122 ISSN 2229-547X VIDEHA 'विदेह' ६८ म अंक १५ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६८) वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi एहि अंकमे अछि:- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. विनीत उत्पल- की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत २.२.गजेन्द्र ठाकुर मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव २.३.सुजीत कुमार झा- अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली पढाइकें हिसाब सँ प्रभावकारी भऽ रहल २.४.सुमित आनन्द- आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१० २.५.श्रीमती शेफालिका वर्माआखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.६.विपिन झा- समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता २.७.१.भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा( लघुकथा)२.ज्योति सुनीत चौधरी-विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता २.८.बीनू भाइ- कथा- उत्ताप ३. पद्य ३.१.गिरीश चन्द्र लाल-नील आकाश ३.२.रमा कान्त झा-१. की होइत अछि कश्मीरमे आब २.रही रही मोन पड़ै अछि गामक ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-बचपन ३.४.मृदुला प्रधान- ई त बूझू ३.५.कालीकांत झा "बूच"-!! मातृवंदना !! ३.६.किशन कारीग़र- लिखैत रही। ३.७.गंगेश गुंजन- (ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे) ३.८.मनीष झा "बौआभाई" भेल एहेन अवतार छल ४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-दुर्गापूजा २.ज्योति सुनीत चौधरी ३श्वेता झा (सिंगापुर) 5. बालानां कृते-डॉ. शेफालिका वर्मा- मूर्ख राजा आ ओकर बेटा 6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.] 7.VIDEHA FOR NON RESIDENTS 7.1.NAAGPHAANS-CONCLUDING PART-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 7.2.1.Original Poems in Maithili byKalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poems in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link. विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions विदेह ई-पत्रिकाक पहिल ५० अंक
विदेह ई-पत्रिकाक ५०म सँ आगाँक अंक विदेह आर.एस.एस.फीड। "विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू। अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू। ↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ। ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add बटन दबाऊ। मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू। http://devanaagarii.net/ http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ। VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू। गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज' मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ। "मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ। संपादकीय १. संपादकीय 74 वर्षक मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार देल जा रहल अछि। लोसा पेरूक स्पेनिश भाषाक लेखक छथि। 1963 ई. मे द टाइम ऑफ द हीरो नाम्ना पहिल उपन्यासक लेखक श्री लोसा मूलतः गद्य लेखक छथि आ ओ निबन्ध, उपन्यास लिखै छथि। नोबल समिति कहलक अछि जे शक्तिक केन्द्रक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक चित्रण लेल श्री लोसा केँ ई पुरस्कार देल गेल अछि। ओ तीससँ नाटक, निबन्धक अतिरिक्त 30 सँ बेसी उपन्यास लिखने छथि। हुनकर किछु आन रचना छन्हि: द फीस्ट ऑफ द गोट, ऑंट जूलिया एंड द स्क्रीनराइटर, द ग्रीनहाउस, कंवर्सेशन इन द कैथेड्रल, कैपटन पैनटोजा एंड द स्पेसल सर्विस। बाल-किशोर विशेषांक/ नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल आ लघुकथा अंकक बाद विदेहक 15 नवम्बर 2010 अंक बाल-किशोर विशेषांक, 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल लेखक टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 नवम्बर 2010 धरि बाल-किशोर विशेषांक लेल; 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल आ 13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल ई-मेलसँ पठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।
(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०६ देशक १,५४७ ठामसँ ५०,२५३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,६९,१५९ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।) गजेन्द्र ठाकुर ggajendra@videha.com गद्य २.१. विनीत उत्पल- की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत २.२.गजेन्द्र ठाकुर मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव २.३.सुजीत कुमार झा- अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली पढाइकें हिसाब सँ प्रभावकारी भऽ रहल २.४.सुमित आनन्द- आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१० २.५.श्रीमती शेफालिका वर्माआखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.६.विपिन झा- समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता २.७.१.भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा( लघुकथा)२.ज्योति सुनीत चौधरी-विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता २.८.बीनू भाइ- कथा- उत्ताप विनीत उत्पल की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत हिन्दू मिथ कथामे वर्णित नर्क आआ॓र आ॓तुक्का ‘यातना’ साकार रूपमे देखबाक इच्छा होअए तँ दिल्लीक जीबी रोडक अगल-बगलके 25 टा बिल्डिंगमे रहैबला पांच हजार सेक्सवर्करकेँ देखि आउ। एहि नर्कसँ निजात दियाबैक सरकारी प्रयासक काजकेँ लऽ कऽ जहिना एकटा सेक्सवर्कर परवीनसँ पुछैत छी, आ॓ तमैक कऽ कहैत अछि, ‘एतए एतेक किछु भोगलहुँ अछि जे आ॓ नहि जानैत अछि। कतय के सरकार आआ॓र कोन सरकार?’ सरकार अछि तँ हम एतए टा मांगैत अछि जे आ॓ हमरा जीबैले दिअए। धंधाक ‘नर्क’ केँ आ॓ बुझाबैत अछि, ‘देह बेचि कऽ जे टा पैसा मिलैत अछि आ॓करा छह टा हिस्सा होइत अछि, कोठा मालकिन, दलाल, पुलिस, राशन कार्ड मालिक, सूदखोर आआ॓र गुंडा।’ देहमंडीक गणित ई अछि जे सौ टकामे हिनकर हिस्सा मात्र पंद्रह टका आबैत अछि। एहि पाइमे हुनका परिवार चलबै पड़ैत अछि, ग्राहक लेल सजय-संवरै पड़ैत अछि आ ग्राहकक संसर्गसँ सौगातमे भेटल बीमारीक इलाज सेहो करए पड़ैत अछि। बाकी 85 टका दलाल, कोठाक मालकिन आआ॓र पुलिस सभक हफ्तामे बँटि जाइत अछि। ई केकरो मजबूरीपर बेइमानीसँ फलैत-फूलैत धंधा अछि। सरकारक नजरिमे ई धंधा दिल्लीमे केबल जीबी रोडपर भऽ रहल अछि, मुदा हयात होटलक इलाका हो वा लक्ष्मीनगर, पटेलनगर आ खानपुर जिस्मफरोशीक अड्डा बनल अछि। जीबी रोडपर दुकानक बीचसँ गुजरैबला अन्हार सीढ़ीक दरवाजापर लाल रंगसँ लिखल अछि, ‘दलालों और जेबकतरों से सावधान’। मुदा जिस्मक भूखक आगू ई चेतावनी बेइमान लागैत अछि। अहि कोठापर हमर भेंट होइत अछि, विमला, नसरीन, बबीता, सीता, परवीन, फरहाना आदिसँ जे दिनराति घुटैत रहैत अछि आ लड़ैत अछि अप्पन जिनगीसँ। देह व्यापार गैर कानूनी होएबाक कारण ई सभ दिनक उजालामे सामान कीनैलै नहि जाइत अछि। राशन बला मिट्टीक तेलमे मिलावट कऽ कऽ दैत अछि आ नापतौलमे बेइमानी करैत अछि। ताहिसँ ई सभ कमला मार्केट जाइत अछि बाजार करै लेल जाहिसँ आ॓तए कियो हिनका चिन्हि नहि लिअए। स्वीपर हिनकासँ घूस मांगैत अछि आ नहि देलापर सीढ़ीपर कूड़ा-कचरा फेंकि दैत अछि। एतए पांच हजार सेक्स वर्करमे सँ 12 सए वोटरक आइ-कार्ड तऽ बनि गेल अछि, आब आ॓ वोटर अछि। एकर बादो लाइमलाइटमे आबैसँ डरैत अछि जे समाज हुनका सभकेँ बारि नहि दिअए। एहन सेक्सवर्कर जे मजबूरवश अपना लेल फैसला कऽ कऽ एहि धंधामे उतरल अछि आआ॓र हुनकर घरबला एहि धंधासँ अनजान अछि, आ॓ सेहो अप्पन तस्वीर उजागर होएबासँ डरैत अछि। दूर-दूरसँ आएल लड़की पावनि-त्योहार, शादी-ब्याहक मौका्पर घर तँ जाइत अछि मुदा अप्पन धंधाकेँ लऽ कऽ केकरोसँ गप नहि करैत अछि। फोटो खिचाबैसँ एहि लेल मना करैत अछि। ई सेक्सवर्कर धंधाक पाइ-पाइ हिसाब बताबैत अछि जे कॉलगर्लक धंधा पनपैसँ हुनकर धंधाक रौनक कम भऽ गेल अछि। आ॓ पांच हजार टका महीना कमाबैत अछि जाहिमे 1500 टका बच्चापर खर्च भऽ जाइत छै। एक हजार टका कपड़ा आ मेकअपमे खत्म भऽ जाइत छै। संगे एक हजार टका रेंट दिअए पड़ैत छै। खाए-पीब के जे पैसा बचैत छै आ॓करा घर पठा दैत अछि। एकरामे सभकेँ अप्पन बच्चाक परवरिशक खास ख्याल छै। कियो-कियो अप्पन बच्चाकेँ एम.सी.डी. स्कूलमे नहि भेजि कऽ मंटो रोड लग प्राइवेट स्कूलमे भेजैत अछि आ मास्टरसँ कहैत अछि जे हुनकर धंधाक गप बच्चा लग नहि करू। कतेक सेक्सवर्कर एहनो अछि जे अप्पन धंधाक भेद बच्चाक लग खुजि नहि जाए, एकर डरसँ अपनासँ दूर बोर्डिंगमे राखि कऽ बच्चाकेँ पढ़ा-लिखा रहल अछि। देहक बाजार सर्वधर्म समभावपर चलैत अछि। जी.बी. रोडपर हनुमान मंदिर आआ॓र मस्जिद एकहि इलाकामे अछि। एक कमरा्मे मक्का-मदीनाक फोटो अछि तहि बगलमे हिन्दू देवी-देवताक कएक टा फोटो टांगल अछि। बालकनीमे लागल तुलसी आआ॓र मनीप्लांटक गाछ एहि गपक गवाह छल जे देहव्यापारक नहि कोनो धर्म होइत अछि आआ॓र नहि कोनो जाति होइत अछि। एतए सभक बस एक्के टा जद्दोजहद अछि, जिनगी गुजारैक। गजेन्द्र ठाकुर पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।
लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।
मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।
मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।
उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।
कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।
अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास। शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराशं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका । सम्पादन: अन्तर्जालपर विदेह ई-पत्रिका “विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)। ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव उपन्यासक आरम्भ: वाणभट्टक कादम्बरी राजा शूद्रकक विदिशानगरीक वर्णनसँ प्रारम्भ होइत अछि। एकटा चाण्डाल अतीव सुन्दरी कन्या वैशम्पायन नाम्ना ज्ञानी सुग्गाकेँ लेने दरबार अबैत अछि आ प्रारम्भ होइत अछि सुग्गाक खिस्सा। चांडालक बस्ती पक्कणमे कियो भिखमंगा नै, कियो चोर नै, ओतुक्का राजा व्याघ्रदेव स्वयं रस्सी बँटैत छथि। संस्कृतक एहि उपन्यास नामसँ मराठीमे उपन्यासकेँ कादम्बरी कहल जाइत अछि। उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजक “डॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ मात्र किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवतीक चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, आ तखन नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। एहि सभक संग जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ तखन एतए दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना करै छथि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि। अंग्रेजी उपन्यासक वाद: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत।आधुनिक कथा-उपन्यास अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ? कोनो कथा-उपन्यासक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि।जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि।जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि।मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत।कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी।मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत।आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि।तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत? जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि।आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल।पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म।कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। बाढ़िमे भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए जाइए। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था। अंगेजी उपन्यासक आरम्भ आ विकास: अंग्रेजी उपन्यास पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस- लेखक कथाक मुख्यपात्रक यात्राक आ ओहि यात्रा मध्य आओल संघर्ष आ उत्साहक वर्णन करैत छथि। डेनियल डिफ़ो अपन रॊबिन्सन क्रूसो उपन्यासमे मुख्यपात्रक साहसिक समुद्र यात्राक वर्णन करैत छथि सैमुअल रिचर्डसनक पेमेला अंग्रेजी उपन्यासकेँ पारिभाषिक स्वरूप देलक। एफ़्रा बेनक ओरूनोको उपन्यासक नायक कारी रंगक दास अछि तँ हुनक ’लव लैटर्स बिटवीन ए नोबल मैन एंड हिज सिस्टर’ मे सामंतक प्रेम कथा सभक वर्णन अछि। हैनरी फ़िल्डिंग ’टॉम जोन्स’ मे सामंतवादक आलोचना केने छथि समाजक विकृतिक चित्रण केने छथि। हेनरी जेम्स “द पोट्रेट ऑफ ए लेडी” मे कलात्मक प्रस्तुति लेल जिनगीक उपेक्षा करै छथि। रिचर्डसन ’कलैरिस’ मे मनुष्यक मनोविज्ञानक तहमे जाइ छथि। जोजफ कोनरेडक ’द शैडोलाइन’ क पात्र समाज आ जीवनक प्रति दृष्टिकोणक एक्द पक्षीय होएबापर सोचै छथि। डी.एच.लॉरेन्स “लेडी चैटर्लीज लवर” क पात्र विकृति लेल संस्कृति आधारित सभ्यताकेँ दोषी कहै छथि। रुडयार्ड किपलिंगक उपन्यास “किम” यूरोपी साम्राज्यवादक लेल एकटा बहन्ना ताकि रहल अछि, यूरोपी सभ्यताकेँ ओ उच्च मानै छथि। ई.एम.फोर्स्टरक “ए पैसेज टू इंडिया”मुदा शासक आ शासितक सम्बन्धकेँ व्याख्यायित करैत अछि। मैथिली उपन्यासक आरम्भ आ विकास: हरिमोहन झाक कन्यादान आ द्विरागमन मिथिलाक बहुत रास सामाजिक व्यवस्थाकेँ सोझाँ अनैत अछि, महिला शिक्षा आ अंध-पाश्चात्यकरणक सेहो हास्य रसमे चित्रण आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासक रीतिएँ करैत छथि। यात्रीक बलचनमा यादव जातिक बलचनमाक आत्मकथ्यक रूपमे अछि। आर्थिक समस्या एकर मूल विषए छैक। बलचनमा कोना एकटा टहल करैबलासँ आगू जाइत किसानक हक लेल जान दैत अछि ताधरिक कथा। कांग्रेस आदि पार्टीक विरुद्ध कम्यूनिस्ट पार्टीक प्रति स्पष्ट झुकाव यात्रीजीक रहल छन्हि। आ पारो बलचनमाक आर्थिक समस्याक विपरीत सामाजिक लक्ष्य तकैत अछि। किछु दिनुका बाद एहि उपन्यासकेँ लोक असली फिक्शनक रूपमे लेताह कारण अगिला पीढ़ीकेँ विश्वास नै हेतै जे एहनो कोनो क्रूर व्यवस्था सभ मानवजातिक मध्य होइत हेतै। आ तैँ एकर महत्व आर बढ़ि जाइत अछि- ओहि सभ व्यवस्था सभकेँ पेटारमे सुरक्षित रखबाक जिम्मेदारी। मुदा जहिया यात्रीजी ओहि समस्यापर लिखने छलाह तहियासँ ओ समस्या रहै आ ई उपन्यास ओहिमे सार्थक हस्तक्षेप कएने छल। रमानन्द रेणुक दूध-फूल उपन्यास समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि आ कलात्मक उपस्थापन करैत अछि। ललितक पृथ्वीपुत्र सेहो समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि। ई उपन्यास कृषक जीवनक आर्थिक समस्यापर सेहो आंगुर धरैत अछि। लिली रे क पटाक्षेप वामपंथक वर्ग-संघर्षक उत्थान आ फेर ओकर दमनक कथा कहैत अछि आ देशक समस्यासँ साहित्यकार द्वारा स्वयंकेँ तत्काल जोड़बाक मार्ग प्रशस्त करैत अछि। धूमकेतुक मोड़ पर सेहो वामपंथी विचारक आलोकमे सामाजिक-आर्थिक समस्याक कथा बैकफ्लैशमे कहैत अछि। साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़िक आ सरकारी नीति आ राहतक कथा अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक मौलाइल गाछक फूल गामक, गामसँ पलायनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि। चतुरानन मिश्रक कला कलादाइक माध्यमेँ गलल सामाजिक व्यवस्थापर प्रहार अछि। शेफालिका वर्माक नागफाँस अंग्रेजक धरतीपर विचरण करैत अछि। धारा आ सीमांतक मिलन एहि जिनगीमे कहियो हेतै, कोनो जादू हेतै की? आ अन्तमे : से जौँ गहींर नजरिसँ देखब तँ लागत जे अंग्रेजी उपन्यासकारक कृति ओहि समएक वाद आ दृष्टिकोणकेँ संग लऽ कऽ चलबाक प्रयास अछि। मुदा सिद्धान्तसँ प्रयोगक क्रममे किछु विशेषता स्वयमेव आबि जाइ छै। तहिना मैथिली उपन्यासक सेहो स्थिति अछि। रमानन्द रेणुक उपन्यास होअए वा शेफालिका वर्माक, ई तथ्य शिल्पमे स्पष्ट रूपसँ देखि सकै छी। लिली रे अपन कलमक धारसँ जेना अपन लग-पासक घटनाक, समाजक, राजनीतिक वर्णन करै छथि से अद्भुत तँ अछिये अंग्रेजी उपन्यास सभसँ एक डेग आगाँ जाइत अछि। ललित, यात्री आ धूमकेतु आर्थिक आ सामाजिक समस्याकेँ सोझाँ रखैत छथि, आ ओहि क्रममे कोनो तथ्यकेँ कोनो रूपेँ नुकबैत नै छथि। साकेतानन्द बाढ़िक समस्याकेँ सोझाँ रखै छथि। हरिमोहन झा अपन शैलीमे अंग्रेजी साहित्यक धारकेँ बहबैत छथि आ नायक द्वारा नायिकाकेँ देल पढाइक सिलेबसमे सेहो ई तथ्य सोझाँ अनैत छथि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जाहि रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होएत जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत। मैथिली उपन्यासक भविष्य : सभ जीवित भाषामे सभसँ बेसी रचना उपन्यासक होइत छै मुदा मैथिलीमे सभसँ कम उपन्यास लिखल जाइत अछि। जाहि रूपमे अंग्रेजी शिक्षा आ साहित्यक अध्ययन कऽ मैथिली साहित्यमे आओल नव पीढ़ीक संख्या बढ़त, मैथिली साहित्य अपन सामाजिक- आर्थिक- राजनैतिक आ सांस्कृतिक अंतर्दृष्टिक विकास कऽ सकत। वीणा ठाकुरक भारती, आशा मिश्रक उचाट आ केदारनाथ चौधरीक चमेली रानी-माहुर आ करार हमर एहि दृष्टिकोणक पुष्टि करैत अछि। सुजीत कुमार झा अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली पढाइकें हिसाब सँ प्रभावकारी भऽ रहल
धनुषा जिल्लाक ३० टा केन्द्रमे अनौपचारिक शिक्षाक पढाइ मैथिली भाषामे शुरु कएल गेल अछि । यूनेस्कोक सहयोगमे आसमान नेपालद्वारा भऽ रहल ओ पढाइकेँ लेल मैथिली भाषामे ‘हमर जात्रा’ नामक किताब सेहो निकालल गेल अछि । १५ वर्ष सँ ४५ वर्ष धरिकेँ महिलाकेँ शिक्षित करबाक उद्देश्य सँ शुरु कएल गेल आधारभुत साक्षरता कार्यक्रममे गजबकेँ रिस्पोन्स भेट रहल आयोजक पक्षक दावी रहल अछि । आसमान नेपालक सुरैत ठाकुर कहैत छथि ‘पहिने हम सभ नेपाली किताब लऽ कऽ आधारभुत साक्षरता कार्यक्रम शुरु करैत छलौं मुुदा मैथिली भाषाक किताब लऽ कऽ एखन प्रशिक्षणे पढाइ शुरु भेल अछि , विद्यार्थी सभ नेपाली सँ मैथिलीक किताब बढियाँ जँका बुझि रहल बतबैत अछि । ‘हमर जात्रा’ किताबक लेखक मैथिली भाषाक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल , डा. आशा सिन्हा आ सुरैत ठाकुर रहल छथि । नारी विकास केन्द्र जनकपुरक साक्षरता कक्षाक सुमित्रा महासेठ कहैत छथि ‘पढाइकेँ हम पहिने ‘प’ नहि जनैत छलौह मुदा आवत कऽ टऽ पढय लागल छी । एकर एकटा कारण अपन भाषामे पढाइ रहल ओ कहैत छथि । आधारभुत साक्षरता कक्षा जनकपुर नगरमे १७, लक्ष्मीपुर बगेवामे ९ आ घोडघासमे ४ टा केन्द्र परिक्षणक रुपमे शुरु कएल गेल अछि । प्रत्येक केन्द्रपर दैनिक २ घण्टा महिला सभकेँ पढाओल जाइत अछि । आसमान नेपालक केन्द्रीय निर्देशक नवल किशोर यादव कहैत छथि ‘आब क्रमशः अन्य केन्द्र पर सेहो मैथिली भाषक किताब लागु कएल जाएत ।’ जिल्ला शिक्षा कार्यालय धनुषा इ अनौपचारिक शिक्षाकेँ स्वयं निगरानी कऽ रहल अछि । विभिन्न केन्द्रक निरीक्षणक बाद धनुषाक शिक्षा अधिकारी सदानन्द झा कहलन्हि ‘पढाइ बढिया भऽ रहल, ओहुमे मात्रृभाषामे सन्तोषक पर्याप्त जगह अछि ।’ धनुषामे मात्र अढाइ सय विद्यालय एहन अछि जे अनौपचारिक शिक्षा पढबैत अछि । नेपालक मिथिलाञ्चल क्षेत्रक बात करी तऽ एक हजार सँ बेसी ठाम अनौपचारिक शिक्षाक पढाई होइत अछि । अधिकांशमे नेपाली किताब लऽ कऽ पढावयकेँ परम्परा अछि । ओहिसभमे सेहो मैथिली भाषाक किताब आवि गेलाक बाद आब ओहि भाषामे पढाओल जाए ताहिपर बहस शुरु भऽ गेल अछि । सुमित आनन्द आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१० आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक आयोजन मैथिली अकादेमी पटना, द्वारा प्रायः पहिल बेर दरभंगामे भेल। आचार्य रमानाथ झा भाषणमाला २१ सितम्बर २०१० केँ आर प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमाला २२ सितम्बर २०१० केँ चन्द्रधारी संग्रहालयक सभागारमे मनाओल गेल जाहिमे मुख्य वक्ता छलाह क्रमशः डॉ. रमण झा, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा आर डॉ. बीरेन्द्र झा प्राचार्य आ अध्यक्ष, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना। मैथिली अकादेमी, पटनाक अध्यक्ष, श्री कमलाकांत झाजीक द्वारा अध्यक्षीय प्रभार ग्रहण कयलाक पश्चात् ई पहिल आयोजन छल जे सफलतापूर्वक सम्पन्न भेल। पहिल दिन अर्थात् २१.०९.२०१० केँ आचार्य रमानाथ झा भाषणमालाक आयोजन २:३० बजे दिनसँ प्रारम्भ भेल। एहि कार्यक्रमक उद्घाटनकर्त्ता-सह-मुख्य अतिथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपन उद्घाटन भाषणमे कहलनि जे महान साहित्यकार लोकनिक जयंती हुनक अंग्रेजी तारीखक अनुसार नहि मनाए पंचांगक तिथिक अनुसार मनाओल जएबाक चाही। ओ कहलनि जे १९६० ई.सँ आचार्य रमानाथ झा मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ ध्यानमे राखि रचना कयलनि। एहि अवसरपर विशिष्ट अतिथिक रूपमे विचार व्यक्त करैत विद्यापति सेवा संस्थानक महासचिव डॉ. वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजू’ कहलनि जे आचार्य रमानाथ झा साहित्यकार, रचनाकार, कवि सहित सर्वगुण सम्पन्न छलाह। मुख्य वक्ता डॉ. रमण झा ‘मैथिली भक्ति-काव्यमे अलङ्कार-विधान’पर अपन व्याख्यान देबाक क्रममे कहलनि जे विद्यापतिक अधिकांश श्रृंगार विषयक गीत राधा-कृष्णसँ सम्बन्ध अछि जकरा भक्तिक कोटिमे राखल जा सकैत अछि। ‘नन्दक नन्दन कदम्बक तरू तर धीरे-धीरे मुरली बजाव’ केर व्याख्या करैत ओ कहलनि जे अलङ्कार (सौन्दर्य) मनुष्ये जकाँ काव्योक हेतु आवश्यक छैक। एहिसँ काव्यमे सरसता बढ़ैत छैक। एहि क्रममे ओ शब्दालङ्कार, अथलिङ्कार, आ उभयालङ्कारक कत्तोक सुन्दर-सुन्दर उदाहरण दैत अपन कथनकेँ प्रमाणित कयलनि। उदाहरणक हेतु ओ विद्यापतिक मधुप, सुमन इत्यादिक रचनासँ सुन्दर-सुन्दर पदक उल्लेख करैत, ओकर अलङ्कारकेँ फड़िछबैत रहलाह। कविशेखर जीक काव्यमे तऽ एक संग अनेक अलङ्कारक गुंफनकेँ सेहो सोझरबैत रहलाह। श्री ब्रह्मेन्द्र झाक संचालनमे कार्यक्रमक समापन मैथिली अकादेमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजीक भाषणसँ भेल। दोसर दिन अर्थात् २२.०९.२०१० केँ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक उद्घाटन प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगाक महामंत्री डॉ. गणपति मिश्रक द्वारा दीप प्रज्वलित कए कएल गेल। डॉ. मिश्र तंत्रनाथ झाक प्रसिद्ध ‘मुसरी झा’ कविताक उल्लेख करैत कहलनि जे ओ अत्यंत लोकप्रिय कवि छलाह। हुनक कथन छलनि जे ‘कीचक वध’ सन महाकाव्य लिखि ओ एकटा नव परिपाटी जन्म देलनि। यात्रीक सम्बन्धमे, जनिकापर ओहि दिनक व्याख्यान केन्द्रित छल, सेहो ओ कतेक गूढ़ गप्प कहलनि कारण जे बारह वर्ष धरि ओ यात्रीजीक चिकित्सकक रूपमे सेवा कएने छलथिन। हुनक कथन छलनि जे अस्वस्थतोक समएमे ओ सर्जनात्मक कार्यमे तल्लीन रहैत छलाह। विशिष्ट अतिथिक पदसँ बजैत मैथिली पुत्र प्रदीप प्रो. तंत्रनाथ झाक किछु स्मृतिक उल्लेख कयलनि। ओ तंत्रनाथ झाक आदेशपर हुनका गीत सुनबैत छलथिन तकर किछु पाँती श्रोता लोकनिकेँ सस्वर सुनओलथिन। मुख्य वक्ता डॉ. बीरेन्द्र झा ‘यात्री साहित्यमे लोक जीवन ओ राजनीतिक चेतना’ विषयपर अपन व्याख्यान दैत हुनका जन कवि कहलनि। डॉ. झा यात्री चित्रासँ अनेक पाँतीक उल्लेख करैत सिद्ध कयलनि जे ओ कमजोर वर्गकेँ उपर उठयबाक हेतु ओकरा समाजक मुख्यधारामे अनबाक हेतु सतत प्रयत्नशील रहलाह। बूढ़वर, विलाप, अंतिम प्रणाम इत्यादिक उदाहरण दए ओ प्रमाणित कयलनि जे यात्री जी वस्तुतः कविताक धारा बदलि देलनि। एहि अवसरपर अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजी अध्यक्षीय भाषणमे घोषणा कयलनि जे ओ अकादेमीक सभ समारोहमे एकटा मैथिली सेवीकेँ पाग तौनी दए सम्मान करताह आ एहि क्रमे ओ बूढ़ा भाइक सम्मान कयलनि। कार्यक्रमक संचालन ब्रह्मेन्द्र झा कयलनि। एहि कार्यक्रमक अवसरपर अनेक गणमान्य व्यक्ति सभ उपस्थित छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह- डॉ. पं. शशिनाथ झा, डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. श्रीमति वीणा ठाकुर, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’, डॉ. विभूति आनन्द, श्री रवीन्द्र झा, श्रीमति आशा मिश्र, श्री मुरलीधर झा, श्री चन्द्रेश, ई. श्री अशोक ठाकुर ‘प्रभृति’ आ समस्त मैथिली अकादेमी पटनाक सदस्यगण उपस्थित छलाह। श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) विश्व हिन्दू परिषदक एहि लेटरपैडमे अध्यक्षक जगह पर पं जयकांत मिश्र पटना छल, कोन जयकांत मिश्र छलथि कहियो जिज्ञासा नहि रहल- आदरणीया बहन शेफालिका जी आपको ज्ञात ही है कि बिहार आंदोलन मे आज़ादी के बाद दूसरी बार महिलाओं की व्यापक हिस्सेदारी हुई । सत्याग्रह के कार्यक्रमों की मुख्य शक्ति बनकर वे उभरी । उनका अपूर्व जागरण हुआ वैसे तो बिहार आन्दोलन ने बहुत कुछ बदला पर महिलाओं के मानस मे उसने बड़ा परिवर्त्तन किया वह परिवर्त्तन क्या फिर सो जायेगी यदि हम सो गयी तो कौन महिलाओं को उनकी सही सामाजिक स्थिति तक पहुँचायेगा इसलिये आर्थिक सामाजिक राजनैतिक सांस्कृतिक आदि सभी मोर्चोपर हमे अपनी लड़ाई पूरे समाज के संदर्भ मे स्वयं लड़नी होगी और इसी का ध्यान मे रखते हुए 29 जुलाई 78 से 2 अगस्त 78 तक पटना मे एक बिहार प्रान्तीय महिला शिविर-सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। बिहार प्रान्तीय महिला शिविर-सम्मेलन का उदेश्य सम्पूर्ण क्रांति की दिशा मे महिलाओं की भूमिका खोजने कार्यक्रम बनाने और संगठन खड़ा करने का है अतः आप से आग्रह है कि आप इसमे भाग लेकर हमे सहयोग करें । आपकी सेवा मे शिविर-सम्मेलन संबंध्ी कागजात भेजे जा रहें है आप से प्रार्थना है कि संलग्न आवेदन पत्र भर कर तुरंत भेजें ताकि अन्य जानकारी भी आपको भेजी जा सके । समस्त शुभकानाओं के साथ - सादर - आपकी बहन नुतन बिहार महिला संघर्ष समिति पटना 18 6 78 प्रिय बहन। कटिहार जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन आगामी 5 फरवरी को सम्पन्न करने का निश्चय किया गया है अधिवेशन के अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन के लिए आमंत्रित कर रहा हँू । श्री मार्कण्डेय प्रवासी जी द्वारा आप का पता मालूम हुआ। अपनी की ओर से मार्ग व्यय एवं सम्मान देने की स्थिति मे हँू । इस अवसर पर बिहार के राज्यपाल महासचिव श्री जगन्नाथ कौशल ने उद्घाटन के लिए हमे स्वीकृति दी है। मैं आशा करता हँू कि आपका सहयोग हमे अवश्यक प्राप्त होगा । कृप्या सेवा के लिए स्वीकृति पत्र भेजने की कृपा की जाय। स्नेहाध्ीन रतनकुमार किशोर सचिव कटिहार जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन पो॰ गुरू बाजार जिला - कटिहार 17 1 78 ओहि काल बीजेपी नेता बादमे मुख्यमंत्राी बिहार भऽ गेलथि कैलाश जीक पत्र- शेफालिका जी एवं ललन जी, आत्मीयता एवं स्नेह भाव से दीपोत्सव के अवसर पर आपकी शुभकामना प्राप्त हुयी। मैं इसे आशीर्वाद समझकर शिरोधार्य कर रहा हूँ। आप लोगों की यह भावना ही जीवन पथ पर चलते रहने की शक्ति प्रदान करती है। निरंतर प्रवास पर रहने के कारण प्राप्ति के पश्चात प्रणाम भेजने मे बिलम्ब हुआ है। सदा स्नेह बना रहे यही आकांक्षा है। भवदीय कैलाशपति मिश्र प्रिय शेफालिका जी आखरक प्रवेशांक पठा चुकल छी भेटत होएत। आखर केहेन लागल अपनेक सम्मति अपेक्षित अछि। आखरक अग्रिम अंकक लेल अपनेक रचना आमंत्रित अछि तैं कमसँ कम समयमे अपन नवीनतम अप्रकाशित रचना पठा देल जाए। एखन धरि हम एहि आश मे छी। अंक देखैत अहाँ अपन सम्मति आ रचना पठा देब। दोसर अहांक सामग्री प्रेसमे चलि जाएत समयपर एम्हर बहुत दिनसँ अपनेक कोनो रचना नहि देखबामे आएल-से की कारण, अहाँक सभ पत्र रचना उपराग आओर यदा-कदा विभिन्न व्यक्तिक द्वारा पठाओल गेल समाद भेटैत रहल अछि, महानगरक कर्म-संकुल जीवनक दुर्वह भारकेँ वहन करबामे ततेक ने समय व्यतीत भऽ जाइत अछि जे ककरो यथासमय पत्रोत्तर दऽ सकी तकरो पलखति नहि भेटैत अछि, एम्हर अग्निपत्रक प्रकाशनमे बेस विलम्ब भेल। नव अंक बहार भऽ गेल अछि, जे अपनेक नाम पठा चुकल छी, आशा जे एहि अंकक विषयमे अपन अभिमत शीघ्र लिखि पठायब। उल्थाक कार्य चलि रहल छैक। अहाँक रचना जा रहल अछि आओर बात अन्य पत्रमे विस्तारसँ लिखब अपन स्वास्थ्यक विषयमे सूचित करी। प्रसन्नता होएत आओर कोना की पत्रवाहक हमर अभिन्न छथि। शेष शुभ वीरेंद्र मल्लिक कलकत्ता 13 11 71 मैथिली साहित्यमे नहुनहु पैर राखैत छलौं कनिया बहुरिया जकाँ स्यात् साठिक दशक छल तखने ई पत्र भेटल छल। श्रीमती शेफालिका जी यथोचित किछु आश्चर्य होएत एक अपरिचितक पत्र पावि। बम्बई मे हम सब कर्ण कायस्थ विकासक हेतु एक कर्ण गोष्ठीक स्थापना केलहुँ ओ अपन सामाजिक सांस्कृतिक अध्याविधि प्रगतिक क्रमिक विकास एक प्रामाणिक पुस्तिकाक प्रकाशन कए रहल छी जाहि सं अपन संस्कृतिक एक पक्ष सुरक्षित रहत ओ भविष्यमे हम अपनाकें पहचानि सकी जे हम के छी। सीमित सम्पर्क रहलो उत्तर हम सब अधिकाधिक समाजक गण्यमाण्य व्यक्तिसं सहयोगक लेल हाथ पसारने छी। पत्रिका की रूप देल जाय एकर आभास संलग्न पत्रसं ज्ञात होएत। विषयक एक सूची कर्ण कायस्थ मे ओकर स्थिति आदि संबंधी एक विवेचना पूर्ण रचनाक आकांक्षी छी। सुविधानुसार शीर्षक या विषय अपने चयन कऽ सकैत छी मुदा रचना पूर्ण कायस्थ समाजक परिधिमे हो। आशा नहि पूर्ण विश्वास अछि अपनेक सहयोग भेटत। भवदीय राम चन्द्र दास 83/2969 तिलक नगर चेम्बर बम्बइ अखिल मिथिला मैथिली प्रचारक संघसँ पत्र आयल छल जकर शाखा संपूर्ण भारत नेपालमे छल। जमशेदपुर 04 01 1969 पत्रांक - 81/69 स्नेही शेफालिका जी जय मैथिली विश्वास अछि टटका अंक संग-संग पत्र सब सेहो भेटि गेल होयत। टटकाक विचारधारा संपूर्ण देशक विचार धारा अछि। अपनेसँ आग्रह जे सह-सम्पादनक भार अपनेकें देल जा रहल अछि। स्वीकार करू। सह सम्पादकक रूपे अपनेसँ सम्पूर्ण प्रचारक बन्धु निवेदन कय रहल छथि जे अपनेकेँ कोनो झंझट नहि होइत। अपने गंगजले रहब तथा प्रत्येक अंकक लेल अपन सम्पादकीय पठा देल करब। आधा पत्रक अक्षर सभ उड़ि गेल अछि- आगाँ अगिला अंकमे.... विपिन झा* समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता “काल्हि मृत्यु कें प्राप्त होयब एहि चिन्तनक संग जीबाक चाही आ हम अमर छी एहि अवधारणाक संग ज्ञानार्जन करबाक चाही” {M.K.Gandhi} ’गाँधी’ ओहि देदीप्यमान नक्षत्रक नाम अछि जेकर आभा सँऽ भारतवर्ष सतत आलोकित होइत रहल अछि। भारतीय स्वाततन्त्र्य संघर्ष मे हुनक योगदान सर्वविदित अछि। सत्य आ सहिष्णुताक अनुपालनक जे अप्रतिम उदाहरण ओ प्रस्तुत कयलथि कदाचित हुनक आलोचको ओहि समक्ष नतमस्तक रहल। ओ नहिं तऽ राजनीतिक आ नहिं तऽ कोनो अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत कयलथि प्रत्युत हुनकर व्यवहार सिद्धान्तक रूप लेलक। जहाँ धरि गाँधीक सिद्धान्तक गप्प अछि; महात्मा गाँधी कोनो नवीन सिद्धान्तक प्रतिपादन नहि कयलथि सनातनधर्म सँ स्वीकृत सिद्धान्त केर अपन जीवन मे प्रयोग कय शिक्षा देलथि जे ई मात्र सैद्धान्तिक नहिं अपितु एकर व्यावहारिक महत्त्व सेहो छैक। स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व गाँधीजीक ई व्यावहारिक प्रयोग जतय स्वराज्यप्राप्ति हेतु प्रयत्न के गति देलक ओतहि स्वाधीन भारत मे नीतिनिर्धारण मे आधारभूमि केर कार्य केलक। ध्यातव्य अछि जे परिकल्पना परिपुष्ट भय सिद्धान्तक रूप लैत अछि आ सिद्धान्त परिपुष्ट भय नियम बनैत अछि। गाँधीजीक स्वाराज्य ग्राम परिकल्पना कालान्तर मे सिद्धान्तक रूप लेलक जाहि हेतु हुनक समस्त गतिविधि दृष्टिगत भेल। गाँधीजीक प्रमुख सिद्धन्त कें अनुशासन, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सादगी आ विश्वास केर गिनती कयल जा सकैत अछि। आब प्रश्न ई उठैत अछि जे ई सिद्धान्त प्रायोगिक रूप मे कतेक अनुगम्य अछि? कोनो सिद्धान्त “करबाक चाही” एकर निर्देश दैत अछि न कि “करैत छी”। प्रत्येक सिद्धान्त एहि धरातल पर सर्वथा प्रायोगिक रूप सऽ अनुगम्य अछि। अनुशासन एहेन आदर्श अछि जे व्यक्तिमात्र के पशु सँऽ पृथक करैत अछि। अनुशासनक महत्त्व सेना क सन्दर्भ मे नजदीक सँऽ देखल जा सकैत अछि। सत्य केर अनुपालन सर्वथा असत्य बजनिहार सेहो करय चाहैत अछि। अहिंसा सऽ आशय मात्र हत्या सँऽ नहिं लय कायिक वाचिक सेहो लेल जाय त एकर उपादेयता सहजतया बुझल जा सकत। ब्रह्मचर्य व्यक्ति उच्छ्रिंखल नहिं बनय दैत अछि। सादगी बाह्याडम्बर के रोकबा मे महत्त्वपूर्ण भूमिका रखैत अछि। आब सहज प्रश्न उठत जे यदि ई एतेक महत्वपूर्ण अछि तऽ लोक एकर अनुपालन कियाक नै करैत अछि? उत्तर सहज अछि आन्तरिक शत्रु के आधीनता स्वीकरबाक कारणे। पुनश्च एकटा प्रश्न उठैत अछि जे गान्धीजीक विचारक झलक आई कतहु देखबा मे अबैत अछि आ कि बस सैद्धान्तिके अछि? निश्च्य व्यवहार मे देखाई दैत अछि। स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व स्वराज्य हेतु पृष्ठबूमिक रूप मे, स्वातन्त्रोत्तर भारतक संविधान क प्रस्तावना, अनुच्छेद 19b, नीतिनिर्देशक तत्त्व, पंचायती राज किछु अप्रतिम उदाहरण अछि। एतबा नहि नेल्सन मंडेला, भारतीय विदेश नीति एहि विचारधारा सँ अप्रभावित नहिं अछि। अस्तु समस्त पाठकवृन्द सँऽ आग्रह जे गाँधी जयन्ती के मात्र एकटा अवकाशदिवस नहि मानि एहि विचारधारा के यथासम्भव अनुसरण कय भारत के सत्यं शिवं सुन्दरं मार्ग मे अवाध गति दी। *लेखक विपिन झा, IIT Bombay मे शोधछात्र छथि। १.भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा (लघुकथा) २.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता १ भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा (लघुकथा) I.ऊँचका डीह राम बाबूक पुरखा बड कलामी रहथिन। नदी कातक वास रहनि तें खूब ऊँच के डीह भरने रहथि। ततेक माँटि देल गेल रहै जे पूबमे पोखरि आ दच्छिन मे डबरा खुना गेल रहनि। ओही डीह पर चौसाल घर, खरिहान, बाडी, झाडी सभटा ले' जगह रहै। परुकाँ साल बाढि आएल रहए तँ चूडा आ चीनीक पैकेट हवाइ जहाज सँ खसाओल गेल। हिनका अपन डीह पर खूब फबि गेल रहए। जाबत आन केओ पानिमे हेलैत हिनकर डीह पर आएल ता धरि इच्छाभरि कोठीमे ढाडि नेने रहथि। आ मनहि मन अपन पुरखाकें प्रणाम कएने रहथि। एहि बेर सेहो बाढि आएल। मुदा एहि बेर राहत-सामग्री नाव सँ घरे घरे बँटबाक व्यवस्था भेल रहै। रामबाबू बाढि सँ प्रभावित नै रहथि तें हिनका केओ किएक देतनि! रामबाबू मसोसिक' रहि गेलाह हरलनि ने फुरलनि-पुरखा कें उकटैत अपनहि ऊँचका डीह पर बनल घरके डेङबए लगलाह। II.हेराफेरी दुर्गापूजाक तैयारी दुनू गाममे चलि रहल छल। खूब चंदा भेल रहए तें सभक इच्छा छलनि जे हमर गामक पूजा बेसी नीक होअए। पहिल चर्चा उठल जे 'एहि बेर अपन गामक जे पंडितजी छथि हुनका बदलल जाए। आ जँ 'हुनका' गामके पंडितजी आबि जैतथि तँ बड नीक होइते। अपन पंडितजी तँ बकलेल छथि!' दुनू गामक दुर्गापूजा समितिमे एके चर्चा छल। दुनू दिससँ लोक सभ पंडितजीकें पोल्हबै ले' आबए-जाए लगलाह। दुनू गामक पंडितजी मसियौते रहथि तेँ बेसी दिक्कत नै भेलनि। एक दोसराक घरमे पहुनाई करैत पूजामे लागल लगलाह मुदा ओते दिन हुनका दुनूक अपन-अपन गोसाउनिसीर पर दीप नै जरलनि!! २ ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता कतेक नीकसँ ऑंखि लागल छल, अतेक हरानी भेल छल गामपर। फेर गामसँ पटनाक यात्रा, पटनाक बादो तँ डोमेस्टिक एयरलान्स अन्तः राष्ट्रीय हवाईसेवा छल । तुरन्त अन्तर बुझा जाइत छै अहि दुनुमे, किन्तु एकबेर गामपर ई बात बजा गेल तँ संगी सब कहलक जे बड पाइ अछि तँ चार्टर्ड प्लेन कऽ लिअ। आब लैण्डिंगमे मात्र बीस मिनट छल से एयरहोस्टेस- विमान सेविका- सब खिड़की खोलि देलक आ सब बत्ती जड़ा देलक। बुझु तँ दूइए मिनिटमे अन्हरिया रातिसँ दुपहरिया भऽ गेल। नास्ता चाय संगे इमिग्रेसन फॉर्म, आप्रवासन प्रपत्र सेहो बॉंटल गेल। यन्त्रवत सभ तैयारी कऽ लेलहुँ कारण कोनो पहिल बेर तऽ छल नहि। आब तँ तेहेन आदत भऽ गेल अछि जे कतौ नाम लीखक आवश्यकता हएत तँ नाम संगे पता. जन्मतिथि. व्यवसाय. पासपोर्ट नम्बर आदि सभ लिखा जाएत। व्यवसाय लेल तँ सालमे कएक बेर हवाइ जहाजक पाला पड़ैत अछि आ चारू साल सऽ जहियासँ विदेश एलहुँ एक बेर गाम तँ जाइते छी। पत्नीमे समय आ परिस्थिति संगे हिलमिल जाइक ततेक नीक गुण छनि जे दोसरे बेरसँ गाम नहि जएबाक शपथ लेली। जखनसँ स्वावलम्बनक आत्मविश्वास भेलनि हुनकर दुरदर्शिता कहलकनि जे गामक प्रगति कहियो नहि होएत । ओहि ठाम जाइ आबऽमे जे खर्चा करैत छी ताहिमे पूरा दुनिया घुमनाइ भऽ जाएत। हमरा अपन जन्मस्थानसँ तेहेन आसक्ति अछि जे सभ बेर परेशान होइत छी मुदा गेनाइ नहि छोड़ैत छी। एकबेर पूरा चौहद्दी्क चक्कर जरूर काटै छी। सभ दिस ताकैत रहै छी जे कनी प्रगति देखा जाए। वैह अपन छोट भायकेँ कोरा लेने बचिया. महिस पर सवार बच्चा. समाजक विकृतिक मटमैल उज्जर रंगमे टंगने विधवा युवती. नाटक नौटंकीक तैयारीमे अपन बेरोजगारीक दुःख नुकाबैत नवयुवक़ घरपर खायक किल्लत मुदा जमाय लेल तिलकोड़ा तरैत बेटीक माय. पुतहुपर कटाक्ष करैत बुढ़िया. टूटल आरिपर चलैत मोक्षक मार्गपर शास्त्रार्थ करैत बुजुर्गवर्ग ई सब हमर पत्नीक बुद्धिमत्ताक गवाही दैत अछि। जखन माटिक टीला केँ ढ़ाहिकऽ उच्चविद्यालय बनैत देखलिऐ तँ अपन छुटपनक दिन सभ भाइ-बहिन. संगी सभ संगे लुकाछिपी खेलायक याद. मिटाइक कनिको दुःख नहिं भेल।खुशी भेल जे आब जाड़क भोरमे वा गरमीक तपनमे वा बरसातक पिच्छड़मे बच्चासबकेँ सायकिल सऽ पॉंर्च पॉंच किलोमीटर नहिं जाए पड़तै। हम सभ तँ पैरे जाइ छलहुँ फेर बाबूजी अठमासँ छात्रावासमे दऽ देलथि। तखन सँ जे घर छूटल से छुटले रहल। कॉलेज लेल दरभंगा. फेर तकनीकी शिक्षा लेल मुजफ्फरपुर आ नौकरी लागल अन्तरराष्ट्रीय कम्पर्नी ई सब घर परिवार छोड़ाइए देलक। । बाबूजीकेँ सपना पूरा भेलनि हमरा अभियन्ता बनैत देखिकऽ। फलक चिन्ता केने बिना कर्म करैक पाठजे गीतामे कहल गेल अछि ताहिपर हमर माता-पिता पूर्णतः अनुसरन करैत छथि। बस स्वयंकेँ विदेशमे रहैबला अभियंताकेँ अभिभावक कहि कऽ खुश भऽ जाइत छथि। अपन ऊपजाबाड़ी. दियाद आ समाजकेँ छोड़िकऽ कतहु नहिं जाइ लेल प्रतिबद्ध छथि। “बस तू आनन्दसँ रह सएह चाहै छी”. यैह जवाब भेटैत अछि जखन अपना संगे जाइ लेल कहैत छियनि। गाम भरिमे विख्यात अछि जे हमर समानमे कपड़ा कम आ पानिक बोतल बेसी रहैत अछि। सभ पटनामे भरि कऽ लऽ लैत छी। गामपर लोककेँ खूब हँसी आबैत छै। सभ डेराबैत रहैत अछि जे डुप्लीकेट होइत अछि। गामक लोकक ज्ञान अहि सभमे बहुत विलक्षण होइत छै । अपने फटेहाल रहत मुदा कोट पैण्ट बलाकेँ तेहेन-तेहेन बात कहत जे ओ तुरन्त ड्राइवास बला लग भागत। जाबे पढ़ैत रही ताबे नौकरीक दुर्गमतापर ई लोकनि बड्ड चिन्तित रहैत छलथि. आब जखन नौकरीमे छी तँ हमर व्यस्ततापर सहानुभूति छनि। गामसँ विदा होइत छी तँ सभ आबै छथि अपन आशिष दै लेल। हिनकर सबहक यएह स्नेह हमरा फेरसँ आबैक निमंत्रण दैत अछि। पैघ कतार छल प्रवासनक पूछताछ लेल, ताहिपर सँ स्त्री. बच्चा आ बुजुर्गक जे विशिष्ट सुविधा छै ताहि सँ आर देर हेबाक आशंका छल मुदा सब जल्दिये भऽ गेल। कनिक समय कस्टमसँ निकासीक बाद समान आबैमे लागि रहल छल। कन्वेयर बेल्ट चलनाइ शुरू भऽ गेल छलै आ समानो आबऽ लागल छल। मोबाइलक बीपक संग अपन ध्यान टूटल तँ देखलहुँ जे हमर समान सेहो आबि गेल छल। पिछला किछ देरमे हम प्रत्येक मिनटमे एक सालक यात्रा कऽ लेने रही। समान लऽ कऽ विदा भेलहुँ आगॉं। मोबाइलपर समाद छल जे पत्नी अराइवल गेट आगमन द्वारपर हमर प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। फोनसँ यथार्थमे आनि देने छली आ जखन भेंट हेती तखनसँ भविष्यक सैयोटा योजना सुनेती। फेर कहियो फुरसतमे रहब तँ अतीतक ओहि भागक यात्रा करब जे अखन छूटि गेल. फिलहाल तँ हम घर दिस विदा भेलहुँ। बीनू भाइ कथा- उत्ताप · सभटा मिथ्या थिक! क्यो कत्तहु नहि देखाइत अछि। क्यो तुरंते एलीह एवं देखिते चोटहि भागि गेलीह। चिन्हियो नहि सकलियनि। अकार चिन्हारे सन छलनि। माथपर नुआक संग अधा कपार तक घोघ छलनि। बिदीर्ण मोने उल्टे डेग बाहरे पड़ेलीह। तखन्हि दु गोटा दौड़लि एलीह। पयर छूबि छगुंतैल चट घुरि गेलीह। एक गोटा हाक देलथिन। समर्थ सन क्यो दौड़ले एलाह। देखलनि। घोकरी सँ मोबाइल लगौलनि। बिष्णुकेँ। कहलथिन्ह स्कूटरसँ तुरंते जाइ लेल। विनयानन्द नहि होथि तँ सनटिटहा पैरघाट वला केँ संगहि नेने अबै लेल। विनयानन्दे एलाह। छूबिकेँ देखलनि। तर्जनी-औंठासँ दुनू पलक सटा देलनि। मुँह बीजका चल गेलाह। आशाहीन कि निरस्त मोने। तथापि देखाइ पड़िये रहल छल जेना एतीकालसँ श्रवण काज करैत छल मुदा बुझियैक नहि जे केऽ की बाजि रहल छथि कारण ध्यान कत्तहु छल। दृष्टि पर केन्द्रित। ध्यान अंतः रहला सँ समक्ष आँखि कान नाक खुजलहु रहला संता कार्य नहि करैत छिअक अर्थात श्वाँस तक ठमकल रहैत छैक। ध्यान मे। घरक किछु-किछुजुटि चुकल छलक। विष्णु एवं सागर जुमि चुकल छलाह। हँय-हँय समान ऊठौलनि। धयँ सँ वस्तु बाहर लऽ गेलाहजाहि सँ क्यो ई नहि बुझय जे घरे मे..। सबहक बओल मुँहसँ बुझाइत छल जे सभ क्यो रोदन कऽ अहल अछि। चारि गोटा जहाँ रोदन करैत छैक तँ शेष के स्वतः कना जाइते छैक भलहि डाहे माखे रहउ तथापि। तहिना चारि गोटा के प्रशन्न भेलासँ खुशीक प्रभावो सम्पर्क लोकपर रक्षण होइत छैक। सुगुन छल जे ओऽ नहि छलीह। कत्तहु नहि छलीह। नहि तँ मुर्छा पर मुर्छाक दृश्य होइत। परम पहपटि भऽ जइतेनि सबकेँ। भन्नहि नहि छथि! कत्तहु! कोनहुँ समान दू गोटासँ घरसँ बाहर कि बाहर सँ घर होइत छैक तँ भरिगर बुझाइते छैक। निष्प्राण वस्तु तँ विशेष। मुदा एहन समान घरसँ बाहर करैत काल चिंतन रहैत छैक जे एखन प्राण छैक। प्रान, बाहरमे जेबाक चाही तें धीयो-पुता कि जनी कै तो हल्लुक जकाँ उठा लैत छथि हूबापर। ‘बी’ तँ अल्पहारी भऽ गेलीह साठिक पश्चाते जे ‘बच्चा’ सबकें भारी नहि लगथिन। बाहर होइत भांतर नेमटेम प्रारम्भ। हरबासल, जितिया, एकादशी, गंगाजल, गोदान। कतेक लोक तँ सामान भऽ चुकल रहैत छथि। वस्तु देखै हेतु लोक गोलिया जाइत अछि छनाक सँ। बानर बनरी नाच सन। मदारी निपत्ता मुदा एकटा मे सभ आनन्दित तँ दोसर मे हाक्रोश करैत। परम सत्य एकेटा! से आइ विश्वास भऽ रहल अछि। पहिनहुँ कदाच से अभरय मुदा मरीचिका सन मृगतृष्णा जेकाँ। कड़गर कि उत्कंठा सँ नहि। ताहि एक गोट परम सत्य जँ पहिने पक्का पक्की बूझि जेतियैक तँ कमसे कम घरहट सन जंजाल काज कदापि नहि ठनितहुँ।पजेबा सीमेंटॅ सुर्खी छड़ कोजैक टाइल्स माखुल आ बाँस कोड़ो बत्ती करची खाम्ह घनि बा फ्लैटक कर्ज लऽ सूदपर सूद चुकता करैमे डँण तोरी। राजो महराजोक अट्टालिका हक्कन कनैत रहि जाइत छनि। एहिसँ नीक वृक्षा-रोपण। बेसी पूंजीपगहोक हाहे बेरबा नहि। एकोटा गाछ रोपि के पोसि लेलहुँ। संतानो सँ नीक बुझैत। अपनहुँ फल खा सुख करू आनहुँ युग युग तक सुख करताह। फल पात जाड़नि सँ। नहि किछु ब्तँ छायासँ। चाया जें बड़ प्रिय होइत छैक तेँ जीनगी भरि संग नहि छोड़ैत छैक। सबहक। कोनहुँ भेदभाव नहि। मनुष्य़ छी कि वनस्पति! सूर्यहु केँ संगनहि छोड़ैत छथि। हुनकहि संग निपत्ता। हुनकहु वैह छथिन्ह। सहचरणीय। ऋषि मुनि सबकेँ कुटी पसीन छलनि, बोन-झाँखुर जंगलमे। ज्ञानी छलाह तेँ। राजो महराज नींघुरैत छलथिन कुटी प्रवेश काल। सबसँ उकठ्ठी जीव मनुष। यमराजोक तस्वीरो घीच लेलक। अत्यंत विकराल भयावह। जखन कि कत्तहु किछु नहि। सामान जकाँ पड़ल रहू। गाछक ढ़ेंग सन। सेहो नहि। ढ़ेंग सड़ैत छैक तँ पहिने कोकनैत छैक तथापि विकट दुर्गन्ध नहि। तहि भभक दुआरे जड़ा देल जाइत छैक आ खूब गहीर मे गोड़ि देल जाइत छैक तेल फुलेल चानन लगाकेँ। समान केँ। एहन समान केँ। जे सड़ला सँ बोकरऽ लागत केहनो तन्दरूस्त लोक। समाज डराइत छैक एहन एकटा समानसँ। तखन ऐंठी। क्यो अवंच नहि। सवदिक भऽ देल अछि। भगवानो भगवतीक खिस्सासँ। कथो पिहानी मे सब प्रेम तकै छैक। ओऽ प्रेम नहि। सीनेमावला प्रेम। दैहिक संभोग वला, बियाह भऽ जाइ वला। बियाह संस्थाकेँ थकुचय वला। ई की भेलइ! पहिने वरदान फेर वध करै लेल अपस्याँत। एके खेड़हा मात्र! सब भगवानक। हुँह! मुदा ई क्यो नहि बुझि पबैत छैक तथापि जे अहंकार-वध बेर-बेर देखौल जाइत छैक जे सबके बेर-बेर मोन पड़ैक अपनहुँ अहंकार! जेकर मर्दन करी। तमसेबाक बदला जँ सेऽ साधि लितहुँ तखन तँ बुधियार एवं ब्रह्मज्ञानी भऽ गेल रहितहुँ याज्ञवल्क्य लोकनि सदृश। कतबहु देखलहुँ खिस्सा-टीली-सीनेमा आ वध; से कहाँ बुझलियै। आब बुझाइये। से गूढ़ विषय। एकटा सत्य! सबटा हुसि गेलाक पश्चात्। एकटा सत्य! अठारहो पुरान छोड़ू। व्यासक दुनू वचन भारी बुझाइत अछि तँ एकेटा मानू। एकेटा सँ गति भेट जाएत। परोपकार टा करू। ताहू मे जँ बड़ शोणित सोखैत बुझाइये तँ तहू सँ हल्लुक एकेटा बात अवधारि लियऽ जे किनकहु अधलाह नहि करब संज्ञान। बैसल ठाम बिनु मेहनति के तप। एकपर विश्वाससँ सिद्धि भेटत। ई एक सबसँ शीर्ष थिक जतय पहुँचय आरम्भ मे दू, तीन, चारि, पाँच....। अर्थात् ..... पाँच, चारि, तीन, दू तत्पश्चात् एक। सब आ लगभग सब, दूए मे लेपटैल बीति जाइत छथि। जँ दू सँ एकक अनुभूति भऽ गेल तँ लक्ष्य भेटि गेल। इएह प्रेम छी। दोसर शब्द मे, ई, प्रेमक अतिरिक्तहु सब किछु छी। तेँ सब किछु, प्रेमे छी। एकानन, चतुरानन, पंचानन; ....। पता चलैत अछि बाँसक फठ्ठीक बिछान पर पाड़ि टांग हाथ ममोड़ि जौड़सँ सक्कत सँ बान्हि जेना भागि ने जाए कहीं, तखन। कुमारिल भट्ट तँ जीविते अग्निक तापकेँ शीतल सिद्ध केलनि। शेष ओहिना नियति सँ स्थान विशेष पर जड़ैत छी, दुर्वाशाक श्रापे नहि। भोजघारा कि दैनिक चुल्हा पजड़ैत नहि रहत। मुदा ई समान काँचे बीजू आमक फेंण संगे स्वतः एना धधकैत अछि कि स्वयं धृत, धूमन, सरड़ रहय। भरि जीवन जे तेल घी चपने रहैत अछि। जतबे-ततबे, मुदा सएह धू-धू धधकैत अछि। मुदा कोनहुँ तापबोध नहि। सेतँ मनुक्खक ललाट पर लिखल अहैत छैक किंवा धस्सल। जे चेतना वस्था मे अछि। आतंकवादी कि खूनिञा चेतनावस्था मे नहि होइत अछि। ओ नींशा मे होइत अछि। वा, हुनक रक्त दुषित होइत छनि जाहि रक्तक ग्रूप पता लगेबाक ज्ञान एखन तक किनकहु नहि। यैह कहि सकैत छी जे एहन कुलंगार आंतरिक रूपें सामाजिक प्राणी नहि होइत अछि तेँ समाज मे अछैत ओ अपराध करैत अछि जानि बूझि के अपहरण, हत्या, गर्दनि रेतनय करैत अछि।भारद्वाज सन त्रिकाल दर्शी वैज्ञानिक एहन केँ देखिये के बारि दितथि। अग्नि सन पवित्र! शीतल! लहलह करैत एवं धधराक संग। पुनः छाउर। फेर माटि। आ चुट्टीक भोजन भऽ पुनः क्षारित भऽ माटि। एकहि बात भेल। तथापि अस्तित्व रहिते छैक। माटि भऽ जाइत अछि पाथर। पाथर सँ मूर्त्ति। जीवंत मूर्त्ति। मुक्ति कहाँ! आ माटिक संग अनंत सूक्ष्म जीव बनि जाइत अछि। एकटा बड़का जीव अंततः अमीबा सँ। माटियो मे उर्वरा शक्तिक उर्जा समाहित रहैत छैक। ई अटल विश्वास जे समान बनै सँ पूर्व ताहि सँ किछु निअसन होइत छैक; नि:सृत। प्राण कि आत्मा आ जे किछु। से मात्र कल्पना अद्यावधि। कोनहुँ प्रमाण नहि। जेऽ नि:सृत भऽ ब्रह्म मे विलीन भऽ जाइत छैक। वशिष्ट नितीज्ञ कहैत छथि। अदृश्य सत्ताक तँ ढ़ेर अस्तित्व आ प्रमाण अछि। विद्युत, चुम्बकत्व, ध्वनि, प्राणवाच, प्रभृत्ति अदृश्य सत्ताक रूप छी। देखबा मे ऐह अबैत छैक जे समान मँहक अंतर्निहित क्रिया रूकि गेलैक अछि। जेना कोनहुँ चलैत मशीन बन्द भऽ जाइत छिअक तँ मशीन सँ किछु भगैत नहि छैक। मुदा मशीन पुनः चलौल जाइत छैक कारण ओकर रहस्य मनुष्य केँ माने वैज्ञानिक मनुष्य केँ मनुक्खक अपन रहस्य अद्यावधि सोलहन्नी ज्ञात नहि। जेतिक ज्ञात करैत अछि ततबे व्याधि सँ आर ओझराएल जा रहल अछि। सकरी, लोहर, हायाघाट समस्तीपुर कि सिन्दरीक मशीन तँ जं-लोहा सँ माटि भइये गेल सन लगैत अछि। चिकित्सा विज्ञान सँ आब पुनः भोग विज्ञान। चहुँ दिस रहस्य जानए वपहिं बपहिं। ग्रह पर तक। सृष्टि कोना बनल। केहन विस्फोट भेल छलैक ओ? एनऽ संतोष लेल चारि पाँच तरहक गाछ रोपण। तें भीष्म पितामह वला गाछ थोड़े भेटत। कते रास इंटा-तीटा पकिला कारबार बूझि करैत छथि। फेर वएह बात! जखन राजा महराजाक अट्टालिकाओ धूल धुसरित भऽ जाइत अछि तखन ई.....। केहन-केहन मन्दिर गिरिजाघर मस्जिद काल कलवित भऽ जाइछ। आब की जमीन्दार! ठाकुर! महराज पर अठ्ठाववज्जर करैत छी उद्योग पतिक बदला। जनिक मोटका-मोटका गगनचुम्बी स्तंभ कलांतरे पताल लोक आ नङ्टे अकाश मुँहे ठार रहि जाइत अछि। कालचक्र! सागरमे पहाड़ डूबा दैछ कि समुद्र पर पहाड़ ठार कऽ दैछ। ई की भेलै? अकाश ठेकल मन्दिर मे एक बीतक मूर्त्ति। मस्जिद मे तँ सेहो नदारत। छुच्छे ढ़ं ढ़ं। एहि सँ नीक स्कूल। अंग्रेजी वला नहि। ताहि मे तँ पाइ वला धनीकहाक बच्चा महान बनैत अछि। मनुक्ख बनबै वला पाठशाला। वोर्डहु लागि गेलै। बीनू भाइ बाल मन्दिर। कालांतरे चपा गेल। अंग्रेजी स्कूलक उत्कर्ष सँ। सब अंग्रेजीक गुलाम। बड़का गौरव वला बात। बोकबा अझरूद्दीनहुँ क’ट’ कऽ केँ बाजए लगलाह। विश्वस्तरीयो ख्याति फीका बिनु अंग्रेजी बजने। गुलामीक। द्विभाषक केँ रोजी भेटि जेतैक ने! श्री संत पर्यंत! एहि बीर्ड़ो मे बोर्डहु उड़ि के कत्तऽ गेल पता नहि। स्कूलोक पता नहि। मात्र लेखामे। दू गोटा मुदा दरमाहा उठबैत चुपेचाप जाकेँ पूर्णियाँ। आब ककरो अनका पतो नहि जे बीनू भाइ नामे स्कूल चलैत छैक। कहुखन केँ लागत जे परशुरामक सिद्ध मन-गतिञे कलियुगमे सब किछु विपरीत चलैत छैक। जखन मनुष्य वस्तु भऽ जाइत! ताहि मे एकटा मे जीवनहि रहैछ एवं नष्ट भऽ जाइछ मुदा दोसर जीवंत समान। बुढ़ारी मे जखन छलहुँ तँ सामाने छलहुँ मुदा प्राण कि हुकहुकी रहए। एसगर बगुला सन टकटक तकैत। क्यो पूछनिहार नहि नहि, फुरसतिक अभावें। दया आबए मुदा वएह उल्टे दयाक पात्र बूझय। अहाहा! झुनकूट भऽ गेलथिन। सत्तरि टपि गेलनि। की दवाइ दौरी मे! बेकार के! एहिसँ नीक जे आब ...। वर्षी मे, पाँच वर्षी तक जाइत जाइत अकच्छ! तिथि, पतरा, महापात्र, गाम गेनए, छुट्टी लेनए। धुत्! अंग्रेजी गुलाम लेल एहिसँ सुनीनगर नीक फस्ट जनवरी, मारिज डे, बथ्थ डे, भेलेन टॉइ डे। हरिबाशल कि जितिया व्रत! बाप रे बाप! बथ्थ डे, मारीज डे सब मे आइ अपन काल्हि बौहुक परस्क बेटा बेटीक ....। बारहो महिना! जतेक मोन हुये! धुर छी: गुलाम! तिथि बुझिते नहि छथिन डेट पर जेता! छोछनए छोड़ि के पोछनए। लोक आब करोड़ मे महवारी पबैत अछि! ई एतनी मे फुच्छ! खबाशी मे! अहिना एक दिन जाके सोलहनी गुलाम भऽ जाइत अछि लेलिन मार्क्स लोकनिक चोला लगा वेद वाक्य सर्वे भवंतु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम्, ...नारी पूज्यंते रमंते... देवता... सार्वभौमिक वैश्वीकरणक सनातनी मत सबके हरकुचि थकुचि। दोसर महात्मा गान्धी जन्मताह! से, बाट तकिते तकिते दाँत खिशोटि देब। से गीठ्ठ बान्हि लियऽ। ओना बाबा रामदेव अवतरित भेलाह अछि घोघिवलाक घोघि फोड़इ लेल, खेलहा के बोकरबइ हेतु। तहिया तँ भूलचूक सँ आँखि मे अमेरिकन लेंस एवं हृदयमे अमेरिकन स्टेंट लगबावय पड़ल। कपालभाथी सँ बाहर ने फेका जाएत तकर भय छले। मुदा हुनका कोन जे पोलीस्टर चाउर, लेमिनेटेड भट्ठा कि दस दिन मे जन्मौल एक हाथक गेन्हारी कि सूइया देलहा सजमनि कदीमा अनरनेब खाइ छी। फुलकोबीक नामे सुनि गैस कि भरोड़ दियऽ लगैत अछि! सबटा देखि रहल छी। बुझि रहल छी! अकानियो रहल छी। टॉंट, जाड़नि सन पजड़ैत। तथापि ने कुहड़नए आने उत्ताप। एक मिशिया चिनगी उड़ि पड़ला सँ लोक केँ लहरऽ लगैत छैक। काँच जाड़नियो कानि के नोर बहबऽ लगैत अछि। धू धू धुधुऐतो शीतलताक बोध भऽ रहल अछि हमरा! कारण जीवन मे एहि सँ उत्कट ताप छलैक डाह मारब, इर्ष्या, पश्चाताप, क्रोध, अहं मे समावेशी नीति आरक्षण सँ भिन्ने अपमान बोध। प्रोन्नतियो मे। आब बबा वले फौदारी नहि। अपने मे लड़ि कटि मरि जाउ। पाटलीपुत्रो अपने कहाँ ठठला! आर्यावर्त्त के डूबबैत अपनहुँ स्वाहा। गर्त्तमे कर्त्ता। मैथिलीयों के साठि वर्षे दयाक भीख! संत महात्मा ब्रह्मचारी कालमे। बाबा वले होइते तँ कहिया ने भेटल रहिते ई। पुनः एकटंगा देने रहूआ अपने मोने गज्जैत रहू। चारि गोटा। चानन ठोपवला। फोल्डिंग शिष सूत्र वला। मिथिला सासुर वला 108 श्री श्री भगवान राम माँ मैथिली के ततेक सधलथिन जे विष्ठो देखि मिथिलावासी कहए लगलाह राम राम! आब कहए पड़त-त्यज गोविन्दम् त्यज गोविन्दम्। मात्र माँ शक्तिक शरणम् मैथिली शरणम्। मनुज प्रेम सूत्र सँ बीनल मात्र केँ कथा कहैत छथि। महाकवि लोकनि तहिया जँ रति क्रीड़ाक श्रम जलक बदला जँ श्रमिकक श्रमजल जँ परखने रहि तथि तँ आइ श्रम जल धारी पीछड़लाहा श्रमजीवी मैथिली सँ दूरस्थ नहि भऽ सबसँ बेसी संख्या मे समाजक आगाँ रहितथि। भगवान रामकेँ सीता माँ सँ प्रेम आकि काट? से रामकथा कहैत अछि। वएहकाट कि विधान-निर्णय प्रेमक प्रतीक, प्रेमक परिभाषा। राधा विरहक नोर प्रेमक प्रथम दृष्टांत। तें एहन विषाद सँ पृथक संसारो, निस्सन प्रेम थिक। जे पढ़ल हुये। जे पढ़े मे नीक लागए। जे एकोरत्ती उत्तम संदेश हो। प्रज्वलित शिखो मध्य हार्दिकता सँ अर्पित हो। सब तँ छाया सहित भस्म होइतहि छथि। सबहक छाया भास्कर संग साँझ होइत-होइत भरि राति लेल निपत्ता भऽ जाइछ तथापि हम यथावत छी। लहकैतहु भस्म नहि भेलहुँ अछि। भगवतीक दया माया सँ हमर छाया सेहो अद्यावधि अहर्निश सङ छथि जे गीता सेहो थिकीह एवं प्रेमवश गीतू अर्थात् एहि प्रेम कथाक राधा! जाउ सभ अपन-अपन नीन्न गबै लेल! शेष अगिला जनम मे! शुभ कलियुग! ३.१.गिरीश चन्द्र लाल-नील आकाश ३.२.रमा कान्त झा-१. की होइत अछि कश्मीरमे आब २.रही रही मोन पड़ै अछि गामक ३.३.ज्योति सुनीत चौधरी-बचपन ३.४.मृदुला प्रधान- ई त बूझू ३.५.कालीकांत झा "बूच"-!! मातृवंदना !! ३.६.किशन कारीग़र- लिखैत रही। ३.७.गंगेश गुंजन- (ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे) ३.८.मनीष झा "बौआभाई" भेल एहेन अवतार छल गिरीश चन्द्र लाल , काठमांडू , नेपाल – गिरीश जी नेपालक सर्वोच्च न्यायालयमे न्यायाधीश छथि। हुनक ई कविता प्रकृतिक रहस्यमयतामे तीतल अछि।-सम्पादक नील आकाश जीवन के शुन्य समय मे आकाश दिश देखू, आकाश, नीला आकाश आ निराकार आकाश, निशछल, शान्त आ निरामय! जेना सभ आ सभटा हेरा गेल होय। सूर्यक सप्तरंगी छवि आ चानक ईजोरिया, निबीड अन्धकार के चीर के प्रयास करैत, अनन्त आकाश मे थाकल खद्दोत जकाँ, थाकल, ठेहियायल आ भन-भन करैत अछि। के छथि सूर्य, के छथि चान आ के छथि तरेगन सब? किछु रहैथ तखन ने परिचय होय। उठा लाबी, बजा लाबी, आ बैसा ली अपन आँगन मे। आदि नहिं, अन्त नहिं आ मध्य जकर नहिं अछि, तकर ठाम कोन एक ठाम खोजू। आ कोना जोडू अपन नाम ओहि नाम सँ जकर नाम सभ नाम आ सभ नाम जकर नाम छैक। रमा कान्त झा सौराठ मधुबनी बिहार १ की होइत अछि कश्मीरमे आब की होइत अछि कश्मीरमे आब, आगि लगा रहल तकदीरमे , जान जान लऽ कऽ भागै अए देखू कश्मीरमे !! स्वर्ग की छलहुँ आब नरक बना देलक तक़दीर हिन्दू मुस्लिम किओ नहि बाकि जड़ि रहल अछी कश्मीरमे , लगि कऽ जाला डेल्ही पहुँचल , राजनीतिक दरबारमे , नेता जी राजनीतिक रोटी सेकथि! जीवन फसल मझधारमे , की होइत अछि कश्मीरमे आब आगि लगा रहल तकदीरमे !! पाकिस्तान आपन चली चालि वा , आतंकवादीकेँ दऽ सहारा अशान्ति फैलाबए कश्मीरमे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाइ आपसमे हे भाइ-भाइ , कतह गेल ई नारा , की भए रहल कश्मीरमे की होइत अछि कश्मीरमे आब आगि लगा रहल तकदीरमे !! २ रही रही मोन पड़ै अछि गामक गामक लताम आ आम , पुरबा पछवा ओ दंड हवामे , ओरत बालू के , लेटित हो मन , आमक गाछक निच्चामे खाट बिछा , गोपी आमक आनंद , जीव शहरक जीव बनल पतंग , खोंहू ककरो हाथक डोरी , पेटक बासते दौड़ि रहल छी , सगरो संसार छोट बुझना जाइछ, आखिर कनकन होइत पुरगरम रहि-रहि मोन पड़ै अछि गामक !! ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। बचपन
उठिते देरी प््राात मे दिवसक पहिले पुकार मे दूबि पर छितरायत ओसक मोतीके धांगि धांगि माटिमे मिलाबै छल
दिनक रौद तपलाक बादमे कुसियारके पकड़ने हाथमे जड़ैत आकाश मे मिझाइत सुर्यके सांझक सांझ निहारै छल
कनिया पुतरा के खेल मे संगी सबहक मेल मे पूरा विन्यास स विवाह रचाबैत नम्हरो दिनके पछाड़ैत छल
छतपर ठाढ़ भेल कातमे रातिक गहन अन्हारमे बड़का पसरल बाधक सन्नाटा पर दूर दूर नजर दौड़ाबै छल
जाड़मे आकि आममे बीतल अछि जे गाममे घुरिकऽ फेर नहिं आयत कहियो बचपन के ओ बीतल पल मृदुला प्रधान ई त बूझू अपना गोर पर अपने , कुल्हाड़ी मरनाई, भ गेल . द देलीयईक टिप्पणी, मैथिली में, एही भाषाक कविता पर, बस..... बुझलों जे भ गेल, मुदा से नईं भेल . भेल ई जे एकटा नवका द्वार , मुंह बौने ,आँखिक आगाँ,अनायास ठाढ़ भ गेल . पाठक-गण तक भरसक, संकेत पहुंचल- 'निश्चय मैथिल भाषी छथि' फलस्वरूप लिखवाक आग्रह ल क आबि गेल , स्नेह-सम्मान सँ भरपूर 'ई-मेल' आ हमरा भाव-विह्वल होयबाक, पूर्ण व्यवस्था भ गेल . अपनों दोष , कम नईं अछि , कलम क माध्यम सँ , कुमरपत क गाम-घर में , विचरण करवाक लोभ , टाल नईं सकलों आ किछ न किछ , लिख-लिख क , निर्दिष्ट ठेकाना पर , पठावय लगलों. अब आगाँ क यथार्थ ई जे बाल्यकाल सँ किशोरावस्था पर्यन्त, पढ़ल , चारि टा किताब , प्रणम्य-देवता , कन्यादान , द्विरागमन, चर्चरी आ भनसाघर सँ , रसोईया बबाजीक, मैथिल स्वर -लहरी . एतवे ल क, फुरफुरायल छलों. 'येन-तेन-प्रकारेन' एही सभ सँ अर्जित , शब्द-कोषक , लिपा- पोति करैत-करैत , किछ दिन पार लागि गेल किन्तु आब कि ..... आब कि लिखू ? यैह गुन-धुन में अन्ह्ररौखे सँ , चिकैरि-चिकैरि क सोचैत रहैत छी, हे माँ सरस्वती , विनती करैत छी, उठाऊ अपन वरद हस्त, किछ जोगाड़ कय दिय, जेमें छवि बनल रहै, लेखनी में एहन किछ, भरि दिय. श्री कालीकान्त झा "बूच" कालीकांत झा "बूच" 1934-2009 हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई. मे भेलनि। पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह।माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल। मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि-पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय-समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूचीमे डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि। मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल। श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि। डा. दुर्गानाथ झा "श्रीश" संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि | !! मातृवंदना !!
जननि हय, जीवन हमर कठोर । अध्यावधि सुख - शांति न भेटल, पयलहुँ विपति अघोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 1 ।।
जानी नहि वात्सल्य - पाश, अज्ञात सिनेहक कोर । लागल नहि ऑचर क छाँह, नहि सटल गाल पर ठोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 2 ।।
आनन पर अविराम रूदन, मन पर चिंता घनघोर । कतऽ हमर विश्राम - राति हे, कतऽ विनोदी भोर ? जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 3 ।।
अपने शिव शव वनल शिवे, तोरो छह लगल बकोर । तोहर दया अकाशी चंदा, हम धरती क चकोर ।। जननि हय जीवन हमर कठोर ।। 4 ।। किशन कारीग़र परिचय:-जन्म- 1983ई0 कलकता में मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं। लिखैत रही। मोन होइए जे एक मिसिया कऽ पिबैत रही मुदा कहियो कऽ किछू-किछू लिखैत रही कनेक हमरो गप पर धियान देबैए मोन होइए जे पाठक सभ सॅं भेंट करैत रही। ग़ालिब सेहो एक मिसिया कऽ पिबैत छलाह मुदा किछू-किछू तऽ लिखैत छलाह अपना लेल नहि पाठक लोकनिक लेल मुदा बड्ड निक लिखैत छलाह। पद्य लिखनाई तऽ आब हम सीख रहल छी हमरा तऽ नहि लिखबाक ढंग अछि मुदा किछू निक पद्य लिखि नेनापन सॅं एतबाक तऽ हमर सख अछि। िक िलखू िकछू ने फुरा रहल अिछ बढलैऍ मँहगाई तऽ अधपेटे भूखले रहैत छी िकऍक ने रही जाऍ भूखल पेट मुदा िकछू िलखबाक लेल मोन सुगबुगा रहल अछी। पोथि लिखलनि महाकवि विद्यापति लिखलनि पोथि बाबा नागार्जुन किछू नव रचना जे नहि लिखब तऽ कोना भेटत मैथिली साहित्यक सद्गुण। लेखक समाजक सजग प्रहरी होइत छथि अपना लेल तऽ नहि अनका लेल लिखैत छथि कतेक लोक हुनका आर्थिक अवस्था पर हॅसैत अछि मुदा तइयो ओ चुपेचाप लिखैत रहैत छथि। कहू एहेन उराउल हॅसी पर कोनो लेखक एक मिसिया कऽ पिबत कि नहि अपन दुःखित भेल मोन के कखनो के अपनेमने हॅंसाउत कि नहि कतेक लोक गरियअबैत अछि एक मिसिया पीब कऽ लिखब ई किएक सीखू मुदा आई किशन’ मोनक गप कहि रहल अछि पिबू आ कि नहि पीबू मुदा किछूएक तऽ लिखब सीखू। आई हमरो मोन भए रहल अछि जे एक मिसिया कऽ पिबैत रही अपना लेल नहि तऽ पाठक लोकनिक लेल मुदा किछू नव रचना लिखैत रही। गंगेश गुंजन (ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे) कोन एहन त्रुटि भ' गेल हमरा अहाँ जकर गीरह बन्हने छी ककरो कोनो समाद तं नहिएँ चिfठ;ks- पत्री बंद केने छी सबटा युगसंभव मानय मोन बज़ार कें हमहूँ चिन्हने छी ककर स्नेह आ कोन समर्पणक एहि युग मे निष्ठा धेने छी करी हिसाब तं की हासिल यौ ह्रदय अहाँ जेgu पओने छी सब अभाव-अभियोग कात मे मन जांति सब अनठkSने छी भरि संसार बस्तुएक बाज़ार किछुए मुदा हमहूँ किनने छी अपनो बस्ती ओहने शो-रूम किछु ने किछु अहूँ सजने छी दाम पास नहिं रहल आब तं पुरने सबटा अa¡गेजने छी मानल आहा¡ बहुत देलौन्हें किछु तं हम कहियो देने छी यैह नियति तं यैह हो सही अहांक देल सबटा धेऩे छी कहाँ एलनि गुंजन कें गन' अहूं तं भरिसक्के गनने छी. (गं.गुंजन/ १९ सितंबर २०१०) मनीष झा "बौआभाई", मूल नाम- मनीष कुमार झा , रचनामे- मनीष झा "बौआभाई" , पिता - पं. श्री नारायण जी झा , पितामह - स्व.पं. सत्यदेव झा , जन्म तिथि- २५ अगस्त १९८१ ई. , मूल- दहिभतवार नरौछ , गोत्र- शांडिल्य जन्म स्थान/स्थायी पता : ग्राम+पोस्ट- बड़हारा, भाया - अंधरा ठाढी , जिला -मधुबनी (बिहार) , पिन-८४७४०१ पठन -पाठन : जागेश्वर रामेश्वर संस्कृत मध्य विद्यालय, बड़हारा (वर्ग सातम तक), राजदेव जनता उच्च विद्यालय, नवनगर (वर्ग दसम तक) , आर. के. कॉलेज, मधुबनी [बी.कॉम.(प्रतिष्ठा) तक] अर्थोपार्जन : वर्तमान मे एकटा बहुराष्ट्रीय (सिंगापुर) कंपनीमे कार्यरत I लेखन अभिरुचि : लेखन कार्य पूज्य बाबा के सानिध्य आ सामीप्यमे प्रारम्भ कयल, पिताजी द्वारा प्रोत्साहन भेटल आ निरंतर नव-नव रचनात्मक कार्य मे लागल रहैत छी इएह हमर उपलब्धि थिक I रचना के क्रम मे किछु उपलब्धि :- कैसेट (गीतकार)क रूपमे- १. सरस्वती पूजा (JAISHREE CASSETES) , २. मइया रानी (SUGATI SOPAN) , ३. हे भोला बाबा (TOP MUSIC) , ४. बिजुरिया चले छम-छम (MCPL) , ५. सजनाक प्रेम(AAVL) , ६. जुल्फी वाली रनियाँ भाग-२ (T-SERIES), ७. हेल्लो मिथिला (T-SERIES) , ८. रसमलाई (K.N.PRODUCTION) , ९. झारखण्ड बोकारो घुमइबौ गे-खोरठा (RP MUSIC) , १०. बबली डोट कॉम (A-1 FILMS), पत्रिका (कवि/लेखक)क रूप मे :- १. आँकुर त्रैमासिक पत्रिका- (i) आचरण(कविता), (ii) अफरल पेट(कविता), (iii) प्रशंसा पत्र(कविता), (iv) माय बाप के बखरा(कविता) (v) हमरा चाही ढौआ २. स्मारिका -वी एम वाई एम-२००७ (i) ऋतु बसंत(कविता) ३. स्मारिका -वी एम वाई एम-२००८ (i) मिथिलाक चित्रकला(लेख) , (ii) केदैन पुछैइयै (कविता) ४. स्मारिका -वी एम वाई एम-२००९ (i) जय भारती करी आरती(आरती), (ii) मैथिली गीत संगीत(लेख), (iii) माय(कविता) ५. स्मारिका-वी एम वाई एम-२०१० (i) समयक अश्रुपात (ii) जय भारती करी आरती(आरती) ६. झलक मिथिला (साप्ताहिक समाचार पत्र) (i) फहराइयै पताका (कविता) (ii) छी मानव अलबत्ते हम (कविता) , (iii) श्रद्धांजलि (कविता) , ७. विदेह/मैथिल आर मिथिला , (i) नेताजी के हाल (कविता) , विभिन्न विषय पर अनेको रचना प्रकाशाधीन आ कैसेट्स सभ प्रक्रियामेI भेल एहेन अवतार छल भारत केर एहि पावन धरती पर कलियुग मे भेल एहेन अवतार छल जे राष्ट्रपिता स' संबोधित भेलाह व्यक्तित्वहि आजादिक आधार छल सत्य-अहिंसा-सहयोगक बल पर प्रेमक डेग बढेने गेलाह शांत स्वभावक परिचय द' क' सदिखन उचितहि निर्णय लेलाह विश्व बंधुत्वक सिद्धांत बना क' मानवता पर बड़ पैघ कैल उपकार छल कलियुग मे भेल एहेन अवतार छल कला चलौन्हि जे चरखा के देलन्हि सभ केर शिक्षा जुनि बिसरू केयो संस्कृति अप्पन जे देने गेलाह दीक्षा स्वाभिमान मे जीबू सभ केयो छल-प्रपंच स' दूर जिनक संसार छल कलियुग मे भेल एहेन अवतार छल द्वापर मे भ' श्रीकृष्ण जनमलहु त्रेता मे बनि श्रीराम सतयुग मे श्रीहरिश्चंद्र बनल छी कलियुग मे गाँधी नाम ओहि सिद्धपुरुष के "मनीषक" पुष्पांजलि जिनकर ह्रदय स्वच्छ आ निर्विकार छल कलियुग मे भेल एहेन अवतार छल मिथिला कला संगीत १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) १ श्वेता झा चौधरी गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स। कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)। कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग। प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक। हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात। दुर्गापूजा २. ज्योति सुनीत चौधरी जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित। ३.श्वेता झा (सिंगापुर) बालानां कृते श्रीमति शेफालिका वर्मा- जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार। मूर्ख राजा आ ओकर बेटा एकटा राजा छल, ओकरा चारी टा बेटा छल. चारो राजकुमार बच्चे से महल में पलल पोसल गेल छल . जखन चारो पैघ भ गेल ते हुनका मोने चहारदीवारी के बहार देखवाक हिलस उठलैक .चारू भाई आपस में सलाह मोस्विरा कै राजा लग पहुंचल ' पिता जी , हम चारू भाई राजमहल से बाहरक दुनिया देख चाहैत छी , यदि अपनेक आज्ञा होय ते हम सब बहार जा के घूमी आबि .. राजा बजलाह ' हँ हँ, किएक नै . हम सब व्यवस्था क दैत छी . सैनिक सब अहांक संग जायत , घूमी लिय , जतय मोन होयत ऐछ ' ' नहि,पिता श्री , हम सब आम लोग जका जेवा लेल चाहैत छी . अपन पहिचान ककरो नै बतायब ; ' राजा मानि गेलाह . ठीक छैक जे अहाँ सब के नीक लागे.. चारो राजकुमार अपन भेष बदलि, साधारण लोक जकां महल स बहार निकललाह ...बाहर पैर राखिताही जेना हुनक मन मस्त भ गेलैक . कनिक काल ठाढ़ भ खुलल वातावरण में साँस लेलन्हि , एक दोसरा के मुंह देखि खुश भ गेलैथ जेना मुक्ति क स्वाद पहिलुक बेर भेटल होय . नहु नहु पैर राखैत आगू बढैत गेलाह. एकटा चाहक दोकान देखि बैसी रहलाह ओहिठामक बेंच पर. गरम गरम सिंघाड़ा , जिलेबी देखि जीह में पाइन आबी गेलैक..इ की थीक..छोड़ू ने जे होय , खेवाक बाद सोचब की छल .. भरि भरि प्लेट सिंघाड़ा जिलेबी चारू भाई दबेलक.हुनक अंतरात्मा तृप्त भ गेल. ओह नोकर चाकर जे दैत छल सोना चानी क थारी में पकवान सब ओहि में इ स्वाद कत' ? चारू भाई घुमैत रहलाह , तरह तरह के लोग, तरह के रहन सहन देखैत चकित होइत रहलाह...एक बेर घुमैत घुमैत एकटा गाम में पहुँचलाह......चारो दिस माइटक घर छोट छोट , भूखल पिआसल नंग धडंग नेना सब...ओ सब सोचे लगलाह ई कोन दुनिया थीक , सबटा झबरल माथ , आंखि में कांची पीची , बिमारियाह लोग सब , पेट पीठ दुनू सटल , जेना कतेक दिन स अन्न क दाना नहि देखने होय केओ.. ओ सब विचित्र दृष्टि से देखैत छल दीनता से भरल आंखि देखि चारू भाई क दिल पसीज गेलैक . अपन बटुआ से किछ सिक्का निकाली ओकरा सब में बांटि देलक ..चारू ख़ुशी ख़ुशी विदा भ गेलाह...किन्तु विधना ककर भाग्य में की लिखि देने छैक ,केओ नै जनैत छैक....कनिए दूर आगू बढ्लाह त एतेक जोर स अन्धर तूफान , बरषा होब लागल जे सुनसान में डरी गेलाह. पाइन में भिजैत तितैत डेगे डेगे एक दोसर केर हाथ पकड़ने आगू बढैत रहलाह . कनिक दूर पर एकटा माईट क भीत बाला कोनो घर देखा पड़लैक. चारो ओहि भीती आड़ ठाढ़ भ गेलाह , मुदा ओ माइटक भीति अरेरा के खैस पडल . दुर्भाग्य स एकटा राजकुमार भीति तर पिचा के मरि गेल .. आब ते तिनु भाई डर स थरथरा गेल . जेम्हरे बाट भेटलैक ओम्हरे पड़ाई लगलाह .. गहन जंगल में भोतिआय गेलाह की ओहि अन्हार में किम्हर दन स एकटा भैंसा आबि गेल, इ सब कहियो भैंसा नै देखने छलाह , एक ते एकटा भाईक मृत्यु ताहि पर संकटे संकट ...ओ भैंसा आबि अपन सिंघ स एकटा भाईक पेट फाड़ी देलक. ओ तत्क्षण मृत्यु क प्राप्त भ गेलाह, आब ते दुनू भाई ले लंक...भैंसा एकरा सब दिसि दौडल ...ई दुनू भाई जान प्राण नेने भागल , पाछु पाछु भैंसा ...सामने एकटा नदी तीव्र गति से बहि रहल छल . दुनू भाई जान बचेवा लेल ओहि में कूदी गेल ....मुदा नदीक वेग में एकटा भाई कते स कते बहि गेल ...एकटा राजकुमार असगर बची गेलाह... दुई मास बीती गेल छल , पिता स तीन मासक करार ल क आयल छलाह...किन्तु, दुइये मास में एतेक प्रहार बिधाता क भ गेल, के जनैत छल.. बचल असगर राजकुमार दुनियाक जंगल में भोतिआय गेल, कोहुना भटकैत , हकासल, पिआसल अपन राजभवन पहुंचल ..... राजा ओकर इ हाल देखि चोंकि गेल..;' कहू बेटा दुनिया के केहेन रीति शोकाकुल बेटा बाजल....एक पिचायल भीति राजा....'बांचल छल ने पैसा.... बेटा....एक के मारलक भैंसा राजा........आहा,आहा,आह बेटा........एकटा नदी में बह' राजा........धुर्र बेटा मुड़ी नुघरोने...........एक आयल घुरि............. बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक १.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही। कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥ करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक। २.संध्या काल दीप लेसबाक काल- दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः। दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार। ३.सुतबाक काल- रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्। शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥ जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ४. नहेबाक समय- गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥ हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ। ५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥ समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि। ६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा। पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥ जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि। ७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥ अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि। ८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥ ९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती। अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥ १०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२) आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥ आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥ मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव। ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव। हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥ मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि। एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि। अन्वय- ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म रा॒ष्ट्रे - देशमे ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए रा॑ज॒न्यः-राजा शुरे॑ऽ–बिना डर बला इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली) धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित सप्तिः॒-घोड़ा पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर स॒भेयो॒-उत्तम सभामे युवास्य-युवा जेहन यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे नः-हमर सभक प॒र्जन्यों-मेघ वर्षतु॒-वर्षा होए फल॑वत्यो-उत्तम फल बला ओष॑धयः-औषधिः पच्यन्तां- पाकए योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा नः॑-हमरा सभक हेतु कल्पताम्-समर्थ होए ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी। Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.) इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ। विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जएबाक चाही: वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप: 1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक 2. आ’/आऽ आ 3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए 4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल 5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह 6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/ 7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला 8. बला वला 9. आङ्ल आंग्ल 10. प्रायः प्रायह 11. दुःख दुख 12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल 13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन 14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह 15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि 16. चलैत/दैत चलति/दैति 17. एखनो अखनो 18. बढ़न्हि बढन्हि 19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ 20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ 21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ 22. जे जे’/जेऽ 23. ना-नुकुर ना-नुकर 24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि 25. तखन तँ/ तखन तँ 26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल 27. निकलय/निकलए लागल बहराय/ बहराए लागल निकल’/बहरै लागल 28. ओतय/जतय जत’/ओत’/ जतए/ ओतए 29. की फूरल जे कि फूरल जे 30. जे जे’/जेऽ 31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ यादि (मोन) 32. इहो/ ओहो 33. हँसए/ हँसय हँसऽ 34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस 35. सासु-ससुर सास-ससुर 36. छह/ सात छ/छः/सात 37. की की’/कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित) 38. जबाब जवाब 39. करएताह/ करयताह करेताह 40. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस 41. गेलाह गएलाह/गयलाह 42. किछु आर/ किछु और 43. जाइत छल जाति छल/जैत छल 44. पहुँचि/ भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल 45. जबान (युवा)/ जवान(फौजी) 46. लय/लए क’/कऽ/लए कए/ लऽ कऽ/ लऽ कए 47. ल’/लऽ कय/ कए 48. एखन/अखने अखन/एखने 49. अहींकेँ अहीँकेँ 50. गहींर गहीँर 51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए 52. जेकाँ जेँकाँ/ जकाँ 53. तहिना तेहिना 54. एकर अकर 55. बहिनउ बहनोइ 56. बहिन बहिनि 57. बहिन-बहिनोइ बहिन-बहनउ 58. नहि/ नै 59. करबा / करबाय/ करबाए 60. तँ/ त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए 62. भाँय 63. यावत जावत 64. माय मै / माए 65. देन्हि/दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि 66. द’/ दऽ/ दए 67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम) 68. तका कए तकाय तकाए 69. पैरे (on foot) पएरे 70. ताहुमे ताहूमे
71. पुत्रीक 72. बजा कय/ कए 73. बननाय/बननाइ 74. कोला 75. दिनुका दिनका 76. ततहिसँ 77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि 78. बालु बालू 79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध) 80. जे जे’ 81. से/ के से’/के’ 82. एखुनका अखनुका 83. भुमिहार भूमिहार 84. सुगर सूगर 85. झठहाक झटहाक 86. छूबि 87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करइयौ 88. पुबारि पुबाइ 89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि 90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे 91. खेलएबाक 92. खेलेबाक 93. लगा 94. होए- हो 95. बुझल बूझल 96. बूझल (संबोधन अर्थमे) 97. यैह यएह / इएह 98. तातिल 99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ 100. निन्न- निन्द 101. बिनु बिन 102. जाए जाइ 103. जाइ (in different sense)-last word of sentence 104. छत पर आबि जाइ 105. ने 106. खेलाए (play) –खेलाइ 107. शिकाइत- शिकायत 108. ढप- ढ़प 109. पढ़- पढ 110. कनिए/ कनिये कनिञे 111. राकस- राकश 112. होए/ होय होइ 113. अउरदा- औरदा 114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand) 115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself) 116. चलि- चल 117. खधाइ- खधाय 118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह 119. कैक- कएक- कइएक 120. लग ल’ग 121. जरेनाइ 122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ 123. होइत 124. गरबेलन्हि/ गरबओलन्हि 125. चिखैत- (to test)चिखइत 126. करइयो (willing to do) करैयो 127. जेकरा- जकरा 128. तकरा- तेकरा 129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे 130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ 131. हारिक (उच्चारण हाइरक) 132. ओजन वजन 133. आधे भाग/ आध-भागे 134. पिचा / पिचाय/पिचाए 135. नञ/ ने 136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय 137. तखन ने (नञ) कहैत अछि। 138. कतेक गोटे/ कताक गोटे 139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई 140. लग ल’ग 141. खेलाइ (for playing) 142. छथिन्ह छथिन 143. होइत होइ 144. क्यो कियो / केओ 145. केश (hair) 146. केस (court-case) 147. बननाइ/ बननाय/ बननाए 148. जरेनाइ 149. कुरसी कुर्सी 150. चरचा चर्चा 151. कर्म करम 152. डुबाबए/ डुमाबय/ डुमाबए 153. एखुनका/ अखुनका 154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- लऽ 155. कएलक केलक 156. गरमी गर्मी 157. बरदी वर्दी 158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ 159. एनाइ-गेनाइ 160. तेना ने घेरलन्हि 161. नञि 162. डरो ड’रो 163. कतहु- कहीं 164. उमरिगर- उमरगर 165. भरिगर 166. धोल/धोअल धोएल 167. गप/गप्प 168. के के’ 169. दरबज्जा/ दरबजा 170. ठाम 171. धरि तक 172. घूरि लौटि 173. थोरबेक 174. बड्ड 175. तोँ/ तूँ 176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य) 177. तोँही / तोँहि 178. करबाइए करबाइये 179. एकेटा 180. करितथि करतथि
181. पहुँचि पहुँच 182. राखलन्हि रखलन्हि 183. लगलन्हि लागलन्हि 184. सुनि (उच्चारण सुइन) 185. अछि (उच्चारण अइछ) 186. एलथि गेलथि 187. बितओने बितेने 188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह 189. करएलन्हि 190. आकि कि 191. पहुँचि पहुँच 192. जराय/ जराए जरा (आगि लगा) 193. से से’ 194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए) 195. फेल फैल 196. फइल(spacious) फैल 197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि 198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब 199. फेका फेंका 200. देखाए देखा 201. देखाबए 202. सत्तरि सत्तर 203. साहेब साहब 204.गेलैन्ह/ गेलन्हि 205.हेबाक/ होएबाक 206.केलो/ कएलहुँ 207. किछु न किछु/ किछु ने किछु 208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ 209. एलाक/ अएलाक 210. अः/ अह 211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन) 212.कनीक/ कनेक 213.सबहक/ सभक 214.मिलाऽ/ मिला 215.कऽ/ क 216.जाऽ/ जा 217.आऽ/ आ 218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक) 219.निअम/ नियम 220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर 221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़ 222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं 223.कहिं/ कहीं 224.तँइ/ तइँ 225.नँइ/ नइँ/ नञि/ नहि 226.है/ हए 227.छञि/ छै/ छैक/छइ 228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ 229.आ (come)/ आऽ(conjunction) 230. आ (conjunction)/ आऽ(come) 231.कुनो/ कोनो २३२.गेलैन्ह-गेलन्हि २३३.हेबाक- होएबाक २३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ २३५.किछु न किछ- किछु ने किछु २३६.केहेन- केहन २३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ २३८. हएत-हैत २३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ २४०.एलाक- अएलाक २४१.होनि- होइन/होन्हि २४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ २४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ २४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ २४५.शामिल/ सामेल २४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं २४७.जौँ/ ज्योँ २४८.सभ/ सब २४९.सभक/ सबहक २५०.कहिं/ कहीं २५१.कुनो/ कोनो २५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल २५३.कुनो/ कोनो २५४.अः/ अह २५५.जनै/ जनञ २५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन) २५७.केलन्हि/ कएलन्हि २५८.लय/ लए (अर्थ परिवर्तन) २५९.कनीक/ कनेक २६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि २६१.निअम/ नियम २६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर २६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़ २६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित २६५.केर/-क/ कऽ/ के २६६.छैन्हि- छन्हि २६७.लगैए/ लगैये २६८.होएत/ हएत २६९.जाएत/ जएत २७०.आएत/ अएत/ आओत २७१.खाएत/ खएत/ खैत २७२.पिअएबाक/ पिएबाक २७३.शुरु/ शुरुह २७४.शुरुहे/ शुरुए २७५.अएताह/अओताह/ एताह २७६.जाहि/ जाइ/ जै २७७.जाइत/ जैतए/ जइतए २७८.आएल/ अएल २७९.कैक/ कएक २८०.आयल/ अएल/ आएल २८१. जाए/ जै/ जए २८२. नुकएल/ नुकाएल २८३. कठुआएल/ कठुअएल २८४. ताहि/ तै २८५. गायब/ गाएब/ गएब २८६. सकै/ सकए/ सकय २८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल) २८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझैत छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक २८९. दुआरे/ द्वारे २९०.भेटि/ भेट २९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना) २९२.तक/ धरि २९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ) २९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ) २९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि। वक्तव्य २९६.बेसी/ बेशी २९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला) २९८.वाली/ (बदलएवाली) २९९.वार्त्ता/ वार्ता 300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय ३०१. लेमए/ लेबए ३०२.लमछुरका, नमछुरका ३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै) ३०३.लागल/ लगल ३०४.हबा/ हवा ३०५.राखलक/ रखलक ३०६.आ (come)/ आ (and) ३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप ३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नहि। ३०९.कहैत/ कहै ३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different) ३११.तागति/ ताकति ३१२.खराप/ खराब ३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि ३१४.जाठि/ जाइठ ३१५.कागज/ कागच ३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए) ३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय उच्चारण निर्देश: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि। ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी। अछि- अ इ छ ऐछ छथि- छ इ थ – छैथ पहुँचि- प हुँ इ च आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि। फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र । उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू। रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)। मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए। छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो। संयोगने- (उच्चारण संजोगने) केँ/ के / कऽ केर- क (केर क प्रयोग नहि करू ) क (जेना रामक) –रामक आ संगे (उच्चारण राम के / राम कऽ सेहो) सँ- सऽ चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ) रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)। केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित। के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक? नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)। राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि) सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन) पोछैले/ पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि) ओइ/ ओहि ओहिले/ ओहि लेल जएबेँ/ बैसबेँ पँचभइयाँ देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित) जकाँ/ जेकाँ तँइ/ तैँ होएत/ हएत नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ सौँसे बड़/ बड़ी (झोराओल) गाए (गाइ नहि) रहलेँ/ पहिरतैँ हमहीं/ अहीं सब - सभ सबहक - सभहक धरि - तक गप- बात बूझब - समझब बुझलहुँ - समझलहुँ हमरा आर - हम सभ आकि- आ कि सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि) मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। एकटा दूटा (मुदा कैक टा) बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ ) अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)। अइमे, एहिमे जइमे, जाहिमे एखन/ अखन/ अइखन केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित) भऽ मे दऽ तँ (तऽ त नहि) सँ ( सऽ स नहि) गाछ तर गाछ लग साँझ खन जो (जो go, करै जो do) ३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली (भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन १.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना- अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।) पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।) खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।) सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।) खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।) उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि। नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ। २.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना- ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि। ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि। उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि। ३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि। ४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही। ५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि। प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि। नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि। सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि। ए आ “य”क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि। ६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि। ७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि। ८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि: (क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक। अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक। पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक। (ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह। अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह। (ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि। अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल। (घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि। अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि। (ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना- पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक। अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ। (च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना- पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि। अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै। ९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि। १०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। -(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित) 2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन ठाम जकर, तकर तनिकर अछि
अग्राह्य अखन, अखनि, एखेन, अखनी ठिमा, ठिना, ठमा जेकर, तेकर तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य) ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६ VIDEHA FOR NON RESIDENTS 1.NAAGPHAANS-CONCLUDING PART-Maithili novel written byDr.Shefalika Verma-Translated byDr.Rajiv Kumar Verma andDr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi 2.1.Original Poems in Maithili byKalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poems in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary DATE-LIST (year- 2010-11) (१४१८ साल) Marriage Days: Nov.2010- 19 Dec.2010- 3,8 January 2011- 17, 21, 23, 24, 26, 27, 28 31 Feb.2011- 3, 4, 7, 9, 18, 20, 24, 25, 27, 28 March 2011- 2, 7 May 2011- 11, 12, 13, 18, 19, 20, 22, 23, 29, 30 June 2011- 1, 2, 3, 8, 9, 10, 12, 13, 19, 20, 26, 29 Upanayana Days: February 2011- 8 March 2011- 7 May 2011- 12, 13 June 2011- 6, 12 Dviragaman Din: November 2010- 19, 22, 25, 26 December 2010- 6, 8, 9, 10, 12 February 2011- 20, 21 March 2011- 6, 7, 9, 13 April 2011- 17, 18, 22 May 2011- 5, 6, 8, 13 Mundan Din: November 2010- 24, 26 December 2010- 10, 17 February 2011- 4, 16, 21 March 2011- 7, 9 April 2011- 22 May 2011- 6, 9, 19 June 2011- 3, 6, 10, 20 FESTIVALS OF MITHILA Mauna Panchami-31 July Somavati Amavasya Vrat- 1 August Madhushravani-12 August Nag Panchami- 14 August Raksha Bandhan- 24 Aug Krishnastami- 01 September Kushi Amavasya- 08 September Hartalika Teej- 11 September ChauthChandra-11 September Vishwakarma Pooja- 17 September Karma Dharma Ekadashi-19 September Indra Pooja Aarambh- 20 September Anant Caturdashi- 22 Sep Agastyarghadaan- 23 Sep Pitri Paksha begins- 24 Sep Jimootavahan Vrata/ Jitia-30 Sep Matri Navami- 02 October Kalashsthapan- 08 October Belnauti- 13 October Patrika Pravesh- 14 October Mahastami- 15 October Maha Navami - 16-17 October Vijaya Dashami- 18 October Kojagara- 22 Oct Dhanteras- 3 November Diyabati, shyama pooja- 5 November Annakoota/ Govardhana Pooja-07 November Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-08 November Chhathi- -12 November Akshyay Navami- 15 November Devotthan Ekadashi- 17 November Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 21 Nov Shaa. ravivratarambh- 21 November Navanna parvan- 24 -26 November Vivaha Panchmi- 10 December Naraknivaran chaturdashi- 01 February Makara/ Teela Sankranti-15 Jan Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 08 Februaqry Achla Saptmi- 10 February Mahashivaratri-03 March Holikadahan-Fagua-19 March Holi-20 Mar Varuni Yoga- 31 March va.navaratrarambh- 4 April vaa. Chhathi vrata- 9 April Ram Navami- 12 April Mesha Sankranti-Satuani-14 April Jurishital-15 April Somavati Amavasya Vrata- 02 May Ravi Brat Ant- 08 May Akshaya Tritiya-06 May Janaki Navami- 12 May Vat Savitri-barasait- 01 June Ganga Dashhara-11 June Jagannath Rath Yatra- 3 July Hari Sayan Ekadashi- 11 Jul Aashadhi Guru Poornima-15 Jul NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi. NAAGPHAANS XVII CONCLUDING PART Kadamba returned from office. Dhara welcomed him with a glass of water followed by tea. Kadamba – Ma, do you remember my friend Gary. Dhara – Yes .. yes – when you decided to settle in England he had helped you. Kadamba – You are correct Ma. Dhara – Why are you serious beta. I hope everything is fine with Gary. Kadamba – No Ma. His condition is critical and he is hospitalized in Liverpool Hospital. Dhara became disturbed, heart beat increased – though she had never met him she felt a surge of emotions inside for young Gary – how can god be so cruel? Kadamba – Ma, many doctors are attending on him, but unfortunately his disease is yet to be diagnosed – tests after tests are being conducted upon him. Dhara – Let us go to meet him Kadamba. Kadamba – Why not Ma? It is Saturday tomorrow – the weekend – we will go tomorrow to meet him. Man proposes God disposes. Future arrives in present silently and unceremoniously. Man realizes it afterwards. Dhara was disturbed all through the night – surprised with the fact that even the doctors in England were not able to diagnose the disease – she developed countless apprehensions – Is Simant also hospitalized somewhere …. 2 Shame on me – how can I develop such negative thoughts regarding Simant ? He must be in the midst of wealth and woman – enjoying the life to utmost limit. And I – Dhara became angry with herself – why positive thoughts did not come to my mind – only negative and negative – apprehensions, accident, illness, hospital – she started reciting Durga Kawach – ‘ Asti guhyatamam vipra sarvabhutopkarkam Devyastu kawacham punyam tachhrinushva mahamune. Prathmam Shailputri ch dwitiyam Brahmacharini Tritiyam Chandraghanteti Kushmandeti chaturthkam . Panchmam Skandamateti shashtham Katyayini ch Saptamam Kalratri Mahagauriti chashtmam. Navmam Sidhidatri ch Navdurga: prakirtita: Uktanyetani namani Brahmanaiva mahatmana.’ Next day they started for Liverpool. Dhara was impressed with the prosperity of this city. They reached Liverpool Hospital with bouquet containing beautiful yellow flower and a Get Well Soon card. Kadamba also bought some fresh fruits. Hospital had a fixed meeting time – Kadamba enquired about the ward number, the bed number of Gary. Gary was trying to regain consciousness, he looked pale and exhausted – Dhara touched his forehead – Dhara’s loving touch was soul stirring as well as heart stirring – Gary instantly opened his eyes – tears flowed from his eyes. Dhara wanted to cry loudly – Gary’s parents had already passed away – he was completely alone – he was blessed with such a handsome personality but on death bed – Dhara felt suffocated – she came out of the ward – roaming in gallery, wiping the tears. Everywhere nurses were on move. Patients were also being moved from operation theatres to I.C.U. or their respective wards on stretchers. All of a sudden the entire universe moved around her eyes – as if thousands of stars twinkled before her eyes – stretcher raced before her eyes with the patient who resembled Simant. She ran after the stretcher – but the stretcher went inside the operation theatre and the doors got closed. 3 Dhara almost fainted – but she managed to go back to Gary’s ward – she caught hold of Kadamba and dragged him out and pointing her fingers towards operation theatre she tried to speak --- O, O, O… Kadamba – What is the matter Ma? Everybody present near the ward was worried to see fatigued Dhara. But Dhara was in a different world – the beautiful world of Simant. She had visited England only to meet Simant and today after seeing a glimpse of diseased Simant she almost became mad. She started dragging Kadamba towards operation theatre but was not able to utter any word except – O, O, O… and once she reached near operation theatre, she fainted. Sisters, Ward boys all of them narrated the sequence of event which just took place – she saw a patient on the stretcher, ran after him till operation theatre, then went back to ward and before she fainted dragged Kadamba to the operation theatre. Kadamba thought – is that patient my father… certainly … certainly. Kadamba took limping Dhara to visitor’s room and helped her to relax on a sofa. Kadamba then went into a deep thought. Dhara was babbling – remove your doubts – he is your father. Kadamba – But everyone said he is an old man. Dhara – No Kadamba, my eyes will never fail to recognize your father – Kadamba .. beta you please go and enquire about him. Kadamba then collected all the facts about him – the old man was in this hospital since last one month. One English lady had admitted him here and she never came back to see him. His lungs – liver were damaged due to over intake of liquor – he was in coma for the last 15 days. Doctors were not operating him as nobody was there to sign the ‘risk’ document. Moreover, even for doctors his death was imminent and inevitable. 4 Kadamba immediately contacted Manjul, Vikalp and Reshmi, Andrew on phone. He himself continuously kept on praying to god for the well being of his father – yes he needed his father for his Ma, for himself, for Manjul … Manjul, Vikalp, Andrew and Reshmi - they immediately reached the hospital. Tears started flowing from their eyes to see Dhara’s condition – as if it was not Simant but Dhara who was in coma. After 7 hours the doors of operation theatre opened – unconscious Simant was lying on the stretcher – white beard, white hair – really in a disheveled condition. Manjul caressed her mother. Her tears started falling down on Dhara’s hair. Kadamba tried to look for the beautiful face of his father – staring deeply and constantly at the face of the old man. Ward boy took Simants’s stretcher to I.C.U. Visitor room was well equipped with call bells – a source to know the latest condition of the patient. Kadamba pressed the call bell – a house surgeon came in – Kadamba enquired about the condition of his father. Doctor – His condition was very critical. But why you are asking? Kadamba – I am his unfortunate son. Doctor – Where were you for the last one month? 5 Kadamba – Doctor, this is a long story – but the lady sitting here is my mother and the wife of the patient – last year she had come here from India in search of my father … Doctor – One lady had left him in this hospital in a very critical condition. After that nobody was there to look after him – today due to emergency situation we had to perform the operation. Due to God’s grace operation was successful – God is great. Kadamba – Doctor, can you give me details of that lady? Doctor smiled and replied – My brother – here you can not rely on three – work, women and weather. That is why we pay utmost respect to the Indian lady. However, we treated this patient with great care – after three or four days he regained consciousness and uttered some name – some Indian name but I am not able to recollect …….. One nurse who was carefully listening to the Doctor intervened and said – I remember the name. Kadamba asked impatiently – Please tell the name. Sister or nurse – It was Dhara, yes … yes, Dhara. Hearing this, Dhara got a new strength, vigor, zeal and a new meaning to her life. God has brought Dhara and Simant together. Her quest for Simant ended but her journey for a sweet and memorable life began. THE END This translation is dedicated to VIDEHA MITHILA RATNA late LALAN KUMAR VERMA who had celebrated his last birthday on 17th October, 2001, the auspicious day of Kalash sthapan and the very next day, 18th October, 2001 his immortal soul got reunited with PARAM BRAHMA. 6 After his Matriculation from Saharsa, Lalan Kumar Verma did his B.Sc. [Hons.] in Physics in 1962 from famous Science College, Patna University. He did his LL.B from Patna Law College in 1964. He was known as Prince of Dumra among his friends and colleagues as he came from a famous zamindar family. In the meantime, he won the All India Murphy Competition for the best play back singer. He was also selected to the post of Executive by the Indian Tobacco company. Due to illness, he was not able to go to USA for further study in the field of nuclear science. He wanted to practice in Patna High Court. But due to the compulsions of zamindar family, he had to start practice in Saharsa District Court in 1965 In 1970, he was appointed as Additional Public Prosecutor of Saharsa district. At a very young age, in1979 he was appointed as the Public Prosecutor of Saharsa district which at that time also included Madhepura and Supaul. As Public Prosecutor, his work was of high standard and his honesty was vouched for. He also worked as Special Advocate for Bihar State Electricity Board, Food Corporation of India, Bihar State Cooperative Land Development Bank, Bihar State Water Development Corporation, Bihar State Warehousing Corporation, Saharsa Municipality, Bihar State Road Transport Corporation. For a brief period he also taught at RMM Law College, Saharsa. In 1990, he shifted his practice to Patna High Court, thereby realizing the dream which he had long cherished for. He was an expert in civil, criminal, consumer and environmental matters. As a humble son of Mithila, he always espoused the cause of Maithili and Mithila. [ Note – We are thankful to Gajendra ji for the space he readily provided in his esteemed e Magazine Videha for this translated version of Naagphhans. We hope the readers must have found this translated version interesting irrespective of the limitations and the shortcoming on the part of the translators. Wish you all a very happy Vijayadashmi and a glittering Diwali.and Chhatha puja. Videha’s Laghu Katha Anka has taken it to new heights of glory and success. May Goddess Durga bestow her blessings on Videha family which is now truly a global family.] 1.Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary 1. Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine.
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London."ARCHIS"- COLLECTION OF MAITHILI HAIKUS AND POEMS. Prayer To The Goddess Of Power **1** I wandered enough to all Gods In my many incarnations Being disappointed I came at last To your protection The God Vishnu resting in your arms Brahma crying for your grace And without your power Shiv considers him lifeless What to say about other Gods All are bothering depletion I wandered enough to all Gods In my many incarnations Being disappointed I came at last To your protection **2** In devastation you make asleep Gods along with the other lives Oh Tamasa Devi! From you only Gods and devils get energize Rich in illusions and affections The place is filled with fascination I wandered enough to all Gods In my many incarnations Being disappointed I came at last To your protection Vacillation The flow of the world is torrent How will I cross on foot, dear friend? Loaded with all responsibilities How will I hold the oar, dear friend? I am a queen of beauty But a beggar on the path Adorned with reduction How will I confess this, dear friend? When I will be pushed to The boat of a good spirit My obligations are adamant How will I deny, dear friend? The youth starts judging The fights of the life The issue is so tender How will I wrangle, dear friend? Where I fell further down Is really too low It is deep dark here How will I stand, dear friend? 2. Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in The various paths Tied with the memories From behind the stars In front of a dark whole The path is expected to be estranged I will look forward at the various paths It had been a long journey now If I could solve the Mystery of the world I would find the false words To define the making of a history I will look forward at the various paths It had been a long journey now Something may come out of Churning the milk of this world In the churning of the milk of the sea Many things had come out I will look forward at the various paths It had been a long journey now The Colourful Kite These flying kites Like my ambitions Like the books and pens of the competitors Scattered into smithereens The severed kites falling down Shows the ground of reality Ends up there, from where, it has started But the experience of flying Feeling the heaven when rising And while falling...................... I Forgot Again A Short Story Of Karna’s Death Very carefully I kept in mind while going So that I won’t forget it today But again conversation started My artificiality started failing When it was needed I missed to recall as usual The short story of Karna’s death And after that, being disheartened, I remain silent. Fearful Souvenir (Part-1) In the noise of busy city life and society Many memories are lost And with that, came the fear Frightened Obeying the civilisation Lack of time or an excuse of being busy Fear of past or surrendering in front of problems And keeping away From the memories and fear Away from the socialization Centred to family But again, I got time after an era Grown up now, not a child anymore Again held the pen made up of stick To write something But the ink pot is dried out of ink Era passed memories lost Left alone As giant as a comet Web of incidents Breath was tightened Woke up quickly I laughed Hadn’t fallen with imbalance As per my dream I am grown up now There was no control in dreams in childhood I was falling and rising Was getting up Wet with sweats Drenched Couldn’t find the end of the frightening memories The noisy Universe Tied with gravity Rotating The sun situated at billions of miles away And many stars beyond the sun Who is the all-in-all of these? And if there is some creator Then who has created that creator Oh! Couldn’t find the origin? I have decided that I wouldn’t think more By studying Philosophy Broke the pen and inkpot Who is this comet? Rotating in a circular perimeter Is he a cursed demon or a holy saint? Seeking solution of problems But problem lies in itself Who has created whom? And where is the end of that chain Who is whose master? And who is supreme of all masters And who is the master of that supreme I found control over the dream but lost the power of words I have to find the solution Lost in dreams again I won’t fall this time; I have to find the end My self-confidence Is weakened In front of such confusing queries Some fear or some unwanted harm Raises my heart beats supposedly Or it is revival of my childishness Does the mystery of life and rebirth lie in existence of a soul Or a long process of development And science had Created the universe The concept of poison and flower nectar The taste of bitterness, dryness, alkaline, acidic, sour or sweet The voice rising in a lonely forest Shadaj, Rishabh, Gandhar, Madhyam, Pancham, Dhaiwat, Nishad ! Atri, Angira and Marichi started steps to discover With Pulrhitu, Pulastya and Vashishtha To find the ashtasiddhi(the divine 8 accomplishments) of anmik The expansion of the Glorious Dignity was desired to be known Eshitva or Vashitva The eight divine accomplishments of the Saptarshi (seven stars) (continued................................) . १.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions २.मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download, ३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads, ४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos ५.मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र Mithila Painting/ Modern Art and Photos "विदेह"क एहि सभ सहयोगी लिंकपर सेहो एक बेर जाऊ। ६.विदेह मैथिली क्विज : http://videhaquiz.blogspot.com/ ७.विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ ८.विदेह मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित : http://madhubani-art.blogspot.com/ ९.विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" : http://gajendrathakur.blogspot.com/ १०.विदेह इंडेक्स : http://videha123.blogspot.com/ ११.विदेह फाइल : http://videha123.wordpress.com/ १२. विदेह: सदेह : पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ १३. विदेह:ब्रेल: मैथिली ब्रेलमे: पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ १४.VIDEHA"IST MAITHILI FORTNIGHTLY EJOURNAL ARCHIVE http://videha-archive.blogspot.com/ १५. 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Details for purchase available at print-version publishers's site website: http://www.shruti-publication.com/ or you may write to e-mail:shruti.publication@shruti-publication.com विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित। विदेह:सदेह:१: २: ३: ४ सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com २. संदेश- [ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ] १.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत। २.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी। ३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत। ४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन। ५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी। ६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि। ७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू। ८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना। ९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना। १०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब। ११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ। १२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि। १३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत। १४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी। १५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी। १६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग। १७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल। १८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई। १९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत। २०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ। २१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ। २२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य। २३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। २४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि। २५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर) २६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक। २७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत। २८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी। २९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना। ३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी। ३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि। ३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई। ३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई। ३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई। ३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक। ३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ। ३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम। ३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना। ३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ। ४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल। ४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई। ४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य। ४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना। ४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि। ४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक। ४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत। ४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि। ४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत। ४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना। ५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना। ५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना। ५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल। ५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना। ५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। ५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना। ५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल। ५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई। ५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि। ५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी। ६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि। ६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब। ६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी। ६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही। ६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय। ६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना। ६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय। ६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह। ६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना । ६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ। ७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक) ७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि। ७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि। ७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि। ७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना। ७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि। ७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि। ७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि। ७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल। विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन (c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। सह-सम्पादक: उमेश मंडल। सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण)। भाषा-सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा। कला-सम्पादन: ज्योति सुनीत चौधरी आ रश्मि रेखा सिन्हा। सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार वर्मा। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। (c) 2004-10 सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। रचनाक अनुवाद आ पुनः प्रकाशन किंवा आर्काइवक उपयोगक अधिकार किनबाक हेतु ggajendra@videha.co.in पर संपर्क करू। एहि साइटकेँ प्रीति झा ठाकुर, मधूलिका चौधरी आ रश्मि प्रिया द्वारा डिजाइन कएल गेल। सिद्धिरस्तु विदे ह विदेह Videha বিদেহ विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका 'विदेह' ६८ म अंक १५ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६८)http://www.videha.co.in/ मानुषीमिह संस्कृताम् ISSN 2229-547X VIDEHA
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