पाठक पढ़वाक लेल सदति उत्सुक रहताह- ई हमर दृढ़ विश्वास अछि। चर्चित पोथी- मौलाइल गाछक फूल (उपन्यास) लेखक- श्री जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन, न्यू राजेन्द्र नगर दिल्ली-११००८ दाम- २५० टाका मात्र पृष्ठ संख्या- १२८ पोथी प्राप्तिक स्थान- पल्ल्वी डिस्ट्रीब्यूटर्स वार्ड नं.६, निर्मली (सुपौल) मोवाइल नं. ०९५७२४५०४०५ डॉ. योगानन्द झा आदर्शक उपस्थापन : मौलाइल गाछक फूल :: श्री जगदीश प्रसाद मण्डल बहुआयामी रचनाकार छथि। कथा, उपन्यास, नाटक आदि विभिन्न विधामे प्रभूत रचना द्वारा ई आधुनिक मैथिली साहित्यमे बेछप स्थान बना चुकल छथि। ‘मौलाइल गाछक फूल’ हिनक औपन्यासिक कृति थिकनि। आदर्शवादी विचारधारासँ ओतप्रोत हिनक एहि उपन्यासमे मण्डलजीक उदात्त सामाजिक चिन्तनक प्रक्षेपण भेल अछि। एहि उपन्यासक अधिकांश चरित्र उदार ओ सज्जन प्रकृतिक छथि। हुनका लोकनिक हृदय पवित्र छनि आ स्वार्थ ओ वासनासँ फराक रहि समाज उत्थानक हेतु चिन्तन करैत देखि पड़ैत छथि। स्वभावत: एहन चरित्र सबहक अनुगुम्फनसँ ई उपन्यास एक गोट पिरष्कृत सामाजिक चिन्तनक मार्ग प्रशस्त करैत देखि पड़ैत अछि। एहि उपन्यासक केन्द्रीय पात्र छथि रमाकान्त। उपन्यासक अधिकांश घटना हिनके परित: आघूर्णित होइत अछि। ई जमीन्दार छथि आ सुभ्यस्त सेहो। उदार विचार, इमानमे गंभीरता, मनुक्खक प्रति सिनेह हिनक चारित्रिक विशिष्टता छनि। हिनकामे ने सूदिखोर महाजनक चालि छनि ने धन जमा कएनिहार लोकक अमानवीय व्यवहारे छनि। नीक समाजमे जेना धनकेँ जिनगी नहि अपितु जिनगीक साधन बुझल जाइत अछि, सएह रमाकान्तोक परिवारमे छनि। उपन्यासक आरम्भहिमे हिनक उदात्त चरित्रक परिचए भेटि जाइत अछि। गाममे अकाल पड़ि जाइत छैक। आ लोक सभ अन्न बेत्रेक मरब शुरू कऽ दैत अछि। मुदा रमाकान्त लग बखारीक बखारी अन्न पड़ल छनि। लोकक प्रति सहानुभूतिसँ द्रवित भऽ रमाकान्त अपन बखार फोलि दैत छथि आ काजक बदला अनाज कार्यक्रम शुरू कऽ अपन पोखड़िकेँ उरहबा लैत छथि। एहिसँ एक दिस जँ लोककेँ अकर्मण्यतापूर्वक खराती अन्न लेबासँ परहेज करबैत छथि तँ दोसर दिस अन्नाभावमे लोककेँ मरबासँ बचबैत छथि। रमाकान्तक ई अवधारणा छनि जे संसारक यावन्तो मनुक्ख अछि सभकेँ जीबाक अधिकार छैक। सभकेँ सभसँ सिनेह होएवाक चाहिऐक। मुदा जाहि परिवेशमे हमरालोकनि जीवि रहल छी, जाहिठाम व्यक्तिगत सम्पत्ति आ जबाबदेहीक बीच मनुक्ख चलि रहल अछि, ओहिठाम सिनेह खंडित होएबे करतैक आ सिनेह खंडित भेने पारस्परिक द्वेष ओ लड़ाइ-दंगाकेँ कोनो शक्ति रोकि नहि सकैत छैक। तेँ नूतन समाजक निर्माणक हेतु, सामाजिक समरसता हेतु त्याग भावनाक आवश्यकता छैक आ छैक पारस्परिक सहयोग भावनाक विस्तारक आवश्यकता। तेँ ओ अपन दू सए बीघा जमीन गामक भूमिहीन परिवार सबहक बीच वितरणक निर्णए लैत छथि जाहिसँ गामक सभ व्यक्ति सुखी आ सम्पन्न भऽ सकथि। यद्यपि रमाकान्तक एहि प्रकारक अतिशय उदारता जमीन्दारक प्रवृत्ति ओ समसामयिक यथार्थक दृष्टिये सर्वथा अविश्वसनीय प्रतीत होइत अछि, तथापि ई उदात्त लेखकिय कल्पना उपन्यासकारक एहि उद्देश्यकेँ प्रतिपादित करैत अछि जे यावत् समाजमे एक दिस अति विपन्न आ दोसर दिस अति सम्पन्न लोकक वास रहत, ताधरि सामाजिक समरसताक बात स्वप्ने बनल रहत। रमाकान्त उदारताक अतिरंजित वर्णन उपन्यासमे अनेक स्थलमे देखि पड़ैत अछि यथा ओ शशिशेखर नामक युवकक उच्च शिक्षाक हेतु सहायता प्रदान करैत छथि, गाममे स्कूल स्थापित होएबा काल शिक्षकक भोजनादिक व्यवस्थाक भार अपना ऊपर लऽ लैत छथि, टमटमबलाक दु:खिताहि घरवालीक ईलाजक हेतु ओकरा पर्याप्त टाका दऽ सहायता करैत छथि, आदि। एहि उपन्यासमे मण्डलजी मिथिलाक ग्राम्य जीवनमे पसरल धर्मभीरूताक समस्याक यथार्थवादी चित्रण कएलनि अछि। एहि समस्याक चित्रण हेतु ओ सोनेलाल नामक पात्रक अवतारणा करैत छथि। सोनेलालक पत्नी दु:खित पड़ि जाइत छथिन। ओ ओकरा अस्पतालमे देखएबाक हेतु अपन जमीन भरनापर दऽ दैत छथि। उपचार भेलापर हुनक पत्नी स्वस्थ भऽ जाइत छथिन। मुदा ताही क्रममे ओ साधु भण्डाराक कबुला कऽ लैत छथि। एहि कबुलाकेँ पूर करबाक हेतु साधुक दूटा दल निमंत्रित कएल जाइत छथि। हिनकालोकनिक हेतु सोनेलाल पर्याप्त भोज्य पदार्थ जुटबैत छथि। मुदा साधुक दुनू दलमे एकटा वैष्णव सम्प्रदायक तथा दोसर कबीरपन्थी सम्प्रदायक रहैत अछि आ दुनू दल अपन-अपन साम्प्रदायिक अभिवमानसँ ग्रस्त रहैत अछि जकर कारणे भण्डारामे अनेक विसंगति उत्पन्न होइ छैक। मुदा सर्वाधिक कष्टकर स्थिति तखन बनैत छैक जखन वैष्णव सम्प्रदायक महन्थ भण्डाराक बाद स्थानक हेतु एक सए एक, अपना हेतु एक सए एक, भजनिया सभक हेतु एकावन-एकावन आ भनसीयाक हेतु एकासी-एकासी टाका दक्षिणाक मांग कऽ बैसैत छथि। मराभवमे पड़ितहुँ धर्मभीरू सोनेलालकेँ ओ रकम चुकता कऽ देबऽ पड़ैत छनि। तत:पर दोसर दल सेहो हुनका ओतबे दक्षिणा देबाक हेतु दबाब दैत छनि आ सेहो हुनका चुकता करऽ पड़ैत छनि। एहि तरहेँ धर्मभीरू लोक पाखंडी साधु समाज द्वारा कोना लूटल जाइत छथि, तकर वर्णन कए उपन्यासकार एहि समस्याक प्रति लोकदृष्टिकेँ सचेत करबाक उपदेश दैत छथि। अवश्ये दोसर मंडली द्वारा दक्षिणाक रकम घुरा देलासँ सोनेलालकेँ थोड़ैक राहत भेटैत छनि आ ओहि मंडलीक प्रति लोक जगतमे सहानुभूति जगैत छैक। मिथिलाक अनेक लोकव्यवहार सेहो लोकजीवनक अभ्युन्नतिमे बाधक रहल अछि, ताहू दिस मण्डलजी संकेत कएलनि अछि। एहि हेतु ई शशिशेखर नामक पात्रक अवतारणा कएलनि अछि। शशिशेखर कृषि कओलेजमे प्रवेश पाबि जाइत अछि। ओ एहि प्रवेशसँ अपन भावी सुखी जीवनक परिकल्पना कऽ अत्यन्त आनन्दित होइत अछि। ओकर पिता सेहो खेत बेचियो कऽ ओकर पढ़ाइ पूरा करएबाक संकल्प लैत छथि। मुदा किछु दिनक बाद पिता बीमार पड़ि जाइत छथिन। शशिशेखर खेत बेचियो कऽ हुनक इलाज करबैत छनि मुदा ओ कालकवलित भऽ जाइत छथिन। तत:पर अपन बूढ़ि माताक सेवा करैत शशिशेखर अपन आगूक पढ़ाइ कोना जारी राखि सकत ताहिपर बिन्दु विचार कएने खेते बेिच कऽ पिताक श्राद्धो कऽ लैत अछि। परिणामत: ओकरा कओलेज छोड़बाक बाध्यता होइत छैक। एहि तरहेँ मण्डलजी लोकजगतमे व्याप्त अन्धविश्वास ओ लोकव्यवहारसँ बचले उत्तर समाजक कल्याणक दिशानिर्देश करबैत देखि पड़ैत छथि। अन्तत: रमाकान्तक सहायतासँ शशिशेखरकेँ अपन पढ़ाइ पूर करबाक संबल भेटि जाइत छैक मुदा श्राद्धादित लोकव्यवहारक समस्याक प्रति जुगुप्साक भाव अवश्य उत्पन्न भऽ जाइत छैक। अशिक्षा ग्राम्यजीवनक दैन्यक अन्यतम कारण अछि एखनो मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजमे शिक्षाक सर्वथा अभाव छैक जकर कारणे सामाजिक अन्नति बाधिक छैक। मुदा अहू समस्याक समाधान सामाजिक लोकनिक जागरूकतासँ संभव छैक। मसोमातक दान कएल जमीनपर विद्यालयक स्थापना, हीरानन्द द्वारा बौएलाल ओ बौएलाल द्वारा सुमित्राकेँ शिक्षित कऽ ओकरा सबहक स्तरीय जीवनक चित्रण ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक एही उद्धेश्यपरक दृष्टिकोणक परिचायक थिक। आजुक ग्राम्य समाजक ई विडम्बना छैक जे पढ़ल-लिखल धियापुता पाइ कमएबाक अन्ध दौड़मे शामिल भऽ गेल छैक। तेँ ओ सभ अपन गाम-समाजकेँ छोड़ि हजारो मीलक दूरीपर नोकरी करऽ चलि जाइत छैक। परिणामत: बूढ़ माता-पिताक परिचर्या कएनिहार केओ रहि नहि पबैत छैक। पारिवारिक विघटनक फलस्वरूप सामाजिक जगतमे पसरल एहि विसंगतिक कथा रमाकान्त ओ हुनक डाक्टर पुत्र सबहक कथामे भेटैत अछि। मण्डलजी एहू विडम्बनासँ समाजकेँ बचबाक संकेत एहि उपन्यासक माध्यमे कएलनि अछि। हुनक भावना सुबुधक एहि उक्तिमे साकार भेल अछि- ‘आइक जे एकांगी परिवार अछि ओ कुम्हारक घराड़ी जकाँ बनि गेल अछि। बाप-माए कत्तौ, बेटा-पुतोहु कत्तौ आ धिया-पुता कत्तौ रहऽ लागल अछि। मानवीय सिनेह नष्ट भऽ रहल अछि।’ यद्यपि ई भावना कृषक युगीन होएबाक कारणे साम्प्रतिक यथार्थक दृष्टि जे पुरातन पद्धतिक अछि तथापि एकटा वैचारिक द्वन्द्वकेँ ठाढ़ करैत अछि। मण्डलजी रमाकान्तक दुनू डाक्टर पुत्रक मद्रासमे नोकरी करबाक लाथे किछु ग्रामेतर समस्या सबहक चित्रण सेहो कएलनि अछि। एहिमे सर्वाधिक प्रमुख अछि धनलिप्सामे व्यस्त समाजक बेचैनी। महेन्द्रक एहि कथनसँ ई प्रतिभासित होइत अछि जे ग्रामेतर समाजमे अत्यधिक सुविधा सम्पन्न लोकोक जीवन असामान्य भऽ गेल छैक- ‘अपनो सोचै छी जे एते कमाइ छी, मुदा िदन राति खटैत-खटैत चैन नहि भऽ पबैत अछि। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से बुझिये ने रहल छी। टी.भी. घरमे अछि, मुदा देखैक समये ने भेटैत अछि। खाइले बैसै छी तँ चिड़ै जकाँ दू-चारि कौर खाइत-खाइत मन उड़ि जाइत अछि जे फल्लांकेँ समए देने छिऐक, नहि जाएब तँ आमदनी कमि जाएत। तहिना सुतइयोमे होइत अछि। मुदा एते फ्रीसानीक लाभ की भेटैत अछि? सिर्फ पाइ। की पाइये जिनगी छिऐक?’ एतावता मौलाइल गाछक फूलमे लोकजीवनक विविध समस्या ओ तकर समाधानक मार्ग तकबाक प्रयत्न भेल अछि। ‘अपन जिनगीकेँ जिनगी देखैत परिवार, समाजक जिनगी देखब जिनगी थिक।’ मण्डल जीक आदर्शवादी चिन्तनक रूपमे प्रतिफलित भेल अछि। प्राय: एही तथ्यकेँ ध्यानमे रखैत महेन्द्र द्वारा गामहिमे स्वास्थ्य केन्द्र स्थापना कऽ विचार अभिव्यक्त कराओल गेल अछि जतऽ ओकर परिवारक एकटा डाक्टर नित्य मरीजक सेवा, ग्रामवासीक सेवाक हेतु उपलब्ध रहितैक। सामाजिक समन्वयक प्रति पक्षधरता एहि उपन्यासमे भजुआक कथामे भेटैत अछि। जाति-पातिमे बँटल ग्राम्य समाजमे छूताछूत, ऊँच नीचक विचार अदौसँ रहलैक अछि। गाँधीजीक स्वतंत्रता आन्दोलनक समए अछूतोद्धारक प्रति हुनक चेष्टा ओ स्वातंत्र्योत्तर कालमे समाजक बदलैत रीति-नीतिक कारणे यद्यपि ग्रामो समाजमे अस्पृश्यताक प्रति भाव बदललैक अछि तथापि सहभोजनक दृष्टिये अखनो जाति-पातिक बीच दूरी बनले छैक। रमाकान्त द्वारा डोम भजुआक ओहिठाम जाए भोजन करबाक कथाक माध्यमे मण्डलजी समाजक एहि समस्याक आदर्शपूर्ण समाधान देखौलनि अछि। अवश्ये एहिमे इहो संकेत देल गेल अछि जे समरसताक बाधक तथाकथित अस्पृश्य लोकनिक शुचिताक प्रति प्रतबद्धताक अभाव रहलनि अछि। जे अशिक्षाजन्य अछि तथा शिक्षा द्वारा ओकरो बदलल जा सकैत छैक। मण्डलजीक एहि उपन्यासमे नारी विषयक चिन्तनमे प्राचीन भारतीय नारीलोकनिक आदर्शेक उपस्थापन भेल अछि। हिनक अधिकांश नारी पात्र यथा रधिया, श्यामा, सुगिया, सोनेलालक बहिन आदिमे पतिपरायणा भारतीय नारीक चित्रांकन भेल अछि। नारी-शिक्षाक प्रतिबद्धता सेहो मण्डलजीक एहि उपन्यासमे सुमित्राक माध्यमे अभिव्यक्र भेल अछि जे पढ़ि-लिखि कऽ नीक परिचारिकाक रूपमे गामक हेतु एकटा सम्पत्ति बनि जाइत अछि। सुजाता सेहो एहने नारी पात्र छथि जे श्रमिक परिवारमे जन्म लेलाक बादो महेन्द्रक सहायता पाबि डाक्टरनी बनि जाइत छथि आ महेन्द्रक भावहु सेहो भऽ जाइत छथि। मुदा शिक्षिताक संगहि मंडलजी जाहि नारीस्वरूपक परिकल्पना एहि उपन्यासमे रूपायित कएलनि अछि, से थिक नारीक सबला रूप। नारीक एहि स्वरूपक चित्रांकन सितियाक चरित्रमे भेल अछि। ओ नहि केवल अपन इज्जतिपर हाथ उठौनिहार ललबाकेँ थूरि कऽ राखि दैत अछि अपितु जखन ललबाक गामक लोक ओकरा गामपर आक्रमण कऽ दैत छैक, तँ नारीलोकनिक सेनानायिका बनि ओकरो सभकेँ परास्त कऽ दैत अछि। स्वातंत्र्योत्तर भारतमे भ्रष्टाचार एक गोट कोढ़क रूपमे देखि पड़ैत अछि जे राष्ट्रीय जीवनकेँ कुण्ठित जीवन जीबाक बाध्यता होइत छैक। मास्टरक बहालीमे हीरानन्दक आक्रोशक माध्यमे मण्डलजी सरकारी स्तरपर होइत भ्रष्टाचारक यथार्थकेँ अभिव्यक्ति प्रदान कएलनि अछि। मिथिलाक आर्थिक समृद्धिक हेतु एहिठाम जलकरक सदुपयोग करबाक चिन्तन सेहो एहि उपन्यासमे अभिव्यक्त भेल अछि। मौलाइल गाछक फूक’क भाषा अत्यन्त सरल, सहज ओ गमैया मैथिली थिक। मण्डलजी अपन कल्पित संसारकेँ मूर्त्त, विश्वसनीय ओ सजीव रूपमे प्रस्तुत करबाक हेतु लेखनक अनेक प्रविधिकेँ एहि उपन्यासमे समाहित कएने देखि पड़ैत छथि। अनेक ठाम हिनक नाटकीय भाषा प्रयोग अत्यन्त तीब्रता ओ सहजताक संग भेल अछि, यथा- ‘की कहैले ऐहल?’ ‘नत दैले एलौं।’ ‘कोन काज छिअह?’ ‘काज-ताज नै कोनो छी। ओहिना अहाँ चारू गोरेकेँ खुअबैक विचार भेल’ इत्यादि। अनेकठाम ई संस्मरणात्मक भाषाक सुष्ठु प्रयोग कएने छथि यथा- ‘एहि गाममे पहिने हम्मर जाति नै रहए। मुदा डोमक काज तँ सभ गामेमे जनमसँ मरन धरि रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहै। पूभरसँ कोशी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि आएल। अखार चढ़िते कोसी फुलेलै। पहिलुके उझूममे तेहेन बाढ़ि चलि आएल जे बाधक कोन गप्प जे घरो सभमे पानि ढूकि गेल। तीन-दिन तक ने मालजाल घरसँ बहराएल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समए बितौलक। मगर पहिलुका बाढ़ि रहै, तेसरे दिन सटकि गेल।’ इत्यादि। परिवेश ओ वातावरणक निर्माणक हेतु मण्डलजी अभिधा शक्तिसँ संपुष्ट भाषाक प्रयोग द्वारा सटीक ओ विश्वसनीय बिम्ब ठाढ़ करबामे समर्थ देखि पड़ैत छथि यथा- ‘दू साल रौदीक उपरान्त अखाढ़। गारमीसँ जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौँकि-हौँकि लोक सभ बितबैत। सुतली रातिमे उठि-उठि पानि पीबए पड़ैत। भोर होइते घाम उग्र रूप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारैले लग पहुँचि जाइत, तहिना सुरूजो लग आबि गेलाह। रस्ता-पेराक माटि सिमेंट जकाँ सक्कत भऽ गेल अछि।’ इत्यादि। पात्रक परिचय दैत काल मण्डलजी ओकर रूपरेखा, वेश भूषा, आयु आदिक वर्णन अनेक ठाम ओहि पात्रक ठोस व्यक्तित्वकेँ अभिव्यक्त करबाक हेतु कएलनि अछि। मुदा एहि प्रकारक वर्णनक प्रति हुनका प्रतिबद्धता नहि देखि पड़ैछ। तथापि जतऽ कतहु ओ पात्रक मनोभावक वर्णन कएने छथि ओहिठाम हुनक भाषा विश्लेषणात्मक प्रकृतिक देखि पड़ैत अछि जाहिसँ पात्रक हृदयगत भावक प्रति पाठककेँ सुनिश्चित आकलनक अवसर भेटि जाइत छनि, यथा- ‘ब्रह्मचारी जीक बात सुनि रमाकान्तकेँ धनक प्रति मोहभंग हुअए लगलनि। सोचए लगलाह जे हमरो दू सए बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि। जँ ओहि जमीनकेँ निर्भूमिक बीच बाँटि दिऐक तँ कते परिवार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जिनगी जीबै लागत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि जे ढेरिऔने छथि। अदौसँ मिथिलाक तियागी महापुरूषक राज रहल, किएक ने हमहूँ ओहि परम्पराकेँ अपना, परम्पराकेँ पुन:र्जीवित कऽ दिऐक।’ एहि तरहेँ ‘मौलाइल गाछक फूल’मे भाषाक कुशल ओ रचनात्मक प्रयोग भेल अछि जाहिसँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बिम्बधर्मिता, स्पष्टता ओ मनोवैज्ञानिक विश्लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि। अपन गुणक कारणेँ मण्डलजीक कथासंसारमे विश्वसनीयता देखि पड़ैत अछि आ ओ अपन प्रौढ़ विचार ओ अनुभूतिकेँ पाठकीय मानसमे स्थानान्तरित करबामे सफल भेल छथि। अन्तत: महेन्द्रक उक्ति- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि, ओहिमे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देबाक अछि जाहिसँ ओहिमे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’मे उपन्यासक उद्धेश्य स्फुट भेल अछि। स्वभावत: मण्डलजी एहि कृतिक माध्यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि व्यक्ति, परिवार, समाज ओ राष्ट्रक अभ्युन्नतिक हेतु एकर प्रत्येक इकाइकेँ त्याग ओ त्याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श जीवन पद्धति अपनयबाक संदेश देलनि अछि। हिनक ई संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क भावनाक पुन: उपस्थापन थिक। शिव कुमार झा समीक्षा- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक गतांकसँ आगाँ सहस्त्रवाढ़नि उपन्यास :- सहस्त्रवाढ़नि एकटा आकाशीय पिण्ड होइत अछि, जकर दर्शन आर्यक धार्मिक दृष्टिकोणमे अछोप बुझना जाइत अछि, मुदा उपन्यासकार एक अछोप पिण्डकेँ आत्मसात् करैत एकरा सावित्री बना देलनि। सावित्री अपन पातिब्रत्य आ दृढ़ निश्चयसँ सत्यवानक प्राण यमराजसँ छीनि लेने छलीह। एहि उपन्यासक दृष्टिकोण तँ एहन नहि अछि परंच उपन्यासक नायक आरूणिक मृत्युपर विजयमे सहस्त्रवाढ़निक उत्प्रेरणक उद्वोधन कएल गेल अिछ। कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक मूल पृष्ठपर सहस्त्रवाढ़निक चित्र देल गेल अछि। एहिसँ प्रमाणित होइत अछि रचनाकारक दृष्टिमे सम्पूर्ण पोथीक सातो खण्डमे एहि उपन्यासक विशेष महत्व अछि। सहस्त्रवाढ़निक अध्ययन कएलापर उन्नैसम शताब्दीक उतरांशसँ वर्तमानकाल धरिक वर्णन कएल गेल अछि। एक परिवारक एक सए पंद्रह बरखक कथाक वर्णनकेँ कल्प कथा मानव निश्चित रूपसँ रचनाकारक भावनापर कुठाराघात मानल जाएत। सध: ई कथा रचनाकारक पॉजड़िक कथा अछि। जौं एकरा गेजेन्द्र बावूक आत्मकथा मानल जाए तँ संभवत: अति शयोक्ति नहि हएत। उपन्यासक आदि पुरूष झिंगुर बावू एकटा किसान छथि। जनिक घरमे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसक स्थापना बर्ख सन् 1885 ईमे एकटा बालक जन्म लेलन्हि- कलित। कलितक नेनपनसँ एहि उपन्यासक श्री गणेश कएल गेल। कलितकेँ ओहि कालमे वंगाली शिक्षकसँ अंग्रेजीक शिक्षण व्यवस्था दरिभंगामे कएल गेल। एहिसँ दू प्रकारक भावक वोध होइत अछि। पहिल जे झिंगुर बावू समृद्ध लोक छलाह। ओहि कालमे अवहट्ठक शिक्षा सेहो गनल गुथल परिवारमे देल जाइत छल, अंग्रेजीक कथा तँ अति विरल छल। देासर जे वंगाली लोक हमरा सभसँ शिक्षाक दृष्टिमे आगाँ छलाह। वंगाली जातिक अंग्रेजी शिक्षक, हम सभ कतेक पाछाँ छलहुँ जे हमरा सबहक संस्कृतिक राजधानी दरिभंगामे कोनो मैथिल अंग्रेजी शिक्षक झिंगुर बावूकेँ नहि भेटलन्हि। सौराठ आ ससौलाक सभा गाछीक चर्च तँ बेरि-बेरि कएल जाइत अछि, मुदा एहि पोथीमे विलुप्त सभा बलान कातक गाम परतापुरक सभा गाछीसँ कथाकेँ जोड़वाक दृष्टिकोण अलग मुदा नीक बुझना जाइत अछि। कलितक विवाहमे वर महफामे, बूढ़ वरियाती कटही गाड़ीमे आ जवान लोकक पैदल जाएव वर्तमान पीढ़ीक लेल अजगुत लागत मुदा अपन पुरातन संस्कृतिसँ नेना-भुटकाकेँ आत्मसात कराएव आवश्यक अछि। कलितक मृत्युक पश्चातक कथा हुनक छोट पुत्र- नंद-क परिधिमे धूमए लागल। नंदक पारदर्शी सोच, अपन कनियासँ प्रत्यक्षत: गप्प करव, तृतीय पुरूषक रूपे संवोधन नहि। मिथिलामे वर-कनिया, सासु-पुतोहु, साहु जमाएक गप्पमे तृतीय पुरूषक संवोधन अनिवार्य होइत अछि। एहि प्रकारक व्यवस्थाक विरूद्ध नंदजी अपन नवल सोचकेँ केन्द्रित कएलन्हि। वर-कनियाँक संवंध स्वाभाविक रूपेँ तँ समझौता मात्र होइत अछि परंच संसारक व्यवस्थामे सभसँ पवित्र आ अपूर्व संबंध यएह होइत अछि। जीवन भरि निर्वहन कोनो एक जनक संग छूटलापर दोसरमे व्यथा..... अकथ्य व्यथा। तेँ एहि संबंधमे प्रत्यक्ष संवोधन होएवाक चाही। हमर दृष्टिकोण ई नहि जे अपन संस्कृति पराभव कऽ देवाक चाही, मुदा संस्कृति आ व्यवस्थाकेँ सेहो कालक गतिमे परिवर्तनक अनिवार्यता प्रतीत होइत अछि। आर्यावर्त्त न्याय, कर्म, मीमांसा सन प्रांजल दर्शनक अार्विभाव भूमि मानल जाइत अछि। एहि खण्डमे एकटा नव दर्शनसँ मिथिलाक भूमिकेँ वैशिष्ट्ता प्रदान कएल गेल ओ अछि- इमान आ मर्मक विम्बमे संबंधक मर्यादा। नंद बावू इंजीनियर छलाह। जौं अपन धर्मकेँ किछु ढील कऽ दैतथि तँ भौतिकताक बाढ़िसँ परिवार ओत-प्रोत भऽ सकैत छल। मुदा एना नहि कऽ सतत अपन कर्मकेँ साकार सत्यसँ बान्हि लेलन्हि। स्वाभाविक अछि अर्थयुगमे इमानक प्रासंगिकता बड़ ओछ भऽ जाइत अछि। असमए मृत्युक पश्चात् परिवारक दशाक विवेचन मर्मस्पर्शी लागल। हुनक सत् कर्मक प्रभाव यएह भेल जे संतान सभ विशेषत: आरूणि भौतिक रूपसँ रास संपन्न तँ नहि भऽ सकलाह मुदा पिताक छत्र-छायाक आंगनमे मनुक्ख भऽ गेलाह। कर्मक गतिसँ लोक राज भोगकेँ प्राप्त तँ कए सकैत अछि, मुदा मनुक्ख बनवाक लेल नैसर्गिक संस्कार वेशी महत्वपूर्ण होइत अछि। तेँ कहलो गेल अछि- “बढ़ए पूत पिताक धर्मे।” कतहु-कतहु नीच विचारक मानवक संतान मनुसंतान भऽ जाइत अछि, एहिमे दैहिक संस्कार आ प्रकृतिक लीला होइत अछि। आरूणिक दृढ़ विश्वासपर केन्द्रित एहि उपन्यासक कथामे सतत प्रवाहक गंगधारा खहखह आ शीतल बुझना गेल। जँ कथाकेँ आत्मसात् कएल जाए तँ कोनो अर्थमे एकरा काल्पनिक नहि मानल जा सकैछ। आत्मकथा स्पष्टत: नहि मानि सकैत छी, किएक तँ उपन्यासकार कोनो रूपेँ एकर उद्वबोधन नहि कएलनि अछि। भऽ सकैत अछि समाजक अगल-बगलक रेखाचित्र हो, मुदा हमरा मतेँ ई कल्पना नहि, सत्य घटनापर आधारित अछि। उपन्यासमे एकटा कमी सेहो देखलहुँ। अंग्रेजी आखरक ठाम-ठाम प्रयोग कएल गेल जेना- एनेश्थेशिया, ओपिनियन, इम्प्रेशन आदि। एहि सभ शब्दक स्थानपर अपन शब्दक प्रयोग कएल जा सकैत छल, मुदा नहि कएल गेल। हमरा बुझने हम दोसर भाखाक ओहि शब्द सभकेँ मात्र आत्मसात करी जकर स्थानपर हमर अपन भाखामे शब्दक अभाव अछि। सहस्त्राब्दीक चौपड़पर :- कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनकक तेसर खण्ड कविता संग्रहक रूपमे अछि, जकर शीर्षक ‘सहस्त्राब्दीक चौपड़पर’ देल गेल। मात्र तैंतालीस गोट कविताक सम्मिलनमे श्रंृगार, विरह हैकू, विचार मूलक कविताक संग-संग एकटा ध्वज गीत सेहो अछि। इन्द्रधनुषक आसमानी रंग जकाँ प्रथम कविता ‘शामिल वाजाक दुन्दभी वादक’मे क्षणिक प्रकृतिक आवरणमे स्वर-सरगमक भान होइत अछि, मुदा अन्तरक अवलोकनक पश्चात् दशा पूर्णत: विलग। राजस्थानक वाद्य संस्कृतिमे एकटा दर्शक वाद्य यंत्रक प्रासंगिकताक केन्द्रनमे कविक भाव अस्पष्ट लागल। सहज अछि ‘जतऽ‘ नहि पहुँचथि, अेातऽ गएलनि कवि’। कवि स्वयं दुन्दभी वादक छथि तेँ स्पष्ट दर्शन कोना हएत। हिन्दी साहित्यमे एकटा कविता पढ़ने छलहुँ ‘गोरैयो की मजलिसमे कोयल है मुजरिम’। संभवत: समाजक पथ प्रदर्शकक मूक दृष्टकोणकेँ कविताक केन्द्र विन्दु बनाओल गेल अछि। बहुआयामी व्यक्तित्वक धनी व्यक्ति सेहो जीवनक गतिमे दबावक अनुभव करैत कतहु-कतहु अपन संवेदनाकेँ दवा कऽ दुन्दभी बनवाक नाटक करैत छथि। केओ-केओ दोसरकेँ संतुष्ट करबाक लेल अपन विचारधारा वाह्य मनसँ बदैल दैत छथि। संतुष्टीकरण प्रवृति वा कोनो प्रकारक मजवूरी हो हमरा सभकेँ परिस्थितिसँ सामंजस करबाक बहाने अपन सम्यक विचारकेँ माटिक तरमे नहि झॅपवाक चाही। समाज जौं एकरा पूर्वाग्रह मानए तँ अपन पक्षक विवेचन कएल जाए, मुदा अनर्गल प्रलापकेँ मूक समर्थक नहि देवाक चाही। मोनक रंगक अदृश्य देवालमे परिस्थितिजन्य विषमताक विषय वस्तुक दर्शन आशातीत अछि। मन्दाकिनी.... आ पक्का जाठि शीर्षक कवितामे प्रकृति आ समाजक स्थितिक मध्य विगलित मानवतापर मूक प्रहारमे कविक नैसर्गिक मुदा अदृश्य सोच हमरा सन साधारण समीक्षक लेल अनुबूझ पहेली जकाँ अछि। अपन पुरातन इतिहासक ओहि दिवसकेँ लोक स्मरण नहि करए चाहैत छथि, जाहिसँ अतुल पीड़ाक अनुभव होइत अछि। त्रेता युगक घटना, कलियुग धरि पाछाँ धेने अछि। सीता जीक वियाह अगहन शुक्ल पक्ष पंचमीकेँ भेलनि, परिणाम सोझा अिछ। तखन शतानंद पुरोहित जी खरड़ख वाली काकीक विआह ओहि तिथिमे किएक करौलन्हि? भऽ सकैत अछि हुनक भाग्यमे सीताजी जकाँ गृहस्थ सुख नहि लिखल दुख मुदा कलंक तँ ‘वियाह पंचमी’ तिथिकेँ देल गेल। एहि कवितामे कविक दृष्टकोण तँ विधवा विआहक समर्थन करवाक अछि, मुदा सवर्ण मैथिल नहि स्वीकार कऽ रहल छथि। अपन पुरान सॉगह लऽ कऽ हम सभ हवड़ाक पुल बनाएवक कल्पनामे कहिया धरि ओझराएल रहव? एहि कविता संग्रहमे जे नव विषय बुझना गेल ओ अछि ‘बारह टा हैकू’। गिदरक निरैठ, राकश थान, शाहीक मौस आ बिधक लेल शब्द-शब्द बजैत अछि। हैकूक सार्थक अर्थ लगाएव अत्यन्त कठिन होइत अछि, मुदा हमरा बुझने जौं एहेन हैकू लिखल जाए तँ नेनो सभ जे मैथिलीमे माए परिवार कुटुम्वक संग बजैत छथि अवश्य बूझि जएताह। मिथिलाक ध्वज गीतमे मातृभूमिसँ कर्मक सार्थक गति मांगल गेल अछि। जेना गायत्री परिवारक प्रार्थना वह शक्ति हमे दो दयानिधि मे गाओत जाइत अछि। मातृ वंदनाकेँ कविता संग्रहमे देवाक हिनक दृष्टिकोण रचनाक्रममे उपयुक्त हो मुदा हमरा मते एकरा कुरूक्षेत्रम अन्तर्मनक प्रथम पृष्ठपर वंदनाक रूपमे देल गेल रहिते तँ बेसी सुन्नर होइतए। ‘बड़का सड़क छह लेन बला’मे मिथिलाक विकासक क्रमित स्थितिक वर्णन कएल गेल अछि। सम्पूर्ण कविता संग्रहक अवलोकनक वाद कोनो पद्य अकच्छ करैबला नहि लागल। ‘पुत्र प्राप्ति’ शीर्षक कवितामे लुधियानामे हमरा सबहक समूहक एकटा पंडितक ठकपचीसीक चर्च कएल गेल अछि। एहने ठकक कारण ‘विहारी’ व्यक्तिकेँ आठ ठाम लोक शंकाक दृष्टिसँ देखैत छथि। मुदा गजेन्द्रजी सँ हमर आग्रह जे एहि कविताक पंजावी भाषामे अनुवादक अनुमति नहि देल जाए नहि तँ कतेको भलमानुष बनल मैथिल घुरि कऽ गाम आवि जएताह आ हमरा सबहक समाजमे कुचक्र आरो बढ़ि जाएत। क्रमश: शिव कुमार झा मौलाइल गाछक फूल (समीक्षा) कोनो भाषा साहित्यक विकासमे उपन्यासक एकटा अलग महत्व होइत अछि। औपन्यासिक कृतिकेँ जौं साहित्यक चक्षु द्वय कहल जाए तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि होएत। मैथिली साहित्यमे उपन्यास सभक भंडार बड़ विस्तृत अछि। एहि प्रांजल साहित्यिक कृतिमे किछु कोसक पाथर सन रचना भेल जे आर्यावर्त्तक भाषाक गुच्छमे मैथिलीक स्थानकेँ सुवासित कऽ रहल अछि। सर्वकालीन मैथिली साहित्यक इतिहासमे सम्मिलित ओ सभ उपन्यास अछि- पंडित जन सीदन कृत शशिकला, प्रो. हरिमोहन झा रचित कन्यादान ओ द्विरागमन, योगानन्द झा रचित भलमानुष, श्री यात्री कृत पारो, डॉ. मणिपद्म कृति नैका वनिजारा, श्री सोमदेव कृत चानोदाइ, श्री सुधांशु शेखर चौधरी कृत दरिद्र छिम्मड़ि, श्रीमती लीलीरे कृत पटाक्षेप, श्री रमानंद रेणु कृत दूध-फूल, डाॅ. शेफालिका वर्मा कृत नागफांस, श्री साकेतानंद कृत सर्वस्वांत, श्री ललित कृत पृथ्वीपुत्र, श्रीमती गौरी मिश्र कृत चिनगी, श्री केदारनाथ चौधरी कृत माहूर आ श्री गजेन्द्र ठाकुर कृत सहस्त्रवाढ़नि। निश्चित रूपें एहि सभ उपन्याससँ मैथिली साहित्यकेँ नव दशा ओ दिशा भेटल, परंच एकर अतिरिक्त सेहो किछु कृति अछि जकर चर्च करव विना मैथिली उपन्यास विधाकेँ अपूर्ण मानल जाएत। ओहि कृतिमे सँ एक अछि श्री जगदीश प्रसाद मंडल द्वारा लिखित उपन्यास- ‘मौलाइल गाछक फूल’ शीर्षकसँ बुझना गेल जे प्रकृति वर्णनपर आधारित उपन्यास अछि, मुदा अध्ययनक पश्चात् समाजक मौलाइल स्वरूपक वर्णन आ पुनरूत्थानक सकारात्मक स्वरूपक आधारपर एहि उपन्यासक रचना भेल अछि। जौं मालीमे चेतना ओ अनुशीलन हो तँ मौलाइल गाछमे सेहो पुष्प खिलाओल जा सकैत अछि, ठीक ओहिना समाजमे एकरूपता, सामंजस्य ओ अनुग्रह हो तँ विगलित मिथिलाक स्वरूपमे हरियरी आबि सकैत अछि। मैथिल समाजक पहिल लोकसँ लऽ कऽ अंतिम लोकक व्यथा वा सुखद अनुभूतिकेँ रेखांकित कऽ रहल अछि- “मौलाइल गाछक फूल” एहि उपन्यासकेँ सम्पूर्ण उपन्यास एहि दुआरे मानल जा सकैत अछि जे एहिमे समाजक नकारात्मक स्वरूपपर सकारात्मक सिद्धान्तक विजय देखाओल गेल अछि। सत्यक विजय तँ वेस ठॉ होइत अछि, मुदा एहिमे असत्यक हृदय परिवर्त्तनक भऽ कऽ सत्यक जन्म होइत अछि। समाजक सभसँ अंतिम व्यक्तिक दशा ओकरे शब्दमे लिखल गेल, भाषा सम्पादन आ परिमार्जनक आड़िमे कोनो परिवर्तन नहि। सम्पूर्ण जीवन दर्शनमे नायकत्व, किओ खलनायक नहि। वास्तविक रूपे की एना संभव अछि? अवश्य भऽ सकैछ, जौं हम सभ स्वयंमे सम्यक सोच आ दृष्टिकोणकेँ स्थापित करी। कथाक विषय वस्तु कोनो एकटा कथापर केन्द्रित नहि भऽ कऽ बहुत रास उपकथाकेँ सहेजि कऽ बनाओल गेल अछि। कथाक प्रारंभ अकालक परिणामसँ होइत अछि। गरीव मजूर अनुपक पुत्र बौएलाल भुक्खक कारण मृत्युक अवाहन कऽ रहल अछि। माए रधिया अपन लोटा बेचि कऽ ओकर तृप्ति लेल चिक्कस कीनि कऽ अनैत अछि। तीनटा रोटी बनल, मुदा बौएलालक भाग्यमे मात्र एकटा रोटी आ दू लोटा पानि। श्रमजीवीक मार्मिक दशापर लिखल पहिल भागमे संवभत: रधिया अर्न्तमनसँ अनूपसँ कहैत छथि- की बुझवें ककरा कहै छै गरीवी, सपनहुँमे सुख नहि जतऽ श्रमजीवी, सूर्यास्तक पश्चात दू क्षणक लेल कुहेस अबैत अछि, फेर उषाक दर्शन अवश्यंभावी, यएह तँ प्रकृतिक लीला अछि। नथुआ अनूपक अन्हार कूपमे इजोतक सूक्ष्म बाती लऽ कऽ अबैत अछि। रमाकान्त बाबू पोखरि खुनौता तेँ मजूरक आवश्यकता अिछ। अनूपकेँ सपरिवार काज भेट गेलनि। मेट मूसनाक वरदहस्त जे छल। मालिकक मुंशीकेँ मेट कहल जाइत अछि। मूल रूपसँ दलालक प्रवृतिबला मूसन अनुपक लेल प्राणदायक अछि। किएक तँ दुनू परानीक संग-संग बारह बर्खक बौएलालकेँ सेहो काज दऽ देलक। बौएलाल सेहो पूर्ण तन्मय भऽ कऽ कएलक, तकर परिणाम भेल जे रमाकान्त बाबू आन जोनसँ बेसी मजदूरी बौएलालकेँ देलनि। कर्मक गति विचित्र होइत अछि। उपन्यासकार बाल श्रमिककेँ महिमा मंडित कऽ रहल छथि। हमरा सबहक संविधानमे 14 वर्खसँ कम उमेरक व्यक्तिकेँ ‘वाल’ कहल जाइत अछि- मजदूरी प्रतिवंधित। मुदा ओ भुक्खे मरि जाए एकर कोनो परिवाहि नहि। टेलिभीजनमे नाच पाँच बर्खक बच्चा कऽ सकैत छथि, एकरा प्रतिभाक प्रदर्शन मानल जाइत अछि मुदा 12 वर्खक बौएलाल मात्र मौलाइल गाछक मजदूर थिक, वास्तविक जीवनमे पकड़ल जाएत तँ दीन हीन पिताकेँ जेहल भेटल। ‘समरथकेँ नहि दोष गोसाईं। रमाकान्त बाबूक प्रतापसँ अपन कर्मक प्रकृतिसँ अनूपक गरीवी समाप्त भऽ गेल। बौएलाल काजक संग-संग शिक्षा सेहो ग्रहण करए लागल। बौएलालक जीवनमे विहान जे आएल ओ उपन्यासक अंत धरि जगमगाइते रहल। अंतमे रमाकान्त बाबूक जेठ वालक डॉ. महेन्द्रक सहकर्मी भऽ गेला बौएलाल। बौएलालसँ डॉ. बौएलाल- सभटा कर्मक प्रभाव। हिन्दी साहित्यक एकटा कविक उक्ति पूर्णत: सत्य प्रतीत होइत अछि- प्राणों की वर्तिका बनाकर, ओढ़ तिमिर की काली चादर जलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है रोने वाला ही गाता है। कथाक दोसर मोड़पर शशिशेखरक जीवन विहानसँ तिमिरमे प्रवेश करैत अछि। कृषि वैज्ञानिक बनावाक बाटेपर सभटा समाप्त भऽ गेल। माता-पिताक बिमारीमे सभटा चौपट्ट भऽ गेलनि। अधखरू शिक्षा बड़ कष्टदायी होइत अछि। आत्मगलानिक शिकार शशिशेखरक भाग्य सेहो फूजल। एकटा विधवा अपन जमीनसँ विद्यालय खोलवाक योजना बनायलि। गामक संभ्रान्तसँ लऽ कऽ गरीव गुरबाक समर्थन। शशिशेखर शिक्षक भऽ गेलाह। उपन्यासक तेसर खण्डमे सुगियाक शारीरिक व्यथाक आरंम्भक संग-संग पति सोने लालक समर्थन हृदयकेँ झकझोरि दैत अछि। येन-केन प्रकारेण सोनेलाल सुगियाक इलाज करा कऽ गाम घुरलाह। सुगिया स्वस्थ भेली, चिकित्साक प्रभावसँ मुदा कबुलाक प्रभाव मानि सोनेलाल कीर्त्तनक संग-संग भंडारक आयोजन कएलनि। हमरा सबहक समाजमे अंध विश्वासक चमौकनि अपन जालसँ सोचकेँ घेर नेने अछि। कीर्त्तनक दू दल आगाँक जातिक रमापतिक दल आ वेस पछाथिक संग-संग किछु सवर्ण साधुक मिश्रित दल- गंगादासक दल। उधेश्य एक, मुदा दृष्टिकोण अलग-अलग। रमापतिक दल गरीब सोनेलालसँ दक्षिणा लेलनि, दयाक कोनो संभावना नहि। गंगादासक दल दक्षिणा तँ लेलनि मुदा मात्र सिद्धान्तक रूपमे। वास्तवमे लऽ कऽ घुरा देलनि। आत्म सम्मानक भावक संग-संग गंगादासमे दया-भाव सेहो अछि। आब स्वत: बूझल जा सकैत अछि जे सवर्ण ककरा कही? चारिम खण्डक प्रारंभ रमाकान्त बावूक अपन पत्नी श्यामा आ नोकर जुगेसरक संग मद्रास प्रवाससँ होइत अछि। कतऽ गाम आ कतऽ मद्रासक जिनगी। एक दिस जगमगाइत रोशनी, साफ सड़क आ गगनचुम्बी महल तँ दोसर दिस दू कुहेसक वाट। मुदा वास्तविकता किछु आओर छल। पुतोहू-पुत्र डॉ मुदा भविष्यमे किछु नहि भेटबाक संभावना देखि रमाकान्तक हिया सुखा रहल छलनि। बेटा-पुतोहूसँ तँ खूब सम्मान आ सत्कार भेटलनि मुदा पाँचटा पोता-पोतीमे सँ केओ चिन्हवो नहि कएलनि। जे जीवितमे नहि जनैत अछि ओकरासँ जीवनक अंतिम अवस्थामे की आश करी? पलायनवादक पराकाष्ठा धरि लऽ जाएव उपन्यासकारक सोचसँ निश्चित रूपे अजगुत लगैत अछि। मिथिलाक भविष्य कतऽ धरि जाएत जगदीश बावूक संजय सन दृष्टि आश्चर्यजनक मुदा प्रासंगिक अछि। छोटकी पुतोहू सुजाताक जीवनक गाथा सुनि रमाकान्त बाबू पसिझ गेलाह। एकटा धोविनक तनयासँ छोटका बेटाक विवाह भेल दूटा संतान सेहो भऽ गेल, मुदा रमाकान्त बावू अपन पुतोहूक इतिहास नहि जनैत छलाह। साम्यवादी सोचक उन्नायक रमाकान्त बावूसँ एना संभव तँ मानल जा सकैत अछि, मुदा ओ अपन बेटाक विवाहमे शामिल किएक नहि भेलाह। पलायनक एहन फल मैथिलक समृद्ध वर्गकेँ कोना भेट सकैत अछि? गाममे दू सए बीघा जमीनक मालिक रमाकान्त बावूक दुनू लाल किएक नहि गामेमे अस्पताल खोललनि। जखन मद्रासक संभ्रान्त मिथिलामे नहि अबैत छथि तँ हम सभ िकए पलायन करैत छी? विपन्नक पलायन तँ बूझएमे अबैत अछि परंच सम्पन्नक पलायन.....? एहि उपन्यासक सभसँ पैघ विशेषता जे उपन्यासकार कोनो प्रकारक प्रश्नकेँ छोड़ि रचनाक इतिश्री नहि कएलनि। प्रश्नक संग-संग विश्लेषण आ समाधान पोथीमे अनायास भेट जाएत। कथाक अंतमे पलायनवादक इतिश्री कहल गेल। डॉ. महेन्द्र आ डॉ. सुजाता गामक गरीव गुरबाक इलाजक लेल तत्पर भेलीह। कोनो व्यक्तिकेँ असाध्य रोग यथा कैंसर, एड्स नहि। एहिसँ प्रमाणित होइत अछि जे गाममे रहनिहारक जीवन संतुलित अछि। वीमार छथि तकर कारण पोषण संतुलित नहि। श्रमजीवी आ श्रमपोषीक मध्यक खाधिक कारण ई दशा अछि। रमाकान्त बावू एहि दशासँ तीजि-भीजि गेलाह। क्षणहिमे अपन सभटा जमीन जाल गरीवक मध्य वॉटि देलनि। गरीबो आत्म सम्मानी आ वफादार। खेतसँ उपजल अन्न, तीमन तरकारी प्रथमत: रमाकान्त बावूकेँ दैत छथि। सम्यक समाजक रचना, केओ सवर्ण नहि केओ क्षुद्र नहि। सबल मिथिला, संवल मैथिलाक कल्याणकारी सोच मनोरम अछि। हीरानन्द सन सम्यक सोचबला सवर्ण जौं समाजमे आगाँ बढ़ति तँ मिथिलाक रूप रेखा बदलि जाएत। हीरानंदक जातिक उल्लेख तँ नहि कएल गेल अछि मुदा लिखवाक कलासँ स्पष्ट होइत अछि ओ निश्चित रूपेँ आगाँक जातिक छथि। अनुपक घरमे भोजन ग्रहन काल सबरी-रामक सिनेहक स्पष्ट दर्शन। जीवन दर्शनपर आधारित एहि उपन्यासमे कतहु जातिक उल्लेख नहि मुदा लक्षणसँ स्पष्टीकरण होइत अछि। सुबुधिक विवेकशीलतामे रचनाकारक दृष्टिकोण पारदर्शी लागल। बुझना जाइत अछि जे जगदीश बावू सुबुधक रूपेँ उपन्यासमे पैसल छथि। उपन्यासमे एकठॉ वर्ग संधर्षक स्थिति देखऽ मे आएल मुदा एकटा अवला अपन चरित्रक रक्षाक लेल पियक्करपर प्रहार कएलनि। ई सभ वास्तविकता अछि एकरा अनसोहाॅत नहि मानल जा सकैत अछि। विषय-वस्तुक मध्य झाॅपल दशापर वेवाक प्रस्तुति। ओना तँ सभटा रचनाकार अपनाकेँ साम्यवादी आ समाजवादी मानैत छथि। मुदा रचनाक संग-संग सबहक जीवनक दर्शन कएलापर स्थिति विपरीत भऽ सकैत छथि। मैथिली साहित्यक सम्यक चरित्र, सम्यक दृष्टि आ सम्यक जीवन शैलीमे जीबऽ बला किछुए मात्र साहित्यकारक समूहमे जगदीश बावूकेँ सेहो राखल जा सकैत अछि। अपन व्यक्तित्वसँ जीवनक नूतन आयामकेँ समाजमे ज्योतिक रूपमे पसारब मात्र रचनामे नहि, व्यक्तिगत जीवनोमे अवश्ये हएत। भऽ सकैत अछि वर्तमान पिरही एहि ग्रन्थक तादात्मयकेँ पूर्णत: स्वीकार नहि करए, परंच हमरा बुझने ई सम्पूर्ण पाठकक उपन्यास थिक। एहिमे ककरोसँ कोनो पूर्वाग्रह नहि। सम्भ्रान्त समाजकेँ विगलित आ ओछ समाजसँ जोड़ि सम्यक समाजक निर्माण करवाक उद्येश्यमे ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क दृष्टि परिलक्षित होइत अछि। कतहु-कतहु शब्द आ वाक्य सामंजस्यमे किछु त्रुटि सेहो देखऽ मे आएल मुदा भाव पवित्र, उद्येश्य पवित्र तेँ एकरा नजरअंदाज करव प्रासंगिक लागल। निश्चित रूपेँ सर्वश्रेष्ठ मैथिली उपन्यासक सूचीमे एहि उपन्यासक नाओ देल सकैत अछि। पोथीक नाम- मौलाइल गाछक फूल विधा- उपन्यास रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल प्रकाशक- श्रुति प्रकाशन राजेन्द्र नगर दिल्ली मूल्य- २५० टाका मात्र प्रकाशन वर्ष- सन् २००९ पोथी पाप्तिक स्थान- पल्लवी डिस्ट्रीब्यूटर्स, वार्ड न.६, निर्मली, सुपौल, मोवाइल न. ९५७२४५०४०५ शिव कुमार झा भफाइत चाहक जिनगी समीक्षा शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ सं पूर्ण मैथिली भाषामे नाटक विधाक प्रारंभ पंडित जीवन झा कृत नाटक ‘सुन्दर संयोग’सँ सन् १९०४ई मे भेल। एहिसँ पूर्व मैथिलीमे उमापति, रामदास नन्दीपति आदि सेहो नाटकक रचना कएलन्हि, मुदा ओ सभ पूर्ण मैथिलीमे नहि लिखल गेल। सुन्दर संयोग’सँ लऽ कऽ श्री नचिकेता रचित ‘नो एन्ट्री मा प्रविश’, श्रीमती विभारानी कृत ‘भाग रौ आ बलचंदा’ आओर श्री जगदीश प्रसाद मंडल कृत ‘मिथिलाक बेटी’ धरि मैथिली साहित्यमे विविध विधाक नाटकक रास संग्रह उपलब्ध अछि। ओहि समग्र नाटकक मध्य किछु नाटक बड़ लाेकप्रिय भेल अछि ओहिमे- श्री ईशनाथ झा रचित ‘चीनीक लड्डू’ पंडित गोविन्द झा लिखित ‘बसात’ श्री मणिपद्म रचित झुमकी श्री ललन ठाकुर लिखित ‘लौंगिया मिरचाई’ प्रो. राधा कृष्ण चौधरी लिखित ‘राज्याभिषेक’ श्री सुरेन्द्र प्र. सिन्हा रचित ‘वीरचक्र’ श्री महेन्द्र मलंगिया रचित ‘एक कमल नोरमे’ श्री विन्देश्वरी मंडल रचित ‘क्षमादान’ श्री उत्तम लाल मंडल रचित ‘इजोत’ आ श्री गौरीकान्त चौधरी ‘कांत’ (मुखिया जी) रचित ‘वरदान’क संग-संग मैथिलीक मूर्द्धन्य साहित्यकार पंडित सुधांशु शेखर चौधरी रचित ‘भफाइत चाहक जिनगी’ प्रमुख अछि। स्व सुधांशु जी मूलत: मैथिली साहित्यक उपन्यासकारक रूपमे प्रसिद्ध छथि। अर्थनीतिकेँ आधार बना कऽ लिखबाक शैलीक कारण मैथिलीमे हिनक एकटा अलग स्थान अछि, एकटा कलाकार जौं अपन कलाक प्रदर्शन नाट्य रूपमे करए तँ कोनो अजगुत नहि। हिन्दीमे हिनक लिखल नाटक सभ लोकप्रिय भेल, तेँ अपन मातृभाषामे सेहो नाटक लिखए लगलाह। भफाइत चाहक जिनगी’मे समाजक सामान्य बिम्बकेँ विलक्षण रूपसँ विम्बित कऽ हास्य आ मर्मक सम्यक् तारतम्य स्थापित कएलन्हि। चाहक जिनगी कतेक क्षणक होइत अछि, भाफ उपटलासँ एकर अस्तित्व लुप्त भऽ जाइछ, मुदा जौं भनसियामे आत्म विश्वास हो तँ ओहि अस्तित्वविहीन चाहमे नीर-क्षीर मिश्रित कऽ ओकर फेरसँ सुस्वादु बनाओल जा सकैत अछि। नाटकक नायक महेशक जिनगी भफाइत चाहक जिनगी जकाँ अछि। एकटा सुशिक्षित व्यक्ति कर्मक प्रतिस्पर्धाक गतिमे सफल नहि भेलापर समाजक अधलाह मानल गेल कर्मकेँ अपन जीवनक डोरि बना कऽ ततेक आत्मबलसँ जीवैत अछि जे दीर्घसूत्री दृष्टिकोणक लोक सेहो एकरा लग नतमस्तक भऽ गेल। नाटकक कथा चेतना समिति पटनाक कार्यक्रमक मध्य धुरैत अछि। महेश चाहक स्थायी विक्रेता छथि, मुदा अधिक विक्रीक आशक संग मिथिला-मैथिलीसँ सिनेहक दुआरे त्रिदिवसीय कार्यक्रममे अपन दोकान लगौलनि। हुनक दोकानक पांजड़िमे गेना जीक पानक दोकान, मात्र मैथिलीक पावनि धरिक लेल। सम्पूर्ण नाटक एहि दू दोकानक दृश्यमे विम्वित अिछ। चेतना समितिक कार्यक्रमक प्रदर्शन मात्र नेपथ्यसँ कएल गेल। महेश-गेनाक शीत वसंतक वसातक संयोग जकाँ वार्तालापक क्रममे कार्यक्रमक कार्यकर्त्ता गोपालक प्रवेश। हिनक उद्येश्य चाह पीबाक संग कार्यक्रममे चाह पहुँचएवाक सेहो अछि। पान मंचपर अवश्य चाही, किएक तँ ई मैथिल संस्कृतिक प्रतीक अछि। गोपालक संग दिगम्वरक गप्प-सप्पमे अनसोहॉत कटाक्ष शैलीक विवेचन नीक वुझना जाइत अछि। अध्ययन सम्पन्न कऽ लेलाक पश्चात् दिगम्बर बावूकेँ नौकरी नहि भेटलन्हि। पटनामे दस दुआरि बनि पेट पोसि रहल छथि परंच महेशक चाह बेचवासँ ओ संतुष्ट नहि, हुनका गामक महेश चाहक दोकान खोलि गामक नाक कटा रहल अछि। वाह-रे मैथिल! भीख मांगि कऽ खाएव नीक, ठकि कऽ जीएव नीक मुदा छोट कर्म नहि करव। महेश तँ चाह बेिच कऽ अपन परिवारक प्रतिपाल करैत छथि, दू गोट बारह बरखक नेनाकेँ रोजगार देने छथि, मुदा दिगम्वर बावूकेँ अपन यायावरी जीवन नीक लगैत छन्हि। मुँहगर जे स्वयं अकर्मण्य हो ओ गोंग कर्मक पुरूषकेँ दूसय तँ की कहल जाए? महेश चुप्प नहि रहलाह, अपन कर्मक गतिक आड़िमे दिगमबरकेँ सत्यसँ परिचए करा देलनि। ओना ई दोसर गप्प जे महेशो अपन पितासँ असत्य बजने छथि। हुनक पिताकेँ ई वूझल छन्हि जे महेश पटनामे नौकरी करैत अछि। महेश मिथ्या बजलनि मात्र अपन पिताक मानसिक संतुष्टिक लेल, किएक तँ पुरना सोचक लोक अपन ठोप-चाननेटा पर विश्वास करैत छथि, वरू भुक्खे मरि जाएव मुदा विजातीय ओछ कर्म नहि करव। नाटकक देासर प्रमुख पात्र छथि उमानाथ आ चन्द्रमा, एकटा अकाश आ दोसर धरित्री। उमानाथ अभियंता छथि, नाओ टा लेल मैिथल, कार्यक्रम देखवाक लेल नहि अएलनि, मात्र अपन ंसगी सभसँ भेँट करवाक दुआरे चेतना समितिक दर्शक दीर्घा मे अशोकर्य लऽ कऽ पैसलनि। अपन कनियाँ चन्द्रमा टा सँ मैथिलीमे गप्प करैत छथि। की मजाल केओ देासर हुनका संग मैिथलीमे गप्प करवाक दु:साहस करए, ओकरा अपन सामर्थ्य देखा देताह। दुनू परानी चाह पीवाक क्रममे महेशक दोकानपर अबैत छथि, चाह बनल नहि की उमानाथ जीकेँ कोनो संगीपर नजरि पड़ि गेलनि। कनियाकेँ महेशक दोकानपर छोड़ि ठामे पड़ा गेलाह। यथाक्रममे मंचसँ महेश जीकेँ कविता पाठ करवाक आग्रह आएल। चन्द्रमा जीकेँ बिनु दामे दोकानक ओरवाही दऽ ओ मंचस्थ भऽ गेलाह। चन्द्रमा अजगुतमे पड़ि गेलीह, चाहक विक्रेता आ कवि? कालक लीला विचित्र लगलनि। दोकानपर गाहकि सभ आवए लागल, चन्द्रमा भावावेशमे पड़ि चाह बनावए लगलीह। गंगानाथ आ दयानंद सन गाहकिकेँ चाह विक्रेता कवि पचि नहि रहल छल। समितिक मंच हुनका लोकनिक मतेँ गनहा गेल। हरिकान्त बावूकेँ आधुनिक रूपक कार्यक्रम नीक नहि लागि रहल छनि, तँ शिवानंदकेँ पुरातन संस्कृतिसँ कोनो मोह वा छोह नहि। एहि मध्य उमानाथ बावू चन्द्रमाकेँ तकैत दोकानपर अएलाह। अपन कनियाकेँ चाह बनवैत देखिते माहुर भऽ गेलथि। छोड़बाक जिद्द कएलनि मुदा मैथिल नारी अपन उतरदायित्वसँ कोना भटकि सकैत अछि? एक खीरा तीन फॉक! बिगड़ि कऽ फेर पड़ा गेलाह। मोने-मोन महेशपर अगिनवान बरिसबैत छलथि। चन्द्रमा सेहो संकटक अवाहानमे सशंकित मुदा की करतीह? एक दिश भाव आ दोसर दिश कर्त्तव्य वोध, “आँखिक तीरक विख पानि नोर बनि झहड़ल हृदय झमान भेल।” कथाक अंतिम वनिता सरिताक कंठ चाहक लेल सुखए लागल तेँ अपन नोकर आ छोट नेनाक संग महेशक दोकानपर अबैत छथि। कविकाठी महेश कविता पाठ कऽ फेर अपन जीवनकेँ गुनि रहल छथि। सरिताकेँ देखिते स्वयंमे नुकएवाक असहज प्रयास करए लगलनि। वएह सरिता जे कहियो महेशक सह पाठिनी छलीह, आव एकटा आइ.ए.एस. अधिकारीक अर्द्धांगिनी छथि। सरिता महेशसँ साक्षात्कार करबाक प्रयास कऽ रहलीहेँ। महेश अपन भूतकालकेँ झॉपए चाहैत छथि मुदा सरिता घोघट कालक वऽर जकाँ ओकरा उधारि रहल छलीह। हुनक उद्येश्य सिनेहिल अछि तेँ महेश टूटि गेलाह। सरिता अश्रुधारसँ सिचिंत, जकर नोट्स पढ़ि अध्ययन पथपर बढ़ैत रहलीह ओ एहेन दशामे पहुँच गेल। चन्द्रमा सरिताक मोहमे विचरण करए लगलीह। एहि मर्मस्पर्शी क्षणक अंत भेल नहि की उमानाथ आवि महेशक गट्टा पकड़ि वास्तविक जीवनकेँ दर्शन कराबए लगलाह। चन्द्रमा एहि क्षण महेशक संग दऽ रहल छलीह। मैथिली साहित्यक लेल सभसँ विलग नूतन विषय वस्तुक मार्मिक विश्लेषणमे शेखर जीक अतुल्य प्रतिभाक झलक अनमोल अछि। पूर्ण रूपसँ एकरा नाटक नहि कहल जा सकैछ, किएक तँ दीर्ध एकांकीक रूपमे लिखल गेल अछि। कथाक चित्रण मात्र दू दोकानक परिधिमे भेल अछि तेँ दृश्य समायोजनमे कोनो प्रकारक विध्नक स्थिति नहि, सरिपहुँ एकरा शेखर जी नाटकक रूपमे प्रदर्शित कएलनि। महेश सन चरित्र हमरा सबहक समाजमे छथि, मुदा कर्त्तव्यबोधक एहेन पुरूष जौं मिथिलामे सभ ठाम होथि तँ हम सभ साधन वििहन रहितहुँ सम्यक जीवनक रचना कऽ सकैत छी। चन्द्रमा सन दीर्घसोची नारीक विवरणमे वास्तविकतासँ वेशी कल्पनाक आभास होइत अछि। नाटकक आत्मकथ्यमे शेखर जीक आत्मविश्वाससँ वेशी अहंकारक दर्शन भेल। ‘नाटकक क्षेत्रमे हमर किछु मोजर अछि’ सन उक्तिक संग बटुक भाय आ गजेन्द्र ना. चौधरीक प्रति कृतज्ञता ज्ञापनमे महिमा मंडनक भान श्ोशर जीक संस्कारपर बुझना जाइछ। केओ ककरो प्रेरणासँ रचनाकार नहि भऽ सकैत अछि, ई तँ नैसर्गिक प्रतिभाक परिणाम थिक। मुदा एहिसँ ‘भफाइत चाहक जिनगी’क मर्यादाकेँ क्षीण नहि बुझना जा सकैत अछि। मात्र छोट-छोट ३९ पृष्ठक नाटक (ओहुमे सँ आठ पृष्ठ विषय वस्तुसँ बाहरक) मैथिली साहित्यक लेल मरूभूमिमे नीरक सदृश बनल दृष्टिकोणकेँ परिलक्षित करैत अछि। एिह प्रकारक बिम्बक सृजन शेखर जी सन मांजल रचनाकारेसँ संभव भऽ सकैछ। निष्कर्षत: मिथिलाक संस्कृतिक मध्य कर्म प्रधान युगक आचमनिसँ नाटक ओत-प्रोत अछि। मात्र साहित्यक नहि, मंचनक लेल पूर्णत: उपयुक्त लागल। नाटक- भफाइत चाहक िजनगी रचनाकार- पं. सुधांशु शेखर चौधरी प्रथम संस्करण- नवम्वर १९७५ १.मानेश्वर मनुज-मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता, २.मुन्नाजी- सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा ३.गजेन्द्र ठाकुर-गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र १. मानेश्वर मनुज मानसरोवरक भूमिकाक प्रासंगिकता ओना तँ प्रेमचन्द सेहो अप्पन गुरु बंगलाक महान कथाकार शरतचन्द्रकेँ मानलन्हि, मुदा बंगलाक विभिन्न पत्र-पत्रिका कथा-चेतनाक हिसाबे प्रेमचन्दकेँ सर्वोपरि मानैत छथि। एहि बातमे कोनो संदेह नहि जे प्रेमचन्दक कथा साहित्य विश्वसाहित्यमे अप्पन समुचित स्थान रखैत अछि। गाँधीजी रवीन्द्रनाथ टैगोरक समक्ष नतमस्तक भऽ जखन हुनका गुरु कहलकन्हि तखन रवीन्द्रनाथ टैगोर सेहो आह्लादपूर्वक हुनका बापू कहलकन्हि। प्रेमचन्द जे सम्मान बंगला साहित्यकेँ< देलन्हि ताहिसँ कनिको कम सम्मान बंगलाक साहित्यकार प्रेमचन्दकेँ नहि दऽ रहल छथि। प्रेमचन्दक जे कथा सभ पाठ्यपुस्तकमे लागल अछि ताहिसँ हिन्दी आ मैथिली जगत पूर्णतः वाकिफ अछि, तकर अलावे समए-समएपर हिन्दीक पत्रिका सभ प्रेमचन्दक आनो कथा सभ प्रकाशित करैत रहैत अछि। एतेक सभ भेलाक बादो हिन्दी आ मैथिलीक आम पाठक की लेखको प्रेमचन्दसँ अनभिज्ञ भऽ रहल छथि, जाहि कारणेँ मैथिली की हिन्दियो साहित्य एको डेग आगाँ नहि बढ़ि रहल अछि।मानसरोवरक प्राकथनमे प्रेमचन्द भारतीय कथा साहित्यक गुढ़केँ कतेक गदिया कऽ पकड़ने छथि- देखल जा सकैत अछि आ हमरा लोकनि लीकसँ कतेक हटि गेल छी तकरो अनुमान कएल जा सकैत अछि। हिन्दीक कतेको पत्र अप्पन सम्पादकीयमे कहैत छल जे मैथिली पहिने अप्पन साहित्यकेँ मजगूत कऽ लिअए तखन सम्वैधानिक मान्यताक बात करए, मुदा मैथिलीक साहित्यकार लोकनि अपना हठपर अड़ल रहलथि। रोजगारक नामपर दर-दर भटकैत मैथिलजन सभतरि अपमानित भऽ रहल छथि तकर किनको चिन्ता नहि मुदा अप्पन हठ कायम रखताह। साहित्य वा राजनीति एहन हल्लुक चीज नहि जे सत्यसँ अलग पैर राखि आडम्बरक बलपर सफलता प्राप्त कऽ लिअए। सौ चोर मसियौत अइ तँ सौ साधु सहोदर, ई परम सत्य अइ। कथा साहित्य पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श- मानसरोवरक प्राकक्थन-प्रेमचन्द- मैथिली रूपान्तर- मानेश्वर मनुज एक आलोचक लिखलन्हि अछि जे इतिहासमे सभ किछु यथार्थ होइतो ओ असत्य अछि आ कथा साहित्यमे सभ किछु काल्पनिक होइतो ओ सत्य अछि। अइ कथनक आशय एकर सिवाय आओर की भऽ सकैत अछि जे इतिहास आदिसँ अन्त धरि हत्या, संग्राम आ धोखाक प्रदर्शन करैत अछि जे असुन्दर अछि तैँ असत्य अछि, लोभक क्रूरसँ क्रूर अहंकारक नीचसँ नीच, ईर्ष्याक अधमसँ अधम घटना सभ अहाँकेँ ओतऽ भेटत आ अहाँ सोचऽ लागब जे मनुष्य एतेक अमानुषिक अछि, थोड़ स्वार्थक लेल भाए-भाएक हत्या करऽ पर लागल अछि। बेटा बापक हत्या कऽ दैत अछि आ राजा असंख्य प्रजाक हत्या कऽ दैत अछि। एकरा पढ़ि कऽ मोनमे ग्लानि होइत अछि आनन्द नहि। आ जे आनन्द प्रदान नहि कऽ सकैत अछि ओ सुन्दर नहि भऽ सकैत अछि आ ओ सत्य सेहो नहि भऽ सकैत अछि। जतऽ आनन्द अछि ओतै सत्य अछि। साहित्य काल्पनिक बस्तु अछि मुदा एकर प्रधान गुण अछि आनन्द प्रदान करब, आ एहि हेतु ओ सत्य अछि। मनुष्य जगतमे जे किछु सत्य आ सुन्दर पओलक अछि आ पाबि रहल अछि ओकरे साहित्य कहैत छैक आ गल्प सेहो साहित्यक एक भाग अछि। मनुष्य जाति लेल मनुष्ये सभसँ विकट पहेली अछि। ओ स्वयं अपना समझमे नहि अबैत अछि। कोनो ने कोनो रूपमे ओ अपने आलोचना करैत रहैत अछि, अपने मनोरहस्य खोलल करैत अछि। मानव संस्कृतिक विकासे एहि लेल भेल अछि कि मनुष्य अपनाकेँ समझाबय आध्यात्म आ दर्शन जकाँ साहित्यो एहि खोजमे लागल अछि, अन्तर एतनी अछि कि ओ अइ उद्योगमे रसक मिश्रण कऽ ओकरा आनन्दप्रद बना दैत अछि, एहि लेल आध्यात्म आ दर्शन सिर्फ ज्ञानी लोकनिक लेल अछि, साहित्य मनुष्य मात्र लेल। जेना हम ऊपर कहि गेल छी, गल्प आ आख्यायिका साहित्यक एक प्रधान अंग अछि। आइसँ नहि, आदिये कालसँ। हँ, आइ-काल्हुक आख्यायिका आ प्राचीनकालक आख्यायिकामे समयक गति आ रुचिक परिवर्तनसँ बहुत किछु अन्तर भेल अछि। प्राचीन आख्यायिका कुउतुहल प्रधान होइत छल आ आध्यात्म विषयक। उपनिषद आ महाभारतमे आध्यात्मिक रहस्यकेँ समझाबक लेल आख्यायिका सभक आश्रय लेल गेल अछि। “जातक”सेहो आख्यायिकाक सिवाय आओर की अछि? बाइबिलमे सेहो दृष्टान्त सभ आ आख्यायिका सभक द्वारे धर्म तत्व समझाएल गेल अछि। सत्य अइ रूपमे आबि कऽ साकार भऽ जाइत अछि आ तखने जनता ओकरा समझैत अछि आ ओकर व्यवहार करैत अछि। वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक-विश्लेषण आ जीवनक यथार्थ स्वभाविक चित्रणकेँ अप्पन ध्येय समझैत अछि। एहिमे कल्पनाक मात्रा कम, अनुभूतिक मात्रा अधिक होइत अछि, बल्कि अनुभूतिये रचनाशील भावनासँ अनुरंजित भऽ कऽ कथा बनि जाइत अछि, मगर ई समझब भूल होएत कि कथा जीवनक यथार्थ चित्र अछि। जीवनक चित्र तँ मनुष्य स्वयं भऽ सकैत अछि, मगर कथाक पात्र सभक सुख-दुःखसँ हम जतेक प्रभावित होइत छी ओतेक यथार्थ जीवनसँ नहि होइत छी, जावत तक ओ निजत्वक परिधिमे ने आबि जाए। कथा सभक पात्र सभमे हमरा एक्के-दू मिनटक परिचयमे निजत्व भऽ जाइत अछि आ हम ओकरा संग हँसऽ आ कानऽ लगैत छी, ओकर हर्ष आ विषाद हमर अप्पन हर्ष आ विषाद भऽ जाइत अछि, बल्कि कहानी पढ़ि कऽ ओ लोको कानैत आ हँसैत देखल जाइत अछि, जकरापर साधारणतः सुख-दुःखक कोनो असरि नहि पड़ैत अछि, जकर आँखि श्मशानमे या कब्रिस्तानमे सेहो सजग नहि होइत अछि, ओ लोक सेहो उपन्यासक मर्मस्पर्शी स्थल सभपर पहुँचि कऽ कानऽ लगैत अछि। शाइत एकर ईहो कारण होइक कि स्थूल प्राणी सूक्ष्म मनक ओतेक लग नहि पहुँच सकैत अछि जतेक कि कथाक सूक्ष्म चरित्रक। कथाक चरित्र सभ आ मनक बीचमे जड़ताक ई पर्दा नहि होइत अछि, जे एक मनुष्यक हृदयकेँ दोसर मनुष्यक हृदयसँ दूर रखैत अछि। आ अगर हम यथार्थकेँ हूबहू खीच कऽ राखि दी तँ ओहिमे कला कहाँ अछि। कला केवल यथार्थक नकलक नाम नहि अछि। कला देखाइत तँ यथार्थ अछि मुदा यथार्थ होइत नहि अछि। ओकर खूबी ई अछि कि ओ यथार्थ नहि होइतो यथार्थ लगैत अछिउ। एकर मापदण्ड सेहो जीवनक मापदण्डसँ अलग अछि, जीवनमे बहुधा हमर अंत ओही समय भऽ जाइत अछि जखन ओ वांछनीय नहि होइत अछि। जीवन ककरो दायी नहि अछि। ओकर सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरणमे कोनो क्रम कोनो सम्बन्ध ज्ञात नहि होइत अछि। कमसँ कम मनुष्यक लेल ई अज्ञेय अछि, लेकिन कला-साहित्य मनुष्यक रचल जगत अछि आ परिमिति हेबाक कारण सम्पूर्णतः हमरा सामने आबि जाइत अछि आ जहाँ ओ हमर मानवो-न्याय-बुद्धि आ अनुभूतिक अतिक्रमण करैत पाओल जाइत अछि, हम ओकरा दण्ड देबाक लेल तैयार भऽ जाइत छी। कथामे अगर ककरो सुख प्राप्त होइत छैक तँ एकर कारण बतवक हेतैक। दुःखो भेटैत छैक तँ ओकर कारण बतवक हेतैक। एतऽ कोनो चरित्र मरि नहि सकैत छैक जाबत तक मानव-न्याय-बुद्धि ओकर मौत ने मांगैक। सृष्टाकेँ जनताक अदालतमे अप्पन हर एक कृतिक लेल जवाब देबऽ पड़तैक। कलाक रहस्य भ्रान्ति अछि, मुदा ओ भ्रान्ति जाहिपर यथार्थक आवरण पड़ल हो। हमरा सभकेँ ई स्वीकार कऽ लेबऽ मे संकोच नहि हेबाक चाही कि उपन्यासोक जकाँ आख्यायिकाक कलो हम पश्चिमसँ लेल अछि। कमसँ कम एकर आइ-काल्हुक विकसित रूप तँ पश्चिमेक अछि। अनेक कारण सभसँ जीवनक अन्य धारा सभक तरहे साहित्योमे हमर प्रगति रुकि गेल आ हम प्राचीनसँ एको-रत्ती एम्हर-ओम्हर हटबो निषिद्ध बुझि लेलहुँ। साहित्यक लेल प्राचीन लोक सभ जे मर्यादा बाँधि देने छलथि, ओकर उल्लंघन करब वर्जित छल। अतएव काव्य, नाटक, कथा कथूमे हम अप्पन कदम बढ़ा नहि सकलहुँ। कोनो बस्तु बहुत सुन्दर भेलोपर अरुचिकर भऽ जाइत अछि, जावत तक ओइमे किछु नवीनता ने आनल जाए। एक्के तरहक नाटक, एक्के तरहक काव्य पढ़ैत-पढ़ैत आदमी ऊबि जाइत अछि आ ओ किछु नव चीज चाहैत अछि, चाहे ओ ओतेक सुन्दर आ उत्कृष्ट नहि हो। हमरा ओतऽ तँ ई इच्छा उठबे ने कएल या हम सभ एतेक सकुचएलहुँ कि ओ जड़ीभूत भऽ गेल। पश्चिम प्रगति करैत रहल, ओकरा नवीनताक भूख छलैक मर्यादाक बेड़ी सभसँ चिढ़। जीवनक हर एक विभागमे ओकर एहि अस्थिरताक, असंतोषक बेड़ी सभसँ मुक्त भऽ जेबाक छाप लागल अछि। साहित्यमे सेहो ओ क्रान्ति मचा देलक। शेक्सपियरक नाटक अनुपम अछि मुदा आइ ओइ नाटक सभक जनताक जीवनसँ कोनो सम्बन्ध नहि। आजुक नाटकक उद्देश्य किछु आओर अछि, आदर्श किछु आओर अछि, विषय किछु आओर अछि, शैली किछु आओर अछि। कथा-साहित्यमे सेहो विकास भेल आ ओकर विषयमे चाहे ओतेक पैघ परिवर्तन नहि भेलैक मुदा शैली तँ बिल्कुले बदलि गेलैक। अलिफलैला ओहि समयक आदर्श छलै, जाहिमे बहुरूपता छलै, वैचित्र्य छलै, कुतुहल छलै, रोमांस छलै, मुदा ओइमे जीवनक समस्या नहि छलै, मनोविज्ञानक रहस्य नहि छलै, अनुभूति सभक एतेक प्रचुरता नहि छलै, जीवन आ सत्य रूपमे ओतेक स्पष्टता नहि छलै। ओकर रूपान्तर भेलैक आ उपन्यासक उदय भेलैक जे कथा आ ड्रामाक बीचक बस्तु अछि। पुरान दृष्टान्त सभ रूपान्तरित भऽ गल्प बनि गेल। मुदा सए वर्ष पहिले यूरोप सेहो एहि कलासँ अनभिज्ञ छल। पैघ-पैघ, उच्च कोटिक दार्शनिक तथा ऐतिहासिक आ सामाजिक उपन्यास लिखल जाइत छल, लेकिन छोट-छोट कथा सभक दिस ककरो ध्यान नहि जाइत छलैक। हँ परी सभक आ भूत सभक कथा लिखल जाइत छल, किन्तु एहि एक शताब्दीक अन्दर या ओहूसँ कम बुझी छोट-कथा साहित्यक आन सभ अंगपर विजय प्राप्त कऽ लेलक अछि, आ ई गलत नहि होएत कि जेना कोनो जमानामे कविते साहित्यिक अभिव्यक्तिक व्यापक रूप छल ओहिना आइ कथा अछि। आ ओकरा ई गौरव प्राप्त भेलैक अछि यूरोपक कतेको महान कलाकारक प्रतिभासँ, जाहिमे बालजाँक, मोपासाँ, चेखब, टॉलस्टाय, मैक्सिम गोर्की आदि मुख्य अछि। हिन्दीमे पचीस-तीस साल पूर्व तक गल्पक जन्म नहि भेल छल। आइ तँ कोनो एहन पत्रिका नहि जाहिमे दू-चारि “कथा” नहि होअए, एतऽ तक कि कतेको पत्रिकामे केवल “कथे”देल जाइत अछि। कथाक एहि प्राबल्यक मुख्य कारण आजुक जीवन संग्राम आ समयाभाव अछि, आब ओ जमाना नहि रहल कि हम “बोस्ताने खयाल” लऽ कऽ बैस जाइ आ पूरा दिन ओकरे कुँजमे विचरैत रही। आब तँ हम संग्राममे एतेक तन्मय भऽ गेल छी कि हमरा मनोरंजनक लेल समय नहि भेटैत अछि, अगर किछु मनोरंजन स्वास्थ्यक लेल अनिवार्य नहि होइत आ हम विक्षिप्त भेले बिना अट्ठारह घंटा काज कऽ सकितहुँ तँ शाइत हम मनोरंजनक नाम तक नहि लितहुँ, मुदा प्रकृति हमरा विवश कऽ देलक अछि तैँ हम चाहैत छी कि थोड़सँ थोड़ समयमे अधिकसँ अधिक मनोरंजन भऽ जाए, तैँ सिनेमा घरक संख्या दिनो-दिन बढ़ैत जाइत अछि। जाहि उपन्यासकेँ पढ़ऽमे महीना लगैत ओकर आनन्द हम दू घंटामे उठा लैत छी। कथाक लेल पन्द्रह-बीसे मिनट काफी अछि। अतएब हम कथा एहन चाहैत छी कि ओ थोड़सँ थोड़ शब्दमे कहल जाए, ओहिमे एक वाक्य कि एक शब्दो अनावश्यक नहि आबि पाबए, ओकर पहिले वाक्य मनकेँ आकर्षित कऽ लिअए आ अन्त तक ओकरा मुग्ध कएने रहए, ओकरामे किछु छटपटाहट होइक, किछु ताजगी होइक, किछु विकास होइक आ ओकर संग किछु तत्वो होइक। तत्वहीन कथासँ चाहे मनोरंजन भऽ जाए मानसिक तृप्ति नहि होइत छैक। ई सत्य अछि जे हम कथामे उपदेश नहि चाहैत छी, मुदा विचारकेँ उत्तेजित करक लेल, मनक सुन्दर भावकेँ जागृत करक लेल किछु ने किछु अवश्य चाहैत छी। वैह कथा सफल होइत अछि जाहिमे अइ दुनूमे सँ मनोरंजन आ मानसिक तृप्तिमे सँ एक अवश्य उपलब्ध अछि। सभसँ उत्तम कथा ओ होइत अछि जकर आधार कोनो मनोवैज्ञानिक सत्यपर होइक। साधु पिताक अप्पन कुव्यसनी पुत्रक दशासँ दुखी होएब मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। एहि आवेगमे पिताक मनोवेगकेँ चित्रित करब आ तदनुकूल ओकर व्यवहारकेँ प्रदर्शित करब कथाकेँ आकर्षक बना सकैत अछि। अधलाह लोक सेहो बिल्कुल अधलाह नह होइत अछि, ओकरोमे कतौ ने कतौ देवता अवश्य छिपल होइत छैक, ई मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। ओइ देवताकेँ खोलि कऽ देखाए देब सफल आख्यायिकाक काज अछि। विपत्तिपर विपत्ति पड़लासँ मनुष्य कतेक दिलेर भऽ जाइत अछि एते तक कि ओ पैघसँ पैघ संकटक सामना करक लेल टाल-ठोकि कऽ तैयार भऽ जाइत अछि। ओकर सभ दुर्वासना भागि जाइत छैक। ओकरा हृदयक कोनो गुप्त स्थानमे छिपल जौहर निकलि अबैत छैक आ हमरा चकित कऽ दैत अछि, मनोवैज्ञानिक सत्य अछि। एक्के घटना वा दुर्घटना भिन्न-भिन्न प्रकृतक मनुष्यकेँ भिन्न-भिन्न रूपसँ प्रभावित करैत अछि। हम कथामे एकरा सफलताक संग देखा सकी तँ कथा अवश्य आकर्षक होएत। कोनो समस्याक समावेश कथाकेँ आकर्षक बनबाक सभसँ बड़का साधन अछि। जीवनमे एहन समस्या नित्ये उपस्थित होइत अछि आ ओहिमे पैदा होबऽबला द्वन्द्व आख्यायिकाकेँ चमका दैत अछि। सत्यवादी पिताकेँ पता चलैत छैक कि ओकर पुत्र हत्या केलक अछि ओ ओकरा न्यायक वेदीपर बलिदान कऽ दिअए वा अप्पन जीवन सिद्धान्तक हत्या कऽ दिअए? कतेक भीषण द्वन्द्व अछि! पश्चाताप एहन द्वन्द्वक अखण्ड श्रोत अछि। एक भाए दोसर भाएक सम्पत्ति छल-कपटसँ अपहरण कऽ लेलक अछि, ओकरा भिक्षा मांगैत देख कऽ की छली भाएकेँ कनिको पश्चाताप नहि हेतैक। अगर एना नहि होइक तँ ओ मनुष्य नहि अछि। उपन्यासेक जकाँ कथा सेहो किछु घटना प्रधान होइत अछि, किछु चरित्र प्रधान। चरित्र प्रधान कथाक पद उच्च बुझल जाइत अछि, मुदा कथामे बहुत विस्तृत विश्लेषणक गुंजाइश नहि होइत अछि। एतऽ हमर उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्यकेँ चित्रित करब नहि, बल्कि ओकर चरित्रक एक अंग देखाएब अछि। ई परमावश्यक अछि कि हमरा कथासँ जे परिणाम वा तत्व निकलए ओ सर्वमान्य होबए आ ओइमे किछु बारीकी होबए। ई एक साधारण निअम अछि कि हमरा ओही बातेक आनन्द अबैत अछि जाहिसँ हमर किछु सम्बन्ध होबए। जुआ खेलऽबलाकेँ जे उन्माद आ उल्लास होइत छैक ओ दर्शककेँ कदापि नहि भऽ सकैत अछि। जखन हमर चरित्र एतेक सजीव आ आकर्षक अछि कि पाठक स्वयंकेँ ओकरा स्थानपर समझि लैत अछ तखने ओकरा कथाक आनन्द प्राप्त होइत छैक। अगर लेखक अपना पात्रक प्रति पाठकमे ई सहानुभूति नहि उत्पन्न कऽ देलक तँ ओ अपना उद्देश्यमे असफल अछि। पाठकसँ ई कहक जरूरति नहि अछि कि अइ थोड़ दिनमे हिन्दी गल्पकला कतेक प्रौढ़ता प्राप्त कऽ लेलक अछि। पहिने हमरा सामने बंगला कथाक नमूना छल। आब हम संसारक सभ प्रमुख गल्प लेखकक रचना पढ़ैत छी, ओहिपर विचार अ बहस करैत छी, ओकर गुण-दोष निकालैत छी आ ओहिसँ प्रभावित भेने बिना नहि रहि सकैत छी। आब हिन्दीक गल्प लेखक सभमे विषय, दृष्टिकोण आ शैलीक अलग-अलग विकास होबऽ लागल अछि। कथा जीवनक बहुत निकट आबि गेल अछि। ओकर जमीन आब ओतेक लम्बा-चौड़ा नहि अछि। ओहिमे कतेक रस, कतेक चरित्र आ कतेक घटनाक लेल स्थान नहि रहल। आब ओ केवल एक प्रसंगक, आत्माक एक झलकक सजीव ह्रूदयस्पर्शी चित्रण अछि। ई एक तथ्यता, ओहिमे प्रभाव, आकस्मिकता आ तीव्रता भरि दी। आब ओहिमे व्याक्याक अंश कम संवेदनाक अंश बेसी रहैत अछि। एकर शैलियो आब प्रभावमय भऽ गेल अछि। लेखककेँ जे किछु कहक अछि ओ कमसँ कम शब्दमे कहि देबऽ चाहैत अछि। ओ अप्पन चरित्रक मनोभावनाक व्याख्या करैत नहि बैसैत अछि, केवल ओकरा दिस इशारा कऽ दैत अछि। कखनो-कखनो तँ संभाषणमे एक दू-शब्देसँ काज निकालि लैत अछि। एहन कतेको अवसर होइत अछि, जखन पात्रक मुँहसँ एक शब्द सुनि कऽ हम ओकर मनोभावक पूरा अनुमान कऽ लैत छी। पूरा वाक्यक जरूरतिये नहि रहैत अछि। आब हम कथाक मूल्य ओकर घटना विन्याससँ नहि लगबैत छी। हम चाहैत छी पात्रक मनोगति स्वयं घटनाक सृष्टि कराबए। घतनाक स्वतन्त्र कोनो महत्वे नहि रहल, ओकर महत्व कवल पात्रक मनोभावकेँ व्यक्त करबाक दृष्टिएसँ अछि- ओहिना जेना शालिग्राम स्वतन्त्र रूपस कवल पत्थरक एक गोल टुकड़ा छ्हथि, लेकिन उपासकक श्रद्धासँ प्रतिष्ठित भऽ कऽ देवता बनि जाइत छथि। खुलासा ई कि गल्पक आधार आब घटना नहि, मनोवैज्ञानिक अनुभूति अछि। आइ लेखक कोनो रोचक दृश्य देख कऽ कथा लिखऽ नहि बैस जाइत अछि। ओकर उद्देश्य स्थूल सौन्दर्य नहि। ओ तँ कोनो एहन प्रेरणा चाहैत अछि, जाहिमे सौन्दर्यक झलक होइक आ ओकरा द्वारा ओ पाठकक सुन्दर भावनाक स्पर्श कऽ सकए। २. मुन्नाजी मुन्नाजी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म–27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षा–स्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृत–अभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल लघुकथा–‘काँट’ भारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथा–कुकुर आ हम, ‘भरि रात भोर’मे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो लघुकथा, कथा, क्षणिका आ लघुकथा सम्बन्धी किछु आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली लघुकथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत। सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत मैथिली लघुकथा जिनगीमे उठैत उकस-पाकसकेँ सम्वेदनापूर्ण मानवताक संग सरियबैत रचनाकार पत्र-पत्रिकासँ समाज आ पाठकक मोनमे बैसि गेलाग अछि। रेशम आ सूतीक बीच फाँक भेल जिनगीकेँ स्पष्ट करैत, आरामदायक आ सुखद अनुभवकेँ सोझाँ आनब आब रचनाकार अपन रचनाधर्म बुझि गेलाह अछि। तेँ आजुक समस्त रचनामे जिनगीक उतार-चढ़ाव, खसैत-उठैत सम्बन्ध सुखाइत सन सिनेह सभकेँ अपना हृदएमे बसा रचना रचैत छथि लेखक। एहि युगक रचनाकारकेँ आब गरीब भाभनबला किताबी खिस्सा आ राजा-रानीबला पिहानीसँ ऊपर उठि अपन सामाजिक समरसताक निस्सन निशानीक बोध भऽ गेल बुझाइत अछि। तेँ रचना सेहो लोकक जिनगीक गहींरता नपैत ओकर सुख-दुखक फाँटक बीचसँ निकलि ओहि फाँटकेँ भरैत ओकर एक-एक अंश धरि जुड़ि जिनगीक दर्शन करबैत सोझाँ आबि रहल अछि मैथिली लघुकथा सभ। मोम आ पाथर पहिने एक दोसराक विपरीत जिनगीकेँ आरेखित करैत रहल। मुदा आब नै, आब तँ एक्कै हिदएमे क्षणक बदलैत गतिक संग मोम आ पाथर दुनूक समन्वयक बनि जिनगीक सभ अन्तरंगताकेँ छुबैत उद्वेलित कऽ बेरा-बेरी मुदा एक्कै ठाम केन्द्रित भऽ देखार भऽ उठैत अछि। आजुक मानवक संवेदना एतेक परिवर्तनीय भऽ गेल अछि जे एक्के संग अहाँक चरित्रमे मोम आ पाथर दुनूक रूप दृष्टिगोचर होइत, रचनाकार सोझाँ आनि ओकर सत्यकेँ साबित कऽ रहलाह अछि। सत्य! एकटा काल्पनिक विजय मात्र नै थिक, सत्य कतौसँ अनायास नै टपकि पड़ैए। सत्य पूर्णतः मानव जीवनक यथार्थ थिक। सत्य मानवकेँ अनुचित कार्यसँ रोकबाक वा विधर्मी हेबासँ बचेबाक श्रीयंत्र जकाँ अछि, जकरा आजुक रचनाकार अपना रचनाधर्मितासँ लोकक हृदए धरि छुआ ओकर यथार्थ बोध करौलनि अछि। पहिनुक लघुकथा सभ दहेजक दानवकेँ उघार कऽ, दहेज पीड़िताक मर्मकेँ वा दहेजसँ भेल परिणामकेँ अपन केन्द्रमे आनि सम्वेदित करैत छल। ओहिसँ इतर चुटुक्का वा हास्य-कणिका लऽ तत्कालीन नेता सबहक विपटावादी चरित्रकेँ उजागर कऽ अपन रचनाक इतिश्री बुझैत छला। एहेन नै छलै जे तहियाक रचनाकारक सोच संकुचित छल। ओहो सभ दूर धरि सोचैत छला, गमै छला आ तखन ओकरा सोझाँ अनै छला। मुदा ई परिवेशक दोष सेहो कहल जा सकैए जे तहियाक रचनाकार सभ विषए-बैस्तुकेँ संकुचित कऽ मैथिली लघुकथाकेँ सेहो संकुचित कऽ देलनि। २०म सदीक छट्ठम-सातम दशकमे प्रायः ओहने परिवेश संरचित छल। जकर परिणामे लघुकथा मात्र नै वरन् आनो विधा यथा कथा/ नाटक/ उपन्यास आदिमे वएह दहेज आ खिस्सा आ नेताजीक करनीकेँ सोझाँ आनल जाइत रहल छल। आब परिवेश बदललै, दृष्ज्टिगत फरिछता एलै, सामाजिक समरसता पसरलै। तहन समाजक छुआछूत मात्रक अवलोकन होइत छलै। मुदा आइ ओहि छुआछूतसँ भेल परिणाम, जाति-पातिमे बान्हल लोकक दृष्टि-परिवर्तन, आर्थिक सम्पन्नता, पैघक संग सभ बिन्दु। विषय वा स्थानपर ओहो अछोप सन, निंघेष बनल लोकक सहचर बनब, सभकेँ देखाओल जाए लागल आजुक लोककथामे। आब विषय विस्तार स्वतः सभ तरहक घटनाकेँ छुबैत कागचपर आबऽ लागल अछि। आबक परिवेशमे दहेजक पसार भऽ गेल अछि। एहेन पसार जकरा आब विशेष मुद्दा नै बना, बल्कि ओकरा जीवनक सामान्य क्रियाकलाप बुझि, परम्पराकेँ उघबाक प्रक्रियाकेँ दर्शाओल जाए लागल अछि। तहिया दहेज दानव जकाँ छलै। जे रचनाकारक लेल प्रमुख विषए छल। आइ दहेज दानव मात्र नै महादानव बनि ठाढ़ अछि मुदा परिवेश बदलल छै, माने कि आब तहियाक अपेक्षा आर्थिक सम्पन्नता बढ़ि गेलैए तेँ लोककेँ ई महादानव अपन जीवनक एकटा अंग बनि गेल अछि, कोनो बड्ड पैघ समस्या नै। आब तँ ओइसँ पैघ-पैघ समस्या रचनाकारकेँ उद्वेलित करैत अछि। यथा बिआहक खुजल रस्ता, कियो कोनो जाति-धर्मसँ बिआह कऽ सकैए आ ओकरा न्यायालय प्रमाणित तँ करिते अछि। सरकारी संरक्षण सेहो भेटै छै। ओहिसँ ऊपर दहेज उन्मूलनक दिशामे समलिंगी बिआह समाजकेँ जतऽ डेरा रहल अछि, ओतै रचनाकारकेँ एकटा नव दृश्यांकनक अवसर दऽ रहल अछि।एहि सन्दर्भमे दूटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक तीनटा लघुकथा राखि रहल छी- ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार) एकटा इमानदार आदमी “हम टैक्सीबलाकेँ अबाज देलौं आ टैक्सी रुकि गेल। “की हमरा अहाँ सोमोकन्या स्क्वेयर लऽ चलब? ओ जगह एतऽ सँ बड्ड दूर नै छै, मुदा हमरा जल्दी अछि।” पाँच मिनट बाद हम ओकरा रोकलौं। मीटर उनचास कोपेक देखबैत छल। हम एक रूबल निकाललौं। “हमरा लग छुट्टा पाइ नै अछि।” ड्राइवर कहलक। हम अपन जेबीमे तकलौं तँ पचास कोपेकक एकटा सिक्का भेटल। “अफसोच अछि जे हमरा लग एको कोपेक नै अछि।” “कोनो बात नै।” “किएक नै! ” ड्राइवर विरोध प्रकट केलक, “हम एना नै कऽ सकैत छी। अहाँ जनैत छी जे सवारीसँ मीटरसँ बेसी पाइ नै लेल जा सकैत अछि। हम इनामो नै लैत छी।” “बड्ड नीक, मुदा हम की करू? ” “वामा कोनापर एकटा तमाकूबलाक दोकान अछि, ओ खुल्ला कऽ देत।” पाँच मिनट पछाति हम ओइ दोकानपर पहुँचलौं, मुदा तावत धरि खेबाक छुट्टी भऽ गेल छल। मीटर आब सन्तानबे कोपेक बता रहल छल। “कोनो बात नै”- ड्राइवर सहानुभूति जतौलक, “कीव टीशनलग एकटा बैंक अछि, ओइमे काज करऽवाली लड़कीकेँ हम जनैत छिऐक, ओ अहाँकेँ पाइ खुल्ला कऽ देत।” हम कीव टीशन दिस गेलौं, मुदा बैंक बन्द छल। मीटर पूरे तीन रूबल देखा रहल छल। हम ड्राइवरकेँ तीन रूबल देलौं, ओ पाइ जेबीमे राखिकऽ मीटर बन्न कऽ देलक। “हमरा बड्ड दुख अछि”, ओ कहलक। हम सवारीसँ बेसी पाइ नै लैत छी। “बहुत आभारी छी, मुदा हम सोमोकन्या स्क्वायर कोना पहुँचब? ” “हम अहाँकेँ ओतऽ लऽ चलब।” ड्राइवर कहलक आ हमरा टैक्सीमे बैसते मीटर चालू कऽ देलक। पाँच मिनट बाद हम पहुँच गेलौं। मीटर फेरो उनचास कोपेक देखा रहल छल। हम छोट छीन चक्कू निकालि कऽ ड्राइवरक गरदनि लग व्लगा देलौं आ ड्राइवरक हाथमे जबरदस्ती पचास कोपेकक सिक्का राखि टैक्सीसँ कूदि कऽ भागि गेलौं। बादमे बहुत बाद धरि, जे नैतिक भ्रष्टाचार हम ओइ इमानदार आदमीक संग केने छलौं, हमरा ग्लानिक अनुभव होइत रहल। बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार) गपशप “आब हम सभ आपसमे किन्नहुँ गप्प-सप्प नै कऽ सकैत छी”, महाशय “क” एकटा लोकसँ कहलनि। “किएक”?, ओ चौकैत पुछलक। “हम अपन तर्कपूर्ण गप्प आब अहाँक सोझाँ नै राखि सकैत छी। ”, महाशय “क” लचारीवश अपन विचार रखलनि। “मुदा अइ बातसँ हमरापर कोनो फर्क नै पड़त। ”, दोसर अपन संतुष्टि देखौलक। “हमरा बूझल अछि।”, महाशय “क” खौंझाइत कहलक, मुदा हमरापर एकर असरि अवश्य पड़त। महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि महाशय “क” सँ पूछल गेल, जखन अहाँ कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत छी तखन की करैत छी? ” महाशय “क” उतारा देलक, “हम ओहि व्यक्तिक एकटा खाका बनबैत छी आ फेर ऐ फिकिरमे रहैत छी जे ओ हुबहु ओकरे जकाँ बनए। ” “के, ओ खाका? ” “नै।”, महाशय “क” जवाब देलक, “ओ आदमी।” पहिने लोकक विपन्नता सेहो दृष्टि संकुचनक पर्याय छल। ई स्वाभाविक छै जे पेट भरल रहतै तखने लोकक सोच ओइसँ दूर धरि जेतै। नै तँ सभटा सोच भूखसँ उत्पन्न भेल आकुलतामे समाहित भऽ रहि जाएत। आब स्थिति उनटल अछि। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक आएल चलनसारिमे आब लोक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न भेल अछि। आर्थिक सम्पन्नता आब पेटक भूखसँ इतर आन-आन भूख जगेलक अछि। जाहि कारणेँ चोरि, हत्या आ बलात्कारक सेहो बढ़ावा भेल अछि जे ओकरे रूप/ प्रतिरूप बदलि गेल अछि। तँ आजुक लेखककेँ कलम चलेबा लेल आ बदलल प्रतिरूप हथियारक रूपमे भेटि गेल आ रचनाकार सभ ऐ सभ अपराधक अपन कलमक माध्यमे नवीनीकरण कऽ सोझाँ आनि रहल छथि। सम्प्रति रचनाकार सभ पदयात्रासँ ऊपर उठि मंगलग्रह यात्रापर जा रचनारत छथि। पहिलका जमानामे लोक शुद्ध दूध ग्रहण करैत छल, आब दूध तँ दूर पानिक समस्या लोककेँ घेरने जा रहल छै। कतौ पानिक कमीसँ हाहाकार मचैए तँ कतौ लोक बाढ़िक कोप भाजन बनि भूखे बिलबिलाइत नाङट भेल छतविहीन लोकक असरा तकैए। आ लेखक ऐ सभपर अपन दृष्टिए नजरि गरा कागचपर अनै छथि। भारतमे सम्विधान सम्मत पितृसत्तात्मक परिवारकेँ उघबाक निमित्ते पुत्रक पैदाइशकेँ बढ़ावा देल जाइत रहल अछि। ओना तँ आइयो लोक बेटाक लिलसामे बेटीक हत्या (भ्रूण हत्या) कऽ रहल अछि जे दुनू अवस्था मैथिली लघुकथा लेखकक कलमक धारकेँ पिजौलक अछि। मुदा ऐ सबहक बावजूद जे मुद्दा लेखककेँ मसाला देलक ओ अछि नारी सशक्तिकरण। पहिने मौगीक मूँह जाबि कऽ ओकर सुरैतकेँ घोघमे नुकाएल रखबाक परिपाटी छल। मुदा आइ पुरुष सभ अपन कमाइकेँ द्वितीयक आ मौगीक नोकरीकेँ प्राथमिकता दऽ रहल अछि। शहरक कोन जे गाम देहातक मौगी सभ आब सरकारी नोकरी राजनीतिमे आगाँ बढ़ि कऽ आबि रहल अछि आ घरबला सभ पिछलगुआ बनि जीवन बिता रहल छथि, जकरा मैथिली लघुकथाकार सभ अपन कलमक माध्यमे भजा रहल छथि। महिलाकेँ आरक्षण दऽ एक दिस सरकार अप्पन कुर्सी बचबैए तँ दोसर दिस पुरुष सभ अपन घर बचेबा लेल संघर्षरत देखाइत छथि। जाहि सभ क्रियाकलापपर कलमकारक वक्र दृष्टि अछि। उपरोक्त बदलावक अतिरिक्त सभसँ पैघ परिवर्तन देखल जा रहल अछि तकनीकी चलनसारि। आइ मोबाइल इन्टरनेट डिश टी.वी./ एल.सी.डी. आ लेड टी.वी. लोकक जीवनकेँ एगदमसँ चलायमान बना देलक अछि। तेँ लोक धरतीक भीड़ आ भार कम करबाक लेल चान दिस नजरि दऽ रहल अछि। आजुक मैथिली लघुकथाकार सेहो उपरोक्त सभ बिन्दुकेँ छुबैत अपन रचनाक एक-एक सूक्ष्म गतिविधिक सुन्दर वर्णन करैत देखार भऽ रहलाह अछि। ऐ मे सभसँ ऊपर नाम अछि श्री अनमोल झा जीक जे अपना रचनामे अपन सर-समाज आ गामक जिनगीक दैनिक व्यवहारक प्रत्येक बिन्दुपर दृष्टिगत होइत कलम चला रहलाह अछि। लोकक एक-एक क्षणक बदलैत परिस्थितिक जमीनसँ ऊपर उठि हवामे उधियाइत मन मस्तिष्कक। समाजक लोकक प्रत्येक सरोकारक चित्रण अपन लघुकथामे केलनि अछि। तहिना मिथिलेश झा/ गजेन्द्र ठाकुरजी अपन सूक्ष्म दृष्टिएँ समाजमे होइत उत्थान-पतन/ नैतिक क्षीणता/ सामाजिक दायित्व, विछोह आदिकेँ जतऽ तक लोककेँ छूबि संशित वा क्षोभित करैए सभ मैथिली लघुकथाकार ओकरा कलमबद्न कऽ लोकक बन्न नजरिकेँ खोलबाक वा नवपथ दर्शन देबाक सुन्नर प्रयास कऽ रहल छथि। ऐ सभसँ ऊपर एक नाम अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झा जीक जे अपन दृष्टिएँ भौतिकवादी मुदा मौलिक नैतिक क्षरणकेँ एकटा फराक दृष्टिएँ सबहक सोझाँ अनबाक प्रयास च्केलनि अछि। हिनको कलम विषय विविधतापर नजरि राखि सभ कोनमे दौगि रहल अछि। अए सभसँ फराक गामक वा गमैय्या जिनगी मात्रक अवलोकन ओकर परिस्थितिवश बदलैत जीवनक प्रत्येक अंशकेँ शुद्ध गमैये सोचे दृष्टिगत कऽ सोझाँ आनाऽबला तीन प्रमुख नाम अछि- जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश मंडल आ रघुनाथ मुखिया जीक। ऐ तरहेँ समाजक बदलैत घटनाक्रमक प्रत्येक बिन्दुपर चाहे ओ सामाजिक समरसता हो , परिस्थितिगत बदलैत परिवेश हो, तकनीकी चलनक प्रभाव हो, आर्थिक सम्पन्नता- वैश्वीकरण- वा कोनो अन्यान्य खाँहिसँ जनमल कोनो समस्या। आजुक मैथिली लघुकथाकार ओइ प्रत्येक बिन्दुकेँ अपन कलमसँ उठा कागचपर आनि सोझाँ अनैत छथि। जाहिसँ सामाजिक सरोकारसँ जुड़ल एक घटना मैथिली लघुकथाक विषत बनि लोकक सोझाँ आबि रहल अछि। ऐ सँ ई स्पष्ट होइछ जे पहिनुका मैथिली लघुकथा वा लघुकथाकारक एकटा सीमामे बान्हल सोचसँ आगू बढ़ि आजुक रचनाकार मैथिली लघुकथा भण्डारकेँ एना भरि रहलाह अछि जाहिसँ कोनो उमेरक कोनो लोकक कोनो सोचक खाहिसँ पूरा भऽ सकए। तेँ समाजक सभ प्रकारक गतिविधिकेँ समेटकऽ चलि रहल छथि मैथिली लघुकथाकार। पहिल मैथिली लघुकथा गोष्ठीक आयोजन:- २० फरवरी १९९५ ई. केँ चित्रगुप्त प्राङ्गन हटाढ़ रुपौली (मधुबनी)मे भेल छल। संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन। अध्यक्षता- श्री भवनाथ भवन मंच संचालन- कुमार राहुल उपस्थित- १९ गोट लघुकथाकारक २६ गोट लघुकथा पाठ भेल। उपस्थित जनमे- पं.मतिनाथ मिश्र, पं. यन्त्रनाथ मिश्र, श्री श्यामानन्द ठाकुर, उमाशंकर पाठक, ललन प्रसाद, सचिदानन्द सच्चू, मुन्नाजी, कुमार राहुल, अतुल ठाकुर, प्रेमचन्द्र पंकज, मलयनाथ मण्डन, मीरा भारती कर्ण एवं सुनील कर्ण अपन रचना पाठ केलनि। ३. गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।
लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।
मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।
मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।
उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।
कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।
अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका । सम्पादन: अन्तर्जालपर विदेह ई-पत्रिका “विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com गद्य साहित्य मध्य लघुकथाक स्थान आ लघुकथाक समीक्षाशास्त्र गद्यक विभिन्न विधा जेना प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, कथा-गल्प, उपन्यास, पत्रात्मक साहित्य, यात्रा-संस्मरण, रिपोर्ताज आदिक मध्य कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास अनुभव मिश्रित कल्पनापर विशेष रूपसँ आधारित अछि। जकरा हम सभ खिस्सा-पिहानी कहै छिऐ ताहिसँ ई सभ लग अछि। मध्य कथा-गल्प, आख्यान आ उपन्यास आ किछु दूर धरि नाटक आ एकांकी मनोरंजनक लेल सुनल-सुनाओल-पढ़ल जाइत अछि वा मंचित कएल जाइत अछि। ई उद्देश्यपूर्ण भऽ सकैत अछि वा एहिमे निरुद्देश्यता-एबसडिटी सेहो रहि सकै छै- कारण जिनगीक भागदौड़मे निरुद्देश्यपूर्ण साहित्य सेहो मनोरंजन प्रदान करैत अछि। लघुकथा कहने एकटा एहेन विधा बनि सोझाँ आएल अछि जे पहिने कथा थिक फेर लघुकथा। लघुकथा, कथा, दीर्घ कथा, उपन्यास, नाटक आ एकांकी एकटा अनुभव मिश्रित कल्पनापर आधारित अछि। अंग्रेजीमे सेहो लम्बाइक आधारपर शॉर्ट-स्टोरी/ नोवेलेट/ नोवेला/ नोवेल क विभाजन कएल जाइत अछि जे क्रमसँ लघुकथा, कथा, दीर्घ कथा आ उपन्यास लेल प्रयुक्त कएल जा सकैत अछि। मैथिलीमे सभ विधामे शब्द संख्याक घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषासँ बेशी होइत अछि, ओना अंग्रेजी वा दोसर यूरोपियन भाषामे सेहो सभ विधामे लेखकक व्यक्तिगत रुचि आ कथ्यक आवश्यकताक अनुसार घटोत्तरी-बढ़ोत्तरी होइते अछि। तहिना वन-एक्ट प्ले भेल एकांकी आ प्ले भेल नाटक। से लघुकथा कथा तँ छीहे। अहाँक अनुभवमिश्रित कल्पना अहाँसँ किछु कहबा लेल कहैत अछि। आ ई कथ्य हास्य-कणिका वा अहास्य-कणिका बनि सकैत अछि। लोक अहाँकेँ कहि सकै छथि जे अहाँकेँ गप्प बड्ड फुराइए, अहाँ हाजिर जवाब छी। आ तकर बाद अहाँक हिम्मत बढ़ैत अछि आ अहाँ ओहि कथ्यकेँ शिल्पक साँचामे ढलैय्या कऽ लघुकथा बना दै छी। हास्य-कणिकाक संग सभसँ मुख्य अवरोध छै जे अहाँक सुनाओल हास्य-कणिका घूमि-फिरि अहीं लग आबि जाएत, माने मौलिकता कतौ हेरा जाएत। हास्य-कणिका सेहो एक-दू पाँतीसँ आध-एक पृष्ठ धरिक होइत अछि। कथा-उपन्यासमे एकर समावेश कएल जा सकैत अछि मुदा लघुकथा एकर पलखति नै दैत अछि। मुदा कथा-उपन्यासमे जेना कएल जाइत अछि जे एकरा कोनो पात्रक मुँहसँ कहाबी वा कोनो आन प्रसंगसँ जोड़ि सार्थक बनाबी तँ से अहाँ लघुकथामे सेहो कऽ सकै छी। गल्प आख्यानसँ होइत अछि आ नैतिक शिक्षा, प्रेरक कथा आ मिस्टिक टेल्स सेहो लघुसँ दीर्घ रूप धरि होइत अछि। एकर लघु रूप लघुकथा नै भेल सेहो नै। लघुकथामे जे त्वरित विचारक उपस्थापन देखल जाइत अछि से कथा-गल्प आ उपन्यासमे सेहो रहैत अछि। मुदा जे त्वरित विचारक उपस्थापन नै रहलासँ ओ लघुकथा नै रहत सेहो गप नै। उनटे जखन लघुकथाक समीक्षा करए लागब तखन समीक्षकक ध्यान स्थायी तत्व दिस होएबाक चाही नै कि त्वरित उपस्थापन दिस। त्वरित विचारक उपस्थापनक प्रति बेसी झुकाव ओकरा अहास्य-कणिका बना दैत अछि, ओ लघुकथा तँ रहत मुदा श्रेष्ठ लघुकथा नै रहत। लघुकथा झमारि देत तँ ओ लघुकथा वा श्रेष्ठ लघुकथा भेल आ जे ओ झमारि नै सकत तँ ओ लघुकथा भेबे नै कएल- ई गप नै छै। कोनो त्वरित विचार आएल, ओकरा कागचपर लिखि लेलहुँ, एहि डरसँ जे कतौ बिसरा ने जाए- एतऽ धरि तँ ठीक अछि। मुदा हरबड़ा कऽ एकरा लघुकथा बना देबासँ पहिने विचारकेँ सीझऽ दिऔ। ओहिमे की मिज्झर करब तँ ओहिमे स्थायी तत्व आबि सकत ताहिपर मनन करू। ओना बिना सिझने जे झमारैबला लघुकथा लिखि देलहुँ तँ ओ लघुकथा तँ भेल मुदा श्रेष्ठ लघुकथा ओ सेहो भऽ सकत तकर सम्भावना कम। ई ओहिना अछि जेना कोनो झमकौआ गीत अपन प्रभाव बेसी दिन रखबे करत से निश्चित नै अछि तहिना कथाक ई स्वरूप ट्वेंटी-ट्वेंटी सन नै भऽ जाए ताहिपर विचार करए पड़त। उपन्यास तँ एक उखड़ाहामे नै पढ़ल जा सकैए मुदा कथा एक उखड़ाहामे पढ़ल जा सकैत अछि। एक उखड़ाहामे अहाँ कएकटा लघुकथा पढ़ि सकै छी। उपन्यासमे लेखक वातावरणक, प्लॉटक, व्यक्तिक जाहि विशदतासँ वर्णन कऽ सकैए से कथामे सम्भव नै। ओ एकटा पक्षपर/ जौँ कही तँ एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए आ एहि क्रममे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच मात्र खेंचि पबैए। लघुकथामे वातावरण आ व्यक्तिक जीवनक एकटा मोटामोटी विवरणात्मक स्केच सेहो नै खेंचि सकै छी, से पलखति लघुकथा अहाँकेँ नै देत, हँ तखन लघुकथा सेहो एकटा पक्षपर वा एकटा घटनापर केन्द्रित रहैए। आ ई पक्ष वा घटना तेहन रहत जे लेखककेँ ललचबइत रहत जे एकरा स्वतंत्र रूपसँ लिखू, एकरा कथा वा उपन्यासक भाग बना कऽ एकर स्वतंत्रता नष्ट नै करू। तखन उपन्यासक प्लॉटसँ कथाक प्लॉट सरल होएत आ लघुकथाक लेल तँ एकर आवश्यकते नै अछि, पक्ष वा घटनाक वर्णन शिल्पक साँचामे ढलैय्या केलहुँ आ पूर्ण लघुकथा बनि कऽ तैयार। लघुकथाक समीक्षाशास्त्र लघुकथाक समीक्षा कोना करी? दू-पाँतीसँ डेढ़-दू पन्ना धरिक (पाँच पन्ना धरि सेहो) अनुभवमिश्रित काल्पनिक खिस्सा लघुकथा कहएबाक अधिकारी अछि। लघु आकारक कथामे कोनो कथा पूर्ण रूपसँ कहल गेल तँ फेर ओ लघुकथा नै कहाओत। हँ जे ओहिमे एकटा घटनाक शृंखलाक वर्णन एकटा कथ्य कहक लेल आवश्यक अछि तँ शृंखला पूर्ण होएबाक चाही। एहि शृंखलाक कड़ी कनेक नमगर भऽ सकैए। त्वरित उपस्थापनाक हरबड़ी एहि शृंखलाकेँ कमजोर कऽ सकैए। सदिखन उल्टा धार बहाबी आ त्वरित उपस्थापना आनी- ई पद्धति किछु गणमान्य लघुकथा लेखकक फार्मूला बनि गेल अछि। एकाध-दूटा लघुकथामे ई सिनेमाक “आइटम गीत” सन सोहनगर लगैत अछि मुदा फेर समीक्षकक दृष्टि एकरा पकड़ि लैत अछि, कारण ई प्रो-एक्टिव होएबाक साती रिएक्टिव बनि जाइत अछि। स्थायी प्रभाव एहिसँ नै आबि पबै छै, लघुकथा लेखकक प्रतिभाक कमी एहिमे प्रतीत होइ छै। लघुकथा वएह श्रेष्ठ होएत जे एकटा घटनाक शृंखलाक निर्माण करत आ अपन निर्णय सुनेबाक लेल पाठककेँ छोड़ि देत। फरिछेबाक पलखति लघुकथाकेँ नै छै, मुदा तकर माने ई नै जे दू-चारि पाँतीमे बात कएल जाए। मुदा लेखक जौँ दू-चारि पाँतीक गपकेँ लघुकथा कहै छथि तँ समीक्षक ओकरा लघुकथा मानबा लेल बाध्य छथि मुदा ओ श्रेष्ठ लघुकथा होएत तकर सम्भावना घटि जाइत अछि। लघुकथाक वर्ण्य विषय मात्र चलैत-फिरैत घटना नै अछि। लघुकथा-लेखककेँ बच्चाक लेल, नैतिक शिक्षाक लेल आ धार्मिक विषयपर सेहो लघुकथा लिखबाक चाही। ट्रेनमे बसमे जाइ छी, घरमे दलानपर घूरतर गप करै छी आ तकर अनुभव मात्र लघुकथामे आबि रहल अछि। सामाजिक आ आर्थिक समस्या सेहो एकर स्थायी वर्ण्य विषय भऽ सकैत अछि। राजनैतिक प्रश्न आ प्राकृतिक आपदाकेँ वर्ण्य विषय बनाओल जा सकैत अछि। लघुकथा समीक्षक समीक्षा करबा काल पौराणिक रूपमे शिव पुराणमे सभसँ पैघ शिव आ गरुड़ पुराणमे सभसँ पैघ गरुड़ एहि तरहक समीक्षा नै करथि। माने ई नै होमए लागए जे, जे अछि से लघुकथा। जेना उपन्यासमे लेखककेँ अपन पूर्ण प्रतिभा देखेबाक लेल पलखतिक अभाव नै रहै छै से कथामे नै रहै छै आ लघुकथामे तँ से आरो कम रहै छै। मुदा विषयक विस्तार कऽ पाठकक माँगकेँ पूर्ण कएल जा सकैत अछि। कथोपकथनक गुंजाइश कम राखि वा कोनो उपस्थापनासँ पहिने राखि लघुकथा आ कथाकेँ सशक्त बनाओल जा सकैत अछि, अन्यथा ओ एकांकी वा नाटक बनि जाएत। लघुकथाक समावेश कथा-उपन्यासमे भऽ सकैए मुदा लघुकथामे हास्य-कणिकाक समावेश नै हुअए तखने ओ समीक्षाक दृष्टिसँ होएत, कारण एक तँ कम जगह, ताहिमे जे कथोपकथन आ हास्य कणिका घोसियेलहुँ तखन ओकर प्रभाव दीर्घजीवी नै होएत। नीक लघुकथा त्वरित उपस्थापनक आधारपर नै वरन ओहिमे तीक्ष्णतासँ उपस्थापित मानव-मूल्य, सामाजिक समरसताक तत्व आ समानता-न्याय आधारित सामाजिक मान्यताक सिद्धान्त आधार बनत। समाज ओहि आधारपर कोना आगू बढ़ए से संदेश तीक्ष्णतासँ आबैए वा नै से देखए पड़त। पाठकक मनसि बन्धनसँ मुक्त होइत अछि वा नै, ओहिमे दोसराक नेतृत्व करबाक क्षमता आ आत्मबल अबै छै वा नै, ओकर चारित्रिक निर्माणक आ श्रमक प्रति सम्मानक प्रति सन्देह दूर होइ छै वा नै- ई सभटा तथ्य लघुकथाक मानदंड बनत। कात-करोटमे रहनिहार तेहन काज कऽ जाथि जे सुविधासम्पन्न बुते नै सम्भव अछि, आ से कात-करोटमे रहनिहारक आत्मबल बढ़लेसँ होएत। हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत? बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन, कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइत छैक, शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत लिखल जाएबला कथामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए। मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर। युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार एहिमे नहि भेटत, आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता, सत्ताक गतिशीलता, उद्योगीकरण, स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्य राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, कखनो काल परस्पर विरोधी। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रिया। आदिवासी- सतार, गिदरमारा आदि विविधता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता। व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति। किछुकेँ तिरस्कार आ हुनकर जीवन कठिन। महिला आ बाल-विकास- महिलाकेँ अधिकार, शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करब, पाठ्यक्रममे महिला अध्ययन, महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए।स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन।धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित- धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित। विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओहि विकासमे साझी भऽ सकैए। एहिसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। विज्ञान आ प्रौद्योगिकी विकसित आ अविकसित राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा, आशा सुविधाक असीमित विस्तार आ आधार। विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही। नागरिक स्वतंत्रता- मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति। प्रेस- शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे भूमिका, मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार। नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका। जल थल वायु आ आकाश- भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कए प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन। कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। सौंदर्यक कला उपयोगिताक संग। कलापूर्णताक कलाक जीवन दर्शन- संप्रदाय संग। भावनात्मक वातावरण- सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, सुन्दर-मूर्त, अमूर्त। मानसिक क्रिया- मनुष्य़ सोचैबला प्राणी, मानसिक आ भौतिक दुनूक अनुभूति करएबला प्राणी। विरोधाभास वा छद्म आभास- अस्पष्टता। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत। कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि। जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि। जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि। मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि। आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण-विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका , सत्य-असत्य, सभक अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन , आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावनाक रहि-रहि खतम होएब, सत्य कखन असत्य भए जएत तकर कोनो ठेकान नहि, सतही चिन्तन, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि , जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण , कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास, गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास, भूमंडलीकरणक कारणसँ मुख्यधारसँ अलग भेल कतेक समुदायक आ नारीक प्रश्नकेँ उत्तर आधुनिकता सोझाँ अनलक। विचारधारा आ सार्वभौमिक लक्ष्यक विरोध कएलक मुदा कोनो उत्तर नै दऽ सकल। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी। आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास । प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि । विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि। तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि।जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। लघुकथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि।आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल। पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म।कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट !पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। लघुकथा एक पक्ष वा घटनाक वर्णन अछि आ ई आवश्यक नै जे ओकरा एक्के पृष्ठमे लिखल जाए। अहाँ ओहि घटनाकेँ ३-४ पृष्ठमे सेहो लिखि सकै छी आ ओ लघुकथा रहबे करत। जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” लघु-कथा संग्रहक सभ कथा एकटा घटनासँ अनचोके कोनो वस्तुक त्वरित ज्ञान दर्शबैत अछि। १५ टा शॉर्ट-स्टोरीक संग्रह जेम्स जॉयसक “डब्लाइनर” २०० पृष्ठक अछि आ मैथिली लघुकथाक सभ विशेषतासँ युक्त अछि। तहिना खलील-जिब्रान आ एंटन चेखवक ढेर रास शॉर्ट-स्टोरी नमगर रहितो लघुकथा अछि। अंग्रेजीमे वा यूरोपियन साहित्यमे शॉर्ट-स्टोरी आ स्टोरीक प्रयोग कखनो पर्यायवाचीक रूपमे होइत अछि। नॉवेल जकरा बांग्ला आ मैथिलीमे उपन्यास आ मराठीमे कादम्बरी कहै छिऐ-क विस्तार बेशी होइ छै। मैथिलीमे ५०-६० पृष्ठसँ उपन्यास शुरू भऽ जाइत छै जे अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरी / नोवेलेट/ नोवेला/ एहि सभक ऊपरी सीमाक्षेत्रमे अबैत अछि। मुदा मैथिलीक स्थिति अंग्रेजीसँ फराक छै। एहिमे बालकथा कैक राति धरि चलैत अछि तँ पैघ लोकक कथा मिनटमे सेहो खतम भऽ जाइत अछि। मैथिलीक सन्दर्भमे ई तथ्य आब सोझाँ आबि गेल अछि जे लघुकथाक सीमा एक पृष्ठ, कथाक तीन-चारि पृष्ठ, दीर्घकथाक १५-२० पृष्ठ आ उपन्यासक ६०-५०० पृष्ठ अछि। एहिमे लघुकथाक पृष्ठ सीमा १-४ पृष्ठ धरि करबाक बेगरता हम बुझै छी। पंकज कुमार प्रियांशु- जीवनक अनमोल क्षण, जगदीश प्रसाद मंडल दीर्घ कथा ‘मइटूगर’क शेषांश पंकज कुमार प्रियांशु (पंकजजी साहित्य अकादमी द्वारा कॉमनवेल्थ गेम्सक ऊपर कएल जा रहल सेमीनारमे प्रतिभागी छथि।) पिता- श्री विद्याधर झा, जन्म ०३.०२.१९८५ जीवनक अनमोल क्षण जखन प्लस टू सँ इण्टर कएलाक बाद महाविद्यालयमे प्रवेश कएलहुँ तँ बहुत प्रयास कएलाक बाद दू गोट संगी बनल, ओहो समाज सेवा कार्यसँ जुड़लाक बाद। सुनबामे अबैत छल जे कॉलेज स्टूडेन्टकेँ कए गोट मित्र रहैत अछि- पुरुष मित्र आ महिला मित्र दुनू। पुरुष मित्र तँबूझएमे आएल मुदा महिला मित्र एहिपर हमरा कनी आपत्ति छल, किएक तँ हमरा बुझने पुरुष ओ महिला मात्र मित्रेटा बनि नै रहि सकैत अछि। महिला मित्र नै बनए एकरा प्रति सचेष्ट रहैत छलहुँ। यदि कोनो लड़कीसँ आमने-सामने गप करबाक स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत छल तँ परेशान भऽ जाइत छलहुँ। एहि बातपर हम सदिखन दृढ़ निश्चय रही जे यदि कहियो कोनो लड़कीसँ मित्रता भेल तँ ओकरा अपन जीवन-संगिनी बनबाक प्रस्ताव अवश्य देबै। मुदा तकरा लेल एकटा एहन कियो होएबाक चाही जकर कल्पना हम कएने छी। आ हमर कल्पनामे जकर प्रतिबिम्ब छल तकरामे एकमात्र विशेषताक आशा ई कएने रही जे ओ हमरा बूझि सकए। मुदा आजुक समए एहन साथी भेटनाइ, ओहूमे हमरा एहन सामान्य परिवारक लड़काकेँ असम्भव बुझना जाइत छल। तेँ एहि दिशामे हमर कोनो विशेष प्रयास कहियो नै रहल। समए बितैत रहल आ महाविद्यालयमे नामांकन लेलहुँ। हमर मनकेँ जकर इन्तजार छल से शाइत ओतहि आसपास हमर प्रतीक्षामे छल, ई बात बड्ड बादमे बूझएमे आएल। एक दिन कोनो विशेष कार्यवश स्टेशन जएबाक मौका भेटल। किछु अतिथि लोकनि आएल रहथि, हुनका लोकनिकेँ ट्रेनपर बैसेबाक लेल। जाहि बॉगीमे हिनका लोकनिक आरक्षण छल ओहिमे नीचाँबला दूटा बर्थ खाली रहैक। ट्रेन खुजबामे एखन किछु समए छल। तेँ हम ओहि खाली बर्थपर बैसि रहलहुँ। किछु समएक बाद ओहि बॉगीमे दूटा लड़कीकेँ चढ़ैत देखलिऐक। ओहिमे एकटा लड़की चिन्हार सन लागल। भगवानसँ प्रार्थना कएलहुँ जे कमसँ कम किछु क्षणक लेल ओ हमरा लग आबि बैसए। हमर मन तत्क्षण पूरा भऽ गेल। जखन करीबसँ हमर नजरि ओकरासँ मिलल तँ इच्छा भेल जे सभ मर्यादा तोड़ि एकटक ओकरे देखैत रहियैक। मुदा से नै भऽ सकैत छल। हमरा लागल ई तँ ओएह छथि जिनका हमर आत्मा एकीकार करए लेल व्याकुल छल। किछु देर बाद ट्रेन खुजल आ एक खुबसूरत पल हमरासँ दूर होइत गेल। ओ हमरासँ दूर तँ चलि गेली मुदा हमर मन हमरा संगे नै छल।किछु दिन बाद विश्वविद्यालयक कोनो कार्यक्रममे पुनः भेंट भेल। तखन बूझएमे आएल जे ओ हमर विभागक बगलबला विभागक छात्रा छलीह। आब सप्ताहमे एक-दू दिन हुनकासँ भेंट भऽ जाइत छल। कोनो बात करबाक साहस तँ नै होइत छल मुदा जाधरि ओ सोझाँमे रहैत छलीह दुनियाँ बिसरबाक मन होइत छल। एक साल बाद ओकर सत्र समाप्त भऽ गेलै आ ओ अनचोक्के एक दिन शहरसँ दूर चलि गेली। बहुत किछु कहबाक रहए मुदा आब सभ मनेमे रहि गेल। तखन मनकेँ सांत्वना देबाक लेल तरह-तरहक बात अपने-आपसँ करए लगलहुँ। सोचलहुँ एतेक पैघ परिवारक लड़की हमरासँ दोस्ती किएक करत? एतेक सुन्दर नयनाभिराम लड़कीक की पहिनेसँ कोनो दोस्त नै हेतैक जकरा ओ दोस्तसँ बेसी आर किछु मानैत होएत। एहने सभ विचारसँ मनकेँ बुझबाक प्रयास करैत छलहुँ मुदा आगू जा कए हमर ई सभ विचार असत्य भेल। धीरे-धीरे हम अपन कार्यमे लागि गेलहुँ मुदा ओ मनमोहिनी चेहरा हमरा सामनेसँ कहियो नै हटल। तीन-चारि मासक बाद संयोगसँ ओहि विभागमे जेबाक मौका लागल। ओतए सामान्य प्रयासक बाद हमरा ओकर नम्बर सेहो भेट गेल मुदा बात करबाक हिम्मति नै जुटा सकलहुँ। संयोगसँ ओहि विभागमे कोनो विशेष कार्यक्रमक आयोजन छल। हम एहि कार्यक्रमक जानकारी देबएले हुनका फोन कएल। बहुत बेसी नै, दू-चारि मिनट गप भेल। जखन ओ दोबारा भागलपुर अएलीह तँ लगभग एक घंटा समए बितेबाक मौका भेटल। ओहि बीचमे एक-दू बेर हुनक मोबाइलपर फोनो आएल, जाहिमे आधा घंटा लगभग ओ व्यस्त रहलीह। हमरा ई पक्का बुझा गेल जे हुनक पहिनेसँ कोनो मित्र छल, कोन प्रकारक से नै बूझि सकलहुँ। ओ जखन वापस चलि गेली तँ हुनका लए परेशान रहए लगलहुँ। ओना आब फोनपर बातचीतक सिलसिला शुरू भऽ गेल छल। तैयो हमर मन हुनका प्रति एतेक आकृष्ट भऽ गेल छल जे एक दिन हुनका बिना बितेनाइ मोश्किल भऽ गेल छल। परोक्ष रूपसँ अपन मोनक दशा हुनकासँ गपशपक क्रममे बता दै छलियन्हि। हमरा आस्ते-आस्ते एहन लागए लागल जे शाइत ओहो हमरासँ प्रेम करैत छथि।शाइत ओ पहिने हमरा दिससँ पहलक आशा कएने छलीह। लगभग दू मासक बाद एहेन मौका लागल जे हम डराइत-डराइत अपन मनक बात कहि देलियनि। दू दिन बाद हमरा जवाब भेटल। जवाब अनुकूल छल। आब तँ हमरा लागए लागल जे हमर जिन्दगीक सभसँ बहुमूल्य वस्तु हमरा भेटि गेल। विश्वास नै होइत अछि मुदा ई सत्य अछि जे आइ ओ हमर जीवन संगिनीक रूपमे संग दऽ रहल छथि। आ एक आदर्श गृहिणीक अपन जिम्मेदारी सम्हारि रहल छथि। ईश्वरकेँ धन्यवाद दैत छियनि जे हमरा एक एहेन जीवन साथी प्रदान कएलनि जे हमर जीवनक क्षण-क्षणकेँ अमृत समान पवित्र आ विशिष्ट बना देने छथि। जगदीश प्रसाद मंडल दीर्घ कथा ‘मइटूगर’क शेषांश अवश्य पढ़ल जाए- सुशीलाक बात सुिन पलहनि चमकि उठल। बारे रे, सभसँ बेसी भार अपने ऊपर आबि गेल। जन्मक पालनक भार....। अखन धरि जते ठीन काज केलौं, एहेन काजसँ भेँट कहाँ भेल! बुझल बात कम आ अनभुआर बेसी बजरत। जते अपना दिस तकैत जाथि तते चिन्ता बढ़ल जाइत। बच्चाकेँ दूध पिआएव जरूरी भऽ गेल। माइक तँ यएह गति छनि। हे भगवान कोनो उपाय धड़ावह। मन पड़लै अपन बच्चा। अपनो तँ दूध होइते अछि तखन एते घबड़ेवाक कि जरूरत अछि। मुदा अपन दूध तँ चारि मासक बकेन अछि। गजुरा तँ नहि। एत्ते विचार करब तँ बच्चे दम तोड़ि देत। हे भगवान जानिहह तूँ। मने मन कहि दुनू बच्चाकेँ दुनू छाती लगा दूध पिअबए लगली। बच्चाक चोभ देखि पलहनिक मन खुशीसँ बिखैर गेलनि। संकल्प लेलनि जे बच्चाकेँ मरऽ नहि देव। आइये बकरी दूधक ओरियान करैले सेहो कहि दैत छिअनि आ टेम-कुटेम अपनो चटा देवै। मुदा अपनो बच्चा तँ चारिये मासक अछि। छह माससँ पहिने कना दालिक पानि चटेबै। फेरि मातृत्व जगितहि बुदवुदेलीह- ‘अइसँ पैघ काज ऐ धरतीपर हमरा लिए की अछि? जँ दुनियाँ देखऽ पच्चा आएल हएत तँ जरूर देखत। पुतोहूक बात सुिन सुनयना चेतनहीन हुअए लगलीह। कास-कुसक फूल जकाँ मन उड़ि-उड़ि बौराए लगलनि। बच्चाक मुँहपर नजरि पड़ितहि उपराग दैत भगवानकेँ मने-मन कहलनि- “कोन जनमक कनारि अइ बच्चासँ असुल रहल छह। अइ निमू-धनक कोन दोख भेलै। जँ तोरा नइ सोहेलह तँ पेटेमे किअए ने कनारि चुका लेलह। एहन बच्चाक एहन गंजन तोरे सन बुते हेतह।” चहकैत करेजसँ द्रवित भऽ कुहरि उठलीह। एक तँ वेचारीक (पुतोहूक) उपर केहन डाँग पड़ल जे अमूल्य कोखि उसरन भऽ गेलै, तइ संग बच्चा लटुआएल अछि। मुदा अपनो वंश तँ उसरने भऽ रहल अछि। थाकल-ठहिआएल छी छातीपर पथरो रखि आँखि तकब मुदा तपेसर तँ से नहि अछि। जुआन-जहान अछि, हो न हो बताह बनि कहीं बौर ने जाए। ककरा के देखत? जहिना धारक बहैत धारामे माथक मोटरी खुललासँ मोटरीक वस्तु छिड़िया पानिक संग भाँसऽ लगैत जहिसँ किछु बिछेबो करैत आ किछु भँसियो जाइत तहिना सुनयनाक विचार किछु उड़िआइत किछु ठमकल छाती दहलाइत। ओसारक खूँटा लगा बैसल तपेसरक मन मानि गेल जे चूक हमरोसँ भेल। आइ धरि जे देखैत एलौं वएह मनमे बैस गेल। कि रेडियो-अखबारक समाचार झुठे रहैत अछि जे दू-तीन-चारि धरि बच्चा मनुष्यकेँ होइत छै। जहिना परम्परासँ अबैत व्यवहारकेँ बिनु सोच-विचार केनहुँ सभ लकीरक फकीर बनि लहास ढोइत अछि तहिना तँ केलहुँ। मुदा हाथक डोरा टुटने जहिना गुड्डी अकासमे उधिया जाइत तहिना ने तँ उधिया गेलहुँ। सोचैक, बुझैक बात छल जे एक बच्चाक लेल कते सेवाक जरूरत होएत, दू बच्चाक लेल कते....। से नहि बुझि सकलहुँ। आइ जँ वुझल रहैत तँ एहेन दिन देखैक अवसर नहि भेटैत। परिवार उजड़ि जाएत। वंश विलटि जाएत। मुदा जे चुकि गेलहुँ ओकर उपाइये कि? जहिना थाकल अड़िकंचनमे सुन्दर सुकोमल पेंपी निकलैत तहिना तपेसरक मनमे आशाक पेंपी उगल। धारक धाराक सिक्त मनमे उठलनि, जहिना एक दिस परिवार, वंशकेँ उजड़ैत-उपटैत देखै छी तहिना तँ भूत, वर्तमान आ भविष्य सेहो आँखिक सोझमे लहलहा रहल अछि। लहलहाइत परिवारकेँ देखि तपेसरक हृदय उफनि गेलनि। जहिना धारक धारा माने बेगमे टपै काल ओरिया कऽ पाएर रखितहुँ थरथराएल पाएर पिछड़ैत रहैत तहिना तपेसरक मन सेहो असथिर नहि भऽ पिछड़ए लगलनि। मुदा जी-जाँति कऽ माटिपर पाएर रोपितहि मनमे उठलनि, माइयो जीविते छथि, अपनो छी, तैपरसँ दूटा दूधमुहाँ बच्चा सेहो अछिये। तखन परिवार किअए उपटत? हँ, ई बात जरूर जे पुरूष-नारीक बीच बच्चाक लेल माए भोजनक पहिल बखारी होइ छथि। मुदा युग धर्मो तँ कहैत अछि जे आजुक बच्चाक नसीबसँ माइक्रोसॉफ्ट दूध कटि रहल अछि। तइयो तँ बच्चा जीविये जाइत अछि। तखन ई बच्चा किएक ने जीति? सोगाइल तपेसरक मुँह देखि माए सुनायना बोल-भरोस देबा लए घरसँ निकलि आबि बजलीह- “बच्चा, गाड़ीये पहिया जहाँति जीते जिनगी सुख-दुख अबैत रहैए। तइले कननहि की हेतह? भगवानक लीले अगम छन्हि। अखनी हम जीविते छी। हमरा अछैत तोरा कथीक दुख होइ-छह।” सिमसल आँखि उठा तपेसर मायक मुँहपर देलनि। हवामे थरथराइत दीपक बाती जकाँ सुनयनाक छाती डाेलैत। मुदा जहिना हवाक झोंककेँ सहन करैत दीप प्रज्वलित रहैत तहिना धैर्यक लौ सुनयनाक बोलसँ टपकल विचार सुनि तपेसरक मनक डोलैत जमीन थीर हुअए लगल। मनमे उठलनि, यएह माए पुरूख जानि अपन सहारा बुझैत छथि आ अखन सहारा बनि ठाढ़ छथि। कोढ़ीसँ फुलाइत फूल जकाँ तपेसरक मन फुलाए लगलनि। तहिकाल पलहनि मुँह उठा कऽ बाजलि- “काकी, एतै आबथु।” पलहनिक बात सुिन सुनयना तपेसरपर नजरि दौड़ा सोइरीघर दिस बढ़लीह। मनमे एलनि, ओना अन्हारघर साँपे-साँप रहैत मुदा हथोरियो थाहि कऽ तँ लोक अन्हारोमे जीविते अछि। सभ मिलि जँ लगि जाएव तँ बच्चा जरूर उठि कऽ ठाढ़ हेबे करत। तपेसरक मनमे उठल, ‘जाधरि साँस ता धरि आस।’ अपना सभ बुते काज नहि सम्हरत। डॉक्टरकेँ बजेबनि। मुदा लगमे तँ ओहो नहिये छथि। जँ रोगियेकेँ लऽ जाए चाहब सेहो भारिये अछि। एक तँ तेहेन सवारी सुबिधा नहि नहि दोसर तीिन-तीनि गोरेकेँ लए जाएव। ओतवे नहि, अपनो सभकेँ जाइये पड़त। एक दिस अब-तबक िस्थति दोसर दिस सवारीक ओरियान आ डाॅक्टर ऐठाम पहुँचैत पहुँचैत बँचती कि नहि। जहिना अमती काँट एक दिस छोड़बैत-छोड़बैत दोसर दिस पकड़ि लैत तहिना तपेसरक मन ओझरा गेल। कोनो सोझ बाट आँखिक सोझामे पड़बे नहि करैत। बेकल मने उठि कऽ सोइरी घर पहुँच तपेसरकेँ पुछलनि- “माए....।” माएक पछाति कोनो शब्द मुँहसँ नहि निकलल। तपेसरक बेकल मन देखि पलहनि बाजलि- “बौआ, एना मन नइ छोट करू। जे करतूत अछि सएह ने अपना सभ करब। ककरो जान ते नइ दऽ देबै। जखैनसँ दुनू बच्चाकेँ छाती चटौलिऐ तखैन से कल परल अछि। सबसे पहिने दूधक ओरियान करू। अखन महीसि-गाइक दूध पचबैवला नइ अछि नइ अछि, कतौसँ बकरी कीनि आनू। एक तँ बकरियो सब तेहन अछि जे अपनो बच्चा पालैक दूध नइ होइ छै, मुदा जकरा एकटा बच्चा हेतइ ओहन कीनि लिअ।” क्रमश: रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न, सुजीत कुमार झा- संस्मरण मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल रामभरोस कापड़ि "भ्रमर" राजविराजमे मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी सम्पन्न नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आ मैथिली साहित्य परिषद्क संयुक्त तत्वावधानमे गत भाद्र २८ गते ‘मैथिली लोक संस्कृति संगोष्ठी’ सम्पन्न भेल अछि । उक्त गोष्ठीक प्रमुख अतिथिक आसनसं समुद्घाटन करैत नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा प्रसाद उप्रेती नेपाल–भारत सांस्कृतिक सम्वन्ध मजवूत बनएबाक हेतु मैथिली भाषा महत्वपूर्ण कडी थिक–बजलाह । बदलैत परिस्थिति अनुसार प्रज्ञा पतिष्ठान सेहो संगठित भऽ रहल ह्यबाक जानकारी दैत उपकुलपति उप्रेती आगां बजालाह– मैथिली भाषाक उत्थान सेहो ताही अनुरुप ह्यत । गोष्ठीमे धन्यवाद ज्ञापन करैत नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक संस्कृति विभाग प्रमुख रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ प्रज्ञा प्रतिष्ठानमे बढ़ैत मैथिलीक गतिविधिक जानकारी करबैत आर ठोस काज भऽ सकए तकरा लेल मैथिली अनुरागी सभसं दबाबमूलक कार्यक्रम लएबाक आग्रह कएलनि । प्रज्ञा प्रतिष्ठानसं प्राप्त अवसरकें सदुपयोग करबाक हेतु सेहो ओ सभक ध्यानाकर्षण कएलनि । उद्घाटन समारोहमे भारतसं आयल मैथिलीक विद्वानलोकनि डा.प्रफुल्ल कुमार मौन, डा.रामानन्द झा ‘रमण’, चन्द्रेश अपन मन्तव्यमे नेपालक मैथिली साहित्यक बढ़ैत डेग प्रति आश्वस्त होइत संगोष्ठी सन कार्यक्रमक निरन्तरता पर जोड़ देलनि । समारोहकें पूर्वाञ्चल विश्वविद्यालयक उपकुलपति डा.रामावतार यादव, त्रि.वि.वि.क पूर्व भाषा विज्ञान विभाग प्रमुख डा.योगेन्द्र प्र.यादव, त्रि.वि.वि.क मैथिली विभागाध्यक्ष डा.पशुपतिनाथ झा, मैथिलीक सह प्राध्यापक परमेश्वर कापड़ि, मैथिलीक उप–प्राध्यापक उमेश कुमार ललन, डा.सुनिल कु.झा, प्र.जि.अ.रामप्रसाद घिमिरे, जि.शि.अ.शत्रुघ्न प्रसाद यादव आदि व्यक्तित्वलोकनि सम्वोधन कएने रहथि । कार्यक्रम सत्रमे मैथिली लेखन पद्धतिपर डा.रामावतार यादव, लेखन सहजता पर डा.योगेन्द्र प्र.यादव, नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्यक स्वरुपपर चन्द्रेश कार्यपत्र प्रस्तुत कएलनि जकर टिप्पणी क्रमशः डा.रामानन्द झा रमण, डा. सुनिल कुमार झा एवं डा.प्रफुल्ल कुमार मौन कएने रहथि । उपस्थित प्रबुद्ध श्रोता लोकनि दिल खोलि कऽ अपन–अपन प्रश्न पुछने रहथि । कार्यपत्र सत्रक अध्यक्षता प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ कएने छलाह । कार्यक्रममे विभिन्न व्यक्तित्वकें मैथिली साहित्य परिषद् राजविराजद्वारा पाग, दोपुटा पहिरा सम्मानित कएल गेल । सम्मानित व्यक्तित्वमे प्रज्ञा प्रतिष्ठानक उपकुलपति गंगा प्र.उप्रेती, पूर्वाञ्चल विश्व विद्यालयक उपकुलपति डा.रामावतार यादव, प्राज्ञ डा.योगेन्द्र प्र.यादव, चन्द्रेश, रमण, मौन एवं प्राज्ञ रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ आदि छलाह । तकराबाद एकटा वृहत् कवि गोष्ठी भेलैक जे चन्द्रेशक अध्यक्षतमे ५ वजेसं ८ वजेधरि चलल । पैंतीस गोट कवि लोकनिक कविता पाठ भेल, जाहिमे महिला सभक सहभागिता प्रशंसनीय छल । रातिमे मैथिली लोकगाथा दीनाभद्रीक चरित्रपर आधारित रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’क नाटक “भैया, अएलै अपन सुराज”क भव्य मंचन अरुणोदय नाट्य मंचक कलाकार सभद्वारा कएल गेल छल, जकर निर्देशन बद्रीनारायण झा ‘विप्र’ कएने छलाह । सुजीत कुमार झा संस्मरण मोबाइलक घण्टी जेना रुकिय नहि रहल छल नेपालक सभ सँ प्रतिष्ठित पुरस्कार जगदम्बाश्रीक लेल डा. राजेन्द्र विमलकेँ चयन कएल गेल ई समाचार जखन हमरा पता चलल शीघ्र हुनक मोवाइल पर बधाई देबाक लेल फोन लगेलौ, मुदा मोवाइल तऽ ईङ्गेज छल । आसिन ६ गते घण्टो प्रयास कएने रही । ई क्रम ७ गते सेहो रहल । कनिकालकेँ लेल मोनो तमसाएल जे एतेक कमाई छथि आ एकोटा टेलीफोन ठिक नहि रखैत छथि । खैर टेलीफोनमे बधाई वा बातचित नहि तऽ की ? घरे चली । जखन हुनक देवी चौक स्थित घर पर पहुँचलौं तऽ ओतयकेँ स्थितिए अलग छल । डा. विमलकेँ बधाई देबाक लेल लोकसभकेँ ओतबे भीड तऽ टेलीफोन आ मोबाइल कहैन हमहुँ आइए बाजब । डा. विमलक कनियाँ जिनका हमसभ विणा अन्टी कहैत छियन्हि ओ जे बधाई देबाक लेल हुनका घरमे पहुँचथि तिनका मिठाइ खुवबैत छली । हमरे संगे ओतय पहुँचल श्याम भाइजी (श्याम सुन्दर शशि) कहलथि ‘मिठाइ आइए चललैक अछि से नहि बुधदिन साँझे सँ चलि रहल अछि ।’ ओ बुधक साँझ सेहो ओहि ठाम पहुँचल छलथि आ मिठाई सेहो खएने रहथि । अस्तु मैथिली, नेपाली, हिन्दी, भोजपुरी, नेवारीसभ भाषाक चोटीक साहित्यकारकेँ टेलीफोन मात्र नहि शुभेच्छुक सभकेँ बधाई पर बधाई आबि रहल छल । डा. विमल सर सँ १८–१९ वर्ष सँ परिचय अछि । एतेक खुशी हुनका कहियो नहि देखने छलौं । फेर लोकक रिसपौन्स नहि पुछु । अहि रुपमे भऽ सकैया व्यक्तिगत रुप सँ हम कल्पना तक नहि कऽ सकैत छी । जगदम्बाश्रीक पुरस्कार राशी २ लाख टका अछि । डा. विमल सनक व्यक्तित्वक लेल नहि जगदम्बाश्री बडका अछि आ नहि दू लाख टका । हमरा स्मरण अबैत अछि । जहिया हम काठमाण्डू सँ प्रकाशन होबयबला ब्रोडसिड अखवार लोकपत्रमे काज करैत छलौं विमल सरकेँ ओहिमे लेख लिखबाक लेल आग्रह कएलियैन्हि आ ओ दू टा लेख लिखने रहथि । ओ दू टा लेख एतेक प्रशंसित भेल छलैक जे सरकेँ नियमित स्तम्भ लिखबाक लेल कम्पनी दिस सँ विशेष अफर आएल छल । ओ जाहि क्षेत्रमे कलम चलौलन्हि, हुनकर जोडा भेटव मुस्किल छल । १२ वर्षक उमेर जहिया लोक साहित्य कि छैक अहि दिस दिमाग नहि लगबैत अछि । हुनक साहित्यिक यात्रा शुरु भऽ गेल छल । हुनक पहिल रचना जहिया ओ १२ वर्षक उमेरक छलथि तहिया भारतक प्रतिष्ठित अखवार आर्यावर्तमे छपल छल, ओ बेर बेर कहैत छथि । हुनकर नेपाल आ भारतकेँ प्रतिष्ठित पत्रिकासभमे रचना छपयकेँ क्रम एखनो जारी अछि । ई सत्य अछि हुनकर अन्य साहित्यकार जकाँ पुस्तक प्रकाशन नहि भेल अछि मुदा इहो सत्य अछि मैथिली साहित्यक आकाशमे डा. विमलकेँ टक्कर देबयबला विरले अछि । जखन कम पुस्तक छपा कऽ ओ अहि स्तरक व्यक्ति भऽ सकैत छथि तऽ आइ हुनकर किछ पुस्तक प्रकाशन भऽ गेल रहैत तहन कि होइत ? हमरा स्मरण अबैत अछि ओ दिन जहिया हुनका प्रज्ञाप्रतिष्ठानक सदस्यमे मनोनित कएने छल आ सपथ ग्रहण होबय सँ पूर्वे हुनकर पद फिर्ता लऽ लेल गेल छल । ओ बहुत निराश रहथि । त्रिभुवन विश्वविद्यालय हुनका प्राध्यापक तक नहि बना सकल एकर पीडा जखन ओ स्वयं मिथिला डटकममे लिखने रहथि तऽ सहियो बुझाएल । लोक जे कहौक ओ अपनाकेँ असफल बुझैत छथि । हुनक लेख पढलाक बाद बुझाएल छल मुुदा ओ हारल नहि छथि से हुनकालग गेलाक बाद बुझाएल । जगदम्बाश्री हुनका कतेक इनर्जी देलकन्हि अछि से एखन नहि कहल जा सकैत अछि । हमरा हुनका लग सँ छुटला चारि पाँच घण्टा भऽ गेल अछि । हम आदरणीय अपन विमल सरकेँ बारेमे सोंचि रहल छी तऽ लगैत अछि हुनका लेल आब एहने दिन सभ दिन होइतैक । ओ रचनापर रचना करतथि । हुनका सम्मान देबयमे लोक कन्जुसी नहि करितैक । फेर टेलिफोन अहिना इङ्गेज रहितैक आ हमसभ विणा अन्टीकेँ मिठाई खाए लेल पहुँचतहु । ३. पद्य ३.१.कालीकांत झा "बूच" 1934-2009-कपीश वंदना ३.२.जगदीश प्रसाद मंडल-मोवाइल फोन ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-मिथिलांचलक रूपान्तरण ३.४.१.रामाकान्त राय “रमा”-।।बन्दना।।२.विद्यानन्द झा “विदु”-दहेज ३.५.१.मृदुला प्रधान- कहू वागमती २.- प्रवीण कश्यप- दूटा पद्य ३.६.१. रवि भूषण पाठक- कि भेलए एकरा ? २.इन्द्रभूषण कुमार- सहास ३.७.राजेश मोहन झा-केहेन खेल ३.८.सतीश चन्द्र झा-चुनाव श्री कालीकान्त झा "बूच" कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि। पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह।माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल। मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि-पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय-समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूचीमे डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि। मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल। श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि। डा. दुर्गानाथ झा "श्रीश" संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | कपीश वंदना हमरापर तमाम दुरगंजन अपने छी महान दुख भंजन हे हनुमान, अथाह धारसँ पार कऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार............. हम छी पतित पुरनका पापी अएलहुँ शरण बनल संतापी हे कपीश, हाथे धऽ हमरा ठार कऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार......... पाबी अहँक अनमोल मंत्रणा तखन सुकंठक कटल यंत्रणा महावीर हमरोपर कनेक विचार कऽ लिअ उद्धार कऽ दिअ छोड़व नहि अपनेक आइ हम दैत रहब रामक दुहाइ हम “महामंत्र” केर हमरो गिरिमल- हार दऽ दिअ, उद्धार कऽ दिअ हमरा पार कऽ दिअ उद्धार कऽ दिअ। जगदीश प्रसाद मंडल कविता- मोवाइल फोन तीन बजे राति आएल फोन। एकांत चढ़ तुरूछल मन हेमालयक आंगन बनमे पतखर्रनी एक खड़ड़ैत पात एक कोमन एक खड़खड़ देखि मन-विवेकक भेल मतैक्य एक्के गाछक दू पात देखि काज उगल ओकरा मनमे एकक आसन एकक भोजन तखन भरत बैभव तनमे। ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। मिथिलांचलक रूपान्तरण स्वप्न छल जे मिथिलांचलक रूपान्तरण हाेयतै ठार्मठाम सड़क आ भव्य भवन ठाढ़ रहितै कर्मर्सकम एकटा बड़का विमान पत्तन सुगमता स बढ़ितै अमीर लाेकक आवागमन स्थानीय बेराेजगार लाेक के लगितै राेजगार अखन भटकि रहल अछि इम्हर उम्हर बेकार नाैकरी लेल छाेड़ पड़ि रहल अछि अपन गाम टैक्स सहित सब खर्च दाेसर राज्यक नाम जखन ध्यानमे आबैत छल प््रााकृतिक प््राकाेप सदैव कम पड़ि जायत छल सरकारी काेष आब जखन विश्वबैंक स भेटल अछि ऋण दुरूपयाेगक संदेह बढ़ि रहल अछि दिनाेदिन पहिल अविश्वास जे राजनेता की करता फेर नहिं ज्ञात जे उद्याेगपति कतेक पचेता तकनीकक कमी आकि अकुशल कारीगर दिल्लीमे नवनिर्माण ढहि रहल अछि धराधर बरसातमे निर्माण केनाइर् बड मुश्किल छथि कहैत बाहर कतेकाे जगह सबदिन बरसाते अछि रहैत तैयाे पूरा देश कन्क्रीटक बनि गेल अछि बरसाताे मे ने काेनाे रस्ता रूकैत अछि १.रामाकान्त राय “रमा”-।।बन्दना।। २.विद्यानन्द झा “विदु”-दहेज १. रामाकान्त राय “रमा” ।।बन्दना।। जननि, कने दिऔ बीण बजाय सुनि जकर झंकार जन-जम आश कुसुम फुलाय पवनमे गति, तपन ओ शशि जनिक नेह नाहय! ककर कम्पन दनुज उर बिच प्रलय दैछ मचाय? जकर स्वरसँ सकल सृष्टिक पाप क्षणहिं दुराय! सून नभ उर ककर करूणा वारिसँ भरि जाय जाहि तारक रव विहग कल-कंठ सुधा बसाय! जनिक तरजनि अग्र भागे सृष्टि रहल नचाय अथिर-थिर नर-नारी उर जे प्रणय लय सिरजय! अज्ञ ज्ञान विहीन मानव तूँ दयामयि माय मृदुल तव पद कमल वंदन करी माथ झुकाय! २. विद्यानन्द झा “विदु” दहेज युग-सृष्टा युग दृश्य मैथिल अपना पथसँ भटकि रहल छल जकर इतिहास ओ स्वर्णिम आइ कलंकित भए रहल घर-घरमे बेटी मूक भए विलखि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ अछि दहेज दारुण बनल ई दुर्भाग्यक परिचायक अछि बेटाकेँ पूँजी बुझि बैसल सभ्य समाजक नायक अछि अपनहुँ घर सम्भव छन्हि बेटी से छथि अपने बिसरि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ मिथिलाक सम्मानक सीमा स्वयं मैथिल लांघि रहल खुलेआम बाजारमे बेटा मोल-तोल कए बेचि रहल लक्ष्मी रूप जनमल जे बेटी सासुरमे ओकरा जरा रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ दहेज! मिथिलाक दुर्भाग्य बनल गरीबक संताप बनल कन्यादान सन पुण्य कर्मपर अवघाती अभिशाप बनल ससकि रहल घर-घरमे बेटी ठोढ़क मुस्कान छै खिसकि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ तड़पि रहल व्याकुल भए कन्या मन ताड़=-ताड़ अछि भए रहल अछि चिन्तनीय बेटीक जीवन पद नीचाँक भूमि खसकि रहल देखि दहेजक बर्बरता बेटी अछि कुंठित भए रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ जागू मैथिल देरि ने भेल खतम करू ई दहेजक खेल स्वाभिमानसँ माथ उठाऊ लेब-देबसँ ऊपर उठिकऽ आदर्शक परचम लहड़ाउ कारण! देखि ई दुर्गति घर-घर के बेटी मनहि मन अछि बिदकि रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ आबि यदि बरतब नहि संयम खतम करब नहि बर्बर खेल मिटत स्मिता विश्व पटलपर शर्मनाक अछि मिथिला लेल चिन्तन-मनन करी सभ मिलि ई हमर अनुरोध रहल दहेजक दावाग्निसँ मिथिला झुलसि रहल॥ १.मृदुला प्रधान- कहू वागमती, २. - प्रवीण कश्यप- दूटा पद्य १ मृदुला प्रधान यमुनाजी तँ छथि उफनायल, कहू वागमती, अहाँ केहन छी? एतक हाल.... कादो, माटी आर जल अथाह सँ, डूबल गांव, फंसल व्यापारी, ततेक गंदगी ,कूड़ा -करकट कोने-कोने मच्छर भारी. ट्रैफिक जामक हाल न पूछू एहन मचल छैक रेलम -पेल , बस ,गाड़ी ,ऑटो रिक्शा क सड़के -सड़के ठेलम-ठेल . डबरा-डबरी लांघि-लांघि क राशन-पानी सेहो अनैत छी , सरकारी सब चाल-चलन त, ठीक अहाँ जनिबे करैत छी . मंथर गति,कछुओ लजायल, नाला -नाली सब डबडबायल, कटल-फटल दिल्लिक नक्शा, सभ लोक-वेद छितरायल छी, यमुना जी त छथि उफनायल, कहू वागमती, अहाँ केहन छी ? --------------------------- हे 'कॉमन वेल्थ गेम ', अहाँक खोराक, हमरा जकां मूढ़ लोकक , समझ सँ बाहर भ गेल . स्वागत क थारी में , केहन-केहन ज्योनारि , भांपि-भांपि क दिमागे डोलि गेल . परसन पर परसन, परसन पर परसन, के एतवा खा सकैय ? किन्तु अहाँक साम्यर्थक बलिहारी , सुनि-सुनि क गारी , निर्विकार भाव सँ , खेने जाईछि, कनिक बताऊ त, केना पचबईछी? इंग्लैंड क महरानिक खास अर्दली भ क ऐलों, जहाँ छूरी-कांटा सँ कटैत-घोंपैत, छोट-छोट ग्रास नफ़ासत देखबैत, नैपकिन सँ ठोढ पोछैत, भोजन करवाक प्रथा छैक,अहाँ दुनुं हाथ सँ , निरंकुश व्यभिचारी जकां , लपा-लप , खेने जाईत छी , दोसर देश में जा क केहन निर्लज्ज भ गेल छी . अनपच,अजीर्ण,अफारा, चालीस करोड़ क गुब्बारा सँ , मात भ गेल , एहन पाचन-शक्ति , देखनिहार के दाँत लागि गेल. वुद्हिजिवी निरुपाय छथि, जनता निस्हाय, हे 'कॉमन वेल्थ गेम ', आर कतेक खाएब? इठलाईत बजलीह ... धैर्य राखू, अंतिम चरण थिक, आब त बस मधुरेन समापयेत , किछ खाएब , किछ ल जाएब , एतय लोक कुदैत रहो , भुकैत रहो , अतिथि देवो भव, गबैत रहो आर किछ नईं सूझय त जय हो . २. प्रवीण कश्यप दूटा पद्य आच्छादन ई हवा हमरे सँ बहि कऽ अहाँ धरि जायत अपन बहाव मे ई हमर पुरूषार्थक गंध सँ अहाँक स्त्रीत्वक रजोगुण केँ जगाओत। ई हवा हमरे सँ बहि कऽ अहाँ धरि जायत अपन सड़ल गर्मी मे जँ- जँ सूरज अपन ताप सँ हमर गर्मी आ गंध केँ बढ़ाओत तँ- तँ ई उत्ताप मात्रा अहाँक अधर केँ हमर लवणीय उन्माद सँ बहकाओत! ई हवा हमरे सँ बहि कऽ अहाँ धरि जायत किंचित एहि मेघाच्छादित आकाशक प्रसव-घड़ी नहि आयल अछि मुदा वृष्टिक वेदना संजोने एकर नीन्न उड़ल अवश्य छैक! नीन्न उड़ल अछि हमरो सभक मुदा शुष्क नहि पूर्णतः आर्द्रता व्याप्त अछि अपन भुजबंध मे। एहि रससिद्ध श्वेदक अतिवृष्टि अपन देहात्मीय प्रेमक स्नेहकता केँ आओर कोमल बनाओत। ई हवा हमरे सँ बहिकऽ अहाँ धरि जायत किछु हिंसक प्रश्नक दिशा जे अहाँ अपना दिस कयने छी! प्रिया! अहाँ छोड़ू अपन जिद्द केँ कियेक त एहि सर्पबाणक विषदंत हमरे अस्थिमज्जा केँ गला कऽ अहाँ धरि पहुँचत। ई हवा हमरे सँ बहि कऽ अहाँ धरि जायत ई हवा हमरे सँ......... पौरुष पिशाच ए हमर प्रिया अहाँक लेल हमर संबोधनक उपनाम बिला गेल हृदयक गर्त मे भऽ गेल हमर प्रेम सँ अहंकार अहाँकेँ अपना पर! मोबाइलक स्क्रीन पर फेर सँ अछि कोनो हॉलीउडक अभिनेत्री अहाँक फोटो पड़ल अछि कतहु मेमेरी कार्ड मे एकात! अहाँक माय-बाप बुझैत छलाह अहाँके पुत्र! से ठीके अहाँकेँ अछि पुरूषार्थक अभिमान! अहाँ हमरा बनाबऽ चाहलहुँ स्त्री कोनो लाचार स्त्री विधवा-मसोमाति मुदा से त नहि भऽ सकल लटुआयल बिलाइ जकाँ अहाँ कतेक घिसियायब हमरा पराजयक स्वप्न मे हम छिड़ियायल छलहुँ मुदा कहिया धरि कखनहुँ तऽ सुनहे पड़त अहाँकेँ उठैत फणिधर फुफकार आत्महन्ता व्यक्तित्व पाश मे कहिया धरि हम सुखायब भावक समलैंगिकताक द्वंद मे कहाँ बँचल प्रेमक कोनो रस! अहाँक लेल प्रेम अछि गणित सुतब उठब जकाँ दिनचर्या कोनो काज जाहि सँ निवृत होइत रहैत छी अहाँ । अहाँक लेल प्रेमक स्वीकारोक्ति अछि डरक आरंभ, पलायन सत्य सँ तखन कतऽ विलीन भऽ जाइत अछि अहाँक पुरूषार्थ १. रवि भूषण पाठक- कि भेलए एकरा ? २.इन्द्रभूषण कुमार- सहास १. रवि भूषण पाठक ग्राम-करियन, जिला-समस्तीपुर ,बिहार कि भेलए एकरा ?
रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा ? मॉगलियइ रोसड़ा आ दऽ देलकए तेघड़ा
रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा पटनाक बात छोड़ू, दिल्लीक बखरा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा ? सोचैत रहौं मंत्री बनब, शुरूए मे खतरा रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा हरम-महल-अंतःपुर या छुपल घरघुसरा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए ? एकरा दस लाखक टिकट छल, ककरा सॅ बात करी अल्सेसियन ऑखि देखबए, दॉत देखबए झबड़ा ! रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए एकरा? २. इन्द्रभूषण कुमार सहास भऽ रहल छल आयोजन काव्यपाठक जुटल छल कविलोकनि सभ भागक समाप्त भेल औपचारिकता पढ़े लागल कविसभ अपन-अपन कविता। बहुतरास कवि बहुत रंगक कविता क्ेयो माहित छल नयिकाक सुनर गाल पर क्ेयो व्यथित छल प्रेयषिक बदलल व्यवहार पर क्ेयो छलनि क्रांतिक झंडा उठौने क्ेयो रहे भ्रष्टाचारी सभके भरिमन गरियौने। अनमनस्यक भऽक हमहुँ सुनैत रहॅू क्ेयो सुतल नहि माने तैं निक-बहुत-निक करैत रहूॅ। अचानक मंच पर अवतरित भेल एक नारी जेहने देखेए में कारी पहिरनो रहे तेहने मौईल साडी। शुरू केलक अटकि-अटकि कऽ बाजनाई नहि आबि छल ओकरा शब्दक जाल बुननाई मुदा चेहेरा पर तेज छल मनमें उत्साहक अतिरेक छल भय नहि जॅ कहि हुसब श्रोतासभ भरिमन दूसत। नहि लय रहे न रहे छंदक सुन्दरता तैयो सब प्रसन्नभऽ समवेत स्वर में केलथि हुनकर प्रयासक प्रशंसा। जे कहि नहि सकल शब्द प्रयास ओकर कहलक लागत नहि कठिन चाहे लक्ष्य हो किछु खास बस राखि भरोसा अनपना पर करि बढ़बाक सहास। राजेश मोहन झा 1981- उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि। कविता- केहेन खेल खेल-खेल धुरखेल-खेल एहेन खेलमे कतेको खेल खेल संस्कृतिक नाओ हॅसावथि बना कऽ छज्जी नीव डोलवथि कहथि तीस दिन आरो चाही बनावथि कोठी गंडा गाही खेतक बिच्चे बाट बनौलनि, पानि भरल पोखरिक उड़ाही सोनक सिल्लसँ पिरही बनावथि बिनु पौदानक सिरही बनावथि कलमाटी आइ डंडा मारि कऽ शितलहरीमे ए.सी. चलावथि चमकैत दिल्लीकेँ देखत दुनियाँ इसकुल खाली भागल सभ मुनियाँ हटा कऽ झुग्गी फिलैट बनाएव मेलवोर्नसँ बेसी नाओ कमाएव एकपर एक मिनेजर आ प्लेयर सभटा धनमे सबहक शेयर भगवान बचाबथु नाक देख केर बादमे बूझव खर्च क्लेश केर सतीश चन्द्र झा चुनाव बजि उठल चुनावक रणभेरी पसरल जय हो! के तुमुल नाद। सभटा दल उतरल महल छोरि क‘ उठल विजय कें शंखनाद।
हिंसा,हत्या,तृष्णाक आगि पसरत सगरो जड़तै बिहार। इतिहास बनत छल बल धन सँ। नहि जानि ककर छै जीत हार।
साकांक्ष मेल जन जन सगरो भय सँ जीवन की त्राण लेत ! ई धृ्र्रणा द्वेष के महापर्व नहि जानि कते के प्राण लेत !
प्रतिपक्ष अगिलका सरकारक गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल। सत्ता सुख सबके परम लक्ष्य के देखि सकत रौदी अकाल !
भरि गाँव टोल सगरो घुमि घुमि बोधत कहुना जीतत चुनाव ! सामर्थ्यवान के संग लेत भूखल सँॅ एकरा की लगाव !
सम दोष एक दोसर के द‘ छीनत भविष्य के पाँच साल। सुख दुख ओहिना ्र जीवन ओहिना जहिना छल बीतल पाँच साल ! १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। साधुबाबा साधुबाबाक चित्रण मिथिला चित्रकलामे आधुनिक रूपेँ करबाक प्रयास... २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते डॉ. शेफालिका वर्मा साबरमती आश्रम साबरमती आश्रम क प्रांगन मे विस्मय विमुग्ध मृगी सन हम ठाढ़ छलों.ओहि ठामक कण कण मे एकटा संत क साँस प्राणवंत छल. ई आश्रम कतेक दिन धरि बापू क कर्मस्थली बनल रहल .. सघन आबादी आ चिनगी सबहक़ उद्योगी धुइयाँ स प्रदूषित औद्योगिक नगर अहमदाबाद के दुई भागमे विभक्त करय्वाली साबरमती नदीक तट पर इ आश्रम अवस्थित अछि. साबरमती नदी आश्रम स लटपटायल करधनी जका लागैत ऐछ. जखन गाँधी जी डरबन ( दक्षिण अफ्रीका )मे टोलस्टाय आश्रम लेल प्रयत्नरत छलाह तखनहि हुनक मोन मानस मे भारत मे एहेन आश्रमक स्थापना क चित्र आकार ल नेने छल . भारत घुरला क उपरांत समाज सेवी जीवनलाल देसाई हुनक एहि सपना के साकार करवा लेल आत्मिक सहयोग देलनि अहमदाबाद लग 'कोचरब' मे बनल अपन मकान हुनका सुपुर्द क देलन्हि. एवं प्रकारे २५ मई १९१५ मे सत्याग्रह आश्रम बनल .किन्तु, एकर दुई बारिस उपरांत जुलाई १९१७ मे सत्याग्रह आश्रम साबरमती क तट पर स्थानांतरित भ गेल . इ आश्रम ऐतिहासिक दांडी-यात्रा क साक्षात् गवाह अछि जे २०० बारिस स बेसी अंग्रेजी शासन के झकझोरि देलक. 'ह्रदय कुञ्ज ' एहि आश्रम क प्रेरनास्थल अछि .एहिठाम गाँधी जी दलित वर्ग के पहिलुक बेर हरिजन कहिंआत्मिक संबोधन देलनि .बापू आ बा एहिकुंज मे लगभग १२ बरिस धरि संग रहलाह .बापूक कोठरी मेहुनक अपन चरखा , छोट सन मेज़ ,तीन बानर आ एकटा छोट घडी सब स्मृतिक संग अवस्थित छल.लागले बा क कोठरी मे कलम ताम्रपत्र , खडाऊं , चश्मा , मथनी आदि राखल छल. बापू अपना हाथ सँ खादी क वस्त्र बनाय आश्रम मे रहय्वाला हरिजन के दैत छलाह . अश्रम्मे बनल वीथिका संग्रहालय ,पुस्तकालय स गाँधी जी क आत्मा ,हुनक वैचारिक व्यक्तित्व के उजागर करैत छल. ठाम ठाम पर बापूक जीवन यात्रा , कार्य शैली आ अन्य घटना सबहक सजीव फोटो आ फोटो-कृति सब राखल छल /विश्व कोना कोना से आयल बापूक नाम केर पत्र कत्तो कत्तो देवार पर टांगल छल. गाँधी जिक संग आरंभ स अंत धरि रहयवाला हुनक पितियोत भाई 'मगन भाई'क आवास सेहो बगल मे छल. गांधी क विचार स अनुप्राणित बिनोबा भावेक कुटिया सेहो जग्जगार छल. साँझ क सुरम्य बेला मे प्राकृतिक सुषमा क मध्य सोंग्स एंड ड्रामा डिव. दिसि से गाँधी क समस्त जीवन देखोल गेल . हम सब अभिभूत भ गेलों..साबरमती के संत तू ने कर दिया कमाल... स्वतंत्रता संग्राम क कार्यस्थली साबरमती आश्रम एहि लेल महत्वपूर्ण आ प्रेरणास्पद अछि जे अहिंसाक पुजारी बापू अपन वैचारिक क्रांतिक उद्घोष एहि ठाम से केने छलाह . 'वैष्णव जन तो तेने कहिये ...' बापूक प्रिय भजन से अनुगुंजित आश्रम क वातावरण मोन प्राण के उद्वेलित क देने छल.. बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ 8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 8.1.NAAGPHAANS-PART_XVI-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 8.2.1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS XVI Dhara continued smiling throughout the night. She dreamt of two birds happily chirping and pecking together. Manjul’s letter energized her – her tired and charm less life received a new vigor and fillip. Dhara felt comfortable – uneasiness vanished. Manjul’s faith revitalized her – yes, she is destined to meet Simant – she will find out Simant. – Colored balloons of happiness danced before her dreamy eyes – after such a long wait, she was able to savour some interest and excitement. She felt Simant’s cloud like love as raining over her. Loitering near seashore in darkness – all of a sudden the sun rays replace the darkness with light – it is light everywhere – it is invisible god who lights the sun in order to remove the darkness from the world. Who has filled the clouds with water – causing lightening and raining. The star-studded sky appeared as countless gifts and candle lights from a parent to a child as if celebrating his birthday. Dhara went into deep thought – heaven itself exists on this earth. We unfortunate mortals convert it into hell through our unfair actions. God has blessed both man and nature with the quality to struggle, to fight back – in desert, watermelons grow, near the salty water of sea grows the coconut tree containing sweet and pure water. Each man has his own existence – finger prints of human beings never match. Man cannot get more than destined and that is also at a particular time. When the time will come I am bound to meet Simant – Dhara’s eyes became teary expecting the impossible but inevitable to happen. 2 Time went on – Dhara started counting the seconds, minutes and hours – is it the endless waiting? At last the wait was over – not for Simant but for Manjul. She arrived here accompanied by Vikalp. Dhara felt happiness everywhere. It was the occasion of Rakshabandhan. Kadamba was overjoyed to see both of them. His long cherished desire to get rakhi tied by Manjul was to be fulfilled at last. After Rakshabandhan, all of them decided to move from place to place in search of Simant – be it England, Scotland, Wales or Northern Ireland, in short, the United Kingdom. They visited all the important tourist spots in London. Since Simant was fond of a lavish lifestyle, they also tried to find him at market places such as Harrods, the shops on Regent Street and the boutiques at Beauchamp place. But Simant was nowhere to be found. They kept on wandering here and there - visiting other important towns such as Oxford, Bath, York, the Lake District, Cambridge, Canterbury, Durham, Winchester, and finally reaching Newcastle on Tyne. What happened to Simant? Whether he left England and settled down in Scotland. Since Newcastle was nearer to Edinburgh in Scotland, they went there. From Edinburgh, they traveled to Aberdeen and then to Glasgow. They became frustrated and disappointed. Finally they came back to London. Manjul was still confident of meeting her father. Andrew then suggested them to visit Wales. But Kadamba was not excited as he believed that since Wales lagged England in economic development, his father would have never settled there. He rejected the suggestion. Dhara was now completely exhausted physically, mentally and emotionally. She gave up all hopes of meeting Simant in this life. Since Manjul had to go back to Mumbai, she decided to visit Northern Ireland for a final search for her father, accompanied by Vikalp. However, they visited just one place i.e. Donegal and returned to London, dazed, shattered and disappointed. 3 Where is Simant? – Now only one place was left i.e. the abode of God. They decided for Bhagwan Satyanarayan katha followed by Hawan for the well being of Simant. Through it they expected miracle to happen. TO BE CONCLUDED Next will be CONCLUDING PART. 1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 1. Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine.
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Prayer To The Goddess Saraswati **1** With divine smile in lips, having ultimate intellect, riding swan; Wearing radiant white dress, give me purity; Oh supreme Goddess of all! Give me wisdom. **2** The lotus with hundred petals enclosing faith, In the pond of this world spreading smell of reverence, Hands holding charming sfatik garland, Oh inherent saint! Make my soul pure. Oh supreme Goddess of all! Give me wisdom. **3** Sitting on the swan of imagination, Foot rested on muddy dynasty of beauty, Sailing in sky, singing the divine lyrics, Remove my vocal inertia. Oh supreme Goddess of all! Give me wisdom. **4** Shower holy water of knowledge from your pot, Wipe us with your anchal of affection, Guide us to get nectar of your blessings, Please get off the anger of ages, Oh supreme Goddess of all! Give me wisdom. 2. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in At The Beach Of Mahabalipuram The scene of beach of an endless sea At Mahabalipuram, heart filled with ecstasy The Sun-temple with the chariot of the Pandavas I saw the isle of the sky When salty water went into mouth It took me by surprise, I floated I bumped into the wall of waves All of my body thrilled Had heard and known about the sea I respired forgetting my heart and body The foreigners disclosed the truth The Mani guide told me that mystery That was given by the Pallav Vansh Indian forgot that history I recalled the temple of Ankorvaat No sooner the king died, people forgot Swati (stars) diminished When links of history is broken The temples under the Caspian Sea Were built by the Indian merchants Now I am in such condition Where boring pump is gift from the Americans Leave it, why are you lost in there like insane The loving wife laughed again and again. VIDEHA MAITHILI SANSKRIT TUTOR- XXXII संस्कृत शिक्षा च मैथिली शिक्षा च- ३२ (मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्) -गजेन्द्र ठक्कुरः (आगाँ) ACKNOWLEDGEMENTS: chamu krishna shashtry, janardan hegde, vinayak hegde, sudhishtha kumar mishra, shravan kumar, kailashpati jha, H.N.VISHWAS AND other TEACHERS. द्वात्रिशत्तमः पाठः वयं सङ्खयासु लिंगभेदः इति विषये ज्ञातवंतः एकम द्वे इत्य अन्ययोः विशेष अभ्यास अपि कृतवंतः। अहं ग्रामः इत्यादि शब्दानि वदामि भवन्तः एकम्/ एकः/ एका इत्येतेषु उचितं शब्दं योजयित्वा पुनः वदन्तु। यथा ग्रामः/ एकः ग्रामः/ ग्रंथालयः/ विद्यालयः/ घटः एका शाटिका/ घंटा/ विद्यार्थी/ घटी/ कथा/ विद्यार्थिनी एकं राज्यम्/ सुभाषितम् अहम् अस्वस्थम् अस्मि। अतः बर्हिगन्तुम् इच्छामि। कृपया अनुमतिं ददातु। एकः अस्वस्थः अस्ति। सः एकः गन्तुम् इच्छति। अस्तु। गच्छतु। कति छात्राः गच्छन्ति। एकः छात्रः गच्छति। पूर्वतन् पाठे द्वि शब्दस्य स्थाने द्वयम् इति उपयुज्य सौलभ्यं सम्पादितवंतः अभ्यासं अपि कृतवंतः। मार्गे वाहनद्वयं गच्छति एतानि कानि तानि पुष्पाणि एकम्/ द्वे/ त्रीणि त्रीणि पुष्पाणि सन्ति। कति पत्राणि सन्ति। त्रीणि। कति फलानि सन्ति। एते के। ते चमषाः त्रयः चमषाः सन्ति। कति सुधाखण्डाः/ पुरूषाः/ सैनिकाः सन्ति एताः काः/ ताः पत्रिकाः तिस्रः पत्रिकाः सन्ति एताः काः/ ताः संचिका तिस्रः संचिकाः सन्ति/ कति कपाटिकाः सन्ति। तिस्रः। तिस्रः/ कूप्यः/ घट्यः/ लेखन्यः/ अहं वदामि भवन्तः अनुवदन्तु त्रीणि/ त्रयः/ तिस्रः इदानीम् अहम् शब्दान् वदामि भवन्तः उचितान् शब्दं योजयन्तु तत्र। त्रयः बालकाः– पुरूषाः सुधाखण्डाः, वस्त्रकटाः मार्गाः तिस्रः लेखन्यः, शाटिकाः, कूप्यः, त्रीणि गृहाणि, वाहनानि, एतेषाम् उपयोगं कृत्वा वाक्यानि वदामः पेटिकायां तिस्रः संचिकाः सन्ति। ग्रामे त्रयः देवालयाः सन्ति अहं तिस्रः भाषाः जानामि। प्रयागे तिस्रः नद्यः सम्मिलन्ति। शिवस्य त्रीणि नेत्राणि सन्ति। पर्णम्– पर्णानि कति पर्णानि सन्ति– चत्वारि पर्णानि सन्ति चत्वारि फेनकानि सन्ति चत्वारि कङ्कणानि सन्ति चषकाः– चत्वारः चषकाः सन्ति। चत्वारः बालकाः सन्ति। चत्वारः चमषाः सन्ति। चतस्रः– चतस्रः लेखन्यः सन्ति। अङ्कन्यः सन्ति पञ्चानन्तरं संख्यानां लिङ्गभेदः नास्ति। यथा पञ्चबालकाः गच्छन्ति–पञ्चबालिकाः पठन्ति। पञ्चवादनानि सन्ति। पञ्चानन्तरं संख्यानां लिङ्गभेदः नास्ति। - किं भवता कुशलि वा - भवान् ह्यः कुत्र गतवान् आसीत्। - अहं ह्यः एकं चलनचित्रं द्रष्टुं गतवान् आसम्। तत्र नायकद्वयम् आसीत्। - किं भोः। एकापि नायिका नासीत् वा - आसीत् भोः। नायिकाद्वयम् आसीत्। - नायक द्वयम्। नायिका द्वयम्। चत्वारिमुख्यपात्राणि आसन् - एका खलनायकः अपि आसीत्। तस्य चत्वारः अनुचराः आसन्। - नायिकायाः एकापि सखी न आसीत् वा। - आसन् भोः। चतस्रः सख्यः आसन्। परंतु तिस्रः सख्यः खलनायकस्य त्रयः अनुचराः एवं षडजनाः भृताः भवन्ति - इत्युक्तो अन्ते चत्वारि पात्राणि अवशिष्टानि - परन्तु चित्रम् उत्तमं चित्रम्। - तर्हि अहं श्वः अवश्यं पश्यामि। - अवश्यं पश्यतु - भवान् पत्रं पठितवान् वा - सम्यक् पठितवान् - तर्हि तद् विषये प्रश्नं पृच्छामि वा– पृच्छतु - कति वेदाः सन्ति - चत्वारः वेदाः सन्ति - शिवस्य कति नेत्राणि सन्ति - शिवस्य त्रीणि नेत्राणि सन्ति - रामस्य कति पुत्राः सन्ति - रामस्य पुत्रद्वयम् अस्ति। - त्रयः गुणाः के - सत्व, रजस्, तमो गुणाः - दशरथस्य कति पत्न्यः सन्ति - दशरथस्य तिस्रः पत्न्यः आसन् - दुर्योधनस्य भगिन्याः काः - दुर्योधनस्य दुःशला एकायो भगिनी। - महिलापर्व नाटके कति नायिकाः सन्ति - महिला पर्व नाटके चतस्त्रः नायिकाः सन्ति - तर्हि भवता सम्यक् पठितम् सुभाषितम् यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्? लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥ दर्पणः मानवेभ्यः प्रतिबिम्बं प्रदृश्य अलंकारादि विषये बहु उपकारं करोति। परंतु लोचनाभ्यां विहीनः दर्पणतः लाभं स्वीकर्त्तुं न शक्नोति। एवमेव लोके शास्त्राणि बहूनि उत्तमाणि विचारानि बोधयन्ति। प्रजाहीनः शास्त्रतः लाभं प्राप्तुं न शक्नोति। प्रज्ञावान् शास्त्रतः महानतं लाभं प्राप्य जीवने संतोषम् अनुभवन्ति। यथा अंधः दर्पणतः लाभं स्वीकर्त्तुं न शक्नोति तथैव प्रज्ञाहीनः शास्त्रं लाभं प्राप्तुं न शक्नोति। अतः शास्त्रं सुषुक्ष्म्या बुध्या पठनीयम्। कथा रोहिदासः कश्चन् चर्मकारस्य पुत्रः। सः गंगानद्याः तीरे वसति स्म। सः चर्मकारस्य पुत्रः इति कारणतः स्वजीवने वृत्तिम् अपि स्वीकृतवान् चर्मकारवृत्तिमेव। पादरक्षा निर्माणं करोति - विक्रयणं करोति– स्वजीवनं निर्वहति। परन्तु सः हरिभक्तः। धर्मिष्ठः। तत् कारणतः सर्वदा हरिनाम भजति स्म। पादरक्षानिर्माण समये अपि सः हरिनाम वदति स्म। एतत् कारणतः सः प्रसन्नः शान्तः आसीत्। सः आनन्दपूर्णः आसीत्। सर्वदा व्यवहारसमयेपि सः आनन्दपूर्णः भवति स्म। तत्कारणतः जनाः वदन्ति स्म– एषः आत्मानन्दं प्राप्तवान्। अतः एव सर्वदा आनन्दपूर्णः भवति। तस्य बहवः शिष्याः आसन्। एकः धनिकः धर्मिष्ठः शिष्यः आसीत्। सः चिंतितवान् मम गुरूः क्षुद्रं पादरक्षा निर्माणं करोति- एतेन् जीवनं करोति। एवं न भवितव्यम्। सः जीवने उत्तम वृत्तिम् आश्रयेत्। एतेन जीवनं कुर्यात्। इति चिन्तयति। सः एकम् उपायं चिन्तयति। गुरोः समीपम् आगच्छति–गुरो अहं श्वः तीर्थयात्रां गमिष्यामि। मम समीपे एकः निकषः अस्ति। तम निकषम् अहं भवतः गृहे स्थापयामि। एक मासानन्तरं प्रतिस्वीकरोमि निकषः विशिष्टः अस्ति। निकषेन् सह यदि अन्यः लोहः भवति तर्हि सः लोहः अपि स्वर्णमयः भवति। भवान् एतस्य निकषस्य उपयोगं कर्त्तुम् अर्हति। इति उक्तवान्। रोहिदासः अपि अङ्गीकृतवान्। शिष्यः स्वगृहतः निकषं आनीय गुरोः गृहे कोणे स्थापितवान्। तीर्थयात्रार्थं शिष्यः गतवान्। एकमासानान्तरं प्रत्यागतवान् सः चिन्तयति। मम गुरूः इदानीं धनिकः अस्ति। तस्य गृहे यथेष्टं धनम् अस्ति। तस्य गृहम् अपि इदानीं भव्यं जातम् अस्ति। एवं चिन्तयति। सः गुरोः गृहम् आगच्छति। पश्यति। प्राचीनमेव गृहम्। गुरूः अपि तथैव अस्ति। तदैव कार्यं कुर्वन् अस्ति। पादरक्षायाः निर्माणं कुर्वन् अस्ति। हरिनाम जपन् अस्ति। शिष्यः गुरोः समीपे आगत्य पृच्छति। गुरोः अहम् एकम् निकषं दत्तवान्। सः निकषः कुत्र अस्ति। गुरः किञ्चित इव स्मरणं कृतवान् इव चिन्तयित्वा वदति–शिष्यः सः निकषः कुत्र स्यात् भवान् यत्र स्थापितवान् तत्रैव स्यात् अन्वेषणं करोतु। एषः शिष्यः स्वयं यत्र स्थापितवान् तत्र गत्वा पश्यति- सः निकषः तत्रैव अस्ति। यथा स्थापितवान् तथैव अस्ति। ततः एव शिष्यः गुरोः मुखं पश्यति। सः गुरूः आनन्दपूर्णः अस्ति। मुखे आनन्दकान्तिः दृश्यते। समग्र गृहम् आनन्दपूर्णम् अस्ति। तदा गुरूः एव वदति। वत्स– निकषस्य उपयोगेन् अहं किं वा करोमि–सुवर्णं कुर्याम्- सुवर्णेन मम कः लाभः। अकस्मात् सुवर्ण निर्मतिः भवति चेदपि– गृहे सुवर्णं धनादिक अस्ति चेदपि तस्य रक्षण विषये मया चिंतनीयम्। परन्तु सुवर्ण लोभकारणतः तस्य रक्षणादिविषये चिन्तामग्नः भवितुम् अहं न इच्छामि। मम आनन्दपूर्णस्थितः पतितुम् अहं न इच्छामि। अतः मम जीवने सुवर्णस्य निकषस्य आवश्यकताएव नास्ति। तदा शिष्यः रोमांचितः भवति। एवं सरलजीवनं करोति चेदेव आनन्दपूर्णः भवति मनुष्यः। तर्हि अहम् अपि निकषेन् उपयोगं न स्वीकरोमि- निकषं गंगा नद्यां क्षिपामि। मम अपि जीवने निकषात् प्रयोजनं मास्तु। इति चिन्तयित्वा सः निकषं नद्यां क्षिपति। अनन्तरं गुरोः समीपे वदति- गुरो भवान् ममापि तम आनन्दं प्राप्तुं कः उपायः इति बोधयतु– अनन्तरं शिष्यः अपि स्वजीवनं कर्मयोगमयं करोति- हरिनामजपं सरलां वृत्तिम् आश्रित्य जीवनं करोति। श्रेष्ठः भवति। संस्कृत अनुवाद मैथिली अनुवाद अंग्रेजी अनुवाद अम्ब, अहं क्रीडितुं गच्छामि। Mother, I am going out for playing. शीघ्रं प्रत्यागच्छतु। Come back quickly. बहु विलम्बेन मा आगच्छतु। Don’t be too late. पितः, अत्र भवतः हस्ताङ्कनम् आवश्यकम्। Father, your signature is necessary here. तत् अत्र आनयतु। Bring it here. भवता बहु एव न्यूनाः अङ्काः प्राप्ताः एतस्यां परीक्षायाम्। You’ve scored very low marks in this examination. शिक्षकः सम्यक् न पाठयति एव। The teacher does not teach well. भवान् मां पूर्वं किमर्थं न उक्तवान्? Why didn’t you tell me earlier? किम् अभवत्? किमर्थं रोदनम्? What happened? Why do you cry? एषः सोपानतः पतितवान्। He fell from the staircase. अम्ब, अत्र वेदना भवति। Mother, it’s paining here. आगच्छतु, औषधं लेपयामि। Come, I will apply some medicine. गत्वा शयनं करोतु। Go to bed now. एतानि वस्त्राणि परिवर्तयतु। Change these clothes. अम्ब, मम समवस्त्रं कुत्र अस्ति? Mother where is my uniform? कपाटिकायां पश्यतु। See in the cupboard. पितः, मम कृते एतादृशं क्रीडनकम् आवश्यकम्। Father, I want a toy like this. अस्तु, पश्यामः। Okey. We will see. अम्ब, वेणीबन्धं करोतु, शालायाः विलम्बः भवति। Mother plait my hair, it’s getting late for school. स्नानं कृतवान् किम्? Did you take bath? हस्तौ सम्यक् प्रक्षालयतु। Wash your hands properly. प्रथमं शिरोमार्जनं करोतु। First dry your hair. आर्द्रवस्त्रं मा धरतु। Don’t wear wet clothes. युतकस्य कुड्मान् योजयतु। Button up your shirt. गृहपाठः समाप्तः किम्? Have you finished your homework? तर्हि प्रथमं गृहपाठं समापयतु। Then first finish your homework. भोजनसमये आह्वयामि, गच्छतु इदानीम्। Go now, I shall call you when it’s time to eat. अम्ब, अद्य विद्यालये किम् अभवत् जानाति किम्? Mother do you know what happened in school today? वदतु भवती। You tell me. शालास्यूतं स्वस्थाने स्थापयतु। Keep the school bag at it’s place. भवान् उत्तमः बालः। You are a good boy. भवान् एतावत् पर्यन्तं कुत्र आसीत्? Where were you till now? अत्रैव आसम्। I was very much here. मित्रेण सह गतवान् आसम्। I had gone with my friend. अध्ययनं किमपि नास्ति किम्? Don’t you have anything to study? परीक्षारम्भः कदा? When does the examination begin? पितः, मम एकं नूतनं युतकम् आवश्यकम्। Father, I want a new shirt. गतसप्ताहे एकं क्रीतवान् खलु। You bought one in the last week, didn’t you? निखिल, आपणतः कतिचन वस्तूनि आनयति किम्? Nikhil, will you bring a few things from the shop? वस्तूनि स्वस्थाने स्थापनीयानि इति कतिवारम् उक्तवती? How many times did I tell you to keep things in their respective places? अद्य महाविद्यालयं न गच्छति किम्? Are you not going to college today? न, अद्य सर्वे मिलित्वा विजयस्य गृहं गच्छामः। No, today we are all going to vijay’s home. किं निमित्तम्? For what purpose? परीक्षायां तस्य प्रथमक्रमाङ्कः आगतः अतः सहभोजनम् अस्ति। He stood first in the examination so there’s a get–together. अम्ब, मम सख्याः दूरभाषा आगता आसीत् किम्? Mother did my friend ring me up? न, अद्य कस्यापि दूरभाषा न आसीत्। No, nobody telephoned today. रजकः वस्त्राणि नीतवान् किम्? Did the washerman take away the clothes? वस्त्राणि शुष्कयितुं प्रसारयतु। अद्यतन दिनपत्रिका कुत्र अस्ति? Spread out the clothes to dry. Where is today's newspaper? पितरम् एकवारम् आह्वयतु। Call father once. एतत् शाकं कर्तयति किम्? Will you cut this vegetable? कृपया एतत् क्षिपतु। Please throw this away. एकम् आसन्दम् आनयति किम्? Will you bring a chair? एतत् किञ्चित् कालं गृह्णातु। Hold this for a little while. दीपं ज्वालयतु। Switch on the light. दीपं निर्वापयतु। Switch off the light. कोलाहलं मा करोतु। Don’t make noise. द्वारे कः अस्ति इति पश्यति किम्? Will you see who is at the door? सन्ध्या आगतवती, द्वारम् उद्घाटयतु। Sandhya has come, open the door. अहं महाविद्यालयं गच्छामि। I am going to college. यानं वेगेन मा चालयतु। Don’t drive the vehicle too fast. पितः, श्र्वः तत्र गमिष्यामः किम्? Father, shall we go there tomorrow? तद्विषये मातरं पृच्छतु। Ask mother about it. भवान् किं कुर्वन् अस्ति? What are you doing? भवती अत्रैव उपविशतु। You sit here. मम प्रत्यागमनपर्यन्तम् अत्रैव प्रतीक्षां करोतु। Wait here till I return. भवान् जलदेयकं पूरयितुं गच्छति किम्? Will you go to pay the water bill? मह्यं धनं ददातु। Give me money. एतावत् न पर्याप्तम्। This much is not enough. पितः, अद्य परीक्षाशुल्कं दातव्यम् अस्ति। Father, today I have to pay exam fees. द्वारं पिदधातु। (द्वारपिधानं करोतु।) Close the door please. अवहितमनसा करणीयम्। Do it sincerely. श्रद्धया करणीयम्। It should be done with dedication. इतः परम् एवं न कर्तव्यम्। Hereafter don’t act like this. भवान् वृथा कालहरणं करोति। You are wasting time. १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिली पोथीक आर्काइव http://videha-pothi.blogspot.com/ १६. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऑडियो आर्काइव http://videha-audio.blogspot.com/ १७. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका वीडियो आर्काइव http://videha-video.blogspot.com/ १८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला http://videha-paintings-photos.blogspot.com/ १९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) http://maithilaurmithila.blogspot.com/ २०.श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ २१.http://groups.google.com/group/videha २२.http://groups.yahoo.com/group/VIDEHA/ २३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स http://gajendrathakur123.blogspot.com २४.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/ २५. नेना भुटका http://mangan-khabas.blogspot.com/ महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर । महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे। कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७ Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding: Language:Maithili ६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india) (add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु वि दे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक 'विदेह' 'विदेह' ६७ म अंक ०१ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६७)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम्
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